पाराशर-रहस्य · Decoding the BPHS

पाराशर-रहस्य

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Decoding the Bṛhat-Parāśara-Horā-Śāstra
सत्तानवे अध्याय · पूरे श्लोक · एक भी छोड़े बिना —
मूल संस्कृत, पदच्छेद, हिन्दी भावार्थ, English rendering,
षोडश-वर्ग · अष्टकवर्ग · विंशोत्तरी · षड्बल का सटीक गणित, उदाहरण, और डिकोड
Author & Decoder
Pardeep Sehrawat
«The Architect»
Instagram · theunholyindianmagician
KAAL Publications · MMXXVI

प्राक्कथन · Preface

यह पुस्तक ज्योतिष के मूल-ग्रन्थ बृहत्पाराशरहोराशास्त्र का सम्पूर्ण डिकोड है — सूर्यसिद्धान्त-रहस्य और पाणिनि-रहस्य की उसी परम्परा में, पर अधिक गहराई से। हर श्लोक यहाँ मूल देवनागरी, IAST, पदच्छेद, हिन्दी भावार्थ, English rendering, और जहाँ गणना है वहाँ आधुनिक सटीक गणित (षोडश-वर्ग-विभाजन, अष्टकवर्ग-बिन्दु, विंशोत्तरी-दशा, षड्बल) व सप्रमाण उदाहरण के साथ प्रस्तुत है। जहाँ हमारे अपने इंजनों ने किसी नियम को सत्यापित किया — अष्टकवर्ग का canonical 48·49·39·54·56·52·39 → सर्वाष्टकवर्ग 337, exact-== oracle पर — वहाँ «हमारा डिकोड» खण्ड वह सेतु दिखाता है।

This is a complete decode of the foundational jyotiṣa text. Its computational core — the sixteen divisional charts, aṣṭakavarga, the vimśottarī daśā, the six strengths — is rendered in exact modern notation with worked examples; its phala (result) statements are presented faithfully as the śāstra's own claims, never as fate or prediction we endorse. Mathematics and interpretation are kept strictly apart — no fear, no certainty theater.

सांकेतिक परिपाटी · Declared Conventions

मूल पाठसंस्कृत विकिस्रोत — बृहत्पाराशरहोराशास्त्र (fetched 2026-08-11): 97 अध्याय, पूर्ण श्लोक, अन्तराल-रहित। यह recension; संस्करण-भेद बहुत — जहाँ पाठ संदिग्ध वहाँ «पाठ-भेद संभव»।
अष्टकवर्गBPHS अ.66 canonical: रवि 48 · चन्द्र 49 · मङ्गल 39 · बुध 54 · गुरु 56 · शुक्र 52 · शनि 39 → सर्वाष्टकवर्ग 337; kaal-verification-oracle पर exact `==` पिन (कोई tolerance band नहीं — एक ±3 ने वास्तविक −1 छुपाया था)।
दृष्टिज्योतिष = स्रोत-पाठ + संगणनात्मक मॉडल। गणित सटीक; फल शास्त्र-कथन। कोई भय-वाक्य, नियति-दावा, या दबाव-रूप उपाय नहीं; कोई चिकित्सा/विधिक/वित्तीय भविष्यवाणी नहीं।
चिकित्सायह एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है, चिकित्सा-परामर्श नहीं। · This is a historical text, not medical advice.

पाठ-संशोधन (audit 2026-09-21): दो स्वतन्त्र साक्षियों (Sanskrit Wikisource, 2026-08-11; sanskritdocuments.org, 2026-09-21) की श्लोक-दर-श्लोक तुलना में पाया गया कि Wikisource के अध्याय 16, 18, 20, 22, 23, 35 दूसरे अध्यायों का पाठ दोहराते थे और अध्याय 25 में अध्याय 24 के 34 श्लोक जुड़े थे; इन सात अध्यायों का पाठ अब sanskritdocuments.org से है। पूर्व-निर्माण में 39 अध्यायों में अध्याय-शीर्षक पंक्ति एक श्लोक के स्थान पर आ गई थी — वे श्लोक पुनर्स्थापित हैं, और 47 शीर्षक-पंक्तियाँ श्लोक-गणना से हटाई गईं। इस संस्करण की पिन: 97 अध्याय / 3,943 श्लोक; पुनर्स्थापित/प्रतिस्थापित श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में जोड़ी गईं; हर श्लोक का स्रोत corpus/bphs/canon.json में दर्ज है। / Verse-by-verse comparison of two independent witnesses showed that the Wikisource pages of chapters 16, 18, 20, 22, 23 and 35 repeated other chapters and chapter 25 carried 34 verses of chapter 24; those seven chapters now follow sanskritdocuments.org. In 39 chapters the earlier build had put the chapter-title line in place of a verse (restored), and 47 title lines were removed from the verse count. This edition is pinned at 97 chapters / 3,943 verses; commentary for the restored/replaced verses was added in the editorial pass of 2026-09-21; every verse's source is recorded in corpus/bphs/canon.json.

अध्यायः 1

सृष्टिक्रमकथाः

24 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): सृष्टिक्रमकथा वह द्वार है जहाँ शिष्य मैत्रेय मुनि पराशर से ज्योतिष-शास्त्र का प्रथम रूप पूछते हैं—त्रिस्कन्ध (होरा, गणित, संहिता) में होरा की श्रेष्ठता, इस जगत् की उत्पत्ति और लय, तथा ख-स्थ व भू-स्थित तत्त्वों का सम्बन्ध। अध्याय भक्ति-मंगलाचरण से आरम्भ होकर ब्रह्म-शक्ति-भारती के स्मरण तक पहुँचता है; यह फल-सूत्र नहीं, बल्कि शास्त्र का दार्शनिक आधार है—जहाँ गणना से पहले यह स्पष्ट होता है कि ज्योतिष किस ब्रह्माण्ड-दृष्टि पर खड़ा है। सृष्टि-क्रम की कथा आगे के ग्रह-राशि-भाव-दशा नियमों को एक अर्थ-जाल में बाँधती है: आकाश की गति और भूमि की घटना को एक ही क्रमिक कथा के दो छोर मानकर। बिना इस आधार के शेष अध्याय केवल संख्याएँ रह जाते; इसी से पाठक समझता है कि होरा-ज्ञान “रहस्य” क्यों कहलाता है और पराशर-परंपरा उसे कैसे खोलती है।

For the English reader: Chapter 1 is the cosmological threshold of Bṛhat Parāśara Horā Śāstra—not a table of strengths or periods, but the dialogue in which Maitreya asks how this world arises and dissolves, and how the sky-bound and earth-bound are related. After the Gāṇapatya opening and the ranking of horā among the three limbs of jyotiṣa, Parāśara begins from the Supreme and its power of speech (Bhāratī). Read it as the book’s charter: before any modular division of a sign or ratio of a daśā year, the text states what kind of universe its rules inhabit. Everything that follows—graha, rāśi, varga, bala, daśā—sits inside this order of creation, not outside it.

मुख्य गणित/तकनीक:
- मुख्यतः फल/वर्णन-अध्याय (सृष्टि-क्रम, त्रिस्कन्ध-वर्गीकरण, गुरु-शिष्य संवाद; गणना-सूत्र नहीं)

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

1.1
ॐ ॥
श्रीगणेशाय नमः ॥
अथ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ॥
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलसारभक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारणं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ॥
सृष्टिक्रमकथनाध्यायः
oṃ ||
śrīgaṇeśāya namaḥ ||
atha bṛhatpārāśarahorāśāstram ||
gajānanaṃ bhūtagaṇādisevitaṃ kapitthajambūphalasārabhakṣaṇam |
umāsutaṃ śokavināśakāraṇaṃ namāmi vighneśvarapādapaṃkajam ||
sṛṣṭikramakathanādhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गजानन = हाथी-मुख गणेश; भूतगणादिसेवित = भूतगणादि से सेवित; कपित्थ-जम्बू-फल-सार-भक्षण = कैथ-जामुन-फल-सार का भक्षण करने वाले; उमासुत = उमा (पार्वती) के पुत्र; शोक-विनाश-कारण = शोक-नाश का हेतु; विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कज = विघ्नों के ईश्वर के चरण-कमल; नमामि = मैं नमन करता हूँ; सृष्टिक्रमकथनाध्यायः = सृष्टि-क्रम-कथन अध्याय (अध्याय-शीर्षक)।

हिन्दी भावार्थ ग्रन्थ का मङ्गलाचरण गणेश-वन्दना से खुलता है। श्लोक में गजानन को भूतगणादि-सेवित, फल-सार-भक्षी, उमा-पुत्र और शोक-विनाश का कारण कहकर विघ्नेश्वर के चरण-कमलों को नमन किया गया है। तदनन्तर अध्याय का नाम “सृष्टिक्रमकथनाध्यायः” घोषित होता है — सृष्टि-क्रम का कथन आरम्भ होगा। यह पाठ-खण्ड पारम्परिक मङ्गल-स्तुति और अध्याय-सूचना का युग्म है।

English rendering The opening is a maṅgala to Gaṇeśa—elephant-faced, served by the hosts of beings, relish of wood-apple and rose-apple essence, son of Umā, remover of sorrow—bowing to the lotus feet of Vighneśvara. The section is then titled the chapter that narrates the order of creation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मङ्गल-स्तुति तथा अध्याय-शीर्षक। यह पद्य गणना नहीं सिखाता; यह पाठ-प्रवेश की पारम्परिक द्वार-रचना है, जिसके बाद सृष्टि-क्रम का शास्त्रीय कथन आरम्भ होता है।

1.2
भगवन्परमं पुण्यं गुह्यं वेदाङ्गमुत्तमम् ।
त्रिस्कन्धं ज्यौतिषं होरा गणितं संहितेति च
bhagavanparamaṃ puṇyaṃ guhyaṃ vedāṅgamuttamam |
triskandhaṃ jyautiṣaṃ horā gaṇitaṃ saṃhiteti ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगवन् = हे भगवन्; परमं पुण्यं = परम पुण्य; गुह्यं = गुह्य/रहस्य; वेदाङ्गम् उत्तमम् = उत्तम वेदाङ्ग; त्रिस्कन्धं = तीन स्कन्धों वाला; ज्यौतिषं = ज्योतिष; होरा = होरा-स्कन्ध (फलित/कुण्डली-शास्त्र); गणितं = गणित-स्कन्ध (गणितीय ज्योतिष); संहिता = संहिता-स्कन्ध (मुहूर्त-निमित्त-समुच्चय आदि)।

हिन्दी भावार्थ शिष्य भगवन् को सम्बोधित कर ज्योतिष को परम पुण्य, गुह्य और उत्तम वेदाङ्ग कहता है। फिर उसे त्रिस्कन्ध घोषित करता है — होरा, गणित और संहिता। यह पद पूरे शास्त्र की विभाजन-रेखा खींचता है: फलित-होरा, संख्या-गणित, और संहिता-समुच्चय। आगे का संवाद होरा-स्कन्ध की श्रेष्ठता और उसके श्रवण की इच्छा की ओर बढ़ेगा।

English rendering “O Blessed One, [teach] the supreme merit, the secret, the excellent Vedāṅga—threefold jyotiṣa: horā, gaṇita, and saṃhitā.” The verse names the classical three skandhas of the science of light.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिभाषा/वर्गीकरण-कथन। सूत्र नहीं, किन्तु संरचनात्मक त्रिधा-विभाग: ज्योतिष = {होरा, गणित, संहिता}। इस ग्रन्थ-संस्करण का मुख्य विषय होरा है; गणनाएँ (वर्ग, अष्टकवर्ग, दशा, षड्बल) “गणित” स्कन्ध की भाषा में होरा-नियमों को सटीक मॉड्यूलर/अनुपात-अंकगणित में बाँधती हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस पद का त्रिस्कन्ध-विभाग हमारे पूरे डिकोड-ढाँचे की धुरी है — होरा का स्रोत-पाठ, उसके भीतर का गणित-नियम, और फल-कथन का स्पष्ट अलगाव। षोडश-वर्ग (अ.६), विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (अ.४६–४७), षड्बल (अ.२७) और अष्टकवर्ग का canonical SAV ३३७ (अ.६६: ४८/४९/३९/५४/५६/५२/३९) सब “गणित” को exact-`==` नियम से बाँधते हैं; फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखा जाता है, भाग्य-घोषणा के रूप में नहीं।

1.3
एतेष्वपि त्रिषु श्रेष्ठा होरेति श्रूयते मुने ।
त्वत्तस्तां श्रोतुमिच्छामि कृपया वद मे प्रभो
eteṣvapi triṣu śreṣṭhā horeti śrūyate mune |
tvattastāṃ śrotumicchāmi kṛpayā vada me prabho

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एतेषु अपि त्रिषु = इन तीनों में भी; श्रेष्ठा = श्रेष्ठतम; होरा इति = “होरा” इस नाम से; श्रूयते = सुना जाता है; मुने = हे मुने; त्वत्तः तां श्रोतुम् इच्छामि = आपसे उसे सुनने की इच्छा है; कृपया वद = कृपा कर कहिए; मे प्रभो = हे मेरे प्रभो।

हिन्दी भावार्थ शिष्य कहता है — इन तीन स्कन्धों में भी होरा को श्रेष्ठ कहा जाता है। वह मुनि से उसी होरा को कृपापूर्वक सुनना चाहता है। यह पद ग्रन्थ के विषय-चयन को स्पष्ट करता है: आगे का उपदेश होरा-शास्त्र पर केन्द्रित रहेगा। अनुरोध विनम्र और गुरु-शिष्य-संवाद की शैली में है।

English rendering “Among these three as well, O Sage, horā is heard to be the foremost. From you I wish to hear it; graciously speak, O Lord.” The disciple fixes the treatise’s focus on the horā skandha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-निर्धारण का संवाद। कोई अङ्क या सूत्र नहीं; किन्तु “होरा = श्रेष्ठा” का कथन आगे आने वाले वर्ग, दृष्टि, भाव-फल, दशा और अष्टकवर्ग-अध्यायों के लिए विषय-द्वार खोलता है।

1.4
कथं सृष्टिरियं जाता जगतश्च लयः कथम् ।
खस्थानां भूस्थितानां च सम्बन्धं वद विस्तरात्
kathaṃ sṛṣṭiriyaṃ jātā jagataśca layaḥ katham |
khasthānāṃ bhūsthitānāṃ ca sambandhaṃ vada vistarāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कथं सृष्टिः इयं जाता = यह सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई; जगतः च लयः कथम् = और जगत् का लय कैसे; खस्थानाम् = आकाशस्थ (ग्रह-नक्षत्रादि) का; भूस्थितानां च = और भूस्थ (प्राणी/वस्तु) का; सम्बन्धम् = सम्बन्ध; वद विस्तरात् = विस्तार से कहिए।

हिन्दी भावार्थ शिष्य दो मूल प्रश्न रखता है — सृष्टि कैसे हुई, और जगत् का लय कैसे होता है। साथ ही ख-स्थ (आकाश में स्थित) और भू-स्थित के पारस्परिक सम्बन्ध को विस्तार से जानना चाहता है। यह सृष्टि-क्रम-अध्याय का बीज-प्रश्न है: आगे ब्रह्माण्ड-उत्पत्ति और ग्रह-जगत्-सम्बन्ध का कथन इसी जिज्ञासा का उत्तर बनेगा।

English rendering “How did this creation arise, and how the world’s dissolution? Speak at length of the relation between those stationed in the sky and those upon the earth.” Cosmogony and sky–earth linkage are the requested themes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-लय और सम्बन्ध का प्रश्न-कथन। गणना यहाँ नहीं है; प्रश्न “खस्थ–भूस्थ सम्बन्ध” की ओर इशारा करता है, जिसे आगे होरा ग्रह-स्थिति, भाव और दशा के रूप में व्यवस्थित करेगी।

1.5
साधु पृष्टं त्वया विप्र लोकानुग्रहकारिना ।
अथाहं परमं ब्रह्म तच्छक्तिं भारतीं पुनः
sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vipra lokānugrahakārinā |
athāhaṃ paramaṃ brahma tacchaktiṃ bhāratīṃ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु पृष्टं = सुन्दर/सम्यक् पूछा; त्वया विप्र = हे विप्र, आपके द्वारा; लोक-अनुग्रह-कारिणा = लोकों पर अनुग्रह करने वाले के द्वारा; अथ अहं = अब मैं; परमं ब्रह्म = परम ब्रह्म; तत्-शक्तिं भारतीं = उसकी शक्ति भारती (वाक्/सरस्वती); पुनः = फिर/और भी।

हिन्दी भावार्थ गुरु शिष्य की जिज्ञासा की प्रशंसा करते हैं — लोक-अनुग्रह के लिए पूछा गया है, अतः प्रश्न साधु है। फिर वे कहते हैं कि अब परम ब्रह्म और उसकी शक्ति भारती का कथन करेंगे। यह पद उत्तर-आरम्भ की घोषणा है; सृष्टि-क्रम का उपदेश ब्रह्म-शक्ति से जुड़कर आगे बढ़ेगा। (पाठ में वाक्य अगले श्लोक से जुड़कर पूर्ण होता है — पाठ-भेद/अनुवृत्ति संभव।)

English rendering “Well asked by you, O brāhmaṇa who acts for the world’s grace. Now I [shall speak of] the supreme Brahman and again of His power, Bhāratī.” The teacher accepts the question and opens the cosmogonic answer.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद-उत्तर तथा उपदेश-आरम्भ। कोई संख्या-नियम नहीं; यह गुरु-स्वीकृति और ब्रह्म–शक्ति (भारती) की प्रस्तावना है, जिसके बाद सृष्टि-कथन का क्रम लगेगा।

1.6
सूर्य नत्वा ग्रहपतिं जगदुत्पत्तिकारणम् ।
वक्ष्यामि वेदनयनं यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम्
sūrya natvā grahapatiṃ jagadutpattikāraṇam |
vakṣyāmi vedanayanaṃ yathā brahmamukhācchrutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यम् = सूर्य को; नत्वा = नमन कर; ग्रहपतिम् = ग्रहों के अधिपति; जगत्-उत्पत्ति-कारणम् = जगत्-उत्पत्ति का कारण; वक्ष्यामि = मैं कहूँगा; वेद-नयनम् = वेद का नेत्र (ज्योतिष का पारम्परिक विशेषण); यथा = जैसे; ब्रह्म-मुखात् श्रुतम् = ब्रह्मा के मुख से सुना।

हिन्दी भावार्थ वक्ता सूर्य को — ग्रहपति और जगदुत्पत्ति का कारण — नमन कर घोषणा करते हैं कि वे वेद-नयन (ज्योतिष) का उपदेश देंगे, जैसा ब्रह्मा के मुख से सुना। यह पद ज्ञान-परम्परा की श्रृंखला बाँधता है: ब्रह्म-मुख → गुरु-वचन → शिष्य-श्रवण। सूर्य-वन्दना होरा में सूर्य की केन्द्रीयता का भी संकेत है।

English rendering “Bowing to the Sun—lord of the grahas, cause of the world’s arising—I shall declare the eye of the Veda as heard from the mouth of Brahmā.” Authority is traced: Brahmā → teacher → this horā teaching.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति-युक्त उपदेश-प्रतिज्ञा। “वेद-नयन” पारम्परिक विशेषण है, कोई अंश/अर्क नहीं; आगे के अध्यायों में ही वर्ग-विभाजन, दशा-वर्ष, बल-रूप आदि संख्यात्मक नियम आते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “यथा ब्रह्ममुखात् श्रुतम्” हमें याद दिलाता है कि यह संस्करण एक निश्चित पाठ पर पिन है — Sanskrit Wikisource, ९७ अध्याय, ३,९८५ श्लोक — जबकि अन्य मुद्रित पाठ (जैसे संक्षिप्त वल्गेट) भिन्न हैं; जहाँ पङ्क्ति विवादास्पद हो, हम “पाठ-भेद संभव” कहते हैं। आगे का “गणित” भाग (वर्ग, अष्टकवर्ग, दशा, षड्बल) उसी पाठ के नियमों को exact-`==` अनुशासन से जाँचा गया है — फल-कथन को भविष्य-वाणी नहीं बनाया जाता।

1.7
शान्ताय गुरुभक्ताय सर्वदा सत्यवादिने ।
आस्तिकाय प्रदतव्यं ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यति
śāntāya gurubhaktāya sarvadā satyavādine |
āstikāya pradatavyaṃ tataḥ śreyo hyavāpsyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शान्ताय = शान्त को; गुरु-भक्ताय = गुरु-भक्त को; सर्वदा सत्य-वादिने = सदा सत्य बोलने वाले को; आस्तिकाय = आस्तिक को; प्रदातव्यम् = देना चाहिए; ततः = तब; श्रेयः हि अवाप्स्यति = निश्चय श्रेय प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यह विद्या शान्त, गुरु-भक्त, सदा सत्यवादी और आस्तिक को दी जानी चाहिए; तब श्रेय की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान-दान की योग्यता और अनुशासन का पद है, न कि कोई गणना-सूत्र। गुरु-परम्परा में गोपनीयता और पात्रता का आग्रह यहाँ स्पष्ट है।

English rendering “It is to be given to the peaceful, devoted to the guru, ever truth-speaking, and āstika; then indeed one attains the good.” The text states the ethical conditions of transmission, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पात्रता/दान-नियम का फल-कथन। शास्त्र कहता है कि योग्य शिष्य को देने से श्रेय मिलता है — यह नैतिक-पारम्परिक कथन है; इसमें कोई अंश, वर्ष या बिन्दु-गणना निहित नहीं।

1.8
न देयं परशिष्याय नास्तिकाय शठय वा ।
दत्ते प्रतिदिनं दुःखं जायते नात्र संशयः
na deyaṃ paraśiṣyāya nāstikāya śaṭhaya vā |
datte pratidinaṃ duḥkhaṃ jāyate nātra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न देयम् = नहीं देना चाहिए; पर-शिष्य = दूसरे का शिष्य; नास्तिक = वेद/आस्तिक-परंपरा का निषेध करने वाला; शठ = छली/दुष्ट (पाठ-भेद: शठाय); दत्ते = दे दिए जाने पर; प्रतिदिनम् = प्रत्येक दिन; दुःखम् जायते = कष्ट उत्पन्न होता है; नात्र संशयः = इसमें सन्देह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यह ज्ञान पर-शिष्य को, नास्तिक को, अथवा शठ/छली व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। यदि अनुचित पात्र को दे दिया जाए, तो प्रतिदिन दुःख की उत्पत्ति होती है — ऐसा इस श्लोक में निश्चयपूर्वक कहा गया है। यह अध्याय का गोपनीयता-और-पात्रता-नियम है, न कि कोई फल-कथन।

English rendering The text states that this knowledge is not to be given to another’s pupil, to a nāstika, or to a rogue. If so given, daily sorrow arises — “there is no doubt here.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आचार-गोपनीयता / पात्रता-नियम। यह श्लोक ग्रह-राशि-वर्ग की गणना नहीं सिखाता; यह केवल संचरण की सीमा बताता है कि ज्ञान किसके लिए रोका गया है।

1.9
एकोऽव्यक्तात्मको विष्णुरनादिः प्रभुरीश्वरः ।
शुद्धसत्वो जगत्स्वामी निर्गुणस्त्रिगुणान्वितः
eko'vyaktātmako viṣṇuranādiḥ prabhurīśvaraḥ |
śuddhasatvo jagatsvāmī nirguṇastriguṇānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः = एकमात्र; अव्यक्त-आत्मकः = अव्यक्त-स्वरूप; विष्णुः = व्यापक परम; अनादिः = आदि-रहित; प्रभुः / ईश्वरः = स्वामी; शुद्ध-सत्त्वः = शुद्ध सत्त्व-प्रधान; जगत्-स्वामी = जगत् का स्वामी; निर्गुणः = गुणों से परे; त्रिगुण-अन्वितः = तीनों गुणों से युक्त भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सृष्टि-विवेचन का आरम्भ एक परम तत्त्व से करता है — अव्यक्त-स्वरूप, अनादि, प्रभु ईश्वर विष्णु। वह शुद्ध-सत्त्व कहा गया है, जगत् का स्वामी है; निर्गुण होते हुए भी त्रिगुण-संयुक्त कहा गया है। यह विरोधाभास-सा दिखने वाला युग्म (निर्गुण + त्रिगुणान्वित) आगे शक्ति-और-अवतार-क्रम का आधार बनता है।

English rendering The text states that the One, of unmanifest nature, is Viṣṇu — beginningless, the Lord, Īśvara; of pure sattva, master of the world; without the guṇas, yet endowed with the three guṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व-वर्णन / सृष्टि-आधार। यहाँ कोई अंश-विभाजन, वर्ष-संख्या या बल-इकाई नहीं; “एक” का अर्थ एकमात्र परम है, अंश-गणित बाद के श्लोकों में खुलता है।

1.10
संसारकारकः श्रीमान्निमित्तात्मा प्रतापवान् ।
एकांशेन जगत्सर्व सृजत्यवति लीलया
saṃsārakārakaḥ śrīmānnimittātmā pratāpavān |
ekāṃśena jagatsarva sṛjatyavati līlayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संसार-कारकः = संसार का हेतु; श्रीमान् = ऐश्वर्य-युक्त; निमित्त-आत्मा = निमित्त-कारण-स्वरूप; प्रतापवान् = प्रतापी; एक-अंशेन = एक अंश से; जगत् सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; सृजति = रचता है; अवति = पालता है; लीलया = क्रीड़ा/लीला से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वही श्रीमान्, निमित्त-आत्मा, प्रतापवान् संसार का कारक है। सम्पूर्ण जगत् को वह एक अंश से रचता और पालता है — और यह कर्म उसकी लीला कही गई है। “एकांशेन” यहाँ आगे के त्रिपाद–एकपात् भेद का बीज है: जगत्-सृष्टि पूर्ण तत्त्व का एक अंश-मात्र है।

English rendering The text states that the glorious, potent one — of instrumental nature — is the cause of saṃsāra. With a single portion he creates and protects the entire world, as līlā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंश-अवधारणा का बीज (फल-कथन नहीं, तत्त्व-वर्णन)। “एक अंश” यहाँ संख्यात्मक वग-विभाजन नहीं; पूर्ण का आनुपातिक भाग-भाव है, जिसे अगला श्लोक त्रिपाद/एकपात् में खोलता है।

1.11
त्रिपादं तस्य देवत्य ह्यमृतं तत्त्वदर्शिनः ।
विदन्ति तत्प्रमाणं च सप्रधानं तथैकपात्
tripādaṃ tasya devatya hyamṛtaṃ tattvadarśinaḥ |
vidanti tatpramāṇaṃ ca sapradhānaṃ tathaikapāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रि-पादम् = तीन पाद / तीन चौथाई; तस्य देवस्य = उस देव का (पाठ-भेद: देवत्य); अमृतम् = अमृत / अविनाशी; तत्त्व-दर्शिनः = तत्त्व-द्रष्टा; विदन्ति = जानते हैं; तत्-प्रमाणम् = उसका प्रमाण/माप; स-प्रधानम् = प्रधान (प्रकृति) सहित; तथा एक-पात् = तथा एक पाद / एक चौथाई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस देव का त्रिपाद अमृत है — तत्त्वदर्शी उसे जानते हैं; और उसके प्रमाण को, प्रधान सहित, तथा एक-पाद को भी जानते हैं। यह पुरुष-सूक्त-सदृश अनुपात है: पूर्ण का तीन भाग अमृत-अव्यक्त-क्षेत्र, एक भाग व्यक्त-जगत्। पाठ में “देवत्य” आदि रूपों पर पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that three-quarters of that Deity is immortal; the seers of truth know it, and know that measure together with the pradhāna, and likewise the one-quarter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आनुपातिक विभाजन (तत्त्व-माप, न कि कुण्डली-वर्ग):
पूर्ण = 4 पाद; अमृत/अव्यक्त = 3/4; व्यक्त-जगत्-भाग = 1/4।
यह D-वर्ग (राशि के 30° के समान अंश) नहीं; सृष्टि-तत्त्व का चतुष्पाद-माप है। पाठ-भेद संभव जहाँ “देवस्य/देवत्य” आदि रूप भिन्न मिलें।

उदाहरण (worked example) पूर्ण तत्त्व को 4 समान भाग मानें → प्रत्येक पाद = 1/4। त्रिपाद = 3 × 1/4 = 3/4 (अमृत-क्षेत्र, शास्त्रानुसार)। एकपात् = 1/4 (व्यक्त-जगत्-संबंधी भाग)। यह केवल शास्त्र-कथित अनुपात का संख्या-पाठ है; horoscope-longitude या ayanāṃśa यहाँ लागू नहीं।

1.12
व्यक्ताव्यक्तात्मको विष्णुर्वासुदेवस्तु गीयते ।
यदव्यक्तात्मको विष्णुः शक्तितद्वयसमन्वितः
vyaktāvyaktātmako viṣṇurvāsudevastu gīyate |
yadavyaktātmako viṣṇuḥ śaktitadvayasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यक्त-अव्यक्त-आत्मकः = व्यक्त और अव्यक्त दोनों स्वरूप; विष्णुः = व्यापक; वासुदेवः = वासुदेव नाम से; गीयते = गाया/कहा जाता है; यत् अव्यक्त-आत्मकः = जो अव्यक्त-स्वरूप; शक्ति-तद्-द्वय-समन्वितः = उन दो शक्तियों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्यक्त-अव्यक्त-आत्मक विष्णु वासुदेव के नाम से गाया जाता है। जो अव्यक्त-स्वरूप विष्णु है, वह दो शक्तियों से समन्वित कहा गया है। अगले श्लोक व्यक्त पक्ष को तीन शक्तियों से जोड़ते हैं — अव्यक्त = शक्ति-द्वय; व्यक्त = शक्ति-त्रय, यह क्रम यहाँ शुरू होता है।

English rendering The text states that Viṣṇu, of both manifest and unmanifest nature, is sung as Vāsudeva; and that Viṣṇu who is of unmanifest nature is endowed with a pair of śaktis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शक्ति-संख्या का तत्त्व-वर्णन। “द्वय” = 2 (अव्यक्त-पक्ष की शक्ति-संख्या); गणना-सूत्र नहीं, संरचना-सूची का आरम्भ।

1.13
व्यक्तात्मकस्त्रिभिर्युक्तः कथ्यतेऽनन्तशक्तिमान् ।
सत्त्वप्रधाना श्रीशक्तिर्भूशक्तिश्च रजोगुणा
vyaktātmakastribhiryuktaḥ kathyate'nantaśaktimān |
sattvapradhānā śrīśaktirbhūśaktiśca rajoguṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यक्त-आत्मकः = व्यक्त-स्वरूप; त्रिभिः युक्तः = तीनों से युक्त; कथ्यते = कहा जाता है; अनन्त-शक्तिमान् = अनन्त शक्ति वाला; सत्त्व-प्रधाना = सत्त्व-प्रधान; श्री-शक्तिः = श्री शक्ति; भू-शक्तिः = भू शक्ति; रजो-गुणा = रजस्-गुण वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्यक्त-स्वरूप (विष्णु) तीनों से युक्त है और अनन्त-शक्तिमान् कहा जाता है। श्री-शक्ति सत्त्व-प्रधान है; भू-शक्ति रजोगुणा कही गई है। तीसरी शक्ति का नाम-रूप अगले श्लोक में आता है — यहाँ दो नाम स्पष्ट हैं: श्री (सत्त्व) और भू (रजस्)।

English rendering The text states that the manifest form, joined with three, is called possessed of endless power. Śrī-śakti is sattva-predominant; Bhū-śakti is of the rajas guṇa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रि-शक्ति संरचना (तत्त्व-वर्णन)। “त्रिभिः” = 3 शक्तियाँ (व्यक्त पक्ष); गुण-आबंटन: श्री → सत्त्व, भू → रजस्; तीसरी (तमस्/नील) अगले श्लोक में।

1.14
शक्तिस्तृतीया या प्राक्ता नीलाख्या ध्वान्तरूपिणी ।
वासुदेवश्चतुर्थोऽभूच्छ्रीशक्त्या प्रेरितो यदा
śaktistṛtīyā yā prāktā nīlākhyā dhvāntarūpiṇī |
vāsudevaścaturtho'bhūcchrīśaktyā prerito yadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शक्तिः तृतीया = तीसरी शक्ति; या प्राक्ता = जो पहले कही गई; नील-आख्या = नीला नाम वाली; ध्वान्त-रूपिणी = अन्धकार-स्वरूपिणी (तमस्); वासुदेवः = वासुदेव; चतुर्थः अभूत् = चौथा हुआ; श्री-शक्त्या प्रेरितः = श्री-शक्ति से प्रेरित; यदा = जब।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तीसरी शक्ति — जो पहले संकेतित हुई — नीला नाम से जानी जाती है और ध्वान्त/अन्धकार-रूपिणी है (तमस्-पक्ष)। जब श्री-शक्ति से प्रेरित हुआ, तब वासुदेव चतुर्थ हुआ — यह अवतार/व्यक्त-क्रम का आरम्भ-सूत्र है। “चतुर्थ” यहाँ शक्ति-त्रय + वासुदेव का चतुष्क बनाता है, न कि कोई दशा-वर्ष।

English rendering The text states that the third śakti previously indicated is called Nīlā, of the form of darkness. When impelled by Śrī-śakti, Vāsudeva became the fourth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शक्ति-त्रय + वासुदेव-चतुष्क का संरचना-वर्णन। क्रम: (1) श्री-शक्ति (सत्त्व), (2) भू-शक्ति (रजस्), (3) नीला-शक्ति (ध्वान्त/तमस्), (4) वासुदेव — श्री-शक्ति-प्रेरणा से “चतुर्थ”। यह ṣoḍaśa-varga का D4 नहीं; सृष्टि-तत्त्व का चतुष्क्रम है।

1.15
संकर्षणश्च प्रद्युम्नोऽनिरुद्ध इति मूर्तिधृक् ।
तमःशक्त्याऽन्विता विष्णुर्देवः संकर्षणाभिधः
saṃkarṣaṇaśca pradyumno'niruddha iti mūrtidhṛk |
tamaḥśaktyā'nvitā viṣṇurdevaḥ saṃkarṣaṇābhidhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संकर्षण = विष्णु की प्रथम व्यूह-मूर्ति (आकर्षण/संकर्षण-रूप); प्रद्युम्न = द्वितीय व्यूह-मूर्ति; अनिरुद्ध = तृतीय व्यूह-मूर्ति; मूर्तिधृक् = रूप धारण करने वाला; तमःशक्त्या अन्वितः = तमस्-शक्ति से युक्त; विष्णुर्देवः = देव विष्णु; संकर्षणाभिधः = संकर्षण नाम से अभिहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ विष्णु के तीन व्यूह-रूपों का क्रम बताता है—संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। इन मूर्तियों में से संकर्षण-नामधारी विष्णु को तमःशक्ति से अन्वित कहा गया है। यह सृष्टि-वर्णन का वह चरण है जहाँ एक ही विष्णु विभिन्न शक्तियों से भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है।

English rendering The text names three forms of Viṣṇu—Saṃkarṣaṇa, Pradyumna, and Aniruddha. The deity Viṣṇu called Saṃkarṣaṇa is said to be accompanied by the power of tamas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-संवाद / व्यूह-वर्णन। यह श्लोक शक्ति-सहित मूर्ति-नामों का क्रम देता है; इसमें वर्ग, दशा या बल की कोई संख्या-विधि नहीं है।

1.16
प्रद्युम्नो रजसा शक्त्याऽनिरुद्धः सत्त्वया युतः ।
महान्संकर्षणाज्जातः प्रद्युम्नाद्यदहंअकृतिः
pradyumno rajasā śaktyā'niruddhaḥ sattvayā yutaḥ |
mahānsaṃkarṣaṇājjātaḥ pradyumnādyadahaṃakṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रद्युम्नः = द्वितीय व्यूह; रजसा शक्त्या = रजस्-शक्ति से; अनिरुद्धः = तृतीय व्यूह; सत्त्वया युतः = सत्त्व-शक्ति से युक्त; महान् = महत्तत्त्व / महान्; संकर्षणात् जातः = संकर्षण से उत्पन्न; प्रद्युम्नात् = प्रद्युम्न से; अहंकृतिः = अहंकार-तत्त्व (पाठ: यदहंअकृतिः — अहङ्कृतिः)।

हिन्दी भावार्थ प्रद्युम्न को रजस्-शक्ति से, अनिरुद्ध को सत्त्व-शक्ति से युक्त कहा गया है। संकर्षण से महान् का जन्म बताया गया है, और प्रद्युम्न से अहंकृति (अहंकार) का उदय। इस प्रकार तीन व्यूह तीन गुण-शक्तियों से जुड़े हैं, और उनसे आगे के तत्त्व-क्रम का बीज रखा गया है।

English rendering Pradyumna is joined with the power of rajas, Aniruddha with that of sattva. From Saṃkarṣaṇa the Great Principle (mahān) is said to arise; from Pradyumna, ahaṃkṛti (ego-principle).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व-क्रम / गुण-शक्ति-वर्णन। शक्ति-गुण का आरोपण यहाँ सृष्टि-शास्त्रीय कथ्य है; कोण, अंश या वर्ग-विभाग नहीं।

1.17
अनिरुद्धात्स्वयं जातो ब्रह्माहंकाकमूर्तिधृक् ।
सर्वषु सर्वशक्तिश्च स्वशक्त्याऽधिकया युतः
aniruddhātsvayaṃ jāto brahmāhaṃkākamūrtidhṛk |
sarvaṣu sarvaśaktiśca svaśaktyā'dhikayā yutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनिरुद्धात् = अनिरुद्ध से; स्वयं जातः = स्वयं उत्पन्न; ब्रह्मा = ब्रह्मा; अहंकार-मूर्तिधृक् = अहंकार-रूप धारण करने वाला (पाठ: ब्रह्माहंकाकमूर्तिधृक् — अहंकार-मूर्ति); सर्वेषु = सब में; सर्वशक्तिः = सर्व-शक्ति; स्वशक्त्या अधिकया युतः = अपनी अधिक/उत्कृष्ट शक्ति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अनिरुद्ध से ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न होते हैं, और वे अहंकार की मूर्ति धारण करते हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि सब में सर्वशक्ति व्याप्त है, और वह अपनी अधिक शक्ति से युक्त है। यह सृष्टि-शृंखला में व्यूह से ब्रह्मा-अहंकार तक का संक्रमण है।

English rendering From Aniruddha, Brahmā himself is said to be born, bearing the form of ahaṃkāra. And in all, the all-power is present, joined with its own superior śakti.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-क्रम / फल-कथन नहीं, तत्त्व-उत्पत्ति-वर्णन। यहाँ “जन्म” शब्द तात्त्विक उदय का है, काल-गणित का नहीं।

1.18
अहंकारस्त्रिध भूत्वा सर्वमेतद्विस्तरात् ।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्चेदहंकृतिः
ahaṃkārastridha bhūtvā sarvametadvistarāt |
sāttviko rājasaścaiva tāmasaścedahaṃkṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अहंकारः = अहंकार-तत्त्व; त्रिधा भूत्वा = तीन प्रकार होकर (पाठ: त्रिध); सर्वम् एतत् = यह सब; विस्तरात् = विस्तार से / विस्तारित होकर; सात्त्विकः = सत्त्व-प्रधान; राजसः = रजस्-प्रधान; तामसः = तमस्-प्रधान; अहंकृतिः = अहंकार की तीन धाराएँ।

हिन्दी भावार्थ अहंकार तीन रूप धारण कर इस समस्त विस्तार को फैलाता है। शास्त्र उन्हें सात्त्विक, राजस और तामस अहंकृति कहता है। तीन गुणों के अनुसार एक ही अहंकार तीन धाराओं में बँट जाता है—यही आगे देव, इन्द्रिय और भूत की उत्पत्ति का आधार बनेगा।

English rendering Ahaṃkāra, becoming threefold, expands all this. The text names those three as sāttvika, rājasa, and tāmasa ahaṃkṛti.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रिगुण-विभाजन / तत्त्व-वर्णन। “त्रिधा” यहाँ गणना-सूत्र नहीं, गुण-त्रय का गुणात्मक त्रिविध भेद है।

1.19
देवा वैकारिकाज्जातास्तैजसादिन्द्रियाणि ।
तामसच्चैवभू तानि खादीनि स्वस्वशक्तिभिः
devā vaikārikājjātāstaijasādindriyāṇi |
tāmasaccaivabhū tāni khādīni svasvaśaktibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवाः = देवगण; वैकारिकात् = वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार से; जाताः = उत्पन्न; तैजसात् = तैजस (राजस) अहंकार से; इन्द्रियाणि = ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय; तामसात् = तामस अहंकार से; च एव भूतानि = और भूत; खादीनि = आकाश आदि पञ्चमहाभूत; स्व-स्व-शक्तिभिः = अपनी-अपनी शक्तियों से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—वैकारिक अहंकार से देव उत्पन्न होते हैं, तैजस से इन्द्रियाँ, और तामस से आकाश आदि भूत, प्रत्येक अपनी शक्ति के साथ। यह सांख्य-क्रम से मेल खाता हुआ पाराशरी सृष्टि-वर्णन है: एक अहंकार की तीन धाराएँ तीन वर्ग की सृष्टि देती हैं।

English rendering From the vaikārika (sāttvika) ahaṃkāra the gods arise; from the taijasa, the senses; and from the tāmasa, the elements beginning with ākāśa—each with its own powers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व-उत्पत्ति-क्रम / वर्णन। “खादीनि” = आकाश से आरम्भ पञ्चभूत-शृंखला; यहाँ अंश-विभाग या वर्ग-नियम नहीं, केवल उद्भव-मार्ग का कथन है।

1.20
श्रीशक्त्या सहितो विष्णुः सदा पाति जगत्त्रयम् ।
भूशक्त्या सृजते ब्रह्मा नीलशक्त्या शिवोऽत्ति हि
śrīśaktyā sahito viṣṇuḥ sadā pāti jagattrayam |
bhūśaktyā sṛjate brahmā nīlaśaktyā śivo'tti hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रीशक्त्या सहितः = श्री-शक्ति से युक्त; विष्णुः = विष्णु; सदा पाति = सदैव पालन करता है; जगत्त्रयम् = तीनों लोक; भूशक्त्या = भू-शक्ति से; सृजते ब्रह्मा = ब्रह्मा सृष्टि करते हैं; नीलशक्त्या = नील-शक्ति से; शिवः अत्ति = शिव संहार/भक्षण करते हैं; हि = निश्चित रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—श्री-शक्ति से युक्त विष्णु सदा तीनों लोकों का पालन करते हैं; भू-शक्ति से ब्रह्मा सृजन करते हैं; नील-शक्ति से शिव संहार करते हैं। एक ही जगत्-कार्य त्रिमूर्ति और तीन शक्तियों में बँटा हुआ दिखाया गया है—पालन, सृजन, संहार।

English rendering Viṣṇu, joined with Śrī-śakti, always protects the three worlds; Brahmā creates with Bhū-śakti; and Śiva consumes (destroys) with Nīla-śakti—so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रिमूर्ति-शक्ति-वर्णन / स्तुति-सदृश सृष्टि-कर्म-विभाग। यहाँ तीन कर्म (पालन–सृजन–संहार) और तीन शक्ति-नाम हैं; कोई काल-मान या बल-इकाई नहीं।

1.21
सर्वेषु चैव जीवेषु परमात्मा विराजते ।
सर्वं हि तदिदं ब्रह्मन्स्थितं हि परमात्मनि
sarveṣu caiva jīveṣu paramātmā virājate |
sarvaṃ hi tadidaṃ brahmansthitaṃ hi paramātmani

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वेषु जीवेषु = सभी जीवों में; परमात्मा = परम आत्मा; विराजते = विराजमान है / चमकता है; सर्वम् हि तत् इदम् = यह सब ही; ब्रह्मन् = हे ब्रह्मन् (संबोधित); स्थितम् = स्थित; परमात्मनि = परमात्मा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—सभी जीवों में परमात्मा विराजते हैं, और यह समस्त जगत् परमात्मा में ही स्थित है। सृष्टि-अध्याय का यह श्लोक बहुलता को एक आधार में लौटाता है: जीव-जीव भेद रहते हुए भी अधिष्ठान एक है।

English rendering In all living beings the Supreme Self shines forth; and all this, O Brahman, is indeed situated in the Paramātman—so the text declares.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्यात्म-कथन / सृष्टि-उपसंहार। यह श्लोक संख्या, अंश या वर्ग नहीं देता; यह अधिष्ठान-एकत्व का सिद्धान्त-वाक्य है—गणित से अलग, व्याख्या से पहले का मूल कथ्य।

1.22
सर्वेषु चैव जीवेषु स्थितंह्यंशद्वयं क्वचित् ।
जीवांशो ह्यधिकस्तद्वत्परमात्मांशकः किल
sarveṣu caiva jīveṣu sthitaṃhyaṃśadvayaṃ kvacit |
jīvāṃśo hyadhikastadvatparamātmāṃśakaḥ kila

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वेषु जीवेषु = समस्त प्राणियों में; अंशद्वयं = दो अंश (हिस्से); स्थितं = स्थित / विद्यमान; क्वचित् = कहीं / कदाचित् (भेद-युक्त रूप में); जीवांशः = जीव-अंश (व्यष्टि चेतना का अंश); अधिकः = अधिक / प्रधान; परमात्मांशकः = परमात्मा का अंश; किल = निश्चयार्थक संकेत (“वास्तव में”)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि समस्त जीवों में दो प्रकार के अंश स्थित हैं। कहीं जीवांश अधिक होता है, और उसी रीति से कहीं परमात्मांश अधिक माना गया है। यह कथन सृष्टि-अवतार प्रकरण में जीवों की अंश-व्यवस्था का आधार-सूत्र है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष का फल-निर्णय।

English rendering The text states that in all living beings two portions are present; in some the jīva-portion predominates, and likewise in others the paramātma-portion is greater.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-वर्णन / अंश-व्यवस्था का सैद्धान्तिक कथन। यहाँ “अंशद्वय” गणनात्मक इकाई नहीं, अपितु जीव-परमात्मा की द्विविध अंश-अवधारणा का शास्त्रीय नामकरण है।

1.23
सूर्यादयो ग्रहाः सर्वे ब्रह्मकामद्विषादयः ।
एते चान्ये च बहवः परमात्मांशकाधिकाः
sūryādayo grahāḥ sarve brahmakāmadviṣādayaḥ |
ete cānye ca bahavaḥ paramātmāṃśakādhikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यादयः ग्रहाः = सूर्य से आरम्भ कर समस्त ग्रह; ब्रह्म-काम-द्विष-आदयः = ब्रह्मा, काम, द्विष (शत्रु/द्वेष-रूप) आदि (दिव्य-प्राणी-वर्ग; पाठ-भेद संभव); एते च अन्ये च बहवः = ये तथा और भी अनेक; परमात्मांशकाधिकाः = जिनमें परमात्मांश अधिक / प्रधान

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य आदि सभी ग्रह, तथा ब्रह्मा-काम-द्विष आदि और अन्य अनेक — ये परमात्मांश में अधिक माने गए हैं। अर्थात् इस वर्ग में परमात्मा-अंश की प्रधानता कही गई है, जीवांश की नहीं। यह ग्रह-अवतार प्रकरण की अंश-श्रेणीबद्धता है: गणना नहीं, स्वरूप-वर्णन।

English rendering The text states that the planets beginning with the Sun, and Brahmā, Kāma, Dviṣa and many others, are those in whom the paramātma-portion predominates.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवतार/अंश-वर्गीकरण का वर्णन। “परमात्मांशकाधिकाः” यहाँ फल-सूत्र या बलांक नहीं, सृष्टि-शास्त्र की श्रेणी-संज्ञा है।

1.24
शक्तयश्च तथैतेषमधिकांशाः श्रियादयः ।
स्वस्वशक्तिषु चान्यासु ज्ञेया जीवांशकाधिकाः
śaktayaśca tathaiteṣamadhikāṃśāḥ śriyādayaḥ |
svasvaśaktiṣu cānyāsu jñeyā jīvāṃśakādhikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शक्तयः = शक्तियाँ (इनकी सहचरी शक्ति-रूप); तथा = उसी प्रकार; एतेषाम् अधिकांशाः = इनमें से अधिक-अंश वाली; श्रियादयः = श्री (लक्ष्मी) आदि; स्वस्व-शक्तिषु = अपनी-अपनी शक्तियों में; अन्यासु = अन्य (शक्तियों) में; ज्ञेयाः = जाननी चाहिएं; जीवांशकाधिकाः = जिनमें जीवांश अधिक

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इन (परमात्मांश-प्रधान) देव-ग्रह-वर्ग की शक्तियाँ भी उसी क्रम में समझी जाएँ: उनमें अधिक-अंश वाली श्री आदि हैं। तथा अपनी-अपनी शक्ति-परंपरा की अन्य शक्तियों में वे ज्ञेय हैं जिनमें जीवांश अधिक कहा गया है। इस प्रकार शक्ति-जगत् में भी वही द्विविध अंश-भेद — परमात्मांश-प्रधान और जीवांश-प्रधान — लागू किया गया है।

English rendering The text states that the powers (śaktis) of these likewise include those of greater portion, beginning with Śrī; and among the other powers in their respective lines, those in whom the jīva-portion predominates are to be known as such.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शक्ति-वर्ग का अंश-वर्णन। यहाँ “अधिकांश / जीवांशकाधिक” कोई अंश-संख्या, वर्ग-भाग, या बल-इकाई नहीं देते; केवल सृष्टि-क्रम में शक्तियों का द्वैत-अंश वर्गीकरण है।

अध्यायः 2

अथावतारकथाः

13 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
यह अध्याय सृष्टि-क्रम के बाद उस तत्त्व-सूत्र को खोलता है जिसमें ग्रह केवल खगोलीय पिंड नहीं, अपितु परमात्मा के अवतार-रूप हैं। मुनि प्रश्न करते हैं—राम-कृष्णादि अवतार क्या पूर्ण हैं या जीवांश-संयुक्त; उत्तर में पूर्ण और अंशावतार का भेद, तथा सूर्य-चन्द्र-मंगल-बुधादि से राम-कृष्ण-नृसिंह-बुद्ध का क्रम स्पष्ट होता है। दैत्य-बल-नाश, देव-बल-वृद्धि और धर्म-संस्थापन—ये तीन प्रयोजन ग्रहों के शुभ-क्रम में बँधते हैं; साथ ही “जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः” यह सूत्र बताता है कि फल-दान का माध्यम ग्रह-रूप है। यहाँ गणना नहीं, स्वरूप-बोध है—अगले अध्यायों के राशि-ग्रह-वर्ग-बल का आध्यात्मिक आधार यही कथा देती है।

For the English reader:
Adhyāya 2 is the theological hinge of the Hora: after creation comes the mapping of divine descent onto the planets. Parāśara answers whether the great avatāras are full or partial, names Rāma, Kṛṣṇa, Nṛsiṃha and the rest as solar, lunar and other planetary descents, and states the purpose—curbing asuric force, strengthening the divine order, and upholding dharma—while locating Janārdana as the giver of karma-phala through the grahas. Read it as ontology, not ephemeris: the sky’s agents are forms of the One, and every later rule of strength and result rests on this premise.

मुख्य गणित/तकनीक:
- मुख्यतः फल/वर्णन-अध्याय
- पूर्ण vs जीवांश अवतार-भेद (वर्णनात्मक, संख्यात्मक सूत्र नहीं)
- ग्रह ↔ अवतार संयोग: सूर्य–राम, चन्द्र–कृष्ण (यदुनायक), भूमिपुत्र–नृसिंह, सोमसुत–बुद्ध (पाठानुसार)
- फल-सूत्र: ग्रहरूपी जनार्दन = जीवों के कर्म-फल का माध्यम (सिद्धान्त-वाक्य, गणना-इंजन नहीं)

डिकोड-सेतु:
इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

2.1
रामकृष्णादयो ये ह्यवतारा रमापतेः।
तेऽपि जीवांशसंयुक्ताः किंवा ब्रूहि मुनिश्वर
rāmakṛṣṇādayo ye hyavatārā ramāpateḥ|
te'pi jīvāṃśasaṃyuktāḥ kiṃvā brūhi muniśvara

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रामकृष्णादयः = राम, कृष्ण आदि (विष्णु के प्रसिद्ध अवतार); अवताराः = अवतरण-रूप; रमापतेः = रमा (लक्ष्मी) के पति = विष्णु; जीवांश-संयुक्ताः = जीव-अंश से युक्त (परमात्मा-अंश के सापेक्ष जीव-भाग); किंवा = अथवा (क्या… या…); मुनिश्वर = मुनि-श्रेष्ठ (पाराशर को सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ मैत्रेय मुनिश्वर पाराशर से पूछते हैं — राम, कृष्ण आदि जो रमापति के अवतार कहे जाते हैं, क्या वे भी जीव-अंश से युक्त होते हैं, अथवा उनकी स्थिति भिन्न है? यह प्रश्न आगे की अवतार-वर्गीकरण (पूर्ण vs जीवांश) की भूमि तैयार करता है। स्वर विनयपूर्ण जिज्ञासा का है, न कि फल-कथन का।

English rendering Maitreya asks the sage: are the descents of the Lord of Ramā—Rāma, Kṛṣṇa and the rest—also joined with a jīva-portion, or how else should they be understood? The verse opens the avatāra inquiry that the next answers resolve.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न। यह अध्याय की अवतार-रेखा का प्रश्न-सूत्र है; कोई अंश-मान, भोग या गणना यहाँ नहीं दी गई।

2.2
रामः कृष्णश्च भो विप्र नृसिंहः सूकरस्तथा।
एते पूर्णावताराश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विताः
rāmaḥ kṛṣṇaśca bho vipra nṛsiṃhaḥ sūkarastathā|
ete pūrṇāvatārāśca hyanye jīvāṃśakānvitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रामः कृष्णः = राम और कृष्ण; नृसिंहः = नर-सिंह अवतार; सूकरः = वराह (सूकर) अवतार; पूर्णावताराः = पूर्ण अवतार (परमात्मा-अंश प्रधान); अन्ये = शेष अवतार; जीवांशक-अन्विताः = जीवांश से युक्त; भो विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय को उत्तर)।

हिन्दी भावार्थ पाराशर उत्तर देते हैं — हे विप्र, राम, कृष्ण, नृसिंह और सूकर (वराह) — ये पूर्ण अवतार कहे गए हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अवतार जीवांश से अन्वित माने गए हैं। शास्त्र यहाँ “पूर्ण” और “जीवांशक” का द्विविध भेद स्थिर करता है; यह वर्गीकरण पाठ-परंपरा में आगे ग्रह-अवतार सूची से जुड़ता है।

English rendering The sage replies: Rāma, Kṛṣṇa, Nṛsiṃha and the Boar are the complete descents; the others are those endowed with a jīva-portion. The verse fixes a two-class scheme of avatāra within this recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण-कथन। “पूर्ण” बनाम “जीवांशक” एक गुणात्मक भेद है; कोई संख्यात्मक अंश-मान श्लोक में नहीं दिया।

2.3
अवताराण्यनेकानि ह्यजस्य परमात्मनः।
जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः
avatārāṇyanekāni hyajasya paramātmanaḥ|
jīvānāṃ karmaphalado graharūpī janārdanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अवताराणि अनेकानि = अनेक अवतरण; अजस्य = अजन्मा (ब्रह्म/परमात्मा); परमात्मनः = परम आत्मा के; जीवानाम् = जीवों के; कर्म-फल-दः = कर्म का फल देने वाला; ग्रह-रूपी = ग्रह-रूप धारण कर; जनार्दनः = विष्णु (जन-पीड़ा-हरण)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अज परमात्मा के अवतार अनेक हैं। वही जनार्दन ग्रह-रूप में जीवों को उनके कर्म का फल देता है। यहाँ ज्योतिष की मूल कड़ी स्पष्ट होती है: ग्रह केवल खगोलीय पिंड नहीं, अपितु कर्म-फल-वितरण की दैवी व्यवस्था का रूप माने गए हैं — यह कथन शास्त्र का अपना है, न कि हमारे द्वारा निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering The text states that the unborn Supreme Self has many descents, and that Janārdana, appearing in planetary form, is the giver of the fruits of beings’ deeds. Graha is thus framed as the instrument of karmic result within the śāstra’s own voice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सिद्धान्त-वर्णन। कर्म-फल-दान का नियम यहाँ नैतिक-दैवी ढाँचा है; कोई दशा-वर्ष, बल-रূপ या वर्ग-भाग नहीं।

2.4
दैत्यानां बलनाशाय देवानां बलबृद्धये।
धर्मसंस्तापनार्थाय ग्रहाज्जाताः शुभाः क्रमात्‌
daityānāṃ balanāśāya devānāṃ balabṛddhaye|
dharmasaṃstāpanārthāya grahājjātāḥ śubhāḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दैत्यानाम् बल-नाशाय = दैत्य-बल के नाश हेतु; देवानाम् बल-बृद्धये = देव-बल की वृद्धि हेतु; धर्म-संस्थापन-अर्थाय = धर्म की स्थापना के लिए; ग्रहात् जाताः = ग्रहों से उत्पन्न; शुभाः = शुभ/मंगल (अवतार); क्रमात् = क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दैत्यों का बल घटाने, देवों का बल बढ़ाने और धर्म की स्थापना के लिए शुभ अवतार ग्रहों से क्रमशः उत्पन्न हुए। यह श्लोक अगली सूची (सूर्य से केतु तक अवतार-ग्रह युग्म) का प्रयोजन-वाक्य है। “शुभाः” यहाँ अवतारों के लिए प्रयुक्त है; कोई ग्रह-शुभ/अशुभ फल-तालिका इस पंक्ति में नहीं है।

English rendering The text states that the auspicious descents arose from the planets, in order, for crushing the strength of the daityas, increasing that of the gods, and establishing dharma. The verse supplies the purpose-clause for the graha–avatāra sequence that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रयोजन/वर्णन। “क्रमात्” आगामी ग्रह-क्रम की ओर संकेत करता है; स्वयं कोई संख्या-सूत्र नहीं देता।

2.5
रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः।
भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च
rāmo'vatāraḥ sūryasya candrasya yadunāyakaḥ|
[https://puranastudy.freevar.com/pur%20index16/nrisimha.html nṛsiṃho] bhūmiputrasya buddhaḥ somasutasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रामः = राम; अवतारः सूर्यस्य = सूर्य का अवतार; चन्द्रस्य यदु-नायकः = चन्द्र का अवतार = यदु-नायक (कृष्ण); नृसिंहः भूमि-पुत्रस्य = नृसिंह = भूमि-पुत्र (मंगल) का; बुद्धः सोम-सुतस्य = बुद्ध = सोम-सुत (बुध) का।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की युग्म-सूची आरंभ होती है — राम सूर्य का अवतार; यदुनायक कृष्ण चन्द्र का; नृसिंह भूमि-पुत्र मंगल का; बुद्ध सोम-सुत बुध का। यह अवतार↔ग्रह संगतता (correspondence) है — गणना नहीं, किन्तु आगे के अध्यायों में ग्रह-स्वरूप समझने का शास्त्रीय नक्शा। पाठ-भेद अन्य संहिताओं में अवतार-नामों को लेकर संभव।

English rendering The text maps: Rāma to the Sun; the Yadu-lord (Kṛṣṇa) to the Moon; Nṛsiṃha to Earth’s son (Mars); Buddha to Soma’s son (Mercury). It is a fixed graha–avatāra correspondence table in this recension (variant lists elsewhere: पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संगतता-तालिका (mapping)। चार युग्म: सूर्य→राम, चन्द्र→कृष्ण, मंगल→नृसिंह, बुध→बुद्ध। कोई अंश, वर्ष या बल-इकाई नहीं।

2.6
वामनो विबुधेज्यस्य भार्गवो भार्गवस्य च।
कूर्मो भास्करपुत्रस्य सैंहिकेयस्य सूकरः
vāmano vibudhejyasya bhārgavo bhārgavasya ca|
<ref>[https://vedastudy.yolasite.com/kuurma.php kūrmopari ṭippaṇī]</ref>kūrmo bhāskaraputrasya <ref>[https://vedastudy.tripod.com/pur_index25/rahu.htm rāhu upari saṃkṣipta ṭippaṇī]</ref>saiṃhikeyasya <ref>[http://puranastudy.byethost14.com/pur_index26/varaah2.htm varāha upari ṭippaṇī]</ref>sūkaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वामनः विबुध-इज्यस्य = वामन = विबुध-इज्य (देव-गुरु बृहस्पति) का; भार्गवः भार्गवस्य = परशुराम (भृगु-वंश) = भार्गव (शुक्र) का; कूर्मः भास्कर-पुत्रस्य = कूर्म = भास्कर-पुत्र (शनि) का; सैंहिकेयस्य सूकरः = सिंहिका-पुत्र (राहु) का सूकर/वराह।

हिन्दी भावार्थ सूची आगे बढ़ती है — वामन बृहस्पति का; भार्गव (परशुराम) शुक्र का; कूर्म शनि का; सूकर (वराह) सैंहिकेय राहु का। “भार्गव” शब्द दो बार आता है: एक अवतार-नाम, एक ग्रह-नाम (शुक्र) — शास्त्रीय शब्द-प्रयोग; संशय होने पर पाठ-भेद संभव न कहकर यहाँ अर्थ-भेद समझना चाहिए। राहु-वराह युग्म इस पाठ में स्पष्ट है।

English rendering Continuing the map: Vāmana belongs to the gods’ preceptor (Jupiter); Bhārgava (Paraśurāma) to Venus; the Tortoise to the Sun’s son (Saturn); the Boar to Siṃhikā’s son (Rāhu). Four further fixed pairs complete the middle of the list.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संगतता-तालिका। युग्म: गुरु→वामन, शुक्र→परशुराम, शनि→कूर्म, राहु→वराह/सूकर।

2.7
केतोर्मीनावतारश्च ये चान्ये तेऽपि खेटजाः।
परात्मांशोऽधिको येषु ते सर्वे खेचराभिधः
ketormīnāvatāraśca ye cānye te'pi kheṭajāḥ|
parātmāṃśo'dhiko yeṣu te sarve khecarābhidhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः मीन-अवतारः = केतु का मत्स्य/मीन अवतार; ये च अन्ये = और जो अन्य हैं; ते अपि खेट-जाः = वे भी खेट (ग्रह) से उत्पन्न; परात्मा-अंशः अधिकः = जिनमें परमात्मा-अंश अधिक; ते सर्वे खेचर-अभिधाः = वे सब खेचर-नाम से अभिहित (ग्रह-रूप/ग्रह-संज्ञक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — केतु का अवतार मीन (मत्स्य) है; अन्य जो भी हैं, वे भी खेट-ज कहे गए। जिनमें परमात्मा-अंश अधिक है, वे सब खेचर-अभिध हैं — अर्थात् ग्रह-संज्ञा से जाने जाते हैं। २.५–२.७ मिलकर नव-खेट की अवतार-सूची पूरी करते हैं; “अंश अधिक” यहाँ गुणात्मक भेद (पूर्णता) की ओर लौटता है, कोई संख्यात्मक अंश-मान नहीं देता।

English rendering The text assigns the Fish descent to Ketu and states that the remaining figures likewise arise from the planets; those in whom the Supreme Self’s portion is greater are all designated khecara. With 2.5–2.6 this closes the ninefold graha–avatāra map of the chapter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संगतता-तालिका + अंश-सिद्धान्त। केतु→मीन; पूर्ण सूची (इस पाठ): सूर्य-राम, चन्द्र-कृष्ण, मंगल-नृसिंह, बुध-बुद्ध, गुरु-वामन, शुक्र-परशुराम, शनि-कूर्म, राहु-वराह, केतु-मत्स्य। “परात्मांशोऽधिकः” गुणात्मक कसौटी है, मापनीय अंश नहीं।

2.8
जीवांशोह्यधिको येषु जीवास्ते चै प्रकीर्तितः।
सूर्यादिभो ग्रहेभ्यश्च परमात्मांशनिःसृताः
jīvāṃśohyadhiko yeṣu jīvāste cai prakīrtitaḥ|
sūryādibho grahebhyaśca paramātmāṃśaniḥsṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवांशः = जीव-अंश / व्यक्तिगत चेतन-अंश; अधिकः = अधिक / प्रधान; जीवाः = जीव (व्यष्टि चेतन); प्रकीर्तिताः = कथित / नामित; सूर्यादिभ्यः ग्रहेभ्यः = सूर्य आदि ग्रहों से; परमात्मांशनिःसृताः = परमात्मा के अंश से निःसृत / उद्भूत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिनमें जीवांश अधिक होता है, वे जीव कहलाते हैं। और ये सब सूर्यादि ग्रहों के माध्यम से परमात्मांश से निःसृत माने गए हैं। यहाँ जीवत्व को ग्रह-माध्यम से परमात्मांश की व्यष्टि-अभिव्यक्ति के रूप में रखा गया है — गणना नहीं, सृष्टि-अवतार-सिद्धान्त का पद है।

English rendering The text states that those in whom the jīvāṃśa predominates are called jīvas; and these, it says, issue from the Paramātmāṃśa through the planets beginning with the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि/अवतार-वर्णन। यह पद अंश-भेद (परमात्मांश → ग्रह → जीव) का सिद्धान्तिक क्रम बताता है; अंश यहाँ वर्ग-अंश या भाग-गणना नहीं, चेतन-प्रवाह का पद है।

2.9
रामकृष्णादयः सर्व ह्यवतारा भवन्ति चै।
तत्रैव ते विलीयन्ते पुनः कार्योत्तर सदा
rāmakṛṣṇādayaḥ sarva hyavatārā bhavanti cai|
tatraiva te vilīyante punaḥ kāryottara sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रामकृष्णादयः = राम, कृष्ण आदि; सर्वे अवताराः = सभी अवतार; भवन्ति = होते हैं; तत्र एव = उसी (स्रोत) में; विलीयन्ते = लीन हो जाते हैं; कार्योत्तरम् = कार्य-समाप्ति के पश्चात्; सदा = सदैव / नियमतः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राम, कृष्ण आदि सभी अवतार हैं। अपना कार्य पूरा होने पर वे सदा उसी स्रोत में पुनः विलीन हो जाते हैं। यह अवतार की आवृत्ति और लौटने का क्रम है — जन्म-कथा का फल-कथन नहीं, अवतार-सिद्धान्त का संक्षेप।

English rendering The text states that Rāma, Kṛṣṇa and the like are all avatāras; and that, after their work is done, they always dissolve again into that very source.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवतार-वर्णन। “कार्योत्तर विलय” यहाँ लौकिक काल-सूत्र नहीं; सिद्धान्त का पुनः-संहार-क्रम है।

2.10
जीवांशनिःसृतास्तेषां तेभ्यो जाता नरादयः।
तेऽपि तत्रैव लीयन्ते तेऽव्यक्ते समयन्ति हि
jīvāṃśaniḥsṛtāsteṣāṃ tebhyo jātā narādayaḥ|
te'pi tatraiva līyante te'vyakte samayanti hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवांशनिःसृताः = जीवांश से निःसृत; तेषां / तेभ्यः = उनके / उनसे; जाताः नरादयः = मनुष्य आदि उत्पन्न; लीयन्ते = लीन होते हैं; अव्यक्ते = अव्यक्त में; समयन्ति = समा जाते / प्रवेश करते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जीवांश से निःसृत उन (जीव/ग्रह-प्रवाह) से मनुष्य आदि जन्म लेते हैं। वे भी उसी में लीन होते हैं और अव्यक्त में समा जाते हैं। पहले पदों का क्रम यहाँ पूरा होता है: परमात्मांश → ग्रह → जीव → नर — और अंत में पुनः अव्यक्त।

English rendering The text states that humans and the like are born from those who issued from the jīvāṃśa; they too dissolve there and enter the unmanifest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-संहार-वर्णन। “निःसृति → जन्म → लय → अव्यक्त” एक चक्रीय आख्या है; यहाँ कोई अंश-भाग, दशा-वर्ष या बल-इकाई कूटित नहीं।

2.11
इदं ते कथितं विप्र सर्वं यस्मिन्‌ भवेदिति।
भूतान्यपि भविष्यन्ति तत्तज्जातन्ति तद्विदः
idaṃ te kathitaṃ vipra sarvaṃ yasmin‌ bhavediti|
bhūtānyapi bhaviṣyanti tattajjātanti tadvidaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इदं ते कथितम् = यह तुम्हें कहा गया; विप्र = हे ब्राह्मण / शिष्य-संबोधन; सर्वम् यस्मिन् भवेत् = जिसमें सब कुछ स्थित हो; भूतानि = भूत / अतीत; भविष्यन्ति = भविष्यत्; तद्विदः = उसके जानने वाले; तत्तज्जानन्ति / तत्तज्जातन्ति = तत्-तत् को जानते हैं (पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे विप्र, वह सब तुम्हें कहा गया जिसमें यह समग्र व्यवस्था निहित है। उसके जानने वाले भूत और भविष्य को भी उनके-उनके रूप में जानते हैं — यह शास्त्र का अपना दावा है, कोई काल-भविष्यवाणी का इंजन नहीं। “जातन्ति” पाठ में भेद संभव; भाव “जानन्ति / जानने” की ओर है।

English rendering The text says: O Brahmin, all this has been told to you — that in which everything is held; and those who know it, the text claims, know past and future in their respective forms. (Reading of जातन्ति: पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार / अधिकार-कथन। “भूत–भविष्य ज्ञान” यहाँ ज्योतिष-शास्त्र की महिमा का पद है; कोई दशा-सूत्र, वर्ग-नियम या अष्टकवर्ग-बिन्दु नहीं दिया गया।

2.12
विना तज्ज्यैतिषं नान्यो ज्ञातुं शक्नोति कर्हिचित्‌।
तत्मादवश्यमध्येयं ब्राह्मणेश्च विशेषतः
vinā tajjyaitiṣaṃ nānyo jñātuṃ śaknoti karhicit‌|
tatmādavaśyamadhyeyaṃ brāhmaṇeśca viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विना तत् ज्यौतिषम् = उस ज्योतिष के बिना; न अन्यः = कोई अन्य नहीं; ज्ञातुम् शक्नोति = जानने में समर्थ; कर्हिचित् = कभी भी; तस्मात् = इसलिए; अवश्यम् अध्येयम् = अवश्य अध्येय / पढ़ने-योग्य; ब्राह्मणैः विशेषतः = ब्राह्मणों द्वारा विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस ज्योतिष के बिना कोई कभी (इस समग्र को) जान नहीं सकता। अतः यह अवश्य अध्येय है, और ब्राह्मणों के लिए विशेष रूप से। यह अध्ययन का निर्देश है — भय या दबाव का उपाय-विधान नहीं; पाठ अध्ययन-अधिकार और आवश्यकत्व पर ठहरता है।

English rendering The text states that without that jyotiṣa no one can ever know (this); therefore it must certainly be studied, and especially by brāhmaṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्येयत्व / अधिकार-कथन। “अवश्यमध्येयम्” अध्ययन-अनुशासन का पद है; यहाँ कोई गणना-सूत्र नहीं, केवल शास्त्र-अध्ययन की अनिवार्यता का वचन।

2.13
यो नरः शास्त्रमज्ञात्वा ज्यौतिषं खलु निन्दति।
रौरवं नरकं भुक्त्वा चान्धत्वं चान्यजन्मनि
yo naraḥ śāstramajñātvā jyautiṣaṃ khalu nindati|
rauravaṃ narakaṃ bhuktvā cāndhatvaṃ cānyajanmani

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यः नरः = जो मनुष्य; शास्त्रम् अज्ञात्वा = शास्त्र को जाने बिना; ज्यौतिषम् निन्दति = ज्योतिष की निंदा करता है; रौरवं नरकम् = रौरव नरक; भुक्त्वा = भोगकर; अन्धत्वम् = अन्धत्व; अन्यजन्मनि = अन्य जन्म में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो मनुष्य शास्त्र को जाने बिना ज्योतिष की निंदा करता है, वह रौरव नरक भोगकर अन्य जन्म में अन्धत्व भी भोगता है। यह शास्त्र का अपना निंदा-फल कथन है — हम इसे नियति या डर का दावा नहीं बनाते; केवल पाठ का वचन रखते हैं। अनुशासन: अज्ञान में निंदा से बचो, अध्ययन करो — भय-वाणिज्य नहीं।

English rendering The text states that a person who, without knowing the śāstra, reviles jyotiṣa experiences the Raurava hell and, in another birth, blindness. This is the śāstra’s own phala-claim, not a fate we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निंदा-फल)। रौरव और अन्धत्व शास्त्रोक्त परिणाम के रूप में पढ़ें; कोई दशा-वर्ष, बल-इकाई या वर्ग-अंश यहाँ कूटित नहीं — केवल पाठ की नैतिक-शास्त्रीय चेतावनी का स्वर।

अध्यायः 3

ग्रहगुणस्वरूपाध्यायः

74 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
सृष्टि और ग्रहावतरण के बाद मैत्रेय पूछते हैं—ग्रहों का गुण और स्वरूप क्या है। पराशर उत्तर देते हैं: आकाश में जो ज्योतिर्बिम्ब दिखते हैं, उनमें कुछ स्थिर नक्षत्र-संज्ञक हैं, कुछ चलते हुए ग्रह। भचक्र के सत्ताईस अश्विन्यादि अंश और उसके बारह तुल्य मेषादि राशियाँ—यही नाम और स्थान की आधार-रेखा है; जो भानि को गृहण करते हुए निरंतर गमन करते हैं, वे ग्रह हैं, अर्कादि संज्ञक। इस अध्याय में उन्हीं ग्रहों के गुण, स्वभाव, रूप, वर्ण, तत्त्व, देवता, लिंग-वर्ण-आदि लक्षण और पारस्परिक संबंध शास्त्र-रूप में कहे गए हैं—फल यहाँ “पाठ का कथन” है, नियति का दावा नहीं। बिना इस स्वरूप-परिचय के आगे का राशि-भाव, वर्ग, दृष्टि और बल—सब अधूरा रहता है।

For the English reader:
After creation and the planetary descents, the conversation turns to definition: what, in the sky of many light-disks, is a fixed star-name, and what is a planet. Parāśara’s answer is spare and structural—twenty-seven named lunar mansions on the ecliptic circle, twelve equal solar signs from Meṣa, and the grahas as the bodies that move and take those fixed places. The rest of the chapter is the classic catalogue of planetary nature: quality, form, colour, element, deity, gender, temperament, and mutual standing—stated as the śāstra’s inventory, not as fate. Read it as the naming layer on which every later map is drawn.

मुख्य गणित/तकनीक:
- भचक्र-विभाजन: \(N = 27\) नक्षत्र-अंश (अश्विनी से), स्थिर स्थान-नाम।
- राशि-विभाजन: उसी चक्र के \(12\) तुल्य भाग \(\Rightarrow\) प्रत्येक राशि \(= 30^\circ\) (मेषादि संज्ञा)।
- ग्रह-परिभाषा: \(\text{ग्रह} =\) वे ज्योतिर्बिम्ब जो भानि को गृहण कर सतत गमन करते हैं; नाम-क्रम अर्क (सूर्य) से।
- शेष अध्याय मुख्यतः गुण–स्वरूप–वर्णन (फल/लक्षण-पाठ); गणना-इंजन यहाँ नाम और निर्देशांक की नींव रखता है।

डिकोड-सेतु:
इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

3.1
कथितं भवता प्रेम्णा ग्रहावतरणं मुने।
तेषं गुणस्वरूपाद्यं कृपया कथ्यतां पुनः
kathitaṃ bhavatā premṇā grahāvataraṇaṃ mune|
teṣaṃ guṇasvarūpādyaṃ kṛpayā kathyatāṃ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कथितं = कहा गया; भवता = आपके द्वारा; प्रेम्णा = प्रेम/स्नेह से; ग्रह-अवतरणं = ग्रहों का अवतार-वर्णन; मुने = हे मुनि; तेषां = उनका; गुण-स्वरूप-आद्यं = गुण, स्वरूप आदि; कृपया = कृपा करके; कथ्यतां = कहा जाए; पुनः = फिर से

हिन्दी भावार्थ शिष्य (मैत्रेय) मुनि से निवेदन करता है कि आपने प्रेमपूर्वक ग्रहों के अवतरण का वर्णन पहले कर दिया। अब कृपा करके उन्हीं ग्रहों के गुण, स्वरूप और सम्बद्ध लक्षणों को पुनः विस्तार से बतलाइए। यह अध्याय का आरम्भ-संवाद है — विषय-प्रवेश का द्वार।

English rendering The disciple says: O sage, you have lovingly set forth the descent (avatāra) of the grahas; now, of your grace, please tell again their qualities, nature, and related attributes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न-सूत्र। यह श्लोक गणना नहीं सिखाता; अध्याय-३ (ग्रह-राशि-स्वरूप) का द्वार खोलता है, जहाँ आगे नक्षत्र-२७, राशि-१२ और लग्न की परिभाषाएँ आएंगी।

3.2
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि भग्रहाणां परिस्थितिम्‌।
आकाशे यानि दृश्यन्ते ज्योतिर्बिम्बात्यनेकशः
śṛṇu vipra pravakṣyāmi bhagrahāṇāṃ paristhitim‌|
ākāśe yāni dṛśyante jyotirbimbātyanekaśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शृणु = सुनो; विप्र = हे ब्राह्मण/शिष्य; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; भ-ग्रहाणां = आकाश-पिण्डों/नक्षत्र-ग्रहों की; परिस्थितिम् = स्थिति/व्यवस्था; आकाशे = आकाश में; यानि = जो; दृश्यन्ते = दिखाई देते हैं; ज्योतिर्-बिम्बाति = ज्योति-बिम्ब (प्रकाशमान चक्र); अनेकशः = अनेक

हिन्दी भावार्थ मुनि कहते हैं — हे विप्र, सुनो; मैं भ-ग्रहों की व्यवस्था बतलाता हूँ। आकाश में अनेक ज्योति-बिम्ब दिखाई देते हैं। पहले दृष्टि-गोचर पिण्डों का सामान्य उल्लेख है; अगले श्लोकों में स्थिर और चल का भेद स्पष्ट होगा।

English rendering Listen, O learned one: I shall set forth the disposition of the celestial bodies. In the sky many luminous disks are seen.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/विषय-उद्घाटन। “भ-ग्रह” यहाँ अभी साधारण आकाश-पिण्डों का समूह है; वर्गीकरण श्लोक ३.३–३.५ में आता है।

3.3
तेषु नक्षत्रसंज्ञानि ग्रहसंज्ञानि कानिचित्‌।
तानि नक्षत्रनामानि स्थिरस्थानानि यानि चै
teṣu nakṣatrasaṃjñāni grahasaṃjñāni kānicit‌|
tāni nakṣatranāmāni sthirasthānāni yāni cai

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेषु = उनमें; नक्षत्र-संज्ञानि = नक्षत्र-नाम वाले; ग्रह-संज्ञानि = ग्रह-नाम वाले; कानिचित् = कुछ; तानि = वे; नक्षत्र-नामानि = नक्षत्र कहलाने वाले; स्थिर-स्थानानि = स्थिर स्थान वाले; यानि = जो; च = और

हिन्दी भावार्थ उन्हीं ज्योति-बिम्बों में कुछ नक्षत्र-संज्ञक हैं और कुछ ग्रह-संज्ञक। जो स्थिर स्थान रखते हैं, वे नक्षत्र-नाम से जाने जाते हैं। शास्त्र यहाँ “स्थिर” और (अगले श्लोक में) “गमनशील” का स्पष्ट भेद खड़ा करता है — गणना का आधार इसी भेद पर टिका है।

English rendering Among them, some are designated nakṣatras and some grahas. Those that hold fixed places are the ones known by nakṣatra-names.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिभाषा/वर्गीकरण। स्थिर = background ecliptic markers (नक्षत्र); चल = grahas — आगे २७/१२ विभाजन इसी पर बैठता है। पाठ में “यानि चै” अधूरा-सा लगता है — पाठ-भेद संभव।

3.4
गच्छन्तो भानि गृह्णन्ति सततं ये तु ते ग्रहः।
भचक्रस्य नगश्व्यंशा अश्विन्यादिसमाह्वयाः
gacchanto bhāni gṛhṇanti satataṃ ye tu te grahaḥ|
bhacakrasya nagaśvyaṃśā aśvinyādisamāhvayāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गच्छन्तः = गति करते हुए; भानि = भ/नक्षत्र-स्थानों को; गृह्णन्ति = ग्रहण करते/व्याप्त करते हैं; सततं = निरन्तर; ये = जो; तु = तो; ते = वे; ग्रहाः = ग्रह; भ-चक्रस्य = भ-चक्र (नक्षत्र-मण्डल) के; नग-अश्वि-अंशाः = २७ अंश/भाग (भूतसंख्या: अश्वि=२, नग=७ → वामतो गति से २७); अश्विनी-आदि-समाह्वयाः = अश्विनी आदि नाम वाले

हिन्दी भावार्थ जो निरन्तर गति करते हुए भ-स्थानों को ग्रहण करते हैं, वे ही ग्रह कहलाते हैं। भ-चक्र के सत्ताईस (नग-अश्वि) भाग अश्विनी से आरम्भ नामों से जाने जाते हैं। यह ज्योतिष-गणित का मूल स्तम्भ है — २७ नक्षत्रों का समान विभाजन।

English rendering Those that continually move and occupy the celestial stations are the grahas. The circle of the stars has twenty-seven parts, named beginning with Aśvinī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भ-चक्र = ३६०°। नक्षत्र-संख्या भूतसंख्या से: नग-अश्वि-अंश = २७ (अश्वि=२, नग=७; अङ्कानां वामतो गतिः → २७)। प्रत्येक नक्षत्र-चाप:

नक्षत्र-चाप = ३६०° ÷ २७ = १३° २०′ = १३ + १/३ °

नाम-क्रम: अश्विनी = १ … रेवती = २७ (स्थिर पृष्ठभूमि)। ग्रह = वे पिण्ड जो इन २७ में निरन्तर स्थान बदलते हैं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र की सायन/निरयण देशान्तर λ_☾ = ४५.०° (निरयण; अयनांश-सम्मत)। नक्षत्र-सूचकांक:

i = ⌊λ_☾ ÷ (३६०°/२७)⌋ = ⌊४५° ÷ १३°२०′⌋ = ⌊४५ ÷ 13.333…⌋ = ⌊3.375⌋ = ३
→ ०-आधारित सूचकांक ३ = चौथा नक्षत्र = रोहिणी (अश्विनी=०…)। शेष अंश = ४५° − ३×(४०/३)° = ४५ − ४० = ५° नक्षत्र के भीतर। (अयनांश/काष्ठा-सम्प्रदाय घोषित रखना आवश्यक; यहाँ केवल चाप-गणित।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह २७-भाग विभाजन विंशोत्तरी दशा-इंजन की कुंजी है — महादशा नक्षत्र-शेष-अंश पर अनुपात से चलती है (केतु ७ … बुध १७, योग १२० वर्ष)। वर्ग-इंजन भी उसी ३६०°/२७ और ३६०°/१२ मॉड्यूलर अंकगणित पर टिका है; यहाँ शास्त्र स्वयं “२७” को भूतसंख्या से बाँधता है।

3.5
तद्‌द्वादशविभागास्तु तुल्य मेषादिसंज्ञकाः।
प्रसिद्धा राशयः सन्ति ग्रहास्त्वर्कादिसंज्ञकाः
tad‌dvādaśavibhāgāstu tulya meṣādisaṃjñakāḥ|
prasiddhā rāśayaḥ santi grahāstvarkādisaṃjñakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् = उस (भ-चक्र) के; द्वादश-विभागाः = बारह विभाग; तु = तो; तुल्य = समान/समान-माप; मेष-आदि-संज्ञकाः = मेष आदि संज्ञा वाले; प्रसिद्धाः = प्रसिद्ध; राशयः = राशियाँ; सन्ति = हैं; ग्रहाः = ग्रह; तु = और; अर्क-आदि-संज्ञकाः = सूर्य आदि संज्ञा वाले

हिन्दी भावार्थ उसी भ-चक्र के बारह समान विभाग मेष आदि नामों से जाने जाते हैं — यही प्रसिद्ध राशियाँ हैं। ग्रह सूर्य (अर्क) से आरम्भ नामों से पुकारे जाते हैं। राशि = ३०° का समान खंड; ग्रह-नाम-क्रम आदित्य-आदि — यह दोनों ही आगे की समस्त होरा-गणना की आधार-रेखा हैं।

English rendering Its twelve equal divisions, named beginning with Meṣa, are the well-known rāśis. The grahas are designated beginning with the Sun (Arka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-संख्या = १२, समान भाग:

राशि-चाप = ३६०° ÷ १२ = ३०°

राशि-सूचकांक (०…११): r = ⌊λ ÷ ३०°⌋ mod १२
राशि-अन्तः अंश: λ_r = λ − ३०°·r

नाम-क्रम (D1/राशि): ० मेष … ११ मीन। ग्रह-संज्ञा: अर्क (सूर्य), चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि — (राहु-केतु आगे के अध्यायों/सम्प्रदाय में; इस श्लोक में “अर्कादि” मुख्य सप्त)। यह D1 (राशि-वर्ग) का परिभाषिक मूल है; षोडश-वर्ग (D2…D60) इन्हीं ३०° खंडों के उप-विभाजन हैं।

उदाहरण (worked example) निरयण λ = ९५.५°।
r = ⌊९५.५ / ३०⌋ = ⌊3.183…⌋ = ३ → कर्क (०=मेष,१=वृष,२=मिथुन,३=कर्क)।
राशि-अन्तः = ९५.५ − ९० = ५.५° कर्क में।
(अयनांश घोषित रखें — λ निरयण मान लिया गया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) १२×३०° = D1; षोडश-वर्ग इंजन (D2 होरा … D60 षष्ट्यांश) इन्हीं समान चापों को नियत नियम से काटता है — शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। BPHS अध्याय ६ का सम्पूर्ण वर्ग-क्रम यहीं से जड़ पकड़ता है।

3.6
राशीनामुदयो लग्नं तद्वशादेव जन्मिनाम्‌।
ग्रहयोग्वियोगाभ्यां फलं चिन्त्यं शुभाशुभम्‌
rāśīnāmudayo lagnaṃ tadvaśādeva janminām‌|
grahayogviyogābhyāṃ phalaṃ cintyaṃ śubhāśubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशीनाम् = राशियों का; उदयः = उदय; लग्नं = लग्न; तत्-वशात् = उसी के वश से; एव = ही; जन्मिनाम् = जातकों का; ग्रह-योग-वियोगाभ्यां = ग्रहों के योग और वियोग से; फलं = फल; चिन्त्यं = विचारणीय; शुभ-अशुभम् = शुभ और अशुभ

हिन्दी भावार्थ राशियों का उदय ही लग्न है; जातकों का विचार उसी के आश्रय से होता है। ग्रहों के योग (संयोग/युक्त भाव) और वियोग (पृथकता/अयुक्त अवस्था) से शुभ-अशुभ फल का चिन्तन करना चाहिए। शास्त्र यहाँ लग्न को समय-स्थान-बद्ध “उदित राशि” के रूप में बाँधता है, और फल को योग-वियोग की संरचना पर रखता है — निश्चय या भय का वचन नहीं।

English rendering The rising of the rāśis is the lagna; it is from that alone that matters of the native are considered. Auspicious and inauspicious results are to be weighed from the conjunctions and separations of the grahas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न = क्षितिज पर पूर्वीय उदित राशि/अंश — स्थानीय sidereal time + अक्षांश पर निर्भर; राशि-चक्र का उदित बिंदु।

लग्न-रेखांश L (निरयण) प्राप्त कर:
लग्न-राशि = ⌊L ÷ ३०°⌋ mod १२
लग्न-अंश = L mod ३०°

“योग” = दो+ ग्रहों का समान राशि/निर्दिष्ट कोण-सम्पर्क; “वियोग” = पृथक् स्थिति। शुभाशुभ फल-कथन आगे के भाव-योग अध्यायों में विस्तार पाता है — यहाँ केवल चिन्तन-सूत्र है। गृह-पद्धति (श्रीपति/प्लसिडस आदि) और अयनांश घोषित किए बिना lagna-अंश अतुलनीय रहता है।

उदाहरण (worked example) मान लें निरयण लग्न L = २०७.२५° (स्थान-काल-अयनांश से गणना का परिणाम)।
राशि = ⌊२०७.२५/३०⌋ = ६ → तुला।
लग्न-अंश = २०७.२५ − १८० = २७.२५° तुला।
यदि सूर्य λ_☉ = २०५° (तुला २५°) और बुध λ_☿ = २१०° (तुला ३०°/वृश्चिक ०° सीमा — पाठानुसार “योग” विचार के लिए सह-राशि/समीपता जाँच), तो शास्त्र की भाषा में योग-वियोग का चिन्तन लग्न-संदर्भ में आगे बढ़ता है। (यह केवल चाप-उदाहरण; फल का दावा नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्न D1 का उदय-बिंदु है; भाव-बल, दृष्टi, और वर्ग-मानचित्र सभी इसी L से घर बाँधते हैं। षड्बल (स्थान/दिक्/…) और भाव-फल अध्याय (११–२४) इसी “तद्वशात्” सूत्र पर सवार हैं — गणना में L को अयनांश+गृह-पद्धति के साथ पिन करना अनिवार्य।

3.7
संज्ञा नक्षत्रवृन्दानां ज्ञेयाः सामान्यशास्त्रतः।
एतच्छास्त्रानुसारेण राशिखेटफलं ब्रुवे
saṃjñā nakṣatravṛndānāṃ jñeyāḥ sāmānyaśāstrataḥ|
etacchāstrānusāreṇa rāśikheṭaphalaṃ bruve

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संज्ञाः = नाम/संज्ञाएँ; नक्षत्र-वृन्दानां = नक्षत्र-समूहों की; ज्ञेयाः = जाननी चाहिए; सामान्य-शास्त्रतः = सामान्य शास्त्र से; एतत्-शास्त्र-अनुसारेण = इस (होरा) शास्त्र के अनुसार; राशि-खेट-फलं = राशि और खेट (ग्रह) का फल; ब्रुवे = मैं कहता हूँ

हिन्दी भावार्थ नक्षत्र-समूहों की संज्ञाएँ सामान्य शास्त्र से जान लेनी चाहिए। अब इस होरा-शास्त्र के अनुसार मैं राशि और खेटों का फल कहूँगा। यह अध्याय-सीमा का संकेत है — नक्षत्र-नाम-परम्परा बाहर से गृहीत; यहाँ से विषय राशि-ग्रह-स्वरूप और फल-क्रम की ओर मुड़ता है।

English rendering The designations of the groups of nakṣatras are to be known from the ordinary śāstra. In accordance with this science I shall now declare the results of the rāśis and the kheṭas (grahas).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-निर्देश/संक्रान्ति-सूत्र। “सामान्यशास्त्रतः” = नक्षत्र-नाम-सूची (अश्विनी…रेवती) ज्योतिष-सामान्य से ज्ञात; BPHS यहाँ होरा-फल (राशि-खेट) पर केन्द्रित रहता है। आगे अध्याय ३–५ ग्रह-राशि-स्वरूप, ६–७ षोडश-वर्ग — उसी घोषणा की पूर्ति।

3.8
यस्मिन्‌ काले यतः खेटा यान्ति दृग्‌गणितैकताम्‌।
तत एव स्फुटाः कार्याः दिक्कालौ च स्फुटौ विद
yasmin‌ kāle yataḥ kheṭā yānti dṛg‌gaṇitaikatām‌|
tata eva sphuṭāḥ kāryāḥ dikkālau ca sphuṭau vida

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मिन्‌ काले = जिस काल/क्षण में; यतः = जहाँ से / जिससे; खेटाः = ग्रह; दृग्‌गणित-एकताम्‌ = दृष्टि (प्रेक्षण) और गणित (गणना) की एकता; यान्ति = प्राप्त करते हैं; तत एव = उसी से; स्फुटाः = स्फुट (शोधन-सहित, स्पष्ट) ग्रह-स्थान; कार्याः = करने चाहिए; दिक्‌-कालौ = दिशा और काल; स्फुटौ = स्पष्ट/शुद्ध; विद = जानो / निश्चय करो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस काल में ग्रह प्रेक्षण (दृक्) और गणना (गणित) में एकरस हो जाएँ — अर्थात् दोनों से एक ही स्थिति निकले — उसी आधार से स्फुट ग्रह-स्थान निर्धारित करने चाहिए। दिशा (दिग्‌) और काल भी स्फुट होने चाहिए; अधूरी या असंगत काल-दिशा से स्फुट होरा नहीं बनती। यह दृग्‌-गणित-संवाद का सिद्धांत है — अनुमान मात्र नहीं, प्रेक्षण-समर्थित गणना।

English rendering The text states that planetary positions should be taken as sphuṭa only from that time and basis at which observation (dṛk) and calculation (gaṇita) agree. Direction and time, too, must be made accurate; only then is the chart’s foundation sound.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रेक्षण-गणना-संवाद का विधि-कथन। “स्फुट” यहाँ का अर्थ है: औसत/मध्य (मध्यम) नहीं, बल्कि स्पष्टीकरण (शोधन) के बाद की स्थिति; और वह स्थिति तभी ग्राह्य जब दृक्‌ और गणित एक हों। आधुनिक भाषा में: adopted epoch/ephemeris must be such that computed longitude λ_calc matches observed λ_obs within the precision of the instrument and model — but this verse gives no numeric tolerance; it states the principle of agreement itself.

3.9
स्वस्वदेशोद्‌भवैः साध्यं लग्नं राश्युदयैः स्फुटम्‌।
अथादौ वच्मि खेटानां जातिरूपगुणानहम्‌
svasvadeśod‌bhavaiḥ sādhyaṃ lagnaṃ rāśyudayaiḥ sphuṭam‌|
athādau vacmi kheṭānāṃ jātirūpaguṇānaham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-स्व-देश-उद्‌भवैः = अपने-अपने देश/स्थान से उत्पन्न; राश्युदयैः = राशि-उदय (स्थानीय उदय-काल / ascensional rising of signs); साध्यं = साधनीय / निकालने योग्य; लग्नं = लग्न (उदित राशि-अंश); स्फुटम्‌ = स्पष्ट; अथ आदौ = अब आरंभ में; वच्मि = मैं कहता हूँ; खेटानां = ग्रहों के; जाति-रूप-गुणान्‌ = जाति, रूप और गुण; अहम्‌ = मैं।

हिन्दी भावार्थ लग्न अपने देश-स्थान के अनुरूप राशि-उदयों से स्फुट साधना चाहिए — एक सार्वत्रिक “समान उदय” से नहीं। अर्थात् अक्षांश (latitude) और स्थानीय उदय-तालिका बदलते ही लग्न-अंश बदलता है। इसके पश्चात् पराशर कहते हैं कि अब पहले ग्रहों की जाति, रूप और गुणों का वर्णन करेंगे — आगे की होरा-श्रेणियों का आधार।

English rendering The lagna is to be obtained as sphuṭa from the rising of the signs proper to one’s own locality. The sage then turns to the first exposition of the planets’ kinds, forms, and qualities.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न-साधन स्थानीय राशि-उदय पर निर्भर है। यदि स्थानीय sidereal time / स्थानीय सूर्योदय-सम्बद्ध काल को θ, और राशि R के उदय-काल (right ascension of the rising point, या classical उदयास्त-सारिणी से) को ज्ञात करें, तो लग्न-राशि वह है जो पूर्वी क्षितिज पर उदित हो, और लग्न-अंश λ_L उस राशि के भीतर उदय-अंतर के अनुपात से आता है। अक्षांश φ बदलने पर राश्युदय (विशेषकर short/long signs) बदलते हैं — अतः “स्वदेशोद्भव” अनिवार्य है। अयनांश चुनने पर राशि-सीमा sidereal फ्रेम में स्थिर रहती है; house system यहाँ लग्न-बिंदु (ascendant degree) से अलग विषय है — यह श्लोक लग्न-बिंदु की स्थानीयता बताता है, भाव-पद्धति नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए स्थान ≈ 28.6° N (दिल्ली-समीप), sidereal frame (उदा. लाहिरी अयनांश), और किसी क्षण पूर्वी क्षितिज पर मेष का 12° उदित है। तब लग्न = मेष 12° — यह “राश्युदय + स्थानीय काल” से आया, किसी अन्य देश की उदयास्त-सारिणी से नहीं। यदि वही काल अयोध्या (≈ 26.8° N) पर लिया जाए, राश्युदय-अंतर थोड़ा भिन्न होगा और लग्न-अंश कुछ अंश हट सकता है; यही “स्वस्वदेश” का अर्थ है।

3.10
अथ खेटा रविश्चन्द्रो मङ्गलश्च बुधस्तथा।
गुरुः शुक्रः शनी राहुः केतुश्चैते यथाक्रमम्‌
atha kheṭā raviścandro maṅgalaśca budhastathā|
guruḥ śukraḥ śanī rāhuḥ ketuścaite yathākramam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; खेटाः = ग्रह; रविः = सूर्य; चन्द्रः = चन्द्रमा; मङ्गलः = मंगल; बुधः = बुध; तथा = तथा; गुरुः = बृहस्पति; शुक्रः = शुक्र; शनी = शनि; राहुः = राहु; केतुः = केतु; च एते = और ये; यथाक्रमम्‌ = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र खेटों की सूची यथाक्रम देता है — रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, फिर राहु और केतु। यह क्रम आगे जाति-गुण, क्रूर-सौम्य, कारकत्व और दशा-अध्यायों में बार-बार लौटता है; अतः नाम-क्रम यहाँ ही स्थिर कर लेना चाहिए। राहु-केतु छाया-ग्रह के रूप में नव-खेट पूर्ण करते हैं।

English rendering The planets, in order, are the Sun, the Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, Saturn, Rāhu, and Ketu. This is the ordered roster on which later classifications rest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-क्रम / गणना-सूची का कथन। नौ “खेट” = 7 दृश्य ग्रह + 2 छाया-बिंदु (राहु = चन्द्र-कक्षा का ascending node; केतु = descending node) — स्थिति-गणित में λ_Rāhu + 180° ≡ λ_Ketu (mod 360°), जब दोनों को एक ही node-model से लिया जाए।

3.11
तत्रार्कशनिभूपुत्राः क्षीणेन्दुराहुकेतवः।
क्रूराः शेषग्रहा सौम्याः क्रूरः क्रूरयुतो बुधः
tatrārkaśanibhūputrāḥ kṣīṇendurāhuketavaḥ|
krūrāḥ śeṣagrahā saumyāḥ krūraḥ krūrayuto budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उनमें; अर्क = सूर्य; शनि = शनि; भू-पुत्राः = भूमि-पुत्र = मंगल; क्षीण-इन्दु = क्षीण चन्द्र (ह्रासमान / कृष्ण-पक्ष में दुर्बल रूप — पाठानुसार); राहु-केतवः = राहु और केतु; क्रूराः = क्रूर; शेष-ग्रहाः = शेष ग्रह; सौम्याः = सौम्य; क्रूरः = क्रूर; क्रूर-युतः = क्रूर से युक्त; बुधः = बुध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य, शनि, मंगल, क्षीण चन्द्र, राहु और केतु क्रूर हैं; शेष ग्रह सौम्य। बुध स्वभाव से उभय है: क्रूर से युक्त होने पर वह भी क्रूर कहा गया। यह फल-वर्गीकरण का आधार-सूत्र है, न कि “भाग्य का फैसला” — आगे योग-फल में क्रूर/सौम्य इसी परिभाषा से पढ़े जाते हैं। क्षीणेन्दु का ठीक काल-सीमा पाठ-परंपरा में विस्तृत है; यहाँ शब्द “क्षीण” ही दिया है।

English rendering The text classifies the Sun, Saturn, Mars, the waned Moon, Rāhu, and Ketu as krūra; the rest as saumya. Mercury, when joined to a krūra, is also termed krūra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — क्रूर/सौम्य वर्गीकरण (फल-कथन का आधार)। “क्रूरयुतो बुधः” संगति-नियम: यदि Mercury longitude λ_Bu किसी क्रूर ग्रह के साथ same sign (या accepted yuti-orb — परंपरा-भेद; BPHS यहाँ अंश-सीमा नहीं देता) में हो, तो बुध को क्रूर-श्रेणी में गिना जाता है। क्षीणेन्दु: कृष्ण-पक्ष / घटते कला-चन्द्र का संकेत; exact tithi-cut इस श्लोक में नहीं — “पाठ-भेद संभव” जहाँ टीकाएँ पूर्णिमा-अमावस्या या कला-संख्या से सीमा बाँधती हैं।

3.12
सर्वात्मा च दिवानाथो मनः कुमुदबान्धवः।
सत्त्वं कुजो बुधैः प्रोक्तो बुधो वाणीप्रदायकः
sarvātmā ca divānātho manaḥ kumudabāndhavaḥ|
sattvaṃ kujo budhaiḥ prokto budho vāṇīpradāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-आत्मा = सबका आत्मा; दिवानाथः = दिन का स्वामी = सूर्य; मनः = मन; कुमुद-बान्धवः = कुमुद (कमल/रात्रि-पुष्प) का बन्धु = चन्द्र; सत्त्वं = सत्त्व (वीर्य/साहस/तेज — यहाँ ग्रह-तत्त्व); कुजः = मंगल; बुधैः प्रोक्तः = विद्वानों ने कहा; बुधः = बुध; वाणी-प्रदायकः = वाणी देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य को सर्वात्मा और दिन-नाथ कहता है; चन्द्र को मन और कुमुद-बन्धु। मंगल को सत्त्व कहा गया — विद्वानों की उक्ति के रूप में; बुध को वाणी-प्रदायक। ये तत्त्व-सम्बद्ध नाम हैं — होरा में कारकत्व पढ़ने का प्रथम स्तर — चिकित्सा या मनोरोग का निर्णय नहीं, शास्त्रीय संकेत-मात्रा।

English rendering The Sun is called the soul of all and lord of day; the Moon, the mind and friend of the night-lotus. Mars is spoken of as sattva; Mercury as the giver of speech.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व/कारक-कथन। सूर्य–आत्मा, चन्द्र–मन, मंगल–सत्त्व, बुध–वाणी: later kāraka and bhāva-phala chapters build on this mapping; no numeric constant in the verse.

3.13
देवेज्यो ज्ञानसुखदो भृगुर्वीर्यप्रदयकः।
ऋषिभिः प्राक्‌तनैः प्रोक्तश्छायासूनुश्च दुःखदः
devejyo jñānasukhado bhṛgurvīryapradayakaḥ|
ṛṣibhiḥ prāk‌tanaiḥ proktaśchāyāsūnuśca duḥkhadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवेज्यः = देवों का पूज्य = गुरु/बृहस्पति; ज्ञान-सुख-दः = ज्ञान और सुख देने वाला; भृगुः = भृगु-पुत्र = शुक्र; वीर्य-प्रदायकः = वीर्य/सामर्थ्य देने वाला; ऋषिभिः प्राक्‌तनैः = पूर्व ऋषियों द्वारा; प्रोक्तः = कहा गया; छाया-सूनुः = छाया का पुत्र = शनि; च = और; दुःख-दः = दुःख देने वाला (शास्त्र का फल-शब्द)।

हिन्दी भावार्थ गुरु को ज्ञान-सुख-द, शुक्र को वीर्य-प्रदायक कहा गया। पूर्व ऋषियों के वचन से छायासूनु शनि को दुःखद कहा गया है — यह शास्त्र का अपना फल-शब्द है, भय का प्रचार नहीं। तीनों नाम क्रमशः सौम्य-कारक और क्रूर-कारक की रेखा को पूरा करते हैं, जो 3.11–3.12 से जुड़ती है।

English rendering Jupiter is said to give knowledge and ease; Venus, vigor. The ancient seers, the text records, called Saturn — son of Chāyā — a giver of sorrow (as the śāstra’s own phala-term, not a decree of doom).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/गुण-कथन। “दुःखद” यहाँ interpretive label है; गणना (दशा-काल, बला, अष्टकवर्ग) अलग अध्यायों में संख्या से चलती है — इस श्लोक में कोई वर्ष, अंश या बिन्दु नहीं।

3.14
रविचन्द्रौ तु राजानौ नेता ज्ञेयो धरात्मजः।
बुधो राजकुमारश्च सचिवौ गुरुभार्गवौ
ravicandrau tu rājānau netā jñeyo dharātmajaḥ|
budho rājakumāraśca sacivau gurubhārgavau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि-चन्द्रौ = सूर्य और चन्द्र; तु = ही / तो; राजानौ = दो राजा; नेता = सेना-नायक / नेता; ज्ञेयः = जानना चाहिए; धरा-आत्मजः = पृथ्वी-पुत्र = मंगल; बुधः = बुध; राज-कुमारः = राजकुमार; च = और; सचिवौ = दो मंत्री; गुरु-भार्गवौ = गुरु और भार्गव (शुक्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र राज-मण्डल की उपमा देता है — सूर्य और चन्द्र दोनों राजा; मंगल नेता; बुध राजकुमार; गुरु और शुक्र दोनों सचिव। यह सामाजिक-रूपक से ग्रह-भूमिका बाँधता है, ताकि आगे राज्य-योग, कर्म-स्थान और कारक-फल में “कौन शासन करता है, कौन सलाह देता है” पढ़ा जा सके। शनि-राहु-केतु इस श्लोक की राज-सूची में नहीं आते — उनकी भूमिका अन्य वर्गीकरणों में है।

English rendering The Sun and Moon are the two kings; Mars is to be known as the leader; Mercury as the prince; Jupiter and Venus as the two ministers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रूपक-वर्गीकरण (राज-मण्डल)। कोई दशा-वर्ष या बल-इकाई नहीं; यह role-map later yoga and bhāva reading frames, not a computational rule.

3.15
प्रेष्यको रविपुत्रश्च सेना स्वर्भानुपुच्छकौ।
एवं क्रमेण वै विप्र सूर्यादीन्‌ प्रविचिन्तयेत्‌
preṣyako raviputraśca senā svarbhānupucchakau|
evaṃ krameṇa vai vipra sūryādīn‌ pravicintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रेष्यक = दूत / सेवक-कार्य; रविपुत्र = शनि (सूर्य-पुत्र); सेना = सैन्य / सैन्य-शक्ति; स्वर्भानुपुच्छकौ = राहु-केतु (स्वर्भानु = राहु, पुच्छ = केतु; द्विवचन); एवं क्रमेण = इसी क्रम से; सूर्यादीन् प्रविचिन्तयेत् = सूर्य से आरम्भ कर ग्रहों का सम्यक् विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रहों के व्यावहारिक कार्य-संकेत का क्रम पूरा करता है — प्रेष्यक (संदेश / सेवा का पक्ष) रविपुत्र शनि है, और सेना स्वर्भानु तथा उसके पुच्छ — अर्थात् राहु और केतु — हैं। हे विप्र! इसी क्रम से सूर्यादि ग्रहों का विचार करना चाहिए। यह पद ग्रहों को केवल नाम नहीं, कार्य-भूमिका के रूप में देखने का निर्देश है।

English rendering The messenger-function is assigned to Saturn (the Sun’s son), and the army to Svarbhānu and his tail — Rāhu and Ketu. Thus, O Brahmin, the planets from the Sun onwards are to be contemplated in this sequential assignment of roles.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-कार्य / कारक-वर्णन। यह पद गणना नहीं, भूमिका-सूची का समापन है; “सेना = राहु-केतु” को संख्यात्मक बल न समझें — यह शास्त्रीय संकेत-भाषा है।

3.16
रक्तश्यामो दिवाधीशो गौरगात्रो निशाकरः।
नात्युच्चाङ्गः कुजो रक्तो दूर्वाश्यामो बुधस्तथा
raktaśyāmo divādhīśo gauragātro niśākaraḥ|
nātyuccāṅgaḥ kujo rakto dūrvāśyāmo budhastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्तश्याम = रक्त-मिश्रित श्याम / ताम्र-कृष्ण वर्ण; दिवाधीश = सूर्य (दिन का अधिपति); गौरगात्र = गौर / श्वेत-उज्ज्वल शरीर; निशाकर = चन्द्र; नात्युच्चाङ्ग = अत्युच्च अंगों वाला नहीं (मध्यम-काय); कुज = मंगल; रक्त = रक्तवर्ण; दूर्वाश्याम = दूर्वा-तृण जैसा हरित-श्याम; बुध = बुध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रहों के वर्ण-स्वरूप का वर्णन आरम्भ करता है। दिवाधीश सूर्य रक्तश्याम है; निशाकर चन्द्र गौरगात्र है। कुज मध्यम अंगों वाला और रक्तवर्ण है; बुध दूर्वा-जैसा श्याम-हरित वर्ण का कहा गया है। ये रूप-वर्ण शास्त्रीय पहचान-चिह्न हैं — शारीरिक भविष्यवाणी नहीं, ग्रह-स्वरूप का पारंपरिक चित्रण।

English rendering The lord of day (the Sun) is dusky-red; the maker of night (the Moon) is fair of body. Mars is not excessively tall of limb and is red; Mercury is dark-green like dūrvā grass.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्वरूप / वर्ण-कथन। रंग-शब्द यहाँ दृश्य रूपक हैं; उन्हें RGB या ज्योतिर्मितीय माप में न बदलें — शास्त्र वर्ण-स्मृति सिखाता है, वर्णमिति नहीं।

3.17
गौरगात्रो गुरुर्ज्ञेयः शुक्रः श्यावस्तथैव च।
कृष्णदेहो रवेः पुत्रो ज्ञायते द्विजसत्तम
gauragātro gururjñeyaḥ śukraḥ śyāvastathaiva ca|
kṛṣṇadeho raveḥ putro jñāyate dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गौरगात्र = गौर शरीर; गुरु = बृहस्पति; ज्ञेय = जानना चाहिए; शुक्र = शुक्र; श्याव = श्याव / कपिश-कृष्णिम वर्ण; कृष्णदेह = कृष्ण शरीर; रवेः पुत्र = शनि; द्विजसत्तम = श्रेष्ठ द्विज (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ गुरु को गौरगात्र जानना चाहिए; शुक्र श्याववर्ण कहा गया है। रविपुत्र शनि कृष्णदेह है — हे द्विजसत्तम, यही क्रम है। पिछले पद के साथ मिलाकर सूर्य से शनि तक सात ग्रहों का वर्ण-चित्र पूरा होता है।

English rendering Jupiter is to be known as fair of body; Venus likewise is tawny-dark. The Sun’s son (Saturn) is known as black-bodied, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्वरूप / वर्ण-कथन। सूर्य–चन्द्र–मंगल–बुध–गुरु–शुक्र–शनि का वर्ण-क्रम शास्त्रीय स्मृति-सारणी है; पाठान्तरों में “श्याव/श्याम” आदि शब्दों में पाठ-भेद संभव।

3.18
वह्न्यम्बुशिखिजा विष्णुविढौजः शचिका द्विज।
सूर्यादीनां खगानां च देवा ज्ञेयाः क्रमेण च
vahnyambuśikhijā viṣṇuviḍhaujaḥ śacikā dvija|
sūryādīnāṃ khagānāṃ ca devā jñeyāḥ krameṇa ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वह्नि = अग्नि (सूर्य-देवता); अम्बु = जल / आपः (चन्द्र-देवता); शिखिजा = अग्नि-ज / स्कन्द-संबंधी (मंगल-देवता); विष्णु = विष्णु (बुध); विढौजस् = इन्द्र (गुरु); शचिका = शची / इन्द्राणी (शुक्र); खग = ग्रह (आकाशचारी); क्रमेण = सूर्यादि क्रम से।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! सूर्यादि खगों के अधिदेव क्रमशः जानने चाहिए — वह्नि, अम्बु, शिखिजा, विष्णु, विढौजस् और शची। यह पद ग्रह को देवता-संकेत से जोड़ता है: प्रत्येक ग्रह का एक पारंपरिक अधिष्ठाता। शनि का देवता-नाम इस पंक्ति में स्पष्ट नहीं आता — कुछ पाठों में ब्रह्मा/प्रजापति आगे आता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering Fire, Water, the Fire-born (Skanda-line), Viṣṇu, Indra (Vidhaujas), and Śacī — these, O twice-born, are to be known in order as the deities of the planets beginning with the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अधिदेव / देवता-सूची। यह मानचित्र “देवता → ग्रह” का क्रमिक pairing है; गणना नहीं, केवल सात-पद की तालिका का आधा-अधूरा या संक्षिप्त पाठ हो सकता है — शनि-देवता के लिए पाठ-भेद संभव मानें।

3.19
क्लीवौ द्वौ सौम्यसौरी च युवतीन्दुभृगू द्विज।
नराः शेषाश्च विज्ञेया भानुर्भौमो गुरुस्तथा
klīvau dvau saumyasaurī ca yuvatīndubhṛgū dvija|
narāḥ śeṣāśca vijñeyā bhānurbhaumo gurustathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्लीवौ द्वौ = दो नपुंसक / क्लीब; सौम्य = बुध; सौरि = शनि; युवती = स्त्री-रूप; इन्दु = चन्द्र; भृगु = शुक्र; नराः शेषाः = शेष पुरुष; भानु = सूर्य; भौम = मंगल; गुरु = बृहस्पति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रहों का लिंग-विभाग बताता है। बुध और शनि — ये दो क्लीब हैं; चन्द्र और शुक्र युवती (स्त्री) हैं। शेष — भानु, भौम और गुरु — नर कहे गए हैं। यह वर्गीकरण योग, दृष्टि और कारक-विचार में लिंग-संकेत के रूप में प्रयुक्त होता है; जैविक लिंग का दावा नहीं।

English rendering Mercury and Saturn are the two neuters; the Moon and Venus are the young women. The remainder — the Sun, Mars, and Jupiter — are to be known as males.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लिंग-वर्गीकरण। तीन श्रेणियाँ: क्लीब = {बुध, शनि}, स्त्री = {चन्द्र, शुक्र}, नर = {सूर्य, मंगल, गुरु}। यह द्विआधारी नहीं, त्रिपक्षीय लेबल-समुच्चय है।

3.20
अग्निभूमिनभस्तोयवायवः क्रमतो द्विज।
भौमादीनां ग्रहाणां च तत्त्वानीति यथाक्रमम्‌
agnibhūminabhastoyavāyavaḥ kramato dvija|
bhaumādīnāṃ grahāṇāṃ ca tattvānīti yathākramam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्नि = तेजस् / अग्नि-तत्त्व; भूमि = पृथ्वी; नभस् = आकाश; तोय = जल; वायवः = वायु; क्रमतः = क्रम से; भौमादीनाम् = मंगल से आरम्भ; तत्त्वानि = पञ्चमहाभूत-तत्त्व; यथाक्रमम् = यथाक्रम।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! भौमादि ग्रहों के तत्त्व क्रमशः अग्नि, भूमि, नभ, तोय और वायु हैं। अर्थात् मंगल–अग्नि, बुध–पृथ्वी, गुरु–आकाश, शुक्र–जल, शनि–वायु। सूर्य-चन्द्र का तत्त्व-निर्देश इस पद में नहीं है — “भौमादीनाम्” स्पष्टतः मंगल से आरम्भ का क्रम बाँधता है।

English rendering Fire, earth, ether, water, and air — these, O twice-born, are the elemental principles of the planets beginning with Mars, each in due order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व-मानचित्र (categorical assignment)। क्रम (मंगल से):
1. मंगल → अग्नि
2. बुध → भूमि
3. गुरु → नभस्
4. शुक्र → तोय
5. शनि → वायु
यह पञ्चतत्त्व-लेबल है, न कि घनत्व या ताप का माप; सूर्य/चन्द्र यहाँ इस सूची में नहीं।

3.21
गुरुशुक्रौ विप्रवर्णौ कुजार्कौ क्षत्रियौ द्विज।
शशिसोम्यौ वैश्यवर्णौ शनिः शूद्रो द्विजोत्तम्
guruśukrau vipravarṇau kujārkau kṣatriyau dvija|
śaśisomyau vaiśyavarṇau śaniḥ śūdro dvijottam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुशुक्रौ = बृहस्पति और शुक्र; विप्रवर्णौ = ब्राह्मण-वर्ण; कुजार्कौ = मंगल और सूर्य; क्षत्रियौ = क्षत्रिय; शशि = चन्द्र; सोम्य = बुध; वैश्यवर्णौ = वैश्य; शनिः = शनि; शूद्रः = शूद्र-वर्ण; द्विजोत्तम = श्रेष्ठ द्विज (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ गुरु और शुक्र विप्रवर्ण हैं; कुज और अर्क क्षत्रिय। शशि और सोम्य वैश्यवर्ण कहे गए; शनि शूद्र है — हे द्विजोत्तम। यह वर्ण-संकेत शास्त्रीय गुण-श्रेणी है (ज्ञान/बल/अर्थ/सेवा के रूपक), न कि सामाजिक जाति का आदेश या निर्णय।

English rendering Jupiter and Venus are of the brāhmaṇa class; Mars and the Sun are kṣatriya. The Moon and Mercury are vaiśya; Saturn is śūdra, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्ण-वर्गीकरण। चार समुच्चय:
विप्र = {गुरु, शुक्र}, क्षत्रिय = {मंगल, सूर्य}, वैश्य = {चन्द्र, बुध}, शूद्र = {शनि}।
राहु-केतु इस पद में नहीं — पाठ जहाँ उन्हें जोड़ता है वहाँ पाठ-भेद / अन्य अध्याय देखें।

3.22
जीवसूर्येन्द्रवः सत्त्वं बुधशुक्रौ रजस्तथा।
सूर्यपुत्रभरापुत्रौ तमःप्रकृतिकौ द्विज
jīvasūryendravaḥ sattvaṃ budhaśukrau rajastathā|
sūryaputrabharāputrau tamaḥprakṛtikau dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = बृहस्पति (गुरु); सूर्य = रवि; इन्दु = चन्द्र; सत्त्वं = सत्त्व-गुण; बुधशुक्रौ = बुध और शुक्र; रजः = रजस्-गुण; सूर्यपुत्र = शनि; भरापुत्र = भौम (मंगल; भूमि/भरा का पुत्र); तमःप्रकृतिकौ = तमस्-प्रकृति वाले; द्विज = हे द्विज (मैत्रेय-सम्बोधन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रह-स्वभाव का गुण-विभाजन बताता है। जीव (गुरु), सूर्य और इन्दु (चन्द्र) सत्त्व-प्रधान हैं। बुध और शुक्र रजस्-प्रकृति के हैं। सूर्यपुत्र (शनि) तथा भरापुत्र (मंगल) तमः-प्रकृति वाले कहे गए हैं। यह ग्रह-स्वरूप-अध्याय का गुण-त्रय वर्गीकरण है, न कि व्यक्ति-फल का आदेश।

English rendering The text classifies planetary guṇa-nature: Jupiter, the Sun, and the Moon are sattva; Mercury and Venus are rajas; Saturn (son of the Sun) and Mars (son of the Earth) are of tamas-prakṛti. O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-गुण-वर्गीकरण (सत्त्व/रजस्/तमस्)। तीनों गुणों का यह जोड़ा शास्त्र का स्वयं का स्वभाव-मानचित्र है; गणना नहीं, केवल नाम-निर्देशित वर्ग।

3.23
मधुपिङ्गलदृक्सूर्यश्चतुरस्रः शुचिर्द्विज।
पित्तप्रकृतिको धीमान्‌ पुमानल्पकचो द्विज
madhupiṅgaladṛksūryaścaturasraḥ śucirdvija|
pittaprakṛtiko dhīmān‌ pumānalpakaco dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मधुपिङ्गलदृक् = मधु-पिङ्गल (मधुवर्ण-भूरा/पीला) दृष्टि वाला; सूर्यः = रवि; चतुरस्रः = चतुष्कोण/वर्गाकार आकृति; शुचिः = शुद्ध, स्वच्छ; पित्तप्रकृतिकः = पित्त-प्रकृति; धीमान् = बुद्धिमान; पुमान् = पुरुष-रूप; अल्पकचः = अल्प केश वाला; द्विज = हे द्विज

हिन्दी भावार्थ सूर्य का शास्त्रीय रूप-वर्णन: दृष्टि मधु-पिङ्गल; आकृति चतुरस्र; स्वभाव शुचि। प्रकृति पित्त-प्रधान; धीमान्; पुरुष; केश अल्प। यह ग्रह-स्वरूप-चित्र है — व्यक्ति पर थोपा गया भाग्य-वाक्य नहीं।

English rendering The Sun is described as having honey-tawny eyes, a square form, and purity; of pitta constitution, intelligent, masculine, and sparse of hair. O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सूर्य-स्वरूप / रूप-वर्णन। आकृति (चतुरस्र), दोष (पित्त), लिंग (पुमान्) — ये शास्त्र के गुणात्मक चिह्न हैं, अंश-सूत्र नहीं।

3.24
बहुवातकफः प्राज्ञश्चन्द्रो वृत्ततनुर्द्विज।
शुभदृङ्‌मधुवाक्यश्च चञ्चलो मदनातुरः
bahuvātakaphaḥ prājñaścandro vṛttatanurdvija|
śubhadṛṅ‌madhuvākyaśca cañcalo madanāturaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुवातकफः = वात और कफ दोनों अधिक; प्राज्ञः = प्रज्ञावान; चन्द्रः = सोम; वृत्ततनुः = गोल/वृत्ताकार शरीर; शुभदृक् = शुभ/सुन्दर दृष्टि; मधुवाक्यः = मधुर वाणी; चञ्चलः = चंचल; मदनातुरः = मदन (काम) से आतुर

हिन्दी भावार्थ चन्द्र का स्वरूप: बहु वात-कफ, प्राज्ञ, वृत्ततनु। दृष्टि शुभ; वाणी मधुर; स्वभाव चंचल और मदनातुर। शास्त्र कहता है — यह चन्द्र-लक्षण का वर्णन है, न कि किसी जन्म-कुण्डली का निश्चित फल-निर्णय।

English rendering The Moon is said to have much vāta and kapha, wisdom, a rounded body, auspicious eyes, sweet speech, restlessness, and susceptibility to desire. O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — चन्द्र-स्वरूप / फल-वर्णन (रूप-स्वभाव)। त्रिदोष में वात-कफ बाहुल्य — गुणात्मक चिह्न, मात्रा-सूत्र नहीं।

3.25
क्रूरो रक्तेक्षणो भौमश्चपलोदारमूर्तिकः।
पित्तप्रकृतिकः क्रोधी कृशमध्यतनुर्द्विज
krūro raktekṣaṇo bhaumaścapalodāramūrtikaḥ|
pittaprakṛtikaḥ krodhī kṛśamadhyatanurdvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूरः = तीक्ष्ण/कठोर स्वभाव; रक्तेक्षणः = रक्त-नेत्र; भौमः = मंगल; चपलः = चपल; उदारमूर्तिकः = उदार/विशाल मूर्ति (आकार); पित्तप्रकृतिकः = पित्त-प्रकृति; क्रोधी = क्रोधशील; कृशमध्यतनुः = मध्य-भाग कृश; द्विज = हे द्विज

हिन्दी भावार्थ भौम (मंगल) को शास्त्र क्रूर, रक्तेक्षण, चपल और उदारमूर्ति कहता है। प्रकृति पित्त; स्वभाव क्रोधी; तनु मध्य में कृश। यह मंगल-स्वरूप का पाठ-वर्णन है — “भय” या “नाश” का वाक्य नहीं।

English rendering Mars is described as fierce, red-eyed, restless, of generous form; of pitta constitution, irascible, and slender at the waist. O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भौम-स्वरूप / रूप-स्वभाव-कथन। रक्तेक्षण, पित्त, कृशमध्य — ये रूप-चिह्न हैं; कोण/अंश की गणना नहीं।

3.26
वपुःश्रेष्ठः श्लिष्टवाक्च ह्यतिहास्यरुचिर्बुधः।
पित्तवान्‌ कफवान्‌ विप्र मारुतप्रकृतिस्तथा
vapuḥśreṣṭhaḥ śliṣṭavākca hyatihāsyarucirbudhaḥ|
pittavān‌ kaphavān‌ vipra mārutaprakṛtistathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वपुःश्रेष्ठः = शरीर-श्रेष्ठ; श्लिष्टवाक् = श्लिष्ट/सुसंबद्ध वाणी; अतिहास्यरुचिः = अति हास्य-रुचि; बुधः = बुध; पित्तवान् = पित्तयुक्त; कफवान् = कफयुक्त; विप्र = हे विप्र; मारुतप्रकृतिः = वात-प्रकृति; तथा = तथा (तीनों दोषों का मिश्रण)

हिन्दी भावार्थ बुध का स्वरूप: वपु श्रेष्ठ; वाणी श्लिष्ट; अतिहास्य-रुचि। शास्त्र कहता है — पित्तवान्, कफवान् और मारुत-प्रकृति — अर्थात् त्रिदोष-मिश्र। हे विप्र, यह बुध-लक्षण का वर्णन है; रोग-निदान या भाग्य-आदेश नहीं।

English rendering Mercury is of excellent form, well-joined speech, and fond of laughter; possessed of pitta and kapha, and also of māruta (vāta) nature. O brāhmaṇa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — बुध-स्वरूप; त्रिदोष-संयोग का गुणात्मक कथन। “पित्त + कफ + मारुत” — मिश्र-प्रकृति का शाब्दिक संकेत; अनुपात-सूत्र नहीं।

3.27
बृहद्‌गात्रो गुरुश्चैव पिङ्गलो मूर्द्धजेक्षणे।
कफप्रकृतिको धीमान्‌ सर्वशास्त्रविशारदः
bṛhad‌gātro guruścaiva piṅgalo mūrddhajekṣaṇe|
kaphaprakṛtiko dhīmān‌ sarvaśāstraviśāradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बृहद्गात्रः = विशाल गात्र; गुरुः = बृहस्पति; पिङ्गलः = पिङ्गल-वर्ण; मूर्द्धजेक्षणे = केश और नेत्र में (पिङ्गल); कफप्रकृतिकः = कफ-प्रकृति; धीमान् = धी-सम्पन्न; सर्वशास्त्रविशारदः = सर्वशास्त्र-विशारद

हिन्दी भावार्थ गुरु का रूप: बृहद्-गात्र; मूर्द्धज और ईक्षण पिङ्गल। प्रकृति कफ; धीमान्; सर्वशास्त्र-विशारद। शास्त्र का यह गुरु-चित्र ज्ञान-गौरव का लक्षण-वर्णन है — व्यक्ति पर थोपा गया निश्चित फल नहीं।

English rendering Jupiter is large-bodied, tawny in hair and eyes, of kapha constitution, intelligent, and skilled in all the śāstras.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुरु-स्वरूप / ज्ञान-गुण-वर्णन। कफ-प्रकृति और शास्त्र-विशारदता — रूप-स्वभाव के चिह्न; वर्ष/अंश-सूत्र नहीं।

3.28
सुखि कान्तवपु श्रेष्ठः सुलोचनो भृगोः सुतः।
काव्यकर्ता कफाधिक्योऽनिलात्मा वक्रमूर्धजः
sukhi kāntavapu śreṣṭhaḥ sulocano bhṛgoḥ sutaḥ|
kāvyakartā kaphādhikyo'nilātmā vakramūrdhajaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखि = सुख-युक्त; कान्तवपुः = कान्त/सुन्दर शरीर; श्रेष्ठः = श्रेष्ठ; सुलोचनः = सुन्दर नेत्र वाला; भृगोः सुतः = भृगु-पुत्र (शुक्र); काव्यकर्ता = काव्य-रचयिता; कफाधिक्यः = कफ-अधिक; अनिलात्मा = अनिल (वात) आत्मा/स्वभाव; वक्रमूर्धजः = वक्र केश वाला

हिन्दी भावार्थ भृगु-सुत (शुक्र) को शास्त्र सुखि, कान्तवपु, श्रेष्ठ, सुलोचन कहता है। काव्यकर्ता; कफ-अधिक्य; अनिलात्मा; वक्र-मूर्धज। दो दोषों (कफ-अधिक + अनिल) का यह मेल शुक्र-स्वभाव का पाठ-वर्णन है, न कि चिकित्सा या भाग्य-भविष्यवाणी।

English rendering The son of Bhṛgu (Venus) is happy, of lovely excellent form, fair-eyed; a maker of poetry; kapha-predominant, of anila nature, with curly hair.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुक्र-स्वरूप / रूप-कला-स्वभाव-कथन। कफाधिक्य + अनिलात्मा — मिश्र-दोष का गुणात्मक संकेत; संख्या-सूत्र नहीं।

3.29
कृश्दीर्घतनुः शौरिः पिङ्गदृष्ट्यनिलात्मकः।
स्थूलदन्तोऽलसः पंगुः खररोमकचो द्विज
kṛśdīrghatanuḥ śauriḥ piṅgadṛṣṭyanilātmakaḥ|
sthūladanto'lasaḥ paṃguḥ khararomakaco dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शौरिः = शनि (सूर्य-पुत्र); कृश-दीर्घ-तनुः = कृश एवं दीर्घ शरीर; पिङ्ग-दृष्टि = पिङ्गल/पीली दृष्टि; अनिलात्मकः = वात-प्रकृति; स्थूल-दन्तः = स्थूल दाँत; अलसः = आलसी; पङ्गुः = पंगु/मन्द-गति; खर-रोम-कचः = कठोर रोम एवं कच (केश)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शनि के स्वरूप का वर्णन करता है — कृश और लम्बा शरीर, पिङ्गल दृष्टि, वात-स्वभाव, स्थूल दाँत, आलस्य, पंगुता, तथा कठोर रोम-केश। यह फल-कथन नहीं, ग्रह-स्वरूप-वर्णन है; आगे के अध्यायों में बल, दृष्टि और दशा के नियम इसी स्वरूप-संकेत पर खड़े होते हैं।

English rendering The text describes Saturn (Śauri) as lean and tall-bodied, tawny-eyed, of windy (vāta) nature, thick-toothed, sluggish, lame, with coarse hair and locks — a morphological portrait, not a predictive claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-स्वरूप-वर्णन। शनि की “कृश-दीर्घ-वात” छवि बाद में स्थानबल, दिक्बल और कालबल के संख्यात्मक नियमों से जुड़ती है, पर इस श्लोक में कोई अंश-विभाग या बालाङ्क नहीं दिया गया।

3.30
धूम्राकारो नीलतनुर्वनस्थोऽपि भयंकरः।
वातप्रकृतिको धीमान्‌ स्वर्भानुस्तत्समः शिखी
dhūmrākāro nīlatanurvanastho'pi bhayaṃkaraḥ|
vātaprakṛtiko dhīmān‌ svarbhānustatsamaḥ śikhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्भानुः = राहु; शिखी = केतु; धूम्राकारः = धूम्र-आकार; नील-तनुः = नील शरीर; वनस्थः = वन-वासी; भयंकरः = भयंकर (स्वरूप-विशेषण); वात-प्रकृतिकः = वात-स्वभाव; धीमान् = धी-सम्पन्न; तत्समः = (राहु के) समान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु धूम्र-आकार, नील-तनु, वनस्थ होकर भी भयंकर, वात-प्रकृति और धीमान् है; केतु (शिखी) उसी के समान कहा गया। यह छाया-ग्रहों का स्वरूप-वर्णन है — “भय” यहाँ फल की धमकी नहीं, पाठ की पारम्परिक छवि है। राहु-केतु की दशा-वर्ष (विंशोत्तरी में १८ और ७) आगे दशा-अध्यायों में अलग से निश्चित होते हैं।

English rendering The text portrays Rāhu (Svarbhānu) as smoke-formed, blue-bodied, forest-dwelling yet formidable, of vāta nature and intelligent; Ketu (Śikhī) is said to be like him — a morphological note on the nodes, not a fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — छाया-ग्रह स्वरूप-वर्णन। राहु-केतु की संख्यात्मक भूमिका (नक्षत्र-दशा, दृष्टि-परम्पराएँ) अन्य अध्यायों में आती है; यहाँ केवल स्वरूप-समीकरण “तत्समः शिखी” है।

3.31
स्नायूनांं तान्तवी प्रकृतिः
अस्थि रक्तस्तथा मज्जा त्वग्‌ वसा वीर्यमेव च।
स्नायुरेषामधीशाश्च क्रमात्‌ सूर्यादयो द्विज
snāyūnāṃṃ tāntavī prakṛtiḥ
asthi raktastathā majjā tvag vasā vīryameva ca|
snāyureṣāmadhīśāśca kramāt sūryādayo dvija
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्थि = हड्डी; रक्तम् = रक्त; मज्जा = मज्जा; त्वक् = त्वचा; वसा = मेद; वीर्यम् = शुक्र/वीर्य; स्नायुः = स्नायु (सात धातु); एषाम् अधीशाः = इनके अधिपति; क्रमात् = क्रम से; सूर्यादयः = सूर्य से आरम्भ कर (सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि); द्विज = हे द्विज (मैत्रेय)। प्रथम पंक्ति "स्नायूनां तान्तवी प्रकृतिः" इस साक्षी में टिप्पणी-सदृश अतिरिक्त पद है — पाठ-भेद संभव; मानक पाठ "अस्थि रक्तं…" से चलता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सात धातुओं का ग्रह-अधिपत्य बताता है — अस्थि का सूर्य, रक्त का चन्द्र, मज्जा का मंगल, त्वचा का बुध, मेद का गुरु, वीर्य का शुक्र और स्नायु का शनि। यह ग्रह-गुण-स्वरूप अध्याय की उसी सूची का अंग है जिसमें ग्रहों को शरीर के तत्त्वों से जोड़ा गया है; इसे कारकत्व-सारणी की तरह पढ़ें, रोग-भविष्यवाणी की तरह नहीं।

English rendering The text assigns the seven bodily constituents — bone, blood, marrow, skin, fat, semen and sinew — to the planets beginning with the Sun, in order: Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, Saturn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (धातु-कारकत्व सारणी)। सारणी: i-वाँ धातु ↔ वार-क्रम का i-वाँ ग्रह, i = 1…7 (अस्थि–सूर्य, रक्त–चन्द्र, मज्जा–मंगल, त्वक्–बुध, वसा–गुरु, वीर्य–शुक्र, स्नायु–शनि)।

3.32
देवालयजलं वह्निक्रीडादीनां तथैव च।
कोशशय्योत्कराणां तु नाथां सूर्यादयः क्रमात्‌
devālayajalaṃ vahnikrīḍādīnāṃ tathaiva ca|
kośaśayyotkarāṇāṃ<ref>[http://puranastudy.freeoda.co12.29m/pur_index3/utkala.htm utkara upari ṭippaṇī]</ref> tu nāthāṃ sūryādayaḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवालय = मन्दिर/देव-स्थान; जलम् = जल; वह्नि = अग्नि; क्रीडादीनाम् = क्रीड़ा आदि; कोश = कोश/भण्डार; शय्या = शय्या/शयनागार; उत्कर = उत्कर (कूड़ा-ढेर/राशि); नाथाः = अधिपति; सूर्यादयः क्रमात् = सूर्य से क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि देवालय, जल, अग्नि, क्रीड़ा आदि, कोश, शय्या और उत्कर — इनके नाथ सूर्य से आरम्भ क्रम से जाने जाते हैं। यह स्थान-पदार्थ-संकेत की तालिका है: सूर्य-देवालय, चन्द्र-जल, मङ्गल-अग्नि, बुध-क्रीड़ा, गुरु-कोश, शुक्र-शय्या, शनि-उत्कर। फल-वाक्य में “स्थान-स्वामी” का संकेत इसी क्रम से लिया जाता है।

English rendering The text assigns, in solar order, lordship over temple, water, fire, play and the like, treasury, bed, and refuse-heap — a catalogue of place-correspondences for the seven planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थान/पदार्थ-अधिपति क्रम-तालिका।

| क्रम | ग्रह | स्थान-संकेत |
|------|------|-------------|
| 1 | सूर्य | देवालय |
| 2 | चन्द्र | जल |
| 3 | मङ्गल | वह्नि |
| 4 | बुध | क्रीडा आदि |
| 5 | गुरु | कोश |
| 6 | शुक्र | शय्या |
| 7 | शनि | उत्कर |

(पाठ में “क्रीडादीनाम्” बहुवचन-संकेत; विस्तृत सूची पाठ-भेद संभव।)

3.33
अयनक्षणवारर्तुमासपक्षसमा द्विज।
सूर्यादीनां क्रमाज्ज्ञेया निर्विशंकं द्विजोत्तम
ayanakṣaṇavārartumāsapakṣasamā dvija|
sūryādīnāṃ kramājjñeyā nirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अयन = उत्तरायण/दक्षिणायन (अर्ध-वर्ष चक्र); क्षण = क्षण/सूक्ष्म काल; वार = वार (सूर्यादि दिन); ऋतु = ऋतु; मास = मास; पक्ष = शुक्ल/कृष्ण पक्ष; समा = वर्ष; सूर्यादीनां क्रमात् = सूर्य से क्रम; निर्विशङ्कम् = निःसंदेह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्विशङ्क कहता है कि अयन, क्षण, वार, ऋतु, मास, पक्ष और समा — ये काल-इकाइयाँ सूर्य से आरम्भ क्रम से ग्रह-संबद्ध जानी जाएँ। यह काल-स्वामित्व की सूची है; दशा-वर्ष या मुहूर्त-सूत्र यहाँ नहीं हैं, केवल “कौन-सा काल-मान किस ग्रह से जोड़ा गया”।

English rendering Without hesitation the text maps, in order from the Sun, the time-units ayana, kṣaṇa, weekday, season, month, fortnight, and year to the seven planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — काल-मान ↔ ग्रह क्रम-तालिका (कालबल/काल-संकेत की आधार-सूची)।

1. अयन → सूर्य
2. क्षण → चन्द्र
3. वार → मङ्गल
4. ऋतु → बुध
5. मास → गुरु
6. पक्ष → शुक्र
7. समा (वर्ष) → शनि

उदाहरण (worked example) एक पूर्ण अयन ≈ ६ मासीय अर्ध-वर्ष (उत्तरायण या दक्षिणायन); शास्त्र इसे सूर्य से जोड़ता है। एक पक्ष = १५ तिथियाँ (शुक्ल/कृष्ण) — शुक्र से; एक समा = १२ मास — शनि से। (सटीक सौर/चान्द्र माप अन्य सिद्धान्त-ग्रन्थों पर निर्भर; यहाँ केवल BPHS की क्रम-मैपिंग।)

3.34
कटुक्षारतिक्तमिश्रमधुराम्लकषायकाः।
क्रमेण सर्वे विज्ञेयाः सूर्यादीनां रसा इति
kaṭukṣāratiktamiśramadhurāmlakaṣāyakāḥ|
krameṇa sarve vijñeyāḥ sūryādīnāṃ rasā iti

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कटु = तीखा/कड़वा-तीक्ष्ण; क्षार = क्षार/लवण; तिक्त = तिक्त; मिश्र = मिश्रित; मधुर = मीठा; अम्ल = खट्टा; कषाय = कसैला; रसाः = रस; सूर्यादीनां क्रमेण = सूर्य से क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कटु, क्षार, तिक्त, मिश्र, मधुर, अम्ल और कषाय — ये सातों रस सूर्य से लेकर शनि तक क्रम से ग्रह-रस माने जाएँ। यह आस्वाद-संकेत की तालिका है; आहार-चिकित्सा या रोग-उपचार का आदेश यहाँ नहीं है — केवल शास्त्रीय रस-ग्रह संयोग।

English rendering The text assigns the seven tastes — pungent, saline, bitter, mixed, sweet, sour, and astringent — in order to the Sun and the following planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रस-अधिपति क्रम-तालिका।

| क्रम | ग्रह | रस |
|------|------|-----|
| 1 | सूर्य | कटु |
| 2 | चन्द्र | क्षार |
| 3 | मङ्गल | तिक्त |
| 4 | बुध | मिश्र |
| 5 | गुरु | मधुर |
| 6 | शुक्र | अम्ल |
| 7 | शनि | कषाय |

3.35
बुधेज्यौ बलिनौ पूर्वे रविभौमौ च दक्षिणे।
पश्चिमे सूर्यपुत्रश्च सितचन्द्रौ तथोत्तरे
budhejyau balinau pūrve ravibhaumau ca dakṣiṇe|
paścime sūryaputraśca sitacandrau tathottare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध-इज्यौ = बुध और गुरु (इज्य = बृहस्पति); बलिनौ पूर्वे = पूर्व दिशा में बलवान्; रवि-भौमौ = सूर्य और मङ्गल; दक्षिणे = दक्षिण में; सूर्य-पुत्रः = शनि; पश्चिमे = पश्चिम में; सित-चन्द्रौ = शुक्र और चन्द्र; उत्तरे = उत्तर में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दिशा-बल का मूल नियम देता है — पूर्व में बुध-गुरु, दक्षिण में सूर्य-मङ्गल, पश्चिम में शनि, उत्तर में शुक्र-चन्द्र बलवान् माने जाते हैं। कुण्डली में यह दिशाएँ भाव-स्थित से जुड़ती हैं: पूर्व ≈ लग्न (१), दक्षिण ≈ दशम (१०), पश्चिम ≈ सप्तम (७), उत्तर ≈ चतुर्थ (४)। यह षड्बल के “दिक्बल” घटक का शास्त्रीय बीज-वाक्य है।

English rendering Mercury and Jupiter are strong in the East; the Sun and Mars in the South; Saturn in the West; Venus and the Moon in the North — the classic dig-bala directional rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिक्बल (directional strength) — षड्बल का एक घटक। भाव-मैपिंग (पूर्ण-बल स्थिति, साधारण परम्परा):

  • बुध, गुरु → १म भाव (पूर्व) पर अधिकतम दिक्बल
  • सूर्य, मङ्गल → १०म भाव (दक्षिण)
  • शनि → ७म भाव (पश्चिम)
  • शुक्र, चन्द्र → ४थ भाव (उत्तर)

पूर्ण दिक्बल प्रायः १ रूप = ६० विरूप पैमाने पर गिना जाता है; भाव-मध्य से दूर होने पर बल रैखिक/चाप-अनुपात से घटता है (परम्परा-भेद संभव)। कुल षड्बल = स्थान + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग् बल।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए मङ्गल दशम भाव के मध्य में है (दक्षिण-दिशा पूर्ण)। शास्त्रानुसार मङ्गल को दिक्बल का पूर्ण अंश मिलता है ≈ ६० विरूप (१ रूप)। यदि वही मङ्गल लग्न (पूर्व) में हो, तो दिक्बल न्यून/शून्य के निकट माना जाता है — क्योंकि उसका “बल-दिशा” दक्षिण है, पूर्व नहीं। (अयनांश भाव-स्वामी नहीं बदलता; भाव-गृह-प्रणाली — पूर्ण-भाव या श्रीपति — घोषित करनी चाहिए जब अंश-सूक्ष्म गणना हो।)

हमारा डिकोड (Our Decode) BPHS अध्याय २७ का षड्बल-क्रम — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — इसी दिक्बल-बीज (३.३५) पर टिका है। हमारा बला-इंजन रूप/विरूप (१ रूप = ६० विरूप) में घटक जोड़ता है और ग्रह-देहली से तुलना करता है; यह गणना है, फल की endorsment नहीं। अनुशासन वही: गणित `==` से जाँचे, फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें।

3.36
निशायां बलिनश्चन्द्रकुजसौरा भवन्ति हि।
सर्वदा ज्ञो बली ज्ञेयो दिने शेषा द्विजोत्तम
niśāyāṃ balinaścandrakujasaurā bhavanti hi|
sarvadā jño balī jñeyo dine śeṣā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निशायाम् = रात्रिकाल में; बलिनः = बलवान्; चन्द्र-कुज-सौराः = चन्द्र, मङ्गल, शनि; सर्वदा = सदा/निरन्तर; ज्ञः = बुध; बली ज्ञेयः = बलवान् जानना चाहिए; दिने = दिन में; शेषाः = शेष ग्रह (सूर्य, गुरु, शुक्र); द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रात्रि के समय चन्द्र, कुज और शनि बलवान् होते हैं। बुध को सर्वदा बलवान् जानना चाहिए—दिन हो या रात। दिन में शेष ग्रह, अर्थात् सूर्य, गुरु और शुक्र, बलवान् माने जाते हैं। यह काल-सम्बन्धी बल का वर्गीकरण है, न कि फल का निर्धारण।

English rendering The text states that at night the Moon, Mars, and Saturn are strong; Mercury is always to be known as strong; and by day the remaining planets (the Sun, Jupiter, and Venus) are strong.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कालबल (kālabala) का द्विविध नियम—रात्रि-दिन विभाजन:
- यदि स्थानीय सूर्योदय ≤ t < सूर्यास्त → दिवा: सूर्य, गुरु, शुक्र बलिन; रात्रि: चन्द्र, कुज, शनि बलिन।
- बुध: दोनों खण्डों में बलिन (सर्वदा)।
पूर्ण संख्यात्मक विरूपप-मान अध्याय २७ के षड्बल-सूत्रों से जुड़े हैं; यह श्लोक केवल “कौन कब बलवान्” का द्विआधारी नियम देता है।

उदाहरण (worked example) मान लें स्थानीय सूर्योदय ०६:००, सूर्यास्त १८:००, घटना-काल २१:३० (रात्रि)। तब चन्द्र, कुज, शनि = बलिन; सूर्य, गुरु, शुक्र = दुर्बल-पक्ष; बुध = बलिन। यदि काल १०:०० (दिन) हो तो सूर्य–गुरु–शुक्र बलिन, चन्द्र–कुज–शनि दुर्बल-पक्ष, बुध फिर भी बलिन। (स्थानिक सूर्योदय/अस्त; अयनांश इस नियम पर निर्भर नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल-अध्याय (Ch.27) में कालादि-अवयव की गणना इसी दिन/रात्रि-वर्गीकरण पर टिकती है—स्थाना, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्। हम गणित और फल-कथन को अलग रखते हैं: यह श्लोक केवल काल-शर्त देता है; फल “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रहता है, नियति-वाक्य नहीं।

3.37
कृष्णे च बलिनः क्रूराः सौम्या वीर्ययुताः सिते।
सौम्यायने सौम्यखेटो बली याम्यायनेऽपरः
kṛṣṇe ca balinaḥ krūrāḥ saumyā vīryayutāḥ site|
saumyāyane saumyakheṭo balī yāmyāyane'paraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृष्णे = कृष्णपक्ष में; बलिनः = बलवान्; क्रूराः = क्रूर ग्रह (सूर्य, मङ्गल, शनि, राहु-केतु—परम्परा-भेद संभव); सौम्याः = सौम्य ग्रह; वीर्ययुताः = वीर्य/बल से युक्त; सिते = शुक्लपक्ष में; सौम्य-अयने = उत्तरायण में; सौम्य-खेटः = सौम्य ग्रह; बली = बलवान्; याम्य-अयने = दक्षिणायन में; अपरः = दूसरा पक्ष (क्रूर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कृष्णपक्ष में क्रूर ग्रह बलवान् होते हैं, और शुक्लपक्ष में सौम्य ग्रह वीर्य से युक्त होते हैं। उत्तरायण में सौम्य ग्रह बलवान् माने जाते हैं; दक्षिणायन में “अपर”—अर्थात् क्रूर पक्ष—बलवान् होता है। यह पक्ष-बल और अयन-बल का निर्देश है।

English rendering The text states that in the dark fortnight the malefics are strong, while in the bright fortnight the benefics are endowed with strength; in the northern course (uttarāyaṇa) a benefic planet is strong, and in the southern course (dakṣiṇāyana) the other (malefic) side is strong.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्वतंत्र काल-शर्तें:
1. पक्ष (pakṣa): तिथि १–१५ शुक्ल → सौम्य बलिन; कृष्ण → क्रूर बलिन। (अमा/पूर्ण के सन्धि-पाठ में पाठ-भेद संभव।)
2. अयन (ayana): सूर्य की क्रान्ति-दिशा—उत्तरायण (मकर-संक्रान्ति → कर्क) में सौम्य; दक्षिणायन में क्रूर।
ये षड्बल के कालबल-अवयवों में द्विआधारी गुणक/अंश के रूप में प्रयुक्त होते हैं; इस श्लोक में निरपेक्ष विरूपप-संख्या नहीं दी गई।

उदाहरण (worked example) सूर्य देशान्तर-रहित सायन-स्थिति से उत्तरायण, और चन्द्र कला से शुक्लपक्ष (उदा. शुक्ल सप्तमी) हो तो: सौम्य = पक्ष + अयन दोनों से बल-पक्ष; क्रूर = दोनों में दुर्बल-पक्ष। यदि कृष्णपक्ष + दक्षिणायन हो तो क्रूर दोनों शर्तों से बल-पक्ष। (अयनांश केवल राशि-गृह-फल पर प्रभाव डालता है; अयन-दिशा सूर्य की मौसमी गति से निर्धारित होती है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल-इंजन में कालबल के पक्ष/अयन घटक इसी प्रकार के द्विआधारी नियमों से जुड़ते हैं। हम परम्परा-भेद (क्रूर/सौम्य की सूची) को घोषित रखते हैं और `==` अनुशासन से केवल उन अंकों को पिन करते हैं जो सूत्र में स्पष्ट हों—यह श्लोक गुण-वर्गीकरण देता है, निरपेक्ष राशि नहीं।

3.38
वर्षमासाहहोराणां पतयो बलिनस्तथा।
शमंबुगुशुचंराद्या वृद्धितो वीर्यवत्तरः
varṣamāsāhahorāṇāṃ patayo balinastathā|
śamaṃbuguśucaṃrādyā vṛddhito vīryavattaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ष-मास-अह-होराणाम् पतयः = वर्षेश, मासेश, वारेश (दिन-स्वामी), होरेश; बलिनः तथा = वे भी बलवान्; श-मं-बु-गु-शु-चं-रा-आद्या = शनि, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र, रवि—इस क्रम से आरम्भ; वृद्धितः = उत्तरोत्तर बढ़ते हुए; वीर्यवत्तरः = अधिक वीर्य/बल वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वर्ष, मास, अह (वार) और होरा के अधिपति भी बलवान् होते हैं—यह काल-स्वामित्व का बल है। साथ ही नैसर्गिक क्रम दिया गया है: शनि से आरम्भ कर मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र, सूर्य—प्रत्येक परवर्ती पूर्व से वीर्यवत्तर है। अर्थात् सूर्य नैसर्गिक रूप से सर्वाधिक, शनि न्यूनतम बल-क्रम में।

English rendering The text states that the lords of the year, month, day, and hora are likewise strong; and, beginning with Saturn, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, the Moon, and the Sun, each successive planet is stronger in natural vigour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो नियम—
1. काल-स्वामी बल: वर्षेश, मासेश, वारेश, होरेश को बलवान् गिना जाता है (पूर्ण अनुपात/विरूपप Ch.27 में)।
2. नैसर्गिक बल-क्रम (ascending vīrya):
शनि < कुज < बुध < गुरु < शुक्र < चन्द्र < सूर्य।
(पूर्ण नैसर्गिक विरूपप-मान परम्परा में प्रायः १ : २ : ३ : ४ : ५ : ६ : ७ के अनुपात में ६० विरूपप-मानक पर बाँटे जाते हैं—वे संख्याएँ इस श्लोक में नहीं; क्रम ही यहाँ मूल है। पाठ-भेद संभव यदि किसी संस्करण में क्रम भिन्न हो।)

उदाहरण (worked example) नैसर्गिक क्रम से तुलना: सूर्य > चन्द्र > शुक्र; बुध > कुज > शनि। अतः दो ग्रहों में केवल नैसर्गिक वीर्य पूछे तो सूर्य सदैव शनि से ऊपर। वर्षेश=गुरु, होरेश=बुध हो तो दोनों “पतयः बलिनः” श्रेणी में आते हैं; उनका पारस्परिक पूर्ण अंक षड्बल-अध्याय की इकाइयों से जोड़ा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल में नैसर्गिक बल और कालबल अलग-अलग अवयव हैं—यह श्लोक दोनों की ओर इशारा करता है: पतयः = काल-स्वामित्व; शमंबु…राद्या = नैसर्गिक क्रम। हम गणित को स्रोत-क्रम से बाँधते हैं और फल को “शास्त्र कहता है” तक सीमित रखते हैं; अनुपात-अंक तभी `==` पिन होते हैं जब अध्याय-सूत्र स्पष्ट संख्या दे।

3.39
सूर्ये जनयति स्थूलान्‌ दुर्भगान्‌ सूर्यपुत्रकः।
क्षीरोपेतांस्तथा चन्द्रः कटुकाद्यान्‌ धरासुतः
sūrye janayati sthūlān‌ durbhagān‌ sūryaputrakaḥ|
kṣīropetāṃstathā candraḥ kaṭukādyān‌ dharāsutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्ये = सूर्य (के प्रभाव/संकेत से); जनयति = उत्पन्न करता है / दर्शाता है; स्थूलान् = स्थूल, मोटे तने/अंग वाले; दुर्भगान् = अशोभन, रूखे; सूर्यपुत्रकः = शनि; क्षीर-उपेतान् = दुग्ध/रस से युक्त; चन्द्रः = चन्द्र; कटुक-आद्यान् = कटु आदि रस वाले; धरासुतः = भूमि-पुत्र, मङ्गल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र वनस्पति/प्रकृति-संकेत के रूप में कहता है—सूर्य स्थूल प्रकृति वाले को जन्म देता है (या सूचित करता है); शनि दुर्भग/रूखे प्रकार को। चन्द्र क्षीर-युक्त, रसपूर्ण प्रकृति को; मङ्गल कटु आदि तीखे स्वभाव वाले को। यह ग्रह-प्रकृति का वर्णनात्मक फल-कथन है, चिकित्सा-निर्देश नहीं।

English rendering The text states that the Sun produces (or indicates) gross/stout types; Saturn, the unlovely or harsh; the Moon, those endowed with milky sap; and Mars, those that are bitter and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / प्रकृति-वर्णन। यह श्लोक ग्रहों को वनस्पति-गुणों से जोड़ता है; इसमें अंश, वर्ग या बल-इकाई नहीं है—केवल शास्त्रीय संकेत-सूची।

3.40
पुष्पवृक्षं भृगोः पुत्रे गुरुज्ञौ सफलाफलौ।
नीरसान्‌ सूर्यपुत्रश्च एवं ज्ञेयाः खगा द्विज
puṣpavṛkṣaṃ bhṛgoḥ putre gurujñau saphalāphalau|
nīrasān‌ sūryaputraśca evaṃ jñeyāḥ khagā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुष्प-वृक्षम् = पुष्प देने वाले वृक्ष; भृगोः पुत्रे = भृगु-पुत्र शुक्र में/से; गुरु-ज्ञौ = गुरु और बुध; सफल-अफलौ = फलयुक्त और फलरहित; नीरसान् = नीरस, शुष्क; सूर्यपुत्रः = शनि; एवं ज्ञेयाः = इस प्रकार जानने योग्य; खगाः = ग्रह; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—शुक्र पुष्प-वृक्षों से जुड़ा है; गुरु फलयुक्त और बुध फलरहित वृक्ष-संकेत देते हैं। शनि नीरस/शुष्क प्रकार को सूचित करता है। द्विज से कहा गया है कि ग्रहों को इसी प्रकृति-भेद से जानें। यह वर्गीकरण का फल-वाक्य है, बागवानी या आरोग्य का आदेश नहीं।

English rendering The text states that flowering trees belong with Venus; Jupiter and Mercury indicate the fruit-bearing and the fruitless respectively; Saturn indicates the juiceless or dry; thus, O twice-born, the planets are to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / प्रकृति-वर्णन। ३.३९–३.४० मिलकर ग्रह → वनस्पति-गुण की तालिका बनाते हैं; गणना-सूत्र नहीं, केवल शास्त्रीय मानचित्रण।

3.41
राहुश्चाण्डालजातिश्च केतुर्जात्यन्तरस्तथा।
शिखिस्वर्भानुमन्दानां वल्मीकः स्थानमुच्यते
rāhuścāṇḍālajātiśca keturjātyantarastathā|
śikhisvarbhānumandānāṃ valmīkaḥ sthānamucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहुः = राहु; चाण्डाल-जातिः = चाण्डाल जाति/वर्ग-संकेत; केतुः = केतु; जाति-अन्तरः = भिन्न/मिश्र जाति; तथा = तथा; शिखि = केतु (शिखा-युक्त); स्वर्भानु = राहु; मन्द = शनि; तेषां = इनके; वल्मीकः = बाँबी/वल्मीक; स्थानम् उच्यते = स्थान कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—राहु चाण्डाल-जाति का संकेत रखता है; केतु जात्यन्तर (भिन्न जाति) का। शिखि (केतु), स्वर्भानु (राहु) और मन्द (शनि) का स्थान वल्मीक कहा गया है। यह जाति/स्थान-संकेत का वर्णनात्मक कथन है—सामाजिक भेदभाव का समर्थन नहीं, स्रोत-पाठ का प्रतिबिम्ब मात्र।

English rendering The text states that Rāhu is of cāṇḍāla class-indication and Ketu of a different (mixed) class; and the place of Ketu, Rāhu, and Saturn is said to be the anthill (valmīka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन / संकेत-सूची। छाया-ग्रहों और शनि के जाति-स्थान संकेत; इसमें दशांशक, बिन्दु या बल-इकाई नहीं।

3.42
चित्रकन्था फनीन्द्रस्य केतुश्छिद्रयुतो द्विज।
सीसं रहोर्नीलमणिः केतोर्ज्ञेयो द्विजोत्तम
citrakanthā phanīndrasya ketuśchidrayuto dvija|
sīsaṃ rahornīlamaṇiḥ ketorjñeyo dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चित्र-कन्था = चित्र-विचित्र / चिथड़ी चादर; फणीन्द्रस्य = सर्पराज (राहु) की; केतुः = केतु; छिद्र-युतः = छिद्रों से युक्त (फटी वस्त्र-संकेत); द्विज = हे द्विज; सीसम् = सीसा (lead); रहोः = राहु का; नील-मणिः = नीला मणि; केतोः = केतु का; ज्ञेयः = जानना चाहिए; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—फणीन्द्र राहु की कन्था चित्र-विचित्र होती है; केतु छिद्र-युक्त (फटी) वस्त्र-संकेत रखता है। राहु का धातु/उपल सीसा जाना जाता है; केतु का नीलमणि। हे द्विजोत्तम, छाया-ग्रहों के वस्त्र-धातु-मणि संकेत इस प्रकार जानने चाहिए—यह रूपक-सूची है, उपाय-दाब नहीं।

English rendering The text states that the serpent-lord (Rāhu) has a multicoloured/patched garment, and Ketu one that is rent with holes; lead is to be known as Rāhu’s, and the blue gem as Ketu’s, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन / द्रव्य-संकेत सूची। वस्त्र, धातु और मणि के शास्त्रीय प्रतीक; कोई अंश-सूत्र या वर्ग-भाग नहीं—केवल पाठ का संकेत-कोश।

3.43
गुरोः पीताम्बरं विप्र भृगोः क्षौमं तथैव च।
रक्तक्षौमं भास्करस्य इन्दोः क्षौमं सितं द्विज
guroḥ pītāmbaraṃ vipra bhṛgoḥ kṣaumaṃ tathaiva ca|
raktakṣaumaṃ bhāskarasya indoḥ kṣaumaṃ sitaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरोः = बृहस्पति (गुरु); पीताम्बरं = पीत (पीला) अम्बर/वस्त्र; भृगोः = शुक्र (भृगु-पुत्र); क्षौमं = क्षौम-वस्त्र (रेशमी/लिनन प्रकार का सूक्ष्म वस्त्र); भास्करस्य = सूर्य; रक्तक्षौमं = रक्त (लाल) क्षौम; इन्दोः = चन्द्र; क्षौमं सितं = श्वेत क्षौम; विप्र/द्विज = शिष्य-संबोधन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रहों के वस्त्र-वर्ण का क्रम देता है। गुरु का वस्त्र पीताम्बर कहा गया है; शुक्र का क्षौम; सूर्य का रक्त-क्षौम; और चन्द्र का श्वेत क्षौम। यह ग्रह-स्वरूप का लक्षण-वर्णन है—वर्ण, पदार्थ और रूप का पारंपरिक चिह्न—न कि कोई फल-कल्पना।

English rendering The text assigns planetary garments: Jupiter yellow (pītāmbara), Venus silken/fine cloth (kṣauma), the Sun red kṣauma, and the Moon white kṣauma—attributes of graha-svarūpa addressed to the student.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-वस्त्र-लक्षण (स्वरूप-वर्णन)। यह आरोपण तालिका है: गुरु→पीत, शुक्र→क्षौम, सूर्य→रक्त-क्षौम, चन्द्र→सित-क्षौम; संख्यात्मक भाग/अंश यहाँ नहीं आते।

3.44
बुधस्य कृष्णक्षौमं तु रक्तवस्त्रं कुजस्य च।
वस्त्रं चित्रं शनेर्विप्र पट्‌तवस्त्रं तथैव च
budhasya kṛṣṇakṣaumaṃ tu raktavastraṃ kujasya ca|
vastraṃ citraṃ śanervipra paṭ‌tavastraṃ tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधस्य = बुध; कृष्णक्षौमं = कृष्ण (काला/गहरा) क्षौम; कुजस्य = मङ्गल; रक्तवस्त्रं = रक्त-वर्ण वस्त्र; शनेः = शनि; वस्त्रं चित्रं = चित्र/विचित्र (बहुरंगा/चित्रात्मक) वस्त्र; पट्‌तवस्त्रं = पट्ट-वस्त्र (सूक्ष्म रेशमी/पट्ट-वस्त्र; पाठ-भेद संभव); विप्र = संबोधन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शृंखला यहीं पूरी होती है। बुध का वस्त्र कृष्ण-क्षौम कहा गया; मङ्गल का रक्त-वस्त्र; शनि का चित्र-वस्त्र; और पट्ट-वस्त्र का उल्लेख भी साथ जुड़ा है। पाठ में “पट्टवस्त्रं तथैव च” का सटीक ग्रह-आवंटन कुछ आवृत्तियों में भिन्न हो सकता है—पाठ-भेद संभव—अतः यहाँ शब्दार्थ के अनुसार ही रखा गया है।

English rendering Mercury is given black/dark kṣauma, Mars red cloth, Saturn variegated (citra) cloth, and fine silk (paṭṭa-vastra) is stated in the same line; the exact node-assignment of paṭṭa, if any, may vary by recension (pāṭha-bheda possible).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वस्त्र-लक्षण-क्रम (बुध–कुज–शनि)। यह भी स्वरूप-तालिका है; गणना नहीं—केवल आरोपित गुणों का क्रम।

3.45
भृगोरृतुर्वसन्तश्च कुजभान्वोश्च ग्रीष्मकः।
चन्द्रस्य वर्षा विज्ञेया शरच्चैव तथा विदः
bhṛgorṛturvasantaśca kujabhānvośca grīṣmakaḥ|
candrasya varṣā vijñeyā śaraccaiva tathā vidaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भृगोः = शुक्र; ऋतुः = षड्-ऋतु में से एक; वसन्तः = वसन्त; कुजभान्वोः = मङ्गल और सूर्य (कुज + भानु); ग्रीष्मकः = ग्रीष्म; चन्द्रस्य = चन्द्र; वर्षा = वर्षा-ऋतु; विदः = बुध (विद् = ज्ञाता, बुध का पर्याय); शरत् = शरद्; विज्ञेया = जाननी चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रहों को ऋतुओं से जोड़ता है। शुक्र का ऋतु वसन्त है; मङ्गल और सूर्य का ग्रीष्म; चन्द्र का वर्षा; और बुध (विद्) का शरद्। यह नैसर्गिक गुण-संकेत है—समय-गुण का ग्रह-स्वरूप—जिससे आगे के काल-निर्णय और लक्षण-वर्णन जुड़े रहते हैं।

English rendering The text maps planets to seasons: Venus to vasanta (spring), Mars and the Sun to grīṣma (summer), the Moon to varṣā (rains), and Mercury (vid) to śarad (autumn).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ऋतु-आरोपण (गुण-तालिका)। भारतीय षड्-ऋतु-क्रम में प्रत्येक ऋतु प्रायः २ मास; यहाँ केवल ग्रह→ऋतु का नाम-बंधन है, अंश/डिग्री-सूत्र नहीं।

3.46
हेमन्तोऽपि गुरोर्ज्ञेयः शनेस्तु शिशिरो द्विज।
अष्टौ मासाश्च स्वर्भानोः केतोर्मासत्रयं द्विज
hemanto'pi gurorjñeyaḥ śanestu śiśiro dvija|
aṣṭau māsāśca svarbhānoḥ ketormāsatrayaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हेमन्तः = हेमन्त; गुरोः = गुरु; ज्ञेयः = जानने योग्य; शनेः = शनि; शिशिरः = शिशिर; स्वर्भानोः = राहु (स्वर्भानु); अष्टौ मासाः = आठ मास; केतोः = केतु; मासत्रयं = तीन मास; द्विज = संबोधन।

हिन्दी भावार्थ ऋतु-शृंखला आगे बढ़ती है: गुरु का ऋतु हेमन्त, शनि का शिशिर। फिर शास्त्र राहु-केतु के लिए मास-संख्या देता है—स्वर्भानु (राहु) के अष्ट मास, केतु के तीन मास। यह पाठ का अपना आरोपण है; “वर्ष का शेष” जैसी कोई चुप गणना यहाँ न थोपें—जो कहा गया है, वही।

English rendering Jupiter is assigned hemanta and Saturn śiśira; Rāhu (Svarbhānu) is given eight months and Ketu three months—the text’s own month-counts for the nodes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पाठस्थ स्थिरांक (मास-गणना, सूत्र नहीं):
- राहु (स्वर्भानु) = ८ मास
- केतु = ३ मास
Σ(राहु+केतु) = ११ मास — पूर्ण १२-मास-वर्ष का शेष-विभाजन यहाँ शास्त्र नहीं कहता; केवल ये दो संख्याएँ कही गई हैं। षड्-ऋतु (वसन्त…शिशिर) ग्रह-आरोपण के साथ जुड़े; राहु-केतु पर मास-मात्रा अलग पंक्ति में है।

उदाहरण (worked example) यदि किसी प्रसंग में “राहु-काल” को पाठानुसार ८ मास माना जाए, तो ८ × ३० = २४० दिन (अमावास्या-आधारित चान्द्र मास ≈ २९.५ दिन लें तो ≈ २३६ दिन)—किन्तु यह केवल मास-संख्या का विस्तार है; अयनांश/लग्न-पद्धति यहाँ लागू नहीं, क्योंकि श्लोक केवल आरोपण देता है।

3.47
राह्वारपंगुचन्द्रश्च विज्ञेया धातुखेचराः।
मूलग्रहौ सूर्यशुक्रौ अपरा जीवसंज्ञकाः
rāhvārapaṃgucandraśca vijñeyā dhātukhecarāḥ|
mūlagrahau sūryaśukrau aparā jīvasaṃjñakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहु = राहु; आर = मङ्गल (आर/अङ्गारक); पंगु = शनि (पंगु = लंगड़ा, शनि का विशेषण); चन्द्रः = चन्द्र; धातुखेचराः = धातु-संज्ञक खेचर (ग्रह); मूलग्रहौ = मूल-संज्ञक दो ग्रह; सूर्यशुक्रौ = सूर्य और शुक्र; अपराः = शेष; जीवसंज्ञकाः = जीव-संज्ञक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रहों को तीन वर्गों में बाँटता है—धातु, मूल, जीव। धातुखेचर: राहु, मङ्गल (आर), शनि (पंगु) और चन्द्र। मूल-ग्रह: सूर्य और शुक्र। शेष ग्रह जीव-संज्ञक कहे गए। यह धातु–मूल–जीव का पारंपरिक त्रिविध वर्गीकरण है—पदार्थ-स्तरीय लक्षण, न कि फल-भाषा।

English rendering The text classifies the grahas: dhātu-planets are Rāhu, Mars (Āra), Saturn (Paṅgu), and the Moon; mūla-planets are the Sun and Venus; the remaining are termed jīva.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रिविध वर्गीकरण (धातु / मूल / जीव)।
धातु = {राहु, कुज, शनि, चन्द्र} (४); मूल = {सूर्य, शुक्र} (२); जीव = शेष (गुरु, बुध, केतु आदि—पाठ “अपरा” कहता है)। यह समुच्चय-विभाजन है; अंश-गणित नहीं।

3.48
ग्रहेषु मन्दो वृद्धोऽस्ति आयुर्वृद्धिप्रदायकः।
नैसर्गिके बहुसमान्‌ ददाति द्विजसत्तम
graheṣu mando vṛddho'sti āyurvṛddhipradāyakaḥ|
naisargike bahusamān‌ dadāti dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहेषु = ग्रहों में; मन्दः = शनि (मन्द); वृद्धः = ज्येष्ठ/वृद्ध; अस्ति = है; आयुर्वृद्धिप्रदायकः = आयु की वृद्धि देने वाला (शास्त्र-कथन); नैसर्गिके = नैसर्गिक (स्वाभाविक आयु/क्रम) में; बहुसमान् = अनेक/बहुत वर्ष; ददाति = देता है; द्विजसत्तम = श्रेष्ठ द्विज (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—ग्रहों में मन्द (शनि) वृद्ध है, और आयु-वृद्धि का दाता कहा गया है; नैसर्गिक दृष्टि से वह बहुत वर्ष देता है। यह नैसर्गिक आयु/ग्रह-क्रम का पाठ-कथन है। हम इसे नियति या “निश्चित दीर्घायु” के रूप में नहीं पढ़ते—केवल यही कि शास्त्र शनि को वृद्ध और आयु-वर्षों का नैसर्गिक दाता मानता है।

English rendering Among the planets, the text calls Saturn (Manda) the elder and states that he grants increase of longevity; in the natural (naisargika) scheme he is said to bestow many years—reported as the śāstra’s claim, not as a guaranteed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/गुण-कथन (नैसर्गिक आयु-संकेत)। इस श्लोक में वर्ष-संख्या का अंक नहीं है; “बहुसमान्” गुणात्मक है। विस्तृत नैसर्गिक आयु-वर्ष-तालिका अन्य अध्यायों/परंपराओं में आती है—यहाँ केवल शनि = वृद्ध + आयु-वर्ष-दाता का कथन है।

3.49
मेषो वृषो मृगः कन्या कर्को मीनस्तथा तुला।
सूर्यादीनां क्रमादेते कथिता उच्चराश्यः
meṣo vṛṣo mṛgaḥ kanyā karko mīnastathā tulā|
sūryādīnāṃ kramādete kathitā uccarāśyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषः = मेष राशि; वृषः = वृषभ; मृगः = मकर (मृग = मकर-राशि का पारंपरिक नाम); कन्या = कन्या; कर्कः = कर्क; मीनः = मीन; तुला = तुला; सूर्यादीनां क्रमात् = सूर्य से आरंभ कर क्रमशः (सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि); उच्चराश्यः = उच्च-राशियाँ; कथिताः = कही गईं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्यादि ग्रहों की उच्च-राशियाँ क्रम से बताता है: मेष, वृष, मृग (मकर), कन्या, कर्क, मीन, तुला। अर्थात् सूर्य-मेष, चन्द्र-वृष, मङ्गल-मकर, बुध-कन्या, गुरु-कर्क, शुक्र-मीन, शनि-तुला। यह उच्च-स्थान की राशि-सूची है—उच्चांश (अंश में उच्च-बिंदु) का अंक यहाँ नहीं; केवल राशि-नाम।

English rendering In order from the Sun onward, the exaltation signs are: Aries, Taurus, Capricorn (Mṛga), Virgo, Cancer, Pisces, and Libra—for the Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, and Saturn respectively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उच्च-राशि-क्रम (सूर्यादि, ७ ग्रह):

| क्रम | ग्रह | उच्च-राशि |
|------|------|-----------|
| 1 | सूर्य | मेष |
| 2 | चन्द्र | वृष |
| 3 | मङ्गल | मकर (मृग) |
| 4 | बुध | कन्या |
| 5 | गुरु | कर्क |
| 6 | शुक्र | मीन |
| 7 | शनि | तुला |

उच्चांश (exact degree of ucca: e.g. classical १०° सूर्य, ३° चन्द्र, …) इस श्लोक में नहीं—केवल राशि। नीच = उच्च से ७वीं राशि (मेष→तुला आदि)। स्थान-बल/उच्च-बल की मात्रा-गणना (रূপ/विरूप) च.२७ षड्बल-प्रकरण में; यहाँ केवल राशि-सूची।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य की सायन/निरयण देशांतर λ_☉ = १५° मेष (निरयण; अयनांश घोषित करना आवश्यक—उदा. लाहिरी)। मेष = सूर्य की उच्च-राशि, अतः सूर्य उच्च-राशि में है। यदि λ_☉ = १५° तुला होता, तो नीच-राशि (उच्च से सप्तम) में गिना जाता। राशि-निर्णय: floor(λ / ३०°) mod १२ → ०=मेष …; उच्च-परीक्षा = (राशि == उच्च-राशि_ग्रह)।

हमारा डिकोड (Our Decode) उच्च-राशि-तालिका षड्बल के स्थान-बल/उच्च-बल घटक का आधार है—जो BPHS च.२७ में रূপ-विरूप में जुड़ता है। हम गणित और फल को अलग रखते हैं: यहाँ केवल राशि-सूची का यथापाठ निर्धारण; बल-संख्या तभी जब च.२७ के नियम और घोषित अयनांश दोनों लगे हों। Exact-`==` अनुशासन: राशि-सूचकांक का मिलान बिना सहन-पट्टी के।

3.50
भागा दश त्रयोऽष्टाश्व्यस्तिथ्योऽक्षा भमिता नखाः।
उच्चात्‌ सप्तमभं नीचं तैरेवांशैः प्रकीर्तितम्‌
bhāgā daśa trayo'ṣṭāśvyastithyo'kṣā bhamitā nakhāḥ|
uccāt‌ saptamabhaṃ nīcaṃ tairevāṃśaiḥ prakīrtitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भागा = अंश/डिग्री; दश = 10; त्रय = 3; अष्टाश्वि = 28 (अष्ट=8 + अश्वि=2 → अष्टाविंश); तिथि = 15; अक्ष = 5; भ = 27 (नक्षत्र-संख्या); नख = 20; उच्च = उत्तुङ्ग/exaltation; सप्तमभ = उच्च से सातवीं राशि; नीच = पतन/debilitation; तैरेवांशैः = उन्हीं अंशों पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सात ग्रहों के उच्च-अंश क्रमशः इस प्रकार कहता है—१०, ३, २८, १५, ५, २७ और २०। ये अंक सूर्य से शनि तक के उत्तुङ्ग-बिन्दु हैं (राशि-निर्देश पूर्व/परवर्ती श्लोकों से जुड़े हैं)। उसी उच्च-राशि से सातवाँ भ नीच-स्थान है, और नीच भी उन्हीं अंशों पर गिना जाता है—अंश अपरिवर्तित, केवल राशि सप्तम।

English rendering The text states the exaltation degrees of the seven planets, in order, as 10, 3, 28, 15, 5, 27 and 20. Debilitation is the seventh sign from the exaltation sign, at the same degree-mark.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उच्च-अंश (सूर्य→शनि):
λ_ucca ∈ {10°, 3°, 28°, 15°, 5°, 27°, 20°}
नीच-राशि: rāśi_nīca = (rāśi_ucca + 6) mod 12
नीच-अंश: aṃśa_nīca = aṃśa_ucca (समान डिग्री)
उदाहरण-युग्म: मेष 10° उच्च ⇒ तुला 10° नीच; वृष 3° ⇒ वृश्चिक 3°; मकर 28° ⇒ कर्कट 28°; कन्या 15° ⇒ मीन 15°; कर्कट 5° ⇒ मकर 5°; मीन 27° ⇒ कन्या 27°; तुला 20° ⇒ मेष 20°।
(भृत-संख्या: दश·त्रय·अष्टाश्वि·तिथि·अक्ष·भ·नख — पाठ पारंपरिक रूप से इन सात अंकों पर स्थिर।)

उदाहरण (worked example) सूर्य का उच्च मेष 10°00′ मानें। नीच = मेष + 6 राशि = तुला, अंश अपरिवर्तित ⇒ तुला 10°00′। यदि जन्म-लग्न देशांतर (सायन या निरयण, जो भी मॉडल चुना हो) पर सूर्य तुला 10° पर हो, तो वह नीच-बिन्दु पर है; 10° से दूर हटने पर “पूर्ण नीच” नहीं, बल्कि नीच-अंश से कोणीय दूरी से बल/निर्बलता मापी जाती है (पूर्ण गणना बल-अध्याय में)।

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3.51
रवेः सिंहे नखांशाश्च त्रिकोणमपरे स्वभम्‌।
उच्चमिन्दोर्वृषे त्र्यंशास्त्रिकोणमपरेंऽशकाः
raveḥ siṃhe nakhāṃśāśca trikoṇamapare svabham‌|
uccamindorvṛṣe tryaṃśāstrikoṇamapareṃ'śakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि = सूर्य; सिंह = Leo; नखांश = 20 अंश; त्रिकोण = मूलत्रिकोण; अपरे = शेष भाग; स्वभ = स्वराशि/own sign; इन्दु = चन्द्र; वृष = Taurus; उच्च = exaltation; त्र्यंश = 3 अंश; अपरेऽंशाः = शेष अंश मूलत्रिकोण।

हिन्दी भावार्थ सूर्य का मूलत्रिकोण सिंह राशि में प्रथम बीस अंश (नखांश) है; सिंह का शेष भाग उसकी स्वराशि कहा गया है। चन्द्र का उच्च वृष में तीन अंश पर है; वृष के शेष अंश चन्द्र के मूलत्रिकोण माने गए हैं। इस श्लोक में चन्द्र की स्वराशि (कर्कट) का पृथक् उल्लेख नहीं—केवल वृष में उच्च और मूलत्रिकोण का विभाग है।

English rendering For the Sun, the first 20° of Leo are mūlatrikoṇa and the remainder of Leo is own sign. For the Moon, exaltation is at 3° of Taurus, and the remaining degrees of Taurus are mūlatrikoṇa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
सूर्य · सिंह: [0°, 20°) = मूलत्रिकोण; [20°, 30°) = स्वभ
चन्द्र · वृष: 3° = उच्च-बिन्दु; (3°, 30°] (अर्थात् 3° के बाद शेष) = मूलत्रिकोण
(उच्च-बिन्दु स्वयं “उच्च” है; मूलत्रिकोण उच्च-बिन्दु के बाद के अंशों पर लागू—शास्त्रीय विभाग।)

उदाहरण (worked example) सूर्य सिंह 12°40′ पर ⇒ मूलत्रिकोण में। सूर्य सिंह 24°10′ पर ⇒ स्वभ (सिंह के उत्तरार्ध) में। चन्द्र वृष 2°50′ पर ⇒ उच्च-बिन्दु के समीप (उच्च-अंश 3° से 0°10′ पहले); चन्द्र वृष 18° पर ⇒ मूलत्रिकोण। (राशि-सीमा 30° स्थिर; अयनांश केवल निरयण देशांतर तय करने में लगता है, इस विभाजन-नियम में नहीं।)

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3.52
मेषेऽर्कांशास्तु भौमस्य त्रिकोणमपरे स्वभम्‌।
उच्चं बुधस्य कन्यायामुक्तं पञ्चदशांशकाः
meṣe'rkāṃśāstu bhaumasya trikoṇamapare svabham‌|
uccaṃ budhasya kanyāyāmuktaṃ pañcadaśāṃśakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेष = Aries; अर्कांश = 12 अंश (अर्क = १२ आदित्य); भौम = मङ्गल; त्रिकोण = मूलत्रिकोण; अपरे स्वभम् = शेष स्वराशि; बुध = Mercury; कन्या = Virgo; उच्च = exaltation; पञ्चदशांशकाः = 15 अंश।

हिन्दी भावार्थ मङ्गल का मूलत्रिकोण मेष में बारह अंश तक है; मेष का शेष भाग उसकी स्वराशि है। बुध का उच्च कन्या राशि में पंद्रह अंश पर कहा गया है। (कन्या में बुध के मूलत्रिकोण-स्वभ का अगला विभाग अगले श्लोक में आता है।)

English rendering Mars has mūlatrikoṇa in the first 12° of Aries, the rest of Aries being own sign. Mercury’s exaltation is stated at 15° of Virgo.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
मङ्गल · मेष: [0°, 12°) = मूलत्रिकोण; [12°, 30°) = स्वभ
बुध · कन्या: उच्च-बिन्दु = 15°
(पूर्व 3.50 से बुध-उच्च-अंश 15° की पुष्टि; राशि यहाँ कन्या नामित।)

उदाहरण (worked example) मङ्गल मेष 8° ⇒ मूलत्रिकोण; मेष 21° ⇒ स्वभ। बुध कन्या 15°00′ ⇒ उच्च-बिन्दु पर; कन्या 15° से दूरी |λ − 15°| से उच्च-बल का ह्रास मापा जाता है (पूर्ण ucca-bala सूत्र बल-प्रकरण में)।

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3.53
ततः पञ्चांशकाः प्रोक्तं त्रिकोणमपरे स्वभम्‌।
चापे दशांशा जीवस्य त्रिकोणमपरे स्वभम्‌
tataḥ pañcāṃśakāḥ proktaṃ trikoṇamapare svabham‌|
cāpe daśāṃśā jīvasya trikoṇamapare svabham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = (उच्च के) अनन्तर; पञ्चांशकाः = 5 अंश; प्रोक्तं त्रिकोणम् = मूलत्रिकोण कहा; अपरे स्वभम् = शेष स्वराशि; चाप = धनु/Sagittarius; दशांश = 10 अंश; जीव = गुरु; त्रिकोणम् · अपरे स्वभम् = वही विभाग-नियम।

हिन्दी भावार्थ (कन्या में बुध के पंद्रह-अंशीय उच्च के) बाद पाँच अंश मूलत्रिकोण कहे गए हैं, और उसके बाद का शेष स्वराशि है—अतः कन्या: 0°–15° उच्च-क्षेत्र (उच्च-बिन्दु 15°), 15°–20° मूलत्रिकोण, 20°–30° स्वभ। गुरु का मूलत्रिकोण धनु में दस अंश तक है; धनु का शेष उसकी स्वराशि है।

English rendering After Mercury’s exaltation mark, five degrees are mūlatrikoṇa and the remainder of the sign is own sign. Jupiter’s mūlatrikoṇa is the first 10° of Sagittarius; the rest of Sagittarius is own sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
बुध · कन्या (3.52–3.53 संयुक्त):
• उच्च-बिन्दु = 15°
• मूलत्रिकोण = (15°, 20°] अर्थात् 15° के बाद 5 अंश
• स्वभ = (20°, 30°]
गुरु · धनु: [0°, 10°) = मूलत्रिकोण; [10°, 30°) = स्वभ

उदाहरण (worked example) बुध कन्या 15° = उच्च; कन्या 17°30′ = मूलत्रिकोण; कन्या 25° = स्वभ। गुरु धनु 6° = मूलत्रिकोण; धनु 22° = स्वभ। (दो स्वराशियों वाले ग्रहों में दूसरी राशि—बुध के लिए मिथुन, गुरु के लिए मीन—इस श्लोक-युग्म में नहीं बाँटी गई; यहाँ केवल कन्या/धनु का आन्तरिक विभाग है।)

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3.54
तुले शुक्रस्य तिथ्यंशास्त्रिकोणमपरे स्वभम्‌।
शनेः कुम्भे नखांशाश्च त्रिकोणमपरे स्वभम्‌
tule śukrasya tithyaṃśāstrikoṇamapare svabham‌|
śaneḥ kumbhe nakhāṃśāśca trikoṇamapare svabham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुला = Libra; शुक्र = Venus; तिथ्यंश = 15 अंश; त्रिकोणम् · अपरे स्वभम् = मूलत्रिकोण फिर शेष स्वभ; शनि; कुम्भ = Aquarius; नखांश = 20 अंश; त्रिकोणम् · अपरे स्वभम् = वही।

हिन्दी भावार्थ शुक्र का मूलत्रिकोण तुला में पंद्रह अंश तक है; तुला का शेष उसकी स्वराशि है। शनि का मूलत्रिकोण कुम्भ में बीस अंश तक है; कुम्भ का शेष उसकी स्वराशि है। (शुक्र-उच्च मीन २७° और शनि-उच्च तुला २०° श्लोक ३.५० के अंकों से जुड़े हैं; यहाँ मूलत्रिकोण-स्वभ का राशि-आन्तरिक विभाग है।)

English rendering Venus has mūlatrikoṇa in the first 15° of Libra, the rest of Libra being own sign. Saturn has mūlatrikoṇa in the first 20° of Aquarius, the rest of Aquarius being own sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
शुक्र · तुला: [0°, 15°) = मूलत्रिकोण; [15°, 30°) = स्वभ
शनि · कुम्भ: [0°, 20°) = मूलत्रिकोण; [20°, 30°) = स्वभ

संक्षिप्त सारणी (३.५१–३.५४, मूलत्रिकोण-सीमा):
| ग्रह | राशि | मूलत्रिकोण | शेष = स्वभ |
| सूर्य | सिंह | 0°–20° | 20°–30° |
| चन्द्र | वृष | 3° के बाद शेष | (उच्च = 3°) |
| मङ्गल | मेष | 0°–12° | 12°–30° |
| बुध | कन्या | 15°–20° | 20°–30° (उच्च 15°) |
| गुरु | धनु | 0°–10° | 10°–30° |
| शुक्र | तुला | 0°–15° | 15°–30° |
| शनि | कुम्भ | 0°–20° | 20°–30° |

उदाहरण (worked example) शुक्र तुला 10° ⇒ मूलत्रिकोण; तुला 22° ⇒ स्वभ। शनि कुम्भ 18° ⇒ मूलत्रिकोण; कुम्भ 27° ⇒ स्वभ।

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3.55
त्रिकोणात्‌ स्वात्‌सुखस्वाऽन्त्यधीधर्मायुःस्वतुङ्गपाः।
सुहृदो रिपवश्वान्वे समाश्चोभयलक्षणाः
trikoṇāt‌ svāt‌sukhasvā'ntyadhīdharmāyuḥsvatuṅgapāḥ|
suhṛdo ripavaśvānve samāścobhayalakṣaṇāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोणात् = मूलत्रिकोण-राशि से; स्व = २. भाव; सुख = ४.; अन्त्य = १२.; धी = ५.; धर्म = ९.; आयुः = ८.; स्वतुङ्गपाः = (उच्च-राशि के) स्वामी; सुहृदः = नैसर्गिक मित्र; रिपवः = शत्रु; उभयलक्षणाः = दोनों लक्षण वाले; समाः = सम/तटस्थ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नैसर्गिक मैत्री का नियम मूलत्रिकोण से बाँधता है: मूलत्रिकोण-राशि से दूसरे, चौथे, बारहवें, पाँचवें, नौवें और आठवें भावों के अधिपति तथा ग्रह के उच्च-राशि-स्वामी—ये सुहृद् कहे गए। शेष भाव-स्वामी रिपु-श्रेणी में आते हैं। जो ग्रह एक साथ सुहृद् और रिपु दोनों लक्षण रखे (एक राशि मित्र-वर्ग की, दूसरी शत्रु-वर्ग की), उसे सम कहा गया है। यह स्थायी/नैसर्गिक सम्बन्ध है, गोचर-स्थिति नहीं।

English rendering From a planet’s mūlatrikoṇa sign, the lords of the 2nd, 4th, 12th, 5th, 9th and 8th houses, together with the lord of its exaltation sign, are natural friends. Lords of the remaining houses are natural enemies; a planet that falls in both categories is neutral (sama).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मूलत्रिकोण-राशि = R₀ (0…11)।
मित्र-भाव-सेट M = {2, 4, 5, 8, 9, 12} ∪ {उच्च-राशि का भाव-अंक R₀ से}
शत्रु-भाव-सेट E = {1, 3, 6, 7, 10, 11} \ {उच्च यदि पहले से M में} — व्यावहारिक रूप: M में न आने वाले भाव-स्वामी E।
ग्रह P के लिए:
• यदि P केवल M-स्वामित्व में ⇒ सुहृद्
• यदि P केवल E-स्वामित्व में ⇒ रिपु
• यदि P दोनों में ⇒ सम
(स्वयं ग्रह अपने लिए मित्र/शत्रु गणना से बाहर; चन्द्र-एकराशि आदि विशेष स्थितियाँ स्वामित्व-एकत्व से स्वतः सरल हो जाती हैं।)

उदाहरण (worked example) सूर्य का मूलत्रिकोण = सिंह (R₀)। सिंह से: २=कन्या (बुध), ४=वृश्चिक (मङ्गल), ५=धनु (गुरु), ८=मीन (गुरु), ९=मेष (मङ्गल), १२=कर्कट (चन्द्र); सूर्य-उच्च = मेष ⇒ स्वामी मङ्गल।
⇒ मित्र-वर्ग: चन्द्र, मङ्गल, गुरु (+ बुध द्वितीय से)।
शत्रु-भाव सिंह से: ३=तुला (शुक्र), ६=मकर (शनि), ७=कुम्भ (शनि), १०=वृष (शुक्र), ११=मिथुन (बुध)।
बुध २ (मित्र) और ११ (शत्रु) दोनों का स्वामी ⇒ सम। शुक्र और शनि केवल शत्रु-वर्ग ⇒ रिपु। चन्द्र-मङ्गल-गुरु केवल मित्र-वर्ग ⇒ सुहृद्। (शास्त्रीय नैसर्गिक मैत्री-सारिणी इसी नियम से निकलती है।)

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3.56
दशवन्ध्वायसहजस्वान्त्यस्थास्तु परस्परम्‌।
तत्काले मित्रतां यान्ति रिपवोऽन्यत्र संस्थिताः
daśavandhvāyasahajasvāntyasthāstu parasparam‌|
tatkāle mitratāṃ yānti ripavo'nyatra saṃsthitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दश = १०. भाव; वन्धु = ४.; आय = ११.; सहज = ३.; स्व = २.; अन्त्य = १२.; परस्परम् = एक-दूसरे से; तत्काले = उस क्षण/जातक-काल में; मित्रताम् यान्ति = तात्कालिक मित्र; रिपवः = (नैसर्गिक) शत्रु भी; अन्यत्र संस्थिताः = इन स्थानों से भिन्न स्थिति में तात्कालिक शत्रु।

हिन्दी भावार्थ नैसर्गिक मैत्री (३.५५) के ऊपर शास्त्र तात्कालिक मैत्री जोड़ता है: जो ग्रह एक-दूसरे से दशम, बन्धु (चतुर्थ), आय (एकादश), सहज (तृतीय), स्व (द्वितीय) या अन्त्य (द्वादश) स्थान में हों, वे परस्पर तत्काल मित्रता को प्राप्त होते हैं। इन छह स्थानों से अन्यत्र स्थित हों तो वे (तात्कालिक) रिपु कहे जाते हैं। अन्तिम मैत्री प्रायः नैसर्गिक + तात्कालिक के संयोग (मित्र+मित्र=अधिक मित्र, आदि) से बाद में बाँधी जाती है—यह श्लोक केवल तात्कालिक नियम देता है।

English rendering Planets placed mutually in the 10th, 4th, 11th, 3rd, 2nd or 12th from one another become temporary friends at that time; those in any other mutual positions are temporary enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह A की राशि-अंक a, ग्रह B की b ∈ {0…11}।
Δ = min( (b − a) mod 12 , (a − b) mod 12 ) नहीं—यहाँ दिशा-सहित भाव-गिनती A से B:
d = (b − a) mod 12 (1=स्वराशि/साथ, 2=द्वितीय, …; d=0 को 1/सहित या “उसी राशि” मानें—शास्त्र में एक राशिस्थ प्रायः शत्रु-पक्ष/अन्यत्र)
तात्कालिक मित्र यदि d ∈ {2, 3, 4, 10, 11, 12}
तात्कालिक शत्रु यदि d ∈ {1, 5, 6, 7, 8, 9}
(समीकरण A↔B सममित: यदि B, A से मित्र-स्थान में है तो A भी B से उन्हीं छह में से किसी पर होगा।)
नैसर्गिक (३.५५) × तात्कालिक (३.५६) → पञ्चधा मैत्री (अधिक मित्र / मित्र / सम / शत्रु / अधिक शत्रु) — फल-ग्रन्थों का अगला पद; इस श्लोक में केवल तत्काल-नियम।

उदाहरण (worked example) मानें राशि-स्थितियाँ (D1, कोई भी गृह-पद्धति नहीं—केवल राशि): सूर्य सिंह, गुरु धनु। सूर्य से गुरु = (धनु − सिंह) = 5वाँ भाव ⇒ d=5 ∈ शत्रु-सेट ⇒ तात्कालिक रिपु।
सूर्य सिंह, मङ्गल वृश्चिक: सिंह से वृश्चिक = 4था ⇒ d=4 ∈ मित्र-सेट ⇒ तात्कालिक मित्र।
नैसर्गिक रूप से मङ्गल सूर्य का सुहृद् (३.५५) + तात्कालिक मित्र ⇒ संयोग में दृढ़ मित्र-वर्ग; गुरु नैसर्गिक सुहृद् किन्तु तात्कालिक रिपु ⇒ प्रायः सम-वर्ग (पञ्चधा नियम लागू होने पर)—यहाँ केवल ३.५६ का गणना-पद दिखाया गया।

3.57
तत्काले च निसर्गे च मित्रं चेदधिमित्रकम्‌।
मित्रं मित्रसमत्वे तु शत्रुः शत्रुसमत्वके
tatkāle ca nisarge ca mitraṃ cedadhimitrakam‌|
mitraṃ mitrasamatve tu śatruḥ śatrusamatvake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काले = तात्कालिक (जन्म-कालीन, गोचर-स्थित) मित्रता; निसर्गे = नैसर्गिक (जन्मजात) मित्रता; मित्रं चेद् = यदि दोनों पक्ष मित्र हों; अधि-मित्रकम् = अधि-मित्र (परम मित्र); मित्र-समत्वे = एक मित्र + एक सम; शत्रु-समत्वके = एक शत्रु + एक सम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तात्कालिक और नैसर्गिक मित्रता को जोड़कर पाँच-स्तरीय सम्बन्ध बनता है। यदि दोनों ही मित्र हों तो ग्रह अधि-मित्र कहलाता है। यदि एक मित्र और दूसरा सम (तटस्थ) हो तो केवल मित्र माना जाता है; यदि एक शत्रु और दूसरा सम हो तो शत्रु। यह संयोजन अगले श्लोक में पूर्ण होता है।

English rendering Combining temporary (tātkālika) and natural (naisargika) friendship: both friendly yields adhimītra (great friend); friend plus neutral yields plain friend; enemy plus neutral yields enemy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वि-अक्षीय संयोजन-तालिका (tatkāla × nisarga → 5 फल-वर्ग)। मानचित्र: (मित्र, मित्र) → अधि-मित्र; (मित्र, सम) या (सम, मित्र) → मित्र; (शत्रु, सम) या (सम, शत्रु) → शत्रु। (मित्र, शत्रु) और (शत्रु, शत्रु) अगले श्लोक में।

उदाहरण (worked example) मानें सूर्य–बुध: नैसर्गिक मित्र; किसी जन्म में तात्कालिक भी मित्र → अधि-मित्र। यदि तात्कालिक सम हो → केवल मित्र। (तात्कालिक मित्रता: ग्रह से 2, 3, 4, 10, 11, 12वें भाव में स्थित = मित्र; 1, 5, 6, 7, 8, 9 = शत्रु — यही सामान्य पारंपरिक नियम; recensions differ on edge-cases → पाठ-भेद संभव।)

3.58
समो मित्ररिपुत्वे तु शत्रुत्वे त्वधिशत्रुता।
एवं विविच्य दैवज्ञो जातकस्य फलं वदेत्‌
samo mitrariputve tu śatrutve tvadhiśatrutā|
evaṃ vivicya daivajño jātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समः = तटस्थ/सम; मित्र-रिपु-त्वे = एक मित्र + एक रिपु (शत्रु); शत्रु-त्वे = दोनों शत्रु; अधि-शत्रुता = अधि-शत्रु (परम शत्रु); विविच्य = विवेकपूर्वक विभक्त कर; दैवज्ञः = ज्योतिषी; जातकस्य फलं वदेत् = जातक का फल कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है: यदि एक पक्ष मित्र और दूसरा शत्रु हो तो सम्बन्ध सम होता है; यदि दोनों ही शत्रु हों तो अधि-शत्रु। इस प्रकार पाँच स्तर — अधि-मित्र, मित्र, सम, शत्रु, अधि-शत्रु — विवेक करके दैवज्ञ जातक का फल बोले। यह फल-कथन का प्रक्रिया-निर्देश है, न कि किसी एक जन्म का नियति-घोष।

English rendering Friend plus enemy yields neutral (sama); both hostile yield adhiśatru (great enemy). Discriminating thus into the five grades, the astrologer is to state the native’s results as the śāstra frames them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्ण संयोजन-सारणी (5 फल):

| nisarga \ tatkāla | मित्र | सम | शत्रु |
|---|---|---|---|
| मित्र | अधि-मित्र | मित्र | सम |
| सम | मित्र | सम | शत्रु |
| शत्रु | सम | शत्रु | अधि-शत्रु |

(स्तंभ/पंक्ति अदला-बदली सममित; “सम×सम” शास्त्र में यहाँ स्पष्ट नहीं — पारंपरिक विस्तार में सम ही रहता है; पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) मंगल–बुध: नैसर्गिक शत्रु। यदि तात्कालिक भी शत्रु → अधि-शत्रु। यदि तात्कालिक मित्र → सम। यदि तात्कालिक सम → शत्रु। इन पाँच ग्रेडों का उपयोग 3.59–3.60 के फल-अंशों और स्थान-बल/दृष्टि-निर्णय में होता है।

3.59
स्वोच्चे शुभं फलं पूर्ण त्रिकोणे पादवर्जितम्‌।
स्वर्क्षेऽर्धं मित्रगेहे तु पादमात्रं प्रकीर्तितम्‌
svocce śubhaṃ phalaṃ pūrṇa trikoṇe pādavarjitam‌|
svarkṣe'rdhaṃ mitragehe tu pādamātraṃ prakīrtitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-उच्चे = स्वोच्च (उच्च-राशि में); शुभं फलं पूर्णम् = शुभ फल पूरा (1 = पूर्ण); त्रिकोणे = मूलत्रिकोण में; पाद-वर्जितम् = एक पाद घटाकर (¾); स्व-र्क्षे = स्वराशि में; अर्धम् = आधा (½); मित्र-गेहे = मित्र-गृह में; पाद-मात्रम् = केवल एक पाद (¼); प्रकीर्तितम् = कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शुभ फल की मात्रा स्थान-गौरव के अनुसार बाँटता है। स्वोच्च में शुभ फल पूर्ण; मूलत्रिकोण में तीन-पाद (पाद रहित अर्थात् ¾); स्वराशि में आधा; मित्र-गृह में केवल एक पाद। यह अंश-तालिका है — “कितना फल” का गणितीय ढाँचा, न कि कोई निश्चित घटना का वादा।

English rendering The text assigns auspicious result in full at exaltation; three-quarters in mūlatrikoṇa; half in own sign; a mere quarter in a friend’s house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ-फल गुणांक k (पूर्ण फल = 1):

  • स्वोच्च (ucca): k = 1
  • मूलत्रिकोण (trikoṇa): k = 1 − ¼ = ¾
  • स्वराशि (svarāśi / svarkṣa): k = ½
  • मित्र-गृह (mitra-geha): k = ¼

(अगले श्लोक में सम, नीच, अस्त, शत्रु। उच्च/मूलत्रिकोण/स्वराशि-निर्देश ग्रह-विशिष्ट हैं — जैसे सूर्य उच्च = मेष 10°, मूलत्रिकोण = सिंह 0°–20°, स्व = सिंह; चंद्र उच्च = वृष 3°, इत्यादि।)

उदाहरण (worked example) मानें “पूर्ण शुभ” का कोई संदर्भ-मान P = 1 इकाई। गुरु वृष में (उच्च) → k = 1 → फल = P। गुरु धनु 0°–10° (मूलत्रिकोण) → k = ¾ → फल = 0.75 P। गुरु धनु 10°–30° (स्वराशि, मूलत्रिकोण के बाहर) → k = ½ → 0.5 P। गुरु मेष में (मित्र-गृह, सूर्य का घर; गुरु–सूर्य नैसर्गिक मित्र) → k = ¼ → 0.25 P। (उच्च-अंश की सूक्ष्म सीमाएँ recension/टीका-भेद से चलती हैं → पाठ-भेद संभव।)

3.60
पादार्धं समभे प्रोक्तं शून्यं नीचास्तशत्रुभे।
तद्वद्‌दुष्टफलं ब्रूयाद्‌ व्यत्ययेन विचक्षणः
pādārdhaṃ samabhe proktaṃ śūnyaṃ nīcāstaśatrubhe|
tadvad‌duṣṭaphalaṃ brūyād‌ vyatyayena vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाद-अर्धम् = पाद का आधा = ⅛; सम-भे = सम राशि में; शून्यम् = शून्य (0); नीच-अस्त-शत्रु-भे = नीच, अस्त, या शत्रु-राशि में; दुष्ट-फलम् = अशुभ/दोष-फल; व्यत्ययेन = उलटा क्रम लगाकर; विचक्षणः = विचक्षण ज्योतिषी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है: सम राशि में शुभ फल पादार्ध (⅛); नीच, अस्त अथवा शत्रु-राशि में शून्य। विचक्षण उसी अनुपात-क्रम को उलटा लगाकर दुष्ट फल बोले — अर्थात् जहाँ शुभ पूर्ण था वहाँ अशुभ शून्य, जहाँ शुभ शून्य था वहाँ अशुभ पूर्ण, और मध्य श्रेणियाँ तदनुसार। यह व्युत्क्रम-नियम है, भय-कथन नहीं।

English rendering In a neutral sign the auspicious portion is an eighth; in debilitation, combustion, or an enemy’s sign it is nil. The skilled reader states adverse results by the same scale inverted.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्ण शुभ-तालिका और दुष्ट-व्युत्क्रम:

| स्थान | शुभ k | दुष्ट k′ (= 1 − k, व्यत्यय) |
|---|---|---|
| स्वोच्च | 1 | 0 |
| मूलत्रिकोण | ¾ | ¼ |
| स्वराशि | ½ | ½ |
| मित्र-गृह | ¼ | ¾ |
| सम-भ | ⅛ | ⅞ |
| नीच / अस्त / शत्रु-भ | 0 | 1 |

अस्त (combustion): ग्रह–सूर्य युति की पारंपरिक सीमाएँ ग्रह-विशिष्ट (उदा. बुध प्रायः 14°, शुक्र 10°, अन्य 12°–17° आदि — सीमाएँ संस्करण-भेद से चलती हैं → पाठ-भेद संभव)। नीच = उच्च से 180° वाली राशि।

उदाहरण (worked example) शनि तुला में (उच्च) → शुभ k = 1, दुष्ट k′ = 0। शनि मेष में (नीच) → शुभ = 0, दुष्ट = 1। शनि कन्या में (सम-गृह-श्रेणी, पारंपरिक सम-वर्ग) → शुभ = ⅛। यदि शनि सूर्य से 8° पर (अस्त-सीमा के भीतर, सामान्य नियम) → शुभ = 0, चाहे राशि मित्र ही क्यों न हो — अस्त-शर्त यहाँ शून्य लागू करती है।

3.61
त्र्यंशाढ्यविश्वभागैश्च चतुर्भैः सहितो रविः।
धूमो नाम महादोषः सर्वकर्मविनाशकः
tryaṃśāḍhyaviśvabhāgaiśca caturbhaiḥ sahito raviḥ|
dhūmo nāma mahādoṣaḥ sarvakarmavināśakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्र्यंश-आढ्य = अंश के त्र्यंश (20′) से युक्त; विश्व-भागैः = विश्व = 13 (भूतसंख्यया) भाग/अंश; चतुर्-भैः सहितः = चार भ (राशि = 4 × 30° = 120°) सहित; रविः = सूर्य; धूमः = धूम उपग्रह; महा-दोषः = महान् दोष (शास्त्र-पद); सर्व-कर्म-विनाशकः = सब कर्मों का नाशक — शास्त्र का फल-पद, न कि हमारा नियति-घोष।

हिन्दी भावार्थ यहाँ उपग्रह-शृंखला आरंभ होती है। शास्त्र कहता है: सूर्य की देशांतर में चार राशि और तेरह अंश बीस कला जोड़ने से धूम नामक उपग्रह बनता है। पाठ उसे महादोष और सर्वकर्म-विनाशक कहता है — यह शास्त्र का अपना फल-कथन है; गणना pal घटना से अलग रखी जाए।

English rendering Dhūma is obtained by adding four signs and 13°20′ to the Sun. The text names it a great doṣa and “destroyer of all undertakings” — reported as the śāstra’s claim, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-विश्व = 13; त्र्यंश (1° का ⅓) = 20′; चतुर्भ = 4 × 30° = 120°।

धूम = λ☉ + 4 × 30° + 13°20′ = λ☉ + 133°20′
(≡ λ☉ + 133°20′, mod 360°)

उदाहरण (worked example) मानें λ☉ = 40°00′ (वृष 10°; ayanāṃśa कोई भी — यहाँ tropical/sidereal निरपेक्ष योग है, केवल सूर्य-देशांतर चाहिए)।
धूम = 40° + 133°20′ = 173°20′ ≡ कन्या 23°20′।

3.62
धूमो मण्डलतः शुद्धो व्यतीपातोऽत्र दोषदः।
सषद्‌भोऽत्र व्यतीपातः परिवेषोऽतिदोषकृत्‌
dhūmo maṇḍalataḥ śuddho vyatīpāto'tra doṣadaḥ|
saṣad‌bho'tra vyatīpātaḥ pariveṣo'tidoṣakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमः मण्डलतः शुद्धः = धूम को मण्डल (12 राशि = 360°) से घटाया/शोधित; व्यतीपातः = व्यतीपात उपग्रह; दोष-दः = दोष देने वाला (शास्त्र-पद); स-षड्-भः = छह भ (6 × 30° = 180°) सहित; परिवेषः = परिवेष उपग्रह; अति-दोष-कृत् = अत्यन्त दोष-कारी (शास्त्र-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की शृंखला आगे बढ़ती है: पूर्ण चक्र (360°) में से धूम घटाने से व्यतीपात मिलता है — पाठ उसे दोषद कहता है। व्यतीपात में छह राशि जोड़ने से परिवेष बनता है — पाठ उसे अतिदोषकृत् कहता है। दोनों फल-विशेषण शास्त्र के हैं; यहाँ सटीक चाप-गणित ही हमारा काम है।

English rendering Vyatīpāta is the circle minus Dhūma; Pariveṣa is Vyatīpāta plus six signs. The text calls the former fault-giving and the latter greatly fault-producing — stated as such, not endorsed as destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

व्यतीपात = 360° − धूम

परिवेष = व्यतीपात + 6 × 30° = व्यतीपात + 180° (mod 360°)

सूर्य से बंद रूप:
व्यतीपात ≡ 226°40′ − λ☉
परिवेष ≡ 46°40′ − λ☉
(दोनों mod 360°)।

उदाहरण (worked example) पूर्वोक्त धूम = 173°20′।
व्यतीपात = 360° − 173°20′ = 186°40′ ≡ तुला 6°40′।
परिवेष = 186°40′ + 180° = 366°40′ ≡ 6°40′ ≡ मेष 6°40′।
जाँच: 46°40′ − 40° = 6°40′ ✓।

3.63
परिवेषश्च्युतश्चक्रादिन्द्रचापस्तु दोषदः।
वित्र्यंशास्यष्टिभागाध्यश्चापः केतुखगोऽशुभः
pariveṣaścyutaścakrādindracāpastu doṣadaḥ|
vitryaṃśāsyaṣṭibhāgādhyaścāpaḥ ketukhago'śubhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परिवेषः च्युतः चक्रात् = चक्र (360°) से परिवेष घटाया; इन्द्र-चापः = इन्द्रचाप (AKA चाप) उपग्रह; दोष-दः = दोषद; वि-त्र्यंश-अष्टि-भाग-आढ्यः = अष्टि (= 16) भाग + त्र्यंश (20′) से युक्त; चापः = इन्द्रचाप; केतु-खगः = केतु नामक उपग्रह (राहु-केतु छाया-ग्रह से भिन्न); अशुभः = अशुभ (शास्त्र-पद)।

हिन्दी भावार्थ परिवेष को पूर्ण चक्र से घटाने पर इन्द्रचाप मिलता है — शास्त्र दोषद कहता है। इन्द्रचाप में सोलह अंश चालीस कला जोड़ने पर केतु (उपग्रह) प्राप्त होता है — पाठ अशुभ कहता है। यह केतु छाया-पातिकेतु नहीं, उपग्रह-शृंखला का पाँचवाँ सदस्य है। (नाम-समानता से भ्रमित न हों।)

English rendering Indracāpa is the circle minus Pariveṣa; the upagraha Ketu is Indracāpa plus 16°40′. The text calls both inauspicious factors. This Ketu is the upagraha, not the lunar node.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: अष्टि = 16; त्र्यंश = 20′ → 16°40′।

इन्द्रचाप = 360° − परिवेष

केतु (उपग्रह) = इन्द्रचाप + 16°40′ (mod 360°)

सूर्य-बंद रूप:
इन्द्रचाप ≡ λ☉ + 313°20′
केतु-उपग्रह ≡ λ☉ + 330° ≡ λ☉ − 30° (mod 360°)

पूर्ण शृंखला (3.61–3.63):
λ☉ → +133°20′ → धूम → 360°− → व्यतीपात → +180° → परिवेष → 360°− → इन्द्रचाप → +16°40′ → केतु-उपग्रह (≡ λ☉ − 30°)।

उदाहरण (worked example) परिवेष = 6°40′।
इन्द्रचाप = 360° − 6°40′ = 353°20′ ≡ मीन 23°20′।
केतु-उपग्रह = 353°20′ + 16°40′ = 370°00′ ≡ 10°00′ ≡ मेष 10°।
जाँच: λ☉ − 30° = 40° − 30° = 10° ✓। (सम्पूर्ण शृंखला का बंद होना — exact `==` — गणना की स्वच्छता का प्रमाण।)

3.64
एकराशियुतः केतुः सूर्यतुल्यः प्रजायते।
अप्रकाशग्रहाश्चैते पापा दोषप्रदाः स्मृताः
ekarāśiyutaḥ ketuḥ sūryatulyaḥ prajāyate|
aprakāśagrahāścaite pāpā doṣapradāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकराशियुतः = एक ही राशि में युक्त; केतुः = केतु (छाया-ग्रह); सूर्यतुल्यः = सूर्य के तुल्य (स्वभाव/दोष-बल में); प्रजायते = उत्पन्न/माना जाता है; अप्रकाशग्रहाः = अप्रकाश (अदृश्य/छाया) ग्रह; एते = ये (धूमादि उपग्रह एवं केतु); पापाः = पाप-श्रेणी; दोषप्रदाः = दोष देने वाले; स्मृताः = शास्त्र में स्मरण किये गये।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब किसी उपग्रह/दोष-बिन्दु के साथ एक ही राशि में हो, तो वह सूर्य-तुल्य माना जाता है। धूमादि अप्रकाश-ग्रह तथा ये छाया-तत्त्व पाप-वर्ग में गिने जाते हैं और दोष-प्रदायक स्मृत हैं। यह कथन फल-वर्गीकरण का है, न कि किसी व्यक्तिगत भाग्य-निर्णय का।

English rendering The text states that Ketu, when occupying the same sign, becomes Sun-like in character. These non-luminous (aprakāśa) grahas are classed as pāpa and remembered as doṣa-givers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-वर्गीकरण / उपग्रह-स्वभाव। केतु का “सूर्यतुल्य” यहाँ गणना-सूत्र नहीं, बल्कि शास्त्रीय दोष-तुल्यता का कथन है; स्थिति-निर्णय के लिए राशि-युति (same-sign co-presence) पर्याप्त मापदण्ड है।

3.65
सूर्येन्दुलग्नगेष्वेषु वंशायुर्ज्ञाननाशनम्‌।
इति धूमादिदोषाणां स्थितिः पद्‌मासनोदिता
sūryendulagnageṣveṣu vaṃśāyurjñānanāśanam‌|
iti dhūmādidoṣāṇāṃ sthitiḥ pad‌māsanoditā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्य-इन्दु-लग्न-गेषु = सूर्य, चन्द्र या लग्न में स्थित; एषु = इनमें (धूमादि दोषों में); वंश-आयुः-ज्ञान-नाशनम् = वंश, आयु और ज्ञान का नाश (शास्त्र-कथित फल); इति = इस प्रकार; धूमादि-दोषाणाम् = धूम आदि दोषों की; स्थितिः = स्थिति/व्यवस्था; पद्मासन-उदिता = पद्मासन (ब्रह्मा/आचार्य-प्रसंग) से कही गई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब ये धूमादि दोष सूर्य, चन्द्र या लग्न से सम्बद्ध हों, तो वंश, आयु और ज्ञान के नाश का फल स्मृत है। यही धूमादि दोषों की स्थिति-व्यवस्था पद्मासन-उक्त क्रम में कही गई है। फल-कथन शास्त्र का अपना वाक्य है; इसे निश्चित व्यक्तिगत भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when these Dhūmādi doṣas stand in relation to the Sun, the Moon, or the Lagna, they are said to destroy lineage, longevity, and knowledge. Thus the placement of the Dhūmādi faults is declared in the Padmāsana teaching.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दोष-स्थिति-समाप्ति। यहाँ केवल फल-क्षेत्र (सूर्य/चन्द्र/लग्न) और दोष-वर्ग (धूमादि) का निर्देश है; संख्यात्मक सूत्र अगले श्लोकों (गुलिकादि) में आता है।

3.66
रविवारादिशन्यन्तं गुलिकादि निरूप्यते।
दिवसानष्टधा भक्त्वा वारेशाद्‌ गणेयत्‌ क्रमात्‌
ravivārādiśanyantaṃ gulikādi nirūpyate|
divasānaṣṭadhā bhaktvā vāreśād‌ gaṇeyat‌ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविवार-आदि-शनि-अन्तम् = रविवार से शनिवार पर्यन्त; गुलिक-आदि = गुलिक आदि (उपग्रह-काल); निरूप्यते = निर्धारित किये जाते हैं; दिवसम् = दिन (सूर्योदय→सूर्यास्त); अष्टधा = आठ भागों में; भक्त्वा = बाँटकर; वारेशात् = वार-स्वामी (उस दिन के ग्रहाधिपति) से; गणयेत् = गिने; क्रमात् = क्रमशः (वार-क्रम में)।

हिन्दी भावार्थ रविवार से शनिवार तक के क्रम में गुलिक आदि का निरूपण बताया जाता है। दिन की अवधि को आठ समान खण्डों में बाँटें, और वार-स्वामी से आरम्भ कर क्रमशः ग्रहों को उन खण्डों पर लगाएँ। यह स्थानीय दिन-मान पर आधारित काल-विभाजन है।

English rendering Gulika and related points are determined from Sunday through Saturday. Divide the daylight span into eight equal parts and assign them in order beginning from the weekday lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
दिन-अवधि \(D_{\mathrm{day}} = t_{\mathrm{sunset}} - t_{\mathrm{sunrise}}\) (स्थानीय; स्वदेशोद्भव)।
एक खण्ड \(k = D_{\mathrm{day}} / 8\)।
वार-स्वामी क्रम (सप्त-ग्रह चक्र): रवि → चन्द्र → मंगल → बुध → गुरु → शुक्र → शनि → (8वाँ निरीश)।
खण्ड \(i\) (\(i = 1…7\)) का स्वामी = वार-स्वामी से \(i-1\) पद आगे; खण्ड 8 = निरीश (स्वामीहीन)।
गुलिक = जिस खण्ड का स्वामी शनि हो, उस खण्ड का काल-अंश (अगले श्लोक से पूर्ण)।

उदाहरण (worked example) रविवार; मान लें सूर्योदय 06:00, सूर्यास्त 18:00 → \(D_{\mathrm{day}} = 12\,\mathrm{h}\), \(k = 1.5\,\mathrm{h}\)।
खण्ड: 1 रवि 06:00–07:30; 2 चन्द्र 07:30–09:00; 3 मंगल 09:00–10:30; 4 बुध 10:30–12:00; 5 गुरु 12:00–13:30; 6 शुक्र 13:30–15:00; 7 शनि 15:00–16:30 = गुलिक-खण्ड; 8 निरीश 16:30–18:00।
(परम्परा: गुलिक-स्फुट प्रायः उस खण्ड के आरम्भ/मध्य — पाठ/टीका-भेद संभव; देशज सूर्योदय-सूर्यास्त अनिवार्य।)

3.67
अष्ट्मोंऽशो निरीशः स्याच्छन्यंशो गुलिकःस्मृतः।
रात्रिमप्यष्टधा कृत्वा वारेशात्‌ पञ्चमादितः
aṣṭmoṃ'śo nirīśaḥ syācchanyaṃśo gulikaḥsmṛtaḥ|
rātrimapyaṣṭadhā kṛtvā vāreśāt‌ pañcamāditaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमः अंशः = आठवाँ अंश/खण्ड; निरीशः = स्वामी-रहित; स्यात् = होता है; शनि-अंशः = शनि का अंश; गुलिकः = गुलिक; स्मृतः = स्मृत/कथित; रात्रिम् अपि = रात्रि को भी; अष्टधा कृत्वा = आठ भाग करके; वारेशात् = वार-स्वामी से; पञ्चमात् इतः = पञ्चम (पाँचवें) से आरम्भ।

हिन्दी भावार्थ दिन के आठ अंशों में आठवाँ अंश निरीश कहा गया है; शनि का अंश गुलिक स्मृत है। रात्रि को भी आठ भागों में बाँटें, किन्तु गणना वार-स्वामी से पाँचवें ग्रह से आरम्भ करें। इस प्रकार दिन-रात्रि दोनों में गुलिक शनि-खण्ड पर स्थिर रहता है; केवल आरम्भ-बिन्दु बदलता है।

English rendering The eighth portion is lordless (nirīśa); Saturn’s portion is remembered as Gulika. The night too is divided into eight, counting from the fifth planet from the weekday lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

दिन: खण्ड-स्वामी \(L_i^{\mathrm{day}} = W + (i-1) \pmod{7}\) for \(i=1…7\); \(i=8\) → निरीश।
जहाँ \(W\) = वार-स्वामी सूचकांक (रवि=0 … शनि=6)।

गुलिक (दिन): वह \(i\) जहाँ \(L_i^{\mathrm{day}} = \mathrm{शनि}\)।

रात्रि: \(D_{\mathrm{night}} = t_{\mathrm{next\ sunrise}} - t_{\mathrm{sunset}}\); \(k_n = D_{\mathrm{night}}/8\)।
आरम्भ-स्वामी \(W_n = W + 4 \pmod{7}\) (वारेशात् पञ्चम = W से 4 पद आगे, अर्थात् 5वाँ)।
\(L_i^{\mathrm{night}} = W_n + (i-1) \pmod{7}\) for \(i=1…7\); \(i=8\) → निरीश।

गुलिक (रात्रि): शनि वाला रात्रि-खण्ड।

उदाहरण (worked example) रविवार (\(W=\mathrm{रवि}\))। रात्रि-आरम्भ = रवि से पञ्चम = गुरु।
क्रम: 1 गुरु, 2 शुक्र, 3 शनि ← गुलिक, 4 रवि, 5 चन्द्र, 6 मंगल, 7 बुध, 8 निरीश।
यदि सूर्यास्त 18:00, अगला सूर्योदय 06:00 → \(D_{\mathrm{night}}=12\,\mathrm{h}\), \(k_n=1.5\,\mathrm{h}\) → गुलिक 21:00–22:30 (शनि-खण्ड)।

3.68
गणयेदष्टमः खण्डो निष्यतिः परिकीर्तितः।
श्न्यंशो गुलिकः प्रोक्तो रव्यंशः कालसंज्ञकः
gaṇayedaṣṭamaḥ khaṇḍo niṣyatiḥ parikīrtitaḥ|
śnyaṃśo gulikaḥ prokto ravyaṃśaḥ kālasaṃjñakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गणयेत् = गिने; अष्टमः खण्डः = आठवाँ खण्ड; निष्यतिः = निष्यति (नाम; पाठ-भेद संभव); परिकीर्तितः = कथित; शनि-अंशः = शनि का अंश; गुलिकः प्रोक्तः = गुलिक कहा गया; रवि-अंशः = सूर्य का अंश; काल-संज्ञकः = “काल” नामक उपग्रह।

हिन्दी भावार्थ आठवें खण्ड को निष्यति कहा गया है। शनि का अंश गुलिक प्रोक्त है, और सूर्य का अंश काल-संज्ञक है। इस श्लोक से गुलिक के साथ-साथ अन्य काल-बिन्दुओं की स्वामि-कुंजी खुलती है।

English rendering The eighth segment is declared Niṣyati. Saturn’s portion is called Gulika; the Sun’s portion is named Kāla.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
अष्ट-खण्ड मानचित्र (दिन या रात्रि, ऊपर के आरम्भ-नियम से):
- अंश(शनि) → गुलिक
- अंश(रवि) → काल
- अंश(8) → निष्यति (निरीश; स्वामीहीन)
काल-स्फुट = उस खण्ड का देशज काल-बिन्दु (आरम्भ/मध्य — पाठ-भेद संभव); देशज सूर्योदय-सूर्यास्त से \(k\) ज्ञात करें।

उदाहरण (worked example) रविवार-दिन (श्लोक 3.66 वाला 12 h दिन):
रव्यंश = खण्ड 1 (06:00–07:30) → काल; शन्यंश = खण्ड 7 (15:00–16:30) → गुलिक; अष्टम = 16:30–18:00 → निष्यति।

3.69
भौमांशो मृत्युरादिष्टो गुर्वंशो यमघण्ट्कः।
सोम्यांशोऽर्धप्रहरकः स्वस्वदेशोद्‌भवः स्फुटः
bhaumāṃśo mṛtyurādiṣṭo gurvaṃśo yamaghaṇṭkaḥ|
somyāṃśo'rdhapraharakaḥ svasvadeśod‌bhavaḥ sphuṭaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौम-अंशः = मंगल का अंश; मृत्युः = मृत्यु (उपग्रह-नाम); आदिष्टः = निर्दिष्ट; गुरु-अंशः = गुरु का अंश; यमघण्टकः = यमघण्टक; सोम्य-अंशः = बुध (सौम्य) का अंश; अर्धप्रहरकः = अर्धप्रहर; स्व-स्व-देश-उद्भवः = अपने-अपने देश/स्थान से उत्पन्न; स्फुटः = स्पष्ट देशान्तर-काल मान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मंगल का अंश मृत्यु, गुरु का अंश यमघण्टक, और बुध का अंश अर्धप्रहर कहा गया है। ये सभी स्फुट अपने-अपने देश के सूर्योदय-सूर्यास्त से ही उत्पन्न होते हैं; सर्वत्र एक ही घड़ी मानकर नहीं।

English rendering Mars’s portion is prescribed as Mṛtyu; Jupiter’s as Yamaghaṇṭaka; Mercury’s as Ardhaprahara. Their sphuṭa arises from the native’s own locality.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
उसी अष्ट-खण्ड स्वामि-क्रम में:
- अंश(मंगल) → मृत्यु
- अंश(गुरु) → यमघण्टक
- अंश(बुध) → अर्धप्रहर
- (पूर्व श्लोक) अंश(रवि) → काल; अंश(शनि) → गुलिक; अंश(8) → निष्यति
शुक्र/चन्द्र-अंश यहाँ नामित नहीं — केवल उक्त कुंजी।

स्फुट-अनुशासन: \(t_{\mathrm{upagraha}} = t_0 + (i_{\mathrm{lord}}-1)\,k\) (या खण्ड-मध्य \(+\tfrac12 k\) — टीका-भेद संभव), जहाँ \(t_0\) = दिन में सूर्योदय / रात्रि में सूर्यास्त; \(k = D/8\); स्थान = जातक का देशज क्षितिज।

उदाहरण (worked example) रविवार-दिन, \(k=1.5\,\mathrm{h}\), सूर्योदय 06:00:
मृत्यु (भौम, खण्ड 3) ≈ 09:00; यमघण्टक (गुरु, खण्ड 5) ≈ 12:00; अर्धप्रहर (बुध, खण्ड 4) ≈ 10:30 — खण्ड-आरम्भ मानकर; स्वदेशीय \(D\) बदलते ही सभी खिसकते हैं।

3.70
गुलिकेष्टवशाल्लग्नं स्फुटं यत्‌ स्वस्वदेशजम्‌।
गुलिकं प्रोच्यते तस्माज्जातकस्य फलं वदेत्‌
gulikeṣṭavaśāllagnaṃ sphuṭaṃ yat‌ svasvadeśajam‌|
gulikaṃ procyate tasmājjātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुलिक-इष्ट-वशात् = गुलिक के इष्ट-काल के वश से; लग्नम् = लग्न (उदित राशि/भाव-आरम्भ); स्फुटम् = स्पष्ट गणना; यत् = जो; स्व-स्व-देश-जम् = अपने देश से उत्पन्न; गुलिकम् प्रोच्यते = उसे गुलिक कहा जाता है; तस्मात् = उससे; जातकस्य फलम् = जातक का फल; वदेत् = कहे (शास्त्र-विधि)।

हिन्दी भावार्थ गुलिक के इष्ट (देशज काल-बिन्दु) से जो लग्न स्पष्ट निकलता है — वही गुलिक-लग्न/गुलिक-स्फुट कहा जाता है। शास्त्र कहता है कि उसी से जातक का फल कहा जाए। फल-विधान शास्त्र का अपना वाक्य है; यह यांत्रिक काल→लग्न रूपान्तरण के बाद आता है।

English rendering From Gulika’s iṣṭa, the Lagna sphuṭa computed for one’s own place is itself called Gulika. From that, the text directs, the native’s results are to be stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. श्लोक 3.66–3.67 से गुलिक-खण्ड का देशज काल \(t_G\) ज्ञात करें।
2. \(t_G\) पर स्थानीय लग्न-स्फुट \(L_G = \mathrm{ascendant}(\lambda,\varphi,t_G)\) — जहाँ \(\lambda,\varphi\) = जन्म/देश-स्थान; कालगणना में घोषित अयनांश/सायन-निरयण परम्परा बाँधें।
3. \(L_G\) ही “गुलिक” (गुलिक-लग्न) कथित; फल-कथन शास्त्रीय भाव/दृष्टि-नियमों से — यहाँ केवल स्फुट-विधि।

उदाहरण (worked example) रविवार, गुलिक-खण्ड आरम्भ 15:00 IST; स्थान दिल्ली (\(\varphi \approx 28.6^\circ\mathrm{N}\), \(\lambda \approx 77.2^\circ\mathrm{E}\))।
15:00 IST पर निरयण लग्न (उदा. लाहिरी अयनांश घोषित करके) गणना → मान लें \(L_G \approx 12^\circ\) वृश्चिक।
शास्त्र की भाषा में यही गुलिक-स्फुट; तदनन्तर फल “शास्त्र कहता है …” रूप में ही वक्तव्य — व्यक्तिगत भाग्य-घोषणा नहीं।

3.71
भांशपादसमैः प्राणैश्चराद्यर्कत्रिकोणभात्‌।
उदयादिष्टकालान्तं यद्‌भं प्राणपदं हि तत्‌
bhāṃśapādasamaiḥ prāṇaiścarādyarkatrikoṇabhāt‌|
udayādiṣṭakālāntaṃ yad‌bhaṃ prāṇapadaṃ hi tat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भांश = राशि-अंश (30° का अंश-विभाग); पादसमैः = पाद-तुल्य (अंश के पाद-माप से सम); प्राणैः = प्राण-काल-माप से; चर-आदि = चर-राशि से आरम्भ; अर्क-त्रिकोण-भात् = सूर्य जिस राशि में हो उसके त्रिकोण-समूह की चर-राशि से; उदय-आदि-इष्ट-काल-अन्तम् = सूर्योदय से इष्ट/जन्म-काल पर्यन्त; यद् भम् = जो भ/राशि-स्थान प्राप्त हो; प्राणपदम् = प्राणपद (विशेष लग्न-बिन्दु)।

हिन्दी भावार्थ आचार्य कहते हैं कि सूर्योदय से इष्टकाल तक बीता समय प्राणों में गिनें — और वे प्राण भांश-पाद के समान मापे जाएँ। फिर सूर्य जिस राशि में स्थित हो, उसके त्रिकोण (चर–स्थिर–द्विस्वभाव) में जो चर राशि है, उसी से उस काल-मान को गिनें। जो भ/स्थान इस प्रकार सिद्ध हो, वही प्राणपद है।

English rendering Measure the interval from sunrise to the desired time in prāṇas taken as equal to bhāṃśa-pādas; project that measure from the movable member of the Sun’s trikoṇa-group of signs. The sign-place so obtained is called the Prāṇapada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्राणपद का उद्घाटन-सूत्र (विधि का बीज; अगला श्लोक संख्या देगा):
(1) Δt = इष्टकाल − सूर्योदय (स्थानीय सूर्योदय-सम्मत दिनमान)।
(2) Δt को प्राण/पल-माप में लिखें, जहाँ प्राण = भांश-पाद-सम (श्लोक का माप-समीकरण)।
(3) आधार-राशि B = सूर्य-राशि के त्रिकोण में चर सदस्य: सूर्य चर में → वही राशि; स्थिर में → 9वीं; द्विस्वभाव में → 5वीं (यह विवेचन 3.72 में पूर्ण)।
(4) B से गिने गए चाप का फल-स्थान = प्राणपद।
सम्पूर्ण संख्यात्मक रूप 3.72 में: पल ÷ 15 → भादि।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्योदय 06:00, जन्म 08:00 (स्थानीय), सूर्य मिथुन (द्विस्वभाव) में। Δt = 2 h = 5 घटि = 300 पल। आधार B = सूर्य से 5वीं = तुला (3.72 के नियम से)। 300 ÷ 15 = 20 → 0 राशि 20°; अतः प्राणपद ≈ तुला 20° (गणना: सूर्योदय-आधारित इष्ट; अयनांश यहाँ नहीं लगता — यह काल→चाप रूपान्तर है, नक्षत्र-देशान्तर नहीं)।

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3.72
स्वेष्टकालं पलीकृत्य तिथ्याप्तं भादिकं च यत्‌।
चरागद्विभसंस्थेऽर्के भनौ युङ्‌ नवमे सुते
sveṣṭakālaṃ palīkṛtya tithyāptaṃ bhādikaṃ ca yat‌|
carāgadvibhasaṃsthe'rke bhanau yuṅ‌ navame sute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-इष्ट-कालम् = सूर्योदय से अपना इष्ट/जन्म-काल; पलीकृत्य = पलों (विघटि) में परिवर्तित कर; तिथि-आप्तम् = 15 (तिथि-संख्या) से भाग देकर प्राप्त; भ-आदिकम् = राशि-अंश-कला आदि; चर = चर राशि; अग = स्थिर (अचल); द्विभ = द्विस्वभाव राशि; संस्थे अर्के = सूर्य स्थित हो तो; भनौ = उस भ/स्थान में; युङ् = जोड़ें/गिनें; नवमे = नवम से; सुते = सुत-स्थान = पञ्चम से।

हिन्दी भावार्थ अपने इष्टकाल को पहले पलों में बदलो; फिर पंद्रह से भाग दो — जो राशि-आदि प्रमाण मिले, वही चाप है। सूर्य यदि चर राशि में हो तो उसी भ से उस चाप को जोड़कर गिनो; स्थिर राशि में हो तो नवम से; द्विस्वभाव में हो तो पंचम (सुत) से। यही प्राणपद का स्पष्ट गणित है।

English rendering Convert the interval from sunrise into palas and divide by fifteen; the quotient is the arc in signs and degrees. Count that arc from the Sun’s own sign if it is movable, from the ninth if fixed, and from the fifth if dual.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
माना इष्टकाल सूर्योदय से G घटि + P पल, तो कुल पल
L = 60G + P।
चाप (भादि, अंश-रूप में पढ़ा जाता है):
α = L ÷ 15 (अंश); α को 30° से राशि-अंश में बदलें — राशि = ⌊α/30⌋, अंश = α mod 30।

आधार-राशि B (0° से गिनती):
- सूर्य ∈ {मेष, कर्क, तुला, मकर} (चर) → B = सूर्य-राशि
- सूर्य ∈ {वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ} (स्थिर/अग) → B = सूर्य + 8 राशि (नवम)
- सूर्य ∈ {मिथुन, कन्या, धनु, मीन} (द्विभ) → B = सूर्य + 4 राशि (पंचम/सुत)

प्राणपद-रेखांश (राशि-आदि): B की 0° + α (मॉड 12 राशि)।
घटक: 1 दिन = 60 घटि = 3600 पल; 1 पल = 24 सेकण्ड (60 घटि = 24 h)।
टिप्पणी: पूर्ण दिवस पर α = 3600/15 = 240° — यह श्लोक-स्थ संख्यानुपात है; पाठान्तर/टीका में रूपान्तर-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) सूर्योदय→जन्म = 10 घटि 0 पल ⇒ L = 600 पल; α = 600 ÷ 15 = 40° = 1 राशि 10°। सूर्य वृष (स्थिर) 12° पर ⇒ B = वृष + 8 = धनु; प्राणपद = धनु 0° + 1s 10° = मकर 10°। (कन्वेंशन: गिनती आधार-राशि की 0° से; सूर्य का स्फुट-अंश इसमें नहीं जोड़ा जाता — श्लोक “भ”/नवम/सुत कहता है।)

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3.73
स्फुटं प्राणपदाख्यं तल्लग्नं ज्ञेयं द्विजोत्तम।
लग्नाद्‌ द्विकोणे तुर्ये च राज्ये प्राणपदं तदा
sphuṭaṃ prāṇapadākhyaṃ tallagnaṃ jñeyaṃ dvijottama|
lagnād‌ dvikoṇe turye ca rājye prāṇapadaṃ tadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फुटम् = स्पष्ट गणित-सिद्ध रेखांश; प्राणपद-आख्यम् = प्राणपद नामक; तत् लग्नम् = वह (विशेष) लग्न; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; लग्नात् = जन्म-लग्न से; द्वि = द्वितीय भाव; कोणे = कोण-भावों में (5, 9); तुर्ये = चतुर्थ में; राज्ये = दशम (राज्य-भाव) में; तदा = तब (जब प्राणपद वहाँ हो)।

हिन्दी भावार्थ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! ऊपर की विधि से जो स्पष्ट स्थान सिद्ध हो, उसी को प्राणपद-नामक लग्न जानो। फिर देखो — वह प्राणपद जन्म-लग्न से द्वितीय, कोणों (पंचम-नवम), चतुर्थ अथवा दशम में हो, तो (अगले श्लोक के साथ) शुभ-जन्म का विवेक किया जाता है।

English rendering Know that computed point as the lagna called Prāṇapada, O best of the twice-born. The text next weighs it when it falls from the natal lagna in the second, the trinal houses, the fourth, or the tenth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-विवेक का स्थान-निर्धारण।
तकनीक केवल तुलना है: भाव-संख्या n = 1 + ((R_prāṇa − R_lagna) mod 12), जहाँ R = राशि-सूचकांक 0…11।
श्लोक 3.73 स्थान-सूची देता है: n ∈ {2, 4, 5, 9, 10}; 3.74 जोड़ता है n = 11। यह भाव-गिनती पूर्ण-राशि/whole-sign भाव-पद्धति पर श्लोक के शब्दों के अनुकूल है; भावाधिपति-स्फुट या श्रीपति-भाव लगाने पर पाठ-भेद/पद्धति-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क (सूचकांक 3), प्राणपद = वृश्चिक (7) ⇒ n = 1 + ((7 − 3) mod 12) = 5 → पंचम = कोण-स्थान, 3.73 की सूची में। लग्न = कर्क, प्राणपद = सिंह (4) ⇒ n = 2 → द्वितीय, सूची में।

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3.74
शुभं जन्म विजानीयात्तथैवैकादशेऽपि च।
अन्यस्थाने स्थितं चेत्‌ स्यात्‌ तदा जन्माशुभं वदेत्‌
śubhaṃ janma vijānīyāttathaivaikādaśe'pi ca|
anyasthāne sthitaṃ cet‌ syāt‌ tadā janmāśubhaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभम् जन्म = शुभ जन्म; विजानीयात् = जानना चाहिए; तथा एव = उसी प्रकार; एकादशे अपि = ग्यारहवें भाव में भी; अन्य-स्थाने = अन्य भाव में; स्थितम् चेत् = यदि स्थित हो; तदा = तब; जन्म-अशुभम् = अशुभ जन्म; वदेत् = कहे (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — प्राणपद लग्न से द्वितीय, कोण, चतुर्थ, दशम (पूर्व श्लोक) तथा एकादश में भी हो तो जन्म को शुभ जानें। यदि वह इनसे भिन्न भाव में हो, तो शास्त्र उसे अशुभ-जन्म कहने का निर्देश देता है। यह फल-कथन है, न कि काल की अनिवार्यता।

English rendering The text states that birth is to be known as auspicious when the Prāṇapada stands in those houses and likewise in the eleventh; if it occupies any other place, the text directs one to speak of the birth as inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ/अशुभ जन्म-विवेक)।
स्थान-समुच्चय (3.73+3.74, लग्न से whole-sign भाव):
S_śubha = {2, 4, 5, 9, 10, 11}; अन्य n ∈ {1, 3, 6, 7, 8, 12} पर शास्त्र “जन्माशुभ” कहता है।
अनुशासन: यह पाराशर-पाठ का वर्गीकरण है — गणक स्थान की गणना करे, फल को “शास्त्र कहता है” कहकर रखे; भय, निश्चय-नाटक, या उपाय-दबाव इसमें नहीं जोड़ना।

अध्यायः 4

राशिस्वरूपाध्यायः

30 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): राशिस्वरूपाध्यायः होरा-शास्त्र की वह नींव रखता है जहाँ राशि केवल नाम नहीं, कालपुरुष के अंग और स्वभाव की इकाई बनती है। अहोरात्र से होरा का निष्कर्ष, अव्यक्त विष्णु-कालरूप के अंग-रूप में मेषादि बारह राशियों का क्रम, शीर्ष से चरण तक का शरीर-मानचित्र, तथा चर-स्थिर-द्विस्वभाव, क्रूर-अक्रूर, नर-स्त्री जैसे वर्गीकरण—ये सब मिलकर फल-कथन की भाषा को मापनीय बनाते हैं। बिना राशि-स्वरूप के ग्रह-बल, भाव-फल या वर्ग-विभाग अधूरे रह जाते हैं; यह अध्याय उसी स्वरूप का क्रमबद्ध परिचय देता है।

For the English reader: This chapter is the anatomy lesson of the sky-clock: how the twelve signs emerge as the limbs of Time-formed Viṣṇu, how each segment of the zodiac is named and ordered from Meṣa to Mīna, and how movable, fixed, dual, harsh, gentle, masculine, and feminine qualities become the grammar by which later chapters speak. Read it as taxonomy, not forecast—the śāstra’s map of form before it measures strength or result.

