पाणिनि-रहस्य · Decoding Pāṇini

पाणिनि-रहस्य

ॐ
Decoding Pāṇini
अष्टाध्यायी — ३,९८३ सूत्र · १४ माहेश्वर-सूत्र · ४२ प्रत्याहार —
विश्व की प्रथम औपचारिक भाषा का सम्पूर्ण डिकोड, और साथ में
कटपयादि · आर्यभट-सङ्केत · भूतसंख्या — हर encode/decode, चरण-दर-चरण
Author & Decoder
Pardeep Sehrawat
«The Architect»
Instagram · theunholyindianmagician
KAAL Publications · MMXXVI

प्राक्कथन · Preface

सूर्यसिद्धान्त-रहस्य में हमने आकाश का गणित चलाया था; इस पुस्तक में हम भाषा का यन्त्र चलाते हैं। अष्टाध्यायी कोई सूची नहीं — वह एक चालू मशीन है: चौदह माहेश्वर-सूत्रों की पट्टी से प्रत्याहार-सङ्केत बनते हैं, विभक्तियाँ rewrite-नियमों की वाक्य-रचना बन जाती हैं, अनुवृत्ति सूत्रों को compressed diffs में बदल देती है, और त्रिपादी एक staged pipeline है जिसका फल पीछे के नियमों के लिए असिद्ध रहता है। हमने यह सब केवल कहा नहीं — जहाँ-जहाँ गणना संभव थी, वहाँ इंजन चलाकर exact जाँच की: प्रत्याहार-विस्तार शिवसूत्रों से computed हैं; कटपयादि-यन्त्र ने π-श्लोक से बत्तीस अंक अक्षरशः निकाले (जिनमें इकतीस π से मेल खाते हैं); आर्यभट-सङ्केत ने ख्युघृ = ४३,२०,००० सिद्ध किया — वही महायुग-संख्या जो पिछली पुस्तक की धुरी थी। भाषा और संख्या एक ही मेरुदण्ड के दो नाम हैं।

In the Sūrya-Siddhānta book we ran the mathematics of the sky; here we run the machine of language. The Aṣṭādhyāyī is not a list of rules but a working system — an addressing scheme for sounds, a case-inflection syntax for rewrite rules, an inheritance mechanism, a staged pipeline. Wherever computation was possible we computed and exact-checked: the pratyāhāras are derived from the fetched Śivasūtras by engine; the kaṭapayādi codec reads thirty-two digits out of a single verse, thirty-one of them agreeing with π; Āryabhaṭa's letter-numerals verify the very Mahāyuga count that anchored the last book. Language and number turn out to share one spine.

सांकेतिक परिपाटी · Declared Conventions

मूल पाठसंस्कृत विकिस्रोत — अष्टाध्यायी (fetched 2026-08-10): 3,983 सूत्र, 32 पाद, प्रत्येक पाद अन्तराल-रहित सत्यापित। संस्करण-भेद से गणनाएँ ३,९५९–३,९९६ तक मिलती हैं; यह पुस्तक इसी संस्करण पर पिन है।
व्याख्या-रेखाकाशिका-परम्परा की मानक व्याख्या; जहाँ पाठ-भेद या व्याख्या-भेद है, वहाँ अंकित। गहन-स्तर: माहेश्वर-सूत्र + अध्याय १ पाद १ सम्पूर्ण; कोश-स्तर: सभी ३,९८३ सूत्रों की एक-पंक्ति व्याख्या।
गणना-इंजनप्रत्याहार-विस्तार, कटपयादि, आर्यभट-सङ्केत, भूतसंख्या — सभी सारणियाँ इंजन-computed; प्रत्येक इंजन exact-equality (==) जाँच पर बन्द है (इक्, अच्, हल् pins; π-श्लोक के ३२ अंक, प्रथम ३१ π से मेल; ख्युघृ = ४३,२०,०००)।
इतिहास-अनुशासनतिथियाँ शोध-सहमति की सीमाओं में (पाणिनि ~५वीं–४थी श. ई.पू.); परम्परा-प्रचलित आरोपण "परम्परा" कहकर, प्रमाणित तथ्य से अलग।
दृष्टिन भय, न अतिरंजना — ~४,००० नियमों में एक सम्पूर्ण generative व्याकरण, औपचारिक भाषा-सिद्धान्त से ~२,४०० वर्ष पूर्व: यह उपलब्धि अलंकरण नहीं माँगती।
भाग १

इतिहास

History: Śalātura to the Compilers
500 BCE0500 CE1000 CE1500 CE2000 CEपाणिनिअष्टाध्यायी (~५वीं–४थी श. ई.पू.)कात्यायनवार्त्तिकपतञ्जलिमहाभाष्यआर्यभटअक्षर-सङ्केतकशिकाजयादित्य-वामनहरिदत्तकटपयादि-परहितभट्टोजिसिद्धान्त-कौमुदीबोएट्लिङ्कपश्चिमी संस्करणPāṇini-BackusIngerman का प्रस्तावएक ही यन्त्र — २,४०० वर्ष की जीवित परम्परा
परम्परा-रेखा — from Śalātura to the compilers: 2,400 years of one grammar. Positions are computed on a linear axis; dates carry the dossier's ranges, not false precision.

पाणिनि — देश, काल, परम्परा · The Man from Śalātura

देश — गान्धार का शलातुर
पाणिनि का नाम इतिहास में एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थान, एक परम्परा और एक भाषा-दृष्टि के संगम के रूप में आता है। परम्परा उन्हें शलातुर (Śalātura) का निवासी बताती है — गान्धार प्रदेश में, जिसे आज के पाकिस्तान में अट्टक (Attock) के निकट लाहुर / छोटा लाहोर क्षेत्र से जोड़ा जाता है। इसी कारण वे शालातुरीय कहलाए। प्राचीन गान्धार का यह संदर्भ मात्र भौगोलिक नहीं: वह उत्तर-पश्चिम भारत का वह सांस्कृतिक क्षेत्र था जहाँ वैदिक शिक्षा, व्याकरण और व्यावहारिक भाषा एक ही वायुमंडल में साँस लेते थे। परम्परा उन्हें दाक्षीपुत्र (Dākṣīputra) भी कहती है — दाक्षी का पुत्र; यह नाम उनके व्यक्तिगत परिचय को माँ-कुल से जोड़ता है, न कि किसी राजकीय वंश से।

काल — सीमाएँ, न कि एक वर्ष
उनके जीवन का कोई निश्चित वर्ष सुरक्षित नहीं। mainstream scholarship उन्हें लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व (c. 5th–4th century BCE) में रखती है; कुछ विद्वान ६ठी शती ईसा-पूर्व की संभावना भी उठाते हैं। कोई भी “exact year” यहाँ टिक नहीं सकता। व्यावहारिक कथन यही है: उत्तर-वैदिक काल के अन्त में, लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व — scholarly-consensus range, परम्परा और अनुसंधान जहाँ भिन्न हों, वहाँ भिन्नता ही कही जाए।

पक्षसंकेत (dossier-bound)
जन्म-स्थानशलातुर, गान्धार → शालातुरीय
मातृ-संज्ञादाक्षीपुत्र
काल-सीमाc. 5th–4th c. BCE (कुछ: ६ठी शती BCE)
निश्चित वर्षअसमर्थनीय — range ही कथ्य

पूर्ववर्ती — अष्टाध्यायी शिखर है, आरम्भ नहीं
अष्टाध्यायी किसी शून्य से नहीं उठी। पाणिनि लगभग दस पूर्ववर्ती वैयाकरणों का नाम लेते हैं — यह सूची परम्परा की गहराई का प्रमाण है:

अष्टाध्यायी इस पुरानी धारा का summit है, beginning नहीं। उसी पूर्व/लगभग-पाणिनीय संसार में यास्क (Yāska) का निरुक्त आता है — व्युत्पत्ति (etymology) का शास्त्र, व्याकरण का पड़ोसी: शब्द का अर्थ-पथ जहाँ व्याकरण रूप-पथ खोलता है।

विषय — छन्दस् और भाषा
पाणिनि का भाषा-वस्तु दो ध्रुवों पर टिका है:

वे वैदिक विकल्पों को स्पष्ट रूप से चिह्नित करते हैं: वैदिक नियम “विकल्प” या “वैदिक-विशेष” के रूप में अंकित रहते हैं, ताकि bhāṣā का साधारण नियम छन्दस् के विशेष रूप से उलझ न जाए। यह dual object — sacred register और living educated speech — अष्टाध्यायी को मात्र “वेद-व्याकरण” या मात्र “लोक-भाषा” से बड़ा बनाता है: एक generative description of the whole language-world they knew.

पाठ — हमारा pinned edition
अष्टाध्यायी: ८ अध्याय × ४ पाद = ३२ पाद। इस संस्करण (Sanskrit Wikisource, fetched 2026-08-10) में ३,९८३ सूत्र हैं; संस्करणों में भिन्नता लगभग ३,९५९–३,९९६ तक जाती है। शीर्ष पर शिवसूत्र / माहेश्वर-सूत्राणि — १४ सूत्र — pratyāhāra alphabet-compression उत्पन्न करते हैं; हमारे computed engine से इनमें से ४२ canonical pratyāhāras निकलते हैं (उदाहरण: अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ; हल् = ३३ व्यंजन — span में ३४ slots क्योंकि ह दो बार आता है, distinct set = ३३)। सहायक: धातुपाठ (~२,००० धातु), गणपाठ; उणादि-सूत्र और लिङ्गानुशासन परम्परा से जुड़े।

टीका-रीढ़ — संक्षेप में
काल और परम्परा की अगली कड़ी (dossier ranges):

आचार्य / कृतिकाल-सीमा (consensus)भूमिका
कात्यायन — वार्त्तिकc. 3rd c. BCEसंशोधन / परिष्कार
पतञ्जलि — महाभाष्यc. 2nd c. BCE~१,७०० सूत्र + वार्त्तिक; classical reference
काशिकावृत्ति (जयादित्य + वामन)7th c. CEसभी सूत्रों पर running gloss
भट्टोजी दीक्षित — सिद्धान्तकौमुदीc. early 17th c.topical reorder
नागेश भट्ट — परिभाषेन्दुशेखरc. 18th c.metarules का systematization

Böhtlingk’s edition (1839–40; revised 1887); Bloomfield ने अष्टाध्यायी को “one of the greatest monuments of human intelligence” कहा। १९६७ में P. Z. Ingerman ने Backus-Naur Form को “Pāṇini-Backus Form” नाम देने का प्रस्ताव रखा — सूत्र-प्रणाली formal-grammar notation से ~२,४०० वर्ष पहले की anticipates करती है। यह inflation नहीं: ~४,००० नियमों में complete generative grammar — वास्तविक उपलब्धि, बिना “प्राचीन कम्प्यूटर” के नारे के।

निष्कर्ष-बिन्दु, न कि समापन-भाषण
शलातुर का व्यक्ति, दाक्षी का पुत्र, ~१० नामित पूर्ववर्ती, यास्क का निरुक्त-संसार, छन्दस् और भाषा का dual object, और ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व की hedged सीमा — यही पाणिनि का देश-काल-परम्परा-चित्र है। अष्टाध्यायी शिखर है क्योंकि नीचे पहाड़ पहले से खड़ा था; और वह शिखर आज भी executable spec की तरह पढ़ा जा सकता है — computed fact, textual fact, scholarly range और tradition को अलग-अलग रखकर।

मुनित्रय से कौमुदी तक · The Commentarial Spine

चार हज़ार नियमों की मशीन जीवित कैसे रही। पाणिनि की अष्टाध्यायी — इस संस्करण में ३,९८३ सूत्र (संस्कृत विकिस्रोत, २०२६-०८-१०; संस्करणों में लगभग ३,९५९–३,९९६) — उत्तर-वैदिक काल के अन्त में, लगभग पाँचवीं–चौथी शती ईसा-पूर्व रची गई। कोई निश्चित वर्ष सुरक्षित नहीं। लगभग ढाई सहस्राब्दी बाद भी वह “executable specification” की तरह पढ़ी जाती है: सञ्ज्ञा, परिभाषा, विधि, अधिकार, अतिदेश, नियम — परिभाषित टोकन, मेटा-नियम, संक्रिया, स्कोप-हेडिंग, विस्तार, प्रतिबन्ध। मशीन ठहरी नहीं; टीका-परम्परा ने उसे हर युग में फिर से चालू रखा।

मुनित्रय — तीन स्तम्भ। परम्परा का क्लासिकल त्रिकोण यह है:

मुनिकाल (विद्वत्-सहमति)योगदान
कात्यायनलगभग ३री शती ई.पू.वार्त्तिक — सूत्रों पर संशोधन / परिष्कार
पतञ्जलिलगभग २री शती ई.पू.महाभाष्य — ~१,७०० सूत्र + वार्त्तिक
(पाणिनि स्वयं)~५वीं–४थी शती ई.पू.अष्टाध्यायी — आधार-मशीन

कात्यायन के वार्त्तिक सूत्र-मशीन को जमे हुए स्मारक की तरह नहीं छोड़ते। जहाँ नियम अधूरा लगता है, जहाँ दो सूत्र टकराते हैं, जहाँ प्रयोग क्षेत्र बदल चुका है — वहाँ वार्त्तिक संशोधन, प्रतिबन्ध या विस्तार प्रस्तावित करता है। यह “amendment layer” है: core sūtra intact, edge-cases refined। पतञ्जलि का महाभाष्य उसी परत को शास्त्र का केन्द्रीय संदर्भ बना देता है। वह लगभग सत्रह सौ सूत्रों पर — वार्त्तिकों सहित — विस्तृत विमर्श करता है: अर्थ क्या है, विकल्प कब, विरोध कैसे सुलझे। परम्परा की दृष्टि में महाभाष्य classical reference point है; बाद की लगभग हर गंभीर चर्चा उसी चौखटे में लौटती है।

मशीन क्यों टिकाऊ रही — संरचना का उत्तर। टीकाएँ केवल व्याख्या नहीं; वे runtime discipline को सुरक्षित रखती हैं। कुछ स्तम्भ:

टीकाकार इन्हीं levers को दोहराते, विवाद करते, स्थिर करते रहे — इसलिए ~४,०००-नियम की मशीन “dead text” नहीं बनी।

काशिका से कौमुदी — पूरा पाठ, नया क्रम। मुनित्रय के बाद सबसे प्रभावशाली running gloss काशिकावृत्ति है — जयादित्य और वामन, सातवीं शती ई.। यह सभी सूत्रों पर क्रम-बद्ध टीका देती है: अष्टाध्यायी को end-to-end पढ़ने का मानक मार्ग। शताब्दियों बाद भट्टोजी दीक्षित (लगभग आरम्भिक १७वीं शती) सिद्धान्त-कौमुदी में व्याकरण को विषयानुसार (topical) पुनर्व्यवस्थित करते हैं। पाणिनि का मूल क्रम computational dependency और anuvṛtti का है; कौमुदी का क्रम अध्यापन और प्रयोग का — संधि, सुबन्त, तिङन्त…। मशीन वही; interface नया। नागेश भट्ट (लगभग १८वीं शती) परिभाषेन्दुशेखर में मेटा-नियमों को व्यवस्थित करते हैं: paribhāṣā layer — “rules about rules” — conflict, scope, inheritance। यह compiler-theory का प्राचीन समकक्ष नहीं “mysticism”; यह operational discipline का late classical codification है।

spine का रेखाचित्र — काल के साथ।

चरणरचना / परतकार्य
आधारअष्टाध्यायी (~५–४ श. ई.पू.)~४,००० generative rules
संशोधनकात्यायन-वार्त्तिक (~३ श. ई.पू.)refinements
विमर्श-केंद्रपतञ्जलि-महाभाष्य (~२ श. ई.पू.)~१,७०० सूत्रों पर Great Commentary
पूर्ण glossकाशिकावृत्ति (७ श. ई.)running gloss on all sūtras
topical reorderसिद्धान्त-कौमुदी (~आरम्भ १७ श.)pedagogy by topic
metarule systemपरिभाषेन्दुशेखर (~१८ श.)paribhāṣā systematized

पश्चिमी संस्करण और formal भाषा-विज्ञान। बोटलिंग्क का संस्करण १८३९–४० (संशोधित १८८७) यूरोपीय पाठ-संस्थापन का एक मुख्य स्तम्भ बना। ब्लूमफ़ील्ड ने अष्टाध्यायी को “one of the greatest monuments of human intelligence” कहा — प्रशंसा, न कि काल-निर्धारण। १९६७ में पी. ज़ेड. इंगरमैन ने प्रस्तावित किया कि Backus–Naur Form को “Pāṇini–Backus Form” कहा जाए: सूत्र-प्रणाली programming languages की formal-grammar notation से लगभग २,४०० वर्ष पहले context-sensitive rewriting का व्याकरणिक रूप पहले से रखती है। आधुनिक computational Sanskrit (Sanskrit Heritage platform परम्परा आदि) अष्टाध्यायी को executable spec की तरह लेती है — यही दृष्टि इस पुस्तक के डिकोड-सेतु (pratyāhāra expander, exact-equality oracle discipline) से जुड़ती है।

जीवित रहने का वास्तविक कारण। न “पवित्रता” का नारा, न अतिरंजित प्राचीनता। कारण संरचनात्मक है: (१) नियम-प्रकार स्पष्ट; (२) markers metadata हैं; (३) anuvṛtti से compression और dependency; (४) case-syntax से rewrite-semantics; (५) १.४.२ और अपवाद–उत्सर्ग से conflict policy; (६) त्रिपादी से staged pipeline; (७) मुनित्रय → काशिका → कौमुदी → नागेश — हर परत ने machine को re-host किया बिना core को मिटाए। यूनानी, अरबी, यूरोपीय व्याकरण-शास्त्रों की अपनी महत्ता है; यहाँ दावा सीमित और सटीक है — एक पूर्ण generative grammar लगभग चार हज़ार नियमों में, formal language theory से लगभग ढाई सहस्राब्दी पहले, और एक commentarial spine जिसने उसे निरंतर operable रखा।

पाठक के लिए एक पंक्ति। वार्त्तिक = patch notes; महाभाष्य = design review of the classical age; काशिका = full source commentary; कौमुदी = reordered API for learners; नागेश = metarule handbook। पाणिनि की मशीन इसलिए जीवित है क्योंकि परम्परा ने उसे पूजा-मात्र नहीं, संचालित किया — हर शती में, नए interface के साथ, उसी ~४,०००-सूत्र core पर।

विश्व-प्रतिध्वनि · The World Hears Pāṇini

जब कोई पाठ यूरोप की मुद्रित भाषाओं में पहुँचता है, तो वह केवल अनुवाद नहीं होता — वह एक नयी सुनवाई का द्वार खोलता है। पाणिनि की अष्टाध्यायी — आठ अध्याय, प्रत्येक में चार पाद, कुल बत्तीस पाद; इस संस्करण में (Sanskrit Wikisource, fetched 2026-08-10) ३,९८३ सूत्र — उस सुनवाई में धीरे-धीरे केन्द्र में आई। संस्करणों में सूत्र-संख्या ≈३,९५९–३,९९६ के बीच बदलती है; यह भिन्नता संपादन-परंपरा का हिस्सा है, न कि “एक सत्य, एक संख्या” का दावा। पाणिनि स्वयं शलातुर (गान्धार; आज के पाकिस्तान में अट्टक के पास लाहुर/छोटा लाहोर क्षेत्र से जुड़ा) के, शालातुरीय; परंपरा उन्हें दाक्षीपुत्र भी कहती है। mainstream scholarship उन्हें लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व रखती है (कुछ ६ठी शती भी तर्क करते हैं) — कोई सटीक वर्ष defensibly नहीं कहा जा सकता: उत्तर-वैदिक काल के अन्त में, लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व।

बोह्तलिंग्क और मुद्रित पाणिनि। पश्चिमी संस्करण-परंपरा में Otto von Böhtlingk की अष्टाध्यायी-संस्कृति एक ऐतिहासिक मोड़ है: १८३९–४० का संस्करण, फिर १८८७ का संशोधित रूप। इससे पहले भी भारतीय टीका-परंपरा — कात्यायन (लगभग ३री शती ईसा-पूर्व) के वार्त्तिक, पतंजलि (लगभग २री शती ईसा-पूर्व) का महाभाष्य (~१,७०० सूत्रों पर वार्त्तिकों सहित), काशिकावृत्ति (जयादित्य + वामन, ७वीं शती ई.), सिद्धान्तकौमुदी (भट्टोजी दीक्षित, लगभग प्रारंभिक १७वीं शती), परिभाषेन्दुशेखर (नागेश भट्ट, लगभग १८वीं शती) — सूत्र को “जीवित तंत्र” बनाये रखती थी। बोह्तलिंग्क ने उस तंत्र को यूरोपीय भाषाविज्ञान की मेज़ पर रखा: मुद्रित पाठ, क्रॉस-रेफरेंस की संस्कृति, तुलनात्मक व्याकरण की नई आँख। यहाँ “खोज” का स्वर नहीं चाहिए — अष्टाध्यायी पहले से मुनित्रय और उत्तरवर्ती व्याख्या की रीढ़ पर खड़ी थी; पश्चिम ने उसे hear किया, invent नहीं।

ब्लूमफ़ील्ड की प्रशस्ति। अमेरिकी भाषाविद् Leonard Bloomfield ने अष्टाध्यायी को — dossier के अनुसार — “one of the greatest monuments of human intelligence” कहा। यह प्रशस्ति भावुकता से अधिक वर्णनात्मक है: लगभग चार हज़ार नियमों में एक पूर्ण generative grammar; chandas (वैदिक) और bhāṣā (जीवित शिक्षित वाणी) दोनों; वैदिक विकल्प स्पष्ट चिह्नित; और लगभग दस पूर्ववर्ती वैयाकरणों के नाम (शाकटायन, शाकल्य, आपिशलि, गार्ग्य, काश्यप, भारद्वाज, चाक्रवर्मण, सेनक, स्फोटायन, गालव) — अर्थात् अष्टाध्यायी किसी “आरंभ” का मिथक नहीं, पुरानी परंपरा का शिखर है। यास्क का निरुक्त उसी pre/near-Pāṇinian संसार का हिस्सा है। Bloomfield की पंक्ति उसी उपलब्धि को पश्चिमी भाषाविज्ञान की शब्दावली में दोहराती है — बिना “पाँच-हज़ार-वर्षीय कंप्यूटर” जैसी मुद्रा के।

संरचनावाद की गूँज — formal structure, not fashion. बीसवीं शताब्दी का structural linguistics रूप, संबंध, और अंतर की व्यवस्था पर बल देता है। पाणिनि का यंत्र उसी दिशा में, पर अपनी धातु से चलता है — dossier में वर्णित मशीन:

स्तरपाणिनीय संकेतकार्य
परिभाषा / मेटारूलसंज्ञा, परिभाषानाम और शासन
क्रियाविधि, अतिदेश, नियमपरिवर्तन, विस्तार, सीमा
दायराअधिकारscope-heading
मार्करइत् (१.३.२–१.३.९; तस्य लोपः १.३.९)token-flags जैसी metadata
संपीड़नअनुवृत्तिellipsis-inheritance — सूत्र “diffs against context”
पुनर्लेखन१.१.६६ / १.१.६७ / १.१.४९locative = right context; ablative = left; genitive = target
संघर्ष१.४.२ विप्रतिषेधे परं कार्यम्later wins on equal conflict; अपवाद > उत्सर्ग; nitya > anitya, antaraṅga > bahiraṅga (paribhāṣā)
pipeline८.२.१ पूर्वत्रासिद्धम्सपादसप्ताध्यायी (१.१–८.१) vs त्रिपादी (८.२–८.४)

सूत्र इको यणचि (६.१.७७) उसी decode में “इक् → यण् / _ अच्” बनता है — A→B/C_D rewriting, तीरों के स्थान पर विभक्ति। स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०), स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (१.१.५६) substitution की अनुशासन-रेखाएँ हैं। शिबसूत्र / माheśvara-sūtrāṇi (१४ सूत्र) pratyāhāra-संपीड़न देते हैं; इस पुस्तक के इंजन से ४२ canonical pratyāhāras (जैसे अच्, हल् — हल् span में ३४ slots, distinct set = ३३)। संरचनावाद ने “form over substance” सीखा; पाणिनि ने form को executable order में बाँधा।

Pāṇini-Backus Form — Ingerman, १९६७। प्रोग्रामिंग भाषाओं की formal grammar-notation — Backus-Naur Form — के युग में P. Z. Ingerman ने १९६७ में प्रस्ताव किया कि BNF को “Pāṇini-Backus Form” कहा जाए। dossier का hedge साफ़ है: सूत्र-प्रणाली programming languages की formal-grammar notation को लगभग २,४०० वर्ष पूर्व anticipate करती है — यह समानता notation और generative discipline की है, न कि “प्राचीन C compiler” की। ~२,४०० वर्ष की दूरी पाणिनि की scholarly range (५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व) और twentieth-century formal language theory के बीच की है; इसे inflation नहीं, timeline-comparison समझें।

Executable-grammar युग। आधुनिक computational Sanskrit — उदाहरणतः Sanskrit Heritage platform-परंपरा — अष्टाध्यायी को executable specification की तरह पढ़ता है: नियम क्रम, anubandha-metadata, anuvṛtti-context, tripādī-stage isolation। इस पुस्तक की डिकोड-सेतु दिशा उसी अनुशासन में है: fetched शिबसूत्रों से pratyāhāra expander; SS-book pipeline की exact-equality oracle discipline यहाँ भी लागू। computed fact (इंजन का निर्गम), textual fact (सूत्र क्या कहता है), scholarly consensus (dated range), और tradition (attribution varies) — चारों को मिलाकर “रहस्य” नहीं, पुनरुत्पादनीय पठन बनता है।

विश्व की सुनवाई — संक्षेप में गूँजें:

ध्वनि-पद्धति, धातुपाठ (~२,००० धातु), गणपाठ, उणादि और लिङ्गानुशासन — ये ancillaries तंत्र को पूरा करते हैं। विश्व की प्रतिध्वनि तब सच्ची होती है जब प्रशस्ति के साथ तंत्र भी सुना जाए: लगभग ४,००० नियमों में पूर्ण generative grammar, formal language theory से सदियों पहले — बिना डर, बिना छाती-ठोंक, केवल dossier की सीमाओं में।

भाग २

माहेश्वर-सूत्राणि

The Fourteen Śivasūtras
14 सूत्र · 42 computed प्रत्याहार
अइउण्ऋऌक्एओङ्ऐऔच्हयवरट्लण्ञमङणनम्झभञ्घढधष्जबगडदश्खफछठथचटतव्कपय्शषसर्हल्१४ सूत्र · ४३ स्थान१४ इत्-चिह्न (स्वर्ण)प्रत्याहार = आरम्भ-वर्ण → इत्-चिह्न का चाप
माहेश्वर-चक्र — the 14 Śivasūtras in sequence: 43 phoneme slots, 14 it-markers (gold). Every pratyāhāra is an arc of this wheel: start anywhere, close at any later marker. The alphabet is not a list — it is an addressing scheme.
अइउण्ऋऌक्एओङ्ऐऔच्हयवरट्लण्ञमङणनम्झभञ्घढधष्जबगडदश्खफछठथचटतव्कपय्शषसर्हल्अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ (9)इक् = इ उ ऋ ऌ (4)एङ् = ए ओ (2)यण् = य व र ल (4)अम् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ ह य व र ल … (19)झल् = झ भ घ ढ ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ … (24)हल् = ह य व र ल ञ म ङ ण न झ भ घ ढ … (33)इंजन-गणना: ४२ प्रामाणिक प्रत्याहार — प्रत्येक एक ही पट्टी का चाप
प्रत्याहार-विस्तार — computed spans on the phoneme strip (engine output, not hand-drawn): each bracket runs from its start phoneme to its closing it-marker. इक्, अच्, हल् are the workhorses of the whole grammar.
MS.01
अइउण्
aiuṇ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वर्णक्रम-प्रत्याहार का आधार-खण्ड।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अ · इ · उ — तीन सरल स्वर (मूल-स्वर); ण् — इत्-अनुबन्ध (मूक सीमा-चिह्न; 1.3.3 + 1.3.9 से लोप्य)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (माहेश्वर-शृंखला का आरम्भ)।

हिन्दी व्याख्या यह पहला माहेश्वर-सूत्र वर्णमाला की तकनीकी पंक्ति खोलता है। अ, इ, उ को क्रम से रखकर अन्त में ण् को सीमा-चिह्न (इत्) बनाता है। प्रत्याहार-विधि (आदिरन्त्येन सहेता, 1.1.71) से “अ” से “ण्” तक का संक्षिप्त नाम अण् बनता है — अ + इ + उ। आगे के इत्-चिह्नों (क्, च्, ट्, म्, श्…) से जुड़े प्रत्याहार अक्, अच्, अट्, अम्, अश् भी यहीं से आरम्भ होते हैं। इस प्रकार तीन अक्षर एक पूरी स्वर-परिवार-संज्ञा-व्यवस्था का द्वार खोल देते हैं।

English rendering The first Māheśvara-sūtra lists the simple vowels a, i, u and seals the segment with the silent it-marker ṇ. From this ordered span the grammar compresses whole vowel-classes — most famously ac “all vowels” — into single technical names.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्ण-खण्ड₁ = ⟨अ, इ, उ⟩ ; इत् = ण्
प्रत्याहार(X, Y) = { वर्ण | X ≤ वर्ण < Y (क्रम में, Y = इत्) }
अण् = {अ, इ, उ}
अक् = {अ, इ, उ, ऋ, ऌ}
अच् = {अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ}
अट् = अच् ∪ {ह, य, व, र}
अम् = अट् ∪ {ल, ञ, म, ङ, ण, न}
अश् = अम् ∪ {झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द}

उदाहरण
1. अण् = अ इ उ — संज्ञा-क्षेत्र (cf. 1.1.69 अणुदित्…)।
2. इको यणचि (6.1.77): इक् → यण् / _ अच् — दधि + अत्र → दध्यत्र (इ → य्, क्योंकि आगे अच् = अ)।
3. अकः सवर्णे दीर्घः (6.1.101): अक्-स्वर + सवर्ण → दीर्घ — दैत्य + अरि → दैत्यारि (अ + अ → आ)।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन इसी सूत्र के प्रथम वर्ण से ६ प्रामाणिक प्रत्याहार निकालता है (अण्, अक्, अच्, अट्, अम्, अश्) — सम्पूर्ण ४२ प्रत्याहार-संग्रह का स्वर-पक्ष यहीं से आरम्भ होता है।

MS.02
ऋऌक्
ṛḷk

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — ऋ/ऌ-खण्ड; अक् आदि का पूरक।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऋ · ऌ — दो वैदिक/तकनीकी स्वर (मूर्धन्य/दन्त्य-स्वर); क् — इत्-अनुबन्ध (सीमा-चिह्न)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (क्रम-शृंखला का अगला खण्ड; स्वतन्त्र सूची-प्रविष्टि)।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र ऋ और ऌ को वर्ण-क्रम में जोड़ता है और क् से खण्ड बन्द करता है। स्वयं ऋ या ऌ से आरम्भ होने वाला कोई प्रामाणिक प्रत्याहार नहीं बनता — परन्तु पूर्व-सूत्र के अ से लेकर क् तक का प्रत्याहार अक् = अ इ उ ऋ ऌ पूर्ण होता है। अक् “सरल/मूल स्वर” (गुण-वृद्धि से पहले की पाँच-स्वर-सेट) की कुंजी है। ऌ अत्यल्प-प्रयोग का स्वर है; फिर भी पाणिनि उसे व्यवस्था में स्थान देते हैं ताकि कोई वर्ण बाहर न छूटे।

English rendering This sūtra inserts the vowels ṛ and ḷ and closes with the it-marker k. No canonical pratyāhāra starts here, yet the span from a (MS.01) through this k yields ak — the set of simple vowels used throughout the sandhi and guṇa/vṛddhi calculus.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्ण-खण्ड₂ = ⟨ऋ, ऌ⟩ ; इत् = क्
अक् = {अ, इ, उ, ऋ, ऌ} (आदि = अ ∈ MS.01, अन्त-इत् = क्)
प्रत्याहार-आरम्भ(ऋ) = ∅ (कोई Xऋ… प्रत्याहार नहीं)

उदाहरण
1. अकः सवर्णे दीर्घः (6.1.101): होतृ + ऋकार → होतॄकार (ऋ + ऋ → ॠ, अक्-सवर्ण दीर्घ)।
2. इको यणचि (6.1.77) में इक् = इ उ ऋ ऌ — पितृ + अर्थ → पित्रर्थ (ऋ → र् / _ अ)।
3. गुणः (1.1.2) / वृद्धिरादैच् (1.1.1) की तुलना में अक् = वे स्वर जिन पर गुण/वृद्धि लगती है।

डिकोड-सेतु इंजन पुष्टि करता है — इस सूत्र के प्रथम वर्ण से आरम्भ प्रत्याहार-संख्या = ०; अक् का अन्त-बिन्दु यहीं का क् है।

MS.03
एओङ्
eoṅ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — गुण-स्वर (ए, ओ) का खण्ड।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ए · ओ — गुण-स्वर (गुणसंज्ञा, 1.1.2); ङ् — इत्-अनुबन्ध।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या ए और ओ को क्रम में रखकर ङ् से सीमा बाँधता है। इससे दो प्रत्याहार खुलते हैं: एङ् = ए ओ, और आगे ऐऔच् के च् से एच् = ए ओ ऐ औ। एङ् “गुण” की दो-सदस्यीय संज्ञा है; एच् “सन्ध्यक्षर/संयुक्त-स्वर” का चार-सदस्यीय समुच्चय। वृद्धि (आ ऐ औ) और गुण (अ ए ओ) की जोड़ी में ए/ओ मध्य-सीढ़ी हैं — सन्धि और धातु-रूप दोनों में बार-बार बुलाए जाते हैं।

English rendering Listing e and o under the it-marker ṅ yields eṅ = {e, o} and, with the next sūtra’s c, ec = {e, o, ai, au} — the guṇa pair and the full set of complex vowels.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्ण-खण्ड₃ = ⟨ए, ओ⟩ ; इत् = ङ्
एङ् = {ए, ओ}
एच् = {ए, ओ, ऐ, औ} (अन्त-इत् = च् ∈ MS.04)
गुण-स्वर ⊆ {अ} ∪ एङ् ; (cf. 1.1.2 अदेङ् गुणः)

उदाहरण
1. आद्गुणः (6.1.87): अ/आ + एङ् → गुण-एकस्वर — तव + एव → तवैव? नहीं — classic: कृष्ण + एधते → कृष्णएधते → (अ + ए → ए) कृष्णैधते? Wait - standard: देव + ईश → देवेश (अ + ई → ए via गुण), and for एङ्: महा + ओषधि → महौषधि is वृद्धि. Better classics:
1. आद्गुणः (6.1.87): खट्वा + इन्द्र → खट्वेन्द्र (आ + इ → ए); अ + एङ् also: गण + ओकस् → गणोकस् → गणोकः path… Standard textbook: तव + एध → त्वेध? Let me use well-known:
Actually classic for एङ्: एचोऽयवायावः (6.1.78) uses एच् not एङ्.
For एङ्: अदेङ् गुणः (1.1.2) defines गुण as अत् + एङ्.
1. अदेङ् गुणः (1.1.2): गुणसंज्ञा = अत् ∪ एङ् = {अ, ए, ओ}।
2. आद्गुणः (6.1.87): उप + एति → उपैति? No - आ + ए → ए: खट्वा + एधते → खट्वेधते (आ + ए → ए)।
3. एङः पदान्तादति (6.1.109): एङ् + अ → पूर्वरूप — अग्ने + अत्र → अग्नेऽत्र।

उदाहरण
1. अदेङ् गुणः (1.1.2): गुण = {अ} ∪ एङ् = {अ, ए, ओ}।
2. आद्गुणः (6.1.87): खट्वा + एधते → खट्वेधते (आ + ए → ए)।
3. एङः पदान्तादति (6.1.109): अग्ने + अत्र → अग्नेऽत्र (पदान्त एङ् + अ → पूर्वरूप, अवग्रह)।

MS.04
ऐऔच्
aiauc

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वृद्धि-स्वर (ऐ, औ) का खण्ड।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऐ · औ — वृद्धि-स्वर; च् — इत्-अनुबन्ध (एच्/ऐच्/अच् का अन्तिम सीमा-चिह्न भी)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या ऐ और औ को जोड़कर च् से स्वर-शृंखला का यह चरण बन्द होता है। ऐच् = ऐ औ — शुद्ध वृद्धि-युग्म। साथ ही पूर्व के ए ओ से एच् = ए ओ ऐ औ पूरा होता है, और MS.01 के अ से अच् = सभी स्वर बन्द होता है। वृद्धिरादैच् (1.1.1) ऐच् को “वृद्धि” कहता है; एचोऽयवायावः (6.1.78) एच् को य्/व्/आय्/आव् में बदलता है। एक छोटा सूत्र — तीन बड़ी संज्ञाओं का ताला।

English rendering With ai and au sealed by c, the grammar obtains aic (the vṛddhi pair), completes ec (all complex vowels), and closes ac (the full vowel set) from MS.01.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्ण-खण्ड₄ = ⟨ऐ, औ⟩ ; इत् = च्
ऐच् = {ऐ, औ}
एच् = {ए, ओ, ऐ, औ}
अच् = {अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ}
वृद्धि = {आ} ∪ ऐच् (1.1.1 वृद्धिरादैच्)

उदाहरण
1. वृद्धिरादैच् (1.1.1): वृद्धिसंज्ञा = आत् ∪ ऐच् = {आ, ऐ, औ}।
2. एचोऽयवायावः (6.1.78): एच् → अय्/अव्/आय्/आव् / _ अच् — ने + अन → नयन (ए → अय्); पौ + अक → पावक (औ → आव्)।
3. वृद्धिरेचि (6.1.88): अ/आ + एच् → वृद्धि — कृष्ण + ऐक्य → कृष्णैक्य (अ + ऐ → ऐ)।

MS.05
हयवरट्
hayavaraṭ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — ह् + अन्तःस्थ (य व र) का प्रथम व्यञ्जन-खण्ड।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ह · य · व · र — हकार + तीन अन्तःस्थ; ट् — इत्-अनुबन्ध।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (व्यञ्जन-शृंखला का उद्घाटन)।

हिन्दी व्याख्या स्वर-खण्डों के बाद पहला व्यञ्जन-सूत्र: ह, य, व, र — ट् से बन्द। यहीं से हश् (ह से श्-इत् तक के सघोष) और हल् (सभी व्यञ्जन — ह से द्वितीय ह्/ल्-सीमा तक) जैसे विशाल प्रत्याहार खुलते हैं। य् व् र् बाद में यण् (इक्→यण्) के आदेश-वर्ण बनते हैं; ह् अश्/हश्-विधियों में सघोष-सीमा का द्वार है। ध्यान दें: शिवसूत्रों में ह दो बार आता है — प्रत्याहार-विस्तार में स्लॉट ३४, अद्वितीय व्यञ्जन ३३।

English rendering The first consonant sūtra arrays h, y, v, r under ṭ. From h the engine builds the great consonant classes haś (voiced continuum) and hal (all consonants) — and y, v, r later serve as the yaṇ substitutes for i, u, ṛ.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्ण-खण्ड₅ = ⟨ह, य, व, र⟩ ; इत् = ट्
हश् = {ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द}
हल् = हश् ∪ {ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स} ∪ (द्वितीय ह-स्लॉट से बन्द; |set(हल्)| = ३३)
यण् ⊇ {य, व, र, ल} (ल ∈ अगला सूत्र; आदेश-सेट 1.1.45?)

उदाहरण
1. इको यणचि (6.1.77): मधु + अरि → मध्वरि (उ → व्); दधि + अत्र → दध्यत्र (इ → य्) — य्/व् यहीं के खण्ड से।
2. हलोऽनन्तराः संयोगः (1.1.7): हल + हल (बिना स्वर) = संयोग — अग्नि में ग्न्।
3. अटोऽटि नित्यम्? better: झलां जश् झशि (8.4.53) uses classes beyond — classic for हल्: हल्-अन्त्य lopa contexts — वाक्यस्य टेः (2.2.24 area)… Use: उपदेशेऽजनुनासिक इत् (1.3.2) contrasts अच् vs others; simpler textbook: हल् = all consonants — “हल्” in तस्मादित्युत्तरस्य examples of consonant sandhi: वाक् + ईश → वागीश (via later rules, हल्-boundary).

Refined examples:
1. इको यणचि (6.1.77): दधि + अत्र → दध्यत्र (इ → य्); मधु + अरि → मध्वरि (उ → व्)।
2. हलोऽनन्तराः संयोगः (1.1.7): अ-ग्-नि — ग् + न् = संयोग (दो हल्, मध्ये कोई अच् नहीं)।
3. अदो जग्धिर्ल्यप्सलिटि? skip. भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि (8.3.17) uses अश् — ह from this sūtra starts अश्-span already opened in MS.01 list... For हश्: झलां जशोऽन्ते (8.2.39) related. Classic: हशि च (6.1.114) — अत् + हश् → पूर्वरूप options: कः + अस्ति related differently.

उदाहरण
1. इको यणचि (6.1.77): दधि + अत्र → दध्यत्र (इ → य्); मधु + अरि → मध्वरि (उ → व्)।
2. हलोऽनन्तराः संयोगः (1.1.7): अग्नि — ग्-न् मध्ये अच् नहीं ⇒ संयोगसंज्ञा।
3. हशि च (6.1.114): एषः + मान्यः → एष मान्यः (स-लोप/पूर्वरूप-परंपरा; हश् = सघोष-परिवेश)।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन इस आदि-ह से हश् और हल् बनाता है; हल्-सेट का गणना-सिद्ध आकार ३३ (ह दो स्लॉट, अद्वितीय ३३) — SS-पुस्तक वाली exact-equality अनुशासन यहीं लागू।

I need to clean up my response - I had some thinking/draft mess in MS.03 and MS.05. Let me output a clean final version only.#### SUTRA MS.01

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वर्णक्रम-प्रत्याहार का आधार-खण्ड।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अ · इ · उ — तीन सरल स्वर; ण् — इत्-अनुबन्ध (मूक सीमा-चिह्न; 1.3.3, 1.3.9 से लोप्य)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (माहेश्वर-शृंखला का आरम्भ)।

हिन्दी व्याख्या यह पहला माहेश्वर-सूत्र तकनीकी वर्ण-पंक्ति खोलता है। अ, इ, उ को क्रम से रखकर अन्त में ण् को इत्-सीमा बनाता है। आदिरन्त्येन सहेता (1.1.71) से “अ” से “ण्” तक का संक्षिप्त नाम अण् = अ इ उ बनता है। आगे के इत्-चिह्नों (क्, च्, ट्, म्, श्…) से जुड़े अक्, अच्, अट्, अम्, अश् भी यहीं के आदि-अ से खुलते हैं। तीन अक्षर — पूरी स्वर-संज्ञा-व्यवस्था का द्वार।

English rendering The first Māheśvara-sūtra lists the simple vowels a, i, u and seals them with the silent it-marker ṇ. From this ordered span the grammar compresses whole vowel-classes — above all ac, “all vowels” — into single technical names.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्ण-खण्ड₁ = ⟨अ, इ, उ⟩ ; इत् = ण्
प्रत्याहार(X, Y) = { v | X ≤ v < Y (शिवसूत्र-क्रम; Y = इत्) }
अण् = {अ, इ, उ}
अक् = {अ, इ, उ, ऋ, ऌ}
अच् = {अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ}
अट् = अच् ∪ {ह, य, व, र}
अम् = अट् ∪ {ल, ञ, म, ङ, ण, न}
अश् = अम् ∪ {झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द}

उदाहरण
1. अण् = {अ, इ, उ} — अणुदित्सवर्णस्य… (1.1.69) का अण्-क्षेत्र।
2. इको यणचि (6.1.77): इक् → यण् / _ अच् — दधि + अत्र → दध्यत्र (इ → य्, आगे अ ∈ अच्)।
3. अकः सवर्णे दीर्घः (6.1.101): दैत्य + अरि → दैत्यारि (अ + अ → आ; दोनों अक्)।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन इस आदि-अ से छः प्रामाणिक प्रत्याहार गिनता है — अण्, अक्, अच्, अट्, अम्, अश्; ४२ प्रत्याहारों का स्वर-पक्ष यहीं से खुलता है।

MS.06
लण्
laṇ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वर्णमाला-क्रम एवं इत्-चिह्न।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ल — वर्ण «ल» (अन्तस्थ); ण् — इत्-चिह्न (ण्), प्रत्याहार-सीमा हेतु, उच्चारण में लुप्त।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (पूर्ववर्ती माहेश्वर-क्रम का मात्र निरन्तरण)।

हिन्दी व्याख्या यह छठा माहेश्वर-सूत्र केवल एक अन्तस्थ वर्ण «ल» रखता है; ण् उसका इत्-अনুबन्ध है। इससे पहले पाँचवें सूत्र में य्, व्, र् आ चुके हैं; «ल» को उनके बाद जोड़ने से अन्तस्थ-वर्ग पूरा होता है। कोई प्रत्याहार «ल्…» से आरम्भ नहीं होता, फिर भी «ल» कई बड़े प्रत्याहारों में शामिल है — विशेषकर यण् = य व र ल, जो इक् → यण् (६.१.७७) का स्थानि-वर्ग है। ण् सीमा-चिह्न की तरह काम करता है: जिस प्रत्याहार का अन्त ण् से बँधे, वहाँ तक की सूची में «ल» भी गिना जाता है। संक्षेप में — एक अक्षर, एक सीमा, और यण्-संहिता का अंतिम स्तम्भ।

English rendering The sixth Māheśvara sūtra lists only the liquid l, closed by the silent marker ṇ. No canonical pratyāhāra begins at l, yet l completes the set yaṇ = y v r l — the very class that receives the ik → yaṇ glide substitution.

औपचारिक रूप (Formal)
वर्णक्रम-खंड: MS.06 = [ल] · it = ण्
प्रत्याहार-आरम्भ(ल) = ∅ (कम्प्यूटेड सूची)
सदस्यता: ल ∈ यण्, ल ∈ अण् (यदि अ…ण् पढ़ा जाए), ल ∈ हल् इत्यादि दीर्घ प्रत्याहारों में

उदाहरण
1. दधि + अत्र → दध्यत्र — इ → य् (इको यणचि ६.१.७७); यण् = य व र ल में य् स्थानि।
2. मधु + अरि → मध्वरि — उ → व्; फिर यण् में व्।
3. पितृ + अर्थम् → पित्रर्थम् — ऋ → र्; यण् में र्; «ल» उसी वर्ग का चौथा सदस्य है (हल्-आदि में)।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन: MS.06 से आरम्भ कोई कैनोनिकल प्रत्याहार नहीं; परन्तु सीमा-इत् ण् यण् (य…ण्) को बन्द करता है — ४२ प्रत्याहारों में यण् का अंतिम फोनम «ल» यहीं से आता है।

MS.07
ञमङणनम्
ñamaṅaṇanam

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — पञ्च नासिक्य (अनुनासिक) वर्ग।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ञ — तालव्य नासिक्य; म — ओष्ठ्य नासिक्य; ङ — कण्ठ्य नासिक्य; ण — मूर्धन्य नासिक्य; न — दन्त्य नासिक्य; म् — इत्-चिह्न (म्), सीमा/लोप हेतु।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या सातवाँ सूत्र पाँचों नासिक्य व्यञ्जनों को एक पंक्ति में बाँधता है — ञ म ङ ण न — और म् को इत् बनाता है। इन्हीं से प्रत्याहार ञम् बनता है: ञम् = ञ म ङ ण न। पाणिनि नासिक्य-सम्बन्धी विधियों में प्रायः ञम् या उसके अंशों का सहारा लेते हैं; अनुस्वार-विकल्प, न्-लोप, परसवर्ण आदि इसी वर्ग पर टिके हैं। क्रम भी अर्थवान है: वह वर्णमाला के वर्ग-क्रम (क-वर्ग…प-वर्ग) से मेल खाता है — ङ ञ ण न म का «स्थानीय» प्रतिबिम्ब यहाँ ञ म ङ ण न के रूप में संपीड़ित है। छात्र के लिए सरल सूत्र: जहाँ भी «सभी नासिक्य» कहना हो, ञम् काफी है।

English rendering This sūtra packs the five nasal stops ñ m ṅ ṇ n, closed by silent m. The one working pratyāhāra that starts here is ñam = ñ m ṅ ṇ n — the nasal class used throughout sandhi and nasal-assimilation rules.

औपचारिक रूप (Formal)
MS.07 = [ञ, म, ङ, ण, न] · it = म्
ञम् ≜ {ञ, म, ङ, ण, न}
प्रत्याहार-आरम्भ(ञ) = {ञम्}

उदाहरण
1. ञम्-वर्ग: शब्द-रूपों में अन्त्य नासिक्य — राजन्, गाम्, वाङ् (वाच्+ङ्), गण्, मनस्-सम्बद्ध न्।
2. सन्धि-संदर्भ: अहम् + कारः → अहङ्कारः — म् का परसवर्ण/अनुस्वार-पथ; नासिक्य-वर्ग ञम् का सदस्य म।
3. न् + क् → ङ्क् (परसवर्ण): स्वन + कृत → स्वङ्कृत-प्रकार के पारम्परिक दृष्टान्तों में न् ∈ ञम्।

MS.08
झभञ्
jhabhañ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — घोष महाप्राण (झ-वर्ग) द्वार।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) झ — तालव्य घोष महाप्राण; भ — ओष्ठ्य घोष महाप्राण; ञ् — इत्-चिह्न (ञ्), प्रत्याहार-सीमा।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या आठवाँ सूत्र घोष-महाप्राण स्पर्शों की पंक्ति खोलता है — पहले झ और भ, इत् ञ् से बन्द। स्वयं MS.08 में केवल दो वर्ण हैं, परन्तु झ से आरम्भ होने वाले पाँच कैनोनिकल प्रत्याहार पूरे उत्तर-वर्णक्रम को काटते हैं: झष्, झश्, झय्, झर्, झल्। झष् = घोष महाप्राण (झ भ घ ढ ध); झश् = सभी घोष स्पर्श (महाप्राण+अल्पप्राण); झय् = घोष+अघोष अल्प/महा मिलाकर «य्» तक के स्पर्श; झर्/झल् क्रमशः ऊष्म और ह तक फैलाते हैं। विधि-सूत्रों में झल्/झश् सर्वाधिक व्यस्त हैं — लोप, जश्त्व, चर्त्व, असिद्ध-त्रिपादी सब इन्हीं संकेतों पर चलते हैं। द्वार-सूत्र: छोटे से झभञ् से पूरी «झ-परिवार» मशीन खुलती है।

English rendering Listing only jh and bh (marker ñ), this sūtra is the gate for five large pratyāhāras headed by jh: jhaṣ, jhaś, jhay, jhar, jhal — from voiced aspirates up through the full non-nasal consonant span used in the tripādī sandhi engine.

औपचारिक रूप (Formal)
MS.08 = [झ, भ] · it = ञ्
झष् = {झ, भ, घ, ढ, ध}
झश् = {झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द}
झय् = झश् ∪ {ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प}
झर् = झय् ∪ {श, ष, स}
झल् = झर् ∪ {ह}
प्रत्याहार-आरम्भ(झ) = {झष्, झश्, झय्, झर्, झल्}

उदाहरण
1. झलां जश् झशि (८.४.५३): क्+भ → ग्भ → (जश्त्व) … — झल् → जश् / _ झश्।
2. झषस्तथोर्थे (पारम्परिक जश्/चर् सन्दर्भ): लभ् + त → लब्ध — भ् ∈ झष्; महाप्राण-संहिता।
3. झयो होऽन्यतरस्याम् (८.४.६२ आदि): पद् + हि → पद्धि — झय्-वर्ग + ह्।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन: MS.08 = झ-द्वार; पाँचों झ*-प्रत्याहार rewrite-rule decode में सबसे व्यस्त हल्-उपसमूह हैं (विशेषतः झल्/झश् त्रिपादी ८.२–८.४ में)।

MS.09
घढधष्
ghaḍhadhaṣ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — शेष घोष महाप्राण (घ ढ ध)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) घ — कण्ठ्य घोष महाप्राण; ढ — मूर्धन्य घोष महाप्राण; ध — दन्त्य घोष महाप्राण; ष् — इत्-चिह्न (ष्), सीमा हेतु।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या नौवाँ सूत्र झभञ् के बाद बचे तीन घोष-महाप्राण जोड़ता है — घ ढ ध — और ष् को इत् रखता है। घ से आरम्भ कोई स्वतन्त्र कैनोनिकल प्रत्याहार नहीं बनता; ये तीन झष् के पूरक सदस्य हैं (झष् = झ भ + घ ढ ध)। ष् सीमा-चिह्न होने से «…ष्» पर खत्म होने वाले प्रत्याहार (जैसे झष्) यहीं बन्द होते हैं। अर्थ यह कि MS.08 द्वार है, MS.09 उसकी पूर्ति — पूरा घोष-महाप्राण पञ्चक तभी पूरा होता है। ध्वनि-शास्त्रीय दृष्टि से ये पञ्चम-वर्ग (वर्गों के चौथे वर्ण) हैं; संधि में प्रायः जश्/चर् के मार्ग से अल्पप्राण घोष या अघोष बनते हैं।

English rendering Completing the voiced aspirates, this sūtra adds gh ḍh dh under marker ṣ. Nothing canonical begins at gh; the three sounds simply finish jhaṣ = jh bh gh ḍh dh and supply the right edge for any pratyāhāra closed by ṣ.

औपचारिक रूप (Formal)
MS.09 = [घ, ढ, ध] · it = ष्
प्रत्याहार-आरम्भ(घ) = ∅
झष् = {झ, भ} ∪ {घ, ढ, ध} = {झ, भ, घ, ढ, ध}

उदाहरण
1. दुह् + त → दुग्ध — घ्/ध्-पथ; ध ∈ झष् (MS.09 से)।
2. बुध् + त → बुद्ध — ध् → द् (झलां जश्…) फिर ध-आगम/आदेश-परम्परा; ध ∈ झष्।
3. झष्-सदस्यता: भग्न, रूढ, लब्ध — घ ढ ध क्रमशः MS.09 के तीनों स्थान।

MS.10
जबगडदश्
jabagaḍadaś

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — घोष अल्पप्राण स्पर्श (ज-वर्ग)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज — तालव्य घोष अल्पप्राण; ब — ओष्ठ्य घोष अल्पप्राण; ग — कण्ठ्य घोष अल्पप्राण; ड — मूर्धन्य घोष अल्पप्राण; द — दन्त्य घोष अल्पप्राण; श् — इत्-चिह्न (श्), सीमा हेतु।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या दसवाँ सूत्र पाँच घोष-अल्पप्राण स्पर्श बाँधता है — ज ब ग ड द — इत् श् के साथ। इन्हीं से प्रत्याहार जश् बनता है: जश् = ज ब ग ड द। यह पाणिनि-संहिता का एक केन्द्रीय लक्ष्य-वर्ग है: झल् जब झश् के पहले आते हैं तो जश् हो जाते हैं (झलां जश् झशि ८.४.५३) — अर्थात् महाप्राण/अघोष आदि को नरम घोष-अल्पप्राण में ढालना। जश् स्वयं झश् का उपसमूह भी है (झश् = झष् ∪ जश्)। छात्र-सूत्र: «नरम बाँध» — जहाँ घोष अल्पप्राण स्पर्श चाहिए, जश् लिखो। श् सीमा होने से झश् (झ…श्) यहीं कटता है।

English rendering The five voiced unaspirated stops j b g ḍ d, closed by ś, form jaś — the classic output class of jhal → jaś before jhaś, and the soft half of the larger voiced set jhaś.

औपचारिक रूप (Formal)
MS.10 = [ज, ब, ग, ड, द] · it = श्
जश् ≜ {ज, ब, ग, ड, द}
झश् = झष् ∪ जश्
प्रत्याहार-आरम्भ(ज) = {जश्}
संहिता-नियम (संदर्भ): झल् → जश् / _ झश् (८.४.५३)

उदाहरण
1. वाक् + भिः → वाग्भिः — क् (झल्) → ग् (जश्) / _ भ् (झश्)।
2. तत् + घटः → तद्घटः — त् → द् (जश्) / _ घ्।
3. अच् + दि → अज्दि-प्रकार: च् → ज्; ज ∈ जश्।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन + rewrite-rule decode: जश् = MS.10-स्तम्भ; ८.४.५३ का दक्षिण पक्ष (A→B) यहीं परिभाषित — औपचारिक रूप झल् → जश् / _ झश् सीधे केस-सिण्टैक्स (१.१.६६–६७) का उदाहरण है।

MS.11
खफछठथचटतव्
khaphachaṭhathacaṭatav

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वर्णमाला-क्रम और इत्-चिह्न का उपदेश।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ख्-फ्-छ्-ठ्-थ्-च्-ट्-त् + व् (इत्) — क्रमशः कवर्ग/चवर्ग/टवर्ग/तवर्ग के अघोष महाप्राण (ख फ) तथा अघोष अल्पप्राण/महाप्राण मिश्र (छ ठ थ च ट त); अन्त्य व् केवल तकनीकी इत्-चिह्न है, उच्चारण में नहीं रहता।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं — प्रत्येक माहेश्वर-सूत्र स्वतन्त्र वर्ण-उपदेश है; क्रम पूर्व-सूत्रों (जबगडदश् तक) से आगे बढ़ता है।

हिन्दी व्याख्या यह ग्यारहवाँ माहेश्वर-सूत्र अघोष स्पर्श-वर्णों का वह खण्ड देता है जो ख से त तक फैला है। ख और फ महाप्राण अघोष हैं; छ ठ थ च ट त भी अघोष स्पर्श-श्रेणी में आते हैं — ठीक वे ध्वनियाँ जो बाद में ‘कठोर’/अघोष समूहों के नियमों में काम आती हैं। अन्तिम व् इत् है; १.३.३ और १.३.९ के बल से वह लुप्त हो जाता है, केवल प्रत्याहार-सीमा बाँधने को रह जाता है। यहीं से खय् और खर् जैसे प्रत्याहार खुलते हैं, जो अघोष स्पर्श (और आगे खर् में ऊष्म) को एक चिह्न में समेटते हैं। बिना इस क्रम के ‘ख’ से शुरू होने वाले संक्षिप्त समुच्चय बन ही नहीं सकते।

English rendering This sūtra lists the voiceless stops from kha through ta, closed by the it-marker v. That marker is silent metadata; the ordered span is what later rules compress into the pratyāhāras khay and khar.

औपचारिक रूप (Formal)
Phoneme-list (with it):
Σ₁₁ = {ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त}, it(Σ₁₁) = व्
Pratyāhāra (via 1.1.71 आदि…इता):
खय् = {ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प}
खर् = {ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स}
(Closure of खय् needs MS.12 क,प and it य्; of खर् needs MS.12–13 and it र्.)

उदाहरण
1. खय् → अघोष स्पर्श: ख,फ,छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प — जैसे झलां जशोऽन्ते (८.२.३९) की परिधि में अघोष पक्ष का स्पर्श-खण्ड।
2. खर् → अघोष स्पर्श + शषस: ख…प + श ष स — खरि च (८.४.५५) में “खर्” इसी समुच्चय को नाम देता है (चर्त्व)।
3. सीमा-चिह्न: …तव् → व् इत् → लोप; शेष वर्ण ही पाठ हैं।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन MS.11 के आदि-वर्ण ख से सीमा-इत् य्/र् तक फैलाकर खय् और खर् निकालता है — वही ४२-प्रत्याहार सूची का अघोष-स्पर्श कोडेक।

MS.12
कपय्
kapay

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — क/प का क्रम-स्थान और य्-इत् का बन्ध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्-प् + य् (इत्) — कवर्ग और पवर्ग के अघोष अल्पप्राण (क, प); य् केवल इत्, उच्चरित नहीं।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं — स्वतन्त्र उपदेश; क्रम MS.11 के त के ठीक बाद।

हिन्दी व्याख्या बारहवाँ सूत्र केवल दो वर्ण देता है — क और प — पर तंत्र में इनका भार बहुत है। ये अघोष अल्पप्राण स्पर्श हैं, और खय्/खर् जैसे प्रत्याहारों को “प तक” पूरा करने के लिए अनिवार्य कड़ी हैं। य् इत् है; उसी य् पर ठहरकर पूर्ववर्ती ख से खय् बनता है। इस सूत्र से आरम्भ होने वाला कोई प्रत्याहार गणना में नहीं आता — क के बाद शेष श्रृंखला छोटी और पहले से नामित समूहों में समा जाती है — पर सीमा-इत् य् के बिना खय् असम्भव है। छोटे सूत्र, बड़ा लीवर: दो वर्ण + एक इत्, पूरे अघोष-स्पर्श संक्षिप्त नाम को बन्द करते हैं।

English rendering Only ka and pa are taught here, sealed by it y. No canonical pratyāhāra begins at this sūtra’s first sound; the sūtra’s work is to complete earlier spans (notably khay) and to plant the y-boundary those names require.

औपचारिक रूप (Formal)
Σ₁₂ = {क, प}, it(Σ₁₂) = य्
Pratyāhāras with first phoneme ∈ Σ₁₂: ∅
(Role = right-extension + boundary:)
खय् = from ख (MS.11) through प, closed at य्
(also feeds खर् once र् is available as later it)

उदाहरण
1. ख + … + क प + य्-इत् → खय् = ख फ छ ठ थ च ट त क प।
2. क, प स्वयं अघोष अल्पप्राण: क्/प् पर झलां जशोऽन्ते आदि में जश्त्व के लक्ष्य-वर्णों से भिन्न वर्ग।
3. य् इत् → लोप; शेष केवल क, प।

डिकोड-सेतु इंजन MS.12 पर “आदि-प्रत्याहार = शून्य” रिपोर्ट करता है, पर य्-सीमा से खय् की गणना पूर्ण करता है — प्रत्याहार-एक्सपैंडर में ‘शुरुआत’ और ‘बन्द’ अलग-अलग नोड हैं।

MS.13
शषसर्
śaṣasar

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — तीन ऊष्म (श ष स) और र्-इत्।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्-ष्-स् + र् (इत्) — तालव्य/मूर्धन्य/दन्त्य ऊष्म (श ष स); र् इत्-चिह्न।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं — स्वतन्त्र वर्ण-उपदेश; स्पर्श-श्रेणी के बाद ऊष्म-खण्ड।

हिन्दी व्याख्या तेरहवाँ सूत्र तीन ऊष्म-व्यंजन सिखाता है — श, ष, स — जिन्हें व्याकरण ‘ऊष्म’ कहता है। शर् इन्हीं तीन का नाम है; शल् उनमें अन्तिम ह (१४वें सूत्र का द्वितीय ह) जोड़ता है। र् यहाँ इत् है, वही सीमा जिस पर खर् (अघोष स्पर्श + ऊष्म) और शर् दोनों टिकते हैं। विसर्ग-सन्धि, षत्व, सत्व, और खरि च जैसे स्थलों पर ये तीन बार-बार लक्ष्य या निमित्त बनते हैं। सूत्र छोटा है, पर ‘सिखर-ध्वनि’ का पूरा कोड यहीं बैठता है।

English rendering The three sibilants śa, ṣa, sa are listed, closed by it r. That yields the set śar; with the final hal-marker of the next sūtra it also underwrites śal (ś ṣ s h).

औपचारिक रूप (Formal)
Σ₁₃ = {श, ष, स}, it(Σ₁₃) = र्
शर् = {श, ष, स}
शल् = {श, ष, स, ह} (ह = MS.14 का द्वितीय ह; it = ल्)
खर् = (MS.11–12 span) ∪ शर्

उदाहरण
1. शर् → श ष स — षत्व/सत्व और ऊष्म-निमित्त नियमों का लघु नाम।
2. खर् = ख…प + श ष स — खरि च (८.४.५५): खर् पर चर्त्व।
3. शल् = श ष स ह — झलां जशोऽन्ते के पूरक ऊष्म+ह पक्ष की चर्चा में।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन श→र् से शर्, और श→ल् (MS.14) से शल् फैलाता है; खर् में MS.11–13 की श्रृंखला एक सेट-यूनियन है।

MS.14
हल्
hal

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — द्वितीय ह और ल्-इत्; व्यंजन-प्रत्याहार की अन्तिम सीमा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ह् + ल् (इत्) — ह का दूसरा पाठ (पहला: हयवरट्); ल् केवल इत्, जिससे हल्/शल् आदि बन्द होते हैं।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं — चौदह सूत्रों का अन्तिम उपदेश; पूरा हल्-क्रम यहीं समाप्त।

हिन्दी व्याख्या अन्तिम माहेश्वर-सूत्र केवल ह देता है, पर वह ह दुबारा है — पहले हयवरट् में आ चुका। यह द्विरुक्ति संयोग नहीं: जिससे प्रत्याहार हल् (सभी व्यंजन) और शल् (श ष स ह) ल्-सीमा पर सटीक बैठें, और बीच के इत्-चिह्नों से छोटे समुच्चय काटे जा सकें। इंजन की गिनती में हल्-अवधि ३४ स्लॉट दिखाती है, पर समुच्चय-अवयव ३३ हैं — क्योंकि ह दो बार लिखा, एक बार गिना जाता है। ल् इत् है; “हल्” नाम पूरे व्यंजन-वर्ग का मानक संक्षिप्त रूप बन जाता है — अच् का युग्म-पक्ष। यहीं माहेश्वर-माला बन्द होती है: स्वर-प्रत्याहार पहले, व्यंजन-प्रत्याहार अब पूर्ण।

English rendering The fourteenth sūtra re-teaches ha and seals the consonant inventory with it l. The repeated h is structural: it lets hal name all consonants and śal include final h, while the span’s 34 slots collapse to a 33-member set.

औपचारिक रूप (Formal)
Σ₁₄ = {ह₂}, it(Σ₁₄) = ल्
(ह₁ ∈ MS.5 हयवरट्; ह₂ = this sūtra)
हल् = {ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द,
ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स}
= all consonants; |span slots| = 34, |set| = 33 (ह counted once)
हश् = {ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द}
शल् = {श, ष, स, ह₂}
Complement in the full sound system: अच् ∪ हल् = (vowels ∪ consonants) of the Śivasūtra order.

उदाहरण
1. हल् = समस्त व्यंजन — हलोऽनन्तराः संयोगः (१.१.७) में “हल्” यही समुच्चय।
2. हश् = ह से लेकर द तक (घोष पक्ष का बड़ा खण्ड) — झष्/जश् आदि के साथ घोष-स्पर्श+अन्तःस्थ+नासिक्य।
3. श + ष + स + ह₂ + ल्-इत् → शल्; द्वितीय ह के बिना शल् अधूरा।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन (४२ काॅनोनिकल) ह₁→ल् से हल् और ह₁→श् से हश् निकालता है; “३४ स्लॉट / ३३ अवयव” की द्वि-ह गिनती कंप्यूटेड तथ्य है — सूर्यसिद्धान्त-रहस्य वाली exact-equality अनुशासन से ही सत्यापित।

भाग ३

यन्त्र-दर्शन

The Machine: How the Grammar Computes
अध्याय → पाद ↓ · संख्या = सूत्र-गणना (यही संस्करण)अ 1सञ्ज्ञा-परिभाषा751.1731.2931.31101.4अ 2समास-कारक722.1382.2732.3852.4अ 3धातु-प्रत्यय1503.11883.21763.31173.4अ 4तद्धित1784.11454.21684.31444.4अ 5तद्धित1365.11405.21195.31605.4अ 6द्वित्व-स्वर-सन्धि2236.11996.21396.31756.4अ 7अङ्ग-कार्य1037.11187.21207.3977.4अ 8पद-कार्य · त्रिपादी748.11088.21198.3688.4── त्रिपादी-सीमा: 8.2.1 से आगे का फल पूर्व-नियमों के लिए असिद्ध (invisible)कुल = 3,983 सूत्र (32 पाद)
अष्टाध्यायी-मानचित्र — the 8×4 grid of pādas with this edition's exact sūtra counts (total 3,983). The last three pādas (त्रिपादी, vermilion) are a separate pipeline stage: invisible to all earlier rules (8.2.1 पूर्वत्रासिद्धम्).

सूत्र-शरीर-रचना · Anatomy of a Sūtra

सूत्र क्या है। पाणिनि की अष्टाध्यायी — आठ अध्याय × चार पाद = बत्तीस पाद — इस संस्करण (Sanskrit Wikisource, 2026-08-10) में ३,९८३ सूत्र हैं; अन्य संस्करणों में लगभग ३,९५९–३,९९६ तक भिन्नता रहती है। प्रत्येक सूत्र एक संक्षिप्त, संचालन-योग्य कथन है: परिभाषा, दायरा, प्रतिस्थापन, या मेटा-निर्देश। यह कोई “सूक्ति-संग्रह” नहीं; यह एक जनरेटिव व्याकरण है — लगभग चार हज़ार नियमों में — जो वैदिक छन्दस् और समकालीन शिक्षित भाषा (भाषा) दोनों को लक्ष्य करता है, और वैदिक विकल्पों को स्पष्ट रूप से चिह्नित करता है। मुख्यधारा का विद्वान मत पाणिनि को लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व (कुछ ६ठी शती भी सुझाते हैं) में रखते हैं — उत्तर-वैदिक काल के अन्त में; कोई निश्चित वर्ष सिद्ध नहीं होता।

छह प्रकार के नियम। परम्परा और आधुनिक पठन दोनों अष्टाध्यायी के सूत्रों को मुख्यतः छह कार्य-श्रेणियों में बाँटते हैं:

प्रकारसंस्कृतकार्यउदाहरण-दृष्टि
सञ्ज्ञाdefinitionतकनीकी नाम / वर्ग“इक्”, “अच्”, “हल” जैसी संज्ञाएँ
परिभाषाmetaruleनियम कैसे पढ़ें१.१.४९ षष्ठी स्थानेयोगा; १.१.६६–६७
विधिoperationवास्तविक रूपान्तरण६.१.७७ इको यणचि
अधिकारscope-headingबाद के सूत्रों का दायराअध्याय/पाद-स्तरीय अधिकार-सूत्र
अतिदेशextensionएक स्थिति का विस्तार“जैसा कि X में” — नियम-स्थानान्तरण
नियमrestrictionसामान्य का संकुचन / बाध्यताअपवाद-सदृश संकीर्णन

विधि और परिभाषा का “रीराइट”। परिभाषा-सूत्र ही यह तय करते हैं कि कारकों की विभक्तियाँ क्या संकेत करती हैं: १.१.६६ तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य — सप्तमी = दक्षिण-संदर्भ (right context); १.१.६७ तस्मादित्युत्तरस्य — पञ्चमी = वाम-संदर्भ (left context); १.१.४९ षष्ठी स्थानेयोगा — षष्ठी = स्थानापन्न लक्ष्य (target)। इसलिए इको यणचि (६.१.७७) केवल काव्य-पंक्ति नहीं; वह स्वयं rewrite है:

> इक् → यण् / \_ अच्

अर्थात् A→B / C\_D शैली का context-sensitive प्रतिस्थापन — तीरों के बजाय विभक्तियों में कूटित। प्रतिस्थापन की अनुशासन-सूत्र स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०) सबसे समान आदेश चुनने को कहता है; स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (१.१.५६) आदेश को प्रतिस्थापित तत्व का स्थान-धर्म देता है। संघर्ष पर विप्रतिषेधे परं कार्यम् (१.४.२) — समान बल पर परवर्ती नियम; अपवाद उत्सर्ग को हराता है; परिभाषा-परम्परा nitya > anitya, antaraṅga > bahiraṅga जोड़ती है। पूर्वत्रासिद्धम् (८.२.१) से सपादसप्ताध्यायी (१.१–८.१) और त्रिपादी (८.२–८.४) दो चरण बनते हैं — बाद का चरण पहले को “दिखता” नहीं।

अनुबन्ध / इत् — मेटाडेटा-झंडे। तकनीकी अवयवों में कुछ ध्वनियाँ “मौन चिह्न” (इत्) हैं। सूत्र १.३.२–१.३.९ बताते हैं कि कौन-सी ध्वनियाँ इत् मानी जाएँ; और तस्य लोपः (१.३.९) कहता है: उस (इत्) का लोप — अर्थात वे उच्चारण-शरीर से हट जाते हैं, किन्तु अर्थ-शरीर में बने रहते हैं। अनुबन्ध = token पर tags/flags:

शिवसूत्र / माहेश्वर-सूत्राणि — पाठ के शीर्ष पर १४ सूत्र — प्रत्याहार-संपीड़न उत्पन्न करते हैं; इस पुस्तक के इंजन से ४२ कैनोनिकल प्रत्याहार निकलते हैं (उदा. अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ; हल् = ३३ व्यंजन — स्लॉट ३४ हैं क्योंकि ह दो बार आता है, विशिष्ट समुच्चय = ३३)। प्रत्याहार-अक्षर स्वयं अनुबन्ध-तंत्र का फल है: संक्षिप्त नाम, विस्तृत सदस्य-सूची।

अनुवृत्ति — diff-संपीड़न। बाद के सूत्र पहले के शब्दों को दोहराते नहीं; वे अनुवृत्ति से विरासत लेते हैं जब तक रद्द न हो। सूत्र “पूर्ण वाक्य” कम, संदर्भ के विरुद्ध diff अधिक हैं — आधुनिक संस्करण-नियंत्रण की भाषा में: inherited context + local delta।

शरीर के परतें — एक सूत्र कैसे “खुलता” है। किसी विधि-सूत्र को पढ़ते समय चार परतें एक साथ सक्रिय रहती हैं:

इसीलिए अनुबन्ध “आभूषण” नहीं; वे मशीन-निर्देश हैं। बिना इत्-लोप के प्रत्याहार-विस्तार और प्रत्यय-वर्ग दोनों टूट जाते हैं; बिना परिभाषा के विधि-सूत्र का “A→B/_C” रूप अदृश्य रह जाता है।

मुनि-त्रय और पठन-परम्परा (संक्षेप)। कात्यायन (लगभग ३री शती ई.पू.) वार्त्तिक; पतञ्जलि (लगभग २री शती ई.पू.) महाभाष्य — लगभग १,७०० सूत्रों पर; काशिकावृत्ति (जयादित्य + वामन, ७वीं शती ई.) पूर्ण gloss; भट्टोजी दीक्षित (लगभग १७वीं शती आरम्भ) सिद्धान्तकौमुदी में विषय-क्रम; नागेश भट्ट (लगभग १८वीं) परिभाषेन्दुशेखर में मेटा-नियम। पश्चिमी संस्करण: Böhtlingk (१८३९–४०; संशोधित १८८७)। Bloomfield ने अष्टाध्यायी को “one of the greatest monuments of human intelligence” कहा; १९६७ में P. Z. Ingerman ने Backus–Naur Form को “Pāṇini–Backus Form” कहने का प्रस्ताव रखा — सूत्र-तंत्र औपचारिक व्याकरण-नोटेशन से लगभग २,४०० वर्ष पूर्व की संरचनात्मक पूर्वपीठिका है। आधुनिक computational Sanskrit (Sanskrit Heritage परम्परा आदि) इसे executable specification की तरह पढ़ता है — रहस्य नहीं, कोडेक्स।

उपसंहार-बिन्दु (पाठ-भीतर)। सूत्र-शरीर = संज्ञा + अधिकार + विधि + परिभाषा, अनुबन्ध-झंडों से टैग किया हुआ, अनुवृत्ति से संपीड़ित, विभक्ति-रीराइट से संचालित। छह प्रकार कार्य-भूमिकाएँ हैं; इत्/अनुबन्ध (१.३.२–१.३.९) और तस्य लोपः मेटाडेटा-परत है; १.१.४९/६६/६७ रीराइट का व्याकरणिक UI है। वास्तविक उपलब्धि — ~४,००० नियमों में पूर्ण जनरेटिव व्याकरण — को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं, ठीक इसी शरीर-रचना से समझा जाता है।

अनुवृत्ति-अधिकार · Inheritance and Scope

सूत्र एक diff है, पूरा कार्यक्रम नहीं। अष्टाध्यायी को पढ़ना तब कठिन लगता है जब हर सूत्र को एक स्वतन्त्र वाक्य मान लिया जाए। पाणिनि (उत्तर-वैदिक काल के अन्त में, लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व; कुछ विद्वान् ६ठी शती ईसा-पूर्व भी मानते हैं) ने नियम को पूर्ण वाक्य नहीं, संदर्भ-पर संक्षिप्त संशोधन लिखा। अंग्रेज़ी की technical language में: sūtras are compressed diffs against an inherited context. जो पहले आया, वह चुपचाप आगे भी चलता रहता है — जब तक रद्द न हो। इसी मौन-वाहक को परम्परा अनुवृत्ति कहती है; और जब कोई शीर्षक-सूत्र स्वयं कोई विधि नहीं चलाता, केवल क्षेत्र खोलता है, तो वह अधिकार है।

अनुवृत्ति: ellipsis as inheritance. अनुवृत्ति = ellipsis-inheritance — पूर्ववर्ती सूत्रों के पद उत्तरवर्ती सूत्रों में तब तक लागू रहते हैं जब तक वे रद्द न हों। पाठक/व्याकरण-इंजन को हर बार “subject, domain, operator” दोहराने की ज़रूरत नहीं; पद carry forward होते हैं। परिणाम: ~३,९८३ सूत्रों (इस संस्करण, Sanskrit Wikisource, २०२६-०८-१०; संस्करणों में लगभग ३,९५९–३,९९६) में एक पूर्ण generative grammar, बिना verbosity के। यह “कमी” नहीं — compression design है।

धारणाभूमिकाआधुनिक समानता
अनुवृत्तिपूर्व-पदों का मौन वहनscope में inherited bindings; diff पर base context
अधिकारक्षेत्र-शीर्षक, विधि नहींsection header / namespace / `#region`
विधिवास्तविक परिवर्तनrewrite / mutation
परिभाषाmeta-ruleinterpreter directive

अधिकार: scope-heading, not operation. नियम-प्रकारों में अधिकार स्पष्टतः अलग है: सञ्ज्ञा (definition), परिभाषा (metarule), विधि (operation), अधिकार (scope-heading), अतिदेश (extension), नियम (restriction)। अधिकार-सूत्र स्वयं “A → B” नहीं चलाता; वह घोषणा करता है कि आगे के n सूत्र इस क्षेत्र में पढ़े जाएँगे — जैसे “अब णत्व के प्रकरण में…”। बिना अधिकार के श्रृंखला टूट जाती; बिना अनुवृत्ति के अधिकार भी केवल खाली शीर्षक रह जाता। दोनों मिलकर scoped inheritance बनाते हैं।

सूत्र = compressed diff। rewrite-rule decode पहले से case-syntax में बैठा है:

अतः इको यणचि (६.१.७७) पाठ में “इक् → यण् / _ अच्” है — A→B/C_D context-sensitive rewriting, arrows की जगह विभक्तियों में। diff-दृष्टि से: base context (अच्-पर), target (इक्), replacement (यण्) — तीनों को पूरा sentence नहीं, न्यूनतम delta से कूटबद्ध किया गया।

श्रृंखला कैसे चलती है (conceptual chain)। मान लीजिए एक प्रकरण में अधिकार-सूत्र क्षेत्र खोलता है; अगला विधि-सूत्र target और आदेश देता है; तीसरा केवल शर्त जोड़ता है; चौथा अपवाद। अनुवृत्ति के बिना प्रत्येक में “किस पर, कहाँ, कब” दोहराना पड़ता। अनुवृत्ति से:

यह “मौन” लापरवाही नहीं; munitraya — कात्यायन (लगभग ३री शती ईसा-पूर्व) के वार्त्तिक और पतञ्जलि (लगभग २री शती ईसा-पूर्व) का महाभाष्य — इसी inheritance-logic को पढ़कर ~१,७०० सूत्रों पर शास्त्रीय reference point बनाते हैं। काशिकावृत्ति (जयादित्य + वामन, ७वीं शती ई.) पूरे पाठ पर running gloss देती है; भट्टोजी दीक्षित (लगभग आरम्भिक १७वीं शती) सिद्धान्त-कौमुदी में topical reorder करते हैं, फिर भी अधिकार-अनुवृत्ति की अंतर्गत मशीन वही रहती है।

इत्-चिह्न और metadata tags। १.३.२–१.३.९ परिभाषित करते हैं कि technical element में कौन-से ध्वनियाँ इत् (silent markers) हैं; तस्य लोपः (१.३.९) उन्हें हटाता है। markers = tags/flags on tokens — accent, class, behavior। अनुवृत्ति जब किसी आदेश को आगे ले जाती है, तो इत्-stripped form inheritance का “surface token” बनता है; metadata पहले ही encode हो चुकी होती है। यह भी compression का हिस्सा है: rule text में flag-string नहीं, अनubandha।

संघर्ष और stage — inheritance का अनुशासन। केवल “आगे ले चलो” पर्याप्त नहीं; कब कौन जीते:

अनुवृत्ति horizontal inheritance (same evaluation layer में पद-वहन) है; पूर्वत्रासिद्धम् vertical staging है — diff stack में later commit earlier tree को re-feed नहीं करता।

उदाहरण-श्रृंखला (पढ़ने की विधि, न कि एकमात्र “सही” gloss)।

प्रत्याहार-इंजन से जुड़ाव। शिवासत्र/माहेश्वर-सूत्राणि (१४) pratyāhāra alphabet-compression देते हैं; हमारे computed engine से ४२ canonical pratyāhāras (जैसे अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ; हल् = ३३ व्यंजन — span में ३४ slots क्योंकि ह दो बार, distinct set = ३३)। अनुवृत्ति अक्सर इन्हीं compressed class-names को inherit करती है — “अच्” एक शब्द में पूरा vowel-set। diff और alphabet-codec एक ही economy साझा करते हैं: कम अक्षर, पूरा मशीन।

डिकोड-सेतु। Pardeep Sehrawat (The Architect) के engines — pratyāhāra expander, SS-book pipeline की exact-equality oracle discipline — अनुवृत्ति को “अनुमान” नहीं, deterministic context walk मानते हैं: inherited set, cancellation points, adhikāra spans। Bloomfield ने अष्टाध्यायी को “one of the greatest monuments of human intelligence” कहा; १९६७ में P. Z. Ingerman ने BNF को “Pāṇini-Backus Form” नाम देने का प्रस्ताव रखा — formal-grammar notation से लगभग २,४०० वर्ष पूर्व। वह स्मृति-कथन तभी सार्थक है जब inheritance और scope को implementation detail माना जाए, रहस्य नहीं।

संक्षेप में पढ़ने का अनुशासन:

सूत्र “अधूरा वाक्य” नहीं — minimal patch है। पूरी अष्टाध्यायी एक running context machine है; अनुवृत्ति और अधिकार उसके scope और inheritance layer हैं।

इको यणचि (६.१.७७)इकःषष्ठी (genitive)लक्ष्य: इक् = इ उ ऋ ऌ1.1.49 षष्ठी स्थानेयोगायण्प्रथमा (nominative)आदेश: यण् = य व र लस्थानेऽन्तरतमः 1.1.50अचिसप्तमी (locative)दायाँ सन्दर्भ: अच् स्वर1.1.66 तस्मिन्निति...= इक् → यण् / _ अच्A → B / C _ D — context-sensitive rewrite rule, विभक्ति में लिखा हुआदधि + अत्र → दध्य् + अत्र → दध्यत्र (इ → य् before अ)
सूत्र-शरीर-विच्छेद — इको यणचि (6.1.77) decoded: three words, three case-endings, one complete rewrite rule. The vibhakti IS the syntax: genitive marks the target, locative the right context; the substitute stands in nominative.

विभक्ति = वाक्य-रचना · Case as Syntax: the Rewrite-Rule Decode

सूत्र-वाक्य का छिपा संकलन-नियम · The Aṣṭādhyāyī does not write rewrite arrows. It writes vibhakti — case endings — and those endings are not ornament on a sentence about language; they are the sentence’s syntax. What modern formal grammar spells as `A → B / C _ D`, Pāṇini’s machine encodes as genitive, locative, and ablative on technical stems. The decode is not a metaphor imposed from outside; it is the explicit job of three परिभाषा-sūtras in the first pāda of the first adhyāya, which teach the reader how to read every later विधि as a context-sensitive rewrite.

This edition of the Aṣṭādhyāyī (Sanskrit Wikisource, fetched 2026-08-10) holds 3,983 sūtras across 8 adhyāyas × 4 pādas; editions vary roughly in the range ≈3,959–3,996. Among them, a handful of metarules do more work than hundreds of operations: they fix how the case-syntax of rules is to be parsed. Once those metarules are in force, a formula such as इको यणचि (6.1.77) is no longer a riddle of Sanskrit prose — it is the compact surface of the rewrite इक् → यण् / _ अच्.

षष्ठी = target · 1.1.49 षष्ठी स्थानेयोगा · The genitive (ṣaṣṭhī) marks what stands in the place of substitution — the slot that will be overwritten. “X-षष्ठी” in a sūtra does not mean “belonging to X” in ordinary syntax; under this परिभाषा it means: X is the target of the operation; substitute into X’s place. In rewrite anatomy, that target is A in `A → B / C _ D`. Without 1.1.49, the machine would not know which stem is being rewritten and which is merely mentioned.

सप्तमी = right context · 1.1.66 तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य · The locative (saptamī) marks the environment to the right of the change-site: “when that (locative item) is specified, (the operation is) of the preceding.” Locative = D, the right context. The thing that changes is what stands immediately before that right environment — pūrvasya, “of the preceding.” The English formalization “`/ _ D`” is therefore not an import from programming languages; it is a transparent restatement of tasminn iti nirdiṣṭe pūrvasya.

पञ्चमी = left context · 1.1.67 तस्मादित्युत्तरस्य · The ablative (pañcamī) marks the environment to the left: “when that (ablative item) is specified, (the operation is) of the following.” Ablative = C, the left context; the target of change is uttarasya, what comes after it — the formal `/ C _`. Together, 1.1.66 and 1.1.67 split the two sides of the environment bar that SPE and later generative phonology would write with underscores. Pāṇini’s notation uses inflection instead of punctuation; the information content is the same class of object: a context-sensitive rewrite.

कार्य-उदाहरण: इको यणचि = `इक् → यण् / _ अच्` · Expand the pratyāhāras with the engine derived from the fourteen Śivasūtras (Māheśvara-sūtrāṇi): इक् = इ उ ऋ ऌ; यण् = य् व् र् ल्; अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ (the vowel set our expander computes among the 42 canonical pratyāhāras). Read 6.1.77 under the case-metarules:

विभक्ति / surfaceपरिभाषाrewrite slotvalue in 6.1.77
इकः (genitive of इक्)1.1.49 षष्ठी स्थानेयोगाA — targetइक् (इ उ ऋ ऌ)
यण् (nominative substitute)operation’s ādeśaB — outputयण् (य् व् र् ल्)
— (no ablative environment)1.1.67 not triggeredC — left context∅ (empty)
अचि (locative of अच्)1.1.66 तस्मिन्… पूर्वस्यD — right contextअच् (vowels)

Thus the sūtra is the rule `इक् → यण् / _ अच्`: before a vowel, the short high/ṛ/ḷ vowels of इक् are replaced by the corresponding glides of यण्. No arrows appear in the text; the genitive names A, the bare substitute names B, the locative names D, and the empty left side is simply the absence of a पञ्चमी. The A→B/C_D template is not “how we moderns choose to paraphrase”; it is the anatomy that 1.1.49 + 1.1.66 + 1.1.67 force every careful reader to recover.

A→B / C_D · anatomy table (general) · Any विधि that uses this case-syntax unpacks as follows:

SlotFormalVibhakti / signalMetaruleRole
Ainput / targetषष्ठी (…asya / …aḥ)1.1.49what is replaced (स्थाने)
Boutput / substituteoften nominative ādeśaविधि properwhat is inserted
Cleft contextपञ्चमी (…āt)1.1.67material immediately left of A
Dright contextसप्तमी (…i / …e)1.1.66material immediately right of A
bar `_`change-site(implicit between C and D)both 1.1.66–67where A sits in the string

Empty C or D is legitimate: many rules are left-only, right-only, or environment-free. The machine does not require all four slots to be filled; it requires that whatever is filled be read through these metarules and not through ordinary conversational case.

स्थानेऽन्तरतमः · 1.1.50 — similarity as selection · When more than one substitute could occupy A’s place, 1.1.50 स्थानेऽन्तरतमः chooses the most similar (antaratama) candidate. The genitive target is not a free-for-all bag of replacements; similarity along the relevant phonetic/structural dimensions ranks B. In computational terms, the rewrite is typed: B is selected under a nearest-neighbor discipline in the place of A, not under arbitrary stipulation each time. This is part of the substitution discipline that keeps the generative engine deterministic when several ādeśas compete.

स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ · 1.1.56 — inheritance of status · 1.1.56 states that the substitute (ādeśa) behaves as if it were the original (sthānivat) — except in rules that specifically concern the single-sound (al) identity of the replaced item. Substitutes inherit the grammatical status of what they replace: tags, class membership, and downstream eligibility travel with the new surface unless an al-vidhi blocks that fiction. In rewrite-machine language: after `A → B / …`, subsequent rules often still “see” the lineage of A on B. That is why the case-syntax of rules and the inheritance of substitutes form one continuous story: first you locate the rewrite (1.1.49/66/67), then you constrain which B wins (1.1.50), then you decide what B counts as for later rules (1.1.56).

संपीडन, न जादू · These five sūtras — 1.1.49, 1.1.66, 1.1.67, 1.1.50, 1.1.56 — sit among the rule-types the system itself distinguishes: परिभाषा governing how विधि is read. They work with anuvṛtti (ellipsis-inheritance of wording across sūtras) and with it-markers (1.3.2–1.3.9; deletion by tasya lopaḥ 1.3.9) to keep the whole text a stack of compressed diffs. Pāṇini of Śalātura in Gandhāra — mainstream scholarship places him c. 5th–4th century BCE (some argue 6th c. BCE); no exact year is defensible — wrote for both chandas and bhāṣā at the end of the late Vedic world. He cites roughly ten earlier grammarians by name; the Aṣṭādhyāyī is the summit of an older tradition, not its invention of “language as rules.” Kātyāyana (c. 3rd c. BCE) and Patañjali (c. 2nd c. BCE) already treat this machinery as the classical reference point; the later gloss and metarule tradition (Kāśikā, 7th c. CE; Siddhānta-kaumudī, early 17th c.; Nāgeśa, c. 18th c.) reorders and systematizes without inventing the case-decode.

औपचारिक व्याकरण से लगभग २,४०० वर्ष पहले · In 1967 P. Z. Ingerman proposed that Backus–Naur Form be renamed “Pāṇini–Backus Form”: the sūtra system anticipates the formal-grammar notation of programming languages by roughly 2,400 years. That claim needs no inflation into mysticism. The real achievement is concrete: a complete generative grammar — this edition ~3,983 sūtras — in which vibhakti is the rewrite notation, इको यणचि is already `इक् → यण् / _ अच्`, and 1.1.50 with 1.1.56 supply the selection and inheritance discipline that any executable substitution engine still needs. Modern computational Sanskrit work that treats the Aṣṭādhyāyī as a runnable specification is, on this point, simply taking the text’s own case-syntax seriously — the same seriousness the decode engines of this book (Pardeep Sehrawat, The Architect) apply when they expand pratyāhāras and test exact equality rather than approximate paraphrase.

दो नियम एक साथ प्राप्त — कौन लगे?अपवादexception beats the general rule (उत्सर्ग)नित्यthe rule that applies either way goes firstअन्तरङ्गthe inner-conditioned beats the outerपर (1.4.2)on equal footing, the later sūtra wins
संघर्ष-निर्णय-सोपान — when two rules both apply: the traditional decision ladder. Higher rungs beat lower; only at the bottom does 1.4.2 विप्रतिषेधे परं कार्यम् ("the later wins") arbitrate.

संघर्ष-निर्णय · When Rules Collide

जब दो विधि-सूत्र एक ही स्थल पर एक साथ लागू होते हों, और दोनों समान बल रखते हों, तब क्या हो? अष्टाध्यायी केवल नियमों का संग्रह नहीं; वह एक संघर्ष-निर्णय तंत्र भी है — conflict resolution as part of the machine. पाठ-तथ्य: विप्रतिषेधे परं कार्यम् (१.४.२) — on equal conflict, the later rule wins। यह अध्याय उसी कुंजी को खोलता है: पर-कार्य, अपवाद बनाम उत्सर्ग, और परिभाषा-परम्परा के नित्य–अनित्य, अन्तरङ्ग–बहिरङ्ग — फिर एक कामकाजी टकराव।

विप्रतिषेध क्या है? विप्रतिषेध वह स्थिति है जहाँ दो कार्य-विधियाँ एक ही लक्ष्य पर प्रतिस्पर्धा करती हैं, और न तो एक दूसरी का स्पष्ट अपवाद है, न ही कोई परिभाषा पहले से प्राथमिकता तय कर चुकी है। १.४.२ कहता है: समान विरोध में परं — पाठ-क्रम में बाद वाला — जीतता है। “पर” यहाँ कालिक या ऐतिहासिक “बाद” नहीं; सूत्र-पाठ की स्थिति है। सपादसप्ताध्यायी (१.१–८.१) के अंदर भी, और त्रिपादी (८.२–८.४) के अंदर भी, क्रम एक निर्णायक है। यह नियम “समान बल” की शर्त पर चलता है; जहाँ बल असमान है, परम्परा अन्य मेटारूल लगाती है।

अपवाद बनाम उत्सर्ग। सामान्य नियम उत्सर्ग है; विशेष नियम अपवाद। अपवाद उत्सर्ग को निषेध नहीं करता — वह उसके क्षेत्र को काटता है। जहाँ अपवाद लागू होता है, उत्सर्ग वहाँ “नहीं चला” माना जाता है; जहाँ अपवाद नहीं, उत्सर्ग चलता है। यह १.४.२ का प्रतिद्वंद्वी नहीं, उसका पूर्व-फ़िल्टर है: पहले देखो — क्या एक सूत्र दूसरे का अपवाद है? यदि हाँ, तो “समान विरोध” ही नहीं बनता; अपवाद जीतता है। परिभाषा-परम्परा (नागेश भट्ट, लगभग १८वीं शती ई., परिभाषेन्दुशेखर में मेटारूलों का व्यवस्थितकरण) इसी पदानुक्रम को स्पष्ट करती है: अपवाद > उत्सर्ग पहले; फिर, जहाँ दोनों समान स्तर पर टकराएँ, विप्रतिषेधे परं।

नित्य, अन्तरङ्ग — परिभाषा-परम्परा का विस्तार। सूत्र-पाठ स्वयं हर टकराव का नाम नहीं गिनाता; टीका-परम्परा (कात्यायन ~३री शती ई.पू. के वार्त्तिक; पतञ्जलि ~२री शती ई.पू. का महाभाष्य; काशिका ७वीं शती ई.; सिद्धान्तकौमुदी ~प्रारंभिक १७वीं शती; फिर नागेश) मेटारूल जोड़ती है। दो प्रमुख:

ये परिभाषाएँ डोसियर में “परम्परा का जोड़” हैं — १.४.२ के समान “सूत्र-वाक्य” नहीं, बल्कि व्याख्या-तंत्र। आधुनिक गणना-दृष्टि से वे priority layers हैं: exception > general; obligatory > contingent; internal dependency > external; equal residual → later in text order.

क्रम और पाइपलाइन। संघर्ष-निर्णय केवल “कौन जीते” नहीं; कब लागू हो भी। पूर्वत्रासिद्धम् (८.२.१) घोषित करता है कि ८.२ से आगे की क्रियाएँ पूर्ववर्ती नियमों के लिए “असिद्ध” — अदृश्य — हैं। सपादसप्ताध्यायी बनाम त्रिपादी: बाद का चरण पहले में फीडबैक नहीं डालता। टकराव का समाधान इसलिए केवल “पर” नहीं; मंचीय मूल्यांकन भी है — staged evaluation। स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०) और स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (१.१.५६) प्रतिस्थापन की समानता व विरासत तय करते हैं; संघर्ष तब उठता है जब दो आदेश एक ही स्थान पर दावा करें।

प्राथमिकता — सारणी।

स्तरसिद्धांतस्रोत-प्रकार
१अपवाद > उत्सर्गशास्त्रीय व्याख्या + परिभाषा
२नित्य > अनित्यपरिभाषा-परम्परा
३अन्तरङ्ग > बहिरङ्गपरिभाषा-परम्परा
४समान बल → परं कार्यम् (१.४.२)सूत्र-पाठ

एक कामकाजी टकराव (worked conflict)। कल्पना कीजिए दो विधियाँ: (क) एक उत्सर्ग जो किसी पद/धातु-अन्त पर सामान्य आदेश देता है; (ख) एक अपवाद जो उसी स्थान पर विशेष आदेश देता है। चरण १ — क्या अपवाद है? यदि (ख) (क) का अपवाद है, तो १.४.२ तक पहुँचने की आवश्यकता नहीं: (ख) लागू, (क) निरुद्ध। चरण २ — समान बल? यदि दोनों उत्सर्ग-स्तर पर, या दोनों अपवाद-स्तर पर, और नित्य/अन्तरङ्ग में भी बराबरी, तब विप्रतिषेधे परं: पाठ में जो बाद में है, वही कार्य। चरण ३ — स्थान और सन्दर्भ। १.१.६६ (सप्तमी = दक्षिण/दायाँ सन्दर्भ), १.१.६७ (पञ्चमी = बायाँ), १.१.४९ (षष्ठी = लक्ष्य) तय करते हैं कि आदेश किस पर, किस वातावरण में लगता है। चरण ४ — त्रिपादी जाँच। यदि एक कार्य ८.२+ का है और दूसरा पूर्व का, तो पूर्वत्रासिद्धम् के कारण “समान विरोध” अक्सर बनता ही नहीं — बाद का चरण पहले को नहीं देखता।

उदाहरण-ढाँचा (सिद्धांत, न कि किसी असिद्ध उद्धरण का दावा): मान लीजिए दो आदेश एक ही स्वर-स्थान पर “यण्-प्रकार” बनाम अन्य आदेश का दावा करें। पहले जाँचें — क्या एक दूसरे का अपवाद है? नहीं तो नित्य/अन्तरङ्ग। फिर भी बराबरी हो तो परं — जो सूत्र-संख्या/पाठ-स्थिति में आगे है। इको यणचि (६.१.७७) जैसी विधियाँ rewrite-रूप में “इक् → यण् / _ अच्” हैं; टकराव तब है जब कोई दूसरी विधि उसी इक्-स्थान पर दूसरा आदेश चाहे। मशीन का उत्तर: परिभाषा-क्रम + १.४.२, फिर (यदि लागू हो) ८.२+ की असिद्धि।

क्यों यह “कंप्यूटर-विज्ञान” नहीं, पर उससे मिलता-जुलता है। डॉसियर का विनम्र फ्रेम: लगभग ४,००० नियमों (~३,९८३ इस संस्करण में, संस्कृत विकिस्रोत, २०२६-०८-१०; संस्करण-भेद ≈३,९५९–३,९९६) का जनन-व्याकरण, औपचारिक भाषा-सिद्धांत से ~२,४०० वर्ष पहले का। १९६७ में पी. ज़ेड. इन्गरमन ने BNF को “Pāṇini-Backus Form” कहने का प्रस्ताव रखा — स्रष्टा का दावा नहीं, एक आधुनिक पढ़त। संघर्ष-निर्णय यहाँ “रहस्य” नहीं; executable discipline है: exception, obligatory, internal, then later-wins, with a non-feedback late pipeline।

संक्षेप में पंक्तियाँ।

पाणिनि (मूलतः शलातुर, गांधार; विद्वत्-सहमति ~५वीं–४थी शती ई.पू., कोई निश्चित वर्ष नहीं) ने केवल रूप बनाए नहीं — उन्होंने जब नियम भिड़ें तब का न्याय भी सूत्र में बाँधा। संघर्ष-निर्णय अष्टाध्यायी का कोर्ट है: कम शब्दों में, पूरा प्राथमिकता-ग्राफ।

सपादसप्ताध्यायी1.1 – 8.1 · 3,715 सूत्र-क्षेत्रपारस्परिक दृश्य — nitya/para/antaraṅga निर्णयत्रिपादी8.2 → 8.3 → 8.4 (क्रमशः)268 सूत्र · एक-दिश प्रवाहपूर्वत्रासिद्धम् (8.2.1): त्रिपादी का फल पीछे के लिए अदृश्य — no feedback
त्रिपादी-यन्त्र — the staged pipeline: the सपादसप्ताध्यायी (1.1–8.1) is one mutually-visible rule space; the त्रिपादी (8.2–8.4) applies afterwards in order, and its outputs are असिद्ध — invisible upstream. A compiler pass structure, stated in one sūtra (8.2.1).

त्रिपादी-यन्त्र · The Staged Pipeline

पूर्वत्रासिद्धम् — the cut that freezes the earlier machine. अष्टाध्यायी की गणना केवल “नियमों की सूची” नहीं है; वह staged evaluation है — क्रमिक स्तरों पर कार्य, जिनमें बाद का स्तर पहले को पुनर्लेखित नहीं कर सकता। इसी अनुशासन का केन्द्रीय सूत्र है पूर्वत्रासिद्धम् (८.२.१): आठवें अध्याय के द्वितीय पाद से आगे जो कुछ होता है, वह पूर्व (अर्थात् १.१–८.१ के क्षेत्र) के लिए असिद्ध — “अदृश्य / अनुपलब्ध” — माना जाता है। अर्थ यह नहीं कि वे रूप “असत्य” हैं; अर्थ यह है कि पूर्ववर्ती नियम उन्हें इनपुट की तरह नहीं देख सकते। feedback loop बंद है। Later stages cannot feed earlier ones.

सपादसप्ताध्यायी बनाम त्रिपादी — two blocks, one pipeline. परम्परा और आधुनिक पठन दोनों इस विभाजन को स्पष्ट रखते हैं:

ब्लॉकपरिसरभूमिका (pipeline stage)
सपादसप्ताध्यायी१.१ – ८.१मुख्य शब्द-निर्माण: सन्धि-पूर्व संयोजन, प्रत्यय, स्थान, अधिकार — primary derivation
त्रिपादी८.२ – ८.४अंतिम ध्वनि-स्तर: later sandhi, final surface adjustments — terminal stage

नाम स्वयं संख्या-गणित है: सपाद-सप्त-अध्यायी — साढ़े सात अध्याय (अध्याय १–७ + ८.१); त्रिपादी — तीन पाद (८.२, ८.३, ८.४)। हमारे संस्करण (Sanskrit Wikisource, fetched २०२६-०८-१०) में अष्टाध्यायी ३,९८३ सूत्रों की है — संस्करणानुसार ≈३,९५९–३,९९६; किन्तु architecture संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है: ८ अध्याय × ४ पाद = ३२ पाद, और उनमें से अंतिम तीन एक sealed post-processing band बनाते हैं।

staged evaluation, no feedback — क्या “असिद्ध” technically करता है। यदि कोई नियम ८.२ के बाद लागू होकर ध्वनि-रूप बदल दे, तो क्या ६.१ या ७.२ का कोई विधि-सूत्र उस नये रूप पर फिर से दौड़ सकता है? पूर्वत्रासिद्धम् कहता है — नहीं। त्रिपादी का आउटपुट upstream visibility नहीं पाता। यह:

आधुनिक pipeline analogy — compiler / IR / codegen, without inflation. एक compiler pipeline में:

त्रिपादी ठीक इसी phase barrier का वैयाकरण संस्करण है। सपादसप्ताध्यायी ≈ derive the morphological-phonological IR; त्रिपादी ≈ apply terminal surface rules in a sealed pass. “computer” शब्द यहाँ रूपक है, दावा नहीं — दावा केवल यह है कि executable specification की तरह अष्टाध्यायी ordered stages + non-feedback निर्दिष्ट करती है; १९६७ में P. Z. Ingerman ने Backus–Naur Form को “Pāṇini–Backus Form” कहने का प्रस्ताव किया था — सूत्र-प्रणाली formal-grammar notation से लगभग २,४०० वर्ष पूर्व की है (पाणिनि: mainstream scholarship c. ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व; कुछ ६वीं शती ईसा-पूर्व भी तर्क करते हैं — exact year indefensible)। Bloomfield की प्रशंसा (“one of the greatest monuments of human intelligence”) reception है, architecture की जगह नहीं।

यन्त्र के अन्य cog जो staging को संभव बनाते हैं। त्रिपादी अकेली “जादू” नहीं; वह machine के अन्य भागों पर टिकी है:

क्या “no feedback” का अर्थ है कि त्रिपादी में नियम एक-दूसरे को नहीं देखते? नहीं। असिद्धता दिशा-विशेष है: earlier rules do not see later results। त्रिपादी के अंदर ८.२–८.४ स्वयं परस्पर और १.४.२ आदि metarules के अधीन चल सकते हैं; barrier upstream re-entry पर है। यही कारण है कि surface sandhi और final adjustments “स्थिर” लगते हैं — वे derivation को बीच में खोलकर नहीं बिगाड़ते।

डिकोड-सेतु — exact-equality, same spine. इस पुस्तक के engines (pratyāhāra expander; SS-book pipeline की exact-equality oracle discipline) त्रिपादी को “लगभग” नहीं पढ़ते: stage boundaries, sūtra ids, और invisibility claims textual facts हैं; dates scholarly ranges हैं; computed tables (४२ pratyāhāras; edition count ३,९८३) engine outputs हैं। Encoding-chapters (कटपयादि, आर्यभटीय, भूतसंख्या) से साझा रीढ़ यही है — number ↔ language, rule ↔ stage — mysticism नहीं, reversible/deterministic specification।

एक वाक्य में architecture: सपादसप्ताध्यायी शब्द का मुख्य ग्राफ बनाती है; पूर्वत्रासिद्धम् (८.२.१) एक one-way valve खोलता है; त्रिपादी terminal surface pass चलाती है — staged pipeline, no feedback — और यही कारण है कि लगभग चार हज़ार सूत्रों का generative system, उत्तर-वैदिक काल के अन्त में (लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व), आज भी executable की तरह पढ़ा जा सकता है।

भाग ४

सञ्ज्ञा-प्रकरण

Adhyāya 1 · Pāda 1 — Complete
75 सूत्र, गहन-स्तर
1.1.1
वृद्धिरादैच्
vṛddhirādaic

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वृद्धि-वर्ग की नाम-परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृद्धिः (१/१) = “वृद्धि” संज्ञा; आत् (५/१, अ+आत्) = दीर्घ आ; ऐच् (१/१, प्रत्यहार) = ऐ और औ — मिलकर “आ, ऐ, औ”।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (अष्टाध्यायी का प्रथम सूत्र; संज्ञा-प्रकरण का आरम्भ)।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र व्याकरण-यन्त्र की पहली नामपट्टी है। जहाँ भी आगे “वृद्धि” कही जाएगी, उसका मतलब होगा केवल तीन स्वर: आ, ऐ और औ। आत् से दीर्घ आ लिया गया; ऐच् प्रत्यहार से ऐ और औ — दोनों शिवसूत्र-श्रृंखला से खिंचकर आए हैं। यह कोई रूप-बदलने वाली विधि नहीं, बल्कि आगे की विधियों के लिए एक स्थिर संकेत-कोश है। बिना इस संज्ञा के “वृद्धि करो” कहना अर्थहीन रहता।

English rendering Vṛddhi is the technical name for the vowels ā, ai, and au. The sūtra does not rewrite anything; it pins a label that later operational rules will invoke.

औपचारिक रूप (Formal) वृद्धि ≔ {आ, ऐ, औ}
(ऐच् = {ऐ, औ}; आत् ∪ ऐच्)

उदाहरण
1. संज्ञा-प्रयोग: ७.२.११५ अचो ञ्णिति में “वृद्धि” = आ/ऐ/औ — कृ + अण् → कार (ऋ → आर्, वृद्धि-स्तर)।
2. नी + ण्वुल् → नायक (ई → ऐ)।
3. भी + ण्वुल् → भायक (ई → ऐ)।

डिकोड-सेतु ऐच् हमारे प्रत्यहार-इंजन से शिवसूत्रों पर विस्तारित होता है — ऐच् = ऐ औ; आत् जोड़कर वृद्धि-समुच्चय {आ, ऐ, औ} बिल्कुल गणना-सिद्ध है, अनुमान नहीं।

1.1.2
अदेङ् गुणः
adeṅ guṇaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — गुण-वर्ग की नाम-परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत् (५/१) = ह्रस्व अ; एङ् (१/१, प्रत्यहार) = ए और ओ; गुणः (१/१) = “गुण” संज्ञा।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतंत्र संज्ञा; वृद्धि के ठीक बाद युग्म-संज्ञा)।

हिन्दी व्याख्या जैसे वृद्धि तीन स्वरों का नाम था, गुण तीन अन्य स्वरों का नाम है — अ, ए, ओ। अत् से अ; एङ् से ए और ओ। यह भी शुद्ध संज्ञा है: रूप नहीं बदलता, केवल शब्दावली बाँधता है। आगे जब कोई विधि “गुण” विधान करेगी, स्थानापन्न यही तीन होंगे — इक्-स्वरों के स्थान पर (१.१.३ की सहायता से)। वृद्धि और गुण मिलकर संस्कृत की “स्वर-उन्नयन” की दो सीढ़ियाँ बनते हैं।

English rendering Guṇa is the technical name for a, e, and o. Together with 1.1.1 it supplies the two graded vowel-sets that later substitution rules will write into stems and roots.

औपचारिक रूप (Formal) गुण ≔ {अ, ए, ओ}
(एङ् = {ए, ओ}; अत् ∪ एङ्)

उदाहरण
1. भू + शप् + तिप् → भो + अ + ति → भवति (ऊ → ओ = गुण, ७.३.८४)।
2. नी + तृच् → नेतृ (ई → ए = गुण)।
3. कृ + उ + तिप् → करोति (ऋ → अर् = गुण-स्तर का व्यवहार)।

डिकोड-सेतु एङ् = ए ओ — प्रत्यहार-इंजन का सीधा विस्तार; गुण-संज्ञा = {अ} ∪ एङ्, गणना से सत्यापित समुच्चय।

1.1.3
इको गुणवृद्धी
iko guṇavṛddhī

सूत्र-प्रकार परिभाषा — गुण/वृद्धि का लक्ष्य-स्वर (स्थानी) तय करती है।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इकः (६/१, इक्) = इ उ ऋ ऌ (और दीर्घ ई ऊ ॠ) के स्थान में; गुणवृद्धी (१/२) = गुण और वृद्धि (दोनों)।

अनुवृत्ति गुण (१.१.२) और वृद्धि (१.१.१) की संज्ञाएँ — यहाँ “क्या बदले” का मेटा-नियम।

हिन्दी व्याख्या १.१.१–२ ने केवल नाम दिए; यह सूत्र बताता है कि वे नाम जब विधि में आएँ, तो स्थानी इक्-वर्ग है। अर्थात् “गुण करो / वृद्धि करो” कहने पर इ, उ, ऋ, ऌ (तथा दीर्घ) ही बदले जाते हैं — अ/आ स्वयं गुण-वृद्धि के स्थानी नहीं बनते इस परिभाषा से। जोड़ी प्रसिद्ध है: इ/ई → ए (गुण) या ऐ (वृद्धि); उ/ऊ → ओ या औ; ऋ/ॠ → अर् या आर्; ऌ → अल् या आल्। यह परिभाषा आगे की पूरी सार्वधातुक–आर्धधातुक गुण-वृद्धि मशीनरी का द्वार है।

English rendering When guṇa or vṛddhi is prescribed without a further target, the substitutenda are the ik vowels. The sūtra is a metarule that wires the labels of 1.1.1–1.1.2 onto the ik set.

औपचारिक रूप (Formal)
यदि विधि कहे “गुण” या “वृद्धि” (बिना अन्य स्थानी के):
इक् → गुण | वृद्धि
मानक प्रतिचित्रण:
इ/ई ↦ ए (गुण), ऐ (वृद्धि)
उ/ऊ ↦ ओ, औ
ऋ/ॠ ↦ अर्, आर्
ऌ ↦ अल्, आल्
इक् = {इ, उ, ऋ, ऌ} (दीर्घ सहित स्थानी-वर्ग)

उदाहरण
1. नी + तृच् → नेतृ — ई (इक्) → ए (गुण)।
2. भू + शप् → भो(+अ) → भव- — ऊ → ओ (गुण)।
3. कृ + अण् → कार — ऋ → आर् (वृद्धि, ७.२.११५)।

1.1.4
न धातुलोप आर्धधातुके
na dhātulopa ārdhadhātuke

सूत्र-प्रकार नियम — गुण/वृद्धि का निषेध (धातुलोप + आर्धधातुक)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न = नहीं; धातुलोपे (७/१) = धातु के अवयव का लोप होने पर; आर्धधातुके (७/१) = आर्धधातुक प्रत्यय परे।

अनुवृत्ति इको गुणवृद्धी (१.१.३) — उसी गुण/वृद्धि विधान का निषेध-क्षेत्र।

हिन्दी व्याख्या १.१.३ ने इक् पर गुण/वृद्धि खोली; यह सूत्र एक द्वार बन्द करता है। जब आर्धधातुक प्रत्यय के कारण धातु का कोई अवयव लुप्त हो चुका हो, तब शेष बचे इक् पर गुण या वृद्धि नहीं चलती। आशय यह है कि “आधा धातु कट चुका” — उस घायल अङ्ग पर उन्नयन-विधि नहीं थोपी जाए। सार्वधातुक पक्ष इसमें नहीं आता; निषेध आर्धधातुक-परक धातुलोप तक सीमित है। यह अपवाद आगे १.१.५–६ के साथ मिलकर गुण-वृद्धि की अनुशासित सीमाएँ बाँधता है।

English rendering Guṇa and vṛddhi do not replace an ik vowel when a portion of the root has been elided before an ārdhadhātuka affix. Elision-plus-ārdhadhātuka is a blocking environment for 1.1.3.

औपचारिक रूप (Formal)
¬(इक् → गुण|वृद्धि) / धातुलोप _ आर्धधातुक
(अर्थात् १.१.३ निषिद्ध जब context = root-segment deletion before ārdhadhātuka)

उदाहरण
1. नी + तृच् → नेतृ — यहाँ धातुलोप नहीं; गुण लागू (तुलना-दृष्टान्त: निषेध की सीमा स्पष्ट)।
2. आर्धधातुक परे धातु-खण्ड-लोप वाले प्रसंगों में शेष इक् अगुणित/अवृद्ध रहता है — काशिका-पंक्ति: धातोरवयवलोपे आर्धधातुके परतः इको गुणवृद्धी न स्तः।
3. व्याख्या-भेद: “धातुलोप” को कुछ आचार्य केवल स्पष्ट अवयव-लोप पर बाँधते हैं; विस्तारित पठन में सम्प्रसारणादि-लोप-सदृश प्रसंग भी जुड़े माने जाते हैं — दोनों में निष्कर्ष एक: उस वातावरण में १.१.३ नहीं चलता।

1.1.5
ग्क्ङिति च
gkṅiti ca

सूत्र-प्रकार नियम — क्/ग्/ङ्-इत् प्रत्ययों परे गुण/वृद्धि-निषेध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्क्ङिति (७/१) = ग्, क्, ङ् इत्-चिह्न वाले (प्रत्यय परे); च = भी (१.१.४ के निषेध का अनुकर्ष)।

अनुवृत्ति न … इको गुणवृद्धी (१.१.३–१.१.४) — “न” और गुणवृद्धी दोनों।

हिन्दी व्याख्या जिन प्रत्ययों में इत्-मार्कर क्, ग् या ङ् हो, उनके परे भी इक् को गुण/वृद्धि नहीं होती। क्त्वा, क्त, क्तिन्, snu के ङ्इत् आदि — सब “ठंडे” प्रत्यय: वे धातु-स्वर को चढ़ने नहीं देते। यह निषेध धातु-रूपों की पहचान बनाता है — कृत्वा न कि कर्त्वा, चित न कि चेत। इत् यहाँ ठीक टैग/फ्लैग की तरह काम करता है: प्रत्यय के शरीर में चुपचाप बैठा संकेत पूरे गुण-वृद्धि इंजन को ऑफ कर देता है। १.१.४ वातावरण-निषेध था; १.१.५ प्रत्यय-टैग-निषेध है।

English rendering Guṇa and vṛddhi are also blocked before affixes whose it-markers are k, g, or ṅ. The anubandha acts as a flag that suppresses the ik → guṇa/vṛddhi rewrite.

औपचारिक रूप (Formal)
¬(इक् → गुण|वृद्धि) / _ प्रत्यय[it ∈ {क्, ग्, ङ्}]
(१.१.३ का निषेध; “च” से १.१.४-निषेध-शृंखला में जुड़ता है)

उदाहरण
1. कृ + क्त्वा → कृत्वा (न तु कर्त्वा) — क् इत् ⇒ गुण निषिद्ध।
2. चि + क्त → चित (न तु चेत) — क् इत्।
3. भिद् + क्तिन् → भित्ति — क् इत्; इक् अगुणित।

डिकोड-सेतु इत्-मार्कर (१.३.२–१.३.९, तस्य लोपः) = टोकन-फ्लैग; ग्/क्/ङ् फ्लैग ऑन ⇒ गुण-वृद्धि-रीराइट ऑफ — exactly tag-driven rewrite control, as in our formal decode of the sūtra machine.

1.1.6
दीधीवेवीटाम्
dīdhīvevīṭām

सूत्र-प्रकार नियम — विशिष्ट धातु/आगम पर गुण/वृद्धि-निषेध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दीधी-वेवी-इटाम् (६/३) = दीधी, वेवी और इट् — इनके (इक् पर गुण/वृद्धि नहीं)।

अनुवृत्ति न … गुणवृद्धी (१.१.३–१.१.५ की निषेध-श्रृंखला) — “न” जारी।

हिन्दी व्याख्या तीन और नाम इस निषेध-सूची में जुड़ते हैं: धातु दीधी और वेवी, तथा आगम इट्। दीधी और वेवी स्वयं “दीर्घ-ई” रूप की धातुएँ हैं — उन्हें गुण से ए/ओ की ओर नहीं ढकेला जाता; रूप दीध्यते, वेव्यते जैसे अगुणित ही रहते हैं। इट् मध्येऽगम (इ) भी गुण नहीं लेता — कथित, एधित में इट् का इ ए नहीं बनता। सूत्र षष्ठी बहुवचन से तीनों को एक साथ स्थानी-पक्ष में बाँधता है। यह १.१.३ के व्यापक द्वार पर अंतिम छोटी किन्तु कठोर सांकल है।

English rendering Guṇa and vṛddhi do not apply to the roots dīdhī and vevī, nor to the augment iṭ. Three named exceptions complete the blocking set begun in 1.1.4–1.1.5.

औपचारिक रूप (Formal)
¬(इक् → गुण|वृद्धि) for स्थानी ∈ {दीधी, वेवी, इट्}
(इट् = vowel-augment i; its i stays i, never guṇa e)

उदाहरण
1. दीधी + यक् + ते → दीध्यते (ई अगुणित; न तु देध्यते)।
2. वेवी + यक् + ते → वेव्यते।
3. कथ् + इट् + क्त → कथित (इट् का इ → ए नहीं; न “कथेत”)।

1.1.7
हलोऽनन्तराः संयोगः
halo'nantarāḥ saṃyogaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — संयोग-नाम की परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हलोः (हल् + षष्ठी; व्यञ्जनों के) अनन्तराः (बिना बीच के स्वर के, क्रमागत) संयोगः (संयोग-संज्ञा वाले होते हैं)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र सञ्ज्ञा-सूत्र)।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र बताता है कि जब दो या अधिक व्यञ्जन लगातार आएँ और उनके बीच कोई स्वर न हो, तो वह समूह संयोग कहलाता है। “अनन्तर” का अर्थ है—बिच में कोई अन्य वर्ण (विशेषतः स्वर) नहीं। उदाहरण में क् + त् जैसे युग्म, या स् + त् + र् जैसे त्रिक, सब संयोग हैं। आगे के अनेक विधिसूत्र (संयोगे गुरुः, संयोगान्तस्य लोपः आदि) इसी नाम पर टिके हैं। बिना इस परिभाषा के “जुड़े व्यञ्जन” की गणना नियमबद्ध नहीं हो पाती।

English rendering Consecutive consonants with no intervening vowel receive the technical name saṃyoga (“cluster”). Later metrical, sandhi, and elision rules treat that named unit as a single structural object.

औपचारिक रूप (Formal) संयोग ≔ { σ = c₁c₂…cₙ | n ≥ 2, प्रत्येक cᵢ ∈ हल्, और किसी i पर cᵢ तथा cᵢ₊₁ के बीच कोई अच् नहीं }।

उदाहरण (1) अग्निः — ग् + न् = संयोग। (2) स्त्री — स् + त् + र् = संयोग। (3) शब्द “कर्म” में र् + म् = संयोग।

1.1.8
मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः
mukhanāsikāvacano'nunāsikaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अनुनासिक का नामकरण।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुख-नासिका-वचनः (जो मुख और नासिका दोनों से उच्चरित हो) अनुनासिकः (अनुनासिक-संज्ञा वाला)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या जो ध्वनि केवल मुख से नहीं, बल्कि मुख के साथ नासिका से भी निकलती है, उसे अनुनासिक कहते हैं। ङ ञ ण न म—ये स्पर्श अनुनासिक हैं; स्वरों पर अनुनासिकता (अँ इँ आदि) भी इसी वर्ग में आती है। अनुस्वार की व्यवहार-चर्चा परंपरा में अलग भी चलती है, पर मूल कसौटी यही “मुख + नासिका” है। आगे के विधिसूत्र (अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः, अमोऽनुनासिकः आदि) इसी नाम को पकड़ते हैं। यह केवल “नाक से बोलना” नहीं—यह व्याकरणीय ध्वनि-वर्ग की सञ्ज्ञा है।

English rendering A sound produced through both the oral and the nasal cavities is termed anunāsika. The label covers nasal stops and nasalized vowels, and later rules inherit that class as a single named set.

औपचारिक रूप (Formal) अनुनासिक ≔ { x ∈ ध्वनि | उच्चारण-मार्ग(x) = मुख ∧ नासिका }।

उदाहरण (1) अङ्गम् — ङ् अनुनासिक। (2) चञ्चल — ञ् अनुनासिक। (3) अँ (अनुनासिक अ) — मुख-नासिका दोनों से।

1.1.9
तुल्यास्यप्रयत्नम् सवर्णम्
tulyāsyaprayatnam savarṇam

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सवर्ण-संज्ञा का निर्धारण।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुल्य-आस्य-प्रयत्नम् (समान आस्य = उच्चारण-स्थान, और समान प्रयत्न = आभ्यन्तर/बाह्य प्रयास वाला) सवर्णम् (सवर्ण कहा जाता है)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (अगला सूत्र इसे सीमित करता है)।

हिन्दी व्याख्या दो वर्ण सवर्ण तब कहलाते हैं जब उनका उच्चारण-स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) एक हो और प्रयत्न भी एक हो। अ और आ—दोनों कण्ठ्य, विवृत—अतः सवर्ण; क ख ग घ ङ—एक स्थान, स्पर्श-प्रयत्न—सवर्ण-वर्ग। इसी सवर्णता पर दीर्घ-सन्धि (अकः सवर्णे दीर्घः) और अनेक आदेश टिके हैं। “समान दिखना” नहीं—“स्थान + प्रयत्न” की दोहरी समानता माप है। स्थान एक हो पर प्रयत्न भिन्न हो तो सवर्ण नहीं (जैसे क और ह—व्याख्या-भेद में स्थूल चर्चा होती है, पर शास्त्रीय कसौटी यही युग्म है)।

English rendering Sounds sharing the same place of articulation (āsya) and the same articulatory effort (prayatna) are savarṇa (“homogeneous”). That equivalence class drives lengthening and many substitutions later in the grammar.

औपचारिक रूप (Formal) सवर्ण(x, y) ⇔ आस्य(x) = आस्य(y) ∧ प्रयत्न(x) = प्रयत्न(y)। सवर्ण-वर्ग[x] ≔ { y | सवर्ण(x, y) }।

उदाहरण (1) अ + आ → आ (सवर्ण दीर्घ: दण्ड + अग्रम् → दण्डाग्रम्)। (2) इ + ई → ई (गिरी + ईश → गिरीश via सवर्ण-दीर्घ)। (3) क-वर्ग के क/ख/ग/घ/ङ परस्पर सवर्ण (स्थान-प्रयत्न-साम्य से)।

डिकोड-सेतु सवर्ण एक समतुल्यता-सम्बन्ध (equivalence) है—आधुनिक पुनर्लेखन में “same class” का गार्ड; `अकः सवर्णे दीर्घः` (6.1.101) जैसे नियम इसी predicate पर fire करते हैं, ठीक जैसे हमारे rewrite-rule decode में A → B / _ [सवर्ण] का शर्त-खण्ड।

1.1.10
नाज्झलौ
nājjhalau

सूत्र-प्रकार नियम — सवर्णता का निषेध-सीमांकन।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न (नहीं) अच्-हलौ (अच् = स्वर और हल् = व्यञ्जन—यह युग्म) [सवर्णौ]।

अनुवृत्ति सवर्णम् (1.1.9 से)—“स्वर और व्यञ्जन परस्पर सवर्ण नहीं।”

हिन्दी व्याख्या पिछले सूत्र की व्यापक परिभाषा को यह नियम काटता है: कोई स्वर और कोई व्यञ्जन कभी सवर्ण नहीं माने जाएँगे, चाहे स्थान की कोई स्थूल समानता दिखे। अ और ह दोनों कण्ठ-सम्बद्ध लग सकते हैं, फिर भी अच्–हल् युग्म सवर्ण-संज्ञा से बाहर है। बिना इस निषेध के सवर्ण-दीर्घ और सवर्ण-आदेश गलत जगह लग सकते थे। यह “अपवाद” नहीं, परिभाषा का शुद्धिकरण (filter) है। औपचारिक व्याकरण में ऐसे निषेध ही generative मशीन को overgeneration से बचाते हैं।

English rendering A vowel and a consonant are never savarṇa of each other. The restriction blocks over-application of homogeneity-based operations across the vowel/consonant divide.

औपचारिक रूप (Formal) ¬सवर्ण(x, y) यदि (x ∈ अच् ∧ y ∈ हल्) ∨ (x ∈ हल् ∧ y ∈ अच्)। अर्थात् सवर्ण ⊆ (अच्×अच्) ∪ (हल्×हल्) — क्रॉस-श्रेणी निषिद्ध।

उदाहरण (1) अ और ह — सवर्ण नहीं (नाज्झलौ)। (2) इ और य् — सवर्ण नहीं; इको यणचि से य् आदेश अलग तंत्र है, सवर्ण-दीर्घ नहीं। (3) उ और व् — उसी प्रकार अच्–हल् युग्म, सवर्ण-निषिद्ध।

डिकोड-सेतु 1.1.9 सेट-परिभाषा है, 1.1.10 उसका type-guard—स्वर/व्यञ्जन क्रॉस-मैच बंद। executable spec में यही “well-typed savarṇa” बनाए रखता है; oracle-discipline की तरह: सामान्य नियम + स्पष्ट निषेध, अनुमान से नहीं।

1.1.11
ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्
īdūdeddvivacanaṃ pragṛhyam

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — प्रगृह्य पदों का आरम्भिक वर्ग।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ईत् ऊत् एत् (ई, ऊ, ए—इत्-संज्ञक तकनीकी उल्लेख) द्विवचनम् (जो द्विवचनान्त हों) प्रगृह्यम् (प्रगृह्य-संज्ञा वाले—सन्धि से अस्पृष्ट)।

अनुवृत्ति कोई पूर्व-अनुवृत्ति नहीं; स्वयं प्रगृह्य-अधिकार का बीज।

हिन्दी व्याख्या द्विवचन के वे रूप जिनका अन्त ई, ऊ या ए हो, प्रगृह्य कहलाते हैं—अर्थात् उनके बाद स्वरादि आने पर भी सामान्य स्वर-सन्धि नहीं होती। हरी + एतौ → हर्येतौ नहीं, हरी एतौ ही रहता है। विष्णू + इमौ, गङ्गे + अत्र—यही नियम। “प्रगृह्य” का शाब्दिक भाव “अलग पकड़ा गया”—संधि-मशीन से बाहर रखा गया टोकन। आगे 1.1.12–1.1.19 इसी संज्ञा का विस्तार करते हैं (निपात, सम्बुद्धि आदि)।

English rendering Dual forms ending in ī, ū, or e are pragṛhya: they resist ordinary vowel sandhi with a following vowel. The label marks a protected boundary in the sandhi pipeline.

औपचारिक रूप (Formal) प्रगृह्य ⊇ { w | w द्विवचनान्त ∧ (w अन्ते ई ∨ ऊ ∨ ए) }। सन्धि-नियम: यदि पूर्व पद ∈ प्रगृह्य, तो स्वर-संधि (6.1.77 आदि) उस सीमा पर लागू नहीं।

उदाहरण (1) हरी एतौ → हरी एतौ (ई-द्विवचन प्रगृह्य; इ→य् नहीं)। (2) विष्णू इमौ → विष्णू इमौ (ऊ-द्विवचन)। (3) गङ्गे अत्र → गङ्गे अत्र (ए-द्विवचन; ए+अ → ऐ नहीं)।

1.1.12
अदसो मात्
adaso māt

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अदस् के म-परवर्ती रूप प्रगृह्य।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अदसः (अदस् शब्द के) मात् (म् से आरम्भ/म्-पर—अर्थात् मकारोपेत द्विवचन-रूप) [प्रगृह्यम्]।

अनुवृत्ति प्रगृह्यम् (1.1.11 से); द्विवचन-सन्दर्भ भी प्रसंगतः साथ रहता है—अमू, अमी।

हिन्दी व्याख्या सर्वनाम अदस् के वे रूप जिनमें म् आता है—विशेषतः द्विवचन अमू और अमी—प्रगृह्य माने जाते हैं। अतः अमी + ईशाः → अमी ईशाः (अमीयाशाः जैसा सन्धि-रूप नहीं)। अमू + आसाते इसी तरह अस्पृष्ट रहते हैं। 1.1.11 ने सामान्य ई/ऊ/ए-द्विवचन को लिया; यह सूत्र अदस् की विशिष्ट आकृतियों को अलग से जकड़ता है क्योंकि उनकी रूप-रचना सामान्य द्विवचन-पट्टिका से हटकर है। छोटे सूत्र में बड़ा सुरक्षा-पट्ट—विशेष शब्द के लिए विशेष कवच।

English rendering Forms of adas that begin from m onward—classically the duals amū and amī—are pragṛhya. They stay unsandhied before a following vowel, completing the dual-protection begun in 1.1.11 for this pronoun.

औपचारिक रूप (Formal) प्रगृह्य ⊇ { रूप(अदस्) | रूप में म्-परवर्ती द्विवचन-आकृति } — शास्त्रीय सदस्य: अमू, अमी। सन्धि: पूर्व ∈ {अमू, अमी} ⇒ स्वर-संधि निषिद्ध / _.

उदाहरण (1) अमी ईशाः → अमी ईशाः (प्रगृह्य; ई+ई सन्धि नहीं)। (2) अमू आसाते → अमू आसाते (ऊ+आ → नहीं जुड़ते)। (3) अमी अत्र → अमी अत्र (इ-अन्त का सामान्य यण् नहीं)।

1.1.13
शे
śe

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — शे को प्रगृह्य ठहराता है।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शे — (प्रत्याख्यान-रूप) ‘शे’ यह रूप/प्रत्यय (प्रगृह्यम् अनुवर्तते)।

अनुवृत्ति प्रगृह्यम् (१.१.११ से)।

हिन्दी व्याख्या इससे पहले द्विवचन के ई/ऊ/ए तथा अदस्-रूपों को प्रगृह्य कहा गया। अब ‘शे’ — वैदिक द्विवचनात्मक प्रत्यय/रूप — को भी प्रगृह्य-सञ्ज्ञा मिलती है। प्रगृह्य होने से उसके अन्त का स्वर आगे स्वर आने पर भी सन्धि नहीं करता; रूप ‘जैसा है वैसा’ रहता है। यह नियम वैदिक रूप-परम्परा की रक्षा करता है, जहाँ शे वाले द्विवचन स्वतन्त्र उच्चरित होते हैं। आधुनिक दृष्टि से यह एक ‘सन्धि-निषेध ध्वज’ है — टोकन पर लगी रोक, जो पुनर्लेखन-नियम को वहाँ लागू नहीं होने देती।

English rendering The technical form/ending śe is designated pragṛhya: its final vowel does not undergo sandhi with a following vowel. The rule preserves independent pronunciation of certain Vedic dual forms.

औपचारिक रूप (Formal)
प्रगृह्य ⊇ { शे }
sandhi-block(X) ⇔ X ∈ प्रगृह्य
(शे + V → शे V, not fused)

उदाहरण
1. अग्निशे + अत्र → अग्निशे अत्र (ए+अ → कोई वृद्धि/गुण नहीं; प्रगृह्य)
2. इन्द्राग्निशे + इह → इन्द्राग्निशे इह

डिकोड-सेतु प्रगृह्य = token-flag “no-sandhi”; वही metadata-style tagging जो इत्-चिह्नों (१.३.२–१.३.९) में दिखता है — rewrite pipeline में selective disable.

1.1.14
निपात एकाजनाङ्
nipāta ekājanāṅ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — एकाच् निपात (आङ् छोड़) प्रगृह्य।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निपातः — अव्यय/निपात (१); एकाच् — एक स्वर-मात्र (प्रत्याहार अच्) वाला (१); अनाङ् — आङ् (निपात ‘आ’) को छोड़कर (१)।

अनुवृत्ति प्रगृह्यम् (१.१.११)।

हिन्दी व्याख्या जो निपात केवल एक स्वर का हो — इ, उ आदि — उसे प्रगृह्य कहा गया; आगे स्वर आने पर भी सन्धि नहीं। ‘आङ्’ अर्थात् निपात आ इस नियम से बाहर है, इसलिए आ + उदकम् → ओदकम् जैसे सन्धि चलते हैं। एकाच् में प्रत्याहार अच् की गणना काम करती है — स्वर-वर्ग की संक्षिप्त कुंजी। उदाहरण इ इन्द्रः, उ उमेशः क्लासिक हैं: कण्ठस्थ करने योग्य। यह छोटा-सा सूत्र बताता है कि अव्यय भी व्याकरण-यन्त्र में ‘विशेष टोकन’ हो सकते हैं।

English rendering A mono-vowel particle (eka-ac), other than the particle āṅ, is pragṛhya and resists vowel sandhi. The exclusion of ā lets ordinary fusion (ā + u → o) proceed where intended.

औपचारिक रूप (Formal)
प्रगृह्य ⊇ { n ∈ निपात | |ac(n)| = 1 ∧ n ≠ आङ् }
n + V → n ⌢ V (no sandhi) if n ∈ that set
आङ् + V → sandhi(आ, V) (exception)

उदाहरण
1. इ + इन्द्रः → इ इन्द्रः (इ→य् नहीं)
2. उ + उमेशः → उ उमेशः
3. आ + उदकम् → ओदकम् (अनाङ्: आ प्रगृह्य नहीं)

डिकोड-सेतु एकाच् = pratyāhāra अच् से एक-स्वर फ़िल्टर; प्रगृह्य-flag + pratyāhāra engine का संयुक्त decode.

1.1.15
ओत्
ot

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — ओकारान्त निपात प्रगृह्य।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ओत् — ओ (त् इत्/अन्वर्थ: ‘ओ’ वाला रूप) — निपात-सम्बद्ध ओकार।

अनुवृत्ति निपातः, प्रगृह्यम् (१.१.१४/१.१.११)।

हिन्दी व्याख्या निपात जो ओ पर समाप्त हों — अहो, अथो — वे भी प्रगृह्य हैं। ओ + अ/आ आदि पर ‘अव’ या वृद्धि का सन्धि-मार्ग यहाँ बंद रहता है। बोलचाल में ‘अहो अत्र’ अलग-अलग टुकड़ों में सुनाई देता है; यही व्याकरण यहाँ सुरक्षित रखता है। ओत् में त् केवल इत्-चिह्न है — रूप ‘ओ’ की सीमा बाँधता है, उच्चारण में नहीं आता। परिभाषा-श्रृंखला अब एकाच् से आगे बढ़कर ओकारान्त निपातों तक फैलती है।

English rendering Particles ending in o (technically marked ot) are pragṛhya: their final o does not fuse with a following vowel. Thus aho atra stays unjoined.

औपचारिक रूप (Formal)
प्रगृह्य ⊇ { n ∈ निपात | n ends with ओ }
ओ + V → ओ V (blocked sandhi; not अव् / औ …)

उदाहरण
1. अहो + अत्र → अहो अत्र (ओ+अ → अव नहीं)
2. अथो + इति → अथो इति

1.1.16
सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे
sambuddhau śākalyasyetāvanārṣe

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सम्बुद्धि-ओ + इति (अनार्ष) में शाकल्य-मत।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्बुद्धौ — सम्बुद्धि (सम्बोधन/vocative) में (७); शाकल्यस्य — शाकल्य के मत से (६); इतौ — ‘इति’ के परे होने पर (७); अनार्षे — अनार्ष (लौकिक/अवैदिक प्रयोग) में (७)।

अनुवृत्ति ओत्, प्रगृह्यम्; (मत-वैकल्पिकता शाकल्यस्य से)।

हिन्दी व्याख्या सम्बोधन में ओकारान्त रूप (हे विष्णो…) जब लौकिक भाषा में ‘इति’ से जुड़ता है, तो शाकल्य के अनुसार वह ओ प्रगृह्य माना जाता है — विष्णो इति, न कि विष्णविति। ‘अनार्षे’ वैदिक/आर्ष प्रयोग को इस विकल्प से अलग रखता है; वहाँ भिन्न सन्धि-रीति संभव। सूत्र नाम लेकर मत देता है — पाणिनि पूर्ववर्ती आचार्यों को खुले रूप से उद्धृत करते हैं। यह सन्धि-नियम नहीं, सञ्ज्ञा-विकल्प है: प्रगृह्य-ध्वज कब लगे।

English rendering Per Śākalya, a vocative final o before iti in non-Vedic speech is pragṛhya, so viṣṇo iti remains unjoined. The restriction anārṣe keeps Vedic practice outside this option.

औपचारिक रूप (Formal)
if form = vocative ∧ ends_with(ओ) ∧ next = इति ∧ register = अनार्ष
then (शाकल्य) form ∈ प्रगृह्य
⇒ विष्णो + इति → विष्णो इति (not विष्णव्+इति)

उदाहरण
1. विष्णो + इति → विष्णो इति (शाकल्य; प्रगृह्य)
2. रामो + इति → रामो इति (सम्बुद्धि-ओ + इति)

डिकोड-सेतु शर्तयुक्त flag-assignment — rewrite sandbox में context (सम्बुद्धि, इति, register) से sandhi-rule disable; formal grammar का conditional feature.

1.1.17
उञः
uñaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — उञ् (निपात उ) इतौ प्रगृह्य।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उञः — उञ् (निपात ‘उ’, ञ् इत्) का (६ — सम्बन्ध/स्थानीय रूप)।

अनुवृत्ति इतौ, अनार्षे, (शाकल्यस्य — परम्परा में प्रायः), प्रगृह्यम्।

हिन्दी व्याख्या निपात उञ् — अर्थात् तकनीकी रूप से चिह्नित निपात उ — जब (लौकिक प्रयोग में) इति परे हो, तो प्रगृह्य माना जाता है। फल: उ इति — उ और इति अलग; सन्धि से ‘विति’ नहीं बनता। ञ् इत्-चिह्न है: धातु/निपात की पहचान का टैग, उच्चारण में लुप्त (तस्य लोपः १.३.९ की दिशा)। यह १.१.१६ की इति-परक प्रगृह्य-पंक्ति को उ-निपात तक बढ़ाता है। छोटे अव्यय भी सन्धि-यन्त्र से ‘बाहर’ रखे जा सकते हैं — नियम की बारीकी यही है।

English rendering The particle uñ (the particle u with ñ as it-marker), when followed by iti (in the inherited non-Vedic frame), is pragṛhya: u iti does not undergo sandhi.

औपचारिक रूप (Formal)
उञ् = निपात उ with it = ञ्
if next = इति (अनार्ष-context) then उ ∈ प्रगृह्य
उ + इति → उ इति

उदाहरण
1. उ + इति → उ इति (उ→व् नहीं)
2. (प्रयोग) उ इति ह — प्रगृह्य बना रहता है

डिकोड-सेतु इत्-marker ञ् = silent metadata tag; प्रगृह्य = second flag — dossier का “tags/flags on tokens” मॉडल यहीं जीवित है।

1.1.18
ऊँ
ū~

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — ऊँ (प्लुत/अनुनासिक विकल्प) इतौ प्रगृह्य।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊँ — प्लुत-अनुनासिक ऊ (ऊँ) रूप; इति-परक विकल्प/रूप।

अनुवृत्ति उञः-प्रकरण से इतौ (अनार्षे) प्रगृह्यम्; ऊँ उञ् का वैकल्पिक रूप।

हिन्दी व्याख्या उञ् के स्थान पर (या उसके विकल्प में) ऊँ — खींचा/अनुनासिक ऊ — भी इति से पहले प्रगृह्य माना जाता है। श्रुति: ऊँ इति; सन्धि नहीं। यह उच्चारण-विकल्प को व्याकरणिक ध्वज से जोड़ता है — रूप बदलें, पर सन्धि-रोध बना रहे। व्याख्या-भेद: कुछ आचार्य इसे उ→ऊँ का विधि-सा विकल्प पढ़ते हैं, कुछ केवल प्रगृह्य-सञ्ज्ञा का विस्तार; काशिका-पंक्ति में प्रगृह्य-प्रकरण ही प्रधान है। पाठक दोनों रूप (उ इति / ऊँ इति) क्लासिक उदाहरणों में देखें।

English rendering The lengthened nasalized form ū̃ (written ऊँ), in the same iti-frame as uñ, is likewise pragṛhya. Tradition thus licenses both u iti and ū̃ iti without sandhi.

औपचारिक रूप (Formal)
ऊँ ∈ प्रगृह्य (in इति-context of 1.1.16–17)
optional: उञ् ~ ऊँ / _ इति
ऊँ + इति → ऊँ इति

उदाहरण
1. ऊँ + इति → ऊँ इति
2. उ इति / ऊँ इति — दोनों प्रगृह्य-पथ (विकल्प)

डिकोड-सेतु optional surface form + same no-sandhi flag — staged rewrite में variant exponents, एक ही blocking semantics।

1.1.19
ईदूतौ च सप्तम्यर्थे
īdūtau ca saptamyarthe

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — प्रगृह्य-सञ्ज्ञा का विस्तार।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ईदूतौ (ई + ऊ, द्विवचन — दीर्घ ईकार और ऊकार) च (भी) सप्तम्यर्थे (सप्तमी-अर्थ में, सप्तमी एकवचने — locative sense में)।

अनुवृत्ति प्रगृह्यम् (१.१.११ से)।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र प्रगृह्य-सञ्ज्ञा की श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। जो शब्द दीर्घ ईकार या ऊकार पर समाप्त हों और उनमें सप्तमी (अधिकरण) का अर्थ झलकता हो — “इसमें / इस पर” जैसा भाव — वे भी प्रगृह्य कहलाते हैं। प्रगृह्य होने से उनके अन्त का स्वर आगे स्वर आने पर भी सन्धि नहीं खाता; रूप ज्यों-का-त्यों बना रहता है। यह वैदिक और शास्त्रीय व्यवहार दोनों में देखा जाता है, जहाँ ऐसे रूपों को टुकड़े-टुकड़े बोलने की जगह दी गई है। क्लीयर संकेत: अर्थ सप्तमी का हो, मात्र रूप ई/ऊ-अन्त का होना पर्याप्त नहीं।

English rendering Long final ī and ū used in a locative sense are also termed pragṛhya, and therefore do not undergo vowel sandhi with a following vowel.

औपचारिक रूप (Formal)
If X ends in {ī, ū} ∧ sense(X) = locative (सप्तमी-अर्थ), then X ∈ प्रगृह्य।
Sandhi-flag: for V₁ ∈ प्रगृह्य, rewrite V₁ + V₂ ↛ fused form (identity: V₁ ⌢ V₂).

उदाहरण
1. सोमी + इति → सोमी इति (not सोम्यिति) — ई pragrhya in locative sense.
2. कर्कन्धू + इति → कर्कन्धू इति (not कर्कन्ध्विति) — ऊ likewise.

डिकोड-सेतु प्रगृह्य here is a no-rewrite flag on the sandhi pipeline: the token is marked so the context-sensitive vowel rules do not fire — the same “tag on token, then rewrite” discipline as the book’s rewrite-rule decode.

1.1.20
दाधा घ्वदाप्
dādhā ghvadāp

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — धातु-वर्ग घु की परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाधा (दा और धा रूप वाले धातु) घु (घु-सञ्ज्ञक) अदाप् (अ-दाप् — दाप् धातु को छोड़कर)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (नया अधिकार/सञ्ज्ञा-प्रकरण)।

हिन्दी व्याख्या जिन धातुओं का रूप दा या धा है, उन्हें पाणिनि “घु” नाम देते हैं — पर दाप् (दाप् लवने इत्यादि) इस सञ्ज्ञा से बाहर है। घु-सञ्ज्ञा आगे कई विधियों का द्वार खोलती है: घु से जुड़े आदेश, लोप, और प्रत्यय-व्यवहार इन्हीं धातुओं पर लागू होते हैं। उदाहरण के लिए ददाति, दधाति जैसे रूपों का विश्लेषण घु-नियन्त्रित नियमों से जुड़ता है। यह एक छोटा-सा लेबल है, पर धातु-गणना में बहुत काम का।

English rendering Roots of the shape dā and dhā receive the technical name ghu, with the explicit exception of the root dāp.

औपचारिक रूप (Formal)
घु ≔ { dhātu | surface ∈ {दा, धा} } \ {दाप्}
(classic members include डुदाञ्, डुधाञ् and related dā/dhā* stems under the tradition’s listing.)

उदाहरण
1. दा (डुदाञ्) ∈ घु → later ghu-conditioned operations (e.g. patterns feeding दत्त etc.).
2. धा (डुधाञ्) ∈ घु → same tag-class.
3. दाप् ∉ घु — explicitly carved out by अदाप्.

1.1.21
आद्यन्तवदेकस्मिन्
ādyantavadekasmin

सूत्र-प्रकार परिभाषा — एक-वर्ण पर आदि/अन्त का विस्तार।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आद्यन्तवत् (आदि और अन्त के समान) एकस्मिन् (एक में — जब एक ही अवयव/वर्ण हो, सप्तमी)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र परिभाषा)।

हिन्दी व्याख्या जब कोई विधि “आदि” (आरम्भ) या “अन्त” (समाप्ति) की बात करती हो और सामने केवल एक ही अवयव हो, तो वही एक दोनों भूमिकाएँ निभाता है — आदिवत् भी, अन्तवत् भी। बिना इस परिभाषा के एकाक्षर स्थानों पर आदि/अन्त वाले नियम अटक जाते। अभ्यास, आदेश, और कुछ लोप-विधियों में यही सेतु काम आता है। यह मेटा-नियम है: वस्तु पर नहीं, नियमों के लागू होने के ढंग पर।

English rendering When only a single element is present, it is treated as if it were both the initial and the final — so rules keyed to ādi or anta still apply.

औपचारिक रूप (Formal)
If |α| = 1, then α is both आदि(α) and अन्त(α):
∀ rule R referring to आदि or अन्त, R(α) is evaluated as R(ādi=α) ∧ R(anta=α).

उदाहरण
1. Single-phoneme base under an आदि-rule → that one phone counts as आदि.
2. Same base under an अन्त-rule → the same phone counts as अन्त.
3. Reduplication / edge-sensitive operations on monosegmental stems rely on this identity.

डिकोड-सेतु Edge-predicates (start/end of string) on a length-1 token — the same boundary-semantics a rewrite engine needs when context is written as “initial” or “final” rather than full left/right strings.

1.1.22
तरप्तमपौ घः
taraptamapau ghaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — तरप्/तमप् को घ कहा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तरप्तमपौ (तरप् और तमप्, द्विवचन) घः (घ-सञ्ज्ञक, प्रथमा)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या तुलना के प्रत्यय तरप् (-तर) और अतिशयता के प्रत्यय तमप् (-तम) को पाणिनि “घ” नाम देते हैं। आगे के सूत्र जब “घ” कहते हैं, तो इन्हीं दोनों की ओर इशारा होता है — स्त्री-प्रत्यय, आदेश, और कुछ रूप-रचनाएँ इसी सञ्ज्ञा से बँधी हैं। यह लेबल छोटा है, पर तारतम्य-रूपों (पटुतर, पटुतम) की पूरी श्रृंखला इसी पर टिकी है। घु (१.१.२०) धातु-वर्ग है; घ यहाँ प्रत्यय-वर्ग — दोनों अलग सञ्ज्ञाएँ हैं।

English rendering The comparative suffix tarap and the superlative suffix tamap are technically termed gha.

औपचारिक रूप (Formal)
घ ≔ {तरप्, तमप्}
(suffix-class tag; distinct from घु of 1.1.20.)

उदाहरण
1. पटु + तरप् → पटुतर (तरप् ∈ घ).
2. पटु + तमप् → पटुतम (तमप् ∈ घ).
3. Later gha-conditioned feminine/other operations apply to these suffixes as a class.

1.1.23
बहुगणवतुडति संख्या
bahugaṇavatuḍati saṃkhyā

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — संख्या-पदों का दायरा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुगणवतुडति (बहु, गण, वतु, डति — समाहार) संख्या (संख्या-सञ्ज्ञक)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं।

हिन्दी व्याख्या “बहु” और “गण”, तथा वतुप् (-वत्) और डति (-ति) से बने शब्द, संख्या-सञ्ज्ञक कहलाते हैं। यहाँ संख्या केवल १, २, ३… नहीं — गणना/परिमाण बताने वाले शास्त्रीय पदों का तकनीकी वर्ग है। तावत्, यावत्, कति जैसे रूप इसी द्वार से संख्या बनते हैं; बहु और गण स्वयं भी। आगे षट्-सञ्ज्ञा (१.१.२४) और संख्या-सम्बन्धी विधियाँ इसी आधार पर चलती हैं।

English rendering Bahu, gaṇa, and forms built with the affixes vatup and ḍati receive the technical designation saṃkhyā (numeral / quantitative word).

औपचारिक रूप (Formal)
संख्या ≔ {बहु, गण} ∪ { X | X formed with वतुप् } ∪ { X | X formed with डति }
(plus, by the wider grammar, the ordinary cardinals that the tradition treats under this heading where context requires.)

उदाहरण
1. बहु ∈ संख्या.
2. तद् + वतुप् → तावत् ∈ संख्या.
3. किम् + डति → कति ∈ संख्या.

1.1.24
ष्णान्ता षट्
ṣṇāntā ṣaṭ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — षट्-वर्ग (ष्/न्-अन्त संख्या)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ष्णान्ता (ष् या न् पर समाप्त, प्रथमा बहुवचन — ष्-अन्त और न्-अन्त) षट् (षट्-सञ्ज्ञक)।

अनुवृत्ति संख्या (१.१.२३ से)।

हिन्दी व्याख्या जो संख्या-शब्द ष्कार या न्कार पर समाप्त हों, उन्हें “षट्” कहा जाता है। षष् (छह), पञ्चन्, सप्तन्, अष्टन्, नवन्, दशन् — यही प्रसिद्ध सदस्य हैं। षट्-सञ्ज्ञा आगे विशेष व्यवहार बाँधती है: द्विवचन का अभाव, कुछ सुप्-रूप, और सम्बन्धित विधियाँ। नाम “षट्” मात्र छह तक सीमित नहीं — ष्/न्-अन्त संख्याओं का पूरा दल है। अनुवृत्ति से स्पष्ट है: पहले संख्या, फिर उसके भीतर ष्/न्-अन्त उपवर्ग।

English rendering Those saṃkhyā words that end in ṣ or n are termed ṣaṭ — the closed set that includes ṣaṣ, pañcan, saptan, and the other classic n-final numerals.

औपचारिक रूप (Formal)
षट् ≔ { X ∈ संख्या | X ends in ष् or न् }
Classic roster: षष्, पञ्चन्, सप्तन्, अष्टन्, नवन्, दशन्, …

उदाहरण
1. षष् ∈ षट् (ends in ष्).
2. पञ्चन् ∈ षट् (ends in न्) → dual blocked by later षट्-rules (e.g. behaviour under 1.4.14-area / related suP rules in the tradition).
3. सप्तन् ∈ षट् — same class membership.

1.1.25
डति च
ḍati ca

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — षट्-संज्ञा का विस्तार।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) डति — डत् (प्रत्यय)-अन्ते (सप्तमी: “डत् पर होने पर”); च — भी / तथा।

अनुवृत्ति षट् (१.१.२३–२४ से: षट्-संज्ञा विधीयमाना अनुवर्तते)।

हिन्दी व्याख्या इससे पहले ष्/न्-अन्त वाले अंकवाची शब्द षट् कहे गए। यह सूत्र जोड़ता है—जो शब्द डत्-प्रत्ययान्त हों, वे भी षट्-संज्ञक होते हैं। षट्-संज्ञा आगे उन विशेष विभक्ति-लोप-आदेशों का द्वार खोलती है जो “षट्-वर्ग” के अंकों पर लागू होते हैं (जैसे षड्भ्यो लुक् इत्यादि)। संक्षेप में: डत्-अन्त भी उसी तकनीकी सेट में गिना जाता है।

English rendering Words ending in the affix ḍat likewise receive the technical designation ṣaṭ, extending the ṣaṭ-class of numerals beyond those ending in ṣ or n.

औपचारिक रूप (Formal) षट् ⊇ { w | w ends in डत् } (with 1.1.24: also ends in ष्|न्). Flag: षट्(w) = true.

उदाहरण षष् → षट् (डत्-प्रकरण/षट्-संज्ञा) — षट् सु + … → षड्भिः / षट्सु (षट्-वर्गीय रूप); पञ्चन् → पञ्च (१.१.२४ ष्णान्त) + १.१.२५-श्रृंखला में षट्-व्यवहार।

1.1.26
क्तक्तवतू निष्ठा
ktaktavatū niṣṭhā

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — निष्ठा-प्रत्यय-युग्म की परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्त-क्तवतू — क्त और क्तवतु (द्वन्द्व; ऊकार इत्/उच्चारण-साहाय्य); निष्ठा — (एतयोः) निष्ठा-संज्ञा।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (नवीन संज्ञा-विधान)।

हिन्दी व्याख्या क्त और क्तवतु—ये दो कृदन्त-प्रत्यय—एक साथ “निष्ठा” कहलाते हैं। निष्ठा भूतकालिक/परिणाम-बोधक कृदन्तों का पारंपरिक नाम-सेट है: क्त से प्रायः कर्म/भाव-निष्ठ रूप (कृत, गत), क्तवतु से कर्तृ-निष्ठ रूप (कृतवान्, गतवान्)। आगे कई सूत्र “निष्ठा” कहकर दोनों को एक साथ पकड़ते हैं, जिससे नियम दुबारा न लिखने पड़ें। यह शुद्ध नामकरण है, कोई रूपान्तरण स्वयं नहीं करता।

English rendering The participial affixes kta and ktavatu are jointly termed niṣṭhā—the standard label for the past-participial pair used throughout later rules.

औपचारिक रूप (Formal) निष्ठा ≔ { क्त, क्तवतु }. (Tag-set on affix tokens; later rules quantify over “निष्ठा”.)

उदाहरण √कृ + क्त → कृत; √कृ + क्तवतु → कृतवान्; √गम् + क्त → गत — तीनों निष्ठा-प्रत्ययान्त।

डिकोड-सेतु निष्ठा एक named set/tag है—जैसे इत्-चिह्न metadata देते हैं, वैसे ही आगे के विधि-सूत्र “निष्ठा” को एक फ्लैग-सेट मानकर दोनों प्रत्ययों पर एक साथ लागू होते हैं; सञ्ज्ञा = set-definition in the formal decode.

1.1.27
सर्वादीनि सर्वनामानि
sarvādīni sarvanāmāni

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सर्वनाम-वर्ग का द्वार।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वादीनि — सर्व से आरम्भ गणपाठीय शब्द (नपुं. बहु.: “सर्वादि गण के सदस्य”); सर्वनामानि — सर्वनाम-संज्ञक।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (गण-आश्रित नवीन संज्ञा)।

हिन्दी व्याख्या गणपाठ के “सर्वादि” गण में पढ़े शब्द सर्वनाम कहलाते हैं—सर्व, विश्व, उभ, तथा यद्-तद्-किम्, युष्मद्-अस्मद् आदि। सर्वनाम-संज्ञा ही “सर्वस्मै / सर्वस्मात् / सर्वस्मिन्” जैसी सर्वनाम-विभक्तियों का अधिकार देती है; सामान्य पुंलिङ्ग “सर्वाय” नहीं चलता। यह संज्ञा आगे कई विकल्प-निषेधों (१.१.२८–३६) से काटी-छाँटी जाएगी—पहले सेट खुला, फिर सीमाएँ।

English rendering Members of the sarvādi list (Gaṇapāṭha) are designated sarvanāma—pronouns and pronominal adjectives that take the special pronominal case endings.

औपचारिक रूप (Formal) सर्वनाम ≔ सर्वादि ⊆ Gaṇapāṭha. Membership test: w ∈ सर्वादि ⇒ sarvanāma(w).

उदाहरण सर्व + ङे → सर्वस्मै (न तु सर्वाय); तद् + ङसि → तस्मात्; युष्मद् → तुभ्यम् — सर्वनाम-विभक्ति।

डिकोड-सेतु सर्वादि = बाह्य lookup-set (गणपाठ); इंजन की दृष्टि में closed-class dictionary membership—pratyāhāra ध्वनियों को संक्षिप्त करता है, गण शब्दों के सेट को। दोनों “encode/decode” की एक ही रीढ़: नाम → सदस्यता-परीक्षा।

1.1.28
विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ
vibhāṣā diksamāse bahuvrīhau

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — दिक्-बहुव्रीहि में वैकल्पिक संज्ञा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभाषा — विकल्प से (पक्षद्वय); दिक्-समासे — दिशावाची समास में (सप्तमी); बहुव्रीहौ — बहुव्रीहि समास में (सप्तमी)।

अनुवृत्ति सर्वनाम-संज्ञा (१.१.२७ से)।

हिन्दी व्याख्या सर्वादि में पूर्व, अपर, दक्षिण, उत्तर आदि दिक्-शब्द भी हैं। जब ये परस्पर दिक्-बहुव्रीहि बनाएँ (जैसे दक्षिण+पूर्व → दक्षिणापूर्व “आग्नेय दिशा/कोण”), तो सर्वनाम-संज्ञा अनिवार्य नहीं—विभाषा है: कभी सर्वनाम-विभक्ति, कभी सामान्य स्त्री/पुं विभक्ति। दोनों रूप प्रमाण-सम्मत माने जाते हैं। अगले सूत्र सामान्य बहुव्रीहि में संज्ञा काट देंगे; यहाँ केवल दिक्-बहुव्रीहि का कोमल विकल्प है।

English rendering In a bahuvrīhi compound of direction-words, the sarvanāma designation applies only optionally—allowing either pronominal or ordinary inflectional endings.

औपचारिक रूप (Formal) If w ∈ सर्वादि ∧ compound = bahuvrīhi(diks) then sarvanāma(w) ∈ {true, false} (विभाषा). Else fall through to 1.1.29+.

उदाहरण दक्षिणापूर्वा + ङि → दक्षिणापूर्वस्याम् या दक्षिणापूर्वायाम् (दोनों पक्ष); पूर्वापरौ (पूर्व+अपर दिक्-बहुव्रीहि) — सर्वनाम-व्यवहार वैकल्पिक।

1.1.29
न बहुव्रीहौ
na bahuvrīhau

सूत्र-प्रकार नियम — बहुव्रीहि में सर्वनाम-निषेध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न — नहीं; बहुव्रीहौ — बहुव्रीहि समास में (सप्तमी)।

अनुवृत्ति सर्वनाम-संज्ञा (१.१.२७); बहुव्रीहौ (१.१.२८ से, किन्तु दिक्समासे-विभाषा रहित व्यापक रूप में)।

हिन्दी व्याख्या सामान्य बहुव्रीहि में सर्वादि-शब्द सर्वनाम नहीं रह जाते। अतः “सर्वप्रिय” (जिसका सब प्रिय है) या “रूपवद्भार्य” जैसे बहुव्रीहियों पर सर्वस्मै-टाइप विभक्ति नहीं; सामान्य नाम-विभक्ति चलती है। १.१.२८ का दिक्-वैकल्प केवल दिक्-समास के लिए छूट था; शेष बहुव्रीहि पर यह निषेध कठोर है। संज्ञा का अपवाद-नियम: गण-सदस्यता पर्याप्त नहीं, समास-प्रकार भी तय करता है।

English rendering Outside the special dik-case, members of sarvādi in a bahuvrīhi compound do not receive the sarvanāma designation—and so take ordinary, not pronominal, endings.

औपचारिक रूप (Formal) bahuvrīhi(w) ∧ ¬dik-samāsa-option → ¬sarvanāma(w). (Overrides 1.1.27 for this environment.)

उदाहरण सर्वप्रिय + ङे → सर्वप्रियाय (न तु सर्वप्रियस्मै); रूपवद्भार्यः — सामान्य पुं-विभक्ति; चित्रगुः — बहुव्रीहि, सर्वनाम-निषेध-क्षेत्र।

1.1.30
तृतीयासमासे
tṛtīyāsamāse

सूत्र-प्रकार नियम — तृतीया-समास में सर्वनाम-निषेध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीया-समासे — तृतीयान्त (करण/हेतु-सम्बन्ध) समास में (सप्तमी)।

अनुवृत्ति न सर्वनाम-संज्ञा (१.१.२९ से निषेध-परम्परा); समासे-प्रकरण।

हिन्दी व्याख्या जब सर्वादि-शब्द तृतीया-तत्पुरुष में पूर्वपद बने—अर्थात् तृतीया-अर्थ से समास हो—तब भी सर्वनाम-संज्ञा नहीं होती। जैसे पूर्वेण कायेन विशिष्टः → पूर्वकायः: यहाँ “पूर्व” सर्वनाम की तरह विशेष विभक्ति-परम्परा नहीं खींचता। १.१.२९ ने बहुव्रीहि काटा, १.१.३० तृतीया-समास काटता है—दोनों अपवाद-श्रृंखला में सर्वनाम-सेट को वातावरण-संवेदी बनाते हैं। आगे और निषेध/विकल्प (द्वन्द्व, बहुवचन आदि) इसी सूत्र-पट्टी पर जुड़ते हैं।

English rendering In an instrumental (tṛtīyā) tatpuruṣa compound, sarvādi words likewise lose the sarvanāma designation.

औपचारिक रूप (Formal) tṛtīyā-samāsa(w) → ¬sarvanāma(w). Environment-sensitive retraction of the 1.1.27 flag.

उदाहरण पूर्वेण कायेन → पूर्वकायः (पूर्व पर सर्वनाम-संज्ञा निषिद्ध); सर्वेण गुणेन युक्तः → सर्वगुणः — तृतीया-समास-परम्परा में सर्वनाम-विभक्ति नहीं।

1.1.31
द्वन्द्वे च
dvandve ca

सूत्र-प्रकार विधि — सर्वनाम-संज्ञा का निषेध (द्वन्द्व में)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वन्द्वे (७/१) — द्वन्द्व-समास में; च — भी / तथा।

अनुवृत्ति न (१.१.२९), सर्वनाम-संज्ञा-विषय (१.१.२७ से); बहुव्रीहि–तृतीयासमास के निषेध-प्रकरण का विस्तार।

हिन्दी व्याख्या सर्वादि गण के शब्द नित्य सर्वनाम नहीं रह जाते जब वे द्वन्द्व-समास में बँधते हैं। १.१.२९–३० ने बहुव्रीहि और तृतीया-तत्पुरुष में संज्ञा रोकी थी; यह सूत्र उसी निषेध को द्वन्द्व तक बढ़ाता है। इसलिए द्वन्द्व-पद सामान्य प्रातिपदिक की तरह विभक्ति लेता है, सर्वनाम-विशेष रूप नहीं। आगे १.१.३२ जस् में विकल्प से संज्ञा लौटाएगा — यहाँ मूल नियम निषेध ही है।

English rendering Members of the sarvādi class do not receive the designation sarvanāma when they enter a dvandva compound. The bar already set for bahuvrīhi and instrumental tatpuruṣa is hereby extended to coordinate compounds.

औपचारिक रूप (Formal)
संज्ञा-निषेध: ∀ w ∈ सर्वादि, यदि w द्वन्द्व-समास-अवयव है ⟹ w ∉ सर्वनाम
(अधिकार: १.१.२७ की संज्ञा पर; cf. १.१.२९–३०)

उदाहरण
1. सर्व + अन्य (द्वन्द्व) + जस् → सर्वान्याः (नित्य सर्वनाम-रूप सर्वान्ये नहीं; विकल्प १.१.३२ से)
2. पूर्व + अपर (द्वन्द्व) → पूर्वापराः / (जसि विकल्प से) पूर्वापरे
3. अधर + उत्तर (द्वन्द्व) → अधरोत्तराः

1.1.32
विभाषा जसि
vibhāṣā jasi

सूत्र-प्रकार विधि — निषेध के ऊपर विकल्प (जसि)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभाषा — विकल्प से; जसि (७/१) — जस् (प्रथमा बहुवचन) के परे होने पर।

अनुवृत्ति न बहुव्रीहौ / तृतीयासमासे / द्वन्द्वे (१.१.२९–३१) के क्षेत्र में; सर्वनाम-संज्ञा (१.१.२७)।

हिन्दी व्याख्या जहाँ १.१.२९–३१ ने सर्वनाम-संज्ञा रोक दी है, वहाँ यदि आगे जस् (प्रथमा बहुवचन) लगे तो संज्ञा विकल्प से हो सकती है। एक पक्ष सामान्य प्रातिपदिक-रूप (-आः), दूसरा सर्वनाम-रूप (-ए) — दोनों शास्त्र-सम्मत। जस् से भिन्न विभक्ति में निषेध अबाधित रहता है; विकल्प केवल जस्-परक है। यह निषेध-प्रकरण का कोमल द्वार है — नियम कठोर, प्रयोग में लचीला।

English rendering Where the preceding rules have withheld sarvanāma status, that status is optionally restored when the nominative-plural ending jas follows. Elsewhere the prohibition stands.

औपचारिक रूप (Formal)
यदि संज्ञा १.१.२९–३१ से निषिद्ध ∧ परवर्ती = जस्
तो सर्वनाम-संज्ञा ∈ { लागू, निषिद्ध } (विभाषा)
अन्यत्र (जस्-भिन्न): निषेध नित्य

उदाहरण
1. द्वन्द्व + जस्: पूर्वापरे ∥ पूर्वापराः
2. द्वन्द्व + जस्: अधरोत्तरे ∥ अधरोत्तराः
3. (जस्-भिन्न, निषेध नित्य) पूर्वापराभ्याम् — सर्वनाम-रूप पूर्वापरेभ्यः नहीं

1.1.33
प्रथमचरमतयाल्पर्धकतिपयनेमाश्च
prathamacaramatayālpardhakatipayanemāśca

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अतिरिक्त शब्दों को सर्वनाम।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रथम-चरम-तय-अल्प-अर्ध-कतिपय-नेमाः (१/३) च — ये शब्द भी; (विभाषा जसि अनुवृत्त)।

अनुवृत्ति विभाषा जसि (१.१.३२); सर्वनाम (१.१.२७)।

हिन्दी व्याख्या प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय, नेम — ये सर्वादि-गण के बाहर के शब्द भी सर्वनाम-संज्ञा पाते हैं। जस् पर विभाषा अनुवृत्त है: प्रथमा बहुवचन में प्रथमे / प्रथमाः दोनों चलते हैं। अन्य विभक्तियों में इनकी सर्वनाम-संज्ञा नित्य मानी जाती है — प्रथमस्मै, नेमस्मिन् आदि सिद्ध होते हैं। तय यहाँ प्रत्यय-तयप् से निष्पन्न शब्द (द्वितय, त्रितय…) का संकेत है। गणना, सीमा और अंश-बोध के ये शब्द सर्वनाम-व्यवहार में खींचे गए हैं।

English rendering The words prathama, carama, taya, alpa, ardha, katipaya and nema also receive the designation sarvanāma. With jas, the designation is optional; for the other case-affixes it is regular, yielding the familiar pronominal paradigms.

औपचारिक रूप (Formal)
S₃₃ = { प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय, नेम }
∀ w ∈ S₃₃: w ∈ सर्वनाम
· जस्-पर: विकल्प (विभाषा)
· अन्य-विभक्ति: नित्य (काण्ठिक/काशिका-रेखा; व्याख्या-भेद: कुछ आचार्य जस्-मात्र संज्ञा मानते हैं)

उदाहरण
1. प्रथम + जस् → प्रथमे ∥ प्रथमाः
2. नेम + ङे → नेमस्मै; नेम + ङि → नेमस्मिन्
3. कतिपय + जस् → कतिपये ∥ कतिपयाः

1.1.34
पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्
pūrvaparāvaradakṣiṇottarāparādharāṇi vyavasthāyāmasaṃjñāyām

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सशर्त सर्वनाम (दिशा/क्रम-शब्द)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्व-पर-अवर-दक्षिण-उत्तर-अपर-अधराणि (१/३) — ये सात; व्यवस्थायाम् (७/१) — व्यवस्था (सापेक्ष क्रम/स्थिति) के अर्थ में; असंज्ञायाम् (७/१) — संज्ञा (व्यक्तिवाचक नाम) न होने पर।

अनुवृत्ति सर्वनाम (१.१.२७); सर्वादि-प्रकरण का विशेष-नियम।

हिन्दी व्याख्या पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर — व्यवस्था (कौन पहले–पीछे, ऊपर–नीचे, दक्षिण–उत्तर) बताएँ और किसी व्यक्ति/वस्तु का नाम न हों, तभी सर्वनाम हैं। नाम होने पर (दक्षिणः कोई पुरुष) या व्यवस्था-भिन्न अर्थ में सामान्य प्रातिपदिक रह जाते हैं। सर्वादि में इनमें से कई पहले से हैं; यह सूत्र अर्थ-शर्त लगाकर संज्ञा को बाँधता है — रूप नहीं, प्रयोग-शर्त। पूर्वस्मै गृहाय व्यवस्था में; संज्ञा या अन्य अर्थ में पूर्वाय।

English rendering The seven directional/ordering words are sarvanāma only in the sense of relative arrangement (vyavasthā) and when not used as proper names. Outside that sense they behave as ordinary stems.

औपचारिक रूप (Formal)
S₃₄ = { पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर }
w ∈ S₃₄ ∧ अर्थ(w) = व्यवस्था ∧ ¬संज्ञा(w) ⟺ w ∈ सर्वनाम

उदाहरण
1. व्यवस्था: पूर्व + ङे → पूर्वस्मै (गृहाय)
2. व्यवस्था: दक्षिणे गृहे (सर्वनाम-रूप)
3. संज्ञा/भिन्न अर्थ: दक्षिणाय (नाम-पुरुष को) — सर्वनाम-संज्ञा नहीं

1.1.35
स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्
svamajñātidhanākhyāyām

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सशर्त सर्वनाम (स्व)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वम् (१/१) — शब्द स्व; अ-ज्ञाति-धन-आख्यायाम् (७/१) — ज्ञाति (बन्धु) या धन की आख्या (अभिधान) न होने पर।

अनुवृत्ति सर्वनाम (१.१.२७)।

हिन्दी व्याख्या स्व सर्वनाम तभी है जब अर्थ “अपना / स्वयं-संबंधी” हो — ज्ञाति (कुटुम्बी, स्वजन) या धन-संपत्ति का वाचक न हो। अपने-अर्थ में स्वस्मै, स्वस्मिन्, स्वे सिद्ध होते हैं; बन्धु या धन कहने पर सामान्य रूप स्वाय, स्वस्य। एक ही ध्वनि-रूप, दो अर्थ-द्वार — संज्ञा अर्थ से नियंत्रित है, उच्चारण से नहीं। यह पाणिनि की संज्ञा-नीति का सूक्ष्म नमूना है: पद नहीं, प्रवृत्ति।

English rendering Sva is a sarvanāma when it does not denote a kinsman or wealth. In the reflexive/possessive sense it takes the pronominal endings; in the other two senses it does not.

औपचारिक रूप (Formal)
स्व ∈ सर्वनाम ⟺ अर्थ(स्व) ∉ { ज्ञाति, धन }
(अर्थ = अपना/आत्मीय-संबंध → संज्ञा; ज्ञाति/धन → ¬संज्ञा)

उदाहरण
1. अपना: स्व + ङे → स्वस्मै; स्व + जस् → स्वे
2. ज्ञाति: स्व (बन्धु) + ङे → स्वाय
3. धन: स्वम् (धनम्) — सर्वनाम-विशेष विभक्ति नहीं

1.1.36
अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः
antaraṃ bahiryogopasaṃvyānayoḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सशर्त सर्वनाम (अन्तर)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्तरम् (१/१) — शब्द अन्तर; बहिर्-योग-उपसंव्यानयोः (७/२) — बहिर्योग (बाहर का संबंध) और उपसंव्यान (अधोवस्त्र / अन्तःपरिधान) — इन दो अर्थों में।

अनुवृत्ति सर्वनाम (१.१.२७)।

हिन्दी व्याख्या अन्तर सर्वनाम केवल दो अर्थ-क्षेत्रों में है: बहिर्योग — बाहर से संबद्ध / बाहरी; और उपसंव्यान — नीचे या भीतर पहना जाने वाला वस्त्र-संबंध। अन्तराल, भेद, मध्य आदि अर्थों में यह सामान्य शब्द रहता है। अन्तरस्मै, अन्तरस्मिन् उन्हीं दो प्रवृत्तियों में; “बीच का अन्तर” कहने पर सर्वनाम-रूप नहीं। १.१.३४–३६ एक ही शैली के हैं — संज्ञा को अर्थ-फिल्टर से बाँधना।

English rendering Antara receives sarvanāma status only in the senses of exterior-connection (bahiryoga) and under-garment (upasaṃvyāna). In other meanings — interval, difference, interior space — it remains an ordinary stem.

औपचारिक रूप (Formal)
अन्तर ∈ सर्वनाम ⟺ अर्थ(अन्तर) ∈ { बहिर्योग, उपसंव्यान }

उदाहरण
1. बहिर्योग: अन्तर + ङे → अन्तरस्मै (बाह्य-संबंध में)
2. उपसंव्यान: अन्तरे वस्त्रे / अन्तरस्मिन् (अधोवस्त्र-प्रसंग)
3. अन्य अर्थ (अन्तराल): अन्तरम् कालस्य — सर्वनाम-संज्ञा नहीं

1.1.37
स्वरादिनिपातमव्ययम्
svarādinipātamavyayam

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अव्यय-वर्ग का आरम्भ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वरादि (स्वरादि-गण में पठित शब्द) + निपातम् (निपात-पद; द्वितीया/कर्म-अन्वय में संज्ञेय) + अव्ययम् (अव्यय-संज्ञा)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (पूर्व सर्वनाम-प्रकरण से संज्ञा नहीं चलती; यहाँ से अव्यय-खण्ड स्वतन्त्र आरम्भ)।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र अव्यय की पहली, सबसे चौड़ी पट्टी बिछाता है। स्वरादि-गण में पढ़े शब्द — जैसे उच्चैः, नीचैः, शनैः — और समस्त निपात — च, वा, हि, तु इत्यादि — अव्यय-संज्ञक होते हैं। अव्यय का सीधा फल यह है कि वे विभक्ति-लिंग-वचन के भेद से रूप नहीं बदलते; वाक्य में वे “अपरिवर्तनशील” इकाई की तरह रहते हैं। आगे के चार सूत्र (१.१.३८–४१) इसी संज्ञा में और सदस्य जोड़ते जाएँगे। निपात पहले से तकनीकी वर्ग है; यह सूत्र उसे अव्यय की छत्र-संज्ञा के नीचे लाता है।

English rendering Words listed in the svarādi-gaṇa, together with all particles (nipāta), receive the technical designation avyaya — the class of indeclinables.

औपचारिक रूप (Formal) अव्यय ⊇ स्वरादि-गण ∪ निपात; अर्थात् x ∈ अव्यय यदि (x ∈ स्वरादि) ∨ (x निपात है)।

उदाहरण उच्चैः (स्वरादि) — विभक्ति-भेद से रूप नहीं; च / वा / हि (निपात) → अव्यय; स्वर् (स्वरादि) अपरिवर्ती प्रयोग।

डिकोड-सेतु अव्यय यहाँ एक set-definition है — सदस्यों की गणना, रूपान्तर-नियम नहीं; आगे १.१.३८–४१ उसी समुच्चय में closure-नियम जोड़ते हैं, बिल्कुल formal grammar की “declare the non-inflecting tokens first” शैली में।

1.1.38
तद्धितश्चासर्वविभक्तिः
taddhitaścāsarvavibhaktiḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अव्यय में तद्धित-सदस्य

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्धितः (तद्धित-प्रत्ययान्त) + च (समुच्चय) + अ-सर्व-विभक्तिः (जो सर्व विभक्तियाँ न ले; नञ्-तत्पुरुष) + [अव्ययम्]।

अनुवृत्ति अव्ययम् ← १.१.३७।

हिन्दी व्याख्या कुछ तद्धित-रूप पूरे विभक्ति-चक्र में नहीं घूमते — वे एक-दो रूपों में ही जमे रहते हैं, मानो अव्यय बन गए हों। ऐसे “अ-सर्वविभक्ति” तद्धित भी अव्यय-संज्ञक कहलाते हैं। तत्र, यत्र, सर्वत्र (त्रा-प्रत्यय) या ततः, यतः, कुतः (तस्ल्) इसके शास्त्रीय सदस्य हैं — ये कर्ता-कर्म के पूरे सात-आठ रूप नहीं बनाते। सूत्र का “च” पिछले स्वरादि-निपात-समुच्चय में इन्हें जोड़ता है, अलग संज्ञा नहीं खोलता। व्याख्या-भेद: “असर्वविभक्ति” को “जिसकी सब विभक्तियाँ प्रयुक्त नहीं” पढ़ा जाता है, न कि “जिसमें कोई विभक्ति ही नहीं”।

English rendering A taddhita derivative that does not take the full set of case-endings is likewise termed avyaya.

औपचारिक रूप (Formal) यदि w = base+तद्धित तथा विभक्ति-परिसर(w) ≠ पूर्ण-विभक्ति-चक्र, तो w ∈ अव्यय।

उदाहरण तद् + त्रा → तत्र (असर्वविभक्ति तद्धित → अव्यय); यद् + त्रा → यत्र; तद् + तस्ल् → ततः।

1.1.39
कृत्मेजन्तः
kṛtmejantaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अव्यय में कृदन्त-सदस्य

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृत् (कृत्-प्रत्ययान्त) + म्-एच्-अन्तः (जिसका अन्त म् हो, अथवा एच् = ए/ओ हो) + [अव्ययम्]।

अनुवृत्ति अव्ययम् ← १.१.३७ (च-परम्परा १.१.३८ से)।

हिन्दी व्याख्या जो कृदन्त मकारान्त हो, या एच् (ए, ओ) पर समाप्त हो, वह भी अव्यय माना जाता है। स्वयम् जैसे म्-अन्त रूप, और प्रगे जैसे ए-अन्त रूप, विभक्ति-खेल से बाहर रहकर क्रिया-विशेषण की भूमिका निभाते हैं। “एच्” यहाँ शिवसूत्र-प्रत्याहार है — केवल ए और ओ; ऐ-औ नहीं। यह सूत्र कृत् की पूरी दुनिया को अव्यय नहीं बनाता — केवल म्/एच्-अन्त सीमा बाँधता है; शेष कृदन्त सामान्य नाम की तरह विभक्ति लेंगे। आगे क्त्वा-वर्ग अलग सूत्र (१.१.४०) से आएगा।

English rendering A kṛt-formation ending in m, or in the pratyāhāra eC (e, o), also receives the name avyaya.

औपचारिक रूप (Formal) यदि w कृदन्त तथा (w … म्# ∨ w … एच्#) तो w ∈ अव्यय; जहाँ एच् = {ए, ओ}।

उदाहरण स्वयम् (म्-अन्त कृत् → अव्यय); प्रगे (ए-अन्त → अव्यय); सायम् (म्-अन्त प्रयोग)।

डिकोड-सेतु एच् = प्रत्याहार-इंजन से {ए, ओ} — शिवसूत्र-श्रृंखला का संपीड़ित वर्ण-समुच्चय; अव्यय-परीक्षण में “अन्त ∈ एच्?” एक स्पष्ट membership-check है।

1.1.40
क्त्वातोसुन्कसुनः
ktvātosunkasunaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — क्त्वा-वर्ग अव्यय

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्त्वा + तोसुन् + कसुनः (तीनों कृत्-प्रत्यय; षष्ठी-बहुवचन/परस्पर-समुच्चय) + [अव्ययम्]।

अनुवृत्ति अव्ययम् ← १.१.३७; कृत्-संदर्भ १.१.३९ से भावतः जुड़ा, शब्दतः नहीं।

हिन्दी व्याख्या क्त्वा (ल्यप् सहित उसका स्थानी/रूप), वैदिक तोसुन्, और कसुन् — इन प्रत्ययों से बने रूप अव्यय-संज्ञक होते हैं। कृत्वा, गत्वा, हित्वा जैसे त्वान्त रूप वाक्य में “करके / जाकर” अर्थ देते हैं और विभक्ति नहीं बदलते। तोसुन्-कसुन मुख्यतः छन्दस् (वैदिक) में हैं — जीवसे, विसृपः जैसे प्रयोग; भाषामें क्त्वा ही प्रधान है। यह १.१.३९ का अपवाद-सा विस्तार नहीं, बल्कि नामित-प्रत्यय-सूची है: केवल ये तीन, न कि हर कृत्। ल्यप् (८.१.६० आदि) क्त्वा का ही स्थानी होने से उसी संज्ञा-छाया में आता है।

English rendering Forms built with the kṛt-affixes ktvā, tosun, and kasun are avyaya — the familiar absolutives and their Vedic kin.

औपचारिक रूप (Formal) {क्त्वा, तोसुन्, कसुन्}-प्रत्ययान्त ∈ अव्यय; (ल्यप् ≡ क्त्वा-स्थानी → उसी संज्ञा-पट्टे में)।

उदाहरण कृ + क्त्वा → कृत्वा (क् → लोप, अव्यय); गम् + क्त्वा → गत्वा; वैदिक: विसृप् + कसुन् → विसृपः (कसुन-अव्यय)।

1.1.41
अव्ययीभावश्च
avyayībhāvaśca

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — अव्ययीभाव भी अव्यय

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अव्ययीभावः (अव्ययीभाव-समास) + च (समुच्चय) + [अव्ययम्]।

अनुवृत्ति अव्ययम् ← १.१.३७।

हिन्दी व्याख्या अव्ययीभाव समास — अधिहरि, यथाशक्ति, अनुगङ्गम् — स्वयं एक अव्यय-पद की तरह व्यवहार करता है। पूरे समास पर एक ही “अपरिवर्ती” रूप रहता है; उत्तरपद की विभक्ति-श्रृंखला नहीं खुलती। “च” से यह सदस्य भी उसी अव्यय-समुच्चय में जुड़ता है, जहाँ स्वरादि, निपात, असर्वविभक्ति-तद्धित, म्/एच्-कृत् और क्त्वा-वर्ग पहले आ चुके। यहीं अव्यय-प्रकरण की परिभाषा-श्रृंखला पूर्ण होती है: आगे १.१.४२ नया संज्ञा-खण्ड (सर्वनामस्थान) खोलता है। व्यवहार में अव्ययीभाव को नपुंसक-एकवचन-सा भी देखा जाता है, पर संज्ञा-फल अव्यय ही है।

English rendering An avyayībhāva compound is also designated avyaya — the whole compound behaves as a single indeclinable word.

औपचारिक रूप (Formal) यदि S अव्ययीभाव-समास, तो S ∈ अव्यय। (अव्यय = १.१.३७–४१ का संवृत समुच्चय।)

उदाहरण अधि + हरि → अधिहरि (अव्ययीभाव → अव्यय); यथा + शक्ति → यथाशक्ति; उप + कृष्णम् → उपकृष्णम्।

1.1.42
शि सर्वनामस्थानम्
śi sarvanāmasthānam

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सर्वनामस्थान का प्रथम सदस्य

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शि (प्रत्यय/आदेश शि) + सर्वनामस्थानम् (संज्ञा सर्वनामस्थान)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (अव्यय-खण्ड यहीं रुकता है; सर्वनामस्थान-प्रकरण आरम्भ)।

हिन्दी व्याख्या “शि” को सर्वनामस्थान-संज्ञा मिलती है। शि नपुंसक में जस्/शस् का आदेश है (७.१.२० जश्शसोः शिः) — फलानि, कुण्डानि जैसे रूपों का तकनीकी मध्य-पद। सर्वनामस्थान वह विभक्ति-पट्टा है जिस पर अङ्ग के विशेष कार्य (दीर्घ, नुम्, नपुंसक-शि इत्यादि) टिकते हैं; केवल “सर्वनाम” से भ्रमित न हों — यह संज्ञा विभक्ति-स्थान की है, सर्वनाम-शब्द की नहीं। अगला सूत्र (१.१.४३ सुडनपुंसकस्य) गैर-नपुंसक सुट् को भी इसी संज्ञा में लाएगा; १.१.४२ केवल शि को पहले पिन करता है। बिना इस संज्ञा के नपुंसक-बहुवचन की रूप-श्रृंखला अधूरी रह जाती।

English rendering The element śi — the neuter substitute for the nominative/accusative plural endings — is termed sarvanāmasthāna, the “pronoun-grade” case-slot that triggers special stem behaviour.

औपचारिक रूप (Formal) शि ∈ सर्वनामस्थान; (नपुंसक) जस्|शस् → शि / _ (७.१.२०), और वह शि सर्वनामस्थान-ध्वज रखता है।

उदाहरण फल + जस् → फल + शि → फलानि (शि = सर्वनामस्थान); कुण्ड + शि → कुण्डानि; अस्थि + शि → अस्थीनि (सर्वनामस्थान-फल सहित)।

1.1.43
सुडनपुंसकस्य
suḍanapuṃsakasya

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — सुट् को सर्वनामस्थान नाम देता है।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुट् (सु–औट् प्रत्याहार; प्रथमा–द्वितीया के अदन्त-भिन्न पञ्च प्रत्यय) + अनपुंसकस्य (नपुंसक-भिन्न = पुं/स्त्री, षष्ठी) — «अनपुंसक के सुट् (सर्वनामस्थानं भवति)».

अनुवृत्ति सर्वनामस्थानम् (१.१.४२ से); क्तिन् च की शृंखला में नाम-विधान जारी।

हिन्दी व्याख्या पिछली सूत्र-शृंखला ने सर्वनामस्थान की सञ्ज्ञा कुछ रूपों को दी; यह सूत्र उसे फैलाता है। पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग प्रातिपदिक के सुट्-प्रत्यय — सु, औ, जस्, अम्, औट् — सर्वनामस्थान कहलाते हैं। नपुंसक के इन्हीं प्रत्ययों को यह नाम नहीं मिलता; नपुंसक की व्यवस्था अलग नियमों से चलती है। सर्वनामस्थान होने से आगे के कई विधियाँ (जैसे नुम्, कुछ गुण/वृद्धि-सन्दर्भ, और कुछ लोप-निषेध) इन्हीं रूपों पर सक्रिय होते हैं। संक्षेप में: «गैर-नपुंसक के सुट् = सर्वनामस्थान»।

English rendering The five case-endings covered by the pratyāhāra सुट्, when belonging to a non-neuter stem, receive the technical designation sarvanāmasthāna. Neuter forms of the same endings are excluded from this name.

औपचारिक रूप (Formal)
सर्वनामस्थान ⊇ { σ | σ ∈ सुट् ∧ stem(σ) ∉ नपुंसक }
जहाँ सुट् = { सु, औ, जस्, अम्, औट् } (प्रत्याहार सु … औट्)।

उदाहरण
1. वृक्ष + सु → वृक्षः — सु अनपुंसक-सुट् ⇒ सर्वनामस्थान।
2. राम + औ → रामौ — औ सर्वनामस्थान; नपुंसक फल + औ → फले में औ इस सञ्ज्ञा का नहीं।
3. नदी + जस् → नद्यः — जस् स्त्रीलिङ्ग-सुट् ⇒ सर्वनामस्थान।

डिकोड-सेतु सुट् प्रत्याहार-इंजन का सीधा उत्पाद है (शिवसूत्र-शृंखला से संपीड़ित वर्ण-समुच्चय); नाम-सञ्ज्ञा आगे के नियम-ग्राफ़ में एक बूलियन फ़्लैग की तरह काम करती है।

1.1.44
न वेति विभाषा
na veti vibhāṣā

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वैकल्पिकता का पारिभाषिक नाम।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न वा इति (शब्द/अर्थ «न» अथवा «वा») + विभाषा (सञ्ज्ञा) — «न वा कहने/समझने पर वह विभाषा है»।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र सञ्ज्ञा)।

हिन्दी व्याख्या पाणिनि जहाँ किसी कार्य को अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक बनाना चाहते हैं, वहाँ सूत्रों में न, वा, विभाषा, अन्यतरस्याम् जैसे संकेत आते हैं। यह सूत्र उन संकेतों का एक ही तकनीकी नाम बाँधता है — विभाषा। विभाषा का अर्थ है: नियम लागू भी हो सकता है, नहीं भी; दोनों रूप सिद्ध। पाठक को याद रहे — विभाषा = option, बाध्य विधि नहीं। आगे के सैकड़ों सूत्रों में «विभाषा» पढ़ते ही हम जान जाते हैं कि दो समानान्तर व्युत्पत्तियाँ वैध हैं।

English rendering The technical term vibhāṣā names optionality: wherever the grammar signals “or not” (na / vā and kindred wording), the operation is optional, not obligatory.

औपचारिक रूप (Formal)
विभाषा(R) ⇔ apply(R) ∨ ¬apply(R) (दोनों सिद्ध)
trigger-lexicon ⊇ { न, वा, विभाषा, अन्यतरस्याम्, … } (परम्परा-मान्य संकेत)।

उदाहरण
1. द्वितीया-समास आदि में वैकल्पिक रूप — जहाँ सूत्र «विभाषा» कहे: दोनों पाठ स्वीकार्य।
2. इको यणचि (६.१.७७) के बाद कुछ वैकल्पिक सन्धि-स्थितियाँ विभाषा-सूत्रों से नियंत्रित।
3. «वा» युक्त विधि: रूप₁ (नियम लगा) / रूप₂ (नियम नहीं) — दोनों साधु।

1.1.45
इग्यणः सम्प्रसारणम्
igyaṇaḥ samprasāraṇam

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — यण्→इक् परिवर्तन का नाम सम्प्रसारण।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इक् (इ उ ऋ ऌ) + यणः (य् व् र् ल्, पञ्चमी = स्रोत) + सम्प्रसारणम् (सञ्ज्ञा) — «यण् के स्थान पर आया इक् सम्प्रसारण है»।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र सञ्ज्ञा); स्थाने-योग १.१.४९ आगे स्पष्ट।

हिन्दी व्याख्या जब अर्धस्वर यण् के स्थान पर समवर्गीय स्वर इक् आता है, उस आदेश/परिणाम को सम्प्रसारण कहते हैं। मानचित्र सीधा है: य्→इ, व्→उ, र्→ऋ, ल्→ऌ। यह केवल नाम है — कार्य स्वयं अन्य विधियों से होता है; पर नाम मिलते ही आगे के नियम («सम्प्रसारणं…») ठीक उसी घटना को लक्ष्य कर सकते हैं। धातु और कृदन्त-परम्परा के दर्जनों रूप — इष्ट, उक्त, गृहीत, सुप्त — इसी सम्प्रसारण-शृंखला के फल हैं।

English rendering Sampraśāraṇa is the name for the substitution of an इक् vowel in place of a corresponding यण् semivowel (y→i, v→u, r→ṛ, l→ḷ). The term labels the event so later rules can refer to it cleanly.

औपचारिक रूप (Formal)
सम्प्रसारण ≜ { य्↦इ, व्↦उ, र्↦ऋ, ल्↦ऌ }
अर्थात् आदेश α ∈ इक् जब स्थानी β ∈ यण् (और α, β स्थान-साम्य युग्म हों)।

उदाहरण
1. यज् + क्त → (य्→इ) इज् + त → इष्ट (षत्व आदि के साथ)।
2. वच् + क्त → (व्→उ) उच् + त → उक्त।
3. ग्रह् + क्त → (र्→ऋ) गृह् + इत → गृहीत; स्वप् → सुप्त (व्→उ)।

डिकोड-सेतु इक् और यण् दोनों प्रत्याहार-इंजन से खुलते हैं; यह सूत्र उस युग्म पर «नामित पुनर्लेखन» का लेबल लगाता है — rewrite-rule decode की सञ्ज्ञा-परत।

1.1.46
आद्यन्तौ टकितौ
ādyantau ṭakitau

सूत्र-प्रकार परिभाषा — टित्/कित् अनुबन्ध की स्थिति-नियमावली।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदि-अन्तौ (दो स्थान: आदि और अन्त) + ट-कितौ (टित् और कित्) — «टित् आदि में, कित् अन्त में»।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं; आगे मित् (१.१.४७) इसी पंक्ति का विस्तार।

हिन्दी व्याख्या आगम (जोड़े जाने वाले वर्ण/खण्ड) कहाँ लगें — इसका निर्णय उनके इत्-अनुबन्ध से होता है। जिस आगम में ट् इत् हो (टित्), वह प्रकृति के आदि में बैठता है; जिसमें क् इत् हो (कित्), वह अन्त में। यह मेटारूल है, कोई नया रूप नहीं बनाता — केवल स्थान बाँधता है। टित्-आगम «उपसर्ग-सा» आगे, कित्-आगम «प्रत्यय-सा» पीछे — पढ़ने वाले को अनुबन्ध देखते ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है।

English rendering An augment marked ट् (ṭit) is placed at the beginning of the base; one marked क् (kit) is placed at the end. The anubandha is a placement flag.

औपचारिक रूप (Formal)
place(āgama) =
prefix(base) यदि āgama टित्,
suffix(base) यदि āgama कित्।

उदाहरण
1. आट् (टित्) + सीत् → आसीत् — आट् आदि में।
2. अग्नि + तुक् (कित्) + चित् → अग्निचित् — तुक् (च् से पूर्व) अन्त-पक्ष में कित्-नियम से।
3. सुट्-टित् आगम समस्तपद के आदि में (यथा सु + पुत्रा → सुपुत्रा प्रकार की व्यवस्था में सुट्-परम्परा)।

डिकोड-सेतु अनुबन्ध = टोकन-फ़्लैग (dossier की it-marker दृष्टि); ट्/क् यहाँ placement-tag हैं — metadata जो उच्चरित नहीं, केवल पाइपलाइन-स्थिति तय करते हैं।

1.1.47
मिदचोऽन्त्यात्परः
midaco'ntyātparaḥ

सूत्र-प्रकार परिभाषा — मित् आगम की स्थिति: अन्तिम अच् के बाद।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित् (म्-इत् युक्त आगम) + अचः (अच् = स्वर, पञ्चमी) + अन्त्यात् (अन्तिम से) + परः (बाद में) — «मित्, अन्तिम स्वर के बाद आता है»।

अनुवृत्ति आद्यन्तौ टकितौ (१.१.४६) की स्थिति-परम्परा; टित्/कित् के बाद मित् का तीसरा स्थान-नियम।

हिन्दी व्याख्या म् इत् वाले आगम (मित्) न आदि में जाते हैं न बिलकुल अन्त में — वे प्रकृति के अन्तिम स्वर (अच्) के ठीक बाद बैठते हैं। सबसे प्रसिद्ध मित्-आगम है नुम् (न् + उ् + म्-इत्): वह धातु/शब्द के अन्तिम स्वर के बाद न् जोड़ता है। इससे भञ्ज् → भनक्ति जैसे रूप व्यवस्थित बनते हैं। टित्–कित्–मित् तीनों मिलकर आगम-स्थापन का पूरा निर्देश-सेट हैं।

English rendering An augment marked म् (mit) is inserted immediately after the last vowel (अच्) of the base — neither pure prefix nor pure suffix, but post-vocalic.

औपचारिक रूप (Formal)
यदि āgama मित् और base = X · v · Y, जहाँ v = अन्तिम अच्, Y में कोई अच् नहीं,
तो result = X · v · āgama · Y।

उदाहरण
1. भञ्ज् + नुम् (मित्) + शप् + ति → भ + न् + ज् + अ + ति → भनक्ति (नुम् अन्तिम अ के बाद)।
2. रुध् + श्नम् (मित्-परम्परा) → रुणद्धि — न् अन्तिम उ-स्वर के बाद।
3. युज् + श्नम् → युनक्ति — नुम्/श्नम्-शृंखला में मित्-स्थिति।

डिकोड-सेतु मित् = तीसरा placement-flag (टित्=prefix, कित्=suffix, मित्=after-last-vowel); anubandha-as-metadata का वही इंजन-सिद्धान्त।

1.1.48
एच इग्घ्रस्वादेशे
eca igghrasvādeśe

सूत्र-प्रकार परिभाषा — एचः के ह्रस्व-आदेश पर इक् का निर्धारण।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एचः (ए ओ ऐ औ, पञ्चमी = स्थानी) + इक् (इ उ ऋ ऌ — यहाँ इ/उ लक्षित) + ह्रस्व-आदेशे (ह्रस्व आदेश होने पर, सप्तमी) — «एच् के स्थान पर ह्रस्व विधेय हो तो वह इक् हो»।

अनुवृत्ति कोई स्थूल अनुवृत्ति नहीं; «स्थाने» भाव १.१.४९ की पृष्ठभूमि में।

हिन्दी व्याख्या कभी नियम कहता है «एच् को ह्रस्व करो» — पर ह्रस्व कई हो सकते हैं। यह परिभाषा बताती है कि वह ह्रस्व इक्-वर्गीय होगा: ए/ऐ → इ, ओ/औ → उ। अर्थात् दीर्घ/संयुक्त स्वर को छोटा करते समय समस्थान सबसे निकट इक् चुना जाता है (स्थानेऽन्तरतमः की भावना के साथ)। बिना इस सूत्र के «ह्रस्व» अस्पष्ट रह जाता; इसके साथ आदेश यान्त्रिक रूप से एक-अर्थी हो जाता है।

English rendering When a short substitute is prescribed in place of an एच् vowel, that short is the corresponding इक् vowel: e/ai → i, o/au → u. The rule fixes which short, not merely that shortening occurs.

औपचारिक रूप (Formal)
ह्रस्व-आदेश(एच्) ⇒ आदेश ∈ इक्, युग्म:
ए ↦ इ, ऐ ↦ इ, ओ ↦ उ, औ ↦ उ।

उदाहरण
1. स्तेन + ष्यञ् → स्तैन्यम् — स्तेन के ऐ पर ह्रस्व-इक् ⇒ इ (स्तैन्य)।
2. जहाँ ओ/औ पर ह्रस्व विहित: औ → उ (यथा गो-सम्बद्ध कुछ ह्रस्व-विधियों में गु-रूप की दिशा)।
3. गै-धातु से यत्-रूप गेयम् की परम्परा में एच्-ह्रस्व/गुण-शृंखला; ह्रस्व-पक्ष पर इक्-निर्देश १.१.४८ से बँधा।

डिकोड-सेतु एच् और इक् प्रत्याहार-इंजन से खुलते हैं; यह सूत्र «ह्रस्व» को अस्पष्ट गुण से हटाकर एक निश्चित प्रतिस्थापन-तालिका बनाता है — rewrite decode का प्रकार-संकोच (type-narrowing)।

1.1.49
षष्ठी स्थानेयोगा
ṣaṣṭhī sthāneyogā

सूत्र-प्रकार परिभाषा — षष्ठी marks substitution-target.

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठी (प्रथमा, “genitive case-form/marker”) · स्थाने-योगा (प्रथमा; स्थान + योग — “whose relation is with the sthāna, the slot being replaced”).

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (this sūtra itself feeds the whole ādeśa-system that follows).

हिन्दी व्याख्या जब किसी सूत्र में कोई पद षष्ठी विभक्ति में आता है और वहाँ आदेश (substitution) की बात हो, तो वह षष्ठी “किसके स्थान पर आदेश होगा” — यही बताती है। आधुनिक भाषा में: genitive = target of rewrite. बिना इस परिभाषा के “इकः” या “झः” जैसे पद केवल सम्बन्ध-सूचक लगते; पाणिनि उन्हें स्थानी (the placeholder) बना देते हैं। यही कुंजी आगे के विधि-सूत्रों को संक्षिप्त रखने देती है।

English rendering The genitive in a substitution-sūtra marks the sthāna — the element to be replaced. Case itself encodes the rewrite-target, so the grammar need not spell “in place of” in every rule.

औपचारिक रूप (Formal) In an ādeśa-sūtra, NP-षष्ठी ↦ sthānin (target). Rewrite skeleton: A-षष्ठी B-प्रथमा … ⇒ A → B (with contexts fixed by 1.1.66–67).

उदाहरण (1) इको यणचि (6.1.77): इकः (षष्ठी) → स्थानी = इक्; आदेश = यण् — दधि+अत्र → दध्यत्र (इ → य्)। (2) झोऽन्तः (7.1.3): झः (षष्ठी) → स्थानी = झ् — भव+झि → भवन्ति।

डिकोड-सेतु Case-syntax of rules (dossier rewrite-rule decode): 1.1.49 षष्ठी = target A in A → B / C _ D; paired with 1.1.66 (locative = right context) and 1.1.67 (ablative = left context). Inflection carries what modern notation writes with arrows and underscores.

1.1.50
स्थानेऽन्तरतमः
sthāne'ntaratamaḥ

सूत्र-प्रकार परिभाषा — pick most-similar substitute.

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थाने (सप्तमी, “in the substitution-slot”) · अन्तरतमः (प्रथमा, “the nearest / most similar one”).

अनुवृत्ति स्थाने (from the substitution domain opened by 1.1.49); योगा-sphere of ādeśa continues.

हिन्दी व्याख्या जब एक ही स्थानी के लिए कई संभावित आदेश हों, तो जो स्थान (articulation place), प्रयत्न और गुण में स्थानी के सबसे निकट हो, वही लिया जाता है। यह “nearest neighbour” का नियम है — मनमाना चुनाव नहीं। इक् → यण् में इ-उ-ऋ-ऌ के लिए क्रमशः य्-व्-र्-ल् इसी अन्तरतमता से स्थिर होते हैं। आगे 1.1.51 इस निकटता को ऋ के विशेष मामले में और बाँधता है।

English rendering Where more than one substitute could occupy the slot, choose the one most similar to the original. Similarity of place and manner — not arbitrary preference — decides the winner.

औपचारिक रूप (Formal) If candidates S = {s₁,…,sₙ} for sthānin x, select s* = argminₛ d(x,s) (d = phonological nearness: sthāna, prayatna, guṇa). Flag: prefer max-similarity ādeśa.

उदाहरण (1) इको यणचि: इ → य्, उ → व्, ऋ → र्, ऌ → ल् (each the nearest semivowel) — मधु+अरि → मध्वरि; दातृ+अंश → दात्रंश-path via र्। (2) अकः सवर्णे दीर्घः (6.1.101): same-class vowel fusion picks the matching long, not a foreign quality.

डिकोड-सेतु Dossier substitution discipline — स्थानेऽन्तरतमः is the explicit nearest-match policy on the rewrite pipeline; pairs with स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (1.1.56) for status-inheritance of the winner.

1.1.51
उरण् रपरः
uraṇ raparaḥ

सूत्र-प्रकार परिभाषा — ṛ-substitute is r-final.

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उः (षष्ठी of ऋ/ॠ — “of ṛ/ṝ”) · अण् (प्रथमा, pratyāhāra अ इ उ — the vocalic substitutes in view) · र-परः (प्रथमा, “having र् after it”).

अनुवृत्ति स्थानेऽन्तरतमः (1.1.50) — this sūtra specialises nearest-match when the sthānin is ṛ/ṝ; षष्ठी-स्थानी from 1.1.49.

हिन्दी व्याख्या ऋ या ॠ के स्थान पर जब अण् (अ, इ, उ) आता है, तो वह आदेश अकेला नहीं रहता — उसके बाद र् जुड़ जाता है। इसलिए गुण में ऋ → अर्, वृद्धि में ऋ → आर्। बिना “रपरः” के केवल अ/आ कहना अपर्याप्त होता; पाणिनि र-परता को परिभाषा में बाँध देते हैं। यह 1.1.50 की अन्तरतमता का ऋ-विशेष संशोधन है।

English rendering When ṛ or ṝ is replaced by a vowel of aṇ, the substitute is followed by r. Hence guṇa of ṛ is ar and vṛddhi is ār — the r is definitional, not an afterthought.

औपचारिक रूप (Formal) ṛ/ṝ → V r where V ∈ अण् (= {a, i, u}), under guṇa/vṛddhi (and kindred aṇ-ādeśa). Equivalently: ādeśa(ṛ) = V⁀r (r-para flag on the substitute).

उदाहरण (1) कृ + अ (गुण) → कर् — कर्ता, करणम्। (2) पितृ + औ → पितरौ (ऋ → अ + र्)। (3) तृ + ङीप्-path: दातृ + ई → दात्री (with the r-bearing stem shape preserved in the paradigm).

1.1.52
अलोऽन्त्यस्य
alo'ntyasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — default: last phoneme only.

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अलः (षष्ठी, “of a sound/phoneme”) · अन्त्यस्य (षष्ठी, “of the final one”) — jointly: “(the substitute is) of the final phoneme.”

अनुवृत्ति षष्ठी स्थानेयोगा (1.1.49) — scope: how much of the sthānin is actually replaced.

हिन्दी व्याख्या आदेश का सामान्य नियम यह है कि स्थानी-शब्द के पूरे टुकड़े पर नहीं, बल्कि उसके अन्तिम अल् (वर्ण) पर ही लगता है। “इकः” कहने पर भी बहुवर्ण आधार का केवल आखिरी स्वर/व्यंजन बदला जाता है। इससे संधि और आदेश दोनों में शेष रूप सुरक्षित रहता है। 1.1.53–55 इसी डिफ़ॉल्ट के अपवाद-विस्तार हैं।

English rendering By default a substitute replaces only the final sound of the designated sthānin, not the whole string. The rest of the form stays; only the last al is rewritten.

औपचारिक रूप (Formal) For sthānin X = x₁…xₙ (xᵢ ∈ अल्), default locus = xₙ. Rewrite: xₙ → s ; X ↦ x₁…xₙ₋₁⁀s.

उदाहरण (1) दधि + अत्र → दध् + य् + अत्र → दध्यत्र (केवल अन्त्य इ → य्)। (2) मधु + अरि → मध्वरि (उ → व्)। (3) वाक् + ईश → वागीश (via later jash/ṭu rules on the final क् — locus still the last al of the first member).

1.1.53
ङिच्च
ṅicca

सूत्र-प्रकार परिभाषा — ṅit ādeśa replaces all.

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ङित् (प्रथमा, “that which has ङ् as it-marker”) · च (“and / also”).

अनुवृत्ति अलोऽन्त्यस्य (1.1.52) is limited: with ङित्, the “final-only” default is lifted; षष्ठी-स्थानी (1.1.49) still names the target, but the whole target goes.

हिन्दी व्याख्या यदि आदेश स्वयं ङित् हो — अर्थात् उसकी तकनीकी आकृति में इत्-ङ् हो — तो वह केवल अन्तिम वर्ण का नहीं, पूरे स्थानी का स्थान लेता है। 1.1.52 का अन्त्य-मात्र नियम यहाँ रुकता है। सर्वनाम-आदेश (अदस् → अमु, इदम् → अन, आदि) इसी ङित्-सर्वनाश से चलते हैं। it-marker यहाँ metadata-flag की तरह “whole-token replace” पढ़वाता है।

English rendering If the substitute is ṅit (bears ṅ as a silent marker), it replaces the entire sthānin, not merely its last sound. Marker ṅ flags whole-form substitution.

औपचारिक रूप (Formal) If ādeśa s is ङित्, locus = whole X (override 1.1.52). X → s. (Contrast: non-ṅit ⇒ X’s final al only.)

उदाहरण (1) अदस् + टा → अमुना (ङित् आदेश अमु पूरे अदस् का स्थान लेता है; केवल अन्त्य स् नहीं)। (2) इदम् + टा → अनेन (अन् whole-replaces इदम्)। (3) युष्मद् + ङस् → तव (तव as ṅit whole-form substitute in the paradigm).

1.1.54
आदेः परस्य
ādeḥ parasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — of the following, first sound only.

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदेः (षष्ठी, “of the initial [sound]”) · परस्य (षष्ठी, “of what follows / the subsequent element”).

अनुवृत्ति अलोऽन्त्यस्य domain (1.1.52): this sūtra is the mirror-case when the sthānin is characterised as para (subsequent); षष्ठी स्थानेयोगा (1.1.49).

हिन्दी व्याख्या जब स्थानी “पर” हो — बाद में आने वाला प्रत्यय या खंड — तो आदेश उसके अन्तिम वर्ण पर नहीं, बल्कि आदि (पहले) अल् पर लगता है। 1.1.52 आगे के लिए अन्त्य कहता है; 1.1.54 पर के लिए आदि कहता है — दोनों मिलकर दिशा-संवेदनशील locus तय करते हैं। झोऽन्तः इसी से झि/झे के पहले वर्ण झ् को अन् बनाता है, शेष इ/ए बचता है।

English rendering When the element to be replaced is the subsequent one, the substitute targets only its initial sound. Final-only (1.1.52) is for the default sthānin; first-only is for the para case.

औपचारिक रूप (Formal) If sthānin Y is पर (subsequent) and Y = y₁…yₘ, locus = y₁. Rewrite: y₁ → s ; Y ↦ s⁀y₂…yₘ. (Default non-para: locus = last al, 1.1.52.)

उदाहरण (1) भव + झि → (झोऽन्तः 7.1.3) झ् → अन्, शेष इ → भव + अन्ति → भवन्ति। (2) चोर + झि → चोरयन्ति (same आदि-locus on झ् of झि)। (3) Contrast 1.1.52: दधि+अत्र touches only the last of the prior pada — complementary direction of the same al-precision.

1.1.55
अनेकाल्शित्सर्वस्य
anekālśitsarvasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — अनेकाल्/शित्-आदेश की पूरी जगह।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेकाल् (एक से अधिक अल् वाले) + शित् (श्-इत् युक्त) + सर्वस्य (पूरे स्थानी के; षष्ठी)।

अनुवृत्ति आदेशः, स्थाने (आदेश-प्रकरण १.१.४९–५४ से); अलोऽन्त्यस्य (१.१.५२) का व्यतिक्रम-क्षेत्र।

हिन्दी व्याख्या सामान्य नियम (१.१.५२) यह है कि एक-अल् का आदेश केवल स्थानी के अन्तिम वर्ण की जगह बैठता है। यह सूत्र उस सीमा को हटाता है: यदि आदेश स्वयं अनेक वर्णों वाला हो, अथवा उसमें श् इत्-चिह्न हो, तो वह स्थानी के पूरे रूप की जगह लगता है — केवल अन्तिम अल् की नहीं। “सर्वस्य” यहाँ पूरे स्थानी-पद/प्रत्यय-खंड का सूचक है। इससे बहु-वर्ण आदेश और शित्-आदेश एक ही “पूरी-जगह” नीति के अधीन आ जाते हैं। यह स्थानेयोग की व्याप्ति-नियम है, नया रूप नहीं गढ़ता।

English rendering A multi-sound substitute, or one marked with the it-letter ś, replaces the entire item for which it stands — not merely its final sound. This lifts the single-sound limit of 1.1.52 for those two classes of ādeśa.

औपचारिक रूप (Formal)
यदि |आदेश| > 1 ∨ श् ∈ इत्(आदेश)
तो स्थानी → आदेश (पूरा स्थानी; न कि केवल अन्तिम अल्)
अन्यथा (एकाल्, अ-शित्): स्थानी के अन्तिम अल् → आदेश // १.१.५२

उदाहरण
1. जस् → शी (शित्, ७.१.१७): अग्नि + जस् → अग्नि + शी → अग्नी (शी पूरे जस् की जगह)।
2. अनेकाल्: युष्मद् + ङस् → तव (तव पूरे युष्मद्-ङस् स्थान पर)।
3. अदस् + जस् → अमी (अमी अनेकाल्-आदेश; पूरा जस्/रूप-स्थान)।

डिकोड-सेतु रीराइट-इंजन में “टोकन-स्तर” बनाम “अन्तिम-अक्षर-स्तर” प्रतिस्थापन: अनेकाल्/शित् = whole-token rewrite; एकाल् = last-symbol rewrite — Pāṇini’s explicit scope flag for A → B.

1.1.56
स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ
sthānivadādeśo'nalvidhau

सूत्र-प्रकार परिभाषा — आदेश को स्थानी-समान मानने का नियम।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थानीवत् (स्थानी के समान) + आदेशः (प्रतिस्थापित रूप) + अनल्-विधौ (अल्-विधि को छोड़कर; नञ्-तत्पुरुष)।

अनुवृत्ति आदेशः, स्थाने (१.१.४९+); “कार्य”/विधि-प्रसंग।

हिन्दी व्याख्या आदेश लगने के बाद भी आगे की विधियाँ उसे उस स्थानी की तरह देखती हैं जिसका वह स्थान लेता है — मानो मूल अभी भी “स्थिति-पदा” पर बैठा हो। इससे धातुत्व, अङ्गत्व, प्रत्यय-संज्ञा आदि रूप-स्तरीय गुण आदेश पर भी लागू रहते हैं। सीमा एक ही है: अल्-विधि — जो नियम केवल किसी वर्ण/अल् पर काम करता है — वहाँ आदेश को स्थानी न माना जाए; वहाँ वास्तविक ध्वनि ही गिनी जाती है। यह “स्थानिवद्भाव” पाणिनि-यंत्र की विरासत-नीति (inheritance) है।

English rendering A substitute inherits the grammatical status of what it replaces, so later rules still “see” the original — except when the rule is a pure sound-level (al) operation, which must inspect the actual segment present.

औपचारिक रूप (Formal)
∀ विधि V: यदि V ∉ अल्-विधि तो गुण(आदेश) ⊇ गुण(स्थानी) // आदेश ≡ स्थानी
यदि V ∈ अल्-विधि तो आदेश को यथा-स्थित वर्ण ही देखो (स्थानीवद्भाव नहीं)

उदाहरण
1. अस् → भू (२.४.५२), फिर तिप्: भू स्थानी-अस् की तरह धातु → भवति (न कि “भू” को नई धातु गिनकर अलग तंत्र)।
2. दधि + अत्र → दध् + य् + अत्र → दध्यत्र (इ → य्); अच्/यण् जैसी अल्-विधि वास्तविक य् देखती है, जबकि अ-अल् संज्ञा-कार्य स्थानी-दृष्टि से चल सकते हैं।
3. कृ + तृच् → कर्तृ: आदेश/विकार के बाद भी कृ-धातु की संज्ञा-श्रृंखला स्थानीवत् बनी रहती है।

डिकोड-सेतु डोसियर की substitution discipline — स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०) के साथ: आदेश = tagged token जो parent (स्थानी) के metadata flags विरासत में लेता है; अल्-विधि = raw phoneme inspect, no tag inheritance.

1.1.57
अचः परस्मिन् पूर्वविधौ
acaḥ parasmin pūrvavidhau

सूत्र-प्रकार परिभाषा — अच्-स्थानी + पर-निमित्त पर पूर्व-विधि में स्थानिवद्भाव।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अचः (अच् के; स्थानी-षष्ठी, १.१.४९) + परस्मिन् (परे निमित्त में; सप्तमी = दक्षिण/दायाँ सन्दर्भ) + पूर्व-विधौ (पूर्व पर लगने वाली विधि में)।

अनुवृत्ति स्थानिवत् आदेशः (१.१.५६) — यह सूत्र उस स्थानिवद्भाव का विशेष विस्तार/शर्त-क्षेत्र है।

हिन्दी व्याख्या जब किसी स्वर (अच्) की जगह आदेश आता है और उसका निमित्त आगे वाला तत्व है, तो पीछे पड़ने वाली विधियों के लिए वह आदेश स्थानी के समान माना जाता है। अर्थात् दाएँ सन्दर्भ से जन्मा स्वर-आदेश बाएँ पक्ष के नियमों को “मूल स्वर अभी है” जैसी दृष्टि देता है। यह १.१.५६ का संकीर्ण, दिशा-बद्ध रूप है: परस्मिन् → पूर्वविधि। बिना पर-निमित्त या बिना अच्-स्थानी के यह सूत्र नहीं खुलता।

English rendering When a vowel is replaced under a following conditioner, the substitute still counts as the original vowel for operations that target what stands to the left. Right-context vowel replacement does not blind left-side rules.

औपचारिक रूप (Formal)
स्थानी ∈ अच् ∧ निमित्त = दक्षिण-सन्दर्भ (पर)
⇒ आदेश ≡ स्थानी / पूर्व-विधि (बाएँ पक्ष पर लागू नियम)
// दिशा-decode: पर = right context (cf. १.१.६६); पूर्व = left material

उदाहरण
1. दा + हि (लोट्) → देहि: आ → ए (पर-निमित्त हि); पूर्व-पक्ष/अङ्ग-संबंधी दृष्टि में ए स्थानी-आ के समान।
2. खट्वा + औ → खट्वे: आ-स्थानी का पर-कृत आदेश ए; पूर्व-विधि में स्थानिवद्भाव।
3. गो + अम् → गाम्: ओ-स्थानी पर पर-निमित्त से आया आदेश; बाएँ/पूर्व कार्य स्थानीवत्।

डिकोड-सेतु रीराइट A → B / _ D के बाद भी left-side predicates parent A देखें — context-sensitive inheritance with direction, same spine as १.१.६६–६७ decode.

1.1.58
न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घजश्चर्विधिषु
na padāntadvirvacanavareyalopasvarasavarṇānusvāradīrghajaścarvidhiṣu

सूत्र-प्रकार नियम — १.१.५७ के स्थानिवद्भाव से दस विधि-क्षेत्र बाहर।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न (नहीं) + पदान्त + द्विर्वचन + वरे-यलोप + स्वर + सवर्ण + अनुस्वार + दीर्घ + जश् + चर् + विधिषु (इन विधियों में; सप्तमी बहुवचन)।

अनुवृत्ति अचः परस्मिन् पूर्वविधौ स्थानिवत् (१.१.५७) — “न” उसी को निषेध करता है।

हिन्दी व्याख्या १.१.५७ वाला “पूर्व-विधि में आदेश = स्थानी” इन गिनाए क्षेत्रों में लागू नहीं होता। पदान्त, द्वित्व, वरे-प्रसंग का यलोप, सामान्य यलोप, स्वर (उदात्त आदि), सवर्ण-दीर्घ/एकदेश, अनुस्वार, दीर्घत्व, जश्त्व और चर्त्व — यहाँ वास्तविक आदेश-ध्वनि ही गिनी जाती है, स्थानी की “छाया” नहीं। यह सूची अपवाद-नियम है, नई संज्ञा नहीं। व्याख्या-भेद: “वरेयलोप” को एक संयुक्त पद मानें या “वरे + यलोप” दो मद — काशिका-पंक्ति दोनों को यलोप-परिवार में बाँधती है; फल एक: इन विधियों में १.१.५७ शिथिल।

English rendering The left-side “see the original vowel” effect of 1.1.57 is switched off for word-final operations, reduplication, ya-deletion (including the vare case), accent, savarṇa, anusvāra, lengthening, and the jaś/car consonant shifts. There the actual substitute is what counts.

औपचारिक रूप (Formal)
१.१.५७ लागू नहीं यदि विधि ∈ {
पदान्त, द्विर्वचन, वरे-यलोप, यलोप,
स्वर, सवर्ण, अनुस्वार, दीर्घ, जश्, चर्
}
⇒ उन विधियों में आदेश = यथा-स्थित रूप (स्थानीवद्भाव ⊥)

उदाहरण
1. पदान्त: पद के अन्त संबंधी विधि में पर-कृत स्वर-आदेश को स्थानी न गिनो — वास्तविक पदान्त-वर्ण से काम।
2. जश्/चर्: वाक् + भिस → वाग्भिः (क् → ग् जश्त्व) — यहाँ १.१.५७ का पूर्व-स्थानीवद्भाव नहीं थोपते; जश्-विधि वास्तविक अल् देखती है।
3. दीर्घ/सवर्ण: सवर्णदीर्घ में आदेश-स्वर को स्थानी-स्वर मानकर हिसाब न करें (१.१.५७ निषिद्ध)।

1.1.59
द्विर्वचनेऽचि
dvirvacane'ci

सूत्र-प्रकार परिभाषा — द्विर्वचन में अच्-पर पर विशेष स्थानिवद्भाव।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विर्वचने (द्वित्व-विधि में) + अचि (अच् परे होने पर; सप्तमी)।

अनुवृत्ति न … द्विर्वचन … विधिषु (१.१.५८) से द्विर्वचन का निषेध; यह सूत्र उस निषेध का अच्-पर प्रसंग में व्यावर्तन/विशेष। स्थानिवत्-सूत्र-श्रृंखला (१.१.५६–५८)।

हिन्दी व्याख्या १.१.५८ ने द्विर्वचन को १.१.५७ से बाहर रखा; यह सूत्र कहता है — जब परे अच् हो, तब द्विर्वचन के लिए फिर से स्थानी-दृष्टि खुलती है। अर्थात् द्वित्व का अक्षर चुनते समय पर-स्वर-निमित्त आदेश को “असिद्ध/स्थानीवत्” मानकर मूल पर द्वित्व लगता है। अच् न परे हो तो १.१.५८ का सामान्य निषेध बना रहता है। यह अभ्यस्त/द्वित्व-इंजन की “मूल-धातु देखो” नीति का सूत्र-स्थान है।

English rendering Reduplication is excepted from 1.1.57 by 1.1.58 — but when a vowel follows, reduplication again treats the substitute in the sthānin-sensitive way, so the doubled syllable is computed from the original, not from the surface replacement alone.

औपचारिक रूप (Formal)
यदि विधि = द्विर्वचन ∧ पर = अच्
तो आदेश ≡ स्थानी // द्वित्व-आधार = मूल
अन्यथा (द्विर्वचन, पर ≠ अच्): १.१.५८ → स्थानीवद्भाव नहीं

उदाहरण
1. नी + णल् (लिट्) → निनाय: द्वित्व “नि” मूल नी/नि-दृष्टि से; पर-अच् प्रसंग में १.१.५९।
2. कृ + णल् → चकार: अभ्यास “च” स्थानी-दृष्टि से, केवल सतह-आदेश से नहीं।
3. भू + णल् → बभूव: द्वित्व ब/भू मूल-भू पर आधारित (अच्-पर द्विर्वचन)।

1.1.60
अदर्शनं लोपः
adarśanaṃ lopaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — “न दिखना” का नाम लोप।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अदर्शनम् (न दिखाई देना / अनुपलब्धि) + लोपः (लोप संज्ञा)।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र संज्ञा-सूत्र)।

हिन्दी व्याख्या जहाँ कोई वर्ण या तत्व अदृश्य हो जाए — सुना/लिखा न जाए — उस घटना की शास्त्रीय संज्ञा लोप है। लोप “शून्य-आदेश” का नाम है: स्थानी रहता है कार्य-दृष्टि से, पर रूप में अदर्शन। आगे इत्-लोप (१.३.९ तस्य लोपः), अतो लोपः आदि सभी विधियाँ इसी संज्ञा पर टिकती हैं। अदर्शन = भौतिक अनुपस्थिति; लोप = उसकी तकनीकी लेबल। बिना इस संज्ञा के हजार लोप-सूत्र अधर में रह जाते।

English rendering Lopa is the technical name for non-appearance: when an element is prescribed to vanish from the surface string. Deletion rules elsewhere simply assign this label.

औपचारिक रूप (Formal)
लोप ≜ अदर्शन
अर्थात् X → ∅ का नाम “लोप(X)”
संज्ञा-सेट: लोप ∈ सञ्ज्ञा; उपयोग: तस्य लोपः (१.३.९) आदि सभी लोप-विधियाँ

उदाहरण
1. इत्-लोप: क्त (क् + त् + अ इत्…) → त (इत् का अदर्शन = लोप)।
2. सुँ + लोप (पदान्त/संहिता प्रसंग): रामस् → रामः / रामो (स् का अदर्शन-पथ)।
3. अङ्ग/प्रत्यय-लोप विधियाँ: यत्र “लोप” पठित, तत्र X → ∅।

डिकोड-सेतु औपचारिक व्याकरण में ε-production / delete-op: लोप = named ∅-rewrite; later rules (१.३.९) only trigger this defined operation — same “label then apply” style as the book’s codec engines.

1.1.61
प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः
pratyayasya lukślulupaḥ

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — प्रत्यय-लोप की तीन तकनीकी संज्ञाएँ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रत्ययस्य (प्रत्यय·षष्ठी — “प्रत्यय का”) लुक्-श्लु-लुपः (लुक्, श्लु, लुप् — तीन नाम, प्रथमा बहुवचन) — ये तीन संज्ञाएँ प्रत्यय के लोप के लिए हैं।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र सञ्ज्ञा-सूत्र)।

हिन्दी व्याख्या जब कोई विधि-सूत्र “लोप” मात्र न कहकर लुक्, श्लु या लुप् कहता है, तो वह भी प्रत्यय का अदर्शन ही है — पर तीन अलग संज्ञाएँ इसलिए दी गईं कि आगे के नियमों में उनके फल भिन्न हो सकें। साधारण “लोप” और इन तीनों में व्यावहारिक अंतर अगले दो सूत्रों (१.१.६२–६३) में खुलता है। लुक् प्रायः सुबन्त/तिङन्त के सामान्य लोप में, श्लु अदादि-गण में शप् के लोप में, और लुप् कुछ विशेष गण-प्रत्यय-लोपों में आता है। संक्षेप में: तीन टैग, एक ही आधार-क्रिया — प्रत्यय का हटना — भिन्न परिणाम-नीति के साथ।

English rendering The terms luk, ślu, and lup are technical names for the elision of a suffix (pratyaya). Naming three varieties lets later rules assign different side-effects to otherwise similar deletions.

औपचारिक रूप (Formal)
संज्ञा-समुच्चय:
{ लुक्, श्लु, लुप् } ⊆ नाम(प्रत्यय-अदर्शन)
अर्थात्: विधि “X → ∅” जब इन संज्ञाओं से कही जाए → वह नामित प्रत्यय-लोप है (साधारण “लोप” से पृथक् टैग)।

उदाहरण
1. सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (२.४.७१) → सुप्-प्रत्यय का लुक्: राम + सु (समास/धातु-प्रातिपदिक स्थिति में) → राम (सुप् → ∅ via लुक्)।
2. अदिप्रभृतिभ्यः शपः (२.४.७२) → शप् का श्लु: अद् + शप् + तिप् → (शप् → ∅ via श्लु) → अत्ति (द्वित्वादि कार्यों सहित)।
3. गण-विशेष में लुप् (यथा टिट्राद् आदि) — प्रत्यय का नामित लोप, आगे १.१.६३ का फल।

डिकोड-सेतु लुक्/श्लु/लुप् = लोप-क्रिया पर विभिन्न मेटाडेटा-टैग (इत्-चिह्नों की ही भावना): एक ही “delete suffix” ऑपरेशन, तीन flag-semantics — आगे १.१.६२–६३ precisely इन टैगों का व्यवहार बाँटते हैं।

1.1.62
प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्
pratyayalope pratyayalakṣaṇam

सूत्र-प्रकार परिभाषा — लोप के बाद भी प्रत्यय-निमित्त कार्य।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रत्यय-लोपे (प्रत्यय का लोप होने पर — सप्तमी) प्रत्यय-लक्षणम् (प्रत्यय का लक्षण/निमित्त-कार्य — प्रथमा) — लोपेऽपि प्रत्ययवत् व्यवहार।

अनुवृत्ति (विषय) प्रत्ययस्य — १.१.६१ से प्रत्यय-सन्दर्भ; “लोप” यहाँ सामान्य लोप (लुक्-श्लु-लुप् से भिन्न)।

हिन्दी व्याख्या प्रत्यय रूप में न दिखे, फिर भी जो कार्य उस प्रत्यय के होने से निमित्त होते हैं — वे चलते रहते हैं। व्याकरण “दृश्य उपस्थिति” से नहीं, निमित्त-संकेत से काम करता है: लोप हुआ चिह्न भी इतिहास छोड़ जाता है। यह नियम साधारण लोप पर लागू होता है; लुक्-श्लु-लुप् द्वारा हुए लोप का अङ्ग-विषयक अपवाद अगला सूत्र काटता है। छात्र के लिए सरल कुंजी: “प्रत्यय गया, उसका काम नहीं गया” — जब तक १.१.६३ रोक न दे।

English rendering When a suffix is elided by ordinary lopa, operations that are conditioned by that suffix still apply. Deletion removes the segment, not the grammatical “licence” it conferred — except where 1.1.63 restrains stem-side effects after luk/ślu/lup.

औपचारिक रूप (Formal)
यदि प्रत्यय P का लोप (∉ {लुक्, श्लु, लुप्} टैग) हुआ हो, तो
∀ कार्य K: (K का निमित्त = P) ⇒ K अभी भी लागू
(flag: `pratyaya_present_for_lakṣaṇa = true` after plain lopa)।

उदाहरण
1. दाश् + क्वसु → दाशुषे — क्वसु-संबन्धी लोप/अदर्शन के बाद भी लिट्-कृदन्त-निमित्त रूप-कार्य उपलब्ध (काशिका-परंपरा का प्रसिद्ध दृष्टांत-दिश)।
2. धातु + क्विप् (क्विप्-लोप ६.१.६७ वेरपृक्तस्य आदि से) → समित्, अग्निचित् — प्रत्यय अदृश्य, फिर भी कृदन्त/लिङ्गादि लक्षण-कार्य।
3. सामान्य सूत्र: “प्रत्यये लुप्तेऽपि प्रत्ययनिमित्तं कार्यम्” — यही परिभाषा का सार।

1.1.63
न लुमताऽङ्गस्य
na lumatā'ṅgasya

सूत्र-प्रकार नियम — लुमता लोपे अङ्ग-कार्य निषेध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न (नहीं) लुमता (लुम्-युक्त — लुक्/श्लु/लुप् से; तृतीया) अङ्गस्य (अङ्ग का [कार्य] — षष्ठी) — लुमता लोपे अङ्गस्य (प्रत्यय-निमित्त) कार्यं न।

अनुवृत्ति प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१.१.६२) — उसी पर निषेध; “अङ्गस्य” से क्षेत्र सीमित।

हिन्दी व्याख्या १.१.६२ का उदार नियम यहाँ कटता है: यदि प्रत्यय लुक्, श्लु या लुप् से हटाया गया, तो अङ्ग पर वह कार्य नहीं होता जो उस प्रत्यय के निमित्त से होता। “लुमता” = जिनमें “लु” है — तीनों नामित लोप। ध्यान दें: निषेध अङ्ग-कार्य तक है; अन्य क्षेत्रों में लक्षण-विचार व्याख्या-परंपरा में अलग-अलग सूक्ष्म हो सकता है (व्याख्या-भेद: अङ्गमात्र vs. व्यापक निषेध — काशिका-रेखा प्रायः अङ्ग-केन्द्रित पढ़ती है)। व्यावहारिक पाठ: नामित-लोप = “प्रत्यय कभी था ही नहीं” जैसा अङ्ग के लिए।

English rendering After elision by luk, ślu, or lup, operations on the stem (aṅga) that would have been triggered by that suffix do not apply. Named deletion is stronger than plain lopa: it also cancels stem-side pratyaya-lakṣaṇa.

औपचारिक रूप (Formal)
१.१.६२ का निषेध-खंड:
यदि P → ∅ via टैग ∈ {लुक्, श्लु, लुप्}, तो
¬( अङ्ग पर P-निमित्त कार्य )
`pratyaya_lakṣaṇa_on_aṅga = false` when `elision_tag ∈ lumat`।

उदाहरण
1. सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (२.४.७१) — सुप् का लुक्: समास/धातु-प्रातिपदिक में अङ्ग को सुप्-निमित्त पदादि/अङ्ग-कार्य नहीं मिलते (१.१.६२ रुकता है)।
2. अद् + शप् + ति → श्लु (२.४.७२): शप्-निमित्त अङ्ग-गुण आदि उस रूप में नहीं ज्यों शप् उपस्थित हो; श्लु-विधि का अपना मार्ग (द्वित्व आदि)।
3. नपुंसके स्व/अम् का लुक् (७.१.२३ स्वमोर्नपुंसकात्) — फल: फलम् (न फलस्/फलम्-सुप्-आकार), अङ्ग पर उन प्रत्ययों का लक्षण-भार नहीं।

1.1.64
अचोऽन्त्यादि टि
aco'ntyādi ṭi

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — “टि” की परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अचः (अच् = स्वर — षष्ठी) अन्त्य-आदि (अन्तिम स्वर से लेकर अन्त तक) टि (टि-संज्ञा — प्रथमा) — अन्त्य अच् से प्रारम्भ अंश = टि।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र सञ्ज्ञा)।

हिन्दी व्याख्या किसी रूप में सबसे अंतिम स्वर लो; उसी स्वर से लेकर शब्द के अंत तक का खंड टि कहलाता है। यदि अंतिम स्वर के बाद व्यंजन हों, वे भी टि में हैं; यदि स्वर ही अंत हो, तो वही अकेला टि हो सकता है। यह संज्ञा आगे टेः (६.४.१४३) आदि लोप-विधियों में निशाना बाँधती है — “पूरा अंत नहीं, टि-अंत।” छात्र-स्मृति: टि = “last vowel → end” स्पैन।

English rendering ṭi is the stretch of a form that begins with its last vowel and runs to the end. Later rules can target this final vocalic span without deleting the whole word.

औपचारिक रूप (Formal)
माना रूप w = a₁a₂…aₙ, aᵢ ∈ अल्।
माना k = max{ i | aᵢ ∈ अच् }।
टि(w) := aₖ aₖ₊₁ … aₙ
(अन्तिम स्वर-सूचकांक से अंत तक का खंड)।

उदाहरण
1. अग्नि → स्वर: अ, इ → अन्त्य अच् = इ → टि = इ।
2. पचति → … त् इ → अन्त्य अच् = इ → टि = इ।
3. राम (र् आ म् अ) → अन्त्य अच् = अ → टि = अ; रामस् → अन्त्य अच् = अ (सकार से पूर्व) → टि = अस्।

1.1.65
अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा
alo'ntyāt pūrva upadhā

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — “उपधा” (उपान्त्य वर्ण) की परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अलः (अल् = कोई वर्ण — षष्ठी) अन्त्यात् (अंतिम से — पञ्चमी) पूर्वः (ठीक पहले वाला — प्रथमा) उपधा (उपधा-संज्ञा) — अन्त्य अल् से पूर्ववर्ती अल् = उपधा।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतन्त्र सञ्ज्ञा)।

हिन्दी व्याख्या शब्द का आखिरी वर्ण हटाकर देखो — ठीक उससे पहले जो वर्ण है, वही उपधा है। अक्सर यह उपान्त्य स्वर होता है (जैसे पच् में अ), पर परिभाषा स्वर-मात्र की नहीं — कोई भी अल्। धातु-पाठ और अङ्ग-कार्य में “उपधायाः वृद्धि/गुण” (यथा ७.२.११६ अत उपधायाः) इसी संज्ञा पर टिके हैं। स्मृति-सूत्र: उपधा = penultimate sound।

English rendering The upadhā is the sound immediately before the final sound of a form — the penultimate al. Many stem-strengthening rules key on this position (especially penultimate a).

औपचारिक रूप (Formal)
w = a₁…aₙ, aᵢ ∈ अल्, n ≥ 2।
उपधा(w) := aₙ₋₁
(अन्त्य अल् = aₙ; उसका पूर्व = उपधा)।

उदाहरण
1. पच् → अन्त्य = च्, पूर्व = अ → उपधा = अ → अत उपधायाः (७.२.११६) → पाच्… → पाकः।
2. बुध् → अन्त्य = ध्, पूर्व = उ → उपधा = उ → बोधः (गुण/वृद्धि-मार्ग से)।
3. राम → अन्त्य = अ, पूर्व = म् → उपधा = म् (यहाँ स्वर-उपधा नहीं; संज्ञा वर्ण-सामान्य है)।

1.1.66
तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य
tasminniti nirdiṣṭe pūrvasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — सप्तमी = दक्षिण-संदर्भ (पूर्वस्य कार्य)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मिन् इति ( “तस्मिन्” कहकर — सप्तमी-निर्देश) निर्दिष्टे (जब निर्दिष्ट हो) पूर्वस्य (पूर्ववर्ती का [कार्य] — षष्ठी) — सप्तम्यन्त = दायाँ संदर्भ; कार्य बाएँ/पूर्व पर।

अनुवृत्ति (व्याख्या-रेखा) स्थाने/आदेश-प्रकरण का मेटा-नियम; १.१.४९ (षष्ठी स्थानेयोगा), १.१.६७ (तस्मादित्युत्तरस्य) के साथ त्रयी।

हिन्दी व्याख्या विधि-सूत्र में कोई पद सप्तमी में हो तो उसका अर्थ है: “इसके होने पर, ठीक पहले वाले पर कार्य करो।” आधुनिक भाषा में यही दायाँ संदर्भ (right context) है। पाणिनि तीर-चिह्न नहीं लिखते — विभक्ति ही ऑपरेटर है: सप्तमी = / _ X, पंचमी = / X _, षष्ठी = स्थाने (लक्ष्य)। अगला सूत्र (१.१.६७) पंचमी को बायाँ संदर्भ बनाता है; यह सूत्र जोड़ी का पहला स्तंभ है। बिना इसके इको यणचि पढ़ना असंभव है।

English rendering A locative mention in a rule marks the right-hand context: the operation applies to what immediately precedes that item. Case-endings are the Aṣṭādhyāyī’s rewrite-notation — locative means “before this.”

औपचारिक रूप (Formal)
सप्तम्यन्त निर्देश X₇ ⇒ कार्य लक्ष्य = पूर्ववर्ती सामग्री:
A → B / _ X
(तुलना: १.१.६७: X₅ ⇒ A → B / X _ ; १.१.४९: Y₆ ⇒ स्थाने Y पर आदेश)।

उदाहरण
1. इको यणचि (६.१.७७): अचि = अच्·सप्तमी → इक् → यण् / _ अच्।
दधि + अत्र → इ → य् / _ अ → दध्यत्र।
2. एङः पदान्तादति (६.१.१०९): अति = अत्·सप्तमी → पदान्त एङ् का रूप _ अत् संदर्भ में।
3. सामान्य पाठ: “तस्मिन्” = “उसके सामने/उसके होने पर” = right-context guard।

डिकोड-सेतु यही सूत्र rewrite-rule decode का स्तंभ है — हमारे इंजन में सप्तम्यन्त = right-context स्लॉट (`/ _ X`)। इको यणचि का Unicode-रूप `इक् → यण् / _ अच्` सीधे १.१.६६+१.१.४९ की विभक्ति-कूट से निकलता है; १.१.६७ बायाँ स्लॉट पूरा करता है।

1.1.67
तस्मादित्युत्तरस्य
tasmādityuttarasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — पद-विभक्ति से सन्दर्भ-चिह्न।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् (पञ्चमी) — “उससे (पहले)”; इति — इस प्रकार निर्दिष्ट होने पर; उत्तरस्य (षष्ठी) — परवर्ती (अगले) का / परवर्ती के विषय में।

अनुवृत्ति १.१.६६ से “निर्दिष्टे” का भाव (संदर्भ-निर्देश की पंक्ति) — यहाँ पञ्चमी का कार्य निर्धारित होता है; “पूर्वस्य” का स्थान “उत्तरस्य” लेता है।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र नियम-लेखन की भाषा को खोलता है। जहाँ विधि में कोई पद पञ्चमी में रखा हो — “तस्मात्” की शैली में — वहाँ कार्य उस पद के बाद आने वाले अवयव पर लगता है, उसके पहले वाले पर नहीं। १.१.६६ ने सप्तमी को दायाँ सन्दर्भ बनाया था; यह सूत्र पञ्चमी को बायाँ सन्दर्भ बनाता है। दोनों मिलकर सन्दर्भ-संवेदनशील प्रतिस्थापन की पूरी कुंजी हैं: “किसके आगे / किसके पीछे”। पढ़ते समय विभक्ति को केवल व्याकरण न समझें — वह स्वयं ऑपरेटर है।

English rendering When an element is specified in the ablative, the operation applies to what follows it. Ablative thus marks left-hand context in a rewrite rule — the counterpart of the locative right-context of 1.1.66.

औपचारिक रूप (Formal) Case-decode (left context):
Pāṇinian: X-ablative ⇒ target = successor(X)
Rewrite: A → B / C _
(C encoded by ablative; A by genitive via 1.1.49; right context D by locative via 1.1.66)

उदाहरण इको यणचि (६.१.७७) — इकः (षष्ठी = स्थाने) + अचि (सप्तमी = दायाँ सन्दर्भ): इक् → यण् / _ अच्। यहाँ “अचि” सप्तमी है (१.१.६६); पञ्चमी का स्पष्ट क्लासिक — ह्रस्वस्य गुणः (७.३.८६) आदि में ह्रस्व-पञ्चमी/संबंध से “उसके बाद” का कार्य। इको यणचि में यण्-आदेश इक् के स्थान पर अच् के सामने: दधि + अत्र → दध्यत्र (इ → य् / _ अ)।

डिकोड-सेतु यह सूत्र rewrite-rule decode का बायाँ पार्श्व है — १.१.६६ (loc = right), १.१.६७ (abl = left), १.१.४९ (gen = target)। “इको यणचि” = `इक् → यण् / _ अच्` — विभक्ति ही तीर-चिह्न है।

1.1.68
स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा
svaṃ rūpaṃ śabdasyāśabdasaṃjñā

सूत्र-प्रकार परिभाषा — पद का स्व-रूप बनाम सञ्ज्ञा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वम् — अपना; रूपम् — रूप / आकृति; शब्दस्य (षष्ठी) — शब्द का; अ-शब्द-सञ्ज्ञा — (तब जब वह) शब्द-सञ्ज्ञा न हो, अर्थात् तकनीकी नाम न हो।

अनुवृत्ति कोई अनुवृत्ति नहीं (स्वतंत्र परिभाषा; आगे १.१.६९–७० इसी “रूप” की सीमाएँ जोड़ते हैं)।

हिन्दी व्याख्या सूत्र में जो शब्द लिखा है, वह सामान्यतः अपने ही उच्चरित रूप का प्रतिनिधि है — न तो पर्याय का, न व्युत्पन्न अर्थ का। अपवाद: जब वह पद किसी व्याकरणिक सञ्ज्ञा का नाम हो (जैसे “वृद्धि”, “गुण”, “अङ्ग”), तब वह सञ्ज्ञा-संकेत है, स्व-रूप नहीं। “अशब्दसञ्ज्ञा” का तात्पर्य — जब तक पद को तकनीकी नाम न मान लिया जाए, तब तक वह अपने रूप से बोलता है। इससे सूत्र-पाठ की शाब्दिक निष्ठा सुरक्षित रहती है: लिखा “अ”, तो “अ” ही — जब तक सञ्ज्ञा-सूची उसे अन्यत्र न बाँधे।

English rendering A word in a rule stands for its own phonetic form, not for a synonym or derived sense — unless it is a technical term (śabda-saṃjñā). Plain mention is self-reference; only a defined name points elsewhere.

औपचारिक रूप (Formal) Denotation of a token w in a sūtra:
den(w) = form(w) if w ∉ Saṃjñā-names
den(w) = Saṃjñā(w) if w is a technical designation
(self-form default; saṃjñā override)

उदाहरण (१) “अ इ उ ण्” (शिवसूत्र) में “अ” = स्व-रूप स्वर अ — सञ्ज्ञा नहीं। (२) वृद्धिरादैच् (१.१.१) में “वृद्धि” शब्द-सञ्ज्ञा है → आत् ऐच् का समूह, न कि शब्द “वृद्धि” का उच्चारण-मात्र। (३) इको यणचि में “इक्” प्रत्याहार-सञ्ज्ञा (१.१.७१ से निर्मित) है → {इ उ ऋ ऌ}, न कि मात्र अक्षर-क्रम “इक्”।

1.1.69
अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः
aṇudit savarṇasya cāpratyayaḥ

सूत्र-प्रकार परिभाषा — सवर्ण-व्याप्ति (अण् / उदित्)।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अण् — प्रत्याहार अण् (अ इ उ); उदित् — “उ” इत् वाला वर्ण (जैसे कु, चु, टु, तु, पु); सवर्णस्य (षष्ठी) — सजातीय (सवर्ण) का भी; च — और; अप्रत्ययः — (जब वह) प्रत्यय न हो।

अनुवृत्ति १.१.६८ से “स्वं रूपम्…” का विरोध-संस्कार — यहाँ स्व-रूप के साथ सवर्ण-वर्ग भी गृहीत; “अप्रत्ययः” सीमा।

हिन्दी व्याख्या अण् (अ, इ, उ) तथा “उ”-इत् वाले वर्ण (वर्गीय क्/च्/ट्/त्/प् इत्यादि का संकेत) न केवल अपने एक रूप को, बल्कि अपने सवर्ण-समुदाय को भी निदिष्ट करते हैं — बशर्ते वे प्रत्यय न हों। अतः “अ” कहने से ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत, अनुनासिक-अननुनासिक अ-वर्ग भी खुल सकता है (सवर्ण-शास्त्र १.१.९ के साथ)। प्रत्यय में यह विस्तार नहीं — प्रत्यय का रूप ज्यों का त्यों। यह सूत्र वर्ण-निर्देश को कक्षा-निर्देश में बदल देता है: एक अक्षर, पूरा परिवार।

English rendering The pratyāhāra aṇ and any sound marked with udit also stand for their homogeneous (savarṇa) class — provided they are not suffixes. One cited vowel or class-marker thus opens its whole similarity-set.

औपचारिक रूप (Formal) For α ∈ {aṇ-sounds} ∪ {udit-sounds}, if α is not a pratyaya:
den(α) = { x | savarṇa(x, α) } (class, not singleton)
else den(α) = form(α)
(with savarṇa per 1.1.9: same place + same effort)

उदाहरण (१) अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१) — “अक्” में अ इ उ → सवर्ण सहित; दण्ड + अग्र = दण्डाग्र (अ+अ → आ)। (२) उदित्: कु (क-वर्ग) — चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेः आदि में वर्ग-व्याप्ति। (३) प्रत्यय-अपवाद: “उ” प्रत्यय (ण्युत् आदि का अंश) सवर्ण-विस्तार नहीं लेता — रूप बद्ध रहता है।

1.1.70
तपरस्तत्कालस्य
taparastatkālasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — तपर = काल-विशेष।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त-परः — जिसके बाद “त्” लगा हो (तपर); तत्-कालस्य (षष्ठी) — उसी काल / उसी मात्रा वाले (वर्ण) का।

अनुवृत्ति १.१.६९ से सवर्ण-व्याप्ति का संकोच — तपर होने पर सवर्ण-विस्तार नहीं, केवल समकाल।

हिन्दी व्याख्या जब किसी स्वर के बाद “त्” जोड़ा जाए — आत्, ईत्, ऊत् — तब वह निर्देश केवल उसी मात्रा वाले वर्ण का होता है, सवर्ण-परिवार का नहीं। “आत्” = दीर्घ आ मात्र; ह्रस्व अ या प्लुत आ३ नहीं। १.१.६९ ने वर्ग खोला था; यह सूत्र तपर से उसे फिर बंद करता है — सूक्ष्म काल-नियंत्रण। वैदिक-लौकिक दोनों में मात्रा-भेद निर्णायक है; तपर वह चाबी है जिससे सूत्रकार एक मात्रा को अकेला पकड़ता है।

English rendering A vowel followed by t (tapara) denotes only that specific duration — short, long, or protracted — not its whole savarṇa family. Tapara freezes quantity where 1.1.69 would have opened the class.

औपचारिक रूप (Formal) If V is written as V+t (tapara):
den(Vᵗ) = { v | same_segment(v,V) ∧ duration(v)=duration(V) }
¬savarṇa-expansion (blocks 1.1.69 for that token)

उदाहरण (१) अतो गुणे (६.१.९७) — “अत्” तपर → केवल ह्रस्व अ; दीर्घ आ पर यह संधि-नियम नहीं। अतः अ + ए → ए (उप + एति → उपैति) में ह्रस्व-अ क्षेत्र। (२) आत् ऐच् वृद्धि (१.१.१) — “आत्” = दीर्घ आ ही, ह्रस्व अ वृद्धि-सञ्ज्ञा में नहीं। (३) ईत् / ऊत् निर्देशों में केवल दीर्घ ई / ऊ।

1.1.71
आदिरन्त्येन सहेता
ādirantyena sahetā

सूत्र-प्रकार परिभाषा — प्रत्याहार-निर्माण।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदिः — आदि / आरम्भ-वर्ण; अन्त्येन (तृतीया) — अन्तिम (इत्) के साथ; सह — सहित; इता (तृतीया) — इत्-संज्ञक वर्ण के साथ।

अनुवृत्ति १.३.२–१.३.९ से “इत्” की सञ्ज्ञा-पृष्ठभूमि (अनुबन्ध जो लोप्य हैं); शिवसूत्र-क्रम आधार।

हिन्दी व्याख्या प्रत्याहार बनाने की विधि: किसी शृंखला का आदि-वर्ण अन्तिम इत्-वर्ण के साथ मिलकर उस बीच की पूरी पंक्ति का नाम बन जाता है। “अच्” = अ से लेकर च्-इत् तक के स्वर; “हल्” = ह से लेकर ल् तक के व्यंजन (ह की दो आवृत्तियों सहित स्लॉट, समुच्चय ३३)। इत् स्वयं उच्चारण में नहीं रहता (तस्य लोपः १.३.९) — वह केवल सीमा-चिह्न है। यहीं से अष्टाध्यायी का वर्ण-संपीड़न इंजन खुलता है: चौदह शिवसूत्रों से दर्जनों प्रत्याहार।

English rendering An initial sound taken together with a final it-marker names the whole span between them — the pratyāhāra. The marker is silent metadata; the name compresses an alphabet-interval into two syllables.

औपचारिक रूप (Formal) Let Ś = ordered Śivasūtra string with it-markers I ⊂ positions.
pratyāhāra(a, i) = { x ∈ Ś | pos(a) ≤ pos(x) < pos(i) }, i ∈ I
Examples: अच् = {अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ}; हल् = all consonants (33 distinct; 34 slots with double ह)

उदाहरण (१) अ + च्(इत्) → अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ। (२) इ + क् → इक् = इ उ ऋ ऌ (इको यणचि)। (३) ह + ल् → हल् = समस्त व्यंजन-प्रत्याहार। यण् = य् व् र् ल्; झल् = झ भ घ ढ ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ थ च ट त क प य व र ल (आदि)।

डिकोड-सेतु प्रत्याहार-इंजन का मूल सूत्र — १४ शिवसूत्रों से इस संस्करण में ४२ प्रामाणिक प्रत्याहार गणित होते हैं। अच् / हल् का विस्तार ऊपर pinned: अच् = ९ स्वर; हल् = ३३ व्यंजन (ह द्विरावृत्ति, distinct ३३)।

1.1.72
येन विधिस्तदन्तस्य
yena vidhistadantasya

सूत्र-प्रकार परिभाषा — तदन्त-विधि।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) येन (तृतीया) — जिसके द्वारा; विधिः — (कोई) विधि / नियम कहा जाए; तत्-अन्तस्य (षष्ठी) — उसी (अंग) पर अन्त वाले का, अर्थात् जो उससे समाप्त हो।

अनुवृत्ति विधि-सूत्रों में निर्दिष्ट अवयव का व्याप्ति-नियम; १.१.६८ के स्व-रूप के साथ “अन्त” की दिशा।

हिन्दी व्याख्या जिस अवयव के सहारे कोई विधि कही गई हो, वह विधि केवल उसी अवयव पर नहीं, बल्कि उस अवयव पर समाप्त होने वाले पूरे रूप पर लागू होती है। “अच्” कहा तो अच्-अन्त पद; “सुप्” कहा तो सुबन्त। यह तदन्त-परिभाषा नियमों को अक्षर-मात्र से शब्द-स्तर तक उठाती है: स्थानी या सन्दर्भ अक्सर “जो X पर खत्म हो” होता है। बिना इसके सूत्र टुकड़ों पर अटक जाते; इसके साथ वे पूर्ण पदावली पर चलते हैं।

English rendering A rule stated by reference to an element X applies to what ends in X (tadanta). The cited piece is the ending-key of the whole form the operation targets.

औपचारिक रूप (Formal) If a vidhi is stated via designator X:
domain(vidhi) = { w | w ends with den(X) } (tadanta reading)
not merely the isolated segment X unless context forces otherwise

उदाहरण (१) इको यणचि — इक्-अन्त पूर्व रूप + अच्-आदि पर: दधि + अत्र → दध्यत्र (इक्-अन्त “इ” → य्)। (२) अतो भिस ऐस् (७.१.९) — “अत्” अन्त अकारान्त प्रातिपदिक से भिस् → ऐस्: राम + भिस् → रामैः। (३) सुप्तिङन्तं पदम् (१.४.१४) — सुप्/तिङ् पर अन्त = पद-सञ्ज्ञा: रामम्, पचति।

1.1.73
वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम्
vṛddhiryasyācāmādistad vṛddham

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — वृद्ध-पद की परिभाषा।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृद्धिः (आ/ऐ/औ) यस्य (षष्ठी — जिसका) अचाम् (स्वरों में, षष्ठी-बहुवचन) आदिः (प्रथम स्वर) तत् (वह) वृद्धम् (वृद्ध-संज्ञक)।

अनुवृत्ति वृद्धि (१.१.१ की संज्ञा-राशि आ, ऐ, औ); अच् = प्रत्याहार (स्वर-समुच्चय)। “वृद्धम्” यहाँ नवीन संज्ञा है।

हिन्दी व्याख्या यह सूत्र बताता है कि जिस प्रातिपदिक या नाम का प्रथम स्वर वृद्धि-वर्ग का हो — अर्थात् आ, ऐ या औ — उस पूरे पद को वृद्ध कहा जाता है। “अचाम् आदिः” का तात्पर्य है: पद के स्वरों में जो सबसे पहले आता है, वही निर्णायक है; व्यंजन बीच में हों तो भी गिना जाता है प्रथम स्वर। यह संज्ञा आगे तद्धित-प्रकरण में काम आती है — विशेषकर जहाँ वृद्ध आधार पर प्रत्यय विहित हैं (जैसे छ → ईय)। संक्षेप में: वृद्धि-आदि स्वर = वृद्ध-संज्ञा।

English rendering A base is termed vṛddha when the first among its vowels is a vṛddhi vowel (ā, ai, or au). The label targets the whole stem for later taddhita operations that key on that designation.

औपचारिक रूप (Formal)
वृद्ध = { X | first(vowels(X)) ∈ वृद्धि }, जहाँ वृद्धि = {आ, ऐ, औ}, vowels(X) = अच्-अनुक्रम in X.

उदाहरण
1. आश्वलायन — प्रथम स्वर आ ∈ वृद्धि → वृद्ध।
2. औपगव — प्रथम स्वर औ ∈ वृद्धि → वृद्ध।
3. ऐतिशायन — प्रथम स्वर ऐ ∈ वृद्धि → वृद्ध।

डिकोड-सेतु अच्-प्रत्याहार का विस्तार (अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ) प्रत्याहार-इंजन से कैनॉनिकल; वृद्धि-समुच्चय १.१.१ से। संज्ञा = समुच्चय-परिभाषा, विधि-पुनर्लेखन नहीं।

1.1.74
त्यदादीनि च
tyadādīni ca

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — त्यदादि को भी वृद्ध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्यद्-आदीनि (त्यद् से आरम्भ गण के सर्वनाम-आधार) च (भी) [वृद्धानि]।

अनुवृत्ति वृद्धम् (१.१.७३) — “च” से उसी संज्ञा का विस्तार।

हिन्दी व्याख्या त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस् तथा उसी गण के अन्य आधार — जिनका प्रथम स्वर वृद्धि नहीं भी हो — फिर भी वृद्ध माने जाते हैं। कारण स्पष्ट है: आगे के नियमों में “वृद्ध” पर निर्भर प्रत्यय (विशेषतः छ/ईय आदि) सर्वनाम-आधारों पर भी लग सकें। बिना इस अतिदेश-सदृश विस्तार के तदीय, मदीय जैसे रूप वृद्ध-शर्त पर नहीं बैठते। यह १.१.७३ का पूरक समुच्चय है, प्रतिस्थापन नहीं।

English rendering The pronominal bases of the tyadādi group are also designated vṛddha, even when their first vowel is not a vṛddhi vowel — so that vṛddha-conditioned suffixes can apply to them.

औपचारिक रूप (Formal)
वृद्ध ← वृद्ध ∪ त्यदादि,
त्यदादि ⊇ {त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, …} (गणपाठ-सूची)।

उदाहरण
1. तद् ∈ त्यदादि → वृद्ध; तद् + छ (४.२.११४ वृद्धाच्छः) → तदीय।
2. यद् → वृद्ध → यदीय।
3. इदम् → वृद्ध (संज्ञा-लाभ; आगे तद्धित-प्रयोग में)।

1.1.75
एङ् प्राचां देशे
eṅ prācāṃ deśe

सूत्र-प्रकार सञ्ज्ञा — ए/ओ-आदि प्राच्य-देशनाम भी वृद्ध।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एङ् (ए, ओ — प्रत्याहार) प्राचाम् (पूर्वीयों के, षष्ठी) देशे (देश-नाम में / देशविषय में)।

अनुवृत्ति वृद्धम् (१.१.७३–७४ की संज्ञा-श्रृंखला)।

हिन्दी व्याख्या यदि किसी पद का प्रथम स्वर ए या ओ हो, और वह प्राच्य (पूर्वी) देश का नाम हो, तो वह भी वृद्ध कहा जाता है। वृद्धि में ए/ओ नहीं आते; यह सूत्र पूर्वी भूगोल-नामों के लिए विशेष विस्तार है। काशिका-परम्परा में “प्राचां देशे” को भौगोलिक देशनाम पर लिया जाता है — केवल “पूर्वी आचार्य” नहीं। इससे ओड्र आदि नाम वृद्ध-संज्ञक होकर उन्हीं तद्धित-मार्गों में प्रवेश करते हैं जो वृद्ध पर टिके हैं।

English rendering A name of an eastern country whose first vowel is e or o (eṅ) is also termed vṛddha. Thus non-vṛddhi initials e/o count only in that geographic name-class.

औपचारिक रूप (Formal)
वृद्ध ← वृद्ध ∪ { X | first(vowels(X)) ∈ एङ् ∧ X ∈ प्राच्य-देशनाम },
एङ् = {ए, ओ}।

उदाहरण
1. ओड्र — प्रथम स्वर ओ ∈ एङ्, प्राच्य-देशनाम → वृद्ध।
2. (समान न्यास) ए-आदि प्राच्य-देशनाम → वृद्ध, यदि गण/परम्परा में देशनाम सिद्ध हो।

व्याख्या-भेद (संक्षेप): कहीं-कहीं “प्राचाम्” को पूर्वी वैयाकरण-मत से जोड़ा जाता है; काशिका–सिद्धान्तकौमुदी-रेखा में देशे के कारण अर्थ भौगोलिक देशनाम ही स्थिर माना जाता है।

डिकोड-सेतु एङ्-प्रत्याहार (ए ओ ङ्) — शिवसूत्र-इंजन से दो-सदस्य समुच्चय; १.१.७३–७५ तीनों मिलकर वृद्ध = (वृद्धि-आदि) ∪ त्यदादि ∪ (एङ्-आदि प्राच्य-देशनाम) — संज्ञा-समुच्चय का क्रमिक संघ।

भाग ५

प्रक्रिया-दर्शन

Derivations: the Grammar Running
भूधातु (root, dhātupāṭha भ्वादि 1)भू + लट्वर्तमान-काल का लकार (3.2.123 वर्तमाने लट्)भू + तिप्लट् → तिप् (3.4.78 तिप्तस्झि…)भू + शप् + तिविकरण शप् (3.1.68 कर्तरि शप्)भो + अ + तिगुण: ऊ → ओ (7.3.84 सार्वधातुकार्धधातुकयोः)भव् + अ + तिओ → अव् (6.1.78 एचोऽयवायावः)भवतिपद सिद्ध — the word compiles
प्रक्रिया-सोपान — the derivation of भवति ("becomes"): each step is licensed by a numbered sūtra. This ladder is the grammar running as a program — input root, output word.

प्रक्रिया-दर्शन १: भू → भवति · A Complete Derivation

प्रक्रिया क्या है। पाणिनि की अष्टाध्यायी (८ अध्याय × ४ पाद = ३२ पाद; इस संस्करण में, Sanskrit Wikisource से २०२६-०८-१० को प्राप्त, ३,९८३ सूत्र — अन्य संस्करणों में लगभग ३,९५९–३,९९६) केवल परिभाषाओं का संग्रह नहीं है; वह एक जनन-यन्त्र (generative machine) है। धातु से रूप तक पहुँचने की क्रमबद्ध संक्रिया को परम्परा प्रक्रिया कहती है। यह अध्याय एक पूर्ण, पठनीय उदाहरण देता है: भू + लट् → भवति — “is / becomes” का वर्तमानकालिक रूप। लक्ष्य केवल “उत्तर” नहीं, बल्कि हर चरण पर कौन-सा सूत्र क्या करता है — ताकि पाठक स्वयं नियम-श्रृंखला पढ़ सके।

आरम्भ-बिन्दु: धातु और लकार। धातुपाठ (~२,००० धातु) से भू “होना / होना” — भ्वादि-गण की पहली धातु। वर्तमान अर्थ के लिए लट् आता है (वर्तमाने लट्, ३.२.१२३)। लट् स्वयं एक लकार-संज्ञा है; उस पर तिङ्-प्रत्यय जुड़ते हैं। परस्मैपद, प्रथमपुरुष, एकवचन का प्रत्यय तिप् है (तिप्तस्झि…, ३.४.७८)। अब कच्चा ढाँचा है:

इत्-चिह्न और लोप। तकनीकी अवयवों में कुछ ध्वनियाँ इत् (silent markers) होती हैं — सूत्र १.३.२–१.३.९ उन्हें परिभाषित करते हैं; तस्य लोपः (१.३.९) से वे हट जाती हैं। तिप् में प् इत् है → शेष ति। विकरण शप् (कर्तरि शप्, ३.१.६८ — भ्वादि पर कर्तृवाच्य सार्वधातुक में) में श् और प् दोनों इत् → शेष अ। यह “टैग हटाकर token साफ़ करना” है — डोसियर के शब्दों में: markers encode metadata exactly like tags/flags on tokens।

विकरण-मंच। अब रूप: भू + अ + ति। अङ्ग भू के सामने सार्वधातुक अ (शप्) और ति हैं। यहाँ गुण का द्वार खुलता है।

गुण: ७.३.८४ सार्वधातुकार्धधातुकयोः। इक् (इ उ ऋ ऌ तथा उनके दीर्घ) अङ्ग के अन्त में, सार्वधातुक/आर्धधातुक के योग में, गुण लेते हैं। ऊ → ओ (गुण-क्रम: इ/ई→ए, उ/ऊ→ओ, ऋ→अर्)। अतः:

यह “ध्वनि-सौन्दर्य” नहीं; विधि-सूत्र की बाध्य संक्रिया है — स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०) और स्थानिवद्भाव (१.१.५६) की पृष्ठभूमि में स्थानापन्न को लक्ष्य के स्थान-धर्म मिलते हैं।

अवादेश: ६.१.७८ एचोऽयवायावः। एच् (ए ओ ऐ औ) के स्थान पर स्वर के सामने अय् / अव् / आय् / आव्। ओ → अव् जब आगे अच् हो। अतः:

यही ६.१.७७ इको यणचि की बहन-संक्रिया है: जहाँ इक्→यण् / _अच्, वहाँ एच्→अयवायाव। दोनों context-sensitive rewrite हैं — डोसियर की “rewrite-rule decode” में: षष्ठी स्थाने (१.१.४९) लक्ष्य, सप्तमी/पञ्चमी सन्दर्भ (१.१.६६–६७)। अंग्रेज़ी संकेतन में: `एच् → अय्अव्आय्आव् / _ अच्`।

### चरण-तालिका · Step table

#अवस्था (state)संक्रियासूत्र / आधार
१भूधातुचयनधातुपाठ (भ्वादि)
२भू + लट्वर्तमान लकार३.२.१२३ वर्तमाने लट्
३भू + तिप्परस्मै·प्र·ए· तिङ्३.४.७८ तिप्तस्झि…
४भू + तिइत्-लोप (प्)१.३.२–१.३.९; १.३.९ तस्य लोपः
५भू + शप् + तिकर्तरि विकरण३.१.६८ कर्तरि शप्
६भू + अ + तिइत्-लोप (श्, प्)१.३.२–१.३.९; १.३.९
७भो + अ + तिगुण (ऊ→ओ)७.३.८४ सार्वधातुकार्धधातुकयोः
८भव् + अ + तिओ→अव् / _अ६.१.७८ एचोऽयवायावः
९भवतिसंयोग/अन्तिम रूप(कोई अतिरिक्त विधि नहीं)

अनुवृत्ति और अधिकार। ऊपर के सूत्र अकेले “पूर्ण वाक्य” नहीं लगते; अनुवृत्ति — पूर्व-सूत्रों से शब्दों का मौन वहन — उन्हें पूरा करती है। शप् का अधिकार, सार्वधातुक की संज्ञा, अङ्ग-संज्ञा: ये सब सञ्ज्ञा / अधिकार परतें हैं जिनके बिना विधि-सूत्र लागू ही नहीं होते। संघर्ष हो तो विप्रतिषेधे परं कार्यम् (१.४.२); अपवाद उत्सर्ग को काटता है; परम्परा नित्य > अनित्य, अन्तरङ्ग > बहिरङ्ग जोड़ती है। भवति-श्रृंखला में ये संघर्ष प्रायः जागते नहीं — पथ एक-रेखीय (linear) है; यही उसे प्रथम प्रक्रिया-दर्शन के लिए आदर्श बनाता है।

मशीन की दृष्टि से पढ़ना। नियम-प्रकार: यहाँ विधि (गुण, अवादेश, लोप) और सञ्ज्ञा (धातु, लकार, सार्वधातुक, इत्) सक्रिय हैं। पूर्वत्रासिद्धम् (८.२.१) की त्रिपादी (८.२–८.४) इस रूप में हस्तक्षेप नहीं करती — सपादसप्ताध्यायी (१.१–८.१) ही पर्याप्त है। यही कारण है कि आधुनिक computational Sanskrit (Sanskrit Heritage आदि) अष्टाध्यायी को executable spec मानता है: token → tag-strip → affix → guna → sandhi-rewrite → surface form।

ऐतिहासिक क्षितिज (संक्षेप)। यह यन्त्र उत्तर-वैदिक काल के अन्त में, लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व (कुछ विद्वान् ६ठी शती ईपू भी तर्क करते हैं; कोई निश्चित वर्ष रक्षणीय नहीं) शालातुर/गान्धार-सन्दर्भ में रचा गया — पाणिनि शालातुरीय, दाक्षीपुत्र। वह ~१० पूर्ववर्ती वैयाकरणों का नाम लेता है; अष्टाध्यायी शिखर है, आरम्भ नहीं। कात्यायन (लगभग ३री शती ईपू) के वार्त्तिक, पतञ्जलि (लगभग २री शती ईपू) का महाभाष्य (~१,७०० सूत्रों पर), काशिका (७वीं शती ई), सिद्धान्तकौमुदी (भट्टोजी, लगभग १७वीं शती के आरम्भ), नागेश (लगभग १८वीं शती) — सब इसी प्रक्रिया-दृष्टि को पुष्ट करते हैं। Bloomfield ने अष्टाध्यायी को “one of the greatest monuments of human intelligence” कहा; १९६७ में Ingerman ने Backus-Naur Form को “Pāṇini-Backus Form” कहने का प्रस्ताव रखा — सूत्र-व्यवस्था formal grammar notation से लगभग २,४०० वर्ष पूर्व की है। अतिरञ्जना की आवश्यकता नहीं: ~४,००० नियमों में पूर्ण जनन-व्याकरण स्वयं प्रमाण है।

पाठक-अभ्यास। भवति को याद रखना trivial है; भू → भो → भव → भवति की सूत्र-शृंखला याद रखना प्रक्रिया-दृष्टि है। अगले प्रक्रिया-दर्शन में यहीं से शाखाएँ खुलेंगी — आत्मनेपद, अन्य लकार, सेट्/अनिट्, और वे स्थान जहाँ अपवाद गुण/अवादेश को रोकते हैं। इस अध्याय का केवल एक वादा पूरा होना चाहिए: एक रूप, हर चरण, हर सूत्र — और कोई रहस्य शेष नहीं, केवल decode।

प्रक्रिया-दर्शन २: सन्धि-यात्राएँ · Sandhi Walkthroughs

सन्धि एक यांत्रिक पथ है, रहस्य नहीं। पाणिनि की अष्टाध्यायी—इस संस्करण में (Sanskrit Wikisource, 2026-08-10) ३,९८३ सूत्र; संस्करणानुसार लगभग ३,९५९–३,९९६—शब्द-संयोग को अनुमान नहीं, विधि बनाती है। सन्धि-यात्रा का अर्थ: दो पदों (या प्रकृति-प्रत्यय) के संधि-स्थल पर कौन-सा स्वर/व्यंजन किस अधिकार और किस प्रत्याहार से बदला, और परिणाम तक पहुँचने के लिए कौन-से सूत्र क्रमशः सक्रिय हुए। यह अध्याय चार छोटी यात्राएँ दिखाता है—प्रत्येक चरण सूत्र-उद्धृत। मशीन की रीढ़ वही है जो डिकोड-सेतु में पिन है: १.१.४९ षष्ठी = लक्ष्य, १.१.६६ सप्तमी = दायाँ सन्दर्भ, १.१.६७ पञ्चमी = बायाँ सन्दर्भ; अतः इको यणचि (६.१.७७) वाक्यांश में वही है जो आधुनिक अंकन में इक् → यण् / _ अच्।

प्रत्याहार-कुंजी (यात्रा से पहले)। शिवसूत्रों से निर्मित प्रत्याहार-विस्तार यहाँ केवल उतना जितना सन्धि माँगती है:

प्रत्याहारसंक्षेपसन्धि में भूमिका
अच्अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ“स्वर-सन्दर्भ”: दायाँ स्वर
इक्इ उ ऋ ऌयण्-आदेश का लक्ष्य-वर्ग
यण्य् व् र् ल्इक् का स्थानापन्न
एच्ए ओ ऐ औअय्/अव्/आय्/आव्-आदेश
अक्अ इ उ ऋ ऌसवर्ण-दीर्घ आदि

१.१.५० स्थानेऽन्तरतमः—स्थानापन्न “सबसे निकट” चुनो; १.१.५६ स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ—आदेश सामान्यतः मूल का स्थानित्व रखता है। ये दो सूत्र यात्रा में “क्यों य्, व् नहीं?” जैसे प्रश्नों का उत्तर हैं।

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यात्रा १ — दधि + अत्र → दध्यत्र (६.१.७७)

आरम्भ-स्थिति। dadhi का अन्तिम स्वर इ; atra का आदि अ (अच्)।

यही एक सूत्र एक पूरा rewrite-step है—कोई “अनुभव” नहीं, केवल case-syntax + प्रत्याहार।

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यात्रा २ — सुधी + उपास्य → सुध्युपास्य (फिर ६.१.७७, दीर्घ-इक्)

आरम्भ। sudhī का ई भी इक् है; upāsya का उ अच् है।

तुलना-तालिका (यात्रा १–२):

इनपुटबायाँदायाँसूत्रआदेशआउटपुट
दधि+अत्रइअ६.१.७७य्दध्यत्र
सुधी+उपास्यईउ६.१.७७य्सुध्युपास्य

एक ही विधि; मात्रा अलग, स्थानेऽन्तरतमः की जोड़ी वही।

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यात्रा ३ — हरे + ए → हरये (६.१.७८ एचोऽयवायावः)

आरम्भ। hare का अन्तिम ए ∈ एच्; दायाँ स्वर ए ∈ अच्। यहाँ ६.१.७७ नहीं चलता—लक्ष्य इक् नहीं, एच् है।

छोटा विस्तार (एच्-सारिणी):

एच्आदेश (अच् परे)उदाहरण-आकृति
एअय्हरे+ए → हरये
ओअव्विष्णो+ए → विष्णवे
ऐआय्नै+अक → नायक (आकृति)
औआव्नौ+इक → नाविक (आकृति)

यात्रा १–२ “इक्-से-यण्”; यात्रा ३ “एच्-से-अय्…”—दो अलग विधि-सूत्र, एक ही case-syntax।

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यात्रा ४ — देव + इन्द्र → देवेन्द्र (६.१.८७ आद्गुणः) · गुण-सन्धि

आरम्भ। deva का अ (अक्/अ); indra का इ (अच्)। अब न यण्, न अय्—गुण।

तीन यात्राओं का नियम-नक्शा:

परिस्थितिसक्रिय विधिपरिणाम-प्रकार
इक् + अच्६.१.७७ इको यणचिव्यञ्जन-यण् + दायाँ स्वर
एच् + अच्६.१.७८ एचोऽयवायावःअय्/अव्… + दायाँ स्वर
अ/आ + इ/उ…६.१.८७ आद्गुणःएक गुण-स्वर

---

मशीन-दृष्टि: यात्रा = staged rewrite। प्रत्येक चरण एक विधि-सूत्र है; परिभाषाएँ (प्रत्याहार, इत् १.३.२–१.३.९) पहले से token-metadata भर चुकी होती हैं। संघर्ष हो तो १.४.२ विप्रतिषेधे परं कार्यम् (समान बल पर पर-सूत्र), अपवाद उत्सर्ग पर; त्रिपादी (८.२.१ पूर्वत्रासिद्धम्) इस अध्याय की सन्धि-यात्राओं में सामान्यतः फीडबैक नहीं डालती—ये प्रक्रियाएँ प्रायः सपादसप्ताध्यायी के संधि-क्षेत्र में पूर्ण होती हैं।

टिप्पणी, सीमा, इंजन। यहाँ उद्धृत उदाहरण शास्त्रीय प्रक्रिया-दर्शन के worked chains हैं—ऐतिहासिक “पाणिनि ने ये चार शब्द बोले” का दावा नहीं। पाणिनि स्वयं गान्धार-शालातुर (आज के अटक-क्षेत्र से पहचाना जाता क्षेत्र) के, मुख्यधारा-अनुमान लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व (कुछ तर्क ६वीं भी); अष्टाध्यायी ~१० पूर्व-वैयाकरणों का शिखर है, आरम्भ नहीं। टीका-रीढ़—कात्यायन (लगभग ३री शती ईसा-पूर्व), पतञ्जलि महाभाष्य (लगभग २री शती ईसा-पूर्व), काशिका (७वीं शती ई.), सिद्धान्तकौमुदी (भट्टोजी, लगभग १७वीं शती आरम्भ)—इन्हीं यात्राओं को विषय-क्रम या वार्त्तिक-सूक्ष्मता से दोहराती है। डिकोड-सेतु (प्रत्याहार-विस्तार + exact-equality अनुशासन; Pardeep Sehrawat, The Architect) प्रत्येक चरण को “अनुमान” नहीं, सूत्र-मैच + स्थानापन्न-चयन के रूप में दोहराता है: dadhi+atra का dadhyatra एक ही ६.१.७७-कदम है; sudhī+upāsya वही कदम दीर्घ-इक् पर; hare+e ६.१.७८ का अय्-पथ; deva+indra ६.१.८७ का गुण-पथ। सन्धि-यात्राएँ इसलिए “रहस्य” नहीं—वे दृश्यमान rewrite-trace हैं, जहाँ हिन्दी-वाणी नियम समझाती है और English केवल formal environment को पिन्न करती है।

भाग ६

सङ्केत-शास्त्र

The Codecs: Kaṭapayādi · Āryabhaṭa · Bhūtasaṃkhyā
कटपयादि — व्यञ्जन → अङ्कक-वर्गक1ख2ग3घ4ङ5च6छ7ज8झ9ञ0ट-वर्गट1ठ2ड3ढ4ण5त-वर्गत6थ7द8ध9न0प-वर्गप1फ2ब3भ4म5य-आदिय1र2ल3व4श5ष6स7ह8स्वर (अकेला) = 0 · संयुक्ताक्षर में अन्तिम व्यञ्जन ही गिना जाता है
कटपयादि-सारणी — the complete consonant→digit table (computed from the codec engine). In a conjunct only the vowel-bearing final consonant counts; standalone vowels are 0; digits read right-to-left (अङ्कानां वामतो गतिः).

कटपयादि — प्रणाली और इतिहास · The Kaṭapayādi Codec

एक एन्कोडिंग, कोई रहस्य नहीं। कटपयादि (Kaṭapayādi) संस्कृत-मलयालम अक्षरावली को दशमलव अंकों से जोड़ने की एक reversible codec है — संख्या ↔ भाषा का द्विदिशी पुल। यह रहस्यवाद नहीं, गणना-स्मृति का यंत्र है: खगोल, चंद्र-वाक्य, और कर्नाटक संगीत — तीनों में एक ही नियम-समुच्चय। इस अध्याय में: परिभाषा, पूर्ण तालिका, एन्कोड/डिकोड चरण, दक्षिण-से-वाम पठन, संयुक्त-वर्ण नियम, और ऐतिहासिक साक्ष्य की सीमाएँ — dossier के अनुसार, जहाँ परंपरा और शोध भिन्न हैं वहाँ hedged।

पूर्ण अक्षर–अंक तालिका। नाम स्वयं कुंजी है: क-ट-प-य से चार समानांतर शृंखलाएँ निकलती हैं।

अंकक-शृंखलाट-शृंखलाप-शृंखलाय-शृंखला
1कटपय
2खठफर
3गडबल
4घढभव
5ङणमश
6चत—ष
7छथ—स
8जद—ह
9झध—(ळ)
0ञन——

सुधार · correction (2026-10-07) पहले इस तालिका में एक अलग “त-वर्ग” स्तम्भ था जो त = 1, थ = 2, द = 3, ध = 4 देता था, और ट-शृंखला की 6–9 पंक्तियाँ खाली थीं। कटपयादि में त थ द ध = 6 7 8 9 हैं: वे ट-शृंखला को ही आगे बढ़ाते हैं (ट ठ ड ढ ण त थ द ध न = 1…9, 0), जैसा नीचे का संक्षेप और katapayadi.js कहते हैं। (ळ) = 9 केवल दक्षिणी/केरल सूचियों में। Correction: ta–dha are 6–9 of the ṭa-series; check: katapayadi.test.js.

संक्षेप में: क–झ = 1–9, ञ = 0; ट–ण = 1–5; त–ध = 6–9, न = 0; प–म = 1–5; य–ह = 1–8। Standalone vowel = 0। ट-शृंखला ट से न तक दस वर्ण चलती है (ट–ण = 1–5, त–ध = 6–9, न = 0); प-शृंखला पाँच वर्ण (प–म = 1–5); य-शृंखला आठ (य–ह = 1–8)। यही पूर्ण map है — इससे बाहर कुछ “गुप्त” नहीं।

संयुक्त-वर्ण नियम (conjunct rule)। संयुक्ताक्षर में केवल स्वर-धारक अंतिम व्यंजन गिना जाता है; पूर्ववर्ती व्यंजन अंक-मान नहीं देते। उदाहरण की दिशा: क्‍त में त ही गिना; स्त्र में र। स्वर स्वयं standalone हों तो 0; संयुक्त के अंत में स्वर केवल व्यंजन को “vowel-bearing” बनाता है, अलग अंक नहीं जोड़ता जब तक कि अक्षर-क्रम में स्वतंत्र स्वर-अक्षर न हो।

दाएँ-से-बाएँ पठन — अङ्कानां वामतो गतिः। अंक right-to-left पढ़े जाते हैं: पाठ में बाएँ-से-दाएँ लिखे अक्षरों से निकले अंकों का संख्यात्मक क्रम उलटा होता है — न्यूनतम स्थान (units) पाठ के आरंभिक पक्ष से, उच्चतर स्थान अंत की ओर। यह कटपयादि और भूतसंख्या दोनों में समान अनुशासन है। लिखने की दिशा और अंक-स्थान का दिशा-विच्छेद ही codec की “कुंजी” है; इसे भूलकर melakartā संख्या गलत निकलती है। अपवाद — π-श्लोक: वह संख्या नहीं, अंक-माला है, और बाएँ-से-दाएँ पढ़ी जाती है; दाएँ-से-बाएँ पढ़ने पर π नहीं निकलता। (सुधार 2026-10-07: पहले यहाँ π-chronogram को भी वामतो-गति के अधीन कहा गया था।)

एन्कोड चरण (encode steps)।

डिकोड चरण (decode steps)।

स्मृति-सूत्र — attribution hedged। परवर्ती परंपरा में स्मृति-श्लोक «नञावचश्च शून्यानि…» प्रचलित है; attribution varies — अक्सर Śaṅkaravarman की Sadratnamālā (1819 CE) से जोड़ा जाता है। यह नियम-श्लोक कटपयादि का “आद्य स्रोत” सिद्ध नहीं; बाद की pedagogy का स्मृति-पात्र है। Exact quotation का पूर्ण पाठ यहाँ गढ़ा नहीं जाता — dossier केवल आरंभिक पंक्ति और hedged link देता है। ग्रन्थ-भण्डार के reader में छपी दूसरी पंक्ति («मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या…») और शङ्करवर्मन्-आरोपण का कोई मुद्रित साक्षी इस repository में नहीं है [अपरीक्षित · unverified]।

इतिहास — Kerala astronomy से melakartā तक। Secure attestation केरल खगोल में है। Haridatta की Parahita प्रणाली — Grahacāranibandhana, केरल-परम्परा के अनुसार 683 CE (तिथि का मुद्रित साक्षी इस repository में नहीं · [unverified]) — कटपयादि का उपयोग करती है। Candravākya परंपरा (attribution Vararuci को; exact authorship परंपरा-निर्भर) चंद्र-वाक्य इसी codec में संप्रेषित करती है। Kerala school (Mādhava line, 14th–16th c.) में यह pervasive है — trigonometric tables और memoranda के लिए। कर्नाटक संगीत में 72-melakartā नामकरण (17th c., Veṅkaṭamakhin परंपरा) rāga-संख्या को कटपयादि से encode करता है: नाम का अक्षर-क्रम संख्या खोलता है।

कार्य-उदाहरण — π chronogram (computed decode)। प्रसिद्ध chronogram गोपीभाग्यमधुव्रात… का हमारे decoder से पठन exactly 31415926535897932384626433832792 है — 32 अंक, जिनमें प्रथम 31 π से मेल खाते हैं (32वाँ 2 है, π का 5)। यह computed fact है। श्लोक की exact origin unresolved है; popular attribution Kerala school / later pedagogy की ओर झुकती है — attribution को tradition कहें, decode को engine-result।

परिवार में स्थान। कटपयादि अकेला नहीं: Āryabhaṭa का alphasyllabic तंत्र (Āryabhaṭīya, 499 CE, Kusumapura/Pāṭaliputra) varga/avarga और 100-की घातों से अलग map बनाता है — हमारा decoder ख्युघृ = 43,20,000 (महायुग वर्ष-गणना) सत्यापित करता है, वही 4,320,000 जो Sūrya-Siddhānta spine में pin है। Bhūtasaṃkhyā (word-numerals: सप्ताष्टवह्नयः = 387 आदि) तीसरा codec है; अंक वहाँ भी right-to-left। तीनों encodings हैं — reversible, testable — mysticism नहीं। पाणिनि की औपचारिक मशीन (sūtra rewrite, anubandha-tags) भाषा को compute करती है; कटपयादि संख्या को भाषा में pack करती है। दोनों का साझा सूत्र: number ↔ language, और engines की exact-equality अनुशासन।

गोपीभाग्यमधुव्रातशृङ्गिशोदधिसन्धिग । खलजीवितखाताव गलहालारसंधर ॥गो3पी1भा4ग्य1म5धु9व्रा2त6शृ5ङ्गि3शो5द8धि9स7न्धि9ग3ख2ल3जी8वि4त6खा2ता6व4ग3ल3हा8ला3र2स7ध9र2श्लोक: 3.1415926535897932384626433832792 · π: …2795…इंजन-सत्यापित: अक्षर-दर-अक्षर यही ३२ अंक निकलते हैं (exact ==); प्रथम ३१ π से मेल, ३२वाँ (२) π के ५ से भिन्न
π-श्लोक — the celebrated chronogram decoded by the engine, syllable by syllable. Reading the digits as written gives 31415926535897932384626433832792 — thirty-two digits, of which the first thirty-one agree with π (π × 10³¹ = 31415926535897932384626433832795.03…; the verse's last digit 2 differs from π's 5). Attribution is traditional; the decode is computation.

कटपयादि — π-श्लोक और प्रयोग · The π Verse and Uses

कोडेक, न कि रहस्य। कटपयादि संख्या-वाणी का एक प्रतिवर्ती (reversible) अक्षरांक-प्रणाली है: व्यंजन अंक बनते हैं, स्वर शून्य; संयुक्ताक्षर में केवल स्वर-धारक अंतिम व्यंजन गिना जाता है; और अंक दाएँ से बाएँ पढ़े जाते हैं — अङ्कानां वामतो गतिः। यह mysticism नहीं, encoding है: definition → table → encode/decode → worked example → dated attestation — वही ढाँचा जो इस पुस्तक के «सभी encode/decode» अध्यायों का spine है।

मानचित्र — वर्ण से अंक। परंपरा का कटपयादि-नक्शा इस प्रकार है:

वर्ण-श्रेणीअंक
क–झ१–९; ञ = ०
ट–ण१–५
त–ध६–९; न = ०
प–म१–५
य–ह१–८
स्वतंत्र स्वर०

संयुक्ताक्षर में केवल अंतिम (स्वर-युक्त) व्यंजन गिना जाता है; शेष «मौन» रहते हैं। स्मृति-सूत्र «नञावचश्च शून्यानि…» बाद की परंपरा में प्रचलित है; आरोपण स्थिर नहीं — अक्सर उसे शङ्करवर्मन् की सद्रत्नमाला (१८१९ ई.) से जोड़ा जाता है, किंतु attribution varies।

ऐतिहासिक जड़ — केरल ज्योतिष से कर्नाटक संगीत तक। सुरक्षित रूप से प्रमाणित उपयोग हरिदत्त की परहित-प्रणाली में मिलता है: ग्रहचारनिबन्धन, ६८३ ई. — केरल-खगोल का यह स्तंभ कटपयादि को संख्या-स्मृति का उपकरण बनाता है। चंद्रवाक्य-परंपरा (वररुचि से जोड़ी जाती है) चंद्र-वाक्यों को इसी कोड में ढोती है। माधव-पंक्ति की केरल-शाला (१४वीं–१६वीं शती) इसे व्यापक रूप से अपनाती है। कर्नाटक संगीत में ७२ मेलकर्ता नामकरण (१७वीं शती, वेङ्कटमखिन्-परंपरा) राग-संख्याओं को कटपयादि से बाँधता है: नाम का अक्षर-क्रम अंक-युग्म देता है, अंक-युग्म मेल-क्रम देता है — name ↔ number ↔ scale का एक छोटा, reversible loop।

π-श्लोक — गोपीभाग्य… और गणना। प्रसिद्ध काल-श्लोक गोपीभाग्यमधुव्रात… हमारे डिकोडर में ठीक यही अंक-श्रृंखला खोलता है:

३१४१५९२६५३५८९७९३२३८४६२६४३३८३२७९२

अर्थात् ३२ अंक, जिनमें प्रथम ३१ π से अक्षरशः मेल खाते हैं (π × १०³¹ = ३१४१५९२६५३५८९७९३२३८४६२६४३३८३२७९५.०३…; श्लोक का अन्तिम अंक २ π के ५ से भिन्न है) — computed fact, engine-verified। श्लोक का मूल-उद्गम unresolved है: लोक-आरोपण उसे केरल-शाला या बाद की pedagogy से जोड़ता है; परंपरा attribution देती है, दस्तावेज़ी निश्चितता नहीं। इसलिए यहाँ दो परतें साफ़ रखनी चाहिए:

यह dual-ledger वही अनुशासन है जो पाणिनि-इंजनों पर लागू होता है: computed · textual · scholarly range · tradition — कभी मिलाए नहीं।

मेलकर्ता — कटपयादि संगीत में। ७२ मेलकर्ता-नामकरण कटपयादि का clearest public use-case है। नाम के आरंभिक दो (या निर्धारित) अक्षरों से अंक-युग्म निकलता है; युग्म मेल-संख्या देता है; संख्या से राग-क्रम और स्वर-संयोजन पढ़े जाते हैं। उदाहरण-स्वरूप (सिद्धांत का रूप, न कि किसी एक नाम का exclusive claim):

यहाँ भाषा सूची नहीं, address बनती है: याद रखने योग्य शब्द-शरीर संख्या का सूचक है, संख्या राग का। वही codec-logic जो ज्योतिषीय वाक्यों में lunar tables ढोता है, यहाँ rāga-index ढोता है।

सद्रत्नमाला और स्मृति-श्लोक। सद्रत्नमाला (शङ्करवर्मन्, १८१९ ई.) बाद की परंपरा में कटपयादि-स्मृति से जोड़ी जाती है — विशेषकर «नञावचश्च शून्यानि…» जैसे memorial rule-verse के साथ। यह later transmission है, मूल-आविष्कार का दावा नहीं। हरिदत्त (६८३ ई.) से माधव-पंक्ति तक की सदियों में प्रणाली पहले से चल रही थी; उन्नीसवीं शती का ग्रंथ अक्सर pedagogical crystallization देता है, genesis नहीं। आरोपण जहाँ «often linked» है, वहाँ «securely authored by» न लिखना — यही editorial caution है।

आस-पास के codecs — एक spine। कटपयादि अकेला नहीं खड़ा। आर्यभट का अक्षरांक-क्रम (आर्यभटीय, ४९९ ई., कुसुमपुर/पाटलिपुत्र) भिन्न table है: वर्ग क–म = १–२५ (१००⁰, १००¹, … स्थानों में), अवर्ग य–ह = ३०–१००; स्वर १०० की घात चुनता है। हमारा डिकोडर ख्युघृ = ४३,२०,००० सत्यापित करता है — महायुग-वर्ष-गणना, वही संख्या जो सूर्य-सिद्धान्त पुस्तक ४,३२०,००० वर्ष के रूप में pin करती है। भूतसंख्या (शब्द-अंक: सप्ताष्टवह्नयः = ३८७ आदि) सूर्य-सिद्धान्त स्वयं प्रयोग करता है; अंक फिर वामतो गतिः। तीनों codecs का साझा कथन: number ↔ language reversible है; mystique नहीं, specification है।

सावधानी — आरोपण, तिथि, «प्राचीन कंप्यूटर»।

प्रयोग-क्रम (decode, संक्षेप में)।

निष्कर्ष-स्वर, बिना उत्साह-मंच के। कटपयादि, आर्यभट-अक्षरांक, और भूतसंख्या — तीन reversible codecs — भाषा को संख्या का वाहन बनाते हैं। गोपीभाग्य… का π-डिकोड हमारा इंजन-सत्य है; उसका कवि-आरोप परंपरा है। मेलकर्ता नामकरण संगीत को addressable index देता है; सद्रत्नमाला later memory-verse की एक कड़ी है। पाणिनि-रहस्य के लिए नियम एक ही है: computed fact, textual fact, scholarly range, tradition — चार स्तंभ, कभी एक-दूसरे पर चिपके नहीं।

वर्ग-अक्षर (क–म = 1–25) · अवर्ग-अक्षर (य–ह = 30–100)क1ख2ग3घ4ङ5च6छ7ज8झ9ञ10ट11ठ12ड13ढ14ण15त16थ17द18ध19न20प21फ22ब23भ24म25य30र40ल50व60श70ष80स90ह100स्वर-घात: अ=100⁰ · इ=100¹ · उ=100² · ऋ=100³ …ख्युघृ = (ख2+य30)·100² + घ4·100³ = 3,20,000 + 40,00,000 = 43,20,000 ✓
आर्यभट-सङ्केत — the Āryabhaṭīya (499 CE) letter-numeral system: varga consonants 1–25 live in the varga (odd) places, avarga consonants 30–100 in the even; each vowel lifts the block by a power of 100. Engine-verified: ख्युघृ = 43,20,000 — the Mahāyuga of the Sūrya-Siddhānta book.

आर्यभट-सङ्केत · Āryabhaṭa's Alphasyllabic Numerals

सङ्केत का स्थान। संख्या और भाषा का जोड़ केवल व्याकरण की सीमा में नहीं रहता। पाणिनि-रहस्य की “सभी encode/decode” रेखा में जहाँ कण्टपय्यादि (Kaṭapayādi) स्मृति-श्लोकों में अंक छिपाता है, वहाँ आर्यभट का वर्ण-अंक-क्रम (alphasyllabic numeral system) एक भिन्न codec खड़ा करता है: व्यंजन मूल्य देते हैं, स्वर १०० की घात चुनता है। स्रोत आर्यभटीय (Āryabhaṭīya) है; परम्परा और विद्वत्-सहमति दोनों में रचना-स्थल कुसुमपुर / पाटलिपुत्र (Kusumapura / Pāṭaliputra) से जुड़ा है, और तिथि ४९९ ई. — यहाँ इसे दफ़्तर-सम्मत वर्ष के रूप में रखा गया है, न कि अनुमानित शताब्दी-सीमा के रूप में। यह प्रणाली रहस्य नहीं, उत्क्रमणीय कूट (reversible encoding) है: परिभाषा → तालिका → encode/decode → जाँचा हुआ उदाहरण → ऐतिहासिक साक्ष्य-सीमा।

वर्ग और अवर्ग: दो व्यंजन-श्रेणियाँ। आर्यभट-सङ्केत व्यंजनों को दो वर्गों में बाँटता है। वर्ग (varga) व्यंजन — क से म तक — क्रमशः १ से २५ तक मूल्य रखते हैं, और वे वर्ग-स्थानों (varga places) में बैठते हैं: स्थान-घात १००⁰, १००¹, १००², …। अवर्ग (avarga) व्यंजन — य से ह तक — ३० से १०० तक के बड़े चरण-मूल्य लेते हैं। स्वर स्वयं “अंक” नहीं गिनता; वह बताता है कि संगत व्यंजन-मूल्य को १०० की किस घात से गुणा करना है। Unicode में: यदि व्यंजन-मूल्य v और स्वर-निर्धारित घात p हो, तो योगदान v · १००ᵖ है; शब्द का कुल अंक इन योगदानों का योग।

तालिका — वर्ग (१–२५)।

व्यंजनमूल्यव्यंजनमूल्यव्यंजनमूल्य
क1च6ट11
ख2छ7ठ12
ग3ज8ड13
घ4झ9ढ14
ङ5ञ10ण15
त16प21
थ17फ22
द18ब23
ध19भ24
न20म25

तालिका — अवर्ग (३०–१००)। य = 30, र = 40, ल = 50, व = 60, श = 70, ष = 80, स = 90, ह = 100 — ये बड़े चरण वर्ग-स्थानों के “अंक-अंक” नहीं, बल्कि अवस्था-मूल्य (step values) हैं जो उसी स्वर-घात-तन्त्र से जुड़ते हैं।

स्वर = घात-चयन। स्वर-क्रम स्थान-घात p चुनता है: एक ही व्यंजन-मूल्य भिन्न स्वरों से १०० की भिन्न शक्तियों पर चढ़ता है। encode करते समय: (१) संख्या को १००-आधार के अंकों में तोड़ो; (२) प्रत्येक स्थान के लिए उपयुक्त वर्ग/अवर्ग व्यंजन चुनो; (३) स्वर से p बाँधो। decode: प्रत्येक अक्षर-खंड से v और p पढ़ो, v · १००ᵖ जोड़ो। Kaṭapayādi की तरह यहाँ भी “स्मृति-वाक्य” का दबाव कम, गणितीय संरचना का दबाव अधिक है — यह ज्योतिष-गणित की संख्या-लेखन की भाषा है।

ख्युघृ = ४३,२०,००० — जाँचा हुआ तथ्य। इस पुस्तक के decoder ने ख्युघृ का मान ४३,२०,००० (अंतरराष्ट्रीय रूप में 4,320,000) सत्यापित किया है। यह महायुग-वर्ष-गणना (Mahāyuga year-count) है — वही संख्या जिसे हमारी सूर्य-सिद्धान्त पुस्तक 4,320,000 वर्षों के रूप में पिन करती है। दो ग्रन्थ-परम्पराओं का साझा रीढ़: संख्या ↔ भाषा। यहाँ “computed fact” और “textual/historical frame” अलग रखे जाएँ: decode का अंक इंजन-जाँच है; महायुग-सन्दर्भ ज्योतिष-परम्परा का पिन है, न कि पाणिनि-सूत्र का दावा।

तुलना: आर्यभट-सङ्केत और कण्टपय्यादि। दोनों reversible codecs हैं; नियम-समुच्चय भिन्न।

आयामआर्यभट-सङ्केतकण्टपय्यादि (Kaṭapayādi)
मुख्य स्रोत-सीमाआर्यभटीय, ४९९ ई., कुसुमपुर/पाटलिपुत्रकेरल ज्योतिष में सुरक्षित साक्ष्य — हरिदत्त का परहित (ग्रहचारनिबन्धन, ६८३ ई.); चन्द्रवाक्य (वररुचि-परम्परा); माधव-रेखा (१४वीं–१६वीं श.); कर्नाटक संगीत के ७२ मेलकर्ता नाम (१७वीं श., वेङ्कटमखिन्-परम्परा)
अंक-अर्थवर्ग क–म = १–२५; अवर्ग य–ह = ३०–१००क–झ = 1–9, ञ = 0; ट–ण = 1–5; त–ध = 6–9, न = 0; प–म = 1–5; य–ह = 1–8; अकेला स्वर = 0
स्थान/घातस्वर १००ᵖ चुनता हैसंयुक्त में केवल स्वरधारी अन्तिम व्यंजन गिना जाता है
पढ़ने की दिशास्थान-घातों का योग (१००-आधार)अंक दाएँ-से-बाएँ (अङ्कानां वामतो गतिः)
स्मृति-श्लोकसंरचनात्मक तालिका प्रधान“नञावचश्च शून्यानि…” बाद की परम्परा में (attribution varies; अक्सर शङ्करवर्मन् सद्रत्नमाला, १८१९ ई. से जोड़ा)
पुस्तक-इंजन उदाहरणख्युघृ → 4,320,000π-कालक्रम गोपीभाग्यमधुव्रात… → 31415926535897932384626433832792 (32 अंक; प्रथम 31 π से मेल); मूल attribution unresolved — decode computed, attribution tradition

तीसरा codec-रेखा: भूतसङ्ख्या। सूर्य-सिद्धान्त स्वयं भूतसङ्ख्या (word-numerals) प्रयोग करता है — जैसे सप्ताष्टवह्नयः = ३८७ — अंक फिर दाएँ-से-बाएँ। तीनों पद्धतियाँ mysticism नहीं: definition → table → encode → decode → worked example → attestation with date-range। आर्यभट की विशेषता यह है कि वह वर्ण-वर्ग को १–२५ की सघन श्रेणी और १००-घात की स्वर-कुंजी से जोड़ता है; Kaṭapayādi स्मृति-वाक्य और संगीत/ज्योतिष-वाक्य में अंक छिपाता है; भूतसङ्ख्या शब्द-कोशीय प्रतीकों से।

पाणिनि-रहस्य में क्यों यह अध्याय। अष्टाध्यायी (~३,९८३ सूत्र इस संस्करण में; संस्करण-भेद ≈३,९५९–३,९९६) भाषा को नियम-मशीन बनाती है; आर्यभट-सङ्केत संख्या को अक्षर-मशीन बनाता है। दोनों में compress-and-recover: व्याकरण में अनुवृत्ति और प्रत्याहार; अंक-कूट में वर्ग/अवर्ग और स्वर-घात। विद्वत्-सहमति पाणिनि को लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व (कुछ ६ठी श. ई.पू. तर्क) रखती है; आर्यभटीय ४९९ ई. पर ठहरता है — लगभग दो सहस्राब्दी बाद का गणितीय-ज्योतिषीय codec, पर उसी भारतीय ज्ञान-रीढ़ पर जहाँ अक्षर और अंक एक ही पृष्ठ की दो दिशाएँ हैं।

encode/decode — संक्षेप।
- Encode: संख्या → १००-आधार अंक → प्रत्येक स्थान पर वर्ग (1–25) या अवर्ग (30–100) व्यंजन → स्वर से p → अक्षर-श्रृंखला।
- Decode: अक्षर → (v, p) → ∑ v · १००ᵖ → पूर्णांक।
- Verification pin: ख्युघृ = ४३,२०,००० = महायुग-वर्ष; सूर्य-सिद्धान्त-रीढ़ से अभिन्न।

अन्तिम रेखा। आर्यभट-सङ्केत “प्राचीन कम्प्यूटर” का नारा नहीं; यह ४९९ ई. का स्पष्ट, जाँच-योग्य alphasyllabic numeral system है — varga 1–25, avarga 30–100, vowels as 100ᵖ — और ख्युघृ का 4,320,000 इस पुस्तक के decoder का pinned fact है। संख्या यहाँ भाषा की बहन है, न कि रहस्य की छाया।

0शून्य · ख · गगन · आकाश · अम्बर · अभ्र1भू · इन्दु · चन्द्र · शशि · रूप · आदि2नेत्र · पक्ष · यमल · अश्विन् · कर · बाहु3राम · अग्नि · गुण · लोक · काल4वेद · युग · अब्धि · सागर · समुद्र · दिश्5बाण · इन्द्रिय · भूत · प्राण · शर6रस · ऋतु · अङ्ग · दर्शन7ऋषि · स्वर · अश्व · मुनि · पर्वत8वसु · नाग · गज · सिद्धि · मङ्गल9ग्रह · निधि · रन्ध्र · द्वार · अङ्कअङ्कानां वामतो गतिः — अंक दाएँ से बाएँ पढ़े जाते हैं
भूतसंख्या-कोश — word-numerals of the siddhāntas: standard lexicon 0–9. This is the very system the Sūrya-Siddhānta speaks in (सप्ताष्ट-वह्नयः = 7,8,3 → read right-to-left = 387).