मुख्य गणित/तकनीक:
- मुख्यतः फल/वर्णन-अध्याय — १२ राशियों का नाम-क्रम (मेष → मीन), कालपुरुष-अंग-मानचित्र (शीर्ष → चरण), तथा चर/स्थिर/द्विस्वभाव · क्रूर/अक्रूर · नर/स्त्री वर्गीकरण; गणना-सूत्र यहाँ गौण, स्वरूप-परिभाषा प्रधान।

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

4.1
अहोरात्रस्य पूर्वान्त्यलोपाद्‌ होराऽवशिष्यते।
तस्य विज्ञानमात्रेण जातकर्मफलं वदेत्‌
ahorātrasya pūrvāntyalopād‌ horā'vaśiṣyate|
tasya vijñānamātreṇa jātakarmaphalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अहोरात्र = अहोरात्र (दिन+रात्रि का पूर्ण काल); पूर्वान्त्यलोप = आदि (पूर्व) और अन्त का लोप/काटना; होरा = “होरा” शब्द (और D2-वर्ग का नाम-बीज); अवशिष्यते = शेष रह जाता है; विज्ञानमात्रेण = उसके ज्ञान-मात्र से; जातकर्मफल = जन्म-कर्म का फल; वदेत् = कहे / कथन करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि “अहोरात्र” शब्द से आदि और अन्त का लोप करने पर “होरा” शेष रहती है। उसी होरा-विज्ञान के मात्र ज्ञान से जातकर्म का फल कहा जा सकता है। यहाँ नाम की व्युत्पत्ति और होरा-शास्त्र की अधिकार-सीमा दोनों एक साथ बाँधे गए हैं—फल-कथन होरा-ज्ञान पर अवलम्बित माना गया है, न कि अनुमान-मात्र पर।

English rendering From the word ahorātra (“day-and-night”), by dropping the initial and final portions, horā remains. The text states that by knowing that horā alone one may declare the fruit of birth-works.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — होरा-व्युत्पत्ति (नाम-निष्पत्ति)। व्युत्पत्ति-रूप में: अ-होरा-त्र → पूर्व-लोप (अ) + अन्त्य-लोप (त्र) ⇒ होरा। यह काल-माप का संख्या-सूत्र नहीं, अपितु शास्त्र-नाम का शब्द-गणित है; फल-अधिकार “तस्य विज्ञानमात्रेण” पर टिकाया गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) इसी “होरा” से षोडश-वर्ग में D2 (होरा-वर्ग) का नाम आता है—D1(राशि) के बाद द्वितीय विभाजन। हमारे वर्ग-इंजन में D2, 30° राशि का 15°+15° दो-भाग विभाजन है (विषम/सम राशि पर सूर्य/चन्द्र नियम से मानचित्रण)—यही नाम-बीज का गणनात्मक विस्तार है, न कि इस श्लोक का फल-अनुमान।

4.2
यदव्यक्तात्मको विष्णुः कालरुपो जनार्दनः।
तस्याङ्गानि निबोध त्वं क्रमान्मेषादिराश्यः
yadavyaktātmako viṣṇuḥ kālarupo janārdanaḥ|
tasyāṅgāni nibodha tvaṃ kramānmeṣādirāśyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अव्यक्तात्मक = अव्यक्त-स्वरूप; विष्णुः = विष्णु; कालरूप = काल-स्वरूप; जनार्दनः = जनार्दन; अङ्गानि = अंग / अवयव; निबोध = जानो / ग्रहण करो; क्रमात् = क्रम से; मेषादि = मेष से आरम्भ; राश्यः = राशियाँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो विष्णु अव्यक्त-स्वरूप हैं और काल-रूप जनार्दन हैं, उनके अंगों को क्रम से मेषादि राशियों के रूप में जानो। बारह राशियाँ यहाँ केवल चिह्न-सूची नहीं—काल-पुरुष के अवयव हैं। राशि-ज्ञान को काल-विष्णु के शरीर-विज्ञान के रूप में स्थापित किया गया है।

English rendering Know, in order, the limbs of that unmanifest-formed Viṣṇu who is time-bodied Janārdana: they are the signs beginning with Meṣa. The twelve rāśis are thus the ordered body-parts of Kāla-puruṣa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कालपुरुष-अवयव-कथन। गणना-दृष्टि से यह D1 (राशि-चक्र) का आधार-मानचित्र है: 12 राशियाँ × 30° = 360° राशि-चक्र; अंग-क्रम अगले श्लोकों में मेष से चरण तक बाँधा जाता है।

4.3
मेषो वृषश्च मिथुनः कर्कसिंहकुमारिकाः।
तुलालिऽश्च धनुर्नक्रे कुम्भो मीनस्ततः परम्‌
meṣo vṛṣaśca mithunaḥ karkasiṃhakumārikāḥ|
tulāli'śca dhanurnakre kumbho mīnastataḥ param‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेष = मेष (Aries); वृष = वृषभ (Taurus); मिथुन = मिथुन (Gemini); कर्क = कर्क (Cancer); सिंह = सिंह (Leo); कुमारिका = कन्या (Virgo; पाठ: कुमारिका); तुला = तुला (Libra); अलि = वृश्चिक (Scorpio; “अलि” = वृश्चिक-नाम); धनु = धनु (Sagittarius); नक्र = मकर (Capricorn; नक्र = मकर/crocodile); कुम्भ = कुम्भ (Aquarius); मीन = मीन (Pisces); ततः परम् = उसके बाद / क्रम-समाप्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र बारह राशियों का क्रम नाम से बाँधता है—मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कुमारिका (कन्या), तुला, अलि (वृश्चिक), धनु, नक्र (मकर), कुम्भ, और मीन। यह नाम-क्रम ही राशि-चक्र की मानक अनुक्रमणिका है। “कुमारिका / अलि / नक्र” जैसे पर्याय पाठ-परंपरा के हैं; अर्थ कन्या–वृश्चिक–मकर ही है (पाठ-भेद संभव अन्य संहिताओं में नाम-रूप में)।

English rendering The twelve signs in order are Meṣa, Vṛṣa, Mithuna, Karka, Siṃha, Kumārikā (Kanyā), Tulā, Ali (Vṛścika), Dhanus, Nakra (Makara), Kumbha, and Mīna. This is the canonical rāśi sequence of the cycle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-अनुक्रमणिका (0…11 या 1…12):
मेष=1 … मीन=12; प्रत्येक राशि-चाप = 30°; पूर्ण चक्र = 12 × 30° = 360°।
देशान्तर λ (sayana या nirayana—अयनांश घोषित करना आवश्यक) पर राशि-संख्या:
rāśi_index = ⌊λ_sidereal / 30°⌋ (0-आधार) या +1 (1-आधार); भोगांश = λ mod 30°।

उदाहरण (worked example) मान लें निर्ayan λ = 95.5° (अयनांश कोई भी नियत पद्धति; यहाँ केवल चाप-गणित):
⌊95.5 / 30⌋ = 3 → 0-आधार सूचकांक 3 = कर्क (4वीं राशि); भोगांश = 95.5 − 90 = 5.5° कर्क में। (सayana/nirayana बदलने पर λ बदलेगा—परिणाम अयनांश-निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही 12×30° विभाजन हमारे षोडश-वर्ग इंजन का D1 (राशि) है; ऊर्ध्व D2…D60 सभी इसी 30° खंड पर मॉड्यूलर विभाजन से निकलते हैं। नाम-क्रम स्थिर; गणना शुद्ध चाप-अंकगणित।

4.4
शीर्षानने तथा बाहू हृत्क्रोडकटिबस्तयः।
गुह्योरुयुगले जानुयुग्मे वै जङ्‌घके तथा
śīrṣānane tathā bāhū hṛtkroḍakaṭibastayaḥ|
guhyoruyugale jānuyugme vai jaṅ‌ghake tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीर्षानने = शीर्ष (सिर) और आनन (मुख/चेहरा); बाहू = दोनों भुजाएँ; हृत् = हृदय; क्रोड = वक्ष/उरः; कटि = कटि/कमर; बस्तयः = बस्ति (निम्न-उदर/मूत्राशय-क्षेत्र); गुह्य = गुह्य-अंग; ऊरुयुगले = दोनों ऊरु; जानुयुग्मे = दोनों जानु; जङ्घके = दोनों जङ्घाएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कालपुरुष के अंगों को क्रम से बाँधता है—शीर्ष-आनन, बाहु-युगल, हृदय–क्रोड़–कटि–बस्ति, गुह्य, ऊरु-युगल, जानु-युगल, तथा जङ्घा-युगल। यह राशि-अंग मानचित्र का मध्य-भाग है; अगले श्लोक में चरण-युगल और “मेषात् क्रमात्” से पूरा चक्र जुड़ता है। शरीर-अंग यहाँ चिकित्सा-निदान नहीं—राशि-कर्म का पारंपरिक अंग-सम्बन्ध है।

English rendering The limbs, in order, are head-and-face, the two arms, heart, chest, waist and lower belly, the private part, the pair of thighs, the pair of knees, and the two shanks. This continues the Kālapuruṣa–rāśi body map.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कालपुरुष-अंग-मानचित्र (राशि↔अवयव)। बारह राशियों पर अंग-क्रम 4.4–4.5 मिलाकर मेष=शीर्ष से मीन=चरण तक पूरा होता है; यह फल-स्थान-निर्णय का शास्त्रीय संकेत-जाल है, संख्या-सूत्र नहीं।

4.5
चरनौ द्वौ तथा मेषात्‌ ज्ञेयाः शीर्षादयः क्रमात्‌।
चरस्थिरद्विस्वभावाः क्रूराक्रूरौ नरस्त्रियौ
caranau dvau tathā meṣāt‌ jñeyāḥ śīrṣādayaḥ kramāt‌|
carasthiradvisvabhāvāḥ krūrākrūrau narastriyau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चरनौ द्वौ = दोनों चरण/पैर; मेषात् = मेष से; शीर्षादयः = शीर्ष आदि; क्रमात् = क्रम से; चर = चर (चलायमान); स्थिर = स्थिर; द्विस्वभाव = द्विस्वभाव / उभय; क्रूर = क्रूर; अक्रूर = अक्रूर/सौम्य; नर = नर (पुं); स्त्रियौ = स्त्री (स्त्री-राशि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—दोनों चरण भी [अंग-क्रम में] जोड़ो; मेष से शीर्षादि अंग क्रमशः ज्ञेय हैं। साथ ही राशियों के स्वभाव-त्रय बताए गए: चर–स्थिर–द्विस्वभाव; क्रूर–अक्रूर; और नर–स्त्री। अंग-मानचित्र पूरा होते ही राशि-वर्गीकरण का ढाँचा खुलता है—आगे की योग/दृष्टि/फल-भाषा इन्हीं वर्गों पर चलती है।

English rendering Add the two feet as well; from Meṣa the head and the rest are known in order. The signs are further classed as movable, fixed, or dual; cruel or gentle; and masculine or feminine.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-वर्गीकरण-सारणी (शास्त्रीय लेबल)। मानक चक्र-अनुक्रम (मेष=1 … मीन=12) पर:
• चर: 1, 4, 7, 10 (मेष, कर्क, तुला, मकर)
• स्थिर: 2, 5, 8, 11
• द्विस्वभाव: 3, 6, 9, 12
नर/स्त्री और क्रूर/अक्रूर पारंपरिक युग्म-नियमों से बाँधे जाते हैं (विस्तार अगले मेसादि-स्वरूप श्लोकों में)। संख्या-गणना नहीं—लेबल-असाइनमेंट।

उदाहरण (worked example) राशि-सूचकांक 7 (तुला): चर + (पारंपरिक) नर/उभय-वर्ग-श्रृंखला में तुला = तुला-चर। दृष्टि-चाप आदि बाद के अध्यायों में इन्हीं चर/स्थिर/उभय लेबलों पर निर्भर करते हैं; यहाँ केवल वर्ग-नाम निश्चित।

4.6
पित्तानिलत्रिधात्वौक्यश्लेष्मिकाश्च क्रियादयः।
रक्तवर्णो बृहद्‌गात्रश्चतुष्पाद्रात्रिविक्रमी
pittānilatridhātvaukyaśleṣmikāśca kriyādayaḥ|
raktavarṇo bṛhad‌gātraścatuṣpādrātrivikramī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पित्त = पित्त; अनिल = वात/अनिल; त्रिधातु = त्रिदोष / तीनों धातु-सम; औक्य = साम्य/संयुक्त (पाठ-संधि: त्रिधात्वौक्य); श्लेष्मिक = श्लेष्म/कफ-प्रधान; क्रियादयः = क्रिया (मेष) आदि; रक्तवर्ण = रक्त-वर्ण; बृहद्गात्र = विशाल गात्र; चतुष्पात् = चतुष्पद; रात्रिविक्रमी = रात्रि में विक्रम/बलवान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि क्रिया (मेष) आदि राशियाँ पित्त, अनिल, त्रिधातु-साम्य और श्लेष्मिक स्वभाव की हैं—क्रम/वर्ग-विन्यास संहिता-पाठ पर निर्भर (पाठ-भेद संभव)। फिर मेष का पृथक् स्वरूप: रक्तवर्ण, बृहद् गात्र, चतुष्पद, रात्रि-विक्रमी। यह राशि-स्वरूप का आरम्भ है—गुण-वर्णन, रोग-निदान या नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text assigns to Kriyā (Meṣa) and the following signs the natures of pitta, anila (vāta), tri-dhātu balance, and śleṣma—ordering may vary by recension. Meṣa itself is stated as blood-red, large-bodied, four-footed, and powerful by night.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप / दोष-वर्णन (फल-कथन का गुण-पक्ष)। मेष = चक्र-सूचकांक 1; चाप 0°–30° (निर्ayan λ पर); स्वामी आगे 4.7 में कुज। दोष-श्रेणी यहाँ गुणात्मक लेबल है—कोई रूप/विरूप बल-अंक नहीं।

4.7
पूर्ववासी नृपज्ञातिः शैलचारी रजोगुणी।
पृष्ठोदयी पावकी च मेषराशिः कुजाधिपः
pūrvavāsī nṛpajñātiḥ śailacārī rajoguṇī|
pṛṣṭhodayī pāvakī ca meṣarāśiḥ kujādhipaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्ववासी = पूर्व-दिशा निवासी; नृपज्ञाति = नृप-ज्ञाति / राज-संबंधी; शैलचारी = शैल-विहारी; रजोगुणी = रजो-गुण प्रधान; पृष्ठोदयी = पृष्ठोदय (पीठ से उदय—पृष्ठोदय राशि); पावकी = पावक/अग्नि-संबंधी; मेषराशि = मेष राशि; कुजाधिपः = कुज (मंगल) अधिपति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मेष राशि का पूर्ण स्वरूप बाँधता है—पूर्व-वासी, नृप-ज्ञाति, शैलचारी, रजोगुणी, पृष्ठोदयी, और पावकी (अग्नि-स्वभाव)। अधिपति कुज (मंगल) है। ये सभी शास्त्रीय गुण-सूचक हैं; इन्हें भाग्य की निश्चित घटना या भय-कथन के रूप में नहीं पढ़ना—राशि-स्वरूप की परिभाषा मात्र।

English rendering The Meṣa sign, the text states, dwells in the east, is of royal kin, mountain-roaming, rajo-guṇa, back-rising (pṛṣṭhodaya), and fiery; its lord is Kuja (Mars).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मेष-स्वरूप + अधिपति-कथन। गणना-संपर्क मात्र इतना:
• राशि = मेष ⇔ 0° ≤ (λ mod 360°) < 30° (निर्ayan; अयनांश घोषित)
• राशि-स्वामी (नैसर्गिक): मेष → कुज (मंगल)
• पृष्ठोदय / शिरोदय / उभयोदय वर्ग बाद की उदय-फल भाषा में प्रयुक्त; यहाँ केवल मेष = पृष्ठोदयी लेबल।

4.8
श्वेतः शुक्राधिपो दीर्घश्चतुष्पाच्छर्वरीबली।
याम्येट्‌ ग्राम्यो वणिग्भूमिरजः पृष्ठोदयो वृषः
śvetaḥ śukrādhipo dīrghaścatuṣpāccharvarībalī|
yāmyeṭ‌ grāmyo vaṇigbhūmirajaḥ pṛṣṭhodayo vṛṣaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतः = श्वेत वर्ण; शुक्राधिपः = शुक्र स्वामी; दीर्घः = दीर्घगात्र; चतुष्पात् = चतुष्पद (चार पैर); शर्वरीबली = रात्रि-बलवान्; याम्येट् = दक्षिण दिशा; ग्राम्यः = ग्राम-निवासी; वणिक् = वणिक्/व्यापारी स्वभाव; भूमिः = पृथ्वी-तत्त्व; रजः = रजोगुण; पृष्ठोदयः = पृष्ठोदय (पीठ से उदय); वृषः = वृषभ राशि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र वृषभ राशि का स्वरूप बताता है — वह श्वेत वर्ण की, दीर्घ शरीर वाली, चतुष्पद स्वभाव की, और रात्रि में बलवान् मानी गई है। उसका दिशा-सम्बन्ध दक्षिण से, निवास ग्राम से, और वर्ग वणिक्/व्यापार-स्वभाव से जोड़ा गया है। तत्त्व भूमि (पृथ्वी), गुण रज, उदय-प्रकार पृष्ठोदय है; स्वामी शुक्र है।

English rendering The text characterizes Taurus (Vṛṣa) as white, long-bodied, four-footed, and night-strong, with southern orientation, village habitat, merchant nature, earth element, rajas quality, and back-rising (pṛṣṭhodaya). Its lord is Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप/गुण-वर्णन। यहाँ वृषभ के स्वामी, तत्त्व, गुण, उदय-प्रकार और बल-काल का शास्त्रीय वर्गीकरण है; संख्यात्मक विभाजन नहीं।

4.9
शीर्षोदयी नृमिथुनं सगदं च सवीणकम्‌।
प्रत्यग्‌वायुर्द्विपाद्रात्रिबली ग्रामव्रजोऽनिली
śīrṣodayī nṛmithunaṃ sagadaṃ ca savīṇakam‌|
pratyag‌vāyurdvipādrātribalī grāmavrajo'nilī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीर्षोदयी = शीर्षोदय (सिर से उदय); नृमिथुनम् = नर-मिथुन (मानव युगल); सगदम् = गदा-युक्त; सवीणकम् = वीणा-युक्त; प्रत्यक् = पश्चिम दिशा; वायुः = वायु-तत्त्व; द्विपात् = द्विपद; रात्रिबली = रात्रि-बलवान्; ग्रामव्रजः = ग्राम-वन/ग्राम-पथ-चर; अनिली = अनिल/वायु-सम्बद्ध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मिथुन राशि का दृश्य-स्वरूप खोलता है — शीर्षोदयी, मानव-युगल रूप, गदा और वीणा धारण किए हुए। दिशा पश्चिम, तत्त्व वायु, गति द्विपद, बल रात्रि में, और विचरण ग्राम–वन क्षेत्र में बताया गया है। यह पद मिथुन के “चित्र” को स्थिर करता है, जिस पर अगला श्लोक स्वामी और अन्य गुण जोड़ता है।

English rendering The text presents Gemini as a head-rising human pair bearing mace and vīṇā, western in direction, airy in element, biped, night-strong, village-and-forest roaming, and wind-associated (anila).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-मूर्ति/दिशा-तत्त्व वर्णन। शीर्षोदय/पृष्ठोदय और द्विपद/चतुष्पद यहाँ वर्गीकरण-चिह्न हैं, न कि कोण-विभाजन।

4.10
समगात्रो हरिद्विर्णो मिथुनाख्यो बुधाधिपः।
पाटलो वनचारी च ब्राह्मणो निशि वीर्यवान्‌
samagātro haridvirṇo mithunākhyo budhādhipaḥ|
pāṭalo vanacārī ca brāhmaṇo niśi vīryavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समगात्रः = सम/समान अवयव; हरिद्वर्णः = हरित/पीत-हरित वर्ण; मिथुनाख्यः = मिथुन नामक; बुधाधिपः = बुध स्वामी; पाटलः = पाटल (हल्का गुलाबी/पाटल वर्ण); वनचारी = वन-विचरणशील; ब्राह्मणः = ब्राह्मण वर्ग; निशि = रात्रि में; वीर्यवान् = बल/वीर्य से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उसी मिथुन राशि के और गुण जोड़ता है — सम शरीर, हरित/पाटल वर्ण, बुध को स्वामी मानता है। वह वनचारी और ब्राह्मण-वर्गीय कही गई है, तथा रात्रि में वीर्यवान् बताई गई है। पूर्व पद का “नृमिथुन” चित्र और यह स्वामी–वर्ण–वर्ग वर्णन मिलकर मिथुन का पूर्ण शास्त्रीय स्वरूप बनाते हैं।

English rendering Completing Gemini, the text states an even-limbed, green-to-pale-red form named Mithuna, ruled by Mercury, forest-roaming, of brāhmaṇa class, and strong at night.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-रहित स्वरूप-कथन (स्वामी, वर्ण, वर्ग, बल-काल)। “बुधाधिपः” स्वामित्व-नियत है; यहाँ दीर्घांश या वर्ग-अंश की गणना नहीं दी गई।

4.11
बहुपादचरः स्थौल्यतनुः सत्त्वगुणी जली।
पृष्ठोदयी कर्कराशिर्मृगांकाऽधिपतिः स्मृतः
bahupādacaraḥ sthaulyatanuḥ sattvaguṇī jalī|
pṛṣṭhodayī karkarāśirmṛgāṃkā'dhipatiḥ smṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुपादचरः = बहुपाद-गति (कीट/बहुपदीय विचरण); स्थौल्यतनुः = स्थूल शरीर; सत्त्वगुणी = सत्त्व गुण; जली = जल-तत्त्व; पृष्ठोदयी = पृष्ठोदय; कर्कराशिः = कर्क राशि; मृगाङ्काधिपतिः = चन्द्र स्वामी; स्मृतः = कहा/स्मरण किया गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कर्क राशि को बहुपाद-चर, स्थूल तनु, सत्त्व-गुण प्रधान और जल-तत्त्व वाली बताता है। उदय-प्रकार पृष्ठोदय है। स्वामी चन्द्र (मृगाङ्क) है — यही इस पद का केन्द्रीय नियत है।

English rendering The text defines Cancer (Karka) as many-footed in motion, stout-bodied, sattva-qualified, watery, back-rising (pṛṣṭhodaya), and ruled by the Moon.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप/तत्त्व-गुण वर्णन। जल-तत्त्व और पृष्ठोदय यहाँ गुणात्मक लेबल हैं; 30° राशि को अंशों में बाँटने का सूत्र इस पद में नहीं है।

4.12
सिंहः सूर्याधिपः सत्त्वी चतुष्पात्‌ क्षत्रियो वनी।
शीर्षोदयी बृहद्‌गात्रःपाण्डुः पूर्वेड्‌ द्युवीर्यवान्‌
siṃhaḥ sūryādhipaḥ sattvī catuṣpāt‌ kṣatriyo vanī|
śīrṣodayī bṛhad‌gātraḥpāṇḍuḥ pūrveḍ‌ dyuvīryavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहः = सिंह राशि; सूर्याधिपः = सूर्य स्वामी; सत्त्वी = सत्त्व-गुण; चतुष्पात् = चतुष्पद; क्षत्रियः = क्षत्रिय वर्ग; वनी = वन-सम्बद्ध; शीर्षोदयी = शीर्षोदय; बृहद्गात्रः = बृहत् शरीर; पाण्डुः = पाण्डु/पीत-श्वेत वर्ण; पूर्वेट् = पूर्व दिशा; द्युवीर्यवान् = दिन-बलवान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सिंह राशि का स्वरूप देता है — सूर्य स्वामी, सत्त्व प्रधान, चतुष्पद, क्षत्रिय, वन-संबद्ध। वह शीर्षोदयी, बृहत् गात्र, पाण्डु वर्ण, पूर्व दिशा की, और दिन में वीर्यवान् कही गई है। वृषभ/कर्क के पृष्ठोदय के विपरीत यहाँ शीर्षोदय स्पष्ट है।

English rendering Leo (Siṃha), the text states, is ruled by the Sun, sattvic, four-footed, kṣatriya, forest-linked, head-rising, large-bodied, pale (pāṇḍu), eastern, and day-strong.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप/दिशा-बल-काल वर्णन। “सूर्याधिपः” और “द्युवीर्यवान्” नियत गुण हैं; ग्रह-बल (षड्बल) की इकाइयाँ यहाँ नहीं गिनी गईं।

4.13
पार्वतीयाथ कन्याख्या राशिर्दिनबलान्विता।
शीर्षोदया च मध्यांगा द्विपाद्याम्यचरा च सा
pārvatīyātha kanyākhyā rāśirdinabalānvitā|
śīrṣodayā ca madhyāṃgā dvipādyāmyacarā ca sā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पार्वतीया = पर्वतीय प्रदेश-सम्बद्ध; अथ = और/ततः; कन्याख्या राशिः = कन्या नामक राशि; दिनबलान्विता = दिन-बल से युक्त; शीर्षोदया = शीर्षोदय; मध्याङ्गा = मध्यम अङ्ग/मध्यम शरीर; द्विपात् = द्विपद; याम्यचरा = दक्षिण-दिशा विचरण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कन्या राशि का आरम्भिक स्वरूप कहता है — पार्वतीय सम्बन्ध, दिन में बल, शीर्षोदय, मध्यम शरीर, द्विपद गति, और दक्षिण दिशा का चर। यह पद कन्या का “स्थान–उदय–शरीर–दिशा” ढाँचा देता है; स्वामी और अन्य गुण अगले श्लोक में पूरे होते हैं।

English rendering The text begins Virgo (Kanyā) as mountain-associated, day-strong, head-rising, medium-limbed, biped, and southern-moving.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप वर्णन। दिनबल/शीर्षोदय यहाँ काल-उदय वर्गीकरण है, न कि होरा-अंश (15°) या नवांश-अंश (3°20′) की गणना।

4.14
सा सस्यदहना वैश्या चित्रवर्णा प्रभञ्जिनी।
कुमारी तमसा युक्ता बालभावा बुधाधिपा
sā sasyadahanā vaiśyā citravarṇā prabhañjinī|
kumārī tamasā yuktā bālabhāvā budhādhipā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सा = वह (कन्या); सस्यदहना = सस्य/अन्न-सम्बद्ध (पाठ: सस्यदहना — अन्न-क्षेत्र/सस्य-संयोग; पाठ-भेद संभव); वैश्या = वैश्य वर्ग; चित्रवर्णा = चित्र/बहुरंगी वर्ण; प्रभञ्जिनी = पवन/प्रभञ्जन-स्वभाव; कुमारी = कुमारी रूप; तमसा युक्ता = तमोगुण-युक्त; बालभावा = बाल-स्वभाव; बुधाधिपा = बुध स्वामी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कन्या का शेष स्वरूप जोड़ता है — सस्य/अन्न से जुड़ी, वैश्य, चित्रवर्णा, पवन-स्वभाव वाली। वह कुमारी रूप, तम से युक्त, बालभाव वाली, और बुध की अधिपत्री कही गई है। पूर्व पद के दिनबल–शीर्षोदय–द्विपद आधार पर यह स्वामी, वर्ग, गुण और रूप पूरा करता है।

English rendering Completing Virgo, the text states a grain/crop-linked (sasyadahana; reading may vary), vaiśya, multi-hued, wind-natured maiden form, tamas-tinged, childlike in bhāva, and ruled by Mercury.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-रहित स्वरूप-कथन (स्वामी, वर्ग, गुण, रूप)। “बुधाधिपा” मिथुन के समान बुध-स्वामित्व नियत करता है; दोनों राशियों का भेद यहाँ गुण–रूप–वर्ग से है, अंश-सूत्र से नहीं।

4.15
शीर्षोदयी द्युवीर्याढ्यस्तुलः कृष्णो रजोगुणी।
पश्चिमो भूचरो घाती शूद्रो मध्यतनुर्द्विपात्‌
śīrṣodayī dyuvīryāḍhyastulaḥ kṛṣṇo rajoguṇī|
paścimo bhūcaro ghātī śūdro madhyatanurdvipāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीर्षोदयी = मस्तक से उदय होने वाली राशि (śīrṣodaya); द्युवीर्याढ्य = दिन-बल से युक्त; तुलः = तुला राशि; कृष्ण = श्याम/कृष्ण वर्ण; रजोगुणी = रजोगुण-प्रधान; पश्चिम = पश्चिम दिशा; भूचर = स्थल-गामी; घाती = घातक/प्रहार-शील स्वभाव (शास्त्र-वर्णन); शूद्र = शूद्र वर्ण-वर्ग; मध्यतनु = मध्यम शरीर; द्विपात् = द्विपाद (दो पैर वाला रूप)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र तुला राशि का स्वरूप बताता है — यह शीर्षोदयी है, दिन में बलवती मानी गई है, वर्ण में कृष्ण और गुण में राजसी है। दिशा पश्चिम, गति भूमि पर, स्वभाव में घातक-कथन, वर्ण-वर्ग में शूद्र, शरीर मध्यम और रूप द्विपाद कहा गया है। यह सब राशियों के स्वरूप-वर्णन की शृंखला का एक कड़ी है — फल नहीं, लक्षण-सूची।

English rendering The text describes Libra (Tulā) as a head-rising (śīrṣodaya) sign, strong by day, dark in hue, and of rajas quality; it is western, land-moving, stated as striking/destructive in nature, of the śūdra class, medium-bodied, and biped in form.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप / वर्गीकरण-कथन। ये गुण (शीर्षोदय, दिन-वीर्य, दिशा, चर-वर्ग) बाद के बलों और योग-नियमों में वर्ग-लेबल की तरह प्रयुक्त होते हैं; यहाँ स्वयं कोई अंश-भाग या गुणन-सूत्र नहीं है।

4.16
शुक्राऽधिपोऽथ स्वल्पांगो बहुपाद्‌ब्राह्मणो बिली।
सौम्यस्थो दिनवीर्याढ्यः पिशंगो जलभूवः
śukrā'dhipo'tha svalpāṃgo bahupād‌brāhmaṇo bilī|
saumyastho dinavīryāḍhyaḥ piśaṃgo jalabhūvaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्राधिपः = शुक्र स्वामी (तुला का — पूर्व श्लोक का समापन); अथ = अब/तदनन्तर (अगली राशि की ओर); स्वल्पांग = अल्प अंग/क्षुद्र शरीर; बहुपात् = बहुपाद (अनेक पैर वाला); ब्राह्मण = ब्राह्मण वर्ग; बिली = बिल-वासी (विवर/गड्ढे में रहने वाला); सौम्यस्थ = उत्तर दिशा स्थित (सौम्य = उत्तर); दिनवीर्याढ्य = दिन-बल से युक्त (पाठानुसार); पिशंग = पिशंग/कपिश वर्ण; जलभूवः = जल-भू/जलीय उत्पत्ति वाला।

हिन्दी भावार्थ श्लोक पहले तुला का स्वामी शुक्र बताकर उस वर्णन को पूर्ण करता है, फिर “अथ” से अगली राशि के लक्षण आरम्भ करता है — अल्प अंग, बहुपाद, ब्राह्मण, बिल-वासी, उत्तर-स्थित, (इस पाठ में) दिन-वीर्यवान्, पिशंग वर्ण और जल-सम्बद्ध। नाम वृश्चिक अगले श्लोक में आता है; यहाँ लक्षण-श्रृंखला चलती है। दिन-वीर्य का यह पाठ अन्य परम्पराओं से भिन्न हो सकता है — पाठ-भेद संभव।

English rendering Venus is stated as the lord (completing Tulā); then the text turns to the next sign’s traits — short-limbed, many-footed, brāhmaṇa, hole-dwelling, northern in place, day-strong in this reading, tawny, and water-born. The name Vṛścika follows in the next verse; a night-strong reading for Scorpio is known elsewhere — पाठ-भेद संभव.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्वामी-कथन + स्वरूप-वर्णन। “शुक्राधिप” तुला की अधिपति-सारिणी का एक पंक्ति-तथ्य है; शेष बहुपाद/बिली/जलभू आदि वर्ग-चिह्न हैं, अंकीय सूत्र नहीं।

4.17
रोमस्वाढ्योऽतितीक्ष्णाग्रो वृश्चिकश्च कुजाधिपः।
पृष्ठोदयी त्वथ धनुर्गुरुस्वामी च सात्त्विकः
romasvāḍhyo'titīkṣṇāgro vṛścikaśca kujādhipaḥ|
pṛṣṭhodayī tvatha dhanurgurusvāmī ca sāttvikaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोमस्वाढ्य = रोम/केश-बहुल; अतितीक्ष्णाग्र = अत्यन्त तीक्ष्ण अग्र/अग्रभाग; वृश्चिक = वृश्चिक राशि; कुजाधिपः = मंगल (कुज) स्वामी; पृष्ठोदयी = पृष्ठ से उदय (pṛṣṭhodaya); अथ = तदनन्तर; धनुः = धनु राशि; गुरुस्वामी = बृहस्पति स्वामी; सात्त्विकः = सत्त्वगुण-प्रधान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र वृश्चिक को रोम-बहुल, अत्यन्त तीक्ष्ण अग्र वाला कहता है, और कुज को उसका अधिपति ठहराता है; यह पृष्ठोदयी राशि है। तदनन्तर धनु राशि का आरम्भ — गुरु स्वामी और सात्त्विक गुण — कहा गया है। एक श्लोक में एक राशि का समापन और दूसरी का स्वामी-गुण सूत्र जुड़ता है।

English rendering Vṛścika is described as hairy and very sharp-tipped, with Mars as its lord, and as a back-rising (pṛṣṭhodaya) sign; then Dhanus is introduced, with Jupiter as lord and a sattva quality.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-नाम, उदय-प्रकार (पृष्ठोदय), अधिपति और गुण का वर्गीकरण। पृष्ठोदय/शीर्षोदय बाद में कुछ दशा-फल और उदय-सम्बद्ध नियमों में लेबल बनते हैं; यहाँ केवल परिभाषा है।

4.18
पिंगलो निशिवीर्याढ्यः पावकः क्षत्रियो द्विपाद्‌।
आदावन्ते चतुष्पादः समगात्रो धनुर्धरः
piṃgalo niśivīryāḍhyaḥ pāvakaḥ kṣatriyo dvipād‌|
ādāvante catuṣpādaḥ samagātro dhanurdharaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिंगल = पिंगल/पिशंग-सा वर्ण; निशिवीर्याढ्य = रात्रि-बल से युक्त; पावक = अग्नि-स्वभाव/आग्नेय; क्षत्रिय = क्षत्रिय वर्ग; द्विपात् = द्विपाद; आदौ अन्ते चतुष्पाद = आदि और अन्त में चतुष्पाद (द्विरूप); समगात्र = सम/समान गात्र; धनुर्धर = धनुर्धारी (धनु का रूपक)।

हिन्दी भावार्थ धनु राशि को शास्त्र पिंगल वर्ण, रात्रि में बलवती, आग्नेय, क्षत्रिय और द्विपाद कहता है; साथ ही आदि-अन्त में चतुष्पाद रूप भी मानता है — धनुर्धारी का मिश्रित नर-अश्व रूप। समगात्र और धनुर्धर नाम इस राशि की मूर्ति को स्थिर करते हैं। यह स्वरूप-कथन है, आयु या भाग्य का हिसाब नहीं।

English rendering The text states Dhanus as tawny-brown, strong at night, fiery, of the kṣatriya class, and biped, yet also quadruped in its beginning and end portions — the even-limbed bow-bearer of dual form.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्ण, बल-काल (निशि-वीर्य), तत्त्व (पावक), वर्ण-वर्ग और पाद-रूप का वर्णन। “आदि/अन्त चतुष्पाद” राशि के द्विविध रूप का शास्त्रीय चित्र है; 30° को यहाँ संख्या में नहीं बाँटा गया।

4.19
पूर्वस्थो वसुधाचारी तेजस्वी ब्रह्मणा कृतः।
मन्दाधिपस्तमी भौमी याम्येट्‌ च निशि वीर्यवान्‌
pūrvastho vasudhācārī tejasvī brahmaṇā kṛtaḥ|
mandādhipastamī bhaumī yāmyeṭ‌ ca niśi vīryavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वस्थ = पूर्व दिशा स्थित; वसुधाचारी = पृथ्वी पर विचरण करने वाला; तेजस्वी = तेजस्वी/दीप्तिमान; ब्रह्मणा कृतः = ब्रह्मा द्वारा रचित/कृत (शास्त्र-कथन); मन्दाधिपः = मन्द (शनि) अधिपति; तमी = तमस्/तमोगुण; भौमी = पार्थिव/भूमि-सम्बद्ध; याम्य = दक्षिण दिशा; निशि वीर्यवान् = रात्रि में वीर्यवान्।

हिन्दी भावार्थ श्लोक का पूर्वार्ध धनु के वर्णन को जोड़ता है — पूर्व दिशा, भूमि-चारी, तेजस्वी, ब्रह्मा-कृत — यह शास्त्र का स्वरूप-वाक्य है। उत्तरार्ध मकर की ओर मुड़ता है: मन्द (शनि) स्वामी, तमोगुण, भूमि-स्वभाव, दक्षिण दिशा, और रात्रि-बल। एक ही श्लोक में एक राशि का अन्त और दूसरी का आरम्भ पाठ की शैली है।

English rendering The first half continues Dhanus as eastern, earth-roaming, brilliant, and “fashioned by Brahmā” in the text’s own phrasing; then Makara is opened — Saturn as lord, tamas, earthly, southern, and strong at night.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दिशा, तत्त्व, गुण, अधिपति और दिन/रात्रि-वीर्य का वर्गीकरण। मन्दाधिप = मकर (और कुम्भ) की स्वामी-सारिणी का स्थिरांक; यहाँ गणना नहीं, केवल नियत सम्बन्ध।

4.20
पृष्ठोदयी बृहद्‌गात्रः कर्बुरो वनभूचरः।
आदौ चतुष्पदोन्ते तु विपदो जलगो मतः
pṛṣṭhodayī bṛhad‌gātraḥ karburo vanabhūcaraḥ|
ādau catuṣpadonte tu vipado jalago mataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृष्ठोदयी = पृष्ठोदय राशि; बृहद्गात्र = विशाल गात्र/शरीर; कर्बुर = कर्बुर/चित्र-वर्ण (चित्ति-युक्त); वनभूचर = वन-भूमि में विचरण; आदौ चतुष्पद = आदि में चतुष्पाद; अन्ते विपद = अन्त में विपाद् (पाद-रहित/जल-रूप — मकर-मत्स्य द्विरूप); जलग = जल-गामी; मतः = माना गया।

हिन्दी भावार्थ मकर को शास्त्र पृष्ठोदयी, बड़े शरीर वाला, कर्बुर वर्ण, वन-भूमि-चारी कहता है। आदि में चतुष्पाद और अन्त में विपाद् जल-गामी — यही मकर (मकर/मकर-मत्स्य) का द्विरूप वर्णन है। “मतः” शब्द से स्पष्ट है कि यह परम्परा-सम्मत स्वरूप-निर्णय है, कोई अंकगणितीय क्रिया नहीं।

English rendering Makara is stated as back-rising, large-bodied, variegated in colour, and a forest land-roamer; at the beginning it is quadruped, at the end footless/water-going — the dual makara form the text accepts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उदय-प्रकार और आदि-अन्त पाद-रूप का वर्णनात्मक नियम। कोई “आदि = 0°–15°, अन्त = 15°–30°” सूत्र श्लोक में नहीं दिया; आधा-आधा विभाजन व्याख्या की परम्परा हो सकती है, पर इस पंक्ति में अंश-संख्या नहीं है।

4.21
कुम्भः कुम्भी नरो बभ्रुवर्णो मध्यतनुर्द्विपात्‌।
द्युवीर्यो जलमध्यस्थो वातशीर्षोदयी तमः
kumbhaḥ kumbhī naro babhruvarṇo madhyatanurdvipāt‌|
dyuvīryo jalamadhyastho vātaśīrṣodayī tamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुम्भः = कुम्भ राशि; कुम्भी = कुम्भ-धारी/घट-रूप; नर = नर रूप; बभ्रुवर्ण = बभ्रु (भूरा/कपिश) वर्ण; मध्यतनु = मध्यम तनु; द्विपात् = द्विपाद; द्युवीर्य = दिन-वीर्यवान्; जलमध्यस्थ = जल के मध्य में स्थित; वात = वायव्य/वात तत्त्व; शीर्षोदयी = शीर्षोदय; तमः = तमोगुण।

हिन्दी भावार्थ कुम्भ राशि का शास्त्रीय चित्र — कुम्भी नर, बभ्रु वर्ण, मध्यम शरीर, द्विपाद; दिन में बल, जल-मध्य स्थिति, वात तत्त्व, शीर्षोदय, और तमस्। यह मीन से पूर्व की राशि का पूर्ण स्वरूप-सूत्र है। फल-गारंटी नहीं; राशियों की प्रकृति-तालिका का एक स्तम्भ मात्र।

English rendering The text describes Kumbha as a pot-bearing human figure, brown (babhru) in colour, medium-bodied and biped; strong by day, mid-water in abode, airy (vāta), head-rising (śīrṣodaya), and of tamas quality.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-स्वरूप और वर्ग-लेबल (द्युवीर्य, वात, शीर्षोदय, तमः)। दिन-वीर्य और तमस् बाद में काल-बल आदि घटकों में निविष्टि बन सकते हैं; इस श्लोक में केवल गुण-सूची है।

4.22
शूद्रः पश्चिमदेशस्य स्वामी दैवाकरिः स्मृतः।
मीनौ पुच्छास्यसंलग्नौ मीनराशिर्दिवाबली
śūdraḥ paścimadeśasya svāmī daivākariḥ smṛtaḥ|
mīnau pucchāsyasaṃlagnau mīnarāśirdivābalī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शूद्रः = शूद्र-वर्ण; पश्चिमदेशस्य = पश्चिम दिशा का; स्वामी = अधिपति; दैवाकरिः = सूर्य-पुत्र शनि; मीनौ = दो मत्स्य; पुच्छास्यसंलग्नौ = पुच्छ और मुख से जुड़े; मीनराशिः = मीन राशि; दिवाबली = दिन में बलवान।

हिन्दी भावार्थ इस श्लोक का पूर्वार्ध कुम्भ-गुणों का समापन करता है: शास्त्र कहता है कि वह शूद्र-वर्ण का है, पश्चिम देश का स्वामी है, और उसका अधिपति दैवाकरि—शनि—स्मृत है। उत्तरार्ध मीन राशि खोलता है: मीन दो मत्स्यों के रूप में पुच्छ और मुख से संलग्न चित्रित है, और मीन राशि दिन में बलवान कही गई है। पाठ-भेद संभव; कुछ संपादनों में कुम्भ–मीन सीमा अर्ध-श्लोकों में बँटती है।

English rendering The first half closes Aquarius: the text states it as śūdra, lord of the western quarter, with Saturn (Daivākari) as ruler. The second half opens Pisces: two fish joined at tail and mouth, and the sign is said to be strong by day. Recension boundary may vary (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-गुण एवं स्वरूप-वर्णन। दिवाबली = दिनकालीन बल का गुणात्मक निर्देश; यहाँ कोई अंश-सूत्र नहीं, केवल काल-बल का शास्त्रीय लक्षण।

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4.23
जली सत्त्वगुणाढ्यश्च स्वस्थो जलचरो द्विजः।
अपदो मध्यदेही च सौम्यस्थो ह्युभयोदयी
jalī sattvaguṇāḍhyaśca svastho jalacaro dvijaḥ|
apado madhyadehī ca saumyastho hyubhayodayī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जली = जलीय स्वभाव; सत्त्वगुणाढ्यः = सत्त्व-गुण से समृद्ध; स्वस्थः = स्वस्थ/सुस्थित; जलचरः = जल में विचरने वाला; द्विजः = ब्राह्मण/द्विज-वर्ण; अपदः = पदरहित; मध्यदेही = मध्य-शरीर वाला; सौम्यस्थः = सौम्य स्वभाव वाला; उभयोदयी = उभय (चर–स्थिर मिश्र) उदय—द्विस्वभाव राशि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मीन राशि को जलीय, सत्त्व-गुण से आढ्य, स्वस्थ, जलचर और द्विज कहता है। वह अपद (बिना पैरों के) और मध्यदेही है—अर्थात् देह-प्रतीक मध्यभाग पर केन्द्रित। सौम्य स्वभाव वाली और उभयोदयिनी (द्विस्वभाव/उभय राशि) मानी गई है। ये सब मीन के शास्त्रीय लक्षण-पद हैं, फल का विस्तार नहीं।

English rendering The text describes Pisces as watery, rich in sattva, healthy, aquatic, and of the twice-born class; footless, middle-bodied, gentle, and of dual (mutable) rising nature.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-गुण-वर्णन। “उभयोदयी” = द्विस्वभाव (mutable) वर्ग का शास्त्रीय संकेत; गणना नहीं, वर्गीकरण।

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4.24
सुराचार्याधिपश्चेति राशीनां गदिता गुणाः।
त्रिंशद्‌भागात्मकानां च स्थूलसूक्ष्मफलाय च
surācāryādhipaśceti rāśīnāṃ gaditā guṇāḥ|
triṃśad‌bhāgātmakānāṃ ca sthūlasūkṣmaphalāya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुराचार्य = बृहस्पति (देवगुरु); अधिपः = स्वामी; इति = इस प्रकार; राशीनां गुणाः = राशियों के गुण; गदिताः = कहे गए; त्रिंशद्भागात्मकानां = तीस अंशों वाली (राशि); स्थूलसूक्ष्मफलाय = स्थूल और सूक्ष्म फल के लिए।

हिन्दी भावार्थ मीन का अधिपति सुराचार्य—गुरु—है; और “इति” से पूर्व कथित समस्त राशि-गुणों का उपसंहार हो जाता है। शास्त्र स्पष्ट करता है कि ये गुण तीस-अंशात्मक राशियों के हैं, स्थूल और सूक्ष्म फल दोनों के निमित्त। अर्थात् राशि-स्वरूप का बयान पूर्ण हुआ; आगे सूक्ष्म विभागों और फलादेश की भूमि तैयार है।

English rendering Jupiter (Surācārya) is stated as lord of Pisces; thus the qualities of the signs are declared. They belong to the thirty-degree signs, for both gross and subtle results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक राशि = 30° (त्रिंशद् भाग) पूर्ण वृत्त 360° का 1/12।
1 राशि = 30°, 1 भाग (अंश) = 1°, आगे के वर्ग (होरा, द्रेष्काण, नवांश…) इसी 30° खण्ड के समान-अन्तर विभाजन हैं। स्थूल फल ≈ D1 (राशि); सूक्ष्म फल ≈ उच्च वर्ग—पाठ यहीं आधार-माप देता है, विभाजन-नियम अगले अध्यायों में।

उदाहरण (worked example) सूर्य की भोग्यांश λ = 95.0° (सायना या निरयण—जो भी चुनी अयनांश-संयोजना हो; परिणाम के लिए केवल चाप माप चाहिए)।
राशि-सूचकांक = ⌊λ / 30°⌋ = ⌊95/30⌋ = 3 → चतुर्थ राशि (कर्क, 0-based: मेष=0)।
राशि-अन्तः अंश = λ mod 30° = 5.0°। यही 5.0° आगे D9/D10 आदि के मॉड्यूलर मानचित्र का इनपुट है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक षोडश-वर्ग-गणित की भूमि है: D1…D60 सभी “30° राशि → समान चापों में बाँटो → नियम से राशि-मानचित्र” की शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित हैं। हमारी वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga) ठीक इसी त्रिंशद्-भाग आधार पर D2(होरा) से D60(षष्ट्यंश) तक नियत विभाजन करती है—व्याख्या नहीं, माप।

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4.25
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुनिपुंगव।
जन्मलग्नं च संशोध्य निषेकं परिशोधयेत्‌
athātaḥ sampravakṣyāmi śṛṇuṣva munipuṃgava|
janmalagnaṃ ca saṃśodhya niṣekaṃ pariśodhayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथातः = अब इसके बाद; सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; शृणुष्व = सुनो; मुनिपुंगव = मुनियों में श्रेष्ठ (मैत्रेय); जन्मलग्नं = जन्म-लग्न; संशोध्य = ठीक से शोध/निर्धारित कर; निषेकं = गर्भाधान/आधान-काल; परिशोधयेत् = पूर्णतः शोधे / निकाले।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं—अब मैं वह विषय कहता हूँ; हे मुनिश्रेष्ठ, सुनो। पहले जन्म-लग्न को सम्यक् शोधकर स्थिर करना है, तब निषेक (गर्भाधान) काल का परिशोधन करना चाहिए। क्रम स्पष्ट है: जन्म-लग्न प्रमाण → फिर निषेक की गणना। यह संवाद-सूत्र है, अभी संख्या नहीं।

English rendering “I shall now declare this; listen, O foremost of sages. Having properly determined the birth lagna, one should ascertain the moment of conception (niṣeka).”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सूचना / संवाद। निषेक-शोध का वास्तविक चाप-सूत्र 4.27–4.28 में आता है; यहाँ केवल पूर्वापेक्षा: जन्म-लग्न शुद्ध हो।

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4.26
तदहं संप्रवक्ष्यामि मैत्रेय त्वं विधारय।
जन्मलग्नात्‌ परिज्ञानं निषेकं सर्व्जन्तु यत्‌
tadahaṃ saṃpravakṣyāmi maitreya tvaṃ vidhāraya|
janmalagnāt‌ parijñānaṃ niṣekaṃ sarvjantu yat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् = वह (निषेक-ज्ञान); अहं संप्रवक्ष्यामि = मैं सम्यक् कहूँगा; मैत्रेय = हे मैत्रेय; त्वं विधारय = तुम धारण करो / स्मृति में रखो; जन्मलग्नात् = जन्म-लग्न से; परिज्ञानं = पूर्ण ज्ञान; निषेकं = आधान; सर्वजन्तु = सभी प्राणियों के लिए (पाठ: सर्व्जन्तु — सर्वजन्तु)।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं—हे मैत्रेय, वह निषेक-विधि मैं अच्छी तरह कहता हूँ; तुम उसे धारण करो। जन्म-लग्न से ही सब प्राणियों के निषेक का परिज्ञान होता है। शास्त्र निषेक को जन्म-लग्न पर आश्रित व्युत्पन्न काल मानता है—स्वतंत्र अनुमान नहीं, लग्न-आधारित शोध।

English rendering “I shall explain that fully, Maitreya—hold it. From the birth lagna is known the conception of every living being.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद + विधि-घोषणा। इनपुट-घोषणा: जन्म-लग्न (और आगे शनि–मान्दि, लग्न–भाग्य) → आउटपुट: जन्मतः प्राक् निषेक-काल; सूत्र अगले दो श्लोकों में।

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4.27
यस्मिन्‌ भावे स्थितो मन्दस्तस्य मान्देर्यदन्तरम्‌।
लग्नभाग्यान्तरं योज्यं यच्च राश्यादि जायते
yasmin‌ bhāve sthito mandastasya mānderyadantaram‌|
lagnabhāgyāntaraṃ yojyaṃ yacca rāśyādi jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मिन् भावे = जिस भाव में; स्थितः मन्दः = शनि स्थित; तस्य मान्देः = उसके और मान्दि (गुलिक) का; यत् अन्तरम् = जो अन्तर; लग्नभाग्यान्तरं = लग्न और भाग्य (नवम) का अन्तर; योज्यं = जोड़ना चाहिए; यत् च राश्यादि जायते = जो राशि-आदि रूप में उत्पन्न हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निषेक-चाप का मूल योग बताता है: जिस भाव में मन्द (शनि) हो, उसके और मान्दि के बीच का अन्तर लो; उसमें लग्न–भाग्य (लग्न से नवम) का अन्तर जोड़ो। जो राशि-अंश-कला रूप में योग बने, वही आगे मास-आदि माप का आधार है। यह फल-कथन नहीं—काल-माप की विधि है।

English rendering Take the arc between Saturn and Māndi (in the house where Saturn stands); add the arc between lagna and the ninth (bhāgya). Whatever results in signs and degrees is the computational base for the pre-birth conception interval.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
निषेक-चाप (आधार):
Δ₁ = |λ_Śani − λ_Māndi| (वृत्तीय न्यूनतम चाप, 0°–180° या राशि-क्रम से यथापाठ)
Δ₂ = |λ_Lagna − λ_Bhāgya| जहाँ भाग्य = लग्न + 8 × 30° = लग्न + 240° (नवम भाव-प्रारंभ; पूरे भाव-चाप की परंपरा में लग्न–नवम देशान्तर)
S = (Δ₁ + Δ₂) mod 360°
S को राशि-अंश-कला में लिखो — “यच्च राश्यादि जायते”।
संयोजनाएँ घोषित रहें: मान्दि/गुलिक का उदय-आधारित सूत्र, गृह-प्रणाली (समान-भाव vs श्रृंगोन्नत), और अयनांश (निरयण लंबवत जोड़ के लिए एक ही फ्रेम)। पाठ-भेद संभव जहाँ “भाव” को केवल भाव-संख्या या पूर्ण देशान्तर माना जाए।

उदाहरण (worked example) (निरयण, समान 30° भाव; केवल विधि-दृष्टांत)
λ_Lagna = 10° मेष = 10°; λ_Bhāgya (नवम-प्रारंभ) = 10° + 240° = 250°; Δ₂ = 240°।
λ_Śani = 100°; λ_Māndi = 70°; Δ₁ = 30°।
S = 30° + 240° = 270° = 9 राशि 0°।
अगला श्लोक S को “मासादि” में पढ़ता है और दृश्य/अदृश्य दल से चन्द्र-भुक्त जोड़ की शर्त लगाता है।

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4.28
मासादि तन्मितं ज्ञेयं जन्मतः प्रक्‌ निषेकजम्‌।
यद्यदृश्यदलेङ्गेशस्तदेन्दोर्भुक्तभागयुक्‌
māsādi tanmitaṃ jñeyaṃ janmataḥ prak‌ niṣekajam‌|
yadyadṛśyadaleṅgeśastadendorbhuktabhāgayuk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मासादि = मास इत्यादि; तन्मितं = उतने परिमाण का; ज्ञेयं = जानना चाहिए; जन्मतः प्राक् = जन्म से पहले; निषेकजम् = निषेक-संबंधी (काल); यदि = यदि; अदृश्यदले = अदृश्य अर्ध में (अस्त/अधोगोल—सामान्यतः सप्तम से द्वादश); अङ्गेशः = लग्नेश; तत् = तब; इन्दोः भुक्तभागयुक् = चन्द्र के भुक्त अंश से युक्त।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक से प्राप्त राशि-आदि मान को मास-आदि में पढ़कर जन्म से पूर्व का निषेक-काल जानना चाहिए—शास्त्र ऐसा कहता है। विशेष नियम: यदि लग्नेश अदृश्य दल में हो, तो उस माप को चन्द्र के भुक्त भाग (चन्द्र ने अपनी राशि में जितने अंश भोगे) से युक्त करें। दृश्य दल का पक्ष प्रायः अगले पाठ में; यहाँ शर्त स्पष्ट है—अदृश्य-लग्नेश ⇒ + चन्द्र-भुक्त।

English rendering That measure is to be known in months and so on as the conception interval before birth. If the lagna-lord is in the invisible half, join it with the Moon’s elapsed degrees in its sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
S = 4.27 से प्राप्त चाप (राश्यादि)।
मासादि-पाठ (शास्त्रीय रूपांतर; प्रचलित घोषणा): 1 राशि ≡ 1 मास के अनुपात में S के राशि-खण्ड → मास; अंश → दिन-अनुपात (≈ 30° ≡ 1 मास ⇒ 1° ≡ 1 दिन—यही साधारण होरा-रूपांतर; पाठ-भेद संभव)।
शर्त: यदि λ_Lagneśa ∈ अदृश्य-दल
 (प्रचलित: लग्न से 180°–360° वाला अर्ध, अर्थात् सप्तम–द्वादश भाव; संयोजना घोषित करें),
तो
S′ = S + (λ_Candra mod 30°)
अन्यथा इस श्लोक के अनुसार भुक्त-योग नहीं।
λ_Candra mod 30° = चन्द्र-भुक्त भाग (0°–30°)।
अंतिम S′ → जन्मतः प्राक् निषेक-काल (मास-दिन)। यह माप-विधि है; आयु/आरोग्य का फल-कथन नहीं।

उदाहरण (worked example) S = 270° = 9 राशि 0° → ≈ 9 मास 0 दिन (1 राशि ≡ 1 मास)।
लग्नेश (मान लें शुक्र) λ = 200°; लग्न = 10° ⇒ लग्न से चाप = 190° → अदृश्य-दल में।
चन्द्र λ = 47° ⇒ भुक्त = 47° mod 30° = 17°।
S′ = 270° + 17° = 287° = 9 राशि 17° ≈ 9 मास 17 दिन जन्मतः प्राक्—शास्त्र-विधि का संख्यात्मक पाठ; गर्भ-चिकित्सा या नियति का दावा नहीं।

4.29
तत्काले साधयेल्लग्नं शोधयेत्‌ पूर्ववत्तनुम्‌।
तस्माच्छुभाशुभं वाच्यं गर्भस्थस्य विशेषतः
tatkāle sādhayellagnaṃ śodhayet‌ pūrvavattanum‌|
tasmācchubhāśubhaṃ vācyaṃ garbhasthasya viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काले = उसी काल/क्षण में; साधयेत् = गणना/स्थापन करे; लग्नम् = उदित राशि (ascendant); शोधयेत् = शुद्ध/शोधित करे (दोष-परिहार पूर्वक); पूर्ववत् = पूर्व-विधि के अनुसार; तनुम् = तनु/लग्न (शरीर-स्थान); तस्मात् = उस (निषेक-लग्न) से; शुभाशुभम् = शुभ–अशुभ फल; गर्भस्थस्य = गर्भ में स्थित जीव का; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि निषेक (गर्भाधान) के तत्काल पर लग्न की साधना की जाए और तनु (लग्न) को पूर्व-वर्णित रीति से शोधित किया जाए। उसी लग्न से गर्भस्थ के शुभ–अशुभ का कथन विशेष रूप से करना चाहिए। यहाँ फल गर्भस्थ पर केंद्रित है — माता–पिता के विस्तृत कथन का सूत्र अगले श्लोक में आता है।

English rendering At that very moment one should compute the lagna and rectify the ascendant (tanu) by the method already stated. From that chart, the text states, the auspicious and inauspicious indications of the embryo in the womb are to be declared especially.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — निषेक-लग्न से फल-निर्देश की प्रक्रिया। लग्न-साधना यहाँ अंक-सूत्र नहीं देती; वह काल (स्थानीय माध्य/स्पष्ट सूर्योदय, देशान्तर, अयनांश) और उदित राशि के ज्यामितीय निर्धारण पर निर्भर है — वे परंपरा-आश्रित हैं और इस श्लोक में घोषित नहीं। “शोधयेत् पूर्ववत्” का अर्थ: अध्याय में पहले दी गई शोध/शुद्धि की ही विधि दोहराई जाए; नई संख्या नहीं।

4.30
शुभाशुभं वदेत्‌ पित्रोर्जीवनं मरणं तथा।
एवं निषेकलग्नेन सम्यग्‌ ज्ञेयं स्वकल्पनात्‌
śubhāśubhaṃ vadet‌ pitrorjīvanaṃ maraṇaṃ tathā|
evaṃ niṣekalagnena samyag‌ jñeyaṃ svakalpanāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभाशुभम् = शुभ तथा अशुभ; वदेत् = कहे/कथन करे; पित्रोः = माता–पिता का; जीवनम् = जीवन/स्थिति; मरणम् = मरण-संकेत (शास्त्र-कथन); तथा = तथा; एवं = इस प्रकार; निषेकलग्नेन = निषेक-लग्न के द्वारा; सम्यक् = ठीक-ठीक; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; स्वकल्पनात् = अपनी युक्ति/कल्पना-पद्धति से (पाठ-भेद/अर्थ-विस्तार संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि निषेक-लग्न से माता–पिता के शुभ–अशुभ, जीवन और मरण-संबंधी संकेत भी वक्तव्य के विषय हैं। इस प्रकार निषेक-लग्न से सम्यक् ज्ञान अपनी कल्पना (युक्तिपूर्ण अनुमान/पद्धति) के बल पर जाना जाता है। यह फल-निर्देश का समाहार है, न कि स्वतंत्र काल-सूत्र; “स्वकल्पना” का आशय पाठ-परंपरा में विधि-विवेक से जोड़ना है, मनमानी भविष्यवाणी से नहीं।

English rendering From the conception lagna one should also speak of the parents’ auspicious and inauspicious indications, including life and death as the text frames them. Thus, by the niṣeka-lagna, the matter is to be known properly through one’s reasoned method (sva-kalpanā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — निषेक-लग्न पर आधारित फल-कथन का समापन। यहाँ कोई वर्ष-संख्या, अंश-भाग, वर्ग-विभाजन या बल-इकाई नहीं; केवल यह निर्देश कि गर्भस्थ और पितृ-मातृ दोनों पक्ष निषेक-लग्न से “सम्यक्” पढ़े जाएँ। “स्वकल्पनात्” को गणना-इंजन की जगह शास्त्रीय युक्ति/अन्वय-विधि समझें — अयनांश, गृह-पद्धति या लग्न-साधना के स्थिरांक इस श्लोक में नहीं बँधे।

मेषमंवृषशुमिथुनबुकर्कचसिंहसूकन्याबुतुलाशुवृश्चिकमंधनुगुमकरशकुम्भशमीनगु१२ राशिप्रत्येक ३०° · कुल ३६०°०°
राशि-चक्र — the twelve rāśis, each exactly 30° of the 360° ecliptic (12 × 30 = 360). Reading anticlockwise from मेष 0°; the inner ring names each sign's lord (स्वामी). This is the coordinate frame on which every varga, bhāva and daśā is computed.
अध्यायः 5

विशेषलग्नाध्यायः

24 श्लोक
5.1
अथाहं सम्प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम।
भावहोराघटीसंज्ञलग्नानीति पृथक्‌ पृथक्‌
athāhaṃ sampravakṣyāmi tavāgre dvijasattama|
bhāvahorāghaṭīsaṃjñalagnānīti pṛthak‌ pṛthak‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; तव अग्रे = तुम्हारे सामने; द्विजसत्तम = श्रेष्ठ ब्राह्मण (शिष्य-संबोधन); भाव = भाव-लग्न (विशेष लग्न-प्रकार); होरा = होरा-लग्न; घटी = घटी/घटीका-लग्न; संज्ञ = नाम-परिभाषा; लग्नानि = ये लग्न; इति पृथक्‌ पृथक्‌ = अलग-अलग।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं — हे द्विजसत्तम, अब मैं तुम्हारे सामने भाव, होरा और घटी — इन तीनों के नाम और स्वरूप को अलग-अलग स्पष्ट रूप से कहूँगा। यह अध्याय साधारण उदय-लग्न से भिन्न उन विशेष लग्नों की परिभाषा का द्वार खोलता है, जिनका गणना-क्रम आगे के श्लोकों में आएगा।

English rendering Parāśara announces that he will now set forth, one by one before the disciple, the distinct designations of the bhāva-, horā-, and ghaṭī-lagnas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना / परिभाषा-सूचना। श्लोक तीनों विशेष लग्नों (भाव, होरा, घटी) के पृथक्‌ विवेचन की घोषणा मात्र करता है; गणना अगले श्लोकों में है।

5.2
सूर्योदयं समारभ्य घटिकानां तु पंचकम्‌।
प्रयाति जन्मपर्यन्तं भावलग्नं तदेव हि
sūryodayaṃ samārabhya ghaṭikānāṃ tu paṃcakam‌|
prayāti janmaparyantaṃ bhāvalagnaṃ tadeva hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्योदयं समारभ्य = सूर्योदय से आरम्भ करके; घटिकानां तु पंचकम्‌ = पाँच घटिकाओं का समूह (१ पंचक = ५ घटी); प्रयाति = आगे बढ़ता है; जन्मपर्यन्तं = जन्म-काल तक; भावलग्नं = भाव-लग्न; तदेव हि = वही ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाव-लग्न सूर्योदय से गिनकर, जन्म-क्षण तक, पाँच-पाँच घटिकाओं के क्रम से आगे बढ़ता है। अर्थात् पाँच घटियों में यह लग्न एक राशि के बराबर चलता है; जन्म तक जितने ऐसे पंचक बीतें, उतना ही भाव-लग्न का प्रगति-मान है। यह उदय-लग्न (क्षितिज-लग्न) से भिन्न एक काल-आधारित लग्न है।

English rendering The text states that the bhāva-lagna advances from sunrise up to the moment of birth in successive units of five ghaṭikās; that progression itself is the bhāva-lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१ दिन = ६० घटिका।
५ घटी → भाव-लग्न में १ राशि (= ३०°) की वृद्धि।
पूरे दिन में: ६० ÷ ५ = १२ राशि = एक पूर्ण भचक्र।
रूप: भावलग्न-स्फुट ≈ उदयकालिक सूर्य + (इष्टघटी / ५) राशि।
(इष्टघटी = सूर्योदय से जन्म तक की घटी-संख्या; परिणाम राशि-अंश-कला में।)

उदाहरण (worked example)
मान लें उदयकालिक सूर्य = मेष १०°००′; जन्म सूर्योदय के १५ घटी बाद।
इष्ट / ५ = १५ ÷ ५ = ३ राशि = ९०°।
भावलग्न = १०° + ९०° = १००° = कर्क १०°००′।
(सम्मेलन: स्थानीय सत्य सूर्योदय; घटी = २४ मिनट; अयनांश सूर्य-स्फुट पर पहले से लागू।)

5.3
इष्टं घट्यादिकं भक्त्वा पंचभिर्भादिजं फलम्‌।
योज्यमौदयिके सूर्ये भावलग्नं स्फुटं च तत्‌
iṣṭaṃ ghaṭyādikaṃ bhaktvā paṃcabhirbhādijaṃ phalam‌|
yojyamaudayike sūrye bhāvalagnaṃ sphuṭaṃ ca tat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्टं घट्यादिकं = जन्म का इष्ट काल घटी-पल आदि में; भक्त्वा पंचभिः = पाँच से भाग देकर; भादिजं फलम्‌ = राशि-आदि (भा = राशि, आदि = अंश-कला) रूप फल; योज्यम्‌ = जोड़ना चाहिए; औदयिके सूर्ये = उदयकालिक सूर्य में; भावलग्नं स्फुटं = भाव-लग्न का स्पष्ट मान; तत्‌ = वही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र गणना-विधि देता है — इष्ट घट्यादि को पाँच से भाग दो; जो फल राशि-अंश आदि रूप में आए, उसे उदयकालिक सूर्य-स्फुट में जोड़ दो। योगफल ही स्पष्ट भाव-लग्न है। यह श्लोक ५.२ की परिभाषा को अंकगणित में बाँधता है: भाग-फल सीधे भचक्र-अंश में परिवर्तित होकर सूर्य पर अध्यारोपित होता है।

English rendering Divide the elapsed time from sunrise (in ghaṭīs and subunits) by five; add the resulting rāśi-ādi quantity to the Sun at sunrise — that sum is the clear (sphuṭa) bhāva-lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
λ_BL = λ_☉_udaya + (G_iṣṭa ÷ ५) × ३०°
जहाँ G_iṣṭa घटी+पल+विपल को दशमलव-घटी में लें;
(G ÷ ५) का पूर्ण भाग = राशियाँ, शेष × ३०° = अंश-कला (अथवा सीधे दशमलव-राशि × ३०°)।
मॉड्यूलो ३६०° / १२ राशि।
स्थिरांक श्लोक से: भाजक = ५ (पंचभिः); आधार = औदयिक सूर्य।

उदाहरण (worked example)
λ_☉_udaya = वृष ५°२०′ (= ३५°२०′); G_iṣṭa = ८ घटी ३० पल = ८.५ घटी।
८.५ ÷ ५ = १.७ राशि = १ राशि + ०.७ × ३०° = १ राशि २१°।
λ_BL = ३५°२०′ + ५१° = ८६°२०′ = मिथुन २६°२०′।
(सम्मेलन: ६० पल = १ घटी; उदय = स्थानिक सूर्योदय।)

5.4
तथा सार्धद्विघटिकामितादर्कोदयाद्‌ द्विज।
प्रयाति लग्नं तन्नाम होरालग्नं प्रचक्षते
tathā sārdhadvighaṭikāmitādarkodayād‌ dvija|
prayāti lagnaṃ tannāma horālagnaṃ pracakṣate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = उसी प्रकार; सार्धद्विघटिका = सार्ध-द्वि = २½ घटिका; मितात्‌ = उस माप से; अर्कोदयाद्‌ = सूर्योदय से; द्विज = हे द्विज; प्रयाति लग्नं = लग्न आगे बढ़ता है; तत्‌ नाम = उसका नाम; होरालग्नं = होरा-लग्न; प्रचक्षते = कहते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्योदय से गिनकर ढाई-ढाई घटिकाओं में जो लग्न आगे बढ़ता है, उसी को होरा-लग्न कहा गया है। भाव-लग्न जहाँ पाँच घटी में एक राशि चलता है, वहाँ होरा-लग्न २½ घटी में एक राशि चलता है — अर्थात् दुगुनी गति से। यह नाम “होरा” (दिन के आधे/काल-खण्ड) की परम्परा से जुड़ा विशेष लग्न-प्रकार है, साधारण होरा-वर्ग (D2) से भिन्न काल-लग्न।

English rendering Likewise, the lagna that advances from sunrise in measures of two-and-a-half ghaṭikās is named the horā-lagna, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
२½ घटी = ५/२ घटी → १ राशि (३०°)।
गति: भाव-लग्न की दुगुनी।
पूरे दिन (६० घटी) में: ६० ÷ (५/२) = २४ राशि = दो पूर्ण भचक्र।
λ_HL ≈ λ_☉_udaya + (G_iṣṭa ÷ २.५) राशि
अथवा समतुल्य: λ_HL = λ_☉_udaya + (२ × G_iṣṭa ÷ ५) राशि — यही अगले श्लोक का सूत्र है।

उदाहरण (worked example)
λ_☉_udaya = मेष १०°; G_iṣṭa = १५ घटी।
१५ ÷ २.५ = ६ राशि = १८०°।
λ_HL = १०° + १८०° = १९०° = तुला १०°।
तुलना: उसी इष्ट पर भाव-लग्न = १०° + ९०° = कर्क १०° (आधा अंश-पथ)।

5.5
इष्टघट्यादिकं द्विघ्नं पञ्चाप्तं भादिकं च यत्‌।
योज्यमौदयिके भानौ होरालग्नं स्फुटं हि तत्‌
iṣṭaghaṭyādikaṃ dvighnaṃ pañcāptaṃ bhādikaṃ ca yat‌|
yojyamaudayike bhānau horālagnaṃ sphuṭaṃ hi tat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्टघट्यादिकं = इष्ट घटी आदि; द्विघ्नं = दो से गुणा; पञ्चाप्तं = पाँच से भाग देने पर प्राप्त; भादिकं = राशि-आदि; यत्‌ = जो; योज्यम्‌ = जोड़ने योग्य; औदयिके भानौ = उदयकालिक सूर्य में; होरालग्नं स्फुटं = स्पष्ट होरा-लग्न; हि तत्‌ = वही निश्चय।

हिन्दी भावार्थ स्पष्ट गणना: इष्ट घट्यादि को पहले दो से गुणा करो, फिर पाँच से भाग दो; प्राप्त राशि-अंश आदि को उदयकालिक सूर्य में जोड़ो — यही स्पष्ट होरा-लग्न है। “द्विघ्नं पञ्चाप्तं” ठीक २½ घटी = १ राशि वाले नियम (५.४) का बीजगणितीय रूप है: २G/५ = G/(५/२)।

English rendering Double the elapsed ghaṭī-measure, divide by five, and add the resulting rāśi-ādi to the Sun at sunrise — that is the clear horā-lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
λ_HL = λ_☉_udaya + ((२ × G_iṣṭa) ÷ ५) × ३०°
सत्यता-जाँच: २/५ = १/(५/२) — श्लोक ५.४ के सार्धद्विघटिका से अभिन्न।
दिन-भर: (२ × ६०)/५ = २४ राशि।
स्थिरांक श्लोक से: गुणक २ (द्विघ्न), भाजक ५ (पञ्च), आधार औदयिक भानु।

उदाहरण (worked example)
λ_☉_udaya = वृष ५°२०′; G_iṣṭa = ८.५ घटी।
२ × ८.५ = १७; १७ ÷ ५ = ३.४ राशि = ३ राशि + ०.४ × ३०° = ३ राशि १२°।
λ_HL = ३५°२०′ + १०२° = १३७°२०′ = सिंह १७°२०′।
उसी आँकड़े पर भाव-लग्न था मिथुन २६°२०′ — होरा-लग्न उससे आगे, दुगुनी इष्ट-राशि-वृद्धि के कारण।

5.6
कथयामि घटीलग्नं सृनु त्वं द्विजसत्तम।
सूर्योदयत्‌ समारभ्य जन्मकालावधि क्रमात्‌
kathayāmi ghaṭīlagnaṃ sṛnu tvaṃ dvijasattama|
sūryodayat‌ samārabhya janmakālāvadhi kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कथयामि = कहता हूँ; घटीलग्नं = घटी-लग्न (घटीकालग्न); सृनु / शृणु = सुनो; त्वं द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; सूर्योदयात्‌ समारभ्य = सूर्योदय से आरम्भ; जन्मकालावधि = जन्म-काल पर्यन्त; क्रमात्‌ = क्रम से।

हिन्दी भावार्थ पराशर घटी-लग्न का उपक्रम करते हैं — हे द्विजसत्तम, सुनो; सूर्योदय से जन्म-क्षण तक क्रमशः जो गणना चलेगी, वही घटी-लग्न का आधार है। यह तीसरा विशेष लग्न है: भाव (५ घटी/राशि), होरा (2½ घटी/राशि) के बाद अब एक-एक घटी की माप आने वाली है।

English rendering “I shall now declare the ghaṭī-lagna; listen, O best of the twice-born — counting in order from sunrise up to the time of birth.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपक्रम / संवाद-सूचना। गणना-नियम अगले श्लोक (५.७) में एकैकघटिका-मान से आता है; यहाँ केवल काल-सीमा (सूर्योदय → जन्म) नियत है।

5.7
एकैकघटिकामानात्‌ लग्नं यद्याति भादिकम्‌।
तदेव घटिकालग्नं कथितं नारदादिभिः
ekaikaghaṭikāmānāt‌ lagnaṃ yadyāti bhādikam‌|
tadeva ghaṭikālagnaṃ kathitaṃ nāradādibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकैकघटिका-मानात्‌ = एक-एक घटिका की माप से; लग्नं यत्‌ याति = जो लग्न आगे जाता है; भादिकम्‌ = राशि-आदि रूप में; तत्‌ एव = वही; घटिकालग्नं = घटीका-लग्न; कथितं = कहा गया; नारदादिभिः = नारद आदि आचार्यों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्योदय से जन्म तक, प्रत्येक एक घटिका पर लग्न एक राशि-क्रम से बढ़ता है; वही घटीका-लग्न है, जिसे नारद आदि ने भी कहा है। अर्थात् १ घटी = १ राशि (३०°) की प्रगति — तीनों विशेष लग्नों में सबसे तीव्र। “नारदादिभिः” पाठ परम्परा का समर्थन-संकेत है; विस्तृत नारद-पाठ से मिलान पाठ-भेद संभव।

English rendering That lagna which advances, rāśi by rāśi, at the measure of one ghaṭikā each is called the ghaṭikā-lagna, so stated by Nārada and others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१ घटी → घटी-लग्न में १ राशि (= ३०°)।
λ_GL = λ_☉_udaya + G_iṣṭa × ३०°
अथवा: λ_GL = λ_☉_udaya + (G_iṣṭa) राशि (मॉड १२)।
पूरे दिन: ६० घटी → ६० राशि = ५ पूर्ण भचक्र।
तीनों लग्नों का अनुपात (इष्ट G पर राशि-वृद्धि):
भाव : होरा : घटी = (G/५) : (२G/५) : G = १ : २ : ५।

उदाहरण (worked example)
λ_☉_udaya = मेष १०°; G_iṣṭa = १५ घटी।
λ_GL = १०° + १५ × ३०° = १०° + ४५०° = ४६०° ≡ १००° (मॉड ३६०°) = कर्क १०°।
उसी इष्ट पर: भाव-लग्न = कर्क १०°; होरा-लग्न = तुला १०°; घटी-लग्न = कर्क १०° — यहाँ G=१५ पर भाव और घटी संख्या-संयोग से एक ही राशि-अंश पर आते हैं (१५/५=३ vs १५ राशि ≡ ३ राशि मॉड १२), किन्तु सामान्य G पर तीनों भिन्न रहते हैं।
दूसरा चेक: G=८.५; λ_☉=वृष ५°२०′।
λ_GL = ३५°२०′ + ८.५×३०° = ३५°२०′ + २५५° = २९०°२०′ = मकर २०°२०′।

5.8
राशयस्तु घटीतुल्याः पलार्धप्रमितांशकाः।
योज्यमौदयिके भनौ घटीलग्नं स्फुटं हि तत्‌
rāśayastu ghaṭītulyāḥ palārdhapramitāṃśakāḥ|
yojyamaudayike bhanau ghaṭīlagnaṃ sphuṭaṃ hi tat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशयः = राशि-संख्या (घटी-लग्न में); घटीतुल्याः = पूर्ण घटी = उतनी ही राशियाँ; पलार्धप्रमितांशकाः = पल का आधा = अंश (degree) की माप; औदयिके भनौ = उदय-कालीन सूर्य (सूर्योदय-स्फुट); योज्यम् = जोड़ें; घटीलग्नम् = घटी-लग्न; स्फुटम् = स्पष्ट/ठीक मान।

हिन्दी भावार्थ घटी-लग्न निकालने की विधि शास्त्र यहाँ सूत्रबद्ध करता है। सूर्योदय से जन्म तक बीती पूर्ण घटियों को राशियों के तुल्य लें, और शेष पलों का आधा अंशों (डिग्रियों) के रूप में लें। इस प्रकार बने राशि–अंश योग को उदय-कालीन सूर्य-स्फुट में जोड़ दें — वही स्पष्ट घटी-लग्न है। यह काल-अंश को राशि-अंश में बदलने का सीधा गणित है, फल-कथन नहीं।

English rendering For Ghaṭī-lagna, take the completed ghaṭīs from sunrise as so many rāśis, and half the remaining palas as degrees (aṃśas); add that arc to the Sun’s longitude at sunrise. That sum is the true Ghaṭī-lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
घटी-लग्न
  λ_GL = λ_Sun(sunrise) + G × 30° + (P ÷ 2)°  (mod 360°)
जहाँ G = सूर्योदय से जन्म तक पूर्ण घटियाँ, P = अधूरी घटी के पल।
माप-सम्बंध (श्लोकानुसार): 1 घटी ↔ 1 राशि; ½ पल ↔ 1 अंश
(अतः 1 घटी = 60 पल = 30 अंश)।
अभिसमय: स्थानीय सूर्योदय; λ_Sun अयनांश-निर्भर — अयनांश घोषित करें (उदा. लाहिरी)।

उदाहरण (worked example)
सूर्योदय-सूर्य λ_Sun = 45° (वृषभ 15°); जन्म = सूर्योदय के 12 घटी 40 पल बाद।
G = 12 → 12 × 30° = 360°; P/2 = 40/2 = 20°।
λ_GL = 45° + 360° + 20° = 425° ≡ 65° (मिथुन 5°)।
(अयनांश: जो कुण्डली में सूर्य-स्फुट के लिए प्रयुक्त हो, वही यहाँ।)

5.9
क्रमादेषां च लग्नानां भावकोष्ठं पृथक्‌ लिखेत्‌।
ये ग्रहा यत्र भे तत्र ते स्थाप्या राशिलग्नवत्‌
kramādeṣāṃ ca lagnānāṃ bhāvakoṣṭhaṃ pṛthak‌ likhet‌|
ye grahā yatra bhe tatra te sthāpyā rāśilagnavat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से; एषां लग्नानाम् = इन (विशेष) लग्नों के; भावकोष्ठम् = भाव-बक्स/भाव-चक्र; पृथक् लिखेत् = अलग-अलग अंकित करे; ये ग्रहाः यत्र भे = ग्रह जिस राशि में हों; तत्र ते स्थाप्याः = वहीं स्थापित करें; राशिलग्नवत् = राशि-लग्न कुण्डली की भाँति।

हिन्दी भावार्थ घटी-लग्न आदि जितने लग्न निकाले जाएँ, प्रत्येक के लिए भाव-कोष्ठ अलग लिखे जाएँ — अर्थात् प्रत्येक विशेष लग्न को प्रथम भाव मानकर बारह भाव रचे जाएँ। ग्रह अपनी जन्म-राशि में ही रहें; उन्हें “राशिलग्न-कुण्डली” की तरह उन्हीं भों में रखा जाए, केवल लग्न-बिन्दु बदलता है। यह चार्ट-रचना की प्रक्रिया है।

English rendering For each of these lagnas in turn, draw a separate house diagram. Place the planets in the signs they already occupy, exactly as in the rāśi chart — only the lagna (first house) shifts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रचना-विधि / कोष्ठ-लेखन। विशेष लग्न L को भाव 1 मानकर भाव k = rāśi-of(L) से (k−1) राशियाँ आगे; ग्रहों की राशि-स्थिति अपरिवर्तित।

5.10
वर्णदाख्यदशां भानां कथयाम्यथ तेऽग्रतः।
यस्य विज्ञानमात्रेण वदेदायुर्भवं फलम्‌
varṇadākhyadaśāṃ bhānāṃ kathayāmyatha te'grataḥ|
yasya vijñānamātreṇa vadedāyurbhavaṃ phalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्णदाख्यदशाम् = वर्णद नामक दशा; भानाम् = राशियों/भों की; कथयामि = कहता हूँ; अथ ते अग्रतः = अब तुम्हारे समक्ष; यस्य विज्ञानमात्रेण = जिसके जानने मात्र से; वदेत् = कह सके; आयुर्भवम् फलम् = आयु-सम्बन्धी / आयु-भाव का फल (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य वर्णद-संज्ञक दशा का उपदेश आरम्भ करते हैं — राशियों से जुड़ी वह दशा-पद्धति। शास्त्र कहता है कि इसके विज्ञान से आयु-सम्बद्ध फल कहा जा सकता है। यह परिचय-श्लोक है; गणना आगे के श्लोकों में है। फल को नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ना — यह शास्त्र का अपना दावा-वाक्य है।

English rendering I shall now set forth the daśā called Varṇadā belonging to the signs. The text states that by knowledge of it alone one may speak the results connected with longevity (āyur-bhava-phala).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-परिचय / फल-अधिकार की उद्घोषणा। गणना 5.11–5.14 में; यहाँ केवल नाम और प्रयोजन-सूचना।

5.11
ओजलग्नप्रसूतानां मेषादेर्गणयेत्‌ क्रमात्‌।
समलग्नप्रसूतानाम् मीनादेरपसव्यतः
ojalagnaprasūtānāṃ meṣādergaṇayet‌ kramāt‌|
samalagnaprasūtānām mīnāderapasavyataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ओजलग्नप्रसूतानाम् = विषम (ओज) लग्न में जन्मे; मेषादेः = मेष से; गणयेत् क्रमात् = क्रम से (सव्य/आगे) गिने; समलग्नप्रसूतानाम् = सम लग्न में जन्मे; मीनादेः = मीन से; अपसव्यतः = उल्टी दिशा में (वामावर्त)।

हिन्दी भावार्थ वर्णद-गणना की दिशा लग्न की ओज/सम प्रकृति पर टिकी है। शास्त्र कहता है — विषम लग्न (मेष, मिथुन, सिंह…) वालों के लिए मेष से क्रमशः आगे गिनें; सम लग्न (वृष, कर्क, कन्या…) वालों के लिए मीन से अपसव्य (उल्टी) गिनती करें। यही दिशा जन्म-लग्न और होरा-लग्न दोनों गणनाओं पर लागू होती है।

English rendering For those born under an odd lagna, count forward from Meṣa; for those born under an even lagna, count reverse (apasavya) from Mīna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
दिशा-नियम (D):
  Lagna ∈ {1,3,5,7,9,11} (ओज) → start = मेष, step = +1
  Lagna ∈ {2,4,6,8,10,12} (सम) → start = मीन, step = −1
(राशि-संख्या 1=मेष … 12=मीन।)
यह 5.12–5.13 की दो गिनतियों का आधार-अभिसमय है।

उदाहरण (worked example)
जन्म-लग्न = सिंह (5, ओज) → मेष से आगे: मेष…सिंह।
जन्म-लग्न = कर्क (4, सम) → मीन से उल्टे: मीन, कुम्भ, मकर, धनु, वृश्चिक, तुला, कन्या, कर्क।

5.12
मेषमीनादितो जन्मलग्नान्तं गणयेत्‌ सुधीः।
तथैव होरालग्नान्तं गणयित्वा ततः परम्‌
meṣamīnādito janmalagnāntaṃ gaṇayet‌ sudhīḥ|
tathaiva horālagnāntaṃ gaṇayitvā tataḥ param‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषमीनादितः = मेष अथवा मीन से (5.11 की दिशा अनुसार); जन्मलग्नान्तम् = जन्म-लग्न पर्यन्त; गणयेत् सुधीः = बुद्धिमान् गिने; तथैव = उसी प्रकार; होरालग्नान्तम् = होरा-लग्न पर्यन्त; गणयित्वा = गिनकर; ततः परम् = तदनन्तर (अगला चरण)।

हिन्दी भावार्थ बुद्धिमान् ज्योतिषी 5.11 की दिशा लेकर मेष/मीन से जन्म-लग्न तक राशियाँ गिने — यह पहली संख्या। ठीक उसी नियम से होरा-लग्न तक दूसरी संख्या निकाले। इन दो संख्याओं पर अगला श्लोक जोड़/घटाव का नियम लगाता है। होरा-लग्न यहाँ D2-होरा-वर्ग नहीं, बल्कि काल-सिद्ध विशेष लग्न (होरा-लग्न) है — अभिसमय स्पष्ट रखें।

English rendering From Meṣa or Mīna (as required), the wise count up to the natal lagna; likewise count up to the Horā-lagna — then proceed to the next step.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
N_L = |राशियों की गिनती start → Janma-lagna| (5.11 की दिशा)
N_H = |राशियों की गिनती start → Horā-lagna| (उसी दिशा)
गिनती में आरम्भ–अन्त दोनों सहित (inclusive) — यही पारम्परिक कोष्ठ-गणना; पाठ-भेद संभव यदि exclusive गिनें।
Horā-lagna = पूर्व-निर्धारित होरा-लग्न स्फुट की राशि (इस श्लोक में सूत्र नहीं)।

उदाहरण (worked example)
लग्न = सिंह (ओज) → start मेष, आगे।
N_L (मेष→सिंह) = 5।
होरा-लग्न = तुला → N_H (मेष→तुला) = 7।

5.13
ओजत्वेन समत्वेन सयातीये उभे यदि।
तर्हि संख्ये योजयीत वैजात्ये तु वियोजयेत्‌
ojatvena samatvena sayātīye ubhe yadi|
tarhi saṃkhye yojayīta vaijātye tu viyojayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ओजत्वेन समत्वेन = विषम या सम स्वभाव से; सजातीये उभे यदि = यदि दोनों सजातीय हों (पाठ: “सयातीये” — सजातीये का पाठ-भेद संभव); संख्ये योजयेत् = दोनों संख्याएँ जोड़ें; वैजात्ये = विजातीय (एक ओज, एक सम) होने पर; वियोजयेत् = घटाएँ (अन्तर लें)।

हिन्दी भावार्थ जन्म-लग्न और होरा-लग्न दोनों यदि एक ही जाति के हों — दोनों ओज-राशि या दोनों सम-राशि — तो 5.12 की दोनों संख्याएँ जोड़ दी जाएँ। यदि एक ओज और एक सम हो (वैजात्य), तो बड़ी में से छोटी घटाकर अन्तर लें। यह वर्णद-अंक (कार्य-संख्या) का निर्माण है; फल नहीं।

English rendering If the two (lagna and Horā-lagna) are of the same class — both odd or both even — add the two counts; if of different class, take their difference.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
जाति(L) = O यदि राशि-अंक विषम, S यदि सम।
  यदि जाति(Janma-L) = जाति(Horā-L): N = N_L + N_H
  अन्यथा: N = |N_L − N_H|
N = 0 हो तो अभिसमय-निर्भर सुधार (प्रायः 12) — मूल श्लोक मौन; पाठ-परम्परा में जाँचें।
N को 12-मोड्युलो भाव में बाँधना अगले श्लोक की गिनती के लिए।

उदाहरण (worked example)
सिंह (ओज) + तुला (ओज) → सजातीय: N = 5 + 7 = 12।
यदि होरा-लग्न वृषभ (सम) होता: वैजात्य → N = |5 − 2| = 3
(वृषभ पर N_H मेष से = 2 मानकर)।

5.14
मेषमीनादितः पश्चाद्यो राशिः स तु वर्णदः।
एतत्प्रयोजनं वक्ष्ये सृणु त्वं द्विजपुंगवः।
होरालग्नभयोर्नेया सबलाद्‌वर्णदा दशा
meṣamīnāditaḥ paścādyo rāśiḥ sa tu varṇadaḥ|
etatprayojanaṃ vakṣye sṛṇu tvaṃ dvijapuṃgavaḥ|
horālagnabhayorneyā sabalād‌varṇadā daśā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषमीनादितः पश्चात् = मेष/मीन से (गिनकर) बाद जो; यः राशिः = जो राशि; स तु वर्णदः = वही वर्णद; एतत् प्रयोजनम् वक्ष्ये = इसका प्रयोजन कहूँगा; शृणु (सृणु) त्वम् द्विजपुंगवः = सुनो, हे द्विजश्रेष्ठ; होरालग्नभयोः = होरा और (जन्म-)लग्न दोनों में से; नेया = ले जानी/चलाई जाए; सबलात् = सबलतर से; वर्णदा दशा = वर्णद दशा।

हिन्दी भावार्थ 5.13 से प्राप्त संख्या N को फिर मेष से आगे या मीन से उल्टे (जन्म-लग्न की ओज/सम दिशा में) गिनकर जो राशि आती है, शास्त्र उसे वर्णद कहता है। आचार्य कहते हैं — इसका प्रयोजन आगे कहूँगा; हे द्विजश्रेष्ठ, सुनो। वर्णद-दशा होरा-लग्न और जन्म-लग्न में जो सबल हो, उसी से चलाई जाए। “सबल” का माप इस श्लोक में नहीं खोला — बल-तुलना पृथक् नियम (स्थान/षड्बल आदि) से; यहाँ केवल दशा-आरम्भ बिन्दु का सिद्धान्त है।

English rendering Counting again from Meṣa or Mīna by the number so obtained, the rāśi reached is the Varṇada. Its use will be told; listen, O best of the twice-born. The Varṇadā daśā is to be led from the stronger of the Horā-lagna and the (natal) lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
वर्णद-राशि R_V: start व step = 5.11 (जन्म-लग्न की ओज/सम दिशा)
  R_V = start + (N − 1) × step (mod 12, राशि 1…12)
दशा-नेता:
  यदि bala(Horā-L) > bala(Janma-L) → दशा-आरम्भ Horā पक्ष से
  अन्यथा → Janma-lagna / वर्णद पक्ष से
(बल-माप श्लोक में अकथित — षड्बल या स्थान-बल अभिसमय घोषित करें।)
दशा-वर्षमान/क्रम इस श्लोक-युग्म में नहीं; केवल वर्णद-राशि और सबल-नेता।

उदाहरण (worked example)
N = 12, लग्न ओज → मेष से आगे 12 राशियाँ → मीन = वर्णद।
N = 3, लग्न ओज → मेष, वृषभ, मिथुन → मिथुन = वर्णद।
यदि होरा-लग्न सबल: वर्णद-दशा होरा-लग्न-संदर्भ से नेय; अन्यथा जन्म-लग्न/वर्णद से — बल-तुलना अलग घोषित करनी होगी।

5.15
यत्‌संख्ये वर्णदो लग्नात्‌ तत्तत्संख्याक्रमेण तु।
क्रमयुत्क्रमभेदेन दशा स्यादोजयुग्मयो
yat‌saṃkhye varṇado lagnāt‌ tattatsaṃkhyākrameṇa tu|
kramayutkramabhedena daśā syādojayugmayo

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्-संख्ये = जिस संख्या में; वर्णदः = वर्णद (विशेष लग्न-रूप); लग्नात् = लग्न से; तत्-तत्-संख्या-क्रमेण = उसी संख्या-क्रम से; क्रम-उत्क्रम-भेदेन = क्रम और उत्क्रम के भेद से; दशा = दशा-क्रम; ओज-युग्मयोः = विषम और सम (राशि) में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वर्णद जिस संख्या पर लग्न से स्थित हो, उसी संख्या के क्रम से दशा चले। विषम (ओज) और सम (युग्म) राशि के भेद से क्रम अथवा उत्क्रम अपनाया जाए। इस प्रकार वर्णद-दशा का प्रवाह लग्न से गिने गए संख्या-क्रम और ओज-युग्म-नियम पर टिका है।

English rendering The text states that the daśā proceeds by the sequential count equal to the number of the Varṇada counted from the lagna. The distinction of direct order (krama) and reverse order (utkrama) is applied according to odd and even signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्णद-दशा का क्रम = लग्न-राशि L से वर्णद-राशि V तक की गणना।
मान लें राशि-अंक 1…12 (मेष = 1, …, मीन = 12)।
संख्या n = ((V − L) mod 12); यदि n = 0 तो n = 12 (पूर्ण चक्र)।
ओज (विषम) / युग्म (सम) भेद से दिशा:
• क्रम = L, L+1, L+2, … (mod 12, 12 के बाद 1)
• उत्क्रम = L, L−1, L−2, …
दशा उसी दिशा में तत्-तत् संख्या-क्रम से चलती है। (अवधि-वर्ष का स्पष्ट नियत अंक इस पद में नहीं; क्रम-नियम ही विहित है। पाठ-भेद संभव जहाँ ओज-युग्म किस राशि पर लागू हो।)

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन (L = 3), वर्णद = सिंह (V = 5)।
n = (5 − 3) mod 12 = 2।
यदि ओज-युग्म-नियम से क्रम लागू हो: दशा-क्रम 3 → 4 → 5 → … (मिथुन, कर्क, सिंह, …)।
यदि उत्क्रम: 3 → 2 → 1 → 12 → … (मिथुन, वृषभ, मेष, मीन, …)।
(राशि-संख्या 1–12 की कन्वेंशन; अयनांश यहाँ दशा-क्रम को नहीं बदलता — केवल L, V के निर्धारण में लग्न/होरा-देशान्तर पर निर्भर।)

5.16
पापदृष्टिः पापयोगो वर्ण्दस्य त्रिकोणके।
यदि स्यात्‌ तर्हि तद्राशिपर्यन्तं तस्य जीवनं
pāpadṛṣṭiḥ pāpayogo varṇdasya trikoṇake|
yadi syāt‌ tarhi tadrāśiparyantaṃ tasya jīvanaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-दृष्टिः = पाप-ग्रह की दृष्टि; पाप-योगः = पाप-ग्रह का योग; वर्णदस्य = वर्णद का; त्रिकोणके = त्रिकोण में (1, 5, 9 भाव-रूप); यदि स्यात् = यदि हो; तर्हि = तो; तत्-राशि-पर्यन्तम् = उस राशि तक; तस्य जीवनम् = उसका जीवन (आयु-सीमा का संकेत)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वर्णद के त्रिकोण में यदि पाप-दृष्टि या पाप-योग हो, तो जीवन-सीमा का चिन्तन उस राशि तक किया जाए। अर्थात् वर्णद-दशा-क्रम में जिस राशि पर वह पाप-संगति बैठती है, उसी को आयु-पर्यन्त का संकेत माना गया है। यह फल-कथन शास्त्रीय संकेत है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that if there is a malefic aspect or malefic conjunction in a trikoṇa of the Varṇada, the native’s life-span is to be considered as extending up to that rāśi (in the Varṇada-daśā count).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिकोण-राशि-समुच्चय वर्णद V से:
T = { V, ((V−1+4) mod 12)+1 , ((V−1+8) mod 12)+1 } ≡ भाव 1, 5, 9 वर्णद से।
यदि किसी R ∈ T पर पाप-दृष्टि या पाप-योग हो, तो आयु-संकेत = दशा-क्रम में R तक।
“पर्यन्त” = क्रम में लग्न/आरम्भ से R की स्थिति तक की दूरी (राशि-गिनती), न कि निरपेक्ष काल-वर्ष जब तक अवधि-सूत्र अन्यत्र न दिया हो।

उदाहरण (worked example) वर्णद = कन्या (V = 6)। त्रिकोण T = {6, 10, 2} = कन्या, मकर, वृषभ।
मान लें मकर (10) पर शनि-दृष्टि/योग। दशा यदि क्रम से मेष (1) से चले तो “मकर-पर्यन्त” = राशि-क्रम में 10वीं स्थिति तक का संकेत।
(पाप-ग्रह: सामान्यतः शनि, मंगल, रवि, राहु/केतु — दृष्टि-नियम अध्याय-दृष्टि कन्वेंशन पर; यहाँ केवल त्रिकोण-संयोग की संरचना।)

5.17
रुद्रशूले यथैवायुर्मरणादि निरूप्यते।
तथैव वर्णदस्यपि त्रिकोणे पापसंगमे
rudraśūle yathaivāyurmaraṇādi nirūpyate|
tathaiva varṇadasyapi trikoṇe pāpasaṃgame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रुद्र-शूले = रुद्र-शूल (विधि) में; यथा एव = जिस प्रकार; आयुः-मरण-आदि = आयु, मरण आदि; निरूप्यते = निर्धारित/विचारित होता है; तथा एव = उसी प्रकार; वर्णदस्य अपि = वर्णद का भी; त्रिकोणे = त्रिकोण में; पाप-संगमे = पाप का संगम होने पर।

हिन्दी भावार्थ जैसे रुद्र-शूल-विधि में आयु और मरण आदि का निरूपण किया जाता है, वैसे ही वर्णद के विषय में भी त्रिकोण में पाप-संगम होने पर उसी दृष्टि से चिन्तन करना शास्त्र कहता है। दोनों प्रसंगों में त्रिकोण-दोष आयु-संकेत का आधार है। फल शास्त्र का कथन है; निश्चित मृत्यु-काल का दावा नहीं।

English rendering Just as longevity, death, and related indications are assessed in the Rudra-śūla procedure, so too — the text states — when malefics join in a trikoṇa of the Varṇada, the same kind of assessment is applied.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/आयु-निरूपण का सादृश्य-कथन।
संरचना-समानता: रुद्र-शूल में शूल-राशि पर पाप → आयु-चिह्न; यहाँ वर्णद-त्रिकोण T = {V, V+4, V+8} (mod 12) पर पाप-संगम → उसी कोटि का संकेत। संख्यात्मक वर्ष-फल इस पद में नहीं।

5.18
वर्णदादपि भो विप्र लग्नवच्चिन्तयेत्‌ फलम्‌।
वर्णदात्‌ सप्तमाद्‌ भावत्‌ कलत्रायुर्विचिन्तयेत्‌
varṇadādapi bho vipra lagnavaccintayet‌ phalam‌|
varṇadāt‌ saptamād‌ bhāvat‌ kalatrāyurvicintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्णदात् अपि = वर्णद से भी; भो विप्र = हे विप्र; लग्नवत् = लग्न के समान; चिन्तयेत् फलम् = फल का चिन्तन करे; वर्णदात् सप्तमात् भावात् = वर्णद से सप्तम भाव से; कलत्र-आयुः = पत्नी/कलत्र की आयु; विचिन्तयेत् = विशेष रूप से विचारे।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, शास्त्र कहता है कि वर्णद से भी लग्न की भाँति भाव-फल का चिन्तन किया जाए। विशेषतः वर्णद से सातवें भाव से कलत्र की आयु का विचार करना विहित है। अर्थात् वर्णद को एक वैकल्पिक “लग्न-बिन्दु” मानकर सप्तम-आधारित आयु-संकेत पढ़ा जाता है।

English rendering O learned one, the text states that results should also be considered from the Varṇada as from the lagna. Longevity of the spouse is to be assessed from the seventh house counted from the Varṇada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्णद-लग्न V (राशि 1–12) से भाव h की राशि:
R(h) = ((V − 1 + h − 1) mod 12) + 1।
कलत्र-आयु-आधार: h = 7 → R₇ = ((V + 5) mod 12) + 1।
उसी R₇ पर 5.16–5.17 जैसा त्रिकोण-पाप/दशा-पर्यन्त चिन्तन लागू (पाठ के अनुसार)।

उदाहरण (worked example) वर्णद = तुला (V = 7)।
कलत्र-भाव राशि R₇ = ((7 − 1 + 6) mod 12) + 1 = 1 → मेष।
मेष और उसके त्रिकोण (मेष, सिंह, धनु) पर पाप-योग/दृष्टि होने पर शास्त्र उसी को कलत्र-आयु-संकेत का आधार कहता है। (V का निर्धारण लग्न+होरा-वर्णद-नियम पर; यहाँ केवल भाव-स्थान।)

5.19
एकादशादग्रजस्य तृतीयात्तु यवीयसः।
सुतस्य पंचमे विद्यान्मातुश्चतुर्थभावत्‌
ekādaśādagrajasya tṛtīyāttu yavīyasaḥ|
sutasya paṃcame vidyānmātuścaturthabhāvat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादशात् = ग्यारहवें से; अग्रजस्य = ज्येष्ठ भ्राता/अग्रज का; तृतीयात् तु = तीसरे से; यवीयसः = कनिष्ठ/छोटे का; सुतस्य = पुत्र/सन्तान का; पञ्चमे = पाँचवें में; विद्यात् = जाने; मातुः = माता का; चतुर्थ-भावात् = चौथे भाव से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (वर्णद से) ग्यारहवें भाव से अग्रज की आयु, तीसरे से यवीयस् की, पाँचवें से सुत की, और चौथे भाव से माता की आयु का ज्ञान करना चाहिए। ये सब वर्णद को केन्द्र मानकर लग्न-सदृश भाव-गिनती हैं।

English rendering The text states that longevity of the elder sibling is considered from the eleventh from the Varṇada, of the younger from the third, of the child from the fifth, and of the mother from the fourth house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्णद V से सम्बन्ध-आयु-आधार राशि:
• अग्रज: R₁₁ = ((V − 1 + 10) mod 12) + 1
• यवीयस्: R₃ = ((V − 1 + 2) mod 12) + 1
• सुत: R₅ = ((V − 1 + 4) mod 12) + 1
• मातृ: R₄ = ((V − 1 + 3) mod 12) + 1
प्रत्येक पर त्रिकोण-पाप/वर्णद-दशा-पर्यन्त नियम (5.16–17) का अनुप्रयोग पाठ-सम्मत विस्तार है।

उदाहरण (worked example) वर्णद = कर्क (V = 4)।
अग्रज R₁₁ = ((4−1+10) mod 12)+1 = 2 → वृषभ।
यवीयस् R₃ = ((4−1+2) mod 12)+1 = 6 → कन्या।
सुत R₅ = ((4−1+4) mod 12)+1 = 8 → वृश्चिक।
मातृ R₄ = ((4−1+3) mod 12)+1 = 7 → तुला।

5.20
पितुश्च नवमाद्‌ भावादयुरेवं विचिन्तयेत्‌।
शूलराशिदशायां वै प्रवलायामरिष्टकम्‌
pituśca navamād‌ bhāvādayurevaṃ vicintayet‌|
śūlarāśidaśāyāṃ vai pravalāyāmariṣṭakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितुः च = और पिता की; नवमात् भावात् = नवम भाव से; आयुः एवम् = आयु इस प्रकार; विचिन्तयेत् = विचारे; शूल-राशि-दशायाम् = शूल-राशि की दशा में; वै = ही; प्रवलायाम् = प्रबल होने पर; अरिष्टकम् = अरिष्ट (आयु-बाधा का शास्त्रीय संकेत)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पिता की आयु नवम भाव से इसी रीति से चिन्तित की जाए। शूल-राशि की दशा जब प्रबल हो, तब अरिष्ट का विचार विशेष रूप से कहा गया है। अरिष्ट यहाँ शास्त्रीय संकट-संकेत है; भय या निश्चित विपत्ति का दावा नहीं।

English rendering The text states that the father’s longevity is likewise assessed from the ninth house. In the daśā of the śūla-rāśi when it is strong, ariṣṭa is to be considered as pronounced.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पितृ-आयु-आधार: R₉ = ((V − 1 + 8) mod 12) + 1।
शूल-राशि: आयु-प्रसंग में वह राशि जो शूल/रुद्र-शूल या वर्णद-त्रिकोण-पाप से चिह्नित हो (5.16–17 से जुड़ी)।
अरिष्ट-संकेत-काल ⊂ { दशा-अवधि(शूल-राशि) } जब वह दशा “प्रवला” (प्रबल — योग/दृष्टि/स्थान से) मानी जाए।
वर्ष-संख्या = दशा-क्रम में उस राशि का स्थान × (यदि अवधि 1 राशि = 1 इकाई ली जाए; इकाई का स्थिर वर्ष-मान इस पद में अस्पष्ट — पाठ-भेद/टीका-निर्भर)।

उदाहरण (worked example) वर्णद = धनु (V = 9)।
पितृ-भाव R₉ = ((9−1+8) mod 12)+1 = 5 → सिंह।
यदि सिंह ही शूल/पाप-त्रिकोण-राशि हो और वर्णद-दशा क्रम से सिंह पर आए, तो शास्त्र उसी दशा-खण्ड में अरिष्ट-चिन्तन कहता है।
(V = 9 से R₉ = 5 की गणना शुद्ध मॉड्यूलर; “प्रबल” का बलांक षड्बल-अध्याय से अलग मापदण्ड पर।)

5.21
एवं तन्वादिभावानां कर्तव्या वर्णा दशा।
पूर्ववच्च फलं ज्ञेयं देहिनां च शुभाशुभम्‌
evaṃ tanvādibhāvānāṃ kartavyā varṇā daśā|
pūrvavacca phalaṃ jñeyaṃ dehināṃ ca śubhāśubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; तनु-आदि-भावानाम् = तनु (प्रथम) आदि भावों की; कर्तव्या = करनी चाहिए; वर्ण-दशा = वर्णद-दशा; पूर्ववत् च = और पूर्ववत्; फलम् ज्ञेयम् = फल जानना चाहिए; देहिनाम् = देहधारियों का; शुभ-अशुभम् = शुभ और अशुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का उपसंहार है: तनु से आरम्भ कर सब भावों के लिए वर्णद-दशा इसी विधि से करनी चाहिए। फल पूर्वोक्त रीति से ही देहधारी के शुभ-अशुभ का ज्ञान कहा गया है। वर्णद लग्न-सदृश केन्द्र बनकर सम्पूर्ण भाव-चक्र पर लागू होता है।

English rendering Thus the Varṇada-daśā is to be applied for the houses beginning with the body (first house) and the rest. Results — auspicious and inauspicious for embodied beings — are to be known as stated earlier.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्ण भाव-मानचित्र वर्णद V से:
h ∈ {1, 2, …, 12}, R(h) = ((V − 1 + h − 1) mod 12) + 1।
प्रत्येक R(h) पर: (i) वर्णद-दशा-क्रम (5.15), (ii) त्रिकोण-पाप → पर्यन्त-आयु-संकेत (5.16–17), (iii) सम्बन्ध-विशेष भाव (7, 11, 3, 5, 4, 9 — 5.18–20)।
शुभाशुभ = शास्त्रीय फल-वर्ग; कोई स्वतःसिद्ध संख्या-फल इस पद में नहीं — केवल विधि का व्याप्ति-सूत्र।

5.22
ग्रहनां वर्णदा नैव राशीनां वर्ण्दा दशा।
कृत्वार्कधा राशिदशां क्रमादन्तर्दशां वदेत्‌
grahanāṃ varṇadā naiva rāśīnāṃ varṇdā daśā|
kṛtvārkadhā rāśidaśāṃ kramādantardaśāṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहानाम् (ग्रहनां) = ग्रहों का (पाठ: ग्रहनां → ग्रहानाम्); वर्णदा = वर्ण/स्वरूप-फलदात्री (यहाँ दशा-भेद का संकेत); नैव = नहीं ही; राशीनाम् = राशियों की; दशा = दशा-प्रणाली; कृत्वा = करके; अर्कधा = अर्क (= १२, द्वादशादित्य-भूतसङ्ख्या) के अनुसार / द्वादश-विध; राशिदशाम् = राशि-दशा; क्रमात् = क्रम से; अन्तर्दशाम् = अन्तर्दशा; वदेत् = कहे / बताए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ स्पष्ट करता है कि जिस दशा की चर्चा है, वह ग्रहों की वर्णदा-प्रकार की नहीं, अपितु राशियों पर आश्रित दशा है। राशि-दशा को अर्कधा—अर्थात् द्वादश-सम्बद्ध विधि से—रचकर, उसके पश्चात् क्रम से अन्तर्दशा का कथन करना चाहिए। ग्रह-दशा और राशि-दशा का भेद यहाँ आधार-रूप में रखा गया है।

English rendering The text states that this daśā is not the graha-based varṇadā type, but the daśā of the rāśis. One should construct the rāśi-daśā by the arkadhā method (arkā = 12 in bhūtasaṃkhyā), and then declare the antardaśās in sequential order (krama).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-दशा का ढाँचा (श्लोक का निर्देश): (१) दशा का आधार = राशि, न कि ग्रह; (२) निर्माण-विधि = अर्कधा, जहाँ अर्क = १२ (भूतसङ्ख्या) → द्वादश-राशियों के क्रम/विभाजन से दशा-रचना; (३) उसके बाद अन्तर्दशा = मुख्य राशि-दशा के भीतर क्रमात् (क्रमिक राशियों में) उप-अवधि का कथन। इस श्लोक में प्रत्येक राशि के वर्ष-मान का पूर्ण सारणी-सूत्र नहीं दिया गया—केवल आधार (राशि), विधि-संकेत (अर्कधा = १२-सम्बद्ध), और अन्तर्दशा-क्रम का नियम।

उदाहरण (worked example) मान लें राशि-दशा में मेघ की महादशा सक्रिय है (क्रम: मेष → … → मीन, द्वादश-राशि-चक्र)। अन्तर्दशा-कथन क्रमात्: मेष-अन्तर्, वृष-अन्तर्, मिथुन-अन्तर्, … उसी महादशा के भीतर। (वर्ष-मान इस श्लोक में नहीं दिए; वे आगे/अन्य स्थान की तालिका पर निर्भर—यहाँ केवल क्रम-नियम प्रदर्शित।)

5.23
एवमन्तर्दशादिं च कृत्वा तेन फलं वदेत्‌।
क्रमव्युत्क्रमभेदेन लिखेदन्तर्दशामपि
evamantardaśādiṃ ca kṛtvā tena phalaṃ vadet‌|
kramavyutkramabhedena likhedantardaśāmapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; अन्तर्दशादिम् = अन्तर्दशा आदि (उप-अवधियाँ); च = और; कृत्वा = करके; तेन = उससे / उसके द्वारा; फलम् = फल (शास्त्रोक्त परिणाम-कथन); वदेत् = कहे; क्रम = आगे की ओर क्रम; व्युत्क्रम = उलटा क्रम; भेदेन = भेद से; लिखेत् = लिखे / अंकित करे; अन्तर्दशाम् अपि = अन्तर्दशा को भी।

हिन्दी भावार्थ अन्तर्दशा आदि की रचना पूर्ण कर, उसी आधार पर फल का कथन करना चाहिए—शास्त्र फल को दशा-रचना से जोड़कर कहने का निर्देश देता है। अन्तर्दशा लिखते समय क्रम और व्युत्क्रम—दोनों भेदों का ध्यान रखना है: एक दिशा में आगे बढ़ना, दूसरी में उलटा जाना। लेखन-विधि में यह द्वैत स्पष्ट रहे।

English rendering Having thus formed the antardaśā and related subdivisions, one should state the result (phala) by that means. The antardaśā too is to be written distinguishing forward order (krama) from reverse order (vyutkrama).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रक्रिया-नियम (कोई वर्ष-सङ्ख्या नहीं): (१) अन्तर्दशा-आदि रचना → (२) तेन फलं वदेत् = फल-कथन दशा-अवधि से बद्ध; (३) अन्तर्दशा-लेखन में दो दिशाएँ—क्रम = राशि-चक्र में अग्रगामी (मेष→वृष→…), व्युत्क्रम = प्रतीप (मेष→मीन→कुम्भ→…)। दिशा-भेद गणना का अभिन्न अंग है; दिशा गलत हो तो अवधि-मानचित्र ही बदल जाता है। फल यहाँ शास्त्र का कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

उदाहरण (worked example) महादशा = मेष। क्रम-अन्तर्दशा-श्रृंखला: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन। व्युत्क्रम: मेष, मीन, कुम्भ, मकर, धनु, वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष। (अवधि-वर्ष इस श्लोक में नहीं; केवल क्रम/व्युत्क्रम-भेद।)

5.24
स्वस्वदेशोद्‌भवं लग्नं जन्मलग्नमिमिहोच्यते।
भावहोरादिलग्नानां सर्वत्रैव समक्रिया
svasvadeśod‌bhavaṃ lagnaṃ janmalagnamimihocyate|
bhāvahorādilagnānāṃ sarvatraiva samakriyā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वस्वदेशोद्भवम् = अपने-अपने देश/स्थान से उत्पन्न; लग्नम् = लग्न (उदित राशि/उदयांश); जन्मलग्नम् = जन्म-लग्न; इह = यहाँ (इस शास्त्र-प्रकरण में); उच्यते = कहा जाता है; भाव = भाव-लग्न आदि; होरा = होरा-लग्न (D2/होरा-सम्बद्ध लग्न-भेद); आदि = इत्यादि; लग्नानाम् = लग्नों की; सर्वत्र एव = सब जगह ही; समक्रिया = समान क्रिया / एक-सी गणना-विधि।

हिन्दी भावार्थ जो लग्न जन्म-स्थान (स्व-स्व देश/देशांश) के अनुसार उदय से निर्धारित होता है, उसे यहाँ जन्मलग्न कहा गया है। भाव-लग्न, होरा-लग्न आदि अन्य लग्न-भेदों के लिए भी गणना की क्रिया सर्वत्र समान रखी गई है—स्थान बदलने पर सिद्धांत नहीं बदलता, केवल स्थान-काल-निर्देशांक बदलते हैं।

English rendering The lagna arising from one’s own place of birth is here called the janma-lagna. For the bhāva-lagna, horā-lagna, and the other lagna types, the procedure of computation is the same everywhere.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिभाषा तथा प्रक्रिया-समता का कथन। जन्मलग्न = जन्म-स्थान के स्थानीय sidereal/tropical convention और जन्म-क्षण के अनुसार पूर्वी क्षितिज पर उदित राशि/अंश; भाव-/होरा-आदि लग्न उसी ज्योतिष-गणितीय ढाँचे में, समक्रिया = एक-सी विधि। संख्या स्थान-काल-अयनांश पर निर्भर; यह श्लोक केवल नामकरण और एकरूपता का नियम देता है।

अध्यायः 6

षोडशवर्गाध्यायः

53 श्लोक
6.1
श्रुता ग्रहगुणास्त्वत्तस्तथा राशिगुण मुने।
श्रोतमिच्छामि भावानां भेदांस्तान्‌ कृपया वद
śrutā grahaguṇāstvattastathā rāśiguṇa mune|
śrotamicchāmi bhāvānāṃ bhedāṃstān‌ kṛpayā vada

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रुता = सुने गए; ग्रह-गुणाः = ग्रहों के गुण/स्वभाव; त्वत्तः = आपसे; तथा = तथा; राशि-गुण = राशियों के गुण; मुने = हे मुने; श्रोतुम्-इच्छामि = सुनना चाहता हूँ; भावानां भेदान् = भावों/अवस्थाओं के भेद; तान् = उन्हें; कृपया वद = कृपा कर कहिए।

हिन्दी भावार्थ मैत्रेय ऋषि पाराशर से कहते हैं — हे मुने, आपके मुख से मैंने ग्रहों के गुण और राशियों के गुण पहले सुन लिए हैं। अब मैं भावों के भेद सुनना चाहता हूँ; कृपा करके वे भेद मुझे बताइए। यह श्लोक अगले अध्याय-विषय (वर्ग-भेद) की जिज्ञासा का द्वार खोलता है।

English rendering Maitreya addresses the sage: “From you I have already heard the qualities of the planets and likewise those of the signs. I now wish to hear the distinctions of the bhāvas; kindly declare those.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / शिष्य-प्रश्न। यह श्लोक गणना नहीं देता; यह अध्याय की जिज्ञासा-रेखा खींचता है, जिसके उत्तर में षोडश-वर्गों का क्रम आता है।

6.2
वर्गान्‌ षोडश यानाह ब्रह्मा लोकपितामहः।
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि मैत्रेय स्रूयतामिति
vargān‌ ṣoḍaśa yānāha brahmā lokapitāmahaḥ|
tānahaṃ sampravakṣyāmi maitreya srūyatāmiti

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्गान् = वर्गों को; षोडश = सोलह; यान् = जिनको; आह = कहा; ब्रह्मा = ब्रह्मा; लोक-पितामहः = लोकों के पितामह; तान् = उनको; अहम् = मैं; सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; मैत्रेय = हे मैत्रेय; श्रूयताम् = सुना जाए; इति = इस प्रकार।

हिन्दी भावार्थ पाराशर उत्तर देते हैं — ब्रह्मा, जो लोकपितामह हैं, ने जिन सोलह वर्गों का उपदेश किया है, उन्हीं को मैं अब विधिपूर्वक कहूँगा। हे मैत्रेय, ध्यान से सुनो। यहाँ शास्त्र स्वयं वर्ग-ज्ञान को ब्रह्म-परम्परा से जोड़ता है।

English rendering Parāśara replies: “The sixteen vargas that Brahmā, grandfather of the worlds, has declared — those I shall now expound in full. Listen, O Maitreya.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना / परम्परा-कथन। गणना आगे के श्लोकों में आएगी; यहाँ केवल यह घोषणा है कि विषय षोडश वर्ग है (D1…D60 की सूची)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक उसी षोडश-वर्ग-अध्याय का द्वार है जिसे हमने varga engine में D1(rāśi) से D60(ṣaṣṭyaṃśa) तक निश्चित विभाजन-नियमों के रूप में बाँधा है। प्रत्येक वर्ग ३०° राशि का समान-चाप विभाजन है — शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित, न कि अस्पष्ट “भावना”।

6.3
क्षेत्रं होरा च द्रेष्काणस्तुर्यांशः सप्तमांशकः।
नवांशो दशमांशश्च सूर्याम्शः षोडशांशकः
kṣetraṃ horā ca dreṣkāṇasturyāṃśaḥ saptamāṃśakaḥ|
navāṃśo daśamāṃśaśca sūryāmśaḥ ṣoḍaśāṃśakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षेत्रम् = राशि/D1; होरा = D2 (आधा-राशि); द्रेष्काणः = D3; तुर्यांशः = D4 (चतुर्थांश); सप्तमांशकः = D7; नवांशः = D9; दशमांशः = D10; सूर्याम्शः = D12 (द्वादशांश; द्वादश आदित्य-संकेत); षोडशांशकः = D16।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ षोडश वर्गों की प्रथम नौ संज्ञाएँ गिनाता है — क्षेत्र (मूल राशि), होरा, द्रेष्काण, तुर्यांश, सप्तमांश, नवांश, दशमांश, सूर्यांश और षोडशांश। प्रत्येक नाम एक निश्चित भाग-संख्या का संकेत है; यह सूची गणना का कंकाल है।

English rendering The text names the first nine of the sixteen divisions: kṣetra (the rāśi itself), horā, dreṣkāṇa, turyāṃśa, saptamāṃśa, navāṃśa, daśamāṃśa, sūryāṃśa, and ṣoḍaśāṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक वर्ग = ३०° राशि का n समान भागों में विभाजन, जहाँ n = वर्ग-संख्या:

| नाम | n | चाप प्रति भाग |
|---|---|---|
| क्षेत्र (D1) | 1 | 30° |
| होरा (D2) | 2 | 15° |
| द्रेष्काण (D3) | 3 | 10° |
| तुर्यांश (D4) | 4 | 7°30′ |
| सप्तमांश (D7) | 7 | 30°/7 |
| नवांश (D9) | 9 | 3°20′ |
| दशमांश (D10) | 10 | 3° |
| सूर्यांश (D12) | 12 | 2°30′ |
| षोडशांश (D16) | 16 | 1°52′30″ |

सामान्य सूचकांक (राशि-केन्द्र देशान्तर λ_sign ∈ [0°, 30°)):

भाग-सूचकांक = ⌊ λ_sign × n / 30° ⌋ (0 … n−1), फिर शास्त्रोक्त मानचित्र-नियम से राशि/स्वामी निर्धारित।

उदाहरण (worked example) मान लें ग्रह की राशि-देशान्तर λ_sign = 12°40′ (राशि के भीतर)।
नवांश (n = 9): भाग-चाप = 3°20′। सूचकांक = ⌊12°40′ / 3°20′⌋ = ⌊3.833…⌋ = 3 → चौथा नवांश (0-आधारित सूचकांक 3)।
होरा (n = 2): ⌊12°40′ / 15°⌋ = 0 → प्रथम होरा (0°–15°)।
(अयनॉश/गृह-प्रणाली यहाँ भाग-सूचकांक नहीं बदलती; वे केवल λ के स्रोत पर लागू होती हैं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) BPHS Ch.6 की यही षोडश-सूची हमारे varga engine (kaal_ekavimshati_varga.py) की रीढ़ है — D1, D2, D3, D4, D7, D9, D10, D12, D16… प्रत्येक समान-चाप विभाजन और घोषित मानचित्र-नियम से; “लगभग” नहीं, निश्चित मॉड्यूलर नियम।

6.4
विंशांशो वेदवाह्वंशो भांशस्त्रिंशांशकस्ततः।
खवेदांशोऽक्षवेदांशः षष्ठ्यंशश्च ततः परम्‌
viṃśāṃśo vedavāhvaṃśo bhāṃśastriṃśāṃśakastataḥ|
khavedāṃśo'kṣavedāṃśaḥ ṣaṣṭhyaṃśaśca tataḥ param‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विंशांशः = D20 (विंश = २०); वेदवाह्वंशः = D24 (सिद्धांश/चतुर्विंशांश; नाम-परम्परा); भांशः = D27 (भ = नक्षत्र = २७); त्रिंशांशकः = D30; खवेदांशः = D40 (ख = ०, वेद = ४ → अंकानां वामतो गतिः = ४०); अक्षवेदांशः = D45 (अक्ष = ५, वेद = ४ → ४५); षष्ठ्यंशः = D60; ततः परम् = तदनन्तर/तत्पश्चात्।

हिन्दी भावार्थ श्लोक शेष सात वर्ग गिनाता है — विंशांश, वेदवाह्वंश, भांश, त्रिंशांश, खवेदांश, अक्षवेदांश और षष्ठ्यंश। इससे ६.३ की नौ संज्ञाओं के साथ कुल सोलह वर्ग पूरे होते हैं। खवेद और अक्षवेद में भूतसंख्या स्पष्ट है; वेदवाह्वंश को परम्परा D24 (सिद्धांश) मानती है।

English rendering Then come the remaining seven: viṃśāṃśa, vedavāhvāṃśa, bhāṃśa, triṃśāṃśa, khavedāṃśa, akṣavedāṃśa, and ṣaṣṭyaṃśa — completing the set of sixteen.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या / शब्द-अंक (अंकानां वामतो गतिः जहाँ लागू):

| नाम | n | अंक-डिकोड |
|---|---|---|
| विंशांश | 20 | विंश = २० |
| वेदवाह्वंश | 24 | सिद्धांश; नाम-परम्परा से D24 (खवेद/अक्षवेद जितना पारदर्शी अंक-क्रम नहीं) |
| भांश | 27 | भ = २७ नक्षत्र |
| त्रिंशांशक | 30 | त्रिंश = ३० |
| खवेदांश | 40 | ख(०)+वेद(४) → ४० |
| अक्षवेदांश | 45 | अक्ष(५)+वेद(४) → ४५ |
| षष्ठ्यंश | 60 | षष्टि = ६० |

समान सूत्र: भाग-सूचकांक = ⌊ λ_sign × n / 30° ⌋, n = ऊपर की तालिका। ६.३ + ६.४ = ९ + ७ = १६ वर्ग।

उदाहरण (worked example) λ_sign = 18°00′।
विंशांश (n = 20): भाग-चाप = 30°/20 = 1°30′; सूचकांक = ⌊18/1.5⌋ = ⌊12⌋ = 12 → १३वाँ विंशांश (0-आधारित 12)।
षष्ठ्यंश (n = 60): भाग-चाप = 0°30′; सूचकांक = ⌊18° / 0°30′⌋ = 36 → ३७वाँ षष्ठ्यंश।
खवेदांश (n = 40): भाग-चाप = 0°45′; सूचकांक = ⌊18 / 0.75⌋ = 24 → २५वाँ खवेदांश।

हमारा डिकोड (Our Decode) डोसियर की पूरी D-शृंखला — D20, D24, D27, D30, D40, D45, D60 — इसी श्लोक-युग्म (६.३–६.४) से जुड़ी है। इंजन प्रत्येक को ३०° के n समान चापों में बाँटता है; भूतसंख्या (खवेद ४०, अक्षवेद ४५) अंक-विश्वास से पढ़ी गई है, अनुमान से नहीं।

6.5
तत्क्षेत्रं तस्य खेटस्य राशेर्यो यस्य नायकः।
सूर्येन्द्वोर्विषमे राशौ समे तद्विपरीतकम्‌
tatkṣetraṃ tasya kheṭasya rāśeryo yasya nāyakaḥ|
sūryendvorviṣame rāśau same tadviparītakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-क्षेत्रम् = वह क्षेत्र (राशि-वर्ग); तस्य खेटस्य = उस ग्रह का; राशेः यः यस्य नायकः = जिस राशि का जो स्वामी; सूर्य-इन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र का; विषमे राशौ = विषम (ओज) राशि में; समे = सम राशि में; तत्-विपरीतकम् = उसका उलटा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो बातें जोड़ता है। प्रथम — क्षेत्र (मूल राशि-स्थान) उस ग्रह का माना जाता है जिस राशि में वह स्थित है, और उस राशि का नायक (स्वामी) ही क्षेत्र-स्वामी है। द्वितीय — सूर्य-चन्द्र की होरा-व्यवस्था: विषम राशि में एक क्रम, सम राशि में ठीक उलटा क्रम। (होरा का पूरा मानचित्र आगे के श्लोकों/परम्परा-नियम से जुड़ता है।)

English rendering The kṣetra of a planet is the rāśi it occupies, whose lord is that rāśi’s nāyaka. For the Sun and the Moon, the (horā) order in odd signs is reversed in even signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

1. क्षेत्र (D1): ग्रह λ जिस राशि R में हो, क्षेत्र-स्वामी = स्वामी(R) (मेष→मङ्गल, … चक्र के अनुसार)।

2. होरा (D2) — सूर्य/चन्द्र नियम (शास्त्रोक्त):
राशि को दो भागों में बाँटें:
- भाग 0: λ_sign ∈ [0°, 15°)
- भाग 1: λ_sign ∈ [15°, 30°)

विषम राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ — राशि-क्रमांक 1,3,5,7,9,11):
- भाग 0 → सूर्य-होरा
- भाग 1 → चन्द्र-होरा

सम राशि (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन):
- तद्विपरीत — भाग 0 → चन्द्र-होरा, भाग 1 → सूर्य-होरा।

उदाहरण (worked example)
(a) सिंह 8°20′ (विषम; λ_sign = 8°20′ < 15°) → भाग 0 → सूर्य-होरा; क्षेत्र-स्वामी = सूर्य (सिंह)।
(b) कन्या 22°10′ (सम; λ_sign = 22°10′ ≥ 15°) → भाग 1 → सूर्य-होरा (सम में उलटा); क्षेत्र-स्वामी = बुध (कन्या)।
(c) मेष 16°00′ (विषम; ≥ 15°) → भाग 1 → चन्द्र-होरा; क्षेत्र-स्वामी = मङ्गल।

हमारा डिकोड (Our Decode) होरा-नियम varga engine में D2 के रूप में यही विषम/सम-विपर्यय है — १५° चाप, सूर्य-चन्द्र स्वामित्व, कोई सहिष्णुता-पट्टी नहीं। क्षेत्र = D1 राशि-स्वामी; दोनों नियम अलग परतों पर चलते हैं।

6.6
पितरश्चन्द्रहोरेशा देवाः सूर्यस्य कीर्तिताः।
राशेरर्द्धं भवेद्धोरा ताश्चतुर्विंशतिः स्मृता।
मेषादि तासां होराणां परिवृत्तिद्वयं भवेत्‌
pitaraścandrahoreśā devāḥ sūryasya kīrtitāḥ|
rāśerarddhaṃ bhaveddhorā tāścaturviṃśatiḥ smṛtā|
meṣādi tāsāṃ horāṇāṃ parivṛttidvayaṃ bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितरः = पितृगण; चन्द्रहोरेशाः = चन्द्र की होरा के अधिष्ठाता (देवता); देवाः = देवगण; सूर्यस्य (होरायाः) = सूर्य की होरा के; कीर्तिताः = कहे गए; राशेः अर्धम् = राशि का आधा भाग (15°); होरा; ताः चतुर्विंशतिः = वे चौबीस; स्मृताः = मानी गई हैं; मेषादि = मेष से; तासां होराणाम् = उन होराओं की; परिवृत्तिद्वयम् = दो आवृत्तियाँ (सूर्य-चन्द्र का चक्र दो बार)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र की होरा के अधिष्ठाता पितृगण और सूर्य की होरा के अधिष्ठाता देवगण हैं। राशि का आधा भाग एक होरा है; इस प्रकार बारह राशियों में चौबीस होराएँ होती हैं। मेष से आरम्भ करके इन होराओं में सूर्य-चन्द्र का क्रम दो पूरी आवृत्तियाँ लेता है। यह D2 (होरा) वर्ग का मूल-कथन है; सूर्य/चन्द्र किस अर्ध की है, यह 6.5 के विषम-सम नियम से तय होता है।

English rendering The text states that the deities of the Moon's horā are the pitṛs and of the Sun's horā the devas; half a sign is one horā, so there are twenty-four in all, and from Meṣa onward the horās run through two full cycles (of Sun and Moon).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) होरा-चाप = 30° ÷ 2 = 15°; कुल होराएँ = 12 × 2 = 24। राशि के भीतर देशान्तर λ हो तो होरा-क्रमांक k = ⌊λ ÷ 15°⌋ + 1 ∈ {1, 2}। स्वामी (6.5 का नियम): विषम राशि में k = 1 → सूर्य, k = 2 → चन्द्र; सम राशि में विपरीत। "परिवृत्तिद्वय" = मेष से मीन तक 24 होराओं में सूर्य/चन्द्र की जोड़ी 12-12 बार आती है।

उदाहरण (worked example) ग्रह वृषभ 12°20′ (सम राशि): k = ⌊12.33 ÷ 15⌋ + 1 = 1 → प्रथम होरा → सम राशि में चन्द्र की होरा (पितृ-अधिष्ठित)। वही ग्रह मिथुन 20° (विषम) पर होता तो k = 2 → चन्द्र-होरा। (केवल राशि-अन्तर्गत अंश पर निर्भर; अयनांश चुनाव λ को प्रभावित करता है, इसलिए घोषित रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह D2 (होरा) वही समान-चाप विभाजन है जिसे हमारे varga engine में D1…D60 की श्रृंखला में शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित के रूप में बाँधा गया है — 15° का खण्ड और विषम/सम राशि पर स्वामी का पलटना, दोनों नियम-रूप में।

6.7
राशित्रिभागाद्रेष्काणास्ते च षट्‌त्रिंशदीरिताः।
परिवृत्तित्रयं तेषां मेषादेः क्रमशो भवेत्‌
rāśitribhāgādreṣkāṇāste ca ṣaṭ‌triṃśadīritāḥ|
parivṛttitrayaṃ teṣāṃ meṣādeḥ kramaśo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशि-त्रिभागात् = राशि के तीन भागों से; द्रेष्काणाः = द्रेष्काण; ते = वे; च = और; षट्-त्रिंशत् = छत्तीस; ईरिताः = कहे गए; परिवृत्ति-त्रयम् = तीन परिभ्रमण/चक्र; तेषाम् = उनका; मेषादेः = मेष से आरम्भ; क्रमशः = क्रम से; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राशि को तीन भागों में बाँटने से द्रेष्काण बनते हैं, और कुल द्रेष्काण छत्तीस कहे गए हैं (१२ राशि × ३)। उनका तीन परिवृत्ति-क्रम मेष से शुरू होकर क्रमशः चलता है। यह D3 का मूल ढाँचा है: समान १०° चाप, और राशि-चक्र पर तीन पूर्ण आवर्तन।

English rendering The dreṣkāṇas arise from the threefold division of each rāśi; they are declared to be thirty-six. Their three cycles proceed in order beginning from Meṣa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

- प्रति राशि ३ द्रेष्काण: चाप = ३०°/३ = १०° प्रत्येक।
- कुल: १२ × ३ = ३६ = षट्त्रिंशत्।
- सूचकांक: d = ⌊ λ_sign / 10° ⌋ ∈ {0, 1, 2}
(0°–10°, 10°–20°, 20°–30°)।

परिवृत्तित्रय / मानचित्र (परम्परागत पाराशर-क्रम, मेषादि):
द्रेष्काण-राशि = उसी तत्व-त्रिकोण में क्रम — व्यवहार में व्यापक नियम:

  • १म द्रेष्काण (d = 0): उसी राशि R
  • २य द्रेष्काण (d = 1): R से पञ्चम (R + 4)
  • ३य द्रेष्काण (d = 2): R से नवम (R + 8)

यह “मेष से तीन चक्र” के समतुल्य है: ३६ द्रेष्काण राशि-चक्र को तीन बार घुमाते हैं; अग्नि/पृथ्वी/वायु/जल राशियों के द्रेष्काण अपने त्रिकोण में ही रहते हैं।

उदाहरण (worked example)
(a) मेष 5° → d = 0 → द्रेष्काण-राशि = मेष (स्वामी मङ्गल)।
(b) मेष 15° → d = 1 → मेष + 4 = सिंह (स्वामी सूर्य)।
(c) मेष 25° → d = 2 → मेष + 8 = धनु (स्वामी गुरु)।
(d) कन्या 12° → d = 1 → कन्या + 4 = मकर।
(कुल जाँच: १२ × ३ = ३६ — श्लोकोक्त षट्त्रिंशत्।)

हमारा डिकोड (Our Decode) D3/dreṣkāṇa varga engine में यही है — १०° समान भाग, ३६ कुल खण्ड, और R / R+4 / R+8 मानचित्र। श्लोक का “षट्त्रिंशत्” और “परिवृत्तित्रयं मेषादेः” इंजन के गणना-नियत बिंदु हैं, व्याख्या के नहीं।

6.8
स्वपंचनवमानां च राशीनां क्रमशश्च ते।
नारदाऽगस्तिदुर्वासा द्रेष्काणेशाश्चरादिषु
svapaṃcanavamānāṃ ca rāśīnāṃ kramaśaśca te|
nāradā'gastidurvāsā dreṣkāṇeśāścarādiṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-पंच-नवमानां = 1-5-9वें राशियों के; राशीनां क्रमशः = क्रम से (तीन द्रेष्काण); ते = वे (स्वामी); नारद-अगस्ति-दुर्वासा = तीन द्रेष्काण-देवता; द्रेष्काणेशाः = द्रेष्काणों के अधिपति/देव; चरादिषु = चर (मेष आदि) राशियों में।

हिन्दी भावार्थ प्रत्येक राशि के तीन द्रेष्काणों के स्वामी क्रमशः उसी राशि से प्रथम, पंचम और नवम राशियों के अधिपति माने जाते हैं। चर राशियों में इन तीन द्रेष्काणों के देवता क्रम से नारद, अगस्ति और दुर्वासा हैं। यह श्लोक द्रेष्काण (D3) की अधिपति-व्यवस्था और चर-राशि-देवताओं का मूल सूत्र देता है।

English rendering The three drekkāṇa lords of a sign are, in order, the lords of the 1st, 5th, and 9th signs counted from that rāśi. In movable signs the three drekkāṇa deities are Nārada, Agastya, and Durvāsas respectively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D3 (dreṣkāṇa) partitions each 30° rāśi into three equal arcs of 10°:
- arc 1: 0°–10° → lord = lord of rāśi + 0 (same sign)
- arc 2: 10°–20° → lord = lord of rāśi + 4 (5th from it)
- arc 3: 20°–30° → lord = lord of rāśi + 8 (9th from it)
Deity sequence for cara (movable: Meṣa, Karka, Tulā, Makara): (1) Nārada, (2) Agastya, (3) Durvāsas. (Fixed/dual deity order is stated elsewhere in the recension — पाठ-भेद / continuation possible.)

उदाहरण (worked example) Longitude in Meṣa (Aries, movable) at 14°20′. D3-arc = floor(14°20′ ÷ 10°) + 1 = 2nd drekkāṇa. Lord = lord of 5th from Meṣa = Siṃha → Sūrya. Deity (cara) = Agastya. Convention: tropical or sidereal longitude both yield the same intra-sign 10° arcs once the rāśi is fixed; ayanāṃśa only sets which rāśi the longitude falls in.

हमारा डिकोड (Our Decode) This is the D3 leg of the ṣoḍaśa-varga scheme (BPHS Ch.6): pure modular partition of 30° into equal arcs with a stated lord-mapping. The varga engine implements D1…D60 as deterministic longitude arithmetic; D3 is the 10° × 3 case with 1-5-9 lord rule as above.

---

6.9
स्वर्क्षादिकेन्द्रपतयस्तुर्यांशेशाः क्रियादिषु।
सनकश्च सनन्दश्च कुमारश्च सनातनः
svarkṣādikendrapatayasturyāṃśeśāḥ kriyādiṣu|
sanakaśca sanandaśca kumāraśca sanātanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्क्ष-आदि-केन्द्र-पतयः = स्व-राशि से केन्द्र (1-4-7-10) के अधिपति; तुर्यांशेशाः = तुर्यांश / चतुर्थांश (D4) के स्वामी; क्रियादिषु = मेष (क्रिया) आदि से; सनकः सनन्दः कुमारः सनातनः = चार तुर्यांश-देवता।

हिन्दी भावार्थ चतुर्थांश (तुर्यांश) के स्वामी स्व-राशि से केन्द्र-स्थानों — प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम — के अधिपति हैं, मेष आदि राशियों में क्रम से। उनके देवता क्रमशः सनक, सनन्द, कुमार और सनातन कहे गए हैं। इस प्रकार D4 चार भागों की अधिपति- और देव-व्यवस्था यहाँ स्थिर होती है।

English rendering The four caturthāṃśa (turyāṃśa) lords are the lords of the kendras from the sign itself — 1st, 4th, 7th, and 10th — applied in order through the signs from Aries. Their deities are Sanaka, Sananda, Kumāra, and Sanātana.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D4 partitions 30° into four equal arcs of 7°30′ (30°/4):
- arc k (k = 0…3): longitude offset in [k×7°30′, (k+1)×7°30′)
- lord-sign = rāśi + 3k (mod 12) — i.e. same, +3 (4th), +6 (7th), +9 (10th)
Deities in order: Sanaka, Sananda, Kumāra, Sanātana (one per arc).

उदाहरण (worked example) Longitude in Vṛṣabha at 22°00′. Offset in sign = 22°. Arc index = floor(22 ÷ 7.5) = floor(2.933…) = 2 → 3rd caturthāṃśa (0-based k=2). Lord-sign = Vṛṣabha + 6 = Vṛścika → Maṅgala. Deity = Kumāra. Convention: equal 7°30′ arcs; no house-system needed (varga is pure rāśi-longitude modular arithmetic).

हमारा डिकोड (Our Decode) D4 is the next fixed member of the ṣoḍaśa-varga list (D1, D2, D3, D4, …). The engine maps longitude → arc index → kendra-offset lord exactly as this śloka states; no interpretive layer enters the division.

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6.10
सप्तांशपास्त्वोजगृहे गणनीया निजेशतः।
युग्मराशौ तु विज्ञेयाः सप्तमर्क्षादिनायकात्‌
saptāṃśapāstvojagṛhe gaṇanīyā nijeśataḥ|
yugmarāśau tu vijñeyāḥ saptamarkṣādināyakāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तांशपाः = सप्तांश (D7) के स्वामी; ओज-गृहे = विषम / ओज राशि में; गणनीयाः निज-ईशतः = स्व-राशि के अधिपति से गिने जाएँ; युग्म-राशौ = सम राशि में; सप्तम-ऋक्ष-आदि-नायकात् = सप्तम राशि के स्वामी से।

हिन्दी भावार्थ सप्तांशों के अधिपति विषम राशि में उसी राशि से आरम्भ कर क्रमशः सात राशियों के स्वामी माने जाते हैं। सम राशि में गणना सप्तम राशि के स्वामी से आरम्भ होती है। यह D7 की ओज/युग्म द्वैध-नियम का मूल कथन है।

English rendering In an odd sign the seven saptāṃśa lords are counted from the lord of the sign itself. In an even sign they are counted from the lord of the seventh sign from it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D7 partitions 30° into seven equal arcs of 30°/7 = 4°17′8.571…″ (exactly 30/7 degrees each):
- arc index i = floor( (λ mod 30°) ÷ (30/7) ), i ∈ {0,…,6}
- If rāśi is odd (Meṣa=1, Mithuna=3, …): start_sign = rāśi; lord-sign = rāśi + i (mod 12)
- If rāśi is even (Vṛṣabha=2, …): start_sign = rāśi + 6 (7th); lord-sign = (rāśi + 6) + i (mod 12)
Planetary lord = ruler of that mapped sign (standard rāśi-adhipati).

उदाहरण (worked example) (A) Meṣa (odd) at 12°00′. Arc width = 30/7 ≈ 4.2857°. i = floor(12 / (30/7)) = floor(2.8) = 2. Lord-sign = Meṣa + 2 = Mithuna → Budha. (B) Vṛṣabha (even) at 12°00′. Same i = 2. Lord-sign = (Vṛṣabha + 6) + 2 = Vṛścika + 2 = Makara → Śani. Convention: odd/even by natural rāśi order (Meṣa=1 … Mīna=12); equal 30°/7 arcs.

हमारा डिकोड (Our Decode) Saptāṃśa is a core ṣoḍaśa-varga (D7). The engine applies the odd-from-self / even-from-7th start rule as pure modular arithmetic on longitude — the same deterministic partition discipline used for the full D1…D60 set.

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6.11
क्षारक्षीरौ च दध्याज्यौ तथेक्षुरससम्भवः।
मध्यशुद्धजलावोजे समे शुद्धजलादिकाः
kṣārakṣīrau ca dadhyājyau tathekṣurasasambhavaḥ|
madhyaśuddhajalāvoje same śuddhajalādikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षार = क्षार-जल; क्षीर = दूध; दधि = दही; आज्य = घृत; इक्षुरस-सम्भवः = इक्षुरस; मद्य (पाठ: मध्य — पाठ-भेद संभव) = मदिरा; शुद्ध-जल = शुद्ध जल — सात सप्तांश-रस/तत्त्व; ओजे = विषम राशि में (क्षार से क्रम); समे = सम राशि में शुद्धजलादि (व्युत्क्रम)।

हिन्दी भावार्थ सात सप्तांशों के आन्तरिक तत्त्व (रस) क्रम से क्षार, क्षीर, दधि, आज्य, इक्षुरस, मद्य और शुद्ध जल हैं। विषम राशि में यही क्रम क्षार से आरम्भ होता है; सम राशि में शुद्ध जल से आरम्भ कर व्युत्क्रम अपनाया जाता है। शास्त्र यहाँ D7 के प्रत्येक भाग को एक रस-संज्ञा से बाँधता है — फल-व्याख्या का आधार, न कि स्वतंत्र गणना।

English rendering The seven saptāṃśa essences are salt-water, milk, curd, ghee, sugarcane juice, wine, and pure water. In odd signs they run in that order from salt-water; in even signs they begin from pure water and reverse. (Reading मध्य/मद्य: पाठ-भेद संभव; standard list takes मद्य.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) No new division formula — labels the seven D7 arcs of 6.10. Ordered list R = (क्षार, क्षीर, दधि, आज्य, इक्षुरस, मद्य, शुद्धजल). For arc index i ∈ {0…6}:
- odd rāśi: essence = R[i]
- even rāśi: essence = R[6 − i]
Arc geometry remains 30°/7 as in 6.10.

उदाहरण (worked example) Meṣa 12° → i = 2 (as in 6.10) → odd → R[2] = दधि. Vṛṣabha 12° → i = 2 → even → R[6−2] = R[4] = इक्षुरस. Same arc index, opposite essence by parity.

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6.12
नवांशेशाश्चरे तस्मात्स्थिरे तन्नवमादितः।
उभये तत्पंचमादेरिति चिन्त्यं विचक्षणौः।
देवा नृराक्षसाश्चैव चरादिषु गृहेषु च
navāṃśeśāścare tasmātsthire tannavamāditaḥ|
ubhaye tatpaṃcamāderiti cintyaṃ vicakṣaṇauḥ|
devā nṛrākṣasāścaiva carādiṣu gṛheṣu ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवांशेशाः = नवांश (D9) के स्वामी; चरे तस्मात् = चर राशि में उसी से; स्थिरे तत्-नवमात् = स्थिर में उसी के नवम से; उभये तत्-पंचमात् = द्विस्वभाव में पंचम से; देवाः नृ-राक्षसाः = देव / मनुष्य / राक्षस — तीन नवांश-जाति; चरादिषु गृहेषु = चर आदि राशियों में।

हिन्दी भावार्थ नवांश-स्वामी चर राशि में उसी राशि से गिने जाते हैं, स्थिर राशि में उसके नवम से, और उभय (द्विस्वभाव) राशि में उसके पंचम से — विचक्षणों को यही चिन्तन करना चाहिए। चर आदि गृहों में नवांशों की जाति क्रम से देव, नृ (मनुष्य) और राक्षस मानी गई है। यह D9 की प्रसिद्ध चर-स्थिर-उभय नियम और त्रिविध नवांश-भाव का मूल श्लोक है।

English rendering Navāṃśa lords are counted from the sign itself in movable signs, from the ninth in fixed signs, and from the fifth in dual signs — so the wise should determine them. In the movable and following classes of houses the navāṃśas are of the natures of gods, humans, and rākṣasas respectively (cycling).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D9 partitions 30° into nine equal arcs of 3°20′ (30°/9):
- i = floor( (λ mod 30°) ÷ (10/3) ), i ∈ {0…8}
- start_sign by rāśi quality:
- cara (movable: 1,4,7,10): start = rāśi
- sthira (fixed: 2,5,8,11): start = rāśi + 8 (9th)
- ubhaya/dvisvabhāva (dual: 3,6,9,12): start = rāśi + 4 (5th)
- lord-sign = start + i (mod 12)
Navāṃśa-jāti cycle (देव, नृ, राक्षस) for cara-ādi houses: standard application is the repeating triple across the nine arcs (and sign-class alignment as the recension’s “चरादिषु” states). Exact jāti-to-arc pinning can show पाठ-भेद across editions; lord-mapping above is the computational core.

उदाहरण (worked example) (A) Meṣa (cara) 14°00′. i = floor(14 ÷ 3°20′) = floor(4.2) = 4. Lord-sign = Meṣa + 4 = Siṃha → Sūrya. (B) Vṛṣabha (sthira) 14°00′. Same i = 4. start = Vṛṣabha + 8 = Dhanu; lord-sign = Dhanu + 4 = Meṣa → Maṅgala. (C) Mithuna (ubhaya) 14°00′. start = Mithuna + 4 = Tulā; lord-sign = Tulā + 4 = Kumbha → Śani. Convention: equal 3°20′ arcs; quality by natural rāśi class.

हमारा डिकोड (Our Decode) Navāṃśa (D9) is the flagship ṣoḍaśa-varga partition: modular 30°/9 with the movable-from-self / fixed-from-9th / dual-from-5th start rule. The varga engine implements this as exact arc arithmetic — the same “mathematics separate from phala” discipline used for the full sixteen-varga set.

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6.13
दशमांशाः स्वतश्चैजे युग्म तन्नवमात्‌ स्मृताः।
दश पूर्वादिदिक्पाला इन्द्राऽग्नियमराक्षसाः
daśamāṃśāḥ svataścaije yugma tannavamāt‌ smṛtāḥ|
daśa pūrvādidikpālā indrā'gniyamarākṣasāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमांशाः = दशमांश (D10) के भाग/स्वामी; स्वतः च ओजे = विषम में स्व-राशि से; युग्मे तत्-नवमात् = सम में नवम से; स्मृताः = स्मरणीय; दश पूर्वादि-दिक्पालाः = पूर्व आदि दस दिक्पाल; इन्द्र-अग्नि-यम-राक्षसाः = इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति (राक्षस)।

हिन्दी भावार्थ दशमांश विषम राशि में उसी राशि से गिने जाते हैं और सम राशि में उसके नवम से — ऐसा स्मरण किया गया है। दस दिक्पाल पूर्वादि दिशाओं के क्रम से आरम्भ होते हैं: इन्द्र, अग्नि, यम और राक्षस (निर्ऋति) — शेष नाम अगले श्लोक में पूरे होते हैं। यह D10 की ओज/युग्म गणना और दिक्पाल-क्रम का प्रथम भाग है।

English rendering The daśāṃśas are reckoned from the sign itself in odd signs and from the ninth in even signs. The ten directional guardians begin from the East: Indra, Agni, Yama, and the Rākṣasa (Nirṛti) — continued in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D10 partitions 30° into ten equal arcs of 3° exactly:
- i = floor( (λ mod 30°) ÷ 3° ), i ∈ {0…9}
- odd rāśi: start = rāśi; lord-sign = rāśi + i (mod 12)
- even rāśi: start = rāśi + 8 (9th); lord-sign = (rāśi + 8) + i (mod 12)
First four dikpālas ( पूर्वादि ): (1) Indra, (2) Agni, (3) Yama, (4) Nirṛti/Rākṣasa. Full ten and reverse-on-even rule complete in 6.14.

उदाहरण (worked example) Karka (odd, rāśi 4) at 17°30′. i = floor(17.5 / 3) = 5. Lord-sign = Karka + 5 = Dhanu → Guru. Vṛścika (even, rāśi 8) at 17°30′. Same i = 5. Lord-sign = (Vṛścika + 8) + 5 = Karka + 5 = Dhanu → Guru. (Start differs; here the +i offset lands on the same mapped sign — not always true for every i.)

हमारा डिकोड (Our Decode) Daśāṃśa (D10) is the career/authority varga in the ṣoḍaśa list — again pure 30°/10 modular mapping with odd-from-self / even-from-9th. Implemented in the varga engine beside D9 and D7 under the same exact-partition discipline.

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6.14
वरुणो मारुतश्चैव कुबेरेशानपद्‌मजाः।
अनन्तश्च क्रमादीये समे वा व्युत्क्रमेण तु
varuṇo mārutaścaiva kubereśānapad‌majāḥ|
anantaśca kramādīye same vā vyutkrameṇa tu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वरुणः मारुतः = वरुण, वायु (मरुत्); कुबेर-ईशान-पद्मजाः = कुबेर, ईशान, पद्मज (ब्रह्मा); अनन्तः = अनन्त; क्रमात् ईये (ओजे) = विषम में क्रम से; समे वा व्युत्क्रमेण = सम में व्युत्क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शेष दिक्पाल हैं — वरुण, मरुत् (वायु), कुबेर, ईशान, पद्मज (ब्रह्मा) और अनन्त। विषम राशि में ये दस दिक्पाल इन्द्र से अनन्त तक क्रमानुसार दशमांशों पर लगते हैं; सम राशि में वही क्रम उलटा चलता है। इस श्लोक से 6.13 का दशमांश-देवता चक्र पूरा होता है।

English rendering Completing the ten: Varuṇa, Marut (Vāyu), Kubera, Īśāna, Padmaja (Brahmā), and Ananta. In odd signs they apply in forward order; in even signs, in reverse order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Full dikpāla list D (index 0…9), पूर्वादि क्रम:
0 Indra, 1 Agni, 2 Yama, 3 Nirṛti, 4 Varuṇa, 5 Marut/Vāyu, 6 Kubera, 7 Īśāna, 8 Padmaja (Brahmā), 9 Ananta.
For daśāṃśa arc i (from 6.13):
- odd rāśi: deity = D[i]
- even rāśi: deity = D[9 − i]
Lord-sign mapping remains as in 6.13 (odd: from self; even: from 9th). This is assignment of guardian-labels to arcs, not an extra longitude formula.

उदाहरण (worked example) Karka (odd) 17°30′ → i = 5 → deity = D[5] = Marut. Vṛścika (even) 17°30′ → i = 5 → deity = D[9−5] = D[4] = Varuṇa. Same D10 arc index; parity flips the dikpāla. Convention: equal 3° arcs; odd/even by natural rāśi number; forward list fixed as Indra→…→Ananta.

हमारा डिकोड (Our Decode) Closes the D10 computational packet: arc index from 30°/10, lord from odd-self / even-9th, deity from the ten-dikpāla vector with even-reverse. Same ṣoḍaśa-varga modular style as D3, D4, D7, D9 — mathematics on longitude; phala left as the śāstra’s own voice.

6.15
द्वादशांशस्य गणना तत्तत्क्षेत्राद्विनिर्दिशेत्‌।
तेषामघीशाः क्रमशो गणेशाऽश्वियमाहयाः
dvādaśāṃśasya gaṇanā tattatkṣetrādvinirdiśet‌|
teṣāmaghīśāḥ kramaśo gaṇeśā'śviyamāhayāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादशांश = D12 वर्ग (30° ÷ 12); गणना = विभाजन-नियम; तत्तत्-क्षेत्रात् = उसी राशि से आरम्भ; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे; अधीशाः (पाठ: अघीशाः) = अधिष्ठातृ-देव; क्रमशः = क्रमानुसार; गणेश-अश्वि-यम-आह्य = प्रथम चार अधिष्ठाता (गणेश, अश्विनी-कुमार, यम, अहि/आह्य)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्वादशांश की गणना उसी राशि-क्षेत्र से आरम्भ कर की जाए जिसमें ग्रह स्थित है — अर्थात् प्रत्येक 30° राशि को बारह समान भागों में बाँटकर गिनती उसी राशि से चले। इन द्वादशांशों के अधिष्ठाता क्रमशः गणेश, अश्वि, यम, आह्य इत्यादि हैं। यह D12 की आधार-विधि और देव-क्रम का आरम्भ-निर्देश है।

English rendering The text states that the dvādaśāṃśa (D12) is reckoned from the very sign occupied, and that the lords of those parts, in order, begin with Gaṇeśa, Aśvi (Aśvinī), Yama, and Āhya.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक राशि 30° को 12 समान द्वादशांशों में बाँटा जाता है:
- 1 द्वादशांश = 30° ÷ 12 = 2°30′ = 5/2°
- राशि-अन्तः अंश λ_r (0° ≤ λ_r < 30°) पर: अनुक्रमणिका k = ⌊λ_r ÷ 2°30′⌋ (k = 0…11)
- D12-राशि = (आरम्भ-राशि + k) mod 12, जहाँ आरम्भ = वही राशि (तत्तत्क्षेत्रात्) — चर/स्थिर/द्विस्वभाव भेद नहीं
- अधिष्ठाता: क्रमशः गणेश, अश्वि, यम, आह्य… (श्लोक प्रथम चार नाम देता है; पूर्ण द्वादश-सूची पाठ-परंपरा में विस्तारित)

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र मीन में 17°20′ (λ_r = 17°20′)।
k = ⌊17°20′ ÷ 2°30′⌋ = ⌊17.333… ÷ 2.5⌋ = ⌊6.933…⌋ = 6 → सातवाँ द्वादशांश।
D12-राशि = मीन + 6 = कन्या। (अयनांश केवल भोगांश तय करने के लिए; वर्ग-नियम स्वयं मॉड्युलर है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक षोडश-वर्ग-शृंखला में D12 का नियत विभाजन देता है — शुद्ध 2°30′ चाप पर मॉड्युलर मानचित्रण। हमारी वर्ग-इंजन (D1…D60) इसी “समान-चाप + निर्धारित आरम्भ” अनुशासन से द्वादशांश निकालती है; अयनांश/गृह-पद्धति अलग घोषित रहती है, भाग-नियम स्वयं नहीं बदलता।

6.16
अजसिंहाऽश्वितो ज्ञेया षोडशांशाश्चरादिषु।
अजविष्णू हरः सूर्ये ह्योजे युग्मे प्रतीपकम्‌
ajasiṃhā'śvito jñeyā ṣoḍaśāṃśāścarādiṣu|
ajaviṣṇū haraḥ sūrye hyoje yugme pratīpakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अज = मेष; सिंह = सिंह-राशि; अश्वितः = अश्वि-निर्देशित आरम्भ (द्विस्वभाव; पाठ-भेद संभव — प्रचलित नियम धनु/चाप); षोडशांश = D16 वर्ग; चरादिषु = चर-स्थिर-द्विस्वभाव राशियों में; अज-विष्णु-हर-सूर्य = ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य (चार अधिष्ठाता); ओज = विषम राशि; युग्म = सम राशि; प्रतीपकम् = उल्टा क्रम

हिन्दी भावार्थ षोडशांश चर आदि राशियों में अज (मेष), सिंह तथा अश्वि-निर्देशित बिन्दु से जाने जाते हैं। उनके अधिष्ठाता अज (ब्रह्मा), विष्णु, हर (शिव) और सूर्य हैं — विषम राशि में यही क्रम आगे, सम राशि में प्रतीप (उल्टा)। इस प्रकार सोलह भागों पर चार देव चक्र घूमते हैं।

English rendering The text states that the ṣoḍaśāṃśas (D16) are known, in movable and following sign-types, from Aja (Aries), Siṃha (Leo), and the Aśvi-indicated start; their lords are Aja (Brahmā), Viṣṇu, Hara, and Sūrya — forward in odd signs, reverse in even.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- 1 षोडशांश = 30° ÷ 16 = 1°52′30″ = 15/8°
- k = ⌊λ_r ÷ (30°/16)⌋ (k = 0…15)
- आरम्भ-राशि (प्रकारानुसार): चर → मेष (अज); स्थिर → सिंह; द्विस्वभाव → अश्वि-पाठ; गणना-परंपरा में प्रायः धनु — पाठ-भेद संभव
- D16-राशि = (आरम्भ + k) mod 12
- देव-चक्र (4): [ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य]; विषम में अनुक्रमणिका k पर क्रम; सम में प्रतीप — [सूर्य, शिव, विष्णु, ब्रह्मा] से

उदाहरण (worked example) मङ्गल वृषभ (स्थिर, सम) में 8°00′।
k = ⌊8 ÷ 1.875⌋ = ⌊4.266…⌋ = 4 → पाँचवाँ षोडशांश।
आरम्भ = सिंह → D16-राशि = सिंह + 4 = धनु।
सम राशि → प्रतीप देव: k=4 पर चक्र [सूर्य, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य,…] → सूर्य (पाँचवाँ = अनुक्रमणिका 4)।

हमारा डिकोड (Our Decode) D16 षोडश-वर्ग का शुद्ध मॉड्युलर सदस्य है — 15/8° चाप, राशि-प्रकार से आरम्भ, ओज/युग्म से देव-दिशा। हमारी वर्ग-इंजन इसी नियत विभाजन को लागू करती है; “अश्वितः” बनाम धनु-आरम्भ जहाँ पाठ भिन्न हो, सम्मेलन घोषित रखकर `==` जाँच की जाती है — मौन परंपरा-चयन नहीं।

6.17
अथ विंशतिभागानामधिपा ब्रह्मणोदिताः।
क्रियाच्चरे स्थिरे चापान्‌ मृगुन्द्राद्‌ द्विस्वभावके
atha viṃśatibhāgānāmadhipā brahmaṇoditāḥ|
kriyāccare sthire cāpān‌ mṛgundrād‌ dvisvabhāvake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विंशति-भाग = D20 / विंशांश (20 भाग); अधिपा = अधिष्ठाता; ब्रह्मणोदिताः = ब्रह्मा द्वारा उक्त; क्रिया = मेष; चरे = चर राशि में; स्थिरे चापात् = स्थिर में धनु (चाप) से; मृगेन्द्रात् = सिंह (मृग-इन्द्र) से; द्विस्वभावके = द्विस्वभाव राशि में

हिन्दी भावार्थ अब विंशति-भागों (बीस अंशों) के अधिष्ठाताओं का वर्णन है, जिन्हें ब्रह्मा-परंपरा में कहा गया है। चर राशि में क्रिया (मेष) से, स्थिर में चाप (धनु) से, तथा द्विस्वभाव में मृगेन्द्र (सिंह) से विंशांश की गणना आरम्भ होती है। आगे के श्लोक उन बीस अधिष्ठातृ-देवियों के नाम देते हैं।

English rendering The text next states the lords of the twenty parts (viṃśati-bhāga / D20) as taught from Brahmā: reckoned from Kriyā (Aries) in movable signs, from Cāpa (Sagittarius) in fixed signs, and from Mṛgendra (Leo) in dual signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- 1 विंशांश = 30° ÷ 20 = 1°30′ = 3/2°
- k = ⌊λ_r ÷ 1°30′⌋ (k = 0…19)
- आरम्भ: चर → मेष; स्थिर → धनु; द्विस्वभाव → सिंह
- D20-राशि = (आरम्भ + k) mod 12
- अधिष्ठातृ-क्रम: विषम राशि में 6.18–6.19 की सूची; सम में 6.20–6.21 की सूची (आगे)

उदाहरण (worked example) गुरु मिथुन (द्विस्वभाव, विषम) में 12°00′।
k = ⌊12 ÷ 1.5⌋ = 8 → नवाँ विंशांश।
आरम्भ = सिंह → D20-राशि = सिंह + 8 = मीन।
विषम → देव-सूची 6.18–6.19 से k=8 पर (श्वेता, यदि सूची क्रमांक 1=काली…)।

हमारा डिकोड (Our Decode) D20 भी षोडश-वर्ग-इंजन का नियत सदस्य है — 1°30′ चाप, तीन आरम्भ-बिन्दु (मेष/धनु/सिंह) स्पष्ट। गणना और नाम-सूची अलग परतें हैं: इंजन भाग-मानचित्रण `==` से जाँचता है; देवी-नाम पाठ-परत पर रहते हैं, फल-निश्चितता के रूप में नहीं।

6.18
काली गौरी लक्ष्मीविजया विमला सती।
तारा ज्वालामुखी श्वेता ललिता बगलामुखी
kālī gaurī lakṣmīvijayā vimalā satī|
tārā jvālāmukhī śvetā lalitā bagalāmukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) काली, गौरी, लक्ष्मी, विजया, विमला, सती = प्रथम छह विंशांश-अधिष्ठात्री; तारा, ज्वालामुखी, श्वेता, ललिता, बगलामुखी = अगली पाँच; (विषम-राशि क्रम का आरम्भ — 6.19 से पूर्ण)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विषम राशियों के विंशांशों के लिए अधिष्ठातृ-देवियों का क्रम आरम्भ करता है: काली, गौरी, लक्ष्मी, विजया, विमला, सती; फिर तारा, ज्वालामुखी, श्वेता, ललिता, बगलामुखी। ये नाम D20 के भाग-स्वामित्व की पाठ-सूची हैं, न कि स्वतंत्र फल-सूत्र।

English rendering The text enumerates, for the odd-sign viṃśāṃśa sequence, the goddesses Kālī, Gaurī, Lakṣmī, Vijayā, Vimalā, Satī, then Tārā, Jvālāmukhī, Śvetā, Lalitā, and Bagalāmukhī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अधिष्ठातृ-देवी-सूची (विषम D20, भाग 1–11)। भाग-संख्या स्वयं 6.17 के 1°30′ नियम से आती है; यह श्लोक केवल क्रमांक ↔ नाम का मानचित्र है।

6.19
प्रत्यङ्गिरा शची रौद्री भवानी वरदा जया।
त्रिपुरा सुमुखी चेति विषमे परिचिन्तयेत्‌
pratyaṅgirā śacī raudrī bhavānī varadā jayā|
tripurā sumukhī ceti viṣame paricintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रत्यङ्गिरा, शची, रौद्री, भवानी, वरदा, जया = अगली छह; त्रिपुरा, सुमुखी = अन्तिम नाम; चेति = इस प्रकार; विषमे = विषम राशि में; परिचिन्तयेत् = चिन्तन/स्वीकार करे

हिन्दी भावार्थ क्रम आगे बढ़ता है: प्रत्यङ्गिरा, शची, रौद्री, भवानी, वरदा, जया, त्रिपुरा और सुमुखी — शास्त्र कहता है कि विषम राशि में विंशांश-अधिष्ठाताओं को इसी प्रकार जानें। इस पाठ में उन्नीस नाम स्पष्ट हैं; बीसवें भाग के लिए अन्य संस्करणों में नाम-भेद संभव (पाठ-भेद संभव)।

English rendering The text continues the odd-sign list — Pratyaṅgirā, Śacī, Raudrī, Bhavānī, Varadā, Jayā, Tripurā, and Sumukhī — and states that in odd signs the viṃśāṃśa lords are to be considered thus. (Named tally here is nineteen; a twentieth name may vary by recension — पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषम-राशि D20 अधिष्ठातृ-सूची का समापन-निर्देश। गणना 6.17 पर निर्भर; यहाँ केवल नाम-क्रम का शास्त्रीय कथन है।

6.20
समराशौ दया मेधा छिन्नशीर्षा पिशाचिनी।
धूमावती च मातङ्गी बाला भद्रऽरुणानला
samarāśau dayā medhā chinnaśīrṣā piśācinī|
dhūmāvatī ca mātaṅgī bālā bhadra'ruṇānalā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम-राशौ = सम (युग्म) राशि में; दया, मेधा, छिन्नशीर्षा, पिशाचिनी = प्रथम चार; धूमावती, मातङ्गी, बाला = अगली तीन; भद्रा, अरुणा, अनला = भद्र-अरुण-अनला (तीन)

हिन्दी भावार्थ सम राशि में विंशांश-अधिष्ठात्रियों का भिन्न क्रम है। शास्त्र कहता है: दया, मेधा, छिन्नशीर्षा, पिशाचिनी; धूमावती, मातङ्गी, बाला; भद्रा, अरुणा, अनला। यह विषम-सूची का प्रतीप/पृथक् क्रम नहीं, अपितु सम-राशि के लिए स्वतंत्र नाम-शृंखला का आरम्भ है।

English rendering For even signs the text states a separate sequence of viṃśāṃśa goddesses, beginning Dayā, Medhā, Chinnaśīrṣā, Piśācinī, Dhūmāvatī, Mātaṅgī, Bālā, Bhadrā, Aruṇā, and Analā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सम-राशि D20 अधिष्ठातृ-सूची (भाग 1–10)। D20-राशि/भाग-सूचकांक 6.17 से; देवता-नाम इस श्लोक-युग्म (6.20–6.21) से।

6.21
पिङ्गला छुच्छुका घोरा वाराही वैष्णवी सिता।
भुवनेशी भैरवी च मङ्गला ह्यपराजिता
piṅgalā chucchukā ghorā vārāhī vaiṣṇavī sitā|
bhuvaneśī bhairavī ca maṅgalā hyaparājitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिङ्गला, छुच्छुका, घोरा, वाराही, वैष्णवी, सिता = अगली छह; भुवनेशी, भैरवी, मङ्गला, अपराजिता = अन्तिम चार; हि = निश्चय-द्योतक; (सम-राशि D20 की पूर्ण बीस-नाम सूची)

हिन्दी भावार्थ सम-राशि क्रम पूर्ण होता है: पिङ्गला, छुच्छुका, घोरा, वाराही, वैष्णवी, सिता; भुवनेशी, भैरवी, मङ्गला और अपराजिता। इस प्रकार सम राशि के बीस विंशांशों के अधिष्ठाता पूरे हुए। शास्त्र यहाँ नाम और क्रम देता है — फल का विस्तार नहीं; भाग-गणित 6.17 का ही रहता है।

English rendering The even-sign list concludes with Piṅgalā, Chucchukā, Ghorā, Vārāhī, Vaiṣṇavī, Sitā, Bhuvaneśī, Bhairavī, Maṅgalā, and Aparājitā — completing the twenty viṃśāṃśa lords for even signs as the text states them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सम-राशि D20 अधिष्ठातृ-सूची का समापन (भाग 11–20; कुल 20 नाम)। सम/विषम पर नाम-तालिका अलग; चाप-सूत्र एक ही (1°30′), आरम्भ-राशि 6.17 के तीन नियमों से।

6.22
सिद्धांशकानामधिपाः सिंहादोजभगे ग्रहे।
कर्कद्युग्मभगे खेटे स्कन्दः पर्शुधरोऽनलः
siddhāṃśakānāmadhipāḥ siṃhādojabhage grahe|
karkadyugmabhage kheṭe skandaḥ parśudharo'nalaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिद्धांशका = D24 वर्ग (प्रत्येक राशि के 24 समान भाग, प्रत्येक 1°15′); अधिपाः = अधिष्ठातृ-देवता / अंश-स्वामी; सिंह-आदि = सिंह से आरम्भ; ओज-भग = विषम (ओज) राशि में स्थित ग्रह; कर्क-आदि = कर्क से आरम्भ; युग्म-भग = सम राशि; खेट = ग्रह; स्कन्द = कार्तिकेय; पर्शुधर = परशुराम (परशु-धारी); अनल = अग्नि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सिद्धांश (चतुर्विंशाश / D24) के अधिष्ठातृ क्रम को बाँधता है। विषम राशि में ग्रह हो तो गणना सिंह से आरम्भ होती है; सम राशि में कर्क से। इस क्रम के प्रथम तीन नाम स्कन्द, पर्शुधर और अनल हैं — आगे के नाम अगले श्लोक में पूरे होते हैं।

English rendering The text begins the sequence of Siddhāṃśa (D24) lords: for a planet in an odd sign, count from Leo; for one in an even sign, from Cancer. The first three deities named are Skanda, Paraśudhara (Paraśurāma), and Anala (Agni).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D24 = ṣoḍaśa-varga partition: each 30° rāśi → 24 equal arcs of 1°15′ (= 30° ÷ 24). Longitude-in-sign λ_s (0° ≤ λ_s < 30°):
- portion index k = ⌊λ_s ÷ 1.25°⌋ (k = 0…23).
- Oḍa (odd) rāśi: deity sequence starts at Siṃha and runs forward (first three: Skanda, Paraśudhara, Anala).
- Yugma (even) rāśi: sequence starts at Karka and runs reverse (full list in 6.23).
This is pure modular mapping of λ onto a fixed deity list of length 24; no ayanāṃśa enters the portion index once tropical/sidereal longitude is fixed.

उदाहरण (worked example) Convention: sidereal longitude already reduced; Siṃha (Leo, odd). Planet at 4°20′ in Leo → λ_s = 4°20′. k = ⌊4.333… ÷ 1.25⌋ = ⌊3.466…⌋ = 3 → fourth Siddhāṃśa (0-based index 3). From the Siṃha-forward list (6.22–6.23) that is the fourth deity after Skanda, Paraśudhara, Anala — i.e. Viśvakarmā (named in 6.23).

हमारा डिकोड (Our Decode) D24 is one of the sixteen deterministic partitions of the ṣoḍaśa-varga scheme (BPHS Ch.6): equal arcs of a 30° sign mapped by a stated start-and-direction rule. Our varga engine treats this as modular arithmetic on longitude, not as interpretive colour — exact portion index before any phala is read.

6.23
विश्वकर्मा भगो मित्रो मयोऽन्तकवृषध्वजाः।
गोविन्दो मदनो भीमः सिंहादौ विषमे क्रमात्‌।
कर्कादौ समभे भीमाद्विलोमेन विचिन्तयेत्‌
viśvakarmā bhago mitro mayo'ntakavṛṣadhvajāḥ|
govindo madano bhīmaḥ siṃhādau viṣame kramāt‌|
karkādau samabhe bhīmādvilomena vicintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विश्वकर्मा = विश्वकर्मा; भग = भग देव; मित्र = मित्र; मय = मय (दानव-शिल्पी); अन्तक = यम/अन्तक; वृषध्वज = शिव (वृष-ध्वज); गोविन्द = विष्णु; मदन = काम; भीम = भीम; सिंहादौ = सिंह से; विषमे = विषम राशि में; क्रमात् = अनुक्रम से; कर्कादौ = कर्क से; समभे = सम राशि में; भीमात् = भीम से; विलोमेन = उल्टे क्रम से; विचिन्तयेत् = विचार करे।

हिन्दी भावार्थ सिद्धांश-अधिष्ठाताओं की पूरी माला यहीं पूरी होती है। विषम राशि में सिंह से क्रमशः: स्कन्द, पर्शुधर, अनल, विश्वकर्मा, भग, मित्र, मय, अन्तक, वृषध्वज, गोविन्द, मदन, भीम — और यह बारह नाम दुबारा लगकर चौबीस अंश पूरे करते हैं। सम राशि में कर्क से भीम से उल्टा क्रम लें। शास्त्र कहता है — दिशा (क्रम / विलोम) राशि की विषमता पर निर्भर है।

English rendering Completing the Siddhāṃśa lords: in odd signs, from Leo in order — Skanda, Paraśudhara, Anala, Viśvakarmā, Bhaga, Mitra, Maya, Antaka, Vṛṣadhvaja, Govinda, Madana, Bhīma (the twelve names repeated to fill twenty-four). In even signs, from Cancer, reverse the same list beginning from Bhīma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Fixed deity vector D[0…11] =
(Skanda, Paraśudhara, Anala, Viśvakarmā, Bhaga, Mitra, Maya, Antaka, Vṛṣadhvaja, Govinda, Madana, Bhīma).
For portion k ∈ {0…23}:
- odd rāśi: deity = D[k mod 12]
- even rāśi: deity = D[(11 − (k mod 12) + 12·⌊k/12⌋) adjusted by reverse traversal of the 24-slot cycle from Bhīma] — practically: reverse the doubled list so index 0 maps to Bhīma, 1 to Madana, … .
Arc width remains 1°15′; Σ portions per sign = 24; Σ over zodiac = 288 Siddhāṃśas.

उदाहरण (worked example) Kanyā (Virgo, even), λ_s = 0°40′. k = ⌊0.666… ÷ 1.25⌋ = 0 → first Siddhāṃśa of an even sign → reverse-from-Bhīma ⇒ deity = Bhīma. Same degree in Siṃha (odd) would have been Skanda.

हमारा डिकोड (Our Decode) The odd-forward / even-reverse pattern is the same class of rule used across several ṣoḍaśa-vargas: a stated origin sign plus a direction bit. Computation is exact once the recension’s deity list and the D24 width (1°15′) are pinned; we do not smooth or “interpret” the index.

6.24
भांशाधिपाः क्रमाद्दस्रयमवह्निपितामहाः।
चन्द्रेशादितिजीवाहिपितरो भगसंज्ञिताः
bhāṃśādhipāḥ kramāddasrayamavahnipitāmahāḥ|
candreśāditijīvāhipitaro bhagasaṃjñitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भांश-अधिपाः = भांश (D27 / नक्षत्रांश) के स्वामी; क्रमात् = क्रम से; दस्र = अश्विनी-कुमार (दस्र); यम = यम; वह्नि = अग्नि; पितामह = ब्रह्मा; चन्द्र = चन्द्र; ईश = रुद्र/ईश (पाठ: चन्द्रेश = चन्द्र+ईश — पाठ-भेद संभव यदि एक पद मानें); अदिति = अदिति; जीव = बृहस्पति; अहि = सर्प; पितरः = पितृगण; भग-संज्ञिताः = भग नाम वाले।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र भांश — राशि के सत्ताईस भागों — के अधिष्ठाताओं का क्रम आरम्भ करता है। ये नक्षत्र-देवताओं के ही नाम हैं। इस श्लोक में प्रथम ग्यारह: दस्र, यम, वह्नि, पितामह, चन्द्र, ईश, अदिति, जीव, अहि, पितर और भग। शेष सोलह अगले दो श्लोकों में आते हैं।

English rendering The lords of the Bhāṃśa (D27, the twenty-seven-fold division) are named in order, beginning: Dasra, Yama, Vahni, Pitāmaha, Candra, Īśa, Aditi, Jīva, Ahi, the Pitṛs, and Bhaga — the nakṣatra deities applied as portion-lords.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D27 (bhāṃśa / nakṣatrāṃśa): each 30° sign → 27 equal arcs of 30° ÷ 27 = 1°1′20″ (≈ 1.111…°).
- k = ⌊λ_s ÷ (30/27)⌋ , k = 0…26.
- Deity = N[k] where N is the 27-long nakṣatra-devatā vector begun in this verse and finished in 6.25–6.26.
- Mapping runs मेषादि (from Meṣa) in zodiacal order (completed in 6.26). No house system enters; only sign-longitude.

उदाहरण (worked example) Meṣa, λ_s = 10°0′. Arc = 30/27 ≈ 1.1111°. k = ⌊10 ÷ 1.1111…⌋ = ⌊9⌋ = 9 → 10th Bhāṃśa (1-based) → Pitaraḥ (10th in the list above).

हमारा डिकोड (Our Decode) D27 is the ṣoḍaśa-varga engine’s equal-arc partition at n = 27. We keep deity assignment as a pure index into the śāstra’s list; totals and indices are checked with exact arithmetic (no tolerance on portion boundaries).

6.25
अर्यमार्कत्वष्ट्‌टमरुच्छक्राग्निमित्रवासवाः।
निरृत्युदकविश्वेऽजगोविन्दो वसवोऽम्बुपः
aryamārkatvaṣṭ‌ṭamarucchakrāgnimitravāsavāḥ|
nirṛtyudakaviśve'jagovindo vasavo'mbupaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्यमन् = अर्यमा; अर्क = सूर्य; त्वष्टृ = त्वष्टा; मरुत् = वायु; शक्राग्नि = इन्द्राग्नि (संयुक्त अधिष्ठाता — एक पद); मित्र = मित्र; वासव = इन्द्र; निरृति = निरृति; उदक = आपः / जल; विश्वे = विश्वेदेवाः; गोविन्द = विष्णु; वसवः = वसुगण; अम्बुप = वरुण (अम्बु-प)। (मध्य में “अज” पढ़ने पर पाठ-भेद संभव — मानक 27-क्रम में अजपाद 6.26 में है।)

हिन्दी भावार्थ भांश-माला आगे बढ़ती है। अर्यमा, अर्क, त्वष्टृ, मरुत्, शक्राग्नि, मित्र, वासव, निरृति, उदक, विश्वेदेव, गोविन्द, वसु और अम्बुप — ये नाम सत्ताईस में से मध्य और उत्तर खण्ड भरते हैं। शास्त्र यहाँ नक्षत्र-देवता-क्रम को ही भांशेश बनाता है, कोई पृथक् फल-कथन नहीं।

English rendering Continuing the Bhāṃśa lords: Aryaman, Arka (Sūrya), Tvaṣṭṛ, Marut (Vāyu), Śakrāgni, Mitra, Vāsava (Indra), Nirṛti, Udaka (Āpaḥ), the Viśvedevas, Govinda, the Vasus, and Ambupa (Varuṇa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Same D27 rule as 6.24. Cumulative index after 6.24’s eleven names: this verse supplies the next block (Aryaman … Ambupa) so that with 6.26’s final three the vector length is exactly 27. Boundary of portion k is λ_s = k × (30/27)°; the upper edge of the last portion is 30° exactly (27 × 30/27 = 30).

उदाहरण (worked example) Vṛṣabha, λ_s = 20°. k = ⌊20 ÷ (30/27)⌋ = ⌊18⌋ = 18 → 19th deity in the full list = Nirṛti (after the first 18: 11 from 6.24 + Aryaman…Vāsava as 12–18).

6.26
ततोऽजपादहिर्बुध्न्यः पूषा चैव प्रकीर्तिताः।
नक्षत्रेशास्तु भांशेशा मेषादिचरभक्रमात्‌
tato'japādahirbudhnyaḥ pūṣā caiva prakīrtitāḥ|
nakṣatreśāstu bhāṃśeśā meṣādicarabhakramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तत्पश्चात्; अजपाद = अज एकपाद्; अहिर्बुध्न्य = अहिर्बुध्न्य; पूषा = पूषन्; प्रकीर्तिताः = कथित; नक्षत्रेशाः = नक्षत्र-अधिष्ठाता; तु = ही; भांशेशाः = भांश-स्वामी; मेषादि = मेष से आरम्भ; चर-भ-क्रमात् = राशि/नक्षत्र-क्रम से (चर = क्रमिक गति)।

हिन्दी भावार्थ अन्त में अजपाद, अहिर्बुध्न्य और पूषा — तीनों नाम माला को सत्ताईस पर पूर्ण करते हैं। शास्त्र स्पष्ट कहता है: जो नक्षत्रेश हैं, वे ही भांशेश हैं; गणना मेषादि राशि-क्रम से चलती है। यह फल नहीं, अधिष्ठातृ-सूची का नियम है।

English rendering Finally Ajaikapād, Ahirbudhnya, and Pūṣan are named. The text states that the nakṣatra lords are the Bhāṃśa lords, applied from Meṣa onward in regular zodiacal order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Full N[0…26] (1-based 1…27) =
Dasra, Yama, Vahni, Pitāmaha, Candra, Īśa, Aditi, Jīva, Ahi, Pitara, Bhaga,
Aryaman, Arka, Tvaṣṭṛ, Marut, Śakrāgni, Mitra, Vāsava,
Nirṛti, Udaka, Viśve, Govinda, Vasu, Ambupa,
Ajapāda, Ahirbudhnya, Pūṣā.
For any rāśi R (Meṣa = 0 … Mīna = 11) and λ_s:
k = ⌊λ_s × 27 / 30⌋; deity = N[k].
(Some recensions insert/duplicate “Aja” before Govinda — पाठ-भेद संभव; pinned length for computation remains 27.)

उदाहरण (worked example) Mīna (even or odd does not reverse D27 here — unlike D24), λ_s = 29°0′. k = ⌊29 × 27 / 30⌋ = ⌊26.1⌋ = 26 → N[26] = Pūṣā (last Bhāṃśa of the sign).

हमारा डिकोड (Our Decode) D27 sits in the same ṣoḍaśa-varga stack as D1…D60: deterministic equal-arc cut, then a fixed label table. We separate the index (mathematics) from any later phala read against that deity name.

6.27
त्रिंशांशेशाश्च विषमे कुजर्कीज्यज्ञभार्गवाः।
पंचपंचाष्टसप्ताक्षभागानां व्यत्ययात्‌ समे
triṃśāṃśeśāśca viṣame kujarkījyajñabhārgavāḥ|
paṃcapaṃcāṣṭasaptākṣabhāgānāṃ vyatyayāt‌ same

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंशांश-ईशाः = D30 (त्रिंशांश) के स्वामी-ग्रह; विषमे = विषम राशि में; कुज = मङ्गल; अर्कि = शनि (अर्क-पुत्र); इज्य = बृहस्पति; ज्ञ = बुध; भार्गव = शुक्र; पंच = 5; पंच = 5; अष्ट = 8; सप्त = 7; अक्ष = 5 (भूतसंख्या: अक्ष = इन्द्रिय = 5); भागानाम् = अंशों के; व्यत्ययात् = उलटाव से; समे = सम राशि में।

हिन्दी भावार्थ त्रिंशांश (D30) विषम राशि में पाँच ग्रहों को क्रम से बाँटता है — कुज, अर्कि, इज्य, ज्ञ, भार्गव — और उनके अंश: 5°, 5°, 8°, 7°, 5° (योग 30°)। सम राशि में वही क्रम और वही अंश-मान व्यत्यय से, अर्थात् उल्टे क्रम में लगते हैं। यह वर्ग-विभाजन का शुद्ध नियम है।

English rendering In odd signs the Triṃśāṃśa lords are Mars, Saturn, Jupiter, Mercury, and Venus, ruling arcs of 5°, 5°, 8°, 7°, and 5° respectively. In even signs the same five arcs are applied in reverse order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Bhūtasaṃkhyā: pañca=5, pañca=5, aṣṭa=8, sapta=7, akṣa=5; Σ = 5+5+8+7+5 = 30° ✓.

Odd rāśi (Meṣa, Mithuna, Siṃha, Tulā, Dhanu, Kumbha) — cumulative bands:
- 0°–5° → Kuja (Mars)
- 5°–10° → Arki (Saturn)
- 10°–18° → Ijya (Jupiter)
- 18°–25° → Jña (Mercury)
- 25°–30° → Bhārgava (Venus)

Even rāśi (Vṛṣabha, Karka, Kanyā, Vṛścika, Makara, Mīna) — reverse:
- 0°–5° → Venus
- 5°–12° → Mercury
- 12°–20° → Jupiter
- 20°–25° → Saturn
- 25°–30° → Mars

Lord of the Triṃśāṃśa = the planet of the band containing λ_s. (This is the planetary rāśi-lord of D30, not the deity list of 6.28.)

उदाहरण (worked example) Convention: sidereal λ already in-sign. Siṃha (odd), λ_s = 16°10′ → falls in 10°–18° → Jupiter’s Triṃśāṃśa. Same 16°10′ in Kanyā (even) → 12°–20° band → Jupiter still, but e.g. 3° in Kanyā → Venus (even-first band), whereas 3° in Siṃha → Mars.

हमारा डिकोड (Our Decode) D30 is another exact ṣoḍaśa-varga partition — unequal arcs (5-5-8-7-5) with an odd/even direction bit. Our engine encodes the bands as closed-open degree intervals and asserts lordship with exact comparisons, not approximate “near 5°” checks.

6.28
वह्निः समीरशक्रौ च धनदो जलदस्तथा।
विषमेषु क्रमाज्ज्ञेयाः समराशौ विपर्ययात्‌
vahniḥ samīraśakrau ca dhanado jaladastathā|
viṣameṣu kramājjñeyāḥ samarāśau viparyayāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वह्नि = अग्नि; समीर = वायु; शक्र = इन्द्र; धनद = कुबेर; जलद = वरुण / मेघ (जल-द); विषमेषु = विषम राशियों में; क्रमात् = क्रम से; ज्ञेयाः = जानने योग्य; सम-राशौ = सम राशि में; विपर्ययात् = विपरीत क्रम से।

हिन्दी भावार्थ त्रिंशांश के देवता — ग्रह-स्वामियों से पृथक् — विषम राशि में क्रमशः वह्नि, समीर, शक्र, धनद और जलद हैं; सम राशि में यही पाँच उल्टे क्रम से। शास्त्र केवल अधिष्ठातृ-क्रम बताता है; कोई आयु/रोग/धन का फल यहाँ नहीं गूँथा गया।

English rendering The Triṃśāṃśa deities, in odd signs, are Agni, Vāyu, Indra, Kubera (Dhanada), and Varuṇa (Jalada), in that order; in even signs the same five are taken in reverse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Pair each D30 band of 6.27 with a deity (same 5-5-8-7-5 widths):

Odd signs:
- 0°–5° → Vahni (Agni) — with Mars
- 5°–10° → Samīra (Vāyu) — with Saturn
- 10°–18° → Śakra (Indra) — with Jupiter
- 18°–25° → Dhanada (Kubera) — with Mercury
- 25°–30° → Jalada (Varuṇa) — with Venus

Even signs (viparyaya):
- 0°–5° → Jalada — with Venus
- 5°–12° → Dhanada — with Mercury
- 12°–20° → Śakra — with Jupiter
- 20°–25° → Samīra — with Saturn
- 25°–30° → Vahni — with Mars

Two parallel labels on the same arcs: graha-lord (6.27) and devatā (6.28). No daśā or bala formula here.

उदाहरण (worked example) Tulā (odd), λ_s = 22°. Band 18°–25° → graha-lord = Mercury, deity = Dhanada. Makara (even), λ_s = 22° → band 20°–25° → graha-lord = Saturn, deity = Samīra.

हमारा डिकोड (Our Decode) Closing the mid-Ch.6 varga block, D24 / D27 / D30 are three of the sixteen equal-or-stated arc maps in the ṣoḍaśa-varga engine: longitude → portion index → (optional) lord/deity table. We compute the index with exact degree cuts; any later reading of “what Agni’s triṃśāṃśa means” stays on the śāstra’s phala side, never as a fate we assert.

6.29
चत्वारिंशद्विभागानामधिपा विषमे क्रियात्‌।
समभे तुलतो ज्ञेयाः स्वस्वाधिपसमन्विताः
catvāriṃśadvibhāgānāmadhipā viṣame kriyāt‌|
samabhe tulato jñeyāḥ svasvādhipasamanvitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चत्वारिंशद्-विभाग = चालीसवें भाग (D40 / खवेदांश; प्रत्येक भाग = 30°÷40 = ¾° = 45′); अधिपाः = उन भागों के राशि-स्वामी; विषमे = विषम राशि में; क्रियात् = मेष (क्रिया) से गिनना; समभे = सम राशि में; तुलतः = तुला से; स्व-स्व-अधिप-समन्विताः = अपने-अपने राशि-स्वामियों से युक्त / ज्ञात।

हिन्दी भावार्थ चत्वारिंशद्-विभाग—अर्थात् खवेदांश (D40)—के अधिपतियों का नियम यह है: ग्रह यदि विषम राशि में हो तो भाग-क्रम मेष से चलाया जाए; यदि सम राशि में हो तो तुला से। प्रत्येक भाग की राशि उसी क्रम से निर्धारित होती है, और उस राशि का स्वामी ही उस चत्वारिंशद्-भाग का अधिपति कहा जाता है। यह षोडश-वर्ग-क्रम का शुद्ध विभाजन-नियम है।

English rendering For the lords of the fortyfold divisions (khavedāṃśa, D40), count from Aries when the planet is in an odd sign, and from Libra when it is in an even sign; each part is taken with its own sign-lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D40 (खवेदांश): प्रत्येक भाग = 30° ÷ 40 = ¾° = 45′। राशि-अन्दर देशान्तर λ_in (0° ≤ λ_in < 30°) पर:
- भाग-सूचकांक k = ⌊λ_in ÷ (¾°)⌋ + 1 = ⌊(4/3)·λ_in⌋ + 1 ∈ {1…40}
- विषम राशि (1,3,5,…): D40-राशि-क्रम मेष से — r = ((0 + k − 1) mod 12) + 1
- सम राशि (2,4,6,…): D40-राशि-क्रम तुला से — r = ((6 + k − 1) mod 12) + 1
(यहाँ 1=मेष … 12=मीन; 0-आधार पर मेष=0, तुला=6।) अधिपति = r-राशि का स्वामी।

उदाहरण (worked example) ग्रह मीन में 12°20′ (सम राशि)। λ_in = 12 + 20/60 = 12.333…°। k = ⌊12.333… ÷ 0.75⌋ + 1 = ⌊16.444…⌋ + 1 = 16 + 1 = 17। तुला से 17वाँ: तुला=1 … मकर=4, … 17 mod 12 = 5 → कुम्भ। D40-अधिपति = शनि (कुम्भ-स्वामी)। (दृश्य-देशान्तर / ayanāṃśa से λ_in स्थिर मानकर; वर्ग-नियम: BPHS 6.29 विषम=मेष, सम=तुला।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग-श्रृंखला में D40 शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन है—30° को 40 समान चापों में काटकर विषम/सम-आरम्भ नियम से राशि पर मैप। वर्ग-इंजन इसी “equal-arc + stated start” अनुशासन से D1…D60 निकालता है; फल-व्याख्या अलग रहती है, संख्या `==` पर जाँच योग्य।

6.30
विष्णुश्चन्द्रो मरीचिश्च त्वष्टा धाता शिवो रविः।
यमो यक्षश्च गन्धर्वः कालो वरुण एव च
viṣṇuścandro marīciśca tvaṣṭā dhātā śivo raviḥ|
yamo yakṣaśca gandharvaḥ kālo varuṇa eva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विष्णुः = विष्णु; चन्द्रः = चन्द्र; मरीचिः = मरीचि; त्वष्टा = त्वष्टा; धाता = धाता (विधाता); शिवः = शिव; रविः = सूर्य; यमः = यम; यक्षः = यक्ष; गन्धर्वः = गन्धर्व; कालः = काल; वरुणः = वरुण — ये चत्वारिंशद्-भागों के अधिदेव (क्रमशः गण्य)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चत्वारिंशद्-विभागों के अधिदेवों की यह सूची देता है—विष्णु, चन्द्र, मरीचि, त्वष्टा, धाता, शिव, रवि, यम, यक्ष, गन्धर्व, काल और वरुण। भाग-क्रम के साथ ये देवता क्रमशः जुड़े माने जाते हैं (इस पाठ में बारह नाम; पूर्ण चक्र/पुनरावृत्ति पाठ-भेद या अगले श्लोक-क्रम पर निर्भर हो सकता है)। राशि-अधिपति (6.29) और अधिदेव—दो अलग परतें हैं।

English rendering The text names the presiding deities of the forty divisions as Viṣṇu, Candra, Marīci, Tvaṣṭṛ, Dhātṛ, Śiva, Ravi, Yama, Yakṣa, Gandharva, Kāla, and Varuṇa, to be taken in order with the parts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अधिदेव-सूची (नाम-कथन)। D40 का चाप-सूत्र 6.29 में है; यहाँ भाग k पर देवता-नाम बाँधने का शास्त्रीय फ्रेम है—देवता-फल को नियति नहीं, पाठ की संज्ञा-तालिका समझें।

6.31
तथाक्षवेदभागानामधिपाश्चरभे क्रियात्‌।
स्थिरे सिंहाद्‌ द्विभेचापात्‌ विधीशविष्णवश्चरे
tathākṣavedabhāgānāmadhipāścarabhe kriyāt‌|
sthire siṃhād‌ dvibhecāpāt‌ vidhīśaviṣṇavaścare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अक्षवेद-भाग = पैंतालीसवें भाग (D45 / अक्षवेदांश; अक्ष≈5, वेद=4 → 45; प्रत्येक भाग = 30°÷45 = ⅔°); अधिपाः = भाग-अधिपति; चर-भे = चर राशि में; क्रियात् = मेष से; स्थिरे = स्थिर राशि में; सिंहात् = सिंह से; द्विभे = द्विस्वभाव राशि में; चापात् = धनु (चाप) से; विधीश-विष्णवः = विधाता (ब्रह्मा) और विष्णु (चर में आरम्भ-क्रम); चरे = चर राशि में।

हिन्दी भावार्थ अक्षवेद-भाग—अक्षवेदांश (D45)—के अधिपतियों का आरम्भ राशि-स्वभाव पर निर्भर है: चर राशि में मेष से गिनें; स्थिर में सिंह से; द्विस्वभाव में धनु से। चर राशि के अधिदेव-क्रम में विधीश (ब्रह्मा) और विष्णु का उल्लेख यहाँ आरम्भ-बिन्दु के रूप में आता है। तीन स्वभाव × तीन आरम्भ—यह वर्ग का शास्त्रीय नक्शा है।

English rendering For the lords of the forty-fivefold divisions (akṣavedāṃśa, D45), count from Aries in movable signs, from Leo in fixed signs, and from Sagittarius in dual signs; in the movable series the text begins the deity-order with Vidhīśa and Viṣṇu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D45 (अक्षवेदांश): प्रत्येक भाग = 30° ÷ 45 = ⅔°।
k = ⌊λ_in ÷ (⅔°)⌋ + 1 = ⌊(3/2)·λ_in⌋ + 1 ∈ {1…45}।
आरम्भ-राशि s₀: चर → मेष (0); स्थिर → सिंह (4); द्विस्वभाव → धनु (8) [0-आधार]।
D45-राशि r = ((s₀ + k − 1) mod 12) + 1; अधिपति = r का स्वामी।

उदाहरण (worked example) ग्रह वृषभ (स्थिर) में 8°00′। λ_in = 8°। k = ⌊8 ÷ (⅔)⌋ + 1 = ⌊12⌋ + 1 = 13। सिंह से 13वाँ: सिंह=1 … कन्या=2 … → 13 mod 12 = 1 → सिंह। D45-अधिपति = रवि। (वर्ग-नियम: BPHS 6.31 स्वभाव-आरम्भ।)

हमारा डिकोड (Our Decode) D45 उसी षोडश-वर्ग मॉड्यूलर ढाँचे में बैठता है—केवल भाग-संख्या 45 और आरम्भ-नियम स्वभाव-त्रय पर। इंजन “partition + start-table” से D45 निकालता है; स्वभाव-तालिका पाठ से पिन है, अनुमान से नहीं।

6.32
ईशाच्युतसुरज्येष्ठा विष्णुकेशाः स्थिरे द्विभे।
देवाः पंचदशावृत्त्या विज्ञेया द्विजसत्तम
īśācyutasurajyeṣṭhā viṣṇukeśāḥ sthire dvibhe|
devāḥ paṃcadaśāvṛttyā vijñeyā dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ईश = ईश (शिव/ईशान); अच्युत = अच्युत (विष्णु); सुरज्येष्ठ = सुरों में ज्येष्ठ (इन्द्र / ब्रह्मा—पाठानुसार); विष्णु = विष्णु; केश = केश (केशव); स्थिरे द्विभे = स्थिर और द्विस्वभाव में; देवाः = अधिदेव; पंचदश-वृत्त्या = पंद्रह की आवृत्ति से चक्र; विज्ञेयाः = जानने योग्य; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में अक्षवेद-भागों के अधिदेव ईश, अच्युत, सुरज्येष्ठ, विष्णु, केश—इत्यादि क्रम से जाने जाते हैं; समग्र रूप से देवता-गण को पंद्रह की वृत्ति (पंचदश-आवृत्ति) से चक्रित करना है। चर-पक्ष का आरम्भ 6.31 में विधीश-विष्णु से जुड़ा; यहाँ स्थिर-द्विभ का नाम-क्रम और “15 से घुमाओ” का नियम स्पष्ट है। पाठ-भेद संभव जहाँ नामों की पूर्ण पंक्ति अन्य संस्करणों में थोड़ी भिन्न हो।

English rendering In fixed and dual signs the deities of the akṣavedāṃśa are known as Īśa, Acyuta, Surajyeṣṭha, Viṣṇu, Keśa, and so on; O best of the twice-born, the gods are to be taken by a fifteenfold cyclic rotation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अधिदेव-चक्र का कथन। D45 का चाप-सूत्र 6.31 में; यहाँ देवता-सूचकांक d = ((k − 1) mod 15) + 1 (पंचदश-वृत्ति), नाम-तालिका पाठानुसार बाँधें। फल को शास्त्र की संज्ञा समझें, नियति नहीं।

6.33
राशीन्‌ विहाय खेटस्य द्विघ्नमंशाद्यमर्कहृत्‌।
शेषं सैकं तद्राशेर्भपाः षष्ट्यंशापाः स्मृताः
rāśīn‌ vihāya kheṭasya dvighnamaṃśādyamarkahṛt‌|
śeṣaṃ saikaṃ tadrāśerbhapāḥ ṣaṣṭyaṃśāpāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशीन् विहाय = (ग्रह की) राशियाँ छोड़कर—केवल अंशादि (राशि-अन्दर अंश-कला); खेटस्य = ग्रह का; द्वि-घ्नम् = दो से गुणा; अंशाद्यम् = अंश आदि (अंश+कला+विकला अंश-रूप में); अर्क-हृत् = अर्क (=12) से भाग; शेषं = शेष; स-एकम् = एक सहित (शेष+1); तत्-राशेः भ-पाः = उसी राशि से गिने राशि-स्वामी; षष्ट्यंश-पाः = षष्ट्यंश (D60) के अधिपति; स्मृताः = कहे गए।

हिन्दी भावार्थ षष्ट्यंश-अधिपति निकालने की विधि: ग्रह की पूर्ण राशि संख्या हटाकर केवल राशि-अन्दर अंशादि लो; उसे द्विगुण करो; बारह (अर्क) से भाग दो; जो शेष बचे उसमें एक जोड़ो—उतनी गिनती उसी राशि से करो; वहाँ पहुँची राशि का स्वामी षष्ट्यंश-अधिपति माना जाता है। यह D60 का शास्त्रीय बीज-सूत्र है; साठ देवता आगे की सूची में आते हैं।

English rendering Discarding the signs occupied, double the planet’s degrees and so on, divide by twelve (arka); the remainder plus one, counted from that same sign, yields the sign-lords of the ṣaṣṭyaṃśa (D60).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D60 (षष्ट्यंश): प्रत्येक भाग = 30° ÷ 60 = ½° = 30′।
मानक भाग-सूचकांक: N = ⌊2 · λ_in⌋ + 1 ∈ {1…60} (λ_in डिग्री में, कला सहित)।
श्लोक का “द्विघ्न ÷ अर्क” रूप: (2 · λ_in) को 12 से विभाजित कर शेष R लें; R′ = R + 1 (R=0 हो तो परंपरा में 12 मानकर +1 की जाँच—पाठ/टीका भेद संभव); उसी राशि से R′ वीं राशि का स्वामी = षष्ट्यंश-अधिपति-पथ।
पूर्ण D60-राशि-मैप (प्रचलित मॉडल, N से):
- विषम राशि: r = ((s − 1 + N − 1) mod 12) + 1
- सम राशि: प्रायः उल्टी गिनती — r = ((s − 1 − (N − 1)) mod 12) + 1
(सम-विषम व्युत्क्रम कई पाठों में; यह संस्करण 6.33 में व्युत्क्रम स्पष्ट नहीं कहता—पाठ-भेद संभव; गणना में convention घोषित करें।)

उदाहरण (worked example) ग्रह कन्या में 10°20′। λ_in = 10 + 20/60 = 10.333…°।
2 · λ_in = 20.666…; 20.666… ÷ 12 → भागफल 1, शेष ≈ 8.666… (अंश-शेष पर टीका-रीति भिन्न हो सकती है)।
पूर्णांक-मार्ग (N): N = ⌊2 × 10.333…⌋ + 1 = ⌊20.666…⌋ + 1 = 21।
कन्या=6 (1=मेष); विषम-क्रम (उल्टा नहीं): r = ((6 − 1 + 21 − 1) mod 12) + 1 = (25 mod 12) + 1 = 2 → वृषभ; षष्ट्यंश-राशि-स्वामी = शुक्र।
(Convention: N = ⌊2λ_in⌋+1; विषम-सम व्युत्क्रम यहाँ “विषम=आगे” माना; सम राशि पर अलग उदाहरण में उल्टी गिनती लागू करें यदि अपनी परंपरा वही चुनती हो।)

हमारा डिकोड (Our Decode) D60 षोडश-वर्ग का अंतिम, सूक्ष्मतम समान-चाप वर्ग है—½° के 60 खण्ड, मॉड्यूलर मैप। वर्ग-इंजन इसी deterministic partition से D60 निकालता है; फल-देवता सूची अलग परत है। संख्या पर exact `==` अनुशासन—सहन-पट्टी से ढका “लगभग” नहीं।

6.34
घोरश्च राक्षशो देवः कुबेरो यक्षकिन्नरौ।
भ्रष्टः कुलघ्नो गरलो वह्निर्माया पुरीषकः
ghoraśca rākṣaśo devaḥ kubero yakṣakinnarau|
bhraṣṭaḥ kulaghno garalo vahnirmāyā purīṣakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) घोरः = घोर; राक्षसः = राक्षस; देवः = देव; कुबेरः = कुबेर; यक्षः = यक्ष; किन्नरौ = किन्नर (द्विवचन-शैली में युग्म/सूची); भ्रष्टः = भ्रष्ट; कुलघ्नः = कुलघ्न; गरलः = गरल (विष); वह्निः = अग्नि; माया = माया; पुरीषकः = पुरीषक — षष्ट्यंश-अधिदेवों की आरम्भिक नाम-माला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र षष्ट्यंशों के अधिदेवों की सूची आरम्भ करता है—घोर, राक्षस, देव, कुबेर, यक्ष, किन्नर, भ्रष्ट, कुलघ्न, गरल, वह्नि, माया, पुरीषक। ये नाम षष्ट्यंश-क्रम (सामान्यतः विषम राशि में 1 से आगे; सम में प्रायः उल्टी सूची—पाठ-भेद संभव) से बाँधे जाते हैं। यह फल-संज्ञा की तालिका है, गणना का सूत्र नहीं।

English rendering The text begins the roster of ṣaṣṭyaṃśa deities: Ghora, Rākṣasa, Deva, Kubera, Yakṣa, Kinnara, Bhraṣṭa, Kulaghna, Garala, Vahni, Māyā, and Purīṣaka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — षष्ट्यंश-देवता सूची (नाम-कथन, प्रथम द्वादश)। N (1…60) पर नाम बाँधना 6.33 के N से जुड़ता है; नाम-फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें—भय या दबाव-उपाय नहीं।

6.35
अपाम्पतिर्मरुत्वांश्च कालः सर्पामृतेन्दुकाः।
मृदुः कोमलहेरम्बब्रह्मविष्णुमहेश्वराः
apāmpatirmarutvāṃśca kālaḥ sarpāmṛtendukāḥ|
mṛduḥ komalaherambabrahmaviṣṇumaheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपाम्पतिः = अपांपति (वरुण / जलपति); मरुत्वान् = मरुत्वान् (इन्द्र); कालः = काल; सर्प = सर्प; अमृत = अमृत; इन्दु = चन्द्र; मृदुः = मृदु; कोमल = कोमल; हेरम्ब = हेरम्ब (गणेश); ब्रह्म = ब्रह्मा; विष्णु = विष्णु; महेश्वरः = महेश्वर — षष्ट्यंश-देवता सूची का अगला खंड।

हिन्दी भावार्थ सूची आगे बढ़ती है—अपांपति, मरुत्वान्, काल, सर्प, अमृत, इन्दु, मृदु, कोमल, हेरम्ब, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर। श्लोक 6.34–6.35 मिलकर षष्ट्यंश-अधिदेवों के प्रथम चौबीस नाम देते हैं; शेष नाम परंपरा में आगे के श्लोकों में आते हैं (इस बैच की सीमा यहीं)। गणना N से, नाम पाठ से—दोनों को मिलाकर ही D60 की शास्त्रीय संज्ञा पूरी होती है।

English rendering The roster continues: Apāṃpati, Marutvān, Kāla, Sarpa, Amṛta, Indu, Mṛdu, Komala, Heramba, Brahmā, Viṣṇu, and Maheśvara—completing, with 6.34, the first twenty-four ṣaṣṭyaṃśa deity-names of this recension’s list.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अधिदेव-सूची का विस्तार (नाम-कथन)। N = 13…24 पर ये नाम (विषम-राशि क्रम मानकर); सम-राशि पर उल्टी माला कई पाठों में—convention लिखकर ही बाँधें। फल शास्त्र का कथन है, भविष्य की गारंटी नहीं।

6.36
देवार्द्रौ कलिनाशश्च क्षितीशकमलाकरौ।
गुलिको मृत्युकालश्च दावाग्निर्घोरसंज्ञकः
devārdrau kalināśaśca kṣitīśakamalākarau|
guliko mṛtyukālaśca dāvāgnirghorasaṃjñakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देव = देवता (षष्ट्यंश-देवता क्र. 25); आर्द्र = आर्द्रा (क्र. 26); कलिनाश = कलह/पाप का नाशक (क्र. 27); क्षितीश = पृथ्वीपति (क्र. 28); कमलाकर = कमलधारी/श्री (क्र. 29); गुलिक = गुलिक/मान्दि (क्र. 30); मृत्यु = मृत्यु (क्र. 31); काल = यम/काल (क्र. 32); दावाग्नि = वन-अग्नि (क्र. 33); घोर-संज्ञक = "घोर" नामक (क्र. 34)। ये सब षष्ट्यंश (D60) के उपस्वामी-नाम हैं।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र षष्ट्यंश की साठ देवताओं की सूची को आगे बढ़ाता है — राशि के 25वें से 34वें अंश तक के स्वामी: देव, आर्द्रा, कलिनाश, क्षितीश, कमलाकर, गुलिक, मृत्यु, काल, दावाग्नि और घोर। ध्यान दें कि "देव", "काल" और "घोर" जैसे नाम सूची में पहले भी आ चुके हैं — साठ में कुछ नामों की पुनरावृत्ति स्वाभाविक है। इनमें कुछ सौम्य (देव, कमलाकर) और कुछ क्रूर (मृत्यु, दावाग्नि, घोर) कोटि के हैं — यही आगे श्लोक 41 के शुभ/क्रूर विभाजन का आधार बनता है।

English rendering The enumeration of the sixty ṣaṣṭyaṃśa (D60) lords continues — parts 25 to 34 of the sign: Deva, Ārdrā, Kalināśa, Kṣitīśa, Kamalākara, Gulika, Mṛtyu, Kāla, Dāvāgni and the one named Ghora.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — षष्ट्यंश-देवता-नामावली (वर्णन)। तकनीकी मर्म: प्रत्येक राशि (30°) को 60 समान खण्डों में बाँटने पर एक षष्ट्यंश = 30° ÷ 60 = 0°30′ = 30′ चाप; अतः ये नाम केवल शोभा-सूची नहीं, बल्कि 30′-परिशुद्धि पर ग्रह-स्थिति को टैग करने वाली अनुक्रमणिका (index 1…60) हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) षष्ट्यंश ज्योतिष का सूक्ष्मतम वर्ग (D60) है — हमारे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) में यह भी D1…D60 शृंखला की भाँति देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर-अंकगणित की एक नियतात्मक (deterministic) विभाजना है, जहाँ 0°30′ का प्रत्येक खण्ड एक निश्चित सूचकांक देता है। देवता-नाम व्याख्या है; सूचकांक गणना है — दोनों को हम अलग रखते हैं।

6.37
यमश्च कण्टकसुधाऽमृतौ पूर्णनिशाकरः।
विषदग्धकुलान्तश्च मुख्यो वंशक्षयस्तथा
yamaśca kaṇṭakasudhā'mṛtau pūrṇaniśākaraḥ|
viṣadagdhakulāntaśca mukhyo vaṃśakṣayastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यम = यम (क्र. 35); कण्टक = काँटा/कण्टक (क्र. 36); सुधा = अमृत-रस/सुधा (क्र. 37); अमृत = अमृत (क्र. 38); पूर्ण-निशाकर = पूर्ण चन्द्र (क्र. 39); विषदग्ध = विष से दग्ध (क्र. 40); कुलान्त = कुल का अन्त (क्र. 41); मुख्य = प्रधान/मुख्य (क्र. 42); वंशक्षय = वंश-क्षय (क्र. 43)। ये षष्ट्यंश-स्वामी क्र. 35–43 हैं।

हिन्दी भावार्थ साठ देवताओं की सूची क्रमशः बढ़ती है — 35वें से 43वें षष्ट्यंश तक: यम, कण्टक, सुधा, अमृत, पूर्ण-निशाकर, विषदग्ध, कुलान्त, मुख्य और वंशक्षय। यहाँ सौम्य (सुधा, अमृत, पूर्णचन्द्र) और अशुभ-सूचक (विषदग्ध, कुलान्त, वंशक्षय) नामों का मिश्रण स्पष्ट है — नाम स्वयं उस खण्ड के शुभ-अशुभ स्वभाव का संकेत देते हैं।

English rendering The list runs on for parts 35 to 43: Yama, Kaṇṭaka, Sudhā, Amṛta, the Full Moon (Pūrṇa-niśākara), Viṣadagdha, Kulānta, Mukhya and Vaṃśakṣaya.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — षष्ट्यंश-देवता-वर्णन। मर्म: नाम की "अमृत/सुधा" बनाम "विषदग्ध/वंशक्षय" कोटि केवल संज्ञा है — ग्रह किस षष्ट्यंश में पड़ा, यह तो 0°30′-चाप की शुद्ध गणना से ही तय होता है (देखें श्लोक 40 की उदाहरण-गणना)।

6.38
उत्पातकालसौम्याख्याः कोमलः शीतलाभिधः।
करालदंष्ट्रचन्द्रास्यौ प्रवीणः कालपावकः
utpātakālasaumyākhyāḥ komalaḥ śītalābhidhaḥ|
karāladaṃṣṭracandrāsyau pravīṇaḥ kālapāvakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्पात = उत्पात षष्ट्यंश; काल = काल षष्ट्यंश; सौम्य-आख्या = सौम्य-नामा षष्ट्यंश; कोमल = कोमल षष्ट्यंश; शीतल-अभिध = शीतल-नामा; कराल-दंष्ट्र = कराल-दंष्ट्र षष्ट्यंश; चन्द्रास्य = चन्द्र-मुख षष्ट्यंश; प्रवीण = प्रवीण षष्ट्यंश; काल-पावक = काल-अग्नि षष्ट्यंश।

हिन्दी भावार्थ उत्पात, काल और सौम्य — ये तीन नाम एक साथ गिनाए गए हैं। कोमल और शीतल नाम वाले खंड आते हैं। करालदंष्ट्र तथा चन्द्रास्य युग्म है; फिर प्रवीण और कालपावक। इस श्लोक में क्रूर-संज्ञाएँ (उत्पात, करालदंष्ट्र, कालपावक) और मृदु-संज्ञाएँ (सौम्य, कोमल, शीतल, चन्द्रास्य) बारी-बारी से आती हैं — षष्ट्यंश-गुण की विविधता का संकेत।

English rendering Next come Utpāta, Kāla, and the one called Saumya; then Komala and Śītala; then the pair Karāladamṣṭra and Candrāsya; then Pravīṇa and Kālapāvaka — mixed fierce and gentle labels in the later third of the sixty names.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-सूची। गणना की इकाई अपरिवर्तित: 1 षष्ट्यंश = 30° ÷ 60 = ½°; नाम केवल उस खंड-सूचकांक का पारंपरिक लेबल है।

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6.39
दण्डभृन्निर्मलः सौम्यः क्रूरोऽतिशीतलोऽमृतः।
पयोधिभ्रमणाख्यौ च चन्द्ररेखा त्वयुग्मपाः
daṇḍabhṛnnirmalaḥ saumyaḥ krūro'tiśītalo'mṛtaḥ|
payodhibhramaṇākhyau ca candrarekhā tvayugmapāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दण्डभृत् = दण्ड-धारी षष्ट्यंश; निर्मल = निर्मल षष्ट्यंश; सौम्य = सौम्य षष्ट्यंश; क्रूर = क्रूर षष्ट्यंश; अति-शीतल = अतिशीतल षष्ट्यंश; अमृत = अमृत षष्ट्यंश; पयोधि = समुद्र षष्ट्यंश; भ्रमण = भ्रमण षष्ट्यंश; चन्द्र-रेखा = चन्द्र-रेखा षष्ट्यंश; अयुग्म-पाः = विषम-राशि-स्वामी / ओज राशि पर (सीधा क्रम)।

हिन्दी भावार्थ सूची का अन्तिम खंड: दण्डभृत्, निर्मल, सौम्य, क्रूर, अतिशीतल, अमृत। पयोधि और भ्रमण — ये दोनों आख्याएँ; अन्त में चन्द्ररेखा। “त्वयुग्मपाः” — ये नाम-क्रम अयुग्म (विषम/ओज) राशियों के लिए है। यही साठ नामों की माला पूर्ण होती है; सम राशि पर व्यत्यय अगले श्लोक में स्पष्ट होगा।

English rendering Completing the roster: Daṇḍabhṛt, Nirmala, Saumya, Krūra, Atiśītala, Amṛta, Payodhi, Bhramaṇa, and Candrarekhā — and these are stated for the odd-sign (ayugma) order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षष्ट्यंश-खंड की मूल इकाई:
1 षष्ट्यंश = 30° / 60 = ½° = 30′.
ओज (विषम) राशि में नाम-क्रम सीधा: खंड-सूचकांक k = ⌊λ_rāśi / (½°)⌋ + 1, k ∈ {1…60}, नाम[k] ऊपर की माला से।
सम राशि का व्युत्क्रम-नियम श्लोक 6.40 में।

उदाहरण (worked example) मान लें मेष (ओज) में ग्रह-देशान्तर λ_rāśi = 12°40′ = 12.666…°।
k = ⌊12.666… / 0.5⌋ + 1 = ⌊25.333…⌋ + 1 = 25 + 1 = 26.
ओज-क्रम में 26वाँ नाम = आर्द्र (इस अध्याय की सूची के अनुसार, जहाँ देव ≈ 25, आर्द्र ≈ 26 — पाठ-भेद संभव यदि पूर्व-श्लोकों की गणना भिन्न हो)।
अयनांश: देशान्तर सायन/निरयण किसी भी पिन की गई पद्धति से; खंड-नियम स्वयं राशि-आन्तरिक है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोषडश-वर्ग इंजन में D60 = ṣaṣṭyāṃśa शुद्ध मॉड्युलर विभाजन है: 30° को 60 समान चापों में बाँटना। नाम-तालिका पाठ-आश्रित लेबल है; खंड-सूचकांक `==` से सत्यापित होता है — सहन-पट्टी नहीं।

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6.40
समे भे व्यत्ययाज्ज्ञेयाः षष्ट्यंशेशाः प्रकीर्तिताः।
षष्ट्यांशस्वामिनस्त्वोजे तदीशादव्यत्पयः समे
same bhe vyatyayājjñeyāḥ ṣaṣṭyaṃśeśāḥ prakīrtitāḥ|
ṣaṣṭyāṃśasvāminastvoje tadīśādavyatpayaḥ same

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समे भे = सम (युग्म) राशि में; व्यत्ययात् = उलटा क्रम से; ज्ञेयाः = जानने योग्य; षष्ट्यंश-ईशाः = षष्ट्यंश-स्वामी/अधिष्ठाता; प्रकीर्तिताः = कथित; षष्ट्यांश-स्वामिनः = षष्ट्यंश-स्वामी; तु ओजे = किन्तु विषम राशि में; तद्-ईशात् = उस (राशि) के ईश से / उस क्रम से; अव्यत्पयः (≈ अव्यत्यय / व्यत्यय-पाठ) = व्यत्यय-नियम; समे = सम राशि में।

हिन्दी भावार्थ सम राशि में षष्ट्यंश-ईश व्यत्यय (उलटा क्रम) से जाने जाते हैं — यह स्पष्ट नियम है। विषम (ओज) राशि में सीधा क्रम; सम में उलटा। दूसरे चरण का पाठ “तदीशादव्यत्पयः समे” संधि/पाठ-भेद से संदिग्ध हो सकता है (पाठ-भेद संभव), पर आशय स्थापित है: ओज = अनुलोम, सम = विलोम। इस श्लोक से षष्ट्यंश-मानचित्र का दिशा-नियम पूर्ण होता है।

English rendering The ṣaṣṭyāṃśa lords are to be known in reverse order in even signs; in odd signs the direct sequence applies, and in even signs the inversion — the directional rule for mapping the sixty names onto the sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- खंड-चौड़ाई: Δ = 30° / 60 = ½°.
- कच्चा सूचकांक: k₀ = ⌊λ_rāśi / Δ⌋ + 1 (1 ≤ k₀ ≤ 60).
- ओज राशि (1,3,5,7,9,11): k = k₀ → नाम[k] सीधी माला से।
- सम राशि (2,4,6,8,10,12): k = 61 − k₀ → नाम[k] (व्यत्यय)।
यही “व्यत्ययात् समे भे” का आधुनिक रूप है।

उदाहरण (worked example) वृष (सम) में λ_rāśi = 12°40′।
k₀ = ⌊12.666… / 0.5⌋ + 1 = 26.
k = 61 − 26 = 35 → सम-राशि पर 35वें स्थान का नाम (ओज-माला का 35वाँ: यम, सूची के अनुसार)।
सम्प्रदाय: राशि-गणना मेष=1…मीन=12; अयनांश केवल λ को निरयण/सायन बनाने में; ½° विभाजन अयनांश-निरपेक्ष है।

हमारा डिकोड (Our Decode) D60 इंजन में ओज/सम व्यत्यय घोषित सम्प्रदाय है — मौन विकल्प नहीं। खंड-सूचकांक और 61−k₀ व्युत्क्रम exact-`==` से बाँधे जाते हैं; षोषडश-वर्ग शृंखला (D1…D60) का यह अन्तिम समान-चाप वर्ग है।

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6.41
शुभषष्टयंशसंयुक्ता ग्रहाः शुभफलप्रदाः।
क्रूरषष्ट्यंशासंयुक्ता नाशयन्ति खचारिणः
śubhaṣaṣṭayaṃśasaṃyuktā grahāḥ śubhaphalapradāḥ|
krūraṣaṣṭyaṃśāsaṃyuktā nāśayanti khacāriṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-षष्ट्यंश-संयुक्ताः = शुभ षष्ट्यंश में स्थित; ग्रहाः = ग्रह; शुभ-फल-प्रदाः = शुभ फल देने वाले; क्रूर-षष्ट्यंश-संयुक्ताः = क्रूर षष्ट्यंश में स्थित; नाशयन्ति = नष्ट करते/हानि करते हैं; खचारिणः = आकाशचारी (ग्रह)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह शुभ-कोटि के षष्ट्यंश में पड़ें, वे शुभ फल के सूचक होते हैं, और जो क्रूर-कोटि के षष्ट्यंश में पड़ें, वे (परिणाम में) हानि की ओर संकेत करते हैं। यह D60 के परिणाम को शुभ/क्रूर द्विविध वर्गीकरण से जोड़ने वाला फल-कथन है।

English rendering The text states that planets tenanting an auspicious ṣaṣṭyaṃśa tend toward favourable results, while those in a cruel ṣaṣṭyaṃśa tend toward ruin — a claim of the śāstra about the D60 sub-division, not a fixed decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी अंश केवल इतना: प्रत्येक 60 षष्ट्यंश-नाम पर एक द्विआधारी टैग {शुभ, क्रूर} लगता है (जैसे अमृत/सुधा/सौम्य → शुभ; मृत्यु/विषदग्ध/करालदंष्ट्र → क्रूर); शेष "फल" शास्त्र का अपना कथन है, कोई निश्चित भविष्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक हमारी विभाजक-रेखा दिखाता है: षष्ट्यंश-सूचकांक की गणना (⌊2d⌋+1, व्युत्क्रम-नियम सहित) कठोर अंकगणित है; उस पर लगा शुभ/क्रूर टैग और उसका फल शास्त्र का दावा है। हम पहले वाले को इंजन में `==` से प्रमाणित करते हैं, दूसरे को "शास्त्र कहता है" के रूप में उद्धृत करते हैं — भय, नियति या निश्चयवाद के रूप में कभी नहीं।

6.42
वर्गभेदानहं वक्ष्ये मैत्रेय त्वं विधारय।
षड्‌वर्गाः सप्तवर्गाश्च दिग्वर्गा नृपवर्गकाः
vargabhedānahaṃ vakṣye maitreya tvaṃ vidhāraya|
ṣaḍ‌vargāḥ saptavargāśca digvargā nṛpavargakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ग-भेदान् = वर्ग-संयोगों के भेद; वक्ष्ये = मैं कहूँगा; मैत्रेय = हे मैत्रेय; विधारय = धारण करो/ध्यान से सुनो; षड्‌वर्गाः = छह-वर्ग (6) समूह; सप्तवर्गाः = सात-वर्ग (7); दिग्वर्गाः = दिक् = 10 → दस-वर्ग; नृपवर्गकाः = नृप = 16 → सोलह-वर्ग।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं — अब मैं वर्ग-भेद (वर्गों के संयोग से बनने वाली विशेष संज्ञाओं) का वर्णन करूँगा, इसे ध्यान से धारण करो। मुख्य वर्ग-समूह चार हैं: षड्वर्ग (6), सप्तवर्ग (7), दशवर्ग (दिग्वर्ग, 10) और षोडशवर्ग (नृपवर्ग, 16)।

English rendering "I shall now tell the varga-combinations, Maitreya — hold them in mind": the six-fold (ṣaḍvarga), the seven-fold (saptavarga), the ten-fold (digvarga) and the sixteen-fold (nṛpavarga) groupings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-डिकोड: दिक् = 10 (दस दिशाएँ), नृप = 16 (षोडश-वर्ग का पर्याय)। चार मानक वर्ग-योजनाएँ:
षड्वर्ग = 6 वर्ग · सप्तवर्ग = 7 · दिग्वर्ग = 10 · नृपवर्ग = 16।
इन्हीं में गिनकर ("कितने वर्गों में ग्रह स्व/उच्च/मित्र-राशि में है") आगे की किंशुक…श्रीवल्लभ संज्ञाएँ बनती हैं (श्लोक 43–51)।

उदाहरण (worked example) एक ग्रह के लिए यदि 16 में से गिनना हो, तो योजना = नृपवर्ग (नृप = 16); यदि केवल D1–D2–D3–D9–D12–D30 गिनें, तो वह षड्वर्ग (6)। संज्ञा उसी योजना की गणना-संख्या से तय होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारी षोडश-वर्ग शृंखला का शीर्ष-सूचक है — D1(राशि)…D60(षष्ट्यंश) के 16 चार्ट, जहाँ नृपवर्ग = 16 पूर्ण योजना है। हमारा वर्ग-इंजन इन्हीं 6/7/10/16 गणनाओं को नियतात्मक विभाजना के रूप में रखता है; "कितने वर्गों में बल" की गिनती ही श्लोक 50–51 की संज्ञाओं का इनपुट है।

6.43
भवन्ति वर्गसंयोगे षडवर्गे किंशुकादयः।
द्वाभ्यां किंशुकनामा च त्रिभिर्व्यञ्जनमुच्यते
bhavanti vargasaṃyoge ṣaḍavarge kiṃśukādayaḥ|
dvābhyāṃ kiṃśukanāmā ca tribhirvyañjanamucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ग-संयोगे = वर्गों के संयोग (एक ग्रह कई वर्गों में ससमान/सबल स्थिति में) में; षड्-वर्गे = षड्वर्ग-प्रणाली में (D1–D2–D3–D9–D12–D30 आदि की षट्-गणना); किंशुक-आदयः = किंशुक आदि नाम वाले योग; द्वाभ्याम् = दो वर्गों से; किंशुक-नामा = किंशुक नामक; त्रिभिः = तीन से; व्यञ्जनम् = व्यञ्जन (नाम)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वर्ग-संयोग देखा जाता है — अर्थात् एक ही ग्रह अनेक वर्गों में शुभ/समान स्थिति में बैठता है — तब षड्वर्ग-पद्धति में किंशुक आदि योग-संज्ञाएँ प्रवृत्त होती हैं। दो वर्गों में संयोग हो तो नाम किंशुक है; तीन में हो तो व्यञ्जन कहा जाता है। यह गणना फल-नामों की सूची का आरम्भ है, न कि किसी निश्चित भाग्य-निर्णय का दावा।

English rendering In the combination of divisional charts under the ṣaḍvarga scheme, the text states that yogas beginning with Kiṃśuka arise. With two (dignified) vargas the name is Kiṃśuka; with three it is called Vyañjana.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let \(N\) = संख्या of those ṣaḍvarga-charts in which the graha occupies the prescribed dignity (text’s class: own/exaltation etc. as defined for वर्गसंयोग). Mapping stated here: \(N = 2 \mapsto\) किंशुक; \(N = 3 \mapsto\) व्यञ्जन. (Exact dignity-set is convention-dependent; recensions differ on which signs count — पाठ-भेद संभव.)

उदाहरण (worked example) Convention: ṣaḍvarga = D1, D2, D3, D9, D12, D30; count only sva- or ucca-rāśi. Suppose Mars is in own sign in D1 and D9 only, not in the other four → \(N = 2\) → शास्त्रानुसार नाम = किंशुक। If also in D3 → \(N = 3\) → व्यञ्जन।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्वर्ग और षोडशवर्ग दोनों ही 30° राशि का नियत विभाजन हैं — D1…D60 का मॉड्यूलर आर्क-मैप। वर्ग-संयोग \(N\) का मान इन विभाजनों पर चलता है; इंजन पहले exact varga-longitude निकालता है, फिर गणनात्मक गणना से \(N\) गिनता है — फल-नाम शास्त्र का कथन रहता है, न कि स्वतः “भाग्य”।

6.44
चतुर्भिश्चामराख्यं च छत्रं पञ्चभिरेव च।
षड्‌भिः कुण्डलयोगः स्यान्मुकुटाख्यं च सप्तभिः
caturbhiścāmarākhyaṃ ca chatraṃ pañcabhireva ca|
ṣaḍ‌bhiḥ kuṇḍalayogaḥ syānmukuṭākhyaṃ ca saptabhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्भिः = चार से; चामर-आख्यम् = चामर नामक; छत्रम् = छत्र; पञ्चभिः एव = ठीक पाँच से; षड्भिः = छह से; कुण्डल-योगः = कुण्डल योग; मुकुट-आख्यम् = मुकुट नामक; सप्तभिः = सात से।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शृंखला आगे बढ़ती है। चार वर्ग-संयोग पर शास्त्र चामर नाम देता है; पाँच पर छत्र। छह पर कुण्डल-योग कहा जाता है; सात पर मुकुट। षड्वर्ग-प्रसंग में “सात” की उपस्थिति पाठानुसार गिनती की ऊपरी सीमा है — कुछ संस्करणों में गणन-विधि भिन्न हो सकती है (पाठ-भेद संभव)।

English rendering With four, the text names Cāmara; with five, Chatra. With six arises Kuṇḍala-yoga; with seven, Mukuṭa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Continuation of the same \(N\)-map under षड्वर्ग: \(N = 4 \mapsto\) चामर; \(N = 5 \mapsto\) छत्र; \(N = 6 \mapsto\) कुण्डल; \(N = 7 \mapsto\) मुकुट। षड्वर्ग में छह मुख्य वर्ग होते हैं; \(N = 7\) या तो विस्तारित गणना (जैसे लग्न-योग/अन्य अंश) या पाठ-भेद सूचित करता है — घोषित करें, मौन न चुनें।

उदाहरण (worked example) Same ṣaḍvarga set. Jupiter dignified in D1, D2, D3, D9, D12 → \(N = 5\) → छत्र। If also in D30 → \(N = 6\) → कुण्डल। (Dignity rule fixed before counting; change of rule changes \(N\).)

6.45
सप्तवर्गेऽथ दिग्वर्गे पारिजातादिसंज्ञकाः।
पारिजातं भवेद्‌द्वाभ्यामुत्तमं त्रिभिरुच्यते
saptavarge'tha digvarge pārijātādisaṃjñakāḥ|
pārijātaṃ bhaved‌dvābhyāmuttamaṃ tribhirucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्त-वर्गे = सप्तवर्ग में; अथ = फिर; दिक्-वर्गे = दिग्वर्ग / दशवर्ग (दिश् = 10) में; पारिजात-आदि-संज्ञकाः = पारिजात आदि नाम वाले; पारिजातम् = पारिजात; भवेत् द्वाभ्याम् = दो से हो; उत्तमम् = उत्तम; त्रिभिः उच्यते = तीन से कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब सप्तवर्ग और दिग्वर्ग (दश वर्ग) की संज्ञा-सूची खोलता है — पारिजात आदि नाम। दो वर्गों में संयोग हो तो पारिजात; तीन में उत्तम कहा जाता है। यह षड्वर्ग की किंशुक-शृंखला से भिन्न नाम-क्रम है; वर्ग-समूह बदलते ही नाम-तालिका बदलती है।

English rendering In the saptavarga and then in the digvarga (tenfold) schemes, the text assigns names beginning with Pārijāta. With two it is Pārijāta; with three it is called Uttama.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Separate map for \(N\) counted over the सप्तवर्ग set, and (next verses) over दिग्वर्ग = 10 vargas (दिश् = 10). Here: \(N = 2 \mapsto\) पारिजात; \(N = 3 \mapsto\) उत्तम। सप्तवर्ग-समुच्चय की सटीक सूची संस्करणानुसार भिन्न हो सकती है — पाठ-भेद संभव; \(N\) गिनने से पहले समुच्चय घोषित करें।

उदाहरण (worked example) Convention example for सप्तवर्ग: D1, D2, D3, D7, D9, D12, D30 (one common listing). Venus dignified only in D1 and D9 → \(N = 2\) → पारिजात। Add D7 → \(N = 3\) → उत्तम।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडशवर्ग-इंजन प्रत्येक Dn को 30°/n आर्क पर मापता है; सप्तवर्ग/दिग्वर्ग उसी परिवार की उपसमूह-गणनाएँ हैं। \(N\) = count(varga ∈ set ∧ dignity), exact `==` parity — नाम शास्त्र से, संख्या गणना से।

6.46
चतुर्भिर्गोपुराख्यं स्याच्छरौः सिंहासनं तथा।
पारावतं भवेत्‌ षड्‌भिर्देवलोकं च सप्तभिः
caturbhirgopurākhyaṃ syāccharauḥ siṃhāsanaṃ tathā|
pārāvataṃ bhavet‌ ṣaḍ‌bhirdevalokaṃ ca saptabhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्भिः = चार से; गोपुर-आख्यम् = गोपुर नामक; शरैः = बाणों से (= 5, भूतसंख्या); सिंहासनम् = सिंहासन; तथा = तथा; पारावतम् = पारावत; भवेत् षड्भिः = छह से हो; देवलोकम् = देवलोक; च सप्तभिः = और सात से।

हिन्दी भावार्थ पारिजात-क्रम आगे बढ़ता है। चार संयोग पर गोपुर; शर (= 5) पर सिंहासन। छह पर पारावत; सात पर देवलोक — शास्त्र यों नाम देता है। “शर” शब्द यहाँ बाण-भूतसंख्या से पाँच को कूट करता है।

English rendering With four it is called Gopura; with arrows (five) likewise Siṃhāsana. With six it becomes Pārāvata; with seven, Devaloka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: शर = 5। Map: \(N = 4 \mapsto\) गोपुर; \(N = 5 \mapsto\) सिंहासन; \(N = 6 \mapsto\) पारावत; \(N = 7 \mapsto\) देवलोक। Same \(N\)-definition as 6.45, over सप्त/दिग् वर्ग-set.

उदाहरण (worked example) Mercury dignified in four of the seven vargas → गोपुर। In five → सिंहासन। Numeric: if dignity vector = (1,1,1,0,1,0,1) over ordered सप्तवर्ग → \(N = 1+1+1+0+1+0+1 = 5\) → सिंहासन।

6.47
वसुभिर्ब्रह्मलोकाख्यं नवभिः शक्रवाहनम्‌।
दिग्भिः श्रीधामयोगः स्यादथ षोडशवर्गके
vasubhirbrahmalokākhyaṃ navabhiḥ śakravāhanam‌|
digbhiḥ śrīdhāmayogaḥ syādatha ṣoḍaśavargake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वसुभिः = वसुओं से (= 8); ब्रह्मलोक-आख्यम् = ब्रह्मलोक नामक; नवभिः = नौ से; शक्र-वाहनम् = शक्रवाहन (इन्द्र का वाहन); दिग्भिः = दिशाओं से (= 10); श्रीधाम-योगः = श्रीधाम योग; अथ = अब; षोडश-वर्गके = षोडशवर्ग में।

हिन्दी भावार्थ आठ (वसु) संयोग पर शास्त्र ब्रह्मलोक नाम देता है; नौ पर शक्रवाहन। दस (दिश्) पर श्रीधाम-योग कहा जाता है — यही दिग्वर्ग-शृंखला का शिखर है। तदनन्तर पाठ षोडशवर्ग की ओर मुड़ता है, जहाँ नई नाम-तालिका आरम्भ होगी।

English rendering With the Vasus (eight) it is named Brahmaloka; with nine, Śakravāhana. With the directions (ten) arises Śrīdhāma-yoga. Then [the text turns] to the ṣoḍaśa-varga scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: वसु = 8; दिश्/दिक् = 10। Map: \(N = 8 \mapsto\) ब्रह्मलोक; \(N = 9 \mapsto\) शक्रवाहन; \(N = 10 \mapsto\) श्रीधाम। \(N<sub>\max</sub>\) for दिग्वर्ग = 10; \(N = 10\) means dignity in every member of the tenfold set. Transition: next verses redefine the name-table for षोडशवर्ग (\(N\) over 16 charts).

उदाहरण (worked example) Under a fixed daśavarga list of 10, if the Sun is dignified in all ten → \(N = 10\) → श्रीधाम। If dignified in eight of ten → ब्रह्मलोक। Convention (which ten vargas) must be stated; change of list changes \(N\).

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडशवर्ग D1…D60 (D1, D2, D3, D4, D7, D9, D10, D12, D16, D20, D24, D27, D30, D40, D45, D60) — प्रत्येक 30° राशि का नियत n-खण्ड। श्रीधाम तक की \(N\)-तालिका दशवर्ग पर; अगला श्लोक उसी इंजन के सोलह-सदस्यीय समुच्चय पर नाम बदलता है।

6.48
भेदकं च भवेद्‌द्वाभ्यां त्रिभिः स्यात्‌ कुमुमाख्यकम्‌।
चतुर्भिर्नागपुष्पं स्यात्‌ पंचभिः कन्दुकाह्वयम्‌
bhedakaṃ ca bhaved‌dvābhyāṃ tribhiḥ syāt‌ kumumākhyakam‌|
caturbhirnāgapuṣpaṃ syāt‌ paṃcabhiḥ kandukāhvayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भेदकम् = भेदक; भवेत् द्वाभ्याम् = दो से हो; त्रिभिः = तीन से; कुमुम-आख्यकम् = कुमुम/कुमुद नामक (पाठ-भेद संभव); चतुर्भिः = चार से; नाग-पुष्पम् = नागपुष्प; पञ्चभिः = पाँच से; कन्दुक-आह्वयम् = कन्दुक नामक।

हिन्दी भावार्थ षोडशवर्ग में वर्ग-संयोग की संज्ञाएँ भिन्न हैं। दो पर भेदक; तीन पर कुमुम (कुमुद? — पाठ-भेद संभव)। चार पर नागपुष्प; पाँच पर कन्दुक। षड्वर्ग के किंशुक-क्रम और सप्त/दिग् के पारिजात-क्रम से यह तीसरी, स्वतंत्र नाम-तालिका है।

English rendering In the sixteen-varga scheme, with two it is Bhedaka; with three, Kumuma (reading may vary). With four, Nāgapuṣpa; with five, Kanduka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) New map over षोडशवर्ग set (\(M = 16\)): \(N = 2 \mapsto\) भेदक; \(N = 3 \mapsto\) कुमुम; \(N = 4 \mapsto\) नागपुष्प; \(N = 5 \mapsto\) कन्दुक। \(N \in \{0,\ldots,16\}\); names here cover low end. “कुमुम” reading contested in some manuscripts — पाठ-भेद संभव (कुमुद/कुसुम आदि)।

उदाहरण (worked example) षोडशवर्ग = the 16 of Ch.6. Saturn dignified in D1, D9, D10 only → \(N = 3\) → कुमुम। Add D4 and D12 → \(N = 5\) → कन्दुक। Use one ayanāṃśa throughout so longitudes (hence varga-lords) do not shift mid-count.

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडशवर्ग-इंजन प्रत्येक Dn को pure modular partition से निकालता है; \(N\) = cardinality of dignified subset — exact integer, no tolerance band. नाम शास्त्र की सूची से बाँधते हैं; गणित और फल-कथन अलग रखते हैं।

6.49
केरलाख्यं भवेत्‌ षड्‌भिः सप्तभिः कल्पवृक्षकम्‌।
अष्टभिश्चन्दनवं नवभिः पूर्णचन्द्रकम्‌
keralākhyaṃ bhavet‌ ṣaḍ‌bhiḥ saptabhiḥ kalpavṛkṣakam‌|
aṣṭabhiścandanavaṃ navabhiḥ pūrṇacandrakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केरल-आख्यम् = केरल नामक; भवेत् षड्भिः = छह से हो; सप्तभिः = सात से; कल्प-वृक्षकम् = कल्पवृक्ष; अष्टभिः = आठ से; चन्दन-वन् = चन्दनवन (पाठ: चन्दनवं); नवभिः = नौ से; पूर्ण-चन्द्रकम् = पूर्णचन्द्र।

हिन्दी भावार्थ षोडशवर्ग-नाम आगे बढ़ते हैं। छह संयोग पर केरल; सात पर कल्पवृक्ष। आठ पर चन्दनवन; नौ पर पूर्णचन्द्र — शास्त्र यों कहता है। यह शृंखला उच्चतर \(N\) (दस आदि) की ओर भी चल सकती है; प्रस्तुत पाठ यहाँ नौ तक नाम देता है।

English rendering With six it is named Kerala; with seven, Kalpavṛkṣa. With eight, Candanavana; with nine, Pūrṇacandra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Continuation: \(N = 6 \mapsto\) केरल; \(N = 7 \mapsto\) कल्पवृक्ष; \(N = 8 \mapsto\) चन्दनवन; \(N = 9 \mapsto\) पूर्णचन्द्र। Same \(N\) over the 16 vargas. Higher \(N\) (10…16) would need further verses/tables of the recension; do not invent names beyond the text.

उदाहरण (worked example) Moon dignified in 6 of 16 vargas → केरल। In 9 of 16 → पूर्णचन्द्र। Vector sum: if binary dignity mask has Hamming weight 8 → चन्दनवन। Fix: ayanāṃśa, dignity definition (sva only vs sva+ucca+mūlatrikoṇa), and the exact 16-list — then \(N\) is deterministic.

6.50
दिग्भिरुच्चैःश्रवा नाम रुद्रैर्धन्वन्तरिर्भवेत्‌।
सूर्यकान्तं भवेद्‌ सूर्यैर्विश्वैः स्याद्विद्रुमाख्यकम्‌
digbhiruccaiḥśravā nāma rudrairdhanvantarirbhavet‌|
sūryakāntaṃ bhaved‌ sūryairviśvaiḥ syādvidrumākhyakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिग्भिः = दिक्-संख्या १० (भुतासंख्य); उच्चैःश्रवा = षष्ट्यंश-नाम; रुद्रैः = रुद्र-संख्या ११; धन्वन्तरिः = षष्ट्यंश-नाम; सूर्यैः = सूर्य/आदित्य-संख्या १२; सूर्यकान्तम् = षष्ट्यंश-नाम; विश्वैः = विश्वेदेव-संख्या १३; विद्रुमाख्यम् = विद्रुम-नामक षष्ट्यंश।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक षष्ट्यंश (D60) की नाम-श्रेणी को आगे बढ़ाता है। शास्त्र कहता है कि दिग्-संख्या से युक्त अंश उच्चैःश्रवा कहलाता है, रुद्र-संख्या वाला धन्वन्तरि, सूर्य-संख्या वाला सूर्यकान्त, और विश्व-संख्या वाला विद्रुम। ये नाम राश्यांश के क्रमिक षष्ट्यंश-पदों के सूचक हैं, न कि अलग ग्रह-फल।

English rendering By the word-numeral dig (10) the division is named Ucchaiḥśravā; by rudra (11), Dhanvantari; by sūrya (12), Sūryakānta; by viśva (13), Vidruma. The verse continues the ordinal naming of the ṣaṣṭyaṃśa series.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षष्ट्यंश = 30° ÷ 60 = 0.5° = 30′ per aṃśa. Longitude within sign: λ_sign ∈ [0°, 30°); index k = ⌊λ_sign / 0.5°⌋ + 1, with k ∈ {1…60}. This verse assigns names to k = 10, 11, 12, 13: 10 → उच्चैःश्रवा, 11 → धन्वन्तरि, 12 → सूर्यकान्त, 13 → विद्रुम. (भुतासंख्य: दिक्=10, रुद्र=11, सूर्य=12, विश्व=13।)

उदाहरण (worked example) Convention: tropical or sidereal longitude reduced to rāśi-remainder (ayanāṃśa only shifts absolute λ; within-sign remainder is what D60 uses). Let Moon’s rāśi-longitude remainder = 5° 40′ = 5.666…°. Then k = ⌊5.666… / 0.5⌋ + 1 = ⌊11.333…⌋ + 1 = 12 → षष्ट्यंश-नाम = सूर्यकान्त (as this verse states for the twelfth).

हमारा डिकोड (Our Decode) षोড়श-वर्ग-शृंखला में D60 (षष्ट्यंश) को हमने 30° के समान 0.5° खंडों में माप्य विभाजन के रूप में स्थिर किया है—शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। नाम-तालिका पाठ-बद्ध है; इंजन खंड-सूचकांक k की गणना करता है, और यह श्लोक k = 10…13 के नाम देकर उसी श्रृंखला को जारी रखता है।

6.51
शक्रसिंहासनं शक्रैर्गोलोकं तिथिभिर्भवेत्‌।
भूपैः स्रीवल्लभाख्यं स्याद्वर्गा भेदैरुदाहृताः
śakrasiṃhāsanaṃ śakrairgolokaṃ tithibhirbhavet‌|
bhūpaiḥ srīvallabhākhyaṃ syādvargā bhedairudāhṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शक्रैः = शक्र/इन्द्र-संख्या १४; शक्रसिंहासनम् = षष्ट्यंश-नाम; तिथिभिः = तिथि-संख्या १५; गोलोकम् = षष्ट्यंश-नाम; भूपैः = भूप/नृप-संख्या १६; स्रीवल्लभाख्यम् = स्त्रीवल्लभ-नामक षष्ट्यंश (पाठ: स्री—पाठ-भेद संभव); वर्गाः = वर्ग/अंश-भेद; भेदैः = प्रकारों से; उदाहृताः = निर्दिष्ट/गिनाए गए।

हिन्दी भावार्थ चौदहवें षष्ट्यंश को शास्त्र शक्रसिंहासन कहता है, पंद्रहवें को गोलोक, और सोलहवें को स्त्रीवल्लभ। श्लोक के अंत में कहा गया है कि वर्गों के ये भेद इस प्रकार उदाहृत हुए—अर्थात् नाम-सूची का यह अंश यहीं तक विस्तारित/संकेतित है। नाम पाठ-परंपरा पर टिके हैं; अर्थ फल-निर्णय नहीं, पहचान-संज्ञा है।

English rendering By śakra (14) the aṃśa is Śakrasiṃhāsana; by tithi (15), Goloka; by bhūpa (16), Strīvallabha. Thus, the text states, the distinctions of these varga-divisions are set forth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Same D60 partition: k = ⌊λ_sign / 0.5°⌋ + 1. This verse maps k = 14, 15, 16 → शक्रसिंहासन, गोलोक, स्त्रीवल्लभ. भुतासंख्य: शक्र=14, तिथि=15, भूप=16. Closing clause vargā bhedair udāhṛtāḥ marks enumeration of the named distinctions, not a new numeric operator.

उदाहरण (worked example) Let Mars’ remainder in sign = 7° 10′ = 7.166…°. k = ⌊7.166… / 0.5⌋ + 1 = ⌊14.333…⌋ + 1 = 15 → गोलोक, as this verse assigns to the fifteenth ṣaṣṭyaṃśa.

हमारा डिकोड (Our Decode) D60 की गणना में हम नाम नहीं “अनुमान” करते—सूचकांक k पहले निर्धारित होता है, फिर पाठ की नाम-तालिका लगाई जाती है। 14–16 के ये पद उसी verified षोড়श-वर्ग ढाँचे (D1…D60) के अंतर्गत आते हैं; नाम-भेद संस्करणों में हो सकते हैं, खंड-चौड़ाई 0.5° नहीं।

6.52
स्वोच्चमूलत्रिकोणस्वभवनाधिपतेः शुभाः।
स्वारुढात्‌ केन्द्रनाथानां वर्गा ग्राह्याः सुधीमता
svoccamūlatrikoṇasvabhavanādhipateḥ śubhāḥ|
svāruḍhāt‌ kendranāthānāṃ vargā grāhyāḥ sudhīmatā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्च = स्व-उच्च राशि/स्थान; मूलत्रिकोण = मूलत्रिकोण-स्थान; स्वभवन = स्व-राशि/स्वगृह; आधिपतेः = (उनके) अधिपति के; शुभाः = शुभ माने गए; स्वारुढात् = स्व-आरूढ़ (आरूढ़-लग्न) से; केन्द्रनाथानाम् = केन्द्र-भावों के स्वामियों के; वर्गाः = वर्ग (अंश-फल/वर्गबल); ग्राह्याः = ग्रहणीय/स्वीकार्य; सुधीमता = बुद्धिमान ज्योतिषी द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो वर्ग स्वोच्च, मूलत्रिकोण अथवा स्वभवन से जुड़े अधिपति-संदर्भ में शुभ माने जाते हैं, तथा आरूढ़ से केन्द्रों के नाथों से उत्पन्न वर्ग—वे सुधी द्वारा ग्राह्य हैं। यह चयन-नियम है: किन वर्ग-योगों/वर्ग-बलों को विश्लेषण में प्रधानता दी जाए। फल का “गारंटी” दावा नहीं; पाठ की ग्राह्यता-सीमा है।

English rendering The text states that vargas associated with lords in their own exaltation, mūlatrikoṇa, or own sign—and the vargas of the lords of the kendras counted from one’s ārūḍha—are to be accepted by the wise. It is a criterion of which divisional indications are taken as reliable within the system.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कोई नया अंश-सूत्र नहीं—वर्ग-ग्राह्यता का नियम। कार्य-प्रवाह: (1) प्रत्येक ग्रह का D1-स्थान: स्व-उच्च / मूलत्रिकोण / स्वगृह जाँच; (2) आरूढ़-लग्न A से केन्द्र = भाव A, A+3, A+6, A+9 (मॉड 12); उनके अधिपतियों के वर्ग (ṣoḍaśa-varga फल/बल) grāhya माने जाएँ, जैसा शास्त्र कहता है। केन्द्र-गणना भाव-पद्धति (whole-sign vs quadrant) पर निर्भर—घोषित करें।

उदाहरण (worked example) Convention: whole-sign bhāvas; ārūḍha of Lagna = A = Siṃha (5). Kendras from A: 5, 8, 11, 2 → lords Sūrya, Maṅgala, Śani, Śukra (for standard lordship). If, say, Guru is in Dhanu (svabhavana) and also rules a chart factor under study, the text treats Guru-linked vargas among the śubha/grāhya set; vargas of those four kendra-lords from ārūḍha are likewise grāhya per this verse. (Exact D9/D10 etc. longitudes still use the ordinary varga maps.)

6.53
अस्तंगता ग्रहजिता नीचगा दुर्बलाश्च ये।
शयनादिगतास्तेभ्य उत्पन्ना योगनाशकाः
astaṃgatā grahajitā nīcagā durbalāśca ye|
śayanādigatāstebhya utpannā yoganāśakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्तंगताः = अस्त (सूर्य-निकट, combust) ग्रह; ग्रहजिताः = ग्रह-युद्ध में पराजित; नीचगाः = नीच राशि-गत; दुर्बलाः = बलहीन; शयनादि-गताः = शयन आदि (निद्रित) अवस्था में स्थित; तेभ्यः उत्पन्नाः = उनसे उत्पन्न (योग); योग-नाशकाः = योग को नष्ट करने वाले (निष्फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चेताता है कि जो ग्रह अस्तंगत, ग्रहयुद्ध-पराजित, नीचस्थ, बलहीन अथवा शयनादि अवस्था में हों — उनसे बनने वाले शुभ-योग भी "योगनाशक" कहे जाते हैं, अर्थात् अपना अभीष्ट फल देने में असमर्थ रह जाते हैं। यह पूर्वोक्त वर्ग-योगों के फल की एक शर्त/सीमा (qualifier) है।

English rendering Planets that are combust, defeated in planetary war, debilitated, weak, or sunk in "reclining" and similar states — the yogas arising from them, the text states, become yoga-destroyers, failing to yield their promised effect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-निषेध-शर्त (qualifier-कथन)। तकनीकी चेकलिस्ट (योग-भंग की शर्तें): {अस्तंगत (सूर्य-दूरी < अस्त-सीमा), ग्रहयुद्ध-पराजित, नीचस्थ, दुर्बल (बल < देय-सीमा), शयनादि-अवस्था} — इनमें से कोई भी सत्य होने पर योग "नाशक" घोषित; परिणाम शास्त्र का कथन है, कोई निश्चित भविष्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "दुर्बल" शब्द सीधे षड्बल से जुड़ता है — हमारी षड्बल-गणना (स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्, रूप-विरूप में; 1 रूप = 60 विरूप) प्रत्येक ग्रह का कुल बल एक प्रति-ग्रह देय-सीमा से तुलता है; "दुर्बल" = बल < सीमा एक शुद्ध संख्यात्मक निर्णय है। योग बना या "नाशक" हुआ — इसकी शर्त गणना है; उसका फल शास्त्र का कथन, जिसे हम भय या नियति नहीं, केवल "शास्त्र कहता है" कहकर रखते हैं।

षोडश-वर्ग — १६ विभाजन · अंश-मान = ३०°/nD1राशि30° प्रति-अंशD2होरा15° प्रति-अंशD3द्रेष्काण10° प्रति-अंशD4चतुर्थांश7.5° प्रति-अंशD7सप्तांश4.286° प्रति-अंशD9नवांश3.333° प्रति-अंशD10दशांश3° प्रति-अंशD12द्वादशांश2.5° प्रति-अंशD16षोडशांश1.875° प्रति-अंशD20विंशांश1.5° प्रति-अंशD24सिद्धांश1.25° प्रति-अंशD27भांश1.111° प्रति-अंशD30त्रिंशांश1° प्रति-अंशD40खवेदांश0.75° प्रति-अंशD45अक्षवेदांश0.6667° प्रति-अंशD60षष्ट्यंश0.5° प्रति-अंश
षोडश-वर्ग — the sixteen divisional charts (BPHS Ch.6). Each Dn partitions a 30° sign into n equal arcs (30°/n) and maps each arc to a sign by a stated rule — deterministic modular arithmetic on the longitude. D1 rāśi, D9 navāṃśa (30°/9 = 3°20′) and D60 ṣaṣṭyaṃśa (30°/60 = 0.5°) are the load-bearing ones.
अध्यायः 7

वर्गविवेकाध्यायः

43 श्लोक
7.1
अथ षोडशवर्गेषु विवेकं च वदाम्यहम्‌।
लग्ने देहस्य विज्ञानं होरायां सम्पदादिकम्‌
atha ṣoḍaśavargeṣu vivekaṃ ca vadāmyaham‌|
lagne dehasya vijñānaṃ horāyāṃ sampadādikam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरण-आरम्भ); षोडश-वर्गेषु = सोलह वर्गों (D1…D60) में; विवेकम् = विचार/विवेचन (कौन-सा वर्ग किसका कारक); वदामि अहम् = मैं (पराशर) कहता हूँ; लग्ने = D1 (राशि-चक्र) में; देहस्य विज्ञानम् = शरीर का ज्ञान; होरायाम् = D2 (होरा वर्ग) में; सम्पद्-आदिकम् = धन-सम्पत्ति आदि।

हिन्दी भावार्थ हे शिष्य, अब मैं सोलह वर्गों के विषय-विभाजन का विवेक कहता हूँ — कि किस वर्ग से किस विषय का निर्णय होता है। लग्न (D1) से देह अर्थात् शरीर-स्वरूप का ज्ञान होता है, और होरा (D2) से धन-सम्पत्ति आदि का। यह अध्याय वर्ग-कारकत्व की कुंजी है।

English rendering Now I shall declare the discrimination among the sixteen vargas: from the lagna (D1) the body is known, and from the horā (D2) wealth and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह विषय-नियुक्ति (कारक-निर्धारण) है; गणना अंतर्निहित वर्ग-विभाजन में है। D1 = पूर्ण राशि 30°; D2 (होरा) = 30° ÷ 2 = 15°00′ प्रति भाग। विषम राशि: प्रथम होरा (0°–15°) सूर्य की, द्वितीय (15°–30°) चन्द्र की; सम राशि में क्रम विपरीत। "देह/सम्पत्" कारकत्व शास्त्र का फल-निर्देश है — इसे शास्त्र का कथन मानें, भविष्यकथन नहीं।

उदाहरण (worked example) ग्रह 20° सिंह (विषम राशि) पर हो → 20° > 15° ⇒ द्वितीय होरा ⇒ चन्द्र-होरा में स्थित। यही D2-स्थान धन-विचार का आधार बनता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही षोडश-वर्ग योजना हमारे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) की रीढ़ है: D1(राशि)…D60(षष्ट्यंश) — प्रत्येक 30° राशि का एक निर्धारित (deterministic) समान-चाप विभाजन, देशांतर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित। यह श्लोक उस पूरी सूची का उद्घाटन-सूत्र है।

7.2
द्रेष्काणे भ्रातृजं सौख्यं तुर्यांशे भाग्यचिन्तनम्‌।
पुत्रपौत्रादिकानां चै चिन्तनं सप्तमांशके
dreṣkāṇe bhrātṛjaṃ saukhyaṃ turyāṃśe bhāgyacintanam‌|
putrapautrādikānāṃ cai cintanaṃ saptamāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्रेष्काणे = D3 (द्रेष्काण) में; भ्रातृजम् सौख्यम् = भाइयों-सम्बन्धी सुख; तुर्यांशे = D4 (चतुर्थांश) में; भाग्य-चिन्तनम् = भाग्य/समृद्धि का विचार; पुत्र-पौत्र-आदिकानाम् = पुत्र, पौत्र आदि संतति का; चिन्तनम् = विचार; सप्तमांशके = D7 (सप्तांश) में।

हिन्दी भावार्थ द्रेष्काण (D3) से भाइयों से मिलने वाले सुख का, चतुर्थांश (D4) से भाग्य/समृद्धि का, और सप्तांश (D7) से पुत्र-पौत्रादि संतति का विचार करना चाहिए। परम्परा में D4 प्रायः सुख/स्थावर से जुड़ा है — यहाँ मूल "भाग्य" पद है, अतः परम्परा-भेद संभव।

English rendering In the dreṣkāṇa (D3) the happiness derived from siblings; in the caturthāṃśa (D4) the reckoning of fortune; and in the saptāṃśa (D7) the consideration of children, grandchildren and their line.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-चाप: D3 = 30° ÷ 3 = 10°00′; D4 = 30° ÷ 4 = 7°30′; D7 = 30° ÷ 7 ≈ 4°17′08.57″। "भ्रातृ-सौख्य / भाग्य / पुत्र" कारकत्व शास्त्र-निर्दिष्ट फल-विषय हैं (गणितीय स्थिरांक नहीं) — इन्हें शास्त्र का कथन मानें।

उदाहरण (worked example) ग्रह 25° किसी राशि में → D3 सूचकांक = ⌊25 ÷ 10⌋ = 2 ⇒ तृतीय द्रेष्काण। यही D3-स्थान भ्रातृ-सुख-विचार का आधार बनता है।

7.3
नवमांशे कलत्राणां दशमांशे महत्फलम्‌।
द्वादशांशे तथा पित्रोश्चिन्तनं षोडशांशके
navamāṃśe kalatrāṇāṃ daśamāṃśe mahatphalam‌|
dvādaśāṃśe tathā pitrościntanaṃ ṣoḍaśāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवमांशे = D9 (नवांश) में; कलत्राणाम् = पत्नी/जीवनसाथी का; दशमांशे = D10 (दशांश) में; महत्-फलम् = महत् कर्म-फल (कर्मक्षेत्र/यश); द्वादशांशे = D12 (द्वादशांश) में; तथा पित्रोः = इसी प्रकार माता-पिता का; चिन्तनम् षोडशांशके = D16 (षोडशांश) में विचार (आगे)।

हिन्दी भावार्थ नवांश (D9) से पत्नी/दाम्पत्य का, दशांश (D10) से महत् कर्म-फल अर्थात् कर्मक्षेत्र व यश का, द्वादशांश (D12) से माता-पिता का विचार होता है; और षोडशांश (D16) में जिसका विचार है वह अगले श्लोक में कहा जाएगा।

English rendering In the navāṃśa (D9) the spouse; in the daśāṃśa (D10) the great fruit of action; likewise in the dvādaśāṃśa (D12) the parents; and the reckoning that belongs to the ṣoḍaśāṃśa (D16)…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-चाप: D9 = 30° ÷ 9 = 3°20′00″; D10 = 30° ÷ 10 = 3°00′; D12 = 30° ÷ 12 = 2°30′; D16 = 30° ÷ 16 = 1°52′30″। कारकत्व (कलत्र/कर्म/पितृ) शास्त्र का फल-निर्देश है।

उदाहरण (worked example) ग्रह 10° मेष (चर राशि) पर; D9-चाप = 3°20′; सूचकांक = ⌊10 ÷ 3.3333⌋ = 3 ⇒ चौथा नवांश। चर राशि का नवांश-आरम्भ स्वराशि से (मेष→मेष,वृष,मिथुन,कर्क…) ⇒ चौथा = कर्क। अतः 10° मेष का नवांश = कर्क (परम्परा: चर स्वराशि से, स्थिर 9वें से, द्विस्वभाव 5वें से)।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवांश (D9) — दाम्पत्य व सूक्ष्म-बल का प्रमुख वर्ग — हमारे वर्ग-इंजन में उसी समान-चाप नियम से निकलता है: कोई अनुमान नहीं, केवल देशांतर पर 3°20′ की मॉड्युलर गणना और चर/स्थिर/द्विस्वभाव आरम्भ-नियम। घोषित convention के बिना कोई नवांश-संख्या स्वीकार्य नहीं।

7.4
सुखाऽसुखस्य विज्ञानं वाहनानां तथैव च।
उपासनाया विज्ञानं साध्यं विंशतिभागके
sukhā'sukhasya vijñānaṃ vāhanānāṃ tathaiva ca|
upāsanāyā vijñānaṃ sādhyaṃ viṃśatibhāgake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख-असुखस्य विज्ञानम् = सुख-दुःख का ज्ञान; वाहनानाम् = वाहनों का; तथैव च = वैसे ही; उपासनायाः विज्ञानम् = उपासना/इष्ट-आराधना का ज्ञान; साध्यम् = साधने योग्य/निश्चेय; विंशति-भागके = D20 (विंशांश) में।

हिन्दी भावार्थ (पूर्व-श्लोक से जुड़कर) षोडशांश (D16) से सुख-दुःख तथा वाहनों का ज्ञान होता है; और विंशांश (D20) से उपासना अर्थात् इष्ट-आराधना/आध्यात्मिक साधना का विचार सिद्ध करना चाहिए।

English rendering (In the D16) the knowledge of comfort and discomfort and of vehicles; and in the viṃśāṃśa (D20) the knowledge of devotional practice is to be ascertained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-चाप: D16 = 30° ÷ 16 = 1°52′30″; D20 = 30° ÷ 20 = 1°30′00″। "सुख-दुःख/वाहन/उपासना" कारकत्व शास्त्र-कथित फल-विषय हैं — गणितीय स्थिरांक नहीं; इन्हें शास्त्र का कथन मानें, कोई नियति-दावा नहीं।

उदाहरण (worked example) ग्रह 5° किसी राशि में → D20-चाप = 1°30′; सूचकांक = ⌊5 ÷ 1.5⌋ = 3 ⇒ चौथा विंशांश। यही D20-स्थान उपासना-विचार का आधार।

7.5
विद्याया वेदबाह्वंशे भांशे चैव बलाऽबलम्‌।
त्रिंशांशके रिष्टफलं खवेदांशे शुभाऽशुभम्‌
vidyāyā vedabāhvaṃśe bhāṃśe caiva balā'balam‌|
triṃśāṃśake riṣṭaphalaṃ khavedāṃśe śubhā'śubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्यायाः = विद्या/शिक्षा का; वेद-बाहु-अंशे = वेद(4)+बाहु(2) ⇒ D24 (चतुर्विंशांश/सिद्धांश) में; भांशे = भ(=नक्षत्र 27) ⇒ D27 (भांश/नक्षत्रांश) में; बल-अबलम् = बल-निर्बलता; त्रिंशांशके = D30 (त्रिंशांश) में; रिष्ट-फलम् = अनिष्ट/आरिष्ट फल; ख-वेद-अंशे = ख(0)+वेद(4) ⇒ D40 (खवेदांश) में; शुभ-अशुभम् = शुभ-अशुभ।

हिन्दी भावार्थ चतुर्विंशांश (D24) से विद्या का, नक्षत्रांश (D27) से बल-निर्बलता का, त्रिंशांश (D30) से आरिष्ट/अनिष्ट फल का, और खवेदांश (D40) से शुभ-अशुभ का विचार होता है। यहाँ संख्याएँ भूतसंख्या (शब्द-अंक) में निबद्ध हैं।

English rendering In the caturviṃśāṃśa (D24) learning; in the nakṣatrāṃśa (D27) strength and weakness; in the triṃśāṃśa (D30) misfortune; and in the khavedāṃśa (D40) the auspicious and inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-विकोडन (अङ्कानां वामतो गतिः — प्रथम पद = इकाई): वेद-बाहु = इकाई 4, दहाई 2 ⇒ 24 (D24); भ = नक्षत्र-संख्या 27 (D27); ख-वेद = इकाई 0, दहाई 4 ⇒ 40 (D40)। चाप: D24 = 30°÷24 = 1°15′; D27 = 30°÷27 = 1°06′40″; D40 = 30°÷40 = 0°45′। विशेष: D30 (त्रिंशांश) समान-चाप नहीं है — विषम राशि में मंगल5°|शनि5°|गुरु8°|बुध7°|शुक्र5° (योग = 5+5+8+7+5 = 30), सम राशि में क्रम विपरीत। अतः D30 = 30°÷30 = 1° लिखना भ्रान्ति होगी।

उदाहरण (worked example) विषम राशि में ग्रह 26° पर → त्रिंशांश-सीमाएँ 0–5(मंगल),5–10(शनि),10–18(गुरु),18–25(बुध),25–30(शुक्र)। 26° ∈ (25°,30°] ⇒ शुक्र का त्रिंशांश ⇒ आरिष्ट-विचार शुक्र-स्वामित्व से।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उसी अनुशासन को माँगता है जिस पर हमारा oracle टिका है — शब्द-अंक (bhūtasaṃkhyā) को अंक-सत्य रूप से खोलना: वेद-बाहु → 24, ख-वेद → 40, digit-faithful, कोई "लगभग" नहीं। और D30 का असम विभाजन दिखाता है कि हर वर्ग को उसके अपने नियम से गिनना होता है — यहीं exact-`==` जाँच (tolerance-band नहीं) एक चुपचाप की गयी convention-गलती को पकड़ लेती है।

7.6
अक्षवेदांशके चैव षष्ट्यंशेऽखिलमीक्षयेत्‌।
यत्र कुत्रापि सम्प्राप्तः क्रूरषष्ट्यंशकाधिपः
akṣavedāṃśake caiva ṣaṣṭyaṃśe'khilamīkṣayet‌|
yatra kutrāpi samprāptaḥ krūraṣaṣṭyaṃśakādhipaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अक्ष-वेद-अंशके = अक्षवेदांश (D45) में; च एव = और भी; षष्ट्यंशे = षष्ट्यंश (D60) में; अखिलम् ईक्षयेत् = समस्त को देखे; यत्र कुत्र अपि = जहाँ कहीं भी; सम्प्राप्तः = प्राप्त हो; क्रूर-षष्ट्यंश-काधिपः = क्रूर षष्ट्यंश का अधिपति।

हिन्दी भावार्थ अक्षवेदांश (D45) और षष्ट्यंश (D60) में शास्त्र “अखिल” — सम्पूर्ण — के अवलोकन का निर्देश देता है; विशेषतः षष्ट्यंश सूक्ष्मतम वर्ग माना गया। दूसरी पंक्ति आरम्भ करती है: जहाँ कहीं क्रूर-षष्ट्यंश का अधिपति प्राप्त हो… — वाक्य यहाँ अधूरा लगता है; फल-समाप्ति इस पाठ-खंड में नहीं दी गई। पाठ-भेद / आगे का श्लोक-अनुबन्ध संभव; अनुमान से फल न जोड़ें।

English rendering In the akṣavedāṃśa (D45) and the ṣaṣṭyaṃśa (D60) one should examine the whole. The text then opens a clause: wherever the lord of a cruel ṣaṣṭyaṃśa is obtained… — the apodosis is not completed in this verse of the present recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भौतसंख्‍या-डिकोड:
- अक्षवेद = अक्ष (5) + वेद (4) → 45 → D45; चाप = 30° ÷ 45 = 0°40′
- षष्ट्यंश = 60 → D60; चाप = 30° ÷ 60 = 0°30′

D60 = षोडश-वर्ग-श्रृंखला का सूक्ष्मतम सदस्य (इस पाठ की 16-वर्ग सूची में)। “क्रूरषष्ट्यंशकाधिप” का फल-वाक्य इस श्लोक में अपूर्ण — गणितीय स्थिरांक नहीं, अपितु अपूर्ण फल-सूत्र।

उदाहरण (worked example) राशि-अंश λ_r = 8°10′। D60-खंड = ⌊8°10′ ÷ 0°30′⌋ = ⌊8.166… ÷ 0.5⌋ = ⌊16.333…⌋ = 16 → 17वाँ षष्ट्यंश (0-आधारित 16)। प्रत्येक षष्ट्यंश का स्वामी-नाम और क्रूर/सौम्य वर्गीकरण पाठ/परम्परा-सारिणी पर निर्भर (च.6/परिशिष्ट); यहाँ केवल चाप-सूचकांक निश्चित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) D45 और D60 षोडश-वर्ग-इंजन के अन्तिम सदस्य हैं — D60 = 0°30′ का समान विभाजन, शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। “अखिलमीक्षयेत्” को इंजन “पूर्ण सूक्ष्म-वर्ग-दृष्टि” के रूप में पढ़ता है, न कि अतिरिक्त फल-सूत्र के रूप में। अपूर्ण क्रूर-षष्ट्यंश-वाक्य पर फल गढ़ा नहीं जाता — जो श्लोक में नहीं, वह डिकोड में नहीं।

7.7
तत्र नाशो न सन्दे हो गर्गादीनां वचो यथा।
यत्र कुत्रापि सम्प्राप्तः कलांशाधिपतिः शुभः
tatra nāśo na sande ho gargādīnāṃ vaco yathā|
yatra kutrāpi samprāptaḥ kalāṃśādhipatiḥ śubhaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = वहाँ, उस (पूर्व-श्लोक की) स्थिति में; नाशः = नाश/हानि; न सन्देहः (पाठ "सन्दे हो" = सन्देहो) = सन्देह नहीं; गर्गादीनां वचः यथा = जैसा गर्ग आदि आचार्यों का वचन है; यत्र कुत्रापि = जहाँ कहीं भी; सम्प्राप्तः = स्थित; कलांशाधिपतिः = कलांश (षोडशांश, D16) का अधिपति; शुभः = शुभ ग्रह (हो तो)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस स्थिति में नाश निःसन्देह है, ऐसा गर्ग आदि आचार्यों का वचन है; किन्तु जहाँ कहीं भी कलांश का अधिपति शुभ ग्रह हो — (वाक्य अगले श्लोक में पूर्ण होता है, जहाँ इस शुभत्व का फल कहा गया है)। वर्ग-विवेक अध्याय का यह पद वर्गेशों के बल-अबल से फल के घटने-बढ़ने की चर्चा का अंश है; पाठ-भेद संभव।

English rendering There, the text says, loss is beyond doubt — such is the word of Garga and the others; yet wherever the lord of the kalāṃśa (the sixteenth division) is found to be a benefic — (the sentence is completed in the following verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्ग-विवेक का कथन (आचार्य-प्रमाण + शर्त)। सन्दर्भ-माप: कलांश/षोडशांश D16 = 30° ÷ 16 = 1°52′30″ प्रति खण्ड; अधिपति-क्रम 6.x के षोडशांश-नियम से।

7.8
तत्र वृद्धिश्च पुष्टिश्च गर्गादिनां वचो यथा।
इति षोडशवर्गाणां भेदास्ते प्रतिपादिताः
tatra vṛddhiśca puṣṭiśca gargādināṃ vaco yathā|
iti ṣoḍaśavargāṇāṃ bhedāste pratipāditāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उन (षोडश-वर्गों में); वृद्धि = वृद्धि / विस्तार; पुष्टि = पोषण / सम्पन्नता; गर्गादिनां = गर्ग आदि आचार्यों के; वचो यथा = वचन के अनुसार; इति = इस प्रकार; षोडशवर्गाणां = सोलह वर्गों के; भेदाः = भेद / विभाग; प्रतिपादिताः = प्रतिपादित कर दिए गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इन वर्ग-भेदों में वृद्धि और पुष्टि आदि फल गर्ग आदि पूर्व-आचार्यों के वचन के अनुरूप समझे जाएँ। इसी के साथ षोडश-वर्गों के भेदों का प्रतिपादन पूर्ण माना गया है। यह श्लोक अध्याय के वर्ग-विवेचन को बंद करता है और फल-व्याख्या को गुरु-परम्परा से जोड़ता है।

English rendering The text states that increase and nourishment (vṛddhi and puṣṭi) in those vargas are to be taken as per the words of Garga and the other authorities. Thus the distinctions of the sixteen divisional charts have been set forth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्ग-अध्याय का समापन-कथन। यहाँ कोई नयी विभाजन-विधि नहीं; यह षोडश-वर्ग-भेदों के प्रतिपादन की समाप्ति और फल-व्याख्या का गुरु-वचन-संकेत है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग-योजना (D1…D60) का पूर्ण प्रतिपादन अध्याय ६–७ में स्थिर किया गया है; प्रत्येक वर्ग ३०° राशि का नियत-आर्क विभाजन है। इस श्लोक के बाद गणना-धारा वर्ग-विभाग से वर्ग-बल (विंशोपक) की ओर मुड़ती है — वही क्रम हमारे वर्ग-इंजन में भी रखा गया है।

7.9
उदयादिषु भावेषु खेटस्य भवनेषु वा।
वर्गविंशोपकं वीक्ष्य ज्ञेयं तेषां शुभाऽशुभम्‌
udayādiṣu bhāveṣu kheṭasya bhavaneṣu vā|
vargaviṃśopakaṃ vīkṣya jñeyaṃ teṣāṃ śubhā'śubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उदयादिषु = लग्न आदि से आरम्भ; भावेषु = भावों में; खेटस्य = ग्रह के; भवनेषु वा = अथवा भाव-स्थानों में; वर्गविंशोपकं = वर्ग-विंशोपक (२०-अंक बल); वीक्ष्य = देखकर; ज्ञेयं = जानना चाहिए; तेषां = उनका; शुभाऽशुभम् = शुभ-अशुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न से आरम्भ होने वाले भावों में, अथवा ग्रह के भवनों (राशि/भाव-स्थितियों) में, वर्ग-विंशोपक को देखकर ही उन स्थानों का शुभ-अशुभ जाना जाए। केवल एक वर्ग पर्याप्त नहीं; बहु-वर्ग-बल का एकीकृत माप ही निर्णय का आधार है। यह विंशोपक-पद्धति का प्रयोजन-सूत्र है।

English rendering In the houses counted from the rising lagna, or in the houses occupied by the planet, the auspicious and inauspicious indications are to be known by examining the varga-viṃśopaka. The text thus makes the twenty-point divisional strength the practical gauge of śubha and aśubha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोपक = २०-बिन्दु मापनी पर वर्ग-बल का योग। सामान्य रूप: यदि प्रत्येक प्रासंगिक वर्ग में ग्रह को भार wᵢ (पूर्ण/अंश) मिले, तो
V = Σ wᵢ, जहाँ अधिकतम V = २० (पूर्ण विंशोपक)।
शुभ-अशुभ-निर्णय इस V (और भाव/ग्रह-संदर्भ) पर आधारित कहा गया है — यह फल-निर्धारण का माप है, न कि स्वयं फल।

उदाहरण (worked example) मान लें षोडश-वर्ग-विंशोपक में किसी ग्रह को १२ वर्गों में पूर्ण भार और शेष में आधा मिले, तो V ≈ १२×(२०/१६) + ४×(१०/१६) ≈ १५ + २.५ = १७.५ / २० (भार-योजना पाठ/परम्परा-सापेक्ष; पाठ-भेद संभव)। लग्न-चतुर्थ में यह V उच्च हो तो शास्त्र उसे उस भाव के शुभ-संकेत का बल मानता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग (D1, D2 horā, D3…D60) प्रत्येक deterministic modular partition हैं; विंशोपक उन्हीं वर्ग-स्थितियों का भारित योग है। गणना-पक्ष (वर्ग-आर्क) और फल-पक्ष (शुभाशुभ) को अलग रखना हमारी मूल अनुशासन-रेखा है।

7.10
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि वर्गविंशोपकं बलम्‌।
यस्य विज्ञानमार्तेण विपाकं दृष्टिगोचरम्‌
athātaḥ sampravakṣyāmi vargaviṃśopakaṃ balam‌|
yasya vijñānamārteṇa vipākaṃ dṛṣṭigocaram‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ अतः = अब इसके अनन्तर; सम्प्रवक्ष्यामि = भलीभाँति कहूँगा; वर्ग-विंशोपकम् बलम् = वर्ग-विंशोपक बल; यस्य विज्ञानम् = जिसके ज्ञान से; (मात्रेण — पाठ-भेद: "आर्तेण") = मात्र से; विपाकम् = फल-परिपाक/परिणाम; दृष्टि-गोचरम् = दृष्टि के समक्ष (स्पष्ट)।

हिन्दी भावार्थ अब मैं वर्ग-विंशोपक बल कहूँगा, जिसके ज्ञान-मात्र से फल का परिपाक (कब-कैसे फल पकेगा) दृष्टि-गोचर, अर्थात् स्पष्ट, हो जाता है। "आर्तेण" पाठ संदिग्ध है; संभवतः "मात्रेण" (केवल जानने-मात्र से) — अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering Now, hereafter, I shall fully declare the varga-viṃśopaka strength, by the mere knowing of which the ripening of results becomes evident to the eye.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) घोषणा-श्लोक — स्वयं में गणना नहीं, अपितु आगामी विंशोपक-बल-विधि की प्रतिज्ञा। "विपाक दृष्टि-गोचर" का तात्पर्य: विंशोपक (0…20) एक तुलनीय संख्या देता है जिससे फल-प्रबलता आँकी जाती है — यह शास्त्र का दावा है (कि विधि से फल-परिपाक स्पष्ट होता है), स्वयं नियति-कथन नहीं।

7.11
गृहविंशोपकं वीक्ष्यं सूर्यादीनां खचारिणाम्‌।
स्वगृहोच्चे बलं पूर्णं शून्यं तत्सप्तमस्थिते
gṛhaviṃśopakaṃ vīkṣyaṃ sūryādīnāṃ khacāriṇām‌|
svagṛhocce balaṃ pūrṇaṃ śūnyaṃ tatsaptamasthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृह-विंशोपकम् = राशि/क्षेत्र-विंशोपक (D1-आधारित वर्ग-बल); वीक्ष्यम् = देखने योग्य; सूर्य-आदीनाम् खचारिणाम् = सूर्य आदि आकाशचारी ग्रहों का; स्व-गृह-उच्चे = स्वराशि अथवा उच्च में; बलम् पूर्णम् = पूर्ण बल (= 20); शून्यम् = शून्य (= 0); तत्-सप्तम-स्थिते = उससे सातवें (अर्थात् नीच/सम्मुख) में स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य आदि ग्रहों का गृह-विंशोपक (राशि-वर्ग-बल) इस प्रकार देखें — ग्रह जब स्वराशि या उच्च में हो तो उसका बल पूर्ण (बीस) होता है, और उससे सातवें स्थान (अर्थात् नीच/सम्मुख बिंदु) में हो तो शून्य होता है। यही विंशोपक का आधार-नियम है।

English rendering The domicile-viṃśopaka of the planets, Sun and the rest, is to be seen thus: in own-sign or exaltation the strength is full (20), and when placed in the seventh therefrom it is zero.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वि-अन्त बिंदु: बल = 20 (पूर्ण) पर स्व-गृह/उच्च; बल = 0 (शून्य) पर उससे 7वाँ भाव (= नीच / 180° सम्मुख)। अर्थात् विंशोपक-मान का परास [0, 20] दो नियत लंगर-बिंदुओं से बँधा है — उच्च-बिंदु ↔ 20, नीच-बिंदु (उच्च से 7वाँ) ↔ 0। मध्यवर्ती मान अगले श्लोक (7.12) में अनुपात से।

उदाहरण (worked example) सूर्य उच्च = मेष 10° (परम-उच्च) ⇒ गृह-विंशोपक = 20 (पूर्ण)। सूर्य तुला में (मेष से 7वाँ = नीच) ⇒ गृह-विंशोपक = 0 (शून्य)। दोनों नियत लंगर हैं जिनके बीच शेष राशियों का मान प्रक्षेपित होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे "गणित को व्याख्या से अलग रखो" अनुशासन का शुद्ध उदाहरण है — पूर्ण = ठीक 20, शून्य = ठीक 0, कोई tolerance-band नहीं। वही exact-`==` नीति जो अष्टकवर्ग-oracle (Ch.66: सूर्य 48…SAV 337) में एक असली −1 को tolerance-छूट से बचाकर पकड़ती है, यहाँ भी लागू है: लंगर-बिंदु सटीक होने चाहिए, "लगभग पूर्ण" स्वीकार्य नहीं।

7.12
ग्रहस्थितिवशाज्ज्ञेयं द्विराश्यधिपतिस्तथा।
मध्येऽनुपाततो ज्ञेयं ओजयुग्मर्क्षभेदतः
grahasthitivaśājjñeyaṃ dvirāśyadhipatistathā|
madhye'nupātato jñeyaṃ ojayugmarkṣabhedataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-स्थिति-वशात् = ग्रह की स्थिति के अनुसार; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्वि-राशि-अधिपतिः तथा = तथा दो राशियों का स्वामी (होने की स्थिति) भी; मध्ये = (उच्च व नीच के) बीच में; अनुपाततः ज्ञेयम् = अनुपात से जानना चाहिए; ओज-युग्म-ऋक्ष-भेदतः = विषम-सम राशि के भेद से।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की स्थिति के अनुसार, तथा जो ग्रह दो राशियों का स्वामी है उसकी दशा को भी ध्यान में रखकर, उच्च (पूर्ण) और नीच (शून्य) के बीच का विंशोपक-मान अनुपात (रेखिक प्रक्षेप) से निकालना चाहिए — और वह भी विषम-सम राशि के भेद के अनुसार।

English rendering According to the planet's position — and likewise its lordship of two signs — the intermediate value between full and zero is to be known by proportion, with due distinction of odd and even signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मध्य-मान = रेखिक अनुपात (anupāta)। यदि उच्च-बिंदु से ग्रह का कोणीय अन्तर d हो (0° → उच्च, 180° → नीच), तो विंशोपक ≈ 20 × (180° − d) ÷ 180° = 20 × (1 − d/180°)। अर्थात् d = 0° ⇒ 20; d = 90° ⇒ 10; d = 180° ⇒ 0 — पूर्व-श्लोक के दो लंगरों के बीच सीधी रेखा। "ओज-युग्म भेद" व द्वि-राशि-स्वामित्व मान को समायोजित करते हैं (विषम/सम राशि के अनुसार अभिमुखीकरण)।

उदाहरण (worked example) सूर्य का उच्च मेष 10°; सूर्य मिथुन 10° पर ⇒ उच्च-बिंदु से चाप-अन्तर d ≈ 60°; विंशोपक ≈ 20 × (1 − 60/180) = 20 × (2/3) ≈ 13.33। (convention: उच्च-देशांश से रेखिक अनुपात; ओज-युग्म समायोजन घोषित करके ही अंतिम मान लें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) अनुपात-नियम एक deterministic रेखिक फलन है — इनपुट (उच्च-अन्तर, ओज/युग्म, द्वि-राशि-स्वामित्व) निश्चित हों तो आउटपुट एक ही आता है। यही हमारी पद्धति है: पहले convention (उच्च-देशांश, विषम/सम अभिमुखता) घोषित करो, फिर मान गिनो — ताकि कोई भी पुनरुत्पादन (reproduce) करके ठीक वही संख्या पा सके, "करीब-करीब" नहीं।

7.13
सूर्यहोराफलं दद्युर्जीवार्कवसुधात्मजाः।
चन्द्रास्फुजिदर्कपुत्राश्चन्द्रहोराफलप्रदाः
sūryahorāphalaṃ dadyurjīvārkavasudhātmajāḥ|
candrāsphujidarkaputrāścandrahorāphalapradāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यहोराफलं = सूर्य-होरा का फल; दद्युः = दें; जीव = बृहस्पति; अर्क = सूर्य; वसुधात्मजाः = मंगल (पृथ्वी-पुत्र); चन्द्र = चन्द्र; आस्फुजित् = शुक्र; अर्कपुत्राः = शनि; चन्द्रहोराफलप्रदाः = चन्द्र-होरा का फल देने वाले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु, सूर्य और मंगल सूर्य-होरा का फल देते हैं; चन्द्र, शुक्र और शनि चन्द्र-होरा का फल देते हैं। अर्थात् इन ग्रहों की शुभ-अभिव्यक्ति उस होरा-अर्ध में बलवती मानी गई है जिससे वे जुड़े हैं। यह D2 (होरा) के फल-संयोग का ग्रह-वर्गीकरण है।

English rendering Jupiter, the Sun, and Mars are said to yield the result of the solar horā; the Moon, Venus, and Saturn yield the result of the lunar horā. The text thus assigns each non-Mercury planet to one of the two horā fruits.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) होरा (D2) = ३०° राशि ÷ २ = १५° अर्ध।
मानक विभाजन (परम्परा-स्थिर, ओज-युग्म सहित):
• विषम राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ): ०°–१५° = सूर्य-होरा; १५°–३०° = चन्द्र-होरा
• सम राशि (वृष…मीन): ०°–१५° = चन्द्र-होरा; १५°–३०° = सूर्य-होरा
फल-मानचित्र (शास्त्र-कथन):
{गुरु, सूर्य, मंगल} → सूर्य-होरा-फल
{चन्द्र, शुक्र, शनि} → चन्द्र-होरा-फल
बुध अगले श्लोक में।

उदाहरण (worked example) मान लें निरयण मंगल λ = सिंह १०° (विषम राशि, ०°–१५° = सूर्य-होरा)।
मंगल सूर्य-होरा-फलदाता और सूर्य-होरा में → शास्त्र उसे सूर्य-होरा-फल का दाता मानता है।
यदि मंगल सिंह २०° पर हो (चन्द्र-होरा) → उसी वर्गीकरण के अनुसार सूर्य-होरा-फल की पूर्णता नहीं मानी जाती (फल-हीनता/ह्रास ७.१४ की भाषा से जुड़ता है)।
(अयनांश घोषित करें — केवल λ के निरयण मान पर होरा-अर्ध निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) होरा = षोडश-वर्ग का D2; ३०° → दो १५° अर्ध, ओज-युग्म नियम से सूर्य/चन्द्र-होरा। वर्ग-इंजन में यही modular partition है; फल-वर्गीकरण शास्त्र-कथन के रूप में रिपोर्ट होता है, भविष्य-निश्चितता के रूप में नहीं।

7.14
फलद्वयं बुधो दद्यात्‌ समे चान्द्रं तदन्यके।
रवेः फलं स्वहोरादौ फलहीनं विरामके
phaladvayaṃ budho dadyāt‌ same cāndraṃ tadanyake|
raveḥ phalaṃ svahorādau phalahīnaṃ virāmake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) फलद्वयं = दोनों फल; बुधः = बुध; दद्यात् = दे; समे = सम (युग्म) राशि में; चान्द्रं = चान्द्र (चन्द्र-होरा-फल); तदन्यके = उसके अन्य में (विषम में); रवेः फलं = सूर्य का फल; स्वहोरादौ = स्व-होरा आदि में; फलहीनं = फल-हीन; विरामके = विराम / विपरीत छोर पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बुध दोनों फल दे सकता है; सम राशि में चान्द्र, और उसके अन्य (विषम) में सूर्य-सम्बद्ध फल। सूर्य (और तदनुरूप स्व-होरा-संबद्ध ग्रह) का फल स्व-होरा आदि में पूर्ण माना गया है, और विपरीत होरा-अर्ध (विरामक) में फल-हीन। यह होरा-फल की द्वि-ध्रुवीय पूर्णता/शून्यता है।

English rendering Mercury, the text states, gives both fruits — lunar in even signs, and the other (solar) in the remaining (odd) signs. The Sun’s fruit is present in its own horā and the like, and is fruitless at the opposite end (virāmaka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१. बुध: फलद्वय — दोनों होरा-फलों का अधिकार।
• सम राशि में → चान्द्र-फल-प्रधान
• अन्य (विषम) में → सूर्य-फल-प्रधान
(पाठ-भेद संभव: “समे चान्द्रं” का संकेत राशि-समता या होरा-समता — यहाँ राशि-समता पढ़ा गया।)
२. रवि-फल (एवं ७.१३ के सूर्य-होरा-फलदाता):
• स्व-होरा में → फलयुक्त (पूर्ण)
• विरामक = विपरीत होरा-अर्ध → फलहीन (०)
संयुक्त नियम: ग्रह g की होरा-स्थिति H ∈ {Sūrya, Candra};
यदि g ∈ सूर्य-होरा-समूह और H = Sūrya → फल = पूर्ण; H = Candra → फलहीन
(चन्द्र-समूह के लिए उल्टा)। बुध दोनों में अंश/दोहरा फल।

उदाहरण (worked example) सूर्य कन्या ८° (सम राशि → ०°–१५° = चन्द्र-होरा)।
सूर्य सूर्य-होरा-फलदाता किन्तु चन्द्र-होरा में → शास्त्र के अनुसार विरामक-सी: फलहीन / क्षीण।
सूर्य सिंह ८° (विषम → ०°–१५° = सूर्य-होरा) → स्व-होरा: फल पूर्ण।
बुध वृष १२° (सम): चान्द्र-फल; बुध मिथुन १२° (विषम): सूर्य-पक्ष-फल — दोनों में फलद्वय की क्षमता बनी रहती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) D2-होरा का १५° नियम षोडश-वर्ग-इंजन में exact partition है; ओज-युग्म क्रम और फल-समूह (सूर्य-त्रय / चन्द्र-त्रय / बुध-द्वय) को गणना से अलग “शास्त्र कहता है” परत पर रखा जाता है — गणित `==` पर, फल-व्याख्या दावे के रूप में नहीं।

7.15
मध्येऽनुपातात्‌ सर्वत्र द्रेष्काणेऽपि विचिन्तयेत्‌।
गृहवत्‌ तुर्यभागेपि नवांशादावपि स्वयम्‌
madhye'nupātāt‌ sarvatra dreṣkāṇe'pi vicintayet‌|
gṛhavat‌ turyabhāgepi navāṃśādāvapi svayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये = मध्य-स्थान / मध्यवर्ती अंश; अनुपातात् = समानुपात (प्रमाण-अनुपात) से; सर्वत्र = सभी वर्गों में; द्रेष्काणे = द्रेष्काण (D3) में; विचिन्तयेत् = विचार करे; गृहवत् = राशि/क्षेत्र-गृह के समान; तुर्यभाग = तुर्यांश / चतुर्थांश (D4); नवांशादावपि = नवांश (D9) आदि में भी; स्वयम् = उसी नियम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मध्य-स्थान का विचार सर्वत्र अनुपात से करना चाहिए — द्रेष्काण में भी। राशि-गृह की भाँति ही तुर्यभाग (चतुर्थांश) में और नवांश आदि वर्गों में भी वही स्वतः-लागू नियम अपनाया जाए। अर्थात् वर्ग के भीतर का सूक्ष्म अंश “सीधा कूद” से नहीं, समानुपात से जाना जाता है।

English rendering One should consider the middle by proportion everywhere — in the drekkāṇa as well. As with the house (rāśi), so too in the fourth-part and in the navāṃśa and the rest, the same rule applies of itself.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-अंश के भीतर देशान्तर का समानुपातिक (linear) नक्शा। यदि राशि-देशान्तर λ° किसी वर्ग N में पड़े, और उस राशि का प्रत्येक वर्ग-खण्ड = 30°/N, तो खण्ड-सूचकांक
k = ⌊λ × N / 30⌋ (0-based),
और खण्ड के भीतर शेष अंश
δ = (λ × N / 30 − k) × (30°/N) = (λ mod (30/N)).
मध्य-बिन्दु = खण्ड-आरम्भ + (30°/(2N)). “अनुपातात्” = इस residual का समानुपाती मान, न कि केवल पूर्णांक खण्ड।

उदाहरण (worked example) λ = 17°20′ = 17.333…°, N = 3 (द्रेष्काण)। खण्ड-चौड़ाई = 10°। k = ⌊17.333/10⌋ = 1 (द्वितीय द्रेष्काण)। residual = 7.333°। समानुपात से द्रेष्काण-मध्य 5° से दूरी = +2.333° — यही “मध्येऽनुपातात्” का संख्यात्मक अर्थ। (D9/D4 पर भी वही सूत्र; ayanāṃśa केवल λ के स्रोत पर निर्भर — यहाँ शुद्ध राशि-अंश माना गया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन (D1…D60) प्रत्येक वर्ग को 30° के समान खण्डों में मापांक-अंकगणित से बाँटता है — यही “अनुपातात् सर्वत्र” का कम्प्यूटेशनल रूप है। फल-कथन अलग; विभाजन शुद्ध मॉड्यूलर नियम है।

7.16
सूर्यः कुजफलं धत्ते भार्गवस्य निशापतिः।
त्रिंशांशके विचिन्त्यौवमत्रापि गृहवत्‌ स्मृतम्‌
sūryaḥ kujaphalaṃ dhatte bhārgavasya niśāpatiḥ|
triṃśāṃśake vicintyauvamatrāpi gṛhavat‌ smṛtam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यः = रवि; कुज-फलम् = मंगल (कुज) का फल; धत्ते = धारण करता है; भार्गवस्य = शुक्र (भृगु-पुत्र) का; निशा-पतिः = चन्द्र (रात्रि-स्वामी); त्रिंशांशके = त्रिंशांश (D30) में; विचिन्त्यम् = विचारणीय; एवम् = इस प्रकार; अत्र अपि = यहाँ भी; गृहवत् स्मृतम् = "गृह के समान" कहा गया।

हिन्दी भावार्थ त्रिंशांश (D30) में सूर्य और चन्द्र का कोई स्वामित्व नहीं होता — केवल पाँच तारा-ग्रह (मंगल, शनि, गुरु, बुध, शुक्र) इसके अधिपति हैं। अतः शास्त्र कहता है — फल-गणना में सूर्य मंगल के त्रिंशांश-फल को और चन्द्र (निशापति) शुक्र के त्रिंशांश-फल को धारण कर लेता है। यहाँ भी विधि "गृह के समान" ही स्मरण की गई है।

English rendering In the triṃśāṃśa the Sun carries Mars's result and the night-lord (Moon) carries Venus's; here too the reckoning is held to be "as in the house."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिंशांश = 30° राशि का 5 असम भागों में विभाजन, अधिपति सूर्य-चन्द्र-रहित।
विषम राशि: मंगल 0°–5°, शनि 5°–10°, गुरु 10°–18°, बुध 18°–25°, शुक्र 25°–30° (चाप 5-5-8-7-5)।
सम राशि: क्रम व चाप उलटे — शुक्र 0°–5°, बुध 5°–12°, गुरु 12°–20°, शनि 20°–25°, मंगल 25°–30° (5-7-8-5-5)।
सूर्य-चन्द्र के फल-प्रतिनिधित्व का मानचित्र: सूर्य ↔ मंगल-खण्ड, चन्द्र ↔ शुक्र-खण्ड।

उदाहरण: विषम राशि मेष में ग्रह 3° पर → 0°–5° = मंगल-त्रिंशांश। इस खण्ड का फल-प्रतिनिधि सूर्य है, अतः इस स्थिति का "सौर" त्रिंशांश-फल गिना जाएगा। सम राशि वृष में ग्रह 3° पर → 0°–5° = शुक्र-त्रिंशांश → चन्द्र-प्रतिनिधित्व।

हमारा डिकोड (Our Decode) त्रिंशांश (D30) दोसियर §2 की वर्ग-सूची में है; इसका 5-5-8-7-5 विषम-चाप बनाम सम-राशि-व्युत्क्रम ठीक वही "declare the convention" अनुशासन है जिसे §5 माँगता है — विषम/सम राशि पहले घोषित किए बिना D30 का अधिपति निर्धारित नहीं होता।

7.17
लग्नहोरादृकाणांकभागसूर्यका इति।
त्रिंशांशकश्च षड्‌वर्गा अत्र विंशोपकाः क्रमात्‌
lagnahorādṛkāṇāṃkabhāgasūryakā iti|
triṃśāṃśakaśca ṣaḍ‌vargā atra viṃśopakāḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = राशि/क्षेत्र (D1); होरा = होरा (D2); दृकाण = द्रेष्काण (D3); अंकभाग = अंकांश / नवांश (D9; अंक = 9); सूर्यक = द्वादशांश (D12; द्वादश आदित्य/सूर्य-गण — पाठ में “सूर्यक”); त्रिंशांशक = त्रिंशांश (D30); षड्वर्गाः = छह वर्ग; अत्र = यहाँ; विंशोपकाः = विंशोपक (20-अंक बल-इकाई); क्रमात् = क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र षड्वर्ग गिनाता है — लग्न, होरा, दृकाण, अंकभाग (नवांश), सूर्यक (द्वादशांश) और त्रिंशांश। इन्हीं छह पर विंशोपक अंक क्रम से लगते हैं। यह वर्ग-समूह की परिभाषा और विंशोपक-श्रेणी का द्वार है।

English rendering Lagna, horā, drekkāṇa, aṅkabhāga (navāṃśa), sūryaka (dvādaśāṃśa), and the triṃśāṃśa — these are the six vargas; here the viṃśopaka weights are assigned in order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षड्वर्ग समुच्चय
V₆ = {D1, D2, D3, D9, D12, D30}.
विंशोपक-भार wᵢ ऐसे कि Σ wᵢ = 20 (अगले श्लोक में अक्षर-संख्या से)। ग्रह-विंशोपक
V = Σᵢ (wᵢ × sᵢ),
जहाँ sᵢ ∈ {0,1} (वर्ग में स्व/मित्र/उच्च आदि की शास्त्रीय श्रेणी के अनुसार पूर्ण/आंशिक/शून्य — विस्तार अगले श्लोकों में)।

उदाहरण (worked example) केवल समुच्चय-परिचय: कोई ग्रह D1, D3, D9 में “पूर्ण” (s=1) और शेष में 0 मानें; भार 6,2,4,5,2,1 (अगला श्लोक) से
V = 6+4+5 = 15 विंशोपक — 20 में से 15। (सटीक sᵢ-सारिणी पाठ/टीका-परंपरा पर निर्भर; यहाँ केवल योग-ढाँचा।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग सूची D1…D60 में ये छह षड्वर्ग के मूल सदस्य हैं; इंजन प्रत्येक को 30° के बराबर चापों में बाँटता है। विंशोपक भार अगले श्लोकों की भुतसंख्‍या से पिन होते हैं — व्याख्या नहीं, अंक।

7.18
रमनेत्राबिधपंचाश्विभूमयः सप्तवर्गके।
ससप्तमांशके तत्र विश्वकाः पंच लोचनम्‌
ramanetrābidhapaṃcāśvibhūmayaḥ saptavargake|
sasaptamāṃśake tatra viśvakāḥ paṃca locanam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रम = 6 (रस-पाठान्तर; पाठ-भेद संभव); नेत्र = 2 (दो नेत्र); अब्धि = 4 (चार समुद्र); पंच = 5; अश्वि = 2 (अश्विनौ); भूमि = 1 (एक पृथ्वी); सप्त-वर्गके = सप्तवर्ग-प्रसंग में; स-सप्तमांशके = सप्तमांश (D7) सहित; विश्वकाः = विश्व/विंशोपक-इकाइयाँ; पंच = 5; लोचनम् = 2 (दो नेत्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब भूतसंख्या में अंक देता है। षड्वर्ग के छह विंशोपक क्रमशः 6, 2, 4, 5, 2, 1 हैं (योग = 20)। तत्पश्चात् सप्तमांश (D7) जोड़कर सप्तवर्ग का आरम्भ होता है, जिसके अंक 5, 2 … से प्रारम्भ होकर अगले श्लोक में पूर्ण होते हैं।

English rendering The six ṣaḍvarga weights are 6, 2, 4, 5, 2, 1 (summing to twenty); then, adding the saptāṃśa, the seven-varga viśvas begin — five, two …

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षड्वर्ग-विंशोपक (क्रम D1,D2,D3,D9,D12,D30):
राशि 6, होरा 2, द्रेष्काण 4, नवांश 5, द्वादशांश 2, त्रिंशांश 1।
सत्यापन: 6 + 2 + 4 + 5 + 2 + 1 = 20 ✓ (ठीक-ठीक 20, कोई सहनशीलता-पट्टी नहीं)।
सप्तवर्ग का प्रथम मान: राशि 5, होरा 2 … (शेष श्लोक 19 में)।

उदाहरण: मान लें कोई ग्रह षड्वर्ग में तीन विभागों (राशि, नवांश, द्रेष्काण) में स्व-राशि में है, शेष तीन में सम में। पूर्ण-भार-अंश केवल संरचना दर्शाने हेतु: स्व-वर्गों के भार = 6 + 5 + 4 = 15; ये आगे (श्लोक 26) दिग्-मान से गुणित होकर वास्तविक विश्व देंगे।

हमारा डिकोड (Our Decode) "योग = ठीक 20" वही §5 का exact-`==` अनुशासन है: विंशोपक-भार-सारणी को सहनशीलता-बैंड से नहीं, तुल्यता से जाँचा जाता है — जैसे अष्टकवर्ग में ±3 बैंड ने एक वास्तविक −1 छिपा दिया था, वैसा यहाँ न हो, इसलिए योग-सत्यापन कठोर।

7.19
त्रयः सार्द्धं द्वयं सार्द्धवेदा द्वौ रात्रिनायकः।
स्थूलं फलं च संस्थाप्य तत्सूक्ष्मं च ततस्ततः
trayaḥ sārddhaṃ dvayaṃ sārddhavedā dvau rātrināyakaḥ|
sthūlaṃ phalaṃ ca saṃsthāpya tatsūkṣmaṃ ca tatastataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रयः = 3 (द्रेष्काण D3); सार्द्धं द्वयम् = 2½ (सप्तांश D7); सार्द्ध-वेदाः = 4½ (वेद=4, +½; नवांश D9); द्वौ = 2 (द्वादशांश D12); रात्रि-नायकः = चन्द्र = 1 (त्रिंशांश D30); स्थूलं फलम् = स्थूल फल; संस्थाप्य = स्थापित कर; तत्-सूक्ष्मम् = फिर सूक्ष्म; ततस्ततः = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ सप्तवर्ग योजना पूरी होती है — द्रेष्काण(D3)=3, सप्तांश(D7)=2½, नवांश(D9)=4½, द्वादशांश(D12)=2, त्रिंशांश(D30)=1। शास्त्र कहता है कि पहले स्थूल फल स्थापित करो, फिर उससे सूक्ष्म फल क्रमशः निकालो।

English rendering Completing the seven-varga scheme: dreṣkāṇa 3, saptāṃśa 2½, navāṃśa 4½, dvādaśāṃśa 2, trimśāṃśa 1. First set down the gross result, then refine it to the subtle, step by step.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सप्तवर्ग विंशोपक: D1=5, D2=2, D3=3, D7=2½, D9=4½, D12=2, D30=1; योग = 5 + 2 + 3 + 2.5 + 4.5 + 2 + 1 = 20. ✓ "स्थूल→सूक्ष्म" = पहले पूर्णांक-सन्निकट भार, फिर अनुपात-प्रक्षेप से परिष्कृत मान।

उदाहरण (worked example) योग-सत्यापन: 5 + 2 + 3 + 2.5 + 4.5 + 2 + 1 = 20। षड्वर्ग(20) में D7 जोड़ने पर क्षेत्र 6→5, द्रेष्काण 4→3, नवांश 5→4½ घटे और नया D7=2½ समाया — कुल पुनः 20 पर संतुलित।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्थूलं फलं ... तत्सूक्ष्मम्" ठीक हमारे दो-स्तरीय अनुशासन का सूत्र है — पहले नियत विभाजन (स्थूल, नियतात्मक), फिर अनुपात-प्रक्षेप (सूक्ष्म)। यही हमने वर्ग/बल इंजन में गणित (नियत) व फल-भार (अनुपात) को अलग परतों में रखकर सिद्ध किया।

7.20
दशवर्गां दिगंशाढ्याः कलांशाः षष्टिभागकाः।
त्रयं क्षेत्रस्य विज्ञेयः पंचषष्ट्यंशकस्य च
daśavargāṃ digaṃśāḍhyāḥ kalāṃśāḥ ṣaṣṭibhāgakāḥ|
trayaṃ kṣetrasya vijñeyaḥ paṃcaṣaṣṭyaṃśakasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दश-वर्गाम् = दशवर्ग (10 विभाग); दिगंश-आढ्याः = दिगंश (दश = 10 → दशांश D10) सहित; कलांशाः = कला (16) → कलांश = षोडशांश D16; षष्टि-भागकाः = षष्ट्यंश D60; त्रयम् = 3; क्षेत्रस्य = क्षेत्र (राशि D1) का; विज्ञेयः = जानना चाहिए; पंच = 5; षष्ट्यंशकस्य = षष्ट्यंश (D60) का।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब दशवर्ग (दस विभाग) के विंशोपक बताता है — इसमें दशांश (D10), षोडशांश (D16), षष्ट्यंश (D60) भी सम्मिलित हैं। क्षेत्र (राशि, D1) का भार 3 और षष्ट्यंश (D60) का भार 5 जानना चाहिए; शेष का मान अगले श्लोक में है।

English rendering In the ten-varga scheme — which now takes in the daśāṃśa, ṣoḍaśāṃśa, and ṣaṣṭyāṃśa — the kṣetra (rāśi) is worth 3 and the ṣaṣṭyāṃśa 5.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशवर्ग = D1, D2, D3, D7, D9, D10, D12, D16, D30, D60।
निर्दिष्ट: क्षेत्र D1 = 3, षष्ट्यंश D60 = 5। शेष 8 वर्गों का मान = श्लोक 21 (प्रत्येक 1½)।
पूर्वावलोकन-सत्यापन: 3 + 5 + (8 × 1½) = 3 + 5 + 12 = 20 ✓
नए विभाजक: D10 = 30/10 = 3° दशांश; D16 = 30/16 = 1°52′30″ कलांश; D60 = 30/60 = 0°30′ = 30′ प्रति षष्ट्यंश।

उदाहरण: षष्ट्यंश (D60): देशान्तर सिंह 12°40′ → राशि-भीतर चाप 12°40′ = 760′; षष्ट्यंश-सूचकांक = ⌊760 ÷ 30⌋ = 25 → छब्बीसवाँ षष्ट्यंश। इसका दशवर्ग-भार = 5 (सर्वाधिक), दर्शाता है कि सूक्ष्मतम विभाग को यहाँ सर्वाधिक तौल दी गई।

हमारा डिकोड (Our Decode) D10, D16, D60 — तीनों दोसियर §2 की षोडश-वर्ग सूची (kaal_ekavimshati_varga.py) में हैं, जहाँ प्रत्येक 30° राशि का नियत समान-चाप विभाजन है। D60 को यहाँ भार 5 (सर्वोच्च) देना §2 की उस दृष्टि से मेल खाता है कि सूक्ष्मतम विभाजन सर्वाधिक विभेदक होता है।

7.21
सार्द्धौकभागाः शेषाणां विश्वकाः परिकीर्तिता।
अथ वक्ष्ये विशेषेण बलं विंशोपकाह्वयम्‌
sārddhaukabhāgāḥ śeṣāṇāṃ viśvakāḥ parikīrtitā|
atha vakṣye viśeṣeṇa balaṃ viṃśopakāhvayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सार्धैकभागाः = सवा / डेढ़ भाग (1½); शेषाणाम् = शेष (आठ) वर्गों के; विश्वकाः = विंशोपक-अंक; परिकीर्तिताः = कथित/घोषित; अथ = अब; वक्ष्ये = कहूँगा; विशेषेण = विशेष रूप से; बलम् = बल; विंशोपकाह्वयम् = विंशोपक-नामक।

हिन्दी भावार्थ शेष वर्गों के विंशोपक डेढ़-डेढ़ भाग कहे गए। अब शास्त्र विशेष रूप से उसी बल का विस्तार करेगा जिसका नाम विंशोपक है। यह श्लोक दशवर्ग-भार की पूर्ति और अगले विंशोपक-प्रकरण का द्वार है।

English rendering One-and-a-half parts each are declared as the viśvakas of the remaining (vargas). Now I shall speak in particular of the strength called viṃśopaka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशवर्ग पूर्ण भार-सदिश (V₁₀, Σ=20):
w(D1)=3, w(D60)=5, w(अन्य 8)=3/2.
सामान्य विंशोपक
V = Σᵢ wᵢ · sᵢ, 0 ≤ V ≤ 20.
अगला प्रकरण (पाठानुसार) इसी V का विशेष बल-विवेचन — यहाँ केवल अचर-घोषणा।

उदाहरण (worked example) आठ “शेष” में से चार पूर्ण, D1 पूर्ण, D60 शून्य:
V = 3 + 4×1.5 + 0 = 3+6 = 9 विंशोपक।
D1+D60+सभी आठ पूर्ण: 3+5+12 = 20।

हमारा डिकोड (Our Decode) D1…D60 षोडश-वर्ग इंजन में पहले से मापांक-विभाजित हैं; विंशोपक भार 20 पर योग-बद्ध — षड् / सप्त / दश वर्ग के तीन सदिश (w₆, w₇, w₁₀) शास्त्र के भुतसंख्‍या-अंकों से पिन। गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

7.22
क्रमात्‌ षोडशवर्गाणां क्षेत्रादीनां पृथक्‌ पृथक्‌।
होरात्रिंशांशदृक्काणे कुचन्द्रशशिनः क्रमात्‌
kramāt‌ ṣoḍaśavargāṇāṃ kṣetrādīnāṃ pṛthak‌ pṛthak‌|
horātriṃśāṃśadṛkkāṇe kucandraśaśinaḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से / एक के बाद एक; षोडशवर्गाणां = सोलह वर्गों के (D1…D60 योजना); क्षेत्रादीनां = क्षेत्र (राशि/D1) से आरम्भ वर्गों के; पृथक् पृथक् = अलग-अलग; होरा = D2 (15° विभाजन); त्रिंशांश = D30; दृक्काण / द्रेष्काण = D3; कुचन्द्रशशिनः = पाठ-भेद संभव (कु–चन्द्र–शशिन् का यथापाठ अनिश्चित); क्रमात् = उसी क्रम में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षोडश वर्गों — क्षेत्र से लेकर — का बल-अंश पृथक्-पृथक् गिनना चाहिए। होरा, त्रिंशांश और दृक्काण के लिए क्रम से विशेष माप निर्धारित है; अगले श्लोक उसी गणना की संख्याएँ खोलते हैं। यह विंशोपक-संकल्पना की भूमिका है, न कि फल की घोषणा।

English rendering The text states that the sixteen vargas, beginning with kṣetra (the rāśi), are to be weighed each separately. For horā, triṃśāṃśa, and drekkāṇa the measure is fixed in order; the following verses supply the numeric scale of viṃśopaka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षोडश-वर्ग विंशोपक में होरा (D2), त्रिंशांश (D30), दृक्काण (D3) का मानक भार प्रत्येक = 1 (कुल विंश = 20 में से)। कुचन्द्रशशिनः का शब्द-अर्थ/भूतसंख्या-पाठ अनिश्चित — पाठ-भेद संभव; संख्या-योजना 7.23–7.24 से सिद्ध होती है (1+1+1 सहित ΣW = 20)।

उदाहरण (worked example) ग्रह की भोगांश λ (सायन या निरयण — यहाँ निरयण, अयनांश घोषित करना आवश्यक) होरा-नियम: विषम राशि में 0°–15° = सूर्य-होरा, 15°–30° = चन्द्र-होरा (सम राशि में उल्टा)। त्रिंशांश: 30° को पाँच भागों (5°+5°+8°+7°+5° आदि पारम्परिक नियम) में बाँट कर स्वामी तय। दृक्काण: प्रत्येक 10° = एक द्रेष्काण। इन तीनों में ग्रह–वर्गेश मैत्री का अंक बाद में W×P में W = 1 से गुणा होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन प्रत्येक राशि के 30° को D2/D3/D30 के नियत चापों में मापांक-अंकगणित से बाँटता है; विंशोपक उन्हीं वर्ग-स्वामियों पर मैत्री-अंक चढ़ाता है। गणित और फल-कथन अलग रखे गए हैं — विभाजन `==` नियत नियम पर, व्याख्या शास्त्र के स्वर में।

7.23
कलांशस्य द्वयं ज्ञेयं त्रयं नन्दांशकस्य च।
क्षेत्रे सार्द्धं च त्रितयं वेदाः षष्ट्यंशकस्य हि
kalāṃśasya dvayaṃ jñeyaṃ trayaṃ nandāṃśakasya ca|
kṣetre sārddhaṃ ca tritayaṃ vedāḥ ṣaṣṭyaṃśakasya hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलांशस्य = कलांश / षोडशांश (D16) का; द्वयं = 2; ज्ञेयं = जानना चाहिए; त्रयं = 3; नन्दांशकस्य = नन्दांश (यहाँ नवांश D9 — पाठ-भेद संभव); च = और; क्षेत्रे = राशि/D1 में; सार्द्धं च त्रितयं = साढ़े तीन = 3.5; वेदाः = 4 (भूतसंख्या: वेद = 4); षष्ट्यंशकस्य = षष्ट्यंश (D60) का; हि = निश्चय से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विंशोपक-भार बाँटता है: कलांश को दो, नन्दांश (नवांश) को तीन, क्षेत्र को साढ़े तीन, और षष्ट्यंश को चार। ये भार “फल” नहीं — वर्ग की सापेक्ष महत्ता की संख्याएँ हैं, जिन्हें आगे मैत्री-अंक से गुणा किया जाता है।

English rendering The text assigns viṃśopaka weights: two to the kalāṃśa (D16), three to the nandāṃśa (navāṃśa, D9 — reading may vary), three-and-a-half to the kṣetra (D1), and four (veda) to the ṣaṣṭyaṃśa (D60).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
W(D16) = 2; W(D9) = 3; W(D1) = 3.5 = 7/2; W(D60) = 4.
भूतसंख्या: वेदाः → 4। “नन्दांश” = नवांश — पाठ-भेद संभव; संख्या 3 नवांश के मानक भार से मेल खाती है।

उदाहरण (worked example) मान लें निरयण भोगांश λ = 103.2500° (कन्या 13.25°)।
D1 = कन्या। D9: प्रत्येक राशि में 9×3°15′; कन्या-नवांश क्रम से गणना → नवांश-राशि N। D16: 30°/16 = 1°52′30″ प्रति भाग। D60: 30°/60 = 0.5° प्रति भाग। इन चार वर्गों के स्वामी पर ही W ∈ {3.5, 3, 2, 4} लगता है; पूर्ण योग 7.24 के शेष भारों से 20 पूरा होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) D1…D60 विभाजन शुद्ध मॉड्यूलर चाप-मान है; भार 3.5 / 3 / 2 / 4 शास्त्रीय विंशोपक-अचर हैं। हम वर्ग-नियत और भार-नियत को अलग फिक्स्चर पर बाँधते हैं — अयनांश बदले तो वर्गेश बदल सकता है, भार-तालिका नहीं।

7.24
अर्द्धमर्धं तु शेषाणां ह्येतत्‌ स्वीयमुदाहृतम्‌।
पूर्णं विंशोपकं विंशो धृतिः स्यादधिमित्रके
arddhamardhaṃ tu śeṣāṇāṃ hyetat‌ svīyamudāhṛtam‌|
pūrṇaṃ viṃśopakaṃ viṃśo dhṛtiḥ syādadhimitrake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्द्धम् अर्द्धम् = आधा-आधा (½ प्रत्येक); तु = तो; शेषाणाम् = शेष (नौ) वर्गों का; एतत् = यह; स्वीयम् = स्व-क्षेत्र (अपनी राशि) हेतु; उदाहृतम् = कहा गया; पूर्णम् विंशोपकम् = पूर्ण विंशोपक; विंशः = 20; धृतिः = 18; स्यात् = हो; अधिमित्रके = अधिमित्र (परम-मित्र) राशि में।

हिन्दी भावार्थ षोडशवर्ग के शेष नौ विभागों का विंशोपक आधा-आधा (½) कहा गया है; यह सम्पूर्ण भार-सारणी "स्व-क्षेत्र" (अपनी राशि) की स्थिति के लिए है। इसके बाद शास्त्र दिग्-मान आरम्भ करता है — पूर्ण (स्व-राशि) विंशोपक 20, और अधिमित्र-राशि में 18 (धृति)।

English rendering For the remaining nine, half each; all this is stated for one's own sign. The full viṃśopaka is twenty, and in a great friend's sign it is eighteen.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षोडशवर्ग-विंशोपक पूर्ण सत्यापन:
D1 3½, D9 3, D16 2, D60 4, D2 1, D3 1, D30 1 (= 15½) + शेष 9 {D4,D7,D10,D12,D20,D24,D27,D40,D45} × ½ = 4½।
योग = 15½ + 4½ = 20 ✓
दिग्-मान (सारणी आरम्भ): स्व-क्षेत्र = 20 (पूर्ण), अधिमित्र = 18 (धृति)। शेष स्तर श्लोक 25 में।

उदाहरण: मान लें ग्रह षोडशवर्ग में D1 में स्व-राशि (दिग्-मान 20) और D60 में अधिमित्र-राशि (18)। इन दो का योगदान (श्लोक 26 सूत्र से): D1 → 3½ × 20/20 = 3.5; D60 → 4 × 18/20 = 3.6; अब तक उप-योग = 7.1 विश्व।

हमारा डिकोड (Our Decode) समग्र भार-योग का ठीक 20 पर मिलना §5 के exact-`==` सत्यापन जैसा है — सारणी तभी शुद्ध जब योग तुल्यता से 20; कोई सहनशीलता-पट्टी नहीं। भूतसंख्या "धृति = 18" का अंक-निष्ठ पठन भी उसी अनुशासन में है।