भूतसंख्या · Word-Numerals of the Siddhāntas

भूतसंख्या क्या है — शब्द से अंक। सिद्धान्त-ज्योतिष की परम्परा में संख्या को केवल अंक-चिह्नों में नहीं, बल्कि शब्दों में याद रखा जाता है। भूतसंख्या (word-numerals) वही कोडेक है: एक परिचित संज्ञा — अग्नि, वेद, दिशा, रस — अपने शास्त्रीय अर्थ के साथ एक अंक का संकेत भी करती है। यह रहस्यवाद नहीं; reversible encoding है — definition → lexicon → encode → decode → worked example। पाणिनि-रहस्य के “सभी encode/decode” अध्यायों में यह कूट Āryabhaṭa के अक्षरांक और Kaṭapayādi के अक्षर-अंक के साथ एक ही रीढ़ पर बैठता है: number ↔ language।

सिस्टम का ढाँचा — इकाई, दशक, शतक… प्रत्येक स्थान पर एक (या कभी संयुक्त) शब्द। पढ़ने की दिशा सिद्धान्त-गणित की प्रसिद्ध रीति के अनुसार दाएँ से बाएँ है — वही सिद्धांत जो Kaṭapayādi में अङ्कानां वामतो गतिः कहलाता है। अर्थात् पद-श्रृंखला का अंतिम शब्द इकाइयाँ देता है, उससे बायाँ दशक, फिर शतक — लिखे हुए क्रम को उल्टा करके ही अंक-स्तम्भ बनता है। स्मृति-छंद में यह सुविधा है: छंदबद्ध सूची याद रहती है, और अंक-सारणी अलग से न देखनी पड़ती।

शब्द-कोश (lexicon) — नीचे एक संक्षिप्त, शास्त्र-सामान्य तालिका है; विस्तृत गणना-तालिका इस संस्करण के Appendix में संकलित है। एक अंक के कई पर्याय हो सकते हैं — संदर्भ और छंद चुनते हैं कि कौन सा शब्द लगे।

अंकप्रतिनिधि शब्द (संकेत)
0ख, आकाश, शून्य, अंबर
1आदि, भूमि, चंद्र, रूप
2अक्षि, युगल, पक्ष, द्वंद्व
3अग्नि, गुण, लोक, राम
4वेद, युग, समुद्र, दिशा (चार)
5बाण, इंद्रिय, भूत, प्राण
6रस, ऋतु, दर्शन, अरि
7मुनि, अश्व, स्वर, पर्वत
8वसु, नाग, सिद्धि, गज
9अंक, ग्रह, छिद्र, निधि

दाएँ-से-बाएँ पढ़ना — decode के चरण

Encode उल्टा चलता है: संख्या के अंक बाएँ से दाएँ नहीं, बल्कि इकाइयों से ऊपर की ओर शब्दों में बाँधकर छंद-योग्य पर्याय चुनते हैं।

सिद्धांत में प्रयोग: सप्ताष्टवह्नयः = ३८७ — सूर्य-सिद्धान्त स्वयं भूतसंख्या का उपयोग करता है। क्लासिक उदाहरण:

> सप्ताष्टवह्नयः

पद-विश्लेषण:

दाएँ-से-बाएँ: इकाइयाँ = वह्नि (३), दशक = अष्ट (८), शतक = सप्त (७) → ३८७।
यही “सप्ताष्टवह्नयः = ३८७” इस अध्याय का worked example है — computed fact के रूप में, जब lexicon और दिशा-नियम दोनों लागू हों। सूर्य-सिद्धान्त की अन्य संख्या-पंक्तियाँ भी इसी ढाँचे में खुलती हैं; विस्तृत सूची SS-पुस्तक और Appendix की तालिका से मिलान की जाती है।

ऐतिहासिक स्थान — hedged — भूतसंख्या ज्योतिष-सिद्धान्तों की स्मृति-भाषा है; यह पाणिनि की अष्टाध्यायी का नियम-प्रकार नहीं, बल्कि उसी सांस्कृतिक मशीन का दूसरा पहलू: भाषा को गणना का वाहन बनाना। तिथियाँ जहाँ सुरक्षित हैं वे अन्य कूटों से आती हैं — जैसे हरिदत्त का परहित / ग्रहचारनिबन्धन (६८३ ई.) Kaṭapayādi का Kerala-ज्योतिष में सुरक्षित साक्ष्य; आर्यभटीय (४९९ ई., कुसुमपुर/पाटलिपुत्र) का अक्षरांक; Kerala-विद्यालय (माधव-परम्परा, १४वीं–१६वीं श.) में Kaṭapayādi का व्यापक प्रयोग; कर्नाटक संगीत में ७२ मेलकर्ता नाम (१७वीं श., वेङ्कटमखिन्-परम्परा)। भूतसंख्या का सूर्य-सिद्धान्त में प्रयोग पाठ-तथ्य है; प्रत्येक छंद की “रचना-तिथि” परंपरा और आलोचनात्मक संस्करण के बीच उतनी ही सावधानी माँगती है जितनी अन्य सिद्धान्त-पदों पर।

अन्य कूटों से पुल — एक ही रीढ़

तीनों कूट encodings हैं: reversible codecs, mysticism नहीं। प्रत्येक को definition → exact table → encode/decode steps → example → historical attestation (date-range) का फ्रेम मिलता है।

सूर्य-सिद्धान्त पुस्तक से सेतु — पाणिनि-रहस्य व्याकरण की मशीन खोलता है: संज्ञा, परिभाषा, विधि, अनुवृत्ति, locative/ablative/genitive rewrite-syntax, पूर्वत्रासिद्धम् की tripādī। संख्या-भाषा का अध्याय उस मशीन को माप से जोड़ता है। SS-पुस्तक में युग, ग्रह-गति, और तालिकाएँ भूतसंख्या (और जहाँ लागू हो अन्य कूट) में लिखी मिलती हैं; यहाँ का ३८७-उदाहरण और Appendix का lexicon उसी pipeline का exact-equality अनुशासन साझा करते हैं जो प्रत्याहार-expander और SS-oracle पर लागू होता है — Pardeep Sehrawat (The Architect) के engines का हिस्सा। दो पुस्तकें एक वाक्य में मिलती हैं: संख्या ↔ भाषा। पाणिनि ~४,००० सूत्रों में (इस संस्करण में ३,९८३ सूत्र; संस्करण लगभग ३,९५९–३,९९६) भाषा उत्पन्न करते हैं; सिद्धान्त-लेखक उन्हीं भाषा-संसाधनों से अंक याद रखते हैं। उपलब्धि को फुलाने की ज़रूरत नहीं — formal grammar से लगभग २,४०० वर्ष पहले की generative system और reversible number-codecs, दोनों साक्ष्य-आधारित हैं।

संक्षेप में पठन-विधि — (१) lexicon से शब्द→अंक; (२) दाएँ→बाएँ स्थान-मान; (३) सिद्धान्त-श्लोक में सत्यापन; (४) SS-पुस्तक की पिन की गई संख्याओं से मिलान। भूतसंख्या स्मृति की सुविधा है, और साथ ही एक स्पष्ट codec — decode के बाद कोई अस्पष्टता नहीं रहनी चाहिए।

भाग ७

सूत्रपाठ-कोश

The Complete Sūtrapāṭha — every sūtra, one line
3983 सूत्र

अध्याय 1 · पाद 1 (75 सूत्र)

1.1.1
वृद्धिरादैच्

IAST vṛddhir ād aic

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आ, ऐ और औ—इन स्वरों की तकनीकी सञ्ज्ञा ‘वृद्धि’ है।

1.1.2
अदेङ् गुणः

IAST ad eṅ guṇaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अ, ए और ओ—इन स्वरों की तकनीकी सञ्ज्ञा ‘गुण’ है।

1.1.3
इको गुणवृद्धी

IAST iko guṇavṛddhī

प्रकार परिभाषा

सार जहाँ गुण या वृद्धि का स्थान निर्दिष्ट न हो, वहाँ वे इक् (इ उ ऋ ऌ) के स्थान पर ही होते हैं।

1.1.4
न धातुलोप आर्धधातुके

IAST na dhātulopa ārdhadhātuke

प्रकार नियम

सार आर्धधातुक प्रत्यय पर धातु-लोप होने पर गुण-वृद्धि नहीं होती।

1.1.5
ग्क्ङिति च

IAST gkṅiti ca

प्रकार नियम

सार क्, ग् या ङ् इत् वाले प्रत्यय पर भी (इक् के) गुण-वृद्धि नहीं होते।

1.1.6
दीधीवेवीटाम्

IAST dīdhīvevīṭām

प्रकार नियम

सार दीधी, वेवी और इट्—इन पर गुण-वृद्धि नहीं होते।

1.1.7
हलोऽनन्तराः संयोगः

IAST halo 'nantarāḥ saṃyogaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार परस्पर अव्यवहित (मध्य में स्वर रहित) हल् वर्णों की सञ्ज्ञा ‘संयोग’ है।

1.1.8
मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः

IAST mukhanāsikāvacano 'nunāsikaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार मुख और नासिका—दोनों से उच्चरित वर्ण की सञ्ज्ञा ‘अनुनासिक’ है।

1.1.9
तुल्यास्यप्रयत्नम् सवर्णम्

IAST tulyāsyaprayatnaṃ savarṇam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार समान आस्य-स्थान और समान (आभ्यन्तर) प्रयत्न वाले वर्ण परस्पर ‘सवर्ण’ कहलाते हैं।

1.1.10
नाज्झलौ

IAST nāj jhalau

प्रकार नियम

सार अच् और हल् परस्पर सवर्ण नहीं माने जाते।

1.1.11
ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्

IAST īd ūd ed dvivacanaṃ pragṛhyam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार द्विवचन के अन्तिम ई, ऊ और ए—इनकी सञ्ज्ञा ‘प्रगृह्य’ है (सन्धि नहीं होती)।

1.1.12
अदसो मात्

IAST adaso māt

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अदस् के म्-परवर्ती (ई/ऊ/ए वाले) रूप भी प्रगृह्य हैं।

1.1.13
शे

IAST śe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार वैदिक ‘शे’ प्रत्ययान्त रूप प्रगृह्य है।

1.1.14
निपात एकाजनाङ्

IAST nipāta ekāj anāṅ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार एकाच् निपात—आङ् को छोड़कर—प्रगृह्य हैं।

1.1.15
ओत्

IAST ot

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ओकारान्त निपात प्रगृह्य हैं।

1.1.16
सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे

IAST sambuddhau śākalyasyetāv anārṣe

प्रकार विधि

सार शाकल्य-मत से अनार्ष (लौकिक) सम्बुद्धि में ‘इति’ के इत्-पूर्ववर्ती ओकार प्रगृह्य है।

1.1.17
उञः

IAST uñaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उञ् (निपात उ) प्रगृह्य है।

1.1.18
ऊँ

IAST ū̃

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ऊँ (अनुनासिक ऊ/निपात) प्रगृह्य है।

1.1.19
ईदूतौ च सप्तम्यर्थे

IAST īd ūtau ca saptamyarthe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सप्तमी-अर्थ में प्रयुक्त ई और ऊ भी प्रगृह्य हैं।

1.1.20
दाधा घ्वदाप्

IAST dādhā ghv adāp

प्रकार सञ्ज्ञा

सार दाप् (अवखण्डने) को छोड़कर दा और धा धातुओं की सञ्ज्ञा ‘घु’ है।

1.1.21
आद्यन्तवदेकस्मिन्

IAST ādyantavad ekasmin

प्रकार अतिदेश

सार एक ही वर्ण पर आदि और अन्त—दोनों के विधान ऐसे लागू होते हैं मानो वह आदि-अन्तवाला हो।

1.1.22
तरप्तमपौ घः

IAST taraptamapau ghaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तरप् और तमप् प्रत्ययों की सञ्ज्ञा ‘घ’ है।

1.1.23
बहुगणवतुडति संख्या

IAST bahugaṇavatuḍati saṃkhyā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार बहु, गण, वतु और डति—इनकी (तथा इनसे युक्तों की) सञ्ज्ञा ‘संख्या’ है।

1.1.24
ष्णान्ता षट्

IAST ṣṇāntā ṣaṭ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ष् या न् पर समाप्त होने वाली संख्या की सञ्ज्ञा ‘षट्’ है।

1.1.25
डति च

IAST ḍati ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार डति-प्रत्ययान्त संख्या भी ‘षट्’ संज्ञक है।

1.1.26
क्तक्तवतू निष्ठा

IAST ktakttavatū niṣṭhā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्त और क्तवतु प्रत्यय निष्ठा-सञ्ज्ञक कहलाते हैं।

1.1.27
सर्वादीनि सर्वनामानि

IAST sarvādīni sarvanāmāni

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सर्वादिगण के शब्द सर्वनाम-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.1.28
विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ

IAST vibhāṣā diksamāse bahuvrīhau

प्रकार विधि

सार दिक्-शब्दों के बहुव्रीहि-समास में सर्वादि की सर्वनाम-सञ्ज्ञा वैकल्पिक है।

1.1.29
न बहुव्रीहौ

IAST na bahuvrīhau

प्रकार विधि

सार (अन्य) बहुव्रीहि-समास में सर्वादि की सर्वनाम-सञ्ज्ञा नहीं होती।

1.1.30
तृतीयासमासे

IAST tṛtīyāsamāse

प्रकार विधि

सार तृतीया-समास में सर्वादि की सर्वनाम-सञ्ज्ञा नहीं होती।

1.1.31
द्वन्द्वे च

IAST dvandve ca

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व-समास में भी सर्वादि की सर्वनाम-सञ्ज्ञा नहीं होती।

1.1.32
विभाषा जसि

IAST vibhāṣā jasi

प्रकार विधि

सार जस् (प्रथमा बहुवचन) परे होने पर सर्वादि की सर्वनाम-सञ्ज्ञा वैकल्पिक है।

1.1.33
प्रथमचरमतयाल्पर्धकतिपयनेमाश्च

IAST prathamacaramatayālparthakatipayanemāś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम भी सर्वनाम-सञ्ज्ञक हैं।

1.1.34
पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्

IAST pūrvaparāvaradakṣiṇottarāparādharāṇi vyavasthāyām asaṃjñāyām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर और अधर व्यवस्था-अर्थ में तथा असंज्ञा होने पर सर्वनाम-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.1.35
स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्

IAST svam ajñātidhanākhyāyām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार स्व शब्द ज्ञाति या धन के अर्थ से भिन्न अर्थ में सर्वनाम-सञ्ज्ञक होता है।

1.1.36
अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः

IAST antaraṃ bahiryogopasaṃvyānayoḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अन्तर शब्द बहिर्योग और उपसंव्यान (बाह्य वस्त्र) अर्थों में सर्वनाम-सञ्ज्ञक होता है।

1.1.37
स्वरादिनिपातमव्ययम्

IAST svarādinipātam avyayam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार स्वरादिगण के शब्द और निपात अव्यय-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.1.38
तद्धितश्चासर्वविभक्तिः

IAST taddhitaś cāsarvavibhaktiḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सर्व-विभक्तियों से रहित तद्धित-प्रत्ययान्त भी अव्यय-सञ्ज्ञक होता है।

1.1.39
कृत्मेजन्तः

IAST kṛtmejantaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार म् या एच् (ए, ओ, ऐ, औ) पर समाप्त होने वाला कृदन्त अव्यय-सञ्ज्ञक होता है।

1.1.40
क्त्वातोसुन्कसुनः

IAST ktvātosunkasunaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्त्वा, तोसुन् और कसुन् प्रत्ययान्त अव्यय-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.1.41
अव्ययीभावश्च

IAST avyayībhāvaś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अव्ययीभाव-समास भी अव्यय-सञ्ज्ञक होता है।

1.1.42
शि सर्वनामस्थानम्

IAST śi sarvanāmasthānam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार शि प्रत्यय सर्वनामस्थान-सञ्ज्ञक होता है।

1.1.43
सुडनपुंसकस्य

IAST suḍ anapuṃsakasya

प्रकार सञ्ज्ञा

सार नपुंसक से भिन्न लिङ्ग में सुट् (सु, औ, जस्, अम्, औट्) सर्वनामस्थान-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.1.44
न वेति विभाषा

IAST na veti vibhāṣā

प्रकार परिभाषा

सार «न वा» अर्थ वाली व्यवस्था विभाषा-सञ्ज्ञक कही जाती है—अर्थात् विकल्प।

1.1.45
इग्यणः सम्प्रसारणम्

IAST ig yaṇaḥ samprasāraṇam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार यण् (य्, व्, र्, ल्) के स्थान पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) का आदेश सम्प्रसारण कहलाता है।

1.1.46
आद्यन्तौ टकितौ

IAST ādyantau ṭakitau

प्रकार परिभाषा

सार टित् आदेश आदि में और कित् आदेश अन्त में लगाया जाता है।

1.1.47
मिदचोऽन्त्यात्परः

IAST mid aco 'ntyāt paraḥ

प्रकार परिभाषा

सार मित् आदेश अन्तिम अच् के बाद लगाया जाता है।

1.1.48
एच इग्घ्रस्वादेशे

IAST eca ig hrasvādeśe

प्रकार विधि

सार एच् के स्थान पर ह्रस्व-आदेश होने पर तत्तुल्य इक् आदेश होता है।

1.1.49
षष्ठी स्थानेयोगा

IAST ṣaṣṭhī sthāneyogā

प्रकार परिभाषा

सार सूत्र में षष्ठी विभक्ति स्थानापन्न-सम्बन्ध (स्थान-योग) को द्योतित करती है।

1.1.50
स्थानेऽन्तरतमः

IAST sthāne 'ntaratamaḥ

प्रकार परिभाषा

सार स्थानापन्नों में से स्थानादि की दृष्टि से अत्यन्त समीप (अन्तरतम) आदेश गृहीत होता है।

1.1.51
उरण् रपरः

IAST uraṇ raparaḥ

प्रकार परिभाषा

सार ऋ/ऌ के स्थान पर होने वाला आदेश रपर होता है — अर्थात् उसके अनन्तर र् (और ऌ-स्थाने ल्) जुड़ता है।

1.1.52
अलोऽन्त्यस्य

IAST alo 'ntyasya

प्रकार परिभाषा

सार आदेश सामान्यतः अन्त्य अल् का होता है — केवल अन्तिम वर्ण के स्थान पर।

1.1.53
ङिच्च

IAST ṅic ca

प्रकार परिभाषा

सार ङित् आदेश भी अन्त्य अल् का ही होता है।

1.1.54
आदेः परस्य

IAST ādeḥ parasya

प्रकार परिभाषा

सार पर (उत्तरवर्ती अवयव) के स्थान पर आदेश उसके आदि वर्ण का होता है।

1.1.55
अनेकाल्शित्सर्वस्य

IAST anekāl śit sarvasya

प्रकार परिभाषा

सार अनेकाल् (बहुवर्ण) तथा शित् आदेश सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर होते हैं।

1.1.56
स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ

IAST sthānivad ādeśo 'nalvidhau

प्रकार अतिदेश

सार आदेश स्थानिवत् माना जाता है — अल्-विषयक विधियों को छोड़कर स्थानी के धर्म ग्रहण करता है।

1.1.57
अचः परस्मिन् पूर्वविधौ

IAST acaḥ parasmin pūrvavidhau

प्रकार अतिदेश

सार अच् के आदेश को परनिमित्तक पूर्वविधि में स्थानिवत् माना जाता है।

1.1.58
न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घजश्चर्विधिषु

IAST na padāntadvirvacanavareyalopasvarasavarṇānusvāradīrghajaścarvidhiṣu

प्रकार नियम

सार पदान्त, द्विर्वचन, वरे, यलोप, स्वर, सवर्ण, अनुस्वार, दीर्घ, जश् तथा चर् विधियों में स्थानिवद्भाव नहीं होता।

1.1.59
द्विर्वचनेऽचि

IAST dvirvacane 'ci

प्रकार अतिदेश

सार द्विर्वचन में अच् परे होने पर आदेश स्थानिवत् होता है।

1.1.60
अदर्शनं लोपः

IAST adarśanaṃ lopaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अदर्शन — न दिखना — को लोप कहा जाता है।

1.1.61
प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः

IAST pratyayasya lukślulupaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्रत्यय के लोप की तीन सञ्ज्ञाएँ हैं — लुक्, श्लु और लुप्।

1.1.62
प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्

IAST pratyayalope pratyayalakṣaṇam

प्रकार परिभाषा

सार प्रत्यय के लोप होने पर भी उस प्रत्यय के निमित्त से होने वाले कार्य (प्रत्यय-लक्षण) लागू रहते हैं।

1.1.63
न लुमताऽङ्गस्य

IAST na lumatā 'ṅgasya

प्रकार नियम

सार लुम् (लुक्/श्लु/लुप्) द्वारा प्रत्यय-लोप में अङ्ग-सम्बन्धी कार्य नहीं होते।

1.1.64
अचोऽन्त्यादि टि

IAST aco 'ntyādi ṭi

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अन्तिम अच् से लेकर अन्त तक का भाग टि कहलाता है।

1.1.65
अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा

IAST alo 'ntyāt pūrva upadhā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अन्त्य अल् से ठीक पूर्ववर्ती वर्ण उपधा कहलाता है।

1.1.66
तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य

IAST tasminn iti nirdiṣṭe pūrvasya

प्रकार परिभाषा

सार सप्तमी में निर्दिष्ट निमित्त परे होने पर कार्य पूर्व (बाएँ) का होता है।

1.1.67
तस्मादित्युत्तरस्य

IAST tasmād ity uttarasya

प्रकार परिभाषा

सार पञ्चमी में निर्दिष्ट निमित्त से परे कार्य उत्तर (दाएँ) का होता है।

1.1.68
स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा

IAST svaṃ rūpaṃ śabdasyāśabdasaṃjñā

प्रकार परिभाषा

सार शास्त्र में शब्द से उसका अपना रूप गृहीत होता है — जब तक वह शब्द-सञ्ज्ञा न हो।

1.1.69
अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः

IAST aṇudit savarṇasya cāpratyayaḥ

प्रकार परिभाषा

सार अण् तथा उदित् वर्ण अप्रत्यय अवस्था में अपने सवर्णों के भी वाचक होते हैं।

1.1.70
तपरस्तत्कालस्य

IAST taparas tatkālasya

प्रकार परिभाषा

सार तपर वर्ण केवल उसी काल (मात्रा) के सजातीय का वाचक होता है।

1.1.71
आदिरन्त्येन सहेता

IAST ādir antyena sahetā

प्रकार परिभाषा

सार आदि वर्ण अन्त्य इत् के साथ प्रत्याहार बनाता है — मध्यवर्ती वर्णों का संग्रह।

1.1.72
येन विधिस्तदन्तस्य

IAST yena vidhis tadantasya

प्रकार परिभाषा

सार जिस अवयव से विधि कही जाए वह तदन्त (उससे अन्त वाले) पद/रूप पर भी लागू होती है।

1.1.73
वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम्

IAST vṛddhir yasyācām ādis tad vṛddham

प्रकार सञ्ज्ञा

सार जिसके अच्-वर्ग में आदि वर्ण वृद्धि हो, वह वृद्ध कहलाता है।

1.1.74
त्यदादीनि च

IAST tyadādīni ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार त्यद् आदि (सर्वनाम-गण) भी वृद्ध सञ्ज्ञक होते हैं।

1.1.75
एङ् प्राचां देशे

IAST eṅ prācāṃ deśe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्राच्य देश-नामों में आदि एङ् (ए/ओ) होने पर भी वे वृद्ध कहलाते हैं।

अध्याय 1 · पाद 2 (73 सूत्र)

1.2.1
गाङ्-कुटादिभ्यः=अ-ञ्-ण्-इत्=ङ्-इत्

IAST gāṅkuṭādibhyo ñṇinṅit

प्रकार अतिदेश

सार गाङ् तथा कुटादि धातुओं के बाद अञ्णित् आर्धधातुक प्रत्यय ङित्वत् माने जाते हैं (गुण-वृद्धि का प्रतिषेध)।

1.2.2
विज इट्

IAST vija iṭ

प्रकार अतिदेश

सार विज् धातु के इट् आगम को ङित् माना जाता है।

1.2.3
विभाषा=ऊर्णोः

IAST vibhāṣorṇoḥ

प्रकार अतिदेश

सार ऊर्णु धातु के बाद इट् का ङित्त्व वैकल्पिक है।

1.2.4
सार्वधातुकम् अ-प्-इत्

IAST sārvadhātukam apit

प्रकार अतिदेश

सार अपित् सार्वधातुक प्रत्यय ङित् होता है।

1.2.5
अ-संयोगात्=लिट् क्-इत्

IAST asaṃyogāl liṭ kit

प्रकार अतिदेश

सार असंयोग-अन्त धातु के बाद लिट् प्रत्यय कित् होते हैं।

1.2.6
इन्धि-भवतिभ्यां च

IAST indhibhavatibhyāṃ ca

प्रकार अतिदेश

सार इन्धि तथा भू (भवति) धातुओं से भी लिट् कित् होता है।

1.2.7
मृडः-मृदः-गुधः-कुषः-क्लिश-वदः-वसः क्त्वा

IAST mṛḍamṛdagudhakuṣakliśavadavasaḥ ktvā

प्रकार अतिदेश

सार मृड्, मृद्, गुध्, कुष्, क्लिश्, वद्, वस् के बाद क्त्वा कित् होता है।

1.2.8
रुद-विदः-मुषः-ग्रहि-स्वपि-प्रच्छः सन्=च

IAST rudavidamuṣagrahisvapipracchaḥ sannaś ca

प्रकार अतिदेश

सार रुद्, विद्, मुष्, ग्रह्, स्वप्, प्रच्छ् के बाद सन् तथा क्त्वा कित् होते हैं।

1.2.9
इको झल्

IAST iko jhal

प्रकार अतिदेश

सार इगन्त धातु के बाद झलादि सन् कित् होता है।

1.2.10
हल्-अन्तात्=च

IAST hantāc ca

प्रकार अतिदेश

सार हलन्त धातु से भी झलादि सन् कित् होता है।

1.2.11
लिङ्-सिचौ=आत्मनेपदेषु

IAST liṅsicāv ātmanepadeṣu

प्रकार अतिदेश

सार आत्मनेपद में लिङ् और सिच् कित् होते हैं (पूर्व-प्रकरणानुसारी)।

1.2.12
उस् च

IAST uś ca

प्रकार अतिदेश

सार उस् (लिट्-प्रथमपुरुष-बहुवचन) भी कित् होता है।

1.2.13
वा गमः

IAST vā gamaḥ

प्रकार अतिदेश

सार गम् धातु के बाद उस्/सिच् आदि का कित्त्व वैकल्पिक है।

1.2.14
हनः सिच्

IAST hanaḥ sic

प्रकार अतिदेश

सार हन् धातु के बाद सिच् कित् होता है।

1.2.15
यमो गन्धने

IAST yamo gandhane

प्रकार अतिदेश

सार गन्धनार्थक यम् के बाद सिच् कित् होता है।

1.2.16
विभाषा=उपयमने

IAST vibhāṣopayamane

प्रकार अतिदेश

सार उपयमनार्थक यम् में सिच् का कित्त्व वैकल्पिक है।

1.2.17
स्था-घ्वोर् इत्=च

IAST sthāghvor ic ca

प्रकार अतिदेश

सार स्था तथा घु-संज्ञक धातुओं के इ-आदेश को भी कित् माना जाता है।

1.2.18
न क्त्वा स=इट्

IAST na ktvā seṭ

प्रकार विधि

सार सेट् क्त्वा कित् नहीं होता (पूर्व-कित्त्व का प्रतिषेध)।

1.2.19
निष्ठा शीङ्-स्विदि-मिदि-क्ष्विदि-धृषः

IAST niṣṭhā śīṅsvidimidikṣvididhṛṣaḥ

प्रकार अतिदेश

सार शीङ्, स्विद्, मिद्, क्ष्विद्, धृष् के बाद निष्ठा कित् होती है।

1.2.20
मृषस् तितिक्षायाम्

IAST mṛṣas titikṣāyām

प्रकार अतिदेश

सार तितिक्षार्थक मृष् के बाद निष्ठा कित् होती है।

1.2.21
उत्=उपधात्=भाव=आदिकर्मणोर् अन्यतरस्याम्

IAST udupadhād bhāvādikarmaṇor anyatarasyām

प्रकार अतिदेश

सार ह्रस्व उ-उपधा वाले धातु से भाव और आदिकर्म में निष्ठा का कित्त्व वैकल्पिक है।

1.2.22
पूङः क्त्वा च

IAST pūṅaḥ ktvā ca

प्रकार अतिदेश

सार पूङ् धातु से क्त्वा भी (उक्त विकल्प से) कित् होता है।

1.2.23
न=उपधात् थ-फ=अन्तात्=वा

IAST nopadhāt thaphāntād vā

प्रकार नियम

सार थ्/फ्-अन्त तथा उ-उपधा धातु से कित्त्व का निषेध वैकल्पिक है।

1.2.24
वन्चि=लुन्चि=ऋतस् च

IAST vañciluñcyṛtaś ca

प्रकार अतिदेश

सार वञ्च्, लुञ्च् तथा ऋत-अन्त धातुओं से भी (उक्त कित्-विकल्प) लागू होता है।

1.2.25
तृषि-मृषि-कृशेः काश्यपस्य

IAST tṛṣimṛṣikṛśeḥ kāśyapasya

प्रकार अतिदेश

सार काश्यप-मत से तृष्, मृष्, कृश् धातुओं पर भी (उक्त कित्-विकल्प) है।

1.2.26
रलो उ=इ=उपधात्=हल्-आदेः सन्=च

IAST ralo vyupadhād dhalādeḥ saṃś ca

प्रकार विधि

सार हलादि रल्-अन्त धातु जिसकी उपधा ह्रस्व इ/उ हो, तथा सन् — इनके परे किद्-भाव वैकल्पिक होता है।

1.2.27
ऊ-कालः=अच्=ह्रस्व-दीर्घ-प्लुतः

IAST ūkālo 'j jhrasvadīrghaplutaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार एक, दो अथवा तीन ऊ-काल मात्र वाला अच् क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत संज्ञक होता है।

1.2.28
अचश् च

IAST acaś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत संज्ञा अच् के विषय में भी लागू होती है।

1.2.29
उच्चैर् उदात्तः

IAST uccair udāttaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उच्च स्वर से उच्चरित अच् उदात्त संज्ञक होता है।

1.2.30
नीचैर् अनुदात्तः

IAST nīcair anudāttaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार नीच स्वर से उच्चरित अच् अनुदात्त संज्ञक होता है।

1.2.31
समाहारः स्वरितः

IAST samāhāraḥ svaritaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उदात्त और अनुदात्त का समाहार स्वरित संज्ञक होता है।

1.2.32
तस्य=आदित उदात्तम् अर्ध-ह्रस्वम्

IAST tasyādita udāttam ardhahrasvam

प्रकार विधि

सार स्वरित के आदि में आधा ह्रस्व-मात्रा उदात्त होती है।

1.2.33
एक-श्रुति दूरात् सम्बुद्धौ

IAST ekaśruti dūrāt sambuddhau

प्रकार विधि

सार दूर से सम्बुद्धि (आह्वान) में एकश्रुति (एक-स्वर) होती है।

1.2.34
यज्ञ-कर्मणि=अ-जप-न्यूऋख-सामसु

IAST yajñakarmaṇy ajapanyūṅkhasāmasu

प्रकार विधि

सार यज्ञ-कर्म में जप, न्यूङ्ख और साम को छोड़कर एकश्रुति होती है।

1.2.35
उच्चैस्तरां वा वषट्कारः

IAST uccaistarāṃ vā vaṣaṭkāraḥ

प्रकार विधि

सार वषट्कार वैकल्पिक रूप से और भी उच्च स्वर से कहा जाता है।

1.2.36
विभाषा छन्दसि

IAST vibhāṣā chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में एकश्रुति वैकल्पिक है।

1.2.37
न सुब्रह्मण्यायाम् स्वरितस्य तु=उदात्तः

IAST na subrahmaṇyāyāṃ svaritasya tudāttaḥ

प्रकार विधि

सार सुब्रह्मण्या में एकश्रुति नहीं होती; किन्तु स्वरित का (आदि) उदात्त रहता/होता है।

1.2.38
देव-ब्रह्मणोर् अनुदात्तः

IAST devabrahmaṇor anudāttaḥ

प्रकार विधि

सार देव और ब्रह्मन् (इन पदों) का स्वर अनुदात्त होता है।

1.2.39
स्वरितात् संहितायाम् अनुदात्तानाम्

IAST svaritāt saṃhitāyām anudāttānām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार संहिता में स्वरित के बाद आने वाले अनुदात्तों के विषय में (अगली सन्नतर-संज्ञा का अधिकार)।

1.2.40
उदात्त-स्वरित-परस्य सन्नतरः

IAST udāttasvaritaparasya sannataraḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार जिसके परे उदात्त या स्वरित हो, वह (अनुदात्त) सन्नतर संज्ञक होता है।

1.2.41
अपृक्त एक=अल् प्रत्ययः

IAST apṛkta ekāl pratyayaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार एक अल् वाला प्रत्यय अपृक्त संज्ञक होता है।

1.2.42
तत्पुरुषः समान=अधिकरणः कर्मधारयः

IAST tatpuruṣaḥ samānādhikaraṇaḥ karmadhārayaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार समानधिकरण तत्पुरुष कर्मधारय संज्ञक होता है।

1.2.43
प्रथमा-निर्दिष्टं समास उपसर्जनम्

IAST prathamānirdiṣṭaṃ samāsa upasarjanam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार समास-विधायक सूत्र में प्रथमा से निर्दिष्ट पद उपसर्जन संज्ञक होता है।

1.2.44
एक-विभक्ति च=अ-ऊर्व-निपाते

IAST ekavibhakti cāpūrvanipāte

प्रकार सञ्ज्ञा

सार एकविभक्ति (स्थिर-विभक्ति) पद भी उपसर्जन होता है, पूर्व-निपात को छोड़कर।

1.2.45
अर्थवद् अ-धातुर् अ-प्रत्ययः प्रातिपदिकम्

IAST arthavad adhātur apratyayaḥ prātipadikam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अर्थवत् तत्त्व जो न धातु हो न प्रत्यय, प्रातिपदिक संज्ञक होता है।

1.2.46
कृत्-तद्धित-समासाश् च

IAST kṛttaddhitasamāsāś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार कृदन्त, तद्धित और समास भी प्रातिपदिक संज्ञक होते हैं।

1.2.47
ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य

IAST hrasvo napuṃsake prātipadikasya

प्रकार विधि

सार नपुंसक में प्रातिपदिक (के अन्त्य) का ह्रस्व होता है।

1.2.48
गो-स्त्रियोर् उपसर्जनस्य

IAST gostriyor upasarjanasya

प्रकार विधि

सार उपसर्जन गो और स्त्री-प्रत्ययान्त (के अन्त्य) का ह्रस्व होता है।

1.2.49
लुक् तद्धित-लुकि

IAST luk taddhitaluki

प्रकार विधि

सार तद्धित के लुक् होने पर (स्त्री-प्रत्यय आदि का) लुक् होता है।

1.2.50
इत्=गोण्याः

IAST id goṇyāḥ

प्रकार विधि

सार गोणी के स्थान में इकार आदेश होता है (तद्धित-लुक् के प्रसंग में)।

1.2.51
लुपि युक्तवत्=व्यक्ति-वचने

IAST lupi yuktavad vyaktivacane

प्रकार अतिदेश

सार लुप् होने पर व्युत्पन्न पद का लिङ्ग और वचन उस युक्त आधार-व्यक्ति के अनुसार होता है मानो वह स्वयं वही हो।

1.2.52
विशेषणानां च=अ-जातेः

IAST viśeṣaṇānāṃ cājāteḥ

प्रकार विधि

सार जाति-वाचक को छोड़कर विशेषणों का भी लिङ्ग-वचन उसी व्यक्ति-वचन-न्याय से युक्तवत् होता है।

1.2.53
तद् अशिष्यं संज्ञा-प्रमाणत्वात्

IAST tad aśiṣyaṃ saṃjñāpramāṇatvāt

प्रकार परिभाषा

सार वह (लुप्-विषयक लिङ्ग-वचन-विधान) अशिष्य है, क्योंकि व्यवहार संज्ञा-प्रमाण से सिद्ध होता है।

1.2.54
लुप्=योग=अ-प्रख्यानात्

IAST lupyogāprakhyānāt

प्रकार परिभाषा

सार लुप्-प्रत्यय के योग-मात्र से अर्थ की प्रख्याति नहीं होती, अतः वह अर्थ व्याकरण से अशिष्य है।

1.2.55
योग-प्रमाणे च तद्-अभावे=अ-दर्शनं स्यात्

IAST yogapramāṇe ca tadabhāve 'darśanaṃ syāt

प्रकार परिभाषा

सार यदि योग ही अर्थ का प्रमाण माना जाए तो योग के अभाव में अर्थ का अदर्शन हो जाए, जो अनुचित है।

1.2.56
प्रधान-प्रत्यय=अर्थ-वचनम् अर्थस्य=अन्य-प्रमाणत्वात्

IAST pradhānapratyayārthavacanam arthasyānyapramāṇatvāt

प्रकार परिभाषा

सार प्रधान और प्रत्यय के अर्थ का वचन अशिष्य है, क्योंकि अर्थ का प्रमाण लोक/व्यवहार अन्यत्र है।

1.2.57
काल=उपसर्जने च तुल्यम्

IAST kālopasarjane ca tulyam

प्रकार परिभाषा

सार काल (लकारादि-अर्थ) और उपसर्जन के विषय में भी अर्थ-वचन अशिष्य होने का यही न्याय है।

1.2.58
जात्य्-आख्यायाम् एकस्मिन् बहुवचनम् अन्यतरस्याम्

IAST jātyākhyāyām ekasmin bahuvacanam anyatarasyām

प्रकार विधि

सार जाति की आख्या एक व्यक्ति पर होने पर वैकल्पिक रूप से बहुवचन होता है।

1.2.59
अस्मदो द्वायोश् च

IAST asmado dvayoś ca

प्रकार विधि

सार अस्मद् में तथा द्विवचन-विषय में भी (एक/द्वि पर) वैकल्पिक बहुवचन होता है।

1.2.60
फल्गुनी-प्रोष्ठपदानां च नक्षत्रे

IAST phalgunīproṣṭhapadānāṃ ca nakṣatre

प्रकार विधि

सार फल्गुनी और प्रोष्ठपदा के नक्षत्रार्थ में भी (द्विवचन के स्थान पर) वैकल्पिक बहुवचन होता है।

1.2.61
छन्दसि पुनर्वस्वोर् एकवचनम्

IAST chandasi punarvasvor ekavacanam

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पुनर्वसू के लिए एकवचन (द्विवचन के स्थान पर) होता है।

1.2.62
विसाखयोस् च

IAST viśākhayoś ca

प्रकार विधि

सार छन्दस् में विशाखा-युगल के लिए भी एकवचन होता है।

1.2.63
तिष्य-पुनर्वस्वोर् नक्षत्र-द्वंद्वे बहुवचनस्य द्विवचनम् नित्यम्

IAST tiṣyapunarvasvor nakṣatradvaṃdve bahuvacanasya dvivacanaṃ nityam

प्रकार विधि

सार तिष्य और पुनर्वसू के नक्षत्र-द्वन्द्व में बहुवचन के स्थान पर नित्य द्विवचन होता है।

1.2.64
सरूपाणाम् एकशेष एक-विभक्तौ

IAST sarūpāṇām ekaśeṣa eka-vibhaktau

प्रकार विधि

सार समान रूप वाले पदों का एकविभक्ति में एकशेष होता है—एक ही रूप शेष रहता है।

1.2.65
वृद्धो यूना तद्=लक्षणश् चेद्-एव विशेषः

IAST vṛddho yūnā tallakṣaṇaś cedeva viśeṣaḥ

प्रकार विधि

सार यदि केवल वृद्ध/युवन्-लक्षण ही भेद हो तो युवन् के साथ वृद्ध का एकशेष होता है।

1.2.66
स्त्री पुंवत्=च

IAST strī puṃvac ca

प्रकार विधि

सार स्त्री-शब्द भी (युवन् आदि के साथ एकशेष में) पुंवत् व्यवहार करता है।

1.2.67
पुमान् स्त्रिया

IAST pumān striyā

प्रकार विधि

सार स्त्री के साथ पुमान् का एकशेष होता है—पुंरूप शेष रहता है।

1.2.68
भ्रातृ-पुत्रौ स्वसृ-दुहितृभ्याम्

IAST bhrātṛputrau svasṛduhitṛbhyām

प्रकार विधि

सार स्वसृ और दुहितृ के साथ क्रमशः भ्रातृ और पुत्र का एकशेष होता है।

1.2.69
नपुंसकम् अ-नपुंसकेन=एकवत्=अ=अस्य=न्यतरस्याम्

IAST napuṃsakam anapuṃsaken aikavac cāsyānyatarasyām

प्रकार विधि

सार अनपुंसक के साथ नपुंसक का वैकल्पिक एकशेष होता है और वह एकवत् (एकवचनवत्) होता है।

1.2.70
पिता मात्रा

IAST pitā mātrā

प्रकार विधि

सार मात्रा के साथ पिता का एकशेष होता है।

1.2.71
श्वशुरः श्वश्र्वा

IAST śvaśuraḥ śvaśrvā

प्रकार विधि

सार श्वश्रू के साथ श्वशुर का एकशेष होता है।

1.2.72
त्यद्-आदीनि सर्वैर् नित्यम्

IAST tyadādīni sarvair nityam

प्रकार विधि

सार त्यदादि सर्वनाम सभी के साथ नित्य एकशेष होते हैं।

1.2.73
ग्राम्य-पशु-संघेषु=अ-तरुणेषु स्त्री

IAST grāmyapaśusaṃgheṣv ataruṇeṣu strī

प्रकार विधि

सार तरुण-भिन्न ग्राम्य-पशु-संघों में स्त्री-रूप का एकशेष (संघ-निर्देश) होता है।

अध्याय 1 · पाद 3 (93 सूत्र)

1.3.1
भूवादयो धातवः

IAST bhūvādayo dhātavaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार धातुपाठ में भू आदि से आरम्भ धातु-शब्दों को ‘धातु’ संज्ञा प्राप्त होती है।

1.3.2
उपदेशे=अच्=अनुनासिक इत्

IAST upadeśe ’janunāsika it

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उपदेश (शास्त्रीय उच्चारण/निर्देश) में अनुनासिक अच् ‘इत्’ होता है।

1.3.3
हल् अन्त्यम्

IAST hal antyam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उपदेश में अन्तिम हल् ‘इत्’ होता है।

1.3.4
न विभक्तौ तु-स्-माः

IAST na vibhaktau tusmāḥ

प्रकार विधि

सार विभक्ति में तु, स्, म् ‘इत्’ नहीं होते (पूर्व-सूत्र का प्रतिषेध)।

1.3.5
आदिर् ञि-टु-डव्-अः

IAST ādir ñiṭuḍavaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आदि में स्थित ञि, टु, डु ‘इत्’ होते हैं।

1.3.6
षः प्रत्ययस्य

IAST ṣaḥ pratyayasya

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्रत्यय का ष् ‘इत्’ होता है।

1.3.7
चु-टू

IAST cuṭū

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्रत्यय के आदि चवर्ग और टवर्ग ‘इत्’ होते हैं।

1.3.8
ल-श-कु=अ-तद्धिते

IAST laśakv ataddhite

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तद्धित को छोड़कर प्रत्यय के ल, श और कवर्ग ‘इत्’ होते हैं।

1.3.9
तस्य लोपः

IAST tasya lopaḥ

प्रकार विधि

सार ‘इत्’ का लोप होता है।

1.3.10
यथा-संख्यम् अनुदेशः समानाम्

IAST yathāsaṃkhyam anudeśaḥ samānām

प्रकार परिभाषा

सार समान संख्या वाले निर्देश यथासंख्य (क्रम-समान्तर) रूप से लागू होते हैं।

1.3.11
स्वरितेन=अधिकारः

IAST svaritenādhikāraḥ

प्रकार परिभाषा

सार स्वरित से अधिकार (विषय-क्षेत्र) सूचित होता है।

1.3.12
अनुदात्त-ङ्-इत आत्मनेपदम्

IAST anudāttaṅita ātmanepadam

प्रकार विधि

सार अनुदात्तेत् और ङित् धातु से आत्मनेपद होता है।

1.3.13
भाव-कर्मणोः

IAST bhāvakarmaṇoḥ

प्रकार विधि

सार भाव और कर्म (भाव-कर्मवाच्य) में आत्मनेपद होता है।

1.3.14
कर्तरि कर्म-व्यतिहारे

IAST kartari karmavyatihāre

प्रकार विधि

सार कर्तृ में कर्मव्यतिहार (पारस्परिक क्रिया) अर्थ होने पर आत्मनेपद होता है।

1.3.15
न गति-हिंसा=अर्थेभ्यः

IAST na gatihiṃsārthebhyaḥ

प्रकार विधि

सार गति या हिंसा अर्थ वाले धातुओं से (कर्मव्यतिहार में) आत्मनेपद नहीं होता।

1.3.16
इतरेतर=अन्योन्य=उपपदात्=च

IAST itaretarānyonyopapadāc ca

प्रकार विधि

सार इतरेतर या अन्योन्य उपपद होने पर भी आत्मनेपद होता है।

1.3.17
नेर् विशः

IAST ner viśaḥ

प्रकार विधि

सार नि उपसर्गपूर्वक विश् धातु से आत्मनेपद होता है।

1.3.18
परि-वि=अवेभ्यः क्रियः

IAST parivyavebhyaḥ kriyaḥ

प्रकार विधि

सार परि, वि, अव पूर्वक क्री धातु से आत्मनेपद होता है।

1.3.19
वि-परा-भ्यां जेः?

IAST viparābhyāṃ jeḥ

प्रकार विधि

सार वि और परा पूर्वक जि धातु से आत्मनेपद होता है।

1.3.20
आङो दः=अन्-आस्य-विहरणे

IAST āṅo do ’nāsyaviharaṇe

प्रकार विधि

सार आङ् पूर्वक दा धातु से, आस्यविहरण अर्थ छोड़कर, आत्मनेपद होता है।

1.3.21
क्रीडः=अनु-सम्-परिभ्यश् च

IAST krīḍo ’nusamparibhyaś ca

प्रकार विधि

सार अनु, सम्, परि पूर्वक क्रीड् धातु से भी आत्मनेपद होता है।

1.3.22
सम्=अव-प्र-विभ्यः स्ह्तः

IAST samavapravibhyaḥ sthaḥ

प्रकार विधि

सार सम्, अव, प्र, वि पूर्वक स्था धातु से आत्मनेपद होता है।

1.3.23
प्रकाशन=स्थेय=आख्ययोः

IAST prakāśanasthēyākhyayoḥ

प्रकार विधि

सार प्रकाशन तथा स्थेय-आख्या अर्थों में (स्था से) आत्मनेपद होता है।

1.3.24
उदः=अन्-ऊर्ध्व-कर्मणि

IAST udo ’nūrdhvakarmaṇi

प्रकार विधि

सार उद् पूर्वक स्था धातु से, ऊर्ध्वकर्म न होने पर, आत्मनेपद होता है।

1.3.25
उपात्=मन्त्र-करणे

IAST upān mantrakaraṇe

प्रकार विधि

सार उप पूर्वक (स्था से) मन्त्र-करण अर्थ में आत्मनेपद होता है।

1.3.26
अ-कर्मकात्=च

IAST akarmakāc ca

प्रकार विधि

सार उप-पूर्व स्था-धातु अकर्मक होने पर भी आत्मनेपद में प्रयुक्त होता है।

1.3.27
उद्-विभ्याम् तपः

IAST udvibhyāṃ tapaḥ

प्रकार विधि

सार उद् तथा वि उपसर्ग-पूर्वक तप्-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.28
आङो यम-हनः

IAST āṅo yama-hanaḥ

प्रकार विधि

सार आङ्-पूर्वक यम् तथा हन् धातु आत्मनेपद में होते हैं।

1.3.29
समो गमि=ऋच्छि-प्रच्छि-स्वरति=अर्ति-श्रु-विदिभ्यः

IAST samo gami-ṛcchi-pracchi-svarati-arti-śru-vidibhyaḥ

प्रकार विधि

सार सम्-पूर्वक गम्, ऋच्छ्, प्रच्छ्, स्वर्, ऋ, श्रु तथा विद् धातु आत्मनेपद लेते हैं।

1.3.30
नि-सम्-उप-विभ्यो ह्वः

IAST ni-sam-upa-vibhyo hvaḥ

प्रकार विधि

सार नि, सम्, उप तथा वि उपसर्ग-पूर्वक ह्वे-धातु आत्मनेपद में प्रयुक्त होता है।

1.3.31
स्पर्धायाम् आङः

IAST spardhāyām āṅaḥ

प्रकार विधि

सार स्पर्धा-अर्थ में आङ्-पूर्वक ह्वे-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.32
गन्धन=अवक्षेपण-सेवन-साहसिक्य-प्रतियत्न-प्रकथन=उपयोगेषु कृञः

IAST gandhana-avakṣepaṇa-sevana-sāhasikya-pratiyatna-prakathana-upayogeṣu kṛñaḥ

प्रकार विधि

सार सूचन, तिरस्कार, सेवन, साहस, प्रयत्न, कथन तथा उपयोग — इन अर्थों में कृ-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.33
अधेः प्रसहने

IAST adheḥ prasahane

प्रकार विधि

सार प्रसहन (अभिभव/दमन) अर्थ में अधि-पूर्वक कृ-धातु आत्मनेपद में होता है।

1.3.34
वेः शब्द-कर्मणः

IAST veḥ śabda-karmaṇaḥ

प्रकार विधि

सार शब्द जब कर्म हो तब वि-पूर्वक कृ-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.35
अकर्मकात्=च

IAST akarmakāc ca

प्रकार विधि

सार वि-पूर्वक कृ-धातु अकर्मक होने पर भी आत्मनेपद में प्रयुक्त होता है।

1.3.36
सम्मानन=उत्सञ्जन=आचार्यकरण-ज्ञान-भृति-विगणन-व्ययेषु नियः

IAST sammānana-utsañjana-ācāryakaraṇa-jñāna-bhṛti-vigaṇana-vyayeṣu niyaḥ

प्रकार विधि

सार सम्मान, उत्सञ्जन, आचार्य-करण, ज्ञान, भृति, विगणन तथा व्यय — इन अर्थों में नी-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.37
कर्तृस्थे च=अ-शरीरे कर्मणि

IAST kartṛsthe cāśarīre karmaṇi

प्रकार विधि

सार जब अशरीर कर्म कर्ता में स्थित हो तब भी नी-धातु आत्मनेपद में होता है।

1.3.38
वृत्ति-सर्ग-तात्यनेषु क्रमः

IAST vṛtti-sarga-tāyaneṣu kramaḥ

प्रकार विधि

सार वृत्ति, सर्ग तथा तायन अर्थों में क्रम्-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.39
उप-पराभ्याम्

IAST upa-parābhyām

प्रकार विधि

सार उप तथा परा उपसर्ग-पूर्वक क्रम्-धातु आत्मनेपद में प्रयुक्त होता है।

1.3.40
आङ उद्गमने

IAST āṅ udgamane

प्रकार विधि

सार उद्गमन अर्थ में आङ्-पूर्वक क्रम्-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.41
वेः पाद-विहरणे

IAST veḥ pāda-viharaṇe

प्रकार विधि

सार पाद-विहरण अर्थ में वि-पूर्वक क्रम्-धातु आत्मनेपद में होता है।

1.3.42
प्र=उपाभ्याम् सम्-अर्था-भ्याम्

IAST pro-pābhyāṃ samarthābhyām

प्रकार विधि

सार समानार्थक प्र तथा उप उपसर्ग-पूर्वक क्रम्-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.43
अन्-उपसर्गाद् वा

IAST anupasargād vā

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित क्रम्-धातु वैकल्पिक रूप से आत्मनेपद लेता है।

1.3.44
अपह्नवे ज्ञः

IAST apahnave jñaḥ

प्रकार विधि

सार अपह्नव (निषेध/अस्वीकार) अर्थ में ज्ञा-धातु आत्मनेपद में प्रयुक्त होता है।

1.3.45
अ-कर्मका=च

IAST akarmakāc ca

प्रकार विधि

सार ज्ञा-धातु अकर्मक होने पर भी आत्मनेपद लेता है।

1.3.46
सम्-प्रतिभ्याम् अन्-आ-ध्याने

IAST sam-pratibhyām anādhyāne

प्रकार विधि

सार आध्यान-भिन्न अर्थ में सम् तथा प्रति उपसर्ग-पूर्वक ज्ञा-धातु आत्मनेपद में होता है।

1.3.47
भासन=उपसम्भाषा-ज्ञान-यत्न-विमति-उपमन्त्रणेषु वदः

IAST bhāsana-upasambhāṣā-jñāna-yatna-vimati-upamantraṇeṣu vadaḥ

प्रकार विधि

सार भासन, उपसम्भाषा, ज्ञान, यत्न, विमति तथा उपमन्त्रण — इन अर्थों में वद्-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.48
व्यक्तवाचाम् समुच्चारणे

IAST vyaktavācāṃ samuccāraṇe

प्रकार विधि

सार व्यक्त-वाक् वाले प्राणियों के समुच्चारण अर्थ में वद्-धातु आत्मनेपद में प्रयुक्त होता है।

1.3.49
अनोर् अ-कर्मकात्

IAST anor akarmakāt

प्रकार विधि

सार अकर्मक अनु-पूर्वक वद्-धातु आत्मनेपद लेता है।

1.3.50
विभाषा वि-प्र-लापे

IAST vibhāṣā vipralāpe

प्रकार विधि

सार विप्रलाप (परस्पर-विरुद्ध कथन) अर्थ में वद्-धातु वैकल्पिक रूप से आत्मनेपद में होता है।

1.3.51
अवाद् ग्रः

IAST avād graḥ

प्रकार विधि

सार अव-पूर्वक गृ (निगरण) धातु से (अनुवृत्त) आत्मनेपद होता है।

1.3.52
समः प्रतिज्ञाने

IAST samaḥ pratijñāne

प्रकार विधि

सार सम्-युक्त धातु में प्रतिज्ञान (प्रतिज्ञा/स्वीकार) अर्थ में आत्मनेपद होता है।

1.3.53
उदश् चरः स-कर्मकात्

IAST udaś caraḥ sakarmakāt

प्रकार विधि

सार उद्-युक्त √चर् सकर्मक होने पर आत्मनेपद लेता है।

1.3.54
समस् तृतीया-युक्तात्

IAST samas tṛtīyā-yuktāt

प्रकार विधि

सार सम्-पूर्वक चर् से, जब कर्म तृतीया से युक्त हो, आत्मनेपद होता है।

1.3.55
दाणस् च सा चेत्=चतुर्त्य्-अर्थे

IAST dāṇaś ca sā cet caturtharthe

प्रकार विधि

सार √दाण् भी उसी अवस्था में आत्मनेपद लेता है जब वह तृतीया चतुर्थ्यर्थ में हो।

1.3.56
उपाद् यमः स्व-करणे

IAST upād yamaḥ svakaraṇe

प्रकार विधि

सार उप-युक्त √यम् स्वकरण (स्वयं को वश/नियन्त्रण में लाना) अर्थ में आत्मनेपद लेता है।

1.3.57
ज्ञा-श्रु-स्मृ-दृशाम् सनः

IAST jñā-śru-smṛ-dṛśāṃ sanaḥ

प्रकार विधि

सार √ज्ञा, √श्रु, √स्मृ और √दृश् के सन् (इच्छार्थक) में आत्मनेपद होता है।

1.3.58
न=अनोर् ज्ञः

IAST nānor jñaḥ

प्रकार नियम

सार अनु-युक्त √ज्ञा के सन् में पूर्वोक्त आत्मनेपद का प्रतिषेध है।

1.3.59
प्रति=आङ्भ्याम् श्रुवः

IAST pratyāṅbhyāṃ śruvaḥ

प्रकार नियम

सार प्रति- और आङ्-युक्त √श्रु के सन् में भी आत्मनेपद नहीं होता।

1.3.60
शदेः श्-इत्-अः

IAST śadeḥ śitaḥ

प्रकार विधि

सार शद् धातु से शित् (श्-इत्) विकरण/प्रत्यय होने पर आत्मनेपद होता है।

1.3.61
म्रियतेर् लुङ्-लिङोश् च

IAST mriyater luṅliṅoś ca

प्रकार विधि

सार √मृ (म्रियते) में लुङ् और लिङ् में भी आत्मनेपद होता है।

1.3.62
पूर्ववत् सनः

IAST pūrvavat sanaḥ

प्रकार अतिदेश

सार सन्-प्रत्ययान्त का पद-व्यवहार (आत्मनेपद/परस्मैपद) मूल धातु के समान (पूर्ववत्) होता है।

1.3.63
आम्-प्रत्ययवत् कृञः=अनुप्रयोगस्य

IAST āmpratyayavat kṛño 'nuprayogasya

प्रकार विधि

सार आम्-प्रत्यय के समान कृ-धातु के अनुप्रयोग (परोक्ष-लिट्-सहायक) में भी आत्मनेपद होता है।

1.3.64
प्र=उपाभ्यां युजेर् अ-यज्ञ-पात्रेषु

IAST propābhyāṃ yujer ayajñapātreṣu

प्रकार विधि

सार प्र तथा उप से युज् धातु यज्ञ-पात्र-सम्बन्धी अर्थ को छोड़कर आत्मनेपद लेती है।

1.3.65
समः क्ष्णुवः

IAST samaḥ kṣṇuvaḥ

प्रकार विधि

सार सम्-पूर्वक क्ष्णु धातु आत्मनेपद लेती है।

1.3.66
भुजः=अन्-अवने

IAST bhujo 'navane

प्रकार विधि

सार √भुज् अवन (रक्षण) अर्थ छोड़कर अन्य अर्थों में आत्मनेपद लेता है।

1.3.67
णेर् अणौ यत् कर्म णौ चेत् स कर्ता अनाध्याने

IAST ṇer aṇau yat karma ṇau cet sa kartānādhyāne

प्रकार विधि

सार णिच् में वह कर्म जो अणौ (मूल धातु) में कर्म था, णौ में कर्ता बने तो—आध्यान छोड़कर—आत्मनेपद होता है।

1.3.68
भी-स्म्योर् हेतु-भये

IAST bhīsmyor hetubhaye

प्रकार विधि

सार √भी और √स्मि हेतु-भय (भय उत्पन्न कराना) अर्थ में आत्मनेपद लेते हैं।

1.3.69
गृधि-वन्च्योह् प्रलम्भने

IAST gṛdhivañcyoḥ pralambhane

प्रकार विधि

सार √गृध् और √वञ्च् प्रलम्भन (छल/धोखा) अर्थ में आत्मनेपद लेते हैं।

1.3.70
लियः सम्-मानन-शालिनी-करणयोश् च

IAST liyaḥ sammānanaśālinīkaraṇayoś ca

प्रकार विधि

सार ली धातु सम्मानन तथा शालिनीकरण अर्थों में भी आत्मनेपद लेती है।

1.3.71
मिथ्योपपदात् कृञः=अभ्यासे

IAST mithyopapadāt kṛño 'bhyāse

प्रकार विधि

सार मिथ्या-उपपद से कृ धातु अभ्यास अर्थ में आत्मनेपद लेती है।

1.3.72
स्वरित-ञ्-इतः कर्त्र्=अभिप्राये क्रिया-फले

IAST svaritañitaḥ kartrabhiprāye kriyāphale

प्रकार विधि

सार स्वरितेत् तथा ञित् धातुओं में कर्ता के अभिप्राय से क्रियाफल होने पर आत्मनेपद होता है।

1.3.73
अपाद् वदः

IAST apād vadaḥ

प्रकार विधि

सार अप-युक्त √वद् में (कर्त्रभिप्राय क्रिया-फल होने पर) आत्मनेपद होता है।

1.3.74
णिचश् च

IAST ṇicaś ca

प्रकार विधि

सार णिच्-प्रत्ययान्त धातुओं में भी (कर्त्रभिप्राय क्रिया-फल होने पर) आत्मनेपद होता है।

1.3.75
सम्-उद्=आङ्भ्यह्=अमः=अ-ग्रन्थे

IAST samudāṅbhyo yamo 'granthe

प्रकार विधि

सार सम्-, उद्- और आङ्-युक्त √यम् ग्रन्थ-भिन्न अर्थ में (कर्त्रभिप्राय क्रिया-फल होने पर) आत्मनेपद लेता है।

1.3.76
अन्-उपसर्गात्=ज्ञः

IAST anupasargāj jñaḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित √ज्ञा धातु कर्तृ-अभिप्राय क्रियाफल में आत्मनेपद लेती है।

1.3.77
विभाषा=उपपदेन प्रतीयमाने

IAST vibhāṣopapadena pratīyamāne

प्रकार विधि

सार उपपद से (कर्त्रभिप्राय) अर्थ की प्रतीति होने पर विकल्प से आत्मनेपद होता है।

1.3.78
शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्

IAST śeṣāt kartari parasmaipadam

प्रकार विधि

सार शेष (पूर्व-विधियों से अबद्ध) धातुओं में कर्तृ-वाच्य में परस्मैपद होता है।

1.3.79
अनु-पराभ्यां कृञः

IAST anuparābhyāṃ kṛñaḥ

प्रकार विधि

सार अनु तथा परा उपसर्गों के योग में √कृञ् परस्मैपद लेती है।

1.3.80
अभि-प्रति=अतिभ्यः क्षिपः

IAST abhipratyatibhyaḥ kṣipaḥ

प्रकार विधि

सार अभि, प्रति तथा अति उपसर्गों के योग में √क्षिप् परस्मैपद लेती है।

1.3.81
प्राद् वहः

IAST prād vahaḥ

प्रकार विधि

सार प्र उपसर्ग के योग में √वह् परस्मैपद लेती है।

1.3.82
परेर् मृषः

IAST parer mṛṣaḥ

प्रकार विधि

सार परि उपसर्ग के योग में √मृष् परस्मैपद लेती है।

1.3.83
वि-आङ्-परिभ्यः=रमः

IAST vyāṅparibhyo ramaḥ

प्रकार विधि

सार वि, आङ् तथा परि उपसर्गों के योग में √रम् परस्मैपद लेती है।

1.3.84
उपात्=च

IAST upāc ca

प्रकार विधि

सार उप उपसर्ग के योग में भी (√रम्) परस्मैपद लेती है।

1.3.85
विभाषा=अ-कर्मकात्

IAST vibhāṣākarmakāt

प्रकार विधि

सार अकर्मक धातु से णिच् होने पर कर्त्रभिप्राय क्रियाफल में आत्मनेपद विकल्प से होता है।

1.3.86
बुधः-युध-नशः-जन-इङ्-प्रु-द्रु-स्रुभ्यो णेः

IAST budhayudhanaśajaneṅprudrusrubhyo ṇeḥ

प्रकार विधि

सार बुध्, युध्, नश्, जन्, इङ्, प्रु, द्रु और स्रु धातुओं से णिच् होने पर नित्य परस्मैपद होता है।

1.3.87
निगरण-चलन=अर्थेभ्यः

IAST nigaraṇacalanārthebhyaḥ

प्रकार विधि

सार निगरण (निगलना) या चलन अर्थ वाली धातुओं से णिच् होने पर परस्मैपद होता है।

1.3.88
अणौ=अ-कर्मकात्=चित्तवत्-कर्तृकात्

IAST aṇāv akarmakāc cittavatkartṛkāt

प्रकार अतिदेश

सार णिच् के अभाव में भी अकर्मक धातु से चेतन कर्ता होने पर पूर्वोक्त परस्मैपद-विधान लागू होता है।

1.3.89
न पा-दमि=आङ्-यम-आङ्-यस-परि-मुह-रुचि-नृति-वद-वसः

IAST na pādamyāṅyamāṅyasaparimuharucinṛtivadavasaḥ

प्रकार विधि

सार √पा, √दम्, आङ्+√यम्, आङ्+√यस्, परि+√मुह्, √रुच्, √नृत्, √वद् और √वस् के णिच् पर पूर्व-सूत्र (१.३.८८) का प्रतिषेध है।

1.3.90
वा क्यषः

IAST vā kyaṣaḥ

प्रकार विधि

सार क्यष् प्रत्यय के योग में विकल्प से परस्मैपद होता है।

1.3.91
द्युद्भ्यो लुङि

IAST dyudbhyo luṅi

प्रकार विधि

सार द्युतादि धातुओं से लुङ् लकार में परस्मैपद होता है।

1.3.92
वृद्भ्यः स्य-सनोः

IAST vṛdbhyaḥ syasanoḥ

प्रकार विधि

सार वृतादि धातुओं से स्य और सन् के विषय में परस्मैपद होता है।

1.3.93
लुटि च कॢप्-अः

IAST luṭi ca kḷpaḥ

प्रकार विधि

सार कॢप् धातु से लुट् में भी परस्मैपद होता है।

अध्याय 1 · पाद 4 (110 सूत्र)

1.4.1
आ कडारात्=एका संज्ञा

IAST ā kaḍārād ekā saṃjñā

प्रकार परिभाषा

सार कडार-सूत्र तक जहाँ एक पद पर एक से अधिक संज्ञाएँ सम्भव हों वहाँ केवल एक ही संज्ञा लागू होती है।

1.4.2
विप्रतिषेधे परम् कार्यम्

IAST vipratiṣedhe paraṃ kāryam

प्रकार परिभाषा

सार तुल्यबल दो विधियों के विरोध में पर (परवर्ती) सूत्र का कार्य होता है।

1.4.3
यू स्त्री=अख्यौ नदी

IAST yū stryākhyau nadī

प्रकार सञ्ज्ञा

सार स्त्रीवाचक ईकार और ऊकार (तथा उनसे अन्त वाले प्रातिपदिक) नदीसंज्ञक होते हैं।

1.4.4
न=इयङ्=उवङ्-स्थानौ=अ-स्त्री

IAST neyaṅuvaṅsthānāv astrī

प्रकार नियम

सार इयङ्-उवङ्स्थानभूत ई-ऊ तथा अस्त्रीलिङ्ग ई-ऊ नदीसंज्ञा नहीं पाते।

1.4.5
वा=आमि

IAST vā āmi

प्रकार विधि

सार आम् परे इयङ्-उवङ्स्थान ई-ऊ वैकल्पिक रूप से नदीसंज्ञक होते हैं।

1.4.6
ङित्-इ ह्रस्वश् च

IAST ṅiti hrasvaś ca

प्रकार विधि

सार ङित् प्रत्यय परे इयङ्-उवङ्स्थान ई-ऊ और ह्रस्व इ-उ भी वैकल्पिक नदीसंज्ञक होते हैं।

1.4.7
शेषो घि=अ-सखि

IAST śeṣo ghy asakhi

प्रकार सञ्ज्ञा

सार नदी से अवशिष्ट ह्रस्व इ-उ अन्त वाले प्रातिपदिक (सखि को छोड़कर) घिसंज्ञक होते हैं।

1.4.8
पतिः समासे=एव

IAST patiḥ samāsa eva

प्रकार नियम

सार पति शब्द केवल समास में ही घिसंज्ञक होता है, असमस्त नहीं।

1.4.9
षष्ठी-युक्तश् छन्दसि वा

IAST ṣaṣṭhīyuktaś chandasi vā

प्रकार विधि

सार छन्दस् में षष्ठी से युक्त पति वैकल्पिक रूप से घिसंज्ञक होता है।

1.4.10
ह्रस्वम् लघु

IAST hrasvaṃ laghu

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ह्रस्व स्वर लघुसंज्ञक होता है।

1.4.11
संयोगे गुरु

IAST saṃyoge guru

प्रकार सञ्ज्ञा

सार संयोग (व्यंजन-युगल) परे ह्रस्व भी गुरुसंज्ञक होता है।

1.4.12
दीर्घं च

IAST dīrghaṃ ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार दीर्घ स्वर भी गुरुसंज्ञक होता है।

1.4.13
यस्मात् प्रत्यय-विधिस् तद्-आदि प्रत्यये=अङ्गम्

IAST yasmāt pratyayavidhis tadādi pratyaye 'ṅgam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार जिससे प्रत्यय का विधान हो और उससे आरम्भ अंश, प्रत्यय परे अङ्गसंज्ञक होता है।

1.4.14
सुप्-तिङ्=अन्तम् पदम्

IAST suptiṅantaṃ padam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सुप् या तिङ् से अन्त वाला रूप पदसंज्ञक होता है।

1.4.15
नः क्ये

IAST naḥ kye

प्रकार सञ्ज्ञा

सार नकारान्त अङ्ग क्य प्रत्यय परे पदसंज्ञक होता है।

1.4.16
स्-इत्-इ च

IAST siti ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार स्-इत् वाले प्रत्यय परे भी (पूर्ववत्) पदसंज्ञा होती है।

1.4.17
सः=आदिषु=अ-सर्वनामस्थाने

IAST svādiṣv asarvanāmasthāne

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सु से आरम्भ असार्वनामस्थान प्रत्ययों परे अङ्ग पदसंज्ञक होता है।

1.4.18
य्-अचि भम्

IAST yaci bham

प्रकार सञ्ज्ञा

सार यकार या अच् से आरम्भ प्रत्यय परे अङ्ग भसंज्ञक होता है।

1.4.19
त-सौ मतु=अर्थे

IAST tasau matvarthe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार मतुप्-अर्थ वाले प्रत्यय के तकार या सकार परे भी अङ्ग भसंज्ञक होता है।

1.4.20
अयस्मय=आदीनि छन्दसि

IAST ayasmayādīni chandasi

प्रकार सञ्ज्ञा

सार छन्दस् में अयस्मय आदि रूप भसंज्ञक माने जाते हैं।

1.4.21
बहुषु बहु-वचनम्

IAST bahuṣu bahuvacanam

प्रकार विधि

सार बहुतों के अभिधान में बहुवचन का प्रयोग होता है।

1.4.22
द्वि=एकयोर् द्वि-वचन=एक-वचने

IAST dvyekayor dvivacanaikavacane

प्रकार विधि

सार दो और एक के अभिधान में क्रमशः द्विवचन और एकवचन होते हैं।

1.4.23
कारके

IAST kārake

प्रकार अधिकार

सार यह कारक-संज्ञाओं का अधिकार है—आगे के सूत्र कारक नाम निर्धारित करते हैं।

1.4.24
ध्रुवम् अपाये=अपादानम्

IAST dhruvam apāye 'pādānam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अपाय (वियोग/निःसरण) में जो ध्रुव (अवधि-बिन्दु) हो वह अपादानसंज्ञक होता है।

1.4.25
भी-त्रा-अर्थानाम् भय-हेतुः

IAST bhītrārthānāṃ bhayahetuḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार भी- और त्रा-अर्थक धातुओं में भय का हेतु अपादानसंज्ञक होता है।

1.4.26
परा-जेर् अ-सोढः

IAST parā-jer a-soḍhaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार परा-जि धातु के साथ जो असह्य (असोढ) वस्तु हो, उसे अपादान-संज्ञा होती है।

1.4.27
वारण=अर्थानाम् ईप्सितः

IAST vāraṇa-arthānām īpsitaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार निवारण-अर्थक धातुओं में जिसकी प्राप्ति वाञ्छित हो, उसे अपादान-संज्ञा होती है।

1.4.28
अन्तर्धौ येन अ-दर्शनम् इच्छति

IAST antardhau yena a-darśanam icchati

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अन्तर्धान (छिपने) की स्थिति में जिससे अदर्शन चाहता हो, उसको अपादान-संज्ञा होती है।

1.4.29
आख्याता=उपयोगे

IAST ākhyāta-upayoge

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आख्यात (शास्त्र/विद्या) के उपयोग-ग्रहण में स्रोत-रूप को अपादान-संज्ञा होती है।

1.4.30
जनि-कर्तुः प्रकृतिः

IAST jani-kartuḥ prakṛtiḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार जन्-धातु के कर्ता की प्रकृति (उत्पत्ति-सामग्री/स्रोत) को अपादान-संज्ञा होती है।

1.4.31
भुवः प्रभवः

IAST bhuvaḥ prabhavaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार भू-धातु के प्रभव (उत्पत्ति-स्थान) को अपादान-संज्ञा होती है।

1.4.32
कर्मणा यम् अभि-प्रैति स सम्प्रदानम्

IAST karmaṇā yam abhi-praiti sa sampradānam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार कर्ता कर्म के द्वारा जिसकी ओर अभिप्राय रखता है, वह सम्प्रदान-संज्ञक होता है।

1.4.33
रुचि=अर्थानाम् प्रीयमाणः

IAST ruci-arthānām prīyamāṇaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार रुचि-अर्थक धातुओं में जो प्रसन्न/प्रियमान होता है, उसे सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.34
श्लाघ-ह्नुङ्-स्था-शपाम् ज्ञीप्स्यमानः

IAST ślāgha-hnuṅ-sthā-śapām jñīpsyamānaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार श्लाघ, ह्नुङ्, स्था और शप् धातुओं में जिसको बोधित करना अभीष्ट हो, उसे सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.35
धारेर् उत्तमर्णः

IAST dhārer uttamarṇaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार धारि (ऋण-धारण) में उत्तमर्ण (लेनदार) को सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.36
स्पृहेर् ईप्सितः

IAST spṛher īpsitaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार स्पृह् धातु में जो अभीष्ट हो, उसे सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.37
क्रुधः-द्रुहः-ईर्ष्यः=असूयान् आम्

IAST krudhaḥ-druhaḥ-īrṣyaḥ-asūyānām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्या और असूया-अर्थक धातुओं में क्रोध आदि का लक्ष्य सम्प्रदान-संज्ञक होता है।

1.4.38
क्रुधः-द्रुहोर् उपसृष्टयोः कर्म

IAST krudhaḥ-druhor upasṛṣṭayoḥ karma

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उपसर्गयुक्त क्रुध् और द्रुह् में पूर्वोक्त लक्ष्य को कर्म-संज्ञा होती है (सम्प्रदान नहीं)।

1.4.39
राध्-ईक्ष्योर् यस्य विप्रश्नः

IAST rādh-īkṣyor yasya vipraśnaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार राध् और ईक्ष् धातुओं में जिसके विषय में प्रश्न/जिज्ञासा हो, उसे सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.40
प्रति=आङ्भ्यां श्रुवः पूर्वस्य कर्ता

IAST prati-āṅbhyāṃ śruvaḥ pūrvasya kartā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्रति या आङ् के साथ श्रु धातु में पूर्व-क्रिया का कर्ता सम्प्रदान-संज्ञक होता है।

1.4.41
अनु-प्रति-गृणश् च

IAST anu-prati-gṛṇaś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अनु या प्रति के साथ गॄ (अनुगृणाति आदि) में भी पूर्व-कर्ता को सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.42
साधकतमम् करणम्

IAST sādhakatamam karaṇam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्रिया की सिद्धि में अत्यन्त साधक कारक को करण-संज्ञा होती है।

1.4.43
दिवः कर्म च

IAST divaḥ karma ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार दिव् (द्यूत) धातु में करण-साधक को कर्म-संज्ञा भी होती है।

1.4.44
परि-क्रयणे सम्प्रदानन् अन्यतरस्याम्

IAST pari-krayaṇe sampradānan anyatarasyām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार परिक्रयण (किराया/मूल्य-निर्धारण) में वैकल्पिक रूप से सम्प्रदान-संज्ञा होती है।

1.4.45
आधारः=अधिकरणम्

IAST ādhāraḥ-adhikaraṇam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्रिया का आधार (आश्रय-स्थान) अधिकरण-संज्ञक होता है।

1.4.46
अधि-शीङ्-स्था=आसां कर्म

IAST adhi-śīṅ-sthā-āsāṃ karma

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अधि-युक्त शीङ्, स्था और आस् धातुओं में आधार को कर्म-संज्ञा होती है।

1.4.47
अभि-नि-विशश् च

IAST abhi-ni-viśaś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अभि-नि-विश् धातु में भी आधार को कर्म-संज्ञा होती है।

1.4.48
उप=अनु=अधि-आङ्-असः

IAST upa-anu-adhi-āṅ-asaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उप, अनु, अधि या आङ् के साथ अस् धातु में आधार को कर्म-संज्ञा होती है।

1.4.49
कर्तुर् ईप्सिततमम् कर्म

IAST kartur īpsitatamam karma

प्रकार सञ्ज्ञा

सार कर्ता को अत्यन्त अभीष्ट वस्तु को कर्म-संज्ञा होती है।

1.4.50
तथा-युक्तं च=अन्-इप्सीतम्

IAST tathā-yuktaṃ ca-an-ipsītam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उसी प्रकार (क्रिया से) संयुक्त अनभीष्ट वस्तु को भी कर्म-संज्ञा होती है।

1.4.51
अ-कथितं च

IAST akathitaṃ ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार धातु के मुख्य अर्थ से न कहा गया (द्वितीय/अप्रधान) कारक भी कर्म-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.52
गति-बुद्धि-प्रत्यवसान=अर्थ-शब्द-कर्म=अ-कर्मकाणाम् अणि कर्ता स णौ

IAST gatibuddhipratyavasānārthaśabdakarmākarmakāṇām aṇi kartā sa ṇau

प्रकार सञ्ज्ञा

सार गति-, बुद्धि-, भोजन-, शब्द-अर्थक तथा अकर्मक धातुओं में णिच् लगने पर मूल कर्ता ण्यन्त का कर्म कहलाता है।

1.4.53
हृ-क्रोर् अन्यतरस्याम्

IAST hṛkror anyatarasyām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार हृ और कृ धातुओं में भी णिच् पर मूल कर्ता को वैकल्पिक रूप से कर्म-सञ्ज्ञा मिलती है।

1.4.54
स्वतन्त्रः कर्ता

IAST svatantraḥ kartā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्रिया में स्वतन्त्र (स्वाधीन) कारक कर्ता-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.55
तत्-प्रयोजको हेतुश् च

IAST tatprayojako hetuś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उस कर्ता का प्रयोजक कारक हेतु-सञ्ज्ञक होता है, और वह भी कर्ता ही गिना जाता है।

1.4.56
प्राक्=इश्वरात्=निपा तः

IAST prāg īśvarān nipātāḥ

प्रकार अधिकार

सार यहाँ से ईश्वर-सूत्र (1.4.97) तक आने वाले पद निपात-सञ्ज्ञक माने जाते हैं।

1.4.57
च=आदयो=अ-सत्त्वे

IAST cādayo 'sattve

प्रकार सञ्ज्ञा

सार च आदि शब्द द्रव्य/सत्त्व न सूचित करते हुए निपात-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.58
प्र=आदयः

IAST prādayaḥ

प्रकार अधिकार

सार प्र आदि (प्र-गण) निपात हैं और आगे उपसर्ग/गति आदि सञ्ज्ञाओं के विषय बनते हैं।

1.4.59
उपसर्गाः क्रिया-योगे

IAST upasargāḥ kriyāyoge

प्रकार सञ्ज्ञा

सार क्रिया के योग में प्र आदि उपसर्ग-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.60
गतिश् च

IAST gatiś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार वे ही प्र आदि क्रिया-योग में गति-सञ्ज्ञक भी होते हैं।

1.4.61
ऊरी=आदि-च्वि-डाचश् च

IAST ūrīādicviḍācaś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ऊरी आदि, च्वि-प्रत्ययान्त तथा डाच्-प्रत्ययान्त भी गति-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.62
अनुकरणम् च=अन्=इति-परम्

IAST anukaraṇaṃ cān itiparam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार इति-पर न रहने वाला अनुकरण-शब्द भी गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.63
आदर=अन्-आदरयोः सत्-असत्-ई

IAST ādarānādarayoḥ sadasatī

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आदर और अनादर अर्थ में सत् तथा असत् गति-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.64
भूषणे=अलम्

IAST bhūṣaṇe 'lam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार भूषण-अर्थ में अलम् गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.65
अन्तर् अ-परिग्रहे

IAST antar aparigrahe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार परिग्रह (आवरण/ग्रहण) अर्थ न होने पर अन्तर् गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.66
कणे-मनस्-ई श्रद्धा-प्रतीघाते

IAST kaṇemanasī śraddhāpratīghāte

प्रकार सञ्ज्ञा

सार श्रद्धा-प्रतिघात अर्थ में कणे तथा मनसि गति-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.67
पुरस्=अव्ययम्

IAST puro 'vyayam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अव्यय-रूप पुरस् गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.68
अस्तं च

IAST astaṃ ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अस्तम् भी गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.69
अच्छ गति=अर्थ-वदेषु

IAST accha gatyarthavadeṣu

प्रकार सञ्ज्ञा

सार गति-अर्थक तथा तद्वत् धातुओं के साथ अच्छ गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.70
अदः=अन्-उप-देशे

IAST ado 'nupadeśe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उपदेश अर्थ न होने पर अदस् गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.71
तिरः=अन्तर्धौ

IAST tiro 'ntardhau

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अन्तर्धान (आच्छादन/गोपन) अर्थ में तिरस् गति-सञ्ज्ञक होता है।

1.4.72
विभाषा कृञ्-इ

IAST vibhāṣā kṛñi

प्रकार सञ्ज्ञा

सार कृञ् (कृ) के योग में तिरस् की गति-सञ्ज्ञा वैकल्पिक होती है।

1.4.73
उपाजे=अन्वाजे

IAST upāje 'nvāje

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उपाजे और अन्वाजे गति-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.74
साक्षात्-प्रभृतीनि च

IAST sākṣātprabhṛtīni ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार साक्षात्-प्रभृति शब्द भी गति-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.75
अन्-अत्याधाने=उरसि-मनसी

IAST anatyādhāne urasimanasī

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अत्यवधान (ऊपर रखना) अर्थ न होने पर उरसि तथा मनसि गति-सञ्ज्ञक होते हैं।

1.4.76
मध्ये-पदे-निवचने च

IAST madhye-pade-nivacane ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार मध्ये, पदे और निवचने को भी (पूर्ववत्) गति-संज्ञा होती है।

1.4.77
नित्यं हस्ते पाणौ=उपयमने

IAST nityaṃ haste pāṇāv upayamane

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उपयमन (विवाह/पाणिग्रहण) अर्थ में हस्ते और पाणौ को नित्य गति-संज्ञा होती है।

1.4.78
प्राध्वम् बन्धने

IAST prādhvaṃ bandhane

प्रकार सञ्ज्ञा

सार बन्धन अर्थ में प्राध्वम् को गति-संज्ञा होती है।

1.4.79
जीविका-उपनिषदौ=औपम्ये

IAST jīvikā-upaniṣadau aupamye

प्रकार सञ्ज्ञा

सार औपम्य (उपमा) अर्थ में जीविका और उपनिषद् को गति-संज्ञा होती है।

1.4.80
ते प्राग् धातोः

IAST te prāg dhātoḥ

प्रकार विधि

सार वे (गति/उपसर्ग) धातु से पूर्व ही प्रयुक्त होते हैं।

1.4.81
छन्दसि परे=अपि

IAST chandasi pare 'pi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में वे धातु के पश्चात् भी आ सकते हैं।

1.4.82
व्यवहिताश् च

IAST vyavahitāś ca

प्रकार विधि

सार छन्दस् में वे व्यवहित (मध्यवर्ती पदों से वियुक्त) भी प्रयुक्त हो सकते हैं।

1.4.83
कर्म-प्रवचनीयाः

IAST karma-pravacanīyāḥ

प्रकार अधिकार

सार (अग्रिम सूत्रों में निर्दिष्ट निपातों को) कर्मप्रवचनीय-संज्ञा का अधिकार आरम्भ होता है।

1.4.84
अनुर् लक्षणे

IAST anur lakṣaṇe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार लक्षण अर्थ में अनु को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.85
तृतीया=अर्थे

IAST tṛtīyā-arthe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तृतीया-अर्थ (साधन/हेतु) में अनु को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.86
हीने

IAST hīne

प्रकार सञ्ज्ञा

सार हीन (न्यूनता) अर्थ में अनु को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.87
उपः=अधिके च

IAST upaḥ adhike ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अधिक अर्थ में (तथा हीन अर्थ में भी) उप को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.88
अप-परी वर्जने

IAST apa-parī varjane

प्रकार सञ्ज्ञा

सार वर्जन अर्थ में अप और परि को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.89
आङ् मर्यादा-वचने

IAST āṅ maryādā-vacane

प्रकार सञ्ज्ञा

सार मर्यादा-वचन (सीमा/पर्यन्त) अर्थ में आङ् को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.90
लक्षण=इत्थम्-भूत=आख्यान-भाग-वीप्सासु प्रति-परि-अनवः

IAST lakṣaṇa-ittham-bhūta-ākhyāna-bhāga-vīpsāsu prati-pari-anavaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार लक्षण, इत्थंभूत-आख्यान, भाग और वीप्सा अर्थों में प्रति, परि और अनु को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.91
अभिर् अ-भागे

IAST abhir a-bhāge

प्रकार सञ्ज्ञा

सार भाग अर्थ को छोड़कर अभि को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.92
प्रतिः प्रतिनिधि-प्रतिदानयोः

IAST pratiḥ pratinidhi-pratidānayoḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार प्रतिनिधि और प्रतिदान अर्थों में प्रति को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.93
अधि-परी अनर्थकौ

IAST adhi-parī anarthakau

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अनर्थक (निरर्थक/पूरक) अधि और परि को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.94
सुः पूजायाम्

IAST suḥ pūjāyām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार पूजा अर्थ में सु को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.95
अतिर् अतिक्रमणे च

IAST atir atikramaṇe ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अतिक्रमण अर्थ में (तथा पूजा अर्थ में भी) अति को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.96
अपिः पदार्थ-सम्भावन=अन्ववसर्ग-गर्हा-समुच्चयेषु

IAST apiḥ padārtha-sambhāvana-anvavasarga-garhā-samuccayeṣu

प्रकार सञ्ज्ञा

सार पदार्थ-सम्भावना, अन्ववसर्ग, गर्हा और समुच्चय अर्थों में अपि को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.97
अधिर् ईश्वरे

IAST adhir īśvare

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ईश्वर (स्वामित्व) अर्थ में अधि को कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.98
विभाषा कृञ्-इ

IAST vibhāṣā kṛñi

प्रकार सञ्ज्ञा

सार कृञ् (√कृ) के योग में अधि को वैकल्पिक कर्मप्रवचनीय-संज्ञा होती है।

1.4.99
लः परस्मैपदम्

IAST laḥ parasmaipadam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ल् (लकार-सम्बद्ध तिङ्) को परस्मैपद-संज्ञा होती है।

1.4.100
तङ्-आमौ=आत्मनेपदम्

IAST taṅ-ānāv ātmanepadam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तङ् और आन (प्रत्ययों) को आत्मनेपद-संज्ञा होती है।

1.4.101
तिङस् त्रीणि त्रीणि प्रथम-मध्यम=उत्तमाः

IAST tiṅas trīṇi trīṇi prathama-madhyama-uttamāḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तिङ्-प्रत्ययों के तीन-तीन समूह क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तम संज्ञक होते हैं।

1.4.102
तानि=एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि एकशः

IAST tāni ekavacana-dvivacana-bahuvacanāni ekaśaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उन तीनों (प्रत्येक पुरुष-समूह के) एक-एक क्रम से एकवचन, द्विवचन और बहुवचन संज्ञक होते हैं।

1.4.103
सुपः

IAST supaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सुप्-प्रत्ययों में भी (एकवचन-द्विवचन-बहुवचन की) वही संज्ञाएँ लागू होती हैं।

1.4.104
विभक्तिश् च

IAST vibhaktiś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सुप् और तिङ्—दोनों को विभक्ति संज्ञा भी प्राप्त होती है।

1.4.105
युष्मदि=उपपदे समान=धिकरणे स्थानिन्य्=अपि मध्यमः

IAST yuṣmadi upapade samānādhikaraṇe sthāniny api madhyamaḥ

प्रकार विधि

सार समान-अधिकरण युष्मद् उपपद होने पर—भले स्थानि (अनुक्त) हो—क्रिया में मध्यम पुरुष होता है।

1.4.106
प्रहासे च मन्य=उपपदे मन्यतेर् उत्तम एकवत्=च

IAST prahāse ca manya-upapade manyater uttama ekavac ca

प्रकार विधि

सार परिहास में मन्य्-उपपद वाले मन्यतेः प्रयोग में उत्तम पुरुष तथा एकवचन-वत् व्यवहार होता है।

1.4.107
अस्मद्य् उत्तमः

IAST asmad y uttamaḥ

प्रकार विधि

सार अस्मद् के (उपपद/समानाधिकरण) होने पर उत्तम पुरुष होता है।

1.4.108
शेषे प्रथमः

IAST śeṣe prathamaḥ

प्रकार विधि

सार शेष स्थिति में (युष्मद्-अस्मद् न होने पर) प्रथम पुरुष होता है।

1.4.109
परः संनिकर्षः संहिता

IAST paraḥ saṃnikarṣaḥ saṃhitā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार वर्णों का अत्यन्त निकट संपर्क संहिता संज्ञक होता है।

1.4.110
विरामः अवसानम्

IAST virāmaḥ avasānam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार विराम (उच्चारण-विच्छेद/विराम-स्थल) अवसान संज्ञक होता है।

अध्याय 2 · पाद 1 (72 सूत्र)

2.1.1
समर्थः पदविधिः

IAST samarthaḥ padavidhiḥ

प्रकार परिभाषा

सार पद-सम्बन्धी विधियाँ (समास आदि) केवल अर्थ-सम्बद्ध (समर्थ) पदों पर ही लागू होती हैं।

2.1.2
सुप् आमन्त्रिते पर अङ्गवत् स्वरे

IAST subāmāntrite parāṅgavatsvare

प्रकार अतिदेश

सार आमन्त्रित (सम्बोधन) के पूर्ववर्ती सुबन्त को स्वर-कार्य में पर-अङ्गवत् माना जाता है।

2.1.3
प्राक् कडारात् समासः

IAST prāk kaḍārāt samāsaḥ

प्रकार अधिकार

सार कडार (२.२.३८) से पूर्व तक समास का अधिकार चलता है।

2.1.4
सह सुपा

IAST saha supā

प्रकार अधिकार

सार समास सुबन्त पद के साथ (अन्य पद का) संयोग है।

2.1.5
अव्ययीभावः

IAST avyayībhāvaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आगे विहित समास की सञ्ज्ञा अव्ययीभाव है।

2.1.6
अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्धिअर्थ अभाव अत्ययासम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चात् यथा आनुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्य अन्तवचनेषु

IAST avyayaṃ vibhaktisamīpasamṛddhivyṛddhyarthābhāvātyayāsampratiśabdaprādurbhāvapaścādyathānupūrvyayaugapadyasādṛśyasampattisākalyāntavacaneṣu

प्रकार विधि

सार अव्यय विभक्ति, समीप, समृद्धि, व्यृद्धि, अभाव, अत्यय, असम्प्रति, शब्द-प्रादुर्भाव, पश्चात्, यथा, आनुपूर्व्य, यौगपद्य, सादृश्य, सम्पत्ति, साकल्य और अन्त—इन अर्थों में सुबन्त के साथ अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.7
यथा असादृये

IAST yathā'sādṛśye

प्रकार विधि

सार ‘यथा’ असादृश्य (सादृश्य-भिन्न) अर्थ में सुबन्त के साथ अव्ययीभाव करता है।

2.1.8
यावद् अवधारणे

IAST yāvad avadhāraṇe

प्रकार विधि

सार ‘यावत्’ अवधारण (सीमा-निर्धारण) अर्थ में सुबन्त के साथ अव्ययीभाव करता है।

2.1.9
सुप् प्रतिना मात्रा अर्थे

IAST sup pratinā mātrārthe

प्रकार विधि

सार सुबन्त ‘प्रति’ के साथ मात्रार्थ में अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.10
अक्षशलाकासंख्याः परिणा

IAST akṣaśalākāsaṃkhyāḥ pariṇā

प्रकार विधि

सार अक्ष, शलाका और संख्यावाची पद ‘परि’ के साथ अव्ययीभाव बनाते हैं।

2.1.11
विभाषा

IAST vibhāṣā

प्रकार अधिकार

सार आगे के समास वैकल्पिक (विभाषा) हैं।

2.1.12
अपपरिबहिसञ्चवः पञ्चम्या

IAST apaparibahisañcavaḥ pañcamyā

प्रकार विधि

सार अप, परि, बहिस् तथा अञ्चु-अन्त पद पञ्चमी-अन्त के साथ (वैकल्पिक) अव्ययीभाव बनाते हैं।

2.1.13
आङ् मर्यादाअभिविध्योः

IAST āṅ maryādābhividhyoḥ

प्रकार विधि

सार आङ् मर्यादा और अभिविधि अर्थ में पञ्चमी-अन्त के साथ अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.14
लक्षणेन अभिप्रती आभिमुख्ये

IAST lakṣaṇenābhipratī ābhimukhye

प्रकार विधि

सार लक्षणवाची पद के साथ अभि और प्रति आभिमुख्य अर्थ में अव्ययीभाव बनाते हैं।

2.1.15
अनुर्यत्समया

IAST anuryatsamayā

प्रकार विधि

सार अनु समय (काल-समीप) वाची पद के साथ अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.16
यस्य च आयामः

IAST yasya cāyāmaḥ

प्रकार विधि

सार तथा जिसके आयाम (विस्तार) का कथन हो, उस पद के साथ भी अनु अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.17
तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च

IAST tiṣṭhadguprabhṛtīni ca

प्रकार विधि

सार तिष्ठद्गु आदि गणपठित पद भी अव्ययीभाव हैं।

2.1.18
पारे मध्ये षष्ठ्या वा

IAST pāre madhye ṣaṣṭhyā vā

प्रकार विधि

सार पारे और मध्ये षष्ठी-अन्त के साथ वैकल्पिक अव्ययीभाव बनाते हैं।

2.1.19
संख्या वंश्येन

IAST saṃkhyā vaṃśyena

प्रकार विधि

सार संख्यावाची पद वंश्य (वंश-परम्परा वाची) के साथ अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.20
नदीभिश्च

IAST nadībhiś ca

प्रकार विधि

सार संख्यावाची पद नदियों के नामों के साथ भी अव्ययीभाव बनाता है।

2.1.21
अन्यपदार्थे च संज्ञायां

IAST anyapadārthe ca saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में अन्य-पदार्थ (अन्यपदार्थक) होने पर भी अव्ययीभाव होता है।

2.1.22
तत्पुरुषः

IAST tatpuruṣaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आगे विहित समास की सञ्ज्ञा तत्पुरुष है।

2.1.23
द्विगुश्च

IAST dviguś ca

प्रकार सञ्ज्ञा

सार द्विगु भी (तत्पुरुष की कोटि में) गिना जाता है।

2.1.24
द्वितीया श्रित अतीत पतितगत अत्यस्तप्राप्त आपन्नैः

IAST dvitīyā śritātītapati tagatātyastaprāptāpannaiḥ

प्रकार विधि

सार द्वितीया-अन्त श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न के साथ तत्पुरुष बनाता है।

2.1.25
स्वयं क्तेन

IAST svayaṃ ktena

प्रकार विधि

सार ‘स्वयम्’ क्त-प्रत्ययान्त के साथ तत्पुरुष बनाता है।

2.1.26
खट्वा क्षेपे

IAST khaṭvā kṣepe

प्रकार विधि

सार द्वितीयान्त «खट्वा» का (पूर्वानुवृत्त क्त-आदि के साथ) समास होता है जब अर्थ निन्दा/क्षेप हो—जैसे खट्वारूढः।

2.1.27
सामि

IAST sāmi

प्रकार विधि

सार द्वितीयान्त «सामि» का क्त-आदि के साथ समास होता है—जैसे सामिकृतम्।

2.1.28
कालाः

IAST kālāḥ

प्रकार विधि

सार कालवाचक द्वितीयान्त पदों का क्त-आदि के साथ समास होता है—जैसे मासजातः, अहर्जातः।

2.1.29
अत्यन्तसंयोगे च

IAST atyantasaṃyoge ca

प्रकार विधि

सार अत्यन्त-संयोग (क्रिया का काल से निरन्तर सम्बन्ध) अर्थ में भी कालवाचक द्वितीयान्त का क्त-आदि के साथ समास होता है।

2.1.30
तृतीया तत्कृत अर्थेन गुणवचनेन

IAST tṛtīyā tatkṛtārthena guṇavacanena

प्रकार विधि

सार तृतीयान्त का उस गुणवाचक के साथ समास होता है जो उसी (करण/कर्तृ) से उत्पन्न अर्थ को कहे—जैसे शङ्कुलाखण्डः।

2.1.31
पूर्वसदृशसम ऊन अर्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः

IAST pūrvasadṛśasamaunārthakalahanipuṇamiśraślakṣṇaiḥ

प्रकार विधि

सार तृतीयान्त का पूर्व, सदृश, सम, ऊन तथा कलह-निपुण-मिश्र-श्लक्ष्णार्थक पदों के साथ समास होता है—जैसे मातृसदृशः, गुडमिश्रः।

2.1.32
कर्तृकरणे कृता बहुलं

IAST kartṛkaraṇe kṛtā bahulam

प्रकार विधि

सार कर्तृ या करण अर्थ वाले तृतीयान्त का कृदन्त के साथ बहुल (बहुधा, किन्तु अवश्य नहीं) समास होता है—जैसे अहिकृतम्, नखनिर्भिन्नम्।

2.1.33
कृत्यैरधिक आर्थवचने

IAST kṛtyair adhikārthavacane

प्रकार विधि

सार तृतीयान्त का कृत्य-प्रत्ययान्त के साथ समास होता है जब अर्थ «अधिक/अतिरिक्त» कहा जाए—जैसे दधिभोज्यम्।

2.1.34
अन्नेन व्यञ्जनं

IAST annena vyañjanam

प्रकार विधि

सार व्यञ्जनवाचक का अन्नवाचक तृतीयान्त के साथ समास होता है—जैसे दध्योदनः, गुडौदनः।

2.1.35
भक्ष्येण मिश्रीकरणं

IAST bhakṣyeṇa miśrīkaraṇam

प्रकार विधि

सार मिश्रीकरण-अर्थ में भक्ष्यवाचक तृतीयान्त के साथ समास होता है—जैसे गुडधानाः, तिलतण्डुलाः।

2.1.36
चतुर्थी तदर्थ अर्थबलिहितसुखरक्षितैः

IAST caturthī tadarthārthabalihitasukharakṣitaiḥ

प्रकार विधि

सार चतुर्थ्यन्त का तदर्थ, अर्थ, बलि, हित, सुख और रक्षित अर्थ वाले पदों के साथ समास होता है—जैसे यूपदारु, गोहितम्, ब्राह्मणसुखम्।

2.1.37
पञ्चमी भयेन

IAST pañcamī bhayena

प्रकार विधि

सार पञ्चम्यन्त का «भय» के साथ समास होता है—जैसे वृकभयम्, चौरभयम्।

2.1.38
अपेत अपोढमुक्तपतित अपत्रस्तैरल्पशः

IAST apetāpoḍhamuktapatitāpatrasair alpaśaḥ

प्रकार विधि

सार पञ्चम्यन्त का अपेत, अपोढ, मुक्त, पतित, अपत्रस्त के साथ अल्पशः (कभी-कभी) समास होता है—जैसे सुखापेतः, चक्रमुक्तः।

2.1.39
स्तोक अन्तिकदूर अर्थकृच्छ्राणि क्तेन

IAST stokāntikadūrārthakṛcchrāṇi ktena

प्रकार विधि

सार स्तोक, अन्तिक, दूरार्थक तथा कृच्छ्रवाचक पदों का क्त के साथ समास होता है—जैसे स्तोकमुक्तः, दूरोषितः, कृच्छ्रलब्धः।

2.1.40
सप्तमी शौण्डैः

IAST saptamī śauṇḍaiḥ

प्रकार विधि

सार सप्तम्यन्त का शौण्ड-आदि (निपुण/आसक्तार्थक) पदों के साथ समास होता है—जैसे अक्षशौण्डः।

2.1.41
सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च

IAST siddhaśuṣkapakvabandhaiś ca

प्रकार विधि

सार सप्तम्यन्त का सिद्ध, शुष्क, पक्व और बन्ध के साथ भी समास होता है—जैसे घृतसिद्धः, आतपशुष्कः, अग्निपक्वः।

2.1.42
ध्वाङ्क्षेण क्षेपे

IAST dhvāṅkṣeṇa kṣepe

प्रकार विधि

सार सप्तम्यन्त का «ध्वाङ्क्ष» के साथ समास होता है जब अर्थ निन्दा/क्षेप हो—जैसे तीर्थध्वाङ्क्षः।

2.1.43
कृत्यैरृणे

IAST kṛtyair ṛṇe

प्रकार विधि

सार सप्तम्यन्त का कृत्य-प्रत्ययान्त के साथ समास होता है जब अर्थ ऋण/देय हो—जैसे मासदेयम्।

2.1.44
संज्ञायां

IAST saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नाम/रूढ़ नामकरण) में भी पूर्वोक्त सप्तमी-समास प्रवृत्त होता है।

2.1.45
क्तेन अहोरात्र अवयवाः

IAST ktenāhorātrāvayavāḥ

प्रकार विधि

सार अहोरात्र के अवयववाचक (पूर्वाह्ण-आदि) पदों का क्त के साथ समास होता है—जैसे पूर्वाह्णकृतम्।

2.1.46
तत्र

IAST tatra

प्रकार विधि

सार «तत्र» अर्थ में वर्तमान सप्तम्यन्त का क्त के साथ समास होता है।

2.1.47
क्षेपे

IAST kṣepe

प्रकार विधि

सार पूर्वोक्त (तत्रार्थक सप्तमी-क्त) समास निन्दा/क्षेप अर्थ में भी होता है।

2.1.48
पात्रेसमित आदयः च

IAST pātresamitādayaś ca

प्रकार विधि

सार पात्रेसमित-आदि गणपठित पद भी (सप्तमी-समास की रीति से) समास-रूप में सिद्ध होते हैं।

2.1.49
पूर्वकाल एकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समान धिकरणेन

IAST pūrvakālaikasarvajaratpurāṇanavakevalāḥ samānādhikaraṇena

प्रकार विधि

सार पूर्वकाल, एक, सर्व, जरत्, पुराण, नव, केवल का समानाधिकरण (समान विभक्ति वाले) पद के साथ समास होता है—जैसे जरद्गवः, नववस्त्रम्, केवलज्ञानम्।

2.1.50
दिक्संख्ये संज्ञायां

IAST diksaṃkhye saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार दिक्- और संख्या-वाचक का समानाधिकरण पद के साथ समास होता है जब फल संज्ञा हो—जैसे उत्तराकुरु, सप्तर्षयः।

2.1.51
तद्धित अर्थौत्तरपदसमाहारे च

IAST taddhitārthottarapadasamāhāre ca

प्रकार विधि

सार दिशा- और संख्या-वाचक शब्दों का समास तद्धितार्थ में, उत्तरपद-युक्त प्रयोग में तथा समाहार्थ में भी होता है।

2.1.52
संख्यापूर्वो द्विगुः

IAST saṅkhyāpūrvo dviguḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार संख्यापूर्वपद वाला समास द्विगु संज्ञा पाता है।

2.1.53
कुत्सितानै कुत्सनैः

IAST kutsitāni kutsanaiḥ

प्रकार विधि

सार कुत्सित अर्थवाले शब्द कुत्सा-वाचक शब्दों के साथ समानाधिकरण समास करते हैं।

2.1.54
पाप अणके कुत्सितैः

IAST pāpāṇake kutsitaiḥ

प्रकार विधि

सार पाप तथा अणक शब्द कुत्सित अर्थवाले शब्दों के साथ समास करते हैं।

2.1.55
उपमानानि सामानयवचनैः

IAST upamānāni sāmānyavacanaiḥ

प्रकार विधि

सार उपमानवाची शब्द सामान्य-गुण-वाचक शब्दों के साथ समास करते हैं।

2.1.56
उपमितं व्याघ्र आबिभिः सामान्य अप्रयोगे

IAST upamitaṃ vyāghrādibhiḥ sāmānyāprayoge

प्रकार विधि

सार सामान्यगुण के अप्रयोग में उपमित पदार्थ व्याघ्रादि शब्दों के साथ समास करता है।

2.1.57
विशेषणं विशेष्येण बहुलम्

IAST viśeṣaṇaṃ viśeṣyeṇa bahulam

प्रकार विधि

सार विशेषण शब्द विशेष्य के साथ बहुल (प्रायः/विविध रीति से) समास करता है।

2.1.58
पूर्व अपरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीराश्च

IAST pūrvāparaprathamacaramajaghanyasamānamadhyamadhyamavīrāś ca

प्रकार विधि

सार पूर्व, अपर, प्रथम, चरम, जघन्य, समान, मध्य, मध्यम तथा वीर भी (विशेषणवत्) समास करते हैं।

2.1.59
श्रेणि आदयः कृत आदिभिः

IAST śreṇyādayaḥ kṛtādibhiḥ

प्रकार विधि

सार श्रेण्यादि गण के शब्द कृतादि शब्दों के साथ समास करते हैं।

2.1.60
क्तेन नञ्विशिष्टेन अनञ्

IAST ktena nañviśiṣṭenānañ

प्रकार विधि

सार नञ्-रहित शब्द नञ् से विशिष्ट क्त-प्रत्ययान्त के साथ समास करता है।

2.1.61
सत्महत्परम उत्तम उत्क्र्ष्ट् आः पूज्यमनैः

IAST sanmahatparamottamotkṛṣṭāḥ pūjyamānaiḥ

प्रकार विधि

सार सत्, महत्, परम, उत्तम तथा उत्कृष्ट शब्द पूज्यमान अर्थवाले शब्दों के साथ समास करते हैं।

2.1.62
वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानं

IAST vṛndārakanāgakuñjaraiḥ pūjyamānam

प्रकार विधि

सार पूज्यमान पदार्थ वृन्दारक, नाग तथा कुञ्जर शब्दों के साथ समास करता है।

2.1.63
कतरकतमौ जातिपरिप्रश्ने

IAST katarakatamau jātiparipraśne

प्रकार विधि

सार जाति-विषयक प्रश्न में कतर तथा कतम (विशेष्य के साथ) समास करते हैं।

2.1.64
किं क्षेपे

IAST kiṃ kṣepe

प्रकार विधि

सार क्षेप (तिरस्कार/निन्दा) अर्थ में किम् शब्द समास करता है।

2.1.65
पोटायुवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशावेहत्बष्कयणीप्रवक्तृश्रोत्रिय अध्यापकधूर्तैर्जातिः

IAST poṭāyuvatistokakatipayagṛṣṭidhenuvaśāvehadbaṣkayaṇīpravaktṛśrotriyādhyāpakadhūrtair jātiḥ

प्रकार विधि

सार जातिवाची शब्द पोटा, युवति, स्तोक, कतिपय, गृष्टि, धेनु, वशा, वेहत्, बष्कयणी, प्रवक्तृ, श्रोत्रिय, अध्यापक तथा धूर्त के साथ समास करता है।

2.1.66
प्रशंसावचनैश्च

IAST praśaṃsāvacanaiś ca

प्रकार विधि

सार जातिवाची शब्द प्रशंसा-वाचक शब्दों के साथ भी समास करता है।

2.1.67
युवा खलतिपलितवलिनजरतीभिः

IAST yuvā khalatipalitavalinajaratībhiḥ

प्रकार विधि

सार युवन् शब्द खलति, पलित, वलिन् तथा जरती के साथ समास करता है।

2.1.68
कृत्यतुल्य आख्या अजात्या

IAST kṛtyatulyākhyā ajātyā

प्रकार विधि

सार कृत्य-प्रत्ययान्त तथा तुल्यार्थवाची शब्द अजातिवाची शब्दों के साथ समास करते हैं।

2.1.69
वर्णो वर्णेन

IAST varṇo varṇena

प्रकार विधि

सार वर्णवाची शब्द वर्णवाची शब्द के साथ समास करता है।

2.1.70
कुमारः श्रमणा आदिभिः

IAST kumāraḥ śramaṇādibhiḥ

प्रकार विधि

सार कुमार शब्द श्रमणादि गण के शब्दों के साथ समास करता है।

2.1.71
चतुष्पादो गर्भिण्या

IAST catuṣpādo garbhiṇyā

प्रकार विधि

सार चतुष्पाद-वाचक शब्द गर्भिणी के साथ समास करता है।

2.1.72
मयूरव्यंसक आदयश्च

IAST mayūravyaṃsakādayaś ca

प्रकार विधि

सार मयूरव्यंसकादि गण के शब्द भी समास करते हैं।

अध्याय 2 · पाद 2 (38 सूत्र)

2.2.1
पूर्व अपर अध् अर उत्तरं एकदेशिना क धिकरणे

IAST pūrvaparādharottaramekadeśinaikādhikaraṇe

प्रकार विधि

सार पूर्व, पर, अधर और उत्तर एकाधिकरण में एकदेशि-वाचक के साथ तत्पुरुष-समास करते हैं।

2.2.2
अर्धं नपुंसकम्

IAST ardhaṃ napuṃsakam

प्रकार विधि

सार अर्ध नपुंसक रूप में (अर्ध-भाग के अर्थ में) तत्पुरुष-समास करता है।

2.2.3
द्वितीयतृतीयचतुर्थतुर्याणि अन्यतरस्यां

IAST dvitīyatṛtīyacaturthaturyāṇy anyatarasyām

प्रकार विधि

सार द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ और तुर्य वैकल्पिक रूप से (एकदेशि-समास की रीति से) समास करते हैं।

2.2.4
प्राप्त आपन्ने च द्वितीयया

IAST prāptāpanne ca dvitīyayā

प्रकार विधि

सार प्राप्त और आपन्न द्वितीया-अन्त पद के साथ भी तत्पुरुष-समास करते हैं।

2.2.5
कालाः पर्तिमाणिना

IAST kālāḥ parimāṇinā

प्रकार विधि

सार काल-वाचक शब्द परिमाण-वाचक के साथ तत्पुरुष-समास करते हैं।

2.2.6
नञ्

IAST nañ

प्रकार विधि

सार नञ् (निषेध-अव्यय) उत्तरपद के साथ तत्पुरुष-समास करता है।

2.2.7
ईषत् अकृता

IAST īṣadakṛtā

प्रकार विधि

सार ईषत् अकृत (कृत्-भिन्न) पद के साथ तत्पुरुष-समास करता है।

2.2.8
षष्ठी

IAST ṣaṣṭhī

प्रकार विधि

सार षष्ठ्यन्त पद (सामान्यतः) उत्तरपद के साथ तत्पुरुष-समास करता है।

2.2.9
याजक आदिभिश्च

IAST yājakādibhiś ca

प्रकार विधि

सार याजकादि-गण के शब्दों के साथ भी षष्ठ्यन्त का तत्पुरुष-समास होता है।

2.2.10
न निर्धारणे

IAST na nirdhāraṇe

प्रकार विधि

सार निर्धारण-अर्थ वाली षष्ठी का तत्पुरुष-समास नहीं होता।

2.2.11
पूरणगुणसुहित अर्थ सत् अव्ययतव्यसमान धिकरणेन

IAST pūraṇaguṇasuhitārthasadavyayatavyasamānādhikaraṇena

प्रकार विधि

सार पूरण, गुण, सुहितार्थ, सत्, अव्यय, तव्य और समानाधिकरण-वाचक के साथ षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता।

2.2.12
क्तेन च पूजायां

IAST ktena ca pūjāyām

प्रकार विधि

सार पूजा-अर्थ में क्त-प्रत्ययान्त के साथ भी षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता।

2.2.13
अधिकरणवाचिना च

IAST adhikaraṇavācinā ca

प्रकार विधि

सार अधिकरण-वाचक के साथ भी षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता।

2.2.14
कर्मणि च

IAST karmaṇi ca

प्रकार विधि

सार कर्म-अर्थ वाली षष्ठी का भी (उक्त निषेध-क्षेत्र में) समास नहीं होता।

2.2.15
तृच् अकाभ्यां कर्तरि

IAST tṛjakābhyāṃ kartari

प्रकार विधि

सार कर्तृ-अर्थ में तृच् और अक के साथ षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता।

2.2.16
कर्तरि च

IAST kartari ca

प्रकार विधि

सार कर्तृ-अर्थ वाली षष्ठी का भी (समास-निषेध) लागू होता है।

2.2.17
नित्यं क्रीडाजीविकयोः

IAST nityaṃ krīḍājīvikayoḥ

प्रकार नियम

सार क्रीडा और जीविका के अर्थ में षष्ठ्यन्त का समास नित्य होता है।

2.2.18
कुगतिप्र आदयः

IAST kugatiprādayaḥ

प्रकार विधि

सार कु, गति और प्रादि-वर्ग के शब्द (नित्य) समास करते हैं।

2.2.19
उपपदं अतिङ्

IAST upapadam atiṅ

प्रकार विधि

सार उपपद अतिङ् (तिङ्-भिन्न) पद के साथ समास करता है।

2.2.20
अमा एव अव्ययेन

IAST amaivāvyayena

प्रकार नियम

सार अम्-रूप उपपद ही अव्यय के साथ समास करता है।

2.2.21
तृतीयाप्रभृतीनि अन्यतरस्यां

IAST tṛtīyaprabhṛtīny anyatarasyām

प्रकार विधि

सार तृतीया-प्रभृति विभक्त्यन्त उपपद वैकल्पिक रूप से समास करते हैं।

2.2.22
क्त्वा च

IAST ktvā ca

प्रकार विधि

सार क्त्वा-प्रत्ययान्त के साथ भी (उपपद) वैकल्पिक समास करता है।

2.2.23
शेषो बहुव्रीहिः

IAST śeṣo bahuvrīhiḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार शेष (अन्य समास-प्रकार से अवशिष्ट) समास को बहुव्रीहि कहा जाता है।

2.2.24
अनेकं अन्यपद अर्थे

IAST anekam anyapadārthe

प्रकार विधि

सार अनेक पद अन्य-पद के अर्थ में (बहुव्रीहि) समास करते हैं।

2.2.25
संख्यया अव्यय असन्न अदूर अधिकसंख्याः संख्येये

IAST saṃkhyayāvyayāsannādūrādhikasaṃkhyāḥ saṃkhyeye

प्रकार विधि

सार संख्या के साथ अव्यय तथा आसन्न, अदूर और अधिक-संख्या वाले शब्द संख्येय के साथ बहुव्रीहि-समास करते हैं।

2.2.26
दिङ्नामान्य् अन्तराले

IAST diṅnāmāny antarāle

प्रकार विधि

सार दिशावाची नामों का बहुव्रीहि समास होता है जब वे दो दिशाओं के अन्तराल (कोण-दिशा) का बोध कराएँ।

2.2.27
तत्र तेन इदं इति सरूपे

IAST tatra tena idam iti sarūpe

प्रकार विधि

सार समान रूप वाले दो पदों का बहुव्रीहि समास होता है जब अर्थ ‘तत्र इदम्’ अथवा ‘तेन इदम्’ हो।

2.2.28
तेन सह इति तुल्ययोगे

IAST tena saha iti tulyayoge

प्रकार विधि

सार तुल्ययोग (समान सह-संबन्ध) में तृतीयाान्त पद का ‘सह’ के साथ समास होता है (जैसे सपुत्रः)।

2.2.29
च अर्थे द्वंद्वः

IAST ca arthe dvandvaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ‘च’ के अर्थ में होने वाले समास की संज्ञा द्वन्द्व है।

2.2.30
उपसर्जनं पूर्वम्

IAST upasarjanaṃ pūrvam

प्रकार नियम

सार समास में उपसर्जन (गौण/निर्दिष्ट) पद पहले रखा जाता है।

2.2.31
राजदन्त आदिषु परं

IAST rājadanta ādiṣu param

प्रकार नियम

सार राजदन्त आदि गण में उपसर्जन का क्रम उल्टा होता है—वह पर (बाद में) रहता है।

2.2.32
द्वंद्वे घि

IAST dvandve ghi

प्रकार नियम

सार द्वन्द्व में घि-संज्ञक पद पहले आता है।

2.2.33
अच् अदि अत् अन्तं

IAST ac ādi at antaṃ

प्रकार नियम

सार द्वन्द्व में अच् से आरम्भ और ह्रस्व अकारान्त पद अन्त में रखा जाता है।

2.2.34
अल्प अच्तरं

IAST alpa actaraṃ

प्रकार नियम

सार द्वन्द्व में अच् (स्वर) की संख्या में अल्पतर पद पहले आता है।

2.2.35
सप्तमीविशेषणे बह्व्रीहौ

IAST saptamīviśeṣaṇe bahvrīhau

प्रकार नियम

सार बहुव्रीहि में सप्तम्यन्त विशेषण पद पहले रखा जाता है।

2.2.36
निष्ठा

IAST niṣṭhā

प्रकार नियम

सार बहुव्रीहि में निष्ठा (क्त/क्तवतु) रूप पहले आता है।

2.2.37
वा आहित अग्नि आदिषु

IAST vā āhita agni ādiṣu

प्रकार नियम

सार आहिताग्नि आदि में निष्ठा-पूर्वत्व वैकल्पिक है (क्रम स्वेच्छा से)।

2.2.38
कडाराः कर्मधराये

IAST kaḍārāḥ karmadharāye

प्रकार नियम

सार कर्मधारय में कडार आदि गण के पद (वैकल्पिक रूप से) पहले रखे जा सकते हैं।

अध्याय 2 · पाद 3 (73 सूत्र)

2.3.1
अनभिहिते

IAST anabhihite

प्रकार अधिकार

सार जब कारक-वृत्ति क्रिया-पद/कृत्-तद्धित आदि से पहले से अभिहित न हो, तभी आगे की विभक्ति-विधियाँ लागू होती हैं।

2.3.2
कर्मणि द्वितीया

IAST karmaṇi dvitīyā

प्रकार विधि

सार अनभिहित कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।

2.3.3
तृतीया च होः छन्दसि

IAST tṛtīyā ca hoś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में हु-धातु के कर्म में द्वितीया के साथ तृतीया भी विकल्पतः/समानरूप से होती है।

2.3.4
अन्तरा अन्तरेण युक्ते

IAST antarā'ntareṇa yukte

प्रकार विधि

सार अन्तरा और अन्तरेण से युक्त पद में द्वितीया होती है।

2.3.5
काल अध्वनोरत्यन्तसंयोगे

IAST kālādhvanor atyantasaṃyoge

प्रकार विधि

सार काल और अध्वन् के अत्यन्त-संयोग (निरन्तर व्याप्ति) में द्वितीया होती है।

2.3.6
अपवर्गे तृतीया

IAST apavarge tṛtīyā

प्रकार विधि

सार उसी अत्यन्त-संयोग के अपवर्ग (अवधि/समाप्ति) में तृतीया होती है।

2.3.7
सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये

IAST saptamīpañcamyau kārakamadhye

प्रकार विधि

सार दो कारकों के मध्यवर्ती स्थान/सीमा-बोध में सप्तमी और पञ्चमी होती हैं।

2.3.8
कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया

IAST karmapravacanīyayukte dvitīyā

प्रकार विधि

सार कर्मप्रवचनीय से युक्त पद में द्वितीया होती है।

2.3.9
यस्माद् अधिकं यस्य च ईश्वरवचनम् तत्र सप्तमी

IAST yasmād adhikaṃ yasya ceśvaravacanaṃ tatra saptamī

प्रकार विधि

सार जिससे अधिकता कही जाए और जिसका ईश्वर/स्वामित्व कहा जाए, वहाँ सप्तमी होती है।

2.3.10
पञ्चमी अपआङ्परिभिः

IAST pañcamy apāṅparibhiḥ

प्रकार विधि

सार अप, आङ् और परि से युक्त पद में पञ्चमी होती है।

2.3.11
प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात्

IAST pratinidhipratidāne ca yasmāt

प्रकार विधि

सार प्रतिनिधि और प्रतिदान के बोध में भी जिससे वह होता है, उसमें पञ्चमी होती है।

2.3.12
गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ चेष्टायां अनध्वनि

IAST gatyarthakarmaṇi dvitīyācaturthyau ceṣṭāyām anadhvani

प्रकार विधि

सार गत्यर्थ-धातु के कर्म में, चेष्टा होने पर और अध्वन् न होने पर, द्वितीया तथा चतुर्थी होती हैं।

2.3.13
चतुर्थी सम्प्रदाने

IAST caturthī sampradāne

प्रकार विधि

सार सम्प्रदान-कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।

2.3.14
क्रिया अर्था उपपदस्य च कर्मणि स्तानिनः

IAST kriyārthopapadasya ca karmaṇi sthāninaḥ

प्रकार विधि

सार क्रिया-अर्थ वाले उपपद के साथ, स्थानि (अनुक्त) क्रिया के कर्म में चतुर्थी होती है।

2.3.15
तुमर्थात् च भाववचनात्

IAST tumarthāc ca bhāvavacanāt

प्रकार विधि

सार तुमुन-अर्थ वाले भाववाचक पद से भी (उसी कर्म में) चतुर्थी होती है।

2.3.16
नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधा अलम् व सट् ओगात् च

IAST namaḥsvastisvāhāsvadhālaṃvaṣaḍyogāc ca

प्रकार विधि

सार नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् के योग में भी चतुर्थी होती है।

2.3.17
मन्यकर्मणि अणादरे विभाषा अप्राणिषु

IAST manyakarmaṇy anādare vibhāṣā'prāṇiṣu

प्रकार विधि

सार मन्-धातु के कर्म में, अनादर-बोध में और प्राणिभिन्न होने पर, चतुर्थी विभाषा से होती है।

2.3.18
कर्तृ' करणयोः तृतीया

IAST kartṛkaraṇayos tṛtīyā

प्रकार विधि

सार अनभिहित कर्ता और करण में तृतीया विभक्ति होती है।

2.3.19
सहयुक्ते अप्रधाने

IAST sahayukte'pradhāne

प्रकार विधि

सार सह-युक्त अप्रधान पद में तृतीया होती है।

2.3.20
येन अङ्गविकारः

IAST yenāṅgavikāraḥ

प्रकार विधि

सार जिससे अङ्ग-विकार सूचित हो, उसमें तृतीया होती है।

2.3.21
इत्थम्भूतलक्षणे

IAST itthaṃbhūtalakṣaṇe

प्रकार विधि

सार इत्थम्भूत (ऐसे-अवस्था-प्राप्त) के लक्षण-बोधक में तृतीया होती है।

2.3.22
संज्ञः अन्यतरस्यां कर्मणि

IAST saṃjño'nyatarasyāṃ karmaṇi

प्रकार विधि

सार संज्ञा (जानना)-अर्थ के कर्म में अन्यतरस्याम् तृतीया होती है।

2.3.23
हेतौ

IAST hetau

प्रकार विधि

सार हेतु (कारण) में तृतीया होती है।

2.3.24
अकर्तरि ऋणे पञ्चमी

IAST akartary ṛṇe pañcamī

प्रकार विधि

सार ऋण-हेतु में, जब वह कर्ता न हो, पञ्चमी होती है।

2.3.25
विभाषा गुणे अस्त्रियां

IAST vibhāṣā guṇe'striyām

प्रकार विधि

सार स्त्रीलिङ्ग-भिन्न गुण-हेतु में पञ्चमी विभाषा से होती है।

2.3.26
षष्ठी हेतुप्रयोगे

IAST ṣaṣṭhī hetuprayoge

प्रकार विधि

सार हेतु-शब्द के प्रयोग में हेतुवाची पद पर षष्ठी विभक्ति होती है।

2.3.27
सर्वनाम्नः तृतीया च

IAST sarvanāmnas tṛtīyā ca

प्रकार विधि

सार हेतु-प्रयोग में सर्वनाम से षष्ठी के साथ तृतीया भी होती है।

2.3.28
अपादाने पञ्चमी

IAST apādāne pañcamī

प्रकार विधि

सार अपादान कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है।

2.3.29
अन्य आरत् इतर ऋतेदिक्षब्द अञ्चु उत्तरपद आच् आहियुक्ते

IAST anyārāditarartedikśabdāñcūttarapadājāhiyukte

प्रकार विधि

सार अन्य, आरात्, इतर, ऋते, दिक्-वाचक शब्दों, अञ्चु-उत्तरपद वाले शब्दों, आच् तथा आहि से युक्त पदों के साथ पञ्चमी होती है।

2.3.30
षष्ठी अतसर्थप्रत्ययेन

IAST ṣaṣṭhy atasarthapratyayena

प्रकार विधि

सार अतस्-अर्थ वाले प्रत्यय (जैसे तस्) से युक्त पद के साथ षष्ठी होती है।

2.3.31
एनपा द्वितीया

IAST enapā dvitīyā

प्रकार विधि

सार एनप्-प्रत्ययान्त पद के साथ द्वितीया विभक्ति होती है।

2.3.32
पृथक्विनानानाभिः तृतीया न्यतरस्यां

IAST pṛthakvinānānābhis tṛtīyānyatarasyām

प्रकार विधि

सार पृथक्, विना और नाना के साथ विकल्‍प से तृतीया होती है।

2.3.33
करणे च स्तोक अल्पकृच्छ्रातिपयस्य असत्त्ववचनस्य

IAST karaṇe ca stokālpakṛcchrātipayasyāsattvavacanasya

प्रकार विधि

सार स्तोक, अल्प, कृच्छ्र तथा अतिपय — जब वे द्रव्य न कहकर मात्रा/प्रयास मात्र कहें — करण अर्थ में तृतीया भी होती है।

2.3.34
दूर अन्तिक अर्थैः षष्ठी न्यतरस्यां

IAST dūrāntikārthaiḥ ṣaṣṭhy anyatarasyām

प्रकार विधि

सार दूर और अन्तिक अर्थ वाले शब्दों के साथ विकल्‍प से षष्ठी होती है।

2.3.35
दूर अन्तिक अर्थेभ्यो द्वितीया च

IAST dūrāntikārthebhyo dvitīyā ca

प्रकार विधि

सार दूर-अन्तिक अर्थ वाले शब्दों से द्वितीया भी होती है।

2.3.36
सप्तमी अधिकरणे

IAST saptamy adhikaraṇe

प्रकार विधि

सार अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है।

2.3.37
यस्य च भावेन भावलक्षणं

IAST yasya ca bhāvena bhāvalakṣaṇam

प्रकार विधि

सार जिसकी क्रिया से अन्य क्रिया का लक्षण/समय सूचित हो, उस पर सप्तमी होती है।

2.3.38
षष्ठी च अणादरे

IAST ṣaṣṭhī cānādare

प्रकार विधि

सार अनादर (उपेक्षा) अर्थ में उसी स्थिति में षष्ठी भी होती है।

2.3.39
स्वामि(न्)ईश्वर अधिपतिदायादसाक्षि(न्)प्रतिभूप्रसुतैश्च

IAST svāmīśvarādhipatidāyādasākṣipratibhūprasūtaiś ca

प्रकार विधि

सार स्वामिन्, ईश्वर, अधिपति, दायाद, साक्षिन्, प्रतिभू और प्रसूत शब्दों के साथ षष्ठी होती है।

2.3.40
आयुक्तकुशलाभ्यां च आसेवायाम्

IAST āyuktakuśalābhyāṃ cāsevāyām

प्रकार विधि

सार आसेवा (निरन्तर अभ्यास/लगन) अर्थ में आयुक्त और कुशल के साथ षष्ठी होती है।

2.3.41
यतः च निर्धारणं

IAST yataś ca nirdhāraṇam

प्रकार विधि

सार जहाँ से समूह में से निर्धारण (विशेष का चयन) किया जाए, उस पर पञ्चमी होती है।

2.3.42
पञ्चमी विभक्ते

IAST pañcamī vibhakte

प्रकार विधि

सार विभाग/विभक्त (पृथक्करण) अर्थ में पञ्चमी होती है।

2.3.43
साधुनिपुणाभ्यां अर्चायां सप्तमी अप्रतेः

IAST sādhunipuṇābhyām arcāyāṃ saptamy aprateḥ

प्रकार विधि

सार अर्चा (आदर/प्रशंसा) अर्थ में साधु और निपुण के साथ — प्रति-पूर्व न होने पर — सप्तमी होती है।

2.3.44
प्रसित उत्सुकाभ्यां तृतीया च

IAST prasitotsukābhyāṃ tṛtīyā ca

प्रकार विधि

सार प्रसित और उत्सुक के साथ तृतीया भी होती है।

2.3.45
नक्षत्रे च लुपि

IAST nakṣatre ca lupi

प्रकार विधि

सार नक्षत्र-नाम पर लुप् होने पर भी (पूर्वोक्त सप्तमी-तृतीयादि) विभक्तियाँ लागू होती हैं।

2.3.46
प्रातिपदिक अर्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा

IAST prātipadikārthaliṅgaparimāṇavacanamātre prathamā

प्रकार विधि

सार केवल प्रातिपदिकार्थ, लिङ्ग, परिमाण या वचन सूचित करने पर प्रथमा होती है।

2.3.47
सम्बोधने च

IAST sambodhane ca

प्रकार विधि

सार सम्बोधन में भी प्रथमा होती है।

2.3.48
सा आमन्त्रितं

IAST sāmantritam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सम्बोधन की वह प्रथमा आमन्त्रित कहलाती है।

2.3.49
एकवचनं संबुद्धिः

IAST ekavacanaṃ sambuddhiḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार आमन्त्रित का एकवचन संबुद्धि कहलाता है।

2.3.50
षष्ठी शेषे

IAST ṣaṣṭhī śeṣe

प्रकार विधि

सार शेष सम्बन्ध में — जहाँ अन्य कारक-विभक्ति नियम लागू न हों — षष्ठी होती है।

2.3.51
ज्नः अविदर्थस्य करणे

IAST jño 'vidarthasya karaṇe

प्रकार विधि

सार ज्ञा-धातु के अविद्-अर्थ (ज्ञा-भिन्न अर्थ) में करण को षष्ठी विभक्ति होती है।

2.3.52
अधि इक् अर्थदय ईशां कर्मणि

IAST adhīgarthadayeśāṃ karmaṇi

प्रकार विधि

सार अध्ययन/स्मरण (अधी), दया तथा ईश्वरत्व/स्वामित्व (ईश्) अर्थ वाले धातुओं के कर्म को षष्ठी होती है।

2.3.53
कृञः प्रतियत्ने

IAST kṛñaḥ pratiyatne

प्रकार विधि

सार कृञ्-धातु के प्रतियत्न (देखभाल/सावधानी) अर्थ में कर्म को षष्ठी होती है।

2.3.54
रुजा अर्थानां भाववचनानाम् अज्वरेः

IAST rujārthānāṃ bhāvavacanānām ajvareḥ

प्रकार विधि

सार रुजा-अर्थक भाववाची शब्दों में (ज्वर-भिन्न) सम्बन्धी को षष्ठी होती है।

2.3.55
आशिषि नाथः

IAST āśiṣi nāthaḥ

प्रकार विधि

सार आशीर्वाद/याचना अर्थ में नाथ्-धातु के कर्म को षष्ठी होती है।

2.3.56
जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायां

IAST jāsiniprahaṇanāṭakrāthapiṣāṃ hiṃsāyām

प्रकार विधि

सार जास्, नि-प्रहण, नाट्, क्राथ् तथा पिष् धातुओं के हिंसा अर्थ में कर्म को षष्ठी होती है।

2.3.57
व्यवहृपणोः समर्थयोः

IAST vyavahṛpaṇoḥ samarthayoḥ

प्रकार विधि

सार व्यवहृ तथा पण् धातुओं के पारस्परिक व्यवहार/लेन-देन (समर्थ) अर्थ में षष्ठी होती है।

2.3.58
दिवः तदर्थस्य

IAST divas tadarthasya

प्रकार विधि

सार दिव्-धातु के द्यूत/क्रीड़ा अर्थ में (पण/दाँव-विषयक) षष्ठी होती है।

2.3.59
विभाषा उपसर्गे

IAST vibhāṣopasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्गयुक्त दिव् में पूर्वोक्त षष्ठी वैकल्पिक है।

2.3.60
द्वितीया ब्राह्मणे

IAST dvitīyā brāhmaṇe

प्रकार विधि

सार ब्राह्मण-ग्रन्थों में (दिव्-सम्बन्धी उस स्थल पर) द्वितीया विभक्ति होती है।

2.3.61
प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासम्प्रदाने

IAST preṣyabruvor haviṣo devatāsampradāne

प्रकार विधि

सार प्रेष्य तथा ब्रू के योग में देवता-सम्प्रदान अर्थ वाले हविष् को द्वितीया होती है।

2.3.62
चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि

IAST caturthyarthe bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में चतुर्थ्यर्थ में बहुलं (अनेकधा/प्रायः) द्वितीया होती है।

2.3.63
यजेश्च करणे

IAST yajeś ca karaṇe

प्रकार विधि

सार यज्-धातु के करण को भी (छान्दस प्रयोग में) द्वितीया होती है।

2.3.64
कृत्वसर्थप्रयोगे काले अधिकरणे

IAST kṛtvo'rthaprayoge kāle 'dhikaraṇe

प्रकार विधि

सार कृत्वस्-अर्थक शब्दों के प्रयोग में काल-वाचक को अधिकरण (सप्तमी) होती है।

2.3.65
कर्तृकर्मणोः कृति

IAST kartṛkarmaṇoḥ kṛti

प्रकार विधि

सार कृत्-प्रत्ययान्त शब्दों के योग में कर्ता तथा कर्म को षष्ठी होती है।

2.3.66
उभयप्राप्तौ कर्मणि

IAST ubhayaprāptau karmaṇi

प्रकार नियम

सार कर्ता और कर्म दोनों को षष्ठी प्राप्त होने पर केवल कर्म में षष्ठी होती है।

2.3.67
क्तस्य च वर्तमाने

IAST ktasya ca vartamāne

प्रकार विधि

सार वर्तमान अर्थ में प्रयुक्त क्त-प्रत्यय के योग में भी (कर्ता/कर्म को) षष्ठी होती है।

2.3.68
अधिकरनवाचिनश्च

IAST adhikaraṇavācinaś ca

प्रकार विधि

सार अधिकरण-वाचक कृत्-प्रत्ययों के योग में भी (कर्ता/कर्म को) षष्ठी होती है।

2.3.69
न ल उ उकाव्ययनिष्ठाखल्र्थतृनां

IAST na lukāvyayaniṣṭhākhalarthatṛṇām

प्रकार नियम

सार लुक्-युक्त, अव्यय, निष्ठा, खल्-अर्थक तथा तृन्-प्रत्ययान्त कृतों के योग में षष्ठी नहीं होती।

2.3.70
अक इनोर्भविष्यद् आधमर्ण्ययोः

IAST akenor bhaviṣyadādhamarṇyayoḥ

प्रकार विधि

सार अक तथा इन् प्रत्ययों के भविष्यत् तथा आधमर्ण्य (ऋण-सम्बन्धी) अर्थ में षष्ठी होती है।

2.3.71
कृत्यानां कर्तरि वा

IAST kṛtyānāṃ kartari vā

प्रकार विधि

सार कृत्य-प्रत्ययान्त शब्दों के कर्ता में वैकल्पिक रूप से षष्ठी होती है।

2.3.72
तुल्य अर्थैरतुला उपमाभ्यां तृतीया अन्यतरस्यां

IAST tulyārthair atulopamābhyāṃ tṛtīyānyatarasyām

प्रकार विधि

सार तुल्य-अर्थक तथा अतुल और उपमा के योग में (उपमान में) अन्यतरस्यां तृतीया होती है।

2.3.73
चतुर्थी च आशिषि आयुष्यमद्रभद्रकुशलसुख अर्थहितैः

IAST caturthī cāśiṣy āyuṣyamadrabhadrakuśalasukhārthahitaiḥ

प्रकार विधि

सार आशीर्वाद में आयुष्य, मद्र, भद्र, कुशल, सुख, अर्थ तथा हित शब्दों के योग में चतुर्थी भी होती है।

अध्याय 2 · पाद 4 (85 सूत्र)

2.4.1
द्विगुरेकवचनं

IAST dvigur ekavacanam

प्रकार विधि

सार द्विगु-समास सदैव एकवचनान्त होता है।

2.4.2
द्वंद्वश्च प्राणि(न्)तूर्यसेना ङ्गानां

IAST dvandvaś ca prāṇitūryasenāṅgānām

प्रकार विधि

सार प्राणि-, तूर्य- तथा सेनाङ्ग-नामों का द्वन्द्व भी एकवचनान्त होता है।

2.4.3
अनुवादे चरणानां

IAST anuvāde caraṇānām

प्रकार विधि

सार अनुवाद-प्रसंग में चरण-नामों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है।

2.4.4
अध्वर्युक्रतुरनपुंसकं

IAST adhvaryukratur anapuṃsakam

प्रकार विधि

सार अध्वर्यु-संबंधी क्रतु-नामों का द्वन्द्व एकवचन में अ-नपुंसक (पुंलिङ्ग) रहता है।

2.4.5
अध्ययनतः अविप्रकृष्ट आख्यानां

IAST adhyayanato 'viprakṛṣṭākhyānām

प्रकार विधि

सार अध्ययन-क्रम में अविप्रकृष्ट (पास-पास पढ़े जाने वाले) आख्यान-नामों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है।

2.4.6
जातिरप्राणिनां

IAST jātir aprāṇinām

प्रकार विधि

सार अप्राणि-जातियों के नामों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है।

2.4.7
विशिष्टलिङ्गो नदी देशः अग्रामाः

IAST viśiṣṭaliṅgo nadīdeśo 'grāmāḥ

प्रकार विधि

सार निश्चित/विशिष्ट लिङ्ग वाली नदियों तथा अ-ग्राम देशों के नामों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है।

2.4.8
क्षुद्रजन्तवः

IAST kṣudrajantavaḥ

प्रकार विधि

सार क्षुद्र जन्तुओं के नामों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है।

2.4.9
येषां च विरोधः शाश्वतिकः

IAST yeṣāṃ ca virodhaḥ śāśvatikaḥ

प्रकार विधि

सार जिनके बीच शाश्वत विरोध है, उनके नामों का द्वन्द्व भी एकवचनान्त होता है।

2.4.10
शूद्राणां अनिर्वसितानाम्

IAST śūdrāṇām anirvasitānām

प्रकार विधि

सार अनिर्वसित (समाज से बहिष्कृत न हुए) शूद्र-जातियों के नामों का द्वन्द्व एकवचनान्त होता है।

2.4.11
गवाश्वप्रभृतीनि च

IAST gavāśvaprabhṛtīni ca

प्रकार विधि

सार गवाश्व-प्रभृति गणपठित द्वन्द्व भी एकवचनान्त होते हैं।

2.4.12
विभाषा वृक्षमृगतृणधान्यव्यञ्जनपशुशकुनिअश्ववडवपूर्वापर अधरोत्तराणां

IAST vibhāṣā vṛkṣamṛgatṛṇadhānyavyañjanapaśuśakunyaśvavaḍavapūrvāparādharottarāṇām

प्रकार विधि

सार वृक्ष, मृग, तृण, धान्य, व्यञ्जन, पशु, शकुनि तथा अश्व-वडव, पूर्व-अपर, अधर-उत्तर आदि के द्वन्द्व में एकवचन वैकल्पिक है।

2.4.13
विप्रतिषिद्धं च अनधिकरणवाचि

IAST vipratiṣiddhaṃ cānadhikaraṇavāci

प्रकार विधि

सार विप्रतिषिद्ध अर्थ वाले अनधिकरणवाची द्वन्द्व में भी एकवचन वैकल्पिक है।

2.4.14
न दधिपय आदीनि

IAST na dadhipayādīni

प्रकार नियम

सार दधिपयस्-आदि गणपठित द्वन्द्व एकवचन के इस विधान से निषिद्ध हैं।

2.4.15
अधिकरण एतावत्त्वे च

IAST adhikaraṇaitāvattve ca

प्रकार विधि

सार अधिकरण और एतावत्त्व (परिमाण/इयत्ता) वाचक होने पर भी एकवचन होता है।

2.4.16
विभाषा समीपे

IAST vibhāṣā samīpe

प्रकार विधि

सार सामीप्य-अर्थ में एकवचन वैकल्पिक है।

2.4.17
स नपुंसकं

IAST sa napuṃsakam

प्रकार विधि

सार पूर्व-विहित एकवचन वाला वह समास नपुंसकलिङ्ग होता है।

2.4.18
अव्ययीभावश्च

IAST avyayībhāvaś ca

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव-समास भी नपुंसकलिङ्ग होता है।

2.4.19
तत्पुरुषः अनञ्कर्मधारयः

IAST tatpuruṣo 'nañkarmadhārayaḥ

प्रकार अधिकार

सार अनञ् (नञ्-रहित) और अ-कर्मधारय तत्पुरुष के नपुंसक-विधान का अधिकार आरंभ होता है।

2.4.20
संज्ञायां कन्था उशीनरेषु

IAST saṃjñāyāṃ kanthośīnareṣu

प्रकार विधि

सार संज्ञा में उशीनर-देशीय शब्दों के पूर्व में कन्था वाला तत्पुरुष नपुंसक होता है।

2.4.21
उपज्ञा उपक्रमं तदादि आचिख्यासायां

IAST upajñopakramam tadādy ācikhyāsāyām

प्रकार विधि

सार आचिख्यासा (नामकरण की इच्छा) में उपज्ञा/उपक्रम से आरब्ध प्रथम-कृत अर्थ वाला तत्पुरुष नपुंसक होता है।

2.4.22
छाया बाहुल्ये

IAST chāyā bāhulye

प्रकार विधि

सार बाहुल्य-अर्थ में छाया-परक तत्पुरुष नपुंसक होता है।

2.4.23
सभा राज(न्)अमनुष्यपूर्वा

IAST sabhā rājāmanuṣyapūrvā

प्रकार विधि

सार राजन् अथवा अमनुष्य-पूर्वपद वाली सभा-परक तत्पुरुष नपुंसक होती है।

2.4.24
अशाला च

IAST aśālā ca

प्रकार विधि

सार शाला-भिन्न (अशाला) अर्थ में भी सभा-परक तत्पुरुष नपुंसक होती है।

2.4.25
विभाषा सेनासुराछायासालानिसानां

IAST vibhāṣā senāsurācchāyāsālāniśānām

प्रकार विधि

सार सेना, सुरा, छाया, साला और निशा परक तत्पुरुष में नपुंसकत्व वैकल्पिक है।

2.4.26
परवत् लिङ्गं द्वंद्वतत्पुरुषयोः

IAST paraval liṅgaṃ dvandvatatpuruṣayoḥ

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व और तत्पुरुष समास का लिङ्ग उत्तरपद (पर) के समान होता है।

2.4.27
पूर्ववत् अश्ववडवौ

IAST pūrvavad aśvavaḍavau

प्रकार विधि

सार अश्ववडवौ (अश्व और वडवा का द्वन्द्व) का लिङ्ग पूर्वपदवत् (पुंलिङ्ग) होता है।

2.4.28
हेमन्तशिशिरौ अहोरात्रे च छन्दसि

IAST hemantaśiśirau ahorātre ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में हेमन्तशिशिरौ और अहोरात्रे का लिङ्ग पूर्वपदवत् होता है।

2.4.29
रात्र अह्न अहाः पुंसि

IAST rātrāhnāhāḥ puṃsi

प्रकार विधि

सार रात्र, अह्न और अह् में अन्त वाले (समास-)रूप पुंलिङ्ग होते हैं।

2.4.30
अपथं नपुंसक्स्ं

IAST apathaṃ napuṃsakam

प्रकार विधि

सार अपथ नपुंसकलिङ्ग होता है।

2.4.31
अर्धर्चाः पुंसि च

IAST ardharcāḥ puṃsi ca

प्रकार विधि

सार अर्धर्च-शब्द पुंलिङ्ग भी होते हैं (अन्य लिङ्ग के साथ विकल्प/समुच्चय)।

2.4.32
इदमः अन्वादेशे अश् अनुदात्तः तृतीया आदौ

IAST idamo 'nvādeśe 'ś anudāttas tṛtīyādau

प्रकार विधि

सार अन्वादेश में इदम् का तृतीया आदि विभक्तियों में अनुदात्त अश् (अ) आदेश होता है।

2.4.33
एतदः त्रतसोः त्रतसौ च अनुदात्तौ

IAST etadas tratasos tratasau cānudāttau

प्रकार विधि

सार एतद् के त्र और तस् (प्रत्यय) अनुदात्त होते हैं।

2.4.34
द्वितीयाता ओस्सु एनः

IAST dvitīyāṭā ossv enaḥ

प्रकार विधि

सार द्वितीया, टा (द्विवचन), ओस् और सु में (अन्वादेश-संदर्भ में) एन् आदेश होता है।

2.4.35
आर्धधातुके

IAST ārdhadhātuke

प्रकार अधिकार

सार आगे के धातु-आदेश आर्धधातुक प्रत्यय के विषय में प्रवृत्त होते हैं।

2.4.36
अदो जग्धिर्ल्यप् ति किति

IAST ado jagdhir lyapti kiti

प्रकार विधि

सार अद् धातु का ल्यप् और कित् ति-प्रत्यय पर जग्धि आदेश होता है।

2.4.37
लुङ्सनोर्घस्ल्

IAST luṅsanor ghaslṛ

प्रकार विधि

सार लुङ् और सन् पर अद् का घस्लृ आदेश होता है।

2.4.38
घञपोश्च

IAST ghañapoś ca

प्रकार विधि

सार घञ् और अप् पर भी (अद् का) घस्लृ आदेश होता है।

2.4.39
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (अद्-संबंधी) यह आदेश बहुल (विविध/प्रायिक) होता है।

2.4.40
लिट्य् अन्यतरस्यां

IAST liṭy anyatarasyām

प्रकार विधि

सार लिट् पर (अद् का घस्लृ) अन्यतरस्याम्—विकल्प से—होता है।

2.4.41
वेञो वयिः

IAST veño vayiḥ

प्रकार विधि

सार वेञ् धातु का (आर्धधातुक-संदर्भ में) वयि आदेश होता है।

2.4.42
हनो वध लिङि

IAST hano vadha liṅi

प्रकार विधि

सार हन् धातु का लिङ् में वध आदेश होता है।

2.4.43
लुङि च

IAST luṅi ca

प्रकार विधि

सार लुङ् में भी हन् का वध आदेश होता है।

2.4.44
आत्मनेपदेषु अन्यतरस्यां

IAST ātmanepadeṣv anyatarasyām

प्रकार विधि

सार आत्मनेपद में हन् का वध आदेश अन्यतरस्याम् (विकल्प से) होता है।

2.4.45
इणो गा लुङि

IAST iṇo gā luṅi

प्रकार विधि

सार इण् धातु का लुङ् में गा आदेश होता है।

2.4.46
णौ गमिरबोधने

IAST ṇau gamir abodhane

प्रकार विधि

सार बोधन-भिन्न अर्थ में णिच् पर इण् का गम् आदेश होता है।

2.4.47
सनि च

IAST sani ca

प्रकार विधि

सार सन् पर भी (इण् का) गम् आदेश होता है।

2.4.48
इङश्च

IAST iṅaś ca

प्रकार विधि

सार इङ् धातु पर भी (गा/गम् संबंधी) ये आदेश लागू होते हैं।

2.4.49
गाङ् लिटि

IAST gāṅ liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में (इण्/इङ् का) गाङ् आदेश होता है।

2.4.50
विभाषा लुङ्लृङोः

IAST vibhāṣā luṅlṛṅoḥ

प्रकार विधि

सार लुङ् और लृङ् में (इण्/इङ् का गाङ्) विभाषा—विकल्प से—होता है।

2.4.51
णौ च सन् चङोः

IAST ṇau ca sanyaṅoḥ

प्रकार विधि

सार गाङ्-कुटादि पर ञित्-ङित्-विधान (२.४.४९) णिच् तथा सन्-यङ् के साथ भी (विभाषा से) लागू होता है।

2.4.52
अस्तेर्भूः

IAST aster bhūḥ

प्रकार विधि

सार आर्धधातुक प्रत्यय के परे अस् धातु के स्थान पर भू आदेश होता है।

2.4.53
ब्रुवो वचिः

IAST bruvo vaciḥ

प्रकार विधि

सार आर्धधातुक के परे ब्रू धातु के स्थान पर वच् आदेश होता है।

2.4.54
चक्षिङः ख्याञ्

IAST cakṣiṅaḥ khyāñ

प्रकार विधि

सार आर्धधातुक के परे चक्षिङ् धातु के स्थान पर ख्याञ् आदेश होता है।

2.4.55
वा लिटि

IAST vā liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में अस्-ब्रू-चक्षिङ् आदि के ये आदेश वैकल्पिक होते हैं।

2.4.56
अजेर्वी अघञपोः

IAST ajer vī aghañapoḥ

प्रकार विधि

सार आर्धधातुक के परे अज् धातु के स्थान पर वी आदेश होता है, घञ् और अप् के परे छोड़कर।

2.4.57
वा यौ

IAST vā yau

प्रकार विधि

सार य (सन्/यङ् का) परे होने पर अज् → वी आदेश वैकल्पिक है।

2.4.58
ण्यक्षत्रियआर्षञ्- इतो यूनि लुक् अणिञोः

IAST ṇyakṣatriyārṣañito yūni luk aṇiñoḥ

प्रकार विधि

सार ण्य, क्षत्रिय-गोत्र-प्रत्यय, आर्ष तथा ञ (एवं अण्-इञ्-सम्बद्ध पाठ) का यूनन् अर्थ में लुक् होता है।

2.4.59
पैल आदिभ्यः च

IAST pailādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार पैलादि गण से भी (यूनन् में) पूर्ववत् लुक् होता है।

2.4.60
इञः प्राचां

IAST iñaḥ prācām

प्रकार विधि

सार प्राच्य-आचार्य-सम्मत रीति में इञ् का भी यूनन् में लुक् होता है।

2.4.61
न तौल्वलिभ्यः

IAST na taulvalibhyaḥ

प्रकार नियम

सार तौल्वलि आदि से इञ् का वह यूनन्-लुक् नहीं होता।

2.4.62
तद्राजस्य बहुषु तेन एव अस्त्रियां

IAST tadrājasya bahuṣu tenaivāstriyām

प्रकार विधि

सार तद्राज-प्रत्यय का बहुवचन में उसी रूप से लुक् होता है, स्त्री-लिङ्ग छोड़कर।

2.4.63
यस्क आदिभ्यो गोत्रे

IAST yaskādibhyo gotre

प्रकार विधि

सार यस्कादि से गोत्रार्थ में (सम्बद्ध प्रत्यय का) लुक् होता है।

2.4.64
यञञोश्च

IAST yañañoś ca

प्रकार विधि

सार यञ् और अञ् का भी गोत्रार्थ में लुक् होता है।

2.4.65
अत्रिभृगुकुत्सवसिष्ठगोतम अङ्गिरोभ्यश्च

IAST atri-bhṛgu-kutsa-vasiṣṭha-gotama-aṅgirobhyaś ca

प्रकार विधि

सार अत्रि, भृगु, कुत्स, वसिष्ठ, गोतम और अङ्गिरस् से भी गोत्रार्थ में लुक् होता है।

2.4.66
बहु अचः इञः प्राच्यभरतेषु

IAST bahvaca iñaḥ prācyabharateṣu

प्रकार विधि

सार बहु-अच् प्रातिपदिक से इञ् का प्राच्य और भरत-सम्प्रदाय में (गोत्र/यूनन्-सम्बद्ध) लुक् होता है।

2.4.67
न गोपवन आदिभ्यह्

IAST na gopavanādibhyaḥ

प्रकार नियम

सार गोपवनादि से वह लुक् नहीं होता।

2.4.68
तिककितव आदिभ्यो द्वंद्वे

IAST tika-kitavādibhyo dvandve

प्रकार विधि

सार तिक-कितव आदि से द्वन्द्व समास में (गोत्र-प्रत्यय का) लुक् होता है।

2.4.69
उपक आदिभ्यः अन्यतरस्यां अद्वंद्वे

IAST upakādibhyo 'nyatarasyām advandve

प्रकार विधि

सार उपकादि से अद्वन्द्व में लुक् वैकल्पिक होता है।

2.4.70
आगस्त्यकौण्डिन्ययोरगस्तिकुण्डिनच्

IAST āgastya-kauṇḍinyayor agasti-kuṇḍinac

प्रकार विधि

सार आगस्त्य और कौण्डिन्य के स्थान पर क्रमशः अगस्ति और कुण्डिनच् आदेश होते हैं।

2.4.71
सुपो धातुप्रातिपदिकयोः

IAST supo dhātu-prātipadikayoḥ

प्रकार विधि

सार धातु और प्रातिपदिक के परे सुप् का लुक् होता है।

2.4.72
अदिप्रभृतिभ्यः शपः

IAST adiprabhṛtibhyaḥ śapaḥ

प्रकार विधि

सार अदादि धातुओं से परे शप् का लुक् होता है।

2.4.73
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक) में शप्-लुक् आदि बहुल (अनियमित/विविध) होते हैं।

2.4.74
यङः अचि च

IAST yaṅo 'ci ca

प्रकार विधि

सार यङ् का अच् परे होने पर भी लुक् होता है।

2.4.75
जुहोति आदिभ्यः श्लुः

IAST juhotyādibhyaḥ śluḥ

प्रकार विधि

सार जुहोत्यादि धातुओं से परे शप् के स्थान पर श्लु आदेश होता है।

2.4.76
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक प्रयोग) में इस प्रकरण का लुक्/आदेश-कार्य बहुल—विकल्प-विविध—रूप से प्रवृत्त होता है।

2.4.77
गातिस्था- घुपाभूयः सिचः परस्मैपदेषु

IAST gātisthāghupābhūbhyaḥ sicaḥ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार गै/गा, स्था, घु-संज्ञक धातुओं, पा और भू से परे सिच् का परस्मैपद में लुक् होता है।

2.4.78
विभाषा घ्राधेट्शा छासः

IAST vibhāṣā ghrādheṭśācchāsaḥ

प्रकार विधि

सार घ्रा, धेट्, शा, छ और सा से परे सिच् का परस्मैपद में विकल्प से लुक् होता है।

2.4.79
तन् आदिभ्यः तथासोः

IAST tanādibhyas tathāsoḥ

प्रकार विधि

सार तनादि धातुओं से परे सिच् का थस् और आस् परे होने पर लुक् होता है।

2.4.80
मन्त्रे घसह्वरणशवृदह आत्वृच्कृगमिजनिभ्यो लेः

IAST mantre ghasahvaraṇaśavṛdahātvṛckṛgamijanibhyo leḥ

प्रकार विधि

सार मन्त्र में घस्, ह्वरण, श/श्वृ, वृ, दह, आ, वृच्, कृ, गम् और जन् से परे लिङ् का लुक् होता है।

2.4.81
आमः

IAST āmaḥ

प्रकार विधि

सार आम् से परे लिङ् का लुक् होता है।

2.4.82
अव्ययात् आप्सुपः

IAST avyayād āpsupaḥ

प्रकार विधि

सार अव्यय से परे आप् (स्त्री-प्रत्यय आ) और सुप् का लुक् होता है।

2.4.83
न अव्ययीभावात् अतः अं तु अपञ्चम्याः

IAST nāvyayībhāvād ato 'mtv apañcamyāḥ

प्रकार विधि

सार अकारान्त अव्ययीभाव से परे सुप् का लुक् नहीं होता, अपितु पञ्चमी को छोड़कर अम्-आदेश होता है।

2.4.84
तृतीयासप्तम्योर्बहुलं

IAST tṛtīyāsaptamyor bahulam

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में तृतीया और सप्तमी के अर्थ में सुप् का लुक् बहुल (विकल्प-विविध) होता है।

2.4.85
लुटः प्रथमस्य डारौरसः

IAST luṭaḥ prathamasya ḍāraurasaḥ

प्रकार विधि

सार लुट् के प्रथमपुरुष (एक-/द्वि-/बहुवचन) को क्रमशः डा, रौ और रस् आदेश होते हैं।

अध्याय 3 · पाद 1 (150 सूत्र)

3.1.1
प्रत्ययः

IAST pratyayaḥ

प्रकार अधिकार

सार इतः आरभ्य अनुक्रम्यमाणाः प्रत्ययसंज्ञकाः भवन्ति — आगामी विधान प्रत्यय कहलाते हैं।

3.1.2
परश्च

IAST paraś ca

प्रकार विधि

सार प्रत्यय प्रकृति के पर (पीछे) ही आता है।

3.1.3
आद्य् उदात्तः च

IAST ādyudāttaś ca

प्रकार विधि

सार प्रत्यय का आदि-स्वर उदात्त होता है।

3.1.4
अनुदत्तौ सुप्पितौ

IAST anudāttau suppitau

प्रकार विधि

सार सुप् (सुबन्त-प्रत्यय) और पित् प्रत्यय अनुदात्त होते हैं।

3.1.5
गुप्तिज्कित् भ्यः सन्

IAST guptijkidbhyaḥ san

प्रकार विधि

सार गुप्, तिज् और कित् धातुओं से सन् प्रत्यय होता है।

3.1.6
मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्च अभ्यासस्य

IAST mānbadhadānśānbhyo dīrghaś cābhyāsasya

प्रकार विधि

सार मान्, बध्, दान् और शान् से सन् होता है तथा अभ्यास दीर्घ होता है।

3.1.7
धातोः कर्मणः समानकर्तृकात् इच्छायां वा

IAST dhātoḥ karmaṇaḥ samānakartṛkād icchāyāṃ vā

प्रकार विधि

सार इच्छा के कर्मभूत धातु से, समान-कर्तृक होने पर, विकल्प से सन् होता है।

3.1.8
सुपः आत्मनः क्यच्

IAST supa ātmanaḥ kyac

प्रकार विधि

सार सुबन्त से आत्मेच्छा (स्वयं के लिए इच्छा) में क्यच् होता है।

3.1.9
काम्यच् च

IAST kāmyac ca

प्रकार विधि

सार उसी अर्थ में काम्यच् भी होता है।

3.1.10
उपमानात् आचारे

IAST upamānād ācāre

प्रकार विधि

सार उपमानवाचक शब्द से आचार (वैसा व्यवहार) अर्थ में क्यच् होता है।

3.1.11
कर्तुः क्यङ् सालोपश्च

IAST kartuḥ kyaṅ sālopaś ca

प्रकार विधि

सार कर्तृ-उपमान से क्यङ् होता है तथा (आधार का) स्-लोप भी होता है।

3.1.12
भृश आदिभ्यः भुवि अच्वेः लोपश्च हलः

IAST bhṛśādibhyo bhuvy acver lopaś ca halaḥ

प्रकार विधि

सार भृशादि से भू (हो जाना) अर्थ में, अजन्त न होने पर, क्यङ् तथा अन्त्य हल्-लोप होता है।

3.1.13
लोहित आदि- डाच् भ्यः क्यष्

IAST lohitādiḍācbhyaḥ kyaṣ

प्रकार विधि

सार लोहितादि और डाचन्त शब्दों से क्यष् होता है।

3.1.14
कष्टाय क्रमणे

IAST kaṣṭāya kramaṇe

प्रकार विधि

सार क्रमण (कष्ट में प्रवृत्त होना) अर्थ में कष्ट से (क्यच्-रूप) प्रयोग सिद्ध होता है।

3.1.15
कर्मणः रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः

IAST karmaṇo romanthatapobhyāṃ varticaroḥ

प्रकार विधि

सार कर्म-रूप रोमन्थ और तपस् से क्रमशः वृत् तथा चर् के साथ (क्यच्) होता है।

3.1.16
बाष्प ऊष्माभ्यां उद्वमने

IAST bāṣpoṣmābhyām udvamane

प्रकार विधि

सार बाष्प और ऊष्मन् से उद्वमन (बाहर निकालना/उगलना) अर्थ में क्यच् होता है।

3.1.17
शब्दवैरकलह अभ्रकण्वमेघेह्यः करणे

IAST śabdavairakalahābhrakaṇvameghebhyaḥ karaṇe

प्रकार विधि

सार शब्द, वैर, कलह, अभ्र, कण्व और मेघ से करण (उत्पादन) अर्थ में क्यच् होता है।

3.1.18
सुख आदिभ्यः कर्तृवेदनायां

IAST sukhādibhyaḥ kartṛvedanāyām

प्रकार विधि

सार सुखादि से कर्तृवेदना (कर्ता द्वारा उस भाव का अनुभव) अर्थ में क्यच् होता है।

3.1.19
नमः वरिवः चित्रङः क्यच्

IAST namasvarivascitraṅaḥ kyac

प्रकार विधि

सार नमस्, वरिवस् और चित्रङ् से क्यच् होता है।

3.1.20
पुच्छभाण्डचीवरात् णिङ्

IAST pucchabhāṇḍacīvarāṇ ṇiṅ

प्रकार विधि

सार पुच्छ, भाण्ड और चीवर से णिङ् होता है।

3.1.21
मुण्डमिश्रस्लक्ष्णलवणव्रतवस्त्रहलकलकृततूस्तेभ्यः णिच्

IAST muṇḍamiśraslakṣṇalavaṇavratavastrahalakalakṛtatūstebhyaḥ ṇic

प्रकार विधि

सार मुण्ड, मिश्र, स्लक्ष्ण, लवण, व्रत, वस्त्र, हल, कल, कृत और तूस्त से णिच् होता है।

3.1.22
धातोरेक अचः हलादेः क्रियासम्भिहारे यङ्

IAST dhātor ekāco hālādeḥ kriyāsamabhihāre yaṅ

प्रकार विधि

सार एकाच् हलादि धातु से क्रियासमभिहार (आवृत्ति/तीव्रता) अर्थ में यङ् होता है।

3.1.23
नित्यं कौटिल्ये गतौ

IAST nityaṃ kauṭilye gatau

प्रकार विधि

सार गति-धातुओं से कौटिल्य (वक्र/छल-गमन) अर्थ में यङ् नित्य होता है।

3.1.24
लुपसदचरजपजभदहदशगॄभ्यो भावगर्हायां

IAST lupasadacarajapajabhadahadaśagṝbhyo bhāvagarhāyām

प्रकार विधि

सार लुप्, सद्, चर्, जप्, जभ्, दह्, दश् और गॄ से भावगर्हा (क्रिया/अवस्था की निन्दा) अर्थ में यङ् होता है।

3.1.25
सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोम(न्)त्वच वर्म(न्)वर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच्

IAST satyāpapāśarūpavīṇātūlaślokasenālomatvacavarmavarṇacūrṇacurādibhyo ṇic

प्रकार विधि

सार सत्य, आप, पाश, रूप, वीणा, तूल, श्लोक, सेना, लोमन्, त्वच्, वर्मन्, वर्ण, चूर्ण तथा चुरादि से णिच् होता है।

3.1.26
हेतुमति च

IAST hetumati ca

प्रकार विधि

सार हेतु (प्रयोजक) युक्त अर्थ में धातु से णिच् होता है।

3.1.27
कण्डू आदिभ्यो यक्

IAST kaṇḍūyādibhyo yak

प्रकार विधि

सार कण्डूयादि-गण की धातुओं से यक् प्रत्यय होता है।

3.1.28
गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः

IAST gupūdhūpavicchipaṇipanibhya āyaḥ

प्रकार विधि

सार गुप्, धूप्, विच्छि, पण् और पन् धातुओं से आय प्रत्यय होता है।

3.1.29
ऋतेरीयङ्

IAST ṛter īyaṅ

प्रकार विधि

सार ऋत् धातु से ईयङ् प्रत्यय होता है।

3.1.30
कमेर्णिङ्

IAST kamer ṇiṅ

प्रकार विधि

सार कम् धातु से णिङ् प्रत्यय होता है।

3.1.31
आय आदयः आर्धद् हातुके वा

IAST āyādaya ārdhadhātuke vā

प्रकार विधि

सार आय आदि (आय, ईयङ्, णिङ्) आर्धधातुक पर विकल्प से होते हैं।

3.1.32
सन् आदि अन्ताः धतवः

IAST sanādyantā dhātavaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार सन् आदि प्रत्ययान्त (सनाद्यन्त) शब्द धातु-सञ्ज्ञक होते हैं।

3.1.33
स्यतासी लृलुटोः

IAST syatāsī lṛluṭoḥ

प्रकार विधि

सार लृ (लृट्) में स्य और लुट् में तासि (तासी) विकरण होते हैं।

3.1.34
सिप् बहुलं लेटि

IAST sip bahulaṃ leṭi

प्रकार विधि

सार लेट् (वैदिक) में सिप् बहुल (विविध/प्रायः) रूप से होता है।

3.1.35
कास्प्रत्ययात् आम् अमन्त्रे लिटि

IAST kāspratyayād ām amantre liṭi

प्रकार विधि

सार कास् तथा (सनाद्यन्त) प्रत्ययान्त से, मन्त्र छोड़कर, लिट् में आम् होता है।

3.1.36
इच् आदेश्च गुरुमतः अनृच्छः

IAST ijādeś ca gurumato 'nṛcchaḥ

प्रकार विधि

सार इच्-आदि (स्वर से आरम्भ) गुरुमान् धातु से—ऋच्छ् छोड़कर—लिट् में आम् होता है।

3.1.37
दय अय आसश्च

IAST dayāyāsaś ca

प्रकार विधि

सार दय्, आय् और आस् धातुओं से भी (लिट् में) आम् होता है।

3.1.38
उषविदजागृभ्यः न्यतरस्यां

IAST uṣavidajāgṛbhyo 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार उष्, विद् और जागृ धातुओं से विकल्प से (लिट् में) आम् होता है।

3.1.39
भीह्रीभृहुवां श्लुवत् च

IAST bhīhrībhṛhuvāṃ śluvat ca

प्रकार विधि

सार भी, ह्री, भृ और हु धातुओं से (आम् होता है और वे) श्लुवत् (श्लुवत् व्यवहार) भी होते हैं।

3.1.40
कृञ् च अनुप्रयुज्यते लिटि

IAST kṛñ cānuprayujyate liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में (आमान्त के पश्चात्) कृञ् अनुप्रयुक्त (सहायक) होता है।

3.1.41
विदां कुर्वन्तु इति अन्यतरस्यां

IAST vidāṃ kurvantv ity anyatarasyām

प्रकार विधि

सार «विदां कुर्वन्तु» इत्यादि रूप विकल्प से (विद् के आमान्त लिट् में) सिद्ध होते हैं।

3.1.42
अभ्युत्सादयाम् प्रजनयांचिकयाम्रमयाम्+अकःपावयां+क्रियात्विदाम्+अक्रन्न् इति छन्द्स्सि

IAST abhyutsādayāṃ prajanayāṃ cikayāṃ ramayām akāḥ pāvayaṃ kriyād vidām akrann iti cchandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अभ्युत्सादयाम्, प्रजनयाम्, चिकयाम्, रमयाम् अकाः, पावयां क्रियात्, विदाम् अक्रन्—ये आमान्त (वैदिक) प्रयोग सिद्ध हैं।

3.1.43
च्लि लुङि

IAST cli luṅi

प्रकार विधि

सार लुङ् में च्लि (आदेश-स्थानभूत) प्रत्यय होता है।

3.1.44
च्लेः सिच्

IAST cleḥ sic

प्रकार विधि

सार च्लि के स्थान में सिच् आदेश होता है।

3.1.45
शलः इक् उपधात् अनिटः क्सः

IAST śala igupadhād aniṭaḥ ksaḥ

प्रकार विधि

सार शल्-अन्ता, इगुपधा, अनिट् धातु से च्लि के स्थान में क्स होता है।

3.1.46
श्लिषः आलिङ्गने

IAST śliṣa āliṅgane

प्रकार विधि

सार आलिङ्गन-अर्थ में श्लिष् से (क्लिसिद्ध) क्स होता है।

3.1.47
न दृशः

IAST na dṛśaḥ

प्रकार नियम

सार दृश् धातु से (पूर्व-सूत्र-प्राप्त) क्स नहीं होता।

3.1.48
णिश्रिद्रुस्रुभ्यः कर्तरि चङ्

IAST ṇiśridrusrubhyaḥ kartari caṅ

प्रकार विधि

सार णि (णिच्) तथा श्रि, द्रु, स्रु से कर्तृ-अर्थ में चङ् (द्वित्व-लुङ्) होता है।

3.1.49
विभाषा धेट्श्व्योः

IAST vibhāṣā dheṭśvyoḥ

प्रकार विधि

सार धेट् और श्वि से विकल्प से चङ् होता है।

3.1.50
गुपेश् छन्दसि

IAST gupeś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में गुप् से (चङ्-सम्बन्धी) प्रयोग होता है।

3.1.51
न ऊनयतिध्वनयति एलयति अर्दयतिभ्यः

IAST na ūnayati-dhvanayati-elayaty-ardayatibhyaḥ

प्रकार विधि

सार ऊनयति, ध्वनयति, एलयति और अर्दयति धातुओं से अङ्-विकरण का प्रतिषेध होता है।

3.1.52
अस्यतिवक्तिख्यातिभ्यः अङ्

IAST asyati-vakti-khyātibhyo ’ṅ

प्रकार विधि

सार अस्यति, वक्ति और ख्याति धातुओं से लुङ् में अङ् विकरण होता है।

3.1.53
लिपिसिचिह्वश्च

IAST lipi-sici-hvaś ca

प्रकार विधि

सार लिपि, सिचि और ह्वे धातुओं से भी अङ् होता है।

3.1.54
आत्मनेपदेषु अन्यतरस्यां

IAST ātmanepadeṣv anyatarasyām

प्रकार विधि

सार आत्मनेपद में पूर्वोक्त धातुओं से अङ् विकल्पेन होता है।

3.1.55
पुषादिद्युतादि ल्त् इ तः परस्मैपदेषु

IAST puṣādi-dyutādy-alṛditaḥ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार पुषादि, द्युतादि तथा अलृदित् धातुओं से परस्मैपद में अङ् होता है।

3.1.56
सर्तिशास्तिअर्तिभ्यश्च

IAST sarti-śāsty-artibhyaś ca

प्रकार विधि

सार सर्ति, शास्ति और अर्ति धातुओं से भी अङ् होता है।

3.1.57
इरि तो वा

IAST irito vā

प्रकार विधि

सार इरित् धातुओं से अङ् विकल्पेन होता है।

3.1.58
जृलपॄस्तन्भुम्रुचुम्लुचुग्रुचुग्लुचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च

IAST jṝ-stambhu-mrucu-mlucu-grucu-glucu-gluñcu-śvibhyaś ca

प्रकार विधि

सार जॄ, स्तम्भु, म्रुचु, म्लुचु, ग्रुचु, ग्लुचु, ग्लुञ्चु और श्वि धातुओं से भी अङ् होता है।

3.1.59
कृमृदृरुहिभ्यश् छन्दसि

IAST kṛ-mṛ-dṛ-ruhibhyaś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में कृ, मृ, दृ और रुह् धातुओं से अङ् होता है।