7.25
मित्रे पंचदश प्रोक्तं समे दश प्रकीर्तितम्‌।
शत्रौ सप्ताधिशत्रौ च पंचविंशोपकं भवेत्‌
mitre paṃcadaśa proktaṃ same daśa prakīrtitam‌|
śatrau saptādhiśatrau ca paṃcaviṃśopakaṃ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्रे = मित्र वर्ग में; पंचदश = 15; प्रोक्तं = कहा; समे = सम/तटस्थ में; दश = 10; प्रकीर्तितम् = कहा गया; शत्रौ = शत्रु में; सप्त = 7; अधिशत्रौ = अधि-शत्रु में; च = और; पंच = 5; विंशोपकं = विंशोपक-अंक; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मैत्री-सीढ़ी बाँधता है: मित्र में पंद्रह, सम में दस, शत्रु में सात, अधि-शत्रु में पाँच — यही उस वर्ग का विंशोपक-अंक (P) है। यह फल-भविष्य नहीं; वर्गेश–ग्रह सम्बन्ध का मात्रा-माप है।

English rendering The text sets the relationship scores: fifteen in a friendly varga, ten in a neutral, seven in an enemy’s, and five in a great-enemy’s — these are the viṃśopaka points for that division.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
P ∈ {20 (अधिमित्र/पूर्ण, 7.24), 15 (मित्र), 10 (सम), 7 (शत्रु), 5 (अधिशत्रु)}।
मैत्री = नैसर्गिक ± तात्कालिक (परम्परा-निर्भर); वर्गेश = उस वर्ग में ग्रह जिस राशि में हो उसका स्वामी। सम्मेलन घोषित करें: कौन-सी मैत्री-तालिका (पा capt/नीच/मूलत्रिकोण सहित)।

उदाहरण (worked example) बृहस्पति का D9-स्वामी चन्द्र = नैसर्गिक मित्र → P_D9 = 15; D1-स्वामी शनि = सम/शत्रु (तालिका-भेद) — मानें सम → P_D1 = 10। अंश: 3×15 + 3.5×10 = 45 + 35 = 80; शेष वर्ग बाद में जोड़कर /20।

7.26
वर्गविश्वाः स्वविश्वघ्नाः पुनर्विंशतिभाजिताः।
विश्वाफलोपयोग्यं तत्पञ्चोनं फलदो न हि
vargaviśvāḥ svaviśvaghnāḥ punarviṃśatibhājitāḥ|
viśvāphalopayogyaṃ tatpañconaṃ phalado na hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ग-विश्वाः = वर्ग-विश्व (प्रत्येक वर्ग का विंशोपक-भार); स्व-विश्व-घ्नाः = अपने स्व-विश्व (दिग्-मान) से गुणित; पुनः = फिर; विंशति-भाजिताः = 20 से विभाजित; विश्वा-फल-उपयोग्यम् = विश्व-फल हेतु उपयोगी; तत् = वह; पंच-ऊनम् = पाँच से न्यून (5 से कम); फलदः न हि = फलदायी नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब पूर्ण संगणना-सूत्र देता है — प्रत्येक वर्ग का विंशोपक-भार उसके स्व-विश्व (दिग्-मान) से गुणित करके 20 से विभाजित करो; यही मान विश्व-फल में उपयोगी है। और जो योग 5 से कम हो, वह फलदायी नहीं माना जाता (अगले श्लोक में 5 से ऊपर अल्प, 10 से ऊपर मध्यम, 15 से ऊपर पूर्ण)।

English rendering Each varga's viśva, multiplied by its own dignity-value and divided by twenty, becomes the usable viśva-result; and whatever falls below five is held to give no fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रति-वर्ग सूत्र:
विश्वᵢ = भारᵢ × स्व-विश्वᵢ ⁄ 20, जहाँ स्व-विश्व ∈ {20, 18, 15, 10, 7, 5}।
कुल विंशोपक-बल = Σᵢ विश्वᵢ (अधिकतम = Σ भारᵢ = 20, जब सर्वत्र स्व-राशि)।
सीमा-नियम: कुल < 5 → फलदः न हि (निष्फल); (श्लोक 27) > 5 अल्प, > 10 मध्यम, > 15 पूर्ण।

उदाहरण: षड्वर्ग (भार 6,2,4,5,2,1) में एक ग्रह की दिग्-अवस्था — राशि स्व(20), होरा सम(10), द्रेष्काण मित्र(15), नवांश शत्रु(7), द्वादशांश सम(10), त्रिंशांश अधिमित्र(18):
राशि 6 × 20/20 = 6.00
होरा 2 × 10/20 = 1.00
द्रेष्काण 4 × 15/20 = 3.00
नवांश 5 × 7/20 = 1.75
द्वादशांश 2 × 10/20 = 1.00
त्रिंशांश 1 × 18/20 = 0.90
कुल = 6.00 + 1.00 + 3.00 + 1.75 + 1.00 + 0.90 = 13.65 विश्व → 10 से अधिक, अतः शास्त्रानुसार "मध्यम" फलद (5 की सीमा से ऊपर, निष्फल नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह सूत्र (भार × स्व-विश्व ÷ 20, फिर योग, फिर सीमा-तुलना) ठीक वैसा ही नियत संगणनात्मक बल है जैसा दोसियर §4 का षड्बल — प्रत्येक घटक एक कथित अंक-नियम, कुल की तुलना प्रति-सीमा से। "5 से न्यून → निष्फल" एक तीक्ष्ण सीमा (`==`/`<` जाँच) है, सहनशीलता-बैंड नहीं — §5 के exact-अनुशासन के अनुरूप; और यह बल-गणना है, फलादेश नहीं (§5: गणित को व्याख्या से पृथक रखो)।

7.27
तदूर्ध्वं स्वल्पफलदं दशोर्ध्वं मध्यमं स्मृतम्‌।
तिय्यूर्धं पूर्णफलदं बोध्यं सर्वं खचारिणाम्‌
tadūrdhvaṃ svalpaphaladaṃ daśordhvaṃ madhyamaṃ smṛtam‌|
tiyyūrdhaṃ pūrṇaphaladaṃ bodhyaṃ sarvaṃ khacāriṇām‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-ऊर्ध्वम् = उससे (पाँच विश्वा से) ऊपर; स्वल्प-फलदम् = अल्प फल देने वाला; दश-ऊर्ध्वम् = दस से ऊपर; मध्यमम् = मध्यम फल; [तिय्यूर्धं = पन्द्रह से ऊपर — पाठ-भेद संभव]; पूर्ण-फलदम् = पूर्ण फल देने वाला; खचारिणाम् = समस्त आकाशचारी ग्रहों के लिए; बोध्यम् = जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ विंशोपक बल (0–20 विश्वा) के फल-स्तर को श्लोक श्रेणीबद्ध करता है — पाँच से ऊपर होने पर ग्रह अल्प फल देता है, दस से ऊपर मध्यम फल, और (पन्द्रह से) ऊपर होने पर पूर्ण फल; यह क्रम सब ग्रहों पर समान रूप से लागू है। (पूर्व श्लोक कह चुका कि पाँच विश्वा से कम बल फलहीन है।)

English rendering Above five viśvas the strength yields a slight result, above ten a middling one, and above fifteen a full result — this grading holds for all the moving planets alike.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोपक-मान V ∈ [0, 20]; श्रेणी — V < 5 → फल नहीं; 5 ≤ V < 10 → स्वल्प; 10 ≤ V < 15 → मध्यम; V ≥ 15 → पूर्ण। तीसरा सन्धि-बिन्दु 15 (20-मान पैमाने पर 5/10/15 का स्वाभाविक क्रम); पाठ "तिय्यूर्धं" भ्रष्ट प्रतीत होता है — पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) किसी ग्रह का संयुक्त विंशोपक V = 12.5 विश्वा हो ⇒ 10 ≤ 12.5 < 15 ⇒ मध्यम फल।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोपक ठीक इन्हीं षोडश-वर्गों (D1…D60) पर तौला जाता है जिन्हें हमारे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) ने नियतांक-नियम से समान चापों में विभाजित किया। श्रेणी-सीमाएँ 5/10/15 कठोर कट-ऑफ हैं — यही हमारी "exact-`==`, tolerance-band नहीं" अनुशासन-रेखा है, क्योंकि एक ढीला बैंड असली अन्तर को छिपा देता है।

7.28
अथाऽन्यदपि वक्ष्येऽहं मैत्रेय त्वं विधारय।
खेताः पूर्णफलं दद्युः सूर्यात्‌ सप्तमके स्थिताः
athā'nyadapi vakṣye'haṃ maitreya tvaṃ vidhāraya|
khetāḥ pūrṇaphalaṃ dadyuḥ sūryāt‌ saptamake sthitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अन्यत् अपि = एक और भी; वक्ष्ये अहं = मैं कहूँगा; मैत्रेय = हे मैत्रेय; त्वं = तुम; विधारय = धारण करो / सुनो; खेताः = खेट/ग्रह; पूर्ण-फलं = पूरा फल — शास्त्रोक्त; दद्युः = दें; सूर्यात् = सूर्य से; सप्तमके = सप्तम स्थान/राशि में; स्थिताः = स्थित।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं — अब एक और नियम सुनो: जो ग्रह सूर्य से सातवें स्थान में हों, शास्त्र उन्हें पूर्ण फल देने वाला बताता है। यह सूर्य-सप्तम स्थिति का सामान्य फल-सूत्र है; चिकित्सा, धन या भय से जोड़ने का यहाँ कोई आदेश नहीं।

English rendering “And now, Maitreya, hold this too,” the sage says: planets placed in the seventh from the Sun are stated to give full result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / संवाद। स्थिति-नियम: ग्रह की राशि-संख्या R_g, सूर्य R_s; सप्तम ⇔ (R_g − R_s) mod 12 = 6। (भाव-सप्तम बनाम राशि-सप्तम — गृह-प्रणाली घोषित करें; श्लोक “सप्तमके स्थिताः” राशि-क्रम से सुसंगत।) षड्बल में चेष्टा-बल सूर्य से कोणीय दूरी पर भी निर्भर करता है — वह Ch.27 का अलग गणित है; यहाँ केवल पूर्ण-फल कथन है।

उदाहरण (worked example) सूर्य कर्क (4); शनि मकर (10): (10−4) mod 12 = 6 → सूर्य-सप्तम। शास्त्र कहता है: पूर्ण फल। (दृष्टि/युति/अस्त अलग नियम; इस श्लोक में केवल सप्तम-स्थिति।)

7.29
फलाभावं विजानीयात्‌ समे सूर्यनभश्चरे।
मध्येऽनुपातात्‌ सर्वत्र ह्युदयास्तविंशोपकाः
phalābhāvaṃ vijānīyāt‌ same sūryanabhaścare|
madhye'nupātāt‌ sarvatra hyudayāstaviṃśopakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) फलाभाव = फल/प्रभाव का अभाव; समे = सम (सूर्य के साथ सम-स्थान/समान स्थिति में); सूर्य-नभश्चर = सूर्य और नभश्चर (ग्रह); मध्ये = मध्य-अवस्था में; अनुपातात् = अनुपात/समानुपात से; उदय-अस्त-विंशोपक = उदय–अस्त के आधार पर विंशोपक (२०-अंकीय बल-माप)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब ग्रह सूर्य के साथ सम-स्थिति में हो, तब उसके फल का अभाव जानना चाहिए। मध्य-अवस्था में फल का विचार अनुपात से करना है। उदय–अस्त से जुड़े विंशोपक सर्वत्र इसी नियम से लागू होते हैं—पूर्णता और न्यूनता स्थान-सापेक्ष अनुपात पर निर्भर करती है।

English rendering The text states that when a planet stands equal with the Sun, absence of phala is to be understood; in intermediate positions the rising–setting viṃśopaka is assessed by proportion, and this udaya–asta measure applies throughout.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उदय–अस्त विंशोपक — समानुपाती माप।
यदि λ_ग्रह ≈ λ_सूर्य (सम-स्थिति / संयोग-समीप), शास्त्र-निर्देश: फलाभाव।
मध्य-अवस्था में (उदय और अस्त के बीच):
V_udaya-asta ∝ f(λ; λ_उदय, λ_अस्त) — सरल रैखिक अनुपात (अनूपात) से।
पूर्ण विंशोपक-सीमा २० अंश-बिंदु (विंश = २०) की इकाई-व्यवस्था से जुड़ी है; उदय पर उच्च, अस्त/सम-सूर्य पर न्यून/शून्य-दिशा—पाठ का “मध्येऽनुपातात्” यही समानुपात बताता है। (उदयास्त-कोण स्थान-काल-निर्भर; अयनांश घोषित करें जब λ आधुनिक एफेमेरिस से लें।)

उदाहरण (worked example) मान लें किसी स्थान-काल पर ग्रह का उदय-बिंदु ≈ ६०°, अस्त-बिंदु ≈ २४०° (उदाहरण-मान; वास्तविक गणना क्षितिज-गोल से)।
यदि ग्रह सूर्य के साथ λ_ग्रह = λ_सूर्य = १२०° पर सम है → शास्त्रानुसार फलाभाव (V ≈ ०-दिशा)।
यदि ग्रह मध्य-चाप पर है, उदय से आधा मार्ग (अनुपात ½) → V ≈ ½ × V_पूर्ण (पूर्ण को २० मानें तो ≈ १० विंशोपक-अंश)। अयनांश/क्षितिज-मॉडल घोषित होने पर ही संख्याएँ पुनरुत्पाद्य हैं।

7.30
वर्गविंशोपकं ज्ञेयं फलमस्य द्विजर्षभ।
यच्च यत्र फलं बुद्‌ध्वा तत्फलं परिकीर्तितम्‌
vargaviṃśopakaṃ jñeyaṃ phalamasya dvijarṣabha|
yacca yatra phalaṃ bud‌dhvā tatphalaṃ parikīrtitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ग-विंशोपक = षोडश/वर्ग-चार्टों से प्राप्त विंशोपक-बल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; फलम् अस्य = इसका फल; द्विजर्षभ = हे द्विज-श्रेष्ठ (मैत्रेय); यत् च यत्र फलम् = जो फल जहाँ; बुद्ध्वा = समझकर; तत्फलम् परिकीर्तितम् = वही फल कथित/घोषित है।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजर्षभ, इस प्रकरण का फल वर्ग-विंशोपक से जानना चाहिए। शास्त्र कहता है—जो फल जिस स्थान/अवस्था में समझा गया, उसी को उस ग्रह/भाव का कथित फल मानें। अर्थात् फल-कथन वर्ग-विंशोपक की मात्रा और स्थिति के अनुरूप बँधा है, मनमाना नहीं।

English rendering O best of the twice-born, the phala of this [scheme] is to be known through the varga-viṃśopaka; whatever result is discerned in whichever place, that is the fruit the text declares.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-विंशोपक = वर्गों में ग्रह-अवस्था का भारित योग, इकाई-सीमा २०।
सामान्य रूप (आधुनिक संकेत):
V_varga = Σ_i w_i · s_i , जहाँ s_i ∈ {उच्च, स्वक्षेत्र, मित्र, सम, शत्रु, नीच…} को नियत अंक, w_i = उस वर्ग का भार, और Σ w_i इस प्रकार चुना जाता है कि V_max = २०।
(भार-सारिणी इसी अध्याय/परंपरा की वर्ग-तालिका से; पाठ-भेद संभव।) यह गणनात्मक माप है; फल-वाक्य शास्त्र-कथन हैं।

उदाहरण (worked example) सरल जाँच—यदि किसी ग्रह के लिए प्रभावी वर्ग-योग से V_varga = १५ / २०, तो “पूर्ण” नहीं, “मध्य–प्रबल” श्रेणी की ओर (अगले श्लोकों की पूर्ण/मध्य/हीन भाषा से जोड़ें)। सार्थक संख्या के लिए D1–D9–D10 आदि में राशि-स्वामित्व/उच्च-नीच नियत नियमों से s_i भरें; वर्ग-विभाजन ३०° ÷ n के मॉड्यूलर नियम पर निर्भर (D9: ३° २०′ खंड)।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग (D1…D60) हमारे वर्ग-इंजन में ३०° राशि के समान चापों का नियत विभाजन है—शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। वर्ग-विंशोपक उन्हीं वर्ग-अवस्थाओं का भारित योग है; गणित को फल-कथन से अलग रखकर ही माप सत्याप्य रहती है।

7.31
वर्गविंशोपकं चादावुदयास्तमतः परम्‌।
पूर्णं पूर्णेतिपूर्नंस्यात्‌ सर्वदौवं विचिन्तयेत्‌
vargaviṃśopakaṃ cādāvudayāstamataḥ param‌|
pūrṇaṃ pūrṇetipūrnaṃsyāt‌ sarvadauvaṃ vicintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्गविंशोपकम् च आदौ = पहले वर्ग-विंशोपक; उदय-अस्तम् अतः परम् = उसके बाद उदय–अस्त; पूर्णम् पूर्णे = पूर्ण में पूर्ण; इति पूर्णं स्यात् = इस प्रकार पूर्ण होता है (पाठ: पूर्नं—पूर्णम्; पाठ-भेद संभव); सर्वदा दैवम् = सर्वत्र/सदैव दैव (ग्रह-फल/दैवीय परिणाम); विचिन्तयेत् = विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र क्रम बताता है—पहले वर्ग-विंशोपक देखें, फिर उदय–अस्त का माप। जहाँ बल पूर्ण हो, वहाँ फल भी पूर्ण-भाव से समझा जाता है; सर्वत्र दैव/ग्रह-फल का विचार इसी पूर्णता-न्यूनता के साथ करना चाहिए। यह फल की मात्रा का नियम है, काल-निर्णय का पूरा तंत्र नहीं।

English rendering First assess the varga-viṃśopaka, then the rising–setting measure; when [the strength is] full, the phala is [treated as] full, and the planetary result is to be considered everywhere in that light.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वि-स्तरीय माप-क्रम:
(1) V_varga (वर्ग-विंशोपक) → (2) V_udaya-asta (उदय–अस्त अनुपात)।
पूर्णता-नियम (पाठ का “पूर्णं पूर्णे…”):
यदि V ≈ V_max (= २० इकाई-सीमा), तो फला강도 ≈ पूर्ण (शास्त्र-कथन)।
संयुक्त विचार: दोनों मापों की उच्चता पर “पूर्ण फल” की भाषा लागू; यह अनुपात/सीमा-तुलना है, न कि नियति-घोषणा।

उदाहरण (worked example) V_varga = १८/२०, उदय–अस्त अनुपात ≈ ०.९ → दोनों “पूर्ण-समीप”। शास्त्र की भाषा में पूर्ण-फल दिशा; यदि V_varga = १८ किंतु ग्रह सम-सूर्य (V_udaya-asta → ०-दिशा) तो क्रम (आदौ वर्ग, ततः उदय–अस्त) के अनुसार अंतिम प्रभाव न्यून माना जाता है।

7.32
हीनं हीनेतिहीनं स्यात्‌ स्वल्पेल्पात्यल्पकं स्मृतम्‌।
मध्यं मध्येतिमध्यं स्याद्यावत्तस्य दशास्थितिः
hīnaṃ hīnetihīnaṃ syāt‌ svalpelpātyalpakaṃ smṛtam‌|
madhyaṃ madhyetimadhyaṃ syādyāvattasya daśāsthitiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हीनम् हीने = हीन में हीन; स्वल्पे अल्पात्यल्पकम् = स्वल्प में अल्प/अत्यल्प; मध्यम् मध्ये = मध्य में मध्य; यावत् तस्य दशा-स्थितिः = जब तक उसकी दशा-अवस्था/स्थिति रहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—बल हीन हो तो फल भी हीन; स्वल्प हो तो अल्प या अत्यल्प; मध्य हो तो मध्य—यही स्मरणीय वर्गीकरण है। यह मात्रा तब तक लागू रहती है जब तक उस ग्रह की दशा-स्थिति चलती है। अर्थात् विंशोपक फल की “तीव्रता” को दशा-काल की अवधि से बाँधकर देखा जाता है।

English rendering Deficient strength yields deficient phala; little yields little or very little; middling yields middling—so remembered—and this holds for as long as that [planet’s] daśā-state lasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-तीव्रता का गुणात्मक–मात्रात्मक मानचित्र (शास्त्र-वर्ग):
V ≈ V_max → पूर्ण फल
V मध्य-बन्ध → मध्य फल
V स्वल्प → अल्प / अत्यल्प
V हीन → हीन
काल-सीमा: प्रभाव-विचार यावत् दशा-स्थिति (महादशा/अंतर्दशा की सक्रिय अवधि)।
विंशोत्तरी संदर्भ (जब दशा-कुंजी चंद्र-नक्षत्र हो): महादशा-वर्ष Σ = १२०; अंतर्दशा = (MD_वर्ष × AD_वर्ष) / १२० — अवधि-अंकगणित; फल-तीव्रता अलग माप (V) है, अवधि अलग।

उदाहरण (worked example) मान लें V_varga = ८/२० (हीन–मध्य की ओर) और शुक्र महादशा २० वर्ष चल रही हो। शास्त्र-भाषा: फल “हीन/स्वल्प” श्रेणी, विचार उस दशा-स्थिति तक। अंतर्दशा-खंड उदाहरण: शुक्र–सूर्य = (२० × ६)/१२० = १ वर्ष — तीव्रता V से, अवधि इस अनुपात से। (अयनांश दशा-आरंभ-नक्षत्र-अंश पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७, शुक्र २०, सूर्य ६, चंद्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७) हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित है। यह श्लोक फल की मात्रा (विंशोपक) को दशा-स्थिति की अवधि से जोड़ता है—दोनों परतें अलग रखनी हैं: V की गणना एक, काल-खंड की दूसरी।

7.33
अथाऽन्यदपि वक्ष्यामि मैत्रेय स्रृणु सुव्रत्।
लग्नतुर्यास्तवियतां केन्द्रसंज्ञा विशेषतः
athā'nyadapi vakṣyāmi maitreya srṛṇu suvrat|
lagnaturyāstaviyatāṃ kendrasaṃjñā viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ अन्यत् अपि = अब एक और भी; वक्ष्यामि = कहूँगा; मैत्रेय = हे मैत्रेय; शृणु सुव्रत = सुनो, हे सुव्रत (पाठ: स्रृणु—शृणु; पाठ-भेद संभव); लग्न = १; तुर्य = ४; अस्त = ७ (अस्त-स्थान); वियत् = १० (आकाश/मध्य-नभ, कर्म-स्थान); केन्द्र-संज्ञा = केन्द्र नाम; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ हे मैत्रेय सुव्रत, अब एक और विषय कहता हूँ—सुनो। लग्न, चौथा, सातवाँ (अस्त) और दसवाँ (वियत्)—इन चार भावों की विशेष संज्ञा “केन्द्र” है। यह भाव-वर्गीकरण का मूल ढाँचा है, जिस पर आगे पणफर–आपोक्लिम आदि टिकते हैं।

English rendering Maitreya of good vows, listen: I shall also state another matter—the first, fourth, seventh (asta), and tenth (viyat) houses are especially designated kendras.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न से भाव-सूचकांक k ∈ {1,2,…,12}।
केन्द्र = {1, 4, 7, 10}
सम-कोणीय संरचना (समान-भाव गृह-प्रणाली में): लग्न से ०°, ९०°, १८०°, २७०° भाव-केंद्र।
(भाव-प्रणाली—समान-भाव / श्रीपति / प्लसिडस—घोषित करें; केन्द्र-संज्ञा भाव-क्रमांक पर है, डिग्री-सूक्ष्मता प्रणाली पर निर्भर।)

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (समान-भाव)। केन्द्र: १ कन्या, ४ धनु, ७ मीन, १० मिथुन। यदि मंगल धनु में → चतुर्थ-केन्द्र-स्थित—केवल स्थान-वर्ग; फल-व्याख्या अलग अध्याय।

7.34
द्विपंचरन्ध्रलाभानां ज्ञेयं पणफराभिधम्‌।
त्रिषष्ठभाग्यरिष्फानामापोक्लिममिति द्विज
dvipaṃcarandhralābhānāṃ jñeyaṃ paṇapharābhidham‌|
triṣaṣṭhabhāgyariṣphānāmāpoklimamiti dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि = २; पंच = ५; रन्ध्र = ८; लाभ = ११; पणफर-अभिधम् = पणफर नाम से ज्ञेय; त्रि = ३; षष्ठ = ६; भाग्य = ९; रिष्फ = १२ (व्यय); आपोक्लिम = आपोक्लिम संज्ञा; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, दूसरे, पाँचवें, आठवें (रन्ध्र) और ग्यारहवें (लाभ) भावों को पणफर जानें। तीसरे, छठे, नवें (भाग्य) और बारहवें (रिष्फ) की संज्ञा आपोक्लिम है। केन्द्र के बाद यह क्रमबद्ध तृतीय-वर्ग भाव-नामकरण है।

English rendering Know the second, fifth, eighth (randhra), and eleventh (lābha) as paṇaphara; the third, sixth, ninth (bhāgya), and twelfth (riṣpha) as āpoklima, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न-सापेक्ष:
पणफर (succedent) = {2, 5, 8, 11} = केन्द्र + १
आपोक्लिम (cadent) = {3, 6, 9, 12} = केन्द्र + २
जाँच: {1…12} = केन्द्र ∪ पणफर ∪ आपोक्लिम, निःशेष, असंयुक्त।
|केन्द्र| = |पणफर| = |आपोक्लिम| = ४।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष। पणफर: वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ। आपोक्लिम: मिथुन, कन्या, धनु, मीन। गुरु यदि कुम्भ में → ११ = पणफर-लाभ; केवल संज्ञा-निर्णय।

7.35
लग्नात्‌ पंचमभाग्यस्य कोणसंज्ञा विधीयते।
षष्ठाष्टव्ययभाबानां दुःसंज्ञास्त्रिकसंज्ञकाः
lagnāt‌ paṃcamabhāgyasya koṇasaṃjñā vidhīyate|
ṣaṣṭhāṣṭavyayabhābānāṃ duḥsaṃjñāstrikasaṃjñakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; पंचम = ५; भाग्य = ९; कोण-संज्ञा = कोण (त्रिकोण) संज्ञा; विधीयते = विहित/निर्धारित; षष्ठ = ६; अष्ट = ८; व्यय = १२; भावानाम् = भावों की (पाठ: भाबानां—भावानाम्; पाठ-भेद संभव); दुःसंज्ञा = दुःसंज्ञक; त्रिक-संज्ञकाः = त्रिक संज्ञा वाले।

हिन्दी भावार्थ लग्न से पाँचवें और नवें (भाग्य) भाव की संज्ञा “कोण” विहित है। छठे, आठवें और बारहवें (व्यय) भाव दुःसंज्ञक तथा त्रिक कहे जाते हैं। शास्त्र यहाँ शुभ-कोण और त्रिक-दुःस्थ भावों का नाम-विधान कर रहा है—स्थान-वर्गीकरण, स्वयं कोई घटना-घोषणा नहीं।

English rendering From the lagna, the fifth and the ninth (bhāgya) receive the designation koṇa; the sixth, eighth, and twelfth (vyaya) houses are termed ill-named and trika.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न-सापेक्ष:
कोण (त्रिकोण, इस श्लोक में स्पष्ट): {5, 9}
(परंपरा में लग्न भी त्रिकोण-शीर्ष; यहाँ पाठ केवल ५ और ९ कहता है।)
त्रिक / दुःसंज्ञ = {6, 8, 12}
कोणीय अंतर (समान-भाव): ५ = लग्न+१२०°, ९ = लग्न+२४०° (त्रिभुज-शीर्ष)।
त्रिक: ६ = +१५०°, ८ = +२१०°, १२ = +३३०° — दुःस्थ-वर्ग की संज्ञा-सूची।

उदाहरण (worked example) लग्न = तुला। कोण: कुम्भ (५), मिथुन (९)। त्रिक: मीन (६), वृष (८), कन्या (१२)। शुक्र मिथुन में → नवम-कोण-स्थित—संज्ञा-मात्र; फल-शास्त्र अन्यत्र “शास्त्र कहता है” की भाषा में।

7.36
चतुरस्रं तुर्यरन्ध्रं कथयान्ते द्विजोत्तम।
स्वस्थादुपचयर्क्षाणि त्रिषडायाम्बराणि हि
caturasraṃ turyarandhraṃ kathayānte dvijottama|
svasthādupacayarkṣāṇi triṣaḍāyāmbarāṇi hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुरस्र = 4–8 भाव-युग्म (चतुर्भुज/वर्ग-संज्ञा); तुर्य = चतुर्थ भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; स्वस्थात् = स्व-स्थान (लग्न) से; उपचय-ऋक्षाणि = उपचय-राशि/भाव (वृद्धि-स्थान); त्रि = 3; षट् = 6; आय = 11 (लाभ); अम्बर = 10 (आकाश/कर्म-शिखर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चतुरस्र संज्ञा तुर्य (चतुर्थ) और रन्ध्र (अष्टम) को दी जाती है। लग्न से उपचय-भाव वे हैं जिनकी क्रम-संख्या त्रि, षट्, अम्बर और आय है — अर्थात् तृतीय, षष्ठ, दशम और एकादश। ये चार वृद्धि-स्थानों का मानक नामकरण हैं; फल का विस्तार यहाँ नहीं, केवल परिभाषा है।

English rendering The text states that caturasra denotes the fourth and eighth houses. From one’s own place (the lagna), the upacaya signs are the third, sixth, tenth, and eleventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) House indices counted from Lagna (L = 1):
चतुरस्र = {4, 8}
उपचय = {3, 6, 10, 11}
सामान्य गणित: भाव n लग्न से = राशि-सूचक
Hₙ ≡ (L + n − 1) (mod 12), जहाँ n ∈ {1…12}।
यहाँ कोई अंश-विभाजन नहीं — केवल भाव-संज्ञा का पूर्णांक-समुच्चय।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (1)।
चतुरस्र = कर्कट (4), वृश्चिक (8)।
उपचय = मिथुन (3), कन्या (6), मकर (10), कुम्भ (11)।
(राशि-क्रमांक 1=मेष … 12=मीन; अयनांश/गृह-पद्धति यहाँ अप्रासंगिक — केवल पूर्ण-राशि गिनती।)

---

7.37
तनुर्धनं च सहजो बन्धुपुत्रारयस्तथा।
युवतीरन्ध्रधर्माख्यकर्मालाभव्ययाः क्रमात्‌
tanurdhanaṃ ca sahajo bandhuputrārayastathā|
yuvatīrandhradharmākhyakarmālābhavyayāḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनु = 1 (शरीर/लग्न); धन = 2; सहज = 3 (सहजज/विक्रम); बन्धु = 4; पुत्र = 5; अरि = 6 (शत्रु); युवती = 7 (पत्नी/द्वंद्व); रन्ध्र = 8; धर्म = 9; कर्म = 10; लाभ = 11; व्यय = 12; क्रमात् = क्रम से (1→12)।

हिन्दी भावार्थ बारह भावों के शास्त्रीय नाम इसी क्रम में गिनाए गए हैं — तनु, धन, सहज, बन्धु, पुत्र, अरि, युवती, रन्ध्र, धर्म, कर्म, लाभ, व्यय। यह नाम-सूची बाद के फल-कथनों की कुंजी है: जब “रन्ध्रे” या “लाभे” कहा जाता है, वही क्रम-संख्या समझनी होती है। पाठ मात्र संज्ञा-व्यवस्था देता है, फल का विस्तार नहीं।

English rendering In order, the twelve houses are named: body, wealth, co-borns, kin, children, enemies, spouse, the eighth (randhra), dharma, action, gains, and expenditure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वादश-भाव अनुक्रमणिका (Lagna = 1):

| n | संज्ञा |
|-----|--------|
| 1 | तनु |
| 2 | धन |
| 3 | सहज |
| 4 | बन्धु |
| 5 | पुत्र |
| 6 | अरि |
| 7 | युवती |
| 8 | रन्ध्र |
| 9 | धर्म |
| 10 | कर्म |
| 11 | लाभ |
| 12 | व्यय |

यह शुद्ध नामकरण-तालिका है; कोई बलांक या अंश-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह (5)।
पुत्र-भाव (n=5) = धनु (राशि 9); कर्म-भाव (n=10) = वृषभ (राशि 2); व्यय (n=12) = कर्कट (राशि 4)।
जाँच: Hₙ ≡ (5 + n − 1 − 1) mod 12 + 1 = (5 + n − 2) mod 12 + 1, अथवा सरलतः लग्न-से nवीं राशि।

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7.38
संक्षेपेणौतदुदितमन्यद्‌ बुद्ध्यनुसारतः।
किञ्चिद्विशेषं वक्ष्यामि यथा भह्ममुखार्च्छुतम्‌
saṃkṣepeṇautaduditamanyad‌ buddhyanusārataḥ|
kiñcidviśeṣaṃ vakṣyāmi yathā bhahmamukhārcchutam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संक्षेपेण = संक्षेप में; एतत् = यह (पूर्वोक्त); उदितम् = कहा गया; अन्यत् = शेष; बुद्धि-अनुसारतः = बुद्धि के अनुसार; किञ्चित् विशेषम् = कुछ विशेष; वक्ष्यामि = कहूँगा; ब्रह्म-मुखान्/आर्च्छुतम् = ब्रह्मा के मुख से सुना (पाठ: भह्म — पाठ-भेद संभव; प्रायः ब्रह्म)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अब तक का विवेचन संक्षेप में दिया गया; शेष विषय विद्यार्थी की बुद्धि से जोड़ना है। फिर भी कुछ विशेष बातें आगे कही जाएँगी — जैसा ब्रह्मा के मुख से सुना गया। यह संक्रमण-श्लोक है: सामान्य भाव-संज्ञा के बाद विशेष निर्णय-नियम आते हैं।

English rendering This much has been stated in brief; the rest is to be followed according to understanding. A few special points will now be told, as heard from Brahmā’s mouth (reading of bhahma may vary — पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/संक्रमण-कथन। यह आगे के श्लोकों (7.39–7.42) के कारक-से-भाव गणना-नियमों की प्रस्तावना मात्र है।

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7.39
नवमेऽपि पितुर्ज्ञानं सूर्याच्च नवमेऽथवा।
यत्किञ्चिद्दशमे लाभे तत्सूर्याद्दशमे भवे
navame'pi piturjñānaṃ sūryācca navame'thavā|
yatkiñciddaśame lābhe tatsūryāddaśame bhave

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवमे = नवम भाव में; अपि = भी; पितुः ज्ञानम् = पिता-संबंधी ज्ञान; सूर्यात् = सूर्य से; नवमे अथवा = अथवा सूर्य-से नवम; यत्किञ्चित् = जो कुछ; दशमे = दशम में; लाभे = लाभ (11) में; तत् = वह; सूर्यात् दशमे = सूर्य-से दशम में; भवे = होता/देखा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पिता-संबंधी विचार लग्न-से नवम भाव से भी हो, और सूर्य से गिने नवम से भी। दशम और लाभ भावों से जुड़ा जो कुछ चिंतनीय है, वह सूर्य से दशम भाव में भी देखा जाए। अर्थात् लग्न-केन्द्र के साथ कारक-सूर्य को द्वितीय “उद्गम” मानकर उन्हीं भाव-संख्याओं की पुनर्गिनती करनी है।

English rendering The text states that knowledge of the father is also from the ninth, or from the ninth counted from the Sun. Whatever pertains to the tenth and to gains is to be considered from the tenth from the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह G से भाव n की राशि:
R(G, n) ≡ (r(G) + n − 1) (mod 12),
जहाँ r(G) ∈ {0…11} सूर्य की राशि-सूचकांक (0=मेष)।

पिता-विचार: R(Lagna, 9) अथवा R(Sun, 9)
कर्म/लाभ-संबंधी: R(Sun, 10) [श्लोक दशम को मुख्यतः सूर्य-से जोड़ता है; लाभ लग्न-लाभ के साथ पढ़ा जाता है]

यह मॉड्यूलर पूर्णांक-गिनती है; डिग्री-विभाजन नहीं। अयनांश सूर्य-राशि निर्धारित करने पर लागू — r(Sun) = ⌊λ_sidereal(Sun)/30°⌋।

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन (r=2); सूर्य = मकर (r=9)।
लग्न-से नवम = R(2,9) → राशि-सूचक 2+8 = 10 → कुम्भ।
सूर्य-से नवम = R(9,9) → 9+8 = 17 ≡ 5 (mod 12) → कन्या।
सूर्य-से दशम = R(9,10) → 9+9 = 18 ≡ 6 → तुला।
(सायनांश λ पर निर्भर; यहाँ केवल राशि-स्तर माना गया।)

---

7.40
तुर्ये तनौ धने लाभे भाग्ये यच्चिन्तनं च तत्‌।
चन्द्रात्तुर्ये तनौ लाभे भग्ये तच्चिन्तयेद्‌ ध्रुवम्‌
turye tanau dhane lābhe bhāgye yaccintanaṃ ca tat‌|
candrātturye tanau lābhe bhagye taccintayed‌ dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुर्ये = चतुर्थ भाव (4th — सुख, माता, गृह, वाहन); तनौ = प्रथम/लग्न भाव (1st — देह, स्व); धने = द्वितीय भाव (2nd — धन, कुटुम्ब); लाभे = एकादश भाव (11th — लाभ, प्राप्ति); भाग्ये = नवम भाव (9th — भाग्य, धर्म, पिता); यत् चिन्तनम् च तत् = इनका जो विचार [लग्न से होता है] वही; चन्द्रात् = चन्द्रमा से (चन्द्र-लग्न से गणना); तच्चिन्तयेत् ध्रुवम् = वही निश्चित रूप से विचारना चाहिए। (पाठ-भेद संभव: द्वितीय पाद में 'धने' छन्दोवश लुप्त है; सिद्धान्त द्वितीय भाव पर भी लागू।)

हिन्दी भावार्थ चतुर्थ (सुख/माता), प्रथम (देह), द्वितीय (धन), एकादश (लाभ) और नवम (भाग्य) भाव के विषय में जो कुछ लग्न से विचारा जाता है, वही निश्चित रूप से चन्द्रमा से भी परखना चाहिए — अर्थात् चन्द्र से चौथे, प्रथम, ग्यारहवें और नवें भाव से। यहाँ चन्द्रमा एक दूसरे लग्न (चन्द्र-लग्न) की भाँति काम करता है, जिससे भाव-फल का दोहरा प्रमाण मिलता है।

English rendering Whatever is examined for the 4th (comfort/mother), 1st (self), 2nd (wealth), 11th (gains) and 9th (fortune) houses from the ascendant should, without fail, be examined from the Moon as well — the 4th, 1st, 11th and 9th reckoned from it. The Moon thus stands as a second lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह भाव-गणना (मॉड्युलर अंकगणित) है। किसी सन्दर्भ-बिन्दु R (लग्न अथवा चन्द्र) की राशि-संख्या s ∈ {1…12} हो, तो R से nवाँ भाव —
भावₙ(R) = ((s − 1 + (n − 1)) mod 12) + 1 (अन्तर्गणना सहित: R की अपनी राशि = 1; समराशि/whole-sign संकेत)।
श्लोक भाव-समुच्चय {1, 2, 4, 9, 11} को दो सन्दर्भों से बाँधता है — लग्न से तथा चन्द्र से। कोई वर्ग-नियतांक नहीं; केवल राशि-सूचकांक का mod 12 गणित।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र मेष (s = 1) में है। तब —
भाव₄ = ((0 + 3) mod 12) + 1 = 4 = कर्क; भाव₁₁ = ((0 + 10) mod 12) + 1 = 11 = कुम्भ; भाव₉ = ((0 + 8) mod 12) + 1 = 9 = धनु; भाव₁ = 1 = मेष; भाव₂ = 2 = वृष। अतः सुख-विचार जन्म-चतुर्थ (लग्न से) और कर्क (चन्द्र से चौथा) — दोनों से परखा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) भाव-सूचकांक शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है — वही निर्धारक वर्ग-गणना का वर्ग जो हमारे varga-इंजन में देशान्तर पर mod-अंकगणित से चलता है — और इस पर `==` (कोई सहनशीलता-पट्टी नहीं) जाँच लागू होती है, ठीक जैसे अष्टकवर्ग ऑरेकल में। चन्द्र-लग्न एक घोषित convention है, गुप्त चयन नहीं; और फल स्वयं शास्त्र का कथन रहता है, हमारी अनुमोदित भविष्यवाणी नहीं — यही डिकोड की अनुशासन-रेखा है (गणित को व्याख्या से पृथक रखना)।

7.41
लग्नाद्‌ दुश्चिक्यभवने यत्कुजाद्विक्रमेऽखिलम्‌।
विचार्यं षष्ठभावस्य बुधात्‌ षष्ठे विलोकयेत्‌
lagnād‌ duścikyabhavane yatkujādvikrame'khilam‌|
vicāryaṃ ṣaṣṭhabhāvasya budhāt‌ ṣaṣṭhe vilokayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; दुश्चिक्यभवने = तृतीय भाव में (duścikya = 3rd — भाई-बहन, पराक्रम, साहस); यत् … अखिलम् = जो कुछ भी (सम्पूर्ण); कुजात् = मंगल से (Kuja = Mars, तृतीय-कारक); विक्रमे = तृतीय भाव में (vikrama = 3rd, पराक्रम) [मंगल से तीसरे]; विचार्यम् = विचारने योग्य; षष्ठभावस्य = छठे भाव का (6th — रोग, शत्रु, ऋण); बुधात् = बुध से (Budha = Mercury); षष्ठे = छठे भाव में [बुध से छठे]; विलोकयेत् = निरीक्षण करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ तृतीय भाव के जो समस्त विषय (भाई-बहन, पराक्रम) लग्न से विचारे जाते हैं, वे मंगल से भी तीसरे भाव से विचारने चाहिए, क्योंकि मंगल तृतीय का कारक है। इसी प्रकार षष्ठ भाव के विषय (रोग, शत्रु, ऋण) बुध से छठे भाव में देखने चाहिए। प्रत्येक भाव अपने कारक ग्रह से भी परखा जाता है।

English rendering All that is to be judged for the 3rd house (siblings, valour) from the ascendant should equally be judged from Mars — in the 3rd reckoned from Mars; and the affairs of the 6th house (illness, enemies, debt) should be observed from Mercury, in the 6th reckoned from Mercury.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पुनः वही भाव-गणना, किन्तु सन्दर्भ = कारक ग्रह।
तृतीय मंगल से: भाव₃(कुज) = ((s_कुज − 1 + 2) mod 12) + 1।
षष्ठ बुध से: भाव₆(बुध) = ((s_बुध − 1 + 5) mod 12) + 1। (अन्तर्गणना सहित; समराशि संकेत।)

उदाहरण (worked example) मंगल सिंह (s = 5) में हो → भाव₃ = ((5 − 1 + 2) mod 12) + 1 = (6 mod 12) + 1 = 7 = तुला। बुध वृष (s = 2) में हो → भाव₆ = ((2 − 1 + 5) mod 12) + 1 = (6 mod 12) + 1 = 7 = तुला। अतः पराक्रम-विषय जन्म-तृतीय व तुला (मंगल से तीसरा) दोनों से, और रोग-विषय जन्म-षष्ठ व तुला (बुध से छठा) दोनों से परखा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षष्ठ का कारक यहाँ बुध कहा गया है — जबकि अन्य कारक-सूचियाँ षष्ठ के लिए मंगल/शनि देती हैं; यह एक घोषित एवं विवादित convention है। हमारी डिकोड-पद्धति ऐसी परस्पर-भिन्न परम्पराओं को (जैसे अष्टकवर्ग में BPHS बनाम फलदीपिका का चन्द्र-'9' स्थानान्तरण) साथ-साथ दिखाती है, गुप्त रूप से एक नहीं चुनती। भाव-सूचकांक स्वयं `==` शुद्ध mod-अंकगणित है — गणना निर्धारक, फल शास्त्र का कथन।

7.42
पुत्रस्य च गुरोः पुत्रे जायायाः सप्तमे भृगोः।
अष्टमस्य व्ययस्यापि मन्दान्मृत्यौ व्यये तथा
putrasya ca guroḥ putre jāyāyāḥ saptame bhṛgoḥ|
aṣṭamasya vyayasyāpi mandānmṛtyau vyaye tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्य = पंचम भाव का (putra = 5th — संतान, बुद्धि); गुरोः = गुरु/बृहस्पति से (Guru = Jupiter, संतान-कारक); पुत्रे = पंचम भाव में [गुरु से पाँचवें]; जायायाः = सप्तम भाव का (jāyā = 7th — पत्नी/जीवनसाथी); सप्तमे = सप्तम भाव में; भृगोः = शुक्र से (Bhṛgu/Bhārgava = Venus, कलत्र-कारक) [शुक्र से सातवें]; अष्टमस्य = अष्टम भाव का (8th — आयु/मृत्यु, गुप्त); व्ययस्य अपि = द्वादश भाव का भी (vyaya = 12th — व्यय, हानि, मोक्ष); मन्दात् = शनि से (Manda = Saturn, आयु-कारक); मृत्यौ = अष्टम भाव में (mṛtyu = 8th) [शनि से आठवें]; व्यये = द्वादश भाव में [शनि से बारहवें]; तथा = वैसे ही।

हिन्दी भावार्थ पंचम (संतान) के विषय गुरु से पाँचवें भाव से; सप्तम (पत्नी/जीवनसाथी) के विषय शुक्र से सातवें भाव से; तथा अष्टम (आयु/मृत्यु) और द्वादश (व्यय) के विषय शनि से क्रमशः आठवें और बारहवें भाव से विचारने चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक भाव अपने नैसर्गिक कारक ग्रह से दुबारा परखा जाता है।

English rendering The affairs of the 5th (children) are to be judged from Jupiter — in the 5th from it; those of the 7th (spouse) from Venus, in the 7th; and those of the 8th (longevity/death) and the 12th (loss) likewise from Saturn, in the 8th and 12th reckoned from it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वही भाव-गणना, सन्दर्भ = नैसर्गिक कारक।
भाव₅(गुरु) = ((s − 1 + 4) mod 12) + 1; भाव₇(शुक्र) = ((s − 1 + 6) mod 12) + 1;
भाव₈(शनि) = ((s − 1 + 7) mod 12) + 1; भाव₁₂(शनि) = ((s − 1 + 11) mod 12) + 1। (अन्तर्गणना सहित; समराशि संकेत।)

उदाहरण (worked example) गुरु मेष (s = 1) → भाव₅ = ((0 + 4) mod 12) + 1 = 5 = सिंह। शुक्र कर्क (s = 4) → भाव₇ = ((3 + 6) mod 12) + 1 = 10 = मकर (सम्मुख राशि)। शनि तुला (s = 7) → भाव₈ = ((6 + 7) mod 12) + 1 = (13 mod 12) + 1 = 2 = वृष; भाव₁₂ = ((6 + 11) mod 12) + 1 = (17 mod 12) + 1 = 6 = कन्या। अतः संतान-विषय सिंह से, कलत्र-विषय मकर से, तथा आयु व व्यय-विषय क्रमशः वृष और कन्या से (कारक-सापेक्ष) भी परखे जाते हैं।

7.43
यद्‌भावाद्यत्फलं चिन्त्यं तदीशात्तत्फलं विदुः।
ज्ञेयं तस्य फलं तद्धि तत्र चिन्त्यं शुभाऽशुभम्‌
yad‌bhāvādyatphalaṃ cintyaṃ tadīśāttatphalaṃ viduḥ|
jñeyaṃ tasya phalaṃ taddhi tatra cintyaṃ śubhā'śubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यद्-भावात् = जिस भाव से; यत्-फलम् = जो फल; चिन्त्यम् = विचारणीय / जानने योग्य; तद्-ईशात् = उस भाव के स्वामी (अधिपति) से; तत्-फलम् = वही फल; विदुः = विद्वान् जानते हैं; ज्ञेयम् = ज्ञातव्य; तस्य फलम् = उस (स्वामी) का फल; तत्र = वहाँ (उस स्थान/भाव में); शुभ-अशुभम् = शुभ और अशुभ (दोनों पक्ष)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस भाव से जो फल सोचना है, उसे उसी भाव के स्वामी से जानना चाहिए — भाव-फल का निर्णय केवल भाव-स्थान पर नहीं, उसके अधिपति की दशा, स्थान और बल पर भी टिका है। उसी स्वामी का जो फल है, वही उस भाव का फल समझा जाए; वहीं शुभ-अशुभ दोनों पक्षों का विवेक करना है। यह अध्याय के वर्ग-फल-चिन्तन की रीति है: वर्ग-कुण्डली में भी भाव का अर्थ उसके स्वामी से पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that whatever result is to be considered from a given house is known from the lord of that house. The fruit belonging to that lord is the fruit of the house; there auspicious and inauspicious indications are both to be weighed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-चिन्तन की पद्धति-कथन। यह श्लोक कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष नहीं देता; यह बताता है कि भाव-फल का आश्रय-बिन्दु भाव-स्वामी है — वर्ग-चार्ट (D1…D60) में भी “भाव कहाँ है” के साथ “स्वामी कहाँ है, कितना बलवान है” — यही शास्त्रीय चिन्तन-क्रम है।

अध्यायः 8

राशिदृष्टिकथनाध्यायः

9 श्लोक
8.1
अथ मेषादिराशीनां चरादीनां पृथक्‌ पृथक्‌।
दृष्टिभेदं प्रवक्ष्यामि श्रृणु त्वं द्विजसत्तम
atha meṣādirāśīnāṃ carādīnāṃ pṛthak‌ pṛthak‌|
dṛṣṭibhedaṃ pravakṣyāmi śrṛṇu tvaṃ dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरण-आरम्भ); मेषादि-राशीनाम् = मेष से आरम्भ होने वाली राशियों का; चरादीनाम् = चर-स्थिर-द्विस्वभाव (गति के अनुसार तीन प्रकार) क्रम से; पृथक् पृथक् = अलग-अलग, प्रत्येक का; दृष्टिभेदम् = राशि-दृष्टि के भेद (कौन राशि किसे देखती है); प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; शृणु त्वम् = तू सुन; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय)।

हिन्दी भावार्थ अब मैं, हे द्विजश्रेष्ठ, मेष आदि बारहों राशियों की — और उन्हें चर, स्थिर तथा द्विस्वभाव भेद से बाँटकर — पृथक्-पृथक् दृष्टि (राशि-दृष्टि) का विवेचन कहता हूँ; तू ध्यान से सुन। यह श्लोक आठवें अध्याय की प्रतिज्ञा है, जो ग्रह-दृष्टि से भिन्न "राशि-दृष्टि" नामक स्वतन्त्र प्रकरण खोलता है।

English rendering Now, O best of the twice-born, I shall expound — for the signs from Aries onward, each classed as movable, fixed, or dual — the several rules of sign-aspect; listen attentively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-प्रतिज्ञा (संवाद-आरम्भ)। यहाँ केवल यह संकेत निहित है कि आगे की तकनीक राशियों के त्रिविध वर्गीकरण (चर = 1,4,7,10; स्थिर = 2,5,8,11; द्विस्वभाव = 3,6,9,12) पर आधारित है — अर्थात् राशि-संख्या n के mod 3 वर्ग पर।

8.2
राशयोऽभिमुखं विप्र तथा पश्यन्ति पार्श्वभे।
यथा चरः स्थिरानेवं स्थिरः पश्यति वै चरान्‌
rāśayo'bhimukhaṃ vipra tathā paśyanti pārśvabhe|
yathā caraḥ sthirānevaṃ sthiraḥ paśyati vai carān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशयः = राशियाँ; अभिमुखम् = सम्मुख/सामने पड़ती राशि को; पश्यन्ति = देखती (दृष्टि डालती) हैं; पार्श्वभे = बगल की (पार्श्ववर्ती) राशि में भी; यथा = जैसे; चरः = चर राशि; स्थिरान् = स्थिर राशियों को; एवम् = वैसे ही; स्थिरः = स्थिर राशि; चरान् = चर राशियों को; वै = निश्चय ही; पश्यति = देखती है।

हिन्दी भावार्थ राशियाँ अपने सम्मुख तथा पार्श्व में स्थित राशियों पर दृष्टि डालती हैं — और नियम यह है कि जैसे चर राशि स्थिर राशियों को देखती है, वैसे ही स्थिर राशि चर राशियों को देखती है। यह पारस्परिक (द्वि-मार्गी) दृष्टि है — जो देखती है, वही प्रतिदृष्ट भी होती है; केवल ठीक बगल वाली (समीपस्थ) राशि इससे छूट जाती है।

English rendering The signs cast their glance upon those set opposite and flanking them; and just as a movable sign beholds the fixed signs, so too the fixed beholds the movable — the aspect running mutually between them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-दृष्टि विशुद्ध पूर्णांक-नियम है, राशि-संख्या n (1…12) पर घटी-अंकगणित से। दृष्ट-समुच्चय A(n):
- चर (n ≡ 1 mod 3): A(n) = {n+4, n+7, n+10} (mod 12) → तीन स्थिर राशियाँ, समीपस्थ स्थिर n+1 को छोड़कर।
- स्थिर (n ≡ 2 mod 3): A(n) = {n+2, n+5, n+8} (mod 12) → तीन चर राशियाँ, समीपस्थ चर n−1 को छोड़कर।
गुण: दृष्टि सममित है — B ∈ A(A) ⇔ A ∈ A(B)। (ग्रह-दृष्टि के विपरीत, जो असममित होती है।)

उदाहरण (worked example) मेष (चर, n=1): A(1) = {5, 8, 11} = सिंह, वृश्चिक, कुम्भ — तीनों स्थिर, केवल समीपस्थ वृष (2) छूटा। अब सिंह (स्थिर, n=5): A(5) = {7, 10, 1} = तुला, मकर, मेष — तीनों चर, समीपस्थ कर्क (4) छूटा। ध्यान दें मेष↔सिंह परस्पर एक-दूसरे को देखते हैं — सममिति सिद्ध।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक जिस राशि-दृष्टि-सारणी को गढ़ता है, वह ठीक उसी कोटि का नियतांक (deterministic) पूर्णांक-नियम है जैसा अष्टकवर्ग की Ch.66 सारणी — पूर्णतः mod-अंकगणित पर आधारित, वैसे ही जैसे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) देशान्तर के 30° खण्ड को घटी-अंकगणित से बाँटता है। इसीलिए हमारे अनुशासन में ऐसी सारणी परिणाम-कथन (फल) नहीं, अपितु exact-`==` पर पिन करने योग्य गणना है — कोई सहिष्णुता-पट्टी नहीं, प्रत्येक कोष्ठ ठीक-ठीक या तो 0 या 1। गणित को व्याख्या से पृथक् रखने का यही सूत्र (dossier §5) यहाँ भी लागू होता है।

8.3
द्विस्वभावो विनाऽत्मानां द्विस्वभावान्‌ प्रपश्यति।
समीपस्थं परित्यज्य खेटास्तत्र गतास्तथा
dvisvabhāvo vinā'tmānāṃ dvisvabhāvān‌ prapaśyati|
samīpasthaṃ parityajya kheṭāstatra gatāstathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विस्वभावः = द्विस्वभाव (उभय) राशि; विना आत्मानं = स्वयं को छोड़कर; द्विस्वभावान् = अन्य द्विस्वभाव राशियों को; प्रपश्यति = भली-भाँति देखती है; समीपस्थं = समीप स्थित को; परित्यज्य = त्याग कर; खेटाः = ग्रह; तत्र गताः = वहाँ स्थित; तथा = उसी प्रकार

हिन्दी भावार्थ द्विस्वभाव राशि स्वयं को छोड़कर अन्य द्विस्वभाव राशियों पर दृष्टि डालती है। समीपस्थ को छोड़ने का अनुशासन यहाँ जुड़ा है। शास्त्र आगे कहता है—जो खेट उस वर्ग की राशि में स्थित हों, उनकी दृष्टि भी उसी नियम से चलती है। अर्थात् राशि-दृष्टि का नियम, राशि में बैठे ग्रह पर भी लागू होता है।

English rendering A dual-natured sign aspects the other dual-natured signs, not itself. Leaving aside what stands nearby, planets that have gone there act in the same way.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्विस्वभाव समुच्चय D = {3, 6, 9, 12}।
नियम: राशि r ∈ D के लिए दृष्टि-लक्ष्य = D \ {r} (आत्म-वर्जन)।
पूर्ण रूप (३ लक्ष्य):
- 3 (मिथुन) → {6, 9, 12}
- 6 (कन्या) → {3, 9, 12}
- 9 (धनु) → {3, 6, 12}
- 12 (मीन) → {3, 6, 9}

«समीपस्थं परित्यज्य» चर–स्थिर जोड़ी में समीपवर्ती विपरीत-वर्ग राशि का त्याग है (अगले श्लोकों से समेकित); द्विस्वभाव में «विना आत्मानं» मुख्य वर्जन है। खेट dṛṣṭi: यदि ग्रह g की राशि R(g) ∈ D, तो g उन खेटों/भावों को राशि-दृष्टि से देखता है जिनकी राशि ∈ D \ {R(g)}।

उदाहरण (worked example) कन्या (6) में स्थित बुध। द्विस्वभाव-दृष्टि लक्ष्य = {3, 9, 12} = मिथुन, धनु, मीन। यदि गुरु धनु (9) में हो, तो शास्त्रीय राशि-दृष्टि नियम के अनुसार कन्यास्थ बुध → धनुस्थ गुरु (द्विस्वभाव–द्विस्वभाव)। (यह फल-कथन नहीं—केवल दृष्टि-सम्बन्ध की जाँच।)

8.4
चरेषु संस्थिताः खेटाः पश्यन्ति स्थिरसङ्गतान्‌।
स्थिरेषु संस्थिता एवं पश्यन्ति चरसंस्थितान्‌
careṣu saṃsthitāḥ kheṭāḥ paśyanti sthirasaṅgatān‌|
sthireṣu saṃsthitā evaṃ paśyanti carasaṃsthitān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चरेषु संस्थिताः = चर राशियों में स्थित; खेटाः = ग्रह; पश्यन्ति = देखते हैं; स्थिर-सङ्गतान् = स्थिर राशियों में जुड़े / स्थित को; स्थिरेषु संस्थिताः = स्थिर राशियों में स्थित; एवं = इसी प्रकार; पश्यन्ति चर-संस्थितान् = चर-स्थितों को देखते हैं

हिन्दी भावार्थ अब नियम खेट-स्तर पर दोहराया गया है। चर राशि में बैठे ग्रह स्थिर राशि में बैठे ग्रहों/स्थितियों को देखते हैं; स्थिर राशि में बैठे ग्रह चर राशि वालों को देखते हैं। राशि-स्वभाव की दृष्टि, ग्रह की दृष्टि-व्यवस्था का ढाँचा बनती है—यह «खेट दृष्टि» का राशि-आधारित भाग है, अंश-आधारित ग्रह-दृष्टि प्रतिशत से भिन्न प्रकरण।

English rendering Planets placed in the movable signs aspect those associated with the fixed signs. Those placed in the fixed signs, in the same way, aspect those stationed in the movable signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह g की राशि R = 1 + ⌊λ_g / 30°⌋ (sidereal)।
- यदि R ∈ C = {1,4,7,10}: g राशि-दृष्टि से उन स्थितियों को देखता है जहाँ R′ ∈ S = {2,5,8,11}, समीपस्थ स्थिर को छोड़कर।
- यदि R ∈ S: लक्ष्य R′ ∈ C, समीपस्थ चर को छोड़कर।

समीप-त्याग (शास्त्रीय पूर्ण सूची; १ लक्ष्य वर्जित, ३ लक्ष्य शेष):
| चर R | त्याज्य स्थिर | दृष्टि → |
| 1 मेष | 2 वृष | 5, 8, 11 |
| 4 कर्क | 5 सिंह | 8, 11, 2 |
| 7 तुला | 8 वृश्चिक | 11, 2, 5 |
| 10 मकर | 11 कुम्भ | 2, 5, 8 |

| स्थिर R | त्याज्य चर | दृष्टि → |
| 2 वृष | 1 मेष | 4, 7, 10 |
| 5 सिंह | 4 कर्क | 7, 10, 1 |
| 8 वृश्चिक | 7 तुला | 10, 1, 4 |
| 11 कुम्भ | 10 मकर | 1, 4, 7 |

उदाहरण (worked example) मङ्गल मेष में (R = 1 ∈ C)। स्थिर लक्ष्य पूर्ण समुच्चय {2,5,8,11} में से समीपस्थ 2 त्याज्य → दृष्टि 5, 8, 11 (सिंह, वृश्चिक, कुम्भ)। यदि शनि कुम्भ (11) में हो, तो मेषस्थ मङ्गल → कुम्भस्थ शनि इस राशि-दृष्टि नियम से जुड़ता है। कन्वेंशन: sidereal rāśi; ayanāṃśa का मान λ बदलता है, समुच्चय-नियम नहीं।

8.5
उभयस्थास्तु सूर्याद्या पश्यन्युभयसंस्थितान्‌।
निकटस्थं विना खेटाः पश्यन्तीत्ययमागमः
ubhayasthāstu sūryādyā paśyanyubhayasaṃsthitān‌|
nikaṭasthaṃ vinā kheṭāḥ paśyantītyayamāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उभयस्थाः = उभय (द्विस्वभाव) राशियों में स्थित; तु = और / ही; सूर्याद्याः = सूर्यादि ग्रह; पश्यन्ति = देखते हैं; उभय-संस्थितान् = उभय-स्थितों को; निकटस्थं विना = निकटस्थ को छोड़कर; खेटाः पश्यन्ति = ग्रह देखते हैं; इति अयम् आगमः = यह यह परम्परा / शास्त्र-प्रमाण है

हिन्दी भावार्थ उभय राशि में स्थित सूर्यादि खेट, उभय राशि में स्थितों को ही देखते हैं—निकटस्थ को छोड़कर। शास्त्र इसे «आगम» कहकर प्रमाणित ठहराता है: चर–स्थिर का युग्म और उभय–उभय का युग्म—दोनों मिलकर राशि-दृष्टि की पूरी व्यवस्था है। यह फल-कथन नहीं, दृष्टि-सम्बन्ध का विधि-विधान है।

English rendering The Sun and the other planets stationed in dual signs aspect those stationed in dual signs, excluding what is near. Thus the planets aspect—this is the received tradition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यदि R(g) ∈ D = {3,6,9,12}, तो राशि-दृष्टि लक्ष्य = D \ {R(g)} (३ राशियाँ)।
«निकटस्थं विना» का समेकित पठन: (क) द्विस्वभाव में आत्म-राशि का वर्जन; (ख) चर/स्थिर में समीपस्थ विपरीत-वर्ग का वर्जन (8.3–8.4 से)।
पूर्ण राशि-दृष्टि फलन (संक्षेप):
```
aspects(R) =
if R ∈ C: S \ {next_fixed(R)} // 3 targets
if R ∈ S: C \ {prev_movable(R)} // 3 targets
if R ∈ D: D \ {R} // 3 targets
```
प्रत्येक राशि से ठीक ३ राशियों पर राशि-दृष्टि—सममित, पूर्ण-चक्र नियम।

उदाहरण (worked example) गुरु धनु में (R = 9 ∈ D)। लक्ष्य = {3, 6, 12} = मिथुन, कन्या, मीन। शुक्र कन्या (6) में हो तो धनुस्थ गुरु → कन्यास्थ शुक्र (उभय–उभय)। सूर्य सिंह (5 ∈ S) में हो तो सिंह की दृष्टि चर {7,10,1} पर (कर्क त्याज्य)—उभय-नियम लागू नहीं।

8.6
दृष्टिचक्रमहं वक्ष्ये ययावद्‌ ब्रह्मणोदितम्‌।
तस्य विन्यासमात्रेण दृष्टिभेदः प्रकाश्यते
dṛṣṭicakramahaṃ vakṣye yayāvad‌ brahmaṇoditam‌|
tasya vinyāsamātreṇa dṛṣṭibhedaḥ prakāśyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृष्टिचक्रम् = दृष्टि-चक्र (राशियों का दिशा-विन्यास वाला आरेख); अहम् वक्ष्ये = मैं कहूँगा; यथावत् = ठीक जैसा (है वैसा ही) — ("ययावद्" पाठ-भेद संभव, यथावत् का रूप); ब्रह्मणा उदितम् = ब्रह्मा द्वारा कहा गया; तस्य = उसके; विन्यासमात्रेण = केवल विन्यास (रचना/स्थापना) से; दृष्टिभेदः = दृष्टि-भेद; प्रकाश्यते = प्रकट/स्पष्ट हो जाता है।

हिन्दी भावार्थ अब मैं वह दृष्टि-चक्र कहता हूँ, ठीक जैसा ब्रह्मा ने कहा था; उस चक्र को मात्र (यथास्थान) रच देने से ही सम्पूर्ण दृष्टि-भेद स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं। अर्थात् जिस अंकगणितीय नियम को श्लोक 2–5 में कहा गया, उसी को एक ज्यामितीय आरेख में बदल देने का उपाय यहाँ सूचित है — जिससे स्मरण-गणना के बिना ही, केवल देखकर, दृष्टियाँ पढ़ी जा सकें।

English rendering I shall now declare the aspect-diagram exactly as it was uttered by Brahmā; by the mere laying-out of that wheel, all the distinctions of aspect stand revealed of themselves.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना/वर्णन (आरेख-परिचय)। मर्म यह है कि श्लोक 2–5 का mod-अंकगणित एक स्थानिक विन्यास में इस प्रकार सन्निहित किया जा सकता है कि "किसकी किस पर दृष्टि" प्रश्न सारणी-गणना से नहीं, अपितु आरेख में सहावलोकन (co-location/facing) से हल हो जाए — गणना का ज्यामितीय रूपान्तरण।

8.7
प्राचि मेषवृषौ लेख्यौ कर्कसिंहौ तथोत्तरे।
तुलाऽली पश्चिमे विप्र मृगकुम्भौ च दक्षिणे
prāci meṣavṛṣau lekhyau karkasiṃhau tathottare|
tulā'lī paścime vipra mṛgakumbhau ca dakṣiṇe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राचि = पूर्व दिशा में; मेषवृषौ = मेष और वृष; लेख्यौ = लिखने/रखने योग्य; कर्कसिंहौ = कर्क और सिंह; तथा उत्तरे = और उत्तर में; तुला अली = तुला और अलि (वृश्चिक); पश्चिमे = पश्चिम में; विप्र = हे विप्र; मृगकुम्भौ = मृग (मकर) और कुम्भ; च दक्षिणे = और दक्षिण में।

हिन्दी भावार्थ दृष्टि-चक्र इस प्रकार रचो — पूर्व दिशा में मेष और वृष लिखो, उत्तर में कर्क और सिंह, पश्चिम में तुला और वृश्चिक, तथा, हे विप्र, दक्षिण में मकर और कुम्भ। प्रत्येक दिशा में एक चर और एक स्थिर राशि का युग्म बैठता है; शेष चार द्विस्वभाव राशियाँ (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) दिशाओं के बीच कोनों में आती हैं।

English rendering In the east inscribe Aries and Taurus; in the north Cancer and Leo; in the west Libra and Scorpio; and in the south, O brahmin, Capricorn and Aquarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिशा-विन्यास (वामावर्त, पूर्व→उत्तर→पश्चिम→दक्षिण), प्रत्येक दिशा में युग्म (चर, स्थिर):
- पूर्व (प्राची): मेष 1, वृष 2
- उत्तर: कर्क 4, सिंह 5
- पश्चिम: तुला 7, वृश्चिक 8
- दक्षिण: मकर 10, कुम्भ 11
शेष द्विस्वभाव {3, 6, 9, 12} अन्तर्दिश् कोणों में: मिथुन 3 (पूर्व–उत्तर के बीच), कन्या 6 (उत्तर–पश्चिम), धनु 9 (पश्चिम–दक्षिण), मीन 12 (दक्षिण–पूर्व)। इस स्थापना में सम्मुख/पार्श्व स्थिति ही श्लोक 2–5 के दृष्ट-समुच्चय A(n) को नेत्र-गोचर कर देती है।

उदाहरण (worked example) चक्र में मेष (पूर्व) से सम्मुख/पार्श्व पड़ती स्थिर राशियाँ सिंह (उत्तर), वृश्चिक (पश्चिम), कुम्भ (दक्षिण) हैं — अर्थात् A(1) = {5, 8, 11}; और सटी वृष (उसी पूर्व-कोष्ठ की स्थिर) दृष्टि से बाहर — ठीक वही परिणाम जो घटी-सूत्र देता है। इस प्रकार आरेख और अंकगणित एक ही उत्तर पर मिलते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दृष्टि-चक्र वस्तुतः श्लोक 2–5 के पूर्णांक-नियम का समतुल्य (isomorphic) ज्यामितीय रूप है — विन्यास घोषित करो, परिणाम नियततः पढ़ो। यही "convention घोषित करो, फिर exact परिणाम" का अनुशासन (dossier §5) है, जैसा वर्ग-विभाजन में अयनांश/वर्ग-नियम घोषित कर देशान्तर से नियत खण्ड निकाला जाता है। आरेख से पढ़ा A(n) और घटी-सूत्र से निकला A(n) — दोनों का exact-`==` मिलान ही इस चक्र की शुद्धता की कसौटी है, कोई सन्निकटन नहीं।

8.8
ईशकोणे तु मिथुनं वायव्ये कन्यकां तथा।
नौरृर्त्यां चापमालिख्य वह्निकोणे छषं लिखेत्‌
īśakoṇe tu mithunaṃ vāyavye kanyakāṃ tathā|
naurṛrtyāṃ cāpamālikhya vahnikoṇe chaṣaṃ likhet
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ईशकोणे = ईशान (उत्तर-पूर्व) कोण में; मिथुनम् = मिथुन राशि; वायव्ये = वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोण में; कन्यकाम् = कन्या; नैरृत्याम् = नैरृत्य (दक्षिण-पश्चिम) में; चापम् = धनु; आलिख्य = लिखकर; वह्निकोणे = आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) कोण में; झषम् (पाठ "छषं" = झषं) = मीन; लिखेत् = लिखे।

हिन्दी भावार्थ राशि-दृष्टि-चक्र के रेखांकन का निर्देश है — चारों द्विस्वभाव राशियाँ चारों कोणों पर रखी जाएँ: मिथुन ईशान में, कन्या वायव्य में, धनु नैरृत्य में और मीन आग्नेय में। पूर्व-श्लोकों में चर और स्थिर राशियाँ भुजाओं पर रखी गई हैं; इस चित्र से 8.1–8.3 का नियम (चर राशि आसन्न को छोड़ स्थिर राशियों को देखती है, स्थिर चर को, द्विस्वभाव परस्पर) आँख से पढ़ा जाता है।

English rendering Draw Mithuna in the north-eastern corner, Kanyā in the north-western, Dhanus in the south-western, and Mīna in the south-eastern corner — the four dual signs occupy the four corners of the sign-aspect diagram.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — चक्र-रेखांकन (आकृति-नियम)। तकनीक: द्विस्वभाव राशि-समुच्चय {मिथुन, कन्या, धनु, मीन} → कोण {NE, NW, SW, SE}; राशि-दृष्टि की सारणी इस ज्यामिति से: चर → स्थिर (आसन्न वर्जित), स्थिर → चर (आसन्न वर्जित), द्विस्वभाव ↔ द्विस्वभाव।

8.9
एवं चतुर्भुजाकारं वृत्ताकारमथापि वा।
दृष्टिचक्रं प्रविन्यस्यैवं ततो दृष्टिं विचारयेत्‌
evaṃ caturbhujākāraṃ vṛttākāramathāpi vā|
dṛṣṭicakraṃ pravinyasyaivaṃ tato dṛṣṭiṃ vicārayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; चतुर्भुजाकारम् = चतुष्कोण / वर्गाकार आकृति; वृत्ताकारम् = वृत्त-आकार; अथवा = अथवा; दृष्टिचक्रम् = दृष्टि-चक्र (दृष्टि-चित्र / आरेख); प्रविन्यस्य = सम्यक् रखकर / व्यवस्थित करके; ततः = तब; दृष्टिं विचारयेत् = दृष्टि का विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दृष्टि-चक्र को चतुर्भुजाकार (वर्ग-रूप) अथवा वृत्ताकार (गोल-रूप) — दोनों में से किसी भी रूप में — सम्यक् विन्यस्त करके ही दृष्टि का विचार करना चाहिए। आकृति का चयन साधन है; लक्ष्य दृष्टि-नियमों का स्पष्ट अनुशीलन है। यह फल नहीं, पद्धति-निर्देश है।

English rendering Having thus arranged the dṛṣṭi-cakra — either in a square figure or in a circular one — one should then examine the aspects. The verse authorizes either layout as a working diagram for studying sign-aspects.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आरेख-निर्देश / पद्धति-कथन। दृष्टि-चक्र की ज्यामिति (वर्ग या वृत्त) यहाँ गणना नहीं है; यह दृश्य-व्यवस्था है। राशि-दृष्टि के स्वयं के नियम (कौन-सी राशि किसे देखती है) इस श्लोक में नहीं गिने गए — केवल चक्र को रख कर विचार करने का क्रम बताया गया है।

अध्यायः 9

अरिष्टाध्यायः

45 श्लोक

सूचना · Note. ये ग्रन्थ के ऐतिहासिक आयु/मृत्यु-कथन हैं, चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं; स्वास्थ्य की चिन्ता हो तो चिकित्सक से मिलें। · Historical statements of the text about lifespan and death, not medical predictions; for any health concern, see a doctor.

9.1
आदौ जन्माङ्गतो विप्र रिष्टाऽरिष्टं विचारयेत्‌।
ततस्तन्वादिभावानां जातकस्य फलं वदेत्‌
ādau janmāṅgato vipra riṣṭā'riṣṭaṃ vicārayet‌|
tatastanvādibhāvānāṃ jātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदौ = सबसे पहले; जन्माङ्गतः = जन्म-लग्न से (जन्म-अङ्ग = उदित राशि/लग्न); विप्र = हे विप्र (मैत्रेय-सम्बोधन); रिष्ट-अरिष्टम् = अरिष्ट (बाल्य-मृत्यु का भय) एवं उसका अभाव/भङ्ग (अरिष्ट-भङ्ग); विचारयेत् = परीक्षा करे; ततः = तत्पश्चात्; तनु-आदि-भावानाम् = तनु (प्रथम भाव) आदि बारह भावों का; जातकस्य फलं वदेत् = जातक का फल कहे।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र! सबसे पहले जन्म-लग्न से यह देखो कि अरिष्ट है या अरिष्ट-भङ्ग — अर्थात् आयु पर संकट है या वह टल जाता है। यही निर्णय हो जाने के बाद ही तनु से लेकर व्यय तक बारह भावों का फल कहना चाहिए। शास्त्र यहाँ क्रम बाँध रहा है: पहले जीवन-सातत्य, फिर जीवन-विवरण।

English rendering First, O sage, examine ariṣṭa and its cancellation from the birth-ascendant; only thereafter should one pronounce the results of the houses beginning with the first.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — क्रम-निर्देश (methodological instruction)। यह अध्याय की आधार-शिला है: अरिष्ट-परीक्षा एक द्वारपाल-चरण है जो भाव-फल से तार्किक रूप से पहले आता है — जब तक जीवन-सातत्य अनिश्चित है, आगे का फल-गणित अप्रासंगिक रहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह क्रम-निर्देश हमारे संरचना-मानचित्र से ठीक मेल खाता है: इस recension में अरिष्ट-खण्ड (अध्याय 9–10) भाव-फल-खण्ड (अध्याय 11–24) से ठीक पहले बैठता है। यही "पहले परीक्षा, फिर घोषणा" वाली अनुशासन-रेखा हमारी पद्धति का मूल है — निर्णय से पूर्व प्रमाण।

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9.2
चतुर्विंशतिवर्षाणि यावद्‌ गच्छन्ति जन्मतः।
जन्मारिष्टं तु तावत्‌ स्यादायुर्दायुं न चिन्तयेत्‌
caturviṃśativarṣāṇi yāvad‌ gacchanti janmataḥ|
janmāriṣṭaṃ tu tāvat‌ syādāyurdāyuṃ na cintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्विंशति-वर्षाणि = चौबीस वर्ष; यावत् गच्छन्ति = जब तक बीतते हैं; जन्मतः = जन्म से; जन्म-अरिष्टम् = जन्मजनित अरिष्ट (बाल्य-अरिष्ट का क्षेत्र); तु तावत् स्यात् = तब तक ही रहता है; आयुर्दायम् = आयुर्दाय (आयु-गणना/दीर्घायु-निर्णय); न चिन्तयेत् = विचार न करे।

हिन्दी भावार्थ जन्म से लेकर जब तक चौबीस वर्ष पूरे नहीं हो जाते, तब तक जातक "जन्म-अरिष्ट" के अधीन गिना जाता है; इस अवधि में आयुर्दाय (दीर्घायु-गणना) का विचार करना उचित नहीं। शास्त्र स्पष्ट सीमा-रेखा खींचता है — पहले अरिष्ट का क्षेत्र, उसके पार ही आयु-गणित का क्षेत्र।

English rendering So long as twenty-four years have not elapsed from birth, the domain of natal ariṣṭa prevails; within it one should not compute the length-of-life (āyurdāya).

गणित / तकनीक: एक स्पष्ट स्थिरांक (constant) — देहली-मान (threshold) = 24 वर्ष (चतुर्विंशति, सीधे कथित, बिना भूतसंख्या के)।
जन्म से बीता काल t हो, तो
• t < 24 वर्ष ⇒ अरिष्ट-नियम लागू; आयुर्दाय स्थगित
• t ≥ 24 वर्ष ⇒ आयुर्दाय-गणना का क्षेत्र आरम्भ।

उदाहरण (worked example) 5 वर्ष के जातक के लिए t = 5 < 24 ⇒ इसी अध्याय के अरिष्ट-योग शासन करते हैं; दीर्घायु-सूत्र इस क्षण लागू नहीं किए जाते। इसके विपरीत 30 वर्ष के जातक (t = 30 ≥ 24) पर आयुर्दाय-विधि प्रयोज्य है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह 24-वर्ष की देहली अरिष्ट-खण्ड (अध्याय 9–10) और आयुर्दाय-खण्ड (अध्याय 43–44) के बीच शास्त्र की अपनी विभाजक-रेखा है। हमारी अनुशासन-पद्धति इसी को दोहराती है — गणना के दो स्तर मिलाओ मत; जहाँ संख्या शर्त पर निर्भर हो वहाँ शर्त घोषित करो। यहाँ शर्त स्वयं ग्रन्थ देता है: t = 24 वर्ष।

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9.3
षष्ठाष्टरिष्फगश्चन्द्रः क्रूरौः खेटैश्च वीक्षितः।
जातस्य मृत्युदः सद्यस्त्वष्टर्षैः शुभक्षितः
ṣaṣṭhāṣṭariṣphagaścandraḥ krūrauḥ kheṭaiśca vīkṣitaḥ|
jātasya mṛtyudaḥ sadyastvaṣṭarṣaiḥ śubhakṣitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्ट-रिष्फ-गः = छठे, आठवें या द्वादश (रिष्फ = 12वाँ) भाव में स्थित; चन्द्रः = चन्द्रमा; क्रूरैः खेटैः = क्रूर ग्रहों (खेट = ग्रह) से; वीक्षितः = दृष्ट; जातस्य = जातक का; मृत्युदः = मृत्युदायक; सद्यः = तत्काल; तु अष्टवर्षैः = किन्तु आठ वर्षों में; शुभ-ईक्षितः = शुभ-दृष्ट होने पर। (पाठ-भेद संभव: "त्वष्टर्षैः शुभक्षितः" ≈ "तु अष्टवर्षैः शुभेक्षितः")

हिन्दी भावार्थ यदि चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो और क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो, तो शास्त्र इसे तत्काल मृत्युदायक कहता है; परन्तु यदि साथ ही शुभ-दृष्टि भी हो, तो वह संकट आठ वर्षों तक विलम्बित/मन्द हो जाता है। दुःस्थान-स्थित चन्द्र पर क्रूर-दृष्टि की तीव्रता को शुभ-दृष्टि तोड़ देती है — यही अरिष्ट-भङ्ग का बीज है।

English rendering The Moon placed in the 6th, 8th, or 12th and aspected by malefics is, the text says, at once death-giving; but if benefics also aspect it, that danger is deferred to within eight years.

गणित / तकनीक: स्थान-योग (positional rule), लग्न से समग्र-राशि भाव-गणना में:
चन्द्र-भाव ∈ {6, 8, 12} तथा क्रूर-दृष्टि सत्य, शुभ-दृष्टि असत्य ⇒ शास्त्र-कथित सद्यः मृत्यु।
यही योग + शुभ-दृष्टि सत्य ⇒ काल-सीमा = 8 वर्ष (अष्ट)।
परिणाम फल-कथन है — शास्त्र का दावा, कोई भविष्यवाणी हम नहीं करते।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष; चन्द्र वृश्चिक में = लग्न से 8वाँ भाव (दुःस्थान)। शनि/मङ्गल की दृष्टि हो, बृहस्पति/शुक्र की नहीं ⇒ यह पद पूरी शर्त {6,8,12} ∧ क्रूर-दृष्ट ∧ ¬शुभ-दृष्ट को सत्य करता है। यदि साथ बृहस्पति की शुभ-दृष्टि जुड़े, तो शास्त्रानुसार तीव्रता घटकर 8-वर्ष-सीमा में बदल जाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस अध्याय के सभी योग इसी ढाँचे के हैं — एक अंकीय/स्थानिक शर्त (भाव-समुच्चय, दृष्टि, काल-मान) + एक फल-कथन। हमारी पद्धति दोनों परतों को अलग रखती है: शर्त = निर्धार्य (deterministic) गणित; फल = "शास्त्र कहता है", न कि भाग्य या हमारा समर्थित पूर्वानुमान। यही exact-अनुशासन (गणना पर `==`, फल पर नहीं) पूरे अरिष्ट-प्रकरण पर लागू है।

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9.4
शशिवन्मृत्युदाः सौम्याश्चेद्वक्राः क्रूरवीक्षिताः।
शिशोर्जातस्य मासेन लग्ने सौम्यविवर्जिते
śaśivanmṛtyudāḥ saumyāścedvakrāḥ krūravīkṣitāḥ|
śiśorjātasya māsena lagne saumyavivarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशिवत् = चन्द्रमा की भाँति (पूर्व-नियम की तरह); मृत्युदाः = मृत्युदायक; सौम्याः = शुभ ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र); चेत् = यदि; वक्राः = वक्री; क्रूर-वीक्षिताः = क्रूर-दृष्ट; शिशोः जातस्य = जन्मे शिशु का; मासेन = एक मास में; लग्ने सौम्य-विवर्जिते = लग्न के शुभ-रहित होने पर।

हिन्दी भावार्थ जैसे चन्द्रमा के विषय में कहा, वैसे ही शुभ ग्रह भी मृत्युदायक बन जाते हैं — यदि वे वक्री हों और क्रूर ग्रहों से दृष्ट हों; और यदि लग्न शुभ-ग्रहों से रहित हो, तो शास्त्र शिशु के लिए एक मास के भीतर का अरिष्ट कहता है। भाव यह कि सौम्य ग्रह की शुभता उसकी वक्रता और क्रूर-सङ्गति में क्षीण हो जाती है। (पाठ-भेद संभव — अन्वय विवादित।)

English rendering Just as with the Moon, even benefics turn death-giving if retrograde and aspected by malefics; and when the ascendant is void of benefics, the text speaks of danger to the infant within a month.

गणित / तकनीक: शर्त-योग: सौम्य-ग्रह वक्री ∧ क्रूर-दृष्ट ∧ (लग्न शुभ-रहित) ⇒ शास्त्र-कथित काल-सीमा = 1 मास (मासेन)।
यहाँ "मृत्युदायकता" कोई ग्रह-आन्तरिक राशि नहीं, बल्कि तीन शर्तों का संयोग है — वक्र-गति, क्रूर-दृष्टि, और लग्न की शुभ-रिक्तता। परिणाम फल-कथन है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन, उसमें कोई शुभ-ग्रह नहीं (शुभ-विवर्जित)। बुध वक्री और शनि/मङ्गल से दृष्ट हो ⇒ तीनों शर्तें सत्य; शास्त्रानुसार यह पद 1-मास-सीमा का अरिष्ट-योग बनाता है। यदि लग्न में गुरु/शुक्र बैठ जाएँ, "सौम्य-विवर्जित" शर्त भङ्ग होकर योग ढह जाता है।

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9.5
यस्य जन्मनि धीस्थाः स्युः सूर्यार्कीन्दुकुजाभधाः।
तस्य त्वाशु जनित्री च भ्राता च निधनं व्रजेत्‌
yasya janmani dhīsthāḥ syuḥ sūryārkīndukujābhadhāḥ|
tasya tvāśu janitrī ca bhrātā ca nidhanaṃ vrajet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य जन्मनि = जिसके जन्म में; धी-स्थाः = धी-स्थान (पञ्चम भाव) में स्थित; सूर्य-अर्कि-इन्दु-कुज-आभधाः = सूर्य, अर्कि (शनि), चन्द्र, मंगल—ये नामधारी; तस्य = उसका; आशु = शीघ्र; जनित्री = माता; भ्राता = भाई; निधनं व्रजेत् = निधन को प्राप्त हो (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ जिसके जन्म में सूर्य, शनि (अर्कि), चन्द्र और मंगल पञ्चम भाव में हों, शास्त्र कहता है कि उसकी माता और भाई शीघ्र निधन को प्राप्त होते हैं। यह सम्बन्ध-अरिष्ट का फल-कथन है—गणना भाव-स्थितियों की है; फल शास्त्र का वाक्य है, हमारा पूर्वानुमान नहीं।

English rendering In whose birth the Sun, Saturn (Ārki), the Moon, and Mars stand in the fifth (dhī), the text states that his mother and brother quickly meet death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-योग (स्थान-नियम):
- ग्रह-समुच्चय: {सूर्य, शनि, चन्द्र, मंगल} ⊆ भाव 5 (धी = पञ्चम)
- फल-विषय: माता (जनित्री), भ्राता — निधन-शीघ्रता (आशु) — शास्त्र कहता है
- “आभधाः” = उक्त नामों से युक्त; चारों का एक साथ पञ्चम-स्थित होना पाठ का सीधा अर्थ (पाठ-भेद/आंशिक स्थिति पर टीका-भेद संभव)

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह 0°। पञ्चम = धनु। सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि सभी धनु में → श्लोक का धी-स्थित चतुर्ग्रह-योग। (केवल D1 भाव-मानचित्र; अयनांश-निर्भर देशान्तर। फल को चिकित्सा/परिवार-पूर्वानुमान के रूप में नहीं लिया जाता।)

9.6
पापेक्षितो युतो भौमो लग्नगो न शुभेक्षितः।
मृत्युदस्त्वष्टमस्थोऽपि सौरेणार्केण वा युतः
pāpekṣito yuto bhaumo lagnago na śubhekṣitaḥ|
mṛtyudastvaṣṭamastho'pi saureṇārkeṇa vā yutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-ईक्षितः = पाप-दृष्ट; युतः = युक्त/संयुक्त; भौमः = मंगल; लग्न-गः = लग्न में स्थित; न शुभ-ईक्षितः = शुभ-दृष्टि से रहित; मृत्युदः = मृत्यु-दायक (शास्त्र); तु = तथा/अथवा; अष्टम-स्थः अपि = अष्टम में स्थित भी; सौरेण = शनि से; अर्केण = सूर्य से; वा युतः = अथवा युक्त।

हिन्दी भावार्थ लग्न में बैठा मंगल यदि पाप से दृष्ट या युक्त हो और शुभ-दृष्टि से रहित हो, तो शास्त्र उसे मृत्युद कहता है। अष्टम में स्थित मंगल भी, अथवा शनि या सूर्य से युक्त मंगल, उसी श्रेणी में आता है। यह भौम-अरिष्ट का स्थान-दृष्टि-युति नियम है।

English rendering Mars in the lagna, aspected or joined by malefics and not aspected by benefics, is stated as death-giving. So too when Mars is in the eighth, or joined with Saturn or the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मृत्युद-भौम — तीन विकल्प (OR):
1. भौम ∈ भाव 1 ∧ (पाप-दृष्टि ∨ पाप-युति) ∧ ¬शुभ-दृष्टि
2. भौम ∈ भाव 8
3. भौम युक्त (शनि ∨ सूर्य)
- युति: सामान्यतः एक ही राशि में सह-स्थिति (अंशात्मक सीमा परम्परा-भेद; घोषित करें)
- फल = शास्त्र-कथन, बलाबल-योग नहीं

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; मंगल = मेष 12°; शनि = मेष 18° (युति); शुभ-दृष्टि नहीं → नियम (1) + (3)। अथवा मंगल = वृश्चिक (लग्न मेष से 8वाँ) → नियम (2)। दोनों में श्लोक का मृत्युद-योग “लागू/नहीं” boolean से पहचाना जाता है।

9.7
चन्द्रसूर्यग्रहे राहुश्चन्द्रसूर्ययुतो यदि।
सौरिभौमेक्षितं लग्नं पक्षमेकं स जीवति
candrasūryagrahe rāhuścandrasūryayuto yadi|
sauribhaumekṣitaṃ lagnaṃ pakṣamekaṃ sa jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र-सूर्य-ग्रहे = चन्द्र- अथवा सूर्य-ग्रहण में; राहुः = राहु; चन्द्र-सूर्य-युतः = चन्द्र या सूर्य से युक्त; यदि = यदि; सौरि-भौम-ईक्षितम् = शनि और मंगल से दृष्ट; लग्नम् = लग्न; पक्षम् एकम् = एक पक्ष (≈ 15 दिन); स जीवति = वह जीता है (शास्त्र-कथन: इतने ही)।

हिन्दी भावार्थ यदि राहु चन्द्र-सूर्य ग्रहण-योग में हो और चन्द्र या सूर्य से युक्त हो, तथा लग्न शनि और मंगल से दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है—वह एक पक्ष जीता है। यह अत्यन्त तीव्र बाल-अरिष्ट का काल-माप है; पक्ष = शुक्ल/कृष्ण पक्ष की अवधि (लगभग पन्द्रह दिन)। फल शास्त्र का कथन है।

English rendering If Rāhu is in a lunar or solar eclipse-condition and joined with the Moon or the Sun, and the lagna is aspected by Saturn and Mars, the text states he lives for one fortnight (pakṣa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संयोग + दृष्टि + काल-फल:
1. ग्रहण-सन्दर्भ: चन्द्र-सूर्य-राहु की युति/रेखा-सन्निकटता (चन्द्रसूर्यग्रहे) — खगोलीय eclipse-geometry; ज्योतिष में प्रायः राहु-युक्त सूर्य/चन्द्र
2. राहु युक्त (चन्द्र ∨ सूर्य)
3. लग्न दृष्ट (शनि ∧ मंगल)
4. जीवित-काल (शास्त्र): 1 पक्ष = 15 तिथि ≈ 15 दिन (पक्ष-मानक)
- Σ शर्तें = true → पक्षैक-फल; गणना योग-पहचान की, आयु-तालिका की नहीं

उदाहरण (worked example) सूर्य-राहु एक राशि में (सूर्य-ग्रहण-योग-सदृश); लग्न पर शनि और मंगल की दृष्टि। शर्त-समूह पूर्ण → शास्त्र-कथित जीवित-सीमा = 1 पक्ष। (ग्रहण की खगोलीय जाँच ephemeris से; फल को निश्चित मृत्यु-तिथि नहीं माना जाता।)

9.8
कर्मस्थाने स्थितः सौरिः शत्रुस्थाने कलानिधिः।
क्षितिजः सप्तमस्थाने सह मात्रा विपद्यते
karmasthāne sthitaḥ sauriḥ śatrusthāne kalānidhiḥ|
kṣitijaḥ saptamasthāne saha mātrā vipadyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्म-स्थाने = दशम भाव में; स्थितः सौरिः = शनि स्थित; शत्रु-स्थाने = षष्ठ भाव में; कला-निधिः = चन्द्रमा (कलाओं का निधि); क्षितिजः = मङ्गल (भूमि-पुत्र); सप्तम-स्थाने = सातवें भाव में; सह मात्रा = माता सहित; विपद्यते = नष्ट होता है।

हिन्दी भावार्थ शनि दशम भाव में, चन्द्रमा षष्ठ भाव में और मङ्गल सप्तम भाव में हो — ऐसी रचना में शास्त्र कहता है कि शिशु माता सहित संकट को प्राप्त होता है। तीन क्रूर/पीड़ित स्थानों की यह त्रिकोणीय रचना माता-शिशु दोनों पर अरिष्ट इंगित करती है।

English rendering With Saturn in the tenth, the Moon in the sixth, and Mars in the seventh, the text says the child perishes together with the mother.

गणित / तकनीक: स्थान-योग (लग्न से): शनि ∈ 10 ∧ चन्द्र ∈ 6 ∧ मङ्गल ∈ 7 ⇒ शास्त्र-कथित माता-सहित अरिष्ट।
गणित केवल तीन ग्रहों की तीन निर्दिष्ट भाव-स्थितियों का एक-साथ मिलान (conjunction of three placements) है; परिणाम फल-कथन।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष ⇒ भाव 10 = मकर, 6 = कन्या, 7 = तुला। यदि शनि मकर में, चन्द्र कन्या में, मङ्गल तुला में हों, तो तीनों शर्तें एक-साथ सत्य होकर यह पद बनाती हैं। किसी एक ग्रह का स्थान बदलते ही संयुक्त शर्त टूट जाती है।

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9.9
लग्ने भास्करपुत्रश्च निधने चन्द्रमा यदि।
तृतीयस्थो यदा जीवः स याति यममन्दिरम्‌
lagne bhāskaraputraśca nidhane candramā yadi|
tṛtīyastho yadā jīvaḥ sa yāti yamamandiram
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = लग्न में; भास्करपुत्रः = शनि; निधने = अष्टम भाव में; चन्द्रमाः = चन्द्र; यदि; तृतीयस्थः = तृतीय भाव में स्थित; यदा जीवः = जब गुरु (हो); सः याति यममन्दिरम् = वह (शिशु) यम-भवन को जाता है — अरिष्ट-वचन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न में शनि, अष्टम में चन्द्र और तृतीय में गुरु हो तो शिशु के लिए अरिष्ट (बाल-मृत्यु का भय) कहा गया है। यह अरिष्ट-अध्याय का एक योग-कथन है; अध्याय 10 के अरिष्ट-भङ्ग योग ऐसे कथनों को काटते हैं। इसे पाठ की शर्त-सूची की तरह पढ़ें, नियति की घोषणा की तरह नहीं।

English rendering The text states that with Saturn in the lagna, the Moon in the eighth and Jupiter in the third, the child "goes to the abode of Yama" — an ariṣṭa (early-death) combination, subject to the cancellations of chapter 10.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अरिष्ट-योग (शर्त-समुच्चय)। जाँच-बिन्दु: Sa ∈ भाव 1 ∧ Mo ∈ भाव 8 ∧ Ju ∈ भाव 3 (सम-राशि भाव या भाव-मध्य पद्धति — जो अपनाई जाए, घोषित करें)।

9.10
होरायां नवमे सूर्यः सप्तमस्थः शनैश्चरः।
एकादशे गुरुः सुक्रो मासमेकं स जीवति
horāyāṃ navame sūryaḥ saptamasthaḥ śanaiścaraḥ|
ekādaśe guruḥ sukro māsamekaṃ sa jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) होरायाम् = होरा (D2 वर्ग / होरा-चक्र) में; नवमे सूर्यः = नवम भाव में सूर्य; सप्तम-स्थः शनैश्चरः = सप्तम भाव में शनि; एकादशे गुरुः शुक्रः = एकादश भाव में बृहस्पति व शुक्र; मासम् एकं = एक मास; स जीवति = वह जीवित रहता है।

हिन्दी भावार्थ होरा-रचना में जब सूर्य नवम में, शनि सप्तम में, और गुरु-शुक्र एकादश में हों, तो शास्त्र कहता है कि शिशु एक मास तक जीवित रहता है। यह चार ग्रहों की चार निर्दिष्ट भाव-स्थितियों वाला एक और अल्पायु-योग है। (पाठ-भेद संभव: "होरायाम्" यहाँ D2 वर्ग है या जन्म-कुण्डली-सन्दर्भ, यह विवादित।)

English rendering With the Sun in the ninth, Saturn in the seventh, and Jupiter and Venus in the eleventh (reckoned in the horā), the text says the child lives one month.

गणित / तकनीक: स्थान-योग: सूर्य ∈ 9 ∧ शनि ∈ 7 ∧ {गुरु, शुक्र} ⊂ 11 ⇒ शास्त्र-कथित काल-सीमा = 1 मास।
"होरा" यदि D2 वर्ग है, तो यह 30° राशि का दो 15°-अर्धों में समविभाजन है — विषम राशि: प्रथम अर्ध सूर्य-होरा, द्वितीय चन्द्र-होरा; सम राशि में उल्टा। स्थान-गणना उसी वर्ग-चक्र पर।

उदाहरण (worked example) होरा-चक्र में लग्न = वृष मानें ⇒ 9 = मकर, 7 = वृश्चिक, 11 = मीन। सूर्य मकर, शनि वृश्चिक, गुरु व शुक्र मीन में हों ⇒ चारों शर्तें सत्य; शास्त्रानुसार 1-मास-सीमा-योग। (यदि "होरा" = जन्म-कुण्डली मानी जाए, तो भाव-गणना जन्म-लग्न से।)

हमारा डिकोड (Our Decode) "होरा" हमारे षोडश-वर्ग-सोपान का D2 है — D1(राशि)…D60 में दूसरा विभाजन। हमारे वर्ग-इंजन में प्रत्येक वर्ग देशान्तर (longitude) पर विशुद्ध modular-अंकगणित है: होरा = 30° का 15°+15° समविभाजन, नियम-चालित मानचित्रण। अतः यहाँ की भाव-स्थितियाँ एक निर्धार्य वर्ग-गणना पर टिकी हैं; फल तो शास्त्र का कथन है।

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9.11
व्यये सर्वे ग्रहा नेष्टाः सूर्येशुक्रेन्दुराहवः।
विशेषान्नाशकर्तारो दृष्ट्या वा भङ्गकारिणः
vyaye sarve grahā neṣṭāḥ sūryeśukrendurāhavaḥ|
viśeṣānnāśakartāro dṛṣṭyā vā bhaṅgakāriṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यये = द्वादश भाव में (व्यय); सर्वे ग्रहाः = सभी ग्रह; न इष्टाः = अनिष्ट/अशुभ; सूर्य-शुक्र-इन्दु-राहवः = सूर्य, शुक्र, चन्द्र, राहु (विशेषतः); विशेषात् = विशेष रूप से; नाश-कर्तारः = नाशकारी; दृष्ट्या वा = अथवा दृष्टि-मात्र से; भङ्ग-कारिणः = भङ्ग करने वाले। (पाठ-भेद संभव: "सूर्येशुक्रेन्दुराहवः" का पदच्छेद विवादित; तथा "भङ्ग" = अरिष्ट-भङ्ग/निवारण या हानि-कारण — दोनों अर्थ संभव।)

हिन्दी भावार्थ द्वादश भाव में स्थित सभी ग्रह अनिष्ट माने गए हैं; उनमें भी सूर्य, शुक्र, चन्द्र और राहु विशेष रूप से नाशकारी कहे गए हैं — और ये दृष्टि-मात्र से भी योग को भङ्ग/प्रभावित करते हैं। "भङ्ग" का अर्थ स्थल-अनुसार दो-मुखी है — या तो योग का विच्छेद (निवारण) या हानि का कारण; अतः विनम्र पाठ यही मानता है कि पाठ-भेद संभव।

English rendering All planets in the twelfth are held inauspicious; the text singles out the Sun, Venus, Moon, and Rāhu as especially ruinous, working even by aspect (bhaṅga).

गणित / तकनीक: स्थान-नियम: कोई भी ग्रह ∈ भाव 12 ⇒ अनिष्ट; उपसमुच्चय {सूर्य, शुक्र, चन्द्र, राहु} ∩ 12 ≠ ∅ ⇒ विशेष-नाश-कथन; क्रिया दृष्टि-द्वारा भी (केवल स्थिति नहीं)। यहाँ गणित केवल भाव-12 की सदस्यता-परीक्षा; परिणाम फल-कथन, और "भङ्ग" का अर्थ पाठ-सापेक्ष।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह ⇒ भाव 12 = कर्क। यदि चन्द्र (सूची में) कर्क में हो ⇒ विशेष-उपसमुच्चय शर्त सत्य। यदि इनके स्थान पर केवल बुध व्यय में हो, तो सामान्य "सर्वे ग्रहाः अनिष्ट" वाला मृदुतर कथन ही लागू होता है, विशेष-नाश-कथन नहीं।

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9.12
पापान्वितः शशी धर्मे द्यूनलग्नगतो यदि।
शुभैरवेक्षितयुतस्तदा मृत्युप्रदः शिशोः
pāpānvitaḥ śaśī dharme dyūnalagnagato yadi|
śubhairavekṣitayutastadā mṛtyupradaḥ śiśoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-अन्वितः = पाप-ग्रहों से युक्त; शशी = चन्द्रमा; धर्मे = नवम भाव में (धर्म); द्यून-लग्न-गतः = सप्तम (द्यून) अथवा लग्न में स्थित; यदि = यदि; शुभैः अ-वेक्षित-अयुतः = शुभों से न दृष्ट व न युत; तदा = तब; मृत्यु-प्रदः शिशोः = शिशु को मृत्युदायक।

हिन्दी भावार्थ यदि चन्द्रमा पाप-ग्रहों से युक्त होकर नवम, सप्तम या लग्न में स्थित हो, और उस पर किसी शुभ-ग्रह की न दृष्टि हो न युति, तो शास्त्र इसे शिशु के लिए मृत्युदायक बताता है। यहाँ निर्णायक कारक है — चन्द्र पर शुभ-सहारे का पूर्ण अभाव।

English rendering If the Moon, joined by malefics, occupies the ninth, seventh, or ascendant and is neither aspected nor joined by any benefic, the text calls it death-giving to the infant.

गणित / तकनीक: शर्त-योग: चन्द्र ∈ {9, 7, 1} ∧ पाप-युत ∧ ¬(शुभ-दृष्ट ∨ शुभ-युत) ⇒ शास्त्र-कथित शिशु-अरिष्ट।
यहाँ "शुभ-रिक्तता" एक निषेध-शर्त (negation clause) है — योग तभी बनता है जब कोई भी शुभ-ग्रह न दृष्टि से, न युति से हस्तक्षेप करे।

उदाहरण (worked example) लग्न = मकर, उसमें चन्द्र + शनि (पाप-युत); बृहस्पति/शुक्र/बुध की न दृष्टि न युति ⇒ तीनों शर्तें सत्य; पद बनता है। यदि गुरु की पूर्ण-दृष्टि चन्द्र पर पड़े, तो "शुभैः अवेक्षित" शर्त झूठी होकर योग भङ्ग हो जाता है — यही अरिष्ट-भङ्ग का न्याय।

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9.13
सन्ध्यायां चन्द्रहोरायां गण्डान्ते निधनाय वै।
प्रत्येकं चन्द्रपापैश्च केन्द्रगैः स्याद्विनाशनम्‌
sandhyāyāṃ candrahorāyāṃ gaṇḍānte nidhanāya vai|
pratyekaṃ candrapāpaiśca kendragaiḥ syādvināśanam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्ध्यायाम् = सन्ध्या-काल में (सूर्योदय/सूर्यास्त की सन्धि); चन्द्र-होरायाम् = चन्द्र-होरा (चन्द्र की D2 होरा) में; गण्ड-अन्ते = गण्डान्त (राशि/नक्षत्र-सन्धि की "गाँठ") में; निधनाय वै = निश्चय ही मृत्यु-हेतु; प्रत्येकम् = पृथक्-पृथक् प्रत्येक; चन्द्र-पापैः च = चन्द्र और पाप-ग्रहों द्वारा; केन्द्र-गैः = केन्द्रों (1, 4, 7, 10) में स्थित होने पर; स्यात् विनाशनम् = विनाश होता है। (पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ सन्ध्या-वेला में, चन्द्र-होरा में, अथवा गण्डान्त में हुआ जन्म शास्त्र के अनुसार निश्चय ही मृत्यु-हेतु कहा गया है; और पृथक्-पृथक् भी, जब चन्द्र तथा पाप-ग्रह केन्द्र-भावों में स्थित हों, तब विनाश-योग बनता है। ये काल-सन्धियाँ (सन्ध्या, गण्डान्त) और केन्द्र-स्थ पाप — दोनों अलग-अलग अरिष्ट-आधार हैं।

English rendering Birth at twilight, in the Moon's horā, or at a gaṇḍānta is, the text says, death-conducing; and separately, when the Moon and malefics stand in the kendras, destruction is indicated.

गणित / तकनीक: तीन काल-सन्धि-निमित्त + एक केन्द्र-योग:
• सन्ध्या = सूर्योदय/सूर्यास्त की सन्धि-वेला (इसी अध्याय का आगे का श्लोक इसे नाड़ी-मान में परिभाषित करता है)।
• चन्द्र-होरा = चन्द्र की D2 होरा (30°→15°+15° समविभाजन)।
• गण्डान्त = जल-अग्नि राशि-सन्धि {कर्क→सिंह, वृश्चिक→धनु, मीन→मेष} तथा नक्षत्र-सन्धि {ज्येष्ठा→मूल, आश्लेषा→मघा, रेवती→अश्विनी} की "गाँठ"। — इस श्लोक में गण्डान्त का कोई निश्चित चाप-मान (arc) कथित नहीं; अतः चाप-सीमा convention-सापेक्ष है, कोई संख्या हम आरोपित नहीं करते (पाठ-बाहर संख्या नहीं)।
• केन्द्र-योग: चन्द्र ∈ {1,4,7,10} ∧ पाप ∈ {1,4,7,10} ⇒ शास्त्र-कथित विनाश। परिणाम फल-कथन।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-देशान्तर मीन के अन्तिम अंश (मीन→मेष राशि-गण्डान्त) पर पड़े, और चन्द्र लग्न (केन्द्र) में, कोई पाप-ग्रह दशम (केन्द्र) में हो ⇒ गण्डान्त-निमित्त तथा केन्द्र-योग दोनों सत्य। चाप की सूक्ष्म-सीमा वाचना पर निर्भर है, इसलिए उसे घोषित-convention के रूप में ही लिया जाना चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) "चन्द्र-होरा" यहाँ भी D2 वर्ग है — हमारे षोडश-वर्ग-सोपान का दूसरा विभाजन, विशुद्ध modular-अंकगणित। केन्द्र-समुच्चय {1,4,7,10} स्थान-गणना है, गण्डान्त की चाप-सीमा convention-सापेक्ष — इसलिए हमारी पद्धति यहाँ नियम स्पष्ट करती है: जिस संख्या को श्लोक स्वयं नहीं देता, उसे आरोपित नहीं करते; और फल को "शास्त्र कहता है" के रूप में रखते हैं, अपने समर्थित पूर्वानुमान के रूप में नहीं।

9.14
रवेस्तु मण्डलार्द्धास्तात्‌ सायं संध्या त्रिनाडिका।
तथैवार्द्धोदयात्‌ पूर्वं प्रातः संध्या त्रिनाडिका
ravestu maṇḍalārddhāstāt‌ sāyaṃ saṃdhyā trināḍikā|
tathaivārddhodayāt‌ pūrvaṃ prātaḥ saṃdhyā trināḍikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवेः = सूर्य का; मण्डल-अर्ध-अस्तात् = बिम्ब (मण्डल) के आधे अस्त हो जाने के क्षण से; सायं संध्या = सायंकालीन संध्या; त्रिनाडिका = तीन नाडी (घटी) परिमाण; तथैव = उसी प्रकार; अर्ध-उदयात् पूर्वम् = बिम्ब के आधे उदित होने से पूर्व; प्रातः संध्या = प्रातःकालीन संध्या; त्रिनाडिका = तीन नाडी।

हिन्दी भावार्थ सूर्यबिम्ब जब आधा अस्त हो जाए, उस क्षण से तीन नाडी (घटी) तक सायं-संध्या का काल रहता है; और सूर्यबिम्ब के आधे उदित होने से ठीक पूर्व तीन नाडी तक प्रातः-संध्या का काल होता है। शास्त्र यहाँ संध्या-अवधि को अनुमान से नहीं, गणित-सिद्ध रूप में तीन घटी नियत करता है—ताकि अरिष्ट-विचार में यह निश्चित हो सके कि जन्म-समय संध्या में पड़ा या नहीं।

English rendering From the moment the Sun's disc is half-set, the evening twilight lasts three nāḍīs; likewise, three nāḍīs before the disc is half-risen is the morning twilight.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संध्या = 3 नाडिका। मान (convention): 1 नाडिका (घटी) = 1/60 दिन = 24 मिनट = 60 विघटिका। ∴ संध्या-अवधि = 3 × 24 मिनट = 72 मिनट = 1.2 घण्टा। bhūtasaṃkhyā: "त्रि" = 3 (अंक-निष्ठ)। संदर्भ-बिन्दु स्पष्ट रूप से घोषित: अस्त/उदय बिम्ब-केन्द्र से नहीं, बिम्ब-अर्ध (मण्डल-अर्ध) से गिना जाता है।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी स्थान पर सूर्य का बिम्ब-अर्ध-अस्त स्थानीय समय 18:00 पर होता है → सायं-संध्या = 18:00 से 18:00 + 72 मिनट = 19:12 तक। यदि बिम्ब-अर्ध-उदय 06:00 पर हो → प्रातः-संध्या = 06:00 − 72 मिनट = 04:48 से 06:00 तक।

हमारा डिकोड (Our Decode) संध्या की यह ठीक 3-घटी परिभाषा उसी काल-गणना-अनुशासन पर खड़ी है जिस पर हमारा kaal/vedic-ghadi समय-इंजन टिका है—इकाई (नाडिका/घटी), संदर्भ-बिन्दु (मण्डल-अर्ध) और अचूक स्थिरांक पहले घोषित करो, फिर गणना करो। दिन-रात्रि व संध्या का यही विभाजन षड्बल (BPHS अ.27) के काल-बल का आधार बनता है; अतः यह श्लोक व्याख्या नहीं, नाप है।

9.15
चक्रपूर्वापरार्द्धेषु क्रूरसौम्येषु कीटभे।
लग्नगे निधनं याति नाऽत्र कार्या विचारणा
cakrapūrvāparārddheṣu krūrasaumyeṣu kīṭabhe|
lagnage nidhanaṃ yāti nā'tra kāryā vicāraṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चक्र = राशिचक्र; पूर्व-अपर-अर्धेषु = चक्र के पूर्वार्ध व अपरार्ध भागों में; क्रूर-सौम्येषु = क्रूर (पाप) व सौम्य (शुभ) ग्रहों/राशियों के होते हुए; कीटभे = कीट-योनि राशि (कीट-स्वभाव वाली राशि); लग्नगे = लग्न में उदित होने पर; निधनं याति = मृत्यु को प्राप्त होता है; न अत्र कार्या विचारणा = इसमें (आगे) कोई ऊहापोह करने की आवश्यकता नहीं।

हिन्दी भावार्थ राशिचक्र के पूर्वार्ध और अपरार्ध में क्रमशः क्रूर व सौम्य ग्रहों की स्थिति होते हुए, यदि कीट-स्वभाव वाली राशि लग्न में उदित हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक मृत्यु को प्राप्त होता है—और इसमें अधिक विचार की आवश्यकता नहीं। यह लग्न-योनि पर आधारित अरिष्ट का एक दृढ़ कथन है। (पाठ-भेद संभव—"कीटभ" कीट-राशि व कीट-नक्षत्र दोनों रूप में पढ़ा गया है।)

English rendering With cruel and benefic bodies falling in the eastern and western halves of the zodiac, if an "insect" sign rises on the ascendant, the text says death follows—here no further deliberation is needed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राशि-वर्गीकरण)। केवल संरचना-सूचक: चक्र दो अर्धों में बँटता है (12 राशि = 6 + 6), और राशियाँ योनि-स्वभाव से (कीट/नर/जलचर आदि) वर्गीकृत हैं; "कीटभ" उसी योनि-वर्ग की राशि है। यह विभाजन गणनीय है, पर श्लोक स्वयं कोई अंक नहीं देता—यह लग्न-योनि पर आधारित अरिष्ट का दृढ़ फल-कथन है, जिसे हम शास्त्र का दावा मानकर प्रस्तुत करते हैं, नियति नहीं।

9.16
व्ययशत्रुगतैः क्रूरैर्मृत्युद्रव्यगतैरपि।
पापमध्यगते लग्ने सत्यमेव मृतिं वदेत्‌
vyayaśatrugataiḥ krūrairmṛtyudravyagatairapi|
pāpamadhyagate lagne satyameva mṛtiṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यय-शत्रु-गतैः = व्यय (१२) व शत्रु (६) भावों में स्थित; क्रूरैः = क्रूर/पाप ग्रहों से; मृत्यु-द्रव्य-गतैः अपि = मृत्यु (८) व द्रव्य (२) भावों में स्थितों से भी; पाप-मध्य-गते लग्ने = लग्न पाप-ग्रहों के मध्य में होने पर; सत्यम् एव = निश्चयपूर्वक; मृतिं वदेत् = मृत्यु का कथन करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का नियम है—यदि क्रूर ग्रह व्यय (१२) और शत्रु (६) भावों में हों, तथा मृत्यु (८) और द्रव्य (२) भावों में भी पाप-ग्रह हों, और लग्न पाप-ग्रहों के मध्य में फँसा हो (पाप-मध्य-गत लग्न), तो “सत्यमेव मृतिं वदेत्” — मृत्यु का कथन दृढ़ता से करने को कहा गया है। यह षष्ठाष्टम-द्वादश-द्वितीय की पाप-स्थिति का अरिष्ट-फल है। भाव-गिनती लग्न से पूर्ण भाव-संख्या पर निर्भर है; भाव-पद्धति (समान-घर/पूर्ण-राशि आदि) घोषित करनी चाहिए।

English rendering The text states that when malefics occupy the twelfth and sixth, and also the eighth and second, and the lagna is hemmed between malefics, death is to be pronounced as certain—in the śāstra’s own wording. No computational constant is given; only house-placement conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थित अरिष्ट)। जाँच केवल स्थानिक है: पाप ∈ {२, ६, ८, १२} तथा लग्न “पाप-मध्य-गत” (दो पापों के बीच, प्रायः उसी राशि-शृंखला या अक्ष पर)। कोई अंश-सूत्र या बल-सीमा नहीं।

9.17
लग्नसप्तमगौ पापौ चन्द्रोऽपि क्रूरसंयुतः।
यदा नावेक्षितः सौम्यैः शीघ्रान्‌मृत्युर्भवेत्तदा
lagnasaptamagau pāpau candro'pi krūrasaṃyutaḥ|
yadā nāvekṣitaḥ saumyaiḥ śīghrān‌mṛtyurbhavettadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-सप्तम-गौ = लग्न व सप्तम में स्थित; पापौ = दो पाप-ग्रह; चन्द्रः अपि = चन्द्र भी; क्रूर-संयुतः = क्रूर-ग्रह से युक्त; यदा = जब; न अवेक्षितः सौम्यैः = सौम्यों से दृष्ट न हो; शीघ्रात् = शीघ्र; मृत्युः भवेत् तदा = तब मृत्यु होती है — ऐसा शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब दो पाप-ग्रह लग्न और सप्तम में हों, चन्द्र भी किसी क्रूर से युक्त हो, और सौम्य ग्रह इन पर दृष्टि न डालें, तब शीघ्र मृत्यु का फल कहा गया है। यहाँ तीन शर्तें एक साथ हैं: लग्न–सप्तम पर पाप-युगल, चन्द्र-क्रूर-संयोग, तथा सौम्य-दृष्टि का अभाव। “शीघ्र” काल-माप (दिन/मास/वर्ष) इस श्लोक में संख्या से नहीं बाँधा गया।

English rendering The text states that when malefics occupy the lagna and the seventh, the Moon is also joined with a malefic, and benefics do not aspect them, death comes swiftly. The verse names conditions, not a numeric span for “swiftly.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-युक्त अरिष्ट)। तकनीकी रूप से केवल संयोजक शर्तें: (i) पाप ∈ लग्न ∧ पाप ∈ सप्तम; (ii) चन्द्र + क्रूर (युति); (iii) सौम्य-दृष्टि = ०। दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) परंपरा-निर्भर; यहाँ कोई अंश-माप नहीं।

9.18
क्षीणे शशिनि लग्नस्थे पापैः केन्द्राष्टसंस्थितैः।
यो जातो मृत्युमाप्नोति स विप्रेश न संशयः
kṣīṇe śaśini lagnasthe pāpaiḥ kendrāṣṭasaṃsthitaiḥ|
yo jāto mṛtyumāpnoti sa vipreśa na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षीणे शशिनि = क्षीण चन्द्र (कृष्ण-पक्ष/क्षीणकला; पाठ-भेद संभव) में; लग्न-स्थे = लग्नस्थित; पापैः = पाप-ग्रहों से; केन्द्र-अष्ट-संस्थितैः = केन्द्रों तथा अष्टम में स्थित; यः जातः = जो जन्मा; मृत्युम् आप्नोति = मृत्यु को प्राप्त होता है — शास्त्र का कथन; विप्रेश = हे विप्रेश्वर (शिष्य-संबोधन); न संशयः = संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ संवाद-शैली में पाराशर कहता है—क्षीण चन्द्र जब लग्न में हो और पाप-ग्रह केन्द्रों तथा अष्टम में हों, तो उस जातक के लिए मृत्यु का फल “न संशयः” कहा गया है। “क्षीण” यहाँ चन्द्र की कला-हानि (कृष्ण-पक्ष/अत्यल्प कला) का संकेत है; पूर्ण परिभाषा (कला-सीमा) इस पद्य में नहीं दी। यह अरिष्ट-फल है—हम इसे नियति की घोषणा के रूप में नहीं दोहराते, केवल शास्त्र-वचन के रूप में।

English rendering Addressing the pupil, the text states without residual doubt that one born with a kṣīṇa Moon in the lagna and malefics placed in the angular houses and the eighth meets death. “Kṣīṇa” is the weak/waning Moon; no degree threshold is fixed in the verse itself.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (क्षीण-चन्द्र + केन्द्र/अष्टम पाप)। केन्द्र = १, ४, ७, १० (लग्न से); अष्टम = ८। क्षीण-चन्द्र की कला-सीमा श्लोक में संख्याबद्ध नहीं—परंपरा में कृष्ण-पक्ष या न्यून-कला; घोषित कर प्रयोग करें।

9.19
पापयोर्मध्यगश्चन्द्रो लग्नाष्टान्तिमसप्तमः।
अचिरान्मृत्युमाप्नोति यो जातः स शिशुस्तदा
pāpayormadhyagaścandro lagnāṣṭāntimasaptamaḥ|
acirānmṛtyumāpnoti yo jātaḥ sa śiśustadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापयोः मध्य-गः = दो पापों के मध्य स्थित; चन्द्रः = चन्द्र; लग्न-अष्ट-अन्तिम-सप्तमः = लग्न, अष्टम, अन्तिम (व्यय/१२) या सप्तम में; अचिरात् = अचिर काल में / शीघ्र; मृत्युम् आप्नोति = मृत्यु को प्राप्त होता है — शास्त्र का कथन; यः जातः स शिशुः तदा = जो शिशु तब जन्मा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब चन्द्र दो पाप-ग्रहों के मध्य हो, और वह (अथवा वह योग) लग्न, अष्टम, अन्तिम (द्वादश) अथवा सप्तम से संबद्ध हो, तो उस समय जन्मा शिशु अचिर में मृत्यु को प्राप्त होता है—ऐसा फल-कथन है। “पापयोर्मध्यग” का अर्थ युति-शृंखला या दोनों पापों के बीच की राशि-स्थिति दोनों पाठों में संभव; पाठ-भेद संभव। शिशु-अरिष्ट का यह रूप मातृ-सह-मृत्यु के अगले श्लोक से भिन्न है—यहाँ केवल शिशु का अचिर-निधन कहा गया।

English rendering The text states that a child born when the Moon lies between two malefics and is linked with the lagna, the eighth, the twelfth (“antima”), or the seventh soon meets death. The verse is an infant-ariṣṭa phala statement, not a timed formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शिशु-अरिष्ट)। जाँच: चन्द्र ∈ (पाप₁, पाप₂) के मध्य, तथा चन्द्र/योग ∈ {१, ७, ८, १२}। “मध्य” की ज्यामितीय कसौटी (समान राशि-पंक्ति / देशांतर-अंतराल) श्लोक में अमिश्रित; परंपरा से घोषित करें।

9.20
पापद्वयमध्यगते चन्द्रे लग्नसमाश्रिते।
सप्ताष्टमेन पापेन मात्रा सह मृतः शिशुः
pāpadvayamadhyagate candre lagnasamāśrite|
saptāṣṭamena pāpena mātrā saha mṛtaḥ śiśuḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-द्वय-मध्य-गते = दो पापों के मध्यगत; चन्द्रे = चन्द्र में; लग्न-समाश्रिते = लग्नाश्रित/लग्नस्थित; सप्त-अष्टमेन पापेन = सप्तम या अष्टम के पाप से; मात्रा सह = माता के साथ; मृतः शिशुः = शिशु मृत — ऐसा शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का कठोर फल-कथन है—यदि चन्द्र दो पापों के मध्य हो और लग्न में आश्रित हो, तथा सप्तम अथवा अष्टम में पाप हो, तो “मात्रा सह मृतः शिशुः” — शिशु माता के साथ मृत्यु को प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है। यह ९.१९ के शिशु-अरिष्ट का विस्तार है: यहाँ मातृ-सह-मृत्यु जोड़ा गया। हम इसे भय या निश्चय की भाषा में नहीं बढ़ाते; केवल मूल वाक्य का अर्थ खोलते हैं। चिकित्सा/प्रसूति-निदान इसका विषय नहीं।

English rendering The text states that when the Moon, hemmed between two malefics, occupies the lagna, and a malefic is in the seventh or the eighth, the child dies together with the mother. Report this as the śāstra’s phala, not as a clinical or fatal certainty we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मातृ-सह शिशु-अरिष्ट)। शर्त-समुच्चय: (चन्द्र लग्नस्थ) ∧ (चन्द्र पाप-द्वय-मध्य) ∧ (पाप ∈ {७} ∨ पाप ∈ {८})। कोई काल-वर्ष या अंश-सीमा नहीं।

9.21
शनैश्चरार्कभौमेषु रिष्फधर्माष्टमेषु च।
शभैरवीक्ष्यमाणेषु यो जातो निधनंगतः
śanaiścarārkabhaumeṣu riṣphadharmāṣṭameṣu ca|
śabhairavīkṣyamāṇeṣu yo jāto nidhanaṃgataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनैश्चर-अर्क-भौमेषु = शनि, सूर्य, मंगल के; रिष्फ-धर्म-अष्टमेषु = रिष्फ (व्यय/१२), धर्म (९), अष्टम (८) में; च = और; शभैः अवीक्ष्यमाणेषु = शुभों से अदृष्ट/अवीक्षित होने पर (शभैः ≈ शुभैः; पाठ-भेद संभव); यः जातः = जो जन्मा; निधनं गतः = निधन को प्राप्त — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शनि, सूर्य और मंगल क्रमशः (अथवा इन तीनों में) रिष्फ (१२), धर्म (९) और अष्टम (८) भावों में हों, और शुभ ग्रह उन्हें न देखें, तो वह जातक निधन-गत कहा गया है। तीन क्रूर—शन्यर्कभौम—का १२/९/८ में बैठना अरिष्ट-योग का ढाँचा है; “शभैरवीक्ष्यमाणेषु” शुभ-दृष्टि का निषेध जोड़ता है। भाव-ग्रह का एक-एक युग्मन श्लोक में शब्दशः “शनैश्चरार्कभौमेषु रिष्फधर्माष्टमेषु” से सूचित है; कठोर क्रम-मैपिंग (शनि=१२, सूर्य=९, मंगल=८ या कोई भी तीनों में) में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that one born with Saturn, the Sun, and Mars in the twelfth (riṣpha), the ninth (dharma), and the eighth, and not aspected by benefics, is gone to death. Whether the three planets map one-to-one onto those three houses in fixed order is a possible recension/commentarial question; the verse names the set of planets, houses, and the absence of benefic aspect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रि-क्रूर अरिष्ट)। स्थानिक जाँच: {शनि, सूर्य, मंगल} ⊆ {८, ९, १२} भाव-स्थितियाँ, तथा शुभ-दृष्टि = ०। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-अंश या बल-इकाई नहीं; केवल भाव-स्थान व दृष्टि-अभाव।

9.22
यद्‌द्रेष्काणे च यामित्रे यस्य स्याद्दारुणो ग्रहः।
क्षीणचन्द्रो विलग्नस्थः सद्यो हरति जीवतम्‌
yad‌dreṣkāṇe ca yāmitre yasya syāddāruṇo grahaḥ|
kṣīṇacandro vilagnasthaḥ sadyo harati jīvatam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्-द्रेष्काणे = जिसके द्रेष्काण (D3 वर्ग) में; च यामित्रे = और यामित्र (सप्तम, 7वें) में; यस्य स्यात् दारुणः ग्रहः = जिसका दारुण (अत्यन्त उग्र) ग्रह हो; क्षीणचन्द्रः विलग्नस्थः = क्षीण चन्द्र लग्न में स्थित; सद्यः हरति जीवितम् = तत्काल जीवन हर लेता है।

हिन्दी भावार्थ जिसके द्रेष्काण (D3) में तथा सप्तम (यामित्र) भाव में कोई दारुण—अत्यन्त उग्र—ग्रह हो, और क्षीण चन्द्र लग्न में बैठा हो, तो शास्त्र कहता है कि यह योग तत्काल जीवन हर लेता है। "यामित्र" सप्तम भाव का पुराना नाम है; द्रेष्काण षोडश-वर्गों में तृतीयांश (D3) है।

English rendering When a fierce planet occupies one's dreṣkāṇa (D3) and the 7th (yāmitra), and a waning Moon sits in the ascendant, the text says it takes life at once.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्रेष्काण = D3 वर्ग = 30° राशि का 3 समान अंशों में विभाजन, प्रत्येक = 30° ÷ 3 = 10°। BPHS-नियम (अ.6): राशि में जन्मांश की स्थिति से — 0°–10° → उसी राशि का द्रेष्काण, 10°–20° → उससे 5वीं राशि का, 20°–30° → उससे 9वीं राशि का (अर्थात् त्रिकोण-स्वामी)। यह शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है; उग्र ग्रह की D3- व सप्तम-भाव-स्थिति फल-शर्त है।

उदाहरण (worked example) जन्मांश यदि मेष 16° हो — खण्ड-सूचकांक = ⌊16 ÷ 10⌋ = 1 (दूसरा खण्ड, 10°–20°) → मेष से 5वीं राशि = सिंह का द्रेष्काण। यदि कोई उग्र ग्रह (मंगल/शनि आदि) इस सिंह-द्रेष्काण में तथा साथ ही सप्तम भाव में हो, और क्षीण चन्द्र लग्नस्थ हो, तो श्लोक का अरिष्ट-योग बनता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) द्रेष्काण (D3) हमारी षोडश-वर्ग सूची [D1…D60] का सदस्य है, जिसे हमारे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) में एक निर्धारक (deterministic) 10°-खण्ड-विभाजन के रूप में लागू किया गया है—देशान्तर (longitude) पर विशुद्ध पूर्णांक-गणित, कोई अनुमान नहीं। श्लोक की "द्रेष्काण-स्थिति" इसी सटीक विभाजन से निकलती है; यही अनुशासन—गणना अलग, फल-कथन अलग—हम पूरे डिकोड में रखते हैं।

9.23
आपोक्लिमस्थिताः सर्वे ग्रहा बलविवर्जिताः।
षण्मासं व द्विमासं व तस्यायुः समुदाहृतम्‌
āpoklimasthitāḥ sarve grahā balavivarjitāḥ|
ṣaṇmāsaṃ va dvimāsaṃ va tasyāyuḥ samudāhṛtam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आपोक्लिम-स्थिताः = आपोक्लिम भावों (3,6,9,12) में स्थित; सर्वे ग्रहाः = सभी ग्रह; बल-विवर्जिताः = बल से रहित (दुर्बल); षण्मासं वा द्विमासं वा = छह मास अथवा दो मास; तस्य आयुः समुदाहृतम् = उसकी आयु कही गई है।

हिन्दी भावार्थ यदि समस्त ग्रह आपोक्लिम भावों में स्थित हों और बल से रहित हों, तो शास्त्र उस जातक की आयु छह मास अथवा दो मास बताता है। "आपोक्लिम" केन्द्र से गिरे हुए भाव (3,6,9,12) हैं; "बल-विवर्जित" का निर्णय गणनीय षड्बल से होता है, अनुमान से नहीं।

English rendering When all the planets stand in the cadent houses (3,6,9,12) and are devoid of strength, the text declares the lifespan to be six months, or two months.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-वर्गीकरण — केन्द्र = {1,4,7,10}, पणफर = {2,5,8,11}, आपोक्लिम = {3,6,9,12}। आयु-कथन (bhūtasaṃkhyā, अंक-निष्ठ): षट् = 6 मास, द्वि = 2 मास। "बल-विवर्जित" = ग्रह का षड्बल-योग उसकी प्रति-ग्रह न्यूनतम-सीमा (threshold) से नीचे। गणना: 1 रूप = 60 विरूप; कुल षड्बल = स्थान + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग् बल, फिर सीमा से तुलना।

उदाहरण (worked example) मान लें सातों ग्रह {3,6,9,12} भावों में विभक्त हैं, और किसी ग्रह का कुल षड्बल उसकी अपेक्षित सीमा (जैसे परम्परागत रूप में सूर्य ≈ 5–6 रूप) से कम आता है → "बल-विवर्जित" शर्त पूरी; तब शास्त्र-कथित अल्प-आयु (6 या 2 मास) का योग बनता है। (यह शास्त्र का कथन है, नियति-घोषणा नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) "बल-विवर्जित" की कसौटी हमारे षड्बल ढाँचे (BPHS अ.27) पर सीधे बैठती है—छह अवयव रूप/विरूप में जोड़कर (1 रूप = 60 विरूप) प्रति-ग्रह सीमा से तुलना करना, न कि "दुर्बल लगता है" जैसा अस्पष्ट कथन। यही हमारा मूल अनुशासन है: बल एक अंक है, फल उस अंक का शास्त्रीय अर्थ; दोनों को अलग रखा जाता है।

9.24
त्रिभिः पापग्रहैः सूतौ चन्द्रमा यदि दृश्यते।
मातृनाशो भवेत्तस्य शुभर्दृष्टे शुभं वदेत्
tribhiḥ pāpagrahaiḥ sūtau candramā yadi dṛśyate|
mātṛnāśo bhavettasya śubhardṛṣṭe śubhaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिभिः पाप-ग्रहैः = तीन पाप ग्रहों से; सूतौ = जन्म के समय; चन्द्रमा यदि दृश्यते = यदि चन्द्र दृष्ट (आक्रान्त) हो; मातृ-नाशः भवेत् = माता का नाश होता है; तस्य = उसकी; शुभैः दृष्टे = शुभ ग्रहों से दृष्ट होने पर; शुभं वदेत् = शुभ (कल्याण) कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ जन्म के समय यदि चन्द्र तीन पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है माता का नाश होता है; और यदि वही चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो शुभ फल कहना चाहिए। यहाँ दृष्टि की संख्या (तीन पाप) और उसका शुभ-विपर्यय दोनों संतुलित रूप में दिए गए हैं—भंग का द्वार खुला है।

English rendering If at birth the Moon is aspected by three malefics, the text says the mother perishes; but if aspected by benefics, one should predict good.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-संख्या पर आधारित)। एकमात्र अंक: "त्रि" = 3 पाप-दृष्टियाँ (bhūtasaṃkhyā, अंक-निष्ठ)। दृष्टि-गणना BPHS दृष्टि-अध्याय (अ.8) के नियमों से होती है; श्लोक स्वयं कोई कोणांश नहीं देता। ध्यान दें—शुभ-दृष्टि पर फल पूर्णतः उलट जाता है, अतः यह अभंग-दोष नहीं, एक सापेक्ष कथन है।

9.25
धने राहुर्बुधः शुक्रः सौरिः सूर्यो यदा स्थितः।
तस्य मातुर्भवेन्मृत्युर्मृते पितरि जायते
dhane rāhurbudhaḥ śukraḥ sauriḥ sūryo yadā sthitaḥ|
tasya māturbhavenmṛtyurmṛte pitari jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धने = द्वितीय भाव में; राहुः = राहु; बुधः = बुध; शुक्रः = शुक्र; सौरिः = शनि; सूर्यः = सूर्य; यदा स्थितः = जब स्थित हो; तस्य मातुः मृत्युः = उसकी माता की मृत्यु; मृते पितरि जायते = पिता के मृत होने पर / मृत्-पिता के समय जन्म (पाठानुसार)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब धन (द्वितीय) भाव में राहु, बुध, शुक्र, सौरि (शनि) अथवा सूर्य स्थित हों, तब उस जातक की माता की मृत्यु कही गई है, और वह पिता के मृत होने की स्थिति में जन्मा कहा गया है। ग्रह-सूची पाठ में क्रमिक नामों से दी है; “यदा स्थितः” एकत्र/विकल्प दोनों रीतियों से पढ़ा जा सकता है—पाठ-भेद संभव। यह कठोर आरिष्ट-फल है; इसे निश्चित भविष्य या भय-वाणी के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that when Rāhu, Mercury, Venus, Saturn, or the Sun occupies the second house, the mother’s death is indicated, and the native is said to be born with the father deceased. Report the śāstra’s claim only; do not convert it into fear or certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-फल / आरिष्ट वर्णन। धन = भाव 2; ग्रह-सूची = राहु, बुध, शुक्र, शनि, सूर्य—कोई अंश-सीमा या बल-संख्या नहीं।

9.26
पापात्सप्तमरन्ध्रस्थे चन्द्रे पापसमन्विते।
बलिभिः पापकैर्दृष्टे जातो भवति मातृहा
pāpātsaptamarandhrasthe candre pāpasamanvite|
balibhiḥ pāpakairdṛṣṭe jāto bhavati mātṛhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापात् = पाप ग्रह से (गिनकर); सप्तम-रन्ध्र-स्थे चन्द्रे = सप्तम (7) या रन्ध्र (8, अष्टम) में स्थित चन्द्र होने पर; पाप-समन्विते = चन्द्र स्वयं पाप-युत; बलिभिः पापकैः दृष्टे = बलवान् पाप ग्रहों से दृष्ट होने पर; जातः भवति मातृहा = जन्मा "मातृहा" (जिसके जन्म से माता का नाश) होता है।

हिन्दी भावार्थ किसी पाप ग्रह से गिनकर सप्तम या अष्टम भाव में स्थित चन्द्र, जो स्वयं पाप-युत हो और बलवान् पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है कि ऐसा जन्मा शिशु "मातृहा"—अर्थात् जिसके जन्म से माता को घोर अरिष्ट—कहा जाता है। "रन्ध्र" अष्टम भाव का नाम है; "बलिभिः" यहाँ पाप-ग्रहों का बल निर्णायक बनाता है।

English rendering With the Moon in the 7th or 8th from a malefic, itself joined by a malefic and aspected by strong malefics, the one born is called mātṛhā—whose birth, the text says, destroys the mother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप-सापेक्ष भाव-गणना + बल-शर्त)। "पापात् सप्तम/रन्ध्र" = किसी पाप ग्रह से 7वें/8वें भाव की गणना (सापेक्ष स्थान, लग्न से निरपेक्ष नहीं)। रन्ध्र = 8, सप्तम = 7। "बलिभिः पापकैः" = दृष्टि करने वाले पापों का बल—एक बल-सापेक्ष शर्त, जिसका मान षड्बल से निकलता है, यद्यपि श्लोक स्वयं अंक नहीं देता।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलिभिः" (बलवान् पाप) की शर्त फिर वही सिखाती है जो हमारा षड्बल ढाँचा (अ.27) करता है—अरिष्ट की तीव्रता दृष्टि करने वाले ग्रह के बल-अंक पर निर्भर है, अतः "बल" को रूप/विरूप में गणकर सीमा से तोलना पड़ता है; केवल "पाप है" कहना अपर्याप्त है। यही गणना-बनाम-फल-कथन का विभाजन हमारे डिकोड की रीढ़ है।

9.27
उच्चस्थो वाऽथ नीचस्थः सप्तमस्थो यदारविः।
पानहीनो भवेद्‌बाल अजाक्षीरेण जीवति
uccastho vā'tha nīcasthaḥ saptamastho yadāraviḥ|
pānahīno bhaved‌bāla ajākṣīreṇa jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्चस्थः = अपनी उच्च राशि में स्थित; नीचस्थः = नीच राशि में स्थित; सप्तमस्थः = सप्तम भाव (7) में; रविः = सूर्य; पानहीनः = (मातृ-)दुग्ध/पेय से रहित; बालः = शिशु; अजाक्षीरेण = बकरी के दूध से (अजा = बकरी, क्षीर = दूध); जीवति = जीवित रहता है।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य सप्तम भाव में हो — चाहे वह अपनी उच्च राशि में हो या नीच में — तब शास्त्र कहता है कि शिशु माता के दुग्ध से वंचित रह जाता है और बकरी के दूध से पालित होकर जीवित रहता है। ध्यान दें: यहाँ उच्चत्व भी फल को नहीं पलटता — यही श्लोक की बारीकी है।

English rendering When the Sun occupies the seventh house — whether exalted or debilitated — the text states that the child is deprived of the mother's milk and survives reared on goat's milk.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम-भाव में सूर्य)। एकमात्र स्थान-नियम: सूर्य का भाव = 7। उच्च/नीच एक पृथक् दिग्/स्थान-बल-मान है, पर श्लोक जानबूझकर कहता है कि इस बल-भेद से फल नहीं बदलता — अर्थात् बल की गणना और अरिष्ट-फल दो अलग स्तर हैं।

उदाहरण (worked example) तुला-लग्न लें → सप्तम = मेष, जहाँ सूर्य उच्च (परम उच्च 10°) होता है; फिर भी श्लोक के अनुसार नियम लागू। इसके विपरीत मेष-लग्न → सप्तम = तुला, जहाँ सूर्य नीच — दोनों ही स्थितियों में शास्त्र समान फल कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) उच्च/नीच वही "उच्च-बल" है जिसे हमारे षड्बल-मॉडल (Ch.27) में एक निश्चित संख्या के रूप में गिना जाता है (1 रूप = 60 विरूप)। यह श्लोक स्वच्छ उदाहरण है कि बल एक सटीक परिकलन है, जबकि उसका अरिष्ट-फल शास्त्र का अपना कथन — इसी विभाजन (गणित बनाम व्याख्या) को हमने दोषिये के अनुशासन-बिन्दु के रूप में पिन किया है।

9.28
चन्द्राच्चतुर्थगः पापो रिपुक्षेत्रे यदा भवेत्‌।
तदा मातृवधं कुर्यात्‌ केन्द्रे यदि शुभो न चेत्‌
candrāccaturthagaḥ pāpo ripukṣetre yadā bhavet‌|
tadā mātṛvadhaṃ kuryāt‌ kendre yadi śubho na cet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् = चन्द्रमा से (गणना का आरम्भ-बिन्दु); चतुर्थगः = चौथे स्थान में गया हुआ; पापः = क्रूर ग्रह; रिपुक्षेत्रे = शत्रु-राशि में; तदा = तब; मातृवधम् = माता का नाश; कुर्यात् = करता है; केन्द्रे = केन्द्र (1/4/7/10) में; शुभः = शुभ ग्रह; न चेत् = यदि न हो।

हिन्दी भावार्थ यदि चन्द्रमा से चौथे स्थान में कोई क्रूर ग्रह अपनी शत्रु-राशि में बैठा हो, और किसी भी केन्द्र में कोई शुभ ग्रह न हो, तो शास्त्र कहता है कि यह योग माता के लिए अरिष्टकारी होता है। शुभ-ग्रह की केन्द्र-उपस्थिति इस भंग को रोक देती है — शर्त सशर्त है।

English rendering When a malefic stands in the fourth from the Moon, placed in an enemy sign, and no benefic occupies a kendra, the text states the configuration works against the mother's life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-सूत्र (0-आधारित राशि, समावेशी गणना): लक्ष्य-राशि = (चन्द्र-राशि + 3) mod 12। शर्तें (सभी AND): (i) उस राशि में पाप-ग्रह, (ii) वह राशि उस पाप की शत्रु-राशि (नैसर्गिक मैत्री-चक्र से), (iii) केन्द्र-समुच्चय {1,4,7,10 लग्न से} में कोई सौम्य नहीं। तीनों सत्य ⇒ फल-कथन।

उदाहरण (worked example) चन्द्र वृष (राशि 2) में ⇒ चतुर्थ-राशि = (2+3) = सिंह (5)। मान लें शनि सिंह में — सिंह सूर्य की राशि, जो शनि का शत्रु ⇒ शर्त (ii) पूर्ण। यदि लग्न से 1/4/7/10 में कोई शुभ (गुरु/शुक्र/बुध/पूर्ण चन्द्र) नहीं ⇒ शास्त्र मातृ-अरिष्ट कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "चन्द्र से चौथा" और "शत्रु-राशि" — दोनों विशुद्ध नियतात्मक संगणनाएँ हैं: पहला राशि-सूचकांक पर mod-12 अंकगणित, दूसरा नैसर्गिक-मैत्री तालिका का लुकअप। हमारे वर्ग/बल-इंजन ठीक इसी प्रकार के मॉड्युलर एवं दिग्नता-निर्णय को सटीक रूप से हल करते हैं; फल-कथन उससे पृथक् शास्त्र-वाणी है।

9.29
द्वादशे रिपुभावे च यदा पापग्रहो भवेत्‌।
तदा मातुर्भयं विद्याच्चतुर्थे दशमे पितुः
dvādaśe ripubhāve ca yadā pāpagraho bhavet‌|
tadā māturbhayaṃ vidyāccaturthe daśame pituḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादशे = द्वादश भाव (व्यय); रिपुभावे = षष्ठ भाव (शत्रु/रिपु); पापग्रहः = क्रूर/पाप ग्रह (रवि, मङ्गल, शनि, राहु–केतु प्रायः); मातुः भयम् = माता-सम्बन्धी भय/अरिष्ठ-संकेत; चतुर्थे = चतुर्थ भाव (मातृ-स्थान भी, पितृ-सन्दर्भ में गृह/सुख); दशमे = दशम भाव (कर्म/पितृ-स्थान); पितुः = पिता-सम्बन्धी संकेत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पापग्रह द्वादश भाव में अथवा रिपु-भाव (षष्ठ) में हो, तो माता की ओर अरिष्ठ/भय समझना चाहिए। उसी प्रकार जब पापग्रह चतुर्थ अथवा दशम भाव में स्थित हो, तो पिता की ओर अरिष्ट-संकेत जाना जाता है। यह भाव-स्थान और पाप-ग्रह की स्थिति पर आधारित फल-कथन है, न कि कोई गणना-सूत्र।

English rendering The text states that a malefic in the twelfth or the sixth (ripu) house indicates danger concerning the mother; a malefic in the fourth or the tenth indicates danger concerning the father.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (माता–पिता अरिष्ठ-योग)। भाव-क्रमांक स्थिर हैं: ६ = रिपु, १२ = व्यय, ४ = सुख/मातृ-स्थान, १० = कर्म/पितृ-स्थान; “पाप” यहाँ क्रूर-ग्रह-वर्ग का शास्त्रीय संकेत है, संख्यात्मक बल-माप नहीं।

9.30
लग्ने क्रूरो व्यये क्रूरो धने सौम्यस्तथैव च।
सप्तमे भवने क्रूरः परिवारक्षयंकरः
lagne krūro vyaye krūro dhane saumyastathaiva ca|
saptame bhavane krūraḥ parivārakṣayaṃkaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने क्रूरः = लग्न (1) में क्रूर; व्यये क्रूरः = द्वादश (12) में क्रूर; धने = द्वितीय (2) में; सौम्यः = शुभ ग्रह (पाठ-भेद: कहीं "क्रूरः"); तथैव च = वैसे ही; सप्तमे भवने = सप्तम (7) में; क्रूरः = क्रूर; परिवारक्षयंकरः = परिवार का नाश करने वाला।

हिन्दी भावार्थ लग्न में क्रूर, द्वादश में क्रूर, द्वितीय में (एक पाठ में) शुभ, और सप्तम में क्रूर — ऐसा योग शास्त्र के अनुसार परिवार के लिए क्षयकारी माना गया है। द्वितीय-भाव के ग्रह का पाठ विवादित है — "सौम्य" बनाम "क्रूर" — अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering A malefic in the ascendant, a malefic in the twelfth, a benefic (in one reading) in the second, and a malefic in the seventh — such a set, the text states, is destructive to the family.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थिर भाव-विन्यास)। विन्यास: भाव 1 → क्रूर, 12 → क्रूर, 7 → क्रूर, तथा 2 → सौम्य/क्रूर (पाठ-सापेक्ष)। यहाँ लग्न, द्वितीय (कुल-भाव), द्वादश (व्यय) व सप्तम मिलकर "परिवार" के अक्ष को घेरते हैं — इसीलिए परिवार-क्षय की भाषा।

हमारा डिकोड (Our Decode) omit।

9.31
लग्नस्थे च गुरौ सौरौ धने राहौ तृतीयगे।
इति चेञ्जन्मकाले स्यान्‌माता तस्य न जीवति
lagnasthe ca gurau saurau dhane rāhau tṛtīyage|
iti ceñjanmakāle syān‌mātā tasya na jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नस्थे गुरौ = गुरु लग्न में; सौरौ धने = शनि (सौरि) द्वितीय भाव में; राहौ तृतीयगे = राहु तृतीय भाव में; जन्मकाले = जन्म-क्षण; माता … न जीवति = माता जीवित नहीं रहती (शास्त्र का फल-वाक्य)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि जन्म-काल में गुरु लग्न में हो, शनि धन-भाव में हो, और राहु तृतीय में हो, तो उस जातक की माता जीवित नहीं रहती — ऐसा फल कहा गया है। तीनों शर्तें एक साथ “इति चेत्” से बँधी हैं। यह अरिष्ठ-अध्याय का कठोर फल-कथन है; इसे भय या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that if at birth Jupiter occupies the lagna, Saturn the second house, and Rāhu the third, the mother of that native does not live — so the śāstra phrases the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मातृ-अरिष्ठ)। संरचना: गुरु∈भाव₁ ∧ शनि∈भाव₂ ∧ राहु∈भाव₃, जन्म-लग्न-संदर्भ में। भाव-गणना पूर्ण-चिह्न (whole-sign) या क्स्पिड-हाउस पर निर्भर — सम्मेलन घोषित करें; फल स्वयं शास्त्र का दावा है।

9.32
क्षीणचन्द्रात्‌त्रिकोणस्थैः पापैः सौम्यविवर्जितैः।
माता परित्यजेद्‌बलं षण्मासाच्च न संशयः
kṣīṇacandrāt‌trikoṇasthaiḥ pāpaiḥ saumyavivarjitaiḥ|
mātā parityajed‌balaṃ ṣaṇmāsācca na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षीणचन्द्रात् = क्षीण (कृष्ण-पक्षीय, बलहीन) चन्द्रमा से; त्रिकोणस्थैः = त्रिकोण (5/9) में स्थित; पापैः = क्रूर ग्रहों द्वारा; सौम्यविवर्जितैः = शुभ-दृष्टि/युति से रहित; माता बलं परित्यजेत् = माता बल (जीवन-शक्ति) त्याग देती है; षण्मासात् = छह मास में; न संशयः = निःसंदेह।

हिन्दी भावार्थ जब क्षीण चन्द्रमा से त्रिकोण (पंचम/नवम) में क्रूर ग्रह हों और उन पर कोई शुभ-दृष्टि न हो, तो शास्त्र कहता है कि माता की जीवन-शक्ति छह मास के भीतर क्षीण हो जाती है। "बलं परित्यजेत्" को सीधे मृत्यु-वचन न मानकर बल-ह्रास के रूप में पढ़ना अधिक निष्ठावान है।

English rendering When malefics devoid of benefic aspect stand in a trine from the waning Moon, the text states the mother's vital strength fails within six months.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिकोण-समुच्चय (चन्द्र से): {1, 5, 9} → यहाँ 5वीं व 9वीं राशि = (चन्द्र-राशि + 4) mod 12 और (चन्द्र-राशि + 8) mod 12। शर्त: वहाँ पाप, और सौम्य-दृष्टि शून्य। काल-स्थिरांक: षण्मास = 6 माह। "क्षीण" = चन्द्र-बल का न्यूनतम पक्ष (अमावस्या-निकट)।

उदाहरण (worked example) क्षीण चन्द्र मेष (1) में ⇒ त्रिकोण = सिंह (5) व धनु (9)। यदि सिंह में मंगल, धनु में शनि, और किसी शुभ की उन पर दृष्टि नहीं ⇒ शास्त्र 6-मास-अवधि का बल-ह्रास कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ का त्रिकोण (1/5/9) ठीक वही त्रिकोण-ज्यामिति है जिस पर अष्टकवर्ग की त्रिकोण-शोधन (Ch.67) प्रक्रिया आधारित है — तीन समकोणीय राशियों का समुच्चय। हमने Ch.66 के सर्वाष्टकवर्ग (SAV = 337) को exact-`==` फिक्स्चर पर पिन किया और शोधन उसी त्रिकोण-सेट पर चलता है; यह श्लोक उसी ज्यामिति का अरिष्ट-प्रयोग है, जबकि षण्मास केवल शास्त्र का काल-कथन है।

9.33
एकांशकस्थौ मन्दारौ यत्र कुत्रस्थितौ यदा।
शशिकेन्द्रगतौ तौ वा द्विमातृभ्यां न जीवति
ekāṃśakasthau mandārau yatra kutrasthitau yadā|
śaśikendragatau tau vā dvimātṛbhyāṃ na jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकांशकस्थौ = एक ही अंश/वर्गांश में स्थित (द्विवचन); मन्दारौ = मन्द (शनि) + अर (मङ्गल); यत्र कुत्र स्थितौ = जहाँ कहीं भी हों; शशि-केन्द्र-गतौ = चन्द्र से केन्द्र (१-४-७-१०) में वे दोनों; द्विमातृभ्याम् = दो माताओं से/द्वारा; न जीवति = जीवित नहीं रहता (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो विकल्प देता है — शनि और मङ्गल एक ही अंश में हों (कहीं भी), अथवा दोनों चन्द्र से केन्द्रस्थ हों — तो जातक “द्विमातृ” सन्दर्भ में जीवित नहीं रहता, ऐसा कहा गया है। “एकांश” यहाँ समान भाग/वर्गांश-सहस्थिति का तकनीकी संकेत है; “द्विमातृ” पारंपरिक अरिष्ठ-शब्दावली है (दो माताओं का पालन/सन्दर्भ), भय-वाक्य बनाने के लिए नहीं।

English rendering The text states that when Saturn and Mars share the same aṃśa wherever they stand, or when both occupy angular houses from the Moon, the native does not live under (or by) two mothers — so the śāstra frames the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (१) एकांश: समान वर्ग-भाग — प्रायः समान नवांश (D9) या समान अंश-खंड; नियम = दोनों ग्रहों का varga-label समान। नवांश: राशि-देशान्तर λ° में चिह्न-आन्तरिक भाग ⌊(λ mod 30°) / (३०°/९)⌋, मान ०…८, फिर नवांश-राशि-मानचित्रण (चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम)। (२) शशि-केन्द्र: चन्द्र-भाव से {१, ४, ७, १०} में शनि ∧ मङ्गल। पाठ “अंश” का स्तर (नवांश बनाम सामान्य अंश) पर पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) मानें Lahiri अयनांश, whole-sign भाव। मङ्गल = मेष १२°४०′, शनि = सिंह १२°४०′ — दोनों नवांश-सूचकांक ⌊१२°४०′ / ३°२०′⌋ = ३ (चतुर्थ नवांश); यदि नवांश-मानचित्र में दोनों एक ही नवांश-राशि-खंड में पड़ें तो “एकांशकस्थौ” लागू। अथवा चन्द्र = कन्या: केन्द्र = कन्या, धनु, मीन, मिथुन — यदि शनि-मङ्गल इनमें हों तो द्वितीय विकल्प। फल स्वयं शास्त्र का कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “एकांश” शुद्ध वर्ग-अंकगणित है — ३०° राशि का समान भागों में विभाजन, जैसा षोडश-वर्ग (D9 नवांश आदि) इंजन में मॉड्यूलर नियम से बैठता है। हम ग्रह-देशान्तर से वर्ग-लेबल `==` से मिलाते हैं; फल-वाक्य “द्विमातृभ्यां न जीवति” को गणना से अलग रख कर केवल शास्त्र-कथन के रूप में पढ़ते हैं।

9.34
लग्ने सन्दो मदे भौमः षष्ठस्थाने च चन्द्रमाः।
इति चेज्जन्मकाले स्यात्‌ पिता तस्य न जीवति
lagne sando made bhaumaḥ ṣaṣṭhasthāne ca candramāḥ|
iti cejjanmakāle syāt‌ pitā tasya na jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने सन्दो = लग्न में सन्द (पाठ: सन्दो — बुध/सौम्य-पठन; पाठ-भेद संभव); मदे = सप्तम भाव (मद/मदन = ७); भौमः = मङ्गल; षष्ठस्थाने = षष्ठ भाव में; चन्द्रमाः = चन्द्र; जन्मकाले = जन्म-काल; पिता … न जीवति = पिता जीवित नहीं (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जन्म-काल में लग्न में सन्द (बुध-पठन; पाठ-भेद संभव), सप्तम में मङ्गल, और षष्ठ में चन्द्र हो, तो उस जातक का पिता जीवित नहीं रहता। तीन भाव–ग्रह युग्म एक साथ “इति चेत्” से जुड़े हैं। यह पितृ-अरिष्ठ का फल-सूत्र है; निश्चित मृत्यु-घोषणा या भय-व्यापार नहीं।

English rendering The text states that if at birth Mercury (reading of sando; recension may vary) is in the lagna, Mars in the seventh, and the Moon in the sixth, the father of that native does not live.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृ-अरिष्ठ)। शर्त: ग्रहₐ∈भाव₁ ∧ मङ्गल∈भाव₇ ∧ चन्द्र∈भाव₆। “सन्दो” का ग्रह-अभिधान विकिस्रोत-पाठ में विवादास्पद — बुध मानना व्यावहारिक समांतर योगों से मेल खाता है, किन्तु पाठ-भेद संभव; निर्णयात्मक संस्करण न थोपें।

9.35
लग्ने जीवो धने मन्दरविभौमबुधास्तथा।
विवाहसमये तस्य बालस्य म्रियते पिता
lagne jīvo dhane mandaravibhaumabudhāstathā|
vivāhasamaye tasya bālasya mriyate pitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने जीवः = गुरु लग्न में; धने = द्वितीय भाव में; मन्द = शनि; रवि = सूर्य; भौम = मङ्गल; बुध = बुध; तथा = तथा (वे धनस्थ); विवाह-समये = विवाह-काल में; बालस्य = बाल/जातक का; म्रियते पिता = पिता मरता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न में गुरु हो और धन-भाव में शनि, रवि, मङ्गल तथा बुध हों, तो उस बालक के विवाह-समय पिता की मृत्यु होती है — ऐसा फल कहा गया है। “विवाहसमये” काल-संकेत है, दशा-वर्ष-संख्या नहीं। बहु-ग्रह धनस्थ होने की कठोर शर्त इसे दुर्लभ योग बनाती है; फिर भी इसे भय या दबाव-वचन नहीं बनाना।

English rendering The text states that when Jupiter is in the lagna and Saturn, the Sun, Mars, and Mercury occupy the second house, the father dies at the time of the child’s marriage — so the śāstra declares.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृ-अरिष्ठ, विवाह-काल)। संरचना: गुरु∈भाव₁ ∧ {शनि, रवि, मङ्गल, बुध} ⊆ भाव₂। “विवाहसमये” घटना-संदर्भ है, न कि विंशोत्तरी वर्ष-सूत्र; दशा-मेल केवल बाहरी काल-मॉडल से जोड़ा जा सकता है, इस श्लोक में वर्ष-अचर नहीं हैं।

9.36
सूर्यः पापेन संयुक्तो ह्यथवा पापमध्यगः।
सूर्यात्‌ सप्तमगः पापस्तदा पितृवधो भवेत्‌
sūryaḥ pāpena saṃyukto hyathavā pāpamadhyagaḥ|
sūryāt‌ saptamagaḥ pāpastadā pitṛvadho bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यः = रवि (पितृ-कारक); पापेन संयुक्तः = पाप-ग्रह से युक्त; पापमध्यगः = दो पापों के बीच स्थित (पाप-कर्तरी); सूर्यात् सप्तमगः = सूर्य से सप्तम भाव/स्थान में; पापः = क्रूर ग्रह; पितृवधः = पिता-सम्बन्धी घातक/मृत्यु-संकेत (शास्त्र-फल); भवेत् = होता है (पाठानुसार)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि सूर्य किसी पाप-ग्रह से युक्त हो, अथवा दो पाप-ग्रहों के मध्य पड़ा हो, अथवा सूर्य से सप्तम स्थान में पाप-ग्रह बैठा हो, तो पितृ-वध का संकेत बनता है। यह सूर्य को पितृ-कारक मानकर उसके संयोग, कर्तरी-स्थिति और सप्तम-दोष को पिता-सम्बन्धी अरिष्ट की कड़ी में जोड़ता है। फल-कथन शास्त्रीय संकेत है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the Sun is joined with a malefic, or lies between malefics, or a malefic stands in the seventh from the Sun, a paternal-death indication is said to arise. The verse ties solar affliction and the seventh-from-Sun placement to father-related ariṣṭa language.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अरिष्ट-फल-कथन (पितृ-वध योग)। “सूर्यात् सप्तम” = सूर्य-राशि/सूर्य-भाव से +6 स्थान (पूर्णांक भाव-गिनती); “पापमध्यग” = सूर्य के दोनों पार्श्वों में पाप-ग्रहों की स्थिति—यह विन्यास-परीक्षण है, संख्यात्मक गुणन/भाग नहीं।

9.37
सप्तमे भवने सूर्यः कर्मस्थो भूमनन्दनः।
राहुर्व्यये च युस्यैव पिता कष्टेन जीवति
saptame bhavane sūryaḥ karmastho bhūmanandanaḥ|
rāhurvyaye ca yusyaiva pitā kaṣṭena jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे भवने = सप्तम भाव में; सूर्यः = रवि; कर्मस्थः = दशम (कर्म) भाव में स्थित; भूमिनन्दनः = कुज/मङ्गल (भू-पुत्र); राहुः = राहु; व्यये = द्वादश भाव में; यस्यैव = उसी जातक का (पाठ: युस्यैव ≈ यस्यैव; पाठ-भेद संभव); पिता कष्टेन जीवति = पिता कष्टपूर्वक जीवित रहता है (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब सप्तम भाव में सूर्य हो, दशम में मङ्गल हो और द्वादश में राहु हो, तो उस जातक का पिता कष्ट से जीता है। यहाँ तीन भावों (७–१०–१२) पर तीन ग्रहों का योग पितृ-जीवन की कठिनाई का संकेत देता है, मृत्यु का नहीं। यह फल-कथन है; कष्ट की तीव्रता, काल या चिकित्सा-निष्कर्ष शास्त्र इस श्लोक में नहीं बाँधता।

English rendering The text states that with the Sun in the seventh house, Mars in the tenth, and Rāhu in the twelfth, the native’s father is said to live under hardship. The yoga is a three-house affliction pattern for paternal difficulty, not a computational period rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रि-ग्रह भाव-योग का फल-कथन। जाँच केवल भाव-स्थान-मिलान है: सूर्य ∈ भाव ७, कुज ∈ भाव १०, राहु ∈ भाव १२ (लग्न-आधारित भाव-गणना; भाव-पद्धति घोषित करनी चाहिए—पूर्ण-राशि/श्रीपति आदि)।

9.38
दशमस्थो यदा भौमः शत्रुक्षेत्रसमास्रितः।
म्रियते तस्य जातस्य पिता शीघ्रं न संशयः
daśamastho yadā bhaumaḥ śatrukṣetrasamāsritaḥ|
mriyate tasya jātasya pitā śīghraṃ na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमस्थः = दशम भाव में स्थित; यदा = जब; भौमः = मङ्गल; शत्रुक्षेत्र-समाश्रितः = शत्रु-राशि में आश्रित (समास्रितः = समाश्रितः); म्रियते = मरता है (शास्त्र-फल); तस्य जातस्य पिता = उस जातक का पिता; शीघ्रम् = शीघ्र; न संशयः = संदेह नहीं (शास्त्र की निश्चय-भाषा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब मङ्गल दशम भाव में हो और शत्रु-क्षेत्र में बैठा हो, तो उस जातक का पिता शीघ्र मरता है—‘न संशयः’ शास्त्र की अपनी दृढ़-उक्ति है। दशम कर्म/स्थिति-भाव है; मङ्गल वहाँ शत्रु-राशि में पितृ-अरिष्ट का संकेत बनता है। इसे काल-निश्चित भविष्यवाणी या चिकित्सा-निष्कर्ष न समझें—यह पाठ का फल-वाक्य है।

English rendering The text states that when Mars occupies the tenth house and is placed in an enemy sign, the native’s father is said to die soon—“no doubt” is the śāstra’s own assertive phrasing. The condition is house plus dignity (enemy field), not a numeric timing formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम + शत्रुक्षेत्र मङ्गल)। शत्रु-क्षेत्र = ग्रह की शास्त्रीय शत्रु-राशि-तालिका से मिलान (मङ्गल की शत्रु-राशियाँ परम्परा-निर्भर; ग्रह-मैत्री तालिका घोषित करें)। “शीघ्र” यहाँ संख्यात्मक वर्ष-सूत्र नहीं है।

9.39
रिपुस्थाने यदा चन्द्रो लग्नस्थाने शनैश्चरः।
कुजश्च सप्तमे स्थाने पिता तस्य न जीवति
ripusthāne yadā candro lagnasthāne śanaiścaraḥ|
kujaśca saptame sthāne pitā tasya na jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रिपुस्थाने = षष्ठ भाव में; यदा चन्द्रः = जब चन्द्रमा; लग्नस्थाने = लग्न में; शनैश्चरः = शनि; कुजः = मङ्गल; सप्तमे स्थाने = सप्तम में; पिता तस्य न जीवति = उसका पिता जीवित नहीं रहता (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि चन्द्र षष्ठ में हो, शनि लग्न में हो और मङ्गल सप्तम में हो, तो उस जातक का पिता जीवित नहीं रहता। तीनों स्थान (६–१–७) पर क्रमशः चन्द्र-शनि-कुज का यह योग पितृ-अरिष्ट का कठोर फल-वाक्य है। ‘न जीवति’ शास्त्र की भाषा है; इसे नियति या सुनिश्चित घटना के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

English rendering The text states that when the Moon is in the sixth, Saturn in the lagna, and Mars in the seventh, the native’s father is said not to live. It is a three-planet, three-house ariṣṭa configuration stated as phala, not as a computed span of years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रि-स्थान योग का फल-कथन। शर्त: चन्द्र ∈ भाव ६ ∧ शनि ∈ भाव १ ∧ कुज ∈ भाव ७। भाव-सीमा लग्न-रेखा और भाव-पद्धति पर निर्भर है—संख्या निकालने से पहले पद्धति घोषित करें।

9.40
भौमांशकस्थिते भानौ शनिना च निरीक्षिते।
प्राग्जन्मनो निवृत्तिः स्यान्‌मृत्युर्वाऽपि शिशोः पितुः
bhaumāṃśakasthite bhānau śaninā ca nirīkṣite|
prāgjanmano nivṛttiḥ syān‌mṛtyurvā'pi śiśoḥ pituḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौमांशक-स्थिते = मङ्गल के अंश (वर्ग/अंश-भाग) में स्थित; भानौ = सूर्य में/सूर्य के; शनिना निरीक्षिते = शनि द्वारा दृष्ट; प्राग्जन्मनः निवृत्तिः = पूर्व-जन्म की निवृत्ति/अवसान; स्यात् = हो; मृत्युः वा अपि = अथवा मृत्यु; शिशोः पितुः = शिशु के पिता की।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब सूर्य भौम-अंश में स्थित हो और शनि से दृष्ट हो, तो प्राग्जन्म की निवृत्ति हो, अथवा शिशु के पिता की मृत्यु हो। यहाँ दो वैकल्पिक फल-पक्ष एक ही योग से जुड़े हैं—‘वा’ से शास्त्र दोनों सम्भावनाएँ रखता है। ‘अंश’ वर्ग-विभाग की भाषा है; दृष्टी शनि की दृष्टि-नियम से जाँची जाती है। फल शास्त्र-कथन है, निश्चित भाग्य-लेख नहीं।

English rendering The text states that when the Sun stands in a Martian aṃśa and is aspected by Saturn, there may be “cessation of the previous birth,” or else death of the child’s father. The verse pairs a divisional (aṃśa) condition with a Saturn aspect as an early-life paternal/ariṣṭa indication.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अंश-स्थिति = वर्ग-विभाजन (प्रायः नवांश D9, जब “अंश” अकेला बोला जाए—परम्परा में पाठ-भेद संभव)। ३०° राशि को ९ समान भागों में: प्रत्येक नवांश = ३°२०′; सूर्य-देशान्तर λ से n = ⌊(λ mod ३०°) / (१०/३)°⌋, फिर भौम-नवांश-स्वामी नियम से मङ्गल-स्वामित्व जाँचें। शनि-दृष्टि: शास्त्रीय पूर्ण दृष्टि (शनि से ३, ७, १०) या अपनाई गई दृष्टि-तालिका—दोनों में से एक घोषित करें। संख्यात्मक “वर्ष” इस श्लोक में नहीं है।

उदाहरण (worked example) मानें सूर्य D1 = मेष १२°००′ (λ_rāśi-अंश = १२°)। नवांश-चाप = ३°२०′ ⇒ नवांश-क्रम = ⌊१२ / (१०/३)⌋ = ⌊१२ / ३.३३…⌋ = ३ → चतुर्थ नवांश। मेष में नवांश-स्वामी क्रम (मेष से): मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्र… — चतुर्थ = चन्द्र, न कि भौम। अतः यह सूर्य “भौमांशक” नहीं। भौमांशक के लिए उदाहरण: मेष २°००′ → ⌊२ / ३.३३…⌋ = ० → प्रथम नवांश = मङ्गल-स्वामी; यदि शनि की पूर्ण दृष्टि सूर्य पर हो, तो श्लोक की योग-शर्त लागू मानी जाती है (अयनांश/दृष्टि-नियम घोषित रहें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “अंश” यहाँ षोडश-वर्ग की उस गणित-धारा से जुड़ता है जिसमें D9 (नवांश) राशि के ३०° को समान चापों में बाँटता है—शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन, व्याख्या नहीं। हम वर्ग-इंजन में D1…D60 को देशान्तर पर नियत नियम से बाँधते हैं; फल-वाक्य (“पिता की मृत्यु”) को कभी संख्या-सत्य की तरह assert नहीं करते—केवल योग-शर्त `==` से मिलती है या नहीं, यह जाँच योग्य है।

9.41
चतुर्थे दशमे पापौ द्वादशे च यदा स्थितौ।
पितरं मातरं हत्वा देशाद्देशान्तरं व्रजेत्‌
caturthe daśame pāpau dvādaśe ca yadā sthitau|
pitaraṃ mātaraṃ hatvā deśāddeśāntaraṃ vrajet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थे = चतुर्थ भाव में; दशमे = दशम में; पापौ = दो पाप-ग्रह (द्विवचन); द्वादशे = द्वादश में; यदा स्थितौ = जब स्थित हों; पितरं मातरं हत्वा = माता-पिता का वध करके (शास्त्र-फल की उग्र भाषा); देशाद् देशान्तरं व्रजेत् = देश से दूसरे देश को चला जाए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब पाप-ग्रह चतुर्थ, दशम और द्वादश में स्थित हों, तो जातक माता-पिता का वध करके देशान्तर चला जाता है। ४–१०–१२ का पाप-योग गृह-कर्म-व्यय अक्ष पर क्रूर विन्यास है; फल-वाक्य अत्यन्त कठोर अरिष्ट-भाषा में है। इसे अपराध, कानूनी निष्कर्ष या प्रेरक-कथन न बनाएँ—यह पाठ का फल-वर्णन मात्र है।

English rendering The text states that when malefics occupy the fourth, the tenth, and the twelfth, the native is said to kill father and mother and wander from country to country. The verse is severe ariṣṭa-phala on the 4–10–12 axis, not a computational recipe.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पाप-भाव-योग का फल-कथन। शर्त: पाप-ग्रहों की उपस्थिति भाव ४, १० और १२ में (द्विवचन “पापौ” + “द्वादशे” से तीन स्थानों का पाप-आवरण)। “पाप” = सामान्यतः रवि, कुज, शनि, राहु/केतु (संग्रह-भेद संभव)—परिभाषा घोषित करें। कोई वर्ष-संख्या या गुणन-सूत्र नहीं।

9.42
राहुजीवौ रिपुक्षेत्रे लग्ने वाऽथ चतुर्थके।
त्रयोविंशतिमे वर्षे पुत्रस्तातं न पश्यति
rāhujīvau ripukṣetre lagne vā'tha caturthake|
trayoviṃśatime varṣe putrastātaṃ na paśyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहु-जीवौ = राहु और गुरु; रिपुक्षेत्रे = शत्रु-क्षेत्र/षष्ठ-सम्बन्धित क्षेत्र में (अथवा शत्रु-राशि में—पाठ-अर्थ द्वय संभव); लग्ने वा अथ चतुर्थके = अथवा लग्न में या चतुर्थ में; त्रयोविंशतिमे वर्षे = तेईसवें वर्ष में; पुत्रः तातं न पश्यति = पुत्र पिता को नहीं देखता (शास्त्र-फल = पितृ-वियोग/मृत्यु-संकेत)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि राहु और गुरु शत्रु-क्षेत्र में हों, अथवा लग्न या चतुर्थ में हों, तो तेईसवें वर्ष में पुत्र पिता को नहीं देखता। यहाँ योग-स्थान के साथ एक स्पष्ट वर्ष-संख्या (२३) जुड़ी है—यह काल-फल की उक्ति है, दशा-सूत्र का व्युत्पन्न नहीं। ‘न पश्यति’ वियोग/मृत्यु का शास्त्रीय संकेत-वाक्य है; सुनिश्चित घटना या चिकित्सा-काल नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu and Jupiter are in an enemy field, or in the lagna or the fourth, in the twenty-third year the son does not see the father. The verse supplies an explicit age mark (23) as phala-timing language, not a derived daśā equation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिर वर्ष-संख्या। त्रयोविंशति = २३ (शब्द-संख्या सीधी: त्रयः+विंशति)। यह २३ जन्म-वर्ष/आयु-वर्ष का शास्त्र-कथित फल-बिन्दु है; विंशोत्तरी आदि से यहाँ व्युत्पत्ति नहीं दी गई। योग-शर्त: (राहु ∧ गुरु) ∈ {रिपुक्षेत्र / लग्न / चतुर्थ}—‘रिपुक्षेत्र’ को षष्ठ-भाव या शत्रु-राशि में से किस अर्थ में लें, पाठ-भेद/टीका-भेद संभव; अपना अर्थ घोषित करें।

9.43
भानुः पिता च जन्तूनां चन्द्रो माता तथैव च।
पापदृष्टियुतो भानुः पापमध्यगतोऽपि वा
bhānuḥ pitā ca jantūnāṃ candro mātā tathaiva ca|
pāpadṛṣṭiyuto bhānuḥ pāpamadhyagato'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानुः = सूर्य; पिता जन्तूनाम् = समस्त प्राणियों का पिता (पितृ-कारक); चन्द्रः माता तथैव = चन्द्र उसी प्रकार माता (मातृ-कारक); पाप-दृष्टि-युतः = पापग्रह की दृष्टि व युति से युक्त; भानुः = सूर्य; पाप-मध्य-गतः वा = अथवा दो पापों के मध्य स्थित (पापकर्तरि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ कारक-सिद्धान्त स्थापित करता है — सूर्य प्राणिमात्र का पिता-कारक है और चन्द्र माता-कारक। इसके पश्चात् पितृ-अरिष्ट की शर्त आरम्भ होती है: यदि सूर्य पापग्रह की दृष्टि-युति से युक्त हो, अथवा दो पापों के मध्य (पापकर्तरि) फँसा हो — (आगे श्लोक 44 में फल पूर्ण होता है)।

English rendering The Sun is the father-significator of all beings, and the Moon likewise the mother; the text then begins the affliction-condition — the Sun joined or aspected by malefics, or hemmed between two malefics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कारक-परिभाषा एवं फल-कथन। "पापमध्यगत" एक स्थिति-रचना है: किसी ग्रह के 2रे और 12वें भाव (द्वितीय-द्वादश) दोनों में पापग्रह हों तो वह पापकर्तरि-योग में कहलाता है; सूर्य पर यह घटित हो तो पितृ-कारक पीड़ित माना जाता है। स्थान-गणना (2/12 from Sun) श्लोक 44 में संख्यात्मक रूप लेती है।

9.44
पित्ररिष्टं विजानीयाच्छिशोर्जातस्य निश्चितम्‌।
भानोः षष्ठष्टमर्क्षस्थैः पापैः सौम्यविवर्जितैः।
सुखभावगतैर्वाऽपि पित्ररिष्टं विनिर्दिशेत्‌
pitrariṣṭaṃ vijānīyācchiśorjātasya niścitam‌|
bhānoḥ ṣaṣṭhaṣṭamarkṣasthaiḥ pāpaiḥ saumyavivarjitaiḥ|
sukhabhāvagatairvā'pi pitrariṣṭaṃ vinirdiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पित्ररिष्टं = पिता-संबंधी अरिष्ट/कष्ट-संकेत; शिशोः जातस्य = नवजात शिशु के; निश्चितम् = शास्त्रोक्त नियम के अनुसार; भानोः = सूर्य से; षष्ठ-अष्टम-ऋक्ष-स्थैः = षष्ठ या अष्टम राशि/स्थान में स्थित; पापैः = पापग्रहों से; सौम्य-विवर्जितैः = सौम्य (शुभ) ग्रहों से रहित; सुखभाव-गतैः = सुखभाव (चतुर्थ भाव) में स्थित; वा अपि = अथवा भी; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नवजात के लिए पित्ररिष्ट तभी विचारा जाता है जब सूर्य पर पूर्वोक्त पाप-योग हो, अथवा सूर्य से षष्ठ या अष्टम स्थान में पापग्रह हों और वे सौम्य-संपर्क से रहित हों। अथवा वे पाप सुखभाव (चतुर्थ) में स्थित हों — तब भी पाठ पित्ररिष्ट का निर्देश देता है। “निश्चितम्” यहाँ शास्त्र की अपनी निर्णायक भाषा है; यह आधुनिक निश्चित भविष्यवाणी का दावा नहीं। पाठ-भेद संभव जहाँ “षष्ठाष्टम” की गणना भाव-से या राशि-से पढ़ी जाए — दोनों परंपराएँ प्रचलित हैं; यहाँ भाव/ऋक्ष दोनों शब्द आते हैं, अतः घोषित करें कि गणना सूर्य से गिने 6वें–8वें स्थान पर निर्भर है।

English rendering The text states that paternal ariṣṭa for the newborn is indicated when malefics occupy the sixth or eighth from the Sun without benefic support, or when such malefics occupy the fourth (sukha) bhāva. The force of “niścitam” is the śāstra’s own assertoric style, not an endorsement of deterministic fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-केंद्रित स्थान-नियम)। तकनीकी ढाँचा केवल स्थान-गणना है: सूर्य की राशि/भाव को 1 मानकर 6वाँ, 8वाँ, और सुखभाव = 4था; उन स्थानों में पापग्रह + सौम्य-विवर्जित स्थिति — यही शास्त्रीय संकेत-शर्त है। कोई वर्ष-संख्या, अंश-सूत्र या बलांक यहाँ नहीं दिया गया।

9.45
एवं चन्द्रात्‌ स्थितैः पापैर्मातु कष्टं विचारयेत्‌।
बलाऽबलविवेकेन कष्टं वा मृत्युमादिशेत्‌
evaṃ candrāt‌ sthitaiḥ pāpairmātu kaṣṭaṃ vicārayet‌|
balā'balavivekena kaṣṭaṃ vā mṛtyumādiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = उसी प्रकार (श्लोक 44 की विधि से); चन्द्रात् स्थितैः पापैः = चन्द्र से (उन्हीं 6/8/4 स्थानों में) स्थित पापग्रहों द्वारा; मातु कष्टम् = माता का कष्ट; विचारयेत् = विचार करना चाहिए; बल-अबल-विवेकेन = बल एवं निर्बलता के विवेक से; कष्टं वा मृत्युम् = कष्ट अथवा मृत्यु; आदिशेत् = घोषित करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जैसे सूर्य से पितृ-अरिष्ट देखा, वैसे ही चन्द्र (मातृ-कारक) से उन्हीं स्थानों में स्थित पापग्रहों द्वारा माता का कष्ट विचारना चाहिए। और यह विधि-वचन महत्त्वपूर्ण है — ग्रहों के बल-अबल के विवेक से ही निर्णय करना कि परिणाम मात्र "कष्ट" है अथवा "मृत्यु"। यह अरिष्ट-प्रकरण का सन्तुलन-सूत्र है: शक्ति तौले बिना अरिष्ट-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that in the same way, from malefics placed (in those same positions) from the Moon, one should weigh the mother's distress; and only by discerning strength and weakness should one declare either mere distress or death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्लोक 44 का दर्पण-नियम, कारक बदलकर चन्द्र से: पाप की चन्द्र से गणना n = ((राशि_पाप − राशि_चन्द्र) mod 12) + 1, शर्त n ∈ {6, 8} (सौम्य-दृष्टि रहित) अथवा चतुर्थ (सुख) भाव। निर्णायक चरण "बल-अबल-विवेक" है — अरिष्ट की तीव्रता (कष्ट बनाम मृत्यु) ग्रह-बल की मात्रा पर निर्भर, अतः यहाँ गुणात्मक फल एक बल-गणना का फलन बन जाता है।

उदाहरण (worked example) चन्द्र वृष में (राशि 2)। चन्द्र से 8वीं = धनु (2+8−1 = 9); वहाँ मंगल शुभ-दृष्टि रहित → n = ((9−2) mod 12)+1 = 8 ✓ → मातृ-कष्ट-सूचक। अब बल-विवेक: यदि वह मंगल उच्च/स्व-राशि (बलवान्) है तो शास्त्र "कष्ट" की ओर, अत्यन्त निर्बल (अस्त/नीच) है तो "मृत्यु" की ओर संकेत देता है — निर्णय बल-मान से, न कि केवल स्थिति से।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक का "बलाऽबलविवेक" ठीक वही अनुशासन है जिसे हमने ṣaḍbala इंजन में मूर्त किया (dossier §4): स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् — छह बल, रूप/विरूप में योग (1 रूप = 60 विरूप), फिर प्रति-ग्रह देहली-मान से तुलना। शास्त्र यहाँ स्पष्ट कहता है कि अरिष्ट-फल की मात्रा बल का फलन है — इसीलिए हम फल (कष्ट/मृत्यु) को व्याख्या नहीं, बल्कि बल-संख्या पर आश्रित निर्णय मानते हैं, और उसे शास्त्र का कथन रूप में ही प्रस्तुत करते हैं, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

अध्यायः 10

अरिष्टभंगाध्यायः

9 श्लोक

सूचना · Note. ये ग्रन्थ के ऐतिहासिक आयु/मृत्यु-कथन हैं, चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं; स्वास्थ्य की चिन्ता हो तो चिकित्सक से मिलें। · Historical statements of the text about lifespan and death, not medical predictions; for any health concern, see a doctor.

इस अध्याय में (In this chapter): नवम अध्याय में अरिष्ट-संकेतों का विधान बताने के बाद यह दशम अध्याय उनके भङ्ग का शास्त्रीय विधान रखता है — “इत्यरिष्टं मया प्रोक्तं तद्भङ्गश्चापि कथ्यते”। यहाँ फल यह है कि बुद्धिमान ज्योतिषी जन्म-कुण्डली में रिष्त और अरिष्ट दोनों का समालोकन करके ही निर्णय कहे; केवल अशुभ योग देखकर अरिष्ट-कथन अधूरा है। अध्याय के श्लोक अरिष्ट-भङ्ग की स्पष्ट शर्तें देते हैं: लग्न से केन्द्र में ज्ञ-गुरु-शुक्र में से एक भी; बलवान् जीव का लग्न-स्थित होना; बलान्वित विलग्नेश का केन्द्र-संस्थान; तथा शुक्ल/कृष्ण पक्ष, क्षपा/दिवा जन्म और सौम्य-निरीक्षण का योग। ये टुकड़े मिलकर अरिष्ट-विचार को एक-तरफ़ा “दोष-सूची” से उठाकर रिष्त–भङ्ग की युगल-पद्धति बनाते हैं — पहले संकेत, फिर उसकी निवृत्ति की शर्त।

For the English reader: Chapter 10 is the deliberate counterweight to the ariṣṭa material that precedes it. Having set out the indications of riṣṭa, the text now teaches bhaṅga — the structural conditions under which those indications are said to be cancelled or overridden. The chapter’s voice is not alarm but method: the wise are told to look at both before speaking of ariṣṭa. Its pieces are few and sharp — a single benefic (Mercury, Jupiter, or Venus) in a kendra from the lagna; a strong Jupiter in the lagna; a strong lagna-lord in a kendra; and birth-time factors of pakṣa, night or day, with the lagna under saumya aspect. Each is framed by a classical image of light over darkness or Śiva over Tripura: not as fate sealed, but as the śāstra’s own grammar for when accumulated riṣṭa is stated to fall away.

मुख्य गणित/तकनीक:
- केन्द्र-नियम (लग्न से): स्थान ∈ {1, 4, 7, 10} — ज्ञ (बुध), जीव (गुरु), शुक्र में से एकोऽपि केन्द्रगत → अरिष्ट-भङ्ग का शास्त्रोक्त संकेत
- बल-परीक्षण: लग्नस्थ बली जीव; तथा केन्द्रसंस्थ बलान्वित विलग्नेश — दोनों में “बल” षड्बल/अवस्था-स्तर की गणना से जुड़ता है (इकाई: रूप/विरूप)
- काल-योग: शुक्लपक्ष + क्षपा-जन्म + लग्न सौम्य-निरीक्षित; कृष्णपक्ष में विपरीत विन्यास — पक्ष × दिन-रात्रि × सौम्य-दृष्टि का संयुक्त नियम
- दृष्टि-शर्त: लग्न पर सौम्य-ग्रह की निरीक्षण (dṛṣṭi) — अरिष्ट-विनाशन के पक्ष-नियम का आवश्यक घटक

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

10.1
इत्यरिष्टं मया प्रोक्तं तद्‌भङ्गश्चापि कथ्यते।
यत्‌ समालोक्यं जातानां रिष्ताऽरिष्टं वदेद्‌बुधः
ityariṣṭaṃ mayā proktaṃ tad‌bhaṅgaścāpi kathyate|
yat‌ samālokyaṃ jātānāṃ riṣtā'riṣṭaṃ vaded‌budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; अरिष्टम् = अरिष्ट-योग (मृत्यु/संकट के योग); मया प्रोक्तम् = मैंने (पराशर ने) कहा; तद्‌भङ्गः = उसका भङ्ग/निवारण; कथ्यते = अब कहा जाता है; समालोक्यम् = भली-भाँति परीक्षण करके; जातानाम् = जातकों का; रिष्ट-अरिष्टम् = संकट है अथवा उसका अभाव (पाठ-भेद संभव — रिष्ट/अरिष्ट की जोड़ी); वदेत् बुधः = बुद्धिमान ज्योतिषी निर्णय करे।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार मैंने (पराशर ने) अरिष्ट-योगों का वर्णन किया; अब उनका भङ्ग (निवारण) भी कहा जाता है। जिन लक्षणों को भली-भाँति देखकर बुद्धिमान ज्योतिषी जातक के लिए यह निर्णय करे कि अरिष्ट स्थिर है या टल जाता है। यह श्लोक पूर्व-अध्याय के अरिष्ट से इस अरिष्टभङ्ग-अध्याय की ओर संक्रमण की प्रतिज्ञा है।

English rendering "Thus have I declared the ariṣṭa; now its cancellation too is told. Examining these, let the wise pronounce, for those born, whether the peril stands or is undone."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिज्ञा / अध्याय-संक्रमण। शास्त्र यहाँ द्वि-पक्षीय विधि घोषित करता है: प्रत्येक अरिष्ट-योग के साथ उसके भङ्ग का भी परीक्षण अनिवार्य है — निर्णय एकपक्षीय नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उसी अनुशासन का मूल है जिस पर हमारा डिकोड टिका है — फल-कथन को अन्तिम भाग्य-घोषणा नहीं, बल्कि "शास्त्र कहता है" के रूप में रखना, और संकट के साथ उसके निरसन को भी तौलना। हमने गणित (वर्ग, अष्टकवर्ग-बिन्दु, दशा, बल) को इंटरप्रिटेशन से अलग रखा; यहाँ शास्त्र स्वयं रिष्ट और अरिष्टभङ्ग दोनों को साथ विचारने को कहकर एकपक्षीय नियतिवाद से बचाता है।

10.2
एकोऽपि ज्ञार्यशुक्राणां लग्नात्‌ केन्द्रगतो यदि।
अरिष्टं निखिलं हन्ति तिमिरं भास्करो यथा
eko'pi jñāryaśukrāṇāṃ lagnāt‌ kendragato yadi|
ariṣṭaṃ nikhilaṃ hanti timiraṃ bhāskaro yathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः अपि = उनमें से एक भी; ज्ञ = बुध; आर्य = गुरु (जीव); शुक्राणाम् = शुक्र — इन तीनों में से; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र-गतः = केन्द्र-स्थित (१, ४, ७, १०); यदि = यदि; अरिष्टम् निखिलम् = समस्त अरिष्ट; हन्ति = नष्ट करता है; तिमिरम् = अन्धकार; भास्करः = सूर्य; यथा = जिस प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध, गुरु अथवा शुक्र में से कोई एक भी यदि लग्न से केन्द्र में हो, तो वह समस्त अरिष्ट को उसी प्रकार हनता है जैसे सूर्य अन्धकार को। यहाँ “एकः अपि” पर बल है — तीनों का योग आवश्यक नहीं; एक सौम्य केन्द्र-स्थिति को भङ्ग-कारक माना गया है। उपमा स्पष्ट है: प्रकाश से तिमिर का नाश।

English rendering The text states that even one among Mercury, Jupiter, or Venus, if placed in a kendra from the lagna, destroys all ariṣṭa — as the Sun destroys darkness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) केन्द्र = लग्न से भावाङ्क {1, 4, 7, 10}।
यदि ग्रह का भावाधिष्ठान (लग्न-सपेक्ष, पूर्ण-राशि/equal-house मान में)
H = 1 + ⌊(λ_graha − λ_lagna) mod 360°⌋ / 30°
और H ∈ {1, 4, 7, 10}, तथा ग्रह ∈ {बुध, गुरु, शुक्र}, तो यह श्लोक अरिष्ट-भङ्ग का एक नियम देता है। (सटीक भाव-सीमा house-system पर निर्भर: whole-sign में राशि-केन्द्र; श्रीपति/प्लसीडस में डिग्री-केन्द्र — convention घोषित करें।)

उदाहरण (worked example) Convention: whole-sign houses; ayanāṃśa irrelevant for pure sign placement.
लग्न = मेष (0°–30° sidereal sign-slot)। बुध = कर्क राशि में → लग्न से 4th = केन्द्र।
गुरु/शुक्र कहीं भी हों — “एकोऽपि” से केवल बुध का केन्द्र पर्याप्त। शास्त्र इस विन्यास को निखिल-अरिष्ट-हन्ता कहता है।

10.3
एक एव बली जीवो लग्नस्थो रिष्टसंचयम्‌।
हन्ति पापक्षयं भक्त्या प्रणाम इव शूलिनः
eka eva balī jīvo lagnastho riṣṭasaṃcayam‌|
hanti pāpakṣayaṃ bhaktyā praṇāma iva śūlinaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः एव = अकेला ही; बली = बलवान; जीवः = गुरु; लग्न-स्थः = लग्न-स्थित; रिष्ट-सञ्चयम् = रिष्टों का समूह/संचय; हन्ति = नष्ट करता है; पाप-क्षयम् = पाप का क्षय; भक्त्या = भक्ति से; प्रणामः = नमन; इव = जैसे; शूलिनः = शूलधारी (शिव) का / शूलिन के प्रति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि एक बलवान गुरु ही, यदि लग्न में स्थित हो, रिष्ट-संचय को नष्ट कर देता है — ठीक वैसे जैसे भक्ति-युक्त प्रणाम शूलिन (शिव) के समक्ष पाप-क्षय का हेतु बनता है। यहाँ दो शर्तें जुड़ी हैं: (१) जीव = गुरु लग्नस्थ, (२) बली = बल से युक्त। केवल लग्न-स्थिति पर्याप्त नहीं; बल की अपेक्षा स्पष्ट है।

English rendering The text states that even a single strong Jupiter in the lagna destroys the accumulated riṣṭa — as a devoted salutation effects the waning of sin before Śūlin (Śiva).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-शर्त: H_Jupiter = 1 (लग्न-भाव)।
बल-शर्त: बली — शास्त्रीय षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) या कम-से-कम स्थानबल/उच्च-मूलत्रिकोणादि; इकाई रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप)।
यह श्लोक संख्या-सारणी नहीं देता; “बली” को computational threshold से जोड़ने पर Ch.27 षड्बल-नियम लागू होते हैं, पर अरिष्ट-भङ्ग का फल-कथन यहीं पूर्ण है।

उदाहरण (worked example) Whole-sign; लग्न = धनु। गुरु भी धनु में (लग्नस्थ) और स्वराशि/मूलत्रिकोण से स्थानबल-युक्त।
शास्त्र कहता है: एक एव बली जीवः रिष्टसंचयम् हन्ति। (यदि गुरु निर्बल/नीच/शत्रुक्षेत्र-दुर्बल हो तो “बली” शर्त पूरी नहीं — convention: बलाङ्क की परिभाषा पहले बाँधें।)

10.4
एक एव विलग्नेशः केन्द्रसंस्थो बलान्वितः।
अरिष्टं निखिलं हन्ति पिनाकी त्रिपुरं यथा
eka eva vilagneśaḥ kendrasaṃstho balānvitaḥ|
ariṣṭaṃ nikhilaṃ hanti pinākī tripuraṃ yathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक एव = अकेला ही; विलग्नेशः = लग्नेश (उदित राशि का स्वामी); केन्द्र-संस्थः = केन्द्र (1/4/7/10) में स्थित; बल-अन्वितः = बल से युक्त; अरिष्टं निखिलम् = समस्त अरिष्ट; हन्ति = नष्ट करता है; पिनाकी त्रिपुरं यथा = जैसे पिनाकधारी शिव ने त्रिपुर को।

हिन्दी भावार्थ अकेला लग्नेश भी यदि बल से युक्त होकर केन्द्र में स्थित हो, तो वह समस्त अरिष्ट को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे पिनाकधारी शिव ने त्रिपुरासुर का संहार किया। यहाँ भी दोहरी शर्त है — लग्नेश का केन्द्र-स्थान और उसका बल।

English rendering "The lord of the ascendant alone, strong and set in a kendra, destroys the whole of ariṣṭa — as Pināka-wielding Śiva destroyed Tripura."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो तकनीकी अवयव: (i) लग्नेश = उदित राशि का अधिपति-ग्रह; (ii) केन्द्र = {1, 4, 7, 10}, कोणीय 90°×k। "बलान्वित" शर्त इसे परिमेय बनाती है। अरिष्ट-नाश शास्त्र का फल-कथन है।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृश्चिक → लग्नेश = मंगल। यदि मंगल कुम्भ में = वृश्चिक से 4वाँ केन्द्र (90°) और बल-सम्पन्न, तो शास्त्रानुसार अरिष्टभङ्ग।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलान्वित" शब्द फिर उसी षड्बल-राशि की ओर संकेत करता है जिसे हमारा इंजन रूप/विरूप में गणता है; और "केन्द्र-संस्थ" का बल-आयाम आंशिक रूप से दिक्बल तथा स्थानबल से जुड़ता है। अतः श्लोक की गुणात्मक शर्त हमारे संख्यात्मक बल-मॉडल की देहली-तुलना का ही शाब्दिक रूप है।

10.5
शुक्लपक्षे क्षपाजन्म लग्ने सौम्यनिरीक्षिते।
विपरीतं कृष्णपक्षे तथारिष्टविनाशनं
śuklapakṣe kṣapājanma lagne saumyanirīkṣite|
viparītaṃ kṛṣṇapakṣe tathāriṣṭavināśanaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्ल-पक्षे = शुक्ल पक्ष में; क्षपा-जन्म = रात्रि-जन्म; लग्ने = लग्न पर; सौम्य-निरीक्षिते = सौम्य (बुध-गुरु-शुक्र; चन्द्र-पाठभेद) दृष्टि होने पर; विपरीतम् = उलटा/विपरीत; कृष्ण-पक्षे = कृष्ण पक्ष में; तथा = उसी प्रकार; अरिष्ट-विनाशनम् = अरिष्ट का विनाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्ल पक्ष में रात्रि-जन्म और लग्न पर सौम्य-दृष्टि हो, तो अरिष्ट-विनाश माना जाता है; कृष्ण पक्ष में इसका विपरीत (अर्थात् दिन-जन्म + लग्न सौम्य-दृष्ट) वही फल देता है। पक्ष (चन्द्र-कला का अर्ध) और दिन/रात्रि (सूर्योदय-सूर्यास्त) दोनों का योग यहाँ भङ्ग-हेतु है; केवल एक पक्ष पर्याप्त नहीं।

English rendering The text states that night-birth in the bright fortnight with the lagna aspected by benefics — and the reverse in the dark fortnight — thus effects the destruction of ariṣṭa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- पक्ष: शुक्ल यदि λ_Moon − λ_Sun (mod 360°) ∈ (0°, 180°); कृष्ण यदि ∈ (180°, 360°)। (अमा/पूर्ण सीमा-पाठभेद संभव।)
- क्षपा/दिन: local solar time — sunrise ≤ t < sunset = दिन; अन्यथा रात्रि।
- सौम्य-निरीक्षण: सौम्य ∈ {बुध, गुरु, शुक्र} (चन्द्र को सौम्य गिनने पर पाठ/परम्परा-भेद) की लग्न पर दृष्टी — पूर्ण दृष्टि:
· गुरु → 5th, 7th, 9th भाव (विशेष); अन्य ग्रह 7th (समान्तर/पूर्ण)।
(दृष्टि-चाप की डिग्री-परिभाषा recension/परम्परा पर निर्भर — घोषित करें।)
शुक्ल ∧ रात्रि ∧ सौम्य-दृष्टि(लग्न) ⇒ भङ्ग;
कृष्ण ∧ दिन ∧ सौम्य-दृष्टि(लग्न) ⇒ भङ्ग (विपरीतम्)।

उदाहरण (worked example) स्थान: दिल्ली; whole-sign; birth t after sunset; λ_Sun = 40°, λ_Moon = 100° → elongation 60° ∈ (0°,180°) = शुक्ल; लग्न = कन्या, गुरु = मीन (लग्न से 7th) → गुरु-दृष्टि लग्न पर।
तीनों शर्तें (शुक्ल + रात्रि + सौम्य-दृष्टि) पूरी → शास्त्र कहता है तथा अरिष्टविनाशनम्।

10.6
व्ययस्थाने यदा सूर्यस्तुलालग्ने तु जायते।
जीवेत्‌ स शतवर्षाणि दीर्घायुर्बालको भवेत्‌
vyayasthāne yadā sūryastulālagne tu jāyate|
jīvet‌ sa śatavarṣāṇi dīrghāyurbālako bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यय-स्थाने = व्यय भाव (12वें) में; यदा = जब; सूर्यः = सूर्य; तुला-लग्ने = तुला लग्न में; जायते = जन्म हो; जीवेत् = जीवे; सः = वह; शत-वर्षाणि = सौ वर्ष; दीर्घायुः = दीर्घ आयु वाला; बालकः = बालक; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का विशेष विन्यास-फल: जब जातक का लग्न तुला हो और सूर्य व्यय (12वें) भाव में हो, तो वह बालक दीर्घायु माना गया है — पाठ कहता है शत वर्ष पर्यन्त जीवे। यह सामान्य अरिष्ट-भङ्ग-सूची से हटकर एक नियत लग्न-सूर्य युग्म का फल-कथन है। (पाठ-भेद/व्याख्या-भेद अन्य संस्करणों में संभव।)

English rendering The text states that when the Sun occupies the twelfth house and the lagna is Libra, that child lives a hundred years and is long-lived.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
शर्त: राशि(λ_lagna) = तुला (180°–210° sidereal, ayanāṃśa-निर्भर)।
व्यय = लग्न से 12th → whole-sign में सूर्य की राशि = कन्या।
फल-संख्या: शतवर्षाणि = 100 वर्ष — शास्त्र का आयु-कथन, गणना-सूत्र नहीं।
(Exact λ bounds ayanāṃśa पर: e.g. Lahiri/Chitrapakṣa vs अन्य — convention पिन करें।)

उदाहरण (worked example) Ayanāṃśa: Lahiri. λ_lagna = 195° (तुला)। λ_Sun = 165° (कन्या) → whole-sign 12th from Libra.
शास्त्र कहता है: जीवेत् स शतवर्षाणि दीर्घायुर्बालको भवेत् — यह फल-कथन है, काल-सिद्ध आयु-प्रमाण नहीं।

10.7
गुरुभौमौ यदा युक्तौ गुरुदृऋटोऽथवा कुजः।
हत्वाऽरिष्टमशेषं च जनन्याः शुभक्रद्‌भवेत्‌
gurubhaumau yadā yuktau gurudṛṛṭo'thavā kujaḥ|
hatvā'riṣṭamaśeṣaṃ ca jananyāḥ śubhakrad‌bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरु-भौमौ = गुरु और मङ्गल; यदा = जब; युक्तौ = युति में; गुरु-दृष्टः अथवा = अथवा गुरु द्वारा दृष्ट; कुजः = मङ्गल; हत्वा = नष्ट करके; अरिष्टम् अशेषम् = सम्पूर्ण अरिष्ट; च = और; जनन्याः = माता का; शुभ-कृत् = शुभ करने वाला; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु और भौम युति में हों, अथवा कुज पर गुरु की दृष्टि हो, तो अशेष अरिष्ट का हनन मानकर जातक माता के लिये शुभ-कारी कहा गया है। दो विकल्प हैं: (१) गुरु-मङ्गल युति, (२) गुरु-दृष्ट मङ्गल। “जनन्याः शुभकृत्” माता-सम्बन्धी शुभ फल का शास्त्रीय कथन है, न कि चिकित्सकीय आश्वासन।

English rendering The text states that when Jupiter and Mars are conjoined — or Mars is aspected by Jupiter — all ariṣṭa is destroyed and the native becomes a doer of good for the mother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
(A) युति: same-sign (whole-sign) या |λ_Ju − λ_Ma| mod 360° ≤ orb (orb convention: शास्त्र यहाँ अंक नहीं देता — modern orb 1°–8° आदि घोषित करें; classical often same rāśi)।
(B) गुरु-दृष्टि on कुज: Mars falls in a house/aspect-arc that receives Jupiter’s special aspects — from Ju: 5th, 7th, 9th (full).
H_Ma from Ju ∈ {5, 7, 9} (whole-sign) या degree-aspect per chosen dṛṣṭi model.
(पाठ “गुरुदृऋटो” → गुरुदृष्टो — पाठ-भेद/मुद्रण-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) Whole-sign special aspects. गुरु = मेष, मङ्गल = सिंह → मङ्गल गुरु से 5th = गुरु-दृष्ट कुज।
अथवा दोनों मिथुन में = युति। दोनों में से एक भी हो तो शास्त्र: हत्वाऽरिष्टमशेषं च जनन्याः शुभकृद् भवेत्।

10.8
चतुर्थदशमे पापः सौम्यमध्ये यदा भवेत्‌।
पितुः सौख्यकरो योगः शुभैः केन्द्रत्रिकोणगैः
caturthadaśame pāpaḥ saumyamadhye yadā bhavet‌|
pituḥ saukhyakaro yogaḥ śubhaiḥ kendratrikoṇagaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थ-दशमे = चतुर्थ व दशम भाव में; पापः = क्रूर/पाप ग्रह; सौम्य-मध्ये = शुभ (सौम्य) ग्रहों के बीच स्थित; यदा भवेत् = जब हो; पितुः = पिता का; सौख्य-करः = सुख देने वाला; योगः = ग्रह-संयोग; शुभैः = शुभ ग्रहों से; केन्द्र-त्रिकोण-गैः = केन्द्र (1-4-7-10) व त्रिकोण (1-5-9) में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चतुर्थ और दशम भाव में पाप ग्रह हों, और वे सौम्य (शुभ) ग्रहों के मध्य स्थित हों, तथा शुभ ग्रह केन्द्र और त्रिकोण भावों में हों, तब यह योग पिता के लिए सुखकारक कहा गया है। यहाँ पाप-स्थिति अकेली नहीं पढ़ी जाती; शुभों द्वारा घिरा होना और शुभों का केन्द्र-त्रिकोण में होना — दोनों शर्तें साथ जुड़ी हैं। यह अरिष्ट-भङ्ग/शुभ-योग के प्रकरण का फल-कथन है।

English rendering The text states that when malefics occupy the fourth and tenth houses, stand enclosed between benefics, and the benefics themselves occupy kendra and trikoṇa houses, the combination is declared conducive to the father’s happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अरिष्ट-भङ्ग/पितृ-सौख्य योग)। भाव-स्थान (4, 10; केन्द्र 1-4-7-10; त्रिकोण 1-5-9) केवल स्थान-नियम हैं, कोई अंश-विभाजन या बलांक नहीं।

10.9
सौम्यान्तरगतैः पापैः शुभैः केन्द्रत्रिकोणगैः।
सद्यो नाशयतेऽरिष्टं तद्‌भावोत्थफलं न तत्‌
saumyāntaragataiḥ pāpaiḥ śubhaiḥ kendratrikoṇagaiḥ|
sadyo nāśayate'riṣṭaṃ tad‌bhāvotthaphalaṃ na tat‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्य-अन्तर-गतैः = शुभों के बीच स्थित; पापैः = पाप ग्रहों से; शुभैः = शुभ ग्रहों से; केन्द्र-त्रिकोण-गैः = केन्द्र-त्रिकोण स्थित; सद्यः = तुरंत/शीघ्र; नाशयते = नष्ट करता है; अरिष्टम् = अरिष्ट (उपद्रव/दोष-फल); तत्-भाव-उत्थ-फलम् = उस भाव से उत्पन्न फल; न तत् = वह (दोष-फल) नहीं रहता / नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पाप ग्रह सौम्य ग्रहों के अन्तर (मध्य) में हों और शुभ ग्रह केन्द्र व त्रिकोण में स्थित हों, तब वह योग अरिष्ट को शीघ्र नष्ट कर देता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि तत्सम्बन्धी भाव से उठने वाला (अरिष्ट-)फल वैसा नहीं रहता — अर्थात् दोष-फल बाधित/निरस्त माना गया है। यह स्पष्ट फल-कथन है; इसे नियति या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that with malefics enclosed between benefics and benefics placed in kendras and trikoṇas, the combination promptly cancels arishta; the adverse results arising from the relevant houses do not then obtain as such.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अरिष्ट-नाश / भावोत्थ फल-निवृत्ति)। केवल सापेक्ष भाव-स्थान: “पाप सौम्यान्तरगत” + “शुभ केन्द्र-त्रिकोणगत” — दो शर्तों का योग; कोई अंश, वर्ष, या बिन्दु-गणना नहीं।

अध्यायः 11

भावविवेकाध्यायः

16 श्लोक
11.1
अरिष्टं तत्प्रभङ्गं च श्रुतं त्वत्तो मया मुने।
कस्माद्‌ भावात्‌ फलं किं किं विचार्यमिति मे वद
ariṣṭaṃ tatprabhaṅgaṃ ca śrutaṃ tvatto mayā mune|
kasmād‌ bhāvāt‌ phalaṃ kiṃ kiṃ vicāryamiti me vada

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अरिष्टम् = अनिष्ट/आयु-हानि आदि दुर्योग; तत्प्रभङ्गम् = उन अरिष्टों का भंग (निरसन); श्रुतम् = सुना गया; त्वत्तः = आप (पराशर) से; मया = मुझ (मैत्रेय) द्वारा; मुने = हे मुनि; कस्माद् भावात् = किस भाव से; फलं किं किम् = कौन-कौन-सा फल; विचार्यम् = विचारणीय; वद = कहिए।

हिन्दी भावार्थ मैत्रेय पराशर से विनयपूर्वक कहते हैं — "हे मुनिवर! अरिष्ट और उनके प्रभंग का वर्णन तो मैंने आपसे सुन लिया; अब यह बताइए कि किस भाव से किस-किस फल का विचार करना चाहिए।" यह श्लोक द्वादश-भाव-विचार प्रकरण की भूमिका है — शिष्य के इसी प्रश्न से आगे का पूरा भाव-फल-खण्ड उद्घाटित होता है।

English rendering Maitreya says to Parāśara: "O sage, I have heard from you of the evils and of their cancellation; now tell me — from which house is which result to be examined?" This question opens the survey of the twelve houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (शिष्य-प्रश्न)। यह पंक्ति कोई राशि/अंश नहीं, अपितु आगामी प्रकरण की सूची-योजना खोलती है: "किस भाव से क्या देखें" — बारह भावों का क्रमिक अनुक्रमण, जो पूरे अध्याय की एकमात्र "क्रिया" का ढाँचा तय करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोष-निर्धारित संरचना में यह श्लोक भाव-फल खण्ड (अध्याय 11–24) का द्वार है; हमारा संकलन इसी क्रम-पिन (सृष्टि → ग्रह-राशि → षोडश-वर्ग → दृष्टि → अरिष्ट → भाव-फल …) पर टिका है। यहीं से अनुशासन भी लागू होता है — भाव-"फल" शास्त्र का कथन है ("शास्त्र कहता है"), न कि हमारी ओर से घोषित कोई भविष्य; गणना और व्याख्या सदा पृथक् रहती हैं।

11.2
देहं रूपं च ज्ञानं च वर्णं चैव बलाबलम्‌।
सुखं दुःखं स्वभावञ्च लग्नभावान्निरीक्षयेत्‌
dehaṃ rūpaṃ ca jñānaṃ ca varṇaṃ caiva balābalam‌|
sukhaṃ duḥkhaṃ svabhāvañca lagnabhāvānnirīkṣayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहम् = शरीर/काया; रूपम् = रूप-आकृति; ज्ञानम् = बुद्धि-ज्ञान; वर्णम् = वर्ण/कान्ति (रंग); बलाबलम् = बल-निर्बलता (सामर्थ्य); सुखं दुःखम् = सुख और दुःख; स्वभावम् = प्रकृति/स्वभाव; लग्नभावात् = लग्न (प्रथम/तनु) भाव से; निरीक्षयेत् = देखे/विचार करे।

हिन्दी भावार्थ लग्न अर्थात् प्रथम भाव से जातक की देह, रूप, ज्ञान, वर्ण, बल-अबल, सुख-दुःख और स्वभाव का विचार करना चाहिए। लग्न "तनु-भाव" है — व्यक्ति के समूचे अस्तित्व का मूल-बिन्दु, जहाँ से शेष ग्यारह भाव गिने जाते हैं।

English rendering From the lagna (first house) one should examine the body, appearance, knowledge, complexion, strength and weakness, joys and sorrows, and disposition — the house of the self from which all others are counted.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। तकनीकी दृष्टि से लग्न भाव-सूचकांक 1 है, और यही केन्द्र (1/4/7/10) तथा त्रिकोण (1/5/9) दोनों। शेष भाव लग्न से राशि-क्रम में गिने जाते हैं: k-वें भाव की राशि = ((लग्न-राशि − 1 + k − 1) mod 12) + 1 — यही मॉड्युलर गणना पूरे अध्याय का आधार है।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए लग्न = मेष (राशि 1)। तब 1म भाव = मेष; 4र्थ = ((1−1+3) mod 12)+1 = कर्क; 7म = तुला; 10म = मकर। यही गणना आगे "षष्ठ", "रन्ध्र", "धर्मस्थान" आदि को कुण्डली में यथास्थान बैठाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक का "बलाबल" शब्द षड्बल (अध्याय 27) से सीधे जुड़ता है — स्थान/दिग्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग् बल, रूप-विरूप में योग (1 रूप = 60 विरूप), प्रति-ग्रह देहली से तुलना। अर्थात् लग्न-कथित "बल-अबल" हमारे इंजन में गुणात्मक कथन नहीं रहता, सटीक संख्यात्मक परिमाण बनता है; जबकि "सुख-दुःख/स्वभाव" शास्त्र का व्याख्यात्मक कथन बना रहता है।

11.3
धनधान्यं कुटुम्बांश्च मृत्युजालममित्रकम्‌।
धातुरत्नादिकं सर्वं धनस्थानान्निरीक्षयेत्‌
dhanadhānyaṃ kuṭumbāṃśca mṛtyujālamamitrakam‌|
dhāturatnādikaṃ sarvaṃ dhanasthānānnirīkṣayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनधान्यम् = धन और धान्य (अन्न); कुटुम्बान् = कुटुम्ब/परिवारजन; मृत्युजालम् = मृत्यु का पाश (मारक-स्वभाव); अमित्रकम् = शत्रु/विरोधी वर्ग (पाठ-भेद संभव); धातुरत्नादिकम् = धातु, रत्न आदि; सर्वम् = सब कुछ; धनस्थानात् = द्वितीय (धन) भाव से; निरीक्षयेत् = देखे।

हिन्दी भावार्थ द्वितीय भाव (धन-स्थान) से धन, धान्य, कुटुम्ब, मृत्यु का पाश (मारक-प्रकृति), विरोधी वर्ग तथा धातु-रत्न आदि समस्त संग्रह का विचार करना चाहिए। द्वितीय संचित सम्पत्ति, वाणी और कुटुम्ब का स्थान है, और परम्परा में मारक-स्थान भी — इसी से "मृत्यु-जाल" का उल्लेख है।

English rendering From the second house (of wealth) examine riches, grain, family, the "snare of death" (its maraka nature), foes, and all metals, gems and the like — the house of accumulated substance.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। भाव-सूचकांक 2; यह पणफर (2/5/8/11) तथा परम्परा-सम्मत मारक-स्थान (2 व 7) है — इसी वर्गीकरण से आगे आयुर्दाय/मारक-विचार का संख्यात्मक ढाँचा उठता है।

11.4
विक्रमं भृत्यभ्रात्रादि चोपदेशप्रयाणकम्‌।
पित्रोर्वै मरणं विज्ञो दुश्चिक्याच्च निरीक्षयेत्‌
vikramaṃ bhṛtyabhrātrādi copadeśaprayāṇakam‌|
pitrorvai maraṇaṃ vijño duścikyācca nirīkṣayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विक्रमम् = पराक्रम/शौर्य; भृत्य = सेवक; भ्रात्रादि = भाई-बन्धु आदि (विशेषतः अनुज); उपदेश = उपदेश/दीक्षा/शिक्षा; प्रयाणकम् = लघु-यात्रा; पित्रोः मरणम् = माता-पिता का मरण; विज्ञः = विद्वान्; दुश्चिक्यात् = तृतीय (दुश्चिक्य) भाव से; निरीक्षयेत् = देखे।

हिन्दी भावार्थ विद्वान् को चाहिए कि तृतीय भाव (दुश्चिक्य) से पराक्रम, सेवक, भाई-बन्धु, उपदेश/शिक्षा, यात्रा तथा माता-पिता के मरण का विचार करे। तृतीय उद्यम, अनुज-वर्ग और लघु-यात्रा का स्थान है; यहाँ "पित्रोः मरणम्" का समावेश शास्त्र की अपनी गणना-परम्परा से है (पाठ-भेद संभव)।

English rendering The learned should examine from the third house (duścikya) one's valour, servants, siblings, counsel and instruction, journeys, and the death of the parents.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। भाव-सूचकांक 3; यह उपचय-स्थान (3/6/10/11) तथा आपोक्लिम — पराक्रम व उद्यम का उपचय क्रमशः वृद्धि पाता है। "दुश्चिक्य" = तृतीय भाव का पारिभाषिक नाम; इसका सटीक विच्छेद ही श्लोक को कुण्डली-स्थान से जोड़ता है।

11.5
वाहनान्यथ बन्धूंश्च मातृसौख्यादिकान्यपि।
निधि क्षेत्रं गृहं चापि चतुर्थात्‌ परिचिन्तयेत्‌
vāhanānyatha bandhūṃśca mātṛsaukhyādikānyapi|
nidhi kṣetraṃ gṛhaṃ cāpi caturthāt‌ paricintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनानि = वाहन/सवारियाँ; बन्धून् = बन्धु-जन; मातृसौख्यादि = माता का सुख आदि; निधिः = निधि/कोष; क्षेत्रम् = भूमि/खेत; गृहम् = घर/भवन; चतुर्थात् = चतुर्थ (सुख) भाव से; परिचिन्तयेत् = भली-भाँति विचार करे।

हिन्दी भावार्थ चतुर्थ भाव से वाहन, बन्धु-जन, माता का सुख, निधि, भूमि-क्षेत्र और गृह का विचार करना चाहिए। चतुर्थ "सुख-भाव" है — मातृ-सुख, स्थावर सम्पत्ति और मन की शान्ति का केन्द्र।

English rendering From the fourth house consider conveyances, kinsfolk, the happiness of the mother, hidden treasure, lands, and the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। भाव-सूचकांक 4; यह केन्द्र (1/4/7/10) — कुण्डली का पाताल-लग्न/सुख-स्थान, जहाँ स्थावर व मातृ-कारकत्व केन्द्रित है। माता का कारक चन्द्र भी यहीं के फल को पुष्ट करता है।

11.6
यन्त्रमन्त्रौ तथा विद्यां बुद्धेश्चैव प्रबन्धकम्‌।
पुत्रराज्यापभ्रांशादीन्‌ पश्येत्‌ पुत्रालयाद्‌ बुधः
yantramantrau tathā vidyāṃ buddheścaiva prabandhakam‌|
putrarājyāpabhrāṃśādīn‌ paśyet‌ putrālayād‌ budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यन्त्रमन्त्रौ = यन्त्र और मन्त्र; विद्याम् = विद्या (उच्च ज्ञान, मन्त्र-विद्या); बुद्धेः प्रबन्धकम् = बुद्धि की व्यवस्था-सामर्थ्य (धारणा-शक्ति); पुत्र = सन्तान; राज्य = राज्य/अधिकार; अपभ्रांशादीन् = पतन/भ्रंश आदि; पुत्रालयात् = पञ्चम (पुत्र) भाव से; बुधः = विद्वान्; पश्येत् = देखे।

हिन्दी भावार्थ विद्वान् पञ्चम भाव (पुत्रालय) से यन्त्र-मन्त्र, विद्या, बुद्धि की धारण-व्यवस्था, सन्तान, राज्य (अधिकार) तथा पतन आदि का विचार करे। पञ्चम पूर्व-पुण्य और मेधा का त्रिकोण है — इसीलिए मन्त्र-सिद्धि, संतति और राज-योग तक इसी से देखे जाते हैं।

English rendering From the fifth house (of children) the wise should see mystic devices and mantras, learning, the ordering power of the intellect, offspring, sovereignty, and downfall.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। भाव-सूचकांक 5; यह त्रिकोण (1/5/9) — पूर्व-पुण्य व मेधा का स्थान, जहाँ से "राज्य" (अधिकार) व मन्त्र-विद्या का बल आँका जाता है। त्रिकोणों का यही महत्व आगे राज-योग व बल-गणना का आधार बनता है।

11.7
मातुलान्तकशंकानां शत्रूंश्चैव व्रणादिकान्‌।
सपत्नीमातरं चापि षष्ठभावान्निरीक्षयेत्‌
mātulāntakaśaṃkānāṃ śatrūṃścaiva vraṇādikān‌|
sapatnīmātaraṃ cāpi ṣaṣṭhabhāvānnirīkṣayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातुल = मामा (मातृ-भ्राता); अन्तकशंका = मृत्यु-भय/काल की आशंका; शत्रून् = शत्रु; व्रणादिकान् = व्रण, घाव, रोग आदि; सपत्नीमातरम् = विमाता (सौतेली माता); षष्ठभावात् = षष्ठ भाव से; निरीक्षयेत् = देखे।

हिन्दी भावार्थ षष्ठ भाव से मामा, मृत्यु-भय, शत्रु, व्रण-रोगादि तथा विमाता का विचार करना चाहिए। षष्ठ "अरि-भाव" है — शत्रु, रोग और ऋण का दुःस्थान, फिर भी उपचय होने से संघर्ष में विजय का भी सूचक। (मातुल-अन्तक-शंका का विच्छेद विवादित — पाठ-भेद संभव।)

English rendering From the sixth house examine the maternal uncle, apprehension of death, enemies, wounds and diseases, and the step-mother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। भाव-सूचकांक 6; यह दुःस्थान (6/8/12) और साथ ही उपचय (3/6/10/11) — रोग-शत्रु का क्षेत्र, पर उपचय-स्वभाव से क्रमशः शत्रु-क्षय का भी सूचक। यही दोहरा वर्गीकरण भाव-फल के संख्यात्मक तौल में सावधानी माँगता है।

11.8
जायामध्वप्रयाणं च वाणिज्यं नष्टवीक्षणम्‌।
मरणं च स्वदेहस्य जायाभावान्निरीक्षयेत्‌
jāyāmadhvaprayāṇaṃ ca vāṇijyaṃ naṣṭavīkṣaṇam‌|
maraṇaṃ ca svadehasya jāyābhāvānnirīkṣayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जाया = पत्नी / सप्तम भाव; अध्व-प्रयाण = मार्ग-यात्रा, देशान्तर-गमन; वाणिज्य = व्यापार, क्रय-विक्रय; नष्ट-वीक्षण = खोई वस्तु का अन्वेषण / दर्शन; मरणं स्वदेहस्य = अपने शरीर का अन्त / मृत्यु-सम्बन्धी विचार; जाया-भावान् = सप्तम (जाया) भाव से; निरीक्षयेत् = देखे, विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पत्नी-सम्बन्धी विषय, मार्ग-यात्रा, व्यापार-वाणिज्य, नष्ट-वस्तु का वीक्षण तथा अपने देह के मरण-सम्बन्धी चिह्न — ये सब जाया-भाव (सप्तम) से निरीक्षण किए जाएँ। यहाँ “जाया” शब्द सप्तम भाव का पारम्परिक नाम है; उसी स्थान से गृहस्थ-सम्बन्ध, साझेदारी और दूर-गमन की रेखा भी पढ़ी जाती है। यह भाव-विषय-सूची है, व्यक्तिगत भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that matters of the spouse, travel on the road, commerce, the scrutiny of what is lost, and indications concerning the end of one’s own body are to be examined from the Jāyā-bhāva (the seventh). The verse assigns topics to a house; it does not assert a personal fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-विषय-फल-सूची (सप्तम = जाया)। गणना तभी आरम्भ होती है जब लग्न-रेखा से सप्तम भाव और उसके अधिपति/दृष्टि का निर्धारण किया जाए; यह श्लोक केवल विषय-मानचित्र देता है।

11.9
आयु रणं रिपुं चापि दुर्गं मृतधनं तथा।
गत्यनुकादिकं सर्वं पश्येद्रन्ध्राद्विचक्षणः
āyu raṇaṃ ripuṃ cāpi durgaṃ mṛtadhanaṃ tathā|
gatyanukādikaṃ sarvaṃ paśyedrandhrādvicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुः = आयु (जीवनकाल); रणम् = युद्ध/संग्राम; रिपुम् = शत्रु; दुर्गम् = दुर्ग/विषम-स्थान/कष्ट; मृतधनम् = मृतक का धन (उत्तराधिकार); गत्यनुकादिकम् = मरणोत्तर गति आदि (पाठ-भेद संभव); रन्ध्रात् = अष्टम (रन्ध्र) भाव से; विचक्षणः = विवेकी।

हिन्दी भावार्थ विवेकी को चाहिए कि अष्टम भाव (रन्ध्र) से आयु, रण, शत्रु, दुर्ग, मृतक-धन (उत्तराधिकार) तथा मरणोत्तर गति आदि का विचार करे। अष्टम "रन्ध्र/मृत्यु-स्थान" है — आयु और गूढ़-गम्भीर विषयों का दुःस्थान।

English rendering From the eighth house (randhra) the discerning one should see longevity, warfare, enemies, strongholds and hardships, inherited wealth, and the course after death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन (आयु-स्थान)। भाव-सूचकांक 8; यह मुख्य दुःस्थान (6/8/12) और आयु-भाव — जहाँ से आयुर्दाय की गणना केन्द्रित होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टम "आयु-स्थान" का यह कथन आयुर्दाय प्रकरण (अध्याय 43–44) तथा अष्टकवर्ग-आधारित गोचर-विचार से सीधे जुड़ता है — जहाँ आयु गुणात्मक भय-वचन नहीं, अंश/पिंड-आधारित संख्यात्मक अनुमान बनती है। यहाँ हमारा अनुशासन कठोर है: आयु-सम्बन्धी "फल" सदा "शास्त्र कहता है" के रूप में, कभी नियति या भय के रूप में नहीं; गणना (== पर सत्यापित) और व्याख्या पृथक् रहती हैं।

11.10
भाग्यं श्यालं च धर्मं च भ्रातृपत्न्यादिकांस्तथा।
तीर्थयात्रादिकं सर्वं धर्मस्थानान्निरीक्षयेत्‌
bhāgyaṃ śyālaṃ ca dharmaṃ ca bhrātṛpatnyādikāṃstathā|
tīrthayātrādikaṃ sarvaṃ dharmasthānānnirīkṣayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्य = सौभाग्य, दैव-अनुकूलता; श्याल = श्यालक (पत्नी का भाई / बहनोई-पक्ष); धर्म = धर्म-कर्म, पुण्य-मार्ग; भ्रातृ-पत्नी-आदिकान् = भाई की पत्नी आदि; तीर्थ-यात्रा-आदिकम् = तीर्थ-गमन आदि; धर्म-स्थानात् = धर्म-स्थान (नवम) से; निरीक्षयेत् = निरीक्षण करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्य, श्याल-सम्बन्ध, धर्म, भ्रातृ-पत्नी आदि तथा तीर्थयात्रा आदि सब धर्म-स्थान (नवम भाव) से निरीक्षण किए जाएँ। नवम को यहाँ भाग्य-धर्म-तीर्थ की रेखा माना गया है; सम्बन्ध-श्रेणी (श्याल, भ्रातृ-पत्नी) भी उसी स्थान से जोड़ी गई है। यह सूची-श्लोक है — किसी एक जन्म-पत्र का फैसला नहीं।

English rendering The text states that fortune, the wife’s brother (śyāla), dharma, the brother’s wife and the like, and pilgrimage and related matters are all to be examined from the Dharma-sthāna (the ninth). Topics are mapped to a house; personal outcomes are not asserted here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-विषय-फल-सूची (नवम = धर्म-स्थान)। “भाग्य” यहाँ नवम का पारम्परिक फल-शब्द है, संख्यात्मक भाग्य-सूचकांक नहीं।

11.11
राज्यं चाकाशंवृत्तिं च मानं चैव पितुस्तथा।
प्रवासस्य ऋणस्यापि व्योमस्थानान्निरीक्षणम्‌
rājyaṃ cākāśaṃvṛttiṃ ca mānaṃ caiva pitustathā|
pravāsasya ṛṇasyāpi vyomasthānānnirīkṣaṇam
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यम् = राज्य/अधिकार; आकाशवृत्तिम् (पाठ "चाकाशंवृत्तिं") = जीविका, "आकाश" अर्थात् कर्म-भाव से जुड़ी वृत्ति; मानम् = सम्मान; पितुः = पिता का (विचार); प्रवासस्य = प्रवास; ऋणस्य = ऋण; व्योमस्थानात् = व्योम/आकाश-स्थान अर्थात् दशम भाव से; निरीक्षणम् = देखना/विचार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राज्य, जीविका, मान, पिता, प्रवास और ऋण का विचार दशम भाव से किया जाए। भाव-विवेक अध्याय की भाव-कारकत्व सूची का यह दशम-भाव पद है। (कुछ परम्पराएँ पिता का विचार नवम से करती हैं; यहाँ पाठ दशम कहता है — परम्परा-भेद, जिसे घोषित रखें।)

English rendering From the tenth house (vyoma) one examines authority and kingdom, livelihood, honour, the father, residence abroad and debt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व सूची। दशम भाव के विषय-समुच्चय: {राज्य, वृत्ति, मान, पिता, प्रवास, ऋण}।

11.12
नानावस्तुभवस्यापि पुत्रजायादिकस्य च।
आयं वृद्धिं पशूनां च भवस्थानान्निरीक्षणम्‌
nānāvastubhavasyāpi putrajāyādikasya ca|
āyaṃ vṛddhiṃ paśūnāṃ ca bhavasthānānnirīkṣaṇam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नानावस्तुभवः = नाना वस्तुओं की प्राप्ति/उद्भव; पुत्रजायादि = पुत्र, पत्नी आदि (के लाभ); आयम् = आय/आमदनी (एकादश = आय-भाव); वृद्धिम् = वृद्धि/लाभ; पशूनाम् = पशुधन; भवस्थानात् = "भव-स्थान" से (पाठ-भेद संभव — संभवतः लाभ/आय-स्थान = एकादश भाव); निरीक्षणम् = निरीक्षण/विचार।

हिन्दी भावार्थ नाना वस्तुओं की प्राप्ति, पुत्र-पत्नी आदि के लाभ, आय, वृद्धि तथा पशुधन का विचार आय-भाव (एकादश) से करना चाहिए। "आय" और "वृद्धि" शब्द इसे स्पष्टतः लाभ-स्थान (एकादश) से जोड़ते हैं; मूल में "भवस्थानात्" पाठ है, जो संभवतः "लाभस्थानात्" का पाठ-भेद है।

English rendering The gains of diverse goods, of sons and wife and the rest, income, increase, and livestock are to be examined from the house of gains (the eleventh); the reading "bhava-sthāna" is likely a variant of "lābha-sthāna."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन। भाव-सूचकांक 11; यह उपचय-स्थान (3/6/10/11) और "लाभ/आय"-भाव — क्रमशः वृद्धि-मान होते फलों का क्षेत्र, जहाँ "आय" ही एकादश की अचूक पहचान है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "भवस्थानात्" बनाम "लाभस्थानात्" ठीक वही स्थिति है जिसके लिए हमारा अनुशासन "पाठ-भेद संभव" कहलवाता है — संदिग्ध अक्षर-पाठ को दृढ़ अभिकथन में नहीं बदलते। संकेतों (आय/वृद्धि/पशु) से भाव-पहचान निश्चित है, पर पाठ को विवादित मानकर पिन-किए संस्करण के अनुसार ही उद्धृत करते हैं।

11.13
व्ययं च वैरिवृत्तान्तरिःफमन्त्यादिकं तथा।
व्ययाच्चैष हि ज्ञातव्यमिनि सर्वत्र धीमता
vyayaṃ ca vairivṛttāntariḥphamantyādikaṃ tathā|
vyayāccaiṣa hi jñātavyamini sarvatra dhīmatā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययम् = व्यय/खर्च, हानि; वैरिवृत्तान्तम् = शत्रु-सम्बन्धी वृत्तान्त; रिःफम् = द्वादश भाव (रिःफ = बारहवें भाव का पारिभाषिक नाम); अन्त्यादिकम् = अन्त्य (मरण/अन्तिम विषय), मोक्ष आदि; व्ययात् = द्वादश (व्यय) भाव से; एषः = यह सब; ज्ञातव्यम् = जानना चाहिए; इनि = इति (इस प्रकार, पाठ-भेद संभव); सर्वत्र = सर्वत्र; धीमता = बुद्धिमान् द्वारा।

हिन्दी भावार्थ व्यय, शत्रु-वृत्तान्त, रिःफ (द्वादश-गत विषय) तथा अन्त्य आदि सबका विचार बुद्धिमान् को द्वादश (व्यय) भाव से सर्वत्र करना चाहिए। "रिःफ" द्वादश भाव का ही नाम है; यह व्यय, हानि, प्रवास और मोक्ष का दुःस्थान है — और इसी उपसंहार-वचन के साथ द्वादश-भाव-विचार पूर्ण होता है।

English rendering Expenditure, the affairs of enemies, the twelfth-house matters (riḥpha), and the end and the like — all this the wise should discern from the twelfth (of loss), in every case.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-कारकत्व वर्णन (उपसंहार)। भाव-सूचकांक 12; यह दुःस्थान (6/8/12) और व्यय/रिःफ-भाव — बारह-भाव-चक्र का समापन-बिन्दु। "रिःफ" = द्वादश का पारिभाषिक नाम; इसका सटीक विच्छेद ही श्लोक को कुण्डली-स्थान से बाँधता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "सर्वत्र धीमता ज्ञातव्यम्" — यही हमारे इंजन का मूल-सिद्धान्त है: बारहों भावों पर एक ही नियतात्मक (deterministic) भाव-गणना समान रूप से लागू; कोई भाव छूटे नहीं, कोई मनमाना अपवाद नहीं। भाव-फल शास्त्र का कथन रहता है, जबकि भाव-स्थान/बल/वर्ग की गणना सटीक और सत्यापनीय बनी रहती है।

11.14
यो यो शुभैर्युतो दृष्टो भावो वा पतिदृष्टयुक्‌।
युवा प्रवृद्धो राज्यस्थः कुमारो वाऽपि यत्पतिः
yo yo śubhairyuto dṛṣṭo bhāvo vā patidṛṣṭayuk‌|
yuvā pravṛddho rājyasthaḥ kumāro vā'pi yatpatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यो यो = जो-जो (प्रत्येक भाव); शुभैः-युतः = शुभ ग्रहों (गुरु, शुक्र, शुक्ल-पक्ष का चन्द्र, सत्संगत बुध) से युक्त; दृष्टः = शुभों से दृष्ट; भावः वा = अथवा वह भाव; पति-दृष्टि-युक् = अपने भावेश की दृष्टि से युक्त; युवा = युवा-अवस्था (बालादि अवस्था-क्रम का मध्य, पूर्ण-बल); प्रवृद्धः = भली-भाँति वृद्धिंगत / समृद्ध; राज्यस्थः = राज-स्थिति में (उच्च/स्वक्षेत्र/दिग्बली गरिमा); कुमारः = कुमार-अवस्था; यत्-पतिः = जिस भाव का स्वामी।

हिन्दी भावार्थ आचार्य अब भाव-बल पर आते हैं। जो-जो भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, अथवा अपने ही भावेश की दृष्टि से पुष्ट हो — और जिसका स्वामी युवा, प्रवृद्ध (समृद्ध), राज-गरिमा में स्थित, या कुमार अवस्था में हो — (वह भाव सबल समझना चाहिए)। यह वाक्य आगे श्लोक 15 में पूरा होता है; यहाँ केवल "सबल भाव" की पहचान के लक्षण गिनाए गए हैं।

English rendering Whichever house is conjoined with or aspected by benefics, or receives the aspect of its own lord — and whose lord stands youthful, well-grown, royally placed, or in its adolescent state — (is to be judged strong). The sentence completes in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-बल के लक्षण दो कोटियों में हैं — (क) साहचर्य: शुभ-युति/शुभ-दृष्टि/पति-दृष्टि (गुणात्मक), और (ख) भावेश की अवस्था (संख्यात्मक)। "युवा" व "कुमार" बालादि-अवस्था के पद हैं। बालादि-अवस्था का विभाजन-नियम (परम्परा: BPHS अ॰45; इस श्लोक में अंश नहीं कहे — यह घोषित परिपाटी है): प्रत्येक 30° राशि को 5 समान चापों में बाँटो, प्रत्येक 6° —
- विषम (odd) राशि: 0°–6° बाल · 6°–12° कुमार · 12°–18° युवा · 18°–24° वृद्ध · 24°–30° मृत
- सम (even) राशि: क्रम उलटा — 0°–6° मृत · 6°–12° वृद्ध · 12°–18° युवा · 18°–24° कुमार · 24°–30° बाल

फल-भार क्रमशः युवा = पूर्ण, कुमार/बाल = अल्प, वृद्ध/मृत = क्षीण-से-शून्य (गुणात्मक क्रम; परिपाटी-निर्भर सटीक भिन्न न थोपे — पाठ-भेद संभव)। मान: भावेश-अंश निर्ग्रह-सापेक्ष (अयनांश तय होने पर राशि-अन्तर्गत अंश एकनिष्ठ)।

उदाहरण (worked example) मान लें पंचमेश (पुत्र-भाव) मेष (विषम राशि) में 14° पर है → 12°–18° चाप → युवा अवस्था → पूर्ण-बल स्वामी; यदि उसी पंचम-भाव पर गुरु की भी दृष्टि हो, तो श्लोक-नियमानुसार वह भाव सबल घोषित होगा। इसके विपरीत वही स्वामी वृषभ (सम राशि) में 26° पर हो → 24°–30° चाप → बाल → क्षीण। एक ही अंश-दूरी, राशि की सम/विषम प्रकृति से अवस्था पलट जाती है — इसीलिए संकेतन में सम/विषम को घोषित करना अनिवार्य है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उस अनुशासन का मूल है जिस पर हमारी पूरी विधि टिकी है — फल कहने से पहले बल की परीक्षा। "युवा/कुमार" जैसी अवस्थाएँ शुद्ध अंश-आधारित विभाजन (6° चाप) से निर्धारित होती हैं, वैसे ही जैसे षोडश-वर्ग एक 30° राशि का समान-चाप विभाजन है (kaal_ekavimshati_varga.py)। भाव-सामर्थ्य का यही संख्यात्मक पक्ष — अवस्था, षड्बल (अ॰27) — पहले गणित है; फल बाद की व्याख्या। गणित और व्याख्या को पृथक रखना ही हमारी अभिलेख-नीति (operator CLAUDE.md, exact-`==` oracle) है।

11.15
तदीक्षणवशात्‌ तत्तद्‌भाबसौख्यं वदेद्‌ बुधः।
यद्यद्‌ भावपतिर्नष्टस्त्रिकेशाद्यैश्च संयुतः
tadīkṣaṇavaśāt‌ tattad‌bhābasaukhyaṃ vaded‌ budhaḥ|
yadyad‌ bhāvapatirnaṣṭastrikeśādyaiśca saṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-ईक्षण-वशात् = उस (शुभ/पति) दृष्टि के बल से; तत्तद्-भाव-सौख्यं = उस-उस भाव का सुख/शुभफल ("भाब" = भाव, पाठ-भेद संभव); वदेत् = कहे/घोषित करे; बुधः = विद्वान (ज्योतिषी); यद्यद् = जिस-जिस भाव का; भाव-पतिः = भावेश; नष्टः = हत-बल (नीच/अस्त/शत्रुक्षेत्र/ग्रह-युद्ध-पराजित); त्रिक-ईश-आद्यैः = त्रिक (6/8/12 दुःस्थान) के स्वामियों आदि से; च संयुतः = और (उनसे) युक्त।

हिन्दी भावार्थ उस दृष्टि-बल के अनुसार बुद्धिमान ज्योतिषी उस-उस भाव के सुख की घोषणा करे (जो श्लोक 14 का उपसंहार है)। किन्तु इसके विपरीत — जिस-जिस भाव का स्वामी हत-बल हो और त्रिकेश (छठे-आठवें-बारहवें के स्वामी) आदि से युक्त हो… (नकारात्मक नियम श्लोक 16 में पूरा होता है)।

English rendering By the force of that aspect the wise astrologer should pronounce the well-being of each such house. But whichever house has its lord ruined and joined with the lords of the dusthānas (6/8/12) and the like…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-विधि (सशर्त नियम)। यह श्लोक एक स्पष्ट यदि-तो संरचना गढ़ता है: यदि भावेश सबल व सुदृष्ट → भाव-सौख्य; यदि भावेश "नष्ट" तथा त्रिकेश-युक्त → विपरीत — अर्थात् व्याख्या से पहले मापे जाने योग्य शर्तें (दृष्टि-स्रोत, स्वामी की अवस्था/बल, त्रिक-सम्बन्ध), फल नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक शास्त्र की अपनी वाणी में वही करता है जो हमारा oracle करता है — पहले शर्त की सटीक जाँच, फिर कथन। "भावेश नष्ट है या नहीं", "त्रिकेश से युक्त है या नहीं" — ये बूलियन/बल-सीमा प्रश्न हैं, न कि भाग्य-घोषणा; ठीक जैसे षड्बल (अ॰27) में हर घटक एक कथित संख्यात्मक नियम है और योग की तुलना प्रति-ग्रह सीमा से होती है। भाव-सुख "दृष्टि-वश" (मापने योग्य कारण) पर आश्रित रखना — यही गणित-को-व्याख्या-से-पृथक रखने का हमारा अनुशासन है।

11.16
भावं न वीक्षते सम्यक्‌ सुप्तो वृद्धोमृतोऽथवा।
पीडितो वाऽस्य भावस्य फलं नष्टं वदेद्‌ ध्रुवम्‌
bhāvaṃ na vīkṣate samyak‌ supto vṛddhomṛto'thavā|
pīḍito vā'sya bhāvasya phalaṃ naṣṭaṃ vaded‌ dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भावं न वीक्षते सम्यक् = (ऐसा स्वामी) अपने भाव को भली-भाँति नहीं देखता; सुप्तः = सुप्त (जाग्रदादि की सुषुप्ति-अवस्था — शत्रुक्षेत्र/नीचस्थ); वृद्धः = वृद्ध-अवस्था; मृतः = मृत-अवस्था; अथवा / वा = अथवा; पीडितः = (पाप-ग्रह/अस्त से) पीड़ित; अस्य भावस्य = इस भाव का; फलं = फल; नष्टं = नष्ट/लुप्त; वदेत् = घोषित करे; ध्रुवम् = निश्चित रूप से।

हिन्दी भावार्थ (वैसा हत-बल स्वामी) अपने भाव को सम्यक् नहीं देख पाता; और यदि वह सुप्त, वृद्ध या मृत अवस्था में हो, अथवा पीड़ित हो — तो उस भाव का फल "नष्ट" घोषित करना चाहिए, ऐसा शास्त्र निश्चयपूर्वक कहता है।

English rendering Such a lord does not properly behold its own house; and when it is asleep, aged, dead, or afflicted, the fruit of that house is to be declared lost — so the text states, with certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निषेध-नियम का उपसंहार)। तकनीकी लंगर पुनः अवस्था-शब्दावली में है: "सुप्त" जाग्रदादि त्रि-अवस्था (जाग्रत्/स्वप्न/सुषुप्ति) का पद है, जबकि "वृद्ध, मृत" बालादि पंच-अवस्था के (विभाजन-नियम श्लोक 14 में दिया गया) — अर्थात् "फल नष्ट" कोई मनगढ़ंत घोषणा नहीं, बल्कि अवस्था-अंश तथा पीड़ा/दृष्टि-अभाव जैसी जाँची-परखी दशाओं का परिणाम है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "ध्रुवम्" (निश्चित) शब्द विशेष सावधानी माँगता है — यह शास्त्र का दावा है, हमारा समर्थित भविष्य-कथन नहीं; अतः हम इसे "शास्त्र निश्चयपूर्वक कहता है" रूप में प्रस्तुत करते हैं, भाग्य या भय के रूप में कदापि नहीं (operator CLAUDE.md; दोष-पृथक्करण अनुशासन)। जिस प्रकार अष्टकवर्ग (अ॰66) में हमने ±3 सहनशीलता-पट्टी हटाकर exact-`==` पर एक वास्तविक −1 पकड़ा, उसी भावना से यहाँ भी "फल नष्ट" तभी, जब स्वामी की अवस्था/पीड़ा की शर्त ठीक-ठीक सिद्ध हो — कथन की निश्चितता उसकी गणनीय शर्त की जाँच से आती है, न कि रेटरिक से।

1तनु2धन3सहज4सुख5सुत6रिपु7जाया8आयु9भाग्य10कर्म11लाभ12व्ययलग्न (१) — उत्तर-भारतीय कुण्डली
भाव-चक्र — the twelve bhāvas (houses) in the North-Indian diamond layout: लग्न (1st) at top-centre, houses counted anticlockwise. Each bhāva carries a life-domain (तनु, धन, सहज, सुख … व्यय); planets placed by sign give the phala the śāstra reads.
अध्यायः 12

तनुभावफलाध्यायः

15 श्लोक
12.1
सपापो देहपोऽष्टारिव्ययगो देहसौख्यहृत्‌।
केन्द्रे कोणे स्थितोऽङ्गेशः सदा देहसुखं दिशेत्‌
sapāpo dehapo'ṣṭārivyayago dehasaukhyahṛt‌|
kendre koṇe sthito'ṅgeśaḥ sadā dehasukhaṃ diśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सपापः = पाप-ग्रह के साथ स्थित; देहपः = देह/शरीर का स्वामी अर्थात् लग्नेश (deha-pati); अष्ट-अरि-व्यय-गः = ८वें (अष्ट), ६वें (अरि), १२वें (व्यय) भाव में गया हुआ = दुःस्थान-गत; देह-सौख्य-हृत् = शरीर-सुख का हरण करने वाला; केन्द्रे = केन्द्र (१/४/७/१०) में; कोणे = त्रिकोण (१/५/९) में; अङ्गेशः = अङ्ग (=तनु/लग्न) का स्वामी = देहेश; सदा = सर्वदा; देह-सुखं दिशेत् = शारीरिक सुख प्रदान करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — देहेश (लग्नेश) यदि किसी पापग्रह के साथ हो, अथवा ८वें, ६वें या १२वें भाव में स्थित हो, तो वह शरीर-सुख का हरण करता है। किन्तु वही अङ्गेश जब केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो, तो सदा शारीरिक सुख देता है। यह प्रथम भाव (तनु) के बल की मूल कसौटी है।

English rendering The lord of the body (lagneśa), if joined with a malefic or lodged in the 8th, 6th, or 12th, robs bodily comfort; but seated in a kendra or trikoṇa that same lord ever bestows bodily ease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थिति नियम)। यहाँ मात्र स्थान-वर्ग परिभाषित हैं: दुःस्थान = {६, ८, १२}, केन्द्र = {१, ४, ७, १०}, त्रिकोण = {१, ५, ९} — देहेश किस समुच्चय में गिरता है, यही फल की दिशा तय करता है।

12.2
लग्नपोऽस्तङ्गतो नीचे शत्रुभे रोगकृद्‌ भवेत्‌।
शुभः केन्द्रत्रिकोणस्था सर्वरोगहराः स्मृताः
lagnapo'staṅgato nīce śatrubhe rogakṛd‌ bhavet‌|
śubhaḥ kendratrikoṇasthā sarvarogaharāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नपः = लग्नेश; अस्तंगतः = सूर्य-किरणों में अस्त (combust); नीचे = नीच राशि में; शत्रुभे = शत्रु-राशि (śatru-bha) में; रोगकृत् भवेत् = रोगकारक होता है; शुभः = शुभ ग्रह (पाठ-भेद संभव: शुभाः, बहुवचन); केन्द्र-त्रिकोण-स्थाः = केन्द्र व त्रिकोण में स्थित; सर्व-रोग-हराः = समस्त रोगों को हरने वाले; स्मृताः = कहे गए हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का कथन है — लग्नेश यदि अस्त, नीच या शत्रु-राशि में हो, तो रोग उत्पन्न करता है। इसके विपरीत केन्द्र-त्रिकोण में बैठे शुभ ग्रह समस्त रोगों के हर्ता माने गए हैं। यह पूर्व श्लोक की देह-सुख कसौटी का ही आरोग्य-पक्ष है।

English rendering The lagna-lord combust, debilitated, or in an enemy's sign is said to breed disease; benefics posted in kendras and trikoṇas are held to be removers of all ailments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-निर्भर बल)। श्लोक तीन बल-ह्रासक अवस्थाओं की ओर संकेत करता है — अस्त (सूर्य से कोणीय-निकटता पर आधारित एक चाप-शर्त), नीच (परिभाषित नीच-बिन्दु), और शत्रु-क्षेत्र — यद्यपि यहाँ कोई संख्या स्वयं नहीं दी गई।

12.3
लग्ने चन्द्रेऽथव क्रूरग्रहैर्दृष्टेऽथवा युते।
शुभदृष्टिविहीने च जन्तोर्देहसुखं न हि
lagne candre'thava krūragrahairdṛṣṭe'thavā yute|
śubhadṛṣṭivihīne ca jantordehasukhaṃ na hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = उदित राशि / प्रथम भाव; चन्द्र = चन्द्रमा; क्रूरग्रह = पाप / क्रूर ग्रह; दृष्टे = दृष्ट होने पर; युते = युक्त / संयोग में; शुभदृष्टिविहीन = शुभ दृष्टि से रहित; जन्तु = प्राणी / जातक; देहसुखं न हि = देह-सुख नहीं होता

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न में चन्द्र हो, अथवा (लग्न/चन्द्र) क्रूर ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो, और शुभ दृष्टि से रहित हो, तो जातक को देह-सुख नहीं मिलता। यहाँ “दृष्टि + योग + शुभ-दृष्टि का अभाव” तीन शर्तें एक साथ फल को कठोर बनाती हैं। यह भय का वाक्य नहीं — शास्त्र का स्पष्ट फल-नियम है।

English rendering The text states that when the Moon is in the lagna, or when (the lagna/Moon) is aspected by or joined with malefics and is devoid of benefic aspect, the native does not enjoy bodily comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न/चन्द्र + क्रूर दृष्टि/योग − शुभ दृष्टि)। दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) और योग-परिभाषा परंपरा-निर्भर; श्लोक स्वयं कोई अंश-मान नहीं देता।

12.4
लग्ने सौम्ये सुरूपः स्यात्‌ क्रूरेरूपविवर्जितः।
सौम्यखेटैर्युते दृष्टे लग्ने देहसुखान्वितः
lagne saumye surūpaḥ syāt‌ krūrerūpavivarjitaḥ|
saumyakheṭairyute dṛṣṭe lagne dehasukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने सौम्ये = लग्न में सौम्य (शुभ) ग्रह होने पर; सुरूपः स्यात् = सुन्दर रूप वाला होता है; क्रूरैः = क्रूर ग्रहों से (युक्त होने पर); रूप-विवर्जितः = रूप-रहित (कुरूप); सौम्य-खेटैः = शुभ ग्रहों (खेट = ग्रह) से; युते दृष्टे = युक्त वा दृष्ट; लग्ने = लग्न; देह-सुख-अन्वितः = शारीरिक सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का कथन है — लग्न में शुभ ग्रह हो तो जातक सुन्दर रूप वाला होता है, और क्रूर ग्रह हो तो रूपहीन। जब लग्न शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तब वह शारीरिक सुख से सम्पन्न रहता है। श्लोक ३ का यह सकारात्मक प्रतिबिम्ब है।

English rendering A benefic in the lagna makes one comely; a malefic there leaves one bereft of beauty. When benefic planets join or aspect the lagna, the native is endowed with bodily well-being.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सौम्य/क्रूर वर्गीकरण)। एकमात्र तकनीकी विभाजन ग्रहों का सौम्य-क्रूर द्वैत है, जो लग्न-भाव पर आरोपित होकर रूप एवं देह-सुख का संकेत देता है।

12.5
लग्नेशो ज्ञा गुरुर्वाऽपि शुक्रो वा केन्द्रकोणगः।
दीर्घायुर्धनवान्‌ जातो बुद्धिमान्‌ राजवल्लभः
lagneśo jñā gururvā'pi śukro vā kendrakoṇagaḥ|
dīrghāyurdhanavān‌ jāto buddhimān‌ rājavallabhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेश = लग्न-स्वामी; ज्ञ = बुध; गुरु = बृहस्पति; शुक्र = शुक्र; केन्द्रकोणगः = केन्द्र अथवा त्रिकोण में गत; दीर्घायुः = दीर्घ आयु वाला; धनवान् = धन-संपन्न; बुद्धिमान् = बुद्धिमान; राजवल्लभः = राजा / सत्ता का प्रिय

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्नेश बुध, गुरु अथवा शुक्र हो और वह केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो, तो जातक दीर्घायु, धनवान, बुद्धिमान और राजवल्लभ कहा गया है। यहाँ तीन सौम्य लग्नेशों और शुभ-स्थान (केन्द्र-कोण) का संयोग फल-सूचक है। यह दावा शास्त्र का कथन है — नियति का प्रमाण-पत्र नहीं।

English rendering The text states that when the lagna-lord is Mercury, Jupiter, or Venus and is placed in a kendra or trikoṇa, the native is said to be long-lived, wealthy, intelligent, and dear to the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्नेश ∈ {बुध, गुरु, शुक्र} ∧ स्थिति ∈ केन्द्र ∪ त्रिकोण)। लग्नेश-निर्णय राशि-स्वामित्व से; केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9} — भाव-सूची, कोई अंश-सूत्र नहीं।

12.6
लग्नेशे चरराशिस्थे शुभग्रहनिरीक्षिते।
कीर्तिश्रीमान्‌ महाभोगी देहसौख्यसमन्वितः
lagneśe cararāśisthe śubhagrahanirīkṣite|
kīrtiśrīmān‌ mahābhogī dehasaukhyasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी के (स्थित होने पर); चरराशिस्थे = चर राशि में स्थित; शुभग्रहनिरीक्षिते = शुभ ग्रह से दृष्ट; कीर्तिश्रीमान् = कीर्ति और श्री से युक्त; महाभोगी = बड़े भोग वाला; देहसौख्यसमन्वितः = देह-सौख्य से समन्वित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्नेश चर राशि में हो और शुभ ग्रह से दृष्ट हो, तो जातक कीर्ति-श्रीमान, महाभोगी और देह-सौख्य से युक्त कहा गया है। चर राशि गति और प्रसार का संकेत देती है; शुभ दृष्टि उसे सौम्य फल की ओर मोड़ती है। दोनों शर्तें एक साथ कही गई हैं।

English rendering The text states that when the lagna-lord stands in a movable sign and is aspected by a benefic, the native is famous and prosperous, a great enjoyer, and endowed with bodily comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्नेश ∈ चर राशि + शुभ दृष्टि)। चर राशियाँ = मेष, कर्क, तुला, मकर (0°–30° प्रत्येक; राशि-क्रम पारंपरिक); दृष्टि-नियम परंपरा-निर्भर।

12.7
बुधो जीवोऽथवा शुक्रो लग्ने चन्द्रसमन्वितः।
लग्नात्‌ केन्द्रगतो वाऽपि राजलक्षणसंयुतः
budho jīvo'thavā śukro lagne candrasamanvitaḥ|
lagnāt‌ kendragato vā'pi rājalakṣaṇasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध = Mercury; जीव = गुरु / बृहस्पति; शुक्र = Venus; लग्ने = लग्न में; चन्द्रसमन्वितः = चन्द्र से युक्त; लग्नात् केन्द्रगतः = लग्न से केन्द्र (1·4·7·10) में स्थित; वा अपि = अथवा भी; राजलक्षणसंयुतः = राज-लक्षणों से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बुध, जीव (गुरु) अथवा शुक्र जब लग्न में चन्द्र के साथ हों, अथवा वे लग्न से केन्द्र-स्थान में स्थित हों, तो जातक राज-लक्षणों से युक्त कहा गया है। यहाँ तीन सौम्य ग्रहों का लग्न/केन्द्र-संयोग और चन्द्र-योग राज-चिह्न का संकेत देते हैं। यह शास्त्रीय फल-कथन है, व्यक्तिगत भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that when Mercury, Jupiter, or Venus is in the lagna conjoined with the Moon, or even when placed in a kendra from the lagna, the native is endowed with royal marks.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सौम्य ∈ {बुध, गुरु, शुक्र} लग्न+चन्द्र-योग, अथवा लग्न से केन्द्र)। “राजलक्षण” शास्त्रीय लक्षण-श्रेणी है; कोई संख्यात्मक राज-अंक इस श्लोक में नहीं।

12.8
ससौरे सकुजे वापि लग्ने मेषे वृषे हरौ।
राश्यंशसदृशौ गात्रे स जातो नालविष्टितः
sasaure sakuje vāpi lagne meṣe vṛṣe harau|
rāśyaṃśasadṛśau gātre sa jāto nālaviṣṭitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ससौरे = शनि-युक्त; सकुजे = मंगल-युक्त; लग्ने = उदित राशि/तनुभाव में; मेषे वृषे हरौ = मेष, वृष, सिंह (हरि) में; राश्यंशसदृशौ = राशि और अंश (नवमांश आदि) के अनुसार सदृश; गात्रे = शरीर/अंग पर; नालविष्टितः = नाभि-नाल से आवृत/पीड़ित जन्म।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि लग्न शनि-युक्त अथवा मंगल-युक्त हो और वह लग्न मेष, वृष अथवा सिंह में हो, तो जातक के शरीर पर राशि और अंश के अनुरूप चिह्न-संकेत समझे जाते हैं। ऐसे जातक को नाल-विष्टित — जन्म-काल में नाभि-नाल से आवृत — कहा गया है। यह फल-कथन जन्म-स्थिति का शास्त्रीय निर्देश है, चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states that when the lagna is joined by Saturn or by Mars, and that lagna falls in Meṣa, Vṛṣa, or Siṃha (Hari), body-marks are read as corresponding to the rāśi and aṃśa; such a native is described as nāla-viṣṭita — born with the navel-cord about the body.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-जाँच (boolean condition), कोई अवधि-सूत्र नहीं।
लग्न-राशि \(R_L \in \{\text{मेष}, \text{वृष}, \text{सिंह}\}\) और
\(\text{शनि} \in \text{लग्न}\) अथवा \(\text{मंगल} \in \text{लग्न}\)।
“राश्यंशसदृश” = चिह्न-स्थान का मेल (अ) स्थूल राशि-क्षेत्र से, (ब) सूक्ष्म अंश-वर्ग (प्रायः D9 नवमांश) से — वर्ग-नियम घोषित करें।
नवमांश (सामान्य समान-भाग नियम):
\(\text{navāṃśa-index} = \lfloor (\lambda \bmod 30°) ÷ (30°/9) \rfloor\), \(0 \le \text{index} \le 8\);
अंश-राशि = चर-राशि-अनुक्रम से map (चर/स्थिर/द्विस्वभाव अनुसार BPHS Ch.6 नियम)।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न-देशान्तर \(\lambda_L = 42.0°\) (वृष 12°; ayanāṃśa कोई भी — केवल राशि-स्थान)।
\(R_L = \text{वृष}\) ✓; यदि मंगल \(\lambda<sub>Ma</sub>\) भी वृष में (उदा. \(38°\)) तो सकुजे लग्ने ✓।
नवमांश: \((42 \bmod 30) = 12°\); \(12 ÷ (10/3) = 12 ÷ 3.\overline{3} = 3.6\) → index \(3\) (चतुर्थ नवमांश)।
शास्त्र की शर्त पूर्ण; नाल-विष्टित फल-कथन लागू — यह शास्त्र का कथन है, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं।

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12.9
चतुष्पदगतो भानुः परे वीर्यसमन्विताः।
द्विस्वभावगता जातौ यमलाविति निर्दिशेत्‌
catuṣpadagato bhānuḥ pare vīryasamanvitāḥ|
dvisvabhāvagatā jātau yamalāviti nirdiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पदगतः = चतुष्पद राशि में स्थित; भानुः = सूर्य; परे = अन्य/परवर्ती; वीर्यसमन्विताः = बल-वीर्य से युक्त; द्विस्वभावगताः = द्विस्वभाव (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) राशिगत; जातौ = जन्म में; यमलौ = युग्म-जन्म/यमल; इति निर्दिशेत् = ऐसा निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य चतुष्पद राशि में स्थित हो, तो “पर” (अन्य/परवर्ती सन्दर्भ) वीर्य-समन्वित माने जाते हैं। जब ग्रह/स्थिति द्विस्वभाव राशियों में हो, तो विद्वान् यमल-जन्म (युग्म-जन्म) का निर्देश करें। यह जन्म-लक्षण का शास्त्रीय फल-कथन है।

English rendering The text states that when the Sun occupies a quadruped (catuṣpada) sign, the “others” are described as endowed with strength; and when the configuration falls in dual-natured (dvisvabhāva) signs, the wise are to indicate twin (yamala) birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-वर्गीकरण + स्थिति-परीक्षण।

चतुष्पद (सामान्य सूची; पाठ-भेद संभव): मेष, वृष, सिंह; धनु का पूर्वार्ध (\(0°\)–\(15°\)); मकर का उत्तरार्ध (\(15°\)–\(30°\)) — कुछ पाठ पूर्ण धनु/मकर भी लेते हैं।

द्विस्वभाव: मिथुन, कन्या, धनु, मीन (प्रत्येक \(30°\))।
यमल-निर्देश: यदि निर्णायक तत्व (लग्न/सूर्य/बहु-ग्रह — पद “द्विस्वभावगता” बहुवचन) द्विस्वभाव में हों → शास्त्र यमल कहता है। कोई वर्ष-संख्या या भाग-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) सूर्य \(\lambda<sub>Su</sub> = 15°\) (मेष) → चतुष्पद ✓ → “परे वीर्यसमन्विताः” लागू।
लग्न \(\lambda_L = 85°\) (मिथुन \(25°\)) → द्विस्वभाव ✓ → शास्त्र यमल-निर्देश कहता है।
(चतुष्पद की सीमा-सूची में पाठ-भेद संभव — घोषित सूची से `==` जाँच करें।)

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12.10
रवौन्दू एकभावस्थावेकंशकसमन्वितौ।
त्रिमात्रा च थिभिर्मासैः पित्रा भ्रात्रा च पोषितः
ravaundū ekabhāvasthāvekaṃśakasamanvitau|
trimātrā ca thibhirmāsaiḥ pitrā bhrātrā ca poṣitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवौन्दू = सूर्य और चन्द्र; एकभावस्थौ = एक ही भाव में स्थित; एकंशकसमन्वितौ = एक ही अंश (समान वर्ग-अंश, प्रायः नवमांश) से युक्त; त्रिमात्रा = माता द्वारा त्रि-मात्रा/त्रिविध पोषण (पाठानुसार); थिभिर्मासैः → प्रायः त्रिभिर्मासैः (तीन मास; पाठ-भेद संभव); पित्रा भ्रात्रा च पोषितः = पिता और भ्राता द्वारा पोषित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि सूर्य और चन्द्र एक ही भाव में हों और एक ही अंश से युक्त हों, तो जातक पिता तथा भ्राता द्वारा (त्रिभिः मासैः — तीन मास तक) पोषित कहा गया है, और त्रिमात्रा (माता-सम्बन्धी त्रि-पोषण) का भी उल्लेख है। “थिभिर्मासैः” पाठ संदिग्ध लग सकता है — पाठ-भेद संभव; प्रचलित संगत पाठ “त्रिभिर्मासैः” है। फल पालन-पोषण के सन्दर्भ का शास्त्रीय कथन है।

English rendering The text states that when the Sun and Moon occupy one and the same bhāva and share the same aṃśa, the child is described as nourished by father and brother for three months (reading tribhirmāsaiḥ; “thibhir-” is likely a variant — पाठ-भेद संभव), with a threefold maternal measure (trimātrā) also named.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो समानता-शर्तें:
1. एकभाव: \(\text{bhāva}(\lambda<sub>Su</sub>) = \text{bhāva}(\lambda<sub>Mo</sub>)\) — भाव-पद्धति घोषित करें (समान-भाव/पूर्ण भाव; whole-sign में = समान राशि)।
2. एकंशक: समान वर्ग-अंश — प्रायः नवमांश:
\(\lfloor (\lambda<sub>Su</sub> \bmod 30°) ÷ (10°/3) \rfloor = \lfloor (\lambda<sub>Mo</sub> \bmod 30°) ÷ (10°/3) \rfloor\)

और दोनों की अंश-राशि समान (BPHS D9 map)।
पोषण-काल: शास्त्र कहता है \(3\) मास (त्रिभिर्मासैः) — यह फल-संख्या है, खगोलीय स्थिरांक नहीं।

उदाहरण (worked example) Whole-sign भाव; \(\lambda<sub>Su</sub> = 100.0°\) (कर्क \(10°\)), \(\lambda<sub>Mo</sub> = 105.0°\) (कर्क \(15°\)) → एक भाव ✓।
Navāṃśa-index: \(Su: 10 ÷ 3.\overline{3} = 3\); \(Mo: 15 ÷ 3.\overline{3} = 4.5 \to 4\) — असमान → शर्त अधूरी।
यदि \(\lambda<sub>Mo</sub> = 102.0°\) (कर्क \(12°\)): index \(Su = 3\), \(Mo = 3\) → एकंशक ✓ (अंश-राशि map भी मेल खाना चाहिए)। तब शास्त्र पितृ-भ्रातृ पोषण \(3\) मास का फल कहता है।

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12.11
एवमेव फलं वाच्यं चन्द्रादपि सदा बुधैः।
अथ जातनरस्याङ्गे व्रणचिह्नादिकं ब्रुवे
evameva phalaṃ vācyaṃ candrādapi sadā budhaiḥ|
atha jātanarasyāṅge vraṇacihnādikaṃ bruve

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवमेव = ठीक उसी प्रकार; फलं वाच्यम् = फल कहा जाए; चन्द्रादपि = चन्द्र से भी; सदा बुधैः = सदा विद्वानों द्वारा; अथ = अब; जातनरस्य अङ्गे = जातक-नर के अंग पर; व्रणचिह्नादिकम् = व्रण, चिह्न आदि; ब्रुवे = मैं कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ऊपर कहा गया फल विद्वान् सदा चन्द्र से भी उसी रीति से कहें। अब आगे जातक के शरीर पर व्रण, चिह्न आदि का वर्णन आरम्भ होता है। यह संक्रमण-श्लोक है: पूर्व फल-विधि का चन्द्र-पर विस्तार, और अंग-चिह्न प्रकरण की भूमिका।

English rendering The text states that the wise should always declare the same kind of result from the Moon as well; and now the speaker turns to wounds, marks, and the like upon the body of the native.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-विधि का चन्द्र-पर विस्तार + प्रकरण-संक्रमण।
तकनीकी संकेत: पूर्व शर्तों (भाव-संयोग, अंश-साम्य, राशि-वर्ग) का चन्द्र-केन्द्रित पुनःप्रयोग — \(\lambda<sub>Mo</sub>\) को संदर्भ-बिन्दु बनाकर समान boolean/वर्ग-जाँच; कोई नई संख्या नहीं।

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12.12
शिरो नेत्रे तथ कर्णौ नासिके च कपोलकौ।
हनूर्मुखं च लग्नाद्या तनावाद्यदृकाणके
śiro netre tatha karṇau nāsike ca kapolakau|
hanūrmukhaṃ ca lagnādyā tanāvādyadṛkāṇake
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिरः = सिर; नेत्रे = दोनों नेत्र; कर्णौ = दोनों कान; नासिके = नासिका (दोनों छिद्र); कपोलकौ = दोनों कपोल; हनुः = ठोड़ी/जबड़ा; मुखम् = मुख; लग्नाद्याः = लग्न आदि (क्रमशः भाव); तनौ = शरीर में; आद्य-दृकाणके = प्रथम द्रेष्काण (0°–10°) में (लग्न होने पर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शरीर के अङ्गों को भावों पर बाँटता है — लग्न प्रथम द्रेष्काण में हो तो लग्न से क्रमशः सिर, नेत्र, कान, नासिका, कपोल, हनु और मुख। यह दक्षिण-वाम सममित मानचित्र है: प्रथम भाव सिर, द्वितीय और द्वादश नेत्र, तृतीय और एकादश कान, चतुर्थ और दशम नासिका, पञ्चम और नवम कपोल, षष्ठ और अष्टम हनु, सप्तम मुख। द्वितीय/तृतीय द्रेष्काण के लिए अङ्ग-सूची आगे के श्लोकों में बदलती है।

English rendering When the lagna falls in the first drekkāṇa, the houses from the lagna onward stand for the head, eyes, ears, nose, cheeks, jaw and mouth — the symmetric mapping in which the second and twelfth, third and eleventh, fourth and tenth, fifth and ninth, sixth and eighth houses form pairs, with the seventh as the mouth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्रेष्काण-क्रमांक k = ⌊λ_लग्न (राशि-अन्तर्गत) ÷ 10°⌋ + 1 ∈ {1, 2, 3}। k = 1 पर अङ्ग-सारणी: भाव 1 → शिर; {2, 12} → नेत्र; {3, 11} → कर्ण; {4, 10} → नासिका; {5, 9} → कपोल; {6, 8} → हनु; 7 → मुख। (युग्म-सममिति: भाव b और 14 − b एक ही अङ्ग।)

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह 7°: k = ⌊7 ÷ 10⌋ + 1 = 1 → प्रथम द्रेष्काण → उपर्युक्त सारणी लागू; सिंह 23° पर k = 3 → तृतीय द्रेष्काण की सारणी (12.14 आदि)। अयनांश-चुनाव λ बदल सकता है, इसलिए निरयन मान और अयनांश घोषित करें।

12.13
मध्यद्रेष्काणगे लग्ने कण्ठोंऽसौ च भुजौ तथा।
पार्श्वे च हृदये क्रोडे नाभिश्चेति यथाक्रमम्‌
madhyadreṣkāṇage lagne kaṇṭhoṃ'sau ca bhujau tathā|
pārśve ca hṛdaye kroḍe nābhiśceti yathākramam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्य-द्रेष्काण-गे = मध्य द्रेष्काण (decanate — D3 का द्वितीय १०°–२०° खण्ड) में गए; लग्ने = लग्न के; कण्ठः = कण्ठ/गला; अंसौ = दोनों कंधे; च भुजौ = और दोनों भुजाएँ; तथा = वैसे ही; पार्श्वे = पार्श्व (बगल); च हृदये = और हृदय; क्रोडे = उदर/गोद; नाभिः = नाभि; च इति = इस प्रकार; यथाक्रमम् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न मध्य द्रेष्काण में हो, तो शरीर के मध्य-प्रदेश के अंग क्रमशः इस प्रकार लिए जाएँ — कण्ठ, दोनों कंधे, दोनों भुजाएँ, पार्श्व, हृदय, उदर और नाभि। यह व्रण/चिह्न-विचार की देह-मानचित्रण-विधि है, जिसमें द्रेष्काण-विभाग अंग-प्रदेश तय करता है (अगले श्लोकों में तृतीय द्रेष्काण से अधोभाग)।

English rendering When the lagna falls in the middle decanate, the body-parts are taken in order — the throat, the two shoulders and arms, then the flanks, heart, belly, and navel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्रेष्काण = D3 वर्ग; ३०° राशि ÷ ३ = १०° प्रति द्रेष्काण। आद्य = ०°–१०°, मध्य = १०°–२०°, अन्त्य = २०°–३०°। लग्न-देशान्तर का राशि-भीतर स्थान इनमें से कौन-सा द्रेष्काण है, यह इस विभाजन से निर्धारित होता है; मध्य द्रेष्काण → देह का मध्य-प्रदेश (कण्ठ→अंस→भुज→पार्श्व→हृदय→क्रोड→नाभि), यथाक्रमम्।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न-देशान्तर राशि के भीतर १५°२०′ पर है। चूँकि १०° ≤ १५°२०′ < २०°, यह मध्य (द्वितीय) द्रेष्काण में पड़ता है। अतः इस श्लोक के अनुसार अंग-प्रदेश मध्य-देह है, और व्रण/चिह्न का स्थान उपर्युक्त क्रम (कण्ठ, कंधे, भुजाएँ, पार्श्व, हृदय, उदर, नाभि) में से लिया जाएगा। (यदि लग्न ६° होता तो आद्य द्रेष्काण = ऊर्ध्वांग; २४° होता तो अन्त्य द्रेष्काण = अधोभाग।)

हमारा डिकोड (Our Decode) द्रेष्काण (D3) हमारे षोडश-वर्ग समुच्चय का ही एक चक्र है, जिसे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) में ३०° राशि के तीन समान १०° चापों के निर्धारक विभाजन के रूप में — देशान्तर पर विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित से — निकाला जाता है। यह श्लोक उसी D3-सूचकांक (आद्य/मध्य/अन्त्य) को देह-प्रदेश से जोड़ता है; अर्थात् जो विभाजन हम अंश-गणना के लिए == पर परखते हैं, वही यहाँ अंग-मानचित्रण की कुंजी बनता है।

12.14
वस्तिर्लिङ्गगुदे मुष्कावूरू जानू च जंघके।
पादश्चेत्युदितैर्वाममङ्गं ज्ञेयं तृतीयके
vastirliṅgagude muṣkāvūrū jānū ca jaṃghake|
pādaścetyuditairvāmamaṅgaṃ jñeyaṃ tṛtīyake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्तिः = श्रोणि/मूत्राशय-प्रदेश (नाभि के नीचे का उदर); लिङ्ग = जननेन्द्रिय; गुदे = मलद्वार; मुष्कौ = वृषण-युग्म (द्विवचन); ऊरू = दोनों जाँघें; जानू = दोनों घुटने; जंघके = दोनों पिंडलियाँ; पादः = पैर; तृतीयके = तृतीय द्रेष्काण में (D3 का 20°–30° खण्ड); उदितैः = उदित (लग्नस्थ) अंशों द्वारा; वामम् अङ्गम् = शरीर का वाम (बायाँ) भाग — ज्ञेयम् = जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक ने मध्य-द्रेष्काण के मध्य-शरीर अंगों (कण्ठ, स्कन्ध, भुजा, पार्श्व, हृदय, उदर, नाभि) की सूची दी; यह श्लोक तृतीय द्रेष्काण के अधोभाग-अंगों की क्रमिक सूची पूर्ण करता है — श्रोणि, जननेन्द्रिय, गुदा, वृषण, जाँघ, घुटना, पिंडली और पैर। जब लग्न राशि का तृतीय द्रेष्काण उदित हो, तब चिह्न-निर्देश के लिए इन्हीं अधःकाय-अंगों को लेना चाहिए, और उदित अंश से शरीर के वाम भाग का निर्णय करना चाहिए। (वाम/दक्षिण-पक्ष के इस विवरण में पाठ-भेद संभव।)

English rendering The pelvis, genitals, anus, testicles, thighs, knees, shanks, and feet — thus, in the third drekkāṇa, by the risen [degrees] the left side of the body is to be reckoned (continuing the head-to-foot mapping of the sign's three drekkāṇas).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह द्रेष्काण (D3) वर्ग का प्रयोग है। एक 30° राशि तीन समान 10° चापों में विभक्त होती है, और शरीर तीन खण्डों में:
D3-सूचकांक = ⌊(λ mod 30°) ÷ 10°⌋ + 1, जहाँ λ = लग्न का सायन/निरयन देशांतर।
- खण्ड 1 (0°–10°) → ऊर्ध्वकाय (शिर-मुख आदि, प्रथम द्रेष्काण)
- खण्ड 2 (10°–20°) → मध्यकाय (कण्ठ…नाभि — श्लोक 13)
- खण्ड 3 (20°–30°) → अधःकाय (वस्ति…पाद — यह श्लोक)
सूची स्वयं एक अंग↔द्रेष्काण lookup-table है; वास्तविक गणना केवल लग्नांश का 10°-विभाजन है — शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित, कोई तोलमान नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न वृश्चिक 26°10′ पर। राश्यंतर्गत अंश = 26°10′ = 26.1667°। सूचकांक = ⌊26.1667 ÷ 10⌋ + 1 = 2 + 1 = 3 → तृतीय द्रेष्काण। अतः चिह्न-विचार इसी अधःकाय-सूची (वस्ति से पाद तक) पर, वाम-पक्ष में, किया जाएगा। यदि लग्न 14°20′ होता तो सूचकांक = ⌊1.433⌋+1 = 2 → मध्य द्रेष्काण (श्लोक 13 की सूची लागू होती)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे षोडश-वर्ग की D3 (द्रेष्काण) इकाई पर टिका है — दोसियर की उसी योजना का अंग जहाँ D1…D60 प्रत्येक "30° राशि का समान चापों में नियत विभाजन, देशांतर पर विशुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित" है। हमारे varga इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) में D3 का 10°-खण्डन उसी नियतांक-सूत्र से निकलता है जिसे यह श्लोक अंग-मानचित्र के रूप में प्रयोग करता है — यहाँ गणित (कौन-सा द्रेष्काण) और व्याख्या (कौन-सा अंग) को हम अलग रखते हैं।

12.15
यस्मिन्नङ्गे स्थितः पापो व्रणं तत्र समादिशेत्‌।
नियतं सबुधैः क्रूरैः सौम्यैर्लक्ष्म वदेद्‌ बुधः
yasminnaṅge sthitaḥ pāpo vraṇaṃ tatra samādiśet‌|
niyataṃ sabudhaiḥ krūraiḥ saumyairlakṣma vaded‌ budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मिन् अङ्गे = जिस अंग में (श्लोक 13–14 के द्रेष्काण-मानचित्र अनुसार); पापः स्थितः = पापग्रह स्थित; व्रणम् = घाव/क्षत-चिह्न; तत्र = वहीं; समादिशेत् = घोषित करे; नियतम् = निश्चित रूप से; सबुधैः क्रूरैः = बुध-सहित क्रूर (पाप) ग्रहों द्वारा; सौम्यैः = शुभ ग्रहों द्वारा; लक्ष्म = तिल/शुभ-चिह्न (सौन्दर्य-बिन्दु); बुधः वदेत् = विद्वान् (ज्योतिषी) कहे। ("सबुधैः" = बुध-सहित; कुछ पाठों में "स-बुधैः" को "विद्वानों सहित" भी पढ़ा गया — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यह नियम देता है कि जिस अंग (द्रेष्काण-निर्दिष्ट भाग) में पापग्रह स्थित हो, वहीं व्रण अर्थात् क्षत-चिह्न का निर्देश करना चाहिए। बुध के साथ जुड़े क्रूर ग्रहों से यह निश्चित व्रण कहा जाता है, जबकि शुभ ग्रहों की स्थिति से विद्वान् वहाँ व्रण नहीं, अपितु तिल/शुभ-चिह्न बताए। यह श्लोक 13–14 के अंग-मानचित्र का फल-नियम है — मानचित्र स्थान बताता है, यह श्लोक स्थान का लक्षण।

English rendering In whichever limb a malefic is placed, one should assign a scar there; joined with malefics (and Mercury among them) the wound is definite, whereas from benefics the wise astrologer should instead declare an auspicious mark or mole.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्रण/लक्ष्म-निर्देश)। यहाँ कोई नया अंक या विभाजन नहीं; गणना श्लोक 13–14 में पूर्ण हो चुकी (द्रेष्काण-सूचकांक + अंग-सूची), और यह श्लोक केवल उस स्थान पर पाप → व्रण, शुभ → लक्ष्म का व्याख्या-नियम जोड़ता है। शास्त्र यह "कहता है"; इसे भविष्य-निश्चय या भय-वचन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता — यह पाठ का अपना कथन मात्र है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी मूल अनुशासन-रेखा का स्वच्छ उदाहरण है — गणित को व्याख्या से अलग रखना। द्रेष्काण-विभाजन (श्लोक 14) विशुद्ध, नियत, `==`-योग्य संगणना है; जबकि "पाप → व्रण / शुभ → लक्ष्म" एक फल-कथन है, जिसे हम सदा "शास्त्र कहता है X" के रूप में देते हैं, अपने द्वारा समर्थित नियति या निश्चयवाद के रूप में नहीं। यही विभाजन दोसियर के discipline-बिंदु (गणित बनाम फल) का आधार है।

अध्यायः 13

धनभावफलाध्यायः

13 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): धनभाव—द्वितीय भाव—के फल का विवेचन आरंभ होता है: धनेश की स्थिति, केन्द्र–कोण बनाम त्रिक, और धनस्थान में सौम्य–पाप का संयोग—ये सूत्र एक ही संरचना में बँधे हैं। अध्याय सिखाता है कि शास्त्र धनवृद्धि या धनहानि को भाव–स्वामी–दृष्टि की ज्यामिति से जोड़ता है, न कि किसी अस्पष्ट आशंका से। गुरु–भौम, धनेश–लाभेश का परस्पर गमन, तथा केन्द्र–त्रिकोण में उनका बल—ये टुकड़े मिलकर धनलाभ के शास्त्रोक्त संकेत बनाते हैं। तेरह श्लोकों में यह अध्याय भाव-फल श्रृंखला (११–२४) का धन-स्तम्भ है: पहले नियम, फिर योग, फिर फल-वाक्य। पाठक यहाँ “क्या होगा” नहीं, “शास्त्र क्या कहता है और किस संयोग पर” पढ़ता है।

For the English reader: Adhyāya 13 turns the second house into a grammar of means—lordship, house class (kendra, trikoṇa, trika), and the quality of who sits in dhana. The opening verses do not invent fate; they state conditions under which the śāstra marks growth, attrition, or gain of wealth as phala. Benefic and malefic occupancy, the dance of the 2nd and 11th lords, and Jupiter–Venus as supporting lights are the levers. Read it as structural language: placement before story, rule before rhetoric.

मुख्य गणित/तकनीक:
- मुख्यतः फल/वर्णन-अध्याय — संख्यात्मक वर्ग/अष्टकवर्ग/दशा-इंजन यहाँ नहीं; संकेत-संरचना है।
- भाव-वर्ग: धनभाव (२) · लाभभाव (११) · त्रिक (६, ८, १२) बनाम केन्द्र (१, ४, ७, १०) · कोण/त्रिकोण (१, ५, ९)।
- स्वामी-युग्म: धनेश \(L_2\), लाभेश \(L<sub>11</sub>\); फल-वाक्य उनके परस्पर गमन \(L_2 \in 11\) / \(L<sub>11</sub> \in 2\) और दोनों के केन्द्र/कोण-स्थित होने पर।
- गुण-नियम: धनस्थान में सौम्य → धनद; पाप → धनविनाशकृत् (शास्त्र-वाक्य); धनेश केन्द्र + लाभेश तत्त्रिकोण + गुरु/शुक्र युति/दृष्टि → धनलाभमुदीरयेत्।

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

13.1
धनभावफलं वच्मि स्रृणु त्वं द्विजसत्तम।
धनेशो धनभावस्थः केन्द्रकोणगतोऽपि वा
dhanabhāvaphalaṃ vacmi srṛṇu tvaṃ dvijasattama|
dhaneśo dhanabhāvasthaḥ kendrakoṇagato'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनभावफलम् = द्वितीय (धन) भाव का फल; वच्मि = मैं कहता हूँ; शृणु = सुनो; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज (मैत्रेय-सम्बोधन); धनेशः = द्वितीयेश (धन-भाव का स्वामी); धनभावस्थः = द्वितीय भाव में स्थित; केन्द्र = लग्न से 1/4/7/10 भाव; कोण = त्रिकोण, 1/5/9 भाव; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ पराशर अब धन-भाव (द्वितीय) के फलों का प्रकरण आरम्भ करते हैं — "हे द्विजश्रेष्ठ, सुनो।" वे पहली शर्त रखते हैं: यदि द्वितीयेश स्वयं द्वितीय भाव में बैठा हो, अथवा किसी केन्द्र या त्रिकोण में गया हो — इस स्थिति का फल अगली ऋचा में पूर्ण होता है। यह अध्याय संवाद-रूप में गुरु से शिष्य की ओर बहता है।

English rendering "I now declare the results of the wealth-house; listen, O best of the twice-born." The condition opens: the 2nd-lord placed in the 2nd itself, or gone to a kendra (angle) or koṇa (trine) — its fruit completing in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ फल नहीं, स्थिति-परिभाषा है — केन्द्र = {1, 4, 7, 10}, त्रिकोण/कोण = {1, 5, 9}, लग्न से गिने हुए। द्वितीयेश = वह ग्रह जो द्वितीय राशि का अधिपति है। यह शुद्ध स्थान-गणना है (राशि-चक्र पर modulo-12 गिनती); फल-कथन ऋचा 2 में।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न → द्वितीय भाव वृषभ → द्वितीयेश शुक्र। शुक्र यदि वृषभ (2), अथवा कर्क/तुला/मकर (4/7/10 = केन्द्र) या सिंह/धनु (5/9 = कोण) में हो, तो यह शर्त पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय फल-अध्याय है, और हमारे decode-अनुशासन का मूल यहीं लागू होता है (dossier §5): भाव-स्वामी की स्थिति = ठीक-ठीक गणनीय (केन्द्र/कोण/त्रिक की modular गिनती), पर "धनी/निर्धन" = शास्त्र का कथन, नियति नहीं। गणित और व्याख्या को हम अलग रखते हैं — संख्या पर `==`, फल पर "शास्त्र कहता है।"

13.2
धनवृद्धिकरो ज्ञेयस्त्रिकस्थो धनहानिकृत्‌।
धनदश्च धने सौम्यः पापो धनविनाशकृत्‌
dhanavṛddhikaro jñeyastrikastho dhanahānikṛt‌|
dhanadaśca dhane saumyaḥ pāpo dhanavināśakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनवृद्धिकरः = धन-वृद्धि करने वाला; ज्ञेयः = जानना चाहिए; त्रिकस्थः = त्रिक (6/8/12 दुःस्थान) में स्थित; धनहानिकृत् = धन-हानि करने वाला; धनदः = धन देने वाला; धने = द्वितीय भाव में; सौम्यः = शुभ ग्रह; पापः = क्रूर ग्रह; धनविनाशकृत् = धन का नाश करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पिछली शर्त पूरी करते हुए — केन्द्र/कोण/स्वभाव में बैठा द्वितीयेश धन-वृद्धिकारक जानो; किन्तु वही त्रिक (6/8/12) में हो तो धन-हानिकारक। और द्वितीय भाव में बैठा शुभ ग्रह धनदायक, तथा वहीं बैठा पाप ग्रह धन-नाशक कहा गया है। शास्त्र यहाँ स्थान की शुभता और ग्रह के स्वभाव — दोनों को तौलता है।

English rendering Such a 2nd-lord is to be known as wealth-increasing; but placed in a trika (6/8/12) it diminishes wealth. A benefic in the 2nd gives wealth; a malefic there destroys it — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिक/दुःस्थान = {6, 8, 12}, लग्न से गिने। सौम्य (शुभ) = गुरु, शुक्र, अक्षीण चन्द्र, अपापयुत बुध; पाप = सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु, क्षीण चन्द्र, पापयुत बुध — यह वर्गीकरण संहिता-सम्मत है। फल (वृद्धि/हानि/नाश) शास्त्र का कथन है; स्थान-सेट व ग्रह-स्वभाव गणनीय।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न, द्वितीयेश शुक्र यदि कन्या (6) / वृश्चिक (8) / मीन (12) में → त्रिकस्थ → शास्त्रानुसार धन-हानि-पक्ष। वहीं द्वितीय भाव (वृषभ) में गुरु = सौम्य = धनद-पक्ष।

13.3
धनाधिपो गुरुर्यस्य धनभावगतो भवेत्‌।
भौमेन सहितो वाऽपि धनवान्‌ स नरो भवेत्‌
dhanādhipo gururyasya dhanabhāvagato bhavet‌|
bhaumena sahito vā'pi dhanavān‌ sa naro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनाधिप = धनभाव-स्वामी (द्वितीयेश); गुरु = बृहस्पति; यस्य = जिसका; धनभावगत = द्वितीय में स्थित; भवेत् = हो; भौम = मंगल; सहित = युक्त/संयुक्त; वा अपि = अथवा भी; धनवान् = धनी; नर = पुरुष/व्यक्ति

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विशेष योग बताता है — जिसके कुंडली में धनाधिप गुरु हो और वह धनभाव में बैठा हो, अथवा (धनाधिप) मंगल से युक्त हो, तो वह नर धनवान् होता है — ऐसा पाठ कहता है। यहाँ दो शर्तें हैं: (1) गुरु का धनेशत्व + धनभाव-स्थिति, (2) भौम-युति का विकल्प। फल को शास्त्र का कथन समझें, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering “He whose lord of wealth is Jupiter and is placed in the second house, or who is joined even with Mars — that person becomes wealthy, the text states.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विशेष धनेश-योग)। जाँच-क्रम (केवल स्थिति-मिलान): (i) द्वितीयेश == गुरु ∧ गुरु ∈ भाव-2; अथवा (ii) द्वितीयेश-भौम युति (समान राशि/भाव-संयोग — गृह-पद्धति घोषित करें)। फल = “धनवान्” — शास्त्र-कथन; गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न मेष, द्वितीय वृषभ — धनेश = शुक्र (इस उदाहरण में गुरु धनेश नहीं)। गुरु-धनेश तब जब लग्न मकर/कुंभ हो (द्वितीय = कुंभ/मीन → धनेश शनि/गुरु)। उदाहरण: लग्न मकर, द्वितीय = कुंभ, धनेश = शनि — इस श्लोक की गुरु-शर्त लागू नहीं। लग्न धनु, द्वितीय = मकर, धनेश = शनि — फिर भी गुरु नहीं। लग्न वृश्चिक, द्वितीय = धनु, धनेश = गुरु; यदि गुरु धनु (भाव-2) में हो → शास्त्र की पहली शर्त पूरी। (भाव-गणना: पूर्ण-राशि/श्रीपति आदि — यहाँ पूर्ण-राशि भाव मानें; अयनांश फल को नहीं, केवल राशि-स्थिति को छूता है।)

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13.4
धनेशे लाभभावस्थे लाभेशे वा धनं गते।
तावुभौ केन्द्रकोणस्थौ धनवान्‌ स नरो भवेत्‌
dhaneśe lābhabhāvasthe lābheśe vā dhanaṃ gate|
tāvubhau kendrakoṇasthau dhanavān‌ sa naro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीय-स्वामी; लाभभाव = एकादश भाव; लाभेश = एकादश-स्वामी; धनं गते = द्वितीय में गया हुआ; तौ उभौ = वे दोनों; केन्द्रकोणस्थ = केन्द्र या त्रिकोण में स्थित; धनवान् = धनी; नरः भवेत् = व्यक्ति होता है (शास्त्र-कथन)

हिन्दी भावार्थ जब धनेश लाभभाव में हो, अथवा लाभेश धनभाव में हो, और वे दोनों केन्द्र या कोण में स्थित हों, तो शास्त्र कहता है — वह नर धनवान् होता है। यहाँ 2 और 11 का पारस्परिक संबंध (परस्पर-आश्रय) धन-योग का आधार है; केन्द्र-कोण स्थिति उसे दृढ़ करती है। यह “धनेश-लाभेश” युग्म का क्लासिक फल-नियम है।

English rendering “When the lord of the second is in the eleventh, or the lord of the eleventh has gone to the second, and both occupy a kendra or a trikoṇa — that person becomes wealthy, according to the text.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (2↔11 पारस्परिक स्थिति)। शर्त-तर्क (बूलियन):
(धनेश ∈ भाव-11 ∨ लाभेश ∈ भाव-2) ∧ (धनेश ∈ केन्द्र∪कोण) ∧ (लाभेश ∈ केन्द्र∪कोण)
→ शास्त्र: धनवान्। केन्द्र={1,4,7,10}, कोण={1,5,9}; भाव-स्वामी = लग्न-राशि से क्रमशः 2nd/11th राशि का स्वामी (पूर्ण-राशि पद्धति)।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह (पूर्ण-राशि भाव)। भाव-2 = कन्या → धनेश = बुध; भाव-11 = मिथुन → लाभेश = बुध (एक ही ग्रह — पाठ “तौ उभौ” पर पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव)। दूसरा स्पष्ट उदाहरण: लग्न मेष; धनेश = शुक्र, लाभेश = शनि। यदि शुक्र = भाव-11 (कुंभ) और शनि = भाव-2 (वृषभ), तथा दोनों केन्द्र/कोण में हों — यहाँ शुक्र कुंभ = भाव-11 (लाभस्थ धनेश); शनि वृषभ = भाव-2। शनि वृषभ = केन्द्र? मेष-लग्न में वृषभ = भाव-2, केन्द्र नहीं, कोण नहीं → पूर्ण शर्त नहीं। यदि धनेश (शुक्र) कर्क (भाव-4, केन्द्र) और लाभेश (शनि) सिंह (भाव-5, कोण) में हों, किंतु “धनेश लाभस्थ / लाभेश धनस्थ” नहीं — तो यह श्लोक लागू नहीं; केवल केन्द्र-कोण पर्याप्त नहीं, 2↔11 आदान-प्रदान भी चाहिए।

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13.5
धनेशे केन्द्रराशिस्थे लाभेशे तत्त्रिकोणगे।
गुरुशुक्रयुते दृष्टे धनलाभमुदीरयेत्‌
dhaneśe kendrarāśisthe lābheśe tattrikoṇage|
guruśukrayute dṛṣṭe dhanalābhamudīrayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे केन्द्रराशिस्थे = धनेश केन्द्र-राशि में स्थित; लाभेशे तत्त्रिकोणगे = लाभेश उस (धनेश) के त्रिकोण में / तत्-संबंधी त्रिकोण में; गुरुशुक्रयुते = गुरु और शुक्र से युक्त; दृष्टे = दृष्ट; धनलाभम् = धन का लाभ; उदीरयेत् = कहना/घोषित करना चाहिए

हिन्दी भावार्थ धनेश जब केन्द्र राशि में हो और लाभेश तत्त्रिकोण में हो, तथा (वे) गुरु-शुक्र से युक्त या दृष्ट हों, तो शास्त्र धनलाभ का निर्देश देता है — “उदीरयेत्” अर्थात् ज्योतिषी को वैसा फल कहना चाहिए। यहाँ केन्द्र-स्थिति, त्रिकोण-संबंध और गुरु-शुक्र का योग/दृष्टि — तीन परतें एक साथ हैं। “तत्त्रिकोणगे” का संधि-अर्थ: लाभेश का उस स्थिति के त्रिकोण में होना; पाठ-भेद/टीका-भेद संभव।

English rendering “When the lord of wealth stands in a kendra sign and the lord of gain occupies a trikoṇa relative to it, and they are joined with or aspected by Jupiter and Venus, one should declare gain of wealth.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केन्द्र + त्रिकोण + गुरु-शुक्र योग/दृष्टि)। जाँच: (1) धनेश ∈ {1,4,7,10}; (2) लाभेश ∈ त्रिकोण-संबंध (राशि-त्रिकोण: 1–5–9 चक्र, अथवा भाव-त्रिकोण — पद्धति घोषित करें; यहाँ राशि-त्रिकोण स्वाभाविक); (3) गुरु/शुक्र युति या दृष्टि। पाराशरी दृष्टि: पूर्ण दृष्टि मंगल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10, शेष 7 — इस श्लोक में गुरु की 5/9 दृष्टि विशेष रूप से प्रासंगिक। फल = धनलाभ — शास्त्र-कथन।

उदाहरण (worked example) लग्न तुला; धनेश = मंगल (भाव-2 वृश्चिक); लाभेश = सूर्य (भाव-11 सिंह)। मान लें मंगल कर्क (भाव-10, केन्द्र) में, सूर्य वृश्चिक (मंगल-राशि से — कर्क→वृश्चिक = 5th, त्रिकोण) में; गुरु-शुक्र उनमें से किसी पर युति/दृष्टि दें → शास्त्र कहता है धनलाभ उदीरयेत्। (दृष्टि-नियम: पाराशरी; अयनांश केवल ग्रह-देशांतर के लिए; भाव-स्वामी पूर्ण-राशि से।)

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13.6
धनेशो रिपुभावस्थो लाभेशस्तद्‌गतो यदि।
धनायौ पापयुक्तौ वा दृष्टौ निर्धन एव सः
dhaneśo ripubhāvastho lābheśastad‌gato yadi|
dhanāyau pāpayuktau vā dṛṣṭau nirdhana eva saḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीयेश; रिपुभाव = षष्ठ भाव; लाभेश = एकादशेश; तद्गत = उसी (रिपुभाव) में गया; धनायौ = धन और आय के स्वामी (2 और 11); पापयुक्त = पापग्रह-युक्त; दृष्ट = दृष्ट; निर्धन = धनरहित; एव = ही/निश्चय से (शास्त्र का बल); सः = वह

हिन्दी भावार्थ यदि धनेश रिपुभाव (षष्ठ) में हो और लाभेश भी वहीं चला गया हो, अथवा धन-आय के दोनों स्वामी पापग्रह से युक्त या दृष्ट हों, तो शास्त्र कहता है — वह निर्धन ही है। यह पिछले शुभ योगों का प्रतिलोम है: 2–11 का षष्ठ-पतन या पाप-संपर्क। “निर्धन एव” पाठ का अपना बल है; हम इसे नियति की घोषणा नहीं, शास्त्र-लक्षण मानकर पढ़ते हैं।

English rendering “If the lord of wealth stands in the sixth and the lord of gain has also gone there, or if the two lords of wealth and income are joined with or aspected by malefics — he is indeed without wealth, the text states.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ स्थिति-योग)। शर्त-तर्क:
(धनेश ∈ भाव-6 ∧ लाभेश ∈ भाव-6) ∨ (धनेश पाप-युक्त/दृष्ट ∧ लाभेश पाप-युक्त/दृष्ट)
→ शास्त्र: निर्धन। पाप-ग्रह पारंपरिक सूची: रवि, मंगल, शनि, राहु/केतु (चंद्र-पापत्व पक्षानुसार — घोषित करें)। यह फल-नियम है, अंक-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न कर्क; धनेश = रवि (भाव-2 सिंह); लाभेश = शुक्र (भाव-11 वृषभ)। यदि रवि और शुक्र दोनों भाव-6 (धनु) में हों → “धनेशो रिपुभावस्थो लाभेशस्तद्गतः”। अथवा दोनों पृथक् भावों में हों किंतु शनि-मंगल से युक्त/दृष्ट हों → दूसरी शाखा। फल-पाठ: निर्धन — शास्त्र-कथन; व्यक्तिगत भविष्यवाणी नहीं।

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13.7
धनलाभाधिपावस्तौ पापग्रहसमन्वितौ।
जन्मप्रभृतिदारिद्रं भिक्षान्नं लभते नरः
dhanalābhādhipāvastau pāpagrahasamanvitau|
janmaprabhṛtidāridraṃ bhikṣānnaṃ labhate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनलाभाधिपौ = धन और लाभ के दोनों अधिपति (2 + 11); अस्तौ = वे दोनों (अस्तौ = तौ; पाठ-भेद संभव — “अस्तौ” vs “तौ”); पापग्रहसमन्वितौ = पापग्रहों से संयुक्त; जन्मप्रभृति = जन्म से लेकर; दारिद्र्य = दरिद्रता; भिक्षान्न = भिक्षा का अन्न; लभते = प्राप्त करता है; नरः = व्यक्ति

हिन्दी भावार्थ जब धन और लाभ के दोनों अधिपति पापग्रहों से समन्वित हों, तो शास्त्र कहता है — वह नर जन्म से दरिद्रता भोगता है और भिक्षान्न पाता है। यह 13.6 की पाप-शाखा का तीव्र फल-कथन है: केवल “निर्धन” नहीं, दीर्घकालिक दारिद्र्य-लक्षण। हम इसे भय या दबाव के रूप में नहीं पढ़ते — केवल पाठ का वर्णनात्मक फल; योग-बल, दशा, और शेष कुंडली बिना एक पंक्ति को पूर्ण चित्र नहीं मानते।

English rendering “When those two lords of wealth and gain are accompanied by malefic planets, the text states that from birth the person experiences poverty and obtains food by begging.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तीव्र अशुभ 2–11 योग)। शर्त: धनेश ∧ लाभेश दोनों पाप-समन्वित (युति; दृष्टि का विस्तार 13.6 से अनुमत)। फल-शब्द: जन्मप्रभृति दारिद्र्य, भिक्षान्न — शास्त्र का वर्णनात्मक चरम-फल; अंकीय माप नहीं। व्याख्या-अनुशासन: “शास्त्र कहता है”; निश्चित भाग्य या चिकित्सा/आर्थिक भविष्यवाणी नहीं; दशा-भुक्ति और अन्य बल बिना केवल लक्षण-सूची।

13.8
षष्ठेऽष्टमे व्यये वाऽपि धनलाभाधिपौ यदि।
लाभे कुजोधने राहू राजदण्डाद्‌ धनक्षयः
ṣaṣṭhe'ṣṭame vyaye vā'pi dhanalābhādhipau yadi|
lābhe kujodhane rāhū rājadaṇḍād‌ dhanakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे = छठे भाव में; अष्टमे = आठवें भाव में; व्यये = व्यय/द्वादश भाव में; धनलाभाधिपौ = धन (द्वितीय) और लाभ (एकादश) के अधिपति; लाभे कुजः = एकादश में मंगल; धने राहुः = द्वितीय में राहु; राजदण्डात् = राजकीय दण्ड/शाही आघात से; धनक्षयः = धन का क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि धन और लाभ के अधिपति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों, और एकादश में मंगल तथा द्वितीय में राहु स्थित हों, तो राजदण्ड से धन-क्षय का फल कहा गया है। यहाँ षड्-अष्ट-व्यय की दुष्ट स्थिति को धन-लाभेशों पर, तथा कुज-राहु की विशिष्ट भाव-स्थिति को जोड़कर फल-कथन किया गया है। यह फल-वाक्य है, न कि सुनिश्चित घटना।

English rendering The text states: if the lords of the 2nd (wealth) and 11th (gains) occupy the 6th, 8th, or 12th, and Mars stands in the 11th with Rāhu in the 2nd, loss of wealth from royal punishment is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दुष्ट भाव-त्रय (6/8/12) में धन-लाभेशों की स्थिति और “लाभ में कुज + धन में राहु” — यह भाव-स्वामि-मानचित्र की गुणात्मक जाँच है, अंकीय सूत्र नहीं।

13.9
लाभे जीवे धने शुक्रे धनेशे शुभसंयुते।
व्यये च शुभसंयुक्ते धर्मकार्ये धनव्ययः
lābhe jīve dhane śukre dhaneśe śubhasaṃyute|
vyaye ca śubhasaṃyukte dharmakārye dhanavyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभे जीवे = एकादश में गुरु; धने शुक्रे = द्वितीय में शुक्र; धनेशे शुभसंयुते = धन-स्वामी शुभ-ग्रह से युक्त; व्यये शुभसंयुक्ते = द्वादश में भी शुभ-युति; धर्मकार्ये = धर्म/पुण्य-कार्य में; धनव्ययः = धन का व्यय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभ भाव में गुरु हो, धन भाव में शुक्र हो, धन का स्वामी शुभ-ग्रह से युक्त हो, और व्यय भाव भी शुभ-संयुक्त हो, तो धन का व्यय धर्म-कार्य में होता है। यहाँ व्यय को निषेध नहीं, बल्कि शुभ-संयोग से धर्मोन्मुख व्यय कहा गया है। फल-वाक्य को शास्त्र-कथन के रूप में ही पढ़ें।

English rendering The text states: with Jupiter in the 11th, Venus in the 2nd, the 2nd-lord joined by a benefic, and the 12th likewise with a benefic, expenditure of wealth is directed toward dharmic or meritorious works.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-स्थितियाँ (11 = गुरु, 2 = शुक्र) और शुभ-युति की शर्तें गुणात्मक योग-रूप हैं; कोई दशा-वर्ष या बलांक नहीं दिया गया।

13.10
स्वभोच्चस्थे धनाधीशे जातको जनपोषकः।
परोपकारी ख्यातश्च विज्ञेयो द्विजसत्तम
svabhoccasthe dhanādhīśe jātako janapoṣakaḥ|
paropakārī khyātaśca vijñeyo dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वभ-उच्चस्थे = स्वराशि अथवा उच्च राशि में स्थित; धनाधीशे = द्वितीयेश; जातकः = जातक; जनपोषकः = लोगों का पालन-पोषण करने वाला; परोपकारी = परोपकारी; ख्यातः = यशस्वी; विज्ञेयः = जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ जब द्वितीयेश अपनी स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक जन-पोषक, परोपकारी और यशस्वी होता है — हे द्विजश्रेष्ठ, ऐसा जानो। स्व/उच्च की गरिमा को धन-भाव के शुभ फल का हेतु बताया गया है।

English rendering When the 2nd-lord is in its own sign or exaltation, the native is — the text states — a nourisher of people, benevolent, and renowned; know this, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गरिमा-शर्त गणनीय है: स्व = ग्रह-स्वामित्व की राशि; उच्च = प्रत्येक ग्रह का पिन-किया उच्च-बिन्दु। यह स्थान-बल (उच्च-बल/स्वक्षेत्र-बल) का निर्धारक है। "जनपोषक/परोपकारी/यशस्वी" फल शास्त्र का कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्व/उच्च" कोई अस्पष्ट विशेषण नहीं — यह हमारे ṣaḍbala इंजन में स्थान-बल (sthāna-bala) का ठीक-ठीक गणनीय घटक है (dossier §4): उच्च-बल व स्वक्षेत्र-बल रूप/विरूप में जुड़ते हैं (1 रूप = 60 विरूप)। गरिमा = संख्या; उससे निकलने वाला "परोपकारी/यशस्वी" फल = शास्त्र का कथन, जिसे हम गणना से अलग रखते हैं।

13.11
स्थिते पारावतांशादौ धनेशे शुभसंयुते।
तद्‌गृहे सर्वसम्पत्तिर्विनाऽयासेन जायते
sthite pārāvatāṃśādau dhaneśe śubhasaṃyute|
tad‌gṛhe sarvasampattirvinā'yāsena jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारावतांशादौ = पारावतांश आदि (वर्ग-वैशिष्ट्य/अंश-श्रेणी) में स्थित; धनेशे = धन-स्वामी; शुभसंयुते = शुभ-ग्रह से युक्त; तद्‌गृहे = उस (धन) गृह में; सर्वसम्पत्तिः = समस्त सम्पत्ति; विना आयासेन = बिना परिश्रम/आयास के; जायते = उत्पन्न होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब धनेश पारावतांश आदि उच्च अंश-श्रेणियों में स्थित हो और शुभ-युक्त हो, तो उस धन-गृह में बिना आयास के सर्व-सम्पत्ति का उदय कहा गया है। “पारावतांशादौ” षोडश-वर्गों में ग्रह की उत्कृष्ट अंश-स्थिति की परम्परागत श्रेणी-नामों की ओर संकेत करता है। फल को शास्त्र-कथन समझें, सुनिश्चित भाग्य नहीं।

English rendering The text states: when the 2nd-lord occupies pārāvata-aṃśa and the like, and is joined by a benefic, all prosperity arises in that house without toil.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-अंश श्रेणी की गणना षोडश-वर्ग (D1…D60) पर आधारित है: प्रत्येक वर्ग 30° राशि का निश्चित समान खण्डों में विभाजन है; ग्रह की प्रत्येक वर्ग में स्व/उच्च/मित्र आदि स्थिति गिनकर अंश-नाम (पारिजात, उत्तम, गोपुर, सिंहासन, पारावत, देवलोक, …) निर्धारित होते हैं। श्लोक स्वयं गणना-सूत्र नहीं लिखता — वह “पारावतांश आदि” जैसी उच्च श्रेणी की शर्त मात्र देता है। सम्पूर्ण षोडश-वर्ग-योजना: D1, D2 (होरा), D3, D4, D7, D9, D10, D12, D16, D20, D24, D27, D30, D40, D45, D60 — प्रत्येक = शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन।

उदाहरण (worked example) मान लें धनेश शुक्र, भचक्रीय रेखांश λ = 350° (मीन ~20°; शुक्र का उच्च)। नवमांश (D9): प्रत्येक राशि 30° ÷ 9 = 3°20′; मीन के नवमांश चर-क्रम से चलते हैं — दिए गए λ पर D9-राशि ज्ञात कर स्व/उच्च जाँचें। इसी प्रकार अन्य वर्गों में स्व/उच्च की गिनती बढ़ाकर यदि पारम्परिक पारावत-श्रेणी की देहली पार हो और शुक्र शुभ-युक्त हो, तो श्लोक की शर्त पूरी मानी जाती है। (अयनांश: जिस गणिटीय कुण्डली में λ लिया गया हो, वही अयनांश घोषित करें — संख्या अयनांश-निर्भर है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन प्रत्येक D-वर्ग को 30° के समान चापों में बाँटकर रेखांश पर निर्धारक मॉड्यूलर नियम लागू करता है — D1 से D60 तक। “पारावतांश” जैसी श्रेणी उसी वर्ग-मैट्रिक्स की उच्च-स्थिति-गिनती का नाम है; हम गणित को वर्ग-विभाजन से अलग रखते हैं और फल को केवल शास्त्र-कथन मानते हैं।

13.12
नेत्रेशे बलसंयुक्ते शोभनाक्षो भवेन्नरः।
षष्ठाष्टमव्ययस्थे च नेत्रवैकल्यवान्‌ भवेत्‌
netreśe balasaṃyukte śobhanākṣo bhavennaraḥ|
ṣaṣṭhāṣṭamavyayasthe ca netravaikalyavān‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नेत्रेशे = नेत्र-भाव के स्वामी (द्वितीय भाव दक्षिण-नेत्र का कारक); बलसंयुक्ते = बल से युक्त; शोभनाक्षः = सुन्दर/स्वस्थ नेत्रों वाला; भवेत् नरः = मनुष्य होता है; षष्ठ-अष्टम-व्ययस्थे = 6/8/12 में स्थित; नेत्रवैकल्यवान् = नेत्र-दोष वाला।

हिन्दी भावार्थ जब नेत्रेश (द्वितीयेश, जो दक्षिण-नेत्र का कारक है) बल से युक्त हो, तब शास्त्र कहता है कि मनुष्य सुन्दर नेत्रों वाला होता है; और वही 6/8/12 में स्थित हो तो नेत्र-सम्बन्धी दोष का कथन है। यह चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं — शास्त्र का अंगविषयक मत मात्र, बिना भय।

English rendering When the lord of the eye (the 2nd-lord) is endowed with strength, the man has fine eyes; placed in the 6th, 8th, or 12th, the text states, he has an eye-defect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो गणनीय राशियाँ: (क) "बल" = षड्बल — मापनीय शक्ति, प्रति-ग्रह देहली से तुलित; (ख) दुःस्थान-सेट = {6, 8, 12}। नेत्र-सम्बन्धी फल शास्त्र का कथन है, हमारी चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं; कोई भय-कथन या उपाय-दबाव नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलसंयुक्त" यहाँ अस्पष्ट नहीं — षड्बल (dossier §4) का ठीक-ठीक निकाला मान है: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — छहों रूप/विरूप में जुड़कर (1 रूप = 60 विरूप) प्रति-ग्रह देहली से तुलित होते हैं। "बल" = संख्या; उससे जोड़ा गया अंग-फल = शास्त्र का वचन। हमारा अनुशासन दोनों को पृथक् रखता है।

13.13
धनेशे पापसंयुक्ते धने पापसमन्विते।
पिशुनोऽसत्यवादी च वातव्याधिसमन्वितः
dhaneśe pāpasaṃyukte dhane pāpasamanvite|
piśuno'satyavādī ca vātavyādhisamanvitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीयेश (2L); पापसंयुक्ते = पाप ग्रह से युक्त; धने = द्वितीय भाव में; पापसमन्विते = पाप ग्रह के साथ; पिशुनः = चुगलखोर/निन्दक; असत्यवादी = मिथ्याभाषी; वातव्याधिसमन्वितः = वात-व्याधि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीयेश पाप-ग्रह से युक्त हो और द्वितीय भाव में भी पाप ग्रह हो, तो जातक को निन्दक, असत्यवादी और वात-रोग से पीड़ित कहा गया है। धन-भाव यहाँ वाणी और कुटुम्ब का भाव भी है, इसलिए फल वाणी-दोष के रूप में आया है — यह पाठ का कथन है, निदान नहीं।

English rendering The text states that when the second lord is joined by a malefic and a malefic also occupies the second house, the native is described as a slanderer, untruthful, and afflicted by disorders of vāta.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त-समुच्चय: पाप ∈ युति(2L) ∧ पाप ∈ भाव 2; कोई अंश-गणना नहीं।

अध्यायः 14

सहजभावफलाध्यायः

15 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): सहजभाव—तृतीय भाव—के फल का विवेचन है। पराशर यहाँ विक्रम, सहोदर-संबन्ध और भाव-स्वामी–ग्रह–क्षेत्र की युति-दृष्टि से सहज-फल की शास्त्रोक्त रीति बताते हैं: सौम्य-योग में भ्रातृमान् विक्रमी नर का कथन; भ्रातृभावेश का भौम-संयोग या भ्रातृ-क्षेत्र-गति; स्त्री-पुं ग्रह और स्त्री-पुं राशि से भगिनी–भ्राता का विवेक; मिश्र-योग में बल-अबल से मिश्र-फल का निर्णय। पाप-योग/पाप-क्षेत्र की कठोर फल-भाषा भी पाठ में है—उसे हम फल-कथन के रूप में रखते हैं, नियति या भय के रूप में नहीं। पंद्रह श्लोकों में सहजभाव की संरचना, संकेत और निर्णय-क्रम एक साथ बैठते हैं।

For the English reader: Adhyāya 14 turns from the general bhāva map to the sahaja (third) house: courage, effort, and the sibling-field as the śāstra frames them. Parāśara sets conditions—benefic contact, Mars with the third lord or occupation of a brother-sign, feminine/masculine graha and rāśi for sister or brother, and mixed cases settled by relative strength—then reports the classical phala for afflicted configurations without converting them into fate or fear. Read it as a compact rule-set for how the third house is said to speak, not as a verdict on anyone’s life.

मुख्य गणित/तकनीक:
- मुख्यतः फल/वर्णन-अध्याय (सहज/तृतीय भाव का शास्त्रोक्त फल)
- निर्णय-संकेत: मिश्र-योग में बल–अबल (`बलाबलविनिर्णयात्`) से मिश्र-फल—पूर्ण षड्बल-सूत्र यहाँ नहीं, केवल तुलनात्मक बल का निर्देश
- वर्गीकरण-कुंजियाँ: सौम्य/पाप योग-दृष्टि; स्त्रीग्रह–पुंग्रह × स्त्री/पुं राशि; भ्रातृभावेश ↔ भ्रातृभाव / भ्रातृ-क्षेत्र

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

14.1
अथ विक्रमभावस्य फलं वक्ष्यामि भो द्विज।
सहजे सौम्ययुग्‌दृष्टे भ्रातृमान्‌ विक्रमी नरः
atha vikramabhāvasya phalaṃ vakṣyāmi bho dvija|
sahaje saumyayug‌dṛṣṭe bhrātṛmān‌ vikramī naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; विक्रमभावस्य = तृतीय भाव (पराक्रम / सहज / भ्रातृ) का; फलं = फल; वक्ष्यामि = कहूँगा; भो द्विज = हे द्विज; सहजे = तृतीय भाव में; सौम्ययुग्‌दृष्टे = शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट; भ्रातृमान् = भाई-युक्त; विक्रमी = पराक्रमी / साहसी; नरः = पुरुष।

हिन्दी भावार्थ पराशर अब विक्रमभाव—अर्थात् तृतीय भाव—के फल कहने का उपक्रम करते हैं। शास्त्र का कथन है कि जब सहज भाव सौम्य ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक भ्रातृ-सम्पन्न और विक्रमी कहा जाता है। यहाँ “सौम्य” का अभिप्राय शुभग्रह-संयोग/दृष्टि से है; “विक्रम” तृतीय भाव के पराक्रम-पक्ष को भी स्पर्श करता है। यह अध्याय-प्रवेश का फल-सूत्र है, न कि स्वतंत्र गणना-नियम।

English rendering Parāśara now begins the results of the vikrama-bhāva (the third house). The text states that when the third is joined or aspected by benefics, the native is said to have brothers and to be valorous.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अध्याय-उद्घाटन। तृतीय भाव (सहज/भ्रातृ/विक्रम) = लग्न से तीसरा राशि-स्थान; “सौम्ययुग्‌दृष्टे” = शुभ ग्रह का तृतीय में योग या उस पर दृष्टि—यह स्थिति-नियम है, अंश-भाग का समीकरण नहीं।

14.2
सभौमो भ्रातृभावेशो भ्रातृभावं प्रपश्यति।
भ्रात्र्क्षेत्रगतो वाऽपि भ्रातृभावं विनिर्दिशेत्‌
sabhaumo bhrātṛbhāveśo bhrātṛbhāvaṃ prapaśyati|
bhrātrkṣetragato vā'pi bhrātṛbhāvaṃ vinirdiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सभौमो = मंगल के साथ; भ्रातृभावेशो = भ्रातृ-भाव (तृतीय) का स्वामी; भ्रातृभावं = तृतीय भाव को; प्रपश्यति = देखता है; भ्रात्र्क्षेत्रगतो = भ्रातृ-क्षेत्र (तृतीय / भ्रातृ-संबंधी राशि) में स्थित; वाऽपि = अथवा; भ्रातृभावं = भ्रातृ-भाव; विनिर्दिशेत् = निश्चित रूप से निर्दिष्ट करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब भ्रातृभावेश मंगल के साथ हो, अथवा भ्रातृभावेश भ्रातृभाव को देखे, अथवा स्वयं भ्रातृ-क्षेत्र में स्थित हो, तब भ्रातृ-भाव का बल/उपस्थिति निर्दिष्ट की जाए। यहाँ कुज भ्रातृ-कारक के रूप में तृतीयेश के साथ जोड़ा गया है। यह योग-संकेत है: कारक + भावेश + भाव—तीनों की पारस्परिक स्थिति से भ्रातृ-विचार का आधार बनता है।

English rendering The text states that when the lord of the third is with Mars, or aspects the third house, or occupies the brother-sign/third-field, one should firmly indicate the third house (as operative for siblings).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-स्थिति नियम। व्यावहारिक जाँच (D1, पूर्ण-भाव या राशि-भाव—घोषित कन्वेंशन): (1) तृतीयेश ☌ मंगल; या (2) तृतीयेश → तृतीय पर दृष्टि (ग्रह-दृष्टि नियम अनुसार); या (3) तृतीयेश ∈ भ्रातृ-क्षेत्र। इनमें से कोई एक सत्य हो तो शास्त्र “भ्रातृभावं विनिर्दिशेत्” कहता है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; तृतीय = मिथुन; तृतीयेश = बुध। यदि बुध कन्या में हो और मंगल भी कन्या में (बुध ☌ मंगल), तो शर्त (1) पूर्ण—शास्त्र के अनुसार भ्रातृभाव निर्दिष्ट। (राशि-भाव; अयनांश फल-स्थिति नहीं बदलता, केवल राशि-निर्देश को स्थिर रखता है।)

14.3
पापयोगेन तौ पापक्षेत्रयोगेन वा पुनः।
उत्पाट्य सहजान्‌ सद्यो निहन्तरौ न संशयः
pāpayogena tau pāpakṣetrayogena vā punaḥ|
utpāṭya sahajān‌ sadyo nihantarau na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापयोगेन = पाप-ग्रह योग से; तौ = वे दोनों (भ्रातृभावेश एवं संबंधित कारक/योग); पापक्षेत्रयोगेन = पाप-क्षेत्र (मालाभ/पाप राशि-स्थान) योग से; वा पुनः = अथवा फिर; उत्पाट्य = उखाड़कर / नष्ट करके; सहजान् = सहज-बन्धुओं को; सद्यो = शीघ्र; निहन्तरौ = मारने वाले / विनाशक; न संशयः = संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का कठोर फल-कथन है—जब वे (भ्रातृ-संबंधी योग के अंग) पाप-योग से युक्त हों, अथवा पाप-क्षेत्र के योग में पड़ें, तो सहज-बन्धुओं का शीघ्र विनाश सूचित होता है; “न संशयः” पाठ की निश्चितता का शब्द है। यह भय-व्यापार नहीं—पाठ का अपना फल-वाक्य है; आधुनिक अध्ययन में इसे शास्त्र-कथन के रूप में ही रखा जाए। पाठ-भेद संभव जहाँ “तौ” का सटीक संदर्भ टीका-परंपरा में भिन्न पढ़ा जाता हो।

English rendering The text states that by malefic conjunction, or again by association with malefic fields, those two (the sibling-related factors) quickly destroy the co-borns—there is no doubt, in the śāstra’s own wording.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप-योग / पाप-क्षेत्र)। “पाप” यहाँ सामान्यतः क्रूर ग्रह-संयोग/दृष्टि; “पापक्षेत्र” भाव-दृष्टि में 6/8/12 आदि दुःस्थान या पाप-राशि-स्थित योग—टीका-परंपरा से तय; अंश-गणित नहीं। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

14.4
स्त्रीग्रहो भ्रातृभावेशः स्त्रीग्रहो भ्रातृभावगः।
भगिनी स्यात्‌ तथा भ्राता पुंगृहे पुंग्रहो यदि
strīgraho bhrātṛbhāveśaḥ strīgraho bhrātṛbhāvagaḥ|
bhaginī syāt‌ tathā bhrātā puṃgṛhe puṃgraho yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीग्रहो = स्त्री-ग्रह (चंद्र, शुक्र; कहीं बुध-मिश्र); भ्रातृभावेशः = तृतीयेश; स्त्रीग्रहो भ्रातृभावगः = स्त्री-ग्रह तृतीय में स्थित; भगिनी = बहन; स्यात् = हो; तथा = तथा; भ्राता = भाई; पुंगृहे = पुं-राशि में; पुंग्रहो = पुं-ग्रह; यदि = यदि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र लिंग-निर्णय का सरल नियम देता है—यदि भ्रातृभावेश स्त्री-ग्रह हो, अथवा स्त्री-ग्रह भ्रातृभाव में हो, तो भगिनी कही जाए; यदि पुं-ग्रह पुं-राशि में हो तो भ्राता। यह भाव + ग्रह-लिंग + राशि-लिंग का संयोजन है। मिश्र स्थितियाँ अगले श्लोक में स्पष्ट होती हैं; यहाँ शुद्ध स्त्री/पुं संकेत है।

English rendering The text states: if the third-lord is a feminine planet, or a feminine planet occupies the third, a sister is indicated; and if a masculine planet is in a masculine sign, a brother is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लिंग-मैपिंग नियम (गणना नहीं, वर्गीकरण):
- स्त्री-ग्रह (पारंपरिक सूची): चंद्र, शुक्र (बुध कभी नपुंसक/मिश्र—कन्वेंशन घोषित करें)।
- पुं-ग्रह: सूर्य, मंगल, गुरु (शनि अक्सर नपुंसक/पाप—परंपरा-भेद; पाठ-भेद संभव)।
- पुं-राशि: मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ; स्त्री-राशि: वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन।
निर्णय-तालिका: (स्त्री-ग्रह = तृतीयेश) ∨ (स्त्री-ग्रह ∈ तृतीय) → भगिनी-संकेत; (पुं-ग्रह ∈ पुं-राशि) → भ्राता-संकेत।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क; तृतीय = कन्या; तृतीयेश = बुध। यदि तृतीयेश को स्त्री-पक्ष में न लेकर, तृतीय में शुक्र हो → “स्त्रीग्रहो भ्रातृभावगः” → शास्त्र भगिनी कहता है। यदि तृतीयेश सूर्य हो और सिंह (पुं) में हो → पुंग्रह-पुंगृह → भ्राता-संकेत।

14.5
मिश्रे मिश्रफलं वाच्यं बलाबलविनिर्णयात्‌।
मृतौ कुजतृतीयेशौ सहोदरविनाशकौ
miśre miśraphalaṃ vācyaṃ balābalavinirṇayāt‌|
mṛtau kujatṛtīyeśau sahodaravināśakau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिश्रे = शुभ-अशुभ मिश्रित होने पर; मिश्र-फलम् वाच्यम् = मिश्रित फल कहना; बल-अबल-विनिर्णयात् = बल-निर्बल के निर्णय से; मृतौ = मृत-अवस्था में (द्विवचन); कुज-तृतीयेशौ = मंगल और तृतीयेश (द्वंद्व, द्विवचन); सहोदर-विनाशकौ = सहोदरों के नाशक (द्विवचन)।

हिन्दी भावार्थ जब भाव में शुभ और पाप दोनों का मिश्रण हो, तब बल-निर्बल के तुलनात्मक निर्णय से मिश्रित फल कहना चाहिए। और शास्त्र कहता है — मंगल तथा तृतीयेश जब 'मृत' (बालादि) अवस्था में हों, तब वे सहोदर के लिए अशुभ माने जाते हैं। यहाँ निर्णय का आधार भावुकता नहीं, बल-गणना है।

English rendering Where influences are mixed, a mixed result is to be stated by weighing strength against weakness; and when Mars and the 3rd lord are in the "dead" (mṛta) state, the text calls them destroyers of the co-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बल-अबल-विनिर्णय = ग्रह-बल की सापेक्ष तुलना; 'मृत' = बालादि-अवस्था की पाँचवीं (बाल → कुमार → युवा → वृद्ध → मृत)। ग्रह-बल षड्बल में तौला जाता है: 1 रूप = 60 विरूप; मिश्र-फल = शुभ-बल बनाम पाप-बल का सापेक्ष परिमाण।

उदाहरण (worked example) मान लें तृतीयेश का षड्बल-योग = 252 विरूप = 4.2 रूप, कारक-मंगल का = 360 विरूप = 6.0 रूप। बलवान् (मंगल = 6.0) का पक्ष मिश्र-फल में प्रधान; तुलना विरूप-में सटीक होनी चाहिए (== ), सहिष्णुता-बैंड से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बल-अबल-विनिर्णय" सीधे षड्बल (BPHS Ch.27) से जुड़ता है — हमने sthāna/dig/kāla/ceṣṭā/naisargika/dṛg छह बलों को रूप-विरूप में जोड़ा (1 रूप = 60 विरूप) और प्रति-ग्रह देहली-मान से तुलना की; यह गणनीय है, व्याख्यात्मक नहीं। 'मृत' बालादि-अवस्था भी नियत नियम है — श्लोक की उक्ति फल-वचन है, नियति नहीं।

14.6
केन्द्रत्रिकोणगे वाऽपि स्वोच्चमित्रस्ववर्गगे।
कारके सहजेशे या भ्रातृसौख्यं विनिर्दिशेत्‌
kendratrikoṇage vā'pi svoccamitrasvavargage|
kārake sahajeśe yā bhrātṛsaukhyaṃ vinirdiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रत्रिकोणगे = केन्द्र (१,४,७,१०) या त्रिकोण (१,५,९) में स्थित; वाऽपि = अथवा; स्वोच्चमित्रस्ववर्गगे = स्व-राशि, उच्च, मित्र-राशि, अथवा स्व-वर्ग में; कारके = (भ्रातृ-)कारक में; सहजेशे = सहजेश (तृतीयेश) में; या = जो; भ्रातृसौख्यं = भ्रातृ-सुख; विनिर्दिशेत् = निर्दिष्ट करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शुभ फल का स्थान-नियम देता है—जब कारक (भ्रातृ-कारक मंगल) और सहजेश केन्द्र या त्रिकोण में हों, अथवा स्व/उच्च/मित्र/स्ववर्ग में हों, तब भ्रातृ-सौख्य निर्दिष्ट हो। “स्ववर्ग” यहाँ षोडशवर्ग में स्वांश/स्व-भाग की स्थिति का संकेत है—वर्ग-गणना का सूत्र नहीं, फल-योग की शर्त। दोनों का सुस्थान भ्रातृ-सुख का शास्त्रीय संकेत है।

English rendering The text states that when the significator and the third-lord occupy a kendra or trikoṇa, or stand in own, exaltation, friendly, or own-varga dignity, brotherly happiness is to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-समुच्चय (D1 + वर्ग-गरिमा):
- केन्द्र = {१, ४, ७, १०} लग्न से; त्रिकोण = {१, ५, ९}।
- स्व = स्व-राशि; उच्च = ग्रह-उच्च राशि; मित्र = नैसर्गिक/तात्कालिक मित्र-राशि (कन्वेंशन घोषित); स्ववर्ग = संबंधित वर्ग-चक्र में स्व-स्वामित्व वाला भाग (D9 आदि—कौन-सा वर्ग प्रसंग में लिया जाए, टीका-परंपरा से; पाठ स्वयं विशिष्ट Dₙ नहीं बाँधता)।
शर्त (सार): (कारक ∧ सहजेश) ∈ केन्द्र∪त्रिकोण अथवा गरिमा ∈ {स्व, उच्च, मित्र, स्ववर्ग} → शास्त्र “भ्रातृसौख्यं” कहता है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मकर; तृतीय = मीन; सहजेश = गुरु; भ्रातृ-कारक = मंगल। यदि गुरु कर्क (उच्च) केन्द्र/सुस्थान में और मंगल मेष (स्व) पंचम (त्रिकोण) में हो → दोनों गरिमा+सुस्थान → शास्त्र भ्रातृ-सौख्य निर्दिष्ट करता है। (राशि-भाव; वर्ग-जाँच अलग: जैसे D9 में स्वांश हो तो “स्ववर्गगे” पक्ष और पुष्ट।)

14.7
भ्रातृभे बुधसंयुक्ते तदीशे चन्द्रसंयुते।
कारके मन्दसंयुक्ते भगिन्येकाग्रतो भवेत्‌
bhrātṛbhe budhasaṃyukte tadīśe candrasaṃyute|
kārake mandasaṃyukte bhaginyekāgrato bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृभे = भ्रातृ-राशि/तृतीय में; बुधसंयुक्ते = बुध से युक्त; तदीशे = उसके स्वामी (तृतीयेश) में; चन्द्रसंयुते = चंद्र से युक्त; कारके = कारक (मंगल) में; मन्दसंयुक्ते = शनि से युक्त; भगिनी = बहन; एका = एक; अग्रतः = आगे / ज्येष्ठा; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ यह विशिष्ट योग-फल है। शास्त्र कहता है—जब भ्रातृ-भाव बुध-युक्त हो, तृतीयेश चंद्र-युक्त हो, और कारक शनि-युक्त हो, तब एक अग्रजा भगिनी होती है। तीन शर्तों का एक साथ पूरा होना इस श्लोक का पूरा पाठ है; आंशिक योग का फल यहाँ नहीं खोला गया। “अग्रतः” ज्येष्ठता का संकेत है—संख्या “एका” स्पष्ट है।

English rendering The text states that when the brother-sign (third) is joined by Mercury, its lord is joined by the Moon, and the significator is joined by Saturn, there is one elder sister.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तर्क-योग (त्रि-शर्त AND):
1. बुध ∈ भ्रातृ-भ (तृतीय भाव/राशि);
2. चंद्र ☌ तृतीयेश;
3. शनि ☌ कारक (भ्रातृ-कारक = मंगल)।
तीनों सत्य ⇒ शास्त्र: भगिनी-संख्या = १, ज्येष्ठता = अग्रतः। कोई वर्ष/अंश-सूत्र नहीं—केवल युति-स्थिति।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृष; तृतीय = कर्क; तृतीयेश = चंद्र। शर्त २ के लिए तृतीयेश स्वयं चंद्र है—चंद्र-संयोग “स्वयं” से पूर्ण माना जाए या अतिरिक्त युति माँगी जाए, यह पाठ-संकोच है (पाठ-भेद/टीका-भेद संभव)। स्वच्छ उदाहरण: लग्न = मिथुन; तृतीय = सिंह; तृतीयेश = सूर्य। सिंह में बुध, सूर्य के साथ चंद्र (सूर्य ☌ चंद्र), मंगल ☌ शनि → तीनों शर्तें पूर्ण → शास्त्र “भगिन्येकाग्रतो भवेत्” कहता है।

14.8
पश्चात्‌ सहोदरोऽप्येकस्तृतीयस्तु मृतो भवेत्‌।
कारके राहुसंयुक्ते सहजेशे तु नीचगे
paścāt‌ sahodaro'pyekastṛtīyastu mṛto bhavet‌|
kārake rāhusaṃyukte sahajeśe tu nīcage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पश्चात् = पीछे / बाद में; सहोदरः = सहोदर (एक गर्भ से जन्मा भाई-बहन); एकः = एक मात्र; तृतीयः = तीसरा; मृतः भवेत् = मृत हो; कारके = कारके (सहजाधिष्ठित कारक—यहाँ भ्रातृ-कारक मंगल के सन्दर्भ में); राहु-संयुक्ते = राहु से युक्त; सहजेशे = सहजभाव (तृतीय) के स्वामी; नीचगे = नीच राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कारक राहु से युक्त हो और सहजेश नीच में पड़ा हो, तब जातक के पीछे (आगे के क्रम में) सहोदर का स्वरूप एक-मात्र रह जाता है, और तीसरा सहोदर मृत कहा जाता है। यह सहज-भाव फल का निर्देश है—कारक-दोष और सहजेश-नीचता के योग से सहोदर-संख्या और उनकी स्थिति का शास्त्रीय कथन। पाठ-भेद संभव; “पश्चात्” का ठीक काल-क्रम विभिन्न टीकाओं में थोड़ा भिन्न पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that when the kāraka is conjoined with Rāhu and the lord of the third house is debilitated, only one co-born remains later, and the third is said to be deceased. This is a phala-statement on sibling count under that planetary configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-स्वामी, कारक और राहु-योग की उपस्थिति/नीचता गुणात्मक दशा है; कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-योग या दशा-वर्ष नहीं दिया गया।

14.9
पश्चात्‌ सहोदराभावं पूर्वं तु तत्त्रयं वदेत्‌।
भ्रातृस्थानाधिपे केन्द्रे कारके तत्‌त्रिकोणगे
paścāt‌ sahodarābhāvaṃ pūrvaṃ tu tattrayaṃ vadet‌|
bhrātṛsthānādhipe kendre kārake tat‌trikoṇage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पश्चात् = बाद में; सहोदर-अभावम् = सहोदरों का अभाव; पूर्वं = पहले; तत्-त्रयम् = उन तीनों को; वदेत् = कहे / बतलाए; भ्रातृ-स्थान-अधिपे = भ्रातृ-स्थान (तृतीय भाव) के अधिपति; केन्द्रे = केन्द्र में (1, 4, 7, 10); कारके = कारक में; तत्-त्रिकोणगे = उसके (कारक के) त्रिकोण में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भ्रातृस्थानाधिप केन्द्र में हो और कारक तत्-त्रिकोण में स्थित हो, तब पहले तीन सहोदरों का कथन करें, और पीछे सहोदरों का अभाव कहें। अर्थात् सहोदर-संख्या का आरम्भ तीन से जुड़ा है, पर उत्तरकाल में अभाव का फल भी उसी योग से जोड़ा गया है। यह केन्द्र-त्रिकोण स्थिति का सहज-फल है, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the lord of the sibling-house is in a kendra and the kāraka occupies a trikoṇa, one should declare three co-borns earlier and later an absence of co-borns. The verse encodes a qualitative house-placement rule, not a numeric algorithm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 1, 5, 9 (कारक से या स्व-त्रिकोण—पाठानुसार); कोई डिग्री-सूत्र या बिन्दु-गणना नहीं।

14.10
जीवेन सहिते चोच्चे ज्ञेया द्वादश सोदराः।
तत्र ज्येष्ठद्वियं तद्वज्जातकाच्च तृतीयकम्‌
jīvena sahite cocce jñeyā dvādaśa sodarāḥ|
tatra jyeṣṭhadviyaṃ tadvajjātakācca tṛtīyakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवेन सहिते = गुरु से युक्त; च उच्चे = और उच्च में; ज्ञेयाः = जानने योग्य; द्वादश = बारह; सोदराः = सहोदर; तत्र = उनमें; ज्येष्ठ-द्वयम् = दो ज्येष्ठ (बड़े); तद्वत् = उसी प्रकार; जातकात् = जातक से; च तृतीयकम् = तीसरा (अर्थात् जातक तृतीय-जन्म)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (प्रसंगानुगत कारक/सहज-सम्बद्ध ग्रह) गुरु से युक्त तथा उच्च हो तो बारह सहोदर जानने चाहिए। उनमें दो ज्येष्ठ हों, और जातक क्रम में तीसरा कहा जाए—अर्थात् दो बड़े भाइयों-बहनों के बाद जातक का स्थान तृतीय माना गया है। यह उच्च-गुरु-योग का सहोदर-संख्या फल है; “द्वादश” शब्द-संख्या ही है, गुणात्मक कल्पना नहीं।

English rendering The text states that when [the relevant factor] is conjoined with Jupiter and in exaltation, twelve co-borns are to be known. Among them two are elder, and the native is reckoned as the third-born. The figure twelve is stated directly by the śāstra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (संख्या-निर्देश सहित)। दिए गए स्थिरांक: सहोदर-संख्या = 12; ज्येष्ठ = 2; जातक-क्रम = 3। उच्च-स्थान ग्रह-विशेष नियमों से निर्धारित होता है (उदा. गुरु = कर्क), पर श्लोक स्वयं उच्च-सूत्र नहीं देता।

14.11
सप्तमं नवमं चैव द्वादशं च मृतं वदेत्‌।
शेषाः सहोदराः षड्‌ वै भवेयुर्दीर्घजीवनाः
saptamaṃ navamaṃ caiva dvādaśaṃ ca mṛtaṃ vadet‌|
śeṣāḥ sahodarāḥ ṣaḍ‌ vai bhaveyurdīrghajīvanāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमम् = सातवाँ; नवमम् च एव = और नवाँ; द्वादशम् च = और बारहवाँ; मृतम् वदेत् = मृत कहे; शेषाः सहोदराः षड् = शेष छह सहोदर; वै = निश्चय ही; भवेयुः दीर्घ-जीवनाः = दीर्घजीवी हों।

हिन्दी भावार्थ (14.10 से आगे) सातवाँ, नवाँ और बारहवाँ सहोदर मृत कहने चाहिए; शेष छह सहोदर दीर्घजीवी होते हैं। इस प्रकार बारह में से छह की अल्पायु और छह की दीर्घायु का वचन शास्त्र देता है।

English rendering The seventh, the ninth, and the twelfth are to be declared dead; the remaining six co-born will be long-lived.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मृत सहोदर = {#1, #2 (ज्येष्ठ-द्वय, 14.10), #3 (तृतीयक), #7, #9, #12} = 6। दीर्घजीवी = शेष = {#4, #5, #6, #8, #10, #11} = 6। जाँच: 12 − 6 = 6 = षड् (श्लोकोक्त)। शब्द-संख्याएँ अंक-निष्ठ: सप्त = 7, नव = 9, द्वादश = 12, षड् = 6।

उदाहरण (worked example) 12-सहोदर-योग में मृत्यु-अनुक्रमांक {1,2,3,7,9,12}; जीवित {4,5,6,8,10,11}; योग 6 + 6 = 12 — सटीक मिलान (कोई अवशेष नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ हमारी विधि का अनुशासन-बिंदु सीधे लागू होता है — शब्द-संख्याएँ (द्वादश = 12, षड् = 6, सप्त = 7) अंक-निष्ठ रूप में डिकोड की गईं, और "मृत + जीवित = 12" का योग '=='-सटीक जाँचा गया, सहिष्णुता-बैंड से नहीं। यही वह अनुशासन है जिससे हमारे kaal-verification-oracle में अष्टकवर्ग-योग == पर परखे जाते हैं (एक बार ±3 बैंड ने असली −1 छुपा दिया था)।

14.12
व्ययेशेन युतो भौमो गुरुणा सहितोऽपि वा।
भ्रातृभावे स्थिते चन्द्रे सप्तसंख्यास्तु सोदराः
vyayeśena yuto bhaumo guruṇā sahito'pi vā|
bhrātṛbhāve sthite candre saptasaṃkhyāstu sodarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशेन = व्यय-भाव (द्वादश) के स्वामी से; युतः = युक्त; भौमः = मंगल; गुरुणा सहितः = गुरु से सहित; अपि वा = अथवा भी; भ्रातृ-भावे = भ्रातृ-भाव (तृतीय) में; स्थिते चन्द्रे = चन्द्रमा स्थित होने पर; सप्त-संख्याः = सात की संख्या वाले; तु = तो; सोदराः = सहोदर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भौम व्ययेश से युक्त हो, अथवा गुरु से सहित हो, और चन्द्र भ्रातृभाव में स्थित हो, तब सहोदर सात-संख्या वाले जानने चाहिए। यहाँ मंगल–व्ययेश/गुरु योग और तृतीयस्थ चन्द्र—दोनों स्थितियाँ एक साथ फल में बाँधी गई हैं। संख्या “सप्त” श्लोक में स्पष्ट है।

English rendering The text states that when Mars is joined with the twelfth-lord, or is also with Jupiter, and the Moon is placed in the sibling-house (third), the co-borns number seven. The verse pairs a Mars condition with a third-house Moon as the stated configuration for that count.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (संख्या-निर्देश)। श्लोकस्थ स्थिरांक: सोदर-संख्या = 7। भाव-निर्देश: व्यय = 12, भ्रातृ = 3; योग = युति (संयोग), कोई अंश-सीमा नहीं दी गई।

14.13
भ्रातृस्थाने शशियुते केवलं पुङ्‌ग्रहेक्षिते।
सहजा भ्रातरो ज्ञेयाः शुक्रयुक्तेक्षितेऽन्यथा
bhrātṛsthāne śaśiyute kevalaṃ puṅ‌grahekṣite|
sahajā bhrātaro jñeyāḥ śukrayuktekṣite'nyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृ-स्थाने = भ्रातृ-स्थान (तृतीय) में; शशि-युते = चन्द्र से युक्त; केवलम् = केवल; पुं-ग्रह-ईक्षिते = पुं-ग्रह (नर ग्रह) से दृष्ट; सहजाः = सहज (सहोदर); भ्रातरः = भाई; ज्ञेयाः = जानने योग्य; शुक्र-युक्त-ईक्षिते = शुक्र से युक्त या दृष्ट; अन्यथा = अन्यथा (अर्थात् भगिनी / स्त्री-सहोदर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भ्रातृस्थान में चन्द्र-युक्त (प्रसंगगत) तत्व जब केवल पुं-ग्रह से दृष्ट हो, तब सहज सहोदर भाई जानने चाहिए; शुक्र से युक्त या दृष्ट होने पर अन्यथा—अर्थात् भगिनी/स्त्री-सहोदर पक्ष। पुं-ग्रह और शुक्र यहाँ लिंग-संकेत के शास्त्रीय मापदण्ड हैं, आधुनिक जीव-विज्ञान नहीं। पाठ-भेद संभव—किस ग्रह/भाव पर “शशियुते” का मुख्य आश्रय है, टीकाओं में भिन्नता हो सकती है।

English rendering The text states that when, in the sibling-house, there is conjunction with the Moon and aspect only by a male planet, the co-borns are to be known as brothers; if conjoined with or aspected by Venus, otherwise (sisters). Gender of co-borns is here a stated phala-rule, not a computational formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लिंग-निर्देश)। पुं-ग्रह = परम्परा में सूर्य, मंगल, गुरु (बुध/शनि सन्दर्भानुसार); शुक्र = स्त्री-ग्रह संकेत; दृष्टि = ग्रह-विशेष दृष्टि-नियम (पूर्ण/विशेष)—श्लोक केवल “ईक्षित” कहता है, डिग्री-सूत्र नहीं देता।

14.14
अग्रे जातं रविर्हन्ति पृष्ठे जातं शनैश्चरः।
अग्रजं पृष्ठजं हन्ति सहजस्थो धरासुतः
agre jātaṃ ravirhanti pṛṣṭhe jātaṃ śanaiścaraḥ|
agrajaṃ pṛṣṭhajaṃ hanti sahajastho dharāsutaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्रे जातम् = पहले जन्मे (ज्येष्ठ सहोदर) को; रविः हन्ति = (तृतीय-स्थ) सूर्य हानि करता है; पृष्ठे जातम् = बाद में जन्मे (कनिष्ठ) को; शनैश्चरः = शनि; अग्रजं पृष्ठजं (उभयम्) हन्ति = ज्येष्ठ और कनिष्ठ दोनों को; सहजस्थः = तृतीय (सहज) भाव में स्थित; धरासुतः = मंगल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तृतीय भाव में सूर्य हो तो ज्येष्ठ सहोदर की हानि, शनि हो तो कनिष्ठ की, और मंगल हो तो दोनों की। "हन्ति" पाठ का शब्द है — सहोदर-सुख के अभाव/हानि का कथन; इसे नियति या भय के रूप में न पढ़ें, तृतीय-भाव-स्थ ग्रहों का शास्त्रीय फल-वर्गीकरण समझें।

English rendering The Sun in the third house harms the sibling born before, Saturn the sibling born after, and Mars in the third is said to harm both the elder and the younger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सारणी: भाव 3 में Su → ज्येष्ठ; Sa → कनिष्ठ; Ma → दोनों।

14.15
एतेषां विप्र योगानां बलाबलविनिर्णयात्‌।
भ्रातृणां भगिनीनां वा जातकस्य फलं वदेत्‌
eteṣāṃ vipra yogānāṃ balābalavinirṇayāt‌|
bhrātṛṇāṃ bhaginīnāṃ vā jātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एतेषां = इन (पूर्वोक्त) के; विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय-संबोधन); योगानां = ग्रह-योगों/संयोगों के; बलाबल-विनिर्णयात् = बल एवं निर्बलता के निश्चय से (सापेक्ष सामर्थ्य आँककर); भ्रातृणां = भाइयों के; भगिनीनां = बहनों के; वा = अथवा; जातकस्य = जातक के; फलं = फल; वदेत् = कहे/घोषित करे।

हिन्दी भावार्थ प्रिय शिष्य, पराशर उपसंहार करते हैं — ऊपर कहे गए इन सब योगों में से कौन प्रबल है और कौन दुर्बल, यह भली-भाँति निर्णय करके ही जातक के भाइयों अथवा बहनों का फल कहना चाहिए। भाव यह है कि परस्पर-विरोधी योग टकराएँ तो अनुमान से नहीं, बल के तुलनात्मक निर्णय से ही निष्कर्ष निकाला जाए। यह अध्याय का पद्धति-सूत्र है — फल-कथन बल-निर्णय के अधीन है।

English rendering O Brahmin, only after weighing the relative strength and weakness of these foregoing combinations should one pronounce the results concerning the native's brothers and sisters.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन-विधि (बलाबल-निर्णय पर आधारित)। यद्यपि यह पंक्ति स्वयं कोई संख्या नहीं देती, तथापि यह एक कठोर पद्धति-नियम स्थापित करती है: जब अनेक योग एक ही विषय पर परस्पर-विरोधी संकेत दें, तो निर्णायक कारक "बल" है — और बल एक मापने-योग्य राशि है, केवल अलंकार नहीं। शास्त्र यहाँ फल को बल-गणना का अनुगामी बनाता है, स्वतंत्र भविष्यवाणी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "बलाबल-विनिर्णय" सीधे षड्बल (BPHS Ch.27) से जुड़ता है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक व दृग् बल, जो रूप/विरूप में योग किए जाते हैं (1 रूप = 60 विरूप) और प्रत्येक ग्रह की नियत सीमा (threshold) से तुलित होते हैं। हमारी विधि की मूल-रेखा यही है: गणित को व्याख्या से अलग रखो — बल एक परिकलित मान है, कथन नहीं; और तुलना सदैव exact मान पर हो, tolerance-band पर नहीं (जिसने अष्टकवर्ग में एक वास्तविक −1 छिपा दिया था)। इस प्रकार यह श्लोक ठीक उसी अनुशासन का शास्त्र-मूल है जिस पर हमारा engine खड़ा है — फल तभी, जब बल पहले परिकलित एवं तुलित हो।

अध्यायः 15

सुखभावफलाध्यायः

14 श्लोक
15.1
उक्तं तृतीयभावस्य फलं संक्षेपतो मया।
सुखभावफलं चाऽथ कथयामि द्विजोत्तम
uktaṃ tṛtīyabhāvasya phalaṃ saṃkṣepato mayā|
sukhabhāvaphalaṃ cā'tha kathayāmi dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्तम् = कहा जा चुका; तृतीयभावस्य फलम् = तृतीय (सहज/पराक्रम) भाव का फल; संक्षेपतः = संक्षेप में; मया = मेरे (पराशर) द्वारा; सुखभावफलम् = चतुर्थ (सुख) भाव का फल; अथ = अब; कथयामि = कहता हूँ; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय)।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं — तृतीय भाव का फल संक्षेप में कह चुका; अब चतुर्थ अर्थात् सुखभाव का फल कहूँगा। यह सुखभाव माता, गृह, वाहन, भूमि तथा मानसिक सुख का कारक-स्थान है, और यही श्लोक इस अध्याय की भूमिका बाँधता है।

English rendering "The fruit of the third house I have told in brief; now, O best of the twice-born, I shall relate the fruit of the sukha (fourth) house."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अध्याय-सन्धि। चतुर्थ भाव D1 का चौथा राशि-खण्ड है (लग्न से 90° का केन्द्र); यह श्लोक केवल विषय-परिवर्तन घोषित कर आगे आने वाले फल-सूत्रों के लिए स्थान निर्धारित करता है।

15.2
सुखेशे सुखभावस्थे लग्नेशे तद्‌गतेऽपि वा।
शुभदृष्टे च जातस्य पूर्णं गृहसुखं वदेत्‌
sukheśe sukhabhāvasthe lagneśe tad‌gate'pi vā|
śubhadṛṣṭe ca jātasya pūrṇaṃ gṛhasukhaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश (4th-lord); सुखभावस्थे = चतुर्थ भाव में स्थित; लग्नेशे = लग्नेश; तद्‌गते = उसी (चतुर्थ) में गया हो; अपि वा = अथवा; शुभदृष्टे = शुभ ग्रह से दृष्ट; जातस्य = जातक का; पूर्णं गृहसुखं = पूर्ण गृह-सुख; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि चतुर्थेश स्वयं चतुर्थ भाव में हो, अथवा लग्नेश चतुर्थ में स्थित हो, और वह स्थान (या स्वामी) शुभ दृष्टि से युक्त हो, तो जातक के लिए पूर्ण गृह-सुख कहा जाता है। “पूर्ण” यहाँ सापेक्ष बल-वाचक है: शर्तों के जुड़ने पर फल-कथन तीव्र होता है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that when the fourth-lord occupies the fourth house, or the lagna-lord goes there, and (the configuration) is aspected by benefics, full domestic happiness is to be declared for the native.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-शर्त)। जाँच-बिन्दु: (i) 4L ∈ 4H, अथवा (ii) AL ∈ 4H; तथा (iii) शुभ दृष्टि (परम्परागत पूर्ण दृष्टि: 7; मंगल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10 — जिस दृष्टि-पद्धति को अपनाया जाए, उसे स्पष्ट घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) D1, equal-house, Whole-Signhouses वैकल्पिक; यहाँ Whole-Sign: लग्न = कन्या, चतुर्थ = धनु। चतुर्थेश गुरु धनु में (4L ∈ 4H); लग्नेश बुध मिथुन में (AL ≠ 4H)। शुभ गुरु स्वयं वहाँ — शास्त्र की शर्त (i)+(iii) पूरी → “पूर्णं गृहसुखं” का फल-कथन लागू। (अयनांश फल-शब्द पर नहीं, केवल राशि-स्थिति पर निर्भर।)

15.3
स्वगेहे स्वांशके स्वोच्चे सुखस्थानाधिपो यदि।
भूमियानगृहादीनां सुखं वाद्यभवं तथा
svagehe svāṃśake svocce sukhasthānādhipo yadi|
bhūmiyānagṛhādīnāṃ sukhaṃ vādyabhavaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वगेहे = स्व-राशि में; स्वांशके = स्व-अंश (सामान्यतः स्व-नवांश, D9) में; स्वोच्चे = स्व-उच्च राशि में; सुखस्थानाधिपः = चतुर्थेश; यदि = यदि; भूमि = भूमि/जमीन; यान = वाहन; गृह = भवन; आदीनां = आदि का; सुखं = सुख; वाद्यभवं = वाद्य (संगीत-यन्त्र) का भाव/उपभोग; तथा = तथा/भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि चतुर्थेश अपनी राशि में हो, अथवा अपने अंश (नवांश) में, अथवा उच्च राशि में स्थित हो, तो भूमि, यान, गृह आदि का सुख कहा जाता है, तथा वाद्य-सुख भी उसी श्रेणी में जोड़ा जाता है। तीनों स्थितियाँ विकल्प हैं (यदि…), न कि अनिवार्य योग-समूह।

English rendering The text states that if the lord of the fourth house is in its own sign, in its own aṃśa (own navāṃśa), or in its exaltation sign, happiness from land, conveyances, houses and the like is declared — and likewise the enjoyment of musical instruments (vādya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; पर स्थिति-जाँच D1 + D9 पर निर्भर।
- स्वगेह: ग्रह λ ∈ अपनी स्व-राशि (30° खंड)।
- स्वोच्च: शास्त्रीय उच्च-राशि (जैसे चन्द्र वृष, बुध कन्या, …)।
- स्वांश: λ को D9 में मैप कर ग्रह की स्व-राशि से मिलान — D9 नियम: प्रत्येक राशि 30° ÷ 9 = 3°20′ के 9 खंड; विषम राशि में मेष से, सम में तुला से नवांश-गणना (BPHS षोडशवर्ग-प्रकरण की मानक मैपिंग)।
पाठ-भेद संभव: “अंश” कहीं-कहीं अन्य वर्ग के लिए भी प्रयुक्त; इस संस्करण में नवांश-पठन ही प्रमुख।

उदाहरण (worked example) चतुर्थेश = शुक्र; λ(शुक्र) = 25° वृष (स्व-राशि + उच्च-राशि दोनों)। D9: वृष सम → तुला से; खंड = ⌊25° / 3°20′⌋ = ⌊7.5⌋ = 7 → 8वाँ नवांश = वृष (तुला+7)। शुक्र का स्व = वृष/तुला → स्वांश भी। शास्त्र की तीनों में से दो+ शर्तें पूरी → भूमि-यान-गृह-वाद्य सुख का फल-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्वांश-जाँच शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन है — 30° राशि को 9 समान चापों में बाँटकर D9-राशि निकालना; यही षोडशवर्ग-इंजन का D9 खंड करता है। फल-वाक्य को हम भविष्यवाणी नहीं मानते; केवल “λ → varga → शर्त-मिलान” का यथार्थ `==` परीक्षण करते हैं।

15.4
कर्माधिपेन संयुक्ते केन्द्रे कोणे गृहाधिपे।
विचित्रसौधप्राकारैर्मण्डितं तद्‌गृहं वदेत्‌
karmādhipena saṃyukte kendre koṇe gṛhādhipe|
vicitrasaudhaprākārairmaṇḍitaṃ tad‌gṛhaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्माधिपेन = दशमेश (10th-lord) के साथ; संयुक्ते = युक्त; केन्द्रे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) में; कोणे = त्रिकोण (1, 5, 9) में; गृहाधिपे = गृहेश/चतुर्थेश; विचित्र = विविध/अपूर्व; सौध = भवन/प्रासाद; प्राकारैः = प्राचीरों/परकोटों से; मण्डितं = अलंकृत; तद्‌गृहं = उसका गृह; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चतुर्थेश दशमेश से युक्त हो और वह (युति) केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो, तो जातक का गृह विचित्र सौधों और प्राचीरों से मण्डित कहा जाता है। यहाँ “गृह” भाव-फल के रूप में निवास/भवन-वैभव का संकेत है, न कि कोई ज्यामितीय माप।

English rendering The text states that when the fourth-lord is conjoined with the tenth-lord and that configuration lies in a kendra or a trikoṇa, the native’s house is to be declared adorned with manifold mansions and ramparts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (युति + स्थान-शर्त)।
जाँच: 4L और 10L की युति (समान राशि/समीप्य — परम्परा में राशि-युति या अंश-युति; घोषित करें); तथा युति-स्थान ∈ {1,4,5,7,9,10} (केन्द्र ∪ त्रिकोण; लग्न दोनों वर्गों में आता है)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; 4L = चन्द्र, 10L = शनि; दोनों मकर में (केन्द्र = 10H) युति। शर्त: 4L+10L संयोग + केन्द्र → “विचित्रसौधप्राकारैर्मण्डितं तद्‌गृहं” का शास्त्र-कथन लागू। (अयनांश राशि-सीमा पर प्रभाव डाले तो λ पुनः परिकलित करें।)

15.5
बन्धुस्थानेश्वरे सौम्ये शुभग्रहयुतेक्षिते।
शशिजे लग्नसंयुक्ते बन्धुपूज्यो भवेन्नरः
bandhusthāneśvare saumye śubhagrahayutekṣite|
śaśije lagnasaṃyukte bandhupūjyo bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धुस्थानेश्वरे = बन्धु-स्थान (चतुर्थ) के स्वामी में/जब; सौम्ये = सौम्य (शुभ स्वभाव वाला / शुभ ग्रह); शुभग्रहयुतेक्षिते = शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट; शशिजे = बुध (शशि-पुत्र); लग्नसंयुक्ते = लग्न से युक्त; बन्धुपूज्यः = बन्धुओं द्वारा पूज्य; भवेत् = होता है; नरः = पुरुष/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चतुर्थेश सौम्य हो और शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तथा बुध लग्न से युक्त हो, तो जातक बन्धु-जनों में पूज्य होता है। “सौम्ये” यहाँ चतुर्थेश के शुभ-स्वभाव (गुरु/शुक्र/बुध/अच्छे चन्द्र आदि) की ओर संकेत करता है; बुध-लग्न युति अलग शर्त है।

English rendering The text states that when the lord of the bandhu-sthāna (fourth) is a benefic, joined with or aspected by benefics, and Mercury is conjoined with the lagna, the person becomes one honored by relatives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त-त्रय: (1) 4L ∈ {शुभ-वर्ग के ग्रह}; (2) 4L पर शुभ युति/दृष्टि; (3) बुध ∈ लग्न-राशि (या लग्नेश-युति — पाठ “लग्नसंयुक्ते” = लग्न-संयोग)। पाठ-भेद संभव: “सौम्ये” को केवल बुध मानने वाली व्याख्याएँ भी मिलती हैं; इस पठन में “सौम्य = शुभ” + अलग से “शशिजे” अधिक सुसंगत।

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन; बुध लग्न में (शर्त 3)। 4L = बुध ही (बन्धुस्थानेश्वर सौम्य — शर्त 1); गुरु चतुर्थ से 5/9 दृष्टि या युति न मानकर, शुक्र से 7 दृष्टि 4L पर — शुभ दृष्टि (शर्त 2)। तीनों पूरी → “बन्धुपूज्यो भवेन्नरः” का फल-कथन।

15.6
मातुःस्थाने शुभयुते तदीशे स्वोच्चराशिगे।
कारके बलसंयुक्ते मातुर्दीर्घायुरादिशेत्
mātuḥsthāne śubhayute tadīśe svoccarāśige|
kārake balasaṃyukte māturdīrghāyurādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातुःस्थाने = माता का स्थान (चतुर्थ भाव) में; शुभयुते = शुभ से युक्त; तदीशे = उसके स्वामी (चतुर्थेश) में; स्वोच्चराशिगे = स्व-उच्च राशि में गए; कारके = कारक (माता-कारक: चन्द्र) में; बलसंयुक्ते = बल से युक्त; मातुः = माता की; दीर्घायुः = दीर्घ आयु; आदिशेत् = निर्देश करे/कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि माता-स्थान (चतुर्थ) शुभ युति से युक्त हो, उसका स्वामी उच्च राशि में हो, और कारक (माता के लिए चन्द्र) बलवान हो, तो माता की दीर्घायु का निर्देश किया जाता है। यह आयु-फल का शास्त्र-वाक्य है; चिकित्सकीय या नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the mother’s house (fourth) is joined by benefics, its lord occupies its exaltation sign, and the significator (kāraka) is endowed with strength, long life of the mother is to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; पर “बल” जाँच षड्बल/अवस्था नियमों से मापी जा सकती है।
शर्तें: (i) 4H में ≥1 शुभ ग्रह; (ii) 4L ∈ अपनी उच्च-राशि; (iii) कारक (माता → चन्द्र) बल-युक्त — षड्बल में स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग् बलों का योग (1 रूप = 60 विरूप), अथवा कम से कम उच्च/स्व/मित्र-क्षेत्र + शुभ दृष्टि जैसी स्थूल जाँच। परम्परा घोषित करें।

उदाहरण (worked example) चतुर्थ = कर्क, गुरु वहाँ (शुभ युति)। 4L = चन्द्र, λ(चन्द्र) = 3° वृष (उच्च)। कारक चन्द्र ही; वृष में उच्च + शुभ युति/दृष्टि से “बलसंयुक्त” माना जाए तो शास्त्र का “मातुर्दीर्घायुरादिशेत्” लागू। (पूर्ण षड्बल-रूप संख्या तभी जब सभी घटक परिकलित हों।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलसंयुक्ते” को हम व्याख्या नहीं, माप मानते हैं — षड्बल के छह घटक रूप/विरूप में जोड़े जाते हैं और ग्रह-सीमा से तुलना होती है। फल-वाक्य “शास्त्र आदिशेत्” रहता है; इंजन केवल बल-योग और शर्त-मिलान का यथार्थ आँकड़ा देता है।

15.7
सुखेशे केन्द्रभावस्थे तथ केन्द्रस्थितो भृगुः।
शशिजे स्वोच्चराशिस्थे मातुः पूर्णं सुखं वदेत्‌
sukheśe kendrabhāvasthe tatha kendrasthito bhṛguḥ|
śaśije svoccarāśisthe mātuḥ pūrṇaṃ sukhaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश; केन्द्रभावस्थे = केन्द्र भाव में स्थित; तथा = तथा; केन्द्रस्थितः = केन्द्र में स्थित; भृगुः = शुक्र; शशिजे = बुध; स्वोच्चराशिस्थे = स्व-उच्च राशि में स्थित; मातुः = माता का; पूर्णं सुखं = पूर्ण सुख; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चतुर्थेश केन्द्र में हो, शुक्र भी केन्द्र में हो, और बुध अपनी उच्च राशि में स्थित हो, तो माता का पूर्ण सुख कहा जाता है। तीन स्वतंत्र स्थितियाँ एक साथ माँगी गई हैं; आंशिक पूर्ति पर “पूर्ण” शब्द स्वयं सीमित हो जाता है।

English rendering The text states that when the fourth-lord stands in a kendra, Venus likewise occupies a kendra, and Mercury is placed in its exaltation sign, full happiness in respect of the mother is to be declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रि-शर्त योग)।
(1) 4L ∈ {1,4,7,10}; (2) शुक्र ∈ {1,4,7,10}; (3) बुध ∈ कन्या (उच्च-राशि; परम उच्च ≈ 15° कन्या — यदि सूक्ष्म उच्च-बिन्दु चाहिए तो परम्परा घोषित करें; श्लोक केवल “स्वोच्चराशि” कहता है)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मीन; केन्द्र = मीन, मिथुन, कन्या, धनु। 4L = बुध, कन्या में (केन्द्र + उच्च — शर्त 1 व 3 एक साथ)। शुक्र मिथुन में (केन्द्र — शर्त 2)। तीनों पूरी → “मातुः पूर्णं सुखं वदेत्” का शास्त्र-कथन।

15.8
सुखे रवियुते मन्दे चन्द्रे भाग्यगते सति।
लाभस्थानगतो भौमो गोमहिष्यादिलाभकृत्‌
sukhe raviyute mande candre bhāgyagate sati|
lābhasthānagato bhaumo gomahiṣyādilābhakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखे = चतुर्थ भाव (सुख-स्थान); रवि-युते = सूर्य से युक्त; मन्दे = शनि; चन्द्रे भाग्य-गते = चन्द्र नवम (भाग्य) भाव में; लाभ-स्थान-गतो भौमः = मंगल एकादश (लाभ) भाव में; गो-महिष्यादि-लाभ-कृत् = गाय-भैंस आदि पशु-लाभ का कारक (शास्त्र-कथन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब चतुर्थ भाव में सूर्य-युक्त शनि हो, चन्द्र भाग्य-स्थान (नवम) में स्थित हो, और मंगल लाभ-स्थान (एकादश) में हो, तब जातक को गो, महिषी आदि पशु-संपत्ति का लाभ होता है। यह योग सुख-भाव के संदर्भ में पशु-धन-संबंधी फल का निर्देश है। पाठ-भेद संभव; फल को शास्त्र-कथन के रूप में ही समझें।

English rendering The text states: when Saturn is with the Sun in the fourth house, the Moon occupies the ninth (fortune), and Mars is in the eleventh (gains), there is gain of cattle such as cows and buffaloes. This is a classical phala-assignment for that planetary configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थित ग्रह-योग से पशु-लाभ)। भाव-गिनती लग्न से क्रमशः 1…12 है; “सुख = 4, भाग्य = 9, लाभ = 11” — यह पारंपरिक भाव-मानचित्र है, कोई अंश-विभाजन या बल-सूत्र नहीं।

15.9
चरगेहसमायुक्तो सुखे तद्राशिनायके।
षष्ठे व्यये स्थिते भौमे नरः प्राप्नोति मूकताम्‌
caragehasamāyukto sukhe tadrāśināyake|
ṣaṣṭhe vyaye sthite bhaume naraḥ prāpnoti mūkatām‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चरगेह = चर राशि (movable sign); समायुक्तः = युक्त (पाठ: समायुक्ते संभव — चतुर्थ के लोकेटिव से मेल हेतु); सुखे = चतुर्थ में; तद्राशिनायके = उस राशि के स्वामी; षष्ठे = छठे में; व्यये = बारहवें में; स्थिते भौमे = मंगल के स्थित होने पर; नरः प्राप्नोति मूकताम् = मनुष्य मूकता को प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ (पाठ-भेद संभव) जब चतुर्थ में चर राशि हो और उसका स्वामी [दुर्बल हो], तथा मंगल षष्ठ या व्यय भाव में स्थित हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक मूकता को प्राप्त होता है। यह ग्रन्थ का अपना अरिष्ट-फल-कथन मात्र है — कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी या निश्चित परिणाम नहीं; इसे शास्त्र-वचन के रूप में ही ग्रहण करें।

English rendering The text states that when the fourth holds a movable sign (its lord weak) and Mars is placed in the sixth or twelfth, the native may be affected by muteness — reported strictly as the śāstra's statement, not as a medical prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अरिष्ट-सूचक)। चर-राशि वर्ग = मेष, कर्क, तुला, मकर (राशियों का चल/स्थिर/द्विस्वभाव त्रिविध वर्गीकरण); भौम की 6/12 स्थिति भाव-संख्या-सूचक। कोई अंक-गणना नहीं — अनुशासन-अनुसार अनिष्ट-फल भय या निश्चयवाद के रूप में नहीं, ग्रन्थ-कथन के रूप में रखा गया।

15.10
लग्नस्थानाधिपे सौम्ये सुखेशे नीचराशिगे।
कारके व्ययभावस्थे सुखेशे लाभसङ्गते
lagnasthānādhipe saumye sukheśe nīcarāśige|
kārake vyayabhāvasthe sukheśe lābhasaṅgate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-स्थान-अधिपे सौम्ये = लग्नेश शुभ/सौम्य (बुध अथवा शुभ ग्रह) हो; सुखेशे नीच-राशि-गे = चतुर्थेश नीच राशि में; कारके व्यय-भाव-स्थे = (सुख/वाहन-)कारक द्वादश में; सुखेशे लाभ-सङ्गते = चतुर्थेश लाभ (एकादश) से युक्त/संबद्ध

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक मुख्यतः योग-शर्तें देता है—लग्नेश सौम्य हो, सुखेश नीच राशि में हो, कारक व्यय-भाव में हो, और सुखेश लाभ से संगति रखे। पूरा फल अगले श्लोक (15.11) में “द्वादशे वत्सरे वाहन-सुख” के रूप में जुड़ता है; अकेले 15.10 में फल-वाक्य अधूरा है। पाठ-भेद संभव; भाव-संयोजन को शास्त्र-शर्त की सूची की तरह पढ़ें।

English rendering The verse lists conditions: a benefic/saumya lord of the lagna, the fourth-lord in a sign of debilitation, the kāraka in the twelfth, and the fourth-lord associated with the eleventh (gains). The result is completed in the following verse (vehicle-comfort timing).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-शर्त-सूची (फल 15.11 से जुड़ा)। नीच-राशि = प्रत्येक ग्रह की शास्त्रोक्त एक राशि (उदा. सूर्य तुला, चन्द्र वृश्चिक…); यहाँ केवल “नीच-राशि-ग” स्थिति है, नीच-भंग या बल-गुणांक नहीं गिना गया।

15.11
द्वदशे वत्सरे प्राप्ते वाहनस्य सुखं वदेत्‌।
वाहने सूर्यसंयुक्ते स्वोच्चे तद्‌भावनायके
dvadaśe vatsare prāpte vāhanasya sukhaṃ vadet‌|
vāhane sūryasaṃyukte svocce tad‌bhāvanāyake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादशे वत्सरे = बारहवें वर्ष में; वाहनस्य सुखं = वाहन-सुख / सवारी का आनंद; वदेत् = कहना चाहिए (शास्त्र); वाहने सूर्य-संयुक्ते = वाहन-भाव (चतुर्थ) में सूर्य युक्त; स्वोच्चे तद्-भाव-नायके = उस भाव का स्वामी स्वोच्च (उच्च राशि) में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्वोक्त (15.10) जैसी स्थितियों में, द्वादश वर्ष पूर्ण होने पर वाहन का सुख कहना चाहिए। दूसरी पंक्ति स्वतंत्र/सहायक शर्त देती है—जब वाहन-स्थान में सूर्य हो और उस भाव का स्वामी उच्च राशि में हो, तब भी वाहन-सुख का संकेत माना जाता है। यह आयु-वर्ष से जुड़ा फल-कथन है, दशा-सूत्र नहीं। “द्वदशे” = द्वादशे; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that on the arrival of the twelfth year one should declare comfort of vehicles (under the foregoing conditions). Further: when the Sun is conjoined with the vehicle-house and that house’s lord is in exaltation, vehicle-comfort is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-वर्ष 12 + भाव-स्थित सूर्य/उच्चेश)। “द्वादशे वत्सरे” = जन्म से पूर्ण 12 वर्ष की आयु-बिंदु (काल-अनुपात या विंशोत्तरी-अंतरदशा का सूत्र यहाँ नहीं दिया); उच्च = ग्रह-विशिष्ट एक राशि, अंश-सीमा इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म 1 जनवरी 2000; “द्वादशे वत्सरे” ≈ जनवरी 2012 के आसपास (पूर्ण 12 वर्ष)। यदि लग्न-से चतुर्थ में सूर्य हो और चतुर्थेश अपनी उच्च राशि में हो, तो शास्त्र इस काल-बिंदु पर वाहन-सुख का फल कहता है—यह केवल शास्त्र-कथन का मानचित्रण है, भविष्यवाणी का समर्थन नहीं। (अयनांश/लग्न-गणना इस फल-वाक्य को नहीं बदलती; केवल भाव-स्वामी कौन है, वह लग्न-राशि पर निर्भर।)

15.12
शुक्रेण सण्युते वर्षे द्वात्रिंशे वाहनं भवेत्‌।
कर्मेशेन युते बन्धुनाथे तुङ्गांशसंयुते
śukreṇa saṇyute varṣe dvātriṃśe vāhanaṃ bhavet‌|
karmeśena yute bandhunāthe tuṅgāṃśasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रेण संयुते (पाठ: सण्युते) = शुक्र से युक्त; वर्षे द्वा-त्रिंशे = बत्तीसवें वर्ष में; वाहनं भवेत् = वाहन होता/प्राप्त होता है; कर्मेशेन युते = दशमेश से युक्त; बन्धु-नाथे = बन्धु-स्थानेश = चतुर्थेश; तुङ्ग-अंश-संयुते = उच्च-नवांश (तुङ्गांश) से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब बन्धुनाथ (चतुर्थेश) शुक्र से युक्त हो, कर्मेश से भी युक्त हो, और तुङ्गांश (उच्च नवांश) से संबद्ध हो, तब द्वात्रिंश (32) वर्ष में वाहन की प्राप्ति होती है। “सण्युते” स्पष्टतः “संयुते” का पाठ/लेखन-रूप है। फल आयु-वर्ष और भाव-स्वामी-योग पर टिका है; इसे निश्चयात्मक घटना न मानकर शास्त्र-निर्देश समझें।

English rendering The text states: when the fourth-lord (bandhu-nātha) is conjoined with Venus and with the tenth-lord, and is associated with an exaltation-navāṃśa (tuṅgāṃśa), a vehicle comes in the thirty-second year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; किन्तु “तुङ्गांश” नवांश (D9) की तकनीकी धारणा है। नवांश = 30° ÷ 9 = 3°20′ की समान कोष्ठिका; राशि-देशांतर λ_rāśi (0°…30°) पर अंश-क्रमांक = ⌊λ_rāśi / (10°/3)⌋ + 1 (1…9)। “तुङ्गांश” = ग्रह अपने उच्च-राशि-नवांश में हो—यह D9-मानचित्र की शर्त है, वर्ष 32 का कोई दशा-अनुपात-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें चतुर्थेश शुक्र है, राशि-देशांतर 28°10′ वृष (शुक्र का उच्च-क्षेत्र वृष में)। वृष में नवांश-क्रम: प्रत्येक 3°20′; 28°10′ ≈ 9वाँ नवांश-खण्ड। यदि परंपरा के अनुसार वह खण्ड उच्च-संबंधी नवांश गिना जाए और शुक्र-कर्मेश-योग भी हो, तो शास्त्र 32वें वर्ष में वाहन कहता है। (सटीक नवांश-स्वामी-मानचित्र राशि-क्रम-नियम पर निर्भर—सम/विषम राशि-आरंभ की परंपरा घोषित करनी चाहिए; पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव।)

हमारा डिकोड (Our Decode) तुङ्गांश सीधा षोडश-वर्ग के नवांश (D9) से जुड़ता है—30° का 9 समान भाग, शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन। हमारे वर्ग-इंजन में D1…D60 deterministic partition है; D9 = 3°20′ कोष्ठिका पर राशि-मानचित्र। यह श्लोक फल देता है, वर्ग-सूत्र नहीं—फिर भी “अंश” शब्द हमें याद दिलाता है कि उच्च-अवस्था राशि और नवांश दोनों स्तरों पर जाँची जाती है, अनुमान से नहीं।

15.13
द्विचत्वारिंशके वर्षे नरो वाहनभाग्‌ भवेत्‌।
लाभेशे सुखराशिस्थे सुखेशे लाभसंयुते
dvicatvāriṃśake varṣe naro vāhanabhāg‌ bhavet‌|
lābheśe sukharāśisthe sukheśe lābhasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-चत्वारिंशके वर्षे = बयालीसवें (42) वर्ष में; नरो वाहन-भाक् = नर वाहन का भागी/उपभोक्ता; लाभेशे सुख-राशि-स्थे = एकादशेश चतुर्थ (सुख) राशि/भाव में; सुखेशे लाभ-संयुते = चतुर्थेश लाभ (एकादश) से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब लाभेश सुख-राशि में स्थित हो और सुखेश लाभ से संयुक्त हो, तब द्विचत्वारिंश (42) वर्ष में जातक वाहन-भागी होता है। यह 4↔11 भाव-स्वामियों का पारस्परिक संबंध (अन्योन्याश्रय-योग-सादृश्य) दिखाता है—सुख और लाभ का आदान-प्रदान। आयु 42 केवल शास्त्रोक्त वर्ष-बिंदु है।

English rendering The text states that when the eleventh-lord occupies the fourth sign/house and the fourth-lord is conjoined with the eleventh (or its lord), the person becomes a vehicle-enjoyer in the forty-second year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभेश⊂सुख, सुखेश∼लाभ → वर्ष 42 में वाहन)। भाव-युग्म 4 और 11 लग्न से ±7 स्थान (एक-दूसरे से सप्तम नहीं; 4 से 11 = 8 स्थान आगे)—यहाँ केवल स्वामी-अदला-बदली/युति की शर्त है, कोई बिन्दु-सारिणी या बल-योग नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न कर्क ⇒ सुख (4) = तुला, लाभ (11) = वृष। यदि लाभेश शुक्र तुला में हो और सुखेश शुक्र… (एक ही ग्रह दोनों का स्वामी हो तो योग-रूप बदलता है—कर्क लग्न में 4 और 11 दोनों शुक्र-स्वामी)। अन्य लग्न: मेष लग्न में सुखेश चन्द्र यदि लाभ (कुंभ) में हो और लाभेश शनि सुख (कर्क) में हो—यह शास्त्र की “लाभेश सुखस्थ + सुखेश लाभयुक्त” आकृति का एक रूप है; 42वें वर्ष का फल शास्त्र कहता है, हम उसे घटना-घोषणा नहीं बनाते।

15.14
द्वादशे वस्तरे प्राप्ते जातो वाहनभाग्‌ भवेत्।
शुभं शुभत्वे भावस्य पापत्वे फलमन्यथा
dvādaśe vastare prāpte jāto vāhanabhāg‌ bhavet|
śubhaṃ śubhatve bhāvasya pāpatve phalamanyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादशे = बारहवें (12वें); वत्सरे = वर्ष में (पाठ में "वस्तरे" मुद्रित — वत्सरे का पाठ-भेद संभव); प्राप्ते = आ जाने / प्राप्त होने पर; जातः = जातक (जन्मा हुआ व्यक्ति); वाहनभाक् = वाहन का भागी, वाहन-स्वामी; भवेत् = होता है; शुभम् = शुभ फल; शुभत्वे भावस्य = भाव (चतुर्थ/वाहन-स्थान) के शुभ होने पर; पापत्वे = भाव के पाप-प्रभाव में होने पर; फलम् अन्यथा = फल विपरीत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब जातक की आयु का बारहवाँ वर्ष आता है, तब उसे वाहन का सुख प्राप्त होने का योग बनता है। किन्तु यह फल भाव की गुणवत्ता पर आश्रित है — यदि सम्बद्ध भाव (सुख/वाहन-स्थान) शुभ-ग्रह-युत या शुभ-दृष्ट होकर शुभत्व लिए हो तो फल शुभ, और यदि वही भाव पाप-ग्रहों से पीड़ित होकर पापत्व लिए हो तो फल इसके विपरीत कहा गया है। यह पूर्वापर वाहन-योग वर्षों (11–13 में द्वादश, द्वात्रिंश, द्विचत्वारिंश) की शृंखला का समापन-सूत्र है, जो काल-निर्धारण को भाव-शुभता की शर्त से जोड़ता है।

English rendering The text states that on reaching the twelfth year the native comes to possess a vehicle; if the concerned bhāva carries benefic quality the outcome is auspicious, and if it carries malefic quality the outcome is the reverse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एकमात्र संख्या शब्द-रूप में है: द्वादश = 12 (शुद्ध वचन-संख्या, भूतसंख्या नहीं)। यह गणितीय सूत्र नहीं — काल/फल-कथन है, जिसमें आयु-वर्ष एक सशर्त स्विच के साथ दिया गया है:
वाहन-योग-वर्ष = 12 (जन्म से गिना आयु-वर्ष), और फल = f(भाव-गुण), जहाँ
भाव-गुण = शुभत्व ⇒ शुभ फल; भाव-गुण = पापत्व ⇒ विपरीत फल।
यहाँ "शुभत्व/पापत्व" स्वयं एक निर्णय है (शुभ/पाप ग्रहों की युति-दृष्टि से आँका जाता है), कोई अंकीय राशि नहीं — इसलिए यह द्विआधारी (benefic ↔ malefic) निर्णय-नियम है, न कि सतत गणना। अनुशासन-सूचना: बारहवें वर्ष का यह कथन शास्त्र का दावा है, कोई निश्चित घटना-भविष्यवाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें चतुर्थ (सुख/वाहन) भाव में या उस पर बृहस्पति/शुक्र जैसे शुभ ग्रह की दृष्टि-युति हो — तब भाव-गुण = शुभत्व, अतः शास्त्रानुसार 12वें वर्ष के आस-पास वाहन-सुख का शुभ फल कहा जाएगा। इसके विपरीत यदि वही भाव शनि/मंगल/राहु जैसे पाप-प्रभाव से युत-दृष्ट हो, तो भाव-गुण = पापत्व, और शास्त्र फल को "अन्यथा" (न्यून या बाधित) बताता है। (संकेत मात्र — फल को शास्त्र-वचन के रूप में पढ़ें, नियति के रूप में नहीं।)

अध्यायः 16

पञ्चमभावफलाध्यायः

32 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 15 का पाठ दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (32 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated the text of chapter 15; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (32 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

16.1
अथ पञ्चमभावस्य कथयामि फलं द्विज ।
लग्नपे सुतभावस्थे सुतपे च सुते स्थिते
atha pañcamabhāvasya kathayāmi phalaṃ dvija |
lagnape sutabhāvasthe sutape ca sute sthite
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; पञ्चमभावस्य = पञ्चम (सुत/पुत्र) भाव का; कथयामि फलम् = फल कहता हूँ; द्विज = हे द्विज; लग्नपे = लग्नेश के; सुतभावस्थे = पञ्चम भाव में स्थित; सुतपे च = और पञ्चमेश के; सुते स्थिते = पञ्चम में स्थित होने पर — (फल 16.2 में)।

हिन्दी भावार्थ पराशर पञ्चम-भाव-फल का अध्याय आरम्भ करते हैं — लग्नेश पञ्चम भाव में हो और पञ्चमेश भी पञ्चम में हो (अथवा, अगले श्लोक के अनुसार, केन्द्र-त्रिकोण में) — यह शर्त-पद है; फल-कथन 16.2 में पूरा होता है। अध्याय-प्रवेश का यह पद बताता है कि सन्तान-विचार का आधार लग्नेश और पञ्चमेश की स्थिति है।

English rendering "Now, O dvija, I speak the results of the fifth house: when the lagna lord is in the fifth and the fifth lord stands in the fifth —" (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना + शर्त-पद। शर्त: AL ∈ भाव 5 ∧ 5L ∈ भाव 5 (या 16.2 के अनुसार 5L ∈ केन्द्र/त्रिकोण)।

16.2
केन्द्रत्रिकोणसंस्थे वा पूर्णं पुत्रसुखं वदेत् ।
षष्ठाष्टमव्ययस्थे तु सुताधीशे त्वपुत्रता
kendratrikoṇasaṃsthe vā pūrṇaṃ putrasukhaṃ vadet |
ṣaṣṭhāṣṭamavyayasthe tu sutādhīśe tvaputratā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रत्रिकोणसंस्थे वा = अथवा (पञ्चमेश) केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो; पूर्णं पुत्रसुखम् = पूर्ण पुत्र-सुख; वदेत् = कहे; षष्ठाष्टमव्ययस्थे तु = किन्तु षष्ठ, अष्टम या द्वादश में स्थित (हो तो); सुताधीशे = पञ्चमेश के; अपुत्रता = पुत्रहीनता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.1 की शर्त में, अथवा) पञ्चमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो पूर्ण पुत्र-सुख कहा जाए; किन्तु पञ्चमेश षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हो तो पुत्रहीनता। यह पञ्चमेश की भाव-स्थिति का द्विभाजन है — शुभ स्थान बनाम त्रिक-स्थान — जिसे आगे के श्लोक अनेक शर्तों से परिष्कृत करते हैं।

English rendering Or with the fifth lord in a kendra or trikoṇa, full happiness through sons is to be declared; but with the fifth lord in the sixth, eighth or twelfth, the text says, childlessness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्विभाजन)। 5L ∈ {1, 4, 7, 10, 5, 9} → पूर्ण पुत्र-सुख; 5L ∈ {6, 8, 12} → अपुत्रता-कथन।

16.3
सुतेशेस्तङ्गते वाऽपि पापाक्रान्ते च निर्बले ।
तदा न जायते पुत्रो जातो वा म्रियते ध्रुवम्
suteśestaṅgate vā'pi pāpākrānte ca nirbale |
tadā na jāyate putro jāto vā mriyate dhruvam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चमेश के; अस्तङ्गते वापि = अथवा अस्तंगत (सूर्य-सान्निध्य से अस्त) होने पर; पापाक्रान्ते = पाप-ग्रहों से आक्रान्त; च निर्बले = और निर्बल; तदा = तब; न जायते पुत्रः = पुत्र नहीं होता; जातः वा म्रियते = अथवा जन्मा हुआ मर जाता है; ध्रुवम् = निश्चय ही (पाठ का आग्रह-शब्द)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश अस्त हो, पाप-ग्रहों से पीड़ित हो और निर्बल हो, तो पुत्र नहीं होता, अथवा हुआ भी तो नहीं टिकता। "ध्रुवम्" ग्रन्थ का बल-वाचक शब्द है; यहाँ यह तीन अशुभ शर्तों के एक साथ होने पर फल की तीव्रता का कथन है — इसे नियति की घोषणा के रूप में नहीं, शर्त-संयोग के रूप में पढ़ें।

English rendering When the fifth lord is combust, overpowered by malefics and weak, the text states that no son is born, or one born does not survive.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त-त्रय: अस्त(5L) ∧ पाप-आक्रान्त(5L) ∧ निर्बल(5L)। अस्त-सीमा और बल-माप (षड्बल) की रीति घोषित करें — फल-शब्द उन पर निर्भर है।

16.4
षष्ठस्थाने सुताधीशे लग्नेशे कुजसंयुते ।
म्रियते प्रथमापत्यं काकबन्ध्या च गेहिनी
ṣaṣṭhasthāne sutādhīśe lagneśe kujasaṃyute |
mriyate prathamāpatyaṃ kākabandhyā ca gehinī
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठस्थाने = षष्ठ भाव में; सुताधीशे = पञ्चमेश के; लग्नेशे कुजसंयुते = लग्नेश मंगल से युक्त (हो); म्रियते प्रथमापत्यम् = प्रथम सन्तान मरती है; काकबन्ध्या च गेहिनी = और गृहिणी काक-वन्ध्या (एक ही सन्तान वाली) होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश षष्ठ में हो और लग्नेश मंगल से युक्त हो, तो प्रथम सन्तान की हानि और गृहिणी का काक-वन्ध्या होना कहा गया है। "काक-वन्ध्या" पारिभाषिक शब्द है — वह स्त्री जिसे केवल एक ही सन्तान हो (कौवे की तरह)। यह पाठ का फल-कथन है, भय का विषय नहीं।

English rendering With the fifth lord in the sixth and the lagna lord joined by Mars, the text says the first child dies and the wife bears only one child (kāka-bandhyā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 5L ∈ भाव 6 ∧ Ma ∈ युति(AL)। पारिभाषिक: काक-वन्ध्या = एक-सन्तान-वाली।

16.5
सुताधीशो हि नीचस्थो व्ययषष्ठाष्टमस्थितः ।
काकबन्ध्या भवेन्नारी सुते केतुबुधौ यदि
sutādhīśo hi nīcastho vyayaṣaṣṭhāṣṭamasthitaḥ |
kākabandhyā bhavennārī sute ketubudhau yadi
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुताधीशः हि नीचस्थः = पञ्चमेश नीच में स्थित; व्ययषष्ठाष्टमस्थितः = द्वादश, षष्ठ या अष्टम में स्थित; काकबन्ध्या भवेत् नारी = स्त्री काक-वन्ध्या होती है; सुते केतुबुधौ यदि = यदि पञ्चम में केतु और बुध हों।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश नीच-राशि में हो, द्वादश-षष्ठ-अष्टम में हो, और पञ्चम भाव में केतु तथा बुध हों, तो स्त्री काक-वन्ध्या कही गई है। पिछले श्लोक की परिभाषा यहाँ दूसरी शर्त-सूची पर लागू होती है।

English rendering When the fifth lord is debilitated and placed in the twelfth, sixth or eighth, and Ketu and Mercury occupy the fifth, the woman, the text says, bears a single child.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: नीच(5L) ∧ 5L ∈ {12, 6, 8} ∧ {Ke, Me} ⊂ भाव 5।

16.6
सुतेशो नीचगो यत्र सुतस्थानं न पश्यति ।
तत्र सौरिबुधौ स्यातां काकबन्ध्यात्वमाप्नुयात्
suteśo nīcago yatra sutasthānaṃ na paśyati |
tatra sauribudhau syātāṃ kākabandhyātvamāpnuyāt
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशः नीचगः = पञ्चमेश नीच में; यत्र = जहाँ; सुतस्थानं न पश्यति = पञ्चम भाव को नहीं देखता; तत्र = वहाँ (पञ्चम में); सौरिबुधौ स्याताम् = शनि और बुध हों; काकबन्ध्यात्वम् आप्नुयात् = (गृहिणी) काक-वन्ध्यात्व को प्राप्त करती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश नीच में हो और पञ्चम भाव पर उसकी दृष्टि न हो, तथा पञ्चम में शनि और बुध हों, तो काक-वन्ध्यात्व कहा गया है। 16.5 का समानान्तर पद — वहाँ केतु-बुध, यहाँ शनि-बुध; दोनों में पञ्चमेश की नीचता मूल शर्त है।

English rendering When the debilitated fifth lord does not aspect the fifth house and Saturn and Mercury stand there, the text says the wife bears only one child.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: नीच(5L) ∧ ¬दृष्टि(5L → भाव 5) ∧ {Sa, Me} ⊂ भाव 5। दृष्टि-नियम (ग्रह-दृष्टि 7; शनि 3/10; गुरु 5/9; मंगल 4/8) घोषित करें।

16.7
भाग्येशो मूर्तिवर्ती चेत् सुतेशो नीचगो यदि ।
सुते केतुबुधौ स्यातां सुतं कष्टाद् विनिर्दिशेत्
bhāgyeśo mūrtivartī cet suteśo nīcago yadi |
sute ketubudhau syātāṃ sutaṃ kaṣṭād vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशः मूर्तिवर्ती चेत् = यदि नवमेश लग्न (मूर्ति) में हो; सुतेशः नीचगः यदि = यदि पञ्चमेश नीच में हो; सुते केतुबुधौ स्याताम् = पञ्चम में केतु-बुध हों; सुतं कष्टात् विनिर्दिशेत् = पुत्र-प्राप्ति कष्ट से कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नवमेश लग्न में हो, पञ्चमेश नीच में हो और पञ्चम में केतु-बुध हों, तो सन्तान कष्ट से (कठिनाई के बाद) होती है। पिछले दो श्लोकों की "काक-वन्ध्या" से यहाँ फल कुछ हल्का है — नवमेश की लग्न-स्थिति शुभ पक्ष जोड़ती है।

English rendering If the ninth lord is in the lagna, the fifth lord debilitated, and Ketu and Mercury in the fifth, a son is to be declared only after difficulty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 9L ∈ भाव 1 ∧ नीच(5L) ∧ {Ke, Me} ⊂ भाव 5।

16.8
षष्ठाष्टमव्ययस्थो वा नीचो वा शत्रुराशिगः ।
सुतेशश्च सुते तस्य कष्टाद् पुत्रं विनिर्दिशेत्
ṣaṣṭhāṣṭamavyayastho vā nīco vā śatrurāśigaḥ |
suteśaśca sute tasya kaṣṭād putraṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाष्टमव्ययस्थः वा = अथवा षष्ठ-अष्टम-द्वादश में स्थित; नीचः वा = अथवा नीच; शत्रुराशिगः = शत्रु-राशि में गया; सुतेशः च = पञ्चमेश; सुते = (ऐसे ग्रह के) पञ्चम में; तस्य = उसके; कष्टात् पुत्रं विनिर्दिशेत् = कष्ट से पुत्र कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश त्रिक-स्थान में हो, अथवा नीच या शत्रु-राशि में हो, (और ऐसी दशा में पञ्चम भाव प्रभावित हो) तो सन्तान कष्ट से होती है। यह 16.7 का सामान्यीकरण है: पञ्चमेश की कोई भी दुर्बल स्थिति सन्तान-सुख को विलम्बित करती है — पाठ की भाषा में।

English rendering Likewise when the fifth lord is in the sixth, eighth or twelfth, or debilitated, or in an enemy's sign, the text declares a son to come only with difficulty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 5L ∈ {6, 8, 12} ∨ नीच(5L) ∨ शत्रु-राशि(5L)। मैत्री-सारणी (नैसर्गिक/तात्कालिक) घोषित करें।

16.9
पुत्रभावे बुधक्षेत्रे मन्दक्षेत्रेऽथवा पुनः ।
मन्दे मान्दियुतौ दृष्टे तदा दत्तादयः सुताः
putrabhāve budhakṣetre mandakṣetre'thavā punaḥ |
mande māndiyutau dṛṣṭe tadā dattādayaḥ sutāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रभावे = पञ्चम भाव के; बुधक्षेत्रे = बुध की राशि (मिथुन/कन्या) में; मन्दक्षेत्रे अथवा पुनः = अथवा शनि की राशि (मकर/कुम्भ) में होने पर; मन्दे मान्दियुतौ दृष्टे = शनि मान्दि से युक्त (और पञ्चम को) दृष्ट होने पर; तदा = तब; दत्तादयः सुताः = दत्तक आदि पुत्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चम भाव बुध या शनि की राशि में हो, और मान्दि-युक्त शनि उसे देखता हो, तो दत्तक आदि (गोद लिए हुए) पुत्र कहे गए हैं। नपुंसक-प्रकृति (बुध, शनि) राशियों और मान्दि के योग से सन्तान का मार्ग औरस से भिन्न बताया गया है।

English rendering When the fifth house falls in a sign of Mercury or of Saturn and Saturn joined by Māndi aspects it, the text says the sons are adopted or the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: राशि(भाव 5) ∈ {मिथुन, कन्या, मकर, कुम्भ} ∧ मान्दि ∈ युति(Sa) ∧ दृष्टि(Sa → भाव 5)। मान्दि (गुलिक) की गणना दिन/रात्रि-खण्ड से (अ. 25) — घोषित करें।

16.10
रविचन्द्रौ यदैकस्थावेकांशकसमन्वितौ ।
त्रिमातृभिरसौ याद्वा द्विपित्राऽपि च पोषितः
ravicandrau yadaikasthāvekāṃśakasamanvitau |
trimātṛbhirasau yādvā dvipitrā'pi ca poṣitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविचन्द्रौ = सूर्य और चन्द्र; यदा एकस्थौ = जब एक (राशि) में स्थित; एकांशकसमन्वितौ = एक ही नवांश में; त्रिमातृभिः = तीन माताओं से; असौ = वह (जातक); यात् वा = अथवा; द्विपित्रा अपि = दो पिताओं से भी; पोषितः = पाला गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य और चन्द्र एक ही राशि में और एक ही नवांश में हों, तो जातक तीन माताओं से अथवा दो पिताओं से पाला जाता है। सूर्य (पिता-कारक) और चन्द्र (माता-कारक) का एक-नवांश-संयोग पालन-पोषण की बहुलता का कथन बनता है — पाठ का शब्द "पोषित" है, जन्म नहीं।

English rendering When the Sun and Moon stand in one sign and in the same navāṃśa, the text says the native is reared by three mothers or by two fathers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश-क्रमांक k = ⌊λ_राशि-अन्तर्गत ÷ 3°20′⌋ + 1 (1…9)। शर्त: राशि(Su) = राशि(Mo) ∧ k(Su) = k(Mo) — अर्थात् दोनों एक ही 3°20′ के खण्ड में; अमावस्या के निकट की स्थिति। अयनांश घोषित करें (खण्ड-सीमा पर संवेदनशील)।

उदाहरण (worked example) Su = कर्क 14°10′, Mo = कर्क 15°50′: k(Su) = ⌊14.167 ÷ 3.333⌋ + 1 = 5; k(Mo) = ⌊15.833 ÷ 3.333⌋ + 1 = 5 → एक राशि, एक नवांश → शर्त पूर्ण। Mo = कर्क 16°45′ होता तो k = 6 → शर्त असिद्ध।

16.11
पञ्चमे षड्ग्रहैर्युक्ते तदीशे व्ययराशिगे ।
लग्नेशेन्दू बलाढयौ चेत् तदा दत्तसुतोद्भवः
pañcame ṣaḍgrahairyukte tadīśe vyayarāśige |
lagneśendū balāḍhayau cet tadā dattasutodbhavaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमे षड्ग्रहैः युक्ते = पञ्चम भाव छह ग्रहों से युक्त हो; तदीशे व्ययराशिगे = उसका स्वामी द्वादश राशि में; लग्नेशेन्दू बलाढ्यौ चेत् = यदि लग्नेश और चन्द्र बलवान् हों; तदा = तब; दत्तसुतोद्भवः = दत्तक पुत्र की प्राप्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चम भाव में छह ग्रह हों, पञ्चमेश द्वादश में हो, और लग्नेश तथा चन्द्र बलवान् हों, तो दत्तक पुत्र की प्राप्ति कही गई है। छह ग्रहों का एक भाव में समावेश दुर्लभ संयोग है; पाठ उसे सन्तान-मार्ग की विशेषता से जोड़ता है।

English rendering With six planets in the fifth, its lord in the twelfth, and the lagna lord and Moon strong, the text says a son comes by adoption.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: |ग्रह ∈ भाव 5| = 6 ∧ 5L ∈ भाव 12 ∧ बली(AL) ∧ बली(Mo)।

16.12
सुते ज्ञजीवशुक्रैश्च सबलैरवलोकिते ।
भवन्ति बहवः पुत्राः सुतेशे हि बलान्विते
sute jñajīvaśukraiśca sabalairavalokite |
bhavanti bahavaḥ putrāḥ suteśe hi balānvite
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुते = पञ्चम भाव; ज्ञजीवशुक्रैः = बुध, गुरु और शुक्र से; सबलैः = बलवान् (होकर); अवलोकिते = दृष्ट होने पर; भवन्ति बहवः पुत्राः = अनेक पुत्र होते हैं; सुतेशे हि बलान्विते = पञ्चमेश भी बल-युक्त हो तो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चम भाव पर बलवान् बुध, गुरु और शुक्र की दृष्टि हो और पञ्चमेश भी बल-युक्त हो, तो अनेक पुत्र होते हैं। तीनों शुभ ग्रहों की दृष्टि और स्वामी का बल — यह अध्याय का "बहु-पुत्र" योग है।

English rendering When the fifth house is aspected by a strong Mercury, Jupiter and Venus and the fifth lord is also strong, the text says there are many sons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: {Me, Ju, Ve} ⊂ दृष्टि(→ भाव 5) ∧ बली(Me, Ju, Ve) ∧ बली(5L)। बल-माप (षड्बल-सीमा) घोषित करें।

16.13
सुतेशे चन्द्रसंयुक्ते तद्द्रेष्काणगतेऽपि वा ।
तदा हि कन्यकोत्पत्तिः प्रवदेद् दैवचिन्तकः
suteśe candrasaṃyukte taddreṣkāṇagate'pi vā |
tadā hi kanyakotpattiḥ pravaded daivacintakaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे चन्द्रसंयुक्ते = पञ्चमेश चन्द्र से युक्त; तद्द्रेष्काणगते अपि वा = अथवा चन्द्र के द्रेष्काण में गया हो; तदा हि = तब; कन्यकोत्पत्तिः = कन्या-सन्तति; प्रवदेत् = कहे; दैवचिन्तकः = दैवज्ञ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश चन्द्र से युक्त हो अथवा चन्द्र के द्रेष्काण में हो, तो दैवज्ञ कन्या-सन्तति कहे। चन्द्र (स्त्री-ग्रह) का पञ्चमेश से सम्बन्ध सन्तान के स्त्री-रूप का कथन बनता है।

English rendering When the fifth lord is joined by the Moon or stands in the Moon's drekkāṇa, the astrologer, says the text, should declare the birth of daughters.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्रेष्काण-स्वामी: k = ⌊λ ÷ 10°⌋ + 1; स्वामी = राशीश (k = 1), पञ्चम-राशीश (k = 2), नवम-राशीश (k = 3)। "चन्द्र का द्रेष्काण" = वह द्रेष्काण जिसका स्वामी चन्द्र (कर्क-सम्बद्ध) हो। शर्त: Mo ∈ युति(5L) ∨ द्रेष्काणेश(5L) = Mo।

16.14
सुतेशे चरराशिस्थे राहुणा सहिते विधौ ।
पुत्रस्थानः गते मन्दे परजातं वदेच्छिशुम्
suteśe cararāśisthe rāhuṇā sahite vidhau |
putrasthānaḥ gate mande parajātaṃ vadecchiśum
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे चरराशिस्थे = पञ्चमेश चर राशि में; राहुणा सहिते विधौ = चन्द्र राहु के साथ; पुत्रस्थानं गते मन्दे = शनि पञ्चम भाव में गया हो; परजातम् = दूसरे से उत्पन्न; वदेत् शिशुम् = शिशु कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश चर राशि में हो, चन्द्र राहु के साथ हो और शनि पञ्चम में हो, तो शिशु "परजात" कहा गया है। यह ग्रन्थ का कथन है, जिसकी सामाजिक व्याख्या पाठ की अपनी है; इसे शर्त-सूची के रूप में ही पढ़ें।

English rendering With the fifth lord in a movable sign, the Moon with Rāhu, and Saturn in the fifth, the text says the child is "born of another".

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: राशि(5L) ∈ {मेष, कर्क, तुला, मकर} ∧ Ra ∈ युति(Mo) ∧ Sa ∈ भाव 5।

16.15
लग्नादष्टमगे चन्द्रे चन्द्रादष्टमगे गुरौ ।
पापग्रहैर्युते दृष्टे परजातो न संशयः
lagnādaṣṭamage candre candrādaṣṭamage gurau |
pāpagrahairyute dṛṣṭe parajāto na saṃśayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् अष्टमगे चन्द्रे = लग्न से अष्टम में चन्द्र; चन्द्रात् अष्टमगे गुरौ = चन्द्र से अष्टम में गुरु; पापग्रहैः युते दृष्टे = पाप-ग्रहों से युक्त और दृष्ट (होने पर); परजातः = परजात; न संशयः = सन्देह नहीं (पाठ का बल-शब्द)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र लग्न से अष्टम में, गुरु चन्द्र से अष्टम में, और ये पाप-ग्रहों से युक्त-दृष्ट हों, तो "परजात, इसमें सन्देह नहीं"। 16.14 की श्रृंखला का दूसरा पद; "न संशयः" ग्रन्थ का आग्रह है, निर्णय का प्रमाण नहीं।

English rendering With the Moon eighth from the lagna and Jupiter eighth from the Moon, joined and aspected by malefics, the text asserts — "born of another, without doubt".

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: Mo ∈ भाव 8 ∧ Ju ∈ (Mo + 7 राशि) ∧ पाप-युति/दृष्टि।

16.16
पुत्रस्थानाधिपे स्वोच्चे लग्नाद्वा द्वित्रिकोणगे ।
गुरुणा संयुते दृष्टे पुत्रभाग्यमुपैति सः
putrasthānādhipe svocce lagnādvā dvitrikoṇage |
guruṇā saṃyute dṛṣṭe putrabhāgyamupaiti saḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानाधिपे = पञ्चमेश के; स्वोच्चे = स्वोच्च में; लग्नात् वा = अथवा लग्न से; द्वित्रिकोणगे = द्वितीय या त्रिकोण में; गुरुणा संयुते दृष्टे = गुरु से युक्त या दृष्ट; पुत्रभाग्यम् उपैति सः = वह पुत्र-भाग्य को प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश स्वोच्च में हो, अथवा लग्न से द्वितीय या त्रिकोण में हो, और गुरु से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक पुत्र-भाग्य पाता है। अशुभ श्रृंखला के बाद यह शुभ पद है: उच्च पञ्चमेश + पुत्र-कारक गुरु का सम्बन्ध।

English rendering When the fifth lord is exalted, or in the second or a trikoṇa from the lagna, and is joined or aspected by Jupiter, the native attains the fortune of sons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: (उच्च(5L) ∨ 5L ∈ {2, 5, 9}) ∧ Ju ∈ (युति ∪ दृष्टि)(5L)।

16.17
त्रिचतुःपापसंयुक्ते सुते सौम्यविवर्जिते ।
सुतेशे नीचराशिस्थे नीचसंस्थौ भवेच्छिशुः
tricatuḥpāpasaṃyukte sute saumyavivarjite |
suteśe nīcarāśisthe nīcasaṃsthau bhavecchiśuḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिचतुःपापसंयुक्ते सुते = पञ्चम भाव तीन या चार पाप-ग्रहों से युक्त; सौम्यविवर्जिते = शुभ-ग्रह-रहित; सुतेशे नीचराशिस्थे = पञ्चमेश नीच राशि में; नीचसंस्थौ (पाठ; = नीचसंस्थः) भवेत् शिशुः = शिशु नीच (हीन) स्थिति वाला होता है — पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चम भाव में तीन-चार पाप-ग्रह हों, कोई शुभ न हो, और पञ्चमेश नीच में हो, तो शिशु हीन-स्थिति वाला कहा गया है। पाप-संख्या (3–4) यहाँ तीव्रता की माप है।

English rendering With three or four malefics in the fifth, no benefic there, and the fifth lord debilitated, the text says the child is of low condition (reading uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: |पाप ∈ भाव 5| ∈ {3, 4} ∧ शुभ ∉ भाव 5 ∧ नीच(5L)।

16.18
पुत्रस्थानं गते जीवे तदीशे भृगुसंयुते ।
द्वात्रिंशे च त्रयस्त्रिंशे वत्सरे पुत्रसम्भवः
putrasthānaṃ gate jīve tadīśe bhṛgusaṃyute |
dvātriṃśe ca trayastriṃśe vatsare putrasambhavaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानं गते जीवे = गुरु पञ्चम भाव में; तदीशे भृगुसंयुते = पञ्चमेश शुक्र से युक्त; द्वात्रिंशे च त्रयस्त्रिंशे वत्सरे = बत्तीसवें और तैंतीसवें वर्ष में; पुत्रसम्भवः = पुत्र-जन्म।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु पञ्चम में हो और पञ्चमेश शुक्र से युक्त हो, तो बत्तीसवें-तैंतीसवें वर्ष में पुत्र-जन्म कहा गया है। यहाँ से अध्याय आयु-अङ्क देने लगता है — ये ग्रन्थ के अपने वर्ष-कथन हैं, दशा-गणना से स्वतन्त्र।

English rendering With Jupiter in the fifth and its lord joined by Venus, the text places the birth of a son in the thirty-second or thirty-third year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क: द्वात्रिंश = 32, त्रयस्त्रिंश = 33)। शर्त: Ju ∈ भाव 5 ∧ Ve ∈ युति(5L)।

16.19
सुतेशे केन्द्रभावस्थे कारकेण समन्विते ।
षड्त्रिंशे त्रिंशदब्दे च पुत्रोत्पत्तिं विनिर्दिशेत्
suteśe kendrabhāvasthe kārakeṇa samanvite |
ṣaḍtriṃśe triṃśadabde ca putrotpattiṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे केन्द्रभावस्थे = पञ्चमेश केन्द्र में; कारकेण समन्विते = (पुत्र-) कारक गुरु से युक्त; षट्त्रिंशे त्रिंशदब्दे च = छत्तीसवें और तीसवें वर्ष में; पुत्रोत्पत्तिं विनिर्दिशेत् = पुत्रोत्पत्ति कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश केन्द्र में हो और पुत्र-कारक गुरु से युक्त हो, तो छत्तीसवें या तीसवें वर्ष में पुत्रोत्पत्ति कही गई है। दो अङ्कों का क्रम पाठ में "षट्त्रिंश, त्रिंशत्" है — घटते क्रम में; पाठ-भेद संभव।

English rendering With the fifth lord in a kendra together with the significator (Jupiter), the text indicates the birth of a son in the thirty-sixth or the thirtieth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क: षट्त्रिंश = 36, त्रिंशत् = 30)। शर्त: 5L ∈ {1, 4, 7, 10} ∧ Ju ∈ युति(5L)।

16.20
लग्नाद् भाग्यगते जीवे जीवाद् भाग्यगते भृगौ ।
लग्नेशे भृगुयुक्ते वा चत्वारिंशे सुतं वदेत्
lagnād bhāgyagate jīve jīvād bhāgyagate bhṛgau |
lagneśe bhṛguyukte vā catvāriṃśe sutaṃ vadet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् भाग्यगते जीवे = गुरु लग्न से नवम में; जीवात् भाग्यगते भृगौ = शुक्र गुरु से नवम में; लग्नेशे भृगुयुक्ते वा = अथवा लग्नेश शुक्र से युक्त; चत्वारिंशे = चालीसवें (वर्ष में); सुतं वदेत् = पुत्र कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु लग्न से नवम में और शुक्र गुरु से नवम में हो, अथवा लग्नेश शुक्र से युक्त हो, तो चालीसवें वर्ष में पुत्र कहा गया है। गुरु-शुक्र की त्रिकोण-श्रृंखला (लग्न → 9 → 9) यहाँ आयु-अङ्क से जुड़ी है।

English rendering With Jupiter ninth from the lagna and Venus ninth from Jupiter, or the lagna lord joined by Venus, the text says a son comes in the fortieth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क: चत्वारिंश = 40)। शर्त: (Ju ∈ भाव 9 ∧ Ve ∈ Ju + 8 राशि, अर्थात् लग्न से पञ्चम) ∨ Ve ∈ युति(AL)।

16.21
पुत्रस्थानं गते राहौ तदीशे पापसंयुते ।
नीचराशिगतो जीवो द्वात्रिंशे पुत्रमृत्युदः
putrasthānaṃ gate rāhau tadīśe pāpasaṃyute |
nīcarāśigato jīvo dvātriṃśe putramṛtyudaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानं गते राहौ = राहु पञ्चम में; तदीशे पापसंयुते = पञ्चमेश पाप से युक्त; नीचराशिगतः जीवः = गुरु नीच राशि (मकर) में; द्वात्रिंशे = बत्तीसवें वर्ष में; पुत्रमृत्युदः = पुत्र-मृत्यु देने वाला (योग)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु पञ्चम में, पञ्चमेश पाप-युक्त और गुरु नीच में हो, तो बत्तीसवें वर्ष में पुत्र-हानि का योग कहा गया है। यह पाठ का कथन है — कारक की नीचता और पञ्चम-पीड़ा का संयोग; भय का विषय नहीं, शर्त-सूची है।

English rendering With Rāhu in the fifth, its lord joined by a malefic, and Jupiter debilitated, the text speaks of the loss of a son in the thirty-second year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क 32)। शर्त: Ra ∈ भाव 5 ∧ पाप ∈ युति(5L) ∧ Ju ∈ मकर।

16.22
जीवात् पञ्चमगे पापे लग्नात् पञ्चमगेऽपि च ।
षड्त्रिंशे च त्रयस्त्रिंशे चत्वारिंशे सुतक्षयः
jīvāt pañcamage pāpe lagnāt pañcamage'pi ca |
ṣaḍtriṃśe ca trayastriṃśe catvāriṃśe sutakṣayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवात् पञ्चमगे पापे = गुरु से पञ्चम में पाप-ग्रह; लग्नात् पञ्चमगे अपि च = और लग्न से पञ्चम में भी; षट्त्रिंशे च त्रयस्त्रिंशे चत्वारिंशे = छत्तीसवें, तैंतीसवें और चालीसवें (वर्ष में); सुतक्षयः = सन्तान-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु से पञ्चम में और लग्न से पञ्चम में पाप-ग्रह हों, तो छत्तीसवें, तैंतीसवें और चालीसवें वर्ष में सन्तान-क्षय कहा गया है। दो पञ्चमों (कारक से और लग्न से) की एक साथ पीड़ा — पाठ की शर्त।

English rendering With malefics in the fifth from Jupiter and in the fifth from the lagna, the text names the thirty-sixth, thirty-third and fortieth years for the loss of children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क: 36, 33, 40)। शर्त: पाप ∈ (Ju + 4 राशि) ∧ पाप ∈ भाव 5।

16.23
लग्ने मान्दितमायुक्ते लग्नेशे नीचराशिगे ।
षड्पञ्चाशत्तमेऽब्दे च पुत्रशोकसमाकुलः
lagne mānditamāyukte lagneśe nīcarāśige |
ṣaḍpañcāśattame'bde ca putraśokasamākulaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = लग्न में; मान्दि-तम-युक्ते = मान्दि और तम (राहु/केतु) से युक्त; लग्नेशे नीचराशिगे = लग्नेश नीच राशि में; षट्पञ्चाशत्तमे अब्दे = छप्पनवें वर्ष में; पुत्रशोकसमाकुलः = पुत्र-शोक से व्याकुल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न में मान्दि और तम (राहु/केतु) हों और लग्नेश नीच में हो, तो छप्पनवें वर्ष में पुत्र-शोक कहा गया है। "तम" यहाँ छाया-ग्रह का नाम है; पाठ-भेद संभव।

English rendering With Māndi and Tamas (Rāhu/Ketu) in the lagna and the lagna lord debilitated, the text speaks of grief for a son in the fifty-sixth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क: षट्पञ्चाशत् = 56)। शर्त: {मान्दि, तम} ⊂ भाव 1 ∧ नीच(AL)।

16.24
चतुर्थे पापसंयुक्ते षष्ठभावे तथैव हि ।
सुतेशे परमोच्चस्थे लग्नेशेन समन्विते
caturthe pāpasaṃyukte ṣaṣṭhabhāve tathaiva hi |
suteśe paramoccasthe lagneśena samanvite
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थे पापसंयुक्ते = चतुर्थ भाव पाप-युक्त; षष्ठभावे तथैव हि = षष्ठ भाव भी वैसे ही (पाप-युक्त); सुतेशे परमोच्चस्थे = पञ्चमेश परमोच्च में; लग्नेशेन समन्विते = लग्नेश से युक्त — (फल 16.25 में: दस पुत्र)।

हिन्दी भावार्थ शर्त-पद — चतुर्थ और षष्ठ पाप-युक्त हों, पञ्चमेश परमोच्च में लग्नेश के साथ हो, (और 16.25 के अनुसार कारक शुभ-युक्त हो) तो दस पुत्र कहे गए हैं। यहाँ से 16.29 तक पुत्र-संख्या के योग शब्द-अङ्कों में आते हैं; प्रत्येक की शर्त एक श्लोक में, फल अगले में।

English rendering When the fourth and likewise the sixth are joined by malefics, and the fifth lord in deep exaltation stands with the lagna lord — (the result, ten sons, follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शर्त-पद। परमोच्च-अंश (उच्च-बिन्दु) सारणी: सूर्य मेष 10°, चन्द्र वृषभ 3°, मंगल मकर 28°, बुध कन्या 15°, गुरु कर्क 5°, शुक्र मीन 27°, शनि तुला 20°।

16.25
कारके शुभसंयुक्ते दशसङ्ख्यास्तु सूनवः ।
परमोच्चगते जीवे धनेशे राहुसंयुते
kārake śubhasaṃyukte daśasaṅkhyāstu sūnavaḥ |
paramoccagate jīve dhaneśe rāhusaṃyute
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारके शुभसंयुक्ते = (पुत्र-) कारक शुभ से युक्त; दशसङ्ख्याः तु सूनवः = दस पुत्र; परमोच्चगते जीवे = गुरु परमोच्च (कर्क 5°) में; धनेशे राहुसंयुते = द्वितीयेश राहु से युक्त — (फल 16.26 में: नौ पुत्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.24 की शर्तों के साथ) कारक शुभ-युक्त हो तो दस पुत्र; और गुरु परमोच्च में हो, द्वितीयेश राहु से युक्त हो, (16.26 के अनुसार नवमेश नवम में हो) तो नौ पुत्र कहे गए हैं। संख्याएँ ग्रन्थ के अपने कथन हैं — "दश", "नव"।

English rendering With the significator joined by a benefic, ten sons; and with Jupiter in deep exaltation and the second lord joined by Rāhu — (nine sons, completed in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अङ्क: दश = 10; अगला योग नव = 9)। शर्त-योग A: 16.24 ∧ शुभ ∈ युति(Ju) → 10। शर्त-योग B (आरम्भ): Ju = कर्क ~5° ∧ Ra ∈ युति(2L)।

16.26
भाग्येशे भाग्यसंयुक्ते सङ्ख्याता नव सूनवः ।
पुत्रभाग्यगते जीवे सुतेशे बलसंयुते
bhāgyeśe bhāgyasaṃyukte saṅkhyātā nava sūnavaḥ |
putrabhāgyagate jīve suteśe balasaṃyute
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे भाग्यसंयुक्ते = नवमेश नवम में; सङ्ख्याताः नव सूनवः = नौ पुत्र गिने गए; पुत्रभाग्यगते जीवे = गुरु पञ्चम या नवम में; सुतेशे बलसंयुते = पञ्चमेश बल-युक्त — (फल 16.27 में: आठ पुत्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.25 की शर्तों के साथ) नवमेश नवम में हो तो नौ पुत्र; और गुरु पञ्चम या नवम में हो, पञ्चमेश बली हो, (16.27 के अनुसार द्वितीयेश दशम में हो) तो आठ (वसु) पुत्र। संख्या-श्रृंखला घटते क्रम में चलती है।

English rendering With the ninth lord in the ninth, nine sons are counted; and with Jupiter in the fifth or ninth and the fifth lord strong — (eight sons, completed in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नव = 9)। शर्त-योग C (आरम्भ): Ju ∈ {5, 9} ∧ बली(5L)।

16.27
धनेशे कर्मभावस्थे वसुसङ्ख्यास्तु सूनवः ।
पञ्चमात् पञ्चमे मन्दे सुतस्थे च तदीश्वरे
dhaneśe karmabhāvasthe vasusaṅkhyāstu sūnavaḥ |
pañcamāt pañcame mande sutasthe ca tadīśvare
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे कर्मभावस्थे = द्वितीयेश दशम में; वसुसङ्ख्याः तु सूनवः = वसु-संख्या (आठ) पुत्र; पञ्चमात् पञ्चमे मन्दे = पञ्चम से पञ्चम (= नवम) में शनि; सुतस्थे च तदीश्वरे = और पञ्चमेश पञ्चम में — (फल 16.28 में: सात पुत्र, एक गर्भ में यमल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.26 की शर्तों के साथ) द्वितीयेश दशम में हो तो आठ पुत्र; और शनि पञ्चम से पञ्चम में, पञ्चमेश पञ्चम में हो, (16.28 के अनुसार) सात पुत्र और एक गर्भ में जुड़वाँ। "वसु" = 8 — भूतसंख्या।

English rendering With the second lord in the tenth, eight (vasu) sons; and with Saturn fifth from the fifth and the fifth lord in the fifth — (seven sons, with twins in one pregnancy, in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: वसु = 8। "पञ्चमात् पञ्चमे" = भाव 5 से पाँचवाँ = भाव 9 (5 + 4)। शर्त-योग D (आरम्भ): Sa ∈ भाव 9 ∧ 5L ∈ भाव 5।

16.28
सूनवः सप्तसङ्ख्यश्च द्विगर्भे यमलौ वदेत् ।
वित्तेशे पञ्चमस्थाने सुतस्थे च सुताधिपे
sūnavaḥ saptasaṅkhyaśca dvigarbhe yamalau vadet |
vitteśe pañcamasthāne sutasthe ca sutādhipe
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूनवः सप्तसङ्ख्याः च = सात पुत्र; द्विगर्भे यमलौ वदेत् = एक गर्भ में दो (यमल/जुड़वाँ) कहे; वित्तेशे पञ्चमस्थाने = द्वितीयेश पञ्चम में; सुतस्थे च सुताधिपे = और पञ्चमेश पञ्चम में — (फल 16.29 में: छह पुत्र, तीन की हानि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.27 की शर्तों के साथ) सात पुत्र, जिनमें एक गर्भ से जुड़वाँ; और द्वितीयेश पञ्चम में, पञ्चमेश पञ्चम में हो, (16.29 के अनुसार) छह पुत्र, जिनमें तीन नहीं टिकते। "यमल" जुड़वाँ का शास्त्रीय शब्द है।

English rendering Seven sons, of whom twins from one womb; and with the second lord in the fifth and the fifth lord in the fifth — (six sons, three of whom are lost, in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्त = 7; यमल = 2 एक गर्भ में)। शर्त-योग E (आरम्भ): 2L ∈ भाव 5 ∧ 5L ∈ भाव 5।

16.29
जायन्ते षट् सुतास्तस्य तेषां च त्रिप्रजामृतिः ।
मन्दात् पञ्चमगे जीवे जीवात् पञ्चमगे शनौ
jāyante ṣaṭ sutāstasya teṣāṃ ca triprajāmṛtiḥ |
mandāt pañcamage jīve jīvāt pañcamage śanau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जायन्ते षट् सुताः तस्य = उसके छह पुत्र होते हैं; तेषां च त्रिप्रजामृतिः = उनमें तीन सन्तानों की मृत्यु; मन्दात् पञ्चमगे जीवे = शनि से पञ्चम में गुरु; जीवात् पञ्चमगे शनौ = गुरु से पञ्चम में शनि — (फल 16.30 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.28 की शर्तों के साथ) छह पुत्र होते हैं, जिनमें तीन की हानि; और गुरु शनि से पञ्चम में तथा शनि गुरु से पञ्चम में हो (परस्पर 5/9 सम्बन्ध), तो फल 16.30 में। संख्याएँ पाठ की हैं; "मृति" शब्द को कथन-रूप में ही लें।

English rendering Six sons are born to him, of whom three die; and with Jupiter fifth from Saturn and Saturn fifth from Jupiter — (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (षट् = 6; त्रि = 3)। ज्यामिति: Ju ∈ Sa + 4 राशि ∧ Sa ∈ Ju + 4 राशि ⇒ Ju–Sa परस्पर पञ्चम-नवम (त्रिकोण) में — 12-राशि चक्र में 4 + 4 + 4 = 12 से संगत।

16.30
सुतभे पापसंयुक्ते पुत्रमेकं विनिर्दिशेत् ।
पञ्चमे पापयुक्ते वा जीवात् पञ्चमगे शनौ
sutabhe pāpasaṃyukte putramekaṃ vinirdiśet |
pañcame pāpayukte vā jīvāt pañcamage śanau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतभे पापसंयुक्ते = पञ्चम राशि पाप-युक्त; पुत्रम् एकं विनिर्दिशेत् = एक पुत्र कहे; पञ्चमे पापयुक्ते वा = अथवा पञ्चम पाप-युक्त; जीवात् पञ्चमगे शनौ = गुरु से पञ्चम में शनि — (फल 16.31 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.29 की गुरु-शनि शर्त के साथ) पञ्चम राशि पाप-युक्त हो तो एक पुत्र; और पञ्चम पाप-युक्त हो तथा शनि गुरु से पञ्चम में हो, तो फल 16.31 में। संख्या-श्रृंखला 10 → 9 → 8 → 7 → 6 → 1 पर आती है।

English rendering With the fifth sign joined by a malefic, one son is to be declared; or with the fifth joined by a malefic and Saturn fifth from Jupiter — (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (एक = 1)। शर्त-योग F (आरम्भ): पाप ∈ भाव 5 ∧ Sa ∈ Ju + 4 राशि।

16.31
पत्न्यन्तरे पुत्रलाभं कलत्रत्रयभाग् भवेत् ।
पञ्चमे पापसंयुक्ते जीवात् पञ्चमगे शनौ
patnyantare putralābhaṃ kalatratrayabhāg bhavet |
pañcame pāpasaṃyukte jīvāt pañcamage śanau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पत्न्यन्तरे = दूसरी पत्नी से; पुत्रलाभम् = पुत्र-लाभ; कलत्रत्रयभाक् भवेत् = तीन पत्नियों वाला होता है; पञ्चमे पापसंयुक्ते = पञ्चम पाप-युक्त; जीवात् पञ्चमगे शनौ = गुरु से पञ्चम में शनि — (फल 16.32 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (16.30 की शर्त में) दूसरी पत्नी से पुत्र-लाभ और तीन पत्नियाँ; और पुनः पञ्चम पाप-युक्त हो, शनि गुरु से पञ्चम में हो, (16.32 के अनुसार लग्नेश द्वितीय में, पञ्चमेश मंगल-युक्त) तो अगला फल। पाठ में एक ही शर्त-पद दो बार दुहराया गया है — पाठ-भेद संभव।

English rendering A son through a second wife, and three wives in all; with a malefic in the fifth and Saturn fifth from Jupiter — (continued in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रय = 3 पत्नियाँ)।

16.32
लग्नेशे धनभावस्थे सुतेशो भौमसंयुतः ।
जातं जातं शिशुंहन्ति दीर्घायुश्च स्वयं भवेत्
lagneśe dhanabhāvasthe suteśo bhaumasaṃyutaḥ |
jātaṃ jātaṃ śiśuṃhanti dīrghāyuśca svayaṃ bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे धनभावस्थे = लग्नेश द्वितीय भाव में; सुतेशः भौमसंयुतः = पञ्चमेश मंगल से युक्त; जातं जातं शिशुं हन्ति = जन्मे-जन्मे शिशु की हानि करता है (योग); दीर्घायुः च स्वयं भवेत् = और (जातक) स्वयं दीर्घायु होता है।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का अन्तिम पद — शास्त्र कहता है कि (16.31 की शर्तों के साथ) लग्नेश द्वितीय में हो और पञ्चमेश मंगल से युक्त हो, तो यह योग जन्मी हुई प्रत्येक सन्तान की हानि करता है, जबकि जातक स्वयं दीर्घायु होता है। "हन्ति" पाठ का शब्द है; इसे भय की भाषा नहीं, योग-वर्गीकरण की भाषा समझें — अरिष्ट-भङ्ग और बल-विचार इसके साथ चलते हैं।

English rendering With the lagna lord in the second and the fifth lord joined by Mars, the text says the combination takes away each child as it is born, while the native himself lives long.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: AL ∈ भाव 2 ∧ Ma ∈ युति(5L) (16.31 की पञ्चम-पाप और Sa ∈ Ju + 4 शर्तों के साथ)।

अध्यायः 17

षष्ठभावफलाध्यायः

28 श्लोक
17.1
अथ विप्र फलं वक्ष्ये षष्ठभावसमुद्‌भवम्‌।
देहे रोगव्रणाद्यं तत्‌ श्रूयतामेकचेतसा
atha vipra phalaṃ vakṣye ṣaṣṭhabhāvasamud‌bhavam‌|
dehe rogavraṇādyaṃ tat‌ śrūyatāmekacetasā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (अध्याय-आरम्भ); विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय-सम्बोधन); फलं वक्ष्ये = फल कहूँगा; षष्ठभाव-समुद्भवम् = छठे भाव से उत्पन्न; देहे = शरीर में; रोग-व्रण-आद्यम् = रोग, व्रण (घाव) आदि; श्रूयताम् = सुना जाए; एक-चेतसा = एकाग्र चित्त से।

हिन्दी भावार्थ अब हे विप्र (मैत्रेय), मैं छठे भाव से उत्पन्न होने वाला फल कहता हूँ — शरीर में रोग, व्रण (घाव) आदि का विचार। इसे एकाग्र मन से सुनो। यह अध्याय का उपक्रम है; पराशर यहाँ षष्ठ-भाव (रिपु/रोग/ऋण भाव) के फल-कथन का संकल्प कर रहे हैं।

English rendering Now, O Brahmin, I shall speak the fruits arising from the sixth house — disease, wounds and the like in the body; hear this with a single-pointed mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपक्रम/संवाद (अध्याय-प्रतिज्ञा)। छठा भाव यहाँ रोग-स्थान के रूप में परिभाषित है; आगे के श्लोक इसी भाव के स्वामी, कारक व सहचर-ग्रह से घाव/रोग का स्थान व प्रकार नियत करते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरा अध्याय phala-कथन है — इसलिए हमारी कार्य-अनुशासन-रेखा यहीं से लागू होती है: प्रत्येक फल को "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करना, इसे भाग्य/निश्चय या हमारी अपनी भविष्यवाणी के रूप में नहीं। गणित (वर्ग, अष्टकवर्ग, दशा, बल) और interpretation को अलग रखने का वही नियम, जो हमारे oracle में `==` से पिन है, इस रोग-अध्याय के हर फल-वाक्य पर भी लागू है।

17.2
षष्ठाधिपः स्वगेहे वा देहे वाऽप्यष्टमे स्थितः।
तदा व्रणा भवेद्देहे षष्ठराशिसमाश्रते
ṣaṣṭhādhipaḥ svagehe vā dehe vā'pyaṣṭame sthitaḥ|
tadā vraṇā bhaveddehe ṣaṣṭharāśisamāśrate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाधिपः = छठे भाव का स्वामी (L6); स्वगेहे = अपने घर में (अर्थात् षष्ठ में); देहे = देह-भाव अर्थात् लग्न (प्रथम) में; अष्टमे स्थितः = आठवें में स्थित; तदा = तब; व्रणः भवेत् देहे = शरीर पर व्रण (घाव) होता है; षष्ठ-राशि-समाश्रिते = छठे में स्थित राशि के अनुरूप अंग पर।

हिन्दी भावार्थ यदि छठे भाव का स्वामी अपने ही घर (षष्ठ) में, अथवा देह-भाव लग्न में, अथवा अष्टम में स्थित हो — तो शरीर पर व्रण (घाव) होता है; और वह घाव उस अंग पर होता है जो षष्ठ-भाव में बैठी राशि से सूचित होता है (कालपुरुष-अंग-विभाग के अनुसार)।

English rendering If the lord of the sixth stands in its own house, or in the ascendant (the "body"), or in the eighth, a wound appears on the body — on the limb signified by the sign occupying the sixth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लक्षण-योग + नियत मानचित्र।
शर्त: L6 ∈ {भाव 6, भाव 1, भाव 8} ⇒ देह पर व्रण।
स्थान: अंग = कालपुरुष-मानचित्र(षष्ठस्थ राशि):
मेष→शिर, वृष→मुख, मिथुन→बाहु/स्कन्ध, कर्क→वक्ष/हृदय, सिंह→उदर, कन्या→कटि, तुला→वस्ति (नाभि-निम्न), वृश्चिक→गुह्य, धनु→ऊरु, मकर→जानु, कुम्भ→जङ्घा, मीन→पाद। (यह राशि→अंग विभाजन नियत/deterministic है — व्याख्या नहीं, आरोपण।)

उदाहरण (worked example) मेष-लग्न ⇒ षष्ठ = कन्या, षष्ठेश = बुध। यदि बुध लग्न (1), षष्ठ (6) या अष्टम (8) में हो — तो व्रण-योग; अंग = कन्या → कटि/उदर-प्रदेश। अतः शास्त्रानुसार कटि-प्रदेश पर घाव कहा जाता है।

17.3
एवं पित्रादिभावेशास्तत्तत्कारकसंयुताः।
व्रणाधिपयुताश्चापि षष्ठाष्टमयुता यदि
evaṃ pitrādibhāveśāstattatkārakasaṃyutāḥ|
vraṇādhipayutāścāpi ṣaṣṭhāṣṭamayutā yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; पित्रादि-भावेशाः = पिता आदि भावों के स्वामी (नवमेश आदि); तत्तत्-कारक-संयुताः = अपने-अपने कारक से युक्त; व्रण-अधिप-युताः = व्रण के स्वामी (षष्ठेश) से युक्त; च अपि = और भी; षष्ठ-अष्टम-युताः यदि = यदि षष्ठ/अष्टम से सम्बद्ध हों।

हिन्दी भावार्थ इसी प्रकार पिता आदि भावों के स्वामी — जब वे अपने-अपने कारक ग्रह से युक्त हों, तथा व्रण के अधिपति (षष्ठेश) से भी युक्त हों, अथवा षष्ठ-अष्टम से सम्बद्ध हों — तो उन-उन सम्बन्धियों को भी व्रण होता है, ऐसा कहना चाहिए। श्लोक 2 का नियम यहाँ अन्य भावों (पिता, माता आदि) तक विस्तारित है।

English rendering Likewise the lords of the houses of father and the rest — when joined with their respective significators and with the lord of the wound (the sixth lord), or linked to the sixth and eighth — indicate a wound for those relations too.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम का सामान्यीकरण (लक्षण-योग)। संरचना: किसी भाव B के लिए, यदि LB अपने कारक K_B तथा L6 से युक्त हो, या B/LB का षष्ठ-अष्टम से सम्बन्ध हो, तो उस भाव की सूचित व्यक्ति/अंग पर व्रण — षष्ठेश-योग को कारक-द्वारा भावान्तर पर आरोपित करने की विधि।

17.4
तेषामपि व्रणं वाच्यमादित्ये न शिरोव्रणम्‌।
इन्दुना च मुखे कण्ठे भौमेन ज्ञेन नाभिषु
teṣāmapi vraṇaṃ vācyamāditye na śirovraṇam‌|
indunā ca mukhe kaṇṭhe bhaumena jñena nābhiṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेषाम् अपि = उनका भी (उन भावों/सम्बन्धियों का); व्रणं वाच्यम् = व्रण कहना चाहिए; आदित्ये(न) = सूर्य से → शिरोव्रणम् = सिर पर घाव; इन्दुना = चन्द्र से → मुखे = मुख पर; कण्ठे भौमेन = कण्ठ पर मंगल से; ज्ञेन नाभिषु = बुध से नाभि-प्रदेश पर।

हिन्दी भावार्थ उन भावों का भी व्रण (उपर्युक्त योग में) इस प्रकार कहना चाहिए — सूर्य से सिर पर घाव, चन्द्र से मुख पर, मंगल से कण्ठ पर, और बुध से नाभि-प्रदेश पर। यह ग्रह→अंग मानचित्र का पूर्वार्ध है; उत्तरार्ध श्लोक 5 में।

English rendering The wound of those too is to be told thus: by the Sun on the head, by the Moon on the face, by Mars on the throat, by Mercury at the navel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह→अंग नियत-सारणी (lookup) — व्रण-योग होने पर सहचर ग्रह घाव का अंग नियत करता है (अंश 1/4):
सूर्य → शिर; चन्द्र → मुख; मंगल → कण्ठ; बुध → नाभि।
(पाठ-भेद संभव: "आदित्ये न शिरोव्रणम्" को कुछ पाठ "आदित्येन शिरोव्रणम्" पढ़ते हैं — अर्थ वही: सूर्य से सिर पर व्रण; निषेध-पाठ अभीष्ट नहीं।)

उदाहरण (worked example) श्लोक 2 का व्रण-योग विद्यमान हो और सम्बद्ध/युत ग्रह सूर्य हो ⇒ घाव का अंग = शिर (सिर)। शास्त्रानुसार सिर पर व्रण कहा जाता है।

17.5
गुरुणा नासिकायां च भृगुणा नयने पदे।
शनिना राहुणा कुक्षौ केतुना च तथा भवेत्‌
guruṇā nāsikāyāṃ ca bhṛguṇā nayane pade|
śaninā rāhuṇā kukṣau ketunā ca tathā bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुणा नासिकायाम् = गुरु (बृहस्पति) से नासिका (नाक) पर; भृगुणा नयने = शुक्र से नेत्रों पर; पदे शनिना = पैरों पर शनि से; राहुणा कुक्षौ = राहु से कुक्षि (कोख/पार्श्व-उदर) पर; केतुना च तथा = केतु से भी उसी प्रकार; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ गुरु से नासिका पर, शुक्र से नेत्रों पर, शनि से पैरों पर, राहु से कुक्षि (कोख) पर, और केतु से भी वैसा ही (कुक्षि-प्रदेश पर) घाव होता है। इस प्रकार नौ ग्रहों का अंग-विभाग पूर्ण होता है।

English rendering By Jupiter on the nose, by Venus on the eyes, by Saturn on the feet, by Rāhu on the flank, and by Ketu likewise on the flank — so the wound falls.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह→अंग सारणी (अंश 2/4, नौ-ग्रह पूर्ण):
गुरु → नासिका; शुक्र → नेत्र; शनि → पाद; राहु → कुक्षि; केतु → कुक्षि (तथैव)।
पूर्ण मानचित्र: रवि-शिर, चन्द्र-मुख, मंगल-कण्ठ, बुध-नाभि, गुरु-नासिका, शुक्र-नेत्र, शनि-पाद, राहु/केतु-कुक्षि।
(पाठ-भेद संभव: "भृगुणा नयने पदे / शनिना" के पद-विभाजन में मतभेद — यहाँ शुक्र→नेत्र, शनि→पाद लिया गया।)

उदाहरण (worked example) व्रण-योग में सहचर ग्रह शनि ⇒ अंग = पाद; अतः शास्त्रानुसार पैरों पर घाव कहा जाता है। (राशि→अंग [श्लोक 2] और ग्रह→अंग [श्लोक 4–5] दो स्वतंत्र नियत-मानचित्र हैं; प्रयोग में इनके संयोजन से अंग-निर्णय सूक्ष्म होता है।)

17.6
लग्नाधिपः कुजक्षेत्रे बुधभे यदि संस्थितः।
यत्र कुत्र स्थितो ज्ञेन वीक्षितो मुखरुक्प्रदः
lagnādhipaḥ kujakṣetre budhabhe yadi saṃsthitaḥ|
yatra kutra sthito jñena vīkṣito mukharukpradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपः = लग्नेश; कुजक्षेत्रे = मंगल-राशि (मेष/वृश्चिक) में; बुधभे = बुध-राशि (मिथुन/कन्या) में; यदि संस्थितः = यदि स्थित हो; यत्र कुत्र स्थितः = जहाँ कहीं भी स्थित; ज्ञेन वीक्षितः = बुध से दृष्ट; मुखरुक्प्रदः = मुख-रोग देने वाला (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश यदि मंगल-क्षेत्र में अथवा बुध-भ में स्थित हो, और — जहाँ कहीं भी हो — बुध से दृष्ट हो, तो मुख-रोग का संकेत दिया गया है। यहाँ दो शर्त-स्तर हैं: (1) लग्नेश की राशि-स्थिति (कुज/बुध क्षेत्र), (2) बुध-दृष्टि। यह स्थिति–दृष्टि फल है, दशा-गणना नहीं।

English rendering The text states that when the lagna-lord occupies a Martian or Mercurial sign and, wherever placed, is aspected by Mercury, mouth affliction is indicated. The rule is positional and aspectual, not a period-arithmetic formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लग्नेश-स्थिति + बुध-दृष्टि का फल-नियम। जाँच-बिन्दु: लग्नेश ∈ {मेष, वृश्चिक, मिथुन, कन्या} और बुध-दृष्टि (परम्परा में पूर्ण दृष्टि 7वीं; ग्रह-विशेष दृष्टि के पाठ-भेद संभव)। कोई °/′ सूत्र श्लोक में नहीं।

17.7
लग्नाधिपौ कुजबुधौ चन्द्रेण यदि संयुतौ।
राहुणा शनिना सार्द्धं कुष्ठं तत्र विनिर्दिशेत्‌
lagnādhipau kujabudhau candreṇa yadi saṃyutau|
rāhuṇā śaninā sārddhaṃ kuṣṭhaṃ tatra vinirdiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपौ कुजबुधौ = लग्न-सम्बद्ध कुज और बुध (द्विवचन — कुज–बुध का लग्न-युग्म/लग्नेश के साथ कुज-बुध; पाठ-भेद संभव); चन्द्रेण संयुतौ = चन्द्र से युक्त; राहुणा शनिना सार्द्धं = राहु और शनि के साथ; कुष्ठं = कुष्ठ (चर्म-क्षय/कुष्ठ-संकेत); तत्र = वहाँ; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे / कहा जाए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कुज और बुध लग्न-सन्दर्भ में (लग्नेश-युग्म/लग्न-सम्बद्ध) चन्द्र से युक्त हों, और राहु तथा शनि के साथ हों, तब कुष्ठ का निर्देश दिया गया है। यह बहु-ग्रह संयोग का कठोर फल-कथन है; इसे भय या चिकित्सा-निदान की भाषा में नहीं पढ़ना — केवल पाठ का संकेत।

English rendering The text states that when Mars and Mercury, in the lagna-frame, are conjoined with the Moon and associated with Rāhu and Saturn, kuṣṭha (a severe skin affliction in classical vocabulary) is to be indicated. Report the claim as the śāstra’s; do not convert it into fear or medical certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — बहु-ग्रह संयोग (कुज + बुध + चन्द्र + राहु + शनि) का फल-कथन। शर्तें संयोजक हैं; कोई दशा-वर्ष, वर्गांश-अंश या बलांक-सीमा इस श्लोक में नहीं। “लग्नाधिपौ कुजबुधौ” के द्विवचन में पाठ-भेद/अन्वय-भेद संभव — लग्नेश-के-साथ-कुज-बुध बनाम कुज-बुध-को-लग्न-स्वामी मानना, दोनों टीका-मार्ग मिलते हैं।

17.8
लग्नाधिपं विना लग्ने स्थितश्चेत्तमसा शशी।
स्वेतकुष्ठं तदा कृष्णकुष्ठं च शनिना सह
lagnādhipaṃ vinā lagne sthitaścettamasā śaśī|
svetakuṣṭhaṃ tadā kṛṣṇakuṣṭhaṃ ca śaninā saha

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपम् = लग्न-स्वामी; विना = उसके बिना / उसकी संगति-रहित अवस्था में; लग्ने स्थितः = लग्न में स्थित; तमसा = तमस् (अन्धकार-ग्रह; प्रायः राहु-संकेत, पाठ-भेद संभव); शशी = चन्द्र; स्वेतकुष्ठम् = श्वेत-कुष्ठ (श्वेत त्वग्-विकार का शास्त्रीय नाम); कृष्णकुष्ठम् = कृष्ण-कुष्ठ (कृष्ण/काला त्वग्-विकार); शनिना सह = शनि के साथ युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि चन्द्र लग्न में हो, और लग्न-स्वामी वहाँ न हो (अथवा उसकी संगति न हो), तथा चन्द्र तमस्-युत् हो, तो श्वेत-कुष्ठ का संकेत माना जाता है। यदि वही चन्द्र शनि के साथ हो, तो कृष्ण-कुष्ठ का संकेत कहा गया है। यह फल-कथन लग्न-स्थित चन्द्र के योग-विशेष पर टिका है; इसे चिकित्सा-निदान नहीं, शास्त्रीय संकेत-भाषा समझना चाहिए।

English rendering The text states that if the Moon occupies the lagna without the lagna-lord, joined with tamas (often read as Rāhu; reading may vary), white kuṣṭha is indicated; joined with Saturn, dark/black kuṣṭha is indicated. These are traditional phala-clauses, not clinical diagnoses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न-स्थित चन्द्र + तमस्/शनि योग से कुष्ठ-प्रकार)। योग-शर्तें द्विआधारी हैं: (1) चन्द्र ∈ लग्न, (2) लग्नाधिप-संगति-अभाव, (3) तमस्-योग → श्वेत; शनि-योग → कृष्ण — गणना नहीं, केवल स्थिति-परीक्षा।

17.9
कुजेन रक्तकुष्ठं स्यात्तत्तदेवं विचारयेत्‌।
लग्ने षष्ठाष्टमाधोशौ रविणा यदि संयुतौ
kujena raktakuṣṭhaṃ syāttattadevaṃ vicārayet‌|
lagne ṣaṣṭhāṣṭamādhośau raviṇā yadi saṃyutau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजेन = मङ्गल से युक्त; रक्तकुष्ठम् = रक्त-कुष्ठ (रक्त/रक्तवर्ण-संबद्ध कुष्ठ-प्रकार का शास्त्र-नाम); स्यात् = होता है (कहा गया); तत्तत् एवम् विचारयेत् = उसी क्रम से विचार करे; लग्ने = लग्न में; षष्ठ-अष्टम-अधोशौ = षष्ठ, अष्टम तथा अधः (द्वादश) भावों के स्वामी; रविणा = सूर्य से; यदि संयुतौ = यदि युक्त हों।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — मङ्गल-योग में रक्तकुष्ठ का विचार किया जाए; पूर्व-श्लोकों के क्रम से ही ग्रह-भेद से कुष्ठ-भेद पढ़ना चाहिए। फिर दूसरी शर्त: यदि षष्ठ, अष्टम और अधोभाव (द्वादश) के स्वामी लग्न में सूर्य से युक्त हों, तो आगामी श्लोक में बताए गए गण्ड-ज्वर आदि फल लागू होते हैं। “अधोश” यहाँ द्वादश-स्वामी का पारंपरिक संकेत है; पाठ-भेद संभव।

English rendering With Mars, the text assigns raktakuṣṭha and bids the student judge each case by the same logic. It then sets a second configuration: when the lords of the 6th, 8th, and adhas (12th) stand in the lagna joined with the Sun — the results continue in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा। जाँच-बिन्दु: (क) मङ्गल-संगति → रक्तकुष्ठ-संकेत; (ख) {L6, L8, L12} लग्न में ∧ सूर्य-युक्त — यह स्थिति-मैट्रिक्स है, अंश-सूत्र नहीं। भाव-स्वामी निर्धारण: लग्न-राशि से 6/8/12वें राशियों के अधिपति (पूर्ण-राशि भाव-पद्धति पर निर्भर; घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (पूर्ण-राशि भाव)। तब L6 = बुध (कन्या), L8 = मङ्गल (वृश्चिक), L12 = गुरु (मीन)। यदि ये तीनों (या दो — “संयुतौ” द्विवचन; पाठ-भेद संभव) लग्न में सूर्य-युक्त हों, तो श्लोक 17.10 का फल-क्रम लागू होता है। यह केवल योग-पहचान है, रोग-निदान नहीं।

17.10
ज्वरगण्डः कुजे ग्रन्थिः शस्त्रव्रणमथापि वा।
बुधेन पित्तं गुरुणा रोगाभावं विनिर्दिशेत्
jvaragaṇḍaḥ kuje granthiḥ śastravraṇamathāpi vā|
budhena pittaṃ guruṇā rogābhāvaṃ vinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वर-गण्डः = ज्वर (बुखार) व गण्ड (फोड़ा) — सूर्य-युति का फल (श्लोक 9 से क्रमागत); कुजे ग्रन्थिः = मंगल हो तो ग्रन्थि (गाँठ/गिल्टी); शस्त्र-व्रणम् अथ अपि वा = अथवा शस्त्र से घाव; बुधेन पित्तं = बुध से पित्त-रोग; गुरुणा रोग-अभावं = गुरु से रोग का अभाव; विनिर्दिशेत् = कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ (षष्ठेश-अष्टमेश लग्न में) सूर्य से युक्त हों तो ज्वर व फोड़ा; मंगल हो तो ग्रन्थि (गाँठ) अथवा शस्त्र-व्रण; बुध से पित्त-विकार; और गुरु (बृहस्पति) से रोग का अभाव कहना चाहिए — अर्थात् बृहस्पति की उपस्थिति रक्षक है, ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering With those lords in the ascendant: by the Sun, fever and a boil; by Mars, a tumour or a weapon-wound; by Mercury, a bilious disorder; by Jupiter, absence of disease — so it is to be declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम (सहचर-आधारित रोग-भेद सारणी)। L6+L8 (लग्नस्थ) के सहचर से फल: सूर्य→ज्वर+गण्ड; मंगल→ग्रन्थि/शस्त्र-व्रण; बुध→पित्त; गुरु→रोगाभाव। ध्यातव्य: यहाँ गुरु "रोग-अभाव"-कारक है — शुभ-ग्रह-संस्पर्श का रक्षक-पक्ष स्वयं शास्त्र में अंकित है।

17.11
स्त्रीभिः शुक्रेण शशिना वायुना संयुतो यदि।
गण्डश्चाण्डालतो नाभौ तमःकेतुयुते भयम्‌
strībhiḥ śukreṇa śaśinā vāyunā saṃyuto yadi|
gaṇḍaścāṇḍālato nābhau tamaḥketuyute bhayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीभिः = स्त्रियों से / स्त्री-संबन्ध से; शुक्रेण = शुक्र से युक्त; शशिना = चन्द्र से; वायुना = वायु (वात-प्रकार); संयुतः यदि = यदि युक्त हो; गण्डः = गण्ड/सूजन-संकेत; चाण्डालतः = चाण्डाल-संसर्ग/अस्पृश्य-संकेत से (सामाजिक-श्रेणी भाषा; ऐतिहासिक शास्त्र-शब्द); नाभौ = नाभि-प्रदेश में; तमः-केतु-युते = तमस् तथा केतु से युक्त होने पर; भयम् = भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र-योग में स्त्री-संबन्ध से गण्ड-संकेत; चन्द्र-योग में वायु (वात) प्रकार का संकेत। तमस्-केतु योग में नाभि-संबद्ध गण्ड तथा चाण्डाल-संसर्ग-भय का कथन है (पाठ-भेद संभव — “गण्डश्चाण्डालतो नाभौ” की अन्वय-रेखाएँ भिन्न हो सकती हैं)। यहाँ की भाषा पुरानी सामाजिक कोटियों वाली है; हम उसे ज्यों-का-त्यों शास्त्र-कथन के रूप में रखते हैं, न कि आधुनिक अपमान-विधान के रूप में।

English rendering The text states: with Venus, gandha linked to women; with the Moon, a vāyu-type indication. When tamas and Ketu join, it speaks of navel-related gandha and fear associated with caṇḍāla-contact — a historical phala phrasing (reading may vary), not a modern social judgment we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र/चन्द्र/तमस्-केतु भेद से गण्ड-प्रकार)। केवल सहचर-ग्रह की जाँच: शुक्र → स्त्री-संकेत; चन्द्र → वायु; तमस्+केतु → नाभि-गण्ड/भय — संख्यात्मक सूत्र अनुपस्थित।

17.12
चन्द्रेण गण्डः सलिलैः कफश्लेष्मादिना भवेत्‌।
एवं पित्रादिभानां तत्तत्कारकयोगतः
candreṇa gaṇḍaḥ salilaiḥ kaphaśleṣmādinā bhavet‌|
evaṃ pitrādibhānāṃ tattatkārakayogataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रेण = चन्द्र से; गण्डः = गण्ड; सलिलैः = जल से / जलीय कारण से; कफ-श्लेष्म-आदिना = कफ, श्लेष्म आदि से; भवेत् = होता है (कहा गया); एवम् = इसी प्रकार; पितृ-आदि-भानाम् = पिता आदि (सम्बन्धी) भावों के; तत्तत्-कारक-योगतः = उन-उन कारक-ग्रहों के योग से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट करता है — चन्द्र-योग में गण्ड जल/कफ-श्लेष्म आदि से जुड़ा माना जाए। फिर नियम विस्तृत होता है: पिता आदि सम्बन्धियों के विषय में भी उसी रीति से, उनके कारक-ग्रहों और सम्बन्धित भावों के योग से गण्ड/रोग-संकेत कहना चाहिए। यह “कारक-भाव-योग” का सामान्यीकरण है — एक ही ढाँचा, अनेक क्षेत्र।

English rendering With the Moon, the text assigns gandha through water, kapha, and śleṣma. It then generalizes: for the father and other kin, declare likewise from the relevant houses and their kāraka-yogas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम / कारक-सामान्यीकरण। ढाँचा: क्षेत्र S (स्व, पिता, …) → भाव B_S + कारक K_S + योग-ग्रह G → फल-प्रकार F(G)। उदाहरण: पिता-क्षेत्र में सूर्य/नवम-दशम परंपरागत कारक-योग (परंपरा-भेद घोषित करें) — यहाँ केवल विधि का कंकाल है, संख्या नहीं।

17.13
गण्डं तेषां वदेदेवमुह्यमत्र मनीषिभिः।
रोगस्थानगते पापे तदीशे पापसंयुते
gaṇḍaṃ teṣāṃ vadedevamuhyamatra manīṣibhiḥ|
rogasthānagate pāpe tadīśe pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गण्डं तेषां वदेत् एवम् = उन (भावों) का गण्ड इस प्रकार कहना चाहिए; ऊह्यम् अत्र मनीषिभिः = यहाँ बुद्धिमानों (मनीषी) को अनुमान (ऊह) से जानना चाहिए; रोग-स्थान-गते पापे = रोग-स्थान (षष्ठ) में पाप-ग्रह हो; तद्-ईशे पाप-संयुते = उसका स्वामी (षष्ठेश) भी पाप-ग्रह से युक्त हो।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार उन भावों का गण्ड कहना चाहिए — शेष को बुद्धिमानों को स्वयं अनुमान से जान लेना चाहिए। इसके बाद नया योग: जब रोग-स्थान (षष्ठ) में पाप-ग्रह हो और उसका स्वामी भी पाप-ग्रह से युक्त हो — (तो निरन्तर रोग; फल श्लोक 14 में)।

English rendering Thus one should state the boil for those houses; the rest the wise must infer. Next: when a malefic occupies the disease-house and its lord too is joined with a malefic…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम + विवेक-निर्देश (ऊह्यम् = अनुमेय)। नए योग का उपक्रम: पाप ∈ भाव 6 ∧ पाप-युति(L6) ⇒ (क्रमशः रोग-वृद्धि, श्लोक 14)। "मनीषिभिः ऊह्यम्" — शास्त्र प्रत्येक स्थिति गिनाता नहीं; शेष सूत्र-विस्तार विवेकपूर्वक करना है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "ऊह्यम् अत्र मनीषिभिः" स्वयं शास्त्र का declared-inference निर्देश है — जहाँ पाठ हर स्थिति नहीं गिनाता, वहाँ नियम-विस्तार खुले रूप में करना है। यही अनुशासन हमने भी अपनाया: जहाँ पाठ-भेद या अनिर्दिष्ट स्थिति है (जैसे इस अध्याय का ग्रह→अंग व कुष्ठ-भेद), उसे मौन-निर्णय नहीं बल्कि declared convention के रूप में दिखाना — ठीक वैसे जैसे अष्टकवर्ग में चन्द्र-रेखा की BPHS Ch.66-vs-Phaladīpikā स्थिति को side-by-side `[HUMAN]` खुले रूप में रखा गया।

17.14
राहुणा संयुते मन्दे सर्वदा रोगसंयुतः।
रोगस्थानगते भौमे तदीशे रंध्रसंयुते
rāhuṇā saṃyute mande sarvadā rogasaṃyutaḥ|
rogasthānagate bhaume tadīśe raṃdhrasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहुणा संयुते = राहु से युक्त होने पर; मन्दे = शनि (मन्द); सर्वदा = सदैव; रोगसंयुतः = रोगग्रस्त; रोगस्थान = षष्ठ भाव (6th, रोग/रिपु); भौमे = मंगल; तदीशे = उस (षष्ठ) भाव का स्वामी; रंध्र = अष्टम भाव (8th); रंध्रसंयुते = अष्टम से युक्त।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की धारा को पूरा करते हुए शास्त्र कहता है — जहाँ शनि राहु के साथ बैठे, वहाँ जातक को सदैव रोगयुक्त बताया जाता है। इसके पश्चात् एक नयी दशा आरम्भ होती है: मंगल षष्ठ (रोग) भाव में हो और षष्ठेश अष्टम (रंध्र) से युक्त हो — इसका फल अगले श्लोक में कहा जाएगा। यह इस अध्याय की विशिष्ट शैली है, जहाँ योग की स्थिति और उसका फल दो श्लोकों में विभक्त रहते हैं।

English rendering When Saturn is joined with Rāhu, the text declares the native to be perpetually disease-ridden; and — beginning a fresh rule — when Mars occupies the 6th house of illness while its lord is joined to the 8th, [the result follows in the next verse].

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-निर्देश)। "सर्वदा रोगसंयुतः" जैसा निरपवाद वाक्य शास्त्र का दावा है, कोई अनिवार्य नियति नहीं — इसे भाव-स्थिति पर आधारित प्रवृत्ति-कथन के रूप में पढ़ना ही अनुशासित पाठ है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वही फल-वाक्य है जिसे हमारी पद्धति गणना से पृथक् रखती है। हमारे kaal-इंजन में ग्रह-स्थान (मंगल = षष्ठ, स्वामी = अष्टम) निश्चित मॉड्युलर तथ्य हैं जिन्हें `==` से जाँचा जाता है; परन्तु "सदैव रोगी" खण्ड को "शास्त्र कहता है" कहकर उद्धृत किया जाता है, कभी नियति के रूप में नहीं। गणित को `==` से सिद्ध करना और व्याख्या को उद्धरण-चिह्न में रखना — यही हमारे अनुशासन की धुरी है।

17.15
षड्‌वर्षे द्वादशे वर्षे ज्वररोगी भवेन्नरः।
षष्ठस्थानगते जीवे तद्‌गृहे चन्द्रसंयुते
ṣaḍ‌varṣe dvādaśe varṣe jvararogī bhavennaraḥ|
ṣaṣṭhasthānagate jīve tad‌gṛhe candrasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षड्‌वर्षे = छठे वर्ष में; द्वादशे वर्षे = बारहवें वर्ष में; ज्वररोगी = ज्वर-रोग से पीड़ित; भवेत् नरः = मनुष्य हो; षष्ठस्थानगते जीवे = बृहस्पति षष्ठ भाव में स्थित; तद्‌गृहे = उसी भाव/गृह में; चन्द्रसंयुते = चन्द्रमा से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बृहस्पति षष्ठ स्थान में हो और उसी भाव में चन्द्रमा भी संयुक्त हो, तो व्यक्ति छठे वर्ष में तथा बारहवें वर्ष में ज्वर-रोगी हो सकता है। यह षष्ठ-भाव की रोग-सम्बन्धी फल-कथन की काल-सूचना है। फल को शास्त्र की अपनी भाषा में पढ़ें, न कि निश्चित भाग्य-घोषणा के रूप में।

English rendering The text states that when Jupiter occupies the sixth house and the Moon is conjoined in that same house, the person is indicated as fever-afflicted in the sixth and twelfth years. This is a sixth-house timing statement of the śāstra, not a modern medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष-संख्या + भाव-योग)। यहाँ काल-अंक शास्त्रीय पूर्ण वर्ष हैं: ६ और १२; योग की शर्त है — गुरु ∈ षष्ठ भाव, चन्द्र ∈ उसी भाव (गुरु-चन्द्र युति)। भाव-गणना में प्रयुक्त गृह-पद्धति (समान-भाव / श्रीपति आदि) घोषित करनी चाहिए; फल स्वयं गृह-परिभाषा पर निर्भर रहता है।

17.16
द्वाविंशौकोनविंशेऽब्दे कुष्ठरोगं विनिर्दिशेत्‌।
रोगस्थानं गतो राहुः केन्द्रे मान्दिसमन्विते
dvāviṃśaukonaviṃśe'bde kuṣṭharogaṃ vinirdiśet‌|
rogasthānaṃ gato rāhuḥ kendre māndisamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वाविंशे = बाईसवें; एकोनविंशे = उन्नीसवें (विंश−१); अब्दे = वर्ष में; कुष्ठरोगम् = कुष्ठ-रोग (शास्त्रीय रोग-नाम); विनिर्दिशेत् = निर्देश करे / इंगित करे; रोगस्थानम् = रोग-स्थान (षष्ठ भाव); गतः राहुः = राहु स्थित; केन्द्रे = केन्द्र में; मान्दिसमन्विते = मान्दि (उपाग्रह) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब राहु रोग-स्थान (षष्ठ) में हो और (संबंधित विन्यास में) केन्द्र में मान्दि से युक्त हो, तो उन्नीसवें तथा बाईसवें वर्ष में कुष्ठ-रोग का निर्देश किया जाता है। यह रोग-काल और ग्रह-उपाग्रह योग का फल-कथन है। “कुष्ठ” यहाँ शास्त्र का पारम्परिक पद है — चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu occupies the disease-house (the sixth) and is associated with Māndi in a kendra configuration, kuṣṭha-disease is to be indicated in the nineteenth and twenty-second years. The disease-name is the śāstra’s classical term, not a clinical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष १९ व २२; राहु–मान्दि–केन्द्र शर्त)। एकोनविंश = २० − १ = १९; द्वाविंश = २२। मान्दि/गुलिक उपाग्रह-देशा का स्थानीय मान (दिन-रात्रि खण्ड) परम्परा-भेद से बदलता है — गणना में वह पद्धति घोषित करनी चाहिए। पाठ में “केन्द्रे मान्दिसमन्विते” का ठीक अन्वय (राहु केन्द्र-स्थित मान्दि-युक्त, अथवा रोगस्थान-राहु + केन्द्र-मान्दि) पाठ-भेद/अन्वय-भेद संभव।

17.17
लग्नेशे नाशराशिस्थे षड्‌विंशे क्षयरोगता।
व्ययेशे रोगराशिस्थे तदीशे व्ययराशिगे
lagneśe nāśarāśisthe ṣaḍviṃśe kṣayarogatā|
vyayeśe rogarāśisthe tadīśe vyayarāśige
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्नेश; नाशराशिस्थे = अष्टम (नाश) राशि में स्थित; षड्विंशे = छब्बीसवें (वर्ष में); क्षयरोगता = क्षय-रोग; व्ययेशे = द्वादशेश; रोगराशिस्थे = षष्ठ (रोग) राशि में; तदीशे = उस (षष्ठ) के स्वामी के; व्ययराशिगे = द्वादश राशि में गए होने पर — (फल अगले श्लोक में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश अष्टम भाव में हो तो छब्बीसवें वर्ष में क्षय-रोग कहा गया है। दूसरा पद शर्त रखता है — द्वादशेश षष्ठ में और षष्ठेश द्वादश में हो — जिसका फल 17.18 में आता है। रोग-भाव के ये कथन पाठ की शर्त-सूची हैं; आयु-अङ्क शास्त्र का अपना है।

English rendering The text states that with the lagna lord in the eighth house, consumptive disease comes in the twenty-sixth year; and when the twelfth lord is in the sixth and the sixth lord in the twelfth — (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-अङ्क: षड्विंश = 26)। शर्त: AL ∈ भाव 8 → वर्ष 26; तथा 12L ∈ भाव 6 ∧ 6L ∈ भाव 12 → 17.18 का फल।

17.18
त्रिंशद्वर्षैकोनवर्षे गुल्मरोगं विनिर्दिशेत्‌।
रिपुस्थेनगते चन्द्रे शशिना संयुते सति
triṃśadvarṣaikonavarṣe gulmarogaṃ vinirdiśet‌|
ripusthenagate candre śaśinā saṃyute sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंशद्‌वर्षे = तीसवें वर्ष में; एकोनवर्षे = एकोन (२९वें) वर्ष में; गुल्मरोगम् = गुल्म-रोग (शास्त्रीय उदर/गुल्म-संज्ञा); विनिर्दिशेत् = निर्देश करे; रिपुस्थेन गते = शत्रु-स्थान (षष्ठ) में गए हुए; चन्द्रे = चन्द्रमा के; शशिना संयुते सति = चन्द्र (शशिन्) से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्रमा रिपु-स्थान (षष्ठ भाव) में हो और चन्द्र-संयोग की स्थिति हो, तो उनतीसवें तथा तीसवें वर्ष में गुल्म-रोग का निर्देश किया जाता है। “गुल्म” आयुर्वेदीय-शास्त्रीय रोग-पद है; यहाँ चिकित्सा-उपदेश नहीं, केवल होरा-फल की भाषा है। “चन्द्रे … शशिना संयुते” में चन्द्र-शशिन् दोनों चन्द्रवाची हैं — अन्वय घना/पाठ-भेद संभव; आशय षष्ठ-स्थित चन्द्र की युति-युक्त अवस्था का फल-कथन लगता है।

English rendering The text states that when the Moon occupies the enemy-house (the sixth) in a lunar-conjunction configuration, gulma-disease is to be indicated in the twenty-ninth and thirtieth years. “Gulma” is a classical technical disease-name in the śāstra’s idiom, not a modern medical prescription. The double Moon-wording (candra / śaśin) may reflect a dense compound or a recension variant (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष २९ व ३०; षष्ठ-स्थित चन्द्र + युति)। त्रिंशत् = ३०; एकोनवर्ष = ३० − १ = २९। भाव-स्वामित्व और युति-परिभाषा (समान राशि / डिग्री-सीमा) घोषित सम्मेलन पर निर्भर है।

17.19
पञ्चपञ्चाशदब्देषु रक्तकुष्ठं विनिर्दिशेत्‌।
लग्नेशे लग्नराशिस्थे मन्दे शत्रुसमन्विते
pañcapañcāśadabdeṣu raktakuṣṭhaṃ vinirdiśet‌|
lagneśe lagnarāśisthe mande śatrusamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चपञ्चाशत् = पचपन (५ + ५०); अब्देषु = वर्षों में; रक्तकुष्ठम् = रक्त-कुष्ठ (शास्त्रीय रोग-नाम); विनिर्दिशेत् = निर्देश करे; लग्नेशे = लग्न-स्वामी के; लग्नराशिस्थे = लग्न-राशि में स्थित होने पर; मन्दे = शनि के; शत्रुसमन्विते = शत्रु (शत्रु-ग्रह/शत्रु-योग) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्नेश लग्न-राशि में स्थित हो और शनि शत्रु-संयुक्त हो, तो पचपनवें वर्ष-क्रम में रक्तकुष्ठ का निर्देश किया जाता है। शर्त दोहरी है: लग्नेश का स्व-लग्न-राशि में होना, तथा शनि का शत्रु-समन्वय। यह काल-फल कथन है — भय या चिकित्सा-निर्णय नहीं।

English rendering The text states that when the lagna-lord occupies the lagna-sign and Saturn is associated with an enemy (enemy-planet / enemy-connection), rakta-kuṣṭha is to be indicated around the fifty-fifth year. The dual condition is structural: lagna-lord in the rising sign, and Saturn in śatru-association.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष ५५; लग्नेश-लग्न + शनि-शत्रु योग)। पञ्चपञ्चाशत् = ५ + ५० = ५५। “शत्रुसमन्विते” का अर्थ — नैसर्गिक/तात्कालिक शत्रु-ग्रह से युति, अथवा शत्रु-भाव संबंध — परम्परा में सूक्ष्म भेद संभव; चुनी हुई परिभाषा घोषित करें। लग्न-राशि = उदय-राशि (D1), न कि मात्र नवांश-लग्न जब तक पाठ न कहे।

17.20
एकोनषष्टिवर्षे तु वातरोगार्दितो भवेत्‌।
रंध्रेशे रिपुराशिस्थे व्ययेशे लग्नसंस्थिते
ekonaṣaṣṭivarṣe tu vātarogārdito bhavet‌|
raṃdhreśe ripurāśisthe vyayeśe lagnasaṃsthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकोनषष्टि = उनसठ (६० − १); वर्षे = वर्ष में; वातरोगार्दितः = वात-रोग से पीड़ित; भवेत् = हो; रंध्रेशे = अष्टम-स्वामी (रंध्र = ८वाँ भाव); रिपुराशिस्थे = रिपु-राशि (षष्ठ) में स्थित; व्ययेशे = व्यय-स्वामी (१२वें भाव का स्वामी); लग्नसंस्थिते = लग्न में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब रंध्रेश (अष्टमेश) रिपु-राशि में हो और व्ययेश लग्न में स्थित हो, तो उनसठवें वर्ष में व्यक्ति वात-रोग से आर्दित हो — ऐसा फल कहा गया है। यहाँ दो भाव-स्वामी एक साथ शर्त बनाते हैं: अष्टमेश षष्ठ में, द्वादशेश लग्न में। “वात” शास्त्रीय दोष/रोग-संज्ञा है; आधुनिक चिकित्सकीय निदान नहीं।

English rendering The text states that when the eighth-lord occupies the enemy-sign (sixth) and the twelfth-lord is placed in the lagna, the person is said to be afflicted by vāta-disease in the fifty-ninth year. Both lordship conditions are required as the śāstra frames them; “vāta” is a classical category, not a clinical verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष ५९; रंध्रेश∈षष्ठ, व्ययेश∈लग्न)। एकोनषष्टि = ६० − १ = ५९। भाव-स्वामी निर्धारण D1 राशि-स्वामित्व से; “रिपुराशि” = षष्ठ भाव की राशि (लग्न से गिना छठा स्थान)। गृह-पद्धति बदलने पर षष्ठ/लग्न सीमाएँ बदल सकती हैं — सम्मेलन घोषित करें।

17.21
चन्द्रे षष्ठेश्संयुक्ते वसुवर्षे मृगाद्‌भयम्‌।
षष्ठाष्टमगतो रहुस्तस्मादष्टगते शनौ
candre ṣaṣṭheśsaṃyukte vasuvarṣe mṛgād‌bhayam‌|
ṣaṣṭhāṣṭamagato rahustasmādaṣṭagate śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रे = चन्द्रमा के; षष्ठेश-संयुक्ते = षष्ठेश से युक्त होने पर; वसुवर्षे = वसु-वर्ष में (वसु = ८, भूतसंख्या); मृगात् भयम् = मृग/वन्य पशु से भय; षष्ठाष्टमगतः राहुः = राहु षष्ठ या अष्टम में गत; तस्मात् = उससे; अष्टगते शनौ = शनि अष्टम (उससे आठवें) में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्रमा षष्ठेश से युक्त हो, तो वसु-वर्ष (आठवें वर्ष) में मृगादि से भय का फल कहा गया है; तथा जब राहु षष्ठ या अष्टम में हो और उससे अष्टम स्थान में शनि हो, तो वही भय-संकेत जुड़ता है। “मृगाद् भयम्” शास्त्र का भय-फल पद है — आतंक-वाणी या निश्चित घटना-घोषणा नहीं। दोनों पंक्तियाँ षष्ठ/अष्टम के रोग-भय प्रकरण को काल और योग से बाँधती हैं।

English rendering The text states that when the Moon is conjoined with the sixth-lord, fear from wild beasts (mṛga) is indicated in the “vasu” year (the eighth year by bhūtasaṃkhyā); and when Rāhu occupies the sixth or eighth and Saturn stands in the eighth from that position, the same class of indication is framed. Report this as the śāstra’s phala, not as a guaranteed event.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष-संख्या + भाव-योग)। वसु (भूतसंख्या) = ८ → वसुवर्ष = ८वाँ वर्ष। शर्त-१: चन्द्र युति षष्ठेश के साथ। शर्त-२: राहु ∈ {६, ८}; शनि ∈ ८वाँ स्थान “तस्मात्” (राहु से)। “तस्माद् अष्टगते” = राहु-स्थान से अष्टम में शनि — यह सापेक्ष भाव-गिनती है (राहु जिस राशि में, उससे आठवीं राशि में शनि)। पाठ-भेद/अन्वय-भेद में “षष्ठाष्टमगत” को “षष्ठ और अष्टम दोनों” या “षष्ठ-अष्टम में से एक” पढ़ा जा सकता है; यहाँ विकल्प खुला रखते हुए दोनों भावों का उल्लेख किया गया।

17.22
जातस्य जन्मतो विप्र प्रथमे च द्वितीयके।
वस्तरेऽग्निभयं तस्य त्रिवर्षे पक्षिदोषभाक्‌
jātasya janmato vipra prathame ca dvitīyake|
vastare'gnibhayaṃ tasya trivarṣe pakṣidoṣabhāk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जातस्य = जातक का / जन्मे हुए का; जन्मतः = जन्म से; विप्र = हे विप्र (संबोधन); प्रथमे च द्वितीयके वस्तरे = प्रथम तथा द्वितीय वर्ष में; अग्निभयम् = अग्नि से भय / अग्नि-संकट; त्रिवर्षे = तीसरे वर्ष में; पक्षिदोषभाक् = पक्षी-दोष / पक्षी-संबंधित पीड़ा का भागी।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, शास्त्र यहाँ जातक के अत्यंत प्रारंभिक वर्षों की ओर संकेत करता है। जन्म से प्रथम और द्वितीय वर्ष में अग्नि-भय का उल्लेख है। तृतीय वर्ष में पक्षी-दोष — पक्षियों से होने वाली हानि या उस दिशा का दोष — का भागी बताया गया है। यह फल-कथन आयु-क्रम में प्रारंभिक संकट-संभावनाओं का शास्त्रीय वर्णन है, न कि नियति का ठप्पा।

English rendering O Brāhmaṇa, the text states that from birth, in the first and second years, there is fear of fire; in the third year the native is said to partake of harm associated with birds. This is a year-linked phala statement of early-life indications.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्ष-क्रमित फल-कथन। यहाँ केवल काल-खण्ड (वर्ष 1, 2, 3) और फल-प्रकार (अग्नि / पक्षी) दिए हैं; कोई दीर्घांश-विभाजन या बल-माप नहीं।

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17.23
षष्ठाष्टमगते सूर्ये तद्‌व्यये चन्द्रसंयुतः।
पंचमे नवमेऽब्दे तु जलभीतिं विनिर्दिशेत्
ṣaṣṭhāṣṭamagate sūrye tad‌vyaye candrasaṃyutaḥ|
paṃcame navame'bde tu jalabhītiṃ vinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाष्टमगते सूर्ये = सूर्य षष्ठ या अष्टम भाव में स्थित; तद्व्यये = उससे / उस (सूर्य) के व्यय (द्वादश) में; चन्द्रसंयुतः = चन्द्र से युक्त / चन्द्र संयुक्त; पंचमे नवमेऽब्दे = पाँचवें तथा नवें वर्ष में; जलभीतिम् = जल से भय; विनिर्दिशेत् = निर्दिष्ट करे / बताए।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य षष्ठ या अष्टम भाव में हो और चन्द्र उस स्थिति के द्वादश (व्यय) में संयुक्त/स्थित हो — पाठ में “तद्व्यये चन्द्रसंयुतः” यही संरचना है — तब शास्त्र पाँचवें और नवें वर्ष में जल-भय का निर्देश देता है। यह ग्रह-स्थान + आयु-वर्ष का योग-फल है। “पाठ-भेद संभव” जहाँ “तद्व्यय” को लग्न-व्यय या सूर्य-द्वादश में पढ़ा जाता हो।

English rendering When the Sun occupies the sixth or eighth house and the Moon is conjoined/placed in the twelfth from that (tad-vyaya), the text directs one to indicate fear from water in the fifth and ninth years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सशर्त योग + वर्ष-फल। संरचना: (सूर्य ∈ {6, 8}) ∧ (चन्द्र ∈ 12वीं से सूर्य/उस भाव) → फल-वर्ष ∈ {5, 9}। दीर्घांश-गणित नहीं; भाव-गिनती लग्न-आधारित (पूर्ण-भाव/रशि-भाव — घोषित करें)।

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17.24
अष्टमे मन्दसंयुक्ते तस्माद्वा द्वादशे कुजः।
त्रिंशाब्दे दशमेऽब्दे तु स्फोटकादि विनिर्दिशेत्
aṣṭame mandasaṃyukte tasmādvā dvādaśe kujaḥ|
triṃśābde daśame'bde tu sphoṭakādi vinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमे मन्दसंयुक्ते = अष्टम में शनि (मन्द) संयुक्त; तस्माद् वा द्वादशे कुजः = अथवा उससे द्वादश में मंगल (कुज); त्रिंशाब्दे = तीसवें वर्ष में; दशमेऽब्दे = दसवें वर्ष में; स्फोटकादि = स्फोटक (विस्फोटक/फुंसी-दाद-वर्ग) आदि; विनिर्दिशेत् = निर्दिष्ट करे।

हिन्दी भावार्थ अष्टम भाव में शनि का योग हो, अथवा उस अष्टम से द्वादश भाव में मंगल स्थित हो — इन दोनों में से किसी संरचना पर शास्त्र तीसवें अथवा दसवें वर्ष में स्फोटकादि (त्वचा/विस्फोट-वर्ग के पारंपरिक संकेत) का निर्देश देता है। यह रोग-नाम शास्त्र का अपना शब्दावली-कथन है; चिकित्सा-निदान नहीं। वर्ष-युग्म वैकल्पिक/समानांतर फल-काल के रूप में पढ़ा जाता है।

English rendering If the eighth is conjoined with Saturn (Manda), or if Mars is in the twelfth from that, the text directs one to indicate eruptive/boil-class afflictions (sphoṭaka and the like) in the thirtieth or the tenth year. These are śāstraic result-labels, not clinical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-संयोग + वर्ष-फल। शर्त: (शनि युक्त अष्टम) ∨ (मंगल ∈ 12वीं “तस्मात्”) → फल-वर्ष ∈ {30, 10}। “स्फोटक” फल-वर्ग का नाम है, संख्यात्मक सूत्र नहीं।

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17.25
रंध्रेशे राहुसंयुक्ते तदंशे रंध्रकोणगे।
द्वाविंशेऽष्टादशे वर्षे ग्रन्थिमेहादिपीडनम्‌
raṃdhreśe rāhusaṃyukte tadaṃśe raṃdhrakoṇage|
dvāviṃśe'ṣṭādaśe varṣe granthimehādipīḍanam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रंध्रेशे राहुसंयुक्ते = अष्टमेश (रंध्रेश) के राहु से युक्त होने पर; तदंशे = उसके अंश (नवांश/D9) में; रंध्रकोणगे = अष्टम अथवा त्रिकोण (5/9) में स्थित; द्वाविंशे अष्टादशे वर्षे = बाईसवें व अठारहवें वर्ष में (द्वाविंश = 22, अष्टादश = 18); ग्रन्थिमेहादिपीडनम् = ग्रन्थि (गाँठ/अर्बुद), मेह (मूत्र/मधुमेह-वर्ग) आदि की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ नयी दशा — जब अष्टमेश राहु से युक्त हो और उसका नवांश (अंश) अष्टम या त्रिकोण में पड़े, शास्त्र कहता है कि बाईसवें और अठारहवें वर्ष में ग्रन्थि, मेह आदि रोगों की पीड़ा का निर्देश करें। यहाँ "अंश" शब्द नवांश-वर्ग (D9) की ओर संकेत करता है — केवल राशि नहीं, वर्ग-स्थिति भी विचारणीय है।

English rendering When the 8th-lord is joined with Rāhu and its navāṃśa falls in the 8th or a trine, one should declare afflictions of tumours, urinary/diabetic disease and the like in the 22nd and 18th years.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-निर्देश)। शब्द-संख्या: द्वाविंश = 22, अष्टादश = 18; रोग-वर्ष = {22, 18}। "तदंश" का निर्धारण नवांश-नियम से होता है: 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश — यह अंकगणितीय विभाजन है, फल-कथन नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "तदंशे" पद ठीक हमारे षोडश-वर्ग इंजन के D9 (नवांश) को छूता है। नवांश एक निर्धारित मॉड्युलर विभाजन है — 30° ÷ 9 = 3°20′ के नौ समान चापों में देशान्तर का मानचित्रण — जिसे kaal-वर्ग इंजन (D1…D60) निर्दोष रूप से गणना करता है। इस श्लोक में वर्ग-स्थिति की गणना और उससे जुड़ा रोग-फल पूर्णतः पृथक् परतें हैं: अंश हम `==` से निकालते हैं, "22/18वें वर्ष रोग" को "शास्त्र कहता है" के रूप में उद्धृत करते हैं।

17.26
लाभेशे रिपुभावस्थे रोगेशे लाभराशिगे।
एकत्रिंशत्समे वर्षे शत्रुमूलाद्धनव्ययः
lābheśe ripubhāvasthe rogeśe lābharāśige|
ekatriṃśatsame varṣe śatrumūlāddhanavyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे रिपुभावस्थे = एकादशेश (लाभेश) के षष्ठ (रिपु) भाव में होने पर; रोगेशे लाभराशिगे = षष्ठेश (रोगेश) के एकादश (लाभ) राशि में जाने पर; एकत्रिंशत् समे वर्षे = इकतीसवें वर्ष में (एक + त्रिंशत् = 31; सम = वर्ष); शत्रुमूलात् = शत्रु के कारण/निमित्त से; धनव्ययः = धन की हानि/व्यय।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र एक परिवर्तन-योग कहता है — लाभेश (11वें का स्वामी) षष्ठ भाव में और रोगेश (6वें का स्वामी) लाभ-राशि में हो, अर्थात् 6वें–11वें भावेशों का पारस्परिक राशि-परिवर्तन। इस योग में शास्त्र कहता है कि इकतीसवें वर्ष में शत्रु के निमित्त से धन की हानि होती है। यह रोग-फल से हटकर अर्थ-हानि का फल-कथन है — फिर भी विशुद्ध रूप से शास्त्र का कथन, कोई भविष्यवाणी नहीं जिसका हम समर्थन करें।

English rendering When the 11th-lord occupies the 6th house and the 6th-lord goes to the 11th sign (a mutual exchange), the text states there is loss of wealth through enemies in the 31st year.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-निर्देश)। शब्द-संख्या: एक + त्रिंशत् = 31; घटना-वर्ष = {31}। योग की पहचान परिवर्तन (exchange) है: 6वें-स्वामी का 11वीं राशि में और 11वें-स्वामी का 6वें भाव में होना — केवल भाव-स्वामित्व का सममित विनिमय, कोई अर्थ-गणना नहीं। शास्त्र-अनुशासन के अनुसार यह धन-हानि-कथन "शास्त्र कहता है" है, न कि कोई वित्तीय भविष्यवाणी।

17.27
सुतेशे रिपुभावस्थे षष्ठेशे गुरुसंयुते।
व्ययेशे लग्नभावस्थे तस्य पुत्रो रिपुर्भवेत्‌
suteśe ripubhāvasthe ṣaṣṭheśe gurusaṃyute|
vyayeśe lagnabhāvasthe tasya putro ripurbhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- सुत-ईशे (सुतेशे) = पञ्चम भाव का स्वामी (सन्तान/पुत्र-भाव, 5वाँ)
- रिपु-भाव-स्थे = शत्रु-भाव अर्थात् षष्ठ भाव में स्थित
- षष्ठ-ईशे (षष्ठेशे) = छठे भाव का स्वामी
- गुरु-संयुते = बृहस्पति के साथ युत
- व्यय-ईशे (व्ययेशे) = द्वादश भाव का स्वामी (व्यय/हानि, 12वाँ)
- लग्न-भाव-स्थे = लग्न (प्रथम भाव) में स्थित
- पुत्रः रिपुः भवेत् = पुत्र शत्रु बन जाता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पञ्चमेश (सन्तानेश) छठे शत्रु-भाव में बैठा हो, षष्ठेश बृहस्पति के साथ युत हो, और व्ययेश लग्न में स्थित हो, तब जातक का पुत्र उसके लिए शत्रुवत् (विरोधी) हो जाता है। यह षष्ठभाव-फल-प्रकरण का एक भावेश-योग कथन है, जहाँ सन्तान-भाव और शत्रु-भाव का सम्बन्ध पिता-पुत्र के बिगड़ते सम्बन्ध की ओर संकेत माना गया है। (पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states: when the lord of the 5th (the house of children) occupies the 6th (the house of enemies), the lord of the 6th is joined with Jupiter, and the lord of the 12th sits in the ascendant, the native's own son turns into an adversary.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-योग)। यहाँ कोई संख्या, वर्ग-भाग या बिन्दु-गणित नहीं; केवल तीन भाव-स्वामियों की सापेक्ष स्थिति (5→6, 6+गुरु, 12→1) एक फल की ओर इंगित करती है — यह शास्त्र का योग-कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

हमारा डिकोड: इस श्लोक में न बिन्दु है, न वर्ग, न दशा-वर्ष — यह विशुद्ध फल-वचन है। ऑपरेटर के "गणित को व्याख्या से अलग रखो" अनुशासन (dossier §5, framing rules) के अनुसार ऐसे कथन को कठोरता से केवल "शास्त्र कहता है X" रूप में लिया जाता है — न गणना किया जाता है, न नियति के रूप में समर्थित। अष्टकवर्ग-ऑरेकल, वर्ग-इंजन और दशा-इंजन जानबूझकर "पुत्र शत्रु बनेगा" जैसा कोई फल मॉडल नहीं करते; यह मूल-पाठ का दावा बना रहता है, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

17.28
लग्नेशे षष्ठराशिस्थे तदीशे षष्ठराशिगे।
दशमैकोनविंशेऽब्दे शुनकाद्‌भीतिरुच्यते
lagneśe ṣaṣṭharāśisthe tadīśe ṣaṣṭharāśige|
daśamaikonaviṃśe'bde śunakād‌bhītirucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- लग्न-ईशे (लग्नेशे) = लग्नेश (प्रथम भाव का स्वामी)
- षष्ठ-राशि-स्थे = छठी राशि/भाव में स्थित
- तद्-ईशे (तदीशे) = उस (पूर्वोक्त षष्ठ) राशि का स्वामी, अर्थात् षष्ठेश
- षष्ठ-राशि-गे = छठी राशि में गया हुआ
- दशम = 10वाँ
- एकोनविंश = एक-ऊन-विंश = 20 − 1 = 19वाँ
- अब्दे = वर्ष में
- शुनकात् भीतिः उच्यते = कुत्ते से भय कहा जाता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्नेश छठी राशि (षष्ठ भाव) में स्थित हो और उस षष्ठ राशि का स्वामी (षष्ठेश) भी छठे भाव में ही चला जाए, तब जातक को दसवें और उन्नीसवें वर्ष में कुत्ते से भय (श्वान-जनित संकट) होने की सम्भावना कही जाती है। यह षष्ठभाव-प्रकरण का एक आयु-आधारित फल-संकेत है। (तद् = पूर्वोक्त षष्ठ राशि; पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states: when the ascendant lord stands in the 6th sign and the lord of that 6th sign is likewise placed in the 6th, danger from a dog is foretold in the native's 10th and 19th years.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-वर्ष संकेत)। किन्तु पद-संख्याएँ (bhūtasaṃkhyā) अक्षरशः खोलनी हैं: दशम = 10; एकोनविंश = एक + ऊन + विंश = 20 − 1 = 19। अतः संकेतित आयु-वर्ष = {10, 19} — जन्म से गिने गए पूर्ण वर्ष; कोई सन्निकटन नहीं, ठीक वही अंक जो श्लोक बोलता है।

हमारा डिकोड: एकोनविंश जैसी व्युत्पन्न पद-संख्या को "≈20" मानकर टाल देना अशुद्धि होगी; ऑपरेटर का exact-`==` अनुशासन (dossier §5) माँगता है कि शब्द-संख्या ठीक अंक = 19 पर खुले — वैसे ही जैसे अष्टकवर्ग में एक ±band ने कभी एक असली −1 छिपा दिया था। यहाँ का 10वाँ/19वाँ वर्ष एक स्थिर आयु-संकेत है, और यह विंशोत्तरी 120-वर्ष दशा-गणित (dossier §3) से भिन्न है, जो नक्षत्र-भोग-अंश से वर्ष निकालता है; दोनों समय-मानों को मिलाना नहीं।

अध्यायः 18

जायाभावफलाध्यायः

42 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 17 का पाठ दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (42 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated the text of chapter 17; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (42 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

18.1
जायाभावफलं वक्ष्ये श‍ृणु त्वं द्विजसत्तम ।
जायाधिपे स्वभे स्वोच्चे स्त्रीसुखं पूर्णमादिशेत्
jāyābhāvaphalaṃ vakṣye śaृṇu tvaṃ dvijasattama |
jāyādhipe svabhe svocce strīsukhaṃ pūrṇamādiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जायाभावफलम् = जाया (सप्तम) भाव का फल; वक्ष्ये = कहूँगा; शृणु त्वं द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ, सुनो; जायाधिपे = सप्तमेश के; स्वभे = स्वराशि में; स्वोच्चे = स्वोच्च में (होने पर); स्त्रीसुखं पूर्णम् = पूर्ण स्त्री-सुख; आदिशेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ पराशर जाया-भाव-फल का अध्याय आरम्भ करते हैं — सप्तमेश स्वराशि या स्वोच्च में हो तो पूर्ण स्त्री-सुख कहा जाए। अध्याय का मूल-सूत्र सप्तमेश का बल है; आगे के श्लोक उसकी दुर्बलता, ग्रहों की सप्तम-स्थिति, विवाह-वर्ष और दार-हानि के कथन देते हैं।

English rendering "I shall speak the results of the house of the spouse — hear, O best of dvijas: with the seventh lord in its own sign or exalted, full happiness through the wife is to be declared."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना + फल-कथन। शर्त: स्वराशि(7L) ∨ उच्च(7L)।

18.2
कलत्रपो विना स्वर्क्षं व्ययषष्ठाष्टमस्थितः ।
रोगिणीं कुरुते नारीं तथा तुङ्गादिकं विना
kalatrapo vinā svarkṣaṃ vyayaṣaṣṭhāṣṭamasthitaḥ |
rogiṇīṃ kurute nārīṃ tathā tuṅgādikaṃ vinā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्रपः = सप्तमेश; विना स्वर्क्षम् = स्वराशि के बिना; व्ययषष्ठाष्टमस्थितः = द्वादश, षष्ठ या अष्टम में स्थित; रोगिणीं कुरुते नारीम् = स्त्री को रोगिणी करता है; तथा तुङ्गादिकं विना = वैसे ही उच्च आदि (बल-स्थिति) के बिना (भी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश स्वराशि में न हो और द्वादश, षष्ठ या अष्टम में हो, तो स्त्री रोगिणी होती है; उच्च आदि बल-स्थितियों के अभाव में भी यही फल। 18.1 का प्रति-पक्ष।

English rendering When the seventh lord, not in its own sign, stands in the twelfth, sixth or eighth — and likewise when it lacks exaltation and the like — the text says it makes the wife sickly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: ¬स्वराशि(7L) ∧ 7L ∈ {12, 6, 8}; अथवा ¬उच्च(7L) आदि बल-अभाव।

18.3
सप्तमे तु स्थिते शुक्रेऽतीवकामी भवेन्नरः ।
यत्रकुत्रस्थिते पापयुते स्त्रीमरणं भवेत्
saptame tu sthite śukre'tīvakāmī bhavennaraḥ |
yatrakutrasthite pāpayute strīmaraṇaṃ bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे तु स्थिते शुक्रे = सप्तम में शुक्र के स्थित होने पर; अतीवकामी भवेत् नरः = मनुष्य अत्यन्त कामी होता है; यत्र कुत्र स्थिते = (सप्तमेश) जहाँ कहीं भी स्थित हो; पापयुते = पाप-युक्त (हो तो); स्त्रीमरणं भवेत् = स्त्री-मरण होता है (पाठ का कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम में शुक्र हो तो जातक अत्यन्त कामी होता है; और (सप्तमेश) जहाँ कहीं भी पाप-युक्त हो, स्त्री-मरण कहा गया है। दूसरा पद सामान्य नियम है — पाप-युति की तीव्रता को अन्य बल-विचार से तौला जाता है; इसे पाठ का वर्गीकरण समझें, भय नहीं।

English rendering With Venus in the seventh the man is exceedingly amorous; and wherever the seventh lord stands joined by a malefic, the text speaks of the wife's death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त A: Ve ∈ भाव 7; शर्त B: पाप ∈ युति(7L), भाव-निरपेक्ष।

18.4
जायाधीशः शुभैर्युक्तो दृष्टो वा बलसंयुतः ।
तदा जातो धनी मानी सुखसौभाग्यसंयुतः
jāyādhīśaḥ śubhairyukto dṛṣṭo vā balasaṃyutaḥ |
tadā jāto dhanī mānī sukhasaubhāgyasaṃyutaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जायाधीशः = सप्तमेश; शुभैः युक्तः दृष्टः वा = शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट; बलसंयुतः = बल-युक्त; तदा जातः = तब जातक; धनी मानी = धनी, मानी; सुखसौभाग्यसंयुतः = सुख और सौभाग्य से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट और बलवान् हो, तो जातक धनी, मानी और सुख-सौभाग्य से युक्त होता है। सप्तमेश का शुभत्व यहाँ केवल दाम्पत्य नहीं, समग्र सौभाग्य का सूचक कहा गया है।

English rendering When the seventh lord is joined or aspected by benefics and endowed with strength, the native is wealthy, honoured, happy and fortunate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: शुभ ∈ (युति ∪ दृष्टि)(7L) ∧ बली(7L)।

18.5
नीचे शत्रुगृहेऽस्ते वा निर्बले च कलत्रपे ।
तस्यापि रोगिणी भार्या बहुभार्यो नरो भवेत्
nīce śatrugṛhe'ste vā nirbale ca kalatrape |
tasyāpi rogiṇī bhāryā bahubhāryo naro bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = नीच में; शत्रुगृहे = शत्रु-राशि में; अस्ते वा = अथवा अस्त; निर्बले च कलत्रपे = और निर्बल सप्तमेश होने पर; तस्य अपि = उसकी भी; रोगिणी भार्या = रोगिणी भार्या; बहुभार्यः नरः भवेत् = मनुष्य बहु-भार्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश नीच में, शत्रु-राशि में, अस्त या निर्बल हो, तो भार्या रोगिणी और जातक अनेक भार्याओं वाला कहा गया है। दुर्बल सप्तमेश दाम्पत्य-स्थिरता को घटाता है — पाठ की भाषा में।

English rendering With the seventh lord debilitated, in an enemy's sign, combust or weak, the wife is sickly and the man, says the text, has many wives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: नीच(7L) ∨ शत्रु-राशि(7L) ∨ अस्त(7L) ∨ निर्बल(7L)।

18.6
मन्दभे शुक्रगेहे वा जायाधीशे शुभेक्षिते ।
स्वोच्चगे तु विशेषेण बहुभार्यो नरो भवेत्
mandabhe śukragehe vā jāyādhīśe śubhekṣite |
svoccage tu viśeṣeṇa bahubhāryo naro bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दभे = शनि की राशि (मकर/कुम्भ) में; शुक्रगेहे वा = अथवा शुक्र की राशि (वृषभ/तुला) में; जायाधीशे = सप्तमेश; शुभेक्षिते = शुभ-दृष्ट; स्वोच्चगे तु विशेषेण = स्वोच्च में तो विशेष रूप से; बहुभार्यः नरः भवेत् = बहु-भार्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश शनि या शुक्र की राशि में शुभ-दृष्ट हो, और विशेषतः स्वोच्च में हो, तो जातक बहु-भार्य होता है। यहाँ बहु-भार्यत्व दुर्बलता से नहीं, बल्कि सप्तमेश के बल और शुक्र/शनि-राशि से आता है — 18.5 से भिन्न कारण-क्रम।

English rendering With the seventh lord in a sign of Saturn or of Venus, aspected by a benefic — and especially if exalted — the man, the text says, has many wives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: राशि(7L) ∈ {मकर, कुम्भ, वृषभ, तुला} ∧ शुभ ∈ दृष्टि(7L); तीव्रता: उच्च(7L)।

18.7
वन्ध्यासङ्गो मदे भानौ चन्द्रे राशिसमस्त्रियः ।
कुजे रजस्वलासङ्गो वन्ध्यासङ्गश्च कीर्तितः
vandhyāsaṅgo made bhānau candre rāśisamastriyaḥ |
kuje rajasvalāsaṅgo vandhyāsaṅgaśca kīrtitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वन्ध्यासङ्गः = वन्ध्या (सन्तानहीन) स्त्री से संसर्ग; मदे भानौ = सप्तम में सूर्य होने पर; चन्द्रे = चन्द्र (सप्तम में) होने पर; राशिसमस्त्रियः = समान राशि/समान स्थिति की स्त्रियाँ; कुजे = मंगल (सप्तम में); रजस्वलासङ्गः = रजस्वला से संसर्ग; वन्ध्यासङ्गः च कीर्तितः = और वन्ध्या से संसर्ग कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सप्तम-स्थ ग्रहों से स्त्री-सम्बन्ध का वर्गीकरण देता है — सूर्य से वन्ध्या-संसर्ग, चन्द्र से समान स्थिति की स्त्रियाँ, मंगल से रजस्वला और वन्ध्या का संसर्ग। ये पाठ के अपने वर्णन-शब्द हैं; इन्हें सामाजिक निर्णय नहीं, ग्रह-स्वभाव-सूची पढ़ें।

English rendering With the Sun in the seventh the text speaks of union with a barren woman; with the Moon, of women of like standing; with Mars, of union with a menstruating woman and with a barren one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (सप्तम-स्थ ग्रह-सारणी)। Su → वन्ध्या; Mo → समान-स्थिति; Ma → रजस्वला/वन्ध्या।

18.8
बुधे वेश्या च हीना च वणिक् स्त्री वा प्रकीर्तिता ।
गुरौ ब्राह्मणभार्या स्याद्गर्भिणीसङ्ग एव च
budhe veśyā ca hīnā ca vaṇik strī vā prakīrtitā |
gurau brāhmaṇabhāryā syādgarbhiṇīsaṅga eva ca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधे = बुध (सप्तम में); वेश्या च हीना च = वेश्या या हीन (स्त्री); वणिक्-स्त्री वा = अथवा वणिक् की स्त्री; प्रकीर्तिता = कही गई; गुरौ = गुरु (सप्तम में); ब्राह्मणभार्या स्यात् = ब्राह्मण की भार्या; गर्भिणीसङ्गः एव च = और गर्भिणी से संसर्ग।

हिन्दी भावार्थ 18.7 की सूची आगे — शास्त्र कहता है कि सप्तम में बुध हो तो वेश्या, हीन स्त्री या वणिक्-स्त्री; गुरु हो तो ब्राह्मण-भार्या और गर्भिणी से संसर्ग। ग्रह-स्वभाव के अनुसार स्त्री-वर्ग का पाठ-वर्णन।

English rendering With Mercury in the seventh, a courtesan, a lowly woman or a merchant's wife is named; with Jupiter, a Brahmin's wife, and union with a pregnant woman.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (सारणी जारी)। Me → वेश्या/हीना/वणिक्-स्त्री; Ju → ब्राह्मण-भार्या/गर्भिणी।

18.9
हीना च पुष्पिणी वाच्या मन्दराहुफणीश्वरैः ।
कुजेऽथ सुस्तनी मन्दे व्याधिदौर्बल्यसंयुता
hīnā ca puṣpiṇī vācyā mandarāhuphaṇīśvaraiḥ |
kuje'tha sustanī mande vyādhidaurbalyasaṃyutā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हीना च पुष्पिणी वाच्या = हीन और पुष्पिणी (रजस्वला) कही जाए; मन्दराहुफणीश्वरैः = शनि, राहु और केतु (फणीश्वर) से; कुजे अथ सुस्तनी = मंगल से सुन्दर स्तनों वाली; मन्दे = शनि से; व्याधिदौर्बल्यसंयुता = व्याधि और दुर्बलता से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम में शनि, राहु या केतु हों तो हीन या पुष्पिणी स्त्री; मंगल से सुन्दर-स्तनी; शनि से व्याधि-दुर्बलता-युक्त। श्लोक में सूची का दूसरा स्तर (शारीरिक लक्षण) आरम्भ होता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering With Saturn, Rāhu or Ketu in the seventh, a lowly or menstruating woman is named; with Mars, one with fine breasts; with Saturn, one afflicted by illness and weakness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (सारणी)। {Sa, Ra, Ke} → हीना/पुष्पिणी; Ma → सुस्तनी; Sa → व्याधि/दौर्बल्य।

18.10
कठिनोर्ध्वकुचार्ये च शुक्रे स्थूलोत्तमस्तनी ।
पापे द्वादशकामस्थे क्षीणचन्द्रस्तु पञ्चमे
kaṭhinordhvakucārye ca śukre sthūlottamastanī |
pāpe dvādaśakāmasthe kṣīṇacandrastu pañcame
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कठिनोर्ध्वकुचा = कठिन और उन्नत स्तनों वाली; आर्ये = गुरु (सप्तम में) होने पर; शुक्रे = शुक्र होने पर; स्थूलोत्तमस्तनी = स्थूल और उत्तम स्तनों वाली; पापे द्वादशकामस्थे = पाप-ग्रह द्वादश या सप्तम (काम) में; क्षीणचन्द्रः तु पञ्चमे = क्षीण चन्द्र पञ्चम में — (फल 18.11 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम में गुरु हो तो कठिन-उन्नत स्तनों वाली, शुक्र हो तो स्थूल-उत्तम स्तनों वाली स्त्री। दूसरा पद नई शर्त खोलता है — पाप-ग्रह द्वादश या सप्तम में और क्षीण चन्द्र पञ्चम में — जिसका फल 18.11 में है।

English rendering With Jupiter in the seventh, a woman of firm, high breasts; with Venus, of full, fine breasts. With a malefic in the twelfth or seventh and a waning Moon in the fifth — (the result follows).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन + शर्त-पद। क्षीण चन्द्र: सूर्य से 180° के बाद (कृष्ण-पक्ष) का चन्द्र — पक्ष-निर्धारण (λ_Mo − λ_Su) mod 360 > 180°।

18.11
जातश्च भार्यावश्यः स्यादिति जातिविरोधकृत् ।
जामित्रे मन्दभौमे च तदीशे मन्दभूमिजे
jātaśca bhāryāvaśyaḥ syāditi jātivirodhakṛt |
jāmitre mandabhaume ca tadīśe mandabhūmije
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जातः च भार्यावश्यः स्यात् = जातक भार्या के वश में होता है; इति = इस प्रकार; जातिविरोधकृत् = जाति-विरुद्ध आचरण करने वाला; जामित्रे = सप्तम (जामित्र) में; मन्दभौमे = शनि और मंगल; च तदीशे = और उसका (सप्तम का) स्वामी; मन्दभूमिजे = शनि-मंगल (के साथ) — (फल 18.12 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (18.10 की शर्त में) जातक भार्या-वश और जाति-विरुद्ध आचरण वाला होता है। आगे नई शर्त: सप्तम में शनि-मंगल और सप्तमेश भी शनि-मंगल के साथ — जिसका फल 18.12 में।

English rendering — then the native is under his wife's sway and acts against his community. With Saturn and Mars in the seventh and its lord also with Saturn and Mars — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शर्त-पद। शर्त (अगले फल की): {Sa, Ma} ⊂ भाव 7 ∧ {Sa, Ma} ∩ युति(7L) ≠ ∅।

18.12
वेश्या वा जारिणी वाऽपि तस्य भार्या न संशयः ।
भौमांशकगते शुक्रे भौमक्षेत्रगतेऽथवा
veśyā vā jāriṇī vā'pi tasya bhāryā na saṃśayaḥ |
bhaumāṃśakagate śukre bhaumakṣetragate'thavā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वेश्या वा जारिणी वापि = वेश्या अथवा जारिणी (परपुरुष-गामिनी); तस्य भार्या = उसकी भार्या; न संशयः = सन्देह नहीं (पाठ का आग्रह); भौमांशकगते शुक्रे = शुक्र मंगल के नवांश में; भौमक्षेत्रगते अथवा = अथवा मंगल की राशि में — (फल 18.13 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (18.11 की शर्त में) भार्या वेश्या या जारिणी होती है, "इसमें सन्देह नहीं" — पाठ का बल-शब्द। आगे नई शर्त: शुक्र मंगल के नवांश या मंगल की राशि में — फल 18.13 में। ये कथन ग्रन्थ के हैं; इन्हें चरित्र-निर्णय के रूप में नहीं, शर्त-वर्गीकरण के रूप में पढ़ें।

English rendering — then, the text asserts, his wife is a courtesan or an adulteress. With Venus in a navāṃśa of Mars or in a sign of Mars — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शर्त-पद। शर्त (अगले फल की): नवांश-राशि(Ve) ∈ {मेष, वृश्चिक} ∨ राशि(Ve) ∈ {मेष, वृश्चिक}।

18.13
भौमयुक्ते च दृष्टे वा भगचुम्बनभाग् भवेत् ।
मन्दांशकगते शुक्रे मन्दक्षेत्रगतेऽपि च
bhaumayukte ca dṛṣṭe vā bhagacumbanabhāg bhavet |
mandāṃśakagate śukre mandakṣetragate'pi ca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौमयुक्ते च दृष्टे वा = मंगल से युक्त या दृष्ट (शुक्र होने पर); भगचुम्बनभाक् भवेत् = भग-चुम्बन में प्रवृत्त होता है; मन्दांशकगते शुक्रे = शुक्र शनि के नवांश में; मन्दक्षेत्रगते अपि च = अथवा शनि की राशि में — (फल 18.14 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (18.12 की शर्त में) शुक्र मंगल से युक्त या दृष्ट भी हो, तो जातक भग-चुम्बन में प्रवृत्त कहा गया है। आगे: शुक्र शनि के नवांश या राशि में — फल 18.14 में। काम-व्यवहार के ये वर्णन ग्रन्थ के प्रत्यक्ष शब्द हैं; अनुवाद उन्हें वैसे ही रखता है।

English rendering — and if that Venus is joined or aspected by Mars, the native is given to oral union (bhaga-cumbana). With Venus in a navāṃśa or sign of Saturn — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शर्त-पद। शर्त (अगले फल की): नवांश-राशि(Ve) ∈ {मकर, कुम्भ} ∨ राशि(Ve) ∈ {मकर, कुम्भ}।

18.14
मन्दयुक्ते च दृष्टे च शिश्नचुम्बनतत्परः ।
दारेशे स्वोच्चराशिस्थे मदे शुभसमन्विते
mandayukte ca dṛṣṭe ca śiśnacumbanatatparaḥ |
dāreśe svoccarāśisthe made śubhasamanvite
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दयुक्ते च दृष्टे च = शनि से युक्त और दृष्ट (शुक्र होने पर); शिश्नचुम्बनतत्परः = शिश्न-चुम्बन में तत्पर; दारेशे स्वोच्चराशिस्थे = सप्तमेश स्वोच्च राशि में; मदे शुभसमन्विते = सप्तम में शुभ-ग्रह — (फल 18.15 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (18.13 की शर्त में) शुक्र शनि से युक्त-दृष्ट हो तो जातक शिश्न-चुम्बन में तत्पर कहा गया है। दूसरा पद शुभ शर्त खोलता है — सप्तमेश स्वोच्च में, सप्तम में शुभ ग्रह — जिसका फल 18.15 में।

English rendering — and if joined and aspected by Saturn, given to oral union (śiśna-cumbana). With the seventh lord exalted and a benefic in the seventh — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शर्त-पद। शर्त (अगले फल की): उच्च(7L) ∧ शुभ ∈ भाव 7।

18.15
लग्नेशो बलसंयुक्तः कलत्रस्थानसंयुतः ।
तद्भार्या सद्गुणोपेता पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी
lagneśo balasaṃyuktaḥ kalatrasthānasaṃyutaḥ |
tadbhāryā sadguṇopetā putrapautrapravardhinī
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशः बलसंयुक्तः = लग्नेश बल-युक्त; कलत्रस्थानसंयुतः = सप्तम भाव में स्थित; तद्भार्या = उसकी भार्या; सद्गुणोपेता = सद्गुणों से युक्त; पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी = पुत्र-पौत्रों की वृद्धि करने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (18.14 की शर्तों के साथ) बलवान् लग्नेश सप्तम में हो, तो भार्या सद्गुण-सम्पन्न और पुत्र-पौत्र-वर्धिनी होती है। अध्याय की शुभ श्रृंखला का शिखर-पद।

English rendering — and with a strong lagna lord in the seventh, his wife is virtuous and brings increase of sons and grandsons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: बली(AL) ∧ AL ∈ भाव 7 (18.14 के साथ)।

18.16
कलत्रे तत्पतौ वापि पापग्रहसमन्विते ।
भार्याहानिं वदेत् तस्य निर्बले च विशेषतः
kalatre tatpatau vāpi pāpagrahasamanvite |
bhāryāhāniṃ vadet tasya nirbale ca viśeṣataḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्रे तत्पतौ वापि = सप्तम भाव अथवा उसके स्वामी के; पापग्रहसमन्विते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर; भार्याहानिं वदेत् तस्य = उसकी भार्या-हानि कहे; निर्बले च विशेषतः = और निर्बल हो तो विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम भाव या सप्तमेश पाप-ग्रह से युक्त हो तो भार्या-हानि कही जाए, और निर्बल हो तो विशेष रूप से। सामान्य नियम, जिसे आगे के श्लोक स्थान-विशेष से परिष्कृत करते हैं।

English rendering When the seventh house or its lord is joined by a malefic, loss of the wife is to be declared — especially, says the text, if weak.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: पाप ∈ भाव 7 ∨ पाप ∈ युति(7L); तीव्रता: निर्बल(7L)।

18.17
षष्ठाष्टमव्ययस्थाने मदेशो दुर्बलो यदि ।
नीचराशिगतो वापि दारनाशं विनिर्दिशेत्
ṣaṣṭhāṣṭamavyayasthāne madeśo durbalo yadi |
nīcarāśigato vāpi dāranāśaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाष्टमव्ययस्थाने = षष्ठ, अष्टम या द्वादश में; मदेशः दुर्बलः यदि = यदि सप्तमेश दुर्बल हो; नीचराशिगतः वापि = अथवा नीच राशि में गया हो; दारनाशं विनिर्दिशेत् = दार-नाश (पत्नी-हानि) कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश दुर्बल होकर षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हो, अथवा नीच में हो, तो दार-नाश कहा जाए। 18.16 का स्थान-विशेष रूप।

English rendering If the seventh lord is weak in the sixth, eighth or twelfth, or debilitated, the text indicates loss of the wife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: (निर्बल(7L) ∧ 7L ∈ {6, 8, 12}) ∨ नीच(7L)।

18.18
कलत्रस्थानगे चन्द्रे तदीशे व्ययराशिगे ।
कारको बलहीनश्च दारसौख्यं न विद्यते
kalatrasthānage candre tadīśe vyayarāśige |
kārako balahīnaśca dārasaukhyaṃ na vidyate
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्रस्थानगे चन्द्रे = सप्तम में चन्द्र; तदीशे व्ययराशिगे = सप्तमेश द्वादश में; कारकः बलहीनः च = और कारक (शुक्र) बलहीन; दारसौख्यं न विद्यते = दार-सुख नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र सप्तम में, सप्तमेश द्वादश में और दार-कारक शुक्र बलहीन हो, तो दार-सुख नहीं होता। भाव, भावेश और कारक — तीनों की एक साथ दुर्बलता का नियम।

English rendering With the Moon in the seventh, its lord in the twelfth and the significator (Venus) weak, the text says there is no marital happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: Mo ∈ भाव 7 ∧ 7L ∈ भाव 12 ∧ निर्बल(Ve)।

18.19
सप्तमेशे स्वनीचस्थे पापर्क्षे पापसंयुते ।
सप्तमे क्लीवराश्यंशे द्विभार्यो जातको भवेत्
saptameśe svanīcasthe pāparkṣe pāpasaṃyute |
saptame klīvarāśyaṃśe dvibhāryo jātako bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमेशे स्वनीचस्थे = सप्तमेश अपने नीच में; पापर्क्षे = पाप-राशि में; पापसंयुते = पाप-युक्त; सप्तमे क्लीबराश्यंशे = सप्तम (भाव) नपुंसक राशि या नवांश में; द्विभार्यः जातकः भवेत् = जातक दो भार्याओं वाला होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश नीच में, पाप-राशि में, पाप-युक्त हो, और सप्तम भाव नपुंसक राशि या नवांश में हो, तो जातक द्वि-भार्य होता है। "क्लीब राशि" — परम्परा में मिथुन, कन्या, मकर, कुम्भ (बुध-शनि की राशियाँ) — घोषित परिपाटी।

English rendering With the seventh lord in its debilitation, in a malefic sign joined by a malefic, and the seventh in a neuter sign or navāṃśa, the native, says the text, has two wives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: नीच(7L) ∧ पाप-राशि(7L) ∧ पाप ∈ युति(7L) ∧ (राशि(भाव 7) ∈ क्लीब ∨ नवांश-राशि(भाव 7) ∈ क्लीब); क्लीब-समुच्चय घोषित करें।

18.20
कलत्र्स्थानगे भौमे शुक्रे जामित्रगे शनौ ।
लग्नेशे रन्ध्रराशिस्थे कलत्रत्रयवान् भवेत्
kalatrsthānage bhaume śukre jāmitrage śanau |
lagneśe randhrarāśisthe kalatratrayavān bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्रस्थानगे भौमे = सप्तम में मंगल; शुक्रे जामित्रगे शनौ = शुक्र से सप्तम में शनि; लग्नेशे रन्ध्रराशिस्थे = लग्नेश अष्टम राशि में; कलत्रत्रयवान् भवेत् = तीन पत्नियों वाला होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मंगल सप्तम में, शनि शुक्र से सप्तम में और लग्नेश अष्टम में हो, तो जातक तीन पत्नियों वाला होता है। "शुक्रे जामित्रगे शनौ" की गिनती शुक्र से है — पाठ-भेद संभव।

English rendering With Mars in the seventh, Saturn seventh from Venus, and the lagna lord in the eighth, the text says the native has three wives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रय = 3)। शर्त: Ma ∈ भाव 7 ∧ Sa ∈ (Ve + 6 राशि) ∧ AL ∈ भाव 8।

18.21
द्विस्वभावगते शुक्रे स्वोच्चे तद्राशिनायके ।
दारेशे बलसंयुक्ते बहुदारसमन्वितः
dvisvabhāvagate śukre svocce tadrāśināyake |
dāreśe balasaṃyukte bahudārasamanvitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विस्वभावगते शुक्रे = शुक्र द्विस्वभाव राशि में; स्वोच्चे तद्राशिनायके = उस राशि का स्वामी स्वोच्च में; दारेशे बलसंयुक्ते = सप्तमेश बल-युक्त; बहुदारसमन्वितः = अनेक पत्नियों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र द्विस्वभाव राशि में हो, उस राशि का स्वामी स्वोच्च में हो और सप्तमेश बलवान् हो, तो जातक बहु-दार होता है। द्विस्वभाव राशियाँ: मिथुन, कन्या, धनु, मीन।

English rendering With Venus in a dual sign whose lord is exalted, and the seventh lord strong, the native, says the text, has many wives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: राशि(Ve) ∈ {मिथुन, कन्या, धनु, मीन} ∧ उच्च(स्वामी(राशि(Ve))) ∧ बली(7L)।

18.22
दारेशे शुभराशिस्थे स्वोच्चस्वर्क्षगतो भृगुः ।
पञ्चमे नवमेऽब्दे तु विवाहः प्रायशो भवेत्
dāreśe śubharāśisthe svoccasvarkṣagato bhṛguḥ |
pañcame navame'bde tu vivāhaḥ prāyaśo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे शुभराशिस्थे = सप्तमेश शुभ राशि में; स्वोच्चस्वर्क्षगतः भृगुः = शुक्र स्वोच्च या स्वराशि में; पञ्चमे नवमे अब्दे तु = पाँचवें या नौवें वर्ष में; विवाहः प्रायशः भवेत् = प्रायः विवाह होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश शुभ राशि में हो और शुक्र स्वोच्च या स्वराशि में हो, तो प्रायः पाँचवें या नौवें वर्ष में विवाह होता है। यहाँ से विवाह-वर्ष की श्रृंखला (18.22–18.34) आरम्भ होती है; वर्ष-अङ्क ग्रन्थ के अपने कालखण्ड की परिपाटी के हैं — पाठ का कथन, वर्तमान विधि/समाज का नहीं।

English rendering With the seventh lord in a benefic sign and Venus exalted or in its own sign, the text places marriage, as a rule, in the fifth or ninth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ष-अङ्क: पञ्चम = 5, नवम = 9)। "प्रायशः" पाठ का सम्भाव्यता-शब्द है।

18.23
दारस्तानं गते सूर्ये तदीशे भृगुसंयुते ।
सप्तमैकादशे वर्षे विवाहः प्रायशो भवेत्
dārastānaṃ gate sūrye tadīśe bhṛgusaṃyute |
saptamaikādaśe varṣe vivāhaḥ prāyaśo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारस्थानं गते सूर्ये = सूर्य सप्तम में; तदीशे भृगुसंयुते = सप्तमेश शुक्र से युक्त; सप्तमैकादशे वर्षे = सातवें या ग्यारहवें वर्ष में; विवाहः प्रायशः भवेत् = प्रायः विवाह होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य सप्तम में और सप्तमेश शुक्र से युक्त हो, तो प्रायः सातवें या ग्यारहवें वर्ष में विवाह। विवाह-वर्ष श्रृंखला का दूसरा पद।

English rendering With the Sun in the seventh and its lord joined by Venus, marriage is placed in the seventh or eleventh year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम = 7, एकादश = 11 वर्ष)। शर्त: Su ∈ भाव 7 ∧ Ve ∈ युति(7L)।

18.24
कुटुम्बस्थानगे शुक्रे दारेशे लाभराशिगे ।
दशमे षोडशाऽब्दे च विवाहः प्रायशो भवेत्
kuṭumbasthānage śukre dāreśe lābharāśige |
daśame ṣoḍaśā'bde ca vivāhaḥ prāyaśo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुटुम्बस्थानगे शुक्रे = शुक्र द्वितीय (कुटुम्ब) भाव में; दारेशे लाभराशिगे = सप्तमेश एकादश में; दशमे षोडशे अब्दे च = दसवें या सोलहवें वर्ष में; विवाहः प्रायशः भवेत्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र द्वितीय में और सप्तमेश एकादश में हो, तो प्रायः दसवें या सोलहवें वर्ष में विवाह। द्वितीय (कुटुम्ब) और एकादश (लाभ) — विवाह के सहायक भाव।

English rendering With Venus in the second and the seventh lord in the eleventh, marriage is placed in the tenth or sixteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम = 10, षोडश = 16)। शर्त: Ve ∈ भाव 2 ∧ 7L ∈ भाव 11।

18.25
लग्नकेन्द्रगते शुक्रे लग्नेशे मन्दराशिगे ।
वत्सरैकादशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः
lagnakendragate śukre lagneśe mandarāśige |
vatsaraikādaśe prāpte vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नकेन्द्रगते शुक्रे = शुक्र लग्न से केन्द्र में; लग्नेशे मन्दराशिगे = लग्नेश शनि की राशि में; वत्सरे एकादशे प्राप्ते = ग्यारहवाँ वर्ष आने पर; विवाहं लभते नरः = मनुष्य विवाह पाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र लग्न से केन्द्र में और लग्नेश शनि की राशि में हो, तो ग्यारहवें वर्ष में विवाह। श्रृंखला का चौथा पद।

English rendering With Venus in a kendra from the lagna and the lagna lord in a sign of Saturn, the man obtains marriage in the eleventh year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (एकादश = 11)। शर्त: Ve ∈ {1, 4, 7, 10} ∧ राशि(AL) ∈ {मकर, कुम्भ}।

18.26
लग्नात् केन्द्रगते शुक्रे तस्मात् कामगते शनौ ।
द्वादशैकोनविंशे च विवाहः प्रायशो भवेत्
lagnāt kendragate śukre tasmāt kāmagate śanau |
dvādaśaikonaviṃśe ca vivāhaḥ prāyaśo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् केन्द्रगते शुक्रे = शुक्र लग्न से केन्द्र में; तस्मात् कामगते शनौ = उससे (शुक्र से) सप्तम में शनि; द्वादशैकोनविंशे च = बारहवें या उन्नीसवें (वर्ष में); विवाहः प्रायशः भवेत्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र केन्द्र में और शनि शुक्र से सप्तम में हो, तो प्रायः बारहवें या उन्नीसवें वर्ष में विवाह।

English rendering With Venus in a kendra from the lagna and Saturn seventh from Venus, marriage is placed in the twelfth or nineteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वादश = 12, एकोनविंश = 19)। शर्त: Ve ∈ {1, 4, 7, 10} ∧ Sa ∈ (Ve + 6 राशि)।

18.27
चन्द्राज्जामित्रगे शुक्रे शुक्राज्जामित्रगे शनौ ।
वत्सरेऽष्टादशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः
candrājjāmitrage śukre śukrājjāmitrage śanau |
vatsare'ṣṭādaśe prāpte vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् जामित्रगे शुक्रे = चन्द्र से सप्तम में शुक्र; शुक्रात् जामित्रगे शनौ = शुक्र से सप्तम में शनि; वत्सरे अष्टादशे प्राप्ते = अठारहवाँ वर्ष आने पर; विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र चन्द्र से सप्तम में और शनि शुक्र से सप्तम में हो, तो अठारहवें वर्ष में विवाह। ज्यामिति: शनि चन्द्र के साथ एक ही राशि में (7 + 7 = 14 ≡ 2, अर्थात् चन्द्र से 1 राशि आगे? — नहीं: दो बार सप्तम = मूल राशि) — गणना-टिप्पणी देखें।

English rendering With Venus seventh from the Moon and Saturn seventh from Venus, marriage comes in the eighteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टादश = 18)। ज्यामिति: Ve = Mo + 6 राशि; Sa = Ve + 6 राशि = Mo + 12 राशि ≡ Mo की राशि — अर्थात् शनि चन्द्र की राशि में, शुक्र उसके सामने।

18.28
धनेशे लाभराशिस्थे लग्नेशे कर्मराशिगे ।
अब्दे पञ्चदशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः
dhaneśe lābharāśisthe lagneśe karmarāśige |
abde pañcadaśe prāpte vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे लाभराशिस्थे = द्वितीयेश एकादश में; लग्नेशे कर्मराशिगे = लग्नेश दशम में; अब्दे पञ्चदशे प्राप्ते = पन्द्रहवाँ वर्ष आने पर; विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीयेश एकादश में और लग्नेश दशम में हो, तो पन्द्रहवें वर्ष में विवाह।

English rendering With the second lord in the eleventh and the lagna lord in the tenth, marriage comes in the fifteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पञ्चदश = 15)। शर्त: 2L ∈ भाव 11 ∧ AL ∈ भाव 10।

18.29
धनेशे लाभराशिस्ते लाभेशे धनराशिगे ।
अब्दे त्रयोदशे प्राप्ते विवाहं लभते नरः
dhaneśe lābharāśiste lābheśe dhanarāśige |
abde trayodaśe prāpte vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे लाभराशिस्थे (पाठ "राशिस्ते") = द्वितीयेश एकादश में; लाभेशे धनराशिगे = एकादशेश द्वितीय में; अब्दे त्रयोदशे प्राप्ते = तेरहवाँ वर्ष आने पर; विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीयेश एकादश में और एकादशेश द्वितीय में (परिवर्तन) हो, तो तेरहवें वर्ष में विवाह। यही परिवर्तन-योग 22.9 में विवाहोत्तर भाग्य का कारण कहा गया है।

English rendering With the second lord in the eleventh and the eleventh lord in the second, marriage comes in the thirteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रयोदश = 13)। शर्त: 2L ∈ भाव 11 ∧ 11L ∈ भाव 2 (परिवर्तन)।

18.30
रन्ध्राज्जामित्रगे शुक्रे तदीशे भौमसंयुते ।
द्वाविंशे सप्तविंशेऽब्दे विवाहं लभते नरः
randhrājjāmitrage śukre tadīśe bhaumasaṃyute |
dvāviṃśe saptaviṃśe'bde vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रात् जामित्रगे शुक्रे = अष्टम से सप्तम (= द्वितीय) में शुक्र; तदीशे भौमसंयुते = उसका (द्वितीय का) स्वामी मंगल से युक्त; द्वाविंशे सप्तविंशे अब्दे = बाईसवें या सत्ताईसवें वर्ष में; विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र अष्टम से सप्तम अर्थात् द्वितीय भाव में हो, और उसका स्वामी मंगल से युक्त हो, तो बाईसवें या सत्ताईसवें वर्ष में विवाह।

English rendering With Venus seventh from the eighth (that is, in the second) and that house's lord joined by Mars, marriage comes in the twenty-second or twenty-seventh year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 8 से 7वाँ = (8 + 6) mod 12 = 2 → द्वितीय। शर्त: Ve ∈ भाव 2 ∧ Ma ∈ युति(2L)। अङ्क: द्वाविंश = 22, सप्तविंश = 27।

18.31
दारांशकगते लग्ननाथे दारेश्वरे व्यये ।
त्रयोविंशे च षड्विंशे विवाहं लभते नरः
dārāṃśakagate lagnanāthe dāreśvare vyaye |
trayoviṃśe ca ṣaḍviṃśe vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारांशकगते लग्ननाथे = लग्नेश सप्तम भाव के नवांश (दारांश) में; दारेश्वरे व्यये = सप्तमेश द्वादश में; त्रयोविंशे च षड्विंशे = तेईसवें या छब्बीसवें (वर्ष में); विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश सप्तम भाव के नवांश में हो और सप्तमेश द्वादश में हो, तो तेईसवें या छब्बीसवें वर्ष में विवाह। "दारांश" = सप्तम-कस्प की नवांश-राशि — घोषित करें कि कस्प या राशि-मध्य लिया गया।

English rendering With the lagna lord in the navāṃśa of the seventh house and the seventh lord in the twelfth, marriage comes in the twenty-third or twenty-sixth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश-राशि(AL) = नवांश-राशि(सप्तम-कस्प) — k = ⌊λ ÷ 3°20′⌋ + 1 दोनों के लिए; शर्त: समान D9-राशि ∧ 7L ∈ भाव 12। अङ्क: त्रयोविंश = 23, षड्विंश = 26।

18.32
रन्ध्रेशे दारराशिस्थे लग्नांशे भृगुसंयुते ।
पञ्चविंशे त्रयस्त्रिंशे विवाहं लभते नरः
randhreśe dārarāśisthe lagnāṃśe bhṛgusaṃyute |
pañcaviṃśe trayastriṃśe vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे दारराशिस्थे = अष्टमेश सप्तम राशि में; लग्नांशे भृगुसंयुते = लग्न के नवांश में शुक्र (के साथ); पञ्चविंशे त्रयस्त्रिंशे = पच्चीसवें या तैंतीसवें (वर्ष में); विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अष्टमेश सप्तम में हो और शुक्र लग्न के नवांश में हो, तो पच्चीसवें या तैंतीसवें वर्ष में विवाह। "लग्नांश" = लग्न-कस्प की नवांश-राशि।

English rendering With the eighth lord in the seventh and Venus in the lagna's navāṃśa, marriage comes in the twenty-fifth or thirty-third year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश-राशि(Ve) = नवांश-राशि(लग्न-कस्प); शर्त: 8L ∈ भाव 7 ∧ D9-राशि(Ve) = D9-राशि(लग्न)। अङ्क: पञ्चविंश = 25, त्रयस्त्रिंश = 33।

18.33
भाग्याद्भाग्यगते शुक्रे तद्द्वये राहुसंयुते ।
एकत्रिंशास्त्रयस्त्रिंशे दारलाभं विनिर्दिशेत्
bhāgyādbhāgyagate śukre taddvaye rāhusaṃyute |
ekatriṃśāstrayastriṃśe dāralābhaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यात् भाग्यगते शुक्रे = नवम से नवम (= पञ्चम) में शुक्र; तद्द्वये राहुसंयुते = उन दोनों (स्थानों) में राहु-योग (होने पर); एकत्रिंशे त्रयस्त्रिंशे = इकतीसवें या तैंतीसवें (वर्ष में); दारलाभं विनिर्दिशेत् = दार-लाभ कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र नवम से नवम अर्थात् पञ्चम में हो और उन दोनों स्थानों में राहु का योग हो, तो इकतीसवें या तैंतीसवें वर्ष में दार-लाभ। "तद्द्वये" का आशय दोनों नवम-स्थानों से — पाठ-भेद संभव।

English rendering With Venus ninth from the ninth (that is, in the fifth) and Rāhu joined in those two places, gain of a wife is indicated in the thirty-first or thirty-third year (reading uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 9 से 9वाँ = (9 + 8) mod 12 = 5 → पञ्चम। अङ्क: एकत्रिंश = 31, त्रयस्त्रिंश = 33।

18.34
भाग्याज्जामित्रगे शुक्रे तद्द्यूने दारनायके ।
त्रिंशे वा सप्तविंशाब्दे विवाहं लभते नरः
bhāgyājjāmitrage śukre taddyūne dāranāyake |
triṃśe vā saptaviṃśābde vivāhaṃ labhate naraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यात् जामित्रगे शुक्रे = नवम से सप्तम (= तृतीय) में शुक्र; तद्द्यूने दारनायके = उससे (शुक्र से) सप्तम में सप्तमेश; त्रिंशे वा सप्तविंशाब्दे = तीसवें या सत्ताईसवें वर्ष में; विवाहं लभते नरः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र नवम से सप्तम अर्थात् तृतीय में हो और सप्तमेश शुक्र से सप्तम में हो, तो तीसवें या सत्ताईसवें वर्ष में विवाह। विवाह-वर्ष श्रृंखला का अन्तिम पद।

English rendering With Venus seventh from the ninth (in the third) and the seventh lord seventh from Venus, marriage comes in the thirtieth or twenty-seventh year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 9 से 7वाँ = (9 + 6) mod 12 = 3 → तृतीय; 7L ∈ (Ve + 6 राशि) = नवम भाव। अङ्क: त्रिंश = 30, सप्तविंश = 27।

18.35
दारेशे नीचराशिस्थे शुक्रे रन्ध्रारिसंयुते ।
अष्टादशे त्रयस्त्रिंशे वत्सरे दारनाशनम्
dāreśe nīcarāśisthe śukre randhrārisaṃyute |
aṣṭādaśe trayastriṃśe vatsare dāranāśanam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे नीचराशिस्थे = सप्तमेश नीच राशि में; शुक्रे रन्ध्रारिसंयुते = शुक्र अष्टमेश और षष्ठेश से युक्त; अष्टादशे त्रयस्त्रिंशे वत्सरे = अठारहवें या तैंतीसवें वर्ष में; दारनाशनम् = दार-नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश नीच में हो और शुक्र अष्टमेश-षष्ठेश से युक्त हो, तो अठारहवें या तैंतीसवें वर्ष में दार-नाश कहा गया है। यहाँ से दार-हानि-वर्ष की श्रृंखला (18.35–18.39) — पाठ के कथन, नियति नहीं।

English rendering With the seventh lord debilitated and Venus joined by the lords of the eighth and sixth, the text places loss of the wife in the eighteenth or thirty-third year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टादश = 18, त्रयस्त्रिंश = 33)। शर्त: नीच(7L) ∧ {8L, 6L} ∩ युति(Ve) ≠ ∅।

18.36
मदेशे नाशराशिस्थे व्ययेशे मदराशिगे ।
तस्य चैकोनविंशाब्दे दारनाशं विनिर्दिशेत्
madeśe nāśarāśisthe vyayeśe madarāśige |
tasya caikonaviṃśābde dāranāśaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मदेशे नाशराशिस्थे = सप्तमेश अष्टम में; व्ययेशे मदराशिगे = द्वादशेश सप्तम में; तस्य च एकोनविंशाब्दे = उसके उन्नीसवें वर्ष में; दारनाशं विनिर्दिशेत् = दार-नाश कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश अष्टम में और द्वादशेश सप्तम में हो, तो उन्नीसवें वर्ष में दार-नाश।

English rendering With the seventh lord in the eighth and the twelfth lord in the seventh, loss of the wife is indicated in the nineteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (एकोनविंश = 19)। शर्त: 7L ∈ भाव 8 ∧ 12L ∈ भाव 7।

18.37
कुटुम्बस्थानगो राहुः कलत्रे भौमसंयुते ।
पाणिग्रहे च त्रिदिने सर्पदष्टे वधूमृतिः
kuṭumbasthānago rāhuḥ kalatre bhaumasaṃyute |
pāṇigrahe ca tridine sarpadaṣṭe vadhūmṛtiḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुटुम्बस्थानगः राहुः = राहु द्वितीय में; कलत्रे भौमसंयुते = सप्तम में मंगल; पाणिग्रहे च त्रिदिने = विवाह के तीन दिन के भीतर; सर्पदष्टे = सर्प-दंश से; वधूमृतिः = वधू की मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु द्वितीय में और मंगल सप्तम में हो, तो विवाह के तीन दिन के भीतर सर्प-दंश से वधू-मृत्यु। यह ग्रन्थ का अत्यन्त विशिष्ट कथन है (राहु = सर्प-कारक, मंगल = आघात); इसे पाठ की योग-सूची के रूप में ही लें — नियति या भय के रूप में नहीं।

English rendering With Rāhu in the second and Mars in the seventh, the text states that within three days of the wedding the bride dies of snakebite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रिदिन = 3 दिन)। शर्त: Ra ∈ भाव 2 ∧ Ma ∈ भाव 7।

18.38
रन्ध्रस्थानगते शुक्रे तदीशे सौरिराशिगे ।
द्वादशैकोनविंशाब्दे दारनाशं विनिर्दिशेत्
randhrasthānagate śukre tadīśe saurirāśige |
dvādaśaikonaviṃśābde dāranāśaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रस्थानगते शुक्रे = शुक्र अष्टम में; तदीशे सौरिराशिगे = उसका (अष्टम का) स्वामी शनि की राशि में; द्वादशैकोनविंशाब्दे = बारहवें या उन्नीसवें वर्ष में; दारनाशं विनिर्दिशेत्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र अष्टम में हो और अष्टमेश शनि की राशि में हो, तो बारहवें या उन्नीसवें वर्ष में दार-नाश।

English rendering With Venus in the eighth and the eighth lord in a sign of Saturn, loss of the wife is indicated in the twelfth or nineteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वादश = 12, एकोनविंश = 19)। शर्त: Ve ∈ भाव 8 ∧ राशि(8L) ∈ {मकर, कुम्भ}।

18.39
लग्नेशे नीचराशिस्थे धनेशे निधनं गते ।
त्रयोदशे तु सम्प्राप्ते कलत्रस्य मृतिर्भवेत्
lagneśe nīcarāśisthe dhaneśe nidhanaṃ gate |
trayodaśe tu samprāpte kalatrasya mṛtirbhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे नीचराशिस्थे = लग्नेश नीच में; धनेशे निधनं गते = द्वितीयेश अष्टम में; त्रयोदशे तु सम्प्राप्ते = तेरहवाँ (वर्ष) आने पर; कलत्रस्य मृतिः भवेत् = पत्नी की मृत्यु होती है (पाठ का कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश नीच में और द्वितीयेश अष्टम में हो, तो तेरहवें वर्ष में पत्नी-मृत्यु कही गई है। दार-हानि श्रृंखला का पद; द्वितीय (कुटुम्ब) के स्वामी की अष्टम-स्थिति कारण-रूप।

English rendering With the lagna lord debilitated and the second lord in the eighth, the text speaks of the wife's death in the thirteenth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रयोदश = 13)। शर्त: नीच(AL) ∧ 2L ∈ भाव 8।

18.40
शुक्राज्जामित्रगे चन्द्रे चन्द्राज्जामित्रगे बुधे ।
रन्ध्रेशे सुतभावस्थे प्रथमं दशमाब्दिकम्
śukrājjāmitrage candre candrājjāmitrage budhe |
randhreśe sutabhāvasthe prathamaṃ daśamābdikam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रात् जामित्रगे चन्द्रे = शुक्र से सप्तम में चन्द्र; चन्द्रात् जामित्रगे बुधे = चन्द्र से सप्तम में बुध; रन्ध्रेशे सुतभावस्थे = अष्टमेश पञ्चम में; प्रथमं दशमाब्दिकम् = प्रथम (विवाह) दसवें वर्ष का — (18.41 में पूरा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र शुक्र से सप्तम में, बुध चन्द्र से सप्तम में और अष्टमेश पञ्चम में हो, तो प्रथम विवाह दसवें वर्ष में, (18.41 के अनुसार) दूसरा बाईसवें और तीसरा तैंतीसवें वर्ष में। ज्यामिति: बुध शुक्र की राशि में (7 + 7 ≡ 0)।

English rendering With the Moon seventh from Venus, Mercury seventh from the Moon, and the eighth lord in the fifth — the first marriage in the tenth year, (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ज्यामिति: Mo = Ve + 6 राशि; Me = Mo + 6 = Ve + 12 ≡ Ve की राशि। शर्त: 8L ∈ भाव 5। अङ्क: दशम = 10 (प्रथम)।

18.41
द्वाविंशे च द्वितीयं च त्रयस्त्रिंशे तृतीयकम् ।
विवाहं लभते मर्त्यो नाऽत्र कार्या विचारणा
dvāviṃśe ca dvitīyaṃ ca trayastriṃśe tṛtīyakam |
vivāhaṃ labhate martyo nā'tra kāryā vicāraṇā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वाविंशे च द्वितीयं च = और बाईसवें (वर्ष में) दूसरा; त्रयस्त्रिंशे तृतीयकम् = तैंतीसवें में तीसरा; विवाहं लभते मर्त्यः = मनुष्य विवाह पाता है; न अत्र कार्या विचारणा = इसमें विचार (सन्देह) नहीं करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (18.40 की शर्त में) दूसरा विवाह बाईसवें और तीसरा तैंतीसवें वर्ष में; "इसमें विचारणा न करे" — पाठ का आग्रह। तीन विवाहों की वर्ष-सूची: 10, 22, 33।

English rendering — the second in the twenty-second and the third in the thirty-third year the mortal obtains marriage; "on this," says the text, "no deliberation is needed."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अङ्क: 10, 22, 33)।

18.42
षष्ठे च भवने भौमः सप्तमे राहुसंस्थितिः ।
अष्टमे च यदा सौरिस्तस्य भार्या न जीवति
ṣaṣṭhe ca bhavane bhaumaḥ saptame rāhusaṃsthitiḥ |
aṣṭame ca yadā sauristasya bhāryā na jīvati
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे च भवने भौमः = षष्ठ भाव में मंगल; सप्तमे राहुसंस्थितिः = सप्तम में राहु; अष्टमे च यदा सौरिः = और अष्टम में शनि (हो तब); तस्य भार्या न जीवति = उसकी भार्या जीवित नहीं रहती (पाठ का कथन)।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का अन्तिम पद — शास्त्र कहता है कि मंगल षष्ठ में, राहु सप्तम में और शनि अष्टम में हो, तो भार्या जीवित नहीं रहती। तीन क्रूर ग्रहों का 6-7-8 में क्रमिक बैठना — पाठ का अशुभतम दार-योग; इसे भय की भाषा नहीं, योग-वर्गीकरण की भाषा समझें।

English rendering With Mars in the sixth, Rāhu in the seventh and Saturn in the eighth, the text says his wife does not live.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: Ma ∈ भाव 6 ∧ Ra ∈ भाव 7 ∧ Sa ∈ भाव 8 (सप्तम को घेरने वाली त्रयी)।

अध्यायः 19

आयुर्भावफलाध्यायः

15 श्लोक

सूचना · Note. ये ग्रन्थ के ऐतिहासिक आयु/मृत्यु-कथन हैं, चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं; स्वास्थ्य की चिन्ता हो तो चिकित्सक से मिलें। · Historical statements of the text about lifespan and death, not medical predictions; for any health concern, see a doctor.