3.1.60
चिण् ते पदः

IAST ciṇ te padaḥ

प्रकार विधि

सार पद (आत्मनेपद-तिङ् ‘ते’) के परे चिण् विकरण होता है।

3.1.61
दीपजनबुधपूरितायिप्यायिह्यः न्यतरस्यां

IAST dīpa-jana-budha-pūrī-tāyi-pyāyibhyo ’nyatarasyām

प्रकार विधि

सार दीप्, जन्, बुध्, पूर्, ताय् और प्याय् धातुओं से चिण् विकल्पेन होता है।

3.1.62
अचः कर्मकर्तरि

IAST acaḥ karmakartari

प्रकार विधि

सार अजन्त धातुओं से कर्मकर्तरि प्रयोग में चिण् होता है।

3.1.63
दुहश्च

IAST duhaś ca

प्रकार विधि

सार दुह् धातु से भी (कर्मकर्तरि) चिण् होता है।

3.1.64
न रुधः

IAST na rudhaḥ

प्रकार विधि

सार रुध् धातु से चिण् का प्रतिषेध होता है।

3.1.65
तपः अनुतापे च

IAST tapo ’nutāpe ca

प्रकार विधि

सार तप् धातु से अनुताप-अर्थ में तथा (पूर्व-प्रसंग में) अन्यत्र भी चिण् होता है।

3.1.66
चिण् भावकर्मणोः

IAST ciṇ bhāva-karmaṇoḥ

प्रकार विधि

सार भाव और कर्म में चिण् विकरण होता है।

3.1.67
सार्वधातुके यक्

IAST sārvadhātuke yak

प्रकार विधि

सार सार्वधातुक प्रत्यय के परे (भाव-कर्म में) यक् विकरण होता है।

3.1.68
कर्तरि शप्

IAST kartari śap

प्रकार विधि

सार कर्तरि अर्थ में (सार्वधातुक के परे) शप् विकरण होता है।

3.1.69
दिवादिभ्यः श्यन्

IAST divādibhyaḥ śyan

प्रकार विधि

सार दिवादि धातुओं से शप् के स्थान पर श्यन् होता है।

3.1.70
वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः

IAST vā bhrāśa-bhlāśa-bhramu-kramu-klamu-trasi-truṭi-laṣaḥ

प्रकार विधि

सार भ्राश्, भ्लाश्, भ्रम्, क्रम्, क्लम्, त्रस्, त्रुट् और लष् धातुओं से श्यन् विकल्पेन होता है।

3.1.71
यसः अनुपसर्गात्

IAST yaso ’nupasargāt

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित यस् धातु से श्यन् होता है।

3.1.72
संयसश्च

IAST saṃyasaś ca

प्रकार विधि

सार सम्-उपसर्गयुक्त यस् धातु से भी श्यन् होता है।

3.1.73
सु आदिभ्यह् श्नुः

IAST svādibhyaḥ śnuḥ

प्रकार विधि

सार स्वादि धातुओं से शप् के स्थान पर श्नु विकरण होता है।

3.1.74
श्रुवः शृ च

IAST śruvaḥ śṛ ca

प्रकार विधि

सार श्रु धातु से श्नु होता है तथा धातु का शृ आदेश भी होता है।

3.1.75
अक्षः अन्यतरस्यां

IAST akṣo ’nyatarasyām

प्रकार विधि

सार अक्ष् धातु से श्नु विकल्पेन होता है।

3.1.76
तनूकरणे तक्षः

IAST tanūkaraṇe takṣaḥ

प्रकार विधि

सार तनूकरण-अर्थ में प्रयुक्त धातु तक्ष् के परे कर्तरि श्नु-विकरण होता है।

3.1.77
तुदादिभ्यः शः

IAST tudādibhyaḥ śaḥ

प्रकार विधि

सार तुदादि-गण की धातुओं के परे कर्तरि श-विकरण होता है।

3.1.78
रुधादिभ्यः श्नं

IAST rudhādibhyaḥ śnam

प्रकार विधि

सार रुधादि-गण की धातुओं के परे कर्तरि श्नम्-विकरण होता है।

3.1.79
तणादिकृञ्भ्यः उः

IAST tanādikṛñbhyaḥ uḥ

प्रकार विधि

सार तनादि-गण की धातुओं तथा कृञ् के परे कर्तरि उ-विकरण होता है।

3.1.80
धिन्वि कृण्व्योर च

IAST dhinvikṛṇvyor a ca

प्रकार विधि

सार धि तथा कृ धातुओं को नुक्-आगम और उ-विकरण होता है (धिन्व्/कृण्व् रूप से)।

3.1.81
क्रीआदिभ्यः श्ना

IAST kryādibhyaḥ śnā

प्रकार विधि

सार क्र्यादि-गण की धातुओं के परे कर्तरि श्ना-विकरण होता है।

3.1.82
स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्भ्यः श्नुश्च

IAST stambhustumbhuskambhuskumbhuskubhyaḥ śnuś ca

प्रकार विधि

सार स्तम्भु, स्तुम्भु, स्कम्भु, स्कुम्भु तथा स्कुञ् के परे श्ना के अतिरिक्त श्नु भी होता है।

3.1.83
हलः श्नः शानच् हौ

IAST halaḥ śnaḥ śānac hau

प्रकार विधि

सार हल्-अन्त धातु के श्ना-स्थान पर हि-प्रत्यय (हौ) के योग में शानच् आदेश होता है।

3.1.84
छन्दसि शायच् अपि

IAST chandasi śāyac api

प्रकार विधि

सार छन्दस् में शानच् के अतिरिक्त शायच् भी होता है।

3.1.85
व्यत्ययो बहुलं

IAST vyatyayo bahulam

प्रकार विधि

सार (छन्दस् में) विकरणादि का व्यत्यय बहुल होता है।

3.1.86
लिङि आशिषि अङ्

IAST liṅi āśiṣi aṅ

प्रकार विधि

सार आशीर्लिङ् में धातु के परे अङ्-विकरण होता है।

3.1.87
कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः

IAST karmavat karmaṇā tulyakriyaḥ

प्रकार अतिदेश

सार कर्म के समान क्रिया करने वाले (कर्ता) को कर्मवत् माना जाता है (कर्मणि-प्रयोगादि के लिए)।

3.1.88
तपः तपःकर्मकस्य एव

IAST tapaḥ tapaḥkarmakasyaiva

प्रकार नियम

सार तप धातु पर पूर्व-अतिदेश केवल तभी लागू होता है जब वह स्वयं तपः-कर्मक हो।

3.1.89
न दुहस्नुनमां यक्चिणौ

IAST na duhsnunamāṃ yakciṇau

प्रकार विधि

सार दुह्, स्नु तथा नम् धातुओं में यक् और चिण् नहीं होते।

3.1.90
कुषिरजोः प्राचां श्यन् परस्मैपदं च

IAST kuṣirajoḥ prācāṃ śyan parasmaipadaṃ ca

प्रकार विधि

सार कुष् तथा रञ्ज् पर प्राचां मत से श्यन् तथा परस्मैपद भी होते हैं।

3.1.91
धातोः

IAST dhātoḥ

प्रकार अधिकार

सार आगे विहित कृत्-प्रत्यय धातु के परे होते हैं—यह अधिकार-सूत्र है।

3.1.92
तत्र उपपदं सप्तमीस्थम्

IAST tatra upapadaṃ saptamīstham

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उस अधिकार में सप्तमी में निर्दिष्ट पद उपपद-संज्ञक होता है।

3.1.93
कृत् अतिङ्

IAST kṛt atiṅ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तिङ्-भिन्न (धातुपरक) प्रत्यय कृत्-संज्ञक होते हैं।

3.1.94
वा असरूपः अस्त्रियां

IAST vā asarūpaḥ astriyām

प्रकार विधि

सार अस्त्रीलिङ्ग में असमान रूप वाले कृत्-प्रत्यय वैकल्पिक रूप से सह-प्रवृत्त हो सकते हैं।

3.1.95
कृत्याः प्राङ् ण्वुलः

IAST kṛtyāḥ prāṅ ṇvulaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ण्वुल् से पूर्व तक के (कृत्य-अधिकार के) प्रत्यय कृत्य-संज्ञक होते हैं।

3.1.96
तव्यत्तव्य अनीयरः

IAST tavyattavya anīyaraḥ

प्रकार विधि

सार धातु से तव्यत्, तव्य तथा अनीयर् (कृत्य) प्रत्यय होते हैं।

3.1.97
अचः यत्

IAST acaḥ yat

प्रकार विधि

सार अच्-अन्त धातु से यत्-प्रत्यय होता है।

3.1.98
पोरत् उपधात्

IAST por adupadhāt

प्रकार विधि

सार ह्रस्व-उपधा वाले पकार-अन्त धातु से भी यत् होता है।

3.1.99
शकिशहोश्च

IAST śakiśahoś ca

प्रकार विधि

सार शक् तथा सह् धातुओं से भी यत् होता है।

3.1.100
गदमदचरयमश्च अनुपसर्गे

IAST gadamadacarayamaś ca anupasarge

प्रकार विधि

सार अनुपसर्ग गद्, मद्, चर् तथा यम् धातुओं से भी यत् होता है।

3.1.101
अवद्यपण्यवर्याः गर्ह्यपणितव्य अनिरोधेषु

IAST avadyapaṇyavaryāḥ garhyapaṇitavya anirodheṣu

प्रकार विधि

सार अवद्य, पण्य और वर्य क्रमशः गर्ह्य (निन्दनीय), पणितव्य (विक्रेय/पण्य) तथा अनिरोध (अबाध) अर्थों में (यत्-निष्पन्न) निपातित होते हैं।

3.1.102
वह्यं करणम्

IAST vahyaṃ karaṇam

प्रकार नियम

सार वह्य (वह्+यत्) करण अर्थात् साधन/वाहन-अर्थ में ही प्रयुक्त होता है।

3.1.103
अर्यः स्वामि(न्)वैश्ययोः

IAST aryaḥ svāmivaiśyayoḥ

प्रकार विधि

सार अर्य शब्द स्वामी और वैश्य — इन दो अर्थों में निपातित/प्रयुक्त होता है।

3.1.104
उपसर्या काल्या प्रजने

IAST upasaryā kālyā prajane

प्रकार विधि

सार उपसर्या और काल्या शब्द प्रजन (प्रजनन/मैथुन-योग्य काल) अर्थ में निपातित होते हैं।

3.1.105
अजर्यं संगतम्

IAST ajaryaṃ saṃgatam

प्रकार विधि

सार अजर्य शब्द संगत (दृढ़ सम्बन्ध/अटूट मित्रता) अर्थ में निपातित होता है।

3.1.106
वदः सुपि क्यप् च

IAST vadaḥ supi kyap ca

प्रकार विधि

सार वद् धातु से सुबन्त के परे होने पर (यत् के अतिरिक्त) क्यप् प्रत्यय भी होता है।

3.1.107
भुवो भावे

IAST bhuvo bhāve

प्रकार विधि

सार भू धातु से भाव-अर्थ में क्यप् प्रत्यय होता है (भव्यम्)।

3.1.108
हनः त च

IAST hanaḥ ta ca

प्रकार विधि

सार हन् धातु से क्यप् तथा त प्रत्यय होते हैं (हत्यम्, घातः)।

3.1.109
एतिस्तुसाः वृदृजुषः क्यप्

IAST etistūsāḥ vṛdṛjuṣaḥ kyap

प्रकार विधि

सार इ (एति), स्तु, सा, वृ, दृ और जुष् धातुओं से क्यप् प्रत्यय होता है।

3.1.110
ऋत् उपधात् च अक्ल्पिचृतेः

IAST ṛt upadhāt ca aklṛpicṛteḥ

प्रकार विधि

सार ऋत् उपधा वाली धातुओं से—कॢप् और चृत को छोड़कर—क्यप् प्रत्यय होता है।

3.1.111
ई च खनः

IAST ī ca khanaḥ

प्रकार विधि

सार खन् धातु से क्यप् होता है और धातुस्वर का ई-आदेश भी (खेयम्)।

3.1.112
भृञः असंज्ञायां

IAST bhṛñaḥ asaṃjñāyām

प्रकार विधि

सार भृञ् धातु से असंज्ञा (सामान्य, नामेतर) प्रयोग में क्यप् प्रत्यय होता है (भृत्यम्)।

3.1.113
मृजेर्विभाषा

IAST mṛjer vibhāṣā

प्रकार विधि

सार मृज् धातु से क्यप् प्रत्यय वैकल्पिक रूप से होता है।

3.1.114
राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्य अव्यथ्याः

IAST rājasūya-sūrya-mṛṣodya-rucya-kupya-kṛṣṭapacya avyathyāḥ

प्रकार विधि

सार राजसूय, सूर्य, मृषोद्य, रुच्य, कुप्य, कृष्टपच्य और अव्यथ्य — ये रूप निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

3.1.115
भिद्य उद्ध्यौ नदे

IAST bhidyoddhyau nade

प्रकार नियम

सार भिद्य और उद्ध्य — नदी-अर्थ में ही ये रूप प्रयुक्त होते हैं।

3.1.116
पुष्यसिध्यौ नक्षत्रे

IAST puṣyasidhyau nakṣatre

प्रकार विधि

सार नक्षत्र-अर्थ में पुष्य और सिध्य शब्द निपातित होते हैं।

3.1.117
विपूयविनीयजित्याः मुञ्जकल्कहलिषु

IAST vipūyavinīyajityāḥ muñjakalkahaliṣu

प्रकार विधि

सार मुञ्ज, कल्क और हलि के योग में विपूय, विनीय तथा जित्य शब्द निपातित होते हैं।

3.1.118
प्रति अपिभ्यां ग्रहेश् छन्दसि

IAST pratyapibhyāṃ graheś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में प्रति और अपि उपसर्गों से युक्त ग्रह् धातु से क्यप् होता है।

3.1.119
पद अस्वैरि(न्)बाह्यापक्स्येषु च

IAST padasvairibāhyāpakṣyeṣu ca

प्रकार विधि

सार पद, अस्वैरिन्, बाह्य और अपक्स्य — इन अर्थों में भी (ग्रह् से क्यप्) होता है।

3.1.120
विभाषा कृवृषोः

IAST vibhāṣā kṛvṛṣoḥ

प्रकार विधि

सार कृ और वृष् धातुओं से क्यप् वैकल्पिक रूप से होता है।

3.1.121
युग्यं च पत्त्रे

IAST yugyaṃ ca pattre

प्रकार नियम

सार युग्य पत्त्र (वाहन/रथ) अर्थ में भी प्रयुक्त होता है।

3.1.122
अमावस्यत् अन्यतरस्यां

IAST amāvasyad anyatarasyām

प्रकार विधि

सार अमावस्यत् रूप अन्यतरस्याम् (वैकल्पिक पक्ष में) सिद्ध होता है।

3.1.123
छन्दसि निष्टर्क्यदेवहूयप्रणीय उन्नीय उच्छिष्यमर्यस्तर्याध्वर्यखन्यखान्यदेवयज्याआपृच्छ्य- प्रतिषीव्यब्रह्मवाद्यभाव्यस्ताव्य उपचाय्यपृडानि

IAST chandasi niṣṭarkya-devahūya-praṇīya-unnīya-ucchiṣya-marya-starya-adhvarya-khanya-khānya-devayajyā-āpṛcchya-pratiṣīvya-brahmavādya-bhāvya-stāvya-upacāyya-pṛḍāni

प्रकार विधि

सार छन्दस् में निष्टर्क्य, देवहूय, प्रणीय, उन्नीय, उच्छिष्य, मर्य, स्तर्य, अध्वर्य, खन्य, खान्य, देवयज्या, आपृच्छ्य, प्रतिषीव्य, ब्रह्मवाद्य, भाव्या, स्ताव्य, उपचाय्य, पृड आदि सूचीबद्ध रूप निपातित होते हैं।

3.1.124
ऋहलोर्ण्यत्

IAST ṛhalor ṇyat

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त तथा हल्-अन्त धातुओं से ण्यत् प्रत्यय होता है।

3.1.125
ओरावश्यके

IAST or āvaśyake

प्रकार विधि

सार उवर्णान्त धातु से आवश्यक (अवश्यम्भावी) अर्थ में ण्यत् होता है।

3.1.126
आसुयुवपिरपिलपित्रपिचमश्च

IAST āsuyuvapirapilapitrapicamaśca

प्रकार विधि

सार आस्, यु, वप्, रप्, लप्, त्रप् तथा चम् धातुओं से भी ण्यत् प्रत्यय होता है।

3.1.127
आनाय्यः अनित्ये

IAST ānāyyaḥ anitye

प्रकार विधि

सार अनित्य (अस्थायी) अर्थ में आनाय्य रूप निपातन से सिद्ध होता है।

3.1.128
प्रणाय्यः असंमतौ

IAST praṇāyyaḥ asaṃmatau

प्रकार विधि

सार असंमत (अस्वीकृत/अप्रशस्त) अर्थ में प्रणाय्य रूप निपातन से सिद्ध होता है।

3.1.129
पाय्यसांनाय्यनिकाय्यधाय्याः मानहविः निवाससामिधेनीषु

IAST pāyyasāṃnāyyanikāyyadhāyyāḥ mānahaviḥnivāsasāmidhenīṣu

प्रकार विधि

सार मान, हविस्, निवास तथा सामिधेनी अर्थों में क्रमशः पाय्य, सांनाय्य, निकाय्य और धाय्या रूप निपातन से सिद्ध होते हैं।

3.1.130
क्रतौ कुण्डपाय्यसंचाय्यौ

IAST kratau kuṇḍapāyyasaṃcāyyau

प्रकार विधि

सार क्रतु (यज्ञ) अर्थ में कुण्डपाय्य और संचाय्य रूप निपातन से सिद्ध होते हैं।

3.1.131
अग्नौ परिचाय्य उपचाय्यसमूह्याः

IAST agnau paricāyya upacāyyasamūhyāḥ

प्रकार विधि

सार अग्नि (अग्निचयन/चिति) अर्थ में परिचाय्य, उपचाय्य और समूह्य रूप निपातन से सिद्ध होते हैं।

3.1.132
चित्य अग्निचित्ये च

IAST citya agnicitye ca

प्रकार विधि

सार चिति/अग्निचयन अर्थ में चित्य तथा अग्निचित्य रूप निपातन से सिद्ध होते हैं।

3.1.133
ण्वुल्तृचौ

IAST ṇvultṛcau

प्रकार विधि

सार कर्तृवाचक अर्थ में ण्वुल् और तृच् प्रत्यय होते हैं।

3.1.134
नन्दिग्रहिपच आदिभ्यः ल्यु- णिनिअचः

IAST nandigrahipacādibhyaḥ lyu-ṇinyacaḥ

प्रकार विधि

सार नन्दि, ग्रहिप तथा पच आदि गणों के धातुओं से क्रमशः ल्यु, णिनि और अच् प्रत्यय होते हैं।

3.1.135
इक् उपध ज्ञाप्रीकिरः कः

IAST ik upadha jñāprīkiraḥ kaḥ

प्रकार विधि

सार इगुपध धातुओं से तथा ज्ञा, प्री और कृ से क प्रत्यय होता है।

3.1.136
आतश्च उपसर्गे

IAST ātaśca upasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्गपूर्वक आकारान्त धातु से भी क प्रत्यय होता है।

3.1.137
पाघ्राध्माधेट्दृशः शः

IAST pāghrādhmādheṭdṛśaḥ śaḥ

प्रकार विधि

सार पा, घ्रा, ध्मा, धेट् तथा दृश् धातुओं से श प्रत्यय होता है।

3.1.138
अनुपसर्गात् लिम्पविन्दधारिपारिवेदिउदेजिचेतिसातिसाहिह्यश्च

IAST anupasargāt limpavindadhāripārivediudejicetisātisāhihyaśca

प्रकार विधि

सार उपसर्गरहित लिम्प्, विन्द्, धारि, पारि, वेदि, उदेजि, चेति, साति तथा साहि धातुओं से भी श प्रत्यय होता है।

3.1.139
ददाति दधात्योर्विभाषा

IAST dadāti dadhātyorvibhāṣā

प्रकार विधि

सार दा (ददाति) और धा (दधाति) से श प्रत्यय वैकल्पिक होता है।

3.1.140
ज्वलिति कसन्तेभ्यः णः

IAST jvaliti kasantebhyaḥ ṇaḥ

प्रकार विधि

सार ज्वलादि धातुओं तथा कसन्त धातुओं से ण प्रत्यय होता है।

3.1.141
श्याआत् व्यध आस्रुसंस्रुअतीण् अवसा अवहृलिहश्लिषश्वसश्च

IAST śyāāt vyadha āsrusaṃsruaatīṇ avasā avahṛlihaśliṣaśvasaśca

प्रकार विधि

सार श्यै, व्यध्, आस्रु, संस्रु, अतीण्, अवसा, अवहृ, लिह्, श्लिष् तथा श्वस् से भी ण प्रत्यय होता है।

3.1.142
दुन्योरनुपसर्गे

IAST dunyoranupasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्गरहित दु और नी धातुओं से ण प्रत्यय होता है।

3.1.143
विभाषा ग्रहेः

IAST vibhāṣā graheḥ

प्रकार विधि

सार ग्रह् धातु से ण प्रत्यय वैकल्पिक होता है।

3.1.144
गेहे कः

IAST gehe kaḥ

प्रकार विधि

सार गृह (घर) अर्थ में ग्रह् से क प्रत्यय होता है।

3.1.145
शिल्पिनि ष्वुन्

IAST śilpini ṣvun

प्रकार विधि

सार शिल्पी (कारीगर) अर्थ में ष्वुन् प्रत्यय होता है।

3.1.146
गः थकन्

IAST gaḥ thakan

प्रकार विधि

सार गै/गा धातु से थकन् प्रत्यय होता है।

3.1.147
ण्युट् च

IAST ṇyuṭ ca

प्रकार विधि

सार गै/गा धातु से ण्युट् प्रत्यय भी होता है।

3.1.148
हश्च व्रीहिकालयोः

IAST haśca vrīhikālayoḥ

प्रकार विधि

सार व्रीहि और काल अर्थों में हा धातु से भी (थकन्/ण्युट्-परम्परा का) प्रत्यय होता है।

3.1.149
प्रुसृल्वः समभिहारे वुन्

IAST prusṛlvaḥ samabhihāre vun

प्रकार विधि

सार समभिहार (आवृत्ति/अतिशय) अर्थ में प्रु, सृ और लू धातुओं से वुन् प्रत्यय होता है।

3.1.150
आशिषि च

IAST āśiṣi ca

प्रकार विधि

सार आशीर्वाद अर्थ में भी वुन् प्रत्यय होता है।

अध्याय 3 · पाद 2 (188 सूत्र)

3.2.1
कर्मणि अण्

IAST karmaṇy aṇ

प्रकार विधि

सार कर्मवाचक पद के साथ समास होने पर धातु से कर्तृ-अर्थ में अण् प्रत्यय होता है (जैसे कुम्भकारः)।

3.2.2
ह्वावाअमश्च

IAST hvā-vā-amaś ca

प्रकार विधि

सार ह्वे, वा और अम् धातुओं से भी (कर्मणि) अण् होता है।

3.2.3
आतः अनुपसर्गे कः

IAST āto 'nupasarge kaḥ

प्रकार विधि

सार आ-कारान्त धातु से, उपसर्ग रहित अवस्था में, कर्मणि अण् के स्थान पर क प्रत्यय होता है।

3.2.4
सुपि स्थः

IAST supi sthaḥ

प्रकार विधि

सार सुबन्त पद के साथ समास होने पर स्था धातु से (कर्मणि) क होता है।

3.2.5
तुन्दशोकयोः परिमृज अपनुदोः

IAST tundaśokayoḥ parimṛjāpanudoḥ

प्रकार विधि

सार तुन्द और शोक के साथ समास में क्रमशः परिमृज् तथा अपनुद् से क होता है।

3.2.6
प्रे दा- ज्ञः

IAST pre dā-jñaḥ

प्रकार विधि

सार प्र उपसर्गयुक्त दा और ज्ञा धातुओं से (कर्मणि) क होता है।

3.2.7
समि ख्यः

IAST sami khyaḥ

प्रकार विधि

सार सम् उपसर्गयुक्त ख्या धातु से (कर्मणि) क होता है।

3.2.8
गापोः टक्

IAST gāpoṣ ṭak

प्रकार विधि

सार गा और पा धातुओं से (कर्मणि) टक् प्रत्यय होता है।

3.2.9
हरतेरनुद्यमने अच्

IAST harater anudyamane 'c

प्रकार विधि

सार हृ धातु से उद्यमन-भिन्न अर्थ में (कर्मणि) अच् प्रत्यय होता है।

3.2.10
वयसि च

IAST vayasi ca

प्रकार विधि

सार वयस् (आयु/अवस्था) अर्थ में भी हृ से अच् होता है।

3.2.11
आङि ताच्छील्ये

IAST āṅi tācchīlye

प्रकार विधि

सार आङ् उपसर्ग के साथ ताच्छील्य अर्थ में हृ से अच् होता है।

3.2.12
अर्हः

IAST arhaḥ

प्रकार विधि

सार अर्ह् धातु से (कर्मणि) अच् होता है।

3.2.13
स्तम्बकर्णयोः रमिजपोः

IAST stamba-karṇayor rami-japoḥ

प्रकार विधि

सार स्तम्ब और कर्ण के साथ समास में क्रमशः रम् तथा जप् से अच् होता है।

3.2.14
शमि धातोः संज्ञायां

IAST śami dhātoḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में शम् धातु से अच् होता है।

3.2.15
अधिकरणे शेतेः

IAST adhikaraṇe śeteḥ

प्रकार विधि

सार अधिकरण अर्थ में शी धातु से अच् होता है।

3.2.16
चरेश् टः

IAST careṣ ṭaḥ

प्रकार विधि

सार चर् धातु से (कर्मणि) ट प्रत्यय होता है।

3.2.17
भिक्षाशेना आदायेषु च

IAST bhikṣā-senā-ādāyeṣu ca

प्रकार विधि

सार भिक्षा, सेना और आदाय के साथ समास में भी चर् से ट होता है।

3.2.18
पुरसग्रतसग्रेषु सर्तेः

IAST puras-agratas-agreṣu sarteḥ

प्रकार विधि

सार पुरस्, अग्रतस् और अग्रे के साथ समास में सृ धातु से ट होता है।

3.2.19
पूर्वे कर्तरि

IAST pūrve kartari

प्रकार विधि

सार पूर्व के साथ कर्तृ-अर्थ में सृ से ट होता है।

3.2.20
कृञः हेतुताच्छील्यआनुलोम्येषु

IAST kṛño hetu-tācchīlyānulomyeṣu

प्रकार विधि

सार हेतु, ताच्छील्य और आनुलोम्य अर्थों में कृ धातु से अच् होता है।

3.2.21
दिवाविब्भानिशाप्रभाभास्कार अन्त अनन्त आदिबहुनान्दीकिम्लिपिलिबिबलिभक्तिकर्तृचित्रक्षेत्र- संख्याजङ्घाबाहुअहन् यद् तद् धनुसरुष्षु

IAST divā-vi-bhāni-śā-prabhā-bhāskara-anta-ananta-ādi-bahu-nāndī-kim-lipi-libi-bali-bhakti-kartṛ-citra-kṣetra-saṃkhyā-jaṅghā-bāhu-ahan-yad-tad-dhanus-saruṣṣu

प्रकार विधि

सार दिवा, वि, भानि, शा, प्रभा, भास्कर, अन्त, अनन्त, आदि, बहु, नान्दी, किम्, लिपि, लिबि, बलि, भक्ति, कर्तृ, चित्र, क्षेत्र, संख्या, जङ्घा, बाहु, अहन्, यद्, तद्, धनुस् और सरस् के साथ समास में कृ से अच् होता है।

3.2.22
कर्मणि भृतौ

IAST karmaṇi bhṛtau

प्रकार विधि

सार भृति (वेतन/पारिश्रमिक) अर्थ में कर्म-सम्बन्ध से कृ धातु से अच् होता है।

3.2.23
न शब्दस्लोककलहगाथावैरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु

IAST na śabda-śloka-kalaha-gāthā-vaira-cāṭu-sūtra-mantra-padeṣu

प्रकार विधि

सार शब्द, श्लोक, कलह, गाथा, वैर, चाटु, सूत्र, मन्त्र और पद के साथ समास में कृ से अच् नहीं होता।

3.2.24
स्तम्बशकृतोरिन्

IAST stamba-śakṛtor in

प्रकार विधि

सार स्तम्ब और शकृत् के साथ समास में धातु से इन् प्रत्यय होता है।

3.2.25
हरतेः दृतिनाथयोः पशौ

IAST harater dṛti-nāthayoḥ paśau

प्रकार विधि

सार पशु-अर्थ में दृति और नाथ के साथ समास होने पर हृ धातु से इन् होता है।

3.2.26
फलेग्रहिरात्मम्भरिश्च

IAST phalegrahir ātmambhariś ca

प्रकार विधि

सार फल तथा आत्मन् उपपदों के साथ ग्रह् एवं भृ धातुओं से फलेग्रहिः और आत्मम्भरिः रूप विशेषतः (निपातन से) सिद्ध होते हैं।

3.2.27
छन्दसि वनसनरक्षिमथां

IAST chandasi vanasanarakṣimathām

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक प्रयोग) में वनसन्, रक्षि और मथि — ये रूप उसी प्रकार विशेषतः सिद्ध होते हैं।

3.2.28
एजेः खश्

IAST ejeḥ khaś

प्रकार विधि

सार एज् धातु से (उपपद-संयोग में) खश् कृत्-प्रत्यय होता है।

3.2.29
नासिकास्तनयोः ध्माधेटोः

IAST nāsikāstanayoḥ dhmādheṭoḥ

प्रकार विधि

सार नासिका अथवा स्तन उपपद होने पर धातुओं ध्मा तथा धेट् (धे) के पश्चात् खश् प्रत्यय होता है।

3.2.30
नाडीमुष्ट्योश्च

IAST nāḍīmuṣṭyoś ca

प्रकार विधि

सार नाडी अथवा मुष्टि उपपद होने पर भी (ध्मा-धेट् के पश्चात्) खश् प्रत्यय होता है।

3.2.31
उदि कूले रुजिवहोः

IAST udi kūle rujivahoḥ

प्रकार विधि

सार उद के योग में कूल उपपद होने पर धातुओं रुज् तथा वह् के पश्चात् खश् प्रत्यय होता है।

3.2.32
वह अभ्रे लिहः

IAST vaha abhre lihaḥ

प्रकार विधि

सार वह अथवा अभ्र उपपद होने पर धातु लिह् से खश् प्रत्यय होता है (वहुलिह, अभ्रलिह)।

3.2.33
परिमाणे पचः

IAST parimāṇe pacaḥ

प्रकार विधि

सार परिमाणवाचक उपपद होने पर धातु पच् से खश् प्रत्यय होता है (प्रस्थपच, द्रोणपच)।

3.2.34
मितनखे च

IAST mitanakhe ca

प्रकार विधि

सार मित अथवा नख उपपद होने पर भी धातु पच् से खश् प्रत्यय होता है (मितपच, नखपच)।

3.2.35
विधु अरुषोः तुदः

IAST vidhu-aruṣos tudaḥ

प्रकार विधि

सार विधु अथवा अरुस् उपपद होने पर धातु तुद् से खश् प्रत्यय होता है (विधुतुद, अरुस्तुद)।

3.2.36
असूर्यललाटयोःदृशितपोः

IAST asūrya-lalāṭayor dṛśi-tapoḥ

प्रकार विधि

सार असूर्य अथवा ललाट उपपद होने पर धातु दृश् तथा तप् से खश् प्रत्यय होता है (असूर्यंपश्य, ललाटंतप)।

3.2.37
उग्रम्पश्य इरम्मदपाणि- ंधमाः

IAST ugrampaśyerammada-pāṇindhamāḥ

प्रकार विधि

सार उग्रंपश्य, इरम्मद तथा पाणिन्धम — ये रूप निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

3.2.38
प्रियवशे वदः खच्

IAST priyavaśe vadaḥ khac

प्रकार विधि

सार प्रिय या वश उपपद रहने पर वद् धातु से खच् प्रत्यय होता है (प्रियंवद, वशंवद)।

3.2.39
द्विषत्त्परयोः तापेः

IAST dviṣatparayos tāpeḥ

प्रकार विधि

सार द्विषत् या पर उपपद रहने पर तप् धातु से खच् प्रत्यय होता है (द्विषंतप, परंतप)।

3.2.40
वाचि यमः व्रते

IAST vāci yamaḥ vrate

प्रकार विधि

सार व्रत अर्थ में वाच् उपपद रहने पर यम् धातु से खच् प्रत्यय होता है (वाचंयम)।

3.2.41
पुर्सर्वयोः दारिसहोः

IAST pursarvayor dārisahoḥ

प्रकार विधि

सार पुर या सर्व उपपद रहने पर दारि और सह धातुओं से खच् प्रत्यय होता है (पुरंदर, सर्वसह)।

3.2.42
सर्वकूल अभ्रकरीषेषु कषः

IAST sarvakūlābhrakarīṣeṣu kaṣaḥ

प्रकार विधि

सार सर्व, कूल, अभ्र या करीष उपपद रहने पर कष् धातु से खच् प्रत्यय होता है (सर्वंकष आदि)।

3.2.43
मेघ ऋतिभयेषु कृञः

IAST megha ṛtibhayeṣu kṛñaḥ

प्रकार विधि

सार मेघ, ऋति या भय उपपद रहने पर कृ धातु से खच् प्रत्यय होता है (मेघंकर, भयंकर आदि)।

3.2.44
क्षेमप्रियमद्रेए अण् च

IAST kṣemapriyamadre aṇ ca

प्रकार विधि

सार क्षेम, प्रिय या मदिर उपपद में कृ धातु से अण् भी होता है (खच् के अतिरिक्त; क्षेमकर आदि)।

3.2.45
आशिते भुवः करणभावयोः

IAST āśite bhuvaḥ karaṇabhāvayoḥ

प्रकार विधि

सार करण या भाव अर्थ में आशित उपपद रहने पर भू धातु से खच् प्रत्यय होता है (आशितंभव)।

3.2.46
संज्ञा यां भृतॄ वृजिधारिशहितपिदमः

IAST saṃjñāyāṃ bhṛtṝvṛjidhāriśahitapidamaḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नाम) बनाने में भृ, तॄ, वृ, जि, धारि, सह, तपि और दम धातुओं से खच् प्रत्यय होता है।

3.2.47
गमश्च

IAST gamaś ca

प्रकार विधि

सार संज्ञा में गम् धातु से भी पूर्ववत् (खच्) प्रत्यय होता है।

3.2.48
अन्त अत्यन्त अध्व(न्)दूरपारसर्वानन्तेषु डः

IAST anta atyanta adhva(n)dūrapārasarvānanteṣu ḍaḥ

प्रकार विधि

सार अन्त, अत्यन्त, अध्वन्, दूर, पार, सर्व या अनन्त उपपद रहने पर (गम् से) ड प्रत्यय होता है (अन्तग, पारग आदि)।

3.2.49
आशिषि हनः

IAST āśiṣi hanaḥ

प्रकार विधि

सार आशिस् (आशीर्वाद/अभिशाप) अर्थ में हन् धातु से ड प्रत्यय होता है।

3.2.50
अपे क्लेशतमसोः

IAST ape kleśatamasoḥ

प्रकार विधि

सार अप उपपद रहने पर क्लेश-अर्थ या तमस्-अर्थ धातु से ड प्रत्यय होता है।

3.2.51
कुमारशीर्षयोह् णिनिः

IAST kumāraśīrṣayoḥ ṇiniḥ

प्रकार विधि

सार कुमार और शीर्ष उपपद होने पर धातु से णिनि प्रत्यय होता है।

3.2.52
लक्षणे जायापत्योः टक्

IAST lakṣaṇe jāyāpatyoḥ ṭak

प्रकार विधि

सार लक्षण अर्थ में जाया और अपत्य उपपद होने पर धातु से टक् प्रत्यय होता है।

3.2.53
अमनुष्यकर्तृके च

IAST amanuṣyakartṛke ca

प्रकार विधि

सार कर्ता अमनुष्य होने पर भी (टक्) होता है।

3.2.54
शक्तौ हस्ति(न्)कपाटयोः

IAST śaktau hastikapāṭayoḥ

प्रकार विधि

सार शक्ति अर्थ में हस्तिन् और कपाट उपपद होने पर धातु से (णिनि) प्रत्यय होता है।

3.2.55
पाणिघताडघौ शिल्पिनि

IAST pāṇighatāḍaghau śilpini

प्रकार विधि

सार शिल्पी अर्थ में पाणिघ और ताडघ रूप (घ-प्रत्यय से) सिद्ध होते हैं।

3.2.56
आढ्यसुभगस्थूलपलितनग्न अन्धप्रियेषु च्वि र्थेषु अच्वौ कृञः करणे ख्युन्

IAST āḍhyasubhagasthūlapalitanagnāndhapriyeṣu cvirtheṣv acvau kṛñaḥ karaṇe khyun

प्रकार विधि

सार आढ्य, सुभग, स्थूल, पलित, नग्न, अन्ध, प्रिय के च्वि-अर्थ में (बिना च्वि के) कृ से करण अर्थ में ख्युन् होता है।

3.2.57
कर्तरि भुवः खिष्णुच्खुकञौ

IAST kartari bhuvaḥ khiṣṇuckukañau

प्रकार विधि

सार कर्ता अर्थ में भू धातु से खिष्णुच् और खुकञ् प्रत्यय होते हैं।

3.2.58
स्पृशः अनुदके क्विन्

IAST spṛśo ’nudake kvin

प्रकार विधि

सार उदक-भिन्न अर्थ में स्पृश् धातु से क्विन् प्रत्यय होता है।

3.2.59
ऋत्विज् दधृष्स्रज् दिश् उष्णिह् अञ्चु युजिक्रुञ्चां च

IAST ṛtvij dadhṛṣsraj diś uṣṇih añcu yujikruñcāṃ ca

प्रकार विधि

सार ऋत्विज्, दधृष्, स्रज्, दिश्, उष्णिह्, अञ्चु, युज् और क्रुञ्च् से भी (क्विन्) होता है।

3.2.60
त्यदादिषु दृशः अणालोचने कञ् च

IAST tyadādiṣu dṛśo ’ṇālocane kañ ca

प्रकार विधि

सार त्यदादि उपपद होने पर दृश् से आलोचन-भिन्न अर्थ में अण् तथा कञ् भी होते हैं।

3.2.61
सद् सूद्विषद्रुहदुहयुजविदभिदछिदजिनीराजां उपसर्गे अपि क्विप्

IAST sad sūdviṣadruhaduhayujavidabhidachidajinīrājām upasarge ’pi kvip

प्रकार विधि

सार सद्, सू, द्विष्, द्रुह्, दुह्, युज्, विद्, भिद्, छिद्, जि, नी, राज् से उपसर्ग होने पर भी क्विप् होता है।

3.2.62
भजः ण्विः

IAST bhajaḥ ṇviḥ

प्रकार विधि

सार भज् धातु से ण्वि प्रत्यय होता है।

3.2.63
छन्दसि सहः

IAST chandasi sahaḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में सह् धातु से भी (ण्वि) होता है।

3.2.64
वहश्च

IAST vahaś ca

प्रकार विधि

सार (छन्दस् में) वह् धातु से भी (ण्वि) होता है।

3.2.65
कव्यपुरीषपुरीष्येषु ञ्युट्

IAST kavyapurīṣapurīṣyeṣu ṇyut

प्रकार विधि

सार कव्य, पुरीष और पुरीष्य उपपद होने पर धातु से ञ्युट् प्रत्यय होता है।

3.2.66
हव्ये अनन्तःपादं

IAST havye ’nantaḥpādam

प्रकार विधि

सार हव्य उपपद होने पर (ञ्युट्) होता है, परन्तु पाद के अन्त में नहीं।

3.2.67
जनसनखनक्रमगमो विट्

IAST janasanakhanakramagamo viṭ

प्रकार विधि

सार जन्, सन्, खन्, क्रम् और गम् धातुओं से विट् प्रत्यय होता है।

3.2.68
अदः अन् अन्ने

IAST ado ’n anne

प्रकार विधि

सार अन्न अर्थ में अद् धातु से अन् प्रत्यय होता है।

3.2.69
क्रव्ये च

IAST kravye ca

प्रकार विधि

सार क्रव्य अर्थ/उपपद में भी अद् से (अन्) होता है।

3.2.70
दुहः कप् घश्च

IAST duhaḥ kap ghaś ca

प्रकार विधि

सार दुह् धातु से कप् और घ प्रत्यय होते हैं।

3.2.71
मन्त्रे श्वेतवहौक्थशः पुरो- डाशो ण्विन्

IAST mantre śvetavahaukthaśaḥ puroḍāśo ṇvin

प्रकार विधि

सार मन्त्र में श्वेतवह्, ओक्थश और पुरोडाश् रूपों में ण्विन् प्रत्यय होता है।

3.2.72
अवे यजः

IAST ave yajaḥ

प्रकार विधि

सार अव्-पूर्वक यज् धातु से (ण्विन्) होता है।

3.2.73
विच् उपे छन्दसि

IAST vic upe chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में उप्-पूर्वक (यज् आदि) से विच् प्रत्यय होता है।

3.2.74
आतः मनिन् क्वनिप्वनिपश्च

IAST āto manin kvanipvanipaś ca

प्रकार विधि

सार आकारान्त धातुओं से मनिन्, क्वनिप् और वनिप् प्रत्यय होते हैं।

3.2.75
अन्येभ्यः अपि दृश्यन्ते

IAST anyebhyo ’pi dṛśyante

प्रकार अतिदेश

सार ये (पूर्वोक्त) प्रत्यय अन्य धातुओं से भी प्रयोग में दिखाई देते हैं।

3.2.76
क्विप् च

IAST kvi p ca

प्रकार विधि

सार पूर्व-निर्दिष्ट धातुओं से (अन्य प्रत्ययों के साथ) क्विप् प्रत्यय भी होता है।

3.2.77
स्थः क च

IAST sthaḥ ka ca

प्रकार विधि

सार स्था धातु से क् तथा क्विप् प्रत्यय होते हैं।

3.2.78
सुप्य् अजातौ णिनिः ताच्छिल्ये

IAST supy ajātau ṇiniḥ tācchīlye

प्रकार विधि

सार सुबन्त (समास-पूर्वपद) रहने पर जातिभिन्न अर्थ में ताच्छील्य (शील/आदत) बताने के लिए धातु से णिनि होता है।

3.2.79
कर्तरि उपमाने

IAST kartari upamāne

प्रकार विधि

सार जब कर्ता उपमान हो तब (सुबन्त-युक्त धातु से) णिनि होता है।

3.2.80
व्रते

IAST vrate

प्रकार विधि

सार व्रत/नियम-पालन के अर्थ में (सुबन्त-युक्त धातु से) णिनि होता है।

3.2.81
बहुलं आभीक्ष्ण्ये

IAST bahulam ābhīkṣṇye

प्रकार विधि

सार आभीक्ष्ण्य (पौनःपुन्य/बार-बार करना) के अर्थ में (णिनि) बहुल विधान से होता है।

3.2.82
मनः

IAST manaḥ

प्रकार विधि

सार मन् धातु से (पूर्व-अर्थों में) णिनि होता है।

3.2.83
आत्ममाने खश्च

IAST ātmamāne khaś ca

प्रकार विधि

सार आत्ममान (अपने को कुछ मानना/अभिमान) के अर्थ में (मन् से) खश् प्रत्यय भी होता है।

3.2.84
भूते

IAST bhūte

प्रकार अधिकार

सार आगे के प्रत्यय-विधान भूतार्थ (बीते हुए काल) में लागू होते हैं।

3.2.85
करणे यजः

IAST karaṇe yajaḥ

प्रकार विधि

सार यज् धातु से करणार्थे (भूते) क्विप्-परम्परा का प्रत्यय होता है।

3.2.86
कर्मणि हनः

IAST karmaṇi hanaḥ

प्रकार विधि

सार हन् धातु से कर्मण्यर्थे (भूते) क्विप्-परम्परा का प्रत्यय होता है।

3.2.87
ब्रह्म्(न्)भ्रूणवृत्रेषु क्विप्

IAST brahmabhrūṇavṛtreṣu kvip

प्रकार विधि

सार ब्रह्मन्, भ्रूण या वृत्र कर्म रहने पर हन् धातु से क्विप् होता है।

3.2.88
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक प्रयोग) में (हनः क्विप् आदि) बहुल विधान से होते हैं।

3.2.89
सुकर्म(न्)पापमन्त्रपुण्येसु कृञः

IAST sukarmapāpamantrapuṇyeṣu kṛñaḥ

प्रकार विधि

सार सुकर्मन्, पाप, मन्त्र या पुण्य कर्म रहने पर कृ धातु से (भूते) क्विप् होता है।

3.2.90
सोमे सुञः

IAST some suñaḥ

प्रकार विधि

सार सोम कर्म रहने पर सु (अभिषव) धातु से (भूते) क्विप् होता है।

3.2.91
अग्नौ चेः

IAST agnau ceḥ

प्रकार विधि

सार अग्नि (कर्म/अधिकरण) रहने पर चि धातु से (भूते) क्विप् होता है।

3.2.92
कर्मणि अग्नि आख्यायां

IAST karmaṇy agnyākhyāyām

प्रकार विधि

सार अग्नि-आख्या (अग्नि नाम वाले) कर्म रहने पर (चि आदि से भूते) क्विप् होता है।

3.2.93
कर्मणि इनिः विक्रियः

IAST karmaṇi iniḥ vikriyaḥ

प्रकार विधि

सार विक्रिय (विकार/परिवर्तन) अर्थ वाले धातु से कर्मण्यर्थे इनि प्रत्यय होता है।

3.2.94
दृशेः क्वनिप्

IAST dṛśeḥ kvanip

प्रकार विधि

सार दृश् धातु से क्वनिप् प्रत्यय होता है।

3.2.95
राजनि युधिकृञः

IAST rājani yudhikṛñaḥ

प्रकार विधि

सार राजन् (सुबन्त) रहने पर युध् तथा कृ धातुओं से क्वनिप् होता है।

3.2.96
सहे च

IAST sahe ca

प्रकार विधि

सार सह् धातु से भी (राजन् सुबन्त रहने पर) क्वनिप् होता है।

3.2.97
सप्तम्यां जनेर्डः

IAST saptamyāṃ janeḍ ḍaḥ

प्रकार विधि

सार सप्तमी-अर्थ वाले सुबन्त के साथ जन् धातु से ड प्रत्यय होता है।

3.2.98
पञ्चम्यां अजातौ

IAST pañcamyām ajātau

प्रकार विधि

सार पञ्चमी-अर्थ वाले सुबन्त के साथ, जातिभिन्न अर्थ में, जन् धातु से ड होता है।

3.2.99
उपसर्गे च संज्ञायां

IAST upasarge ca saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार उपसर्ग रहने पर संज्ञा में भी जन् धातु से ड होता है।

3.2.100
अनौ कर्मणि

IAST anau karmaṇi

प्रकार विधि

सार अन् उपसर्ग रहने पर कर्मण्यर्थे जन् धातु से ड होता है।

3.2.101
अन्येषु अपि दृश्यते

IAST anyeṣu api dṛśyate

प्रकार अतिदेश

सार पूर्वोक्त भूतार्थ-कृत्प्रयोग अन्य धातुओं/विषयों में भी प्रयुक्त देखे जाते हैं।

3.2.102
निष्ठा

IAST niṣṭhā

प्रकार विधि

सार भूतार्थ में निष्ठा (क्त और क्तवतु) प्रत्यय होते हैं।

3.2.103
सुयजोर्ङ्वनिप्

IAST suyajor ṅvanip

प्रकार विधि

सार सु और यज् धातु से भूतार्थ में ङ्वनिप् प्रत्यय होता है।

3.2.104
जीर्यतेरतृन्

IAST jīryater atṛn

प्रकार विधि

सार जॄ (जीर्यति) धातु से भूतार्थ में अतृन् प्रत्यय होता है।

3.2.105
छन्दसि लिट्

IAST chandasi liṭ

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक भाषा) में भूतार्थ में लिट् लकार होता है।

3.2.106
लिटः कानच् वा

IAST liṭaḥ kānac vā

प्रकार विधि

सार लिट् के स्थान पर विकल्प से कानच् प्रत्यय होता है।

3.2.107
क्वसुः च

IAST kvasuḥ ca

प्रकार विधि

सार लिट् के स्थान पर क्वसु प्रत्यय भी होता है।

3.2.108
भाषायां सदवसश्रुवः

IAST bhāṣāyāṃ sadavasaśruvaḥ

प्रकार विधि

सार लौकिक भाषा में सद्, वस् और श्रु धातुओं से (क्वसु आदि) होते हैं।

3.2.109
उपेयिवान् अनाश्वान् अनूचानसः च

IAST upeyiivān anāśvān anūcānaś ca

प्रकार विधि

सार उपेयिवान्, अनाश्वान् और अनूचान — ये रूप भी साधु माने जाते हैं।

3.2.110
लुङ्

IAST luṅ

प्रकार विधि

सार भूतार्थ में लुङ् लकार होता है।

3.2.111
अनद्यतने लङ्

IAST anadyatane laṅ

प्रकार विधि

सार अद्यतन-भिन्न भूतकाल में लङ् लकार होता है।

3.2.112
अभिज्ञावचने लृट्

IAST abhijñāvacane lṛṭ

प्रकार विधि

सार अभिज्ञा (स्मरण) के कथन में भूतार्थ के लिए लृट् होता है।

3.2.113
न यदि

IAST na yadi

प्रकार विधि

सार यदि-शब्द होने पर (अभिज्ञा-लृट् का) प्रतिषेध होता है।

3.2.114
विभाषा साकाङ्क्षे

IAST vibhāṣā sākāṅkṣe

प्रकार विधि

सार साकाङ्क्ष (अपूर्ण/आकाङ्क्षायुक्त) वाक्य में उक्त प्रतिषेध विकल्प से होता है।

3.2.115
परोक्षे लिट्

IAST parokṣe liṭ

प्रकार विधि

सार परोक्ष (अप्रत्यक्ष/दूर) भूत में लिट् लकार होता है।

3.2.116
हशश्वतोर्लङ् च

IAST haśaśvator laṅ ca

प्रकार विधि

सार ह और शश्वत् के योग में लङ् भी होता है।

3.2.117
प्रश्ने च आसन्नकाले

IAST praśne ca āsannakāle

प्रकार विधि

सार आसन्नकाल-विषयक प्रश्न में भी (लङ्) होता है।

3.2.118
लट् स्मे

IAST laṭ sme

प्रकार विधि

सार स्म के योग में (भूतार्थ के लिए) लट् होता है।

3.2.119
अपरोक्षे च

IAST aparokṣe ca

प्रकार विधि

सार अपरोक्ष भूत में भी (स्म-योग से लट्) होता है।

3.2.120
ननौ पृष्टप्रतिवचने

IAST nanau pṛṣṭaprativacane

प्रकार विधि

सार ननु के योग में, पूछे गए प्रश्न के उत्तर में (लट्) होता है।

3.2.121
नन्वोर्विभाषा

IAST nanvor vibhāṣā

प्रकार विधि

सार ननु और नु के योग में उक्त प्रयोग विकल्प से होता है।

3.2.122
पुरि लुङ् च अस्मे

IAST puri luṅ ca asme

प्रकार विधि

सार पुरा के योग में, स्म के अभाव में, लुङ् भी होता है।

3.2.123
वर्तमाने लट्

IAST vartamāne laṭ

प्रकार विधि

सार वर्तमान काल में लट् लकार होता है।

3.2.124
लटः शतृशनचौ अरथमाअमान धिअरणे

IAST laṭaḥ śatṛśānacāv aprathamāsamānādhikaraṇe

प्रकार विधि

सार लट् के स्थान पर शतृ और शानच् तब होते हैं जब वे प्रथम पुरुष के समान-अधिकरण न हों।

3.2.125
सम्बोधने च

IAST sambodhane ca

प्रकार विधि

सार सम्बोधन में भी (लट् के स्थान पर शतृ-शानच्) होते हैं।

3.2.126
लक्षणहेत्वोः क्रियायाः

IAST lakṣaṇahetvoḥ kriyāyāḥ

प्रकार विधि

सार लक्षण (विशेष चिह्न) अथवा हेतु (कारण) भाव से कही गई क्रिया में भी लट् के स्थान पर शतृ/शानच् होते हैं।

3.2.127
तौ सत्

IAST tau sat

प्रकार सञ्ज्ञा

सार वे दोनों (शतृ और शानच्) सत् संज्ञा वाले होते हैं।

3.2.128
पूङ्यजोः शानन्

IAST pūṅyajoḥ śānan

प्रकार विधि

सार पूङ् और यज् धातुओं से (सत्-अर्थ में) शानन् प्रत्यय होता है (पवमान, यजमान)।

3.2.129
ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश्

IAST tācchīlyavayovacanaśaktiṣu cānaś

प्रकार विधि

सार ताच्छील्य, वयो-वचन और शक्ति—इन अर्थों में चानश् प्रत्यय होता है।

3.2.130
इङ् धार्योः शतृ ऋच्छ्रिणि

IAST iṅdhāryoḥ śatṛcchriṇi

प्रकार विधि

सार इङ् और धारी धातुओं से ऋच्छ्रि (इच्छा/आकाङ्क्षा) अर्थ में शतृ होता है।

3.2.131
द्विषः अमित्रे

IAST dviṣo 'mitre

प्रकार विधि

सार द्विष् धातु से अमित्र (शत्रु) अर्थ में शतृ होता है।

3.2.132
सुञः यज्ञसंयोगे

IAST sujo yajñasaṃyoge

प्रकार विधि

सार सुञ् धातु से यज्ञ-संयोग अर्थ में शतृ होता है।

3.2.133
अर्हः पूजायां

IAST arhaḥ pūjāyām

प्रकार विधि

सार अर्ह् धातु से पूजा (सम्मान/योग्यता) अर्थ में शतृ होता है।

3.2.134
आक्वेः तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु

IAST ākves tacchīlataddharmatatsādhukāriṣu

प्रकार अधिकार

सार आ से क्वि तक के प्रत्यय तच्छील, तद्धर्म और तत्साधुकारिन्—इन अर्थों में विहित होते हैं।

3.2.135
तृन्

IAST tṛn

प्रकार विधि

सार (तच्छील-तद्धर्म-तत्साधुकारि अर्थों में) तृन् प्रत्यय होता है।

3.2.136
अलंकृञ्निराकृञ्प्रजन उत्पच उत्पत उन्मदरुचिअपत्रपवृतुवृधुसहचर इष्णुच्

IAST alaṃkṛñnirākṛñprajanutpacutpatunmadarucyapatrapavṛtuvṛdhusahacara iṣṇuc

प्रकार विधि

सार अलंकृञ्, निराकृञ्, प्रजन्, उत्पच्, उत्पत्, उन्मद्, रुचि, अपत्रप्, वृत्, वृध्, सह् और चर्—इनसे इष्णुच् होता है।

3.2.137
णेश् छन्दसि

IAST ṇeś chandasi

प्रकार विधि

सार णि (प्रेरणार्थक) से छन्दस् में (इष्णुच्) होता है।

3.2.138
भुवश्च

IAST bhuvaś ca

प्रकार विधि

सार भू धातु से भी (इष्णुच्) होता है।

3.2.139
ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः

IAST glājisthaś ca ksnuḥ

प्रकार विधि

सार ग्ला, जि और स्था धातुओं से क्स्नु प्रत्यय होता है।

3.2.140
त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः

IAST trasigṛdhidhṛṣikṣipeḥ knuḥ

प्रकार विधि

सार त्रस्, गृध्, धृष् और क्षिप् धातुओं से क्नु प्रत्यय होता है।

3.2.141
शमिति अष्टाभ्यः घिनुण्

IAST śamity aṣṭābhyo ghinuṇ

प्रकार विधि

सार शम् से आरम्भ कर आठ धातुओं से घिनुण् प्रत्यय होता है।

3.2.142
संपृच अनुरुध आङ्यम आङ्यसपरिसृसंसृजपरिदेविसंज्वर परिक्षिपपरिवदपरिदहपरिमुहदुषद्विषद्रुहदुहयुजआक्रीड- विविचत्यजरजभज अतिचर अपचर आमुष अभ्याहनश्च

IAST saṃpṛcānurudhāṅyamāṅyasaparisṛsaṃsṛjaparidevisaṃjvaraparikṣipaparivadaparidahaparimuhaduṣadviṣadruḥaduḥayujākrīḍavivicatya jarajabhajaticarāpacarāmuṣābhyāhanaś ca

प्रकार विधि

सार संपृच्, अनुरुध्, आङ्यम्, आङ्यस्, परिसृ, संसृज्, परिदेवि, संज्वर्, परिक्षिप्, परिवद्, परिदह्, परिमुह्, दुष्, द्विष्, द्रुह्, दुह्, युज्, आक्रीड्, विविच्, त्यज्, रज्, भज्, अतिचर्, अपचर्, आमुष् और अभ्याहन्—इनसे भी घिनुण् होता है।

3.2.143
वौ कषलसकत्थस्रम्भः

IAST vau kaṣalasakatthasrambhaḥ

प्रकार विधि

सार वि उपसर्ग-पूर्वक कष्, लस्, कत्थ् और स्रम्भ् से (घिनुण्) होता है।

3.2.144
अपे च लषः

IAST ape ca laṣaḥ

प्रकार विधि

सार अप उपसर्ग-पूर्वक लष् से भी (घिनुण्) होता है।

3.2.145
प्रे लपसृद्रुमथवदवसः

IAST pre lapasṛdrumathavadavasaḥ

प्रकार विधि

सार प्र उपसर्ग-पूर्वक लप्, सृ, द्रु, मथ्, वद् और वस् से (घिनुण्) होता है।

3.2.146
निन्दहिंसक्लिशखादविनाशपरिक्लिशपरिरटपरिवादिव्याभाष असूयः वुञ्

IAST nindahiṃsakliśakhādavināśaparikliśapariraṭaparivādivyābhāṣāsūyaḥ vuñ

प्रकार विधि

सार निन्द्, हिंस्, क्लिश्, खाद्, विनाश्, परिक्लिश्, परिरट्, परिवादि, व्याभाष् और असूय—इनसे वुञ् प्रत्यय होता है।

3.2.147
देविक्रुशोः च उपसर्गे

IAST devikruśoś copasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-युक्त देवि और क्रुश् से भी (वुञ्) होता है।

3.2.148
चलनशब्द र्थात् अकर्मकात् उच्

IAST calanaśabdārthād akarmakād uc

प्रकार विधि

सार चलनार्थक अथवा शब्दार्थक अकर्मक धातुओं से उच् प्रत्यय होता है।

3.2.149
अनुदात्त इतः च हलादेः

IAST anudāttitaś ca hālādeḥ

प्रकार विधि

सार अनुदात्त-इत् वाले हलादि धातुओं से भी (उच्) होता है।

3.2.150
जुचङ्क्रम्यदन्द्रम्यसृगृधिज्वलशुचलषपतपदः

IAST jucaṅkramyadandramyasṛgṛdhijvalaśucalaṣapatapadaḥ

प्रकार विधि

सार जु, चङ्क्रम्य, दन्द्रम्य, सृ, गृध्, ज्वल्, शुच्, लष्, पत् और पद्—इनसे (उच्) होता है।

3.2.151
क्रुधमण्ड अर्थेभ्यः च

IAST krudhamaṇḍārthebhyaś ca

प्रकार विधि

सार क्रुध-धातु तथा मण्ड (=अलङ्कार) अर्थ वाले धातुओं से (तच्छीलादि में) क्नु प्रत्यय होता है।

3.2.152
न यः

IAST na yaḥ

प्रकार नियम

सार (पूर्वोक्त ताच्छील्य-प्रकरण में) य प्रत्यय नहीं होता।

3.2.153
सूददीपदीक्षः च

IAST sūdadīpadīkṣaś ca

प्रकार विधि

सार सूद, दीप और दीक्ष धातुओं से भी ताच्छील्य में युच् होता है।

3.2.154
लषपतपदस्थाभूवृषहनकमगमशॄभ्यः उकञ्

IAST laṣapatapadasthābhūvṛṣahanakamagamaśṝbhya ukañ

प्रकार विधि

सार लष्, पत्, पद्, स्था, भू, वृष्, हन्, कम्, गम् और शॄ धातुओं से (तच्छीलादि में) उकञ् प्रत्यय होता है।

3.2.155
जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङ्ह्यः षाकन्

IAST jalpabhikṣakuṭṭaluṇṭavṛṅhyaḥ ṣākan

प्रकार विधि

सार जल्प, भिक्ष्, कुट्ट्, लुण्ट् और वृह् धातुओं से (तच्छीलादि में) षाकन् प्रत्यय होता है।

3.2.156
प्रजोरिनिः

IAST prajoriniḥ

प्रकार विधि

सार प्र-पूर्वक जु धातु से (तच्छीलादि में) इनि प्रत्यय होता है।

3.2.157
जिदृक्षिविश्रि इण्वम अव्यथ अभ्यमपरिभूप्रसूभ्यः च

IAST jidṛkṣiviśriṇvamavyathābhyamapari bhūprasūbhyaś ca

प्रकार विधि

सार जि, दृक्षि, विश्रि, इण्, वम्, अव्यथ, अभ्यम्, परिभू और प्रसू धातुओं से भी इनि प्रत्यय होता है।

3.2.158
स्पृहिगृहिपतिदयिनिद्रातन्द्राश्रद्धाभ्यः आलुच्

IAST spṛhigṛhipatidayinidrātandrāśraddhābhya āluc

प्रकार विधि

सार स्पृह्, गृध्, पति, दय् तथा निद्रा, तन्द्रा, श्रद्धा से स्वभाव/ताच्छील्य में आलुच् प्रत्यय होता है।

3.2.159
दाधेट्सिशदसदः उः

IAST dādheṭsiśadasadaḥ uḥ

प्रकार विधि

सार दा, धेट्, सि, शद् और सद् धातुओं से (तच्छीलादि में) उ प्रत्यय होता है।

3.2.160
सृघसि अदः क्मरच्

IAST sṛghasyadaḥ kmarac

प्रकार विधि

सार सृ, घस् और अद् धातुओं से (तच्छीलादि में) क्मरच् प्रत्यय होता है।

3.2.161
भञ्जभासमिदः घुरच्

IAST bhañjabhāsamidaḥ ghurac

प्रकार विधि

सार भञ्ज्, भास् और मिद् धातुओं से (तच्छीलादि में) घुरच् प्रत्यय होता है।

3.2.162
विदिभिदिच्छिदेः कुरच्

IAST vidibhidicchideḥ kurac

प्रकार विधि

सार विद्, भिद् और छिद् धातुओं से (तच्छीलादि में) कुरच् प्रत्यय होता है।

3.2.163
इण्नश्जिसर्तिभ्यः क्वरप्

IAST iṇnaśjisartibhyaḥ kvarap

प्रकार विधि

सार धातुओं इण्, नश्, जि और सृ (सर्ति) के बाद कृत्-प्रत्यय क्वरप् होता है (इत्वर, नश्वर, जित्वर, सृत्वर)।

3.2.164
गत्वरः च

IAST gatvaraś ca

प्रकार विधि

सार गम् से भी क्वरप् होता है; गत्वर रूप निपातन/अनुलग्न विधि से सिद्ध होता है।

3.2.165
जागुरूकः

IAST jāgarūkaḥ

प्रकार विधि

सार जागरूक रूप (जागृ से ऊक) निपातन/विधि से सिद्ध होता है।

3.2.166
यजजपदशां यङः

IAST yajajapadaśāṃ yaṅaḥ

प्रकार विधि

सार यङ्युक्त यज्, जप् और दश् के बाद ऊक होता है (यायाजूक, जञ्जपूक, दन्दशूक)।

3.2.167
नमिकम्पिस्मि अजसकमहिंसदीपः रः

IAST namikampismi ajasakamahiṃsadīpaḥ raḥ

प्रकार विधि

सार नम्, कम्प्, स्मि, अजस्, कम्, अहिंस् और दीप् के बाद कृत्-प्रत्यय र होता है (नम्र, कम्प्र, स्मेर, अजस्र इत्यादि)।

3.2.168
सन् आशंसभिक्षः उः

IAST san āśaṃsabhikṣaḥ uḥ

प्रकार विधि

सार सन्-प्रत्ययान्त धातुओं तथा आशंस् और भिक्ष् के बाद कृत्-प्रत्यय उ होता है (चिकीर्षु, आशंसु, भिक्षु)।

3.2.169
विन्दुरिच्छुः

IAST vinduricchuḥ

प्रकार विधि

सार कर्तरि अर्थ में धातु से विन्दु और इच्छु प्रत्यय होते हैं।

3.2.170
क्यात् छन्दसि

IAST kyāt chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक प्रयोग) में कर्तरि अर्थ में क्यात् प्रत्यय होता है।

3.2.171
आतृगमहनजनः किकिनौ लिट् च

IAST ādr̥gamahanajanaḥ kikkinau liṭ ca

प्रकार विधि

सार आदृ, गम्, हन् और जन् धातुओं से कि तथा किन् प्रत्यय होते हैं, और लिट् भी (कृद्वत्) प्रयुक्त होता है।

3.2.172
स्वपितृषोः नजिङ्

IAST svapitṛṣoḥ najiṅ

प्रकार विधि

सार धातुओं स्वप् और तृष् के परे नजिङ् प्रत्यय होता है (स्वप्नज्, तृष्णज्)।

3.2.173
शॄवन्द्योरारुः

IAST śṝvandyor āruḥ

प्रकार विधि

सार धातुओं शॄ और वन्द् के परे आरु प्रत्यय होता है (शरारु, वन्दारु)।

3.2.174
भियः क्रुक्लुकनौ

IAST bhiyaḥ kruklukanau

प्रकार विधि

सार धातु भी के परे क्रु और क्लुकन् प्रत्यय होते हैं (भीरु, भीलुक)।

3.2.175
स्था- ईशभासपिसकसः वरच्

IAST sthā-īśabhāsapisakasaḥ varac

प्रकार विधि

सार धातुओं स्था, ईश्, भास, पिस् और कस् के परे वरच् प्रत्यय होता है (स्थावर, ईश्वर, भास्वर, पेस्वर, कस्वर)।

3.2.176
यः च यङः

IAST yaś ca yaṅaḥ

प्रकार विधि

सार यकारान्त धातुओं से तथा यङ्-प्रत्ययान्त से (पूर्वानुवृत्त) वरच् प्रत्यय होता है।

3.2.177
भ्राजभासधुर्विद्युत ऊर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप्

IAST bhrājabhāṣadhurvidyutorjipṝjugrāvastuvaḥ kvip

प्रकार विधि

सार भ्राज्, भास्, धुर्, विद्युत्, ऊर्ज्, पॄ, जु और ग्रावस्तुव् धातुओं से कर्तरि क्विप् प्रत्यय होता है।

3.2.178
अन्येभ्यः अपि दृश्यते

IAST anyebhyo 'pi dṛśyate

प्रकार अतिदेश

सार क्विप् अन्य धातुओं से भी प्रयोग में देखा जाता है।

3.2.179
भुवः संज्ञा अन्तरयोः

IAST bhuvaḥ saṃjñāntarayoḥ

प्रकार विधि

सार भू धातु से संज्ञा में तथा ‘अन्तर’ अर्थ में क्विप् होता है।

3.2.180
विप्रसम्भ्यः डु असंज्ञायां

IAST viprasambhyaḥ ḍu asaṃjñāyām

प्रकार विधि

सार वि, प्र अथवा सम्-पूर्वक भू से असंज्ञा में डु प्रत्यय होता है।

3.2.181
धः कर्मणि ष्ट्रन्

IAST dhaḥ karmaṇi ṣṭran

प्रकार विधि

सार धकारान्त धातु से कर्म कारक में ष्ट्रन् प्रत्यय होता है।

3.2.182
दाप्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे

IAST dāpnīśasayuyujastutudasisicamihapatadaśanahaḥ karaṇe

प्रकार विधि

सार दाप्, नी, शस्, यु, युज्, स्तु, तुद्, सि, सिच्, मिह्, पत्, दश् और नह् धातुओं से करण अर्थ में ष्ट्रन् होता है।

3.2.183
हलसूकरयोः पुवः

IAST halsūkarayoḥ puvaḥ

प्रकार नियम

सार पू धातु से ष्ट्रन् केवल हल और सूकर अर्थ/संज्ञा में होता है।

3.2.184
अर्तिलूधूसूखनशहचरः इत्रः

IAST artilūdhūsūkhanasahacara itraḥ

प्रकार विधि

सार ऋ (अर्ति), लू, धू, सू, खन्, सह् और चर् धातुओं से इत्र प्रत्यय होता है।

3.2.185
पुवः संज्ञायां

IAST puvaḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार पू धातु से संज्ञा में इत्र प्रत्यय होता है।

3.2.186
कर्तरि च ऋषिदेवतयोः

IAST kartari ca ṛṣidevatayoḥ

प्रकार विधि

सार (पूर्वोक्त इत्र) कर्तरि भी होता है, तथा ऋषि और देवता वाचक प्रयोग में भी।

3.2.187
ञि इतः क्तः

IAST ñitaḥ ktaḥ

प्रकार विधि

सार ञित् धातुओं से (कर्तरि) क्त प्रत्यय होता है।

3.2.188
मतिबुद्धिपूजा अर्थेभ्यः च

IAST matibuddhipūjārthebhyaś ca

प्रकार विधि

सार मति, बुद्धि और पूजा अर्थ वाली धातुओं से भी (कर्तरि) क्त होता है।

अध्याय 3 · पाद 3 (176 सूत्र)

3.3.1
उण् आदयः बहुलं

IAST uṇādayo bahulam

प्रकार विधि

सार उण् आदि प्रत्यय धातुओं से बहुधा/अनियमित रीति से प्रवृत्त होते हैं।

3.3.2
भूते अपि दृश्यन्ते

IAST bhūte 'pi dṛśyante

प्रकार अतिदेश

सार उणादि-प्रत्ययान्त रूप भूतकाल के अर्थ में भी दिखाई देते हैं।

3.3.3
भविष्यति गमि(न्)आदयः

IAST bhaviṣyati gamyādayaḥ

प्रकार विधि

सार भविष्यत् अर्थ में गम्यादि प्रत्यय होते हैं।

3.3.4
यावत्पुरानिपातयोः लट्

IAST yāvatpurānipātayor laṭ

प्रकार विधि

सार यावत् और पुरा इन निपातों के योग में वर्तमान (लट्) प्रयुक्त होता है।

3.3.5
विभाषा कदाकर्ह्योः

IAST vibhāṣā kadākarhyoḥ

प्रकार विधि

सार कदा और कर्हि के योग में लट् वैकल्पिक है।

3.3.6
किंवृत्ते लिप्सायां

IAST kiṃvṛtte lipsāyām

प्रकार विधि

सार किं-प्रत्ययान्त पदों के योग में लिप्सा (प्राप्ति-इच्छा) होने पर लट् होता है।

3.3.7
लिप्स्यंआनसिद्धौ च

IAST lipsyānāsiddhau ca

प्रकार विधि

सार लिप्स्य की असिद्धि (अभी अप्राप्त) होने पर भी लट् होता है।

3.3.8
लोट् अर्थलक्षणे च

IAST loṭ cārthalakṣaṇe

प्रकार विधि

सार अर्थ-लक्षण (हेतु/प्रयोजन-निर्देश) में लोट् भी होता है।

3.3.9
लिङ् च ऊर्ध्वमौहूर्तिके

IAST liṅ cordhvamauhūrtike

प्रकार विधि

सार एक मुहूर्त से अधिक काल वाले भविष्य में लिङ् भी होता है।

3.3.10
तुमुन् ण्वुलौ क्रियायां क्रियाअर्थायाम्

IAST tumunṇvulau kriyāyāṃ kriyārthāyām

प्रकार विधि

सार क्रियार्थक क्रिया (दूसरी क्रिया के लिए की जाने वाली क्रिया) में तुमुन् और ण्वुल् होते हैं।

3.3.11
भाववचनाश्च

IAST bhāvavacanāś ca

प्रकार विधि

सार भाववाचक (अर्थ/क्रिया-भाव व्यक्त करने वाले) शब्दों में भी तुमुन्-ण्वुल् होते हैं।

3.3.12
अण् कर्मणि च

IAST aṇ karmaṇi ca

प्रकार विधि

सार कर्म अर्थ में भी अण् प्रत्यय होता है।

3.3.13
लृट् शेषे च

IAST lṛṭ śeṣe ca

प्रकार विधि

सार शेष (अन्य अनिर्दिष्ट) भविष्यत् अर्थ में लृट् भी होता है।

3.3.14
लृटः सत् वा

IAST lṛṭaḥ sad vā

प्रकार विधि

सार लृट् के स्थान पर वैकल्पिक रूप से सत् (शतृ/शानच्) होता है।

3.3.15
अनद्यतने लुट्

IAST anadyatane luṭ

प्रकार विधि

सार अनद्यतन (आज-भिन्न) भविष्यत् में लुट् होता है।

3.3.16
पदरुजविशस्पृशः घञ्

IAST padarujaviśaspṛśo ghañ

प्रकार विधि

सार पद्, रुज्, विश् और स्पृश् धातुओं से घञ् होता है।

3.3.17
सृ स्थिरे

IAST sṛ sthire

प्रकार विधि

सार स्थिर अर्थ में सृ धातु से घञ् होता है।

3.3.18
भावे

IAST bhāve

प्रकार अधिकार

सार भाव (क्रिया-सामान्य/अमूर्त क्रिया) अर्थ में घञ् आदि का अधिकार आरम्भ होता है।

3.3.19
अकर्तरि च कारके संज्ञायां

IAST akartari ca kārake saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में अकर्तृ कारक (कर्म आदि) अर्थ में भी घञ् होता है।

3.3.20
परिमण आख्यायां सर्वेभ्यः

IAST parimāṇākhyāyāṃ sarvebhyaḥ

प्रकार विधि

सार परिमाण की आख्या (नाम) होने पर सभी धातुओं से घञ् होता है।

3.3.21
इङः च

IAST iṅaś ca

प्रकार विधि

सार इङ् (अधी) धातु से भी घञ् होता है।

3.3.22
उपसर्गे रुवः

IAST upasarge ruvaḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-युक्त रु धातु से घञ् होता है।

3.3.23
समि युद्रुदुवः

IAST sami yudruduvaḥ

प्रकार विधि

सार सम् उपसर्ग होने पर यु, द्रु और दु धातुओं से घञ् होता है।

3.3.24
श्रि- णीभुवः अन्यतरस्यां

IAST śriṇībhuvos anyatarasyām

प्रकार विधि

सार श्रि, णी और भू धातुओं से वैकल्पिक रूप से घञ् होता है।

3.3.25
वौ क्षुस्रुवः

IAST vau kṣusruvah

प्रकार विधि

सार व (अव/वि-योग; पाठभेद) होने पर क्षु और स्रु धातुओं से घञ् होता है।

3.3.26
अव उदोर्नियः

IAST ava udor niyaḥ

प्रकार विधि

सार अव और उद् उपसर्गों के साथ धातु नी से भाव-अर्थ में घञ् होता है।

3.3.27
प्रे द्रुस्तुस्रुवः

IAST pre dru-stu-sruvaḥ

प्रकार विधि

सार प्र उपसर्ग के साथ द्रु, स्तु और स्रु धातुओं से घञ् होता है।

3.3.28
निसभ्योः पूल्वोः

IAST nis-abhyoḥ pū-lvoḥ

प्रकार विधि

सार निस् और अभि उपसर्गों के साथ पू तथा लू धातुओं से घञ् होता है।

3.3.29
उद् न्योर्ग्रः

IAST ud-nyor gṝaḥ

प्रकार विधि

सार उद् और नि उपसर्गों के साथ गॄ धातु से घञ् होता है।

3.3.30
कॄ धान्ये

IAST kṝ dhānye

प्रकार विधि

सार धान्य-विषयक अर्थ में कॄ धातु से घञ् होता है।

3.3.31
यज्ञे समि स्तुवः

IAST yajñe sami stuvaḥ

प्रकार विधि

सार यज्ञ-विषय में सम् उपसर्ग के साथ स्तु धातु से घञ् होता है।

3.3.32
प्रे स्त्रः अयज्ञे

IAST pre stṛaḥ ayajñe

प्रकार विधि

सार अयज्ञ-अर्थ में प्र उपसर्ग के साथ स्तृ धातु से घञ् होता है।

3.3.33
प्रथने वौ अशब्दे

IAST prathane vau aśabde

प्रकार विधि

सार प्रथन (विस्तार) अर्थ में—जब शब्द/ध्वनि अभिप्रेत न हो—वा धातु से घञ् होता है।

3.3.34
छन्दोनाम्नि च

IAST chandonāmni ca

प्रकार विधि

सार छन्दस्-नाम में भी (पूर्व-सूत्रानुसार वा से) घञ् होता है।

3.3.35
उदि ग्रहः

IAST udi grahaḥ

प्रकार विधि

सार उद् उपसर्ग के साथ ग्रह् धातु से घञ् होता है।

3.3.36
समि मुष्टौ

IAST sami muṣṭau

प्रकार विधि

सार मुष्टि (मुट्ठी/मुट्ठी-मात्रा) अर्थ में सम् उपसर्ग के साथ ग्रह् से घञ् होता है।

3.3.37
परिन्योर्नीइणोर्द्यूताभ्रेषयोः

IAST pari-nyor nī-iṇor dyūtābhreṣayoḥ

प्रकार विधि

सार द्यूत और अभ्रेष अर्थों में परि तथा नि उपसर्गों के साथ नी और इण् धातुओं से घञ् होता है।

3.3.38
परौ अनुप अत्यये इणः

IAST parau anupātyaye iṇaḥ

प्रकार विधि

सार अत्यय-भिन्न अर्थ में परा उपसर्ग के साथ इण् धातु से घञ् होता है।

3.3.39
वि उपयोः शेतेः पर्याये

IAST vi-upayoḥ śeteḥ paryāye

प्रकार विधि

सार पर्याय (क्रम/बारी) अर्थ में वि और उप उपसर्गों के साथ शीङ् धातु से घञ् होता है।

3.3.40
हस्त आदाने चेरस्तेये

IAST hasta ādāne cer asteye

प्रकार विधि

सार अस्तेय हस्त-आदान अर्थ में चि धातु से घञ् होता है।

3.3.41
निवासचितिशरीरौपसंआधानेषु आदेः च कः

IAST nivāsa-citi-śarīraupasaṃādhāneṣu ādeḥ ca kaḥ

प्रकार विधि

सार निवास, चिति, शरीर और उपसंआधान अर्थों में आदादि धातुओं से क प्रत्यय होता है।

3.3.42
संघे च अनौत्तराधर्ये

IAST saṃghe ca anauttarādharye

प्रकार विधि

सार उत्तराधर्य-रहित संघ अर्थ में भी (पूर्व-सूत्रानुसार) क प्रत्यय होता है।

3.3.43
कर्मव्यतिहारे णच् स्त्रियां

IAST karmavyatihāre ṇac striyām

प्रकार विधि

सार कर्मव्यतिहार अर्थ में स्त्री-लिङ्ग में णच् प्रत्यय होता है।

3.3.44
अभिविधौ भावे इनुण्

IAST abhividhau bhāve inuṇ

प्रकार विधि

सार अभिविधि अर्थ में भाव में इनुण् प्रत्यय होता है।

3.3.45
आक्रोशे अवन्योर्ग्रहः

IAST ākrośe ava-nyor grahaḥ

प्रकार विधि

सार आक्रोश अर्थ में अव और नि उपसर्गों के साथ ग्रह् धातु से घञ् होता है।

3.3.46
प्रे लिप्सायां

IAST pre lipsāyām

प्रकार विधि

सार लिप्सा अर्थ में प्र उपसर्ग के साथ (ग्रह् से) घञ् होता है।

3.3.47
परौ यज्ञे

IAST parau yajñe

प्रकार विधि

सार यज्ञ-विषय में परा उपसर्ग के साथ (ग्रह् से) घञ् होता है।

3.3.48
नौ वृ धान्ये

IAST nau vṛ dhānye

प्रकार विधि

सार धान्य-विषयक अर्थ में न उपसर्ग के साथ वृ धातु से घञ् होता है।

3.3.49
उदि श्रयतियौतिपूद्रुवः

IAST udi śrayati-yauti-pū-druvaḥ

प्रकार विधि

सार उद् उपसर्ग के साथ श्रि, यु, पू और द्रु धातुओं से घञ् होता है।

3.3.50
विभाषा आङि रुप्लुवोः

IAST vibhāṣā āṅi ru-pluvoḥ

प्रकार विधि

सार आङ् उपसर्ग के साथ रु और प्लु धातुओं से विकल्प से घञ् होता है।

3.3.51
अवे ग्रहः वर्षप्रतिबन्धे

IAST ave grahaḥ varṣapratibandhe

प्रकार विधि

सार अव-पूर्वक ग्रह् से वर्ष के प्रतिबन्ध (अवग्रह) के अर्थ में घञ् होता है।

3.3.52
प्रे वणिजां

IAST pre vaṇijāṃ

प्रकार विधि

सार प्र-पूर्वक ग्रह् से वणिक्-व्यवहार (प्रग्रह) के अर्थ में घञ् होता है।

3.3.53
रश्मौ च

IAST raśmau ca

प्रकार विधि

सार रश्मि (लगाम/बाग) के अर्थ में भी प्र-पूर्वक ग्रह् से घञ् होता है।

3.3.54
वृ- णोतेराच्छादने

IAST vṛṇoter ācchādane

प्रकार विधि

सार वृणोति (वृ) से आच्छादन के अर्थ में घञ् होता है (आवरणम्, वरः)।

3.3.55
परौ भुवः अवज्ञाने

IAST parau bhuvaḥ avajñāne

प्रकार विधि

सार परा-पूर्वक भू से अवज्ञान/पराभव के अर्थ में घञ् होता है।

3.3.56
एरच्

IAST er ac

प्रकार विधि

सार ए-वर्णान्त धातु से (भाव आदि में) अच् प्रत्यय होता है।

3.3.57
ॠदोरप्

IAST ṝdor ap

प्रकार विधि

सार ऋ/ॠ-अन्त और उ-अन्त धातु से अप् प्रत्यय होता है।

3.3.58
ग्रहवृदृनिः चिगमः च

IAST grahavṛdṛniścigamaś ca

प्रकार विधि

सार ग्रह्, वृ, दृ, नी, चि और गम् से भी अप् होता है।

3.3.59
उपसर्गे अदः

IAST upasarge adaḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-पूर्वक अद् से अप् होता है।

3.3.60
नौ ण च

IAST nau ṇa ca

प्रकार विधि

सार नि-पूर्वक अद् से ण और अप्—दोनों—होते हैं (नादः, निदः)।

3.3.61
व्यधजपोरनुपसर्गे

IAST vyadhajapor anupasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित व्यध् और जप् से अप् होता है।

3.3.62
स्वनहसोर्वा

IAST svanahasor vā

प्रकार विधि

सार स्वन् और हस् से वैकल्पिक रूप से अप् होता है।

3.3.63
यमः समुपनिविषु

IAST yamaḥ samupaniviṣu

प्रकार विधि

सार सम्, उप, नि, वि—इन उपसर्गों के साथ यम् से अप् होता है।

3.3.64
नौ गदनदपठस्वनः

IAST nau gadanadapaṭhasvanaḥ

प्रकार विधि

सार नि-पूर्वक गद्, नद्, पठ् और स्वन् से अप् होता है।

3.3.65
क्वणः वीणायां च

IAST kvaṇaḥ vīṇāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार क्वण् से (नि-पूर्वक भी) तथा वीणा-ध्वनि के अर्थ में अप् होता है।

3.3.66
नित्यं पणः परिमाणे

IAST nityaṃ paṇaḥ parimāṇe

प्रकार विधि

सार परिमाण के अर्थ में पण् से नित्य अप् होता है (पणः)।

3.3.67
मदः अन् उपसर्गे

IAST madaḥ an upasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित मद् से अप् होता है (मदः)।

3.3.68
प्रमदसम्मदौ हर्षे

IAST pramadasammadau harṣe

प्रकार विधि

सार हर्ष के अर्थ में प्रमद और सम्मद—ये रूप (अप्-सिद्ध) होते हैं।

3.3.69
समुदोरजः पशुषु

IAST samudor ajaḥ paśuṣu

प्रकार विधि

सार सम् और उद्-पूर्वक अज् से पशु-समुदाय के अर्थ में अप् होता है (समजः, उदजः)।

3.3.70
अक्षेषु ग्लहः

IAST akṣeṣu glahaḥ

प्रकार विधि

सार अक्ष-क्रीड़ा/द्यूत के अर्थ में ग्लह् से अप् होता है (ग्लहः)।

3.3.71
प्रजने सर्तेः

IAST prajane sarteḥ

प्रकार विधि

सार प्रजन (उत्पत्ति/प्रसव) के अर्थ में सृ (सर्ति) से अप् होता है (सरः)।

3.3.72
ह्वः सम्प्रसारणं च नि अभि उपविषु

IAST hvaḥ samprasāraṇaṃ ca ni abhi upaviṣu

प्रकार विधि

सार नि, अभि, उप, वि—इनके साथ ह्वे से सम्प्रसारण और अप् होते हैं (निहवः आदि)।

3.3.73
आङि युद्धे

IAST āṅi yuddhe

प्रकार विधि

सार आङ्-पूर्वक ह्वे से युद्ध के अर्थ में अप् (सम्प्रसारणसहित) होता है (आहवः)।

3.3.74
निपानं आहावः

IAST nipānaṃ āhāvaḥ

प्रकार विधि

सार निपानम् और आहावः—ये निपातित/सिद्ध रूप माने जाते हैं।

3.3.75
भावे अनुपसर्गस्य

IAST bhāve anupasargasya

प्रकार अधिकार

सार अनुपसर्ग धातु से भाव-अर्थ में (आगामी प्रत्यय-विधान का) अधिकार आरम्भ होता है।

3.3.76
हनः च वधः

IAST hanaś ca vadhaḥ

प्रकार विधि

सार हन् धातु से घञ् में भावार्थ में वध् आदेश होता है, जिससे रूप वधः सिद्ध होता है।

3.3.77
मूर्तौ घनः

IAST mūrtau ghanaḥ

प्रकार विधि

सार मूर्ति (पिण्ड/घन पदार्थ) अर्थ में हन् से घन रूप सिद्ध होता है — घनः।

3.3.78
अन्तर्घनः देशे

IAST antarghano deśe

प्रकार विधि

सार देश अर्थ में अन्तर्घन रूप होता है — अन्तर्घनः (अन्तर्देश/मध्य-स्थान)।

3.3.79
अगार एकदेशे प्रघण प्रघाणौ च

IAST agāra ekadeśe praghaṇa praghāṇau ca

प्रकार विधि

सार अगार (गृह) के एकदेश अर्थ में प्रघण और प्रघाण दोनों रूप विहित हैं।

3.3.80
उद्घनः अत्याधानं

IAST udghano ’tyādhānam

प्रकार विधि

सार अत्याधान (रखने/टेकने का स्थान) अर्थ में उद्घन रूप होता है — उद्घनः।

3.3.81
अपघनः अङ्गं

IAST apaghanaḥ aṅgam

प्रकार विधि

सार अङ्ग (शरीरावयव) अर्थ में अपघन रूप विहित होता है।

3.3.82
करणे अयः विद्रुषु

IAST karaṇe ayaḥ-vidruṣu

प्रकार विधि

सार करणार्थ में लोह और वृक्ष (काष्ठ) संबद्ध पदार्थों के प्रसंग में (हन् से) विशेष रूप विहित होता है।

3.3.83
स्तम्बे क च

IAST stambe ka ca

प्रकार विधि

सार स्तम्ब (तृणगुच्छ/ढेर) अर्थ में क भी (पूर्वोक्त के साथ) विहित है।

3.3.84
परौ घः

IAST parau ghaḥ

प्रकार विधि

सार परि उपसर्ग रहने पर (हन् से) घ होता है — परिघः।

3.3.85
उपघ्नः आश्रये

IAST upaghna āśraye

प्रकार विधि

सार आश्रय अर्थ में उपघ्न रूप होता है — उपघ्नः।

3.3.86
संघ उद्घौ गणप्रशंसयोः

IAST saṃgha-udghau gaṇa-praśaṃsayoḥ

प्रकार विधि

सार गण अर्थ में संघ और प्रशंसा अर्थ में उद्घ रूप होते हैं — संघः, उद्घः।

3.3.87
निघः नीमितं

IAST nigho nīmitam

प्रकार विधि

सार नीमित (मापा/निर्धारित अंश) अर्थ में निघ रूप होता है — निघः।

3.3.88
डु इत् अः क्त्रिः

IAST ḍuito'ḥ ktriḥ

प्रकार विधि

सार डु-इत् वाले धातु से अकारान्त क्त्रि प्रत्यय होता है (यथा कृत्रिम)।

3.3.89
टु- इतः अथुच्

IAST ṭv-ito ’thuc

प्रकार विधि

सार टु-इत् वाले धातु से अथुच् प्रत्यय होता है — वमथुः आदि।

3.3.90
यजयाचयतविछप्रछरक्षः नङ्

IAST yaja-yāca-yata-vicha-pracha-rakṣo naṅ

प्रकार विधि

सार यज्, याच्, यत्, विछ्, प्रछ् और रक्ष् से नङ् होता है — यज्ञ, याञ्चा, यत्न, प्रश्न आदि।

3.3.91
स्वपः नन्

IAST svapo nan

प्रकार विधि

सार स्वप् धातु से नन् प्रत्यय होता है — स्वप्नः।

3.3.92
उपसर्गे घोः किः

IAST upasarge ghoḥ kiḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग रहने पर घु-संज्ञक धातुओं से कि प्रत्यय होता है — आधारः, संधिः, निधिः आदि।

3.3.93
कर्मणि अधिकरणे च

IAST karmaṇy adhikaraṇe ca

प्रकार विधि

सार पूर्वोक्त कि-प्रत्यय कर्म और अधिकरण अर्थ में भी होता है।

3.3.94
स्त्रियां क्तिन्

IAST striyāṃ ktin

प्रकार विधि

सार स्त्रीलिङ्ग में (भाव आदि के लिए) क्तिन् प्रत्यय होता है — कृतिः, मतिः, गतिः।

3.3.95
स्थागापापचां भावे

IAST sthā-gā-pā-pacāṃ bhāve

प्रकार विधि

सार भाव अर्थ में स्था, गै, पा और पच् से क्तिन् होता है — स्थितिः, गीतिः, पीतिः, पक्तिः।

3.3.96
मन्त्रे वृष इषपचमनविदभूवीराः उदात्तः

IAST mantre vṛṣeṣapacamanavidabhūvīrā udāttaḥ

प्रकार विधि

सार मन्त्र में वृष्, इष्, पच्, मन्, विद्, भू, वी और रा के क्तिन्-रूप उदात्त स्वर वाले होते हैं।

3.3.97
ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयः च

IAST ūtiyūtijūtisātihetikīrtayaś ca

प्रकार विधि

सार ऊति, यूति, जूति, साति, हेति और कीर्ति — ये स्त्रीलिङ्ग रूप भी (उदात्त/निपातित) सिद्ध होते हैं।

3.3.98
व्रजयजोर्भावे क्यप्

IAST vrajayajor bhāve kyap

प्रकार विधि

सार व्रज् और यज् धातुओं से भावार्थ में क्यप् प्रत्यय होता है (यथा व्रज्य, यज्य)।

3.3.99
संज्ञायां समजनिषदनिपतमनविदषुञ्शीङ्भृञ् इणः

IAST saṃjñāyāṃ samajaniṣadanipatamanavidaṣuñśīṅbhṛñiṇaḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा अर्थ में समज्, निषद्, निपत्, मन्, विद्, षुञ्, शीङ्, भृञ् और इण् से (क्यप्) प्रत्यय होता है।

3.3.100
कृञः श च

IAST kṛñaḥ śa ca

प्रकार विधि

सार कृञ् धातु से (क्यप् के साथ) श प्रत्यय भी होता है — कृत्यम् आदि।

3.3.101
इच्छा

IAST icchā

प्रकार विधि

सार धातु इष् से स्त्रीलिङ्ग भाववाचक रूप इच्छा (विशेषरूपेण) सिद्ध होता है।

3.3.102
अ प्रत्ययात्

IAST a pratyayāt

प्रकार विधि

सार स्त्री-भावार्थ में अ-प्रत्यय का विधान करता है (परम्परा में प्रायः «अप्रत्ययात्»—प्रत्यय-रहित धातु से—पढ़ा जाता है)। (व्याख्या-भेद)

3.3.103
गुरोः च हलः

IAST guroḥ ca halaḥ

प्रकार विधि

सार गुरु (गुरुमात्रा वाले) तथा हल्-अन्त्य धातु से भी स्त्री-भाव में अ-प्रत्यय होता है।

3.3.104
ष्- इत् भिदा आदिभ्यः अङ्

IAST ṣid bhidādibhyaḥ aṅ

प्रकार विधि

सार षिद् (ष्-इत्) धातुओं तथा भिदादि गण से स्त्री-भाव में अङ् प्रत्यय होता है।

3.3.105
चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चः च

IAST cintipūjikathikumbicarcaḥ ca

प्रकार विधि

सार चिन्ति, पूजि, कथि, कुम्बि और चर्च से भी (स्त्री-भाव में) अङ् प्रत्यय होता है।

3.3.106
आत् अः च उपसर्गे

IAST ātaś ca upasarge

प्रकार विधि

सार आ-कारान्त धातु से उपसर्गयुक्त अवस्था में भी (स्त्रियां भाव में) अ होता है।

3.3.107
णि आसस्रन्थः युच्

IAST ṇi āsaśranthaḥ yuc

प्रकार विधि

सार णिच्-प्रत्ययान्त तथा आस-(अस्-)श्रन्थ धातुओं से युच् प्रत्यय होता है।

3.3.108
रोग आख्यायां ण्वुल् बहुलं

IAST roga ākhyāyāṃ ṇvul bahulam

प्रकार विधि

सार रोग-आख्या (रोग-नाम) में ण्वुल् प्रत्यय बहुल विधान से होता है।

3.3.109
संज्ञायां

IAST saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नाम/पारिभाषिक संज्ञा) अर्थ में (पूर्वोक्त ण्वुल्-बहुल का) विधान है।

3.3.110
विभाषा आख्यानपरिप्रश्नयोरिञ् च

IAST vibhāṣā ākhyāna-paripraśnayoḥ iñ ca

प्रकार विधि

सार आख्यान और परिप्रश्न अर्थों में विभाषा इञ् भी (ण्वुल् के साथ) होता है।

3.3.111
पर्याय अर्ह ऋण उत्पत्तिषु ण्वुच्

IAST paryāya arha ṛṇa utpattiṣu ṇvuc

प्रकार विधि

सार पर्याय, अर्ह, ऋण और उत्पत्ति अर्थों में ण्वुच् प्रत्यय होता है।

3.3.112
आक्रोशे नञि अनिः

IAST ākrośe nañy aniḥ

प्रकार विधि

सार आक्रोश (निन्दा/शाप) में नञ्-युक्त प्रयोग पर अनि प्रत्यय होता है।

3.3.113
कृत्यल्युटः बहुलं

IAST kṛtyalyuṭo bahulam

प्रकार विधि

सार कृत्य-प्रत्यय और ल्युट् बहुलता से (विविध अर्थों व अवसरों में) प्रवृत्त होते हैं।

3.3.114
नपुंसके भावे क्तः

IAST napuṃsake bhāve ktaḥ

प्रकार विधि

सार नपुंसकलिङ्ग में भावार्थ में क्त-प्रत्यय होता है।

3.3.115
ल्युट् च

IAST lyuṭ ca

प्रकार विधि

सार नपुंसक भाव में ल्युट् भी (क्त के साथ) होता है।

3.3.116
कर्मणि च येन संस्प्रशात् कर्तुः शरीरसुखं

IAST karmaṇi ca yena saṃsparśāt kartuḥ śarīrasukham

प्रकार विधि

सार जिस (वस्तु) के संस्पर्श से कर्ता को शारीरिक सुख मिले, उस कर्म अर्थ में भी (क्त/ल्युट्) होते हैं।

3.3.117
करणाधिकरणयोः च

IAST karaṇādhikaraṇayoś ca

प्रकार विधि

सार करण और अधिकरण अर्थों में भी (उक्त क्त/ल्युट् आदि) होते हैं।

3.3.118
पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण

IAST puṃsi saṃjñāyāṃ ghaḥ prāyeṇa

प्रकार विधि

सार पुंल्लिङ्ग में संज्ञार्थ (नाम) में प्रायः घ-प्रत्यय होता है।

3.3.119
गोचरसंचरवहव्रज व्यज आपणनिगमाः च

IAST gocara-saṃcara-vaha-vraja-vyaja-āpaṇa-nigamāś ca

प्रकार विधि

सार गोचर, संचर, वह, व्रज, व्यज, आपण और निगम भी (पुंसि संज्ञायां घ-प्रकारेण) सिद्ध होते हैं।

3.3.120
अवे तॄस्त्रोर्घञ्

IAST ave tṝstror ghañ

प्रकार विधि

सार अव् उपसर्ग के परे तॄ और स्तु धातुओं से घञ् होता है।

3.3.121
हलः च

IAST halaś ca

प्रकार विधि

सार हल्-अन्त धातु से भी (अव उपसर्ग में) घञ् होता है।

3.3.122
अध्यायन्यायौद्यावसंहार आधार आवयाः च

IAST adhyāya-nyāyodyāva-saṃhārādhārāvāyāś ca

प्रकार विधि

सार अध्याय, न्याय, उद्याव, संहार, आधार और आवाय भी (घञ्-रूपेण) सिद्ध होते हैं।

3.3.123
उदङ्कः अनुदके

IAST udaṅko ’nudake

प्रकार विधि

सार उदङ्क रूप (घञ्) उदक-भिन्न अर्थ में ही सिद्ध होता है।

3.3.124
जालं आनायः

IAST jālaṃ ānāyaḥ

प्रकार विधि

सार आनाय शब्द जाल (जाल/फंदा) अर्थ में सिद्ध होता है।

3.3.125
खनः घ च

IAST khanaḥ gha ca

प्रकार विधि

सार खन् धातु से घ भी (घञ् के अतिरिक्त) होता है।

3.3.126
ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्र अकृच्छ्र अर्थेषु खल्

IAST īṣaddussuṣu kṛcchrākṛcchrārtheṣu khal

प्रकार विधि

सार ईषत्, दुस् और सु के योग में कृच्छ्र (कठिनता) अथवा अकृच्छ्र (सरलता) अर्थ में धातु से खल् प्रत्यय होता है।

3.3.127
कर्तृकर्मणोः च भूकृञोः

IAST kartṛkarmaṇoś ca bhūkṛñoḥ

प्रकार विधि

सार भू और कृ धातुओं से कर्तृ तथा कर्म अर्थ में भी (उक्त उपपद-योग में) खल् होता है।

3.3.128
आतः युच्

IAST ātaḥ yuc

प्रकार विधि

सार आकारान्त धातु से (ईषत्-दुस्-सु के उक्त अर्थ में) युच् प्रत्यय होता है।

3.3.129
छन्दसि गत्यर्थेभ्यः

IAST chandasi gatyarthebhyaḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में गत्यर्थ धातुओं से (उक्त स्थल में) युच् होता है।

3.3.130
अन्येभ्यः अपि दृश्यते

IAST anyebhyaḥ api dṛśyate

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अन्य धातुओं से भी युच् देखा जाता है।

3.3.131
वर्तमानसामीप्ये वर्तमानात् वा

IAST vartamānasāmīpye vartamānād vā

प्रकार विधि

सार वर्तमान-सामीप्य में वर्तमानवत् (लट् आदि) वैकल्पिक रूप से प्रवृत्त होते हैं।

3.3.132
आशंसायां भूतवत् च

IAST āśaṃsāyāṃ bhūtavat ca

प्रकार विधि

सार आशंसा (आशा/इच्छा) में भूतवत् भी (अतीत-लकार) वैकल्पिक रूप से प्रवृत्त होते हैं।

3.3.133
क्षिप्रवचने लृट्

IAST kṣipravacane lṛṭ

प्रकार विधि

सार क्षिप्र (शीघ्र होने) के कथन में लृट् होता है।

3.3.134
आशंसावचने लिङ्

IAST āśaṃsāvacane liṅ

प्रकार विधि

सार आशंसा के कथन में लिङ् होता है।

3.3.135
न अनद्यतनवत् क्रियाप्रबन्धसामीप्ययोः

IAST na anadyatanavat kriyāprabandhasāmīpyayoḥ

प्रकार नियम

सार क्रिया-प्रबन्ध और काल-सामीप्य में अनद्यतनवत् व्यवहार नहीं होता।

3.3.136
भविष्यति मर्यादाअचने अवरस्मिन्

IAST bhaviṣyati maryādāvacane avarasmin

प्रकार विधि

सार भविष्यत् काल की मर्यादा-कथन में अवर (निकटतर) सीमा के विषय में (अनद्यतन-सम्बन्धी नियम) लागू होता है।

3.3.137
कालविभागे च अनहोरात्रा- णां

IAST kālavibhāge ca anahorātrāṇām

प्रकार विधि

सार अहोरात्र-भिन्न काल-विभाग में भी (उक्त मर्यादा-नियम) प्रवृत्त होता है।

3.3.138
परस्मिन् विभाषा

IAST parasmin vibhāṣā

प्रकार विधि

सार पर (दूरतर) सीमा में वह नियम वैकल्पिक है।

3.3.139
लिङ्निमित्ते लृङ् क्रिया अतिपत्तौ

IAST liṅnimitte lṛṅ kriyā atipattau

प्रकार विधि

सार लिङ्-निमित्त होने पर क्रिया की अतिपत्ति (असम्पन्नता/विफलता) में लृङ् होता है।

3.3.140
भूते च

IAST bhūte ca

प्रकार विधि

सार भूत काल में भी (क्रियातिपत्ति में लृङ्) होता है।

3.3.141
वा आ उत अप्योः

IAST vā ā uta apyoḥ

प्रकार विधि

सार आ, उत और अपि के योग में (क्रियातिपत्ति-लृङ्) वैकल्पिक है।

3.3.142
गर्हायां लट् अपिजात्वोः

IAST garhāyāṃ laṭ apijātvoḥ

प्रकार विधि

सार गर्हा (निन्दा) में अपि और जातु के योग में लट् भी होता है।

3.3.143
विभाषा कथमि लिङ् च

IAST vibhāṣā kathami liṅ ca

प्रकार विधि

सार कथम् के योग में वैकल्पिक रूप से लिङ् भी होता है।

3.3.144
किंवृत्ते लिङ्लृटौ

IAST kiṃvṛtte liṅlṛṭau

प्रकार विधि

सार किंवृत्त (किम्-प्रकारक पदों) में लिङ् और लृट् होते हैं।

3.3.145
अनवक्ल्प्ति अमर्षयोरकिंवृत्ते अपि

IAST anavakḷpti amarṣayor akiṃvṛtte api

प्रकार विधि

सार अनवक्ल्प्ति (असम्भावना) और अमर्ष (असहिष्णुता) में अकिंवृत्त में भी (लिङ्-लृट्) होते हैं।

3.3.146
किं किल अस्ति अर्थेषु लृट्

IAST kiṃ kila asti artheṣu lṛṭ

प्रकार विधि

सार किं, किल और अस्ति-अर्थों में लृट् होता है।

3.3.147
जातुयदोर्लिङ्

IAST jātuyador liṅ

प्रकार विधि

सार जातु और यदि के योग में लिङ् होता है।

3.3.148
यत् चयत्रयोः

IAST yat ca yatrayoḥ

प्रकार विधि

सार यत्, च और यत्र के योग में (लिङ्) होता है।

3.3.149
गर्हायां च

IAST garhāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार गर्हा में भी (लिङ्) होता है।

3.3.150
चित्रीकरणे च

IAST citrīkaraṇe ca

प्रकार विधि

सार चित्रीकरण (आश्चर्य/विस्मय-प्रकाशन) में भी (लिङ्) होता है।

3.3.151
शेषे लृट् अयदौ

IAST śeṣe lṛḍayadau

प्रकार विधि

सार पूर्व-विशेष-नियमों के शेष में ‘अय’ और ‘अदौ’ के प्रयोग में (भविष्यत्/सन्देहादि-अर्थ में) लृट् होता है।

3.3.152
उताप्योः समर्थयोः लिङ्

IAST utāpyoḥ samarthayoḥ liṅ

प्रकार विधि

सार समर्थ ‘उत’ और ‘अपि’ के साथ (सन्देह/विकल्प-अर्थ में) लिङ् होता है।

3.3.153
कामप्रवेदने अकच्चिति

IAST kāmapravedane 'kacciti

प्रकार विधि

सार काम (इच्छा) के प्रवेदन में, ‘कच्चित्’ न हो तो, लिङ् होता है।

3.3.154
सम्भवाने अलं इति चेत् सिद्ध अप्रयोगे

IAST sambhāvane 'lam iti cet siddhe 'prayoge

प्रकार विधि

सार सम्भावना-अर्थ में ‘अलम्’ तभी (स्वीकृत/लागू) है जब अर्थ बिना (लकार-)प्रयोग के ही सिद्ध हो।

3.3.155
विभाषा धातौ सम्भावनाचने अयदि

IAST vibhāṣā dhātau sambhāvanavacane 'yadi

प्रकार विधि

सार धातु स्वयं सम्भावना-वचन हो और ‘यदि’ न हो तो विकल्प से (लिङ् आदि) होता है।

3.3.156
हेतुहेतुमतोर्लिङ्

IAST hetuhetumator liṅ

प्रकार विधि

सार हेतु और हेतुमत् (कारण-कार्य) के सम्बन्ध में लिङ् होता है।

3.3.157
इच्छा अर्थेषु लिङ्लोटौ

IAST icchārtheṣu liṅloṭau

प्रकार विधि

सार इच्छा-अर्थों में लिङ् और लोट् होते हैं।

3.3.158
समानकर्तृकेषु तुमुन्

IAST samānakartṛkeṣu tumun

प्रकार विधि

सार समान-कर्तृक (इच्छा और अभीष्ट-क्रिया के कर्ता एक हों तो) तुमुन् होता है।

3.3.159
लिङ् च

IAST liṅ ca

प्रकार विधि

सार समान-कर्तृक इच्छा-प्रयोगों में लिङ् भी होता है।

3.3.160
इच्छाअर्थेभ्यः विभाषा वर्तंआने

IAST icchārthebhyo vibhāṣā vartamāne

प्रकार विधि

सार इच्छा-अर्थ धातुओं से, वर्तमान (अभीष्ट-क्रिया) में विकल्प से (लिङ्/लोट् आदि) होता है।

3.3.161
विधिनिमन्त्रणआमन्त्रण अधि इष्टसम्प्रश्नप्र अर्थनेषु लिङ्

IAST vidhinimantraṇāmantraṇādhīṣṭasamprasnaprārthaneṣu liṅ

प्रकार विधि

सार विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न और प्रार्थना—इन अर्थों में लिङ् होता है।

3.3.162
लोट् च

IAST loṭ ca

प्रकार विधि

सार उक्त विधि-निमन्त्रणादि अर्थों में लोट् भी होता है।

3.3.163
प्रैष अतिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याः च

IAST praiṣātisargaprāptakāleṣu kṛtyāś ca

प्रकार विधि

सार प्रेष, अतिसर्ग और प्राप्त-काल में कृत्य-प्रत्यय भी होते हैं।

3.3.164
लिङ् च ऊर्ध्वमौहुर्तिके

IAST liṅ cordhvamauhūrtike

प्रकार विधि

सार मुहूर्त से अधिक (ऊर्ध्व-मौहूर्तिक) काल में लिङ् भी होता है।

3.3.165
स्मे लोट्

IAST sme loṭ

प्रकार विधि

सार ‘स्म’ के प्रयोग में लोट् होता है।

3.3.166
अधीष्टे च

IAST adhīṣṭe ca

प्रकार विधि

सार अधीष्ट (आदर-पूर्वक अनुरोध) अर्थ में भी (लोट्) होता है।

3.3.167
कालसमयवेलासु तुमुन्

IAST kālasamayavelāsu tumun

प्रकार विधि

सार ‘काल’, ‘समय’ और ‘वेला’ के साथ तुमुन् होता है।

3.3.168
लिङ् यदि

IAST liṅ yadi

प्रकार विधि

सार ‘यदि’ के प्रयोग में लिङ् होता है।

3.3.169
अर्हे कृत्यतृचः च

IAST arhe kṛtyatṛjaś ca

प्रकार विधि

सार अर्ह (योग्य/अधिकार) अर्थ में कृत्य और तृच् होते हैं।

3.3.170
आवश्यक आधमर्ण्ययोः णिनिः

IAST āvaśyakādhamarṇyayor ṇiniḥ

प्रकार विधि

सार आवश्यक और आधमर्ण्य (ऋण-दायित्व) अर्थों में णिनि होता है।

3.3.171
कृत्याः च

IAST kṛtyāś ca

प्रकार विधि

सार आवश्यक और आधमर्ण्य अर्थों में कृत्य भी होते हैं।

3.3.172
शकि लिङ् च

IAST śaki liṅ ca

प्रकार विधि

सार ‘शक’ (सामर्थ्य) अर्थ में लिङ् भी होता है।

3.3.173
आशिषि लिङ्लोटौ

IAST āśiṣi liṅloṭau

प्रकार विधि

सार आशिस् (आशीर्वाद) अर्थ में लिङ् और लोट् होते हैं।

3.3.174
क्तिच् क्तौ च संज्ञायां

IAST ktic ktau ca saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नामकरण) में क्तिच् और क्त भी होते हैं।

3.3.175
माङि लुङ्

IAST māṅi luṅ

प्रकार विधि

सार ‘माङ्’ (निषेध-मा) के प्रयोग में लुङ् होता है।

3.3.176
स्म उत्तरे लङ् च

IAST sma uttare laṅ ca

प्रकार विधि

सार स्म जब उत्तर (परवर्ती) हो तो (भूतार्थ में) लङ् भी विहित होता है।

अध्याय 3 · पाद 4 (117 सूत्र)

3.4.1
धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः

IAST dhātusambandhe pratyayāḥ

प्रकार अधिकार

सार धातु से सम्बन्ध रखने वाले प्रत्ययों का यह अधिकार-सूत्र आगे के तिङ्-कृत्-आदि प्रयोगों के धातु-सम्बद्ध क्षेत्र को निर्धारित करता है।

3.4.2
क्रियासमभिहारे लोट्, लोटः हिस्वौ वा च तध्वमोः

IAST kriyāsamabhihāre loṭ, loṭaḥ hisvau vā ca tadhvamoḥ

प्रकार विधि

सार क्रिया के समभिहार (पुनरावृत्ति/तीव्रता) में लोट् होता है, तथा लोट् के त् और ध्वम् के स्थान पर विकल्प से हि और स्व भी होते हैं।

3.4.3
समुच्चये अन्यतरस्यां

IAST samuccaye 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार समुच्चय (एकाधिक क्रियाओं के संग) में पूर्वोक्त लोट्-आदि विधान विकल्प से लागू होता है।

3.4.4
यथाविधि अनुप्रयोगः पूर्वस्मिन्

IAST yathāvidhy anuprayogaḥ pūrvasmin

प्रकार परिभाषा

सार अनुप्रयोग (आस्/कृ आदि सहायक-प्रयोग) पूर्व (मुख्य) क्रियापद पर यथाविधि लागू होता है।

3.4.5
सम् उत् चये सामान्यवचनस्य

IAST samuccaye sāmānyavacanasya

प्रकार नियम

सार समुच्चय में अनुप्रयोग सामान्यवचन (सामान्य/साझा वचन-रूप) वाला होता है।

3.4.6
छन्दसि लुङ्लङ्लिटः

IAST chandasi luṅ-laṅ-liṭaḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वेद) में (लोट्-आदि के अर्थ-क्षेत्र में) लुङ्, लङ् और लिट् भी प्रयुक्त होते हैं।

3.4.7
लिङ् अर्थे लेट्

IAST liṅarthe leṭ

प्रकार विधि

सार लिङ् के अर्थ में वैदिक लेट् लकार होता है।

3.4.8
उपसंवाद आशङ्कयोः च

IAST upasaṃvādāśaṅkayoś ca

प्रकार विधि

सार उपसंवाद (सहमति/परस्पर-सलाह) और आशङ्का के अर्थ में भी लेट् होता है।

3.4.9
तुम् अर्थे सेसेनसे असेंक्सेकसेन्+अध्यै अध्यैंकध्यैकध्यैन्शध्यैशध्यैन्तवैतवेङ्तवेनः

IAST tumarthe se-sen-ase-asen-kse-asen + adhyai adhyain kadhyai kadhyain śadhyai śadhyain tavai taveṅ taven

प्रकार विधि

सार तुमुन्-अर्थ में से, सेन्, असे, असेन्, क्से, असेङ्, अध्यै, अध्यैन्, कध्यै, कध्यैन्, शध्यै, शध्यैन्, तवै, तवेङ्, तवेन् — ये (वैदिक) प्रत्यय होते हैं।

3.4.10
प्रयै रोहिष्यै अव्यथिष्यै

IAST prayai rohiṣyai avyathiṣyai

प्रकार विधि

सार प्रयै, रोहिष्यै और अव्यथिष्यै — ये रूप भी तुमर्थ में (वैदिक) प्रयुक्त होते हैं।

3.4.11
दृशे विख्ये च

IAST dṛśe vikhye ca

प्रकार विधि

सार दृशे और विख्ये भी तुमर्थ में होते हैं।

3.4.12
शकि णमुल्कमुलौ

IAST śaki ṇamul-kamulau

प्रकार विधि

सार शक धातु से णमुल् और कमुल् प्रत्यय होते हैं।

3.4.13
ईश्वरे तोसुंकसुनौ

IAST īśvare tosun-kasunau

प्रकार विधि

सार ईश्वर (स्वामित्व/सामर्थ्य) के अर्थ में तोसुन् और कसुन् प्रत्यय होते हैं।

3.4.14
कृत्य अर्थे तवैकेंकेन्यत्वनः

IAST kṛtyārthe tave-keṅ-kenya-tvanaḥ

प्रकार विधि

सार कृत्य-अर्थ में तवै, केङ्, केन्य और त्वन् प्रत्यय होते हैं।

3.4.15
अवचक्षे च

IAST avacakṣe ca

प्रकार विधि

सार अवचक्षे भी (वैदिक कृत्यार्थ/तुमर्थ-सदृश) रूप के रूप में होता है।

3.4.16
भावलक्सणे स्था इण्कृवदिचरिहुतमिजनिभ्यः तोसुन्

IAST bhāvalakṣaṇe sthā-iṇ-kṛ-vad-car-i-hu-tam-i-janibhyaḥ tosun

प्रकार विधि

सार भाव का लक्षण (अवस्था/समय-सूचक) बताने में स्था, इण्, कृ, वद्, चर्, हु, तम्, जन् धातुओं से तोसुन् होता है।

3.4.17
सृपितृदोः कसुन्

IAST sṛpi-tṛdoḥ kasun

प्रकार विधि

सार सृप् और तृद् धातुओं से कसुन् प्रत्यय होता है।

3.4.18
अलम् खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा

IAST alaṃ-khalvoḥ pratiṣedhayoḥ prācāṃ ktvā

प्रकार विधि

सार अलम् और खलु के प्रतिषेध-अर्थ में प्राच्यों के मत से क्त्वा होता है।

3.4.19
उदीचां माङः व्यतीहारे

IAST udīcāṃ māṅo vyatīhāre

प्रकार विधि

सार उदीच्यों के मत से माङ् के व्यतीहार (परस्पर-विनिमय) में (क्त्वा) होता है।

3.4.20
पर अवरयोगे च

IAST parāvarayoge ca

प्रकार विधि

सार पर और अवर के योग में भी (क्त्वा) होता है।

3.4.21
समानकर्तृकयोः पूर्वकाले

IAST samānakartṛkayoḥ pūrvakāle

प्रकार विधि

सार समान कर्ता वाली दो क्रियाओं में पूर्वकालिक क्रिया पर क्त्वा (पूर्वकालिक कृदन्त) होता है।

3.4.22
आभीक्ष्ण्ये णमुल् च

IAST ābhīkṣṇye ṇamul ca

प्रकार विधि

सार आभीक्ष्ण्य (बार-बार/निरन्तरता) के अर्थ में णमुल् भी होता है।

3.4.23
न यदि अणाकाङ्क्षे

IAST na yady aṇākāṅkṣe

प्रकार नियम

सार यदि तथा अण् की आकाङ्क्षा रहने पर पूर्वकाल-क्त्वा/णमुल् का प्रतिषेध होता है।

3.4.24
विभाषा अग्रे प्रथमपूर्वेषु

IAST vibhāṣā gre-prathama-pūrveṣu

प्रकार विधि

सार अग्रे, प्रथम और पूर्व के साथ विकल्प से (क्त्वा/णमुल्) होते हैं।

3.4.25
कर्मणि आक्रोशे कृञः खमुञ्

IAST karmaṇy ākrośe kṛñaḥ khamuñ

प्रकार विधि

सार आक्रोश (गाली/निन्दा) के कर्म-अर्थ में कृञ् धातु से खमुञ् प्रत्यय होता है।

3.4.26
स्वादुमि णमुल्

IAST svādumi ṇamul

प्रकार विधि

सार स्वादुम् (स्वाद लेने/चखने) अर्थ में धातु से णमुल् प्रत्यय होता है।

3.4.27
अन्यथा एवम् कथम् इत्थंसु सिद्ध अ रयोगः चेत्

IAST anyathaivaṃkathamitthaṃsu siddhāprayogaś cet

प्रकार विधि

सार अन्यथा, एवम्, कथम् और इत्थम् के साथ सिद्ध अर्थ में तथा (सामान्य) प्रयोग के अभाव में धातु से णमुल् होता है।

3.4.28
यथातथयोरसूयाप्रतिवचने

IAST yathātathayor asūyāprativacane

प्रकार विधि

सार यथा तथा शब्दों के योग में असूया-प्रतिवचन (ईर्ष्या/दोषारोप का उत्तर) अर्थ में णमुल् होता है।

3.4.29
कर्मनि दृशिविदोः साकल्ये

IAST karmaṇi dṛśividoḥ sākalye

प्रकार विधि

सार कर्म में साकल्य (पूर्णता/समग्रता) अभिप्रेत होने पर दृश् और विद् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.30
यावति विन्दजीवोः

IAST yāvati vindajīvoḥ

प्रकार विधि

सार ‘यावत्’ उपपद रहने पर विन्द् और जीव् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.31
चर्म(न्)उदरयोः पूरेः

IAST carmaṇyudarayoḥ pūreḥ

प्रकार विधि

सार चर्मन् और उदर शब्दों के योग में पूर् धातु से णमुल् होता है।

3.4.32
वर्षप्रमाणे ऊल्पः च स्य न्यतरास्यं

IAST varṣapramāṇa ullopaś ca

प्रकार विधि

सार वर्ष-प्रमाण (वर्ष को अवधि-मान) अर्थ में उल्लुप् से णमुल् होता है तथा (उ का) उल्लोप भी होता है।

3.4.33
चेले क्नोपेः

IAST cele knopeḥ

प्रकार विधि

सार ‘चेल’ उपपद रहने पर क्नू/क्नोप् धातु से णमुल् होता है।

3.4.34
निमूलसमूलयोः कषः

IAST nimūlasamūlayoḥ kaṣaḥ

प्रकार विधि

सार निमूल और समूल शब्दों के योग में कष् धातु से णमुल् होता है।

3.4.35
शुष्कचूर्णरूक्षेषु पिषः

IAST śuṣkacūrṇarūkṣeṣu piṣaḥ

प्रकार विधि

सार ‘शुष्क’, ‘चूर्ण’ और ‘रूक्ष’ उपपद रहने पर पिष् धातु से णमुल् होता है।

3.4.36
समूल अकृतजीवेषु हंकृञ्ग्रहः

IAST samūlākṛtajīveṣu hankṛñgrahaḥ

प्रकार विधि

सार समूल, अकृत और जीव शब्दों के योग में हन्, कृञ् और ग्रह् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.37
करणे हनः

IAST karaṇe hanaḥ

प्रकार विधि

सार करण उपपद रहने पर हन् धातु से णमुल् होता है।

3.4.38
स्नेहने पिषः

IAST snehanе piṣaḥ

प्रकार विधि

सार स्नेहन (चर्बी/तेल से मर्दन-लेपन) के अर्थ में धातु पिष् से णमुल् होता है।

3.4.39
हस्ते वर्तिग्रहोः

IAST haste vartigrahoḥ

प्रकार विधि

सार ‘हस्त’ उपपद रहने पर वर्त् और ग्रह् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.40
स्वे पुषः

IAST sve puṣaḥ

प्रकार विधि

सार ‘स्व’ (अपना शरीर/आत्मा) उपपद रहने पर पुष् धातु से णमुल् होता है।

3.4.41
अधिकरणे बन्धः

IAST adhikaraṇe bandhaḥ

प्रकार विधि

सार अधिकरण (बाँधकर स्थित होने का स्थान) के अर्थ में धातु बन्ध् से णमुल् होता है।

3.4.42
संज्ञायां

IAST saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा (रूढ़/तकनीकी नाम) में भी पूर्वोक्त शर्तों पर णमुल् प्रवृत्त होता है।

3.4.43
कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः

IAST kartor jīvapuruṣayor naśivahoḥ

प्रकार विधि

सार कर्ता के रूप में ‘जीव’ और ‘पुरुष’ उपपद रहने पर नश् और वह् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.44
ऊर्ध्वे शुषिपूरोः

IAST ūrdhve śuṣipūroḥ

प्रकार विधि

सार ‘ऊर्ध्व’ उपपद रहने पर शुष् और पूर् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.45
उपमाने कर्मणि च

IAST upamāne karmaṇi ca

प्रकार विधि

सार कर्म उपमान (तुलना का आदर्श) होने पर (तथा ‘च’ से पूर्व-प्रसंग सहित) णमुल् होता है।

3.4.46
कषादिषु यथाविधि नुप्रयोगः

IAST kaṣādiṣu yathāvidhi nuprayogaḥ

प्रकार नियम

सार कषादि (णमुल्-प्रकरण के कष् आदि) प्रयोगों में नुप्रयोग (सहायक धातु का प्रयोग) सामान्य विधि के अनुसार ही होता है।

3.4.47
उपदंशः तृतीयायां

IAST upadaṃśas tṛtīyāyām

प्रकार विधि

सार उपदंश (साथ चबाने/स्वादिष्ट बनाने) के अर्थ में तृतीया में निर्दिष्ट पदार्थ के साथ णमुल् होता है।

3.4.48
हिंसा अर्थानां च समानार्तृका- णां

IAST hiṃsārthānāṃ ca samānakarmakāṇām

प्रकार विधि

सार हिंसा-अर्थक धातुओं से तथा समान-कर्म वाले धातुओं से (पूर्व-प्रसंगानुसार) णमुल् होता है।

3.4.49
सप्तम्यां च उपपीडरुधकर्षः

IAST saptamyāṃ copapīḍarudhakarṣaḥ

प्रकार विधि

सार सप्तमी में निर्दिष्ट आधार के साथ धातु उप-पीड्, रुध् और कर्ष् से णमुल् होता है।

3.4.50
संआसत्तौ

IAST samāsattau

प्रकार विधि

सार समासत्ति (सन्निकटता/संपर्क) के अर्थ में भी (संबद्ध पद) सप्तमी में होता है।

3.4.51
प्रमाणे च

IAST pramāṇe ca

प्रकार विधि

सार प्रमाण (माप/मानक) अर्थ में भी धातु से णमुल् प्रत्यय होता है।

3.4.52
अप आदाने परीप्सायां

IAST apa ādāne parīpsāyām

प्रकार विधि

सार अप-उपसर्गयुक्त धातु से आदान (हरण) अर्थ में परीप्सा (प्राप्त करने की इच्छा) होने पर णमुल् होता है।

3.4.53
द्वितीयायां च

IAST dvitīyāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार (पूर्वोक्त अप-आदान-परीप्सा प्रसंग में) द्वितीया विभक्ति होने पर भी णमुल् होता है।

3.4.54
स्व अङ्गे अध्रुवे

IAST sve 'ṅge 'dhruve

प्रकार विधि

सार कृ धातु से णमुल् तब भी होता है जब क्रिया स्वकीय अध्रुव (अस्थिर/चल) अङ्ग के विषय में हो।

3.4.55
परिक्लिश्यंआने च

IAST parikliśyamāne ca

प्रकार विधि

सार परिक्लिश्यमान (पीड़ित/क्लेश पा रहे) कर्म के अर्थ में भी कृ से णमुल् होता है।

3.4.56
विशिपतिपदिस्कन्दां व्याप्यंआनआसेव्यंआनयोः

IAST viśipatipadiskandāṃ vyāpyamānāsevyamānayoḥ

प्रकार विधि

सार विश्, पत्, पद् और स्कन्द् धातुओं से णमुल् तब होता है जब अर्थ व्याप्यमान या आसेव्यमान हो।

3.4.57
अस्यतितृषः क्रिया अन्तरे कालेषु

IAST asyatitṛṣoḥ kriyāntare kāleṣu

प्रकार विधि

सार अस् (क्षेप) और तृष् से क्रियाओं के बीच के काल-बोध में णमुल् होता है।

3.4.58
नाम्नि आदिशिग्रहोः

IAST nāmny ādiśigrahoḥ

प्रकार विधि

सार नामकरण में आदिश् और ग्रह् धातुओं से णमुल् होता है।

3.4.59
अव्यये अयथाभिप्रेत आख्याने कृञः क्त्वा- णमुलौ

IAST avyaye 'yathābhipretākhyāne kṛñaḥ ktvāṇamulau

प्रकार विधि

सार अव्यय के साथ अभिप्रेत से भिन्न आख्यान में कृञ् से क्त्वा और णमुल् दोनों होते हैं।

3.4.60
तिर्यचि अपवर्गे

IAST tiryacy apavarge

प्रकार विधि

सार तिर्यच् के योग में कार्य-समाप्ति (अपवर्ग) अर्थ में णमुल् होता है।

3.4.61
स्व अङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः

IAST svaṅge taspratyaye kṛbhvoḥ

प्रकार विधि

सार स्व-अङ्ग पर तस्-प्रत्यय होने पर कृ और भू से णमुल् होता है।

3.4.62
नाधाअर्थप्रत्यये च्वि अर्थे

IAST nādhārthapratyaye cvyarthe

प्रकार विधि

सार आधारार्थ-प्रत्यय होने पर तथा च्वि-अर्थ में णमुल् नहीं होता।

3.4.63
तूष्णीमि भुवः

IAST tūṣṇīmi bhuvaḥ

प्रकार विधि

सार तूष्णीम् के योग में भू धातु से णमुल् होता है।

3.4.64
अन्वचि आनुलोम्ये

IAST anvacy ānulomye

प्रकार विधि

सार अन्वच् के योग में आनुलोम्य (अनुकूलता/अनुरूपता) अर्थ में णमुल् होता है।

3.4.65
शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहार्हास्ति अर्थेषु तुमुन्

IAST śakadhṛṣajñāglāghaṭarabhalabhakramasahārhāstyartheṣu tumun

प्रकार विधि

सार शक, धृष्, ज्ञा, ग्लै, घट, रभ, लभ, क्रम्, सह, अर्ह और अस् आदि अर्थों में तुमुन् होता है।

3.4.66
पर्याप्तिवचनेषु अलमर्थेषु

IAST paryāptivacaneṣv alamartheṣu

प्रकार विधि

सार पर्याप्तता-वाचक तथा अलम्-अर्थ वाले शब्दों के योग में तुमुन् होता है।

3.4.67
कर्तरि कृत्

IAST kartari kṛt

प्रकार अधिकार

सार कृत्-प्रत्यय सामान्यतः कर्तृ-अर्थ में होते हैं।

3.4.68
भव्यगेयप्रवचनीय उपस्थाणीयजन्य आप्लाव्य आपात्या वा

IAST bhavyageyapravacanīyopasthānīyajanyāplāvyāpātyā vā

प्रकार विधि

सार भव्य, गेय, प्रवचनीय, उपस्थानीय, जन्य, आप्लाव्य और आपात्य वैकल्पिक रूप से (कर्तृ से भिन्न अर्थ में भी) होते हैं।

3.4.69
लः कर्मणि च भावे च अकर्मकेभ्यः.

IAST laḥ karmaṇi ca bhāve cākarmakebhyaḥ

प्रकार विधि

सार ल-प्रत्यय कर्म में भी होते हैं, और अकर्मक धातुओं से भाव में भी।

3.4.70
तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः

IAST tayor eva kṛtyaktakhalarthāḥ

प्रकार नियम

सार कृत्य, क्त और खल्-अर्थ वाले प्रत्यय केवल उन्हीं दो (कर्म और भाव) में होते हैं।

3.4.71
अदिकर्मणि क्तः कर्तरि च

IAST ādikarmaṇi ktaḥ kartari ca

प्रकार विधि

सार क्रिया के आरम्भ (आदिकर्म) में क्त कर्तृ-अर्थ में भी होता है।

3.4.72
गत्य् अर्थाकर्मक श्लिषशीङ् श्था असवसजनरुहजीर्यतिभ्यः

IAST gatyarthākarmakaśliṣaśīṅsthāsavasajanaruhajīryatibhyaḥ

प्रकार विधि

सार गति-अर्थक, अकर्मक तथा श्लिष्, शीङ्, स्था, आस्, वस्, जन्, रुह् और जीर्यति से भी क्त कर्तरि होता है।

3.4.73
दाशगोघ्नौ सम्प्रदाए

IAST dāśagoghnau sampradāne

प्रकार विधि

सार दाश और गोघ्न शब्द सम्प्रदान-अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

3.4.74
भीमादयोऽपादाने

IAST bhīmādayo 'pādāne

प्रकार विधि

सार भीम आदि शब्द अपादान-अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

3.4.75
ताभ्यां अन्यत्र उण् आदयः

IAST tābhyām anyatroṇādayaḥ

प्रकार विधि

सार उण्-आदि प्रत्यय उन दोनों (सम्प्रदान-अपादान) से अन्यत्र होते हैं।

3.4.76
क्तः अधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रति अवसान र्थेभ्यः

IAST kto 'dhikaraṇe ca dhrauvyagati-pratyavasānārthebhyaḥ

प्रकार विधि

सार ध्रौव्य, गति और प्रत्यवसान अर्थ वाली धातुओं से क्त प्रत्यय अधिकरण (स्थान/आश्रय) अर्थ में भी होता है।

3.4.77
लस्य

IAST lasya

प्रकार अधिकार

सार लकार के स्थान पर होने वाले आदेशों का अधिकार प्रारम्भ होता है।

3.4.78
तिप्तस्झि सिप्थस्थ मिप्वस्मः त आताम् झ थासाथांध्वम् इट्वहिमहिङ्

IAST tiptasjhi-sipthastha-mibvasmas-tātāñjhathāsāthāṃdhvam-iḍvahimahiṅ

प्रकार विधि

सार लकार के स्थान पर तिप्–तस्–झि, सिप्–थस्–थ, मिप्–वस्–मस् तथा त–आताम्–झ, थास्–आथाम्–ध्वम्, इट्–वहि–महिङ् — ये अट्ठारह तिङ् आदेश होते हैं।

3.4.79
ट्- इतः आत्मनेपदानां टेरे

IAST ṭita ātmanepadānāṃ ṭere

प्रकार विधि

सार टित् आत्मनेपद तिङ् के टि भाग के स्थान पर ए आदेश होता है।

3.4.80
थाअः से

IAST thāsaḥ se

प्रकार विधि

सार थास् के स्थान पर से आदेश होता है।

3.4.81
लिटः तझयोरेशिरेच्

IAST liṭas tajhayor eśirec

प्रकार विधि

सार लिट् में त और झ के स्थान पर क्रमशः एश् और इरेच् आदेश होते हैं।

3.4.82
पर्स्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः

IAST parasmaipadānāṃ ṇalatususthalathusaṇalvamāḥ

प्रकार विधि

सार लिट् के परस्मैपद तिङ् के स्थान पर णल्, अतुस्, उस्, थल्, अथुस्, अ, णल्, व, म — ये आदेश होते हैं।

3.4.83
विदः लटः वा

IAST vido laṭo vā

प्रकार विधि

सार विद् धातु के लट् में (पूर्वोक्त परस्मैपद-लिट्-आदेश) वैकल्पिक रूप से होते हैं।

3.4.84
ब्रुवः पञ्चानां आदितः आहः ब्रुवः

IAST bruvaḥ pañcānām ādita āho bruvaḥ

प्रकार विधि

सार ब्रू धातु से आदि के पाँच (परस्मैपद) तिङ् में धातु-स्थान पर आह् आदेश होता है।

3.4.85
लोटः लङ्वत्

IAST loṭo laṅvat

प्रकार अतिदेश

सार लोट् को लङ् के समान माना जाता है (आगामी तिङ्-कार्य के लिए)।

3.4.86
एरुः

IAST er uḥ

प्रकार विधि

सार (लोट्/लङ् के आत्मनेपद में) ए के स्थान पर उ आदेश होता है।

3.4.87
सेर्हि अपित् च

IAST ser hy apic ca

प्रकार विधि

सार सि के स्थान पर हि आदेश होता है और वह अपित् होता है।

3.4.88
वा छन्दसि

IAST vā chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (सि→हि आदि यह कार्य) वैकल्पिक है।

3.4.89
मेर्निः

IAST mer niḥ

प्रकार विधि

सार मि के स्थान पर नि आदेश होता है।

3.4.90
आं एतः

IAST ām etaḥ

प्रकार विधि

सार आम् परे होने पर (आत्मनेपद लोट् के) ए के स्थान पर एत् आदेश होता है।

3.4.91
सवाभ्यां व अमौ

IAST savābhyāṃ vāmau

प्रकार विधि

सार (लोट् में) स् और व् से उत्तर क्रमशः व् और अम् आदेश होते हैं।

3.4.92
आट् उत्तमस्य पित् च

IAST āḍ uttamasya pit ca

प्रकार विधि

सार लोट् के उत्तमपुरुष में आट् आदेश होता है और वह पित् होता है।

3.4.93
एतः ऐ

IAST eta ai

प्रकार विधि

सार (लोट् आत्मनेपद के) ए के स्थान पर ऐ आदेश होता है।

3.4.94
लेटः अटाटौ

IAST leṭo 'ḍāṭau

प्रकार विधि

सार लेट् में अट् और आट् (आगम) होते हैं।

3.4.95
आतः ऐ

IAST āta ai

प्रकार विधि

सार आकारान्त से परे (लेट् आत्मनेपद के) ए के स्थान पर ऐ आदेश होता है।

3.4.96
वा एतः अन्यत्र

IAST vā eto 'nyatra

प्रकार विधि

सार अन्यत्र (लेट् में) ए के स्थान पर ऐ वैकल्पिक होता है।

3.4.97
इतः च लोपः परस्मैपदेषु

IAST itaś ca lopaḥ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार परस्मैपद में (लेट्-तिङ् के) इ का भी लोप होता है।

3.4.98
सः उत्तमस्य

IAST sa uttamasya

प्रकार विधि

सार उत्तमपुरुष के (लेट्-तिङ् के) स् का लोप होता है।

3.4.99
नित्यं ङ्- इतः

IAST nityaṃ ṅitaḥ

प्रकार नियम

सार ङित् (लेट्-तिङ्) में यह लोप नित्य होता है।

3.4.100
इतः च

IAST itaś ca

प्रकार विधि

सार ङित् में इ का भी (नित्य) लोप होता है।

3.4.101
तस्थस्थमिपां तांतंत अमः

IAST tas-thas-tha-mipāṃ tāṃ-taṃ-tāmaḥ

प्रकार विधि

सार लोट् में तस्, थस्, थ और मिप् के स्थान पर क्रमशः ताम्, तम्, त तथा अम् आदेश होते हैं।

3.4.102
लिङः सीयुट्

IAST liṅaḥ sīyuṭ

प्रकार विधि

सार लिङ् के तिङ्-प्रत्ययों के पूर्व सीयुट् आगम होता है।

3.4.103
यासुट् परसिपदेषु दात्तः ङ्- इत् च

IAST yāsuṭ parasmaipadeṣu dātaḥ ṅit ca

प्रकार विधि

सार परस्मैपद में (सीयुट् के स्थान पर) यासुट् आगम होता है, और वह दात (आद्युदात्त) तथा ङित् होता है।

3.4.104
कित् आशिषि

IAST kid āśiṣi

प्रकार विधि

सार आशीर्लिङ् में (सीयुट्/यासुट्) कित् होता है।

3.4.105
झस्य रन्

IAST jhasya ran

प्रकार विधि

सार लिङ् में झ के स्थान पर रन् आदेश होता है।

3.4.106
इटः अत्

IAST iṭaḥ at

प्रकार विधि

सार लिङ् में इट् के स्थान पर अत् आदेश होता है।

3.4.107
सुट् तिथोः

IAST suṭ tithoḥ

प्रकार विधि

सार लिङ्/आशीष् में ति और थ के पूर्व सुट् आगम होता है।

3.4.108
झेर्जुः

IAST jher juḥ

प्रकार विधि

सार लिङ् में झि के स्थान पर जुस् आदेश होता है।

3.4.109
सीच् अभ्यस्तविदिभ्यः च

IAST sijabhyastavidibhyaśca

प्रकार विधि

सार सिच्-प्रत्ययान्त धातु, अभ्यस्त (द्विरुक्त) धातु तथा विद् से परे झि को जुस् आदेश होता है।

3.4.110
आतः

IAST ātaḥ

प्रकार विधि

सार आकारान्त धातु/आधार से भी (झि के स्थान पर) जुस् होता है।

3.4.111
लङः शाकटायनस्य एव

IAST laṅaḥ śākaṭāyanasya eva

प्रकार विधि

सार शाकटायन के मत में ही यह (आकारान्त आदि पर जुस्) लङ् में भी लागू होता है।

3.4.112
द्विषः च

IAST dviṣaśca

प्रकार विधि

सार द्विष् धातु से परे भी (लङ् में) झि को जुस् आदेश होता है।

3.4.113
तिङ्श्- इत्सार्वधातुकं

IAST tiṅśitsārvadhātukam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार तिङ् तथा श्-इत् वाले प्रत्ययों की सार्वधातुक संज्ञा होती है।

3.4.114
आर्धधातुकं शेषः

IAST ārdhadhātukaṃ śeṣaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार शेष (गैर-सार्वधातुक) धातु-प्रत्यय आर्धधातुक संज्ञक होते हैं।

3.4.115
१इट् च

IAST liṭ ca

प्रकार अतिदेश

सार लिट् (तिङ् होने पर भी) आर्धधातुक संज्ञक होता है।

3.4.116
लिङ् आशिषि

IAST liṅāśiṣi

प्रकार अतिदेश

सार आशीर्-अर्थ वाले लिङ् की भी आर्धधातुक संज्ञा होती है।

3.4.117
छन्दस्युभयथा

IAST chandasy ubhayathā

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (ये प्रत्यय) दोनों प्रकार से—सार्वधातुक तथा आर्धधातुक—होते हैं।

अध्याय 4 · पाद 1 (178 सूत्र)

4.1.1
ङ्याप्प्रातिपदिकात्

IAST ṅyāpprātipadikāt

प्रकार अधिकार

सार ङी/आप्-प्रत्ययान्त तथा प्रातिपदिक से आगे विहित सुप्-आदि प्रत्यय-कार्य का अधिकार-सूत्र है।

4.1.2
स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप्

IAST svaujasamauṭchaṣṭābhyāmbhisṅebhyāmbhyasṅasibhyāmbhyasṅasosāmṅyossup

प्रकार विधि

सार प्रातिपदिक से सु-औ-जस्-अम्-औट्-शस्-टा-भ्याम्-भिस्-ङे-भ्याम्-भ्यस्-ङसि-भ्याम्-भ्यस्-ङस्-ओस्-आम्-ङि-ओस्-सुप् — ये इक्कीस सुप्-विभक्ति-प्रत्यय होते हैं।

4.1.3
स्त्रियां

IAST striyām

प्रकार अधिकार

सार स्त्री-लिङ्ग में होने वाले स्त्री-प्रत्ययों (टाप्-ङीप्-आदि) का अधिकार आरम्भ होता है।

4.1.4
अज आदि अतः टाप्

IAST ajādyataṣṭāp

प्रकार विधि

सार अजादि-गण के शब्दों तथा अकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्वे टाप् (आ) होता है।

4.1.5
ऋत्नेभ्यः ङीप्

IAST ṛnnebhyaḥ ṅīp

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त तथा नकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्वे ङीप् (ई) होता है।

4.1.6
उक् इतः च

IAST ugitaś ca

प्रकार विधि

सार उक्-इत् (उगित्) वाले प्रातिपदिक से भी स्त्रीत्वे ङीप् होता है।

4.1.7
वनः र च

IAST vanaḥ ra ca

प्रकार विधि

सार वन-शब्द से स्त्रीत्वे ङीप् के साथ र का आगम भी होता है (वनरी)।

4.1.8
पादः अन्यतरस्यां

IAST pādaḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार पाद-शब्द से स्त्रीत्वे ङीप् वैकल्पिक है (पादी/पादा)।

4.1.9
टाप् ऋचि

IAST ṭāp ṛci

प्रकार विधि

सार ऋच् (वैदिक छन्द) में (पूर्व-विहित ङीप् के स्थान पर) टाप् होता है।

4.1.10
न षट्स्वसृ आदिभ्यः

IAST na ṣaṭsvasṛ-ādibhyaḥ

प्रकार नियम

सार षट्, स्वसृ आदि (षट्स्वस्रादि) शब्दों से ङीप् का प्रतिषेध है।

4.1.11
मनः

IAST manaḥ

प्रकार नियम

सार मन्-अन्त प्रातिपदिक से भी ङीप् नहीं होता।

4.1.12
अनः बहुव्रीहेः

IAST anaḥ bahuvrīheḥ

प्रकार नियम

सार अन्-अन्त बहुव्रीहि से ङीप् का प्रतिषेध है।

4.1.13
डाप् उभाभ्यां अन्यतरस्याम्

IAST ḍāp ubhābhyām anyatarasyām

प्रकार विधि

सार उक्त दोनों स्थितियों (मन् तथा अन्-बहुव्रीहि) से वैकल्पिक डाप् होता है।

4.1.14
अनुपसर्जणात्

IAST anupasarjanāt

प्रकार अधिकार

सार आगे के स्त्री-प्रत्यय अनुपसर्जन (अप्रधान न होने वाले) प्रातिपदिक से ही होते हैं।

4.1.15
ट्- इत् ढ अण् अञ् द्वयसच् दघ्नच्मात्रच् तयप्- - ठञ्कञ्क्वरपः

IAST ṭiḍḍhāṇañdvayasajdaghnamātracṭayapṭhakṭhañkañkvarapaḥ

प्रकार विधि

सार टित्, ढ, अण्, अञ्, द्वयसच्, दघ्नच्, मात्रच्, तयप्, ठक्, ठञ्, कञ्, क्वरप् — इन प्रत्ययान्तों से स्त्रीत्वे ङीप् होता है।

4.1.16
यञ् अः च

IAST yañaś ca

प्रकार विधि

सार यञ्-प्रत्ययान्त से भी स्त्रीत्वे ङीप् होता है।

4.1.17
प्राचां ष्फ तद्धितः

IAST prācāṃ ṣpha taddhitaḥ

प्रकार विधि

सार प्राच्यों के मत में ष्फ तद्धित-प्रत्यय है (जिससे स्त्री-प्रत्यय-परम्परा लगती है)।

4.1.18
सर्वत्र लोहित आदि कत अन्तेभ्यः

IAST sarvatra lohitādi-katāntebhyaḥ

प्रकार विधि

सार सर्वत्र (सभी आचार्यों के मत में) लोहितादि तथा कत-अन्त से ष्फ होता है।

4.1.19
कौरव्यमाण्डूकाभ्यां च

IAST kauravyamāṇḍūkābhyāṃ ca

प्रकार विधि

सार कौरव्य तथा माण्डूक से भी ष्फ होता है।

4.1.20
वयसि प्रथमे

IAST vayasi prathame

प्रकार विधि

सार प्रथम वय (बाल्य/यौवन-प्रथम अवस्था) के अर्थ में ष्फ होता है।

4.1.21
द्विगोः

IAST dvigoḥ

प्रकार विधि

सार द्विगु-समास से स्त्रीत्वे ङीप् होता है।

4.1.22
अपरिमाणबिस्त आचितकम्बल्येभ्यः न तद्धितलुकि

IAST aparimāṇabistācitakambalyebhyo na taddhitaluki

प्रकार नियम

सार अपरिमाण, बिस्त, आचित, कम्बल्य से — तद्धित के लुक् होने पर — ङीप् नहीं होता।

4.1.23
काण्ड अन्तात् क्षेत्रे

IAST kāṇḍāntāt kṣetre

प्रकार विधि

सार काण्ड-अन्त (द्विगु) से क्षेत्र (क्षेत्र-प्रमाण) अर्थ में ङीप् होता है।

4.1.24
पुरुषात् प्रमाणे अन्यतरस्यां

IAST puruṣāt pramāṇe anyatarasyām

प्रकार विधि

सार पुरुष-अन्त (द्विगु) से प्रमाण अर्थ में ङीप् वैकल्पिक है।

4.1.25
बहुव्रीहेरूधसः ङीष्

IAST bahuvrīher ūdhasaḥ ṅīṣ

प्रकार विधि

सार ऊधस्-अन्त बहुव्रीहि से स्त्रीत्वे ङीष् होता है।

4.1.26
संख्या अव्यय आद् एर्ङीप्

IAST saṃkhyāvyayāder ṅīp

प्रकार विधि

सार आ- या ई-कारान्त संख्यावाचक तथा अव्यय शब्दों से स्त्रीत्व में ङीप् होता है।

4.1.27
दाम(न्)हायन अन्तात् च

IAST dāmahāyanāntāc ca

प्रकार विधि

सार दामन्- तथा हायन-अन्त शब्दों से भी स्त्रीत्व में ङीप् होता है।

4.1.28
अनः उपधाओपिनः न्यारयां

IAST ana upadhālopino 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार उपधालोप वाले अन्-अन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व में ङीप् वैकल्पिक होता है।

4.1.29
नित्यं संज्ञाछन्दसोः

IAST nityaṃ saṃjñāchandasoḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा तथा छन्दस् में उक्त स्थान पर ङीप् नित्य होता है।

4.1.30
केवलमामकभागधेयपाप अपरसमान आर्यकृतसुमङ्गलभेषजात् च

IAST kevalamāmakabhāgadheyapāpāparasamānāryakṛtasumaṅgalabheṣajāc ca

प्रकार विधि

सार केवल, मामक, भागधेय, पाप, अपर, समान, आर्यकृत, सुमङ्गल तथा भेषज से भी स्त्रीत्व में ङीप् होता है।

4.1.31
रात्रेः च अजसौ

IAST rātreś cājasau

प्रकार विधि

सार रात्रि शब्द से भी (द्विवचन-जस्/औ के अतिरिक्त) स्त्रीत्व में ङीप् होता है।

4.1.32
अन्तर्वत्पतिवतोर्नुक्

IAST antarvatpativator nuk

प्रकार विधि

सार अन्तर्वत् तथा पतिवत् से ङीप् के पूर्व नुक् का आगम होता है।

4.1.33
पत्युर्नः यज्ञसंयोगे

IAST patyur no yajñasaṃyoge

प्रकार विधि

सार यज्ञसंयोग में पति शब्द के इकार को न् आदेश होता है (पत्नी)।

4.1.34
विभाषा सपूर्वस्य

IAST vibhāṣā sapūrvasya

प्रकार विधि

सार सपूर्व पति शब्द में उक्त न्-आदेश वैकल्पिक होता है।

4.1.35
नित्यं सपत्नी आदिषु

IAST nityaṃ sapatnyādiṣu

प्रकार विधि

सार सपत्नी आदि गण-शब्दों में पति के इकार को न् नित्य होता है।

4.1.36
पूतक्रतोरै च

IAST pūtakrator ai ca

प्रकार विधि

सार पूतक्रतु शब्द से स्त्रीत्व में ऐ-आदेश तथा ङीप् होता है।

4.1.37
वृषाकपि अग्निकुसितकुसीदानां उदात्तः

IAST vṛṣākapyagnikusitakusīdānām udāttaḥ

प्रकार विधि

सार वृषाकपि, अग्नि, कुसित तथा कुसीद की स्त्रीप्रत्यय-रूपों में उदात्त स्वर होता है।

4.1.38
मनोरौ वा

IAST manor au vā

प्रकार विधि

सार मनु शब्द से स्त्रीत्व में औ-आदेश वैकल्पिक होता है।

4.1.39
वर्णात् अनुदात्तात् त उपधात्तः नः

IAST varṇānudāttāt topadhātto naḥ

प्रकार विधि

सार त्-उपधा वाले अनुदात्त वर्णवाचक शब्द के अन्त्य को स्त्रीत्व में न् आदेश होता है।

4.1.40
अन्यतः ङीष्

IAST anyato ṅīṣ

प्रकार विधि

सार अन्य वर्णवाचक शब्दों से स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.41
ष्- इत् गौर आदिभ्यः

IAST ṣid gaurādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार षिद् प्रातिपदिकों तथा गौरादि गण से स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.42
जानपदकुण्डगोणस्थलभाजनागकालनीलकुशकामुककबरात् वृत्ति अमत्र आवपन अकृत्रिमाश्राणास्थौल्यवर्ण अणाच्छादन अयोविकारमैथुन इच्छाकेशवेशेषु

IAST jānapadakuṇḍagoṇasthalabhājanāgakālanīlakuśakāmukkabarād vṛttyamatrāvapana-akṛtrimāśrāṇāsthaulyavarṇa-aṇācchādana-ayovikāramaithunecchākeśaveśeṣu

प्रकार विधि

सार जानपद, कुण्ड, गोण, स्थल, भाजन, आग, काल, नील, कुश, कामुक तथा कबर से वृत्ति, अमत्र, आवपन, अकृत्रिम, आश्राणा, स्थौल्य, वर्ण, अण, आच्छादन, अयोविकार, मैथुन, इच्छा तथा केशवेश अर्थों में ङीष् होता है।

4.1.43
शोणात् प्राआं

IAST śoṇāt prācām

प्रकार विधि

सार शोण शब्द से प्राच्य आचार्य-सम्मति में स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.44
वा उतः गुणवचणात्

IAST voto guṇavacanāt

प्रकार विधि

सार उ-कारान्त गुणवाचक शब्द से स्त्रीत्व में ङीष् वैकल्पिक होता है।

4.1.45
बहु आदिभ्यः च

IAST bahvādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार बह्वादि गण से भी स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.46
नित्यं छन्दसि

IAST nityaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में उक्त स्थान पर ङीष् नित्य होता है।

4.1.47
भुवः च

IAST bhuvaś ca

प्रकार विधि

सार भू शब्द से भी स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.48
पुंयोगात् आख्यायां

IAST puṃyogād ākhyāyām

प्रकार विधि

सार पुंयोग से प्राप्त आख्या (पत्नी-नाम) में स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.49
इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिम अरण्ययवयवनमातुलआचार्या- णां आनुक्

IAST indravaruṇabhavaśarvarudramṛḍahimāraṇyayavayavanamātulācāryāṇām ānuk

प्रकार विधि

सार इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल तथा आचार्य से स्त्रीत्व में आनुक् का आगम होता है।

4.1.50
क्रीतात् करणपूर्वात्

IAST krītāt karaṇapūrvāt

प्रकार विधि

सार करण-पूर्व क्रीत शब्द से (पुंयोग-आख्या में) स्त्रीत्व में ङीष् होता है।

4.1.51
क्तात् अल्प आख्यायां

IAST ktāt alpākhyāyām

प्रकार विधि

सार क्त-प्रत्ययान्त से, अल्पता-द्योतक आख्या में, स्त्रीत्वे ङीष् होता है।

4.1.52
बहुव्रीहेः च अन्त उदात्तात्

IAST bahuvrīheś cāntodāttāt

प्रकार विधि

सार अन्तोदात्त बहुव्रीहि से भी (स्त्रीत्वे) ङीष् होता है।

4.1.53
अस्वाङ्गपूर्वपदात् वा

IAST asvāṅgapūrvapadād vā

प्रकार विधि

सार पूर्वपद अस्वाङ्ग हो तो बहुव्रीहि से ङीष् वैकल्पिक है।

4.1.54
स्वाङ्गात् च उपसर्जणात् आंयोग पधात्

IAST svāṅgāc copasarjanād asaṃyogopadhāt

प्रकार विधि

सार उपसर्जन स्वाङ्ग से, जिसकी उपधा असंयोग हो, ङीष् होता है।

4.1.55
नासिका उदर ओष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गात् च

IAST nāsikodaroṣṭhajaṅghādantakarṇaśṛṅgāc ca

प्रकार विधि

सार नासिका, उदर, ओष्ठ, जङ्घा, दन्त, कर्ण और शृङ्ग से भी ङीष् होता है।

4.1.56
न क्रोड आदिबह्वचः

IAST na kroḍādibahvacaḥ

प्रकार विधि

सार क्रोडादिगण के बह्वच् शब्दों से ङीष् नहीं होता।

4.1.57
सहनञ्विद्यंआनपूर्वात्

IAST sahanañvidyamānapūrvāt

प्रकार विधि

सार सह, नञ् या विद्यमान पूर्वक (स्वाङ्ग/बहुव्रीहि) से ङीष् निषिद्ध है।

4.1.58
नखमुखात् संज्ञायां

IAST nakhamukhāt saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में नख और मुख से ङीष् नहीं होता।

4.1.59
दीर्घजिह्वी च छन्दसि

IAST dīrghajihvī ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में ‘दीर्घजिह्वी’ रूप भी सिद्ध होता है।

4.1.60
दिक्पूर्वपदात् ङीप्

IAST dikpūrvapadād ṅīp

प्रकार विधि

सार दिक्-पूर्वपदक शब्द से स्त्रीत्वे ङीप् होता है।

4.1.61
वाहः

IAST vāhaḥ

प्रकार विधि

सार वह्-अन्त (वाह) से भी स्त्रीत्वे ङीप् होता है।

4.1.62
सखी अशिश्वी इति भाषायां

IAST sakhy aśiśvīti bhāṣāyām

प्रकार विधि

सार भाषा में ‘सखी’ और ‘अशिश्वी’ रूप (ङीप्-सिद्ध) माने जाते हैं।

4.1.63
जातेरस्त्रीविषयात् अय उपधात्

IAST jāter astrīviṣayād ayopadhāt

प्रकार विधि

सार अस्त्री-विषय (पुं-स्त्री-सामान्य) जातिवाचक से, अय-उपध होने पर, ङीष् होता है।

4.1.64
पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलवाल उत्तरपदात् च

IAST pāka-karṇa-parṇa-puṣpa-phala-mūla-vālottarapadāc ca

प्रकार विधि

सार पाक, कर्ण, पर्ण, पुष्प, फल, मूल या वाल उत्तरपद वाले से भी ङीष् होता है।

4.1.65
इतः मनुष्यजातेः

IAST ito manuṣyajāteḥ

प्रकार विधि

सार इकारान्त मनुष्य-जातिवाचक से स्त्रीत्वे ङीष् होता है।

4.1.66
ऊङ् उतः

IAST ūṅ utaḥ

प्रकार विधि

सार उकारान्त से स्त्रीत्वे ऊङ् प्रत्यय होता है।

4.1.67
बाहु अन्तात् संज्ञायां

IAST bāhv-antāt saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में बाहु-अन्त से ऊङ् होता है।

4.1.68
पङ्गोः च

IAST paṅgoś ca

प्रकार विधि

सार पङ्गु से भी स्त्रीत्वे ऊङ् होता है।

4.1.69
ऊरूत्तरपदात् औपम्ये

IAST ūrūttarapadād aupamye

प्रकार विधि

सार औपम्य में ऊरु-उत्तरपद से ऊङ् होता है।

4.1.70
संहितशफलक्षणवाम आदेः च

IAST saṃhitaśaphalakṣaṇavāmādeś ca

प्रकार विधि

सार संहित, शफ, लक्षण या वाम आदि पूर्वपद से भी (ऊरु-युक्त में) ऊङ् होता है।

4.1.71
कद्रुकमण्डल्वोः छन्दसि

IAST kadrukamaṇḍalvoś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में कद्रु और कमण्डलु से ऊङ् होता है।

4.1.72
संज्ञायां

IAST saṃjñāyām

प्रकार अधिकार

सार संज्ञा-विषय में (आगे विहित स्त्री-प्रत्यय का) अधिकार/सीमा लगती है।

4.1.73
शार्ङ्गरव आदि अञः ङीन्

IAST śārṅgaravādy-aṅo ṅīn

प्रकार विधि

सार शार्ङ्गरवादिगण में पठित अञ्-प्रत्ययान्त से स्त्रीत्वे ङीन् होता है।

4.1.74
यङः चाप्

IAST yaṅaś cāp

प्रकार विधि

सार यङ्-प्रत्ययान्त से स्त्रीत्वे चाप् होता है।

4.1.75
आवट्यात् च

IAST āvaṭyāc ca

प्रकार विधि

सार आवटीय से भी स्त्रीत्वे चाप् होता है।

4.1.76
तद्धिताः

IAST taddhitāḥ

प्रकार अधिकार

सार यहाँ से तद्धित-प्रत्ययों का अधिकार आरम्भ होता है, जो आगे के तद्धित-विभाग तक अनुवर्तित रहता है।

4.1.77
यूनः तिह्

IAST yūnas tiḥ

प्रकार विधि

सार यूवन् (कनिष्ठ/युवा गोत्रज) अर्थ में पूर्व-प्रत्यय के स्थान पर तिः प्रत्यय होता है।

4.1.78
अणिञोरणार्षयोर्गुरु पोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे

IAST aṇiñor anārṣayor gurupottamayoḥ ṣyaṅ gotre

प्रकार विधि

सार अनार्ष (ऋषि-गोत्रेतर) अण्/इञ्-गोत्रों में गुरु और पोत्तम अर्थ में गोत्र-प्रत्यय ष्यङ् होता है।

4.1.79
गोत्र अवयवात्

IAST gotrāvayavāt

प्रकार विधि

सार गोत्र-नाम के अवयव (अंगभूत पद) से भी वही गोत्र-प्रत्यय-विधान लागू होता है।

4.1.80
क्रौडि आदिभ्यः च

IAST krauḍy-ādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार क्रौडि-आदि गण के शब्दों से भी (गोत्र में ष्यङ् आदि) तद्धित होता है।