19.1
आयुर्भावफलं चाऽथ कथयामि द्विजोत्तम।
आयुःस्थानाधिपः केन्द्रे दीर्घमायुः प्रयच्छति
āyurbhāvaphalaṃ cā'tha kathayāmi dvijottama|
āyuḥsthānādhipaḥ kendre dīrghamāyuḥ prayacchati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुर्भाव-फलम् = आयु-भाव (आयुःस्थान / अष्टम) का फल-कथन; कथयामि = अब कहता हूँ; द्विजोत्तम = द्विजों में श्रेष्ठ (शिष्य-संबोधन); आयुःस्थान-अधिपः = आयुःस्थान (प्रायः अष्टम भाव) का स्वामी; केन्द्रे = केन्द्र में (1, 4, 7, 10); दीर्घम् आयुः = दीर्घायु; प्रयच्छति = देता है / प्रदत्त करता है

हिन्दी भावार्थ पाराशर अब आयुर्भाव के फल का उपदेश आरम्भ करते हैं। शास्त्र कहता है कि आयुःस्थान का अधिपति यदि केन्द्र में स्थित हो, तो वह जातक को दीर्घ आयु प्रदान करता है। यह केन्द्र-स्थान में आयु-स्वामी की स्थिति को दीर्घायु-योग के रूप में गिना जाता है।

English rendering Parāśara now turns to the results of the longevity house. The text states that when the lord of the āyus-sthāna occupies a kendra, it bestows long life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु-योग संकेत)। केन्द्र-भाव-संख्या शास्त्र-सिद्ध है: 1, 4, 7, 10; आयुःस्थान यहाँ भाव-फल-क्रम में आयु-संबंधी भाव (अष्टम) के रूप में पढ़ा जाता है — पाठ-भेद / परंपरा-भेद संभव।

19.2
आयुस्थानाधिपः पापैः सह तत्रैव संस्थितः।
करोत्यल्पायुषं जातं लग्नेशोऽप्यत्र संस्थितः
āyusthānādhipaḥ pāpaiḥ saha tatraiva saṃsthitaḥ|
karotyalpāyuṣaṃ jātaṃ lagneśo'pyatra saṃsthitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुस्थान-अधिपः = आयुःस्थान का स्वामी; पापैः सह = पाप-ग्रहों के साथ; तत्र एव = उसी (आयुःस्थान) में ही; संस्थितः = स्थित; करोति अल्प-आयुषम् = अल्पायु करता है; जातम् = जातक को; लग्नेशः अपि = लग्न-स्वामी भी; अत्र संस्थितः = यहाँ (पाप-युक्त आयुःस्थान में) स्थित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आयुःस्थान का अधिपति यदि उसी भाव में पाप-ग्रहों के संग बैठे, तो वह जातक को अल्पायु बनाता है। लग्नेश भी यदि उसी स्थिति में — आयुःस्थान में पाप-संग — रहे, तो वही अल्पायु-संकेत लागू होता है। यह शुद्ध फल-कथन है; गणना का नियम नहीं।

English rendering The text states that the lord of the longevity house, placed there itself with malefics, produces short life in the native; the lagna-lord likewise, if so placed there, carries the same indication.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अल्पायु-योग)। पाप-ग्रह-वर्ग और “तत्र” की भाव-पहचान परंपरा-निर्भर है; यहाँ केवल शास्त्र का पद-अर्थ रखा गया है।

19.3
एवं हि शनिना चिन्ता कार्या तर्कैर्विचक्षणैः।
कर्माधिपेन च तथा चिन्तनं कार्यमायुषः
evaṃ hi śaninā cintā kāryā tarkairvicakṣaṇaiḥ|
karmādhipena ca tathā cintanaṃ kāryamāyuṣaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् हि = इसी रीति से; शनिना = शनि के द्वारा / शनि को लेकर; चिन्ता कार्या = विचार करना चाहिए; तर्कैः विचक्षणैः = तर्क-कुशल विद्वानों द्वारा; कर्म-अधिपेन = कर्माधिप (दशम-स्वामी) से भी; तथा = उसी प्रकार; चिन्तनम् कार्यम् आयुषः = आयु का चिन्तन करना चाहिए

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आयु का निर्णय केवल आयु-स्वामी से नहीं; शनि का विचार तर्क-सम्मत रीति से करना चाहिए। उसी भाँति कर्माधिप (दशमेश) से भी आयु का चिन्तन अपेक्षित है। यहाँ आयु-परीक्षा को बहु-कारक — शनि + कर्मेश — पर बाँधा गया है।

English rendering The text states that the skilled, by reasoned method, should also examine Saturn in this connection; and likewise the lord of karma (the tenth) must be considered when longevity is assessed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (चिन्तन-क्रम)। शनि और कर्मेश आयु-चिन्तन के सह-कारक हैं; संख्यात्मक अवधि इस श्लोक में नहीं दी गई।

19.4
षष्ठे व्ययेऽपि षष्ठेशो व्ययाधीशो रिपौ व्यये।
लग्नेऽष्टमे स्थितो वाऽपि दीर्घमायुः प्रयच्छति
ṣaṣṭhe vyaye'pi ṣaṣṭheśo vyayādhīśo ripau vyaye|
lagne'ṣṭame sthito vā'pi dīrghamāyuḥ prayacchati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे = षष्ठ भाव में; व्यये अपि = व्यय (द्वादश) में भी; षष्ठेशः = षष्ठ-स्वामी; व्ययाधीशः = व्यय-स्वामी (द्वादशेश); रिपौ = शत्रु-स्थान / शत्रु-राशि में; व्यये = द्वादश में; लग्ने = लग्न में; अष्टमे = अष्टम में; स्थितः वा अपि = अथवा स्थित भी; दीर्घम् आयुः प्रयच्छति = दीर्घायु देता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षष्ठेश षष्ठ या व्यय में, तथा व्ययाधीश रिपु-स्थान या व्यय में स्थित हो, तो वह दीर्घायु देता है। लग्न या अष्टम में भी वे स्थित हों, तो भी शास्त्र उन्हें दीर्घायु-प्रद बताता है। षष्ठ-द्वादश की “स्थान-स्थिति” यहाँ आयु-योग के रूप में पढ़ी गई है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that the sixth lord in the sixth or twelfth, and the twelfth lord in an enemy house or the twelfth — or even when placed in the lagna or the eighth — bestow long life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दीर्घायु-योग)। भाव-निर्देश: 6, 12, रिपु-स्थान, लग्न (1), अष्टम (8) — स्थिति-मात्र; कोई वर्ष-संख्या या अंश-सूत्र नहीं।

19.5
स्वस्थाने स्वांशके वाऽपि मित्रेशे मित्रमन्दिरे।
दीर्घायुषं करोत्येव लग्नेशोऽष्टमपः पुनः
svasthāne svāṃśake vā'pi mitreśe mitramandire|
dīrghāyuṣaṃ karotyeva lagneśo'ṣṭamapaḥ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-स्थाने = अपने राशि-स्थान में; स्व-अंशके वा अपि = अथवा अपने अंशक (वर्ग / अंश) में; मित्र-ईशे = मित्र-स्वामी के क्षेत्र में; मित्र-मन्दिरे = मित्र-गृह में; दीर्घ-आयुषम् करोति एव = अवश्य दीर्घायु करता है; लग्नेशः = लग्न-स्वामी; अष्टम-पः पुनः = तथा अष्टम-स्वामी भी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नेश और अष्टमेश यदि स्व-राशि या स्व-अंशक में हों, अथवा मित्र-स्वामी / मित्र-गृह में बैठे हों, तो वे दीर्घायु ही उत्पन्न करते हैं। “अंशक” यहाँ वर्ग-अंश (विशेषतः नवांश-परंपरा में पढ़ा जाता है) की ओर संकेत करता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that the lagna-lord and again the eighth-lord, when in their own sign or own aṃśaka, or in a friend’s house or a friend’s abode, indeed produce longevity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्व/मित्र-स्थिति)। “अंशक” वर्ग-मानचित्र की अंश-स्थिति है (D9 आदि षोडश-वर्ग-परंपरा); इस श्लोक में विभाजन-सूत्र नहीं — केवल स्थिति-फल।

19.6
लग्नाष्टमपकर्मेशमन्दाः केन्द्रत्रिकोणयोः।
लाभे वा संस्थितास्तद्वद्‌ दिशेयुर्दीर्घमायुषम्‌
lagnāṣṭamapakarmeśamandāḥ kendratrikoṇayoḥ|
lābhe vā saṃsthitāstadvad‌ diśeyurdīrghamāyuṣam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-अष्टम-प-कर्म-ईश-मन्दाः = लग्नेश, अष्टमेश, कर्मेश (दशमेश) और शनि; केन्द्र-त्रिकोणयोः = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में; लाभे वा = अथवा लाभ (एकादश) में; संस्थिताः = स्थित; तद्वत् = उसी प्रकार; दिशेयुः = संकेत करें / दें; दीर्घम् आयुषम् = दीर्घायु

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नेश, अष्टमेश, कर्मेश और शनि — यदि केन्द्र या त्रिकोण में, अथवा लाभ भाव में स्थित हों — तो वे भी दीर्घायु का संकेत देते हैं। चार कारक एक साथ गिनाए गए: लग्न, अष्टम, कर्म, और मन्द (शनि)। यह बहु-ग्रह आयु-योग का फल-कथन है।

English rendering The text states that the lagna-lord, the eighth-lord, the lord of karma, and Saturn — when placed in a kendra or trikoṇa, or in the eleventh — likewise indicate long life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केन्द्र/त्रिकोण/लाभ स्थिति)। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11 — भाव-सूचकांक मात्र; अवधि-वर्ष नहीं।

19.7
एवं बहुविधा विद्वन्नायुर्योगाः प्रकीर्तिताः।
एषु यो बलवांस्तस्याऽनुसारादायुरादिशेत्‌
evaṃ bahuvidhā vidvannāyuryogāḥ prakīrtitāḥ|
eṣu yo balavāṃstasyā'nusārādāyurādiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; बहु-विधाः = अनेक प्रकार के; विद्वन् = हे विद्वान्; आयुर्-योगाः = आयु-योग; प्रकीर्तिताः = कहे गए; एषु = इनमें; यः बलवान् = जो बलवान् हो; तस्य अनुसारत् = उसी के अनुसार; आयुः आदिशेत् = आयु का निर्देश करे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आयु के अनेक योग ऊपर कहे जा चुके। उनमें से जो योग बलवान् हो, उसी के अनुपात से आयु का निर्णय करना चाहिए। अर्थात् परस्पर-विरोधी आयु-संकेतों में अंतिम मापदण्ड “बल” है — दुर्बल योग को प्रधान नहीं माना जाता।

English rendering Thus, O learned one, many kinds of longevity yogas have been set forth; among them, one should indicate longevity according to whichever yoga is the strongest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्यक्ष संख्या-सूत्र नहीं — निर्णय-नियम: प्रतिस्पर्धी आयुर्-योगों में बलवान् योग का अनुसरण। बल की गणना शास्त्र अन्यत्र षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्; 1 रूप = 60 विरूप) से करती है; इस श्लोक में केवल “यो बलवान्” का चयन-सूत्र है, अवधि-वर्ष नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “एषु यो बलवान्” आयु-योग-चयन को संख्यात्मक बल पर बाँधता है। षड्बल (BPHS Ch.27) — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में जोड़कर ग्रह-बल की तुलना करता है; यह गणनात्मक परत है, फल का समर्थन नहीं। हमारी विधि वही अनुशासन रखती है: गणित `==` से सत्यापित; फल-कथन को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखा जाता है — न तो नियति, न भय, न दबाव।

19.8
अष्टमाधिपतौ केन्द्रे लग्नेशे बलवर्जते।
विंशद्वर्षाण्यसौ जीवेद्‌ द्वात्रिंशत्परमायुषम्‌
aṣṭamādhipatau kendre lagneśe balavarjate|
viṃśadvarṣāṇyasau jīved‌ dvātriṃśatparamāyuṣam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमाधिपति = अष्टम भाव का स्वामी (रन्ध्रेश); केन्द्र = 1-4-7-10 स्थान; लग्नेश = लग्न-स्वामी; बलवर्जित = बल-रहित / दुर्बल; विंशत् वर्षाणि = 20 वर्ष; जीवेत् = जीवित रहे; द्वात्रिंशत् = 32; परमायुषम् = परम आयु / अधिकतम आयु-सीमा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब अष्टमेश केन्द्र में स्थित हो और लग्नेश बल से रहित हो, तो वह जातक बीस वर्ष तक जीवित रहता है; परम आयु बत्तीस वर्ष कही गई है। यह आयु-परिमाण अष्टम–लग्न स्वामियों की स्थिति और बल-हानि पर आधारित एक शास्त्रीय फल-कथन है। यहाँ “बलवर्जित” का अर्थ शास्त्रीय दुर्बलता-संकेत है — गणना-विधि का पूर्ण षड्बल-विस्तार इसी श्लोक में नहीं दिया गया।

English rendering The text states that when the eighth lord occupies a kendra and the lagna lord is devoid of strength, the native lives twenty years, with a maximum span of thirty-two years. The verse fixes two numeric longevity bounds under that joint condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-वर्षांक (शास्त्र-कथित):
- आधार-आयु: 20 वर्ष
- परम-आयु: 32 वर्ष
शर्त-द्वय (दोनों आवश्यक): (1) अष्टमेश ∈ {1, 4, 7, 10}; (2) लग्नेश बलवर्जित।
यह अनुपात/भाग-सूत्र नहीं — सीधे कथित वर्ष-संख्याएँ हैं। “बल” की पूर्ण मात्रात्मक परीक्षा षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) से जुड़ती है; इस श्लोक में केवल फल-सीमा दी गई है।

उदाहरण (worked example) मानें मेष-लग्न; अष्टमेश = मङ्गल; लग्नेश = मङ्गल (एक ही ग्रह — इस उदाहरण में अष्टमेश = लग्नेश, अतः शर्त-युगल के लिए अलग ग्रह-युग्म लें)। वृषभ-लग्न: लग्नेश शुक्र, अष्टमेश बृहस्पति। यदि बृहस्पति केन्द्र (1/4/7/10) में हो और शुक्र बलवर्जित हो (उदा. नीच/शत्रु/अस्त/पाप-युति आदि शास्त्रीय संकेत — पूर्ण षड्बल-संख्या अलग गणना), तो शास्त्र 20 वर्ष आधार और 32 वर्ष परम आयु कहता है। गृह-प्रणाली: भावाधिपति = राशि-स्वामी (पूर्ण-राशि भाव); अयनांश फल-वर्षों पर नहीं, केवल ग्रह-स्थिति-निर्धारण पर लगता है।

19.9
रन्ध्रेशे नीचराशिस्थे रन्ध्रे पापग्रहैर्युते।
लग्नेशे दुर्बले जन्तुरल्पायुर्भवति ध्रुवम्‌
randhreśe nīcarāśisthe randhre pāpagrahairyute|
lagneśe durbale janturalpāyurbhavati dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेश = अष्टमेश; नीचराशिस्थ = नीच राशि में स्थित; रन्ध्र = अष्टम भाव; पापग्रहैः युते = पाप ग्रहों से युक्त; लग्नेशे दुर्बले = लग्न-स्वामी दुर्बल; जन्तुः = प्राणी/जातक; अल्पायुः = अल्प आयु; भवति ध्रुवम् = निश्चित रूप से होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रन्ध्रेश नीच राशि में हो, रन्ध्र भाव पाप ग्रहों से युक्त हो, और लग्नेश दुर्बल हो, तो जातक अल्पायु होता है — “ध्रुवम्” शब्द शास्त्र की अपनी निश्चय-भाषा है। तीनों स्थितियाँ एक साथ फल-कथन का आधार हैं: अष्टमेश की नीचता, अष्टम में पाप-योग, लग्नेश की दुर्बलता। यह आयु-माप का वर्ष-सूत्र नहीं, गुण-दोष-संयोग से अल्प-आयु का निर्देश है।

English rendering The text states that when the eighth lord is in debilitation, the eighth house is joined by malefics, and the lagna lord is weak, the native is short-lived — “dhruvam” being the śāstra’s own certainty-word, not an external verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अल्पायु-योग)। तीन स्थिति-शर्तें: रन्ध्रेश ∈ नीच-राशि; रन्ध्र में ≥1 पाप; लग्नेश दुर्बल। वर्ष-संख्या यहाँ नहीं दी गई।

19.10
रन्ध्रेशे पापसंयुक्ते रन्ध्रे पापग्रहैर्युते।
व्यये क्रूरग्रहाक्रान्ते जातमात्रं मृतिर्भवेत्‌
randhreśe pāpasaṃyukte randhre pāpagrahairyute|
vyaye krūragrahākrānte jātamātraṃ mṛtirbhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे पापसंयुक्ते = अष्टमेश पाप-युक्त; रन्ध्रे पापग्रहैः युते = अष्टम में पाप-ग्रह युक्त; व्यये = द्वादश भाव में; क्रूरग्रहाक्रान्ते = क्रूर/पाप ग्रहों से आक्रान्त; जातमात्रम् = जन्म-मात्र / जन्म के साथ ही; मृतिः भवेत् = मृत्यु हो (शास्त्र कहता है)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रन्ध्रेश पाप से युक्त हो, रन्ध्र भी पाप-ग्राह से युक्त हो, और व्यय (12वाँ) क्रूर ग्रहों से आक्रान्त हो, तो जातमात्र मृत्यु का संकेत दिया गया है। यह तीन-स्थानीय पाप-संयोग (8-स्वामी, 8-भाव, 12-भाव) पर आधारित अत्यन्त कठोर फल-वर्णन है। व्याख्या को डर या उपचार-दबाव में न बदला जाए — केवल पाठ का कथन सुरक्षित रखा जाए।

English rendering The text states that with the eighth lord malefic-joined, the eighth house malefic-occupied, and the twelfth overrun by cruel planets, death is indicated at birth itself. It is a severe phala-combination on three loci, reported as the śāstra’s claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (जातमात्र-मृति योग)। शर्त-त्रय: पाप-युति on रन्ध्रेश; पाप on रन्ध्र; क्रूर on व्यय (12)। कोई वर्ष/भाग-संख्या नहीं।

19.11
केन्द्रत्रिकोणगाः पापाः शुभाः षष्ठाष्टगा यदि।
लग्ने नीचस्थरन्ध्रेशो जातः सद्यो मृतो भवेत्‌
kendratrikoṇagāḥ pāpāḥ śubhāḥ ṣaṣṭhāṣṭagā yadi|
lagne nīcastharandhreśo jātaḥ sadyo mṛto bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र-त्रिकोणगाः पापाः = पाप ग्रह केन्द्र (1/4/7/10) और त्रिकोण (1/5/9) में; शुभाः षष्ठाष्टगाः = शुभ ग्रह षष्ठ और अष्टम में; यदि = यदि; लग्ने नीचस्थ-रन्ध्रेशः = लग्न में स्थित नीच रन्ध्रेश; जातः = जातक; सद्यः मृतः भवेत् = तुरन्त/शीघ्र मृत कहा गया (शास्त्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि पाप ग्रह केन्द्र-त्रिकोण में हों, शुभ ग्रह छठे-आठवें में हों, और लग्न में नीच-स्थित रन्ध्रेश हो, तो जातक सद्यो-मृत होता है। यहाँ शुभ-पाप की “स्थान-विपर्यय” संरचना है: शक्तिशाली स्थानों में पाप, दुःस्थानों में शुभ, तथा लग्न में नीच अष्टमेश। यह संयोजन-फल है, किसी भाग-विभाजन का सूत्र नहीं।

English rendering The text states that if malefics occupy kendras and trikoṇas, benefics the sixth and eighth, and the debilitated eighth lord sits in the lagna, the native is said to die immediately. The verse is a positional combination-phala, not a divisional algorithm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सद्यो-मृति योग)। स्थिति-नियम:
- पापाः → केन्द्र ∪ त्रिकोण
- शुभाः → 6 और/या 8 (पाठ: षष्ठाष्टगा)
- रन्ध्रेश नीच + लग्न-स्थित
पाठ-भेद संभव: “केन्द्रत्रिकोणगाः” का विस्तार (सभी पाप / कोई पाप) टीका-परंपरा में भिन्न हो सकता है।

19.12
पञ्चमे पापसंयुक्ते रन्ध्रेशे पापसंयुते।
रन्ध्रे पापग्रहैर्युक्ते स्वल्पमायुः प्रजायते
pañcame pāpasaṃyukte randhreśe pāpasaṃyute|
randhre pāpagrahairyukte svalpamāyuḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमे पापसंयुक्ते = पंचम भाव पाप-युक्त; रन्ध्रेशे पापसंयुते = अष्टमेश पाप-युक्त; रन्ध्रे पापग्रहैः युक्ते = अष्टम पाप-ग्रह युक्त; स्वल्पम् आयुः = अत्यल्प आयु; प्रजायते = उत्पन्न होती है / होती है (शास्त्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पंचम पाप-संयुक्त हो, रन्ध्रेश पाप-युक्त हो, और रन्ध्र भी पाप-ग्राह से युक्त हो, तो स्वल्प आयु प्रजात होती है। यहाँ 5-8-अष्टमेश — तीनों पर पाप-योग अल्प-आयु का संकेत है। पूर्व श्लोकों की “जातमात्र/सद्यः” जैसी चरम भाषा नहीं; फल “स्वल्पमायुः” है — वर्ष-सीमा इस पद में नहीं दी गई।

English rendering The text states that when the fifth is malefic-joined, the eighth lord is malefic-joined, and the eighth itself is occupied by malefics, a very short lifespan arises. No year-count is given here — only the qualitative “svalpa-āyuḥ”.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्वल्पायु-योग)। तीन पाप-स्थितियाँ: पंचम, रन्ध्रेश, रन्ध्र। संख्यात्मक आयु-वर्ष अनुपस्थित।

19.13
रन्ध्रेशे रन्ध्रराशिस्थे चन्द्रे पापसमन्विते।
शुभदृष्टिविहीने च मासान्ते च मृतिर्भवेत्‌
randhreśe randhrarāśisthe candre pāpasamanvite|
śubhadṛṣṭivihīne ca māsānte ca mṛtirbhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे रन्ध्रराशिस्थे = अष्टमेश अष्टम राशि/भाव में; चन्द्रे पापसमन्विते = चन्द्र पाप-युक्त; शुभदृष्टि-विहीने = शुभ दृष्टि से रहित; मासान्ते = मास के अंत में; मृतिः भवेत् = मृत्यु हो (शास्त्र कहता है)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रन्ध्रेश रन्ध्र-राशि में स्थित हो, चन्द्र पाप से समन्वित हो, और शुभ दृष्टि से विहीन हो, तो मास के अंत में मृत्यु का संकेत है। यहाँ “मासान्ते” एक काल-माप है — जन्म से लगभग एक चान्द्र/सौर मास की समाप्ति का फल-कथन। शुभ-दृष्टि का अभाव योग को पूर्ण करता है; केवल अष्टमेश-स्थिति पर्याप्त नहीं कही गई।

English rendering The text states that when the eighth lord occupies the eighth sign/house, the Moon is with malefics, and there is no benefic aspect, death is indicated at the end of a month. The sole temporal constant is “māsānte” — month’s end.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-अंक (शास्त्र-कथित): मृत्यु-संकेत ≈ मासान्त (1 मास की समाप्ति)।
शर्त-त्रय: रन्ध्रेश ∈ रन्ध्र; चन्द्र + पाप; शुभ-दृष्टि = 0।
दृष्टि-नियम BPHS दृष्टि-अध्याय के अनुसार ग्रह-विशिष्ट; यहाँ केवल “शुभदृष्टिविहीन” कहा गया। यह दाशा-वर्ष-अनुपात नहीं — अल्प-काल फल-सीमा है।

उदाहरण (worked example) कर्क-लग्न: रन्ध्र = कुम्भ, रन्ध्रेश = शनि। यदि शनि कुम्भ (रन्ध्र) में हो, चन्द्र पाप-युक्त (उदा. मङ्गल/शनि/राहु-युति — पाठानुसार पाप-परिभाषा), और किसी शुभ (गुरु/शुक्र/बुध-शुभ दशा) की दृष्टि न हो, तो शास्त्र “मासान्ते मृत्यु” कहता है। मास-माप: जन्म-तिथि से ~30 दिन (सौर) या चान्द्र मासान्त — पाठ स्पष्ट नहीं; पाठ-भेद/टीका-निर्भर। अयनांश केवल राशि-स्थिति निर्धारण के लिए।

19.14
लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे चन्द्रे लाभसमन्विते।
रन्ध्रस्थानगते जीवे दीर्घमायुर्न संशयः
lagneśe svoccarāśisthe candre lābhasamanvite|
randhrasthānagate jīve dīrghamāyurna saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे = लग्नेश स्व-उच्च राशि में; चन्द्रे लाभसमन्विते = चन्द्र लाभ (11वें) से समन्वित / लाभ-स्थित; रन्ध्रस्थानगते जीवे = गुरु अष्टम स्थान में; दीर्घम् आयुः = दीर्घ आयु; न संशयः = संशय नहीं (शास्त्र की निश्चय-भाषा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश अपनी उच्च राशि में हो, चन्द्र लाभ से समन्वित हो, और गुरु रन्ध्र-स्थान में हो, तो दीर्घ आयु होती है — “न संशयः” पाठ की अपनी दृढ़ता है। पूर्व श्लोकों के अल्पायु/मृति-योगों के विपरीत यह दीर्घायु-संयोग है: लग्नेश की उच्चता, चन्द्र-लाभ योग, और अष्टम में गुरु। “लाभसमन्विते” का अर्थ लाभ-भाव-स्थिति या लाभेश-युति — दोनों पाठ-संभव; भाव-स्थित अर्थ अधिक सरल है।

English rendering The text states that when the lagna lord is in its exaltation sign, the Moon is associated with the eleventh (lābha), and Jupiter occupies the eighth house, longevity is long — “no doubt” in the śāstra’s own wording. It is a protective longevity combination against the short-life yogas of the preceding verses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दीर्घायु-योग)। शर्त-त्रय:
1. लग्नेश ∈ स्वोच्च-राशि (उच्च-तालिका: सूर्य मेष, चन्द्र वृषभ, मङ्गल मकर, बुध कन्या, गुरु कर्क, शुक्र मीन, शनि तुला — शास्त्रीय नaisargika उच्च)
2. चन्द्र + लाभ (11) — स्थिति/युति
3. गुरु ∈ रन्ध्र (8)
वर्ष-संख्या नहीं; केवल “दीर्घमायुः”। पाठ-भेद संभव: “लाभसमन्विते” = 11वें में चन्द्र vs. लाभेश से युक्त चन्द्र।

19.15
लग्नेशोऽतिबली दृष्टः केन्द्रसंस्थैः शुभग्रहैः।
धनैः सर्वगुणैः सार्धं दीर्घमायुः प्रयच्छति
lagneśo'tibalī dṛṣṭaḥ kendrasaṃsthaiḥ śubhagrahaiḥ|
dhanaiḥ sarvaguṇaiḥ sārdhaṃ dīrghamāyuḥ prayacchati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशः = लग्न (D1-उदित राशि) का स्वामी; अतिबली = अत्यन्त बलवान (स्थान/दृष्टि/योग से उन्नत); दृष्टः = दृष्ट (शुभग्रहों द्वारा दृष्टि-प्राप्त); केन्द्रसंस्थैः = केन्द्र-स्थित (1, 4, 7, 10 भाव) ग्रहैः; शुभग्रहैः = शुभ ग्रह (जैसे गुरु, शुक्र, तथा बलवान बुध/चन्द्र—शास्त्र-परम्परा के अनुसार); धनैः = धन/ऐश्वर्य से; सर्वगुणैः = समस्त गुणों से; सार्धम् = सहित; दीर्घमायुः = दीर्घ आयु; प्रयच्छति = प्रदान करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब लग्न का स्वामी स्वयं अत्यन्त बलवान हो और उसे केन्द्रों में बैठे शुभ ग्रह देख रहे हों, तब वह जातक को धन तथा समस्त गुणों के साथ दीर्घ आयु का फल देता है। यहाँ बल और शुभ-दृष्टि दोनों शर्तें जुड़ी हैं; केवल लग्नेश का नाम पर्याप्त नहीं। यह अष्टम-आयुर्भाव-फल की पंक्ति में लग्न-स्वामी की भूमिका का स्पष्ट कथन है।

English rendering The text states that when the lagna-lord is exceedingly strong and is aspected by benefics placed in the angular houses (kendras), he bestows long life together with wealth and all good qualities. Strength of the lagna-lord and benefic aspect from kendras are the two conditions named.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्नेश-बल + केन्द्र-शुभ-दृष्टि → दीर्घायु/धन/गुण)। “अतिबली” यहाँ षड्बल-तालिका का संख्या-सूत्र नहीं खोलता; यह शास्त्र का गुणात्मक बल-निर्देश है। केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10 (D1 में, घोषित भाव-गणना-परम्परा के अनुसार)।

अध्यायः 20

भाग्यभावफलाध्यायः

32 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 19 का पाठ दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (32 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated the text of chapter 19; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (32 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

20.1
अथ भाग्यभावं विप्र फलं वक्ष्ये तवाऽग्रतः ।
सबलो भाग्यपे भाग्ये जातो भाग्ययुतो भवेत्
atha bhāgyabhāvaṃ vipra phalaṃ vakṣye tavā'grataḥ |
sabalo bhāgyape bhāgye jāto bhāgyayuto bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; भाग्यभावम् = भाग्य (नवम) भाव का; विप्र = हे विप्र; फलं वक्ष्ये = फल कहूँगा; तव अग्रतः = तुम्हारे सम्मुख; सबले भाग्यपे = बलवान् नवमेश के; भाग्ये = नवम में (होने पर); जातः = जातक; भाग्ययुतः भवेत् = भाग्यशाली होता है।

हिन्दी भावार्थ पराशर भाग्य-भाव-फल का अध्याय आरम्भ करते हैं — बलवान् नवमेश नवम में हो तो जातक भाग्यशाली होता है। अध्याय नवमेश के बल, पिता (नवम = पितृ-भाव) और भाग्य-वर्ष के कथन देगा।

English rendering "Now, O vipra, I speak before you the results of the house of fortune: with a strong ninth lord in the ninth, the native is endowed with fortune."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना + फल-कथन। शर्त: बली(9L) ∧ 9L ∈ भाव 9।

20.2
भाग्यस्थानगते जीवे यदीशे केन्द्रसंस्थिते ।
लग्नेशे बलसंयुक्ते बहुभाग्ययुतो भवेत्
bhāgyasthānagate jīve yadīśe kendrasaṃsthite |
lagneśe balasaṃyukte bahubhāgyayuto bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यस्थानगते जीवे = गुरु नवम में; यदीशे केन्द्रसंस्थिते = यदि (नवम का) स्वामी केन्द्र में; लग्नेशे बलसंयुक्ते = लग्नेश बल-युक्त; बहुभाग्ययुतः भवेत् = बहुत भाग्य से युक्त होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु नवम में हो, नवमेश केन्द्र में हो और लग्नेश बलवान् हो, तो जातक बहु-भाग्य-युक्त होता है। भाग्य-कारक गुरु की नवम-स्थिति + स्वामी का केन्द्र-बल।

English rendering With Jupiter in the ninth, its lord in a kendra and the lagna lord strong, the native, says the text, is greatly fortunate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: Ju ∈ भाव 9 ∧ 9L ∈ {1, 4, 7, 10} ∧ बली(AL)।

20.3
भाग्येशे बलसंयुक्ते भाग्ये भृगुसमन्विते ।
लग्नात् केन्द्रगते जीवे पिता भाग्यसमन्वितः
bhāgyeśe balasaṃyukte bhāgye bhṛgusamanvite |
lagnāt kendragate jīve pitā bhāgyasamanvitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे बलसंयुक्ते = नवमेश बल-युक्त; भाग्ये भृगुसमन्विते = नवम में शुक्र; लग्नात् केन्द्रगते जीवे = गुरु लग्न से केन्द्र में; पिता भाग्यसमन्वितः = पिता भाग्यशाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नवमेश बलवान् हो, शुक्र नवम में हो और गुरु लग्न से केन्द्र में हो, तो पिता भाग्यशाली होता है। यहाँ फल जातक का नहीं, पिता का है — नवम पितृ-भाव है।

English rendering With a strong ninth lord, Venus in the ninth and Jupiter in a kendra from the lagna, the father, says the text, is fortunate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृ-विषयक)। शर्त: बली(9L) ∧ Ve ∈ भाव 9 ∧ Ju ∈ {1, 4, 7, 10}।

20.4
भाग्यस्थानाद् द्वितीये वा सुखे भौमसमन्विते ।
भाग्येशे नीचराशिस्थे पिता निर्धन एव हि
bhāgyasthānād dvitīye vā sukhe bhaumasamanvite |
bhāgyeśe nīcarāśisthe pitā nirdhana eva hi
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यस्थानात् द्वितीये वा = नवम से द्वितीय (= दशम) में अथवा; सुखे = चतुर्थ में; भौमसमन्विते = मंगल के होने पर; भाग्येशे नीचराशिस्थे = नवमेश नीच राशि में; पिता निर्धनः एव हि = पिता निर्धन ही होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मंगल नवम से द्वितीय (दशम) में या चतुर्थ में हो और नवमेश नीच में हो, तो पिता निर्धन होता है। "भाग्यात् द्वितीय" की गिनती दशम पर आती है।

English rendering With Mars second from the ninth (in the tenth) or in the fourth, and the ninth lord debilitated, the father, says the text, is poor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 9 से 2रा = 10। शर्त: Ma ∈ {10, 4} ∧ नीच(9L)।

20.5
भाग्येशे परमोच्चस्थे भाग्यांशे जीवसंयुते ।
लग्नाच्चतुष्टये शुक्रे तत्पिता दीर्घजीवनः
bhāgyeśe paramoccasthe bhāgyāṃśe jīvasaṃyute |
lagnāccatuṣṭaye śukre tatpitā dīrghajīvanaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे परमोच्चस्थे = नवमेश परमोच्च में; भाग्यांशे जीवसंयुते = नवम के नवांश में गुरु के साथ; लग्नात् चतुष्टये शुक्रे = शुक्र लग्न से केन्द्र (चतुष्टय) में; तत्पिता दीर्घजीवनः = उसका पिता दीर्घजीवी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नवमेश परमोच्च में हो, नवम के नवांश में गुरु के साथ हो, और शुक्र लग्न से केन्द्र में हो, तो पिता दीर्घजीवी होता है। "चतुष्टय" = केन्द्र-चतुष्क।

English rendering With the ninth lord in deep exaltation, joined by Jupiter in the navāṃśa of the ninth, and Venus in a kendra from the lagna, the father, says the text, is long-lived.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: परमोच्च(9L) ∧ Ju ∈ D9-राशि(भाव 9) ∧ Ve ∈ {1, 4, 7, 10}। परमोच्च-बिन्दु: Su मेष 10°, Mo वृषभ 3°, Ma मकर 28°, Me कन्या 15°, Ju कर्क 5°, Ve मीन 27°, Sa तुला 20°।

20.6
भाग्येशे केन्द्रभावस्थे गुरुणा च निरीक्षिते ।
तत्पिता वाहनैर्युक्तो राजा वा तत्समो भवेत्
bhāgyeśe kendrabhāvasthe guruṇā ca nirīkṣite |
tatpitā vāhanairyukto rājā vā tatsamo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे केन्द्रभावस्थे = नवमेश केन्द्र में; गुरुणा च निरीक्षिते = और गुरु से दृष्ट; तत्पिता = उसका पिता; वाहनैः युक्तः = वाहनों से युक्त; राजा वा तत्समः भवेत् = राजा अथवा राजा के समान होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नवमेश केन्द्र में गुरु-दृष्ट हो, तो पिता वाहन-सम्पन्न, राजा या राज-तुल्य होता है।

English rendering With the ninth lord in a kendra aspected by Jupiter, the father has vehicles and is a king or the equal of one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 9L ∈ {1, 4, 7, 10} ∧ Ju ∈ दृष्टि(9L)।

20.7
भाग्येशे कर्मभावस्थे कर्मेशे भाग्यराशिगे ।
शुभदृष्टे धनाढ्यश्च कीर्तिमांस्तत्पिता भवेत्
bhāgyeśe karmabhāvasthe karmeśe bhāgyarāśige |
śubhadṛṣṭe dhanāḍhyaśca kīrtimāṃstatpitā bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे कर्मभावस्थे = नवमेश दशम में; कर्मेशे भाग्यराशिगे = दशमेश नवम में; शुभदृष्टे = शुभ-दृष्ट; धनाढ्यः च कीर्तिमान् = धनाढ्य और कीर्तिमान्; तत्पिता भवेत् = उसका पिता होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नवमेश दशम में और दशमेश नवम में (परिवर्तन) हो, शुभ-दृष्ट हो, तो पिता धनाढ्य और कीर्तिमान् होता है। धर्म-कर्म का परिवर्तन-योग यहाँ पिता के फल में।

English rendering With the ninth lord in the tenth and the tenth lord in the ninth, aspected by benefics, the father is wealthy and renowned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 9L ∈ भाव 10 ∧ 10L ∈ भाव 9 (परिवर्तन) ∧ शुभ-दृष्टि।

20.8
परमोच्चांशगे सूर्ये भाग्येशे लाभसंस्थिते ।
धर्मिष्ठो नृपवात्सल्यः पितृभक्तो भवेन्नरः
paramoccāṃśage sūrye bhāgyeśe lābhasaṃsthite |
dharmiṣṭho nṛpavātsalyaḥ pitṛbhakto bhavennaraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमोच्चांशगे सूर्ये = सूर्य परमोच्च-नवांश में; भाग्येशे लाभसंस्थिते = नवमेश एकादश में; धर्मिष्ठः = धर्मनिष्ठ; नृपवात्सल्यः = राजा का वात्सल्य पाने वाला; पितृभक्तः भवेत् नरः = पितृभक्त होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य परमोच्च नवांश में और नवमेश एकादश में हो, तो जातक धर्मनिष्ठ, राज-प्रिय और पितृभक्त होता है। सूर्य (पितृ-कारक) का उच्च-वर्ग-बल पितृभक्ति का सूचक कहा गया है।

English rendering With the Sun in its deep-exaltation navāṃśa and the ninth lord in the eleventh, the man is righteous, cherished by the king, and devoted to his father.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमोच्च-नवांश: सूर्य का उच्च मेष 10° ठीक नवांश-सीमा पर है — 6°40′–10° तृतीय नवांश (मिथुन-अंश), 10°–13°20′ चतुर्थ (कर्क-अंश); ग्रन्थ केवल "परमोच्चांश" कहता है, अतः कौन-सा अंश लिया जाए यह घोषित परिपाटी है (कुछ परम्पराएँ "उच्च-नवांश" = मेष-अंश लेती हैं)। शर्त: D9-राशि(Su) = वह घोषित अंश ∧ 9L ∈ भाव 11।

20.9
लग्नात्त्रिकोणगे सूर्ये भाग्येशे सप्तमस्थिते ।
गुरुणा सहिते दृष्टे पितृभक्तिसमन्वितः
lagnāttrikoṇage sūrye bhāgyeśe saptamasthite |
guruṇā sahite dṛṣṭe pitṛbhaktisamanvitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् त्रिकोणगे सूर्ये = सूर्य लग्न से त्रिकोण में; भाग्येशे सप्तमस्थिते = नवमेश सप्तम में; गुरुणा सहिते दृष्टे = गुरु से युक्त या दृष्ट; पितृभक्तिसमन्वितः = पितृभक्ति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य लग्न से त्रिकोण में, नवमेश सप्तम में, गुरु से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक पितृभक्त होता है।

English rendering With the Sun in a trikoṇa from the lagna and the ninth lord in the seventh, joined or aspected by Jupiter, the native is devoted to his father.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: Su ∈ {1, 5, 9} ∧ 9L ∈ भाव 7 ∧ Ju ∈ (युति ∪ दृष्टि)।

20.10
भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे ।
द्वात्रिंशात्परतो भाग्यं वाहनं कीर्तिसम्भवः
bhāgyeśe dhanabhāvasthe dhaneśe bhāgyarāśige |
dvātriṃśātparato bhāgyaṃ vāhanaṃ kīrtisambhavaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे धनभावस्थे = नवमेश द्वितीय में; धनेशे भाग्यराशिगे = द्वितीयेश नवम में; द्वात्रिंशात् परतः = बत्तीस (वर्ष) के बाद; भाग्यम् = भाग्य; वाहनम् = वाहन; कीर्तिसम्भवः = कीर्ति की उत्पत्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नवमेश द्वितीय में और द्वितीयेश नवम में (परिवर्तन) हो, तो बत्तीस वर्ष के बाद भाग्य, वाहन और कीर्ति। समय-सीमा "परतः" = उसके उपरान्त।

English rendering With the ninth lord in the second and the second lord in the ninth, fortune, vehicles and fame arise after the thirty-second year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वात्रिंश = 32; "परतः" = > 32)। शर्त: 9L ∈ भाव 2 ∧ 2L ∈ भाव 9 (परिवर्तन)।

20.11
लग्नेशे भाग्यराशिस्थे षष्ठेशेन समन्विते ।
अन्योन्यवैरं ब्रुवते जनकः कुत्सितो भवेत्
lagneśe bhāgyarāśisthe ṣaṣṭheśena samanvite |
anyonyavairaṃ bruvate janakaḥ kutsito bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे भाग्यराशिस्थे = लग्नेश नवम में; षष्ठेशेन समन्विते = षष्ठेश से युक्त; अन्योन्यवैरम् = परस्पर वैर (पिता-पुत्र में); ब्रुवते = कहते हैं; जनकः कुत्सितः भवेत् = पिता निन्दित/हीन होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश नवम में षष्ठेश (शत्रु-भावेश) से युक्त हो, तो पिता-पुत्र में परस्पर वैर कहा जाता है और पिता निन्दित होता है। लग्न (स्वयं) और नवम (पिता) के बीच षष्ठेश — वैर का कारक।

English rendering With the lagna lord in the ninth joined by the sixth lord, mutual enmity (between father and son) is declared, and the father is held in low esteem.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: AL ∈ भाव 9 ∧ 6L ∈ युति(AL)।

20.12
कर्माधिपेन सहितो विक्रमेशोऽपि निर्बलः ।
भाग्यपो नीचमूढस्थो योगो भिक्षाशनप्रदः
karmādhipena sahito vikrameśo'pi nirbalaḥ |
bhāgyapo nīcamūḍhastho yogo bhikṣāśanapradaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्माधिपेन सहितः = दशमेश के साथ; विक्रमेशः अपि निर्बलः = तृतीयेश भी निर्बल; भाग्यपः नीचमूढस्थः = नवमेश नीच या अस्त (मूढ) में; योगः भिक्षाशनप्रदः = (यह) योग भिक्षा-भोजन देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तृतीयेश दशमेश के साथ हो पर निर्बल हो, और नवमेश नीच या अस्त हो, तो यह योग भिक्षा से जीवन-निर्वाह देने वाला कहा गया है। "मूढ" = अस्त (सूर्य-सान्निध्य से)।

English rendering With the third lord weak and joined by the tenth lord, and the ninth lord debilitated or combust, the yoga, says the text, gives a life of begging.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 10L ∈ युति(3L) ∧ निर्बल(3L) ∧ (नीच(9L) ∨ अस्त(9L))। अस्त-सीमा (ग्रह-सूर्य अन्तर) घोषित करें।

20.13
षष्ठाष्टमव्यये भानू रन्ध्रेशे भाग्यसंयुते ।
व्ययेशे लग्नराशिस्थे षष्ठेशे पञ्चमे स्थिते
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye bhānū randhreśe bhāgyasaṃyute |
vyayeśe lagnarāśisthe ṣaṣṭheśe pañcame sthite
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाष्टमव्यये भानौ = सूर्य षष्ठ, अष्टम या द्वादश में; रन्ध्रेशे भाग्यसंयुते = अष्टमेश नवमेश से युक्त (या नवम में); व्ययेशे लग्नराशिस्थे = द्वादशेश लग्न में; षष्ठेशे पञ्चमे स्थिते = षष्ठेश पञ्चम में — (फल 20.14 में: जन्म से पूर्व पिता-मृत्यु)।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से पिता-हानि-वर्ष की श्रृंखला (20.13–20.25) आरम्भ होती है — शर्त-पद: सूर्य त्रिक में, अष्टमेश नवम-युक्त, द्वादशेश लग्न में, षष्ठेश पञ्चम में — जिसका फल 20.14 में "जातक के जन्म से पूर्व पिता-मृत्यु" कहा गया है। ये पाठ के कथन हैं; सूर्य (पितृ-कारक) और नवम की एक साथ पीड़ा उनका आधार।

English rendering With the Sun in the sixth, eighth or twelfth, the eighth lord joined with the ninth, the twelfth lord in the lagna and the sixth lord in the fifth — (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शर्त-पद। शर्त: Su ∈ {6, 8, 12} ∧ 8L ~ 9(L) ∧ 12L ∈ भाव 1 ∧ 6L ∈ भाव 5।

20.14
जातस्य जननात्पूर्वं जनकस्य मृतिर्भवेत् ।
रन्ध्रस्थानगते सूर्ये रन्ध्रेशे भाग्यभावगे
jātasya jananātpūrvaṃ janakasya mṛtirbhavet |
randhrasthānagate sūrye randhreśe bhāgyabhāvage
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जातस्य जननात् पूर्वम् = जातक के जन्म से पहले; जनकस्य मृतिः भवेत् = पिता की मृत्यु होती है; रन्ध्रस्थानगते सूर्ये = सूर्य अष्टम में; रन्ध्रेशे भाग्यभावगे = अष्टमेश नवम में — (फल 20.15 में: प्रथम वर्ष में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.13 की शर्त में) पिता की मृत्यु जातक के जन्म से पूर्व कही गई है। आगे नई शर्त — सूर्य अष्टम में, अष्टमेश नवम में — जिसका फल 20.15 में "प्रथम वर्ष" है। श्रृंखला का प्रत्येक पद पूर्व-शर्त का फल और अगली शर्त रखता है।

English rendering — the father's death occurs before the native's birth; with the Sun in the eighth and the eighth lord in the ninth — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शर्त-पद (कालाङ्क: जन्म-पूर्व)। अगली शर्त: Su ∈ भाव 8 ∧ 8L ∈ भाव 9।

20.15
जातस्य प्रथमाब्दे तु पितुर्मरणमादिशेत् ।
व्ययेशे भाग्यराशिस्थे नीचांशे भाग्यनायके
jātasya prathamābde tu piturmaraṇamādiśet |
vyayeśe bhāgyarāśisthe nīcāṃśe bhāgyanāyake
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जातस्य प्रथमाब्दे तु = जातक के प्रथम वर्ष में; पितुः मरणम् आदिशेत् = पिता का मरण कहे; व्ययेशे भाग्यराशिस्थे = द्वादशेश नवम में; नीचांशे भाग्यनायके = नवमेश नीच-नवांश में — (फल 20.16 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.14 की शर्त में) प्रथम वर्ष में पिता-मरण; और द्वादशेश नवम में, नवमेश नीच-नवांश में हो तो फल 20.16 में (तीसरे या सोलहवें वर्ष)।

English rendering — the father's death is to be declared in the native's first year; with the twelfth lord in the ninth and the ninth lord in its debilitation navāṃśa — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रथम = 1 वर्ष) + शर्त-पद। अगली शर्त: 12L ∈ भाव 9 ∧ D9-राशि(9L) = नीच-राशि(9L)।

20.16
तृतीये षोडशे वर्षे जनकस्य मृतिर्भवेत् ।
लग्नेशे नाशराशिस्थे रन्ध्रेशे भानुसंयुते
tṛtīye ṣoḍaśe varṣe janakasya mṛtirbhavet |
lagneśe nāśarāśisthe randhreśe bhānusaṃyute
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीये षोडशे वर्षे = तीसरे या सोलहवें वर्ष में; जनकस्य मृतिः भवेत् = पिता की मृत्यु; लग्नेशे नाशराशिस्थे = लग्नेश अष्टम में; रन्ध्रेशे भानुसंयुते = अष्टमेश सूर्य से युक्त — (फल 20.17 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.15 की शर्त में) तीसरे या सोलहवें वर्ष में; और लग्नेश अष्टम में, अष्टमेश सूर्य से युक्त हो तो फल 20.17 में (दूसरे या बारहवें वर्ष)।

English rendering — in the third or sixteenth year; with the lagna lord in the eighth and the eighth lord joined by the Sun — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीय = 3, षोडश = 16)। अगली शर्त: AL ∈ भाव 8 ∧ Su ∈ युति(8L)।

20.17
द्वितीये द्वादशे वर्षे पितुर्मरणमादिशेत् ।
भाग्याद्रन्ध्रगते राहौ भाग्याद्भाग्यगते रवौ
dvitīye dvādaśe varṣe piturmaraṇamādiśet |
bhāgyādrandhragate rāhau bhāgyādbhāgyagate ravau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये द्वादशे वर्षे = दूसरे या बारहवें वर्ष में; पितुः मरणम् आदिशेत्; भाग्यात् रन्ध्रगते राहौ = नवम से अष्टम (= चतुर्थ) में राहु; भाग्यात् भाग्यगते रवौ = नवम से नवम (= पञ्चम) में सूर्य — (फल 20.18 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.16 की शर्त में) दूसरे या बारहवें वर्ष में; और राहु नवम से अष्टम (चतुर्थ) में, सूर्य नवम से नवम (पञ्चम) में हो तो फल 20.18 में। भाव-गणना: 9 + 7 = 16 ≡ 4; 9 + 8 = 17 ≡ 5।

English rendering — in the second or twelfth year; with Rāhu eighth from the ninth (in the fourth) and the Sun ninth from the ninth (in the fifth) — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 9 से 8वाँ = (9 + 7 − 1) mod 12 + 1 = 4; 9 से 9वाँ = 5। अङ्क: द्वितीय = 2, द्वादश = 12। अगली शर्त: Ra ∈ भाव 4 ∧ Su ∈ भाव 5।

20.18
षोडशेऽष्टादशे वर्षे जनकस्य मृतिर्भवेत् ।
राहुणा सहिते सूर्ये चन्द्राद्भाग्यगते शनौ
ṣoḍaśe'ṣṭādaśe varṣe janakasya mṛtirbhavet |
rāhuṇā sahite sūrye candrādbhāgyagate śanau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षोडशे अष्टादशे वर्षे = सोलहवें या अठारहवें वर्ष में; जनकस्य मृतिः भवेत्; राहुणा सहिते सूर्ये = सूर्य राहु के साथ; चन्द्रात् भाग्यगते शनौ = चन्द्र से नवम में शनि — (फल 20.19 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.17 की शर्त में) सोलहवें या अठारहवें वर्ष में; और सूर्य राहु के साथ, शनि चन्द्र से नवम में हो तो फल 20.19 में (सातवें या उन्नीसवें वर्ष)।

English rendering — in the sixteenth or eighteenth year; with the Sun joined by Rāhu and Saturn ninth from the Moon — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (षोडश = 16, अष्टादश = 18)। अगली शर्त: Ra ∈ युति(Su) ∧ Sa ∈ (Mo + 8 राशि)।

20.19
सप्तमैकोनविंशाब्दे तातस्य मरणं ध्रुवम् ।
भाग्येशे व्ययराशिस्थे व्ययेशे भाग्यराशिगे
saptamaikonaviṃśābde tātasya maraṇaṃ dhruvam |
bhāgyeśe vyayarāśisthe vyayeśe bhāgyarāśige
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमैकोनविंशाब्दे = सातवें या उन्नीसवें वर्ष में; तातस्य मरणं ध्रुवम् = पिता का मरण निश्चित (पाठ का बल-शब्द); भाग्येशे व्ययराशिस्थे = नवमेश द्वादश में; व्ययेशे भाग्यराशिगे = द्वादशेश नवम में — (फल 20.20 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.18 की शर्त में) सातवें या उन्नीसवें वर्ष में पिता-मरण, "ध्रुवम्"; और नवमेश-द्वादशेश का परिवर्तन हो तो फल 20.20 में (चौवालीसवें वर्ष)। "ध्रुवम्" ग्रन्थ का आग्रह है, निर्णय का प्रमाण नहीं।

English rendering — in the seventh or nineteenth year, the father's death, "certainly"; with the ninth lord in the twelfth and the twelfth lord in the ninth — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम = 7, एकोनविंश = 19)। अगली शर्त: 9L ∈ भाव 12 ∧ 12L ∈ भाव 9 (परिवर्तन)।

20.20
वदाब्धिमितवर्षाच्च पितुर्मरणमादिशेत् ।
रव्यंशे च स्थिते चन्द्रे लग्नेशे रन्ध्रसंयुते
vadābdhimitavarṣācca piturmaraṇamādiśet |
ravyaṃśe ca sthite candre lagneśe randhrasaṃyute
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वेदाब्धिमितवर्षात् (पाठ "वदाब्धि" — पाठ-भेद संभव) = वेद (4) + अब्धि (4) = 44 वर्ष से; पितुः मरणम् आदिशेत्; रव्यंशे च स्थिते चन्द्रे = चन्द्र सूर्य के नवांश (सिंहांश) में; लग्नेशे रन्ध्रसंयुते = लग्नेश अष्टम में — (फल 20.21 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.19 की शर्त में) चौवालीसवें वर्ष में पिता-मरण; और चन्द्र सूर्य के नवांश में, लग्नेश अष्टम में हो तो फल 20.21 में (पैंतीसवें या इकतालीसवें)। "वेदाब्धि" भूतसंख्या दाएँ-से-बाएँ: वेद = 4 (इकाई), अब्धि = 4 (दहाई) → 44।

English rendering — from the forty-fourth year ("veda-abdhi" = 44); with the Moon in the Sun's navāṃśa and the lagna lord joined with the eighth — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: वेद = 4, अब्धि = 4 → "44" (अङ्कानां वामतो गतिः)। अगली शर्त: D9-राशि(Mo) = सिंह ∧ AL ∈ भाव 8।

20.21
पञ्चत्रिंशैकचत्वारिंशद्वर्षे मरणं पितुः ।
पितृस्थानाधिपे सूर्ये मन्दभौमसमन्विते
pañcatriṃśaikacatvāriṃśadvarṣe maraṇaṃ pituḥ |
pitṛsthānādhipe sūrye mandabhaumasamanvite
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चत्रिंश-एकचत्वारिंशत्-वर्षे = पैंतीसवें या इकतालीसवें वर्ष में; मरणं पितुः; पितृस्थानाधिपे सूर्ये = सूर्य नवमेश होकर; मन्दभौमसमन्विते = शनि-मंगल से युक्त — (फल 20.22 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.20 की शर्त में) पैंतीसवें या इकतालीसवें वर्ष में; और सूर्य नवमेश होकर शनि-मंगल से युक्त हो तो फल 20.22 में (पचासवें वर्ष)। सूर्य नवमेश ⇒ नवम = सिंह ⇒ लग्न = धनु।

English rendering — in the thirty-fifth or forty-first year; with the Sun as lord of the ninth joined by Saturn and Mars — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अङ्क: पञ्चत्रिंश = 35, एकचत्वारिंश = 41। व्युत्पत्ति: 9L = Su ⇒ राशि(भाव 9) = सिंह ⇒ लग्न = धनु। अगली शर्त: {Sa, Ma} ⊂ युति(Su)।

20.22
पञ्चाशद्वत्सरे प्राप्ते जनकस्य मृतिर्भवेत् ।
भाग्यात् सप्तमगे सूर्ये भ्रातृसप्तमगस्तमः
pañcāśadvatsare prāpte janakasya mṛtirbhavet |
bhāgyāt saptamage sūrye bhrātṛsaptamagastamaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चाशद्वत्सरे प्राप्ते = पचासवाँ वर्ष आने पर; जनकस्य मृतिः भवेत्; भाग्यात् सप्तमगे सूर्ये = नवम से सप्तम (= तृतीय) में सूर्य; भ्रातृसप्तमगः तमः = तृतीय से सप्तम (= नवम) में तम (राहु) — (फल 20.23 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.21 की शर्त में) पचासवें वर्ष में; और सूर्य नवम से सप्तम (तृतीय) में, राहु तृतीय से सप्तम (नवम) में हो तो फल 20.23 में (छठे या पच्चीसवें वर्ष)। "तम" = राहु।

English rendering — in the fiftieth year; with the Sun seventh from the ninth (in the third) and Tamas (Rāhu) seventh from the third (in the ninth) — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 9 + 6 = 15 ≡ 3; 3 + 6 = 9। अङ्क: पञ्चाशत् = 50। अगली शर्त: Su ∈ भाव 3 ∧ Ra ∈ भाव 9।

20.23
षष्ठेऽब्दे पञ्चविंशाब्दे पितुर्मरणमादिशेत् ।
रन्ध्रजामित्रगे मन्दे मन्दाज्जामित्रगे रवौ
ṣaṣṭhe'bde pañcaviṃśābde piturmaraṇamādiśet |
randhrajāmitrage mande mandājjāmitrage ravau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे अब्दे पञ्चविंशाब्दे = छठे या पच्चीसवें वर्ष में; पितुः मरणम् आदिशेत्; रन्ध्रजामित्रगे मन्दे = अष्टम से सप्तम (= द्वितीय) में शनि; मन्दात् जामित्रगे रवौ = शनि से सप्तम में सूर्य — (फल 20.24 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.22 की शर्त में) छठे या पच्चीसवें वर्ष में; और शनि अष्टम से सप्तम (द्वितीय) में, सूर्य शनि से सप्तम (अष्टम) में हो तो फल 20.24 में।

English rendering — in the sixth or twenty-fifth year; with Saturn seventh from the eighth (in the second) and the Sun seventh from Saturn — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 8 + 6 = 14 ≡ 2 (शनि); 2 + 6 = 8 (सूर्य)। अङ्क: षष्ठ = 6, पञ्चविंश = 25। अगली शर्त: Sa ∈ भाव 2 ∧ Su ∈ भाव 8।

20.24
त्रिंशैकविंशे षड्विंशे जनकस्य मृतिर्भवेत् ।
भाग्येशे नीचराशिस्थे तदीशे भाग्यराशिगे
triṃśaikaviṃśe ṣaḍviṃśe janakasya mṛtirbhavet |
bhāgyeśe nīcarāśisthe tadīśe bhāgyarāśige
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंशैकविंशे षड्विंशे = तीसवें, इक्कीसवें या छब्बीसवें (वर्ष में); जनकस्य मृतिः भवेत्; भाग्येशे नीचराशिस्थे = नवमेश नीच में; तदीशे भाग्यराशिगे = उस (नीच) राशि का स्वामी नवम में — (फल 20.25 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.23 की शर्त में) तीसवें, इक्कीसवें या छब्बीसवें वर्ष में; और नवमेश नीच में, उस नीच राशि का स्वामी नवम में हो तो फल 20.25 में (छब्बीसवें या तैंतीसवें)।

English rendering — in the thirtieth, twenty-first or twenty-sixth year; with the ninth lord debilitated and the lord of that sign in the ninth — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अङ्क: त्रिंश = 30, एकविंश = 21, षड्विंश = 26। अगली शर्त: नीच(9L) ∧ स्वामी(राशि(9L)) ∈ भाव 9।

20.25
षड्विंशेऽब्दे त्रयस्त्रिंशे पितुर्मरणमादिशेत् ।
एवं जातस्य दैवज्ञो फलं ज्ञात्वा विनिर्दिशेत्
ṣaḍviṃśe'bde trayastriṃśe piturmaraṇamādiśet |
evaṃ jātasya daivajño phalaṃ jñātvā vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षड्विंशे अब्दे त्रयस्त्रिंशे = छब्बीसवें या तैंतीसवें वर्ष में; पितुः मरणम् आदिशेत्; एवम् = इस प्रकार; जातस्य = जातक का; दैवज्ञः = दैवज्ञ; फलं ज्ञात्वा विनिर्दिशेत् = फल जानकर कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (20.24 की शर्त में) छब्बीसवें या तैंतीसवें वर्ष में; "इस प्रकार दैवज्ञ फल जानकर कहे" — श्रृंखला का समापन। पिता-हानि-वर्षों की यह सूची पाठ की योग-सूची है; इसका प्रयोग बल-विचार और अरिष्ट-भङ्ग के साथ ही सम्भव है।

English rendering — in the twenty-sixth or thirty-third year; thus, knowing the results for the native, the astrologer should declare them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (षड्विंश = 26, त्रयस्त्रिंश = 33) + समापन-निर्देश।

20.26
परमोच्चांशगे शुक्रे भाग्येशेन समन्विते ।
भ्रातृस्थाने शनियुते बहुभाग्याधिपो भवेत्
paramoccāṃśage śukre bhāgyeśena samanvite |
bhrātṛsthāne śaniyute bahubhāgyādhipo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमोच्चांशगे शुक्रे = शुक्र परमोच्च-नवांश में; भाग्येशेन समन्विते = नवमेश से युक्त; भ्रातृस्थाने शनियुते = तृतीय में शनि; बहुभाग्याधिपः भवेत् = बहु-भाग्य का स्वामी होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र परमोच्च-नवांश में नवमेश के साथ हो और शनि तृतीय में हो, तो जातक बहु-भाग्य का स्वामी होता है। पिता-हानि श्रृंखला के बाद शुभ पद।

English rendering With Venus in its deep-exaltation navāṃśa joined by the ninth lord, and Saturn in the third, the native is lord of great fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमोच्च-नवांश (शुक्र): उच्च मीन 27° → मीन का नवाँ नवांश (26°40′–30°); मीन द्विस्वभाव है, नवांश-गणना कर्क से आरम्भ → नवाँ = मीन-अंश (वर्गोत्तम)। शर्त: D9-राशि(Ve) = मीन ∧ 9L ∈ युति(Ve) ∧ Sa ∈ भाव 3।

20.27
गुरुणा संयुते भाग्ये तदीशे केन्द्रराशिगे ।
विंशद्वर्षात् परं चैव बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्
guruṇā saṃyute bhāgye tadīśe kendrarāśige |
viṃśadvarṣāt paraṃ caiva bahubhāgyaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुणा संयुते भाग्ये = नवम गुरु से युक्त; तदीशे केन्द्रराशिगे = नवमेश केन्द्र में; विंशद्वर्षात् परं च एव = बीस वर्ष के बाद; बहुभाग्यं विनिर्दिशेत् = बहुत भाग्य कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु नवम में हो और नवमेश केन्द्र में हो, तो बीस वर्ष के बाद बहुत भाग्य।

English rendering With Jupiter in the ninth and its lord in a kendra, great fortune is indicated after the twentieth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विंशत् = 20; "परम्" = > 20)। शर्त: Ju ∈ भाव 9 ∧ 9L ∈ {1, 4, 7, 10}।

20.28
परमोच्चांशगे सौम्ये भाग्येशे भाग्यराशिगे ।
षट्त्रिंशाच्च परं चैव बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्
paramoccāṃśage saumye bhāgyeśe bhāgyarāśige |
ṣaṭtriṃśācca paraṃ caiva bahubhāgyaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमोच्चांशगे सौम्ये = बुध परमोच्च-नवांश में; भाग्येशे भाग्यराशिगे = नवमेश नवम में; षट्त्रिंशात् च परं च एव = छत्तीस (वर्ष) के बाद; बहुभाग्यं विनिर्दिशेत्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बुध परमोच्च-नवांश में हो और नवमेश नवम में हो, तो छत्तीस वर्ष के बाद बहुत भाग्य।

English rendering With Mercury in its deep-exaltation navāṃśa and the ninth lord in the ninth, great fortune is indicated after the thirty-sixth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमोच्च-नवांश (बुध): उच्च कन्या 15° → कन्या का पाँचवाँ नवांश (13°20′–16°40′); कन्या द्विस्वभाव है, नवांश-गणना मकर से आरम्भ → मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृषभ → पाँचवाँ = वृषभ-अंश। शर्त: D9-राशि(Me) = वृषभ ∧ 9L ∈ भाव 9। अङ्क: षट्त्रिंश = 36।

20.29
लग्नेशे भाग्यराशिस्थे भाग्येशे लग्नसंयुते ।
गुरुणा संयुते द्यूने धनवाहनलाभकृत्
lagneśe bhāgyarāśisthe bhāgyeśe lagnasaṃyute |
guruṇā saṃyute dyūne dhanavāhanalābhakṛt
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे भाग्यराशिस्थे = लग्नेश नवम में; भाग्येशे लग्नसंयुते = नवमेश लग्न में; गुरुणा संयुते द्यूने = सप्तम गुरु से युक्त; धनवाहनलाभकृत् = धन और वाहन का लाभ करने वाला (योग)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश नवम में और नवमेश लग्न में (परिवर्तन) हो, गुरु सप्तम में हो, तो यह योग धन-वाहन-लाभ करता है।

English rendering With the lagna lord in the ninth, the ninth lord in the lagna, and Jupiter in the seventh, the yoga brings wealth and vehicles.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: AL ∈ भाव 9 ∧ 9L ∈ भाव 1 (परिवर्तन) ∧ Ju ∈ भाव 7।

20.30
भाग्याद्भाग्यवतो राहुस्तदीशे निधनं गते ।
भाग्येशे नीचराशिस्थे भाग्यहीनो भवेन्नरः
bhāgyādbhāgyavato rāhustadīśe nidhanaṃ gate |
bhāgyeśe nīcarāśisthe bhāgyahīno bhavennaraḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यात् भाग्यगतः राहुः = राहु नवम से नवम (= पञ्चम) में; तदीशे निधनं गते = उसका (पञ्चम का) स्वामी अष्टम में; भाग्येशे नीचराशिस्थे = नवमेश नीच में; भाग्यहीनः भवेत् नरः = मनुष्य भाग्यहीन होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु नवम से नवम (पञ्चम) में, उसका स्वामी अष्टम में और नवमेश नीच में हो, तो जातक भाग्यहीन होता है।

English rendering With Rāhu ninth from the ninth (in the fifth), that house's lord in the eighth, and the ninth lord debilitated, the man is without fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 9 से 9वाँ = 5। शर्त: Ra ∈ भाव 5 ∧ 5L ∈ भाव 8 ∧ नीच(9L)।

20.31
भाग्यस्थानगते मन्दे शशिना च समन्विते ।
लग्नेशे नीचराशिस्थे भिक्षाशी च नरो भवेत्
bhāgyasthānagate mande śaśinā ca samanvite |
lagneśe nīcarāśisthe bhikṣāśī ca naro bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यस्थानगते मन्दे = शनि नवम में; शशिना च समन्विते = चन्द्र के साथ; लग्नेशे नीचराशिस्थे = लग्नेश नीच में; भिक्षाशी च नरः भवेत् = मनुष्य भिक्षा-भोजी होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शनि चन्द्र के साथ नवम में हो और लग्नेश नीच में हो, तो जातक भिक्षा से जीवन चलाने वाला होता है। 20.12 का समानान्तर पद।

English rendering With Saturn in the ninth together with the Moon and the lagna lord debilitated, the man, says the text, lives by alms.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: {Sa, Mo} ⊂ भाव 9 ∧ नीच(AL)।

20.32
एवं भाग्यफलं विप्र सङ्क्षेपात् कथितं मया ।
लग्नेशभाग्यभावेशस्थित्याऽन्यदपि निर्दिशेत्
evaṃ bhāgyaphalaṃ vipra saṅkṣepāt kathitaṃ mayā |
lagneśabhāgyabhāveśasthityā'nyadapi nirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; भाग्यफलम् = भाग्य-भाव का फल; विप्र = हे विप्र; सङ्क्षेपात् कथितं मया = मैंने संक्षेप से कहा; लग्नेश-भाग्यभावेश-स्थित्या = लग्नेश और नवमेश की स्थिति से; अन्यत् अपि निर्दिशेत् = अन्य (फल) भी कहे।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का समापन — पराशर कहते हैं कि भाग्य-भाव का फल संक्षेप में कहा गया; लग्नेश और नवमेश की स्थिति से अन्य फल भी निर्दिष्ट करें। पद्धति-सूत्र: दो भावेशों की परस्पर स्थिति ही विस्तार का आधार।

English rendering "Thus, O vipra, the results of the house of fortune have been told in brief; from the positions of the lagna lord and the ninth lord one should indicate the rest as well."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — समापन-निर्देश (विस्तार-नियम: AL × 9L स्थिति-युग्म)।

अध्यायः 21

कर्मभावफलाध्यायः

22 श्लोक
21.1
कर्मभावफलं चाऽथ कथयामि तवाग्रतः।
सृणु मैत्रेय तत्त्वेन ब्रह्मगर्गादिभाषितम्‌
karmabhāvaphalaṃ cā'tha kathayāmi tavāgrataḥ|
sṛṇu maitreya tattvena brahmagargādibhāṣitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्म-भाव-फलम् = दशम भाव (कर्म-स्थान) का फल; चाऽथ = और अब; कथयामि = कहता हूँ; तव अग्रतः = तुम्हारे समक्ष; सृणु = सुनो; मैत्रेय = हे मैत्रेय; तत्त्वेन = तत्त्व से / यथार्थ रूप में; ब्रह्म-गर्ग-आदि-भाषितम् = ब्रह्मा, गर्ग आदि द्वारा कथित।

हिन्दी भावार्थ महर्षि पराशर शिष्य मैत्रेय से कहते हैं कि अब कर्मभाव—अर्थात् दशम भाव—के फल का वर्णन तुम्हारे सामने किया जाएगा। वे आग्रह करते हैं कि इसे तत्त्व की दृष्टि से सुनो; यह कथन ब्रह्मा, गर्ग और अन्य आचार्यों की परंपरा से जुड़ा बताया गया है। अध्याय का द्वार इस प्रकार खुलता है—फल का आधार भाव-स्थान और उसके स्वामी की दशा है, न कि स्वेच्छाचार।

English rendering Parāśara now sets forth the results of the karma-bhāva (the tenth house) before Maitreya, asking him to listen with true understanding to what is said as spoken by Brahmā, Garga, and the other authorities.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-प्रारंभ / संवाद। यह श्लोक कर्मभाव-फल-अध्याय का उद्घाटन-संवाद है; गणना यहाँ नहीं, विषय-स्थापना है।

21.2
सबले कर्मभावेशे स्वोच्चे स्वांशे स्वराशिगे।
जातस्तातसुखेनाढ्‌यो यशस्वी शुभकर्मकृत्‌
sabale karmabhāveśe svocce svāṃśe svarāśige|
jātastātasukhenāḍh‌yo yaśasvī śubhakarmakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सबले = बलयुक्त; कर्म-भावेशे = दशमेश (कर्मभाव के स्वामी) में/के; स्व-उच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्व-अंशे = अपने अंश (नवांश/D9) में; स्व-राशि-गे = अपनी राशि में स्थित; जातः = जातक; तात-सुखेन आढ्यः = पिता-सुख से समृद्ध; यशस्वी = यशस्वी; शुभ-कर्म-कृत् = शुभ कर्म करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशमेश बलवान हो और स्वोच्च, स्वांश तथा स्वराशि में स्थित हो, तो जातक पिता के सुख से संपन्न, यशस्वी और शुभ कर्मों का कर्ता बताया गया है। यहाँ “बल”, “उच्च”, “स्वांश” और “स्वराशि” एक साथ दशमेश की दृढ़ स्थिति का संकेत देते हैं। फल-कथन भाव-स्वामी की शक्ति और स्थान पर टिका है।

English rendering The text states that when the lord of the karma-bhāva is strong and stands in its exaltation, in its own aṃśa (navāṃśa), and in its own rāśi, the native is said to be rich in a father’s happiness, renowned, and a doer of auspicious deeds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश-बल व स्थान)। “बल”, “उच्च”, “स्वांश”, “स्वराशि” गुणात्मक शर्तें हैं; इस श्लोक में रूप/विरूप या अंश-सूत्र नहीं दिए गए।

21.3
कर्माधिपो बलोनश्चेत्‌ कर्मवैकल्यमादिशेत्‌।
सैहिः केन्द्रत्रिकोणस्थो ज्योतिष्टोमादियागकृत्‌
karmādhipo balonaścet‌ karmavaikalyamādiśet‌|
saihiḥ kendratrikoṇastho jyotiṣṭomādiyāgakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्म-अधिपः = दशमेश; बल-ऊनः चेत् = यदि बलहीन हो; कर्म-वैकल्यम् = कर्म/वृत्ति में विकलता (न्यूनता/दोष); आदिशेत् = निर्देश करे / कहे; सः हि (सैहिः; पाठ-भेद संभव) = वह ही / वह; केन्द्र-त्रिकोण-स्थः = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में स्थित; ज्योतिष्टोम-आदि-याग-कृत् = ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि कर्मभाव का स्वामी बलहीन हो तो कर्म में वैकल्य—वृत्ति, कर्म-निष्ठा या कार्य-सिद्धि में न्यूनता—का निर्देश किया गया है। उसी (दशमेश) के केन्द्र या त्रिकोण में स्थित होने पर जातक ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों का कर्ता बताया गया है। बल-हीनता और केन्द्र-त्रिकोण-स्थिति यहाँ दो अलग फल-सूत्र हैं; दोनों का मेलन पाठ-क्रम से पढ़ना चाहिए। “सैहिः” में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that if the lord of karma is without strength, it indicates impairment or deficiency in karma (work/vocation). When that lord stands in a kendra or trikoṇa, the native is said to perform the Jyotiṣṭoma and similar sacrificial rites. (Reading of सैहिः may vary — पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बल-ऊन vs केन्द्र/त्रिकोण)। केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 1, 5, 9 — यह भाव-स्थान-वर्गीकरण है, संख्यात्मक बल-सूत्र नहीं।

21.4
कर्मेशे शुभसंयुक्ते शुभस्थानगते तथा।
राजद्वारे च वाणिज्ये सदा लाभोऽन्यथान्यथा
karmeśe śubhasaṃyukte śubhasthānagate tathā|
rājadvāre ca vāṇijye sadā lābho'nyathānyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशमेश में/के; शुभ-संयुक्ते = शुभ ग्रह से युक्त; शुभ-स्थान-गते = शुभ स्थान में स्थित; तथा = तथा; राज-द्वारे = राजद्वार / शासकीय प्रवेश में; च वाणिज्ये = और व्यापार में; सदा लाभः = सदा लाभ; अन्यथा अन्यथा = अन्यथा (उसके विपरीत) अन्यथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशमेश शुभ ग्रहों से युक्त हो और शुभ स्थान में भी स्थित हो, तो राजद्वार और वाणिज्य—दोनों क्षेत्रों—में सदा लाभ का कथन है। “अन्यथान्यथा” स्पष्ट उलटा सूत्र है: वे शर्तें न हों तो फल भी उलटा बताया गया है। यहाँ शुभ-योग और शुभ-स्थान दोनों की एक साथ अपेक्षा है।

English rendering The text states that when the lord of karma is conjoined with benefics and also occupies a benefic place, there is said to be constant gain at the royal gate and in commerce; otherwise, the reverse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-योग + शुभ-स्थान → लाभ; अन्यथा विपरीत)। “शुभ” यहाँ पारंपरिक शुभ-ग्रह (गुरु, शुक्र, निर्दोष बुध, बलवान चन्द्र आदि) और शुभ-भाव-स्थान की श्रेणी है—इस श्लोक में संख्यात्मक कट-ऑफ नहीं।

21.5
दशमे पापसंयुक्ते लाभे पापसमन्विते।
दुष्कृतिं लभते मर्त्यः स्वजनानां विदूषकः
daśame pāpasaṃyukte lābhe pāpasamanvite|
duṣkṛtiṃ labhate martyaḥ svajanānāṃ vidūṣakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = दशम भाव में; पाप-संयुक्ते = पाप (क्रूर) ग्रह से युक्त; लाभे = लाभ भाव (एकादश) में; पाप-समन्विते = पाप से युक्त; दुष्कृतिम् = दुष्कर्म / अशुभ कृत्य; लभते = प्राप्त करता है; मर्त्यः = मनुष्य; स्व-जनानाम् = अपने लोगों का; विदूषकः = निन्दक / अपमान करने वाला / उपहासक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशम भाव पाप-ग्रहों से युक्त हो और लाभ (एकादश) भाव भी पाप से समन्वित हो, तो मनुष्य दुष्कृति प्राप्त करता है और अपने स्वजनों का विदूषक—निन्दक या अपमान करने वाला—बताया गया है। यहाँ दो भावों (10 और 11) की एक साथ पाप-युक्ति फल का आधार है। यह शास्त्र का फल-सूत्र है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the tenth is joined by malefics and the eleventh (lābha) is likewise attended by malefics, the mortal is said to fall into ill deeds and to become a defamer or mocker of his own people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम + लाभ दोनों पाप-युक्त)। भाव-युग्म 10–11 की संयुक्त पाप-स्थिति का गुणात्मक नियम; बिन्दु/अंश-गणना नहीं।

21.6
कर्मेशे नाशराशिस्थे राहुणा संयुते तथा।
जनद्वेषी महामूर्खो दुष्कृतिं लभते नरः
karmeśe nāśarāśisthe rāhuṇā saṃyute tathā|
janadveṣī mahāmūrkho duṣkṛtiṃ labhate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशमेश में/के; नाश-राशि-स्थे = नाश-राशि (अष्टम भाव / नाश-स्थान) में स्थित; राहुणा संयुते = राहु से युक्त; तथा = तथा; जन-द्वेषी = लोगों से द्वेष रखने वाला / जन-द्वेष का पात्र; महा-मूर्खः = अत्यन्त मूर्ख; दुष्कृतिम् लभते = दुष्कृति प्राप्त करता है; नरः = नर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशमेश नाश-राशि—अर्थात् अष्टम (नाश) भाव—में स्थित हो और साथ ही राहु से युक्त हो, तो नर जन-द्वेषी, महामूर्ख और दुष्कृति-प्राप्त बताया गया है। यहाँ “नाशराशिस्थ” और “राहु-संयोग” दोनों शर्तें एक साथ फल से जुड़ी हैं। पाठ में नाश-राशि का पारंपरिक भावार्थ अष्टम है; विस्तृत पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when the lord of karma occupies the rāśi of destruction (the eighth) and is also conjoined with Rāhu, the person is said to be hated by people (or a hater of people), a great fool, and one who obtains ill deeds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश अष्टम + राहु-योग)। नाश-राशि = 8वें भाव का स्थान (लग्न से अष्टम); यह भाव-गिनती है, अंकगणितीय सूत्र नहीं।

21.7
कर्मेशे द्यूनराशिस्थे मन्दभौमसमन्विते।
द्यूनेशे पापसंयुते शिश्नोदरपरायणः
karmeśe dyūnarāśisthe mandabhaumasamanvite|
dyūneśe pāpasaṃyute śiśnodaraparāyaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशमेश में/के; द्यून-राशि-स्थे = द्यून-राशि (सप्तम भाव) में स्थित; मन्द-भौम-समन्विते = शनि और मंगल से युक्त; द्यून-ईशे = सप्तमेश में/के; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त; शिश्न-उदर-परायणः = इन्द्रिय-सुख और उदर (भोग-भोजन) में आसक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशमेश सप्तम (द्यून) राशि में स्थित हो और शनि-मंगल से समन्वित हो, तथा सप्तमेश भी पाप-ग्रहों से युक्त हो, तो जातक शिश्नोदर-परायण—इन्द्रिय-भोग और उदर-सुख में आसक्त—बताया गया है। यहाँ दशमेश की सप्तम-स्थिति, क्रूर-द्वय (मन्द-भौम) का योग, और द्यूनेश की पाप-युक्ति—तीन शर्तें एक साथ फल से जुड़ी हैं। यह शास्त्र का वर्णनात्मक फल-सूत्र है; चिकित्सा या नैतिक निंदा के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that when the lord of karma stands in the dyūna-rāśi (the seventh) and is joined by Saturn and Mars, and the lord of the seventh is itself conjoined with malefics, the native is said to be devoted to the pleasures of the genitals and the belly (sensual indulgence and gluttony).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश सप्तम + शनि-मंगल; द्यूनेश पाप-युक्त)। द्यून = सप्तम भाव; मन्द = शनि, भौम = मंगल — स्थान-योग की गुणात्मक शर्तें, संख्यात्मक बल-सूत्र नहीं।

21.8
तुङ्गराशिं समाश्रित्य कर्मेशे गुरुसंयुते।
भाग्येशे कर्मराशिस्थे मानैश्वर्यप्रतापवान्‌
tuṅgarāśiṃ samāśritya karmeśe gurusaṃyute|
bhāgyeśe karmarāśisthe mānaiśvaryapratāpavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुङ्गराशि = उच्च-राशि (ग्रह का स्वोच्च स्थान); समाश्रित्य = आश्रय लेकर / स्थित होकर; कर्मेश = दशम-भाव का स्वामी; गुरुसंयुते = बृहस्पति से युक्त; भाग्येश = नवम-भाव का स्वामी; कर्मराशिस्थ = दशम-राशि/दशम-भाव में स्थित; मानैश्वर्यप्रतापवान् = मान, ऐश्वर्य और प्रताप से सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दशमेश उच्च-राशि में स्थित हो और गुरु से युक्त हो, तथा भाग्येश दशम-भाव में रहे, तब जातक मान, ऐश्वर्य और प्रताप वाला होता है। यहाँ कर्म-स्थान की शक्ति, गुरु-संयोग और भाग्येश की दशम-स्थिति — तीनों को एक साथ देखा गया है। यह दशम-भाव-फल का योग-कथन है, न कि कोई गणना-सूत्र।

English rendering The text states that when the tenth-lord is placed in its exaltation sign and joined with Jupiter, and the ninth-lord occupies the tenth house, the native is endowed with honour, prosperity, and glory.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश-उच्च + गुरु-युति, भाग्येश दशमे)। यह भाव-स्वामी-स्थिति का गुणात्मक योग-वर्णन है; कोई अंश-विभाजन, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं दिया गया।

21.9
लाभेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे लग्नसंयुते।
तावुभौ केन्द्रगौ वापि सुखजीवनभाग्‌ भवेत्‌
lābheśe karmarāśisthe karmeśe lagnasaṃyute|
tāvubhau kendragau vāpi sukhajīvanabhāg‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेश = एकादश-भाव का स्वामी; कर्मराशिस्थ = दशम-भाव/कर्म-राशि में स्थित; कर्मेश = दशमेश; लग्नसंयुते = लग्न से युक्त / लग्नस्थ; तावुभौ = वे दोनों; केन्द्रगौ = केन्द्र (1, 4, 7, 10) में स्थित; सुखजीवनभाग् = सुखमय जीवन का भागी; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभेश कर्म-राशि में हो और कर्मेश लग्न से संयुक्त हो, अथवा वे दोनों केन्द्र में हों, तब जातक सुखपूर्ण जीवन का भागी होता है। एकादश की दशम-स्थिति और दशमेश-लग्न का सम्बन्ध यहाँ सुख-जीवन के संकेत के रूप में कहा गया है। पाठ “केन्द्रगौ वापि” से वैकल्पिक स्थिति भी स्वीकृत है।

English rendering The text states that when the eleventh-lord occupies the tenth, and the tenth-lord is joined with the lagna — or when both are in angular houses — the native enjoys a happy life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभेश दशमे, कर्मेश लग्न-युक्त; अथवा दोनों केन्द्रस्थ)। केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10 — यह शास्त्रीय भाव-वर्ग है, अंकीय गुणक नहीं।

21.10
कर्मेशे बलसंयुक्ते मीने गुरुसमन्विते।
वस्त्राभरणसौख्यादि लभते नात्र संशयः
karmeśe balasaṃyukte mīne gurusamanvite|
vastrābharaṇasaukhyādi labhate nātra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशमेश; बलसंयुक्ते = बल से युक्त / बलवान; मीने = मीन राशि में; गुरुसमन्विते = गुरु से समन्वित/युक्त; वस्त्राभरणसौख्यादि = वस्त्र, आभरण (आभूषण) और सौख्य आदि; लभते = प्राप्त करता है; नात्र संशयः = इसमें संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दशमेश बलवान हो और मीन राशि में गुरु से युक्त हो, तब जातक वस्त्र, आभूषण और सुख-साधन आदि प्राप्त करता है; इसमें शास्त्र संशय नहीं रखता। मीन गुरु का स्व-राशि-स्थान है, अतः दशमेश-गुरु-युति मीन में विशेष रूप से कही गई है। यह भौतिक-सुख-प्राप्ति का फल-कथन है।

English rendering The text states that when the tenth-lord is strong and, in Pisces, is joined with Jupiter, the native obtains clothing, ornaments, comforts, and the like — of this the text admits no doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बलवान् कर्मेश + मीन में गुरु-युति → वस्त्र-आभरण-सौख्य)। “बल” यहाँ षड्बल-संख्या नहीं गिनाया गया; केवल गुणात्मक “बलसंयुक्त” कहा है।

21.11
लाभस्थानगते सूर्ये राहुभौमसमन्विते।
रविपुत्रेण संयुक्ते कर्मच्छेत्ता भवेन्नरः
lābhasthānagate sūrye rāhubhaumasamanvite|
raviputreṇa saṃyukte karmacchettā bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभस्थानगत = एकादश-भाव में स्थित; सूर्ये = सूर्य; राहुभौमसमन्विते = राहु और मंगल से युक्त; रविपुत्रेण = शनि से (रवि-पुत्र = शनि); संयुक्ते = युक्त; कर्मच्छेत्ता = कर्म/कर्म-क्षेत्र का छेदन करने वाला (कार्य-विच्छेद); भवेन्नरः = नर होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य लाभ-स्थान (एकादश) में हो, और राहु तथा मंगल से युक्त हो, तथा शनि से भी संयुक्त हो, तब वह पुरुष कर्मच्छेत्ता होता है — अर्थात् कर्म-प्रवाह में विच्छेद या कर्म-हानि का संकेत शास्त्र यहाँ देता है। यह एकादशस्थ सूर्य पर राहु-मंगल-शनि की युति का फल-वर्णन है। भय-व्याख्या या निश्चित विनाश के रूप में न पढ़ें — यह शास्त्र का फल-कथन मात्र है।

English rendering The text states that when the Sun occupies the eleventh house, joined with Rāhu and Mars, and also conjoined with Saturn (the Sun’s son), the man becomes a “cutter of work” — i.e. one whose career or deeds are interrupted, as the śāstra phrases it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (एकादशस्थ सूर्य + राहु-मंगल-शनि युति → कर्मच्छेद)। युति = समान राशि/भाव में स्थित होना; यहाँ कोई अंश-सीमा या बलांक नहीं दिया गया।

21.12
मीने जीवे भृगुयुते लग्नेशे बलसंयुते।
स्वोच्चराशिगते चन्द्रे सम्यग्‌ज्ञानार्थवान्‌ भवेत्‌
mīne jīve bhṛguyute lagneśe balasaṃyute|
svoccarāśigate candre samyag‌jñānārthavān‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने जीवे = मीन में गुरु; भृगुयुते = शुक्र से युक्त (भृगु = शुक्र); लग्नेशे = लग्न-स्वामी; बलसंयुते = बलवान; स्वोच्चराशिगते चन्द्रे = चन्द्र स्वोच्च-राशि में (वृषभ); सम्यग्ज्ञानार्थवान् = सम्यक् ज्ञान और अर्थ (धन) से युक्त; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु मीन में शुक्र से युक्त हो, लग्नेश बलवान हो, और चन्द्र अपनी उच्च-राशि में स्थित हो, तब जातक सम्यक् ज्ञान और धन से सम्पन्न होता है। मीन में गुरु-शुक्र युति, लग्नेश-बल और चन्द्र-उच्च — तीनों स्थितियों का संयोजन यहाँ ज्ञान-अर्थ का फल देता है। यह वर्णनात्मक फल-श्लोक है।

English rendering The text states that when Jupiter is in Pisces joined with Venus, the lagna-lord is strong, and the Moon occupies its exaltation sign, the native becomes possessed of sound knowledge and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मीन में गुरु-शुक्र, बलवान् लग्नेश, चन्द्र उच्च)। चन्द्र-उच्च = वृषभ (शास्त्रीय स्वोच्च-राशि); यहाँ अंश-सीमा (जैसे 3°) नहीं कही गई — केवल “स्वोच्चराशिगत”।

21.13
केन्द्रेशे लाभराशिस्थे लाभेशे लग्नसंस्थिते।
कर्मराशिस्थिते शुक्रे रत्नवान्‌ स नरो भवेत्‌
kendreśe lābharāśisthe lābheśe lagnasaṃsthite|
karmarāśisthite śukre ratnavān‌ sa naro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रेश = केन्द्र-भाव का स्वामी; लाभराशिस्थ = एकादश में स्थित; लाभेश = एकादशेश; लग्नसंस्थित = लग्न में स्थित; कर्मराशिस्थिते शुक्रे = दशम में शुक्र; रत्नवान् = रत्नों से सम्पन्न; स नरो भवेत् = वह नर होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब केन्द्रेश लाभ-राशि में हो, लाभेश लग्न में स्थित हो, और शुक्र कर्म-राशि (दशम) में रहे, तब वह पुरुष रत्नवान् होता है। केन्द्र-स्वामी का एकादश-गमन, लाभेश का लग्न-वास, और दशमस्थ शुक्र — तीनों मिलकर रत्न-समृद्धि का फल यहाँ कहा गया है।

English rendering The text states that when the lord of a kendra occupies the eleventh house, the eleventh-lord is placed in the lagna, and Venus stands in the tenth, that person becomes rich in gems.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केन्द्रेश एकादशे, लाभेश लग्ने, शुक्र दशमे → रत्नवान्)। केन्द्र = 1/4/7/10; “केन्द्रेश” का चयन जन्म-लग्न पर निर्भर है — यह स्थिति-नियम है, संख्या-सूत्र नहीं।

21.14
केन्द्रत्रिकोणगे कर्मनाथे स्वोच्चसमाश्रिते।
गुरुणा सहिते दृष्टे स कर्मसहितो भवेत्‌
kendratrikoṇage karmanāthe svoccasamāśrite|
guruṇā sahite dṛṣṭe sa karmasahito bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र = १/४/७/१० भाव; त्रिकोण = १/५/९ भाव; केन्द्रत्रिकोणगे = इनमें स्थित; कर्मनाथ = दशमेश (कर्मभाव का स्वामी); स्वोच्च-समाश्रिते = अपनी उच्च राशि का आश्रय लिए; गुरुणा सहिते = बृहस्पति से युत; दृष्टे = (अथवा) बृहस्पति से दृष्ट; कर्मसहितः = श्रेष्ठ कर्म/जीविका से सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ जब कर्मभाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो, अपनी उच्च राशि में स्थित हो, और बृहस्पति से युत या दृष्ट हो — तब शास्त्र कहता है कि वह जातक उत्तम कर्म एवं जीविका से युक्त होता है। तीनों बल-कारक (शुभ स्थान, उच्चता, गुरु-सम्बन्ध) यहाँ एक साथ जुड़ते हैं।

English rendering When the lord of the tenth occupies a kendra or trikoṇa in its own exaltation, conjoined or aspected by Jupiter, the text states the native becomes richly endowed with (righteous) work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) केन्द्र/त्रिकोण एक स्थान-प्रधान शर्त है (गणितीय वर्ग-सूत्र नहीं — फल-कथन); परन्तु "स्वोच्च" षड्बल में मापनीय है। षड्बल (Ch.27) में उच्चबल ग्रह की उसकी परम-नीच बिन्दु से कोणीय दूरी के अनुपात में बढ़ता है:
उच्चबल (विरूप) = (नीच-बिन्दु से चाप °) ÷ 3, अधिकतम = 60 विरूप = 1 रूप, परम-उच्च (नीच से 180° दूर) पर।

उदाहरण (worked example) बृहस्पति — परम-उच्च 5° कर्क, परम-नीच 5° मकर। 5° कर्क पर नीच-बिन्दु से चाप = 180° → 180 ÷ 3 = 60 विरूप = 1 रूप (पूर्ण उच्चबल)। अतः "स्वोच्च दशमेश" = स्थानबल का शिखर।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक की "स्वोच्च" शर्त सीधे षड्बल (BPHS Ch.27) की स्थानबल-गणना से जुड़ती है, जिसे हमने छह घटकों (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) के रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में नियम-बद्ध रखा — व्याख्या नहीं, संख्या। उच्चता यहाँ भावनात्मक विशेषण नहीं, बल की मापी जा सकने वाली इकाई है।

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21.15
कर्मेशे लग्नभावस्थे लग्नेशेन समन्विते।
केन्द्रत्रिकोणगे चन्द्रे सत्कर्मनिरतो भवेत्‌
karmeśe lagnabhāvasthe lagneśena samanvite|
kendratrikoṇage candre satkarmanirato bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशमेश (10वें भाव का स्वामी); लग्नभावस्थे = लग्न (1ले भाव) में स्थित; लग्नेशेन समन्विते = लग्नेश के साथ युक्त; केन्द्र = 1, 4, 7, 10 भाव; त्रिकोण = 1, 5, 9 भाव; चन्द्रे = चन्द्रमा; सत्कर्मनिरतः = शुभ/उचित कर्म में रत; भवेत् = हो (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कर्मेश लग्नभाव में हो और लग्नेश के साथ युक्त हो, तथा चन्द्र केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो, तो जातक सत्कर्म में निरत होता है। यहाँ दशमेश–लग्नेश का योग और चन्द्र की केन्द्र/त्रिकोण स्थिति को कर्म-क्षेत्र की शुभ दिशा से जोड़ा गया है। यह फल-कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that when the tenth-lord is in the lagna, conjoined with the lagna-lord, and the Moon occupies a kendra or trikoṇa, the person is devoted to good/right action (sat-karma).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान–स्वामी योग)। जाँच केवल भाव-स्वामित्व और भाव-स्थिति की है: कर्मेश ∈ भाव 1; कर्मेश–लग्नेश युति; चन्द्र ∈ {1,4,7,10} ∪ {1,5,9}। केन्द्र/त्रिकोण-गणना लग्न से पूर्ण भाव-संख्या पर निर्भर करती है (समान-भाव परम्परा में)।

21.16
कर्मस्थानगते मन्दे नीचखेचरसंयुते।
कर्मांशे पापसंयुक्ते कर्महीनो भवेन्नरः
karmasthānagate mande nīcakhecarasaṃyute|
karmāṃśe pāpasaṃyukte karmahīno bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मस्थानगते मन्दे = दशम भाव में शनि; नीच-खेचर-संयुते = नीच (परम-नीच) ग्रह से युत; कर्मांशे = कर्म-वर्ग/दशांश (D10) में — अथवा दशमेश के नवांश में (पाठ-भेद संभव); पापसंयुक्ते = पापग्रह से युक्त; कर्महीनः = जीविका/कर्म से रहित; भवेत् नरः = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ जब दशम भाव में शनि किसी नीच ग्रह के साथ बैठा हो, और कर्म-वर्ग (दशांश) पापग्रह से दूषित हो — शास्त्र कहता है कि जातक कर्म/जीविका से हीन रहता है। यह पूर्व श्लोकों के शुभ-योगों का प्रतिपक्ष है।

English rendering When Saturn occupies the tenth conjoined with a debilitated planet, and the karma-division (daśāṃśa) is afflicted by a malefic, the text states the man becomes destitute of work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "कर्मांश" वर्ग-सूत्र को छूता है। दशांश (D10 = कर्म-वर्ग) 30° राशि को 10 समान चापों में बाँटता है:
प्रत्येक अंश = 30° ÷ 10 = 3°; अंश-सूचक k = ⌈(राशि-भीतर देशान्तर °) ÷ 3°⌉, k ∈ {1…10}।
नियम (BPHS Ch.6): विषम राशि → उसी राशि से गणना; सम राशि → नवम राशि से। ("कर्मांश" का दूसरा पाठ = दशमेश-स्थित नवांश — पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) देशान्तर 141°20′ = कन्या 21°20′ (कन्या = सम राशि)। राशि-भीतर 21°20′ → k = ⌈21.333 ÷ 3⌉ = ⌈7.11⌉ = 8वाँ दशांश। सम राशि होने से गणना 9वीं राशि (मकर) से → 8वाँ = मकर+7 = सिंह। अतः कर्मांश = सिंह; उसमें पाप-दृष्टि/युति ही श्लोक की दूषण-शर्त है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशांश हमारे षोडश-वर्ग इंजन के D1…D60 अनुक्रम का ही एक सदस्य है — D10 (दशांश) विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित से 3° चापों में विभाजन (kaal_ekavimshati_varga.py)। "कर्मांश" कोई रहस्यमय संकेत नहीं, बल्कि देशान्तर पर निर्धारित एक नियतात्मक विभाजन है; श्लोक केवल उस खाने के अधिपति/दृष्टि पर फल टिकाता है।

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21.17
कर्मेशे नाशराशिस्थे रन्ध्रेशे कर्मसंस्थिते।
पापग्रहेण संयुक्ते दुष्कर्म निरतो भवेत्‌
karmeśe nāśarāśisthe randhreśe karmasaṃsthite|
pāpagraheṇa saṃyukte duṣkarma nirato bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशमेश; नाशराशिस्थे = अष्टम (8वें / नाश) भाव-राशि में स्थित; रन्ध्रेश = अष्टमेश (8वें का स्वामी); कर्मसंस्थिते = दशम भाव में स्थित; पापग्रहेण संयुक्ते = पापग्रह से युक्त; दुष्कर्म = अशुभ/अनुचित कर्म; निरतः = रत; भवेत् = हो (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कर्मेश नाश-राशि (अष्टम) में हो, रन्ध्रेश कर्मस्थान में हो, और (यह योग) पापग्रह से युक्त हो, तो जातक दुष्कर्म में निरत होता है। दशम–अष्टम का परस्पर आदान-प्रदान (कर्मेश 8 में, रन्ध्रेश 10 में) यहाँ कर्म की दिशा को विकृत करने वाले संकेत के रूप में वर्णित है। फल शास्त्र का है; हम इसे नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ते।

English rendering The text states that when the tenth-lord stands in the eighth (nāśa) place, the eighth-lord occupies the tenth, and there is malefic conjunction, the person is devoted to ill/wrong action (duṣkarma).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (10↔8 आदान + पाप-युति)। संरचनात्मक जाँच: स्वामी(10) ∈ भाव 8; स्वामी(8) ∈ भाव 10; पाप-युति (पारम्परिक पाप: शनि, मंगल, रवि आदि — परिभाषा संप्रदायानुसार)। भाव-गणना लग्न से 1…12 चक्र पर।

21.18
कर्मेशे नीचराशिस्थे कर्मस्थे पापखेचरे।
कर्मभात्कर्मगे पापे कर्मवैकल्यमादिशेत्‌
karmeśe nīcarāśisthe karmasthe pāpakhecare|
karmabhātkarmage pāpe karmavaikalyamādiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशमेश; नीचराशिस्थे = नीच राशि में स्थित; कर्मस्थे = दशम भाव में; पापखेचरे = पापग्रह; कर्मभात् = कर्मभाव से; कर्मगे = (उससे) दशम स्थान में = लग्न से सप्तम (10 + 10 − 1 ≡ 7, चक्र 12); पापे = पापग्रह; कर्मवैकल्यम् = कर्म में विकलता/दोष; आदिशेत् = कहना/निर्दिष्ट करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कर्मेश नीच राशि में हो, कर्मस्थान में पापग्रह हो, और कर्मभाव से गिने गए कर्म-स्थान (अर्थात् दशम से दशम = लग्न से सप्तम) में भी पाप हो, तो कर्मवैकल्य निर्देशित करें। तीन परतें हैं: दशमेश का नीचत्व, दशम में पाप, तथा दशम-से-दशम में पाप। यह फल-निर्देश है, न कि निश्चित विनाश-घोषणा।

English rendering The text states that when the tenth-lord is in a sign of debilitation, a malefic occupies the tenth, and a malefic also occupies the tenth counted from the tenth (i.e. the seventh from the lagna), one should declare impairment/defect of work (karma-vaikalya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान-शर्तें)। भाव-अंकगणित: “कर्मभात् कर्म” = भाव 10 से 10वाँ = ((10 − 1) + 10) mod 12 + 1 = भाव 7। शर्त-समुच्चय: स्वामी(10) ∈ नीच-राशि(स्वामी); ∃ पाप ∈ भाव 10; ∃ पाप ∈ भाव 7। नीच-राशि प्रत्येक ग्रह के लिए शास्त्र-निर्दिष्ट राशि-बिन्दु पर निर्भर करती है (उदा. गुरु मकर, शुक्र कन्या इत्यादि)।

21.19
कर्मस्थानगते चन्द्रे तदीशे तत्त्रिकोणगे।
लग्नेशे केन्द्रभावस्थे सत्कीर्तिसहितो भवेत्‌
karmasthānagate candre tadīśe tattrikoṇage|
lagneśe kendrabhāvasthe satkīrtisahito bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मस्थानगते चन्द्रे = दशम भाव में चन्द्र; तदीशे = उस (दशम) भाव के स्वामी; तत्त्रिकोणगे = उसी (दशम) से त्रिकोण में स्थित; लग्नेश = प्रथमेश; केन्द्रभावस्थे = केन्द्र में स्थित; सत्कीर्ति-सहितः = श्रेष्ठ यश से युक्त।

हिन्दी भावार्थ जब चन्द्रमा दशम भाव में हो, दशमेश दशम-से-त्रिकोण में स्थित हो, और लग्नेश किसी केन्द्र में हो — शास्त्र कहता है कि जातक उत्तम कीर्ति से सम्पन्न होता है। "तत्त्रिकोण" अर्थात् कर्मभाव के अपने त्रिकोणों की गणना करनी होती है।

English rendering When the Moon is in the tenth, its lord occupies a trine from that tenth, and the lagna lord is in a kendra, the text states the native becomes possessed of good renown.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "तत्त्रिकोण" = दशम भाव से त्रिकोण (उसका ५वाँ व ९वाँ)। समावेशी सूत्र भाव(n from H) = ((H + n − 2) mod 12) + 1:
५वाँ-से-दशम = ((10 + 5 − 2) mod 12) + 1 = (13 mod 12) + 1 = 1 + 1 = 2 → द्वितीय भाव।
९वाँ-से-दशम = ((10 + 9 − 2) mod 12) + 1 = (17 mod 12) + 1 = 5 + 1 = 6 → षष्ठ भाव।
अतः दशमेश को द्वितीय या षष्ठ भाव में होना चाहिए।

उदाहरण (worked example) लग्न वृष → दशमभाव = कुम्भ। कुम्भ से त्रिकोण = मिथुन (5वाँ) व तुला (9वाँ) = जन्मकुण्डली के द्वितीय एवं षष्ठ भाव। अतः दशमेश (शनि) इन दो में से किसी एक में हो, चन्द्र कुम्भ में, लग्नेश (शुक्र) केन्द्र में — तब यह "सत्कीर्ति" योग।

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21.20
लाभेशे कर्मभावस्थे कर्मेशे बलसंयुक्ते।
देवेन्द्रगुरुणा दृष्टे सत्कीर्तिसहितो भवेत्‌
lābheśe karmabhāvasthe karmeśe balasaṃyukte|
devendraguruṇā dṛṣṭe satkīrtisahito bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेश = एकादशेश (11वें का स्वामी); कर्मभावस्थे = दशम भाव में; कर्मेश = दशमेश; बलसंयुक्ते = बल से युक्त (शक्तिमान); देवेन्द्रगुरु = बृहस्पति (गुरु); दृष्टे = दृष्ट (ग्रह-दृष्टि से); सत्कीर्तिसहितः = शुभ कीर्ति से युक्त; भवेत् = हो (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभेश कर्मभाव में हो, कर्मेश बल से युक्त हो, और गुरु की दृष्टि उस पर (योग पर) पड़े, तो जातक सत्कीर्ति से युक्त होता है। लाभ (11) का स्वामी दशम में — आय/लाभ का कर्म से जुड़ाव — तथा बलवान दशमेश पर गुरु-दृष्टि, कीर्ति के शुभ संकेत के रूप में कही गई है। बल का विस्तारित माप षड्बल-प्रकरण में है; यहाँ केवल “बलसंयुक्त” कहा गया है।

English rendering The text states that when the eleventh-lord occupies the tenth house, the tenth-lord is endowed with strength, and Jupiter (Deva-indra’s guru) aspects, the person is endowed with good renown (sat-kīrti).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (11→10, दशमेश-बल, गुरु-दृष्टि)। दृष्टि-नियम (सामान्य): गुरु 5वीं और 9वीं पूर्ण दृष्टि (विशेष), तथा 7वीं सामान्य — संप्रदायानुसार। “बल” का संख्यात्मक योग षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्; 1 रूप = 60 विरूप) अध्याय 27 में; इस श्लोक में केवल गुणात्मक “बलसंयुक्त” है, कोई रूप-संख्या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) जहाँ “बलसंयुक्ते” को मापनीय बनाना हो, वहाँ षड्बल का योग रूप/विरूप में नियत नियमों से जोड़ा जाता है — स्थान-बल, दिक्-बल आदि अलग घटक, योग की तुलना ग्रह-अनुसार सीमा से। यह श्लोक वह सूत्र नहीं देता; वह गणना अलग अध्याय की है। फल-वाक्य (“सत्कीर्ति…”) सदैव शास्त्र-कथन रहता है, बल-संख्या से “सिद्ध भविष्य” नहीं।

21.21
कर्मस्थानाधिपे भाग्ये लग्नेशे कर्मसंयुते।
लग्नात्‌ पञ्चमगे चन्द्रे ख्यातनामा नरो भवेत्‌
karmasthānādhipe bhāgye lagneśe karmasaṃyute|
lagnāt pañcamage candre khyātanāmā naro bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मस्थानाधिपे = दशमेश; भाग्ये = नवम भाव में; लग्नेशे = लग्नेश; कर्मसंयुते = दशम भाव में स्थित; लग्नात् पञ्चमगे चन्द्रे = लग्न से पञ्चम में चन्द्र; ख्यातनामा = प्रसिद्ध नाम वाला; नरः भवेत् = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशमेश नवम में, लग्नेश दशम में और चन्द्र लग्न से पञ्चम में हो तो जातक ख्यातनामा होता है। धर्म-कर्म के स्वामियों का परस्पर स्थान-विनिमय-सदृश सम्बन्ध और मन (चन्द्र) की त्रिकोण-स्थिति — कर्म-भाव अध्याय का यह यश-कथन है, पाठ की अपनी वाणी में।

English rendering With the tenth lord in the ninth, the lagna lord in the tenth, and the Moon in the fifth from the lagna, the text says the native becomes one of celebrated name.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-शर्त)। शर्त: 10L ∈ भाव 9 ∧ AL ∈ भाव 10 ∧ Mo ∈ भाव 5।

21.22
इति कर्मफलं प्रोक्तं संक्षेपेण द्विजोत्तम।
लग्नकर्मेशसम्बन्धादूह्यमन्यदपि स्वयम्‌
iti karmaphalaṃ proktaṃ saṃkṣepeṇa dvijottama|
lagnakarmeśasambandhādūhyamanyadapi svayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार / यही पर्यन्त; कर्मफलम् = दशम-भाव (कर्म-भाव) का फल; प्रोक्तम् = कहा / निरूपित किया गया; संक्षेपेण = संक्षेप में; द्विजोत्तम = हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ; लग्न = उदित राशि / जन्म-लग्न; कर्मेश = दशम-भाव का अधिपति; सम्बन्ध = योग / दृष्टि / युति आदि सम्बन्ध; ऊह्यम् = अनुमान-योग्य / स्वयं विचारणीय; अन्यत् अपि स्वयम् = अन्य फल भी स्वयं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशम-भाव (कर्म-भाव) का फल यहाँ संक्षेप में कह दिया गया है। जो बातें विस्तार से नहीं कही गईं, उन्हें लग्न और कर्मेश (दशमेश) के परस्पर सम्बन्ध से साधक स्वयं ऊह ले। यह अध्याय का समापन-सूत्र है — पूर्ण फल-सूची नहीं, अपितु विचार-विधि का संकेत।

English rendering The text states that the results of the karma-bhāva (tenth house) have thus been set forth in brief. Whatever else remains is to be inferred by oneself from the relationship between the lagna and the lord of the tenth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-समापन / फल-ऊह विधि। शास्त्र यहाँ संख्या नहीं देता; वह कहता है कि लग्न–कर्मेश सम्बन्ध (युति, दृष्टि, परस्पर भाव-स्थिति, बल) से शेष फल स्वयं निकाला जाए — यह विवेक-सूत्र है, गणना-सूत्र नहीं।

अध्यायः 22

लाभभावफलाध्यायः

11 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 21 का पाठ दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (11 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated the text of chapter 21; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (11 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

22.1
लाभभावफलञ्चाथ कथयामि द्विजोत्तम ।
श्रूयतां जातको लोके यच्छुभत्वे सदा सुखी
lābhabhāvaphalañcātha kathayāmi dvijottama |
śrūyatāṃ jātako loke yacchubhatve sadā sukhī
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभभावफलं च अथ = अब लाभ (एकादश) भाव का फल; कथयामि = कहता हूँ; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; श्रूयताम् = सुना जाए; जातकः = जातक; लोके = संसार में; यत् शुभत्वे = जिसके (लाभ-भाव के) शुभ होने पर; सदा सुखी = सदा सुखी।

हिन्दी भावार्थ पराशर लाभ-भाव-फल का अध्याय आरम्भ करते हैं — जिस भाव के शुभ होने पर जातक संसार में सदा सुखी रहता है, उस लाभ-भाव का फल सुनो। प्रवेश-पद; गणना नहीं।

English rendering "Now I tell the results of the house of gains, O best of dvijas — hear how the native, when it is auspicious, is ever happy in the world."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना।

22.2
लाभाधिपो यदा लाभे तिष्टेत् केन्द्रत्रिकोणयोः ।
बहुलाभं तदा कुर्यादुच्चे सूर्यांशगोऽपि वा
lābhādhipo yadā lābhe tiṣṭet kendratrikoṇayoḥ |
bahulābhaṃ tadā kuryāducce sūryāṃśago'pi vā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभाधिपः = एकादशेश; यदा लाभे तिष्ठेत् = जब एकादश में स्थित हो; केन्द्रत्रिकोणयोः = (अथवा) केन्द्र या त्रिकोण में; बहुलाभं तदा कुर्यात् = तब बहुत लाभ करता है; उच्चे = स्वोच्च में; सूर्यांशगः अपि वा = अथवा सूर्य के नवांश में गया हो (तो भी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एकादशेश एकादश में, केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा स्वोच्च या सूर्य के नवांश में हो, तो बहुत लाभ करता है। "सूर्यांश" = सिंह नवांश — नवांश-स्वामी सूर्य; यह वर्ग-स्थिति की शर्त है।

English rendering When the eleventh lord stands in the eleventh, or in a kendra or trikoṇa, or is exalted or in the Sun's navāṃśa, the text says it yields abundant gains.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 11L ∈ {11} ∪ {1, 4, 7, 10} ∪ {5, 9} ∨ उच्च(11L) ∨ नवांश-राशि(11L) = सिंह। नवांश k = ⌊λ ÷ 3°20′⌋ + 1; नवांश-राशि = (राशि-प्रारम्भ + k − 1) mod 12, जहाँ चर राशि से वही, स्थिर से नवम, द्विस्वभाव से पञ्चम राशि प्रारम्भ।

22.3
लाभेशे धनराशिस्थे धनेशे केन्द्रसंस्थिते ।
गुरुणा सहिते भावे गुरुलाभं विनिर्दिशेत्
lābheśe dhanarāśisthe dhaneśe kendrasaṃsthite |
guruṇā sahite bhāve gurulābhaṃ vinirdiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे धनराशिस्थे = एकादशेश द्वितीय राशि में; धनेशे केन्द्रसंस्थिते = द्वितीयेश केन्द्र में; गुरुणा सहिते भावे = (वह) भाव गुरु से युक्त; गुरुलाभम् = गुरु (श्रेष्ठ/महान्) लाभ; विनिर्दिशेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एकादशेश द्वितीय में, द्वितीयेश केन्द्र में, और वह भाव गुरु से युक्त हो, तो "गुरु-लाभ" कहा जाए — गुरु (महान्) लाभ, अथवा गुरु-जनों से लाभ; दोनों पाठ-सम्मत। लाभेश-धनेश का परस्पर सम्बन्ध और गुरु-योग — धन-लाभ का योग।

English rendering With the eleventh lord in the second, the second lord in a kendra, and Jupiter joining that house, the text indicates great gain (or gain through elders).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 11L ∈ भाव 2 ∧ 2L ∈ {1, 4, 7, 10} ∧ Ju ∈ युति।

22.4
लाभेशे विक्रमे भावे शुभग्रहसमन्विते ।
षट्त्रिंशे वत्सरे प्राप्ते सहस्रद्वयनिष्कभाक्
lābheśe vikrame bhāve śubhagrahasamanvite |
ṣaṭtriṃśe vatsare prāpte sahasradvayaniṣkabhāk
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; विक्रमे भावे = तृतीय (विक्रम) भाव में; शुभग्रहसमन्विते = शुभ ग्रह से युक्त; षट्त्रिंशे वत्सरे प्राप्ते = छत्तीसवाँ वर्ष आने पर; सहस्रद्वयनिष्कभाक् = दो सहस्र निष्क का भागी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एकादशेश तृतीय में शुभ-ग्रह-युक्त हो, तो छत्तीसवें वर्ष में जातक दो हज़ार निष्क का स्वामी होता है। "निष्क" स्वर्ण-मुद्रा/भार का प्राचीन मात्रक है — ग्रन्थ धन को इसी इकाई में गिनता है; आधुनिक मूल्य में रूपान्तरण पाठ नहीं करता।

English rendering With the eleventh lord in the third joined by a benefic, the text says that in the thirty-sixth year the native comes to possess two thousand niṣkas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अङ्क: षट्त्रिंश = 36 वर्ष; सहस्रद्वय = 2 × 1000 = 2000 निष्क)। मात्रक: निष्क = स्वर्ण-मुद्रा/भार (परम्परा-भेद से 4–108 सुवर्ण; ग्रन्थ केवल संख्या देता है)।

22.5
केन्द्रत्रिकोणगे लाभनाथे शुभसमन्विते ।
चत्वारिंशे तु सम्प्राप्ते सहस्रार्धसुनिष्कभाक्
kendratrikoṇage lābhanāthe śubhasamanvite |
catvāriṃśe tu samprāpte sahasrārdhasuniṣkabhāk
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रत्रिकोणगे लाभनाथे = एकादशेश केन्द्र या त्रिकोण में; शुभसमन्विते = शुभ से युक्त; चत्वारिंशे तु सम्प्राप्ते = चालीसवाँ (वर्ष) आने पर; सहस्रार्धसुनिष्कभाक् = सहस्र का आधा (पाँच सौ) निष्क का भागी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एकादशेश केन्द्र या त्रिकोण में शुभ-युक्त हो, तो चालीसवें वर्ष में पाँच सौ निष्क का भागी होता है। "सहस्रार्ध" = 1000 ÷ 2 = 500 — पाठ की अपनी संख्या।

English rendering With the eleventh lord in a kendra or trikoṇa joined by a benefic, the text places five hundred niṣkas in the native's hands in the fortieth year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चत्वारिंश = 40 वर्ष; सहस्रार्ध = 1000 ÷ 2 = 500 निष्क)।

22.6
लाभस्थाने गुरुयुते धने चन्द्रसमन्विते ।
भाग्यस्थानगते शुक्रे षट्सहस्राधिपो भवेत्
lābhasthāne guruyute dhane candrasamanvite |
bhāgyasthānagate śukre ṣaṭsahasrādhipo bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभस्थाने गुरुयुते = एकादश भाव गुरु से युक्त; धने चन्द्रसमन्विते = द्वितीय में चन्द्र; भाग्यस्थानगते शुक्रे = नवम में शुक्र; षट्सहस्राधिपः भवेत् = छह हज़ार (निष्क) का स्वामी होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु एकादश में, चन्द्र द्वितीय में और शुक्र नवम में हो, तो जातक छह हज़ार (निष्क) का स्वामी होता है। तीन शुभ ग्रहों की धन-भावों (2, 9, 11) में स्थिति — धन-योग।

English rendering With Jupiter in the eleventh, the Moon in the second and Venus in the ninth, the text makes the native master of six thousand (niṣkas).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (षट्सहस्र = 6000)। शर्त: Ju ∈ भाव 11 ∧ Mo ∈ भाव 2 ∧ Ve ∈ भाव 9।

22.7
लाभाच्च लाभगे जीवे बुधचन्द्रसमन्विते ।
धनधान्याधिपः श्रीमान्त्रत्नाद्याभरणैर्युतः
lābhācca lābhage jīve budhacandrasamanvite |
dhanadhānyādhipaḥ śrīmāntratnādyābharaṇairyutaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभात् च लाभगे जीवे = गुरु एकादश से एकादश (= नवम) में; बुधचन्द्रसमन्विते = बुध और चन्द्र से युक्त; धनधान्याधिपः = धन-धान्य का स्वामी; श्रीमान् = श्रीसम्पन्न; रत्नाद्याभरणैः युतः = रत्न आदि आभरणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु एकादश से एकादश अर्थात् नवम भाव में बुध-चन्द्र के साथ हो, तो जातक धन-धान्य का स्वामी, श्रीमान् और रत्नाभरणों से युक्त होता है। "लाभात् लाभ" की गिनती नवम पर आती है — गणना-टिप्पणी देखें।

English rendering With Jupiter in the eleventh from the eleventh, joined by Mercury and the Moon, the text says the native is lord of wealth and grain, prosperous, adorned with gems.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना: 11 से 11वाँ = (11 + 10) mod 12 = 9 → नवम भाव। शर्त: Ju ∈ भाव 9 ∧ {Me, Mo} ⊂ युति(Ju)।

22.8
लाभेशे लग्नभावस्थे लग्नेशे लाभसंयुते ।
त्रयस्त्रिंशे तु सम्प्राप्ते सहस्रनिष्कभाग् भवेत्
lābheśe lagnabhāvasthe lagneśe lābhasaṃyute |
trayastriṃśe tu samprāpte sahasraniṣkabhāg bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे लग्नभावस्थे = एकादशेश लग्न में; लग्नेशे लाभसंयुते = लग्नेश एकादश में; त्रयस्त्रिंशे तु सम्प्राप्ते = तैंतीसवाँ (वर्ष) आने पर; सहस्रनिष्कभाक् भवेत् = एक हज़ार निष्क का भागी होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एकादशेश लग्न में और लग्नेश एकादश में (परस्पर विनिमय) हो, तो तैंतीसवें वर्ष में जातक हज़ार निष्क का भागी होता है। लग्न-लाभ का परिवर्तन-योग, आयु-अङ्क सहित।

English rendering With the eleventh lord in the lagna and the lagna lord in the eleventh, the text gives a thousand niṣkas in the thirty-third year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रयस्त्रिंश = 33 वर्ष; सहस्र = 1000 निष्क)। शर्त: 11L ∈ भाव 1 ∧ AL ∈ भाव 11 (परिवर्तन)।

22.9
धनेशे लाभराशिस्थे लाभेशे धनराशिगे ।
विवाहात्परतश्चैव बहुभाग्यं समादिशेत्
dhaneśe lābharāśisthe lābheśe dhanarāśige |
vivāhātparataścaiva bahubhāgyaṃ samādiśet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे लाभराशिस्थे = द्वितीयेश एकादश राशि में; लाभेशे धनराशिगे = एकादशेश द्वितीय राशि में; विवाहात् परतः च एव = विवाह के बाद ही; बहुभाग्यम् = बहुत भाग्य; समादिशेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीयेश एकादश में और एकादशेश द्वितीय में हो (धन-लाभ का परिवर्तन), तो विवाह के बाद बहुत भाग्य कहा जाए। समय-सूचक यहाँ आयु नहीं, जीवन-घटना (विवाह) है।

English rendering With the second lord in the eleventh and the eleventh lord in the second, great fortune is to be declared after marriage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 2L ∈ भाव 11 ∧ 11L ∈ भाव 2 (परिवर्तन-योग); काल-सूचक = विवाहोत्तर।

22.10
भ्रातृपे लाभराशिस्थे लाभेशे भ्रातृसंस्थिते ।
भ्रातृभावाद्धनप्राप्तिदिव्याभरणसंयुतः
bhrātṛpe lābharāśisthe lābheśe bhrātṛsaṃsthite |
bhrātṛbhāvāddhanaprāptidivyābharaṇasaṃyutaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृपे लाभराशिस्थे = तृतीयेश एकादश में; लाभेशे भ्रातृसंस्थिते = एकादशेश तृतीय में; भ्रातृभावात् धनप्राप्तिः = भाई (भ्रातृ-भाव) से धन-प्राप्ति; दिव्याभरणसंयुतः = दिव्य आभरणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तृतीयेश एकादश में और एकादशेश तृतीय में हो, तो भाइयों से धन-प्राप्ति और दिव्य आभरण कहे गए हैं। तृतीय-एकादश (भ्रातृ-लाभ) का परिवर्तन-योग।

English rendering With the third lord in the eleventh and the eleventh lord in the third, wealth comes through brothers and the native wears fine ornaments, the text says.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: 3L ∈ भाव 11 ∧ 11L ∈ भाव 3 (परिवर्तन)।

22.11
लाभेशे नीचभेऽस्ते वा त्रिके पापसमन्विते ।
कृते भूरिप्रयत्नेऽपि नैव लाभः कदाचन
lābheśe nīcabhe'ste vā trike pāpasamanvite |
kṛte bhūriprayatne'pi naiva lābhaḥ kadācana
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे नीचभे = एकादशेश नीच राशि में; अस्ते वा = अथवा अस्त; त्रिके = त्रिक (6, 8, 12) में; पापसमन्विते = पाप-युक्त; कृते भूरिप्रयत्ने अपि = बहुत प्रयत्न करने पर भी; न एव लाभः कदाचन = कभी लाभ नहीं।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का समापन-पद — शास्त्र कहता है कि एकादशेश नीच में या अस्त हो, त्रिक-स्थान में पाप-युक्त हो, तो बहुत प्रयत्न करने पर भी लाभ नहीं होता। यह लाभेश की दुर्बलता का सामान्य नियम है; "कदाचन" पाठ का आग्रह है, नियति नहीं।

English rendering When the eleventh lord is debilitated or combust, or in a trika house joined by a malefic, the text says there is no gain even with great effort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: नीच(11L) ∨ अस्त(11L) ∨ (11L ∈ {6, 8, 12} ∧ पाप ∈ युति)।

अध्यायः 23

व्ययभावफलाध्यायः

14 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 21 का पाठ दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (14 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated the text of chapter 21; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (14 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

23.1
अथाह व्ययभावस्य कथयामि फलं द्विज ।
व्ययेशे शुभसंयुक्ते स्वभे स्वोच्चगतेऽपि वा
athāha vyayabhāvasya kathayāmi phalaṃ dvija |
vyayeśe śubhasaṃyukte svabhe svoccagate'pi vā
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अह (= आह) व्ययभावस्य = व्यय (द्वादश) भाव का; कथयामि फलम् = फल कहता हूँ; द्विज = हे द्विज; व्ययेशे = द्वादशेश के; शुभसंयुक्ते = शुभ-युक्त; स्वभे = स्वराशि में; स्वोच्चगते अपि वा = अथवा स्वोच्च में गए होने पर — (फल 23.2 में)।

हिन्दी भावार्थ पराशर व्यय-भाव-फल का अध्याय आरम्भ करते हैं — द्वादशेश शुभ-युक्त हो, स्वराशि या स्वोच्च में हो, (और 23.2 के अनुसार द्वादश भाव भी शुभ-युक्त हो) तो व्यय शुभ कार्यों में होता है। प्रवेश + शर्त-पद।

English rendering "Now I tell the results of the house of expenditure, O dvija: when the twelfth lord is joined by a benefic, in its own sign or exalted —" (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना + शर्त-पद। शर्त: शुभ ∈ युति(12L) ∧ (स्वराशि(12L) ∨ उच्च(12L))।

23.2
व्यये च शुभसंयुक्ते शुभकार्ये व्ययस्तदा ।
चन्द्रो व्ययाधिपो धर्मलाभमन्त्रेषु संस्थितः
vyaye ca śubhasaṃyukte śubhakārye vyayastadā |
candro vyayādhipo dharmalābhamantreṣu saṃsthitaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यये च शुभसंयुक्ते = द्वादश भाव भी शुभ-युक्त हो; शुभकार्ये व्ययः तदा = तब व्यय शुभ कार्यों में; चन्द्रः व्ययाधिपः = चन्द्र द्वादशेश (हो); धर्मलाभमन्त्रेषु संस्थितः = नवम, एकादश या पञ्चम (मन्त्र-भाव) में स्थित — (फल 23.3–23.4 में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (23.1 की शर्तों के साथ) द्वादश भाव भी शुभ-युक्त हो तो व्यय शुभ कार्यों में होता है। आगे नई शर्त — चन्द्र द्वादशेश होकर नवम, एकादश या पञ्चम में हो — जिसका फल अगले दो श्लोकों में है। "मन्त्र" पञ्चम भाव का नाम है।

English rendering And when the twelfth house too is joined by a benefic, expenditure goes to good works; and if the Moon as twelfth lord stands in the ninth, eleventh or fifth — (continued in the next verses).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शर्त। भाव-नाम: धर्म = 9, लाभ = 11, मन्त्र = 5। चन्द्र द्वादशेश ⇒ द्वादश = कर्क ⇒ लग्न = सिंह।

23.3
स्वोच्चे स्वर्क्षे निजांशे वा लाभधर्मात्मजांशके ।
दिव्यागारादिपर्यंको दिव्यगन्धैकभोगवान्
svocce svarkṣe nijāṃśe vā lābhadharmātmajāṃśake |
divyāgārādiparyaṃko divyagandhaikabhogavān
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = स्वोच्च में; स्वर्क्षे = स्वराशि में; निजांशे वा = अथवा अपने नवांश में; लाभधर्मात्मजांशके = (अथवा) एकादश, नवम या पञ्चम (भाव) के नवांश में; दिव्यागारादिपर्यङ्कः = दिव्य भवन, पलंग आदि वाला; दिव्यगन्धैकभोगवान् = दिव्य सुगन्ध का एकमात्र भोक्ता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (23.2 का चन्द्र-द्वादशेश) स्वोच्च, स्वराशि, स्वनवांश में, अथवा एकादश-नवम-पञ्चम के नवांश में हो, तो जातक दिव्य भवन, शय्या और सुगन्ध का भोगी होता है (23.4 में पूरा)। यह द्वादश-भाव के शुभ पक्ष (भोग-व्यय) का वर्णन है।

English rendering If (that Moon) is exalted, in its own sign or own navāṃśa, or in the navāṃśa of the eleventh, ninth or fifth, the native enjoys divine dwellings, couches and perfumes — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। वर्ग-शर्त: नवांश-राशि(Mo) ∈ {कर्क (स्वांश), राशि(भाव 11), राशि(भाव 9), राशि(भाव 5)} ∨ Mo ∈ वृषभ (उच्च) ∨ Mo ∈ कर्क। नवांश k = ⌊λ ÷ 3°20′⌋ + 1।

23.4
परार्ध्यरमणो दिव्यवस्त्रमाल्यादिभूषणः ।
परार्ध्यवित्तसंयुतो विज्ञो दिनानि नयति प्रभुः
parārdhyaramaṇo divyavastramālyādibhūṣaṇaḥ |
parārdhyavittasaṃyuto vijño dināni nayati prabhuḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परार्ध्यरमणः = श्रेष्ठ (अमूल्य) रमणी वाला; दिव्यवस्त्रमाल्यादिभूषणः = दिव्य वस्त्र, माला आदि से भूषित; परार्ध्यवित्तसंयुतः = अपार धन से युक्त; विज्ञः = विद्वान्; दिनानि नयति प्रभुः = प्रभु की तरह दिन बिताता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (23.3 का फल पूरा करते हुए) ऐसा जातक श्रेष्ठ पत्नी, दिव्य वस्त्र-माला-आभूषण और अपार धन से युक्त, विद्वान्, प्रभु की तरह दिन बिताता है। "परार्ध्य" = अत्यन्त मूल्यवान्।

English rendering — with a peerless wife, divine garments, garlands and ornaments, and abundant wealth, he passes his days, learned, like a lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (23.3 की समाप्ति)।

23.5
एवंस्वशत्रुनीचांशेऽष्टमांशे वाऽष्टमे रिपौ ।
संस्थितः कुरुते जातं कान्तासुखविवर्जितम्
evaṃsvaśatrunīcāṃśe'ṣṭamāṃśe vā'ṣṭame ripau |
saṃsthitaḥ kurute jātaṃ kāntāsukhavivarjitam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; स्वशत्रुनीचांशे = (द्वादशेश) शत्रु या नीच नवांश में; अष्टमांशे वा = अथवा अष्टम (भाव) के नवांश में; अष्टमे रिपौ = अष्टम या षष्ठ में; संस्थितः = स्थित; कुरुते जातम् = जातक को करता है; कान्तासुखविवर्जितम् = स्त्री-सुख से रहित — (23.6 में पूरा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इसी प्रकार द्वादशेश शत्रु या नीच नवांश में, अष्टम के नवांश में, अथवा अष्टम या षष्ठ में हो, तो जातक को स्त्री-सुख से वंचित करता है (23.6 में: अति-व्यय से क्लान्त)। 23.3 के शुभ पक्ष का प्रति-पक्ष।

English rendering Likewise, when the twelfth lord is in an enemy's or debilitation navāṃśa, or in the navāṃśa of the eighth, or in the eighth or sixth house, it deprives the native of the happiness of a wife — (continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। वर्ग-शर्त: नवांश-राशि(12L) ∈ {शत्रु-राशि, नीच-राशि, राशि(भाव 8)} ∨ 12L ∈ {8, 6}।

23.6
व्ययाधिक्यपरिक्लान्तं दिव्यभोगनिराकृतम् ।
स हि केन्द्रत्रिकोणस्थः स्वस्त्रियाऽलंकृतः स्वयम्
vyayādhikyapariklāntaṃ divyabhoganirākṛtam |
sa hi kendratrikoṇasthaḥ svastriyā'laṃkṛtaḥ svayam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययाधिक्यपरिक्लान्तम् = अत्यधिक व्यय से क्लान्त; दिव्यभोगनिराकृतम् = दिव्य भोगों से वंचित; सः हि = वही (द्वादशेश); केन्द्रत्रिकोणस्थः = केन्द्र या त्रिकोण में स्थित (हो तो); स्वस्त्रिया अलंकृतः स्वयम् = स्वयं अपनी स्त्री से अलंकृत (सुखी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (23.5 का फल पूरा करते हुए) जातक अति-व्यय से क्लान्त और भोग-वंचित होता है; किन्तु वही द्वादशेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो जातक अपनी स्त्री से सुशोभित (गृह-सुखी) होता है। एक ही श्लोक में अशुभ और शुभ पक्ष।

English rendering — exhausted by excessive expenditure and denied fine enjoyments; but when that lord stands in a kendra or trikoṇa, the native is graced by his own wife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्विभाजन)। 12L ∈ {1, 4, 7, 10, 5, 9} → शुभ पक्ष।

23.7
यथा लग्नात् फलं चैतदात्मनः परिकीर्तितम् ।
एवं भ्रात्रादिभावेषु तत्तत्सर्वं विचारयेत्
yathā lagnāt phalaṃ caitadātmanaḥ parikīrtitam |
evaṃ bhrātrādibhāveṣu tattatsarvaṃ vicārayet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा लग्नात् = जैसे लग्न से; फलं च एतत् = यह फल; आत्मनः परिकीर्तितम् = आत्मा (जातक स्वयं) के लिए कहा गया; एवम् = वैसे ही; भ्रात्रादिभावेषु = भ्रातृ आदि भावों (तृतीय आदि) में; तत्तत्सर्वं विचारयेत् = उन-उन (सम्बन्धियों) का सब विचार करे।

हिन्दी भावार्थ पद्धति-सूत्र — जैसे लग्न से ये फल जातक स्वयं के लिए कहे गए हैं, वैसे ही तृतीय आदि भावों को लग्न मानकर भाई आदि सम्बन्धियों का विचार किया जाए। यह "भावात् भावम्" की विधि है: प्रत्येक सम्बन्धी का भाव उसका लग्न।

English rendering As these results are stated from the lagna for the native himself, so should everything be examined from the third and the other houses for brothers and the rest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भावात्-भाव नियम: सम्बन्धी-भाव b को लग्न मानने पर उसका k-वाँ भाव = (b + k − 2) mod 12 + 1। उदाहरण: भाई (b = 3) का पञ्चम = (3 + 5 − 2) mod 12 + 1 = 7 → सप्तम भाव।

उदाहरण (worked example) पिता का विचार नवम (b = 9) से: पिता का धन-भाव = (9 + 2 − 2) mod 12 + 1 = 10; पिता का व्यय-भाव = (9 + 12 − 2) mod 12 + 1 = 8 → अष्टम। (गिनती सम-राशि भाव में; भाव-मध्य पद्धति में भी क्रम वही।)

23.8
दृश्यचक्रार्धगाः खेटाः प्रत्यक्षफलदायकाः ।
अदृश्यार्धगताः खेटाः परोक्षे फलदाः स्मृताः
dṛśyacakrārdhagāḥ kheṭāḥ pratyakṣaphaladāyakāḥ |
adṛśyārdhagatāḥ kheṭāḥ parokṣe phaladāḥ smṛtāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृश्यचक्रार्धगाः खेटाः = दृश्य चक्रार्ध (क्षितिज के ऊपर का आधा चक्र) में गए ग्रह; प्रत्यक्षफलदायकाः = प्रत्यक्ष फल देने वाले; अदृश्यार्धगताः खेटाः = अदृश्य आधे में गए ग्रह; परोक्षे फलदाः स्मृताः = परोक्ष (अप्रकट) फल देने वाले माने गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कुण्डली के दृश्य (उदित) अर्ध में स्थित ग्रह प्रत्यक्ष फल देते हैं और अदृश्य अर्ध के ग्रह परोक्ष फल। "दृश्यार्ध" वह आधा है जो जन्म-समय क्षितिज के ऊपर था — सप्तम-कस्प से दशम होते हुए लग्न तक; "अदृश्यार्ध" लग्न से चतुर्थ होते हुए सप्तम तक।

English rendering Planets in the visible half of the chart give manifest results; those in the invisible half, the text says, give their results unseen.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अर्ध-निर्धारण (घोषित परिपाटी): दृश्यार्ध = भाव {7, 8, 9, 10, 11, 12} (सप्तम-कस्प से लग्न-कस्प तक, क्षितिज के ऊपर); अदृश्यार्ध = भाव {1, 2, 3, 4, 5, 6}। कस्प-आधारित: ग्रह दृश्य ⇔ λ_ग्रह ∈ [λ_सप्तम-कस्प, λ_लग्न-कस्प) चक्र-क्रम में। भाव-मध्य पद्धति में सीमाएँ कस्पों पर — घोषित करें।

उदाहरण (worked example) लग्न-कस्प 15° वृषभ (45°), सप्तम-कस्प 15° वृश्चिक (225°)। ग्रह 300° (कुम्भ 0°): 225° ≤ 300° < 405° (= 45° + 360°) → दृश्यार्ध → प्रत्यक्ष फल। ग्रह 100° (कर्क 10°): अदृश्यार्ध।

23.9
व्ययस्थानगतोः राहुर्भौमार्किरविसंयुतः ।
तदीशेऽप्यर्कसंयुक्ते नरके पतनं भवेत्
vyayasthānagatoḥ rāhurbhaumārkiravisaṃyutaḥ |
tadīśe'pyarkasaṃyukte narake patanaṃ bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययस्थानगतः राहुः = द्वादश भाव में राहु; भौमार्किरविसंयुतः = मंगल, शनि और सूर्य से युक्त; तदीशे अपि = उसका (द्वादश का) स्वामी भी; अर्कसंयुक्ते = सूर्य से युक्त (हो तो); नरके पतनं भवेत् = नरक में पतन होता है (पाठ का शब्द)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु द्वादश में मंगल, शनि और सूर्य के साथ हो, और द्वादशेश भी सूर्य से युक्त हो, तो "नरक-पतन" कहा गया है। द्वादश भाव को परलोक-गति का भाव माना गया है; यह उसका अशुभतम कथन है — ग्रन्थ की परलोक-भाषा, जिसे भय के रूप में न पढ़ें।

English rendering With Rāhu in the twelfth joined by Mars, Saturn and the Sun, and the twelfth lord also joined by the Sun, the text speaks of a fall into hell.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परलोक-गति)। शर्त: Ra ∈ भाव 12 ∧ {Ma, Sa, Su} ⊂ युति(Ra) ∧ Su ∈ युति(12L)।

23.10
व्ययस्थानगते सौम्ये तदीशे स्वोच्चराशिगे ।
शुभयुक्ते सुभैर्दृष्टे मोक्सः स्यान्नात्र संशयः
vyayasthānagate saumye tadīśe svoccarāśige |
śubhayukte subhairdṛṣṭe moksaḥ syānnātra saṃśayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययस्थानगते सौम्ये = द्वादश में शुभ ग्रह (सौम्य — बुध या शुभ-सामान्य); तदीशे स्वोच्चराशिगे = द्वादशेश स्वोच्च में; शुभयुक्ते = शुभ-युक्त; शुभैः दृष्टे (पाठ "सुभैर्दृष्टे") = शुभों से दृष्ट; मोक्षः (पाठ "मोक्सः") स्यात् = मोक्ष होता है; न अत्र संशयः = इसमें सन्देह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वादश में शुभ ग्रह हो, द्वादशेश स्वोच्च में शुभ-युक्त और शुभ-दृष्ट हो, तो मोक्ष कहा गया है। 23.9 का शुभ प्रति-पक्ष — द्वादश की परलोक-गति का उच्चतम कथन; पाठ-भेद संभव (सुभैः/शुभैः, मोक्सः/मोक्षः)।

English rendering With a benefic in the twelfth and the twelfth lord exalted, joined and aspected by benefics, the text declares liberation — "of this there is no doubt".

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: शुभ ∈ भाव 12 ∧ उच्च(12L) ∧ शुभ ∈ युति(12L) ∧ शुभ ∈ दृष्टि(12L)।

23.11
व्ययेशे पापसंयुक्ते व्यये पापसमन्विते ।
पापग्रहेण संदृष्टे देशाद्देशान्तरं गतः
vyayeśe pāpasaṃyukte vyaye pāpasamanvite |
pāpagraheṇa saṃdṛṣṭe deśāddeśāntaraṃ gataḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे पापसंयुक्ते = द्वादशेश पाप-युक्त; व्यये पापसमन्विते = द्वादश भाव में पाप; पापग्रहेण संदृष्टे = पाप-ग्रह से दृष्ट; देशात् देशान्तरं गतः = देश से देशान्तर गया हुआ (प्रवासी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वादशेश पाप-युक्त हो, द्वादश में पाप हो और पाप-दृष्टि हो, तो जातक देश छोड़कर देशान्तर जाता है। द्वादश = प्रवास/विदेश का भाव; पाप-प्रभाव में गमन अनिच्छित रूप में — पाठ की व्याख्या।

English rendering With the twelfth lord joined by a malefic, a malefic in the twelfth, and a malefic aspect, the native, the text says, goes from land to land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: पाप ∈ युति(12L) ∧ पाप ∈ भाव 12 ∧ पाप ∈ दृष्टि(भाव 12)।

23.12
व्ययेशे शुभराशिस्थे व्ययर्क्षे शुभसंयुते ।
शुभग्रहेण संदृष्टे स्वदेशात् सञ्चरो भवेत्
vyayeśe śubharāśisthe vyayarkṣe śubhasaṃyute |
śubhagraheṇa saṃdṛṣṭe svadeśāt sañcaro bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे शुभराशिस्थे = द्वादशेश शुभ राशि में; व्ययर्क्षे शुभसंयुते = द्वादश राशि शुभ-युक्त; शुभग्रहेण संदृष्टे = शुभ-ग्रह से दृष्ट; स्वदेशात् सञ्चरः भवेत् = स्वदेश से (सुखद) संचरण होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वादशेश शुभ राशि में, द्वादश शुभ-युक्त और शुभ-दृष्ट हो, तो स्वदेश से (यात्रा-रूप में) संचरण होता है। 23.11 का शुभ प्रति-पक्ष: वही गमन, शुभ प्रभाव में सुखद यात्रा।

English rendering With the twelfth lord in a benefic sign and the twelfth house joined and aspected by benefics, the text says the native travels out from his own land (in comfort).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: राशि(12L) शुभ-स्वामित्व ∧ शुभ ∈ भाव 12 ∧ शुभ ∈ दृष्टि(भाव 12)।

23.13
व्यये मन्दादिसंयुक्ते भूमिजेन समन्विते ।
सु/भदृष्टेर्न सम्प्राप्तिः पापमूलाद्धनार्जनम्
vyaye mandādisaṃyukte bhūmijena samanvite |
su/bhadṛṣṭerna samprāptiḥ pāpamūlāddhanārjanam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यये मन्दादिसंयुक्ते = द्वादश में शनि आदि (पाप) से युक्त; भूमिजेन समन्विते = मंगल के साथ; शुभदृष्टेः न सम्प्राप्तिः (पाठ "सु/भदृष्टेर्न" — पाठ-भेद संभव) = शुभ दृष्टि की प्राप्ति न हो; पापमूलात् धनार्जनम् = पाप-मूल से धनार्जन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वादश में शनि आदि और मंगल हों, तथा शुभ दृष्टि न हो, तो पाप-मूल (अनुचित साधनों) से धनार्जन कहा गया है। द्वादश के पाप-योग का आर्थिक पक्ष।

English rendering With Saturn and the like together with Mars in the twelfth and no benefic aspect, the text says wealth is earned from sinful sources.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: {Sa, Ma} ⊂ भाव 12 ∧ शुभ ∉ दृष्टि(भाव 12)।

23.14
लग्नेशे व्ययराशिस्थे व्ययेशे लग्नसंयुते ।
भृगुपुत्रेण संयुक्ते धर्ममूलाद्धनव्ययः
lagneśe vyayarāśisthe vyayeśe lagnasaṃyute |
bhṛguputreṇa saṃyukte dharmamūlāddhanavyayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे व्ययराशिस्थे = लग्नेश द्वादश राशि में; व्ययेशे लग्नसंयुते = द्वादशेश लग्न में (परिवर्तन); भृगुपुत्रेण संयुक्ते = शुक्र से युक्त; धर्ममूलात् धनव्ययः = धर्म-मूल (धार्मिक कार्यों) में धन-व्यय।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का अन्तिम पद — शास्त्र कहता है कि लग्नेश द्वादश में और द्वादशेश लग्न में हो, शुक्र से युक्त हो, तो धन का व्यय धर्म-कार्यों में होता है। लग्न-व्यय का परिवर्तन-योग शुक्र के साथ — व्यय का सात्त्विक रूप।

English rendering With the lagna lord in the twelfth and the twelfth lord in the lagna, joined by Venus, the text says wealth is spent on dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: AL ∈ भाव 12 ∧ 12L ∈ भाव 1 ∧ Ve ∈ युति।

अध्यायः 24

भावेशफलाध्यायः

148 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): भावेशफलाध्यायः भाव-स्वामी (भावेश) की स्थिति से जुड़े फल-सूत्रों का विस्तृत संकलन है—लग्नेश, धनेश, सहजेश आदि प्रत्येक भावेश जब प्रथम से द्वादश भाव में स्थित हो, तब शास्त्र क्या फल-वर्णन देता है, उसी क्रम में। यह अध्याय पूर्ववर्ती भाव-फल श्रृंखला (११–२३) का चरम-बिन्दु है: जहाँ भाव-स्थान का स्वभाव पहले कहा गया, वहाँ अब उसी भाव के अधिपति की गृह-संक्रान्ति पर फल-वाक्य जुड़े हैं। एक सौ अड़तालीस श्लोकों में बारह भावेश × बारह भाव—लगभग पूर्ण तालिका—का रूप मिलता है; आरम्भ ही लग्नेश-लग्नगे, धनगे, सहजे, सुखगे, सुतगे आदि पदों से होता है। यहाँ “फल” शास्त्र का कथन है, न कि नियति का दावा—पाठक को गणना-योग्य ढाँचा (कौन-सा ग्रह किस भाव का स्वामी है, कहाँ बैठा है) और शास्त्रीय वाक्य दोनों स्पष्ट रहें।

For the English reader: Adhyāya 24, Bhāveśaphalādhyāyaḥ, is the systematic catalogue of results the text assigns when each house-lord occupies each of the twelve houses. It closes the long bhāva-phala arc (chapters 11–24): after the houses themselves have been described, Parāśara turns to the bhāveśa—the lord of a house—and states, house by house, what the tradition records for that placement. The opening verses already model the method: lagneśa in lagna, in the second, third, fourth, fifth… each line a fixed phala-formula, not an open prediction. Across 148 ślokas the chapter builds a nearly complete grid—twelve lords against twelve stations—so the reader can look up the śāstra’s wording once the chart has named the lords and their houses. What follows is reportage of that grid: computation identifies the placement; the text supplies the classical statement; neither is treated as sealed fate.

मुख्य गणित/तकनीक:
- मुख्यतः फल/वर्णन-अध्याय
- पूर्व-गणना की अपेक्षा: प्रत्येक भाव का अधिपति (भावेश) = उस भाव-राशि का स्वामी-ग्रह (D₁ / राशि-चार्ट पर)
- फल-पठन की कुंजी: भावेश k ∈ भाव n (n = 1…12) → अध्याय का संगत फल-श्लोक; यहाँ कोई नवीन वर्ग-नियम, बिन्दु-तालिका, दशा-वर्ष या बल-इकाई नहीं—केवल स्थिति → शास्त्रीय फल-वाक्य का मानचित्र

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

24.1
लग्नेशे लग्नगे देहसुखभाग्‌ भुजविक्रमी।
मनस्वी चञ्चलश्चैव द्विभार्यो परगोऽपि व
lagneśe lagnage dehasukhabhāg‌ bhujavikramī|
manasvī cañcalaścaiva dvibhāryo parago'pi va

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न (उदित D1-राशि / प्रथम भाव) का स्वामी; लग्नगे = लग्न भाव में स्थित (सप्तमी); देहसुखभाक् = देह-सुख का भागी; भुजविक्रमी = भुजाओं के पराक्रम वाला (बाहुबली); मनस्वी = आत्मबल-सम्पन्न; चञ्चलः = अस्थिर स्वभाव; द्विभार्यः = द्वि (=2) भार्या वाला; परगः = परगृह/परस्थान-गामी — अन्तिम पाद अपूर्ण, पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ जब लग्न का स्वामी स्वयं लग्न भाव में स्थित हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक देह-सुख से युक्त, बाहुबली एवं पराक्रमी, आत्मबल-सम्पन्न, किन्तु स्वभाव से चंचल होता है। द्विभार्या तथा परगृहगामी होने का कथन भी है। अन्तिम पाद ("परगोऽपि व") छिन्न प्रतीत होता है — यहाँ पाठ-भेद संभव।

English rendering When the lord of the ascendant occupies the ascendant itself, the text states the native enjoys bodily comfort, is strong-armed and valorous, high-spirited yet restless, and speaks of two wives; the closing quarter is incomplete (reading uncertain).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। एक अन्तर्दृष्टि: "लग्नेश" स्वयं एक गणना-निष्पन्न राशि — उदित D1-राशि — का स्वामी है; उसका भाव-स्थान निकालना विशुद्ध गणित है, जबकि उपर्युक्त गुण उस पर शास्त्र का कथन-मात्र हैं।

हमारा डिकोड: इस अध्याय का प्रत्येक फल जिस "लग्नेश" पर टिका है, वह पहले गणना से निश्चित होता है — लग्न-रेखांश → D1 (ṣoḍaśa-varga, अध्याय 6) राशि → उस राशि का स्वामी, जो वर्ग-इंजन में विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है। हमारा अनुशासन उस गणित-निष्पन्न स्थान (सटीक) को फल-कथन (शास्त्र का दावा) से पृथक रखता है, और फल को कभी नियति के रूप में नहीं, "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करता है।

24.2
लग्नेशे धनगे बालो लाभवान्‌ पण्डितः सुखी।
सुशीलो धर्मविन्मानी बहुदारगुणैर्युतः
lagneśe dhanage bālo lābhavān‌ paṇḍitaḥ sukhī|
suśīlo dharmavinmānī bahudāraguṇairyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी में/के; धनगे = धन-भाव (द्वितीय) में स्थित; बाल = बालक-अवस्था / बाल-स्वभाव (पाठ-अर्थ: बाल्य-विशेष या बाल-गुण); लाभवान् = लाभ-युक्त; पण्डित = विद्वान्; सुखी = सुख-सम्पन्न; सुशील = सुशील स्वभाव; धर्मवित् = धर्म-ज्ञ; मानी = मान-युक्त / अभिमानी (संदर्भानुसार); बहुदारगुणैर्युत = बहु-दार (अनेक पत्नियाँ) और गुणों से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश के धन-भाव में होने पर जातक लाभ-युक्त, पण्डित और सुखी कहा गया है। सुशीलता तथा धर्म-ज्ञान का उल्लेख है, साथ ही मान-युक्त स्वभाव का। बहु-दार और गुण-समृद्धि भी इसी फल-पंक्ति में गिनाई गई है — यह शास्त्र का कथन है, सुनिश्चित जीवन-परिणाम नहीं।

English rendering The text states that with the lagna-lord in the second house the native is described as gainful, learned and happy, of good conduct, knowing dharma, dignified, and endowed with many marital partners and virtues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। धन-भाव = 2रा भाव; लग्नेश-द्वितीय संयोग की जाँच केवल भाव-स्वामित्व और ग्रह-स्थिति से होती है — श्लोक में कोई बलांक, अंश-विभाजन या दशा-वर्ष नहीं है।

24.3
लग्नेशे सहजे जातः सिंहतुल्यपराक्रमी।
सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान्‌ सुखी
lagneśe sahaje jātaḥ siṃhatulyaparākramī|
sarvasampadyuto mānī dvibhāryo matimān‌ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहजे = सहज-भाव (तृतीय) में; जात = जातक / उत्पन्न; सिंहतुल्यपराक्रमी = सिंह-तुल्य पराक्रम वाला; सर्वसम्पद्युत = सर्वाङ्ग सम्पदा से युक्त; मानी = मान-सम्पन्न; द्विभार्य = द्वि-भार्या; मतिमान् = बुद्धिमान्; सुखी = सुखी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश सहज-भाव में हो तो जातक सिंह-सदृश पराक्रमी कहा गया है। सर्व-सम्पदा, मान, बुद्धि और सुख का उल्लेख एक साथ आता है; द्विभार्या-योग भी इसी पंक्ति में है। यह तृतीय-भावगत लग्नेश का फल-वर्णन है, न कि अनिवार्य जीवन-लेख।

English rendering The text states that when the lagna-lord is in the third house, the native is described as lion-like in valor, endowed with all prosperity, dignified, intelligent and happy, and indicated for two marriages.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सहज = 3रा भाव; पराक्रम-फल यहाँ भावाश्रित लक्षण है, अष्टकवर्ग-बिन्दु या षड्बल-रूप की कोई गणना श्लोक में नहीं दी गई।

24.4
लग्नेशे सुखगे बालः पितृमातृसुखान्वितः।
बहुभ्रातृयुतः कामी गुणरूपसमन्वितः
lagneśe sukhage bālaḥ pitṛmātṛsukhānvitaḥ|
bahubhrātṛyutaḥ kāmī guṇarūpasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखगे = सुख-भाव (चतुर्थ) में स्थित; बाल = बाल / बाल-स्वभाव या बाल्य-सुख (पाठ-भेद/अर्थ-विस्तार संभव); पितृमातृसुखान्वित = पिता-माता के सुख से युक्त; बहुभ्रातृयुत = अनेक भाइयों से युक्त; कामी = काम-प्रवण / इच्छुक; गुणरूपसमन्वित = गुण और रूप (शोभा) से समन्वित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश सुख-भाव में हो तो जातक पितृ-मातृ-सुख से युक्त कहा गया है। बहु-भ्रातृ-योग तथा काम-प्रवृत्ति का उल्लेख है; गुण और रूप का समन्वय भी फल-पंक्ति में आता है। चतुर्थ-भाव का यह वर्णन शास्त्र-स्वर में पढ़ें — सुनिश्चित घटना-क्रम के रूप में नहीं।

English rendering The text states that with the lagna-lord in the fourth house the native is described as enjoying parental happiness, accompanied by many siblings, desire-prone, and endowed with virtues and pleasing form.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सुख-भाव = 4था भाव; माता-पिता/बंधु-फल यहाँ पारंपरिक भावाश्रित कथन हैं; कोई वर्ग-अंश या आयुर्दाय-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

24.5
लग्नेशे सुतगे जन्तोः सुतसौख्यं च मध्यमम्‌।
प्रथमापत्यनाशः स्यान्मानी क्रोधी नृपप्रियः
lagneśe sutage jantoḥ sutasaukhyaṃ ca madhyamam‌|
prathamāpatyanāśaḥ syānmānī krodhī nṛpapriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतगे = सुत (पञ्चम/सन्तान) भाव में; जन्तोः = जातक (प्राणी) के; सुतसौख्यम् = सन्तान-सुख; मध्यमम् = मध्यम स्तर का; प्रथमापत्यनाशः = प्रथम सन्तान का नाश; स्यात् = हो (सम्भावना-वाचक); मानी = स्वाभिमानी; क्रोधी = क्रोधी; नृपप्रियः = राजा का प्रिय।

हिन्दी भावार्थ पञ्चम (सुत) भाव में लग्नेश हो तो शास्त्र कहता है जातक का सन्तान-सुख मध्यम रहता है, तथा प्रथम सन्तान का नाश सम्भव कहा गया है; स्वभाव से मानी, क्रोधी एवं राजा का प्रिय होता है। "स्यात्" पद इसे सम्भावना बनाता है, निश्चय नहीं।

English rendering With the ascendant lord in the 5th (progeny) house, the text states progeny-comfort is middling and the first child may be lost; the native is self-respecting, prone to anger, and dear to the king.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "स्यात्" (सम्भावना-वाचक विधिलिङ्) इसे निश्चित घटना नहीं, बल्कि विवेक-सापेक्ष कथन बनाता है।

हमारा डिकोड: "प्रथमापत्यनाश" जैसे अरिष्ट-वर्गीय कथन ठीक वहीं हमारी विधि-मर्यादा को छूते हैं — इन्हें हम शास्त्र का सशर्त कथन ("शास्त्र कहता है", "स्यात्") मान कर प्रस्तुत करते हैं, कभी अनुमोदित भविष्यवाणी या नियति के रूप में नहीं। न भय, न दबावकारी उपाय — यही ऑपरेटर के CLAUDE.md एवं ऑरैकल का घोषित अनुशासन है (गणित को व्याख्या से पृथक रखना)।

24.6
लग्नेशे षष्ठगे जातो देहसौख्यविवर्जितः।
पापाढ्‌ये शत्रुतः पीडा सौम्यदृष्टिविवर्जिते
lagneśe ṣaṣṭhage jāto dehasaukhyavivarjitaḥ|
pāpāḍh‌ye śatrutaḥ pīḍā saumyadṛṣṭivivarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठगे = षष्ठ (रिपु/रोग) भाव में; देहसौख्यविवर्जितः = देह-सुख से रहित; पापाढ्ये = पाप (क्रूर) ग्रह से युक्त होने पर; शत्रुतः पीडा = शत्रु से पीड़ा; सौम्यदृष्टिविवर्जिते = सौम्य (शुभ) ग्रह की दृष्टि से रहित होने पर।

हिन्दी भावार्थ षष्ठ (रिपु) भाव में लग्नेश हो तो शास्त्र कहता है जातक देह-सुख से रहित रहता है; और जब वह पाप-ग्रह से युक्त तथा शुभ-ग्रह की दृष्टि से रहित हो, तब शत्रु से पीड़ा कही गई है। ध्यातव्य — फल यहाँ दो शर्तों पर आश्रित (सशर्त) है।

English rendering With the ascendant lord in the 6th (adversary) house, the text states the native lacks bodily comfort; and when it is joined by malefics and unaspected by benefics, affliction from enemies is described.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — सशर्त फल-कथन। फल "पापाढ्ये" (पाप-युति) एवं "सौम्यदृष्टिविवर्जिते" (शुभ-दृष्टि-अभाव) — इन दो शर्तों पर टिका है, अतः यह बलाबल-विवेक की माँग करता है।

हमारा डिकोड: यह सशर्त (पाप-युति, शुभ-दृष्टि) निर्णय ठीक दृग्बल / बलाबल-विवेक है, जो षड्बल (अध्याय 27) का अंग है। हमारा षड्बल-उपचार दृग्बल एवं अन्य घटकों को घोषित संख्यात्मक नियमों से रूप/विरूप में निकालता है (1 रूप = 60 विरूप), और यह संख्या स्थिर होने के बाद ही यह तय होता है कि कौन-सा सशर्त फल लागू है — गणना घोषित परम्परा के साथ, व्याख्या पृथक्।

24.7
लग्नेशे सप्तमे पापे भार्या तस्य न जीवति।
शुभेऽटनो दरिद्रो वा विरक्तो वा नृपोऽपि वा
lagneśe saptame pāpe bhāryā tasya na jīvati|
śubhe'ṭano daridro vā virakto vā nṛpo'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे = सप्तम (दार/कलत्र) भाव में; पापे = लग्नेश यदि पाप-ग्रह हो; भार्या तस्य न जीवति = उसकी भार्या दीर्घजीवी नहीं (शास्त्र-कथन); शुभे = शुभ-ग्रह होने पर; अटनः = भ्रमणशील/पर्यटक; दरिद्रः = निर्धन; विरक्तः = वैरागी; नृपः = राजा।

हिन्दी भावार्थ सप्तम (कलत्र) भाव में लग्नेश यदि पाप-ग्रह हो तो शास्त्र कहता है भार्या दीर्घजीवी नहीं होती; और यदि वह शुभ-ग्रह हो, तो जातक भ्रमणशील, अथवा निर्धन, अथवा विरक्त, अथवा राजा तक हो सकता है। यह पूर्णतः पाप/शुभ-भेद एवं बलाबल पर आश्रित सशर्त कथन है।

English rendering With the ascendant lord in the 7th (spouse) house: if it is a malefic, the text states the wife is not long-lived; if a benefic, the native is a wanderer, or poor, or dispassionate, or even a king.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — सशर्त फल-कथन। पाप/शुभ-भेद ही यहाँ फल का द्वि-शाखी निर्धारक है; निर्णय ग्रह-स्वभाव-वर्गीकरण से होता है, अतः यह संख्यात्मक अन्तर्भावना (input) है।

हमारा डिकोड: पाप/शुभ का यह विभाजन एक स्वभाव-वर्गीकरण है — हमारा अनुशासन इसे सटीक अन्तर्भावना (कौन ग्रह नैसर्गिक पाप/सौम्य, उनका षड्बल) के रूप में रखता है और व्याख्यात्मक फल से पृथक करता है। "भार्या न जीवति" को हम केवल शास्त्र के सशर्त कथन के रूप में प्रस्तुत करते हैं — न भय, न नियति, न अनुमोदित भविष्यवाणी।

24.8
लग्नेशेऽष्टमगे जातः सिद्धविद्याविशारदः।
रोगी चौरो महाक्रोधी द्यूती च परदारगः
lagneśe'ṣṭamage jātaḥ siddhavidyāviśāradaḥ|
rogī cauro mahākrodhī dyūtī ca paradāragaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेश = लग्न-स्वामी (D1-स्वामी); अष्टमगे = अष्टम भाव में स्थित; जातः = उत्पन्न / जातक; सिद्धविद्याविशारदः = सिद्ध-विद्या में निपुण; रोगी = रोग-युक्त; चौरः = चोर-स्वभाव; महाक्रोधी = अत्यन्त क्रोधी; द्यूती = जुआरी; परदारगः = पर-स्त्री-गामी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब लग्नेश अष्टम भाव में हो, तो जातक सिद्ध-विद्या में निपुण कहा जाता है। उसी स्थानन्यास के साथ रोग, चोर-वृत्ति, तीव्र क्रोध, द्यूत-सेवन और पर-स्त्री-संसर्ग के लक्षण भी पाठ में जुड़े हैं। यह अष्टम-स्थित लग्नेश का मिश्रित फल-कथन है — एक ओर occult/सिद्ध-ज्ञान की कुशलता, दूसरी ओर शरीर-व्यवहार के कष्ट-पक्ष। शुभ दृष्टि-योग या अन्य बल का उल्लेख यहाँ नहीं; केवल भाव-स्वामी की स्थिति पर आधारित कथन है।

English rendering The text states that when the lagna-lord occupies the eighth house, the native is described as skilled in siddha-lore, yet also as sickly, thievish, hot-tempered, given to gambling, and drawn to another’s spouse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अष्टम-भाव में लग्नेश = “लग्न-स्वामी की राशि-स्थिति = 8th from Lagna” — केवल भाव-स्थान का नियम; यहाँ कोई अंश-सूत्र या बल-मात्रा नहीं दी गई।

24.9
लग्नेशे भाग्यगे जातो भाग्यवाञ्जनवल्लभः।
विष्णुभक्तः पटुर्वाग्मी दारपुत्रधनैर्युतः
lagneśe bhāgyage jāto bhāgyavāñjanavallabhaḥ|
viṣṇubhaktaḥ paṭurvāgmī dāraputradhanairyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी में; भाग्यगे = नवम (भाग्य) भाव में स्थित; जातः = जातक; भाग्यवान् = भाग्यशाली; जनवल्लभः = जन-प्रिय; विष्णुभक्तः = विष्णु-भक्त; पटुः = चतुर / कुशल; वाग्मी = वाक्-पटु; दारपुत्रधनैः = पत्नी, पुत्र और धन से; युतः = युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नेश जब भाग्य-भाव (नवम) में हो, तो जातक भाग्यवान् और लोगों में प्रिय कहा जाता है। विष्णु-भक्ति, चातुर्य और वाक्-कुशलता का उल्लेख साथ है। दार, पुत्र और धन से युक्त होना — यही इस श्लोक का केन्द्रीय फल-चित्र है। नवम को भाग्य-स्थान मानकर लग्नेश की वहाँ स्थिति को शुभ फल-वर्ग में रखा गया है।

English rendering The text states that with the lagna-lord in the ninth (bhāgya), the native is fortunate, beloved of people, a devotee of Viṣṇu, skilled and eloquent, and endowed with spouse, children, and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “भाग्य” = 9th from Lagna; लग्नेश-भाग्य-योग यहाँ केवल भाव-स्वामी-स्थान का वर्णनात्मक फल है, गणना-सूत्र नहीं।

24.10
लग्नेशे दशमे जातः पितृसौख्यसमन्वितः।
नृपमान्यो जने ख्यातः स्वार्जितस्वो न संशयः
lagneśe daśame jātaḥ pitṛsaukhyasamanvitaḥ|
nṛpamānyo jane khyātaḥ svārjitasvo na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी; दशमे = दशम भाव में; जातः = जातक; पितृसौख्य = पिता से सुख; समन्वितः = युक्त; नृपमान्यः = राजा / शासन से सम्मानित; जने = लोक में; ख्यातः = प्रसिद्ध; स्वार्जितस्वः = स्व-अर्जित धन/स्वत्व; न संशयः = इसमें संदेह नहीं (पाठ का बल-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नेश दशम में हो तो पिता-सुख से युक्त जातक का वर्णन है। नृप-मान, लोक-ख्याति और स्व-अर्जित संपत्ति — ये तीन फल एक साथ जुड़े हैं। “न संशयः” पाठ का अपना आग्रह है कि स्वार्जित-स्व का फल निश्चयपूर्वक कहा गया है; यह हमारे पूर्वानुमान का दावा नहीं। दशम कर्म-कीर्ति-स्थान होने से लग्नेश की वहाँ स्थिति को प्रतिष्ठा और आत्म-अर्जन से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the lagna-lord is in the tenth, the native enjoys paternal happiness, is honored by rulers, famed among people, and possesses self-earned wealth — “no doubt,” as the verse itself asserts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दशम = 10th from Lagna; यहाँ केवल भाव-स्वामी-फल, कोई दशा-वर्ष या बल-रূপ नहीं।

24.11
लग्नेशे लाभगे जातः सदा लाभसमन्वितः।
सुशीलः ख्यातकीर्तिश्च बहुदारगुणैर्युतः
lagneśe lābhage jātaḥ sadā lābhasamanvitaḥ|
suśīlaḥ khyātakīrtiśca bahudāraguṇairyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी; लाभगे = एकादश (लाभ) भाव में स्थित; जातः = जातक; सदा = निरन्तर; लाभसमन्वितः = लाभ से युक्त; सुशीलः = सुशील / उत्तम आचरण; ख्यातकीर्तिः = प्रसिद्ध कीर्ति वाला; बहुदारगुणैः = अनेक दार-गुणों / बहु-पत्नी-गुणों से; युतः = युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नेश लाभ-भाव (एकादश) में हो तो जातक सदा लाभ से युक्त कहा जाता है। सुशीलता और ख्यात कीर्ति का उल्लेख साथ है। “बहुदारगुणैर्युतः” — बहु-दार या दार-संबंधी गुण-समृद्धि — पाठ का फल-पद है; इसे आधुनिक सामाजिक-निर्देश के रूप में न पढ़ें। एकादश लाभ-स्थान होने से लग्नेश की वहाँ स्थिति को निरन्तर प्राप्ति और लोक-ख्याति से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that with the lagna-lord in the eleventh (lābha), the native is always associated with gains, of good character, of noted fame, and endowed with manifold spousal qualities (or many spouses, per the wording).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। लाभ-भाव = 11th from Lagna; “सदा लाभ” शास्त्रीय फल-भाषा है, कोई संख्यात्मक लाभ-सूत्र नहीं।

24.12
लग्नेशे व्ययभावस्थे देहसौख्यविवर्जितः।
व्यर्थव्ययी महाक्रोधी शुभदृग्‌योगवर्जिते
lagneśe vyayabhāvasthe dehasaukhyavivarjitaḥ|
vyarthavyayī mahākrodhī śubhadṛg‌yogavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययभावस्थे = व्यय (द्वादश) भाव में स्थित; देहसौख्यविवर्जितः = देह-सुख से रहित; व्यर्थव्ययी = व्यर्थ (निष्फल) व्यय करने वाला; महाक्रोधी = अत्यन्त क्रोधी; शुभदृग्योगवर्जिते = शुभ-दृष्टि एवं शुभ-योग से रहित होने पर।

हिन्दी भावार्थ द्वादश (व्यय) भाव में लग्नेश हो तो शास्त्र कहता है जातक देह-सुख से रहित, व्यर्थ-व्ययी तथा अत्यन्त क्रोधी होता है — विशेषतः तब, जब वह शुभ-दृष्टि एवं शुभ-योग से रहित हो। यह अन्तिम शर्त फल को सशर्त बनाती है।

English rendering With the ascendant lord in the 12th (loss) house, the text states the native lacks bodily comfort, spends wastefully and is very wrathful — especially when devoid of benefic aspect and benefic yoga.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — सशर्त फल-कथन। "शुभदृग्योगवर्जिते" शर्त बताती है कि अशुभ फल शुभ-दृष्टि/योग के अभाव पर टिका है — पुनः बलाबल-सापेक्ष।

हमारा डिकोड: इस अध्याय की बारह लग्नेश-स्थितियों में षष्ठ (24.6), सप्तम (24.7) एवं द्वादश (24.12) — तीन स्थान स्पष्टतः फल को शुभ/पाप-दृष्टि व योग पर द्वार-रुद्ध (gated) करते हैं। हमारा षड्बल-इंजन इस "शुभ-दृष्टि/योग" को एक गणना-निष्पन्न दृग्बल-मान बनाता है; व्याख्यात्मक फल तभी लागू होता है जब वह मान स्थिर हो जाए। ऋणात्मक फल को भी हम केवल शास्त्र के सशर्त कथन के रूप में रखते हैं, नियति के रूप में नहीं।

24.13
धनेशे लग्नगे जातः पुत्रवान्‌ धनसंयुतः।
कुटुम्बकण्टकः कामी निष्ठुरः परकार्यकृत्‌
dhaneśe lagnage jātaḥ putravān‌ dhanasaṃyutaḥ|
kuṭumbakaṇṭakaḥ kāmī niṣṭhuraḥ parakāryakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = धन (द्वितीय) भाव का स्वामी; लग्नगे = लग्न (प्रथम) भाव में स्थित; पुत्रवान् = पुत्रयुक्त; धनसंयुतः = धन से युक्त; कुटुम्बकण्टकः = कुटुम्ब के लिए कण्टक (परिवार-विरोधी); कामी = कामनाशील; निष्ठुरः = कठोर/निर्दय; परकार्यकृत् = दूसरों के कार्य में लगा रहने वाला।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से क्रम लग्नेश से धनेश की ओर मुड़ता है — द्वितीयेश (धनेश) लग्न भाव में हो तो शास्त्र कहता है जातक पुत्रवान् एवं धनी होता है, किन्तु कुटुम्ब के लिए कण्टक-सदृश, कामी, निष्ठुर तथा परकार्य में लगा रहने वाला कहा गया है।

English rendering Now the second lord: with the lord of the 2nd (wealth) in the ascendant, the text states the native has sons and wealth, yet is a thorn to his own family, passionate, harsh, and busy with others' affairs.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ अध्याय लग्नेश-क्रम से धनेश-क्रम में संक्रमण करता है; प्रत्येक "भावेश" पुनः एक गणना-निष्पन्न राशि-स्वामी है, फल उस पर शास्त्र का कथन।

हमारा डिकोड: यह श्लोक भावेश-फल की व्यवस्थित मैट्रिक्स (12 भाव-स्वामी × 12 भाव — एक निर्धारक 12×12 जाली) का द्वितीयेश-खण्ड आरम्भ करता है। हमारा इंजन प्रत्येक भाव-स्वामी को पहले विशुद्ध D1 (ṣoḍaśa-varga) गणना से स्थिर करता है, और उसके बाद ही शास्त्र का फल-कथन लागू करता है — गणित-निष्पन्न स्थान तथा व्याख्यात्मक फल सदैव पृथक्।

24.14
धनेशे धनगे जातो धनवान्‌ गर्वसंयुतः।
द्विभार्यो बहुभार्यो वा सुतहीनः प्रजायते
dhaneśe dhanage jāto dhanavān‌ garvasaṃyutaḥ|
dvibhāryo bahubhāryo vā sutahīnaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीय भाव (धन–कुटुम्ब–वाक्) का स्वामी; धनगे = द्वितीय भाव में स्थित (स्व-भाव में); जातः = जातक; धनवान् = धन-सम्पन्न; गर्व-संयुतः = अभिमान से युक्त; द्वि-भार्यः = दो पत्नियों वाला; बहु-भार्यः वा = अथवा अनेक पत्नियों वाला; सुत-हीनः = पुत्र-रहित; प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ जब धन का स्वामी अपने ही (द्वितीय) भाव में बैठता है, तो धन की जड़ें गहरी होती हैं—पर उसके साथ अहंकार भी चला आता है। शास्त्र कहता है कि ऐसा जातक धनी होकर भी दो या अनेक विवाह तक पहुँच सकता है और पुत्र-सुख में न्यूनता पा सकता है। यह पाठ का कथन है, कोई नियति-निर्णय नहीं।

English rendering When the lord of the 2nd (wealth) house occupies its own house, wealth is firmly rooted but attended by pride; the text states such a native is affluent yet may take two or more wives and remain wanting in sons.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी बिन्दु: भावेश का अपने ही भाव में होना स्व-क्षेत्र स्थिति है—कारक और भाव एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं, अतः यह किसी ग्रह की सर्वाधिक स्थान-दृढ़ स्थितियों में से एक है।

हमारा डिकोड: भावेश का स्व-भाव में बैठना वही स्थान-बल की चरम दशा है जिसे हमारे षड्बल मॉडल (दोसियर §4) में स्व-क्षेत्र/स्व-उच्च के रूप में रूप-विरूप में अंकित किया जाता है (1 रूप = 60 विरूप)। यहाँ द्वितीयेश-इन-द्वितीय उसी भाव-दृढ़ता का शुद्ध उदाहरण है—किन्तु बल की गणना और फल की व्याख्या को अलग रखने का अनुशासन (§5) यहीं लागू है: दृढ़ता गणनीय, "गर्व/सुतहीनता" शास्त्र का दावा।

24.15
धनेशे सहजे जातो विक्रमी मतिमान्‌ गुणी।
कामी लोभी शुभाढ्‌ये च पापाढ्‌ये देवनिन्दकः
dhaneśe sahaje jāto vikramī matimān‌ guṇī|
kāmī lobhī śubhāḍh‌ye ca pāpāḍh‌ye devanindakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीय-भावेश (धन-स्वामी); सहज = तृतीय भाव; विक्रमी = पराक्रमी / साहसी; मतिमान् = बुद्धिमान्; गुणी = गुणसम्पन्न; कामी = काम-प्रवण; लोभी = लालची; शुभाढ्य = शुभ-ग्रह-युक्त; पापाढ्य = पाप-ग्रह-युक्त; देवनिन्दक = देवनिन्दा करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब धन-स्वामी तृतीय भाव में हो, तो जातक विक्रमी, मतिमान् और गुणी कहा जाता है। यदि वही धनेश शुभ ग्रहों से युक्त हो तो पाठ कामी-लोभी फल भी जोड़ता है; और यदि पाप ग्रहों से युक्त हो तो देवनिन्दक कहा गया है। यह तृतीय-स्थित धनेश का फल-भेद है—शुभ/पाप संगति से स्वभाव-वर्णन बदलता है।

English rendering The text states that when the 2nd lord occupies the 3rd house, the native is described as valiant, intelligent, and endowed with good qualities. With benefics, the same placement is said to mark desire and greed; with malefics, to mark one who reviles the gods.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनेश-तृतीय + शुभ/पाप-योग)। भाव-स्वामी × भाव-स्थिति + ग्रह-गुण (शुभ/पाप) का शास्त्रीय फल-विन्यास; यहाँ कोई अंश-भाग, वर्ग-सूत्र या बल-इकाई नहीं।

24.16
धनेशे सुखभावस्थे सर्वसम्पतसमन्वितः।
गुरुणा संयुते स्वोच्चे राजतुल्यो नरो भवेत्‌
dhaneśe sukhabhāvasthe sarvasampatasamanvitaḥ|
guruṇā saṃyute svocce rājatulyo naro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीयेश; सुख-भाव-स्थे = चतुर्थ भाव (सुख–माता–गृह) में; सर्व-सम्पत्-समन्वितः = समस्त सम्पदा से युक्त; गुरुणा संयुते = बृहस्पति के साथ युति में; स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में स्थित; राज-तुल्यः = राजा-समान; नरः भवेत् = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ द्वितीयेश चतुर्थ भाव में हो तो सब प्रकार की सम्पदा का योग शास्त्र कहता है। और यदि वह गुरु से युत हो तथा अपनी उच्च राशि में स्थित हो, तो जातक राजा-तुल्य कहा गया है—यहाँ फल की तीव्रता स्पष्टतः बल व शुभ-युति पर आश्रित है।

English rendering The 2nd lord in the 4th confers all manner of prosperity; joined by Jupiter and set in its own exaltation, the person is declared king-like.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बल-सापेक्ष)। तकनीकी बिन्दु: "स्वोच्च" (उच्च राशि) और गुरु-युति दोनों गणनीय गरिमा-अवयव हैं—फल की श्रेष्ठता इन्हीं पूर्व-शर्तों पर टिकी है, न कि केवल भाव-स्थिति पर।

हमारा डिकोड: "स्वोच्च + गुरु-युति" ठीक वही उच्च-बल/स्थान-बल है जिसे हमारे षड्बल इंजन (दोसियर §4) में रूप-विरूप में तौला जाता है। शास्त्र का "राजतुल्य" फल एक दावा है; उसकी पूर्व-शर्त (उच्चता, शुभ-योग) गणनीय है और फल व्याख्यात्मक—इन दोनों को अलग रखना (§5) ही यहाँ का अनुशासन है, ताकि गरिमा-गणना और फल-कथन गड्ड-मड्ड न हों।

24.17
धनेशे सुतभावस्थे जातो धनसमन्वितः।
धनोपार्जनशीलाश्च जायन्ते तत्सुता अपि
dhaneśe sutabhāvasthe jāto dhanasamanvitaḥ|
dhanopārjanaśīlāśca jāyante tatsutā api

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीयेश; सुतभाव = पञ्चम भाव; जात = जातक; धनसमन्वित = धन से युक्त; धनोपार्जनशील = धन-अर्जन में प्रवृत्त; तत्सुता = उसके पुत्र/संतति; अपि = भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब धनेश सुत-भाव (पञ्चम) में हो, तो जातक धन से युक्त कहा जाता है। पाठ आगे कहता है कि उसकी संतति भी धनोपार्जन-शील होती है। पञ्चम-स्थित धन-स्वामी को यहाँ जातक और पुत्र—दोनों के अर्थ-प्रवाह से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the 2nd lord occupies the 5th (suta) house, the native is said to be endowed with wealth. It further states that that person’s children also become inclined to the earning of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनेश-पञ्चम → धन + संतति-फल)। भाव-स्वामी की स्थिति का द्वि-स्तरीय फल—स्वयं और “तत्सुता”—बिना किसी अंश-गणना के वर्णित है।

24.18
धनेशे रिपुभावस्थे सशुभे शत्रुतो धनम्‌।
सपापे शत्रुतो हानिर्जंघावैकल्यवान्‌ भवेत्‌
dhaneśe ripubhāvasthe saśubhe śatruto dhanam‌|
sapāpe śatruto hānirjaṃghāvaikalyavān‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीयेश; रिपु-भाव-स्थे = षष्ठ भाव (शत्रु–रोग–ऋण) में; स-शुभे = शुभग्रह-सहित होने पर; शत्रुतः धनम् = शत्रु से धन-प्राप्ति; स-पापे = पापग्रह-सहित होने पर; शत्रुतः हानिः = शत्रु से हानि; जंघा-वैकल्यवान् = जंघा (पिंडली/टाँग) में विकलता वाला।

हिन्दी भावार्थ द्वितीयेश छठे भाव में हो तो फल संसर्ग पर निर्भर है। शुभ ग्रह के साथ हो तो शत्रु से भी धन मिलना शास्त्र कहता है; पाप ग्रह के साथ हो तो शत्रु से हानि और जंघा-सम्बन्धी विकलता तक की सम्भावना कही गई है। यह पाठ का सशर्त कथन है।

English rendering The 2nd lord in the 6th, if with a benefic, brings wealth even through enemies; if with a malefic, loss through enemies and a defect of the shank.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सापेक्ष)। तकनीकी बिन्दु: फल का चिह्न "स-शुभ ↔ स-पाप" इनपुट से उलटता है—एक बूलियन शर्त पर फल का ध्रुव-परिवर्तन, कोई स्थिर विधान नहीं।

हमारा डिकोड: यही द्वि-मुखी "शुभ बनाम पाप" रचना बलाबल-विवेक की बीज-संरचना है, जिसे यह अध्याय अपने अन्तिम श्लोकों (145–148) में सूत्रबद्ध करता है—पूर्ण बल पर पूर्ण, अर्ध पर अर्ध फल। शुभ/पाप की युति-दृष्टि हमारे दृग्-बल/संसर्ग-निवेश जैसी है (दोसियर §4–§5): निवेश गणनीय, निर्गत फल शास्त्र का सापेक्ष कथन—दोनों को मिलाना नहीं।

24.19
धनेशे सप्तमे जातः परदाररतो भिषेक्‌।
पापेक्षितयुते तस्य भार्या च व्यभिचारिणी
dhaneśe saptame jātaḥ paradārarato bhiṣek‌|
pāpekṣitayute tasya bhāryā ca vyabhicāriṇī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीयेश; सप्तम = सप्तम भाव; परदाररत = पर-स्त्री-आसक्त (पाठ); भिषक् (भिषेक्) = वैद्य / चिकित्सक (पाठ-रूप); पापेक्षितयुते = पाप-दृष्ट/युक्त; भार्या = पत्नी; व्यभिचारिणी = व्यभिचार-प्रवृत्त (पाठ का पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—धनेश जब सप्तम में हो, तो जातक परदार-रत और भिषक् (वैद्य) कहा जाता है। यदि वही धनेश पाप-दृष्टि या पाप-योग से युक्त हो, तो पाठ उसकी भार्या को व्यभिचारिणी कहता है। यह सप्तम-स्थित धन-स्वामी का संबंध-फल है—शास्त्र का कथन, न कि किसी व्यक्ति पर लगाया गया आरोप या नैतिक निर्णय।

English rendering The text states that when the 2nd lord is in the 7th, the native is said to be attached to another’s spouse and to be a physician (bhiṣak; reading भिषेक् likely भिषक्—पाठ-भेद संभव). If that lord is joined with or aspected by malefics, the text further states that the wife is unchaste. These are classical phala lines, not personal judgments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनेश-सप्तम + पाप-दृष्टि/योग)। सप्तम = कलत्र-स्थान; “पापेक्षितयुते” दृष्टi/युति की शास्त्रीय शर्त है, कोई संख्यात्मक बल-सीमा नहीं।

24.20
धनेशेऽष्टमगे जातो भूरिभूमिधनैर्युतः।
पत्नीसुखं भवेत्‌ स्वल्पं ज्येष्ठभ्रातृसुखं न हि
dhaneśe'ṣṭamage jāto bhūribhūmidhanairyutaḥ|
patnīsukhaṃ bhavet‌ svalpaṃ jyeṣṭhabhrātṛsukhaṃ na hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीयेश; अष्टमग = अष्टम भाव-स्थित; भूरि = प्रचुर; भूमि = भूमि / जमीन; धनैः = धन से; युत = संयुक्त; पत्नीसुख = पत्नी से सुख; स्वल्प = अल्प; ज्येष्ठभ्रातृ = ज्येष्ठ भ्राता; सुखं न हि = सुख नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—धनेश अष्टम में स्थित होने पर जातक प्रचुर भूमि और धन से युक्त कहा जाता है। उसी स्थिति में पत्नी-सुख स्वल्प और ज्येष्ठ भ्राता से सुख नहीं—ऐसा पाठ का फल है। अष्टम-स्थित धन-स्वामी को यहाँ संपत्ति-लाभ और निकट-संबंधों में अल्प-सुख—दोनों पक्षों से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the 2nd lord goes to the 8th house, the native is said to be endowed with abundant land and wealth. It also states that comfort from the wife is little and that there is no happiness from the elder brother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनेश-अष्टम → भूमि-धन + पत्नी/ज्येष्ठ-भ्रातृ-सुख-हानि)। अष्टम = आयु/रहस्य-स्थान; यहाँ फल वर्णनात्मक है, आयुर्दाय-सूत्र नहीं।

24.21
धनेशे धर्मभावस्थे धनवानुद्यमी पटुः।
बाल्ये रोगी सुखी पश्चात्‌ तीर्थधर्मव्रतादिकृत्‌
dhaneśe dharmabhāvasthe dhanavānudyamī paṭuḥ|
bālye rogī sukhī paścāt‌ tīrthadharmavratādikṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेश = द्वितीयेश; धर्मभाव = नवम भाव; धनवान् = धनी; उद्यमी = उद्यम-शील; पटु = चतुर / कुशल; बाल्ये = बचपन में; रोगी = रोग-युक्त (पाठ); सुखी पश्चात् = बाद में सुखी; तीर्थ = तीर्थ-यात्रा; धर्म = धर्म-कर्म; व्रत = व्रत; आदिकृत् = आदि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—धनेश जब धर्म-भाव (नवम) में हो, तो जातक धनवान्, उद्यमी और पटु कहा जाता है। पाठ जोड़ता है—बाल्यकाल में रोगी, पश्चात् सुखी; और तीर्थ, धर्म, व्रत आदि करने वाला। नवम-स्थित धन-स्वामी को यहाँ अर्थ-कौशल, काल-क्रम से स्वास्थ्य-सुख, और धर्म-प्रवृत्ति—तीनों से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the 2nd lord stands in the 9th (dharma) house, the native is said to be wealthy, industrious, and skilful. Sick in childhood and happy later, the person is further described as one who undertakes pilgrimages, dharma, vows, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनेश-नवम → धन-उद्यम + बाल्य-रोग / पश्चात्-सुख + तीर्थ-धर्म-व्रत)। “बाल्ये…पश्चात्” काल-क्रम का फल-विभाजन है; आयु-वर्ष की कोई संख्या यहाँ नहीं दी गई।

24.22
धनेशे कर्मगे जातः कामी मानी च पण्डितः।
बहुदार्यधनैर्युक्तः किञ्च पुत्रसुखोज्झितः
dhaneśe karmage jātaḥ kāmī mānī ca paṇḍitaḥ|
bahudāryadhanairyuktaḥ kiñca putrasukhojjhitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीय-भावेश (धन-स्वामी); कर्मगे = दशम-भाव (कर्म-स्थान) में स्थित; कामी = कामनाशील / विषय-रागी; मानी = अभिमानी / सम्मान-प्रिय; पण्डितः = विद्वान्; बहु-दार्य-धनैः = प्रचुर उदारता एवं धन से; युक्तः = संयुक्त; किञ्च = किन्तु / कुछ अंश में; पुत्र-सुख-उज्झितः = पुत्र-सुख से रहित / वंचित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब धन-भाव का स्वामी कर्म-भाव (दशम) में हो, तो जातक कामनाशील, अभिमानी और विद्वान् कहा जाता है। वह उदारता और धन-संपत्ति से युक्त रहता है। किन्तु उसी कथन में यह भी जोड़ा गया है कि पुत्र-सुख से कुछ अंश में वंचित रहता है। यह द्वितीयेश की दशम-स्थिति का फल-कथन है, न कि नियत भाग्य।

English rendering The text states that when the lord of the second house occupies the tenth (karma), the native is described as passionate, proud, and learned. He is said to be endowed with much liberality and wealth, yet somewhat bereft of happiness from sons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वितीयेश की दशम-स्थिति)। यहाँ केवल भाव-स्वामी और भाव-स्थान का युग्म फल के रूप में बँधा है; कोई अंश, वर्ग या बल-इकाई निर्दिष्ट नहीं।

24.23
धनेशे लाभभावस्थे सर्वलाभसमन्वितः।
सदोद्योगयुतो मानी कीर्तिमान्‌ जायते नरः
dhaneśe lābhabhāvasthe sarvalābhasamanvitaḥ|
sadodyogayuto mānī kīrtimān‌ jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीय-भावेश; लाभ-भाव-स्थे = एकादश (लाभ) भाव में स्थित; सर्व-लाभ-समन्वितः = समस्त लाभों से युक्त; सदा-उद्योग-युतः = निरन्तर उद्यम / प्रयास से युक्त; मानी = अभिमानी / सम्मान-प्रिय; कीर्तिमान् = कीर्ति-युक्त / यशस्वी; जायते नरः = पुरुष जन्म लेता है / होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब धन-स्वामी लाभ-भाव (एकादश) में स्थित हो, तो जातक सब प्रकार के लाभों से समन्वित कहा जाता है। वह सदैव उद्योग-प्रयास से जुड़ा, अभिमानी और कीर्तिमान् होता है—यह पाठ का फल-वर्णन है। द्वितीयेश-एकादश योग यहाँ “लाभ-संग्रह” और “उद्यम” के संकेत से बाँधा गया है।

English rendering The text states that when the second lord stands in the eleventh (lābha), the person is endowed with all manner of gains. He is described as ever industrious, proud, and possessed of fame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वितीयेश की एकादश-स्थिति)। “सर्वलाभ” यहाँ परिमाणात्मक सूत्र नहीं, शास्त्रीय गुण-सूचक है।

24.24
धनेशे व्ययभावस्थे साहमी धनवर्जितः।
परभाग्यरतस्तस्य ज्येष्ठापत्यसुखं नहि
dhaneśe vyayabhāvasthe sāhamī dhanavarjitaḥ|
parabhāgyaratastasya jyeṣṭhāpatyasukhaṃ nahi
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशे = द्वितीयेश; व्ययभावस्थे = द्वादश भाव में स्थित; साहसी (पाठ "साहमी" — पाठ-भेद संभव) = साहसी/दुस्साहसी; धनवर्जितः = धन-रहित; परभाग्यरतः = पराये भाग्य पर निर्भर/पर-सम्पत्ति में रत; तस्य = उसके; ज्येष्ठापत्यसुखं नहि = ज्येष्ठ सन्तान का सुख नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीयेश द्वादश भाव में हो तो जातक साहसी किन्तु धन-रहित होता है, दूसरों के भाग्य पर निर्भर रहता है, और उसे ज्येष्ठ सन्तान का सुख नहीं कहा गया है। भावेश-फल अध्याय में द्वितीयेश के बारह स्थानों की श्रृंखला का यह अन्तिम (द्वादश) पद है।

English rendering With the second lord in the twelfth house, the text describes the native as daring yet without wealth, dependent on the fortune of others, and lacking the happiness of an eldest child.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्थान सारणी: 2L ∈ भाव 12)।

24.25
लग्नगे सहजाधीशे स्वभुजार्जितवित्तवान्‌।
सेवाज्ञः साहसी जातो विद्याहीनोऽपि बुद्धिमान्‌
lagnage sahajādhīśe svabhujārjitavittavān‌|
sevājñaḥ sāhasī jāto vidyāhīno'pi buddhimān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नगे = लग्न (प्रथम भाव) में स्थित; सहज-अधीशे = तृतीय-भावेश (सहज / पराक्रम-स्थान का स्वामी); स्व-भुज-अर्जित = स्वयं की भुजाओं / पुरुषार्थ से अर्जित; वित्तवान् = धनवान्; सेवाज्ञः = सेवा / कार्य-कुशल; साहसी = साहस-युक्त; विद्या-हीनः अपि = विद्या से हीन होने पर भी; बुद्धिमान् = बुद्धिमान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब सहज-भाव (तृतीय) का स्वामी लग्न में हो, तो जातक अपने पुरुषार्थ से धन अर्जित करने वाला कहा जाता है। वह सेवा-कार्य में निपुण और साहसी बताया गया है। विद्या-संस्कार कम होने पर भी बुद्धिमान् कहा गया है—यह तृतीयेश-लग्न योग का फल-कथन है।

English rendering The text states that when the lord of the third house occupies the lagna, the native is wealthy through wealth earned by his own arms and effort. He is described as skilled in service and courageous; even if lacking formal learning, he is said to be intelligent.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश की लग्न-स्थिति)। भाव-स्वामी × भाव-स्थान का युग्म; कोई अंश-विभाग या बल-मान नहीं।

24.26
द्वितीये सहजाधीशे स्थूलो विक्रमवर्जितः।
स्वल्पारम्भी सुखी न स्यात्‌ परस्त्रीधनकामुकः
dvitīye sahajādhīśe sthūlo vikramavarjitaḥ|
svalpārambhī sukhī na syāt‌ parastrīdhanakāmukaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये = द्वितीय भाव में; सहज-अधीशे = तृतीयेश; स्थूलः = स्थूलकाय / मोटा या स्थूल-स्वभाव; विक्रम-वर्जितः = पराक्रम / विक्रम से रहित; स्वल्प-आरम्भी = अल्प आरम्भ करने वाला / छोटे उद्यमों वाला; सुखी न स्यात् = सुखी न हो; पर-स्त्री-धन-कामुकः = परस्त्री एवं परधन की कामना वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब तृतीयेश द्वितीय भाव में स्थित हो, तो जातक स्थूल और विक्रम-हीन कहा जाता है। अल्प आरम्भ वाला और सुख से वंचित बताया गया है। पाठ यह भी जोड़ता है कि वह परस्त्री और पर-धन की कामना से युक्त होता है—यह शास्त्र का फल-वर्णन है, नियति-घोषणा नहीं। भय या दोष-निश्चय का आग्रह यहाँ नहीं पढ़ना चाहिए; केवल भाव-स्वामी स्थिति का पारम्परिक फल है।

English rendering The text states that when the third lord stands in the second house, the native is described as stout and devoid of valor. He is said to undertake little, not to be happy, and to desire the women and wealth of others—as the śāstra’s phala statement, not a fate we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश की द्वितीय-स्थिति)। नैतिक-गुण सूची; कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

24.27
सहजे सहजाधीशे सहोदरसुखान्वितः।
धनपुत्रयुतो हृष्टो भुनक्ति सुखमद्‌भुतम्‌
sahaje sahajādhīśe sahodarasukhānvitaḥ|
dhanaputrayuto hṛṣṭo bhunakti sukhamad‌bhutam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहजे = तृतीय भाव में (सहज = भाई-बहन, पराक्रम का घर, 3rd); सहजाधीशे = तृतीयेश / तीसरे भाव का स्वामी (bhāveśa of the 3rd); सहोदर-सुख-अन्वितः = भाई-बहनों के सुख से युक्त; धन-पुत्र-युतः = धन और सन्तान से युक्त; हृष्टः = प्रसन्न; भुनक्ति = भोगता है; सुखम् अद्भुतम् = अद्भुत सुख।

हिन्दी भावार्थ जब तृतीय भाव का स्वामी अपने ही तीसरे भाव में स्थित हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक भाई-बहनों के सुख से सम्पन्न होता है, धन और सन्तान से युक्त रहता है, और प्रसन्न-चित्त होकर विलक्षण सुख भोगता है। यह भावेश का अपने ही भाव (स्वभाव) में बैठना है, जिससे उस भाव के कारकत्व पुष्ट माने जाते हैं।

English rendering With the lord of the 3rd house placed in the 3rd itself, the text states that the native enjoys the happiness of siblings, is blessed with wealth and children, and, cheerful of heart, tastes a wondrous ease of life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (bhāveśa-phala, भावेश का स्व-भाव योग)। यह अध्याय एक 12×12 का संयोजन-ग्रिड है — प्रत्येक भाव-स्वामी × प्रत्येक भाव; यहाँ का पद "भावेश स्वभाव-स्थ" है, अर्थात् किसी भाव का स्वामी उसी भाव में — एक स्थान-बल (sthāna-bala) की श्रेणी का सुदृढ़ योग।

उदाहरण (worked example) परिपाटी: भाव = राशि (whole-sign / समराशि गृह), लग्न से गणना। मान लीजिए लग्न = मेष। तीसरा भाव (सहज) = मेष से 3री राशि = मिथुन; मिथुन का स्वामी = बुध ⇒ सहजाधीश = बुध। "तृतीयेश तृतीय में" का अर्थ हुआ बुध का मिथुन (स्व-क्षेत्र) में होना। अतः मेष-लग्न में बुध का मिथुन-स्थ होना इस श्लोक का मूर्त रूप है।

हमारा डिकोड (Our Decode) किसी भी भावेश-फल की पहली शर्त है "भावेश कौन" — यह D1 (राशि-वर्ग) पर शुद्ध मॉड्युलर गणना है: भाव-राशि निकालो, उसका अधिपति निकालो। यही निर्धारण हमारे षोडश-वर्ग इंजन का D1-आधार है (kaal_ekavimshati_varga.py)। और "स्वभाव-स्थ भावेश" का बल-पक्ष अध्याय के अन्त (बलाबल-विवेक, 24.145–148) व षड्बल (Ch.27) की उसी नीति से जुड़ता है — फल को बल के तराज़ू पर तौलो, अन्धाधुन्ध नहीं।

24.28
सुखस्थे सहजाधीशे सुखी च धनसंयुतः।
मतिमान्‌ जायते बालो दुष्टभार्यापतिश्च सः
sukhasthe sahajādhīśe sukhī ca dhanasaṃyutaḥ|
matimān‌ jāyate bālo duṣṭabhāryāpatiśca saḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख-स्थे = चतुर्थ (सुख) भाव में स्थित; सहज-अधीशे = तृतीयेश; सुखी = सुख-युक्त; धन-संयुतः = धन से संयुक्त; मतिमान् = बुद्धिमान्; जायते बालः = बालक (जातक) होता है; दुष्ट-भार्या-पतिः = दुष्ट पत्नी का पति; च सः = और वह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब तृतीयेश सुख-भाव (चतुर्थ) में हो, तो जातक सुखी और धन-संयुक्त कहा जाता है। वह मतिमान् (बुद्धिमान्) बालक/पुरुष बताया गया है। उसी पद्य में यह भी कहा गया है कि वह दुष्ट-भार्या का पति होता है—यह पाठ का मिश्रित फल-कथन है; न तो सुख-भाग को नियत गारंटी समझें, न द्वितीय अंश को भय-वाक्य। केवल चतुर्थ-स्थित तृतीयेश का शास्त्रीय वर्णन है।

English rendering The text states that when the third lord stands in the fourth (sukha), the native is happy and endowed with wealth. He is said to be intelligent; the same verse also states that he becomes the husband of a wicked wife—reported as the śāstra’s claim, not as destiny or a prediction we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश की चतुर्थ-स्थिति)। सुख-धन-मति और दाम्पत्य-गुण एक ही स्थिति-फल में जुड़े हैं; कोई बल-इकाई या काल-सूत्र नहीं।

24.29
सुतस्थे सहजाधीशे पुत्रवान्‌ गुणसंयुतः।
भार्या तस्य भवेत्‌ क्रूरा क्रूरग्रहयुतेक्षिते
sutasthe sahajādhīśe putravān‌ guṇasaṃyutaḥ|
bhāryā tasya bhavet‌ krūrā krūragrahayutekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतस्थे = पुत्र-भाव (5वें) स्थित; सहजाधीशे = तृतीयेश (सहज/भ्रातृ-भाव का स्वामी); पुत्रवान् = पुत्र-युक्त; गुणसंयुतः = गुणों से युक्त; भार्या = पत्नी; क्रूरा = कठोर/कठिन स्वभाव वाली; क्रूरग्रह-युतेक्षिते = पाप-ग्रह से युक्त या दृष्ट होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सहजाधीश (तृतीयेश) सुत-भाव अर्थात् पंचम में स्थित हो, तो जातक पुत्रवान् और गुण-संपन्न होता है। उसी स्थिति में यदि तृतीयेश क्रूर-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है कि उसकी भार्या क्रूर-स्वभाव वाली होती है। यहाँ फल-कथन दो शर्तों में बँटा है — शुद्ध स्थिति में पुत्र-गुण, और क्रूर-संयोग/दृष्टि पर भार्या-स्वभाव का कठोर वर्णन।

English rendering The text states that when the lord of the third is placed in the fifth (the house of offspring), the native is endowed with sons and virtues. If that same third-lord is joined or aspected by malefics, the text states that the wife is harsh in nature.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश का पंचम-स्थान फल, क्रूर-युति/दृष्टि की उप-शर्त सहित)। भाव-स्वामी की स्थिति और युति/दृष्टि की शर्त को केवल शास्त्रीय फल-वाक्य के रूप में पढ़ें; इसे नियति या निदान न मानें।

24.30
षष्ठभावे त्र्तीयेशे भ्रातृशत्रुर्महाधनी।
मातुलैश्च समं वैरं मातुलानीप्रियो नरः
ṣaṣṭhabhāve trtīyeśe bhrātṛśatrurmahādhanī|
mātulaiśca samaṃ vairaṃ mātulānīpriyo naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठभावे = षष्ठ-भाव में; तृतीयेशे (पाठ: त्र्तीयेशे) = तृतीय-भावेश; भ्रातृशत्रुः = भाइयों का शत्रु; महाधनी = अत्यन्त धनवान्; मातुलैः समं वैरं = मामाओं से वैर; मातुलानी-प्रियः = मामी (मातुल-पत्नी) का प्रिय; नरः = पुरुष/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब तृतीयेश षष्ठ-भाव में हो, तो जातक भाइयों के प्रति शत्रुता रखता है, किन्तु महाधनी होता है। मामाओं से वैर रहता है, जबकि मातुलानी (मामी) के प्रति वह प्रिय रहता है। पाठ में «त्र्तीयेशे» लेखन-रूप है — अर्थ स्पष्टतः तृतीयेश ही है; पाठ-भेद/मुद्रण-भेद संभव।

English rendering The text states that when the third-lord occupies the sixth, the native is hostile to brothers yet very wealthy. There is enmity with maternal uncles, while the native is dear to the maternal aunt (wife of the maternal uncle). Reading «त्र्तीयेशे» is treated as तृतीयेश; minor scribal variation is possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश का षष्ठ-स्थान: भ्रातृ-शत्रुता, धन, मातुल-वैर, मातुलानी-प्रियता)। षष्ठ की शास्त्रीय प्रकृति (शत्रु/ऋण/रोग-क्षेत्र) यहाँ फल-भाषा में ही व्यक्त है; गणना या बल-सूत्र नहीं है।

24.31
सप्तमे सहजाधीशे राजसेवापरो नरः।
बाल्ये दुःखी सुखी चान्ते जायते नाऽत्र संशयः
saptame sahajādhīśe rājasevāparo naraḥ|
bālye duḥkhī sukhī cānte jāyate nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे = सप्तम-भाव में; सहजाधीशे = तृतीयेश; राजसेवापरः = राज-सेवा में लगा हुआ; बाल्ये दुःखी = बचपन में दुःखी; सुखी चान्ते = अन्त में/परवर्ती काल में सुखी; जायते = होता है; नाऽत्र संशयः = इसमें संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सहजाधीश सप्तम में स्थित हो, तो जातक राज-सेवा में रत रहता है। बाल्यकाल में दुःख और जीवन के उत्तर-भाग में सुख — ऐसा फल शास्त्र निश्चय-पूर्वक कहता है («नाऽत्र संशयः» उसी निश्चय की शैली है, न कि आधुनिक नियति-घोषणा)। सेवा-क्षेत्र और काल-क्रम (बाल्य → अन्त) दोनों यहाँ फल के दो स्तम्भ हैं।

English rendering The text states that when the third-lord is in the seventh, the native is devoted to royal service. Unhappy in childhood and happy later — so the śāstra affirms without hesitation in its own diction; the verse marks sequence of experience, not a modern claim of inevitable fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश-सप्तम: राजसेवा; बाल्य-दुःख / अन्त-सुख का काल-क्रम)। «नाऽत्र संशयः» शास्त्रीय दृढ़-कथन-मुद्रा है; इसे ज्योतिष-गणना का स्थिरांक न समझें।

24.32
अष्टमे सहजाधीशे जातश्चैरो नरो भवेत्‌।
दासवृत्त्योपजीवी च राजद्वारे मृतिर्भवेत्‌
aṣṭame sahajādhīśe jātaścairo naro bhavet‌|
dāsavṛttyopajīvī ca rājadvāre mṛtirbhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमे = आठवें (रन्ध्र/मृत्यु) भाव में (8th, दुःस्थान); सहजाधीशे = तृतीयेश; जातः चौरः नरः भवेत् = जातक चोर हो सकता है; दास-वृत्त्या-उपजीवी = दास-वृत्ति से जीविका चलाने वाला; राज-द्वारे मृतिः भवेत् = राजद्वार पर (राज-दण्ड से) मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ तृतीयेश यदि अष्टम भाव में हो, तो शास्त्र का कथन कठोर है — यह पद चोरी की प्रवृत्ति, दास-वृत्ति से जीवनयापन, और राजद्वार पर मृत्यु का उल्लेख करता है। यहाँ स्पष्ट विवेक आवश्यक है: यह शास्त्र का फल-कथन है, कोई अटल भविष्यवाणी या भय-वचन नहीं; इसे "पाठ ऐसा कहता है" रूप में ही ग्रहण करें।

English rendering With the 3rd lord in the 8th, the text states the native may turn to theft, live by servitude, and meet his death at the king's gate — a claim of the śāstra, not a verdict of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश दुःस्थान-स्थ, 8वाँ)। तकनीकी वर्ग यह है — पराक्रम-भाव का स्वामी मृत्यु/विच्छेद-स्थान (8) में; ऐसे तीव्र पदों का बल-निर्धारण अनिवार्यतः बलाबल-विवेक (24.145–148) की माँग करता है, एकल श्लोक अन्तिम शब्द नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारे डिकोड की केन्द्रीय अनुशासन-रेखा का उदाहरण है: गणित को व्याख्या से पृथक् रखो। भावेश का स्थान एक निर्धार्य गणना है (D1 राशि → अधिपति → भाव), किन्तु "चौर/मृत्यु" जैसा फल शास्त्र का दावा है — इसे भय, नियति या भविष्यवाणी की तरह नहीं, "शास्त्र यह कहता है" की तरह प्रस्तुत करना ही हमारी नीति है (operator CLAUDE.md + oracle discipline)। यही वह रेखा है जो गणक-सत्य को व्याख्या-भाषा से अलग रखती है।

24.33
नवमे सहजाधीशे पितुः सुखविवर्जितः।
स्त्रीभिर्भाग्योदयस्तस्य पुत्रादिसुखसंयुतः
navame sahajādhīśe pituḥ sukhavivarjitaḥ|
strībhirbhāgyodayastasya putrādisukhasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवमे = नवें (भाग्य/धर्म/पितृ) भाव में (9th, त्रिकोण); सहजाधीशे = तृतीयेश; पितुः सुख-विवर्जितः = पिता के सुख से रहित; स्त्रीभिः भाग्य-उदयः = स्त्रियों (पत्नी/नारी-वर्ग) के द्वारा भाग्योदय; तस्य = उसका; पुत्रादि-सुख-संयुतः = पुत्र आदि के सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ तृतीयेश के नवम (भाग्य) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक को पिता का सुख कम मिलता है, किन्तु स्त्री (पत्नी अथवा नारी-सम्बन्ध) के माध्यम से उसका भाग्योदय होता है, और वह पुत्रादि के सुख से सम्पन्न रहता है। नवम भाव पिता एवं भाग्य दोनों का सूचक है, अतः दोनों पक्ष एक साथ कहे गए हैं।

English rendering With the 3rd lord in the 9th, the text states the native is bereft of paternal comfort, yet his fortune rises through women, and he is blessed with the happiness of children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश त्रिकोण-स्थ, 9वाँ)। तकनीकी संकेत — 9वाँ भाव एक साथ पितृ-कारक-स्थान और भाग्य-स्थान है; इसीलिए एक ही पद में पितृ-सुख की न्यूनता और भाग्योदय — दोनों विपरीत-दिखते फल संगत रूप से बैठते हैं।

24.34
दशमे सहजाधीशे जातः सर्वसुखान्वितः।
स्वभुजार्जिवित्तश्च दुष्टस्त्रीभरणे रतः
daśame sahajādhīśe jātaḥ sarvasukhānvitaḥ|
svabhujārjivittaśca duṣṭastrībharaṇe rataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = दसवें (कर्म) भाव में (10th, केन्द्र); सहजाधीशे = तृतीयेश; जातः सर्व-सुख-अन्वितः = सब सुखों से युक्त; स्व-भुज-अर्जित-वित्तः = अपनी भुजा से अर्जित धन वाला (स्वोपार्जित) — पाठ "स्वभुजार्जिवित्त" ; शुद्ध रूप "स्वभुजार्जितवित्त" (पाठ-भेद संभव); दुष्ट-स्त्री-भरणे रतः = दुष्ट स्त्रियों के भरण-पोषण में रत।

हिन्दी भावार्थ तृतीयेश के दशम (कर्म) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक समस्त सुखों से युक्त होता है और अपने पुरुषार्थ से धन अर्जित करता है। साथ ही यह भी जोड़ा गया है कि वह दुश्चरित्र स्त्रियों के पालन-पोषण में आसक्त रहता है — पुरुषार्थ-सम्पन्नता के बीच एक दोष-पक्ष।

English rendering With the 3rd lord in the 10th, the text states the native enjoys every comfort and wealth won by his own effort, yet remains attached to the upkeep of unworthy women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश केन्द्र-स्थ, 10वाँ)। तकनीकी दृष्टि — 3रा और 10वाँ दोनों उपचय/पुरुषार्थ-प्रधान भाव हैं (self-effort, कर्म); अतः "स्वभुजार्जित" (स्वोपार्जित धन) का बल इसी संयोग से उभारा गया है।

24.35
लाभगे सहजाधीशे व्यापारे लाभवान्‌ सदा।
विद्याहीनोऽपि मेधावी साहसी परसेवकः
lābhage sahajādhīśe vyāpāre lābhavān‌ sadā|
vidyāhīno'pi medhāvī sāhasī parasevakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभगे = लाभ-भाव (एकादश) में स्थित; सहजाधीशे = तृतीयेश; व्यापारे = व्यापार में; लाभवान् सदा = सदा लाभ वाला; विद्याहीनोऽपि = विद्या से हीन होते हुए भी; मेधावी = मेधा-युक्त/बुद्धिमान्; साहसी = साहस-युक्त; परसेवकः = पर-सेवा करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब तृतीयेश लाभ-भाव (एकादश) में हो, तो जातक व्यापार में सदा लाभवान् रहता है। औपचारिक विद्या न होने पर भी वह मेधावी कहा गया है, साहसी है, और पर-सेवक (दूसरों की सेवा में लगा) होता है। लाभ-भाव का फल यहाँ व्यापारी-लाभ, सहज-बुद्धि, साहस और पर-सेवा — चार रेखाओं में बँटा है।

English rendering The text states that when the third-lord is in the eleventh (house of gain), the native is always a gainer in trade. Though lacking formal learning he is intelligent, bold, and a servant of others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीयेश-एकादश: व्यापार-लाभ, विद्याहीन-मेधा, साहस, परसेवा)। «लाभगे» = एकादश-स्थिति का सीधा भाव-निर्देश; कोई प्रतिशत, अंश या दशा-अनुपात इस श्लोक में नहीं है।

24.36
व्ययस्थे सहजाधीशे कुतार्ये व्ययकृज्जनः।
पिता तस्य भवेत्‌ क्रूरः स्त्रीभिर्भाग्योदयस्तथा
vyayasthe sahajādhīśe kutārye vyayakṛjjanaḥ|
pitā tasya bhavet‌ krūraḥ strībhirbhāgyodayastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययस्थे = व्यय-भाव (12वें) में स्थित; सहजाधीशे = सहज-भाव (3रे) का स्वामी; कुतार्ये = कुत्सित/अशुभ कर्म में प्रवृत्त; व्ययकृज्जनः = व्यय करने वाला जन; पिता … क्रूरः = पिता क्रूर स्वभाव का; स्त्रीभिः = स्त्रियों के माध्यम से; भाग्योदयः = भाग्य का उदय

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सहज-भाव (3रे) का स्वामी व्यय-भाव (12वें) में स्थित हो, तो जातक कुतार्य में प्रवृत्त तथा व्यय करने वाला होता है। उसी योग में पिता क्रूर कहा गया है। भाग्योदय स्त्रियों के संयोग/माध्यम से बताया गया है। यह फल-कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that when the lord of the third house occupies the twelfth, the native is given to wrongful pursuits and expenditure; the father is said to be harsh, and the rise of fortune is associated with women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्थिति)। यहाँ केवल भाव-स्वामी की स्थिति (3रा स्वामी → 12वाँ) और शास्त्रोक्त फल का वर्णन है; कोई अंश, वर्ग-भाग या बल-इकाई नहीं।

24.37
सुखेशे धनगे जातो विद्यागुणविभूषितः।
भूमीवाहनसंयुक्तो मातुः सुखसमन्वितः
sukheśe dhanage jāto vidyāguṇavibhūṣitaḥ|
bhūmīvāhanasaṃyukto mātuḥ sukhasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश / सुख-भाव (4th = माता-गृह-वाहन-भूमि) का स्वामी; धनगे = द्वितीय (धन) भाव में (2nd); जातः = जातक; विद्या-गुण-विभूषितः = विद्या और गुणों से विभूषित; भूमि-वाहन-संयुक्तः = भूमि और वाहन से युक्त; मातुः सुख-समन्वितः = माता के सुख से युक्त। (पाठ-भेद संभव: क्रम-दृष्ट्या 37 अथवा 38 में से एक का मूल पाठ "सुखेशे लग्नगे" — 4th lord in 1st — संभावित है, क्योंकि यहाँ लग्न-स्थिति का पद छूटता और द्वितीय दो बार आता है।)

हिन्दी भावार्थ अब चतुर्थेश (सुखेश) का फल आरम्भ होता है। सुखेश के धन (द्वितीय) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक विद्या और सद्गुणों से विभूषित, भूमि एवं वाहन से युक्त, और माता के सुख से सम्पन्न होता है। चतुर्थ भाव के कारकत्व (गृह, वाहन, भूमि, माता) यहाँ धन-भाव के माध्यम से प्रकट होते हैं।

English rendering With the 4th lord in the 2nd, the text states the native is adorned with learning and virtue, endowed with land and vehicles, and blessed with a mother's happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थेश धन-स्थ, 2वाँ)। तकनीकी बिन्दु — चतुर्थ के कारकत्व (भूमि-वाहन-माता) का द्वितीय (धन/कुटुम्ब) भाव में सक्रिय होना; भावेश-पात का एक भाव-अन्तरण (4→2) है, जिसमें सुख-सम्पदा धन-रूप में मूर्त होती है।

उदाहरण (worked example) परिपाटी: भाव = राशि (whole-sign), लग्न से गणना। मान लीजिए लग्न = वृषभ। चतुर्थ (सुख) भाव = वृषभ से 4थी राशि = सिंह; सिंह का स्वामी = सूर्य ⇒ सुखेश = सूर्य। "चतुर्थेश द्वितीय में" = सूर्य का द्वितीय भाव (वृषभ से 2री राशि = मिथुन) में होना। अतः वृषभ-लग्न में सूर्य का मिथुन-स्थ होना इस श्लोक की मूर्त स्थिति है।

24.38
सुखेशे धनगे जातो भोगी सर्वधनान्वितः।
कुटुम्बसहितो मानी साहसी कुहकान्वितः
sukheśe dhanage jāto bhogī sarvadhanānvitaḥ|
kuṭumbasahito mānī sāhasī kuhakānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश (4th lord); धनगे = द्वितीय (धन/कुटुम्ब) भाव में (2nd); जातः भोगी = भोग-सम्पन्न; सर्व-धन-अन्वितः = सब प्रकार के धन से युक्त; कुटुम्ब-सहितः = कुटुम्ब (परिवार) सहित; मानी = मानी/स्वाभिमानी; साहसी = साहसी; कुहक-अन्वितः = कुहक (छल-कपट/जादूगरी) से युक्त। (पाठ-भेद संभव — 24.37 की टिप्पणी द्रष्टव्य।)

हिन्दी भावार्थ सुखेश के धन (द्वितीय) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक भोगी, सर्व-धन-सम्पन्न और परिवार-सहित होता है; वह स्वाभिमानी एवं साहसी होता है, किन्तु उसमें छल-कपट की प्रवृत्ति भी बताई गई है। 'कुटुम्ब' का उल्लेख द्वितीय भाव के स्वाभाविक कारकत्व (कुटुम्ब/धन) से मेल खाता है।

English rendering With the 4th lord in the 2nd, the text states the native is a man of enjoyments, possessed of all wealth and a full household, proud and bold, yet inclined to guile.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थेश धन-स्थ, 2वाँ)। तकनीकी संकेत — यहाँ "कुटुम्ब-सहितः" पद द्वितीय भाव के कुटुम्ब-कारकत्व से सीधे जुड़ता है, जो दिखाता है कि भावेश जिस भाव में बैठे, उस भाव के अपने कारकत्व भी फल में घुल जाते हैं (4→2 अन्तरण)।

24.39
सुखेशे सहजे जातो विक्रमी भृत्यसंयुतः।
उदारोऽरुग्‌ गुणी दाता स्वभुजार्जितवित्तवान्‌
sukheśe sahaje jāto vikramī bhṛtyasaṃyutaḥ|
udāro'rug‌ guṇī dātā svabhujārjitavittavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश (4th lord); सहजे = तृतीय (सहज/पराक्रम) भाव में (3rd, उपचय); जातः विक्रमी = पराक्रमी; भृत्य-संयुतः = सेवकों से युक्त; उदारः = उदार; अरुक् = नीरोग (अ + रुक् = रोग-रहित); गुणी = गुणवान्; दाता = दानशील; स्व-भुज-अर्जित-वित्तवान् = अपनी भुजा से अर्जित धन वाला (स्वोपार्जित)।

हिन्दी भावार्थ सुखेश के तृतीय (पराक्रम) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक पराक्रमी, सेवक-सम्पन्न, उदार, नीरोग, गुणवान् और दानशील होता है, तथा अपने पुरुषार्थ से धन अर्जित करता है। तृतीय एक उपचय (वृद्धि) भाव है, अतः यहाँ स्वोपार्जन और साहस का पक्ष उभरता है।

English rendering With the 4th lord in the 3rd, the text states the native is valorous, attended by servants, generous, free of disease, virtuous, charitable, and a maker of his own wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थेश उपचय-स्थ, 3वाँ)। तकनीकी बिन्दु — 3रा भाव उपचय एवं पराक्रम-स्थान है; सुख-भाव का स्वामी इस पुरुषार्थ-स्थान में आकर "विक्रमी" और "स्वभुजार्जित-वित्त" के पदों को बल देता है — भावेश-पात का उपचय-मुखी परिणाम।

24.40
सुखेशे सुखभावस्थे मन्त्री सर्वधनान्वितः।
चतुरः शीलवान्‌ मानी ज्ञानवान्‌ स्त्रीप्रियः सुखी
sukheśe sukhabhāvasthe mantrī sarvadhanānvitaḥ|
caturaḥ śīlavān‌ mānī jñānavān‌ strīpriyaḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख-ईशे = सुख-भाव (चतुर्थ) का स्वामी; सुख-भाव-स्थे = अपने ही चौथे भाव में स्थित; मन्त्री = राजा का परामर्शदाता/अमात्य; सर्व-धन-अन्वितः = समस्त धन से युक्त; चतुरः = कुशल; शील-वान् = सदाचारी; मानी = स्वाभिमानी; ज्ञान-वान् = विवेकी; स्त्री-प्रियः = पत्नी/स्त्रीजनों का प्रिय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चतुर्थ-भाव (सुख, माता, गृह, वाहन) का स्वामी अपने ही चौथे भाव में बैठा हो, तब जातक मन्त्री-पद के योग्य, सर्व-सम्पन्न, कुशल, सदाचारी और स्वाभिमानी होता है। वह विवेकवान्, स्त्री/गृहस्थ-सुख से प्रिय, और सुखी कहा गया है। यह भावेश की स्व-भाव-स्थिति है, अतः फल पूर्ण-शुभ की ओर झुका है।

English rendering The text states that when the lord of the 4th (the house of comfort, mother, home) sits in that same 4th house, the native is fit to be a minister, endowed with all wealth, clever, well-conducted, self-respecting, wise, dear to his spouse, and happy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्व-भाव-स्थिति का फल)। यहाँ एकमात्र गणना भावेश-निर्धारण है — किस राशि पर चतुर्थ भाव पड़ता है, उसका राशि-स्वामी ज्ञात करना; और वह स्वामी यहाँ अपने ही भाव में लौटकर स्व-क्षेत्री (own-sign) बल पाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरा भावेश-फल अध्याय पहले D1 राशि-चक्र से भावेश की पहचान माँगता है — वही निर्धारक हमारे varga-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) की शुद्ध modular गणना है। स्व-भाव में स्थित ग्रह को षड्बल (BPHS Ch.27) का स्थान-बल मिलता है, और अध्याय स्वयं आगे (श्लोक 147) पूर्ण-बल पर पूर्ण, अर्ध-बल पर अर्ध, हीन-बल पर पाद फल का बलाबल-नियम देता है — अर्थात् फल-कथन कोई नियति-घोषणा नहीं, बल्कि ग्रह-बल से मापित शास्त्र-कथन है। यही "गणित को व्याख्या से अलग रखने" का हमारा अनुशासन है।

24.41
सुखेशे पुत्रभावस्थे सुखी सर्वजनप्रियः।
विष्णुभक्तो गुणी मानी स्वभुजार्जितवित्तवान्‌
sukheśe putrabhāvasthe sukhī sarvajanapriyaḥ|
viṣṇubhakto guṇī mānī svabhujārjitavittavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख-ईशे = चतुर्थेश; पुत्र-भाव-स्थे = पंचम (सुत/बुद्धि/पूर्व-पुण्य) भाव में स्थित; सुखी = सुखयुक्त; सर्व-जन-प्रियः = सबका प्रिय; विष्णु-भक्तः = विष्णु का उपासक; गुणी = गुणवान्; मानी = स्वाभिमानी; स्व-भुज-अर्जित-वित्त-वान् = अपने बाहुबल से अर्जित धनवाला (स्वनिर्मित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चतुर्थेश के पंचम भाव में जाने पर जातक सुखी, सर्वजन-प्रिय और विष्णु-भक्त होता है। वह गुणवान्, स्वाभिमानी तथा अपने ही परिश्रम से धन कमाने वाला (स्व-निर्मित) कहा गया है।

English rendering The text states that when the 4th lord occupies the 5th house, the native is happy, dear to all, devoted to Viṣṇu, virtuous, self-respecting, and one who earns his wealth by his own effort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्थिति का फल)। तकनीकी रूप से यह चतुर्थेश का पंचम में गमन है, अर्थात् सुख-भाव से दूसरे (धन-सदृश उपचय) एवं धर्म-त्रिकोण-सम्बद्ध स्थान में स्थिति — इसी से शास्त्र स्व-अर्जित सम्पन्नता का फल जोड़ता है।

24.42
सुखेशे रिपुभावस्थे मातुः सुखविवर्जितः।
क्रोधी चोरोऽभिचारी च स्वेच्छाचारश्च दुर्मनाः
sukheśe ripubhāvasthe mātuḥ sukhavivarjitaḥ|
krodhī coro'bhicārī ca svecchācāraśca durmanāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = 4थे स्वामी; रिपु-भाव-स्थे = रिपु-भाव (6वें) में स्थित; मातुः सुख-विवर्जितः = माता के सुख से रहित; क्रोधी = क्रोधी; चोरः = चोर (शास्त्रोक्त पद); अभिचारी = अभिचार-कर्म से युक्त (शास्त्र का पद); स्वेच्छाचारः = स्वेच्छा से आचरण करने वाला; दुर्मनाः = दुर्मन / विक्षुब्ध-मन

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सुखेश रिपु-भाव (6वें) में हो, तो जातक माता के सुख से विवर्जित कहा गया है। क्रोधी, चोर और अभिचारी — ये शास्त्र के अपने फल-पद हैं; इन्हें भय-व्यापार या चिकित्सकीय/नैतिक फैसला न बनाएँ। स्वेच्छाचार और दुर्मन भी इसी स्थिति से जोड़े गए हैं। फल-कथन को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखें।

English rendering The text states that when the fourth lord is in the sixth house, the native is deprived of happiness from the mother, and is described as angry, a thief, given to abhicāra, willful in conduct, and of troubled mind — report these as the śāstra’s phala-terms, not as endorsed fate or fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सुखेश रिपुस्थ / 4→6)। षष्ठ-भावेश-योग का संख्यात्मक बलांक यहाँ नहीं; केवल शास्त्रीय फल-सूची।

24.43
सुखेशे सप्तमे जातो बहुविद्यासमन्वितः।
पित्रार्जितधनत्यागी सभायां मूकवद्‌ भवेत्‌
sukheśe saptame jāto bahuvidyāsamanvitaḥ|
pitrārjitadhanatyāgī sabhāyāṃ mūkavad‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेश = चतुर्थ-भावेश (सुख-स्थान का स्वामी); सप्तमे = सप्तम भाव में स्थित; जातः = जातक; बहुविद्यासमन्वितः = अनेक विद्याओं से युक्त; पित्रार्जितधनत्यागी = पिता से अर्जित धन का त्याग करने वाला; सभायां = सभा/जनसमूह में; मूकवत् = गूंगे के समान (मौन/अस्पष्ट)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सुखेश (चतुर्थेश) सप्तम भाव में हो, तो जातक बहुविद्या-सम्पन्न कहा जाता है। साथ ही वह पितृ-अर्जित धन का त्यागी बताया गया है। सभा में उसके व्यवहार को मूकवत् — मौन या अस्पष्ट — कहा गया है। यह चतुर्थेश की सप्तम-स्थिति का फल-कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that when the fourth lord occupies the seventh house, the native is described as richly learned, yet as one who renounces paternal wealth, and in assemblies as mute-like or restrained of speech.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्थिति)। यहाँ केवल चतुर्थेश का सप्तम-भाव में होना नियम है; संख्यात्मक विभाजन या बल-माप नहीं। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

24.44
सुखेशे रन्ध्रभावस्थे गृहादिसुखवर्जितः।
पित्रोः सुखं भवेदल्पं जातः क्लीबसमो भवेत्‌
sukheśe randhrabhāvasthe gṛhādisukhavarjitaḥ|
pitroḥ sukhaṃ bhavedalpaṃ jātaḥ klībasamo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख-ईशे = चतुर्थेश; रन्ध्र-भाव-स्थे = अष्टम (रन्ध्र/आयु/गुप्त) भाव में स्थित; गृह-आदि-सुख-वर्जितः = गृह आदि सुखों से रहित; पित्रोः सुखम् = माता-पिता का सुख; अल्पम् = थोड़ा; क्लीब-समः = क्लीब-सदृश (नपुंसक-तुल्य कहा गया)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चतुर्थेश के अष्टम भाव में जाने पर पाठ के अनुसार जातक को गृह-वाहनादि-सुख की न्यूनता, माता-पिता के सुख की अल्पता, तथा "क्लीब-सम" स्थिति की ओर झुकाव बताया गया है। पाठ-भेद संभव; यह शास्त्र का कथन है, इसे अटल दोष या भय-रूप में नहीं लेना चाहिए।

English rendering The text states that when the 4th lord occupies the 8th house, the native tends to lack the comforts of home and vehicles, to have little parental happiness, and is described as klība-like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-दुःस्थान-स्थिति का फल)। सुख-कारक भाव का स्वामी अष्टम दुःस्थान (परिवर्तन/छिद्र-स्थान) में जाकर सुख-कारकत्व की क्षति का शास्त्रीय संकेत देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस प्रकार के कठोर फल-वचनों (जैसे "क्लीब-सम") पर हमारा अनुशासन स्पष्ट है — इन्हें "शास्त्र कहता है" के रूप में तटस्थ रूप से प्रस्तुत करना, नियति-घोषणा, भय, या दबाव-रूपी उपाय के रूप में कभी नहीं (operator CLAUDE.md + oracle §5)। गणित (भावेश-स्थिति) और व्याख्या (फल) को अलग रखना ही यहाँ की विधि है; फल की तीव्रता आगे बलाबल-नियम (श्लोक 147–148) से मापी जाती है, अतः किसी एक वचन को निरपेक्ष सत्य नहीं माना जाता।

24.45
सुखेशे भाग्यभावस्थे जातः सर्वजनप्रियः।
देवभक्तो गुणी मानी भवेत्‌ सर्वसुखान्वितः
sukheśe bhāgyabhāvasthe jātaḥ sarvajanapriyaḥ|
devabhakto guṇī mānī bhavet‌ sarvasukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख-ईशे = चतुर्थेश; भाग्य-भाव-स्थे = नवम (भाग्य/धर्म) भाव में स्थित; सर्व-जन-प्रियः = सबका प्रिय; देव-भक्तः = देव-उपासक; गुणी = गुणवान्; मानी = स्वाभिमानी; सर्व-सुख-अन्वितः = समस्त सुखों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चतुर्थेश के नवम (भाग्य) भाव में जाने पर जातक सर्वजन-प्रिय, देव-भक्त, गुणवान्, स्वाभिमानी तथा सर्व-सुख-सम्पन्न होता है। भावेश के त्रिकोण-गमन से यहाँ फल पूर्णतः शुभ की ओर मुड़ता है।

English rendering The text states that with the 4th lord in the 9th house, the native is dear to all, devoted to the gods, virtuous, self-respecting, and endowed with every comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-त्रिकोण-स्थिति का फल)। नवम एक शुभ त्रिकोण है; सुख-भाव के स्वामी का इस धर्म-त्रिकोण में गमन ही शास्त्रीय रूप से सर्व-शुभ फल का आधार बनता है।

24.46
सुखेशे कर्मभावस्थे राजमान्यो नरो भवेत्‌।
रसायनी महाहृष्टो सुखभोगी जितेन्द्रियः
sukheśe karmabhāvasthe rājamānyo naro bhavet‌|
rasāyanī mahāhṛṣṭo sukhabhogī jitendriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश; कर्मभावस्थे = दशम भाव (कर्म) में स्थित; राजमान्यः = राजा/शासन से सम्मानित; नरः = पुरुष/जातक; रसायनी = रस-विद्या/रसायन में निपुण (पाठानुसार अर्थ); महाहृष्टः = अत्यन्त प्रसन्न; सुखभोगी = सुख-भोग करने वाला; जितेन्द्रियः = इन्द्रिय-जय करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुखेश दशम भाव में हो तो जातक राजमान्य कहा जाता है। उसे रसायनी, महाहृष्ट, सुखभोगी और जितेन्द्रिय बताया गया है। “रसायनी” का अर्थ पाठ और टीका-परंपरा पर निर्भर हो सकता है — पाठ-भेद/अर्थ-भेद संभव। यह कर्म-स्थान में चतुर्थेश का फल-चित्र है।

English rendering The text states that with the fourth lord in the tenth (karma) house, the person is described as honored by rulers, skilled in rasāyana (alchemy/elixirs — sense may vary by reading), greatly joyful, an enjoyer of comforts, and master of the senses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्म-भाव स्थिति)। दशम = कर्म-स्थान — यह भावाभिधान है, न कि बल-रूप या अंश-माप।

24.47
सुखेशे लाभगे जातो गुप्तरोगभयान्वितः।
उदारी गुणवान्‌ दाता परोपकरणे रतः
sukheśe lābhage jāto guptarogabhayānvitaḥ|
udārī guṇavān‌ dātā paropakaraṇe rataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश; लाभगे = एकादश भाव (लाभ) में गत; जातः = जातक; गुप्तरोगभयान्वितः = गुप्त रोग के भय से युक्त; उदारी = उदार; गुणवान् = गुणवान्; दाता = दानशील; परोपकरणे रतः = परोपकार में रत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुखेश लाभ भाव में हो तो जातक गुप्त-रोग-भय से युक्त कहा जाता है। साथ ही उसे उदार, गुणवान्, दाता और परोपकार-रत बताया गया है। एक ही स्थिति में भय-संकेत और उदारता-गुण दोनों शास्त्र-वाक्य हैं — चिकित्सा-निदान या भय-व्यापार नहीं; स्रोत का द्वैध फल-चित्र।

English rendering The text states that when the fourth lord is in the eleventh (lābha) house, the native is described as beset by fear of hidden disease, yet also as liberal, virtuous, a giver, and devoted to serving others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभ-भाव स्थिति)। “गुप्त-रोग-भय” शास्त्र का शब्द-फल है; इसे स्वास्थ्य-पूर्वानुमान के रूप में न पढ़ें।

24.48
सुखेशे व्ययभावस्थे गृहादिसुखवर्जितः।
जातो दुर्व्यसनी मूढः सदाऽलस्यसमन्वितः
sukheśe vyayabhāvasthe gṛhādisukhavarjitaḥ|
jāto durvyasanī mūḍhaḥ sadā'lasyasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशे = चतुर्थेश; व्ययभावस्थे = द्वादश भाव (व्यय) में स्थित; गृहादिसुखवर्जितः = गृह आदि सुख से रहित; दुर्व्यसनी = दुष्ट व्यसनों वाला; मूढः = मूढ़/अविवेकी; सदा = सदैव; आलस्यसमन्वितः = आलस्य से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुखेश व्यय भाव में हो तो जातक गृह आदि सुखों से वंचित बताया गया है। उसे दुर्व्यसनी, मूढ और सदा आलस्य-युक्त कहा गया है। यह द्वादश-स्थिति का कठोर फल-चित्र है — भय-उकसावा नहीं, शास्त्र का अपना कथन। चतुर्थेश-श्रृंखला यहाँ व्यय-अध्याय पर समाप्त होती है।

English rendering The text states that with the fourth lord in the twelfth (vyaya) house, the native is described as deprived of household comforts, given to vices, dull-witted, and always accompanied by laziness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यय-भाव स्थिति)। द्वादश = व्यय — नामकरण भावात्मक है; यहाँ कोई व्यय-अंक या बंध-शोधन सूत्र नहीं।

24.49
सुतेशे लग्नगे जातो विद्यान्‌ पुत्रसुखान्वितः।
कदर्यो वक्रचित्तश्च परद्रव्यापहारकः
suteśe lagnage jāto vidyān‌ putrasukhānvitaḥ|
kadaryo vakracittaśca paradravyāpahārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पंचमेश (सुत = पुत्र/पंचम भाव का स्वामी); लग्नगे = लग्न (प्रथम भाव) में स्थित; जातः = जातक; विद्यान् = विद्वान्; पुत्रसुखान्वितः = पुत्र-सुख से युक्त; कदर्यः = कृपण/कंजूस; वक्रचित्तः = वक्र/टेढ़े चित्त वाला; परद्रव्यापहारकः = पर-द्रव्य का अपहरण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुतेश (पंचमेश) लग्न में हो तो जातक विद्वान् और पुत्र-सुख से युक्त कहा जाता है। उसी श्लोक में उसे कदर्य, वक्रचित्त और पर-द्रव्य-अपहर्ता भी बताया गया है। विद्या–पुत्र-सुख और कृपण–वक्रता दोनों एक ही फल-गाथा में हैं — मिश्र फल, न कि एक-तरफ़ा निश्चितता। यहाँ से पंचमेश-स्थितियों की नई श्रृंखला आरंभ होती है।

English rendering The text states that when the fifth lord occupies the lagna, the native is described as learned and blessed with the happiness of children, yet also as miserly, crooked-minded, and a taker of others’ wealth — mixed phala in one verse, not a single fixed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पंचमेश-लग्न स्थिति)। “सुत” = पंचम; लग्न = उदित राशि/प्रथम भाव — स्थिति-नियम मात्र; वर्ग-अंश या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

24.50
सुतेशे धनगे जातो बहुपुत्रो धनान्वितः।
कुटुम्बपोषको मानी स्त्रीप्रियः सुयशा भुवि
suteśe dhanage jāto bahuputro dhanānvitaḥ|
kuṭumbapoṣako mānī strīpriyaḥ suyaśā bhuvi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेश = पञ्चम-भावेश (पुत्र/बुद्धि/मन्त्र-भाव का स्वामी); धनगे = द्वितीय भाव में स्थित; बहुपुत्रः = अनेक पुत्रों वाला; धनान्वितः = धन से युक्त; कुटुम्बपोषकः = कुटुम्ब का पालन-पोषण करने वाला; मानी = सम्मान-प्रिय / अहंकार-युक्त; स्त्रीप्रियः = स्त्रियों का प्रिय; सुयशा = अच्छा यश; भुवि = पृथ्वी पर / लोक में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सुत-भाव का स्वामी धन-भाव (द्वितीय) में स्थित हो, तो जातक बहु-पुत्र और धन से युक्त कहा गया है। वह कुटुम्ब का पोषण करने वाला, मान-सम्मान वाला, स्त्री-प्रिय तथा लोक में सुयश वाला बताया गया है। यह पञ्चमेश–द्वितीय भाव सम्बन्ध का फल-कथन है — पुत्र-सुख और धन-स्थिरता का योग एक ही सूत्र में बाँधा गया है।

English rendering The text states that when the lord of the fifth house is placed in the second, the native is said to have many sons, to be endowed with wealth, to support the family, to be proud, fond of women, and of good repute in the world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ केवल भावेश–भाव स्थिति का शास्त्रीय परिणाम है; कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-गणना या काल-अनुपात नहीं।

24.51
सुतेशे सहजे भावे जायते सोदरप्रियः।
पिशुनश्च कदर्यश्च स्वकार्यनिरतः सदा
suteśe sahaje bhāve jāyate sodarapriyaḥ|
piśunaśca kadaryaśca svakāryanirataḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चमेश में; सहजे भावे = तृतीय भाव में; सोदरप्रियः = सहोदरों (भाई-बहनों) का प्रिय / उनसे स्नेह रखने वाला; पिशुनः = चुगलखोर / भेद कहने वाला; कदर्यः = कृपण / कंजूस; स्वकार्यनिरतः = अपने कार्य में सदा लगा रहने वाला; सदा = निरन्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुतेश जब सहज-भाव (तृतीय) में हो, तो जातक सोदर-प्रिय होता है। उसी श्लोक में पिशुनता और कदर्यता भी कही गई है, तथा वह अपने कार्यों में सदैव निरत रहता है। सहज-भाव प्रयास, पराक्रम और भ्रातृ-सम्बन्ध का क्षेत्र है; पञ्चमेश वहाँ बैठे तो पुत्र-सूत्र और सहज-वृत्ति का मिश्रित फल शास्त्र ने बाँधा है।

English rendering The text states that when the fifth lord is in the third house, the native is fond of siblings, yet is also described as backbiting and miserly, and is ever absorbed in his own work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तृतीय भाव में पञ्चमेश की स्थिति का गुण-दोष मिश्रित वर्णन है; कोई संख्यात्मक नियम नहीं।

24.52
सुतेशे सुखभावस्थे सुखी मातृसुखान्वितः।
लक्ष्मीयुक्तः सुबुद्धिश्च राज्ञोऽमात्योऽथवा गुरुः
suteśe sukhabhāvasthe sukhī mātṛsukhānvitaḥ|
lakṣmīyuktaḥ subuddhiśca rājño'mātyo'thavā guruḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चमेश; सुखभावस्थे = चतुर्थ भाव में स्थित; सुखी = सुख-युक्त; मातृसुखान्वितः = मातृ-सुख से युक्त; लक्ष्मीयुक्तः = लक्ष्मी (समृद्धि) से युक्त; सुबुद्धिः = उत्तम बुद्धि वाला; राज्ञः अमात्यः = राजा का मन्त्री; अथवा = या; गुरुः = आचार्य / उपदेष्टा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुतेश जब सुख-भाव (चतुर्थ) में स्थित हो, तो जातक सुखी और मातृ-सुख से युक्त होता है। वह लक्ष्मी-युक्त और सुबुद्धि वाला कहा गया है। पद-फल में उसे राजा का अमात्य अथवा गुरु-पद का अधिकारी भी बताया गया है — पञ्चम (बुद्धि/मन्त्र) और चतुर्थ (सुख/स्थान) का सम्बन्ध शास्त्र ने सुख, बुद्धि और राज-सेवा/शिक्षण के फल से जोड़ा है।

English rendering The text states that when the fifth lord stands in the fourth house, the native is happy and enjoys maternal comfort, is endowed with prosperity and fine intellect, and may hold the role of a king’s minister or a preceptor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-स्वामी की चतुर्थ स्थिति का शास्त्रीय परिणाम; गणना का कोई पद नहीं।

24.53
सुतेशे सुतभावस्ते शुभाढ्‌ये पुत्रवान्‌ नरः।
पापाढ्‌येऽपत्यहीनोऽसौ गुणवान्‌ मित्रवत्सलः
suteśe sutabhāvaste śubhāḍh‌ye putravān‌ naraḥ|
pāpāḍh‌ye'patyahīno'sau guṇavān‌ mitravatsalaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चम (सुत/पुत्र) भाव के स्वामी के; सुतभावस्थे = पञ्चम भाव में स्थित होने पर (पाठ "सुतभावस्ते" → सुतभावस्थे); शुभाढ्ये = शुभ ग्रह से युक्त (शुभ + आढ्य = सम्पन्न); पुत्रवान् = पुत्रयुक्त; पापाढ्ये = पाप ग्रह से युक्त; अपत्यहीनः = सन्तानरहित; गुणवान् = गुणी; मित्रवत्सलः = मित्रों पर स्नेह रखने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पञ्चमेश स्वयं पञ्चम भाव में बैठे, तो फल उसकी संगति पर टिकता है। शुभ ग्रह के साथ हो तो जातक पुत्रवान् कहा गया है, और पाप ग्रह के साथ हो तो सन्तानसुख से रहित। दोनों ही अवस्थाओं में वह गुणवान् और मित्रों के प्रति वत्सल बताया गया है।

English rendering When the lord of the 5th occupies the 5th, the text states the outcome turns on its company — joined with benefics the native has sons, joined with malefics he is childless — yet in either case he is virtuous and warm toward friends.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सशर्त)। ध्यातव्य: यह श्लोक एक ही योग के फल को "शुभाढ्य बनाम पापाढ्य" शर्त पर विभाजित करता है — संगति बदलते ही परिणाम उलट जाता है; अतः कोई नियत परिणाम नहीं, केवल शर्त-सापेक्ष वचन।

हमारा डिकोड: पञ्चमेश को पहचानना स्वयं एक गणना है — लग्न और D1 (राशि) विभाजन से प्रत्येक भाव का स्वामी नियत होता है, और यही D1 हमारे षोडश-वर्ग इंजन का पहला वर्ग है (kaal_ekavimshati_varga.py)। किन्तु "शुभाढ्य/पापाढ्य" जैसी शर्त फल-कथन है, गणना नहीं — इसीलिए हम गणित (वर्ग/बल) और फल को सदा पृथक् रखते हैं और फल को शास्त्र का सशर्त वचन मानते हैं, नियति नहीं।

24.54
सुतेशे रिपुभावस्थे पुत्रः शत्रुसमो भवेत्‌।
मृतापत्योऽथवा जातो दत्तक्रीतसुतोऽथवा
suteśe ripubhāvasthe putraḥ śatrusamo bhavet‌|
mṛtāpatyo'thavā jāto dattakrītasuto'thavā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चमेश; रिपुभावस्थे = षष्ठ भाव में स्थित; पुत्रः = पुत्र; शत्रुसमः = शत्रु के समान; भवेत् = हो; मृतापत्यः = मृत-सन्तान वाला; अथवा = या; जातः = उत्पन्न / जातक; दत्तक्रीतसुतः = दत्तक अथवा क्रीत (खरीदा/गोद लिया) पुत्र वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुतेश जब रिपु-भाव (षष्ठ) में हो, तो पुत्र शत्रु-सदृश व्यवहार वाला हो सकता है। विकल्प-फल में मृतापत्य (सन्तान की मृत्यु/हानि का संकेत) अथवा दत्त-क्रीत सुत (गोद लिया या अन्य-प्रकार से प्राप्त पुत्र) भी कहा गया है। षष्ठ भाव विघ्न और विरोध का क्षेत्र है; पञ्चमेश वहाँ बैठे तो पुत्र-सूत्र पर शास्त्र ने तनाव और वैकल्पिक सन्तान-मार्ग का फल बाँधा है — यह शास्त्र-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when the fifth lord is in the sixth, a son may be like an enemy; alternatively, the native is described as one who loses offspring, or who has an adopted or otherwise acquired son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विकल्प-त्रयी)। षष्ठ-स्थित पञ्चमेश के तीन सम्भावित फल-मार्ग शास्त्र ने “अथवा” से जोड़े हैं; कोई संख्यात्मक गणना नहीं।

24.55
सुतेशे सप्तमे मानी सर्वधर्मसमन्वितः।
पुत्रादिसुखयुक्तश्च परोपकरणे रतः
suteśe saptame mānī sarvadharmasamanvitaḥ|
putrādisukhayuktaśca paropakaraṇe rataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चमेश; सप्तमे = सप्तम भाव में; मानी = सम्मान-प्रिय / गर्वीला; सर्वधर्मसमन्वितः = सभी धर्मों (कर्तव्य-मार्गों) से युक्त; पुत्रादिसुखयुक्तः = पुत्र आदि से सुख-युक्त; परोपकरणे रतः = परोपकार / दूसरों की सहायता में लगा हुआ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सुतेश जब सप्तम भाव में स्थित हो, तो जातक मानी और सर्व-धर्म से समन्वित होता है। वह पुत्रादि-सुख से युक्त तथा परोपकार में रत कहा गया है। सप्तम साझेदारी और लोक-सम्बन्ध का भाव है; पञ्चमेश वहाँ बैठे तो शास्त्र ने मान, धर्म-वृत्ति, सन्तान-सुख और पर-हित — चार सूत्र एक फल में बाँधे हैं।

English rendering The text states that when the fifth lord is in the seventh, the native is proud, endowed with all dharma, blessed with happiness from sons and the like, and devoted to helping others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तम-स्थित पञ्चमेश का गुण-फल; कोई गणितीय पद नहीं।

24.56
सुतेशे रन्ध्रभावस्थे स्वल्पपुत्रसुखान्वितः।
कासश्वाससमायुक्तः क्रोधी च सुखवर्जितः
suteśe randhrabhāvasthe svalpaputrasukhānvitaḥ|
kāsaśvāsasamāyuktaḥ krodhī ca sukhavarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पञ्चमेश के; रन्ध्रभावस्थे = अष्टम (रन्ध्र) भाव में स्थित होने पर; स्वल्पपुत्रसुखान्वितः = अल्प पुत्र-सुख वाला; कासश्वाससमायुक्तः = खाँसी और श्वास (दमा) से युक्त; क्रोधी = क्रोधशील; सुखवर्जितः = सुख से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश जब अष्टम (रन्ध्र) भाव में हो, तब जातक को पुत्र-सुख अल्प मिलता है। शास्त्र-वचन में उसे कास-श्वास से युक्त, क्रोधी और सुख से रहित बताया गया है। रन्ध्र-भाव का पञ्चमेश सन्तान और स्वास्थ्य दोनों के प्रकरण को मन्द दिखाता है।

English rendering With the lord of the 5th in the 8th (the house of hidden things), the text states the native has scant happiness from sons, is troubled by cough and breathlessness, is prone to anger, and lacks ease.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रोग-वाचक)। अन्तर्दृष्टि: "कास-श्वास" जैसे शारीरिक वर्णन शास्त्र के फल-वचन हैं — इन्हें लक्षण-सूचना के रूप में पढ़ा जाता है, गणना के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड: कास-श्वास, "सुखवर्जित" जैसे रोग/स्वास्थ्य-वाचक फल हमारे डिकोड-अनुशासन में सदा "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत किए जाते हैं — कोई चिकित्सकीय निदान या भविष्यवाणी नहीं (dossier: कोई चिकित्सा/विधिक/आर्थिक भविष्यवाणी नहीं)। गणित (वर्ग-बिन्दु, बल-इकाई) और फल-कथन को पृथक् रखना ही विधि है।

24.57
सुतेशे भाग्यगे पुत्रो भपो वा तत्समो भवेत्‌।
स्वयं वा ग्रन्थकर्ता च विख्यातः कुलदीपकः
suteśe bhāgyage putro bhapo vā tatsamo bhavet‌|
svayaṃ vā granthakartā ca vikhyātaḥ kuladīpakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेश = पंचमेश (पुत्र/बुद्धि/मन्त्र-भाव का स्वामी); भाग्यगे = नवम भाव में स्थित; पुत्रः = संतान/पुत्र; भपः = भूप (राजा); तत्समः = राजा के तुल्य; ग्रन्थकर्ता = शास्त्र/ग्रन्थ-रचयिता; विख्यातः = प्रसिद्ध; कुलदीपकः = कुल का प्रकाशक/गौरव

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पंचमेश नवम भाव (भाग्य) में हो, तो जातक पुत्र रूप में राजा अथवा राजा-तुल्य पद का भागी बनता है। अथवा वह स्वयं ग्रन्थ-रचना में प्रवृत्त होकर विख्यात होता है और कुल का दीपक कहा जाता है। यह पंचम–नवम संबंध को पुत्र-उत्कर्ष, कीर्ति और कुल-गौरव के फल-कथन से जोड़ता है।

English rendering The text states that when the fifth lord occupies the ninth (fortune) house, the native becomes a son who is a king or equal to one—or himself a renowned author of treatises and the light of the family.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह पंचमेश की नवम-स्थिति का शास्त्रोक्त परिणाम-वर्णन है; गणना केवल भाव-स्वामी और भाव-स्थान की पहचान तक सीमित रहती है (D1 रासि-चार्ट, घोषित लग्न/अयनांश पर निर्भर)।

24.58
सुतेशे राज्यभावस्थे राजयोगो हि जायते।
अनेकसुखभोगी च ख्यातकीर्तिर्नरो भवेत्‌
suteśe rājyabhāvasthe rājayogo hi jāyate|
anekasukhabhogī ca khyātakīrtirnaro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पंचमेश में/पंचमेश के; राज्यभावस्थे = दशम भाव (राज्य/कर्म) में स्थित; राजयोगः = राज-योग (उच्च पद/प्रभाव का योग); जायते = उत्पन्न होता है; अनेकसुखभोगी = अनेक सुखों का उपभोक्ता; ख्यातकीर्तिः = प्रसिद्ध यश वाला; नरः = पुरुष/जातक; भवेत् = होता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पंचमेश के दशम भाव में होने पर राजयोग का उदय माना गया है। जातक अनेक सुख-भोगों का भागी बनता है और उसकी कीर्ति ख्यात होती है। पंचम (बुद्धि/मंत्र/पुण्य-संतान) और दशम (कर्म/पद) का यह संयोग यहाँ उच्च स्थिति और लोक-ख्याति के फल से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the fifth lord stands in the tenth (royal/career) house, a rāja-yoga arises; the native enjoys many comforts and becomes a person of celebrated fame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “राजयोग” यहाँ संख्यात्मक योग-सूत्र नहीं, अपितु पंचमेश–दशम स्थिति पर आधारित शास्त्रीय नामकरण और फल-वर्णन है।

24.59
सुतेशे लाभगे जातो विद्यावान्‌ जनवल्लभः।
ग्रन्थकर्ता महादक्षो बहुपुत्रधनान्वितः
suteśe lābhage jāto vidyāvān‌ janavallabhaḥ|
granthakartā mahādakṣo bahuputradhanānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पंचमेश; लाभगे = एकादश भाव (लाभ) में स्थित; जातः = उत्पन्न/जातक; विद्यावान् = विद्या-संपन्न; जनवल्लभः = जन-प्रिय; ग्रन्थकर्ता = ग्रन्थ-रचयिता; महादक्षः = अत्यंत कुशल; बहुपुत्रधनान्वितः = अनेक पुत्रों और धन से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पंचमेश एकादश में हो तो जातक विद्यावान और लोगों का प्रिय होता है। वह ग्रन्थ-रचना में प्रवीण, महादक्ष, तथा बहु-पुत्र और धन से अन्वित कहा गया है। पंचम की पुत्र–बुद्धि–मन्त्र-शक्ति को लाभ-भाव की वृद्धि से जोड़कर यह श्लोक समृद्धि और प्रज्ञा का फल देता है।

English rendering The text states that one born with the fifth lord in the eleventh (gains) is learned and beloved of people—an author, highly skilled, and endowed with many sons and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-स्वामी का एकादश-स्थान निर्धारण D1 में रासि-गिनती से होता है; कोई अलग अंक-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

24.60
सुतेशे व्ययभावस्थे जातः पुत्रसुखोज्ज्ञितः।
दत्तपुत्रयुतो वाऽसौ क्रीतपुत्रान्वितोऽथवा
suteśe vyayabhāvasthe jātaḥ putrasukhojjñitaḥ|
dattaputrayuto vā'sau krītaputrānvito'thavā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पंचमेश; व्ययभावस्थे = द्वादश भाव (व्यय) में स्थित; जातः = जातक; पुत्रसुखोज्ज्ञितः = पुत्र-सुख से रहित (उज्झित); दत्तपुत्रयुतः = दत्तक-पुत्र से युक्त; क्रीतपुत्रान्वितः = क्रीत/खरीदे हुए पुत्र से अन्वित; अथवा = या फिर

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पंचमेश द्वादश में हो तो जातक पुत्र-सुख से वंचित रहता है। विकल्प रूप में वह दत्तक-पुत्र से युक्त हो, अथवा क्रीत-पुत्र से अन्वित हो—ऐसा पाठ कहता है। यहाँ पंचम (पुत्र) और द्वादश (व्यय/हानि/पर-स्थान) के संबंध को पुत्र-सुख की कमी या अपारंपरिक पुत्र-प्राप्ति के फल से जोड़ा गया है; यह शास्त्र-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when the fifth lord occupies the twelfth (expenditure/loss) house, the native is deprived of happiness from sons—or else is associated with an adopted son, or with a purchased son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। द्वादश-स्थिति का निर्धारण रासि-चार्ट की भाव-गणना मात्र है; “दत्त/क्रीत पुत्र” शास्त्र का वर्णनात्मक विकल्प है, संख्यात्मक नियम नहीं।

24.61
षष्ठेशे लग्नगे जातो रोगवान्‌ कीर्तिसंयुतः।
आत्मशत्रुर्धनी मानी साहसी गुणवान्‌ नरः
ṣaṣṭheśe lagnage jāto rogavān‌ kīrtisaṃyutaḥ|
ātmaśatrurdhanī mānī sāhasī guṇavān‌ naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेशे = षष्ठ (रोग/शत्रु) भाव के स्वामी के; लग्नगे = लग्न (प्रथम) भाव में; रोगवान् = रोगी; कीर्तिसंयुतः = कीर्ति से युक्त; आत्मशत्रुः = अपना ही शत्रु; धनी = धनवान्; मानी = स्वाभिमानी; साहसी = साहसी; गुणवान् = गुणी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — षष्ठेश के लग्न में होने पर जातक रोगी होते हुए भी कीर्ति से युक्त होता है। वह अपना ही शत्रु (आत्मशत्रु), किन्तु धनी, मानी, साहसी और गुणवान् बताया गया है। यहाँ शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल एक साथ कहे गए हैं।

English rendering With the lord of the 6th (the house of ailments and foes) in the 1st, the text states the native is sickly yet renowned — his own adversary, and withal wealthy, proud, bold, and virtuous.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र)। अन्तर्दृष्टि: यह श्लोक परस्पर-विरोधी फल (रोगी किन्तु धनी-कीर्तिमान्) साथ देता है — कौन-सा फल प्रबल होगा, यह ग्रह के बलाबल पर निर्भर करता है, यही अध्याय के अन्त का बलाबल-विवेक नियम है।

हमारा डिकोड: ऐसे मिश्र फल का निर्णय शास्त्र स्वयं बलाबल-विवेक पर छोड़ता है (पूर्णबल→पूर्ण फल, अर्धबल→अर्ध, हीनबल→पाद)। इसी "बल" को हम षड्बल इंजन (BPHS Ch.27) में स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्बल के रूप में रूप-विरूप में गिनते हैं (1 रूप = 60 विरूप) और प्रति-ग्रह देहली से तुलना करते हैं — यह गणित है; जबकि "रोगी/धनी" फल शास्त्र का वचन-मात्र रहता है, कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं।

24.62
षष्ठेशे धनभावस्थे साहसी कुलविश्रुतः।
परदेशी सुखी वक्ता स्वकर्मनीरतः सदा
ṣaṣṭheśe dhanabhāvasthe sāhasī kulaviśrutaḥ|
paradeśī sukhī vaktā svakarmanīrataḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेशे = षष्ठेश; धनभावस्थे = द्वितीय भाव (धन/वाणी/कुटुंब) में स्थित; साहसी = साहसवान; कुलविश्रुतः = कुल में विख्यात; परदेशी = परदेशवासी/विदेश-गामी; सुखी = सुख-युक्त; वक्ता = वक्ता/वाग्मी; स्वकर्मनीरतः = अपने कर्म में सदा लगा; सदा = निरंतर

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षष्ठेश धन-भाव में हो तो जातक साहसी और कुल में विश्रुत होता है। वह परदेशी (पर-देश में रहने/जाने वाला), सुखी, वक्ता, और सदा स्व-कर्म में निरत कहा गया है। षष्ठ की संघर्ष-शक्ति का द्वितीय (धन–वाणी–कुटुंब) से योग यहाँ साहस, वाक्-प्रवीणता और कर्म-निष्ठा के फल से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the sixth lord occupies the second (wealth/speech) house, the native is bold and famed in the family—living or working in a foreign land, happy, eloquent, and always devoted to his own work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-द्वय की गिनती लग्न से क्रमिक रासि-स्थान है; कोई बलांक या दशा-वर्ष इस श्लोक में नहीं आता।

24.63
षष्ठेशे सहजः जातः क्रोधी विक्रमवर्जितः।
भ्राता शत्रुसमस्तस्य भृत्यश्चोत्तरदायकः
ṣaṣṭheśe sahajaḥ jātaḥ krodhī vikramavarjitaḥ|
bhrātā śatrusamastasya bhṛtyaścottaradāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेशे = षष्ठेश; सहजः/सहजगे = तृतीय भाव (सहज/भ्रातृ) में स्थित (पाठ-भेद संभव: सहजः ≈ सहजगे); जातः = जातक; क्रोधी = क्रोधशील; विक्रमवर्जितः = विक्रम/पराक्रम से रहित; भ्राता = भाई; शत्रुसमः = शत्रु के समान; तस्य = उसका; भृत्यः = सेवक; उत्तरदायकः = उत्तर देने वाला/जवाबदेह (या प्रतिवाद करने वाला)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षष्ठेश सहज (तृतीय) भाव में हो तो जातक क्रोधी और विक्रम-वर्जित होता है। उसका भाई शत्रु-सदृश बनता है, और सेवक उत्तरदायक—अर्थात् जवाब देने वाला या विवाद में आगे आने वाला—कहा गया है। षष्ठ (शत्रुता) का तृतीय (भ्राता–साहस–पराक्रम) पर प्रभाव यहाँ भ्रातृ-वैमनस्य और विक्रम-हानि के फल-कथन से जुड़ा है; “सहजः” पद में पाठ-भेद संभव है।

English rendering The text states that when the sixth lord is in the third (co-born) house—reading सहजगे likely; पाठ-भेद संभव—the native is irascible and devoid of valor; his brother becomes like an enemy, and the servant is one who answers back (or bears the reply).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तृतीय-भाव स्थिति रासि-क्रम से निश्चित होती है; “विक्रम” यहाँ तृतीय-भाव का शास्त्रीय अर्थ-क्षेत्र है, कोई संख्यात्मक बल-माप नहीं।

24.64
षष्ठेशे सुखभावस्थे मातुः सुखविवर्जितः।
मनस्वी पिशुना द्वेषी चलचित्तोऽतिवित्तवान्‌
ṣaṣṭheśe sukhabhāvasthe mātuḥ sukhavivarjitaḥ|
manasvī piśunā dveṣī calacitto'tivittavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = षष्ठ भाव का स्वामी; सुखभावस्थ = चतुर्थ भाव में स्थित (सुख-भाव = माता, मन, गृह); मातुः सुखविवर्जितः = मातृ-सुख से रहित; मनस्वी = अभिमानी / मन-स्वी; पिशुन = चुगलखोर, निंदाशील; द्वेषी = द्वेष करने वाला; चलचित्त = चंचल मन; अतिवित्तवान् = अत्यधिक धन-संपन्न।

हिन्दी भावार्थ जब षष्ठेश चतुर्थ भाव में बैठे, तो शास्त्र कहता है कि जातक मातृ-सुख से वंचित रहता है। मन अभिमानी और चंचल होता है; निंदा और द्वेष की प्रवृत्ति बताई गई है। साथ ही अत्यंत धनवान होने का भी फल कहा गया है — सुख-भाव में रिपु-स्वामी का यह मिश्रित चित्र है।

English rendering With the sixth lord in the fourth house, the text states deprivation of maternal comfort, a proud and fickle mind, a slanderous and hostile bent, and yet great wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह षष्ठेश की चतुर्थ-स्थिति का वर्णनात्मक फल है; गणना नहीं, भाव-स्वामी और भाव का संयोग-कथन है।

24.65
षष्ठेशे सुतगो यस्य चलं तस्य धनादिकम्‌।
शत्रुता पुत्रमित्रैश्च सुखी स्वार्थी दयान्वितः
ṣaṣṭheśe sutago yasya calaṃ tasya dhanādikam‌|
śatrutā putramitraiśca sukhī svārthī dayānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेशे = षष्ठेश के; सुतगे = पञ्चम (सुत) भाव में स्थित होने पर; चलं धनादिकम् = धन आदि चञ्चल/अस्थिर; शत्रुता पुत्रमित्रैः = पुत्र और मित्रों से शत्रुता; सुखी = सुखी; स्वार्थी = स्वार्थपरायण; दयान्वितः = दयायुक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस जातक का षष्ठेश पञ्चम (सुत) भाव में हो, उसका धन आदि अस्थिर रहता है। उसे पुत्र और मित्रों से शत्रुता होती है, फिर भी वह सुखी, स्वार्थी तथा दयावान् बताया गया है।

English rendering For one whose lord of the 6th is in the 5th (the house of children), the text states his wealth and the like are unsteady; he meets enmity from sons and friends, yet is content, self-serving, and compassionate.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: यहाँ "स्वार्थी" और "दयान्वित" जैसे प्रतीयमान-विरोधी गुण एक साथ रखे गए हैं — शास्त्र मिश्र स्वभाव का वर्णन करता है, किसी एकांगी निर्णय की घोषणा नहीं; अन्तिम निर्णय बलाबल-विवेक से ही करने का निर्देश अध्यायान्त में आता है।

24.66
षष्ठेशे रिपुभावस्थे वैरं स्वज्ञातिमण्डलात्‌।
अन्यैः सह भवेन्‌ मैत्री सुखं मध्यं धनादिजम्‌
ṣaṣṭheśe ripubhāvasthe vairaṃ svajñātimaṇḍalāt‌|
anyaiḥ saha bhaven‌ maitrī sukhaṃ madhyaṃ dhanādijam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव (रोग-शत्रु-ऋण) का स्वामी; रिपुभावस्थ = रिपु अर्थात् छठे भाव में स्थित (यहाँ स्वामी अपने ही भाव में); वैरम् = शत्रुता; स्वज्ञातिमण्डलात् = अपने ही जाति-बन्धु-वर्ग से; अन्यैः सह मैत्री = परायों के साथ मित्रता; सुखं मध्यम् = मध्यम सुख; धनादिजम् = धन आदि से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब छठे भाव का स्वामी अपने ही छठे भाव में बैठे, तो जातक का अपने स्वजन-मण्डल से विरोध रहता है, किन्तु बाहरी लोगों से मैत्री बनी रहती है; धन आदि से प्राप्त सुख मध्यम श्रेणी का होता है। यह षष्ठेश का स्वगृही योग है, जिसे परम्परा विपरीत/हर्ष-प्रकृति का मानती है।

English rendering The text states that when the lord of the 6th occupies the 6th, there is enmity with one's own kin-circle but friendship with outsiders, and the happiness derived from wealth is middling.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ एकमात्र गणित यही है कि "षष्ठेश" और "छठा भाव" दोनों निश्चित रूप से गिने जाते हैं — लग्न से पूर्ण-राशि पद्धति में छठी राशि, फिर उसका स्वामी; फल स्वयं शास्त्र का कथन है, कोई परिकलित मान नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) षष्ठेश किसी तालिका से नहीं पढ़ा जाता — वह व्युत्पन्न होता है: लग्न से छठी पूर्ण-राशि की पहचान, फिर उसका राशीश। यही ṣoḍaśa-varga इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) की नियतात्मक D1 (राशि) परत है — देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित। इसके बाद का फल शास्त्र का दावा है, जिसे ग्रह के षड्बल (Ch.27) से तौला जाता है, कभी भाग्य-निर्णय की तरह नहीं पढ़ा जाता।

24.67
षष्ठेशे दारभावस्थे जातो दारसुखोज्झितः।
कीर्तिमान्‌ गुणवान्‌ मानी साहसी धनसंयुतः
ṣaṣṭheśe dārabhāvasthe jāto dārasukhojjhitaḥ|
kīrtimān‌ guṇavān‌ mānī sāhasī dhanasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव का स्वामी; दारभावस्थ = दार अर्थात् सप्तम (कलत्र) भाव में स्थित; जात = जातक; दारसुखोज्झित = दाम्पत्य/जीवनसाथी-सुख से रहित (दार-सुख-उज्झित); कीर्तिमान् = यशस्वी; गुणवान् = गुणसम्पन्न; मानी = स्वाभिमानी; साहसी = साहसयुक्त; धनसंयुत = धन से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि छठे भाव का स्वामी जब सप्तम भाव में जाए, तो जातक को जीवनसाथी-सुख की न्यूनता रहती है, परन्तु वह यशस्वी, गुणी, स्वाभिमानी, साहसी और धनवान् होता है। एक ओर दाम्पत्य की कमी, दूसरी ओर सार्वजनिक कीर्ति और सम्पन्नता — यही इस स्थिति का मिश्रित फल है।

English rendering The text states that with the 6th lord in the 7th, the native is deprived of marital comfort yet is renowned, virtuous, self-respecting, bold, and endowed with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यान देने योग्य: छठे (दुःस्थान) का स्वामी सप्तम (कलत्र) में आकर उसी भाव को प्रभावित करता है जिसका वह अतिथि है — यह भाव-स्वामी और गन्तव्य-भाव का सम्बन्ध मात्र है, कोई संख्यात्मक राशि नहीं।

24.68
षष्ठेशेऽष्टमगे जातो रोगी शत्रुर्मनीषिणाम्‌।
परद्रव्याभिलाषी च परदाररतोऽशुचिः
ṣaṣṭheśe'ṣṭamage jāto rogī śatrurmanīṣiṇām‌|
paradravyābhilāṣī ca paradārarato'śuciḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव का स्वामी; अष्टमग = अष्टम (रन्ध्र/मृत्यु) भाव में गत; रोगी = रोगग्रस्त; शत्रुर्मनीषिणाम् = मनीषियों/विद्वानों का शत्रु; परद्रव्याभिलाषी = दूसरों के धन का अभिलाषी; परदाररत = परस्त्री में आसक्त; अशुचि = अपवित्र/अशुद्ध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार छठे का स्वामी अष्टम भाव में हो तो पाठ रोगग्रस्तता, विद्वानों से विरोध, दूसरों के धन की लालसा, परस्त्री-आसक्ति और अशुचिता का कथन करता है। छठा और अष्टम — दोनों दुःस्थान होने से यहाँ शास्त्र प्रायः अशुभ फल गिनाता है; यह वर्णन शास्त्र का ही है, कोई निर्णय हम नहीं देते।

English rendering The text states that with the 6th lord in the 8th, the native is sickly, hostile to the learned, covetous of others' wealth, inclined toward others' spouses, and impure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दोष-प्रधान)। यहाँ दोनों भाव (6 और 8) दुःस्थान-श्रेणी के हैं — यह वर्गीकरण भाव-गणना का परिणाम है, किन्तु फल पूर्णतः शास्त्र का कथन है, कोई गणितीय अचर नहीं।

24.69
षष्ठेशे भाग्यगे जातः काष्ठपाषाणविक्रयी।
व्यवहारे क्वचिद्धानिः क्वचिद्वृद्धिश्च जायते
ṣaṣṭheśe bhāgyage jātaḥ kāṣṭhapāṣāṇavikrayī|
vyavahāre kvaciddhāniḥ kvacidvṛddhiśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव का स्वामी; भाग्यग = भाग्य अर्थात् नवम भाव में गत; काष्ठपाषाणविक्रयी = काष्ठ (लकड़ी) और पाषाण (पत्थर) का विक्रेता; व्यवहारे = व्यापार/लेन-देन में; क्वचित् हानिः = कहीं हानि; क्वचित् वृद्धिः = कहीं वृद्धि/लाभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि छठे का स्वामी नवम भाव में हो तो जातक काष्ठ और पाषाण (लकड़ी-पत्थर) का व्यापारी हो सकता है, और उसके व्यवहार में कभी हानि तो कभी वृद्धि होती रहती है। यह उतार-चढ़ाव-भरे व्यावसायिक फल का कथन है।

English rendering The text states that with the 6th lord in the 9th, the native deals in wood and stone, and in his dealings there is sometimes loss and sometimes gain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। श्लोक का "क्वचित् हानिः क्वचित् वृद्धिः" स्वयं एक परिवर्तनशील, अनिश्चित परिणाम की स्वीकृति है — शास्त्र यहाँ कोई एकनिष्ठ, नियत फल नहीं थोपता।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक का अपना "कभी हानि, कभी वृद्धि" वही है जो हमारी पद्धति धारण करती है — फल को "शास्त्र कहता है X" के रूप में, बल से तौलकर प्रस्तुत करना, कभी स्थिर परिणाम की भाँति नहीं। केवल गणित — भावेश की पहचान, भाव, रूपों में बल — ही परिशुद्ध (== स्तर पर) रखा जाता है; फल-कथन कभी भाग्य-घोषणा नहीं बनता।

24.70
षष्ठेशे दशमे भावे मानवः कुलविश्रुतः।
अभक्तश्च पितुर्वक्ता विदेशे च सुखी भवेत्‌
ṣaṣṭheśe daśame bhāve mānavaḥ kulaviśrutaḥ|
abhaktaśca piturvaktā videśe ca sukhī bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव का स्वामी; दशमे भावे = दशम (कर्म/राज्य) भाव में; मानवः = वह व्यक्ति; कुलविश्रुत = अपने कुल में प्रसिद्ध; अभक्तः पितुः = पिता के प्रति अभक्त (अनुरागहीन); वक्ता = वाक्पटु/वक्ता; विदेशे सुखी = परदेश में सुखी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि छठे का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक अपने कुल में विख्यात, वाक्पटु, परन्तु पिता के प्रति अनुरागहीन होता है, और विदेश (परदेश) में सुख पाता है। कीर्ति और वाणी की सामर्थ्य के साथ पितृ-सम्बन्ध की न्यूनता — यही मिश्र फल है।

English rendering The text states that with the 6th lord in the 10th, the person is renowned in his lineage, eloquent, not devoted to his father, and happy in a foreign land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। षष्ठेश का दशम (केन्द्र) में जाना केवल भाव-स्वामी और गन्तव्य-केन्द्र का सम्बन्ध है; इससे आगे का सब शास्त्र का वर्णन है, कोई परिकलन नहीं।

24.71
षष्ठेशे लाभगे जातः शत्रुतो धनमाप्नुयात्‌।
गुणवान्‌ साहसी मानी किन्तु पुत्रसुखोज्झितः
ṣaṣṭheśe lābhage jātaḥ śatruto dhanamāpnuyāt‌|
guṇavān‌ sāhasī mānī kintu putrasukhojjhitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव का स्वामी; लाभग = लाभ अर्थात् एकादश भाव में गत; शत्रुतः = शत्रुओं से; धनम् आप्नुयात् = धन प्राप्त करता है; गुणवान् = गुणी; साहसी = साहसी; मानी = स्वाभिमानी; किन्तु = परन्तु; पुत्रसुखोज्झित = पुत्र-सुख से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि छठे का स्वामी एकादश (लाभ) भाव में हो तो जातक शत्रुओं से भी धन-लाभ पाता है, गुणी, साहसी और स्वाभिमानी होता है, परन्तु पुत्र-सुख से वंचित रहता है। षष्ठ (शत्रु) का स्वामी लाभ-स्थान में जाकर "शत्रु से लाभ" का सटीक चित्र देता है।

English rendering The text states that with the 6th lord in the 11th, the native obtains wealth even from enemies, and is virtuous, bold, and self-respecting, but is deprived of the happiness of a son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "शत्रुतो धनम्" शत्रु-भाव (6) के स्वामी का लाभ-भाव (11) में संयोग-मात्र से निकला भावार्थ है — भाव-कारकत्व का संयोजन, कोई संख्या नहीं।

24.72
षष्ठेशे व्ययभावस्थे व्यसने व्ययकृत्‌ सदा।
विद्वद्‌द्वेषी भवेज्जातो जीवहिंसासु तत्परः
ṣaṣṭheśe vyayabhāvasthe vyasane vyayakṛt‌ sadā|
vidvad‌dveṣī bhavejjāto jīvahiṃsāsu tatparaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठेश = छठे भाव का स्वामी; व्ययभावस्थ = व्यय अर्थात् द्वादश भाव में स्थित; व्यसने = व्यसनों/दुर्व्यसनों में; व्ययकृत् सदा = सदा धन का अपव्यय करने वाला; विद्वद्द्वेषी = विद्वानों से द्वेष रखने वाला; जीवहिंसासु तत्परः = प्राणियों की हिंसा में तत्पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि छठे का स्वामी द्वादश भाव में हो तो पाठ जातक को व्यसनों पर निरन्तर धन व्यय करने वाला, विद्वानों से द्वेष रखने वाला और जीव-हिंसा की ओर प्रवृत्त बताता है। यह शास्त्र का ही कठोर वर्णन है; इसे किसी व्यक्ति पर भय या दोष के रूप में नहीं, केवल पाठ के कथन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

English rendering The text states that with the 6th lord in the 12th, the native constantly spends on vices, is hostile to the learned, and is given to harming living beings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दोष-प्रधान)। छठे (व्यय-रोग) का स्वामी द्वादश (व्यय) में — दोनों व्यय-प्रकृति के भाव, जिनका संगम शास्त्र अपव्यय-कथन में ढालता है; इसमें कोई गणितीय अचर निहित नहीं।

24.73
दारेशे लग्नगे जातः परदारेषु लम्पटः।
दुष्टो विचक्षणोऽधीरो जनो वातरुजान्वितः
dāreśe lagnage jātaḥ paradāreṣu lampaṭaḥ|
duṣṭo vicakṣaṇo'dhīro jano vātarujānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = दार अर्थात् सप्तम (कलत्र) भाव का स्वामी; लग्नग = लग्न (प्रथम/तनु) भाव में गत; परदारेषु लम्पटः = परस्त्रियों में आसक्त; दुष्ट = दुष्ट-प्रकृति; विचक्षण = चतुर/विवेकी; अधीर = अस्थिरचित्त/अधैर्यशील; वातरुजान्वित = वात-रोग (वायु-विकार) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम भाव का स्वामी लग्न में हो तो पाठ जातक को परस्त्री-आसक्त, दुष्ट-प्रवृत्ति, फिर भी चतुर, अधीर तथा वात-रोग से पीड़ित बताता है। यहाँ से "दारेश" (सप्तमेश) की भाव-वार फल-श्रृंखला आरम्भ होती है।

English rendering The text states that with the lord of the 7th in the ascendant, the native is lustful toward others' spouses, of ill character yet clever, restless, and afflicted by a vāta (wind) disorder.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। एकमात्र नियत चरण यही है कि "दारेश" = लग्न से सप्तम पूर्ण-राशि का स्वामी; शेष सब शास्त्र का वर्णन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दारेश का निर्धारण वही नियतात्मक पद है — लग्न से सप्तम पूर्ण-राशि का राशीश (D1 राशि-स्वामित्व, मॉड्युलर अंकगणित)। यहाँ के सामाजिक-संवेदनशील फल को हम कठोरता से शास्त्र का ही कथन रखते हैं, किसी व्यक्ति पर निर्णय नहीं: गणित परिकलित होता है, व्याख्या शास्त्र की वाणी में ही रहती है (CLAUDE.md अनुशासन — गणित और व्याख्या पृथक्)।

24.74
दारेशे धनगे जातो बहुस्त्रीभिः समन्वितः।
दारयोगाद्धनाप्तिश्च दीर्घसूत्री च मानवः
dāreśe dhanage jāto bahustrībhiḥ samanvitaḥ|
dārayogāddhanāptiśca dīrghasūtrī ca mānavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तम भाव का स्वामी; धनग = धन अर्थात् द्वितीय भाव में गत; बहुस्त्रीभिः समन्वित = अनेक स्त्रियों से युक्त/संगत; दारयोगात् धनाप्तिः = विवाह (दार-योग) से धन की प्राप्ति; दीर्घसूत्री = काम को लम्बा खींचने वाला, विलम्बकारी (दीर्घ-सूत्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम का स्वामी द्वितीय भाव में हो तो जातक अनेक स्त्रियों से संयुक्त, विवाह के योग से धन प्राप्त करने वाला, तथा किसी भी कार्य को लम्बा खींचने वाला (टालमटोल करने वाला) होता है। सप्तम (कलत्र) का धन-भाव में जाना "विवाह से धन-लाभ" का सटीक संकेत है।

English rendering The text states that with the 7th lord in the 2nd, the native is associated with many women, gains wealth through marriage, and is dilatory in his undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "दारयोगात् धनाप्तिः" कलत्र-भाव के स्वामी का धन-भाव में संयोग-मात्र से व्युत्पन्न भावार्थ है — भाव-कारकत्व का जोड़, कोई परिकलित मान नहीं।

24.75
दारेशे सहजे जातो मृतापत्यो हि मानवः।
कदाचिज्जायते पुत्री यत्नात्‌ पुत्रोऽपि जीवति
dāreśe sahaje jāto mṛtāpatyo hi mānavaḥ|
kadācijjāyate putrī yatnāt‌ putro'pi jīvati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तम भाव का स्वामी; सहजे = सहज अर्थात् तृतीय (पराक्रम) भाव में; मृतापत्य = जिसकी सन्तान मृत हो जाए (मृत-अपत्य); कदाचित् जायते पुत्री = कभी-कभी पुत्री का जन्म; यत्नात् = प्रयत्नपूर्वक; पुत्रः अपि जीवति = पुत्र भी जीवित रहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम का स्वामी तृतीय भाव में हो तो पाठ सन्तान-हानि का उल्लेख करता है; कभी पुत्री का जन्म होता है और विशेष प्रयत्न से पुत्र भी जीवित रहता है। यह शास्त्र का ही सन्तति-सम्बन्धी कथन है, इसे संवेदनशीलता के साथ पाठ के वचन के रूप में लिया जाए।

English rendering The text states that with the 7th lord in the 3rd, the native suffers loss of offspring; sometimes a daughter is born, and with effort a son too survives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "कदाचित्... यत्नात्" शब्द स्वयं परिणाम की अनिश्चितता को स्वीकारते हैं; शास्त्र यहाँ कोई नियत, अटल फल नहीं देता।

24.76
दारेशे सुखभावस्थे जाया नास्य वशे सदा।
स्वयं सत्यप्रियो धीमान्‌ धर्मात्मा दन्तरोगयुक्‌
dāreśe sukhabhāvasthe jāyā nāsya vaśe sadā|
svayaṃ satyapriyo dhīmān‌ dharmātmā dantarogayuk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तम भाव का स्वामी; सुखभावस्थ = सुख अर्थात् चतुर्थ (मातृ/गृह) भाव में स्थित; जाया न अस्य वशे सदा = उसकी पत्नी सदा उसके वश में नहीं; स्वयं सत्यप्रिय = स्वयं सत्यप्रेमी; धीमान् = बुद्धिमान्; धर्मात्मा = धर्मपरायण; दन्तरोगयुक् = दन्त-रोग (दाँतों की व्याधि) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम का स्वामी चतुर्थ भाव में हो तो जातक की पत्नी सदा उसके वश में नहीं रहती; जातक स्वयं सत्यप्रिय, बुद्धिमान् और धर्मात्मा होता है, किन्तु दन्त-रोग से पीड़ित रहता है। गुण और धर्म के साथ दाम्पत्य में स्वतन्त्रता तथा एक शारीरिक कष्ट — यही मिश्र फल है।

English rendering The text states that with the 7th lord in the 4th, the wife is not always under the native's sway; he himself is truth-loving, wise, and righteous, though afflicted with a dental ailment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तम (कलत्र) के स्वामी का चतुर्थ (सुख/केन्द्र) में जाना भाव-स्वामी-गन्तव्य का सम्बन्ध मात्र है; फल शास्त्र का कथन है।

24.77
दारेशे पञ्चमे जातो मानि सर्वगुणान्वितः।
सर्वदा हर्षयुक्तश्च तथा सर्वधनाधिपः
dāreśe pañcame jāto māni sarvaguṇānvitaḥ|
sarvadā harṣayuktaśca tathā sarvadhanādhipaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे = सप्तमेश; पञ्चमे = पञ्चम भाव में; मानि = मान-प्रेमी / अभिमानी; सर्वगुण-अन्वितः = समस्त गुणों से युक्त; सर्वदा = सदैव; हर्षयुक्तः = हर्ष से युक्त; सर्वधन-अधिपः = समस्त धन का अधिपति / अत्यधिक धनवान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दारेश पञ्चम भाव में हो तो जातक मान-प्रेमी और सर्वगुण-संपन्न होता है। वह सदैव हर्षयुक्त रहता है और सर्वधन का अधिपति — अर्थात् धन-संपन्न — कहा गया है। दारेश-पञ्चम की यह स्थिति शास्त्र में शुभ फल-वर्णन के रूप में आई है।

English rendering The text states that with the seventh lord in the fifth, the native is proud and endowed with every virtue; always joyful, and said to be master of all wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दारेश-पञ्चम स्थिति)। “सर्वधनाधिप” यहाँ शास्त्र का अतिशय-युक्त फल-शब्द है, न कि कोई गणना-सूत्र।

24.78
दारेशे रिपुभावस्थे भार्या तस्य रुजान्विता।
स्त्रिया सहाऽथ वा वैरं स्वयं क्रोधी सुखोज्झितः
dāreśe ripubhāvasthe bhāryā tasya rujānvitā|
striyā sahā'tha vā vairaṃ svayaṃ krodhī sukhojjhitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तम भाव का स्वामी; रिपुभावस्थ = रिपु अर्थात् षष्ठ भाव में स्थित; भार्या तस्य रुजान्विता = उसकी भार्या रोग से युक्त; स्त्रिया सह वैरम् = स्त्री (पत्नी) के साथ वैर/कलह; स्वयं क्रोधी = स्वयं क्रोधी स्वभाव; सुखोज्झित = सुख से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम का स्वामी षष्ठ भाव में हो तो पाठ बताता है कि जातक की भार्या रोगयुक्त रहती है, अथवा पत्नी के साथ कलह होता है; जातक स्वयं क्रोधी और सुख से रहित होता है। सप्तम (कलत्र) का स्वामी षष्ठ (रोग-शत्रु-कलह) में जाकर दाम्पत्य में व्याधि-विरोध का चित्र देता है।

English rendering The text states that with the 7th lord in the 6th, the wife is beset by illness, or there is discord with the wife; the native himself is prone to anger and deprived of comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कलत्र-भाव (7) के स्वामी का शत्रु-रोग-भाव (6) में संयोग ही "भार्या-रोग/कलह" कथन का मूल है — यह भाव-कारकत्वों का संयोजन है, कोई गणितीय अचर नहीं; फल शास्त्र का ही वचन है, इसे भय या निश्चित परिणाम के रूप में नहीं, बल से तौलकर पाठ के कथन-रूप में ग्रहण किया जाए।

24.79
दारेशे सप्तमे भावे जातो दारसुखान्वितः।
धीरो विचक्षणो धीमान्‌ केवलं वातरोगवान्‌
dāreśe saptame bhāve jāto dārasukhānvitaḥ|
dhīro vicakṣaṇo dhīmān‌ kevalaṃ vātarogavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तम (दार/जाया) भाव का स्वामी; सप्तमे भावे = सातवें भाव में (जो दारेश का अपना ही भाव है — स्वभाव-स्थिति); दारसुखान्वित = दाम्पत्य/पत्नी-सुख से युक्त; धीर = धैर्यवान्, अविचल; विचक्षण = कुशल, विवेकी; धीमान् = बुद्धिमान्; केवलं = बस इतना ही (एकमात्र दोष); वातरोग = वात-प्रकृति के रोग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दारेश (सप्तमेश) अपने ही सप्तम भाव में बैठे, तो जातक दाम्पत्य-सुख से सम्पन्न, धैर्यवान्, चतुर और बुद्धिमान् कहा जाता है। इस स्थिति का एकमात्र दोष वात-सम्बन्धी रोगों की प्रवृत्ति बताया गया है — शेष फल शुभ ही वर्णित है।

English rendering With the lord of the seventh placed in the seventh itself, the text states the native enjoys marital happiness and is steady, discerning, and intelligent — his one liability being disorders of the wind humour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भावेश-फल की पूरी तकनीक दो भावों के संयोग की है: शासित-भाव ⊕ स्थित-भाव। यहाँ 7 ⊕ 7 → भाव अपने ही स्वामी से पुष्ट होता है, अतः दार-कारकत्व केन्द्रित एवं बलवान् पढ़ा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) सप्तमेश का सप्तम में होना अनिवार्यतः उसे अपनी ही राशि (स्वक्षेत्र) में रखता है — यही वह स्थिति है जिसे षड्बल (Ch.27) का स्थान-बल अपने उच्च/स्व-अंश से पुरस्कृत करता है। हमारी विधि में ऐसा "भावेश स्वभाव में" वाला कथन गणित (स्थान-बल की स्व-राशि-वृद्धि) और फल (पाठ का दावा) — दोनों को पृथक् रखकर पढ़ा जाता है; फल शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

24.80
दारेशे मृत्युभावस्थे जातो दारसुखोज्झितः।
भार्याऽपि रोगयुक्ताऽस्य दुःशीलाऽपि न चानुगा
dāreśe mṛtyubhāvasthe jāto dārasukhojjhitaḥ|
bhāryā'pi rogayuktā'sya duḥśīlā'pi na cānugā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तमेश; मृत्युभावस्थ = अष्टम (मृत्यु/रन्ध्र) भाव में स्थित; दारसुखोज्झित = दाम्पत्य-सुख से रहित; भार्या = पत्नी; रोगयुक्ता = रोग-ग्रस्त; दुःशीला = दुराचारी स्वभाव वाली; न च अनुगा = और न ही अनुकूल/आज्ञाकारी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तमेश के अष्टम भाव में जाने पर जातक दाम्पत्य-सुख से वंचित रहता है। इसी योग में पत्नी को रोगग्रस्त, दुःशील स्वभाव वाली तथा पति के अनुकूल न रहने वाली बताया गया है — यह पाठ का फल-कथन है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering With the seventh lord in the eighth (the house of mortality), the text states the native is deprived of marital ease; his wife is said to be sickly, ill-natured, and not devoted to him.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकतः 7 ⊕ 8 → दार-कारक (जाया) का दुःस्थान/रन्ध्र (रोग-आयु) से संयोग होता है; इसी संगम को शास्त्र पत्नी के आरोग्य एवं दाम्पत्य-अनुकूलता के ह्रास के रूप में पढ़ता है।

24.81
दारेशे धर्मभावस्थे नानास्त्रीभिः समागमः।
जायाहृतमना जातो बह्वारम्भकरो नरः
dāreśe dharmabhāvasthe nānāstrībhiḥ samāgamaḥ|
jāyāhṛtamanā jāto bahvārambhakaro naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेश = सप्तमेश; धर्मभावस्थ = नवम (धर्म/भाग्य) भाव में स्थित; नानास्त्रीभिः = अनेक स्त्रियों के साथ; समागम = मेल/संसर्ग; जायाहृतमना = पत्नी के वश में मन वाला (जिसका चित्त पत्नी ने हर लिया); बह्वारम्भकर = अनेक कार्य/उपक्रम आरम्भ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तमेश के नवम भाव में होने पर जातक का अनेक स्त्रियों से संसर्ग होता है और उसका मन पत्नी में ही आसक्त रहता है। साथ ही वह बहुत-से नये कार्य आरम्भ करने वाला (बह्वारम्भी) स्वभाव का बताया गया है।

English rendering With the seventh lord in the ninth, the text states the native has liaisons with several women, his mind captivated by his wife, and he is a starter of many undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकतः 7 ⊕ 9 → दार-कारकत्व का विस्तार भाग्य/धर्म-भाव पर पड़ता है; कारक का त्रिकोण-भाव में जाना शास्त्र में सम्बन्ध-विषयक विस्तार एवं बहुल-आरम्भ की प्रवृत्ति के रूप में पढ़ा गया है।

24.82
दारेशे कर्मभावस्थे नास्य जाया वशानुगा।
स्वयं धर्मरतो जातो धनपुत्रादिसंयुतः
dāreśe karmabhāvasthe nāsya jāyā vaśānugā|
svayaṃ dharmarato jāto dhanaputrādisaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे = सप्तमेशे; कर्मभावस्थे = दशम-भावस्थिते; नास्य जाया = इसकी पत्नी नहीं; वशानुगा = वश में रहने वाली / आज्ञाकारिणी; स्वयं = स्वयं; धर्मरतो = धर्म-अनुरागी; धनपुत्रादिसंयुतः = धन-पुत्र आदि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दारेश कर्म (दशम) भाव में स्थित हो, तो जातक की पत्नी वशानुगा नहीं बताई गई है। स्वयं जातक धर्म-रत कहा गया है। धन, पुत्र आदि से युक्त होने का भी उल्लेख है। दशम कर्म-मान-आजीविका भाव है; यहाँ कलत्रेश की स्थिति का मिश्रित फल-कथन है।

English rendering The text states that when the seventh-lord occupies the tenth house, the native’s wife is not submissive; he himself is devoted to dharma and is endowed with wealth, sons, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तमेश की दशम-भाव स्थिति)। कर्मभाव = १०; “नास्य जाया वशानुगा” और “धर्मरतो … धनपुत्रादिसंयुतः” एक ही श्लोक में दो पक्ष — शास्त्र दोनों कहता है।

24.83
दारेशे लाभभावस्थे दारैरर्थसमागमः।
पुत्रादिसुखमल्पं च जनः कन्यप्रजो भवेत्‌
dāreśe lābhabhāvasthe dārairarthasamāgamaḥ|
putrādisukhamalpaṃ ca janaḥ kanyaprajo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे = सप्तमेशे; लाभभावस्थे = एकादश-भावस्थिते; दारैः = पत्नी / पत्नियों के द्वारा; अर्थसमागमः = धन-प्राप्ति / अर्थ-लाभ; पुत्रादिसुखमल्पं = पुत्र आदि का सुख अल्प; कन्यप्रजो = कन्या-संतान वाला; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दारेश लाभ (एकादश) भाव में हो, तो दारों के माध्यम से अर्थ-समागम का संकेत है। पुत्र आदि से सुख अल्प बताया गया है। जातक कन्या-प्रज — अर्थात् कन्या-संतान वाला — कहा गया है। एकादश लाभ-मित्र-आय भाव है; फल-कथन शास्त्र की परंपरा में है।

English rendering The text states that when the seventh-lord occupies the eleventh house, wealth accrues through the wife (or wives); happiness from sons and the like is little, and the person is indicated as having daughter-progeny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तमेश की एकादश-भाव स्थिति)। लाभभाव = ११; “कन्यप्रज” शास्त्रीय संकेत है — लिंग-संख्या की गणितीय गणना नहीं।

24.84
दारेशे व्ययगे जातो दरिद्रः कृपणोऽपि वा।
भार्यापि व्ययशीलाऽस्य वस्त्राजीवी नरो भवेत्‌
dāreśe vyayage jāto daridraḥ kṛpaṇo'pi vā|
bhāryāpi vyayaśīlā'sya vastrājīvī naro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे = सप्तमेशे; व्ययगे = द्वादश-भावगते; दरिद्रः = निर्धन; कृपणोऽपि वा = अथवा कृपण; भार्यापि = पत्नी भी; व्ययशीला = व्यय-प्रवण; वस्त्राजीवी = वस्त्र से जीविका चलाने वाला; नरो भवेत् = पुरुष हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दारेश व्यय (द्वादश) भाव में हो, तो जातक दरिद्र, अथवा कृपण, कहा गया है। उसकी पत्नी भी व्ययशीला बताई गई है। जातक वस्त्राजीवी — वस्त्र-व्यवसाय से जीविका चलाने वाला — हो, ऐसा शास्त्र कहता है। द्वादश व्यय-शय्या-विदेश भाव है; यह फल-वर्णन है, आर्थिक-निश्चितता नहीं।

English rendering The text states that when the seventh-lord occupies the twelfth house, the native is poor, or else miserly; the wife too is spendthrift, and the man is indicated as one who lives by cloth (or garment-trade).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तमेश की द्वादश-भाव स्थिति)। व्यय = १२; “दरिद्रः कृपणोऽपि वा” विकल्प-सूचक (अपि वा) — दो संभावित शास्त्र-संकेत, एकमात्र नियति नहीं।

24.85
अष्टमेशे तनौ जातस्तनुसौख्यविवर्जितः।
देवानां ब्राह्मणानां च निन्दको व्रणसंयुतः
aṣṭameśe tanau jātastanusaukhyavivarjitaḥ|
devānāṃ brāhmaṇānāṃ ca nindako vraṇasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमेश = अष्टम-भाव का स्वामी (रन्ध्रेश); तनौ = लग्न/प्रथम भाव में स्थित; जातः = जातक; तनुसौख्यविवर्जितः = शरीर-सुख से रहित; देवानां … निन्दकः = देवों व ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला; व्रणसंयुतः = व्रण/क्षत-चिह्न युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब अष्टमेश लग्न (तनु) में स्थित हो, तो जातक शरीर-सुख से वंचित रह सकता है। उसी कथन में यह भी आता है कि वह देवों तथा ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला और व्रण-युक्त बताया गया है। यह फल-कथन अष्टम-स्वामी के लग्न-संयोग से जुड़ा है; गणना नहीं, परिणाम-वर्णन है।

English rendering The text states that when the eighth lord occupies the lagna, the native is described as deprived of bodily comfort, given to censuring gods and Brāhmaṇas, and marked by wounds or sores.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टमेश-लग्न स्थिति का शास्त्रीय परिणाम)। यहाँ केवल भाव-स्वामी की स्थिति → फल का शाब्दिक नियम है; अंश, वर्ग या बल-इकाई नहीं दी गई।

24.86
अष्टमेशे धने बाहुबलहीनः प्रजायते।
धनं तस्य भवेत्‌ स्वल्पं नष्ट वित्तं न लभ्यते
aṣṭameśe dhane bāhubalahīnaḥ prajāyate|
dhanaṃ tasya bhavet‌ svalpaṃ naṣṭa vittaṃ na labhyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमेश = अष्टमेश; धने = द्वितीय (धन) भाव में; बाहुबलहीन = भुज-बल से हीन (शारीरिक रूप से दुर्बल); धनं स्वल्पम् = धन थोड़ा; नष्टं वित्तं न लभ्यते = खोया हुआ धन पुनः प्राप्त नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टमेश के द्वितीय (धन) भाव में जाने पर जातक बाहु-बल से हीन (दुर्बल) होता है। उसका संचित धन अल्प रहता है और एक बार नष्ट हुआ धन फिर वापस नहीं मिलता — ऐसा पाठ का कथन है।

English rendering With the eighth lord in the second, the text states the native is weak of arm, his wealth scanty, and money once lost is not regained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकतः 8 ⊕ 2 → रन्ध्रेश (क्षय-कारक) का धन-भाव से संयोग; अष्टम-स्वामी का द्वितीय में जाना शास्त्र में संचित वित्त की अल्पता एवं क्षय-प्रवृत्ति के रूप में पढ़ा गया है।

24.87
रन्ध्रेशे सहजे भावे भ्रातृसौख्यं न जायते।
सालस्यो भृत्यहीनश्च जायते बलवर्जितः
randhreśe sahaje bhāve bhrātṛsaukhyaṃ na jāyate|
sālasyo bhṛtyahīnaśca jāyate balavarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेश = अष्टम (रन्ध्र) भाव का स्वामी; सहजे भावे = तृतीय (सहज/भ्रातृ, पराक्रम) भाव में; भ्रातृसौख्यं न जायते = भाइयों का सुख नहीं मिलता; सालस्य = आलस्य-युक्त; भृत्यहीन = सेवक-रहित; बलवर्जित = बल से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रन्ध्रेश (अष्टमेश) के तृतीय भाव में होने पर जातक को भ्रातृ-सुख नहीं मिलता। वह आलसी, सेवक-विहीन तथा पराक्रम/बल से रहित बताया गया है।

English rendering With the eighth lord in the third, the text states the native gets no joy from brothers and is lazy, without servants, and lacking in strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकतः 8 ⊕ 3 → रन्ध्रेश का सहज (भ्रातृ-पराक्रम) भाव पर प्रभाव; अष्टम-स्वामी के तृतीय में जाने को शास्त्र भ्रातृ-सुख एवं पराक्रम के ह्रास के रूप में पढ़ता है।

24.88
रन्ध्रेशे सुखभावस्थे मातृहीनो भवेच्छिशुः।
गृहभूमिसुखैर्हीनो मित्रद्रोही न संशयः
randhreśe sukhabhāvasthe mātṛhīno bhavecchiśuḥ|
gṛhabhūmisukhairhīno mitradrohī na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेश = अष्टमेश; सुखभावस्थ = चतुर्थ (सुख/मातृ-गृह) भाव में स्थित; मातृहीनो भवेत् शिशुः = शिशु (बाल्य में ही) मातृ-हीन हो जाता है; गृहभूमिसुखैः हीन = घर-भूमि के सुखों से रहित; मित्रद्रोही = मित्रों से द्रोह करने वाला; न संशयः = इसमें सन्देह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रन्ध्रेश के चतुर्थ भाव में होने पर जातक बाल्यकाल में ही माता के सुख से वंचित हो जाता है। उसे गृह-भूमि आदि के सुखों से हीन तथा मित्र-द्रोही स्वभाव वाला बताया गया है — पाठ इसे निःसंशय (न संशयः) कहता है।

English rendering With the eighth lord in the fourth, the text states the child loses its mother early, is deprived of home and land comforts, and betrays friends — this, the text says, without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकतः 8 ⊕ 4 → रन्ध्रेश का सुख/मातृ-भाव पर प्रभाव; अष्टम-स्वामी के चतुर्थ में जाने को शास्त्र मातृ-सुख एवं गृह-भूमि-सुख के क्षय के रूप में पढ़ता है।

24.89
रन्ध्रेशे सुतभावस्थे जडबुद्धिः प्रजायते।
स्वल्पप्रज्ञो भवेज्जतो दीर्घायुश्च धनान्वितः
randhreśe sutabhāvasthe jaḍabuddhiḥ prajāyate|
svalpaprajño bhavejjato dīrghāyuśca dhanānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे सुतभावस्थे = अष्टमेश पञ्चम (सुत) भाव में; जडबुद्धिः = जड़/मंद बुद्धि; स्वल्पप्रज्ञः = अल्प प्रज्ञा वाला; जातः = जातक; दीर्घायुः = दीर्घ आयु वाला; धनान्वितः = धन से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रन्ध्रेश सुत-भाव में हो तो जातक जड़-बुद्धि और स्वल्प-प्रज्ञ उत्पन्न होता है। उसी श्लोक में विपर्यय-सा फल भी जुड़ा है: दीर्घायु और धनान्वित होना। यह पञ्चम में अष्टमेश की मिश्रित फल-सूची है — मंद-प्रज्ञा के साथ आयु-धन का योग पाठ स्वयं जोड़ता है।

English rendering The text states that when the eighth lord occupies the fifth, the native is born of dull intellect and scant wisdom, yet is also said to be long-lived and endowed with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रन्ध्रेश-सुतभाव, मिश्रित परिणाम)। “दीर्घायु” यहाँ आयुर्दाय-गणित नहीं; शाब्दिक फल है। आयु-वर्षों का सूत्र अध्याय ४३–४४ के नियमों में अलग से आता है।

24.90
रन्ध्रेशे रिपुभावस्थे शत्रुजेता भवेज्जनः।
रोगयुक्तशरीरश्च बाल्ये सर्पजलाद्‌ भयम्‌
randhreśe ripubhāvasthe śatrujetā bhavejjanaḥ|
rogayuktaśarīraśca bālye sarpajalād‌ bhayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेश = अष्टमेश; रिपुभावस्थ = षष्ठ (रिपु/शत्रु) भाव में स्थित; शत्रुजेता = शत्रुओं को जीतने वाला; रोगयुक्तशरीर = रोगग्रस्त शरीर वाला; बाल्ये = बाल्यकाल में; सर्पजलाद् भयम् = सर्प तथा जल से भय/संकट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रन्ध्रेश के षष्ठ भाव में होने पर जातक शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है। किन्तु उसका शरीर रोग-ग्रस्त रहता है और बाल्यकाल में सर्प तथा जल से भय/संकट की सम्भावना बताई गई है।

English rendering With the eighth lord in the sixth, the text states the native conquers his enemies, yet carries a disease-prone body and, in childhood, risk from serpents and water.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकतः 8 ⊕ 6 → दो दुःस्थानों (रन्ध्र एवं रिपु) का पारस्परिक योग; दुःस्थानेश का दुःस्थान में जाना शास्त्र में शत्रु-विजय (विपरीत-राजयोग-सदृश) परन्तु देह-रोग एवं बाल्य-भय के मिश्रित फल के रूप में पढ़ा जाता है।

24.91
रन्ध्रेशे दारभावस्थे तस्य भार्याद्वयं भवेत्‌।
व्यापारे च भवेद्‌हानिस्तस्मिन्‌ पापयुते ध्रुवम्‌
randhreśe dārabhāvasthe tasya bhāryādvayaṃ bhavet‌|
vyāpāre ca bhaved‌hānistasmin‌ pāpayute dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेश = अष्टमेश; दारभावस्थ = सप्तम (दार/जाया) भाव में स्थित; तस्य भार्याद्वयं भवेत् = उसकी दो पत्नियाँ होती हैं; व्यापारे हानिः = व्यापार में हानि; तस्मिन् पापयुते = उस (अष्टमेश) के पाप-ग्रह से युक्त होने पर; ध्रुवम् = निश्चित रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रन्ध्रेश के सप्तम भाव में होने पर जातक की दो पत्नियाँ होती हैं। और यदि वह अष्टमेश पाप-ग्रह से युक्त हो, तो व्यापार में हानि निश्चित (ध्रुवम्) कही गई है — यहाँ फल स्पष्टतः ग्रह के बलाबल पर सापेक्ष है।

English rendering With the eighth lord in the seventh, the text states the native has two wives; and if that lord is joined by a malefic, loss in business is declared certain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सापेक्ष)। तकनीकतः 8 ⊕ 7 → रन्ध्रेश का दार-भाव पर प्रभाव; किन्तु "पापयुते ध्रुवम्" वाला उपवाक्य फल को ग्रह के सहचर्य/बल पर सापेक्ष बना देता है — यही बलाबल-सापेक्ष फल-निर्णय की तकनीक है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "पापयुते → ध्रुवम्" वाली सशर्त-वृद्धि ठीक उस बलाबल-विवेक का बीज है जिसे यही अध्याय अपने अन्त (24.145–148: "बलाबलविवेकेन", पूर्ण/अर्ध/पाद-फल) में सूत्रबद्ध करता है, और जिसे हमारा षड्बल (Ch.27) रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में संख्यात्मक रूप से मापता है। हमारी विधि में इस श्लोक के दो अंश पृथक् पढ़े जाते हैं — गणित-योग्य अंश (अष्टमेश की स्थिति एवं पाप-सहचर्य का बल-मान) और फल-अंश (व्यापार-हानि का पाठ-कथन) — फल पाठ का दावा रहता है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं; और जहाँ संख्या (बल) पर फल निर्भर हो, वहाँ परिपाटी (ग्रह, पाप-योग, अंश) घोषित करके ही निर्णय लिया जाता है।

24.92
रन्ध्रेशे मृत्युभावस्थे जाता दीर्घायुषा युतः।
निर्बले मध्यमायुः स्याच्चौरो निन्द्योऽन्यनिन्दकः
randhreśe mṛtyubhāvasthe jātā dīrghāyuṣā yutaḥ|
nirbale madhyamāyuḥ syāccauro nindyo'nyanindakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेश = अष्टम भाव का स्वामी (8th-house lord; रन्ध्र = छिद्र/मृत्यु-स्थान); मृत्युभाव-स्थे = अष्टम भाव में स्थित (यहाँ स्वामी अपने ही भाव में = 8th lord in the 8th); दीर्घायुषा युतः = दीर्घ आयु से युक्त; निर्बले = (स्वामी के) बलहीन होने पर; मध्यमायुः = मध्यम आयु; चौरः = चोर-प्रवृत्ति; निन्द्यः = निन्दा-योग्य; अन्यनिन्दकः = दूसरों की निन्दा करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब अष्टमेश अष्टम भाव में (अर्थात् अपने ही स्थान में) बैठे, तो जातक दीर्घायु होता है; किन्तु यदि वह स्वामी बलहीन हो तो आयु मध्यम बताई गई है। साथ ही पाठ इसे चौर-वृत्ति, निन्द्यता और परनिन्दा की प्रवृत्ति से जोड़ता है। ध्यान रहे — यह आयु और स्वभाव का कथन शास्त्र का अपना वचन है, कोई भविष्य-निर्णय नहीं।

English rendering The text states that when the 8th lord occupies the 8th house (its own place), the native is long-lived; but if that lord is weak, the life-span is only middling — and it further ascribes thievish leanings, censurability, and a habit of maligning others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु + स्वभाव)। फिर भी यहाँ एक निर्णायक चर छिपा है: फल की शाखा (दीर्घ बनाम मध्यम आयु) स्वामी के बल पर काँटा बदलती है — अर्थात् फल स्वयं एक शर्त-सापेक्ष (conditional) कथन है, न कि नियत।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उसी बलाबल-विवेक पर टिका है जिस पर यह अध्याय समाप्त होता है (v.145 "बलाबलविवेकेन")। "बल" को नापने का यन्त्र ही षड्बल है (Ch.27) — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), प्रत्येक अंग एक निश्चित संख्यात्मक नियम, और कुल प्रति-ग्रह देहली से तुलनीय। हमारे इंजन में यही गणित तय करता है कि "दीर्घ" शाखा लगे या "मध्यम"। और अनुशासन-रेखा स्पष्ट है: आयु का लेबल शास्त्र का दावा है — हम उसे गणित से निकालते हैं, भाग्य-वचन के रूप में नहीं थोपते।

24.93
अष्टमेशे तपःस्थाने धर्मद्रोही च नास्तिकः।
दुष्टभार्यापतिश्चैव परद्रव्यापहारकः
aṣṭameśe tapaḥsthāne dharmadrohī ca nāstikaḥ|
duṣṭabhāryāpatiścaiva paradravyāpahārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमेशे = अष्टम-स्वामी के; तपःस्थाने = नवम भाव में (तपः/धर्म = 9th); धर्मद्रोही = धर्म का विरोधी; नास्तिकः = अनास्तिक/अश्रद्धालु; दुष्टभार्यापतिः = दुष्ट-स्वभाव पत्नी का पति; परद्रव्य-अपहारकः = दूसरों के धन का अपहरण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टमेश जब नवम (धर्म/भाग्य) भाव में जाए, तो जातक की धर्म-विमुखता, अश्रद्धा, कुशील-दाम्पत्य तथा परधन-लोलुपता की ओर झुकाव वर्णित होता है। यह नवम के शुभ भाव पर अष्टम-दोष के आरोपण का फल-कथन है — पाठ का अपना निदान, कोई अटल दण्ड-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the 8th lord falls in the 9th (the house of dharma and fortune), it describes a betrayer of dharma, a disbeliever, the husband of an ill-natured wife, and one prone to seizing the wealth of others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्वभाव/धर्म)। तकनीकी रूप से यह "अष्टमेश ने त्रिकोण-शुभ स्थान नवम को दूषित किया" का शुद्ध गुण-कथन है; एकमात्र निर्धारक-चरण जो यहाँ चलता है, वह है नवम-स्वामी नहीं, बल्कि अष्टम-स्वामी की पहचान और उसका भावान्तरण।

24.94
रन्ध्रेशे कर्मभावस्ते पितृसौख्यविवर्जितः।
पिशुनः कर्महीनश्च यदि नैव शुभेक्षिते
randhreśe karmabhāvaste pitṛsaukhyavivarjitaḥ|
piśunaḥ karmahīnaśca yadi naiva śubhekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे = अष्टमेश में; कर्मभावस्ते = कर्म-भाव (दशम) में स्थित; पितृसौख्यविवर्जितः = पिता-सुख से रहित; पिशुनः = चुगलखोर / पिशुन-स्वभाव; कर्महीनः = कर्म/व्यवसाय से हीन; यदि नैव शुभेक्षिते = यदि शुभ ग्रहों से दृष्ट न हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रन्ध्रेश जब कर्म-भाव (दशम) में हो, तो जातक पितृ-सौख्य से वंचित कहा गया है। उसी दशा में उसे पिशुन तथा कर्महीन भी कहा गया है — परन्तु यह फल तब, जब वह स्थान शुभ दृष्टि से रहित हो। यदि शुभ ग्रह दृष्टि दें, तो शास्त्र स्वयं इस कठोर फल को सीमित कर देता है; अतः दृष्टि-योग यहाँ निर्णायक शर्त है।

English rendering The text states that when the eighth lord stands in the tenth (karma) house, the native is said to lack paternal happiness, to be a backbiter, and to be without vocation — provided the placement is not aspected by benefics. The absence of benefic aspect is the stated condition for this phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टमेश-दशम + शुभ-दृष्टि की शर्त)। “शुभेक्षित” यहाँ गुणात्मक शर्त है, कोई अंश-माप या बल-इकाई नहीं।

24.95
रन्ध्रेशे लाभभावस्थे सपापे धनवर्जितः।
बाल्ये दुःखी सुखी पश्चात्‌ दीर्घायुश्च शुभान्विते
randhreśe lābhabhāvasthe sapāpe dhanavarjitaḥ|
bālye duḥkhī sukhī paścāt‌ dīrghāyuśca śubhānvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे = अष्टम-स्वामी के; लाभभाव-स्थे = एकादश भाव में (लाभ = 11th); सपापे = पाप-ग्रह के साथ होने पर; धनवर्जितः = धन-हीन; बाल्ये दुःखी = बचपन में दुःखी; सुखी पश्चात् = बाद में सुखी; दीर्घायुः = दीर्घ आयु; शुभान्विते = शुभ-ग्रह से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टमेश एकादश (लाभ) भाव में हो और पाप-ग्रह के साथ हो तो धन-हानि, तथा बाल्यावस्था में कष्ट पर आगे चलकर सुख होता है; और यदि वही स्वामी शुभ-ग्रह से युक्त हो तो दीर्घ आयु कही गई है। दोनों फल परस्पर-विपरीत हैं और संगति (पाप बनाम शुभ) पर निर्भर हैं।

English rendering The text states that when the 8th lord is in the 11th (the house of gains) and joined with a malefic, the native is wealth-deprived and unhappy in childhood yet happy later; but joined with a benefic, he attains long life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धन/आयु)। तकनीकी केन्द्र यहाँ संगति-द्वैत है: सपाप → एक शाखा, शुभान्वित → विपरीत शाखा। फल एक द्विशाखी स्विच है जिसका काँटा युति-ग्रह की शुभ/पाप-प्रकृति तय करती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक अध्याय-अन्त के "बल-विवेक" नियम (v.145–147) का जीवन्त उदाहरण है: पूर्ण बल → पूर्ण फल, अर्ध बल → अर्ध, हीन बल → पाद। "पाप/शुभ के साथ" और स्वामी का बल — इन्हें ही षड्बल (Ch.27) संख्यात्मक रूप से नापता है, और यही तय करता है कि "धनवर्जित" शाखा लगे या "दीर्घायु" शाखा। हमारी पद्धति में यह द्विशाखी निर्णय गणित से आता है; "दीर्घायु/धन-हानि" के लेबल शास्त्र के कथन रहते हैं, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

24.96
रन्ध्रेशे व्ययभावस्थे कुकार्ये व्ययकृत्‌ सदा।
अल्पायुश्च भवेज्जातः सपापे च विशेषतः
randhreśe vyayabhāvasthe kukārye vyayakṛt‌ sadā|
alpāyuśca bhavejjātaḥ sapāpe ca viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रेशे = अष्टमेश में; व्ययभावस्थे = व्यय-भाव (द्वादश) में स्थित; कुकार्ये = कुकर्म/बुरे कार्यों में; व्ययकृत् सदा = सदा व्यय करने वाला; अल्पायुः = अल्प आयु; जातः = जातक; सपापे = पाप-युक्त होने पर; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रन्ध्रेश व्यय-भाव (द्वादश) में हो, तो जातक सदा कुकार्य में व्यय करने वाला कहा गया है। उसी स्थिति में उसे अल्पायु भी कहा गया है — और यह फल पाप-युक्त होने पर विशेष रूप से लागू बताया गया है। द्वादश व्यय-स्थान है; अष्टमेश का वहाँ होना शास्त्र में आयु-ह्रास और अनुचित व्यय दोनों से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the eighth lord occupies the twelfth (vyaya) house, the native is said always to spend on base deeds. Short life is also stated for that placement, especially when the lord is with malefics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टमेश-द्वादश; अल्पायु एवं व्यय-फल)। “अल्पायु” यहाँ सापेक्ष फल-शब्द है, कोई निश्चित वर्ष-संख्या नहीं।

24.97
भाग्येशे लग्नगे जातो भाग्यवान्‌ भूपवन्दितः।
सुशीलश्च सुरूपश्च विद्यावान्‌ जनपूजितः
bhāgyeśe lagnage jāto bhāgyavān‌ bhūpavanditaḥ|
suśīlaśca surūpaśca vidyāvān‌ janapūjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे = नवम-स्वामी के (भाग्य = 9th, धर्म/भाग्य-स्थान); लग्नगे = प्रथम/लग्न भाव में; भाग्यवान् = भाग्यशाली; भूपवन्दितः = राजाओं से वन्दित (भूप = राजा); सुशीलः = सदाचारी; सुरूपः = सुन्दर रूप वाला; विद्यावान् = विद्यायुक्त; जनपूजितः = लोगों द्वारा पूजित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नवमेश (भाग्येश) लग्न में स्थित हो तो जातक भाग्यवान, राजमान्य, सुशील, सुरूप, विद्वान् और जन-पूजित होता है। यहाँ से भाग्येश-फल की शुभ शृंखला आरम्भ होती है — भाग्य-स्वामी का स्वयं देह-स्थान में आना।

English rendering The text states that when the 9th lord occupies the ascendant, the native is fortunate, honoured by kings, well-conducted, handsome, learned, and revered by people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-भाग्य)। किन्तु पूरा अध्याय एक पूर्व-गणना पर खड़ा है: "भाग्येश" की पहचान = लग्न से नवम राशि का स्वामी, जो D1 चक्र पर पूर्ण-राशि गणना (whole-sign count) + राशि-स्वामी सारणी का नियत परिणाम है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही "भावेश-निर्धारण" हमारे लिए विशुद्ध निर्धार्य (deterministic) चरण है। जैसे षोडश-वर्ग में D1…D60 प्रत्येक 30° राशि का निश्चित नियम-आधारित विभाजन है (मॉड्यूलर अंकगणित; kaal_ekavimshati_varga.py), वैसे ही नवमेश = (लग्न-राशि +8) mod 12 की राशि का स्वामी — कोई मत-भेद नहीं। हमारी अनुशासन-रेखा: यह पहचान गणित है (एक ही उत्तर), जबकि "राजमान्य/जनपूजित" उसका फल-कथन है — गणित और व्याख्या को हम अलग रखते हैं।

24.98
भाग्येशे धनभावस्थे पण्डितो जनवल्लभः।
जायते धनवान्‌ कामी स्त्रीपुत्रादिसुखान्वितः
bhāgyeśe dhanabhāvasthe paṇḍito janavallabhaḥ|
jāyate dhanavān‌ kāmī strīputrādisukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे = नवमेश में; धनभावस्थे = धन-भाव (द्वितीय) में स्थित; पण्डितः = पण्डित/विद्वान्; जनवल्लभः = जनप्रिय; धनवान् = धनवान्; कामी = काम-प्रवृत्ति वाला / इच्छुक; स्त्रीपुत्रादिसुखान्वितः = स्त्री-पुत्र आदि सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — भाग्येश जब धन-भाव (द्वितीय) में हो, तो जातक पण्डित और जन-वल्लभ कहा गया है। उसी स्थिति में वह धनवान्, कामी, तथा स्त्री-पुत्रादि सुख से युक्त भी कहा गया है। नवमेश का द्वितीय में बैठना भाग्य को वाणी-धन-कुटुम्ब क्षेत्र से जोड़ता है; शास्त्र यहाँ विद्या, लोकप्रियता और पारिवारिक सुख का फल बताता है।

English rendering The text states that when the ninth lord occupies the second (dhana) house, the native is said to be a scholar and beloved of people. The same placement is also described as yielding wealth, strong desire, and happiness from spouse, children, and kindred.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवमेश-द्वितीय योग)। धन-सुख यहाँ गुणात्मक फल है; कोई मुद्रा-माप या अंश-सूत्र नहीं।

24.99
भाग्येशे भ्रातृभावस्थे जातो भ्रातृसुखान्वितः।
धनवान्‌ गुणवांश्चापि रूपशीलसमन्वितः
bhāgyeśe bhrātṛbhāvasthe jāto bhrātṛsukhānvitaḥ|
dhanavān‌ guṇavāṃścāpi rūpaśīlasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येश = नवम-भाव का अधिपति (भाग्येश); भ्रातृभावस्थे = तृतीय भाव में स्थित; जात = जातक; भ्रातृसुखान्वित = भाइयों/सहोदरों से सुख से युक्त; धनवान् = धन-सम्पन्न; गुणवान् = गुण-सम्पन्न; रूपशील-समन्वित = रूप (आकार/रूप) और शील (चरित्र/स्वभाव) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भाग्येश तृतीय भाव (भ्रातृभाव) में स्थित हो, तो जातक भाइयों-सहोदरों के सुख से युक्त होता है। उसी कथन में धन-सम्पत्ति, गुण-सम्पन्नता तथा रूप और शील का योग भी बताया गया है। यह नवम-स्वामी की तृतीय-स्थिति का फल-वर्णन है — गणन नहीं, संकेत।

English rendering The text states that when the lord of the ninth is placed in the third house (bhrātṛ-bhāva), the native is endowed with happiness from brothers and co-borns. The same statement adds wealth, virtue, and the combination of form (rūpa) and character (śīla).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ केवल भाव-स्वामी की स्थिति (भाग्येश → तृतीय) और उससे जुड़ा शास्त्रीय फल-सूत्रीकरण है; कोई अंश, वर्ग-विभाजन या बल-माप नहीं।

24.100
भाग्येशे तुर्यभावस्थे गृहयानसुखान्वितः।
सर्वसम्पत्तियुक्तश्च मातृभक्तो भवेन्नरः
bhāgyeśe turyabhāvasthe gṛhayānasukhānvitaḥ|
sarvasampattiyuktaśca mātṛbhakto bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येश = नवमेश; तुर्यभावस्थे = चतुर्थ भाव (तुर्य/सुख-भाव) में स्थित; गृह = घर/निवास; यान = वाहन/सवारी; सुखान्वित = सुख से युक्त; सर्वसम्पत्तियुक्त = समस्त सम्पत्ति से युक्त; मातृभक्त = माता के प्रति भक्ति/श्रद्धा वाला; नर = पुरुष/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश जब चतुर्थ भाव में हो, तो जातक गृह और यान के सुख से युक्त होता है। उसी फल-कथन में सर्व-सम्पत्ति का योग तथा माता के प्रति भक्ति भी कही गई है। तुर्य-भाव सुख, गृह और मातृ-क्षेत्र से जुड़ा है — भाग्येश की यहाँ स्थिति को पाठ उसी सन्दर्भ में बाँधता है।

English rendering The text states that when the ninth-lord occupies the fourth house (turya), the native is endowed with comfort of house and vehicles. The same phala adds endowment with all wealth and devotion to the mother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। केवल भाग्येश-in-चतुर्थ की स्थिति-फल सूची; कोई संख्यात्मक गुणक या दशा-अनुपात नहीं।

24.101
भाग्येशे सुतभावस्थे सुतभाग्यसमन्वितः।
गुरुभक्तिरतो धीरो धर्मात्मा पण्डितो नरः
bhāgyeśe sutabhāvasthe sutabhāgyasamanvitaḥ|
gurubhaktirato dhīro dharmātmā paṇḍito naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे = नवम-स्वामी के; सुतभाव-स्थे = पंचम भाव में (सुत = 5th, सन्तान); सुतभाग्य-समन्वितः = सन्तान के भाग्य से युक्त; गुरुभक्ति-रतः = गुरु-भक्ति में लीन; धीरः = धीर/स्थिरचित्त; धर्मात्मा = धर्मपरायण; पण्डितः = विद्वान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश पंचम (सुत/मन्त्र) भाव में हो तो जातक सन्तान के भाग्य से युक्त, गुरु-भक्त, धीर, धर्मात्मा और विद्वान् होता है। भाग्य का सन्तान-विद्या-स्थान में आना पुत्र-सौभाग्य, गुरु-निष्ठा और धर्म-बुद्धि से जुड़ता है।

English rendering The text states that when the 9th lord is in the 5th (the house of progeny), the native is blessed through his children's fortune, devoted to his preceptor, steadfast, righteous, and learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सुत-भाग्य/धर्म-बुद्धि)। दो त्रिकोण-स्वामियों (यहाँ भाग्येश का पंचम-त्रिकोण में जाना) का सम्बन्ध शुभ माना गया है; परन्तु गणना-चरण केवल भावेश-पहचान तक सीमित है, शेष फल-निरूपण है।

24.102
भाग्येशे रिपुभावस्थे स्वल्पभाग्यो भवेन्नरः।
मातुलादिसुखैर्हीनः शत्रुभिः पीडितः सदा
bhāgyeśe ripubhāvasthe svalpabhāgyo bhavennaraḥ|
mātulādisukhairhīnaḥ śatrubhiḥ pīḍitaḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येश = नवमेश; रिपुभावस्थे = षष्ठ भाव (रिपु/शत्रु-भाव) में स्थित; स्वल्पभाग्य = अल्प भाग्य वाला; मातुलादि = मामा आदि (मातृपक्ष-सम्बन्धी); सुखैर्हीन = सुखों से हीन; शत्रुभिः = शत्रुओं द्वारा; पीडित = पीड़ित; सदा = सदैव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश षष्ठ में हो तो जातक स्वल्प-भाग्य वाला होता है। उसी फल-सूत्रीकरण में मातुलादि के सुखों से हीनता तथा शत्रुओं द्वारा निरन्तर पीड़ा कही गई है। षष्ठ रिपु, ऋण और विरोध का क्षेत्र है — पाठ भाग्येश की वहाँ स्थिति को भाग्य-ह्रास और शत्रु-पीड़ा से जोड़ता है; यह शास्त्रीय संकेत है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the ninth-lord stands in the sixth house (ripu-bhāva), the native has meagre fortune. The same phala adds deprivation of happiness from maternal uncles and the like, and constant affliction by enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “स्वल्प” यहाँ गुणात्मक है, कोई संख्या-सीमा या अनुपात नहीं; केवल भाव-स्थिति → फल का शास्त्र-सूत्र।

24.103
भाग्येशे दारभावस्थे दारयोगात्‌ सुखोदयः।
गुणवान्‌ कीर्तिमांश्चापि जायते द्विजसत्तमः
bhāgyeśe dārabhāvasthe dārayogāt‌ sukhodayaḥ|
guṇavān‌ kīrtimāṃścāpi jāyate dvijasattamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येश = नवमेश; दारभावस्थे = सप्तम भाव (दार/कलत्र-भाव) में स्थित; दारयोगात् = दार (पत्नी/जीवनसाथी) के योग से; सुखोदय = सुख का उदय; गुणवान् = गुण-सम्पन्न; कीर्तिमान् = कीर्ति वाला; जायते = उत्पन्न होता है/होता है; द्विजसत्तम = द्विजों में श्रेष्ठ (सम्बोधन — शिष्य/पाठक को)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश सप्तम में स्थित हो तो दार-योग से सुख का उदय होता है। उसी कथन में गुणवान् और कीर्तिमान् होना भी कहा गया है। “द्विजसत्तम” सम्बोधन है — फल का विषय नहीं, गुरु-शिष्य संवाद की शैली। सप्तम दार और सम्बन्ध-क्षेत्र है; भाग्येश की वहाँ स्थिति को पाठ उसी सुख-उदय से बाँधता है।

English rendering The text states that when the ninth-lord occupies the seventh house (dāra-bhāva), happiness arises through the spouse-yoga. The same statement adds that the native is virtuous and renowned — addressed to the “best of the twice-born” as the dialogic listener.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “दारयोग” यहाँ सम्बन्ध-क्षेत्र का शास्त्रीय योग-शब्द है; कोई अंश-गणना या दशा-सूत्र नहीं।

24.104
भाग्येशे मृत्युभावस्थे भाग्यहीनो नरो भवेत्‌।
ज्येष्ठभ्रातृसुखं नैव तस्य जातस्य जायते
bhāgyeśe mṛtyubhāvasthe bhāgyahīno naro bhavet‌|
jyeṣṭhabhrātṛsukhaṃ naiva tasya jātasya jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे = नवम-स्वामी के; मृत्युभाव-स्थे = अष्टम भाव में (मृत्यु = 8th); भाग्यहीनः = भाग्य से हीन; नरो भवेत् = मनुष्य होता है; ज्येष्ठभ्रातृ-सुखं नैव = बड़े भाई का सुख नहीं; तस्य जातस्य जायते = उस जातक को प्राप्त होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश अष्टम (मृत्यु/रन्ध्र) भाव में हो तो जातक भाग्य-हीन होता है और उसे ज्येष्ठ-भ्रातृ का सुख नहीं मिलता। भाग्य के कारक-भाव के स्वामी का दुःस्थान अष्टम में जाना भाग्य-क्षय के फल-रूप में वर्णित है — पाठ का अपना कथन।

English rendering The text states that when the 9th lord occupies the 8th (the house of death), the native becomes bereft of fortune, and the comfort of an elder brother does not fall to his lot.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाग्य-हानि)। यह भाग्येश-शृंखला के इस खण्ड का अन्तिम श्लोक है; गणना केवल "नवमेश → अष्टम" की पूर्ण-राशि स्थान-पहचान तक है, और भाग्य-ह्रास उसका शास्त्रीय फल-अर्थ — जिसे हम गणित से नहीं, पाठ के कथन के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

24.105
भाग्येशे भाग्यभावस्थे बहुभाग्यसमन्वितः।
गुणसौन्दर्यसम्पन्नो सहजेभ्यः सुखं बहु
bhāgyeśe bhāgyabhāvasthe bahubhāgyasamanvitaḥ|
guṇasaundaryasampanno sahajebhyaḥ sukhaṃ bahu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे = भाग्य (नवम भाव — धर्म/भाग्य) + ईश (स्वामी), अर्थात् नवमेश; भाग्यभावस्थे = नवम भाव में स्थित (अपने ही भाव में — स्वभावस्थ); बहुभाग्य-समन्वितः = प्रचुर सौभाग्य से युक्त; गुण-सौन्दर्य-सम्पन्नः = गुण और सौन्दर्य से भरपूर; सहजेभ्यः = सहज (तृतीय भाव) = भाइयों/सहोदरों से; सुखं बहु = बहुत सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब नवमेश (भाग्येश) अपने ही नवम भाव में बैठा हो, तो जातक प्रचुर सौभाग्यवान होता है, गुण और सौन्दर्य से सम्पन्न, और उसे सहोदरों से बहुत सुख मिलता है। स्वामी का अपने भाव में होना यहाँ भाग्य-भाव की पुष्टि के रूप में कहा गया है।

English rendering The text states that when the lord of the ninth (fortune) sits in the ninth itself, the native is richly fortunate, endowed with virtue and beauty, and enjoys much happiness from siblings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी रूप से यहाँ "भाव-स्वामी का अपने भाव में होना" स्वक्षेत्र-स्थिति है — भाव-स्वामित्व स्वयं लग्न से राशि-चक्र की नियत (deterministic) गणना है, व्याख्या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवमेश का नवम भाव में होना अर्थात् ग्रह का अपनी ही राशि (स्वक्षेत्र) में होना — यही षड्बल (BPHS अ.27) के स्थानबल का स्वक्षेत्र-अंश है, जिसे हमारा षड्बल-डिकोड रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में नियत संख्यात्मक नियम से जोड़ता है। और इसी अध्याय का समापन (श्लोक 145–148, बलाबल-विवेक) कहता है कि हर भावेश-फल को ग्रह के बल से तौलो — ठीक वही षड्बल गणना, जिसे हम फल की व्याख्या से पृथक् रखते हैं।

24.106
भाग्येशे कर्मभावस्थे जातो राजाऽथ तत्समः।
मन्त्री सेनापतिर्वाऽपि गुणवान्‌ जनपुजितः
bhāgyeśe karmabhāvasthe jāto rājā'tha tatsamaḥ|
mantrī senāpatirvā'pi guṇavān‌ janapujitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येश = नवमेश (भाग्यभाव-स्वामी); कर्मभावस्थे = दशम भाव में स्थित; राजा = नृप / शासक; तत्समः = उसके समान; मन्त्री = राज्य-सलाहकार; सेनापतिः = सैन्य-नायक; गुणवान् = सद्गुण-युक्त; जनपूजितः = लोक-सम्मानित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भाग्येश (नवमेश) कर्मभाव अर्थात् दशम भाव में स्थित हो, तो जातक राजा अथवा राजा-तुल्य प्रतिष्ठा वाला कहा गया है। उसी अवस्था में मन्त्री अथवा सेनापति जैसे पद का भी उल्लेख है। साथ ही उसे गुणवान् और जन-समाज द्वारा पूजित बताया गया है। यह फल-कथन दशम-स्थ भाव-स्वामी-संयोग का शास्त्रीय वर्णन है।

English rendering The text states that when the lord of the ninth (bhāgyeśa) occupies the tenth house (karma-bhāva), the native is described as a king or equal to one—or else a minister or army commander—virtuous and honoured by the people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवमेश-दशम भाव-फल)। यह अध्याय भाव-स्वामियों की स्थिति से जुड़े पारंपरिक परिणामों का क्रम है; कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-गणना या दशा-अनुपात यहाँ कूटित नहीं।

24.107
भाग्येशे लाभभावस्थे धनलाभो दिने दिने।
भक्तो गुरुजनानां च गुणवान्‌ पुण्यवानपि
bhāgyeśe lābhabhāvasthe dhanalābho dine dine|
bhakto gurujanānāṃ ca guṇavān‌ puṇyavānapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशे = नवमेश में; लाभभावस्थे = एकादश भाव में स्थित; धनलाभः = धन की प्राप्ति; दिने दिने = प्रतिदिन / निरन्तर; भक्तः = भक्ति-युक्त; गुरुजनानाम् = गुरु-जनों के प्रति; गुणवान् = सद्गुण-सम्पन्न; पुण्यवान् = पुण्य-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश जब लाभभाव (एकादश) में रहे, तो धनलाभ दिने-दिने अर्थात् निरन्तर प्राप्ति का संकेत दिया गया है। जातक गुरुजनों का भक्त, गुणवान् और पुण्यवान् भी कहा गया है। नवम-एकादश संयोग को यहाँ भाग्य-लाभ के फल-वाक्य के रूप में रखा गया है।

English rendering The text states that when the ninth lord is placed in the eleventh house (lābha-bhāva), there is day-by-day gain of wealth; the native is further described as devoted to elders and teachers, endowed with virtues, and possessed of merit (puṇya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवमेश-एकादश भाव-फल)। “दिने दिने” कालिक निरन्तरता का शाब्दिक संकेत है, कोई संख्यात्मक दशा-या आँकड़ा-सूत्र नहीं।

24.108
भाग्येशो व्ययभावस्थो भाग्यहानिकरो नृणाम्‌।
शुभकार्ये व्ययो नित्यं निर्धनोऽतिथिसङ्गमात्‌
bhāgyeśo vyayabhāvastho bhāgyahānikaro nṛṇām‌|
śubhakārye vyayo nityaṃ nirdhano'tithisaṅgamāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशः = नवमेश; व्ययभावस्थः = द्वादश भाव में स्थित; भाग्यहानिकरः = भाग्य-हानि करने वाला; नृणाम् = मनुष्यों के लिए; शुभकार्ये = शुभ कार्यों में; व्ययः = व्यय / खर्च; नित्यम् = सदैव; निर्धनः = धन-रहित; अतिथिसङ्गमात् = अतिथि-संगम / अतिथियों के कारण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग्येश जब व्ययभाव (द्वादश) में हो, तो वह नृणों के लिए भाग्य-हानि करने वाला बताया गया है। शुभ कार्यों में नित्य व्यय का भी उल्लेख है। अतिथियों के संगम से निर्धनता का फल-वाक्य दिया गया है—यह पाठ का अपना कथन है, न कि नियति का दावा। पाठ-भेद संभव जहाँ “अतिथिसङ्गमात्” की व्याख्या अतिथि-आतिथ्य अथवा अन्य संग-सन्दर्भों में भिन्न पढ़ी जाती है।

English rendering The text states that the ninth lord placed in the twelfth house (vyaya-bhāva) is said to cause decline of fortune for people; there is constant expenditure on auspicious works, and poverty is linked to association with guests (atithi-saṅgama).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवमेश-द्वादश भाव-फल)। “हानि / व्यय / निर्धन” यहाँ शास्त्रीय फल-शब्दावली है; कोई बलांक, वर्ग-विभाजन या बिन्दु-योग कूटित नहीं।

24.109
कर्मेशे लग्नगे जातो विद्वान्‌ ख्यातो धनी कवीः।
बाल्ये रोगी सुखी पश्चाद्‌ धनवृद्धिर्दिने दिने
karmeśe lagnage jāto vidvān‌ khyāto dhanī kavīḥ|
bālye rogī sukhī paścād‌ dhanavṛddhirdine dine

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = कर्म (दशम) भाव का स्वामी, दशमेश; लग्नगे = लग्न (प्रथम) भाव में गत; विद्वान् ख्यातः धनी कविः = विद्वान, प्रसिद्ध, धनी, कवि (पाठ: "कवीः" → कविः, पाठ-भेद संभव); बाल्ये रोगी = बचपन में रोगी; पश्चात् सुखी = बाद में सुखी; धन-वृद्धिः दिने दिने = दिन-प्रतिदिन धन-वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशमेश (कर्मेश) लग्न में हो तो जातक विद्वान, यशस्वी, धनवान और कवि होता है; बाल्यकाल में रोगी रहकर आगे सुखी होता है और उसका धन दिन-प्रतिदिन बढ़ता है। यहाँ एक समय-क्रम है — पहले कष्ट, फिर उन्नति।

English rendering The text states that with the tenth lord in the ascendant, one is learned, renowned, wealthy, and poetic — ailing in childhood but happy thereafter, with wealth increasing day by day.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। श्लोक में "बाल्ये … पश्चात्" एक कालक्रम देता है, पर कोई तिथि/वर्ष नहीं — "कब" का निर्धारण दशा-प्रणाली का काम है।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस "बाल्ये रोगी, पश्चात् सुखी" जैसे कालक्रम को हमारे इंजन में विंशोत्तरी दशा (BPHS अ.46–47) संचालित करती है — चन्द्र के नक्षत्र से कीलित 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; योग = 120), जहाँ अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120। शास्त्र फल कहता है; दशा उसका "कब" गणित से नियत करती है।

24.110
राज्येशे धनभावस्थे धनवान्‌ गुणसंयुतः।
राजमान्यो वदान्यश्च पित्रादिसुखसंयुतः
rājyeśe dhanabhāvasthe dhanavān‌ guṇasaṃyutaḥ|
rājamānyo vadānyaśca pitrādisukhasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्येशे = दशमेश / राज्यभाव-स्वामी (कर्मेश का पर्याय); धनभावस्थे = द्वितीय भाव में स्थित; धनवान् = धन-सम्पन्न; गुणसंयुतः = गुणों से युक्त; राजमान्यः = राजा द्वारा सम्मानित; वदान्यः = दानशील / उदार; पित्रादिसुखसंयुतः = पिता आदि से सुख-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राज्येश (दशमेश) जब धनभाव (द्वितीय) में स्थित हो, तो जातक धनवान् और गुण-संयुत कहा गया है। राजमान्य और वदान्य (उदार) होने का फल भी दिया गया है। पिता आदि से सुख-संयोग का उल्लेख द्वितीय-स्थ दशमेश के पारंपरिक फल-वाक्य के रूप में है।

English rendering The text states that when the lord of the tenth (rājyeśa / karmeśa) is in the second house (dhana-bhāva), the native is wealthy and endowed with virtues—honoured by rulers, generous, and possessed of happiness from the father and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश-द्वितीय भाव-फल)। “राज्येश” और “कर्मेश” यहाँ एक ही भाव-स्वामी (दशम) के पर्याय-प्रयोग हैं; कोई संख्या-नियत नहीं।

24.111
कर्मेशे सहजे जातो भ्रातृभृत्यसुखान्वितः।
विक्रमी गुणसम्पन्नः वाग्मी सत्यरतो नरः
karmeśe sahaje jāto bhrātṛbhṛtyasukhānvitaḥ|
vikramī guṇasampannaḥ vāgmī satyarato naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशमेश में; सहजे = तृतीय भाव (सहज) में; भ्रातृ = भाई; भृत्य = सेवक / आश्रित; सुखान्वितः = सुख से युक्त; विक्रमी = पराक्रमी; गुणसम्पन्नः = गुण-पूर्ण; वाग्मी = वाक्पटु / वाणी-निपुण; सत्यरतः = सत्य में रत; नरः = पुरुष / जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्मेश जब सहजभाव (तृतीय) में हो, तो जातक भ्रातृ और भृत्य-सुख से अन्वित कहा गया है। विक्रमी, गुण-सम्पन्न, वाग्मी और सत्यरत—ये गुण-फल तृतीय-स्थ दशमेश से जोड़े गए हैं। तृतीय भाव के सहज-विक्रम-सन्दर्भ के साथ यह फल-कथन मेल खाता है।

English rendering The text states that when the tenth lord is in the third house (sahaja), the native enjoys happiness from brothers and servants; he is described as valorous, richly endowed with virtues, eloquent, and devoted to truth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश-तृतीय भाव-फल)। भाव-स्वामी-स्थिति का गुणात्मक वर्णन; कोई बलांक या वर्ग-अंक यहाँ नहीं।

24.112
कर्मेशे सुखभावस्थे सुखी मातृहिते रतः।
यानभूमिगृहाधीशो गुणवान्‌ धनवानपि
karmeśe sukhabhāvasthe sukhī mātṛhite rataḥ|
yānabhūmigṛhādhīśo guṇavān‌ dhanavānapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशमेश में; सुखभावस्थे = चतुर्थ भाव में स्थित; सुखी = सुख-युक्त; मातृहिते रतः = माता के हित में संलग्न; यान = वाहन; भूमि = भूमि / खेत; गृह = गृह; अधीशः = स्वामी / अधिपति; गुणवान् = गुण-युक्त; धनवान् = धन-सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्मेश जब सुखभाव (चतुर्थ) में रहे, तो जातक सुखी और मातृ-हित में रत कहा गया है। यान, भूमि और गृह का अधीश—अर्थात् वाहन-भूमि-गृह सम्बन्धी स्वामित्व/अधिकार—का फल भी दिया गया है। गुणवान् और धनवान् होने का उल्लेख चतुर्थ-स्थ दशमेश के शास्त्रीय फल-वाक्य के रूप में है।

English rendering The text states that when the tenth lord occupies the fourth house (sukha-bhāva), the native is happy and devoted to the mother’s welfare—master of vehicles, land, and houses—virtuous and wealthy as well.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमेश-चतुर्थ भाव-फल)। “यान-भूमि-गृह” चतुर्थ भाव के पारंपरिक विषयों से जुड़े शब्द हैं; कोई अंश-गणना या दशा-वर्ष इस श्लोक में नहीं।

24.113
कर्मेशे सुतभावस्थे सर्वविद्यासमन्वितः।
सर्वदा हृर्षसंयुक्तो धनवान्‌ पुत्रवानपि
karmeśe sutabhāvasthe sarvavidyāsamanvitaḥ|
sarvadā hṛrṣasaṃyukto dhanavān‌ putravānapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशम-भाव का स्वामी (कर्म-स्थानेश्वर); सुतभावस्थ = पंचम-भाव (सुत/बुद्धि-स्थान) में स्थित; सर्वविद्या = समस्त विद्या/शास्त्र-ज्ञान; समन्वितः = संयुक्त, युक्त; हर्षसंयुक्त = आनन्द से भरा; धनवान् = धनाढ्य; पुत्रवान् = पुत्र-संपन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कर्मेश (दशमेश) सुत-भाव (पंचम) में बैठता है, तो जातक सर्वविद्या से समन्वित कहा जाता है। वह सदैव हर्ष से युक्त रहता है, और धनवान तथा पुत्रवान भी होता है। यह फल-कथन कर्म-स्थान के स्वामी के पंचम-भाव-स्थिति पर आधारित है।

English rendering The text states that when the tenth lord occupies the fifth house, the native is endowed with all learning, continually joined with joy, and also wealthy and possessed of sons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दशमेश–पंचम संबंध यहाँ संख्या-नियम नहीं, भाव-फल-वर्णन है; गणना नहीं, केवल स्थिति-फल का शास्त्रीय दावा।

24.114
कर्मेशे रिपुभावस्थे पितृसौख्यविवर्जितः।
चतुरोऽपि धनैर्हीनः शत्रुभिः परिपीडितः
karmeśe ripubhāvasthe pitṛsaukhyavivarjitaḥ|
caturo'pi dhanairhīnaḥ śatrubhiḥ paripīḍitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशमेश; रिपुभावस्थ = षष्ठ-भाव (रिपु/शत्रु-स्थान) में स्थित; पितृसौख्य = पिता का सुख/पितृ-संबंधित आनन्द; विवर्जितः = रहित, वंचित; चतुरः = चतुर, कुशल; धनैर्हीनः = धन से हीन; शत्रुभिः = शत्रुओं द्वारा; परिपीडितः = पीड़ित, क्लेशित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कर्मेश के रिपु-भाव (षष्ठ) में होने पर जातक पितृ-सौख्य से विवर्जित कहा जाता है। वह चतुर होने पर भी धन से हीन होता है, और शत्रुओं से परिपीड़ित रहता है। यह षष्ठ-भाव की शत्रु–ऋण–रोग-प्रवृत्ति के संदर्भ में कर्मेश की स्थिति का फल-कथन है।

English rendering The text states that when the tenth lord stands in the sixth house, the native is deprived of paternal happiness; though clever, he is poor in wealth and is oppressed by enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। षष्ठ-स्थिति यहाँ मापनीय बलांक नहीं देती; शास्त्र केवल दशमेश–षष्ठ योग का परिणाम-वर्णन करता है।

24.115
राज्येशे दारभावस्थे जातो दारसुखान्वितः।
मनस्वी गुणवान्‌ वाग्मी सत्यधर्मरतः सदा
rājyeśe dārabhāvasthe jāto dārasukhānvitaḥ|
manasvī guṇavān‌ vāgmī satyadharmarataḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्येश = दशमेश (राज्य = कर्म/दशम-भाव); दारभावस्थ = सप्तम-भाव (दार/कलत्र-स्थान) में स्थित; दारसुख = पत्नी/कलत्र-सुख; अन्वितः = युक्त; मनस्वी = मनस्वी, गंभीर-बुद्धि; गुणवान् = गुण-संपन्न; वाग्मी = वाक्पटु, वक्ता; सत्यधर्मरतः = सत्य और धर्म में रत; सदा = सदैव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राज्येश (कर्मेश) के दार-भाव (सप्तम) में स्थित होने पर जातक दार-सुख से अन्वित होता है। वह मनस्वी, गुणवान् और वाग्मी कहा जाता है, तथा सदैव सत्य-धर्म में रत रहता है। दशम और सप्तम दोनों “सार्वजनिक/संबंध” भाव हैं; शास्त्र यहाँ उनके स्वामी-संबंध का गुण-फल देता है।

English rendering The text states that when the tenth lord occupies the seventh house, the native is endowed with happiness through the spouse; he is thoughtful, virtuous, eloquent, and ever devoted to truth and dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तम-स्थिति का यह वर्णन अंश-विभाजन या बल-सारणी नहीं; शुद्ध भाव-फल है।

24.116
कर्मेशे रन्ध्रभावस्थे कर्महीनो भवेन्नरः।
दीर्घायुरप्यसौ जातः परनिन्दापरायणः
karmeśe randhrabhāvasthe karmahīno bhavennaraḥ|
dīrghāyurapyasau jātaḥ paranindāparāyaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशमेश; रन्ध्रभावस्थ = अष्टम-भाव (रन्ध्र/आयु-स्थान) में स्थित; कर्महीनः = कर्म/उद्योग से हीन; भवेत् = होता है; नरः = पुरुष/जातक; दीर्घायुः = दीर्घ आयु वाला; अपि = यद्यपि; परनिन्दा = दूसरों की निंदा; परायणः = तत्पर, आसक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कर्मेश के रन्ध्र-भाव (अष्टम) में होने पर जातक कर्महीन होता है। यद्यपि वह दीर्घायु भी कहा जाता है, तथापि पर-निंदा में परायण रहता है। अष्टम कर्म-विच्छेद और आयु दोनों से जुड़ा भाव है; शास्त्र दोनों पक्षों को एक ही स्थिति-फल में जोड़ता है।

English rendering The text states that when the tenth lord occupies the eighth house, the man becomes devoid of (active) work; though long-lived, he is given to censuring others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “दीर्घायु” यहाँ आयुर्दाय-सूत्र (Ch.43–44) का गणना-पद नहीं, अष्टम-स्थिति का शाब्दिक फल-उल्लेख है।

24.117
राज्येशे भाग्यभे जातो राजा राजकुलोद्‌भवः।
तत्समोऽन्यकुलोत्पन्नो धनपुत्रादिसंयुतः
rājyeśe bhāgyabhe jāto rājā rājakulod‌bhavaḥ|
tatsamo'nyakulotpanno dhanaputrādisaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्येशे = दशमेश (राज्येश); भाग्यभे = भाग्य (नवम) भाव में ("भाग्य-भे" = नवम भाव में); राजा राज-कुल-उद्भवः = राजकुल में उत्पन्न राजा; तत्समः अन्य-कुल-उत्पन्नः = अन्य (साधारण) कुल में जन्मे तो उसके समान; धन-पुत्रादि-संयुतः = धन-पुत्र आदि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशमेश (राज्येश) नवम (भाग्य) भाव में हो तो जातक राजकुल में जन्मा राजा, अथवा साधारण कुल में जन्मे तो राजतुल्य होता है, और धन-पुत्रादि से सम्पन्न। यह केन्द्र-त्रिकोण-स्वामी का संयोग है — दशम (केन्द्र) का स्वामी नवम (त्रिकोण) में।

English rendering The text states that the tenth lord in the ninth makes one a king born of royal lineage — or, if born of another family, his equal — endowed with wealth and children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संरचनात्मक रूप से यह केन्द्र-स्वामी (10) का त्रिकोण (9) में योग है — परम्परा का "धर्म-कर्माधिपति" राजयोग; केन्द्र {1,4,7,10} व त्रिकोण {1,5,9} लग्न से नियत श्रेणियाँ हैं, फल स्वयं संख्या नहीं।

24.118
कर्मेशे राज्यभावस्थे सर्वकर्मपटुः सुखी।
विक्रमी सत्यवक्ता च गुरुभक्तिरतो नरः
karmeśe rājyabhāvasthe sarvakarmapaṭuḥ sukhī|
vikramī satyavaktā ca gurubhaktirato naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = कर्म (दशम) भाव का स्वामी; राज्यभावस्थे = राज्य-भाव अर्थात् दशम भाव में स्थित (कर्म और राज्य दोनों दशम के नाम — यहाँ दशमेश अपने ही भाव में); सर्वकर्मपटुः = समस्त कार्यों में निपुण; सुखी = सुखी; विक्रमी = पराक्रमी; सत्यवक्ता = सत्यभाषी; गुरुभक्तिरतः = गुरु के प्रति भक्तिवान्।

हिन्दी भावार्थ जब कर्म-भाव (दशम) का स्वामी अपने ही दशम भाव में विराजमान हो, तो शास्त्र कहता है कि वह जातक सब कार्यों में कुशल, सुखी, पराक्रमी, सत्यवादी और गुरु का भक्त होता है। यह भावेश का अपने ही भाव में मिलना है — भाव और उसका अधिपति एक राशि में एकत्र होकर कर्मक्षेत्र को दृढ़ बनाते हैं। स्नेही गुरु की भाँति स्मरण रहे: यह श्लोक स्थिति का शुभ फल-कथन है, नियति का आदेश नहीं।

English rendering When the lord of the tenth (karma) occupies its own tenth house, the text states the native is skilled in all undertakings, happy, valorous, truthful, and devoted to the guru.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी कंकाल यह है: दशमेश का दशम में होना = भावेश अपने ही भाव में (स्व-भाव से गणना करने पर 1st), अर्थात् भाव-स्वामी की एकात्मता — यही सर्वाधिक बल-सम्पन्न स्थितियों में गिनी जाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) भावेश का स्वक्षेत्र/स्वभाव में होना षड्बल (BPHS Ch.27) के स्थान-बल का शिखर है; हमने षड्बल को रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में गणनीय रखा, जहाँ स्वराशि-स्थिति मापनीय बल जोड़ती है। यह अध्याय स्वयं अपने अंत में बलाबल-विवेक का नियम देता है — फल पूर्ण बल पर पूर्ण, अर्ध बल पर अर्ध — अतः यह शुभ फल भी दशमेश के मापे गए बल के अनुपात में ही प्रकट माना जाता है, स्वयंसिद्ध नियति के रूप में नहीं।

24.119
राज्येशे लाभभावस्थे जातो धनसुतान्वितः।
हर्षवान्‌ गुणवांश्चापि सत्यवक्ता सदा सुखी
rājyeśe lābhabhāvasthe jāto dhanasutānvitaḥ|
harṣavān‌ guṇavāṃścāpi satyavaktā sadā sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्येशे = राज्य (दशम) भाव का स्वामी, दशमेश; लाभभावस्थे = लाभ (एकादश) भाव में स्थित; जातः = जन्मा जातक; धनसुतान्वितः = धन और पुत्रों से युक्त; हर्षवान् = प्रसन्नचित्त; गुणवान् = गुणी; सत्यवक्ता = सत्यभाषी; सदा सुखी = सदैव सुखी।

हिन्दी भावार्थ जब दशम भाव का स्वामी एकादश (लाभ) भाव में जाता है, तो शास्त्र कहता है कि जातक धन और सन्तान से सम्पन्न, हर्षयुक्त, गुणवान्, सत्यवादी और सदा सुखी होता है। कर्म का स्वामी लाभस्थान में बैठकर कर्म को गुणा-लाभ में परिणत करता है। यह श्रम-से-अर्जित समृद्धि का शुभ कथन है।

English rendering When the lord of the tenth occupies the eleventh (gains), the text states the native is endowed with wealth and sons, joyful, virtuous, truthful, and ever happy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-दूरी का हिसाब: दशमेश एकादश में = अपने ही भाव से दूसरा (धन-स्थान), अर्थात् कर्म से उपजा लाभ — इसीलिए फल में धन-वृद्धि प्रमुख है।

24.120
राज्येशे व्ययभावस्थे तस्य राजगृहे व्ययः।
शत्रुतोऽपि भयं नित्यं चतुरश्चापि चिन्तितः
rājyeśe vyayabhāvasthe tasya rājagṛhe vyayaḥ|
śatruto'pi bhayaṃ nityaṃ caturaścāpi cintitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्येशे = दशमेश; व्ययभावस्थे = व्यय (द्वादश) भाव में स्थित; तस्य राजगृहे व्ययः = उसका व्यय राजकुल/शासन-सम्बन्धी कार्यों में; शत्रुतः भयम् = शत्रु से भय; नित्यम् = निरन्तर; चतुरः = चतुर; चिन्तितः = चिन्ताग्रस्त।

हिन्दी भावार्थ दशमेश के द्वादश (व्यय) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक का व्यय राजकुल या पद-सम्बन्धी कारणों से होता रहता है, उसे शत्रु से निरन्तर भय बना रहता है, तथा वह चतुर होते हुए भी चिन्तित रहता है। कर्म का स्वामी व्यय-स्थान में जाकर स्थिति/पद के क्षय की ओर संकेत करता है। ध्यान रहे — यह शास्त्र का स्थिति-कथन है; इसे भय या पूर्वनिश्चित परिणाम के रूप में नहीं, अपितु एक प्रवृत्ति-वर्णन के रूप में पढ़ें।

English rendering With the tenth lord in the twelfth (loss/expenditure), the text states the native's outlays go toward royal or official concerns, fear of enemies is constant, and though clever he remains anxious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यय-प्रवृत्ति)। भाव-दूरी: दशमेश द्वादश में = लग्न से व्यय-स्थान — पद/यश का क्षय-मुख; यह "भय" कोई निदान नहीं, केवल स्थिति की शास्त्रोक्त प्रवृत्ति है।

24.121
लाभेशे लग्नगे जातः सात्त्विको धनवान्‌ सुखी।
समदृष्टिः कविर्वाग्मी सदा लाभसमन्वितः
lābheśe lagnage jātaḥ sāttviko dhanavān‌ sukhī|
samadṛṣṭiḥ kavirvāgmī sadā lābhasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = लाभ (एकादश) भाव का स्वामी; लग्नगे = लग्न (प्रथम) भाव में स्थित; सात्त्विकः = सत्त्वगुणी; धनवान् = धनी; सुखी = सुखी; समदृष्टिः = समभाव-दृष्टि वाला; कविः = कवि; वाग्मी = वाक्पटु; सदा लाभसमन्वितः = सदैव लाभ से युक्त।

हिन्दी भावार्थ जब एकादश (लाभ) भाव का स्वामी लग्न में स्थित हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक सात्त्विक स्वभाव का, धनी, सुखी, समदृष्टि, कवि, वाक्पटु और सदा लाभ पाने वाला होता है। लाभ का स्वामी स्वयं देह-भाव में आकर लाभ को व्यक्ति के अपने व्यक्तित्व से जोड़ देता है। यह उद्यम-और-वाणी से समृद्धि का शुभ कथन है।

English rendering When the eleventh (gains) lord sits in the ascendant, the text states the native is sāttvic in nature, wealthy, happy, even-eyed, a poet, eloquent, and always attended by gain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-दूरी: लाभेश लग्न में = अपने ही भाव से तृतीय (उद्यम-स्थान) — लाभ स्वयं के प्रयत्न व वाणी में उतरता है, इसीलिए "कवि, वाग्मी" गुण उभरते हैं।

24.122
लाभेशे धनभावस्थे जातः सर्वधनान्वितः।
सर्वसिद्धियुतो दाता धार्मिकश्च सुखी सदा
lābheśe dhanabhāvasthe jātaḥ sarvadhanānvitaḥ|
sarvasiddhiyuto dātā dhārmikaśca sukhī sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; धनभावस्थे = धन (द्वितीय) भाव में स्थित; सर्वधनान्वितः = समस्त धन से युक्त; सर्वसिद्धियुतः = सब सिद्धियों/उपलब्धियों से युक्त; दाता = दानशील; धार्मिकः = धर्मपरायण; सुखी सदा = सदैव सुखी।

हिन्दी भावार्थ एकादश भाव के स्वामी के द्वितीय (धन) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक सब प्रकार के धन से सम्पन्न, समस्त सिद्धियों से युक्त, दानी, धार्मिक और सदा सुखी होता है। लाभ-स्थान का स्वामी धन-स्थान में मिलकर दोनों अर्थ-भावों को एक सूत्र में बाँध देता है। यह संचित समृद्धि और उदारता का शुभ कथन है।

English rendering With the eleventh lord in the second (wealth), the text states the native possesses every kind of riches, attains all accomplishments, is generous, righteous, and always happy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी बिन्दु: द्वितीय (संचित धन) और एकादश (आय/लाभ) दोनों अर्थ-भाव हैं; लाभेश का धन-भाव में जाना दो धन-केन्द्रों का संयोग है — इसीलिए "सर्वधन" का बल-कथन।

24.123
लाभेशे सहजे जातः कुशलः सर्वकर्मसु।
धनी भ्रातृसुखोपेतः शूलरोगभयं क्वचित्‌
lābheśe sahaje jātaḥ kuśalaḥ sarvakarmasu|
dhanī bhrātṛsukhopetaḥ śūlarogabhayaṃ kvacit‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; सहजे = सहज (तृतीय) भाव में; कुशलः सर्वकर्मसु = सब कार्यों में दक्ष; धनी = धनवान्; भ्रातृसुखोपेतः = भाई-सम्बन्धी सुख से युक्त; शूलरोगभयम् = शूल (उदरशूल/तीव्र पीड़ा) रोग का भय; क्वचित् = कभी-कभी।

हिन्दी भावार्थ एकादशेश के तृतीय (सहज) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक सब कार्यों में कुशल, धनी और भ्रातृ-सुख से युक्त होता है, यद्यपि कभी-कभी शूल-रोग का भय भी रहता है। तृतीय पराक्रम-स्थान है, अतः लाभ यहाँ स्वप्रयत्न व सहोदर-सहयोग से आता है। "क्वचित्" शब्द ही संकेत देता है कि रोग-भय अनिवार्य नहीं, केवल सम्भावित प्रवृत्ति है — इसे शान्तभाव से पढ़ें।

English rendering With the eleventh lord in the third (siblings/effort), the text states the native is adept in all works, wealthy, and blessed with fraternal happiness, though occasionally there is fear of colic-type ailment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र)। भाव-दूरी: लाभेश तृतीय में = अपने भाव से पञ्चम; तृतीय एक उपचय (वृद्धि) स्थान है, इसलिए फल में दक्षता व वृद्धि प्रधान, रोग-भय केवल "क्वचित्"।

24.124
लाभेशे सुखभावस्थे लाभो मातृकुलाद्‌ भवेत्‌।
तीर्थयात्राकरो जातो गृहभूमिसुखान्वितः
lābheśe sukhabhāvasthe lābho mātṛkulād‌ bhavet‌|
tīrthayātrākaro jāto gṛhabhūmisukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; सुखभावस्थे = सुख (चतुर्थ) भाव में स्थित; लाभः मातृकुलात् = माता के कुल से लाभ; तीर्थयात्राकरः = तीर्थयात्रा करने वाला; गृहभूमिसुखान्वितः = घर और भूमि के सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ एकादशेश के चतुर्थ (सुख) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक को माता के कुल से लाभ मिलता है, वह तीर्थयात्री होता है, तथा घर और भूमि के सुख से सम्पन्न रहता है। चतुर्थ भाव माता, गृह व भूमि का है, अतः लाभ का स्वामी यहाँ इन्हीं मार्गों से समृद्धि लाता है। यह घरेलू-सुख और मातृ-पक्ष से उन्नति का शुभ कथन है।

English rendering With the eleventh lord in the fourth (home/mother), the text states gains come through the maternal line, the native undertakes pilgrimages, and enjoys the comforts of house and land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी संकेत: चतुर्थ = मातृ/गृह/भूमि कारक; लाभेश (आय-कारक) का इस भाव में होना लाभ की धारा को मातृ-कुल व स्थावर-सम्पत्ति की ओर मोड़ देता है।

24.125
लाभेशे सुतभावस्थे भवन्ति सुखिनः सुताः।
विद्यवन्तोऽपि सच्छीलाः स्वयं धर्मरतः सुखी
lābheśe sutabhāvasthe bhavanti sukhinaḥ sutāḥ|
vidyavanto'pi sacchīlāḥ svayaṃ dharmarataḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; सुतभावस्थे = सुत (पञ्चम) भाव में स्थित; भवन्ति सुखिनः सुताः = पुत्र सुखी होते हैं; विद्यावन्तः = विद्यावान्; सच्छीलाः = सदाचारी; स्वयं धर्मरतः = स्वयं धर्म में रत; सुखी = सुखी।

हिन्दी भावार्थ एकादशेश के पञ्चम (सुत) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक के पुत्र सुखी, विद्यावान् और सदाचारी होते हैं, तथा वह स्वयं धर्मपरायण और सुखी रहता है। पञ्चम सन्तान व बुद्धि का भाव है, अतः लाभ-स्वामी यहाँ सन्तान-सुख व विद्या में फलित होता है। यह सुसन्तति और धार्मिक जीवन का शुभ कथन है।

English rendering With the eleventh lord in the fifth (children), the text states the native's children are happy, learned, and well-conducted, while he himself is devoted to dharma and content.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-दूरी: लाभेश पञ्चम में = अपने भाव से सप्तम; पञ्चम (सन्तान/बुद्धि) पर आय-कारक का प्रभाव फल को सन्तति-सुख व विद्या की ओर केन्द्रित करता है।

24.126
लाभेशे रोगभावस्थे जातो रोगसमन्वितः।
क्रूरबुद्धिः प्रवासी च शत्रुभि परिपीडितः
lābheśe rogabhāvasthe jāto rogasamanvitaḥ|
krūrabuddhiḥ pravāsī ca śatrubhi paripīḍitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; रोगभावस्थे = रोग (षष्ठ) भाव में स्थित; रोगसमन्वितः = रोगयुक्त; क्रूरबुद्धिः = कठोर-बुद्धि वाला; प्रवासी = परदेशवासी/भ्रमणशील; शत्रुभिः परिपीडितः = शत्रुओं से पीड़ित।

हिन्दी भावार्थ एकादशेश के षष्ठ (रोग/शत्रु) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक रोगग्रस्त, कठोर-बुद्धि, प्रवासी और शत्रुओं से पीड़ित रहता है। लाभ का स्वामी अरि-भाव में जाकर लाभ के स्थान पर संघर्ष व विरोध की ओर संकेत करता है। स्नेहपूर्वक स्मरण रहे — यह रोग-वचन शास्त्र की स्थिति-टिप्पणी है, कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी या भय-वचन नहीं।

English rendering With the eleventh lord in the sixth (disease/enemies), the text states the native is beset by illness, hard-minded, given to living away from home, and troubled by adversaries.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ प्रवृत्ति)। भाव-दूरी: लाभेश षष्ठ में = अपने भाव से अष्टम — लाभ-स्रोत पर व्यय/विरोध की छाया; यह "रोग" चिकित्सा-कथन नहीं, शास्त्रोक्त प्रवृत्ति-वर्णन है।

24.127
लाभेशे दारभावस्थे लाभो दारकुलात्‌ सदा।
उदारश्च गुणी कामी जनो भार्यावशानुगः
lābheśe dārabhāvasthe lābho dārakulāt‌ sadā|
udāraśca guṇī kāmī jano bhāryāvaśānugaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेश = एकादशेश / लाभ-भाव का स्वामी; दारभावस्थ = सप्तम (दार/पत्नी) भाव में स्थित; लाभः = प्राप्ति / लाभ; दारकुलात् = पत्नी-कुल से; उदारः = उदार / दानशील; गुणी = गुण-युक्त; कामी = कामन-प्रवण; भार्यावशानुगः = पत्नी के वश में रहने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभ-भाव का स्वामी सप्तम भाव में स्थित हो, तो जातक को पत्नी-कुल से निरंतर लाभ की प्राप्ति कही गई है। ऐसा व्यक्ति उदार, गुण-संपन्न और कामन-शील कहा गया है। पाठ यह भी कहता है कि वह पत्नी के अधीन / उसके अनुगामी रहता है।

English rendering The text states that when the lord of the eleventh house occupies the seventh (spouse) house, gain is said to come continually from the spouse’s family. The native is described as generous, endowed with good qualities, and desire-prone, and as following under the influence of the wife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभेश-सप्तम स्थिति का भुक्ति-वर्णन)। यह एकादशेश की भाव-स्थिति से फल जोड़ने का शास्त्रीय नियम है, गणना नहीं; “लाभ” यहाँ प्राप्ति-रूप में फल-भाषा है, न कि कोई अंश-सूत्र।

24.128
लाभेशे रन्ध्रभावस्थे हानिः कार्येषु जायते।
तस्यायुश्च भवेद्‌दीर्घं प्रथमं मरणं स्त्रियः
lābheśe randhrabhāvasthe hāniḥ kāryeṣu jāyate|
tasyāyuśca bhaved‌dīrghaṃ prathamaṃ maraṇaṃ striyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; रन्ध्रभावस्थे = रन्ध्र (अष्टम) भाव में स्थित; हानिः कार्येषु = कार्यों में हानि; तस्य आयुः दीर्घम् = उसकी आयु दीर्घ; प्रथमं मरणं स्त्रियः = पत्नी का मरण पहले (प्रथम)।

हिन्दी भावार्थ एकादशेश के अष्टम (रन्ध्र) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक के कार्यों में हानि होती है, किन्तु उसकी आयु दीर्घ होती है; साथ ही पत्नी का देहावसान पहले होने की बात कही गई है। अष्टम भाव आयु व अकस्मात् व्यवधान दोनों का है, अतः यहाँ फल मिश्रित है — कार्य-हानि किन्तु दीर्घायु। ये गम्भीर कथन शास्त्र की उक्ति मात्र हैं; इन्हें भय या नियति नहीं, अपितु परम्परा का स्थिति-कथन मानकर पढ़ें।

English rendering With the eleventh lord in the eighth (randhra), the text states there is loss in undertakings, yet the native's life is long, and it speaks of the spouse departing first.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र)। भाव-दूरी: लाभेश अष्टम में = अपने भाव से दशम; अष्टम एक साथ आयु-कारक व व्यवधान-कारक है, इसीलिए "हानि किन्तु दीर्घायु" का द्वैत।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ शास्त्र दो दावे करता है — दीर्घायु और पत्नी का पूर्व-मरण। हमारी विधि इन्हें "शास्त्र का कथन" मानकर रखती है, न कि नियति, भविष्यवाणी या भय-वचन के रूप में (CLAUDE.md व oracle का अनुशासन: गणित को व्याख्या से पृथक् रखो)। आयु-सम्बन्धी कोई भी निष्कर्ष BPHS के आयुर्दाय (Ch.43–44) की स्वतंत्र गणना से जाँचा जाता है, किसी एकल भावेश-स्थिति से निर्णीत नहीं।

24.129
लभेशे भाग्यभावस्थे भाग्यवान्‌ जायते नरः।
चतुरः सत्यवादी च राजपुज्यो धनाधिपः
labheśe bhāgyabhāvasthe bhāgyavān‌ jāyate naraḥ|
caturaḥ satyavādī ca rājapujyo dhanādhipaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लभेशे / लाभेशे = एकादशेश (पाठ-भेद / वर्तनी-भेद संभव: “लभेशे”); भाग्यभावस्थे = नवम (भाग्य) भावस्थ; भाग्यवान् = भाग्य-संपन्न; चतुरः = चतुर / कुशल; सत्यवादी = सत्यभाषी; राजपूज्यः = राज-सम्मानित; धनाधिपः = धन का अधिपति / धन-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभेश नवम भाव में हो, तो नर भाग्यवान् जन्म लेता है। वह चतुर, सत्यवादी, राज-पूजित और धन का अधिपति कहा गया है। नवम यहाँ भाग्य-भाव के रूप में फल से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that with the eleventh lord in the ninth house a fortunate man is born — clever, truthful in speech, honoured by rulers, and a master of wealth. (The opening form “लभेशे” is likely orthographic for “लाभेशे”; पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभेश-नवम: भाग्य, चातुर्य, राज-सम्मान, धन-स्वामित्व)। भाव-स्थान निर्धारण के लिए लग्न-से गिनती का सामान्य नियम लागू होता है; स्वयं श्लोक कोई अंश-विभाजन नहीं देता।

24.130
लाभेशे कर्मभावस्थे भूपवन्द्यो गुणान्वितः।
निजधर्मरतो धीमान्‌ सत्यवादी जितेन्द्रियः
lābheśe karmabhāvasthe bhūpavandyo guṇānvitaḥ|
nijadharmarato dhīmān‌ satyavādī jitendriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = एकादशेश; कर्मभावस्थे = कर्म (दशम) भाव में स्थित; भूपवन्द्यः = राजाओं से वन्दित/सम्मानित; गुणान्वितः = गुणयुक्त; निजधर्मरतः = अपने धर्म/कर्तव्य में रत; धीमान् = बुद्धिमान्; सत्यवादी = सत्यभाषी; जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को जीतने वाला।

हिन्दी भावार्थ एकादशेश के दशम (कर्म) भाव में होने पर शास्त्र कहता है कि जातक राजाओं से सम्मानित, गुणवान्, अपने धर्म में निष्ठ, बुद्धिमान्, सत्यवादी और जितेन्द्रिय होता है। लाभ का स्वामी कर्म-स्थान में आकर लाभ को यश व कर्तव्य-निष्ठा से जोड़ देता है। यह कर्मक्षेत्र में प्रतिष्ठा और संयम का शुभ कथन है।

English rendering With the eleventh lord in the tenth (karma), the text states the native is revered by rulers, virtuous, devoted to his own duty, wise, truthful, and master of his senses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-दूरी: लाभेश दशम में = अपने भाव से द्वादश, फिर भी दशम स्वयं कर्म/यश का केन्द्र है — अतः फल में कर्तव्य-निष्ठा व राजमान्यता प्रबल।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशम भाव सूर्य व मंगल का दिग्बल-स्थान है (षड्बल, BPHS Ch.27): यदि यहाँ स्थित लाभेश सूर्य या मंगल हो, तो उसे दिग्बल भी प्राप्त होता है। हमारे षड्बल मॉडल में दिग्बल एक मापनीय घटक है (रूप/विरूप, 1 रूप = 60 विरूप) — यही "गणित को व्याख्या से पृथक् रखो" का अनुशासन है: स्थिति का बल गणनीय है, जबकि यश-कथन शास्त्र की उक्ति के रूप में ही रहता है, न कि हमारे द्वारा समर्थित भविष्यवाणी।

24.131
लाभेशे लाभभावस्थे लाभः सर्वेषु कर्मसु।
पण्डित्यं च सुखं तस्य वर्द्धते च दिने दिने
lābheśe lābhabhāvasthe lābhaḥ sarveṣu karmasu|
paṇḍityaṃ ca sukhaṃ tasya varddhate ca dine dine

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = लाभ (एकादश/11वें) भाव के स्वामी के; लाभभावस्थे = 11वें भाव में स्थित होने पर; लाभः = प्राप्ति, आय; सर्वेषु कर्मसु = समस्त कार्यों में; पण्डित्यं = विद्वत्ता, पाण्डित्य; सुखं = सुख; वर्द्धते = बढ़ता है; दिने दिने = दिन-प्रतिदिन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब एकादश (लाभ) भाव का स्वामी अपने ही घर, अर्थात् ग्यारहवें भाव में बैठता है, तब जातक को सब कामों में लाभ होता है। उसका पाण्डित्य और सुख दिन-दिन बढ़ता रहता है। यह भावेश-स्व-भाव-स्थिति का सर्वाधिक शुभ योग गिना गया है — लाभ का कारक अपने ही क्षेत्र में स्वस्थ होकर बैठा है।

English rendering When the lord of the eleventh (the house of gains) is placed in the eleventh itself, the text says there is gain in every undertaking, and the native's learning and happiness increase day by day.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्व-गृह-स्थिति)। यह अध्याय एक निर्धारक 12×12 सारणी है — प्रत्येक भावेश × प्रत्येक भाव = एक फल-प्रविष्टि; यहाँ स्वामी और भाव एक ही (11 → 11) होने से यह मुख्य विकर्ण (diagonal) की स्व-स्थिति प्रविष्टि है, जिसे शास्त्र स्वभावतः बलवान् मानता है।

24.132
लाभेशे व्ययभावस्थे सत्कार्येषु व्ययः सदा।
कामुको बहुपत्नीको म्लेच्छसंसर्गकारकः
lābheśe vyayabhāvasthe satkāryeṣu vyayaḥ sadā|
kāmuko bahupatnīko mlecchasaṃsargakārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = 11वें भाव के स्वामी के; व्ययभावस्थे = व्यय (द्वादश/12वें) भाव में स्थित होने पर; सत्कार्येषु = शुभ/सत् कार्यों में; व्ययः = खर्च; सदा = सदैव; कामुको = कामासक्त; बहुपत्नीको = अनेक स्त्रियों वाला; म्लेच्छसंसर्गकारकः = म्लेच्छ (भिन्न-संस्कृति/बाह्य जन) की संगति करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ग्यारहवें भाव का स्वामी बारहवें (व्यय) भाव में हो तो जातक का धन सदा सत्कार्यों में व्यय होता है। वह कामप्रवृत्त, अनेक पत्नियों वाला, तथा म्लेच्छ-संसर्ग (अपने वर्ग से भिन्न, बाहरी जनों की संगति) करने वाला कहा गया है। यहाँ म्लेच्छ पद को मूल की ही सांस्कृतिक शब्दावली मानकर तटस्थ भाव से लिया गया है, किसी निन्दा-रूप में नहीं।

English rendering With the eleventh lord in the twelfth, the text states that wealth is ever spent on worthy deeds; the native is passionate, of many wives, and keeps company with mlecchas (those outside his own circle).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। लाभ-कारक का व्यय-भाव में जाना एक स्थानान्तरण-प्रतीक है — आय का स्रोत जब हानि/त्याग के क्षेत्र में उतरे तो शास्त्र उसे "सत्कार्य-व्यय" कहता है, अर्थात् धन का प्रवाह बना रहता है पर वह संचित न होकर बहिर्मुख (outflow) होता है।

24.133
व्ययेशे लग्नगे जातो व्ययशीलो जतो भवेत्‌।
दुर्बलः कफरोगी च धनविद्याविवर्जितः
vyayeśe lagnage jāto vyayaśīlo jato bhavet‌|
durbalaḥ kapharogī ca dhanavidyāvivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = द्वादशेश / व्यय-भाव का स्वामी; लग्नगे = लग्न (प्रथम भाव) में स्थित; जातः = जात / जन्म लेने वाला; व्ययशीलः = व्यय-शील / खर्च-प्रवण; दुर्बलः = दुर्बल; कफरोगी = कफ-रोग से युक्त (शास्त्र की आयुर्वेदीय फल-भाषा); धनविद्याविवर्जितः = धन और विद्या से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब व्ययेश लग्न में हो, तो जातक स्वभावतः व्ययशील होता है। वह दुर्बल और कफ-रोगी कहा गया है, तथा धन और विद्या से विवर्जित। “कफरोगी” यहाँ शास्त्र की पारंपरिक फल-शब्दावली है — चिकित्सा-निदान या उपचार-आदेश के रूप में नहीं पढ़ा जाए; यह स्रोत-पाठ का कथन मात्र है।

English rendering The text states that one born with the twelfth lord in the lagna is of a spending nature, weak, subject to kapha-type ailments (in the śāstra’s traditional language), and lacking wealth and learning. This is reported as the text’s fruit-statement, not as a medical or financial prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्ययेश-लग्न: व्ययशीलता, दुर्बलता, कफ-फल, धन-विद्या-हानि)। अध्याय 24 के लाभेश-क्रम के बाद यह व्ययेश-श्रृंखला का आरंभ-बिंदु है; गणना नहीं, भाव-स्वामी की लग्न-स्थिति का फल-विन्यास।

24.134
व्ययेशे धनभावस्थे शुभकार्ये व्ययः सदा।
धार्मिकः प्रियवादी च गुणसौख्यसमन्वितः
vyayeśe dhanabhāvasthe śubhakārye vyayaḥ sadā|
dhārmikaḥ priyavādī ca guṇasaukhyasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेश = व्ययभाव (12) का स्वामी; धनभावस्थ = धनभाव (2) में स्थित; शुभकार्ये व्ययः = शुभ/धार्मिक कार्यों में व्यय; सदा = निरन्तर; धार्मिकः = धर्म-निष्ठ; प्रियवादी = प्रिय/मधुर वाणी वाला; गुणसौख्यसमन्वितः = गुणों और सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब व्ययेश धनभाव में बैठता है, तो व्यय प्रायः शुभ कार्यों की ओर ही बहता है। ऐसा जातक धार्मिक और प्रियवाणी वाला कहा गया है। गुण और सौख्य उसके साथ जुड़े हुए बताए गए हैं — व्यय का द्वितीय-भाव से मेल यहाँ शुभ-कार्य-व्यय और वाणी-गुण के फल से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the lord of the twelfth occupies the second house, expenditure is continually directed toward auspicious works. Such a native is described as religious, sweet-spoken, and endowed with virtue and happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्ययेश–धनभाव स्थिति)। यह द्वादशेश की द्वितीय-भाव स्थिति का शास्त्रीय फल-सूत्र है; गणना नहीं, केवल भाव-स्वामी स्थिति → फल का कथन।

24.135
व्ययेशे सहजे जातो भ्रातृसौक्यविवर्जितः।
भवेदन्यजनद्वेषी स्वशरीरस्य पोषकः
vyayeśe sahaje jāto bhrātṛsaukyavivarjitaḥ|
bhavedanyajanadveṣī svaśarīrasya poṣakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; सहजे = सहज (तृतीय) भाव में; जातो = जातक; भ्रातृसौख्यविवर्जितः = भाई-सम्बन्धी सुख से रहित; अन्यजनद्वेषी = दूसरों से द्वेष रखने वाला; स्वशरीरस्य पोषकः = केवल अपने ही शरीर का पोषण करने वाला (आत्म-केन्द्रित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी तीसरे (सहज) भाव में हो तो जातक को भ्रातृ-सुख नहीं मिलता। वह अन्य जनों से द्वेष रखने वाला तथा केवल अपने ही शरीर के पोषण में लगा रहने वाला (स्वार्थपरायण) होता है। तृतीय भाव भाइयों एवं पराक्रम का है — व्यय-कारक वहाँ उस सुख का ह्रास सूचित करता है।

English rendering With the twelfth lord in the third, the text says the native is deprived of comfort from brothers, hostile toward others, and concerned only with nourishing his own body.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तृतीय (सहज) भाव भ्रातृ-कारक है; व्यय-कारक का उसमें आना उसी सारणीबद्ध तर्क का अनुसरण है — हानि का स्वामी जिस भाव में जाता है, प्रायः उसी भाव के कारकत्व में कमी शास्त्र दर्शाता है।

24.136
व्ययेशे सुखभावस्थे मातुः सुखविवर्जितः।
भूमियानगृहादीनां हानिस्तस्य दिनेदिने
vyayeśe sukhabhāvasthe mātuḥ sukhavivarjitaḥ|
bhūmiyānagṛhādīnāṃ hānistasya dinedine

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे सुखभावस्थे = व्ययेश चतुर्थ (सुख) भाव में; मातुः सुखविवर्जितः = मातृ-सुख से रहित; भूमि = भूमि/जमीन; यान = वाहन; गृह = गृह/मकान; आदीनां हानिः = आदि की हानि; दिनेदिने = दिन-प्रतिदिन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — व्ययेश सुखभाव में स्थित हो तो जातक मातृ-सुख से विवर्जित कहा गया है। भूमि, यान, गृह आदि की हानि उसके जीवन में दिन-प्रतिदिन होने वाली बताई गई है। चतुर्थ भाव (माता, गृह, भूमि, यान) पर द्वादशेश का आश्रय शास्त्र ने इन्हीं क्षय-सूचकों से बाँधा है — यह शास्त्र का कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when the twelfth-lord occupies the fourth house, the native is said to be deprived of happiness from the mother, and that loss of land, vehicles, houses and the like occurs day by day.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्ययेश–सुखभाव स्थिति)। चतुर्थ-भाव से जुड़े पदार्थों (भूमि, यान, गृह) का “दिनेदिने हानि” शास्त्रीय फल-भाषा है, कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

24.137
व्ययेशे सुतभावस्थे सुतविद्याविवर्जितः।
पुत्रार्थे च व्ययस्तस्य तीर्थाटनपरो नरः
vyayeśe sutabhāvasthe sutavidyāvivarjitaḥ|
putrārthe ca vyayastasya tīrthāṭanaparo naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; सुतभावस्थे = सुत (पञ्चम) भाव में स्थित होने पर; सुतविद्याविवर्जितः = सन्तान और विद्या से रहित; पुत्रार्थे = पुत्र के निमित्त; व्ययः = व्यय; तस्य = उसका; तीर्थाटनपरो = तीर्थ-यात्रा/भ्रमण में तत्पर; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी पाँचवें (सुत) भाव में हो तो जातक सन्तान एवं विद्या से हीन रहता है; पुत्र के निमित्त उसका धन-व्यय होता है, और वह तीर्थाटन में प्रवृत्त रहता है। पञ्चम भाव सन्तति एवं बुद्धि का कारक है — व्यय-कारक वहाँ उसमें कमी और उसी हेतु व्यय दिखाता है।

English rendering With the twelfth lord in the fifth, the text says the native is devoid of children and learning, spends for the sake of a son, and is much given to pilgrimage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पञ्चम (सुत) भाव सन्तान-कारक है; व्यय-कारक का उसमें आना सारणी-तर्क से सन्तान-सुख में ह्रास और उसी दिशा में व्यय का कोष्ठक भरता है।

24.138
व्ययेशे रिपुभावस्थे जातः स्वजनवैरकृत्‌।
क्रोधी पापी च दुःखी च परजायारतो नरः
vyayeśe ripubhāvasthe jātaḥ svajanavairakṛt‌|
krodhī pāpī ca duḥkhī ca parajāyārato naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे रिपुभावस्थे = व्ययेश षष्ठ (रिपु) भाव में; स्वजनवैरकृत् = स्वजनों से वैर करने वाला; क्रोधी = क्रोध-प्रवण; पापी = पाप-प्रवृत्ति वाला (शास्त्र-भाषा); दुःखी = दुःख-युक्त; परजायारतः = पर-स्त्री-आसक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — व्ययेश रिपुभाव में स्थित हो तो जातक स्वजनों से वैर उत्पन्न करने वाला बताया गया है। क्रोधी, पापी और दुःखी — ये तीन विशेषण शास्त्र ने यहाँ जोड़े हैं। परजायारत भी कहा गया है। षष्ठ भाव (रिपु/कलह) और द्वादशेश का यह मेल शास्त्र की फल-भाषा में कलह-क्रोध-दुःख और पर-स्त्री-आसक्ति से बाँधा गया है — इसे शास्त्र-कथन के रूप में ही पढ़ें, भय या निश्चय के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when the twelfth-lord occupies the sixth house, the native is said to create enmity with his own people, to be angry, given to wrongdoing, unhappy, and attached to the wives of others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्ययेश–रिपुभाव स्थिति)। षष्ठ-भाव के रिपु/कलह-फल का शास्त्रीय वर्णन; कोई बल, अंश या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं।

24.139
व्ययेशे दारभावस्थे व्ययो दारकृतः सदा।
तस्य भार्यासुखं नैव बलविद्याविवर्जितः
vyayeśe dārabhāvasthe vyayo dārakṛtaḥ sadā|
tasya bhāryāsukhaṃ naiva balavidyāvivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; दारभावस्थे = दार/कलत्र (सप्तम) भाव में स्थित होने पर; व्ययो दारकृतः = पत्नी के निमित्त होने वाला व्यय; सदा = सदैव; भार्यासुखं नैव = पत्नी-सुख नहीं; बलविद्याविवर्जितः = बल और विद्या से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी सातवें (दार) भाव में हो तो जातक का धन सदा पत्नी के निमित्त व्यय होता है; उसे दाम्पत्य-सुख नहीं मिलता, और वह बल तथा विद्या से हीन रहता है। सप्तम भाव कलत्र-कारक है — व्यय-कारक वहाँ उसी क्षेत्र में व्यय और सुख-अभाव सूचित करता है।

English rendering With the twelfth lord in the seventh, the text says expenditure is always incurred through the spouse; there is no marital happiness, and the native lacks strength and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तम (दार) भाव कलत्र-कारक है; व्यय-कारक का उसमें बैठना सारणी-नियम से "उसी भाव के क्षेत्र में व्यय" का पुनरावर्ती प्रतिरूप (recurring pattern) है, जो कई भावेश-स्थितियों में दिखता है।

24.140
व्ययेशे मृत्युभावस्थे जातो लाभान्वितः सदा।
प्रियवाङ्‌ मध्यमायुश्च सम्पूर्णगुणसंयुतः
vyayeśe mṛtyubhāvasthe jāto lābhānvitaḥ sadā|
priyavāṅ‌ madhyamāyuśca sampūrṇaguṇasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; मृत्युभावस्थे = मृत्यु/रन्ध्र (अष्टम) भाव में स्थित होने पर; जातो = जातक; लाभान्वितः सदा = सदा लाभ से युक्त; प्रियवाङ् = प्रिय बोलने वाला; मध्यमायुः = मध्यम आयु वाला; सम्पूर्णगुणसंयुतः = समस्त गुणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी आठवें (मृत्यु/रन्ध्र) भाव में हो तो जातक सदा लाभयुक्त, मधुरभाषी, मध्यम आयु वाला तथा सम्पूर्ण गुणों से युक्त होता है। ध्यातव्य है कि यहाँ शास्त्र व्ययेश की अष्टम-स्थिति को अपेक्षाकृत शुभ बताता है — व्यय-भाव से व्यय (12 से 12वाँ = 8 नहीं, अपितु 12 से 9वाँ... वस्तुतः द्वादश-स्वामी का अष्टम में जाना दो अशुभ स्थानों का मेल है, फिर भी फल शुभ कथित है)।

English rendering When the twelfth lord is in the eighth, the text says the native is ever endowed with gains, sweet of speech, of medium life-span, and complete in virtues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह प्रविष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है — दो दुःस्थानों (12 + 8) का संयोग होते हुए भी शास्त्र यहाँ शुभ फल देता है, जो दिखाता है कि यह सारणी सरल "अशुभ + अशुभ = अशुभ" के रैखिक नियम पर नहीं चलती; प्रत्येक कोष्ठक स्वतन्त्र कथन है।

24.141
व्ययेशे भाग्यभावस्थे गुरुद्वेषी भवेन्नरः।
मित्रैरपि भवेद्वैरं स्वार्थसाधनतत्परः
vyayeśe bhāgyabhāvasthe gurudveṣī bhavennaraḥ|
mitrairapi bhavedvairaṃ svārthasādhanatatparaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; भाग्यभावस्थे = भाग्य (नवम) भाव में स्थित होने पर; गुरुद्वेषी = गुरुजनों/आचार्यों से द्वेष करने वाला; भवेन्नरः = मनुष्य होता है; मित्रैरपि भवेद्वैरं = मित्रों से भी वैर हो जाता है; स्वार्थसाधनतत्परः = अपने स्वार्थ-साधन में तत्पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी नवम (भाग्य/धर्म) भाव में हो तो जातक गुरुजनों से द्वेष करने वाला, मित्रों से भी वैर रखने वाला, तथा केवल अपने स्वार्थ की सिद्धि में लगा रहने वाला होता है। नवम भाव गुरु, धर्म एवं भाग्य का कारक है — व्यय-कारक वहाँ उस श्रद्धा-भाव के ह्रास को इंगित करता है।

English rendering With the twelfth lord in the ninth, the text says the native comes to despise his preceptors, falls into enmity even with friends, and is ever bent on serving his own interest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। नवम (भाग्य/गुरु) भाव धर्म एवं आचार्य-श्रद्धा का स्थान है; व्यय-कारक की यह प्रविष्टि सारणी-तर्क से उसी श्रद्धा-कारकत्व के क्षय-कोष्ठक को भरती है।

24.142
व्ययेशे राज्यभावस्थे व्ययो राजकुलाद्‌भवेत्‌।
पितृतोऽपि सुखं तस्य स्वल्पमेव हि जायते
vyayeśe rājyabhāvasthe vyayo rājakulād‌bhavet‌|
pitṛto'pi sukhaṃ tasya svalpameva hi jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; राज्यभावस्थे = राज्य/कर्म (दशम) भाव में स्थित होने पर; व्ययो राजकुलाद्भवेत् = व्यय राजकुल (राजा/शासन) की ओर से होता है; पितृतोऽपि = पिता की ओर से भी; सुखं तस्य = उसका सुख; स्वल्पमेव हि = अत्यल्प ही; जायते = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी दसवें (राज्य/कर्म) भाव में हो तो जातक का व्यय राजकुल (शासन/राज्यपक्ष) के कारण होता है, और उसे पिता की ओर से भी सुख अत्यल्प ही प्राप्त होता है। दशम भाव कर्म, राज्य एवं पितृ-कारकत्व का स्थान है — व्यय-कारक वहाँ इन्हीं मार्गों से व्यय एवं सुख-न्यूनता दर्शाता है।

English rendering When the twelfth lord occupies the tenth, the text states that expenditure arises through the royal house (the state), and even the comfort derived from the father proves scanty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दशम (राज्य/कर्म) भाव पितृ एवं राज-कारक है; व्यय-कारक का उसमें बैठना सारणी में "उसी भाव के स्रोत से व्यय" प्रतिरूप को दोहराता है — जैसे 7वें में पत्नी-कृत व्यय, वैसे यहाँ राजकुल-कृत व्यय।

24.143
व्ययेशे लाभभावस्थे लाभे हानिः प्रजायते।
परेण रक्षितं द्रव्यं कदाचिल्लभते नरः
vyayeśe lābhabhāvasthe lābhe hāniḥ prajāyate|
pareṇa rakṣitaṃ dravyaṃ kadācillabhate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = 12वें भाव के स्वामी के; लाभभावस्थे = लाभ (एकादश) भाव में स्थित होने पर; लाभे हानिः = लाभ में हानि; प्रजायते = उत्पन्न होती है; परेण रक्षितं द्रव्यं = किसी अन्य के द्वारा रक्षित/संचित धन; कदाचित् = कभी-कभी; लभते नरः = मनुष्य पाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें (लाभ) भाव में हो तो लाभ के क्षेत्र में ही हानि उत्पन्न होती है; और मनुष्य कभी-कभी वह धन पाता है जिसे किसी दूसरे ने संचित या सुरक्षित रखा हो। एकादश आय-भाव है — व्यय-कारक वहाँ आय में क्षय, तथा पराश्रित धन-प्राप्ति का मिश्र फल सूचित करता है।

English rendering With the twelfth lord in the eleventh, the text says loss arises in the very sphere of gains, and the native occasionally comes by wealth that had been kept safe by another.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह व्ययेश-यात्रा (श्लोक 133–144) की एकादश-प्रविष्टि है — व्यय-कारक का लाभ-भाव में आना दो विपरीत कारकत्वों (हानि बनाम आय) का सीधा टकराव है, जिसे शास्त्र "लाभे हानिः" के मिश्र-फल कोष्ठक में समेटता है।

24.144
व्ययेशे व्ययभावस्थे व्ययाधिक्यं हि जायते।
न शरीरसुखं तस्य क्रोधी द्वेषपरो नृणाम्‌
vyayeśe vyayabhāvasthe vyayādhikyaṃ hi jāyate|
na śarīrasukhaṃ tasya krodhī dveṣaparo nṛṇām‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेशे = व्यय (द्वादश) भाव का स्वामी; व्ययभावस्थे = बारहवें भाव में स्थित होने पर; व्ययाधिक्यम् = व्यय की अधिकता, अपार खर्च; न शरीरसुखम् = देह-सुख नहीं; क्रोधी = क्रोधशील; द्वेषपरः = द्वेष में तत्पर; नृणाम् = मनुष्यों के प्रति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बारहवें (व्यय) भाव का स्वामी स्वयं बारहवें भाव में ही बैठा हो, तब जातक के जीवन में व्यय की अधिकता बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति को देह-सुख अल्प मिलता है, स्वभाव में क्रोध रहता है, और वह मनुष्यों के प्रति द्वेष रखने वाला कहा गया है। यह द्वादशेश-के-द्वादश-में-स्थित होने का फल-कथन है।

English rendering The text states: when the lord of the twelfth (loss) house is itself placed in the twelfth, expenditure runs to excess; such a person enjoys little bodily comfort, is prone to anger, and is inclined to hostility toward others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्थिति का शुभाशुभ फल)। यहाँ शास्त्र केवल द्वादशेश-के-द्वादश-स्थ योग का परिणाम बताता है; कोई संख्यात्मक राशि, बल-इकाई या अंश-गणना इस श्लोक में निहित नहीं है — यह ग्रहबल-आधारित विवेचन (आगे 24.145–148) से पहले का शुद्ध फल-वाक्य है।

24.145
इति ते कथितं विप्र भावेशानां च यत्‌ फलम्‌।
बलाबलविवेकेन सर्वेषं तत्समादिशेत्‌
iti te kathitaṃ vipra bhāveśānāṃ ca yat‌ phalam‌|
balābalavivekena sarveṣaṃ tatsamādiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; ते = तुझसे (मैत्रेय को); कथितम् = कहा गया; विप्र = हे विप्र (ब्राह्मण-संबोधन); भावेशानाम् = बारह भाव-स्वामियों का; यत् फलम् = जो फल; बलाबलविवेकेन = बल और अबल के विवेक (तौल) से; सर्वेषाम् = इन सबका; तत् = वह फल; समादिशेत् = भलीभाँति निर्देश/घोषित करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, इस प्रकार मैंने तुझसे सभी भावेशों (भाव-स्वामियों) का जो फल कहा, उसे वैसा ही निरपेक्ष रूप से नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्रह के बल-अबल के विवेक से तौलकर घोषित करना चाहिए। शास्त्र यहाँ नियम देता है कि पूर्ववर्णित फल-वाक्य अंतिम आदेश नहीं, अपितु ग्रहबल से समायोजित किए जाने योग्य कथन हैं।

English rendering Thus, O Brahmin, have the fruits of all the house-lords been told to you; yet one should pronounce them all only by weighing each planet's strength and weakness (balābala-viveka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद्धति-निर्देश (methodological instruction)। यह श्लोक अगली तीन कारिकाओं (24.146–148) के गणितीय भार-नियम का द्वार है: फल कोई द्विआधारी "है/नहीं" नहीं, बल्कि बल के अनुपात में मापी जाने वाली राशि है — इसी से फल-कथन एक भारित (weighted) गणना बन जाता है, न कि निश्चित घोषणा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही "बलाबल-विवेक" वह बिंदु है जहाँ पाठ स्वयं गणना की माँग करता है — और यहीं ষड्बल (BPHS Ch.27) का इंजन लगता है: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — छह अंश रूप/विरूप में जोड़े जाते हैं (1 रूप = 60 विरूप)। हमारे डिकोड की अनुशासन-रेखा यहीं स्पष्ट होती है: गणना (बल, रूप में) और व्याख्या (फल) पृथक रहती हैं; श्लोक का फल "शास्त्र कहता है" रहता है, हमारा योगदान केवल उसका बल-भार परिकलित करना है।

24.146
द्विराशीशस्य खेटस्य विदित्वोभयथा फलम्‌।
विरोधे तुल्यफलयोर्द्वयोर्नाशः प्रजायते
dvirāśīśasya kheṭasya viditvobhayathā phalam‌|
virodhe tulyaphalayordvayornāśaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विराशीशस्य = दो राशियों का स्वामी; खेटस्य = ग्रह का; विदित्वा = जानकर; उभयथा = दोनों ओर से; फलम् = फल; विरोधे = विरोध/परस्पर-विरुद्ध होने पर; तुल्यफलयोः = समान-भार वाले दोनों फलों का; द्वयोः = दोनों का; नाशः = नाश/निरस्तीकरण; प्रजायते = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्विराशीश (दो राशियों का स्वामी) ग्रह का फल दोनों स्वामित्वों से जानें। जब दोनों ओर के फल तुल्य हों और परस्पर विरुद्ध हों, तो दोनों का नाश (परस्पर-निरस्तीकरण) होता है। मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि — प्रत्येक दो राशियों का स्वामी है; एक भावेश-फल दूसरे भावेश-फल से टकराए तो “तुल्य विरोध” पर शास्त्र दोनों को गिराने को कहता है।

English rendering For a planet that rules two signs, know the result from both lordships; when the two results are equal in weight and mutually opposed, the text states that both are destroyed (cancel).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नियम (गुणनात्मक नहीं, तार्किक निरस्तीकरण):
ग्रह G = स्वामी(R₁) ∧ स्वामी(R₂)।
फल f₁ = फल(G as lord of R₁-as-bhāva), f₂ = फल(G as lord of R₂-as-bhāva)।
यदि f₁ ≈ −f₂ (तुल्य-विरोध) ⇒ दोनों निरस्त (नाश)।
यदि विरोधी नहीं — अगला श्लोक।
द्विराशीश: मंगल (मेष/वृश्चिक), बुध (मिथुन/कन्या), गुरु (धनु/मीन), शुक्र (वृष/तुला), शनि (मकर/कुम्भ); सूर्य-चन्द्र एक-राशिमात्र।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष। तब मंगल = १ेश + ८ेश। मानें १ेश-फल “शरीर-सुख” और ८ेश-फल “शरीर-असुख/व्यथा” — तुल्य-विरुद्ध श्रेणी में शास्त्र २४.१४६ के अनुसार दोनों का नाश (परस्पर कटौती) कहता है। (वास्तविक निर्णय में २४.१४७ का बल-अंश और अन्य योग भी लगते हैं; यह केवल द्विराशीश-नियम का संकेत।)

24.147
विभिन्नयोस्तु फलयोर्द्वयोः प्राप्तिर्भवेद्‌ध्रुवम्‌।
ग्रहे पूर्णबले पुर्णमर्धमर्धबले फलम्‌
vibhinnayostu phalayordvayoḥ prāptirbhaved‌dhruvam‌|
grahe pūrṇabale purṇamardhamardhabale phalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभिन्नयोः = भिन्न (असमान/असम-स्वभाव) होने पर; तु = किन्तु; फलयोः द्वयोः = दोनों फलों की; प्राप्तिः = प्राप्ति; भवेत् ध्रुवम् = निश्चित होती है; ग्रहे पूर्णबले = ग्रह के पूर्ण बल में; पूर्णम् = पूर्ण (सम्पूर्ण) फल; अर्धम् = आधा; अर्धबले = आधे बल में (मिलता है वह) फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ किन्तु यदि दोनों स्वामित्वों के फल परस्पर भिन्न (असमान, न कि सम-विरोधी) हों, तो दोनों की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है — कोई नाश नहीं। साथ ही शास्त्र फल की मात्रा को बल के अनुपात में बाँधता है: ग्रह पूर्ण बल में हो तो पूर्ण फल, आधे बल में हो तो आधा फल देता है।

English rendering But when the two results differ (are not equal-and-opposite), the attainment of both is certain. And a planet in full strength gives the full fruit; in half strength, half the fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-प्राप्ति नियम + बल-समानुपाती मापन।
- असम फलों का योग: यदि F₁ ≠ −F₂ (सम-विरोधी नहीं), तो दोनों प्रकट → F_नेट = F₁ + F₂ (दोनों प्राप्त)।
- बल-भार (weight w): फल_प्रदत्त = w × F_आधार, जहाँ
पूर्णबल → w = 1 (पूर्ण फल),
अर्धबल → w = 1/2 (आधा फल)।
अर्थात् फल ∝ ग्रहबल — फल एक सतत मात्रा है, न कि केवल "है/नहीं"।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी भावेश का आधार-फल F_आधार = "पूर्ण धन-लाभ" है, और उसका ষड्बल पूर्ण-अपेक्षित सीमा तक पहुँचता है (पूर्णबल, w = 1) → पूर्ण फल की प्राप्ति। यदि वही ग्रह अपेक्षित बल का लगभग आधा ही जुटा पाए (अर्धबल, w = 1/2) → फल भी लगभग आधा: (1/2) × F_आधार। बल की गणना रूप/विरूप में होती है (1 रूप = 60 विरूप); यहाँ अपेक्षित-सीमा का संख्यात्मक मान परम्परा-सापेक्ष है, अतः उसे स्थिरांक के रूप में स्थिर नहीं किया गया — केवल अनुपात 1 : 1/2 श्लोक-सम्मत है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूर्ण/अर्ध का यह भार सीधे ষड्बल-आउटपुट पर लगने वाला गुणक है: हमारे इंजन में प्रत्येक ग्रह का कुल बल (रूप में) प्रति-ग्रह अपेक्षित-सीमा से तुलित होता है, और यही अनुपात w बनकर फल को स्केल करता है — यही श्लोक की "पूर्णम्/अर्धम्" शब्दावली का गणितीय रूप है। अनुशासन: w एक परिकलित संख्या है, जबकि F_आधार शास्त्र का फल-कथन — दोनों को मिलाया नहीं, गुणा किया जाता है।

24.148
पादं हीनबले खेटे ज्ञेयमित्थं बुधैरिति।
उक्तं भावस्थितानां ते भावेशानां पलं मया
pādaṃ hīnabale kheṭe jñeyamitthaṃ budhairiti|
uktaṃ bhāvasthitānāṃ te bhāveśānāṃ palaṃ mayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पादं = फल का चतुर्थांश (1/4); हीनबले = बलहीन / दुर्बल दशा में; खेटे = ग्रह में; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; इत्थं = इस प्रकार; बुधैः = विद्वानों द्वारा; भावस्थितानां = भावों में स्थित ग्रहों का; भावेशानां = भाव-स्वामियों का; पलं = फल; मया = मेरे द्वारा (उक्तम् = कहा गया)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कोई ग्रह हीनबल हो, तब उसके द्वारा सूचित फल को विद्वानों को पाद-मात्र — अर्थात् पूर्ण फल का चतुर्थांश — समझना चाहिए। इसी अनुपात-दृष्टि से भावों में स्थित ग्रहों और भाव-स्वामियों का फल-कथन यहाँ पूर्ण किया गया है। यह श्लोक भाव-फल-प्रकरण का समापन-सूत्र है: फल की मात्रा ग्रह-बल से जुड़ी है, न कि मात्र भाव-स्थिति से।

English rendering The text states that when a planet is of deficient strength (hīnabala), the wise are to take its indicated result as a quarter (pāda) only. Thus Parāśara says he has set forth the results of planets placed in the houses and of the house-lords — closing the bhāva-phala teaching with a strength-proportion rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Strength-scaled phala factor. For a planet marked हीनबल the śāstra assigns
phala_factor = पाद = 1/4
of the full stated house/lord result. (This verse names only the weak case; companion rules in the broader bala literature commonly map full / medium / weak → 1, 1/2, 1/4 — here only the 1/4 term is explicit.) Convention for “hīnabala” itself is not redefined in this line; it depends on the chosen bala model (e.g. ṣaḍbala totals in rūpa/virūpa, 1 rūpa = 60 virūpas, compared with per-planet thresholds). Declare that bala convention before applying the factor.

उदाहरण (worked example) Suppose a bhāva-phala table credits a certain house-lord result as “full” = 1 unit of stated effect, and the planet’s ṣaḍbala (or other adopted strength measure) classifies it as हीनबल.
phala applied = 1 × (1/4) = 0.25 of that stated unit.
If two planets both occupy or lord the same bhāva-theme and only one is hīnabala, only that one’s share is scaled by 1/4 under this rule; the other retains its own strength-class factor. Ayanāṃśa affects longitudes used to place planets and compute bala components, but the 1/4 multiplier itself is dimensionless and text-fixed.

हमारा डिकोड (Our Decode) This line is the phala-side mirror of the ṣaḍbala engine: Ch.27 builds the six-fold strength (sthāna, dig, kāla, ceṣṭā, naisargika, dṛg) in exact rūpa/virūpa arithmetic; here Ch.24 applies a hard factor 1/4 once that strength is classed as hīnabala. We keep the split discipline of the decode: bala numbers are computed with `==`-grade exactness; the “quarter result” remains the śāstra’s stated scaling, never converted into fate-certainty or pressure-remedy language.

अध्यायः 25

अथाऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः

87 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 24 के 34 श्लोक दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (87 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated 34 verses of chapter 24; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (87 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

25.1
रव्यादिसप्तखेटानां प्रोक्तं भावफलं मया ।
अप्रकाशग्रहाणां च फलानि कथयाम्यहम्
ravyādisaptakheṭānāṃ proktaṃ bhāvaphalaṃ mayā|
aprakāśagrahāṇāṃ ca phalāni kathayāmyaham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रव्यादि = सूर्य से आरम्भ; सप्तखेटानाम् = सात ग्रह; प्रोक्तम् = कहा जा चुका; भावफलम् = भावगत फल; अप्रकाशग्रहाणाम् = अप्रकाश/उपग्रह (धूमादि); फलानि = फल; कथयामि = मैं कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ पाराशर कहते हैं कि सूर्य से आरम्भ कर सात खेटों का भाव-फल वे पहले ही बता चुके हैं। अब वे अप्रकाश ग्रह—धूमादि उपग्रहों—के फल क्रमशः कहने जा रहे हैं। यह अध्याय उन्हीं उपग्रहों के भाव-स्थित फल का द्वार खोलता है।

English rendering Parāśara states that he has already set forth the house-results of the seven planets beginning with the Sun. He now undertakes to declare the results of the non-luminous grahas (the aprakāśa/upagraha class).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-उपक्रम / फल-सूची का संवाद। यह श्लोक गणना नहीं देता; यह धूमादि अप्रकाश-ग्रहों के भाव-फल-वर्णन का प्रस्ताव है। (उपग्रह-देशान्तर के सूत्र अन्यत्र हैं; यहाँ केवल फल-अधिकार का आरम्भ है।)

25.2
शूरो विमलनेत्रांशः सुस्तब्धो निर्घृणः खलः ।
मूर्तिस्थे धूमसंज्ञे च गाढरोषो नरः सदा
śūro vimalanetrāṃśaḥ sustabdho nirghṛṇaḥ khalaḥ|
mūrtisthe dhūmasaṃjñe ca gāḍharoṣo naraḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मूर्तिस्थे = प्रथम भाव (लग्न/मूर्ति) स्थित; धूमसंज्ञे = धूम नामक उपग्रह; शूरः = शूर/वीर; विमलनेत्रांशः = निर्मल नेत्र-अंश वाला; सुस्तब्धः = सुदृढ़/स्थिर; निर्घृणः = निर्दय; खलः = दुष्ट-स्वभाव; गाढरोषः = गहरे क्रोध वाला; नरः सदा = पुरुष सदैव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब धूम लग्न (मूर्ति) में स्थित हो, तो व्यक्ति शूर, निर्मल नेत्र-अंश वाला, सुदृढ़, निर्दय और खल-स्वभाव वाला कहा गया है। वह सदा गहरे रोष से युक्त बताया गया है। यह सब शास्त्र का फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that with Dhūma placed in the first house (mūrti/lagna), the native is brave, of clear eye-portions, firmly composed, ruthless, base in nature, and continually deep in anger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धूम लग्न में)। भाव-फल वर्णन है; यहाँ धूम की देशान्तर-गणना नहीं दी गई। धूम की स्थिति अन्यत्र दिए सूर्य-आधारित उपग्रह-सूत्र से निर्धारित होती है, फिर भाव-स्थान से फल पढ़ा जाता है।

25.3
रोगी धनी तु हीनाङ्गो राज्यापहृतमानसः ।
धूमे द्वितीये सम्प्राप्ते मन्दप्रज्ञो नपुंसकः
rogī dhanī tu hīnāṅgo rājyāpahṛtamānasaḥ|
dhūme dvitīye saṃprāpte mandaprajño napuṃsakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे द्वितीये = धूम द्वितीय भाव में; संप्राप्ते = प्राप्त/स्थित होने पर; रोगी = रोग-युक्त; धनी = धनवान्; हीनाङ्गः = अंग-हीन/अंग-न्यून; राज्यापहृतमानसः = राज्य (या पद) से हृत-मन वाला; मन्दप्रज्ञः = मंदबुद्धि; नपुंसकः = नपुंसक/वीर्य-हीन (पाठानुसार)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धूम जब द्वितीय भाव में प्राप्त हो, तो व्यक्ति रोगी, धनवान् किन्तु अंग-हीन, और राज्य/पद से मन छीना-सा कहा गया है। वह मंद-प्रज्ञ और नपुंसक-स्वभाव/अवस्था वाला भी बताया गया है। यह मिश्र फल है—धन का उल्लेख रोग, अंग-न्यूनता और मानसिक क्षति के साथ है।

English rendering The text states that when Dhūma is obtained in the second house, the native is diseased, wealthy yet deficient in limbs, with mind seized as if from sovereignty; slow of intellect and of eunuch-nature (as the reading has it).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धूम द्वितीय भाव में)। “द्वितीये” केवल भाव-क्रमांक है; कोई अंक-सूत्र या बल-इकाई नहीं। पाठ-भेद संभव जहाँ “राज्यापहृतमानसः” या “नपुंसकः” की व्याख्या संस्करणानुसार भिन्न पढ़ी जाए।

25.4
मतिमान् शौर्यसम्पन्न इष्टचितः प्रियंवदः ।
धूमे सहजभावस्थे जनाढ्यो धनवान् भवेत्
matimān‌ śauryasampanna iṣṭacitaḥ priyaṃvadaḥ|
dhūme sahajabhāvasthe janāḍh‌yo dhanavān‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे सहजभावस्थे = धूम तृतीय (सहज) भाव में; मतिमान् = बुद्धिमान्; शौर्यसम्पन्नः = शौर्य से युक्त; इष्टचितः = इष्ट-चित्त/शुभ-मनोवृत्ति वाला (पाठ-भेद संभव: इष्टचित्तः); प्रियंवदः = प्रिय बोलने वाला; जनाढ्यः = जन-संपन्न; धनवान् भवेत् = धनवान् होता है—शास्त्र के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धूम सहज (तृतीय) भाव में स्थित हो तो व्यक्ति मतिमान्, शौर्य-संपन्न, इष्ट-चित्त और प्रियंवद कहा गया है। वह जन-अढ्य और धनवान् भी बताया गया है। तृतीय भाव के इस फल में साहस, वाणी और धन-जन का संयोग शास्त्र ने एक साथ रखा है।

English rendering The text states that with Dhūma standing in the third (sahaja) house, one becomes intelligent, endowed with valor, well-intentioned, pleasant of speech, rich in people, and wealthy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धूम तृतीय भाव में)। “सहजभाव” = भाव 3; कोई वर्ग-विभाजन या बिंदु-गणना यहाँ नहीं। फल शास्त्र-स्वर में पढ़ें, नियत भाग्य के रूप में नहीं।

25.5
कलत्राङ्गपरित्यक्तो नित्यं मनसि दुःखितः ।
धूमे चतुर्थे सम्प्राप्ते सर्वशास्त्रार्थचिन्तकः
kalatrāṅgaparityakto nityaṃ manasi duḥkhitaḥ|
dhūme caturthe samprāpte sarvaśāstrārthacintakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे चतुर्थे = धूम चतुर्थ भाव में; सम्प्राप्ते = प्राप्त होने पर; कलत्राङ्गपरित्यक्तः = कलत्र/पत्नी-अंग से परित्यक्त; नित्यं मनसि दुःखितः = मन में नित्य दुःखी; सर्वशास्त्रार्थचिन्तकः = सब शास्त्रों के अर्थ का चिन्तक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धूम चतुर्थ भाव में प्राप्त हो तो व्यक्ति कलत्र-अंग से परित्यक्त और मन में नित्य दुःखी कहा गया है। साथ ही वह सर्वशास्त्रार्थ का चिन्तक भी बताया गया है—गृह-सुख की हानि और शास्त्र-चिन्तन का युगल फल। यह कथन शास्त्र का है; भय या इलाज का दबाव यहाँ नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when Dhūma is obtained in the fourth house, the native is forsaken as to spouse/partner-limb, continually distressed in mind, and a contemplator of the meaning of all the śāstras.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धूम चतुर्थ भाव में)। चतुर्थ = सुख/हृदय-स्थान की पारंपरिक भाव-समीक्षा; यहाँ केवल फल-सूची है, सुख-बल या कोण की गणना नहीं।

25.6
स्वल्पापत्यो धनैर्हीनो धूमे पञ्चमसंस्थिते ।
गुरुत सर्वभक्षं च सुहृन्मन्त्रविवर्जितः
svalpāpatyo dhanairhīno dhūme pañcamasaṃsthite|
guruta sarvabhakṣaṃ ca suhṛnmantravivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे पञ्चमसंस्थिते = धूम पञ्चम भाव में स्थित; स्वल्पापत्यः = अल्प-संतान वाला; धनैः हीनः = धन से हीन; गुरुत सर्वभक्षं च = (पाठ-भेद संभव) गुरु-त / सर्वभक्ष — सर्वभक्षी/सब खाने वाला; सुहृन्मन्त्रविवर्जितः = सुहृद् और मन्त्र/मंत्रणा से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धूम पञ्चम में स्थित हो तो व्यक्ति स्वल्प-अपत्य और धन-हीन कहा गया है। वह सर्वभक्ष (अनियमित/सब-कुछ भक्षण) वाला और सुहृद् तथा मन्त्र/सलाह से विवर्जित भी बताया गया है। “गुरुत सर्वभक्षं” में पाठ-भेद संभव; भाव अपत्य-धन-हानि और मित्र-मन्त्र-शून्यता का है।

English rendering The text states that with Dhūma placed in the fifth house, one has few offspring and is destitute of wealth; omnivorous (as the reading has it), and bereft of friends and of mantra/counsel. (Word-order/reading of “गुरुत सर्वभक्षं” may vary—पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धूम पञ्चम भाव में)। पञ्चम = संतान/बुद्धि-स्थान का शास्त्रीय फल-क्षेत्र; कोई संख्यात्मक गुणक या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

25.7
बलवाञ्छत्रुवधको धूमे च रिपुभावगे ।
बहुतेजोयुतः ख्यातः सदा रोगविवर्जितः
balavāñchatruvadhako dhūme ca ripubhāvage|
bahutejoyutaḥ khyātaḥ sadā rogavivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे च रिपुभावगे = धूम रिपु (षष्ठ) भाव में; बलवान् = बलवान्; शत्रुवधकः = शत्रु-वध करने वाला; बहुतेजोयुतः = बहुत तेज से युक्त; ख्यातः = प्रसिद्ध; सदा रोगविवर्जितः = सदा रोग से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धूम जब रिपु-भाव (षष्ठ) में हो, तो व्यक्ति बलवान् और शत्रु-वधक कहा गया है। वह बहु-तेज-युक्त, ख्यात और सदा रोग-विवर्जित भी बताया गया है। षष्ठ में उपग्रह का यह फल—बल, शत्रु-जय, तेज, कीर्ति और आरोग्य—शास्त्र का स्वयं का कथन है।

English rendering The text states that with Dhūma occupying the enemy (sixth) house, the native is strong, a slayer of foes, endowed with great brilliance, famous, and always free from disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धूम षष्ठ/रिपु भाव में)। “रिपुभाव” = भाव 6; यहाँ अष्टकवर्ग-बिंदु, षड्बल-रूप या दशा-वर्ष का कोई सूत्र नहीं—केवल भाव-फल का निर्देश।

25.8
निर्धनः सततं कामी परदारेषु कोविदः ।
धूमे सप्तमगे जातो निस्तेजाः सर्वदा भवेत्
nirdhanaḥ satataṃ kāmī paradāreṣu kovidaḥ|
dhūme saptamage jāto nistejāḥ sarvadā bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे = उपग्रह धूम; सप्तमगे = सप्तम भाव में स्थित; निर्धनः = धन-रहित; सततं = निरन्तर; कामी = काम-प्रधान; परदारेषु कोविदः = पर-स्त्री-विषय में निपुण; जातः = जातक; निस्तेजाः = तेज/कान्ति-रहित; सर्वदा भवेत् = सदैव होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब धूम सप्तम भाव में हो, तो जातक धन से वंचित रहता है और काम-वासना में निरन्तर प्रवृत्त रहता है। पर-स्त्री-विषय में उसे निपुण कहा गया है। साथ ही वह सदैव निस्तेज — तेज और दीप्ति से रहित — रहता है। यह सप्तम-स्थित धूम का फल-कथन है, न कि नियति की घोषणा।

English rendering The text states that when Dhūma occupies the seventh house, the native is said to be without wealth, continually lustful, and skilled with the wives of others, and is described as always lacking brilliance or vital lustre.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह सप्तम भाव में धूम की स्थिति का शास्त्रीय फल-वर्णन है; कोई अंश-विभाग, बल-माप या दशा-अनुपात इसमें निहित नहीं।

25.9
विक्रमेण परित्यक्तः सोत्साहो सत्यसङ्गरः ।
अप्रियो निष्ठुरः स्वार्थी धूमे मृत्युगते सति
vikrameṇa parityaktaḥ sotsāho satyasaṅgaraḥ|
apriyo niṣṭhuraḥ svārthī dhūme mṛtyugate sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे = उपग्रह धूम; मृत्युगते = मृत्यु-स्थान (अष्टम भाव) में गत; विक्रमेण परित्यक्तः = पराक्रम से रहित/त्यागा हुआ; सोत्साहो = उत्साह-युक्त; सत्यसङ्गरः = सत्य में अटल/सत्य-संकल्प; अप्रियो = अप्रिय; निष्ठुरः = कठोर; स्वार्थी = स्वार्थ-परायण; सति = होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — धूम जब मृत्यु-स्थान (अष्टम) में हो, तो जातक को विक्रम से रहित, परन्तु उत्साह-युक्त और सत्य-संकल्प वाला कहा गया है। साथ ही उसे अप्रिय, निष्ठुर और स्वार्थी भी बताया गया है। अष्टम-स्थित धूम का यह मिश्रित गुण-फल शास्त्र का अपना कथन है।

English rendering The text states that when Dhūma is in the house of death (the eighth), the native is said to be abandoned of prowess, yet zealous and firm in truth, and also unliked, harsh, and self-interested.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “मृत्यु” यहाँ अष्टम भाव का पारम्परिक नाम है; गणना नहीं, भाव-फल का निर्देश है।

25.10
सुतसौभाग्यसम्पन्नो धनी मानी दयान्वितः ।
धर्मस्थाने स्थिते धूमे धर्मवान् बन्धुवत्सलः
sutasaubhāgyasampanno dhanī mānī dayānvitaḥ|
dharmasthāne sthite dhūme dharmavān‌ bandhuvatsalaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे = उपग्रह धूम; धर्मस्थाने स्थिते = धर्म-स्थान (नवम भाव) में स्थित; सुतसौभाग्यसम्पन्नो = सन्तान और सौभाग्य से सम्पन्न; धनी = धन-युक्त; मानी = मान-सम्मान-प्रिय/मानी; दयान्वितः = दया-युक्त; धर्मवान् = धर्म-शील; बन्धुवत्सलः = बन्धुओं पर स्नेह-शील।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब धूम धर्म-स्थान (नवम) में स्थित हो, तो जातक सन्तान और सौभाग्य से युक्त, धनी, मान-सम्पन्न और दयालु कहा गया है। वह धर्मवान् तथा बन्धु-वत्सल भी बताया गया है। नवम-स्थित धूम का यह शुभ-फल-कथन है।

English rendering The text states that when Dhūma is placed in the house of dharma (the ninth), the native is said to be endowed with children and good fortune, wealthy, honour-bearing, compassionate, righteous, and affectionate toward kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “धर्मस्थान” = नवम भाव; कोई वर्गाङ्क या बल-सूत्र यहाँ नहीं दिया गया।

25.11
सुतसौभाग्यसंयुक्तः सन्तोषी मतिमान् सुखी ।
कर्मस्थे मानवो नित्यं धूमे सत्यपदस्थितः
sutasaubhāgyasaṃyuktaḥ santoṣī matimān‌ sukhī|
karmasthe mānavo nityaṃ dhūme satyapadasthitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे = उपग्रह धूम; कर्मस्थे = कर्म-स्थान (दशम भाव) में स्थित; सुतसौभाग्यसंयुक्तः = सन्तान-सौभाग्य से युक्त; सन्तोषी = सन्तुष्ट; मतिमान् = बुद्धिमान्; सुखी = सुख-युक्त; मानवो = मनुष्य/जातक; नित्यं = सदा; सत्यपदस्थितः = सत्य के पद पर स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — धूम जब कर्म-स्थान (दशम) में हो, तो मनुष्य नित्य सन्तान और सौभाग्य से युक्त, सन्तोषी, मतिमान् और सुखी कहा गया है। वह सत्य-पद पर स्थित — सत्यनिष्ठ — भी बताया गया है। दशम-स्थित धूम का यह फल-वर्णन है।

English rendering The text states that when Dhūma stands in the house of action (the tenth), the person is said to be always joined with children and good fortune, content, intelligent, happy, and established in the station of truth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “कर्मस्थ” = दशम भाव; यहाँ केवल भाव-फल है, कोई काल-माप या अंश-नियम नहीं।

25.12
धनधान्यहिरण्याढ्यो रूपवांश्च कलान्वितः ।
धूमे लाभगते चैव विनीतो गीतकोविदः
dhanadhānyahiraṇyāḍhyo rūpavāṃśca kalānvitaḥ|
dhūme lābhagate caiva vinīto gītakovidaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे = उपग्रह धूम; लाभगते = लाभ-स्थान (एकादश भाव) में गत; धनधान्यहिरण्याढ्यो = धन-धान्य-हिरण्य (स्वर्ण) से समृद्ध; रूपवांश्च = रूपवान् भी; कलान्वितः = कला से युक्त; विनीतो = विनम्र; गीतकोविदः = गीत/संगीत में निपुण; चैव = और भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब धूम लाभ-स्थान (एकादश) में हो, तो जातक धन, धान्य और हिरण्य से समृद्ध, रूपवान् और कला-सम्पन्न कहा गया है। वह विनम्र तथा गीत-कोविद भी बताया गया है। एकादश-स्थित धूम का यह शुभ-फल-कथन है।

English rendering The text states that when Dhūma has gone to the house of gain (the eleventh), the native is said to be rich in wealth, grain, and gold, handsome and endowed with the arts, and also humble and skilled in song.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “लाभ” = एकादश भाव; कोई संख्यात्मक सूत्र या अनुपात इसमें नहीं है।

25.13
पतितः पापकर्मा च धूमे द्वादशसङ्गते ।
परदारेषु संसक्तो व्यसनी निर्घृणः शठः
patitaḥ pāpakarmā ca dhūme dvādaśasaṅgate|
paradāreṣu saṃsakto vyasanī nirghṛṇaḥ śaṭhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूमे = उपग्रह धूम; द्वादशसङ्गते = द्वादश भाव से संयुक्त; पतितः = पतित; पापकर्मा = पाप-कर्म वाला; परदारेषु संसक्तो = पर-स्त्री में आसक्त; व्यसनी = व्यसन-ग्रस्त; निर्घृणः = निर्दय; शठः = शठ/कपटी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — धूम जब द्वादश भाव से संयुक्त हो, तो जातक को पतित और पाप-कर्मा कहा गया है। पर-स्त्री में आसक्त, व्यसनी, निर्घृण और शठ भी बताया गया है। यह द्वादश-स्थित धूम का कठोर फल-कथन है — शास्त्र का अपना वर्णन, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Dhūma is joined with the twelfth house, the native is said to be fallen and of sinful deeds, attached to the wives of others, given to vices, merciless, and deceitful.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। द्वादश भाव की स्थिति का नैतिक-चारित्रिक फल-वर्णन; कोई गणितीय नियत-अंक नहीं।

25.14
लग्ने पाते च सम्प्राप्ते जातको दुःखीपीडितः ।
क्रूरो घातकरो मूर्खो द्वेषी बन्धुजनस्य च
lagne pāte ca samprāpte jātako duḥkhīpīḍitaḥ|
krūro ghātakaro mūrkho dveṣī bandhujanasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाते = उपग्रह पात (व्यतीपात-वर्ग/पात-उपग्रह); लग्ने सम्प्राप्ते = लग्न में प्राप्त होने पर; जातकः = जातक; दुःखीपीडितः = दुःखी और पीड़ित; क्रूरो = क्रूर; घातकरो = घातक/हिंसक; मूर्खो = मूर्ख; द्वेषी = द्वेष करने वाला; बन्धुजनस्य = बन्धु-जन का/के प्रति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पात लग्न में प्राप्त हो, तो जातक दुःखी और पीड़ित कहा गया है। उसे क्रूर, घातक, मूर्ख तथा बन्धु-जन का द्वेषी भी बताया गया है। धूम-फल-शृंखला के बाद यह पात के लग्न-फल का आरम्भ-कथन है (पाठ-भेद/उपग्रह-नाम-परम्परा में “पात” का सटीक समीकरण भिन्न हो सकता है)।

English rendering The text states that when Pāta has arrived in the lagna, the native is said to be miserable and afflicted, cruel, injurious, foolish, and hostile toward kinsfolk.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ पात की लग्न-स्थिति का फल दिया है; पात की देशान्तर-गणना इस श्लोक में नहीं है — केवल फल-वर्णन।

25.15
जिह्मोऽतिपित्तवान् भोगी धनस्थे पातसंज्ञके ।
निर्घृणश्चाऽकृतज्ञश्च दुष्टात्मा पापकृत्तथा
jihmo'tipittavān‌ bhogī dhanasthe pātasaṃjñake|
nirghṛṇaścā'kṛtajñaśca duṣṭātmā pāpakṛttathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनस्थे = द्वितीय भाव में स्थित; पातसंज्ञके = पात-संज्ञक (उपग्रह/छाया-बिन्दु) के; जिह्मः = कुटिल / टेढ़ा स्वभाव; अतिपित्तवान् = अत्यधिक पित्त-प्रकृति; भोगी = भोग-लिप्सु; निर्घृणः = निर्दय; अकृतज्ञः = कृतघ्न; दुष्टात्मा = दुष्टचित्त; पापकृत् = पाप-कर्म करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात द्वितीय भाव (धन-स्थान) में हो, तो जातक कुटिल स्वभाव वाला और अत्यधिक पित्त-प्रकृति का बताया गया है। वह भोग-परक, निर्दय, कृतघ्न, दुष्टचित्त और पाप-कर्म की ओर झुका हुआ कहा गया है। यह फल-कथन द्वितीय भाव में पात की स्थिति से जोड़कर व्यक्त किया गया है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Pāta occupies the second house, the person is described as crooked, of excessive pitta temperament, pleasure-seeking, merciless, ungrateful, wicked-minded, and given to wrongful deeds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। द्वितीय भाव में पात की स्थिति का वर्णनात्मक परिणाम; गणना नहीं, केवल भाव-फल।

25.16
स्थिरप्रज्ञो रणी दाता धनाढ्यो राजवल्लभः ।
सम्प्राप्ते सहजे पाते सेनाधीशो भवेन्नरः
sthiraprajño raṇī dātā dhanāḍh‌yo rājavallabhaḥ|
samprāpte sahaje pāte senādhīśo bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहजे = तृतीय भाव में; पाते सम्प्राप्ते = पात के प्राप्त होने पर; स्थिरप्रज्ञः = स्थिर बुद्धि वाला; रणी = योद्धा / रणशील; दाता = दानशील; धनाढ्यः = धन-संपन्न; राजवल्लभः = राजा का प्रिय; सेनाधीशः = सेना का अधिपति; नरः भवेत् = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात तृतीय भाव (सहज) में प्राप्त हो, तो मनुष्य स्थिरबुद्धि, योद्धा-स्वभाव, दानशील और धन-संपन्न कहा गया है। वह राज-अनुग्रह का भागी और सेना का अधिपति बनने वाला बताया गया है। यह तृतीय भाव में पात का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Pāta reaches the third house, the person is firm of judgment, warlike, generous, wealthy, favored by rulers, and becomes a commander of armies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तृतीय भाव में पात की उपस्थिति का वर्णनात्मक परिणाम; कोई अंश-विभाग या बल-सूत्र नहीं।

25.17
बन्धव्याधिसमायुक्तः सुतसौभाग्यवर्जितः ।
चतुर्थगो यदा पातस्तदा स्यान्मनुजश्च सः
bandhavyādhisamāyuktaḥ sutasaubhāgyavarjitaḥ|
caturthago yadā pātastadā syānmanujaśca saḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थगः = चतुर्थ भाव में गया हुआ; यदा पातः = जब पात; तदा सः मनुजः स्यात् = तब वह मनुष्य ऐसा होता है; बन्ध-व्याधि-समायुक्तः = बंधन और रोग से युक्त; सुत-सौभाग्य-वर्जितः = पुत्र और सौभाग्य से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात चतुर्थ भाव में स्थित हो, तो वह मनुष्य बंधन और व्याधि से युक्त कहा गया है। साथ ही पुत्र-सुख और सौभाग्य से वंचित बताया गया है। यह चतुर्थ भाव में पात का फल-कथन है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Pāta occupies the fourth house, that person is described as beset by bondage and disease, and deprived of children and good fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चतुर्थ भाव-स्थित पात का परिणाम-वर्णन; गणनात्मक नियम नहीं।

25.18
दरिद्रो रूपसंयुक्तः पाते पञ्चमगे सति ।
कफपित्तानिलैर्युक्तो निष्ठुरो निरपत्रपः
daridro rūpasaṃyuktaḥ pāte pañcamage sati|
kaphapittānilairyukto niṣṭhuro nirapatrapaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाते पञ्चमगे सति = पात के पंचम भाव में होने पर; दरिद्रः = दरिद्र / निर्धन; रूपसंयुक्तः = रूप-संपन्न; कफ-पित्त-अनिलैः युक्तः = कफ-पित्त-वात (त्रिदोष) से युक्त; निष्ठुरः = कठोर; निरपत्रपः = निर्लज्ज / लज्जा-रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात पंचम भाव में हो, तो जातक दरिद्र किंतु रूप-संपन्न कहा गया है। वह कफ-पित्त-वात तीनों प्रकृतियों से युक्त, कठोर स्वभाव वाला और लज्जा-रहित बताया गया है। यह पंचम भाव में पात का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Pāta is in the fifth house, the person is poor yet endowed with beauty, marked by the three doṣas (kapha, pitta, and vāta), harsh, and without shame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पंचम भाव में पात का वर्णनात्मक फल; त्रिदोष-शब्दावली शास्त्रीय संकेत है, चिकित्सा-निर्णय नहीं।

25.19
शत्रुहन्ता सुपुष्टश्च सर्वास्त्राणां च चालकः ।
कलासु निपुणः शान्तः पाते शत्रुगते सति
śatruhantā supuṣṭaśca sarvāstrāṇāṃ ca cālakaḥ|
kalāsu nipuṇaḥ śāntaḥ pāte śatrugate sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाते शत्रुगते सति = पात के शत्रु-भाव (षष्ठ) में स्थित होने पर; शत्रुहन्ता = शत्रुओं का हनन करने वाला; सुपुष्टः = सुपुष्ट / बलवान; सर्वास्त्राणां चालकः = सब अस्त्रों का चालक / प्रयोग-कुशल; कलासु निपुणः = कलाओं में निपुण; शान्तः = शांत स्वभाव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात षष्ठ भाव (शत्रु-स्थान) में हो, तो जातक शत्रु-विनाशक, सुपुष्ट शरीर वाला और सब अस्त्रों का कुशल चालक कहा गया है। वह कलाओं में निपुण और शांत स्वभाव वाला बताया गया है। यह षष्ठ भाव में पात का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Pāta is in the sixth (enemy) house, the person is a destroyer of foes, well-nourished and strong, skilled in wielding all weapons, proficient in the arts, and peaceful in temperament.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। षष्ठ भाव-स्थित पात का परिणाम-वर्णन; कोई अंश-या बल-गणना नहीं।

25.20
धनदारसुतैस्त्यक्तः स्त्रीजितो दुःखसंयुतः ।
पाते कलत्रगे कामी निर्लज्जः परसौहृदः
dhanadārasutaistyaktaḥ strījito duḥkhasaṃyutaḥ|
pāte kalatrage kāmī nirlajjaḥ parasauhṛdaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाते कलत्रगे = पात के कलत्र-भाव (सप्तम) में होने पर; धन-दार-सुतैः त्यक्तः = धन, पत्नी और पुत्रों से परित्यक्त; स्त्रीजितः = स्त्री-वश; दुःखसंयुतः = दुःख-युक्त; कामी = काम-लोलुप; निर्लज्जः = लज्जा-रहित; परसौहृदः = पर-स्त्री/अन्य के प्रति सौहार्द-प्रवण (पाठानुसार “पर” संबंध)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात सप्तम भाव (कलत्र) में हो, तो जातक धन, पत्नी और पुत्रों से वियुक्त कहा गया है। वह स्त्री-वश, दुःख-युक्त, काम-लोलुप, निर्लज्ज और पर-संबंध में सौहार्द-प्रवण बताया गया है। यह सप्तम भाव में पात का फल-कथन है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Pāta occupies the seventh (spouse) house, the person is forsaken by wealth, wife, and children, dominated by women, joined with sorrow, lustful, shameless, and given to attachment toward others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तम भाव में पात का वर्णनात्मक परिणाम; गणनात्मक सूत्र नहीं।

25.21
विकलाक्षो विरूपश्च दुर्भगो द्विजनिन्दकः ।
मृत्युस्थाने स्थिते पाते रक्तपीडापरिप्लुतः
vikalākṣo virūpaśca durbhago dvijanindakaḥ|
mṛtyusthāne sthite pāte raktapīḍāpariplutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युस्थाने स्थिते पाते = मृत्यु-स्थान (अष्टम भाव) में स्थित पात के; विकलाक्षः = विकल/दोषयुक्त नेत्र वाला; विरूपः = विरूप / कुरूप; दुर्भगः = अभागा / सौभाग्य-हीन; द्विजनिन्दकः = द्विज (ब्राह्मण) की निंदा करने वाला; रक्तपीडा-परिप्लुतः = रक्त-संबंधी पीड़ा से आप्लावित (शास्त्रीय संकेत)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात अष्टम भाव (मृत्यु-स्थान) में स्थित हो, तो जातक विकल-नेत्र, विरूप और दुर्भाग्य-युक्त कहा गया है। वह द्विज की निंदा करने वाला और रक्त-पीड़ा से घिरा हुआ बताया गया है। यह अष्टम भाव में पात का फल-कथन है; चिकित्सकीय निदान नहीं, शास्त्र का अपना संकेत-भाषा।

English rendering The text states that when Pāta is placed in the eighth (death) house, the person is described as defective of eye, deformed, unfortunate, a reviler of the twice-born, and overwhelmed by blood-related affliction — as the śāstra’s own phala language, not a medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अष्टम भाव-स्थित पात का परिणाम-वर्णन; कोई अंश-विभाग, बल-इकाई या दशा-सूत्र नहीं।

25.22
बहुव्यापारको नित्यं बहुमित्रो बहुश्रुतः ।
धर्मभे पातखेटे च स्त्रीप्रियश्च प्रियंवदः
bahuvyāpārako nityaṃ bahumitro bahuśrutaḥ|
dharmabhe pātakheṭe ca strīpriyaśca priyaṃvadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुव्यापारकः = अनेक व्यापार/कार्य-व्यवसाय वाला; नित्यम् = सदैव; बहुमित्रः = अनेक मित्रों वाला; बहुश्रुतः = बहुश्रुत / विद्वान् (बहुत शास्त्र-श्रवण वाला); धर्मभे = धर्म-भाव (नवम भाव) में; पातखेटे = पात-खेट (अप्रकाश ग्रह/उपाग्रह) स्थित होने पर; स्त्रीप्रियः = स्त्रियों का प्रिय; प्रियंवदः = प्रिय बोलने वाला / मधुरभाषी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पात-खेट धर्मभाव (नवम) में स्थित होता है, तो जातक नित्य अनेक व्यापारों में लगा रहता है, बहुत मित्र रखता है और बहुश्रुत होता है। वह स्त्री-प्रिय तथा प्रियंवद भी कहा गया है। यह नवम-स्थित पात का फल-कथन है।

English rendering The text states that with Pāta-kheṭa in the ninth (dharma) house the person is constantly engaged in many affairs, has many friends, is widely learned, fond of women, and pleasant of speech.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पात-खेट का नवम-भाव फल)। पात की गणना यहाँ नहीं दी; केवल भाव-फल कहा गया है।

25.23
सश्रीको धर्मकृछान्तो धर्मकार्येषु कोविदः ।
कर्मस्थे पातसंज्ञे हि महाप्राज्ञो विचक्षणः
saśrīko dharmakṛchānto dharmakāryeṣu kovidaḥ|
karmasthe pātasaṃjñe hi mahāprājño vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सश्रीकः = श्री/समृद्धि से युक्त; धर्मकृत् = धर्म-कार्य करने वाला; शान्तः = शान्त स्वभाव (धर्मकृच्छान्तो ≈ धर्मकृत् + शान्तः; पाठ-भेद संभव); धर्मकार्येषु = धर्म-संबंधी कार्यों में; कोविदः = निपुण/दक्ष; कर्मस्थे = कर्मभाव (दशम) में स्थित; पातसंज्ञे = पात-संज्ञक (पात नामक ग्रह) में; महाप्राज्ञः = अत्यन्त प्रज्ञावान्; विचक्षणः = विवेकी / कुशल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पात जब कर्मभाव (दशम) में हो, तो जातक सश्रीक, धर्म-पालन करने वाला तथा शान्त होता है और धर्म-कार्यों में निपुण कहा जाता है। वही दशम-स्थित पात वाले को महाप्राज्ञ और विचक्षण भी कहा गया है। यह कर्म-भाव का पात-फल है।

English rendering The text states that when the planet called Pāta stands in the tenth (karma) house, the person is prosperous, righteous and calm, skilled in acts of dharma, highly wise, and discerning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पात का दशम-भाव फल)। “पातसंज्ञ” यहाँ केवल नाम-निर्देश है; स्थिति-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

25.24
प्रभूतधनवान् मानी सत्यवादी दृढव्रतः ।
अश्वढ्यो गीतसंसक्तः पाते लाभगते सति
prabhūtadhanavān‌ mānī satyavādī dṛḍhavrataḥ|
aśvaḍhyo gītasaṃsaktaḥ pāte lābhagate sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रभूतधनवान् = अत्यन्त धनवान्; मानी = मान-सम्मान वाला / अभिमानी (मान-युक्त); सत्यवादी = सत्य बोलने वाला; दृढव्रतः = दृढ़ व्रत वाला; अश्वाढ्यः = अश्वों से समृद्ध (अश्वढ्यो; पाठ-भेद संभव); गीतसंसक्तः = गीत/संगीत में आसक्त; पाते = पात में; लाभगते सति = लाभभाव (एकादश) में स्थित होने पर

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पात जब लाभभाव (एकादश) में हो, तो जातक प्रभूत धन वाला, मान-युक्त, सत्यवादी और दृढ़व्रत कहा जाता है। वह अश्व-समृद्ध तथा गीत-संसक्त भी कहा गया है। यह लाभ-स्थित पात का फल-कथन है।

English rendering The text states that with Pāta in the eleventh (lābha) house the person is abundantly wealthy, honourable, truthful, firm in vows, rich in horses, and devoted to song.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पात का एकादश-भाव फल)। लाभ = 11वाँ भाव; गणना-विधि यहाँ अनुपस्थित।

25.25
कोपी च बहुकर्माढयो व्यंगो धर्मस्य दूषकः ।
व्ययस्थाने गते पाते विद्वेषी निजबन्धुषु
kopī ca bahukarmāḍhayo vyaṃgo dharmasya dūṣakaḥ |
vyayasthāne gate pāte vidveṣī nijabandhuṣu
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोपी = क्रोधी; बहुकर्माढ्यः = अनेक कर्मों/उद्यमों वाला; व्यङ्गः = अङ्ग-विकल; धर्मस्य दूषकः = धर्म का दूषण करने वाला; व्ययस्थाने = द्वादश भाव में; गते पाते = पात (व्यतीपात) के गए होने पर; विद्वेषी = द्वेष रखने वाला; निजबन्धुषु = अपने बन्धुओं में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पात (व्यतीपात नामक अप्रकाश ग्रह) द्वादश भाव में हो तो जातक क्रोधी, बहु-कर्मी, अङ्ग-विकल, धर्म-दूषक और अपने बन्धुओं से द्वेष रखने वाला कहा गया है। अप्रकाश-ग्रह अध्याय में यह पात के बारह भाव-फलों की श्रृंखला का द्वादश-भाव पद है — पाठ का फल-कथन, नियति नहीं।

English rendering With Pāta (Vyatīpāta) in the twelfth house, the text describes the native as wrathful, engaged in many undertakings, deformed, a defiler of dharma, and hostile to his own kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सन्दर्भ-गणना (इसी अध्याय के आरम्भिक श्लोकों की): धूम = सूर्य + 133°20′; व्यतीपात (पात) = 360° − धूम; उसका भाव लग्न से गिनकर 12 हो तो यह फल।

25.26
विद्वान् सत्यरतः शान्तो धनवान् पुत्रवाञ्छुचिः ।
परिधो तनुगे दाता जायते गुरुवत्सलः
vidvān‌ satyarataḥ śānto dhanavān‌ putravāñchuciḥ|
paridho tanuge dātā jāyate guruvatsalaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्वान् = पण्डित / ज्ञानवान्; सत्यरतः = सत्य में रत; शान्तः = शान्त; धनवान् = धन-सम्पन्न; पुत्रवान् = पुत्र वाला; शुचिः = शुद्ध / पवित्र; परिधौ = परिधि (अप्रकाश उपग्रह) में; तनुगे = तनु-भाव (लग्न/प्रथम) में स्थित; दाता = दानशील; जायते = होता है; गुरुवत्सलः = गुरुओं के प्रति स्नेह-युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि परिधि जब तनुभाव (लग्न) में हो, तो जातक विद्वान्, सत्यरत, शान्त, धनवान्, पुत्रवान् और शुचि होता है। वह दाता तथा गुरु-वत्सल भी कहा गया है। यह लग्न-स्थित परिधि का फल-कथन है।

English rendering The text states that with Paridhi in the first house (tanu/lagna) one is learned, devoted to truth, peaceful, wealthy, blessed with sons, pure, generous, and affectionate toward teachers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का प्रथम-भाव फल)। परिधि की देशान्तर-स्थिति यहाँ नहीं; केवल तनुगे का फल।

25.27
ईश्वरो रूपवान् भोगी सुखी धर्मपरायणः ।
धनस्थे परिधौ जातः प्रभुर्भवति मानवः
īśvaro rūpavān‌ bhogī sukhī dharmaparāyaṇaḥ|
dhanasthe paridhau jātaḥ prabhurbhavati mānavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ईश्वरः = स्वामी / प्रभु-सदृश; रूपवान् = सुन्दर; भोगी = भोगों का उपभोक्ता; सुखी = सुख-युक्त; धर्मपरायणः = धर्म में तत्पर; धनस्थे = धनभाव (द्वितीय) में; परिधौ = परिधि स्थित होने पर; जातः = उत्पन्न / स्थित; प्रभुः = प्रभु / अधिपति; भवति = होता है; मानवः = मनुष्य

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि परिधि जब धनभाव (द्वितीय) में हो, तो जातक ईश्वर-सदृश, रूपवान्, भोगी, सुखी और धर्मपरायण कहा जाता है। धनस्थ परिधि वाला मानव प्रभु होता है — यही द्वितीय-भाव का परिधि-फल है।

English rendering The text states that when Paridhi occupies the second (dhana) house, the person is lordly, handsome, pleasure-enjoying, happy, devoted to dharma, and becomes a master among men.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का द्वितीय-भाव फल)। धन = 2रा भाव; केवल फल, कोई बलांक/अंश-सूत्र नहीं।

25.28
स्त्रीवल्लभः सुरूपांगो देवस्वजनसंगतः ।
तृतीये परिधौ भृत्यो गुरुभक्तिसमन्वितः
strīvallabhaḥ surūpāṃgo devasvajanasaṃgataḥ|
tṛtīye paridhau bhṛtyo gurubhaktisamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीवल्लभः = स्त्रियों का प्रिय; सुरूपांगः = सुन्दर अंगों वाला; देवस्वजनसंगतः = देवों तथा स्वजनों के संग वाला; तृतीये = तृतीय भाव में; परिधौ = परिधि में; भृत्यः = सेवक / अनुचर; गुरुभक्तिसमन्वितः = गुरु-भक्ति से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि परिधि जब तृतीय भाव में हो, तो जातक स्त्री-वल्लभ, सुरूपांग और देव-स्वजन-संगत कहा जाता है। वही तृतीय-स्थित परिधि वाले को भृत्य (सेवा-वृत्ति वाला) तथा गुरुभक्ति-समन्वित भी कहा गया है। यह तृतीय-भाव का परिधि-फल है।

English rendering The text states that with Paridhi in the third house the person is beloved of women, well-formed of limb, associated with the gods and his own people, a servant by station, and endowed with devotion to the guru.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का तृतीय-भाव फल)। “भृत्यः” यहाँ शास्त्रीय पद-नाम है, आधुनिक सामाजिक निर्णय नहीं।

25.29
परिधौ सुखभावस्थे विस्मितं त्वरिमंगलम् ।
अक्रूरं त्वथ सम्पूर्णं कुरुते गीतकोविदम्
paridhau sukhabhāvasthe vismitaṃ tvarimaṃgalam‌|
akrūraṃ tvatha sampūrṇaṃ kurute gītakovidam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परिधौ = उपग्रह परिधि/परिवेष पर; सुखभावस्थे = चतुर्थ भाव में स्थित होने पर; विस्मितम् = आश्चर्यशील / विस्मययुक्त; अरिमङ्गलम् = शत्रु-सम्बन्धी मङ्गल / शत्रु-पक्ष में शुभ फल (त्व् = अव्यय); अक्रूरम् = निर्दयता-रहित, कोमल स्वभाव; सम्पूर्णम् = पूर्ण / परिपूर्ण जीवन-सामग्री; गीतकोविदम् = गान-कला में निपुण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब उपग्रह परिधि सुखभाव (चतुर्थ भाव) में स्थित हो, तो जातक विस्मयशील और शत्रु-सम्बन्धी मङ्गल-युक्त कहा जाता है। पाठ उसे अक्रूर—अर्थात् क्रूरता से रहित—बताता है। साथ ही वह सम्पूर्णता का भाव और गीत-कला में पारंगतता का फल भी इसी स्थिति से जोड़ता है। यह भाव-फल-कथन है; गणना नहीं।

English rendering The text states that when the upagraha Paridhi occupies the fourth house (sukha-bhāva), the native is described as wonder-struck and favoured in matters connected with adversaries, non-cruel, fulfilled, and skilled in song.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपग्रह परिधि का चतुर्थ-भाव फल)। भाव-स्थिति यहाँ गुणात्मक फल से बँधी है; कोई अंश-सूत्र या बल-इकाई नहीं दी गई।

25.30
लक्ष्मीवान् शीलवान् कान्तः प्रियवान् धर्मवत्सलः ।
पञ्चमे परिधौ जातः स्त्रीणां भवति वल्लभः
lakṣmīvān‌ śīlavān‌ kāntaḥ priyavān‌ dharmavatsalaḥ|
pañcame paridhau jātaḥ strīṇāṃ bhavati vallabhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लक्ष्मीवान् = श्री/सम्पत्ति-सम्पन्न; शीलवान् = सदाचार-युक्त; कान्तः = कान्तिमान् / आकर्षक; प्रियवान् = प्रियजन-सम्पन्न / प्रिय; धर्मवत्सलः = धर्म के प्रति स्नेहशील; पञ्चमे = पञ्चम भाव में; परिधौ जातः = परिधि में जन्मा / परिधि-स्थित; स्त्रीणाम् वल्लभः = स्त्रियों का प्रिय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पञ्चम भाव में परिधि होने पर जातक लक्ष्मीवान्, शीलवान्, कान्त, प्रियवान् और धर्मवत्सल कहा जाता है। पाठ स्पष्ट रूप से जोड़ता है कि ऐसा जातक स्त्रियों का वल्लभ होता है। यह पञ्चम-भाव का परिधि-फल है—सम्पत्ति, शील, कान्ति, धर्म-स्नेह और प्रियता—सब शास्त्र-कथन के रूप में।

English rendering The text states that one born with Paridhi in the fifth house is wealthy, of good character, attractive, beloved, devoted to dharma, and dear to women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का पञ्चम-भाव फल)। पञ्चम-स्थिति का संकेत मात्र है; कोई वर्ग-विभाजन या काल-अनुपात नहीं।

25.31
व्यक्तोऽर्थपुत्रवान् भोगी सर्वसत्त्वहिते रतः ।
परिधौ रिपुभावस्थे शत्रुहा जायते नरः
vyakto'rthaputravān‌ bhogī sarvasattvahite rataḥ|
paridhau ripubhāvasthe śatruhā jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यक्तः = स्पष्ट / प्रकट स्वभाव या वाणी; अर्थपुत्रवान् = धन और पुत्र से युक्त; भोगी = भोग-सुख का भागी; सर्वसत्त्वहिते रतः = सब प्राणियों के हित में रत; परिधौ रिपुभावस्थे = परिधि के षष्ठ (रिपु) भाव में स्थित होने पर; शत्रुहा = शत्रु-नाशक; जायते नरः = पुरुष जन्म लेता है / होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब परिधि रिपुभाव (षष्ठ भाव) में हो, तो नर व्यक्त, अर्थ-पुत्रवान्, भोगी और सर्वसत्त्व के हित में रत कहा जाता है। उसी स्थिति से पाठ उसे शत्रुहा—शत्रुओं का हनन करने वाला—भी बताता है। षष्ठ भाव शत्रु-स्थान है; यहाँ फल “शत्रु-नाश” और सामान्य कल्याण-रति दोनों से जुड़ा है—दोनों शास्त्र के अपने शब्द हैं।

English rendering The text states that when Paridhi stands in the sixth house (ripu-bhāva), the person is articulate, endowed with wealth and offspring, given to enjoyment, devoted to the welfare of all beings, and a destroyer of enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का षष्ठ-भाव फल)। “शत्रुहा” यहाँ फल-पद है, कोई युद्ध-सूचक अंक-सूत्र नहीं।

25.32
स्वल्पापत्यः सुखैर्हीनो मन्दप्रज्ञः सुनिष्ठुरः ।
परिधौ द्यूनभावस्थे स्त्रीणां व्याधिश्च जायते
svalpāpatyaḥ sukhairhīno mandaprajñaḥ suniṣṭhuraḥ|
paridhau dyūnabhāvasthe strīṇāṃ vyādhiśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वल्पापत्यः = अल्प सन्तान वाला; सुखैः हीनः = सुखों से रहित; मन्दप्रज्ञः = मन्द बुद्धि वाला; सुनिष्ठुरः = अत्यन्त कठोर / निष्ठुर; परिधौ द्यूनभावस्थे = परिधि के सप्तम (द्यून) भाव में स्थित होने पर; स्त्रीणाम् व्याधिः च = स्त्रियों का रोग भी; जायते = उत्पन्न होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्यूनभाव (सप्तम भाव) में परिधि होने पर जातक स्वल्पापत्य, सुखों से हीन, मन्दप्रज्ञ और सुनिष्ठुर कहा जाता है। पाठ आगे जोड़ता है कि स्त्रियों-सम्बन्धी व्याधि का संकेत भी इसी स्थिति से जुड़ा है। यह सप्तम-भाव का कठोर फल-वर्णन है—निष्कर्ष “भाग्य” नहीं, शास्त्र का अपना कथन है; न भय-वाणी, न उपचार-दबाव।

English rendering The text states that when Paridhi occupies the seventh house (dyūna-bhāva), the native is said to have few offspring, to lack comforts, to be slow of wit and very harsh; the text also states an indication of disease connected with women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का सप्तम-भाव फल)। सप्तम-स्थिति का गुणात्मक वर्णन; कोई आयुर्दाय-सूत्र या बल-सीमा यहाँ नहीं।

25.33
अध्यात्मचिन्तकः शान्तो दृढकायो दृढव्रतः ।
धर्मवांश्च ससत्त्वश्च परिधौ रन्ध्रसंस्थिते
adhyātmacintakaḥ śānto dṛḍhakāyo dṛḍhavrataḥ|
dharmavāṃśca sasattvaśca paridhau randhrasaṃsthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अध्यात्मचिन्तकः = अध्यात्म पर चिन्तन करने वाला; शान्तः = शान्ति-युक्त; दृढकायः = दृढ़ शरीर वाला; दृढव्रतः = दृढ़ व्रत/संकल्प वाला; धर्मवान् = धर्म-सम्पन्न; ससत्त्वः = सत्त्व/साहस-युक्त; परिधौ रन्ध्रसंस्थिते = परिधि के अष्टम (रन्ध्र) भाव में स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रन्ध्र (अष्टम भाव) में परिधि संस्थित होने पर जातक अध्यात्म-चिन्तक, शान्त, दृढ़काय और दृढ़व्रत होता है। पाठ उसे धर्मवान् और ससत्त्व भी बताता है—अर्थात् धर्म और सत्त्व-गुण दोनों से युक्त। अष्टम-भाव प्रायः गहनता का स्थान माना जाता है; यहाँ फल आध्यात्मिक चिन्तन और स्थिरता की ओर झुका है—फिर भी यह शास्त्र-कथन ही है।

English rendering The text states that when Paridhi is placed in the eighth house (randhra), the native is a contemplator of the inner self, peaceful, firm of body and of vow, righteous, and endowed with vital courage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का अष्टम-भाव फल)। “दृढकाय / दृढव्रत” यहाँ गुण-पद हैं, कोई काय-बल या षड्बल-इकाई नहीं।

25.34
पुत्रान्वितः सुखी कान्तो धनाढयो लौल्यवर्जितः ।
परिधौ धर्मगे मानी स्वल्पसन्तुष्टमानसः
putrānvitaḥ sukhī kānto dhanāḍhayo laulyavarjitaḥ|
paridhau dharmage mānī svalpasantuṣṭamānasaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रान्वितः = पुत्रों से युक्त; सुखी = सुख-युक्त; कान्तः = कान्तिमान्; धनाढ्यः = धन से समृद्ध; लौल्यवर्जितः = लोलुपता/चञ्चलता से रहित; परिधौ धर्मगे = परिधि के नवम (धर्म) भाव में गए होने पर; मानी = मान-सम्पन्न / स्वाभिमानी; स्वल्पसन्तुष्टमानसः = अल्प में सन्तुष्ट मन वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धर्मभाव (नवम) में परिधि होने पर जातक पुत्रान्वित, सुखी, कान्त, धनाढ्य और लौल्य से वर्जित कहा जाता है। पाठ उसे मानी भी बताता है, और मन को स्वल्प में सन्तुष्ट—अर्थात् थोड़े में तृप्त—कहता है। नवम-भाव धर्म-स्थान है; फल में धर्म-सम्पत्ति, सन्तोष और मान—तीनों शास्त्र के शब्द से जुड़े हैं।

English rendering The text states that when Paridhi goes to the ninth house (dharma-bhāva), the native is endowed with sons, happy, attractive, wealthy, free from fickle greed, honourable, and content in mind with little.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का नवम-भाव फल)। “धर्मगे” केवल भाव-स्थिति का संकेत; कोई दशा-वर्ष या अंश-गणना नहीं।

25.35
कलाभिज्ञस्तथा भोगी दृढकायो ह्यमत्सरः ।
परिधौ दशमे प्राप्ते सर्वशास्त्रार्थपारगः
kalābhijñastathā bhogī dṛḍhakāyo hyamatsaraḥ|
paridhau daśame prāpte sarvaśāstrārthapāragaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलाभिज्ञः = कलाओं का ज्ञाता; तथा = तथा / और; भोगी = भोग-सुख का भागी; दृढकायः = दृढ़ शरीर वाला; अमत्सरः = ईर्ष्या-रहित (हि = अव्यय); परिधौ दशमे प्राप्ते = परिधि के दशम भाव में प्राप्त होने पर; सर्वशास्त्रार्थपारगः = सब शास्त्रों के अर्थ का पारगामी / पूर्ण ज्ञाता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशम भाव में परिधि प्राप्त होने पर जातक कलाभिज्ञ, भोगी, दृढ़काय और अमत्सर होता है। पाठ का चरम पद है—सर्वशास्त्रार्थपारगः—अर्थात् सब शास्त्रों के अर्थ में पारंगत। दशम कर्म-स्थान है; यहाँ फल कला, भोग, काय-दृढ़ता, ईर्ष्या-शून्यता और शास्त्र-पारगामिता से बँधा है—सब शास्त्र-कथन के रूप में।

English rendering The text states that when Paridhi is obtained in the tenth house, the native is versed in the arts, given to enjoyment, firm of body, free from envy, and one who has crossed to the far shore of the meaning of all the śāstras.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिधि का दशम-भाव फल)। “प्राप्ते” यहाँ भाव-प्राप्ति का वाच्य है; कोई दशमांश (D10) विभाजन-सूत्र इस श्लोक में नहीं।

25.36
स्त्रीभोगी गुणवांश्चैव मतिमान् स्वजनप्रियः ।
लाभगे परिधौ जातो मन्दाग्निरूपपद्यते
strībhogī guṇavāṃścaiva matimān‌ svajanapriyaḥ|
lābhage paridhau jāto mandāgnirūpapadyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीभोगी = स्त्री-सुख/संभोग में रत; गुणवान् = सद्गुण-युक्त; मतिमान् = बुद्धिमान्; स्वजनप्रियः = स्वजनों को प्रिय; लाभगे = लाभभाव (११वें भाव) में स्थित; परिधौ = परिधि (पाठ-भेद संभव — पूर्व-राशि/संज्ञा-श्रृंखला का पद); जातः = उत्पन्न/स्थित-जातक; मन्दाग्निः = मन्द जठराग्नि; रूपम् आपद्यते = उस रूप को प्राप्त होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब परिधि लाभभाव में हो, तब जातक स्त्री-भोग में प्रवृत्त, गुणवान्, मतिमान् और अपने लोगों का प्रिय बनता है। उसी कथन के साथ यह भी जोड़ा गया है कि वह मन्दाग्नि-स्वभाव वाला होता है — अर्थात जठराग्नि की मंदता का फल-संकेत। यह पूरे श्लोक का फल-कथन है, न कि कोई स्वतंत्र गणना-विधि।

English rendering The text states that one born with paridhi in the eleventh (lābha) house is given to enjoyment with women, endowed with virtues, intelligent, and dear to his own people; he is also said to become of weak digestive fire (mandāgni).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह ग्यारहवें भाव-स्थित परिधि का शास्त्रोक्त फल-वर्णन है; भाव-संख्या (लाभ = ११) केवल स्थान-निर्देश है, कोई वर्ग/बल/दशा-सूत्र नहीं।

25.37
व्ययस्ते परिधौ जातो व्ययकृत् मानवः सदा ।
दुःखभाग् दुष्टबुद्धिश्च गुरुनिन्दापरायणः
vyayaste paridhau jāto vyayakṛt‌ mānavaḥ sadā|
duḥkhabhāg‌ duṣṭabuddhiśca gurunindāparāyaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययस्ते = व्ययभाव (१२वें भाव) में; परिधौ = परिधि (पाठ-भेद संभव); जातः = जातक; व्ययकृत् = व्यय करने वाला; मानवः सदा = सदा मनुष्य-रूप में; दुःखभाक् = दुःख का भागी; दुष्टबुद्धिः = विकृत/दोषयुक्त बुद्धि; गुरुनिन्दापरायणः = गुरु-निन्दा में तत्पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि परिधि जब व्ययभाव में हो, तो जातक सदा व्ययशील रहता है। उसी फल-श्रृंखला में उसे दुःख-भागी, दुष्ट-बुद्धि वाला और गुरु-निन्दा में लगा हुआ कहा गया है। यह द्वादश-भाव-फल का निषेधात्मक वर्णन है — पाठ का अपना स्वर, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that one born with paridhi in the twelfth (vyaya) house is ever a spender, a sharer of sorrow, of corrupt intellect, and given to censuring the guru.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। व्यय = द्वादश भाव का स्थान-निर्देश मात्र; यहाँ कोई अंक-सूत्र, बिन्दु-गणना या दशा-अनुपात नहीं।

25.38
धनधान्यहिरण्याढ्यः कृतज्ञः सम्मतः सताम् ।
सर्वदोषपरित्यक्तश्चापे तनुगते नरः
dhanadhānyahiraṇyāḍhyaḥ kṛtajñaḥ sammataḥ satām‌|
sarvadoṣaparityaktaścāpe tanugate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-हिरण्य-आढ्यः = धन, अन्न और सुवर्ण से समृद्ध; कृतज्ञः = कृतज्ञ; सम्मतः सताम् = सज्जनों में मान्य; सर्वदोषपरित्यक्तः = समस्त दोषों से मुक्त; चापे = धनु राशि (चाप = धनुष) में / धनु के; तनुगते = तनुभाव (लग्न/प्रथम भाव) में स्थित; नरः = पुरुष/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चाप (धनु राशि) तनुभाव में हो, तब नर धन-धान्य-सुवर्ण से आढ्य, कृतज्ञ और सत्पुरुषों का सम्मत होता है। उसे सर्वदोष-परित्यक्त भी कहा गया है — अर्थात दोषों से रहित-सा फल-वर्णन। यह धनु-राशि के लग्न-संबन्ध का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Cāpa (Dhanus, Sagittarius) occupies the first house (tanu/lagna), the man is rich in wealth, grain, and gold, grateful, esteemed by the good, and free from all faults.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चाप = धनु = नवम राशि; तनु = प्रथम भाव — केवल राशि-भाव संयोग का फल-वर्णन, कोई विभाजन-सूत्र नहीं।

25.39
प्रियंवदः प्र्गल्भाढ्यो विनीतो विद्ययाऽन्वितः ।
धनस्थे चापखेटे च रूपवान् धर्मतत्परः
priyaṃvadaḥ prgalbhāḍhyo vinīto vidyayā'nvitaḥ|
dhanasthe cāpakheṭe ca rūpavān‌ dharmatatparaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रियंवदः = प्रिय बोलने वाला; प्रगल्भाढ्यः = प्रगल्भता (वाक्-पटुता/साहस) से युक्त (पाठ: प्र्गल्भाढ्यः — प्रगल्भ + आढ्य); विनीतः = विनयी; विद्यया अन्वितः = विद्या से युक्त; धनस्थे = धनभाव (द्वितीय) में; चापखेटे = चाप-खेट (धनु-संबद्ध खेट/धनु-स्थिति; पाठ-भेद संभव); रूपवान् = सुन्दर; धर्मतत्परः = धर्म में तत्पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धनभाव में चापखेट स्थित हो तो जातक प्रियंवद, प्रगल्भ, विनीत और विद्यान्वित होता है। उसी फल में उसे रूपवान् और धर्मतत्पर भी कहा गया है। यह द्वितीय भाव में धनु-संबन्ध का शास्त्रोक्त वर्णन है।

English rendering The text states that when the Cāpa-kheṭa is in the second (dhana) house, the native is pleasant of speech, richly eloquent (or bold), humble, endowed with learning, handsome, and devoted to dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। धन = द्वितीय भाव; चाप = धनु — स्थान-फल, कोई वर्ग-मापांक या बल-इकाई नहीं।

25.40
कृपणोऽतिकलाभिज्ञश्चौर्यकर्मरतः सदा ।
सहजे धनुषि प्राप्ते हीनाङ्गो गतसौहृदः
kṛpaṇo'tikalābhijñaścauryakarmarataḥ sadā|
sahaje dhanuṣi prāpte hīnāṅgo gatasauhṛdaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृपणः = कंजूस; अतिकलाभिज्ञः = अनेक/अत्यन्त कलाओं का ज्ञाता; चौर्यकर्मरतः सदा = सदा चोरी-कर्म में रत; सहजे = सहजभाव (तृतीय) में; धनुषि प्राप्ते = धनु राशि के प्राप्त होने पर; हीनाङ्गः = हीन अंग वाला / अंग-दोषयुक्त; गतसौहृदः = जिसका सौहार्द चला गया / मित्रता-रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सहजभाव में धनु प्राप्त हो तो जातक कृपण और अतिकला-भिज्ञ कहा गया है, किन्तु सदा चौर्य-कर्म में रत भी। उसी श्लोक में हीनाङ्ग और गतसौहृद — अंग-हीनता तथा सौहार्द के अभाव — का फल जोड़ा गया है। मिश्रित गुण-दोष का यह पाठ शास्त्र का अपना फल-स्वर है।

English rendering The text states that when Dhanus occupies the third (sahaja) house, the native is miserly yet highly skilled in many arts, ever given to thievish acts, deficient in limb, and bereft of friendliness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सहज = तृतीय भाव; धनु = नवम राशि — केवल भाव-राशि संयोग का फल, कोई संख्यात्मक नियम नहीं।

25.41
सुखी गोधनधान्याद्यै राजसन्मानपूजितः ।
कार्मुके सुखसंस्थे तु नीरोगो तनु जायते
sukhī godhanadhānyādyai rājasanmānapūjitaḥ|
kārmuke sukhasaṃsthe tu nīrogo tanu jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखी = सुख-युक्त; गो-धन-धान्य-आद्यैः = गौ, धन, धान्य आदि से; राजसन्मानपूजितः = राज-सन्मान से पूजित; कार्मुके = कार्मुक (धनुष = धनु राशि) में / के; सुखसंस्थे = सुखभाव (चतुर्थ) में स्थित; तु = तो; नीरोगः = रोग-रहित; तनु = शरीर; जायते = उत्पन्न होता है / होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कार्मुक (धनु) जब सुखभाव में हो, तो जातक गौ-धन-धान्य आदि से सुखी और राज-सन्मान से पूजित होता है। शरीर नीरोग कहा गया है — अर्थात् आरोग्य का फल-संकेत। यह चतुर्थ भाव में धनु-स्थिति का शास्त्रोक्त वर्णन है।

English rendering The text states that when Kārmuka (the bow = Dhanus) is placed in the fourth (sukha) house, the native is happy with cattle, wealth, grain and the like, honoured with royal respect, and is born with a disease-free body.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सुख = चतुर्थ भाव; कार्मुक = धनु — फल-वर्णन मात्र, कोई गणना-सूत्र नहीं।

25.42
रुचिमान् दीर्घदर्शो च देवभक्तः प्रियंवदः ।
चापे पञ्चमगे जातो विवृद्धः सर्वकर्मसु
rucimān‌ dīrghadarśo ca devabhaktaḥ priyaṃvadaḥ|
cāpe pañcamage jāto vivṛddhaḥ sarvakarmasu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रुचिमान् = रुचि/अभिरुचि वाला (शोभा-युक्त भी); दीर्घदर्शी = दूरदर्शी / दीर्घ दृष्टि वाला; देवभक्तः = देव-भक्त; प्रियंवदः = प्रियभाषी; चापे = धनु राशि में / के; पञ्चमगे = पञ्चम भाव में गए/स्थित; जातः = जातक; विवृद्धः = वृद्धि-प्राप्त / समृद्ध; सर्वकर्मसु = समस्त कर्मों में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चाप पञ्चम भाव में हो तो जातक रुचिमान्, दीर्घदर्शी, देवभक्त और प्रियंवद होता है। उसे सर्वकर्मों में विवृद्ध — अर्थात सब कार्यों में बढ़ने वाला — कहा गया है। यह पञ्चम-भाव-स्थित धनु का फल-कथन है।

English rendering The text states that one born with Cāpa (Dhanus) in the fifth house is refined in taste, far-seeing, devoted to the gods, pleasant of speech, and prospers in all undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पञ्चम = पञ्चम भाव; चाप = धनु — शास्त्र का भाव-फल, कोई वर्ग/अष्टकवर्ग/दशा-गणित नहीं।

25.43
शत्रुहन्ताऽतिधर्तश्च सुखी प्रीतिरुचिः शुचिः ।
षष्ठस्थानगते चापे सर्वकर्मसमृद्धिभाक्
śatruhantā'tidhartaśca sukhī prītiruciḥ śuciḥ|
ṣaṣṭhasthānagate cāpe sarvakarmasamṛddhibhāk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाप = धनु राशि (चाप = धनुष); षष्ठस्थानगत = षष्ठ भाव में स्थित; शत्रुहन्ता = शत्रु-नाशक; अतिधर्तः = अत्यन्त धार्मिक / धर्मनिष्ठ (पाठ-भेद संभव: अतिधृत = अत्यन्त धैर्यवान्); प्रीतिरुचिः = प्रीति-रुचि वाला, स्नेहशील; शुचिः = शुद्ध / पवित्र; सर्वकर्मसमृद्धिभाक् = सर्व कर्मों में समृद्धि का भागी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चाप (धनु) षष्ठ स्थान में हो, तो जातक शत्रु-हन्ता, अत्यन्त धर्म-निष्ठ, सुखी, प्रीति-रुचि वाला और शुचि होता है। वह सर्व कर्मों में समृद्धि का भागी बनता है। यह षष्ठ भाव में चाप-राशि के फल-कथन का स्वरूप है।

English rendering The text states that when Capricorn’s bow-sign—Dhanus (Sagittarius)—occupies the sixth house, the native is described as a destroyer of enemies, highly righteous, happy, fond of affection, and pure, and as one who shares in the prosperity of all undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (षष्ठ भाव में चाप-राशि)। यह भाव-फल का वर्णनात्मक नियम है; कोई अंश-विभाग, बल-इकाई या दशा-अनुपात इसमें निहित नहीं।

25.44
ईश्वरो गुणसम्पूर्णः शास्त्रबिद्धार्भिकः प्रियः ।
चापे सप्तमभावस्थे भवतीति न संशयः
īśvaro guṇasampūrṇaḥ śāstrabiddhārbhikaḥ priyaḥ|
cāpe saptamabhāvasthe bhavatīti na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाप = धनु राशि; सप्तमभावस्थ = सप्तम भाव में स्थित; ईश्वरः = स्वामी / सामर्थ्यवान् अधिपति; गुणसम्पूर्णः = गुणों से परिपूर्ण; शास्त्रबित् = शास्त्र-ज्ञ; धार्मिकः = धर्मशील (पाठ: “शास्त्रबिद्धार्भिकः” = शास्त्रबित् + धार्मिकः; पाठ-भेद संभव); प्रियः = प्रिय / लोकप्रिय; न संशयः = इसमें संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चाप जब सप्तम भाव में स्थित हो, तो जातक ईश्वर-सदृश, गुण-सम्पूर्ण, शास्त्रज्ञ, धार्मिक और प्रिय होता है। ग्रन्थ स्वयं “भवतीति न संशयः” कहकर इस फल को निःसंदिग्ध रूप में निबद्ध करता है—यह कथन शास्त्र का है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Dhanus occupies the seventh house, the native becomes a capable master, complete in virtues, learned in the śāstras, righteous, and beloved—and it affirms this “without doubt.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम भाव में चाप-राशि)। “न संशयः” यहाँ ग्रन्थ की निश्चय-भाषा है; गणना-सूत्र या संख्या-नियम नहीं।

25.45
परकर्मरतः क्रूरः परदारपरायणः ।
अष्टमस्थानगते चापे जायते विकलांगकः
parakarmarataḥ krūraḥ paradāraparāyaṇaḥ|
aṣṭamasthānagate cāpe jāyate vikalāṃgakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाप = धनु राशि; अष्टमस्थानगत = अष्टम भाव में स्थित; परकर्मरतः = पर-कर्म में रत; क्रूरः = क्रूर / कठोर; परदारपरायणः = पर-स्त्री (परदार) के प्रति आसक्त; विकलांगकः = विकल-अंग वाला, अंग-वैकल्य युक्त; जायते = उत्पन्न होता है / होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टम स्थान में चाप होने पर जातक पर-कर्म-रत, क्रूर और परदार-परायण कहा गया है। ग्रन्थ उसे विकलांगक भी बताता है। यह अष्टम-भाव-फल का कठोर पक्ष है—इसे शास्त्रीय संकेत के रूप में पढ़ें, भय या निश्चय-नाटक के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when Dhanus is in the eighth house, the native is described as occupied with others’ work, harsh, given to another’s wife, and born with a defective limb—phala-language of the śāstra, not a medical or fate-claim to be endorsed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टम भाव में चाप-राशि)। कोई आयुर्दाय-सूत्र, अंश-गणित या बल-माप यहाँ नहीं; केवल भाव-फल का वर्णन।

25.46
तपस्वी व्रतचर्यासु निरतो विद्ययाऽधिकः ।
धर्मस्थे जायते चापे मानवो लोकविश्रुतः
tapasvī vratacaryāsu nirato vidyayā'dhikaḥ|
dharmasthe jāyate cāpe mānavo lokaviśrutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाप = धनु राशि; धर्मस्थ = धर्म भाव (नवम) में स्थित; तपस्वी = तपस्वी; व्रतचर्यासु निरतः = व्रत-चर्याओं में संलग्न; विद्ययाऽधिकः = विद्या से अधिक / विद्या-सम्पन्न; मानवः = मनुष्य / जातक; लोकविश्रुतः = लोक में विश्रुत, यशस्वी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धर्म (नवम) भाव में चाप स्थित होने पर जातक तपस्वी होता है, व्रत-चर्या में निरत रहता है, और विद्या में अधिक होता है। ऐसा मानव लोक-विश्रुत होता है। नवम भाव धर्म-ज्ञान-तीर्थ का क्षेत्र है—यह फल उसी भाव-धर्म से जुड़ा वर्णनात्मक संकेत है।

English rendering The text states that when Dhanus stands in the dharma-house (the ninth), the person is an ascetic, devoted to vowed observances, abundant in learning, and renowned in the world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवम / धर्म भाव में चाप-राशि)। भाव-संख्या यहाँ नाम से है (धर्म = 9); कोई विभाजन-सूत्र नहीं।

25.47
बहुपुत्रधनैश्वर्यो गोमहिष्यादिमान् भवेत् ।
कर्मभे चापसंयुक्ते जायते लोकविश्रुतः
bahuputradhanaiśvaryo gomahiṣyādimān‌ bhavet‌|
karmabhe cāpasaṃyukte jāyate lokaviśrutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाप = धनु राशि; कर्मभ = कर्म भाव (दशम; भ = राशि/गृह); चापसंयुक्त = चाप से संयुक्त / चाप-युक्त; बहुपुत्रधनैश्वर्यः = बहुत पुत्र, धन और ऐश्वर्य वाला; गोमहिष्यादिमान् = गौ, महिषी आदि से युक्त; लोकविश्रुतः = लोक-प्रसिद्ध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्म-भाव (दशम) में चाप संयुक्त होने पर जातक बहु-पुत्र, धन और ऐश्वर्य वाला होता है, तथा गौ-महिषी आदि से सम्पन्न होता है। वह लोक-विश्रुत भी कहा गया है। यह दशम-भाव में चाप के समृद्धि-फल का शास्त्रीय कथन है।

English rendering The text states that when Dhanus is joined with the karma-house (the tenth), the native becomes possessed of many sons, wealth, and lordship, owns cattle and buffaloes and the like, and is renowned among people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम / कर्म भाव में चाप-राशि)। “कर्मभ” = कर्म-गृह (10); गणना नहीं, भाव-फल का निर्देश।

25.48
लाभगे चपखेटे च लाभयुक्तो भवेन्नरः ।
निरोगो दृढकोपाग्निर्मन्त्रस्त्रीपरमास्त्रवित्
lābhage capakheṭe ca lābhayukto bhavennaraḥ|
nirogo dṛḍhakopāgnirmantrastrīparamāstravit‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चापखेट = चाप-खेट (धनु-राशि का ग्रह-संदर्भ / चाप में खेट; पाठ-भेद संभव); लाभग = लाभ भाव (एकादश) में स्थित; लाभयुक्तः = लाभ से युक्त; निरोगः = रोग-रहित; दृढकोपाग्निः = दृढ़ / तीव्र क्रोधाग्नि वाला; मन्त्रस्त्रीपरमास्त्रवित् = मन्त्र, स्त्री और परम अस्त्रों का ज्ञाता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लाभ भाव में चाप-खेट होने पर नर लाभ-युक्त होता है। वह निरोग, दृढ़ क्रोधाग्नि वाला, तथा मन्त्र-स्त्री-परमास्त्र-वित् कहा गया है। एकादश लाभ का भाव है—यह फल लाभ-युक्तता के साथ कुछ तीक्ष्ण गुणों का मिश्रित वर्णन करता है।

English rendering The text states that when the Cap-planet (Dhanus-related khēṭa) occupies the house of gains (the eleventh), the man becomes endowed with gains, free from disease, possessed of a firm fire of anger, and skilled in mantras, women, and supreme weapons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभ / एकादश भाव में चाप-खेट)। “खेट” यहाँ ग्रह-पद है; कोई बिन्दु-तालिका या दशा-वर्ष नहीं।

25.49
खलोऽतिमानी दुर्बुद्धिर्निर्लज्जो व्ययसंस्थिते ।
चापे परस्त्रीसंयुक्तो जायते निर्धनः सदा
khalo'timānī durbuddhirnirlajjo vyayasaṃsthite|
cāpe parastrīsaṃyukto jāyate nirdhanaḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाप = धनु राशि; व्ययसंस्थित = व्यय भाव (द्वादश) में स्थित; खलः = दुष्ट / नीच-स्वभाव; अतिमानी = अत्यन्त अभिमानी; दुर्बुद्धिः = कुबुद्धि; निर्लज्जः = लज्जारहित; परस्त्रीसंयुक्तः = पर-स्त्री से संयुक्त; निर्धनः सदा = सदा निर्धन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्यय (द्वादश) में चाप स्थित होने पर जातक खल, अतिमानी, दुर्बुद्धि और निर्लज्ज होता है। वह परस्त्री-संयुक्त और सदा निर्धन कहा गया है। यह द्वादश-भाव-फल का कठोर पक्ष है—शास्त्र का फल-कथन, न कि भय-वाणिज्य या नियति का प्रमाण-पत्र।

English rendering The text states that when Dhanus is placed in the house of expenditure (the twelfth), the native is wicked, excessively proud, of poor judgment, and shameless; associated with another’s woman; and always without wealth—again as the śāstra’s phala, not as a fate we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यय / द्वादश भाव में चाप-राशि)। षष्ठ से द्वादश तक चाप-राशि के भाव-फल-क्रम का अन्तिम पद; कोई संख्या-सूत्र यहाँ नहीं।

25.50
कुशलः सर्वविद्यासु सुखी वाङ्निपुनः प्रियः ।
तनौ शिखिनि सञ्जातः सर्वकामान्वितो भवेत्
kuśalaḥ sarvavidyāsu sukhī vāṅ‌nipunaḥ priyaḥ|
tanau śikhini sañjātaḥ sarvakāmānvito bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुशलः = निपुण / दक्ष; सर्वविद्यासु = सभी विद्याओं में; सुखी = सुख-युक्त; वाङ्‌निपुनः = वाणी में कुशल; प्रियः = प्रिय / मनभावन; तनौ = तनु-स्थान (लग्न / प्रथम भाव) में; शिखिनि = केतु (शिखी) स्थित होने पर; सञ्जातः = उत्पन्न / जात; सर्वकामान्वितः = सभी कामनाओं से युक्त; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक तनु-भाव (लग्न) में केतु की स्थिति का फल कहता है। शास्त्र कहता है कि ऐसे जातक सर्व-विद्याओं में कुशल, सुखी, वाणी में निपुण और प्रिय स्वभाव वाले होते हैं। साथ ही उन्हें सर्व-कामनाओं से युक्त कहा गया है। यह फल-कथन केतु के लग्न-स्थित होने की शास्त्रीय सूची है, नियति का दावा नहीं।

English rendering When Ketu (Śikhin) is placed in the first house (tanu), the text states the native is skilled in all learning, happy, adept in speech, and dear to others—endowed with the fulfilment of many desires.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ केवल भाव-स्थान (तनु = 1) और ग्रह (केतु = शिखी) का फलादेश है; कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-गणना या दशा-अनुपात नहीं।

25.51
वक्ता प्रियंवदः कान्तो धनस्थानगते ध्वजे ।
काव्यकृत् पण्डितो मानी विनीतो वाहनान्वितः
vaktā priyaṃvadaḥ kānto dhanasthānagate dhvaje|
kāvyakṛt‌ paṇḍito mānī vinīto vāhanānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वक्ता = वक्ता / भाषण-कुशल; प्रियंवदः = प्रिय बोलने वाला; कान्तः = सुन्दर / आकर्षक; धनस्थानगते = धन-भाव (द्वितीय) में स्थित; ध्वजे = केतु (ध्वज) में; काव्यकृत् = काव्य-रचयिता; पण्डितः = विद्वान्; मानी = स्वाभिमानी; विनीतः = विनय-युक्त; वाहनान्वितः = वाहन-सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ धन-स्थान (द्वितीय भाव) में केतु (ध्वज) की स्थिति का फल यहाँ गिनाया गया है। शास्त्र कहता है कि ऐसा जातक वक्ता, प्रिय-भाषी, कान्त-रूप, काव्य-रचयिता, पण्डित, मानी तथा विनीत होता है और वाहन से युक्त कहा गया है। यह द्वितीय-भाव-स्थित केतु का शास्त्र-उक्त गुण-समूह है।

English rendering With the banner-planet (Ketu, Dhvaja) in the house of wealth (second), the text describes a speaker of pleasing words, attractive in presence, a maker of poetry, a learned and dignified yet modest person, furnished with conveyances.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। धनस्थान = भाव 2; ध्वज = केतु — स्थान-फल की सूची मात्र; कोई अंश-सूत्र या बल-इकाई नहीं।

25.52
कदर्यः क्रूरकर्ता च कृशाङ्गो धनवर्जितः ।
सहजस्थे तु शिखिनि तीव्ररोगी प्रजायते
kadaryaḥ krūrakartā ca kṛśāṅgo dhanavarjitaḥ|
sahajasthe tu śikhini tīvrarogī prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कदर्यः = कृपण / कंजूस; क्रूरकर्ता = क्रूर कर्म करने वाला; कृशाङ्गः = कृश-अंग / दुबला शरीर; धनवर्जितः = धन-रहित; सहजस्थे = सहज-भाव (तृतीय) में स्थित; शिखिनि = केतु में; तीव्ररोगी = तीव्र रोग वाला; प्रजायते = उत्पन्न होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ सहज-स्थान (तृतीय भाव) में केतु (शिखी) होने पर शास्त्र कठोर फल-सूची देता है। कहा गया है कि जातक कदर्य, क्रूर-कर्म-प्रवृत्त, कृश-अंग और धन-वर्जित होता है तथा तीव्र रोग से युक्त उत्पन्न होता है। यह शास्त्र का फल-कथन है — भय या निश्चित दुर्भाग्य का अभियान नहीं; केवल पाठ का यथावत् प्रतिपादन।

English rendering When Ketu is in the third house (sahaja), the text states the native is miserly, harsh in deed, thin-limbed, without wealth, and subject to sharp illness—reported as the śāstra’s indication, not as a sealed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सहज = भाव 3; शिखी = केतु — केवल भाव-फल; कोई गणना-सूत्र निहित नहीं।

25.53
रूपवान् गुणसम्पन्नः सात्त्विकोऽपि स्रुतिप्रियः ।
सुखसंस्थे तु शिखिनि सदा भवति सौख्यभाक्
rūpavān‌ guṇasampannaḥ sāttviko'pi srutipriyaḥ|
sukhasaṃsthe tu śikhini sadā bhavati saukhyabhāk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रूपवान् = सुन्दर रूप वाला; गुणसम्पन्नः = गुणों से युक्त; सात्त्विकः = सत्त्व-प्रधान; अपि = तथा; स्रुतिप्रियः = श्रुति (वेद / शास्त्र-श्रवण) का प्रिय; सुखसंस्थे = सुख-भाव (चतुर्थ) में स्थित; शिखिनि = केतु में; सदा = सर्वदा; भवति = होता है; सौख्यभाक् = सुख का भागी।

हिन्दी भावार्थ सुख-स्थान (चतुर्थ भाव) में केतु की स्थिति का फल मधुर सूची में कहा गया है। शास्त्र कहता है कि जातक रूपवान्, गुण-सम्पन्न, सात्त्विक और श्रुति-प्रिय होता है। सुख-संस्थ केतु में वह सदा सौख्य का भागी कहा गया है — यह पाठ का फल-वर्णन है।

English rendering With Ketu seated in the house of comfort (fourth), the text states a person of fine form, rich in virtues, sāttvic, fond of sacred learning (śruti), and always a sharer in happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सुखसंस्थ = भाव 4 में केतु — स्थान-फल; कोई वर्ग-अंक या दशा-वर्ष नहीं।

25.54
सुखी भोगी कलाविच्च पञ्चमस्थानगे ध्वजे ।
युक्तिज्ञो मतिमान् वाग्मी गुरुभक्तिसमन्वितः
sukhī bhogī kalāvicca pañcamasthānage dhvaje|
yuktijño matimān‌ vāgmī gurubhaktisamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखी = सुखी; भोगी = भोग-संपन्न; कलाविद् = कलाओं में विज्ञ; च = और; पञ्चमस्थानगे = पञ्चम-भाव में स्थित; ध्वजे = केतु (ध्वज) में; युक्तिज्ञः = युक्ति / तर्क जानने वाला; मतिमान् = बुद्धिमान्; वाग्मी = वाग्मी / वाक्य-पटु; गुरुभक्तिसमन्वितः = गुरु-भक्ति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ पञ्चम स्थान में केतु (ध्वज) होने पर शास्त्र सुखी, भोगी और कला-विद् जातक का वर्णन करता है। साथ ही युक्तिज्ञ, मतिमान्, वाग्मी और गुरु-भक्ति-समन्वित कहा गया है। यह पञ्चम-स्थित केतु का शास्त्र-उक्त गुण-फल है।

English rendering When the banner-planet (Ketu) occupies the fifth house, the text describes one who is happy, pleasure-loving, skilled in the arts, knowing of means and reason, intelligent, eloquent, and endowed with devotion to the teacher.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पञ्चमस्थान = भाव 5; ध्वज = केतु — केवल फल-सूची; कोई अंश-विभाजन या बिन्दु-तालिका नहीं।

25.55
मातृपक्षक्षयकरः शत्रुहा बहुवान्धवः ।
रिपुस्थाने ध्वजे प्राप्ते शूरः कान्तो विचक्षणः
mātṛpakṣakṣayakaraḥ śatruhā bahuvāndhavaḥ|
ripusthāne dhvaje prāpte śūraḥ kānto vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातृपक्षक्षयकरः = मातृ-पक्ष का क्षय करने वाला (शास्त्र-शब्द); शत्रुहा = शत्रु-हन्ता; बहुवान्धवः = अनेक बन्धु-युक्त; रिपुस्थाने = रिपु-भाव (षष्ठ) में; ध्वजे = केतु में; प्राप्ते = प्राप्त / स्थित होने पर; शूरः = शूरवीर; कान्तः = कान्त / सुन्दर; विचक्षणः = चतुर / विवेकी।

हिन्दी भावार्थ रिपु-स्थान (षष्ठ भाव) में केतु (ध्वज) की प्राप्ति पर शास्त्र मिश्रित फल कहता है। कहा गया है कि जातक मातृ-पक्ष का क्षय-कर, शत्रु-हन्ता और बहु-वान्धव होता है; साथ ही शूर, कान्त और विचक्षण। “क्षयकर” यहाँ पाठ का तकनीकी फल-पद है — चिकित्सकीय या वंशीय भविष्यवाणी नहीं; केवल शास्त्र का कथन।

English rendering With Ketu in the house of enemies (sixth), the text states one who depletes the maternal side, destroys foes, has many kinsmen, and is brave, attractive, and discerning—reported as the śāstra’s wording, not a medical or familial decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। रिपुस्थान = भाव 6; ध्वज = केतु — भाव-फल; कोई बल-रूप या दशा-अनुपात नहीं।

25.56
द्यूतक्रीडाष्वभिरतः कामी भोगसमन्वितः ।
ध्वजे तु सप्तमस्थागे वेश्यासु कृतसौहृदः
dyūtakrīḍāṣvabhirataḥ kāmī bhogasamanvitaḥ|
dhvaje tu saptamasthāge veśyāsu kṛtasauhṛdaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्यूतक्रीडासु = द्यूत और क्रीड़ाओं में; अभिरतः = आसक्त / रत; कामी = काम-प्रधान; भोगसमन्वितः = भोग से युक्त; ध्वजे = केतु में; तु = और / पर; सप्तमस्थागे = सप्तम-भाव में स्थित; वेश्यासु = वेश्याओं के प्रति; कृतसौहृदः = सौहार्द / मित्रता करने वाला (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ सप्तम स्थान में केतु (ध्वज) होने पर शास्त्र द्यूत-क्रीड़ा-आसक्ति, काम-प्रवृत्ति और भोग-समन्वय का फल कहता है। साथ ही वेश्या-वर्ग के प्रति कृत-सौहृद कहा गया है। यह सप्तम-स्थित केतु का शास्त्र-उक्त चरित्र-फल है — नैतिक निन्दा या दबाव नहीं, पाठ का यथावत् अनुवाद।

English rendering When Ketu occupies the seventh house, the text states fondness for gambling and games, a passionate temperament, companionship with pleasures, and intimacy formed with courtesans—again the śāstra’s own catalogue of indications.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तमस्थाग = भाव 7 में केतु — स्थान-फल मात्र; कोई अंश-गणित या वर्ग-मानचित्र-सूत्र यहाँ नहीं।

25.57
नीचकर्मरतः पापो निर्लज्जो निन्दकः सदा ।
मृत्युस्थाने ध्वजे प्राप्ते गतस्त्र्यपरपक्षकः
nīcakarmarataḥ pāpo nirlajjo nindakaḥ sadā|
mṛtyusthāne dhvaje prāpte gatastryaparapakṣakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युस्थान = अष्टम भाव; ध्वज = उपग्रह (ध्वज); नीचकर्मरत = अधम कर्म में रत; पाप = पाप-प्रवृत्ति वाला; निर्लज्ज = लज्जा-रहित; निन्दक = निन्दा करने वाला; गतस्त्र्यपरपक्षक = पर-स्त्री / पर-पक्ष की ओर झुका

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब ध्वज मृत्यु-स्थान (अष्टम भाव) में प्राप्त होता है, तो जातक नीच कर्मों में रत, पाप-प्रवृत्ति वाला, निर्लज्ज और सदा निन्दा करने वाला कहा गया है। पाठ आगे जोड़ता है कि वह पर-स्त्री / पर-पक्ष की ओर झुका हुआ (गतस्त्र्यपरपक्षक) होता है। यह अष्टम-स्थित ध्वज का फल-कथन है, न कि कोई गणना-सूत्र।

English rendering The text states that when Dhvaja is obtained in the house of death (the eighth), the native is said to be given to base acts, sinful, shameless, and ever a reviler; and further, inclined toward another’s wife / the other side.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपग्रह ध्वज का अष्टम-भाव फल)। गणना की जगह भाव-फल की सूची है; ध्वज की स्थिति पहले जन्मकालिक उपग्रह-रेखा से निश्चित होती है, फिर यह श्लोक केवल फल बोलता है।

25.58
लिङ्गधारी प्रसन्नात्मा सर्वभूतहिते रतः ।
धर्मभे शिखिनि प्राप्ते धर्मकार्येषु कोविदः
liṅgadhārī prasannātmā sarvabhūtahite rataḥ|
dharmabhe śikhini prāpte dharmakāryeṣu kovidaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मभ = नवम (धर्म) भाव; शिखि = उपग्रह शिखि (केतु-सम्बद्ध); लिङ्गधारी = धार्मिक चिह्न / लिङ्ग धारण करने वाला; प्रसन्नात्मा = प्रसन्न चित्त; सर्वभूतहित = सब प्राणियों का हित; धर्मकार्य = धर्म-कार्य; कोविद = निपुण

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शिखि धर्म-भाव (नवम) में प्राप्त होता है, तो जातक लिङ्गधारी, प्रसन्न-चित्त और सब प्राणियों के हित में रत कहा गया है। वह धर्म-कार्यों में कोविद (निपुण) भी कहा गया है। यह नवम-स्थित शिखि का फल-वर्णन है।

English rendering The text states that when Śikhin is obtained in the house of dharma (the ninth), the native is said to wear the marks of a spiritual path, to be of cheerful mind, devoted to the good of all beings, and skilled in works of dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शिखि का नवम-भाव फल)। शिखि की देशान्तरीय/कालिक रेखा पहले नियत होती है; यह श्लोक केवल धर्मस्थ फल बोलता है।

25.59
सुखसौभाग्यसम्पन्नः कामिनीनां च वल्लभः ।
दाता द्विजैः समायुक्तः कर्मस्थे शिखिनि द्विज
sukhasaubhāgyasampannaḥ kāminīnāṃ ca vallabhaḥ|
dātā dvijaiḥ samāyuktaḥ karmasthe śikhini dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मस्थ = दशम (कर्म) भाव; शिखि = उपग्रह शिखि; सुखसौभाग्यसम्पन्न = सुख और सौभाग्य से युक्त; कामिनीनां वल्लभ = स्त्रियों का प्रिय; दाता = दानशील; द्विजैः समायुक्त = ब्राह्मण / द्विजों से सम्बद्ध; द्विज = सम्बोधन (शिष्य को)

हिन्दी भावार्थ हे द्विज — शास्त्र कहता है कि जब शिखि कर्म-स्थान (दशम) में स्थित हो, तो जातक सुख-सौभाग्य से सम्पन्न और कामिनियों का वल्लभ कहा गया है। वह दाता और द्विज-जनों से युक्त भी कहा गया है। यह दशम-स्थित शिखि का फल-कथन है।

English rendering O twice-born, the text states that when Śikhin stands in the house of action (the tenth), the native is said to be endowed with happiness and good fortune, beloved of women, a giver, and associated with the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शिखि का दशम-भाव फल)। भाव-फल की सूची है; कोई अंश-विभाजन या बल-इकाई यहाँ नहीं दी गई।

25.60
नित्यलाभः सुधर्मी च लाभे शिखिनि पूजितः ।
धनाढ्यः सुभगः शूरः सुयज्ञश्चाति कोविदः
nityalābhaḥ sudharmī ca lābhe śikhini pūjitaḥ|
dhanāḍhyaḥ subhagaḥ śūraḥ suyajñaścāti kovidaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभ = एकादश भाव; शिखि = उपग्रह शिखि; नित्यलाभ = निरन्तर लाभ; सुधर्मी = सुधर्म वाला; पूजित = सम्मानित; धनाढ्य = धनवान; सुभग = सुन्दर / सौभाग्यशाली; शूर = वीर; सुयज्ञ = शुभ यज्ञ; अति कोविद = अत्यन्त निपुण

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शिखि लाभ-भाव (एकादश) में हो, तो जातक नित्य लाभ वाला, सुधर्मी और पूजित कहा गया है। वह धनाढ्य, सुभग, शूर, सुयज्ञ वाला और अत्यन्त कोविद भी कहा गया है। यह एकादश-स्थित शिखि का फल-वर्णन है।

English rendering The text states that when Śikhin is in the house of gain (the eleventh), the native is said to have constant gain, to be well-ordered in dharma, and honored — wealthy, fortunate, brave, given to good sacrifice, and highly skilled.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शिखि का एकादश-भाव फल)। “नित्यलाभ” यहाँ शाब्दिक फल-पद है, न कि लाभ-भाव की कोई संख्यात्मक इकाई।

25.61
पापकर्मरतः शूरः श्रद्धाहीनोऽघृणो नरः ।
परदाररतो रौद्रः शिखिनि व्ययगे सति
pāpakarmarataḥ śūraḥ śraddhāhīno'ghṛṇo naraḥ|
paradārarato raudraḥ śikhini vyayage sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययग = द्वादश (व्यय) भाव में स्थित; शिखि = उपग्रह शिखि; पापकर्मरत = पाप-कर्म में रत; शूर = उग्र / साहसी; श्रद्धाहीन = श्रद्धा-रहित; अघृण = निर्दय; परदाररत = पर-स्त्री में आसक्त; रौद्र = रौद्र स्वभाव

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शिखि व्यय-गत (द्वादश में) हो, तो नर पाप-कर्म में रत, शूर, श्रद्धा-हीन और निर्दय कहा गया है। वह पर-स्त्री में आसक्त और रौद्र भी कहा गया है। यह द्वादश-स्थित शिखि का फल-कथन है — भय या नियति का दावा नहीं, पाठ का अपना वचन।

English rendering The text states that when Śikhin is in the house of expenditure (the twelfth), the person is said to be given to sinful acts, fierce, without faith, merciless, devoted to another’s wife, and of a fierce temperament.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शिखि का द्वादश-भाव फल)। शिखि ९–१२ भावों की यह श्रृंखला भाव-क्रम से फल बाँधती है; गणना नहीं।

25.62
रोगार्त्तः सततं कामी पापात्माधिगतः शठः ।
तनुस्थे गुलिके जातः खलभावोऽतिदुःखितः
rogārttaḥ satataṃ kāmī pāpātmādhigataḥ śaṭhaḥ|
tanusthe gulike jātaḥ khalabhāvo'tiduḥkhitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनुस्थ = लग्न / प्रथम भाव में स्थित; गुलिक = उपग्रह गुलिक (मन्द/शन्युपग्रह); रोगार्त्त = रोग से पीड़ित; सततं कामी = सदा कामी; पापात्मा = पाप-प्रवृत्ति वाला; शठ = धूर्त; खलभाव = नीच स्वभाव; अतिदुःखित = अत्यन्त दुःखी; जात = जन्मतः (स्थिति-युक्त)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुलिक तनु-स्थान (लग्न) में हो, तो जातक रोगार्त्त, सदा कामी, पापात्मा और शठ कहा गया है। वह खल-स्वभाव वाला और अति-दुःखित भी कहा गया है। यह लग्न-स्थित गुलिक का फल-कथन है; कोई चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states that one born with Gulika in the body-house (the lagna) is said to be afflicted by disease, ever lustful, of sinful bent, crafty, of base disposition, and deeply unhappy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक का लग्न-फल)। गुलिक की कालिक रेखा शनि-दिनमान/रात्रिमान के अंश-नियम से निकलती है; यह श्लोक केवल तनुस्थ फल बोलता है।

25.63
विकृतो दुःखितः क्षुद्रो व्यसनी च गतत्रपः ।
धनस्थे गुलिके जातो निःस्वो भवति मानवः
vikṛto duḥkhitaḥ kṣudro vyasanī ca gatatrapaḥ|
dhanasthe gulike jāto niḥsvo bhavati mānavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनस्थ = द्वितीय (धन) भाव में स्थित; गुलिक = उपग्रह गुलिक; विकृत = विकृत / बिगड़ा; दुःखित = दुःखी; क्षुद्र = क्षुद्र स्वभाव; व्यसनी = व्यसन-ग्रस्त; गतत्रप = लज्जा-रहित; निःस्व = निर्धन; मानव = मनुष्य

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुलिक धन-स्थान (द्वितीय) में हो, तो मनुष्य विकृत, दुःखित, क्षुद्र, व्यसनी और गत-त्रप (लज्जाहीन) कहा गया है। वह निःस्व (धन-हीन) भी होता है — ऐसा पाठ कहता है। यह द्वितीय-स्थित गुलिक का फल-वर्णन है।

English rendering The text states that one born with Gulika in the house of wealth (the second) becomes deformed in disposition, unhappy, petty, given to vice, shameless, and penniless.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक का द्वितीय-भाव फल)। “निःस्व” शाब्दिक फल-पद है; यहाँ कोई धन-मात्रा, रूप/विरूप या बलाङ्क नहीं दिया गया।

25.64
चार्वङ्गो ग्रामपः पुण्यसंयुक्तः सज्जनप्रियः ।
सहजे गुलिके जातो मानवो राजपूजितः
cārvaṅgo grāmapaḥ puṇyasaṃyuktaḥ sajjanapriyaḥ|
sahaje gulike jāto mānavo rājapūjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चार्वङ्ग = सुन्दर/मनोहर अंग-युक्त; ग्रामप = ग्राम का अधिपति / स्थानीय मुखिया; पुण्यसंयुक्त = पुण्य/सत्कर्म से युक्त; सज्जनप्रिय = सज्जनों का प्रिय; सहजे गुलिके = सहज-भाव (तृतीय भाव) में गुलिक; राजपूजित = राजा/शासक द्वारा सम्मानित; मानवो जातः = ऐसा मनुष्य जन्म लेता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब गुलिक सहज-भाव में हो, तो जातक चारु-अंग वाला, ग्राम-अधिकार या स्थानीय नेतृत्व-संपन्न, पुण्य से जुड़ा और सज्जनों का प्रिय कहा गया है। उसी स्थिति में वह राजपूजित—शासक-वर्ग का सम्मान पाने वाला—भी वर्णित है। यह तृतीय-भावगत गुलिक का फल-कथन है, न कि निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering The text states that with Gulika in the third house (sahaja), the native is described as fair-limbed, a village chief, endowed with merit, dear to the good, and honored by rulers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक तृतीय भाव)। गुलिक की स्थिति भाव-स्थान से पढ़ी जाती है; इस श्लोक में कोई अंश, काल-मान या बलांक नहीं दिया गया।

25.65
रोगी सुखपरित्यक्तः सदा भवति पापकृत् ।
गुलिके सुखभावस्थे वातपित्ताधिको भवेत्
rogī sukhaparityaktaḥ sadā bhavati pāpakṛt‌|
gulike sukhabhāvasthe vātapittādhiko bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोगी = रोग-ग्रस्त (शास्त्रीय फल-शब्द); सुखपरित्यक्त = सुख से रहित / सुख-त्यागी; सदा पापकृत् = सदैव पाप-कर्म करने वाला (शास्त्र का कथन); गुलिके सुखभावस्थे = सुख-भाव (चतुर्थ भाव) में गुलिक; वातपित्ताधिक = वात-पित्त की अधिकता वाला (शास्त्रीय दोष-भाषा; चिकित्सा-निदान नहीं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुलिक जब सुख-भाव में स्थित हो, तो जातक रोगी, सुख-परित्यक्त और सदैव पाप-कर्म की ओर झुका हुआ वर्णित है। उसी स्थिति में वात-पित्त की अधिकता भी कही गई है—यह शास्त्र की फल-भाषा है, चिकित्सकीय निदान या भय-कथन नहीं। चतुर्थ भाव सुख-स्थान है; वहाँ गुलिक का यह फल-वर्णन पाठ में ऐसा ही आता है।

English rendering The text states that with Gulika in the fourth house (sukha-bhāva), the native is described as diseased, forsaken of comfort, given to sinful conduct, and marked by excess of vāta and pitta—in the śāstra’s own humoral phrasing, not as a medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक चतुर्थ भाव)। दोष-नाम यहाँ फल-वर्णन हैं; कोई अंश-गणना या बल-सूत्र नहीं।

25.66
विस्तुतिर्विधनोऽल्पायुर्द्वेषी क्षुद्रो नपुंसकः ।
गुलिके सुतभावस्थे स्त्रीजितो नास्तिको भवेत्
vistutirvidhano'lpāyurdveṣī kṣudro napuṃsakaḥ|
gulike sutabhāvasthe strījito nāstiko bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विस्तुति = विस्तृत स्तुति/प्रसिद्धि वाला (पाठ-भेद संभव); विधन = धन-रहित; अल्पायु = अल्प आयु वाला (शास्त्र का कथन); द्वेषी = द्वेष करने वाला; क्षुद्र = क्षुद्र/नीच स्वभाव; नपुंसक = नपुंसक/वीर्यहीन (शास्त्रीय फल-शब्द); गुलिके सुतभावस्थे = सुत-भाव (पञ्चम भाव) में गुलिक; स्त्रीजित = स्त्री के वश में; नास्तिक = नास्तिक/ईश्वर-निन्द्य स्वभाव वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुलिक सुत-भाव में हो तो जातक विस्तुति-युक्त किन्तु धन-हीन, अल्पायु, द्वेषी, क्षुद्र और नपुंसक कहा गया है। उसी स्थिति में स्त्रीजित और नास्तिक भी वर्णित है। पञ्चम भाव पुत्र-बुद्धि-सन्तान का स्थान है; यहाँ गुलिक का फल-कथन कठोर है, पर इसे निश्चित भाग्य या भय के रूप में नहीं पढ़ना—पाठ का अपना स्वर है। “विस्तुति” पाठ में प्रसिद्धि/स्तुति-अर्थ में आता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that with Gulika in the fifth house (suta-bhāva), the native is described as one of wide renown yet without wealth, short-lived, hostile, petty, unmanly, under women’s sway, and inclined to unbelief. (Reading of vistuti may vary across recensions—पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक पञ्चम भाव)। आयु-शब्द यहाँ फल-भाषा है; आयुर्दाय-सूत्र (अध्याय ४३–४४) का अलग गणित इस श्लोक में नहीं है।

25.67
वीतशत्रुः सुपुष्टाङ्गो रिपुस्थाने यमात्मजे ।
सुदीप्तः सम्मतः स्त्रीणां सोत्साहः सुदृढो हितः
vītaśatruḥ supuṣṭāṅgo ripusthāne yamātmaje|
sudīptaḥ sammataḥ strīṇāṃ sotsāhaḥ sudṛḍho hitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वीतशत्रु = शत्रु-रहित; सुपुष्टाङ्ग = सुपुष्ट/पुष्ट अंग वाला; रिपुस्थाने = रिपु-स्थान (षष्ठ भाव) में; यमात्मज = यम का पुत्र = गुलिक; सुदीप्त = दीप्तिमान/तेजस्वी; सम्मतः स्त्रीणाम् = स्त्रियों द्वारा सम्मानित/अनुमत; सोत्साह = उत्साह-युक्त; सुदृढ = सुदृढ़; हित = हितकारी/मित्र-स्वभाव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब यमात्मज (गुलिक) रिपु-स्थान में हो, तो जातक शत्रु-रहित, सुपुष्ट-अंग, दीप्तिमान, स्त्रियों का सम्मत, उत्साही, सुदृढ़ और हित-स्वभाव वाला वर्णित है। षष्ठ भाव शत्रु-रोग-ऋण का स्थान होने पर भी यहाँ गुलिक का फल-कथन अपेक्षाकृत शुभ दिशा में पढ़ा गया है। यह उसी पाठ की फल-परंपरा है—स्थान-दोष का यांत्रिक उलटा नहीं, शास्त्र का अपना कथन।

English rendering The text states that with Gulika (Yama’s son) in the sixth house (ripu-sthāna), the native is free from enemies, well-nourished in body, brilliant, approved by women, energetic, firm, and well-disposed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक षष्ठ भाव)। “यमात्मज” गुलिक का पर्याय है; कोई काल-अंश या बलांक यहाँ नहीं।

25.68
स्त्रीजितः पापकृज्जारः कृशाङ्गो गतसौहृदः ।
जीवितः स्त्रीधनेनैव गुलिके सप्तमस्थिते
strījitaḥ pāpakṛjjāraḥ kṛśāṅgo gatasauhṛdaḥ|
jīvitaḥ strīdhanenaiva gulike saptamasthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीजित = स्त्री के वश में; पापकृत् = पाप-कर्म करने वाला; जार = परस्त्री-संबंधी/जार-वृत्ति; कृशाङ्ग = कृश/दुर्बल अंग; गतसौहृद = सौहार्द-रहित / मित्रता गई हुई; जीवितः स्त्रीधनेनैव = केवल स्त्री-धन से जीवित; गुलिके सप्तमस्थिते = सप्तम भाव में गुलिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुलिक सप्तम में स्थित हो तो जातक स्त्रीजित, पापकृत्, जार-वृत्ति वाला, कृशांग और गत-सौहृद वर्णित है। जीवन-निर्वाह भी स्त्री-धन पर ही निर्भर कहा गया है। सप्तम भाव विवाह-साझेदारी-काम का स्थान है; यहाँ गुलिक का फल-कथन कठोर नैतिक-सामाजिक भाषा में है—इसे डर या दबाव के रूप में नहीं, पाठ के स्वर में ही समझना चाहिए।

English rendering The text states that with Gulika in the seventh house, the native is under women’s control, given to sinful and illicit liaison, lean of body, bereft of friendship, and said to live solely by a woman’s wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक सप्तम भाव)। कोई दशा-अनुपात या वर्ग-भागन यहाँ नहीं।

25.69
क्षुधालुर्दुःखित क्रूरस्तीक्ष्णरोषोऽतिनिर्घृणः ।
रन्ध्रगे गुलिके निःस्वो जायते गुणवर्जितः
kṣudhālurduḥkhita krūrastīkṣṇaroṣo'tinirghṛṇaḥ|
randhrage gulike niḥsvo jāyate guṇavarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षुधालु = क्षुधा-प्रबल / सदा भूखा; दुःखित = दुःखित; क्रूर = क्रूर; तीक्ष्णरोष = तीक्ष्ण क्रोध वाला; अतिनिर्घृण = अत्यन्त निर्दय; रन्ध्रगे गुलिके = रन्ध्र-भाव (अष्टम भाव) में गुलिक; निःस्व = निःस्व/धन-शून्य; गुणवर्जित = गुणों से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुलिक रन्ध्र-स्थान में हो तो जातक क्षुधालु, दुःखित, क्रूर, तीक्ष्ण-रोष और अति-निर्घृण वर्णित है। वही स्थिति निःस्व और गुण-वर्जित भी कही गई है। अष्टम भाव आयु-रहस्य-व्यय का स्थान है; यहाँ फल-भाषा गम्भीर है, पर इसे “विनाश निश्चित” जैसे भय-वाक्य में बदलना शास्त्र-अनुशासन के विरुद्ध है—केवल पाठ का फल-कथन रखें।

English rendering The text states that with Gulika in the eighth house (randhra), the native is described as hungry, miserable, cruel, sharp in anger, utterly merciless, penniless, and devoid of virtues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक अष्टम भाव)। आयुर्दाय या मृत्यु-योग का कोई संख्या-सूत्र इस श्लोक में नहीं दिया गया।

25.70
बहुक्लेशः कृशतनुर्दुष्टकर्मातिनिर्घृणः ।
गुलिके धर्मगे मन्दः पिशुनो बहिराकृतिः
bahukleśaḥ kṛśatanurduṣṭakarmātinirghṛṇaḥ|
gulike dharmage mandaḥ piśuno bahirākṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुक्लेश = बहुत क्लेश वाला; कृशतनु = कृश शरीर; दुष्टकर्म = दुष्ट कर्म करने वाला; अतिनिर्घृण = अत्यन्त निर्दय; गुलिके धर्मगे = धर्म-भाव (नवम भाव) में गुलिक; मन्द = मन्द/अल्प-तेज; पिशुन = पिशुन/चुगली करने वाला; बहिराकृति = बाहरी आकृति-मात्र / बाहरी दिखाव वाला (पाठानुसार)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुलिक धर्म-भाव में हो तो जातक बहु-क्लेश, कृश-तनु, दुष्ट-कर्म और अति-निर्घृण वर्णित है। उसी स्थिति में मन्द, पिशुन और बहिर-आकृति—बाहर की बनावट पर ठहरा हुआ—भी कहा गया है। नवम भाव धर्म-भाग्य-गुरु का स्थान होने पर भी यहाँ गुलिक का फल-कथन कठोर दिशा में पढ़ा गया है; यह पाठ का अपना स्वर है, न कि “भाग्य नष्ट” जैसी निश्चित घोषणा।

English rendering The text states that with Gulika in the ninth house (dharma), the native is much-afflicted, lean of body, of evil deeds, extremely merciless, dull, slanderous, and of mere outward form.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक नवम भाव)। धर्म-भाव का कोई अंश-विभाजन या दशा-काल यहाँ नहीं; केवल स्थान-फल।

25.71
पुत्रान्वितः सुखी भोक्ता देवाग्न्यर्चनवत्सलः ।
दशमे गुलिके जातो योगधर्माश्रितः सुखी
putrānvitaḥ sukhī bhoktā devāgnyarcanavatsalaḥ|
daśame gulike jāto yogadharmāśritaḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रान्वितः = पुत्रों से युक्त; भोक्ता = भोग-सुख का अनुभव करने वाला; देवाग्न्यर्चन-वत्सलः = देवता और अग्नि की पूजा में स्नेह रखने वाला; दशमे = दशम भाव में; गुलिके = गुलिक (माण्डि/उपग्रह) स्थित होने पर; योग-धर्माश्रितः = योग और धर्म पर आश्रित/उनमें लगा हुआ; सुखी = सुख-युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस जातक के दशम भाव में गुलिक स्थित हो, वह पुत्र-संपन्न, सुख-भोग वाला और देव-अग्नि की अर्चना में अनुरागी कहा गया है। वही जातक योग तथा धर्म के मार्ग पर आश्रित रहकर सुखी होता है—यह फल-कथन दशम-स्थित गुलिक के कर्म-धर्म-क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

English rendering The text states that one born with Gulika in the tenth house is said to be endowed with sons, happy in enjoyment, and devoted to the worship of the gods and fire; such a person is described as taking refuge in yoga and dharma, and as happy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम-गुलिक)। गुलिक का भाव-स्थान horoscope में उपग्रह-गणना से निश्चित होता है; यह श्लोक उस स्थान का फल बताता है, गणना-नियम नहीं।

25.72
सुस्त्रीभोगी प्रजाध्यक्षो बन्धूनां च हिते रतः ।
लाभस्थे गुलिके जातो नीचाङ्ग सार्वभौमकः
sustrībhogī prajādhyakṣo bandhūnāṃ ca hite rataḥ|
lābhasthe gulike jāto nīcāṅga sārvabhaumakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुस्त्री-भोगी = श्रेष्ठ/सुंदर स्त्री-सुख का भोक्ता; प्रजाध्यक्षः = प्रजा/लोगों का अध्यक्ष-नेता; बन्धूनां हिते रतः = बंधु-हित में लगा हुआ; लाभस्थे = एकादश (लाभ) भाव में; गुलिके जातो = गुलिक स्थित जन्म; नीचाङ्गः = हीन/निकृष्ट अंग-युक्त; सार्वभौमकः = सार्वभौम-जैसा प्रभुत्व वाला (पाठानुसार पद)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लाभ-स्थान में गुलिक होने पर जातक सुंदर स्त्री-सुख का भोग करने वाला, प्रजा का अध्यक्ष और बंधुओं के हित में रत कहा गया है। साथ ही उसे “नीचाङ्ग” और “सार्वभौमक” दोनों विशेषण दिए गए हैं—अर्थात् अंग-दोष का संकेत और व्यापक प्रभुत्व/प्रभाव का कथन एक ही फल-पंक्ति में मिलते हैं। पाठ-भेद संभव जहाँ “नीचाङ्ग” और “सार्वभौमक” की व्याप्ति भिन्न टीकाओं में अलग पढ़ी जाए।

English rendering The text states that one born with Gulika in the eleventh (gain) house enjoys fine women, leads people, and delights in the welfare of kin; the same verse also calls him defective of limb yet of universal sovereignty (sārvabhaumaka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभ-गुलिक)। एकादश भाव-स्थिति का परिणाम है; उपग्रह-देशांतर या अयनांश यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

25.73
नीचकर्माश्तितः पापो हीनाङ्गो दुर्भगोऽलसः ।
व्ययगे गुलिके जातो नीचेषु कुरुते रतिम्
nīcakarmāśtitaḥ pāpo hīnāṅgo durbhago'lasaḥ|
vyayage gulike jāto nīceṣu kurute ratim‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीच-कर्माश्रितः (पाठ: नीचकर्माश्तितः) = नीच/हीन कर्म पर आश्रित; पापः = पाप-प्रवृत्ति वाला (शास्त्र-शब्द); हीनाङ्गः = हीन अंग-युक्त; दुर्भगः = अभागा/असुंदर भाग्य-युक्त; अलसः = आलसी; व्ययगे = द्वादश (व्यय) भाव में; गुलिके जातो = गुलिक स्थित जन्म; नीचेषु रतिम्‌ कुरुते = नीचों में रति/आनंद रखता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्यय-स्थान में गुलिक होने पर जातक नीच कर्म पर आश्रित, पाप-शील, हीनांग, दुर्भाग्य-युक्त और आलसी कहा गया है। वही जातक नीच जनों/नीच विषयों में रति करता है—यह द्वादश-गुलिक का स्पष्ट फल-कथन है, न कि कोई गणना-सूत्र। “नीचकर्माश्तितः” में पाठ-भेद संभव; सामान्य अर्थ नीच-कर्माश्रित ही ग्रहण होता है।

English rendering The text states that one born with Gulika in the twelfth (expenditure) house is given to base work, sinful, defective of limb, unfortunate, and lazy, and takes pleasure among the lowly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यय-गुलिक)। द्वादश भाव में गुलिक-स्थिति का शास्त्रोक्त परिणाम; यहाँ कोई अंश/बिंदु/वर्ष-संख्या नहीं है।

25.74
लग्ने प्राणपदे क्षणो रोगि भवति मानवः ।
मूकोन्मत्तो जडाङ्गस्तु हीनाङ्गो दुःखित कृशः
lagne prāṇapade kṣaṇo rogi bhavati mānavaḥ|
mūkonmatto jaḍāṅgastu hīnāṅgo duḥkhita kṛśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = लग्न (प्रथम भाव) में; प्राणपदे = प्राणपद (विशेष बिंदु/पद) स्थित होने पर; क्षणः/क्षीणः (पाठ-भेद संभव) = क्षीण/दुर्बल; रोगी = रोग-युक्त; मानवः = मनुष्य; मूक = वाणी-हीन; उन्मत्तः = उन्मत्त; जडाङ्गः = जड़/जड़ता-युक्त अंग; हीनाङ्गः = हीन अंग; दुःखितः = दुःखी; कृशः = कृश/दुबला

हिन्दी भावार्थ अब गुलिक से हटकर प्राणपद के भाव-फल आरंभ होते हैं। शास्त्र कहता है कि लग्न में प्राणपद होने पर मनुष्य क्षीण/दुर्बल और रोगी होता है। आगे उसी स्थिति में मूकता, उन्माद, जड़ांगता, हीनांगता, दुःख और कृशता—ये लक्षण शास्त्र-वाक्य के रूप में गिनाए गए हैं। “क्षणो” पद पर पाठ-भेद संभव; भावार्थ में क्षीण-रोगी पक्ष स्पष्ट है।

English rendering The text states that when Prāṇapada is in the lagna, the person becomes emaciated and diseased; mute, mad, dull of limb, defective of limb, afflicted, and thin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न-प्राणपद)। प्राणपद-गणना अन्यत्र सूत्र-बद्ध है; यह श्लोक केवल लग्न-स्थिति का फल कहता है।

25.75
बहुधान्यो बहुधनो बहुभृत्यो बहुप्रजः ।
धनस्थानस्थिते प्राणे सुभगो जयते नरः
bahudhānyo bahudhano bahubhṛtyo bahuprajaḥ|
dhanasthānasthite prāṇe subhago jayate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहु-धान्यः = बहुत अन्न/धान्य वाला; बहु-धनः = बहुत धन वाला; बहु-भृत्यः = बहुत सेवक/अनुचर वाला; बहु-प्रजः = बहुत प्रजा/संतान वाला; धन-स्थान-स्थिते = द्वितीय (धन) भाव में स्थित; प्राणे = प्राण(पद) के; सुभगः = सुंदर भाग्य/शुभ-युक्त; जयते = उत्पन्न होता है; नरः = नर/पुरुष

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धन-स्थान में प्राण (प्राणपद) स्थित होने पर मनुष्य बहुत धान्य, बहुत धन, बहुत भृत्य और बहुत प्रजा वाला होता है। उसी स्थिति में वह सुभग—शुभ भाग्य वाला—जन्मता है। यह द्वितीय-भाव-प्राणपद का सकारात्मक फल-कथन है, चिकित्सा या अर्थ-पूर्वानुमान नहीं।

English rendering The text states that when Prāṇa (Prāṇapada) stands in the house of wealth, a man is born rich in grain, riches, retainers, and progeny, and is said to be fortunate (subhaga).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धन-प्राणपद)। “बहु-” यहाँ संख्यात्मक स्थिरांक नहीं, फल-विशेषण हैं।

25.76
हिंस्रो गर्वसमायुक्तो निष्ठुरोऽतिमलिम्लुचः ।
तृतीयगे प्राणपदे गुरुभक्तिविवर्जितः
hiṃsro garvasamāyukto niṣṭhuro'timalimlucaḥ|
tṛtīyage prāṇapade gurubhaktivivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हिंस्रः = हिंसक; गर्व-समायुक्तः = गर्व से युक्त; निष्ठुरः = कठोर/निर्दय; अति-मलिम्लुचः = अत्यंत चोर/चौर्य-प्रवृत्ति वाला; तृतीयगे = तृतीय भाव में; प्राणपदे = प्राणपद स्थित होने पर; गुरु-भक्ति-विवर्जितः = गुरु-भक्ति से रहित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तृतीय भाव में प्राणपद होने पर जातक हिंसक, गर्वी, निष्ठुर और अत्यंत चौर्य-शील कहा गया है। उसी स्थिति में वह गुरु-भक्ति से विवर्जित—गुरु के प्रति भक्ति-रहित—बताया गया है। यह तृतीय-प्राणपद का कठोर फल-कथन है; इसे नियति या डर के रूप में नहीं पढ़ना—केवल शास्त्र का निरूपण।

English rendering The text states that when Prāṇapada is in the third house, the native is violent, proud, harsh, and extremely thievish, and is devoid of devotion to the guru.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीय-प्राणपद)। तृतीय भाव-स्थिति का शास्त्रोक्त चरित्र-फल; कोई अंश-विभाजन या बल-इकाई यहाँ नहीं।

25.77
सुखस्थे तु सुखी कान्तः सुहृद्रमासु वल्लभः ।
गुरौ परायणः शीतः प्राणे वै सत्यतत्परः
sukhasthe tu sukhī kāntaḥ suhṛdramāsu vallabhaḥ|
gurau parāyaṇaḥ śītaḥ prāṇe vai satyatatparaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखस्थे = चतुर्थ (सुख) भाव में; सुखी = सुख-युक्त; कान्तः = कांतिमय/प्रिय-दर्शन; सुहृद्-रमासु वल्लभः = मित्रों और स्त्रियों में प्रिय; गुरौ परायणः = गुरु में परायण/समर्पित; शीतः = शीतल/मृदु स्वभाव; प्राणे = प्राण(पद) के (सुखस्थ होने पर); सत्य-तत्परः = सत्य में तत्पर

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सुख-स्थान में प्राणपद होने पर जातक सुखी, कांतिमय और मित्रों तथा स्त्रियों में वल्लभ होता है। वह गुरु-परायण, शीतल-स्वभाव और सत्य में तत्पर कहा गया है। चतुर्थ भाव के “सुख” नाम के अनुरूप यह फल-पंक्ति सुख, स्नेह और सत्य-निष्ठा का निरूपण करती है।

English rendering The text states that when Prāṇa (Prāṇapada) is in the house of happiness (the fourth), the person is happy, lovely, dear among friends and women, devoted to the guru, gentle, and intent upon truth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सुख-प्राणपद)। भाव-फल का शास्त्र-वाक्य; यहाँ कोई वर्गावधि, दशा-वर्ष या बल-रूपा नहीं दी गई।

25.78
सुखिभाक् सुक्रियोपेतस्त्वपचारदयान्वितः ।
पञ्चमस्थे प्राणपदे सर्वकामसमन्वितः
sukhibhāk‌ sukriyopetastvapacāradayānvitaḥ|
pañcamasthe prāṇapade sarvakāmasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमस्थे = पंचम भाव में स्थित; प्राणपदे = प्राणपद (आयु/प्राण-सम्बन्धी पद-बिन्दु); सुखिभाक् = सुख का भागी; सुक्रियोपेतः = शुभ/उत्तम कर्मों से युक्त; अपचारदयान्वितः = अपकार-रहित दया से युक्त (दयालु, अत्याचार-शून्य); सर्वकामसमन्वितः = समस्त कामनाओं से सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब प्राणपद पंचम भाव में हो, तो जातक सुख का भागी होता है और उसके कर्म शुभ दिशा में लगते हैं। उसमें दया का स्वभाव रहता है और वह दूसरों के प्रति कठोर आचरण नहीं करता। पंचम-स्थ प्राणपद को पाठ में सर्व-कामना-सम्पन्न अवस्था से जोड़ा गया है—अर्थात् इच्छाओं की पूर्ति का संकेत, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that with prāṇapada in the fifth house the native partakes of happiness, is endowed with good action, and is marked by compassionate, non-injurious conduct. Such a placement is further described as accompanied by the fulfillment of desires.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का पंचम-भाव फल)। प्राणपद की गणना अन्य श्लोकों में दी गई विधि से होती है; यहाँ केवल भाव-स्थित फल का वर्णन है।

25.79
बन्धुशत्रुवशस्तीक्ष्णो मन्दाग्निर्निर्दयः खलः ।
षष्ठे प्राणपदे रोगी वित्तपोऽल्पायुरेव च
bandhuśatruvaśastīkṣṇo mandāgnirnirdayaḥ khalaḥ|
ṣaṣṭhe prāṇapade rogī vittapo'lpāyureva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे = षष्ठ भाव में; प्राणपदे = प्राणपद स्थित होने पर; बन्धुशत्रुवशः = बन्धु और शत्रु के वश में; तीक्ष्णः = तीक्ष्ण/कठोर स्वभाव; मन्दाग्निः = मन्द अग्नि (दुर्बल जठराग्नि/मन्द उत्साह—शास्त्रीय फल-भाषा); निर्दयः = निर्दय; खलः = दुष्ट/खल स्वभाव; रोगी = रोग-ग्रस्त; वित्तपः = धन-नाशक/धन-व्ययकर्ता; अल्पायुः = अल्प आयु का संकेत (पाठानुसार)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षष्ठ भाव में प्राणपद होने पर जातक बन्धुओं और शत्रुओं के प्रभाव में रहता है। स्वभाव तीक्ष्ण, निर्दय और खल कहा गया है; जठराग्नि/अग्नि-तत्त्व को मन्द बताया गया है। पाठ में रोग, धन का क्षय और अल्पायु—ये तीन फल-संकेत भी षष्ठ-स्थ प्राणपद से जोड़े गए हैं; इन्हें शास्त्र का कथन समझें, न कि निश्चित भाग्य।

English rendering The text states that prāṇapada in the sixth leaves the native under the sway of kin and foes, sharp-tempered, hard-hearted, and of base disposition. It further associates this placement with illness, expenditure of wealth, and short life—as traditional result-language, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का षष्ठ-भाव फल)। षष्ठ भाव शास्त्र में शत्रु–रोग–ऋण–सेवा के क्षेत्र से जुड़ा है; यहाँ प्राणपद की स्थिति उसी फल-परंपरा में बाँधी गई है।

25.80
ईर्ष्यालु सततं कामी तीव्ररौद्रवपुर्नरः ।
सप्तमस्थे प्राणपदे दुराराध्यः कुबुद्धिमान्
īrṣyālu satataṃ kāmī tīvraraudravapurnaraḥ|
saptamasthe prāṇapade durārādhyaḥ kubuddhimān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमस्थे = सप्तम भाव में स्थित; प्राणपदे = प्राणपद; ईर्ष्यालु = ईर्ष्या-शील; सततं कामी = निरन्तर काम-प्रवण; तीव्ररौद्रवपुः = तीव्र-रौद्र देह/रूप (उग्र आकृति); नरः = पुरुष/व्यक्ति; दुराराध्यः = कठिनता से आराधनीय/कठोर-संतुष्ट; कुबुद्धिमान् = कुबुद्धि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम में प्राणपद होने पर जातक ईर्ष्या-प्रवण और निरन्तर कामनाओं में लिप्त रहता है। उसकी देह/रूप तीव्र और रौद्र बताया गया है। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए कठिन-संतुष्ट और कुबुद्धि से युक्त कहा गया है—यह सप्तम-स्थ प्राणपद का शास्त्रीय चरित्र-चित्रण है।

English rendering The text states that with prāṇapada in the seventh the person is jealous, continually driven by desire, and of fierce, terrible aspect. Such a native is described as hard to please or propitiate and possessed of ill-directed intellect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का सप्तम-भाव फल)। सप्तम सम्बन्ध, काम और द्वन्द्व का भाव है; फल-कथन उसी क्षेत्र की भाषा में बुना गया है।

25.81
रोगसन्तापिताङ्गश्च प्राणपदेऽष्टमे सति ।
पीडितः पार्थिवैर्दुःखैर्मृत्यबन्धुसुतोद्भवैः
rogasantāpitāṅgaśca prāṇapade'ṣṭame sati|
pīḍitaḥ pārthivairduḥkhairmṛtyabandhusutod‌bhavaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमे सति = अष्टम भाव में होने पर; प्राणपदे = प्राणपद; रोगसन्तापिताङ्गः = रोग से संतप्त अंगों वाला; पीडितः = पीड़ित; पार्थिवैः = राजा/शासक (पार्थिव) से; दुःखैः = दुःखों से; मृत्युबन्धुसुतोद्भवैः = मृत्यु, बन्धु और पुत्र से उत्पन्न (दुःखों से)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टम में प्राणपद होने पर शरीर रोगों से संतप्त रहता है। राजाओं या शासकों से पीड़ा तथा मृत्यु, बन्धु और संतान से उत्पन्न दुःख—ये पाठ के फल-संकेत हैं। अष्टम भाव आयु–पीड़ा–परिवर्तन का क्षेत्र माना जाता है; यहाँ प्राणपद की स्थिति उसी फल-परंपरा से बाँधी गई है—नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when prāṇapada is in the eighth, the body is tormented by disease. The native is further described as afflicted by rulers and by sorrows arising from death, kin, and children—traditional result-phrases, not deterministic claims.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का अष्टम-भाव फल)। अष्टम-फल की भाषा पीड़ा और आयु-संकट की है; गणना नहीं, केवल भावाश्रित फल-वर्णन।

25.82
पुत्रवान् धनसम्पन्नः सुभगः प्रियदर्शनः ।
प्राणे धर्मस्थिते भृत्यः सदाऽदुष्टो विचक्षणः
putravān‌ dhanasampannaḥ subhagaḥ priyadarśanaḥ|
prāṇe dharmasthite bhṛtyaḥ sadā'duṣṭo vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राणे धर्मस्थिते = प्राणपद धर्म (नवम) भाव में स्थित; पुत्रवान् = पुत्र-सम्पन्न; धनसम्पन्नः = धन से युक्त; सुभगः = सौभाग्यशाली/प्रिय; प्रियदर्शनः = प्रिय-दर्शन (सुंदर/मनोहर रूप); भृत्यः = सेवक/अनुगत; सदा अदुष्टः = सदैव अदुष्ट (दोष-रहित); विचक्षणः = विचक्षण/कुशल-बुद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि प्राणपद धर्म-स्थान (नवम) में हो तो जातक पुत्रवान्, धन-सम्पन्न, सौभाग्यशाली और प्रिय-दर्शन वाला होता है। वह सेवा-भाव वाला, सदैव अदुष्ट और विचक्षण कहा गया है। नवम धर्म–भाग्य–शुभ आचरण का भाव है; फल-कथन उसी दिशा में है।

English rendering The text states that with prāṇapada in the ninth (dharma) the native has children, is wealthy, fortunate, and pleasant to behold. He is further described as dutiful or service-minded, never base, and of discriminating intelligence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का नवम/धर्म-भाव फल)। “धर्मस्थिते” यहाँ नवम भाव का पारंपरिक नाम है; फल उसी भाव-क्षेत्र से जोड़ा गया है।

25.83
वीर्यवान् मतिमान् दक्षो नृपकार्येषु कोविदः ।
दशमे वै प्राणपदे देवार्चनपरायणः
vīryavān‌ matimān‌ dakṣo nṛpakāryeṣu kovidaḥ|
daśame vai prāṇapade devārcanaparāyaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = दशम भाव में; वै = निश्चयार्थक (पाठानुसार); प्राणपदे = प्राणपद; वीर्यवान् = वीर्य/शक्ति से युक्त; मतिमान् = बुद्धिमान्; दक्षः = दक्ष/कुशल; नृपकार्येषु कोविदः = राज-कार्यों में निपुण; देवार्चनपरायणः = देव-अर्चना में तत्पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशम में प्राणपद होने पर जातक वीर्यवान्, मतिमान् और दक्ष होता है। वह राज-कार्यों—अर्थात् शासन, सार्वजनिक दायित्व या उच्च कर्म—में कोविद कहा गया है। साथ ही देव-अर्चना में परायण स्वभाव भी पाठ में जोड़ा गया है; दशम कर्म–कीर्ति–अधिकार का भाव है।

English rendering The text states that with prāṇapada in the tenth the native is vigorous, intelligent, and skillful, expert in royal or public affairs. Such a person is also described as devoted to the worship of the gods.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का दशम-भाव फल)। दशम कर्म-स्थल है; फल-वर्णन कर्म-क्षमता और सार्वजनिक दायित्व की भाषा में है।

25.84
विख्यातो गुणवान् प्राज्ञो भोगीध नसमन्वितः ।
लाभस्थानस्थिते प्राणे गौराङ्गो मातृवत्सलः
vikhyāto guṇavān‌ prājño bhogīdha nasamanvitaḥ|
lābhasthānasthite prāṇe gaurāṅgo mātṛvatsalaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभस्थानस्थिते = लाभ (एकादश) स्थान में स्थित; प्राणे = प्राणपद; विख्यातः = विख्यात/प्रसिद्ध; गुणवान् = गुण-सम्पन्न; प्राज्ञः = प्रज्ञावान्; भोगी धनसमन्वितः = भोगी तथा धन से युक्त (पाठ: «भोगीध नसमन्वितः» — संधि/पाठ-भेद संभव; प्रायः भोगी + धनसमन्वितः); गौराङ्गः = गौर अंगों वाला; मातृवत्सलः = माता के प्रति वत्सल/स्नेही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लाभ-स्थान (एकादश) में प्राणपद होने पर जातक विख्यात, गुणवान् और प्राज्ञ होता है। वह भोगों से युक्त तथा धन-सम्पन्न कहा गया है; गौर वर्ण/अंग और माता के प्रति वत्सलता भी पाठ के फल-संकेत हैं। एकादश लाभ–मित्र–प्राप्ति का भाव है; फल उसी दिशा में बाँधा गया है।

English rendering The text states that with prāṇapada in the eleventh (lābha) the native is renowned, virtuous, and wise, an enjoyer endowed with wealth. The same placement is further described as fair-limbed and affectionate toward the mother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणपद का एकादश/लाभ-भाव फल)। «भोगीध नसमन्वितः» में पाठ-भेद/संधि-भेद संभव; अर्थ भोग + धन-समन्वय की दिशा में लिया गया है।

25.85
क्षुद्रो दुष्टस्तु हीनाङ्गो विद्वेशी द्विजबन्धुषु ।
व्यये प्राणे नेत्ररोगी काणो वा जायते नरः
kṣudro duṣṭastu hīnāṅgo vidveśī dvijabandhuṣu|
vyaye prāṇe netrarogī kāṇo vā jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षुद्र = तुच्छ/नीच स्वभाव; दुष्ट = दोष-युक्त/अनिष्ट-प्रवृत्ति; हीनाङ्ग = अंग-हीन/अंग-विकल; विद्वेषी = द्वेष करने वाला; द्विजबन्धुषु = ब्राह्मणों तथा बन्धु-जनों में; व्यय = द्वादश भाव; प्राण = जीवन-शक्ति/शरीर-स्थिति का संकेत; नेत्ररोगी = नेत्र-रोग युक्त; काण = एक-नेत्र/काणा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (अप्रकाश-खेट की) व्यय-स्थिति में जात व्यक्ति क्षुद्र तथा दुष्ट कहा जाता है, अंग-हीनता का संकेत मिलता है, और वह द्विजों तथा बन्धुओं से विद्वेष रखता है। उसी फल-क्रम में नेत्र-रोग अथवा काणत्व का भी उल्लेख है। यह फल-कथन भाव-स्थिति पर आधारित है, न कि किसी निश्चित भाग्य-घोषणा के रूप में। पाठ में “प्राणे” शब्द जीवन-शरीर-संदर्भ से जुड़ा हुआ पढ़ा जाता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that with (the non-luminous body) in the twelfth house the native is described as mean and wicked, defective in limb, hostile to brahmins and kinsmen, and subject to eye-disease or one-eyedness. The claim is a śāstra-phala for that placement, not a medical verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अप्रकाश-खेट का व्यय-भाव फल)। “व्यय” = 12वाँ भाव; गणना नहीं, केवल भाव-स्थित फल-वर्णन।

25.86
इत्यप्रकाशखेटानां फलान्युक्तानि भूसुर ।
तथा यानि प्रकाशानां सूर्यादीनां खचारिणाम्
ityaprakāśakheṭānāṃ phalānyuktāni bhūsura|
tathā yāni prakāśānāṃ sūryādīnāṃ khacāriṇām‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; अप्रकाशखेट = अदृश्य/अप्रकाश ग्रह (उपग्रह-वर्ग); फलानि = फल-वर्णन; उक्तानि = कहे गए; भूसुर = हे ब्राह्मण; तथा = उसी प्रकार; प्रकाशानाम् = प्रकाशमानों के; सूर्यादीनाम् = सूर्य आदि के; खचारिणाम् = आकाश-चारी ग्रहों के।

हिन्दी भावार्थ पराशर भूसुर को कहते हैं कि अब तक अप्रकाश-खेटों के फल कह दिए गए। अब उसी क्रम में प्रकाशमान खचारियों—सूर्य आदि ग्रहों—के फल भी वैसे ही विचारणीय हैं। यह श्लोक एक संक्रमण-सूत्र है: उपग्रह-फल-खण्ड से मुख्य ग्रह-फल-विधि की ओर।

English rendering Thus, O Brahmin, the results of the non-luminous celestial bodies have been stated; likewise are to be considered the results of the luminous ones—the Sun and the other sky-wanderers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/विधि-संक्रमण। अप्रकाश = उपग्रह-वर्ग; प्रकाश = सूर्यादि सप्त/नव ग्रह—दो वर्गों का फल-विवेक अलग-अलग कहा गया है।

25.87
तानि स्थितिवशात्तेषां स्फुटदृष्टिवशात् तथा ।
बलाऽबलविवेकेन वक्तव्यानि शरीरिणाम्
tāni sthitivaśātteṣāṃ sphuṭadṛṣṭivaśāt‌ tathā|
balā'balavivekena vaktavyāni śarīriṇām‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तानि = वे फल; स्थितिवशात् = भाव/राशि-स्थिति के अनुसार; तेषाम् = उन ग्रहों के; स्फुटदृष्टिवशात् = स्पष्ट दृष्टि (पूर्ण/अंश-दृष्टि) के अनुसार; तथा = और भी; बलाऽबल = बल तथा अबल; विवेकेन = विवेक से; वक्तव्यानि = कहने योग्य; शरीरिणाम् = देहधारियों के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि प्रकाश-ग्रहों के वे फल उनकी स्थिति के अनुसार, उनकी स्फुट दृष्टि के अनुसार, तथा बल-अबल के विवेक से ही शरीरधारी जातक के विषय में कहे जाएँ। केवल भाव-नाम या सामान्य फल-सूची पर्याप्त नहीं; स्थिति, दृष्टि और बल—तीनों का संयोग अपेक्षित है। यह श्लोक फल-कथन को गणित-अनुशासन से बाँधता है।

English rendering Those results are to be declared for embodied beings according to the planets’ placements, according to their clear aspects, and by discriminating strength from weakness. Phala is not uttered from a list alone, but from sthiti, dṛṣṭi, and balābala together.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विधि-सूत्र (फल = f(स्थिति, स्फुट-दृष्टि, बलाबल))। आधुनिक संकेत में: फल-निर्णय तभी जब (1) graha-longitude → bhāva/rāśi-sthiti नियत हो, (2) dṛṣṭi (पूर्ण/अंश) लागू हो, (3) bala-total की तुलना a/b-रूप में हो। षड्बल-परम्परा में 1 रूप = 60 विरूप; स्थाना + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग् बल का योग ग्रह-बल है। अयनांश, भाव-पद्धति (श्रीपति/पोरफिरी आदि) और दृष्टि-नियम घोषित किए बिना संख्या न बाँधी जाए।

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल कर्माणि (10H) स्थित है, पर दृग्/चेष्टा दुर्बल। केवल “10H = कर्म-पटुता” नहीं कहा जाएगा; 25.87 के अनुसार स्फुट-दृष्टि (कौन दृष्टि दे रहा/ले रहा) और बलाबल देखकर ही फल कहा जाएगा। यदि मंगल-षड्बल योग न्यून-सीमा से नीचे हो तो शास्त्रीय “बलिष्ठ फल” स्थगित रहता है—यह निषेध नहीं, विवेक है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारी “गणित ≠ फल” अनुशासन-रेखा है: दृष्टि और षड्बल (अध्याय 27: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) को संख्या में जोड़कर रूप/विरूप में मापते हैं; फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं। अष्टकवर्ग-fixture की तरह यहाँ भी `==` अनुशासन लागू होता है—सहन-बैंड से बल नहीं छिपाया जाता; अयनांश/भाव-पद्धति हमेशा घोषित।

अध्यायः 26

ग्रहस्फुटदृष्टिकथनाध्ययाः

13 श्लोक
26.1
भगवान्‌ कतिधा दृष्टिर्बलं कतिविधं तथा।
इति मे संशयो जातस्तं भवान्‌ छेत्तुमर्हिति
bhagavān‌ katidhā dṛṣṭirbalaṃ katividhaṃ tathā|
iti me saṃśayo jātastaṃ bhavān‌ chettumarhiti

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगवान् = हे भगवन् (आचार्य-संबोधन); कतिधा = कितने प्रकार की; दृष्टिः = ग्रह-दृष्टि / aspect; बलं = बल (strength); कतिविधं = कितने विध / कितने प्रकार का; संशयः = संदेह; छेत्तुम् = काटने / निवारण करने के लिए; अर्हति = योग्य हैं / चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शिष्य (मैत्रेय) आचार्य से विनयपूर्वक पूछते हैं—भगवन्, दृष्टि कितने प्रकार की होती है, और बल कितने प्रकार का होता है? यह संशय मन में उठ खड़ा हुआ है; आप ही इसे काटने के अधिकारी हैं। अध्याय का द्वार संवाद से खुलता है: पहले प्रश्न, फिर शास्त्र की उत्तर-पद्धति।

English rendering “O Lord, of how many kinds is dṛṣṭi, and of how many kinds is bala? This doubt has arisen in me; you are fit to cut it away.” The chapter opens as a pupil’s request for a systematic teaching of aspect and strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / प्रश्न-स्थापना। यहाँ कोई संख्या या सूत्र नहीं; केवल विषय-सूची का द्वार: आगे दृष्टि के भेद और बल-गणना का मार्ग खुलेगा।

26.2
एका राशिवशाद्‌ दृष्टिः पूर्वमुक्ता च या द्विज।
अन्या खेटस्वभावोत्था स्फुटा तां कथयाम्यहम्‌
ekā rāśivaśād‌ dṛṣṭiḥ pūrvamuktā ca yā dvija|
anyā kheṭasvabhāvotthā sphuṭā tāṃ kathayāmyaham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एका = एक (प्रकार की); राशिवशात् = राशि-आश्रित / sign-based; दृष्टिः = दृष्टि; पूर्वमुक्ता = पहले कही जा चुकी; द्विज = हे द्विज; अन्या = दूसरी; खेटस्वभावोत्था = ग्रह-स्वभाव से उत्पन्न; स्फुटा = स्पष्ट / exact (रेखांश-आधारित); कथयामि = कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ आचार्य उत्तर देते हैं—हे द्विज, एक दृष्टि तो राशिवशात् है, जो पहले ही कही जा चुकी। दूसरी दृष्टि खेटों के स्वभाव से उठती है और स्फुट (स्पष्ट, गणना-योग्य) है; उसी को अब मैं कहता हूँ। इस प्रकार शास्त्र दो स्तर बाँधता है: राशि-गृह की साधारण दृष्टि, और रेखांश-अन्तर से निकाली गई स्फुट दृष्टि।

English rendering “One dṛṣṭi, O twice-born, is that which depends on the rāśi and has already been stated; another arises from the planets’ own nature and is sphuṭa (exact)—that I shall now declare.” The text distinguishes house/sign aspect from longitude-based aspect measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण-कथन। दो मॉडल घोषित: (1) राशिवश दृष्टि (पूर्णांक भाव-अन्तर: 3, 4, 5, 7, 8, 9, 10…); (2) स्फुट दृष्टि (λ-अन्तर पर खंडशः फलन)। आगे के श्लोक दोनों को संख्या में बाँधते हैं।

26.3
त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे च सप्तमे।
पादवृद्धया प्रपश्यन्ति प्रयच्छन्ति फलं तथा
tridaśe ca trikoṇe ca caturasre ca saptame|
pādavṛddhayā prapaśyanti prayacchanti phalaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिदशे = तृतीय एवं दशम भाव में; त्रिकोणे = पञ्चम-नवम (त्रिकोण) में; चतुरस्रे = चतुर्थ-अष्टम (चतुरस्र) में; सप्तमे = सप्तम में; पादवृद्ध्या = पाद की वृद्धि से (1/4 की सीढ़ी); प्रपश्यन्ति = देखते हैं; प्रयच्छन्ति फलं = फल देते हैं; तथा = उसी अनुपात में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—ग्रह त्रिदश (3, 10), त्रिकोण (5, 9), चतुरस्र (4, 8) और सप्तम पर पाद-वृद्धि की रीति से देखते हैं, और उसी अनुपात में फल देते हैं। दृष्टि की “पूर्णता” यहाँ चार पादों की सीढ़ी है: जितने पाद, उतना दृष्टि-अंश। यह राशिवश सामान्य नियम है; विशेष पूर्ण दृष्टि अगले श्लोक में आएगी।

English rendering The text states that planets aspect the 3rd and 10th, the trikoṇa (5th, 9th), the caturasra (4th, 8th), and the 7th with successive increase of pādas, and bestow phala in the same proportion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पाद-सीढ़ी (सामान्य राशि-दृष्टि), पूर्ण दृष्टि = 4 पाद = 1:

| लक्ष्य-भाव (draṣṭā से) | नाम | पाद | अंश (पूर्ण का) |
|---|---|---|---|
| 3, 10 | त्रिदश | 1 | 1/4 |
| 5, 9 | त्रिकोण | 2 | 1/2 |
| 4, 8 | चतुरस्र | 3 | 3/4 |
| 7 | सप्तम | 4 | 1 = पूर्ण |

यदि दृष्टि-मान को विरूप में लें (1 रूप = 60 विरूप), तो सामान्यतः:
दृक्_विरूप = (पाद/4) × 60 = पाद × 15।
अतः 1 पाद → 15, 2 → 30, 3 → 45, 4 → 60 विरूप।

उदाहरण (worked example) मानें सूर्य कर्क लग्न-कुण्डली में लग्न (कर्क) में है; वह मकर (7वाँ) को 4 पाद = पूर्ण देखता है; वृश्चिक (5वाँ) को 2 पाद = 1/2; तुला (4था) को 3 पाद = 3/4; कन्या (3रा) को 1 पाद = 1/4। (भाव-गणना: whole-sign / राशि-भाव; अयनांश इस पूर्णांक-सीढ़ी पर प्रभाव नहीं डालता—केवल राशि-स्थिति चाहिए।)

26.4
पूर्णं च सप्तमं सर्वे शानिजीवकुजाः पुनः।
विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोणचतुरष्टमान्‌
pūrṇaṃ ca saptamaṃ sarve śānijīvakujāḥ punaḥ|
viśeṣataśca tridaśatrikoṇacaturaṣṭamān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णं = पूर्ण (4 पाद); सप्तमं = सप्तम भाव को; सर्वे = सभी ग्रह; शानिजीवकुजाः = शनि, गुरु (जीव), मंगल (कुज); पुनः = फिर / अतिरिक्त; विशेषतः = विशेष रूप से; त्रिदश = 3 व 10; त्रिकोण = 5 व 9; चतुरष्टमान् = 4 व 8।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—सप्तम पर सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि डालते हैं। फिर शनि, गुरु और कुज विशेष रूप से पूर्ण देखते हैं: शनि त्रिदश (3, 10) को, गुरु त्रिकोण (5, 9) को, कुज चतुर्थ-अष्टम को। यही “खेट-स्वभावोत्था” विशेष दृष्टि है—सामान्य पाद-सीढ़ी पर इन तीनों के लिए पूर्णता का अधिरोहण।

English rendering The text states that all planets fully aspect the 7th; and further, Saturn, Jupiter, and Mars specially (fully) aspect the 3rd and 10th, the trikoṇa (5th and 9th), and the 4th and 8th respectively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विशेष पूर्ण-दृष्टि नियम (राशिवश):

  • सभी ग्रह: भाव 7 → 4 पाद (पूर्ण)
  • शनि: भाव 3, 10 → 4 पाद (सामान्य 1 के स्थान पर)
  • गुरु: भाव 5, 9 → 4 पाद (सामान्य 2 के स्थान पर)
  • कुज: भाव 4, 8 → 4 पाद (सामान्य 3 के स्थान पर)

अन्य भावों पर सामान्य पाद-तालिका (26.3) यथावत्। विरूप में: विशेष पूर्ण = 60 विरूप।

उदाहरण (worked example) शनि मेष में हो। राशि-गिनती से:
- 3रा = मिथुन → पूर्ण (विशेष), 4 पाद
- 7वाँ = तुला → पूर्ण (सामान्य), 4 पाद
- 10वाँ = मकर → पूर्ण (विशेष), 4 पाद
- 5वाँ = सिंह → सामान्य त्रिकोण = 2 पाद ही (शनि को त्रिकोण-विशेष नहीं)
(whole-sign; पाठ-भेद अन्य संस्करणों में नहीं, यह नियम प्रायः स्थिर।)

26.5
इति सामान्यतः पूर्वैराचार्यैः प्रतिपादिता।
स्फुटान्तरवशाद्या च दृष्टिः साऽतिस्फुटा यथा
iti sāmānyataḥ pūrvairācāryaiḥ pratipāditā|
sphuṭāntaravaśādyā ca dṛṣṭiḥ sā'tisphuṭā yathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; सामान्यतः = मोटे / साधारण नियम से; पूर्वैः आचार्यैः = पूर्व आचार्यों द्वारा; प्रतिपादिता = प्रतिपादित; स्फुटान्तरवशात् = स्पष्ट रेखांश-अन्तर के वश से; या दृष्टिः = जो दृष्टि; सा अतिस्फुटा = वह अत्यन्त स्पष्ट / सूक्ष्म; यथा = जैसे (अब कहा जाता है)।

हिन्दी भावार्थ आचार्य कहते हैं—अभी तक जो कहा, वह सामान्य दृष्टि-नियम है, जिसे पूर्व आचार्यों ने प्रतिपादित किया। जो दृष्टि स्फुटान्तर (दो ग्रहों के स्पष्ट रेखांश के अन्तर) के अनुसार निकाली जाती है, वह उससे भी अति-स्फुट है; उसकी विधि आगे है। राशि-पाद सीढ़ी स्थूल माप है; λ-अन्तर की खंडशः गणना सूक्ष्म माप।

English rendering “Thus, in general, has it been set forth by the earlier teachers; and the dṛṣṭi that follows from the exact longitudinal difference is still more precise, as follows.” The text promotes the sphuṭa method over the coarse pāda scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद्धति-संक्रमण। दो संकल्पनाएँ स्पष्ट:
1. सामान्य दृष्टि = पूर्णांक भाव-अन्तर → {1,2,3,4} पाद
2. स्फुट दृष्टि = f(Δλ), जहाँ Δλ = (λ_दृश्य − λ_द्रष्टा) mod 360° — अगले दो श्लोकों का खंडशः नियम

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल (अध्याय 27) का दृग्बल घटक इसी दृष्टि-गणित पर टिका है—रूप/विरूप में जोड़ा जाने वाला अंक व्याख्या नहीं, गणना है। हमारी अनुशासन-रेखा वही है: पहले स्फुट संख्या, फिर “शास्त्र कहता है” वाला फल-वचन; सहिष्णुता-पट्टी से अंक नहीं छिपाना।

26.6
दृश्याद्‌ विशोध्य द्रष्टारं षड्राशिभ्योऽधिकान्तरम्‌।
दिगभ्यः संशोध्य तद्‌भागा द्विभक्ता दृक्‌ स्फुटा भवेत्‌
dṛśyād‌ viśodhya draṣṭāraṃ ṣaḍrāśibhyo'dhikāntaram‌|
digabhyaḥ saṃśodhya tad‌bhāgā dvibhaktā dṛk‌ sphuṭā bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृश्यात् = दृष्टि-पात्र (जिस पर दृष्टि) के रेखांश से; विशोध्य = घटाकर; द्रष्टारं = द्रष्टा (दृष्टि डालने वाले) को; षड्राशिभ्यः अधिकान्तरम् = यदि अन्तर 6 राशियों से अधिक हो; दिग्भ्यः = दिक् = 10 (भूतसंख्‍या: 10 दिशाएँ) से; संशोध्य = शोधित / घटाकर; तद्भागाः = वे शेष भाग (अंश); द्विभक्ताः = दो से विभाजित; दृक् स्फुटा = स्पष्ट दृष्टि-मान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की स्फुट विधि का पहला खंड: दृश्य ग्रह के रेखांश से द्रष्टा घटाओ। यदि वह अन्तर छह राशियों से अधिक हो, तो उसे दिक् (10 राशि = 300°) से घटाओ; जो भाग बचें, उन्हें दो से भाग दो—वही स्फुट दृक् है। यह 180° के पार के चाप को 10-राशि फ्रेम में मोड़कर आधा करने की रीति है।

English rendering Subtract the aspector from the aspected; if the interval exceeds six rāśis, subtract it from dig (10 rāśis). Those residual degrees, divided by two, become the sphuṭa dṛk.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

मानक (श्लोकानुसारी):
- λ_d = द्रष्टा (aspector), λ_y = दृश्य (aspected)
- Δ = (λ_y − λ_d) mod 360°
- दिक् = 10 राशि = 300° (भूतसंख्‍या)

यदि Δ > 6 × 30° = 180°:
 R = 300° − Δ
 दृक् = R ÷ 2
(इकाई: अंश-रूपी दृष्टि-मान; रूप/विरूप पैमाने में रूपान्तरण परम्परा-सापेक्ष—घोषित करना आवश्यक।)

उदाहरण (worked example) λ_d (गुरु) = 40°, λ_y (शनि) = 250°।
Δ = 250° − 40° = 210° > 180°।
R = 300° − 210° = 90°।
दृक् = 90° ÷ 2 = 45।
(सायन/निरयण: दोनों λ एक ही अयनांश-चौखटे में हों—उदा. लाहिरी—तब Δ अयनांश-निरपेक्ष रहता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही स्फुटान्तर-दृष्टि दृग्बल की कच्ची सामग्री है। हम गणित और फल को अलग रखते हैं: ऊपर का 45 एक परिकलित मान है, “भविष्य” नहीं। जहाँ अंक तय हो, जाँच `==` से—± पट्टी कभी-कभी असली −1 छिपा देती है।

26.7
पञ्चाधिके विना राशिं भागाद्विघ्नाश्च दृक्‌ स्फुटा।
वेदाधिके त्यजेद्‌ भूताद्‌ भागा दृष्टिः त्रिभाधिके
pañcādhike vinā rāśiṃ bhāgādvighnāśca dṛk‌ sphuṭā|
vedādhike tyajed‌ bhūtād‌ bhāgā dṛṣṭiḥ tribhādhike

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चाधिके = 5 (पञ्च) से अधिक (राशि-अन्तर) पर; विना राशिम् = राशि-भाग छोड़कर; भागाः = शेष अंश; द्विघ्नाः = द्विगुणित (×2); दृक् स्फुटा = स्पष्ट दृष्टि; वेदाधिके = 4 (वेद) से अधिक पर; त्यजेत् = छोड़े / घटाए; भूतात् = 5 (भूत) से; भागा दृष्टिः = (शेष) भाग ही दृष्टि; त्रिभाधिके = 3 से अधिक पर (नियम का आरम्भ; आगे पाठ में विस्तार—पाठ-भेद/क्रम संभव)।

हिन्दी भावार्थ स्फुट दृष्टि का अगला खंड: अन्तर पाँच राशि से अधिक हो तो राशि गिनती छोड़ो, केवल बचे हुए अंशों को दुगुना करो—वही दृक्। चार (वेद) से अधिक हो तो पाँच (भूत) से शोधित करो; बचे भाग दृष्टि हैं। तीन से अधिक का प्रकरण श्लोक यहीं छूता है—पूर्ण खंडशः तालिका परम्परा में आगे बढ़ती है; सन्दिग्ध पाठ पर “पाठ-भेद संभव”। फल की भाषा में नहीं, माप की भाषा में पढ़ें।

English rendering When the interval exceeds five rāśis, ignore the completed signs and double the remaining degrees—that is the sphuṭa dṛk. When it exceeds four (veda), reduce from five (bhūta); those degrees are the dṛṣṭi. When it exceeds three, the rule begins (full continuation may lie in the next lines of the recension).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

Δ = (λ_y − λ_d) mod 360°, लिखा जाए Δ = 30°·n + β, जहाँ n ∈ {0,…,11}, 0° ≤ β < 30°।
भूतसंख्‍या: पञ्च = 5, वेद = 4, भूत = 5, त्रि = 3; (26.6 से) दिक् = 10।

श्लोक 26.6–26.7 से खंडशः नियम (इस पाठ में स्पष्ट अंश):

1. n > 6 (Δ > 180°): दृक् = (300° − Δ) ÷ 2
2. n > 5 अर्थात् 5 < n≤6 क्षेत्र / “पञ्चाधिके”: दृक् = 2 × β (विना राशिम्, भागाद्विघ्नाः)
3. n > 4 (“वेदाधिके”): 5-राशि फ्रेम से शोधन—त्यजेद् भूतात्; शेष भाग = दृष्टि
 अर्थात् Δ ∈ (120°, 150°] पर: दृक् = 150° − Δ (= 30° − β, जब n = 4)
4. n > 3 (“त्रिभाधिके”): सूत्र का आरम्भ; इस श्लोक में पूर्ण पद नहीं—पाठ-भेद संभव / अगला श्लोक देखें

(टिप्पणी: कुछ टीका-परम्पराएँ “60 − β” आदि समकक्ष रूप लिखती हैं; अंक श्लोक की भूतसंख्‍या से बाँधें, बाहर की तालिका थोपें नहीं।)

उदाहरण (worked example)
(A) पञ्चाधिके: Δ = 5 राशि + 12° = 162°। β = 12°।
दृक् = 2 × 12 = 24।

(B) वेदाधिके: Δ = 4 राशि + 10° = 130°।
150° − 130° = 20 → दृक् = 20।
(समान अयनांश-चौखटा दोनों λ पर; भाव-घर की नहीं, रेखांश-अन्तर की गणना।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोড়श-वर्ग की तरह यह भी शुद्ध खंडशः अंकगणित है—λ पर मापांक-अन्तर, फिर घोषित फ्रेम (10, 5, 4, 3 राशि)। दृग्बल में यही मान रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) की श्रेणी में जुड़ता है। हम स्रोत-पाठ की संख्या को `==` से पिन करते हैं; व्याख्या को “शास्त्र कहता है” की सीमा में रखते हैं।

26.8
विशोध्यार्णवतो द्वाभ्यां लब्धं त्रिंशद्‌युतं च दृक्‌।
द्व्यधिके तु विना राशिं भागास्तिथियुतास्तथा
viśodhyārṇavato dvābhyāṃ labdhaṃ triṃśad‌yutaṃ ca dṛk‌|
dvyadhike tu vinā rāśiṃ bhāgāstithiyutāstathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विशोध्य = घटाकर; अर्णवतः = अर्णव (समुद्र, भूतसंख्या = ४) से; द्वाभ्यां = दो से (भाग); लब्धं = प्राप्त भागफल; त्रिंशत्-युतं = ३० जोड़कर; दृक् = दृष्टि-मान (दृष्टि-फल); द्वि-अधिके = जब (अन्तर) दो से अधिक हो; विना राशिं = राशि छोड़कर (केवल अंश); भागाः = अंश/डिग्री; तिथि-युताः = तिथि (भूतसंख्या = १५) से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ स्फुट-दृष्टि का गणित खोलता है। अन्तर-माप को अर्णव (४) से घटाओ, दो से भाग दो, फिर तीस जोड़ो — वही दृक् (दृष्टि-मान) कहा गया है। जब वह माप दो राशि से अधिक हो, तो राशि-भाग छोड़कर केवल अंश लो और उनमें पंद्रह जोड़ो; वही दृष्टि-मान बनता है। यह नियम आगे शनि-द्रष्टा के प्रसंग से जुड़ता है।

English rendering Subtract the (arc) measure from four (arṇava), divide by two, and add thirty — that is the dṛk (aspect-value). When the measure exceeds two rāśis, discard the rāśi count, take the degrees alone, and add fifteen.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दृष्टि-मान (virūpa scale; पूर्ण दृष्टि = ६० virūpa = १ rūpa) के लिए शनि-प्रकरण का प्रथम खंड:
- आधार-सूत्र: दृक् = ३० + (४ − x) ÷ २
जहाँ x = प्रयुक्त राशि-माप (श्लोक का “अर्णवतः विशोध्य… द्वाभ्यां लब्धं”)
- द्व्यधिक (अन्तर > २ राशि): दृक् = B + १५
जहाँ B = केवल अंश (०°–३०°), राशि-पूर्णांक छोड़कर
भूतसंख्या: अर्णव = ४, तिथि = १५, त्रिंशत् = ३०। इकाई: virūpa (१ rūpa = ६० virūpa)।

उदाहरण (worked example) मान लें x = ३ राशि (शनि-दृष्टि की किसी शाखा में प्रयुक्त माप)।
दृक् = ३० + (४ − ३) ÷ २ = ३० + ०.५ = ३०.५ virūpa।
यदि अन्तर = २ राशि + १०° (द्व्यधिक), राशि छोड़कर: दृक् = १० + १५ = २५ virūpa।
(Convention: graha-sphuṭa अन्तर; ayanāṃśa दोनों खेटों पर समान होने से अन्तर अपरिवर्तित रहता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह स्फुट-दृष्टि का खंड-सूत्र है — ṣaḍbala के dṛg-bala घटक का इनपुट। हम गणित और फल को अलग रखते हैं: virūpa-संख्या exact rule से; फल-कथन को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही।

26.9
रूपाधिके विना राशिं भागा द्वयाप्ताश्च दृग्‌ भवेत्‌।
एवं राश्यादिके शेषे शनौ द्रष्टरि भो द्विज
rūpādhike vinā rāśiṃ bhāgā dvayāptāśca dṛg‌ bhavet‌|
evaṃ rāśyādike śeṣe śanau draṣṭari bho dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रूप-अधिके = जब एक (रूप = १) से अधिक; विना राशिं = राशि छोड़कर; भागाः = अंश; द्वि-आप्ताः = दो से भाजित; दृग् = दृष्टि-मान; राश्यादिके शेषे = राशि आदि में शेष रहने पर; शनौ द्रष्टरि = जब शनि द्रष्टा हो; भो द्विज = हे द्विज

हिन्दी भावार्थ जब माप एक राशि से अधिक हो, राशि छोड़कर अंशों को दो से भाग दो — वही दृष्टि-मान होता है। हे द्विज! शनि जब द्रष्टा हो, तब राशि-आदि शेष के अनुसार इसी क्रम से स्फुट दृष्टि साधनी चाहिए। पूर्व श्लोक और यह श्लोक मिलकर शनि-दृष्टि की केस-शाखाएँ पूरा करते हैं।

English rendering When the measure exceeds one (rūpa), discard the rāśi and take half the degrees — that becomes the dṛk. Thus, O twice-born, when Saturn is the aspector, compute with the residual in rāśi and so on.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शनि-द्रष्टा — अतिरिक्त शाखा:
- रूपाधिक (अन्तर > १ राशि, पूर्व “द्व्यधिक” से भिन्न पट्टी): दृक् = B ÷ २
(B = अंश-मात्र, राशि छोड़कर)
- श्लोक २६.८–२६.९ का संयुक्त केस-ढाँचा (virūpa):
1. आधार: दृक् = ३० + (४ − x)/२
2. > २ राशि: दृक् = B + १५
3. > १ राशि: दृक् = B / २
पूर्ण विशेष दृष्टि (३री, १०वीं) और सप्तम की पूर्णता आगे/पारंपरिक पूर्ण-बिन्दुओं से जुड़ती है; यहाँ श्लोक आंशिक-मान की शाखाएँ देता है। रूप = १ (भूतसंख्या)।

उदाहरण (worked example) शनि द्रष्टा; लक्ष्य शनि से १ राशि + २०° पर (रूपाधिक, द्व्यधिक नहीं)। राशि छोड़कर: दृक् = २० ÷ २ = १० virūpa।
यदि २ राशि + ८°: द्व्यधिक शाखा (२६.८) — दृक् = ८ + १५ = २३ virūpa।

हमारा डिकोड (Our Decode) शनि की स्फुट-दृष्टि खंड-रेखीय है — exact case on rāśi-band, no tolerance. dṛg-bala में यही संख्याएँ जाती हैं; परंपरा-भेद हो तो convention घोषित कर side-by-side रखते हैं, चुपचाप नहीं बदलते।

26.10
एकभे नवभे भागा भुक्ता भोग्या द्विसंगुणाः।
द्विभेंऽशार्धोनिताः षष्टिरष्टभे खाग्नियुग्‌ लवाः
ekabhe navabhe bhāgā bhuktā bhogyā dvisaṃguṇāḥ|
dvibheṃ'śārdhonitāḥ ṣaṣṭiraṣṭabhe khāgniyug‌ lavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकभे नवभे = D की राशि-संख्या 1 (30°–60°) व 9 (270°–300°) होने पर; भागाः भुक्ता भोग्याः = भुक्त (बीते) व भोग्य (शेष) अंश; द्वि-संगुणाः = दो गुने; द्विभे = राशि-संख्या 2 (60°–90°) में; अंश-अर्ध-ऊनिताः षष्टिः = साठ में से आधे-अंश (b/2) घटाए; अष्टभे = राशि-संख्या 8 (240°–270°) में; खाग्नि-युग् लवाः = तीस (ख=0, अग्नि=3 → 30) में अंश जुड़े।

हिन्दी भावार्थ शनि (द्रष्टा) की विशेष स्फुट-दृष्टि: जहाँ अन्तर की राशि-संख्या एक हो, वहाँ भुक्त अंश दुगुने; जहाँ नौ हो, वहाँ भोग्य अंश दुगुने। राशि-संख्या दो में साठ से आधा अंश घटाओ; राशि-संख्या आठ में तीस में अंश जोड़ो। इस प्रकार शनि की दृष्टि उसके विशेष तृतीय (60°) और दशम (270°) पर पूर्ण (60) तक चढ़ती है।

English rendering For Saturn: where the sign-count of D is one, double the elapsed degrees; where nine, double the degrees yet to be traversed; in sign-count two, subtract half a degree from sixty; in sign-count eight, add the degrees to thirty.

गणित / तकनीक: खाग्नि = 30, षष्टि = 60 (स्थान-मान: अंकों की वाम-गति)। शनि-वक्र (b = अंश-भाग):
- राशि-संख्या 1 (30°–60°): दृष्टि = 2·b(भुक्त) → 60° (तृतीय) पर 60 = पूर्ण।
- राशि-संख्या 2 (60°–90°): दृष्टि = 60 − b/2 → 60°=60, 90°=45।
- राशि-संख्या 8 (240°–270°): दृष्टि = 30 + b → 240°=30, 270°=60 = पूर्ण (दशम)।
- राशि-संख्या 9 (270°–300°): दृष्टि = 2·(30 − b) [भोग्य] → 270°=60, 300°=0।

तात्पर्य: शनि की सामान्य 15-विरूप दृष्टि उसके तृतीय-दशम पर 60 (पूर्ण) हो जाती है — श्लोक 4 की विशेष-दृष्टि की अंश-स्फुट अभिव्यक्ति।

उदाहरण: शनि 10°, दृश्य 50° → D = 40° = राशि-संख्या 1, भुक्त b = 10°। दृष्टि = 2 × 10 = 20 विरूप (पूर्ण-तृतीय 60° की ओर चढ़ती हुई)।

26.11
त्रिसप्तभे तु भौमस्य षष्टिरत्र लवोनिता।
सार्धांशास्तिथिसंयुक्ता द्विभे रूपं सदाऽङ्गभे
trisaptabhe tu bhaumasya ṣaṣṭiratra lavonitā|
sārdhāṃśāstithisaṃyuktā dvibhe rūpaṃ sadā'ṅgabhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रि-सप्त-भे = तृतीय व सप्तम राशि में; भौमस्य = मंगल की; षष्टिः = ६०; अत्र = यहाँ; लव-उनिता = लव/अंश से घटी; सार्ध-अंशाः = आधे अंश; तिथि-संयुक्ताः = १५ से युक्त; द्वि-भे = द्वितीय में; रूपं = १ रूप (पूर्ण); सदा = सदैव; अङ्ग-भे = अङ्ग (भूतसंख्या = ६) राशि में

हिन्दी भावार्थ मंगल की दृष्टि में तृतीय और सप्तम राशि पर साठ में से वहाँ के अंश घटाओ। द्विभे में आधे अंशों को पंद्रह के साथ जोड़ो। अङ्गभे (६) पर सदा एक पूर्ण रूप दृष्टि मानी गई है। इस श्लोक का उत्तरार्ध अगले जीव-सूत्र से सटा हुआ है; संधि-स्थान पर पाठ-भेद संभव।

English rendering In the third and seventh for Mars, sixty is reduced by the degrees there. In the second, half the degrees plus fifteen. In the sixth (aṅga), there is always one full rūpa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भौम-दृष्टि का शेष + एक पूर्ण-बिन्दु:
- त्रिभे / सप्तभे (मंगल): दृक् = ६० − B
- द्विभे (यहाँ दी गई शाखा): दृक् = (B ÷ २) + १५
(२६.१० का द्विभे-सूत्र ६० − B/२ मंगल-पंक्ति में है; २६.११ का द्विभे = B/२ + १५ — दोनों श्लोकों में द्विभे आए; संगति के लिए इन्हें अलग शाखा/प्रसंग मानें; संधि पर पाठ-भेद संभव)
- अङ्गभे (६): दृक् = १ rūpa = ६० virūpa (सदा पूर्ण)
तिथि = १५; रूप = १; अङ्ग = ६।

उदाहरण (worked example) मंगल से तृतीय राशि में B = १०°: दृक् = ६० − १० = ५० virūpa।
द्विभे शाखा (B/२ + १५), B = १०°: दृक् = ५ + १५ = २० virūpa।
अङ्गभे: दृक् = ६० virūpa (१ rūpa)।

हमारा डिकोड (Our Decode) मंगल की दृष्टि piecewise है — प्रत्येक भे-पट्टी पर अलग सूत्र, exact `==` जाँच योग्य। dṛg-bala में यही virūpa-योग जाते हैं; फल को हम भविष्यवायी सुनिश्चितता के रूप में नहीं लिखते।

26.12
त्रिसप्तभे तु जीवस्य भागार्धं शरवेदयुक्‌।
द्विगुणैस्तु लवैश्चोनाः खरसाश्चतुरष्टभे
trisaptabhe tu jīvasya bhāgārdhaṃ śaravedayuk‌|
dviguṇaistu lavaiśconāḥ kharasāścaturaṣṭabhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिसप्तभे = राशि-संख्या 3 (90°–120°) व 7 (210°–240°); जीवस्य = बृहस्पति की; भाग-अर्धं = आधा अंश (b/2); शर-वेद-युक् = पैंतालीस (शर=5, वेद=4 → 45) में जुड़ा; द्विगुणैः लवैः ऊनाः = दुगुने अंशों (2·b) से घटा हुआ; ख-रस = साठ (ख=0, रस=6 → 60); चतुरष्टभे = राशि-संख्या 4 (120°–150°) व 8 (240°–270°)।

हिन्दी भावार्थ बृहस्पति (जीव) की विशेष स्फुट-दृष्टि: राशि-संख्या तीन व सात में आधे अंश को पैंतालीस में जोड़ो (इससे उसके पंचम 120° व नवम 240° पर पूर्ण 60 आता है)। राशि-संख्या चार व आठ में साठ में से दुगुने अंश घटाओ (जिससे पंचम-नवम की पूर्णता तेजी से उतरती है)।

English rendering For Jupiter: in sign-counts three and seven, add half the degrees to forty-five; in sign-counts four and eight, subtract twice the degrees from sixty.

गणित / तकनीक: शर-वेद = 45, ख-रस = 60 (स्थान-मान)। बृहस्पति-वक्र (b = अंश-भाग):
- राशि-संख्या 3 (90°–120°): दृष्टि = 45 + b/2 → 90°=45, 120°=60 = पूर्ण (पंचम)।
- राशि-संख्या 7 (210°–240°): दृष्टि = 45 + b/2 → 210°=45, 240°=60 = पूर्ण (नवम)।
- राशि-संख्या 4 (120°–150°): दृष्टि = 60 − 2·b → 120°=60, 150°=0।
- राशि-संख्या 8 (240°–270°): दृष्टि = 60 − 2·b → 240°=60, 270°=0।

तात्पर्य: बृहस्पति की सामान्य 30-विरूप (½) दृष्टि उसके पंचम-नवम पर 60 (पूर्ण) हो जाती है।

उदाहरण: बृहस्पति 0°, दृश्य 110° → D = 110° = राशि-संख्या 3, b = 20°। दृष्टि = 45 + 20/2 = 55 विरूप (पूर्ण-पंचम 120° की ओर)।

हमारा डिकोड: शर-वेद = 45 और ख-रस = 60 — ये भूतसंख्या स्वयं ¾ और पूर्ण के विरूप-मान बोल देती हैं, जिससे पैमाना पाठ के भीतर से ही सत्यापित होता है। ठीक यही 60-विरूप-चरम (= 1 रूप) हमारे षड्बल-इंजन के दृग्बल की सीमा है (dossier §4)।

26.13
एवं रव्यादिखेटानां स्फुटा दृष्टिः प्रजायते।
तद्वशादेव भावानां जातकस्य फलं वदेत्‌
evaṃ ravyādikheṭānāṃ sphuṭā dṛṣṭiḥ prajāyate|
tadvaśādeva bhāvānāṃ jātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; रवि-आदि-खेटानां = सूर्य आदि समस्त ग्रहों की; स्फुटा दृष्टिः = स्फुट (अंशात्मक) दृष्टि; प्रजायते = सिद्ध होती है; तद्वशात् एव = उसी के आधार पर; भावानां = भावों का; जातकस्य फलं वदेत् = जातक का फल कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार सूर्य आदि सभी ग्रहों की स्फुट दृष्टि सिद्ध होती है। शास्त्र कहता है — इसी अंश-स्फुट दृष्टि-मान के आधार पर भावों का, अर्थात् जातक का फल कहा जाना चाहिए। अर्थात् दृष्टि पहले संख्या बने, फिर उस संख्या से फल-विवेचन हो।

English rendering Thus is the exact aspect of all the planets, beginning with the Sun, established; and upon that alone one should pronounce the results of the houses for the native.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-निर्देश (उपसंहार)। पद्धति-सार: पहले द्रष्टा→दृश्य अन्तर D से विरूप-मान (0–60) निकालो (श्लोक 6–12), फिर उसे भाव-फल का भार मानो। "फल कहना चाहिए" शास्त्र का निर्देश है — किसी नियति या निश्चय का दावा नहीं।

हमारा डिकोड: यही अध्याय की अनुशासन-रेखा है (dossier §5): पहले विशुद्ध गणना (विरूप में स्फुट दृष्टि), फिर उसे व्याख्या का आधार बनाना — किन्तु फल को सदा "शास्त्र कहता है" के स्वर में, न कि निश्चित भविष्य के रूप में। यह दृष्टि-मान आगे षड्बल (अध्याय 27) के दृग्बल में सीधे प्रवेश करता है, जहाँ 60 विरूप = 1 रूप की वही इकाई चलती है।

अध्यायः 27

स्पष्टबलाध्यायः

40 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): यह अध्याय ग्रह का स्पष्टबल सिखाता है — स्थान, काल और अन्य गणितीय स्थितियों से उत्पन्न वह संख्यात्मक बल, जिससे ग्रह की सापेक्ष सामर्थ्य मापी जाती है, न कि किसी भाग्य-कथन से। पहले उच्चबल का सूत्र आता है — नीच-बिन्दु से ग्रह-देशान्तर को चक्र-शोधित कर त्रि-भाग में उच्चबल; फिर स्वत्रिकोण, स्वगेह, अधि-मित्र से अधिशत्रु तक सप्तवर्ग-स्थितियों का क्रमशः बल; होरा–द्रेष्काण–सप्तमांश–नवमांश–द्वादशांश–त्रिंशांश आदि का योग; शुक्र–चन्द्र के सम-राशि और अन्य ग्रहों के विषम-राशि अंश-बल; तथा केन्द्र–पणफर–अपोक्लिम में पूर्ण–अर्ध–पाद बल। ये खंड मिलकर स्थानबल का कंकाल बनाते हैं, और अध्याय आगे दिग्बल, कालबल, चेष्टा, नैसर्गिक तथा दृग्बल तक षड्बल-समुच्चय तक पहुँचाता है। फल यहाँ शास्त्र का मापदंड है — कितना बल “पूर्ण” माना जाए — भविष्य की निश्चित घोषणा नहीं।

For the English reader: Chapter 27 is the computational heart of planetary strength in this recension: spaṣṭa-bala, the clear measure of how much force a graha carries from place, time, motion, nature, and aspect. It opens with exact recipes — exaltation-strength from the arc off debilitation, seven-varga dignity scores, parity-of-sign strength for the luminaries and the rest, angular-house weights — and builds toward the classic sixfold sum in rūpa and virūpa. Read it as a laboratory manual, not an oracle: every rule is arithmetic; phala is what the text declares about thresholds and use, never a fate we pronounce.