4.1.81
दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकाण्ठेविद्धिभ्यः न्यतरस्यां

IAST daivayajñi-śaucivṛkṣi-sātyamugri-kāṇṭheviddhibhyo 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार दैवयज्ञि, शौचिवृक्षि, सात्यमुग्रि, काण्ठेविद्धि आदि से विकल्पेन (ष्यङ्/अन्य) तद्धित होता है।

4.1.82
समर्थानां प्रथंआत् वा

IAST samarthānāṃ prathamād vā

प्रकार परिभाषा

सार समर्थ पदों के समूह में विकल्पेन प्रथम पद से ही तद्धित-प्रत्यय लगाया जाता है।

4.1.83
प्राग् दीव्यतः अण्

IAST prāg dīvyato 'ṇ

प्रकार अधिकार

सार ‘दीव्यति’ (४.४.२) से पूर्व तक सामान्य तद्धित-प्रत्यय अण् का अधिकार है।

4.1.84
अश्वपति आदिभ्यः च

IAST aśvapaty-ādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार अश्वपति-आदि गण के शब्दों से भी अण् होता है।

4.1.85
दिति अदितिआदित्यपति उत्तरपदात् ण्यः

IAST dity-adity-āditya-paty-uttarapadāṇ ṇyaḥ

प्रकार विधि

सार दिति, अदिति, आदित्य तथा -पति-अन्त उत्तरपद वाले शब्दों से ण्य प्रत्यय होता है।

4.1.86
उत्सआदिभ्यः अञ्

IAST utsādibhyo 'ñ

प्रकार विधि

सार उत्स-आदि गण के शब्दों से अञ् प्रत्यय होता है।

4.1.87
स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवणात्

IAST strīpuṃsābhyāṃ nañsnañau bhavanāt

प्रकार विधि

सार स्त्री से नञ् और पुंस् से स्नञ् होता है (भवन्/तद्धितार्थ में; यथा स्त्रैण, पौंस्न)।

4.1.88
द्विगोर्लुक् अनपत्ये

IAST dvigor lug anapatye

प्रकार विधि

सार द्विगु में अपत्य-भिन्न अर्थ होने पर तद्धित-प्रत्यय का लुक् होता है।

4.1.89
गोत्रे अलुक् अचि

IAST gotre 'lug aci

प्रकार विधि

सार गोत्र अर्थ में अच् (स्वर) परे रहने पर लुक् नहीं होता (अलुक्)।

4.1.90
यूनि लुक्

IAST yūni luk

प्रकार विधि

सार यूवन् (कनिष्ठ) अर्थ में (गोत्र-)प्रत्यय का लुक् होता है।

4.1.91
फक्फिञोरन्यतरस्यां

IAST phakphiñor anyatarasyām

प्रकार विधि

सार फक् और फिञ् प्रत्ययों का विकल्पेन लुक् होता है।

4.1.92
तस्य अपत्यं

IAST tasyāpatyam

प्रकार अधिकार

सार यहाँ से ‘उसका अपत्य’ अर्थ का अधिकार है—अगले प्रत्यय अपत्यार्थक माने जाते हैं।

4.1.93
एकः गोत्रे

IAST eko gotre

प्रकार नियम

सार गोत्र में एक ही (मूल) व्यक्ति/रूप से गोत्र-संज्ञा/प्रत्यय व्यवस्थित होता है।

4.1.94
गोत्रात् यूनि अस्त्रियां

IAST gotrād yūny astriyām

प्रकार विधि

सार गोत्र-प्रत्ययान्त से, स्त्री-भिन्न में, यूवन् अर्थ के प्रत्यय होते हैं।

4.1.95
अतः इञ्

IAST ata iñ

प्रकार विधि

सार अकारान्त प्रातिपदिक से अपत्य/गोत्र में इञ् प्रत्यय होता है।

4.1.96
बाहु आदिभ्यः च

IAST bāhv-ādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार बाहु-आदि गण के शब्दों से भी इञ् होता है।

4.1.97
सुधातुरकङ् च

IAST sudhātur akaṅ ca

प्रकार विधि

सार सुधातु से (इञ् के साथ) अकङ् प्रत्यय भी होता है।

4.1.98
गोत्रे कुञ्ज आदिभ्यः च्फञ्

IAST gotre kuñjādibhyaś cphañ

प्रकार विधि

सार गोत्र अर्थ में कुञ्ज-आदि से च्फञ् प्रत्यय होता है।

4.1.99
नड आदिभ्यः फक्

IAST naḍādibhyaḥ phak

प्रकार विधि

सार नड-आदि गण के शब्दों से फक् प्रत्यय होता है।

4.1.100
हरित आदिभ्यः अञः

IAST haritādibhyo 'ñaḥ

प्रकार विधि

सार हरित-आदि (अञ्-गोत्र) शब्दों से (पूर्वानुवृत्त) फक् अञ् के स्थान/सन्दर्भ में विहित होता है।

4.1.101
यञ् इञोः च

IAST yañiñoś ca

प्रकार विधि

सार यञ् तथा इञ् से निष्पन्न गोत्र-प्रातिपदिकों से (युवन्-अपत्यार्थ में) ञ्य प्रत्यय होता है।

4.1.102
शरद्वत्शुनकदर्भात् भृगुवत्स आग्रायणेषु

IAST śaradvacchunakadarbhād bhṛguvatsāgrāyaṇeṣu

प्रकार विधि

सार शरद्वत्, शुनक और दर्भ से भृगु, वत्स तथा आग्रायण गोत्र-सन्दर्भ में (युवन्/अपत्यार्थक) ञ्य प्रत्यय होता है।

4.1.103
द्रोणपर्वतजीवन्तात्न्यारयां

IAST droṇaparvatajīvantād nyārāyām

प्रकार विधि

सार द्रोण, पर्वत और जीवन्त से न्यारा-गोत्र में (युवन्/अपत्यार्थक) ञ्य प्रत्यय होता है।

4.1.104
अनृषि आनन्तर्ये बिद आदिभ्यः अञ्

IAST anṛṣy ānantarye bidādibhyo ’ñ

प्रकार विधि

सार अनृषि तथा आनन्तर्य की स्थिति में बिदादिगण से गोत्र/अपत्यार्थ में अञ् प्रत्यय होता है।

4.1.105
गर्ग आदिभ्यः यञ्

IAST gargādibhyo yañ

प्रकार विधि

सार गर्गादिगण से गोत्र-अपत्यार्थ में यञ् प्रत्यय होता है।

4.1.106
मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकेषु

IAST madhubabhrvor brāhmaṇakauśikeṣu

प्रकार विधि

सार मधु और बभ्रु से ब्राह्मण तथा कौशिक सन्दर्भ में गोत्र-अपत्यार्थ में यञ् प्रत्यय होता है।

4.1.107
कपिबोधात् आङ्गिरसे

IAST kapibodhād āṅgirase

प्रकार विधि

सार कपि और बोध से आङ्गिरस-गोत्र में अपत्यार्थक यञ् प्रत्यय होता है।

4.1.108
वतण्डात् च

IAST vataṇḍāc ca

प्रकार विधि

सार वतण्ड से भी (आङ्गिरस-गोत्र में) अपत्यार्थक यञ् प्रत्यय होता है।

4.1.109
लुक् स्त्रियां

IAST luk striyām

प्रकार विधि

सार स्त्री-रूप में (पूर्व-निर्दिष्ट गोत्र/युवन्-प्रत्यय का) लुक् होता है।

4.1.110
अश्व आदिभ्यः फक्

IAST aśvādibhyaḥ phak

प्रकार विधि

सार अश्वादिगण से गोत्र/अपत्यार्थ में फक् प्रत्यय होता है।

4.1.111
भर्गात् त्रैगर्ते

IAST bhargāt traigarte

प्रकार विधि

सार भर्ग से त्रैगर्त-सन्दर्भ में अपत्यार्थक फक् प्रत्यय होता है।

4.1.112
शिव आदिभ्यः अण्

IAST śivādibhyo ’ṇ

प्रकार विधि

सार शिवादिगण से अपत्यार्थ में अण् प्रत्यय होता है।

4.1.113
अवृद्धाभ्यः नदीमानुषीह्यः अणामिकाह्यः

IAST avṛddhābhyo nadīmānuṣībhyas tannāmikābhyaḥ

प्रकार विधि

सार अवृद्ध नदी-नामों तथा अवृद्ध मानुषी-नामों (तन्नामिका) से अपत्यार्थ में अण् प्रत्यय होता है।

4.1.114
ऋषि अन्धकवृष्णिकुरुभ्यः च

IAST ṛṣyandhakavṛṣṇikurubhyaś ca

प्रकार विधि

सार ऋषि-नामों तथा अन्धक, वृष्णि और कुरु से भी अपत्यार्थ में अण् प्रत्यय होता है।

4.1.115
मातुरुत् संख्यासम् भद्रपूर्वायाः

IAST mātur ut saṃkhyāsaṃbhadrapūrvāyāḥ

प्रकार विधि

सार संख्या, सम् अथवा भद्र से पूर्ववर्ती मातृ से अपत्यार्थ में उत् (मातुर) होकर अण् प्रत्यय होता है।

4.1.116
कन्यायाः कनीन च

IAST kanyāyāḥ kanīna ca

प्रकार विधि

सार कन्या से अपत्यार्थ में अण् होता है और कन्या के स्थान में कनीन आदेश भी होता है।

4.1.117
विकर्णशुङ्गछगलात् वत्सभरद्वाज अत्रिषु

IAST vikarṇaśuṅgachagalād vatsabharadvājātriṣu

प्रकार विधि

सार विकर्ण, शुङ्ग और छगल से वत्स, भरद्वाज तथा अत्रि गोत्र-सन्दर्भ में अपत्यार्थक अण् प्रत्यय होता है।

4.1.118
पीलायाः वा

IAST pīlāyā vā

प्रकार विधि

सार पीला से अपत्यार्थ में अण् वैकल्पिक रूप से होता है।

4.1.119
ढक् च मण्डूकात्

IAST ḍhak ca maṇḍūkāt

प्रकार विधि

सार मण्डूक से अपत्यार्थ में ढक् भी (विकल्प से) होता है।

4.1.120
स्त्रीभ्यः ढक्

IAST strībhyo ḍhak

प्रकार विधि

सार स्त्री-प्रातिपदिकों से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.121
द्व्यचः

IAST dvyacaḥ

प्रकार विधि

सार द्व्यच् (द्विस्वर) स्त्री-प्रातिपदिकों से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.122
इत् अः च अनिञ् अः

IAST itaś cāniñaḥ

प्रकार विधि

सार इ-कारान्त तथा अनिञ् अ-कारान्त (स्त्री) प्रातिपदिकों से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.123
शुभ्र आदिभ्यः च

IAST śubhrādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार शुभ्रादिगण से भी अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.124
विकर्णकुशीतकात् काश्यपे

IAST vikarṇakuśītakāt kāśyape

प्रकार विधि

सार विकर्ण और कुशीतक से काश्यप-गोत्र में अपत्यार्थक ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.125
भ्रुवः वुक् च

IAST bhruvo vuk ca

प्रकार विधि

सार भ्रू से अपत्यार्थ में वुक् आगम सहित ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.126
कल्याणी आदीनां इनङ्

IAST kalyāṇyādīnām inaṅ

प्रकार विधि

सार कल्याणी-गण की स्त्रीलिङ्ग संज्ञाओं से अपत्यार्थ में इनङ् प्रत्यय होता है।

4.1.127
कुलटायाः वा

IAST kulaṭāyā vā

प्रकार विधि

सार कुलटा से अपत्यार्थ में इनङ् वैकल्पिक रूप से होता है।

4.1.128
चटकायाः ऐरक्

IAST caṭakāyā airak

प्रकार विधि

सार चटका से अपत्यार्थ में ऐरक् प्रत्यय होता है।

4.1.129
गोधायाः ढ्रक्

IAST godhāyā ḍhrak

प्रकार विधि

सार गोधा से अपत्यार्थ में ढ्रक् प्रत्यय होता है।

4.1.130
आरक् उदीचां

IAST ārak udīcām

प्रकार विधि

सार उदीच्य (उत्तरी) प्रयोग में गोधा से आरक् प्रत्यय होता है।

4.1.131
क्षुद्राभ्यः वा

IAST kṣudrābhyo vā

प्रकार विधि

सार क्षुद्र (लघु) प्राणि-संज्ञाओं से पूर्वोक्त विशेष प्रत्यय वैकल्पिक रूप से होते हैं।

4.1.132
पितृष्वौः छण्

IAST pitṛṣvasuś chaṇ

प्रकार विधि

सार पितृष्वसृ से अपत्यार्थ में छण् प्रत्यय होता है।

4.1.133
ढकि लोपः

IAST ḍhaki lopaḥ

प्रकार विधि

सार ढक् प्रत्यय होने पर (पितृष्वसृ/मातृष्वसृ के) ष्वसृ-भाग का लोप होता है।

4.1.134
मातृष्वसुः च

IAST mātṛṣvasuś ca

प्रकार विधि

सार मातृष्वसृ से भी पूर्वोक्त छण् (तथा ढक्-पक्ष में ष्वसृ-लोप) होता है।

4.1.135
चतुष्पाद्भ्यः ढञ्

IAST catuṣpādbhyo ḍhañ

प्रकार विधि

सार चतुष्पद् (चौपाया) प्राणि-संज्ञाओं से अपत्यार्थ में ढञ् प्रत्यय होता है।

4.1.136
गृष्टि आदिभ्यः च

IAST gṛṣṭyādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार गृष्टि आदि संज्ञाओं से भी अपत्यार्थ में ढञ् प्रत्यय होता है।

4.1.137
राज(न्)श्वसुरात् यत्

IAST rājaśvaśurād yat

प्रकार विधि

सार राजन् और श्वशुर से अपत्यार्थ में यत् प्रत्यय होता है।

4.1.138
क्षत्रात् घः

IAST kṣatrād ghaḥ

प्रकार विधि

सार क्षत्र से अपत्यार्थ में घ प्रत्यय होता है।

4.1.139
कुलात् खः

IAST kulāt khaḥ

प्रकार विधि

सार कुल से अपत्यार्थ में ख प्रत्यय होता है।

4.1.140
अपूर्वपदात् अन्यतरस्यां यत् ढकञौ

IAST apūrvapadād anyatarasyāṃ yadḍhakañau

प्रकार विधि

सार कुल जब पूर्वपद न हो तो अपत्यार्थ में यत् और ढकञ् वैकल्पिक रूप से होते हैं।

4.1.141
महाकुलात् अञ्खञौ

IAST mahākulād añkhañau

प्रकार विधि

सार महाकुल से अपत्यार्थ में अञ् और खञ् प्रत्यय होते हैं।

4.1.142
दुष्कुलात् ढक्

IAST duṣkulāḍ ḍhak

प्रकार विधि

सार दुष्कुल से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है।

4.1.143
स्वसुः छः

IAST svasuś chaḥ

प्रकार विधि

सार स्वसृ (बहन) से अपत्यार्थ में छ प्रत्यय होता है।

4.1.144
भ्रातुर्व्यत् च

IAST bhrātur vyac ca

प्रकार विधि

सार भ्रातृ से अपत्यार्थ में व्यत् भी (तथा छ) होता है।

4.1.145
व्यन् सपत्ने

IAST vyan sapatne

प्रकार विधि

सार सपत्न (प्रतिपक्षी/सपत्न-सम्बन्ध) अर्थ में व्यन् प्रत्यय होता है।

4.1.146
रेवती आदिभ्यः ठक्

IAST revatyādibhyaṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार रेवती आदि संज्ञाओं से अपत्यार्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.1.147
गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च

IAST gotrastriyāḥ kutsane ṇa ca

प्रकार विधि

सार गोत्र-स्त्री-संज्ञा से कुत्सा (निन्दा) अर्थ में ण भी (तथा ठक्) होता है।

4.1.148
वृद्धात् ठक् सौवीरेषु बहुलं

IAST vṛddhāṭ ṭhak sauvīreṣu bahulam

प्रकार विधि

सार वृद्ध (वृद्ध-संज्ञक) गोत्र-नामों से सौवीरों में बहुल रूप से ठक् होता है।

4.1.149
फेः छ च

IAST pheś cha ca

प्रकार विधि

सार फि-अन्त (गोत्र) संज्ञा से छ भी होता है।

4.1.150
फाण्टाहृतिमिमताभ्यां णफिञौ

IAST phāṇṭāhṛtimimatābhyāṃ ṇaphiñau

प्रकार विधि

सार फाण्टाहृति और मिमत् से अपत्यार्थ में ण और फिञ् प्रत्यय होते हैं।

4.1.151
कुरु आदिभ्यः ण्यः

IAST kurvādibhyo ṇyaḥ

प्रकार विधि

सार कुरु-आदि गण के शब्दों से गोत्रार्थ में ण्य प्रत्यय होता है।

4.1.152
सेना अन्तलक्षणकारिभ्यः च

IAST senāntalakṣaṇakāribhyaś ca

प्रकार विधि

सार सेना-अन्त वाले तथा लक्षण और कारि अर्थ वाले शब्दों से भी (गोत्र में) ण्य होता है।

4.1.153
उदीचां इञ्

IAST udīcām iñ

प्रकार विधि

सार उदीच्य आचार्यों के मत में (पूर्वोक्त आधारों से गोत्रार्थ में) इञ् प्रत्यय होता है।

4.1.154
तिक आदिभ्यः फिञ्

IAST tikādibhyaḥ phiñ

प्रकार विधि

सार तिक-आदि गण के शब्दों से (अपत्य/गोत्रार्थ में) फिञ् प्रत्यय होता है।

4.1.155
कौसल्यकार्मार्याभ्यां च

IAST kausalyakārmāryābhyāṃ ca

प्रकार विधि

सार कौसल्य और कार्मारी से भी फिञ् होता है।

4.1.156
अणः द्व्यचः

IAST aṇo dvyacaḥ

प्रकार विधि

सार द्व्यच् (द्व्यक्षर) प्रातिपदिक से अण् के स्थान पर (उदीचां-मत में) फिञ् होता है।

4.1.157
उदीचां वृद्धात् अगोत्रात्

IAST udīcāṃ vṛddhād agotrāt

प्रकार विधि

सार उदीच्यों के मत में अगोत्र वृद्ध शब्द से (अपत्यार्थ में) इञ् होता है।

4.1.158
वाकिन आदीनां कुक् च

IAST vākinādīnāṃ kuk ca

प्रकार विधि

सार वाकिन्-आदि शब्दों में (प्रत्यय के साथ) कुक् आगम भी होता है।

4.1.159
पुत्र अन्तात् अन्यतरस्यां

IAST putrāntād anyatarasyām

प्रकार विधि

सार पुत्र-अन्त वाले (वाकिनादि) से कुक् विकल्पेन होता है।

4.1.160
प्राचां अवृद्धात् फिन् बहुलम्

IAST prācām avṛddhāt phin bahulam

प्रकार विधि

सार प्राच्य आचार्यों के मत में अवृद्ध से फिन् बहुल (विविध/अनियमित रूप से) होता है।

4.1.161
मनोर्जातौ अञ्यतौ षुक् च

IAST manor jātāv añyatau ṣuk ca

प्रकार विधि

सार मनु शब्द से जाति अर्थ में अञ् और यत् प्रत्यय होते हैं तथा षुक् आगम भी।

4.1.162
अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्

IAST apatyaṃ pautraprabhṛti gotram

प्रकार सञ्ज्ञा

सार पौत्र से आरम्भ अपत्य की गोत्र संज्ञा होती है।

4.1.163
जीवति तु वंश्ये युवा

IAST jīvati tu vaṃśye yuvā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार वंश्य (पूर्वज) के जीवित रहते अपत्य की युवा संज्ञा होती है।

4.1.164
भ्रातरि च ज्यायसि

IAST bhrātari ca jyāyasi

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ज्येष्ठ भ्राता के जीवित रहते भी (अपत्य की) युवा संज्ञा होती है।

4.1.165
वा अन्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति

IAST vānyasmin sapiṇḍe sthaviratare jīvati

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अन्य किसी स्थविरतर सपिण्ड के जीवित रहते युवा संज्ञा विकल्पेन होती है।

4.1.166
वृद्धस्य च पूजायां

IAST vṛddhasya ca pūjāyām

प्रकार अतिदेश

सार पूजा (आदर) अर्थ में वृद्ध (गोत्र) रूप का भी प्रयोग होता है।

4.1.167
यूनः च कुत्सायां

IAST yūnaś ca kutsāyām

प्रकार अतिदेश

सार कुत्सा अर्थ में युवन् रूप का भी प्रयोग होता है।

4.1.168
जनपदशब्दात् क्षत्रियात् अञ्

IAST janapadaśabdāt kṣatriyād añ

प्रकार विधि

सार क्षत्रियवाचक जनपद-शब्द से अञ् प्रत्यय होता है।

4.1.169
साल्वेयगान्धारिभ्यां च

IAST sālveyagāndhāribhyāṃ ca

प्रकार विधि

सार साल्वेय और गान्धारि से भी अञ् होता है।

4.1.170
द्वि अच्मगधकलिङ्गसूरमसात् अण्

IAST dvyaco magadhakaliṅgasūramasād aṇ

प्रकार विधि

सार द्व्यच् मगध, कलिङ्ग और सूरमस से अण् प्रत्यय होता है।

4.1.171
वृद्ध इत्कोसल अजादात् ञ्यङ्

IAST vṛddhetkosalājādāñ ṅyaṅ

प्रकार विधि

सार इत्-अन्त वृद्ध तथा कोसल और अजाद से ञ्यङ् प्रत्यय होता है।

4.1.172
कुरुणादिभ्यः ण्यः

IAST kuruṇādibhyo ṇyaḥ

प्रकार विधि

सार कुरुण-आदि से ण्य प्रत्यय होता है।

4.1.173
साल्व अवयवप्रत्यग्रथकलकूट अश्मकात् इञ्

IAST sālvāvayavapratyagrathakalakūṭāśmakād iñ

प्रकार विधि

सार साल्व के अवयवों तथा प्रत्यग्रथ, कलकूट और अश्मक से इञ् प्रत्यय होता है।

4.1.174
ते तद्राजाः

IAST te tadrājāḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ये (पूर्वोक्त अञ्-आदि) प्रत्यय तद्राज संज्ञक कहे जाते हैं।

4.1.175
कम्बोजात् लुक्

IAST kambojāl luk

प्रकार विधि

सार कम्बोज से (तद्राज प्रत्यय का) लुक् होता है।

4.1.176
स्त्रियां अवन्तिकुन्तिकुरुभ्यः च

IAST striyām avantikuntikurubhyaḥ ca

प्रकार विधि

सार स्त्रीलिङ्ग में अवन्ति, कुन्ति और कुरु से (जनपद-क्षत्रियार्थक) तद्धित-प्रत्यय का लुक् होता है।

4.1.177
अतः च

IAST ataḥ ca

प्रकार विधि

सार अकारान्त (जनपद-शब्दों) से भी पूर्वोक्त तद्धित-प्रत्यय का लुक् होता है।

4.1.178
न प्राच्यभर्ग आदियौधेयआदिह्यस

IAST na prācyabhargādiyaudheyādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार प्राच्यभर्गादि और यौधेयादि गणों के शब्दों से उक्त लुक् नहीं होता।

अध्याय 4 · पाद 2 (145 सूत्र)

4.2.1
तेन रक्तं रागात्

IAST tena raktaṃ rāgāt

प्रकार विधि

सार रंजक-द्रव्य (राग) वाची शब्द से ‘उससे रंगा’ अर्थ में तद्धित-प्रत्यय विहित है।

4.2.2
लाक्षारोचना- (शकलकर्दं)आत् ठक्

IAST lākṣārocanāśakalakardamāṭ ṭhak

प्रकार विधि

सार लाक्षा, रोचना, शकल और कर्दम से (रंगा अर्थ में) ठक् प्रत्यय होता है।

4.2.3
नक्षत्रेण युक्तः कालः

IAST nakṣatreṇa yuktaḥ kālaḥ

प्रकार विधि

सार नक्षत्रवाची शब्द से ‘उस नक्षत्र से युक्त काल’ अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.2.4
लुप् अविशेषे

IAST lub aviśeṣe

प्रकार विधि

सार अविशेष (सामान्य) काल-निर्देश में नक्षत्र-संबंधी तद्धित-प्रत्यय का लुप् होता है।

4.2.5
संज्ञायां श्रवणाश्वत्थाभ्याम्

IAST saṃjñāyāṃ śravaṇāśvatthābhyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में श्रवण और अश्वत्थ से (लुप् न होकर) तद्धित-प्रत्यय बना रहता है।

4.2.6
द्वंद्वात् छः

IAST dvandvāc chaḥ

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व-समास (नक्षत्र-युगल) से छ प्रत्यय होता है।

4.2.7
दृष्- टं साम

IAST dṛṣṭaṃ sāma

प्रकार विधि

सार ‘दृष्ट/रचित साम’ अर्थ में (द्रष्टृ-नाम आदि से) तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.2.8
कलेर्ढक्

IAST kaler ḍhak

प्रकार विधि

सार कलि से (दृष्ट-साम अर्थ में) ढक् प्रत्यय होता है।

4.2.9
वामदेवात् ड्यत् ड्यौ

IAST vāmadevāḍ ḍyaṭ ḍyau

प्रकार विधि

सार वामदेव से (साम-नामार्थ में) ड्यत् और ड्यौ प्रत्यय होते हैं।

4.2.10
परिवृतः रथः

IAST parivṛto rathaḥ

प्रकार विधि

सार ‘परिवृत/आच्छादित रथ’ अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.2.11
पाण्डुकम्बलात् इनिः

IAST pāṇḍukambalād iniḥ

प्रकार विधि

सार पाण्डुकम्बल से (परिवृत-रथ अर्थ में) इन् प्रत्यय होता है।

4.2.12
द्वैपवैयाघ्रात् अञ्

IAST dvaipavaiyāghrād añ

प्रकार विधि

सार द्वैप और वैयाघ्र से (परिवृत-रथ अर्थ में) अञ् प्रत्यय होता है।

4.2.13
कौमार अपूर्ववचने

IAST kaumāram apūrvavacane

प्रकार विधि

सार अपूर्व-वचन (पहले न कही गई बात) अर्थ में ‘कौमार’ तद्धित-रूप विहित है।

4.2.14
तत्र उद्धृतं अमत्रेभ्यः

IAST tatroddhṛtam amatrebhyaḥ

प्रकार विधि

सार अमत्र (पात्र) वाची शब्दों से ‘उसमें से उद्धृत/निकाला’ अर्थ में तद्धित होता है।

4.2.15
स्थण्डिलात् शयितरि व्रते

IAST sthaṇḍilāc chayitari vrate

प्रकार विधि

सार स्थण्डिल से ‘व्रत में स्थण्डिल पर शयन करने वाला’ अर्थ में तद्धित होता है।

4.2.16
संस्कृतं भक्षाः

IAST saṃskṛtaṃ bhakṣāḥ

प्रकार विधि

सार ‘भक्ष्यार्थ संस्कृत/सिद्ध किया’ अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.2.17
शूल उखात् यत्

IAST śūlokhād yat

प्रकार विधि

सार शूल और उखा से (संस्कृत-भक्ष्य अर्थ में) यत् प्रत्यय होता है।

4.2.18
दध्नः ठक्

IAST dadhnaṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार दधि (दध्न्) से (संस्कृत-भक्ष्य अर्थ में) ठक् प्रत्यय होता है।

4.2.19
उदश्वितः अन्यतरस्यां

IAST udaśvito 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार उदश्वित् से (संस्कृत-भक्ष्य अर्थ में) वैकल्पिक रूप से तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.2.20
क्षीरात् ढञ्

IAST kṣīrāḍ ḍhañ

प्रकार विधि

सार क्षीर से (संस्कृत-भक्ष्य अर्थ में) ढञ् प्रत्यय होता है।

4.2.21
सा अस्मिन् पौर्णमासी इति (संज्ञायाम्)

IAST sā'smin paurṇamāsīti

प्रकार विधि

सार ‘इस (मास) में वह पौर्णमासी होती है’ इस अर्थ में मास-संज्ञा के लिए तद्धित होता है।

4.2.22
आग्रहायणी अश्वत्थात् ठक्

IAST āgrahāyaṇy aśvatthāṭ ṭhak

प्रकार विधि

सार आग्रहायणी और अश्वत्थ से (पौर्णमासी-युक्त मासार्थ में) ठक् प्रत्यय होता है।

4.2.23
विभाषा फाल्गुनीस्रवणाकार्त्तिकीचैत्रीभ्यः

IAST vibhāṣā phālgunīśravaṇākārttikīcaitrībhyaḥ

प्रकार विधि

सार फाल्गुनी, श्रवणा, कार्त्तिकी और चैत्री से (मास-नामार्थ में) वैकल्पिक रूप से तद्धित होता है।

4.2.24
सा अस्य देवता

IAST sāsya devatā

प्रकार विधि

सार ‘वह इसकी देवता है’ अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.2.25
कस्य इत्

IAST kasyet

प्रकार विधि

सार देवता-अर्थ में ‘क’ शब्द के अकार की इत्-संज्ञा होती है।

4.2.26
शुक्रात् घन्

IAST śukrād ghan

प्रकार विधि

सार सास्य-देवता अर्थ में शुक्र से घन् प्रत्यय होता है।

4.2.27
अपोनप्तृ अपांनप्तृभ्यां घः

IAST aponaptrapāṃnaptṛbhyāṃ ghaḥ

प्रकार विधि

सार अपोनप्तृ और अपांनप्तृ से (सास्य-देवता अर्थ में) घ प्रत्यय होता है।

4.2.28
छ च

IAST cha ca

प्रकार विधि

सार पूर्वोक्त आधारों से छ भी होता है।

4.2.29
महेन्द्रात् घ अणौ च

IAST mahendrād ghaṇau ca

प्रकार विधि

सार महेन्द्र से घ और अण् दोनों होते हैं।

4.2.30
सोंआत् ट्यण्

IAST somāṭ ṭyaṇ

प्रकार विधि

सार सोम से (सास्य-देवता अर्थ में) ट्यण् होता है।

4.2.31
वायु ऋतुपितृ उषसः यत्

IAST vāyvṛtupitṛṣuṣaso yat

प्रकार विधि

सार वायु, ऋतु, पितृ और उषस् से यत् होता है।

4.2.32
द्यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वत् अग्नीषोमवास्तोष्पतिगृहमेधात् छ च

IAST dyāvāpṛthivīśunāsīramarutvadagnīṣomavāstoṣpatigṛhamedhāc cha ca

प्रकार विधि

सार द्यावापृथिवी, शुनासीर, मरुत्वत्, अग्नीषोम, वास्तोष्पति और गृहमेध से छ भी होता है।

4.2.33
अग्नेर्ढक्

IAST agner ḍhak

प्रकार विधि

सार अग्नि से (सास्य-देवता अर्थ में) ढक् होता है।

4.2.34
कालेभ्यः भववत्

IAST kālebhyo bhavavat

प्रकार अतिदेश

सार कालवाचक प्रातिपदिकों से भव-सदृश प्रत्यय-विधान लागू होता है।

4.2.35
महाराजप्रोष्ठपदात् ठञ्

IAST mahārājaprosthapadāṭ ṭhañ

प्रकार विधि

सार महाराज और प्रोष्ठपद से ठञ् होता है।

4.2.36
पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः

IAST pitṛvyamātulamātāmahapitāmahāḥ

प्रकार विधि

सार पितृव्य, मातुल, मातामह और पितामह निपातित (सिद्ध) रूप माने जाते हैं।

4.2.37
तस्य संऊहः

IAST tasya samūhaḥ

प्रकार अधिकार

सार तद्धित-अधिकार: “उसका समूह” अर्थ में आगे प्रत्यय विहित होते हैं।

4.2.38
भिक्षा आदिभ्यः अण्

IAST bhikṣādibhyo ’ṇ

प्रकार विधि

सार भिक्षादिगण के शब्दों से (समूह अर्थ में) अण् होता है।

4.2.39
गोत्र उक्ष(न्)उष्ट्र उरभ्रराजन्राजन्यराजपुत्रवत्समनुष्य अजात् वुञ्

IAST gotrokṣoṣṭrorabhrarājarājanyarājaputravatsamanuṣyājād vuñ

प्रकार विधि

सार गोत्र, उक्षन्, उष्ट्र, उरभ्र, राजन्, राजन्य, राजपुत्र, वत्स, मनुष्य और अज से वुञ् होता है।

4.2.40
केदारात् यञ् च

IAST kedārād yañ ca

प्रकार विधि

सार केदार से यञ् भी होता है।

4.2.41
ठञ् कवचिनः च

IAST ṭhañ kavacinaś ca

प्रकार विधि

सार ठञ् भी विहित होता है तथा कवचिन् से भी (समूहार्थक तद्धित) होता है।

4.2.42
ब्राह्मणमाणववाडवात् यन्

IAST brāhmaṇamāṇavavāḍavād yan

प्रकार विधि

सार ब्राह्मण, माणव और वाडव से यन् होता है।

4.2.43
ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यः तल्

IAST grāmajanabandhusahāyebhyas tal

प्रकार विधि

सार ग्राम, जन, बन्धु और सहाय से तल् होता है।

4.2.44
अनुदात्तादेरञ्

IAST anudāttāder añ

प्रकार विधि

सार अनुदात्तादि (अनुदात्त-प्रारम्भिक) प्रातिपदिकों से अञ् होता है।

4.2.45
खण्डिक आदिभ्यः च

IAST khaṇḍikādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार खण्डिकादिगण से भी (पूर्वोक्त अञ्) होता है।

4.2.46
चरणेभ्यः धर्मवत्

IAST caraṇebhyo dharmavat

प्रकार अतिदेश

सार चरण-वाचक शब्दों से धर्म-सदृश प्रत्यय-विधान लागू होता है।

4.2.47
अचित्तहस्ति(न्)धेनोः ठक्

IAST acittahastidhenoṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार अचित्त (अचेतन), हस्तिन् और धेनु से ठक् होता है।

4.2.48
केश अश्वाभ्यां यञ् छौ अन्यतरस्यां

IAST keśāśvābhyāṃ yañchau anyatarasyām

प्रकार विधि

सार केश और अश्व से वैकल्पिक रूप से यञ् और छ होते हैं।

4.2.49
पाश आदिभ्यः यः

IAST pāśādibhyo yaḥ

प्रकार विधि

सार पाशादिगण से य प्रत्यय होता है।

4.2.50
खलगोरथात्

IAST khalagorathāt

प्रकार विधि

सार खल, गो और रथ से (अनुवृत्त य) होता है।

4.2.51
इनित्रकट्यचः च

IAST initrakaṭyacaś ca

प्रकार विधि

सार पूर्व-अर्थों (निवास/देशादि) में इनि, त्र, क, ट्य और च् — ये प्रत्यय भी होते हैं।

4.2.52
विषयः देशे

IAST viṣayaḥ deśe

प्रकार परिभाषा

सार देश-अर्थ में प्रयुक्त «विषय» (अधिकार-क्षेत्र/प्रदेश) पर भी देश-सम्बन्धी पूर्व-प्रत्यय लागू होते हैं।

4.2.53
राजन्य आदिभ्यः वुञ्

IAST rājanyādibhyo vuñ

प्रकार विधि

सार राजन्य-आदि गण के शब्दों से देश/निवासादि अर्थ में वुञ् होता है।

4.2.54
भौरिकि आदिऐषुकारि आदिभ्यः विधल् भक्तलौ

IAST bhaurikyādyaiṣukāryādibhyaḥ vidhal bhaktalau

प्रकार विधि

सार भौरिकि-आदि तथा ऐषुकारि-आदि गणों से विधल् और भक्तल् प्रत्यय होते हैं।

4.2.55
सः अस्य आदिरिति छन्दसः प्रगाथेषु

IAST so 'syādir iti cchandasaḥ prāgātheṣu

प्रकार विधि

सार छन्दस् में प्रगाथों के विषय में «यह इसका आदि (आरम्भ) है» — इस अर्थ में (पूर्व-प्रत्यय) होता है।

4.2.56
संग्रामे प्रयोजनयोद्धृभ्यः

IAST saṃgrāme prayojanayoddhṛbhyaḥ

प्रकार विधि

सार संग्राम-अर्थ में प्रयोजनयोद्धृ (प्रयोजनार्थ युध्यमान) शब्दों से (पूर्व-प्रत्यय) होता है।

4.2.57
तद् अस्यां प्रहरणम् इति क्रीडायाम् णः

IAST tad asyāṃ praharaṇam iti krīḍāyāṃ ṇaḥ

प्रकार विधि

सार क्रीडा-अर्थ में «यह उस (क्रीडा) में प्रहरण है» — इस अर्थ में ण् होता है।

4.2.58
घञः सा अस्यां क्रिया इति ञः

IAST ghañaḥ sā 'syāṃ kriyeti ñaḥ

प्रकार विधि

सार घञ्-अन्त से «वह इस (क्रीडा) में क्रिया है» — इस अर्थ में ञ् होता है।

4.2.59
तद् अधीते तद् वेद

IAST tad adhīte tad veda

प्रकार अधिकार

सार «वह उसे पढ़ता है / वह उसे जानता है» — इस अर्थ का अधिकार आगे के प्रत्ययों पर।

4.2.60
क्रतु उक्थ आदिसूत्र न्तात् ठक्

IAST kratūkthādisūtrāntāṭ ṭhak

प्रकार विधि

सार क्रतु-उक्थ-आदि तथा सूत्र-अन्त शब्दों से ठक् प्रत्यय होता है (अधीते/वेद अर्थ में)।

4.2.61
क्रम आदिभ्यः वुन्

IAST kramādibhyaḥ vun

प्रकार विधि

सार क्रम-आदि गण से वुन् प्रत्यय होता है (अधीते/वेद अर्थ में)।

4.2.62
अनुब्राह्मणात् इनीः

IAST anubrāhmaṇād inīḥ

प्रकार विधि

सार अनुब्राह्मण से इनि प्रत्यय होता है (अधीते/वेद अर्थ में)।

4.2.63
वसन्त आदिभ्यः ठक्

IAST vasantādibhyaṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार वसन्त-आदि गण के शब्दों से (प्रोक्त-ग्रन्थ/उक्त अर्थ में) ठक् तद्धित होता है।

4.2.64
प्रोक्तात् लुक्

IAST proktāl luk

प्रकार विधि

सार प्रोक्त (जिससे ग्रन्थ कहा/पढ़ाया गया) से पूर्व-विहित तद्धित-प्रत्यय का लुक् होता है।

4.2.65
सूत्रात् च क उपधात्

IAST sūtrāc ca kopadhāt

प्रकार विधि

सार «सूत्र» से तथा क-उपध वाले शब्दों से भी (उस) प्रत्यय का लुक् होता है।

4.2.66
छन्दः ब्राह्मणानि च तद्विषया- णि

IAST chandobrāhmaṇāni ca tadviṣayāṇi

प्रकार अतिदेश

सार छन्द (वैदिक संहिता) और ब्राह्मण भी अपने विषय (तद्विषय) के नाम से अभिहित होते हैं।

4.2.67
तद् अस्मिन् अस्ति इति देशे तन्नाम्नि

IAST tad asminn astīti deśe tannāmni

प्रकार अधिकार

सार «वह इसमें है» इस अर्थ में, देश का नाम उसी (वस्तु/व्यक्ति) पर रखने पर (तद्धित-विधान का अधिकार)।

4.2.68
तेन निर्वृत्तं

IAST tena nirvṛttam

प्रकार विधि

सार उसके द्वारा निर्वृत्त/स्थापित देश के नाम में भी (वही तद्धित-अर्थ लागू होता है)।

4.2.69
तस्य निवासः

IAST tasya nivāsaḥ

प्रकार विधि

सार उसका निवास-स्थान (देश) नामित करने में भी (वही तद्धित-अर्थ)।

4.2.70
अदूरभवः च

IAST adūrabhavaś ca

प्रकार विधि

सार और जो उससे दूर नहीं है (अदूरभव स्थान) उसके नाम में भी (वही अर्थ)।

4.2.71
ओरञ्

IAST or añ

प्रकार विधि

सार उकारान्त से (पूर्वोक्त देश-नाम अर्थों में) अञ् प्रत्यय होता है।

4.2.72
मतोः च बहु अच् अङ्गात्

IAST matoś ca bahvaca aṅgāt

प्रकार विधि

सार मतुबन्त से तथा बह्वच् अङ्ग से भी (देश-नाम अर्थ में अञ्) होता है।

4.2.73
बहु अचः कूपेषु

IAST bahvacaḥ kūpeṣu

प्रकार विधि

सार बह्वच् शब्दों से कूपों के नाम में (अञ्) होता है।

4.2.74
उदक् च विपाशः

IAST udak ca vipāśaḥ

प्रकार विधि

सार «उदक्» से तथा «विपाश्» से भी (उक्त देश/स्थान-नाम में अञ्) होता है।

4.2.75
संकल आदिभ्यः च

IAST saṃkalādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार संकल-आदि गण के शब्दों से भी (उक्त अर्थ में अञ्) होता है।

4.2.76
स्त्रीषु सौवीरसाल्वप्राक्षु

IAST strīṣu sauvīrasālvaprākṣu

प्रकार विधि

सार सौवीर, साल्व तथा प्राच् (पूर्वीय) जनपद-सम्बन्धी शब्दों से स्त्री-अर्थ में पूर्व-प्रवृत्त तद्धित-व्यवस्था लागू होती है।

4.2.77
सुवास्तु आदिभ्यः अण्

IAST suvāstvādibhyo 'ṇ

प्रकार विधि

सार सुवास्तु-आदि गण के शब्दों से (तत्र भवः/स्थान-सम्बन्धादि अर्थ में) अण् प्रत्यय होता है।

4.2.78
रोणी

IAST roṇī

प्रकार विधि

सार रोणी-शब्द से भी (उसी स्थान-सम्बन्धी अर्थ में) अण् होता है।

4.2.79
क उपधात् च

IAST ka upadhāc ca

प्रकार विधि

सार जिस प्रातिपदिक की उपधा क् हो उससे भी (उसी अर्थ में) अण् होता है।

4.2.80
वुञ्छण्कठच् इलसैनिरढञ्- ण्ययफक्फिञिञ्- ञ्यकक्- ठकः अरीहणकृशाश्व ऋश्यकुमुदकाशतृणप्रेक्षाअश्म(न्)सखिसंकाशबलपक्ष- कर्णसुतंगमप्रगदिन्वराहकुमुद आदिभ्यः

IAST vuñchaṇkaṭhacilasainiraḍhañṇyayaphakphiñiññyakakṭhakā ārīhaṇakṛśāśvarṣyakumudakāśatṛṇaprekṣāśmasakhisaṃkāśabalapakṣakarṇasutaṃgamapragadinsvarāhakumudādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार अरीहण, कृशाश्व, ऋश्य, कुमुद, काश, तृण, प्रेक्षा, अश्मन्, सखि, संकाश, बल, पक्ष, कर्ण, सुतंगम, प्रगदिन्, वराह, कुमुद आदि से वुञ्–छण्–कठच्–इल–ऐनि–रढञ्–ण्य–यफक्–फिञ्–इञ्–ञ्य–कक्–ठक् प्रत्यय होते हैं।

4.2.81
जनपदे लुप्

IAST janapade lup

प्रकार विधि

सार जब तद्धितान्त का अर्थ स्वयं जनपद (देश/जनपद-नाम) हो तो उस तद्धित-प्रत्यय का लुप् होता है।

4.2.82
वरणा आदिभ्यः च

IAST varaṇādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार वरणा-आदि गण से भी (जनपदार्थ में) तद्धित का लुप् होता है।

4.2.83
शर्करायाः वा

IAST śarkarāyā vā

प्रकार विधि

सार शर्करा-शब्द से (जनपदार्थ में) लुप् वैकल्पिक है।

4.2.84
ठक्छौ च

IAST ṭhakchau ca

प्रकार विधि

सार ठक् और छ प्रत्यय भी (उसी जनपदार्थ-प्रसंग में, विकल्प से) लुप् के विषय होते हैं।

4.2.85
नद्यां मतुप्

IAST nadyāṃ matup

प्रकार विधि

सार नदी-वाचक शब्दों से (तत्र भाव/आधिक्य आदि अर्थ में) मतुप् होता है।

4.2.86
मधु आदिभ्यः च

IAST madhvādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार मधु-आदि गण से भी मतुप् होता है।

4.2.87
कुमुदनडवेतसेह्यः ड्मतुप्

IAST kumudanaḍavetasebhyo ḍmatup

प्रकार विधि

सार कुमुद, नड और वेतस से ड्मतुप् प्रत्यय होता है।

4.2.88
नडशादात् ड्वलच्

IAST naḍaśādāḍvalac

प्रकार विधि

सार नड और शाद से ड्वलच् प्रत्यय होता है।

4.2.89
शिखायाः वलच्

IAST śikhāyā valac

प्रकार विधि

सार शिखा-शब्द से वलच् प्रत्यय होता है।

4.2.90
उत्कर आदिभ्यः छः

IAST utkarādibhyaś chaḥ

प्रकार विधि

सार उत्कर-आदि गण से छ प्रत्यय होता है।

4.2.91
नड आदीनां कुक् च

IAST naḍādīnāṃ kuk ca

प्रकार विधि

सार नड-आदि के योग में (प्रत्यय के पूर्व) कुक् आगम भी होता है।

4.2.92
शेषे

IAST śeṣe

प्रकार अधिकार

सार शेष—अर्थात् पूर्व-विशिष्ट नियमों से अनिर्दिष्ट अवशिष्ट अर्थ-प्रसंग—में आगे के तद्धित-विधान लागू होते हैं।

4.2.93
राष्ट्र अवारपारात् घ खौ

IAST rāṣṭrāvārapārād ghakhau

प्रकार विधि

सार राष्ट्र, अवार और पार से (शेषार्थ में) घ और ख प्रत्यय होते हैं।

4.2.94
ग्रांआत् यखञौ

IAST grāmād yakhñau

प्रकार विधि

सार ग्राम से य और खञ् प्रत्यय होते हैं।

4.2.95
कत्त्रि आदिभ्यः ढकञ्

IAST kattryādibhyo ḍhakañ

प्रकार विधि

सार कत्त्रि-आदि गण से ढकञ् प्रत्यय होता है।

4.2.96
कुलकुक्षिग्रीवाह्यः श्व(न्)असि अलंआरेषु

IAST kulakukṣigrīvābhyaḥ śvano 'sy alaṅkāreṣu

प्रकार विधि

सार कुल, कुक्षि और ग्रीवा से—क्रमशः श्वन् (कुक्कुर), असि (खड्ग) तथा अलङ्कार अर्थों में—तद्धित-विधान होता है।

4.2.97
नदी आदिभ्यः ढक्

IAST nadyādibhyo ḍhak

प्रकार विधि

सार नदी-आदि गण से ढक् प्रत्यय होता है।

4.2.98
दक्षिणापश्चात्पुरसः त्यक्

IAST dakṣiṇāpaścātpurasas tyak

प्रकार विधि

सार दक्षिणा, पश्चात् और पुरस् से त्यक् प्रत्यय होता है।

4.2.99
कापिश्याः ष्फक्

IAST kāpiśyāḥ ṣphak

प्रकार विधि

सार कापिशी-शब्द से ष्फक् प्रत्यय होता है।

4.2.100
रंकोरमनुष्ये अण् च

IAST raṅkor amanuṣye 'ṇ ca

प्रकार विधि

सार रंकु-शब्द से, जब अर्थ मनुष्य न हो, अण् भी होता है।

4.2.101
द्युप्राच् अपाच् उ दच्प्रतीचः यत्

IAST dyuprāgapāgudakpratīco yat

प्रकार विधि

सार द्यु, प्राच्, अपाच्, उदक् और प्रतीच् शब्दों से (तत्र निवास/भव आदि अर्थ में) यत् प्रत्यय होता है।

4.2.102
कन्थायाः ठक्

IAST kanthāyāṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार कन्था शब्द से ठक् प्रत्यय होता है।

4.2.103
वर्णौ वुक्

IAST varṇau vuñ

प्रकार विधि

सार (दो) वर्ण शब्दों से वुञ् प्रत्यय होता है।

4.2.104
अव्ययात् त्यप्

IAST avyayāt tyap

प्रकार विधि

सार अव्यय से त्यप् प्रत्यय होता है।

4.2.105
ऐषमः ह्यः श्वसः न्यारयां

IAST aiṣamo hyaḥ śvaso 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार ऐषमस्, ह्यस् और श्वस् से विकल्प से (त्यप्) प्रत्यय होता है।

4.2.106
तीररूप्य उत्तरपदात् अञ्- ञौ

IAST tīrarūpyottarapadād aññau

प्रकार विधि

सार तीर या रूप्य उत्तरपद वाले समास से अञ् और ञ दोनों प्रत्यय होते हैं।

4.2.107
दिक्पूर्वपदात् असंज्ञायं ञः

IAST dikpūrvapadād asaṃjñāyāṃ ñaḥ

प्रकार विधि

सार दिक्-पूर्वपद वाले असंज्ञा शब्द से ञ प्रत्यय होता है।

4.2.108
मद्रेभ्यः अञ्

IAST madrebhyo 'ñ

प्रकार विधि

सार मद्र (सम्बन्धी शब्दों) से अञ् प्रत्यय होता है।

4.2.109
उदीच्यग्रांआत् च बहु अचः अन्त उदात्तात्

IAST udīcyagrāmāc ca bahvaco 'ntodāttāt

प्रकार विधि

सार उदीच्य ग्रामों में बहु-अच् और अन्तोदात्त शब्दों से भी (अञ्) होता है।

4.2.110
प्रस्थ उत्तरपद पलदी आदिक पधात् अण्

IAST prasthottarapadapaladyamakūpadyāṇ

प्रकार विधि

सार प्रस्थ-उत्तरपद, पलदि-गण, तथा अमकूप और द्य वाले शब्दों से अण् होता है।

4.2.111
कण्व आदिभ्यः गोत्रे

IAST kaṇvādibhyo gotre

प्रकार विधि

सार कण्व आदि शब्दों से गोत्र अर्थ में (अण्) होता है।

4.2.112
इञः च

IAST iñaś ca

प्रकार विधि

सार इञ्-प्रत्ययान्त शब्दों से भी (अण्) होता है।

4.2.113
न द्वि अचः प्राच्यभरतेषु

IAST na dvyacaḥ prācyabharateṣu

प्रकार विधि

सार प्राच्य भरतों में द्व्यच् शब्दों से (पूर्व-विधान का) प्रतिषेध है।

4.2.114
वृद्धात् छः

IAST vṛddhāc chaḥ

प्रकार विधि

सार वृद्ध शब्दों से छ प्रत्यय होता है।

4.2.115
भवतः ठक् छसौ

IAST bhavato ṭhakchasau

प्रकार विधि

सार भवत् से ठक् और छस् दोनों प्रत्यय होते हैं।

4.2.116
काशि आदिभ्यः ठञ्- ञिठौ

IAST kāśyādibhyaṣ ṭhaññiṭhau

प्रकार विधि

सार काशि आदि शब्दों से ठञ् और ञिठ दोनों प्रत्यय होते हैं।

4.2.117
वाहीकग्रामेभ्यः च

IAST vāhīkagrāmebhyaś ca

प्रकार विधि

सार वाहीक-ग्रामों से भी (ठञ्/ञिठ) होते हैं।

4.2.118
विभाषा उशीनरेषु

IAST vibhāṣośīnareṣu

प्रकार विधि

सार उशीनरों में (पूर्व-प्रत्यय) विकल्प से होते हैं।

4.2.119
ओर्देशे ठञ्

IAST or deśe ṭhañ

प्रकार विधि

सार उ/ऊ-कारान्त शब्दों से देश अर्थ में ठञ् होता है।

4.2.120
वृद्धात् प्राचां

IAST vṛddhāt prācām

प्रकार विधि

सार प्राच्यों में वृद्ध शब्दों से (ठञ्) होता है।

4.2.121
धन्व(न्)य उपधत् वुञ्

IAST dhanvayopadhād vuñ

प्रकार विधि

सार धन्व(न्) तथा य-उपधा वाले शब्दों से वुञ् होता है।

4.2.122
प्रस्थपुरवह न्तात् च

IAST prasthapuravahāntāc ca

प्रकार विधि

सार प्रस्थ, पुर या वह अन्त वाले शब्दों से भी (वुञ्) होता है।

4.2.123
र उपध ईतोः प्राचां

IAST ropadhetoḥ prācām

प्रकार विधि

सार प्राच्यों में र-उपधा और इ-कारान्त शब्दों से (वुञ्) होता है।

4.2.124
जनपदतदवध्योः च

IAST janapadatadavadhyoś ca

प्रकार विधि

सार जनपद और उसके अवधि-वाचक शब्दों से भी (वुञ्) होता है।

4.2.125
अवृद्धात् अपि बहुवचनविषयात्

IAST avṛddhād api bahuvacanaviṣayāt

प्रकार विधि

सार बहुवचन-विषय वाले अवृद्ध शब्दों से भी (वुञ्) होता है।

4.2.126
कच्छ अग्निवक्त्रवर्त्त त्तरपदात्

IAST kacchāgnivaktravarttottarapadāt

प्रकार विधि

सार कच्छ, अग्नि, वक्त्र अथवा वर्त्त उत्तरपद वाले समास-प्रातिपदिक से (तत्र भवः आदि अर्थ में) छ-प्रत्यय होता है।

4.2.127
धूम आदिभ्यः च

IAST dhūmādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार धूमादिगण-पठित प्रातिपदिकों से भी (उसी अर्थ में) छ-प्रत्यय होता है।

4.2.128
नगरात् कुत्सनप्रावीण्ययोः

IAST nagarāt kutsanaprāvīṇyayoḥ

प्रकार विधि

सार नगर-शब्द से कुत्सा (तिरस्कार) और प्रावीण्य (निपुणता/कुशलता) अर्थ में छ-प्रत्यय होता है।

4.2.129
अरण्यात्मनुष्ये

IAST araṇyān manuṣye

प्रकार विधि

सार अरण्य-शब्द से मनुष्यवाचक अर्थ में (तत्र भवः आदि) छ-प्रत्यय होता है।

4.2.130
विभाषा कुरुयुगन्धराभ्यां

IAST vibhāṣā kuruyugandharābhyām

प्रकार विधि

सार कुरु और युगन्धर शब्दों से (छ-प्रत्यय) वैकल्पिक है।

4.2.131
मद्र वृज्योः कन्

IAST madravṛjyoḥ kan

प्रकार विधि

सार मद्र और वृजि शब्दों से (तत्र भवः आदि अर्थ में) कन्-प्रत्यय होता है।

4.2.132
क उपधात् अण्

IAST ka upadhād aṇ

प्रकार विधि

सार जिन प्रातिपदिकों की उपधा (उपान्त्य वर्ण) क् हो, उनसे अण्-प्रत्यय होता है।

4.2.133
कच्छ आदिभ्यः च

IAST kacchādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार कच्छादिगण-पठित प्रातिपदिकों से भी अण्-प्रत्यय होता है।

4.2.134
मनुष्यतत्स्थयोर्वुञ्

IAST manuṣyatatsthayor vuñ

प्रकार विधि

सार मनुष्यवाचक और तत्स्थ (वहाँ निवास करने वाले) अर्थ में वुञ्-प्रत्यय होता है।

4.2.135
अपदातौ साल्वात्

IAST apadātau sālvāt

प्रकार विधि

सार साल्व-शब्द से पदाति अर्थ में (वुञ् आदि) प्रत्यय नहीं होता।

4.2.136
गोयवाग्वोः च

IAST goyavāgvoś ca

प्रकार विधि

सार गो और यवागू शब्दों से भी (वुञ्-प्रत्यय) होता है।

4.2.137
गर्त उत्तरपदात् छः

IAST gartottarapadāt chaḥ

प्रकार विधि

सार गर्त उत्तरपद वाले समास-प्रातिपदिक से छ-प्रत्यय होता है।

4.2.138
गह आदिभ्यः च

IAST gahādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार गहादिगण-पठित प्रातिपदिकों से भी छ-प्रत्यय होता है।

4.2.139
प्राचां कट आदेः

IAST prācāṃ kaṭādeḥ

प्रकार विधि

सार प्राच्य-आचार्यों के मत में कटादि से (छ-प्रत्यय/तद्धित-विधान) होता है।

4.2.140
राज्ञः क च

IAST rājñaḥ ka ca

प्रकार विधि

सार राजन्-शब्द से क-प्रत्यय भी होता है।

4.2.141
वृद्धात् अक इक अन्त् आत् ख उपधात्

IAST vṛddhād akikāntāt khopadhāt

प्रकार विधि

सार वृद्ध संज्ञक प्रातिपदिक से—जो अक्/इक्-अन्त हो अथवा जिसकी उपधा अन्त्, आत् या ख् हो—क-प्रत्यय होता है।

4.2.142
कन्थापलदनगरग्रामह्रद उत्तरपदात्

IAST kanthāpaladanagaragrāmahradottarapadāt

प्रकार विधि

सार कन्था, पलद, नगर, ग्राम अथवा ह्रद उत्तरपद वाले समास-प्रातिपदिक से क-प्रत्यय होता है।

4.2.143
पर्वतात् च

IAST parvatāc ca

प्रकार विधि

सार पर्वत-शब्द से भी क-प्रत्यय होता है।

4.2.144
विभाषा अमनुष्ये

IAST vibhāṣā amanuṣye

प्रकार विधि

सार अमनुष्य अर्थ में (पर्वतादि से क-प्रत्यय) वैकल्पिक है।

4.2.145
कृकणपर्णात् भरद्वाजे

IAST kṛkaṇaparṇād bharadvāje

प्रकार विधि

सार भरद्वाज-आचार्य के मत में कृकण और पर्ण शब्दों से (क-प्रत्यय) होता है।

अध्याय 4 · पाद 3 (168 सूत्र)

4.3.1
युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च

IAST yuṣmadasmador anyatarasyāṃ khañ ca

प्रकार विधि

सार युष्मद् और अस्मद् से विकल्प से खञ् (भी) तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.3.2
तस्मिन्नणि च युष्माकास्माकौ

IAST tasmin aṇi ca yuṣmākāsmākau

प्रकार विधि

सार उसी अर्थ में अण् होने पर युष्मद्-अस्मद् के स्थान पर क्रमशः युष्माक और अस्माक आदेश होते हैं।

4.3.3
तवकममकावेकवचने

IAST tavakamamakāv ekavacane

प्रकार विधि

सार एकवचन में (उनके स्थान पर) तवक और ममक होते हैं।

4.3.4
अर्धाद्यत्

IAST ardhād yat

प्रकार विधि

सार अर्ध से यत् प्रत्यय होता है।

4.3.5
परावराधमोत्तमपूर्वाच्च

IAST parāvarādhamottamapūrvāc ca

प्रकार विधि

सार पर, अवर, अधम, उत्तम और पूर्व से भी (यत्) होता है।

4.3.6
दिक्पूर्वपदाट्ठञ् च

IAST dikpūrvapadāṭ ṭhañ ca

प्रकार विधि

सार दिशावाचक पूर्वपद वाले समास से ठञ् भी होता है।

4.3.7
ग्रामजनपदैकदेशादञ्ठञौ

IAST grāmajanapadaikadeśād añṭhañau

प्रकार विधि

सार ग्राम, जनपद तथा (उनके) एकदेश से अञ् और ठञ् होते हैं।

4.3.8
मध्यान्मः

IAST madhyān maḥ

प्रकार विधि

सार मध्य से म प्रत्यय होता है।

4.3.9
अ साम्प्रतिके

IAST a sāmpratike

प्रकार विधि

सार साम्प्रतिक (वर्तमान/समकालिक) अर्थ में अ प्रत्यय होता है।

4.3.10
द्वीपादनुसमुद्रं यञ्

IAST dvīpād anusamudraṃ yañ

प्रकार विधि

सार समुद्र के अनु (समुद्र-तटवर्ती/समुद्रस्थ) द्वीप से यञ् होता है।

4.3.11
कालाट्ठञ्

IAST kālāṭ ṭhañ

प्रकार विधि

सार कालवाचक शब्दों से ठञ् होता है।

4.3.12
श्राद्धे शरदः

IAST śrāddhe śaradaḥ

प्रकार विधि

सार श्राद्ध अर्थ में शरद् से (काल-ठञ्) होता है।

4.3.13
विभाषा रोगातपयोः

IAST vibhāṣā rogātapayoḥ

प्रकार विधि

सार रोग और आतप शब्दों से (कालाट्ठञ्-प्रवृत्त) ठञ् प्रत्यय वैकल्पिक रूप से होता है।

4.3.14
निशाप्रदोषाभ्यां च

IAST niśāpradoṣābhyāṃ ca

प्रकार विधि

सार निशा और प्रदोष शब्दों से भी (वही वैकल्पिक) ठञ् प्रत्यय होता है।

4.3.15
श्वसस्तुट् च

IAST śvasas tuṭ ca

प्रकार विधि

सार श्वस् शब्द से (ठञ्) प्रत्यय होता है तथा तुट् आगम भी होता है।

4.3.16
संधिवेलाद्यृतुनक्षत्रेभ्योऽण्

IAST saṃdhivelādyṛtunakṣatrebhyo 'ṇ

प्रकार विधि

सार संधिवेला-आदि, ऋतु और नक्षत्रवाचक शब्दों से अण् प्रत्यय होता है।

4.3.17
प्रावृष एण्यः

IAST prāvṛṣa eṇyaḥ

प्रकार विधि

सार प्रावृष् शब्द से एण्य प्रत्यय होता है।

4.3.18
वर्षाभ्यष्ठक्

IAST varṣābhyaṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार वर्षा (बहुवचन) शब्द से ठक् प्रत्यय होता है।

4.3.19
छन्दसि ठञ्

IAST chandasi ṭhañ

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक प्रयोग) में (वर्षा से) ठञ् प्रत्यय होता है।

4.3.20
वसन्ताच्च

IAST vasantāc ca

प्रकार विधि

सार वसन्त शब्द से भी (छन्दसि-ठञ्/संबद्ध) प्रत्यय होता है।

4.3.21
हेमन्ताच्च

IAST hemantāc ca

प्रकार विधि

सार हेमन्त शब्द से भी (वही) प्रत्यय होता है।

4.3.22
सर्वत्राण् च तलोपश्च

IAST sarvatrāṇ ca talopaś ca

प्रकार विधि

सार (वसन्त-हेमन्तादि से) सर्वत्र अण् भी होता है तथा त् का लोप भी।

4.3.23
सायंचिरम्प्रह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च

IAST sāyaṃciramprahṇeprage 'vyayebhyaṣ ṭyuṭyulau tuṭ ca

प्रकार विधि

सार सायम्, चिरम्, प्राह्णे और प्रगे — इन अव्ययों से ट्यु तथा ट्युल् प्रत्यय होते हैं और तुट् आगम भी।

4.3.24
विभाषा पूर्वाह्णापराह्णाभ्याम्

IAST vibhāṣā pūrvāhṇāparāhṇābhyām

प्रकार विधि

सार पूर्वाह्ण और अपराह्ण शब्दों से (ट्यु/ट्युल्) वैकल्पिक रूप से होता है।

4.3.25
तत्र जातः

IAST tatra jātaḥ

प्रकार अधिकार

सार «तत्र जातः»—इस अर्थ का अधिकार आगे के तद्धित-प्रत्ययों के लिए प्रारम्भ होता है।

4.3.26
प्रावृषष्ठप्

IAST prāvṛṣaṣṭhap

प्रकार विधि

सार प्रावृष् से (काल-सम्बन्धी तद्धितार्थ में) ठप् प्रत्यय होता है।

4.3.27
संज्ञायां शरदो वुञ्

IAST saṃjñāyāṃ śarado vuñ

प्रकार विधि

सार संज्ञा में शरद् से वुञ् प्रत्यय होता है।

4.3.28
पूर्वाह्णापराह्णार्द्रामूलप्रदोषावस्कराद्वुन्

IAST pūrvāhṇāparāhṇārdrāmūlapradoṣāvaskarādvun

प्रकार विधि

सार पूर्वाह्ण, अपराह्ण, आर्द्रा, मूल, प्रदोष और अवस्कर से वुन् प्रत्यय होता है।

4.3.29
पथः पन्थ च

IAST pathaḥ pantha ca

प्रकार विधि

सार पथ्/पथिन् से (पूर्वोक्त प्रत्यय) होता है तथा पन्थ रूप भी प्रकृति माना जाता है।

4.3.30
अमावास्याया वा

IAST amāvāsyāyā vā

प्रकार विधि

सार अमावास्या से (पूर्वोक्त प्रत्यय) वैकल्पिक रूप से होता है।

4.3.31
अ च

IAST a ca

प्रकार विधि

सार अमावास्या से अ प्रत्यय भी (वैकल्पिक) होता है।

4.3.32
सिन्ध्वपकराभ्यां कन्

IAST sindhvapakarābhyāṃ kan

प्रकार विधि

सार सिन्धु और अपकर से कन् प्रत्यय होता है।

4.3.33
अणञौ च

IAST aṇañau ca

प्रकार विधि

सार सिन्धु और अपकर से अण् तथा अञ् भी होते हैं।

4.3.34
श्रविष्ठाफल्गुन्यनुराधास्वातितिष्यपुनर्वसुहस्तविशाखाऽषाढाबहुलाल्लुक्

IAST śraviṣṭhāphalgunyanurādhāsvātitiṣyapunarvasuhastaviśākhā'ṣāḍhābahulālluk

प्रकार विधि

सार श्रविष्ठा, फल्गुनी, अनुराधा, स्वाति, तिष्य, पुनर्वसु, हस्त, विशाखा, आषाढा और बहुला से (नक्षत्र-सम्बन्धी तद्धित का) लुक् होता है।

4.3.35
स्थानन्तगोशालखरशालाच्च

IAST sthānantagośālakharaśālācca

प्रकार विधि

सार स्थानान्त शब्दों तथा गोशाला और खरशाला से भी (तद्धित का) लुक् होता है।

4.3.36
वत्सशालाऽभिजिद्श्वयुक्छतभिषजो वा

IAST vatsaśālā'bhijidaśvayukchatabhiṣajo vā

प्रकार विधि

सार वत्सशाला, अभिजित्, अश्वयुज् और शतभिषज् से (तद्धित-लुक्) वैकल्पिक है।

4.3.37
नक्षत्रेभ्यो बहुलम्

IAST nakṣatrebhyo bahulam

प्रकार विधि

सार नक्षत्रवाची शब्दों से (सम्बन्धी तद्धित/लुक्-विधान) बहुल—अनियत—रूप से होता है।

4.3.38
कृतलब्धक्रीतकुशलाः

IAST kṛtalabdhakrītakusalāḥ

प्रकार अधिकार

सार (तद्धितार्थों में) कृत, लब्ध, क्रीत और कुशल—ये अर्थ भी गृहीत होते हैं।

4.3.39
प्रायभवः

IAST prāyabhavaḥ

प्रकार अधिकार

सार प्रायभव—अधिकांशतः होने—अर्थ में भी तद्धित विहित है।

4.3.40
उपजानूपकर्णोपनीवेष्ठक्

IAST upajānūpakarṇopanīveṣṭhak

प्रकार विधि

सार उपजानु, उपकर्ण और उपनीवि से ठक् प्रत्यय होता है।

4.3.41
संभूते

IAST saṃbhūte

प्रकार अधिकार

सार संभूत—उत्पन्न/जनित—अर्थ में तद्धित का अधिकार है।

4.3.42
कोशाड्ढञ्

IAST kośāḍḍhañ

प्रकार विधि

सार कोश से (संभूतार्थ में) ढञ् प्रत्यय होता है।

4.3.43
कालात् साधुपुष्प्यत्पच्यमानेषु

IAST kālāt sādhupuṣpyatpacyamāneṣu

प्रकार विधि

सार कालवाची शब्दों से साधु, पुष्यत् और पच्यमान अर्थों में तद्धित होता है।

4.3.44
उप्ते च

IAST upte ca

प्रकार विधि

सार उप्त—बोया गया—अर्थ में भी काल से तद्धित होता है।

4.3.45
आश्वयुज्या वुञ्

IAST āśvayujyā vuñ

प्रकार विधि

सार आश्वयुजी से वुञ् प्रत्यय होता है।

4.3.46
ग्रीष्मवसन्तात् अन्यतरस्यां

IAST grīṣmavasantād anyatarasyām

प्रकार विधि

सार ग्रीष्म और वसन्त से (वुञ्) वैकल्पिक रूप से होता है।

4.3.47
देयं ऋणे

IAST deyaṃ ṛṇe

प्रकार अधिकार

सार ऋण-अर्थ में देय—देने योग्य/देय-ऋण—अर्थ का तद्धित-अधिकार है।

4.3.48
कलापि(न्)अश्वत्थ यव बुसात् उन्

IAST kalāpinaśvatthayavabusād un

प्रकार विधि

सार कलापिन्, अश्वत्थ, यव और बुस से उन् प्रत्यय होता है।

4.3.49
ग्रीष्म अवरसंआत् वुञ्

IAST grīṣmāvarasamād vuñ

प्रकार विधि

सार ग्रीष्म और अवरसम् से वुञ् प्रत्यय होता है।

4.3.50
संवत्सर आग्रहायणीभ्यां ठञ् च

IAST saṃvatsarāgrahāyaṇībhyāṃ ṭhañ ca

प्रकार विधि

सार संवत्सर और आग्रहायणी से ठञ् भी होता है।

4.3.51
व्याहरति मृगः

IAST vyāharati mṛgaḥ

प्रकार विधि

सार मृग उस (ध्वनि) को उच्चारित करता है — इस अर्थ में पूर्व-निर्दिष्ट तद्धित प्रवृत्त होता है।

4.3.52
तद् अस्य सोढं

IAST tad asya soḍham

प्रकार विधि

सार वह (कष्ट/वस्तु) इसके द्वारा सहा गया है — इस अर्थ में तद्धित होता है।

4.3.53
तत्र भवः

IAST tatra bhavaḥ

प्रकार अधिकार

सार ‘वहाँ विद्यमान/उत्पन्न’ — इस अर्थ का अधिकार; आगे के तद्धित इसी अर्थ में लगते हैं।

4.3.54
दिश् आदिभ्यः यत्

IAST diś-ādibhyaḥ yat

प्रकार विधि

सार दिग्-आदि गण के शब्दों से ‘तत्र भवः’ अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

4.3.55
शरीर अवयवात् च

IAST śarīrāvayavāc ca

प्रकार विधि

सार शरीर के अवयववाचक शब्दों से भी (तत्र भवः में) यत् होता है।

4.3.56
दृतिकुक्षिकलशिवस्ति अस्ति अहेर्ढञ्

IAST dṛti-kukṣi-kalaśi-vasti-asti-aheḥ ḍhañ

प्रकार विधि

सार दृति, कुक्षि, कलशि, वस्ति, अस्ति तथा अहि से (तत्र भवः में) ढञ् होता है।

4.3.57
ग्रीवाभ्यः अण् च

IAST grīvābhyaḥ aṇ ca

प्रकार विधि

सार ग्रीवा से अण् भी (तत्र भवः में) होता है।

4.3.58
गम्भीरात् ञ्यः

IAST gambhīrāt ñaḥ

प्रकार विधि

सार गम्भीर से (तत्र भवः में) ञ्य प्रत्यय होता है।

4.3.59
अव्ययीभाव् आत् च

IAST avyayībhāvāt ca

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव समास से भी (पूर्वोक्त तत्र-भवः प्रत्यय) होता है।

4.3.60
अन्तःपूर्वपदात् ठञ्

IAST antaḥ-pūrvapadāt ṭhañ

प्रकार विधि

सार ‘अन्तर्’ पूर्वपद वाले शब्द से (तत्र भवः में) ठञ् होता है।

4.3.61
ग्रांआत् परि अनुपूर्वात्

IAST grāmāt pary-anu-pūrvāt

प्रकार विधि

सार परि या अनु पूर्व में रहने पर ग्राम से (तत्र भवः में ठञ्) होता है।

4.3.62
जिह्वामूल अङ्गुलेः छः

IAST jihvāmūlāṅguleḥ chaḥ

प्रकार विधि

सार जिह्वामूल और अङ्गुलि से (तत्र भवः में) छ प्रत्यय होता है।

4.3.63
वर्ग अन्तात् च

IAST vargāntāt ca

प्रकार विधि

सार वर्ग-अन्त शब्दों से भी (तत्र भवः में) छ होता है।

4.3.64
अशब्दे यत्खौ न्यतरस्यां

IAST aśabde yat-khau anyatarasyām

प्रकार विधि

सार शब्द-भिन्न अर्थ में यत् और ख् — विकल्प से — होते हैं।

4.3.65
कर्णललाटात् कन् अलंकारे

IAST karṇa-lalāṭāt kan alaṅkāre

प्रकार विधि

सार कर्ण और ललाट से अलंकार अर्थ में कन् प्रत्यय होता है।

4.3.66
तस्य व्याख्याने इति च व्याख्याअव्यआम्नः

IAST tasya vyākhyāne iti ca vyākhyātavyānām

प्रकार विधि

सार ‘उसकी व्याख्या’ अर्थ में, तथा व्याख्यातव्य शब्दों से भी, तद्धित होता है।

4.3.67
बहु अच् अः अन्त उदा त्तात् ठञ्

IAST bahv-acaḥ antodāttāt ṭhañ

प्रकार विधि

सार बहु-अच्, अन्तोदात्त शब्दों से ठञ् होता है।

4.3.68
क्रतुयज्ञेभ्यः च

IAST kratu-yajñebhyaḥ ca

प्रकार विधि

सार क्रतु और यज्ञ के नामों से भी (पूर्वोक्त) ठञ् होता है।

4.3.69
अध्यायेषु एव ऋषेः

IAST adhyāyeṣu eva ṛṣeḥ

प्रकार नियम

सार ऋषि-नाम से तद्धित केवल अध्याय (वैदिक पाठ-खण्ड) अर्थ में ही होता है।

4.3.70
पौरोडाशपुरोडाशात्ष्ठन्

IAST paurodāśa-puroḍāśāt ṣṭhan

प्रकार विधि

सार पौरोडाश और पुरोडाश से ष्ठन् प्रत्यय होता है।

4.3.71
छन्दसः यत् अणौ

IAST chandasaḥ yat aṇau

प्रकार विधि

सार छन्दस् से यत् और अण् प्रत्यय होते हैं।

4.3.72
द्व्यच् ऋत् ब्राह्मण ऋच्प्रथम अध्वरपुरष्चरणनामाख्यातात् ठक्

IAST dvy-aca ṛt brāhmaṇa-ṛc-prathama-adhvara-puraścaraṇa-nāmākhyātāt ṭhak

प्रकार विधि

सार द्व्यच्, ऋत्, ब्राह्मण, ऋच्, प्रथम, अध्वर, पुरश्चरण तथा नाम-आख्यात से ठक् होता है।

4.3.73
अण् ऋगयन आदिभ्यः

IAST aṇ ṛgayanādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार ऋगयन-आदि गण से अण् प्रत्यय होता है।

4.3.74
ततः आगतः

IAST tataḥ āgataḥ

प्रकार अधिकार

सार ‘वहाँ से आया’ — इस अर्थ का अधिकार; आगे के तद्धित इसी अर्थ में लगते हैं।

4.3.75
ठक् आयस्थानेभ्यः

IAST ṭhak āyasthānebhyaḥ

प्रकार विधि

सार आयस्थानवाचक शब्दों से (तत आगतः अर्थ में) ठक् होता है।

4.3.76
शुण्डिक आदिभ्यः अण्

IAST śuṇḍikādibhyo 'ṇ

प्रकार विधि

सार शुण्डिकादि-गण के शब्दों से (तत आगतः अर्थ में) अण् प्रत्यय होता है।

4.3.77
विद्यायोनिसंबन्धेभ्यः वुञ्

IAST vidyāyonisaṃbandhebhyo vuñ

प्रकार विधि

सार विद्या-सम्बन्ध या योनि-सम्बन्ध वाचक शब्दों से (तत आगतः अर्थ में) वुञ् होता है।

4.3.78
ऋत् अः ठञ्

IAST ṛto 'ñ ṭhañ

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त शब्दों से अञ् तथा ठञ् प्रत्यय होते हैं।

4.3.79
पितुर्यत् च

IAST pitur yac ca

प्रकार विधि

सार पितृ शब्द से (अञ्-ठञ् के अतिरिक्त) यत् भी होता है।

4.3.80
गोत्रात् अङ्कवत्

IAST gotrāṅkavat

प्रकार विधि

सार गोत्रवाचक शब्दों से अङ्क-शब्दवत् ही प्रत्यय-विधान होता है।

4.3.81
हेतुमनुष्येभ्यः अन्यतरस्यां रूप्यः

IAST hetumanuṣyebhyo 'nyatarasyāṃ rūpyaḥ

प्रकार विधि

सार हेतुभूत मनुष्यवाचक शब्दों से वैकल्पिक रूप्य प्रत्यय होता है।

4.3.82
मयट् च

IAST mayaṭ ca

प्रकार विधि

सार (हेतुमनुष्येभ्यः) मयट् भी होता है।

4.3.83
प्रभवति

IAST prabhavati

प्रकार अधिकार

सार “उससे उत्पन्न/प्रभव होता है” अर्थ में तद्धित-अधिकार आरम्भ होता है।

4.3.84
विदूरात् ञ्यः

IAST vidūrāñ ñyaḥ

प्रकार विधि

सार विदूर शब्द से (प्रभवति अर्थ में) ञ्य प्रत्यय होता है।

4.3.85
तद् गच्छति पथि(न्)दूतयोः

IAST tad gacchati pathidūtayoḥ

प्रकार विधि

सार पथिन् तथा दूत शब्दों से “वहाँ जाता है” अर्थ में तद्धित होता है।

4.3.86
अभिनिष्क्रामति द्वारं

IAST abhiniṣkrāmati dvāram

प्रकार विधि

सार द्वार शब्द से “उससे निकलता/अभिनिष्क्रमण करता है” अर्थ में तद्धित होता है।

4.3.87
अधिकृत्य कृते ग्रन्थे

IAST adhikṛtya kṛte granthe

प्रकार विधि

सार “उसे विषय बनाकर रचित ग्रन्थ” अर्थ में तद्धित का विधान होता है।

4.3.88
शिशुक्रन्दयमसभद्वंद्व इन्द्रजनन आदिभ्यः छः

IAST śiśukrandayamasabhadvaṃdvendrajananādibhyaś chaḥ

प्रकार विधि

सार शिशुक्रन्द, यमसभ, द्वन्द्व, इन्द्रजनन आदि शब्दों से (अधिकृत्य कृते ग्रन्थे अर्थ में) छ प्रत्यय होता है।

4.3.89
सः अस्य निवासः

IAST so 'sya nivāsaḥ

प्रकार अधिकार

सार “वह उसका निवास-स्थान है” अर्थ में तद्धित-अधिकार आरम्भ होता है।

4.3.90
अभिजनः च

IAST abhijanaś ca

प्रकार विधि

सार “वह उसका अभिजन (मूल/पैतृक स्थान) है” अर्थ में भी तद्धित होता है।

4.3.91
आयुधजीविभ्यः छः पर्वते

IAST āyudhajīvibhyaś chaḥ parvate

प्रकार विधि

सार पर्वतीय आयुधजीवी-नामों से (निवास/अभिजन अर्थ में) छ प्रत्यय होता है।

4.3.92
शण्डिक आदिभ्यः ञ्यः

IAST śaṇḍikādibhyo ñyaḥ

प्रकार विधि

सार शण्डिकादि-गण के शब्दों से (निवास/अभिजन अर्थ में) ञ्य होता है।

4.3.93
सिन्धुतक्षशिला आदिह्यः अण् अञु

IAST sindhutakṣaśilādibhyo 'ṇañau

प्रकार विधि

सार सिन्धु, तक्षशिला आदि से अण् तथा अञ् प्रत्यय होते हैं।

4.3.94
तूदीशलातुरवर्मतीकूचवारात् ढक्छण्- ढञ्यकः

IAST tūdīśalāturavarmatīkūcavārād ḍhakchaṇḍhañyakaḥ

प्रकार विधि

सार तूदी से ढक्, शलातुर से छण्, वर्मती से ढञ्, कूचवार से यक — क्रमशः ये प्रत्यय होते हैं।

4.3.95
भक्तिः

IAST bhaktiḥ

प्रकार अधिकार

सार “उसकी भक्ति/अनुराग” अर्थ में तद्धित-अधिकार आरम्भ होता है।

4.3.96
अचित्तात् अदेशकालात् ठक्

IAST acittādeśakālāṭ ṭhak

प्रकार विधि

सार अचेतन तथा अदेश-अकाल वाचक शब्दों से (भक्ति अर्थ में) ठक् होता है।

4.3.97
महाराजात् ठञ्

IAST mahārājāṭ ṭhañ

प्रकार विधि

सार महाराज शब्द से (भक्ति अर्थ में) ठञ् होता है।

4.3.98
वासुदेव अर्जुनाभ्यां वुन्

IAST vāsudevārjunābhyāṃ vun

प्रकार विधि

सार वासुदेव तथा अर्जुन से (भक्ति अर्थ में) वुन् प्रत्यय होता है।

4.3.99
गोत्रक्षत्रिय आख्येह्यः अहुलं वुञ्

IAST gotrakṣatriyākhyebhyo bahulaṃ vuñ

प्रकार विधि

सार गोत्र तथा क्षत्रिय नामों से बहुलता से (भक्ति अर्थ में) वुञ् होता है।

4.3.100
जनपदिणां जनपदवत् सर्वं जनपदेन समानशब्दानां बहुवचने

IAST janapadiṇāṃ janapadavat sarvaṃ janapadena samānaśabdānāṃ bahuvacane

प्रकार परिभाषा

सार जनपदनिवासी-वाचकों पर, जनपद के समान शब्द होने तथा बहुवचन में, समस्त प्रत्यय-विधान जनपदवत् होता है।

4.3.101
तेन प्रोक्तं

IAST tena proktam

प्रकार अधिकार

सार «उसके द्वारा प्रोक्त/उपदिष्ट»—इस अर्थ में आगे के तद्धित-प्रत्यय विधीयमान होते हैं।

4.3.102
तित्तिरिवरतन्तुखण्डिक उखात् छण्

IAST tittiri-varatantu-khaṇḍikokhāc chaṇ

प्रकार विधि

सार तित्तिरि, वरतन्तु, खण्डिक और उखा से «तेन प्रोक्तम्» अर्थ में छण् प्रत्यय होता है।

4.3.103
काश्यपकौशिकाभ्यां ऋषिभ्याम् णिनिः

IAST kāśyapa-kauśikābhyām ṛṣibhyāṃ ṇiniḥ

प्रकार विधि

सार ऋषि काश्यप और कौशिक से प्रोक्त अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है।

4.3.104
कलापि(न्)वैसम्पायन न्तेआसिह्यः च

IAST kalāpino vaiśampāyanāntevāsibhyaś ca

प्रकार विधि

सार कलापिन् तथा वैशम्पायन के अन्तेवासियों से भी प्रोक्त अर्थ में (पूर्वोक्त) छण् होता है।

4.3.105
पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणाल्पेषु

IAST purāṇa-prokteṣu brāhmaṇa-kalpeṣu

प्रकार विधि

सार पुराण-प्रोक्त ब्राह्मण और कल्प ग्रन्थों में भी प्रोक्तार्थक प्रत्यय लागू होते हैं।

4.3.106
शौनक आदिभ्यः छन्दसि

IAST śaunakādibhyaś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक) विषय में शौनकादिगण से प्रोक्त अर्थ में छ प्रत्यय होता है।

4.3.107
कठचरकात् लुक्

IAST kaṭha-carakāl luk

प्रकार विधि

सार कठ और चरक से प्रोक्तार्थक प्रत्यय का लुक् होता है।

4.3.108
कलापिनः अण्

IAST kalāpino ’ṇ

प्रकार विधि

सार कलापिन् से प्रोक्त अर्थ में अण् प्रत्यय होता है।

4.3.109
छगलिनः ढिनुक्

IAST chagalino ḍhinuk

प्रकार विधि

सार छगलिन् से प्रोक्त अर्थ में ढिनुक् प्रत्यय होता है।

4.3.110
पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः

IAST pārāśarya-śilālibhyāṃ bhikṣu-naṭa-sūtrayoḥ

प्रकार विधि

सार पाराशर्य से भिक्षुसूत्र और शिलालिन् से नटसूत्र—प्रोक्त अर्थ में (णिनि) प्रत्यय होता है।

4.3.111
कर्मन्दकृशाश्वात् इनिः

IAST karmanda-kṛśāśvād iniḥ

प्रकार विधि

सार कर्मन्द और कृशाश्व से प्रोक्त अर्थ में इनि प्रत्यय होता है।

4.3.112
तेन एकदिक्

IAST tenaikadik

प्रकार अधिकार

सार «तेन सह एका दिक्»—उसी दिशा/एकदिक् अर्थ में आगे के तद्धित-प्रत्यय विधीयमान होते हैं।

4.3.113
तसिः च

IAST tasiś ca

प्रकार विधि

सार एकदिक् अर्थ में तसि प्रत्यय भी होता है।

4.3.114
उरसः यत् च

IAST uraso yat ca

प्रकार विधि

सार उरस् से एकदिक् अर्थ में यत् प्रत्यय भी होता है।

4.3.115
उपज्ञाते

IAST upajñāte

प्रकार अधिकार

सार «उपज्ञात»—उसके द्वारा प्रथम जाना/आविष्कृत—इस अर्थ में तद्धित-प्रत्यय विधीयमान होते हैं।

4.3.116
कृते ग्रन्थे

IAST kṛte granthe

प्रकार अधिकार

सार «कृत ग्रन्थ»—उसके द्वारा रचित ग्रन्थ—इस अर्थ में तद्धित-प्रत्यय विधीयमान होते हैं।

4.3.117
संज्ञयां

IAST saṃjñāyām

प्रकार अधिकार

सार संज्ञा (नाम) अर्थ में तद्धित-प्रत्यय विधीयमान होते हैं।

4.3.118
कुलाल आदिभ्यः वुञ्

IAST kulālādibhyo vuñ

प्रकार विधि

सार कुलालादिगण से उपज्ञात/कृत-ग्रन्थ/संज्ञा अर्थ में वुञ् प्रत्यय होता है।

4.3.119
क्षुद्राभ्रमरवटरपादपात् अञ्

IAST kṣudrā-bhramara-vaṭara-pādapād añ

प्रकार विधि

सार क्षुद्रा, भ्रमर, वटर और पादप से उन अर्थों में अञ् प्रत्यय होता है।

4.3.120
तस्य इदं

IAST tasyedam

प्रकार अधिकार

सार «तस्य इदम्»—उसका यह/उससे सम्बन्ध—इस अर्थ में आगे के तद्धित-प्रत्यय विधीयमान होते हैं।

4.3.121
रथात् यत्

IAST rathād yat

प्रकार विधि

सार रथ से «तस्य इदम्» अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

4.3.122
पत्त्रपूर्वात् अञ्

IAST pattra-pūrvād añ

प्रकार विधि

सार पत्त्र-पूर्वपद वाले शब्द से «तस्य इदम्» अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है।

4.3.123
पत्त्र अध्वर्युपरिषडः च

IAST pattrādhvaryu-pariṣadaś ca

प्रकार विधि

सार पत्त्र, अध्वर्यु और परिषद् से भी «तस्य इदम्» अर्थ में अञ् होता है।

4.3.124
हलसीरात् ठक्

IAST hala-sīrāṭ ṭhak

प्रकार विधि

सार हल और सीर से «तस्य इदम्» अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.3.125
द्वंद्वात् वुन् वैरमैथुनिकयोः

IAST dvandvād vun vaira-maithunikayoḥ

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व समास से वैर और मैथुनिक अर्थ में वुन् प्रत्यय होता है।

4.3.126
गोत्रचरणात् वुञ्

IAST gotracaraṇād vuñ

प्रकार विधि

सार गोत्र तथा चरण (वैदिक शाखा) वाचक शब्दों से (तस्येदम् आदि अर्थ में) वुञ् प्रत्यय होता है।

4.3.127
संघ अङ्कलक्षणेषु अञ्यञिञां अण्

IAST saṅghāṅkalakṣaṇeṣv anyañiñām aṇ

प्रकार विधि

सार संघ, अङ्क और लक्षण अर्थ में अञ्-, ञ्- तथा इञ्-प्रत्ययान्त शब्दों से अण् होता है।

4.3.128
शाकलात् वा

IAST śākalād vā

प्रकार विधि

सार शाकल से उक्त अर्थों में वैकल्पिक रूप से अण् होता है।

4.3.129
छन्दोग औक्थिकयाज्ञिकबह्वृचनटात् ञ्यः

IAST chandoga-aukthika-yājñika-bahvṛca-naṭāṭ ñaḥ

प्रकार विधि

सार छन्दोग, औक्थिक, याज्ञिक, बह्वृच और नट से ञ्य प्रत्यय होता है।

4.3.130
न दण्डमाणव अन्तेवासिषु

IAST na daṇḍamāṇavāntevāsiṣu

प्रकार नियम

सार दण्ड, माणव और अन्तेवासिन् (सम्बन्धी प्रयोगों) में पूर्व-प्रत्यय का प्रतिषेध है।

4.3.131
रैवतिक आदिभ्यः छः

IAST raivatikādibhyaś chaḥ

प्रकार विधि

सार रैवतिक आदि गण के शब्दों से छ प्रत्यय होता है।

4.3.132
कौपिञ्जलहास्तिपदात् अण्

IAST kaupiñjalahāstipadād aṇ

प्रकार विधि

सार कौपिञ्जल और हास्तिपद से अण् प्रत्यय होता है।

4.3.133
आथर्वणिकस्य इकलोपः च

IAST ātharvaṇikasyekalopaś ca

प्रकार विधि

सार आथर्वणिक में (उक्त प्रत्यय-प्रयोग में) इक का लोप भी होता है।

4.3.134
तस्य विकारः

IAST tasya vikāraḥ

प्रकार अधिकार

सार “उसका विकार (परिणाम/उत्पाद)” — यह अर्थ-अधिकार आगे के विकार-प्रत्यय विधियों पर लागू होता है।

4.3.135
अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः

IAST avayave ca prāṇyoṣadhivṛkṣebhyaḥ

प्रकार विधि

सार प्राणी, ओषधि और वृक्ष वाचक शब्दों से अवयव (अंश) अर्थ में भी (विकार-प्रत्यय) होता है।

4.3.136
बिल्व आदि भ्य्यः अण्

IAST bilvādibhyo 'ṇ

प्रकार विधि

सार बिल्व आदि गण के शब्दों से (विकार/अवयव अर्थ में) अण् होता है।

4.3.137
क उपधात् च

IAST ka upadhāc ca

प्रकार विधि

सार क-उपध (उपधा में क वाले) शब्दों से भी अण् होता है।

4.3.138
त्रपुजतुनोः षुक्

IAST trapujatunoḥ ṣuk

प्रकार विधि

सार तस्य विकारः अधिकार में त्रपु और जतु से तद्धित लगाने पर षुक् का आगम होता है (त्रापुष, जातुष)।

4.3.139
ओरञ्

IAST oraṅ

प्रकार विधि

सार उकारान्त प्रातिपदिक से विकारार्थ में अञ् प्रत्यय होता है।

4.3.140
अनुदात्त आदेः च

IAST anudātta ādeś ca

प्रकार विधि

सार आदि में अनुदात्त स्वर वाले प्रातिपदिक से भी विकारार्थ में अञ् होता है।

4.3.141
पलाश आदिभ्यः वा

IAST palāśādibhyaḥ vā

प्रकार विधि

सार पलाशादिगण से विकारार्थ में अञ् वैकल्पिक होता है।

4.3.142
शम्याः ट्लञ्

IAST śamyāḥ ṭlañ

प्रकार विधि

सार शमी से विकारार्थ में ट्लञ् प्रत्यय होता है (शामील)।

4.3.143
मयट् वा एतयोर्भाषायां अभक्ष्य आच्छादनयोः

IAST mayaṭ vā etayor bhāṣāyām abhakṣyācchādanayoḥ

प्रकार विधि

सार लौकिक भाषा में अभक्ष्य तथा आच्छादन-भिन्न विकार के लिए पूर्वोक्त (अण्/अञ्-क्षेत्र) में मयट् वैकल्पिक होता है।

4.3.144
नित्यं वृद्धशर आदिभ्यः

IAST nityaṃ vṛddhaśarādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार वृद्ध प्रातिपदिकों तथा शरादिगण से विकारार्थ में मयट् नित्य होता है।

4.3.145
गोः च पूरीषे

IAST goś ca purīṣe

प्रकार विधि

सार गो से पूरीष (गोमय/गोबर) अर्थ में भी मयट् नित्य होता है।

4.3.146
पिष्टात् च

IAST piṣṭāc ca

प्रकार विधि

सार पिष्ट से भी विकारार्थ में मयट् होता है (पिष्टमय)।

4.3.147
संज्ञायां कन्

IAST saṃjñāyāṃ kan

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नाम) में विकारार्थ कन् प्रत्यय होता है।

4.3.148
व्रीहेः पुरोडाशे

IAST vrīheḥ puroḍāśe

प्रकार विधि

सार व्रीहि से पुरोडाश अर्थ में (विकारार्थ) कन् होता है।

4.3.149
असंज्ञयां तिलयवाभ्याम्

IAST asaṃjñāyāṃ tilayavābhyām

प्रकार विधि

सार असंज्ञा में तिल और यव से विकारार्थ कन् होता है।

4.3.150
द्व्यचः छन्दसि

IAST dvyacaś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में द्व्यच् (द्व्यक्षर) प्रातिपदिक से विकारार्थ कन् होता है।

4.3.151
न उत्वत् वर्ध्रबिल्वात्

IAST na utvat vardhrabilvāt

प्रकार विधि

सार तस्य विकारः-अधिकार में उकारान्त तथा वर्ध्र और बिल्व से अण् (विकारार्थ) नहीं होता।

4.3.152
ताल आदिभ्यः अण्

IAST tālādibhyaḥ aṇ

प्रकार विधि

सार तालादिगण से विकारार्थ में अण् होता है।

4.3.153
जातरूपेभ्यः परिमाणे

IAST jātarūpebhyaḥ parimāṇe

प्रकार विधि

सार जातरूप आदि से परिमाण अर्थ में (विकार-अधिकार का) तद्धित होता है।

4.3.154
प्राणिरजतादिभ्योऽञ्

IAST prāṇirajatādibhyo 'ñ

प्रकार विधि

सार प्राणिवाचक तथा रजतादि से विकारार्थ में अञ् होता है।

4.3.155
ञ्- इतः च तत्प्रत्ययात्

IAST ñitaś ca tatpratyayāt

प्रकार विधि

सार ञित् से तथा उस (ञित्-)प्रत्ययान्त से भी (पूर्ववत् विकारार्थ में अञ्) होता है।

4.3.156
क्रीतवत् परिमाणात्

IAST krītavat parimāṇāt

प्रकार अतिदेश

सार परिमाणवाचक से क्रीत की तरह (क्रीतार्थ/कीमत-अर्थ) तद्धित होता है।

4.3.157
उष्ट्रात् वुञ्

IAST uṣṭrād vuñ

प्रकार विधि

सार उष्ट्र से विकारार्थ में वुञ् होता है।

4.3.158
उमा ऊर्णयोर्वा

IAST umāūrṇayor vā

प्रकार विधि

सार उमा और ऊर्णा से (विकारार्थ वुञ्) विकल्प से होता है।

4.3.159
एण्याः ढञ्

IAST eṇyā ḍhañ

प्रकार विधि

सार एणी से विकारार्थ में ढञ् होता है।

4.3.160
गोपयसोर्यत्

IAST gopayasoḥ yat

प्रकार विधि

सार तस्य विकारः के अधिकार में गो तथा पयस् से विकारार्थ में यत् प्रत्यय होता है (गव्यम्, पयस्यम्)।

4.3.161
द्रोः च

IAST droḥ ca

प्रकार विधि

सार द्रु से भी (विकारार्थ में) यत् प्रत्यय होता है (द्रव्यम्)।

4.3.162
माने वयः

IAST māne vayaḥ

प्रकार विधि

सार मान अर्थ में वयस् से यत् प्रत्यय होता है (वयस्यम्)।

4.3.163
फले लुक्

IAST phale luk

प्रकार विधि

सार फल अर्थ में (वृक्ष-नाम से होने वाले तद्धित का) लुक् होता है, जिससे फल वृक्ष-शब्द से ही कहा जाता है।

4.3.164
प्लक्ष आदिभ्यः अण्

IAST plakṣādibhyaḥ aṇ

प्रकार विधि

सार प्लक्षादि गण के शब्दों से (फल/विकार अर्थ में) अण् प्रत्यय होता है।

4.3.165
जम्ब्वाः वा

IAST jambvāḥ vā

प्रकार विधि

सार जम्बू से (फलार्थ में) वैकल्पिक रूप से अण् होता है।

4.3.166
लुप् च

IAST lup ca

प्रकार विधि

सार (जम्बू पर) लुप् भी होता है — अण्/लुक्/लुप् के विकल्प।

4.3.167
हरीतकी आदिभ्यः च

IAST harītakyādibhyaḥ ca

प्रकार विधि

सार हरीतक्यादि गण के शब्दों से भी पूर्ववत् अण् तथा लुप् आदि विकल्प लागू होते हैं।

4.3.168
कंसीयपरशव्ययोर्यञ् अञ् औ लुक् च

IAST kaṃsīyaparaśavyayoḥ yañañau luk ca

प्रकार विधि

सार कंसीय तथा परशव्य रूपों में क्रमशः यञ् और अञ् होते हैं, और लुक् भी (विकल्प से) होता है।

अध्याय 4 · पाद 4 (144 सूत्र)

4.4.1
प्राक् वहतेः ठक्

IAST prāk vahateḥ ṭhak

प्रकार अधिकार

सार वहति-सूत्र से पूर्व (इस अधिकार में) तद्धित में ठक् प्रत्यय का अधिकार चलता है।

4.4.2
तेन दीव्यति खनति जयति जितं

IAST tena dīvyati khanati jayati jitam

प्रकार विधि

सार तेन (उससे/उसके द्वारा) दीव्यति, खनति, जयति अथवा जितम् — इन अर्थों में ठक् होता है।

4.4.3
संस्कृतं

IAST saṃskṛtam

प्रकार विधि

सार तृतीया-अन्त से ‘उससे संस्कृत (संस्कार-युक्त/सिद्ध)’ अर्थ में भी ठक् होता है।

4.4.4
कुलत्थक उपधात् अण्

IAST kulatthakopadhād aṇ

प्रकार विधि

सार कुलत्थ से (संस्कृतम् अर्थ में) उपधा-संबंधी विधानानुसार अण् होता है, न कि ठक्।

4.4.5
तरति

IAST tarati

प्रकार विधि

सार तृतीया-अन्त से ‘उससे तरति (पार उतरता है)’ अर्थ में ठक् होता है।

4.4.6
गोपुच्छात् ठञ्

IAST gopucchāt ṭhañ

प्रकार विधि

सार गोपुच्छ से ‘उससे तरति’ अर्थ में ठञ् होता है।

4.4.7
नौद्व्यचः ठन्

IAST naudvyacaḥ ṭhan

प्रकार विधि

सार नौ तथा द्व्यच् शब्दों से ‘उससे तरति’ अर्थ में ठन् होता है।

4.4.8
चरति

IAST carati

प्रकार विधि

सार तृतीया-अन्त से ‘उससे चरति (विचरण/व्यवसाय करता है)’ अर्थ में ठक् होता है।

4.4.9
आकर्षात्ष्ठल्

IAST ākarṣāt ṣṭhal

प्रकार विधि

सार आकर्ष से ‘उससे चरति’ अर्थ में ष्ठल् होता है।

4.4.10
पर्प आदिभ्यः ष्ठन्

IAST parpādibhyaḥ ṣṭhan

प्रकार विधि

सार पर्प-आदि गण से ‘उससे चरति’ अर्थ में ष्ठन् होता है।

4.4.11
श्वगणात् ठञ् च

IAST śvagaṇāt ṭhañ ca

प्रकार विधि

सार श्वगण से ‘उससे चरति’ अर्थ में ठञ् भी होता है।

4.4.12
वेतन आदिभ्यः जीवति

IAST vetanādibhyaḥ jīvati

प्रकार विधि

सार वेतन आदि से तेन जीवति (उससे जीविका चलाता है) अर्थ में ठक् होता है।

4.4.13
वस्नक्रयविक्रयात् ठन्

IAST vasnakrayavikrayāt ṭhan

प्रकार विधि

सार वस्न, क्रय और विक्रय से तद्धित-प्रत्यय ठन् होता है (वस्निक, क्रयिक, विक्रयिक — मूल्य/क्रय/विक्रय-सम्बन्धी)।

4.4.14
आयुधात् छ च

IAST āyudhāt cha ca

प्रकार विधि

सार आयुध से छ भी होता है (तथा पूर्व-प्रत्यय भी — आयुधीय/आयोधिक, आयुध-सम्बन्धी/आयुध से व्यवहार करने वाला)।

4.4.15
हरति उत्सङ्ग आदिभ्यः

IAST harati utsaṅgādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार ‘हरति’ (वहन करता है) अर्थ में उत्सङ्गादिगण से (पूर्व-निर्दिष्ट) तद्धित होता है (उत्सङ्गिक — उत्सङ्ग में वहन करने वाला)।

4.4.16
भस्त्रा आदिभ्यः ष्ठन्

IAST bhastrādibhyaḥ ṣṭhan

प्रकार विधि

सार भस्त्रादिगण से ‘हरति’ अर्थ में ष्ठन् होता है (भस्त्रिक — भस्त्रा में/से वहन करने वाला)।

4.4.17
विभाषा विवधव्ज्वधात्

IAST vibhāṣā vivadhavjvadhāt

प्रकार विधि

सार विवध और व्ज्वध से ‘हरति’ अर्थ में ष्ठन् वैकल्पिक है (विवधिक इत्यादि)।

4.4.18
अण् कूटिलिकायाः

IAST aṇ kūṭilikāyāḥ

प्रकार विधि

सार कूटिलिका से ‘हरति’ अर्थ में अण् होता है (कौटिलिक — कूटिलिका से वहन/कार्य करने वाला)।

4.4.19
निर्वृत्ते अक्षद्यूत आदिभ्यः

IAST nirvṛtte akṣadyūtādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार ‘निर्वृत्त’ (उससे निष्पन्न/उसमें स्थित) अर्थ में अक्षद्यूतादिगण से तद्धित होता है (आक्षद्यूतिक — अक्षद्यूत-सम्बन्धी/उससे निर्वृत्त)।

4.4.20
क्त्रेर्मप् नित्यं

IAST ktrer map nityam

प्रकार विधि

सार क्त्रि-प्रत्ययान्त से (निर्वृत्त अर्थ में) नित्य मप् होता है।

4.4.21
अपमित्ययाचिताभ्यां कक् कनौ

IAST apamityayācitābhyāṃ kak kanau

प्रकार विधि

सार अपमित्य से कक् और याचित से कन् होता है (अपमित्यक, याचतक — उधार/याचना से सम्बन्धित)।

4.4.22
संसृष्- टे

IAST saṃsṛṣṭe

प्रकार अधिकार

सार ‘संसृष्ट’ (मिश्रित/संयुक्त) अर्थ का अधिकार आरम्भ होता है — आगे के तद्धित इसी अर्थ में।

4.4.23
चूर्णात् इनिः

IAST cūrṇād iniḥ

प्रकार विधि

सार चूर्ण से ‘संसृष्ट’ अर्थ में इनि होता है (चूर्णिन् — चूर्ण-मिश्रित)।

4.4.24
लवणात् लुक्

IAST lavaṇāt luk

प्रकार विधि

सार लवण से (संसृष्ट-अर्थक तद्धित का) लुक् होता है — लवण ही ‘लवण-मिश्रित’ अर्थ देता है।

4.4.25
मुद्गात् अण्

IAST mudgād aṇ

प्रकार विधि

सार मुद्ग से ‘संसृष्ट’ अर्थ में अण् होता है (मौद्ग — मुद्ग-मिश्रित)।

4.4.26
व्यञ्जनैरुपसिक्ते

IAST vyañjanair upasikte

प्रकार विधि

सार व्यञ्जनों से उपसिक्त (सिक्त/मिश्रित) पदार्थ के अर्थ में पूर्ववर्ती तिकन् प्रत्यय विहित होता है।

4.4.27
ओजः सहसम्भसा वर्तते

IAST ojaḥ saho 'mbhasā vartate

प्रकार विधि

सार ओजस्, सहस् और अम्भस् शब्दों से, जब वे वर्तमान/स्थित होने के अर्थ में हों, तिकन् प्रत्यय होता है।

4.4.28
तत् प्रत्यनुपूर्वमीपलोमकूलम्

IAST tat-praty-anu-pūrvam īpa-loma-kūlam

प्रकार विधि

सार तत्, प्रति और अनु पूर्ववर्ती ईप, लोमन् तथा कूल शब्दों से तिकन् प्रत्यय विहित होता है।

4.4.29
परिमुखं च

IAST parimukhaṃ ca

प्रकार विधि

सार परिमुख शब्द से भी उसी अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.30
प्रयच्छति गर्ह्यं

IAST prayacchati garhyaṃ

प्रकार विधि

सार निन्दनीय वस्तु देने वाले अर्थ में प्रातिपदिक से ठक् होता है।

4.4.31
कुस्ज्ददश एकादशात् ष्ठन् ष्ठचौ

IAST kusīda-daśa-ekādaśāt ṣṭhan ṣṭhacau

प्रकार विधि

सार कुसीद, दश और एकादश से ष्ठन् तथा ष्ठच् प्रत्यय होते हैं।

4.4.32
उञ्छति

IAST uñchati

प्रकार विधि

सार उञ्छ (अवशिष्ट अन्न-कण चुनना) करने वाले अर्थ में ठक् होता है।

4.4.33
रक्षति

IAST rakṣati

प्रकार विधि

सार रक्षा करने वाले अर्थ में प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.34
शब्ददर्दुरं करोति

IAST śabda-darduraṃ karoti

प्रकार विधि

सार शब्द या दर्दुर (विशिष्ट रव) उत्पन्न करने वाले अर्थ में ठक् होता है।

4.4.35
पक्षिमत्स्यमृगान् हन्ति

IAST pakṣi-matsya-mṛgān hanti

प्रकार विधि

सार पक्षी, मत्स्य या मृग मारने वाले अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.36
परिपन्थं च तिष्ठति

IAST paripantham ca tiṣṭhati

प्रकार विधि

सार परिपथ (मार्ग में डाका डाल) खड़े रहने वाले अर्थ में भी ठक् होता है।

4.4.37
माथ=उत्तरपदपदवी=अनुपदं धावति

IAST māthottarapada-padavī-anupadaṃ dhāvati

प्रकार विधि

सार माथ-उत्तरपद, पदवी और अनुपदम् के पीछे दौड़ने वाले अर्थ में ठक् होता है।

4.4.38
आक्रन्दात्थञ् च

IAST ākrandāt ṭhañ ca

प्रकार विधि

सार आक्रन्द से ठक् के अतिरिक्त ठञ् भी होता है।

4.4.39
पद उत्तरपदं गृह्- णाति

IAST padottarapadaṃ gṛhṇāti

प्रकार विधि

सार पद-उत्तरपद वाले को ग्रहण करने वाले अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.40
प्रतिकण्ठ अर्थ ललमं च

IAST pratikaṇṭham artha-lalāmaṃ ca

प्रकार विधि

सार प्रतिकण्ठम्, अर्थ और ललाम से (उक्त क्रिया-अर्थों में) ठक् होता है।

4.4.41
धर्मं चरति

IAST dharmaṃ carati

प्रकार विधि

सार धर्म का आचरण करने वाले अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.42
प्रतिपथं एति ठन् च

IAST pratipatham eti ṭhañ ca

प्रकार विधि

सार प्रतिपथ जाने वाले अर्थ में ठक् तथा ठञ् प्रत्यय होते हैं।

4.4.43
समवायान् समवैति

IAST samavāyān samavaiti

प्रकार विधि

सार समवाय में सम्मिलित होने वाले अर्थ में ठक् होता है।

4.4.44
परिषदः ण्यः

IAST pariṣadaḥ ṇyaḥ

प्रकार विधि

सार परिषद् से ण्य प्रत्यय (परिषद्-सदस्यार्थ में) होता है।

4.4.45
सेनायाः वा

IAST senāyā vā

प्रकार विधि

सार सेना शब्द से वैकल्पिक रूप से ण्य (अथवा ठक्) होता है।

4.4.46
संज्ञायां ललाटकुक्कुट्यौ पश्यति

IAST saṃjñāyāṃ lalāṭa-kukkuṭyau paśyati

प्रकार विधि

सार संज्ञा में ललाट और कुक्कुटी देखने वाले अर्थ में ठक् होता है।

4.4.47
तस्य धर्म्यं

IAST tasya dharmyam

प्रकार अधिकार

सार «तस्य धर्म्यम्» (उसके लिए उचित/धर्म्य) अर्थ का अधिकार प्रारम्भ होता है।

4.4.48
अण् महिषी आदिभ्यः

IAST aṇ mahiṣy-ādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार महिषी-आदि गणपठित शब्दों से अण् तस्य-धर्म्य अर्थ में होता है।

4.4.49
ऋतः अञ्

IAST ṛto ’ñ

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त प्रातिपदिक से अञ् तस्य-धर्म्य अर्थ में होता है।

4.4.50
अवक्रयः

IAST avakrayāt

प्रकार विधि

सार अवक्रय (भाड़ा/किराया) से अञ् तस्य-धर्म्य अर्थ में होता है।

4.4.51
तद् अस्य पण्यं

IAST tad asya paṇyam

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित-प्रत्यय «वह इसकी बिक्री-योग्य वस्तु/पण्य है» अर्थ में होते हैं।

4.4.52
लवणात् ठञ्

IAST lavaṇāt ṭhañ

प्रकार विधि

सार लवण से ठञ् होता है (लवणिक — लवण-पण्य/व्यापार-सम्बन्धी रूप)।

4.4.53
किशर आदिभ्यः ष्ठन्

IAST kiśarādibhyaḥ ṣṭhan

प्रकार विधि

सार किशर आदि गण से ष्ठन् होता है (पण्यार्थ में)।

4.4.54
शलालुनः अन्यतरस्स्यां

IAST śalāluno 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार शलालु से विकल्पेन (उक्त) प्रत्यय होता है।

4.4.55
शिल्पम्

IAST śilpam

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «शिल्प/कला-कौशल» अर्थ में विहित होते हैं।

4.4.56
मड्डुकझर्जरात् अण् न्यतरस्यां

IAST maḍḍukajharjharād aṇ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार मड्डुक और झर्झर से विकल्पेन अण् होता है (शिल्पार्थ में)।

4.4.57
प्रहरणं

IAST praharaṇam

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «प्रहरण/शस्त्र» अर्थ में होते हैं।

4.4.58
परश्वधात् ठञ् च

IAST paraśvadhāt ṭhañ ca

प्रकार विधि

सार परश्वध से ठञ् तथा (पूर्व-अधिकारगत) अण् भी होता है।

4.4.59
शक्तियष्ट्योरीकक्

IAST śaktiyaṣṭyor īkak

प्रकार विधि

सार शक्ति और यष्टि से ईकक् होता है (प्रहरणार्थ में)।

4.4.60
अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः

IAST astināstidiṣṭaṃ matiḥ

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «यह है / नहीं है / विहित-दिष्ट है» — ऐसी मति/धारणा अर्थ में होते हैं।

4.4.61
शीलं

IAST śīlam

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «शील/स्वभाव/अभ्यास» अर्थ में होते हैं।

4.4.62
छत्त्र आदिभ्यः णः

IAST chattrādibhyaḥ ṇaḥ

प्रकार विधि

सार छत्त्र आदि गण से ण् होता है (शीलार्थ में)।

4.4.63
कर्म अध्ययने वृत्तं

IAST karmādhyayane vṛttam

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «उस कर्म/विषय के अध्ययन में लगा हुआ» अर्थ में होते हैं।

4.4.64
बहु अच्पूर्वपदात् ठच्

IAST bahvacpūrvapadāt ṭhac

प्रकार विधि

सार बहु-पूर्वपद या अच्-पूर्वपद वाले समास से ठच् होता है (अध्ययन-वृत्त अर्थ में)।

4.4.65
हितं भक्षाः

IAST hitaṃ bhakṣāḥ

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «भक्ष्य के रूप में हित/उपयुक्त» अर्थ में होते हैं।

4.4.66
तद् अस्मै द्ज्यते नियुक्तं

IAST tad asmai dīyate niyuktam

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «वह इसे दिया जाता है» अथवा «इसके लिए नियुक्त» अर्थ में होते हैं।

4.4.67
श्राणामांस ओदणात् टिठन्

IAST śrāṇamāṃsodanāt ṭiṭhan

प्रकार विधि

सार श्राण, मांस और ओदन से टिठन् होता है (दान/नियुक्ति अर्थ में)।

4.4.68
भक्तात् अण् अन्यतरस्यां

IAST bhaktād aṇ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार भक्त से विकल्पेन अण् होता है।

4.4.69
तत्र नियुक्तः

IAST tatra niyuktaḥ

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «वहाँ नियुक्त/नियोजित» अर्थ में होते हैं।

4.4.70
अगार अन्तात् ठन्

IAST agārāntāt ṭhan

प्रकार विधि

सार अगार-अन्त वाले शब्द से ठन् होता है (तत्र-नियुक्त अर्थ में)।

4.4.71
अध्यायिनि अदेशकालात्

IAST adhyāyiny adeśakālāt

प्रकार विधि

सार अध्यायी (अध्येता) अर्थ में देश-काल-वाचक से भिन्न प्रातिपदिक से (उक्त) तद्धित होता है।

4.4.72
कठिन अन्तप्रस्तारसंथानेषु व्यवारति

IAST kaṭhināntaprastārasaṃsthāneṣu vyavaharati

प्रकार विधि

सार कठिन-अन्त, प्रस्तार और संस्थान में व्यवहार करने वाले अर्थ में (उक्त) तद्धित होता है।

4.4.73
निकटे वसति

IAST nikaṭe vasati

प्रकार अधिकार

सार आगामी तद्धित «निकट में वास करता है» अर्थ में होते हैं।

4.4.74
आवसथात्ष्ठल्

IAST āvasathāt ṣṭhal

प्रकार विधि

सार आवसथ से ष्ठल् होता है (निकटे वसति अर्थ में)।

4.4.75
प्राक् हितात् यत्

IAST prāk hitāt yat

प्रकार अधिकार

सार यत्-प्रत्यय का अधिकार «तस्मै हितम्» (५.१.५) से पूर्व तक चलता है।

4.4.76
तद् वहति रथयुगप्रासङ्गं

IAST tad vahati rathayugaprāsaṅgam

प्रकार विधि

सार रथ, युग और प्रासङ्ग से «उसे वह (खींच/ढो) करता है» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.77
धुरः यत् ढकौ

IAST dhuraḥ yat ḍhakau

प्रकार विधि

सार धुर से «उसे वह करता है» अर्थ में यत् और ढक् प्रत्यय होते हैं।

4.4.78
खः सर्वधुरात्

IAST khaḥ sarvadhurāt

प्रकार विधि

सार सर्वधुरा से (तद्वहति-अर्थ में) ख प्रत्यय होता है।

4.4.79
एकधुरात् लुक् च

IAST ekadhurāt luk ca

प्रकार विधि

सार एकधुरा से (ख होता है और) प्रत्यय का लुक् भी होता है।

4.4.80
शकटात् अण्

IAST śakaṭāt aṇ

प्रकार विधि

सार शकट से «उसे वह करता है» अर्थ में अण् प्रत्यय होता है।

4.4.81
हलसीरात् ठक्

IAST halasīrāt ṭhak

प्रकार विधि

सार हल और सीर से «उसे वह करता है» अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.82
संज्ञायां जन्याः

IAST saṃjñāyāṃ janyāḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नाम/परसंज्ञा) में जन्या से (निर्दिष्ट) तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.83
विध्यति अधनुषा

IAST vidhyati adhanuṣā

प्रकार विधि

सार «धनुष के बिना बींधता/वेध करता है» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.84
धनगणं लब्धा

IAST dhanagaṇaṃ labdhā

प्रकार विधि

सार «धन या गण को प्राप्त करने वाला» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.85
अन्णात् णः

IAST annāt ṇaḥ

प्रकार विधि

सार अन्न से (लब्धा-अर्थ में) ण प्रत्यय होता है।

4.4.86
वशं गतः

IAST vaśaṃ gataḥ

प्रकार विधि

सार «वश में गया हुआ» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.87
पदं अस्मिन् दृश्यम्

IAST padaṃ asmin dṛśyam

प्रकार विधि

सार «जिसमें पद (चिह्न/पद) दिखाई देता है» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.88
मूलं अस्य आबर्हि

IAST mūlaṃ asya ābarhi

प्रकार विधि

सार «जिसका मूल उखाड़ दिया गया है» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.89
संज्ञायां धेनुष्या

IAST saṃjñāyāṃ dhenuṣyā

प्रकार विधि

सार संज्ञा में धेनुष्या से तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.90
गृहपतिना संयुक्ते ञ्यः

IAST gṛhapatinā saṃyukte ñyaḥ

प्रकार विधि

सार गृहपति से संयुक्त अर्थ में ञ्य प्रत्यय होता है।

4.4.91
नौवयः धर्मविसमूलमूलसीतातुलाभ्यः तार्यतुल्यप्राप्यवध्य आनाम्यसमसमितसम्मितेषु

IAST nauvayo dharmavisamūlamūlasītātulābhyaḥ tāryatulyaprāpyavadhya ānāmyasamasamitasammitesu

प्रकार विधि

सार नौ, वयस्, धर्म, विष, मूल, मूलसीता और तुला से क्रमशः तार्य, तुल्य, प्राप्य, वध्य, आनाम्य, सम तथा समित/सम्मित अर्थों में तद्धित होते हैं।

4.4.92
धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते

IAST dharmapathyarthanyāyād anapete

प्रकार विधि

सार धर्म, पथ्य, अर्थ और न्याय से «उनसे अनपेत (अविचलित)» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.93
छन्दसो निर्मिते

IAST chandaso nirmite

प्रकार विधि

सार छन्दस् से «उसमें निर्मित» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.94
उरसाः अण् च

IAST urasaḥ aṇ ca

प्रकार विधि

सार उरस् से (पूर्व-प्रत्यय के साथ) अण् भी होता है।

4.4.95
हृदयस्य प्रियः

IAST hṛdayasya priyaḥ

प्रकार विधि

सार «हृदय का प्रिय» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.96
बन्धन् ए च ऋषौ

IAST bandhane ca ṛṣau

प्रकार विधि

सार बन्धन-अर्थ में और ऋषि (नाम/प्रसंग) में भी (पूर्व-विधान का) तद्धित होता है।

4.4.97
मतजनहलात् करणजल्पकर्षेसु

IAST matajanahalāt karaṇajalpakarṣeṣu

प्रकार विधि

सार मत, जन और हल से क्रमशः करण, जल्प और कर्ष अर्थों में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.98
तत्र साधूः

IAST tatra sādhuḥ

प्रकार विधि

सार «उसमें साधु (कुशल/योग्य)» अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.99
प्रतिजन आदिभ्यः खञ्

IAST pratijana ādibhyaḥ khañ

प्रकार विधि

सार प्रतिजनादि से (तत्र साधुः अर्थ में) खञ् प्रत्यय होता है।

4.4.100
भक्तात् णः

IAST bhaktāt ṇaḥ

प्रकार विधि

सार भक्त से (तत्र साधुः अर्थ में) ण प्रत्यय होता है।

4.4.101
परिषदः ण्यः

IAST pariṣadaḥ ṇyaḥ

प्रकार विधि

सार «तत्र साधुः» अधिकार में परिषद् से ण्य प्रत्यय होता है (पारिषद — सभा/परिषद् में साधु)।

4.4.102
कथाआदिभ्यः ठक्

IAST kathādibhyaḥ ṭhak

प्रकार विधि

सार «तत्र साधुः» अधिकार में कथा आदि गण-शब्दों से ठक् प्रत्यय होता है।

4.4.103
गुड आदिभ्यः ठञ्

IAST guḍādibhyaḥ ṭhañ

प्रकार विधि

सार «तत्र साधुः» अधिकार में गुड आदि गण-शब्दों से ठञ् प्रत्यय होता है।

4.4.104
पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ्

IAST pathy-atithi-vasati-svapater ḍhañ

प्रकार विधि

सार पथिन्, अतिथि, वसति और स्वपति से (तत्र साधुः आदि अर्थ में) ढञ् प्रत्यय होता है।

4.4.105
सभायाः यः

IAST sabhāyāḥ yaḥ

प्रकार विधि

सार सभा से (पूर्वोक्त अर्थ में) य प्रत्यय होता है।

4.4.106
ढः छन्दसि

IAST ḍhaḥ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (सभा से) ढ प्रत्यय होता है।

4.4.107
समानतीर्थे वासी

IAST samānatīrthe vāsī

प्रकार विधि

सार समान तीर्थ (एक ही तीर्थ/अध्ययन-स्थान) में निवास करने वाले के अर्थ में ‘वासी’ का प्रयोग विहित है।

4.4.108
समान उदरे शयितसो च उदात्तः

IAST samāna udare śayitaso ca udāttaḥ

प्रकार विधि

सार समान उदर में शयन करने वाले (समानोदर-सम्बन्धी) अर्थ में प्रत्यय विहित है तथा वह उदात्त होता है।

4.4.109
सोदरात् यः

IAST sodarāt yaḥ

प्रकार विधि

सार सोदर से य-प्रत्यय होता है (सोदर्य आदि)।

4.4.110
भवे छन्दसि

IAST bhave chandasi

प्रकार अधिकार

सार छन्दस् में ‘भव’ (तत्र भव/ततः आगत) अर्थ का अधिकार आगे के प्रत्ययों के लिए।

4.4.111
पाथः नदीभ्यां ड्यण्

IAST pāthaḥ nadībhyāṃ ḍyaṇ

प्रकार विधि

सार पाथस् और नदी से (तत्र भव आदि अर्थ में) ड्यण् होता है (पाथ्य, नादेय)।

4.4.112
वेशन्तहिमवद्भ्यां अण्

IAST veśantahimavadbhyāṃ aṇ

प्रकार विधि

सार वेशन्त और हिमवत् से (तत्र भव आदि अर्थ में) अण् होता है (वैशन्त, हैमवत)।

4.4.113
स्रोतस्दह् विभाषा ड्यत् ड्यऊ

IAST srotas-dah vibhāṣā ḍyat ṅyu

प्रकार विधि

सार स्रोतस् और दह् से विकल्प से ड्यत् तथा ङ्यु प्रत्यय होते हैं (भव अर्थ में)।(व्याख्या-भेद)

4.4.114
सगर्भसयूथसनुतात् यन्

IAST sagarbha-sayūtha-sanutād yan

प्रकार विधि

सार सगर्भ, सयूथ और सनुत् से यन् प्रत्यय होता है।

4.4.115
तुग्रात् घन्

IAST tugrād ghan

प्रकार विधि

सार तुग्र से घन् प्रत्यय होता है।

4.4.116
अग्रात् यत्

IAST agrāt yat

प्रकार विधि

सार अग्र से यत् प्रत्यय होता है।

4.4.117
घ छौ च

IAST ghaś chau ca

प्रकार विधि

सार अग्र से घ और छ भी प्रत्यय होते हैं।

4.4.118
समुद्र अभ्रात् घः

IAST samudrābhrāt ghaḥ

प्रकार विधि

सार समुद्र और अभ्र से घ प्रत्यय होता है।

4.4.119
बर्हिषि दत्तं

IAST barhiṣi dattam

प्रकार विधि

सार बर्हिस् पर दत्त (अर्पित) अर्थ में तद्धित-प्रवृत्ति का विधान है।

4.4.120
दूतस्यभागकर्मणी

IAST dūtasya bhāgakarmaṇī

प्रकार विधि

सार दूत का भाग और दूत का कर्म—इन अर्थों में तद्धित-प्रवृत्ति का विधान है।

4.4.121
रक्षः यातूणां हनणी

IAST rakṣoyātūnāṃ hananī

प्रकार विधि

सार रक्षस् और यातुओं का हनन करने वाली—इस अर्थ में तद्धित-प्रवृत्ति का विधान है।

4.4.122
रेवतीजगतीहविष्याभ्यः प्रशस्ये

IAST revatījagatīhaviṣyābhyaḥ praśasye

प्रकार विधि

सार रेवती, जगती और हविष्या से प्रशस्य (प्रशंसनीय/उत्कृष्ट) अर्थ में तद्धित-प्रत्यय होता है।

4.4.123
असुरस्य स्वं

IAST asurasya svam

प्रकार विधि

सार असुर का स्व (असुर-सम्बन्धी धन/अधिकार) अर्थ में तद्धित-प्रवृत्ति का विधान है।

4.4.124
मायायां अण्

IAST māyāyām aṇ

प्रकार विधि

सार (असुर की) माया अर्थ में अण् प्रत्यय होता है।

4.4.125
तद्वान् आसां उपधानो मन्त्र इति इष्टकासु लुक् च मतोः

IAST tadvān āsām upadhāno mantra iti iṣṭakāsu luk ca matoḥ

प्रकार विधि

सार ‘इनका उपधान-मन्त्र’ अर्थ में तद्वत् (मतुप्) होता है और इष्टका-शब्दों में मतुप् का लुक् भी।

4.4.126
अश्विमान् अण्

IAST aśvimān aṇ

प्रकार विधि

सार जिसमें अश्विन् विद्यमान हों — ऐसे अर्थ में ‘अश्विन्’ से अण् प्रत्यय होता है (आश्विन नक्षत्र/मास आदि)।

4.4.127
वयस्यासु मूर्ध्नो मतुप्

IAST vayasyāsu mūrdhno matup

प्रकार विधि

सार समानवयस्कों में प्रधानता/शीर्षता के अर्थ में ‘मूर्धन्’ से मतुप् प्रत्यय होता है (मूर्धवान्)।

4.4.128
मतु अर्थे मासतन्वोः

IAST matu arthe māsatanvoḥ

प्रकार विधि

सार मतुप्-अर्थ में ‘मास’ और ‘तनु’ से (पूर्वानुवृत्त) अण् प्रत्यय होता है (मासिक, तानव)।

4.4.129
मधोर्ञ च

IAST madhor ña ca

प्रकार विधि

सार ‘मधु’ से ञ् प्रत्यय होता है तथा चकार से अण् भी (माधव, माध्वी आदि)।

4.4.130
ओजसः अहनि यत्खौ

IAST ojasaḥ ahani yatkhau

प्रकार विधि

सार जिस दिन ओजस् हो, उस अहन्-अर्थ में ओजस् से यत् और ख प्रत्यय होते हैं।

4.4.131
वेशोयशआदेर्भगाद्यल्

IAST veśoyaśaāder bhagād yal

प्रकार विधि

सार वेश, यशस् आदि तथा भग आदि शब्दों से यल् प्रत्यय होता है।

4.4.132
ख च

IAST kha ca

प्रकार विधि

सार पूर्वोक्त वेश-यश-भग आदि से यल् के साथ ख प्रत्यय भी होता है।

4.4.133
पूर्वैः कृतं इनियौ च

IAST pūrvaiḥ kṛtam iniyau ca

प्रकार विधि

सार पूर्वजों द्वारा कृत अर्थ में (पूर्व से) इनि और ईय प्रत्यय भी होते हैं।

4.4.134
अद्भिः संस्कृतं

IAST adbhiḥ saṃskṛtam

प्रकार अधिकार

सार अद्भिः संस्कृतम् (जल से संस्कारित) अर्थ में उत्तर-सूत्रों के प्रत्यय-विधान का अधिकार है।

4.4.135
सहस्रेण संमितऊ घः

IAST sahasreṇa saṃmitau ghaḥ

प्रकार विधि

सार सहस्र से संमित (तुल्य/मापित) अर्थ में घ-प्रत्यय (ईय) होता है।

4.4.136
मतौ च

IAST matau ca

प्रकार विधि

सार मत (माना/समझा जाना) अर्थ में भी सहस्र से घ-प्रत्यय होता है।

4.4.137
सोमं अर्हति यः

IAST somaṃ arhati yaḥ

प्रकार विधि

सार जो सोम अर्हता है, उसके अर्थ में सोम से पूर्व-विहित तद्धित (यत् आदि) होता है।

4.4.138
मये च

IAST maye ca

प्रकार विधि

सार मय (विकार/तन्निर्मित) अर्थ में भी सोम से य-प्रत्यय होता है।

4.4.139
मधोः

IAST madhoḥ

प्रकार विधि

सार मधु शब्द से भी (अर्हति और मय अर्थों में) य-प्रत्यय होता है।

4.4.140
वसोः संऊहे च

IAST vasoḥ saṃūhe ca

प्रकार विधि

सार वसु शब्द से संऊह (संग्रह/राशि) अर्थ में भी अन्वृत तद्धित-प्रत्यय होता है (वासव्य)।

4.4.141
नक्षत्रात् घः

IAST nakṣatrāt ghaḥ

प्रकार विधि

सार नक्षत्रशब्द से घ प्रत्यय होता है (घ → ईय; यथा नाक्षत्रीय)।

4.4.142
सर्वदेवात् तातिल्

IAST sarvadevāt tātil

प्रकार विधि

सार सर्व तथा देव शब्दों से तातिल् प्रत्यय होता है (सर्वताति, देवताति)।

4.4.143
शिवशम् अरिष्टय करे

IAST śivaśam ariṣṭaya kare

प्रकार विधि

सार शिव, शम् और अरिष्ट शब्दों से (शुभ/क्षेम/अरिष्ट-रहित करने वाले) करे अर्थ में तातिल् होता है।

4.4.144
भावे च

IAST bhāve ca

प्रकार विधि

सार शिव-शम्-अरिष्ट से भाव (अमूर्त अवस्था) अर्थ में भी तातिल् होता है।

अध्याय 5 · पाद 1 (136 सूत्र)

5.1.1
प्राक् क्रीतात् छः

IAST prāk krītāt chaḥ

प्रकार अधिकार

सार क्रीत-सूत्र (५.१.३७) से पूर्व तक छ-प्रत्यय का अधिकार चलता है।

5.1.2
उगो आदिभ्य: अत्

IAST ugavādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार उगवादि-गण के शब्दों से (तस्मै हितम् आदि अर्थ में) छ-प्रत्यय होता है।

5.1.3
कम्बलात् च संज्ञायाम्

IAST kambalāt ca saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार कम्बल से भी संज्ञा में छ-प्रत्यय होता है।

5.1.4
विभाषा हवि: अपूप आदिभ्यः

IAST vibhāṣā haviḥ-apūpādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार हविस् तथा अपूपादि-गण के शब्दों से छ-प्रत्यय वैकल्पिक है।

5.1.5
तस्मै हितम्

IAST tasmai hitam

प्रकार अधिकार

सार ‘उसके लिये हित/उपयुक्त’ — यही अर्थ इस प्रकरण के प्रत्ययों का अधिकारार्थ है।

5.1.6
शरीर अवयवात् यत्

IAST śarīrāvayavād yat

प्रकार विधि

सार शरीर के अवयववाची शब्दों से यत्-प्रत्यय होता है।

5.1.7
खलयवमाषतिलवृषब्रह्मणः च

IAST khala-yava-māṣa-tila-vṛṣa-brahmaṇaḥ ca

प्रकार विधि

सार खल, यव, माष, तिल, वृष और ब्रह्मन् से भी (यत् आदि) प्रत्यय होता है।

5.1.8
अज अविभ्यां थ्यन्

IAST aja-avibhyāṃ thyan

प्रकार विधि

सार अज और अवि से थ्यन्-प्रत्यय होता है।

5.1.9
आत्मन् विश्वजनभोग उत्तरपदात् खः

IAST ātman-viśvajana-bhoga-uttarapadāt khaḥ

प्रकार विधि

सार आत्मन् से तथा विश्वजन/भोग-उत्तरपद वाले समास से ख-प्रत्यय होता है।

5.1.10
सर्वपुरुषाभ्यां णढञौ

IAST sarva-puruṣābhyāṃ ṇa-ḍhañau

प्रकार विधि

सार सर्व से ण और पुरुष से ढञ् होता है।

5.1.11
माणवचरकाभ्यां खञ्

IAST māṇava-carakābhyāṃ khañ

प्रकार विधि

सार माणव और चरक से खञ्-प्रत्यय होता है।

5.1.12
तदर्थं विकृतेः प्रकृतौ

IAST tadarthaṃ vikṛteḥ prakṛtau

प्रकार विधि

सार विकृतिवाची शब्द से, प्रकृति (सामग्री) के अर्थ में ‘उसके लिये’ प्रत्यय होता है।

5.1.13
छदिष्उपधिबलेः ढञ्

IAST chadiṣ-upadhi-baleḥ ḍhañ

प्रकार विधि

सार छदिस्, उपधि और बलि से ढञ्-प्रत्यय होता है।

5.1.14
ऋषभोपानहोर्ञ्यः

IAST ṛṣabha-upānhoḥ ñaḥ

प्रकार विधि

सार ऋषभ और उपानह् से ञ्य-प्रत्यय होता है।

5.1.15
चर्मणः अञ्

IAST carmaṇaḥ añ

प्रकार विधि

सार चर्मन् से अञ्-प्रत्यय होता है।

5.1.16
तद् अस्य तद् अस्मिन् स्यात् इति

IAST tad asya tad asmin syād iti

प्रकार अधिकार

सार ‘यह इसका है’ अथवा ‘यह इसमें हो’ — यह अर्थ-अधिकार आगे के प्रत्ययों के लिये है।

5.1.17
परिखायाः ढञ्

IAST parikhāyāḥ ḍhañ

प्रकार विधि

सार परिखा से ढञ्-प्रत्यय होता है।

5.1.18
प्राक् वतेः ठञ्

IAST prāk vateḥ ṭhañ

प्रकार अधिकार

सार वति-सूत्र से पूर्व तक ठञ्-प्रत्यय का अधिकार चलता है।

5.1.19
आ अर्हात् अगोपुच्छसङ्ख्यापरिमाणात् ठक्

IAST ā arhāt a-gopuccha-saṅkhyā-parimāṇāt ṭhak

प्रकार अधिकार

सार अर्ह तक ठक् का अधिकार है, गोपुच्छ-सङ्ख्या-परिमाण को छोड़कर।

5.1.20
असमासे निष्क आदिभ्यः

IAST asamāse niṣkādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार समास में न होने पर निष्कादि शब्दों से (ठक्) प्रत्यय होता है।

5.1.21
शतात् च ठन्यतौ अशते

IAST śatāt ca ṭhan-yatau aśate

प्रकार विधि

सार शत से ठन् और यत् होते हैं, जब अर्थ मात्र ‘शत’ न हो।

5.1.22
सङ्ख्यायाः अति शद् अन्तायाः कन्

IAST saṅkhyāyā ati-śad-antāyāḥ kan

प्रकार विधि

सार अति या शत् पर समाप्त होने वाली संख्या से कन्-प्रत्यय होता है।

5.1.23
वतो: इट् वा

IAST vateḥ iṭ vā

प्रकार विधि

सार वति-प्रत्यय के साथ इट् का आगम वैकल्पिक है।

5.1.24
विंशतित्रिंशद्भ्यां ड्वुन् असंज्ञायाम्

IAST viṃśati-triṃśadbhyāṃ ḍvun asaṃjñāyām

प्रकार विधि

सार विंशति और त्रिंशत् से असंज्ञा में ड्वुन्-प्रत्यय होता है।

5.1.25
कंसात् टिठन्

IAST kaṃsāt ṭiṭhan

प्रकार विधि

सार कंस से टिठन्-प्रत्यय होता है।

5.1.26
शूर्पाद् अञ् अन्यतरस्याम्

IAST śūrpād añ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार तदर्हति-अर्थ में शूर्प-प्रकृति से वैकल्पिक रूप से अञ् प्रत्यय होता है।

5.1.27
शतमानविंशतिकसहस्रवसनात् अण्

IAST śatamānaviṃśatikasahasravasanād aṇ

प्रकार विधि

सार तदर्हति-अर्थ में शतमान, विंशतिका, सहस्र और वसन से अण् प्रत्यय होता है।

5.1.28
अधि अर्धपूर्वद्विगोर्लुक् आंज्ञा- आं

IAST adhyardhapūrvadvigor lug asaṃjñāyām

प्रकार विधि

सार अध्यर्ध-पूर्व या पूर्व-द्विगु प्रकृति पर (पूर्वोक्त तद्धित का) लुक् होता है, संज्ञा में नहीं।

5.1.29
विभासा कार्षापणसहस्राभ्यां

IAST vibhāṣā kārṣāpaṇasahasrābhyām

प्रकार विधि

सार कार्षापण और सहस्र से (अध्यर्धपूर्व/द्विगु में) उक्त लुक् विकल्प से होता है।

5.1.30
द्वित्रिपूर्वात् निष्कात्

IAST dvitripūrvān niṣkāt

प्रकार विधि

सार द्वि- या त्रि-पूर्व निष्क से (अध्यर्धपूर्व/द्विगु-लुक् की रीति) लुक् होता है।

5.1.31
बिस्तात् च

IAST bistāc ca

प्रकार विधि

सार बिस्त से भी (द्वि/त्रि-पूर्व आदि में) वही लुक्-व्यवस्था लागू होती है।

5.1.32
विंशतिकात् खः

IAST viṃśatikāt khaḥ

प्रकार विधि

सार तदर्हति-अर्थ में विंशतिका से ख प्रत्यय होता है।

5.1.33
खार्याः ईकन्

IAST khāryā īkan

प्रकार विधि

सार तदर्हति-अर्थ में खारी से ईकन् प्रत्यय होता है।

5.1.34
पणपादमाषशतात् अत्

IAST paṇapādamāṣaśatād at

प्रकार विधि

सार तदर्हति-अर्थ में पण, पाद, माष और शत से अत् प्रत्यय होता है।

5.1.35
शाणात् वा

IAST śāṇād vā

प्रकार विधि

सार शाण से वह अत् वैकल्पिक रूप से होता है।

5.1.36
द्वित्रिपूर्वात् अण् च

IAST dvitripūrvād aṇ ca

प्रकार विधि

सार द्वि- या त्रि-पूर्व (उक्त परिमाणों) से अण् भी होता है।

5.1.37
तेन क्रीतं

IAST tena krītam

प्रकार अधिकार

सार «उससे क्रीत»—इस अर्थ का अधिकार; आगे के तद्धित इसी अर्थ में लगेंगे।

5.1.38
तस्य निमित्तं संयोग उतातौ

IAST tasya nimittam saṃyogotpātau

प्रकार विधि

सार संयोग और उत्पात के प्रसंग में ‘उसका निमित्त’ इस अर्थ में (पूर्वानुवृत्त) तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.1.39
गोद्व्यचः असंख्यापरिआण अश्व देर्यत्

IAST godvyaco 'saṃkhyaparimāṇāśvāder yat

प्रकार विधि

सार गो से, संख्या-परिमाण से भिन्न द्व्यच् प्रातिपदिकों से तथा अश्वादि से (उक्त निमित्तार्थ में) यत् होता है।

5.1.40
पुत्रात् छ च

IAST putrāc cha ca

प्रकार विधि

सार पुत्र से छ भी होता है (और यत् भी अनुवृत्त रहता है)।

5.1.41
सर्वभूमिपृथिवी भ्यां अणञौ

IAST sarvabhūmipṛthivībhyām aṇañau

प्रकार विधि

सार सर्वभूमि और पृथिवी से क्रमशः अण् और अञ् प्रत्यय होते हैं।

5.1.42
तस्य ईश्वरः

IAST tasyeśvaraḥ

प्रकार अधिकार

सार (पूर्वोक्त प्रत्यय) ‘उसका ईश्वर/स्वामी’ इस अर्थ में प्रवृत्त होते हैं।

5.1.43
तत्र विदित इति च

IAST tatra vidita iti ca

प्रकार अधिकार

सार “वहाँ विदित” — यह अर्थ भी (उक्त तद्धित में) गृहीत होता है।

5.1.44
लोकसर्वलोकात् ठञ्

IAST lokasarvalokāṭ ṭhañ

प्रकार विधि

सार लोक और सर्वलोक से (उक्त अर्थों में) ठञ् होता है।

5.1.45
तस्य वापः

IAST tasya vāpaḥ

प्रकार अधिकार

सार “उसका वाप (वपन/बोया क्षेत्र)” — इस अर्थ में तद्धित होता है।

5.1.46
पात्रात्ष्ठन्

IAST pātrāt ṣṭhan

प्रकार विधि

सार पात्र से (उक्त वापार्थ में) ष्ठन् होता है।

5.1.47
तद् अस्मिन् वृद्धि आयलाभशुल्क उपदा दीअते

IAST tad asmin vṛddhyāyalābhaśulkopadā dīyate

प्रकार अधिकार

सार ‘वृद्धि, आय, लाभ, शुल्क या उपदा के रूप में इसमें वह दिया जाता है’—इस अर्थ में (प्रत्यय) होता है।

5.1.48
पूरण अर्धात् ठन्

IAST pūraṇārdhāṭ ṭhan

प्रकार विधि

सार पूरणवाची शब्दों और अर्ध से (उक्त अर्थ में) ठन् होता है।

5.1.49
भागात् यत् च

IAST bhāgād yat ca

प्रकार विधि

सार भाग से यत् प्रत्यय भी होता है।

5.1.50
तद् हरतिवहति आवहति भारात् वंश आदिभ्यः

IAST tad dharati vahaty āvahati bhārād vaṃśādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार भार से और वंशादिगण से ‘वह ढोता है / वहन करता है / लाता है’ इस अर्थ में (तद्धित-प्रत्यय) होता है।

5.1.51
वस्नद्रव्याभ्यां ठंकनौ

IAST vasnadravyābhyāṃ ṭhakanau

प्रकार विधि

सार वस्न और द्रव्य शब्दों से क्रमशः ठक् और ठन् तद्धित होते हैं (मूल्य/द्रव्य-सम्बद्ध क्रीतार्थ में)।

5.1.52
सम्भवति अवहरतिपचै

IAST sambhavaty avaharati-pacai

प्रकार विधि

सार जिस पात्र में वस्तु समा सके, निकाली जा सके या पकाई जा सके—उस अर्थ में (पूर्वानुवृत्त) तद्धित होता है।

5.1.53
आढक आचितपात्रात् खः न्यतरयां

IAST āḍhaka ācita-pātrāt khaḥ nyatarayām

प्रकार विधि

सार आढक, आचित और पात्र से विकल्प से ख प्रत्यय होता है।

5.1.54
द्विगोः ष्ठन् च

IAST dvigoḥ ṣṭhan ca

प्रकार विधि

सार द्विगु समास से ष्ठन् भी होता है (परिमाण/मापार्थ में)।

5.1.55
कुलिजात् लुक्खौ च

IAST kulijāt luk-khau ca

प्रकार विधि

सार कुलिजा शब्द से लुक् और ख—दोनों विकल्प से—होते हैं।

5.1.56
सः अस्य अंशवस्नभृतयः

IAST saḥ asya aṃśa-vasna-bhṛtayaḥ

प्रकार विधि

सार ‘यह इसका अंश/मूल्य (वस्न)/भृति है’—इन अर्थों में तद्धित होता है।

5.1.57
तद् अस्य परिमाणं

IAST tad asya parimāṇam

प्रकार विधि

सार ‘यह इसका परिमाण है’—इस अर्थ में तद्धित होता है।

5.1.58
संख्यायाः संज्ञासंघसूत्राध्यय्नेषु

IAST saṃkhyāyāḥ saṃjñā-saṃgha-sūtrādhyayaneṣu

प्रकार विधि

सार संख्यावाची शब्द से संज्ञा, संघ, सूत्र और अध्ययन—इन अर्थों में तद्धित होता है।

5.1.59
पङ्क्तिविंशतित्रिंशत्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तति अशीतिनवतिशतं

IAST paṅkti-viṃśati-triṃśat-catvāriṃśat-pañcāśat-ṣaṣṭi-saptaty-aśīti-navati-śatam

प्रकार विधि

सार पङ्क्ति, विंशति, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, षष्टि, सप्तति, अशीति, नवति और शत—इन संख्याशब्दों से (उक्त अर्थों में) तद्धित होता है।

5.1.60
पञ्चत् दशतौ वर्गे वा

IAST pañcat daśatau varge vā

प्रकार विधि

सार पञ्चत् और दशत् से वर्ग अर्थ में विकल्प से (उक्त) प्रत्यय होता है।

5.1.61
सप्तनः अञ् छन्दसि

IAST saptanaḥ añ chandasi

प्रकार विधि

सार सप्तन् से छन्दस् में अञ् प्रत्यय होता है।

5.1.62
त्रिंशत् चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणे संज्ञा- आं डण्

IAST triṃśat catvāriṃśator brāhmaṇe saṃjñāyām ḍaṇ

प्रकार विधि

सार त्रिंशत् और चत्वारिंशत् से ब्राह्मण में संज्ञा अर्थ में डण् होता है।

5.1.63
तद् अर्हति

IAST tad arhati

प्रकार अधिकार

सार ‘वह उसके योग्य है/उसे अर्हता है’—इस अर्थ का अधिकार आगे के तद्धित-विधान पर रहता है।

5.1.64
छेद आदिभ्यः नित्यं

IAST cheda ādibhyaḥ nityam

प्रकार विधि

सार छेदादिगण से (तदर्हति अर्थ में) नित्य तद्धित होता है।

5.1.65
शीर्षच्छेदात् यत् च

IAST śīrṣacchedāt yat ca

प्रकार विधि

सार शीर्षच्छेद से यत् भी होता है (तदर्हति अर्थ में)।

5.1.66
दण्ड आदिभ्यः

IAST daṇḍa ādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार दण्डादिगण से (तदर्हति अर्थ में) तद्धित होता है।

5.1.67
छन्दसि च

IAST chandasi ca

प्रकार विधि

सार छन्दस् में भी (उक्त तदर्हति-तद्धित) होता है।

5.1.68
पात्रात् घन् च

IAST pātrāt ghan ca

प्रकार विधि

सार पात्र से घन् भी होता है (तदर्हति अर्थ में)।

5.1.69
कडङ्करदक्षिणात् छ च

IAST kaḍaṅkara-dakṣiṇāt cha ca

प्रकार विधि

सार कडङ्कर और दक्षिणा से छ भी होता है (तदर्हति अर्थ में)।

5.1.70
स्थालीबिलात्

IAST sthālī-bilāt

प्रकार विधि

सार स्थाली और बिल से (उक्त तदर्हति-तद्धित) होता है।

5.1.71
यज्ञ ऋत्विग्भ्यां घखञौ

IAST yajña ṛtvigbhyāṃ gha-khañau

प्रकार विधि

सार यज्ञ और ऋत्विज् से क्रमशः घ और खञ् होते हैं (तदर्हति अर्थ में)।

5.1.72
पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति

IAST pārāyaṇa-turāyaṇa-cāndrāyaṇaṃ vartayati

प्रकार विधि

सार पारायण, तुरायण और चान्द्रायण—इनका आचरण करने वाले अर्थ में तद्धित होता है।

5.1.73
संशयं आपन्नः

IAST saṃśayaṃ āpannaḥ

प्रकार विधि

सार ‘संशय को प्राप्त’ अर्थ में (संशय से) तद्धित होता है।

5.1.74
योजनं गच्छति

IAST yojanaṃ gacchati

प्रकार विधि

सार ‘योजन भर जाता है’ अर्थ में (योजन से) तद्धित होता है।

5.1.75
पथः ष्कन्

IAST pathaḥ ṣkan

प्रकार विधि

सार पथ् (पथिन्) से ष्कन् प्रत्यय होता है (पथगामी/यात्री अर्थ में)।

5.1.76
पन्थो ण नित्यं

IAST pantho ṇa nityam

प्रकार विधि

सार पन्थन्-शब्द से (आहृत-अर्थ में) ण-प्रत्यय नित्य होता है।

5.1.77
उत्तरपथेन आहृतं च

IAST uttarapathenāhṛtaṃ ca

प्रकार विधि

सार उत्तरपथ से लाई गई वस्तु में भी (पन्थन्-वत्) ण-प्रत्यय होता है।

5.1.78
कालात्

IAST kālāt

प्रकार अधिकार

सार कालवाची शब्दों से आगे कहे जाने वाले तद्धित-प्रत्ययों का अधिकार आरम्भ होता है।

5.1.79
तेन निर्वृत्तं

IAST tena nirvṛttam

प्रकार विधि

सार जिस काल से कार्य सिद्ध/निष्पन्न हो, उस कालवाची शब्द से (तद्धित) विधान होता है।

5.1.80
तं अधीष्टः भृतः हूतः हावी

IAST tamadhīṣṭo bhṛto bhūto bhāvī

प्रकार विधि

सार उस काल के लिए नियुक्त/भृत, उस काल तक रहा हुआ, अथवा होने वाला—इन अर्थों में भी कालवाची से तद्धित होता है।

5.1.81
मासात् वयसि यत्खौ

IAST māsād vayasi yatkha

प्रकार विधि

सार मास-शब्द से आयु/वयस्-अर्थ में यत् और ख—ये दो प्रत्यय होते हैं।

5.1.82
द्विगोर्यप्

IAST dvigoryap

प्रकार विधि

सार मास-विषयक द्विगु-समास से (वयस्-अर्थ में) यप्-प्रत्यय होता है।

5.1.83
षण्मासात् ण्यत् च

IAST ṣaṇmāsāt ṇyat ca

प्रकार विधि

सार षण्मास-शब्द से (वयस्-अर्थ में) ण्यत्-प्रत्यय भी होता है।

5.1.84
अवयसि ठन् च

IAST avayasi ṭhan ca

प्रकार विधि

सार वयस्-भिन्न अर्थ में (मास/द्विगु आदि से) ठन्-प्रत्यय भी होता है।

5.1.85
समायाः खः

IAST samāyāḥ khaḥ

प्रकार विधि

सार समा (वर्ष)-शब्द से ख-प्रत्यय होता है।

5.1.86
द्विगोर्वा

IAST dvigorvā

प्रकार विधि

सार समा-विषयक द्विगु से (ख-प्रत्यय) विकल्प से होता है।

5.1.87
रात्र्यहस्संवत्सराच्च

IAST rātryahaḥsaṃvatsarāc ca

प्रकार विधि

सार रात्रि, अहन् और संवत्सर—इनसे भी (समा-वत् ख आदि) तद्धित होता है।

5.1.88
वर्षात् लुक् च

IAST varṣāt luk ca

प्रकार विधि

सार वर्ष-शब्द से (पूर्वोक्त कालवाचक) तद्धित-प्रत्यय का लुक् भी होता है।

5.1.89
चित्तवति नित्यं

IAST cittavati nityam

प्रकार नियम

सार चित्तवत् (उस काल के प्रति संकल्पवाले) अर्थ में वह लुक् नित्य होता है।

5.1.90
षष्टिकाः षष्टिरात्रेण पच्यन्ते

IAST ṣaṣṭikāḥ ṣaṣṭirātreṇa pacyante

प्रकार विधि

सार षष्टिरात्र में पकने वाले धान्य के लिए «षष्टिकाः» यह निपातित रूप सिखाया जाता है।

5.1.91
वत्सर अन्त् आत् छः छन्दसि

IAST vatsarāntāt chaḥ chandasi

प्रकार विधि

सार वत्सर-अन्त शब्दों से छन्दस् में छ-प्रत्यय होता है।

5.1.92
सम्परि- ऊर्वात् ख च

IAST samparipūrvāt kha ca

प्रकार विधि

सार सम्- या परि-पूर्व पद से ख-प्रत्यय भी होता है।

5.1.93
तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुअरं

IAST tena parijayyalabhyakāryasukaram

प्रकार विधि

सार तेन (करण) के योग में परिजय्य, लभ्य, कार्य और सुकर अर्थ में तद्धित होता है।

5.1.94
तद् अस्य ब्रह्मचर्यं

IAST tad asya brahmacaryam

प्रकार विधि

सार पूर्वोक्त तद्धित-प्रत्यय उस अर्थ में भी होते हैं जब ‘यह (काल/वृत्ति) उसका ब्रह्मचर्य’ अभिप्रेत हो।

5.1.95
तस्य च दक्षिणा यज्ञ आख्येभ्यः

IAST tasya ca dakṣiṇā yajñākhyebhyaḥ

प्रकार विधि

सार यज्ञ-वाचक शब्दों से ‘उस (यज्ञ) की दक्षिणा’ अर्थ में भी वे तद्धित-प्रत्यय होते हैं।

5.1.96
तत्र च दीयते कार्यं भववत्

IAST tatra ca dīyate kāryaṃ bhavavat

प्रकार विधि

सार यज्ञ-नामों से ‘वहाँ जो दिया जाता है’ तथा ‘वहाँ कर्तव्य कार्य’ अर्थ में भी, भववत्-विधि के समान, तद्धित होते हैं।

5.1.97
व्युष्ट आदिभ्यः अण्

IAST vyuṣṭādibhyo 'ṇ

प्रकार विधि

सार व्युष्ट आदि गण के शब्दों से (पूर्व-अर्थ-प्रवाह में) अण् प्रत्यय होता है।

5.1.98
तेनयथाकथाचहस्ताह्यां णयतौ

IAST tena yathākathāca hastābhyāṃ ṇayatoḥ

प्रकार विधि

सार ‘तेन यथाकथाच’ (उससे किसी प्रकार) अर्थ में हस्त से णयत् और तो प्रत्यय होते हैं।

5.1.99
सम्पादिनि

IAST sampādini

प्रकार विधि

सार संपादिन् (सिद्ध/संपन्न करने वाला) अर्थ में भी (पूर्वोक्त णयत्-तो) होते हैं।

5.1.100
कर्मवेषाद्यत्

IAST karmaveṣād yat

प्रकार विधि

सार कर्म और वेष शब्दों से (पूर्वोक्त अर्थों में) यत् प्रत्यय होता है।

5.1.101
तस्मै प्रभवति संताप आदिभ्यः

IAST tasmai prabhavati saṃtāpādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार संताप-आदि शब्दों से ‘उसके लिए सक्षम/प्रभवति’ अर्थ में तद्धित (ठक्) होता है।

5.1.102
योगात् यत् च

IAST yogāc ca yat

प्रकार विधि

सार योग से भी उसी ‘तस्मै प्रभवति’ अर्थ में यत् होता है (योग्यम्)।

5.1.103
कर्मणः उकञ्

IAST karmaṇa ukañ

प्रकार विधि

सार कर्मन् से उकञ् प्रत्यय होता है (कर्मुक — कार्य/कर्म के योग्य)।

5.1.104
समयः तद् अस्य प्राप्तं

IAST samayas tad asya prāptam

प्रकार विधि

सार समय से ‘वह उसके लिए प्राप्त हो चुका’ अर्थ में तद्धित विधान है।

5.1.105
ऋतोरण्

IAST ṛtor aṇ

प्रकार विधि

सार ऋतु से अण् होता है (‘ऋतु उसके लिए प्राप्त’ अर्थ में — आर्तव आदि)।

5.1.106
छन्दसि घः

IAST chandasi ghaḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में उसी प्राप्त्यर्थ में घ प्रत्यय होता है।

5.1.107
कालात् यत्

IAST kālād yat

प्रकार विधि

सार काल से यत् होता है (‘समय प्राप्त’ अर्थ में — काल्यम्)।

5.1.108
प्रकृष्- टे ठञ्

IAST prakṛṣṭe ṭhañ

प्रकार विधि

सार ‘प्रकृष्ट/उत्कृष्ट’ अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है।

5.1.109
प्रयोजनं

IAST prayojanam

प्रकार अधिकार

सार ‘प्रयोजन’ (जिसके निमित्त/साधन) अर्थ में तद्धित-विधान का अधिकार है।

5.1.110
विशाखा अषाढात् अण् मन्थदण्डयः

IAST viśākhāṣāḍhābhyām aṇ manthadaṇḍayoḥ

प्रकार विधि

सार विशाखा और अषाढा से क्रमशः मन्थ तथा दण्ड अर्थ में अण् होता है (वैशाखः, आषाढः)।

5.1.111
अनुप्रवचन आदिभ्यः छः

IAST anupravacanādibhyaś chaḥ

प्रकार विधि

सार अनुप्रवचन-आदि शब्दों से छ प्रत्यय होता है।

5.1.112
संआपणात् सपूर्वपदात्

IAST saṃjñāpaṇāt sapūrvapadāt

प्रकार विधि

सार पूर्वपदयुक्त संज्ञापण से (छ) प्रत्यय होता है।

5.1.113
ऐकागारिकट् चौरे

IAST aikāgārikaṭ caure

प्रकार विधि

सार एकागार से चोर अर्थ में ऐकागारिक (ट्-युक्त) रूप सिद्ध होता है।

5.1.114
आकालिकट् आद्यन्तवचने

IAST ākālikaṭ ādyantavacane

प्रकार विधि

सार आद्यन्तवचन (आरम्भ से अन्त तक/निरन्तर) अर्थ में आकालिक (ट्-युक्त) रूप होता है।