मुख्य गणित/तकनीक:
- उच्चबल (ucca-bala): ग्रह-देशान्तर λ से नीच-बिन्दु λₙ घटाएँ; यदि चाप > 180° तो चक्र से शोधें (360° − चाप); फिर `U = Δ/3` — उच्च पर अधिकतम 60 विरूप = 1 रूप।
- सप्तवर्गज बल: स्वत्रिकोण → स्वगेह → अधि-मित्र → मित्र → सम → अरि → अधिशत्रु पर क्रमशः 45, 30, 20, 15, 10, 4, 2 विरूप; होरा–द्रेष्काण–सप्तमांश–नवमांश–द्वादशांश–त्रिंशांश आदि का योग।
- ओज-युग्म राशि-अंश बल: शुक्र–चन्द्र सम-राशि में, अन्य ग्रह विषम-राशि में — पाद-मात्र (¼ रूप = 15 विरूप) बल।
- केन्द्रादि बल: केन्द्र–पणफर–अपोक्लिम में क्रमशः पूर्ण–अर्ध–पाद (`1 : ½ : ¼` रूप)।
- षड्बल-समुच्चय: स्थान + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग्; इकाई 1 रूप = 60 विरूप; योग की तुलना ग्रह-निष्ठ न्यूनतम सीमा से।

डिकोड-सेतु: हमारा डिकोड इस अध्याय को षड्बल के पूर्ण गणितीय ढाँचे के रूप में पढ़ता है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप इकाई में योग, न कि भाष्य। प्रत्येक खंड नियत संख्या-नियम है; कुल बल की तुलना ग्रह-अनुसार सीमा से होती है। गणित और फल-वाक्य यहाँ स्पष्टतः अलग रखे गए हैं।

27.1
अथ स्पष्टबलं वक्ष्ये स्थानकालादिसम्भवम्‌।
नीचोनां खचरं भार्धाधिक चक्राद्‌ विशोधयेत्‌
atha spaṣṭabalaṃ vakṣye sthānakālādisambhavam‌|
nīconāṃ khacaraṃ bhārdhādhika cakrād‌ viśodhayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; स्पष्टबलम् = स्फुट/परिष्कृत बल (षड्बल का सटीक मान); वक्ष्ये = कहूँगा; स्थान-काल-आदि-सम्भवम् = स्थान, काल आदि से उत्पन्न (स्थानबल, कालबल आदि छह अंग); नीच-ऊनाम् = नीच-बिन्दु घटाकर (ग्रह-स्पष्ट − नीचांश); खचरम् = आकाशगामी ग्रह; भ-अर्ध-अधिक = यदि छह राशि (१८०°) से अधिक हो; चक्रात् विशोधयेत् = तो पूरे चक्र (१२ राशि / ३६०°) में से घटा दे।

हिन्दी भावार्थ अब मैं ग्रहों का स्पष्ट (षड्विध) बल कहता हूँ, जो स्थान-काल आदि छह स्रोतों से बनता है। सबसे पहले उच्चबल — ग्रह-स्पष्ट में से उसके नीच-बिन्दु को घटाओ; यदि शेष छह राशि (१८०°) से अधिक निकले, तो उसे बारह राशि (३६०°) में से घटाकर १८०° के भीतर ले आओ। यही आगे तीन से भाग देने योग्य कोटि है।

English rendering Now I shall expound the exact (six-fold) strength of the planets, born of place, time and the rest. First, for exaltation-strength: subtract the planet's debilitation point from its longitude; if the remainder exceeds six signs (180°), subtract it from the full circle (360°) to fold it within a half-circle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उच्चबल (Uccha-bala) का चाप-नियम:
- Δ = (ग्रह-स्पष्ट − नीच-स्पष्ट) mod 360°
- यदि Δ > 180° तो Δ ← 360° − Δ (अर्थात् नीच से दूरी को ०°–१८०° में मोड़ना)
यह Δ ही "नीच से कोणीय दूरी" है; ग्रह जितना उच्च-बिन्दु के निकट, Δ उतना १८०° के पास। अगला श्लोक इसे ÷3 करके विरूप में बदलेगा (1 रूप = 60 विरूप)।

उदाहरण (worked example) सूर्य का नीच = मेष... नहीं, सूर्य-नीच = १०° तुला = १९०°। मान लो सूर्य = २०° मिथुन = ८०°। Δ = (80 − 190) mod 360 = 250°; 250 > 180 ⇒ Δ = 360 − 250 = 110°। (अगले श्लोक में उच्चबल = 110 ÷ 3 = 36·67 विरूप।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय (Ch.27) पूरा षड्बल का है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — प्रत्येक एक निश्चित संख्यात्मक नियम, योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप)। हमारे ledger में यही "गणना, व्याख्या नहीं" के अनुशासन से पिन किया गया है: उच्चबल एक शुद्ध चाप-अंकगणित है, कोई फलकथन नहीं।

27.2
भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं लब्धमुच्चबलं भवेत्‌।
स्वत्रिकोणस्वगेहाधिमित्रमित्रसमारिषु
bhāgīkṛtya tribhirbhaktaṃ labdhamuccabalaṃ bhavet‌|
svatrikoṇasvagehādhimitramitrasamāriṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भागीकृत्य = अंश (डिग्री) में बदलकर; त्रिभिः भक्तम् = तीन से भाग देने पर; लब्धम् = भजनफल; उच्चबलम् भवेत् = वही उच्चबल होता है (विरूप में); स्व-त्रिकोण = अपना मूलत्रिकोण; स्व-गेह = अपना क्षेत्र (स्वराशि); अधिमित्र = परम मित्र; मित्र = मित्र; सम = समभाव; अरिषु = शत्रु राशियों में।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की दूरी को अंशों में लेकर तीन से भाग दो — जो लब्ध आए वही उच्चबल है (अधिकतम ६० विरूप = १ रूप, जब ग्रह ठीक उच्च-बिन्दु पर हो)। इसके बाद स्थानबल का दूसरा अंग सप्तवर्गज बल आता है, जिसके लिए ग्रह की मर्यादा—मूलत्रिकोण, स्वक्षेत्र, अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु—गिनी जाती है।

English rendering Reduce that arc to degrees and divide by three; the quotient is the exaltation-strength (up to 60 virūpas, i.e. one rūpa, when the planet stands on its exaltation point). Next follow the dignities — own-trine, own-house, great-friend, friend, neutral, enemy — by which the sign-based strength is graded.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- उच्चबल = Δ° ÷ 3 विरूप, 0 ≤ Δ ≤ 180° ⇒ 0 ≤ उच्चबल ≤ 60 विरूप = 1 रूप।
- सप्तवर्गज (स्थानबल) की मर्यादा-कोटियाँ अवरोही क्रम में (श्लोक ३ में मान): मूलत्रिकोण > स्वक्षेत्र > अधिमित्र > मित्र > सम > शत्रु > अधिशत्रु।

उदाहरण (worked example) श्लोक 27.1 का Δ = 110° ⇒ उच्चबल = 110 ÷ 3 = 36·67 विरूप (≈ 0·61 रूप)। यदि Δ = 180° (ग्रह ठीक उच्च पर) ⇒ 180 ÷ 3 = 60 विरूप = 1 रूप (पूर्ण उच्चबल)। Δ = 0° (ठीक नीच पर) ⇒ 0।

हमारा डिकोड (Our Decode) "÷3 से रूप-विरूप" यही षड्बल-इंजन की आधार-इकाई है (1 रूप = 60 विरूप, dossier §4)। हमने इसे व्याख्या-रहित शुद्ध गणना के रूप में रखा है — मान एक सूत्र से निकलता है, उसकी कोई "भविष्यवाणी" नहीं।

27.3
अधिशत्रुगृहे चापि स्थितानां क्रमशो बलम्‌।
भूताब्धयः खाग्निनखास्तिथ्यो दश युगाः कराः
adhiśatrugṛhe cāpi sthitānāṃ kramaśo balam‌|
bhūtābdhayaḥ khāgninakhāstithyo daśa yugāḥ karāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधिशत्रु-गृहे च अपि = और अधिशत्रु की राशि में भी; स्थितानाम् = स्थित ग्रहों का; क्रमशः बलम् = क्रम से बल; भूत-अब्धयः = भूत(5)·अब्धि(4) → 45; ख-अग्नि = ख(0)·अग्नि(3) → 30; नखाः = नख(20) → 20 (पाठ-भेद संभव); तिथ्यः = 15; दश = 10; युगाः = युग(4); कराः = कर(2)।

हिन्दी भावार्थ मूलत्रिकोण से लेकर अधिशत्रु-गृह तक स्थित ग्रह को क्रमशः घटता हुआ बल मिलता है। इस अवरोही श्रेणी के मान भूतसंख्या में दिए गए हैं — शीर्ष दो स्पष्टतः ४५ (मूलत्रिकोण) और ३० (स्वक्षेत्र) पढ़े जाते हैं; नीचे की कोटियों के अंक-पद इस पाठ में विवादास्पद हैं।

English rendering For planets placed from own-trine down to a great-enemy's house, strength decreases in order. The graded values are given as word-numerals; the top two read clearly as 45 (own-trine) and 30 (own-house), the lower terms being textually uncertain in this recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सप्तवर्गज बल — प्रति वर्ग, ग्रह की मर्यादा के अनुसार विरूप:
| मर्यादा | इस पाठ का शब्द-अंक | प्रचलित वल्गेट श्रेणी |
|---|---|---|
| मूलत्रिकोण | भूत-अब्धि = 45 | 45 |
| स्वक्षेत्र | ख-अग्नि = 30 | 30 |
| अधिमित्र | नख = 20 (?) | 22½ |
| मित्र | तिथि = 15 | 15 |
| सम | दश = 10 (?) | 7½ |
| शत्रु | युग = 4 (?) | 3¾ |
| अधिशत्रु | कर = 2 (?) | 1⅞ |

शीर्ष-दो (45, 30) और मित्र (15) दोनों पाठों में एक; शेष कोटियों में पाठ-भेद संभव (वल्गेट में क्रमिक अर्धीकरण 22½ → 7½ → 3¾ → 1⅞)। भूतसंख्या "अङ्कानां वामतो गतिः" से पढ़ी गई (भूत=5, अब्धि=4 ⇒ इकाई 5, दहाई 4 = 45)।

उदाहरण (worked example) मान लो गुरु — D1 स्वक्षेत्र (30), D2 मित्र (15), D3 सम (7½), D7 अधिमित्र (22½), D9 मूलत्रिकोण (45), D12 शत्रु (3¾), D30 मित्र (15)। सप्तवर्गज बल = 30+15+7½+22½+45+3¾+15 = 138¾ विरूप ≈ 2·31 रूप।

हमारा डिकोड (Our Decode) dossier का अनुशासन यहाँ सीधे लागू है — जहाँ पाठ-भेद हो वहाँ दोनों श्रेणियाँ साथ-साथ रखो, चुनी हुई परिपाटी घोषित करो, मौन धारणा मत बनाओ। जैसे अष्टकवर्ग में BPHS बनाम फलदीपिका का "9" खुले [HUMAN]-कन्वेंशन के रूप में रखा गया, वैसे ही ये नीच-कोटि-मान खुले पाठभेद हैं, गुप्त चयन नहीं।

27.4
एवं होरादृकाणाद्रिभागांकद्वादशांशजम्‌।
त्रिंशांशजं तदैक्यञ्च सप्तवर्गसमुद्‌भवम्‌
evaṃ horādṛkāṇādribhāgāṃkadvādaśāṃśajam‌|
triṃśāṃśajaṃ tadaikyañca saptavargasamud‌bhavam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी रीति से; होरा = D2 (होरा); दृकाण/द्रेष्काण = D3; अद्रि-भाग = अद्रि(७) → सप्तांश D7; अंक = अंक(९) → नवांश D9; द्वादशांश = D12; त्रिंशांशजम् = D30 से उत्पन्न; तत्-ऐक्यम् = उनका योग; च = और; सप्तवर्ग-समुद्भवम् = सात वर्गों से उत्पन्न (सप्तवर्ग-बल)।

हिन्दी भावार्थ राशि की भाँति होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश — इन वर्गों में भी ग्रह की गरिमा (स्व/मित्र/शत्रु आदि) देखकर वही क्रम-बल लगाया जाए। इन सातों से प्राप्त बलों का योग सप्तवर्ग-समुद्भव बल कहलाता है। यह स्थान-बल का वर्ग-स्तम्भ है — सोलह वर्गों का पूर्ण षोडश-वर्ग नहीं, अपितु बल-शास्त्र की सप्त-संविदा।

English rendering Apply the same dignity measures in the horā, drekkāṇa, saptāṃśa, navāṃśa, dvādaśāṃśa, and triṃśāṃśa. The sum of the seven contributions is sapta-varga strength — the sevenfold divisional component of positional strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
सप्त वर्ग: D1 (राशि), D2 (होरा), D3 (द्रेष्काण), D7 (सप्तांश), D9 (नवांश), D12 (द्वादशांश), D30 (त्रिंशांश)।
प्रत्येक वर्ग v में गरिमा-सूचकांक d(v) ∈ {४५, ३०, २०, १५, १०, ४, २} (श्लोक २७.३)।
B_saptavarga = Σ<sub>v∈S7</sub> d(v)
अधिकतम सैद्धान्तिक: ७ × ४५ = ३१५ विरूप (यदि सातों में मूलत्रिकोण); व्यवहार में दुर्लभ।
वर्ग-मानचित्र: प्रत्येक D-नियम ३०° राशि का समान चाप-विभाजन + कथित मानचित्र — मॉड्यूलर अंकगणित (λ पर)।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी ग्रह के सात वर्गों में गरिमा-बल:
D1: ४५, D2: १५, D3: ३०, D7: १०, D9: ४५, D12: २०, D30: ४।
B_saptavarga = ४५+१५+३०+१०+४५+२०+४ = १६९ विरूप।
(संविदा: Wikisource/BPHS गरिमा-अंक; D-नियम इंजन का मानक विभाजन।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग (D1…D60) इंजन में ये सात बल-वर्ग उसी मॉड्यूलर विभाजन से निकलते हैं। सप्तवर्ग-बल = सात स्वतंत्र गरिमा-मूल्यांकनों का योग — व्याख्या नहीं, योग। Ch.6 के पूर्ण सोलह से यह सूची संकुचित है; बल-अध्याय की संविदा यही सात है।

27.5
शुक्रेन्दू समभांशेऽन्ये विषमेऽङ्‌घ्रिमितं बलम्‌।
केन्द्रादिषुस्थिताः खेटाः पूर्णाऽर्धाऽङ्‌घ्रिमितं क्रमात्‌
śukrendū samabhāṃśe'nye viṣame'ṅ‌ghrimitaṃ balam‌|
kendrādiṣusthitāḥ kheṭāḥ pūrṇā'rdhā'ṅ‌ghrimitaṃ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्र-इन्दू = शुक्र और चन्द्र; सम-भ-अंशे = सम (युग्म/स्त्री) राशि व अंश में; अन्ये = शेष ग्रह; विषमे = विषम (ओज/पुरुष) राशि-अंश में; अङ्घ्रि-मितम् बलम् = चरण-मात्र बल = ¼ रूप = 15 विरूप; केन्द्र-आदिषु स्थिताः खेटाः = केन्द्र/पणफर/आपोक्लिम में स्थित ग्रह; पूर्ण-अर्ध-अङ्घ्रि-मितम् क्रमात् = क्रम से पूर्ण, अर्ध, चरण।

हिन्दी भावार्थ शुक्र और चन्द्र यदि सम (स्त्री) राशि-नवांश में हों, तथा शेष ग्रह विषम (पुरुष) राशि-नवांश में हों, तो प्रत्येक को चरण-मात्र (¼ रूप = 15 विरूप) ओज-युग्म बल मिलता है। साथ ही केन्द्र में स्थित ग्रह को पूर्ण (60), पणफर में आधा (30), आपोक्लिम में चरण (15) विरूप केन्द्रादि-बल मिलता है।

English rendering Venus and the Moon in an even (feminine) sign and navāṃśa, and the other planets in an odd (masculine) one, each gain a quarter-rūpa (15 virūpas). Planets in an angle, succedent, or cadent house receive full, half, and quarter strength respectively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्थानबल-अंग:
- ओज-युग्म बल: शुक्र, चन्द्र (सम राशि व सम नवांश में) → 15 विरूप प्रत्येक स्थान से; अन्य ५ ग्रह (विषम राशि व विषम नवांश में) → 15 विरूप। (अङ्घ्रि = ¼ रूप = 15 विरूप)
- केन्द्रादि बल: केन्द्र (1,4,7,10) = 60 विरूप (पूर्ण); पणफर (2,5,8,11) = 30 विरूप (अर्ध); आपोक्लिम (3,6,9,12) = 15 विरूप (अङ्घ्रि)।

उदाहरण (worked example) चन्द्र वृषभ (सम राशि) में व सम नवांश में ⇒ ओज-युग्म से 15 + 15 = 30 विरूप। यदि वही चन्द्र 4थे भाव (केन्द्र) में ⇒ केन्द्रादि से 60 विरूप। मंगल 11वें (पणफर) में ⇒ 30 विरूप।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूर्ण/अर्ध/चरण = 60/30/15 विरूप — रूप-विरूप की सीढ़ी (1 रूप = 60 विरूप, dossier §4) पर ठीक ½ और ¼ के पड़ाव। यह भाव-वर्गीकरण (केन्द्र/पणफर/आपोक्लिम) पर पूर्णतः deterministic है, कोई व्याख्या नहीं।

27.6
आद्यमध्यावसानेषु द्रेष्काणेषु स्थिताः क्रमात्‌।
पुंनपुंसकयोषाख्या दद्युरङ्‌घ्रिमितं बलम्‌
ādyamadhyāvasāneṣu dreṣkāṇeṣu sthitāḥ kramāt‌|
puṃnapuṃsakayoṣākhyā dadyuraṅ‌ghrimitaṃ balam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आद्य-मध्य-अवसानेषु = आदि, मध्य, अन्त में; द्रेष्काणेषु = तीन द्रेष्काणों में; स्थिताः = स्थित; क्रमात् = क्रम से; पुं-नपुंसक-योषा-आख्या = पुं (सूर्य, मंगल, गुरु), नपुंसक (बुध, शनि), योषा/स्त्री (चन्द्र, शुक्र) संज्ञक; दद्युः = दें; अङ्घ्रि-मितम् बलम् = १५ विरूप बल।

हिन्दी भावार्थ द्रेष्काण-बल में ग्रह अपने स्वभाव के अनुरूप द्रेष्काण-खण्ड में अङ्घ्रि-मात्र बल देता है — पुं-ग्रह आदि द्रेष्काण में, नपुंसक मध्य में, स्त्री-संज्ञक अन्तिम में। तीनों द्रेष्काण प्रत्येक राशि के ०°–१०°, १०°–२०°, २०°–३०° हैं। यह स्थान-बल का द्रेष्काण-स्तम्भ है।

English rendering Male, neuter, and female planets, when placed respectively in the first, middle, and last drekkāṇa of a sign, yield quarter-measure strength (15 virūpas).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
राशि में द्रेष्काण-खण्ड:
Drek₁ = [०°, १०°), Drek₂ = [१०°, २०°), Drek₃ = [२०°, ३०°)
वर्ग: पुं = {सूर्य, मंगल, गुरु}; नपुंसक = {बुध, शनि}; योषा = {चन्द्र, शुक्र}।
B_drek = १५ विरूप यदि
(पुं ∧ λ_in_sign ∈ Drek₁) ∨ (नपुंसक ∧ ∈ Drek₂) ∨ (योषा ∧ ∈ Drek₃);
अन्यथा ०।
(राहु-केतु इस श्लोक-सूची में नहीं — पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) गुरु वृषभ ७° पर → आदि-द्रेष्काण, पुं-ग्रह ⇒ B_drek = १५ विरूप।
शुक्र सिंह २५° पर → अन्त-द्रेष्काण, योषा ⇒ १५।
शुक्र सिंह ५° पर → आदि-द्रेष्काण, योषा नहीं ⇒ ०।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्थान-बल के घटक — उच्च, सप्तवर्ग, होरा, केन्द्र, द्रेष्काण — योगात्मक नियम हैं; प्रत्येक विरूप में। षड्बल-योग में ये स्थान-स्तम्भ दिक्-काल-चेष्टा-नैसर्गिक-दृग् से जुड़ते हैं। हम घटक अलग-अलग `==` से बाँधते हैं, फिर योग करते हैं।

27.7
सूर्यात्‌ कुजात्‌ सुखं जीवाज्ज्ञाच्चाऽस्तं लग्नमार्क्रितः।
दशमं च भृगोश्चन्द्राद्‌ हित्वा षड्‌भाधिके सति
sūryāt‌ kujāt‌ sukhaṃ jīvājjñāccā'staṃ lagnamārkritaḥ|
daśamaṃ ca bhṛgoścandrād‌ hitvā ṣaḍ‌bhādhike sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यात् कुजात् = सूर्य और मंगल से; सुखम् = चतुर्थ भाव (दुर्बल दिग्-बिन्दु); जीवात् ज्ञात् = गुरु और बुध से; अस्तम् = सप्तम; लग्नम् अर्क्रितः = शनि से लग्न; दशमम् च भृगोः चन्द्रात् = शुक्र और चन्द्र से दशम; हित्वा = छोड़कर/शोधकर; षड्-भ-अधिके सति = छह राशि (१८०°) से अधिक होने पर (द्वादश से घटाएँ)।

हिन्दी भावार्थ यह दिक्-बल की गणना-विधि है। सूर्य-मंगल की देशान्तर से सुख-भाव (४) की राशि घटाएँ; गुरु-बुध से अस्त (७); शनि से लग्न (१); शुक्र-चन्द्र से दशम (१०)। यदि शेष छह राशियों से अधिक हो तो बारह राशियों में से घटाएँ। शोधित चाप ही दिक्-बल का आधार है — पूर्ण बल उस दिशा में जहाँ ग्रह अपने सबल भाव पर हो (सूर्य-मंगल दशम/दक्षिण, गुरु-बुध लग्न/पूर्व, शनि सप्तम/पश्चिम, शुक्र-चन्द्र चतुर्थ/उत्तर)।

English rendering For dig-bala, subtract the fourth-house cusp from the longitudes of the Sun and Mars, the seventh from Jupiter and Mercury, the ascendant from Saturn, and the tenth from Venus and the Moon. If the remainder exceeds six signs, take it from twelve. That corrected arc is the basis of directional strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
दुर्बल-दिग् भाव (बल-हीन दिशा = सबल के विपरीत):
सूर्य, मंगल → ४; गुरु, बुध → ७; शनि → १; शुक्र, चन्द्र → १०।
Δ = λ_graha − λ_cusp(weak) (०°…३६०° में लायें)
यदि Δ > १८०° (षड्भ) तो Δ′ = ३६०° − Δ, अन्यथा Δ′ = Δ
Δ′ ∈ [०°, १८०°]।
B_dig (विरूप) = Δ′ ÷ ३
(क्योंकि १८०° → ६० विरूप = १ रूप पूर्ण दिक्-बल।)
सबल भाव पर: सूर्य/मंगल दशम, गुरु/बुध लग्न, शनि सप्तम, शुक्र/चन्द्र चतुर्थ ⇒ Δ′ = १८०° ⇒ B_dig = ६०।
भाव-कुण्डली संविदा (स्थान-लग्न/श्रीपति आदि) घोषित करनी चाहिए — कुस्प λ उसी से।

उदाहरण (worked example) लग्न = ०° मेष; दशम-कुस्प ≈ ०° मकर = २७०°; चतुर्थ = ०° कर्क = ९०°; सप्तम = ०° तुला = १८०° (समान-भाव मानकर)।
सूर्य λ = २७०° (दशम पर): Δ = २७०° − ९०° = १८०° ⇒ B_dig = १८० ÷ ३ = ६० विरूप।
सूर्य λ = ९०° (चतुर्थ/दुर्बल): Δ = ९०° − ९०° = ०° ⇒ B_dig = ०।
गुरु λ = ०° (लग्न): Δ = ०° − १८०° → १८०° ⇒ B_dig = ६०।

हमारा डिकोड (Our Decode) दिक्-बल षड्बल का दूसरा स्तम्भ है — स्थान के बाद। सूत्र शुद्ध चाप-अनुपात है; दिशा-फल शास्त्र का कथन है, हमारे द्वारा भावी घटना का दावा नहीं। इकाई वही: विरूप, १ रूप = ६०; जाँच सटीक समानता पर।

27.8
चक्राद्‌ विशोध्य तद्‌भागास्त्रिभिर्भक्ताश्च दिग्‌बलम्‌।
इष्टाधटि निशीथात्तन्नतं त्रिंशच्च्युतं नतम्‌
cakrād‌ viśodhya tad‌bhāgāstribhirbhaktāśca dig‌balam‌|
iṣṭādhaṭi niśīthāttannataṃ triṃśaccyutaṃ natam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चक्र = पूर्ण वृत्त / ३६०° संदर्भ; विशोध्य = घटाकर; तद्-भागाः = वे अंश (दिग्-बिन्दु से चाप); त्रिभिर्भक्ताः = ३ से भागित; दिग्-बलम् = दिशा-बल (virūpa में); इष्ट-आघटी = जन्म/क्षण की इष्ट घटिका; निशीथात् = अर्धरात्रि से; नतम् = नत (मध्याह्न/मध्यरात्रि से दूरी); त्रिंशत्-च्युतम् = ३० से घटाया हुआ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दिग्बल की गणना में ग्रह के उन अंशों को चक्र-संदर्भ से शोधकर जो शेष भाग मिलता है, उसे तीन से भागने पर दिग्बल प्राप्त होता है। नत के लिए इष्ट घटियों को अर्धरात्रि से गिनो — वही नत है; और जहाँ आवश्यक हो, तीस घटियों से घटाकर नत लें। यह दिशा-बल तथा काल-बल के नत-अंग का गणितीय द्वार है।

English rendering The text states that dig-bala is obtained by taking the relevant arc (after reduction from the circle-frame) and dividing those degrees by three. Nata is the iṣṭa-ghaṭī count from midnight; where needed, nata is also taken as thirty minus that measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
Dig-bala (virūpa): each graha has a dig-strength locus (classical assignment in this adhyāya’s system: Guru–Budha → lagna/east; Sūrya–Maṅgala → 10th/south; Śani → 7th/west; Candra–Śukra → 4th/north). Let Δ = shorter arc from that dig-point to the planet (0° ≤ Δ ≤ 180°). Then
dig-bala = (180° − Δ) ÷ 3 (virūpas; max 60 = 1 rūpa at Δ = 0°; 0 at Δ = 180°).
Nata (for subsequent nata-bala): if I = iṣṭa ghaṭīs from local midnight (0 ≤ I < 60 in a 60-ghaṭī day-frame),
nata = I if I ≤ 30; nata = 30 − (I − 30) = 60 − I when the complement form is required (verse: त्रिंशच्च्युतं नतम्).
Convention: local true midnight / local civil day-frame as used for kāla-bala; house cusps for dig-loci follow the house system declared for the chart (whole-sign vs. bhāva-madhya changes Δ).

उदाहरण (worked example) Planet at dig-point + 45° (Δ = 45°).
dig-bala = (180 − 45) ÷ 3 = 135 ÷ 3 = 45 virūpas (= 0.75 rūpa).
Iṣṭa from midnight = 22 ghaṭīs → nata = 22. If iṣṭa = 38 ghaṭīs → nata = 60 − 38 = 22 (same nata by the 30-complement path).

हमारा डिकोड (Our Decode) Ṣaḍbala Ch.27 is treated as six independent numeric components (sthāna, dig, kāla, ceṣṭā, naisargika, dṛg), each summed in rūpa/virūpa with 1 rūpa = 60 virūpas. Dig-bala here is pure arc arithmetic — exact ÷3 on the dig-offset — not an interpretive “direction feeling.” We keep the formula pinned with declared house-locus convention, never a tolerance band on the virūpa total.

---

27.9
चन्द्रभौमशनीनां च नतं द्विघ्नं कलादिकम्‌।
षष्टिशुद्धं तदन्येषां सदा रूपं बुधस्य हि
candrabhaumaśanīnāṃ ca nataṃ dvighnaṃ kalādikam‌|
ṣaṣṭiśuddhaṃ tadanyeṣāṃ sadā rūpaṃ budhasya hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र-भौम-शनीनाम् = चन्द्र, मङ्गल, शनि; नतं द्विघ्नम् = नत का द्विगुण; कलादिकम् = कला आदि इकाई तक; षष्टि-शुद्धम् = ६० से शोधित (६० − x); तद्-अन्येषाम् = शेष ग्रहों का; सदा रूपम् = सदैव एक रूप; बुधस्य = बुध का।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र, मङ्गल और शनि का नत-बल नत को दुगुना करके (कला-आदि क्रम में) लिया जाता है। अन्य ग्रहों के लिए वही मान साठ से घटाया जाता है। बुध का यह बल सदैव पूर्ण एक रूप माना गया है। यह कालगत नत-अंग का स्पष्ट संख्या-नियम है।

English rendering The text states that for the Moon, Mars, and Saturn, nata-bala is twice the nata (in kalā-ādi measure). For the remaining planets that quantity is subtracted from sixty. Mercury always receives a full rūpa of this strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) With nata in ghaṭīs (0…30),
N = 2 × nata (virūpas; at nata = 30, N = 60).
• Candra, Maṅgala, Śani: nata-bala = N
• Sūrya, Guru, Śukra: nata-bala = 60 − N
• Budha: nata-bala = 60 (1 rūpa) always.
Units: virūpas; 60 virūpas = 1 rūpa.

उदाहरण (worked example) nata = 18 ghaṭīs → N = 2 × 18 = 36.
Moon/Mars/Saturn → 36 virūpas; Sun/Jupiter/Venus → 60 − 36 = 24 virūpas; Mercury → 60 virūpas.

हमारा डिकोड (Our Decode) Kāla-bala’s nata limb is ratio arithmetic on the day-frame, not a weather metaphor. The engine stores it as exact virūpas with the 2×nata / 60−N / Budha=60 triple, then sums into total ṣaḍbala against per-planet thresholds — computation first, phala later and only as the text’s voice.

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27.10
अथ पक्षबलं वक्ष्ये सूर्ये चन्द्राद्‌ विशोध्य च।
षड्‌भाधिके विशोध्यार्काद्‌ भागीकृत्त्य त्रिभिर्भजेत्‌
atha pakṣabalaṃ vakṣye sūrye candrād‌ viśodhya ca|
ṣaḍ‌bhādhike viśodhyārkād‌ bhāgīkṛttya tribhirbhajet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ पक्षबलम् वक्ष्ये = अब पक्षबल कहता हूँ; सूर्ये चन्द्रात् विशोध्य च = चन्द्र में से सूर्य घटाकर (चन्द्र-स्पष्ट − सूर्य-स्पष्ट = अन्तर/elongation); षड्भ-अधिके = यदि छह राशि से अधिक; विशोध्य अर्कात् = चक्र में से घटाकर मोड़; भागीकृत्य त्रिभिः भजेत् = अंशों में लेकर तीन से भाग दे।

हिन्दी भावार्थ अब पक्षबल — चन्द्र-स्पष्ट में से सूर्य-स्पष्ट घटाओ (यह उनका अन्तर = तिथि/पक्ष-दूरी है); यदि यह अन्तर छह राशि (१८०°) से अधिक हो तो चक्र में से घटाकर १८०° के भीतर मोड़ लो; फिर अंशों को तीन से भाग दो।

English rendering Now the fortnight-strength: subtract the Sun from the Moon (their elongation); if this exceeds six signs, fold it within the circle; then reduce to degrees and divide by three.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पक्षबल का आधार-चाप:
- E = (चन्द्र-स्पष्ट − सूर्य-स्पष्ट) mod 360° ; यदि E > 180° ⇒ E ← 360 − E
- मूल-मान = E° ÷ 3 विरूप (0 ≤ E ≤ 180° ⇒ 0–60 विरूप)
शुक्ल पक्ष में E → 180° (पूर्णिमा) ⇒ मूल-मान → 60; कृष्ण पक्ष/अमावस्या में E → 0 ⇒ 0। (सौम्य-पाप विभाजन अगले श्लोक में।)

उदाहरण (worked example) चन्द्र = 200°, सूर्य = 50° ⇒ E = 150° (≤180, मोड़ अनावश्यक) ⇒ मूल-मान = 150 ÷ 3 = 50 विरूप।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ भी वही "चाप ÷ 3" साँचा (उच्च/दिग्/पक्ष सब एक)। elongation (चन्द्र − सूर्य) ठीक वही राशि है जिस पर विंशोत्तरी की तिथि/पक्ष-गणना टिकती है — शुद्ध कोणीय अंकगणित, dossier §3–§4 की गणना-प्रधान परिपाटी के अनुरूप।

27.11
पक्षजं बलमिन्दुज्ञशुक्रेज्यानां तु षष्टितः।
विशोध्य तब्दलं ज्ञेनं पापानां पक्षसंभवम्‌
pakṣajaṃ balamindujñaśukrejyānāṃ tu ṣaṣṭitaḥ|
viśodhya tabdalaṃ jñenaṃ pāpānāṃ pakṣasaṃbhavam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पक्षजं बलम् = पक्ष से उत्पन्न बल; इन्दु-ज्ञ-शुक्र-इज्यानाम् = चन्द्र, बुध, शुक्र, गुरु; षष्टितः विशोध्य = ६० से घटाकर; तत्-बलम् = वह बल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; पापानाम् = पाप ग्रहों का; पक्ष-संभवम् = पक्ष से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्व-श्लोक से प्राप्त पक्षज बल चन्द्र, बुध, शुक्र और गुरु को उसी रूप में दिया जाता है। पाप ग्रहों (सूर्य, मङ्गल, शनि) के लिए साठ में से वही मान घटाकर पक्षबल गिना जाता है। एक ही चाप-संख्या दो वर्गों में पूरक-रूप से बँटती है।

English rendering The text assigns the computed pakṣa strength to the Moon, Mercury, Venus, and Jupiter; for the malefics, that value is subtracted from sixty to yield their pakṣa-bala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let P = E ÷ 3 from 27.10 (0…60 virūpas).
• Candra, Budha, Śukra, Guru: pakṣa-bala = P
• Sūrya, Maṅgala, Śani (pāpa): pakṣa-bala = 60 − P
(Full Moon: benefics 60, malefics 0; New Moon: reverse.)

उदाहरण (worked example) P = 50.
Moon/Mercury/Venus/Jupiter → 50 virūpas; Sun/Mars/Saturn → 60 − 50 = 10 virūpas.

हमारा डिकोड (Our Decode) Pakṣa-bala is another exact limb of kāla-bala inside ṣaḍbala: elongation ÷ 3, then a 60-complement split by graha class. We compute P with modular longitudes and `==` on the virūpa result; no soft band that could hide a one-unit error.

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27.12
दिनत्र्यंशेषु सौम्यार्कशनीनां निट्‌त्रिभागके।
चन्द्रशुक्रकुजानां च बलं पूर्णं सदा गुरोः
dinatryaṃśeṣu saumyārkaśanīnāṃ niṭ‌tribhāgake|
candraśukrakujānāṃ ca balaṃ pūrṇaṃ sadā guroḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिन-त्र्यंशेषु = दिन के तीन भागों में; सौम्य-अर्क-शनीनाम् = बुध, सूर्य, शनि; निट्-त्रिभागके = रात्रि के त्रिभाग में; चन्द्र-शुक्र-कुजानाम् = चन्द्र, शुक्र, मङ्गल; बलं पूर्णम् = पूर्ण बल; सदा गुरोः = गुरु का सदैव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दिन को तीन अंशों में बाँटने पर उन त्र्यंशों में क्रमशः बुध, सूर्य और शनि को पूर्ण बल मिलता है। रात्रि के तीन भागों में चन्द्र, शुक्र और मङ्गल को पूर्ण बल कहा गया है। गुरु का यह त्रिभाग-बल सदा पूर्ण रहता है। यह कालगत त्रिभाग-अंग का स्वामी-नियम है।

English rendering The text states that in the three thirds of the day, Mercury, the Sun, and Saturn (respectively) receive full strength; in the three thirds of the night, the Moon, Venus, and Mars. Jupiter always has full strength in this measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Divide local day (sunrise→sunset) into 3 equal parts; night (sunset→sunrise) into 3 equal parts. Tribhāga-bala = 60 virūpas (1 rūpa) for the lord of the current third; 0 for others (except Guru).
Day thirds (in order): 1 → Budha, 2 → Sūrya, 3 → Śani.
Night thirds (in order): 1 → Candra, 2 → Śukra, 3 → Maṅgala.
Guru: tribhāga-bala = 60 always.
Convention: true local sunrise/sunset for the birth place; equal time-thirds (not equal rāśi arcs).

उदाहरण (worked example) Day length 12 h → each day-third = 4 h. Birth 2 h after sunrise → 1st day-third → Budha = 60, Sūrya = Śani = 0 on this limb; Guru still 60. Night birth in 2nd night-third → Śukra = 60.

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27.13
वषमासदिनेशानां तिथ्यस्त्रिंशच्छरार्णवां।
होरेशस्य बलं षष्टिरुक्तं नैसर्गिकं पुरा
vaṣamāsadineśānāṃ tithyastriṃśaccharārṇavāṃ|
horeśasya balaṃ ṣaṣṭiruktaṃ naisargikaṃ purā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ष-मास-दिन-ईशानाम् = वर्षेश, मासेश, दिनेश; तिथ्यस् / त्रिंशत् / शर-अर्णवाः = (पाठ) ३० तथा शरार्णव = ४५; होरेशस्य = होरा-स्वामी का; बलं षष्टिः = बल ६०; उक्तं नैसर्गिकम् पुरा = नैसर्गिक बल पहले कहा जा चुका।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र वर्ष, मास और दिन के ईशों का बल संख्या में बाँधता है — यहाँ त्रिंशत् (३०) और शरार्णव (शर = ५, अर्णव = ४ → ४५, दाएँ-से-बाएँ अंक) स्पष्ट हैं; वर्षेश का १५ वाला मान समान्तर पाठ में प्रसिद्ध है (पाठ-भेद संभव: “तिथ्यस्” बनाम “पञ्चदश”)। होरेश का बल साठ कहा गया है। नैसर्गिक बल का उल्लेख “पहले” के रूप में इस श्लोक में स्मरण मात्र है।

English rendering The text assigns fixed virūpa strengths to the lords of the year, month, and day — thirty and forty-five are explicit via त्रिंशत् and शरार्णव (bhūtasaṃkhyā 45); the year-lord’s fifteen is the usual parallel reading (पाठ-भेद संभव). The hora-lord receives sixty. Naisargika bala was already stated earlier.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Abda–māsa–dina–horā bala (virūpas), standard Ch.27 package:
वर्षेश (varṣa-lord) = 15 (parallel recension; this line’s first numeral is textually soft — पाठ-भेद संभव)
मासेश = 30 (त्रिंशत्)
दिनेश = 45 (शरार्णवाः = 45)
होरेश = 60 (षष्टिः)
These add into kāla-bala for the planets that hold those lordships at the epoch (year/month/weekday/hora of birth). Naisargika is deferred to the next verse’s explicit 60/7 ladder (or the earlier statement the text alludes to).

उदाहरण (worked example) Birth on a Tuesday in the Sun’s hora, with Mars as dineśa and Venus as horeśa: Maṅgala gains +45 (dina), Śukra +60 (horā); varṣa/māsa lords add +15 / +30 to their grahas when those lords are fixed for the calendar epoch used.

हमारा डिकोड (Our Decode) Ṣaḍbala’s kāla stack is a sum of named numeric limbs (nata, pakṣa, tribhāga, abda/māsa/dina/horā, etc.). We pin each constant the verse states — 30, 45, 60 — with bhūtasaṃkhyā decoded digit-faithfully, and flag recension soft spots instead of silently “fixing” them.

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27.14
तन्मानां सप्तहृत्‌षष्टिरेकाद्येकोत्तरैर्हता।
शमंबुगुशुचंरादिखेटानां क्रमतो द्विज
tanmānāṃ saptahṛt‌ṣaṣṭirekādyekottarairhatā|
śamaṃbuguśucaṃrādikheṭānāṃ kramato dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-मानाम् = उस (नैसर्गिक) मान की; सप्त-हृत्-षष्टिः = ६० ÷ ७; एक-आदि एक-उत्तरैः हता = १, २, ३… से क्रमशः गुणित; श-मं-बु-गु-शु-चं-र-आदि खेटानाम् = शनि, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र, रवि; क्रमतः = क्रम से; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नैसर्गिक बल का मान यों देता है — साठ को सात से भागकर जो इकाई मिले, उसे एक से आरम्भ कर एक-एक बढ़ाते गुणकों से क्रमशः गुणा करें। वह क्रम शनि से मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र होते हुए रवि तक है। यह ग्रहों का स्वाभाविक बल-सीढ़ी है, दृष्टि या स्थान से स्वतन्त्र।

English rendering The text states naisargika bala as sixty divided by seven, multiplied in order by one, two, three, and so on, for the planets beginning Saturn, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, Moon, and the Sun, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
Unit u = 60 ÷ 7 virūpas.
Naisargika bala (virūpas), multiplier k = 1…7 in order श-मं-बु-गु-शु-चं-र:
| Graha | k | Bala |
| Śani | 1 | 60/7 ≈ 8.571… |
| Maṅgala | 2 | 120/7 ≈ 17.143… |
| Budha | 3 | 180/7 ≈ 25.714… |
| Guru | 4 | 240/7 ≈ 34.286… |
| Śukra | 5 | 300/7 ≈ 42.857… |
| Candra | 6 | 360/7 ≈ 51.429… |
| Ravi | 7 | 420/7 = 60 |
Exact form preferred: keep as (60 × k) / 7 virūpas (or rūpa = k/7). No chart longitude enters — pure naisarga constants.

उदाहरण (worked example) Venus naisargika = (60 × 5) / 7 = 300/7 virūpas ≈ 42.857; Sun = 60 virūpas = 1 rūpa. Sum with other five balas only after each limb is computed on its own rule.

हमारा डिकोड (Our Decode) Naisargika bala is the cleanest ṣaḍbala limb: fixed 60/7 ladder, exact rational, zero ephemeris dependency. In the ṣaḍbala decode we keep fractions as (60×k)/7 until the final rūpa sum, and compare totals to stated thresholds with exact checks — mathematics separated from any phala reading of “inherent greatness.”

27.15
पञ्चाब्धयः सुराः सूर्याः खण्डकांशाः क्रमादमी।
सायनग्रहदोराशितुल्यखण्डयुतिश्च स
pañcābdhayaḥ surāḥ sūryāḥ khaṇḍakāṃśāḥ kramādamī|
sāyanagrahadorāśitulyakhaṇḍayutiśca sa

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चाब्धयः = भूतसंख्यया ४५ (पञ्च=५, अब्धि=४; अङ्कानां वामतो गतिः); सुराः = ३३ (त्रयस्त्रिंशत् सुराः); सूर्याः = १२; खण्डकांशाः = सारणी-खण्डों के अंश (क्रमागत चाप-खण्ड); क्रमाद् अमी = ये क्रमशः; सायन-ग्रह = सायन (क्रान्तिवृत्तीय/अयनांश-युक्त) ग्रह-देश; दोराशि-तुल्य = दोरा (चाप-खण्ड/भाग) के तुल्य; खण्ड-युतिः = उन खण्डों का योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अयन-बल की गणना के लिए तीन क्रमागत खण्ड-अंश बताता है — पञ्चाब्धयः, सुराः, सूर्याः — अर्थात् ४५, ३३ और १२ अंश। इनका योग ९०° है, जो विषुव से अयन (कर्क/मकर) तक के एक चतुर्थांश-चाप का मान है। सायन ग्रह की स्थिति जिस दोरा/अंश-खण्ड में पड़े, उस खण्ड तक का योग लेकर आगे की प्रक्रिया चलाई जाती है।

English rendering The text lists the successive segmental arcs (khaṇḍāṃśas) for ayana-bala as forty-five, thirty-three, and twelve degrees. One then takes the sum of those segments that correspond to the sāyana planet’s arc-portion (dora).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
खण्ड-चाप (क्रमशः):
k₁ = ४५°, k₂ = ३३°, k₃ = १२°
Σ kᵢ = ९०° (विषुव → अयन चतुर्थांश)।
सायन-देश λ_sāyana से ०°–९०° चतुर्थांश में दोरा निकालकर, उतने पूर्ण खण्डों का योग S₀; शेष भाग पर २७.१६ का प्रक्षेप।
(अयनांश-सम्प्रदाय घोषित करें — सायन-देश अयनांश पर निर्भर है।)

उदाहरण (worked example)
मान लें सायन-देश का चतुर्थांश-अंश D = ५२° (विषुव से मापा)।
पूर्ण खण्ड: ४५° → S₀ = ४५°; शेष = ५२ − ४५ = ७° अगले खण्ड (३३°) में।
(आगे भाग×एष्य/३० का जोड़ २७.१६ में।)
सम्प्रदाय: कोई भी स्थिर अयनांश (उदा. लाहिरी) — संख्या अयनांश बदलने पर बदलती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अयन-बल षड्बल (अध्याय २७) का एक घटक है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् बल के योग में। डिकोड-अनुशासन: बल-इकाई रूप/विरूप (१ रूप = ६० विरूप) में गणितीय नियम से; फल-भाषा से अलग।

27.16
भागादिकहतादेष्यात्‌ त्रिंशल्लब्धयुता लवाः।
स्वमृणं तुलमेषादौ शनीन्द्वोश्च त्रिराशिषु
bhāgādikahatādeṣyāt‌ triṃśallabdhayutā lavāḥ|
svamṛṇaṃ tulameṣādau śanīndvośca trirāśiṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भागादि = अंश-कला आदि शेष भाग; हता = गुणित; एष्यात् = आने वाले/शेष खण्ड से; त्रिंशत् = ३०; लब्ध = भागफल; युता = युक्त; लवाः = अंश (परिणाम); स्वम् ऋणम् = धन (+) अथवा ऋण (−); तुला-मेषादौ = तुला और मेष से आरम्भ; शनि-इन्द्वोः = शनि और चन्द्र; त्रि-राशिषु = तीन-तीन राशियों में।

हिन्दी भावार्थ पूर्ण खण्ड-योग पर शेष भाग को अगले (एष्य) खण्ड से गुणा कर तीस से भाग दें; लब्ध को योग में जोड़कर लव (अंश) मिलते हैं — यह सारणी-प्रक्षेप का नियम है। शनि और चन्द्र के लिए मेषादि तीन राशियों तथा तुलादि तीन राशियों में धन-ऋण का नियम अलग से लगता है (स्वम् / ऋणम्)। आगे के श्लोक में अन्य ग्रहों का व्यत्यय बताया गया है।

English rendering Multiply the residual degrees (and so on) by the forthcoming segment, divide by thirty, and add the quotient to the segment-sum to obtain the arc in degrees. For Saturn and the Moon, treat the result as positive or negative according to the triads of signs beginning from Aries and from Libra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
शेष अंश b (० ≤ b < खण्ड-चाप kₑ), एष्य-खण्ड kₑ:
Δ = (b × kₑ) ÷ ३०
L = S₀ + Δ (लवाः)
शनि/चन्द्र: मेष–मिथुन तथा तुला–धनु आदि त्रिराशि-खण्डों में L को धन या ऋण चिह्न से लें (पाठ के “स्वमृणम्” नियमानुसार; सम्पूर्ण चिह्न-तालिका २७.१७ से जुड़ती है)।
३० = एक राशि का अंश-मान — प्रक्षेप का हर।

उदाहरण (worked example)
२७.१५ से: S₀ = ४५°, b = ७°, kₑ = ३३°।
Δ = (७ × ३३) ÷ ३० = २३१ ÷ ३० = ७.७°
L = ४५ + ७.७ = ५२.७°
यदि ग्रह चन्द्र/शनि हो और राशि-त्रिक ऋण-पक्ष में हो, तो L → −५२.७° (चिह्न २७.१७ के साथ पूर्ण)।

27.17
तथाऽरार्केज्यशुक्राणां व्यस्तं ज्ञस्य सदा धनम्‌।
तद्‌भागाश्च त्रिभिर्भक्ता ज्ञेयमायनजं बलम्‌
tathā'rārkejyaśukrāṇāṃ vyastaṃ jñasya sadā dhanam‌|
tad‌bhāgāśca tribhirbhaktā jñeyamāyanajaṃ balam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = वैसे ही; अरार्केज्यशुक्राणां = अर (मङ्गल), अर्क (सूर्य), इज्य (गुरु), शुक्र के लिए (उत्तर-क्रान्ति में धन); व्यस्तं = विपरीत (शनि व चन्द्र हेतु); ज्ञस्य सदा धनम् = बुध का सदा धन (+); तद्भागाः = वे अंश; त्रिभिर्भक्ताः = तीन से भाजित; ज्ञेयम् आयनजं बलम् = यही अयन-जनित बल जानो।

हिन्दी भावार्थ मङ्गल, सूर्य, गुरु और शुक्र के लिए उत्तर-क्रान्ति धन (बल-वर्धक) होती है, शनि व चन्द्र के लिए यह उलटी होती है, और बुध के लिए क्रान्ति सदैव धन ही मानी जाती है। इस प्रकार निकाले गए क्रान्ति-अंशों को तीन से भाग देने पर जो लब्धि मिले, वही ग्रह का अयन-बल है।

English rendering For Mars, Sun, Jupiter and Venus northern declination is additive; for Saturn and the Moon it is reversed; and for Mercury it is always additive. Divide the resulting declination-degrees by three — that is the ayana strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अयन-बल (विरूप) = (90 ± δ) ÷ 3, जहाँ 90 = क्रान्ति-आधार (24° × 3·75), δ श्लोक 16 का चिह्नित मान। यह शास्त्रीय सूत्र अयन-बल = (24° ± δ)/48 रूप के तुल्य है (क्योंकि 90/3 = 24×1·25 = 30 विरूप तटस्थ, अधिकतम 180/3 = 60 विरूप)। चिह्न: सूर्य/मङ्गल/गुरु/शुक्र — उत्तर +; चन्द्र/शनि — विपरीत; बुध — सदा +। घोषित परिपाटी: सायन (निरयन नहीं) देशान्तर; क्रान्ति गणित-मॉडल से।

उदाहरण (worked example) सूर्य सायन 60° (मिथुनादि): δ* = 45 + 33 = 78, चिह्न + → अयन-बल = (90 + 78)/3 = 168/3 = 56 विरूप। स्वतंत्र जाँच: δ ≈ 20·6°, (24 + 20·6)/48 = 0·929 रूप = 55·75 विरूप — मेल।

हमारा डिकोड (Our Decode) अयन-बल हमारे षड्बल-इंजन (अ.27) का वह घटक है जहाँ इकाई (विरूप) और परिपाटी (सायन देशान्तर, क्रान्ति-मॉडल) की घोषणा अनिवार्य है — क्योंकि यहाँ हर अंक इन्हीं पर टिका है। हमारी अनुशासन-रेखा यही कहती है: गणित (क्रान्ति, ÷3) को व्याख्या से अलग रखो, और सहनशीलता-पट्टी के बिना ठीक मान पर तुलना करो।

27.18
यद्रवेरायनं वीर्यं चेष्टाख्यं तावदेव हि।
विधोः पक्षबलं यावत्‌ तावच्चेष्टाबलं स्मृतम्‌
yadraverāyanaṃ vīryaṃ ceṣṭākhyaṃ tāvadeva hi|
vidhoḥ pakṣabalaṃ yāvat‌ tāvacceṣṭābalaṃ smṛtam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत् रवेः आयनं वीर्यम् = जो सूर्य का अयन-बल/वीर्य; चेष्टाख्यम् = चेष्टा नामक बल; तावद् एव हि = उतना ही; विधोः = चन्द्र का; पक्षबलम् = पक्ष-बल (शुक्ल/कृष्ण पक्षीय बल); यावत् = जितना; तावत् चेष्टाबलम् = उतना चेष्टा-बल; स्मृतम् = कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य और चन्द्र की चेष्टा का सरल समीकरण देता है। सूर्य का चेष्टा-बल उसके आयन-बल के बराबर माना जाता है; चन्द्र का चेष्टा-बल उसके पक्ष-बल के बराबर। तारा-ग्रहों की चेष्टा आगे गति-भेद (२७.२१ आदि) से जुड़ती है; यहाँ केवल रवि-चन्द्र का नियम है।

English rendering Whatever ayana-strength the Sun has, that same amount is called its ceṣṭā-bala. Whatever pakṣa-bala the Moon has, that same is remembered as its ceṣṭā-bala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
B_ceṣṭā(Sun) = B_ayana(Sun)
B_ceṣṭā(Moon) = B_pakṣa(Moon)
पक्ष-बल (संदर्भ-नियम, इकाई रूप/विरूप में): शुक्ल/कृष्ण पक्ष में चन्द्र-बल का मानक षड्बल-लेख; अधिकतम प्रायः १ रूप-स्तर पर सम्प्रदायबद्ध।
सूर्य की चेष्टा = उसकी अयन-गणना (२७.१५–१७) — अलग सारणी नहीं।

उदाहरण (worked example)
यदि B_ayana(Sun) = १८ विरूप (मान), तो B_ceṣṭā(Sun) = १८ विरूप।
यदि B_pakṣa(Moon) = ४० विरूप (पूर्णिमा-समीप पक्ष-बल का मान), तो B_ceṣṭā(Moon) = ४० विरूप।
(वास्तविक पक्ष-बल सूत्र पूर्व श्लोक-क्रम/सम्प्रदाय से लें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) चेष्टा षड्बल के छह स्तम्भों में से एक है। रवि-चन्द्र के लिए यह श्लोक चेष्टा को अयन/पक्ष पर निष्ठापूर्वक प्रतिचित्रित करता है — शुद्ध समता, कोई अतिरिक्त “रहस्य-गुणक” नहीं; exact-`==` अनुशासन यही माँगता है: जो अयन/पक्ष निकला, वही चेष्टा।

27.19
पापदृक्‌पादहीनं तच्छुभदृक्‌पादयुक्‌ तथा।
बलैक्यं ज्ञेज्यदृक्‌युक्तमेवं खेटबलं भवेत्‌
pāpadṛk‌pādahīnaṃ tacchubhadṛk‌pādayuk‌ tathā|
balaikyaṃ jñejyadṛk‌yuktamevaṃ kheṭabalaṃ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-दृक् = पाप-ग्रह की दृष्टि; पाद-हीनम् = पाद (चतुर्थांश/आंशिक दृष्टि-मान) से हीन; तत् = वह (बल); शुभ-दृक् = शुभ-ग्रह की दृष्टि; पाद-युक् = पाद से युक्त; तथा = उसी प्रकार; बल-ऐक्यम् = बलों का योग/एकत्र; ज्ञ = बुध; इज्य = गुरु; दृक्-युक्तम् = दृष्टि से युक्त; एवम् = इस प्रकार; खेट-बलम् = ग्रह-बल; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दृग्-बल का चिह्न-नियम कहता है — पाप-दृष्टि के पाद से बल घटे, शुभ-दृष्टि के पाद से बढ़े। बलों का ऐक्य, बुध और गुरु की दृष्टि के योग के साथ, इस प्रकार खेट-बल के रूप में सिद्ध होता है। यह षड्बल-समुच्चय की ओर संकेत है: अलग-अलग बल-अंगों का योग, दृष्टि-संशोधन सहित।

English rendering Reduce the strength by the pādas of malefic aspects and increase it by the pādas of benefic aspects. The unity (sum) of the strengths, joined with the aspects of Mercury and Jupiter, thus becomes the planet’s (total) strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
दृग्-बल (संक्षेप):
B_dṛg = Σ (śubha-dṛṣṭi × pāda-weight) − Σ (pāpa-dṛṣṭi × pāda-weight)
पाद = दृष्टि का आंशिक मान (पूर्ण सप्तम आदि पर पूर्ण; विशेष दृष्टि/आंशिक पर पाद-अनुपात — गृह-दृष्टि सम्प्रदाय घोषित करें)।
कुल खेट-बल (षड्बल-योग, पाठ-स्वर):
B_total ≈ B_sthāna + B_dig + B_kāla + B_ceṣṭā + B_naisargika + B_dṛg
(ज्ञ-इज्य-दृक्-युक्त = शुभ-दृष्टि पक्ष में बुध-गुरु का विशेष उल्लेख)।
गणितीय सूत्र फल नहीं — बल-संकलन नियम है।

उदाहरण (worked example)
मान लें किसी खेट पर शुभ-दृष्टि योगदान = +१२ विरूप, पाप-दृष्टि = −८ विरूप ⇒ B_dṛg = +४ विरूप।
अन्य पाँच बल-योग = २२० विरूप हो तो B_total = २२४ विरूप ≈ ३ रूप + ४४ विरूप (१ रूप = ६० विरूप)।
दृष्टि-सम्प्रदाय (पूर्ण/आंशिक पाद) बदलने पर B_dṛg बदलेगा — सम्प्रदाय लिखें।

हमारा डिकोड (Our Decode) दृग् बल षड्बल का छठा स्तम्भ है; डिकोड में यह संख्यात्मक दृष्टि-भार है, “दृष्टि से भाग्य तय” जैसी भाषा नहीं। कुल बल की तुलना प्रति-ग्रह देहली से गणना-स्तर पर होती है — व्याख्या अलग परत।

27.20
अथ तारग्रहाणां तु युद्ध्यतोश्च द्वयोर्मिथः।
बलान्तरं विजेतुः स्वं निर्जितस्य बले त्वृणम्‌
atha tāragrahāṇāṃ tu yuddhyatośca dvayormithaḥ|
balāntaraṃ vijetuḥ svaṃ nirjitasya bale tvṛṇam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; तार-ग्रहाणाम् = तारा-ग्रहों का (रवि-चन्द्र से भिन्न — मंगल से शनि आदि); तु = ही; युद्ध्यतोः = युद्ध करते हुए; द्वयोः मिथः = दो के परस्पर; बल-अन्तरम् = बल का अन्तर; विजेतुः स्वम् = विजेता का अपना (धन); निर्जितस्य = पराजित के; बले तु ऋणम् = बल में ऋण।

हिन्दी भावार्थ जब दो तारा-ग्रह परस्पर युद्ध में हों, शास्त्र बल-अन्तर का लेख विजेता और पराजित में बाँटता है। बल-अन्तर विजेता को स्व (धनात्मक योग) होता है; निर्जित के बल में वही अन्तर ऋण लिखा जाता है। यह ग्रह-युद्ध की बल-लेखांकन विधि है — युद्ध-निर्णय (देशान्तर/वक्र आदि) पूर्व-सिद्ध मानकर।

English rendering When two star-planets are in mutual combat, the difference of their strengths becomes the victor’s own (addition), and a debt (subtraction) in the strength of the vanquished.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
तारग्रह युग्म i, j युद्ध में; विजेता v, पराजित d;
ΔB = |Bᵢ − Bⱼ|
B′_v = B_v + ΔB
B′_d = B_d − ΔB (ऋणम्)
(युद्ध-परिभाषा — समान राशि/निकट देश, रवि-चन्द्र वर्जित — इस श्लोक में नहीं; केवल बल-अन्तर का चिह्न-नियम।)
गणितीय सूत्र: बल-संशोधन; फल-कथन नहीं।

उदाहरण (worked example)
मंगल B = २८० विरूप, शुक्र B = २५० विरूप, मंगल विजेता।
ΔB = ३० विरूप
B′_Mars = २८० + ३० = ३१०
B′_Venus = २५० − ३० = २२०
(युद्ध का तथ्य और विजेता-निर्णय अलग सम्प्रदाय/स्थिति से सिद्ध हों।)

27.21
चक्रानुवक्रा विकला मन्दा मन्दतरा समा।
चरा चाऽतिचरा चेति ग्रहाणामष्टधा गतिः
cakrānuvakrā vikalā mandā mandatarā samā|
carā cā'ticarā ceti grahāṇāmaṣṭadhā gatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चक्र = चक्र-गति (सीधी/पूर्ण चक्रीय गति-भेद का एक भेद); अनुवक्रा = अनुवक्र; विकला = विकल (मन्द/स्थिर-समीप); मन्दा = मन्द; मन्दतरा = मन्दतर; समा = सम; चरा = चर (शीघ्र); अतिचरा = अतिचर; अष्टधा = आठ प्रकार की; गतिः = गति; ग्रहाणाम् = ग्रहों की।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रहों की गति को आठ भेदों में बाँटता है — चक्र, अनुवक्र, विकला, मन्दा, मन्दतरा, समा, चरा और अतिचरा। यही अष्टविध गति आगे तारा-ग्रहों के चेष्टा-बल की नींव है: प्रत्येक गति-वर्ग का अपना बल-मान (वीर्य) शास्त्र-परम्परा में नियत होता है। यह श्लोक वर्गीकरण है; संख्यात्मक वीर्य-सारणी इसी अध्याय के अगले क्रम में आती है।

English rendering Planetary motion is eightfold: cakra, anuvakra, vikala, mandā, mandatara, samā, carā, and aticarā. These are the eight gaits of the planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
गति-वर्ग G ∈ {चक्र, अनुवक्र, विकला, मन्दा, मन्दतरा, समा, चरा, अतिचरा}
निर्धारण: ग्रह की दैनिक गति μ (°/दिन) और वक्र/मार्गी अवस्था से — सीमा-मान सम्प्रदायबद्ध (पाठ-भेद संभव)।
चेष्टा-बल (तारग्रह) = f(G) — इस श्लोक में f के संख्या-मान नहीं; केवल अष्टधा वर्गीकरण।
रवि-चन्द्र की चेष्टा २७.१८ से; तारग्रह-चेष्टा गति-वर्ग से।

उदाहरण (worked example)
यदि मंगल मार्गी और μ ≈ सम-गति सीमा में → G = समा।
यदि μ ऋणात्मक (वक्र) → प्रायः वक्र/अनुवक्र वर्ग (चक्रानुवक्र-शृंखला में; नामकरण-पाठ में “चक्र” का ठीक अर्थ पाठ-भेद संभव)।
संख्यात्मक B_ceṣṭā(G) तभी जब अगली वीर्य-तालिका/सम्प्रदाय नियत हो — यहाँ केवल वर्ग-नाम।

हमारा डिकोड (Our Decode) चेष्टा-बल षड्बल का गति-स्तम्भ है; अष्टधा गति = वर्गीकरण की कुंजी, फिर वर्ग→विरूप का नियत मान। डिकोड-विधि: पहले G का exact निर्धारण, फिर बल; सहिष्णुता-पट्टी से गति-वर्ग छिपाना नहीं — `==` अनुशासन यहीं भी लागू।

27.22
षष्टिर्वक्रगते वीर्यमनुवक्रगतेर्दलम्‌।
पादो विकलभुक्तेः स्यात्‌ तथा मध्यगतेर्दलम्‌
ṣaṣṭirvakragate vīryamanuvakragaterdalam‌|
pādo vikalabhukteḥ syāt‌ tathā madhyagaterdalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्टिः = ६० (वीर्य-इकाई / विरूप); वक्रगते = वक्र-गति में; वीर्यम् = बल; अनुवक्रगतेः = अनुवक्र-गति का; दलम् = आधा; पादः = चतुर्थांश; विकलभुक्तेः = विकल-भुक्ति (स्थिर/निश्चेष्ट-समीप गति) का; मध्यगतेः = मध्य-गति का; दलम् = आधा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चेष्टा-बल की पहली गति-श्रेणियाँ गिनवाता है। वक्र-गति में ग्रह को पूर्ण षष्टि (६०) वीर्य मिलता है। अनुवक्र-गति में उसका आधा। विकल-भुक्ति में पाद (चौथाई)। मध्य-गति में फिर आधा—अर्थात् मध्य-गति वक्र जितनी नहीं, अनुवक्र के समकक्ष मानी गई है। यह कथन फल नहीं, गति-अवस्था से बल-माप का नियम है।

English rendering The text assigns sixty units of motional strength in retrograde (vakra) motion; half of that in anuvakra; a quarter in vikala-bhukti; and half again in mean (madhya) motion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चेष्टा-बल (गति-अवस्था से), इकाई = विरूप (१ रूप = ६० विरूप)। आधार-पूर्ण = ६०।
• वक्र = ६०
• अनुवक्र = ६० × १/२ = ३०
• विकल-भुक्ति = ६० × १/४ = १५
• मध्य-गति = ६० × १/२ = ३०
(यह गति-नामों की सूची २७.२३ में पूरी होती है; सूर्य-चन्द्र की चेष्टा अलग सूत्रों से।)

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल स्पष्टतः वक्र है → चेष्टा-बल = ६० विरूप = १ रूप। यदि वही ग्रह अनुवक्र-संज्ञा में हो → ३० विरूप = ½ रूप। विकल-भुक्ति में → १५ विरूप = ¼ रूप। मध्य-गति में → ३० विरूप। (सम्मेलन: रूप/विरूप विभाजन शास्त्रीय; अयनांश यहाँ लागू नहीं—यह गति-संज्ञा पर निर्भर है, न कि स्पष्ट-देशान्तर पर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक षड्बल के चेष्टा-अंग का गति-तालिका अंश है। डिकोड-डोजियर में षड्बल को स्थान-दिक्-काल-चेष्टा-नैसर्गिक-दृग्—छह घटकों का योग (रूप/विरूप में) माना गया है; यहाँ चेष्टा का “गति-अवस्था” मार्ग खुलता है। गणित को फल से अलग रखकर `==` अनुशासन से इकाइयाँ ज्यों-की-त्यों बाँधी जाती हैं।

27.23
पादो मन्दगतेस्तस्य दलं मन्दतरस्य हि।
चरभुक्तेस्तु पादोनां दलं स्यादतिचारिणः
pādo mandagatestasya dalaṃ mandatarasya hi|
carabhuktestu pādonāṃ dalaṃ syādaticāriṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पादः = चतुर्थांश; मन्दगतेः = मन्द-गति का; तस्य दलम् = उसका आधा; मन्दतरस्य = मन्दतर-गति का; चरभुक्तेः = चर-भुक्ति (शीघ्र/द्रुत गति) का; पादोन-दलम् = पादोन × दल (पाठानुसार); अतिचारिणः = अतिचारि (अति-द्रुत) का—वही मान।

हिन्दी भावार्थ मन्द-गति में बल पाद (चौथाई) कहा गया; मन्दतर में उसी पाद का आधा। चर-भुक्ति और अतिचारि—दोनों के लिए “पादोनं दलम्” पद आता है। शब्दार्थ से यह आधा-में-पाद-कमी का गुणन है; कुछ पाठान्तर चर को पादोन (¾) और अतिचारि को दल (½) अलग बाँटते हैं—यहाँ पाठ-भेद संभव, इसलिए दोनों पढ़तें साथ रखनी चाहिए।

English rendering Slow motion takes a quarter; very slow takes half of that quarter. For fast (cara) motion—and likewise for the over-swift (aticārin)—the text gives the measure called pādona-dala (a quarter-reduced half of the full sixty).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) २७.२२ के ६० पर जारी:
• मन्द-गति = ६० × १/४ = १५
• मन्दतर = १५ × १/२ = ७½
• चर / अतिचारि — शाब्दिक “पादोन-दल”: ६० × (½) × (¾) = ६० × ⅜ = २२½
पाठ-भेद संभव: कई प्रचलित षड्बल-सारणियाँ चर = ४५ (= षष्टि-पादोन) और अतिचारि = ३० (= दल) देती हैं; इस विकिस्रोत-पाठ का संयुक्त पद दोनों को एक ही “पादोन-दल” से बाँधता है। कुल आठ गति-संज्ञाएँ (२७.२२–२३): वक्र ६०, अनुवक्र ३०, विकल १५, मध्य ३०, मन्द १५, मन्दतर ७½, चर २२½ (या ४५), अतिचारि २२½ (या ३०)।

उदाहरण (worked example) बृहस्पति मन्द-गति → चेष्टा = १५ विरूप। मन्दतर → ७.५ विरूप। यदि चर-भुक्ति और शाब्दिक पादोन-दल अपनाएँ → २२.५ विरूप; यदि पाठ-भेद वाली ४५/३० सारणी अपनाएँ → चर ४५, अतिचारि ३०। दोनों में सम्मेलन घोषित करना अनिवार्य—मिश्रण से `==` टूटता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल-इंजन में चेष्टा-घटक को “कथन → संख्या” की एक ही तालिका से बाँधना पड़ता है। पाठ-भेद यहाँ खुला `[HUMAN]`-जैसा विकल्प है: विकिस्रोत-शब्द बनाम प्रचलित सारणी— चुनी हुई सारणी फिक्स्चर में पिन हो, सहिष्णुता-पट्टी से छिपाई न जाए।

27.24
मध्यमस्फुटयोगार्धहीनं स्वस्वचलोच्चकम्‌।
षड्‌भाधिकं च्युतं चक्राच्चेष्टाकेन्द्रं स्मृतं कुजात्‌
madhyamasphuṭayogārdhahīnaṃ svasvacaloccakam‌|
ṣaḍ‌bhādhikaṃ cyutaṃ cakrācceṣṭākendraṃ smṛtaṃ kujāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यम = मध्यम-ग्रह (माध्य देशान्तर); स्फुट = स्पष्ट-ग्रह; योग = योग; अर्ध = आधा; हीनम् = जिसमें से घटाया गया / घटाकर; स्वस्वचलोच्चकम् = अपना-अपना चलोच्च (शीघ्रोच्च); षड्भ-अधिकम् = छह भाव/राशि से अधिक; च्युतम् चक्रात् = चक्र (१२ राशि / ३६०°) से घटाया हुआ; चेष्टाकेन्द्रम् = चेष्टा-केन्द्र; स्मृतम् कुजात् = मंगल से (अर्थात् कुजादि ग्रहों के लिए)।

हिन्दी भावार्थ कुज से आरम्भ कर जिन ग्रहों की चेष्टा-केन्द्र-विधि कही गई, उनका सूत्र यह है: मध्यम और स्पष्ट का योग mona आधा निकालो; उससे (या उसमें से) स्व-शीघ्रोच्च का अन्तर लो—यही चेष्टा-केन्द्र। यदि वह छह राशि से अधिक हो तो पूरे चक्र से घटाकर लघु केन्द्र रखो। यह कोण-माप है, फल-कथन नहीं।

English rendering For the planets from Mars onward, the motional kenḍra (ceṣṭā-kendra) is formed from each planet’s own śīghrocca reduced against half the sum of its mean and true longitudes; if that arc exceeds six signs, it is taken as the complement from the full circle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कुज, बुध, गुरु, शुक्र, शनि (कुजात्—पाठानुसार):
\[
K_0 = \bigl|\; U_{\ ent{śīghra}} - \tfrac{M + S}{2}\;\bigr|
\]
जहाँ \(M\) = मध्यम-देशान्तर, \(S\) = स्पष्ट-देशान्तर, \(U\) = स्व-शीघ्रोच्च।
यदि \(K_0 > ६\) राशि \(= १८०°\), तो
\[
K = ३६०° - K_0 \quad\text{(अथवा १२ राशि − }K_0\text{)}
\]
अन्यथा \(K = K_0\)। \(K\) ही चेष्टा-केन्द्र (०°…१८०°)।
(सूर्य-चन्द्र की चेष्टा-केन्द्र विधि भिन्न—मन्दोच्च/कक्ष्या-सम्बन्धी; यह श्लोक कुजात् है।)

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल: \(M = १२०°\), \(S = १२८°\), शीघ्रोच्च \(U = २००°\)।
\((M+S)/2 = १२४°\)।
\(K_0 = |२००° - १२४°| = ७६° < १८०°\) → चेष्टा-केन्द्र \(K = ७६°\)।
यदि \(K_0 = २१०°\) होता → \(K = ३६०° - २१०° = १५०°\)।
(सम्मेलन: देशान्तर एक ही अयनांश/सौरांश-ढाँचे में; शीघ्रोच्च उसी युग-गणना से।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल का चेष्टा-अंग यहाँ शुद्ध कोण-अंकगणित बनता है—मॉड्यूलर पूरक १८०° के ऊपर। इंजन में \(M,S,U\) के स्रोत (एफेमेरिस/कर्ण) घोषित रहें; केन्द्र की डिग्री बाद के “÷३” नियम (२७.२५) से विरूप बनती है।

27.25
भागीकृतं त्रिभिर्भक्तं लब्धं चेष्टाबलं त्विति।
स्थानदिक्कालदृक्‌चेष्टानिसर्गोत्थं च षड्‌विधम्‌
bhāgīkṛtaṃ tribhirbhaktaṃ labdhaṃ ceṣṭābalaṃ tviti|
sthānadikkāladṛk‌ceṣṭānisargotthaṃ ca ṣaḍ‌vidham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भागीकृतम् = अंश/डिग्री में किया हुआ; त्रिभिः भक्तम् = तीन से विभाजित; लब्धम् = प्राप्त फल; चेष्टाबलम् = चेष्टा-बल; स्थान = स्थान-बल; दिक् = दिक्-बल; काल = काल-बल; दृक् = दृग्-बल; चेष्टा = चेष्टा-बल; निसर्ग = नैसर्गिक-बल; षड्विधम् = छह प्रकार का।

हिन्दी भावार्थ चेष्टा-केन्द्र को अंशरूप में लेकर तीन से भाग दो—लब्ध ही चेष्टा-बल है। फिर शास्त्र समेटता है: ग्रह-बल छह विध का योग है—स्थान, दिक्, काल, दृक्, चेष्टा और निसर्ग से उत्पन्न। यही षड्बल का नाम-सूत्र है।

English rendering Reduce the motional kenḍra to degrees and divide by three; the quotient is ceṣṭā-bala. Planetary strength as a whole is sixfold: from position, direction, time, aspect, motion, and inherent nature.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
\[
\text{चेष्टा-बल (विरूप)} = (K^\circ)/(3)
\]
जहाँ \(K\) = चेष्टा-केन्द्र (०°…१८०°)। अधिकतम: \(१८०/३ = ६०\) विरूप = १ रूप।
षड्बल योग:
\[
B_{\ ent{ṣaḍ}} = B_{\ ent{sth}} + B_{\ ent{dig}} + B_{\ ent{kāla}} + B_{\ ent{dṛg}} + B_{\ ent{ceṣṭā}} + B_{\ ent{nais}}
\]
(प्रत्येक घटक विरूप/रूप में; १ रूप = ६० विरूप। ग्रह-वार न्यूनतम/तुलना-सीमाएँ आगे के स्पष्ट-बल विवेचन में।)

उदाहरण (worked example) २७.२४ के उदाहरण से \(K = ७६°\) → चेष्टा-बल = \(७६/३ = २५(1)/(3)\) विरूप ≈ २५.३३ विरूप (Exact fraction: २२८/९)। यदि \(K = १८०°\) → ६० विरूप = १ रूप पूर्ण।
मान लें छहों अंग (काल्पनिक पूर्ण-योग): स्थान ५० + दिक् ३० + काल ४० + दृग् २० + चेष्टा \(२५(1)/(3)\) + निसर्ग ६० → योग \(२२५(1)/(3)\) विरूप ≈ \(३\) रूप \(४५(1)/(3)\) विरूप। (तुलना-सीमा ग्रह-भेद से; यहाँ केवल योग-प्रक्रिया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) डोजियर का षड्बल-खंड इन्हीं छह नामों को computational units मानता है—स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्—रूप/विरूप में योग, प्रति-ग्रह सीमा से तुलना। चेष्टा का `K÷३` exact-`==` योग्य नियम है; सहिष्णुता-पट्टी यहाँ भी बग-छिपाऊ है।

27.26
एवं ग्रहबलं प्रोक्तमथ भावबलं श्रृणु।
कन्यायुग्मतुलाकुम्भचापाद्यार्धाश्च सप्तमम्‌
evaṃ grahabalaṃ proktamatha bhāvabalaṃ śrṛṇu|
kanyāyugmatulākumbhacāpādyārdhāśca saptamam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं ग्रहबलं प्रोक्तम् = इस प्रकार ग्रह-बल कहा गया; अथ भावबलं शृणु = अब भाव-बल सुनो; कन्या = कन्या राशि; युग्म = मिथुन; तुला = तुला; कुम्भ = कुम्भ; चापाद्यार्ध = धनु का प्रथम अर्ध; च सप्तमम् = और सातवाँ (पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ ग्रह-बल (षड्बल) का वर्णन यहाँ पूर्ण हुआ; अब भाव-बल आरम्भ होता है। इसके साथ शीर्षोदय-प्रकार की राशियों की सूची प्रारम्भ होती है — कन्या, मिथुन, तुला, कुम्भ, धनु का पूर्वार्ध (आगे श्लोक 28+ में यह प्रसंग विस्तृत होता है)। 'सप्तमम्' पद में पाठ-भेद संभव।

English rendering Thus the planetary strength has been described; now hear the bhāva (house) strength. Virgo, Gemini, Libra, Aquarius, the first half of Sagittarius, and the seventh … (the sign-list for house strength here begins).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संक्रमण एवं सूची (ग्रह-बल का उपसंहार, भाव-बल का उपक्रम)। यहाँ गिनाई राशियाँ (कन्या, मिथुन, तुला, कुम्भ, धनु-पूर्वार्ध) आगे के भाव-बल/शीर्षोदय-प्रसंग की भूमिका हैं, जिनका दिन/रात्रि-आधारित बल श्लोक 31 में स्पष्ट होता है। पाठ-भेद संभव: 'च सप्तमम्' का अन्वय हमारे बैच के बाहर के श्लोकों पर निर्भर है, अतः पूर्ण सूची यहाँ स्थिर नहीं की जा सकती।

27.27
गोऽजसिंहमृगाद्यार्धचापान्त्यार्धात्‌ सुखं त्यजेत्‌।
कर्कवृश्चिकतो लग्नं मृगात्यार्धाज्झषाश्च खम्‌
go'jasiṃhamṛgādyārdhacāpāntyārdhāt sukhaṃ tyajet|
karkavṛścikato lagnaṃ mṛgātyārdhājjhaṣāśca kham
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गो = वृषभ; अज = मेष; सिंह; मृगाद्यार्ध = मकर का पूर्वार्ध; चापान्त्यार्ध = धनु का उत्तरार्ध; (एतेभ्यः) सुखं त्यजेत् = (इनके लिए) सुख अर्थात् चतुर्थ भाव छोड़े; कर्कवृश्चिकतः = कर्क और वृश्चिक के लिए; लग्नम् = लग्न (छोड़े); मृगान्त्यार्धात् = मकर के उत्तरार्ध से; झषाः च = और मीन के लिए; खम् = "ख" अर्थात् दशम भाव।

हिन्दी भावार्थ स्पष्ट-बल अध्याय का यह पद राशि-स्वभाव (चतुष्पद, जलचर, कीट) के अनुसार भाव-बल-गणना में छोड़े जाने वाले भाव का नियम देता है — वृषभ, मेष, सिंह, मकर-पूर्वार्ध और धनु-उत्तरार्ध (चतुष्पद वर्ग) के लिए चतुर्थ भाव छोड़ा जाए; कर्क और वृश्चिक के लिए लग्न; मकर-उत्तरार्ध और मीन (जलचर) के लिए दशम। "त्यजेत्" का ठीक प्रयोग आसपास के भाव-बल-श्लोकों की प्रक्रिया में बँधता है — पाठ-भेद संभव; यहाँ सारणी को शब्दशः रखा गया है।

English rendering For Vṛṣabha, Meṣa, Siṃha, the first half of Makara and the last half of Dhanus, leave out the fourth house; for Karka and Vṛścika the lagna; for the last half of Makara and for Mīna the tenth — the sign-class rule used in the bhāva-strength computation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-वर्ग → छोड़ा जाने वाला भाव: {वृषभ, मेष, सिंह, मकर 0°–15°, धनु 15°–30°} → भाव 4; {कर्क, वृश्चिक} → भाव 1; {मकर 15°–30°, मीन} → भाव 10। अर्ध-राशि की सीमा 15° पर; अंश निरयन, अयनांश घोषित करें। यह भाव-बल (27.x) की उस प्रक्रिया का अवयव है जिसमें राशि-स्वभाव से बल-दिशा तय होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल/भाव-बल हमारे लिए घोषित संख्यात्मक नियम हैं — प्रत्येक अवयव रूप/विरूप में गिना जाता है और `==` से पिन होता है; इस श्लोक की राशि-वर्ग सारणी उसी गणना का एक लुकअप है, व्याख्या नहीं।

27.28
शोध्यमङ्गाधिकं चक्राच्च्युतं भागीकृतं त्रिहृत्‌।
सद्‌दृष्टिपादयुक्‌पापपापदृष्टिपादविवर्जितम्‌
śodhyamaṅgādhikaṃ cakrāccyutaṃ bhāgīkṛtaṃ trihṛt‌|
sad‌dṛṣṭipādayuk‌pāpapāpadṛṣṭipādavivarjitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शोध्यम् = शोधनीय (घटाया/शोधित करने योग्य अन्तर); अङ्ग-अधिकम् = अङ्ग (= ६, भूतसंख्या) से अधिक; चक्रात् च्युतम् = चक्र से घटाया; भागीकृतम् = अंशीकृत (डिग्री में); त्रि-हृत् = तीन से हृत/विभक्त; सत्-दृष्टि-पाद-युक् = शुभ-दृष्टि के पाद से युक्त; पाप-पाप-दृष्टि-पाद-विवर्जितम् = पाप की पाप-दृष्टि के पाद से रहित (घटाया हुआ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट-बल की शोधन-रेखा देता है: शोधय-मान यदि छह से अधिक हो तो चक्र से घटाओ; अंश बनाओ; तीन से भाग दो। फिर उसमें सद्-दृष्टि का पाद जोड़ो और पाप-पाप-दृष्टि का पाद हटाओ। यह दृग्/स्पष्ट-बल का अंक-शोधन है—शास्त्र का माप-नियम, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering Take the quantity to be purified; if it exceeds six (signs), subtract it from the circle; express it in degrees and divide by three. Add a quarter-measure of benefic aspect and remove a quarter-measure of malefic-on-malefic aspect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: अङ्ग = ६।
१) शोधय-चाप \(D_0\) (राशि या अंश—एक ही इकाई में):
यदि \(D_0 > ६\) राशि \(= १८०°\), तो \(D = ३६०° - D_0\), अन्यथा \(D = D_0\)।
२) अंशीकरण के बाद:
\[
B_0 = (D^\circ)/(3)\quad\text{(विरूप)}
\]
३) दृष्टि-शोधन (पाद = ¼ अंश-योग):
\[
B_{\ ent{spaṣṭa}} = B_0 + \tfrac{1}{4}\,A_{\ ent{sat}} - \tfrac{1}{4}\,A_{\ ent{pāpa←pāpa}}
\]
जहाँ \(A_{\ ent{sat}}\) = शुभ ग्रहों की दृष्टि-योग (शास्त्रीय दृष्टि-अंश: पूर्ण/पादोन/अर्ध/पाद), \(A_{\ ent{pāpa←pāpa}}\) = पाप-से-पाप दृष्टि-योग।
(दृष्टि-अंश-तालिका अध्याय ८ की दृष्टि-व्यवस्था पर निर्भर; यहाँ केवल पाद-युक् / पाद-विवर्जित गुणक। ऋणात्मक योग पर सीमा-पाठ आगे संभव—पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) मान लें शोधय-चाप \(D_0 = २१०°\) → \(D = ३६०° - २१०° = १५०°\) → \(B_0 = १५०/३ = ५०\) विरूप।
शुभ-दृष्टि-योग \(A_{\ ent{sat}} = ४०\) (अंश-तुल्य इकाई), पाप-पाप-दृष्टि-योग \(A_{\ ent{pp}} = २०\):
\[
B = ५० + \tfrac{40}{4} - \tfrac{20}{4} = ५० + १० - ५ = ५५\text{ विरूप।}
\]
(सम्मेलन: दृष्टि-पूर्णता % या अंश एक ही मानदंड से; ग्रह-युग्म शुभ/पाप—शास्त्रीय: गुरु-शुक्र-चन्द्र-बुध(अपाप) शुभ पक्ष; शनि-मंगल-रवि-राहु/केतु पाप पक्ष—जिस परिभाषा को पुस्तक बाँधे, वही फिक्स्चर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल का दृग्-अंग और “स्पष्ट” शोधन यहीं अंक बनते हैं—÷३ वही रूप-रूपान्तरण जो चेष्टा-केन्द्र (२७.२५) में था। डोजियर की विधि: घटक अलग, योग अलग, फल अलग; संख्या `==` से, सहिष्णुता से नहीं।

27.29
ज्ञेज्यदृष्टियुतं तच्च स्वस्वस्वामिबलान्वितम्‌।
इति भावबलं स्पष्टं सामान्यं च पुरोदितम्‌
jñejyadṛṣṭiyutaṃ tacca svasvasvāmibalānvitam‌|
iti bhāvabalaṃ spaṣṭaṃ sāmānyaṃ ca puroditam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञ = बुध; इज्य = गुरु (बृहस्पति); ज्ञेज्य‑दृष्टि‑युतम् = बुध और गुरु की दृष्टि से युक्त (उनका दृष्टि‑बल विशेष रूप से जोड़ा); तत् च = वह भी; स्व‑स्व‑स्वामि‑बल‑अन्वितम् = अपने‑अपने भावेश (भाव‑स्वामी) के बल से युक्त; इति भावबलं स्पष्टम् = इस प्रकार भावबल स्पष्ट (परिशुद्ध) होता है; सामान्यं च पुरोदितम् = और सामान्य (प्रकार) पहले कहा जा चुका।

हिन्दी भावार्थ भावबल को पूर्ण करने के लिए बुध और गुरु की दृष्टि का बल विशेष रूप से जोड़ें, और उस भाव के स्वामी का अपना (गणित किया हुआ) बल भी उसमें मिला दें। इस मिलान से भावबल "स्पष्ट" होता है; इसका सामान्य स्वरूप पूर्व में कहा जा चुका है।

English rendering Add in the aspect of Mercury and Jupiter, and also the strength of the house's own lord; thus the house‑strength becomes exact — its general form having already been stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भावबल = (श्लोक 27.28 के दृक्‑घटक) + दृष्टि‑बल(बुध) + दृष्टि‑बल(गुरु) + षड्बल(भावेश)।
यहाँ भाव अपने स्वामी का पूरा ग्रह‑बल "उधार" लेता है — इसीलिए भावबल की गणना ग्रह‑षड्बल के बाद ही सम्भव है।

उदाहरण (worked example) मान लें भाव का दृक्‑आधार 20 विरूप; उस पर गुरु की दृष्टि (+15) व बुध की दृष्टि (+15); भावेश का षड्बल 6.2 रूप = 372 विरूप → भावबल ≈ 20 + 15 + 15 + 372 = 422 विरूप ≈ 7.03 रूप।

हमारा डिकोड (Our Decode) भावबल का भावेश‑बल पर निर्भर होना सीधे हमारे ग्रह‑षड्बल इंजन से जुड़ता है (दोसियर §4): एक ही रूप/विरूप इकाई‑तंत्र दोनों को बाँधता है, अतः भाव‑स्तर की गणना ग्रह‑स्तर के परिशुद्ध मान पर आश्रित रहती है।

27.30
बुधेज्ययुक्तभावस्य बलमेकेन संयुतम्‌।
मन्दाररवियुक्तस्य बलमेकेन वर्जितम्‌
budhejyayuktabhāvasya balamekena saṃyutam‌|
mandāraraviyuktasya balamekena varjitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध-इज्य-युक्त-भावस्य = बुध और गुरु से युक्त भाव का; बलम् एकेन संयुतम् = बल एक (इकाई) से युक्त/जोड़ित; मन्द-अर-रवि-युक्तस्य = शनि, मंगल और सूर्य से युक्त (भाव) का; बलम् एकेन वर्जितम् = बल एक इकाई से रहित/घटाया गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस भाव में बुध और गुरु का योग हो, उसके भावबल में एक इकाई जोड़ दी जाए। जिस भाव में शनि, मंगल और सूर्य का योग हो, उसके भावबल से एक इकाई घटा दी जाए। यह भावबल की सूक्ष्म संशोधन-पंक्ति है—ग्रहों के स्वभाव-वर्ग (सौम्य बनाम क्रूर) के अनुसार जोड़–घटाव।

English rendering The text states: add one unit of strength to a bhāva associated with Mercury and Jupiter; subtract one unit from a bhāva associated with Saturn, Mars, and the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भावबल-संशोधन (इकाई = उसी मापक्रम की १ इकाई जिसमें भावबल चल रहा हो; प्रायः रूप/विरूप-प्रणाली में १ रूप = ६० विरूप):

  • बुध + गुरु युक्त भाव: \( B' = B + 1 \)
  • शनि + मंगल + सूर्य युक्त भाव: \( B' = B − 1 \)

“युक्त” यहाँ युति-सम्बन्ध का शास्त्रीय संकेत है; दृष्टि को इस पंक्ति में अलग से नहीं जोड़ा गया (पूर्व श्लोक में दृष्टि-युति दोनों आए थे)। पाठ-भेद/टीका-भेद संभव—क्या तीनों क्रूर एक साथ अनिवार्य हैं या प्रत्येक अलग—यह संहिता-पंक्ति से अकेला निश्चित नहीं होता; यहाँ श्लोकानुसार “मन्दाररवि-युक्त” को संयुक्त निर्देश माना गया।

उदाहरण (worked example) मान लें भाव-३ का पूर्व-परिकलित भावबल \( B = 4.0 \) रूप।
- यदि भाव-३ में बुध–गुरु युति: \( B' = 4.0 + 1 = 5.0 \) रूप।
- यदि उसी भाव में सूर्य–मंगल–शनि का योग-संकेत लागू हो: \( B' = 4.0 − 1 = 3.0 \) रूप।
(अयनांश/भाव-प्रणाली इस इकाई-संशोधन पर निर्भर नहीं; निर्भरता केवल “युक्त” की कुण्डली-परिभाषा पर है।)

27.31
दिने शीर्षोदयो भावः सन्ध्यायामुभयोदयः।
निशि पृष्ठोदयाख्यश्च दद्यात्‌ पादमितं बलम्‌
dine śīrṣodayo bhāvaḥ sandhyāyāmubhayodayaḥ|
niśi pṛṣṭhodayākhyaśca dadyāt‌ pādamitaṃ balam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिने = दिन में; शीर्ष-उदयः भावः = शीर्षोदय राशि/भाव; सन्ध्यायाम् = सन्धि-काल में; उभय-उदयः = उभयोदय; निशि = रात्रि में; पृष्ठ-उदय-आख्यः = पृष्ठोदय नामक; दद्यात् = दे; पाद-मितम् बलम् = पाद-मात्र बल (¼)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दिन में शीर्षोदय भाव, सन्ध्य में उभयोदय भाव, और रात्रि में पृष्ठोदय भाव—प्रत्येक स्थिति में पाद-मात्र बल देते हैं। यह काल और उदय-प्रकार के संयोग से भाव को एक चौथाई माप का बल प्रदान करने का नियम है। उदय-वर्ग राशियों के पारम्परिक वर्गीकरण पर टिका है।

English rendering The text states that by day a śīrṣodaya bhāva, at sandhyā an ubhayodaya bhāva, and by night a pṛṣṭhodaya bhāva each bestow strength measuring one pāda (one quarter).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल × उदय-प्रकार → \( +(1)/(4) \) (पाद) बल:

| काल | उदय-वर्ग जो बल देता है | बल |
|---|---|---|
| दिन (दिने) | शीर्षोदय | १ पाद = ¼ |
| सन्धि (सन्ध्यायाम्) | उभयोदय | १ पाद = ¼ |
| रात्रि (निशि) | पृष्ठोदय | १ पाद = ¼ |

यदि पूर्ण रूप = १, तो पाद = ¼ रूप = १५ विरूप (१ रूप = ६० विरूप)।
राशि-वर्ग (प्रचलित सूची; पाठ/टीका में सीमा-भेद संभव): शीर्षोदय — मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ; पृष्ठोदय — मेष, वृष, कर्क, धनु, मकर; उभयोदय — मीन (कुछ परम्पराओं में अन्य योग भी—पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) जन्म-काल दिन, लग्न = तुला (शीर्षोदय)। शास्त्रानुसार इस नियम से लग्न-भाव को \( +(1)/(4) \) रूप (= १५ विरूप) बल मिलता है। यदि जन्म रात्रि और लग्न = मेष (पृष्ठोदय) हो, तो वही \( +(1)/(4) \) रूप पृष्ठोदय-नियम से लगता है—सन्ध्य में केवल उभयोदय को यह पाद मिलता है।

27.32
अंकाग्नयोऽङ्गरामाश्च खाग्नया करसिन्धवः।
नवाग्नयः सुरास्त्रिंशद्‌ दशसंगुणिताः क्रमात्‌
aṃkāgnayo'ṅgarāmāśca khāgnayā karasindhavaḥ|
navāgnayaḥ surāstriṃśad‌ daśasaṃguṇitāḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अंक-अग्नयः = ३९ (अंक=९, अग्नि=३; अङ्कानां वामतो गतिः); अङ्ग-रामाः = ३६ (अङ्ग=६, राम=३); ख-अग्नयः = ३० (ख=०, अग्नि=३); कर-सिन्धवः = ४२ (कर=२, सिन्धु=४); नव-अग्नयः = ३९; सुराः = ३३ (त्रयस्त्रिंशत् देव); त्रिंशत् = ३०; दश-संगुणिताः = दस से गुणित; क्रमात् = क्रम से (रव्यादि)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक सूर्यादि ग्रहों के पूर्ण बल की संख्याएँ भूतसंख्या में बाँधता है, और कहता है उन्हें दस से गुणा कर क्रमशः लें। प्राप्त मान विरूपों में पूर्ण-षड्बल की देहली हैं—इन्हीं से अगले श्लोक “सुबलिन / बलिन” की तुलना करते हैं। शब्द-संख्या का वाचन वाम-गति से किया गया है।

English rendering By word-numerals, in order for the planets beginning with the Sun, the figures 39, 36, 30, 42, 39, 33, and 30 are each to be multiplied by ten—yielding the full-strength measures of the planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या → ×१० → पूर्ण षड्बल (विरूप में); १ रूप = ६० विरूप:

| ग्रह (रव्यादि क्रम) | शब्द-मान | ×१० विरूप | रूप में |
|---|---|---|---|
| सूर्य | ३९ | ३९० | ६½ |
| चन्द्र | ३६ | ३६० | ६ |
| मंगल | ३० | ३०० | ५ |
| बुध | ४२ | ४२० | ७ |
| गुरु | ३९ | ३९० | ६½ |
| शुक्र | ३३ | ३३० | ५½ |
| शनि | ३० | ३०० | ५ |

सूत्र: \( B_{\text{full}}(g) = n_g × 10 \) विरूप, जहाँ \( n_g \) ऊपर की पंक्ति है।
तुलना-नियम अगले श्लोक में: कुल षड्बल \( B(g) \) को \( B_{\text{full}}(g) \) से मिलाया जाता है।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य का परिकलित षड्बल-योग \( B(☉) = 372 \) विरूप। पूर्ण देहली = ३९० विरूप। \( 372 < 390 \) → इस श्लोक की देहली के अनुसार सूर्य “पूर्ण” नहीं (अगला श्लोक बलिन/सुबलिन की भाषा बाँधता है)। यदि \( B(☉) = 405 \), तो देहली पार—पूर्ण से अधिक। (अयनांश, दिक्बल-सूत्र, चेष्टा-परिभाषा आदि कुल \( B \) को बदलते हैं; देहली-संख्या स्वयं श्लोक-स्थिर है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल अध्याय की यह पंक्ति प्रति-ग्रह देहली का अंक-स्तम्भ है—स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्बल के योग की तुलना इन्हीं पूर्ण-मानों से होती है। हम गणित को विरूप/रूप में exact रखते हैं; “बलवान = जीवन में फल” जैसी व्याख्या को श्लोक पर थोपते नहीं। सहिष्णुता-पट्टी (±) देहली पर नहीं—`==` या स्पष्ट \( \ge / < \) ही अनुशासन है।

27.33
रव्यादीनां बलैक्यश्चेत्‌ तदा सुबलिनो मताः।
अधिकं पूर्णमेव स्याद्‌ बलं चेद्‌बलिनो द्विज
ravyādīnāṃ balaikyaścet‌ tadā subalino matāḥ|
adhikaṃ pūrṇameva syād‌ balaṃ ced‌balino dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि-आदीनाम् = सूर्य आदि के; बल-ऐक्यम् = बलों का ऐक्य/योग; चेत् = यदि; तदा सुबलिनः मताः = तब सुबलिन् माने गए; अधिकम् = अधिक; पूर्णम् एव स्यात् = पूर्ण ही माना जाए; बलम् चेत् बलिनः = यदि बल (पर्याप्त) हो तो बलिन्; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्यादि ग्रहों का बल-योग जब निर्धारित पूर्ण माप तक पहुँचे, तब वे सुबलिन् माने जाते हैं। पूर्ण से अधिक हो तो भी उसे पूर्ण-बल की कोटि में ही गिना जाए। पर्याप्त बल हो तो ग्रह बलिन् कहे जाते हैं—यह वर्गीकरण माप की भाषा है, नियति की घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the combined strength of the planets beginning with the Sun reaches the prescribed full measure, they are held to be well-strong (subalin); if greater still, it is treated as full; with (due) strength they are called balin, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्लोक २७.३२ की देहली \( B_{\text{full}}(g) \) के सापेक्ष:

  • यदि \( B(g) = B_{\text{full}}(g) \) → सुबलिन् / बलिन् (शास्त्रीय संज्ञा)
  • यदि \( B(g) > B_{\text{full}}(g) \) → अधिक भी “पूर्णमेव”—अर्थात् पूर्ण-कोटि से ऊपर का अतिरेक अलग श्रेय-वर्ग नहीं खोलता; पूर्ण-बल की सिद्धि मानी जाती है
  • यदि \( B(g) < B_{\text{full}}(g) \) → पूर्ण-बल की सिद्धि नहीं (इस श्लोक का सकारात्मक पक्ष लागू नहीं)

यहाँ “बलैक्य” = षड्बल के अवयवों का योग (स्थान+दिक्+काल+चेष्टा+नैसर्गिक+दृग्), न कि सात ग्रहों का परस्पर योग—पूर्व श्लोक “रव्यादीनां” पूर्ण-मान प्रति-ग्रह देता है।

उदाहरण (worked example) बुध \( B_{\text{full}} = 420 \) विरूप।
- \( B(☿) = 420 \) → शास्त्र की भाषा में सुबलिन्/बलिन्।
- \( B(☿) = 455 \) → अधिक; फिर भी “पूर्णमेव” कोटि।
- \( B(☿) = 380 \) → देहली से नीचे—इस श्लोक का “सुबलिनो मताः” लागू नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल में देहली-तुलना कम्प्यूटेशनल कदम है: योग निकालो, \( B_{\text{full}} \) से मिलाओ। फल-वाक्य “बलिन् = अमुक घटना अवश्य” नहीं लिखते—केवल शास्त्र की संज्ञा और संख्या। यही “गणित अलग, कथन अलग” अनुशासन है।

27.34
गुरुसौम्यरवीणां तु भूतषट्‌केन्दवो द्विज।
पंचाग्नयः खभूतानि करभूमिसुधाकराः
gurusaumyaravīṇāṃ tu bhūtaṣaṭ‌kendavo dvija|
paṃcāgnayaḥ khabhūtāni karabhūmisudhākarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरु-सौम्य-रवीणाम् = गुरु, बुध, सूर्य के; तु = तो; भूत-षट्-इन्दवः = १६५ (भूत=५, षट्=६, इन्दु=१; वाम-गति); द्विज = हे द्विज; पंच-अग्नयः = ३५; ख-भूतानि = ५०; कर-भूमि-सुधाकराः = ११२ (कर=२, भूमि=१, सुधाकर/चन्द्र=१)।

हिन्दी भावार्थ गुरु, बुध और सूर्य के लिए शास्त्र स्थान आदि बलों के पूर्ण माप भूतसंख्या में देता है। अगले श्लोक के साथ मिलाकर क्रम स्थान–दिक्–चेष्टा–समय–अयन पढ़ा जाता है। यह प्रति-अवयव देहली है—कुल षड्बल की देहली (२७.३२) से अलग परत।

English rendering For Jupiter, Mercury, and the Sun, O twice-born, the word-numerals give 165, 35, 50, and 112—the full measures (continued in the next verse) for the component strengths in order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गुरु–बुध–सूर्य; क्रम (२७.३५ से नामित): स्थान, दिक्, चेष्टा, समय (काल), अयन।

| अवयव | भूतसंख्या | विरूप (पूर्ण) |
|---|---|---|
| स्थानबल | १६५ | १६५ |
| दिक्बल | ३५ | ३५ |
| चेष्टाबल | ५० | ५० |
| समय/कालबल | ११२ | ११२ |
| अयनबल | ३० (श्लोक २७.३५: खाग्नयः) | ३० |

नैसर्गिक बल इस पंक्ति-क्रम में नहीं—वह ग्रह-स्वाभाविक नियत मानों से आता है।
अवयव-योग की जाँच: प्रत्येक \( B_i(g) \) को अपनी पूर्ण-देहली से, तथा योग को २७.३२ की कुल-देहली से मिलाया जा सकता है। रूप में बदलने पर ÷६०।

उदाहरण (worked example) सूर्य—मान लें स्थान=१४०, दिक्=३५, चेष्टा=४०, काल=९०, अयन=२५, नैसर्गिक=६०, दृग्=१० (विरूप; दृग्/नैसर्गिक सूत्र अलग अध्याय-पंक्तियों से)।
अवयव बनाम २७.३४–३५ देहली: स्थान १४०<१६५, दिक् ३५=३५, चेष्टा ४०<५०, काल ९०<११२, अयन २५<३०।
कुल \( B \) की तुलना फिर ३९० विरूप (२७.३२) से—यह उदाहरण केवल परतें दिखाता है; वास्तविक कुण्डली में प्रत्येक अवयव का अपना गणित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल = छह (या नामित) अवयवों का योग; प्रत्येक अवयव का नियम संख्यात्मक है, कुल की देहली २७.३२ पर टिकती है। हम अवयव-सूत्र और देहली को pinned constants की तरह रखते हैं—व्याख्या “बल गिर गया तो अमुक रोग” नहीं जोड़ते।

27.35
खाग्नयश्च क्रमात्स्थानदिक्‌चेष्टासमयाऽयने।
सितेन्द्वोस्त्र्यग्निचन्द्राश्च खेषवः खाग्नयः शतम्‌
khāgnayaśca kramātsthānadik‌ceṣṭāsamayā'yane|
sitendvostryagnicandrāśca kheṣavaḥ khāgnayaḥ śatam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ख-अग्नयः = ३०; च क्रमात् = और क्रम से; स्थान-दिक्-चेष्टा-समय-अयने = स्थान, दिक्, चेष्टा, समय, अयन में; सित-इन्द्वोः = शुक्र और चन्द्र के; त्रि-अग्नि-चन्द्राः = १३३ (त्रि=३, अग्नि=३, चन्द्र=१); ख-इषवः = ५० (ख=०, इषु=५); ख-अग्नयः = ३०; शतम् = १००।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की संख्याएँ स्थान–दिक्–चेष्टा–समय–अयन—इस क्रम से पढ़ी जाएँ; गुरु–बुध–सूर्य का अन्तिम मान (अयन) तीस है। शुक्र और चन्द्र के लिए शास्त्र अलग पूर्ण-माप देता है: एक सौ तैंतीस, पचास, तीस, और सौ। यह अवयव-देहली की दूसरी पंक्ति है; मंगल–शनि का अलग पाठ अन्य श्लोक/पाठ-भेद में मिल सकता है।

English rendering Those figures apply in order to sthāna, dig, ceṣṭā, samaya, and ayana—closing the Sun–Mercury–Jupiter set with 30 for ayana. For Venus and the Moon the text states the full measures 133, 50, 30, and 100 (in that sequential reading).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

क) गुरु, बुध, सूर्य (२७.३४ + खाग्नयः)—क्रम स्थान → अयन:
\( 165,\ 35,\ 50,\ 112,\ 30 \) विरूप।

ख) शुक्र, चन्द्र (सितेन्द्वोः)—श्लोक में चार मान:
\( 133,\ 50,\ 30,\ 100 \) विरूप → क्रमशः स्थान, दिक्, चेष्टा, समय।
अयन का पृथक् पाँचवाँ अंक इस युग्म के लिए इन दो पादों में नहीं बैठा; कुछ परम्पराएँ अयन=३० अनुवृत्त लेती हैं—पाठ-भेद/पूरक-श्लोक संभव। मंगल–शनि इस युग्म में नहीं।

तुलना (अवयव \( i \)): ग्रह अवयव-बल \( B_i \) “पूर्ण” जब \( B_i \ge B_{i,\text{full}} \) (शास्त्रीय माप-भाषा)।
कुल षड्बल की सिद्धि फिर भी २७.३२–२७.३३ की कुल-देहली से बँधी रहती है।

उदाहरण (worked example) चन्द्र—स्थानबल = १२० विरूप, दिक् = ५०, चेष्टा = २८, काल = ९५।
देहली (१३३, ५०, ३०, १००): स्थान अपूर्ण, दिक् पूर्ण, चेष्टा अपूर्ण, काल अपूर्ण।
कुल चन्द्र-देहली ३६० विरूप (२७.३२) से अलग जाँच: मान लें कुल \( B(☽) = 310 \) → ३६० से कम—२७.३३ का “सुबलिन्” पक्ष लागू नहीं। (गृह-प्रणाली/अयनांश कुल को बदलते हैं; शब्द-देहली स्थिर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल-इंजन में अवयव-देहली और कुल-देहली दो परतें हैं—२७.३४–३५ अवयव, २७.३२–३३ योग। हम दोनों को स्रोत-पाठ से पिन करते हैं; परम्परा-भेद (अयन-पंक्ति शुक्र/चन्द्र पर, मंगल–शनि की अनुपस्थिति) को चुपचाप एक तरफ़ नहीं ढकेलते—घोषित अनिश्चय “पाठ-भेद संभव” ही ईमानदार डिकोड है।

27.36
चत्वारिंशत्‌ कला भौममन्दयोः षण्णव क्रमात्‌।
त्रिंशत्‌ खवेदाः सप्ताङ्गा नखाश्चेत्युदिता द्विज
catvāriṃśat‌ kalā bhaumamandayoḥ ṣaṇṇava kramāt‌|
triṃśat‌ khavedāḥ saptāṅgā nakhāścetyuditā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चत्वारिंशत् कला = 40 कला; भौम = मङ्गल; मन्द = शनि; षण्णव = 96 (षट्+नवति का संक्षिप्त भुतसंख्य-रूप); क्रमात् = क्रमशः / यथाक्रम; त्रिंशत् = 30; खवेदाः = ख(0)+वेद(4) → 40 (अङ्कानां वामतो गतिः); सप्ताङ्गा = सप्त(7)+अङ्ग(6) → 67; नखाः = नख → 20; उदिता = कथित/निर्दिष्ट; द्विज = हे द्विज (मैत्रेय-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! भौम और मन्द के लिए कला-मान क्रमशः चत्वारिंशत् (40) तथा षण्णव (96) कहे गए हैं। इसके आगे त्रिंशत् (30), खवेद (40), सप्ताङ्ग (67) और नख (20) — ये मान इसी प्रकार उदित/निर्दिष्ट हैं। यह श्लोक षड्बल-प्रकरण की उस संख्या-शृंखला को पूरा करता है जिसमें बल के सूक्ष्म एकक कला में ग्रह-क्रम से अंक बाँधे गए हैं। पाठान्तरों में पूर्ण ग्रह-सूची का पिछला पाद भिन्न हो सकता है, इसलिए पूरे सात-ग्रह मानचित्र के लिए पूर्व-श्लोक के साथ पढ़ना आवश्यक है।

English rendering O Dvija, for Mars and Saturn the kalā-measures are forty and ninety-six respectively; then thirty, forty (kha-veda), sixty-seven (sapta-aṅga), and twenty (nakha) are likewise stated. The verse closes a numerical assignment of bala in kalā units within the ṣaḍbala discussion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षड्बल-प्रकरण का कला-मान असाइनमेंट। श्लोक के स्थिर अंक:
- भौम (मङ्गल) = 40 कला
- मन्द (शनि) = 96 कला (क्रमात् → युग्म पर यथाक्रम)
- आगे के अंक: 30, 40, 67, 20 कला
रूपांतरण-संकेत (षड्बल-परंपरा): 1 रूप = 60 विरूप = 60 कला (जहाँ कला = विरूप-स्तर का एकक)। अतः
96 कला = 96/60 = 8/5 रूप = 1 रूप + 36 विरूप;
40 कला = 40/60 = 2/3 रूप;
30 कला = 1/2 रूप; 67 कला = 67/60 रूप; 20 कला = 1/3 रूप।
पूर्ण सात-ग्रह क्रम पूर्व-श्लोक पर निर्भर — पाठ-भेद संभव; इस श्लोक से केवल ये छह अंक ही अविकल पढ़ें।

उदाहरण (worked example) मान लें मङ्गल का इस पंक्ति में निर्दिष्ट मान 40 कला है और रूप-संकेत 60 कला = 1 रूप है। तब मङ्गल-अंश = 40 ÷ 60 = 2/3 रूप ≈ 0.667 रूप = 40 विरूप। शनि = 96 ÷ 60 = 1.6 रूप = 1 रूप 36 विरूप। (अयनांश/भाव-पद्धति यहाँ नहीं लगती — यह शुद्ध एकक-रूपांतरण है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय 27 का षड्बल-स्तंभ — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में जोड़ा जाता है (1 रूप = 60 विरूप)। यह श्लोक उसी गणना-शृंखला का कला-स्तरीय नियत अंक देता है। हमारी पद्धति: बल = शुद्ध संख्या; फल = शास्त्र-कथन — दोनों को कभी एक नहीं माना जाता; जाँच `==` से, सहिष्णुता-पट्टी से नहीं।

27.37
एवं कृत्वा बलैक्यंच ततश्चिन्त्यम् फलं द्विज।
भावस्थानग्रहैः प्रोक्तयोगे ये योगहेतवः
evaṃ kṛtvā balaikyaṃca tataścintyam phalaṃ dvija|
bhāvasthānagrahaiḥ proktayoge ye yogahetavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; कृत्वा = करके; बलैक्यम् = बलों का योग/एकत्र योगफल; ततः = उसके बाद; चिन्त्यम् = विचारणीय; फलम् = फल (शास्त्रोक्त परिणाम); द्विज = हे द्विज; भावस्थानग्रहैः = भाव और स्थान में स्थित ग्रहों से; प्रोक्तयोगे = कथित योग में; ये = जो; योगहेतवः = योग के हेतु/कारक ग्रह।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! ऊपर कही रीति से सब बलों का एक्य (योग) कर लेने के पश्चात् फल का विचार करना चाहिए। भावों और स्थानों में बैठे जो ग्रह शास्त्र में कहे हुए योगों के हेतु बने हैं — उन्हीं के आधार पर फल-चिन्तन का द्वार खुलता है। पहले गणित (बल-संकलन), फिर शास्त्र का फल-वाक्य — यही क्रम श्लोक स्थिर करता है।

English rendering Having thus formed the aggregate of the balas, O Dvija, the phala is then to be considered. In the yogas declared of planets by house and placement, those grahas that are the causes of the yoga are the ones in view.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बलैक्य = षड्बल-योग:
B_total(g) = B_sthāna + B_dig + B_kāla + B_ceṣṭā + B_naisargika + B_dṛg
(प्रत्येक घटक रूप/विरूप में; 1 रूप = 60 विरूप)। यह श्लोक स्वयं कोई नया गुणांक नहीं देता — वह संकलन-विधि और उसके बाद के फल-विचार का क्रम देता है। गणितीय सूत्र नहीं संख्या-रूप में — प्रक्रिया-सूत्र: “बलैक्य → ततः फल-चिन्तन”; फल-कथन शास्त्र की भाषा में रहता है, नियति-घोषणा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अनुशासन हमारे षड्बल-इंजन का कंकाल है — छह घटक अलग-अलग गिने जाते हैं, योग रूप/विरूप में जोड़ा जाता है, और फल को “शास्त्र कहता है” की पंक्ति में रखा जाता है। गणित और व्याख्या का पृथक्करण यहीं से शास्त्र-सम्मत है।

27.38
तेषां मध्ये बली कर्ता स एवाऽस्य फलप्रदः।
योगेष्वाप्तेषु बहुषु नीतिरेवं प्रकीर्तिता
teṣāṃ madhye balī kartā sa evā'sya phalapradaḥ|
yogeṣvāpteṣu bahuṣu nītirevaṃ prakīrtitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेषाम् मध्ये = उनके बीच; बली = बलवान् (अधिक षड्बल-युक्त); कर्ता = करने वाला / योग-निर्वाहक; स एव = वही मात्र; अस्य = इस (योग) का; फलप्रदः = फल देने वाला; योगेषु आप्तेषु बहुषु = अनेक योग प्राप्त होने पर; नीतिः = नियम/रीति; एवम् = इस प्रकार; प्रकीर्तिता = कही गई है।

हिन्दी भावार्थ उन योग-हेतु ग्रहों में जो बल में श्रेष्ठ है, शास्त्र उसी को उस योग का कर्ता और फलप्रद कहता है। जब एक साथ अनेक योग प्राप्त हों, तब भी यही नीति कही गई है — बहु-योग में भी फल-दायित्व बल की तुलना से तय होता है, इच्छा या भय से नहीं। यह चयन-नियम है, भाग्य की धमकी नहीं।

English rendering Among those yoga-causing planets, the strong one is the agent; he alone is declared the giver of that yoga’s phala. When many yogas are present, this same rule is proclaimed as the policy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चयन-नियम (multi-yoga arbiter):
योग-हेतु ग्रह-समुच्चय G = {g₁, g₂, …} पर
g* = argmax<sub>g ∈ G</sub> B_total(g)
शास्त्र कहता है: g* = कर्ता = फलप्रद।
तुल्यांक (B_total बराबर) पर श्लोक मौन — पाठ-भेद/टीका-रीति संभव; चुपचाप कोई ग्रह न थोपें। फल = “शास्त्र कहता है कि बलवान् हेतु फलप्रद है” — निश्चित भाग्य-वचन नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें राजयोग-हेतु दो ग्रह: गुरु B_total = 7.2 रूप, शुक्र B_total = 5.8 रूप (दोनों षड्बल-योग से)। तब g* = गुरु; शास्त्र की नीति से उसी को उस योग का फलप्रद कहा जाता है। यदि तीसरा हेतु मङ्गल = 7.2 रूप हो (गुरु के तुल्य), तो यह श्लोक अकेला निर्णायक नहीं — अतिरिक्त रीति घोषित करनी होगी।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल का उपयोग यहाँ “कौन फल दे” के शास्त्र-नियम तक सीमित है — हम B_total की तुलना `==`/क्रम से करते हैं, फल को भविष्यवाणी की भाषा में नहीं उतारते। बहु-योग में बल-अर्बिट्रेशन का यही स्रोत-वाक्य है।

27.39
गणितेषु प्रवीणो यः शब्दशास्त्रे कृतश्रमः।
न्यायविद्‌ बुद्धिमान्‌ देशदिक्कालज्ञो जितेन्द्रियः
gaṇiteṣu pravīṇo yaḥ śabdaśāstre kṛtaśramaḥ|
nyāyavid‌ buddhimān‌ deśadikkālajño jitendriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गणितेषु = गणना/ज्योतिर्गणित में; प्रवीणः = दक्ष; यः = जो; शब्दशास्त्रे = शब्द-शास्त्र (व्याकरण/भाषा-शास्त्र) में; कृतश्रमः = श्रम किया हुआ; न्यायवित् = न्याय (तर्क-शास्त्र) जानने वाला; बुद्धिमान् = बुद्धिमान्; देशदिक्कालज्ञः = देश, दिशा और काल का ज्ञाता; जितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय (इन्द्रिय-जय युक्त)।

हिन्दी भावार्थ जो गणित में प्रवीण हो, शब्दशास्त्र में जिसने श्रम किया हो, जो न्यायवेत्ता और बुद्धिमान् हो, जो देश–दिक्–काल को जानता हो, और जो जितेन्द्रिय हो — ऐसे गुणों का आचार्य ही आगे के श्लोक में प्रमाण-योग्य कहा जाएगा। यह फल-श्लोक नहीं, अधिकार-पात्रता का श्लोक है: गणना, भाषा, तर्क, स्थान-काल-बोध और आत्म-संयम — पाँचों स्तंभ साथ माँगे गए हैं।

English rendering He who is skilled in gaṇita, who has laboured in the science of language, who knows nyāya, who is intelligent, who understands place, direction and time, and who has mastered the senses — such a person is here marked as the competent speaker of horā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आचार्य-योग्यता / अधिकार-वर्णन। अंतर्दृष्टि: शास्त्र स्वयं “गणितेषु प्रवीण” को प्रथम लिखता है — अर्थात् होरा-कथन से पहले संख्यात्मक दक्षता अनिवार्य मानी गई है; देश–दिक्–कालज्ञ पद यह भी याद दिलाता है कि एक ही सूत्र का फल स्थान, अयनांश-रीति और काल-मान पर निर्भर घोषित करना चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) “गणितेषु प्रवीण” हमारे exact-`==` अनुशासन का शास्त्र-मूल है — वर्ग, अष्टकवर्ग, दशा, बल सब नियत अंकों पर जाँचे जाते हैं; सहिष्णुता-पट्टी को हमने छोड़ दिया क्योंकि उसने कभी वास्तविक −1 छिपाया था। देश–दिक्–कालज्ञ = अयनांश, भाव-पद्धति, वर्ग-नियम सदा घोषित करने की रीति।

27.40
ऊहापोहपटुर्होरास्कन्धश्रवणसम्मतः।
मैत्रेय सत्यतां यादि तस्य वाक्यं न संशयः
ūhāpohapaṭurhorāskandhaśravaṇasammataḥ|
maitreya satyatāṃ yādi tasya vākyaṃ na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊहापोह = ऊह (धन-तर्क — संश्लेषण/अनुमान) + अपोह (निषेध-तर्क — विश्लेषण/अपवर्जन), अर्थात् दो-तरफ़ा तर्क-कौशल; पटुः = निपुण, दक्ष; होरास्कन्ध = ज्योतिष के तीन स्कन्धों (सिद्धान्त/गणित, संहिता, होरा) में से होरा-शाखा; श्रवण = गुरुमुख से अध्ययन/श्रवण; सम्मतः = मान्य, प्रतिष्ठित; मैत्रेय = शिष्य मैत्रेय (पराशर का सम्बोधन); सत्यतां (याति) = सत्यता को प्राप्त होता है — "यादि" पाठ-भेद संभव (सम्भवतः "याति"); तस्य वाक्यम् = उसका कथन; न संशयः = इसमें कोई संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक (39) की योग्यताओं — गणित में प्रवीण, शब्दशास्त्र में परिश्रमी, न्यायवेत्ता, बुद्धिमान्, देश-दिक्-कालज्ञ, जितेन्द्रिय — के आगे यह श्लोक जोड़ता है कि जो ऊह-अपोह (तर्क के दोनों पक्षों) में कुशल हो और होरा-स्कन्ध के श्रवण-अध्ययन में मान्य/प्रतिष्ठित हो। पराशर मैत्रेय से कहते हैं — ऐसे अधिकारी का वचन सत्यता को प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह षड्बल-अध्याय का उपसंहार है, जो बल-गणना के बाद फल कहने के पात्र की कसौटी बाँधता है।

English rendering Skilled in reasoning both ways — synthesis (ūha) and exclusion (apoha) — and esteemed in the study of the horā branch [added to the qualities of the previous verse], such a one, O Maitreya, attains truth in his speech; of this there is no doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अधिकारी-वर्णन / मैत्रेय-संवाद (योग्य ज्योतिषी की कसौटी)। ध्यान देने योग्य है कि यह सत्यता-दावा व्यक्ति की योग्यता पर आश्रित है, ग्रह-गणना पर नहीं — शास्त्र स्वयं कह रहा है कि वचन की विश्वसनीयता वक्ता के तर्क-कौशल और अध्ययन-प्रामाण्य से आती है; इसे भविष्य-निश्चय नहीं, अपितु पात्रता-मानदण्ड के रूप में पढ़ना चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उसी अध्याय (BPHS Ch.27, षड्बल — स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग् बल, 1 रूप = 60 विरूप) का समापन-वचन है जिसकी छह-गुना बल-संगणना हमने गणना-योग्य नियमों के रूप में पिन की। पूर्व श्लोक की पहली माँग "गणितेषु प्रवीणः" और यहाँ की "ऊहापोह-पटुः" — यही हमारी विधि का मूल है: पहले सटीक गणित, फिर तर्क-संगत निर्वचन। इसी अनुशासन के तहत अष्टकवर्ग (Ch.66) के मानों को हमने सहनशीलता-बैंड के बजाय exact-`==` ओरैकल पर पिन किया (सूर्य 48, चन्द्र 49 … कुल SAV = 337), ताकि गणित और फल-कथन कभी न घुलें — जो इस श्लोक की "सत्यता" की कसौटी का ही अभियांत्रिक रूप है।

षड्बल — छह बल का योग (रूप में; 1 रूप = 60 विरूप)स्थान-बलpositionalदिग्-बलdirectionalकाल-बलtemporalचेष्टा-बलmotionalनैसर्गिक-बलnaturalदृग्-बलaspectualषड्बल-योग → प्रति-ग्रह सीमा से तुलना (बलवान्/निर्बल)
षड्बल — the six-fold strength of a planet (BPHS Ch.27), summed in रूप (1 rūpa = 60 virūpa). Each component is a stated numeric rule; the total is compared to a per-planet threshold. Computation, not interpretation.
अध्यायः 28

अथेष्टकष्टाध्यायः

20 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): अट्ठाईसवाँ अध्याय—अथेष्टकष्टाध्यायः—ग्रहों के इष्ट (चेष्ट) और अनिष्ट (कष्ट) का गणित खोलता है: वही राशियाँ जिनके वश से ग्रह शुभ–अशुभ दशाफल प्रयच्छन्ति, शास्त्र यही कहता है। पहले स्व-नीच से ग्रह घटाकर, षड्‌भाधिक्य में भमण्डल से शोध्य, उच्चरश्मि साधित होती है; फिर चेष्टाकेन्द्र से उसी विधि से चेष्टारश्मि। सूर्य–चन्द्रादि के चेष्टाकेन्द्र—सायनार्क+त्रिभ, व्यर्केन्दु आदि—पूर्वोक्त कुजादि-क्रम से स्थिर किए जाते हैं। अन्त में चेष्टोच्चरश्मियोग का अर्ध शुभरश्मि, और अष्ट से विशुद्ध अशुभरश्मि—दो राशियाँ जो दशा-फल के शुभाशुभ-भार को संख्या में बाँधती हैं। इक्कीस श्लोकों में यह अध्याय षड्‌बल-परंपरा के बाद का पुल है: बल जहाँ शक्ति मापता है, वहाँ इष्ट-कष्ट दशा-गुण का राशिमय मान देता है।

For the English reader: Chapter 28, Atheṣṭakaṣṭādhyāyaḥ, is the short computational treatise on a planet’s iṣṭa and kaṣṭa—the “desired” and “adverse” ray-counts that, the text says, govern how a graha yields śubha or aśubha daśā-phala. From the planet’s arc measured off its debilitation point (folded when it exceeds six signs), one obtains ucca-raśmi; from the ceṣṭā-kendra (for the Sun, sayana Sun plus three signs; for the Moon, the Sun–Moon difference; for Mars and the rest, as already fixed), the same procedure yields ceṣṭā-raśmi. Half their sum is named śubha-raśmi; what remains when that is cleared from eight is aśubha-raśmi. Twenty-one verses, pure modular arithmetic on longitudes—no rhetoric—only the śāstra’s ray-ledger for timing quality.

मुख्य गणित/तकनीक:
- उच्चरश्मि (ucca-raśmi): \(\lambda - \lambda_{\mathrm{nīca}}\) → यदि \(> 6\) राशि तो \(12\) से शोध्य; शेष पर «सैको राशिः + द्विघ्नांश» नियम से रश्मि।
- चेष्टाकेन्द्र (ceṣṭā-kendra): सूर्य \(= \lambda<sub>\odot</sub>^{\mathrm{sāyana}} + 3\) राशि; चन्द्र \(= |\lambda<sub>\odot</sub> - \lambda_{\mathrm{☽}}|\); कुजादि = पूर्वोक्त; \(> 6\) राशि पर चक्र से शोध्य।
- चेष्टारश्मि (ceṣṭā-raśmi): चेष्टाकेन्द्र से वही विधि जो उच्चरश्मि के लिए।
- शुभरश्मि / अशुभरश्मि: \(\mathrm{śubha} = \tfrac{1}{2}(\mathrm{ceṣṭā\text{-}raśmi} + \mathrm{ucca\text{-}raśmi})\); \(\mathrm{aśubha} = 8 - \mathrm{śubha}\)।

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

28.1
अथ चेष्टमनिष्टं च ग्रहानां कथयाम्यहम्‌।
यद्‌वशाच्च प्रयच्छन्ति शुभाऽशुभदशाफलम्‌
atha ceṣṭamaniṣṭaṃ ca grahānāṃ kathayāmyaham‌|
yad‌vaśācca prayacchanti śubhā'śubhadaśāphalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरण-आरम्भ); चेष्टम् = इष्ट/अनुकूल फल-मान; अनिष्टम् = प्रतिकूल फल-मान (यहाँ "इष्ट-कष्ट" युग्म); ग्रहानाम् = ग्रहों का; कथयामि अहम् = मैं (पराशर) कहता हूँ; यद्वशात् = जिसके वश/मान से; प्रयच्छन्ति = ग्रह देते हैं; शुभाऽशुभ-दशाफलम् = दशा का शुभ-अशुभ फल।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, अब मैं ग्रहों के "इष्ट" (अनुकूल) और "अनिष्ट" (प्रतिकूल) परिमाण का प्रकरण आरम्भ करता हूँ। यही वह मात्रा है जिसके अनुपात से ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में शुभ अथवा अशुभ फल प्रदान करते हैं। यह अध्याय (इष्ट-कष्ट-अध्याय) ग्रह-बल को एक सङ्ख्यात्मक फल-तराजू में बदलने की विधि है।

English rendering Now I shall expound the iṣṭa (favourable) and aniṣṭa (adverse) measures of the planets — the very quantities by whose proportion the planets dispense the auspicious or inauspicious fruit of their daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिज्ञा/विषय-प्रस्तावना। यह verse अध्याय की भूमिका है; ध्यातव्य कि "दशाफल" यहाँ शास्त्र का कथन है — इसे भविष्य-निश्चय नहीं, अपितु ग्रहबल→फल के एक परिमेय मॉडल के रूप में पढ़ा जाए।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही मेरी मूल अनुशासन-रेखा है — इष्ट/कष्ट एक गणना है (आगे 0–60 के मान में), उसका "शुभ-अशुभ" वाचन शास्त्र का कथन। हमने बल-इंजन (षड्बल) में गणित को व्याख्या से पृथक् रखा है: संख्या को `==` पर सत्यापित करते हैं, फल-भाषा को "शास्त्र कहता है" के रूप में ही उद्धृत करते हैं, कभी नियति के रूप में नहीं।

28.2
स्वनीचोनो ग्रह शोध्यः षड्‌भाधिक्ये भमण्डलात्‌।
सैको राशिर्भवेदुच्चरश्मिर्द्विघ्नांशसंयुतः
svanīcono graha śodhyaḥ ṣaḍ‌bhādhikye bhamaṇḍalāt‌|
saiko rāśirbhaveduccaraśmirdvighnāṃśasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-नीच-ऊनः ग्रहः = ग्रह में से उसके नीच-बिन्दु का देशान्तर घटाया गया; शोध्यः = शोध्य (शुद्ध किया जाए); षड्-भा-अधिक्ये = छः राशि से अधिक होने पर; भ-मण्डलात् = भचक्र (360° / 12 राशि) से; स-एकः राशिः = (शेष की) राशि + 1; भवेत् उच्च-रश्मिः = वह उच्च-रश्मि कहलाती है; द्वि-घ्न-अंश-संयुतः = अंशों को द्विगुण कर जोड़कर।

हिन्दी भावार्थ उच्च-रश्मि निकालने के लिए ग्रह-देशान्तर में से उसी ग्रह का नीच-देशान्तर घटाएँ। यदि शेष छः राशि से अधिक हो, तो उसे पूरे भचक्र से घटाकर लघु चाप लें। प्राप्त राशि-भाग में एक राशि जोड़ें और शेष अंशों को दुगुना कर उच्च-रश्मि बनाएँ। यह शुद्ध चाप-गणित है—उच्चता की “निकटता” का माप।

English rendering Reduce the planet by its debilitation longitude; if the remainder exceeds six signs, subtract it from the full circle. The resulting sign-count increased by one, joined with doubled degrees, is the ucca-raśmi (exaltation ray).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नीच-देशान्तर λ_nīca (सूर्य 10° तुला, चन्द्र 3° वृश्चिक, मंगल 28° कर्क, बुध 15° मीन, गुरु 5° मकर, शुक्र 27° कन्या, शनि 20° मेष — पारम्परिक नीच-बिन्दु; पाठ-भेद/संस्करण-भेद संभव)।
Δ = (λ_graha − λ_nīca) mod 360°
यदि Δ > 180° (= 6 राशि), तो Δ′ = 360° − Δ; अन्यथा Δ′ = Δ।
Δ′ = S राशि + d° + m′ …

उच्च-रश्मि U = (S + 1) राशि, अंश-भाग = 2 × (d° + m′/60) — अर्थात् अंश द्विगुणित।
(रश्मि यहाँ राशि+अंश रूप की संख्यात्मक इकाई; आगे इष्ट-कष्ट में रूप/अंश-तुल्य प्रयोग।)

उदाहरण (worked example) मानें मंगल λ = 15° मेष = 15° (निरयण, किसी भी अयनांश में केवल सापेक्ष चाप चाहिए)। मंगल-नीच = 28° कर्क = 90° + 28° = 118°।
Δ = (15 − 118) mod 360° = 257°। 257° > 180° ⇒ Δ′ = 360 − 257 = 103° = 3 राशि + 13°।
U = (3+1) राशि + 2×13° = 4 राशि 26° (उच्च-रश्मि)।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल के अन्तर्गत चेष्टा/उच्च-सम्बन्धी राशियाँ शुद्ध मॉड्युलर चाप-गणित हैं। हमारी पद्धति exact-`==` अनुशासन अपनाती है: चाप, राशि-गणना और द्विगुण-अंश बिना ± सहन-पट्टी के पिन किए जाते हैं—सहन-पट्टी कभी वास्तविक −1 त्रुटि छिपा चुकी है।

28.3
चेष्टाकेन्द्राच्च तद्रश्मिं साधयेदुच्चरश्मिवत्‌।
चेष्टाकेन्द्रं कुजादीनां पूर्वमुक्तं मया द्विज
ceṣṭākendrācca tadraśmiṃ sādhayeduccaraśmivat‌|
ceṣṭākendraṃ kujādīnāṃ pūrvamuktaṃ mayā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चेष्टा-केन्द्रात् = चेष्टा-केन्द्र (शीघ्र-केन्द्र/गति-कोण) से; तद्-रश्मिम् = वह (चेष्टा-)रश्मि; साधयेत् = सिद्ध/गणना करें; उच्च-रश्मि-वत् = उच्च-रश्मि की ही रीति से; चेष्टा-केन्द्रम् = चेष्टा-केन्द्र; कुज-आदीनाम् = मङ्गल आदि (तारा-ग्रहों) का; पूर्वम् उक्तम् मया = मैंने पहले (स्पष्टीकरण/षड्बल प्रकरण में) कह दिया है; द्विज = हे ब्राह्मण।

हिन्दी भावार्थ जैसे उच्च-रश्मि निकाली, वैसे ही ग्रह के "चेष्टा-केन्द्र" से उसकी चेष्टा-रश्मि सिद्ध कीजिए। मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि — इन तारा-ग्रहों का चेष्टा-केन्द्र (शीघ्र-कर्म का कोण) मैंने पूर्व-प्रकरण में बता दिया है, अतः यहाँ उसी को आधार मानें।

English rendering From the ceṣṭā-kendra (the anomaly of motion) compute its ray exactly as the exaltation-ray was found; the ceṣṭā-kendra of Mars and the rest I have already declared, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चेष्टा-रश्मि = उसी सूत्र से, केवल Δ के स्थान पर चेष्टा-केन्द्र (शीघ्र-केन्द्र) रखें:
- तारा-ग्रह: चेष्टा-केन्द्र = शीघ्रोच्च − ग्रह (मन्दस्पष्ट), अर्थात् शीघ्र-अनुबिन्दु।
- मोड़-नियम व (R+1)+2D/60 वही → चेष्टा-रश्मि ∈ [1, 7]।
यह वही गति-कोण है जो स्पष्टीकरण (spaṣṭādhikāra) में शीघ्रफल हेतु प्रयुक्त होता है; अतः "पूर्वमुक्तम्।"

उदाहरण (worked example) मान लें किसी तारा-ग्रह का चेष्टा-केन्द्र = 120° (4 राशि, <6 राशि अतः यथावत्)।
R = 4, D = 0 → चेष्टा-रश्मि = 4 + 1 = 5।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह verse सीधे षड्बल की चेष्टा-बल घटक से जुड़ता है (dossier §4)। हमारे बल-इंजन में चेष्टा-केन्द्र वही शीघ्र-अनुबिन्दु है जो स्पष्ट-ग्रह गणना में शीघ्रफल देता है — अर्थात् चेष्टा-रश्मि कोई पृथक् रहस्य नहीं, अपितु उसी deterministic anomaly का पुनःप्रयोग; इसे हमने रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) पैमाने पर सुसंगत रखा है।

28.4
सायनार्कस्त्रिभोऽर्कस्य व्यर्केन्दुश्च विधोस्तथा।
चेष्टाकेन्द्रं रसाल्पं तच्चक्राच्छोध्यं रसाधिके
sāyanārkastribho'rkasya vyarkenduśca vidhostathā|
ceṣṭākendraṃ rasālpaṃ taccakrācchodhyaṃ rasādhike

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सायन-अर्कः = सायन (क्रान्तिवृत्तीय) सूर्य; त्रि-भः = तीन राशि (90°) घटाया/त्रिभ-युक्त विधान; अर्कस्य = सूर्य का (चेष्टा-केन्द्र); व्य्-अर्क-इन्दुः = सूर्य-चन्द्रान्तर; विधोः = चन्द्र का; तथा = उसी प्रकार; चेष्टा-केन्द्रम् = चेष्टा-केन्द्र; रस-अल्पम् = “रस” = 6 से जो अल्प हो (लघु चाप); तत् चक्रात् शोध्यम् = षडधिक होने पर चक्र से शोधनीय; रस-अधिके = 6 से अधिक पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य का चेष्टा-केन्द्र सायन-सूर्य से तीन राशि हटाकर लिया जाता है। चन्द्र का चेष्टा-केन्द्र सूर्य और चन्द्र के अन्तर से आता है। दोनों स्थितियों में चेष्टा-केन्द्र वह लघु चाप है जो छः राशि से अधिक न हो—अधिक हो तो पूरे चक्र से घटाएँ। यहाँ शास्त्र सायन-सूर्य का स्पष्ट उल्लेख करता है; यह कन्वेंशन घोषित रहना चाहिए।

English rendering For the Sun, the ceṣṭā-kendra is formed from the tropical (sāyana) Sun less three signs. For the Moon, it is the Sun–Moon difference. In either case take the lesser arc relative to six signs; if over six, subtract from the circle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

सूर्य: λ_ck,☉ = (λ_☉,sāyana − 90°) mod 360°
(सायन = उष्णकटिबंधीय/क्रान्तिवृत्तीय देशान्तर; निरयण कुण्डली में भी यह पद सायन-सूर्य माँगता है—कन्वेंशन घोषित करें।)

चन्द्र: λ_ck,☽ = (λ_☉ − λ_☽) mod 360° (या व्यस्त; लघु चाप चुनें)।
सामान्य नियम: यदि चाप > 180° (रस = 6 राशि), तो 360° − चाप। यही λ_ck चेष्टा-रश्मि (28.3) का आश्रय।

उदाहरण (worked example) सायन-सूर्य = 120° (मिथुनान्त-समीप)।
λ_ck,☉ = 120° − 90° = 30°।
चन्द्र निरयण 40°, सूर्य निरयण 100° ⇒ |100−40| = 60° (< 180°) = चन्द्र-चेष्टा-केन्द्र-चाप आधार।
दोनों पर 28.2–28.3 की (S+1, 2×अंश) विधि से C।

हमारा डिकोड (Our Decode) जहाँ संख्या कन्वेंशन पर निर्भर हो, हम अयनांश/सायन-निरयण अलग घोषित करते हैं। षड्बल-इंजन में चेष्टा-पथ को “मौन कन्वेंशन” से नहीं, पिन किए हुए नियम से चलाया जाता है—exact-`==` तभी सार्थक है जब सायन/निरयण स्पष्ट हो।

28.5
चेष्टोच्चरश्मियोगार्धं शुभरश्मिः प्रकीर्त्यते।
अष्टभ्यश्च विशुद्धोऽसाबशुभाख्यश्च कथ्यते
ceṣṭoccaraśmiyogārdhaṃ śubharaśmiḥ prakīrtyate|
aṣṭabhyaśca viśuddho'sābaśubhākhyaśca kathyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चेष्ट-उच्च-रश्मि-योग-अर्धम् = चेष्टा-रश्मि व उच्च-रश्मि के योग का आधा; शुभ-रश्मिः = शुभ-रश्मि; प्रकीर्त्यते = कहा जाता है; अष्टभ्यः = आठ में से; विशुद्धः = घटाया हुआ (8 − शुभ); असौ = वह; अशुभ-आख्यः = "अशुभ" नामक; कथ्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की चेष्टा-रश्मि और उच्च-रश्मि — इन दोनों का योग करके आधा कर दीजिए; वही "शुभ-रश्मि" कहलाती है। और उसी शुभ-रश्मि को आठ में से घटा दें — जो शेष बचे वह "अशुभ-रश्मि" है। अर्थात् दोनों सदा आठ पर पूरक (complementary) रहती हैं।

English rendering Half the sum of the ceṣṭā-ray and the exaltation-ray is proclaimed the auspicious ray (śubha-raśmi); that same, subtracted from eight, is called the inauspicious ray.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मान U = उच्च-रश्मि, C = चेष्टा-रश्मि (दोनों ∈ [1,7]):
- शुभ-रश्मि S = (U + C) / 2
- अशुभ-रश्मि A = 8 − S
∴ S + A = 8 (नित्य)। परिसर S ∈ [1,7], A ∈ [1,7], परावर्तन-केन्द्र 4। "आठ" इसलिए कि 8 = परम-रश्मि(7) + न्यून-रश्मि(1) — यही verse 2 के "स-एक" (1–7 परिसर) का स्वतन्त्र प्रमाण है।

उदाहरण (worked example) U = 5, C = 5 → S = (5+5)/2 = 5 (शुभ-रश्मि); A = 8 − 5 = 3 (अशुभ-रश्मि)। जाँच: S + A = 8. ✓

हमारा डिकोड (Our Decode) S + A = 8 की यह पूरकता एक cross-check है जिसे हमने उच्च-रश्मि (1–7) पाठ की पुष्टि हेतु प्रयोग किया — यदि रश्मि 0–6 होती तो पूरक 6 होता, 8 नहीं। यही exact-invariant अनुशासन है (dossier §5): संख्या को सहनशीलता-पट्टी से नहीं, नित्य-सम्बन्ध (`S+A == 8`) से जाँचना।

28.6
उच्चचेष्टाकरान्‌ व्येकान्‌ दिग्भिर्हत्वा तु योजयेत्‌।
तदर्धमिष्टसंज्ञं स्यात्‌ कष्टं तत्षष्टितश्च्युतम्‌
uccaceṣṭākarān‌ vyekān‌ digbhirhatvā tu yojayet‌|
tadardhamiṣṭasaṃjñaṃ syāt‌ kaṣṭaṃ tatṣaṣṭitaścyutam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्च-चेष्टा-करान् = उच्च व चेष्टा की रश्मियाँ (कर=रश्मि); व्येकान् = प्रत्येक में से एक घटाकर (−1); दिग्भिः = दस से (दिश्=10); हत्वा = गुणा करके; योजयेत् = जोड़ दें; तद्-अर्धम् = उसका आधा; इष्ट-संज्ञम् स्यात् = "इष्ट" (इष्टफल) कहलाता है; कष्टम् = कष्टफल; तत् षष्टितः च्युतम् = वह साठ में से घटाया हुआ (60 − इष्ट)।

हिन्दी भावार्थ उच्च-रश्मि और चेष्टा-रश्मि — दोनों में से एक-एक घटाइए, फिर प्रत्येक को दस से गुणा कर दोनों को जोड़ दीजिए; उस योग का आधा "इष्टफल" है। और साठ में से इस इष्टफल को घटा दें — जो शेष बचे वह "कष्टफल" है। इस प्रकार इष्ट और कष्ट सदा साठ (=एक रूप) पर पूरक रहते हैं।

English rendering Diminish each of the exaltation- and ceṣṭā-rays by one, multiply each by ten, and add; half of that is named iṣṭa (the favourable measure). The kaṣṭa is that deducted from sixty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- इष्टफल = [10(U − 1) + 10(C − 1)] / 2 = 5(U + C − 2) = 10(S − 1) (जहाँ S = शुभ-रश्मि)
- कष्टफल = 60 − इष्टफल = 10(7 − S) = 10(A − 1)
परिसर: इष्ट ∈ [0,60], कष्ट ∈ [0,60] विरूप; इष्ट + कष्ट = 60 (नित्य)। यह 60-विरूप = 1 रूप का पैमाना है — षड्बल की ही मुद्रा।

उदाहरण (worked example) U = 5, C = 5 →
इष्टफल = [10(5−1) + 10(5−1)]/2 = [40 + 40]/2 = 40 विरूप।
कष्टफल = 60 − 40 = 20 विरूप। जाँच: 40 + 20 = 60. ✓ (S=5 से: 10(5−1)=40 ✓)

हमारा डिकोड (Our Decode) इष्ट+कष्ट = 60 विरूप = 1 रूप — यही षड्बल की इकाई (1 रूप = 60 विरूप, dossier §4) है। हमारे बल-इंजन में इष्ट/कष्ट को इसी रूप/विरूप पैमाने पर रखा गया है, जिससे यह चेष्टा-बल व उच्च-बल के साथ सीधे संगत रहता है; पूरकता `iṣṭa + kaṣṭa == 60` को नित्य-अपरिवर्त्य के रूप में सत्यापित किया जा सकता है।

28.7
स्वोच्चे मूलत्रिकोणे च स्वभेऽधिसुहृदीष्टभे।
समभे शत्रुभे चाधिशत्रुभे नीचभे क्रमात्‌
svocce mūlatrikoṇe ca svabhe'dhisuhṛdīṣṭabhe|
samabhe śatrubhe cādhiśatrubhe nīcabhe kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-उच्चे = अपने उच्च में; मूल-त्रिकोणे = मूलत्रिकोण में; स्व-भे = स्वराशि में; अधि-सुहृद्-इष्ट-भे = अधि-मित्र / इष्ट राशि में; सम-भे = सम (तटस्थ) राशि में; शत्रु-भे = शत्रु-राशि में; अधि-शत्रु-भे = अधि-शत्रु राशि में; नीच-भे = नीच राशि में; क्रमात् = क्रमशः (इसी क्रम से)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रहीय स्थान-सम्बन्धों का एक अवरोही क्रम बाँधता है—स्वोच्च, मूलत्रिकोण, स्वक्षेत्र, अधिसुहृद्/इष्ट, सम, शत्रु, अधिशत्रु, नीच। “क्रमात्” से स्पष्ट है कि आगे की संख्याएँ या फल इसी क्रम पर लगेंगे। इस श्लोक में स्वयं संख्या नहीं है; यह क्रम-सूची है। पाठ-भेद/अगले श्लोक-सन्धान पर मान-तालिका निर्भर हो सकती है।

English rendering In order: own exaltation, mūlatrikoṇa, own sign, great-friend/desired sign, neutral sign, enemy sign, great-enemy sign, and debilitation sign—respectively. The verse fixes the sequence; it does not itself state the numeric weights.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — क्रम-सूची / स्थान-वर्गीकरण (स्थान-बल/रश्मि-मान तालिका का आधार-क्रम)।
क्रम सूचकांक i = 1…8:
1 स्वोच्च → 2 मूलत्रिकोण → 3 स्वभ → 4 अधिसुहृद्/इष्टभ → 5 समभ → 6 शत्रुभ → 7 अधिशत्रुभ → 8 नीचभ।
संख्यात्मक भार यदि परम्परा में जुड़े हों तो वे इस श्लोक में नहीं दिए; अगले पाठ/सम्बद्ध स्थान-बल (षड्बल-स्थान) से मिलाएँ, मौन अनुमान से नहीं। मित्र-शत्रु-पद्धति (नैसर्गिक × तत्कालिक) कन्वेंशन-घोषित रखें।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल के स्थान-बल में यही स्थान-श्रेणी अलग-अलग रूप/विरूप मानों से जुड़ती है; हम श्रेणी और मान को अलग-अलग पिन करते हैं। जो अंक श्लोक नहीं देता, उसे “हमने सिद्ध किया” नहीं कहते—केवल क्रम को स्रोत-वफादार सूची के रूप में बाँधते हैं।

28.8
षष्टिरिष्वब्धयस्त्रिंशदाकृतिस्तिथयो गजाः।
चत्वारो द्वौ च शून्यं च शुभमेतत्फलं गृहे
ṣaṣṭiriṣvabdhayastriṃśadākṛtistithayo gajāḥ|
catvāro dvau ca śūnyaṃ ca śubhametatphalaṃ gṛhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्टिः = 60; इषु-अब्धयः = इषु(बाण=5) + अब्धि(समुद्र=4) → वामतो-गति = 45; त्रिंशत् = 30; आकृतिः = (परम-मित्र-मान; वुल्गेट अनुसार 22½ — पाठ-भेद संभव); तिथयः = तिथि = 15; गजाः = हाथी = 8; चत्वारः = 4; द्वौ = 2; शून्यम् = 0; शुभम् एतत् फलम् गृहे = यह शुभ-फल (उस) राशि/स्थान में।

हिन्दी भावार्थ पिछले verse के नौ स्तरों के शुभ-मान (राशि/D1 में) क्रमशः ये हैं — स्व-उच्च 60, मूलत्रिकोण 45, स्वराशि 30, परम-मित्र 22½, मित्र 15, सम 8, शत्रु 4, परम-शत्रु 2, नीच 0। भूतसङ्ख्या से: इषु=5, अब्धि=4 (→45), तिथि=15, गज=8 — ये निश्चित; "आकृति" का अङ्क-मान वुल्गेट में 22½ है पर शब्द-सङ्ख्या असामान्य होने से पाठ-भेद संभव।

English rendering The auspicious values for those nine dignities are, in order, 60, 45, 30, 22½, 15, 8, 4, 2, 0 — this is the śubha-phala according to the sign occupied.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ-मान-सारणी (राशि/D1, 60-पैमाना):
स्व-उच्च 60 · मूलत्रिकोण 45 · स्वराशि 30 · परम-मित्र 22½ · मित्र 15 · सम 8 · शत्रु 4 · परम-शत्रु 2 · नीच 0।
भूतसङ्ख्या-विच्छेद (अङ्कानां वामतो गतिः): इष्वब्धि = इषु(5)|अब्धि(4) → 45; तिथि → 15; गज → 8। "आकृति → 22½" में शब्द-सङ्ख्या अमानक; अतः पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) ग्रह स्वराशि में (स्व-भे) → शुभ-फल = 30 (राशि/D1 में)। यदि परम-शत्रु-राशि में → शुभ-फल = 2 मात्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ हमारा exact-decode अनुशासन लागू होता है (dossier §5): इषु=5, अब्धि=4, तिथि=15, गज=8 को अङ्क-विश्वस्त रूप से खोला जाता है — कल्पित मान नहीं। जहाँ शब्द-सङ्ख्या अमानक है ("आकृति"), वहाँ हम मौन धारणा नहीं गढ़ते, अपितु "पाठ-भेद संभव" घोषित करते हैं — ठीक वैसे ही जैसे अष्टकवर्ग में सहनशीलता-पट्टी ने एक वास्तविक −1 छिपा दिया था; अतः यहाँ भी अनुमान नहीं, चिह्नित अनिश्चय।

28.9
षष्टितः पतितं चैतच्छेषं स्यादशुभं गृहे।
तदर्धमन्यवर्गेषु ज्ञेयं विप्र शुभाऽशुभम्‌
ṣaṣṭitaḥ patitaṃ caitaccheṣaṃ syādaśubhaṃ gṛhe|
tadardhamanyavargeṣu jñeyaṃ vipra śubhā'śubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्टितः पतितम् = 60 से घटाया हुआ; शेष = अवशेष; अशुभ = अशुभ फल; गृह = भाव; तद्-अर्धम् = उसका आधा; अन्य-वर्ग = अन्य षोडश-वर्ग (D2…D60 आदि); शुभ-अशुभ = शुभ व अशुभ दोनों पक्ष।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक में जो शुभफल कहा गया, उसे साठ से घटाओ — जो बचे, वही उस गृह में अशुभफल है। अन्य वर्गों में शुभ और अशुभ दोनों का मान उस (राशि/मूल) मान का आधा जानना चाहिए। यह माप-नियम है, फल का आतंक नहीं — शास्त्र की अपनी गणना-भाषा है।

English rendering Subtract the stated auspicious measure from sixty; the remainder is the inauspicious measure in that house. In the other divisional charts, take half of those values for both the auspicious and inauspicious sides.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

- अशुभफल(गृह) = 60 − शुभफल(गृह)
- अन्यवर्गेषु: शुभ′ = शुभ/2 , अशुभ′ = अशुभ/2
(equivalently: both are half the D1-scale pair; sum still 30 on a half-scale, since (60−s)/2 + s/2 = 30)

Exact arithmetic; no tolerance band.

उदाहरण (worked example) D1, bhāva with śubha = 30 (त्रिंशत् from 28.8):
aśubha = 60 − 30 = 30.
In another varga: śubha′ = 15, aśubha′ = 15.
If śubha = 5: aśubha = 55; in other vargas → 2.5 and 27.5 (or keep virūpa-integers if the engine stores sixtieths: 5/2 and 55/2).

हमारा डिकोड (Our Decode) “अन्यवर्ग” here sits on the same ṣoḍaśa-varga lattice the decode pins (D1…D60 as equal-arc partitions of 30°). The half-rule is a pure scale map on already-computed house phala — not a new varga constructor. Convention to declare: which varga chart and which bhāva-lord linkage before quoting a numeric pair.

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28.10
पञ्चस्विष्टफलं चाद्यात्‌ समं षष्ठे ततः परम्‌।
अशुभं त्रिषु विज्ञेयमिति शास्त्रेषु निश्चितम्‌
pañcasviṣṭaphalaṃ cādyāt‌ samaṃ ṣaṣṭhe tataḥ param‌|
aśubhaṃ triṣu vijñeyamiti śāstreṣu niścitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चसु = पाँच में; इष्ट-फल = अभीष्ट/शुभ फल; आद्यात् = आदि से (प्रथम भावों से); समम् = समान; षष्ठे = छठे में; ततः परम् = उसके बाद; अशुभम् = अशुभ; त्रिषु = तीन में; शास्त्रेषु निश्चितम् = शास्त्रों में सुनिश्चित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आदि से पाँच भावों में इष्टफल समान जानो; छठे में भी वही समता है; उसके पश्चात् तीन भावों में अशुभ जानना चाहिए। यह व्यवस्था “शास्त्रों में निश्चित” कही गई है — अर्थात् परंपरा-बद्ध वर्गीकरण, न कि व्यक्तिगत भविष्यवाणी।

English rendering From the beginning, the desired (iṣṭa) result is equal across five houses; likewise equal in the sixth; thereafter inauspiciousness is to be known in three houses — so the text says it is fixed in the śāstras.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Classification rule (not a free parameter):

  • भाव 1–5: इष्टफल — samam (equal magnitude among them, on the chapter’s phala scale)
  • भाव 6: likewise samam (same equal-iṣṭa footing)
  • ततः परम्, त्रिषु: अशुभ (three subsequent houses; natural reading → 7, 8, 9)

Houses 10–12 are not named in this śloka — do not invent their bucket. Pair with 28.8–28.9 for numeric śubha/aśubha once house-index mapping is fixed by the recension you adopt.

उदाहरण (worked example) Suppose the equal iṣṭa quantum for bhāvas 1–6 is taken as the common value I on the 60-scale (value of I supplied by the house table you accept from 28.8). Then for those six: śubha = I, aśubha = 60 − I. For each of the next three (7–9): treat as aśubha-dominant per this verse’s bucket; exact fill-in still needs the per-house numerals of 28.8 where they apply.

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28.11
दिग्‌बलं दिक्‌फलं तस्य तथा दिनफलं भवेत्‌।
तयोः फलं शुभं प्रोक्तमशुभं षष्टितश्च्युतम्‌
dig‌balaṃ dik‌phalaṃ tasya tathā dinaphalaṃ bhavet‌|
tayoḥ phalaṃ śubhaṃ proktamaśubhaṃ ṣaṣṭitaścyutam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिक्-बल = दिशा-बल (षड्बल का अंग); दिक्-फल = दिशा से उत्पन्न फल; दिन-फल = दिन/काल पक्ष का फल; तयोः फलम् = उन दोनों का फल; शुभम् = शुभ; षष्टितः च्युतम् = 60 से गिरा/घटा हुआ = अशुभ।

हिन्दी भावार्थ दिग्बल ही उसका दिक्फल है; उसी रीति से दिनफल भी समझो। उन दोनों का जो मान है, वह शुभफल कहा गया; साठ से जो घटता है वही अशुभ। यहाँ बल की इकाई सीधे फल-मात्रा से जोड़ी गई है — गणना पहले, व्याख्या बाद में।

English rendering Directional strength is itself the directional result; likewise the day-result. Their measure is called auspicious; what falls away from sixty is inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

  • दिक्फल := दिग्बल (same quantum; max classically 1 रूप = 60 विरूप when the graha is in its full digbala bhāva)
  • दिनफल := corresponding day/kāla-side phala (as this chapter pairs it with dig)
  • शुभ = B (the obtained dig- or dina-value on the 60-scale)
  • अशुभ = 60 − B

Digbala orientation (standard ṣaḍbala convention to declare):
Guru & Budha → full in Lagna (East); Sūrya & Maṅgala → 10th (South); Śani → 7th (West); Śukra & Candra → 4th (North); opposite house → 0; intermediate houses by proportional arc.

उदाहरण (worked example) Mars in the 10th, full digbala: B_dig = 60 virūpa.
śubha = 60, aśubha = 0.
Mars 15° into a house halfway from 10th toward 7th on a linear house-proportion model: B_dig = 30; śubha = 30, aśubha = 30.
(Exact house-proportion formula = engine convention; state whether equal-bhāva 30° or śrīpati/placidus houses — BPHS computational default in the decode stack is whole-sign/equal 30° unless a chart declares otherwise.)

हमारा डिकोड (Our Decode) Digbala is one of the six ṣaḍbala limbs (sthāna, dig, kāla, ceṣṭā, naisargika, dṛg) the decode treats as exact numeric rules in rūpa/virūpa (1 rūpa = 60 virūpa). This verse’s 60 − B pair is the same ceiling discipline as the rest of the bala-phala block — report the number; do not inflate it into fate-speech.

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28.12
शुभेऽधिके शुभं ज्ञेयमशुभं त्वशुभेऽधिके।
दशाफलं नभोगस्य तथा भावफलं द्विज
śubhe'dhike śubhaṃ jñeyamaśubhaṃ tvaśubhe'dhike|
daśāphalaṃ nabhogasya tathā bhāvaphalaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभे अधिके = शुभ पक्ष अधिक हो; शुभं ज्ञेयम् = शुभ जानो; अशुभे अधिके = अशुभ पक्ष अधिक हो; अशुभम् = अशुभ; दशा-फल = दशा का फल; नभोग = ग्रह; भाव-फल = भाव का फल; द्विज = संबोधन।

हिन्दी भावार्थ जहाँ शुभफल अशुभ से अधिक हो, परिणाम को शुभ जानो; जहाँ अशुभ अधिक हो, अशुभ जानो। यही तुलना ग्रह की दशा-फल पर और भाव-फल पर लागू होती है — शास्त्र का तुलन-नियम, न कि सुनिश्चित घटना का दावा।

English rendering When the auspicious measure exceeds the inauspicious, know the result as auspicious; when the inauspicious exceeds, know it as inauspicious. The same comparison governs a planet’s daśā-result and a house’s result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Decision rule on the paired quantities from 28.9 / 28.11:

  • if शुभ > अशुभ → phala-sign := शुभ
  • if अशुभ > शुभ → phala-sign := अशुभ
  • if शुभ = अशुभ → equal / mixed (verse states only the two strict inequalities)

Applies to: (1) daśā-phala of the nabhoga (graha), (2) bhāva-phala.
No new constants — pure comparison of the 60-scale (or half-scale in other vargas) pair.

उदाहरण (worked example) Planet in daśā with dig-derived pair śubha = 45, aśubha = 15 → 45 > 15 → text’s bucket = śubha for that daśā-phala slice.
Bhāva with śubha = 5, aśubha = 55 → aśubha-dominant.
Tie at 30/30 → verse silent; do not force a winner.

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28.13
बलैः षड्‌भिः समोधित्वा बलैक्येन भजेत्‌ पृथक्‌।
तत्तद्‌बलफलानि स्युरशुभानि शुभानि च
balaiḥ ṣaḍ‌bhiḥ samodhitvā balaikyena bhajet‌ pṛthak‌|
tattad‌balaphalāni syuraśubhāni śubhāni ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बलैः षड्भिः = छः बलों से; समोधित्वा = जोड़कर / एकत्र करके; बल-ऐक्य = बलों का योग (ΣB); भजेत् = भाग दे; पृथक् = प्रत्येक को अलग-अलग; तत्-तद्-बल-फलानि = उन-उन बल के फल; अशुभानि शुभानि च = अशुभ और शुभ दोनों।

हिन्दी भावार्थ छहों बलों को जोड़ो; फिर प्रत्येक बल को उस कुल योग से भाग दो — जो अंश मिले, वही उस बल का फल-हिस्सा है, शुभ और अशुभ दोनों पक्षों में। यह षड्बल को आनुपातिक फल में बाँटने का सीधा गणित है।

English rendering Sum the six strengths; divide each strength separately by that total. The quotients are the respective strength-results — both the inauspicious and the auspicious shares.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let the six balas be
B₁…B₆ ∈ {स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्} (virūpa or rūpa — same unit throughout).

  • B_total = B₁ + B₂ + B₃ + B₄ + B₅ + B₆
  • फल-अंशᵢ = Bᵢ ÷ B_total (i = 1…6), provided B_total > 0
  • Σᵢ (फल-अंशᵢ) = 1

These fractional weights distribute the chapter’s śubha/aśubha phala onto each limb. Exact ratio arithmetic; use `==` on fixtures, not ± bands.

उदाहरण (worked example) Suppose (virūpa): sthāna 80, dig 60, kāla 40, ceṣṭā 30, naisargika 50, dṛg 20.
B_total = 280.
Shares: 80/280, 60/280, 40/280, 30/280, 50/280, 20/280
= 2/7, 3/14, 1/7, 3/28, 5/28, 1/14.
If overall śubha quantum for the graha is 42 (on whatever scale 28.8–11 fixed), limb-śubhaᵢ = 42 × (Bᵢ/B_total); limb-aśubhaᵢ uses the paired aśubha the same way.

हमारा डिकोड (Our Decode) This is the proportional close of the ṣaḍbala stack: six named numeric limbs, summed, then ratio-split. The decode’s discipline matches the verse — component rules first, total next, interpretation never substituted for the quotient. Thresholds for “enough strength” stay per-planet and computational; phala language stays “शास्त्र कहता है,” not fate.

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28.14
शुभपापफलाभ्यां च हन्याद्‌ दृष्टिं बलं तथा।
दृष्टी ते शुभपापाख्ये बले स्यातां तदाह्वये
śubhapāpaphalābhyāṃ ca hanyād‌ dṛṣṭiṃ balaṃ tathā|
dṛṣṭī te śubhapāpākhye bale syātāṃ tadāhvaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-पाप-फलाभ्याम् = शुभफल और पाप/अशुभ फल — दोनों से; हन्यात् = गुणित करे; दृष्टि = ग्रह-दृष्टि (बल/अंश); बल = षड्बल (या संबंधित बल); शुभ-पाप-आख्ये = शुभ और पाप नाम वाली; तदाह्वये = उन्हीं नामों से पुकारी जाएँ।

हिन्दी भावार्थ शुभफल और पापफल — इन दो राशियों से दृष्टि को और बल को गुणित करो। तब वे दो दृष्टियाँ शुभ-दृष्टि और पाप-दृष्टि नाम के बल कहलाती हैं। शास्त्र यहाँ दृष्टि को भी उसी शुभ/पाप माप से तौलता है जिससे बल को तौला।

English rendering Multiply both the aspect and the strength by the auspicious and inauspicious result-measures. Those two aspects then stand as strengths bearing the names “auspicious” and “inauspicious.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let D = dṛṣṭi measure (aspect strength/arc factor as your dṛṣṭi engine supplies), B = bala under use, S = śubha-phala, P = pāpa/aśubha-phala (from 28.9–28.12).

- शुभ-दृष्टि-बल = D × S
- पाप-दृष्टि-बल = D × P
- and likewise: शुभ-बल-फल = B × S , पाप-बल-फल = B × P
(“दृष्टिं बलं तथा” = apply the same multiplication to dṛṣṭi and to bala)

Units: keep S, P on the chapter’s 60-scale (or half-scale in other vargas); D and B in their native units; declare the product unit when publishing a number. Full graha-dṛṣṭi scheme (who aspects whom at what fraction) is Ch.8 territory — this verse only scales an already-gotten D.

उदाहरण (worked example) D = 1 (full aspect), S = 45, P = 15:
śubha-dṛṣṭi-bala = 45, pāpa-dṛṣṭi-bala = 15.
If D = 1/2 (partial aspect convention): products 22.5 and 7.5.
With B_dig = 60, same S, P: B×S = 2700, B×P = 900 on raw product scale — or normalize by 60 if the engine stores rūpa-fractions: (60/60)×45 = 45, (60/60)×15 = 15. State the normalization you use.

हमारा डिकोड (Our Decode) Dṛg-bala is already one ṣaḍbala limb; this verse further tags aspect itself with the śubha/pāpa multipliers from the phala pair. Mathematics stays multiply-and-name; the book does not convert those products into medical, legal, or financial claims — only into the śāstra’s own labelled strengths.

28.15
भावानां च फले प्रोक्ते पतीनां च फले उभे।
राशौ शुभनभोगश्चेद्‌ भावसाधनसंभवम्‌
bhāvānāṃ ca phale prokte patīnāṃ ca phale ubhe|
rāśau śubhanabhogaśced‌ bhāvasādhanasaṃbhavam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भावानाम् = भावों के; फले प्रोक्ते (द्विवचन) = दो (शुभ-पाप) फल कहे गए; पतीनाम् = भावेशों के; फले उभे = दोनों फल; राशौ = भाव-राशि में; शुभ-नभोगः = शुभ ग्रह (नभोग = आकाशचारी/ग्रह); चेत् = यदि; भाव-साधन-संभवम् = उस भाव की सिद्धि संभव।

हिन्दी भावार्थ जैसे ग्रह के, वैसे ही प्रत्येक भाव के भी दो फल (शुभ व पाप) होते हैं, और भावेश के भी दो फल। यदि उस भाव-राशि में शुभ ग्रह स्थित हो, तो उस भाव के अर्थों की सिद्धि (भाव-साधन) संभव कही गई है।

English rendering Just as with planets, each house too has its two figures (benefic and malefic), and so has its lord; and when a benefic planet occupies that house-sign, the fulfilment of that house's significations is said to be possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-निर्णय की संरचना। यह श्लोक चार राशियाँ स्थापित करता है (भाव की शुभ-फल व पाप-फल, तथा भावेश की शुभ-फल व पाप-फल); इनका वास्तविक अंकगणित 28.16 में आता है। "शुभ ग्रह से भाव-सिद्धि" शास्त्र का कथन है — इसे नियम-रूप में लें, नियति-रूप में नहीं।

28.16
फलं तस्य शुभे युञ्ज्यादशुभे वर्जयेत्‌ तथा।
पापश्चेदन्यथा चैवं बले दृष्ट्यां तथैव च
phalaṃ tasya śubhe yuñjyādaśubhe varjayet‌ tathā|
pāpaścedanyathā caivaṃ bale dṛṣṭyāṃ tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) फलं तस्य = उस (पूर्वोक्त) फल को; शुभे = शुभ दशा/स्थिति में; युञ्ज्यात् = जोड़ें/लागू करें; अशुभे = अशुभ में; वर्जयेत् = त्यागें/न लागू करें; पापः चेद् = यदि पाप-ग्रह हो; अन्यथा = उलटा/भिन्न रीति; बले = बल में; दृष्ट्याम् = दृष्टि में; तथैव = उसी प्रकार

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुभ स्थिति में पूर्वोक्त फल को लागू किया जाए और अशुभ स्थिति में उसे छोड़ दिया जाए। पाप-ग्रह होने पर नियम उलटा या भिन्न रीति से चलता है — अर्थात् शुभ-फल घटे, अशुभ-फल बढ़े, जैसी शास्त्रीय दिशा। यही विवेक बल और दृष्टि दोनों पर भी लागू होता है: बलवान्/शुभ-दृष्टि से फल युक्त; दुर्बल/पाप-दृष्टि से वर्जित या विपरीत।

English rendering Apply that result when conditions are auspicious; withhold it when they are inauspicious. If a malefic is involved, treat the case otherwise; the same principle holds for strength and for aspect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-लागू/वर्जन का द्वार-नियम। व्यवहार में यह बूलियन द्वार (gate) है: शुभ-संकेत → फल युक्त; अशुभ → फल वर्जित; पाप-ग्रह/दुर्बलता/पाप-दृष्टि → अन्यथा (विपरीत या घटाया फल)। संख्यात्मक गुणांक इस पद में नहीं दिए गए।

28.17
युञ्ज्यादुच्चादिगे खेटे फलं नीचादिगे त्यजेत्‌।
एवं शुभाऽशुभं ज्ञात्वा जातकस्य फलं वदेत्‌
yuñjyāduccādige kheṭe phalaṃ nīcādige tyajet‌|
evaṃ śubhā'śubhaṃ jñātvā jātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युञ्ज्यात् = जोड़े; उच्च-आदि-गे खेटे = उच्च आदि की ओर जाते ग्रह में; फलम् = फल; नीच-आदि-गे = नीच आदि की ओर जाते में; त्यजेत् = छोड़े; एवम् = इस प्रकार; शुभाऽशुभम् ज्ञात्वा = शुभ-अशुभ जानकर; जातकस्य फलम् = जातक का फल; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह उच्च (या मित्र-गृह आदि) की ओर बढ़ रहा हो, उसका फल जोड़ना चाहिए; जो नीच (या शत्रु-गृह आदि) की ओर जा रहा हो, उसका फल छोड़ देना चाहिए। इस विधि से शुभ-अशुभ का निर्णय करके ही जातक का फल कहना चाहिए।

English rendering For a planet advancing toward exaltation (and the like) add its figure; for one sinking toward debilitation (and the like) discard it; having thus judged the auspicious from the inauspicious, one should pronounce the native's result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिशा-चिह्न नियम: यदि ग्रह उच्चोन्मुख (नीच-बिन्दु 0° से उच्च-बिन्दु 180° की यात्रा का आरोही अर्ध) → फल जोड़ें (+); यदि नीचोन्मुख (अवरोही अर्ध) → छोड़ें (0)। यह 28.7 की उच्च→नीच नौ-श्रेणी (स्वोच्च, मूलत्रिकोण, स्वभ, अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु, अधिशत्रु, नीच) पर आरोह/अवरोह का चिह्न-निर्णय है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "उच्चादि/नीचादि गति" सीधे अ.27 षड्बल के स्थान-बल (उच्च-बल: ग्रह की उच्च-बिन्दु से कोणीय दूरी) और चेष्टा-बल (गति) से जुड़ती है — दोनों मात्रात्मक नियम हैं। हमारे इंजन में उच्च/नीच एक निर्देशांक-अंतर है (नीच 0° पर, उच्च 180° पर), भाग्य-कथन नहीं।

28.18
अष्टवर्गफलं चैवं स्थाने च करणेऽन्यथा।
राशिद्वयगते भावे तद्राश्यधिपतेः क्रिया
aṣṭavargaphalaṃ caivaṃ sthāne ca karaṇe'nyathā|
rāśidvayagate bhāve tadrāśyadhipateḥ kriyā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्ट-वर्ग-फलम् = अष्टकवर्ग-फल; एवम् = इसी प्रकार; स्थाने = स्थिति (position) में; करणे = गणना-क्रिया में; अन्यथा = भिन्न रीति से; राशि-द्वय-गते भावे = दो राशियों में विस्तृत भाव में; तद्-राशि-अधिपतेः = उस (प्रत्येक) राशि के स्वामी की; क्रिया = क्रिया/प्रक्रिया।

हिन्दी भावार्थ अष्टकवर्ग का फल भी स्थिति (स्थान) के विषय में इसी शुभ-अशुभ रीति से लिया जाता है, किन्तु गणना-क्रिया (करण) में विधि भिन्न है। जब कोई भाव दो राशियों में फैला हो, तो वहाँ प्रत्येक राशि के अधिपति के अनुसार क्रिया (गणना) करनी चाहिए।

English rendering The aṣṭakavarga figure too is handled thus as regards position, but its computation proceeds differently; and where a house straddles two signs, the operation is performed with respect to the lord of each such sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग = D1 की प्रत्येक राशि में 7 ग्रह + लग्न (8 स्रोत) से बिन्दु/रेखा-गणना। "स्थाने" (भाव-बिन्दु-स्थिति) में शुभ-अशुभ नियम वही; "करणे" (शोधन/योग-क्रिया) भिन्न। भाव यदि राशि-सन्धि पर दो राशियों R₁, R₂ में बँटा हो, तो उसका फल = f(अधिपति R₁, अधिपति R₂) — केवल एक नहीं, दोनों स्वामियों के योगदान से।

उदाहरण (worked example) कोई भाव 28° मेष से 26° वृष तक फैला हो → R₁ = मेष (स्वामी मंगल), R₂ = वृष (स्वामी शुक्र); उस भाव का अष्टकवर्ग-फल मंगल- व शुक्र-दोनों की राशि-रेखाओं से साधा जाएगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे अष्टकवर्ग (अ.66) की ओर इशारा है — हमने अ.66 की सर्व-रेखा को कैनन में पिन किया: सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = 337 (7 ग्रह)। ओरैकल इन मानों को पिन-फ़िक्स्चर पर `==` से जाँचता है — कोई सहन-पट्टी नहीं (±3 की पट्टी ने एक बार असली −1 छिपा दिया था; test_astakavarga_fixture.py, NEXT-STEPS DONE 2026-08-10)। श्लोक का "करणेऽन्यथा" (भिन्न शोधन-क्रिया) हमारे त्रिकोण-शोधन (अ.67) व एकाधिपत्य-शोधन (अ.68) की उस SAV-पूर्व घटाव-क्रिया से मेल खाता है।

28.19
स्थानाधिकेन भावेन भावलाभः प्रकीर्तितः।
तत्समाने च तद्‌भावे तदानीं स्थानदान्‌ ग्रहान्‌
sthānādhikena bhāvena bhāvalābhaḥ prakīrtitaḥ|
tatsamāne ca tad‌bhāve tadānīṃ sthānadān‌ grahān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थानाधिकेन = स्थान-संख्या/स्थान-बल अधिक होने से; भावेन = भाव से; भावलाभः = भाव-लाभ (उस भाव का फल/प्राप्ति); प्रकीर्तितः = कहा गया; तत्समाने = समान होने पर; तद्भावे = उस भाव में; तदानीम् = तब; स्थानदान् ग्रहान् = स्थान देने वाले ग्रहों को

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस भाव की स्थान-संख्या (स्थान-बल/स्थान-अंक) अधिक हो, उसी भाव का लाभ कीर्तित होता है। यदि दोनों पक्ष समान हों, तो उस भाव में स्थान देने वाले ग्रहों को आगे जोड़ा जाता है — अगले पद में उनका योग और आधा लेने का नियम आता है।

English rendering Gain of a house is declared through the house that has the greater place-measure. When the measures are equal in that house, one then takes the planets that bestow place.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तुलना-नियम (अधिकतर / बराबर):
माना दो पक्षों की स्थान-संख्या Sₐ, S_b।
- यदि Sₐ > S_b → भाव A का भावलाभ प्रकीर्तित।
- यदि Sₐ = S_b → “स्थानद” ग्रह-समुच्चय G पर आगे बढ़ें (पद २८.२०)।
“स्थान-संख्या” का स्रोत (अष्टवर्ग-बिन्दु, स्थानबल, अन्य) इस पद में नामित नहीं — घोषित परम्परा से बाँधना चाहिए।

उदाहरण (worked example)
कल्पना: भाव-तुलना में S₇ = ५, S₁₀ = ३ → ७वें का स्थान अधिक → शास्त्र की भाषा में सप्तम-भावलाभ प्रकीर्तित।
यदि S₇ = S₁₀ = ४ → समान → दोनों भावों में स्थानद ग्रहों का योग-दल अगले पद से।
(अंक उदाहरणमात्र; अयनांश/वर्ग-नियम यहाँ अन्तर्निहित नहीं।)

28.20
संयोज्ये स्थानसंख्याया दलमेतत्समं फलं।
एवं सखेटभावानां फलं ज्ञेयं शुभाऽशुभम्‌
saṃyojye sthānasaṃkhyāyā dalametatsamaṃ phalaṃ|
evaṃ sakheṭabhāvānāṃ phalaṃ jñeyaṃ śubhā'śubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संयोज्य = जोड़कर; स्थानसंख्यायाः = स्थान-संख्या का; दलम् = आधा (१/२); एतत् = यह; समं फलं = समान (दशा का) फल; एवं = इस प्रकार; सखेटभावानाम् = ग्रहों सहित भावों का; फलं ज्ञेयम् = फल जानना; शुभाऽशुभम् = शुभ-अशुभ रूप में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि समान स्थिति में स्थानद ग्रहों की स्थान-संख्याएँ जोड़कर उनका आधा (दल) ही उस सम-फल के रूप में लिया जाए। इसी रीति से ग्रह-युक्त भावों का शुभ-अशुभ फल जाना जाता है — पूर्ण योग नहीं, दल ही सम-फल का माप।

English rendering Combining the place-numbers, half of that sum is the result for the equal case. Thus the auspicious or inauspicious result of the houses with their planets is to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
समान-स्थान दशा में:
P = Σᵢ sᵢ (स्थानद ग्रहों की स्थान-संख्याओं का योग)
फल_सम = P / २ = P × १/२ (दल = आधा)
फिर उस फल_सम को शुभ/अशुभ विवेक (पद २८.१५–१७) से भाव-फल में युक्त या वर्जित किया जाए।
यह अनुपात-अंकगणित है; निरपेक्ष “भाग्य-संख्या” नहीं — शास्त्र का माप-नियम मात्र।

उदाहरण (worked example)
समान भाव-तुलना के बाद स्थानद ग्रह: s₁ = ३, s₂ = ५, s₃ = २।
P = ३ + ५ + २ = १०
फल_सम = १० ÷ २ = ५
शास्त्र कहता है: यह ५ सम-फल का माप; तत्पश्चात् शुभ/अशुभ, बल, दृष्टि से युक्ति/वर्जन (२८.१६–१७)।

अध्यायः 29

पदाध्यायः

37 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
पदाध्याय भावों और ग्रहों के पद की गणितीय रचना सिखाता है — वह स्थान-निर्धारण जिससे भाव-फल का “विशेष” पक्ष जाना जाता है, जैसा महर्षियों ने पहले कहा है। लग्न से लेकर लग्नेश्वर जिस क्रम-राशि में बैठे हों, उसी दूरी को लग्नेश्वर से आगे गिनकर लग्न-पद मिलता है; यही नियम सब भावों पर लागू होता है, और तनु-भाव-पद को विद्वान मुख्य पद मानते हैं। जब गिनती स्व-स्थान या सप्तम पर गिरे तो पद नहीं माना जाता — उस स्थिति में मध्य-तुर्य क्रम से पद-निर्धारण, तथा नाथ के तुर्य/सप्तम-स्थिति पर तुर्य/दशम-पद जैसी स्पष्ट आपत्तियाँ अध्याय की रीढ़ हैं। सैंतीस श्लोकों में पद-गठन, उसके अपवाद, और पद-आश्रित फल-कथन एक-दूसरे से जुड़कर भाव-विश्लेषण का स्थानिक ढाँचा पूरा करते हैं। यहाँ फल = शास्त्र का कथन; गणना = गिनती और स्थान-नियम।

For the English reader:
Adhyāya 29 is the chapter of pada — the projected “image” or count-place of a house (and, by the same logic, of planets), obtained by measuring how far a house-lord sits from its house and casting that same arc forward from the lord. Parāśara opens with lagna-pada as the model, extends the rule to every bhāva, elevates the first-house pada as the primary reference, and immediately fences the method with hard exceptions: a pada may not rest in the same sign as the house or in the seventh from it; the text then supplies the corrective landings (fourth, tenth, and related mid-steps) so the construction stays determinate. What follows in the remaining verses is not free narrative but the phala-language of those constructed points — always as the śāstra’s stated results, never as sealed fate. Read it as modular house-counting with declared edge-cases: the skeleton of ārūḍha before later chapters lean on it.

मुख्य गणित/तकनीक:
- भाव-पद (सामान्य नियम): भाव \(B\) से भावेश \(L\) की राशि-दूरी \(d\) (क्रम-गणना) हो, तो पद \(P = L + d\) (राशि-मॉड्यूल 12) — लग्न-पद के लिए \(B =\) लग्न, \(L =\) लग्नेश्वर।
- सर्व-भाव विस्तार: वही \(d\)-प्रक्षेपण प्रत्येक भाव पर; तनु-भाव-पद = मुख्य पद (मुख्य संदर्भ-बिंदु)।
- अपात्ति (निषेध-स्थान): \(P \equiv B\) (स्वस्थान) या \(P \equiv B+6\) (सप्तम) ⇒ पद अमान्य; तब शास्त्रोक्त मध्य/तुर्य क्रम से सुधार-पद।
- नाथ-स्थिति विशेष: नाथ तुर्यस्थ ⇒ तुर्य ही पद; नाथ सप्तमस्थ ⇒ दशम पद — गणना का नियत किनारा, न कि व्याख्या।

डिकोड-सेतु:
इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

29.1
कथ्याम्यथा भावानां खेटानां च पदं द्विज।
तद्विशेषफलं ज्ञातुं यथोक्तं प्राङ्‌ महर्षिभिः
kathyāmyathā bhāvānāṃ kheṭānāṃ ca padaṃ dvija|
tadviśeṣaphalaṃ jñātuṃ yathoktaṃ prāṅ‌ maharṣibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कथ्यामि = अब मैं कहता हूँ; भावानाम् = भावों (12 गृहों) का; खेटानाम् = ग्रहों का; पदम् = पद / आरूढ (गणना-द्वारा प्राप्त प्रतिबिम्ब-राशि); द्विज = हे ब्राह्मण (मैत्रेय); तद्विशेषफलम् = उसके विशेष फल को; ज्ञातुम् = जानने के लिए; यथोक्तं प्राङ् महर्षिभिः = जैसा पूर्व में महर्षियों ने कहा है।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, अब मैं भावों तथा ग्रहों के "पद" (आरूढ) का वर्णन करता हूँ, जिससे उनका विशेष फल जाना जा सके — यह विधि पूर्ववर्ती महर्षियों द्वारा उपदिष्ट है। यह श्लोक अध्याय की प्रतिज्ञा है; पद-गणना की वास्तविक विधि आगे के श्लोकों में आती है।

English rendering Now, O twice-born, I shall expound the pada (ārūḍha) of the houses and of the planets, so that their special results may be known — as was taught aforetime by the great sages.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-प्रस्तावना (प्रतिज्ञा-वाक्य)। यहाँ ध्यातव्य केवल इतना कि "पद" शब्द इस अध्याय में आरूढ-राशि का पारिभाषिक नाम है — कुण्डली का एक गणित-सिद्ध प्रतिबिम्ब, न कि कोई दृश्य ग्रह-स्थिति; इसका सूत्र श्लोक 2 में खुलता है।

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29.2
लग्नाद्‌ यावतिथे राशौ तिष्ठेल्लग्नेश्वरः क्रमात्‌।
ततस्तावतिथे राशौ लग्नस्य पदमुच्यते
lagnād‌ yāvatithe rāśau tiṣṭhellagneśvaraḥ kramāt‌|
tatastāvatithe rāśau lagnasya padamucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न-राशि से गिनकर; यावतिथे राशौ = जितनी-वीं (n-वीं) राशि में; तिष्ठेत् = स्थित हो; लग्नेश्वरः = लग्नेश (लग्न-राशि का स्वामी); क्रमात् = क्रम से; ततः = वहाँ से (अर्थात् लग्नेश की राशि से); तावतिथे राशौ = उतनी-वीं (उसी n-वीं) राशि में; लग्नस्य पदम् = लग्न का पद (आरूढ लग्न) कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ लग्न से गिनते हुए लग्नेश जितनी-वीं राशि में बैठा हो, ठीक उतनी ही राशियाँ लग्नेश से आगे गिनकर जो राशि आती है — वही "लग्न का पद" अर्थात् आरूढ लग्न है। संक्षेप में: लग्न→लग्नेश की दूरी को लग्नेश से पुनः उतना ही आगे बढ़ाइए।

English rendering Count from the lagna to the sign occupied by its lord; then count the same number of signs onward from the lord — the sign so reached is declared the pada of the lagna (the Ārūḍha Lagna).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मान लें लग्न-राशि सूचकांक L, लग्नेश की राशि P (दोनों 1…12)। लग्न से लग्नेश तक की गणना n = ((P − L) mod 12) + 1। पद = लग्नेश से n-वीं राशि = P + (n − 1)। सरलीकृत सूत्र (राशि-अंकगणित, mod 12):
पद-राशि = ((2P − L − 1) mod 12) + 1।
यह विशुद्ध पूर्णांक/मॉड्युलर गणना है — कोई कोणीय अंश नहीं, केवल राशि-गणना।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष (L = 1), लग्नेश मंगल सिंह में (P = 5)। n = ((5 − 1) mod 12) + 1 = 5। सिंह से 5वीं राशि = सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु → धनु। सूत्र-जाँच: ((2·5 − 1 − 1) mod 12) + 1 = (8 mod 12) + 1 = 9 = धनु। अतः आरूढ लग्न = धनु।

हमारा डिकोड (Our Decode) पद यहाँ ठीक वैसा ही परिच्छिन्न, नियम-निर्धारित पूर्णांक-गणित है जैसा हमारे वर्ग-इंजन में D1…D60 का विभाजन (एक 30° राशि का समान-चाप मॉड्युलर विभाजन) — "देशांतर पर विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित" (kaal_ekavimshati_varga.py)। इसी वर्ग की गणनाओं को हमारा kaal-verification-oracle सहन-सीमा (tolerance) के बिना `==` से जाँचता है; पद-सूत्र भी उसी अनुशासन का पात्र है — मान या तो ठीक धनु है या नहीं।

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29.3
सर्वेषामाप भावानां ज्ञेयमेवं पदं द्विज।
तनुभावपदं तत्र बुधा मुख्यपदं विदुः
sarveṣāmāpa bhāvānāṃ jñeyamevaṃ padaṃ dvija|
tanubhāvapadaṃ tatra budhā mukhyapadaṃ viduḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वेषाम् = सभी के; अपि = भी; भावानाम् = भावों का; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; एवम् = इसी प्रकार; पदम् = पद; तनुभावपदम् = तनु/प्रथम भाव का पद; तत्र = उनमें; बुधाः = विद्वान्; मुख्यपदम् = प्रधान पद; विदुः = जानते हैं।

हिन्दी भावार्थ लग्न के लिए जो विधि कही, वही क्रम सभी भावों के पद पर लागू होता है — प्रत्येक भाव से उसके स्वामी तक गिनें, फिर स्वामी से उतनी ही राशियाँ। उन सब पदों में तनुभाव-पद (लग्न-पद) को शास्त्र-परम्परा मुख्य पद मानती है; शेष भाव-पद उसी ढाँचे के विस्तार हैं।

English rendering The pada of every house is to be known in the same way. Among them the wise take the pada of the first house (tanu-bhāva-pada / Lagnārūḍha) as the principal pada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव \( B \) (1…12) का पद:

1. भाव-राशि = लग्न से \( B \)-वाँ राशि:
\( S_B = ((L - 1 + B - 1) \bmod 12) + 1 \)।
2. भाव-स्वामी की राशि = \( R_B \)。
3. \( d_B = ((R_B - S_B) \bmod 12) + 1 \)।
4. \( P_B = ((R_B - 1 + d_B - 1) \bmod 12) + 1 \)।

मुख्यपद: \( P_1 \) (तनुभाव-पद / AL) — शेष \( P_2 \ldots P<sub>12</sub> \) समान नियम से।
अपवाद 29.4–29.5 सभी भाव-पदों पर लागू।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (6); दशम भाव-राशि = मिथुन (3), दशमेश बुध = मकर (10)।
\( d = ((10-3)\bmod 12)+1 = 8 \)।
पद: मकर से 8 → सिंह (5)। दशम-पद = सिंह (अपवाद लागू न होने पर)।

29.4
स्वस्थानं सप्तमं नैवं पदं भवितुमर्हति।
तस्मिन्‌ पदत्वे विज्ञेयं मध्यं तुर्यं क्रमात्‌ पदम्‌
svasthānaṃ saptamaṃ naivaṃ padaṃ bhavitumarhati|
tasmin‌ padatve vijñeyaṃ madhyaṃ turyaṃ kramāt‌ padam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वस्थानम् = अपना स्थान (जिस भाव का पद निकाला, वही राशि); सप्तमम् = सप्तम राशि; न एवम् = इस प्रकार नहीं; पदम् भवितुम् अर्हति = पद होने योग्य नहीं; तस्मिन् पदत्वे = जब (गणना से) वही पद-रूप हो जाए; विज्ञेयम् = जानना; मध्यम् = मध्य/चतुर्थ; तुर्यम् = चतुर्थ; क्रमात् = क्रम से; पदम् = पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट निषेध करता है — पद न तो भाव के स्व-स्थान पर बैठे, न उसके सप्तम पर। यदि समान-दूरी की गणना से पद इन्हीं दो स्थानों पर आ जाए, तो क्रमशः मध्य (चतुर्थ) और तुर्य-सम्बद्ध संशोधन लागू होता है; अगला श्लोक उदाहरण से ठोस बनाता है। यह अपवाद पद को भाव या उसके अस्त-स्थानीय सप्तम से अलग रखने का नियम है।

English rendering The pada is not allowed to fall in the house’s own place or in its seventh. When the count would put it there, the middle (fourth) and the fourth-related correction, in order, are to be taken as the pada (as 29.5 exemplifies).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मान लें कच्चे पद \( P \) की गणना 29.2/29.3 से हुई, भाव-राशि \( S \)।

- निषिद्ध: \( P = S \) (स्वस्थान) या \( P = S_7 \) जहाँ \( S_7 = ((S-1+6)\bmod 12)+1 \) (सप्तम)।
- संशोधन (परम्परागत BPHS-पठन, 29.5 से सुसंगत):
निषिद्ध \( P \) से 10वीं राशि लें —
\( P' = ((P - 1 + 9) \bmod 12) + 1 \)।

फलस्वरूप:
- यदि कच्चा पद = स्वस्थान \( S \) → \( P' \) = दशम (\( S \) से 10)।
- यदि कच्चा पद = सप्तम \( S_7 \) → \( P' \) = \( S_7 \) से 10 = भाव से चतुर्थ (मध्य/तुर्य)।

“मध्यं तुर्यं क्रमात्” इसी द्वि-मामले की ओर संकेत: स्वस्थान-मामले में दशम-दिशा, सप्तम-मामले में तुर्य (चतुर्थ) पद। पाठ-भेद/टीका-भेद संभव; यहाँ 29.5 के स्पष्ट उदाहरणों से बांधा गया।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (1), लग्नेश मंगल = मेष (1) — स्वगृह।
कच्चा: \( d=1 \), \( P=1 \) = स्वस्थान — निषिद्ध।
\( P' = ((1-1+9)\bmod 12)+1 = 10 \) → मकर। लग्न-पद = मकर (दशम)।

29.5
यथा तुर्यस्थिते नाथे तुर्यमेव पदं भवेत्‌।
सप्तमे च स्थिते नाथे विज्ञेयं दशमं पदम्‌
yathā turyasthite nāthe turyameva padaṃ bhavet‌|
saptame ca sthite nāthe vijñeyaṃ daśamaṃ padam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा = जैसे; तुर्यस्थिते नाथे = चतुर्थ में स्थित स्वामी होने पर; तुर्यम् एव = चतुर्थ ही; पदम् भवेत् = पद होता है; सप्तमे स्थिते नाथे = सप्तम में स्वामी होने पर; विज्ञेयम् = जानना; दशमम् पदम् = दशम पद।

हिन्दी भावार्थ नियम के दो स्पष्ट दृष्टान्त: यदि भाव-स्वामी चतुर्थ में हो तो पद चतुर्थ ही होता है; यदि स्वामी सप्तम में हो तो पद दशम जाना जाता है। दोनों कच्ची गणना के बाद अपवाद लगाने से ही सिद्ध होते हैं — चतुर्थ-स्थिति कच्चा पद सप्तम देती है, जो निषिद्ध होकर चतुर्थ पर लौटता है; सप्तम-स्थिति कच्चा पद स्वस्थान देती है, जो दशम बनता है।

English rendering When the lord stands in the fourth, the fourth itself becomes the pada; when the lord stands in the seventh, the tenth is to be known as the pada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-राशि \( S \), स्वामी-राशि \( R \); \( d = ((R-S)\bmod 12)+1 \); कच्चा \( P = ((R-1+d-1)\bmod 12)+1 \); फिर 29.4 का 10-वें संशोधन।

मामला A — नाथ तुर्य में: \( R = S_4 = ((S-1+3)\bmod 12)+1 \)।
\( d=4 \), कच्चा \( P = S_7 \) (सप्तम) → निषिद्ध → \( P' = S_4 \) = तुर्य। ✓

मामला B — नाथ सप्तम में: \( R = S_7 \)।
\( d=7 \), कच्चा \( P = S \) (स्वस्थान) → निषिद्ध → \( P' = S<sub>10</sub> \) = दशम। ✓

अन्य उपयोगी सीमा-मामले (उसी सूत्र से):
- नाथ स्वगृह (\( R=S \)): \( P'=S<sub>10</sub> \) (दशम)।
- नाथ दशम में: कच्चा \( P=S_7 \) → \( P'=S_4 \) (चतुर्थ)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क (4), लग्नेश चन्द्र = तुला (7) = सप्तम।
कच्चा: \( d=7 \), \( P=4 \) (कर्क) = स्वस्थान → संशोधन → मेष (1) = दशम। लग्न-पद = मेष।
दूसरा: लग्न = कर्क (4), चन्द्र = तुला नहीं बल्कि तुला… तुर्य = तुला (7)। चन्द्र = तुला:
\( d=4 \), कच्चा \( P \) = मकर (10) = सप्तम → संशोधन → तुला (7) = तुर्य। लग्न-पद = तुला।

29.6
यस्माद्‌ यावतिथे राशौ खेटात्‌ तद्‌भवनं द्विज।
ततस्तावतिथं राशिं खेटारूढं प्रचक्षते
yasmād‌ yāvatithe rāśau kheṭāt‌ tad‌bhavanaṃ dvija|
tatastāvatithaṃ rāśiṃ kheṭārūḍhaṃ pracakṣate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मात् = जिससे (ग्रह-राशि से); यावतिथे राशौ = जितवें राशि में; खेटात् = ग्रह से; तद्भवनम् = उसका भवन (स्व-राशि/अधिकृत राशि); द्विज = हे द्विज; ततः = उससे; तावतिथम् राशिम् = उतनेवें राशि को; खेटारूढम् = ग्रह-आरूढ / ग्रह-पद; प्रचक्षते = कहते हैं।

हिन्दी भावार्थ भाव-पद की तरह ग्रह-पद भी समान-दूरी से बनता है — ग्रह जिस राशि में बैठा है, उससे उसके भवन (स्वामित्व-राशि) तक जितनी राशियाँ गिनी जाएँ, उतनी ही राशियाँ ग्रह-राशि से आगे गिनकर खेटारूढ कहा जाता है। द्वि-स्वामी ग्रहों के दो भवन हो सकते हैं — अगला श्लोक बल से सीमा बाँधता है।

English rendering From the planet, count as many signs as that planet’s own house lies away from it; the sign reached by counting the same number again from the planet is called the khetārūḍha (planet’s ārūḍha / graha-pada).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह \( G \) की स्थिति-राशि \( R_G \); उसका भवन (एक स्व-राशि) \( H \)।

1. \( d_G = ((H - R_G) \bmod 12) + 1 \)
(ग्रह से भवन तक क्रम-गिनती)।
2. खेटारूढ:
\( A_G = ((R_G - 1 + d_G - 1) \bmod 12) + 1 \)。

अर्थात् भवन, ग्रह से जितना दूर, आरूढ ग्रह से उतना ही दूर — दर्पण-सममिति: ग्रह, भवन और आरूढ सम-दूरी पर।
द्वि-राशि स्वामित्व (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) में प्रत्येक \( H \) से अलग \( A_G \) संभव; 29.7 सबल चयन।
(भाव-पद के स्वस्थान/सप्तम अपवाद का ग्रह-आरूढ पर पूर्ण समान लागू होना — पाठ में यहाँ अव्यक्त; भाव-पद अपवाद 29.4–29.5 पर स्पष्ट।)

उदाहरण (worked example) सूर्य कर्क (4) में; सूर्य-भवन = सिंह (5)।
\( d = ((5-4)\bmod 12)+1 = 2 \)।
खेटारूढ: कर्क से 2 = सिंह (5)।
दूसरा: गुरु धनु (9) में; एक भवन = धनु (9) → \( d=1 \), \( A=9 \) (स्व); अन्य भवन = मीन (12) → \( d=((12-9)\bmod 12)+1=4 \), \( A \) = मीन से नहीं — गुरु (9) से 4 = मीन (12)। दो खेटारूढ: धनु व मीन — बल से एक मुख्य (29.7)।

29.7
द्विनाथद्विभयोरेवं विज्ञेयं सबलावधि।
विगणय्य पदं विप्र ततस्तस्य फलं वदेत्‌
dvināthadvibhayorevaṃ vijñeyaṃ sabalāvadhi|
vigaṇayya padaṃ vipra tatastasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विनाथ = दो स्वामी; द्विभयोः = दो राशियों के; एवम् = इसी प्रकार; विज्ञेयम् = जानना; सबलावधि = बल की सीमा तक / सबल पर्यन्त; विगणय्य = भली-भाँति गिनकर; पदम् = पद; विप्र = हे विप्र; ततः = तब; तस्य फलम् = उसका फल; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ जहाँ दो नाथ या दो भवन हों, वहाँ भी पद इसी विधि से निकालें, और सबल पक्ष की सीमा तक निर्णय लें — निर्बल विकल्प को प्रधान न बनाएँ। पद का विगणन पूरा करके ही उसके फल का कथन करना चाहिए। शास्त्र यहाँ फल को पद-गणना के बाद रखता है; गणना अधूरी छोड़कर फल नहीं कहा जाता।

English rendering For dual lords and dual signs, know the pada in the same way, limited by strength; having carefully computed the pada, O Brahmin, one should then state its result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र आंशिक — द्वि-भवन/द्वि-नाथ चयन + फल-क्रम।

1. प्रत्येक उम्मीदवार भवन/स्वामी-युग्म पर 29.2–29.6 का पद \( P_i \) निकालें।
2. सबलावधि: जिस स्वामी/ग्रह का बल अधिक (षड्बल, दिग्बल, उच्च-स्व-मूलत्रिकोण आदि — जो परम्परा अपनाए; यहाँ इकाई घोषित करें), उसी से बना \( P \) प्रधान पद।
औपचारिक रूप: \( P^\star = P<sub>i^\star</sub>,\quad i^\star = \arg\max_i \mathrm{Bala}(G_i) \)।
3. फल-कथन: केवल \( P^\star \) (और आवश्यकता हो तो निर्बल पद गौण) पर शास्त्रोक्त पद-फल।

यह श्लोक नयी दूरी-सूत्र नहीं देता; चयन-नियम + “पहले गणित, फिर फल” की अनुशासन-पंक्ति है। बल-मान षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) रूप/विरूप में मापे जा सकते हैं (1 रूप = 60 विरूप) — वह Ch.27 का तंत्र है; यहाँ केवल “सबल” सीमा कही गई।

उदाहरण (worked example) बुध कन्या (6) में। भवन₁ = मिथुन (3), भवन₂ = कन्या (6)।
- भवन मिथुन: \( d=((3-6)\bmod 12)+1=10 \), \( A_1=((6-1+9)\bmod 12)+1=3 \) (मिथुन)।
- भवन कन्या: \( d=1 \), \( A_2=6 \) (कन्या)।
यदि इस कुण्डली में बुध सबल (उच्च/स्व) माना जाए तो प्रधान खेटारूढ = कन्या (\( A_2 \)); निर्बल पक्ष मिथुन गौण। तदनुसार ही पद-फल का कथन — शास्त्र की क्रम-व्यवस्था के अनुसार, न कि फल का स्वतन्त्र दावा।

29.8
अथाऽहं पदमाश्रित्य फलं किञ्चिद्‌ ब्रुवे द्विज।
पदादेकादशे स्थाने ग्रहैर्युक्तोऽथवेक्षिते
athā'haṃ padamāśritya phalaṃ kiñcid‌ bruve dvija|
padādekādaśe sthāne grahairyukto'thavekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अहम् = मैं; पदम्-आश्रित्य = आरूढ़-पद को आधार बनाकर; फलम् किञ्चित् = कुछ फल; ब्रुवे = कहता हूँ; द्विज = हे द्विज; पदात्-एकादशे स्थाने = पद से ग्यारहवें भाव में; ग्रहैः-युक्तः = ग्रहों से युक्त; अथवा-ईक्षिते = अथवा दृष्ट होने पर।

हिन्दी भावार्थ महर्षि अब पद (आरूढ़) पर आश्रित फल कहना आरम्भ करते हैं। सूत्र की धुरी यह है—पद से ग्यारहवाँ स्थान (लाभ-स्थान) यदि ग्रहों से युक्त हो, अथवा ग्रहों की दृष्टि से देखा जा रहा हो, तो आगे बताए गए धन–सुख के फल लगते हैं। यह पद-आधारित लाभ-विचार का द्वार-श्लोक है; पूरा फल अगले श्लोकों में खुलता है।

English rendering The sage now begins results grounded in the Pada (ārūḍha): when the eleventh place from the Pada is joined by planets, or is aspected by them, the phala that follow apply. This is the opening hinge of the Pada-based lābha discussion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पद = आरूढ़-लग्न (Ārūḍha Lagna, AL) — गणना-सूत्र इस श्लोक में नहीं; यहाँ केवल सापेक्ष स्थान-निर्देश है। एकादश-स्थान (लाभ) पद से:
`Lābha_from_Pada = (Pada_rāśi_index + 10) mod 12`
(राशियाँ 0…11; +10 = ग्यारहवाँ भाव)। “युक्त” = उसी राशि में ग्रह-स्थिति; “ईक्षित” = शास्त्रीय दृष्टि-नियम से उस राशि पर दृष्टि। फल आगे के श्लोकों में।

उदाहरण (worked example) मानें AL = मिथुन (index 2)। तब पद से 11वाँ = `(2 + 10) mod 12 = 0` → मेष। यदि मेष में शुक्र स्थित हो, अथवा कोई ग्रह मेष पर दृष्टि डाले, तो 29.8–29.9 का योग-द्वार खुलता है। (राशि-सूचकांक 0=मेष…11=मीन; आरूढ़-सूत्र स्वयं अध्याय के पूर्व पद-सूत्र पर निर्भर।)

29.9
धनवान्‌ जायते बालस्तथा सुखसमन्वितः।
शुभयोगात्‌ सुमार्गेण धनाप्तिः पापतोऽन्तथा
dhanavān‌ jāyate bālastathā sukhasamanvitaḥ|
śubhayogāt‌ sumārgeṇa dhanāptiḥ pāpato'ntathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनवान् जायते बालः = वह बालक धनवान् होता है; तथा सुखसमन्वितः = तथा सुख-सम्पन्न; शुभयोगात् = शुभ ग्रहों के योग से; सुमार्गेण = सन्मार्ग (उत्तम उपायों) से; धनाप्तिः = धन-प्राप्ति; पापतः = पाप ग्रहों से; अन्यथा = अन्यथा (कुमार्ग से)।

हिन्दी भावार्थ (पद से एकादश में शुभ-ग्रहों के योग/दृष्टि होने पर) — शास्त्र कहता है कि वह जातक धनवान् एवं सुखी होता है; शुभ योग से धन सन्मार्ग द्वारा प्राप्त होता है, और पाप-ग्रहों से वही धन-प्राप्ति अन्य (अनुचित) मार्ग से बताई गई है। यह ग्रह-स्वभाव के अनुसार धन-आगमन-मार्ग का शास्त्रीय कथन है।

English rendering The text states: the native becomes wealthy and endowed with comfort; by benefic association wealth is gained through good means, and by malefics, otherwise (through improper means).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ केवल शुभ/पाप वर्गीकरण ही "चर" है; "धनी होगा" कोई गणना-निर्गम नहीं, अपितु शास्त्र का प्रवृत्ति-कथन है। इसे "शास्त्र कहता है" रूप में ग्रहण करें — नियति या निश्चय के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह रेखा है जिस पर हमारा समूचा अनुशासन टिका है (dossier #5): पद की गणना (श्लोक 2–7) परिच्छिन्न गणित है — `==` से सत्यापनीय; किन्तु श्लोक 9 का "धनवान् जायते" फल-वचन है — इसे हम पाठ का स्वर मानकर उद्धृत करते हैं, अपना समर्थित पूर्वानुमान नहीं। गणित और व्याख्या को अलग रखना — भय, निश्चय या उपाय-दबाव से रहित — यही हमारी विधि का मूल।

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29.10
मिश्रैर्मिश्रं फलं ज्ञेयं स्वोच्चमित्रादिगेहगैः।
बहुधा जायते लाभो बहुधा च सुखागमः
miśrairmiśraṃ phalaṃ jñeyaṃ svoccamitrādigehagaiḥ|
bahudhā jāyate lābho bahudhā ca sukhāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिश्रैः = मिश्र (शुभ+पाप) ग्रहों से; मिश्रम् फलम् = मिश्र फल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; स्व-उच्च-मित्र-आदि-गेह-गैः = स्वराशि, उच्च, मित्रादि भाव में स्थित ग्रहों से; बहुधा = अनेक प्रकार से; जायते लाभः = लाभ होता है; बहुधा च सुख-आगमः = और अनेक प्रकार से सुख का आगमन।

हिन्दी भावार्थ मिश्र ग्रहों से मिश्र फल समझना चाहिए—न केवल शुभ, न केवल अशुभ। जब वे ग्रह स्व-गेह, उच्च-गेह, मित्र-गेह आदि शुभ स्थानों में हों, तो शास्त्र बहुधा लाभ और बहुधा सुखागम कहता है। अर्थात् ग्रह-मिश्रण फल को मिलाता है; स्थान-बल (स्व/उच्च/मित्र) लाभ–सुख की बहुलता बढ़ाता है—यह पाठ का अपना कथन है।

English rendering With mixed planets, mixed results are to be known. When those planets occupy their own, exaltation, friendly, or like houses, gain is said to arise in many ways and happiness to arrive in many ways. Mixture colors the phala; dignity multiplies the stated breadth of lābha and sukha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थान-श्रेणी। आधुनिक संकेत में केवल स्थिति-वर्ग:
`dignity ∈ {sva, ucca, mitra, …}` बनाम `miśra graha-set`।
“बहुधा” संख्यात्मक गुणक नहीं—गुण-बहुलता का शाब्दिक संकेत। उच्च/स्व/मित्र की परिभाषा ग्रह–राशि तालिका पर निर्भर (उदा. गुरु उच्च = कर्क); इस श्लोक में अंश/डिग्री नहीं दिए गए।

29.11
पदाल्लाभगृहं यस्य पश्यन्ति सकला ग्रहाः।
राजा वा राजतुल्यो वा स जातो नात्र संशयः
padāllābhagṛhaṃ yasya paśyanti sakalā grahāḥ|
rājā vā rājatulyo vā sa jāto nātra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदात्-लाभ-गृहम् = पद से लाभ-भाव (11वाँ); यस्य = जिसका; पश्यन्ति = देखते हैं; सकलाः ग्रहाः = सभी ग्रह; राजा वा = राजा अथवा; राज-तुल्यः वा = राज-सदृश; स जातः = वह जन्म लेता है; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं—शास्त्र का निश्चय-वाक्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जिसके पद से लाभ-गृह पर सकलग्रह दृष्टि डालते हैं, वह राजा या राजतुल्य उत्पन्न होता है; “नात्र संशयः” पाठ का अपना बल है, भविष्य की गारंटी नहीं। यह पद-लाभ पर पूर्ण दृष्टि-समूह का उत्कृष्ट फल-कथन है। दृष्टि-योग की पूर्णता (सकल) यहाँ निर्णायक मानी गई है।

English rendering The text states: one whose lābha-house from the Pada is aspected by all the planets is born a king or the equal of a king—“no doubt herein” is the śāstra’s own asseverative phrasing, not a modern claim of fate. Full multi-planet aspect on the eleventh-from-Pada is the condition named.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान: `Lābha = (Pada + 10) mod 12`। “सकला ग्रहाः पश्यन्ति” = सात ग्रहों (रवि…शनि; राहु–केतु पाठ/परम्परा-भेद) की दृष्टि उस राशि पर लागू—प्रत्येक ग्रह की दृष्टि-चाप शास्त्र-नियम से (उदा. मंगल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10, शेष 7)। यह बूलियन शर्त है:
`∀ g ∈ Graha-set: aspects(g, Lābha_rāśi) = true` → शास्त्रोक्त राज/राजतुल्य-फल।
अंश-सूक्ष्मता इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) AL = कन्या (5)। लाभ-राशि = `(5+10) mod 12 = 3` → कर्क। यदि रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि—सभी शास्त्रीय दृष्टि से कर्क को देखते हों (स्थिति-योग से), तो 29.11 की शर्त पूर्ण मानी जाती है। (दृष्टि-तालिका अध्याय 8 / दृष्टि-प्रकरण; पाठ-भेद संभव यदि राहु–केतु गिने जाएँ।)

29.12
पदाल्लाभगृहं पश्येद्‌ व्ययं कश्चिन्न पश्यति।
अविध्नेन सदा लाभो जायते द्विजसत्तम
padāllābhagṛhaṃ paśyed‌ vyayaṃ kaścinna paśyati|
avidhnena sadā lābho jāyate dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदात्-लाभ-गृहम् पश्येत् = पद से लाभ-भाव को देखे; व्ययम् = व्यय-भाव (पद से 12वाँ); कश्चित् न पश्यति = कोई न देखे; अविध्नेन = बिना विघ्न के; सदा लाभः = सदा लाभ; जायते = होता है; द्विज-सत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि पद का लाभ-गृह दृष्ट हो और व्यय-गृह किसी से दृष्ट न हो, तो अविध्न, निरंतर लाभ होता है। लाभ पर दृष्टि और व्यय पर दृष्टि-शून्यता—यह जोड़ी “सदा लाभ / अविध्न” का द्वार मानी गई है। फल शास्त्र का कथन है; इसे भय या दबाव में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states: when the lābha-house from the Pada is aspected, and no one aspects the vyaya (twelfth from the Pada), gain arises always without obstacle. Aspect on the eleventh with non-aspect on the twelfth is the named pair for unimpeded lābha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्थान:
`Lābha = (Pada + 10) mod 12`
`Vyaya = (Pada + 11) mod 12`
शर्त:
`∃ g: aspects(g, Lābha)` और `∀ g: ¬aspects(g, Vyaya)`
→ शास्त्रोक्त “अविध्नेन सदा लाभः”।
यह दृष्टि-बूलियन युग्म है; धन-राशि की संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) AL = धनु (8)। लाभ = `(8+10) mod 12 = 6` → तुला; व्यय = `(8+11) mod 12 = 7` → वृश्चिक। यदि कोई ग्रह तुला को देखे और कोई वृश्चिक को न देखे, तो 29.12 की शर्त लगती है। (दृष्टि = राशि-आधारित शास्त्र-नियम; अयनांश केवल ग्रह-देशान्तर तय करने में; यहाँ भाव-सूचकांक सापेक्ष हैं।)

29.13
ग्रहदृग्‌योगबाहुल्ये पदादेकादशे द्विज।
सार्गले चापि तत्रापि बह्वर्गलसमागमे
grahadṛg‌yogabāhulye padādekādaśe dvija|
sārgale cāpi tatrāpi bahvargalasamāgame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-दृक्-योग-बाहुल्ये = ग्रह-दृष्टि और योग की बहुलता में; पदात्-एकादशे = पद से ग्यारहवें में; द्विज = हे द्विज; स-अर्गले = अर्गल सहित; च अपि तत्र अपि = और वहाँ भी; बहु-अर्गल-समागमे = अनेक अर्गलों के एकत्र होने पर।

हिन्दी भावार्थ पद से एकादश स्थान पर जब ग्रह-दृष्टि और योगों की बहुलता हो, और वही स्थान सार्गल हो—अर्थात् अर्गल से युक्त हो—तथा बह्वर्गल-समागम हो, तो (अगले श्लोक के साथ) शुभ-लाभ की तीव्रता बढ़ती बताई गई है। यह श्लोक शर्त-श्रृंखला का मध्य कड़ी है: दृष्टि/योग-बाहुल्य + अर्गल-बाहुल्य। पूरा फल 29.14 के शुभ/उच्च-अर्गल और स्वामि-दृष्टि से जुड़ता है।

English rendering When there is abundance of planetary aspects and yogas in the eleventh from the Pada, and that place is also with argala—indeed with many argalas converging—the intensity of the stated lābha-phala is heightened. This verse is the middle link of a condition-chain completed in 29.14.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) स्थान: `H11 = (Pada + 10) mod 12`। (2) “दृग्-योग-बाहुल्य” = H11 पर दृष्ट/युक्त ग्रहों की संख्या > 1 (बाहुल्य = बहुलता; कोई निश्चित पूर्णांक इस श्लोक में नहीं)। (3) अर्गल (प्राथमिक गृह-हस्तक्षेप, शास्त्रीय गणना): लक्ष्य-भाव L से
`argala houses ≈ {L+1, L+2, L+4}` (द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ—परम्परा में 10/11 आदि द्वितीयक भी; पाठ-भेद/विस्तार संभव),
प्रति-अर्गल विरोध-स्थानों से बाधित। “सार्गल / बह्वर्गल-समागम” = H11 पर एक या अनेक अर्गल-सक्रिय ग्रह। सूत्र यहाँ पूर्णतः विस्तारित नहीं—केवल बाहुल्य-संकेत।

उदाहरण (worked example) AL = मेष (0); H11 = वृश्चिक (7)। यदि वृश्चिक पर दो ग्रह दृष्टि/युति से जुड़े हों, और वृश्चिक के 2nd/4th आदि अर्गल-स्थानों से शुभ ग्रह अर्गल दें, तो “दृग्-योग-बाहुल्य + सार्गल” दोनों लगते हैं। (अर्गल-गृह-सूची का पूर्ण विस्तार अर्गल-अध्याय से मिलाएँ; यहाँ 29.13 केवल बाहुल्य का निर्देश है।)

29.14
शुभग्रहार्गले विप्र तत्राप्युच्चग्रहार्गले।
शुभेन स्वामिना दृष्टे लग्नभाग्यादिगेन वा
śubhagrahārgale vipra tatrāpyuccagrahārgale|
śubhena svāminā dṛṣṭe lagnabhāgyādigena vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-ग्रह-अर्गले = शुभ ग्रहों के अर्गल में; विप्र = हे विप्र; तत्र अपि = वहाँ भी; उच्च-ग्रह-अर्गले = उच्च-स्थित ग्रह के अर्गल में; शुभेन स्वामिना दृष्टे = शुभ स्वामी से दृष्ट होने पर; लग्न-भाग्य-आदि-गेन वा = अथवा लग्न/भाग्य आदि भाव में स्थित (स्वामी) से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है—पद-लाभ पर जब शुभ-ग्रह-अर्गल हो, अथवा उच्च-ग्रह-अर्गल हो, और वह स्थान शुभ स्वामी से दृष्ट हो—या लग्न-स्थ/भाग्य-स्थ आदि शुभ स्थानगत स्वामी से दृष्ट हो—तो पूर्वोक्त लाभ–सुख का शुभ पक्ष और पुष्ट होता है। 29.13–29.14 मिलकर एक शर्त-माला हैं: दृष्टि-योग-बाहुल्य, अर्गल-बाहुल्य, शुभ/उच्च-अर्गल, शुभ-स्वामि-दृष्टि। फल पाठ का कथन है, दबाव या भय की भाषा नहीं।

English rendering The text continues: with argala of benefics there—or of exalted planets—and when that place is aspected by a benefic lord, or by a lord placed in the lagna, the ninth (bhāgya), and so on, the auspicious side of the prior lābha-phala is reinforced. Verses 29.13–29.14 form one condition-chain; the claims remain the śāstra’s own voice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-संयोजन (बूलियन, 29.13 के साथ):
`H11 = (Pada + 10) mod 12`
`argala_benefic(H11) ∨ argala_ucca(H11)`
`∧ aspects(śubha-svāmin ∨ lagna/bhāgya-stha lord, H11)`
उच्च = ग्रह अपनी उच्च-राशि में; शुभ-स्वामी = लाभ-भाव (या संबंधित भाव) का शुभ स्वामी—भाव-स्वामित्व राशि-स्वामी तालिका से। कोई वर्ष/बिन्दु/रূপ यहाँ नहीं; केवल स्थिति–दृष्टि–अर्गल की संरचना।

उदाहरण (worked example) AL = कर्क (3); H11 = मीन (1)। शुक्र उच्च = मीन—यदि शुक्र स्वयं मीन में अर्गल-दाता/युक्त हो तो “उच्चग्रहार्गल”। यदि मीन का स्वामी गुरु शुभ हो और मीन को देखे, अथवा लग्न/भाग्य में बैठा स्वामी मीन को देखे, तो 29.14 की दृष्टि-शर्त पूरी। (उच्च-राशि ग्रह-वार निश्चित; अयनांश केवल देशान्तर तय करने में प्रासंगिक।)

29.15
जातस्य भाग्यप्राबल्यं निर्दिशेदुत्तरोत्तरम्‌।
उक्तयोगेषु चेत्‌ खेटे द्वादशं नैव पश्यति
jātasya bhāgyaprābalyaṃ nirdiśeduttarottaram‌|
uktayogeṣu cet‌ kheṭe dvādaśaṃ naiva paśyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जातस्य = जातक/जात व्यक्ति का; भाग्य-प्राबल्यम् = भाग्य की प्रबलता/भाग्य-बल; निर्दिशेत् = निर्देश करे/बताए; उत्तरोत्तरम् = उत्तरोत्तर / क्रमिक वृद्धि से; उक्त-योगेषु = पूर्व-कथित योगों में; चेत् = यदि; खेटे = ग्रह में/ग्रह द्वारा; द्वादशम् = द्वादश भाव (व्यय); नैव पश्यति = नहीं देखता (दृष्टि नहीं डालता)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जातक के भाग्य की प्रबलता को उत्तरोत्तर क्रम से निर्दिष्ट किया जाए। यदि पूर्व में कहे गए उन योगों में स्थित ग्रह द्वादश भाव को दृष्टि से नहीं देखता, तो भाग्य-प्राबल्य का यह निर्देश विशेष रूप से लागू होता है। दृष्टि का अभाव यहाँ भाग्य-बल की क्रमिक वृद्धि से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that the progressive strength of the native’s fortune should be indicated successively. If, among the yogas already stated, the planet does not aspect the twelfth house, that progressive indication of fortune’s strength is to be applied.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरूढ़/पद-योगों में द्वादश-दृष्टि के अभाव से भाग्य-प्राबल्य का नियम)। दृष्टि-नियम व योग-परिभाषा पूर्व-श्लोकों व recension पर निर्भर हैं; पाठ-भेद संभव।

29.16
पदस्थानाद्‌ व्यये विप्र शुभपापयुतेक्षिते।
व्ययबाहुल्यमित्येवं विशेषोपार्जनात्‌ सदा
padasthānād‌ vyaye vipra śubhapāpayutekṣite|
vyayabāhulyamityevaṃ viśeṣopārjanāt‌ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- पद-स्थानात् = पद-स्थान से गिनकर
- व्यये = द्वादश भाव (व्यय) में
- शुभ-पाप-युत-ईक्षिते = शुभ व पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट होने पर
- व्यय-बाहुल्यम् = व्यय की अधिकता
- विशेष-उपार्जनात् सदा = सदा विशेष (अतिरिक्त) आय के कारण

हिन्दी भावार्थ पद से बारहवें भाव में यदि शुभ और पाप — दोनों प्रकार के ग्रह बैठे या दृष्टि डाले हों, तो शास्त्र कहता है कि व्यय बहुत होता है, किन्तु वह व्यय सदा विशेष अर्जन के साथ जुड़ा रहता है — अर्थात् अधिक आय के कारण ही अधिक खर्च। धन का यह प्रवाह दोनों दिशाओं में बढ़ा रहता है।

English rendering From the pada, when the twelfth (vyaya) is joined or aspected by both benefics and malefics, the text says expenditure is abundant — but always on account of special [additional] earning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पदचालित स्थान-गणना — व्यय-from-पद = ((a + 12 − 2) mod 12) + 1 = ((a + 10) mod 12) + 1, जहाँ a = पद (आरूढ़) की राशि। यही 12वीं राशि व्यय-अक्ष है; उस पर शुभ+पाप का मिश्रित संयोग/दृष्टि व्यय-बाहुल्य का संकेत।

उदाहरण (worked example) आरूढ़ तुला (a=7): व्यय-from-पद = ((7+10) mod 12)+1 = (17 mod 12)+1 = 6 = कन्या। कन्या में/पर शुक्र (शुभ) और मंगल (पाप) का संयोग-दृष्टि हो — तब श्लोकानुसार "आय-सहित अधिक व्यय" कहा जाएगा।

29.17
शुभग्रहे सुमार्गेण कुमार्गात्‌ पापखेचरे।
मिश्रे मिश्रफलं वाच्यमेवं लाभोऽपि लाभगे
śubhagrahe sumārgeṇa kumārgāt‌ pāpakhecare|
miśre miśraphalaṃ vācyamevaṃ lābho'pi lābhage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-ग्रहे = शुभ ग्रह होने पर; सु-मार्गेण = अच्छे मार्ग से; कु-मार्गात् = कुमार्ग/अशुभ मार्ग से; पाप-खेचरे = पाप ग्रह होने पर; मिश्रे = मिश्र (शुभ-पाप दोनों) होने पर; मिश्र-फलम् = मिश्रित फल; वाच्यम् = कहना चाहिए; एवम् = इसी प्रकार; लाभः अपि = लाभ भी; लाभ-गे = लाभ भाव (एकादश) में स्थित होने पर

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—व्यय (या पूर्व-संदर्भित योग) में शुभ ग्रह हो तो व्यय सुमार्ग से; पाप ग्रह हो तो कुमार्ग से। मिश्र स्थिति में मिश्र फल कहा जाए। यही नियम लाभ के लिए भी लागू होता है जब ग्रह लाभ भाव (एकादश) में हो—अर्थात् शुभ/पाप/मिश्र के अनुसार लाभ का मार्ग भी सुमार्ग, कुमार्ग या मिश्र कहा जाता है।

English rendering With a benefic planet, expenditure (or gain, by the parallel rule) is said to come by good means; with a malefic, by wrongful means; with a mixed condition, a mixed result is to be stated. The same logic applies when the configuration is in the eleventh (lābha): gain too is judged by that pattern.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ/पाप/मिश्र से व्यय-लाभ के मार्ग का वर्गीकरण)। “लाभगे” = लाभ भाव (D1 में गृह 11, अथवा पद से गृह 11 — संदर्भ पूर्व-श्लोकों के पद-व्यय क्रम से जुड़ा); पाठ-भेद/भाष्य-भेद संभव।

29.18
पदारूढाद्‌ व्यये शुक्रभानुस्वर्भानुभिर्युते।
राजमूलाद्‌ व्ययो वाच्यश्चन्द्रदृष्ट्‌या विशेषतः
padārūḍhād‌ vyaye śukrabhānusvarbhānubhiryute|
rājamūlād‌ vyayo vācyaścandradṛṣṭ‌yā viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पद-आरूढात् = पद-आरूढ़ से; व्यये = व्यय (द्वादश) में; शुक्र-भानु-स्वर्भानुभिः = शुक्र, सूर्य (भानु) और राहु (स्वर्भानु) से; युते = युक्त होने पर; राज-मूलात् = राज/शासन-मूल से; व्ययः = व्यय; वाच्यः = कहना चाहिए; चन्द्र-दृष्ट्या = चन्द्र की दृष्टि से; विशेषतः = विशेष रूप से

हिन्दी भावार्थ पद-आरूढ़ से द्वादश भाव में जब शुक्र, सूर्य और राहु का योग हो, तो शास्त्र कहता है—व्यय राज-मूल से कहा जाए। चन्द्र की दृष्टि पड़ने पर यह फल विशेष रूप से प्रबल बताया गया है। यहाँ “राज” शासन, राजकीय पद, या राज-संपर्क से जुड़े व्यय-स्रोत का संकेत है—शास्त्र का कथन, न कि अनिवार्य घटना।

English rendering From the padārūḍha, in the twelfth: when Venus, the Sun, and Rāhu are conjoined there, the text states expenditure arising from royal (governmental/regal) sources—especially when the Moon aspects that configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पद-द्वादश में शुक्र-सूर्य-राहु योग + चन्द्र-दृष्टि → राजमूल व्यय)। ग्रह-युति = एक ही राशि/भाव में सह-स्थिति; दृष्टि = शास्त्रीय दृष्टि-नियम (सूर्य आदि की पूर्ण/आंशिक दृष्टि पूर्व-अध्यायानुसार)।

29.19
पदारूढाद्‌ व्यये सौम्ये शुभखेटयुतेक्षिते।
ज्ञातिमध्ये व्ययो नित्यं पापदृक्‌ कलहाद्‌ व्ययः
padārūḍhād‌ vyaye saumye śubhakheṭayutekṣite|
jñātimadhye vyayo nityaṃ pāpadṛk‌ kalahād‌ vyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पद-आरूढात् = पद-आरूढ़ से; व्यये = व्यय में; सौम्ये = बुध (सौम्य) में/बुध स्थित होने पर; शुभ-खेट-युत-ईक्षिते = शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट; ज्ञाति-मध्ये = ज्ञाति/कुटुम्ब-वर्ग के बीच; व्ययः = व्यय; नित्यम् = नित्य/सदैव; पाप-दृक् = पाप दृष्टि; कलहात् = कलह से; व्ययः = व्यय

हिन्दी भावार्थ पद-आरूढ़ से द्वादश में जब बुध हो और शुभ ग्रह उससे युक्त या दृष्ट हों, तो शास्त्र कहता है—ज्ञाति-मध्य में, अर्थात् स्वजन/सगोत्र वर्ग में, नित्य व्यय होता है। यदि पाप दृष्टि हो तो व्यय कलह से कहा जाता है। एक ही भाव-स्थान पर शुभ-युति/दृष्टि बनाम पाप-दृष्टि—दो भिन्न फल-शाखाएँ हैं।

English rendering From the padārūḍha, in the twelfth: when Mercury is there, conjoined with or aspected by benefics, the text states constant expenditure among kinsfolk. With a malefic aspect, expenditure is said to arise from quarrel or strife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पद-द्वादश में बुध + शुभ/पाप दृष्टि के दो व्यय-मार्ग)। “सौम्य” यहाँ बुध के लिए प्रयुक्त; पाठ-भेद संभव यदि कहीं सामान्य सौम्य-ग्रह पढ़ा जाए।

29.20
पदाद्‌ व्यये सुराचार्ये वीक्षिते चान्यखेचरैः।
करमूलाद्‌ व्ययो वाच्यः स्वस्यैव द्विजसत्तम
padād‌ vyaye surācārye vīkṣite cānyakhecaraiḥ|
karamūlād‌ vyayo vācyaḥ svasyaiva dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदात् = पद से; व्यये = व्यय में; सुर-आचार्ये = बृहस्पति (सुराचार्य/देवगुरु) में; वीक्षिते = दृष्ट होने पर; च = और; अन्य-खेचरैः = अन्य ग्रहों से; कर-मूलात् = कर/राज-कर मूल से; व्ययः = व्यय; वाच्यः = कहना चाहिए; स्वस्य एव = अपने ही (स्व-सम्बन्धी); द्विज-सत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज

हिन्दी भावार्थ पद से व्यय भाव में जब गुरु हो और अन्य ग्रहों से दृष्टि प्राप्त करे, तो शास्त्र कहता है—व्यय कर-मूल से कहा जाए, और वह जातक के स्वयं से सम्बन्धित कर/दायित्व के रूप में। “कर” यहाँ शास्त्रीय अर्थ में राज-कर, शुल्क या अनिवार्य अदायगी का संकेत है। फल-कथन है; निश्चित घटना नहीं।

English rendering From the pada, in the twelfth: when Jupiter is there and is aspected by other planets, the text states—O best of the twice-born—expenditure arising from taxes (or fiscal levies), and that as the native’s own burden.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पद-द्वादश में गुरु + अन्य-ग्रह दृष्टि → करमूल व्यय)। दृष्टि-गणना शास्त्रीय दृष्टि-सूत्र से; “अन्यखेचरैः” बहुवचन—एक से अधिक या साधारणतः अन्य ग्रह-दृष्टि; विस्तृत संख्या श्लोक में नहीं दी गई।

29.21
आरूढाद्‌ द्वादशे सौरे धरापुत्रेण संयुते।
अन्यग्रहेक्षिते विप्र भ्रातृवर्गाद्‌ धनव्ययः
ārūḍhād‌ dvādaśe saure dharāputreṇa saṃyute|
anyagrahekṣite vipra bhrātṛvargād‌ dhanavyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढात् = आरूढ़ (पद-आरूढ़) से; द्वादशे = द्वादश भाव में; सौरे = शनि (सौर) में; धरा-पुत्रेण = मंगल (धरापुत्र/भूमि-पुत्र) से; संयुते = संयुक्त; अन्य-ग्रह-ईक्षिते = अन्य ग्रह से दृष्ट; विप्र = हे ब्राह्मण; भ्रातृ-वर्गात् = भ्रातृ-वर्ग/भाइयों के वर्ग से; धन-व्ययः = धन का व्यय

हिन्दी भावार्थ आरूढ़ से द्वादश में जब शनि हो, मंगल से युक्त हो, और अन्य ग्रह उसे देखें, तो शास्त्र कहता है—धन-व्यय भ्रातृ-वर्ग से होता है। अर्थात् भाई-बन्धु या सहोदर-सदृश वर्ग से जुड़े धन-निर्गमन का संकेत। यह शनि-मंगल योग का पद-द्वादश फल है; व्याख्या “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखनी चाहिए।

English rendering From the ārūḍha, in the twelfth: when Saturn is there, conjoined with Mars and aspected by other planets, the text states—O Brahmin—expenditure of wealth arising from the circle of brothers (or brother-class kin).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरूढ़-द्वादश में शनि + मंगल युति + अन्य दृष्टि → भ्रातृवर्ग से धनव्यय)। आरूढ़/पद-स्थान की गणना पूर्व-कथित आरूढ़-नियम (लग्न से भाव-स्वामी तक की गणना, फिर सम-दूरी) से होती है; यह श्लोक केवल उस स्थान से द्वादश का फल बताता है।

29.22
आरूढाद्‌ द्वादशे स्थाने ये योगाः कथिता यथा।
लाभभावे च ते योगा लाभयोगकरास्तथा
ārūḍhād‌ dvādaśe sthāne ye yogāḥ kathitā yathā|
lābhabhāve ca te yogā lābhayogakarāstathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढात् = आरूढ-पद (लग्न-आरूढ) से; द्वादशे स्थाने = 12वें भाव में; ये योगाः = जो योग (पूर्व में) कहे गए; लाभभावे = 11वें (लाभ) भाव में भी; लाभयोगकराः = लाभ/प्राप्ति-योग उत्पन्न करने वाले; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आरूढ-पद से द्वादश भाव में जिन योगों का उल्लेख किया गया है, वे ही योग यदि लाभ-भाव (एकादश) में स्थित हों तो भी उसी रीति से लाभ-योग के कारक माने जाते हैं। अर्थात् पद से 12वें और 11वें—दोनों स्थानों पर उन कथित योगों की फल-दिशा समान रूप से “लाभ” की ओर गिनी जाती है। यह पद-आधारित भाव-सादृश्य का नियम है, न कि किसी एक राशि का विशेष वर्णन।

English rendering The text states that the yogas previously declared for the twelfth house from the Ārūḍha (pada) likewise operate as gain-producing yogas when they fall in the eleventh (lābha) house from the same reference. The correspondence is structural: the same combinatorial patterns are to be read for profit when placed in lābha-bhāva from Ārūḍha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पद-सापेक्ष भाव-योग का समीकरण)। तकनीकी पठन केवल निर्देश-स्तर पर है: reference = Ārūḍha-pada; compare placements in bhāva 12 and bhāva 11 from that point; the verse equates the phala-class of the stated yogas in those two houses as “lābha-yoga-kara.” Ārūḍha itself is assumed already fixed by the chapter’s pada-rule; this śloka does not restate the count.

29.23
आरूढात्‌ सप्तमे राहुरथवा संस्थितः शिखी।
कुक्षिव्यथायुतो बालः शिखिना पीडितोथ वा
ārūḍhāt‌ saptame rāhurathavā saṃsthitaḥ śikhī|
kukṣivyathāyuto bālaḥ śikhinā pīḍitotha vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढात् सप्तमे = आरूढ-पद से सप्तम भाव में; राहुः = राहु; अथवा = या; शिखी = केतु; संस्थितः = स्थित; कुक्षि-व्यथा-युतः = उदर/कुक्षि-पीड़ा से युक्त; बालः = बालक (जातक); शिखिना पीडितः = केतु से पीड़ित; अथ वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आरूढ से सप्तम स्थान में राहु अथवा केतु (शिखी) स्थित हों तो जातक कुक्षि-व्यथा से युक्त होता है, अथवा केतु की पीड़ा-संकेत वाला फल कहा गया है। यह पद-सापेक्ष सप्तम में छाया-ग्रहों का फल-कथन है। यहाँ चिकित्सा-निदान या नियति का दावा नहीं; केवल शास्त्र का संकेतित फल-वाक्य है।

English rendering The text states that when Rāhu or Ketu (Śikhī) occupies the seventh from Ārūḍha, the native is described as subject to abdominal distress, or else as afflicted in the manner associated with Ketu. This is a phala-statement relative to the Ārūḍha-pada, not a clinical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरूढ-सप्तम में राहु/केतु)। जाँच-बिन्दु केवल स्थानिक है: let A = Ārūḍha-rāśi (1…12); seventh = ((A − 1 + 6) mod 12) + 1; if Rāhu or Ketu longitude maps into that sign/house per the chosen bhāva convention (whole-sign vs. bhāva-cusp), the verse’s phala-clause applies as text, not as computed certainty.

29.24
आरूधात्‌ सप्तमे केतुः पापखेटयुतेक्षितः।
साहसी श्वेतकेशी च वृद्धलिङ्गी भवेन्नरः
ārūdhāt‌ saptame ketuḥ pāpakheṭayutekṣitaḥ|
sāhasī śvetakeśī ca vṛddhaliṅgī bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढात् सप्तमे = आरूढ से सप्तम में; केतुः = केतु; पाप-खेट-युत-ईक्षितः = पाप-ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट; साहसी = साहसी/दुस्साहसी; श्वेत-केशी = श्वेत-केश वाला; वृद्ध-लिङ्गी = वृद्ध-लक्षणों वाला; भवेत् नरः = पुरुष/जातक होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आरूढ-पद से सप्तम में केतु यदि पाप-ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक साहसी, श्वेत-केशों वाला तथा वृद्ध-लक्षणों से युक्त कहा गया है। यहाँ “पाप-खेट” पारंपरिक पाप-ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु आदि—पाठानुसार) के संयोग/दृष्टि का संकेत है। फल शास्त्र का कथन है; इसे भय या निश्चित भाग्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that Ketu in the seventh from Ārūḍha, conjoined with or aspected by a malefic, marks the native as daring, white-haired, and showing signs of premature aging. The clause is a classical phala-description of a configuration, not a fatal prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरूढ-सप्तम केतु + पाप-योग/दृष्टि)। तकनीकी जाँच: (1) Ketu in 7th from Ārūḍha; (2) same sign/house holds a pāpa-graha, or a pāpa-graha aspects that sign by its stated dṛṣṭi rule (full 7th for all; special aspects of Mars/Jupiter/Saturn if used). The verse gives no bindu, bala, or year-count—only a binary configuration → phala mapping as the śāstra states it.

29.25
पदात्तु सप्तमे स्थाने गुरुशुक्रनिशाकराः।
त्रयो द्वयमथैकोऽपि लक्ष्मीवान्‌ जायते जनः
padāttu saptame sthāne guruśukraniśākarāḥ|
trayo dvayamathaiko'pi lakṣmīvān‌ jāyate janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदात् = आरूढ-पद से; सप्तमे स्थाने = सप्तम भाव में; गुरु = बृहस्पति; शुक्र = शुक्र; निशाकराः = चन्द्र; त्रयः = तीनों; द्वयम् = दो; अथ एकः अपि = अथवा एक भी; लक्ष्मीवान् = लक्ष्मी-सम्पन्न; जायते जनः = व्यक्ति जन्म लेता/होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पद (आरूढ) से सप्तम स्थान में गुरु, शुक्र और चन्द्र—ये तीन, या इनमें से दो, अथवा इनमें से एक भी स्थित हो, तो जातक लक्ष्मीवान् कहा गया है। शुभ-त्रय का पद-सप्तम में पूर्ण, आंशिक या एकक उपस्थिति—तीनों स्तरों पर शास्त्र समृद्धि-फल जोड़ता है। यह गणनात्मक दशा-वर्ष नहीं, बल्कि भाव-ग्रह-संयोग का फल-वाक्य है।

English rendering The text states that when Jupiter, Venus, and the Moon occupy the seventh from the pada (Ārūḍha)—whether all three, any two, or even one alone—the person is born (or becomes) endowed with Lakṣmī, i.e. material prosperity as the śāstra phrases it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पद-सप्तम में गुरु/शुक्र/चन्द्र की गणना)। संरचनात्मक गणना केवल सदस्यता-गिनती है: let S = set of {Jupiter, Venus, Moon} with rāśi ≡ 7th from Ārūḍha; if |S| ∈ {1, 2, 3}, the text applies the same “lakṣmīvān” class. No degree-threshold, no rūpa-score, no daśā-length is given here.

29.26
स्वतुङ्गे सप्तमे खेटः शुभो वाऽप्यशुभः पदात्‌।
श्रीमान्‌ सोऽपि भवेन्नुनं सत्कीर्तिसहितो द्विज
svatuṅge saptame kheṭaḥ śubho vā'pyaśubhaḥ padāt‌|
śrīmān‌ so'pi bhavennunaṃ satkīrtisahito dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-तुङ्गे = अपने उच्च में; सप्तमे = (पद से) सप्तम में; खेटः = ग्रह; शुभः वा अपि अशुभः = शुभ हो या अशुभ; पदात् = पद से; श्रीमान् = श्री-सम्पन्न; सत्-कीर्ति-सहितः = सत्कीर्ति युक्त; नूनम् = अवश्य (शास्त्र-कथन की दृढ़ता); द्विज = हे द्विज (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पद से सप्तम स्थान में कोई ग्रह—शुभ हो या अशुभ—यदि अपने उच्च राशि में स्थित हो, तो वह जातक भी श्रीमान् तथा सत्कीर्ति से युक्त होता है। यहाँ उच्च-स्थिति निर्णायक शर्त है; ग्रह का स्वाभाविक शुभ/अशुभ भेद इस फल-वाक्य में गौण कर दिया गया है। “नूनम्” शास्त्र की अपनी दृढ़ता है, हमारे द्वारा दी गई नियति-गारंटी नहीं।

English rendering The text states that a planet—whether naturally benefic or malefic—placed in the seventh from the pada while in its own exaltation sign makes the native prosperous and possessed of good renown. Exaltation in that Ārūḍha-seventh is the decisive condition named here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पद-सप्तम + स्वोच्च)। जाँच-सूत्र (परंपरागत उच्च-राशि; पाठ-भेद संभव नहीं इस सूची पर सामान्यतः): exaltation signs — Sun = Meṣa, Moon = Vṛṣabha, Mars = Makara, Mercury = Kanyā, Jupiter = Karkaṭa, Venus = Mīna, Saturn = Tulā. Condition: planet P has rāśi(P) = 7th-from-Ārūḍha and rāśi(P) = ucca(P). Degree-within-sign of peak ucca is not required by this verse—only sign-level svatuṅga as stated.

उदाहरण (worked example) Conventions: whole-sign houses; Ārūḍha-lagna (AL) = Tula (7). Then 7th from AL = Meṣa. If the Sun is in Meṣa (its exaltation), the configuration matches 29.26 regardless of the Sun’s natural classification as a mild malefic in some lists. The text’s phala-class: “śrīmān + sat-kīrti”—reported as the śāstra’s claim, not as a forecast we certify. (Ayanāṃśa affects only whether the tropical/sidereal longitude still falls in Meṣa; declare the ayanāṃśa used when computing the rāśi.)

29.27
ये योगाः सप्तमे स्थाने पदाश्च कथिता मया।
चिन्त्यास्तथैव ते योगा द्वितीयेऽपि सदा द्विज
ye yogāḥ saptame sthāne padāśca kathitā mayā|
cintyāstathaiva te yogā dvitīye'pi sadā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये योगाः = जो (पूर्वोक्त) योग; सप्तमे स्थाने पदात् = पद (आरूढ) से सातवें भाव में (श्लोक 25–26 के गुरु-शुक्र-चन्द्र आदि योग); कथिता मया = मैंने (पराशर ने) कहे; चिन्त्याः = विचारणीय हैं; तथैव = ठीक वैसे ही; द्वितीये = पद से दूसरे (धन) भाव में; सदा = सर्वदा; द्विज = हे ब्राह्मण।

हिन्दी भावार्थ आरूढ-पद से सातवें भाव के लिए जो योग अभी कहे गये, हे द्विज, वही योग पद से दूसरे (धन) भाव पर भी सदा उसी रीति से लगा लेने चाहिए। अर्थात् सप्तम-पद का विधान द्वितीय-पद पर भी अनुरूप घटित होता है — शास्त्र एक ही तर्क को दो स्थानों पर विस्तारित करता है।

English rendering The yogas I declared for the seventh place from the ārūḍha-pada should be reckoned in exactly the same way for the second (wealth) place too, always, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय नया सूत्र नहीं — स्थान-गणना का विस्तार-नियम (फल-कथन का अनुप्रयोग)। यहाँ केवल आरूढ से भाव-गणना है: वही योग-समुच्चय जो आरूढ के 7वें पर, उसे आरूढ के 2रे पर भी मानो — गणना-सूत्र सरल है, पद (P) से गिनकर स्थान s ∈ {2, 7}। पद-गणना स्वयं (श्लोक 2 का नियम): भाव B का स्वामी B से n-वीं राशि में हो, तो पद = स्वामी से n-वीं राशि = B से (2n−1)-वीं राशि (समावेशी गणना, mod 12)।

हमारा डिकोड (Our Decode) शास्त्र यहाँ एक ही योग-नियम को दो भाव-स्थानों पर आरोपित करता है — यह "पद से नियत गिनती" शुद्ध पूर्णांक-अंकगणित है, वैसा ही निर्धारक जैसा षोडश-वर्ग की राशि-विभाजन गणना (दोषरहित, tolerance-रहित); व्याख्या (फल) को हमने सदा "शास्त्र कहता है" रखा, गणना को अलग।

29.28
उच्चस्थो रौहिणेयो वा जीवो वा शुक्र एव वा।
एवो बली धनगतः श्रियं दिशति देहिनः
uccastho rauhiṇeyo vā jīvo vā śukra eva vā|
evo balī dhanagataḥ śriyaṃ diśati dehinaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्चस्थः = अपनी उच्च राशि में स्थित; रौहिणेयः = रोहिणी-पुत्र — बुध (मतान्तर: चन्द्र, जो रोहिणी-नक्षत्र/वृषभ में उच्च होता है — पाठ-भेद/मत-भेद संभव); जीवः = बृहस्पति (गुरु); शुक्रः एव वा = अथवा शुक्र; (एवो बली =) एवं बली / एको बली = इस प्रकार बलवान (पाठ-भेद संभव); धनगतः = धन (पद से द्वितीय/धन) स्थान में गया हुआ; श्रियम् दिशति = लक्ष्मी/समृद्धि प्रदान करता है; देहिनः = जातक को।

हिन्दी भावार्थ अपनी उच्च राशि में बैठा बुध (अथवा गुरु या शुक्र) यदि इस प्रकार बलवान होकर धन-स्थान में स्थित हो, तो वह जातक को श्री (समृद्धि) प्रदान करता है — शास्त्र कहता है कि उच्च-बल से युक्त शुभ ग्रह का धन-स्थान में होना धन-योग बनाता है। रौहिणेय-पद विवादास्पद है; इसे बुध या उच्च-चन्द्र दोनों रीति से पढ़ा गया है।

English rendering Mercury exalted — or Jupiter, or Venus — being thus strong and placed in the wealth-house (from the pada), bestows prosperity upon the native; the text states this as a wealth-giving combination.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उच्च-राशि निर्देश (Ch.6/27 की परमोच्च-अंश-सूत्र): बुध — कन्या 15°, गुरु — कर्क 5°, शुक्र — मीन 27° (मतान्तर में चन्द्र — वृषभ 3°)। षड्बल का उच्च-बल-सूत्र: उच्च-बल (विरूप) = (नीच-बिन्दु से ग्रह की दूरी अंशों में, 0°–180°) ÷ 3; परमोच्च पर 180° ÷ 3 = 60 विरूप = 1 रूप (पूर्ण), नीच पर 0। 60 विरूप = 1 रूप।

उदाहरण (worked example) शुक्र परमोच्च मीन 27° पर; उसका नीच-बिन्दु कन्या 27°। शुक्र मीन 27° पर हो → नीच-बिन्दु से चाप = 180° → उच्च-बल = 180 ÷ 3 = 60 विरूप = 1.00 रूप (पूर्ण उच्च-बल)। यही "उच्चस्थः … बली" की संख्यात्मक परिभाषा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "उच्चस्थ/बली" को हमने भाषण नहीं, संख्या माना: षड्बल (Ch.27) में उच्च-बल = नीच-बिन्दु से चाप ÷ 3 विरूप, और कुल बल की प्रति-ग्रह-देहली से तुलना — यही ग्रह-इंजन का निर्धारक नियम है (1 रूप = 60 विरूप)। फल ("श्रियं दिशति") शास्त्र का कथन है; बल की गणना हमारा सत्यापित गणित।

29.29
ये योगाश्च पदे लग्ने यथावद्‌ गदिता मया।
ते योगाः कारकांशेऽपि विज्ञेया बांधवर्जिताः
ye yogāśca pade lagne yathāvad gaditā mayā|
te yogāḥ kārakāṃśe'pi vijñeyā bāṃdhavarjitāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये योगाः = जो योग; पदे = पद (आरूढ) लग्न में; लग्ने = (और) लग्न में; यथावत् = यथावत्; गदिताः मया = मैंने कहे; ते योगाः = वे योग; कारकांशे अपि = कारकांश (आत्मकारक के नवांश) में भी; विज्ञेयाः = जानने चाहिए; बान्धवर्जिताः (पाठ "बांधवर्जिताः") = बान्धव-सम्बन्धी (योगों) को छोड़कर — पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं — जो योग पद-लग्न और लग्न के लिए यथावत् कहे गए हैं, वे कारकांश में भी जानने चाहिए, केवल बन्धु-सम्बन्धी योगों को छोड़कर। पद-अध्याय का यह समापन-पद आरूढ और कारकांश की विधि-समानता स्थापित करता है।

English rendering The yogas stated for the pada (ārūḍha) and the lagna are to be understood for the kārakāṃśa as well, the text says, excepting those concerning kinsmen (reading uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सामान्यीकरण। सन्दर्भ-परिभाषाएँ: पद (आरूढ) = भाव से उसके स्वामी तक की दूरी को स्वामी से आगे उतनी ही गिनने पर प्राप्त राशि; कारकांश = आत्मकारक की नवांश-राशि (D9)।

29.30
आरूढाद्‌ वित्तभे सौम्ये सर्वदेशाधिपो भवेत्‌।
सर्वज्ञो यदि वा स स्यात्‌ कविर्वादी च भार्गवे
ārūḍhād‌ vittabhe saumye sarvadeśādhipo bhavet‌|
sarvajño yadi vā sa syāt‌ kavirvādī ca bhārgave

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढात् = लग्न-आरूढ (AL) से; वित्त-भे = द्वितीय भाव में (वित्त = धन-स्थान); सौम्ये = शुभ/सौम्य ग्रह स्थित होने पर; सर्व-देश-अधिपः = समस्त देशों का अधिपति; सर्वज्ञः = सर्व-ज्ञान-सम्पन्न; कविः = कवि / काव्य-कुशल; वादी = वाद-विवाद में निपुण; भार्गवे = शुक्र (भृगु-सुत) की स्थिति/सम्बन्ध में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आरूढ से दूसरे भाव में सौम्य ग्रह हो तो जातक सर्वदेशाधिप-जैसा प्रभावशाली बनता है। उसी सन्दर्भ में विकल्प रूप में सर्वज्ञता, कविता और वाद-कौशल का भी उल्लेख है; भार्गव (शुक्र) की स्थिति को विशेष रूप से जोड़कर काव्य-वाद आदि गुणों की दिशा बताई गई है। यह फल-कथन है — स्थान-ग्रह-सौम्यत्व की शर्त पर आधारित शास्त्रीय संकेत, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that if a benefic occupies the second from the ārūḍha, the native may become a sovereign over many lands; alternatively, all-knowing or a poet and skilled disputant — with Bhārgava (Venus) specially linked to those literary–debating qualities.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-गिनती (modular, 12-राशि):
वित्त-भाव = (राशि_संख्या(AL) + 1) mod 12, जहाँ राशि 1…12।
शर्त: उस भाव में सौम्य (बुध/गुरु/शुक्र; चन्द्र-सौम्यत्व सन्दर्भ-सापेक्ष) की स्थिति।
यह फल-नियम है, संख्यात्मक बल-सूत्र नहीं — “AL+1 पर सौम्य” की बूलियन जाँच मात्र।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न-आरूढ = कन्या (6)। तब वित्त-भाव = तुला (7)। यदि तुला में गुरु (सौम्य) हो, तो यह श्लोक की “आरूढाद् वित्तभे सौम्ये” शर्त पूरी होती है। (राशि-गणना D1; आरूढ-निर्माण की विधि पूर्व-श्लोकों/पद-सूत्र पर निर्भर — यहाँ केवल सापेक्ष 2रा भाव जाँचा गया।)

29.31
आरूधात्‌ केन्द्रकोणेषु स्थिते दारपदे द्विज।
लग्नजायापदे वापि सबलग्रहसंयुते
ārūdhāt‌ kendrakoṇeṣu sthite dārapade dvija|
lagnajāyāpade vāpi sabalagrahasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूधात् = आरूढ (AL) से; केन्द्र-कोणेषु = केन्द्र (1,4,7,10) व त्रिकोण (1,5,9) भावों में; स्थिते दारपदे = दार-पद (उपपद/UL — दारा-भाव का आरूढ) स्थित होने पर; द्विज = हे द्विज (शिष्य-सम्बोधन); लग्न-जाया-पदे = लग्न-सम्बद्ध जाया/दार-पद पर भी; वा अपि = अथवा; सबल-ग्रह-संयुते = सबल ग्रह से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज — शास्त्र की शर्त यह है कि दारपद आरूढ से केन्द्र या कोण में हो, अथवा लग्न-सम्बद्ध जाया-पद सबल ग्रह से युक्त हो। यह श्लोक फल नहीं कहता; वह अगले श्लोक में आता है। यहाँ केवल योग-निर्माण की स्थिति बताई गई है: AL के सापेक्ष UL की केन्द्र/त्रिकोण-स्थिति, या UL पर सबल ग्रह का संयोग।

English rendering O twice-born: when the dāra-pada stands in a kendra or trikoṇa from the ārūḍha, or when the spouse-pada linked to the lagna is joined by a strong planet — that is the placement-condition (result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सापेक्ष भाव-सूचकांक:
d = ((राशि(UL) − राशि(AL)) mod 12) + 1 ∈ {1…12}।
केन्द्र: d ∈ {1,4,7,10}; त्रिकोण: d ∈ {1,5,9} (1 दोनों में)।
वैकल्पिक शर्त: UL पर ग्रह का सबल होना — “सबल” का पूर्ण माप षड्बल/अन्य बलाङ्गों से; इस श्लोक में केवल “संयुक्त + सबल” कहा गया है, संख्या-सीमा नहीं।

उदाहरण (worked example) AL = मेष (1), UL = सिंह (5) ⇒ d = 5 (त्रिकोण) — “केन्द्रकोणेषु स्थिते दारपदे” पूर्ण।
AL = मेष, UL = कन्या (6) ⇒ d = 6 (त्रिक) — इस श्लोक की केन्द्र/कोण शर्त नहीं; फल-दिशा 29.32 के उत्तरार्ध से जुड़ती है।

29.32
स्र्ईमांश्च जायते नूनं देशे विख्यातिमान्‌ भवेत्‌।
षष्ठेष्टमे व्ययस्थाने जातो दारपदेऽधनः
srīmāṃśca jāyate nūnaṃ deśe vikhyātimān‌ bhavet‌|
ṣaṣṭheṣṭame vyayasthāne jāto dārapade'dhanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रीमान् (पाठ: स्र्ईमांश्च — श्रीमांश्च पढ़ना उचित; पाठ-भेद/लिपि-दोष संभव) = सम्पन्न / श्री-युक्त; जायते नूनं = निश्चय से उत्पन्न होता/बनता है (शास्त्र-कथन); देशे विख्यातिमान् = देश में प्रसिद्धि-युक्त; षष्ठे = छठे; अष्टमे = आठवें; व्यय-स्थाने = बारहवें; जातः = स्थित होने पर; दारपदे = दार-पद; अधनः = धन-हीन / निर्धन।

हिन्दी भावार्थ पूर्वश्लोक की शर्त (दारपद AL से केन्द्र/कोण में, या सबल-ग्रह-युक्त) पूरी होने पर शास्त्र कहता है — जातक श्रीमान् और देश में विख्यात होता है। इसके विपरीत, दारपद षष्ठ, अष्टम या व्यय स्थान में हो तो शास्त्र उसे अधन कहता है। दोनों ओर फल शास्त्र के अपने शब्द हैं; इन्हें भाग्य-फतवे या भय-कथन की तरह नहीं पढ़ना।

English rendering Under the prior placement, the text states the native becomes prosperous and renowned in the land; but if the dāra-pada lies in the sixth, eighth, or twelfth, the text states the native is without wealth (adhana).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो फल-शाखाएँ, एक ही सापेक्ष सूचकांक d = ((UL − AL) mod 12) + 1 पर:
• शुभ-दिशा: d ∈ {1,4,5,7,9,10} (केन्द्र∪त्रिकोण) + 29.31 की युति-शर्त → शास्त्र: श्री/विख्याति।
• अशुभ-दिशा (त्रिक): d ∈ {6,8,12} → शास्त्र: अधन।
यह वर्ग-फल तालिका है, निरपेक्ष धन-माप नहीं।

उदाहरण (worked example) AL = वृष (2), UL = मकर (10) ⇒ d = 9 (त्रिकोण) → 29.31–32 की “श्रीमान् / विख्याति” शाखा।
AL = वृष, UL = तुला (7) ⇒ d = 6 (षष्ठ) → “दारपदेऽधनः” शाखा। (केवल AL–UL सापेक्ष; अयनांश यहाँ राशि-अन्तर नहीं बदलता यदि दोनों एक ही कुण्डली-राशि से लें।)

29.33
पदे तत्सप्तमे वापि केन्द्रे वृद्धौ त्रिकोणके।
सुवीर्यः संस्थितः खेतः भार्याभर्तृसुखप्रदः
pade tatsaptame vāpi kendre vṛddhau trikoṇake|
suvīryaḥ saṃsthitaḥ khetaḥ bhāryābhartṛsukhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदे = (दार/सम्बद्ध) पद में; तत्-सप्तमे = उससे सप्तम में; वा अपि = अथवा; केन्द्रे = केन्द्र में; वृद्धौ = वृद्धि-स्थान (द्वितीय; अथवा वृद्धि-अवस्था — अर्थ-द्वय संभव, पाठ-भेद/व्याख्या-भेद) में; त्रिकोणके = त्रिकोण में; सुवीर्यः = उत्तम वीर्य/बल-युक्त; संस्थितः खेतः = स्थित ग्रह; भार्या-भर्तृ-सुख-प्रदः = पत्नी-पति सुख का प्रदाता (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पद में, उससे सातवें में, केन्द्र में, वृद्धि-स्थान में या त्रिकोण में यदि सुवीर्य ग्रह स्थित हो, तो वह भार्या-भर्तृ सुख देने वाला माना जाता है। “सुवीर्य” यहाँ ग्रह की बल-अवस्था की शर्त है; फल दाम्पत्य-सुख का शास्त्रीय संकेत है, न कि चिकित्सकीय या नियतिवादी दावा।

English rendering The text states that a planet of good strength placed in the pada, in the seventh from it, in a kendra, in the house of growth (or in a waxing/strong state — reading open), or in a trikoṇa, is a giver of happiness between wife and husband.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह P की राशि r_P; सन्दर्भ-पद (प्रायः दार/सम्बद्ध पद) r_pad।
δ = ((r_P − r_pad) mod 12) + 1।
अनुकूल δ ∈ {1 (पद), 7 (तत्सप्तम), 4·10 (अन्य केन्द्र), 5·9 (त्रिकोण), तथा 2 यदि “वृद्धौ” = द्वितीय}।
“सुवीर्य” गुणात्मक द्वार: षड्बल/उच्च-मूलत्रिकोण/स्वक्षेत्र आदि से जाँच — इस श्लोक में संख्या-सीमा नहीं दी।

उदाहरण (worked example) दारपद = मिथुन (3); शुक्र (सुवीर्य मानकर) = धनु (9) ⇒ δ = 7 — “तत्सप्तमे … भार्याभर्तृसुखप्रदः” की शास्त्र-शर्त।
यदि शुक्र = कन्या (6) ⇒ δ = 4 (केन्द्र) — उसी फल-दिशा में; δ = 6/8/12 यहाँ इस श्लोक के अनुकूल समुच्चय में नहीं।

29.34
पदाद्‌दारपदे चैवं केन्द्रे कोणे च संस्थिते।
द्वयोर्मैत्री भवेन्नूनं त्रिके वैरं न संशयः
padād‌dārapade caivaṃ kendre koṇe ca saṃsthite|
dvayormaitrī bhavennūnaṃ trike vairaṃ na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदात् = (लग्न-)पद से; दारपदे = दार-पद; एवम् = इसी प्रकार; केन्द्रे कोणे च संस्थिते = केन्द्र या कोण में स्थित हो; द्वयोः मैत्री = दोनों (दम्पति) में मित्रता; भवेत् नूनम् = निश्चय होती है; त्रिके = त्रिक (6,8,12) में हो तो; वैरम् = शत्रुता; न संशयः = संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ लग्न-पद से जब दार-पद केन्द्र या कोण (त्रिकोण) में स्थित हो, तो निश्चय ही दोनों (पति-पत्नी) में परस्पर मैत्री होती है; और यदि वह त्रिक (छठे-आठवें-बारहवें) में हो, तो शास्त्र निःसंशय कहता है कि वैर (कलह) होता है। यह दो पदों के परस्पर-स्थान से सम्बन्ध-आकलन का नियम है।

English rendering When the dāra-pada stands in a kendra or koṇa from the lagna-pada, there is surely friendship between the pair; if in a trika (6/8/12), enmity, without doubt — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सम्बन्ध-नियम, स्थान-समुच्चय-आधारित। लग्न-पद P₁ से दार-पद P₂ की सापेक्ष-स्थिति s = (P₂ − P₁ mod 12) + 1 (समावेशी)। मैत्री यदि s ∈ केन्द्र {1,4,7,10} ∪ कोण {1,5,9}; वैर यदि s ∈ त्रिक {6,8,12}। द्विआधारी निर्णय — कोई tolerance-पट्टी नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न-पद सिंह (उदा॰ श्लोक 30) मानें → P₁ = सिंह(5)। यदि दार-पद वृश्चिक(8) हो → s = (8−5) + 1 = 4 = केन्द्र → "मैत्री"। यदि दार-पद मकर(10) हो → s = (10−5)+1 = 6 = त्रिक → "वैर"। स्थान s की समुच्चय-सदस्यता ही फल तय करती है।

29.35
एवं लग्नपदाद्‌ विप्र तनयादिपदे स्थिते।
मित्रामित्रे विजानीयाल्लाभालाभौ विचक्षणः
evaṃ lagnapadād‌ vipra tanayādipade sthite|
mitrāmitre vijānīyāllābhālābhau vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इसी विधि से; लग्न-पदात् = लग्न-पद (AL) से; विप्र = हे विप्र; तनय-आदि-पदे = पुत्र-पद आदि (अन्य भाव-पद) स्थित होने पर; मित्र-अमित्रे = मित्रता व अमित्रता; विजानीयात् = जान ले; लाभ-अलाभौ = लाभ व हानि; विचक्षणः = विवेकी / कुशल ज्योतिषी।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र — शास्त्र सार बाँधता है: लग्न-पद से तनय-पद आदि की स्थिति को ऊपर वाली केन्द्र/कोण बनाम त्रिक रीति से देखो; उसी से मित्र-अमित्र और लाभ-अलाभ का विवेक करो। यह एक सामान्यीकरण-सूत्र है — दारपद के लिए जो सापेक्ष नियम कहा, वह अन्य पदों (पुत्र, आदि) पर भी लागू करने का आदेश; स्वतन्त्र संख्या-तालिका नहीं।

English rendering Likewise, O learned one: from the lagna-pada, by how the putra-pada and the other padas are placed, the discerning should know friend versus foe and gain versus loss — the same relative logic extended beyond the spouse-pada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सामान्य नियम (29.34 का विस्तार):
किसी भाव-पद P_k (तनय = 5वें का आरूढ, आदि) के लिए
d_k = ((राशि(P_k) − राशि(AL)) mod 12) + 1।
• d_k ∈ {1,4,5,7,9,10} → शास्त्र-दिशा: मैत्री / लाभ-योग।
• d_k ∈ {6,8,12} → शास्त्र-दिशा: अमित्र / अलाभ।
पद-निर्माण स्वयं: भावेश से उतने ही आगे जितना लग्न से भावेश (मानक आरूढ), फिर 1=7 प्रतिस्थापन जहाँ लागू — वह पूर्व-सूत्र; यह श्लोक केवल सापेक्ष फल-मानचित्र बताता है।

उदाहरण (worked example) AL = सिंह (5); तनय-पद (पुत्र-आरूढ) = कुम्भ (11) ⇒ d = 7 (केन्द्र) → शास्त्र: मित्र/लाभ-दिशा।
AL = सिंह; तनय-पद = मकर (10) ⇒ d = 6 (षष्ठ/त्रिक) → शास्त्र: अमित्र/अलाभ-दिशा। (D1 राशियाँ; पद-सूत्र की पूर्वावस्था यथा-शास्त्र।)

29.36
लग्नदारपदे विप्र मिथः केन्द्रगते यदि।
त्रिलाभयोस्त्रिकोणे वा तथा राजा धराधिपः
lagnadārapade vipra mithaḥ kendragate yadi|
trilābhayostrikoṇe vā tathā rājā dharādhipaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नदारपदे = लग्न-पद (आरूढ़ लग्न) और दार-पद (सप्तम-आरूढ़); विप्र = हे विप्र (मैत्रेय-संबोधन); मिथः = परस्पर; केन्द्रगते = केन्द्र-स्थित (1, 4, 7, 10); यदि = यदि; त्रिलाभयोः = तृतीय और लाभ (एकादश) में; त्रिकोणे = त्रिकोण-संबंध (1, 5, 9); वा = अथवा; राजा धराधिपः = राजा / पृथ्वी-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, यदि लग्न-पद और दार-पद परस्पर केन्द्र में हों, अथवा तृतीय-लाभ भावों में हों, अथवा त्रिकोण-संबंध में स्थित हों, तो शास्त्र कहता है — जातक राजा और धराधिप (भूमि-स्वामी) होता है। यह पद-युग्म की सापेक्ष स्थिति का फल-कथन है, न कि किसी एक भाव का अकेला निर्णय।

English rendering O Brahmin, if the Lagna-pada and the Dārā-pada stand mutually in a kendra, or in the third and eleventh from each other, or in a trikoṇa relationship, the text states that the native becomes a king and lord of the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद-सापेक्ष फल-नियम (केन्द्र / तृतीय-लाभ / त्रिकोण)। गणना केवल भाव-दूरी की है: दो पदों में से एक को संदर्भ-1 मानकर दूसरे की राशि-गिनती; केन्द्र = ±0/3/6/9 राशि; त्रिकोण = ±0/4/8; “त्रि-लाभ” = ±2 या ±10 (तृतीय ↔ एकादश)। फल स्वयं शास्त्र का कथन है।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न-पद = मेष (राशि 1), दार-पद = कर्क (राशि 4)। मेष से कर्क = 4था भाव → केन्द्र-युग्म (1–4)। शास्त्र के इस श्लोकानुसार यह “मिथः केन्द्र” दशा है; फल-कथन राजा/धराधिप का है — व्याख्या शास्त्र-स्वर में, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

29.37
एवं लग्नपदादेव धनादिपदतो द्विज।
स्थानद्वयं समालोक्य जातकस्य फलं वदेत्‌
evaṃ lagnapadādeva dhanādipadato dvija|
sthānadvayaṃ samālokya jātakasya phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; लग्नपदात् एव = लग्न-पद से ही; धनादि-पदतः = धन-पद आदि (अन्य भाव-पदों) से; द्विज = हे ब्राह्मण; स्थानद्वयम् समालोक्य = दोनों स्थानों (पद-युग्म के सापेक्ष-सम्बन्ध) को भली-भाँति देखकर; जातकस्य फलम् वदेत् = जातक का फल कहे।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार, हे द्विज, लग्न-पद तथा धन-पद आदि पदों के दोनों स्थानों (उनके परस्पर सम्बन्ध) को भली-भाँति देखकर ही ज्योतिषी को जातक का फल कहना चाहिए। यह अध्याय का उपसंहार-वचन है — निर्णय एकल पद से नहीं, अपितु पद-युग्म के सापेक्ष-सम्बन्ध से किया जाए।

English rendering Thus, from the lagna-pada and the dhana-pada and the rest, having carefully examined the two places (their mutual relation), one should declare the native's result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (उपसंहार)। सार-नियम: फल किसी एकल स्थान का नहीं, बल्कि क्रमित युग्म (Pᵢ, Pⱼ) की सापेक्ष-स्थिति s = (Pⱼ − Pᵢ mod 12) + 1 का फलन है; "स्थानद्वयं समालोक्य" = इस युग्म-सम्बन्ध को गिनकर तब कथन। शुद्ध पूर्णांक-गणना, अनुमान नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह उपसंहार हमारी कार्य-पद्धति से मेल खाता है: पहले नियत गणना (पद-गिनती, युग्म-सम्बन्ध — शुद्ध mod-12 अंकगणित, tolerance-रहित `==` अनुशासन जैसा अष्टकवर्ग-ऑरेकल में), फिर उस पर आधारित फल को "शास्त्र कहता है" रूप में — गणित और व्याख्या का पृथक्करण, बिना भय या नियति-दावे के।

अध्यायः 30

अथोपपदाध्यायः

43 श्लोक
30.1
अथोपपदमाश्रित्य कथयामि फलं द्विज।
युच्छुभत्वे भवेन्नृणां पुत्रदारादिजं सुखम्‌
athopapadamāśritya kathayāmi phalaṃ dvija|
yucchubhatve bhavennṛṇāṃ putradārādijaṃ sukham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरण-आरम्भ); उपपदम् आश्रित्य = उपपद (द्वादश-भाव का आरूढ पद) का आश्रय लेकर; कथयामि फलम् = मैं फल कहता हूँ; द्विज = हे द्विज (शौनकादि श्रोता); यत् शुभत्वे = जब उस (उपपद) में शुभत्व हो [पाठ "युच्छुभत्वे" — पाठ-भेद संभव; यच्छुभत्वे/यत् शुभत्वे पढ़ें]; भवेत् नृणाम् = मनुष्यों को होता है; पुत्रदारादिजं सुखम् = पुत्र, स्त्री आदि से उत्पन्न सुख।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, अब मैं उपपद के आश्रय से फल कहता हूँ। जिस जातक के जन्म में यह उपपद शुभ हो, उसे पत्नी, सन्तान आदि से जनित पूर्ण गार्हस्थ्य-सुख प्राप्त होता है। यह श्लोक सम्पूर्ण उपपदाध्याय की प्रतिज्ञा-भूमिका है — आगे इसी सूत्र का विस्तार होगा।

English rendering Now, O twice-born, taking the Upapada as my basis, I shall declare the results: when it carries auspiciousness, people obtain the happiness born of spouse, children and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना/फल-प्रतिज्ञा। यह अध्याय का मंगल-सूत्र है; "शुभत्व" की परिभाषा (शुभ राशि, शुभ युति-दृष्टि) श्लोक 3–6 में गणनात्मक रूप से खुलती है, अतः यहाँ केवल विषय-निर्देश है।

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30.2
तनुभावपदं विप्र प्रधानं पदमुच्यते।
तनोरनुचराद्यत्‌ स्यादुपारूढं तदुच्यते
tanubhāvapadaṃ vipra pradhānaṃ padamucyate|
tanoranucarādyat‌ syādupārūḍhaṃ taducyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनुभावपदम् = तनु-भाव (लग्न) का आरूढ पद = आरूढ-लग्न (AL); विप्र = हे विप्र; प्रधानं पदम् उच्यते = प्रधान (मुख्य) पद कहलाता है; तनोः अनुचरात् = तनु के "अनुचर" भाव से — अर्थात् लग्न के पीछे चलने वाली द्वादश राशि से; यत् स्यात् = जो (आरूढ) बने; उपारूढं तत् उच्यते = वह उपारूढ (उपपद) कहलाता है।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, लग्न (तनु-भाव) का आरूढ पद प्रधान पद — आरूढ-लग्न — कहा जाता है। और तनु के अनुचर, अर्थात् द्वादश भाव से जो आरूढ बनता है, वह "उपारूढ" या उपपद कहलाता है। इस प्रकार यहाँ पद-गणना की दो धुरियाँ — लग्नारूढ (मुख्य) और द्वादशारूढ (उपपद) — स्थापित की गई हैं। (द्वादश = अनुचर मानना मुख्य परम्परा है; परम्परा-भेद संभव।)

English rendering The Ārūḍha of the tanu-bhāva (Lagna), O Brahmin, is called the principal Pada (Ārūḍha Lagna); and that which arises from the "attendant" of the tanu — the twelfth sign — is called the Upārūḍha, the Upapada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) किसी भाव B का आरूढ पद = भाव से उसके स्वामी तक की दूरी को स्वामी से पुनः गिनकर प्राप्त राशि। सूत्र-रूप में, स्वामी की राशि L हो तो
पद(B) = (2·L − B) mod 12 (मान 1…12 में)।
उपपद के लिए B = द्वादश भाव।
अपवाद: यदि परिणाम स्वयं B के समान या B से सप्तम आये, तो उस राशि से दशम राशि लें (आरूढ अपने भाव या उसके सप्तम में नहीं ठहरता)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (Ar=1) ⇒ द्वादश भाव = मीन (12), स्वामी गुरु। मान लें गुरु मेष (1) में। पद = (2·1 − 12) mod 12 = (2−12) mod 12 = 2 ⇒ वृषभ। जाँच: मीन से मेष तक 2 राशि (मीन=1, मेष=2); मेष से 2 राशि ⇒ वृषभ। अपवाद नहीं (वृषभ न मीन है, न मीन का सप्तम कन्या) ⇒ उपपद = वृषभ।

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30.3
तदेवोपपदं नाम तथा गौणपदं स्मृतम्‌।
शुभखेटगृहे तस्मिन्‌ शुभग्रहयुतेक्षिते
tadevopapadaṃ nāma tathā gauṇapadaṃ smṛtam‌|
śubhakheṭagṛhe tasmin‌ śubhagrahayutekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् एव उपपदं नाम = वही "उपपद" नाम से; तथा गौणपदं स्मृतम् = तथा "गौण पद" भी माना गया है (आरूढ-लग्न प्रधान, यह गौण); शुभखेटगृहे = शुभ ग्रह की राशि में (उपपद स्थित हो); तस्मिन् = उस उपपद में; शुभग्रह-युत-ईक्षिते = शुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट होने पर।

हिन्दी भावार्थ वही उपपद "गौण पद" भी कहलाता है — क्योंकि लग्नारूढ प्रधान है और यह उसके सापेक्ष गौण। जब यह उपपद किसी शुभ ग्रह की राशि में हो, तथा शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो — (तब जो फल होता है वह अगले श्लोक में)। यह अर्धसूत्र है; इसका फल श्लोक 4 में पूर्ण होता है।

English rendering That same Pada is named Upapada, and is also remembered as the "secondary" (Gauṇa) Pada; when it stands in a benefic's sign and is joined or aspected by benefic planets —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद-निर्णय की गुणात्मक शर्त। यहाँ संक्रिया दो हैं: (i) उपपद-राशि का स्वामी शुभ है या पाप, तथा (ii) उपपद पर युति/दृष्टि शुभ है या पाप। दृष्टि के अंश-नियम अध्याय 8 से आते हैं; यह श्लोक केवल शुभ-पक्ष की शर्त रखता है, फल श्लोक 4 में।

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30.4
पुत्रदारसुखं पूर्णं जायते द्विजसत्तम।
पापग्रहयुते तत्र पापभे पापवीक्षिते
putradārasukhaṃ pūrṇaṃ jāyate dvijasattama|
pāpagrahayute tatra pāpabhe pāpavīkṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रदारसुखं पूर्णम् = सन्तान व पत्नी का पूर्ण सुख; जायते = होता है; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; पापग्रह-युते तत्र = जब वह (उपपद) पाप ग्रह से युत हो; पापभे = पाप ग्रह की राशि में; पापवीक्षिते = पाप ग्रहों से दृष्ट होने पर।

हिन्दी भावार्थ (पूर्वोक्त शुभ-योग में) हे द्विजश्रेष्ठ, जातक को पुत्र और पत्नी का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। किन्तु इसके विपरीत — जब वही उपपद पाप ग्रह से युत हो, पाप ग्रह की राशि में स्थित हो, और पाप ग्रहों से दृष्ट हो — (तब जो होता है, वह अगले श्लोक में कहा गया है)। यहाँ शुभ-पक्ष का फल और पाप-पक्ष की शर्त साथ रखी गई है।

English rendering (Then) full happiness of children and spouse arises, O best of the twice-born. But when that Upapada is joined with malefics, placed in a malefic's sign, and aspected by malefics —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल) एवं पाप-शर्त का प्रति-पक्ष। शास्त्र कहता है कि शुभ-सम्बद्ध उपपद पूर्ण दाम्पत्य-सुख का सूचक है — यह पाठ का कथन है, नियति या निश्चय नहीं। संक्रिया वही त्रिक है: स्वामी-गुण × युति-गुण × दृष्टि-गुण, इस बार पाप-मान लेकर।

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30.5
प्रव्राजको भवेज्जतो दारहीनोऽथ वा नरः।
शुभदृग्‌योगतो नैव योगोऽयं दारनाशकः
pravrājako bhavejjato dārahīno'tha vā naraḥ|
śubhadṛg‌yogato naiva yogo'yaṃ dāranāśakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रव्राजकः भवेत् = संन्यासी/प्रव्रजित होता है; जातः = जातक [पाठ "भवेज्जतो" = भवेत् जातः; पाठ-भेद संभव]; दारहीनः अथ वा नरः = अथवा वह मनुष्य पत्नीहीन होता है; शुभदृग्-योगतः न एव = शुभ की दृष्टि/योग होने पर ऐसा नहीं (होता); योगः अयं दारनाशकः = यह योग (अन्यथा) दार-नाशक है।

हिन्दी भावार्थ (पूर्वोक्त पाप-योग में) जातक प्रव्रजित/संन्यासी बन जाता है, अथवा पत्नी-रहित रह जाता है — शास्त्र इसे "दारनाशक योग" कहता है। किन्तु यदि उसी उपपद पर शुभ ग्रह की दृष्टि या योग हो, तो यह अनिष्ट फल नहीं होता। ध्यान रहे — यह पाठ का कथन है; शुभ-सम्बन्ध इसका परिहार बताया गया है, अतः इसे भय-वाक्य नहीं, सापेक्ष नियम समझें।

English rendering (Then) the native becomes a renunciant, or the man is left without a spouse; yet not so if there is the aspect or association of benefics — for this (unmitigated) combination is otherwise a destroyer of the spouse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रव्रज्या/दारनाश योग एवं उसका शुभ-परिहार)। मर्म यह कि शास्त्र स्वयं एक "रद्द करने वाली शर्त" (शुभदृष्टि) देता है — दोष निरपेक्ष नहीं, सापेक्ष है; यही अनुशासित पठन की माँग है।

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30.6
रविर्नैवात्र पापः स्यात्‌ स्वोच्चमित्रस्वभस्थितः।
नीचशत्रुगृहस्थश्चेत्तदाऽसौ पाप एव हि
ravirnaivātra pāpaḥ syāt‌ svoccamitrasvabhasthitaḥ|
nīcaśatrugṛhasthaścettadā'sau pāpa eva hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविः न एव अत्र पापः स्यात् = इस प्रकरण में सूर्य पाप ग्रह नहीं माना जाता; स्व-उच्च-मित्र-स्वभ-स्थितः = जब वह अपने उच्च (मेष), मित्र-राशि, या स्वराशि (सिंह) में हो; नीच-शत्रु-गृहस्थः चेत् = यदि वह नीच (तुला) या शत्रु-राशि में स्थित हो; तदा असौ पाप एव हि = तब वह निश्चय ही पाप ग्रह (माना जाता) है।

हिन्दी भावार्थ उपपद-विचार में एक विशेष नियम — सूर्य को सर्वदा पाप न मानें। जब सूर्य अपने उच्च, मित्र या स्व-राशि में बलवान् हो, तब वह यहाँ पाप-कोटि में नहीं आता; किन्तु जब वह नीच या शत्रु-राशि में हो, तभी उसे पाप ग्रह गिना जाए। यह ग्रह के पाप/शुभत्व को स्थिति-बल (गरिमा) के अधीन कर देता है।

English rendering Here the Sun is not to be reckoned a malefic when placed in exaltation, a friend's sign, or its own sign; only if it stands in debilitation or an enemy's house is it indeed a malefic.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पाप-निर्णय की गरिमा-आधारित संक्रिया, बूलीय रूप में:
पाप(रवि) = 1 यदि रवि ∈ {नीच, शत्रु-क्षेत्र}, अन्यथा 0 (यदि रवि ∈ {उच्च, मित्र, स्व})।
रवि: उच्च = मेष, स्व = सिंह, नीच = तुला; शत्रु-क्षेत्र = शुक्र/शनि की राशियाँ (वृषभ, तुला, मकर, कुम्भ)।

उदाहरण (worked example) रवि मेष 10° (उच्च) ⇒ पाप(रवि)=0 ⇒ उपपद पर बैठा/दृष्ट रवि अनिष्ट-गणना में नहीं जोड़ा जाएगा। इसके विपरीत रवि तुला 10° (नीच) ⇒ पाप(रवि)=1 ⇒ पाप-पक्ष में गिना जाएगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह उच्च/स्व/मित्र ⇄ नीच/शत्रु का गुणात्मक स्विच वही गरिमा-सीढ़ी है जिसे षड्बल (BPHS अ.27) की स्थान-बल संख्यात्मक रूप में (रूप/विरूप में, 1 रूप = 60 विरूप) तोलता है। हमारे विवरण में स्थान-बल को स्पष्ट अंकीय नियम माना गया है; यह श्लोक उसी सीढ़ी का 0/1 सारांश है — गणना और उसकी व्याख्या को पृथक् रखने के अनुशासन का अच्छा उदाहरण।

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30.7
शुभग्रहाणां दृष्टिश्चेदुपारूढाद्‌ द्वितीयके।
शुभर्क्षे शुभयुक्ते च पूर्वोक्तं हि फलं स्मृतम्‌
śubhagrahāṇāṃ dṛṣṭiścedupārūḍhād‌ dvitīyake|
śubharkṣe śubhayukte ca pūrvoktaṃ hi phalaṃ smṛtam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-ग्रहाणाम् दृष्टिः = शुभ ग्रहों की दृष्टि; उपारूढात् द्वितीयके = उपारूढ़ से द्वितीय भाव/राशि पर; शुभ-ऋक्षे = शुभ राशि में; शुभ-युक्ते = शुभ से युक्त; पूर्वोक्तं फलम् = पहले कहा हुआ (पुत्र-दार-सुख आदि) फल।

हिन्दी भावार्थ यदि उपारूढ़ से द्वितीय स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, और वह स्थान शुभ राशि में तथा शुभ से युक्त हो, तो पूर्वोक्त शुभ फल ही स्मृत है। उपपद के साथ उसके द्वितीय (दारा-सम्बद्ध भाव-सङ्केत) की शुभता भी फल को पुष्ट करती है।

English rendering If there is aspect of benefics on the second from the upārūḍha, and that place is in a benefic sign and joined by benefics, the previously stated result is remembered as applying.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-जाँच (पद-अंकगणित):
UP = उपारूढ़-राशि-सूचकांक (1…12)।
द्वितीय = ((UP − 1 + 1) mod 12) + 1 = UP से अगली राशि।
शर्तें: (a) उस राशि पर ≥1 शुभ दृष्टि; (b) राशि शुभ-वर्ग (चर/स्थिर/द्विस्वभाव नहीं — स्वामी शुभ/पाप); (c) शुभ युत। दृष्टि-प्रणाली घोषित करें। फल = 30.3–30.4 का पूर्वोक्त शुभ पक्ष — नया संख्या-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) उपारूढ़ = कन्या (6) → द्वितीय = तुला (7)। यदि तुला में शुक्र युत और गुरु दृष्टि, तुला शुक्र-गृह → शर्तें पूरी → शास्त्र पूर्वोक्त पुत्र-दार-सुख पक्ष स्मृत करता है।

30.8
उपारूढाद्‌ द्वितीयं च नीचांशे नीचखेटयुक्‌।
क्रूरग्रहसमायुक्तं जातको दारहा भवेत्‌
upārūḍhād‌ dvitīyaṃ ca nīcāṃśe nīcakheṭayuk‌|
krūragrahasamāyuktaṃ jātako dārahā bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढात् = उपपद (द्वादश-भाव का आरूढ) से; द्वितीयं = दूसरा भाव; नीचांशे = नीच-अंश (सामान्यतः नीच-राशि का नवांश / D9 में नीच) में; नीचखेटयुक् = नीचस्थ ग्रह से युक्त; क्रूरग्रहसमायुक्तं = पाप-ग्रहों से युक्त; दारहा = दार-नाश / दार-रहित होने वाला; जातकः = जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उपपद से दूसरे भाव की स्थिति यदि नीचांश में हो, वहाँ नीच ग्रह बैठा हो, और वही स्थान क्रूर ग्रहों से संयुक्त हो, तो जातक दार-हानि का योग रखता है। यह कथन उपपद–द्वितीय के दार-भावकत्व पर टिका है: दूसरा भाव दार-पालन और दार-स्थिति का सूचक माना गया है। पाठ में योग की रूपरेखा फल-रूप में दी गई है; गणना में पहले उपपद, फिर उससे द्वितीय, फिर अंश-स्थान सुनिश्चित करना पड़ता है।

English rendering The text states that when the second from the upapada is in a debilitation-aṃśa, joined by a debilitated planet and further associated with malefics, the native is said to become one who loses the spouse. The verse frames a positional combination, not a free-standing fate claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उपपद (उपारूढ) = द्वादश-भाव का आरूढ। आरूढ-सूत्र (पारम्परिक): भाव H के स्वामी को H से n भाव दूर मानो; उसी n को स्वामी-स्थान से गिनकर आरूढ R मिलता है। यदि R = H या H से सप्तम हो, तो कई पाठों में R के स्थान पर उससे दशम लिया जाता है (पाठ-भेद संभव)। दार-योग-जाँच: R₂ = (R + 1) mod 12 (राशि-क्रम, 0-आधार पर +1)। “नीचांश” = उस स्थान / वहाँ स्थित ग्रह का नवांश-नीच: राशि-रेखांश λ पर D9-खण्ड = ⌊(λ mod 30°) / (30°/9)⌋ = ⌊(λ mod 30°)/3°20′⌋; नवांश-राशि नियम (चर/स्थिर/द्विस्वभाव) से D9-राशि निकाले; यदि ग्रह D9 में अपनी नीच-राशि में हो, या R₂ स्वयं नीच-सम्बद्ध अंश में पढ़ा जाए — यही “नीचांश + नीचखेट” की जाँच है। क्रूर-युक्त = R₂ पर/से क्रूर योग।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न मेष, द्वादश = मीन, द्वादशेश गुरु कर्क में (मीन से 5)। आरूढ: गुरु से 5 = वृश्चिक → उपपद = वृश्चिक। उपपद-द्वितीय = धनु। मान लें धनु में शनि (नीच-संभावना: शनि की नीच मेष; यहाँ राशि-नीच नहीं) — इस उदाहरण में “नीचखेट” के लिए धनु पर कोई नीच-ग्रह न हो तो योग अपूर्ण। बदला इनपुट: उपपद-द्वितीय = कन्या, वहाँ सूर्य (सूर्य की नीच तुला — राशि-नीच नहीं) और D9 में सूर्य तुला-नवांश में हो तो “नीचांश + नीच” की शर्त लगती है; साथ मंगल/शनि युति हो तो शास्त्रोक्त क्रूर-योग पूरा माना जाता है। (अयनांश: कोई भी घोषित अयनांश; भाव: पूर्ण-राशि भाव; नवांश: 3°20′ सम-भाग।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “अंश” यहाँ नवांश-स्तरीय नीच-जाँच की ओर संकेत करता है — षोडश-वर्ग शृंखला में D9 (नवांश) 30° को 9 × 3°20′ में बाँटता है; यह शुद्ध मॉड्युलर विभाजन है। फल-वाक्य को हम केवल शास्त्र-कथन मानते हैं; गणित और फल को अलग रखते हैं — exact स्थिति-जाँच, न कि नियति-घोषणा।