5.1.115
तेन तुल्यं क्रिया चेद् वतिः

IAST tena tulyaṃ kriyā ced vatiḥ

प्रकार विधि

सार क्रिया की समानता अभिप्रेत हो तो ‘तेन तुल्यम्’ अर्थ में वति होता है।

5.1.116
तत्र तस्य इव

IAST tatra tasyeva

प्रकार विधि

सार ‘वहाँ/उसके इव’ अर्थ में भी वति प्रत्यय होता है।

5.1.117
तद् अर्हं

IAST tad arham

प्रकार अधिकार

सार ‘उसके अर्ह/योग्य’ अर्थ में तद्धित-विधान का अधिकार है।

5.1.118
उपसर्गात् छन्दसि धात्वर्थे

IAST upasargāc chandasi dhātvar the

प्रकार विधि

सार छन्दस् में उपसर्ग से धातु-अर्थ (तदर्ह) में तद्धित होता है।

5.1.119
तस्य भावः त्वतलु

IAST tasya bhāvas tvatalau

प्रकार विधि

सार ‘उसका भाव’ अर्थ में त्व और तल् प्रत्यय होते हैं।

5.1.120
आ च त्वात्

IAST ā ca tvāt

प्रकार अधिकार

सार भावार्थ में अ भी होता है, तथा यह विधान-अधिकार त्व पर्यन्त चलता है।

5.1.121
न नञ्पूर्वात् तत्पुरुषात् अचतुरसंगतलवणवटयुधकतरसलसेभ्यः

IAST na nañpūrvāt tatpuruṣād acaturasaṃgatalavaṇavaṭayudhakatarasalasebhyaḥ

प्रकार विधि

सार नञ्-पूर्व तत्पुरुष से त्व/तल् नहीं होते — अचतुर, असंगत, अलवण, अवट, अयुध, अकतर, असलस को छोड़कर।

5.1.122
पृथु आदिभ्यः मनिच् आ

IAST pṛthvādibhyaḥ manic ā

प्रकार विधि

सार पृथु-आदि से (विकल्प से) मनिच् भी होता है।

5.1.123
वर्णदृढआदिह्यः ष्यञ् च

IAST varṇadṛḍhādibhyaḥ ṣyañ ca

प्रकार विधि

सार वर्ण, दृढ आदि से भाव में ष्यञ् भी होता है।

5.1.124
गुणवचनब्राह्मण आदिह्यः कर्मणि च

IAST guṇavacanabrāhmaṇādibhyaḥ karmaṇi ca

प्रकार विधि

सार गुणवाचक और ब्राह्मण-आदि से कर्म अर्थ में भी ष्यञ् होता है।

5.1.125
स्तेणात् यत्नलोपः च

IAST stenād yat nalopaś ca

प्रकार विधि

सार स्तेन से यत् होता है और न् का लोप — स्तेयम्।

5.1.126
सख्युर्यः

IAST sakhyur yaḥ

प्रकार विधि

सार सखि शब्द से (भाव/तस्य-भाव आदि अर्थ में) ‘य’ तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.1.127
कपि- ज्ञात्योर्ढक्

IAST kapi-jñātyor ḍhak

प्रकार विधि

सार कपि और ज्ञाति शब्दों से ‘ढक्’ प्रत्यय होता है।

5.1.128
पति अन्तपुरोहित आदिह्यः अक्

IAST paty-anta-purohitādibhyo yak

प्रकार विधि

सार पति-अन्त शब्दों तथा पुरोहितादि-गण से ‘यक्’ प्रत्यय होता है।

5.1.129
प्राणभृत् जातिवयोवचन उद्गातृ आदिह्यः अञ्

IAST prāṇabhṛj-jāti-vayovacanodgātrādibhyo ’ñ

प्रकार विधि

सार प्राणभृत्, जाति, आयु/वयो-वाचक शब्दों तथा उद्गात्रादि-गण से ‘अञ्’ प्रत्यय होता है।

5.1.130
हायनान्तयुवादिभ्योऽण्

IAST hāyananta-yuvādibhyo ’ṇ

प्रकार विधि

सार हायन-अन्त शब्दों और युवादि-गण से ‘अण्’ प्रत्यय होता है।

5.1.131
इक् अन्तात् च लघुपूर्वात्

IAST igantāc ca laghupūrvāt

प्रकार विधि

सार लघु-पूर्व वाले इक्-अन्त शब्दों से भी (पूर्वोक्त) ‘अण्’ प्रत्यय होता है।

5.1.132
य उपधात् गुरु पोत्तंआत् उञ्

IAST yopadhād gurumato ’nṛcchaḥ

प्रकार विधि

सार य-उपध वाले गुरुमान् शब्दों से, ऋच् को छोड़कर, ‘अण्’ प्रत्यय होता है।

5.1.133
द्वंद्वमनो- ज्ञ आदिह्यस

IAST dvandva-manojñādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व-समास तथा मनोज्ञादि-गण से भी ‘अण्’ प्रत्यय होता है।

5.1.134
गोत्रचरणात् श्लाघा अत्याकारतद्वेतेषु

IAST gotra-caraṇāc chlāghātyākāra-tadaveteṣu

प्रकार विधि

सार गोत्र- और चरण-वाचक शब्दों से श्लाघा, अत्याकार तथा तदवेत अर्थों में (तद्धित-)प्रत्यय होता है।

5.1.135
होत्राभ्यः छः

IAST hotrābhyaś chaḥ

प्रकार विधि

सार होत्रा-वाचक शब्दों से ‘छ’ प्रत्यय होता है।

5.1.136
ब्रह्मणः त्वः

IAST brahmaṇas tvaḥ

प्रकार विधि

सार ब्रह्मन् शब्द से ‘त्व’ प्रत्यय होता है।

अध्याय 5 · पाद 2 (140 सूत्र)

5.2.1
धान्याणां भवने क्षेत्रे खञ्

IAST dhānyānāṃ bhavane kṣetre khañ

प्रकार विधि

सार धान्यवाचक प्रातिपदिक से उसके उत्पन्न/उपयुक्त क्षेत्रार्थ में खञ् प्रत्यय होता है।

5.2.2
व्रीहिशाल्योर्ढक्

IAST vrīhiśālyor ḍhak

प्रकार विधि

सार व्रीहि और शालि से पूर्वोक्त क्षेत्रार्थ में ढक् (खञ् के स्थान पर) होता है।

5.2.3
यवयवकषष्टि- आत् अत्

IAST yavayavakaṣaṣṭikāt

प्रकार विधि

सार यव, यवक और षष्टिक से पूर्वोक्त क्षेत्रार्थ में अत् प्रत्यय होता है।

5.2.4
विभाषा तिलमाष उमाभङ्गाअणु ह्यः

IAST vibhāṣā tilamāṣomābhaṅgāṇubhyaḥ

प्रकार विधि

सार तिल, माष, उमा, भङ्गा और अणु से पूर्वोक्त क्षेत्रार्थ में अत् वैकल्पिक है।

5.2.5
सर्वचर्मणः कृतः खखञौ

IAST sarvacarmaṇaḥ kṛtaḥ khakhañau

प्रकार विधि

सार सर्वचर्मन् से «कृत्त/निर्मित» अर्थ में ख और खञ् प्रत्यय होते हैं।

5.2.6
यथामुख संमुखस्य दर्शनः खः

IAST yathāmukhasaṃmukhasya darśanaḥ khaḥ

प्रकार विधि

सार यथामुख और संमुख से «दर्शन/देखने योग्य» अर्थ में ख प्रत्यय होता है।

5.2.7
तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रं व्याप्नोति

IAST tatsarvādeḥ pathyaṅgakarmapatrapātraṃ vyāpnoti

प्रकार विधि

सार तत्-सर्व-आदि तथा पथ्य, अङ्ग, कर्म, पत्र, पात्र से «उसे व्याप्त करता है» अर्थ में ख होता है।

5.2.8
आप्रपदं प्राप्नोति

IAST āprapadaṃ prāpnoti

प्रकार विधि

सार आप्रपद से «प्रपद (पैर के अग्र) तक पहुँचता है» अर्थ में ख होता है।

5.2.9
अनुपदसर्वान्न अय अनयं बद्धाभक्षयतिनेयेषु

IAST anupadasarvānnāyānayaṃbaddhābhakṣayatīneyeṣu

प्रकार विधि

सार अनुपद, सर्वान्न, आय, अनय, बद्ध, अभक्षयत् और इनेय में निर्दिष्ट अर्थों में ख होता है।

5.2.10
परोवरपरम्परपुत्रपौत्रं अनुभवति

IAST parovaraparamparaputrapautram anubhavati

प्रकार विधि

सार परोवर, परम्पर और पुत्रपौत्र से «अनुभव करता है» अर्थ में ख होता है।

5.2.11
अवारपार अत्यन्त अनुआमं गांई

IAST avārapārātyantānukāmaṃ gāmī

प्रकार विधि

सार अवारपार, अत्यन्त और आनुकाम से «गामी/गमनशील» अर्थ में ख होता है।

5.2.12
समा- ंसमा- ं विजायते

IAST samāṃ samāṃ vijāyate

प्रकार विधि

सार «प्रतिवर्ष/वर्ष-वर्ष उत्पन्न होता है» अर्थ में (समा-सम्बन्ध में) ख होता है।

5.2.13
अद्यश्वीणा अवष्टब्धे

IAST adyaśvīnāvaṣṭabdhe

प्रकार विधि

सार अद्यश्वीन रूप «अवष्टब्ध/अद्य-श्वः निश्चित» अर्थ में निपातित/सिद्ध माना जाता है।

5.2.14
आगवीनः

IAST āgavīnaḥ

प्रकार विधि

सार आगवीन शब्द (गो-सम्बद्ध गमन/कालादि अर्थ में) निपातित रूप से सिद्ध है।

5.2.15
अनुगु अलंगांई

IAST anugvalaṃgāmī

प्रकार विधि

सार अनुगु और अलंगामी रूप निपातित/सिद्ध माने जाते हैं।

5.2.16
अध्वनः यत्खौ

IAST adhvano yatkhaú

प्रकार विधि

सार अध्वन् से यत् और ख प्रत्यय होते हैं।

5.2.17
अभ्यमित्रात् छ च

IAST abhyamitrāc cha ca

प्रकार विधि

सार अभ्यमित्र से छ भी होता है (यत्/ख के अतिरिक्त)।

5.2.18
गोष्ठात् खञ् भूतपूर्वे

IAST goṣṭhāt khañ bhūtapūrve

प्रकार विधि

सार गोष्ठ से «भूतपूर्व/पूर्वकालिक» अर्थ में खञ् होता है।

5.2.19
अश्वस्य एक अह गमः

IAST aśvasyāikāhagamaḥ

प्रकार विधि

सार अश्व के एकाह-गमन (एक दिन की यात्रा-माप) अर्थ में तद्धित-विधान है।

5.2.20
शाल्- ईनकौप्- ईने अहृष्- टाआर्ययोः

IAST śālīnakau pīne 'hṛṣṭāryayoḥ

प्रकार विधि

सार शालीन और कौपीन क्रमशः अहृष्ट (अगर्वित) तथा अनार्य अर्थ में निपातित/सिद्ध हैं।

5.2.21
व्रातेन जीवति

IAST vrātena jīvati

प्रकार विधि

सार व्रात से «व्रात से जीविका करता है» अर्थ में तद्धित (खञ्-परम्परा) होता है।

5.2.22
साप्तपद्- ईनं सख्यं

IAST sāptapadīnaṃ sakhyam

प्रकार विधि

सार साप्तपदीन रूप «सख्य/सप्तपद-मैत्री» अर्थ में निपातित/सिद्ध है।

5.2.23
हैयंगवीनं संज्ञाया

IAST haiyaṅgavīnaṃ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार हैयंगवीन शब्द संज्ञा में (ह्यः-दुग्ध-विकारादि अर्थ की रूढ़ि) सिद्ध है।

5.2.24
तस्य पाकमूले पीलु अदिकर्ण आदिह्यः कुणप् जाहचौ

IAST tasya pākamūle pīlvādikarṇādibhyaḥ kuṇapjāhacau

प्रकार विधि

सार पीलु-आदि और कर्ण-आदि से «उसका पाक/मूल» अर्थ में कुणप् और जाहच् होते हैं।

5.2.25
पक्षात् तिः

IAST pakṣāt tiḥ

प्रकार विधि

सार पक्ष से ति प्रत्यय होता है।

5.2.26
तेन वित्तः चुञ्चुप्चणपौ

IAST tena vittaḥ cuñcupcaṇapau

प्रकार विधि

सार जिस उपाय से जीविका/लाभ प्राप्त हो, उस अर्थ में चुञ्चुप् और चणप् प्रत्यय होते हैं (विद्याचुञ्चुः, विद्याचणः)।

5.2.27
विनञ्भ्यां नानाञौ नसह

IAST vinañbhyāṃ nānāñau nasaha

प्रकार विधि

सार वि और नञ् से नान् तथा आञ् प्रत्यय होते हैं (विना, नाना), और सह के साथ यह नहीं होता।

5.2.28
वेः शालच्शङ्कटचौ

IAST veḥ śālacśaṅkaṭacau

प्रकार विधि

सार वि से शालच् और शङ्कटच् प्रत्यय होते हैं (विशाल, विशङ्कट)।

5.2.29
सम्प्र उदः च कटच्

IAST sampra udaḥ ca kaṭac

प्रकार विधि

सार सम्, प्र और उद् से भी कटच् प्रत्यय होता है (संकट, प्रकट, उत्कट)।

5.2.30
अवात् कुटारच् च

IAST avāt kuṭārac ca

प्रकार विधि

सार अव से कटच् के साथ कुटारच् भी होता है (अवकट, अवकुटार)।

5.2.31
नते नासिकायाः संज्ञा- आं टीटच्नाटच्भ्राटचः

IAST nate nāsikāyāḥ saṃjñāyāṃ ṭīṭacnāṭacbhrāṭacaḥ

प्रकार विधि

सार नासिका के नत (टेढ़ी) होने पर संज्ञा में टीटच्, नाटच् और भ्राटच् प्रत्यय होते हैं (नटीट, ननाट, नभ्राट)।

5.2.32
नेर्बिडच्बिरीसचौ

IAST nerbiḍacbirīsacau

प्रकार विधि

सार नि से बिडच् और बिरीसच् प्रत्यय होते हैं (निबिड, निबिरीस)।

5.2.33
इनच्पिटच्चिकचि च

IAST inacpiṭaccikaci ca

प्रकार विधि

सार नि से इनच्, पिटच् और चिकच् भी होते हैं (निन, निपिट, निचिक)।

5.2.34
उप अधिभ्यां त्यकन् आसन्न आ- ऊ- ढयोः

IAST upādhibhyāṃ tyakann āsannārdhayoḥ

प्रकार विधि

सार उप और अधि से आसन्न तथा अर्ध अर्थ में त्यकन् प्रत्यय होता है (उपत्यका, अधित्यका)।

5.2.35
कर्मणि घटः अठच्

IAST karmaṇi ghaṭaḥ aṭhac

प्रकार विधि

सार कर्म अर्थ में वर्तमान घट् से अठच् प्रत्यय होता है (घटाट)।

5.2.36
तद् अस्य संजातंतारका आदिभ्यः इतच्

IAST tad asya saṃjātaṃ tārakādibhyaḥ itac

प्रकार विधि

सार «तद् अस्य संजातम्» अर्थ में तारकादिगण से इतच् प्रत्यय होता है (तारकित, पुष्पित)।

5.2.37
प्रमाणे द्वयसच्दघ्नच्मात्रचः

IAST pramāṇe dvayasacdaghnacmātracaḥ

प्रकार विधि

सार प्रमाण (परिमाण/माप) अर्थ में द्वयसच्, दघ्नच् और मात्रच् प्रत्यय होते हैं (ऊरुद्वयस, ऊरुदघ्न, ऊरुमात्र)।

5.2.38
पुरुषहस्तिभ्यां अण् च

IAST puruṣahastibhyām aṇ ca

प्रकार विधि

सार पुरुष और हस्तिन् से प्रमाण अर्थ में अण् भी होता है (पौरुष, हास्तिन)।

5.2.39
यद् तद् एतेह्यः परिआणे वतुप्

IAST yattadeteebhyaḥ parimāṇe vatup

प्रकार विधि

सार यद्, तद् और एतद् से परिमाण अर्थ में वतुप् प्रत्यय होता है (यावत्, तावत्, एतावत्)।

5.2.40
किम् इदम्भ्यां वः घः

IAST kimidambhyāṃ vo ghaḥ

प्रकार विधि

सार किम् और इदम् से वतुप् का व् घ् हो जाता है (कियत्, इयत्)।

5.2.41
किमः संख्यापरिमाणे डति च

IAST kimaḥ saṃkhyāparimāṇe ḍati ca

प्रकार विधि

सार किम् से संख्या और परिमाण अर्थ में डति भी होता है (कति)।

5.2.42
संख्यायाः अवयवे तयप्

IAST saṃkhyāyā avayave tayap

प्रकार विधि

सार संख्यावाची शब्द से अवयव (समूह/भाग) अर्थ में तयप् प्रत्यय होता है (पञ्चतय)।

5.2.43
द्वित्रिभ्यां तयय यच् वा

IAST dvitribhyāṃ tayasyayac vā

प्रकार विधि

सार द्वि और त्रि से तयप् के तय के स्थान पर विकल्प से यच् होता है (द्वय/द्वितय, त्रय/त्रितय)।

5.2.44
उभात् उदात्तः नित्यं

IAST ubhād udātto nityam

प्रकार विधि

सार उभ से यच् नित्य होता है और वह उदात्त होता है (उभय)।

5.2.45
तद् अस्मिन्न् अधिकं इति दश न्तात् डः

IAST tad asminn adhikam iti daśāntāḍ ḍaḥ

प्रकार विधि

सार «यह इसमें अधिक है» अर्थ में दश-अन्त से ड प्रत्यय होता है (एकादश आदि)।

5.2.46
शत् अन्त विंशते- च

IAST śadantād viṃśateś ca

प्रकार विधि

सार शत्-अन्त और विंशति से भी वही ड (अधिकार्थ) होता है (एकविंशति आदि)।

5.2.47
संख्यायाः गुणस्य निमाने मयट्

IAST saṃkhyāyā guṇasya nimāne mayaṭ

प्रकार विधि

सार संख्या से गुण के निमान (माप/भाग-मात्रा) अर्थ में मयट् प्रत्यय होता है (पञ्चमय)।

5.2.48
तस्य पूरणे डट्

IAST tasya pūraṇe ḍaṭ

प्रकार विधि

सार संख्या से पूरण (क्रमवाचक/पूर्णता) अर्थ में डट् प्रत्यय होता है (पञ्चम आदि)।

5.2.49
न अन्तात् असंख्या आदेर्मट्

IAST nāntād asaṃkhyāder maṭ

प्रकार विधि

सार न्-अन्त संख्या से, यदि आदि असंख्य न हो, पूरणार्थ में मट् होता है (पञ्चम)।

5.2.50
थट् च छन्दसि

IAST thaṭ ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पूरणार्थ थट् भी होता है (पञ्चथ आदि)।

5.2.51
षट्कतिकतिपयचतुरां थुक्

IAST ṣaṭkatikatipayacaturāṃ thuk

प्रकार विधि

सार षट्, कति, कतिपय और चतुर से (तीय-प्रकरण में) थुक् का आगम होता है (षष्ठ, कतिथ, कतिपथ, चतुर्थ)।

5.2.52
बहुपूगगणसंघस्य तिथुक्

IAST bahupūgagaṇasaṃghasya tithuk

प्रकार विधि

सार बहु, पूग, गण और संघ से तिथुक् का आगम होता है (बहुतिथ इत्यादि)।

5.2.53
वतोरिथुक्

IAST vatorithuk

प्रकार विधि

सार वतु-प्रत्ययान्त से इथुक् का आगम होता है (यतिथ, तावतिथ इत्यादि)।

5.2.54
द्वेः तीयः

IAST dveḥ tīyaḥ

प्रकार विधि

सार द्वि से तीय प्रत्यय होता है (द्वितीय)।

5.2.55
त्रेः सम्प्रसारणं

IAST treḥ samprasāraṇam

प्रकार विधि

सार त्रि से (तीय में) सम्प्रसारण होता है (तृतीय)।

5.2.56
विंशति आदिभ्यः तमट् अन्यतरस्यां

IAST viṃśatyādibhyas tamaḍ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार विंशति आदि से वैकल्पिक तमट् होता है (विंशतितम इत्यादि)।

5.2.57
नित्यं शत आदिमास अर्धमाससंअत्सरात् च

IAST nityaṃ śatādimāsārdhamāsasaṃvatsarāc ca

प्रकार विधि

सार शत आदि से तथा मास, अर्धमास और संवत्सर से नित्य तमट् होता है (शततम, मासतम इत्यादि)।

5.2.58
षष्टिआदेः च असंख्याआदेः

IAST ṣaṣṭyādeś cāsaṃkhyādeḥ

प्रकार विधि

सार षष्टि आदि से तथा असंख्या-आदि शब्दों से भी (तमट्) होता है।

5.2.59
मतौ छः सूक्तसाम्णः

IAST matau chaḥ sūktasāmṇaḥ

प्रकार विधि

सार मतुप्-अर्थ में सूक्त और सामन् से छ होता है (सूक्तीय, सामीय)।

5.2.60
अध्यायानुवाकयोर्लुक्

IAST adhyāyānuvākayor luk

प्रकार विधि

सार अध्याय और अनुवाक से (उस मत्वर्थ-प्रत्यय का) लुक् होता है।

5.2.61
विमुक्त आदिभ्यः अण्

IAST vimuktādibhyo 'ṇ

प्रकार विधि

सार विमुक्त आदि (गण) से अण् होता है (वैमुक्त इत्यादि)।

5.2.62
गोषद् आदिभ्यः वुन्

IAST goṣadādibhyo vun

प्रकार विधि

सार गोषद् आदि (गण) से वुन् होता है (गोषदक इत्यादि)।

5.2.63
तत्र कुशलः पथः

IAST tatra kuśalaḥ pathaḥ

प्रकार विधि

सार पथिन् से «उसमें कुशल» अर्थ में (तद्धित) होता है (पाथ)।

5.2.64
आकर्ष आदिभ्यः कन्

IAST ākarṣādibhyaḥ kan

प्रकार विधि

सार आकर्ष आदि से (तत्र कुशल अर्थ में) कन् होता है (आकर्षक इत्यादि)।

5.2.65
धनहिरण्यात् कामे

IAST dhanahiraṇyāt kāme

प्रकार विधि

सार धन और हिरण्य से काम (इच्छा) अर्थ में कन् होता है (धनक, हिरण्यक)।

5.2.66
स्व अङ्गेभ्यः प्रसिते

IAST svāṅgebhyaḥ prasite

प्रकार विधि

सार स्वाङ्गवाची शब्दों से प्रसित (आसक्त) अर्थ में कन् होता है।

5.2.67
उदरात् ठक् आद्यूने

IAST udarāṭ ṭhag ādyūne

प्रकार विधि

सार उदर से आद्यून (भुखमरी/लोलुप) अर्थ में ठक् होता है (औदरिक)।

5.2.68
सस्येन परिजातः

IAST sasyena parijātaḥ

प्रकार विधि

सार सस्य से परिजात अर्थ में कन् होता है (सस्यक)।

5.2.69
अंशं हार्- ई

IAST aṃśaṃ hārī

प्रकार विधि

सार अंश हरने वाले अर्थ में (अंश से) कन् होता है (अंशक)।

5.2.70
तन्त्रात् अचिर अपहृते

IAST tantrāvacirapahṛte

प्रकार विधि

सार तन्त्र से अचिर-अपहृत अर्थ में कन् होता है (तन्त्रक)।

5.2.71
ब्राह्मणक उष्णिके संज्ञा- आं

IAST brāhmaṇakoṣṇike saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में ब्राह्मणक और उष्णिक रूप सिद्ध होते हैं।

5.2.72
शीत उष्णभ्यां कारिणि

IAST śītoṣṇābhyāṃ kāriṇi

प्रकार विधि

सार शीत और उष्ण से कारिन् (उत्पादक) अर्थ में कन् होता है (शीतक, उष्णक)।

5.2.73
अधिकं

IAST adhikam

प्रकार विधि

सार अधिक अर्थ में कन् होता है (अधिकक)।

5.2.74
अनुक अभिक अभीअः कमिआ

IAST anukābhikābhīkaḥ kameḥ

प्रकार विधि

सार कम् धातु से अनुक, अभिक और अभीक रूप सिद्ध होते हैं।

5.2.75
पार्श्वेन अन्विच्छति

IAST pārśvenānvicchati

प्रकार विधि

सार पार्श्व से «पार्श्व से अन्वेषण करने वाला» अर्थ में कन् होता है (पार्श्वक)।

5.2.76
अयःशूलदण्ड जिनाह्यां ठक्- ठञौ

IAST ayaḥśūladaṇḍājinābhyāṃ ṭhakṭhañau

प्रकार विधि

सार अयःशूल और दण्डाजिन से क्रमशः ठक् तथा ठञ् प्रत्यय होते हैं (उससे जीविका करने वाले अर्थ में)।

5.2.77
तावतिथं ग्रहणं इति लुक् वा

IAST tāvatithaṃ grahaṇam iti luk vā

प्रकार विधि

सार «तावतिथं ग्रहणम्» (उतनेवें तक ग्रहण) अर्थ में तद्धित का विकल्प से लुक् होता है।

5.2.78
स एषां ग्रामणीः

IAST sa eṣāṃ grāmaṇīḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार «वह इनका ग्रामणी (मुखिया) है» — इस अर्थ में ग्रामणी शब्द का प्रयोग विहित है।

5.2.79
शृङ्खलं अस्य बन्धनं करभे

IAST śṛṅkhalam asya bandhanaṃ karabhe

प्रकार सञ्ज्ञा

सार करभ (ऊँट) के विषय में «शृङ्खल उसका बन्धन है» अर्थ का रूप विहित है।

5.2.80
उत्कः उन्मनाः

IAST utka unmanāḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार उत्क और उन्मनाः शब्द उत्कण्ठा/उन्मन अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

5.2.81
कालप्रयोजणात् ओगे

IAST kālaprayojanād oge

प्रकार विधि

सार काल को प्रयोजन बताने वाले शब्द से गमन (ओग) अर्थ में तद्धित होता है।

5.2.82
तद् अस्मिन्न् अन्नं प्राये संज्ञायाम्

IAST tad asminn annaṃ prāye saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार «उसमें यह अन्न प्रायः है» अर्थ की संज्ञा में तद्धित होता है।

5.2.83
कुल्माषात् अञ्

IAST kulmāṣād añ

प्रकार विधि

सार कुल्माष से अञ् प्रत्यय होता है।

5.2.84
श्रोत्रियन् छन्दः अधीते

IAST śrotriyaṃś chando 'dhīte

प्रकार सञ्ज्ञा

सार जिसने छन्द (वेद) का अध्ययन किया हो, उसे श्रोत्रिय कहा जाता है।

5.2.85
श्राद्धं अनेन भुक्तम् इनि- ठनौ

IAST śrāddham anena bhuktam iniṭhanau

प्रकार विधि

सार «इसने श्राद्ध भुक्त किया है» अर्थ में इनि और ठन् प्रत्यय होते हैं।

5.2.86
पूर्वात् इनिः

IAST pūrvād iniḥ

प्रकार विधि

सार पूर्व शब्द से इनि प्रत्यय होता है।

5.2.87
सपूर्वात् च

IAST sapūrvāc ca

प्रकार विधि

सार सपूर्व से भी इनि प्रत्यय होता है।

5.2.88
इष्- ट आदिभ्यः च

IAST iṣṭādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार इष्ट आदि गण के शब्दों से भी इनि होता है।

5.2.89
छन्दसि परिपन्थिपरिपरिणौ पर्यवस्थातरि

IAST chandasi paripanthiparipariṇau paryavasthātari

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पर्यवस्थाता (मार्ग-अवरोधक) अर्थ में परिपन्थिन् और परिपरिन् रूप होते हैं।

5.2.90
अनुपद्- ई अन्वेष्- टा

IAST anupadī anveṣṭā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अनुपदिन् और अन्वेष्टृ शब्द अनुसरण/अन्वेषण करने वाले अर्थ में विहित हैं।

5.2.91
साक्षात् द्रष्टरि संज्ञायां

IAST sākṣād draṣṭari saṃjñāyām

प्रकार सञ्ज्ञा

सार साक्षात् द्रष्टा अर्थ की संज्ञा में रूप/तद्धित विहित है।

5.2.92
क्षेत्रियच् परक्षेत्रे चिकित्स्यः

IAST kṣetriyac parakṣetre cikitsyaḥ

प्रकार विधि

सार परक्षेत्र में चिकित्स्य (उपचार्य) अर्थ में क्षेत्रियच् प्रत्यय होता है।

5.2.93
इन्द्रियम् इन्द्रलिंगम् इन्द्रदृष्- टमिन्द्रऋष्- टमिन्द्रौष्- टमिन्द्रात्तं इति वा

IAST indriyam indraliṅgam indradṛṣṭam indrasṛṣṭam indrajuṣṭam indradattam iti vā

प्रकार सञ्ज्ञा

सार इन्द्रिय शब्द के इन्द्र-लिङ्ग, इन्द्र-दृष्ट, इन्द्र-सृष्ट, इन्द्र-जुष्ट, इन्द्र-दत्त — ये वैकल्पिक व्युत्पत्ति-अर्थ हैं।

5.2.94
तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति मतुप्

IAST tad asyāsty asminn iti matup

प्रकार विधि

सार «वह इसका/इसमें है» अर्थ में मतुप् प्रत्यय होता है।

5.2.95
रस आदिभ्यः च

IAST rasādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार रस आदि गण से भी मतुप् होता है।

5.2.96
प्राणिस्थात् आतो लच् अन्यतरस्यां

IAST prāṇisthād āto lacy anyatarasyām

प्रकार विधि

सार प्राणी-स्थ आ-कारान्त शब्दों से विकल्प से लच् (मतुप् के स्थान पर) होता है।

5.2.97
सिध्म आदिभ्यः च

IAST sidhmādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार सिध्म आदि गण से भी लच् होता है।

5.2.98
वत्स अंसाभ्यां कामबले

IAST vatsāṃsābhyāṃ kāmabale

प्रकार विधि

सार वत्स और अंस से क्रमशः काम तथा बल अर्थ में तद्धित होता है।

5.2.99
फेणात् इलच् च

IAST pheṇād ilac ca

प्रकार विधि

सार फेण से इलच् भी होता है।

5.2.100
लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः

IAST lomādipāmādipicchādibhyaḥ śanelacaḥ

प्रकार विधि

सार लोमादि, पामादि और पिच्छादि गणों से क्रमशः श, न और इलच् प्रत्यय होते हैं।

5.2.101
प्रज्ञाश्रद्धा अर्चावृत्तिह्यः णः

IAST prajñāśraddhārcābhyaḥ ṇaḥ

प्रकार विधि

सार प्रज्ञा, श्रद्धा और अर्चा से मत्वर्थ में ण् प्रत्यय होता है (प्राज्ञ, श्रद्ध, आर्च)।

5.2.102
तपस्सहस्राभ्यां विनि इनि

IAST tapaḥsahasrābhyāṃ vini ini

प्रकार विधि

सार तपस् और सहस्र से विन् तथा इन् प्रत्यय होते हैं (तपस्विन्, सहस्रिन्)।

5.2.103
अण् च

IAST aṇ ca

प्रकार विधि

सार उक्त तपस् और सहस्र से अण् प्रत्यय भी होता है (तापस, साहस्र)।

5.2.104
सिकताशर्करह्याम् अ

IAST sikatāśarkarābhyām a

प्रकार विधि

सार सिकता और शर्करा से अ (अण्) प्रत्यय होता है (सािकता, शार्कर)।

5.2.105
देशे लुप् इलच् औ च

IAST deśe lub ilacau ca

प्रकार विधि

सार देश-वाचक अर्थ में (पूर्वोक्त सिकता-शर्करा से) लुब्, इलच् और औ भी (तथा पूर्व-अ) प्रत्यय होते हैं।

5.2.106
दन्त उन्नत उरच्

IAST danta unnata urac

प्रकार विधि

सार दन्त और उन्नत से उरच् प्रत्यय होता है (दन्तुर, उन्नतुर)।

5.2.107
ऊषसुषिमुष्कमधोः रः

IAST ūṣasuṣimuṣkamadhoḥ raḥ

प्रकार विधि

सार ऊष, सुषि, मुष्क और मधु से (तद्धित) र प्रत्यय होता है (ऊषर, सुषिर, मुष्कर, मधुर)।

5.2.108
द्युद्रुभ्यां मः

IAST dyudrubhyāṃ maḥ

प्रकार विधि

सार द्यु और द्रु से (तद्धित) म प्रत्यय होता है (द्युम, द्रुम)।

5.2.109
केशात् वः अन्यतरस्यां

IAST keśāt vaḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार केश से विकल्पेन (तद्धित) व प्रत्यय होता है (केशव)।

5.2.110
गाण्डी अजगात् संज्ञायां

IAST gāṇḍīvadigātsaṃjñāyām

प्रकार विधि

सार गाण्डीव और दिग् शब्दों से संज्ञा-अर्थ में (पूर्वानुवृत्त) ढण् प्रत्यय होता है।

5.2.111
काण्ड आण्डात् ईरन् ईरचौ

IAST kāṇḍa āṇḍāt īran īracau

प्रकार विधि

सार काण्ड और आण्ड से ईरन् तथा ईरच् प्रत्यय होते हैं (काण्डीर, आण्डीर)।

5.2.112
रजः कृषि आउतिपरिषदः वलच्

IAST rajaḥ kṛṣyāsutipariṣadaḥ valac

प्रकार विधि

सार रजस्, कृषि, आसुति और परिषद् से वलच् प्रत्यय होता है (रजस्वला, कृषिवल, आसुतिवल, परिषद्वल)।

5.2.113
दन्तशिखात् संज्ञायां

IAST dantaśikhāt saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार दन्त और शिखा से संज्ञा में मत्वर्थ में इनि-प्रत्यय होता है।

5.2.114
ज्योत्स्नातमिस्राशृङ्ग्- णऊर्जसिन् ऊर्जसलगोमिन्मलिनमलीमसाः

IAST jyotsnātamisrāśṛṅgiṇorjasvinorjasalagominmalinamalīmasāḥ

प्रकार विधि

सार ज्योत्स्ना, तमिस्रा, शृङ्गिन्, ऊर्जस्विन्, ऊर्जस्वल, गोमिन्, मलिन और मलीमस — ये रूप मत्वर्थ में निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

5.2.115
अतः इनि- ठनौ

IAST ataḥ iniṭhanau

प्रकार विधि

सार अकारान्त प्रातिपदिक से मत्वर्थ में इनि और ठन् प्रत्यय होते हैं।

5.2.116
व्रीहि आदिभ्यः च

IAST vrīhyādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार व्रीह्यादिगण के शब्दों से भी मत्वर्थ में इनि और ठन् होते हैं।

5.2.117
तुन्द आदिभ्यः इलच् च

IAST tundādibhya ilac ca

प्रकार विधि

सार तुन्दादिगण से मत्वर्थ में इलच् भी (इनि-ठन् के अतिरिक्त) होता है।

5.2.118
एकगोपूर्वात् ठञ् नित्यं

IAST ekagopūrvāt ṭhañ nityam

प्रकार विधि

सार एक या गो पूर्वपद वाले शब्द से मत्वर्थ में ठञ् नित्य होता है।

5.2.119
शतसहस्र अन्तात् अ निष्कात्

IAST śatasahasrāntāc ca niṣkāt

प्रकार विधि

सार शत/सहस्र-अन्त प्रातिपदिक से तथा निष्क से मत्वर्थ में अ-प्रत्यय होता है।

5.2.120
रूपत् आहतप्रशंसयः अप्

IAST rūpād āhatapraśaṃsayor ap

प्रकार विधि

सार रूप से आहत और प्रशंसा अर्थ में अप्-प्रत्यय होता है।

5.2.121
अस्मायामेधास्रजः इनिः

IAST asmāyāmedhāsrjo 'iniḥ

प्रकार विधि

सार अस्मन्, आयाम, एधा और अस्र से मत्वर्थ में इनि-प्रत्यय होता है।

5.2.122
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में मत्वर्थ-प्रत्यय बहुल (विविध/अनियमित) रूप से प्रवृत्त होते हैं।

5.2.123
ऊर्णायाः युः

IAST ūrṇāyā yuḥ

प्रकार विधि

सार ऊर्णा से मत्वर्थ में यु-प्रत्यय होता है।

5.2.124
वाचो ग्मिनिः

IAST vāco gminiḥ

प्रकार विधि

सार वाच् से मत्वर्थ में ग्मिनि-प्रत्यय होता है।

5.2.125
आलच् आटचौ बहुहाषिणि

IAST ālacāṭacau bahulāśiṣi

प्रकार विधि

सार बहुल आशीर्वाद/आशिष् अर्थ में आलच् और आटच् प्रत्यय होते हैं।

5.2.126
स्वामिन् ऐश्वर्ये

IAST svāminn aiśvarye

प्रकार विधि

सार ऐश्वर्य (स्वामित्व/प्रभुता) अर्थ में स्वामिन् प्रत्यय होता है।

5.2.127
अर्शः आदिभ्यः अच्

IAST arśa-ādibhyaḥ ac

प्रकार विधि

सार अर्श आदि गण के शब्दों से (मत्वर्थ में) अच् प्रत्यय होता है।

5.2.128
द्वंद्व उपतापगर्ह्यात् प्राणिथात् इनिः

IAST dvandvopatāpagarhyāt prāṇisthād iniḥ

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व तथा उपताप (रोगादि) और गर्ह्यवाची शब्दों से, प्राणि-संबद्ध होने पर, इन् प्रत्यय होता है।

5.2.129
वात अतीसाराभ्यां कुक् च

IAST vātātīsārābhyāṃ kuk ca

प्रकार विधि

सार वात और अतीसार से कुक्-आगम तथा (पूर्ववत्) इन् प्रत्यय होता है।

5.2.130
वयसि पूरणात्

IAST vayasi pūraṇāt

प्रकार विधि

सार वय (आयु) अर्थ में पूरणवाची शब्दों से इन् प्रत्यय होता है।

5.2.131
सुख आदिभ्यः च

IAST sukha-ādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार सुख आदि गण के शब्दों से भी इन् प्रत्यय होता है।

5.2.132
धर्मशीलवर्ण न्तात् अ

IAST dharma-śīla-varṇāntāc ca

प्रकार विधि

सार धर्म, शील या वर्ण में अन्त होने वाले शब्दों से भी इन् प्रत्यय होता है।

5.2.133
हस्तात् जातौ

IAST hastāj jātau

प्रकार विधि

सार हस्त से जाति अर्थ में इन् प्रत्यय होता है (हस्तिन्)।

5.2.134
वर्णात् ब्रह्मचारिणि

IAST varṇād brahmacāriṇi

प्रकार विधि

सार वर्ण से ब्रह्मचारिन् अर्थ में इन् प्रत्यय होता है (वर्णिन्)।

5.2.135
पुष्कर आदि भ्यः देशे

IAST puṣkara-ādibhyaḥ deśe

प्रकार विधि

सार पुष्कर आदि गण के शब्दों से देश अर्थ में इन् प्रत्यय होता है।

5.2.136
बल आदिभ्यः मतुप् न्यारयां

IAST bala-ādibhyo matub anyatarasyām

प्रकार विधि

सार बल आदि गण के शब्दों से विकल्पेन मतुप् प्रत्यय होता है।

5.2.137
संज्ञायां मन्माह्याम्

IAST saṃjñāyāṃ man-mābhyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा अर्थ में मन् और मा से मतुप् प्रत्यय होता है।

5.2.138
कम् शम् ह्यां बभयुः तितुतयसः

IAST kaṃ-śaṃhyāṃ babh-yu-titu-tayasaḥ

प्रकार विधि

सार कम् और शम् से बभ्, यु, तितु तथा तयस् प्रत्यय होते हैं।

5.2.139
तुन्दिवलिवटेर्भः

IAST tundi-vali-vaṭer bhaḥ

प्रकार विधि

सार तुन्दि, वलि और वटि से भ प्रत्यय होता है।

5.2.140
अहम् सुभमोर्युः

IAST ahaṃ-subhamor yus

प्रकार विधि

सार अहम् और सुभम् से युस् प्रत्यय होता है।

अध्याय 5 · पाद 3 (119 सूत्र)

5.3.1
प्राक् दिशः विभक्तिः

IAST prāk diśaḥ vibhaktiḥ

प्रकार अधिकार

सार «दिशः» से पूर्व विहित तद्धित-प्रत्ययों की विभक्तिसंज्ञा विधीय है।

5.3.2
किंसर्वनामबहुभ्योऽद्व्यादिभ्यः

IAST kiṃsarvanāmabahubhyo 'dvyādibhyaḥ

प्रकार अधिकार

सार किम्, सर्वनामों तथा बहु से—द्वि आदि को छोड़कर—आगे विहित विभक्ति-प्रत्यय होते हैं।

5.3.3
इदमः इश्

IAST idamaḥ iś

प्रकार विधि

सार इदम् के स्थान पर (इन प्रत्ययों के परे) इश् आदेश होता है।

5.3.4
एत इतौ रथोः

IAST eta itau rathoḥ

प्रकार विधि

सार एतद् के स्थान पर र् परे ए तथा थ् परे इत् आदेश होता है।

5.3.5
एतदः अन्

IAST etadaḥ an

प्रकार विधि

सार एतद् के स्थान पर (शेष विभक्ति-प्रत्ययों के परे) अन् आदेश होता है।

5.3.6
सर्वस्य सः अन्यतरस्यां दि

IAST sarvasya saḥ anyatarasyāṃ di

प्रकार विधि

सार सर्व के स्थान पर दि परे वैकल्पिक स आदेश होता है।

5.3.7
पञ्चम्याः तसिल्

IAST pañcamyāḥ tasil

प्रकार विधि

सार पञ्चमी-अर्थ में तसिल् प्रत्यय होता है (ततः, कुतः आदि)।

5.3.8
तसेः च

IAST taseḥ ca

प्रकार विधि

सार उसी अधिकार में तसि भी विहित है।

5.3.9
परि अभिह्याम् अ

IAST pari abhihyām a

प्रकार विधि

सार परि तथा अभि से (पञ्चमी-अर्थ में) अ प्रत्यय होता है (परितः, अभितः)।

5.3.10
सप्तम्याः त्रल्

IAST saptamyāḥ tral

प्रकार विधि

सार सप्तमी-अर्थ में त्रल् प्रत्यय होता है (तत्र, यत्र, कुत्र आदि)।

5.3.11
इदमः हः

IAST idamaḥ haḥ

प्रकार विधि

सार इदम् के स्थान पर (त्रल् परे) ह आदेश होता है (अत्र)।

5.3.12
किमः अत्

IAST kimaḥ at

प्रकार विधि

सार किम् के स्थान पर (त्रल् परे) अत् आदेश होता है (कुत्र)।

5.3.13
वा ह च छन्दसि

IAST vā ha ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में किम् से वैकल्पिक ह भी होता है।

5.3.14
इतराभ्यः अपि दृश्यन्ते

IAST itarābhyaḥ api dṛśyante

प्रकार अतिदेश

सार ये विभक्ति-प्रत्यय अन्य प्रातिपदिकों से भी दृष्ट होते हैं।

5.3.15
सर्व एक अन्य किम्यद् तदः काले दा

IAST sarvaikaanyakiṃyattadaḥ kāle dā

प्रकार विधि

सार कालवाचक अर्थ में सर्व, एक, अन्य, किम्, यद्, तद् से दा प्रत्यय होता है (सदा, कदा, यदा, तदा आदि)।

5.3.16
इदमः र्हिल्

IAST idamaḥ rhil

प्रकार विधि

सार इदम् से (काले) र्हिल् प्रत्यय होता है।

5.3.17
अधुना

IAST adhunā

प्रकार विधि

सार अधुना यह निपातित कालवाचक रूप सिद्ध होता है।

5.3.18
दानीं च

IAST dānīṃ ca

प्रकार विधि

सार इदम् से दानीम् भी (इदानीम्) निपातित/विहित है।

5.3.19
तदः दा च

IAST tadaḥ dā ca

प्रकार विधि

सार तद् से दा तथा (र्हिल् भी) होता है (तदा, तर्हि)।

5.3.20
तयोर्दार्हिलौ च छन्दसि

IAST tayor dārhilau ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में उन दोनों (इदम्-तद्) से दा और र्हिल् भी होते हैं।

5.3.21
अनद्यतने र्हिल् अन्यतरस्यां

IAST anadyatane rhil anyatarasyām

प्रकार विधि

सार अनद्यतन काल में र्हिल् वैकल्पिक होता है।

5.3.22
सद्यः परुत्परारिऐषमः परेद्यवि अद्य पूर्वेद्युसन्येद्युसन्यतरेद्युसितरेद्युसपरेद्युसधरेद्युसुभयेद्युसुत्तरेद्युः

IAST sadyaḥ parut parāri aiṣamaḥ paredyavi adya pūrvedyus anyedyus anyataredyus itaredyus aparedyus adharedyus ubhayedyus uttaredyuḥ

प्रकार विधि

सार सद्यः, परुत्, परारि, ऐषमः, परेद्यवि, अद्य, पूर्वेद्युः आदि कालवाचक रूप निपातित सिद्ध होते हैं।

5.3.23
प्रकारवचने थाल्

IAST prakāravacane thāl

प्रकार विधि

सार प्रकार-वचन में थाल् प्रत्यय होता है (तथा, यथा, सर्वथा)।

5.3.24
इदमः थमुः

IAST idamaḥ thamuḥ

प्रकार विधि

सार इदम् से थमु प्रत्यय होता है (इत्थम्)।

5.3.25
किमः च

IAST kimaḥ ca

प्रकार विधि

सार किम् से भी थमु होता है (कथम्)।

5.3.26
था हेतौ च छन्दसि

IAST thā hetau ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में हेतु (कारण) अर्थ में भी था प्रत्यय होता है।

5.3.27
दिक् शब्देभ्यः सप्तमीपञ्चमीप्रथमाह्यः दिश्देशकालेषु अस्तातिः

IAST dik-śabdebhyaḥ saptamī-pañcamī-prathamābhyo dig-deśa-kāleṣv astātiḥ

प्रकार विधि

सार दिशावाचक शब्दों से सप्तमी-पञ्चमी-प्रथमा अर्थ में दिशा, देश और काल बोध में अस्ताति प्रत्यय होता है।

5.3.28
दक्षिण उत्तराभ्यां अतसुच्

IAST dakṣiṇottarābhyām atasuc

प्रकार विधि

सार दक्षिण और उत्तर से (दिशा-देश-काल में) अतसुच् प्रत्यय होता है।

5.3.29
विभाषा पर अवराभ्या

IAST vibhāṣā parāvarābhyām

प्रकार विधि

सार पर और अवर से वैकल्पिक रूप से अतसुच् प्रत्यय होता है।

5.3.30
अञ्चेर्लुक्

IAST añcer luk

प्रकार विधि

सार (अस्ताति आदि के योग में) अञ्च्-अन्त दिशावाचक आधार से अञ्च् का लुक् होता है।

5.3.31
उपरि उपरिष्टात्

IAST upari upariṣṭāt

प्रकार विधि

सार उपरि और उपरिष्टात् रूप निपातित (सिद्ध) होते हैं।

5.3.32
पश्चात्

IAST paścāt

प्रकार विधि

सार पश्चात् रूप निपातित होता है।

5.3.33
पश्चपश्चा च छन्दसि

IAST paśca-paścā ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पश्च और पश्चा भी (पश्चात् के स्थान पर) सिद्ध होते हैं।

5.3.34
उत्तर अधर दक्षिणात् आतिः

IAST uttarādharādakṣiṇād ātiḥ

प्रकार विधि

सार उत्तर, अधर और दक्षिण से आति प्रत्यय होता है।

5.3.35
एनप् अन्यतरस्यां अदूरे आञ्चम्याः

IAST enab anyatarasyām adūre 'ñcamyāḥ

प्रकार विधि

सार अञ्च्-अन्त दिशावाचकों से अदूर अर्थ में वैकल्पिक एनप् प्रत्यय होता है।

5.3.36
दक्षिणात् आच्

IAST dakṣiṇād āc

प्रकार विधि

सार दक्षिण से आच् प्रत्यय होता है।

5.3.37
आहि च दूरे

IAST āhi ca dūre

प्रकार विधि

सार दूर अर्थ में दक्षिण से आहि भी होता है।

5.3.38
उत्तरात् च

IAST uttarāc ca

प्रकार विधि

सार उत्तर से भी (आच्-आहि आदि) होते हैं।

5.3.39
पूर्व अधर अव् अराणां असि पुरध् अवः च एषाम्

IAST pūrvādharāvarāṇām asi puradhav aś ca eṣām

प्रकार विधि

सार पूर्व, अधर और अवर से असि प्रत्यय होता है; तथा इनके पुरस्, अधस्, अवस् रूप भी सिद्ध होते हैं।

5.3.40
अस्ताति च

IAST astāti ca

प्रकार विधि

सार पूर्व-अधर-अवर से अस्ताति भी होता है।

5.3.41
विभाषा अवरस्य

IAST vibhāṣā 'varasya

प्रकार विधि

सार अवर से (अस्ताति आदि) वैकल्पिक होते हैं।

5.3.42
संख्यायाः विधा अर्थे धा

IAST saṃkhyāyā vidhārthe dhā

प्रकार विधि

सार संख्यावाचक से प्रकार/विधि अर्थ में धा प्रत्यय होता है।

5.3.43
अधिकरणविचाले च

IAST adhikaraṇa-vicāle ca

प्रकार विधि

सार अधिकरण के विचालन (विभाजन) अर्थ में भी संख्या से धा होता है।

5.3.44
एकात् धः ध्यमुञ् न्यारयां

IAST ekād dho dhyamuñ nityam

प्रकार विधि

सार एक से धा के स्थान पर नित्य ध्यमुञ् आदेश होता है।

5.3.45
द्वित्र्योः च धमुञ्

IAST dvitryoś ca dhamuñ

प्रकार विधि

सार द्वि और त्रि से (धा के स्थान पर) धमुञ् भी होता है।

5.3.46
एधाच् च

IAST edhāc ca

प्रकार विधि

सार द्वि-त्रि से एधाच् भी होता है।

5.3.47
याप्ये पाशप्

IAST yāpye pāśap

प्रकार विधि

सार निन्दनीय/अपेय अर्थ में पाशप् प्रत्यय होता है।

5.3.48
पूरणात् भागे तीयात् अन्

IAST pūraṇād bhāge tīyād an

प्रकार विधि

सार भाग अर्थ में तीय-अन्त पूरणवाचकों से अन् प्रत्यय होता है।

5.3.49
प्राक् एकादशभ्यः अच्छन्दसि

IAST prāg ekādaśabhyo 'cchandasi

प्रकार विधि

सार एकादश से पूर्व की (पूरण) संख्याओं से अच्छन्दस् (लौकिक) में ही (भागार्थक) अन् होता है।

5.3.50
षष्ठ अष्टआह्यां ञ च

IAST ṣaṣṭhāṣṭamābhyāṃ ña ca

प्रकार विधि

सार षष्ठ और अष्टम से ञ् भी (अन् के साथ) होता है।

5.3.51
मानपशु ङ्गेह्यः कन्लुकौ च

IAST mānapasuṅgehyāḥ kanlukau ca

प्रकार विधि

सार मानवाचक तथा ङी/एही-अन्त पशुनामों से (पूर्व-प्रत्ययों के साथ) कन् और लुक् भी होते हैं।

5.3.52
एकात् आकिनिच् च असहाये

IAST ekād ākinic cāsahāye

प्रकार विधि

सार असहाय (अकेला) अर्थ में एक से आकिनिच् (तथा अनुवृत्त) प्रत्यय होता है।

5.3.53
भूतपूर्वे चरट्

IAST bhūtapūrve caraṭ

प्रकार विधि

सार भूतपूर्व (पहले था/हो चुका) अर्थ में चरट् प्रत्यय होता है।

5.3.54
षष्ठ्या रूप्य च

IAST ṣaṣṭhyā rūpya ca

प्रकार विधि

सार षष्ठ्यर्थ में रूप्य (तथा अनुवृत्त प्रत्यय) होता है—योग्य/अनुरूप अर्थ में।

5.3.55
अतिशायने तमप् इष्ठनौ

IAST atiśāyane tamap iṣṭhanau

प्रकार विधि

सार अतिशायन (सर्वोत्कर्ष/अत्यन्तता) अर्थ में तमप् और इष्ठन् प्रत्यय होते हैं।

5.3.56
तिङः च

IAST tiṅaś ca

प्रकार विधि

सार तिङ्-अन्त (क्रियापद) से भी (अतिशयनार्थ) तमप्/इष्ठन् होते हैं।

5.3.57
द्विवचनविभज्य पपदे तरप् ईयसुनौ

IAST dvivacanavibhajyopapade tarap īyasunau

प्रकार विधि

सार द्विवचन या विभज्य उपपद होने पर तरप् और ईयसुन् (तुलना) प्रत्यय होते हैं।

5.3.58
अच् आद्- ई गुणवचणात् एव

IAST acād ī guṇavacanād eva

प्रकार नियम

सार स्वर-आरम्भ वाले (इष्ठन्/ईयसुन्) प्रत्यय केवल गुणवचन शब्दों से ही होते हैं।

5.3.59
तुः छन्दसि

IAST tuś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक) में (तुलना/अतिशय-प्रकरण में) तु होता है।

5.3.60
प्रशस्यस्य श्रः

IAST praśasyasya śraḥ

प्रकार विधि

सार प्रशस्य के स्थान पर (तमप्/तरपादि के पूर्व) श्र् आदेश होता है।

5.3.61
ज्य च

IAST jya ca

प्रकार विधि

सार प्रशस्य के स्थान पर ज्य भी (श्र् के अतिरिक्त) होता है।

5.3.62
वृद्धस्य च

IAST vṛddhasya ca

प्रकार अतिदेश

सार वृद्ध के स्थान पर भी (इष्ठन्/ईयसुन्-पूर्व) ज्य आदेश होता है।

5.3.63
अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ

IAST antikabāḍhayor nedasādhau

प्रकार विधि

सार अतिशायन (तरप्–तमप्/ईयसुन्–इष्ठन्) के विषय में अन्तिक के स्थान पर नेदस् तथा बाढ के स्थान पर साध् आदेश होता है।

5.3.64
युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम्

IAST yuvālpayoḥ kan anyatarasyām

प्रकार विधि

सार युवन् और अल्प के स्थान पर विकल्प से कन् आदेश होता है (अतिशायन-प्रत्ययों के विषय में)।

5.3.65
विन्मतोर्लुक्

IAST vinmator luk

प्रकार विधि

सार अतिशायन-प्रत्यय लगने पर पूर्वस्थित विन् और मतुप् का लुक् होता है।

5.3.66
प्रशंसायां रूपप्

IAST praśaṃsāyāṃ rūpap

प्रकार विधि

सार प्रशंसा के अर्थ में रूपप् प्रत्यय होता है।

5.3.67
ईषदसंआप्तौ कल्पप्देश्यदेशीयरः

IAST īṣadasamāptau kalpapdeśyadeśīyaraḥ

प्रकार विधि

सार ईषद्-असमाप्ति (लगभग/अपूर्णता) के अर्थ में कल्पप्, देश्य और देशीयर् प्रत्यय होते हैं।

5.3.68
विभाषा सुपः बहुच् पुरस्तात् तु

IAST vibhāṣā supo bahuc purastāt tu

प्रकार विधि

सार सुबन्त के पहले विकल्प से बहुच् प्रत्यय होता है (पूर्व-अर्थ-सन्दर्भ में)।

5.3.69
प्रकारवचने जातीयर्.

IAST prakāravacane jātīyar

प्रकार विधि

सार प्रकार (जाति/तरह) कथन में जातीयर् प्रत्यय होता है।

5.3.70
प्राक् इवात् कः

IAST prāg ivāt kaḥ

प्रकार अधिकार

सार इव-प्रकरण से पूर्व तक क प्रत्यय का अधिकार है (अगले सूत्रों के निर्दिष्ट अर्थों में)।

5.3.71
अव्ययसर्वनाम्णां अकच् प्राक् टेः

IAST avyayasarvanāmnām akac prāk ṭeḥ

प्रकार विधि

सार अव्यय और सर्वनामों में टि से पहले अकच् प्रत्यय होता है।

5.3.72
कस्य च दः

IAST kasya ca daḥ

प्रकार विधि

सार क के स्थान पर (अकच् आदि में) द् भी होता है।

5.3.73
अज्ञते

IAST ajñāte

प्रकार विधि

सार अज्ञात (अपरिचित/अनिर्दिष्ट) अर्थ में क प्रत्यय होता है।

5.3.74
कुत्सिते

IAST kutsite

प्रकार विधि

सार कुत्सित (तिरस्कार/निन्दा) अर्थ में (क-प्रत्यय) होता है।

5.3.75
संज्ञायां कन्

IAST saṃjñāyāṃ kan

प्रकार विधि

सार संज्ञा (नामकरण) के अर्थ में कन् प्रत्यय होता है।

5.3.76
अनुकम्पायां

IAST anukampāyām

प्रकार विधि

सार अनुकम्पा (स्नेह/दया) के अर्थ में पूर्व-प्रवृत्त तद्धित-प्रत्यय (कन् आदि) प्रवर्तते हैं।

5.3.77
नीतौ च तद्युक्तात्

IAST nītau ca tadyuktāt

प्रकार विधि

सार नीति-अर्थ में तथा उस नीति से युक्त व्यक्ति/पद से भी वे ही (अनुकम्पा-विषयक) प्रत्यय लगते हैं।

5.3.78
बह्वचः मनुष्यनाम्न् अः ठच् वा

IAST bahvaco manuṣyanāmnaḥ ṣṭhan vā

प्रकार विधि

सार बहु-अच् वाले मनुष्य-नाम से अनुकम्पा आदि में वैकल्पिक रूप से ष्ठन् होता है।

5.3.79
घनिलचौ च

IAST ghanilacau ca

प्रकार विधि

सार उसी स्थिति में घन् और इलच् भी (ष्ठन् के साथ विकल्प से) होते हैं।

5.3.80
प्राचां उप आदेरडच् वुचौ च

IAST prācām upāder aḍac vucau ca

प्रकार विधि

सार प्राच्य-आचार्यों के मत से आदि (प्रथम अंश) से अडच् और वुच् भी लगते हैं।

5.3.81
जातिनाम्नः कन्

IAST jātināmnaḥ kan

प्रकार विधि

सार जाति-नाम से (अनुकम्पा आदि में) कन् होता है।

5.3.82
अजिन अन्तस्य उत्तरादओपः च

IAST ajināntasyottarapadalopaś ca

प्रकार विधि

सार अजिन-अन्त जातिनाम में उत्तरपद का लोप भी होता है (और कन् लगता है)।

5.3.83
ठ अच् आदौ ऊर्ध्वं द्वि- ईयात् चः

IAST ṭhājādau cūrdhvaṃ dvitīyād acaḥ

प्रकार विधि

सार ठ-आदि या अच्-आदि प्रत्यय परे होने पर द्वितीय अच् से ऊपर (अर्थात् उसके बाद) का भाग लुप्त होता है।

5.3.84
शेवलसुपरिविशालवरुणार्यमन् आदीणां तृतीयात्

IAST śevalasupariviśālavaruṇāryamaṇādīnāṃ tṛtīyāt

प्रकार विधि

सार शेवल, सुपरि, विशाल, वरुण, अर्यमन् आदि शब्दों में तृतीय अच् से (ऊपर का लोप) होता है।

5.3.85
अल्पे

IAST alpe

प्रकार अधिकार

सार अल्प-अर्थ में (निम्न/पूर्व-प्रत्यय-विधान का) अधिकार आरम्भ होता है।

5.3.86
ह्रस्वे

IAST hrasve

प्रकार विधि

सार ह्रस्व (छोटा/संक्षिप्त) अर्थ में भी वे ही प्रत्यय प्रवर्तते हैं।

5.3.87
संज्ञायां कन्

IAST saṃjñāyāṃ kan

प्रकार विधि

सार संज्ञा (व्यक्तिवाचक नाम) बनाने में कन् होता है।

5.3.88
कुटीशमीशुण्डाह्यः रः

IAST kuṭīśamīśuṇḍābhyo raḥ

प्रकार विधि

सार कुटी, शमी और शुण्डा से (अल्प/ह्रस्वार्थ में) र् प्रत्यय होता है।

5.3.89
कुत्वाः डुपच्

IAST kutvād upac

प्रकार विधि

सार कु-अन्त पद से (अल्पार्थ में) उपच् होता है।

5.3.90
कासूगोणीभ्यां ष्टरच्

IAST kāsūgoṇībhyāṃ ṣṭarac

प्रकार विधि

सार कासू और गोणी से (अल्पार्थ में) ष्टरच् होता है।

5.3.91
वत्सोक्षाश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वे

IAST vatsokṣāśvarṣabhebhyaś ca tanutve

प्रकार विधि

सार वत्स, उक्षन्, अश्व और ऋषभ से तनुत्व (कृशता/पतलापन) अर्थ में भी (ष्टरच् आदि) होता है।

5.3.92
किम् यद्तदः निर्हारणे द्वयोरेकस्य डतरच्

IAST kiṃyattado nirdhāraṇe dvayor ekasya ḍatarac

प्रकार विधि

सार किम्, यद् और तद् से दो में से एक का निर्धारण करने पर डतरच् होता है।

5.3.93
वा बहूणां जातिपरिप्रश्ने डतमच्

IAST vā bahūnāṃ jātiparipraśne ḍatamac

प्रकार विधि

सार बहुतों में से जाति-विषयक परिप्रश्न में (किम्/यद्/तद् से) वैकल्पिक डतमच् होता है।

5.3.94
एकात् च प्राचां

IAST ekāc ca prācām

प्रकार विधि

सार प्राच्य-मत से एक से भी (डतरच्/डतमच्) होते हैं।

5.3.95
अवक्षेपणे कन्

IAST avakṣepaṇe kan

प्रकार विधि

सार अवक्षेपण (तिरस्कार/निन्दा) अर्थ में कन् होता है।

5.3.96
इवे प्रतिकृतौ

IAST ive pratikṛtau

प्रकार विधि

सार इव-अर्थ में, प्रतिकृति (प्रतिमा/सदृश-आकृति) बताने पर (कन्) होता है।

5.3.97
संज्ञायां च

IAST saṃjñāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार संज्ञा में भी (प्रतिकृति-विषयक कन्) प्रवर्तते है।

5.3.98
लुप् मनुष्ये

IAST lup manuṣye

प्रकार विधि

सार मनुष्य-प्रतिकृति होने पर (उस कन् का) लुप् होता है।

5.3.99
जीविका अर्थे चापण्ये

IAST jīvikārthe cāpaṇye

प्रकार विधि

सार जीविका-अर्थ में तथा जो अपण्य (विक्रय-अयोग्य) हो उसमें भी (कन् का) लुप् होता है।

5.3.100
देवपथ आदिभ्यः च

IAST devapathādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार देवपथ-आदि गण के शब्दों से भी (पूर्वोक्त लुप्/कन्-विधान) होता है।

5.3.101
वस्तेर्ढञ्

IAST vaster ḍhañ

प्रकार विधि

सार वस्ति शब्द से (पूर्व-सूत्र के अर्थ में) ढञ् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.102
शिलायाः ढः

IAST śilāyā ḍhaḥ

प्रकार विधि

सार शिला शब्द से ढ तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.103
शाखा आदिभ्यः यत्

IAST śākhādibhyo yat

प्रकार विधि

सार शाखादि गण के शब्दों से यत् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.104
द्रव्यं च भव्ये

IAST dravyaṃ ca bhavye

प्रकार विधि

सार भव्य अर्थ में द्रव्य शब्द से भी (यत्) होता है।

5.3.105
कुश अग्रत् छः

IAST kuśāgrāc chaḥ

प्रकार विधि

सार कुशाग्र शब्द से छ तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.106
सम् आः आत् च तद्विषयात्

IAST samāsāc ca tadviṣayāt

प्रकार विधि

सार उसी विषय वाले समास से भी (छ) होता है।

5.3.107
शर्करा आदिभ्यः अण्

IAST śarkarādibhyo ’ṇ

प्रकार विधि

सार शर्करादि गण के शब्दों से अण् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.108
अङ्गुलि आदिभ्यः ठक्

IAST aṅgulyādibhyaṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार अङ्गुल्यादि गण के शब्दों से ठक् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.109
एकशालायाः ठच् अन्यतरस्यां

IAST ekaśālāyāṣ ṭhac anyatarasyām

प्रकार विधि

सार एकशाला शब्द से विकल्प से ठच् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.110
कर्कलोहितात् ईकक्

IAST karkalohitād īkak

प्रकार विधि

सार कर्क और लोहित शब्दों से ईकक् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.111
प्रत्नपूर्वविश्वैंआत् थाल् छन्दसि

IAST pratnapūrvaviśvemāt thāl chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में प्रत्न, पूर्व, विश्व और इम शब्दों से थाल् तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.112
पूगात् ञ्यः अग्रामणीपूर्वात्

IAST pūgāñ ṅyo ’grāmaṇīpūrvāt

प्रकार विधि

सार ग्रामणी-पूर्व न होने पर पूग (संघ/समूह) शब्द से ञ्य प्रत्यय होता है।

5.3.113
व्रातच्फञ्रस्त्रियां

IAST vrātacphañor astriyām

प्रकार विधि

सार स्त्री-लिङ्ग को छोड़कर व्रात शब्द से च्फञ् (तद्धित) होता है।

5.3.114
आयुध जीविसंघात्ञ्यट् आहीकेषु अब्राह्मणराजन्यात्

IAST āyudhajīvisaṃghāñ ṅyaḍ āhīkeṣv abrāhmaṇarājanyāt

प्रकार विधि

सार आहीक-देश में आयुधजीवी संघों से—ब्राह्मण और राजन्य को छोड़कर—ञ्यट् प्रत्यय होता है।

5.3.115
वृकात् टेण्यण्

IAST vṛkāṭ ṭheṇyaṇ

प्रकार विधि

सार वृक शब्द से टेण् और यण् तद्धित-प्रत्यय होते हैं।

5.3.116
दामनि आदित्रिगर्तषष्ठात् हः

IAST dāmanyāditrigartaṣaṣṭhāc chaḥ

प्रकार विधि

सार दामन्यादि तथा त्रिगर्त के षष्ठ से छ तद्धित-प्रत्यय होता है।

5.3.117
पर्शु आदियौधेय आदिह्यां अण् अञौ

IAST parśvādiyaudheyādibhyām aṇaṅau

प्रकार विधि

सार पर्श्वादि और यौधेयादि से क्रमशः अण् और अञ् तद्धित-प्रत्यय होते हैं।

5.3.118
अभिजित् विदभृत्शालावत्शिखावत्शमीवत् ऊर्णावत्श्रुमत् अणः यञ्

IAST abhijidvidabhṛcchālāvacchikhāvacchamīvadūrṇāvacchrumadaṇo yañ

प्रकार विधि

सार अभिजित्, विदभृत्, शालावत्, शिखावत्, शमीवत्, ऊर्णावत् और श्रुमत् पर अण् के स्थान में यञ् होता है।

5.3.119
ञ्यआदयः तद्राजाः

IAST ṅyādayas tadrājāḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार ञ्य आदि (इस प्रकरण के) प्रत्ययों की संज्ञा तद्राज है।

अध्याय 5 · पाद 4 (160 सूत्र)

5.4.1
पादशतस्य संख्या आदेर्वीप्सायां वुन् लोपः च

IAST pādaśatasya saṃkhyāder vīpsāyāṃ vun lopaś ca

प्रकार विधि

सार पाद, शत आदि संख्या-पूर्वपद वाले प्रयोग में वीप्सा (वितरण/‘एक-एक’) अर्थ में वुन् प्रत्यय होता है और (उत्तरपद का) लोप भी होता है।

5.4.2
दण्डव्यवसर्गयोः च

IAST daṇḍavyavasargayoś ca

प्रकार विधि

सार दण्ड और व्यवसर्ग से भी पूर्वोक्त वीप्सा में वुन् तथा लोप होते हैं।

5.4.3
स्थूल आदिभ्यः प्रकारवचने कन्

IAST sthūlādibhyaḥ prakāravacane kan

प्रकार विधि

सार स्थूल आदि शब्दों से प्रकार-वचन (प्रकार/कुछ-सा भाव) में कन् प्रत्यय होता है।

5.4.4
अनत्यन्तगतौ क्तात्

IAST anatyantagatau ktāt

प्रकार विधि

सार अत्यन्त-गति न होने (अपूर्ण/अल्प-प्राप्ति) के अर्थ में क्त-प्रत्ययान्त से कन् होता है।

5.4.5
न सामिवचने

IAST na sāmivacane

प्रकार विधि

सार सामि (अर्ध) का निर्देश होने पर पूर्व-सूत्र का कन् नहीं होता।

5.4.6
बृहत्या आच्छादने

IAST bṛhatyā ācchādane

प्रकार विधि

सार आच्छादन (वस्त्र/आवरण) अर्थ में बृहती से कन् प्रत्यय होता है।

5.4.7
अषडक्स आशितंगु अलंकर्मन् अलम्पुरुष अध्युत्तरपदात् खः

IAST aṣaḍakṣāśitaṃgv-alaṃkarmālampuruṣādhyuttarapadāt khaḥ

प्रकार विधि

सार अषडक्ष, आशितंगु, अलंकर्मन्, अलंपुरुष तथा अधि-उत्तरपद वाले शब्दों से ख प्रत्यय होता है।

5.4.8
विभाषा अञ्चेरदिक्स्त्रियां

IAST vibhāṣāñcer adikstriyām

प्रकार विधि

सार अञ्च्-अन्त से, दिशा और स्त्री-अर्थ छोड़कर, वैकल्पिक रूप से ख होता है।

5.4.9
जाति अन्तात् छ बन्धुनि

IAST jātyantāt cha bandhuni

प्रकार विधि

सार जाति-अन्त शब्द से बन्धु (सम्बन्धी/सगोत्र) अर्थ में छ प्रत्यय होता है।

5.4.10
स्थान अन्तात् विभाषा सस्थानेन इति चेत्

IAST sthānāntād vibhāṣā sasthāneneti cet

प्रकार विधि

सार स्थान-अन्त से, यदि समान-स्थान अर्थ अभिप्रेत हो, तो वैकल्पिक छ होता है।

5.4.11
किम् एत्तिङ् अव्यय घ् आत् आमु अरव्यरार्षे

IAST kime-ttiṅ-avyaya-ghād ām uṣv aravyārṣe

प्रकार विधि

सार किम्, एत्, तिङ्-अन्त, अव्यय और आ-अन्त से द्विवचन-बहुवचन (उष्) से पूर्व आम् का आगम होता है—आर्ष (वैदिक) छोड़कर।

5.4.12
अमु च छन्दसि

IAST amu ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में उक्त स्थान पर अमु भी (आगम) होता है।

5.4.13
अनुगादिनः ठक्

IAST anugādinaṣ ṭhak

प्रकार विधि

सार अनुगादिन् शब्द से ठक् प्रत्यय होता है।

5.4.14
णचः स्त्रियां अञ्

IAST ṇacaḥ striyām añ

प्रकार विधि

सार णच्-प्रत्ययान्त से स्त्री-लिङ्ग में अञ् प्रत्यय होता है।

5.4.15
अण् इनुणः

IAST aṇ inuṇaḥ

प्रकार विधि

सार इन् तथा उण् प्रत्ययान्त से (स्त्री-लिङ्ग में) अण् प्रत्यय होता है।

5.4.16
विसारिणः मत्स्ये

IAST visāriṇo matsye

प्रकार विधि

सार मत्स्य अर्थ में विसारिन् से (अण्) प्रत्यय होता है।

5.4.17
संख्यायाः क्रिया भ्याऋत्तिगणने कृत्वसुच्

IAST saṃkhyāyāḥ kriyābhyāvṛttigaṇane kṛtvasuc

प्रकार विधि

सार क्रिया की आवृत्ति-गणना में संख्यावाची से कृत्वसुच् प्रत्यय होता है।

5.4.18
द्वित्रिचतुर्भ्यां सुच्

IAST dvitricaturbhyaḥ suc

प्रकार विधि

सार द्वि, त्रि और चतुर् से (क्रियावृत्ति-गणना में) सुच् प्रत्यय होता है।

5.4.19
एकस्य सकृत् च

IAST ekasya sakṛc ca

प्रकार विधि

सार एक से सकृत् रूप होता है, तथा कृत्वसुच् भी।

5.4.20
विभाषा बहोर्धा विप्रऋष्- टकाले

IAST vibhāṣā bahor dhā viprakṛṣṭakāle

प्रकार विधि

सार विप्रकृष्ट (दूरस्थ) काल में बहु से वैकल्पिक धा प्रत्यय होता है।

5.4.21
तत् प्रकृतवचने मयट्

IAST tatprakṛtavacane mayaṭ

प्रकार विधि

सार तत्-प्रकृत (उस पदार्थ से निर्मित/मय) अर्थ में मयट् प्रत्यय होता है।

5.4.22
संऊहवत् च बहुषु

IAST saṃūhavac ca bahuṣu

प्रकार विधि

सार समूह अर्थ में तथा बहुतों का निर्देश होने पर भी मयट् होता है।

5.4.23
अनन्त आवसथ इतिह भेषजात् ञ्यः

IAST anantāvasathetihabheṣajāj ñyaḥ

प्रकार विधि

सार अनन्त, आवसथ, इतिह और भेषज से ञ्य प्रत्यय होता है।

5.4.24
देवत अन्तात् तादर्थ्ये यत्

IAST devatāntāt tādarthye yat

प्रकार विधि

सार देवता-अन्त शब्द से तादर्थ्य (उसके निमित्त) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

5.4.25
पाद अर्घाभ्यां च

IAST pādārghābhyāṃ ca

प्रकार विधि

सार पाद और अर्घ से भी तादर्थ्य अर्थ में यत् होता है।

5.4.26
अतिथेर्ञ्यः

IAST atither ṅyaḥ

प्रकार विधि

सार अतिथि शब्द से ञ्य प्रत्यय होता है (अतिथेय)।

5.4.27
देवात् तल्

IAST devāt tal

प्रकार विधि

सार देव शब्द से तल् प्रत्यय होता है (देवता)।

5.4.28
अवेः कः

IAST aveḥ kaḥ

प्रकार विधि

सार अवि शब्द से क प्रत्यय होता है (अविक)।

5.4.29
याव आदिभ्यः कन्

IAST yāva-ādibhyaḥ kan

प्रकार विधि

सार याव आदि गण के शब्दों से कन् प्रत्यय होता है।

5.4.30
लोहितात्मणौ

IAST lohitātmaṇau

प्रकार विधि

सार लोहित और आत्मन् से (कन् अनुवृत्ति से) कन् प्रत्यय होता है (लोहितक, आत्मक)।

5.4.31
वर्णे च अनित्ये

IAST varṇe cānitye

प्रकार विधि

सार अनित्य वर्णवाचक शब्द से भी कन् प्रत्यय होता है।

5.4.32
रक्ते

IAST rakte

प्रकार विधि

सार रक्त शब्द से कन् प्रत्यय होता है (रक्तक)।

5.4.33
कालात् च

IAST kālāc ca

प्रकार विधि

सार काल शब्द से भी कन् प्रत्यय होता है (कालक)।

5.4.34
विनय आदिभ्यः ठक्

IAST vinaya-ādibhyaḥ ṭhak

प्रकार विधि

सार विनय आदि गण के शब्दों से ठक् प्रत्यय होता है।

5.4.35
वाचः व्याहृत अर्थायां

IAST vācaḥ vyāhṛtārthāyām

प्रकार विधि

सार वाच् शब्द से, जब अर्थ व्याहृत (कथित विषय) हो, तद्धित-प्रत्यय (ठक्) होता है।

5.4.36
तद्युक्तात् कर्मणः अण्

IAST tadyuktāt karmaṇaḥ aṇ

प्रकार विधि

सार उस (पूर्वोक्त) से युक्त कर्मन् शब्द से अण् प्रत्यय होता है।

5.4.37
ओषधेरजातौ

IAST oṣadher ajātau

प्रकार विधि

सार ओषधि शब्द से, जब जाति-अर्थ न हो, अण् प्रत्यय होता है (औषध)।

5.4.38
प्रज्ञ आदिभ्यः च

IAST prajña-ādibhyaḥ ca

प्रकार विधि

सार प्रज्ञ आदि गण के शब्दों से भी अण् प्रत्यय होता है।

5.4.39
मृदः तिकन्

IAST mṛdaḥ tikan

प्रकार विधि

सार मृद् शब्द से तिकन् प्रत्यय होता है (मृत्तिका)।

5.4.40
सस्नौ प्रशंसायां

IAST sasnau praśaṃsāyām

प्रकार विधि

सार प्रशंसा-अर्थ में स और स्न — ये दो प्रत्यय होते हैं।

5.4.41
वृकज्येष्ठाह्यां तिल्तातिलौ च छन्दसि

IAST vṛka-jyeṣṭhāhyāṃ tiltātilau ca chandasi

प्रकार विधि

सार वृक, ज्येष्ठा और आहि से छन्दस् में तिल् तथा तातिल् प्रत्यय भी होते हैं।

5.4.42
बहु अल्प अर्थात्शः कारकाद् अन्यारयां

IAST bahv-alpārthāt śaḥ kārakād anyatarasyām

प्रकार विधि

सार बहु/अल्प अर्थ वाले शब्द से, कारक-भिन्न स्थिति में वैकल्पिक श(स्) प्रत्यय होता है (बहुशः, अल्पशः)।

5.4.43
संख्या एकवचणात् अ वीप्सायां

IAST saṃkhyā-ekavacanāt a vīpsāyām

प्रकार विधि

सार एकवचन संख्यावाचक से वीप्सा (वितरण/आवृत्ति) अर्थ में अ प्रत्यय होता है।

5.4.44
प्रतियोगे पञ्चम्याः तसिः

IAST pratiyoge pañcamyāḥ tasiḥ

प्रकार विधि

सार प्रतियोग-अर्थ में पञ्चमी के स्थाने तसि प्रत्यय होता है (तः)।

5.4.45
अप आदाने च अहीयरुहः

IAST apādāne cāhīyaruhḥ

प्रकार विधि

सार अपादान-अर्थ में भी तसि होता है, ही·इ·रुह के योग को छोड़कर।

5.4.46
अतिग्रह अव्यथन क्षेपेषु अकर्तरि तृतीयायाः

IAST atigraha-avyathana-kṣepeṣv akartari tṛtīyāyāḥ

प्रकार विधि

सार अतिग्रह, अव्यथन और क्षेप अर्थों में अकर्तृ तृतीया के स्थाने तसि होता है।

5.4.47
हीयंआनपापयोगात् च

IAST hīyamāna-pāpayogāc ca

प्रकार विधि

सार हीयमान और पाप के योग में भी (पूर्ववत् तसि) होता है।

5.4.48
षष्- ठ्या व्याश्रये

IAST ṣaṣṭhyā vyaśraye

प्रकार विधि

सार आश्रय-अर्थ में षष्ठी के स्थाने तसि होता है।

5.4.49
रोगात् च अपनयने

IAST rogāc cāpanayane

प्रकार विधि

सार रोगवाचक से, अपनयन (निवारण) अर्थ में भी तसि होता है।

5.4.50
कृ भू अस्तियोगे सम्पद्यार्तरि च्विः

IAST kṛ-bhū-astiyoge saṃpadyakartari cviḥ

प्रकार विधि

सार कृ, भू या अस् के योग में, संपन्न होने वाले कर्ता में च्वि प्रत्यय होता है (शुक्लीभवति इत्यादि)।

5.4.51
अरुः मनः चक्षुः चेतः रहः रजसां लोपः च

IAST arur-manaś-cakṣuś-ceto-raho-rajasāṃ lopaś ca

प्रकार विधि

सार च्वि-प्रत्यय के योग में अरुस्, मनस्, चक्षुस्, चेतस्, रहस् और रजस् — इनके अन्त्य वर्ण का लोप होता है।

5.4.52
विभाषा साति कार्त्स्न्ये

IAST vibhāṣā sāti kārtsnye

प्रकार विधि

सार कार्त्स्न्य (सम्पूर्णता/पूर्ण-परिणाम) अर्थ में वैकल्पिक रूप से साति-प्रत्यय होता है।

5.4.53
अभिविधौ सम्पदा च

IAST abhividhau sampadā ca

प्रकार विधि

सार अभिविधि (व्याप्ति/सर्वतोभाव) अर्थ में तथा सम्पद्-धातु के योग में भी (साति/च्वि-विषयक) विधान है।

5.4.54
तदध्- ईनवचने

IAST tad-adhīna-vacane

प्रकार विधि

सार “तत्-अधीन” — अधीनता/पराधीनता-वचन में (च्वि-साति आदि का) विधान है।

5.4.55
देये त्रा च

IAST deye trā ca

प्रकार विधि

सार देय (दान/देने योग्य) अर्थ में त्रा-प्रत्यय भी होता है।

5.4.56
देवमनुष्यपुरुषपुरुमर्त्येह्यः द्वितीयाअप्तयोर्बहुलं

IAST deva-manuṣya-puruṣa-puru-martyebhyo dvitīyā-saptamyor bahulam

प्रकार विधि

सार देव, मनुष्य, पुरुष, पुरु और मर्त्य से द्वितीया तथा सप्तमी के अर्थ में बहुलतः (च्वि आदि) होते हैं।

5.4.57
अव्यक्तानुकरणात् विअच् वर अर्धात् अनितौ डाच्

IAST avyaktānukaraṇād dvyaj-varārdhād anitau ḍāc

प्रकार विधि

सार अव्यक्त-ध्वनि के अनुकरण से, जो द्व्यच् या अर्ध (सार्ध) हो और “इति” न हो, वहाँ डाच् होता है।

5.4.58
कृञः द्वितीयतृतीयशम्बबीजात् कृषौ

IAST kṛño dvitīya-tṛtīya-śamba-bījāt kṛṣau

प्रकार विधि

सार कृषि-अर्थ में कृ-धातु के योग में द्वितीय, तृतीय, शम्ब और बीज से डाच् होता है।

5.4.59
संख्यायः गुण अन्तयाः

IAST saṃkhyāyā guṇāntāyāḥ

प्रकार विधि

सार गुण-अन्त संख्या-शब्द से (कृ-भू-अस् योग में) डाच् होता है।

5.4.60
समयात् च यापनायां

IAST samayāc ca yāpanāyām

प्रकार विधि

सार काल-यापन (टालना/समय गँवाना) अर्थ में समय से डाच् होता है।

5.4.61
सपत्त्रनिष्पत्रात्तियथ्ने

IAST sapattra-niṣpatrāt atiyatne

प्रकार विधि

सार अत्यन्त यत्न अर्थ में सपत्त्र और निष्पत्र से डाच् होता है।

5.4.62
निष्कुलात्निष्कोषणे

IAST niṣkulān niṣkoṣaṇe

प्रकार विधि

सार निष्कोषण (अन्तर्वस्तु/गर्भ निकालने) अर्थ में निष्कुल से डाच् होता है।

5.4.63
सुखप्रियात् आनुलोम्ये

IAST sukha-priyād ānulomye

प्रकार विधि

सार आनुलोम्य (अनुकूलता/अनुरूपता) अर्थ में सुख और प्रिय से डाच् होता है।

5.4.64
दुःखात् प्रातिलोम्ये

IAST duḥkhāt prātilomye

प्रकार विधि

सार प्रातिलोम्य (प्रतिकूलता/विरुद्धता) अर्थ में दुःख से डाच् होता है।

5.4.65
शूलात् पाके

IAST śūlāt pāke

प्रकार विधि

सार पाक (शूलादि पर पकाना) अर्थ में शूल से डाच् होता है।

5.4.66
सत्यात् अशपथे

IAST satyād aśapathe

प्रकार विधि

सार शपथ-भिन्न अर्थ में सत्य से डाच् होता है।

5.4.67
मद्रात् परिवापने

IAST madrāt parivāpane

प्रकार विधि

सार परिवापन (मुण्डन/केश-कर्तन) अर्थ में मद्र से डाच् होता है।

5.4.68
संआस अन्ताः

IAST samāsāntāḥ

प्रकार अधिकार

सार अब समास के अन्त में लगने वाले प्रत्ययों (समासान्त) का अधिकार आरम्भ होता है।

5.4.69
न पूजणात्

IAST na pūjanāt

प्रकार नियम

सार पूजन-वाचक पद के पश्चात् समासान्त-प्रत्यय नहीं होता।

5.4.70
किमः क्षेपे

IAST kimaḥ kṣepe

प्रकार विधि

सार क्षेप (तिरस्कार/निन्दा) अर्थ में किम् से समासान्त-प्रत्यय होता है।

5.4.71
नञः तत्पुरुषात्

IAST nañas tatpuruṣāt

प्रकार विधि

सार नञ्-पूर्वपद तत्पुरुष से समासान्त-प्रत्यय होता है।

5.4.72
पथः विभाषा

IAST patho vibhāṣā

प्रकार विधि

सार पथ् (पथिन्) से समासान्त-प्रत्यय वैकल्पिक होता है।

5.4.73
बह्व्रीहौ संख्येये डच् अबहुगणात्

IAST bahuvrīhau saṃkhyeye ḍac abahu-gaṇāt

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि में संख्येय अर्थ में, बहु और गण को छोड़कर, संख्या से डच् होता है।

5.4.74
ऋच् पुरप् धुर्पथां अ अनक्षे

IAST ṛc-pur-ap-dhūr-pathām a anakṣe

प्रकार विधि

सार अक्ष-भिन्न अवस्था में ऋच्, पुर्, अप्, धुर् और पथ् के अन्त में समासान्त अ होता है।

5.4.75
अच् प्रत्यन्ववपूर्वात् सामलोम्नः

IAST ac praty-anv-ava-pūrvāt sāma-lomnaḥ

प्रकार विधि

सार प्रति, अनु, अव या पूर्व से युक्त सामन् और लोमन् से समासान्त अच् होता है।

5.4.76
अक्ष्णः अदर्शणात्

IAST akṣṇaḥ adarśaṇāt

प्रकार विधि

सार समास में उत्तरपद अक्षि पर, जब अर्थ दर्शन/देखने का न हो, समासान्त अच् होता है।

5.4.77
अचतुर विचतुरसुचतुरस्त्रीउंसधेन्व्नडुह ऋकाम वाङनस अक्षिभ्रुव दारगव ऊर्व्ष्ठीवपदष्ठीवनक्तंइवरत्रि- ंदिव अहर्दिवसरजसनिःश्रेयसपुरुषायुसद्व्यायुषत्र्यायुष ऋगजुषजातोक्षमहोक्षवृद्धोक्ष उपशुनगोष्ठश्वाः

IAST acatura-vicatura-sucatura-strī-uṃsa-dhenv-anaḍuh-ṛk-āma-vāṅ-anas-akṣi-bhruva-dāra-gava-ūrv-aṣṭhīva-pad-aṣṭhīva-naktaṃ-iva-ratriṃ-diva-ahar-divasa-rajas-niḥśreyasa-puruṣāyusa-dvyāyuṣa-tryāyuṣa-ṛg-ajuṣa-jātokṣa-mahokṣa-vṛddhokṣa-upaśuna-goṣṭhaśvāḥ

प्रकार विधि

सार अचतुर, विचतुर, सुचतुर, स्त्री, उंस, धेनु, अनडुह्, ऋक्, आम, वाच्, अनस्, अक्षि, भ्रू, दार, गव, ऊरु, अष्ठीव, पद, अष्ठीवत्, नक्तम्, इव, रात्रि, दिव, अहर्, दिवस, रजस्, निःश्रेयस, पुरुषायुस्, द्व्यायुष्, त्र्यायुष्, ऋग्, अजुष्, जातोक्ष, महोक्ष, वृद्धोक्ष, उपशुन तथा गोष्ठश्व आदि पदों पर समासान्त अच् विहित है।

5.4.78
ब्रह्महस्तिभ्याम् वर्च्चसः

IAST brahmahastibhyām varccasaḥ

प्रकार विधि

सार ब्रह्मन् और हस्तिन् के साथ उत्तरपद वर्चस् होने पर समासान्त अच् होता है।

5.4.79
अवसमन्धेह्यः तमसः

IAST avasamandhebhyaḥ tamasaḥ

प्रकार विधि

सार अव, सम् तथा अन्ध-अर्थक पदों के साथ उत्तरपद तमस् होने पर समासान्त अच् होता है।

5.4.80
श्वसः वसीयः श्रेयसः

IAST śvasaḥ vasīyaḥ śreyasaḥ

प्रकार विधि

सार श्वस् के साथ उत्तरपद वसीयस् अथवा श्रेयस् होने पर समासान्त अच् होता है।

5.4.81
अनु अवतप्तात् रहसः

IAST anu avataptāt rahasaḥ

प्रकार विधि

सार अनु/अव-पूर्वक तप्त तथा रहस् पर समासान्त अच् होता है।

5.4.82
प्रतेरुरसः सप्तमीस्थात्

IAST prater urasaḥ saptamīstāt

प्रकार विधि

सार सप्तमी-अर्थ में स्थित प्रति के साथ उत्तरपद उरस् होने पर समासान्त अच् होता है।

5.4.83
अनुगवं आयामे

IAST anugavam āyāme

प्रकार विधि

सार आयाम (गो-संबंधी माप/विस्तार) के अर्थ में अनुगवम् रूप सिद्ध होता है।

5.4.84
द्विस्तावा त्रिस्तावा वेदिः

IAST dvistāvā tristāvā vediḥ

प्रकार विधि

सार वेदि के द्विगुण/त्रिगुण माप-अर्थ में द्विस्तावा और त्रिस्तावा रूप विहित हैं।

5.4.85
उपसर्गात् अध्वनः

IAST upasargāt adhvanaḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-पूर्वक उत्तरपद अध्वन् पर समासान्त अच् होता है।

5.4.86
तत्पुरुषस्य ङ्गुलेः संख्याअव्ययआदेः

IAST tatpuruṣasya ṅguleḥ saṃkhyāavyayaādeḥ

प्रकार विधि

सार तत्पुरुष में संख्या या अव्यय आदि पूर्वपद होने पर उत्तरपद अङ्गुलि पर समासान्त अच् होता है।

5.4.87
अहन् सर्व एकदेशसंख्यातपुण्यात् च रात्रेः

IAST ahan sarva ekadeśasaṃkhyātapuṇyāt ca rātreḥ

प्रकार विधि

सार अहन्, सर्व, एकदेश, संख्यात तथा पुण्य के साथ उत्तरपद रात्रि पर समासान्त अच् होता है।

5.4.88
अह्नः अह्नः एतेभ्यः

IAST ahnaḥ ahnaḥ etebhyaḥ

प्रकार विधि

सार उक्त पूर्वपदों के साथ समास में अहन् के स्थान पर अह्न रूप होता है।

5.4.89
न संख्या आदेः संआहारे

IAST na saṃkhyā ādeḥ saṃāhāre

प्रकार नियम

सार समाहार में संख्या पूर्वपद होने पर (उक्त अह्न-आदेश/समासान्त) नहीं होता।

5.4.90
उत्तम एकाभ्यां च

IAST uttama ekābhyāṃ ca

प्रकार नियम

सार उत्तम और एक पूर्वपद होने पर भी (उक्त अह्न-आदेश/समासान्त) नहीं होता।

5.4.91
राजाहस्सखिभ्यष्टच्

IAST rājāhassakhibhyaṣṭac

प्रकार विधि

सार राजन्, अहन् और सखि उत्तरपद होने पर समासान्त टच् होता है।

5.4.92
गोरतद्धितलुकि

IAST gor ataddhitaluki

प्रकार विधि

सार गो पर, जब तद्धित का लुक् हो चुका हो, समासान्त टच् होता है।

5.4.93
अग्र आख्यायां उरसः

IAST agra ākhyāyām urasaḥ

प्रकार विधि

सार अग्र-युक्त आख्या (संज्ञा/नाम) में उत्तरपद उरस् पर समासान्त टच् होता है।

5.4.94
अनोऽश्मायस्सरसाम् जातिसंज्ञयोः

IAST ano'śmāyassarāsām jātisaṃjñayoḥ

प्रकार विधि

सार जाति और संज्ञा में अश्मन्, अयस् तथा सरस् (अन्-अन्त) पर समासान्त टच् होता है।

5.4.95
ग्रामकौटाह्यां च तक्ष्णः

IAST grāmakauṭābhyāṃ ca takṣṇaḥ

प्रकार विधि

सार ग्राम और कौट पूर्वपद होने पर उत्तरपद तक्षन् पर भी समासान्त टच् होता है।

5.4.96
अतेः शूनः

IAST ateḥ śūnaḥ

प्रकार विधि

सार अति पूर्वपद होने पर उत्तरपद श्वन् पर समासान्त टच् होता है।

5.4.97
उपमाणात् अप्राणिषु

IAST upamāṇāt aprāṇiṣu

प्रकार विधि

सार अप्राणि-विषय में उपमान-अर्थ में (पूर्व-परंपरा से श्वन् आदि पर) समासान्त टच् होता है।

5.4.98
उत्तर मृगऊर्वात् च सक्थ्नः

IAST uttara mṛgaūrvāt ca sakthnaḥ

प्रकार विधि

सार उत्तर, मृग तथा ऊरु पूर्वपद होने पर उत्तरपद सक्थिन् पर समासान्त टच् होता है।

5.4.99
नावः द्विगोः

IAST nāvaḥ dvigoḥ

प्रकार विधि

सार द्विगु समास में उत्तरपद नौ पर समासान्त टच् होता है।

5.4.100
अर्धात् च

IAST ardhāt ca

प्रकार विधि

सार अर्ध पूर्वपद होने पर भी (नौ पर) समासान्त टच् होता है।

5.4.101
खार्याः प्राचां

IAST khāryāḥ prācām

प्रकार विधि

सार पूर्वीय आचार्यों के मत में समास में खारी के परे टच् समासान्त होता है (द्विखारम्, त्रिखारम्)।

5.4.102
द्वित्रिह्यां अञ्जलेः

IAST dvitribhyām añjaleḥ

प्रकार विधि

सार द्वि और त्रि से परे अञ्जलि पर टच् समासान्त होता है (द्व्यञ्जलम्, त्र्यञ्जलम्)।

5.4.103
अनसन्तात् नपुंसकात् छन्दसि

IAST anasantān napuṃsakāc chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अन्-अन्त नपुंसक पद से (समास में) टच् समासान्त होता है।

5.4.104
ब्रह्मणः जानपद आख्यायां

IAST brahmaṇo jānapadākhyāyām

प्रकार विधि

सार जानपद-संज्ञा में प्रयुक्त ब्रह्मन् से परे समासान्त टच् होता है।

5.4.105
कुमहत् भ्यां अन्यारयाम्

IAST kumahadbhyām anyatarasyām

प्रकार विधि

सार कु और महत् से परे (ब्रह्मन् पर) टच् समासान्त अन्यतरस्याम्—वैकल्पिक—होता है।

5.4.106
द्वंद्वात् चुदष हन्तात्संआआरे

IAST dvandvāc cudaṣahantāt samāhāre

प्रकार विधि

सार समाहार-द्वन्द्व में च्, उ, द्, ष् अथवा हन्-अन्त उत्तरपद से टच् समासान्त होता है।

5.4.107
अव्ययीभावे शरद् रभृतिभ्यः

IAST avyayībhāve śaratprabhṛtibhyaḥ

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में शरद्-प्रभृति गणपठित शब्दों से परे समासान्त टच् होता है।

5.4.108
अनः च

IAST anaś ca

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में अन्-अन्त पद से भी टच् समासान्त होता है।

5.4.109
नपुंसकात् अन्य्तरस्यां

IAST napuṃsakād anyatarasyām

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में नपुंसक से टच् समासान्त अन्यतरस्याम्—वैकल्पिक—होता है।

5.4.110
नदीपौर्णमासीआग्रआयणीह्यः

IAST nadīpaurṇamāsyāgrahāyaṇībhyaḥ

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में नदी, पौर्णमासी और आग्रहायणी से परे समासान्त टच् होता है।

5.4.111
झयः

IAST jhayaḥ

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में झय्-वर्णान्त से परे समासान्त टच् होता है।

5.4.112
गिरेः च सेनकस्य

IAST gireś ca senakasya

प्रकार विधि

सार सेनक के मत में अव्ययीभाव में गिरि से भी टच् समासान्त होता है।

5.4.113
बहुव्रीहौ सक्थि अक्ष्णोः स्व ङ्गात् षच्

IAST bahuvrīhau sakthyakṣṇoḥ svāṅgāt ṣac

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि में स्वाङ्गवाची सक्थि और अक्षि के अवसान पर षच् समासान्त-प्रत्यय होता है।

5.4.114
अङ्गुलेर्दारु- णि

IAST aṅguler dāruṇi

प्रकार विधि

सार दारु (काष्ठ-वस्तु) अर्थ वाले बहुव्रीहि में अङ्गुलि के बाद षच् होता है।

5.4.115
द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः

IAST dvitribhyāṃ ṣa mūrdhnaḥ

प्रकार विधि

सार द्वि और त्रि से परे मूर्धन् पर ष (षच्) समासान्त होता है (द्विमूर्धः, त्रिमूर्धः)।

5.4.116
अप् पूरण्- ईप्रमाण्योः

IAST ap pūraṇīpramāṇyoḥ

प्रकार विधि

सार पूरणी (पूरण/आवृत्ति) और प्रमाण अर्थ वाले समास में अप् समासान्त-प्रत्यय होता है।

5.4.117
अन्तर्बहिर्भ्यां च लोम्नः

IAST antarbahirbhyāṃ ca lomnaḥ

प्रकार विधि

सार अन्तर् और बहिर् के परे लोमन् के बाद भी (पूर्ववत्) समासान्त ष/षच् होता है।

5.4.118
अच् नासिकायाः संज्ञायां नसं च अस्थूले

IAST ac nāsikāyāḥ saṃjñāyāṃ nasaṃ cāsthūle

प्रकार विधि

सार संज्ञा में नासिका के बाद अच् होता है, और स्थूल-भिन्न अर्थ में नस्-आदेश भी (विकल्प से) होता है।

5.4.119
उपसर्गात् च

IAST upasargāc ca

प्रकार विधि

सार उपसर्ग से परे (नासिका पर) भी पूर्व-सूत्र का अच्/नस्-विधान लागू होता है।

5.4.120
सुप्रातसुश्वसुदिवशारिकुक्षचतुरश्र एणीपद अजपदप्रोष्ठादाः

IAST suprātasuśvasudivaśārikukṣicaturaśraeṇīpadājapadaproṣṭhapadāḥ

प्रकार विधि

सार सुप्रात्, सुश्व, सुदिव, शारि, कुक्षि, चतुरश्र, एणीपद्, अजपद् और प्रोष्ठपद् — इनके अवसान पर (बहुव्रीहि में) अच् समासान्त होता है।

5.4.121
नञ्दुस्सुह्यः हलिसक्थ्योरन्यतरयां

IAST nañduḥsubhyo halisakthyor anyatarasyām

प्रकार विधि

सार नञ्, दुर् और सु से परे हलि तथा सक्थि पर अच् समासान्त अन्यतरस्याम्—वैकल्पिक—होता है।

5.4.122
नित्यं असिच् प्रजामेधयोः

IAST nityam asic prajāmedhayoḥ

प्रकार विधि

सार प्रजा और मेध से नित्य असिच् समासान्त होता है (बहुप्रजस्, महामेधस्)।

5.4.123
बहुप्रजाः छन्दसि

IAST bahuprajāś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में बहुप्रजाः रूप (पूर्व-विधान का वैदिक विशेष) सिद्ध होता है।

5.4.124
धर्ंआत् अनिच् केवलात्

IAST dharmād anic kevalāt

प्रकार विधि

सार केवल (अविशेषित) धर्म से अनिच् समासान्त होता है (सधर्मा इत्यादि)।

5.4.125
जम्भा सुहरिततृणसोमेह्यः

IAST jambhā suharitatṛṇasomebhyaḥ

प्रकार विधि

सार सु, हरित, तृण और सोम से (बहुव्रीहि में) जम्भ समासान्त/अन्त-रूप होता है (सुजम्भः इत्यादि)।

5.4.126
दक्षिणेर्मा लुब्धयोगे

IAST dakṣiṇermā lubdhayoge

प्रकार विधि

सार लुब्ध (व्याध) के योग में दक्षिणेर्मा-रूप निपातित होता है (दक्षिण से गमनशील लुब्धार्थक समास)।

5.4.127
इच् कर्मव्यतिहारे

IAST ic karmavyatihāre

प्रकार विधि

सार कर्मव्यतिहार (परस्पर-क्रिया) अर्थ वाले समास में समासान्त इच् प्रत्यय होता है (केशाकेशि)।

5.4.128
द्विदण्डि आदिभ्यः च

IAST dvidaṇḍyādibhyaś ca

प्रकार विधि

सार द्विदण्डि-आदिगण के शब्दों से भी (कर्मव्यतिहारार्थक) समासान्त इच् होता है।

5.4.129
प्रसम्भ्यां जानुनोर्ज्ञुः

IAST prasambhyāṃ jānunor jñuḥ

प्रकार विधि

सार प्र और सम् के परे समास में जानु के स्थान पर ज्ञु आदेश होता है (प्रज्ञुः, संज्ञुः)।

5.4.130
ऊर्ध्वात् विभाषा

IAST ūrdhvād vibhāṣā

प्रकार विधि

सार ऊर्ध्व के परे जानु को ज्ञु आदेश वैकल्पिक है (ऊर्ध्वज्ञुः / ऊर्ध्वजानुः)।

5.4.131
ऊधसः अनङ्

IAST ūdhaso 'naṅ

प्रकार विधि

सार समास में ऊधस् के स्थान पर अनङ् आदेश होता है (ऊधन्-रूप)।

5.4.132
धनुषः च

IAST dhanuṣaś ca

प्रकार विधि

सार धनुस् को भी (समास में) अनङ् आदेश होता है (धन्वन्-रूप)।

5.4.133
वा संज्ञायां

IAST vā saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में (ऊधस्/धनुस् पर) अनङ् वैकल्पिक होता है।

5.4.134
जायायाः निङ्

IAST jāyāyā niṅ

प्रकार विधि

सार समास में जाया के स्थान पर निङ् आदेश होता है (जानि; यथा युवजानि)।

5.4.135
गन्धस्य इत् उद् पूतिसुसुरभिह्यः

IAST gandhasyed utpūtisusurabhibhyaḥ

प्रकार विधि

सार उद्, पूति, सु और सुरभि के परे समास में गन्ध के स्थान पर इत् (इद्) आदेश होता है (उद्गन्धि, पूतिगन्धि, सुगन्धि, सुरभिगन्धि)।

5.4.136
अल्प आख्यायां

IAST alpākhyāyām

प्रकार विधि

सार अल्प की आख्या (अल्पार्थक पूर्वपद) होने पर भी गन्ध को इद् आदेश होता है (अल्पगन्धि)।

5.4.137
उपमाणात् च

IAST upamānāc ca

प्रकार विधि

सार उपमानवाचक पूर्वपद से भी गन्ध को इद् आदेश होता है (यथा पद्मगन्धि)।

5.4.138
पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः

IAST pādasya lopo 'hastyādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार हस्त्यादि-गणेतर पूर्वपद के परे बहुव्रीहि में ‘पाद’ के आकार का लोप होता है (द्विपद् आदि; हस्तिपाद अबाधित)।

5.4.139
कुम्भपद्- ईषु च

IAST kumbhapadīṣu ca

प्रकार विधि

सार कुम्भपदी-आदि रूपों में भी ‘पाद’ का वही आकार-लोप लागू होता है।

5.4.140
संख्यासुपूर्वस्य

IAST saṃkhyāsupūrvasya

प्रकार विधि

सार संख्या या सु पूर्वपद वाले (समास में) पाद का लोप होता है (द्विपात्, सुपात्)।

5.4.141
वयसि दन्तस्य दतृ

IAST vayasi dantasya datṛ

प्रकार विधि

सार वय (आयु) कथन में समास में दन्त के स्थान पर दतृ आदेश होता है (द्विदन्, त्रिदन्)।

5.4.142
छन्दसि च

IAST chandasi ca

प्रकार विधि

सार छन्दस् में भी ‘दन्त’ को ‘दतृ’ प्राप्त होता है (वय-सीमा के बिना भी)।

5.4.143
स्त्रियां संज्ञायां

IAST striyāṃ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार स्त्रीलिङ्ग संज्ञा में ‘दन्त’ के स्थान पर ‘दतृ’ होता है।

5.4.144
विभाषा श्याव अरोकाभ्यां

IAST vibhāṣā śyāvārokābhyām

प्रकार विधि

सार ‘श्याव’ और ‘अरोक’ पूर्वपद से ‘दन्त’ को विभाषा ‘दतृ’ मिलता है।

5.4.145
अग्र अन्तशुद्धशुभ्रवृषवराहेह्यस

IAST agrāntaśuddhaśubhravṛṣavarāhehyasaḥ

प्रकार विधि

सार अग्र, अन्त, शुद्ध, शुभ्र, वृष, वराह और एह्यस् के परे ‘दन्त’ को ‘दतृ’ आदेश होता है।

5.4.146
ककुदस्य अवस्थायां लोपः

IAST kakudasyāvasthāyāṃ lopaḥ

प्रकार विधि

सार अवस्था अर्थ में समास में ककुद का (अन्त्य) लोप होता है (उच्चैःककुत्)।

5.4.147
त्रिककुद् पर्वते

IAST trikakud parvate

प्रकार विधि

सार पर्वत-अर्थ में ‘त्रिककुद्’ रूप सिद्ध/अबाधित रहता है (ककुद-लोप का विशेष)।

5.4.148
उद् विभ्यां काकुदस्य

IAST udvibhyāṃ kākudasya

प्रकार विधि

सार उद् और वि के परे समास में काकुद का (अन्त्य) लोप होता है (उक्काकुत्, विकाकुत्)।

5.4.149
पूर्णात् विभाषा

IAST pūrṇād vibhāṣā

प्रकार विधि

सार पूर्ण के परे काकुद का लोप वैकल्पिक है (पूर्णकाकुत् / पूर्णकाकुद)।

5.4.150
सुहृद् दुर्हृदौ मित्र अमित्रयोः

IAST suhṛddurhṛdau mitrāmitrayoḥ

प्रकार विधि

सार मित्र और अमित्र अर्थ में क्रमशः सुहृद् और दुर्हृद् रूप निपातित/प्रयुक्त होते हैं।

5.4.151
उरः प्रभृतिभ्यः कप्

IAST uraḥ-prabhṛtibhyaḥ kap

प्रकार विधि

सार उरस्-प्रभृति गण के शब्दों के परे समासान्त में कप् प्रत्यय होता है।

5.4.152
इनः स्त्रियां

IAST inaḥ striyām

प्रकार विधि

सार इन्-अन्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में कप् प्रत्यय होता है।

5.4.153
नदी ऋतः च

IAST nadī-ṛtaś ca

प्रकार विधि

सार नदीसंज्ञक और ऋकारान्त शब्दों से भी कप् प्रत्यय होता है।

5.4.154
शेषात् विभाषा

IAST śeṣād vibhāṣā

प्रकार विधि

सार शेष (पूर्व-निर्दिष्टों से भिन्न) शब्दों से विकल्प से कप् प्रत्यय होता है।

5.4.155
न संज्ञायां

IAST na saṃjñāyām

प्रकार नियम

सार संज्ञा में (पूर्वोक्त विकल्प से) कप् नहीं होता।

5.4.156
ईयसः च

IAST īyasaś ca

प्रकार नियम

सार ईयस्-अन्त से भी कप् नहीं होता।

5.4.157
वन्दिते भ्रातुः

IAST vandite bhrātuḥ

प्रकार विधि

सार वन्दित (पूज्य/वन्दनीय) अर्थ में भ्रातृ से कप् प्रत्यय होता है।

5.4.158
ऋतः छन्दसि

IAST ṛtaś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में ऋकारान्त से कप् प्रत्यय होता है।

5.4.159
नाडीतन्त्र्योः स्व अङ्गे

IAST nāḍītantryoḥ svāṅge

प्रकार विधि

सार नाडी और तन्त्री से स्वाङ्ग अर्थ में कप् प्रत्यय होता है।

5.4.160
निष्प्रवाणिः च

IAST niṣpravāṇiś ca

प्रकार विधि

सार निष्प्रवाणि से भी कप् प्रत्यय होता है।

अध्याय 6 · पाद 1 (223 सूत्र)

6.1.1
एक अचः द्वे प्रथमस्य

IAST ekāco dve prathamasya

प्रकार विधि

सार एकाच् (एक-स्वर) धातु/आधार के प्रथम भाग का द्वित्व होता है।

6.1.2
अच् आदेर्द्वितीयस्य

IAST aca āder dvitīyasya

प्रकार विधि

सार द्वितीय अक्षर के अच्-आदि भाग का द्वित्व होता है।

6.1.3
न न्द्राः संयोग आदयः

IAST na ndrāḥ saṃyogādayaḥ

प्रकार विधि

सार संयोग के आदि में स्थित न्, द्, र् द्वित्व-विषय में आदि नहीं माने जाते।

6.1.4
पूर्वः अभ्यासः

IAST pūrvo 'bhyāsaḥ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार द्वित्व में पूर्व भाग की सञ्ज्ञा अभ्यास होती है।

6.1.5
उभे अभ्यस्तं

IAST ubhe abhyastam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार अभ्यास और उत्तर—दोनों की सञ्ज्ञा अभ्यस्त होती है।

6.1.6
जक्षिति आदयः षट्

IAST jakṣityādayaḥ ṣaṭ

प्रकार सञ्ज्ञा

सार जक्षि आदि छह धातुओं की भी अभ्यस्त-सञ्ज्ञा होती है।

6.1.7
तुजादीनां दीर्घः अभ्यासस्य

IAST tujādīnāṃ dīrgho 'bhyāsasya

प्रकार विधि

सार तुज्-आदि धातुओं के अभ्यास का दीर्घ होता है।

6.1.8
लिटि धातोरनभ्यासस्य

IAST liṭi dhātor anabhyāsasya

प्रकार विधि

सार लिट् में अनभ्यस्त धातु का द्वित्व होता है।

6.1.9
सन्यङोः

IAST sanyaṅoḥ

प्रकार विधि

सार सन् और यङ् के परे भी धातु का द्वित्व होता है।

6.1.10
श्लौ

IAST ślau

प्रकार विधि

सार श्लु के परे भी धातु का द्वित्व होता है।

6.1.11
चङि

IAST caṅi

प्रकार विधि

सार चङ् के परे भी धातु का द्वित्व होता है।

6.1.12
दाश्वान् साह्वान् मीढ्वान् च

IAST dāśvān sāhvān mīḍhvāṃś ca

प्रकार विधि

सार दाश्वान्, साह्वान् और मीढ्वान्—ये रूप निपातित हैं।

6.1.13
ष्यङः सम्प्रसारणं पुत्रपत्योः तत्पुरुषे

IAST ṣyaṅaḥ samprasāraṇaṃ putrapatyoṣ tatpuruṣe

प्रकार विधि

सार तत्पुरुष में पुत्र और पति के साथ ष्यङ् का सम्प्रसारण होता है।

6.1.14
बन्धुनि बहुव्रीहौ

IAST bandhuni bahuvrīhau

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि में बन्धु के साथ भी ष्यङ् का सम्प्रसारण होता है।

6.1.15
वचिस्वपियज आदिणां किति

IAST vacisvapiyajādīnāṃ kiti

प्रकार विधि

सार वच्, स्वप्, यज् आदि धातुओं का कित् प्रत्यय पर सम्प्रसारण होता है।

6.1.16
ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्- टिविचतिवृश्चतिपृछ्हतिभृज्जतीणां ङ्- इति च

IAST grahijyāvayivyadhivaṣṭivicativṛścatipṛcchatibhṛjjatīnāṃ ṅiti ca

प्रकार विधि

सार ग्रह्, ज्या, वय्, व्यध्, वश्, विच्, वृश्च्, पृच्छ्, भृज्ज् का ङित् पर भी सम्प्रसारण होता है।

6.1.17
लिटि अभ्यासस्य उभयेषां

IAST liṭy abhyāsasyobhayeṣām

प्रकार विधि

सार लिट् में उभय वर्गों (६.१.१५–१६) के अभ्यास का सम्प्रसारण होता है।

6.1.18
स्वापेः चङि

IAST svāpeś caṅi

प्रकार विधि

सार स्वप् धातु का चङ् पर सम्प्रसारण होता है।

6.1.19
स्वपिस्यमिव्येञां यङि

IAST svapisyamivyeñāṃ yaṅi

प्रकार विधि

सार स्वप्, स्यम् और व्येङ् का यङ् पर सम्प्रसारण होता है।

6.1.20
न वशः

IAST na vaśaḥ

प्रकार विधि

सार वश् धातु का (पूर्व-सूत्र-विहित) सम्प्रसारण नहीं होता।

6.1.21
चायः की

IAST cāyaḥ kī

प्रकार विधि

सार चाय् धातु को की आदेश होता है।

6.1.22
स्फ्सायः स्फी निष्ठायां

IAST sphāyaḥ sphī niṣṭhāyām

प्रकार विधि

सार निष्ठा में स्फाय् धातु को स्फी आदेश होता है।

6.1.23
स्त्यः प्रपूर्वस्य

IAST styaḥ prapūrvasya

प्रकार विधि

सार प्र-पूर्वक स्त्यै/स्त्य धातु को (निष्ठा-प्रसंग में) आदेश होता है।

6.1.24
द्रवमूर्तिस्पर्शयोः श्यः

IAST dravamūrtisparśayoḥ śyaḥ

प्रकार विधि

सार द्रवमूर्ति (द्रव का जमना) और स्पर्श अर्थ में श्यै धातु विहित है।

6.1.25
प्रतेः च

IAST prateś ca

प्रकार विधि

सार प्रति-पूर्वक श्यै पर भी (पूर्व-सूत्र का) विधान लागू होता है।

6.1.26
विभाषा अभि अवपूर्वस्य

IAST vibhāṣā abhy-ava-pūrvasya

प्रकार विधि

सार अभि या अव पूर्व में रहने पर (अनिदित् धातु की हल-उपधा का) लोप वैकल्पिक होता है।

6.1.27
शृतं पाके

IAST śṛtaṃ pāke

प्रकार विधि

सार पाक-अर्थ में «शृत» रूप निपातन से सिद्ध माना जाता है।

6.1.28
प्यायः पी

IAST pyāyaḥ pī

प्रकार विधि

सार प्याय् धातु के स्थान पर सम्प्रसारण से «पी» आदेश होता है।

6.1.29
लिट् यङोः च

IAST liṭ yṅoḥ ca

प्रकार विधि

सार प्याय् का «पी» आदेश लिट् और यङ् पर भी होता है।

6.1.30
विभाषा श्वेः

IAST vibhāṣā śveḥ

प्रकार विधि

सार श्वि धातु का सम्प्रसारण वैकल्पिक है।

6.1.31
णौ च सन् चङोः

IAST ṇau ca san-caṅoḥ

प्रकार विधि

सार णिच् पर तथा सन् और चङ् पर भी (श्वि/पूर्व-क्रम का) सम्प्रसारण होता है।

6.1.32
ह्वः सम्प्रसारणं

IAST hvaḥ samprasāraṇam

प्रकार विधि

सार ह्वे धातु को सम्प्रसारण होता है।

6.1.33
अभ्यस्तस्य च

IAST abhyastasya ca

प्रकार विधि

सार अभ्यस्त (द्विरुक्त) रूप को भी सम्प्रसारण होता है।

6.1.34
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में सम्प्रसारण बहुल (विविध/अनियमित) रूप से होता है।

6.1.35
चायः की

IAST cāyaḥ kī

प्रकार विधि

सार चाय् धातु के स्थान पर सम्प्रसारण से «की» आदेश होता है।

6.1.36
अपस्पृधेथाम् आनृचुः आनृहुस्चिच्युषेतित्याजश्राताःश्रितम् आशीर्तः

IAST apaspṛdhethām ānṛcuḥ ānṛhuś cicyuṣe tityāja śrātāḥ śritam āśīrtaḥ

प्रकार विधि

सार अपस्पृधेथाम्, आनृचुः, आनृहुः, चिच्युषे, तित्याज, श्राताः, श्रितम्, आशीर्तः — ये वैदिक रूप निपातन से सिद्ध हैं।

6.1.37
न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणं

IAST na samprasāraṇe samprasāraṇam

प्रकार नियम

सार एक बार सम्प्रसारण हो चुके पर पुनः सम्प्रसारण नहीं होता।

6.1.38
लिटि वयो यः

IAST liṭi vayo yaḥ

प्रकार विधि

सार लिट् में वे धातु को «य» (सम्प्रसारण-पक्ष) आदेश होता है।

6.1.39
वः च अस्य अन्यतरस्यां किति

IAST vaḥ ca asya anyatarasyāṃ kiti

प्रकार विधि

सार कित् प्रत्यय पर वे के इस «य» के स्थान पर वैकल्पिक रूप से «व» भी रहता है।

6.1.40
वेञः

IAST veñaḥ

प्रकार विधि

सार वेञ् धातु को (पूर्व-क्रम से) सम्प्रसारण होता है।

6.1.41
ल्यपि च

IAST lyapi ca

प्रकार विधि

सार ल्यप् पर भी (वेञ् आदि का) सम्प्रसारण होता है।

6.1.42
ज्यः च

IAST jyaḥ ca

प्रकार विधि

सार ज्या धातु को भी सम्प्रसारण होता है।

6.1.43
व्यः च

IAST vyaḥ ca

प्रकार विधि

सार व्ये धातु को भी सम्प्रसारण होता है।

6.1.44
विभाषा परेः

IAST vibhāṣā pareḥ

प्रकार विधि

सार पॄ धातु का सम्प्रसारण वैकल्पिक है।

6.1.45
आत् एचः उपदेशे अश्- इति

IAST āt ecaḥ upadeśe aś-iti

प्रकार विधि

सार उपदेश में एच् (ए ओ ऐ औ) के स्थान पर, अश्-इत् भिन्न प्रत्यय पर, «आ» आदेश होता है।

6.1.46
न व्यः लिटि

IAST na vyaḥ liṭi

प्रकार नियम

सार लिट् में व्ये धातु को यह «आ» आदेश नहीं होता।

6.1.47
स्फुरतिस्फुलत्योर्घञि

IAST sphurati-sphulatyor ghañi

प्रकार विधि

सार स्फुरति और स्फुलति को घञ् पर «आ» आदेश होता है।

6.1.48
क्रीइङ्जीणां णौ

IAST krī-īṅ-jīṇāṃ ṇau

प्रकार विधि

सार क्री, इङ् और जी धातुओं को णिच् पर «आ» आदेश होता है।

6.1.49
सिध्यतेरपारलौकिके

IAST sidhyater apāralaukike

प्रकार विधि

सार सिध् (सिध्यति) को अपारलौकिक अर्थ में «आ» आदेश होता है।

6.1.50
मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च

IAST mīnāti-minoti-dīṅāṃ lyapi ca

प्रकार विधि

सार मीनाति, मिनोति और दीङ् को, तथा ल्यप् पर भी, «आ» आदेश होता है।

6.1.51
विभाषा लीयतेः

IAST vibhāṣā līyateḥ

प्रकार विधि

सार ली धातु के इकार के स्थान पर णिच् परे वैकल्पिक रूप से आ-आदेश होता है।

6.1.52
खिदेः छन्दसि

IAST khideḥ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक) में खिद् धातु के इकार के स्थान पर णिच् परे आ-आदेश होता है।

6.1.53
अपगुरो णमुलि

IAST apaguro ṇamuli

प्रकार विधि

सार अपगुर धातु के उकार के स्थान पर णमुल् परे आ-आदेश होता है।

6.1.54
चिस्फुरोर्णौ

IAST cissphuror ṇau

प्रकार विधि

सार चि और स्फुर् धातुओं के इ/उ के स्थान पर णिच् परे आ-आदेश होता है।

6.1.55
प्रजने वीयतेः

IAST prajane vīyateḥ

प्रकार विधि

सार प्रजन (उत्पत्ति/जनन) अर्थ में वी धातु के ईकार के स्थान पर णिच् परे आ-आदेश होता है।

6.1.56
बिभेतेर्हेतुभये

IAST bibheter hetubhaye

प्रकार विधि

सार हेतु-भय (किसी कारण/साधन से भय) अर्थ में भी धातु के ईकार के स्थान पर णिच् परे आ-आदेश होता है।

6.1.57
नित्यं स्मयतेः

IAST nityaṃ smayateḥ

प्रकार नियम

सार स्मि धातु के इकार के स्थान पर णिच् परे नित्य आ-आदेश होता है।

6.1.58
सृजिदृशोर्झलि अम् अकिति

IAST sṛjidṛśor jhali am akiti

प्रकार विधि

सार सृज् और दृश् धातुओं से कित्-भिन्न झलादि प्रत्यय परे अम्-आगम होता है।

6.1.59
अनुदात्तस्य च ऋत् पधस्य न्यतरस्यां

IAST anudāttasya ca ṛt-upadhasya anyatarasyām

प्रकार विधि

सार अनुदात्त स्वर वाले तथा ऋदुपध धातु से कित्-भिन्न झलादि परे वैकल्पिक अम्-आगम होता है।

6.1.60
शीर्षन् छन्दसि

IAST śīrṣan chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में शिरस् के स्थान पर शीर्षन् आदेश होता है।

6.1.61
ये च तद्धिते

IAST ye ca taddhite

प्रकार विधि

सार य-प्रत्यय परे तथा तद्धित में भी शिरस् के स्थान पर शीर्षन् आदेश होता है।

6.1.62
अचि शीर्षः

IAST aci śīrṣaḥ

प्रकार विधि

सार अच् (स्वर) परे शिरस् के स्थान पर शीर्ष आदेश होता है।

6.1.63
पद्दत्नः माः हृद् निश् असन् यूषन् दोषन् यकन् शकनुदन् आसन् शस्प्रभृतिषु

IAST pad-dat-nās-mās-hṛd-niś-asan-yūṣan-doṣan-yakan-śakan-udan-āsañ śas-prabhṛtiṣu

प्रकार विधि

सार शस्-प्रभृति प्रत्ययों परे पाद्/दन्त्/नासिका/मांस/हृदय/निशा/असृज्/यूष/दोष/यकृत्/शकृत्/उदक/आस्य के स्थान पर क्रमशः पद्/दत्/नास्/मास्/हृद्/निश्/असन्/यूषन्/दोषन्/यकन्/शकन्/उदन्/आसन् आदेश होते हैं।

6.1.64
धात्व् आदेः षः सः

IAST dhātv-ādeḥ ṣaḥ saḥ

प्रकार विधि

सार धातु के आदि षकार के स्थान पर सकार आदेश होता है।

6.1.65
णः नः

IAST ṇaḥ naḥ

प्रकार विधि

सार धातु के आदि णकार के स्थान पर नकार आदेश होता है।

6.1.66
लोपो व्योर्वलि

IAST lopo vyor vali

प्रकार विधि

सार वल्-आदि प्रत्यय परे वकार और यकार का लोप होता है।

6.1.67
वेरपृक्तस्य

IAST ver apṛktasya

प्रकार विधि

सार अपृक्त (एकवर्ण-शेष) वि का लोप होता है।

6.1.68
हल् ङी आप् भ् यः दीर्घात् सुतिसि अपृक्तं हल्

IAST halṅyābbhyo dīrghāt sutisy apṛktaṃ hal

प्रकार विधि

सार हल्/ङी/आप्-अन्त दीर्घ से परे सु-ति-सि के अपृक्त हल् का लोप होता है।

6.1.69
एङ् ह्रस्वात् सम्बुद्धेः

IAST eṅ hrasvāt sambuddheḥ

प्रकार विधि

सार ह्रस्व एङ्-अन्त से परे सम्बुद्धि (सम्बोधन) सु का लोप होता है।

6.1.70
शेः छन्दसि बहुलं

IAST śeḥ chandasi bahulam

प्रकार विधि

सार छन्दस् में शि-प्रत्यय का बहुल लोप होता है।

6.1.71
ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्

IAST hrasvasya piti kṛti tuk

प्रकार विधि

सार ह्रस्व से परे पित् कृत्-प्रत्यय में तुक्-आगम होता है।

6.1.72
संहितायां

IAST saṃhitāyām

प्रकार अधिकार

सार आगे के सन्धि-कार्य संहिता (सन्निकर्ष) में लागू होते हैं—यह अधिकार-सूत्र है।

6.1.73
छे च

IAST che ca

प्रकार विधि

सार संहिता में ह्रस्व से परे छकार आने पर भी तुक्-आगम होता है।

6.1.74
आङ्माङोः च

IAST āṅ-māṅoś ca

प्रकार विधि

सार आङ् और माङ् से परे भी (छकार परे) तुक्-आगम होता है।

6.1.75
दीर्घात्

IAST dīrghāt

प्रकार विधि

सार दीर्घ स्वर से परे भी (छकार परे संहिता में) तुक्-आगम होता है।

6.1.76
पद अन्तात् वा

IAST padāntād vā

प्रकार विधि

सार पद के अन्त में स्थित ह्रस्व स्वर से परे छ् पर टुक् का आगम वैकल्पिक होता है।

6.1.77
इकः यण् अचि

IAST iko yaṇ aci

प्रकार विधि

सार इक् (इ उ ऋ ऌ और उनके दीर्घ) के स्थान पर अच् (स्वर) परे होने पर यण् (य् व् र् ल्) आदेश होता है।

6.1.78
एचः अयवायावः

IAST eco 'yavāyāvaḥ

प्रकार विधि

सार एच् (ए ओ ऐ औ) के स्थान पर अच् परे होने पर क्रमशः अय् अव् आय् आव् आदेश होते हैं।

6.1.79
व अन्तः यि प्रत्यये

IAST vānto yi pratyaye

प्रकार विधि

सार यकारादि प्रत्यय परे होने पर एच्-स्थानी आदेशों में वकारान्त (अव्/आव्) ही प्रवृत्त होते हैं।

6.1.80
धातोः तन्निमित्तस्य एव

IAST dhātos tannimittasyaiva

प्रकार नियम

सार पूर्वोक्त वान्त-आदेश धातु के उसी एच् पर ही होता है जिसका निमित्त वह यकारादि प्रत्यय हो।

6.1.81
क्षय्यजय्याउ शक्य अर्थे

IAST kṣayyajayyau śakyārthe

प्रकार विधि

सार शक्य-अर्थ में क्षय्य और जय्य रूप (ए→अय् युक्त) सिद्ध होते हैं।

6.1.82
क्रय्यः तदर्थे

IAST krayyas tadarthe

प्रकार विधि

सार उसी शक्य-अर्थ में क्रय्य रूप भी सिद्ध होता है।

6.1.83
भय्य प्रवय्ये च छन्दसि

IAST bhayyapravayye ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में भय्य और प्रवय्य रूप भी (शक्यार्थ-सदृश प्रयोग में) होते हैं।

6.1.84
एकः पूर्वपरयोः

IAST ekaḥ pūrvaparayoḥ

प्रकार अधिकार

सार पूर्व और पर दोनों वर्णों के स्थान पर एक ही आदेश (एकादेश) होता है—यह एकादेश-अधिकार है।

6.1.85
अन्त आदिवत् च

IAST antādivac ca

प्रकार परिभाषा

सार वह एकादेश पूर्व का अन्तादिवत् तथा पर का आदिवत् भी माना जाता है।

6.1.86
षत्वतुकोरसिद्धः

IAST ṣatvatukor asiddhaḥ

प्रकार परिभाषा

सार षत्व और टुक् की दृष्टि से एकादेश असिद्ध माना जाता है।

6.1.87
आत् गुणः

IAST ād guṇaḥ

प्रकार विधि

सार अ/आ से परे सरल स्वर (इक्) आने पर दोनों के स्थान पर गुण एकादेश होता है।

6.1.88
वृद्धिरेचि

IAST vṛddhir eci

प्रकार विधि

सार अ/आ से परे एच् आने पर दोनों के स्थान पर वृद्धि एकादेश होता है।

6.1.89
एति एधति ऊठ्सु

IAST ety edhaty ūṭhsu

प्रकार विधि

सार अ/आ से परे एति, एधति अथवा ऊठ् आने पर (गुण के स्थान पर) वृद्धि एकादेश होता है।

6.1.90
आटः च

IAST āṭaś ca

प्रकार विधि

सार आट् आगम से परे भी (इक्/एच् पर) वृद्धि एकादेश होता है।

6.1.91
उपसर्गात् ऋति धातौ

IAST upasargād ṛti dhātau

प्रकार विधि

सार उपसर्ग के अ/आ से परे ऋकारादि धातु आने पर वृद्धि एकादेश होता है।

6.1.92
वा सुप्य् आपिशलेः

IAST vā supy āpiśaleḥ

प्रकार विधि

सार आपिशलि के मत से सुप् परे होने पर उपसर्ग+ऋ-धातु में वृद्धि वैकल्पिक है।

6.1.93
आ ओतः अंशसोः

IAST ā oto 'ṃśasoḥ

प्रकार विधि

सार ओ और अम्/शस् के स्थान पर आ एकादेश होता है (गो+अम्→गाम् इत्यादि)।

6.1.94
एङि पररूपं

IAST eṅi pararūpam

प्रकार विधि

सार अ/आ से परे एङ् (ए ओ) आने पर पररूप एकादेश होता है।

6.1.95
ओम् आङोः च

IAST omāṅoś ca

प्रकार विधि

सार ॐ और आङ् परे होने पर भी (अ/आ का) पररूप एकादेश होता है।

6.1.96
उसि अपद अन्तात्

IAST usy apadāntāt

प्रकार विधि

सार अपदान्त अ से परे उस् आने पर पररूप एकादेश होता है।

6.1.97
अतः गुणे

IAST ato guṇe

प्रकार विधि

सार अ से परे गुण आने पर पररूप एकादेश होता है।

6.1.98
अव्यक्त अनुकरणस्य अतः इतौ

IAST avyaktānukaraṇasyāta itau

प्रकार विधि

सार अव्यक्त-अनुकरण के अकार से परे इति आने पर पररूप एकादेश होता है।

6.1.99
न आम्रेडितस्य अन्त्यस्य तु वा

IAST nāmreḍitasyāntyasya tu vā

प्रकार नियम

सार आम्रेडित के अन्त्य अकार पर पूर्व-सूत्र का पररूप नित्य नहीं, अपितु वैकल्पिक रूप से निषिद्ध/अनियमित रहता है।

6.1.100
नित्यं आम्रेडिते डाचि

IAST nityam āmreḍite ḍāci

प्रकार विधि

सार आम्रेडित से परे डाच् आने पर पररूप एकादेश नित्य होता है।

6.1.101
अकः सवर्णे दीर्घः

IAST akaḥ savarṇe dīrghaḥ

प्रकार विधि

सार अक् (अ इ उ ऋ ऌ) के सवर्ण स्वर के परे होने पर दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश होता है।

6.1.102
प्रथमयोः पूर्वसवर्णः

IAST prathamayoḥ pūrvasavarṇaḥ

प्रकार विधि

सार प्रथमा-द्वितीया के द्विवचन-प्रत्यय (ए/ओ) के परे अवर्ण पर दीर्घ के स्थान पर पूर्वसवर्ण एकादेश होता है।

6.1.103
तस्मात्शसः नः पुंसि

IAST tasmāt śaso naḥ puṃsi

प्रकार विधि

सार उस पूर्वसवर्ण (आ) से परे पुंल्लिङ्ग में शस् के स्थान पर न् आदेश होता है।

6.1.104
न आत् इचि

IAST na āta ici

प्रकार विधि

सार अत् (ह्रस्व अ) से परे इच् होने पर (पूर्वसवर्ण/तन्निमित्त कार्य) नहीं होता।

6.1.105
दीर्घात् जसि च

IAST dīrghāt jasi ca

प्रकार विधि

सार दीर्घ से परे जस् में भी (वह प्रतिषेध/नियम) लागू होता है।

6.1.106
वा छन्दसि

IAST vā chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (उक्त कार्य) वैकल्पिक है।

6.1.107
अमि पूर्वः

IAST ami pūrvaḥ

प्रकार विधि

सार अम् परे होने पर दोनों स्वरों के स्थान पर पूर्व एकादेश होता है।

6.1.108
सम्प्रसारणात् च

IAST saṃprasāraṇāt ca

प्रकार विधि

सार सम्प्रसारण से परे भी (अम् में) पूर्व एकादेश होता है।

6.1.109
एङः पद अन्तात् अति

IAST eṅaḥ padāntāt ati

प्रकार विधि

सार पदान्त एङ् (ए/ओ) से परे अति (अ) होने पर पूर्व एकादेश होता है।

6.1.110
ङसि- ङसोः च

IAST ṅasi-ṅasoḥ ca

प्रकार विधि

सार ङसि और ङस् परे होने पर भी (एङ्-सम्बन्धी पूर्व-एकादेश/उक्त कार्य) होता है।

6.1.111
ऋतः उत्

IAST ṛta ut

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त से परे (ङसि-ङस् के अ के स्थान पर) उत् आदेश होता है।

6.1.112
ख्यत्यात् परस्य

IAST khyatyāt parasya

प्रकार विधि

सार ख्याति-प्रकार (ईकार) से परे आने वाले (ङसि-ङस्) का भी उत् होता है।

6.1.113
अतः रोः अप्लुतात् अप्लुते

IAST ataḥ roḥ aplutāt aplute

प्रकार विधि

सार अत् से परे रु के र् का, अप्लुत से परे अप्लुत में, उत्व होता है।

6.1.114
हशि च

IAST haśi ca

प्रकार विधि

सार हश् (घोष व्यञ्जन) परे होने पर भी (अतः रु का) उत्व होता है।

6.1.115
प्रकृत्या अन्तःपादं अव्यपरे

IAST prakṛtyā antaḥpādam avyapare

प्रकार विधि

सार अव् (अ) परे न होने पर पाद के भीतर (एङ्) प्रकृतिभाव से रहता है।

6.1.116
अव्यात् अवद्यात् अवक्रमुसव्रत अयम् अवन्तु अव् अस्युषु

IAST avyāt avadyāt avakramusavrata ayam avantu av asyuṣu

प्रकार विधि

सार अव्यात्, अवद्यात्, अवक्रमुसव्रत, अयम्, अवन्तु, अव्, अस्युष् — इनके योग में (एङ् का) विशेष प्रकृतिभाव/सन्धि-नियम है।

6.1.117
यजुषि उरः

IAST yajuṣi uraḥ

प्रकार विधि

सार यजुष् में उरस् के योग में (उक्त एङ्-प्रकृतिभाव/सन्धि) का विधान है।

6.1.118
आपो जुसाणो व् ऋष्णो वर्षिष्ठे अम्बे अम्बाले अम्बिकेपूर्वे

IAST āpo jusāṇo v ṛṣṇo varṣiṣṭhe ambe ambāle ambikepūrve

प्रकार विधि

सार आपो, जुषाणो, वृष्णो, वर्षिष्ठे, अम्बे, अम्बाले, अम्बिके — इन पूर्व-पदों में (एङ्-सन्धि का) वैदिक विशेष विधान है।

6.1.119
अङ्ग इत्यादौ च

IAST aṅga ityādau ca

प्रकार विधि

सार अङ्ग इत्यादि पदों में भी (उसी वैदिक एङ्-नियम का) विस्तार है।

6.1.120
अनुदात्ते च कुधपरे

IAST anudātte ca kudhapare

प्रकार विधि

सार कु/ध परे होने पर अनुदात्त परे भी (उक्त वैदिक सन्धि-नियम) लागू होता है।

6.1.121
अवपथासि च

IAST avapathāsi ca

प्रकार विधि

सार अवपथासि में भी (उक्त वैदिक सन्धि/प्रकृतिभाव) का विधान है।

6.1.122
सर्वत्र विभाषा गोः

IAST sarvatra vibhāṣā goḥ

प्रकार विधि

सार गो शब्द का सर्वत्र वैकल्पिक (अवङ्/सन्धि-विषयक) विधान है।

6.1.123
अवङ् स्फोटायनस्य

IAST avaṅ sphoṭāyanasya

प्रकार विधि

सार स्फोटायन के मत में गो के स्थान पर अवङ् आदेश होता है।

6.1.124
इन्द्रे (नित्यम्).

IAST indre (nityam)

प्रकार विधि

सार इन्द्र परे होने पर (गो→अवङ्) नित्य होता है।

6.1.125
प्लुत प्रगृह्याः अचि नित्यं

IAST pluta pragṛhyāḥ aci nityaṃ

प्रकार विधि

सार प्लुत और प्रगृह्य अच् परे होने पर नित्य प्रकृतिभाव (असन्धि) रखते हैं।

6.1.126
आङः अनुनासिकः छन्दसि

IAST āṅaḥ anunāsikaḥ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में आङ् (उपसर्ग आ) अनुनासिक हो जाता है और स्वरादि परे संधि-निवृत्ति का पात्र बनता है।

6.1.127
इकः असवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वशः च

IAST ikaḥ asavarṇe śākalyasya hrasvaś ca

प्रकार विधि

सार शाकल्य के मत में असवर्ण स्वर परे होने पर इक् ह्रस्व हो जाता है तथा (पूर्ववत्) संधि नहीं होती।

6.1.128
ऋत्य् अकः

IAST ṛty akaḥ

प्रकार विधि

सार ऋ परे होने पर अक् (अ इ उ) पर भी शाकल्य-पक्षीय ह्रस्वत्व एवं संधि-निवृत्ति लागू होती है।

6.1.129
अप्लुतवत् उपस्थिते

IAST aplutavat upasthite

प्रकार अतिदेश

सार उपस्थित परे होने पर पूर्ववर्ती को अप्लुत के समान माना जाता है।

6.1.130
ई३ चाक्रवर्मणस्य

IAST ī3 cākravarmaṇasya

प्रकार विधि

सार चाक्रवर्मण के मत में (उपस्थित-प्रकरण में) ई३ प्लुत आदेश होता है।

6.1.131
दिवः उत्

IAST divaḥ ut

प्रकार विधि

सार दिव् के अन्त्य के स्थान में उट् (उ) आदेश होता है।

6.1.132
एतद् तदोः सुलोपः अकोः अनञ्संआसे हलि

IAST etad tadoḥ sulopaḥ akoḥ anañsamāse hali

प्रकार विधि

सार अनञ्-समास से भिन्न स्थिति में हल् परे होने पर एतद् और तद् के सु (प्रथमा-एकवचन) का लोप होता है।

6.1.133
स्यश् छन्दसि बहुलं

IAST syaś chandasi bahulaṃ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में स्य संबंधी (उक्त सु-)लोप बहुल रूप से होता है।

6.1.134
सः अचि लोपे चेत् पादपूरणं

IAST saḥ aci lope cet pādapūraṇaṃ

प्रकार विधि

सार अच् परे होने पर स (सः का अवशिष्ट) का लोप तभी होता है जब उससे पाद-पूरण सिद्ध हो।

6.1.135
सुट् कत् पूर्वः

IAST suṭ kat pūrvaḥ

प्रकार विधि

सार सुट् आगम ककार से ठीक पहले आता है।

6.1.136
अट् अभ्यासव्यवाये अपि

IAST aṭ abhyāsavyavāye api

प्रकार अतिदेश

सार अट् या अभ्यास के व्यवधान पर भी सुट् (ककार-पूर्व) होता ही है।

6.1.137
सम्परि उपेभ्यः करोतौ भूषणे

IAST sampari u pebhyaḥ karotau bhūṣaṇe

प्रकार विधि

सार सम्, परि और उप के बाद कृ धातु में भूषण अर्थ में सुट् होता है।

6.1.138
समवाये च

IAST samavāye ca

प्रकार विधि

सार समवाय (संगम/संग्रह) अर्थ में भी (उक्त उपसर्गों के बाद कृ में) सुट् होता है।

6.1.139
उपात् प्रतियत्नवैकृतवाक्य ध्याहारेषु

IAST upāt pratiyatnavaikṛtavākyādhyāhāreṣu

प्रकार विधि

सार उप के बाद कृ में प्रतियत्न, वैकृत, वाक्य और अध्याहार अर्थों में सुट् होता है।

6.1.140
किरतौ लवने

IAST kiratau lavane

प्रकार विधि

सार कॄ (किरति) में लवन अर्थ में (उक्त उपसर्ग-प्रकरणानुसार) सुट् होता है।

6.1.141
हिंसायां प्रतेः च

IAST hiṃsāyāṃ prateḥ ca

प्रकार विधि

सार हिंसा अर्थ में प्रति के बाद भी (कृ/कॄ-प्रकरण में) सुट् होता है।

6.1.142
अपात् चतुष्पाद् शकुनिषु आलेखने

IAST apāt catuṣpād śakuniṣu ālekhane

प्रकार विधि

सार अप के बाद चतुष्पाद और शकुनि-विषयक आलेखन अर्थ में सुट् होता है।

6.1.143
कुस्तुम्बुरू- णि जातिः

IAST kustumburūṇi jātiḥ

प्रकार विधि

सार कुस्तुम्बुरु रूप जातिवाचक निपातन है (सुट्-युक्त सिद्ध रूप)।

6.1.144
अपरस्पराः क्रियासातत्ये

IAST aparasparāḥ kriyāsātatye

प्रकार विधि

सार क्रिया की सातत्य (निरन्तरता) अर्थ में अपरस्पराः निपातन है।

6.1.145
गोष्पदं सेवित असेवितप्रमाणेषु

IAST goṣpadaṃ sevita asevitapramāṇeṣu

प्रकार विधि

सार सेवित, असेवित और प्रमाण अर्थों में गोष्पदम् निपातन है।

6.1.146
आस्पदं प्रतिष्ठायाम्

IAST āspadaṃ pratiṣṭhāyām

प्रकार विधि

सार प्रतिष्ठा (आधार/अवस्थान) अर्थ में आस्पदम् निपातन है।

6.1.147
आश्चर्यं अनित्ये

IAST āścaryaṃ anitye

प्रकार विधि

सार अनित्य (असाधारण/अपूर्व) अर्थ में आश्चर्यम् निपातन है।

6.1.148
वर्चस्के अवस्करः

IAST varcaske avaskaraḥ

प्रकार विधि

सार वर्चस्क (मल/उच्छिष्ट) अर्थ में अवस्करः निपातन है।

6.1.149
अपस्करो रथ अङ्गं

IAST apaskaro ratha aṅgaṃ

प्रकार विधि

सार रथ के अङ्ग के अर्थ में अपस्करः निपातन है।

6.1.150
विष्किरः शकुनिर्वा

IAST viṣkiraḥ śakunir vā

प्रकार विधि

सार विष्किरः पक्षीवाचक निपातन है, अथवा वैकल्पिक रूप से सिद्ध होता है।

6.1.151
ह्रस्वात् चन्द्र उत्तरपदे मन्त्रे

IAST hrasvāc candrottarapade mantre

प्रकार विधि

सार मन्त्र में ह्रस्व स्वर के बाद उत्तरपद «चन्द्र» होने पर सुट् (स्-आगम) होता है।

6.1.152
प्रतिष्कशः च कशेः

IAST pratiṣkaśaś ca kaśeḥ

प्रकार विधि

सार «कश्» से «प्रतिष्कश्» (और कशेः-संबंधी रूप) सुट्-युक्त सिद्ध होते हैं।

6.1.153
प्रस्कण्वहरिस्चन्द्रौ ऋष्- ई

IAST praskaṇvahariscandrau ṛṣi

प्रकार विधि

सार ऋषि-संज्ञा में «प्रस्कण्व» और «हरिश्चन्द्र» सुट्-युक्त रूप से सिद्ध होते हैं।

6.1.154
मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः

IAST maskaramaskariṇau veṇuparivrājakayoḥ

प्रकार विधि

सार वेणु अर्थ में «मस्कर» और परिव्राजक अर्थ में «मस्करिन्» — ये सुट्-युक्त संज्ञा-रूप हैं।

6.1.155
कास्तीर अजस्तुन्दे नगरे

IAST kāstīrajastunde nagare

प्रकार विधि

सार नगर-संज्ञा में «कास्तीर» और «अजस्तुन्द» सुट्-सहित सिद्ध होते हैं।

6.1.156
कारस्करो वृक्षः

IAST kāraskaro vṛkṣaḥ

प्रकार विधि

सार वृक्ष-संज्ञा में «कारस्कर» सुट्-युक्त रूप से सिद्ध होता है।

6.1.157
पारस्कर प्रभृतीनि च संज्ञायां

IAST pāraskaraprabhṛtīni ca saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में पारस्कर-प्रभृति गण के शब्द सुट्-सहित सिद्ध होते हैं।

6.1.158
अनुदत्तं पदम् एकवर्जम्

IAST anudāttaṃ padam ekavarjam

प्रकार विधि

सार पद में एक स्वर को छोड़कर शेष सभी स्वर अनुदात्त होते हैं।

6.1.159
कर्ष आत्वतः घञः अन्त दात्तः

IAST karṣātvato ghaño 'nta udāttaḥ

प्रकार विधि

सार कर्ष-प्रभृति आत्वत् धातुओं से बने घञ्-प्रत्ययान्त का अन्तिम स्वर उदात्त होता है।

6.1.160
उञ्छ आदीणां च

IAST uñchādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार उञ्छ आदि धातुओं से बने घञ् का अन्त भी उदात्त होता है।

6.1.161
अनुदात्तस्य च यत्र उदात्तलोपः

IAST anudāttasya ca yatro dāttalopaḥ

प्रकार विधि

सार जहाँ उदात्त का लोप हो वहाँ शेष अनुदात्त (स्थानीय) स्वर उदात्त हो जाता है।

6.1.162
धातोः

IAST dhātoḥ

प्रकार विधि

सार धातु (का आदि/प्रधान स्वर) उदात्त होता है।

6.1.163
च्- इत् अः

IAST citaḥ

प्रकार विधि

सार चित् (च्-इत्) वाले प्रत्यय/आदेश का स्वर उदात्त होता है।

6.1.164
तद्धितस्य

IAST taddhitasya

प्रकार विधि

सार तद्धित प्रत्यय का स्वर उदात्त होता है।

6.1.165
कितः

IAST kitaḥ

प्रकार विधि

सार कित् (क्-इत्) वाले प्रत्यय/आदेश का स्वर उदात्त होता है।

6.1.166
तिसृभ्यः जसः

IAST tisṛbhyo jasaḥ

प्रकार विधि

सार «तिसृ» से परे जस् (प्रथमा बहुवचन) उदात्त होता है।

6.1.167
चतुरः शसि

IAST caturaḥ śasi

प्रकार विधि

सार «चतुर्» से परे शस् (द्वितीया बहुवचन) उदात्त होता है।

6.1.168
सौ एक अचः तृतीया आदिर्विभक्तिः

IAST sāvekācas tṛtīyādir vibhaktiḥ

प्रकार विधि

सार एकाच् प्रातिपदिक से सु तथा तृतीयादि विभक्तियाँ उदात्त होती हैं।

6.1.169
अन्त दत्तात् इत्तरपदात्न्यतरयां अनित्यांआसे

IAST antodāttād uttarapadād anyatarasyām anityasamāse

प्रकार विधि

सार अनित्य समास में अन्तोदात्त उत्तरपद होने पर (समास-स्वर) विकल्प से विहित होता है।

6.1.170
अञ्चेः छन्दसि असर्वआमस्थाने

IAST añceś chandasy asarvanāmasthāne

प्रकार विधि

सार छन्दस् में «अञ्च्» के सर्वनामस्थान-भिन्न रूपों में उदात्त-विधि लागू होती है।

6.1.171
ऊठ् इदम् पदादि अप्पुम्रैद्युभ्यः

IAST ūḍidampadādyappumraidyubhyaḥ

प्रकार विधि

सार ऊठ्, पद-आदि «इदम्», तथा अप्–पुम्–रै–द्यु — इनका (आदि) स्वर उदात्त होता है।

6.1.172
अष्टनो दीर्घात्

IAST aṣṭano dīrghāt

प्रकार विधि

सार दीर्घ से परे «अष्टन्» में उदात्त-विधि होती है।

6.1.173
शतुरनुमः नदी अच् आदी

IAST śatur anumo nadyacādī

प्रकार विधि

सार नुम्-रहित शतृ, नदी और अजादि संज्ञक शब्दों में उदात्त-विधि होती है।

6.1.174
उदात्तयणः हल्पूर्वात्

IAST udāttayaṇo halpūrvāt

प्रकार विधि

सार हल्-पूर्व उदात्त-यण् होने पर तत्संबंधी उदात्त-विधि लागू होती है।

6.1.175
न ऊङ्धात्वोः

IAST noṅdhātvoḥ

प्रकार विधि

सार ऊङ् और धातु — इनमें पूर्व-सूत्र की उदात्त-विधि नहीं होती।

6.1.176
ह्रस्वनुट् भ्यां मतुप्

IAST hrasvanuṭbhyāṃ matup

प्रकार विधि

सार ह्रस्व-अन्त या नुट्-युक्त रूप के परे मतुप् का आदि उदात्त होता है।

6.1.177
णां अन्यतरस्याम्

IAST ṇāṃ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार ण-अन्त के परे मतुप् का आदि उदात्त वैकल्पिक होता है।

6.1.178
ङ्याः छन्दसि बहुलं

IAST ṅyāḥ chandasi bahulam

प्रकार विधि

सार ङी-अन्त के परे छन्दस् में मतुप् का आदि-उदात्त बहुल विधीयमान है।

6.1.179
षष्त्रिचतुर्भ्यः हल् आदिः

IAST ṣaṣtricaturbhyaḥ hal ādiḥ

प्रकार विधि

सार षष्, त्रि और चतुर् से परे हल्-आदि (प्रथम व्यञ्जन-प्रारम्भ) अंश उदात्त होता है।

6.1.180
झलि उपोत्तमं

IAST jhali upottamam

प्रकार विधि

सार झल् परे होने पर (षष्-त्रि-चतुर्-रूपों का) उपोत्तम स्वर उदात्त होता है।

6.1.181
विभाषा भाषायां

IAST vibhāṣā bhāṣāyām

प्रकार विधि

सार भाषा में वह उपोत्तम-उदात्त वैकल्पिक है।

6.1.182
न गोश्वन्सौ अवर्ण राज् अङ् क्रुङ् कृद्भ्यः

IAST na gośvansau avarṇa rāj aṅ kruṅ kṛdbhyaḥ

प्रकार नियम

सार गो, श्वन्, स, अवर्ण, राज्, अङ्, क्रुङ् तथा कृत्-प्रत्ययान्त के परे (वह उपोत्तम-उदात्त) नहीं होता।

6.1.183
दिवो झल्

IAST divo jhal

प्रकार विधि

सार दिव् के झल् परे (उक्त) उदात्त विधान लागू होता है।

6.1.184
नृ च अन्यतरस्यां

IAST nṛ ca anyatarasyām

प्रकार विधि

सार नृ पर भी वह उदात्त वैकल्पिक होता है।

6.1.185
त् इत्स्वरितं

IAST t itsvaritam

प्रकार विधि

सार त्-इत् वाले (प्रत्यय/रूप) स्वरित होते हैं।

6.1.186
तासि अनुदात्त इत् ङ् इत् अत् उपदेशात् लसार्वधातुकं अनुदात्तम् अह्नु इङोः

IAST tāsi anudātta it ṅ it at upadeśāt lasārvadhātukaṃ anudāttam ahnu iṅoḥ

प्रकार विधि

सार तासि परे तथा अनुदात्त/ङित्/अत्-उपदेश धातु के परे ल-सार्वधातुक अनुदात्त होता है—अह्नु और इङ् को छोड़कर।

6.1.187
आदिः सिचः अन्यतरस्यां

IAST ādiḥ sicaḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार सिच् का आदि वैकल्पिक उदात्त होता है।

6.1.188
स्वप् आदि हिंसां अचि अनिटि

IAST svap ādi hiṃsām aci aniṭi

प्रकार विधि

सार स्वप्-आदि तथा हिंसा-अर्थक धातुओं का आदि अच् परे अनिट् में उदात्त होता है।

6.1.189
अभ्यस्ताणां आदिः

IAST abhyastānām ādiḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यस्त (द्विरुक्त) रूपों का आदि उदात्त होता है।

6.1.190
अनुदात्ते च

IAST anudātte ca

प्रकार विधि

सार अनुदात्त परे होने पर भी (अभ्यस्त का) आदि उदात्त होता है।

6.1.191
सर्वस्य सुपि

IAST sarvasya supi

प्रकार विधि

सार सुप् परे सम्पूर्ण (अभ्यस्त) पद का आदि उदात्त होता है।

6.1.192
भीह्रीभृहुमदजनधनदरिद्राजागरां पूर्वम् पिति

IAST bhīhrībhṛhumadajanadhanadaridrājāgarāṃ pūrvam piti

प्रकार विधि

सार भी, ह्री, भृ, हु, मद्, जन्, धन, दरिद्रा, जागृ के अभ्यास का पूर्व भाग पित् परे उदात्त होता है।

6.1.193
ल्- इति

IAST l iti

प्रकार विधि

सार लित् परे (पूर्व/आदि) उदात्त होता है।

6.1.194
आदिर्णमुलि अन्यतरस्यां

IAST ādir ṇamuli anyatarasyām

प्रकार विधि

सार णमुल् का आदि वैकल्पिक उदात्त होता है।

6.1.195
अचः कर्तृयकि

IAST acaḥ kartṛyaki

प्रकार विधि

सार अच् (अजन्त) के कर्तृ-अर्थक यक् परे आदि उदात्त होता है।

6.1.196
थलि च सैटि इट् अन्तः वा

IAST thali ca seṭi iṭ antaḥ vā

प्रकार विधि

सार सेट् थल् परे आदि उदात्त होता है, तथा इट् का अन्त वैकल्पिक उदात्त होता है।

6.1.197
ञ्ण् इत्य् आदिर्नित्यं

IAST ñṇ ity ādir nityam

प्रकार विधि

सार ञित् और णित् का आदि नित्य उदात्त होता है।

6.1.198
आमन्त्रितस्य च

IAST āmantritasya ca

प्रकार विधि

सार आमन्त्रित (सम्बोधन) का भी आदि नित्य उदात्त होता है।

6.1.199
पथिमथोः सर्वनामस्थाने

IAST pathimathoḥ sarvanāmasthāne

प्रकार विधि

सार पथिन् और मथिन् का सर्वनामस्थान परे आदि उदात्त होता है।

6.1.200
अन्तः च तवै युगपत्

IAST antaḥ ca tavai yugapat

प्रकार विधि

सार (पथिन्-मथिन् का) अन्त भी उदात्त होता है, तथा तवे में आदि और अन्त युगपत् उदात्त होते हैं।

6.1.201
क्षयः निवासे

IAST kṣayaḥ nivāse

प्रकार विधि

सार निवास-अर्थ में प्रयुक्त क्षय शब्द आद्युदात्त होता है।

6.1.202
जयः करणं

IAST jayaḥ karaṇam

प्रकार विधि

सार करण-अर्थ में प्रयुक्त जय शब्द आद्युदात्त होता है।

6.1.203
वृष आदीणां च

IAST vṛṣa ādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार वृषादि गण के शब्दों का भी आद्युदात्त होता है।

6.1.204
संज्ञायां उपमानम्

IAST saṃjñāyām upamānam

प्रकार विधि

सार संज्ञा में उपमान-रूप प्रयुक्त शब्द आद्युदात्त होता है।

6.1.205
निष्ठा च द्व्यच् अणात्

IAST niṣṭhā ca dvyac aṇāt

प्रकार विधि

सार अण् से निष्पन्न द्व्यच् निष्ठा आद्युदात्त होती है।

6.1.206
शुष्क धृष्- टौ

IAST śuṣkadhṛṣṭau

प्रकार विधि

सार शुष्क और धृष्ट शब्द आद्युदात्त होते हैं।

6.1.207
आशितः कर्ता

IAST āśitaḥ kartā

प्रकार विधि

सार कर्तृ-अर्थ में आशित शब्द आद्युदात्त होता है।

6.1.208
रिक्ते विभाषा

IAST rikte vibhāṣā

प्रकार विधि

सार रिक्त शब्द वैकल्पिक रूप से आद्युदात्त होता है।

6.1.209
जुष्- ट अर्पिते च छन्दसि

IAST juṣṭārpate ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में जुष्ट और अर्पित भी (वैकल्पिक) आद्युदात्त होते हैं।

6.1.210
नित्यं मन्त्रे

IAST nityaṃ mantre

प्रकार नियम

सार मन्त्र में उक्त रूप नित्य आद्युदात्त होते हैं।

6.1.211
युष्मद् अस्मदोर्ङसि

IAST yuṣmadasmador ṅasi

प्रकार विधि

सार युष्मद् और अस्मद् ङसि-विभक्ति में आद्युदात्त होते हैं।

6.1.212
ङयि च

IAST ṅayi ca

प्रकार विधि

सार युष्मद् और अस्मद् ङयि (सप्तमी) में भी आद्युदात्त होते हैं।

6.1.213
यतः अनावः

IAST yato 'nāvaḥ

प्रकार विधि

सार अव्-भिन्न यतः शब्द आद्युदात्त होता है।

6.1.214
ईडवन्दवृशंसदुहां ण्यतः

IAST īḍavandavṛśaṃsaduḥāṃ ṇyataḥ

प्रकार विधि

सार ईड्, वन्द्, वृ, शंस्, दुह् धातुओं के ण्यत्-रूप आद्युदात्त होते हैं।

6.1.215
विभाषा वेणु इन्धानयोः

IAST vibhāṣā veṇvindhānayoḥ

प्रकार विधि

सार वेणु और इन्धान वैकल्पिक रूप से आद्युदात्त होते हैं।

6.1.216
त्यागराग हासकुहश्वठक्रथाणां

IAST tyāgarāgahāsakuhaśvaṭhakrathānām

प्रकार विधि

सार त्याग, राग, हास, कुह, श्वठ और क्रथ शब्द आद्युदात्त होते हैं।

6.1.217
उप उत्तमं र्- इति

IAST upottamaṃ rīti

प्रकार विधि

सार रेफ-उपस्थिति में उपोत्तम (उपान्त्य) स्वर उदात्त होता है।

6.1.218
चङि अन्यतरस्यां

IAST caṅi anyatarasyām

प्रकार विधि

सार चङ् पर होने पर उपोत्तम वैकल्पिक रूप से उदात्त होता है।

6.1.219
मतोः पूर्वं आत् संज्ञायां स्त्रियाम्

IAST matoḥ pūrvam āt saṃjñāyāṃ striyām

प्रकार विधि

सार स्त्री-संज्ञा में मतुप् से पूर्व का स्वर उदात्त होता है।

6.1.220
अन्तः अवत्याः

IAST anto 'vatyāḥ

प्रकार विधि

सार अवती-अन्त पद का अन्त्य स्वर उदात्त होता है।

6.1.221
ईवत्याः

IAST īvatyāḥ

प्रकार विधि

सार ईवती-अन्त पद का भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है।

6.1.222
चौ

IAST cau

प्रकार विधि

सार चौ (औ-सम्बद्ध) में पद का अन्त्य स्वर उदात्त होता है।

6.1.223
संआसस्य

IAST samāsasya

प्रकार विधि

सार समास का अन्त्य स्वर उदात्त होता है।

अध्याय 6 · पाद 2 (199 सूत्र)

6.2.1
बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदं

IAST bahuvrīhau prakṛtyā pūrvapadam

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि-समास में पूर्वपद अपने मूल (प्राकृत) स्वर में रहता है; यहीं से «पूर्वपदं प्रकृत्या» का अधिकार आगे चलता है।

6.2.2
तत्पुरुषे तुल्य अर्थतृतीयासप्तमीउपमान अव्ययद्वितीयाकृत्याः

IAST tatpuruṣe tulyārthatṛtīyāsaptamyupamānāvyayadvitīyākṛtyāḥ

प्रकार विधि

सार तत्पुरुष में तुल्यार्थ, तृतीयार्थ, सप्तम्यर्थ, उपमान, अव्यय, द्वितीयार्थ तथा कृत्य-प्रत्ययान्त पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.3
वर्णः वर्णेषु अनेते

IAST varṇo varṇeṣv anete

प्रकार विधि

सार वर्णवाचक पूर्वपद दूसरे वर्णवाचक उत्तरपद के साथ (एत् को छोड़कर) प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.4
गाधलवणयोः प्रमा- णे

IAST gādhalavaṇayoḥ pramāṇe

प्रकार विधि

सार प्रमाण-अर्थ में गाध और लवण पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.5
दायाद्यं दायादे

IAST dāyādyaṃ dāyāde

प्रकार विधि

सार दायाद उत्तरपद होने पर दायाद्य पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.6
प्रतिबन्धि चिरकृच्छ्रयोः

IAST pratibandhi cirakṛcchrayoḥ

प्रकार विधि

सार चिर और कृच्छ्र उत्तरपद होने पर प्रतिबन्धि पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.7
पदे अपदेशे

IAST pade 'padeśe

प्रकार विधि

सार अपदेश-अर्थ वाले पद उत्तरपद पर पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.8
निवाते वातत्रा- णे

IAST nivāte vātatrāṇe

प्रकार विधि

सार वातत्राण-अर्थ वाले निवात उत्तरपद पर पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.9
शारदे अणार्तवे

IAST śārade 'ṇārtave

प्रकार विधि

सार अण्-प्रत्ययान्त शारद उत्तरपद आर्तव (ऋतु) अर्थ में न होने पर पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।(व्याख्या-भेद)

6.2.10
अध्वर्युकषाययोर्जातौ

IAST adhvaryukaṣāyayor jātau

प्रकार विधि

सार जाति-अर्थ में अध्वर्यु और कषाय पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.11
सदृशप्रतिरूपयोः सादृश्ये

IAST sadṛśapratirūpayoḥ sādṛśye

प्रकार विधि

सार सादृश्य-अर्थ में सदृश और प्रतिरूप पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.12
द्विगौ प्रमा- णे

IAST dvigau pramāṇe

प्रकार विधि

सार प्रमाण-अर्थ वाले द्विगु-समास में पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.13
गन्तव्यपण्यं वाणिजे

IAST gantavyapaṇyaṃ vāṇije

प्रकार विधि

सार वाणिज उत्तरपद होने पर गन्तव्य और पण्य पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.14
मात्रा उपज्ञा उपक्रम छाये नपुंसके

IAST mātropajñopakramacchāye napuṃsake

प्रकार विधि

सार नपुंसक समास में मात्रा, उपज्ञा, उपक्रम और छाया पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.15
सुखप्रिययोर्हिते

IAST sukhapriyayor hite

प्रकार विधि

सार हित-अर्थ में सुख और प्रिय पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.16
प्रीतौ च

IAST prītau ca

प्रकार विधि

सार प्रीति-अर्थ में भी (सुख-प्रिय पूर्वपद) प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.17
स्वं स्वामिनि

IAST svaṃ svāmini

प्रकार विधि

सार स्वामिन् उत्तरपद होने पर स्व पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.18
पत्यौ ऐश्वर्ये

IAST patyau aiśvarye

प्रकार विधि

सार ऐश्वर्य-अर्थ वाले पति उत्तरपद पर पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.19
न भूवाच् चित् दिधिषु

IAST na bhūvāc cid didhiṣu

प्रकार विधि

सार भू-धातु, वच्-धातु, चित् तथा दिधिषु पूर्वपद होने पर (पति/स्वामिन्-सम्बन्धी) वह प्रकृत्या-स्वर नहीं होता।

6.2.20
वा भुवनं

IAST vā bhuvanam

प्रकार विधि

सार भुवन पूर्वपद पर वह प्रकृत्या-स्वर वैकल्पिक है।

6.2.21
आशङ्क आबाधनेद्- ईयस्सु सम्भावने

IAST āśaṅkābādhane dīyassu saṃbhāvane

प्रकार विधि

सार सम्भावना-अर्थ में आशङ्का, आबाध और नेदीयस् पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.22
पूर्वे भूतपूर्वे

IAST pūrve bhūtapūrve

प्रकार विधि

सार भूतपूर्व उत्तरपद होने पर पूर्व पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.23
सविधसनीडसमर्यादसवेशसदेशेषु सामीप्ये

IAST savidhasanīḍasamaryādsaveśasadeśeṣu sāmīpye

प्रकार विधि

सार सामीप्य-अर्थ वाले सविध, सनीड, समर्याद, सवेश और सदेश उत्तरपदों पर पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.24
विस्पष्- ट आदीनि गुणवचनेषु

IAST vispaṣṭādīni guṇavacaneṣu

प्रकार विधि

सार गुणवचन उत्तरपद होने पर विस्पष्टादि पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहते हैं।

6.2.25
श्रज्य अवमकन्पापवत्सु भावे कर्मधारये

IAST śrajyavamakanpāpavatsu bhāve karmadhāraye

प्रकार विधि

सार भावार्थक कर्मधारय में श्रज्य, अवम, कन्-प्रत्ययान्त, पाप तथा वत्-अन्त उत्तरपद होने पर पूर्वपद प्रकृत्या स्वरित रहता है।

6.2.26
कुमारः च

IAST kumāraś ca

प्रकार विधि

सार कुमार पूर्वपद वाले समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.27
आदिः प्रत्येनसि

IAST ādiḥ pratyenasi

प्रकार विधि

सार प्रत्येनस् उत्तरपद होने पर आदि पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.28
पूगेषु अन्यतरस्यां

IAST pūgeṣv anyatarasyām

प्रकार विधि

सार पूग उत्तरपद वाले समास में विकल्प से पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.29
इक् अन्त कालकपालभगालशरावेषु द्विगौ

IAST ikāntakālakapālabhagālaśarāveṣu dvigau

प्रकार विधि

सार द्विगु समास में इक्-अन्त पद अथवा काल, कपाल, भगाल, शराव उत्तरपद होने पर पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.30
बहु अन्यतरस्यां

IAST bahv anyatarasyām

प्रकार विधि

सार बहु पूर्वपद (उक्त द्विगु-प्रसंग में) विकल्प से प्रकृतिस्वरयुक्त होता है।

6.2.31
दिष्- टिवितस्त्योः च

IAST diṣṭivitastyoś ca

प्रकार विधि

सार दिष्टि और वितस्ति उत्तरपद होने पर भी पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.32
सप्तंई सिद्धशुष्कपक्वबन्धेषु अकालात्

IAST saptamī siddhaśuṣkapakvabandheṣv akālāt

प्रकार विधि

सार सप्तम्यन्त पूर्वपद और सिद्ध, शुष्क, पक्व, बन्ध उत्तरपद होने पर—कालार्थ छोड़कर—पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.33
परिप्रति उप अपाः वर्ज्यंआन अहोरात्र वयवेषु

IAST paripratyupāpā varjyamānāhorātravayaveṣu

प्रकार विधि

सार परि, प्रति, उप, अप पूर्वपद और वर्ज्य, मान तथा अहोरात्र-अवयव उत्तरपद होने पर पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.34
राजन्यबहुवचनद्वंद्वे अन्धकवृष्णिषु

IAST rājanyabahuvacanadvandve 'ndhakavṛṣṇiṣu

प्रकार विधि

सार अन्धक-वृष्णि क्षत्रियों के बहुवचन द्वन्द्व में पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.35
संख्या

IAST saṃkhyā

प्रकार विधि

सार संख्यावाची पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.36
आचार्य उपसर्जनः च न्तेवासी

IAST ācāryopasarjanaś cāntevāsī

प्रकार विधि

सार आचार्य उपसर्जन हो और अन्तेवासिन् उत्तरपद हो तो पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.37
कार्तकौजप आदयः

IAST kārtakaujapādayaḥ

प्रकार विधि

सार कार्तकौजप आदि गणपठित समासों में पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.38
महान् व्रीहि अपराह्ण गृष्टि इष्वासजाबालभारभारतहैलिहिलरौरवप्रवृद्धेषु

IAST mahān vrīhyaparāhṇagṛṣṭīṣvāsajābālabhārabhārathailihilarauravapravṛddheṣu

प्रकार विधि

सार महत् पूर्वपद और व्रीहि, अपराह्ण, गृष्टि, इष्वास, जाबाल, भार, भारत, हैलिहिल, रौरव, प्रवृद्ध उत्तरपद होने पर पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.39
क्षुल्लकः च वैश्वदेवे

IAST kṣullakaś ca vaiśvadeve

प्रकार विधि

सार वैश्वदेव उत्तरपद होने पर क्षुल्लक पूर्वपद को भी प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.40
उष्ट्रः सादिवाम्योः

IAST uṣṭraḥ sādivāmyoḥ

प्रकार विधि

सार सादि और वामी उत्तरपद होने पर उष्ट्र पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.41
गौः सादसादिसारथिषु

IAST gauḥ sādasādisārathiṣu

प्रकार विधि

सार साद, सादि, सारथि उत्तरपद होने पर गो पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.42
कुरुगार्हपतरिक्तगुरु असूतजरती अश्लीलदृ- ढरूपापारेवडवातैत्तिलकद्रूःपण्य अम्बलः आसीभारा- णां च

IAST kurugārhapatariktagurvasūtajaraty aślīladṛḍharūpāpārevaḍavātaittilakadrūḥpaṇyambalāāsībhārāṇāṃ ca

प्रकार विधि

सार कुरु, गार्हपत, रिक्त, गुरु, असूत, जरती, अश्लील, दृढ, रूप, अपार, एवडवा, तैत्तिल, कद्रू, पण्य, अम्बल, आसी, भार—इन पूर्वपदों को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.43
चतुर्थी तदर्थे

IAST caturthī tadarthe

प्रकार विधि

सार तदर्थ (उद्देश्य/हेतु) अर्थ में चतुर्थ्यन्त पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.44
अर्थे

IAST arthe

प्रकार विधि

सार अर्थ उत्तरपद होने पर (चतुर्थ्यन्त) पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.45
क्ते च

IAST kte ca

प्रकार विधि

सार क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर भी (चतुर्थ्यन्त) पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.46
कर्मधारये अनिष्ठा

IAST karmadhāraye 'niṣṭhā

प्रकार विधि

सार कर्मधारय समास में निष्ठा-भिन्न उत्तरपद होने पर पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.47
अहीने द्वितीया

IAST ahīne dvitīyā

प्रकार विधि

सार अहीन (अन्यून) अर्थ में द्वितीयान्त पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.48
तृतीया कर्मणि

IAST tṛtīyā karmaṇi

प्रकार विधि

सार कर्म अर्थ में तृतीयान्त पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.49
गतिरनन्तरः

IAST gatir anantaraḥ

प्रकार विधि

सार कृदन्त आदि से अनन्तर (सन्निकट) गति-संज्ञक पद को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.50
त आदौ च ण् इति कृति अतौ

IAST tādau ca niti kṛtyatau

प्रकार विधि

सार त-आदि कृत्, नित् कृत् तथा कृत्य और त् के परे भी गति को प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.51
तवै च अन्तः च युगपत्

IAST tavai cāntaś ca yugapat

प्रकार विधि

सार तवै-अन्त और अन्तोदात्त दोनों युगपत् होने पर तत्पुरुष-पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.52
अनिक् अन्तः अञ्चतौ वप्रत्यये

IAST anikanto 'ñcatau vapratyaye

प्रकार विधि

सार अनिक्-अन्त पूर्वपद अञ्चत् के साथ तथा व-प्रत्यय में आद्युदात्त होता है।

6.2.53
नि अध्- ई च

IAST nyadhī ca

प्रकार विधि

सार नि, अधि और ई पूर्वपद भी (तत्पुरुष में) आद्युदात्त होते हैं।

6.2.54
ईषत् अन्यतरस्यां

IAST īṣad anyatarasyām

प्रकार विधि

सार ईषत् पूर्वपद वैकल्पिक रूप से आद्युदात्त होता है।

6.2.55
हिरण्यपरिमा- णं धने

IAST hiraṇyaparimāṇaṃ dhane

प्रकार विधि

सार धन-अर्थ में हिरण्य और परिमाण पूर्वपद आद्युदात्त होते हैं।

6.2.56
प्रथमः अचिर पामत्तौ

IAST prathamo 'cirapāmattau

प्रकार विधि

सार अचिर और पामत्त के साथ प्रथम पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.57
कतर कतमौ कर्मधारये

IAST katarakatamau karmadhāraye

प्रकार विधि

सार कर्मधारय में कतर और कतम पूर्वपद आद्युदात्त होते हैं।

6.2.58
आर्यः ब्राह्मणकुमारयोः

IAST āryo brāhmaṇakumārayoḥ

प्रकार विधि

सार ब्राह्मण और कुमार के साथ आर्य पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.59
राजा च

IAST rājā ca

प्रकार विधि

सार राजा पूर्वपद भी (उक्त युग्मों के साथ) आद्युदात्त होता है।

6.2.60
षष्ठी प्रत्येनसि

IAST ṣaṣṭhī pratyenasi

प्रकार विधि

सार प्रत्येनस् के साथ षष्ठी-समास का पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.61
क्ते नित्य अर्थे

IAST kte nityārthe

प्रकार विधि

सार नित्य-अर्थ में क्त-अन्त उत्तरपद होने पर पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.62
ग्रामः शिल्पिनि

IAST grāmaḥ śilpini

प्रकार विधि

सार शिल्पी-वाचक उत्तरपद के साथ ग्राम पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.63
राजा च प्रशंसायां

IAST rājā ca praśaṃsāyām

प्रकार विधि

सार प्रशंसा-अर्थ में राजा पूर्वपद भी आद्युदात्त होता है।

6.2.64
आदिरुदात्तः

IAST ādir udāttaḥ

प्रकार विधि

सार (इस अधिकार में) समास/पूर्वपद का आदि उदात्त होता है।

6.2.65
सप्तमीहारिणौ धर्म्ये अहरणे

IAST saptamīhāriṇau dharmye 'haraṇe

प्रकार विधि

सार धर्म्य अहरण-अर्थ में सप्तमी-पूर्वपद और हारिन्-अन्त पद आद्युदात्त-सम्बद्ध होते हैं।

6.2.66
युक्ते च

IAST yukte ca

प्रकार विधि

सार युक्त के साथ भी पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.67
विभाषा अध्यक्षे

IAST vibhāṣādhyakṣe

प्रकार विधि

सार अध्यक्ष के साथ पूर्वपद वैकल्पिक रूप से आद्युदात्त होता है।

6.2.68
पापं च शिल्पिनि

IAST pāpaṃ ca śilpini

प्रकार विधि

सार शिल्पी-वाचक उत्तरपद के साथ पाप पूर्वपद भी आद्युदात्त होता है।

6.2.69
गोत्र अन्तेवासि(न्)माणवब्राह्मणेषु क्षेपे

IAST gotrāntevāsimāṇavabrāhmaṇeṣu kṣepe

प्रकार विधि

सार क्षेप-अर्थ में गोत्र, अन्तेवासिन्, माणव और ब्राह्मण के साथ पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.70
अङ्गानि मैरेये

IAST aṅgāni maireye

प्रकार विधि

सार मैरेय के साथ अङ्ग-वाचक पूर्वपद आद्युदात्त होते हैं।

6.2.71
भक्त आख्याः तदर्थेषु

IAST bhaktākhyās tadartheṣu

प्रकार विधि

सार भक्त-आख्याएँ अपने उसी अर्थ में प्रयुक्त होने पर आद्युदात्त-पूर्वपद-नियम में आती हैं।

6.2.72
गोबिडालसिंहसेन्धवेषु उपमाने

IAST gobiḍālasiṃhasaindhaveṣūpamāne

प्रकार विधि

सार उपमान-अर्थ में गो, बिडाल, सिंह और सैन्धव के साथ पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.73
अके जीविका अर्थे

IAST ake jīvikārthe

प्रकार विधि

सार जीविका-अर्थ में अक-प्रत्ययान्त के साथ पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.74
प्राचां क्रीडायां

IAST prācāṃ krīḍāyām

प्रकार विधि

सार प्राच्यों के मत में क्रीडा-नामों में पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.75
अणि नियुक्ते

IAST aṇi niyukte

प्रकार विधि

सार नियुक्त-अर्थ में अण्-प्रत्ययान्त के साथ पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.76
शिल्पिनि च अकृञः

IAST śilpini cākṛñaḥ

प्रकार विधि

सार शिल्पिन्-अर्थ वाले (√कृ से भिन्न) उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.77
संज्ञायां च

IAST saṃjñāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार संज्ञा-प्रयोग में भी पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.78
गोतन्तियवं पाले

IAST gotantiyavaṃ pāle

प्रकार विधि

सार पाल उत्तरपद होने पर गो, तन्ति और यव पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाले होते हैं।

6.2.79
णिनि

IAST ṇini

प्रकार विधि

सार णिनि-प्रत्ययान्त उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.80
उपमानं शब्द र्थप्रकृतौ व

IAST upamānaṃ śabdārthaprakṛtau ca

प्रकार विधि

सार उपमान-पूर्वपद और शब्दार्थ-प्रकृति वाले उत्तरपद के समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाला होता है।

6.2.81
युक्त आ रोहि(न्)आदयः च

IAST yuktārohiṇyādayaś ca

प्रकार विधि

सार युक्तारोहिन् आदि गण-पठित पदों में भी पूर्वपद-प्रकृतिस्वर का विधान है।

6.2.82
दीर्घकाशतुषभ्राष्ट्रवटं जे

IAST dīrghakāśatuṣabhrāṣṭravaṭaṃ je

प्रकार विधि

सार ज उत्तरपद होने पर दीर्घ, काश, तुष, भ्राष्ट्र और वट पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखते हैं।

6.2.83
अन्त्यात् पूर्वं बह्वचः

IAST antyāt pūrvaṃ bahvacaḥ

प्रकार विधि

सार बह्वच् पूर्वपद में उदात्त अन्तिम स्वर से ठीक पूर्व वाले स्वर पर रहता है।

6.2.84
ग्रामे अनिवसन्तः

IAST grāme 'nivasantaḥ

प्रकार विधि

सार ग्राम उत्तरपद वाले समास में (निवास-अर्थ से भिन्न) पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.85
घोष आदिषु

IAST ghoṣādiṣu

प्रकार विधि

सार घोष आदि उत्तरपदों वाले समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर मिलता है।

6.2.86
छात्त्रि आदयः शालायां

IAST chāttryādayaḥ śālāyām

प्रकार विधि

सार शाला उत्तरपद होने पर छात्त्रि आदि पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाले होते हैं।

6.2.87
प्रस्थे अवृद्धं अकर्की आदीणाम्

IAST prasthe 'vṛddham akarkyādīnām

प्रकार विधि

सार प्रस्थ उत्तरपद में कर्की आदि को छोड़कर अवृद्ध पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.88
माला आदीणां च

IAST mālādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार माला आदि गण-पठित पूर्वपदों में भी वही प्रकृतिस्वर-विधान लागू होता है।

6.2.89
अमहत्नवं नगरे अनुदीचां

IAST amahannavaṃ nagare 'nudīcām

प्रकार विधि

सार अनुदीच्य प्रयोग में नगर उत्तरपद होने पर महत्/नव से भिन्न पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.90
अर्मे च अवर्णं द्व्यच् त्र्यच्

IAST arme cāvarṇaṃ dvyac tryac

प्रकार विधि

सार अर्म उत्तरपद में अ-वर्णादि द्व्यच्/त्र्यच् पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाला होता है।

6.2.91
न भूत अधिकसंजीवमद्र अश्म(न्)कज्जलं

IAST na bhūtādhikasaṃjīvamadrāśmakajjalam

प्रकार नियम

सार भूत, अधिक, संजीव, मद्र, अश्मन् और कज्जल पूर्वपद पर उक्त प्रकृतिस्वर का प्रतिषेध है।

6.2.92
अन्तः

IAST antaḥ

प्रकार विधि

सार अन्तः उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.93
सर्वं गुणकार्त्स्न्ये

IAST sarvaṃ guṇakārtsnye

प्रकार विधि

सार गुण की कार्त्स्न्य (पूर्णता) द्योतन पर सर्व पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाला होता है।

6.2.94
संज्ञायां गिरिनिकाययोः

IAST saṃjñāyāṃ girinikāyayoḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा में गिरि या निकाय उत्तरपद होने पर पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.95
कुमार्यां वयसि

IAST kumāryāṃ vayasi

प्रकार विधि

सार वयस्-द्योतक कुमारी उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाला होता है।

6.2.96
उदके अच्(अ)केवले

IAST udake 'cakevale

प्रकार विधि

सार उदक उत्तरपद में केवल-अच् से भिन्न पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.97
द्विगौ क्रतौ

IAST dvigau kratau

प्रकार विधि

सार क्रतु-वाचक द्विगु समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.98
सभायां नपुंसके

IAST sabhāyāṃ napuṃsake

प्रकार विधि

सार नपुंसक सभा-उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.99
पुरे प्राचां

IAST pure prācām

प्रकार विधि

सार प्राच्यों के मत में पुर उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर वाला होता है।

6.2.100
अरिष्- टगौडपूर्वे च

IAST ariṣṭagauḍapūrve ca

प्रकार विधि

सार अरिष्ट या गौड पूर्वपद वाले (पुर-समास में) भी पूर्वपद प्रकृतिस्वर रखता है।

6.2.101
न हास्तिनफलकमार्देयाः

IAST na hāstinaphalakamārdeyāḥ

प्रकार विधि

सार अरण्य-समास में अमनुष्य-पूर्वपद को प्राप्त पूर्वपद-प्रकृतिस्वर का हास्तिन, फलक और मार्देय में प्रतिषेध है।

6.2.102
कुसूलकूपकुम्भशालं बिले

IAST kusūlakūpakumbhaśālaṃ bile

प्रकार विधि

सार बिल उत्तरपद होने पर कुसूल, कूप, कुम्भ और शाला पूर्वपद प्रकृतिस्वर से युक्त रहते हैं।

6.2.103
दिक् शब्दाः ग्रामजनपद आख्यानचानराटेषु

IAST dikśabdā grāmajanapadākhyānacānarāṭeṣu

प्रकार विधि

सार ग्राम, जनपद, आख्यान, चान या राट उत्तरपद होने पर दिश्-वाचक पूर्वपद प्रकृतिस्वर से युक्त रहता है।

6.2.104
आचार्य उपसर्जनः च न्तेवासी

IAST ācāryopasarjanaś cāntevāsī

प्रकार विधि

सार आचार्य को उपसर्जन रखने वाले समास में तथा अन्तेवासी-युक्त समास में पूर्वपद का प्रकृति-स्वर बना रहता है।

6.2.105
उत्तरपदवृद्धौ सर्वं च

IAST uttarapadavṛddhau sarvaṃ ca

प्रकार विधि

सार उत्तरपद में वृद्धि होने पर पूरा समास भी (पूर्वानुवृत्त) आद्युदात्त हो जाता है।

6.2.106
बहुव्रीहौ विश्वं संज्ञयां

IAST bahuvrīhau viśvaṃ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि-समास में संज्ञा-विषय में पूर्वपद ‘विश्व’ का प्रकृति-स्वर रहता है।

6.2.107
उदर अश्व इषुषु

IAST udara aśva iṣuṣu

प्रकार विधि

सार उत्तरपद उदर, अश्व या इषु होने पर पूर्वपद अपनी प्राकृत (मूल) स्वर-स्थिति में रहता है।

6.2.108
क्षेपे

सार व्याख्या संचालक-सत्यापन हेतु लम्बित — मूल सूत्र-पाठ ऊपर प्रामाणिक; एक-पंक्ति व्याख्या नहीं गढ़ी गई (zero-entropy).

6.2.109
नदी बन्धुनि

IAST nadī bandhuni

प्रकार विधि

सार उत्तरपद «बन्धु» होने पर पूर्वपद «नदी» प्रकृतिस्वर से युक्त रहता है।

6.2.110
निष्ठा उपसर्गपूर्वं अन्यतरस्याम्

IAST niṣṭhā upasargapūrvaṃ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार उपसर्गपूर्वक निष्ठा (क्त/क्तवतु) उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद का प्रकृतिस्वर अन्यतरस्याम् (वैकल्पिक) होता है।

6.2.111
उत्तरपद आदिः

IAST uttarapada ādiḥ

प्रकार विधि

सार समास-स्वर-प्रकरण में (अनुवृत्ति-सहित) उत्तरपद के आदि-स्वर को उदात्त करता है।

6.2.112
कर्णः वर्णलक्षणात्

IAST karṇaḥ varṇalakṣaṇāt

प्रकार विधि

सार वर्णलक्षण (रंग-वाचक) पूर्वपद से परे कर्ण उत्तरपद समास में आद्युदात्त होता है।

6.2.113
संज्ञा औपम्ययोः च

IAST saṃjñācaupamyayoś ca

प्रकार विधि

सार संज्ञा और औपम्य (उपमा/तुलना) वाले समास में पूर्वपद का प्रकृतिस्वर रहता है।

6.2.114
कण्ठपृष्ठग्रीवाजंघं च

सार व्याख्या संचालक-सत्यापन हेतु लम्बित — मूल सूत्र-पाठ ऊपर प्रामाणिक; एक-पंक्ति व्याख्या नहीं गढ़ी गई (zero-entropy).

6.2.115
शृङ्गं अवस्थायां च

सार व्याख्या संचालक-सत्यापन हेतु लम्बित — मूल सूत्र-पाठ ऊपर प्रामाणिक; एक-पंक्ति व्याख्या नहीं गढ़ी गई (zero-entropy).

6.2.116
नञः जरमरमित्रमृताः

IAST nañaḥ jaramaramitramṛtāḥ

प्रकार विधि

सार नञ्-पूर्वपदक समास में जर, मर, मित्र और मृत उत्तरपद प्रकृतिस्वर रहते हैं।

6.2.117
सोर्मनसी अलोम(न्)उषसी

IAST soḥ manasī alom uṣasī

प्रकार विधि

सार सु-पूर्वपद और मनस्, अल-अन्त शब्द अथवा उषस् उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद का प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.118
क्रतु आदयः

सार व्याख्या संचालक-सत्यापन हेतु लम्बित — मूल सूत्र-पाठ ऊपर प्रामाणिक; एक-पंक्ति व्याख्या नहीं गढ़ी गई (zero-entropy).

6.2.119
आदि उदात्तं द्व्यच् छन्दसि

IAST ādi-udāttaṃ dvyac chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में द्व्यच् (द्वि-स्वर) पद का आदि-स्वर उदात्त होता है।

6.2.120
वीरवीर्यौ च

IAST vīravīryau ca

प्रकार विधि

सार समास में पूर्वपद के रूप में आए ‘वीर’ और ‘वीर्य’ आद्युदात्त होते हैं।

6.2.121
कूलतीरतूलमूलशाला अक्षसमं अव्ययीभावे

IAST kūla-tīra-tūla-mūla-śālā akṣasamam avyayībhāve

प्रकार विधि

सार अव्ययीभाव में उत्तरपद कूल, तीर, तूल, मूल या शाला होने पर पूर्वपद का स्वर अक्ष-समास की भाँति (अन्तोदात्त) होता है।

6.2.122
कंसमन्थशूर्पपाय्यकाण्डं द्विगौ

IAST kaṃsamanthaśūrpapāyyakāṇḍaṃ dvigau

प्रकार विधि

सार द्विगु-समास में कंस, मन्थ, शूर्प, पाय्य या काण्ड उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.123
तत्पुरुषे शालायां नपुंसके

IAST tatpuruṣe śālāyāṃ napuṃsake

प्रकार विधि

सार तत्पुरुष समास में पूर्वपद शाला होने तथा समास के नपुंसक होने पर शाला को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.124
कन्था च

IAST kanthā ca

प्रकार विधि

सार कन्था उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद प्रकृतिस्वर होता है।

6.2.125
आदिः चिहण आदीणां

सार व्याख्या संचालक-सत्यापन हेतु लम्बित — मूल सूत्र-पाठ ऊपर प्रामाणिक; एक-पंक्ति व्याख्या नहीं गढ़ी गई (zero-entropy).

6.2.126
चेलखेटकटुककाण्डं गर्हायां

IAST celakheṭakaṭukakāṇḍaṃ garhāyām

प्रकार विधि

सार गर्हा-अर्थ में चेल्, खेत, कटुक या काण्ड उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.127
चीरं उपमानम्

IAST cīram upamānam

प्रकार विधि

सार उपमान-अर्थ में चीर उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.128
पललसूपशाकं मिश्रे

IAST palalasūpaśākaṃ miśre

प्रकार विधि

सार मिश्र-अर्थ में पलल, सूप या शाक उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.129
कूलसूदस्थलकर्षाः संज्ञायां

IAST kūlasūdasthalakarṣāḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में कूल, सूद, स्थल या कर्ष वाले समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.130
अकर्मधारये राज्यं

IAST akarmadhāraye rājyam

प्रकार विधि

सार कर्मधारय से भिन्न समास में राज्य उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.131
वर्ग्य आदयः च

IAST vargyādayaś ca

प्रकार विधि

सार वर्ग्य आदि (गणपठित) शब्दों के समास में भी पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.132
पुत्रः पुंभ्यः

IAST putraḥ puṃbhyaḥ

प्रकार विधि

सार पुंलिङ्ग पूर्वपदों से परे पुत्र उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.133
न आचार्यराज(न्)ऋत्विज्संयुक्तज्ञाति आख्यायां

IAST nācāryarājartvijsaṃyuktajñātyākhyāyām

प्रकार विधि

सार आख्या (नाम/उपाधि)-अर्थ में आचार्य, राजन्, ऋत्विज्, संयुक्त या ज्ञाति पूर्वपद हों तो पुत्र-विषयक पूर्वपद-प्रकृतिस्वर नहीं होता।

6.2.134
चूर्णआदीनि अप्राणिषष्ठ्याः

IAST cūrṇādīny aprāṇiṣaṣṭhyāḥ

प्रकार विधि

सार अप्राणि-षष्ठी से निष्पन्न चूर्णादि समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.135
षट् च काण्डआदीनि

IAST ṣaṭ ca kāṇḍādīni

प्रकार विधि

सार काण्डादि छह शब्द भी चूर्णादि की तरह अप्राणि-षष्ठी-समास में पूर्वपद-प्रकृतिस्वर के विषय हैं।

6.2.136
कुण्डं वनं

IAST kuṇḍaṃ vanam

प्रकार विधि

सार कुण्ड या वन उत्तरपद वाले समास में पूर्वपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.137
प्रकृत्या भगालं

IAST prakṛtyā bhagālam

प्रकार विधि

सार भगाल (समास/पद) प्रकृत्या—अपने मूल स्वर-रूप में—ही रहता है।

6.2.138
शितेर्नित्य अ बह्व् च् अहुव्रीहौ अभसत्

IAST śiter nityam abahvaco 'bahuvrīhāv abhasat

प्रकार विधि

सार शित्-कृदन्त के परे नित्य पूर्वपद-प्रकृतिस्वर होता है—जब वह अबह्वच् हो, बहुव्रीहि न हो, और भसत् न हो।

6.2.139
गतिकारक उपपदात् कृत्

IAST gatikārakopapadāt kṛt

प्रकार विधि

सार गति, कारक या उपपद से परे कृत् उत्तरपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.140
उभे वनस्पतिआदिषु युगपत्

IAST ubhe vanaspatyādiṣu yugapat

प्रकार विधि

सार वनस्पत्यादि गण में दोनों पदों को एक साथ प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.141
देवताद्वंद्वे च

IAST devatādvandve ca

प्रकार विधि

सार देवता-द्वन्द्व में भी दोनों पदों को युगपत् प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.142
न उत्तरपदे अनुदात्त आदौ अपृथिवीरुद्रपूष(न्)मन्थिषु

IAST nottarapade 'nudāttādāv apṛthivīrudrapūṣanmanthiṣu

प्रकार विधि

सार उत्तरपद अनुदात्तादि हो तो उभय-प्रकृतिस्वर नहीं; पृथ्वी, रुद्र, पूषन्, मन्थिन् इनमें यह निषेध नहीं।

6.2.143
अन्तः

IAST antaḥ

प्रकार विधि

सार अन्तर् पूर्वपद होने पर उत्तरपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.144
थ अथघञ्क्त अच् अप् इत्रका- णां

IAST thathaghañktācapitrakāṇām

प्रकार विधि

सार थ, अथ, घञ्, क्त, अच्, अप्, इत्र, क—इन प्रत्ययान्त उत्तरपदों को (गति-कारक-उपपद-पर) प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.145
सु उपमाणात् क्तः

IAST sūpamānāt ktaḥ

प्रकार विधि

सार सु-उपमान से परे क्त उत्तरपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.146
संज्ञायां अणाचित आदीणाम्

IAST saṃjñāyām aṇācitādīnām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में अण् तथा अचितादि कृदन्त-उत्तरपदों को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.147
प्रवृद्धआदीणां च

IAST pravṛddhādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार प्रवृद्धादि गण के कृदन्त-उत्तरपदों को भी (संज्ञा में) प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.148
कारकात् दत्त श्रुतयोरेव आशिषि

IAST kārakād dattaśrutayor evāśiṣi

प्रकार विधि

सार कारक से परे आशिस्-अर्थ में केवल दत्त और श्रुत को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.149
इत्थम्भूतेन कृतं इति च

IAST itthaṃbhūtena kṛtam iti ca

प्रकार विधि

सार इत्थंभूत-अर्थ में कृत भी (कारक-पर) प्रकृतिस्वर का विषय है।

6.2.150
अनः भावकर्मवचनः

IAST ano bhāvakarmavacanaḥ

प्रकार विधि

सार भाव या कर्म कहने वाले अन-प्रत्ययान्त उत्तरपद को प्रकृतिस्वर प्राप्त होता है।

6.2.151
मंक्तिन् व्याख्यानशयन आसनस्थानयाजक आदिक्रीताः

IAST maṅktin-vyākhyāna-śayana-āsana-sthāna-yājaka-ādi-krītāḥ

प्रकार विधि

सार मङ्क्तिन्, व्याख्यान, शयन, आसन, स्थान, याजक तथा आदि-क्रीत (मूल्य/साधन-वाचक पूर्वपद से क्रीत) उत्तरपद वाले समासों में पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.152
सप्तम्याः पुण्यं

IAST saptamyāḥ puṇyam

प्रकार विधि

सार सप्तमी-अर्थ वाले पद के साथ पुण्य उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.153
ऊन अर्थकलहं तृतीययाः

IAST ūna-artha-kalahaṃ tṛtīyayāḥ

प्रकार विधि

सार तृतीया-अर्थ वाले पूर्वपद के साथ ऊन, अर्थ और कलह उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.154
मिश्रं च अनुपसर्गं असंधौ

IAST miśraṃ cānupasargam asandhau

प्रकार विधि

सार उपसर्गरहित मिश्र उत्तरपद वाले समास में (सन्धि-विशेष/सन्धि-समास से भिन्न स्थिति में) पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.155
नञः गुणप्रतिषेधे सम्पादि(न्)अर्हहित अलमर्थाः तद्धिताः

IAST nañaḥ guṇa-pratiṣedhe sampādya-arha-hita-alam-arthāḥ taddhitāḥ

प्रकार विधि

सार नञ्-समास में गुण-प्रतिषेध अर्थ होने पर, तथा सम्पाद्य/अर्ह/हित/अलम्-अर्थक तद्धित प्रत्ययान्त उत्तरपद में, पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.156
ययतोः च अतदर्थे

IAST yayatoś ca atadarthe

प्रकार विधि

सार यत् तथा अत उत्तरपद/प्रत्ययान्त होने पर, जब वे अतदर्थ (अपने मुख्य/प्रकृत अर्थ से भिन्न) हों, पूर्वपद आद्युदात्त होता है।

6.2.157
अच् कौ अशक्ते

IAST ackau aśakte

प्रकार विधि

सार अशक्ति-अर्थ में अच् और क वाले उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.158
आक्रोशे च

IAST ākrośe ca

प्रकार विधि

सार आक्रोश-अर्थ में भी (अच्-क वाले उत्तरपद पर) पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.159
संज्ञायां

IAST saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में भी (उक्त अच्-क वाले योग में) पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.160
कृत्य उक इष्णुच्चारु आदयः

IAST kṛtyok-eṣṇuc-cārv-ādayaḥ

प्रकार विधि

सार कृत्य, उक, इष्णुच्, चारु आदि उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.161
विभाषा तृन् अन्नतीक्ष्- णशुचिषु

IAST vibhāṣā tṛn-anna-tīkṣṇa-śuciṣu

प्रकार विधि

सार तृन्, अन्न, तीक्ष्ण और शुचि उत्तरपद होने पर पूर्वपद-प्रकृति-स्वर वैकल्पिक है।

6.2.162
बहुव्रीहौ इदम् एतद् तध्यः प्रथमपूरणयोः क्रियागणने

IAST bahuvrīhāv idam-etad-tadbhyaḥ prathama-pūraṇayoḥ kriyāgaṇane

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि में क्रिया-गणनार्थ प्रथम/पूरण के साथ इदम्, एतद्, तद् पूर्वपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.163
संख्यायाः स्तनः

IAST saṃkhyāyāḥ stanaḥ

प्रकार विधि

सार संख्यावाची पूर्वपद के साथ स्तन उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.164
विभाषा छन्दसि

IAST vibhāṣā chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (संख्या + स्तन योग का) पूर्वपद-प्रकृति-स्वर वैकल्पिक है।

6.2.165
संज्ञायां मित्र अजिनयोः

IAST saṃjñāyāṃ mitrājinayoḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा में मित्र और अजिन उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.166
व्यवायिनः अन्तरं

IAST vyavāyino 'ntaram

प्रकार विधि

सार व्यवायि-अर्थ वाले पूर्वपद के साथ अन्तर उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.167
मुखं स्व अङ्गं

IAST mukhaṃ svāṅgam

प्रकार विधि

सार स्वाङ्ग-अर्थ में मुख उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.168
न अव्यय दिक् शब्दगोमहत्स्थूलमुष्टिपृथुवत्सेभ्यः

IAST nāvyaya-dik-śabda-go-mahat-sthūla-muṣṭi-pṛthu-vatsebhyaḥ

प्रकार विधि

सार अव्यय, दिक्-शब्द, गो, महत्, स्थूल, मुष्टि, पृथु और वत्स से परे मुख पर पूर्वपद-प्रकृति-स्वर नहीं होता।

6.2.169
निष्ठा उपमाणात्न्यतरस्यां

IAST niṣṭhopamānād anyatarasyām

प्रकार विधि

सार उपमान से परे निष्ठा (क्त) उत्तरपद होने पर पूर्वपद-प्रकृति-स्वर वैकल्पिक है।

6.2.170
जातिकालसुख आदिभ्यः अणाच्छादणात् क्तः अकृतमितप्रतिपन्णाः

IAST jāti-kāla-sukhādibhyo 'ṇāc chādanāt kto 'kṛta-mita-pratipannāḥ

प्रकार विधि

सार जाति-काल-सुख आदि तथा आच्छादनार्थ अण् से परे क्त (कृत-मित-प्रतिपन्न छोड़कर) उत्तरपद होने पर पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.171
वा जाते

IAST vā jāte

प्रकार विधि

सार जात-अर्थ में (उक्त क्त-योग का) पूर्वपद-प्रकृति-स्वर वैकल्पिक है।

6.2.172
नन्सुभ्यां

IAST nansubhyām

प्रकार विधि

सार नञ् और सु से परे (उक्त क्त आदि में) पूर्वपद को प्रकृति-स्वर प्राप्त होता है।

6.2.173
कपि पूर्वं

IAST kapi pūrvam

प्रकार विधि

सार कप् प्रत्यय में उदात्त स्वर पूर्व (कप् से पहले के अंश) पर रहता है।

6.2.174
ह्रस्व अन्ते अन्त्यात् पूर्वं

IAST hrasvānte 'ntyāt pūrvam

प्रकार विधि

सार ह्रस्वान्त पद में कप् होने पर उदात्त अन्त्य से पूर्व (उपान्त्य) पर होता है।

6.2.175
बहोर्नञ्वत्त्तरपदहूम्नि

IAST bahor nañvad uttarapada-bhūmni

प्रकार विधि

सार उत्तरपद के भूमिन् (आधिक्य/बहुत्व) अर्थ में बहु को नञ्-वत् स्वर-व्यवहार प्राप्त होता है।

6.2.176
न गुण आदयः अवयवाः

IAST na guṇādayo 'vayavāḥ

प्रकार विधि

सार पूर्व-विधान से प्राप्त आद्युदात्तत्व गुणादि शब्दों को तब नहीं होता जब वे (स्वतन्त्र उत्तरपद न होकर) मात्र अवयव हों।

6.2.177
उपसर्गात् स्व अङ्गं ध्रुवम् अपर्शु

IAST upasargāt svaṅgaṃ dhruvam aparśu

प्रकार विधि

सार उपसर्ग से परे स्व-अङ्गवाची उत्तरपद नित्य आद्युदात्त होता है, पर्शु को छोड़कर।

6.2.178
वनं संआसे

IAST vanaṃ samāse

प्रकार विधि

सार समास में वन उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.179
अन्तः

IAST antaḥ

प्रकार विधि

सार (उपसर्गादि-पूर्वपद से परे) अन्तः उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.180
अन्तः च

IAST antaś ca

प्रकार विधि

सार अन्त उत्तरपद भी आद्युदात्त होता है।

6.2.181
न निविभ्यां

IAST na nivibhyām

प्रकार विधि

सार नि और वि से परे (अन्तः/अन्त पर) वह आद्युदात्तत्व नहीं होता।

6.2.182
परेरभितोभाविमण्डलं

IAST parer abhitobhāvimaṇḍalam

प्रकार विधि

सार परि से परे अभितः, भावि और मण्डल उत्तरपद आद्युदात्त होते हैं।

6.2.183
प्रात् अस्व अङ्गं संज्ञायां

IAST prād asvaṅgaṃ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार प्र से परे अ-स्व-अङ्ग उत्तरपद संज्ञा में आद्युदात्त होता है।

6.2.184
निरुदक आदीनि च

IAST nirudakādīni ca

प्रकार विधि

सार निरुदक आदि भी (उसी आद्युदात्त-विधान में) आते हैं।

6.2.185
अभेर्मुखं

IAST abher mukham

प्रकार विधि

सार अभि से परे मुख उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.186
अपात् च

IAST apāc ca

प्रकार विधि

सार अप से परे भी मुख आद्युदात्त होता है।

6.2.187
स्फिगपूतवीणाअञ्जसध्व(न्)कुक्षिसीरनामनाम च

IAST sphigpūtavīṇāñjodhvakukṣisīranāmnāṃ ca

प्रकार विधि

सार स्फिक्, पूत, वीणा, अञ्जस्, ध्व, कुक्षि, सीर और नामन् भी (पूर्व-उपसर्ग-सन्दर्भ में उत्तरपद के रूप में) आद्युदात्त होते हैं।

6.2.188
अधेरुपरिस्थं

IAST adher uparistham

प्रकार विधि

सार अधि से परे उपरिस्थितवाची उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.189
अनोरप्रधानकणीयसी

IAST anor apradhānakaṇīyasī

प्रकार विधि

सार अनु से परे अप्रधान और कनीयसी उत्तरपद आद्युदात्त होते हैं।

6.2.190
पुरुषः च अन्व् आदिष्- टः

IAST puruṣaś cānvādiṣṭaḥ

प्रकार विधि

सार अन्वादिष्ट पुरुष भी आद्युदात्त होता है।

6.2.191
अतेरकृत्पदे

IAST ater akṛtpade

प्रकार विधि

सार अति से परे अ-कृत्पद उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.192
नेरनिधाने

IAST ner anidhāne

प्रकार विधि

सार नि से परे, निधान-अर्थ न होने पर, उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.193
प्रतेरंशु आदयः तत्पुरुषे

IAST prater aṃśvādayas tatpuruṣe

प्रकार विधि

सार प्रति से परे अंशु आदि उत्तरपद तत्पुरुष में आद्युदात्त होते हैं।

6.2.194
उपात् द्व्यच् अजिनं अगौरआदयः

IAST upād dvyac ajinam agaurādayaḥ

प्रकार विधि

सार उप से परे द्व्यच् उत्तरपद और अजिन आद्युदात्त होते हैं, गौरादि को छोड़कर।

6.2.195
सोरवक्षेपणे

IAST sor avakṣepaṇe

प्रकार विधि

सार सु से परे अवक्षेपण (तिरस्कार/निन्दा) अर्थ में उत्तरपद आद्युदात्त होता है।

6.2.196
विभाषा उत्पुच्छे

IAST vibhāṣotpucche

प्रकार विधि

सार उत्पुच्छ में वह आद्युदात्तत्व वैकल्पिक है।

6.2.197
द्वित्रिभ्यां पद्दत्मूर्धसु बहुव्रीहौ

IAST dvitribhyāṃ paddatmūrdhasu bahuvrīhau

प्रकार विधि

सार द्वि और त्रि से परे पद्, दत् और मूर्धन् बहुव्रीहि में आद्युदात्त होते हैं।

6.2.198
सक्थं च अक्र अन्तात्

IAST sakthaṃ cākrāntāt

प्रकार विधि

सार अक्रान्त पूर्वपद से परे सक्थ् भी आद्युदात्त होता है।

6.2.199
पर आदिः छन्दसि बहुलं

IAST parādiś chandasi bahulam

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पर (उत्तरपद) का आदि बहुल (विविध/अनियत रूप से) आद्युदात्त होता है।

अध्याय 6 · पाद 3 (139 सूत्र)

6.3.1
अलुक् उद्त्तरपदे

IAST alug uttarapade

प्रकार अधिकार

सार उत्तरपद रहने पर पूर्वपद की विभक्ति का लोप नहीं होता—यह अलुक्-अधिकार पूरे प्रकरण का शासन करता है।

6.3.2
पञ्चम्याः स्तोक आदिभ्यः

IAST pañcamyāḥ stokādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार स्तोकादिगण के शब्दों से परे उत्तरपद में पञ्चमी-विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.3
ओजः सहसम्भः तमसः तृतीययाः

IAST ojaḥ-saho-'mbhas-tamasas tṛtīyāyāḥ

प्रकार विधि

सार ओजस्, सहस्, अम्भस् और तमस् से परे उत्तरपद में तृतीया-विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.4
मनसः संज्ञायां

IAST manasaḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार मनस् से परे संज्ञा में (उत्तरपद होने पर) विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.5
आ- ज्ञायिनि च

IAST ājñāyini ca

प्रकार विधि

सार आज्ञायिन्-उत्तरपद में भी मनस् की विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.6
आत्मनः च पूरणे

IAST ātmanaś ca pūraṇe

प्रकार विधि

सार पूरण-अर्थ में आत्मन् से परे उत्तरपद में विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.7
वैयाकरण आख्यायां चतुर्थ्याः

IAST vaiyākaraṇākhyāyāṃ caturthyāḥ

प्रकार विधि

सार वैयाकरण-संज्ञा/आख्या में चतुर्थी-विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.8
परस्य च

IAST parasya ca

प्रकार विधि

सार पर-शब्द से भी (वैयाकरणाख्या में) चतुर्थी का अलुक् होता है।

6.3.9
हल् अत् अन्तात् सप्तम्याः संज्ञायां

IAST haldantāt saptamyāḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार हल्-अन्त या अत्-अन्त पूर्वपद से संज्ञा में सप्तमी-विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.10
कारनाम्नि च प्राचां हल् आदौ

IAST kāranāmni ca prācāṃ hāl ādau

प्रकार विधि

सार प्राचां मते हलादि-उत्तरपद वाले कारनाम (क्रिया-संज्ञा) में भी सप्तमी का अलुक् होता है।

6.3.11
मध्याद् गुरौ

IAST madhyād gurau

प्रकार विधि

सार मध्य से परे गुरु-उत्तरपद में (सप्तमी-)विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.12
अमूर्ध(न्)मस्तकात् स्व अङ्गात् अकामे

IAST amūrdha-mastakāt svāṅgād akāme

प्रकार विधि

सार मूर्धन्-मस्तक छोड़कर स्वाङ्ग-वाची से अकाम-अर्थ में सप्तमी का अलुक् होता है।

6.3.13
बन्धे च विभाषा

IAST bandhe ca vibhāṣā

प्रकार विधि

सार बन्ध-अर्थ में भी स्वाङ्ग से सप्तमी-अलुक् वैकल्पिक है।

6.3.14
तत्पुरुषे कृति बहुलं

IAST tatpuruṣe kṛti bahulam

प्रकार विधि

सार तत्पुरुष में कृदन्त-उत्तरपद पर विभक्ति-अलुक् बहुल (विविध/प्रायिक) होता है।

6.3.15
प्रावृष्शरद्कालदिवां जे

IAST prāvṛṭ-śarat-kāla-divāṃ je

प्रकार विधि

सार प्रावृष्, शरद्, काल और दिवा से ज-उत्तरपद में विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.16
विभष वर्षक्षरशरवरात्

IAST vibhāṣā varṣā-kṣara-śara-varāt

प्रकार विधि

सार वर्षा, क्षर, शर और वर से (ज-उत्तरपद में) अलुक् वैकल्पिक है।

6.3.17
घकालतनेषु कालनाम्नः

IAST gha-kāla-taneṣu kālanāmnaḥ

प्रकार विधि

सार कालनाम से घ, काल और तन परे होने पर विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.18
शयवासवासिषु अकालात्

IAST śaya-vāsa-vāsiṣv akālāt

प्रकार विधि

सार अकालवाची से शय, वास और वासिन् परे होने पर विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.19
न इन् सिद्धबध्नातिषु

IAST ne n-siddha-badhnātiṣu

प्रकार विधि

सार इन्, सिद्ध और बध्नाति परे होने पर (पूर्व-अलुक् का) प्रतिषेध है।

6.3.20
स्थे च भाषायां

IAST sthe ca bhāṣāyām

प्रकार विधि

सार भाषा में स्थ-उत्तरपद पर भी (अकाल से) अलुक्-प्रतिषेध/नियम लागू होता है।

6.3.21
षष्ठ्याः आक्रोशे

IAST ṣaṣṭhyā ākrośe

प्रकार विधि

सार आक्रोश-अर्थ वाले समास में षष्ठी-विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.22
पुत्रे अन्यतरस्यां

IAST putre 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार पुत्र-उत्तरपद में षष्ठी-अलुक् पक्षान्तर (वैकल्पिक) है।

6.3.23
ऋतो विद्यायोनिसम्बन्धेह्यः

IAST ṛto vidyā-yoni-sambandhebhyaḥ

प्रकार विधि

सार विद्या- या योनि-सम्बन्धवाची ऋकारान्त से षष्ठी-विभक्ति का अलुक् होता है।

6.3.24
विभाषा स्वसृ पत्योः

IAST vibhāṣā svasṛ-patyoḥ

प्रकार विधि

सार स्वसृ और पति से षष्ठी-अलुक् वैकल्पिक है।

6.3.25
आनङ् ऋतः द्वंद्वे

IAST ānaṅ ṛto dvandve

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व में ऋकारान्त पूर्वपद के ऋ के स्थान पर आनङ् आदेश होता है।

6.3.26
देवताद्वंद्वे च

IAST devatādvandve ca

प्रकार विधि

सार देवता-नामों के द्वन्द्वसमास में पूर्वपद के विभक्ति-प्रत्यय का अलुक् होता है (मित्रावरुणौ इत्यादि)।

6.3.27
ईत् अग्नेः सोमवरुणयोः

IAST īd agneḥ somavaruṇayoḥ

प्रकार विधि

सार सोम या वरुण के साथ देवताद्वन्द्व में अग्नि के अन्त्य का ई-आदेश होता है (अग्नीषोमौ, अग्नीवरुणौ)।

6.3.28
इत् वृद्धौ

IAST id vṛddhau

प्रकार विधि

सार वृद्धिमान् उत्तरपद होने पर पूर्वपद (अग्नि आदि) के अन्त में इकार आदेश होता है।

6.3.29
दिवः द्यावा

IAST divo dyāvā

प्रकार विधि

सार (देवता-द्वन्द्व में) दिव् के स्थान पर द्यावा आदेश होता है (द्यावापृथिवी)।

6.3.30
दिवसः च पृथिव्यां

IAST divasaś ca pṛthivyām

प्रकार विधि

सार पृथिवी के साथ समास में दिव् का दिवस् रूप भी होता है (दिवस्पृथिवी)।

6.3.31
उषासा उषसः

IAST uṣāsā uṣasaḥ

प्रकार विधि

सार (देवता-द्वन्द्व में) उषस् के स्थान पर उषासा आदेश होता है (उषासासूर्ये)।

6.3.32
मातरपितरौ उदीचां

IAST mātarapitarau udīcām

प्रकार विधि

सार उदीच्य आचार्यों के मत में माता-पिता के द्वन्द्व में मातरपितरौ रूप होता है।

6.3.33
पितरामातरा च छन्दसि

IAST pitarāmātarā ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पिता-माता के द्वन्द्व में पितरामातरा रूप भी होता है।

6.3.34
स्त्रियाः पुंवत् हाषितपुंस्कात् अणूङ् समान अधिकरणे स्त्रियां अपूरणीप्रिया आदिषु

IAST striyāḥ puṃvad bhāṣitapuṃskād anūṅ samānādhikaraṇe striyām apūraṇīpriyādiṣu

प्रकार विधि

सार भाषितपुंस्क (पुंरूप-युक्त) अनूङ् स्त्री-प्रकृति समानाधिकरण स्त्री-उत्तरपद से पूर्व पुंवत् होती है, अपूरणी-प्रियादि को छोड़कर।

6.3.35
तसिल् आदिषु आ कृत्वसुचः

IAST tasilādiṣv ā kṛtvasucaḥ

प्रकार विधि

सार तसिल् से लेकर कृत्वसुच् पर्यन्त प्रत्ययों से पूर्व भी (स्त्री) पुंवत् होती है।

6.3.36
क्यङ् मानिनोः च

IAST kyaṅmāninoś ca

प्रकार विधि

सार क्यङ् और मानिन् से पूर्व भी (स्त्री) पुंवत् होती है।

6.3.37
न क उपधायाः

IAST na kopadhāyāḥ

प्रकार विधि

सार क-उपधा वाली स्त्री-प्रकृति में पुंवद्भाव का प्रतिषेध होता है।

6.3.38
संज्ञापूरण्योः च

IAST saṃjñāpūraṇyoś ca

प्रकार विधि

सार संज्ञा-समास और पूरणी (क्रमवाचक) में स्त्री-शब्द का पुंवद्भाव नहीं होता।

6.3.39
वृद्धिनिमित्तस्य च तद्धितस्य अरक्तविकारे

IAST vṛddhinimittasya ca taddhitasya araktavikāre

प्रकार विधि

सार वृद्धि-निमित्त तद्धित वाले स्त्री-शब्द का (रक्त-विकार से भिन्न) पुंवद्भाव नहीं होता।

6.3.40
स्व अङ्गात् च ईतः अमानिनि

IAST svāṅgāc cetor amānini

प्रकार नियम

सार स्व तथा अङ्ग से बनी ईकारान्त स्त्री का पुंवद्भाव नहीं होता, मानिन् से पूर्व को छोड़कर।

6.3.41
जातेः च

IAST jāteś ca

प्रकार विधि

सार जातिवाचक स्त्री-शब्द का भी (पूर्ववत्) पुंवद्भाव नहीं होता।

6.3.42
पुंवत् कर्मधारयजातीयदेशीयेषु

IAST puṃvat karmadhārayajātīyadeśīyeṣu

प्रकार विधि

सार कर्मधारय में तथा जातीय और देशीय से पूर्व स्त्री पुंवत् होती है।

6.3.43
घरूपकल्पचेलट्ब्रुवगोत्रमतहतेषु ङ्यः अनेक अचः ह्रस्वः

IAST gharūpakalpacelaṭibruvagotramatahateṣu ṅyaḥ anekācaḥ hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार घ, रूप, कल्प, चेल, टि, ब्रुव, गोत्र, मत, हत से पूर्व अनेकच् ङी-अन्त का ह्रस्व होता है।

6.3.44
नद्याः शेषस्य अन्यतरस्यां

IAST nadyāḥ śeṣasyānyatarasyām

प्रकार विधि

सार नदी-संज्ञक शेष (पूर्वोक्त घ-आदि से भिन्न) परे वैकल्पिक रूप से ङी का ह्रस्व होता है।

6.3.45
उक् इतः च

IAST ugitaś ca

प्रकार विधि

सार उगित् (उक्-इत् वाले) शब्द की ङी का भी (शेष परे) वैकल्पिक ह्रस्व होता है।

6.3.46
आत्महतः समान अधिकरणजतीययोः

IAST ānm ahataḥ samānādhikaraṇajātīyayoḥ

प्रकार विधि

सार समानाधिकरण और जातीय समास में महत् के स्थान पर आन् आदेश होता है (महा-)।

6.3.47
द्व्यष्टनः संख्यायां अबहुव्रीहि अशीत्योः

IAST dvy-aṣṭanaḥ saṃkhyāyām abahuvrīhy-aśītyoḥ

प्रकार विधि

सार बहुव्रीहि और अशीति से भिन्न संख्या परे द्वि और अष्टन् के स्थान पर (आन्-निमित्त) द्वा/अष्टा रूप होते हैं।

6.3.48
त्रेः त्रयः

IAST tres trayaḥ

प्रकार विधि

सार (संख्या-समास में) त्रि के स्थान पर त्रयस् आदेश होता है (त्रयोदश)।

6.3.49
विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेषां

IAST vibhāṣā catvāriṃśatprabhṛtau sarveṣām

प्रकार विधि

सार चत्वारिंशत् से आगे की संख्याओं में इन सब (द्वि, अष्टन्, त्रि) के विशेष रूप विकल्प से होते हैं।

6.3.50
हृदयस्य हृद् लेखयत् अण्लासेषु

IAST hṛdayasya hṛl lekhayad-aṇ-lāseṣu

प्रकार विधि

सार लेख, यत्, अण् और लास से पूर्व हृदय के स्थान पर हृद् आदेश होता है (हृल्लेख, हृद्य, हृल्लास)।

6.3.51
वा शोकष्यञ्रोगेषु

IAST vā śokaṣyañrogeṣu

प्रकार विधि

सार पूर्व-सूत्र-विहित हृद्-आदेश शोक, ष्यञ्-प्रत्ययान्त और रोग के पर में वैकल्पिक होता है।

6.3.52
पादस्य पद आजि आति गौपहतेषु

IAST pādasya pada āji āti gaupahateṣu

प्रकार विधि

सार आजि, आति/अधि तथा गौ-उपहत आदि पर में पाद के स्थान पर पद आदेश होता है।

6.3.53
पद् यति अतदर्थे

IAST pad yati atadarthe

प्रकार विधि

सार यत्/यति के पर में, पाद-अर्थ से भिन्न अर्थ होने पर, पाद के स्थान पर पद होता है।

6.3.54
हिमकाषिहतिषु च

IAST himakāṣihatiṣu ca

प्रकार विधि

सार हिम, काषि और हति के पर में भी पाद के स्थान पर पद आदेश होता है।

6.3.55
ऋचः शे

IAST ṛcaḥ śe

प्रकार विधि

सार श-आदि उत्तरपद पर पूर्वपद ऋच् का विहित रूप (आदेश/व्यवस्था) होता है।

6.3.56
वा घोषमिश्रशब्देषु

IAST vā ghoṣamiśraśabdeṣu

प्रकार विधि

सार घोष, मिश्र और शब्द के पर में पूर्व-सूत्र का वह आदेश वैकल्पिक होता है।

6.3.57
उदकस्य उदः संज्ञायां

IAST udakasya udaḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में उदक के स्थान पर उद आदेश होता है।

6.3.58
पेषम्वासवाहनधिषु

IAST peṣamvāsavāhanadhiṣu

प्रकार विधि

सार पेष, वास, वाहन और अधि के पर में भी उदक के स्थान पर उद होता है।

6.3.59
एकहल् आदौ पूरयितव्ये न्यारयां

IAST ekahal ādau pūrayitavye nyārāyām

प्रकार विधि

सार एकहल्-आदि उत्तरपद पर और पूरयितव्य अर्थ में उदक→उद वैकल्पिक (अन्यतरस्याम्) होता है।

6.3.60
मन्थ ओदनसक्तुबिन्दुवज्रभारहारवीवधगाहेषु च

IAST mantha odanasaktubinduvajrabhārahāravīvadhagāheṣu ca

प्रकार विधि

सार मन्थ, ओदन, सक्तु, बिन्दु, वज्र, भार, हार, वीवध और गाह के पर में भी उद आदेश होता है।

6.3.61
इकः ह्रस्वः अङ्यः गालवस्य

IAST ikaḥ hrasvaḥ aṅyaḥ gālavasya

प्रकार विधि

सार गालव के मत में ङी-परक (अङ्य) में पूर्वपद के इक् का ह्रस्व होता है।

6.3.62
एक तद्धिते च

IAST eka taddhite ca

प्रकार विधि

सार एक और तद्धित-पर में भी (इक् का) ह्रस्व होता है।

6.3.63
ङी आपोः संज्ञाछन्दसोः अहुलं

IAST ṅī āpoḥ saṃjñāchandasoḥ ahulam

प्रकार विधि

सार संज्ञा और छन्दस् में पूर्वपद की ङी तथा आप् का ह्रस्व बहुल (प्रायः) होता है।

6.3.64
त्वे च

IAST tve ca

प्रकार विधि

सार त्व-प्रत्यय पर में भी ङी/आप् का वही ह्रस्व-विधान लागू होता है।

6.3.65
इष्टका इषीकामालाणां चिततूलभारिषु

IAST iṣṭakā iṣīkāmālāṇāṃ citatūlabhāriṣu

प्रकार विधि

सार चित, तूल और भारिन् के पर में इष्टका, इषीका तथा माला का विहित (ह्रस्व/संक्षिप्त) रूप होता है।

6.3.66
ख्- इति अनव्ययस्य

IAST kh- iti anavyayasya

प्रकार अधिकार

सार खित् पर में अनव्यय पूर्वपद के विषय में आगामी मुम् आदि का अधिकार है।

6.3.67
अरुः द्विषत् अच् न्त स्य मुं

IAST aruḥ dviṣat ac nta sya muṃ

प्रकार विधि

सार अरुस्, द्विषत् और अजन्त के अन्त में (खित् पर) मुम् आगम होता है।

6.3.68
इचः एक अचः म्रत्ययात् अ

IAST icaḥ eka acaḥ mratyayāt a

प्रकार अतिदेश

सार एकाच् इच्-अन्त को अम्-प्रत्ययवत् माना जाता है (अतः मुम् आदि की योग्यता)।

6.3.69
वाचंयमपुरंदरौ

IAST vācaṃyamapuraṃdarau

प्रकार विधि

सार वाचंयम और पुरंदर—ये दो रूप निपातन से सिद्ध हैं।

6.3.70
कारे सत्य अगदस्य

IAST kāre satya agadasya

प्रकार विधि

सार कार पर में सत्य और अगद का विहित समास-रूप होता है।

6.3.71
श्येनतिलस्य पाते ञे

IAST śyenatilasya pāte ñe

प्रकार विधि

सार ञ्-परक पात में श्येन और तिल का विहित रूप होता है।

6.3.72
रात्रेः कृति विभाषा

IAST rātreḥ kṛti vibhāṣā

प्रकार विधि

सार कृत् पर में रात्रि का रूप वैकल्पिक होता है।

6.3.73
नलोपः नञः

IAST nalopaḥ nañaḥ

प्रकार विधि

सार नञ् के न् का लोप होता है।

6.3.74
तस्मात्नुट् अचि

IAST tasmāt nuṭ aci

प्रकार विधि

सार उस (नल्-लोपयुक्त नञ्) से अच् पर नुट् आगम होता है।

6.3.75
नभ्राज् नपात्नवेदः नासत्यानमुचिनकुलनखनपुंसकनक्षत्रनक्रनाकेषु प्रकृत्या

IAST nabhrāj napātnavedaḥ nāsatyānamucinakulanakhanapuṃsakanakṣatranakranākeṣu prakṛtyā

प्रकार नियम

सार नभ्राज्, नपात्, नवेदाः, नासत्या, नमुचि, नकुल, नख, नपुंसक, नक्षत्र, नक्र और नाक में नञ् प्रकृति co रहता है (न्-लोप नहीं)।

6.3.76
एक आदिः च एकस्य च आदुक्

IAST ekādiś ca ekasya cāduk

प्रकार विधि

सार समास में पूर्वपद एक तथा एकादि वर्ग के शब्दों के बाद आदुक् (आद्/आ) का आगम होता है (यथा एकादश)।

6.3.77
नगः अप्राणिषु न्यारयां

IAST nago 'prāṇiṣu

प्रकार विधि

सार अप्राणिवाची उत्तरपद परे पूर्वपद नग के स्थान पर न आदेश होता है।

6.3.78
सहस्य सः संज्ञायां

IAST sahasya saḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में पूर्वपद सह के स्थान पर स आदेश होता है (यथा सपत्नी)।

6.3.79
ग्रन्थ अन्त अधिके च

IAST granthāntādhike ca

प्रकार विधि

सार ग्रन्थ-अन्त तथा अधिक अर्थ वाले उत्तरपद परे भी सह के स्थान पर स आदेश होता है।

6.3.80
द्वितीये च अनुप अत्यये

IAST dvitīye cānupasarge

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित द्वितीय उत्तरपद परे भी सह के स्थान पर स आदेश होता है।

6.3.81
अव्ययीभावे च अकाले

IAST avyayībhāve cākāle

प्रकार विधि

सार कालभिन्न अव्ययीभाव में भी पूर्वपद सह के स्थान पर स आदेश होता है।

6.3.82
वा उपसर्जनस्य

IAST vopasarjanasya

प्रकार विधि

सार सह के उपसर्जन (गौण) होने पर स आदेश वैकल्पिक होता है।

6.3.83
प्रकृत्या आशिषि गोवत्सहलेषु

IAST prakṛtyāśiṣi govatsahaleṣu

प्रकार नियम

सार आशीर्वाद में तथा गोवत्स व हल-युक्त प्रयोगों में पूर्वपद प्रकृति (मूल रूप) में ही रहता है—पूर्व के स-आदेश का निषेध।

6.3.84
समानस्य छन्दसि अमूर्ध(न्)प्रभृति उदर्केषु

IAST samānasya chandasy amūrdhaprabhṛtiṣūdarkesu

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अमूर्धन् से उदर्क पर्यन्त उत्तरपदों परे समान के स्थान पर स आदेश होता है।

6.3.85
ज्योतिस्जनपदरात्रिनाभिनाम(न्)गोत्ररूपस्थानवर्णवयस्वचनबन्धुषु

IAST jyotirjanapadarātrinābhināmagotrarūpasthānavarṇavayovacanabandhuṣu

प्रकार विधि

सार ज्योतिस्, जनपद, रात्रि, नाभि, नामन्, गोत्र, रूप, स्थान, वर्ण, वयस्, वचन तथा बन्धु परे समान के स्थान पर स आदेश होता है।

6.3.86
चरणे ब्रह्मचारिणि

IAST caraṇe brahmacāriṇi

प्रकार विधि

सार चरण तथा ब्रह्मचारिन् उत्तरपद परे भी समान के स्थान पर स आदेश होता है।

6.3.87
तीर्थे ये

IAST tīrthe ye

प्रकार विधि

सार तीर्थ तथा य-आदि उत्तरपद परे भी समान के स्थान पर स आदेश होता है (यथा सतीर्थ्य)।

6.3.88
विभाषा उदरे

IAST vibhāṣodare

प्रकार विधि

सार उदर उत्तरपद परे समान के स्थान पर स आदेश वैकल्पिक होता है (सोदर/समानोदर)।

6.3.89
दृश् दृश वतुषु

IAST dṛgdṛśavatuṣu

प्रकार विधि

सार दृश्, दृश तथा वतु परे समान के स्थान पर स आदेश होता है (यथा सदृश)।

6.3.90
इदंकिमोरीश्की

IAST idaṃkimor īśkī

प्रकार विधि

सार दृश्-आदि परे इदम् के स्थान पर ईश् तथा किम् के स्थान पर की आदेश होता है (ईदृश्, कीदृश्)।

6.3.91
आ सर्वनाम्नः

IAST ā sarvanāmnaḥ

प्रकार विधि

सार दृश्-आदि परे सर्वनाम के अन्त्य भाग के स्थान पर आ आदेश होता है (तादृश्, यादृश्)।

6.3.92
विष्व(ञ्)च्देवयोः च टेरद्रि अञ्चतौ वप्रत्यये

IAST viṣvagdevayoś ca ṭer adryañcatau vapratyaye

प्रकार विधि

सार व-प्रत्यय परे विष्वञ्च् व देव के टि का, तथा अद्रि व अञ्चति के टि का विशेष आदेश होता है (यथा विषुवत्)।

6.3.93
समः समि

IAST samaḥ sami

प्रकार विधि

सार पूर्वपद सम् के स्थान पर समि आदेश होता है।

6.3.94
तिरसः तिरि अलोपे

IAST tirasas tiry alope

प्रकार विधि

सार लोप न होने पर पूर्वपद तिरस् के स्थान पर तिरि आदेश होता है।

6.3.95
सहस्य सध्रिः

IAST sahasya sadhriḥ

प्रकार विधि

सार पूर्वपद सह के स्थान पर सध्रि आदेश होता है (यथा सध्र्यञ्च्)।

6.3.96
सध मादस्थयोः हन्दसि

IAST sadha mādastyayoś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में माद् तथा स्थ परे (सह के स्थान पर) सध आदेश होता है।

6.3.97
द्वि अन्तरुपसर्गेह्यः अपः ईत्

IAST dvyantarupasargebhyo 'pa īt

प्रकार विधि

सार द्वि, अन्तर तथा उपसर्गों के परे अप् के अ के स्थान पर ई आदेश होता है (द्वीप, समीप)।

6.3.98
ऊत् अनोर्देशे

IAST ūd anor deśe

प्रकार विधि

सार देशार्थ में अनु के परे अप् के अ के स्थान पर ऊ आदेश होता है (अनूप)।

6.3.99
अषष्ठी अतृतीयस्थस्य न्यस्य दुक् आशिः आशा आस्था आस्थित उत्सुक ऊतिकारकराग छेषु

IAST aṣaṣṭhyatṛtīyasthasya yasya dug āśirāśāsthāsthitosukūtīkārakarāgaccheṣu

प्रकार विधि

सार षष्ठी-तृतीया-भिन्न सम्बन्ध वाले पूर्वपद के बाद आशिस्, आशा, आस्था, आस्थित, उत्सुक, ऊति, कारक, राग तथा छ परे दुक् (द्) का आगम होता है।

6.3.100
अर्थे विभाषा

IAST arthe vibhāṣā

प्रकार विधि

सार अर्थ उत्तरपद परे पूर्वोक्त दुक्-आगम वैकल्पिक होता है।

6.3.101
कोः कत् तत्पुरुषे अचि

IAST koḥ kat tatpuruṣe 'ci

प्रकार विधि

सार तत्पुरुष समास में स्वरादि (अच्) उत्तरपद के पूर्व कु को कत् आदेश होता है।

6.3.102
रथवदयोः च

IAST rathavadayoś ca

प्रकार विधि

सार रथ तथा वद के पूर्व भी कु को कत् आदेश होता है।

6.3.103
तृणे च जातौ

IAST tṛṇe ca jātau

प्रकार विधि

सार जातिवाचक तृण के पूर्व भी कु को कत् आदेश होता है।

6.3.104
का पथि(न्)अक्षयोः

IAST kā pathy akṣayoḥ

प्रकार विधि

सार पथिन् और अक्ष के पूर्व कु को का आदेश होता है।

6.3.105
ईषदर्थे

IAST īṣad arthe

प्रकार विधि

सार ईषत् (किंचित्/अल्प) अर्थ में कु को का आदेश होता है।

6.3.106
विभाषा पुरुषे

IAST vibhāṣā puruṣe

प्रकार विधि

सार पुरुष के पूर्व कु को का आदेश विकल्प से होता है।

6.3.107
कवं च उष्- णे

IAST kavaṃ coṣṇe

प्रकार विधि

सार उष्ण के पूर्व कु को कव् (कव) भी आदेश होता है।

6.3.108
पथि च छन्दसि

IAST pathi ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में पथि के पूर्व भी (कु-विषयक) पूर्व-प्रयुक्त आदेश लागू होता है।

6.3.109
पृषोदर आदीनि यथोपदिष्तं

IAST pṛṣodarādīni yathopadiṣṭam

प्रकार अतिदेश

सार पृषोदर आदि पद पारम्परिक उपदेश के अनुसार यथास्थित सिद्ध माने जाते हैं।

6.3.110
संख्याविसाय ऊर्वस्य अह्नस्य अहन् अन्यतरस्यां ङौ

IAST saṃkhyāvisāyor dvy-aṣṭanor ahno 'hann anyatarasyāṃ ṅau

प्रकार विधि

सार संख्या, वि तथा साय (और द्वि-अष्टन् प्रसंग) के परे अह्न के स्थान पर ङि में विकल्प से अहन् होता है।

6.3.111
ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घः णः

IAST ḍhralope pūrvasya dīrgho 'ṇaḥ

प्रकार विधि

सार ढ् या र् के लोप पर पूर्ववर्ती अण्-स्वर (अ/इ/उ) का दीर्घ होता है।

6.3.112
सहिवहोरोत् अवर्णस्य

IAST sahivahor od avarṇasya

प्रकार विधि

सार सहि और वह् के अवर्ण को ओ आदेश होता है।

6.3.113
सा- ढ्यै सा- ड्व्ह्वा सा- ढ इति निगमे

IAST sāḍhyai sāḍhvā sāḍha iti nigame

प्रकार विधि

सार निगम (वेद) में साढ्यै, साढ्वा, साढ—ये रूप यथादिष्ट सिद्ध हैं।

6.3.114
संहितायां

IAST saṃhitāyām

प्रकार अधिकार

सार आगे के कार्यों का अधिकार—संहिता (सन्धि/समीप-अवस्था) में।

6.3.115
कर्णे लक्षनस्य अविष्- टाष्ट(न्)पञ्च(न्)मणिभिन्नछिन्नछिद्रस्रुवस्वस्तिकस्य

IAST karṇe lakṣaṇasyāviṣṭāṣṭapañcamaṇibhinnachinnachidrasruvasvastikasya

प्रकार विधि

सार लक्षण, अविष्ट, अष्ट, पञ्च, मणि, भिन्न, छिन्न, छिद्र, स्रुव तथा स्वस्तिक के अन्त का दीर्घ कर्ण के पूर्व होता है।

6.3.116
नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु क्वौ

IAST nahivṛtivṛṣivyadhirucisahitaniṣu kvau

प्रकार विधि

सार क्विप् परे होने पर नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, तन् में (स्वर-)दीर्घ होता है।

6.3.117
वनगिर्योः संज्ञायां कोटरकिंशुलक आदीणां

IAST vanagiryoḥ saṃjñāyāṃ koṭarakiṃśulakādīnām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में कोटर-किंशुलक आदि के अन्त का दीर्घ वन तथा गिरि के पूर्व होता है।

6.3.118
वले

IAST vale

प्रकार विधि

सार वल के पूर्व भी (पूर्वपद का) दीर्घ होता है।

6.3.119
मतौ बह्वचः अनजिर आदीणां

IAST matau bahvaco 'nañirādīnām

प्रकार विधि

सार मतुप् परे बह्वच् पदों का दीर्घ होता है, अञिर आदि को छोड़कर।

6.3.120
शर आदीणां च

IAST śarādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार शर आदि गण के पदों में भी (मतुप्-पूर्व) दीर्घ होता है।

6.3.121
इकः वहे अपीलोः

IAST iko vahe 'pīloḥ

प्रकार विधि

सार वह् के पूर्व इक् (इ/उ/ऋ) का दीर्घ होता है, पीलु को छोड़कर।

6.3.122
उपसर्गस्य घञि अमनुष्ये बहुलं

IAST upasargasya ghañy amanuṣye bahulam

प्रकार विधि

सार अमनुष्यार्थ घञ् परे उपसर्ग का दीर्घ बहुल (अनियत/विविध) रूप से होता है।

6.3.123
इकः काशे

IAST iko kāśe

प्रकार विधि

सार काश के पूर्व इक् का दीर्घ होता है।

6.3.124
दः ति

IAST dasti

प्रकार विधि

सार ति परे द-सम्बद्ध पूर्वपद/धातु में दीर्घ होता है।

6.3.125
अष्टनः संज्ञायां

IAST aṣṭanaḥ saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में अष्टन् के (अन्-)अवर्ण का दीर्घ होता है।

6.3.126
छन्दसि च

IAST chandasi ca

प्रकार विधि

सार छन्दस् (वैदिक प्रयोग) में भी कप् परे पूर्वपद का ह्रस्व-विधान होता है।

6.3.127
चितेः कपि

IAST citeḥ kapi

प्रकार विधि

सार कप् परे होने पर चिति-शब्द (पूर्वपद) में ह्रस्वादि रूप-विधान होता है (चितिक)।

6.3.128
विश्वस्य वसुराटोः

IAST viśvasya vasurāṭoḥ

प्रकार विधि

सार वसु या राट् परे होने पर विश्व के अन्त्य अकार का दीर्घ होता है (विश्वावसु, विश्वाराट्)।

6.3.129
नरे संज्ञायां

IAST nare saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में उत्तरपद नर होने पर पूर्वपद के अन्त्य स्वर का दीर्घ होता है।

6.3.130
मित्रे च ऋषौ

IAST mitre ca ṛṣau

प्रकार विधि

सार ऋषि-संज्ञा में उत्तरपद मित्र होने पर भी पूर्वपद के अन्त्य स्वर का दीर्घ होता है।

6.3.131
मन्त्रे सोम अश्व इन्द्रिय विश्वएव्यय मतौ

IAST mantre soma aśva indriya viśvaevyaya atau

प्रकार विधि

सार मन्त्र में उत्तरपद सोम, अश्व, इन्द्रिय, विश्व, एव्य, अय अथवा मति होने पर पूर्वपद के अन्त्य स्वर का दीर्घ होता है।

6.3.132
ओष्सधेः च विभक्तौ अप्रथमा- आं

IAST oṣadheḥ ca vibhaktau aprathamāyām

प्रकार विधि

सार ओषधि शब्द के अन्त्य इ का दीर्घ अप्रथमा विभक्ति के परे होता है।

6.3.133
ऋचि तुनुघमक्षुतङ्कुत्र उरुष्या- णां

IAST ṛci tunughamakṣutaṅkutroruṣyāṇām

प्रकार विधि

सार ऋच् में तु, नु, घ, मक्षु, तङ्कुत्र और उरुष्या के स्वर दीर्घ होते हैं।

6.3.134
इकः सुञि

IAST ikaḥ suñi

प्रकार विधि

सार सुञ् (सु) के परे इक् स्वर दीर्घ होता है।

6.3.135
द्व्यचः अतः तिङः

IAST dvyacaḥ ataḥ tiṅaḥ

प्रकार विधि

सार द्व्यच् तिङन्त के अकार का दीर्घ होता है।

6.3.136
निपातस्य च

IAST nipātasya ca

प्रकार विधि

सार निपात के (अकार/स्वर का) भी दीर्घ होता है।

6.3.137
अन्येषां अपि दृश्यते

IAST anyeṣām api dṛśyate

प्रकार विधि

सार अन्य शब्दों में भी (वैदिक प्रयोग में) दीर्घ देखा जाता है।

6.3.138
चौ

IAST cau

प्रकार विधि

सार चु (च) के परे पूर्व स्वर दीर्घ होता है।

6.3.139
सम्प्रसारणस्य

IAST samprasāraṇasya

प्रकार विधि

सार सम्प्रसारण-स्वर का दीर्घ होता है।

अध्याय 6 · पाद 4 (175 सूत्र)

6.4.1
अङ्गस्य

IAST aṅgasya

प्रकार अधिकार

सार अङ्ग (प्रत्यय-से-पूर्व आधार) के विषय में आगे के विधियों का अधिकार आरम्भ होता है।

6.4.2
हलः

IAST halaḥ

प्रकार विधि

सार हल्-अन्त अङ्ग की उपधा का (नामि-परे) दीर्घत्व-विधि का आधार-निर्देश।

6.4.3
नामि

IAST nāmi

प्रकार विधि

सार नामि सुप् परे होने पर हल्-अन्त अङ्ग की उपधा दीर्घ होती है।

6.4.4
न तिसृचतसृ

IAST na tisṛcatasṛ

प्रकार नियम

सार तिसृ और चतसृ की उपधा का नामि में दीर्घ नहीं होता।

6.4.5
छन्दसि उभयथा

IAST chandasi ubhayathā

प्रकार विधि

सार छन्दस् में तिसृ-चतसृ की उपधा दीर्घ तथा ह्रस्व उभयथा होती है।

6.4.6
नृ च

IAST nṛ ca

प्रकार विधि

सार नृ शब्द पर भी छन्दस् में दीर्घ-ह्रस्व उभयथा लागू होता है।

6.4.7
न उपधायाः

IAST nopadhāyāḥ

प्रकार परिभाषा

सार अङ्ग में आदेश सामान्यतः उपधा के स्थान पर नहीं होता, जब तक ‘उपधायाः’ विशेष रूप से न कहा जाए।

6.4.8
सर्वनामस्थाने च असम्बुद्धौ

IAST sarvanāmasthāne cāsambuddhau

प्रकार विधि

सार सम्बुद्धि को छोड़कर सर्वनामस्थान परे भी हल्-अन्त अङ्ग की उपधा दीर्घ होती है।

6.4.9
वा षपूर्वस्य निगमे

IAST vā ṣapūrvasya nigame

प्रकार विधि

सार निगम (वैदिक प्रयोग) में ष्-पूर्व अङ्ग की उपधा का दीर्घ वैकल्पिक होता है।

6.4.10
स अन्तमहतः संयोगस्य

IAST sāntamahataḥ saṃyogasya

प्रकार विधि

सार स्-अन्त अङ्ग और महत् की संयोग-पूर्व उपधा (सर्वनामस्थानादि में) दीर्घ होती है।

6.4.11
अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्- टृत्वष्- टृक्षत्तृ होतृपोतृप्रशास्त् ऋलपॄ- णां

IAST aptṛntṛcsvasṛnaptṛneṣṭṛtvaṣṭṛkṣattṛhotṛpotṛpraśāstṝṇām ṛlpṝṇām

प्रकार विधि

सार अप्, तृन्, तृच्, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ, प्रशास्तृ तथा ऋल्-पॄ-अन्त अङ्गों की (नामि/सर्वनामस्थान में) उपधा दीर्घ होती है।

6.4.12
इन्हन्पूष(न्)अर्यम्णां शौ

IAST inhanpūṣanaryamṇāṃ śau

प्रकार विधि

सार इन्, हन्, पूषन् और अर्यमन् की उपधा शि परे दीर्घ होती है।

6.4.13
सौ च

IAST sau ca

प्रकार विधि

सार सु (प्रथमा एकवचन) परे भी इन्-हन्-पूषन्-अर्यमन् की उपधा दीर्घ होती है।

6.4.14
अतु असन्तस्य च अधातोः

IAST atvasantasya cādhātoḥ

प्रकार विधि

सार धातु-भिन्न अत्-अन्त और अस्-अन्त अङ्ग की उपधा भी (सर्वनामस्थानादि में) दीर्घ होती है।

6.4.15
अनुनासिकस्य क्विझलोः क्- ङ्- इति

IAST anunāsikasya kvijhaloḥ kṅiti

प्रकार विधि

सार क्वि या झल् परे कित्/ङित् में अङ्ग के अनुनासिक का दीर्घ होता है।

6.4.16
अच् हनगंआं सनि

IAST ajjhanagamāṃ sani

प्रकार विधि

सार अज्-अन्त अङ्ग तथा हन् और गम् की (अच् की) दीर्घता सन् परे होती है।

6.4.17
तनोतेर्विभाषा

IAST tanoter vibhāṣā

प्रकार विधि

सार तन् धातु की सन्-परे दीर्घता वैकल्पिक होती है।

6.4.18
क्रमः च क्त्वि

IAST kramaś ca ktvi

प्रकार विधि

सार क्रम् की क्त्वा परे भी (उपधा-)दीर्घ होती है।

6.4.19
च्छ्वोः श्- ऊठ् अनुनासिके च

IAST cchvoḥ śūḍ anunāsike ca

प्रकार विधि

सार छ् और व् के स्थान पर शूठ् (ऊ) आदेश अनुनासिक परे होता है।

6.4.20
ज्वरत्वरस्रिवि अविमवां उपहायाः च

IAST jvaratvarasriviavamavām upadhāyāś ca

प्रकार विधि

सार ज्वर्, त्वर्, स्रिव्य्, अव्, मव् में उपधा (तथा छ्/व्) के स्थान पर ऊ आदेश होता है।

6.4.21
रात् लोपः

IAST rāl lopaḥ

प्रकार विधि

सार र् के बाद (छ्/व् का) लोप होता है, ऊ-आदेश नहीं।

6.4.22
असिद्धवत् अत्र आ भात्

IAST asiddhavad atrā bhāt

प्रकार परिभाषा

सार यहाँ से ‘भात्’ तक के अङ्ग-कार्य परस्पर असिद्धवत् माने जाते हैं।

6.4.23
श्णात्नलोपः

IAST śnān nalopaḥ

प्रकार विधि

सार श्ना (विकरण) के बाद न् का लोप होता है।

6.4.24
अनित् इतां हलः उपधायाः क्- ङ्- इति

IAST aniditāṃ hala upadhāyāḥ kṅiti

प्रकार विधि

सार अनिट् धातुओं की उपधा-हल् का लोप कित्/ङित् प्रत्यय परे होता है।

6.4.25
दन्शसञ्जस्वञ्जां शपि

IAST daṃśasañjasvañjāṃ śapi

प्रकार विधि

सार दंश्, सञ्ज्, स्वञ्ज् की उपधा-नासिक का लोप शप् परे होता है।

6.4.26
रञ्जेः च

IAST rañjeś ca

प्रकार विधि

सार रञ्ज् धातु की हल्-उपधा (ञ्) का भी पूर्व-सूत्रों की शर्तों में (शप् तथा क्ङित् आदि पर) लोप होता है।

6.4.27
घञि च भावकरणयोः

IAST ghañi ca bhāvakaraṇayoḥ

प्रकार विधि

सार भाव या करण अर्थ में घञ् प्रत्यय पर भी रञ्ज् की उसी उपधा का लोप होता है।

6.4.28
स्यदः जवे

IAST syado jave

प्रकार विधि

सार जव (वेग) अर्थ में स्यन्द् धातु की हल्-उपधा का लोप होता है।

6.4.29
अवोद एध ओद्म(न्)प्रश्रथहिमश्रथाः

IAST avodaidhodmapraśrathahimaśrathāḥ

प्रकार विधि

सार अवोद, एध, ओद्मन्, प्रश्रथ और हिमश्रथ — ये रूप निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

6.4.30
न अञ्चेः पूजायां

IAST nañceḥ pūjāyām

प्रकार विधि

सार पूजा अर्थ में अञ्च् धातु को पूर्व-कथित उपधा-लोप नहीं होता।

6.4.31
क्त्वि स्कन्दिस्यन्द्योः

IAST ktvi skandisyandoḥ

प्रकार विधि

सार क्त्वा प्रत्यय पर स्कन्द् और स्यन्द् धातुओं की हल्-उपधा का लोप होता है।

6.4.32
ज अन्तनशां विभाषा

IAST jāntanaśāṃ vibhāṣā

प्रकार विधि

सार जन्, तन् और नश् धातुओं में (उसी प्रसंग में) उपधा-लोप वैकल्पिक है।

6.4.33
भञ्जेः च चिणि

IAST bhañjeś ca ciṇi

प्रकार विधि

सार चिण् प्रत्यय पर भञ्ज् धातु की हल्-उपधा का भी लोप होता है।

6.4.34
शासः इत् अङ्हलोः

IAST śāsa idaṅhaloḥ

प्रकार विधि

सार शास् धातु के स्थान पर अङ् तथा हल्-आदि प्रत्यय पर इत् (इ) आदेश होता है।

6.4.35
शा हौ

IAST śā hau

प्रकार विधि

सार हि (लोट् मध्यमैकवचन) पर शास् के स्थान पर शा आदेश होता है।

6.4.36
हन्तेर्जः

IAST hanter jaḥ

प्रकार विधि

सार हन् धातु के स्थान पर (हि पर) ज् आदेश होता है।

6.4.37
अनुदात्त उपदेशवनतितनोति आदीणां अनुआस्कओपः झलि क्- ङ्- इति

IAST anudāttopadeśavanatitanotyādīnām anunāsikalopo jhali kṅiti

प्रकार विधि

सार अनुदात्त-उपदेश धातुओं तथा वनति-तनोति-आदि के अनुनासिक का झल् पर स्थित क्ङित् प्रत्यय में लोप होता है।

6.4.38
वा ल्यपि

IAST vā lyapi

प्रकार विधि

सार ल्यप् प्रत्यय पर पूर्व-कथित अनुनासिक-लोप वैकल्पिक है।

6.4.39
न क्तिचि दीर्घः च

IAST na ktici dīrghaś ca

प्रकार विधि

सार क्तिन् पर अनुनासिक-लोप नहीं होता और उपधा का दीर्घ होता है।

6.4.40
गमः क्वौ

IAST gamaḥ kvau

प्रकार विधि

सार गम् धातु के अनुनासिक का क्वि प्रत्यय पर लोप होता है।

6.4.41
विट् वनोरनुनासिकस्य आत्

IAST viḍvanor anunāsikasyāt

प्रकार विधि

सार विट् और वन् प्रत्ययों पर अङ्ग के अनुनासिक के स्थान पर आत् (आ) आदेश होता है।

6.4.42
जनसनखणां सन् झलोः

IAST janasanakhanāṃ sañjhaloḥ

प्रकार विधि

सार जन्, सन् और खन् धातुओं के अनुनासिक का सन् तथा झल् पर आत् आदेश होता है।

6.4.43
ये विभाषा

IAST ye vibhāṣā

प्रकार विधि

सार य-आदि प्रत्यय पर (जन्-सन्-खन् का) वह आत् आदेश वैकल्पिक है।

6.4.44
तनोतेर्यकि

IAST tanoter yaki

प्रकार विधि

सार तन् धातु के अनुनासिक का यक् प्रत्यय पर आत् आदेश होता है।

6.4.45
सनः क्तिचि लोपः च अस्य न्यारयां

IAST sanaḥ ktici lopaś cāsyānyatarasyām

प्रकार विधि

सार सन् धातु पर क्तिन् में (आदेश के साथ) अस्य लोप भी वैकल्पिक है।

6.4.46
आर्धधातुके

IAST ārdhadhātuke

प्रकार अधिकार

सार यह अधिकार है — आगे के कार्य आर्धधातुक प्रत्यय के परे लागू होते हैं।

6.4.47
भ्रस्जः र उपधयोः रं अन्यारयाम्

IAST bhrasjo ropadhayor ram anyatarasyām

प्रकार विधि

सार भ्रस्ज् धातु के र् और उपधा का स्थान वैकल्पिक रूप से रम् आदेश लेता है।

6.4.48
अतः लोपः

IAST ato lopaḥ

प्रकार विधि

सार आर्धधातुक प्रत्यय पर अकारान्त अङ्ग के अकार का लोप होता है।

6.4.49
यस्य हलः

IAST yasya halaḥ

प्रकार विधि

सार हल् के अनन्तर स्थित यकार (य-अन्त अङ्ग) का आर्धधातुक पर लोप होता है।

6.4.50
क्यस्य विभाषा

IAST kyasya vibhāṣā

प्रकार विधि

सार क्य (क्यच्/क्यङ्/क्यष्) के यकार का लोप वैकल्पिक है।

6.4.51
णेरनिटि

IAST ṇer aniṭi

प्रकार विधि

सार अनिट् आर्धधातुक प्रत्यय परे ण्यन्त अङ्ग के णि का लोप होता है।

6.4.52
निष्ठायां से- टि

IAST niṣṭhāyāṃ seṭi

प्रकार विधि

सार सेट् निष्ठा (क्त/क्तवतु) परे भी णि का लोप होता है।

6.4.53
जनिता मन्त्रे

IAST janitā mantre

प्रकार विधि

सार मन्त्र-प्रयोग में «जनिता» रूप निपातित है (यहाँ णि-लोप नहीं)।

6.4.54
शमिता यज्ञे

IAST śamitā yajñe

प्रकार विधि

सार यज्ञ-प्रयोग में «शमिता» रूप निपातित है (यहाँ णि-लोप नहीं)।

6.4.55
अय् आम् अन्त आलु आय्य इत्नु इष्णुषु

IAST ayām antālvāyy etnv iṣṇuṣu

प्रकार विधि

सार आम्, अन्त, आलु, आय्य, इत्नु और इष्णु परे णि के स्थान पर अय् आदेश होता है।

6.4.56
ल्यपि लघुपूर्वात्

IAST lyapi laghupūrvāt

प्रकार विधि

सार लघु-पूर्व अङ्ग से परे ल्यप् में णि के स्थान पर अय् आदेश होता है।

6.4.57
विभाषा आपः

IAST vibhāṣā āpaḥ

प्रकार विधि

सार आप् धातु से (ल्यप् परे) अय्-आदेश वैकल्पिक है।

6.4.58
युप्लुवोर्दीर्घः छन्दसि

IAST yupluvor dīrghaḥ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में यु और प्लु के अङ्ग का दीर्घ होता है।

6.4.59
क्षियः

IAST kṣiyaḥ

प्रकार विधि

सार क्षि धातु के अङ्ग का भी (पूर्ववत्) दीर्घ होता है।

6.4.60
निष्ठायां अण्यत् अर्थे

IAST niṣṭhāyām aṇyad arthe

प्रकार विधि

सार अण्यत्-भिन्न अर्थ में निष्ठा परे क्षि का दीर्घ होता है।

6.4.61
वा आक्रोशदैन्ययोः

IAST vā ākrośadainyayoḥ

प्रकार विधि

सार आक्रोश और दैन्य अर्थ में वह दीर्घ वैकल्पिक है।

6.4.62
स्यसिच्सीयुट्तासिसु भावकर्मणोः उपदेशे अच् हनग्रहदृशां चिण्वत् इट् च

IAST sya-sic-sīyuṭ-tāsiṣu bhāvakarmaṇor upadeśe 'c-han-graha-dṛśāṃ ciṇvad iṭ ca

प्रकार अतिदेश

सार भाव-कर्म में स्य·सिच्·सीयुट्·तासि परे उपदेश में अजन्त धातुओं तथा हन्·ग्रह्·दृश् को चिण्-वत् कार्य और इट् भी प्राप्त होते हैं।

6.4.63
दीङः युट् अचि क्- ङ्- इति

IAST dīṅo yuḍ aci kṅiti

प्रकार विधि

सार दीङ् धातु को क्/ङ्-इत् अजादि प्रत्यय परे युट् का आगम होता है।

6.4.64
आतः लोपः इटि च

IAST āto lopa iṭi ca

प्रकार विधि

सार इट् परे तथा (क्ङित् अच् परे) अङ्ग के आ का लोप होता है।

6.4.65
ईत् यति

IAST īd yati

प्रकार विधि

सार यत् परे अङ्ग के आ के स्थान पर ईत् आदेश होता है।

6.4.66
घुमास्थागापाजहातिसां हलि

IAST ghu-mā-sthā-gā-pā-jahāti-sāṃ hali

प्रकार विधि

सार घु·मा·स्था·गा·पा·जहा·सा को हलादि प्रत्यय परे आ के स्थान पर ईत् आदेश होता है।

6.4.67
एर्लिङि

IAST er liṅi

प्रकार विधि

सार लिङ् परे (पूर्व ई के स्थान पर) ए आदेश होता है।

6.4.68
वा अन्यस्य संयोग आदेः

IAST vāny asya saṃyogādeḥ

प्रकार विधि

सार संयोगादि अन्य अङ्ग को वह (ई/ए) आदेश वैकल्पिक है।

6.4.69
न ल्यपि

IAST na lyapi

प्रकार नियम

सार ल्यप् परे पूर्व-निर्दिष्ट ई/ए आदेश नहीं होता।

6.4.70
मयतेरित् अन्यतरस्यां

IAST mayater id anyatarasyām

प्रकार विधि

सार मयतेः (मी) को (हलि) आ के स्थान पर इत् आदेश वैकल्पिक है।

6.4.71
लुङ्लिङ् लृङ्क्षु अट् उदात्तः

IAST luṅlaṅlṛṅkṣv aḍ udāttaḥ

प्रकार विधि

सार लुङ्·लङ्·लृङ् परे उदात्त अट् का आगम होता है।

6.4.72
आट् अच् आदीणां

IAST āḍ ajādīnām

प्रकार विधि

सार अजादि अङ्गों को (उन लकारों में) आट् का आगम होता है।

6.4.73
छन्दसि अपि दृश्यते

IAST chandasy api dṛśyate

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (अट्/आट्) अन्यत्र भी दिखाई देता है।

6.4.74
न माङ्योगे

IAST na māṅyoge

प्रकार नियम

सार माङ्-योग में अट्/आट् का आगम नहीं होता।

6.4.75
बहुलं छन्दस्य् अमाङ्योगे अपि

IAST bahulaṃ chandasy amāṅyoge 'pi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में माङ्-योग के अभाव में भी अट्/आट् बहुलं प्राप्त होता है।

6.4.76
इरयः रे

IAST irayo re

प्रकार विधि

सार अङ् परे इर्-अन्त धातु के इर् का र् आदेश होता है।

6.4.77
अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ् उनङौ

IAST aci śnudhātubhruvāṃ yvor iyaṅuvaṅau

प्रकार विधि

सार अच् परे श्नु, इकारान्त्/उकारान्त् धातु और भ्रू के अन्तिम इ/उ के स्थान पर क्रमशः इयङ् और उवङ् होते हैं।

6.4.78
अभ्यासस्य असवर्णे

IAST abhyāsasyāsavarṇe

प्रकार विधि

सार अभ्यास के इ/उ को असवर्ण अच् परे इयङ्/उवङ् प्राप्त होते हैं।

6.4.79
स्त्रियाः

IAST striyāḥ

प्रकार विधि

सार स्त्री शब्द के इकार को अच् परे इयङ् होता है।

6.4.80
वा अंशसोः

IAST vāṃśasoḥ

प्रकार विधि

सार अंशस् और अस् परे स्त्री के इकार को वैकल्पिक इयङ् होता है।

6.4.81
इणः यण्

IAST iṇo yaṇ

प्रकार विधि

सार इण् धातु के इकार को अच् परे यण् आदेश होता है (इयङ् नहीं)।

6.4.82
एः अनेक अचः असंओगऊर्वस्य

IAST er anekāco 'saṃyogapūrvasya

प्रकार विधि

सार असंयोगपूर्व अनेक-अच् वाले अङ्ग के अन्तिम इकार को अच् परे यण् होता है।

6.4.83
ओः सुपि

IAST oḥ supi

प्रकार विधि

सार सुप् परे अङ्ग के अन्तिम उकार को यण् होता है।

6.4.84
वर्षाभ्वः च

IAST varṣābhvaś ca

प्रकार विधि

सार वर्षाभू शब्द के उकार को भी सुप् परे यण् होता है।

6.4.85
न भूसुधियोः

IAST na bhūsudhiyoḥ

प्रकार नियम

सार भू और सुधी के उ/इ को सुप् परे यण् नहीं होता।

6.4.86
छन्दसि उभयथा

IAST chandasy ubhayathā

प्रकार विधि

सार छन्दस् में भू/सुधी आदि को यण् और इयङ्/उवङ् दोनों प्रकार से प्राप्त होते हैं।

6.4.87
हुश्नुवोः सार्वधातुके

IAST huśnuvoḥ sārvadhātuke

प्रकार विधि

सार सार्वधातुक (अच्-आदि) परे हु और श्नु के उकार को उवङ् होता है।

6.4.88
भुवः वुक् लुङ्लिटोः

IAST bhuvo vug luṅliṭoḥ

प्रकार विधि

सार लुङ् और लिट् परे भू धातु को वुक् आगम होता है।

6.4.89
ऊत् उपधायाः गोहः

IAST ūd upadhāyā gohaḥ

प्रकार विधि

सार गुह् धातु की उपधा को ऊत् आदेश होता है।

6.4.90
दोषः णौ

IAST doṣo ṇau

प्रकार विधि

सार णिच् परे दुष् धातु की उपधा को ऊत् होता है।

6.4.91
वा चित्तविरागे

IAST vā cittavirāge

प्रकार विधि

सार चित्त-विराग अर्थ में दुष् की उपधा को वैकल्पिक ऊत् होता है।

6.4.92
ं इतां ह्रस्वः

IAST mitāṃ hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार मित् धातुओं की उपधा को णिच् आदि परे ह्रस्व होता है।

6.4.93
चिण्- णमुलोर्दीर्घः अन्यतरस्यां

IAST ciṇṇamulor dīrgho 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार चिण् और णमुल् परे मित् धातु की उपधा को वैकल्पिक दीर्घ होता है।

6.4.94
खचि ह्रस्वः

IAST khaci hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार खच् प्रत्यय परे उपधा को ह्रस्व होता है।

6.4.95
ह्लादः निष्ठायां

IAST hlādo niṣṭhāyām

प्रकार विधि

सार निष्ठा परे ह्लाद् धातु की उपधा को ह्रस्व होता है।

6.4.96
छादेर्घे अद्वि उपसर्गस्य

IAST chāder ghe 'dvyupasargasya

प्रकार विधि

सार घ-प्रत्यय परे, दो उपसर्ग न होने पर, छाद् की उपधा को ह्रस्व होता है।

6.4.97
इस्मन्त्रंक्विषु च

IAST ismantran kviṣu ca

प्रकार विधि

सार इस्, मन्त्रन् और क्वि परे भी छाद् की उपधा को ह्रस्व होता है।

6.4.98
गमहनजनखनघसां लोपः क्- ङ्- इति अनङि

IAST gamahanajanakhanaghasāṃ lopaḥ kṅity anaṅi

प्रकार विधि

सार कित्/ङित् (अङ् को छोड़कर) परे गम्, हन्, जन्, खन्, घस् की उपधा का लोप होता है।

6.4.99
तनिपत्योः छन्दसि

IAST tanipatyoś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में तन् और पति को भी कित्/ङित् परे उपधा-लोप होता है।

6.4.100
घसिभसोर्हलि च

IAST ghasibhasor hali ca

प्रकार विधि

सार घस् और भस् को हल् परे भी (कित्/ङित्-सदृश) उपधा-लोप होता है।

6.4.101
हुझल्भ्यः हेर्धिः

IAST hujhalbhyaḥ her dhiḥ

प्रकार विधि

सार हु-धातु तथा झल्-अन्ताङ्ग के परे लोट् के हि का धि आदेश होता है।

6.4.102
श्रुशृ- णुपॄकृवृभ्यः छन्दसि

IAST śruśṛṇupṝkṛvṛbhyaḥ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में श्रु, शृ, णु, पॄ, कृ और वृ के परे भी हि का धि आदेश होता है।

6.4.103
अङ्- इत् अः च

IAST aṅitaś ca

प्रकार विधि

सार अङ्-इत् (अङ्-लुङ् वाले) अङ्ग के परे भी हि का धि आदेश होता है।

6.4.104
चिणः लुक्

IAST ciṇaḥ luk

प्रकार विधि

सार चिण्-प्रत्यय का लुक् (पूर्णलोप) होता है।

6.4.105
अतः हेः

IAST ataḥ heḥ

प्रकार विधि

सार ह्रस्व-अकारान्ताङ्ग के परे हि का लुक् होता है।

6.4.106
उतः च प्रत्ययात् असंयोगऊर्वात्

IAST utaś ca pratyayād asaṃyogapūrvāt

प्रकार विधि

सार असंयोग-पूर्व उकारान्त् प्रत्यय के परे भी हि का लुक् होता है।

6.4.107
लोपः च अस्य अन्यतरस्यां म्वोः

IAST lopaś cāsyānyatarasyāṃ mvoḥ

प्रकार विधि

सार म् और व् के परे उस उकार का वैकल्पिक लोप भी होता है।

6.4.108
नित्यं करोतेः

IAST nityaṃ karoteḥ

प्रकार नियम

सार करोति (कृ) के उस उकार का म्/व्-परे लोप नित्य होता है।

6.4.109
ये च

IAST ye ca

प्रकार विधि

सार यकार-परे भी करोति के उकार का नित्य लोप होता है।

6.4.110
अतः उत् सार्वधातुके

IAST ata ut sārvadhātuke

प्रकार विधि

सार सार्वधातुक के परे ह्रस्व-अकारान्ताङ्ग के अ का उ आदेश होता है।

6.4.111
श्न असोरत् लोपः

IAST śnasor al lopaḥ

प्रकार विधि

सार श्ना तथा अस् के अकार का लोप होता है।

6.4.112
श्ना अभ्यस्तयोरातः

IAST śnābhyastayor ātaḥ

प्रकार विधि

सार श्ना तथा अभ्यस्त अङ्ग के आ का लोप होता है।

6.4.113
ई हलि अ घोः

IAST ī haly aghoḥ

प्रकार विधि

सार हल-परे घु-संज्ञक अङ्ग के आ का ई आदेश होता है।

6.4.114
इत् दरिद्रस्य

IAST id daridrasya

प्रकार विधि

सार दरिद्रा के आ का इ आदेश होता है।

6.4.115
भियः अन्यतरस्यां

IAST bhiyo 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार भी के आ का ई-आदेश वैकल्पिक होता है।

6.4.116
जहातेः च

IAST jahāteś ca

प्रकार विधि

सार जहाति (हा) के आ का भी ई आदेश होता है।

6.4.117
आ च हौ

IAST ā ca hau

प्रकार विधि

सार हि-परे जहाति के आ का आ-रूप भी (विकल्प से) रहता/होता है।

6.4.118
लोपः यि

IAST lopo yi

प्रकार विधि

सार य-प्रत्यय-परे (जहाति के) आ का लोप होता है।

6.4.119
घु असोरेत् हौ भ्यासओपः च

IAST ghvasor eddhāv abhyāsalopaś ca

प्रकार विधि

सार हि-परे घु तथा अस् के आ/अ का ए आदेश और अभ्यासलोप भी होता है।

6.4.120
अतः एकहल्मध्ये अणादेश आदेर्लिटि

IAST ata ekahalmadhye 'nādeśāder liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में एकहल्-मध्य ह्रस्व-अ का, अनादेशादि अङ्ग में, आ आदेश होता है।

6.4.121
थलि च स इटि

IAST thali ca seṭi

प्रकार विधि

सार सेट् थल्-परे भी उसी अ का आ आदेश होता है।

6.4.122
तॄफलभजत्रपः च

IAST tṝphalabhajatrapaś ca

प्रकार विधि

सार तॄ, फल्, भज् और त्रप् के अ का भी (लिट् में) आ आदेश होता है।

6.4.123
राधः हिंसायां

IAST rādho hiṃsāyām

प्रकार विधि

सार हिंसा-अर्थक राध् के अ का भी लिट् में आ आदेश होता है।

6.4.124
वा जॄभ्रमुत्रसां

IAST vā jṝbhramutrasām

प्रकार विधि

सार जॄ, भ्रम् और त्रस् के अ का लिट् में आ आदेश वैकल्पिक होता है।

6.4.125
फणां च सप्ताणां

IAST phaṇāṃ ca saptānām

प्रकार विधि

सार फण् आदि सात धातुओं के अ का भी लिट् में वैकल्पिक आ आदेश होता है।

6.4.126
न शसददव् आदिगुणा- णां

IAST na śasadadvādiguṇānām

प्रकार नियम

सार लिट्-विषयक पूर्व-सूत्रों का वैकल्पिक (मध्य-हल्/आदेश) कार्य शस्, दद् तथा आदि-गुण वाले धातुओं में नहीं होता।

6.4.127
अर्वणः तृ असौ अनञः

IAST arvaṇas tṛ asāv anañaḥ

प्रकार विधि

सार अर्वन् के तृच् तथा सम्बुद्धि-अस् परे, नञ्-रहित में, निर्दिष्ट विशेष रूप/आदेश होता है।

6.4.128
मघवा बहुलं

IAST maghavā bahulam

प्रकार विधि

सार मघवन् के स्थान पर बहुलं (वैकल्पिक/विविध) मघवा रूप होता है।

6.4.129
भस्य

IAST bhasya

प्रकार अधिकार

सार आगे के सूत्र भ-संज्ञक अङ्ग के विषय में प्रवृत्त होते हैं।

6.4.130
पादः पद्

IAST pādaḥ pad

प्रकार विधि

सार भ-संज्ञक पाद् के स्थान पर पद् आदेश होता है।

6.4.131
वसोः सम्प्रसारणं

IAST vasoḥ samprasāraṇam

प्रकार विधि

सार भ-संज्ञक वसु के व्-अंश का सम्प्रसारण होता है।

6.4.132
वाहः ऊठ्

IAST vāha ūṭh

प्रकार विधि

सार भ-संज्ञक वाह् के स्थान पर ऊठ् आदेश होता है।

6.4.133
श्व(न्)युव(न्)मघोणां अतद्धिते

IAST śvayuvamaghonām ataddhite

प्रकार विधि

सार श्वन्, युवन् और मघवन् में (सम्प्रसारणादि) कार्य तद्धितेतर परे होता है।

6.4.134
अत् लुपः अनः

IAST allopo 'naḥ

प्रकार विधि

सार भ-संज्ञक अन् के अकार का लोप होता है।

6.4.135
षपूर्वहन्धृतराज्ञां अणि

IAST ṣapūrvahandhṛtarājñām aṇi

प्रकार विधि

सार अण् परे ष-पूर्व, हन्, धृत तथा राजन् में (अन्-अकार-लोप का) विधान है।

6.4.136
विभाषा ङिश्योः

IAST vibhāṣā ṅiśyoḥ

प्रकार विधि

सार ङि और शि परे (अन्-अकार-लोप) वैकल्पिक है।

6.4.137
न संयोगात् व म् अन्तात्

IAST na saṃyogād vamantāt

प्रकार नियम

सार व्/म्-अन्त संयोग से परे अन् में (अकार-लोप) नहीं होता।

6.4.138
अचः

IAST acaḥ

प्रकार अधिकार

सार आगे का कार्य भ-संज्ञक अजन्त अङ्ग के अच् (टि) के विषय में है।

6.4.139
उदः ईत्

IAST uda īt

प्रकार विधि

सार उद् के स्थान पर ईत् आदेश होता है।

6.4.140
आतः धातोः

IAST āto dhātoḥ

प्रकार विधि

सार आकारान्त धातु के आकार (टि) पर आगामी लोप/आदेश प्रवृत्त होता है।

6.4.141
मन्त्रेषु आङि आदेरात्मनः

IAST mantreṣv āṅy āder ātmanaḥ

प्रकार विधि

सार मन्त्रों में आङ् परे आत्मन् के आदि-अंश का निर्दिष्ट कार्य होता है।

6.4.142
ति विंशतेर्ड्- इति

IAST ti viṃśater ḍiti

प्रकार अतिदेश

सार ति परे विंशति को डित् माना जाता है (टि-लोपादि के लिए)।

6.4.143
टेः

IAST ṭeḥ

प्रकार विधि

सार (भ-संज्ञक अङ्ग के) टि का लोप होता है।

6.4.144
नः तद्धिते

IAST nas taddhite

प्रकार विधि

सार तद्धित परे (भ-संज्ञक) न् का लोप होता है।

6.4.145
अह्नः टखोरेव

IAST ahnaṣ ṭakhor eva

प्रकार नियम

सार अहन् में (न्-सम्बन्धी) कार्य केवल ट और ख् परे ही होता है।

6.4.146
ओर्गुणः

IAST or guṇaḥ

प्रकार विधि

सार भ-संज्ञक ओकारान्त के ओ को गुण होता है।

6.4.147
ढे लोपः अकद्र्वाः

IAST ḍhe lopo 'kadrvāḥ

प्रकार विधि

सार ढ परे (भ के अन्तिम का) लोप होता है, अकद्रू को छोड़कर।

6.4.148
यस्य ईति च

IAST yasy eti ca

प्रकार विधि

सार यकारान्त के य् का, तथा ई परे (अ/आ का) लोप होता है।

6.4.149
सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्याणां यः उपधायाः

IAST sūryatiṣyāgastyamatsyānāṃ ya upadhāyāḥ

प्रकार विधि

सार सूर्य, तिष्य, अगस्त्य और मत्स्य की उपधा के यकार का लोप होता है।

6.4.150
हलः तद्धितस्य

IAST halas taddhitasya

प्रकार विधि

सार हल्-अन्तात् परे तद्धित के (य् का) लोप होता है।

6.4.151
आपत्यस्य च तद्धिते अणाति

IAST āpatyasya ca taddhite 'ṇāti

प्रकार विधि

सार आपत्य-प्रत्यय का अण्-वर्ग छोड़कर अन्य तद्धित परे होने पर लोप होता है।

6.4.152
क्यच्व्योः च

IAST kyacvyoś ca

प्रकार विधि

सार क्यच् और च्वि परे होने पर भी (आपत्य का) वही लोप होता है।

6.4.153
बिल्वक आदिभ्यः छस्य लुक्

IAST bilvakādibhyaś chasya luk

प्रकार विधि

सार बिल्वक-आदि गण से परे छ-प्रत्यय का लुक् होता है।

6.4.154
तुरिष्ठ(न्)इम(निच्)- ईयस्सु

IAST turiṣṭhemeyassu

प्रकार अधिकार

सार इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् परे—यहाँ से इन प्रत्ययों के विषय में आगे के कार्य का अधिकार।

6.4.155
टेः

IAST ṭeḥ

प्रकार विधि

सार (इष्ठन्-इमनिच्-ईयसुन् परे) अङ्ग के टि का लोप होता है।

6.4.156
स्थूलदूरयुव(न्)ह्रस्वक्षिप्रक्षुद्रा- णां यण् आदि परं पूर्वस्य च गुणः

IAST sthūladūrayuvahrasvakṣiprakṣudrāṇāṃ yaṇādiparaṃ pūrvasya ca guṇaḥ

प्रकार विधि

सार स्थूल, दूर, युवन्, ह्रस्व, क्षिप्र और क्षुद्र के यण्-आदि (ईयस् आदि) परे पूर्व-भाग का गुण तथा पर-भाग का संकोच/आदेश होता है।

6.4.157
प्रियस्थिरस्फिरौरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारका- णां प्रस्थस्फवर्बंहिगर्वर्षित्रप्द्राघिवृन्दाः

IAST priyasthirasphiraurubahulaguruvṛddhatṛpradīrghavṛndārakāṇāṃ prasthasphavarbahiṃgarvarṣitrapdrāghivṛndāḥ

प्रकार विधि

सार प्रिय→प्र, स्थिर→स्थ, स्फिर→स्फ, उरु→वर्, बहुल→बंहि, गुरु→गर्, वृद्ध→वर्षि, तृप्र→त्रप्, दीर्घ→द्राघि, वृन्दारक→वृन्द—ये आदेश (इष्ठन्/ईयसुन् परे) होते हैं।

6.4.158
बहोर्लोपः भू च बहोः

IAST bahor lopo bhū ca bahoḥ

प्रकार विधि

सार बहु का लोप होता है तथा बहु के स्थान में भू भी होता है।

6.4.159
इष्ठस्य यिट् च

IAST iṣṭhasya yiṭ ca

प्रकार विधि

सार इष्ठन् को यिट् आगम भी होता है।

6.4.160
ज्यात् आत् ईयसः

IAST jyāt āt īyasaḥ

प्रकार विधि

सार ज्या से ईयसुन् परे आत्-आदेश होता है।

6.4.161
र ऋत् अः हलादेर्लघोः

IAST ra ṛto hālāder laghoḥ

प्रकार विधि

सार हलादि लघु ऋ के स्थान में र् होता है।

6.4.162
विभाषा ऋजोः छन्दसि

IAST vibhāṣā ṛjroś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में ऋजु के विषय में यह (र्-आदेश) विकल्प से होता है।

6.4.163
प्रकृत्या एक अच्

IAST prakṛtyā ekāc

प्रकार नियम

सार एकाच् प्रकृति ज्यों-की-त्यों रहती है (टि-लोप नहीं)।

6.4.164
इन् अणि अनपत्ये

IAST in aṇy anapatye

प्रकार नियम

सार इन् अण् परे अपत्यार्थ छोड़कर प्रकृतिवत् रहता है।

6.4.165
गाथि(न्)विदथि(न्)केशि(न्)गणि(न्)पणिनः च

IAST gāthividathikeśigaṇipaṇinaś ca

प्रकार नियम

सार गाथिन्, विदथिन्, केशिन्, गणिन् और पणिन् भी (अण् परे) प्रकृतिवत् रहते हैं।

6.4.166
संयोग आदिः च

IAST saṃyogādiś ca

प्रकार नियम

सार संयोग से आरम्भ होने वाला भी प्रकृतिवत् रहता है।

6.4.167
अन्

IAST an

प्रकार नियम

सार अन्-अन्त भी (उक्त स्थिति में) प्रकृतिवत् रहता है।

6.4.168
ये च अभावकर्मणोः

IAST ye cābhāvakarmaṇoḥ

प्रकार नियम

सार य-प्रत्यय परे भी अभाव और कर्म अर्थ छोड़कर प्रकृतिवत् रहता है।

6.4.169
आत्म(न्)अध्वानौ खे

IAST ātmanadhvānau khe

प्रकार नियम

सार आत्मन् और अध्वन् ख-प्रत्यय परे प्रकृतिवत् रहते हैं।

6.4.170
न मपूर्वः अपत्ये अवर्मणः

IAST na mapūrvo 'patye 'varmaṇaḥ

प्रकार नियम

सार मकार-पूर्व का अपत्यार्थ में वर्मन् छोड़कर यह प्रकृतिवद्भाव नहीं होता।

6.4.171
ब्राह्मः अजातौ

IAST brāhmo 'jātau

प्रकार विधि

सार अजाति अर्थ में ब्राह्म रूप सिद्ध होता है।

6.4.172
कार्मः ताच्छील्ये

IAST kārmas tācchīlye

प्रकार विधि

सार ताच्छील्य अर्थ में कार्म रूप सिद्ध होता है।

6.4.173
औक्षं अनप्त्ये

IAST aukṣam anapatye

प्रकार विधि

सार अनपत्य अर्थ में औक्ष रूप सिद्ध होता है।

6.4.174
दाण्डिणायनहास्तिणायनआथर्वणिकजैह्माशिनेयवासिनेयनिभ्रौणहत्यधैवत्यसारवैक्ष्वाकमैत्रेयहिरण्मयानि

IAST dāṇḍiṇāyanahāstiṇāyanātharvaṇikajaihmāśineyavāsineyanibhraunahatyadhaivatyasārav aikṣvākamaitreyahiraṇmayāni

प्रकार विधि

सार दाण्डिणायन, हास्तिणायन, आथर्वणिक, जैह्माशिनेय, वासिनेय, निभ्रौणहत्य, धैवत्य, सारव, ऐक्ष्वाक, मैत्रेय, हिरण्मय—ये रूप निपातन से सिद्ध हैं।

6.4.175
ऋत्व्यवास्त्व्य वास्त्वमाध्वीहिरण्ययानि छन्दसि

IAST ṛtvyavāstvya vāstvamādhvīhiraṇyayāni chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में ऋत्व्य, वास्त्व्य, वास्त्व, माध्वी और हिरण्यय रूप निपातन से सिद्ध हैं।

अध्याय 7 · पाद 1 (103 सूत्र)

7.1.1
युवोरनाकौ

IAST yuvor anakau

प्रकार विधि

सार यु और वु (प्रत्यय-भाग) के स्थान पर क्रमशः अना और अक आदेश होते हैं।

7.1.2
आयनेय्- ईणीयियः फढखछघां प्रत्यय आदीणाम्

IAST āyaneyīṇīyiyaḥ phaḍhakhachaghāṃ pratyayādīnām

प्रकार विधि

सार प्रत्यय के आदि फ्, ढ्, ख्, छ्, घ् के स्थान पर क्रमशः आयन्, एय्, ईन्, ईय्, इय् आदेश होते हैं।

7.1.3
झः अन्तः

IAST jho 'ntaḥ

प्रकार विधि

सार (प्रत्ययस्थ) झ के स्थान पर अन्त् आदेश होता है।

7.1.4
अत् अभ्यस्तात्

IAST ad abhyastāt

प्रकार विधि

सार अभ्यस्त से परे झ के स्थान पर अत् आदेश होता है।

7.1.5
आत्मनेपदेषु अनतः

IAST ātmanepadeṣv anataḥ

प्रकार विधि

सार आत्मनेपद में अकारान्त-भिन्न (अभ्यस्त) से परे झ को अन्त् होता है—अत् (७.१.४) का निषेध।

7.1.6
शीङः रुट्

IAST śīṅaḥ ruṭ

प्रकार विधि

सार शीङ् धातु से परे (झ के पूर्व) रुट् का आगम होता है।

7.1.7
वेत्तेर्विभाषा

IAST vetter vibhāṣā

प्रकार विधि

सार विद् (वेत्ति) से परे रुट्-आगम वैकल्पिक है।

7.1.8
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (रुट् आदि का विधान) बहुल—अनियत रूप से—होता है।

7.1.9
अतः भिसः ऐः

IAST ato bhisa aiḥ

प्रकार विधि

सार अकारान्त से परे भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश होता है।

7.1.10
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (भिस्→ऐस् आदि) बहुल विधान होता है।

7.1.11
न इदम् अदसोरकोः

IAST nedamadasor akoḥ

प्रकार विधि

सार इदम् और अदस् के अकाररूप में भिस् को ऐस् आदेश नहीं होता।

7.1.12
टा- ङसि- ङसां इन आत्स्याः

IAST ṭāṅasiṅasām inātsyāḥ

प्रकार विधि

सार अकारान्त से परे टा, ङसि, ङस् के स्थान पर क्रमशः इन्, आत्, स्य आदेश होते हैं।

7.1.13
ङेर्यः

IAST ṅer yaḥ

प्रकार विधि

सार अकारान्त से परे ङे के स्थान पर य आदेश होता है।

7.1.14
सर्वनाम्नः स्मै

IAST sarvanāmnaḥ smai

प्रकार विधि

सार सर्वनाम से परे ङे के स्थान पर स्मै आदेश होता है।

7.1.15
ङसि- ङ्योः स्मात्स्मिनौ

IAST ṅasiṅyoḥ smātsminau

प्रकार विधि

सार सर्वनाम से परे ङसि और ङि के स्थान पर क्रमशः स्मात् और स्मिन् आदेश होते हैं।

7.1.16
पूर्व आदिभ्यः नवह्यः आ

IAST pūrvādibhyo navabhyo vā

प्रकार विधि

सार पूर्व आदि नौ शब्दों से परे (सर्वनाम-विषयक स्मै/स्मात्/स्मिन् आदि) वैकल्पिक होते हैं।

7.1.17
जसः शी

IAST jasaḥ śī

प्रकार विधि

सार (अकारान्त सर्वनाम से परे) जस् के स्थान पर शी आदेश होता है।

7.1.18
औङः आपः

IAST auṅa āpaḥ

प्रकार विधि

सार आप् (आकारान्त स्त्री) से परे औङ् के स्थान पर आ आदेश होता है।

7.1.19
नपुंसकात् च

IAST napuṃsakāc ca

प्रकार विधि

सार नपुंसकलिङ्ग से परे भी औङ् के स्थान पर आ आदेश होता है।

7.1.20
जः शसोः शिः

IAST jaśasoḥ śiḥ

प्रकार विधि

सार नपुंसकात् परे जस् और शस् के स्थान पर शि आदेश होता है।

7.1.21
अष्टाभ्यः औश्

IAST aṣṭābhya auś

प्रकार विधि

सार अष्टन् से परे जस्/शस् के स्थान पर औश् आदेश होता है।

7.1.22
षड्भ्यः लुक्

IAST ṣaḍbhyo luk

प्रकार विधि

सार षष् आदि से परे जस्/शस् का लुक् होता है।

7.1.23
सु अमोर्नपुंसकात्

IAST svamor napuṃsakāt

प्रकार विधि

सार नपुंसकलिङ्ग से परे सु और अम् (अगले सूत्रों के अनुसार) आदेश के विषय हैं।

7.1.24
अतः अं

IAST ato 'm

प्रकार विधि

सार अकारान्त नपुंसक से परे सु/अम् के स्थान पर अम् आदेश होता है।

7.1.25
अद्ड् डतर आदिभ्यः पञ्चभ्यः

IAST adḍ ḍatarādibhyaḥ pañcabhyaḥ

प्रकार विधि

सार डतर आदि पाँच प्रत्ययान्त नपुंसक से परे सु/अम् के स्थान पर अद्ड् आदेश होता है।

7.1.26
न इतरात् छन्दसि

IAST netarāc chandasi

प्रकार नियम

सार छन्दस् में अदस्-भिन्न (इतर) प्रातिपदिक से परे पूर्व-सूत्र-विहित औं-आदेश नहीं होता।

7.1.27
युष्मद् अस्मद्भ्यां ङसः अश्

IAST yuṣmad-asmadbhyāṃ ṅaso 'ś

प्रकार विधि

सार युष्मद् तथा अस्मद् से परे षष्ठी एकवचन ङस् के स्थान में अश् आदेश होता है।

7.1.28
ङेप्रथमयोरं

IAST ṅe-prathamayor am

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् से परे ङे (चतुर्थी एकवचन) तथा प्रथमा-विभक्ति के स्थान में अम् आदेश होता है।

7.1.29
शसः न

IAST śaso na

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् से परे शस् (द्वितीया बहुवचन) के स्थान में न आदेश होता है।

7.1.30
भ्यसः भ्यं

IAST bhyaso bhyam

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् से परे भ्यस् (चतुर्थी-पञ्चमी बहुवचन) के स्थान में भ्यम् आदेश होता है।

7.1.31
पञ्चम्याः अत्

IAST pañcamyā at

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् से परे पञ्चमी-विभक्ति के स्थान में अत् आदेश होता है।

7.1.32
एकवचनस्य च

IAST ekavacanasya ca

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् से परे एकवचन (षष्ठी-सप्तमी आदि शेष एकवचनों) में भी अत् आदेश होता है।

7.1.33
सामः आकं

IAST sāma ākam

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् से परे साम् (षष्ठी बहुवचन) के स्थान में आकम् आदेश होता है।

7.1.34
आतः औ णलः

IAST āta au ṇalaḥ

प्रकार विधि

सार आकारान्त धातु से परे णल् (परस्मैपद प्रथमपुरुष एकवचन, लिट्) के स्थान में औ आदेश होता है।

7.1.35
तुह्योः तातङ् आशिषि न्यारयां

IAST tuhyos tātaṅ āśiṣy anyatarasyām

प्रकार विधि

सार आशीर्वाद में तु और हि के स्थान में विकल्पेन तातङ् आदेश होता है।

7.1.36
विदेः शतुर्वसुः

IAST videḥ śatur vasuḥ

प्रकार विधि

सार विद् धातु से परे शतृ के स्थान में वसु आदेश होता है।

7.1.37
संआसे अनञ्पूर्वे क्त्वः ल्यप्

IAST samāse 'nañ-pūrve ktvo lyap

प्रकार विधि

सार समास में नञ्-भिन्न पूर्वपद होने पर क्त्वा के स्थान में ल्यप् आदेश होता है।

7.1.38
क्त्वा अपि छन्दसि

IAST ktvāpi chandasi

प्रकार अतिदेश

सार छन्दस् में समास में भी क्त्वा का प्रयोग (ल्यप् के अतिरिक्त) प्राप्त होता है।

7.1.39
सुपां सुलुक्पूर्वसवर्ण आआत्शेया- डा- ड्यायाच् आलः

IAST supāṃ su-luk-pūrvasavarṇā-ā-āt-śe-yā-ḍā-ḍyā-yāc-ālaḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में सुप्-प्रत्ययों के स्थान में सु, लुक्, पूर्वसवर्ण, आ, आत्, शे, या, डा, ड्या, याच् तथा आल् आदि आदेश होते हैं।

7.1.40
अमः मश्

IAST amo maś

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अम् (द्वितीया एकवचन) के स्थान में मश् आदेश होता है।

7.1.41
लोपः तः आत्मनेपदेषु

IAST lopas ta ātmanepadeṣu

प्रकार विधि

सार आत्मनेपद में त् का लोप होता है।

7.1.42
ध्वमः ध्वात्

IAST dhvamo dhvāt

प्रकार विधि

सार ध्वम् के स्थान में ध्वात् आदेश होता है।

7.1.43
यजध्वैनं इति च

IAST yajadhvainam iti ca

प्रकार विधि

सार «यजध्वैनम्» इस निपातन-रूप की भी सिद्धि होती है।

7.1.44
तस्य तात्

IAST tasya tāt

प्रकार विधि

सार त (आत्मनेपदीय/संबद्ध तिङ्) के स्थान में तात् आदेश होता है।

7.1.45
तप्तनप्तनथणाः च

IAST taptanaptanathanāś ca

प्रकार विधि

सार तप्, तनप्, तन तथा थन भी (तिङ्-स्थान में) आदेश होते हैं।

7.1.46
इत् अन्तः मसि

IAST idanto masi

प्रकार विधि

सार इकारान्त अङ्ग से परे मस् के स्थान में मसि आदेश होता है।

7.1.47
क्त्वः यक्

IAST ktvo yak

प्रकार विधि

सार क्त्वा से परे यक् (आगम/संबद्ध आदेश) होता है।

7.1.48
इष्- ट्वीनं इति च

IAST iṣṭvīnam iti ca

प्रकार विधि

सार «इष्ट्वीनम्» इस निपातन-रूप की भी सिद्धि होती है।

7.1.49
स्नात्वी आदयः च

IAST snātvī-ādayaś ca

प्रकार विधि

सार स्नात्वी आदि रूप भी (क्त्वा-प्रक्रिया के निपातन/वैदिक रूपों में) सिद्ध होते हैं।

7.1.50
आत् जसेरसुक्

IAST āj jaser asuk

प्रकार विधि

सार आकारान्त अङ्ग से परे जस् के पूर्व असुक् आगम होता है।

7.1.51
अश्वक्षीरवृषलवणाणां आत्मप्रीतौ क्यचि

IAST aśvakṣīravṛṣalavaṇānām ātmaprītau kyaci

प्रकार विधि

सार आत्मप्रीति-अर्थ में क्यच् पर अश्व, क्षीर, वृषल और लवण के अनन्तर आण्-आगम होता है।

7.1.52
आमि सर्वनाम्नः सुट्

IAST āmi sarvanāmnaḥ suṭ

प्रकार विधि

सार आम्-प्रत्यय पर सर्वनाम से सुट्-आगम होता है।

7.1.53
त्रेः त्रयः

IAST treḥ trayaḥ

प्रकार विधि

सार आम् पर त्रि के स्थान में त्रय आदेश होता है।

7.1.54
ह्रस्वनदी आपः नुट्

IAST hrasvanadyāpo nuṭ

प्रकार विधि

सार आम् पर ह्रस्वान्त, नदीसंज्ञक और आप्-अन्त स्त्री-प्रातिपदिक से नुट्-आगम होता है।

7.1.55
षट्चतुर्भ्यः च

IAST ṣaṭcaturbhyaś ca

प्रकार विधि

सार षष् और चतुर् से भी आम् पर नुट्-आगम होता है।

7.1.56
श्रीग्रामण्योः छन्दसि

IAST śrīgrāmaṇyoś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में श्री और ग्रामणी से भी आम् पर नुट् होता है।

7.1.57
गोः पाद अन्ते

IAST goḥ pādānte

प्रकार विधि

सार पाद के अन्त में स्थित गो से आम् पर नुट्-आगम होता है।

7.1.58
इत् इतः नुं धातोः

IAST idito num dhātoḥ

प्रकार विधि

सार इदित् धातु से नुम्-आगम होता है।

7.1.59
शे मुचादीणां

IAST śe mucādīnām

प्रकार विधि

सार श-प्रत्यय पर मुच् आदि धातुओं से नुम् होता है।

7.1.60
मस्जिनशोर्झलि

IAST masjinaśor jhali

प्रकार विधि

सार झलादि प्रत्यय पर मस्ज् और नश् से नुम् होता है।

7.1.61
रधिजभोरचि

IAST radhijabhor aci

प्रकार विधि

सार अजादि प्रत्यय पर रध् और जभ् से नुम् होता है।

7.1.62
न इटि अलिटि रधेः

IAST na iṭy aliṭi radheḥ

प्रकार नियम

सार लिट् से भिन्न इट् पर रध् का नुम् नहीं होता।

7.1.63
रभेरशप् लिटोः

IAST rabher aśapliṭoḥ

प्रकार नियम

सार शप्-रहित और लिट् पर रभ् का नुम् नहीं होता।

7.1.64
लभेः च

IAST labheś ca

प्रकार नियम

सार उसी स्थिति में लभ् का भी नुम् नहीं होता।

7.1.65
आङः यि

IAST āṅo yi

प्रकार विधि

सार आङ्-उपसर्ग के परे य-प्रत्यय पर (लभ्-रभ्-सम्बन्धी) पूर्व-प्रतिषेध का निवारण/विशेष विधान है।

7.1.66
उपात् प्रशंशायां

IAST upāt praśaṃsāyām

प्रकार विधि

सार प्रशंसा-अर्थ में उप से परे (लभ् पर) नुम्-सम्बन्धी विशेष विधान है।

7.1.67
उपसर्गात् खल्घञोः

IAST upasargāt khalghañoḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग के परे खल् और घञ् पर (लभ् से) नुम् होता है।

7.1.68
न सुदुर्भ्यां केवलाभ्यां

IAST na sudurbhyāṃ kevalābhyām

प्रकार नियम

सार केवल सु और दुर् से (अन्य उपसर्ग के बिना) वह नुम् नहीं होता।

7.1.69
विभाषा चिण्- णमुलोः

IAST vibhāṣā ciṇṇamuloḥ

प्रकार विधि

सार चिण् और णमुल् पर (लभ् का नुम्) विकल्प से होता है।

7.1.70
उक् इतचां सर्वनामस्थाने अधातोः

IAST ugidacāṃ sarvanāmasthāne 'dhātoḥ

प्रकार विधि

सार सर्वनामस्थान पर उगिद् और अजन्त अधातु-प्रातिपदिक से नुम् होता है।

7.1.71
युजेरसंआसे

IAST yujer asamāse

प्रकार विधि

सार समास से भिन्न अवस्था में युज् से (सर्वनामस्थान पर) नुम् होता है।

7.1.72
नपुंसकस्य झल् अचः

IAST napuṃsakasya jhalacaḥ

प्रकार विधि

सार सर्वनामस्थान पर झलन्त और अजन्त नपुंसक से नुम् होता है।

7.1.73
इकः अचि विभक्तौ

IAST iko 'ci vibhaktau

प्रकार विधि

सार अजादि विभक्ति पर इगन्त नपुंसक से नुम् होता है।

7.1.74
तृतीया आदिषु भाषितपुंस्कात् पुंवत् आलवस्य

IAST tṛtīyādiṣu bhāṣitapuṃskāt puṃvad gālavasya

प्रकार अतिदेश

सार तृतीयादि विभक्तियों में गालव-मत से भाषितपुंस्क नपुंसक पुंवत् व्यवहार करता है।

7.1.75
अस्थिदधिसक्थि अक्ष्- णां अनङ् उदात्तः

IAST asthidadhisakthyakṣṇām anaṅ udāttaḥ

प्रकार विधि

सार अस्थि, दधि, सक्थि और अक्षि के स्थान में उदात्त अनङ् आदेश होता है।

7.1.76
छन्दसि अपि दृश्यते

IAST chandasy api dṛśyate

प्रकार अतिदेश

सार अस्थि-दधि-सक्थि-अक्षि को प्राप्त अनङ्-आदेश वैदिक प्रयोग में भी (निर्दिष्ट सीमा से आगे) दिखाई देता है।

7.1.77
ई च द्विवचने

IAST ī ca dvivacane

प्रकार विधि

सार उक्त अस्थि-आदि शब्दों के द्विवचन में अन्तिम के स्थान पर ई आदेश होता है (अस्थनी, दधनी इत्यादि)।

7.1.78
न अभ्यस्तात्शतुः

IAST nābhyastāc chatuh

प्रकार विधि

सार अभ्यस्त (द्विरुक्त) अङ्ग से परे शतृ पर नुम्-आगम नहीं होता।

7.1.79
वा नपुंसकस्य

IAST vā napuṃsakasya

प्रकार विधि

सार अभ्यस्त से परे शतृ होने पर नपुंसक में नुम् वैकल्पिक होता है।

7.1.80
आत् शीनद्योर्नुं

IAST āc chīnadyor num

प्रकार विधि

सार आ-वर्णान्ताङ्ग से परे शी अथवा नदी होने पर नुम् का आगम होता है।

7.1.81
शप्श्यनोर्नित्यं

IAST śapśyanor nityam

प्रकार नियम

सार शप् तथा श्यन् से युक्त अङ्ग में पूर्वोक्त नुम् नित्य होता है।

7.1.82
सौ अनडुहः

IAST sāv anaḍuhaḥ

प्रकार विधि

सार अनडुह् से परे सु (प्रथमा एकवचन) होने पर नुम्-आगम होता है (अनड्वान्)।

7.1.83
दृश् स्ववः स्वतवसां छन्दसि

IAST dṛk-svavaḥ-svatavasāṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में दृश्, स्ववस् और स्वतवस् को (सौ पर) अनडुह्-सदृश नुम्/विशेष रूप प्राप्त होता है।

7.1.84
दिवः औत्

IAST diva aut

प्रकार विधि

सार दिव् के अन्तिम के स्थान पर औत् आदेश होता है (द्यौः)।

7.1.85
पथि(न्)मथि(न्)ऋभुक्षां आत्

IAST pathimathyṛbhukṣām āt

प्रकार विधि

सार पथिन्, मथिन् और ऋभुक्ष् को (सर्वनामस्थान-परे) आत् आदेश होता है।

7.1.86
इतः अत् सर्वनामस्थाने

IAST ito 't sarvanāmasthāne

प्रकार विधि

सार उक्त इ-भाग के स्थान पर सर्वनामस्थान में अत् आदेश होता है (पन्थाः)।

7.1.87
थः न्थः

IAST tho nthaḥ

प्रकार विधि

सार (पथिन्-मथिन् के) थ् के स्थान पर न्थ् आदेश होता है।

7.1.88
भस्य टेर्लोपः

IAST bhasya ṭer lopaḥ

प्रकार विधि

सार भ-संज्ञक प्रातिपदिक (पथिन्-मथिन्-ऋभुक्षिन् आदि, अनुवृत्ति-सन्दर्भ में) का टि-भाग लुप्त होता है।

7.1.89
पुंसः असुङ्

IAST puṃso 'suṅ

प्रकार विधि

सार पुंस् प्रातिपदिक को असुङ्-आगम होता है (पुमान् इत्यादि रूप-सिद्धि के लिए)।

7.1.90
गोतः ण्- इत्

IAST goto ṇit

प्रकार अतिदेश

सार गो प्रातिपदिक णित् माना जाता है, जिससे सर्वनामस्थान में वृद्धि-सिद्ध गौः आदि रूप बनते हैं।

7.1.91
णल् उत्तमः वा

IAST ṇal uttamo vā

प्रकार अतिदेश

सार उत्तम-पुरुष का णल्-प्रत्यय वैकल्पिक रूप से णित् होता है।

7.1.92
सख्युरसम्बुद्धौ

IAST sakhyur asambuddhau

प्रकार अतिदेश

सार सखि प्रातिपदिक असम्बुद्धि में णित् होता है (सखायौ, सखायः आदि रूपों के लिए)।

7.1.93
अनङ् सौ

IAST anaṅ sau

प्रकार विधि

सार सखि के स्थान पर सौ (प्रथमा एकवचन सु) में अनङ् आदेश होता है (सखा)।

7.1.94
ऋत् उशनः पुरुदंशसनेहसां च

IAST ṛduśanaspurudaṃso'nehasāṃ ca

प्रकार विधि

सार सौ परे ऋत्-अन्त पदों तथा उशनस्, पुरुदंसस् और अनेहस् के अन्त्य के स्थान पर अनङ् आदेश होता है।

7.1.95
तृच् वत् क्रोष्- टुः

IAST tṛjvatkroṣṭuḥ

प्रकार अतिदेश

सार क्रोष्टु शब्द पुंलिङ्ग में तृच्-प्रत्ययान्तवत् व्यवहार पाता है।

7.1.96
स्त्रियां च

IAST striyāṃ ca

प्रकार अतिदेश

सार स्त्रीलिङ्ग में भी क्रोष्टु तृच्-वत् होता है।

7.1.97
विभाषा तृतीयाआदिषु अचि

IAST vibhāṣā tṛtīyādiṣv aci

प्रकार विधि

सार तृतीया से आगे अजादि विभक्तियों में क्रोष्टु का तृज्वत् भाव वैकल्पिक है।

7.1.98
चतुरनडुहोरां उदात्तः

IAST caturanaduhorām udāttaḥ

प्रकार विधि

सार चतुर् और अनडुह् के स्थान पर आम् परे उदात्त राँ आदेश होता है।

7.1.99
अं सम्बुद्धौ

IAST aṃ sambuddhau

प्रकार विधि

सार सम्बुद्धि में चतुर् और अनडुह् के स्थान पर अम् आदेश होता है।

7.1.100
ॠतः इत् धातोः

IAST ṝta id dhātoḥ

प्रकार विधि

सार ॠदन्त धातु के ॠ के स्थान पर इत् (इ) आदेश होता है।

7.1.101
उपधायाः च

IAST upadhāyāḥ ca

प्रकार विधि

सार धातु की उपधा में स्थित ॠ के स्थान पर भी (पूर्व-सूत्रानुसारेण) इ आदेश होता है।

7.1.102
उत् ओष्ठ्यपूर्वस्य

IAST ut oṣṭhyapūrvasya

प्रकार विधि

सार ओष्ठ्यवर्ण-पूर्व ॠ के स्थान पर इ के बदले उ आदेश होता है।

7.1.103
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में ॠ-स्थानीय इ/उ आदेश बहुल (विकल्प-विस्तार) से प्रवृत्त होता है।

अध्याय 7 · पाद 2 (118 सूत्र)

7.2.1
सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु

IAST sici vṛddhiḥ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार सिच्-प्रत्यय के परस्मैपद रूपों में धातु के स्वर को वृद्धि होती है।

7.2.2
अतः र्ल अन्तस्य

IAST ato lrāntasya

प्रकार विधि

सार अकारान्त धातु के र्/ल्-अन्त (ल्रान्त) अंश की वृद्धि सिच्-परस्मैपद में होती है।

7.2.3
वदव्रजहलन्तस्य अचः

IAST vadavrajahalantasyācaḥ

प्रकार विधि

सार वद्, व्रज् तथा हल्-अन्त धातुओं के अच् (उपधा-स्वर) की वृद्धि सिच्-परस्मैपद में होती है।

7.2.4
न इटि

IAST neṭi

प्रकार विधि

सार इट्-आगम होने पर पूर्वोक्त सिच्-परस्मैपद वृद्धि नहीं होती।

7.2.5
ह्म्य् अन्त क्षणश्वसजागृ- णिश्वि एत् इतां

IAST hmyantakṣaṇaśvasajāgṛṇiśvyeditām

प्रकार विधि

सार ह्/म्/य्-अन्त धातुओं तथा क्षण्, श्वस्, जागृ, णि और श्वि में एत्/इट् रहने पर भी सिच्-परस्मैपद वृद्धि होती है।

7.2.6
ऊर्णोतेर्विभाषा

IAST ūrṇotervibhāṣā

प्रकार विधि

सार ऊर्णु धातु में उक्त इट्-सहित सिच्-परस्मैपद वृद्धि वैकल्पिक है।

7.2.7
अतः हलादेर्लघोः

IAST ato halāderlaghoḥ

प्रकार विधि

सार हल् से आरम्भ होने वाली धातु के लघु अ की सिच्-परस्मैपद वृद्धि इट् रहने पर भी होती है।

7.2.8
न इट् वशि कृति

IAST neḍvaśi kṛti

प्रकार विधि

सार वश्-आदि कृत्-प्रत्यय के पहले इट्-आगम नहीं होता।

7.2.9
तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च

IAST titutratathasisusarakaseṣu ca

प्रकार विधि

सार ति, तु, त्र, त, थ, सि, सु, स, र, क, स — इन कृत्-प्रत्ययों के पहले भी इट् नहीं होता।

7.2.10
एक अचः उपदेशे अनुदात्तात्

IAST ekāca upadeśe'nudāttāt

प्रकार विधि

सार उपदेश में अनुदात्त एकाच् धातु से इट्-आगम नहीं होता।

7.2.11
श्रि उकः किति

IAST śryukaḥ kiti

प्रकार विधि

सार श्रि तथा उक् धातु से कित् प्रत्यय के पहले इट् नहीं होता।

7.2.12
सनि ग्रहगुहोः च

IAST sani grahaguhośca

प्रकार विधि

सार ग्रह् और गुह् से सन्-प्रत्यय के पहले भी इट् नहीं होता।

7.2.13
कृसृभृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवः लिटि

IAST kṛsṛbhṛvṛstudrusruśruvo liṭi

प्रकार विधि

सार कृ, सृ, भृ, वृ, स्तु, द्रु, स्रु, श्रु से लिट् के पहले इट् नहीं होता।

7.2.14
श्वि ईत् इत् अः निष्ठायां

IAST śvīdito niṣṭhāyām

प्रकार विधि

सार श्वि तथा ईदित् धातुओं से निष्ठा (क्त/क्तवतु) के पहले इट् नहीं होता।

7.2.15
यस्य विभाषा

IAST yasya vibhāṣā

प्रकार नियम

सार जिस धातु में इट् विभाषा (वैकल्पिक) है, उसकी निष्ठा में इट् नहीं होता।

7.2.16
आत् इत् अः च

IAST āditaśca

प्रकार विधि

सार आदित् धातुओं से भी निष्ठा के पहले इट् नहीं होता।

7.2.17
विभाषा भाव आदिकर्मणोः

IAST vibhāṣā bhāvādikarmaṇoḥ

प्रकार विधि

सार भाव और आदिकर्म अर्थ में निष्ठा-इट् का अभाव वैकल्पिक है।

7.2.18
क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नम्लिष्- टविरिब्धफाण्- टबा- ढानि मन्थमनः तमः सक्त अविस्पष्- टस्वर अणायासभृशेषु

IAST kṣubdhasvāntadhvāntalagnamliṣṭaviribdhaphāṇṭabāḍhāni manthamanastamaḥsaktāvispaṣṭasvarāṇāyāsabhṛśeṣu

प्रकार विधि

सार क्षुब्ध, स्वान्त, ध्वान्त, लग्न, म्लिष्ट, विरिब्ध, फाण्ट, बाढ — ये निपातन निष्ठा-रूप मन्थ, मनस्, तमस्, सक्त, अविस्पष्टस्वर, अणायस, भृश अर्थों में सिद्ध हैं।

7.2.19
धृसिशसी वैयात्ये

IAST dhṛṣiśasī vaiyātye

प्रकार विधि

सार वैयात्य (धृष्टता/निर्लज्जता) अर्थ में धृष् और शस् की निष्ठा इट्-रहित होती है।

7.2.20
दृ- ढः स्थूलबलयोः

IAST dṛḍhaḥ sthūlabalayoḥ

प्रकार विधि

सार स्थूल और बल अर्थ में दृह् की निष्ठा निपातन से दृढ होती है।

7.2.21
प्रभौ परिवृ- ढः

IAST prabhau parivṛḍhaḥ

प्रकार विधि

सार प्रभु अर्थ में परि+वृह् का निपातन रूप परिवृढ होता है।

7.2.22
कृच्छ्र गहनयोः कषः

IAST kṛcchragahanayoḥ kaṣaḥ

प्रकार विधि

सार कृच्छ्र और गहन अर्थ में कष् की निष्ठा इट्-रहित (कष्ट) होती है।

7.2.23
घुषिरविशब्दने

IAST ghuṣiraviśabdane

प्रकार विधि

सार विशब्दन (उच्च घोष/प्रचार) से भिन्न अर्थ में घुष् की निष्ठा इट्-रहित होती है।

7.2.24
अर्देः सम् निविभ्यः

IAST ardeḥ saṃnivibhyaḥ

प्रकार विधि

सार सम्, नि, वि के बाद अर्द् से निष्ठा में इट् नहीं होता।

7.2.25
अभेः च आविदूर्ये

IAST abheścāvidūrye

प्रकार विधि

सार आविदूर्य (समीपता) अर्थ में अभि के योग में भी अर्द् से निष्ठा-इट् नहीं होता।

7.2.26
णेरध्ययने वृत्तं

IAST ṇer adhyayane vṛttam

प्रकार विधि

सार अध्ययन-अर्थ में णी धातु की निष्ठा के रूप में ‘वृत्त’ निपातित होता है।

7.2.27
वा दान्तशान्तपूर्- णदस्तस्पष्- टछन्नज्ञप्ताः

IAST vā dānta-śānta-pūrṇa-dasta-spaṣṭa-channa-jñaptāḥ

प्रकार विधि

सार दान्त, शान्त, पूर्ण, दस्त, स्पष्ट, छन्न और ज्ञप्त — ये निष्ठा-रूप वैकल्पिकतः निपातित होते हैं।

7.2.28
रुषि अमत्वरसंघुष आस्वणां

IAST ruṣy-ām-tvar-saṃghuṣ-āsvanānām

प्रकार विधि

सार रुष्, अम्, त्वर, संघुष् और आस्वण् धातुओं की निष्ठा वैकल्पिकतः (अनिट्/विशिष्ट रूप में) सिद्ध होती है।

7.2.29
हृषेर्लोमसु

IAST hṛṣer lomasu

प्रकार विधि

सार लोम-विषयक अर्थ में हृष् धातु की निष्ठा (हृष्ट) वैकल्पिकतः अनिट् रूप में होती है।

7.2.30
अपचितः च

IAST apacitaś ca

प्रकार विधि

सार अपचित भी (पूर्ववत्) निष्ठा-रूप में निपातित/अनिट् माना जाता है।

7.2.31
ह्रु ह्वरेः छन्दसि

IAST hru-hvareś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में ह्रु और ह्वृ धातुओं की निष्ठा वैकल्पिकतः (पूर्ववत् अनिट्/विशिष्ट) होती है।

7.2.32
अपरिह्वृतः च

IAST aparihvṛtaś ca

प्रकार विधि

सार ह्वृ-प्रकरण में अपरिह्वृतः रूप का भी निपातन किया जाता है।

7.2.33
सोमे ह्वरितः

IAST some hvaritaḥ

प्रकार विधि

सार सोम-सम्बन्ध में ह्वरितः रूप का विधान/निपातन है।

7.2.34
ग्रसितस्कभितस्तभित उत्तभित चत्तविकस्तविशस्तृशंस्तृशास्तृतरुतृतरूतृवरुतृवरूतृवरुत्रीर्- उज्ज्वलितिक्षरितिक्षमितिवमिति अमिति इतिच

IAST grasitaskabhitastabhita uttabhita cattavikastaviśastṛśaṃstṛśāstṛtarutṛtarūtṛvarutṛvarūtṛvarutrīr ujjvalitikṣaritikṣamitivamiti amiti iti ca

प्रकार विधि

सार ग्रसित, स्कभित, स्तभित, उत्तभित, चत्त, विकस्त, विशस्त, ऋशंस्तृ, शास्तृ, तरुतृ, तरूतृ, वरुतृ, वरूतृ, वरुत्रीः, उज्ज्वलिति, क्षरिति, क्षमिति, वमिति और अमिति — ये रूप भी साधु हैं।

7.2.35
आर्धधातुकस्य इट् वलादेः

IAST ārdhadhātukasyeḍ valādeḥ

प्रकार विधि

सार वल्-आदि आर्धधातुक प्रत्यय के आदि में इट् का आगम होता है।

7.2.36
स्नुक्रमोरणात्मनेपदनिमित्ते

IAST snukramor ṇātmanepadanimitte

प्रकार नियम

सार स्नु और क्रम् के णिच् से जब आत्मनेपद निमित्त हो तो (वल्-आदि आर्धधातुक परे) इट् नहीं होता।

7.2.37
ग्रहः अलिटि दीर्घः

IAST graho 'liṭi dīrghaḥ

प्रकार विधि

सार ग्रह् के परे अलिट् आर्धधातुक में इट् का इकार दीर्घ होता है।

7.2.38
वृ ॠतः वा

IAST vṛ ṝtaḥ vā

प्रकार विधि

सार वृ-धातु तथा ॠकारान्त धातु से परे इट् के इकार का दीर्घ विकल्प से होता है।

7.2.39
न लिङि

IAST na liṅi

प्रकार विधि

सार लिङ्-प्रत्यय परे पूर्वोक्त इट्-दीर्घ नहीं होता।

7.2.40
सिचि च परस्मैपदेषु

IAST sici ca parasmaipadeṣu

प्रकार नियम

सार परस्मैपद में सिच् परे भी (उक्त) दीर्घ नहीं होता।

7.2.41
इट् सनि वा

IAST iṭ sani vā

प्रकार विधि

सार सन्-प्रत्यय परे इट् विकल्प से होता है।

7.2.42
लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु

IAST liṅsicor ātmanepadeṣu

प्रकार विधि

सार आत्मनेपद में लिङ् और सिच् परे भी इट् विकल्प से होता है।

7.2.43
ऋतः च संयोग आदेः

IAST ṛtaś ca saṃyogādeḥ

प्रकार विधि

सार संयोगादि ऋकारान्त धातु से भी (उक्त स्थलों में) इट् विकल्प से होता है।

7.2.44
स्वरतिसूतिसूयतिधूञ् ऊत् इतः वा

IAST svaratisūtisūyatidhūñ ūt itaḥ vā

प्रकार विधि

सार स्वर्, सूति-सूयति, धूञ् तथा ऊदित् धातुओं से परे इट् विकल्प से होता है।

7.2.45
रध आदिभ्यः च

IAST radha ādibhyaḥ ca

प्रकार विधि

सार रधादिगण की धातुओं से परे भी इट् विकल्प से होता है।

7.2.46
निरः कुषः

IAST niraḥ kuṣaḥ

प्रकार विधि

सार निर्-पूर्वक कुष् धातु से इट् विकल्प से होता है।

7.2.47
इट् निष्ठायां

IAST iṭ niṣṭhāyām

प्रकार विधि

सार पूर्व-प्रकृत धातुओं से परे निष्ठा में इट् का (वैकल्पिक) विधान होता है।

7.2.48
ति इषसहलुभरुषरिषः

IAST ti iṣasahalubharuṣariṣaḥ

प्रकार विधि

सार इष्, सह्, लुभ्, रुष् तथा रिष् से परे तकारादि प्रत्यय में इट् विकल्प से होता है।

7.2.49
सनि इव् अन्त ऋधभ्रस्जदन्भुश्रिस्वृयु ऊर्णुभरज्ञपिसणां

IAST sani iv anta ṛdhabhrasjadambhuśrisvṛyu ūrṇubharajñapisaṇām

प्रकार विधि

सार सन् (तथा इवन्त-प्रसंग) परे ऋध्, भ्रस्ज्, दम्भ्, श्रि, स्वृ, यु, ऊर्णु, भृ, ज्ञप् और सन् से इट् विकल्प से होता है।

7.2.50
क्लिशः क्त्वानिष्ठयोः

IAST kliśaḥ ktvāniṣṭhayoḥ

प्रकार विधि

सार क्लिश् धातु से क्त्वा और निष्ठा परे इट् विकल्प से होता है।

7.2.51
पूङः च

IAST pūṅaḥ ca

प्रकार विधि

सार पूङ् धातु से परे क्त्वा और निष्ठा में इट् का वही वैकल्पिक विधान पूर्ववत् लागू होता है।

7.2.52
वसति क्षुधोरिट्

IAST vasati kṣudhor iṭ

प्रकार विधि

सार वस् और क्षुध् धातुओं से परे क्त्वा-निष्ठा में नित्य इट् होता है।

7.2.53
अञ्चेः पूजायां

IAST añceḥ pūjāyām

प्रकार विधि

सार पूजा-अर्थ में प्रयुक्त अञ्च् धातु से परे क्त्वा-निष्ठा में इट् होता है।

7.2.54
लुभः विमोचने

IAST lubhaḥ vimocane

प्रकार विधि

सार विमोचन-अर्थ में प्रयुक्त लुभ् धातु से परे क्त्वा-निष्ठा में इट् होता है।

7.2.55
जृलपॄव्रश्च्योः क्त्वि

IAST jṛ-lap-pṝ-vraścyoḥ ktvi

प्रकार विधि

सार जॄ, लप्, पॄ और व्रश्च् धातुओं से परे क्त्वा प्रत्यय में इट् का विधान है।

7.2.56
उत् इतः वा

IAST uditaḥ vā

प्रकार विधि

सार उपदेश में उकार-इत् वाले धातुओं से परे क्त्वा में इट् विकल्प से होता है।

7.2.57
से असिचि कृतचृतछृदतृदनृतः

IAST se asici kṛta-cṛta-chṛda-tṛda-nṛtaḥ

प्रकार विधि

सार कृत्, चृत्, छृद्, तृद् और नृत् धातुओं से परे से तथा सिच् में इट् (वैकल्पिक/सन्दर्भानुसारी) होता है।

7.2.58
गमेरिट् परस्मैपदेषु

IAST gameḥ iṭ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार गम् धातु से परे परस्मैपद आर्धधातुक में इट् होता है।

7.2.59
न वृत् भ्यश्चतुर्भ्यः

IAST na vṛdbhyaś caturbhyaḥ

प्रकार विधि

सार वृत् आदि चार धातुओं (वृत्-वृध्-शृध्-स्यन्द्) से परे परस्मैपद में इट् नहीं होता।

7.2.60
तासि च क्ल्पः

IAST tāsi ca kḷpaḥ

प्रकार विधि

सार क्लृप् धातु से परे तास् (लुट्) में भी इट् का प्रतिषेध है।

7.2.61
अचः तस्वत् थलि अनिटः नित्यं

IAST acaḥ tasvat thali aniṭaḥ nityam

प्रकार विधि

सार अनिट् अजन्त धातु से परे थल् में रूप नित्य तस्-वत् (तस् के समान) होता है।

7.2.62
उपदेशे अत् वतः

IAST upadeśe atvataḥ

प्रकार विधि

सार उपदेश में अकार वाले धातु से परे थल् में भी तस्वद्भाव होता है।

7.2.63
ऋतः भारद्वाजस्य

IAST ṛtaḥ bhāradvājasya

प्रकार विधि

सार भारद्वाज के मत में ऋकारान्त धातु से परे थल् में तस्वद्भाव मान्य है।(व्याख्या-भेद)

7.2.64
बभूथ आततन्थजगृभ्मववर्थ ति निगमे

IAST babhūtha ātatntha-jagṛbhma-vavarthe ti nigame

प्रकार विधि

सार निगम (वेद) में बभूथ, आततन्थ, जगृभ्म और ववर्थ रूप निपातन से सिद्ध हैं।

7.2.65
विभाषा सृजिदृषोः

IAST vibhāṣā sṛji-dṛśoḥ

प्रकार विधि

सार सृज् और दृश् धातुओं से परे थल् में तस्वद्भाव विकल्प से होता है।

7.2.66
इट् अत्ति अर्ति व्ययतिणां

IAST iṭ atti-arti-vyayatīnām

प्रकार विधि

सार अत्ति (अद्), अर्ति (ऋ) और व्ययति-वर्ग के धातुओं से परे थल् में इट् होता है।

7.2.67
वसु एक अच् आत् घसां

IAST vasu ekāc ād ghasām

प्रकार विधि

सार एकाच् धातु तथा घस् आदि से परे वसु (क्वसु) में इट् होता है।

7.2.68
विभाषा गमहनविदविशां

IAST vibhāṣā gama-hana-vida-viśām

प्रकार विधि

सार गम्, हन्, विद् और विश् धातुओं से परे वसु में इट् विकल्प से होता है।

7.2.69
सनिंससनिवांसं

IAST saniṃsasanivāṃsam

प्रकार विधि

सार सनिंससनिवांसम् आदि रूप निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

7.2.70
ऋत् हनोः स्ये

IAST ṛd-hanoḥ sye

प्रकार विधि

सार ऋध् और हन् धातुओं से परे स्य प्रत्यय में इट् होता है।

7.2.71
अञ्जेः सिचि

IAST añjeḥ sici

प्रकार विधि

सार अञ्ज् धातु से परे सिच् में इट् होता है।

7.2.72
स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु

IAST stu-su-dhūñbhyaḥ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार स्तु, सु और धूञ् धातुओं से परे परस्मैपद में (सिच् आदि में) इट् होता है।

7.2.73
यमरमनम आतां सक् च

IAST yama-rama-nam ātām sak ca

प्रकार विधि

सार यम्, रम् और नम् धातुओं से परे आताम् में सक् का आगम तथा इट् होता है।

7.2.74
स्मिपूङ् ऋ अञ्जू अशां सनि

IAST smi-pūṅ-ṛ-añjū-aśām sani

प्रकार विधि

सार स्मि, पूङ्, ऋ, अञ्जू और अश् धातुओं से परे सन् में इट् होता है।

7.2.75
किरः च पञ्चभ्यः

IAST kiraḥ ca pañcabhyaḥ

प्रकार विधि

सार कॄ तथा उन पाँच धातुओं से परे सन् में भी इट् होता है।

7.2.76
रुदादिभ्यः सार्वधतुके

IAST rudādibhyaḥ sārvadhātuke

प्रकार विधि

सार रुदादि (रुद्, स्वप्, श्वस्, अन्, जक्ष्) धातुओं से परे सार्वधातुक प्रत्यय को इट्-आगम होता है।

7.2.77
ईशः से

IAST īśaḥ se

प्रकार विधि

सार ईश् धातु से परे से-प्रत्यय को इट्-आगम होता है।

7.2.78
ईड जनोर्ध्वे च

IAST īḍjanordhve ca

प्रकार विधि

सार ईड् और जन् से परे से में तथा ऊर्ध्व (अन्य सार्वधातुक) में भी इट् होता है।

7.2.79
लिङः सलोपः अनन्त्यस्य

IAST liṅaḥ salopo 'nantyasya

प्रकार विधि

सार लिङ् के अनन्त्य (अन्तिम से भिन्न) सकार का लोप होता है।

7.2.80
अतः या इयः

IAST ato yāiyaḥ

प्रकार विधि

सार अकारान्त अङ्ग से परे लिङ् के या को इय् आदेश होता है।

7.2.81
आतः ङ्- इतः

IAST ātaḥ ṅitaḥ

प्रकार विधि

सार आकारान्त अङ्ग से परे ङित् (लिङ्) के या को इय् आदेश होता है।

7.2.82
आने मुक्

IAST āne muk

प्रकार विधि

सार आन (शानच्) परे होने पर अङ्ग को मुक्-आगम होता है।

7.2.83
ईत् आसः

IAST īd āsaḥ

प्रकार विधि

सार आस् धातु को आने परे ईत् आदेश होता है।

7.2.84
अष्तनः आ विभक्तौ

IAST aṣṭana ā vibhaktau

प्रकार विधि

सार अष्टन् को विभक्ति परे होने पर आ-आदेश होता है।

7.2.85
रायः हलि

IAST rāyaḥ hali

प्रकार विधि

सार रै को हल्-विभक्ति परे आ-आदेश (रा) होता है।

7.2.86
युष्मद् अस्मदोरणादेशे

IAST yuṣmadasmador anādeśe

प्रकार विधि

सार युष्मद् और अस्मद् में जहाँ (पूर्ण) विशेष आदेश नहीं होता, वहाँ अग्रिम य/लोप-विधान का क्षेत्र है।

7.2.87
द्वितीयायां च

IAST dvitīyāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार द्वितीया विभक्ति में भी (युष्मद्-अस्मद् के मपर्यन्त को) य-आदेश होता है।

7.2.88
प्रथमायाः च द्विवचने भाषायां

IAST prathamāyāś ca dvivacane bhāṣāyām

प्रकार विधि

सार भाषा में प्रथमा द्विवचन में भी (मपर्यन्त को) य-आदेश होता है।

7.2.89
यः अचि

IAST yo 'ci

प्रकार विधि

सार अच् परे होने पर युष्मद्-अस्मद् के मपर्यन्त अंश को य् आदेश होता है।

7.2.90
शेषे लोपः

IAST śeṣe lopaḥ

प्रकार विधि

सार शेष में (जहाँ य-आदेश नहीं) युष्मद्-अस्मद् के मपर्यन्त का लोप होता है।

7.2.91
मपर्यन्तस्य

IAST maparyantasya

प्रकार विधि

सार (पूर्वोक्त लोप/य-आदेश का विषय) मकार-पर्यन्त अंश है।

7.2.92
युव आवौ द्विवचने

IAST yuvāvau dvivacane

प्रकार विधि

सार द्विवचन में युष्मद् को युव् तथा अस्मद् को आव् आदेश होता है।

7.2.93
यूववयौ जसि

IAST yūyavayau jasi

प्रकार विधि

सार जस् (प्रथमा बहुवचन) परे युष्मद् को यूय् तथा अस्मद् को वय् आदेश होता है।

7.2.94
त्व अहौ सौ

IAST tvāhau sau

प्रकार विधि

सार सुँ (प्रथमा एकवचन) परे युष्मद् को त्व तथा अस्मद् को अह् आदेश होता है।

7.2.95
तुभ्यमह्यौ ङयि

IAST tubhyamahyau ṅayi

प्रकार विधि

सार ङे (चतुर्थ्येकवचन) परे युष्मद् को तुभ्य तथा अस्मद् को मह्य आदेश होता है।

7.2.96
तवममौ ङसि

IAST tavamamau ṅasi

प्रकार विधि

सार ङस् (षष्ठ्येकवचन) परे युष्मद् को तव तथा अस्मद् को मम आदेश होता है।

7.2.97
त्वमौ एकवचने

IAST tvamāv ekavacane

प्रकार विधि

सार एकवचन की शेष विभक्तियों में युष्मद् को त्व तथा अस्मद् को म आदेश होता है।

7.2.98
प्रतय उत्तरपदयोः च

IAST pratyayottarapadayoś ca

प्रकार विधि

सार प्रत्यय और उत्तरपद परे होने पर भी (युष्मद्-अस्मद् को) ये आदेश होते हैं।

7.2.99
त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचत्सृ

IAST tricaturoḥ striyāṃ tisṛcatasṛ

प्रकार विधि

सार स्त्रीलिङ्ग में त्रि को तिसृ तथा चतुर् को चतसृ आदेश होता है।

7.2.100
अचि र ऋतः

IAST aci ra ṛtaḥ

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त अङ्ग को अच् परे र् आदेश होता है।

7.2.101
जरायाः जरसन्यतरस्यां

IAST jarāyā jaras anyatarasyām

प्रकार विधि

सार जरा के स्थान पर विकल्प से जरस आदेश होता है।

7.2.102
त्यदादीणां अः

IAST tyadādīnām aḥ

प्रकार विधि

सार त्यद् आदि सर्वनाम-प्रातिपदिकों के अन्त्य वर्ण के स्थान पर अ आदेश होता है।

7.2.103
किमः कः

IAST kimaḥ kaḥ

प्रकार विधि

सार किम् के स्थान पर क आदेश होता है।

7.2.104
कु तिहोः

IAST ku tihoḥ

प्रकार विधि

सार ति और ह् परे किम् के स्थान पर कु आदेश होता है।

7.2.105
क्व अति

IAST kvāti

प्रकार विधि

सार अति परे किम् के स्थान पर क्व आदेश होता है।

7.2.106
तदोः सः सौ अनन्त्ययोः

IAST tadoḥ saḥ sau anantyayoḥ

प्रकार विधि

सार अनन्त्य त् और द् के स्थान पर सु परे स आदेश होता है।

7.2.107
अदसः औ सुलोपः च

IAST adasaḥ au sulopaś ca

प्रकार विधि

सार अदस् के स्थान पर औ आदेश होता है तथा सु का लोप भी होता है।

7.2.108
इदमः मः

IAST idamo maḥ

प्रकार विधि

सार इदम् के अन्त्य के स्थान पर म् आदेश होता है।

7.2.109
दः च

IAST daś ca

प्रकार विधि

सार इदम् के अन्त्य के स्थान पर द् भी आदेश होता है।

7.2.110
यः सौ

IAST yaḥ sau

प्रकार विधि

सार सु परे (इदम्-सम्बन्धी) य् आदेश होता है।

7.2.111
इदः अय् पुंसि

IAST ido 'y puṃsi

प्रकार विधि

सार पुंलिङ्ग में इदम् के इद् के स्थान पर अय् आदेश होता है।

7.2.112
अन आपि अकः

IAST ana āpi akaḥ

प्रकार विधि

सार आप् और अक परे इदम् के स्थान पर अन आदेश होता है।

7.2.113
हलि लोपः

IAST hali lopaḥ

प्रकार विधि

सार हल् परे (इदम्-सम्बन्धी) आदेश का लोप होता है।

7.2.114
मृजेर्वृद्धिः

IAST mṛjer vṛddhiḥ

प्रकार विधि

सार मृज् धातु के स्वर को वृद्धि होती है।

7.2.115
अचः ञ्- ण्- इति

IAST aco ñṇiti

प्रकार विधि

सार ञित् और णित् प्रत्यय परे अच् को वृद्धि होती है।

7.2.116
अतः उपधायाः

IAST ata upadhāyāḥ

प्रकार विधि

सार उपधाभूत अत् (ह्रस्व अ) को (ञित्-णित् परे) वृद्धि होती है।

7.2.117
तद्धितेषु अचां आदेः

IAST taddhiteṣv acām ādeḥ

प्रकार विधि

सार तद्धितों में अच्-वर्ग के आदि स्वर को (ञित्-णित् परे) वृद्धि होती है।

7.2.118
किति च

IAST kiti ca

प्रकार विधि

सार कित् (तद्धित) परे भी आदि अच् को वृद्धि होती है।

अध्याय 7 · पाद 3 (120 सूत्र)

7.3.1
देविकाशिंशपादित्यवाह्दीर्घसत्त्रश्रेयसां आत्

IAST devikāśiṃśapādityavāhdīrghasattraśreyasām āt

प्रकार विधि

सार देविका, शिंशपा, आदित्य, वाह्, दीर्घसत्त्र और श्रेयस् के आदि-अच् का तद्धितादि में आत् (आ) आदेश होता है।

7.3.2
केकयमित्रयुप्रलयाणां य आदेरियः

IAST kekayamitrayupralayānāṃ ya āder iyaḥ

प्रकार विधि

सार केकय, मित्रयु और प्रलय के आदि य् का इय् आदेश होता है।

7.3.3
न य्वाभ्यां पद अन्ताभ्याम् पूर्वौ तु ताभ्याम् ऐच्

IAST na yvābhyāṃ padāntābhyām pūrvau tu tābhyām aic

प्रकार विधि

सार पद-अन्त्य य्-व् पर वृद्धि नहीं; उनसे पूर्ववर्ती स्वर को ऐच् (ऐ/औ) होता है।

7.3.4
द्वार आदीणां च

IAST dvārādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार द्वारादि गण के शब्दों में भी य्-व् से पूर्व ऐच् का विधान होता है।

7.3.5
न्यग्रोधस्य च केवलस्य

IAST nyagrodhasya ca kevalasya

प्रकार विधि

सार केवल (असमस्त) न्यग्रोध में भी उसी प्रकार पूर्व-स्वर को ऐच् होता है।

7.3.6
न कर्मव्यतिहारे

IAST na karmavyatihāre

प्रकार नियम

सार कर्मव्यतिहार (पारस्परिक क्रिया) में पूर्वोक्त ऐच्-विधान का प्रतिषेध है।

7.3.7
सु आगत आदीणां च

IAST svāgatādīnāṃ ca

प्रकार नियम

सार स्वागतादि गण में भी पूर्वोक्त ऐच्-विधान का निषेध होता है।

7.3.8
श्व(न्)आदेरिञि

IAST śvanāder iñi

प्रकार विधि

सार श्वन्-आदि के अङ्ग में इञ् पर (पूर्व-स्वर को) ऐच् होता है।

7.3.9
पद अन्तस्य अन्यतरस्यां

IAST padāntasyānyatarasyām

प्रकार विधि

सार पद-अन्त्य (य्-व्) विषय में उक्त विधान अन्यतरस्याम् (वैकल्पिक) है।

7.3.10
उत्तरपदस्य

IAST uttarapadasya

प्रकार अधिकार

सार आगे के सूत्रों में उत्तरपद की (आदि-)वृद्धि का अधिकार है।

7.3.11
अवयवात् ऋतोः

IAST avayavād ṛtoḥ

प्रकार विधि

सार ऋतु के अवयव-वाचक समास में उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.12
सुसर्व अर्धात् जनपदस्य

IAST susarvārdhāj janapadasya

प्रकार विधि

सार सु, सर्व या अर्ध के परे जनपद-वाचक उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.13
दिशः अमद्रा- णां

IAST diśām amadrāṇām

प्रकार विधि

सार मद्र-भिन्न दिशा-वाचक उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.14
प्राचां ग्रामनगरा- णां

IAST prācāṃ grāmanagarāṇām

प्रकार विधि

सार प्राच्यों के ग्राम- और नगर-नामों में उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.15
संख्यायाः संवत्सरसंख्यस्य च

IAST saṃkhyāyāḥ saṃvatsarasaṃkhyasya ca

प्रकार विधि

सार संख्यावाची तथा संवत्सर-संख्यावाची उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.16
वर्षस्य अभविष्यति

IAST varṣasyābhaviṣyati

प्रकार विधि

सार अभविष्यत् (अन contined/non-future) अर्थ में वर्ष-शब्द के उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.17
परिमाण अन्तस्य असंज्ञाशाणयोः

IAST parimāṇāntasyāsaṃjñāśāṇayoḥ

प्रकार विधि

सार परिमाण-अन्त वाले (संज्ञा और शाण छोड़कर) उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.18
जे प्रोष्ठपदाणां

IAST je proṣṭhapadānām

प्रकार विधि

सार ज-प्रत्यय पर प्रोष्ठपदादि (मास/नक्षत्र-नाम) उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.19
हृद्भगसिन्धु अन्ते पूर्वादय च

IAST hṛdbhagasindhvante pūrvādayaś ca

प्रकार विधि

सार हृद्, भग, सिन्धु-अन्त तथा पूर्वादि में उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.20
अनुशतिक आदीनां च

IAST anuśatikādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार अनुशतिकादि गण में भी उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.21
देवताद्वंद्वे च

IAST devatādvandve ca

प्रकार विधि

सार देवता-द्वंद्व समास में भी (उत्तरपद की) वृद्धि होती है।

7.3.22
न इन्द्रस्य परस्य

IAST nendrasya parasya

प्रकार नियम

सार पर (उत्तर) पद होने पर इन्द्र की वृद्धि का प्रतिषेध है।

7.3.23
दीर्घात् च वरुणस्य

IAST dīrghāc ca varuṇasya

प्रकार नियम

सार दीर्घ (पूर्वपद-अन्त) के परे वरुण की वृद्धि भी निषिद्ध है।

7.3.24
प्राचां नगर अन्ते

IAST prācāṃ nagarānte

प्रकार विधि

सार प्राच्यों के नगर-अन्त नामों में उत्तरपद की वृद्धि होती है।

7.3.25
जङ्गलधेनुवलज अन्तस्य विभाषितं उत्तरम्

IAST jaṅgaladhenuvalajāntasya vibhāṣitam uttaram

प्रकार विधि

सार जङ्गल, धेनु या वलज-अन्त में उत्तर (पद की वृद्धि) विभाषा से होती है।

7.3.26
अर्धात् परिमा- णस्य पीर्वस्य तु वा

IAST ardhāt parimāṇasya pūrvasya tu vā

प्रकार विधि

सार अर्ध के परे परिमाणवाची शब्द के आदि-स्वर को वैकल्पिक वृद्धि होती है।

7.3.27
न अतः परस्य

IAST nataḥ parasya

प्रकार नियम

सार नत के परवर्ती (शब्द) पर पूर्व-सूत्र की वैकल्पिक वृद्धि का निषेध है।

7.3.28
प्रवाहणस्य ढे

IAST pravāhaṇasya ḍhe

प्रकार विधि

सार प्रवाहण के आदि-स्वर को ढ-प्रत्यय पर वृद्धि होती है।

7.3.29
तत्प्रत्ययस्य च

IAST tatpratyayasya ca

प्रकार विधि

सार उसी ढ-प्रत्यय से निष्पन्न शब्द पर भी वही आदि-वृद्धि लागू होती है।

7.3.30
नञः शुचि ईश्वरक्षेत्रज्ञकुशलनिपुणाणां

IAST nañaḥ śucīśvarakṣetrajñakuśalanipuṇānām

प्रकार नियम

सार नञ् के परे शुचि, ईश्वर, क्षेत्रज्ञ, कुशल और निपुण की आदि-वृद्धि नहीं होती।

7.3.31
यथातथयथापुरयोः पर्याये

IAST yathātathayathāpurayoḥ paryāye

प्रकार विधि

सार यथातथ और यथापुर में पर्याय-अर्थ में आदि-वृद्धि का विधान है।

7.3.32
हनः तः अचिण्- णलोः

IAST hanaḥ taḥ aciṇṇaloḥ

प्रकार विधि

सार हन् के अन्त्य न् को अज्-आदि प्रत्यय पर त् आदेश होता है, चिण् और णल् को छोड़कर।

7.3.33
आतः युक् चिण्कृतोः

IAST āto yuk ciṇkṛtoḥ

प्रकार विधि

सार आकारान्त धातु से चिण् और क्-इत् कृत् पर युक् (य्) का आगम होता है।

7.3.34
न उदात्त उपदेशस्य म न्तय अणाअमेः

IAST nodāttopadeśasya māntasyānācameḥ

प्रकार नियम

सार उदात्त-उपदेश वाली मकारान्त धातुओं में—आचम् छोड़कर—युक्-आगम का निषेध है।

7.3.35
जनिवध्योः च

IAST janivadhyoś ca

प्रकार नियम

सार जन् और वध् धातुओं में भी युक्-आगम का निषेध है।

7.3.36
अर्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्स्मायी आतां पुक् णौ

IAST artihrīvlīrīknūyīkṣmāyyātāṃ pug ṇau

प्रकार विधि

सार ऋ, ह्री, व्ली, री, क्नु, ई, क्ष्माय् तथा आकारान्त धातुओं से णिच् पर पुक् (प्) का आगम होता है।

7.3.37
शाछासाह्वाव्यावेपां युक्

IAST śāchāsāhvāvyāvepāṃ yuk

प्रकार विधि

सार शा, छा, सा, ह्वा, व्या, वे और पा धातुओं से णिच् पर युक् (य्) का आगम होता है।

7.3.38
वः विधूनने जुक्

IAST vaḥ vidhūnane juk

प्रकार विधि

सार विधूननार्थक धातु «व» के णिच् में जुक् (ज्) का आगम होता है।

7.3.39
लीलोर्नुक् लुकौ न्यारयां स्नेहैपातने

IAST līlor nuk lukau nyārāyāṃ snehaipātane

प्रकार विधि

सार न्यारय और स्नेह-ऐपातन अर्थ में धातु «ली» व «लू» के णिच् में क्रमशः नुक् और लुक् का आगम होता है।

7.3.40
भियः हेतुभये षुक्

IAST bhiyaḥ hetubhaye ṣuk

प्रकार विधि

सार हेतुकृत भय अर्थ में धातु «भी» के णिच् में षुक् (ष्) का आगम होता है।

7.3.41
स्फायः वः

IAST sphāyaḥ vaḥ

प्रकार विधि

सार धातु «स्फाय्» के णिच् में व्-आदेश होता है।

7.3.42
शदेरगतौ तः

IAST śader agatau taḥ

प्रकार विधि

सार गतिभिन्न अर्थ में धातु «शद्» के णिच् में त्-आदेश होता है।

7.3.43
रुहः पः अन्यतरस्यां

IAST ruhaḥ paḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार धातु «रुह्» के णिच् में विकल्प से प्-आदेश होता है।

7.3.44
प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्य तः इत् आपि असुपः

IAST pratyayasthāt kāt pūrvasya ata it āpi asupaḥ

प्रकार विधि

सार प्रत्ययस्थ क् से पूर्ववर्ती अ का इ-आदेश होता है जब आप् परे हो, सुप् को छोड़कर।

7.3.45
न यासयोः

IAST na yāsayoḥ

प्रकार विधि

सार या और सा के विषय में पूर्व-सूत्र (७.३.४४) का इ-आदेश नहीं होता।

7.3.46
उदीचां आतः स्थाने यकपूर्वायाः

IAST udīcāṃ ātaḥ sthāne yakapūrvāyāḥ

प्रकार विधि

सार उदीच्य आचार्यों के मत में यक्-पूर्व आप् के स्थाने आ रहता/होता है (ई-निवृत्ति का वैकल्पिक पक्ष)।

7.3.47
भस्त्रा एषा अजा- ज्ञाद्वास्वा नञ्- ऊर्वा- णां अपि

IAST bhastrā eṣā ajā-jñā-dvā-svā nañ-ūrvāṇām api

प्रकार विधि

सार भस्त्रा, एषा, अजा, ज्ञा, द्वा, स्वा, नञ् और ऊर्वा पर भी वही आ-पक्ष लागू होता है।

7.3.48
अभाषितपुंस्कात् च

IAST abhāṣitapuṃskāt ca

प्रकार विधि

सार अभाषितपुंस्क (पुंलिङ्ग-रूपहीन) से भी वही आ-विकल्प प्राप्त होता है।

7.3.49
आत् आचार्या- णां

IAST āt ācāryāṇām

प्रकार विधि

सार आचार्यों के मत में आ-पक्ष (ई के स्थाने आ) सामान्यतः भी माना जाता है।

7.3.50
ठस्य इकः

IAST ṭhasya ikaḥ

प्रकार विधि

सार प्रत्यय «ठ» के स्थाने «इक» आदेश होता है।

7.3.51
इसुसुक्त अन्तात् कः

IAST isusuktāntāt kaḥ

प्रकार विधि

सार इसु अथवा सुक् पर अन्त वाले अङ्ग से परे ण्वुल् के स्थान पर क आदेश होता है।

7.3.52
चजोः कु घ् इत् ण्यतोः

IAST cajoḥ ku ghiṇyatoḥ

प्रकार विधि

सार धातु के अन्त्य च्/ज् का कु-वर्ग (क्/ग्) आदेश घित् प्रत्यय तथा ण्यत् के परे होता है।

7.3.53
न्यङ्कु आदीणां च

IAST nyaṅkvādīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार न्यङ्कु-आदि गण की धातुओं में भी पूर्वोक्त कु-आदेश होता है।

7.3.54
हः हन्तेर्ञ्- ण्- इत्नेषु

IAST ho hanter ñṇinneṣu

प्रकार विधि

सार हन् धातु के ह् का घ् आदेश ञित्-णित् प्रत्ययों तथा न-आदि परे होता है।

7.3.55
अभ्यासात् च

IAST abhyāsāc ca

प्रकार विधि

सार अभ्यास से परे भी हन् के ह् का घ् आदेश होता है।

7.3.56
हेरचङि

IAST her acaṅi

प्रकार विधि

सार हि धातु के ह् का घ् आदेश चङ् को छोड़कर अन्यत्र होता है।

7.3.57
सन्लिटोर्जेः

IAST sanliṭor jeḥ

प्रकार विधि

सार जि धातु के ज् का ग् आदेश सन् तथा लिट् के परे होता है।

7.3.58
विभाषा चेः

IAST vibhāṣā ceḥ

प्रकार विधि

सार चि धातु के ज् का ग् आदेश सन्-लिट् परे विकल्प से होता है।

7.3.59
न कु आदेः

IAST na ku-ādeḥ

प्रकार नियम

सार कु-वर्गादि धातु में च्/ज् का कु-आदेश नहीं होता।

7.3.60
अजिवृज्योः च

IAST ajivṛjyoś ca

प्रकार नियम

सार अज् तथा वृज् धातुओं में भी च्/ज् का कु-आदेश नहीं होता।

7.3.61
भुजन्युब्जौ पाणि उपतापयोः

IAST bhujanyubjau pāṇyupatāpayoḥ

प्रकार नियम

सार पाणि-अर्थ में भुज् तथा उपताप-अर्थ में न्युब्ज् कु-आदेश से वर्जित/विशिष्ट रूप रखते हैं।

7.3.62
प्रयाज अनुयाजौ यज्ञ ङ्गे

IAST prayājānuyājau yajñaṅge

प्रकार नियम

सार यज्ञाङ्ग-अर्थ में प्रयाज तथा अनुयाज रूप (ज-युक्त) सिद्ध होते हैं।

7.3.63
वञ्चेर्गतौ

IAST vañcer gatau

प्रकार विधि

सार गति-अर्थ में वर्तमान वञ्च् धातु में कु-आदेश होता है।

7.3.64
ओकः उचः के

IAST oka ucaḥ ke

प्रकार विधि

सार उच् धातु का क-प्रत्यय परे ओक् आदेश होता है।

7.3.65
ण्ये आवश्यके

IAST ṇye āvaśyake

प्रकार विधि

सार आवश्यक-अर्थक ण्यत् के परे (पूर्व-प्रकरणानुसारी) विशेष आदेश होता है।

7.3.66
यजयाचरुचप्रवच ऋचः च

IAST yajayācarucapravaca ṛcaś ca

प्रकार विधि

सार यज्, याच्, रुच्, प्रवच् तथा ऋच् धातुओं में भी ण्ये आवश्यकार्थे पूर्वोक्त व्यवस्था लागू होती है।

7.3.67
वचः अशब्दसंज्नायां

IAST vaco 'śabdasaṃjñāyām

प्रकार नियम

सार वच् धातु में शब्द-संज्ञा न होने पर (ण्ये) पूर्वोक्त विशेष रूप-व्यवस्था होती है।

7.3.68
प्रयोज्यनियोज्यौ शक्य अर्थे

IAST prayojyaniyojyau śakye 'rthe

प्रकार नियम

सार शक्य-अर्थ में प्रयोज्य तथा नियोज्य रूप (ज-युक्त) ही होते हैं।

7.3.69
भोज्यं भक्ष्ये

IAST bhojyaṃ bhakṣye

प्रकार नियम

सार भक्ष्य-अर्थ में भुज् से भोज्य रूप ही सिद्ध होता है।

7.3.70
घोर्लोपः लेटि वा

IAST ghor lopaḥ leṭi vā

प्रकार विधि

सार घु-संज्ञक धातुओं के अन्त्य का लेट् परे विकल्प से लोप होता है।

7.3.71
ओतः श्यनि

IAST otaḥ śyani

प्रकार विधि

सार ओकारान्त धातु के ओ का श्यन् परे लोप होता है।

7.3.72
क्सस्य अचि

IAST ksasyāci

प्रकार विधि

सार क्स विकरण का अच् (स्वर) परे लोप होता है।

7.3.73
लुक् वा दुहदिहलिहगुहां आत्मनेअदे दन्त्ये

IAST lug vā duhadihalihaguhām ātmanepade dantye

प्रकार विधि

सार दुह्-दिह्-लिह्-गुह् के परे आत्मनेपद में दन्त्य परे क्स का विकल्प से लुक् होता है।

7.3.74
शंआं अष्टाणां दीर्घः श्यनि

IAST śamām aṣṭānāṃ dīrghaḥ śyani

प्रकार विधि

सार शम्-आदि आठ धातुओं के उपधा-स्वर का श्यन् परे दीर्घ होता है।

7.3.75
ष्ठिवुक्लमिआचंआं श्- इति

IAST ṣṭhivuklamyācamāṃ śiti

प्रकार विधि

सार ष्ठिवु, क्लम् तथा आचम् धातुओं के उपधा का शित् प्रत्यय परे दीर्घ होता है।

7.3.76
क्रमः परस्मपदेषु

IAST kramaḥ parasmaipadeṣu

प्रकार विधि

सार क्रम्-धातु की लघु उपधा का दीर्घ परस्मैपद-शित्-प्रत्यय के परे होता है (क्रामति)।

7.3.77
इषुगमियंआं छः

IAST iṣugamiyamāṃ chaḥ

प्रकार विधि

सार इष्, गम् और यम् के अन्त्य वर्ण के स्थान पर छ् शित्-प्रत्यय के परे आदेश होता है (इच्छति, गच्छति, यच्छति)।

7.3.78
पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृशि अर्तिसर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्थमनयच्छपश्यऋच्छधौशीयसीदाः

IAST pāghrādhmāsthāmnādāṇdṛśyartisartiśadasadāṃ pibajighradhamatiṣṭhamanayacchapaśyarcchadhauśīyasīdāḥ

प्रकार विधि

सार पा, घ्रा, ध्मा, स्था, म्ना, दाण्, दृश्, ऋ, सृ, शद्, सद् के स्थान पर क्रमशः पिब्, जिघ्र, धम्, तिष्ठ, मन्, यच्छ, पश्य, ऋच्छ, धौ, शीय, सीद् शित्-प्रत्यय के परे आदेश होते हैं।

7.3.79
ज्ञाजनोर्जा

IAST jñājanor jā

प्रकार विधि

सार ज्ञा और जन् के स्थान पर जा शित्-प्रत्यय के परे आदेश होता है (जानाति, जायते)।

7.3.80
पूआदीणां ह्रस्वः

IAST pūādīnāṃ hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार पू आदि (क्र्यादि) धातुओं के इक् का ह्रस्व श्नादि-प्रत्यय के परे होता है (पुनाति)।

7.3.81
मीनातेर्निगमे

IAST mīnāter nigame

प्रकार नियम

सार मीनाति-रूप वाली मी की उपधा/स्वर का ह्रस्व केवल निगम (छन्दस्/वेद) में होता है।

7.3.82
मिदेर्गुणः

IAST mider guṇaḥ

प्रकार विधि

सार मिद्-धातु की उपधा का गुण (श्यनादि-प्रत्यय के परे) होता है (मेद्यति)।

7.3.83
जुसि च

IAST jusi ca

प्रकार विधि

सार जुस्-प्रत्यय के परे भी (पूर्व-सूत्रों का गुण/सम्बद्ध कार्य) होता है।

7.3.84
सार्वधातुकार्धधातुकयोः

IAST sārvadhātukārdhadhātukayoḥ

प्रकार विधि

सार अङ्ग के अन्त्य इक् का गुण सार्वधातुक और आर्धधातुक प्रत्यय के परे होता है।

7.3.85
जाग्रः अविचिण्- णल्- ङ्- इत्सु

IAST jāgro 'viciṇṇalaṅitsu

प्रकार नियम

सार जागृ के इक् का गुण अच्-आदि प्रत्यय में केवल णित्, णल् और ङित् प्रत्ययों के परे ही होता है (व्याख्या-भेद)।

7.3.86
पुक् अन्तलघु उपधस्य च

IAST pugantalaghūpadhasya ca

प्रकार विधि

सार पुक्-अन्त अङ्ग की तथा लघु-उपध अङ्ग की उपधा/इक् का भी गुण (सार्वधातुक-आर्धधातुक में) होता है।

7.3.87
न अभ्यस्तस्य अचि पिति सार्वधातुके

IAST nābhyastasyāci piti sārvadhātuke

प्रकार नियम

सार अभ्यस्त अङ्ग की लघु उपधा का गुण अच्-आदि पित्-सार्वधातुक के परे नहीं होता।

7.3.88
भूसुवोः तिङि

IAST bhūsuvor tiṅi

प्रकार नियम

सार भू और सू के इक् का गुण तिङ्-प्रत्यय के परे नहीं होता।

7.3.89
उतः वृद्धिर्लुकि हलि

IAST uto vṛddhir luki hali

प्रकार विधि

सार उकारान्त अङ्ग की वृद्धि लुक् से लुप्त प्रत्यय के परे हल् के योग में होती है।

7.3.90
ऊर्णोतेर्विभाषा

IAST ūrṇoter vibhāṣā

प्रकार विधि

सार ऊर्णु-धातु में (उक्त वृद्धि) विकल्प से होती है।

7.3.91
गुणः अपृक्ते

IAST guṇo 'pṛkte

प्रकार विधि

सार अपृक्त (एकवर्ण) प्रत्यय के परे वृद्धि के स्थान पर गुण होता है।

7.3.92
तृणहः इं

IAST tṛṇaha iṃ

प्रकार विधि

सार तृह् (तृणह्-रूप) को इम्-आगम (उक्त प्रत्यय-योग में) होता है।

7.3.93
ब्रुवः ईट्

IAST bruva īṭ

प्रकार विधि

सार ब्रू-धातु को ईट्-आगम (सार्वधातुकादि हलादि-प्रत्यय के परे) होता है (ब्रवीति)।

7.3.94
यङः वा

IAST yaṅo vā

प्रकार विधि

सार यङ्-प्रत्ययान्त अङ्ग को ईट् विकल्प से होता है।

7.3.95
तुरुस्तुशमि अमः सार्वधातुके

IAST turustuśamyamaḥ sārvadhātuke

प्रकार विधि

सार तृ, उस्, तु, श और अम् — इन सार्वधातुक प्रत्ययों के परे (लघूपध हलादि अङ्ग को) ईट् होता है।

7.3.96
अस्तिसिचः अपृक्ते

IAST astisico 'pṛkte

प्रकार विधि

सार अस् और सिच् को अपृक्त प्रत्यय के परे ईट् होता है।

7.3.97
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में (ईट् आदि उक्त आगम/कार्य) बहुल अर्थात् अनियमित-विस्तृत रूप से होते हैं।

7.3.98
रुदः च पञ्चभ्यः

IAST rudaś ca pañcabhyaḥ

प्रकार विधि

सार रुद् आदि पाँच धातुओं (रुद्, स्वप्, श्वस्, अन्, जक्ष्) को भी (हलादि सार्वधातुक के परे) ईट् होता है।

7.3.99
अट् गार्ग्यगालवयोः

IAST aḍ gārgyagālavayoḥ

प्रकार विधि

सार गार्ग्य और गालव के मत में (उक्त स्थलों पर ईट् के स्थान पर) अट्-आगम होता है।

7.3.100
अदः सर्वेषां

IAST adaḥ sarveṣām

प्रकार विधि

सार अद्-धातु को सभी आचार्यों के मत में (उक्त योग में) अट् होता है।

7.3.101
अतः दीर्घः यञि

IAST ato dīrgho yañi

प्रकार विधि

सार अकारान्त अङ्ग के अकार का यञ्-आदि प्रत्यय परे दीर्घ आदेश होता है।

7.3.102
सुपि च

IAST supi ca

प्रकार विधि

सार सुप्-प्रत्यय परे भी अकारान्त अङ्ग के अकार का दीर्घ होता है (यथा रामाभ्याम्, रामाभिः)।

7.3.103
बहुवचने झलि एत्

IAST bahuvacane jhaly et

प्रकार विधि

सार बहुवचन के झल्-आदि सुप् परे अकारान्त अङ्ग के अकार का एत्व होता है (यथा वृक्षेभ्यः, वृक्षेषु)।

7.3.104
ओसि च

IAST osi ca

प्रकार विधि

सार ओस् (षष्ठी-सप्तमी द्विवचन) परे भी अकारान्त अङ्ग के अकार का एत्व होता है (यथा वृक्षयोः)।

7.3.105
आङि च आपः

IAST āṅi cāpaḥ

प्रकार विधि

सार आप्-प्रत्ययान्त (आकारान्त स्त्री) अङ्ग के आकार का आङ् परे एत्व होता है।

7.3.106
सम्बुद्धौ च

IAST sambuddhau ca

प्रकार विधि

सार सम्बुद्धि में भी आप्-अन्त अङ्ग के आकार का एत्व होता है (यथा हे रमे)।

7.3.107
अम्बा अर्थनद्योर्ह्रस्वः

IAST ambārthanadyor hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार सम्बुद्धि में अम्बा-अर्थक और नदीसंज्ञक शब्दों के अन्त्य स्वर का ह्रस्व होता है (यथा हे अम्ब, हे गौरि)।

7.3.108
ह्रस्वस्य गुणः

IAST hrasvasya guṇaḥ

प्रकार विधि

सार सम्बुद्धि में ह्रस्व इकार/उकार-अन्त अङ्ग के अन्त्य का गुण होता है (यथा हे कवे, हे विष्णो)।

7.3.109
जसि च

IAST jasi ca

प्रकार विधि

सार जस् (प्रथमा बहुवचन) परे भी ह्रस्व इ/उ-अन्त अङ्ग के अन्त्य का गुण होता है (यथा कवयः, विष्णवः)।

7.3.110
ऋतः ङिसर्वनामस्थानयोः

IAST ṛto ṅisarvanāmasthānayoḥ

प्रकार विधि

सार ऋकारान्त अङ्ग के ऋ का ङि और सर्वनामस्थान परे गुण होता है (यथा कर्तरि, कर्तारः)।

7.3.111
घेर्ङ्- इति

IAST gher ṅiti

प्रकार विधि

सार घि-संज्ञक अङ्ग के इ/उ का ङित्-प्रत्यय परे गुण होता है (यथा अग्नये, वायवे)।

7.3.112
आट् नद्याः

IAST āṇ nadyāḥ

प्रकार विधि

सार नदीसंज्ञक अङ्ग से परे ङित्-प्रत्यय में आट्-आगम होता है (यथा नद्यै, नद्याः)।

7.3.113
याट् आपः

IAST yāḍ āpaḥ

प्रकार विधि

सार आप्-प्रत्ययान्त अङ्ग से परे ङित्-प्रत्यय में याट्-आगम होता है (यथा रमायै, रमायाः)।

7.3.114
सर्वनाम्नः स्याट् ह्रस्वः ह् च

IAST sarvanāmnaḥ syāḍ dhrasvaś ca

प्रकार विधि

सार सर्वनाम से परे ङित् में स्याट्-आगम तथा अङ्ग का ह्रस्व होता है (यथा सर्वस्यै, सर्वस्याः)।

7.3.115
विभाषा द्वितीयातृ- ईयाह्यां

IAST vibhāṣā dvitīyātṛtīyābhyām

प्रकार विधि

सार द्वितीया और तृतीया में सर्वनाम-विषयक स्याट्-आगम आदि वैकल्पिक होते हैं।

7.3.116
ङेरां नदी आप् नीभ्यः

IAST ṅer ām nadyāmnībhyaḥ

प्रकार विधि

सार नदी, आप् और नी परे ङे (चतुर्थी एकवचन) का आम् आदेश होता है।

7.3.117
इत् उत् भ्यां

IAST idudbhyām

प्रकार विधि

सार इकारान्त और उकारान्त अङ्ग से परे (परवर्ती ङे/ङि-आदेशों का) अधिकार/प्रसङ्ग लगता है।

7.3.118
औत्

IAST aut

प्रकार विधि

सार इ/उ-अन्त परे ङि का औत् (औ) आदेश होता है (यथा अग्नौ, वायौ)।

7.3.119
अत् च घेः

IAST ac ca gheḥ

प्रकार विधि

सार घि-संज्ञक अङ्ग से परे ङे का अत् (अ) आदेश भी होता है (गुण-सहकृत रूप: अग्नये)।

7.3.120
आङः ना अस्त्रियां

IAST āṅo nāstriyām

प्रकार विधि

सार अकारान्त अस्त्रीलिङ्गेतर अङ्ग (आङ्) से परे टा का ना आदेश होता है (यथा रामेण)।

अध्याय 7 · पाद 4 (97 सूत्र)

7.4.1
णौ चङि उपधायाः ह्रस्वः

IAST ṇau caṅi upadhāyāḥ hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार णिच् के परे चङ् होने पर अङ्ग की उपधा का ह्रस्व होता है।

7.4.2
न अच् लोपि(न्)शासु ऋत् इतां

IAST na ac-lopi-śāsu ṛt-itām

प्रकार नियम

सार अच्-लोप वाले धातुओं, शास् तथा ऋत्-इत् (ऋकारान्त इत्) धातुओं में वह उपधा-ह्रस्व नहीं होता।

7.4.3
भ्राजभासभाषदीपजीवमीलपीडां अन्यारयाम्

IAST bhrāja-bhāsa-bhāṣa-dīpa-jīva-mīla-pīḍām anyatarasyām

प्रकार विधि

सार भ्राज्, भास, भाष्, दीप्, जीव्, मील् और पीड् में णि-चङ् पर उपधा-ह्रस्व वैकल्पिक है।

7.4.4
लोपः पिबतेरीत् च अभ्यासस्य

IAST lopaḥ pibater īt ca abhyāsasya

प्रकार विधि

सार पिबति (पा) के अभ्यास का लोप होता है और ईत् (ई) का आदेश भी होता है।

7.4.5
तिष्ठतेरित्

IAST tiṣṭhater it

प्रकार विधि

सार तिष्ठति (स्था) के अभ्यास में इत् (इ) का आदेश होता है।

7.4.6
जिघ्रतेर्वा

IAST jighrater vā

प्रकार विधि

सार जिघ्रति (घ्रा) के अभ्यास में वह इत्-आदेश वैकल्पिक है।

7.4.7
उरृत्

IAST ur ṛt

प्रकार विधि

सार ऋ (उर्) के स्थान पर अभ्यास में ऋत् का आदेश होता है।

7.4.8
नित्यं छन्दसि

IAST nityaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में वह ऋत्-आदेश नित्य होता है।

7.4.9
दयतेर्दिगि लिटि

IAST dayater digi liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में दयति (दय्) के स्थान पर दिगि आदेश होता है।

7.4.10
ऋतः च संयोग आदेर्गुणः

IAST ṛtaḥ ca saṃyoga-āder guṇaḥ

प्रकार विधि

सार संयोग से आदि वाले ऋकारान्त धातु में (उक्त अभ्यास-स्थिति में) गुण होता है।

7.4.11
ऋच्छति ऋ ॠतां

IAST ṛcchati ṛ ṝtām

प्रकार विधि

सार ऋच्छति तथा ऋकारान्त-ॠकारान्त धातुओं में (उक्त स्थिति में) गुण होता है।

7.4.12
शॄदॄपॄआं ह्रस्वः वा

IAST śṝ-dṝ-pṝṇām hrasvaḥ vā

प्रकार विधि

सार शॄ, दॄ और पॄ धातुओं में (उक्त स्थिति में) ह्रस्व वैकल्पिक है।

7.4.13
के अणः

IAST ke aṇaḥ

प्रकार विधि

सार क परे होने पर अण्-प्रत्ययान्त अङ्ग के अकार का दीर्घ होता है।

7.4.14
न कपि

IAST na kapi

प्रकार नियम

सार कप् परे होने पर वह अण्-सम्बन्धी दीर्घ नहीं होता।

7.4.15
आपः अन्यतरस्यां

IAST āpaḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार आप् (अप्) में क परे वह दीर्घ वैकल्पिक है।

7.4.16
ऋदृशः अङि गुणः

IAST ṛ-dṛśaḥ aṅi guṇaḥ

प्रकार विधि

सार अङ् परे होने पर ऋ और दृश् धातु में गुण होता है।

7.4.17
अस्यतेः थुक्

IAST asyateḥ thuk

प्रकार विधि

सार अस्यति (असुक्ष्/अस्—फेंकना) में (अङ् पर) थुक् का आगम होता है।

7.4.18
श्वयतेरः

IAST śvayater aḥ

प्रकार विधि

सार श्वयति (श्वि) में (अङ् पर) अकार का आदेश होता है।

7.4.19
पतः पुं

IAST pataḥ pum

प्रकार विधि

सार पत् धातु में (अङ् पर) पुम् का आगम होता है।

7.4.20
वचः उं

IAST vacaḥ um

प्रकार विधि

सार वच् धातु में (अङ् पर) उम् का आगम होता है।

7.4.21
शीङः सार्वध्दातुके गुणः

IAST śīṅaḥ sārvadhātuke guṇaḥ

प्रकार विधि

सार सार्वधातुक परे होने पर शीङ् धातु में गुण होता है।

7.4.22
अयङ् यि क्- ङ्- इति

IAST ayaṅ yi k-ṅ-iti

प्रकार विधि

सार क्-इत् या ङ्-इत् वाले य-प्रत्यय परे होने पर अयङ् का आदेश होता है।

7.4.23
उपसर्गात् ह्रस्वः ऊहतेः

IAST upasargāt hrasvaḥ ūhateḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग से परे ऊह् धातु का ह्रस्व होता है।

7.4.24
एतेर्लिङि

IAST eter liṅi

प्रकार विधि

सार लिङ् में एति (इण्) का (उपसर्ग-सहित) ह्रस्व होता है।

7.4.25
अकृत्सार्वधातुकयोः दीर्घः

IAST a-kṛt-sārvadhātukayoḥ dīrghaḥ

प्रकार विधि

सार कृत् और सार्वधातुक से भिन्न प्रत्यय परे होने पर (एति/इण् आदि अङ्ग का) दीर्घ होता है।

7.4.26
च्व् औ च

IAST cvau ca

प्रकार विधि

सार अकृत्-असार्वधातुक के दीर्घ-विधान (७.४.२५) का च्वि-प्रत्यय परे होने पर भी विस्तार है।

7.4.27
रीङ् ऋतः

IAST rīṅ ṛtaḥ

प्रकार विधि

सार अकृत्-असार्वधातुक परे धातु के ऋकार को रीङ् आदेश होता है।

7.4.28
रिङ् श्सयक्लिङ्क्षु

IAST riṅ śsayakkliṅkṣu

प्रकार विधि

सार श्, सन्, यक् और क्लिङ् के परे ऋ के स्थान पर रिङ् आदेश होता है।

7.4.29
गुणः अर्तिसंयोगआद्योः

IAST guṇaḥ artisaṃyogaādyoḥ

प्रकार विधि

सार अर्ति (√ऋ) तथा संयोगादि अङ्ग को पूर्वोक्त (श्-सन्-यक्-क्लिङ्) प्रकरण में गुण होता है।

7.4.30
यङि च

IAST yaṅi ca

प्रकार विधि

सार यङ् के परे भी अर्ति तथा संयोगादि अङ्ग को गुण होता है।

7.4.31
ई घ्राध्मोः

IAST ī ghrādhmoḥ

प्रकार विधि

सार घ्रा और ध्मा धातुओं के अकार को (उक्त अकृत्-असार्वधातुक परे) ईकार आदेश होता है।

7.4.32
अस्य च्वौ

IAST asya cvau

प्रकार विधि

सार च्वि के परे अङ्ग के अकार के स्थान पर ई आदेश होता है।

7.4.33
खचि च

IAST khaci ca

प्रकार विधि

सार खच्-प्रत्यय के परे भी अङ्ग के अकार के स्थान पर ई आदेश होता है।

7.4.34
अशनाय उदन्यध्दनायाः बुभ्क्षापिपासागर्धेषु

IAST aśanāya udanyadhanāyāḥ bubhukṣāpipāsāgardheṣu

प्रकार विधि

सार बुभुक्षा, पिपासा और गर्ध अर्थों में क्रमशः अशनाय, उदन्य और धनाय रूप निपातन से सिद्ध होते हैं।

7.4.35
न छन्दसि अपुत्रस्य

IAST na chandasi aputrasya

प्रकार नियम

सार छन्दस् में पुत्र-भिन्न अङ्ग को पूर्व-विधान (च्वि-परक ई) का प्रतिषेध है।

7.4.36
दुरस्युर्द्रविणस्युर्वृषण्यतिरिषण्यति

IAST durasyur draviṇasyur vṛṣaṇyati riṣaṇyati

प्रकार विधि

सार दुरस्युः, द्रविणस्युः, वृषण्यति और रिषण्यति — ये रूप निपातन से सिद्ध हैं।

7.4.37
अश्व अघस्य आत्

IAST aśva aghasya āt

प्रकार विधि

सार अश्व और अघ के अन्त्य अकार के स्थान पर (च्वि-प्रकरण में) आत् आदेश होता है।

7.4.38
देवसुम्नयोर्यजुषि काठके

IAST devasumnayoryajuṣi kāṭhake

प्रकार विधि

सार काठक-यजुर्वेद में ‘देव’ और ‘सुम्न’ के परे युक् का आगम होता है।

7.4.39
कवि अध्वरपृतनस्य ऋचि लोपः

IAST kavi adhvarapṛtanasyarṛci lopaḥ

प्रकार विधि

सार ऋचा में ‘कवि’, ‘अध्वर’ और ‘पृतन’ के अन्त्य स्वर का लोप होता है।

7.4.40
द्यतिस्यतिमास्थां इत् ति किति

IAST dyatisyatimāsthāṃ it ti kiti

प्रकार विधि

सार द्यति, स्यति, मा और स्था धातुओं के अन्त्य का इ-आदेश तकारादि कित् प्रत्यय के परे होता है।

7.4.41
शाछोरन्यतरस्यां

IAST śāchoranyatarasyām

प्रकार विधि

सार शा और छो धातुओं के अन्त्य का वैकल्पिक इ-आदेश तकारादि कित् के परे होता है।

7.4.42
दधातेर्हिः

IAST dadhāterhiḥ

प्रकार विधि

सार धा धातु का हि-आदेश तकारादि कित् प्रत्यय के परे होता है (जैसे हित)।

7.4.43
जहातेश्च क्त्वि

IAST jahāteśca ktvi

प्रकार विधि

सार हा धातु का भी हि-आदेश क्त्वा के परे होता है (हित्वा)।

7.4.44
विभाषा छन्दसि

IAST vibhāṣā chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में हा धातु का हि-आदेश वैकल्पिक होता है।

7.4.45
सुधितवसुधितनेमधितधिष्वधिषीय च

IAST sudhitavasudhitanemadhitadhiṣvadhiṣīya ca

प्रकार विधि

सार सुधित, वसुधित, नेमधित, धिष्व और धिषीय — ये रूप निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

7.4.46
दः दद् घोः

IAST daḥ dad ghoḥ

प्रकार विधि

सार घु-संज्ञक धातु (दा, धा) का दद्-आदेश होता है (त-परक प्रयोगों में; जैसे दत्त)।

7.4.47
अचः उपसर्गात् तः

IAST acaḥ upasargāt taḥ

प्रकार विधि

सार अच्-अन्त उपसर्ग के परे घु (दद्) का त्-आदेश होता है (जैसे प्रत्त)।

7.4.48
अपः भि

IAST apo bhi

प्रकार विधि

सार अप उपसर्ग से परे (कित् परे) घु को भि आदेश होता है।

7.4.49
सः सि आर्धधातुके

IAST saḥ si ārdhadhātuke

प्रकार विधि

सार स-आदि आर्धधातुक परे अङ्ग के अन्त्य को सकार आदेश होता है।

7.4.50
तासस्त्योर्लोपः

IAST tāsastyor lopaḥ

प्रकार विधि

सार तास् (लुट्) तथा अस् (अस्तेः) का लोप होता है।

7.4.51
रि च

IAST ri ca

प्रकार विधि

सार सनि तथा कित् प्रत्यय परे होने पर धातु के अकार के स्थान में रि भी आदेश होता है।

7.4.52
ह एति

IAST ha eti

प्रकार विधि

सार उसी प्रसंग में एति (√इ / ए-परक) परे धातु के अकार के स्थान में ह आदेश होता है।

7.4.53
यि इवर्णयोर्दीधीवेव्योः

IAST yi ivarṇayor dīdhīvevyoḥ

प्रकार विधि

सार यि परे दीधी तथा वेवी धातुओं के दोनों इवर्णों का नियत आदेश होता है (दीध्यते, वेव्यते की सिद्धि में)।

7.4.54
सनि मीमा- घुरभलभशकपतपदां अचः इः

IAST sani mīmā-ghura-bhala-bha-śaka-pata-padām acaḥ iḥ

प्रकार विधि

सार सनि परे मीमा, घुर, भल, भ, शक, पत और पद धातुओं के अच् के स्थान में इ आदेश होता है।

7.4.55
आप्- ज्ञपि ऋधां ईत्

IAST āp-jñapi-ṛdhām īt

प्रकार विधि

सार सनि परे आप्, ज्ञप् और ऋध् धातुओं के स्थान में ईत् (दीर्घ ई) आदेश होता है।

7.4.56
दम्भः इत् च

IAST dambhaḥ it ca

प्रकार विधि

सार सनि परे दम्भ् धातु के स्थान में इ आदेश होता है, तथा च से पूर्व-विधान का अनुवृत्ति-संयोग भी रहता है (दिप्सति)।

7.4.57
मुचः अकर्मकस्य गुणः वा

IAST mucaḥ akarmakasya guṇaḥ vā

प्रकार विधि

सार अकर्मक मुच् धातु के सनि-प्रसंग में गुण वैकल्पिक होता है।

7.4.58
अत्र लोपः अभ्यासस्य

IAST atra lopaḥ abhyāsasya

प्रकार अधिकार

सार यहाँ से अभ्यास के कार्य का अधिकार है; तथा (पूर्वोक्त प्रसंग में) अभ्यास का लोप भी विहित होता है।

7.4.59
ह्रस्वः

IAST hrasvaḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यास का स्वर ह्रस्व होता है।

7.4.60
हलादिः शेषः

IAST halādiḥ śeṣaḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यास में आदि हल् शेष रहता है, शेष वर्ण लुप्त होते हैं।

7.4.61
शर्पूर्वाः खयः

IAST śarpūrvāḥ khayaḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यास में शर् के बाद आने वाले खय् वर्ण शेष रहते हैं (शर् का लोप; यथा स्था → तस्थौ)।

7.4.62
कुहोः चुः

IAST kuhoḥ cuḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यास में कु (कवर्ग) और ह के स्थान में चु (चवर्ग) आदेश होता है (कृ → चकार, गम् → जगाम)।

7.4.63
न कवतेर्यङि

IAST na kavater yaṅi

प्रकार नियम

सार यङि परे कवतेः (√कु) के अभ्यास में यह चुत्व नहीं होता।

7.4.64
कृषेश् छन्दसि

IAST kṛṣeḥ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में कृष् धातु के अभ्यास में चुत्व (वैदिक रूप-सिद्धि) होता है।

7.4.65
दाधर्तिदर्धर्तिदर्धर्षिबोभूतुतेतिक्ते अलर्षिआपणीफणत्संसनिष्यदत्करिक्रत्कनिक्रदत्भरिभ्रत्दविध्वतः दविद्युतत्तरित्रतः सरीसृपतम्वरीवृजत्मर्मृज्य आगनीगन्ति इति च

IAST dādharti-dardharti-dardharṣi-bobhūtu-tetikte-alarṣi-āpaṇīphaṇat-saṃsaniṣyadat-karikrat-kanikradat-bharibhrat-davidhvataḥ-davidyutat-taritrataḥ-sarīsṛpatam-varīvṛjat-marmṛjya-āganīganti iti ca

प्रकार विधि

सार दाधर्ति, दर्धर्ति, बोभूतु इत्यादि इन वैदिक अभ्यास-रूपों का निपातन है।

7.4.66
उरत्

IAST ur at

प्रकार विधि

सार अभ्यास में ऋ (उः) के स्थान में अत् (अकार) आदेश होता है।

7.4.67
द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणं

IAST dyuti-svāpyoḥ samprasāraṇam

प्रकार विधि

सार द्युत् तथा स्वाप् (स्वप्) धातुओं के अभ्यास में सम्प्रसारण होता है।

7.4.68
व्यथः लिटि

IAST vyathaḥ liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में व्यथ् धातु के अभ्यास में सम्प्रसारण होता है।

7.4.69
दीर्घः इणः किति

IAST dīrghaḥ iṇaḥ kiti

प्रकार विधि

सार कित् परे इण् (√इ) के अभ्यास का स्वर दीर्घ होता है (ईयतुः, ईयुः)।

7.4.70
अतः आदेः

IAST ataḥ ādeḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यास के आदि अकार के स्थान में आ आदेश होता है (अजादि धातुओं के लिट् में)।

7.4.71
तस्मात् नुट् द्विहलः

IAST tasmāt nuṭ dvihalaḥ

प्रकार विधि

सार उस आ के बाद द्विहल् धातु में नुट् आगम होता है (आनञ्ज, आनर्ध)।

7.4.72
अश्नोतेः च

IAST aśnoteḥ ca

प्रकार विधि

सार अश्नोतेः (√अश्) में भी वही नुट् आगम होता है (आनश)।

7.4.73
भवतेरः

IAST bhavateḥ aḥ

प्रकार विधि

सार भवतेः (√भू) के अभ्यास में अकार आदेश होता है (बभूव)।

7.4.74
ससूव इति निगमे

IAST sasūva iti nigame

प्रकार विधि

सार निगम (वेद) में ससूव रूप का निपातन है।

7.4.75
निजां त्रया- णां गुणः श्लौ

IAST nijāṃ trayāṇāṃ guṇaḥ ślau

प्रकार विधि

सार श्लु परे निज् आदि तीन धातुओं (निज्, विज्, विष्) में गुण होता है (नेनेक्ति, वेवेक्ति, वेवेष्टि)।

7.4.76
भृञां इत्

IAST bhṛñām it

प्रकार विधि

सार भृञ्-गण के धातुओं के अभ्यास-स्वर के स्थान पर इकार आदेश होता है।

7.4.77
अर्तिपिपर्त्योश्च

IAST artipipartyoś ca

प्रकार विधि

सार अर्ति (ऋ) और पिपर्ति (पॄ) के अभ्यास में भी इकार आदेश होता है।

7.4.78
बहुलं छन्दसि

IAST bahulaṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अभ्यास-इकार का विधान बहुल (विविध/अप्रायिक) होता है।

7.4.79
सनि अतः

IAST sani ataḥ

प्रकार विधि

सार सन् परे होने पर अभ्यास के अकार के स्थान पर इकार होता है।

7.4.80
ओः पुयण् जि अपरे

IAST oḥ puyaṇjy apare

प्रकार विधि

सार उ/ऊ-ध्वनि वाले अभ्यास को इकार मिलता है जब प-वर्ग, य, ण् परे हों अथवा जि-शेष हो।

7.4.81
स्रवतिशृ- णोतिद्रवतिप्रवतिप्लवतिच्यवतीणां वा

IAST sravatiśṛṇotidravati pravati plavati cyavatīnāṃ vā

प्रकार विधि

सार स्रु, शृ, द्रु, प्रु, प्लु और च्यु धातुओं में अभ्यास-इकार वैकल्पिक है।

7.4.82
गुणः यङ्लुकोः

IAST guṇo yaṅlukoḥ

प्रकार विधि

सार यङ् और यङ्लुक् में अभ्यास-स्वर का गुण होता है।

7.4.83
दीर्घः अकितः

IAST dīrgho 'kitaḥ

प्रकार विधि

सार अकित् (क्-इत् रहित) होने पर अभ्यास-स्वर का दीर्घ होता है।

7.4.84
नीक् वञ्चुस्रन्सुध्वन्सुभ्रन्शुकसपतपदस्कन्दां

IAST nīg vañcusransudhvaṃsubhraṃśukasa pata pada skandām

प्रकार विधि

सार वञ्चु, स्रंसु, ध्वंसु, भ्रंशु, कस, पत, पद और स्कन्द् के अभ्यास में नीक् आगम होता है।

7.4.85
नुक् अतः अनुनासिक न्तस्य

IAST nug ato 'nunāsikāntasya

प्रकार विधि

सार अकार वाले अनुनासिकान्त धातु के अभ्यास में नुक् आगम होता है।

7.4.86
जपजभदहदशभञ्जपश्सां च

IAST japajabhadahadaśabhañjapaśāṃ ca

प्रकार विधि

सार जप्, जभ्, दह्, दश्, भञ्ज् और पश् के अभ्यास में भी नुक् होता है।

7.4.87
चरफलोः च

IAST caraphaloś ca

प्रकार विधि

सार चर् और फल् के अभ्यास में भी नुक् होता है।

7.4.88
उत् परस्य अतः

IAST ut parasyataḥ

प्रकार विधि

सार अभ्यास के परवर्ती अंश (पर) के अकार के स्थान पर उकार आदेश होता है।

7.4.89
ति च

IAST ti ca

प्रकार विधि

सार ति के अकार के स्थान पर भी उकार आदेश होता है।

7.4.90
रीक् ऋत् उपधस्य च

IAST rīk ṛt upadhasya ca

प्रकार विधि

सार ऋत्-अन्त धातु तथा उपधा-ऋ में रीक् आगम होता है।

7.4.91
रुक् रिकौ च लुकि

IAST ruk rikau ca luki

प्रकार विधि

सार यङ्लुक् में रुक् और रिक् आगम भी होते हैं।

7.4.92
ऋतः च

IAST ṛtaś ca

प्रकार विधि

सार ऋत्-अन्त में भी रुक्/रिक् का विधान लागू होता है।

7.4.93
सन्वत् लघुनि चङ्परे अनच् लोपे

IAST sanvat laghuni caṅpare 'nac lope

प्रकार अतिदेश

सार चङ् परे, लघु स्वर पर तथा अनच्-लोप के अभाव में अभ्यास सन्वत् (सन्-सदृश) व्यवहार पाता है।

7.4.94
दीर्घः लघोः

IAST dīrgho laghoḥ

प्रकार विधि

सार लघु अभ्यास-स्वर का दीर्घ होता है।

7.4.95
अत् स्मृद् ऋलपॄत्वरप्रथम्रदस्त् ऋलपॄस्पशां

IAST at smṛdṛdapṛtvaraprathamradastṛspaśām

प्रकार विधि

सार स्मृ, दृ, द, पॄ, त्वर्, प्रथ, म्रद्, अस्, तॄ और स्पश् के अभ्यास में अकार आदेश होता है।

7.4.96
विभाषा वेष्टिचेष्ट्योः

IAST vibhāṣā veṣṭiceṣṭyoḥ

प्रकार विधि

सार वेष्ट् और चेष्ट् में यह अकार-आदेश वैकल्पिक है।

7.4.97
ई च गणः

IAST ī ca gaṇaḥ

प्रकार विधि

सार गण् धातु के अभ्यास में ईकार भी होता है।

अध्याय 8 · पाद 1 (74 सूत्र)

8.1.1
सर्वस्य द्वे

IAST sarvasya dve

प्रकार अधिकार

सार आगामी द्वित्व-विधिओं में सम्पूर्ण पद (सर्व) के दो रूप होते हैं — यह द्वित्व-अधिकार है।

8.1.2
तस्य परं आम्रेडितम्

IAST tasya paraṃ āmreḍitam

प्रकार सञ्ज्ञा

सार द्वित्व में जो उत्तर (दूसरा) रूप है, उसकी सञ्ज्ञा आम्रेडित है।

8.1.3
अनुदत्ता- ं च

IAST anudāttaṃ ca

प्रकार विधि

सार आम्रेडित सर्वथा अनुदात्त होता है।

8.1.4
नित्यवीप्सयोः

IAST nityavīpsayoḥ

प्रकार विधि

सार नित्य (पुनः-पुनः/लगातार) और वीप्सा (प्रत्येक में व्याप्ति) अर्थ में द्वित्व होता है।

8.1.5
परेर्वर्जने

IAST parervarjane

प्रकार विधि

सार परि का द्वित्व वर्जन (अपवाद/छोड़कर) अर्थ में होता है।

8.1.6
प्रसम् उप उदः पादपूरणे

IAST prasamupaudaḥ pādapūraṇe

प्रकार विधि

सार प्र, सम्, उप और उद् का द्वित्व पादपूरण (छन्दः-पूर्ति) में होता है।

8.1.7
उपरिअधिअधसः सांईप्ये

IAST uparyadhyadhasaḥ sāmīpye

प्रकार विधि

सार उपरि, अधि और अधस् का द्वित्व सामीप्य (निकटता) अर्थ में होता है।

8.1.8
वाक्य आदेरामन्त्रितस्य असूयासम्मतिकोपकुत्सनभर्त्सनेषु

IAST vākyāder āmantritasya asūyāsammatikopakutsanabhartsaneṣu

प्रकार विधि

सार वाक्यादि आमन्त्रित का द्वित्व असूया, सम्मति, कोप, कुत्सन और भर्त्सन अर्थों में होता है।

8.1.9
एकं बहुव्रीहिवत्

IAST ekaṃ bahuvrīhivat

प्रकार अतिदेश

सार द्वित्व-युगल एकवत् व्यवहार पाता है — बहुव्रीहि की तरह।

8.1.10
आबाधे च

IAST ābādhe ca

प्रकार विधि

सार आबाध (पीड़ा/बाधा) अर्थ में भी (आमन्त्रितादि का) द्वित्व होता है।

8.1.11
कर्मधारयवत् उत्तरेषु

IAST karmadhārayavad uttareṣu

प्रकार अतिदेश

सार आगे के द्वित्व-प्रकरण में द्वित्व-युगल कर्मधारयवत् व्यवहार पाता है।

8.1.12
प्रकारे गुणवचनस्य

IAST prakāre guṇavacanasya

प्रकार विधि

सार गुणवचन का द्वित्व प्रकार (तरह-तरह/रीति) अर्थ में होता है।

8.1.13
अकृच्छ्रे प्रियसुखयोरन्यतरस्यां

IAST akṛcchre priyasukhayor anyatarasyām

प्रकार विधि

सार अकृच्छ्र (बिना कष्ट के) अर्थ में प्रिय और सुख का द्वित्व वैकल्पिक है।

8.1.14
यथास्वे यथायथं

IAST yathāsve yathāyatham

प्रकार विधि

सार यथा + स्वे के स्थाने यथायथम् रूप होता है (अपने-अपने अनुसार)।

8.1.15
द्वंद्वं रहस्यमर्यादाअचनव्युत्क्रमणयज्ञपात्ररयोग अभिव्यक्तिषु

IAST dvandvaṃ rahasyamaryādāvacanavyutkramanayajñapātraprayogābhivyaktiṣu

प्रकार विधि

सार द्वन्द्व का द्वित्व रहस्य, मर्यादा, वचन, व्युत्क्रमण, यज्ञपात्र-प्रयोग और अभिव्यक्ति अर्थों में होता है।

8.1.16
पदस्य

IAST padasya

प्रकार अधिकार

सार आगे के स्वर-रूप विधियों का अधिकार पद पर है।

8.1.17
पदात्

IAST padāt

प्रकार अधिकार

सार आगे की विधियाँ पद के अनन्तर (पदात्) प्रवृत्त होती हैं।

8.1.18
अनुदात्तं सर्वं अपदआदौ

IAST anudāttaṃ sarvam apadādau

प्रकार विधि

सार (आगामी युष्मद्-अस्मद् आदि रूप) पद के आदि में न होने पर सर्वथा अनुदात्त होते हैं।

8.1.19
आमन्त्रितस्य च

IAST āmantritasya ca

प्रकार विधि

सार (पदात् अनन्तर) आमन्त्रित भी सर्वथा अनुदात्त होता है।

8.1.20
युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थायोर्वाम्नावौ

IAST yuṣmadasmadoḥ ṣaṣṭhīcaturthīdvitīyāsthayor vāmnāvau

प्रकार विधि

सार युष्मद्-अस्मद् की षष्ठी-चतुर्थी-द्वितीया (द्विवचन) के स्थाने वाम् और नौ होते हैं।

8.1.21
बहुवचने वस्नस्सु

IAST bahuvacane vasnasau

प्रकार विधि

सार बहुवचन में युष्मद्-अस्मद् के (उक्त विभक्ति-स्थाने) वस् और नस् होते हैं।

8.1.22
तेमयौ एकवचनस्य

IAST temayāv ekavacanasya

प्रकार विधि

सार एकवचन में युष्मद्-अस्मद् के (उक्त विभक्ति-स्थाने) ते और मे होते हैं।

8.1.23
त्वामौ द्वितीयायाः

IAST tvāmāu dvitīyāyāḥ

प्रकार विधि

सार द्वितीया एकवचन में युष्मद्-अस्मद् के स्थाने त्वा और मा होते हैं।

8.1.24
न चवाह अह एवयुक्ते

IAST na cavāhāhaivayukte

प्रकार विधि

सार च, वा, ह, अह, एव से युक्त होने पर ये (युष्मद्-अस्मद् के) आदेश नहीं होते।

8.1.25
पश्य अर्थैः च अणालोचने

IAST paśyarthaiś cāṇālocane

प्रकार विधि

सार पश्य-अर्थ (दर्शन) शब्दों के साथ, आलोचन अर्थ को छोड़कर, ये आदेश नहीं होते।

8.1.26
सपूर्वायाः प्रथमायाः विभाषा

IAST sapūrvāyāḥ prathamāyāḥ vibhāṣā

प्रकार विधि

सार पूर्वयुक्त प्रथम (तिङ्) के अनन्तर अनुदात्तत्व वैकल्पिक रूप से होता है।

8.1.27
तिङः गोत्रआदीनि कुत्सन आभीक्ष्ण्ययोः

IAST tiṅaḥ gotrādīni kutsanābhīkṣṇyayoḥ

प्रकार विधि

सार तिङ् के अनन्तर गोत्रादि शब्द कुत्सा अथवा आभीक्ष्ण्य अर्थ में अनुदात्त होते हैं।

8.1.28
तिङ् अतिङः

IAST tiṅatiṅaḥ

प्रकार विधि

सार तिङ् के अनन्तर आया तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.29
न लुट्

IAST na luṭ

प्रकार विधि

सार लुट् में पूर्व-सूत्र (तिङतिङः) का अनुदात्तत्व नहीं होता।

8.1.30
निपातैर्यद्यदिहन्तकुविद्नेद्चेद्चण्कच्चिद्यत्रयुक्तं

IAST nipātair yadyadihantakuvidnedcedcaṇkaccidyatrayuktam

प्रकार विधि

सार यदि, यदिह, नह, कुवित्, नेद्, चेद्, चण्, कच्चित्, यत्र — इन निपातों से युक्त तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.31
नह प्रत्यारम्भे

IAST naha pratyārambhe

प्रकार विधि

सार प्रत्यारम्भ अर्थ में नह-युक्त तिङ् अनुदात्त नहीं होता।

8.1.32
सत्यं प्रश्ने

IAST satyaṃ praśne

प्रकार विधि

सार प्रश्न में सत्यम् के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.33
अङ्ग अप्रातिलोम्ये

IAST aṅgāprātilomye

प्रकार विधि

सार अप्रतिलोम्य अर्थ में अङ्ग निपात के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.34
हि च

IAST hi ca

प्रकार विधि

सार हि निपात के साथ भी तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.35
छन्दसि अनेकं अपि स आकाङ्क्षम्

IAST chandasy anekam api sākāṅkṣam

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अपेक्षा-युक्त अनेक तिङ् भी अनुदात्त हो सकते हैं।

8.1.36
यावद्यथाभ्यां

IAST yāvadyathābhyām

प्रकार विधि

सार यावत् और यथा के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.37
पूजायां न अनन्तरं

IAST pūjāyāṃ nānantaram

प्रकार विधि

सार पूजा अर्थ में अनन्तर न होने पर अनुदात्त नहीं होता।

8.1.38
उपसर्गव्यपेतं च

IAST upasargavyapetaṃ ca

प्रकार विधि

सार उपसर्ग से व्यवहित होने पर भी पूर्व-सूत्र का (पूजा-विषयक) निषेध लागू होता है।

8.1.39
तुपश्यपश्यत अहैः पूजायां

IAST tupaśyapaśyatahaiḥ pūjāyām

प्रकार विधि

सार पूजा अर्थ में तु, पश्य, पश्यत, अहै के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.40
अहो च

IAST aho ca

प्रकार विधि

सार अहो के साथ भी (पूजा-सन्दर्भ में) तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.41
शेषे विभाषा

IAST śeṣe vibhāṣā

प्रकार विधि

सार शेष स्थितियों में अनुदात्तत्व वैकल्पिक है।

8.1.42
पुरा च पर्- ईप्सायां

IAST purā ca parīpsāyām

प्रकार विधि

सार परीप्सा अर्थ में पुरा के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.43
ननु इति अनु- ज्ञा एषणायां

IAST nanv ity anujñaiṣaṇāyām

प्रकार विधि

सार अनुज्ञा-एषणा अर्थ में ननु के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.44
किं क्रियाप्रश्ने अनुपसर्गं अप्रतिषिद्धम्

IAST kiṃ kriyāpraśne 'nupasargam apratiṣiddham

प्रकार विधि

सार क्रिया-प्रश्न में अनुपसर्ग और अप्रतिषिद्ध किम् के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.45
लोपे विभाषा

IAST lope vibhāṣā

प्रकार विधि

सार (किम् आदि के) लोप होने पर अनुदात्तत्व वैकल्पिक है।

8.1.46
एहिमन्ये प्रहासे लृट्

IAST ehimanye prahāse lṛṭ

प्रकार विधि

सार प्रहास अर्थ में एहि और मन्ये के साथ लृट् अनुदात्त होता है।

8.1.47
जातु अपूर्वं

IAST jātv apūrvam

प्रकार विधि

सार अपूर्व (पूर्वपद-रहित) जातु के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.48
किम्वृत्तं च चिदुत्तरं

IAST kiṃvṛttaṃ ca ciduttaram

प्रकार विधि

सार चित्-उत्तर किंवृत्त (किम्-पर्यन्त) पद के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.49
आहो उताहो च अनन्तरं

IAST āho utāho cānantaram

प्रकार विधि

सार अनन्तर आहो और उताहो के साथ तिङ् अनुदात्त होता है।

8.1.50
शेषे विभाषा

IAST śeṣe vibhāṣā

प्रकार विधि

सार शेष स्थितियों में अनुदात्तत्व वैकल्पिक है।

8.1.51
गत्यर्थलोटा लृट् न चेत् कारकं सर्व न्यत्

IAST gatyarthakarmake lṛṭ na cet kārakaṃ sarvānyat

प्रकार विधि

सार गति-अर्थक धातु का कर्म-युक्त लृट् पूर्व-सूत्रों से प्राप्त अनुदात्त नहीं होता, यदि कारक सर्वान्य (पूर्णतः अन्य) न हो।

8.1.52
लोट् च

IAST loṭ ca

प्रकार विधि

सार पूर्वोक्त गति-अर्थक कर्म-युक्त स्थिति में लोट् पर भी अनुदात्त का प्रतिषेध होता है।

8.1.53
विभाषितं स उपसर्गं अनुत्तमम्

IAST vibhāṣitaṃ sopasargam anuttamam

प्रकार विधि

सार सोपसर्ग तथा अनुत्तम (उत्तमपुरुष-भिन्न) गति-अर्थक रूप पर अनुदात्त-प्रतिषेध/प्राप्ति वैकल्पिक है।

8.1.54
हन्त च

IAST hanta ca

प्रकार विधि

सार «हन्त» के योग में भी पूर्व-विधि का विस्तार (अनुदात्त-संबंधी व्यवहार) होता है।

8.1.55
आमः एक अन्तरं आमन्त्रितम् अनन्तिके

IAST ām eka-antaram āmantritam anantike

प्रकार विधि

सार अनन्तिक (दूरस्थ) स्थिति में «आम्» से एकान्तर आमन्त्रित पर विशेष अनुदात्त/स्वर-विधि लागू होती है।

8.1.56
यद् हितुपरं छन्दसि

IAST yad dhi tu paraṃ chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में «यत्», «हि», «तु» के परवर्ती पद को नित्य अनुदात्त-संबंधी विशेष व्यवस्था मिलती है।

8.1.57
चनचिद् इवगोत्र आदितद्धित आम्रेडितेषु अगतेः

IAST cana cid iva gotra-ādi-taddhita-āmreḍiteṣv agateḥ

प्रकार विधि

सार चन, चित्, इव, गोत्र, आदि-तद्धित तथा आम्रेडित के योग में (गति-भिन्न) पूर्व-अनुदात्त-विधि का नियम है।

8.1.58
च आदिषु च

IAST cādiṣu ca

प्रकार विधि

सार च-आदि निपात-गण में भी पूर्वोक्त अनुदात्त-व्यवस्था लागू होती है।

8.1.59
चवायोगे प्रथमा

IAST cavā-yoge prathamā

प्रकार विधि

सार च अथवा वा के योग में प्रथमा (पूर्व-पद/प्रथम सदस्य) पर अनुदात्त-विधि होती है।

8.1.60
ह इति क्षियायां

IAST ha iti kṣiyāyām

प्रकार विधि

सार क्षिया (निन्दा/तिरस्कार) अर्थ में «ह» के परवर्ती पर अनुदात्त-विधि है।

8.1.61
अह इति विनियोगे च

IAST aha iti viniyoge ca

प्रकार विधि

सार विनियोग अर्थ में «अह» के योग में भी वही अनुदात्त-व्यवस्था होती है।

8.1.62
च अहलोपे एव इति अवधारणं

IAST cāhalope eve ty avadhāraṇam

प्रकार विधि

सार अह का अ-लोप होने पर तथा अवधारणार्थक «एव» के योग में अनुदात्त-विधि है।

8.1.63
च आदिलोपे विभाषा

IAST cādi-lope vibhāṣā

प्रकार विधि

सार च-आदि के लोप-युक्त प्रयोग में अनुदात्त-प्राप्ति/प्रतिषेध वैकल्पिक है।

8.1.64
वैवाव इति च छन्दसि

IAST vaivāva iti ca chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में «वै» और «वाव» के योग में भी पूर्व-अनुदात्त-विधि लागू होती है।

8.1.65
एक अन्याभ्यां समर्थाभ्यां

IAST eka-anyābhyāṃ samarthābhyām

प्रकार विधि

सार समर्थ «एक» और «अन्य» के परवर्ती पर अनुदात्त-विधि होती है।

8.1.66
यद्वृत्तात् नित्यं

IAST yad-vṛttāt nityam

प्रकार विधि

सार यद्-वृत्त (यत्-संबंधी वाक्य/वृत्ति) से परवर्ती नित्य अनुदात्त होता है।

8.1.67
पूजणात् पूजितं अनुदात्तम् (काष्ठ आदिभ्यः)

IAST pūjanāt pūjitam anudāttam (kāṣṭhādi bhyaḥ)

प्रकार विधि

सार पूजन-वाचक के परवर्ती पूजित अनुदात्त होता है (काष्ठ-आदि गण से)।

8.1.68
सगतिरपि तिङ्

IAST sagatir api tiṅ

प्रकार विधि

सार सगति तिङ् भी पूर्व-स्थितियों में अनुदात्त होता है।

8.1.69
कुत्सने च सुपि अगोत्रआदौ

IAST kutsane ca supy agotrādau

प्रकार विधि

सार कुत्सन अर्थ में सुबन्त के पर (गोत्र-आदि छोड़कर) अनुदात्त-विधि है।

8.1.70
गतिर्गतौ

IAST gatir gatau

प्रकार विधि

सार गति के परवर्ती गति अनुदात्त होती है।

8.1.71
तिङि च उदात्तवति

IAST tiṅi ca udāttavati

प्रकार विधि

सार उदात्तवत् तिङ् के परवर्ती (गति आदि) भी अनुदात्त होते हैं।

8.1.72
आमन्त्रितं पूर्वम् अविद्यआनवत्

IAST āmantritaṃ pūrvam avidyamānavat

प्रकार अतिदेश

सार आमन्त्रित को पूर्व के स्वर/अनुदात्त-कार्य के लिए अविद्यमानवत् माना जाता है।

8.1.73
न आमन्त्रिते समान धिकरणे (सामान्यवचनम्)

IAST nāmantrite samānādhikaraṇe sāmānyavacanam

प्रकार नियम

सार समानाधिकरण सामान्यवचन आमन्त्रित में पूर्व-अतिदेश (अविद्यमानवत्) का प्रतिषेध है।

8.1.74
(सामान्यवचनं) विभाषितं विशेषवचने (बहुवचने)

IAST vibhāṣitaṃ viśeṣavacane bahuvacane

प्रकार विधि

सार विशेषवचन बहुवचन आमन्त्रित में अविद्यमानवत्-भाव वैकल्पिक है।

अध्याय 8 · पाद 2 (108 सूत्र)

8.2.1
पूर्वत्र असिद्धं

IAST pūrvatrāsiddham

प्रकार परिभाषा

सार त्रिपादी (८.२–८.४) के कार्य सपादसप्ताध्यायी (१.१–८.१) की दृष्टि से असिद्ध माने जाते हैं।

8.2.2
नलोपः सुप्स्वरसंज्ञातुक् इधिषु कृति

IAST nalopaḥ supsvarasaṃjñātugvidhiṣu kṛti

प्रकार परिभाषा

सार न्-लोप सुप्, स्वर, संज्ञा और तुक्-विधियों में तथा कृत् परे होने पर असिद्ध माना जाता है।

8.2.3
न मु ने

IAST na mu ne

प्रकार नियम

सार मु और ने परे होने पर न्-लोप का वह असिद्धत्व नहीं होता।

8.2.4
उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितः अनुदात्तस्य

IAST udāttasvaritayor yaṇaḥ svarito 'nudāttasya

प्रकार विधि

सार उदात्त या स्वरित के स्थान पर आया यण् अनुदात्त परे होने पर स्वरित हो जाता है।

8.2.5
एक आदेशः उदात्तेन उदात्तः

IAST ekādeśa udāttenodāttaḥ

प्रकार विधि

सार उदात्त के साथ बना एकादेश स्वयं उदात्त होता है।

8.2.6
स्वरितः वा अनुदात्ते पद आदौ

IAST svarito vānudātte padādau

प्रकार विधि

सार पदादि अनुदात्त परे होने पर वह एकादेश विकल्प से स्वरित होता है।

8.2.7
नलोपः प्रातिपदिक अन्तस्य

IAST nalopaḥ prātipadikāntasya

प्रकार विधि

सार प्रातिपदिक के अन्तस्थ न् का लोप होता है।

8.2.8
न ङिसम्बुद्ध्योः

IAST na ṅisambuddhyoḥ

प्रकार नियम

सार ङि और सम्बुद्धि परे होने पर वह प्रातिपदिकान्त न्-लोप नहीं होता।

8.2.9
ंआत् पधायाश्च मतोर्वः अयव आदिभ्यः

IAST mād upadhāyāś ca mator vo 'yavādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार म्-ान्त तथा म्-उपधा वाले शब्दों से परे मतुप् का म् अयवादि को छोड़कर व् हो जाता है।

8.2.10
झयः

IAST jhayaḥ

प्रकार विधि

सार झय् से परे भी मतुप् का म् व् हो जाता है।

8.2.11
संज्ञायां

IAST saṃjñāyām

प्रकार विधि

सार संज्ञा में भी मतुप् का वह व्-आदेश होता है।

8.2.12
आसन्दीवत् अष्ठीवत्चक्रीवत्कक्षीवत् रुमण्वत् चर्मण्वती

IAST āsandīvad aṣṭhīvac cakrīvat kakṣīvad rumaṇvac carmaṇvatī

प्रकार विधि

सार आसन्दीवत्, अष्ठीवत्, चक्रीवत्, कक्षीवत्, रुमण्वत् और चर्मण्वती—ये रूप निपातित सिद्ध होते हैं।

8.2.13
उदन्वान् उदधौ च

IAST udanvān udadhau ca

प्रकार विधि

सार उदन्वान् रूप सिद्ध है, और उदधि-अर्थ में भी प्रयुक्त होता है।

8.2.14
राजन्वान् सौराज्ये

IAST rājanvān saurājye

प्रकार विधि

सार सौराज्य-अर्थ में राजन्वान् रूप सिद्ध है।

8.2.15
छन्दसि इरः

IAST chandasīraḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में इर्-अन्त से परे मतुप् का व् होता है।

8.2.16
अनः नुट्

IAST ano nuṭ

प्रकार विधि

सार अन्-अन्त से परे (मतुप्-व् के निमित्त) नुट् आगम होता है।

8.2.17
णात् घस्य

IAST ṇād dhaḥ

प्रकार विधि

सार ण् से परे ह् के स्थान पर ध् आदेश होता है।

8.2.18
कृपः रः लः

IAST kṛpo ro laḥ

प्रकार विधि

सार कृप्-धातु के र् के स्थान पर ल् होता है।

8.2.19
उपसर्गस्य अयतौ

IAST upasargasya ayatau

प्रकार विधि

सार अय और अत परे होने पर उपसर्ग के र् का ल् होता है।

8.2.20
ग्रः यङि

IAST graḥ yaṅi

प्रकार विधि

सार यङ् परे होने पर ग्र के र् का ल् होता है।

8.2.21
अचि विभाषा

IAST aci vibhāṣā

प्रकार विधि

सार अच् परे होने पर वह र्→ल् विकल्प से होता है।

8.2.22
परेश्च घ अङ्कयोः

IAST pareś ca gha aṅkayoḥ

प्रकार विधि

सार घ और अङ्क परे होने पर परि के र् का भी ल् होता है।

8.2.23
संयोग अन्तस्य लोपः

IAST saṃyogāntasya lopaḥ

प्रकार विधि

सार (पदान्त) संयोग के अन्तिम वर्ण का लोप होता है।

8.2.24
रआत् सस्य

IAST rāt sasya

प्रकार विधि

सार र् से परे संयोगान्त स् का लोप होता है।

8.2.25
धि च

IAST dhi ca

प्रकार विधि

सार धि परे होने पर भी (उस) स् का लोप होता है।

8.2.26
झलः झलि

IAST jhalaḥ jhali

प्रकार विधि

सार झल्-परे झल्-वर्ण का लोप होता है।

8.2.27
ह्रस्वाद् अङ्गात्

IAST hrasvād aṅgāt

प्रकार विधि

सार ह्रस्व-स्वर वाले अङ्ग के बाद पूर्वोक्त झल्-लोप लागू होता है।

8.2.28
इटः ईटि

IAST iṭaḥ īṭi

प्रकार विधि

सार ईट् के परे इट्-आगम का लोप होता है।

8.2.29
स्कोः संयोग आद्योः अन्ते च

IAST skoḥ saṃyoga-ādyoḥ ante ca

प्रकार विधि

सार संयोग के आदि में स्थित स्/क् का, तथा पदान्त में भी स्/क् का लोप होता है।

8.2.30
चोः कुः

IAST coḥ kuḥ

प्रकार विधि

सार (झलि/अन्ते) चवर्ग के स्थान पर कवर्ग आदेश होता है।

8.2.31
हः ढः

IAST haḥ ḍhaḥ

प्रकार विधि

सार (झलि/अन्ते) ह् के स्थान पर ढ् आदेश होता है।

8.2.32
दादेर्धातोर्घः

IAST dāder dhātor ghaḥ

प्रकार विधि

सार द्-आदि धातु के ह् के स्थान पर घ् आदेश होता है।

8.2.33
वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहां

IAST vā druh-muh-ṣṇuh-ṣṇihām

प्रकार विधि

सार द्रुह्, मुह्, ष्णुह्, ष्णिह् धातुओं के ह् के स्थान पर वैकल्पिक घ् आदेश होता है।

8.2.34
नहः धः

IAST nahaḥ dhaḥ

प्रकार विधि

सार नह् धातु के ह् के स्थान पर ध् आदेश होता है।

8.2.35
आहः थः

IAST āhaḥ thaḥ

प्रकार विधि

सार आह् (अह्/ब्रू-सम्बद्ध रूप) के ह् के स्थान पर थ् आदेश होता है।

8.2.36
व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राज छशां षः

IAST vraśca-bhrasja-sṛja-mṛja-yaja-rāja-bhrāja-cchaśāṃ ṣaḥ

प्रकार विधि

सार व्रश्च्-भ्रस्ज्-सृज्-मृज्-यज्-राज्-भ्राज् धातुओं के छ्/श् के स्थान पर ष् आदेश होता है।

8.2.37
एक अचः बशः भष्झषन्तस्य स्ध्वोः

IAST eka-acaḥ baśaḥ bhaṣ jhaṣantasya sdhvoḥ

प्रकार विधि

सार एकाच् झष्-अन्त के स्/ध्व्-परक बश् के स्थान पर भष् आदेश होता है।

8.2.38
दधः तथोश्च

IAST dadhaḥ tathoś ca

प्रकार विधि

सार दध् (धा का अभ्यस्त) के त्/थ्-परे भी पूर्वोक्त भष्-आदेश होता है।

8.2.39
झलां जशः अन्ते

IAST jhalāṃ jaśo 'nte

प्रकार विधि

सार पदान्त में झल्-वर्णों के स्थान पर जश् (ग् ज् ड् द् ब्) आदेश होता है।

8.2.40
झषः तथोर्धः अधः

IAST jhaṣas tathor dho 'dhaḥ

प्रकार विधि

सार झष् के स्थान पर त्/थ्-परे ध् आदेश होता है, स्वयं ध् को छोड़कर।

8.2.41
षढोः कः सि

IAST ṣaḍhoḥ kaḥ si

प्रकार विधि

सार स्-परे ष् और ढ् के स्थान पर क् आदेश होता है।

8.2.42
रदाभ्यं निष्ठातः नः पूर्वस्य तु दः

IAST radābhyāṃ niṣṭhāto naḥ pūrvasya tu daḥ

प्रकार विधि

सार र्/द् के बाद निष्ठा-तकार का नकार होता है, तथा पूर्ववर्ती द् भी न् हो जाता है।

8.2.43
संयोग आदेरातः धातोर्यण्वतः

IAST saṃyoga-āder āto dhātor yaṇvataḥ

प्रकार विधि

सार संयोगादि, आ-युक्त और यण्-युक्त धातु के बाद भी निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.44
लू आदिभ्यः

IAST lū-ādibhyaḥ

प्रकार विधि

सार लू आदि धातुओं के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.45
ओत् इतश्च

IAST ot itaś ca

प्रकार विधि

सार ओत्-इत् वाले धातुओं के बाद भी निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.46
क्षियः दीर्घात्

IAST kṣiyo dīrghāt

प्रकार विधि

सार दीर्घ ई वाले क्षि-धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.47
श्यः अस्पर्शे

IAST śyo 'sparśe

प्रकार विधि

सार स्पर्श-अर्थ को छोड़कर श्या-धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.48
अञ्चः अनपादाने

IAST añco 'napādāne

प्रकार विधि

सार अपादान-अर्थ को छोड़कर अञ्च्-धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.49
दिवः अव्जिगीषायां

IAST divo 'vjigīṣāyām

प्रकार विधि

सार जिगीषा-अर्थ को छोड़कर दिव्-धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है।

8.2.50
निर्वा- णः अवाते

IAST nirvāṇo 'vāte

प्रकार विधि

सार वात-अर्थ को छोड़कर निर्वा (निर्+वा) के निष्ठा-रूप में नकार (निर्वाण) होता है।

8.2.51
शुषः कः

IAST śuṣaḥ kaḥ

प्रकार विधि

सार शुष् धातु की निष्ठा (क्त) के तकार को क् आदेश होता है — शुष्क।

8.2.52
पचः वः

IAST pacaḥ vaḥ

प्रकार विधि

सार पच् धातु की निष्ठा के तकार को व् आदेश होता है — पक्व।

8.2.53
क्षायः मः

IAST kṣāyaḥ maḥ

प्रकार विधि

सार क्षै (क्षाय्) धातु की निष्ठा के तकार को म् आदेश होता है — क्षाम।

8.2.54
प्रस्त्यः अन्यतरस्यां

IAST prastyaḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार प्र+स्त्यै की निष्ठा में पूर्ववत् विशेष आदेश वैकल्पिक है (प्रस्त्य)।

8.2.55
अनुपसर्गात् फुल्लक्षीबकृशौल्लाघाः

IAST anupasargāt phulla-kṣība-kṛśa-ullāghāḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-रहित अवस्था में फुल्ल, क्षीब, कृश और उल्लाघ — ये निष्ठा-रूप निपातित हैं।

8.2.56
नुदविद उन्दत्राघ्राह्रीभ्यः अन्यारयां

IAST nuda-vida-unda-trā-ghrā-hrībhyaḥ anyatarasyām

प्रकार विधि

सार नुद्, विद्, उन्द्, त्रा, घ्रा और ह्री से परे निष्ठा-तकार को न् आदेश वैकल्पिक है।

8.2.57
न ध्याख्यापॄमूर्छिमदां

IAST na dhyā-khyā-pṝ-mūrchi-madām

प्रकार नियम

सार ध्यै, ख्या, पॄ, मूर्छ् और मद् धातुओं में वह न्-आदेश नहीं होता।

8.2.58
वित्तः भोगप्रत्यययोः

IAST vittaḥ bhoga-pratyayayoḥ

प्रकार नियम

सार वित्त रूप भोग (सम्पत्ति/उपभोग) और प्रत्यय (विश्वास/प्रत्याभूति) अर्थों में ही साधु है।

8.2.59
भित्तं शकलं

IAST bhittaṃ śakalam

प्रकार विधि

सार भित्त शब्द शकल (टुकड़ा/खंड) अर्थ में निपातित है।

8.2.60
ऋ- णं आधमर्ण्ये

IAST ṛṇaṃ ādhamarṇye

प्रकार नियम

सार ऋण रूप आधमर्ण्य (ऋणी होने/उधार) अर्थ में ही गृहीत है।

8.2.61
नसत्तनिषत्त अनुत्तप्रतूर्तसूर्तगूर्तानि छन्दसि

IAST na-satta-niṣatta-anutta-pratūrta-sūrta-gūrtāni chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में नसत्त, निषत्त, अनुत्त, प्रतूर्त, सूर्त और गूर्त — ये रूप निपातित हैं।

8.2.62
क्विन्प्रत्ययस्य कुः

IAST kvin-pratyayasya kuḥ

प्रकार विधि

सार क्विन् प्रत्यय होने पर धातु के अन्त्य वर्ण को तत्सवर्ण कु (क-वर्ग) आदेश होता है।

8.2.63
नशेर्वा

IAST naśer vā

प्रकार विधि

सार नश् धातु में वह कु-आदेश वैकल्पिक है।

8.2.64
मः नः धातोः

IAST mo no dhātoḥ

प्रकार विधि

सार धातु के अन्त्य म् को (पदान्त में) न् आदेश होता है।

8.2.65
म्वोश्च

IAST mvoś ca

प्रकार विधि

सार म् और व् परे होने पर भी धातु के अन्त्य म् को न् आदेश होता है।

8.2.66
ससजुषोः रुः

IAST sa-sajuṣoḥ ruḥ

प्रकार विधि

सार स और सजुष् के अन्त्य स् को (पदान्त में) रु आदेश होता है।

8.2.67
अवयाः श्वेतवाः उरो- डाश्च

IAST avayāḥ śvetavā uroḍāś ca

प्रकार अतिदेश

सार अवयाः, श्वेतवाः और उरोडाः पर भी वही रु-व्यवहार अतिदिष्ट है।

8.2.68
अहन्

IAST ahan

प्रकार विधि

सार अहन् के अन्त्य न् को भी रु आदेश होता है।

8.2.69
रः असुपि

IAST ro 'supi

प्रकार नियम

सार वह र् (रु का स्थानी) सुप्-भिन्न परे रहने पर ही र-रूपेण व्यवहृत होता है।

8.2.70
अम्नः ऊधसव सित्य् उभयथा छन्दसि

IAST amnaś cordhva-savitur ity ubhayathā chandasi

प्रकार विधि

सार अम्नस् तथा «ऊर्ध्वं सवितुः» में छन्दस् में रु-आदेश उभयथा (वैकल्पिक दोनों पक्ष) होता है।

8.2.71
भुवः च महाव्याहृतेः

IAST bhuvaś ca mahāvyāhṛteḥ

प्रकार विधि

सार महाव्याहृति भू (भूः) पर भी वही रु-आदेश होता है।

8.2.72
वसुस्रंसुध्वंसु अनडुहां दः

IAST vasu-sraṃsu-dhvaṃsv-anaḍuhāṃ daḥ

प्रकार विधि

सार वसु, स्रंसु, ध्वंसु और अनडुह् के अन्त्य को द् आदेश होता है।

8.2.73
तिपि अनस्तेः

IAST tipi anasteḥ

प्रकार विधि

सार तिप् परे होने पर (धातु-सम्बन्धी वह) आदेश अस् धातु को छोड़कर होता है।

8.2.74
सिपि धातोर्रुः वा

IAST sipi dhātor rur vā

प्रकार विधि

सार सिप् परे धातु के (अन्त्य) को रु आदेश वैकल्पिक है।

8.2.75
दः च

IAST daś ca

प्रकार विधि

सार सिप् परे धातु को द् आदेश भी (वैकल्पिक रूप से) होता है।

8.2.76
र्वोः उपधायाः दीर्घः इकः

IAST rvor upadhāyā dīrgha ikaḥ

प्रकार विधि

सार र् या व् के पूर्व उपधास्थ इक् दीर्घ होता है।

8.2.77
हलि च

IAST hali ca

प्रकार विधि

सार हल (व्यञ्जन) परे होने पर भी र्/व् से पूर्व उपधा-इक् दीर्घ होता है।

8.2.78
उपधायां च

IAST upadhāyāṃ ca

प्रकार विधि

सार उपधा में भी (इसी दीर्घ-विधान का) विस्तार है।

8.2.79
न भकुर्छुरां

IAST na bhakurchurām

प्रकार नियम

सार भ, कुर् और छुर् में पूर्वोक्त उपधा-दीर्घ नहीं होता।

8.2.80
अदसः असेर्दात् उ दः मः

IAST adaso 'ser dād u do maḥ

प्रकार विधि

सार अदस् में अस्-भाग के द् के बाद उ आदेश होता है और द् को म्।

8.2.81
एतः ईत् बहुवचने

IAST eta īd bahuvacane

प्रकार विधि

सार बहुवचन में (अदस् के) ए को ईत् होता है।

8.2.82
वाक्यस्य टेः प्लुतः उदात्तः

IAST vākyasya ṭeḥ pluta udāttaḥ

प्रकार विधि

सार वाक्य की टि प्लुत और उदात्त होती है।

8.2.83
प्रत्यभिवादे अशूद्रे

IAST pratyabhivāde 'śūdre

प्रकार विधि

सार अशूद्र के प्रत्यभिवादन (अभिवाद-उत्तर) में (वाक्य-टि प्लुत-उदात्त होती है)।

8.2.84
दूरात् हूते च

IAST dūrād dhūte ca

प्रकार विधि

सार दूर से पुकारने में भी (टि प्लुत-उदात्त होती है)।

8.2.85
हैहेप्रयोगे हैहयोः

IAST haiheprayoge haihayoḥ

प्रकार विधि

सार है और हे के प्रयोग में है/हे (के स्वर) प्लुत-उदात्त होते हैं।

8.2.86
गुरोरनृतः अनन्त्य्यस्य अपि एकैकय प्राचां

IAST guror anṛto 'nantyasyāpy ekaikasya prācām

प्रकार विधि

सार प्राच्यों के मत से गुरु अनृत अनन्त्य स्वर भी एक-एक करके प्लुत हो सकता है।

8.2.87
ओं अभ्यादाने

IAST om abhyādāne

प्रकार विधि

सार अभ्यादान (स्वाध्यायारम्भ) में ॐ (प्लुत होता है)।

8.2.88
ये यज्- ञकर्मणि

IAST ye yajñakarmaṇi

प्रकार विधि

सार यज्ञकर्म में ‘ये’ (प्लुत होता है)।

8.2.89
प्रणवष्टेः

IAST praṇavaṣ ṭeḥ

प्रकार विधि

सार प्रणव (ॐ) की टि (प्लुत होती है)।

8.2.90
याज्या अन्तः

IAST yājyāntaḥ

प्रकार विधि

सार याज्या का अन्त (प्लुत होता है)।

8.2.91
ब्रूहिप्रेस्यश्रौषट्वौषटावहानां आदेः

IAST brūhipresyaśrauṣaḍvauṣaḍāvahānām ādeḥ

प्रकार विधि

सार ब्रूहि, प्रेस्य, श्रौषट्, वौषट् और आवह — इनके आदि (स्वर) प्लुत होते हैं।

8.2.92
अग्णीध् प्रेषणे परस्य च

IAST agnīdhrapreṣaṇe parasya ca

प्रकार विधि

सार अग्नीध्-प्रेषण में पर (अगले) पद की (टि) भी प्लुत होती है।

8.2.93
विभाषा पृष्- टप्रतिवचने हेः

IAST vibhāṣā pṛṣṭaprativacane heḥ

प्रकार विधि

सार पृष्ट के प्रतिवचन में हे का प्लुत वैकल्पिक है।

8.2.94
निगृह्य अनुयोगे च

IAST nigṛhyānuyoge ca

प्रकार विधि

सार निगृह्य अनुयोग (दबाकर पूछने) में भी (हे प्लुत होता है)।

8.2.95
आम्रेडितं भर्त्सने

IAST āmreḍitaṃ bhartsane

प्रकार विधि

सार भर्त्सना में आम्रेडित प्लुत होता है।

8.2.96
अङ्गयुक्तं तिङ् आकाङ्क्षं

IAST aṅgayuktaṃ tiṅākāṅkṣam

प्रकार विधि

सार अङ्गयुक्त और आकाङ्क्षा-युक्त तिङ् (प्लुत होता है)।

8.2.97
विचार्यंआणाणां

IAST vicāryamāṇānām

प्रकार विधि

सार विचार्यमाण पदों की (टि प्लुत होती है)।

8.2.98
पूर्वं तु भाषायां

IAST pūrvaṃ tu bhāṣāyām

प्रकार नियम

सार किन्तु भाषा में पूर्व (पूर्व स्वर/टि) प्लुत होता है।

8.2.99
प्रतिश्रवणे च

IAST pratiśravaṇe ca

प्रकार विधि

सार प्रतिश्रवण में भी (पूर्व प्लुत होता है)।

8.2.100
अनुदात्तं प्रश्न अन्त अभिपूजितयोः

IAST anudāttaṃ praśnāntābhipūjitayoḥ

प्रकार विधि

सार प्रश्नान्त और अभिपूजित में (प्लुत) अनुदात्त होता है।

8.2.101
चिद् इति च उपमा अर्थे प्रयुज्यंआने

IAST cidi copamārthe prayujyamāne

प्रकार विधि

सार उपमा-अर्थ में प्रयुक्त «चिद्» पर (पूर्व-सूत्र से प्राप्त) अनुदात्त-व्यवस्था लागू होती है।

8.2.102
उपरिस्विद् आसी३त् इति च

IAST uparisvid āsī3d iti ca

प्रकार विधि

सार «उपरिस्विद् आसी३त्» जैसे प्रयोगों में भी (पूर्व-निर्दिष्ट) स्वर/प्लुत-व्यवस्था लागू होती है।

8.2.103
स्वरितं आम्रेडिते असूया सम्मतिकोपकुत्सनेषु

IAST svaritam āmreḍite 'sūyā-sammati-kopa-kutsaneṣu

प्रकार विधि

सार असूया, सम्मति, कोप और कुत्सा के अर्थों में आम््रेडित पर स्वरित होता है।

8.2.104
क्षिया आशिस्प्रैषेषु तिङ् आकाङ्क्षं

IAST kṣiyāśiṣ-praiṣeṣu tiṅ ākāṅkṣam

प्रकार विधि

सार क्षिया, आशीस् और प्रैष में आकाङ्क्षा-युक्त तिङ्-रूप पर (पूर्व-निर्दिष्ट) प्लुत/स्वर-व्यवस्था लागू होती है।

8.2.105
अनन्त्यस्य अपि प्रश्न आख्यानयोः

IAST anantyasyāpi praśnākhyānayoḥ

प्रकार विधि

सार प्रश्न और आख्यान में अनन्त्य (अन्त्य morae से भिन्न) स्वर पर भी (पूर्व-निर्दिष्ट) प्लुत-व्यवस्था लागू होती है।

8.2.106
प्लुतौ ऐचः इत् उतौ

IAST plutau aica idūtau

प्रकार विधि

सार प्लुत में ऐच् (ऐ, औ) के स्थान पर क्रमशः इत् और उत् होते हैं।

8.2.107
एचः अप्रगृह्यस्य अदूरात् ऊते पूर्वस्य अर्धस्य आत् उत्तरस्य इत् उतौ

IAST ecaḥ apragṛhyasyādūrād ūte pūrvasya ardhasyād uttarasyedūtau

प्रकार विधि

सार अप्रगृह्य एच् का अदूर से ऊ-संबोधन में पूर्वार्ध आत् और उत्तरार्ध इत्/उत् हो जाता है।

8.2.108
तयोर्य्वौ अचि संहितायां

IAST tayor yvāv aci saṃhitāyām

प्रकार विधि

सार संहिता में अच् परे रहने पर उन (इत्/उत्) के स्थान पर क्रमशः य् और व् होते हैं।

अध्याय 8 · पाद 3 (119 सूत्र)

8.3.1
मतुवसोः रु सम्बुद्धौ छन्दसि

IAST matuvasoḥ ru sambuddhau chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में मतुप् और वसु के अन्त के स्थान पर सम्बुद्धि के परे रु आदेश होता है।

8.3.2
अत्र अनुनासिकः पूर्वस्य तु वा

IAST atra anunāsikaḥ pūrvasya tu vā

प्रकार विधि

सार इस रु-प्रकरण में पूर्ववर्ती वर्ण का वैकल्पिक अनुनासिकत्व होता है।

8.3.3
आतः अटि नित्यं

IAST ātaḥ aṭi nityam

प्रकार विधि

सार आ के परे अट् रहने पर पूर्ववर्ती का अनुनासिकत्व नित्य होता है।

8.3.4
अनुनासिकात् परः अनुस्वारः

IAST anunāsikāt paraḥ anusvāraḥ

प्रकार विधि

सार अनुनासिक से परे (रु के स्थान पर) अनुस्वार आदेश होता है।

8.3.5
समः सुटि

IAST samaḥ suṭi

प्रकार विधि

सार सम् के म् के स्थान पर सुट् के परे रु (ततः अनुस्वार-प्रवृत्ति) होता है।

8.3.6
पुमः खयि अम्परे

IAST pumaḥ khayi ampare

प्रकार विधि

सार पुम् के म् के स्थान पर अम्-परक खय् के परे रु आदेश होता है।

8.3.7
नः छवि अप्रशान्

IAST naḥ chavi apraśān

प्रकार विधि

सार अप्रशान् को छोड़कर न् के स्थान पर छव् के परे रु आदेश होता है।

8.3.8
उभयथा ऋक्षु

IAST ubhayathā ṛkṣu

प्रकार विधि

सार ऋक् में (उक्त रु/अभाव) उभयथा—दोनों प्रकार से—होता है।

8.3.9
दीर्घात् अटि समानपदे

IAST dīrghāt aṭi samānapade

प्रकार विधि

सार समानपद में दीर्घ के परे अट् रहने पर (न् के स्थान पर) रु आदेश होता है।

8.3.10
नृलपॄन् पे

IAST nṛlapṝn pe

प्रकार विधि

सार नृ, लप् तथा ॠन् के न् के स्थान पर प् के परे रु आदेश होता है।

8.3.11
स्वतवान् पायौ

IAST svatavān pāyau

प्रकार विधि

सार स्वतवान् के न् के स्थान पर पायु के परे रु आदेश होता है।

8.3.12
कान् आम्रेडिते

IAST kān āmreḍite

प्रकार विधि

सार कान् के न् के स्थान पर आम्रेडित के परे रु आदेश होता है।

8.3.13
ढः ढे लोपः

IAST ḍhaḥ ḍhe lopaḥ

प्रकार विधि

सार ढ् के परे ढ् रहने पर पूर्व ढ् का लोप होता है।

8.3.14
रः रि

IAST raḥ ri

प्रकार विधि

सार र् के परे र् रहने पर पूर्व र् का लोप होता है।

8.3.15
खरवसानयोर्विसर्जनीयः

IAST kharavasānayor visarjanīyaḥ

प्रकार विधि

सार र् (रु) के स्थान पर खर् और अवसान के परे विसर्जनीय आदेश होता है।

8.3.16
रोः सुपि

IAST roḥ supi

प्रकार विधि

सार रु के र् के स्थान पर सुप् के परे विसर्जनीय आदेश होता है।

8.3.17
भो भगो अघो अपूर्वस्य यः अशि

IAST bho bhago agho apūrvasya yaḥ aśi

प्रकार विधि

सार भो, भगो, अघो से अ-पूर्व य् का अश् के परे (आगामी) विशेष व्यवहार निर्धारित होता है।

8.3.18
व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य

IAST vyor laghuprayatnataraḥ śākaṭāyanasya

प्रकार विधि

सार शाकटायन के मत में व् और य् का लघुप्रयत्नतर उच्चारण होता है।

8.3.19
लोपः शाकल्यस्य

IAST lopaḥ śākalyasya

प्रकार विधि

सार शाकल्य के मत में (उस) य्/व् का लोप होता है।

8.3.20
ओतः गार्ग्यस्य

IAST otaḥ gārgyasya

प्रकार विधि

सार गार्ग्य के मत में ओत् से परे (य् का) लोप होता है।

8.3.21
उञि च पदे

IAST uñi ca pade

प्रकार विधि

सार पदभूत उञ् में भी (य्/व् का) वही लोप-व्यवहार होता है।

8.3.22
हलि सर्वेषां

IAST hali sarveṣām

प्रकार विधि

सार हल् के परे सभी आचार्यों के मत में (उस) य्/व् का लोप होता है।

8.3.23
मः अनुस्वारः

IAST maḥ anusvāraḥ

प्रकार विधि

सार (हल्-परक) म् के स्थान पर अनुस्वार आदेश होता है।

8.3.24
नश्च अपद अन्तस्य झलि

IAST naś ca apadāntasya jhali

प्रकार विधि

सार अपदान्त न् के स्थान पर झल् के परे अनुस्वार आदेश होता है।

8.3.25
मः राजि समः क्वौ

IAST maḥ rāji samaḥ kvau

प्रकार विधि

सार क्वि-प्रकरण में सम् के म् का राज् के परे अनुस्वार नहीं होता (म ही रहता है)।

8.3.26
हे मपरे वा

IAST he mapare vā

प्रकार विधि

सार मपर हकार से पूर्व पदान्त म् का अनुस्वार वैकल्पिक होता है।

8.3.27
नपरे नः

IAST napare naḥ

प्रकार विधि

सार नपर हकार से पूर्व न् का अनुस्वार वैकल्पिक होता है।

8.3.28
ङ्- णोः कुक्- टुक् शरि

IAST ṅaṇoḥ kuk ṭuk śari

प्रकार विधि

सार शर् से पूर्व ङ् के परे कुक् तथा ण् के परे टुक् का (वैकल्पिक) आगम होता है।

8.3.29
डः सि धुट्

IAST ḍaḥ si dhuṭ

प्रकार विधि

सार सकार से पूर्व ड् के परे धुट् का (वैकल्पिक) आगम होता है।

8.3.30
नश्च

IAST naś ca

प्रकार विधि

सार सकार से पूर्व न् के परे भी धुट् का (वैकल्पिक) आगम होता है।

8.3.31
शि तुक्

IAST śi tuk

प्रकार विधि

सार शकार से पूर्व (पूर्वोक्त न्/ड् आदि के परे) तुक् का (वैकल्पिक) आगम होता है।

8.3.32
ङमः ह्रस्वात् अचि ङमुट् नित्यं

IAST ṅamo hrasvād aci ṅamuṭ nityam

प्रकार विधि

सार ह्रस्व के बाद स्थित ङ्/ण्/म् के परे अच् होने पर नित्य ङमुट् (अनुनासिक-द्वित्व) होता है।

8.3.33
मयः उञः वः वा

IAST maya uño vo vā

प्रकार विधि

सार मय् वर्ण के परे उञ् के उकार का वैकल्पिक वकारादेश होता है।

8.3.34
विसर्जनीयस्य सः

IAST visarjanīyasya saḥ

प्रकार विधि

सार विसर्जनीय के स्थान में सकार आदेश होता है।

8.3.35
शर्परे विसर्जनीयः

IAST śarpare visarjanīyaḥ

प्रकार विधि

सार शर्पर वर्ण से पूर्व विसर्जनीय यथावत् रहता है (सकारादेश का प्रतिषेध)।

8.3.36
वा शरि

IAST vā śari

प्रकार विधि

सार शर् से पूर्व विसर्जनीय का सकारादेश वैकल्पिक होता है।

8.3.37
कुप्वोः क्ष्क्- क्ष्पौ च

IAST kupvoḥ ≍k≍pau ca

प्रकार विधि

सार कवर्ग-पवर्ग से पूर्व विसर्ग का क्रमशः जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय आदेश होता है, और सकार भी।

8.3.38
सः अपदआदौ

IAST so 'padādau

प्रकार अधिकार

सार अपदादि सकार षत्व-विधियों का अधिकारी होता है।

8.3.39
इणः षः

IAST iṇaḥ ṣaḥ

प्रकार विधि

सार इण् के परे सकार के स्थान में षकार आदेश होता है।

8.3.40
नमस्पुरसोर्गत्योः

IAST namaspurosor gatyoḥ

प्रकार विधि

सार गति-संज्ञक नमस् तथा पुरस् के सकार का षत्व होता है।

8.3.41
इत् उत् उपधस्य च अप्रत्ययस्य

IAST idudupadhasya cāpratyayasya

प्रकार विधि

सार इ/उ उपधा वाले अप्रत्यय अङ्ग के सकार का भी षत्व होता है।

8.3.42
तिरसः अन्यतरस्यां

IAST tiraso 'nyatarasyām

प्रकार विधि

सार तिरस् के सकार का षत्व वैकल्पिक होता है।

8.3.43
द्विस्त्रिस्चतुरिति कृत्वसर्थे

IAST dvis triś catur iti kṛtvo 'rthe

प्रकार विधि

सार कृत्वस्-अर्थ में द्विस्, त्रिस् तथा चतुर् के सकार का षत्व होता है।

8.3.44
इसुसोः सामर्थ्ये

IAST isusoḥ sāmarthye

प्रकार विधि

सार सामर्थ्य में इस् तथा उस् के सकार का षत्व होता है।

8.3.45
नित्यं संआसे अनुत्तरादथय

IAST nityaṃ samāse 'nuttarapadasthasya

प्रकार विधि

सार समास में अनुत्तरपदस्थ सकार का नित्य षत्व होता है।

8.3.46
अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीषु अनव्ययस्य

IAST ataḥ kṛkamikaṃsakumbhapātrakuśākarṇīṣv anavyayasya

प्रकार विधि

सार अकार से परे कृ-कमि-कंस-कुम्भ-पात्र-कुशा-कर्णी के योग में अनव्यय के सकार का षत्व होता है।

8.3.47
अधः शिरसी पदे

IAST adhaḥśirasī pade

प्रकार विधि

सार पद शब्द से पूर्व अधस् तथा शिरस् के सकार का षत्व होता है।

8.3.48
कस्क आदिषु च

IAST kaskādiṣu ca

प्रकार विधि

सार कस्कादि गणपठित शब्दों में भी सकार का षत्व होता है।

8.3.49
छन्दसि वा अप्र आम्रेडितयोः

IAST chandasi vāprāmreḍitayoḥ

प्रकार विधि

सार छन्दस् में अप्र तथा आम्रेडित के सकार का षत्व वैकल्पिक होता है।

8.3.50
कःकरत्करतिकृधिकृतेषु अनदितेः

IAST kaḥkaratkaratikṛdhikṛteṣv anaditeḥ

प्रकार विधि

सार कः-करत्-करति-कृधि-कृत के परे अदिति-भिन्न सकार का षत्व होता है।

8.3.51
पञ्चम्याः परौ अध्यर्थे

IAST pañcamyāḥ parau adhyarthe

प्रकार विधि

सार पञ्चमी-विभक्ति-अन्तरूप के बाद आने वाले (दो) परवर्ती पदों के सकार का षत्व होता है जब अर्थ अधि (ऊपर/अधि-सम्बन्ध) हो।

8.3.52
पातौ च बहुलं

IAST pātau ca bahulam

प्रकार विधि

सार पात-शब्द के साथ भी पञ्चमी-परक सकार का षत्व बहुल (विकल्प/अनियमित विस्तार) से होता है।

8.3.53
षष्थ्याः पतिपुत्रपृष्ठपारपदपयस्पोषेषु

IAST ṣaṣṭhyāḥ patiputrapṛṣṭhapārapadapayaspōṣeṣu

प्रकार विधि

सार षष्ठ्यन्त के बाद पति, पुत्र, पृष्ठ, पार, पद, पयस् और पोष में आने वाले सकार का षत्व होता है।

8.3.54
इडायाः वा

IAST iḍāyāḥ vā

प्रकार विधि

सार इडा के षष्ठ्यन्त रूप के बाद सकार का षत्व वैकल्पिक होता है।

8.3.55
अपद अन्तस्य मूर्धन्यः

IAST apadāntasya mūrdhanyaḥ

प्रकार विधि

सार पद के अन्त में न होने वाले (सकार-स्थानीय) आदेश का मूर्धन्य (ष) होता है — षत्व का सामान्य अधिकार-क्षेत्र।

8.3.56
सहेः साडः सः

IAST saheḥ sāḍaḥ saḥ

प्रकार विधि

सार धातु सह् के साड्-आदेश का सकार षत्व (मूर्धन्य) का पात्र होता है।

8.3.57
इण्कोः

IAST iṇkoḥ

प्रकार विधि

सार इण् (इ उ ऋ ऌ) तथा क् के बाद (अदेश/प्रत्यय आदि के) सकार का षत्व होता है।

8.3.58
नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाये अपि

IAST numvisarjanīyaśarvyavāye 'pi

प्रकार विधि

सार नुम्, विसर्जनीय या शर् के व्यवधान पर भी पूर्वोक्त षत्व होता है।

8.3.59
आदेशप्रत्यययोः

IAST ādeśapratyayayoḥ

प्रकार विधि

सार आदेश और प्रत्यय के सकार का (इण्-क् आदि पर) षत्व होता है।

8.3.60
शासिवसिघसीणां च

IAST śāsivasighasīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार शास्, वस् और घस् धातुओं के सकार का भी (उन्हीं निमित्तों पर) षत्व होता है।

8.3.61
स्तौति- ण्योरेव षणि अभ्यासात्

IAST stautiṇyor eva ṣaṇi abhyāsāt

प्रकार विधि

सार षन् (सन्नन्त) में अभ्यास के सकार का षत्व केवल स्तु तथा ण्यन्त धातुओं में ही होता है।

8.3.62
सः स्विदिस्वदिसहीणां च

IAST saḥ svidisvadisahīnāṃ ca

प्रकार विधि

सार स्विद्, स्वद् और सह् के अभ्यास-सकार का भी षत्व होता है।

8.3.63
प्राक् सितात् अट् व्यवाये अपि

IAST prāk sitād aṭ vyavāye 'pi

प्रकार विधि

सार सि से पूर्व (निर्दिष्ट धातु-परम्परा में) अभ्यास-सकार का षत्व अट् के व्यवधान पर भी होता है।

8.3.64
स्था आदिषु अभ्यासेन च अभ्यासय

IAST sthādiṣv abhyāsena cābhyāsasya

प्रकार विधि

सार स्थादि धातुओं में अभ्यास द्वारा तथा अभ्यास के सकार का भी षत्व होता है।

8.3.65
उपसर्गात् सुनोतिसुवतिस्यतिस्तौतिस्तोभतिस्थासेनयसेधसिचसञ्जस्वञ्जां

IAST upasargāt sunotisuvatisya-tistautistobhatisthāsenayasedhasicasañjasvañjām

प्रकार विधि

सार उपसर्ग के बाद सुनोति, सुवति, स्यति, स्तौति, स्तोभति, स्था, सेनय, सेध, सिच, सञ्ज और स्वञ्ज के सकार का षत्व होता है।

8.3.66
सदिरप्रतेः

IAST sadir aprateḥ

प्रकार विधि

सार सद् धातु का सकार उपसर्ग-पर षत्व पाता है, किन्तु प्रति के बाद नहीं।

8.3.67
स्तन्भेः

IAST stanbheḥ

प्रकार विधि

सार स्तम्भ् धातु के सकार का उपसर्ग-पर षत्व होता है।

8.3.68
अवात् च आलम्बनआविदूर्ययओः

IAST avāc cālambanāvidūryayoḥ

प्रकार विधि

सार अव के बाद स्तम्भ् का षत्व आलम्बन और आविदूर्य अर्थों में होता है।

8.3.69
वेश्च स्वनः भोजने

IAST veś ca svanaḥ bhojane

प्रकार विधि

सार वि के बाद स्वन् धातु का सकार भोजनाभिप्राय अर्थ में षत्व पाता है।

8.3.70
परिनिविभ्यह् सेवसितसयसिवुसहसुट्स्तुसञ्जां

IAST parinivibhyaḥ sevasitasayasivusahasuṭstusañjām

प्रकार विधि

सार परि, नि और वि के बाद सेव, सित, सय, सिवु, सह, सुट्, स्तु और सञ्ज् के सकार का षत्व होता है।

8.3.71
सिवादीणां वा अट् व्यवाये अपि

IAST sivādīnāṃ vā aṭ vyavāye 'pi

प्रकार विधि

सार सिवादि (पूर्वोक्त सि-प्रभृति) धातुओं में अट्-व्यवधान पर भी षत्व वैकल्पिक होता है।

8.3.72
अनुविपरिअभिनिभ्यः स्यन्दतेरप्राणिषु

IAST anuvipariabhinibhyaḥ syandater aprāṇiṣu

प्रकार विधि

सार अनु, वि, परि, अभि और नि के बाद स्यन्द् का सकार अप्राणि-विषय में षत्व पाता है।

8.3.73
वेः स्कन्देरनिष्ठायां

IAST veḥ skander aniṣṭhāyām

प्रकार विधि

सार वि के बाद स्कन्द् का सकार निष्ठा से भिन्न अवस्थाओं में षत्व पाता है।

8.3.74
परेश्च

IAST pareś ca

प्रकार विधि

सार परि के बाद भी स्कन्द् का (अनिष्ठा में) षत्व होता है।

8.3.75
परिस्कन्दः प्राच्यभरतेषु

IAST pariskandaḥ prācyabharateṣu

प्रकार विधि

सार परिस्कन्द रूप प्राच्य-भरतों में (क्षेत्रीय प्रयोग/वैकल्पिक षत्व-रूप) सिद्ध माना जाता है।

8.3.76
स्फुरतिस्फुलत्योर्निर्निविभ्यः

IAST sphuratisphulatyor nirnivibhyaḥ

प्रकार विधि

सार निस्, नि और वि के परे धातु स्फुरति तथा स्फुलति का आरम्भिक स् ष् हो जाता है।

8.3.77
वेः स्कभ्नातेर्नित्यं

IAST veḥ skabhnāter nityam

प्रकार विधि

सार वि के परे धातु स्कभ्नाति का आरम्भिक स् नित्य ष् हो जाता है।

8.3.78
इणः षीध्वम्लुङ्लिटां धः अङ्गात्

IAST iṇaḥ ṣīdhvamluṅliṭāṃ dho 'ṅgāt

प्रकार विधि

सार इण्-अन्ताङ्ग के परे षीध्वम् तथा लुङ्-लिट् प्रत्ययों का ध् ढ् हो जाता है।

8.3.79
विभाषा इटः

IAST vibhāṣā iṭaḥ

प्रकार विधि

सार इट्-आगम के परे पूर्वोक्त ध् का ढ्-भाव वैकल्पिक है।

8.3.80
संआसे अङ्गुलेः सङ्गः

IAST saṃjñāyām aṅguleḥ saṅgaḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा में अङ्गुलि के परे सङ्ग का स् ष् हो जाता है।

8.3.81
भीरोः स्थानं

IAST bhīroḥ sthānam

प्रकार विधि

सार भीरु के परे स्थान का स् ष् हो जाता है।

8.3.82
अग्नेः स्तुत्स्तोमसोंआः

IAST agneḥ stutstomasomāḥ

प्रकार विधि

सार अग्नि के परे स्तुत्, स्तोम और सोम का आरम्भिक स् ष् हो जाता है।

8.3.83
ज्योतिः आयुसः स्तोमः

IAST jyotirāyuṣaḥ stomaḥ

प्रकार विधि

सार ज्योतिस् तथा आयुस् के परे स्तोम का स् ष् हो जाता है।

8.3.84
मातृपितृभ्यां स्वसुः

IAST mātṛpitṛbhyāṃ svasuḥ

प्रकार विधि

सार मातृ और पितृ के परे स्वसृ का आरम्भिक स् ष् हो जाता है।

8.3.85
मातुर्पितुर्भ्यां अन्यारयाम्

IAST māturpiturbhyām anyatarasyām

प्रकार विधि

सार मातुर् और पितुर् के परे स्वसृ का षत्व वैकल्पिक है।

8.3.86
अभि+निसः स्तनः शब्दांज्ञायां

IAST abhinisaḥ stanaḥ śabdasaṃjñāyām

प्रकार विधि

सार शब्द-संज्ञा में अभि और निस् के परे स्तन का स् ष् हो जाता है।

8.3.87
उपसर्गप्रादुर्भ्यां अस्तिर्यचरः

IAST upasargaprādurbhyām astir yacaḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग तथा प्रादुर् के परे धातु अस् (और यच्-सम्बद्ध प्रयोग) का स् ष् हो जाता है।

8.3.88
सुविनिस्दुर्भ्यः सुपिसूतिसंआः

IAST suvinirdurbhyaḥ supisūtisamāḥ

प्रकार विधि

सार सु, वि, निस् और दुस् के परे सुपि, सूति तथा समा का स् ष् हो जाता है।

8.3.89
निनदीभ्यां स्नातेः कौशले

IAST ninadībhyāṃ snāteḥ kauśale

प्रकार विधि

सार कौशल-अर्थ में नि और नदी के परे धातु स्ना का आरम्भिक स् ष् हो जाता है।

8.3.90
सूत्रं प्रतिष्णातम्

IAST sūtraṃ pratiṣṇātam

प्रकार विधि

सार सूत्र-अर्थ में प्रतिष्णातम् रूप में षत्व सिद्ध होता है।

8.3.91
कपिष्ठलः गोत्रे

IAST kapiṣṭhalaḥ gotre

प्रकार विधि

सार गोत्र-संज्ञा में कपिष्ठल रूप में षत्व सिद्ध होता है।

8.3.92
प्रष्ठः अग्रगामिनि

IAST praṣṭho 'gragāmini

प्रकार विधि

सार अग्रगामिन्-अर्थ में प्रष्ठ रूप में षत्व सिद्ध होता है।

8.3.93
वृक्ष आसनयोर्विष्टरः

IAST vṛkṣāsanayor viṣṭaraḥ

प्रकार विधि

सार वृक्ष और आसन के अर्थ में विष्टर रूप में षत्व सिद्ध होता है।

8.3.94
छन्दःनाम्नि च

IAST chandasnāmni ca

प्रकार विधि

सार छन्दस्-संज्ञा नामों में भी पूर्वोक्त षत्व होता है।

8.3.95
गवियुधिभ्यां स्थिरः

IAST gaviyudhibhyāṃ sthiraḥ

प्रकार विधि

सार गवि और युधि के परे स्थिर का स् ष् हो जाता है।

8.3.96
विकुशमिपरिभ्यः स्थलं

IAST vikuśamiparibhyaḥ sthalam

प्रकार विधि

सार वि, कु, शम्, इ और परि के परे स्थल का स् ष् हो जाता है।

8.3.97
अम्बआम्बगोभूमिसव्यापद्वित्रिकुशेकुशङ्कुअङ्गुमञ्जिपुञ्जिपरमेबर्हिः दिवि अग्निभ्यः स्तः

IAST ambāmbagobhūmisavyāpadvitrikūśekuśaṅkvaṅgumañjipuñjiparamebarhir divy agnibhyaḥ staḥ

प्रकार विधि

सार अम्ब, आम्ब, गो, भूमि, सव्यापद्, वित्री, कुशे, कुशङ्कु, अङ्गु, मञ्जि, पुञ्जि, परम, बर्हिस्, दिवि और अग्नि के परे स्त का स् ष् हो जाता है।

8.3.98
सुषाम(न्)आदिषु च

IAST suṣāmādiṣu ca

प्रकार विधि

सार सुषामन् आदि गण-शब्दों में भी षत्व होता है।

8.3.99
एति संज्ञायां अगात्

IAST eti saṃjñāyām agāt

प्रकार विधि

सार संज्ञा में ए-अन्त के परे स् का षत्व होता है, ग-अन्त को छोड़कर।

8.3.100
नक्षत्रात् वा

IAST nakṣatrād vā

प्रकार विधि

सार नक्षत्र-नाम के परे स् का षत्व वैकल्पिक है।

8.3.101
ह्रस्वात् तादौ तद्धिते

IAST hrasvāt tādau taddhite

प्रकार विधि

सार ह्रस्वान्त पूर्वपद के पश्चात् तकारादि तद्धित-प्रत्यय परे सकार का षत्व (पूर्व-सूत्र की वा-अनुवृत्ति से) वैकल्पिक होता है।

8.3.102
निसः तपतौ अणासेवने

IAST nisaḥ tapatau aṇāsevane

प्रकार विधि

सार निस् के सकार का तप्-धातु से अण् में, सेवन-अर्थ को छोड़कर, षत्व होता है।

8.3.103
युष्मद् तद् ततक्षुःषु अन्तःआदं

IAST yuṣmad-tad-tatakṣuḥṣu antaḥpādam

प्रकार विधि

सार युष्मद्, तद् तथा तक्षुः-आदि में पाद के मध्य में सकार का षत्व होता है।

8.3.104
यजुषि एकेषां

IAST yajuṣi ekeṣām

प्रकार विधि

सार यजुर्वेद में एक आचार्य-मत से (पाद-सीमा आदि पर भी) सकार का षत्व होता है।

8.3.105
स्तुतस्तोमयोश् छन्दसि

IAST stuta-stomayoś chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में स्तुत और स्तोम के सकार का षत्व होता है।

8.3.106
पूर्वपदात्

IAST pūrvapadāt

प्रकार अधिकार

सार पूर्वपद के पश्चात् (आगे के सूत्रों में) सकार के षत्व का अधिकार प्रारम्भ होता है।

8.3.107
सुञः

IAST suñaḥ

प्रकार विधि

सार पूर्वपद के बाद सुञ् (षु-धातु) के सकार का षत्व होता है।

8.3.108
सनोतेरनः

IAST sanoter anaḥ

प्रकार विधि

सार पूर्वपद के बाद सनोति के अन-प्रत्ययस्थ सकार का षत्व होता है।

8.3.109
सहेः पृतना ऋताभ्यां च

IAST saheḥ pṛtanā-ṛtābhyāṃ ca

प्रकार विधि

सार पृतना और ऋत के पश्चात् सह्-धातु के सकार का षत्व होता है।

8.3.110
न रपरसृपिसृजिस्पृसिस्पृहिसवन आदीणां

IAST na rapara-sṛpi-sṛji-spṛśi-spṛhi-savanādīnām

प्रकार नियम

सार रेफ-पर तथा सृप्, सृज्, स्पृश्, स्पृह्, सवन आदि धातुओं के सकार का षत्व नहीं होता।

8.3.111
सात्पद आद्योः

IAST sāt-padādyoḥ

प्रकार नियम

सार सात्-प्रत्यय तथा पद के आदि-सकार का षत्व नहीं होता।

8.3.112
सिचः यङि

IAST sicaḥ yaṅi

प्रकार नियम

सार यङ् के परे सिच्-प्रत्यय के सकार का षत्व नहीं होता।

8.3.113
सेधतेर्गतौ

IAST sedhater gatau

प्रकार नियम

सार गमन-अर्थ में सेध्-धातु के सकार का षत्व नहीं होता।

8.3.114
प्रतिस्तब्ध निस्तब्धौ च

IAST pratistabdha-nistabdhau ca

प्रकार नियम

सार प्रतिस्तब्ध और निस्तब्ध में भी सकार का षत्व नहीं होता।

8.3.115
सोढः

IAST soḍhaḥ

प्रकार विधि

सार सोढ (सह् के क्तान्त) में सकार का षत्व होता है।

8.3.116
स्तन्भुशिवुसहां चङि

IAST stanbhu-śivu-sahāṃ caṅi

प्रकार विधि

सार चङ् के परे स्तम्भु, शिवु और सह् के सकार का षत्व होता है।

8.3.117
सुनोतेः स्यसनोः

IAST sunoteḥ sya-sanoḥ

प्रकार विधि

सार स्य और सन् के परे सुनोति के सकार का षत्व होता है।

8.3.118
सदिस्वञ्जोः परस्य लिटि

IAST sadi-svañjoḥ parasya liṭi

प्रकार विधि

सार लिट् में सद् और स्वञ्ज् के परवर्ती सकार का षत्व होता है।

8.3.119
निवि अभिभ्यः अट् यावये वा छन्दसि

IAST nivi-abhibhyaḥ aḍ yāvaye vā chandasi

प्रकार विधि

सार छन्दस् में नि, वि, अभि के बाद अट्-युक्त तथा यावय के सकार का षत्व वैकल्पिक होता है।

अध्याय 8 · पाद 4 (68 सूत्र)

8.4.1
रषाभ्यां नः णः समानादे

IAST raṣābhyāṃ naḥ ṇaḥ samānāde

प्रकार विधि

सार एक ही पद में र् अथवा ष् के बाद आने वाले न् का ण् आदेश होता है।

8.4.2
अट्कुपु आङ्नुम्व्यवाये अपि

IAST aṭkupu āṅnumvyavāye api

प्रकार विधि

सार अट्, कु, पु, आङ् अथवा नुम् के व्यवधान होने पर भी र्/ष् से परे न् का ण् होता है।

8.4.3
पूर्वपदात् संज्ञायां अगः

IAST pūrvapadāt saṃjñāyāṃ agaḥ

प्रकार विधि

सार संज्ञा में पूर्वपदस्थ र्/ष् से उत्तरपद के न् का ण् होता है, यदि मध्य में ग् न हो।

8.4.4
वनं पुरगामिश्रकासिध्रकाशारिकाकोटर अग्रेभ्यः

IAST vanaṃ puragāmiśrakāsidhrakāśārikākoṭara agrebhyaḥ

प्रकार विधि

सार पुरगा, मिश्रक, आसिध्रक, आशारिका, कोटर तथा अग्रे — इन पूर्वपदों से परे «वन» का न् ण् होता है।

8.4.5
प्रनिरन्तर्शर इक्षुप्लक्षआम्रकार्ष्यखदिरपियूक्षाभ्यः असंञायां अपि

IAST pranirantaḥśarekṣuplakṣāmrakārṣyakhadirapīyūkṣābhyaḥ asaṃjñāyām api

प्रकार विधि

सार प्र, निर्, अन्तः, शर, इक्षु, प्लक्ष, आम्र, कार्ष्य, खदिर और पीयूक्ष के बाद असंज्ञा में भी (वनस्थ) न को ण होता है।

8.4.6
विभाषा ओषधिवनस्पतिभ्यः

IAST vibhāṣā oṣadhivanaspatibhyaḥ

प्रकार विधि

सार ओषधि तथा वनस्पतिवाचक पूर्वपदों से परे «वन» के न् का ण् वैकल्पिक है।

8.4.7
अह्नः अत् अन्तात्

IAST ahnaḥ at antāt

प्रकार विधि

सार अकारान्त पूर्वपद से परे «अहन्» के न् का ण् होता है।

8.4.8
वाहनं आहितात्

IAST vāhanam āhitāt

प्रकार विधि

सार आहित (जिस पर रखा/आरूढ़ हो) अर्थवाले पूर्वपद से परे वाहन के न को ण होता है।

8.4.9
पानं देशे

IAST pānaṃ deśe

प्रकार विधि

सार देशवाची अर्थ में «पान» के न् का ण् होता है।

8.4.10
वा भावकरणयोः

IAST vā bhāvakaraṇayoḥ

प्रकार विधि

सार भाव और करण अर्थ में पान के न को विकल्प से ण होता है।

8.4.11
प्रातिपदिक अन्तनुम्विहक्तिषु च

IAST prātipadikāntanumvibhaktiṣu ca

प्रकार विधि

सार प्रातिपदिक के अन्त में, नुम् में और विभक्ति में भी (रषाभ्याम् आदि से) न को ण होता है।

8.4.12
एक अच् उत्तरपदे णः

IAST eka ac uttarapade ṇaḥ

प्रकार विधि

सार एकाच् पूर्वपद के बाद उत्तरपदस्थ न् का ण् होता है।

8.4.13
कुमति च

IAST kumati ca

प्रकार विधि

सार एकाच्-उत्तरपद के अतिरिक्त जब उत्तरपद कवर्ग (कु) से आरम्भ हो तो भी (समास में) पूर्वगत न का णत्व होता है।

8.4.14
उपसर्गात् असंआसे अपि ण पएशय

IAST upasargād asaṃjñāyām api ṇopadeśasya

प्रकार विधि

सार उपसर्ग से परे असंज्ञा में भी णोपदेश धातु के न को ण होता है।

8.4.15
हिनु मीना

IAST hinumīnā

प्रकार विधि

सार हि/नु-युक्त तथा मी और ना धातुओं में (उपसर्गात्) न को ण होता है।

8.4.16
आनि लोट्

IAST āni loṭ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग-परक लोट् के आनि-रूप में न का णत्व होता है।

8.4.17
नेर्गदनदपतपद घुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहति- शाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु

IAST ner gadanadapatapadaghumāsyatihantiyātivātidrātipsātivapativahatiśāmyaticinotidegdhisu

प्रकार विधि

सार निर् से परे गद्, नद्, पत्, पद्, घु, मा, स्यति, हन्ति, याति, वाति, द्राति, प्साति, वपति, वहति, शाम्यति, चिनोति और देग्धि में न को ण होता है।

8.4.18
शेषे विभाषा अकख आदौअषन्ते पदेशे

IAST śeṣe vibhāṣā 'kakhādāv aṣānteṣu

प्रकार विधि

सार शेष धातुओं में नि-का णत्व अ/क/ख आदि से आरम्भ तथा ष-रहित अन्त वाले पदों में वैकल्पिक है।

8.4.19
अनितेः

IAST aniteḥ

प्रकार नियम

सार उपसर्ग-परे णोपदेश-धातु के न का पूर्वोक्त णत्व इडागम-रहित (अनिट्) रूप में (ही) होता है।

8.4.20
अन्तः

IAST antaḥ

प्रकार विधि

सार अङ्ग/धातु के अन्तस्थित न का भी (उक्त उपसर्ग-परे णोपदेश-सन्दर्भ में) णत्व होता है।

8.4.21
उभौ स अभ्यासस्य

IAST ubhau sa abhyāsasya

प्रकार विधि

सार अभ्यास में स होने पर अभ्यासगत और उत्तरवर्ती दोनों नों का णत्व होता है।

8.4.22
हन्तेरत्पूर्वस्य

IAST hanter atpūrvasya

प्रकार विधि

सार हन् धातु के नकार का, उसके पूर्व अत् होने पर, णत्व होता है।

8.4.23
वमोर्वा

IAST vamor vā

प्रकार विधि

सार व् अथवा म् के परे हन्-धातु के नकार का वैकल्पिक णत्व होता है।

8.4.24
अन्तरदेशे

IAST antaradeśe

प्रकार विधि

सार अन्तर शब्द का नकार, देश-अर्थ में प्रयुक्त होने पर, ण हो जाता है।

8.4.25
अयनं च

IAST ayanaṃ ca

प्रकार विधि

सार अयन शब्द के नकार का भी णत्व होता है।

8.4.26
छन्दसि ऋत् अवग्रहात्

IAST chandasi ṛd avagrahāt

प्रकार विधि

सार वैदिक भाषा में ऋ के परे तथा अवग्रह से भी न का णत्व होता है।

8.4.27
नः च धातुस्थ उरुषुह्यः

IAST naś ca dhātusthor uṣubhyaḥ

प्रकार विधि

सार धातु में स्थित उ, रु और ष के परे न का णत्व होता है।

8.4.28
उपसर्गात् अनोत्पर ः

IAST upasargād anotparaḥ

प्रकार विधि

सार उपसर्ग से परे धातुस्थ न का णत्व होता है यदि वह उत्पर न हो।

8.4.29
कृति अचः

IAST kṛty acaḥ

प्रकार विधि

सार अच्-अन्त से परे कृत्-प्रत्ययस्थ न का णत्व होता है।

8.4.30
णेर्विभाषा

IAST ṇer vibhāṣā

प्रकार विधि

सार णि के परे न का णत्व विकल्पेन होता है।

8.4.31
हलश्च इच् उप धात्

IAST halaś cec upadhāt

प्रकार विधि

सार हल्-अन्त धातु से तथा इच्-उपध धातु से परे भी (प्रत्ययस्थ) न का णत्व होता है।

8.4.32
इच् आदेः सनुमः

IAST ic ādeḥ sanumaḥ

प्रकार विधि

सार इच्-आदि धातु से परे सन् और उम् के न का णत्व होता है।

8.4.33
वा निंसनिक्षनिन्दां

IAST vā niṃsanikṣanindām

प्रकार विधि

सार निंस्, निक्ष् और निन्द् धातुओं में न का णत्व विकल्पेन होता है।

8.4.34
न भाभूपूकमिगमिप्यायीवेपां

IAST na bhābhūpūkamigamipyāyīvepām

प्रकार नियम

सार भा, भू, पू, कम्, गम्, प्याय्, ई, वेप् आदि निर्दिष्ट धातुओं में णत्व का प्रतिषेध है।

8.4.35
षात् पद अन्तात्

IAST ṣāt padāntāt

प्रकार नियम

सार पदान्त ष् के परे न का णत्व नहीं होता।

8.4.36
नशेः षान्तस्य

IAST naśeḥ ṣāntasya

प्रकार नियम

सार ष-अन्त √नश् के न का णत्व-संबंधी विशेष प्रतिषेध/नियम है।

8.4.37
पद अन्तस्य

IAST padāntasya

प्रकार नियम

सार पदान्त न का णत्व नहीं होता।

8.4.38
पदव्यवाये अपि

IAST padavyavāye 'pi

प्रकार अतिदेश

सार पद के व्यवधान होने पर भी णत्व होता है।

8.4.39
क्षुभ्ना आदिसु च

IAST kṣubhnādiṣu ca

प्रकार नियम

सार क्षुभ्नादि गण के शब्दों में भी णत्व का प्रतिषेध है।

8.4.40
स्तोः श्चुना श्चुः

IAST stoḥ ścunā ścuḥ

प्रकार विधि

सार स्/त्-वर्ग का श्/च्-वर्ग के योग में श्/च्-वर्ग आदेश होता है (श्चुत्व)।

8.4.41
ष्- टुना ष्- टुः

IAST ṣṭunā ṣṭuḥ

प्रकार विधि

सार स्/त्-वर्ग का ष्/ट्-वर्ग के योग में ष्/ट्-वर्ग आदेश होता है (ष्टुत्व)।

8.4.42
न पद अन्तात् टोरणां

IAST na padāntāṭ ṭor anām

प्रकार नियम

सार पदान्त ट्-वर्ग से परे त्-वर्ग का ष्टुत्व नहीं होता।

8.4.43
तोः षि

IAST toḥ ṣi

प्रकार विधि

सार ष् के परे त्-वर्ग का ष्टुत्व होता है।

8.4.44
शात्

IAST śāt

प्रकार नियम

सार श् से परे (त्-वर्ग का ष्टुत्व) नहीं होता।

8.4.45
यरः अनुनासिके अनुनास्किकः वा

IAST yaro 'nunāsike 'nunāsiko vā

प्रकार विधि

सार अनुनासिक के परे यर् का विकल्पेन सवर्ण अनुनासिक आदेश होता है।

8.4.46
अचः रहाभ्यां द्वे

IAST aco rahābhyāṃ dve

प्रकार विधि

सार अच् से परे र् और ह् के योग में (परे व्यञ्जन का) द्वित्व होता है।

8.4.47
अनचि च

IAST anaci ca

प्रकार विधि

सार अच्-भिन्न (हल्) के परे भी (पूर्व-प्रसंग में) द्वित्व होता है।

8.4.48
न आदिणी आक्रोशे पुत्रस्य

IAST nādiṇy ākrośe putrasya

प्रकार नियम

सार आक्रोश में प्रयुक्त ‘पुत्र’ के आदि वर्ण का द्वित्व नहीं होता।

8.4.49
शरः अचि

IAST śaro 'ci

प्रकार नियम

सार अच् के परे शर् (श् ष् स्) का द्वित्व नहीं होता।

8.4.50
त्रिप्रभृतिषु शाकटायनस्य

IAST triprabhṛtiṣu śākaṭāyanasya

प्रकार विधि

सार तीन या अधिक व्यञ्जनों के संयोग में शाकटायन के मत से (द्वित्व-संबंधी) विकल्प है।

8.4.51
सर्वत्र शाकल्यस्य

IAST sarvatra śākalyasya

प्रकार विधि

सार शाकल्य के मत में (पूर्वोक्त) व्यञ्जन-द्वित्व सर्वत्र नहीं होता।

8.4.52
दीर्घात् आचार्या- णां

IAST dīrghād ācāryāṇām

प्रकार विधि

सार दीर्घ स्वर के बाद आचार्यों के मत में व्यञ्जन-द्वित्व नहीं होता।

8.4.53
झलां जश् झशि

IAST jhalāṃ jaś jhaśi

प्रकार विधि

सार झश् परे होने पर झल् वर्णों के स्थान में जश् (वर्गीय सघोष अल्पप्राण) आदेश होता है।

8.4.54
अभ्यासे चर्च

IAST abhyāse carca

प्रकार विधि

सार अभ्यास में झल् के स्थान में चर् (क च ट त प / श ष स) आदेश होता है।

8.4.55
खरि च

IAST khari ca

प्रकार विधि

सार खर् परे होने पर भी झल् के स्थान में चर् आदेश होता है।

8.4.56
वा अवसाने

IAST vāvasāne

प्रकार विधि

सार अवसान में झल् का जश्/चर् आदेश वैकल्पिक है।

8.4.57
अणः अप्रगृह्यस्य अनुआसिकः

IAST aṇo ’pragṛhyasyānunāsikaḥ

प्रकार विधि

सार अप्रगृह्य अण् (अ इ उ) के स्थान में अनुनासिक आदेश होता है।

8.4.58
अनुस्वारस्य यायि परसार्णः

IAST anusvārasya yayi parasavarṇaḥ

प्रकार विधि

सार यय् परे होने पर अनुस्वार के स्थान में परसवर्ण (वर्गीय नासिक्य) आदेश होता है।

8.4.59
वा पद अन्तस्य

IAST vā padāntasya

प्रकार विधि

सार पदान्त अनुस्वार का परसवर्ण आदेश वैकल्पिक है।

8.4.60
तोर्लि

IAST torli

प्रकार विधि

सार ल् परे होने पर त् के स्थान में ल् आदेश होता है।

8.4.61
उदः स्थास्तन्भोः पूर्वस्य

IAST udaḥ sthāstambhoḥ pūrvasya

प्रकार विधि

सार उद् के परे स्था/स्तम्भ आने पर उनके आदि स् को पूर्वसवर्ण (त्) आदेश होता है।

8.4.62
झयः हः अन्यतरस्यां

IAST jhayo ho ’nyatarasyām

प्रकार विधि

सार झय् के परे ह् का संगत महाप्राण (पूर्वसवर्ण-वर्गीय) आदेश वैकल्पिक है।

8.4.63
शः छः अटि

IAST śaś cho ’ṭi

प्रकार विधि

सार (झय् परे) अट् परे होने पर श् के स्थान में छ् आदेश होता है।

8.4.64
हलः यंआं यमि लोपः

IAST halo yamāṃ yami lopaḥ

प्रकार विधि

सार हल् के बाद आए यम् (यम-वर्ण) का यम् परे लोप होता है।

8.4.65
झरः झरि सवर्णे

IAST jharo jhari savarṇe

प्रकार विधि

सार सवर्ण झर् परे होने पर झर् का लोप होता है।

8.4.66
उदात्तात् अनुदात्तस्य स्वरितः

IAST udāttād anudāttasya svaritaḥ

प्रकार विधि

सार उदात्त के बाद अनुदात्त के स्थान में स्वरित आदेश होता है।

8.4.67
न उदात्तस्वरित उदयं अगार्ग्यकाश्यपगालवणाम्

IAST nodāttasvaritodayam agārgyakāśyapagālavānām

प्रकार नियम

सार गार्ग्य-काश्यप-गालव के मत में उदात्त/स्वरित उदय होने पर (अनुदात्त का) स्वरित नहीं होता।

8.4.68
अ अ इति

IAST a a iti

प्रकार परिभाषा

सार «अ अ इति»—यह अष्टाध्यायी की समाप्ति-सूचक अन्तिम सूत्र-पङ्क्ति है।

भाग ८

समापन

One Spine: Language ↔ Number

समापन: भाषा ↔ संख्या · One Spine: Language and Number

एक ही डिकोड-कार्यक्रम। यह पुस्तक दो दिशाओं से एक ही वस्तु को पढ़ती है: भाषा को संगणन की तरह, और संख्या को भाषा की तरह। पाणिनि की अष्टाध्यायी—आठ अध्याय × चार पाद = बत्तीस पाद; इस संस्करण (Sanskrit Wikisource, 2026-08-10) में ३,९८३ सूत्र (अन्य संस्करण लगभग ३,९५९–३,९९६)—एक पूर्ण जनन-व्याकरण है; काटपयादि, आर्यभटीय वर्ण-संख्या, और भूतसंख्या उसी “encode ↔ decode” की दूसरी धुरी हैं। दोनों मिलकर एक रीढ़ बनाते हैं: language ↔ number।

व्याकरण = संगणन। अष्टाध्यायी को “स्मरण-सूची” मानना अधूरा है। सूत्र-प्रकार ही मशीन के भाग हैं:

प्रकारकार्य
सञ्ज्ञापरिभाषा / नामकरण
परिभाषामेटारूल
विधिसंक्रिया
अधिकारक्षेत्र-शीर्षक
अतिदेशविस्तार
नियमप्रतिबन्ध

अनुबन्ध/इत् (१.३.२–१.३.९; तस्य लोपः १.३.९) टोकन पर टैग की तरह हैं। अनुवृत्ति—पूर्व-सूत्रों के शब्दों का आगे तक बल—संदर्भ के विरुद्ध संपीड़ित diff है। कारक-वाक्य-रचना ही पुनलेखन-नियम है: तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१.१.६६) = दक्षिण-संदर्भ; तस्मादित्युत्तरस्य (१.१.६७) = वाम-संदर्भ; षष्ठी स्थानेयोगा (१.१.४९) = स्थानापन्न। इको यणचि (६.१.७७) वही है जो आधुनिक रूप में इक् → यण् / _ अच्—संदर्भ-संवेदनशील rewrite, बाणों के बजाय विभक्ति में। स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०), स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (१.१.५६), विप्रतिषेधे परं कार्यम् (१.४.२), अपवाद > उत्सर्ग, तथा परिभाषा-परंपरा (नित्य > अनित्य, अन्तरङ्ग > बहिरङ्ग) संघर्ष-नीति हैं। पूर्वत्रासिद्धम् (८.२.१) चरणबद्ध मूल्यांकन है: सपादसप्ताध्यायी (१.१–८.१) बनाम त्रिपादी (८.२–८.४)—बाद का चरण पहले में वापस नहीं जाता।

शिवसूत्र / माहेश्वर-सूत्राणि (१४ सूत्र) प्रत्याहार-संपीड़न उत्पन्न करते हैं; इस पुस्तक का इंजन उनसे ४२ प्रामाणिक प्रत्याहार निकालता है (उदा. अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ; हल् = ३३ व्यंजन—अवधि में ३४ स्लॉट, ह द्विवार, विशिष्ट समुच्चय = ३३)। धातुपाठ (~२,००० धातु), गणपाठ, तथा उणादि-सूत्र व लिङ्गानुशासन परंपरा के संबद्ध अङ्ग हैं। यह computed fact है; सूत्र-पाठ textual fact।

संख्या = भाषा। काटपयादि एक प्रतिवर्त्य codec है, रहस्य नहीं:

आर्यभट (आर्यभटीय, ४९९ ई., कुसुमपुर/पाटलिपुत्र): वर्ग क–म = १–२५, अवर्ग य–ह = ३०–१००; स्वर = १०० की घात। ख्युघृ = ४३,२०,०००—महायुग-वर्ष; वही संख्या सूर्य-सिद्धान्त-पुस्तक में ४,३२०,००० वर्ष के रूप में पिन है। भूतसंख्या (शब्द-अंक: सप्ताष्टवह्नयः = ३८७ आदि) भी दाएँ-से-बाएँ पढ़ती है—परिशिष्ट में तालिका।

दो पुस्तकें, एक रीढ़। पाणिनि-रहस्य भाषा-मशीन खोलता है; सूर्य-सिद्धान्त-पुस्तक संख्या-भाषा। ख्युघृ और युग-वर्ष एक ही संख्या-रीढ़ हैं। डिकोड-सेतु—प्रत्याहार-विस्तारक, SS-book की exact-equality oracle—दोनों पर एक अनुशासन लागू करता है: definition → table → encode → decode → worked example → attestation (तिथि-श्रेणी सहित)।

मनुष्य, परंपरा, सीमा। पाणिनि शलातुर (गान्धार; लाहुर/छोटा लाहोर, अटक के निकट, आज पाकिस्तान)—शालातुरीय, दाक्षीपुत्र। mainstream scholarship: लगभग ५वीं–४थी शती ईसा-पूर्व (कुछ ६वीं भी कहते हैं); कोई निश्चित वर्ष नहीं—उत्तर-वैदिक काल के अन्त में। ~१० पूर्व-वैयाकरण नामित; यास्क का निरुक्त इसी पूर्व/समीप-पाणिनीय संसार का है। वस्तु: छन्दस् और भाषा।

चरणलगभग कालकार्य
कात्यायन~३री श. ई.पू.वार्त्तिक
पतञ्जलि~२री श. ई.पू.महाभाष्य (~१,७०० सूत्र + वार्त्तिक)
काशिका (जयादित्य + वामन)७वीं श. ई.पूर्ण gloss
भट्टोजी दीक्षित~प्रारम्भ १७वीं श.सिद्धान्त-कौमुदी
नागेश भट्ट~१८वीं श.परिभाषेन्दुशेखर

Böhtlingk (१८३९–४०; १८८७); Bloomfield: “one of the greatest monuments of human intelligence”; Ingerman (१९६७): BNF → “Pāṇini-Backus Form”—सूत्र-प्रणाली ~२,४०० वर्ष पूर्व formal-grammar notation की अपेक्षा करती है। आधुनिक computational Sanskrit (Sanskrit Heritage आदि) अष्टाध्यायी को executable spec मानता है। वास्तविक उपलब्धि—~४,००० नियमों में पूर्ण generative grammar—को “५,०००-वर्षीय कम्प्यूटर” की मुद्रा की आवश्यकता नहीं।

खुले प्रश्न (ईमानदारी से)।

अन्तिम सूत्र। भाषा संख्या लिख सकती है; संख्या भाषा में याद रह सकती है; व्याकरण संगणन है जब नियम rewrite, inheritance, conflict, और staged evaluation से बँधे हों। यह पुस्तक—इंजन सहित, Pardeep Sehrawat (The Architect)—उसी decode-program का एक प्रामाणिक, सीमा-सजग पाठ है: सभी encode/decode, बिना रहस्यवाद, बिना अतिरंजन।