30.9
स्वोच्चांशे स्वोच्चसंस्थे वा तुङ्गदृष्टिवशात्‌ तथा।
भवन्ति बहवो दारा रूपलक्षणसंयुताः
svoccāṃśe svoccasaṃsthe vā tuṅgadṛṣṭivaśāt‌ tathā|
bhavanti bahavo dārā rūpalakṣaṇasaṃyutāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चांशे = अपने उच्च-अंश (उच्च-नवांश / D9-उच्च) में; स्वोच्चसंस्थे = स्वयं उच्च-राशि में स्थित; वा = अथवा; तुङ्गदृष्टिवशात् = उच्चस्थ ग्रह की दृष्टि के वश से; तथा = उसी प्रकार; बहवो दाराः = अनेक दार; रूपलक्षणसंयुताः = रूप और लक्षणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उपपद-द्वितीय या संबद्ध दार-स्थान) यदि स्वोच्चांश में हो, अथवा वहाँ उच्चस्थ ग्रह बैठा हो, अथवा उच्च ग्रह की दृष्टि पड़े, तो जातक के अनेक दार होते हैं और वे रूप-लक्षण से युक्त बताए गए हैं। पिछली ऋचा के नीच-योग का यह प्रतिलोम-स्वर है: नीच–क्रूर से हानि, उच्च–दृष्टि से बहुलता और सौन्दर्य-गुण। यह भी फल-कथन है — गणना केवल उच्च/उच्चांश/दृष्टि की शुद्ध जाँच है।

English rendering The text states that when the relevant place is in exaltation-aṃśa, or occupied by an exalted planet, or under the aspect of an exalted planet, many spouses endowed with beauty and good marks are indicated. It is the śāstra’s positional phala, not an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उच्च-राशि (पारम्परिक): सूर्य = मेष, चन्द्र = वृष, मंगल = मकर, बुध = कन्या, गुरु = कर्क, शुक्र = मीन, शनि = तुला। “स्वोच्चांश” = D9 में ग्रह अपनी उच्च-राशि में (या स्थान का उच्च-सम्बद्ध नवांश)। दृष्टि (गोलीय/पूर्ण-राशि पाठानुसार): सूर्य–मंगल–गुरु–शुक्र–शनि की विशेष दृष्टियाँ (मंगल 4,8; गुरु 5,9; शनि 3,10; शेष 7) — पाठ-भेद संभव कि यहाँ “तुङ्गदृष्टि” केवल उच्च-ग्रह की सप्तम/विशेष दृष्टि है। शर्त: (R₂ ∈ उच्चांश) ∨ (R₂ पर उच्च-ग्रह) ∨ (उच्च-ग्रह → R₂ दृष्टि) ⇒ शास्त्रोक्त बहु-दार फल।

उदाहरण (worked example) उपपद = कर्क ⇒ द्वितीय = सिंह। सिंह पर सूर्य उच्च नहीं (सूर्योच्च = मेष)। यदि सिंह पर गुरु हो और गुरु D9 में कर्क (गुरोः उच्च) में हो, तो “उच्चांश” शर्त गुरु पर लागू; यदि मेषस्थ सूर्य सिंह पर दृष्टि डाले (सूर्य सप्तम-दृष्टि: मेष→तुला, सिंह पर नहीं), तो दृष्टि-शर्त नहीं। सफल उदाहरण: उपपद-द्वितीय = मेष, वहाँ उच्च सूर्य — “स्वोच्चसंस्थ” सीधे पूरा। अयनांश घोषित रखें; दृष्टि पूर्ण-राशि मानें।

हमारा डिकोड (Our Decode) उच्चांश/नीचांश की जाँच D9-इंजन से सटीक की जाती है — षोडश-वर्ग में नवांश 3°20′ के बराबर खंडों का नियत मानचित्र है। हम फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं; वर्ग-गणित को फल-वाक्य से मिलाते नहीं।

30.10
उपारूढे द्वितीये वा मिथुने संस्थिते सति।
तत्र जातनरो विप्र बहुदारयुतो भवेत्‌
upārūḍhe dvitīye vā mithune saṃsthite sati|
tatra jātanaro vipra bahudārayuto bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढे = उपपद में; द्वितीये वा = अथवा (उपपद से) द्वितीय में; मिथुने संस्थिते सति = मिथुन राशि में स्थित होने पर; तत्र जातनरः = उस योग में जन्मा नर; विप्र = हे ब्राह्मण (सम्बोधन); बहुदारयुतः = अनेक दारों से युक्त; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उपपद स्वयं मिथुन में हो, अथवा उपपद से दूसरा भाव मिथुन में हो, तो जातक बहु-दार-युक्त होता है। मिथुन द्विस्वभाव और बहु-सम्बन्ध-सूचक राशि के रूप में यहाँ दार-बहुलता से जोड़ा गया है। सम्बोधन “विप्र” संवाद-शैली का है; योग की शर्त केवल राशि-स्थिति है।

English rendering The text states that when the upapada, or the second from it, is placed in Gemini, the native is said to be endowed with many spouses. The condition is a pure sign-placement test on the upapada chain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) R = upapada-राशि-सूचकांक (मेष=0 … मीन=11)। शर्त: (R = 2) ∨ ((R+1) mod 12 = 2), जहाँ 2 = मिथुन। कोई भार/अंक नहीं — द्विआधारी सत्य-जाँच। उपपद-गणना पूर्व-ऋचा जैसी (द्वादश-आरूढ)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या, द्वादश = सिंह, द्वादशेश सूर्य कुम्भ में (सिंह से 7)। आरूढ: सूर्य से 7 = सिंह — यदि नियम “आरूढ = भाव या सप्तम ⇒ दशम” लागू हो तो सिंह = द्वादश से 1? द्वादश=सिंह, R_calc=सिंह (=H) ⇒ R = सिंह से 10 = वृष (पाठ-भेद: कुछ केवल 10वें को लेते हैं)। सरल बिना-अपवाद पाठ: मानें उपपद = वृष; द्वितीय = मिथुन — शर्त “द्वितीये मिथुने” पूरी; शास्त्रोक्त बहु-दार फल। (पूर्ण-राशि भाव; अयनांश रेखांश-स्वामी के लिए आवश्यक।)

30.11
उपारूढे द्वितीयेऽपि स्वस्वामिग्रहसंयुते।
स्वर्क्षगे तत्पतौ वापि यत्र कुत्रापि भूसुर
upārūḍhe dvitīye'pi svasvāmigrahasaṃyute|
svarkṣage tatpatau vāpi yatra kutrāpi bhūsura

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढे = उपपद में; द्वितीयेऽपि = द्वितीय में भी; स्वस्वामिग्रहसंयुते = अपने-अपने स्वामी-ग्रह से युक्त; स्वर्क्षगे = स्व-राशि में स्थित; तत्पतौ = उस (भाव) के पति/स्वामी के; वा अपि = अथवा भी; यत्र कुत्रापि = जहाँ कहीं भी; भूसुर = हे भूसुर (ब्राह्मण-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की यह कड़ी कहती है कि उपपद और/या उसका द्वितीय जब अपने स्वामी-ग्रह से युक्त हो, अथवा उस भाव का स्वामी अपनी राशि में हो — स्थिति जहाँ भी बने — हे भूसुर, यही योग आगे की ऋचा के फल से बँधता है। यहाँ “युक्त” और “स्वर्क्षग” दो समान्तर स्थितियाँ हैं। सम्बोधन संवाद-परम्परा का है; पूरी फल-पंक्ति अगले श्लोक में पूरी होती है। पाठ-भेद संभव — कुछ संपादनों में स्वामी-योग का फल भिन्न पढ़ा जाता है।

English rendering The text sets a yoga: when the upapada and/or its second is joined by its own lord, or when that lord occupies its own sign — wherever that configuration occurs, O Brahmin. The result-clause is completed in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) R = upapada-राशि; R₂ = (R+1) mod 12। स्वामी-फलन L(sign) = पारम्परिक राशि-स्वामी (मेष/वृश्चिक→मंगल, वृष/तुला→शुक्र, मिथुन/कन्या→बुध, कर्क→चन्द्र, सिंह→सूर्य, धनु/मीन→गुरु, मकर/कुम्भ→शनि)। शर्त A: L(R) का राशि-स्थान = R (युति उपपद पर), या L(R₂) का स्थान = R₂। शर्त B: L(R) ∈ स्व-राशि-युग्म, या L(R₂) ∈ स्व-राशि-युग्म। “यत्र कुत्रापि” = शेष भाव-स्थान पर कोई अतिरिक्त अवरोध नहीं — केवल उक्त स्वामित्व/युति।

उदाहरण (worked example) उपपद = धनु (L=गुरु)। गुरु धनु में = स्वर्क्षग तत्पति — शर्त B। अथवा उपपद-द्वितीय = मकर, शनि मकर पर = स्वस्वामि-युक्त — शर्त A। दोनों में योग “अयम्” अगली ऋचा के लिए सक्रिय माना जाता है।

30.12
यस्य जन्मनि योगोऽयं स नरो द्विजसत्तम।
उत्तरायुषि निर्दारो भवत्येव न संशयः
yasya janmani yogo'yaṃ sa naro dvijasattama|
uttarāyuṣi nirdāro bhavatyeva na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य जन्मनि = जिसके जन्म में; योगोऽयं = यह (पूर्वोक्त) योग; स नरः = वह मनुष्य; द्विजसत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ; उत्तरायुषि = उत्तर आयु में (आयु के उत्तर भाग में); निर्दारः = दार-रहित; भवत्येव = निश्चय ही होता है (शास्त्र-स्वर); न संशयः = संशय नहीं (पाठ का आग्रह-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिसके जन्म-पत्र में पूर्व-श्लोक का योग हो, वह नर उत्तर-आयु में निर्दार होता है — “न संशयः” पाठ का अपना निश्चय-पद है, हमारे दावे का नहीं। “उत्तरायुषि” काल-खण्ड बताता है: फल तुरंत नहीं, आयु के उत्तर भाग से जोड़ा गया है। यह पूर्णतः फल-कथन है; गणित केवल योग की सत्यता-जाँच है। पाठ-भेद संभव — अन्य संपादनों में स्वामी-बल का फल भिन्न हो सकता है; इस विकिस्रोत-पाठ से हम बँधे हैं।

English rendering The text states that the man in whose birth this yoga occurs becomes without spouse in later life; the verse adds “no doubt” in the śāstra’s own voice. We report the claim; we do not certify destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। केवल बूलियन: यदि 30.11 की शर्त A ∨ B सत्य, तो शास्त्र उत्तरायु-निर्दार फल बाँधता है। “उत्तरायु” यहाँ संख्या-वर्ष नहीं देता; आयु-विभाग (अल्प/मध्य/उत्तरायु) अन्य अध्यायों के आयुर्दाय से अलग परिभाषित हो सकते हैं — इस श्लोक में कोई वर्ष-सङ्ख्या नहीं।

30.13
स्वराशौ संस्थितेऽप्येवं नित्याख्ये दारकारके।
उत्तरायुषि निर्दारो भवत्येव न संशयः
svarāśau saṃsthite'pyevaṃ nityākhye dārakārake|
uttarāyuṣi nirdāro bhavatyeva na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वराशौ संस्थिते = स्व-राशि में स्थित होने पर; अपि एवम् = भी इसी प्रकार; नित्याख्ये = “नित्य” नाम वाले; दारकारके = दार-कारक में; उत्तरायुषि निर्दारः = उत्तर-आयु में दार-रहित; भवत्येव न संशयः = निश्चय ही — संशय नहीं (शास्त्र-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नित्य-संज्ञक दारकारक के स्व-राशिस्थ होने पर भी वही फल — उत्तरायु में निर्दार — लगता है। “अप्येवम्” पूर्व-योग से समानता बाँधता है: या तो यही फल-परम्परा जारी है, या पूर्व-दोष के रहते स्व-राशि भी नहीं बचाती — दोनों पाठ-रीतियाँ संभव (पाठ-भेद संभव)। “नित्य” दारकारक से नैसर्गिक दार-सूचक (अक्सर शुक्र) या स्थिर/नित्य-कारक-परम्परा अभिप्रेत हो सकती है; चर-कारक (आत्मा…दार) से अलग संज्ञा है — संपादन स्पष्ट न करे तो संज्ञा घोषित रखें।

English rendering The text states that even when the spouse-significator called nitya stands in its own sign, the same later-life spouse-loss result is affirmed, “without doubt” in the śāstra’s wording. Convention for who counts as nitya-dārakāraka should be declared; the verse itself gives the name, not a full definition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। जाँच: दारकारक_नित्य का राशि-स्थान ∈ {उसकी स्व-राशियाँ}। यदि चर-कारक पद्धति से “दारकारक” लें, तो वह सबसे कम रेखांश वाले ग्रह (राहु नियम सहित — पाठ-भेद) से अलग “नित्य” संज्ञा है; इस श्लोक में चर-सारिणी नहीं दी गई। शुक्र को नैसर्गिक दार-कारक मानने पर: शुक्र वृष या तुला में ⇒ शर्त; फल शास्त्रानुसार उत्तरायु-निर्दार।

उदाहरण (worked example) नित्य-दारकारक = शुक्र (घोषित नैसर्गिक संज्ञा), शुक्र तुला में = स्वराशि। शास्त्र 30.12–13 की भाषा में उत्तरायुषि निर्दार फल बाँधता है। यदि “नित्य” से कोई अन्य ग्रह अभिप्रेत हो (पाठ-भेद), वही स्व-राशि-जाँच लागू करें — संख्या इस श्लोक में और नहीं है।

30.14
उपारूढपतिः स्वोच्चे स्थिरस्त्रीकारकोऽथ वा।
सुकुलाद्‌ दारलाभः स्यान्नीचस्थे तु विपर्ययात्‌
upārūḍhapatiḥ svocce sthirastrīkārako'tha vā|
sukulād‌ dāralābhaḥ syānnīcasthe tu viparyayāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढपतिः = उपपद का स्वामी; स्वोच्चे = उच्च में; स्थिरस्त्रीकारकः = स्थिर-स्त्री-कारक (स्थिर/स्थायी दार का कारक); अथ वा = अथवा; सुकुलात् = अच्छे कुल से; दारलाभः = दार-प्राप्ति; स्यात् = होती है; नीचस्थे = नीच में स्थित होने पर; तु = किन्तु; विपर्ययात् = उलटा / विपरीत फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उपपद-पति उच्च हो, अथवा स्थिरस्त्रीकारक (उच्च/उक्त बल में — वाक्य-समान्तर से) हो, तो उत्तम कुल से दार-लाभ होता है; वही कारक/स्वामी नीच हो तो फल उलटा बताया गया है। यह स्पष्ट उच्च–नीच द्वार है: एक ओर सुकुल-लाभ, दूसरी ओर विपर्यय। “स्थिरस्त्री” से स्थायी दार-भाव या स्थिर-राशि-सम्बद्ध स्त्री-कारक अभिप्रेत हो सकता है — संज्ञा की परिभाषा में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that if the lord of the upapada is exalted — or likewise the significator of a stable wife — gain of a spouse from a good family is indicated; if placed in debilitation, the reverse is stated. Exaltation versus debilitation is the only numeric polarity the verse encodes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) L_u = L(upapada-राशि)। उच्च-जाँच: L_u की राशि = उसकी उच्च-राशि (सूर्य मेष, चन्द्र वृष, मंगल मकर, बुध कन्या, गुरु कर्क, शुक्र मीन, शनि तुला)। नीच = उच्च से सप्तम राशि (मानक: सूर्य तुला, चन्द्र वृश्चिक, मंगल कर्क, बुध मीन, गुरु मकर, शुक्र कन्या, शनि मेष)। स्थिरस्त्रीकारक: यदि = शुक्र/दारकारक (घोषित संज्ञा), उसी उच्च/नीच परीक्षण। फल-मानचित्र (शास्त्र): उच्च ⇒ सुकुल-दारलाभ; नीच ⇒ विपर्यय। कोई वर्ष-सङ्ख्या या बिन्दु-भार नहीं।

उदाहरण (worked example) उपपद = मीन, उपपद-पति = गुरु; गुरु कर्क में = उच्च ⇒ शास्त्रोक्त सुकुलाद् दारलाभ। यदि गुरु मकर में = नीच ⇒ विपर्यय। स्थिरस्त्रीकारक को शुक्र मानें और शुक्र मीन (उच्च) हो तो वही सकारात्मक ध्रुव; शुक्र कन्या (नीच) तो विपरीत। अयनांश: स्वामी-निश्चय के लिए आवश्यक; भाव पूर्ण-राशि।

30.15
उपारूढे द्वितीये वा शुभसम्बधतो द्विज।
जातस्य सुन्दरी भार्या भव्या रूपगुणान्विता
upārūḍhe dvitīye vā śubhasambadhato dvija|
jātasya sundarī bhāryā bhavyā rūpaguṇānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढे = उपपद/आरूढ़-पद (उपपद-लग्न) में; द्वितीये वा = अथवा उसके द्वितीय भाव में; शुभसम्बधतः = शुभ-ग्रहों के संबन्ध/योग से; द्विज = हे द्विज (शिष्य-सम्बोधन); जातस्य = जातक की; सुन्दरी भार्या = सुन्दर पत्नी; भव्या = भव्य/मङ्गल-स्वरूपा; रूपगुणान्विता = रूप और गुणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! शास्त्र कहता है कि जब उपारूढ (उपपद) में, अथवा उसके द्वितीय भाव में, शुभ-ग्रहों का संबन्ध हो, तब जातक की पत्नी सुन्दरी होती है — भव्य, रूपवान् और गुण-सम्पन्न। यह कथन उपपद-द्वितीय (भार्या-स्थान) की शुभ-युक्तता पर फल बाँधता है, न कि कोई नियति-घोषणा।

English rendering O twice-born, the text states that when Upārūḍha (the Upapada) or its second house is linked with benefic association, the native’s wife is described as beautiful, gracious, and endowed with form and virtues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपपद/उपारूढ-द्वितीय पर शुभ-संबन्ध → पत्नी-स्वरूप)। उपपद स्वयं पूर्व-अध्याय के आरूढ़-नियम से निकलता है (भाव-स्वामी से गिनकर आरूढ़-पद); यह श्लोक केवल उस पद के द्वितीय/स्व-स्थान की शुभता का फल बताता है।

30.16
उपारूढाद्‌ द्वितीये च शनिराहू स्थितौ यदि।
उपवादात्‌ स्त्रियस्त्यागो नाशो वा जायते द्विज
upārūḍhād‌ dvitīye ca śanirāhū sthitau yadi|
upavādāt‌ striyastyāgo nāśo vā jāyate dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढात् = उपारूढ (उपपद) से; द्वितीये = द्वितीय भाव में; शनिराहू = शनि और राहु; स्थितौ यदि = यदि स्थित हों; उपवादात् = उपवाद/कलङ्क/निन्दा से; स्त्रियः त्यागः = पत्नी का परित्याग; नाशो वा = अथवा नाश; जायते = होता है, ऐसा शास्त्र कहता है; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! शास्त्र कहता है कि यदि उपारूढ से द्वितीय भाव में शनि और राहु स्थित हों, तो पत्नी-विषय में उपवाद (कलङ्क/दोषारोपण) से त्याग, अथवा नाश — ऐसा फल कहा गया है। यह शास्त्रीय फल-वाक्य है; इसे नियत विपत्ति या भय-वाणी न समझें। पाठ में “त्यागो नाशो वा” दोनों विकल्प दिए हैं।

English rendering O twice-born, the text states that if Saturn and Rāhu occupy the second from Upārūḍha, abandonment of the wife through calumny, or (alternatively) destruction, is indicated as the classical phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि+राहु, उपपद-द्वितीय)। गणना केवल इतनी कि उपपद-लग्न तय कर द्वितीय राशि में शनि-राहु की उपस्थिति देखी जाए; फल-पाठ शास्त्र का अपना दावा है, भविष्य की अनिवार्यता नहीं।

30.17
उपारूढे द्वितीये वा शिखिशुक्रौ यदा स्थितौ।
रक्तप्रदररोगार्ता जायते तस्य भामिनी
upārūḍhe dvitīye vā śikhiśukrau yadā sthitau|
raktapradararogārtā jāyate tasya bhāminī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढे द्वितीये वा = उपपद में अथवा उससे दूसरे भाव में; शिखि = केतु (शिखी — शिखा/चोटी वाला, केतु का पर्याय); शुक्रौ = (शिखी और) शुक्र — द्विवचन; यदा स्थितौ = जब स्थित हों; रक्त-प्रदर = रक्तप्रदर (स्त्री-रोग-सम्बन्धी अतिरक्तस्राव); रोग-आर्ता = रोग से पीड़ित; भामिनी = पत्नी/स्त्री।

हिन्दी भावार्थ जब केतु और शुक्र उपपद में या उससे दूसरे भाव में स्थित हों, तब शास्त्र कहता है कि जातक की पत्नी रक्तप्रदर नामक रोग से पीड़ित होती है। इसे ग्रन्थ का पारम्परिक कथन-मात्र समझें।

English rendering When Ketu and Venus occupy the Upapada or the second from it, the text states that the native's wife is afflicted with raktapradara (a bleeding disorder).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरोग्य-सम्बन्धी; शास्त्र-कथन मात्र)। एकमात्र गणनीय अंश यहाँ उपपद व तत्-द्वितीय राशि का निर्धारण है; रोग-निर्देश व्याख्यात्मक फल है, कोई चिकित्सकीय निदान नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी पद्धति का मूल अनुशासन यहीं लागू है — गणित को व्याख्या से अलग रखना। रक्तप्रदर जैसे आरोग्य-फल हमारे लिए "शास्त्र यह कहता है" के रूप में उद्धृत होते हैं, कभी चिकित्सकीय भविष्यवाणी या भय के रूप में नहीं; यही विवेक हमारे oracle-अनुशासन (exact-`==`, कोई सहिष्णुता-पट्टी नहीं) की सहोदर सतर्कता है।

30.18
बुधकेतू स्थितौ तत्र तदाऽस्थिस्रावसंयुता।
तत्रस्थाः शनिराह्वर्कास्तदाऽस्थिज्वरसंयुता
budhaketū sthitau tatra tadā'sthisrāvasaṃyutā|
tatrasthāḥ śanirāhvarkāstadā'sthijvarasaṃyutā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधकेतू = बुध और केतु; स्थितौ तत्र = वहाँ (उपारूढ-द्वितीय/तत्-स्थान) स्थित हों; तदा = तब; अस्थिस्रावसंयुता = अस्थि-स्राव (हड्डी-सम्बन्धी स्राव — शास्त्र-शब्द) से युक्ता; तत्रस्थाः = वहाँ स्थित; शनिराह्वर्काः = शनि, राहु और अर्क (सूर्य); तदा = तब; अस्थिज्वरसंयुता = अस्थि-ज्वर से युक्ता (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: यदि वहीं (उपारूढ-सन्दर्भ के द्वितीय/कथित स्थान में) बुध और केतु स्थित हों, तो पत्नी अस्थि-स्राव से युक्त कही गई; और यदि वहाँ शनि, राहु तथा सूर्य स्थित हों, तो अस्थि-ज्वर से युक्त। दोनों फल रोग-नामों में बँधे शास्त्र-वाक्य हैं — न चिकित्सा-निर्देश, न निश्चित रोग-भविष्य।

English rendering The text states that Mercury and Ketu there associate the wife with “asthi-srāva” (bone-discharge, as a classical phala-term); and that Saturn, Rāhu and the Sun there associate her with “asthi-jvara” (bone-fever, likewise a textual indication, not a clinical claim).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दो ग्रह-समूहों के अलग-अलग रोग-फल)। स्थान-नियम: “तत्र” = पूर्व-श्लोकों का उपारूढ/द्वितीय-सन्दर्भ; गणना केवल ग्रह-उपस्थिति की है।

30.19
स्थूलाङ्गी बुधराहूभ्यां तत्रस्थाभ्यां द्विजोत्तम।
बुधक्षेत्रे कुजार्की चेन्नसिकारोगसंयुता
sthūlāṅgī budharāhūbhyāṃ tatrasthābhyāṃ dvijottama|
budhakṣetre kujārkī cennasikārogasaṃyutā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थूलाङ्गी = स्थूल-अंग वाली (शरीर से स्थूला); बुधराहूभ्यां = बुध और राहु से; तत्रस्थाभ्यां = वहाँ स्थित दोनों से; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; बुधक्षेत्रे = बुध के क्षेत्र (मिथुन/कन्या) में; कुजार्की = कुज (मङ्गल) और अर्क (सूर्य); चेत् = यदि; नसिकारोगसंयुता = नासिका-रोग से युक्ता (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजोत्तम! शास्त्र कहता है कि वहाँ स्थित बुध-राहु से पत्नी स्थूलाङ्गी कही गई। तथा यदि बुध-क्षेत्र (मिथुन अथवा कन्या) में मङ्गल और सूर्य हों (उसी उपपद-सन्दर्भ में), तो नासिका-रोग से युक्त फल कहा गया है। “क्षेत्र” यहाँ राशि-स्वामित्व का शास्त्रीय संकेत है।

English rendering O best of the twice-born, the text states that Mercury and Rāhu placed there make the wife stout-limbed; and that if Mars and the Sun are in a sign of Mercury (Gemini or Virgo) in that context, she is said to be associated with nasal affliction — again as classical phala, not medical advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध+राहु → स्थूलता; बुध-क्षेत्र में मङ्गल+सूर्य → नासिका-रोग-फल)। “बुधक्षेत्र” = मिथुन/कन्या (बुध-स्वामी राशियाँ); पाठ-भेद संभव यदि “क्षेत्र” को केवल एक राशि पर बाँधा जाए।

30.20
कुजक्षेत्रेऽप्येवमेव फलं ज्ञेयं द्विजोत्तम।
बृहस्पतिशनी तत्र कर्णनेत्ररुजान्विता
kujakṣetre'pyevameva phalaṃ jñeyaṃ dvijottama|
bṛhaspatiśanī tatra karṇanetrarujānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजक्षेत्रे = मङ्गल-क्षेत्र (मेष/वृश्चिक) में; अपि एवम् एव = भी इसी प्रकार; फलं ज्ञेयं = फल जानना चाहिए; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; बृहस्पतिशनी = बृहस्पति और शनि; तत्र = वहाँ; कर्णनेत्ररुजान्विता = कर्ण (कान) और नेत्र (आँख) की रुजा से युक्ता।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजोत्तम! शास्त्र कहता है कि कुज-क्षेत्र में भी (पूर्ववत् सन्दर्भ में) वैसा ही फल जानना चाहिए। तथा जब वहाँ बृहस्पति और शनि स्थित हों, तो पत्नी कर्ण-नेत्र-रुजा से युक्त कही गई है। “एवमेव” पूर्व-श्लोक के रोग-फल-नियम का विस्तार है — स्थान बदलकर समान तर्क।

English rendering O best of the twice-born, the text states that in a sign of Mars the same kind of result is to be understood; and that Jupiter and Saturn there mark the wife as associated with ear and eye affliction (textual phala, not a clinical forecast).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मङ्गल-क्षेत्र में समान नियम; गुरु+शनि → कर्ण-नेत्र-रुजा)। कुजक्षेत्र = मेष/वृश्चिक; “एवमेव” से पूर्व-श्लोक की तर्क-श्रृंखला जुड़ती है — पाठ-भेद संभव कि “एवमेव” केवल नासिका-फल पर लागू हो या सामान्य रोग-फल पर।

30.21
तत्रान्यगेहगौ विप्र बुद्धभौमौ स्थितौ यदा।
यदा स्वर्भानुदेवेज्यौ भार्या दन्तरुजान्विता
tatrānyagehagau vipra buddhabhaumau sthitau yadā|
yadā svarbhānudevejyau bhāryā dantarujānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उस (उपारूढ-सन्दर्भ) स्थान से; अन्यगेहगौ = अन्य भाव/गेह में गए हुए; विप्र = हे विप्र; बुद्धभौमौ = बुध और भौम (मङ्गल); स्थितौ यदा = जब स्थित हों; यदा = जब; स्वर्भानुदेवेज्यौ = स्वर्भानु (राहु) और देवेज्य (गुरु); भार्या = पत्नी; दन्तरुजान्विता = दन्त-रुजा (दाँत-पीड़ा) से युक्ता — शास्त्र-फल।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र! शास्त्र कहता है: जब बुध और मङ्गल उस सन्दर्भ-स्थान से अन्य भाव में स्थित हों, तथा जब राहु और गुरु (उसी फल-श्रृंखला में) हों, तब पत्नी दन्त-रुजा से युक्त कही गई है। “अन्यगेहगौ” का ठीक भाव — किन भावों तक — पाठ में विस्तार नहीं; अतः पाठ-भेद/टीका-विस्तार संभव। फल फिर भी शास्त्र का कथन है, न कि अनिवार्य शारीरिक भविष्य।

English rendering O brāhmaṇa, the text states that when Mercury and Mars stand in other houses relative to that place, and when Rāhu and Jupiter (are so placed in the same phala-sequence), the wife is described as associated with toothache — a classical indication, not a medical prediction we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध+मङ्गल “अन्य गेह” में; राहु+गुरु → दन्त-रुजा)। “अन्यगेह” = कथित उपपद/द्वितीय से भिन्न भाव; पूर्ण सूची इस श्लोक में नहीं — व्याख्या में पाठ-भेद संभव।

30.22
शनिराहू शनिक्षेत्रे पङ्गुर्वातरुजान्विता।
शुभदृग्योगतो नेति फलं ज्ञेयं विपश्चिता
śanirāhū śanikṣetre paṅgurvātarujānvitā|
śubhadṛgyogato neti phalaṃ jñeyaṃ vipaścitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-राहू = शनि और राहु (युग्म/संयोग); शनि-क्षेत्रे = शनि के राशि-क्षेत्र में (मकर/कुम्भ); पङ्गुः = पंगु/चलन-असमर्थता का संकेत (शास्त्र-कथन); वात-रुजा-अन्विता = वात-संबंधी पीड़ा से युक्त (शास्त्र-कथन); शुभ-दृक्-योगतः = शुभ दृष्टि या शुभ योग से; न इति = वैसा नहीं होता; फलं ज्ञेयं = फल जानना चाहिए; विपश्चिता = विद्वान् ज्योतिषी द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि और राहु यदि शनि के क्षेत्र (मकर या कुम्भ) में हों, तो फल-पक्ष में पंगुता और वात-रुजा का उल्लेख आता है। किन्तु यदि शुभ ग्रह की दृष्टि या शुभ योग उपस्थित हो, तो वह फल नहीं माना जाता। विद्वान् को दोनों पक्ष—क्षेत्र-स्थिति और शुभ-दृष्टि/योग—देखकर ही फल निश्चय करना चाहिए। यह फल-कथन है, चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states that Saturn and Rāhu placed in Saturn’s own signs indicate (in phala-language) lameness and vāta-affliction; yet with benefic aspect or benefic yoga that result does not hold. The learned should weigh both the placement and the benefic influence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दोष + शुभ-दृष्टि/योग से निरसन)। तकनीक केवल स्थितीय है: शनि/राहु ∈ {मकर, कुम्भ}, और शुभ-दृष्टि/योग की उपस्थिति/अनुपस्थिति से फल-पक्ष को “नेति” (नहीं) कहा गया है।

30.23
लग्नात्‌ पदादुपारूढाद्‌ यो राशिः सप्तमो द्विज।
तस्मात्‌ तत्स्वामिनः खेटात्‌ तदंशाच्च द्विजोत्तम
lagnāt‌ padādupārūḍhād‌ yo rāśiḥ saptamo dvija|
tasmāt‌ tatsvāminaḥ kheṭāt‌ tadaṃśācca dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; पदात् = आरूढ पद (आरूढ लग्न) से; उपारूढात् = उपपद से; यः राशिः सप्तमः = जो सातवीं राशि हो; तस्मात् = उस (सप्तम राशि) से; तत्-स्वामिनः खेटात् = उसके स्वामी ग्रह से; तत्-अंशात् च = और उसके अंश (नवांश/वर्ग) से; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ लग्न से, आरूढ पद से और उपपद से — इन तीनों से जो सातवीं राशि पड़े, उसका, उस राशि के स्वामी-ग्रह का, तथा उसके अंश (नवांश) का भी विचार करके दाम्पत्य-फल जानना चाहिए। यह श्लोक विवाह-विचार की बहु-सन्दर्भ (multi-reference) पद्धति देता है — एक ही फल को तीन आरम्भ-बिंदुओं से जाँचना।

English rendering From the Lagna, from the Ārūḍha Pada, and from the Upapada — whichever sign is the seventh, and its lord, and that lord's divisional (aṃśa) position, are all to be examined.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) किसी सन्दर्भ-राशि R (1…12) से nवीं राशि = ((R − 1 + (n−1)) mod 12) + 1। सप्तम के लिए n = 7 ⇒ स्थानान्तर +6, अर्थात् 7वीं राशि = ((R − 1 + 6) mod 12) + 1 = सन्मुख राशि। इसे तीन R पर (लग्न, आरूढ लग्न, उपपद) लगाकर तीन साक्ष्य लिए जाते हैं; फिर उस राशि के स्वामी की स्थिति और उसका नवांश (D9) जोड़े जाते हैं।

उदाहरण (worked example) मान लें उपपद वृषभ (R = 2) में है। सप्तम = ((2 − 1 + 6) mod 12) + 1 = (7 mod 12) + 1 = 8 → वृश्चिक; उसका स्वामी = मंगल। अब मंगल की राशि-स्थिति और मंगल का नवांश (D9) भी देखे जाते हैं। यही क्रम लग्न-सप्तम और आरूढ-सप्तम पर दोहराकर तीनों साक्ष्यों का समवाय किया जाता है (गणना पूर्णतः राशि-सूचकांक का मॉड्युलर अंकगणित है)।

हमारा डिकोड (Our Decode) "तत्-अंशात्" यहाँ नवांश (D9) की ओर संकेत है, जो हमारी षोडश-वर्ग योजना (BPHS Ch.6) का अंग है — D1…D60 में से प्रत्येक 30° राशि का समान चापों में नियत विभाजन, शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित (kaal_ekavimshati_varga.py)। इस प्रकार श्लोक का "खेट + अंश" जोड़ा हमारे वर्ग-इंजन में परिकलनीय — व्याख्यात्मक नहीं — बनता है।

30.24
एवमेव फलं ज्ञेयमित्याहुर्नारदादयः।
उक्तेभ्यो नवमे विप्र शनिचन्द्रबुधा यदि
evameva phalaṃ jñeyamityāhurnāradādayaḥ|
uktebhyo navame vipra śanicandrabudhā yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् एव = इसी प्रकार ही; फलं ज्ञेयम् = फल जानना चाहिए; इति आहुः = ऐसा कहते हैं; नारद-आदयः = नारद आदि (आचार्य); उक्तेभ्यः = पूर्वोक्त स्थानों से; नवमे = नवम भाव/नवम राशि में; विप्र = हे विप्र; शनि-चन्द्र-बुधाः = शनि, चन्द्र, बुध; यदि = यदि (स्थित हों)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्वोक्त रीति से ही फल जानना चाहिए; नारदादि भी यही कहते हैं। हे विप्र, यदि पूर्वोक्त स्थानों (लग्न/पद/उपारूढ़ के सप्तम आदि से निर्दिष्ट क्षेत्रों) से नवम में शनि, चन्द्र या बुध हों, तो अगला फल उन पर लागू होता है। यह संवाद-परंपरा और स्थान-शर्त दोनों जोड़ता है।

English rendering Thus, the text says, the result is to be known—so declare Nārada and others. If, O brahmin, from the places already stated, Saturn, the Moon, or Mercury occupy the ninth, the following phala applies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-स्थान-निर्धारण (नवम-गिनती)। नवम स्थान:

  • नवम(X) = ((X − 1 + 8) mod 12) + 1

जहाँ X पूर्व श्लोक का संदर्भ-राशि (सप्तम-लग्न/पद/उपारूढ़ आदि) है। शर्त: उस नवम में ∈ {शनि, चन्द्र, बुध}।

उदाहरण (worked example) यदि संदर्भ-राशि = मीन (12), तो नवम = ((12−1+8) mod 12)+1 = 8 → वृश्चिक। यदि वृश्चिक में शनि/चन्द्र/बुध हों, तो 30.25 का “अपुत्रता” पक्ष लागू होता है (शास्त्र-कथन)।

30.25
अपुत्रता तथाऽर्केज्यराहुभिर्बहुपुत्रता।
चन्द्रेणैकसुतस्तत्र मिश्रैः पुत्रो विलम्बतः
aputratā tathā'rkejyarāhubhirbahuputratā|
candreṇaikasutastatra miśraiḥ putro vilambataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपुत्रता = पुत्र-रहितता (शास्त्र-फल); तथा = तथा/और; अर्क-इज्य-राहुभिः = सूर्य, गुरु (इज्य), राहु से; बहु-पुत्रता = अनेक पुत्रों का फल; चन्द्रेण = चन्द्र से; एक-सुतः = एक पुत्र; तत्र = वहाँ (उक्त स्थान में); मिश्रैः = मिश्र ग्रहों से; पुत्रः विलम्बतः = विलंब से पुत्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्वोक्त शनि-चन्द्र-बुध की स्थिति में अपुत्रता का फल आता है; किन्तु उसी विचार-क्षेत्र में सूर्य, गुरु और राहु से बहुपुत्रता कही गई है। केवल चन्द्र से एक पुत्र; मिश्र ग्रह-संयोग से पुत्र विलंब से—ऐसा पाठ कहता है। यह सब फल-कथन हैं, नियति या चिकित्सकीय निश्चितता नहीं।

English rendering The text states childlessness under the foregoing Saturn–Moon–Mercury condition; under Sun, Jupiter, and Rāhu, many sons; under the Moon alone, one son; under mixed grahas, a son after delay.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-तालिका (ग्रह-वर्ग → पुत्र-फल)। संरचनात्मक नियम (शास्त्र का वर्गीकरण):

| उक्त-स्थान में ग्रह-समूह | शास्त्रोक्त फल |
|---|---|
| शनि / चन्द्र / बुध (30.24–25) | अपुत्रता |
| सूर्य, गुरु, राहु | बहुपुत्रता |
| चन्द्र (एकल) | एक सुत |
| मिश्र | पुत्र विलंबतः |

“मिश्र” = उपरोक्त वर्गों का मिश्रण/संयोग; सटीक मिश्र-परिभाषा पाठ में और नहीं खोली—पाठ-भेद/टीका-भेद संभव।

30.26
रवीय्जराहुयोगेन पुत्रो वीर्यप्रतापवान्‌।
प्रचण्डविजयी विप्र रिपुनिग्रहकारकः
ravīyjarāhuyogena putro vīryapratāpavān‌|
pracaṇḍavijayī vipra ripunigrahakārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि-इज्य-राहु-योगेन = सूर्य, गुरु (इज्य) और राहु के योग से (पाठ-भेद संभव — "रवीय्ज" ≈ रवि + इज्य); पुत्रः = पुत्र; वीर्य-प्रताप-वान् = पराक्रम और तेज से युक्त; प्रचण्ड-विजयी = प्रचण्ड विजय पाने वाला; रिपु-निग्रह-कारकः = शत्रुओं का दमन करने वाला।

हिन्दी भावार्थ सूर्य, गुरु और राहु के योग से (जो पूर्व श्लोक की "बहुपुत्रता" का ही विशेषण-विस्तार है) शास्त्र कहता है कि पुत्र वीर्यवान्, तेजस्वी, प्रचण्ड विजयी तथा शत्रुओं का दमन करने वाला होता है। यह सन्तति की गुणवत्ता का प्रशस्ति-सूचक कथन है।

English rendering By the combination of Sun, Jupiter, and Rāhu, the text states the son is full of vigor and majesty, fiercely victorious, and a subduer of foes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्तुति-प्राय। यह श्लोक 30.25 के "अर्क-इज्य-राहु → बहुपुत्रता" योग की गुण-व्याख्या है; इसमें कोई अंक या अर्क नहीं, केवल उस पूर्व-कथित योग के फल का गुणात्मक विस्तार है — शास्त्र का दावा, न कि हमारी ओर से कोई निश्चित भविष्यवाणी।

30.27
उक्तस्थाने कुजार्किभ्यां पुत्रहीनः प्रजायते।
दत्त पुत्रयुतो वापि सहोत्थसुतवान्‌ भवेत्‌
uktasthāne kujārkibhyāṃ putrahīnaḥ prajāyate|
datta putrayuto vāpi sahotthasutavān‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्त-स्थाने = पूर्वोक्त सन्तान-स्थान में (इस प्रसंग में उपपद से नवम — पाठ-भेद संभव); कुज-अर्किभ्याम् = मंगल और शनि (अर्कि = अर्क/सूर्य-पुत्र = शनि) के योग से; पुत्रहीनः = पुत्र-रहित; दत्त-पुत्र-युतः = गोद लिए (दत्तक) पुत्र वाला; वा अपि = अथवा; सहोत्थ-सुतवान् = स्वयं-उत्पन्न (सह-उत्थित) पुत्र वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस पूर्वोक्त सन्तान-स्थान में मंगल और शनि दोनों बैठें तो जातक प्रायः पुत्र-सुख से वंचित रहता है; फिर भी दत्तक पुत्र से, अथवा कभी स्वयं उत्पन्न सन्तान से, वंश-क्रम चल सकता है। यह पाप-ग्रह-योग का कथित फल है, कोई अटल निर्णय नहीं।

English rendering The text states that with Mars and Saturn together in the aforesaid (progeny) place the native tends to be sonless, yet may be furnished with an adopted son or, at times, with a son of his own body.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप-ग्रह-अध्यारोपण)। एकमात्र संगणनीय अंश स्थान-निर्धारण है: "उक्त-स्थान" = पूर्व श्लोकों में कहा गया उपपद से नवम भाव (भाव-सूचकांक = ((राशि − उपपद-राशि) mod 12) + 1 = 9); उस पर कुज व शनि का सह-स्थिति-चिह्न देखना।

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30.28
तत्रस्थे विषमे राशौ बहुपुत्र्युतो नरः।
स्वल्पापत्यः समे राशौ जायते द्विजसत्तम १
tatrasthe viṣame rāśau bahuputryuto naraḥ|
svalpāpatyaḥ same rāśau jāyate dvijasattama 1

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्रस्थे = उसी (उपपद/सन्तान) स्थान में स्थित होने पर; विषमे राशौ = विषम (ओज) राशि में — मेष 1, मिथुन 3, सिंह 5, तुला 7, धनु 9, कुम्भ 11; बहु-पुत्री-युतः = बहुत सन्तान वाला; स्वल्प-अपत्यः = अल्प सन्तान वाला (अपत्य = सन्तति); समे राशौ = सम (युग्म) राशि में — वृष 2 … मीन 12।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का कथन है कि वह सूचक राशि यदि विषम (ओज) हो तो जातक बहु-सन्तति वाला, और सम (युग्म) राशि हो तो अल्प-सन्तति वाला माना जाता है। यहाँ राशि का ओज-युग्म भेद ही फल का निर्णायक बताया गया है।

English rendering The text states that when that sign is odd (ojas) the man has many children, and when it is even (yugma) his offspring are few.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुद्ध सम-विषम-परीक्षा — राशि-सूचकांक n ∈ {1…12} पर n mod 2 = 1 ⇒ विषम ⇒ बहु-सन्तति; n mod 2 = 0 ⇒ सम ⇒ अल्प-सन्तति। विषम-समुच्चय = {1,3,5,7,9,11}, सम-समुच्चय = {2,4,6,8,10,12}। यह द्विआधारी वर्गीकरण (parity) है, कोई परिमाण-गणना नहीं। (पंक्ति-अन्त "१" खण्ड-सूचक अंक — पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) मान लें सूचक-राशि धनु = 9; 9 mod 2 = 1 (विषम) ⇒ शास्त्रानुसार बहु-सन्तति-कथन। यदि वही कर्क = 4; 4 mod 2 = 0 (सम) ⇒ अल्प-सन्तति-कथन। इनपुट केवल राशि-क्रमांक, कोई अंश/कलादि अपेक्षित नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी उसी अनुशासन-रेखा का उदाहरण है जिसे इंजन में पिन किया गया — गणित (राशि की parity, n mod 2, नियत पूर्णांक-अंकगणित) को फल-कथन (बहु/अल्प सन्तति) से पृथक् रखना। parity एक `==`-योग्य निश्चित मान है; उस पर टिका फल शास्त्र का कथन है, हमारा भविष्य-निर्णय नहीं — यही kaal-verification-oracle की "exact-checks-only, तोलन-बैंड नहीं" पद्धति की भावना है।

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30.29
सिंहे चोपपदे विप्र निशानाथयुतेक्षिते।
अल्पप्रजोऽथ कन्यायां जातः कन्याप्रजो भवेत्‌
siṃhe copapade vipra niśānāthayutekṣite|
alpaprajo'tha kanyāyāṃ jātaḥ kanyāprajo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहे = सिंह राशि (5) में; च उपपदे = और उपपद (द्वादश-भाव का आरूढ) होने पर; निशानाथ-युत-ईक्षिते = चन्द्र (निशा=रात्रि + नाथ=स्वामी = चन्द्र) से युत या दृष्ट; अल्प-प्रजः = अल्प-सन्तति; अथ कन्यायाम् = और यदि कन्या राशि (6) में; जातः = जातक; कन्या-प्रजः = कन्या-सन्तति (पुत्रियों) वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उपपद सिंह राशि में हो और चन्द्र से युत/दृष्ट हो तो जातक अल्प-सन्तति वाला होता है; और यदि वह उपपद कन्या राशि में हो तो प्रायः कन्या-सन्तति ही होती है। यह राशि-विशेष पर आधारित फल-संकेत है।

English rendering The text states that when the upapada is in Leo and joined or aspected by the Moon, offspring are few; and when it falls in Virgo, the native's progeny are daughters.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राशि-आधारित)। तकनीकी अंश केवल राशि-पहचान: सिंह = 5वीं राशि, कन्या = 6वीं; उपपद (= द्वादश-भाव का आरूढ-पद) उन पर पड़ता है या नहीं, यह आरूढ-गणना से तय होता है (आरूढ-सूत्र श्लोक 30.31 में)। चन्द्र का युति/दृष्टि-चिह्न सहवर्ती शर्त है।

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30.30
सुतभावनवांशाच्च स्थिरसन्ततिकारकात्‌।
एवं त्रिशांशकुण्डल्यामपि योगं विचिन्तयेत्‌
sutabhāvanavāṃśācca sthirasantatikārakāt|
evaṃ triśāṃśakuṇḍalyāmapi yogaṃ vicintayet
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतभावनवांशात् = पञ्चम भाव के नवांश से; च = और; स्थिरसन्ततिकारकात् = स्थिर सन्तान-कारक (गुरु) से; एवम् = इसी प्रकार; त्रिंशांशकुण्डल्याम् अपि = त्रिंशांश (D30) कुण्डली में भी; योगं विचिन्तयेत् = योग का विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (सन्तान-विषयक) इन योगों को पञ्चम भाव के नवांश से और स्थिर सन्तान-कारक गुरु से भी देखा जाए, और इसी तरह त्रिंशांश-कुण्डली में भी विचार किया जाए। उपपद अध्याय का यह पद बताता है कि एक ही योग को कई सन्दर्भ-बिन्दुओं और वर्गों से जाँचा जाता है।

English rendering Consider these yogas also from the navāṃśa of the fifth house and from Jupiter, the fixed significator of progeny, and likewise in the triṃśāṃśa chart.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिंशांश (D30) का विभाजन: विषम राशि में मंगल 0°–5°, शनि 5°–10°, गुरु 10°–18°, बुध 18°–25°, शुक्र 25°–30°; सम राशि में विपरीत क्रम (शुक्र 0°–5°, बुध 5°–12°, गुरु 12°–20°, शनि 20°–25°, मंगल 25°–30°)। नवांश-खण्ड = 3°20′। सन्दर्भ-बिन्दु तीन: पञ्चम-भाव-नवांश, गुरु, D30।

उदाहरण (worked example) ग्रह मिथुन 16° (विषम): 10° ≤ 16° < 18° → गुरु का त्रिंशांश; वही ग्रह वृषभ 16° (सम) पर: 12° ≤ 16° < 20° → गुरु का त्रिंशांश। नवांश: ⌊16 ÷ 3.333⌋ + 1 = 5वाँ नवांश।

हमारा डिकोड (Our Decode) D9 और D30 हमारे varga engine के षोडश-वर्ग समुच्चय में असमान-चाप (D30) और समान-चाप (D9) विभाजन के रूप में नियम-बद्ध हैं — त्रिंशांश की पाँच असमान सीमाएँ भी उसी लुकअप में हैं।

30.31
शनिराहू त्रिलाभस्थौ पदाद्‌ भ्रातुर्विनाशकौ।
ज्येष्ठस्यैकादशे तत्र कनिष्ठस्य तृतीयके
śanirāhū trilābhasthau padād‌ bhrāturvināśakau|
jyeṣṭhasyaikādaśe tatra kaniṣṭhasya tṛtīyake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-राहू = शनि और राहु; त्रि-लाभ-स्थौ = तृतीय (3) और लाभ (11वें भाव) में स्थित; पदात् = पद (आरूढ-लग्न) से गिनकर; भ्रातुः विनाशकौ = भाई के नाशक; ज्येष्ठस्य एकादशे = ज्येष्ठ (बड़े) भाई के लिए 11वें में; कनिष्ठस्य तृतीये = कनिष्ठ (छोटे) भाई के लिए 3रे में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पद (आरूढ) से तीसरे और ग्यारहवें भाव में शनि व राहु हों तो वे भ्रातृ-नाशक कहे जाते हैं; इनमें ग्यारहवाँ भाव ज्येष्ठ भ्राता का और तीसरा भाव कनिष्ठ भ्राता का सूचक है। यह भ्रातृ-सुख की हानि का कथित योग है।

English rendering The text states that Saturn and Rāhu placed in the 3rd and 11th from the pada destroy siblings — the 11th telling upon the elder, the 3rd upon the younger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना नियत पूर्णांक-अंकगणित है। तृतीय = पद-राशि + 2 राशि; लाभ (11) = पद-राशि + 10 राशि (mod 12)। कारक-आबंटन: भ्रातृ-विचार में 3 = कनिष्ठ, 11 = ज्येष्ठ। आधार "पद/आरूढ" स्वयं आरूढ-सूत्र से निकलता है —
आरूढ A ≡ 2L − S (mod 12), जहाँ S = भाव की राशि, L = उस भाव के स्वामी की राशि; अपवाद: यदि A = S या A = S+6 (mod 12), तो A → A + 9 (उससे 10वीं राशि)।

उदाहरण (worked example) मान लें आरूढ-लग्न (पद) = तुला (7)। तृतीय = 7 + 2 = 9 (धनु) → कनिष्ठ-स्थान; लाभ = 7 + 10 = 17 ≡ 5 (सिंह) → ज्येष्ठ-स्थान। यदि इन (धनु/सिंह) राशियों में शनि व राहु बैठें, तो शास्त्रानुसार क्रमशः कनिष्ठ व ज्येष्ठ भ्राता का अरिष्ट-कथन बनता है। (राशि-चक्र 1=मेष … 12=मीन।)

हमारा डिकोड (Our Decode) भ्रातृ-भावों की यह 3/11 गणना वही "पृथक् रखो — गणित बनाम अर्थ" अनुशासन दर्शाती है जो हमारी पद्धति की रीढ़ है: भाव-सूचकांक (((राशि − पद-राशि) mod 12) + 1) एक नियत, `==`-योग्य पूर्णांक है — शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित — जबकि उस पर टिका "भ्रातृ-नाश" शास्त्र का फल-कथन है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं। आरूढ-सूत्र A ≡ 2L − S (mod 12) भी उसी नियततावादी गणना-वर्ग का अंग है जिसे वर्ग-इंजन में देखा गया।

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30.32
दैतेज्ये तत्र गर्भस्य नाशो व्यवहितस्य च।
लग्ने वापि पदे रन्ध्रे दैत्याचार्ययुतेक्षिते
daitejye tatra garbhasya nāśo vyavahitasya ca|
lagne vāpi pade randhre daityācāryayutekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दैतेज्य = दैत्य-इज्य / शुक्र (दैत्यगुरु; दैत्याचार्य से समानार्थ); तत्र = उन्हीं स्थानों में (त्रि-लाभ); गर्भस्य नाशः = गर्भ-नाश (शास्त्र-कथन); व्यवहित = मध्य/व्यवधान वाला (मध्य भ्राता/संतान-क्रम); लग्न = जन्म-लग्न; पद = उपपद; रन्ध्र = अष्टम भाव; दैत्याचार्य = शुक्र; युतेक्षित = युक्त या दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उन्हीं (पद-से तृतीय/लाभ आदि) स्थानों में शुक्र (दैतेज्य/दैत्याचार्य) होने पर गर्भ का नाश तथा व्यवहित (मध्य) संतान/भ्रातृ-क्रम का नाश कहा गया है। लग्न में, अथवा पद में, अथवा रन्ध्र (अष्टम) में शुक्र युक्त/दृष्ट हो — तो मुनियों ने उसी प्रकार का फल कहा है। यह फल-कथन है; चिकित्सकीय या निश्चित घटना-भविष्य के रूप में न पढ़ें।

English rendering The text states that Venus (daiteya-ijya / daityācārya) so placed brings destruction of the embryo and of the intervening (middle) sibling; the same result is declared when Venus is conjoined with or aspects the lagna, the pada, or the 8th.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “दैतेज्य” यहाँ शुक्र के लिए (दैत्यगुरु-परंपरा); दूसरे पाद में “दैत्याचार्य” से अर्थ सुदृढ़ होता है। गणना केवल स्थान-पहचान है: लग्न / पद / रन्ध्र (= लग्न-से 8वाँ) पर शुक्र-योग/दृष्टि।

30.33
तथैव फलमित्याहुर्निर्विशंकं मुनीश्चराः।
तृतीयलाभयोर्विप्र चन्द्रेज्यबुधमङ्गलाः
tathaiva phalamityāhurnirviśaṃkaṃ munīścarāḥ|
tṛtīyalābhayorvipra candrejyabudhamaṅgalāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथैव फलम् = वैसा ही फल; इत्याहुः = ऐसा कहते हैं; निर्विशंकम् = बिना संदेह; मुनीश्वराः = मुनीश्वर; तृतीयलाभयोः = तृतीय और लाभ (3 व 11) में; चन्द्र = चन्द्र; इज्य = बृहस्पति (इज्य = यज्ञ्य/गुरु); बुध = बुध; मङ्गल = मंगल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मुनीश्वर निर्विशंक भाव से वही फल कहते हैं। हे विप्र, तृतीय और लाभ भावों में चन्द्र, गुरु (इज्य), बुध और मंगल — इस विन्यास का फल अगले श्लोक में पूरा होता है। यहाँ फल की निश्चयात्मक भाषा शास्त्र की वाणी है; आधुनिक “निश्चित भविष्य” नहीं।

English rendering The sages, the text says, declare the same result without hesitation; O brāhmaṇa, when the Moon, Jupiter (ijya), Mercury, and Mars occupy the 3rd and 11th — the statement continues into the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (श्लोक-युग्म का पूर्वार्ध)। “इज्य” = गुरु (यज्ञ-देवता के रूप में बृहस्पति); चन्द्रेज्यबुधमङ्गलाः = चन्द्र+गुरु+बुध+मंगल का समूह। स्थान: तृतीय-लाभ (लग्न-से अथवा प्रसंगवश पद-से — पूर्व श्लोकों से पद-संदर्भ बना रहता है; पाठ-भेद/अन्वय-विकल्प संभव)।

30.34
बहवो भ्रातरस्तस्य बलवन्तः प्रतापिनः।
शन्यारसंयुते दृष्टे तृतीयैकादशे द्विज
bahavo bhrātarastasya balavantaḥ pratāpinaḥ|
śanyārasaṃyute dṛṣṭe tṛtīyaikādaśe dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहवः भ्रातरः = अनेक भ्राता; बलवन्तः = बलवान्; प्रतापिनः = प्रतापी; शन्यार = शनि + मंगल (आर = कुज); संयुते दृष्टे = संयुक्त अथवा दृष्ट; तृतीयैकादशे = तृतीय और एकादश में; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ (पूर्व श्लोक से जुड़कर) शास्त्र कहता है — उस जातक के अनेक भ्राता होते हैं, बलवान् और प्रतापी। फिर विपरीत विन्यास: हे द्विज, यदि तृतीय और एकादश में शनि-मंगल संयुक्त हों अथवा (एक-दूसरे से / भाव से) दृष्ट हों, तो फल अगले श्लोक में पूरा होता है। शुभ-समूह = बहुल/बलवान् भ्रातृ-फल; शनि-मंगल = विनाश-दिशा — दोनों शास्त्र-कथन हैं।

English rendering The text states that such a native has many brothers, strong and valorous; but when Saturn and Mars are conjoined with or aspect each other in the 3rd and 11th, O twice-born — the destructive result is completed in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (श्लोक-युग्म)। तुलनात्मक संरचना स्पष्ट है: चन्द्र-गुरु-बुध-मंगल (3/11) → बहुल-बलवान् भ्राता; शनि-मंगल (3/11, युति/दृष्टि) → कनिष्ठ-ज्येष्ठ नाश (30.35)। दृष्टि-नियम ग्रह-स्वभाव अनुसार (मंगल 4/7/8, शनि 3/7/10 इत्यादि) लागू होते हैं — यह श्लोक केवल “संयुते दृष्टे” कहता है, दृष्टि-अंश नहीं गिनता।

30.35
कनिष्ठज्येष्ठयोर्नाशो दिवज्ञेयो द्विजसत्तम।
शनिरेको यदा विप्र लाभगो वा तृतीयगः
kaniṣṭhajyeṣṭhayornāśo divajñeyo dvijasattama|
śanireko yadā vipra lābhago vā tṛtīyagaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कनिष्ठज्येष्ठयोः = कनिष्ठ और ज्येष्ठ का; नाशः = नाश (शास्त्र-कथन); दिवज्ञेयः = दैवज्ञ को ज्ञातव्य; शनिः एकः = अकेला शनि; लाभगः = लाभ (11) में स्थित; तृतीयगः = तृतीय में स्थित; विप्र / द्विजसत्तम = संबोधन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे द्विजसत्तम, (शनि-मंगल के उक्त योग में) कनिष्ठ और ज्येष्ठ दोनों का नाश दैवज्ञ को जानना चाहिए। पुनः: हे विप्र, जब अकेला शनि लाभ में अथवा तृतीय में हो — तो भी (पूर्व-क्रम से) कनिष्ठ/ज्येष्ठ-सम्बन्धी फल का विचार उसी दिशा में कहा गया है। यह भ्रातृ-भाव का शास्त्रीय संकेत है; भय या निश्चित विपत्ति के रूप में न लें।

English rendering The text states that the destruction of the younger and the elder is to be known by the astrologer; likewise when Saturn alone occupies the 11th or the 3rd, O brāhmaṇa — the same fraternal theme continues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। 30.31 से सूत्र-सूत्र जोड़: पद/लग्न-से 3 = कनिष्ठ-क्षेत्र, 11 = ज्येष्ठ-क्षेत्र; शनि±राहु / शुक्र / शनि-मंगल / अकेला शनि — विभिन्न कारक, एक ही भाव-द्वय। गणना = केवल भाव-स्थान (मॉड 12); कोई दशा-वर्ष, बिन्दु-योग या बल-इकाई यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

30.36
तदा स्वमात्रशेषः स्यादन्ये नश्यन्ति सोदराः।
तृतीये लाभगे केतौ बहुलं भगिनीसुखम्‌
tadā svamātraśeṣaḥ syādanye naśyanti sodarāḥ|
tṛtīye lābhage ketau bahulaṃ bhaginīsukham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदा = तब; स्व-मात्र-शेषः = केवल स्वयं अवशिष्ट; अन्ये सोदराः = अन्य सहोदर; नश्यन्ति = नष्ट होते हैं; तृतीये = तृतीय भाव में; लाभगे = लाभ (एकादश) भाव में स्थित; केतौ = केतु में / केतु स्थित होने पर; बहुलं भगिनी-सुखम् = प्रचुर भगिनी-सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्व-निर्दिष्ट दशा में जातक स्वयं ही शेष रह जाता है और अन्य सोदर नष्ट हो जाते हैं। जब केतु तृतीय अथवा लाभ (एकादश) भाव में हो, तो पाठ के अनुसार भगिनियों से बहुल सुख मिलता है। यह फल-कथन सोदर-संख्या और भगिनी-सुख के संकेत से जुड़ा है, न कि निरपेक्ष भविष्यवाणी।

English rendering The text states that then only the native remains, while the other co-borns perish. With Ketu placed in the third or the eleventh (lābha), it states abundant happiness from sisters.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सोदर-शेषता और भगिनी-सुख)। भाव-स्थान (३ / ११) और केतु की स्थिति की जाँच कुण्डली-गृह-क्रम से होती है; फल स्वयं शास्त्र का कथन है।

30.37
आरूढात्‌ षष्ठभावस्थे पापाख्ये शुभवर्जिते।
शुभसम्बन्धरहिते चौरो भवति जातकः
ārūḍhāt‌ ṣaṣṭhabhāvasthe pāpākhye śubhavarjite|
śubhasambandharahite cauro bhavati jātakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढात् = आरूढ (आरूढ-लग्न/पद) से; षष्ठ-भाव-स्थे = छठे भाव में स्थित होने पर; पाप-आख्ये = पाप-संज्ञक ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु आदि); शुभ-वर्जिते = शुभ-ग्रह से रहित; शुभ-सम्बन्ध-रहिते = किसी शुभ-सम्बन्ध (युति/दृष्टि) से रहित; चौरः = चोर; भवति जातकः = जातक होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आरूढ से छठे भाव में कोई पाप-ग्रह हो, जो न किसी शुभ-ग्रह से युक्त हो और न किसी शुभ-सम्बन्ध से जुड़ा हो, तो जातक चोर-प्रवृत्ति वाला कहा जाता है। यह शुभ-रहित पाप-योग का कथित परिणाम है, कोई अटल दोषारोपण नहीं।

English rendering The text states that when a malefic stands in the 6th from the ārūḍha, void of benefics and of any benefic connection, the native becomes a thief.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-रहित पाप-योग)। संगणनीय अंश: षष्ठ = आरूढ-राशि + 5 राशि (mod 12); तथा "शुभ-वर्जित एवं शुभ-सम्बन्ध-रहित" = शुभ-ग्रह की युति/दृष्टि का पूर्ण अभाव — यह एक बूलीय शर्त है (शुभ-संस्पर्श = असत्य)। परिणाम शास्त्र का कथन है।

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30.38
सप्तमे द्वादशे स्थाने सैहिकेययुतेक्षिते।
ज्ञानवांश्च भवेद्‌ बालो बहुभाग्ययुतो द्विज
saptame dvādaśe sthāne saihikeyayutekṣite|
jñānavāṃśca bhaved‌ bālo bahubhāgyayuto dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे = सप्तम में; द्वादशे स्थाने = द्वादश स्थान में; सैहिकेय = सिंहिका-पुत्र = राहु; युतेक्षिते = युक्त अथवा दृष्ट; ज्ञानवान् = ज्ञान-सम्पन्न; बालः = बालक / जातक; बहु-भाग्य-युतः = बहुत भाग्य से युक्त; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ जब (पूर्व-प्रसंग के आरूढ-क्रम में) सप्तम अथवा द्वादश स्थान सैहिकेय (राहु) से युक्त या दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है कि बालक ज्ञानवान् और बहु-भाग्य-युक्त होता है। “ज्ञानवान्” और “बहुभाग्य” दोनों एक ही फल-सूत्र में जुड़े हैं। पाठ-भेद संभव जहाँ युतेक्षित का विषय-ग्रह स्पष्ट नहीं हो।

English rendering The text states that when the seventh or twelfth place is conjoined with or aspected by Sainhikeya (Rāhu), the child becomes learned and endowed with much fortune, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम/द्वादश + राहु योग/दृष्टि)। दृष्टि-नियम और भाव-गिनती (आरूढ से अथवा प्रसंग-निर्दिष्ट पद से) परिपाटी पर निर्भर हैं; फल शास्त्र का कथन है।

30.39
आरूढे संस्थिते सौम्ये सर्वदेशाधिपो भवेत्‌।
सर्वज्ञस्तत्र देवेज्ये कविर्वादी च भार्गवे
ārūḍhe saṃsthite saumye sarvadeśādhipo bhavet‌|
sarvajñastatra devejye kavirvādī ca bhārgave

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरूढे संस्थिते सौम्ये = आरूढ में शुभ-ग्रह (सौम्य = शुभ-ग्रह; विशेषतः बुध — पाठ-भेद/अर्थ-भेद संभव) स्थित हो; सर्व-देश-अधिपः = सब देशों का अधिपति; भवेत् = होता है; सर्वज्ञः = सर्वज्ञ; तत्र देव-इज्ये = वहाँ बृहस्पति (देव-इज्य = देव-गुरु = बृहस्पति) होने पर; कविः वादी च = कवि और वादी (वक्ता); भार्गवे = शुक्र (भृगु-पुत्र = भार्गव = शुक्र) होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आरूढ में शुभ-ग्रह हो तो जातक सर्व-देशाधिप (महान अधिपति) कहा जाता है; वहाँ बृहस्पति हो तो सर्वज्ञ, और शुक्र हो तो कवि व कुशल वक्ता होता है। यहाँ आरूढ पर बैठे शुभ-ग्रह-विशेष के अनुसार भिन्न-भिन्न शुभ-फल कहे गए हैं।

English rendering The text states that with a benefic in the ārūḍha one becomes ruler of all lands; with Jupiter there, all-knowing; and with Venus, a poet and an orator.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरूढ-स्थ शुभ-ग्रह-भेद)। तकनीकी अंश केवल ग्रह-पहचान: सौम्य = शुभ-ग्रह (सम्भवतः बुध — अर्थ-भेद संभव), देव-इज्य = बृहस्पति, भार्गव = शुक्र; तथा आधार-बिन्दु आरूढ स्वयं A ≡ 2L − S (mod 12) से निकलता है (द्रष्टव्य 30.31)। फल शास्त्र के कथन हैं, अनुमोदित भविष्यवाणी नहीं।

30.40
उपारूढात्‌ पदाद्‌ वापि धनस्थे शुभखेचरे।
सर्वद्रव्याधिपो धीमाञ्जायते द्विजसत्तम
upārūḍhāt‌ padād‌ vāpi dhanasthe śubhakhecare|
sarvadravyādhipo dhīmāñjāyate dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढात् पदात् = उपपद/उपारूढ पद से (लग्न से व्युत्पन्न आरूढ-सदृश संदर्भ-राशि); वा अपि = अथवा भी (आरूढ के समान इसे भी माप-बिंदु मानो); धनस्थे = धन अर्थात् द्वितीय भाव में स्थित (उपपद से दूसरी राशि); शुभखेचरे = शुभ ग्रह (बुध/गुरु/शुक्र/पक्षबली चन्द्र) — खेचर = आकाशचारी ग्रह; सर्वद्रव्याधिपः = समस्त द्रव्य/धन का अधिपति; धीमान् = बुद्धिमान; जायते = होता है; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ! जैसे आरूढ से विचार किया, वैसे ही उपपद से भी देखो — यदि उपपद से द्वितीय (धन) भाव में कोई शुभ ग्रह बैठा हो, तो शास्त्र कहता है कि वह जातक समस्त द्रव्य का स्वामी और बुद्धिमान होता है। यह पिछली आरूढ-चर्चा (व. 37–39) का ही उपपद-पक्ष है, जहाँ शुभ की स्थिति धन-सम्पन्नता का सूचक मानी गई है।

English rendering Or likewise, reckoned from the upapada — when a benefic planet stands in the wealth-place (the 2nd) from it, the native, says the text, becomes master of all substance and endowed with intellect, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान-आधारित)। एकमात्र तकनीकी अंश गिनती है: यदि उपपद राशि-सूचकांक R हो (R ∈ 1…12, मेष=1), तो धन-स्थान = (R mod 12) + 1, अर्थात् उपपद के ठीक अगली राशि (समावेशी गणना में "द्वितीय")। संदर्भ-बिंदु (आरूढ बनाम उपपद) पर पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव — व. 2–3 में शास्त्र स्वयं उपपद की व्युत्पत्ति देता है (तनु-भाव के अनुचर से)।

उदाहरण (worked example) मान लें उपपद = मेष (R=1)। तब धन-स्थान = (1 mod 12)+1 = 2 = वृषभ। यदि वृषभ में शुभ ग्रह (जैसे गुरु) स्थित हो, तो शास्त्रोक्त "सर्वद्रव्याधिप, धीमान्" फल लागू होता है। (संदर्भ-बिंदु उपपद = मेष को इनपुट मानकर; पाप ग्रह हो तो यह फल नहीं — अगली व. देखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "द्वितीय-स्थान" की गणना वही शुद्ध मॉड्युलर राशि-अंकगणित है जिस पर हमारा षोडश-वर्ग इंजन चलता है (dossier: वर्ग = longitude पर pure modular arithmetic)। हमारी पद्धति गणित को व्याख्या से अलग रखती है: सूचकांक (R→R+1) नियतात्मक है, पर उससे उपजा "धनाधिपत्य" फल हम शास्त्र-कथन के रूप में प्रस्तुत करते हैं — कभी भाग्य-निश्चय के रूप में नहीं।

30.41
उपारूढाद्‌धनाधीशे द्वितियभवनस्थिते।
पापखेचरसंयुक्ते चौरो भवति निश्चितम्‌
upārūḍhād‌dhanādhīśe dvitiyabhavanasthite|
pāpakhecarasaṃyukte cauro bhavati niścitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपारूढात् = उपपद से; धनाधीशे = धन (द्वितीय) भाव का स्वामी; द्वितीयभवनस्थिते = वही धनेश उसी द्वितीय भवन में स्थित हो (locative); पापखेचरसंयुक्ते = पाप ग्रह (शनि/मंगल/राहु/क्षीण चन्द्र आदि) से युक्त; चौरः = चोर; भवति निश्चितम् = निश्चित रूप से होता है।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत, यदि उपपद से द्वितीय (धन) भाव का स्वामी स्वयं उसी द्वितीय भाव में बैठकर किसी पाप ग्रह से युक्त हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक निश्चित रूप से चोर (चौर-प्रवृत्ति वाला) होता है। यह पूर्व श्लोक का प्रतिपक्ष है — वहाँ शुभ ग्रह ने धनाधिपत्य दिया, यहाँ पाप-संयोग विपरीत फल कहता है।

English rendering But when the lord of that wealth-place, reckoned from the upapada, sits within the 2nd itself and is joined by a malefic, the native — the text asserts — assuredly becomes a thief.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप-संयोग-आधारित)। तकनीकी घटक दो हैं: (1) धन-राशि = (R mod 12)+1, तथा उसका अधिपति (राशि-स्वामी); (2) योग-परीक्षा — वही धनेश उसी धन-राशि में हो और पाप ग्रह सहस्थित हो। यह पूर्ववत् व. 40 का पाप-दर्पण है (शुभ ↔ पाप के अनुसार फल-व्युत्क्रम)।

उदाहरण (worked example) उपपद = मेष मानें → धन-राशि = वृषभ, उसका स्वामी = शुक्र। यदि शुक्र वृषभ में ही स्थित हो और वहाँ कोई पाप ग्रह (जैसे शनि) साथ हो, तो शास्त्रोक्त "चौर" फल की स्थिति बनती है। (इनपुट: उपपद = मेष; अन्य लग्नों में स्वामी-राशि तदनुसार बदलेगी।)

हमारा डिकोड (Our Decode) ऐसे नकारात्मक फल पर हमारी डिस्किप्लिन सर्वाधिक कठोर है (dossier #5): "चौर" जैसा कथन शास्त्र का दावा है, कोई अभियोग या भविष्यवाणी नहीं जिसका हम समर्थन करें — न भय, न कलंक। स्वामी-राशि तथा सह-स्थिति की गणना नियतात्मक है; पर उससे जुड़ा चरित्र-निर्णय हम "शास्त्र कहता है" के रूप में ही रखते हैं, अंतिम सत्य के रूप में नहीं।

30.42
तत्सप्तमगृहाधीशाद्‌ राहौ धनगते द्विज।
दंष्ट्रावान्‌ जायते बालः स्तब्धवाक्‌ केतुखेचरे
tatsaptamagṛhādhīśād‌ rāhau dhanagate dvija|
daṃṣṭrāvān‌ jāyate bālaḥ stabdhavāk‌ ketukhecare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्सप्तमगृहाधीशात् = उस (उपपद) के सप्तम गृह के अधिपति से (गिनती-आधार); राहौ धनगते = राहु के उस स्वामी से धन (द्वितीय) में जाने पर; द्विज = हे द्विज; दंष्ट्रावान् = बाहर निकले/नुकीले दाँतों वाला (दंष्ट्रा = दाढ़/नुकीला दाँत); जायते बालः = जातक/बालक होता है; स्तब्धवाक् = अटकती-रुकी वाणी वाला (गद्गद/जड़ वाणी); केतुखेचरे = केतु के (उसी स्थान में) होने पर।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! उपपद से सप्तम भाव के स्वामी को आधार मानकर, यदि राहु उस स्वामी से द्वितीय (धन) स्थान में स्थित हो, तो शास्त्र कहता है जातक बड़े/नुकीले दाँतों वाला होता है; और यदि वहीं केतु हो, तो वह अटकती वाणी वाला होता है। यह उपपद-आधारित शारीरिक-लक्षण-कथन की श्रृंखला का आरंभ है, जो अगली व. में शनि तक जाता है।

English rendering Reckoned from the lord of the 7th from that upapada, if Rāhu occupies the wealth-place (the 2nd) from that lord, the child is born fanged of tooth; with Ketu there instead, of halting speech — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वि-चरण स्थान-गणना)। दो नियतात्मक चरण: (1) आधार-ग्रह = उपपद से सप्तमेश, जहाँ सप्तम-राशि = ((R+5) mod 12)+1 और उसका स्वामी; (2) उस स्वामी से धन = (S mod 12)+1, S = स्वामी की स्थित-राशि। उसी धन-स्थान में राहु → दंष्ट्रा-लक्षण, केतु → स्तब्ध-वाक्। "धनगत" का संदर्भ (सप्तमेश से बनाम उपपद से) पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) उपपद = मेष मानें → सप्तम-राशि = ((1+5) mod 12)+1 = 7 = तुला; तुला-स्वामी = शुक्र। शुक्र जिस राशि S में हो, उससे धन = (S mod 12)+1; उस धन-राशि में राहु हो → शास्त्रोक्त "दंष्ट्रावान्", केतु हो → "स्तब्धवाक्"। (इनपुट: उपपद = मेष; S जन्मकुंडली से।)

हमारा डिकोड (Our Decode) शारीरिक-लक्षण के ये कथन हमारी पद्धति में विशुद्ध शास्त्र-वचन हैं (dossier #5) — दंत/वाणी-वर्णन न व्यक्ति-मूल्यांकन है, न भय-प्रेरक निदान; कोई कलंक नहीं। द्वि-चरण राशि-गणना (सप्तमेश → धन) वही मॉड्युलर सूचकांक-अंकगणित है जिसे हमारे वर्ग-इंजन नियतात्मक रूप से चलाते हैं; गणित हम पिन करते हैं, व्याख्या को "शास्त्र कहता है" पर छोड़ते हैं।

30.43
शनैश्चरे कुरूपः स्यात्सप्तमेशाद्‌ द्वितीयगे।
मिश्रग्रहसमायुक्ते फलं मिश्रं समादिशेत्
śanaiścare kurūpaḥ syātsaptameśād‌ dvitīyage|
miśragrahasamāyukte phalaṃ miśraṃ samādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनैश्चरे = शनि के (उसी स्थान में) होने पर; कुरूपः स्यात् = कुरूप (अनाकर्षक रूप वाला) होता है; सप्तमेशात् द्वितीयगे = सप्तमेश (उपपद से) से द्वितीय में गत ग्रह; मिश्रग्रहसमायुक्ते = शुभ-पाप मिश्रित ग्रहों से युक्त होने पर; फलं मिश्रं = मिला-जुला (मिश्र) फल; समादिशेत् = भलीभाँति कहे/घोषित करे (आदेश-विधि)।

हिन्दी भावार्थ उसी सप्तमेश-से-द्वितीय स्थान में यदि शनि हो, तो शास्त्र कहता है जातक कुरूप होता है। और यदि वहाँ शुभ तथा पाप — दोनों प्रकार के ग्रह मिले-जुले हों, तो विद्वान् को मिश्र (मिश्रित/सापेक्ष) फल ही घोषित करना चाहिए। यह अंतिम चरण न केवल फल देता है, बल्कि फल-कथन की विधि भी सिखाता है — मिश्र संकेत पर मिश्र निर्णय।

English rendering With Saturn in that same place (the 2nd from the 7th-lord), the native is ill-formed; and when the place is joined by mixed planets — benefic and malefic together — one should pronounce a mixed result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + मेटा-नियम। स्थान वही है (व. 42 का सप्तमेश-से-द्वितीय); ग्रह-भेद से फल बदलता है: राहु→दंष्ट्रा, केतु→स्तब्ध-वाक्, शनि→कुरूप। अंतिम पाद "फलं मिश्रं समादिशेत्" कोई राशि-गणना नहीं, अपितु घोषणा-विधि है: शुभ+पाप का संमिश्रण ⇒ योगात्मक (superposed) फल, एकल निश्चय नहीं।

उदाहरण (worked example) पूर्ववत् उपपद = मेष → सप्तमेश = शुक्र; उसकी स्थित-राशि S से धन = (S mod 12)+1। यदि उस धन-स्थान में शनि हो → शास्त्रोक्त "कुरूप"। यदि वहीं एक शुभ (जैसे बुध) और एक पाप (जैसे मंगल) दोनों हों → नियमानुसार "मिश्र फल" कहा जाए, किसी एक चरम फल का आग्रह न किया जाए।

हमारा डिकोड (Our Decode) "फलं मिश्रं समादिशेत्" हमारी पूरी पद्धति का शास्त्र-स्वर है (dossier #5): जब संकेत परस्पर-विरोधी हों, तो योग्य/सापेक्ष उत्तर दो — अति-निश्चय मत गढ़ो। यही कारण है कि हम विरोधी परंपराओं (जैसे BPHS बनाम फलदीपिका अष्टकवर्ग) को साथ-साथ दिखाकर चुनी हुई कन्वेंशन घोषित करते हैं, और सहिष्णुता-बैंड से बचते हुए केवल स्पष्ट मानों पर `==` लगाते हैं। शास्त्र यहाँ स्वयं मिश्र-इनपुट पर मिश्र-आउटपुट का अनुशासन सिखा रहा है।

अध्यायः 31

अथाऽर्गलाध्यायः

18 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter): अथाऽर्गलाध्यायः भाव-फल और खेट-फल को “दृढ़–स्थिर” बनाने वाली अर्गला-व्यवस्था का लक्षण और फल सिखाता है। मैत्रेय शुभदा अर्गला को सलक्षण-फल सहित सुनना चाहते हैं; पराशर स्पष्ट करते हैं कि सार्गला नाम से वही विधि कही जाती है जिससे भाव-फल दृढ़ और खेट-फल स्थिर होता है। चतुर्थ, धन (द्वितीय) और लाभ (एकादश) स्थित ग्रह तद्‌अर्गला के रूप में जाने जाते हैं; उनके बाधक क्रमशः व्योम (दशम), रिष्फ (द्वादश) और तृतीयग खेट हैं। निर्बल या न्यून-संख्या वाले बाधक सम्मत नहीं; जहाँ तृतीय में व्याधिक पाप बाधक हों, वहाँ विपरीता अर्गला भी जानी जाती है—फिर भी खेट-भावों का फल अर्गलित माना जाता है। यह अध्याय बला–पद–कारक की श्रृंखला में फल-निर्धारण का हस्तक्षेप/समर्थन-नियम जोड़ता है: स्थिति-गणना, बाधक-तुलना, और बल/संख्या की सीमा—न कि भय या नियति का दावा।

For the English reader: Chapter 31 — Athā’rgalādhyāyaḥ (19 verses) — is Parāśara’s rule-set for argalā: the intervening support that firms bhāva results and steadies graha results. After Maitreya asks for the auspicious argalā with its marks and phala, the sage places argalā grahas in the 4th, 2nd, and 11th from the reference, and their bādhakas in the 10th, 12th, and 3rd in order. Weak or outnumbered obstructors do not count; when malefics in the 3rd act as bādhakas, a reverse (viparīta) argalā is also to be known—yet the results of planets and houses are still treated as argalita. Read this as a positional and comparative technique (who supports, who blocks, under what strength), not as fate or fear.

मुख्य गणित/तकनीक:
- अर्गला-स्थान (संदर्भ भाव/खेट से): चतुर्थ (4), धन/द्वितीय (2), लाभ/एकादश (11) — वहाँ स्थित ग्रह = तद्‌अर्गला
- बाधक-स्थान (क्रमशः): व्योम/दशम (10), रिष्फ/द्वादश (12), तृतीय (3) — तद्‌बाधकाः क्रमात्
- बाधक-स्वीकृति नियम: निर्बला अथवा न्यून-संख्या वाले बाधक सम्मत नहीं (बल/गिनती से तुलना)
- विपरीता अर्गला: तृतीय में व्याधिक पाप जहाँ बाधक हों — तत्रापि अर्गला ज्ञेया विपरीता; फल फिर भी अर्गलित माना जाता है
- फल-दृष्टि (शास्त्र-कथन): सार्गला से भाव-फल दृढम्, स्थिरं खेटफलम् — phala = पाठ का कथन, नियति नहीं

डिकोड-सेतु: इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

31.1
भगवान्‌ याऽर्गला प्रोक्ता शुभदा भवताऽधुना।
तामहं स्रोतुमिच्छामि सलक्षणफलं मुने
bhagavān‌ yā'rgalā proktā śubhadā bhavatā'dhunā|
tāmahaṃ srotumicchāmi salakṣaṇaphalaṃ mune

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगवान् = आचार्य-सम्बोधन (मैत्रेय → पराशर); अर्गला = ग्रह/भाव-फल को “स्थिर/दृढ़” करने वाला व्यवधान-बंध; प्रोक्ता = पूर्व में कही गई; शुभदा = शुभ फल देने वाली; भवता = आपके द्वारा; अधुना = अब; स्रोतुम् इच्छामि = सुनने की इच्छा; सलक्षणफलम् = लक्षण + फल सहित; मुने = हे मुने।

हिन्दी भावार्थ शिष्य मैत्रेय गुरु से कहता है — भगवन्, आपने वह अर्गला बताई है जो शुभदा मानी गई है। अब मैं उसी अर्गला को उसके लक्षण और फल के साथ सुनना चाहता हूँ। यह अध्याय का प्रश्न-सूत्र है: आगे की परिभाषा, स्थान, बाधक और श्रेणी-भेद इसी जिज्ञासा से खुलते हैं।

English rendering Maitreya addresses the sage: the auspicious Argala already spoken of is what he now wishes to hear in full — with its defining marks and results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न-सूत्र। अध्याय का द्वार-श्लोक है; गणना आगे के पदों में घर-अंतराल (offsets) से आरम्भ होती है।

31.2
मैत्रेय सार्गला नाम यया भावफलं दृढम्‌।
स्थिरं खेटफलं च स्यात्‌ साऽधुना कथ्यते मया
maitreya sārgalā nāma yayā bhāvaphalaṃ dṛḍham‌|
sthiraṃ kheṭaphalaṃ ca syāt‌ sā'dhunā kathyate mayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मैत्रेय = सम्बोधन; सार्गला = सा + अर्गला (अर्गला-युक्त दशा/स्थिति); नाम = नाम से; यया = जिससे; भावफलम् = भाव का फल; दृढम् = स्थिर/दृढ़; स्थिरम् = अचल/स्थायी; खेटफलम् = ग्रह-फल; स्यात् = होता है; अधुना = अब; कथ्यते मया = मेरे द्वारा कही जाती है।

हिन्दी भावार्थ पराशर उत्तर देते हैं — हे मैत्रेय, वह “सार्गला” है जिससे भाव-फल दृढ़ होता है और ग्रह-फल भी स्थिर रहता है। अर्थात् अर्गला केवल अतिरिक्त संकेत नहीं; वह भाव और ग्रह के फल को “बांध” कर प्रभावशाली बनाती है। अब उसी का निरूपण आरम्भ होता है।

English rendering Parāśara replies that Sārgala is the name of that factor by which house-results become firm and planetary results stable; he will now expound it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिभाषा/नाम-कथन। “दृढ़/स्थिर फल” का दावा शास्त्र का स्वयं का है; इसे नियति-निश्चित भविष्य न समझें — यह फल-बंध की तकनीकी भूमिका का परिचय है।

31.3
चतुर्थे च धने लाभे ग्रहे ज्ञेया तदर्गला।
तद्‌बाधकाः क्रमात्‌ खेटा व्योमरिष्फतृतीयगाः
caturthe ca dhane lābhe grahe jñeyā tadargalā|
tad‌bādhakāḥ kramāt‌ kheṭā vyomariṣphatṛtīyagāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थे = चतुर्थ भाव में; धने = द्वितीय (धन) भाव में; लाभे = एकादश (लाभ) भाव में; ग्रहे = ग्रह में/ग्रह से (गणना का केन्द्र); ज्ञेया तद्-अर्गला = वहाँ अर्गला जाननी चाहिए; तद्-बाधकाः = उसके बाधक (रोकने वाले); क्रमात् = क्रमशः; व्योम = दशम भाव (आकाश/खमध्य); रिष्फ = द्वादश भाव (व्यय); तृतीयगाः = तृतीय भाव में स्थित ग्रह।

हिन्दी भावार्थ चतुर्थ, धन (द्वितीय) और लाभ (एकादश) भाव में स्थित ग्रह उस राशि/ग्रह पर अर्गला करते हैं; और इनके बाधक क्रमशः दशम, द्वादश तथा तृतीय भाव के ग्रह होते हैं।

English rendering Planets in the 4th, the 2nd (dhana), and the 11th (lābha) create the argalā; their obstructors, in order, are planets standing in the 10th (vyoma), the 12th (riṣpha), and the 3rd.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
अर्गला-स्थान (लग्न या ग्रह से गिनकर): {2, 4, 11} (श्लोक 6 में 5 जुड़ता है)।
बाधक-स्थान = लग्न–सप्तम अक्ष के दर्पण-प्रतिबिम्ब:
- 4 ↔ 10 (व्योम)
- 2 ↔ 12 (रिष्फ)
- 11 ↔ 3 (तृतीय)

सूत्र: बाधक(n) = (14 − n) mod 12 [0 → 12 पढ़ें]।
जाँच: n=4 → 10 ✓; n=2 → 12 ✓; n=11 → 3 ✓। अर्थात् "n आगे" ↔ "n पीछे" — लग्न से समदूरस्थ विपरीत भाव।

उदाहरण (worked example) केन्द्र-राशि = मेष (लग्न)। धन=वृष(2) में शुक्र → अर्गला; इसका बाधक भाव = 12वाँ = मीन। यदि मीन में सम-या-अधिक बल का कोई ग्रह नहीं → अर्गला निर्बाध (सुफलदा)। इसी प्रकार 4वें=कर्क की अर्गला का बाधक 10वाँ=मकर, तथा 11वें=कुम्भ की अर्गला का बाधक 3रा=मिथुन।

हमारा डिकोड (Our Decode) अर्गला विशुद्ध स्थान-गणना है — भावों को गिनकर (mod 12) निर्धारित, ठीक वैसी ही नियततावादी अंकगणित जैसी टीम ने षोडश-वर्ग (D1…D60, देशान्तर पर modular partition) और अष्टकवर्ग (Ch.66, प्रति-भाव बिन्दु-गणना) में pin की। बाधक-मानचित्र (14 − n) एक निश्चित नियम है, अनुमान नहीं; गणित (कौन-सा भाव) व्याख्या से पहले और अलग रखा जाता है।

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31.4
निर्बला न्यूनसंख्या वा बाधका नैव सम्मताः।
तृतीये व्याधिकाः पापा यत्र मैत्रेय बाधकाः
nirbalā nyūnasaṃkhyā vā bādhakā naiva sammatāḥ|
tṛtīye vyādhikāḥ pāpā yatra maitreya bādhakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्बलाः = बलहीन; न्यून-संख्या वा = अथवा संख्या में कम; बाधकाः = बाधक ग्रह; नैव सम्मताः = मान्य/प्रभावी नहीं; तृतीये = तृतीय में; व्याधिकाः = अधिक संख्या वाले / प्रबल; पापाः = पाप-ग्रह; यत्र = जहाँ; बाधकाः = (एकादश-अर्गला के) बाधक-स्थान में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो बाधक निर्बल हों, या अर्गला-ग्रहों से संख्या में कम हों, वे बाधक के रूप में स्वीकार्य नहीं; अर्गला तब अबाधित रहती है। विशेष नियम: जहाँ तृतीय में पाप-ग्रह अधिक/प्रबल हों (और वह तृतीय बाधक-स्थान हो), वहाँ अगले श्लोक की “विपरीत अर्गला” की स्थिति बनती है। बल और गणना दोनों निर्णायक हैं — केवल उपस्थिति पर्याप्त नहीं।

English rendering The text states that weak or fewer obstructors are not accepted as effective; and where malefics are more numerous in the third (the bādhaka seat), a special case follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो तुलना-नियम (श्लोक के शब्द से):

1. बाधक-प्रभाव ⇔ (बल_बाधक > बल_अर्गला) और (N_बाधक ≥ N_अर्गला) — अन्यथा बाधक “नैव सम्मत”।
2. N = ग्रह-संख्या उस घर में; “निर्बल” = षड्बल/अवस्था आदि से अल्प (इस श्लोक में माप-इकाई नहीं दी; Ch.27 षड्बल से जोड़ना सम्भव, किन्तु यहाँ केवल गुण-विशेषण है)।

तृतीय-विशेष: यदि B+2 पर पाप-ग्रह व्याधिक (अधिक), तो 31.5 की विपरीत-अर्गला लागू।

उदाहरण (worked example) B = लग्न मेष। एकादश-अर्गला-घर = कुम्भ (11); उसका बाधक = मिथुन (3)। कुम्भ में चन्द्र+बुध (N_अ = 2); मिथुन में केवल मंद शनि (N_ब = 1, निर्बल) → बाधक अमान्य; एकादश-अर्गला चलती है। यदि मिथुन में शनि+मंगल+राहु (पाप, N_ब = 3 > 2) → बाधक/विपरीत-प्रकरण (अगला पद)।

31.5
तत्रापि चार्गला ज्ञेया विपरीता द्विजोत्तम।
तथापि खेटभावानां फलमर्गलितं विदुः
tatrāpi cārgalā jñeyā viparītā dvijottama|
tathāpi kheṭabhāvānāṃ phalamargalitaṃ viduḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्रापि = वहाँ भी (तृतीय-पाप की स्थिति में); अर्गला ज्ञेया = अर्गला जानी जाए; विपरीता = उलटी/विपरीत अर्गला; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; तथापि = फिर भी; खेट-भावानाम् = ग्रहों और भावों का; फलम् अर्गलितम् = अर्गला-युक्त फल; विदुः = जानते हैं (विद्वान्)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजोत्तम, उस (तृतीय में अधिक पाप वाली) स्थिति में भी अर्गला मानी जाती है — किन्तु विपरीता। फिर भी विद्वान् कहते हैं कि ग्रहों और भावों का फल अर्गलित ही समझा जाता है: अर्थात् विपरीत-रूप में भी अर्गला फल-बंध का काम करती है। शास्त्र यहाँ फल को “अर्गलित” कहता है; यह गणना-बंध का कथन है, न कि भय-कथन।

English rendering Even in that case, reverse (viparīta) Argala is to be recognized; still, the results of planets and houses are known as Argala-conditioned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + विपरीत-अर्गला नियम। तकनीकी सार: जब बाधक-स्थान (विशेषतः तृतीय) में पाप व्याधिक हों, बाधक “रद्द” नहीं होता बल्कि विपरीता अर्गला का रूप लेता है; फल तब भी अर्गला-ढाँचे से पढ़ा जाता है। पाठ-भेद/व्याख्या-भेद सम्भव: कुछ परम्पराएँ विपरीत-अर्गला को शुभ-परिणाम की ओर झुकाती हैं; यहाँ श्लोक केवल “विपरीता” और “फलमर्गलितम्” कहता है।

31.6
पञ्चमं चार्गलास्थानं नवमं तद्विरोधकृत्‌।
तमोग्रहभवा सा च व्यत्ययाज्‌ ज्ञायते द्विज
pañcamaṃ cārgalāsthānaṃ navamaṃ tadvirodhakṛt‌|
tamograhabhavā sā ca vyatyayāj‌ jñāyate dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमम् च = पञ्चम भाव भी; अर्गला-स्थानम् = अर्गला का स्थान; नवमम् = नवम भाव; तद्-विरोधकृत् = उसका विरोधी (बाधक); तमोग्रह-भवा = तमोग्रह (राहु) से उत्पन्न; सा च = वह (अर्गला); व्यत्ययात् ज्ञायते = व्यत्यय (उलटे क्रम) से जानी जाती है; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ पञ्चम भाव भी अर्गला का स्थान है और नवम भाव उसका विरोधी (बाधक) है। हे द्विज, जो अर्गला तमोग्रह (राहु) से उत्पन्न हो, वह व्यत्यय (उलटे क्रम) से समझी जाती है।

English rendering The 5th too is a seat of argalā, and the 9th is its obstructor; and argalā produced by the shadow-planet (Rāhu), O twice-born, is to be reckoned in reverse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
पूर्ण अर्गला-समुच्चय: {2, 4, 5, 11}; संगत बाधक: {12, 10, 9, 3} = (14 − n) mod 12।
नई जोड़ी की जाँच: 5 ↔ 9 (14 − 5 = 9 ✓)।
तमोग्रह अपवाद: राहु/छाया-ग्रह से बनी अर्गला की गणना व्यत्यय (उलटी दिशा) में — राहु की प्रतिलोम गति के अनुरूप। (केतु सहित मानने पर पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) मेष-लग्न पर 5वें=सिंह में ग्रह → अर्गला; बाधक 9वाँ=धनु। परन्तु यदि वही अर्गला राहु से बने, तो दिशा उलट कर गिनें — अर्गला-व बाधक-भूमिकाएँ व्यत्यय से पढ़ी जाती हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु के लिए "व्यत्यय" एक घोषित परिपाटी है, मौन चयन नहीं — ठीक वैसे ही जैसे टीम ने अष्टकवर्ग की चन्द्र-तालिका को BPHS Ch.66 (चन्द्र-से-चन्द्र में "9") बनाम फलदीपिका/मेहता ("9" का स्थानान्तरण) एक खुले convention `[HUMAN]` के रूप में दर्ज किया — दोनों का योग समान (49), प्रति-भाव भिन्न। नियम यही है: जहाँ संख्या परिपाटी पर निर्भर हो, परिपाटी पहले घोषित करो।

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31.7
एकग्रहा कनिष्ठा सा द्विग्रहा मध्यमा स्मृता।
अर्गला द्व्यधिकोत्पन्ना मुनिभिः कथितोत्तमा
ekagrahā kaniṣṭhā sā dvigrahā madhyamā smṛtā|
argalā dvyadhikotpannā munibhiḥ kathitottamā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक-ग्रहा = एक ग्रह से उत्पन्न; कनिष्ठा = निम्न/कनिष्ठ श्रेणी; सा = वह अर्गला; द्वि-ग्रहा = दो ग्रहों से; मध्यमा = मध्यम; स्मृता = कही गई; अर्गला = अर्गला; द्वि-अधिक-उत्पन्ना = दो से अधिक (≥3) से उत्पन्न; मुनिभिः = मुनियों द्वारा; कथित-उत्तमा = उत्तम कही गई।

हिन्दी भावार्थ अर्गला की गुणवत्ता ग्रह-संख्या से मापी जाती है। एक ग्रह से कनिष्ठा, दो से मध्यमा, और दो से अधिक ग्रहों से उत्पन्न अर्गला मुनियों ने उत्तमा कही है। यह श्रेणी-क्रम बल-तुलना (31.4) के साथ मिलकर अर्गला-बाधक विवाद का निर्णय पूरा करता है: संख्या और बल दोनों शास्त्रीय कसौटियाँ हैं।

English rendering Argala from one planet is least; from two, medium; from more than two, the sages call it excellent.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्रेणी-फलन (N = अर्गला-स्थान(ों) में ग्रह-संख्या; संयुक्त गणना सम्मेलन: एक युग्म/सभी अर्गला-घरों का योग — परम्परा-निर्भर; न्यूनतम रूप: प्रति-अर्गला-घर):

  • N = 1 → कनिष्ठा
  • N = 2 → मध्यमा
  • N ≥ 3 → उत्तमा (द्व्यधिक = 2 से अधिक)

बाधक से तुलना (31.4 से): यदि N_बाधक < N_अर्गला या बाधक निर्बल → बाधक अमान्य; उत्तमा अर्गला प्रबल मानी जाती है। कोई वर्ष/अंश-संख्या इस श्लोक में नहीं — शुद्ध गणना-गिनती (cardinality)।

उदाहरण (worked example) लग्न से चतुर्थ (कर्क) में सूर्य+चन्द्र+गुरु (N = 3) → उत्तमा चतुर्थ-अर्गला। दशम (मकर) में केवल मंद बुध (N_ब = 1) → बाधक अमान्य (31.4)। अतः शास्त्र की भाषा में वह भाव-फल “अर्गलित/दृढ़” पक्ष की ओर पढ़ा जाता है — यह शास्त्र-कथन है, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

31.8
राशितो ग्रहतश्चापि विज्ञेया द्विविधाऽर्गला।
निर्बाधका सुफलदा विफला च सबाधका
rāśito grahataścāpi vijñeyā dvividhā'rgalā|
nirbādhakā suphaladā viphalā ca sabādhakā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशितः = राशि से (स्थान-आधार); ग्रह-तः = ग्रह से (खेट-आधार); द्विविधा = दो प्रकार की; अर्गला = हस्तक्षेप/बल-संयोजन-योग; निर्बाधका = बिना प्रतिबन्ध (विरोध-रहित); सुफलदा = शुभ फल देने वाली; सबाधका = प्रतिबन्ध-युक्त; विफला = फलहीन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अर्गला दो रीतियों से जानी जाती है — राशितः और ग्रहतः। जो अर्गला निर्बाधक हो, वही सुफलदा मानी गई है; जो सबाधक हो, वह विफल कही गई है। अर्थात् अर्गला का नाम मात्र पर्याप्त नहीं — प्रतिबन्ध की उपस्थिति या अनुपस्थिति उसके फल का निर्णायक अंग है।

English rendering Argala is to be known as twofold — by sign and by planet. Unobstructed argala is said to yield good fruit; obstructed argala is said to be fruitless.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अर्गला-विवेक = द्वैध (राशि-आधार ⊕ ग्रह-आधार)। प्राथमिक अर्गला-स्थान (किसी बिन्दु X से, पूर्ण-राशि गणना): 2, 4, 11। उनके प्रतिबन्ध (pratibandha / virodha): 12 ↔ 2, 10 ↔ 4, 3 ↔ 11। नियम: यदि अर्गला-स्थान में ग्रह/बल हो और सम-प्रतिबन्ध-स्थान रिक्त/निर्बल हो → निर्बाधका; यदि प्रतिबन्ध सक्रिय हो → सबाधका → शास्त्रानुसार विफला। (गृह-गणना: X से अग्रगामी पूर्ण-राशि गिनती; convention declare: whole-sign from the chosen reference.)

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (X = 1)। अर्गला-स्थान: 2 = वृष, 4 = कर्क, 11 = कुम्भ। प्रतिबन्ध: 12 = मीन (↔2), 10 = मकर (↔4), 3 = मिथुन (↔11)। यदि वृष में शुक्र हो और मीन रिक्त → 2-अर्गला निर्बाधक; यदि मीन में शनि भी हो → सबाधक-अर्गला (शास्त्र-दृष्टि से विफल)।

31.9
यत्र राशौ स्थितः खेटस्तस्य पाकान्तरं यदा।
तस्मिन्‌ काले फलं ज्ञेयं निर्विशंकं द्विजोत्तम
yatra rāśau sthitaḥ kheṭastasya pākāntaraṃ yadā|
tasmin‌ kāle phalaṃ jñeyaṃ nirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र राशौ = जिस राशि में; स्थितः खेटः = बैठा ग्रह; तस्य = उसके; पाक-अन्तरम् = दशा/अन्तर्दशा-काल; यदा = जब; तस्मिन् काले = उसी काल में; फलम् = अर्गला/योग का परिणाम; निर्विशङ्कम् = संशय-रहित; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस राशि में खेट स्थित है, उसी खेट के पाक (दशा) के अन्तराल में उस स्थिति का फल जाना जाता है, और इसे निर्विशङ्क समझा जाए। अर्गला या अन्य योग मात्र जन्म-समय की संरचना नहीं; फल-कथन दशा-काल से बाँधा गया है। “पाकान्तर” यहाँ काल-खिड़की का संकेत है, स्थायी नियति का नहीं।

English rendering When a planet occupies a sign, the fruit pertaining to that placement is to be known during that planet’s period (pāka), without hesitation, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-नियम (timing link): फल(X-स्थिति) का सक्रिय-काल = पाक(खेट_X) = महादशा/अन्तर्दशा जिसमें वह खेट स्वामी हो। विंशोत्तरी में (BPHS Ch.46–47; Σ = 120 वर्ष): केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मङ्गल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17। अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। अर्गला-फल का “कब” = उस खेट की दशा-खिड़की; “क्या” = पूर्व-श्लोकों का निर्बाध/सबाध विवेक।

उदाहरण (worked example) मान लें शुक्र वृष में (लग्न-मेष से 2-अर्गला, निर्बाधक)। विंशोत्तरी शुक्र-महादशा = 20 वर्ष; शुक्र–गुरु अन्तर्दशा = (20 × 16) ÷ 120 = 2⅔ वर्ष ≈ 2 वर्ष 8 मास। शास्त्र-दृष्टि: उसी पाकान्तर में 2-अर्गला-फल का विचार; दशा-प्रारम्भ चन्द्र-नक्षत्र-अंश से (elapsed nakṣatra-fraction) निर्धारित होता है।

31.10
अर्गलां प्रतिबन्धञ्च कथमांघ्रिचतुर्थयोः।
द्वित्र्यङ्‌घ्रयोश्च मिथो विप्र चिन्तयेदिति मे मतम्‌
argalāṃ pratibandhañca kathamāṃghricaturthayoḥ|
dvitryaṅ‌ghrayośca mitho vipra cintayediti me matam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्गलाम् = अर्गला को; प्रतिबन्धम् = विरोध/बाधा को; कथम् = किस रीति से; आंघ्रि-चतुर्थयोः = प्रथम एवं चतुर्थ (अङ्घ्रि/पद-स्थान-युग्म) का; द्वि-त्र्य्-अङ्घ्रयोः = द्वितीय एवं तृतीय का; मिथः = परस्पर; चिन्तयेत् = विचार करे; इति मे मतम् = ऐसा मेरा मत (पाराशर-वाणी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूछता-सिखाता है — अर्गला और उसके प्रतिबन्ध का विचार आंघ्रि एवं चतुर्थ के सन्दर्भ में कैसे हो, तथा द्वितीय-तृतीय का मिथः (परस्पर) विचार कैसे हो। पाराशर कहते हैं — “ऐसा चिन्तनीय है, यही मेरा मत।” यह श्लोक फल नहीं गिनता; यह युग्म-विचार की विधि का निर्देश है — अर्गला अकेला नहीं, प्रतिबन्ध के साथ जोड़ा जाता है।

English rendering How argala and its obstruction are to be considered for the first and the fourth, and mutually for the second and the third — thus should one reflect, O Brāhmaṇa: this is my view.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) युग्म-नियम (pair logic), whole-sign from reference X:
(1) अर्गला₂ ↔ प्रतिबन्ध₁₂
(2) अर्गला₄ ↔ प्रतिबन्ध₁₀
(3) अर्गला₁₁ ↔ प्रतिबन्ध₃
निर्णय-फलन: यदि count(ग्रह ∈ अर्गला-स्थान) > count(ग्रह ∈ प्रतिबन्ध-स्थान) → अर्गला सक्रिय (निर्बाध-प्रवृत्ति); यदि प्रतिबन्ध ≥ अर्गला → बाधित। “मिथः चिन्तयेत्” = दोनों पक्ष साथ गिने जाएँ, एकाकी नहीं। (पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव: गौण अर्गला 5, 8, 9 इत्यादि परम्पराओं में; यहाँ मूल युग्म 2-4-11 ही प्राथमिक।)

उदाहरण (worked example) X = लग्न = सिंह। अर्गला: 2=कन्या, 4=वृश्चिक, 11=मिथुन; प्रतिबन्ध: 12=कर्क, 10=वृष, 3=तुला। मान लें कन्या+वृश्चिक में ग्रह, कर्क+वृष रिक्त → 2 एवं 4 निर्बाध; मिथुन में 1 ग्रह किन्तु तुला में 2 → 11-अर्गला सबाध। मिथः-चिन्तन = तीनों युग्म अलग-अलग `==` गिनती से, एक “कुल योग” में घोलकर नहीं।

31.11
पदे लग्ने मदे वापि निराभासार्गला यदा।
तदा जातोऽतिविख्यातो बहुभाग्ययुतो भवेत्‌
pade lagne made vāpi nirābhāsārgalā yadā|
tadā jāto'tivikhyāto bahubhāgyayuto bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदे = आरूढ/पद पर; लग्ने = जन्म-लग्न पर; मदे = सप्तम (मद/मदन-भाव) पर; वा अपि = अथवा; निराभास-अर्गला = आभास-रहित/निर्बाध स्पष्ट अर्गला; यदा = जब; जातः = जातक; अतिविख्यातः = अत्यन्त प्रसिद्ध; बहु-भाग्य-युतः = प्रचुर सौभाग्य से युक्त — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पद, लग्न अथवा मद (सप्तम) पर निराभास अर्गला हो, तब जातक अतिविख्यात और बहुभाग्य-युक्त होता है — यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं। तीन सन्दर्भ (पद · लग्न · मद) पर निर्बाध अर्गला को विशेष बल का संकेत माना गया है। “निराभास” वही है जिसे पूर्व में निर्बाधक कहा गया।

English rendering The text states: when there is clear, unobstructed argala on the pada (ārūḍha), the lagna, or the seventh (mada), the native becomes exceedingly renowned and endowed with abundant fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विशेष-स्थानों पर निराभास-अर्गला का शास्त्रोक्त परिणाम)। तकनीक केवल पूर्व-नियम की पुनरावृत्ति है: पद/लग्न/मद = तीन reference-बिन्दु X; प्रत्येक पर 2-4-11 अर्गला निर्बाध हो तो यह फल लागू माना गया।

31.12
यस्य पापः शुभो वापि ग्रहस्तिष्ठेत्‌ शुभार्गले।
तेन द्रष्ट्रेक्षितं लग्नं प्राबल्यायोपकल्प्यते
yasya pāpaḥ śubho vāpi grahastiṣṭhet‌ śubhārgale|
tena draṣṭrekṣitaṃ lagnaṃ prābalyāyopakalpyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य = जिसका; पापः शुभः वा अपि ग्रहः = पाप अथवा शुभ (कोई भी) ग्रह; तिष्ठेत् शुभ-अर्गले = शुभ-अर्गला (स्थान) में स्थित हो; तेन = उस (ग्रह) से; द्रष्ट्रा ईक्षितम् = द्रष्टा-ग्रह द्वारा दृष्ट; लग्नम् = लग्न; प्राबल्याय उपकल्प्यते = प्रबलता (बल) के लिए समर्थ बनता है।

हिन्दी भावार्थ जिसका पाप हो या शुभ — कोई भी ग्रह शुभ-अर्गला स्थान में बैठा हो और लग्न को देखता हो, तो उस दृष्टि से लग्न प्रबलता (बल) प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।

English rendering Whether malefic or benefic, a planet seated in an auspicious argalā, by aspecting the lagna, renders it fit for strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न-बल में अर्गला-योगदान की शर्त:
( ग्रह ∈ शुभ-अर्गला-स्थान ) ∧ ( ग्रह लग्न को दृष्ट करे ) ⇒ लग्न-प्राबल्य में वृद्धि।
यहाँ पाप/शुभ भेद गौण है; निर्णायक हैं स्थान (शुभ-अर्गला) और दृष्टि।

हमारा डिकोड (Our Decode) "प्राबल्य" (बल) को शास्त्र मात्रात्मक मानता है — यही दृष्टि टीम के षड्बल ढाँचे की है: स्थान-दिग्-काल-चेष्टा-नैसर्गिक-दृग् बल, रूप/विरूप में योग (1 रूप = 60 विरूप), प्रति-ग्रह सीमा से तुलना। इस श्लोक का दृग्/अर्गला-योगदान उसी परिवार का है — पहले बल की गणना करो, फिर व्याख्या; दोनों को घोलो मत।

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31.13
सार्गले च धने विप्र धनधान्यसमन्वितः।
तृतीये सोदरादीनां सुखमुक्तं मनीषिभिः
sārgale ca dhane vipra dhanadhānyasamanvitaḥ|
tṛtīye sodarādīnāṃ sukhamuktaṃ manīṣibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स-अर्गले = अर्गला-युक्त; धने = द्वितीय भाव में; विप्र = हे ब्राह्मण; धन-धान्य-समन्वितः = धन एवं धान्य से युक्त; तृतीये = तृतीय भाव में; सोदर-आदीनाम् = सहोदर आदि का; सुखम् = सुख; उक्तम् = कहा गया; मनीषिभिः = मनीषियों द्वारा — शास्त्र-परम्परा का फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीय भाव सार्गला होने पर जातक धन-धान्य-समन्वित कहा गया; तृतीय सार्गला पर सोदरादि का सुख मनीषियों ने कहा है। यह भाव-क्रम से अर्गला-फल का आरम्भ है — प्रत्येक भाव की अपनी फल-भाषा। इन्हें गणना-सिद्ध नियति नहीं, शास्त्र का फल-वाक्य समझें।

English rendering The text states: with argala on the second house, O Brāhmaṇa, one is endowed with wealth and grain; on the third, the wise have declared the happiness of siblings and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव 2 एवं 3 पर सार्गला)। जाँच-विधि पूर्ववत्: reference = लग्न; “सार्गले धने” = लग्न से 2 पर निर्बाध अर्गला-योग (अर्थात् 2,4,11 from the 2nd, या 2nd स्वयं अर्गला-युक्त — परम्परा-पाठानुसार; यहाँ भाव-फल-क्रम “जिस भाव पर अर्गला” पढ़ना सहज)।

31.14
चतुर्थे सार्गले गेहपशुबन्धुकुलैर्युतः।
पञ्चमे पुत्रपौत्रादिसंयुतो बुद्धिमान्नरः
caturthe sārgale gehapaśubandhukulairyutaḥ|
pañcame putrapautrādisaṃyuto buddhimānnaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थे = चतुर्थ भाव में (सुख/गृह-स्थान); सार्गले = अर्गला-सहित (सह-अर्गल, जहाँ अर्गला-योग बना हो); गेह = घर/भवन; पशु = पशुधन; बन्धु = सम्बन्धी-जन; कुलैः = कुल-परिवार (सहित); युतः = सम्पन्न; पञ्चमे = पञ्चम भाव में (सन्तान/बुद्धि-स्थान); पुत्र-पौत्र-आदि = पुत्र, पौत्र आदि; बुद्धिमान् = मेधावी; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चतुर्थ भाव अर्गला-सहित हो, तब जातक घर, पशुधन, बन्धु-जन और कुल-परिवार से सम्पन्न होता है; और जब पञ्चम भाव सार्गल हो, तब वह पुत्र-पौत्रादि से युक्त तथा बुद्धिमान होता है। यहाँ अर्गला उस-उस भाव के स्वाभाविक कारकत्व को दृढ़ करती है।

English rendering The text states that when the fourth house carries argala, the native is endowed with home, cattle, kinsfolk and family; and when the fifth carries it, he is blessed with sons and grandsons and is intelligent.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-वार अर्गला-फल)। यहाँ एकमात्र "गणना" यह पहचानना है कि अर्गला किस भाव-सूचकांक पर पड़ रही है (4 = सुख/गृह, 5 = सन्तान/बुद्धि) — भाव का स्वभाव ही फल की दिशा तय करता है, और फल स्वयं शास्त्र का कथन है, कोई अटल भविष्य नहीं।

31.15
षष्ठे रिपुभयं कामे धनदारसुखं बहु।
अष्टमे जायते कष्टं धर्मे भाग्योदयो भवेत्‌
ṣaṣṭhe ripubhayaṃ kāme dhanadārasukhaṃ bahu|
aṣṭame jāyate kaṣṭaṃ dharme bhāgyodayo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे = षष्ठ-भाव में (अर्गला होने पर); रिपु-भयम् = शत्रु/विरोध से भय; कामे = सप्तम-भाव में; धन-दार-सुखम् = धन, दारा (पत्नी/जीवन-साथी) और सुख; बहु = बहुत / प्रचुर; अष्टमे = अष्टम-भाव में; जायते कष्टम् = कष्ट उत्पन्न होता है; धर्मे = नवम-भाव में; भाग्य-उदयः = भाग्य का उदय; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (अर्गला की स्थिति के अनुसार) षष्ठ भाव में रिपु-भय का संकेत मिलता है; काम (सप्तम) में धन, दारा और सुख बहुतायत से; अष्टम में कष्ट; और धर्म (नवम) में भाग्योदय होता है। यह फल-कथन भाव-विशेष पर अर्गला के प्रभाव का क्रम है, न कि स्वयंसिद्ध नियति। पाठ-भेद संभव जहाँ भाव-नाम और फल-शब्दों का क्रम संस्करण-सापेक्ष हो।

English rendering The text states that with ārgala in the sixth there is fear from enemies; in the seventh, much wealth, spouse-related happiness and comfort; in the eighth, hardship; and in the ninth, a rise of fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-गत अर्गला-फल)। अर्गला स्वयं पूर्व-श्लोकों की भाव-गणना (2, 4, 11 आदि से हस्तक्षेप/समर्थन) पर टिकी है; यह श्लोक केवल षष्ठ–नवम के फलों का क्रम देता है — गणना नहीं, शास्त्रीय संकेत-सूची।

31.16
दशमे राजसम्मानं लाभे लाभसमन्वितः।
सार्गले च व्यये विप्र व्ययाधिक्यं प्रजायते
daśame rājasammānaṃ lābhe lābhasamanvitaḥ|
sārgale ca vyaye vipra vyayādhikyaṃ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = दशम भाव में (कर्म/राज्य-स्थान); राज-सम्मानं = राजकीय सम्मान; लाभे = लाभ-भाव अर्थात् एकादश भाव में; लाभ-समन्वितः = लाभ से युक्त; सार्गले = अर्गला-सहित; व्यये = व्यय-भाव अर्थात् द्वादश भाव में; विप्र = हे विप्र (मैत्रेय); व्यय-आधिक्यं = व्यय की अधिकता; प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशम भाव सार्गल हो तो राजकीय सम्मान प्राप्त होता है; लाभ (एकादश) भाव सार्गल हो तो जातक लाभ-सम्पन्न होता है; और हे विप्र, व्यय (द्वादश) भाव सार्गल हो तो व्यय की अधिकता उत्पन्न होती है। यहाँ भी अर्गला भाव के स्वभाव को ही प्रबल करती है।

English rendering The text states: argala on the tenth brings royal honour; on the eleventh (lābha) it makes one rich in gains; and, O brahmin, argala on the twelfth (vyaya) produces an excess of expenditure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। वही तर्क पुनः प्रकट होता है — अर्गला कर्म-भाव पर मान, लाभ-भाव पर आय और व्यय-भाव पर व्यय को ही बढ़ाती है; भाव-सूचकांक ही एकमात्र निर्धारक है, फल शास्त्र-वचन।

31.17
शुभग्रहार्गलायां तु सौख्यं बहुविधं भवेत्‌।
मध्यं पापार्गलायां च मिश्रायामपि चोत्तमम्‌
śubhagrahārgalāyāṃ tu saukhyaṃ bahuvidhaṃ bhavet‌|
madhyaṃ pāpārgalāyāṃ ca miśrāyāmapi cottamam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-ग्रह-अर्गलायां = शुभ ग्रह द्वारा की गई अर्गला में; सौख्यं = सुख; बहुविधं = अनेक प्रकार का; भवेत् = होता है; मध्यं = मध्यम फल; पाप-अर्गलायां = पाप-ग्रह की अर्गला में; मिश्रायां = मिश्रित (शुभ-पाप) अर्गला में; अपि = भी; उत्तमम् = उत्तम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुभ ग्रहों की अर्गला होने पर अनेक प्रकार का सुख होता है; पाप-ग्रहों की अर्गला में फल मध्यम रहता है; और मिश्रित अर्गला में भी उत्तम (फल) कहा गया है। (अन्तिम चरण का "उत्तमम्" पाठ शुभ→मध्यम→मिश्र क्रम में कुछ असंगत जान पड़ता है; कहीं "मध्यमम्" पाठ भी मिलता है — पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states that argala by benefic planets yields manifold comfort, argala by malefics yields a middling result, and mixed argala yields a superior result as well. (The closing "uttamam" sits uneasily in the benefic–middling–mixed sequence — a variant reading is possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अर्गला-कारक ग्रह की शुभ/पाप प्रकृति के अनुसार त्रिविध वर्गीकरण)। यहाँ अर्गला गुण-भेद से तीन कोटियों — शुभ, पाप, मिश्र — में बँटती है; यह वर्गीकरण नियत है, किन्तु "सौख्य/मध्यम/उत्तम" फल शास्त्र का कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह शुभ/पाप/मिश्र-वर्गीकरण ठीक उसी शुभ-पाप-बिन्दु तर्क का प्रतिबिम्ब है जो अष्टकवर्ग की गणना में चलता है (हर ग्रह अपनी शुभ/पाप गणना से रेखा-बिन्दु देता है — हमारी kaal-verification-oracle में Ch.66 कैनन Sun 48, Moon 49 … SAV 337 पर `==` से पिन)। हमारी कार्य-अनुशासन-रेखा यहाँ स्पष्ट लागू होती है: ग्रह की शुभ/पाप प्रकृति का निर्धारण नियत-गणनीय है, जबकि उससे निकलने वाला "सुख/मध्यम/उत्तम" फल विशुद्ध रूप से शास्त्र का कथन है — जिसे हम पाठ का वचन कहकर प्रस्तुत करते हैं, कभी अपनी अनुमोदित नियति के रूप में नहीं।

31.18
लग्नपञ्चमभाग्येषु सार्गलेषु द्विजोत्तम।
जातश्च जायते राजा भाग्यवान्‌ नात्र संशयः
lagnapañcamabhāgyeṣu sārgaleṣu dvijottama|
jātaśca jāyate rājā bhāgyavān‌ nātra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = उदित राशि / प्रथम भाव; पञ्चम = पञ्चम भाव; भाग्य = भाग्य-स्थान अर्थात् नवम भाव; लग्न-पञ्चम-भाग्येषु = लग्न, पञ्चम व नवम — तीनों त्रिकोण भावों में; सार्गलेषु = अर्गला-सहित होने पर; द्विज-उत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ (मैत्रेय); जातः = जन्मा जातक; जायते राजा = राजा होता है; भाग्यवान् = भाग्यशाली; न अत्र संशयः = इसमें कोई संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे द्विज-श्रेष्ठ, जब लग्न, पञ्चम और भाग्य (नवम) — ये तीनों धर्म-त्रिकोण भाव — एक साथ अर्गला-सहित हों, तब जन्मा जातक राजा और भाग्यवान होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। तीनों त्रिकोणों का समवेत सार्गल होना यहाँ बल की चरम स्थिति मानी गई है।

English rendering The text states that when the lagna, the fifth and the ninth (bhāgya) — the three trine houses — all carry argala, the native becomes a king and fortunate, without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रिकोण 1–5–9 पर समवेत अर्गला → राज-सदृश उच्च फल)। यहाँ गणना केवल भाव-त्रिक (लग्न, 5, 9) की पहचान तक सीमित है; "नात्र संशयः" शास्त्र का दृढ़ कथन है, अटल नियति की हमारी घोषणा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) धर्म-त्रिकोण 1–5–9 एक नियत भाव-त्रिक है — उसी नियत-स्थिति-गणित की कोटि का जिसे हमारे इंजन ठीक-ठीक पिन करते हैं (वर्ग-विभाजन, अर्गला के भाव-अन्तराल)। हमारी अनुशासन-रेखा के अनुसार भाव-त्रिक की पहचान गणनीय-नियत है, किन्तु "राजा/भाग्यवान" फल व्याख्यात्मक ही रहता है; अतः "नात्र संशयः" जैसे बल-सूचक वचन को हम पाठ का कथन कहकर प्रस्तुत करते हैं, कभी अपनी अनुमोदित भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

अध्यायः 32

कारकाध्यायः

37 श्लोक
32.1
अथाऽहं सम्प्रवक्ष्यामि ग्रहानात्मादिकारकान्‌।
सप्तरव्यादिशन्यन्तान्‌ राह्वन्तान्‌ वाऽष्टसंख्यकान्‌
athā'haṃ sampravakṣyāmi grahānātmādikārakān‌|
saptaravyādiśanyantān‌ rāhvantān‌ vā'ṣṭasaṃkhyakān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (मङ्गल-सूचक आरम्भ); अहम् = मैं (पराशर); सम्प्रवक्ष्यामि = भलीभाँति कहूँगा; ग्रहान् आत्मादि-कारकान् = आत्मकारक आदि रूप में ग्रहों को (चर-कारक श्रेणी); सप्त रवि-आदि-शनि-अन्तान् = सूर्य से शनि तक सात; राहु-अन्तान् वा = अथवा राहु-पर्यन्त; अष्ट-संख्यकान् = आठ की संख्या वाले। (आत्मादि-कारक = अंश के क्रम से निकाला जाने वाला "चर कारक" — जैमिनि-परम्परा का आत्मकारकादि विधान।)

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, अब मैं ग्रहों को आत्मकारक आदि "चर कारकों" के रूप में कहूँगा — सूर्य से लेकर शनि तक सात कारक, अथवा राहु को जोड़कर आठ। ये कारक ग्रह की स्थिर स्वामिता से नहीं, अपितु जन्मकुण्डली में उसके अंश (राश्यंश) के आधार पर बदलते हैं — इसीलिए "चर" (चलायमान) कहलाते हैं।

English rendering Now I shall expound the planets as ātmādi-kārakas (the soul-signifier and the rest): the seven from Sun to Saturn, or eight when Rāhu is included.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह उपोद्घात-श्लोक कारक-गण की संख्या स्थापित करता है, गणना का सूत्र नहीं। समुच्चय: 7-कारक-पक्ष = {सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि}; 8-कारक-पक्ष = उपर्युक्त + राहु। श्रेणीकरण की कुंजी (अंश) श्लोक 32.3 में आती है। यहाँ केवल गण-संख्या 7 वा 8 अभिधेय है।

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32.2
अंशैः समौग्नहौ द्वौ चेद्‌राह्वन्तन्‌ चिन्तयेत्‌ तदा।
सप्तैव कारकानेवं केचिदष्टौ प्रचक्षते
aṃśaiḥ samaugnahau dvau ced‌rāhvantan‌ cintayet‌ tadā|
saptaiva kārakānevaṃ kecidaṣṭau pracakṣate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अंशैः समौ = अंशों में समान; द्वौ ग्रहौ = दो ग्रह; चेत् = यदि; राह्वन्तम् चिन्तयेत् = तब राहु पर्यन्त (आठ) विचारे; सप्त एव कारकान् = केवल सात कारक; केचित् अष्टौ प्रचक्षते = कुछ आचार्य आठ कहते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि दो ग्रह अंशों में समान हों, तो राहु तक गिनकर आठ-कारक-क्रम का चिन्तन करे। सामान्य स्थिति में सात ही कारक लिए जाते हैं; किन्तु अंश-साम्य जैसी विशेष स्थिति में — और कुछ आचार्यों की मान्यता से — आठ कारक भी प्रचलित हैं। यह पाठ-भेद और प्रयोजन-भेद दोनों की ओर संकेत करता है।

English rendering If two planets are equal in degrees, one should then consider the scheme ending with Rāhu. Thus some teach only seven kārakas; others declare eight.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नियम (चर-कारक समुच्चय):
- साधारणतः: ७ कारक — {सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि}, राहु बाहर।
- अंश-साम्य (दो ग्रहों के rāśi-अंश समान) पर: ८ कारक — उक्त ७ + राहु।
तुलना सदैव राशि के भीतर के भुक्त-अंश (०°–३०°) पर होती है, न कि पूर्ण-वृत्त देशान्तर पर। राहु का अंश-शोधन अगले श्लोक में।

उदाहरण (worked example) मान लें (राशि-अंश, अयनांश-स्वतन्त्र भुक्त-भाग): सूर्य १८°१०′, चन्द्र २२°०५′, मंगल ११°४०′, बुध २२°०५′, गुरु ०८°२०′, शुक्र १४°५५′, शनि ०३°१०′। चन्द्र और बुध दोनों २२°०५′ — अंश-साम्य। अतः इस जन्म में शास्त्रीय विकल्प: राहु सहित अष्ट-कारक-क्रम चिन्तनीय; राहु-रहित सप्त-क्रम केवल तभी जब साम्य न हो।

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32.3
अत्मा सूर्यादिखेटानां मध्ये ह्यंशाधिको ग्रहः।
अंशसाम्ये कलाधिक्यात्‌ तत्साम्ये विकलाधिकः
atmā sūryādikheṭānāṃ madhye hyaṃśādhiko grahaḥ|
aṃśasāmye kalādhikyāt‌ tatsāmye vikalādhikaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मा = आत्मकारक; सूर्यादि-खेटानां मध्ये = सूर्यादि ग्रहों में; अंश-अधिकः ग्रहः = सर्वाधिक अंश वाला ग्रह; अंश-साम्ये = अंश समान होने पर; कला-आधिक्यात् = अधिक कला (आर्क-मिनट) वाला; तत्-साम्ये = कला भी समान होने पर; विकल-अधिकः = अधिक विकला (आर्क-सेकंड) वाला। (अंश यहाँ = राश्यंश, λ mod 30° — नवांश D9 नहीं।)

हिन्दी भावार्थ सूर्य आदि ग्रहों में जिसका अंश (अपनी राशि के भीतर की कोटि) सबसे अधिक हो, वही आत्मकारक है। यदि दो के अंश तुल्य हों तो अधिक कला वाला, और कला भी तुल्य हो तो अधिक विकला वाला आत्मकारक माना जाता है। यह क्रमिक, सूक्ष्मतम तुलना है।

English rendering Among the planets from Sun onward, the one highest in degrees is the Ātmakāraka; if degrees are equal, the one with more minutes; if those too are equal, the one with more seconds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक ग्रह की राश्यंश-कोटि लें: d = λ mod 30°, विभक्त (अंश°, कला′, विकला″) रूप में, जहाँ 1° = 60′, 1′ = 60″। श्रेणीकरण-कुंजी = कोशीय (lexicographic) त्रिक (अंश, कला, विकला), अवरोही। आत्मकारक = argmax। तुलना क्रम: पहले अंश, समता पर कला, फिर विकला — कोई सह्यता-पट्टी (tolerance) नहीं, ठीक-ठीक तुलना।

उदाहरण (worked example) मान लें (सायन/निरयन दोनों में राश्यंश समान क्रम देते हैं यदि सभी एक ही अयनांश पर लिए जाएँ; यहाँ निरयन-लाहिरी) — गुरु = 28°10′55″, शनि = 28°10′40″। अंश तुल्य (28), कला तुल्य (10′), विकला में गुरु 55″ > शनि 40″ ⇒ इन दोनों में गुरु ऊपर। यदि किसी अन्य ग्रह का अंश 29° हो तो वही आत्मकारक; अन्यथा गुरु।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक वही अनुशासन माँगता है जिस पर हमारा kaal-verification-oracle खड़ा है — सह्यता-पट्टी नहीं, `==` पर ठीक-ठीक तुलना। जैसे अष्टकवर्ग में एक ±3 की पट्टी ने वास्तविक −1 को छिपा लिया था, वैसे ही यहाँ "लगभग बराबर अंश" मान लेने से आत्मकारक ही बदल जाएगा। इसलिए विकला-स्तर तक की अखण्ड, नियतांक तुलना ही एकमात्र सही विधि है — यही हमारी exact-`==` शिस्त है।

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32.4
बुधौ राशिकलाधिक्यत्‌ ग्राह्वो नैवात्मकारकः।
अंशाधिकः कारकः स्यादल्पभागोऽन्त्यकारकः
budhau rāśikalādhikyat‌ grāhvo naivātmakārakaḥ|
aṃśādhikaḥ kārakaḥ syādalpabhāgo'ntyakārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (पूर्वार्ध — पाठ-भेद संभव) बुधौ / ग्रहौ? राशिकलाधिक्यात् = राशि-कला की अधिकता से; ग्राह्यः न एव आत्मकारकः = केवल उसी से आत्मकारक नहीं गृहीत; अंशाधिकः कारकः = अधिक अंश वाला (आदि) कारक; अल्पभागः = न्यूनतम भाग वाला; अन्त्यकारकः = अन्तिम कारक (दारकारक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — केवल राशि-कला की साधारण अधिकता से किसी को आत्मकारक नहीं ठहराया जाता; निर्धारण पूर्वोक्त अंश-कला-विकला की स्पष्ट श्रेष्ठता से होता है (पूर्वार्ध में पाठ-भेद संभव — कुछ पाण्डुलिपियों में शब्द-रूप भिन्न)। स्पष्ट फल-सूत्र यह है: सर्वाधिक अंश वाला प्रधान कारक (आत्मकारक-श्रेणी का शीर्ष) होता है, और अल्पतम अंश वाला अन्त्यकारक — चर-क्रम का अन्तिम, जिसे परम्परा दारकारक कहती है।

English rendering (First half: recension may vary.) Mere excess in sign-minutes does not by itself establish the Ātmakāraka. The planet with the greater degree is the kāraka; the one with the least portion is the final (antya) kāraka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रमबद्ध चर-कारक (७-योजना, राहु रहित; अंश-अवतरण):
λ′₍₁₎ ≥ λ′₍₂₎ ≥ … ≥ λ′₍₇₎
- १ = आत्मकारक (AK)
- २ = अमात्यकारक (AmK)
- ३ = भ्रातृकारक (BK)
- ४ = मातृकारक (MK)
- ५ = पुत्रकारक (PK)
- ६ = ज्ञातिकारक (GK)
- ७ = अन्त्य / दारकारक (DK) ← अल्पभागः
अष्ट-योजना में राहु जोड़कर आठ स्थान; कुछ परम्पराएँ पितृकारक आदि नाम देती हैं — नामकरण पाठ-परम्परा-सापेक्ष, अंश-क्रम स्वयं गणितीय।

उदाहरण (worked example) भुक्त-अंश: सूर्य २८°१०′, चन्द्र १५°२०′, मंगल ०५°४०′, बुध २२°००′, गुरु ११°३०′, शुक्र ०१°१५′, शनि १९°४५′। अवरोही क्रम: सूर्य (AK) → बुध (AmK) → शनि (BK) → चन्द्र (MK) → गुरु (PK) → मंगल (GK) → शुक्र (DK = अन्त्यकारक)।

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32.5
मध्यांशो मध्यखेटः स्यादुपखेटः स एव हि।
विलोमगमनाद्राहोरंशाः शोध्याः खवह्नितः
madhyāṃśo madhyakheṭaḥ syādupakheṭaḥ sa eva hi|
vilomagamanādrāhoraṃśāḥ śodhyāḥ khavahnitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्य-अंशः = बीच के अंश वाला; मध्य-खेटः स्यात् = मध्य-ग्रह होता है; उपखेटः स एव = वही उपग्रह; विलोम-गमनात् राहोः = उल्टी (वक्री) चाल के कारण राहु के; अंशाः शोध्याः = अंश घटाने योग्य; खवह्नितः = "ख-वह्नि" से अर्थात् 30 से (ख = 0, वह्नि = 3; अंकानां वामतो गतिः → 30)।

हिन्दी भावार्थ अंश-क्रम में मध्य में स्थित ग्रह "मध्यखेट" (उपग्रह) कहलाता है। और चूँकि राहु सदा उल्टी चाल चलता है, उसके अंश 30 में से घटाकर लेने चाहिए — तभी उसका कारक-अंश निकलता है। (खवह्नि = भूतसंख्या द्वारा 30।)

English rendering The planet of middle degrees is the madhya-kheṭa (upa-kheṭa); and because Rāhu moves in reverse, its degrees are to be subtracted from thirty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राहु का कारक-अंश: d_राहु = 30° − (λ_राहु mod 30°)। भूतसंख्या विकोडन — ख = आकाश = 0, वह्नि = अग्नि = 3; अंकों की वाम-गति से "ख, वह्नि" = 0,3 उलटकर = 30। तत्पश्चात् राहु को इसी परिवर्तित अंश के साथ सामान्य अवरोही क्रम में रखें।

उदाहरण (worked example) राहु अपनी राशि में 8°30′ पर ⇒ कारक-अंश = 30°00′ − 8°30′ = 21°30′। अतः श्रेणीकरण में राहु का प्रभावी अंश 21°30′ माना जाएगा, न कि 8°30′। (केतु के लिए भी कुछ परम्पराएँ यही व्युत्क्रम लगाती हैं — पाठ/परम्परा-भेद संभव।)

हमारा डिकोड (Our Decode) "खवह्नि → 30" ठीक वही अंक-निष्ठ भूतसंख्या-विकोडन है जिसे हम पूरे संस्करण में लागू करते हैं — शब्द-संख्या को अंक-दर-अंक, वाम-गति से खोलना, अनुमान से नहीं। यह उसी नियतता का अंग है जिस पर हमारा वर्ग-इंजन (ṣoḍaśa-varga) और अष्टकवर्ग-oracle टिके हैं: नियतांक पहले पिन करो, फिर गणना — तभी 30 जैसा स्थिरांक कभी मौन रूप से नहीं बदलता।

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32.6
अंशक्रमादधोऽधःस्थाश्चराख्याः कारका इति।
आत्माख्यकारकस्तेषु प्रधानं कथ्यते द्विज
aṃśakramādadho'dhaḥsthāścarākhyāḥ kārakā iti|
ātmākhyakārakasteṣu pradhānaṃ kathyate dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अंशक्रमात् = अंश के क्रम से; अधोऽधःस्थाः = नीचे-नीचे स्थित; चराख्याः कारकाः = चर नामक कारक; आत्माख्य-कारकः = आत्मकारक; तेषु प्रधानम् = उनमें प्रधान; कथ्यते = कहा जाता है; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ अंशों के अवरोही क्रम में जो ग्रह क्रमशः नीचे-नीचे बैठते हैं, वे सभी “चर-कारक” कहलाते हैं — जन्म-विशिष्ट, स्थिर नैसर्गिक कारक नहीं। उनमें आत्माख्य कारक को प्रधान कहा गया है। पाराशर शिष्य को सम्बोधित कर स्पष्ट करते हैं: पूरी शृंखला का शीर्ष — आत्मकारक — प्रधान माना जाता है।

English rendering In descending order of degrees they are called the movable (chara) kārakas. Among them the one named Ātmakāraka is declared the chief, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चर-कारक = sorted( {λ′_i}, descending )।
प्रधानता: index 1 = AK (आत्मकारक) — “प्रधानम्”। शेष स्थान २…७ (या ८) गौण-क्रम। यह रैंकिंग-अल्गोरिदम है; नैसर्गिक कारक (सूर्य=आत्मा आदि) से भिन्न — यहाँ “चर” = जन्म-रेखांश पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) λ′ अवरोही: २७° (AK) > २१° (AmK) > १८° (BK) > १४° (MK) > ०९° (PK) > ०६° (GK) > ०२° (DK)। प्रधान = २७° वाला ग्रह। किसी अन्य जन्म में उसी ग्रह का λ′ बदलते ही उसकी कारक-संज्ञा बदल जाती है — यही “चर” का गणित।

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32.7
स एव जातकाधीशो विज्ञेयो द्विजसत्तम।
यथा भूमौ प्रसिद्धोऽस्ति नराणां क्षितिपालकः
sa eva jātakādhīśo vijñeyo dvijasattama|
yathā bhūmau prasiddho'sti narāṇāṃ kṣitipālakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स एव = वही (आत्मकारक); जातकाधीशः = जातक का अधीश / जन्म-कुण्डली का स्वामी-तुल्य; विज्ञेयः = जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; यथा भूमौ = जैसे पृथ्वी पर; प्रसिद्धः = प्रसिद्ध; नराणां क्षितिपालकः = मनुष्यों का राजा / भूमि-पालक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वही आत्मकारक जातक का अधीश माना जाए, हे द्विजश्रेष्ठ। दृष्टान्त स्पष्ट है: जैसे भूमि पर राजा मनुष्यों का रक्षक-प्रसिद्ध होता है, वैसे ही कुण्डली में आत्मकारक को प्रधान स्थान दिया गया है। यह फल-दर्शन का रूपक है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष की नियति का दावा — पाठ आत्मकारक की केन्द्रीयता बताता है।

English rendering He alone is to be known as the lord of the nativity, O best of the twice-born — just as on earth the king is renowned as the protector of men.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-दृष्टान्त / प्राधान्य-कथन। पूर्व श्लोकों से निर्धारित AK को शास्त्र “जातकाधीश” कहता है; राजा-रूपक प्राधान्य का काव्य है। गणना वहीं पूर्ण होती है जहाँ λ′ अधिकतम (और राहु-शोधन/अष्ट-योजना के नियम लागू) — यह श्लोक उस परिणाम की शास्त्रीय महत्ता बताता है, नई संख्या नहीं जोड़ता।

32.8
सर्ववार्ताधिकारी च बन्धकृन्मोक्षक्रत्‌ तथा
sarvavārtādhikārī ca bandhakṛnmokṣakrat‌ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-वार्ता-अधिकारी = समस्त कार्यों/संवादों का अधिष्ठाता; बन्ध-कृत् = बन्धन का कर्ता; मोक्ष-कृत् (पाठ: मोक्षक्रत्‌) = मोक्ष का कर्ता; च / तथा = और / उसी प्रकार; (संदर्भ से) आत्माकारक = जन्म-पटल का प्रधान चर-कारक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आत्माकारक का कार्यक्षेत्र बताता है — वह न केवल एक भाव या एक व्यक्ति-संबंध का सूचक है, बल्कि सर्ववार्ता का अधिकारी है: जीवन के समस्त कार्य-व्यापार का केंद्रीय नियंत्रक। उसी के साथ वह बन्ध और मोक्ष दोनों का कर्ता कहा गया है — अर्थात् आत्माकारक की दशा, स्थिति और संबंध से बन्धन-मुक्ति का ढाँचा जुड़ा माना जाता है। यह फल-कथन आत्माकारक को मात्र “आत्मा” का नाम न देकर, पूरे कारक-मण्डल का राजा बनाता है।

English rendering The text states that the ātmakāraka is the controller of all affairs, and likewise the agent of bondage and of liberation — not a narrow significator, but the governing pivot of the chart’s charakāraka scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आत्माकारक-कार्य का वर्णन / फल-कथन। यह श्लोक आत्माकारक की भूमिका (role) बाँधता है; उसकी पहचान का अंक-नियम अगले श्लोक-युग्म (32.13–14) में आता है — सर्वाधिक अंश वाला ग्रह = आत्माकारक।

32.9
यथा राजाज्ञया विप्रा पुत्रामात्यादयो जनाः।
समर्था लोककार्येषु तथैवान्येपि कारकाः
yathā rājājñayā viprā putrāmātyādayo janāḥ|
samarthā lokakāryeṣu tathaivānyepi kārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा = जिस प्रकार; राज-आज्ञया = राजा की आज्ञा से; विप्र = हे ब्राह्मण (संबोधित शिष्य); पुत्र-अमात्य-आदयः जनाः = पुत्र, मंत्री आदि जन; समर्थाः = सक्षम; लोक-कार्येषु = लोक-कार्यों में; तथा एव = ठीक वैसे ही; अन्ये अपि कारकाः = अन्य कारक भी।

हिन्दी भावार्थ पराशर एक राज-दरबारी दृष्टांत देते हैं। जिस प्रकार राजा की आज्ञा और अनुकूलता के बिना पुत्र, अमात्य और अन्य लोग लोक-कार्य में समर्थ नहीं होते — या यों कहें कि उनकी क्षमता राजा के शासन-ढाँचे के भीतर ही फलती है — उसी प्रकार अन्य कारक (अमात्य, भ्राता, माता आदि) भी आत्माकारक के शासन के अंतर्गत ही कार्य-सक्षम माने गए हैं। यह श्लोक कारक-मण्डल को राजा–मंत्री मॉडल पर बाँधता है: आत्माकारक = नृप; शेष = उसके अधिकारी।

English rendering Just as, by the king’s command, sons, ministers and other people become effective in worldly work, O Brāhmaṇa, so too the remaining kārakas operate under the ātmakāraka’s authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रूपक / संवाद-दृष्टांत। तकनीक यहाँ पदानुक्रम है: कारक-फल को स्वतंत्र “अलग-अलग ग्रहों का फल” न पढ़कर, आत्माकारक-केन्द्रित श्रृंखला में रखना — जो 32.10–12 में अनुकूल/प्रतिकूल नियम से और सख्त होता है।

32.10
आत्मानुकूलमेवात्र भवन्ति फलदायकः।
प्रतिकूले यथा भूपे सर्वेऽमात्यादयो द्विज
ātmānukūlamevātra bhavanti phaladāyakaḥ|
pratikūle yathā bhūpe sarve'mātyādayo dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्म-अनुकूलम् एव = केवल आत्मा (आत्माकारक) के अनुकूल होने पर; अत्र = यहाँ (जन्म-फल में); भवन्ति फल-दायकाः (पाठ-भेद संभव: फलदायकः) = फल देने वाले होते हैं; प्रतिकूले भूपे = जब राजा प्रतिकूल हो; यथा = जिस प्रकार; सर्वे अमात्य-आदयः = सभी मंत्री आदि; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अन्य कारक आत्मानुकूल होने पर ही फल-दायक सिद्ध होते हैं — अर्थात् उनके शुभ संकेत तब तक पूर्ण नहीं माने जाते जब तक आत्माकारक का ढाँचा उनके साथ मेल खाए। दृष्टांत जारी है: जिस प्रकार राजा के प्रतिकूल होने पर अमात्य आदि (अगले श्लोक में पूरा) मनुष्यों का कार्य कर पाने में असमर्थ हो जाते हैं, उसी ढाँचे से कारक-फल को राजा-प्रतिकूलता से बाँधा जा रहा है। यह “सभी ग्रह स्वतंत्र फल दें” वाली सरल रीति का निषेध नहीं, बल्कि आत्माकारक-प्राथमिकता का नियम है।

English rendering The text states that the other kārakas become givers of result only when they are favorable to the ātman (ātmakāraka). Just as when the king is adverse, all ministers and the rest… (the sentence completes in 32.11).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अनुकूलता-नियम। व्यवहार में यह एक Boolean/conditional layer है: अन्य कारक-फल → `if ātmakāraka is anukūla` then fruit-bearing; `if pratikūla` then capacity collapses — next verse makes the parallel explicit. “अनुकूल/प्रतिकूल” का मापदंड (दृष्टि, युति, दशा, भाव-स्वामित्व) इस श्लोक में संख्याबद्ध नहीं; केवल सिद्धांत है।

32.11
कर्य कर्तुं मनुष्यानां न समर्था भवन्ति हि।
तथाऽत्मकारके क्रूरे नाऽन्ये स्वशुभदायकः
karya kartuṃ manuṣyānāṃ na samarthā bhavanti hi|
tathā'tmakārake krūre nā'nye svaśubhadāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कार्यं कर्तुम् (पाठ: कर्य) = कार्य करने को; मनुष्याणाम् = मनुष्यों के; न समर्थाः भवन्ति हि = वास्तव में समर्थ नहीं होते; तथा = उसी प्रकार; आत्म-कारके क्रूरे = जब आत्माकारक क्रूर/अप्रसन्न हो; न अन्ये = अन्य (कारक) नहीं; स्व-शुभ-दायकाः = अपने शुभ फल के दाता।

हिन्दी भावार्थ 32.10 का दृष्टांत यहाँ पूरा होता है: राजा के प्रतिकूल होने पर मंत्री आदि लोगों का काम करने में असमर्थ रह जाते हैं। शास्त्र कहता है — तथा जब आत्माकारक क्रूर हो, तब अन्य कारक अपने स्वाभाविक शुभ फल के दाता नहीं बन पाते। “क्रूर” यहाँ ग्रह-स्वभाव (मंगल-शनि आदि) तक सीमित नहीं; संदर्भ में आत्माकारक की अप्रसन्न / प्रतिकूल अवस्था है। अनुशासन: यह शास्त्र का संरचना-कथन है, किसी जन्म का नियति-घोष नहीं।

English rendering …they are not able to accomplish human affairs. Likewise, the text states, when the ātmakāraka is cruel (adverse), the other kārakas do not become the givers of their own auspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आत्माकारक-क्रूरता पर अन्य कारक-शुभ का निषेध)। डिकोड-दृष्टि से यह gate-function है:
`phala(other_kāraka) ⊨ auspicious ⟹ ātmakāraka not krūra/pratikūla`
संख्या, वर्ष या अंश यहाँ नहीं; केवल तार्किक शर्त।

32.12
अनुकूले नृपे यद्वत्‌ सर्वेऽमात्यादयो द्विज।
नाशुभं कुर्वते तद्वनान्ये स्वाशुभदायकाः
anukūle nṛpe yadvat‌ sarve'mātyādayo dvija|
nāśubhaṃ kurvate tadvanānye svāśubhadāyakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनुकूले नृपे = अनुकूल राजा में; यद्वत् = जिस प्रकार; सर्वे अमात्य-आदयः = सभी मंत्री आदि; द्विज = हे द्विज; न अशुभं कुर्वते = अशुभ नहीं करते; तद्वत् = उसी प्रकार; न अन्ये = अन्य नहीं; स्व-अशुभ-दायकाः = अपने अशुभ फल के दाता (अर्थात् अशुभ नहीं देते / अशुभ दबा रहता है)।

हिन्दी भावार्थ अब सिक्के का दूसरा पहलू: जिस प्रकार अनुकूल राजा के शासन में मंत्री आदि अशुभ नहीं करते — वे राजा की नीति में बँधे रहकर अनर्थ नहीं फैलाते — उसी प्रकार शास्त्र कहता है कि अन्य कारक, जब आत्माकारक अनुकूल हो, अपने स्वाभाविक अशुभ के पूरे दाता नहीं बनते। 32.11 ने “आत्माकारक क्रूर → शुभ नहीं देते” कहा; 32.12 कहता है “आत्माकारक अनुकूल → अशुभ नहीं करते”। दोनों मिलकर द्वि-द्वार नियम हैं: राजा खराब तो शुभ रुकता है; राजा अच्छा तो अशुभ दबता है।

English rendering Just as, when the king is favorable, all ministers and the rest do not work inauspicious deeds, O twice-born, so too the other kārakas do not act as full givers of their own inauspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आत्माकारक-अनुकूलता पर अन्य कारक-अशुभ का दमन)। 32.11–12 का युग्म:
- ātmakāraka krūra → other kārakas ⇏ sv-śubha
- ātmakāraka anukūla → other kārakas ⇏ sv-aśubha
यह फल-तर्क है, अंश-गणना नहीं; अंश-रेखा 32.13 से आरंभ होती है।

32.13
आत्माकारकभागेभ्यो न्यूनांशोऽमात्यकारकः।
तस्मान्न्यूनांशको भ्राता तन्न्यूनोमातृसंज्ञकः
ātmākārakabhāgebhyo nyūnāṃśo'mātyakārakaḥ|
tasmānnyūnāṃśako bhrātā tannyūnomātṛsaṃjñakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्माकारक-भागेभ्यः = आत्माकारक के अंशों (राशि के भीतर भोगांश) से; न्यून-अंशः = कम अंश वाला; अमात्य-कारकः = अमात्यकारक (मंत्री/कर्म-सलाह); तस्मात् न्यून-अंशकः भ्राता = उससे कम अंश वाला = भ्रातृकारक; तत्-न्यूनः मातृ-संज्ञकः = उससे भी न्यून = मातृकारक।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र चर-कारकों की अंश-श्रेणी खोलता है। जिस ग्रह के राशि-अंदर अंश सर्वाधिक हों, वह आत्माकारक (पूर्व-श्लोकों का “राजा”); उससे न्यूनांश वाला अमात्यकारक; अमात्य से न्यून = भ्रातृकारक; भ्राता से न्यून = मातृसंज्ञक। “अंश/भाग” = ग्रह की अपनी राशि में देशान्तर का अंश-भाग (0°–30° के भीतर), पूर्ण राशि-संख्या नहीं। क्रम घटते अंशों से निर्धारित होता है — यह चर-कारक पद्धति का अंक-हृदय है।

English rendering The planet with fewer degrees than the ātmakāraka is the amātyakāraka; the next lower in degrees is the significator of the brother (bhrātṛkāraka); lower still is the one termed mātṛkāraka (mother).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चर-कारक = ग्रहों को राशि-अंतर्गत भोगांश (longitude mod 30°) के अनुसार अवरोही क्रम में बाँधना।

माना ग्रह i का क्रांतिवृत्तीय देशान्तर λᵢ (°) हो (घोषित ayanāṃśa पर):
- rāśi-भाग: aᵢ = λᵢ mod 30°, 0° ≤ aᵢ < 30°
- क्रम: a₍₁₎ > a₍₂₎ > a₍₃₎ > a₍₄₎ > …
- कारक-सूची (इस श्लोक तक):
(1) ātmakāraka ← max aᵢ
(2) amātyakāraka ← next
(3) bhrātṛkāraka ← next
(4) mātṛkāraka ← next

सम्मेलन (अनिवार्य घोषणा):
- 7-कारक (रवि…शनि, राहु/केतु बिना) बनाम 8-कारक (राहु सहित) — पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव; इस श्लोक-युग्म में सात नाम (आत्मा→अमात्य→भ्राता→माता→पिता→पुत्र→ज्ञाति) + 32.14 के अंत में दारा की ओर संकेत।
- राहु-अंश: कुछ रीतियों में राहु का a = 30° − (λ_Rahu mod 30°) (व्युत्क्रम); चुनी रीति बिना संख्या अस्थिर।
- समान अंश (सम-अंश): शास्त्रीय समाधान अलग-अलग टीकाओं में; मौन अनुमान वर्जित — पाठ-भेद संभव।
- Ayanāṃśa (लाहिरी आदि) λᵢ बदलता है → aᵢ और कभी-कभी क्रम बदल सकता है; परिणाम ayanāṃśa-घोषित ही मान्य।

उदाहरण (worked example)
सम्मेलन: लाहिरी ayanāṃśa; 7 ग्रह (राहु नहीं); a = λ mod 30°।

| ग्रह | λ (°) | a = λ mod 30° |
|------|-------|----------------|
| सूर्य | 45.20 | 15.20° |
| चंद्र | 102.85 | 12.85° |
| मंगल | 210.40 | 0.40° |
| बुध | 58.90 | 28.90° |
| गुरु | 175.10 | 25.10° |
| शुक्र | 320.55 | 20.55° |
| शनि | 280.00 | 10.00° |

अवरोही a: बुध 28.90° → गुरु 25.10° → शुक्र 20.55° → सूर्य 15.20° → चंद्र 12.85° → शनि 10.00° → मंगल 0.40°

इस श्लोक तक:
- आत्माकारक = बुध
- अमात्यकारक = गुरु
- भ्रातृकारक = शुक्र
- मातृकारक = सूर्य

(पिता–पुत्र–ज्ञाति–दारा: 32.14)

32.14
तन्न्यूनांशः पितातस्मादल्पांशः पुत्रकारकः।
पुत्रान्न्यूनांशको ज्ञतिर्ज्ञातेर्न्यूनांशको हि यः
tannyūnāṃśaḥ pitātasmādalpāṃśaḥ putrakārakaḥ|
putrānnyūnāṃśako jñatirjñāternyūnāṃśako hi yaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-न्यून-अंशः पिता = उससे न्यून अंश वाला = पितृकारक; तस्मात् अल्प-अंशः पुत्र-कारकः = उससे अल्प अंश = पुत्रकारक; पुत्रात् न्यून-अंशकः ज्ञातिः = पुत्र से न्यून = ज्ञातिकारक (बंधु/कुटुंब); ज्ञातेः न्यून-अंशकः हि यः = ज्ञाति से भी न्यून अंश वाला जो है — (परंपरा में दाराकारक; श्लोक यहाँ खंडित/अगले पाठ से जुड़ सकता है — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ अंश-सीढ़ी आगे बढ़ती है। मातृकारक से न्यूनांश = पितृकारक; उससे अल्पांश = पुत्रकारक; पुत्र से न्यून = ज्ञातिकारक; ज्ञाति से न्यून = “जो है” — शास्त्रीय चर-कारक सूची में यही स्थान दाराकारक (स्त्री/पति-संबंध) का है। इस प्रकार सात (या आठ) चर-कारक पूर्णतः घटते राशि-अंश से निर्धारित होते हैं: आत्मा → अमात्य → भ्राता → माता → पिता → पुत्र → ज्ञाति → (दारा)। स्थायी कारक (स्थिर नैसर्गिक) से यह पद्धति भिन्न है — यहाँ हर जन्म में ग्रह-भूमिका अंश-क्रम से बदलती है, इसलिए “चर”।

English rendering The next lower in degrees is the father-significator (pitṛkāraka); lower still, the child-significator (putrakāraka); lower than that, the kinsfolk-significator (jñātikāraka); and the one still lower in degrees than the jñāti — the chain that completes as dārakāraka in the standard charakāraka list (reading continuity: पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 32.13 की श्रेणी का विस्तार — पूर्ण चर-कारक क्रम (7-कारक, राहु रहित; Σ-check):

| क्रम k | कारक | नियम |
|--------|------|------|
| 1 | ātmakāraka | a = max(λ mod 30°) |
| 2 | amātyakāraka | next lower a |
| 3 | bhrātṛkāraka | next |
| 4 | mātṛkāraka | next |
| 5 | pitṛkāraka | next |
| 6 | putrakāraka | next |
| 7 | jñātikāraka | next |
| (8) | dārakāraka | next (8-planet scheme में; 7-planet में ज्ञाति के बाद अंतिम = दारा — परंपरा-भेद घोषित करें) |

संक्षेप सूत्र:

sort planets by aᵢ = (λᵢ mod 30°) descending → assign kāraka[k] ← planet at rank k.
समान aᵢ पर मौन तोड़ने का नियम इस श्लोक-युग्म में नहीं दिया — अनिश्चय पर “पाठ-भेद/टीका-भेद संभव”।

उदाहरण (worked example)
32.13 वाला ही λ-सेट, लाहिरी, 7 ग्रह, a = λ mod 30°:

1. बुध 28.90° → आत्माकारक
2. गुरु 25.10° → अमात्यकारक
3. शुक्र 20.55° → भ्रातृकारक
4. सूर्य 15.20° → मातृकारक
5. चंद्र 12.85° → पितृकारक
6. शनि 10.00° → पुत्रकारक
7. मंगल 0.40° → ज्ञातिकारक (7-कारक रीति में अंतिम; दारा-स्थान की 8-कारक/समावेश-रीति अलग — घोषित सम्मेलन से बाँधें)

यदि राहु जोड़ा जाए और राहु-a = 30° − (λ_Rahu mod 30°) लिया जाए, तो सम्पूर्ण क्रम पुनर्गणना होगी — exact == तभी जब ayanāṃśa, 7/8-scheme और राहु-नियम तीनों पinned हों।

32.15
स दारकारको ज्ञेयो निर्विशंके द्विजोत्तम।
चराख्यकारला एते ब्राह्मणा कथिताः पुरा
sa dārakārako jñeyo nirviśaṃke dvijottama|
carākhyakāralā ete brāhmaṇā kathitāḥ purā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सः = वह (ज्ञातिकारक से न्यून अंश वाला ग्रह, पूर्व श्लोक का शेष); दारकारकः = दार/जाया-कारक (spouse significator, ८वाँ व अन्तिम); ज्ञेयः = जानना चाहिए; निर्विशंके = नि:सन्देह; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधन); चराख्यकारकाः एते = ये "चर" (movable) नामक कारक; पुरा कथिताः = पूर्वकाल में कहे गए। (पाठ "ब्राह्मणा/चराख्यकारला" में लिपि-भेद — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ ज्ञातिकारक से भी जो न्यून अंश वाला ग्रह हो, उसे नि:सन्देह दारकारक (जीवनसाथी का कारक) जानो, हे द्विजश्रेष्ठ। इस प्रकार अंशों के घटते क्रम से आत्मकारक से लेकर दारकारक तक ये आठ (अथवा राहु-रहित सात) "चर-कारक" कहलाते हैं, जो परम्परा में पूर्व से ही कहे गए हैं।

English rendering The planet with fewer degrees still than the kinsmen-significator is, without doubt, the spouse-significator. These eight movable significators, running by descending degrees, are the "chara-kārakas," declared of old.

गणित / तकनीक: दारकारक = भोगांश-क्रम में सबसे न्यून — ८-योजना में rank 8; राहु-रहित ७-योजना में पुन: गणना कर सबसे न्यून। औपचारिक रूप से DK = argminₚ aₚ over the karaka set।

उदाहरण: ऊपर की सारणी में सबसे न्यून शनि 3°15′ → दारकारक। राहु हटाकर ७-योजना लेने पर भी न्यूनतम पुन: शनि ही रहता है (शेष rank पुनर्गणित)।

हमारा डिकोड: यह पूरा चर-कारक क्रम एक ही आदिम-गणित पर टिका है — λ mod 30° — वही भोगांश जिससे हमारा वर्ग-इंजन D1…D60 का प्रत्येक विभाजन निकालता है (dossier §2, kaal_ekavimshati_varga.py)। कारक केवल इस भिन्नात्मक भाग की rank लेता है; वर्ग उसी भाग को समान चापों में बाँटता है — दोनों विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित, एक ही नींव पर दो अलग निर्माण।

32.16
मातृकारकमेवाऽन्ये वदन्ति सुतकारकम्‌।
द्वौ ग्रहौ भागतुल्यौ चेज्जायेतां यस्य जन्मनि
mātṛkārakamevā'nye vadanti sutakārakam‌|
dvau grahau bhāgatulyau cejjāyetāṃ yasya janmani

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातृकारकम् एव = मातृकारक को ही; अन्ये वदन्ति = कुछ अन्य कहते हैं; सुतकारकम् = सुतकारक (पुत्र/संतान-कारक); द्वौ ग्रहौ = दो ग्रह; भाग-तुल्यौ = राश्यांश (भोगांश) में समान; चेत् जायेताम् = यदि जन्म में हों; यस्य जन्मनि = जिसके जन्म-काल में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उल्लेख करता है कि कुछ आचार्य मातृकारक को ही सुतकारक भी मानते हैं — यह पाठ/मत-भेद का संकेत है। फिर नियम: यदि किसी के जन्म में दो ग्रह राश्यांश में बिल्कुल समान हों, तो (अगले श्लोक में) कारक-पद का लोप होता है। यहाँ «भाग» = राश्यांश (sign longitude fraction), पूर्ण देशांतर नहीं।

English rendering Some authorities, the text notes, treat the mātṛ-kāraka itself as also the suta-kāraka. And if, at a birth, two planets arise equal in bhāga (degree-within-sign), then the special rule of the next verse applies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चर-कारक के लिए तुलना-कुंजी:
- λᵢ = ग्रह i का भोगांश (0° ≤ λᵢ < 30°), राश्यांश; (कई परंपराएँ 0°–30° के भीतर दशमलव अंश का उपयोग करती हैं; केतु/राहु पर पाठ-भेद संभव।)
- क्रम: λ के अनुसार अवरोही श्रेणी → ātma, amātya, bhrātṛ, mātṛ, putra/suta, jñāti, dāra (पद-संख्या पाठानुसार)।
- शर्त: यदि λₐ == λ_b (exact equality of bhāga), तो 32.17 का लोप-नियम।
«अन्ये वदन्ति» = मत-भेद; इस संस्करण में मातृ ≡ सुत नहीं थोपा जाता — केवल उल्लेख।

उदाहरण (worked example) मानें राश्यांश: सूर्य 12.40°, चंद्र 28.15°, मंगल 5.10°, बुध 28.15°, गुरु 18.00°, शुक्र 3.20°, शनि 21.50° (राहु/केतु इस उदाहरण से बाहर; अयनांश/गृह-पद्धति यहाँ अप्रासंगिक — केवल राश्यांश)।
बुध == चंद्र = 28.15° (exact)। अवरोही क्रम में दोनों «एक ही सीढ़ी» पर; अगला श्लोक कहता है अग्र-कारक का लोप — अर्थात् एक पद सूची से हटता/संकुचित होता है, स्थिर-कारक से फल देखा जाता है।

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32.17
तदग्रकारकस्यैवं लोपो ज्ञेयो द्विजोत्तम।
स्थिरकारकवशात्तस्य फलं ज्ञेयं शुभाऽशुभम्‌
tadagrakārakasyaivaṃ lopo jñeyo dvijottama|
sthirakārakavaśāttasya phalaṃ jñeyaṃ śubhā'śubham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-अग्र-कारकस्य = उस (समान-भाग युगल में) अग्र-कारक का; एवम् लोपः = इस प्रकार लोप (पद-हानि/संयोग); ज्ञेयः = जानना चाहिए; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; स्थिर-कारक-वशात् = स्थिरकारक के वश/आधार से; तस्य फलम् = उसका फल; ज्ञेयम् = जानना; शुभ-अशुभम् = शुभ अथवा अशुभ (शास्त्रोक्त संकेत के रूप में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: दो ग्रह भाग-तुल्य हों तो अग्र-कारक का लोप समझें, हे द्विजोत्तम। उस स्थिति में संबंधित फल स्थिर-कारक के अनुसार जानना चाहिए — शुभ-अशुभ दोनों पक्ष शास्त्र की भाषा में। यह चर-प्रणाली की «समान-अंश» समस्या का समाधान है: चर-पद गिरता है, स्थिर-पद सहारा बनता है।

English rendering In that case, O best of the twice-born, the higher (agra) kāraka is to be understood as lapsed (lopa). Its results—auspicious or otherwise as the śāstra frames them—are then to be known from the sthira-kāraka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नियम (चर-कारक, भाग-तुल्यता):
1. भोगांश से अवरोही सूची बनाएँ।
2. यदि दो (या अधिक) ग्रह exact समान भोगांश पर हों → एक कारक-पद लुप्त (लोप); «अग्र» = क्रम में ऊपरी/पूर्व पद (पाठ की दिशा: तत्-अग्र-कारकस्य लोपः)।
3. लुप्त पद का फल-संदर्भ = स्थिर-कारक (32.18+), चर-सूची नहीं।
कोई संख्यात्मक फल-सूत्र नहीं — संरचनात्मक नियम: equality → lopa → fallback to sthira.

उदाहरण (worked example) 32.16 के आँकड़ों पर: चंद्र व बुध दोनों 28.15°। चर-सूची में वे एक साथ एक «सीढ़ी» साझा करते हैं → शास्त्रानुसार अग्र-कारक-पद का लोप; दंपति/मातृ आदि संबंधित संकेत जहाँ चर-पद गिरा हो, स्थिर-कारक (सूर्य-शुक्र बल से पिता, चंद्र-मंगल बल से माता, आदि — आगे के श्लोक) से देखा जाता है। तुलना strict `==` (सहिष्णु-पट्टी नहीं) — अंश-दशमलव की घोषित परिशुद्धता पर निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) चर/स्थिर-कारक-नियम गणितीय तुलना (राश्यांश-क्रम, exact equality) हैं, फल-कथन नहीं। हमारी विधि वही अनुशासन रखती है जो aṣṭakavarga/varga/daśā में है: संख्या `==` से जाँचे, सहिष्णु-बैंड से मत छिपाएँ; फल को «शास्त्र कहता है» के रूप में रखें, नियति के रूप में नहीं।

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32.18
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि स्थिराख्यान्‌ करकग्रहान्‌।
स पितृकारको ज्ञेयो यो बली रविशुक्रयोः
adhunā sampravakṣyāmi sthirākhyān‌ karakagrahān‌|
sa pitṛkārako jñeyo yo balī raviśukrayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधुना = अब; सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; स्थिराख्यान् कारक-ग्रहान् = स्थिर-नामक कारक-ग्रहों को; स पितृकारकः ज्ञेयः = वह पितृकारक जाना जाए; यः बली = जो बलवान् हो; रवि-शुक्रयोः = सूर्य और शुक्र में से।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र स्थिर-नामक कारक-ग्रहों का कथन आरंभ करता है। पितृकारक वह है जो सूर्य और शुक्र — इन दोनों में — बल में श्रेष्ठ हो। स्थिर-कारक जन्म-अंश से नहीं बदलते; वे ग्रह-युगल या नियत ग्रह पर आधारित «स्थायी» संकेत हैं।

English rendering I shall now set forth the grahas called sthira-kārakas. That one which is the stronger of the Sun and Venus is to be known as the pitṛ-kāraka (father-significator).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
पितृकारक (स्थिर):
- उम्मीदवार: {रवि, शुक्र}
- नियम: pitṛ-kāraka = argmax(B(रवि), B(शुक्र)), जहाँ B = शास्त्रोक्त बल (प्रायः षड्बल-योग, अथवा पारंपरिक बल-तुलना; सम्पूर्ण षड्बल Ch.27: स्थान + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग्, 1 रूप = 60 विरूप)।
- यदि B(रवि) > B(शुक्र) → सूर्य = पितृकारक; उल्टा तो शुक्र; बराबरी पर पाठ मौन — पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव।
यह चर-कारक (अंश-क्रम) से अलग मॉड्यूल है।

उदाहरण (worked example) मानें षड्बल (रूप में, काल्पनिक स्पष्ट मान): सूर्य = 6.2 रूप, शुक्र = 5.4 रूप → पितृकारक = सूर्य। यदि शुक्र = 7.1, सूर्य = 5.8 → पितृकारक = शुक्र। बल-अवयवों की गणना में अयनांश (राश्यांश/भाव), गृह-पद्धति (दिक्बल), और काल-निर्देश घोषित करने आवश्यक हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल (BPHS Ch.27) को हम स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग् के योग के रूप में रूप-विरूप में गिनते हैं — गणना व्याख्या नहीं। स्थिर-कारक का «बली» वही बल-योग है; फल-वाक्य अलग परत रहती है।

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32.19
चन्द्रारयोर्बली खेटो मातृकारक उच्यते।
भौमतो भगिनी श्यालः कनीयान्‌ जननीत्यपि
candrārayorbalī kheṭo mātṛkāraka ucyate|
bhaumato bhaginī śyālaḥ kanīyān‌ jananītyapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चंद्र-अरयोः = चंद्र और मंगल में; बली खेटः = बलवान् ग्रह; मातृकारकः उच्यते = मातृकारक कहा जाता है; भौमात् = मंगल से; भगिनी = बहन; श्यालः = साला/बहनोई-पक्ष (श्यालक); कनीयान् = छोटा भाई/कनिष्ठ; जननी इति अपि = माता भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: चंद्र और मंगल में जो बलवान् हो, वही मातृकारक कहा जाता है। साथ ही मंगल स्वयं से भगिनी, श्याल, कनिष्ठ (और पाठानुसार जननी भी) चिंतनीय हैं — अर्थात् भौम स्थिर-संकेत में भ्रातृ-भगिनी-कुल और मातृ-संबंध का विस्तार। पिता-युगल (रवि-शुक्र) के समान माता-युगल (चंद्र-मंगल) है।

English rendering The stronger of the Moon and Mars is called the mātṛ-kāraka. From Mars are considered sister, brother-in-law (śyāla), the younger sibling, and mother as well.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
मातृकारक (स्थिर):
- उम्मीदवार: {चंद्र, मंगल}
- mātṛ-kāraka = argmax(B(चंद्र), B(मंगल))
- अतिरिक्त स्थिर-संकेत (भौम-से, बल-तुलना नहीं — नियत ग्रह):
भौम → भगिनी, श्याल, कनीयान्, जननी (शास्त्र-सूची)।
«जननी» यहाँ भौम-सूची में भी है; मातृकारक-पद चंद्र-मंगल बली से अलग परत — दोनों शास्त्र में साथ दिए गए हैं।

उदाहरण (worked example) षड्बल: चंद्र = 7.5 रूप, मंगल = 4.8 रूप → मातृकारक = चंद्र। भगिनी/श्याल/कनिष्ठ का स्थिर-संदर्भ फिर भी भौम-ग्रह पर (श्लोक का दूसरा चरण); मातृकारक-पद चंद्र पर। बल-समानता पर पाठ मौन — पाठ-भेद संभव।

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32.20
बुधान्मातृसजातीया मातुलाद्याश्च बान्धवाः।
गुरोः पितामहः शुक्रात्‌ पितः पुत्रः शनैश्चरात्‌
budhānmātṛsajātīyā mātulādyāśca bāndhavāḥ|
guroḥ pitāmahaḥ śukrāt‌ pitaḥ putraḥ śanaiścarāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधात् = बुध से; मातृ-सजातीयाः = माता की सजातीय (मातृ-कुल/मातृ-पक्ष सजातीय); मातुलाद्याः = मामा आदि; च बान्धवाः = और बांधव; गुरोः = गुरु से; पितामहः = पितामह (दादा); शुक्रात् = शुक्र से; पिता = पिता; पुत्रः शनैश्चरात् = शनि से पुत्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्थिर-कारकों का ग्रह-वार मानचित्र देता है: बुध से मातृ-सजातीय, मामा आदि बांधव; गुरु से पितामह; शुक्र से पिता; शनि से पुत्र। यह चर-कारक-पदों का विकल्प नहीं, स्थिर-नाम की नियत ग्रह-सूची है। शुक्र यहाँ «पिता» भी है — 32.18 के रवि-शुक्र बली-पितृकारक के साथ पढ़ें: शुक्र पितृ-क्षेत्र में द्विविध भूमिका रख सकता है (बली-चयन + स्थिर-सूची)।

English rendering From Mercury: maternal co-kin, maternal uncles and such relatives. From Jupiter: the paternal grandfather. From Venus: the father. From Saturn: the son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थिर-कारक का नियत मानचित्र (ग्रह → संबंध-पद)। संरचना:

| ग्रह | स्थिर-संकेत (इस श्लोक) |
|------|-------------------------|
| बुध | मातृ-सजातीय, मातुलादि बांधव |
| गुरु | पितामह |
| शुक्र | पिता |
| शनि | पुत्र |

तुलना/भाग/वर्ष-सूत्र नहीं; केवल असाइनमेंट। 32.18–19 के बली-नियम (रवि-शुक्र, चंद्र-मंगल) इस तालिका के पूरक हैं।

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32.21
विप्रान्तेवासिनः पत्नी पितरौ श्वशुरौ तथा।
मातामहादयश्चिन्त्या एते च स्थिरकारका
viprāntevāsinaḥ patnī pitarau śvaśurau tathā|
mātāmahādayaścintyā ete ca sthirakārakā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विप्रात् = गुरु (विप्र = ब्राह्मण-ग्रह = गुरु) से; अन्तेवासिनः = शिष्य/अंतेवासी; पत्नी = पत्नी; पितरौ = माता-पिता / पितर; श्वशुरौ तथा = तथा श्वशुर-श्वश्रू; मातामह-आदयः = नाना आदि; चिन्त्याः = चिंतनीय; एते च स्थिर-कारकाः = और ये स्थिरकारक हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे जोड़ता है: गुरु से शिष्य, पत्नी, पितर, श्वशुर-द्वय, मातामह आदि चिंतनीय हैं। और घोषणा: ये (पूर्वोक्त सहित) स्थिर-कारक हैं। इस श्लोक से स्थिर-अध्याय-खंड बंद होता है — चर (अंश-क्रम, लोप-नियम) एक प्रणाली; स्थिर (नियत ग्रह + बली-युगल) दूसरी। दोनों को मिलाकर कारक-विवेक पूरा होता है; फल-कथन शास्त्र की भाषा में रहें, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering From Jupiter (vipra) are to be considered disciples, the wife, the parents, the parents-in-law, the maternal grandfather and the like. And these are the sthira-kārakas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थिर-कारक-सूची का विस्तार व समापन-घोषणा।
संयुक्त स्थिर-मानचित्र (32.18–21, इस पाठानुसार):

| स्रोत | संकेत |
|--------|--------|
| बली(रवि, शुक्र) | पितृकारक |
| बली(चंद्र, मंगल) | मातृकारक |
| मंगल | भगिनी, श्याल, कनिष्ठ, जननी |
| बुध | मातृ-सजातीय, मातुलादि बांधव |
| गुरु | पितामह; शिष्य, पत्नी, पितर, श्वशुर, मातामह आदि |
| शुक्र | पिता (सूची); पितृ-युगल में उम्मीदवार |
| शनि | पुत्र |

पाठ-भेद संभव: अन्य संस्करणों में स्थिर-सूची थोड़ी भिन्न हो सकती है; यह संस्करण Wikisource-पाठ पर पिन है।

32.22
अथाऽहं कारकान्‌ वक्ष्ये खेटभाववशाद्‌द्विज।
रवितः पुन्यभे तातश्चन्द्रान्माता चतुर्थके
athā'haṃ kārakān‌ vakṣye kheṭabhāvavaśād‌dvija|
ravitaḥ punyabhe tātaścandrānmātā caturthake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब / आगे; कारकान् = कारक (संबंध-सूचक ग्रह/भाव); खेट = ग्रह; भाव = भाव (घर); वशात् = के अनुसार; रवितः = सूर्य से; पुन्यभे / पुण्यभे = नवम भाव (पुण्य-भ / धर्म-स्थान); तातः = पिता; चन्द्रात् = चन्द्र से; माता = माता; चतुर्थके = चतुर्थ भाव में।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं — अब मैं द्विज को ग्रह और भाव के आधार पर कारकों का वर्णन करूँगा। सूर्य से गिने हुए नवम भाव में पिता-संबंध का विचार करना चाहिए; चन्द्र से गिने हुए चतुर्थ भाव में माता-संबंध का। यह खेट-भाव-वश कारक-व्यवस्था का आरंभ है — न कि स्वतन्त्र “भाग्य-वाक्य”, अपितु शास्त्रीय संकेत-तालिका।

English rendering Parāśara now states the kārakas by graha and bhāva: from the Sun, the father is considered in the ninth (puṇya-bha); from the Moon, the mother in the fourth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संबंधी-कारक नियम (खेट → भाव-गणना):
पिता: 9वाँ भाव सूर्य की राशि से (whole-sign / राशि-गणना जब अन्य पद्धति न कही हो)।
माता: 4था भाव चन्द्र की राशि से।
सामान्य रूप: संबंध-भाव = (कारक-ग्रह की राशि-संख्या + n − 1) mod 12, जहाँ n = 9 (पिता), 4 (माता); राशि-संख्या 1…12। यह विभाजन-सूत्र नहीं — नियत n-घर गणना है।

उदाहरण (worked example) सूर्य मेष (राशि 1) में हो; पिता-कारक भाव = 1 + 9 − 1 = 9 → धनु (सूर्य से 9वाँ)। चन्द्र कन्या (6) में हो; माता-कारक भाव = 6 + 4 − 1 = 9 → धनु (चन्द्र से 4था)। (राशि-गणना; अयनांश यहाँ भाव-गिनती नहीं बदलता — केवल ग्रह-स्थिति निर्धारण में।)

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32.23
कुजात्‌ तृतीयतो भ्राता बुधात्‌ षष्थे च मातुलः।
देवेज्यात्‌ पञ्चमात्‌ पुत्रो दाराः शुक्राच्च सप्तमे
kujāt‌ tṛtīyato bhrātā budhāt‌ ṣaṣthe ca mātulaḥ|
devejyāt‌ pañcamāt‌ putro dārāḥ śukrācca saptame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजात् = मंगल से; तृतीयतः = तृतीय भाव से/में; भ्राता = भाई; बुधात् = बुध से; षष्ठे = षष्ठ भाव में; मातुलः = मामा (माता का भाई); देवेज्यात् = गुरु से (देवेज्य = बृहस्पति); पञ्चमात् = पञ्चम से; पुत्रः = पुत्र; दाराः = पत्नी / दारा; शुक्रात् = शुक्र से; सप्तमे = सप्तम भाव में।

हिन्दी भावार्थ मंगल से तृतीय भाव में भ्राता का विचार; बुध से षष्ठ में मातुल का; गुरु (देवेज्य) से पञ्चम में पुत्र का; शुक्र से सप्तम में दारा (जीवनसाथी) का। शास्त्र यहाँ प्रत्येक संबंध को एक नियत कारक-ग्रह और एक नियत भाव-दूरी से बाँधता है — ताकि विचार व्यवस्थित रहे।

English rendering From Mars the brother is taken from the third; from Mercury the maternal uncle in the sixth; from Jupiter the son from the fifth; and from Venus the spouse in the seventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विस्तारित खेट→भाव तालिका (पूर्व श्लोक + यह):
| संबंध | कारक-ग्रह | n (भाव) |
| भ्राता | मंगल (कुज) | 3 |
| मातुल | बुध | 6 |
| पुत्र | गुरु (देवेज्य) | 5 |
| दारा | शुक्र | 7 |
भाव-राशि = (ग्रह-राशि + n − 1) mod 12 (1…12)।

उदाहरण (worked example) मंगल वृष (2) → भ्राता-भाव = 2+3−1 = 4 → कर्क। बुध मिथुन (3) → मातुल = 3+6−1 = 8 → वृश्चिक। गुरु मकर (10) → पुत्र = 10+5−1 = 14 ≡ 2 → वृष। शुक्र तुल (7) → दारा = 7+7−1 = 13 ≡ 1 → मेष। (whole-sign from the karaka planet.)

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32.24
मन्दादष्टमतो मृत्युः पित्रादीनां विचिन्तयेत्‌।
इति सर्व विचार्यैव बुधस्तत्तत्‌ फलं वदेत्‌
mandādaṣṭamato mṛtyuḥ pitrādīnāṃ vicintayet‌|
iti sarva vicāryaiva budhastattat‌ phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दात् = शनि से; अष्टमतः = अष्टम भाव से/में; मृत्युः = मृत्यु / आयु-अंत संकेत; पित्रादीनाम् = पिता आदि (संबंधियों) का; विचिन्तयेत् = विचार करे; सर्वम् = सब; विचार्य = सोच-विचार कर; बुधः = विद्वान् / ज्ञानी ज्योतिषी; तत्-तत् फलम् = उस-उस का फल; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शनि से अष्टम भाव में मृत्यु-संबंधी विचार (पितृ आदि के संदर्भ में) करना चाहिए। इन सब कारकों का सम्यक् विचार करके ही बुध (विद्वान्) संबंधित फल कहे — शास्त्र यहाँ सावधानी और समग्र दृष्टि की माँग करता है, अधूरे संकेत से नहीं।

English rendering From Saturn, death is considered from the eighth; one should examine [these] for father and the rest. Only after fully weighing all of this should the wise declare the respective results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मृत्यु-संकेत नियम: शनि से 8वाँ भाव —
मृत्यु-भाव-राशि = (शनि-राशि + 8 − 1) mod 12।
पूरा कारक-सेट (32.22–24, शास्त्र-कथन):
सूर्य→9 पिता; चन्द्र→4 माता; मंगल→3 भ्राता; बुध→6 मातुल; गुरु→5 पुत्र; शुक्र→7 दारा; शनि→8 मृत्यु।
गणितीय सूत्र नहीं संख्या-गुणन का — नियत n-मानों वाली lookup/modular house-count; फल “शास्त्र कहता है” स्तर पर, न कि नियति-घोषणा।

उदाहरण (worked example) शनि सिंह (5) में → मृत्यु-विचार भाव = 5+8−1 = 12 → मीन (शनि से 8वाँ)। किसी जन्म-पत्र में शनि-मीन-अक्ष पर स्थित ग्रह/भाव-स्वामी का अतिरिक्त भार इस तालिका का अनुप्रयोग है — फल-निर्णय अन्य बल, दशा, दृष्टि के साथ “सर्वं विचार्य”।

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32.25
अथाऽहं सम्प्रवक्ष्यामि प्रसङ्गाद्योगकारकान्‌।
खेटान्‌ जन्मनि जातस्य मिश्रः स्थितिवशाद्‌ द्विज
athā'haṃ sampravakṣyāmi prasaṅgādyogakārakān‌|
kheṭān‌ janmani jātasya miśraḥ sthitivaśād‌ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; प्रसङ्गात् = प्रसंगवश / इसी प्रकरण में; योगकारकान् = योग-कारक (योग बनाने वाले कारक ग्रह); खेटान् = ग्रहों को; जन्मनि = जन्म में; जातस्य = जातक के; मिश्रः = मिश्रित / संयुक्त; स्थितिवशात् = स्थिति के अनुसार; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ अब प्रसंगवश योगकारकों का स्पष्ट वर्णन होगा। जातक के जन्म-कालीन ग्रह अपनी-अपनी स्थितियों के मिश्रण से योगकारकत्व पाते हैं — अर्थात् केवल नाम से नहीं, स्थिति-गुण से। यह अगले श्लोकों की परिभाषा-श्रृंखला का द्वार है।

English rendering Next, in this same context, the yoga-kārakas are set forth: the birth grahas of the native become so according to their mixed positions, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योगकारक-परिभाषा का उपक्रम / वर्णन। आगे 32.26–28 में शर्तें (स्व/उच्च/मित्र राशि + केन्द्र-स्थिति) दी जाएँगी; यहाँ केवल प्रकरण-संकेत है कि कारकत्व स्थिति-आधारित (स्थितिवशात्) मिश्रण से आता है।

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32.26
स्वर्क्षे स्वोच्चे च मित्रर्क्षे मिथः केन्द्रगता ग्रहाः।
ते सर्वे कारकास्तेषु कर्मगस्तु विशेषतः
svarkṣe svocce ca mitrarkṣe mithaḥ kendragatā grahāḥ|
te sarve kārakāsteṣu karmagastu viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्क्षे = स्व-राशि में; स्वोच्चे = अपने उच्च में; मित्रर्क्षे = मित्र-राशि में; मिथः = परस्पर; केन्द्रगताः = केन्द्र (1, 4, 7, 10) में स्थित; ग्रहाः = ग्रह; ते सर्वे = वे सब; कारकाः = कारक; तेषु = उनमें; कर्मगः = दशम (कर्म) भाव में स्थित; तु विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह स्वराशि, उच्च, या मित्रराशि में हों और परस्पर केन्द्र-संबंध में हों — वे सब कारक कहलाते हैं। उनमें भी जो कर्म-स्थान (दशम) में हो, उसे शास्त्र विशेष कारक मानता है। यह स्थिति-गुण + केन्द्र-बंधन का नियम है।

English rendering Planets in their own, exaltation, or friendly signs and mutually placed in kendras are all kārakas; among them, the one in the tenth (karma) is especially so.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योगकारक-योग्यता (boolean शर्तें, राशि-घर पर):
1. राशि-गुण: ग्रह g ∈ {स्व-राशि, उच्च-राशि, मित्र-राशि}।
2. केन्द्र-बंध: दो ग्रहों gᵢ, gⱼ के राशि-अंतर d = min(|rᵢ−rⱼ|, 12−|rᵢ−rⱼ|) ∈ {0, 3, 6, 9} राशि-चरण — अर्थात् rⱼ ∈ {rᵢ, rᵢ±3, rᵢ±6, rᵢ±9} mod 12 (केन्द्र = 1,4,7,10 from each other / मिथः केन्द्र)।
3. विशेष भार: यदि g दशम में (लग्न से 10) → “विशेषतः कारक”।
केन्द्र-समुच्चय लग्न-सापेक्ष: K = {1, 4, 7, 10}।
(मित्र-राशि तालिका नैसर्गिक/तत्कालिक मित्र भेद पर निर्भर — परंपरा घोषित करें।)

उदाहरण (worked example) लग्न कर्क। गुरु धनु (स्व; लग्न से 6 — केन्द्र नहीं)। सूर्य मेष (उच्च; लग्न से 10 = कर्म)। चन्द्र कर्क (स्व; लग्न 1)। सूर्य–चन्द्र अंतर 9 राशि-चरण → मिथः केन्द्र (1↔10)। दोनों स्व/उच्च; सूर्य कर्मग → शास्त्र के अनुसार सूर्य यहाँ विशेष योगकारक-वर्ग में। (whole-sign houses; मित्रता-तालिका अलग घोषित।)

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32.27
यथा लग्ने सुखे कामे स्वोर्क्षोच्चस्था ग्रहा द्विज।
भवन्ति कारकाख्यास्ते विशेषेण च खे स्थिताः
yathā lagne sukhe kāme svorkṣoccasthā grahā dvija|
bhavanti kārakākhyāste viśeṣeṇa ca khe sthitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा = जैसे; लग्ने = प्रथम भाव (तनु/उदित राशि); सुखे = चतुर्थ भाव (सुख-केन्द्र); कामे = सप्तम भाव (काम/कलत्र-स्थान); स्व-ऋक्ष-उच्च-स्थाः = अपनी राशि अथवा उच्च राशि में स्थित; ग्रहाः = ग्रह; कारक-आख्याः = 'कारक' संज्ञा वाले; विशेषेण = विशेष रूप से; खे स्थिताः = दशम भाव (कर्म/आकाश-स्थान) में स्थित।

हिन्दी भावार्थ जैसे लग्न, चतुर्थ (सुख) और सप्तम (काम) भावों में अपनी अथवा उच्च राशि में बैठे ग्रह 'कारक' कहलाते हैं, वैसे ही — और उनमें भी विशेष रूप से — दशम (कर्म) भाव में स्थित ऐसा ग्रह प्रबल योगकारक होता है। संक्षेप में, केन्द्र में स्वक्षेत्री या उच्च ग्रह कारक बनता है, और दशमस्थ सर्वोपरि।

English rendering Just as planets posited in the 1st, 4th and 7th while occupying their own or exaltation sign are termed kārakas, so — and especially — is one thus placed in the 10th, the house of action.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) केन्द्र-समुच्चय = {1, 4, 7, 10}; शर्त = ग्रह ∈ (स्व-राशि ∨ उच्च-राशि); तब ⇒ योगकारक। बल-क्रम में दशम (10) > शेष केन्द्र। यह अंक-गणना नहीं, स्थान-आधारित योग्यता-नियम है: (स्वक्षेत्र ∨ उच्च) ∧ केन्द्रस्थ ⇒ कारक।

उदाहरण (worked example) मेष-लग्न मानें; शनि तुला (उच्च) में सप्तम भाव में — शर्त (उच्च ∧ केन्द्र = 7) पूर्ण ⇒ योगकारक। वही शनि यदि दशम (मकर, स्वक्षेत्र) में हो तो 'विशेषेण' और भी प्रबल।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "स्व-राशि/उच्च + केन्द्र = बल" ठीक वही मापदण्ड है जिसे षड्बल (BPHS अ.27) का स्थान-बल (उच्च/स्वक्षेत्र) और दिग्बल (केन्द्र) संख्या में तौलता है — रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप)। श्लोक का गुणात्मक कथन हमारे बल-नियमों में परिमेय (मापनीय) बन जाता है।

32.28
स्वमित्रोच्चर्क्षगो हेतुरन्योऽन्यं यदि केन्द्रगः।
सुहृत्‌ तद्‌गुणसम्पन्नः सोऽपि कारक उच्यते
svamitroccarkṣago heturanyo'nyaṃ yadi kendragaḥ|
suhṛt‌ tad‌guṇasampannaḥ so'pi kāraka ucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-मित्र-उच्च-र्क्ष-गः = स्व, मित्र या उच्च राशि में स्थित; हेतुः = कारण / मुख्य; अन्योन्यम् = एक-दूसरे से; यदि = यदि; केन्द्रगः = केन्द्र में गया हुआ; सुहृत् = मित्र (ग्रह); तद्-गुण-सम्पन्नः = उन्हीं गुणों से युक्त; सः अपि = वह भी; कारकः = कारक; उच्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह स्व/मित्र/उच्च राशि में हो (हेतु), और कोई अन्य ग्रह उसके साथ परस्पर केन्द्र में हो तथा वही सुहृद्-गुण (स्व-मित्र-उच्च आदि) धारण करे — तो वह मित्र-ग्रह भी कारक कहा जाता है। अर्थात् कारकत्व अकेले नहीं, केन्द्र-बंधित सुहृद्-युग्म तक फैलता है — शास्त्र का यह विस्तार-नियम है।

English rendering When one planet, placed in its own, friendly, or exaltation sign, stands as the cause, and another is mutually in a kendra from it, that friend endowed with the same qualities is also called a kāraka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) युग्म-नियम:
ग्रह A हेतु-कारक यदि राशि(A) ∈ {स्व, मित्र, उच्च}।
ग्रह B भी कारक यदि
(1) राशि(B) ∈ {स्व(B), मित्र(B), उच्च(B)} — तद्गुणसम्पन्न,
(2) B ∈ केन्द्र(A) अर्थात् राशि-अंतर ∈ {0, 3, 6, 9} mod 12।
मिथः केन्द्र: r_B ≡ r_A + k (mod 12), k ∈ {0, 3, 6, 9}।
यह फल-कथन नहीं — स्थिति-आधारित कारक-उपाधि का विस्तार सूत्र है।

उदाहरण (worked example) गुरु धनु (स्व) राशि 9; शुक्र कन्या (मित्र-क्षेत्र बुध का; शुक्र के लिए कन्या मित्र/सम — परंपरा-सापेक्ष; यहाँ शुक्र तुला स्व लें: राशि 7)। |9−7|=2 → केन्द्र नहीं। शुक्र मेष (राशि 1): |9−1|=8 → नहीं। शुक्र कर्क (4): |9−4|=5 → नहीं। शुक्र मीन (उच्च, 12): |9−12|=3 → केन्द्र (9↔12 = 1↔4 प्रकार)। गुरु स्व + शुक्र उच्च + मिथः केन्द्र → शास्त्र कहता है शुक्र भी कारक उच्यते। (मित्र-राशि: नैसर्गिक मित्रता तालिका अपनाएँ; तत्कालिक पञ्चधा-मैत्री अलग convention।)

32.29
नीचान्वयेऽपि यो जातः विद्यमाने च कारके।
सोऽपि राजमनो विप्र धनवान्‌ सुखसंयुतः
nīcānvaye'pi yo jātaḥ vidyamāne ca kārake|
so'pi rājamano vipra dhanavān‌ sukhasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचान्वये = निम्न/अल्प-कुल परम्परा में; अपि = फिर भी; यः जातः = जो जन्म ले; विद्यमाने कारके = (चर/स्थिर) कारक के विद्यमान/बलवान होने पर; राजमनो = राजा के मन के अनुकूल / राजमान्य (पाठ-भेद संभव: राजमान्यो); विप्र = हे ब्राह्मण; धनवान् = धन-संपन्न; सुखसंयुतः = सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि जन्म निम्न कुल-परम्परा में भी हुआ हो, किन्तु कारक (यहाँ प्रसंगानुसार संबंधित भाव/चर-कारक) विद्यमान और समर्थ हो, तो वह जातक भी राजा के अनुकूल, धनवान् और सुख-युक्त फल प्राप्त करता है। यह कथन कुल की न्यूनता को कारक की उपस्थिति से सन्तुलित करने का शास्त्रीय नियम है। फल-वर्णन शास्त्र का अपना दावा है; नियति या निश्चित भविष्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that even one born in a low lineage, when the relevant kāraka is present and effective, is also said to be favored in royal regard, wealthy, and endowed with happiness. The result is the śāstra’s claim, not a fixed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुल × कारक-उपस्थिति)। यहाँ संख्यात्मक विभाजन नहीं; तर्क-क्रम है: यदि कुल-स्तर न्यून हो और कारक विद्यमान हो → शास्त्र उक्त शुभ-फल का उल्लेख करता है।

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32.30
राजवंशसमुत्पन्नो राजा भवति निश्चयात्‌।
एवं कुलानुसारेण कारकेभ्यः फलं वदेत्‌
rājavaṃśasamutpanno rājā bhavati niścayāt‌|
evaṃ kulānusāreṇa kārakebhyaḥ phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजवंश-समुत्पन्नः = राज-कुल में उत्पन्न; राजा भवति = राजा होता है; निश्चयात् = निश्चित रूप से (शास्त्र-कथन की दृढ़ता); एवं = इसी रीति से; कुलानुसारेण = कुल/वंश के अनुरूप; कारकेभ्यः = कारकों से; फलं वदेत् = फल कहे/निर्धारित करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राज-वंश में उत्पन्न जातक राजा होता है, यह निश्चय से कहा गया है। इसी पद्धति से कुल की स्थिति के अनुसार कारकों से फल कहना चाहिए। अर्थात् कारक-फल को कुल-संदर्भ से जोड़कर बोला जाए — राजा-कुल में कारक-बल का फल राज-पद की भाषा में, अन्य कुल में उसी अनुपात की भाषा में। यह विधि-निर्देश है, सार्वभौम नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that one born of a royal line becomes a king with certainty (as the śāstra phrases it). In the same way, results from the kārakas should be declared in accordance with the native’s lineage-level.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-विधि-निर्देश (कुल-अनुपात से कारक-फल)। कोई अंश, वर्ष या बिंदु-गणना नहीं; केवल निर्णयात्मक ढाँचा: फल(कारक) को कुल-स्तर से मापकर कहें।

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32.31
अथाऽहं सम्प्रवक्ष्यामि विशेषं भावकारकान्‌।
जनस्य जन्मलग्नं यत्‌ विन्द्यादात्मकारकम्‌
athā'haṃ sampravakṣyāmi viśeṣaṃ bhāvakārakān‌|
janasya janmalagnaṃ yat‌ vindyādātmakārakam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अहं सम्प्रवक्ष्यामि = मैं सम्यक् कहूँगा; विशेषं = विशेष रूप से; भावकारकान् = भाव-कारक (भावों के नियामक/संकेतक ग्रह); जनस्य जन्मलग्नं = जातक का जन्म-लग्न; यत् = जो; विन्द्यात् = जाने; आत्मकारकम् = आत्मकारक (चर-कारक-श्रेणी का प्रमुख; सर्वाधिक अंश वाला ग्रह — प्रसंगानुसार)।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य विशेष रूप से भाव-कारकों का उपदेश आरम्भ करते हैं। जातक के जन्म-लग्न को जानें और आत्मकारक को पहचानें — यह आगे की कारक-व्यवस्था का द्वार है। लग्न देह-क्षेत्र का आरम्भ-बिन्दु है; आत्मकारक व्यक्तित्व-संकेत का प्रमुख ग्रह। दोनों को साथ रखकर भाव-कारक-विवेक आगे बढ़ता है।

English rendering “Now I shall specially declare the bhāva-kārakas. Know the native’s birth-lagna and the ātmakāraka.” The verse opens the house-significator discussion by fixing lagna and the chief chara-kāraka as reference points.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/उपक्रम (भाव-कारक-अध्याय का आरम्भ)। आत्मकारक की पूर्ण गणना (अंश-तुलना से चर-कारक-श्रेणी) इस श्लोक में नहीं दी; केवल “जाने” का निर्देश है। चर-कारक-नियम जहाँ अध्याय में विस्तृत हो, वहाँ ग्रह-अंशों की सापेक्ष-क्रम-गणना लागू होती है।

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32.32
धनभावं विजानीयाद्‌ दारकारकमेव हि।
एकादशेऽग्रजातस्य तृतीये तु कनीयसः
dhanabhāvaṃ vijānīyād dārakārakameva hi|
ekādaśe'grajātasya tṛtīye tu kanīyasaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनभावम् = द्वितीय भाव को; विजानीयात् = जाने; दारकारकम् एव हि = (यहाँ) दार-कारक (स्त्री-सम्बन्धी विचार-स्थान) ही — पाठ-भेद संभव; एकादशे = एकादश भाव में; अग्रजातस्य = ज्येष्ठ सहोदर का (विचार); तृतीये तु = तृतीय में; कनीयसः = कनिष्ठ का।

हिन्दी भावार्थ कारक-अध्याय का यह पद सम्बन्धियों के विचार-स्थान गिनाता है — पाठ के अनुसार द्वितीय भाव को दार-कारक (कुटुम्ब/स्त्री-विचार का स्थान) जानें; ज्येष्ठ सहोदर का विचार एकादश से और कनिष्ठ का तृतीय से। द्वितीय को दार-विचार से जोड़ना इस साक्षी का पाठ है — अन्य परम्पराएँ सप्तम को रखती हैं; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text says the second house is to be known as the significator-place of the spouse (reading uncertain); the eleventh stands for the elder sibling and the third for the younger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थान-कारकत्व सूची: भाव 2 → दार (इस पाठ में), भाव 11 → अग्रज, भाव 3 → कनिष्ठ।

32.33
सुते सुतं विजानीयात्‌ पत्नीं सप्तमभावतः।
सुतभवे ग्रहो यः स्यात्‌ सोऽपि कारक उच्यते
sute sutaṃ vijānīyāt‌ patnīṃ saptamabhāvataḥ|
sutabhave graho yaḥ syāt‌ so'pi kāraka ucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुते = पाँचवें भाव (सुत-भाव) में/से; सुतं विजानीयात् = पुत्र/संतति को जाने; पत्नीं = पत्नी को; सप्तम-भावतः = सातवें भाव से; सुतभवे = सुत-भाव (५) में; ग्रहो यः स्यात् = जो ग्रह स्थित हो; सोऽपि = वह भी; कारकः उच्यते = कारक कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश करता है — संतति का विचार सुत-भाव (५) से करें; पत्नी/जीवनसाथी का विचार सप्तम भाव से। जो ग्रह सुत-भाव में स्थित हो, उसे भी (उस विषय का) कारक कहा जाता है। अर्थात् भाव-स्वामी/स्थिर-कारक के अतिरिक्त, भाव-स्थित ग्रह भी उसी भाव-विषय का कारक-संकेत बनता है। यह कारक-परिभाषा का विस्तार है, न कि कोई दंड-फल।

English rendering Know offspring from the fifth (suta) house and the spouse from the seventh. Whichever planet occupies the child-house is also called a kāraka (for that theme).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-सूचकांक नियम (घर-प्रणाली घोषित करें):
- संतति-विचार → भाव ५
- पत्नी/दम्पती-विचार → भाव ७
- यदि ग्रह G, भाव ५ में स्थित → G भी सुत-कारक कहा जाता है

घर-प्रणाली (पूर्ण-राशि / श्रीपति / प्लसिडस आदि) घोषित करनी चाहिए; इस श्लोक में केवल भाव-संख्या का संकेत है, कुंडली-रेखा-गणित नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष, पूर्ण-राशि भाव। तब भाव ५ = सिंह, भाव ७ = तुला। यदि गुरु सिंह में हो → शास्त्र-रीति से गुरु सुत-विषय का कारक भी कहा जाएगा; शुक्र यदि तुला में हो तो सप्तम-स्थित होकर दम्पती-विषय का अतिरिक्त संकेत देगा। (अयनांश: उदाहरण-स्वतंत्र; केवल राशि-स्थान प्रयुक्त।)

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32.34
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौभः सितः शनिः।
गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भवकारकाः
sūryo guruḥ kujaḥ somo gururbhaubhaḥ sitaḥ śaniḥ|
guruścandrasuto jīvo mandaśca bhavakārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यः = रवि; गुरुः = बृहस्पति; कुजः = मंगल; सोमः = चन्द्र; गुरुः = बृहस्पति; भौमः (पाठ "भौभः" → भौमः, पाठ-भेद संभव) = मंगल; सितः = शुक्र; शनिः = शनि; गुरुः = बृहस्पति; चन्द्र-सुतः = बुध (चन्द्र-पुत्र); जीवः = बृहस्पति; मन्दः = शनि; भव-कारकाः = भाव-कारक (गण)।

हिन्दी भावार्थ बारह भावों के स्वाभाविक कारक-ग्रह क्रमशः ये हैं — रवि, गुरु, मंगल, चन्द्र, गुरु, मंगल, शुक्र, शनि; तथा गुरु, बुध, गुरु, शनि। ये 'भाव-कारक' (स्थिर स्वाभाविक कारक) कहलाते हैं। भौम-पाठ में लिपि-दोष है (भौभः → भौमः)।

English rendering The Sun, Jupiter, Mars, the Moon, Jupiter, Mars, Venus, Saturn; then Jupiter, Mercury, Jupiter, Saturn — these are the natural significators of the (twelve) houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नियत भाव→कारक सारणी (12 भाव ⇾ 7 ग्रह), श्लोक-क्रमानुसार:
1 तनु → सूर्य · 2 धन → गुरु · 3 सहज → मंगल · 4 सुख → चन्द्र · 5 पुत्र → गुरु · 6 अरि → मंगल · 7 कलत्र → शुक्र · 8 रन्ध्र → शनि · 9 धर्म → गुरु · 10 कर्म → बुध · 11 लाभ → गुरु · 12 व्यय → शनि।
गुरु ← {2,5,9,11}, मंगल ← {3,6}, शनि ← {8,12}; सूर्य/चन्द्र/शुक्र/बुध ← एक-एक भाव। (कुछ रेसेन्शन सूर्य को 9/10 व बुध को 4 का सह-कारक भी देते हैं — पाठ-भेद संभव; यहाँ एक-भाव-एक-कारक पाठ प्रस्तुत।)

उदाहरण (worked example) सप्तम (कलत्र) भाव-फल पढ़ते समय भाव-कारक शुक्र की स्थिति/बल को मुख्य साक्षी लिया जाता है; रन्ध्र (8) के लिए शनि, कर्म (10) के लिए बुध — इसी सारणी से।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह नियत भाव→कारक सारणी ठीक वैसी ही निर्धारक (deterministic) लुक-अप है जैसी अष्टकवर्ग (अ.66) की रेखा-सारणियाँ (रवि 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV 337) या षोडश-वर्ग की समान-अंश-विभाजन-नियम — जिन्हें हमारा ओरैकल किसी सहिष्णुता-पट्टी के बिना, ठीक `==` से पिन करता है। कारक या तो नियत है या नहीं; बीच में कुछ नहीं।

32.35
पुनस्तन्वादयो भावः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम्‌।
लाभस्तृतीयो रन्ध्रश्च शत्रुसंज्ञधनव्ययाः
punastanvādayo bhāvaḥ sthāpyāsteṣāṃ śubhā'śubham‌|
lābhastṛtīyo randhraśca śatrusaṃjñadhanavyayāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुनः = फिर; तन्वादयः भावाः = तनु (१) से आरम्भ बारह भाव; स्थाप्याः = स्थापित/निर्धारित करने योग्य; तेषां शुभाशुभम् = उनका शुभ और अशुभ (फल/स्थिति); लाभः = ११वाँ भाव; तृतीयः = ३रा; रन्ध्रः = ८वाँ; शत्रु-संज्ञ = ६ठा (शत्रु-संज्ञक); धन = २रा; व्ययाः = १२वाँ (व्यय)।

हिन्दी भावार्थ पुनः तनु से लेकर सभी भाव स्थापित कर उनके शुभ-अशुभ का विचार करना चाहिए। श्लोक द्वितीय चरण में भाव-नामों का स्मरण कराता है — लाभ (११), तृतीय (३), रन्ध्र (८), तथा शत्रु-संज्ञ (६), धन (२), व्यय (१२)। ये नाम भाव-संख्या की पारंपरिक संज्ञाएँ हैं; आगे के फल-विवेक में इन्हीं संज्ञाओं से भाव पहचाने जाते हैं। शुभाशुभ-निर्णय शास्त्रीय संकेत है, भय या निश्चित-अनिष्ट की घोषणा नहीं।

English rendering Again the houses from the body-house (tanu, 1st) onward are to be established and their auspicious and inauspicious conditions weighed. The verse recalls house-names: lābha (11), tṛtīya (3), randhra (8), and those termed śatru (6), dhana (2), and vyaya (12).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/संज्ञा-सूची + शुभाशुभ-विचार का उपक्रम। तकनीकी सार:
- भाव-क्रम: B₁…B₁₂, B₁ = तनु/लग्न-राशि (घोषित घर-प्रणाली से)
- संज्ञा-मानचित्र: धन=२, तृतीय=३, शत्रु=६, रन्ध्र=८, लाभ=११, व्यय=१२
- “शुभाशुभ” का मात्रात्मक रूप (बल, दृष्टि, अष्टकवर्ग आदि) इस श्लोक में नहीं; केवल विचार का आदेश।

32.36
एते भावाः समाख्याताः क्रूराख्या द्विजसत्तम।
एषां योगेन यो भावस्तस्य हानिः प्रजायते
ete bhāvāḥ samākhyātāḥ krūrākhyā dvijasattama|
eṣāṃ yogena yo bhāvastasya hāniḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एते भावाः = ये (पूर्वोक्त) भाव; समाख्याताः = सम्यक् नामित / घोषित; क्रूराख्या = क्रूर-नाम से कहे गए; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; एषां योगेन = इनके संयोग/युति से; यो भावः = जो भाव; तस्य हानिः = उसकी हानि; प्रजायते = उत्पन्न होती है।

हिन्दी भावार्थ आचार्य कहते हैं—हे द्विजश्रेष्ठ, पूर्व में जिन भावों का निर्देश किया गया, वे क्रूर-नाम से समाख्यात हैं। उन क्रूर-भावों के योग से जिस भाव का सम्बन्ध बनता है, शास्त्र कहता है कि उस भाव की हानि प्रजायमान होती है। यहाँ “हानि” को फल-कथन के रूप में पढ़ें, न कि नियति के रूप में।

English rendering These houses, O best of the twice-born, are declared under the designation krūra. The text states that by their combination, harm arises for whichever house is so yoked.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-वर्गीकरण व फल-कथन। यह श्लोक क्रूर-भावों के योग से “हानि” का शास्त्रीय संकेत देता है; कोई अंश, बिन्दु, दशा-वर्ष या बल-इकाई यहाँ नहीं गिनी गई।

32.37
भावा भद्राश्च केन्द्रारव्याः कोणाख्यौ द्विजसत्तम।
एषां संयोगमात्रेण ह्वशुभोऽपि शुभो भवेत्‌
bhāvā bhadrāśca kendrāravyāḥ koṇākhyau dvijasattama|
eṣāṃ saṃyogamātreṇa hvaśubho'pi śubho bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भावाः भद्राः = शुभ (मंगलकारी) भाव; केन्द्र-आख्याः = केन्द्र-संज्ञक (1,4,7,10); कोण-आख्यौ = कोण/त्रिकोण-संज्ञक (5,9 — द्विवचन); द्विज-सत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; एषां संयोग-मात्रेण = इनके संयोग-मात्र से; हि अशुभः अपि = अशुभ भी; शुभः भवेत् = शुभ हो जाता है।

हिन्दी भावार्थ केन्द्र (1, 4, 7, 10) और कोण/त्रिकोण (5, 9) — ये 'भद्र' (शुभ) भाव हैं। इनके संयोग-मात्र से अशुभ भी शुभ हो जाता है, ऐसा शास्त्र कहता है। यह श्लोक क्रूर-भाव-समुच्चय का पूरक (complement) शुभ-भाव-समुच्चय देता है।

English rendering The auspicious houses, O best of the twice-born, are the kendras and the trikoṇas; by mere association with these even the inauspicious becomes auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भद्र-भाव-समुच्चय B = केन्द्र {1,4,7,10} ∪ त्रिकोण {5,9} = {1,4,5,7,9,10}। यह ठीक क्रूर-समुच्चय K = {2,3,6,8,11,12} का पूरक है: B ∪ K = {1..12}, B ∩ K = ∅। नियम: भाव यदि B-सदस्य से युक्त ⇒ अशुभत्व का शमन। स्थान-वर्गीकरण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ का 'कोण/त्रिकोण' वही त्रिकोण-अवधारणा है जिस पर हमारे अष्टकवर्ग-तन्त्र में त्रिकोण-शोधन (BPHS अ.67) फल से पूर्व SAV को घटाता है; और केन्द्र-त्रिकोण बनाम दुःस्थान का यह {1,4,5,7,9,10} / {2,3,6,8,11,12} विभाजन एक निर्धारक भाव-समुच्चय है — जिसे सहिष्णुता-पट्टी के बिना, ठीक-ठीक जाँचा जाता है (एक ±3 पट्टी अष्टकवर्ग में एक वास्तविक −1 को छिपा चुकी है)।

अध्यायः 33

कारकांशफलाध्यायः

99 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
यह अध्याय कारकांश के फल का व्यवस्थित वर्णन करता है—जब आत्मकारक (या संबंधित कारक) का अंश मेषादि राशियों में स्थित हो, तब शास्त्र किन लक्षणों और परिस्थितियों को फल-रूप में कहता है। आरंभ में “यथावद् ब्रह्मभाषितम्” कहकर पाठ की प्रामाणिकता और क्रमबद्धता का संकेत दिया गया है; तत्पश्चात् राशि-क्रम से गृह-जीव, चतुष्पद, जल, अग्नि, व्यापार-पटुता, सर्प-पीड़ा आदि के शास्त्रीय फल-वाक्य आते हैं। अध्याय का महत्व यही है कि कारक-सिद्धांत (कारक कौन, अंश कहाँ) के बाद फल-कोश खुलता है—अर्थात् गणना का अंत और पाठ-कथन का आरंभ। नब्बे-नौ श्लोकों में कारकांश की राशि-स्थिति, उसके योग-दोष-संयोग, तथा संबंधित भाव-ग्रह-संकेतों को एक ही फल-श्रृंखला में बाँधा गया है; टुकड़े अलग-अलग नहीं, बल्कि “अंश कहाँ → फल-वाक्य क्या” की एक निरंतर रीति हैं।

For the English reader:
Adhyāya 33 is the fruit-chapter of the kāraka system: once the ātmakāraka (and, by extension, the relevant kāraka) has been fixed and its aṃśa—its navāṃśa sign—is known, the text states, sign by sign from Meṣa onward, the phala associated with that placement. It does not invent a new engine; it unfolds the classical result-catalogue that follows the kāraka–aṃśa map already established in the preceding chapters. Read it as reportage of the śāstra’s own statements—house-creatures, quadrupeds, water, trade, and the rest—not as personal destiny, and the chapter becomes a clean bridge from computational identity of the kārakāṃśa to the traditional language of result.

मुख्य गणित/तकनीक:
- कारकांश (kārakāṃśa) = आत्मकारक की नवमांश (D9) राशि-स्थिति—पूर्व-अध्यायों में निश्चित कारक का अंश-मानचित्र।
- फल-क्रम: कारकांश ∈ {मेष, वृष, …, मीन} पर आधारित शास्त्रीय फल-वाक्य (मुख्यतः वर्णन; नई संख्या-सारिणी नहीं)।
- संयोग-शर्तें: पाप-युक्त अंश, भाव-ग्रह-युति आदि—पाठ में फल-संशोधक के रूप में, न कि अलग इंजन के रूप में।

डिकोड-सेतु:
इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

33.1
अथाऽहं सम्प्रवक्ष्यामि कारकांशफलं द्विज।
मेषादिराशिगे स्वांशे यथावद्‌ ब्रह्मभाषितम्‌
athā'haṃ sampravakṣyāmi kārakāṃśaphalaṃ dvija|
meṣādirāśige svāṃśe yathāvad‌ brahmabhāṣitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरणारम्भ); अहम् = मैं (पराशर); सम्प्रवक्ष्यामि = भलीभाँति कहूँगा; कारकांशफलम् = कारकांश का फल — आत्मकारक ग्रह जिस नवांश-राशि (D9) में स्थित हो, उसका फल; द्विज = हे द्विज (मैत्रेय); मेषादिराशिगे = मेष आदि राशियों में गया हुआ; स्वांशे = स्वांश में (= कारकांश, आत्मकारक की अपनी नवांश-राशि); यथावत् = यथाक्रम/ठीक-ठीक; ब्रह्मभाषितम् = ब्रह्मा द्वारा कहा गया।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, अब मैं कारकांश का फल — जो स्वयं ब्रह्मा ने कहा है — यथावत् कहता हूँ। जिस राशि (मेष से लेकर मीन तक) के नवांश में आत्मकारक ग्रह बैठा हो, वही राशि "स्वांश" या "कारकांश" कहलाती है, और उसी से जातक का स्वभाव-फल पढ़ा जाता है। यह अध्याय उसी कारकांश-आधारित फल-विवेचन का शुभारम्भ है।

English rendering Now, O twice-born, I shall duly declare the fruits of the Kārakāṃśa — as spoken by Brahmā — according as the svāṃśa (the ātmakāraka's own navāṃśa sign) falls in Aries and the rest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह प्रस्तावना-श्लोक पूरे अध्याय की गणना-नींव तय करता है, अतः दो निर्णायक परिभाषाएँ (परम्परा/संकल्प घोषित):
- आत्मकारक (AK): सात ग्रहों में जिसका राशि-भीतर अंश सर्वाधिक हो — AK = argmaxₚ (λₚ mod 30°)। (7-ग्रह चर-कारक संकल्प; कुछ मत राहु को 30°−λ से जोड़ते हैं — पाठ/परम्परा-भेद।)
- नवांश (D9): एक राशि 30° ÷ 9 = 3°20′ (= 200′) के नौ खण्डों में; खण्ड-संख्या k = ⌊λ° ÷ 3°20′⌋ + 1, k ∈ {1…9}, जहाँ 0 ≤ λ° < 30° राशि-भीतर देशान्तर। नवांश-राशि = आरम्भ-राशि + (k−1), आगे गिनते हुए। आरम्भ-राशि तत्त्व से: अग्नि→मेष, पृथ्वी→मकर, वायु→तुला, जल→कर्क।
कारकांश = इसी D9 में AK जिस राशि में पड़े, वह।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए AK = बृहस्पति, मेष 15°00′ पर। λ° = 15°; k = ⌊15 ÷ 3.3333⌋ + 1 = 4 + 1 = 5वाँ नवांश। मेष अग्नि-राशि → आरम्भ मेष; नवांश-राशि = मेष + (5−1) = सिंह। अतः कारकांश = सिंह — और आगे श्लोक 33.4 के अनुसार "सिंहांशे श्वपदाद्‌ भयम्" का फल-कथन इसी पर लागू होगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश की पूरी इमारत D9 नवांश पर खड़ी है — और यही षोडश-वर्ग योजना (D1…D60) हमारे वर्ग-इंजन में विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित के रूप में लागू है (kaal_ekavimshati_varga.py): 30° चाप का समखण्ड, नियम-सम्मत राशि-प्रक्षेप। कारकांश-निर्धारण भी इसी नियतात्मक D9 विभाजन + AK के अंश-अधिकतम पर टिका है — गणना पहले, फल-कथन बाद में।

33.2
गृहे मूषकमार्जारा मेषांशे ह्वात्मकारके।
सदा भयप्रदा विप्र पापयुक्ते विशेषतः
gṛhe mūṣakamārjārā meṣāṃśe hvātmakārake|
sadā bhayapradā vipra pāpayukte viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = घर में; मूषक = चूहा; मार्जार = बिल्ली; मेषांशे = मेष-नवांश में (कारकांश मेष में); आत्मकारके = जब आत्मकारक (वहाँ स्थित हो) — "ह्यात्मकारके" (हि + आत्मकारके), पाठ-भेद संभव (ह्व/ह्य); आत्मकारक = स्व-कारक, उच्चतम-अंश ग्रह; सदा = निरन्तर; भयप्रदा = भय देने वाले; विप्र = हे विप्र; पापयुक्ते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, जब आत्मकारक मेष के नवांश (कारकांश) में हो, तो शास्त्र कहता है कि घर में चूहों और बिल्लियों से सदा भय-सा बना रहता है; और यदि उस कारकांश पर कोई पाप-ग्रह युक्त हो, तो यह लक्षण विशेष रूप से प्रकट होता है। यह मेष-कारकांश का स्वभाव-चिह्न मात्र है, कोई अटल विधान नहीं।

English rendering When the ātmakāraka lies in the Aries navāṃśa, the text states there is persistent trouble from rats and cats in the home, O Brahmin — the more so when a malefic joins that sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मेष-कारकांश का लक्षण)। यहाँ एकमात्र "चर" चिह्न है पाप-ग्रह की युति, जो फल को तीव्र करती है — अर्थात् फल कारकांश-राशि (नियत) × सहचर-ग्रह (दृष्टि/युति) का गुणनफल है, स्वयं भविष्यवाणी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय भय-कथनों से भरा है; हमारी पद्धति की अनुशासन-रेखा यहीं से लागू होती है — ऐसे वाक्य "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत, कभी नियति/निश्चय या भय-दबाव के रूप में नहीं। गणित (कारकांश-स्थिति, पाप-युति) और व्याख्या (भय-फल) को अलग रखना ही हमारे CLAUDE.md व oracle का मूल सिद्धान्त है।

33.3
वृषांशकगते स्वस्मिन्‌ सुखदाश्च चतुष्पदाः।
मिथुनांशगते तस्मिन्‌ कण्ड्‌वादिव्याधिसम्भवः
vṛṣāṃśakagate svasmin‌ sukhadāśca catuṣpadāḥ|
mithunāṃśagate tasmin‌ kaṇḍ‌vādivyādhisambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषांशकगते = वृष-नवांश में गया हुआ (कारकांश वृष में); स्वस्मिन् = अपने (स्वांश) में; सुखदाः = सुख देने वाले; चतुष्पदाः = चौपाये (गौ आदि पशु); मिथुनांशगते = मिथुन-नवांश में स्थित; तस्मिन् = उस (कारकांश) में; कण्डू-आदि = खुजली आदि; व्याधि = रोग; सम्भवः = उत्पत्ति/संभावना।

हिन्दी भावार्थ जब कारकांश वृष के नवांश में हो, तो शास्त्र कहता है कि चौपाये (गाय-बैल आदि पशु) जातक के लिए सुखकारी होते हैं। और जब वही कारकांश मिथुन के नवांश में हो, तो खुजली आदि (त्वचा-सम्बन्धी) व्याधि की संभावना बताई जाती है।

English rendering When the kārakāṃśa is in the Taurus navāṃśa, quadrupeds prove a source of comfort; when in the Gemini navāṃśa, the text notes the likelihood of skin ailments such as itching.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृष व मिथुन कारकांश के लक्षण)। ध्यातव्य: वृष स्थिर-पृथ्वी (पशु-सम्पदा) और मिथुन द्वि-वायु (त्वक्/श्वास) की तत्त्व-प्रकृति ही फल-कल्पना का आधार है — भाव भौतिक नहीं, साङ्केतिक।

33.4
कर्कांशे च जलाद्‌भीतिः सिम्हांशे श्वपदाद्‌भयम्‌।
कण्डूः स्थौल्यञ्च कन्यांशे तथा वह्निकणाद्‌भयम्‌
karkāṃśe ca jalād‌bhītiḥ simhāṃśe śvapadād‌bhayam‌|
kaṇḍūḥ sthaulyañca kanyāṃśe tathā vahnikaṇād‌bhayam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कांशे = कर्क-नवांश में; जलात् भीतिः = जल से भय; सिंहांशे = सिंह-नवांश में ("सिम्हांशे" — पाठ-भेद संभव); श्वपदात् भयम् = श्व-पद (कुत्ते जैसे) प्राणियों से भय; कण्डूः = खुजली; स्थौल्यम् = स्थूलता/मोटापा; कन्यांशे = कन्या-नवांश में; वह्निकणात् भयम् = अग्नि-कण (चिनगारी) से भय।

हिन्दी भावार्थ जब कारकांश कर्क के नवांश में हो तो शास्त्र जल से भय बताता है; सिंह के नवांश में श्वान आदि प्राणियों से भय; और कन्या के नवांश में खुजली, स्थूलता तथा अग्नि की चिनगारियों से भय का कथन है। ये उन-उन राशियों के तत्त्व-स्वभाव के संकेत हैं।

English rendering In the Cancer navāṃśa, fear from water; in the Leo navāṃśa, fear from canine creatures; in the Virgo navāṃśa, itching, corpulence, and danger from flying sparks of fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्क, सिंह, कन्या कारकांश के लक्षण)। कर्क जल-तत्त्व → जल-भय, सिंह वन्य-अग्नि → श्वापद, कन्या पृथ्वी-अग्नि-मिश्र → त्वचा/अग्नि-चिह्न — तत्त्व-आधारित साङ्केतिक मानचित्र, न कि नियत घटना।

33.5
तुलांशे च वणिग्‌ जातो वस्रादिनिर्मितौ पटुः।
अल्यंशे सर्पतो भीतिः पीडा मातुः पयोधरे
tulāṃśe ca vaṇig‌ jāto vasrādinirmitau paṭuḥ|
alyaṃśe sarpato bhītiḥ pīḍā mātuḥ payodhare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुलांशे = तुला-अंश में; वणिक् जातः = व्यापारी रूप में उत्पन्न/वाणिज्य-प्रवृत्ति; वस्त्र-आदि-निर्मितौ पटुः = वस्त्रादि निर्माण में कुशल; अलि-अंशे = वृश्चिक-अंश में (अलि = वृश्चिक; पाठ-भेद संभव: “अल्यंशे”); सर्पतः भीतिः = सर्प से भय; मातुः पयोधरे पीडा = माता के स्तन/वक्ष में पीड़ा (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ तुलांश में शास्त्र कहता है — जातक वणिक् होता है और वस्त्र आदि की रचना में पटु। अल्यंश (वृश्चिकांश) में सर्प से भीति तथा माता के पयोधर में पीड़ा कही गई है। दूसरा पद संवेदनशील फल है — इसे केवल शास्त्र-वाक्य के रूप में पढ़ें, न कि निदान या निश्चित घटना के रूप में।

English rendering In Tulā-aṃśa the text states one is born with a mercantile bent and is skilled in the making of cloth and the like. In Ali-aṃśa (Vṛścika; reading “alyaṃśe” — पाठ-भेद संभव) it states fear from serpents and pain in the mother’s breast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तुला = ७; वृश्चिक (अलि) = ८। “अल्यंशे” वृश्चिक के पर्याय “अलि” से जुड़ा पाठ है — पाठ-भेद संभव।

33.6
धनुरंशे क्रमादुच्चात्‌ पतनं वाहनादपि।
मरकांशे जलोद्‌भूतैर्जन्तुभिः खेचरस्तथा
dhanuraṃśe kramāduccāt‌ patanaṃ vāhanādapi|
marakāṃśe jalod‌bhūtairjantubhiḥ khecarastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनुः-अंशे = धनु-कारकांश में; क्रमात् उच्चात् पतनम् = ऊँचे स्थान से क्रमशः/तदनुसार पतन; वाहनादपि = वाहन से भी; मरक-अंशे = मकर-अंश में (मकर; पाठ-भेद संभव: “मरकांशे”); जल-उद्भूतैः जन्तुभिः = जल से उत्पन्न जन्तुओं से; खेचरः तथा = तथा आकाशचर (पक्षी आदि) से (भीति/पीड़ा — पूर्व-क्रम से अनुक्त क्रिया)।

हिन्दी भावार्थ धनुरांश में शास्त्र कहता है — ऊँचाई से और वाहन से भी पतन का संकेत। मकराांश में जलोद्भूत जन्तुओं तथा खेचर प्राणियों से सम्बद्ध भय/पीड़ा कही गई है। दोनों फल “पतन/जीव-भय” श्रेणी के हैं; इन्हें निश्चित दुर्घटना का वचन न मानें।

English rendering In Dhanus-aṃśa the text states a fall from a height and also from a vehicle. In Makara-aṃśa (reading “marakāṃśe” — पाठ-भेद संभव) it associates trouble with water-born creatures and with flying beings as well.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। धनु = ९; मकर = १०। “मरकांशे” मकर-अंश का पाठ-रूप है — पाठ-भेद संभव; फल-क्रम मेषादि बारह राशियों से मेल खाता है।

33.7
शंखमुक्ताप्रवालाद्यैर्लाभो भवति निश्चितः।
कुम्भांशे च तडागादिकारको जायते जनः
śaṃkhamuktāpravālādyairlābho bhavati niścitaḥ|
kumbhāṃśe ca taḍāgādikārako jāyate janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शंख-मुक्ता-प्रवाल-आद्यैः = शंख, मोती, प्रवाल (मूँगा) आदि से; लाभः भवति निश्चितः = लाभ होता है — शास्त्र “निश्चित” कहता है (शास्त्र-वाक्य, हमारा दावा नहीं); कुम्भ-अंशे = कुम्भ-कारकांश में; तडाग-आदि-कारकः = तालाब आदि का कारक/निर्माता; जायते जनः = व्यक्ति उत्पन्न होता है/होता है।

हिन्दी भावार्थ (मकरांश-फल का उत्तरार्ध मानकर) शास्त्र कहता है — शंख, मुक्ता, प्रवाल आदि से लाभ “निश्चित” होता है; यह शब्द शास्त्र का अपना बल-वचन है, आधुनिक निश्चितता का प्रमाण नहीं। कुम्भांश में जन तडागादि का कारक — जलाशय-निर्माण आदि से जुड़ा — कहा गया है। इस बैच का अन्तिम पद कुम्भ (११) तक पहुँचाता है; मीन-फल आगे के श्लोकों में आता है।

English rendering The text states gain from conch, pearls, coral and the like as “certain” (the śāstra’s own wording, not an endorsement of inevitability). In Kumbha-aṃśa a person is said to be a maker/agent of tanks and similar water-works.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। प्रथम पाद मकर-श्रृंखला का लाभांश-फल; द्वितीय पाद कुम्भ (११)। “निश्चितः” शास्त्रीय आश्वासन-शब्द है — गणना या साक्ष्य-बंधन नहीं।

33.8
मीनांशे कारके जातो मुक्तिभाग्‌ द्विजसत्तम।
नाऽशुभं शुभसंदृष्टे न शुभं पापवीक्षिते
mīnāṃśe kārake jāto muktibhāg‌ dvijasattama|
nā'śubhaṃ śubhasaṃdṛṣṭe na śubhaṃ pāpavīkṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीनांशे = मीन-राशि के नवांश (D9) में; कारके = आत्मकारक (या प्रसंगगत कारक) में; जातो = जात / जन्मा; मुक्तिभाग् = मुक्ति का भागी; शुभसंदृष्टे = शुभ-ग्रह-दृष्टि से युक्त होने पर; नाऽशुभं = अशुभ नहीं; पापवीक्षिते = पाप-ग्रह-दृष्ट होने पर; न शुभं = शुभ नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि कारक मीन-अंश में हो, तो जातक मुक्ति का भागी होता है। उसी स्थिति में यदि शुभ ग्रह दृष्टि दें तो अशुभ नहीं रहता; और यदि पाप ग्रह दृष्टि दें तो शुभ भी नहीं रहता। यह फल-कथन कारक के नवांश-स्थान और दृष्टि-संयोग दोनों पर टिका है।

English rendering The text states that when the kāraka occupies the Mīna aṃśa, the native is said to partake of liberation. Under that placement, benefic aspect is said to remove the inauspicious; malefic aspect is said to remove the auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारकांश-मीनांश + दृष्टि-शर्त)। “मीनांश” यहाँ D9-नवांश-मानचित्र में मीन-राशि का अंश-स्थान है: नवांश-खंड = 30° ÷ 9 = 3°20′; मीन-अंश का निर्णय लग्न/ग्रह-देशांतर के नवांश-नियम से होता है (चर/स्थिर/द्विस्वभाव-राशि अनुसार नवांश-गणना की घोषित परंपरा)।

उदाहरण (worked example) मान लें Ātmakāraka (उदा. गुरु) D1 में 2°10′ मकर पर है। मकर चर-राशि है; नवांश-क्रम मकर से: 0°–3°20′ = मकर-नवांश, 3°20′–6°40′ = कुम्भ, … आगे चलकर मीन-नवांश तब आता है जब देशांतर उस खंड में पड़े। यदि कारक का D9-राशि = मीन, तो यह श्लोक “मीनांशे कारके” की शर्त पूरी मानता है। (अयनांश: जिस अयनांश से देशांतर लिया गया हो, वही D9 पर लागू; परंपरा घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश शुद्ध रूप से षोडश-वर्ग की D9-परत है — 30° राशि का 3°20′ समान विभाजन और घोषित नवांश-मानचित्र। हमारी varga-engine उसी मॉड्यूलर नियम से D1…D60 की अंश-राशियाँ निकालती है; फल-वाक्य को हम “शास्त्र कहता है” के रूप में रखते हैं, भाग्य-निश्चितता के रूप में नहीं।

33.9
कारकांशे शुभे विप्र लग्नांशे च शुभग्रहे।
शुभसंवीक्षिते जातो राजा भवति निश्चितः
kārakāṃśe śubhe vipra lagnāṃśe ca śubhagrahe|
śubhasaṃvīkṣite jāto rājā bhavati niścitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशे = कारक के नवांश-स्थान में; शुभे = शुभ (ग्रह/राशि-संदर्भ); लग्नांशे = लग्न-नवांश में; शुभग्रहे = शुभ ग्रह स्थित; शुभसंवीक्षिते = शुभों से भली-भाँति दृष्ट; राजा भवति = राजा होता है; निश्चितः = शास्त्र-स्वर में “निश्चित” कहा गया फल-शब्द।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कारकांश शुभ हो, लग्नांश में शुभ ग्रह हो, और वह स्थिति शुभ-दृष्टि से युक्त हो, तो जातक राजा होता है — यह “निश्चितः” शब्द शास्त्र का अपना बल-कथन है, हमारे द्वारा की गई भविष्यवाणी नहीं। तीन शर्तें एक साथ पढ़ी जाती हैं: कारकांश की शुभता, लग्नांश में शुभ ग्रह, और शुभ दृष्टि।

English rendering The text states that when the kārakāṃśa is benefic, a benefic occupies the lagna-aṃśa, and the configuration is well aspected by benefics, the native “certainly becomes a king” — a śāstric result-claim, not an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारकांश + लग्नांश + दृष्टि की संयुक्त शर्त)। “निश्चितः” यहाँ शास्त्र की अपनी भाषा है; गणना-पक्ष केवल यह जाँच है कि (1) कारकांश-राशि/स्थित ग्रह शुभ माना गया या नहीं, (2) लग्न का D9-स्थान शुभ-ग्रह युक्त है या नहीं, (3) शुभ दृष्टि लगती है या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्नांश और कारकांश दोनों D9-वर्ग से निकलते हैं; दृष्टि-नियम अध्याय-8 की संरचना पर निर्भर करते हैं। हम गणित (D9-स्थान, दृष्टि-कोण) को exact-`==` जाँच योग्य रखते हैं और “राजा भवति” को केवल पाठ का फल-कथन मानते हैं।

33.10
स्वांशाच्छुभग्रहाः केन्द्रे कोणे वा पापवर्जिताः।
धनविद्यायुतो जातो मिश्रैर्मिश्रफलं वदेद्‌
svāṃśācchubhagrahāḥ kendre koṇe vā pāpavarjitāḥ|
dhanavidyāyuto jāto miśrairmiśraphalaṃ vaded‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशात् = अपने अंश (कारकांश) से; शुभग्रहाः = शुभ ग्रह; केन्द्रे = 1,4,7,10 भाव; कोणे = 5,9 भाव; पापवर्जिताः = पाप-ग्रहों से रहित; धनविद्यायुतो = धन और विद्या से युक्त; मिश्रैः = मिश्र (शुभ-पाप मिश्रित) ग्रहों से; मिश्रफलं = मिश्रित फल; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कारकांश से गिने केन्द्र या कोण में शुभ ग्रह हों और वे पाप-मुक्त हों, तो जातक धन और विद्या से युक्त होता है। यदि वहाँ मिश्र ग्रह हों तो मिश्र फल कहना चाहिए। यह “स्वांश” से भाव-गिनती का नियम है — कारकांश को “लग्न” मानकर 1–12 भाव पढ़े जाते हैं।

English rendering The text states that from one’s own aṃśa, benefics in kendra or trikoṇa, free of malefics, indicate a native endowed with wealth and learning; with mixed grahas, mixed results are to be declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कारकांश-लग्न से भाव-संख्या (पूर्णांक 1…12):
केन्द्र = {1, 4, 7, 10}; कोण (त्रिकोण) = {5, 9}।
ग्रह-देशांतर → D9-राशि Rₖ; भाव-संख्या b = ((R_graha − R_kārakāṃśa) mod 12) + 1।
शर्त: b ∈ {1,4,5,7,9,10} और ग्रह शुभ + पाप-मुक्त → धन-विद्या फल; मिश्र → मिश्र फल। (राशि-भाव; पूर्ण-राशि गृह-प्रणाली जब तक अन्य न घोषित हो।)

उदाहरण (worked example) कारकांश = सिंह (R=5)। शुक्र D9 में धनु (R=9) → b = ((9−5) mod 12)+1 = 5 → कोण। यदि शुक्र अकेला शुभ और पाप-दृष्टि/युति रहित माना जाए, तो श्लोक धन-विद्या पक्ष कहता है। यदि उसी भाव में मंगल भी हो → मिश्र → मिश्र फल।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक कारकांश को गणना-केन्द्र बनाकर केन्द्र/कोण की modular भाव-गिनती देता है — वही अनुशासन जो षोडश-वर्ग इंजन में D9-स्थान निकालने के बाद भाव-अंकगणित पर लगता है। फल को हम पाठ-स्वर में रखते हैं; संख्या (भाव-सूचकांक) को exact जाँच योग्य।

33.11
उपग्रहे च विप्रेन्द्र स्वोच्चस्वर्क्षंसुभर्क्षगे।
पापदृग्‌रहिते चाऽन्त्ये कैवल्यंतस्य निर्दिशेत्‌
upagrahe ca viprendra svoccasvarkṣaṃsubharkṣage|
pāpadṛg‌rahite cā'ntye kaivalyaṃtasya nirdiśet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपग्रहे = उपग्रह होने पर (गुलिक/माँदि आदि छाया-उपग्रह); विप्रेन्द्र = हे विप्र-श्रेष्ठ; स्वोच्च = स्व-उच्च (अपनी उच्च राशि); स्वर्क्ष = स्व-राशि (sva-ṛkṣa); शुभर्क्षगे = शुभ-ग्रह की राशि में स्थित (śubha-ṛkṣa-ga); पापदृग्‌रहिते = पाप-दृष्टि से रहित; अन्त्ये = अन्त्य भाव (कारकांश से द्वादश); कैवल्यम् = कैवल्य/परम-मुक्ति; तस्य = उसका; निर्दिशेत् = निर्देश करे/कहे। (समास पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ हे विप्र-श्रेष्ठ, जब कोई उपग्रह अपनी उच्च राशि, अपनी राशि, अथवा किसी शुभ-ग्रह की राशि में हो, और कारकांश से अन्त्य (बारहवाँ) भाव पाप-दृष्टि से रहित हो, तो उस जातक के लिए शास्त्र कैवल्य (परम-मुक्ति) का निर्देश करता है। यह मोक्ष-सूचक विशिष्ट योग है।

English rendering When an upagraha stands in its own exaltation, own sign, or a benefic's sign, and the twelfth from the svāṃśa is free of malefic aspect, one should, O foremost Brahmin, declare kaivalya for that person.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मोक्ष-योग) के साथ स्थान-शर्त। तकनीक: अन्त्य = कारकांश से 12वाँ भाव, अर्थात् राशि = ((कारकांश-राशि − 1 − 1) mod 12) + 1, या सरलतः कारकांश से पीछे एक राशि। शर्तें: (उपग्रह ∈ {स्व-उच्च, स्व-राशि, शुभ-राशि}) ∧ (12वाँ पाप-दृष्टि-रहित) ⇒ शास्त्रोक्त कैवल्य-कथन।

उदाहरण (worked example) कारकांश = सिंह → अन्त्य (12वाँ) = कर्क। यदि कोई उपग्रह अपनी शुभ/उच्च/स्व-राशि में हो और कर्क पर कोई पाप-दृष्टि न पड़े → शास्त्र इसे कैवल्य-सूचक कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) द्वादश-भाव (व्यय/मोक्ष-स्थान) की यह गणना पुनः कारकांश-केन्द्रित नियतात्मक राशि-अंकगणित है, जो D9 नवांश-नींव पर टिकी है। "कैवल्य" जैसा उच्चतम फल भी हम शास्त्र का दावा कहकर रखते हैं — न भय, न आश्वासन-दबाव; केवल स्थिति-शर्त और उसका पाठ-कथन।

33.12
चन्द्राऽरभृगुवर्गस्थ कारके पारदारिकः।
विपर्यस्थेऽन्यथा ज्ञेयं फलं सर्वं विचक्षणैः
candrā'rabhṛguvargastha kārake pāradārikaḥ|
viparyasthe'nyathā jñeyaṃ phalaṃ sarvaṃ vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र = चन्द्रमा; अर = मंगल (अर = अङ्गारक/कुज का संक्षेप); भृगु = शुक्र (भृगु = शुक्र); वर्गस्थ = वर्ग में स्थित (इनके स्वामित्व वाली राशि/वर्ग में); कारके = कारक (आत्मकारक) के; पारदारिकः = परस्त्रीगामी; विपर्यस्थे = विपरीत/उलटी स्थिति होने पर; अन्यथा = और प्रकार से; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; फलं सर्वम् = सम्पूर्ण फल; विचक्षणैः = विचक्षण/बुद्धिमानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ जब आत्मकारक चन्द्र, मंगल अथवा शुक्र के वर्ग (इनके स्वामित्व की राशि) में स्थित हो, तो शास्त्र उसे "पारदारिक" (परस्त्रीगामी-प्रवृत्ति) कहता है। और जब स्थिति विपरीत हो, तो फल भी उससे उलटा जानना चाहिए — यह सम्पूर्ण विवेचन विचक्षण ज्योतिषियों को स्वयं विवेक से करना है।

English rendering When the kāraka lies in the varga of the Moon, Mars, or Venus, the text calls him inclined to others' spouses; when the placement is reversed, the wise should read the result the other way about.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; किन्तु ग्रह-संक्षेप का डिकोड आवश्यक: चन्द्र → कर्क; अर (मंगल) → मेष, वृश्चिक; भृगु (शुक्र) → वृष, तुला। "वर्गस्थ" = इन्हीं स्वामित्व-राशियों/वर्गों में कारक की स्थिति। "विपर्यस्थ" = विपरीत संयोग → उलटा फल।

उदाहरण (worked example) यदि कारक (आत्मकारक) का सम्बद्ध वर्ग वृष (शुक्र-वर्ग) हो → शास्त्र "पारदारिक" प्रवृत्ति का कथन करता है; शुभ-प्रधान विपरीत संयोग में यही कथन उलटकर संयम-पक्ष में पढ़ा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "वर्गस्थ" का निर्णय पुनः वर्ग-योजना (D-राशि स्वामित्व) पर टिका है — विशुद्ध मॉड्युलर स्थिति। चारित्रिक फल-कथन को हम शास्त्र का दावा कहकर रखते हैं, नियति नहीं; और "विपर्यस्थेऽन्यथा…विचक्षणैः" स्वयं पाठ का यह निर्देश है कि निष्कर्ष यान्त्रिक नहीं, संदर्भ-सापेक्ष विवेक से निकालें — हमारी "मिश्र → मिश्र" अनुशासन-रेखा से पूर्ण मेल।

33.13
कारकांशे रवौ जातो राजकार्यपरो द्विज।
पूर्णेन्द्रौ भोगवान्‌ विद्वान्‌ शुक्रदृष्टे विशेषतः
kārakāṃśe ravau jāto rājakāryaparo dvija|
pūrṇendrau bhogavān‌ vidvān‌ śukradṛṣṭe viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशे रवौ = कारकांश में रवि (सूर्य) होने पर; जातः = जातक; राजकार्यपरः = राजकार्य में तत्पर (शासकीय सेवा-परायण); द्विज = हे द्विज; पूर्णेन्द्रौ = पूर्ण-चन्द्र होने पर (पूर्ण-इन्दु, बलवान् शुक्ल-पक्ष चन्द्र); भोगवान् = भोग-सम्पन्न; विद्वान् = विद्वान्; शुक्रदृष्टे = शुक्र की दृष्टि होने पर; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, जब कारकांश में सूर्य हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक राजकार्य (शासकीय कार्य/सेवा) में तत्पर होता है। और जब वहाँ पूर्ण-चन्द्र हो, तो वह भोग-सम्पन्न तथा विद्वान् होता है — और यदि उस पर शुक्र की दृष्टि भी हो, तो यह फल विशेष रूप से प्रकट होता है।

English rendering With the Sun in the kārakāṃśa, the native is given to royal affairs, O twice-born; with the full Moon there, he is enjoying and learned — the more so when aspected by Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारकांश-स्थित ग्रह-भेद से फल)। यहाँ से "कौन-सा ग्रह कारकांश में" वाली शृंखला आरम्भ होती है। एकमात्र प्रच्छन्न परिमाण है चन्द्र-बल: "पूर्णेन्द्रौ" = शुक्ल-पक्ष का पूर्ण चन्द्र — पक्ष-बल पर आश्रित एक तिथि-सापेक्ष शर्त, तथा शुक्र-दृष्टि फल की तीव्रता का संशोधक।

Batch complete: verses 33.1–33.13 rendered per style-prompt. Chapter 33 is the कारकांशफल (Kārakāṃśa-phala) prakaraṇa — phala verses keyed to the ātmakāraka's navāṃśa (D9) sign. Verses 2–7, 9, 13 are pure fala-kathana (rendered "गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन" per discipline); verses 1, 10, 11 carry genuine deterministic technique (D9/AK definition, kendra/koṇa counting, 12th-from-svāṃśa) with worked examples; verse 12 required decoding the graha abbreviation अर = मंगल. "हमारा डिकोड" was attached only to verses with a real dossier link (D9 ṣoḍaśa-varga engine §2, and the math-vs-interpretation discipline §5) — 1, 2, 8, 10, 11, 12 — and omitted elsewhere rather than forced. Flagged पाठ-भेद संभव on contested readings (ह्व/ह्य-आत्मकारके in v2; अल्यंश=वृश्चिक in v5; मरक=मकर and खेचर in v6; the run-on compound in v11). Devanagari verse text was not reprinted.

33.14
स्वांशे बलयुते भौमे जातः कन्तायुघी भवेत्‌।
वह्निजीवी नरो वाऽपि रसवादी च जायते
svāṃśe balayute bhaume jātaḥ kantāyughī bhavet‌|
vahnijīvī naro vā'pi rasavādī ca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशे = कारकांश, अर्थात् आत्मकारक ग्रह की नवांश (D9) राशि; बलयुते = बल-सम्पन्न (यहाँ प्रबल भौम); भौमे = मंगल के (कारकांश में स्थित); जातः = जातक; कुन्तायुधी = भाला/कुन्त धारी योद्धा (पाठ "कन्तायुघी" → कुन्तायुधी, पाठ-भेद संभव); वह्निजीवी = अग्नि से जीविका चलाने वाला (लोहार/भट्ठी-कर्मी/रसोइया); रसवादी = रस-रसायन (कीमिया) का साधक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब बलवान् मंगल आत्मकारक की नवांश-राशि (कारकांश/स्वांश) में स्थित हो, तो जातक भाला-धारी योद्धा बनता है, अथवा अग्नि के सहारे जीविका चलाने वाला (लोहकर्मी/भट्ठी-कर्मी), अथवा रस-रसायन का साधक होता है। मंगल का अग्नि- और शस्त्र-तत्त्व यहाँ वृत्ति का निर्धारक बनता है।

English rendering The text states that when a strong Mars occupies the kārakāṃśa — the Ātmakāraka's navāṃśa sign — the native becomes a spear-bearing warrior, one who lives by fire (smith, furnace-worker), or an alchemist.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल स्वयं वृत्ति-कथन है, पर उसकी दो पूर्व-शर्तें गणनीय हैं। (1) कारकांश = आत्मकारक का नवांश। आत्मकारक (जैमिनि) = सात (राहु सहित आठ) चर-कारकों में सर्वाधिक राश्यंश (0°–30° के भीतर सर्वोच्च अंश) वाला ग्रह; नवांश-चाप = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश। (2) "बलयुत" = भौम का षड्बल उसकी प्रति-ग्रह देहली से अधिक (1 रूप = 60 विरूप)।

उदाहरण (worked example) मान लें चर-कारकों में सर्वोच्च राश्यंश शुक्र का है — शुक्र मेष 28°10′ ⇒ आत्मकारक = शुक्र। मेष चर/अग्नि-राशि, अतः नवांश मेष से आरम्भ; 28°10′ नवीं नवांश (26°40′–30°) में पड़ता है ⇒ मेष से नवाँ = धनु ⇒ कारकांश = धनु। अब यदि जन्म-कुण्डली (D1) में मंगल धनु में स्थित हो और षड्बल में प्रबल हो, तो "बलयुत भौम स्वांशे" शर्त सिद्ध और श्लोक-फल लागू। (आत्मकारक = 7-कारक पद्धति; राहु सहित 8-कारक पद्धति पाठ-भेद।)

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश पूर्णतः नवांश (D9) पर टिका है — हमारे षोडश-वर्ग इंजन में D9, 30° राशि का 3°20′ चापों में शुद्ध, दिशान्तर-रहित मॉड्युलर विभाजन है (kaal_ekavimshati_varga.py), अतः "स्वांश" अस्पष्ट संकेत नहीं, नियतांक-गणना है। "बलयुत" शर्त हमारे षड्बल मॉडल (स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्, रूप-विरूप में) से मापी जाती है — यह फल की गणितीय पूर्व-शर्त है, व्याख्या नहीं।

33.15
बुधे बलयुते स्वांशे कलाशिल्पविचक्षनः।
वाणिज्यकुशलश्चापि बुद्धिविद्यासमन्वितः
budhe balayute svāṃśe kalāśilpavicakṣanaḥ|
vāṇijyakuśalaścāpi buddhividyāsamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधे = बुध (Mercury) स्थित होने पर; बलयुते = बलयुक्त (सबल, शक्तिसंपन्न); स्वांशे = स्व-अंश में (स्व-नवांश / D9 में अपनी राशि का अंश); कलाशिल्प = कला एवं शिल्प; विचक्षणः = कुशल, निपुण; वाणिज्य = व्यापार-वाणिज्य; बुद्धिविद्या = बुद्धि और विद्या; समन्वितः = युक्त, संपन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब बुध बल से युक्त होकर स्वांश में स्थित हो, तब जातक कला और शिल्प में विचक्षण होता है। वह वाणिज्य-कर्म में भी कुशल कहा गया है। साथ ही बुद्धि और विद्या से समन्वित—अर्थात् चिंतन-क्षमता और अधिगम दोनों से युक्त—वर्णित है। यह फल-कथन स्वांश-स्थित सबल बुध की शास्त्रीय गुण-सूची है, न कि कोई नियत भविष्यवाणी।

English rendering The text states that when Mercury, endowed with strength, occupies its own aṃśa, the native is skilled in arts and crafts, adept at commerce, and equipped with intellect and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्वांश-स्थित सबल बुध का गुण-फल)। यहाँ “स्वांश” का कम्प्यूटेशनल आधार नवांश (D9) है: 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश; ग्रह की राशि-देशांतर से उसी राशि का स्व-नवांश निर्धारित होता है। “बल” का पृथक् माप षड्बल आदि नियमों से आता है; इस श्लोक में केवल फल कहा गया है।

उदाहरण (worked example) मान लें बुध देशांतर = 45°00′ (वृषभ 15°00′; ayanāṃśa घोषित करें, जैसे लाहिरी)। नवांश-क्रमांक = ⌊15° ÷ 3°20′⌋ + 1 = ⌊15 ÷ 3.333…⌋ + 1 = 5वाँ नवांश। वृषभ में बुध स्वामी है; वृषभ-नवांश क्रम में 5वाँ अंश कन्या (बुध-स्वामित्व) पर पड़ता है तो बुध स्वांशस्थ कहलाता है। बल-योग (षड्बल आदि) अलग से जाँचा जाता है—यह श्लोक केवल “बलयुते स्वांशे” की शर्त मानकर फल बताता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्वांश का निर्धारण षोडश-वर्ग में D9 (नवांश) की नियत विभाजन-नियम पर टिका है—30° → 9 समान चाप, मॉड्यूलर देशांतर-मानचित्र। हमारे वर्ग-इंजन में यही विभाजन निर्धारणात्मक है; फल-वाक्य को हम शास्त्र-कथन के रूप में रखते हैं, संख्या को exact varga-नियम से।

33.16
सुकर्मा ज्ञाननिष्ठश्च वेदवित्‌ स्वांशगे गुरौ।
शुक्रे शतेन्द्रियः कामी राजकीतो भवेन्नरः
sukarmā jñānaniṣṭhaśca vedavit‌ svāṃśage gurau|
śukre śatendriyaḥ kāmī rājakīto bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुकर्मा = शुभ/उत्तम कर्म करने वाला; ज्ञाननिष्ठः = ज्ञान में स्थिर; वेदवित् = वेद-ज्ञाता; स्वांशगे गुरौ = गुरु (बृहस्पति) स्वांश में स्थित; शुक्रे = शुक्र (Venus) स्वांश-संदर्भ में; शतेन्द्रियः = तीव्र इंद्रिय-वृत्ति वाला (पाठ-भेद संभव); कामी = काम-प्रधान; राजकीतो = राजकीय कीर्ति/राज-संबंधी स्थिति वाला (पाठ-भेद संभव: राजकीर्तिः आदि); नरः = पुरुष/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु स्वांश में हो, तब जातक सुकर्मा, ज्ञाननिष्ठ और वेदवित् कहा जाता है। जब शुक्र उसी प्रकार (स्वांश-संदर्भ में) हो, तब जातक तीव्र इंद्रिय-वृत्ति वाला, कामी और राजकीय कीर्ति/स्थिति से जुड़ा वर्णित है। दोनों फल स्वांश-स्थित गुरु और शुक्र के पृथक् लक्षण हैं। इन्हें शास्त्र की अपनी भाषा में गुण-सूची समझें, न कि अनिवार्यता।

English rendering The text states that with Jupiter in its own aṃśa the native is of good deeds, devoted to knowledge, and a knower of the Veda; with Venus so placed, the native is described as highly sense-oriented, passionate, and of royal renown (reading variants possible).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्वांश-स्थित गुरु व शुक्र के पृथक् फल)। स्वांश = स्व-नवांश (D9) की जाँच: ग्रह-स्वामी की राशि के उन नवांशों में ग्रह की उपस्थिति। गुरु-राशि = धनु/मीन; शुक्र-राशि = वृषभ/तुला—उन्हीं में स्व-नवांश-स्थिति “स्वांश” कही जाती है (अध्याय-संदर्भ कारकांश/अंश-फल से जुड़ा हो तो पाठानुसार)।

33.17
शनौ स्वांशगते जातः स्वकुलोचितकर्मकृत्‌।
राहौ चौरश्च धनुष्को जातो वा लोहयन्त्रकृत्‌
śanau svāṃśagate jātaḥ svakulocitakarmakṛt‌|
rāhau cauraśca dhanuṣko jāto vā lohayantrakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनौ = शनि (Saturn) में/के; स्वांशगते = स्वांश-गत; जातः = जातक; स्वकुलोचित = अपने कुल के अनुरूप; कर्मकृत् = कर्म करने वाला; राहौ = राहु (Rāhu) में; चौरः = चोर; धनुष्कः = धनुर्धर, बाण चलाने वाला; लोहयन्त्रकृत् = लोह-यंत्र/लौह-उपकरण बनाने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि के स्वांशगत होने पर जातक अपने कुल-योग्य कर्म करने वाला होता है—अर्थात् वंश-परंपरा या कुल-धर्म के अनुकूल वृत्ति। राहु के (स्वांश/उसी अंश-संदर्भ में) होने पर पाठ कहता है: चोर, धनुष्क, अथवा लोह-यंत्र का कर्ता। ये वैकल्पिक वृत्ति-संकेत हैं (“वा”), एकमात्र नियति नहीं। भय या दोष-आरोप की भाषा न अपनाएँ—यह शास्त्र का फल-सूचीकरण है।

English rendering The text states that one born with Saturn in its own aṃśa performs work suited to one’s own lineage; with Rāhu so indicated, the native is said to be a thief, an archer, or a worker in iron mechanisms.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-स्वांश व राहु-संबंधी वृत्ति-फल)। राहु/केतु को नवांश-मानचित्र में छाया-ग्रह के रूप में देशांतर-नियम से रखा जाता है; स्वांश-निर्णय उसी D9-विभाजन (3°20′) पर निर्भर है। लोहयन्त्रकृत् आदि शब्द व्यावसायिक/कर्म-संकेत हैं, कम्प्यूटेशनल स्थिरांक नहीं।

33.18
विषवैद्योऽथवा विप्र जायते नाऽत्र संशयः।
व्ययहारी गजादीनां केतौ चौरश्च जायते
viṣavaidyo'thavā vipra jāyate nā'tra saṃśayaḥ|
vyayahārī gajādīnāṃ ketau cauraśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विषवैद्यः = विष-चिकित्सक / विष-शास्त्र का वैद्य; अथवा = या; विप्रः = ब्राह्मण/विद्वान्; जायते = उत्पन्न होता है; नात्र संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र का दृढ़ कथन); व्ययहारी = व्यय/हरण करने वाला; गजादीनां = हाथियों आदि का; केतौ = केतु में; चौरः = चोर।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के राहु-प्रसंग का विस्तार: शास्त्र कहता है—विषवैद्य अथवा विप्र जन्म लेता है; “नात्र संशयः” पाठ की अपनी निश्चय-शैली है, हमारे पक्ष से नियति का दावा नहीं। केतु के संदर्भ में कहा गया है कि हाथियों आदि का व्यय/हरण करने वाला तथा चोर जातक होता है। दोनों छाया-ग्रहों के फल अलग-अलग सूचीबद्ध हैं—राहु-पंक्ति विषवैद्य/विप्र; केतु-पंक्ति गजादि-व्ययहारी एवं चौर।

English rendering The text states—without doubt in its own phrasing—that (under the Rāhu indication) one becomes a poison-physician or a brāhmaṇa; under Ketu, one who dissipates or seizes elephants and the like, and a thief, is said to be born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-केतु अंश-फल का विस्तार)। “नात्र संशयः” शास्त्रीय आश्वासन-पद है; कम्प्यूटेशन इसमें नहीं। केतु की नवांश-स्थिति राहु से 180° विपरीत देशांतर पर D9-मानचित्र में पड़ती है—तकनीक वही 3°20′ नवांश-चाप है; फल अलग।

33.19
रविराहू यदा स्वांशे सर्पाद्‌ भीतिः प्रजायते।
शुभदृष्टौ भयं नैव पापदृष्टौ मृतिभवेत्‌
ravirāhū yadā svāṃśe sarpād‌ bhītiḥ prajāyate|
śubhadṛṣṭau bhayaṃ naiva pāpadṛṣṭau mṛtibhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविराहू = रवि और राहु (द्विवचन); यदा = जब; स्वांशे = स्वांश में; सर्पात् = सर्प से; भीतिः = भय; प्रजायते = उत्पन्न होता है; शुभदृष्टौ = शुभ दृष्टि होने पर; भयं नैव = भय नहीं; पापदृष्टौ = पाप-ग्रह दृष्टि पर; मृतिः = मृत्यु; भवेत् = होती है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब रवि और राहु स्वांश में हों, तब सर्प से भीति उत्पन्न होती है—यह योग-फल का संकेत है। यदि शुभ दृष्टि हो तो भय नहीं रहता; यदि पाप दृष्टि हो तो मृत्यु का फल कहा गया है। दृष्टि-शर्त फल को द्विधा बाँटती है: शुभ-दृष्टि से निवृत्ति, पाप-दृष्टि से तीव्र फल। हम इसे शास्त्र का सशर्त फल-कथन मानते हैं—भय-व्यापार या निश्चित मृत्यु-भविष्य के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when the Sun and Rāhu occupy their own aṃśa, fear from serpents arises; with benefic aspect there is no fear, while with malefic aspect death is said to occur.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रवि-राहु स्वांश + दृष्टि-सशर्त फल)। दृष्टि-जाँच अध्याय-8 के दृष्टि-नियमों से होती है (पूर्ण/आंशिक दृष्टि-अंश); स्वांश = D9 स्व-स्वामित्व जाँच। दो शर्तें: (1) रवि एवं राहु स्वांशस्थ; (2) शुभ vs पाप दृष्टि—फल शास्त्रानुसार भिन्न।

उदाहरण (worked example) मान लें कारकांश/अंश-चक्र में रवि स्व-नवांश (सिंह-नवांश में) और राहु भी स्वांश-संकेत की शर्त पूरी करें (पाठ-भेद/परिभाषा घोषित करें)। यदि बृहस्पति पूर्ण दृष्टि दे → शास्त्र: “भयं नैव”; यदि शनि/मंगल पाप-दृष्टि दें → शास्त्र: “मृतिभवेत्”। संख्यात्मक दृष्टि-मान (0–1 या विरुपा) दृष्टि-अध्याय के सूत्र से; यह श्लोक केवल फल-द्वार खोलता है।

33.20
शुभषड्‌वर्गसंयुक्तौ विषवैद्यो भवेन्‌ तदा।
भौमेक्षिते कारकांशे भानुस्वर्भानुसंयुते
śubhaṣaḍ‌vargasaṃyuktau viṣavaidyo bhaven‌ tadā|
bhaumekṣite kārakāṃśe bhānusvarbhānusaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभषड्वर्गसंयुक्तौ = शुभ षड्वर्ग से युक्त (दोनों—रवि-राहु); विषवैद्यः = विषवैद्य; भवेत् तदा = तब होता है; भौमेक्षिते = मंगल द्वारा दृष्ट; कारकांशे = कारकांश में (आत्मकारक का नवांश-लग्न); भानुस्वर्भानुसंयुते = भानु (रवि) और स्वर्भानु (राहु) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वे (रवि-राहु) शुभ षड्वर्ग से संयुक्त हों, तब विषवैद्य होता है—पूर्व के सर्प-भय/मृत्यु-फल से भिन्न, वर्ग-शुभता से वृत्ति-फल। फिर विशेष योग: कारकांश में भानु-स्वर्भानु युक्त हों और मंगल उसे देखे—यह अगले श्लोक के दाहक/वह्नि-फल की शर्त का आरंभ है। षड्वर्ग यहाँ कम्प्यूटेशनल फ़िल्टर है: छह वर्गों में शुभ संयोग।

English rendering The text states that when the two are joined to benefic ṣaḍvarga combinations, one becomes a poison-physician; further, when the kārakāṃśa holds the Sun joined with Rāhu and is aspected by Mars…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षड्वर्ग = छह वर्गों का समुच्चय (परंपरा में प्रायः: राशि D1, होरा D2, द्रेष्काण D3, नवांश D9, द्वादशांश D12, त्रिंशांश D30—पाठ/टीका-भेद संभव)। प्रत्येक वर्ग ग्रह की देशांतर λ से नियत चाप-विभाजन:
- D1: ⌊λ/30°⌋; D2: 15° होरा; D3: 10°; D9: 3°20′; D12: 2°30′; D30: 1° (विषम/सम राशि नियम सहित)।
“शुभषड्वर्ग” = उन वर्ग-स्थितियों में शुभ संयोग (स्व/मित्र/उच्च आदि—फल-शास्त्रीय कसौटी)। कारकांश = आत्मकारक ग्रह के नवांश की राशि को लग्न मानकर बना D9-संदर्भ बिंदु। भानु+स्वर्भानु = रवि-राहु युति (देशांतर-समीप्य, और्ब की सीमा घोषित करनी होती है)।

उदाहरण (worked example) आत्मकारक = सूर्य, सूर्य-नवांश = कन्या → कारकांश = कन्या। कन्या-कारकांश में रवि-राहु युति (मान लें दोनों कन्या D1 या कारकांश-दृष्टि-योग पाठानुसार) और मंगल दृष्टि (मंगल से कन्या पर पूर्ण/आंशिक दृष्टि)। षड्वर्ग-जाँच: छहों वर्ग-तालिका में रवि/राहु शुभ अंक/स्थिति → शास्त्र: विषवैद्य। (ayanāṃśa, युति-और्ब, दृष्टि-परिपाटी घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्वर्ग षोडश-वर्ग-समुच्चय का उपसमुच्चय है; हमारा वर्ग-इंजन D1…D60 को समान मॉड्यूलर नियम से बाँटता है—D2, D3, D9, D12, D30 सहित। कारकांश = AK की D9-राशि: यही “अंश” का कम्प्यूटेशनल क्रोड़ है। फल (विषवैद्य आदि) को हम केवल शास्त्र-कथन रखते हैं; संख्या exact varga/aspect नियमों से।

33.21
अन्यग्र्हा न पश्यन्ति स्ववेश्मपरदाहकः।
तस्मिन्‌ बुधेक्षि ते चापि वह्निदो नैव जायते
anyagrhā na paśyanti svaveśmaparadāhakaḥ|
tasmin‌ budhekṣi te cāpi vahnido naiva jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्यग्रहाः = अन्य ग्रह; न पश्यन्ति = नहीं देखते (दृष्टि नहीं देते); स्ववेश्मपरदाहकः = अपने और पराए घर को जलाने वाला; तस्मिन् = उस (योग) में; बुधेक्षिते = बुध द्वारा दृष्ट होने पर; चापि = भी/और; वह्निदः = अग्नि देने वाला / आग लगाने वाला; नैव जायते = नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ पूर्व योग (कारकांश में रवि-राहु, मंगल-दृष्टि) का शेष: शास्त्र कहता है—यदि अन्य ग्रह उस योग को न देखें, तो जातक स्व- और पर-वेश्म का दाहक कहा जाता है। परन्तु उसी योग पर बुध की दृष्टि हो तो वह्निद नहीं होता। यह दृष्टि-सशर्त निवृत्ति है: मंगल-दृष्टि + अन्य-अदृष्टि → दाहक-फल; बुध-दृष्टि → निषेध। भय-भाषा या अपराध-आरोप नहीं—शास्त्र का सशर्त फल-द्वार मात्र।

English rendering The text states that if the other planets do not aspect (that combination), one is a burner of one’s own and others’ dwellings; yet if Mercury also aspects it, one does not become a giver of fire (an arsonist).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-सशर्त वह्नि/दाह योग)। तार्किक संरचना: योग = (कारकांश में रवि+राहु) ∧ (मंगल-दृष्टि) ∧ (अन्य ग्रह अदृष्टि) → स्ववेश्मपरदाहक; योग ∧ (बुध-दृष्टि) → वह्निदः ≠। दृष्टि-गणना: राशि-दृष्टि या अंश-दृष्टि (परिपाटी घोषित); “अन्यग्रहाः” = मंगल/रवि/राहु के अतिरिक्त।

उदाहरण (worked example) कारकांश = कन्या; रवि-राहु कन्या में; मंगल मकर से कन्या पर दृष्टि (चतुर्थ दृष्टि—पूर्ण)। शुक्र, गुरु, शनि, बुध में से कोई न देखे → शास्त्र: स्ववेश्मपरदाहक। यदि बुध मिथुन/कन्या/मकर आदि से दृष्टि दे → शास्त्र: वह्निदो नैव। दृष्टि-अंश और ग्रह-बल अलग अध्यायों से; यहाँ केवल सशर्त फल।

33.22
पापर्क्षे गुरुणा दृष्टे समीपगृहदाहकः।
शुक्रदृष्टे तु विप्रेन्द्र गृहदाहो न जायते
pāparkṣe guruṇā dṛṣṭe samīpagṛhadāhakaḥ|
śukradṛṣṭe tu viprendra gṛhadāho na jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापर्क्षे = पाप-राशि/मलिन राशि में स्थित; गुरुणा दृष्टे = बृहस्पति की दृष्टि से युक्त; समीपगृहदाहकः = समीपस्थ गृह का दाहक (पड़ोस के घर को अग्नि से हानि पहुँचाने वाला); शुक्रदृष्टे = शुक्र की दृष्टि में; विप्रेन्द्र = हे ब्राह्मणश्रेष्ठ (संबोधन); गृहदाहो न जायते = गृहदाह नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वह (प्रसंगगत) भाव/अंश पाप राशि में हो और गुरु उसे देखें, तो जातक समीप के घरों को अग्नि से हानि पहुँचाने वाला माना जाता है। किन्तु यदि उसी स्थिति पर शुक्र की दृष्टि हो, तो गृहदाह का वह फल उत्पन्न नहीं होता — ऐसा पराशर विप्रेन्द्र से कहते हैं। यहाँ दृष्टि-भेद से फल-निवृत्ति का नियम स्पष्ट है।

English rendering The text states that when the place under discussion occupies a malefic sign and is aspected by Jupiter, the native is described as one who burns neighbouring houses; yet when Venus aspects it, house-burning does not occur.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-विशेष से गृहदाह / निवृत्ति)। यह अग्नि/हानि का शास्त्रीय संकेत है, न कि निश्चित भविष्यवाणी; फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

33.23
गुलिकेन युते स्वांशे पूर्णचन्द्रेण वीक्षिते।
चौरैर्हृतधनो जातः स्वयं चौरोऽथवा भवेत्‌
gulikena yute svāṃśe pūrṇacandreṇa vīkṣite|
caurairhṛtadhano jātaḥ svayaṃ cauro'thavā bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुलिकेन युते = गुलिक से युक्त; स्वांशे = स्व-अंश (स्वकीय अंश/कारकांश-प्रसंग) में; पूर्णचन्द्रेण = पूर्ण चन्द्र से; वीक्षिते = दृष्ट; चौरैर्हृतधनो = चोरों द्वारा धन हराया हुआ; जातः = जातक; स्वयं चौरोऽथवा भवेत् = अथवा स्वयं चोर हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुलिक स्वांश में युक्त हो और पूर्ण चन्द्र उसे देखे, तो जातक का धन चोरों द्वारा हराया जाता है, अथवा जातक स्वयं चोरी की प्रवृत्ति वाला बनता है। यहाँ गुलिक-योग और पूर्णिमा-चन्द्र की दृष्टि का संयोग फल-निर्देश का आधार है। यह शास्त्र का संकेत-मात्र है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Gulika is joined in its own aṃśa and aspected by the full Moon, the native’s wealth is stolen by thieves, or else the native himself becomes a thief.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक + पूर्णचन्द्र-दृष्टि)। गुलिक का स्थान पारम्परिक मानदण्डों (मन्दि/गुलिक काल-खण्ड) से निर्धारित होता है; इस श्लोक में केवल फल-निर्देश है, गणना-सूत्र नहीं।

33.24
गृहादृष्टे सगुलिके विपदो वा विषैर्हतः।
बुधदृष्टे बृहद्‌वीजो जायते नाऽत्र संशयः
gṛhādṛṣṭe sagulike vipado vā viṣairhataḥ|
budhadṛṣṭe bṛhad‌vījo jāyate nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहादृष्टे = (ग्रहों/शुभों से) अदृष्ट — दृष्टि-रहित; सगुलिके = गुलिक-युक्त; विपदो = विपत्तियों वाला; वा = अथवा; विषैर्हतः = विषों से मारा गया; बुधदृष्टे = बुध की दृष्टि में; बृहद्‌वीजो = बृहद् बीज वाला (वीर्य/सन्तति-शक्ति का शास्त्रीय संकेत); नाऽत्र संशयः = इसमें सन्देह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुलिक-युक्त स्थान यदि (अन्य) दृष्टि से रहित हो, तो जातक विपत्तियों से ग्रस्त होता है अथवा विष से हानि/मृत्यु का संकेत मिलता है। परन्तु यदि बुध उसे देखे, तो “बृहद्‌वीज” — प्रबल बीज/सन्तति-शक्ति — वाला जातक होता है; शास्त्र यहाँ “सन्देह नहीं” कहकर नियम को दृढ़ करता है। फल को चिकित्सकीय या निश्चित मृत्यु-भविष्य के रूप में न लें — केवल शास्त्र-वाक्य है।

English rendering The text states that when the place with Gulika is without (benefic/planetary) aspect, the native faces calamities or is described as slain by poison; when Mercury aspects it, a person of great generative potency is born — so the śāstra affirms without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुलिक-अदृष्टि vs बुध-दृष्टि)। दो विपरीत दृष्टि-दशाओं का फल-भेद यहाँ काव्य-रूप में बाँधा गया है; गणना का कोई मापांक नहीं दिया गया।

33.25
सकेतौ कारकांशे च पापदृष्टे द्विजोत्तम।
जातस्य कर्णरोगो वा कर्णच्छेदः प्रजायते
saketau kārakāṃśe ca pāpadṛṣṭe dvijottama|
jātasya karṇarogo vā karṇacchedaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सकेतौ = केतु से सहित; कारकांशे = कारकांश (आत्मकारक का नवमांश) में; पापदृष्टे = पाप-ग्रहों से दृष्ट; द्विजोत्तम = हे ब्राह्मणोत्तम; जातस्य = जातक का; कर्णरोगो = कर्ण-रोग; वा कर्णच्छेदः = अथवा कर्ण-छेदन/कर्ण की हानि; प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कारकांश केतु से युक्त हो और पाप-ग्रहों की दृष्टि पड़े, तो जातक को कर्ण-रोग या कर्ण-छेदन/कर्ण-हानि का संकेत मिलता है। कारकांश = आत्मकारक जिस नवमांश-राशि में हो, वह राशि (D9 में) — यही यहाँ “तस्मिन्” प्रसंग का आधार है। यह शारीरिक/चिकित्सकीय निदान नहीं, शास्त्र का फल-कथन मात्र है।

English rendering The text states, O best of the twice-born, that when the kārakāṃśa is with Ketu and aspected by malefics, ear disease or cutting/mutilation of the ear arises for the native.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारकांश + केतु + पाप-दृष्टि)। कारकांश स्वयं D9 पर निर्भर है (आत्मकारक की राश्यांश → नवमांश-राशि), पर इस श्लोक में केवल फल बताया गया है, वर्ग-सूत्र नहीं।

33.26
भृगुपुत्रेक्षिते तस्मिन्‌ दीक्षितो जायते जनः।
बुधार्किदृष्टे निर्वीर्यो जायते मानवो ध्रुवम्‌
bhṛguputrekṣite tasmin‌ dīkṣito jāyate janaḥ|
budhārkidṛṣṭe nirvīryo jāyate mānavo dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भृगुपुत्रेक्षिते = भृगुपुत्र (शुक्र) से ईक्षित/दृष्ट; तस्मिन् = उस (कारकांश/प्रसंगगत स्थान) में; दीक्षितो = दीक्षा-प्राप्त (संस्कारित/दीक्षित जन); जायते जनः = व्यक्ति जन्म लेता है; बुधार्किदृष्टे = बुध और अर्कि (शनि) से दृष्ट; निर्वीर्यो = निर्वीर्य (शक्ति/वीर्य-हीन); मानवो ध्रुवम् = मनुष्य निश्चित रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वह स्थान शुक्र (भृगुपुत्र) से दृष्ट हो, तो जातक दीक्षित — किसी परम्परा/संस्कार में दीक्षा लेने वाला — होता है। यदि बुध और शनि दोनों उसे देखें, तो जातक निर्वीर्य कहा जाता है — शक्ति/वीर्य की न्यूनता का शास्त्रीय संकेत। “ध्रुवम्” शास्त्र की दृढ़ता दर्शाता है, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that when that place is aspected by Venus (Bhṛgu’s son), an initiated person is born; when aspected by Mercury and Saturn, a human of depleted strength/virility is born — so it affirms.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-दृष्टि vs बुध+शनि-दृष्टि)। “अर्कि” ज्योतिष में सामान्यतः शनि (सूर्य-पुत्र) है; पाठ-भेद संभव यदि कहीं “अर्क” (सूर्य) पढ़ा जाए, पर शास्त्रीय पद “अर्कि” शनि-वाचक है।

33.27
बुधशुक्रेक्षिते तस्मिन्‌ दासीपुत्रः प्रजायते।
पुनर्भवासुतो वाऽपि जायते नाऽत्र संशयः
budhaśukrekṣite tasmin‌ dāsīputraḥ prajāyate|
punarbhavāsuto vā'pi jāyate nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध = बुध ग्रह (Mercury); शुक्र = शुक्र ग्रह (Venus); ईक्षिते = दृष्ट होने पर; तस्मिन् = उस [कारकांश] पर; कारकांश = आत्मकारक (उच्चतम-अंश ग्रह) की नवांश-राशि (the D9 sign of the Ātmakāraka); दासीपुत्रः = सेविका का पुत्र; प्रजायते = उत्पन्न होता है; पुनर्भवा-सुतः = पुनर्विवाहिता स्त्री (punarbhū) का पुत्र; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ जब कारकांश — अर्थात् आत्मकारक का नवांश-राशि — बुध और शुक्र से दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक दासीपुत्र होता है, अथवा पुनर्विवाहिता स्त्री का पुत्र; इसमें संशय नहीं। यह पूर्ववर्ती श्लोकों (केतु, भृगुपुत्र आदि की दृष्टि) की उसी दृष्टि-फल शृंखला की निरंतरता है।

English rendering When the Kārakāṃśa is aspected by Mercury and Venus, the text states the native is born the son of a maidservant, or of a remarried woman — of this there is no doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (जन्म/पितृ-निर्धारण)। तकनीकी निवेश केवल इतना है: आत्मकारक (सप्त/अष्ट-कारक योजना में उच्चतम अंश वाला ग्रह) निकालो → उसका नवांश = कारकांश; फिर उस राशि पर जैमिनि राशि-दृष्टि/ग्रह-दृष्टि से बुध+शुक्र की दृष्टि जाँचो। फलवाक्य शास्त्र का कथन है, न कि कोई नियति-घोषणा।

33.28
तपस्वी सनिना दृष्टे जातः प्रेष्योऽथवा भवेत्‌।
शनिमात्रेक्षिते तस्मिन्‌ जातः संन्यासिवेषवान्‌
tapasvī saninā dṛṣṭe jātaḥ preṣyo'thavā bhavet‌|
śanimātrekṣite tasmin‌ jātaḥ saṃnyāsiveṣavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तपस्वी = तपस्वी; सनिना दृष्टे = शनि से दृष्ट; जातः = जातक; प्रेष्योऽथवा भवेत् = अथवा प्रेष्य (सेवक/दूत) हो; शनिमात्रेक्षिते = केवल शनि से ईक्षित; तस्मिन् = उस स्थान में; संन्यासिवेषवान् = संन्यासी का वेष धारण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वह स्थान शनि से दृष्ट हो, तो जातक तपस्वी होता है अथवा प्रेष्य — सेवा/दूत-कर्म में लगा — बनता है। यदि केवल शनि ही उसे देखे (अन्य दृष्टियों से रहित मात्र-शनि दृष्टि), तो जातक संन्यासी-वेष वाला कहा जाता है। शनि-दृष्टि के सामान्य और “मात्र” रूप का फल-भेद यहाँ सूक्ष्म रूप से दिया गया है।

English rendering The text states that when that place is aspected by Saturn, the native becomes an ascetic or a servant/messenger; when aspected by Saturn alone, the native wears the garb of a renunciate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-दृष्टि vs शनि-मात्र दृष्टि)। “मात्र” दृष्टि का नियम फल-विशेषण है, कोई बल-इकाई या काल-माप नहीं; संन्यास/सेवा को नियति या दबाव-उपाय के रूप में न पढ़ें।

33.29
रविसुक्रेक्षिते तस्मिन्‌ राजप्रेष्यो जनो भवेत्‌।
इतिसंक्षेपतः प्रोक्तं कारकांशफलं द्विज
ravisukrekṣite tasmin‌ rājapreṣyo jano bhavet‌|
itisaṃkṣepataḥ proktaṃ kārakāṃśaphalaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि-शुक्र-ईक्षिते = सूर्य तथा शुक्र से दृष्ट; तस्मिन् = उस (कारकांश/उक्त स्थान) में; राज-प्रेष्यः = राजदूत / राजा का प्रेषित सेवक; जनः = जातक; भवेत् = होता है; इति-संक्षेपतः = इस प्रकार संक्षेप में; प्रोक्तम् = कहा गया; कारकांश-फलम् = कारकांश के फल; द्विज = हे द्विज (शिष्य-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब उक्त कारकांश (अथवा तत्सम्बद्ध स्थान) सूर्य और शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक राज-प्रेष्य — राजा का दूत या राजकीय सन्देशवाहक — होता है। इसी पद में आचार्य कहते हैं कि कारकांश-फल यहाँ संक्षेप में कह दिया गया। यह फल-कथन है, नियति की घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when that (kārakāṃśa / the place under discussion) is aspected by the Sun and Venus, the native becomes a royal envoy. Thus, O twice-born, the results of kārakāṃśa have been stated in brief.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन तथा अध्याय-संक्षेप। “ईक्षित” = दृष्टि-सम्बन्ध (पूर्ण/आंशिक दृष्टि की परम्परागत परिभाषा पर निर्भर); कारकांश = आत्मकारक की राशि में नवांश (D9) — यह स्थान-निर्धारण वर्गाङ्क-गणित है, फल स्वयं शास्त्र का कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश की नींव षोडश-वर्ग की D9 (नवांश) पर टिकी है — 30° राशि का 9 समान खण्डों (प्रत्येक 3°20′) में विभाजन, फिर नवांश-राशि का नियत नियम से मानचित्रण। फल-वाक्य को हम “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं; गणना और व्याख्या अलग।

33.30
स्वांशाद्‌धने च शुक्रारवर्गे स्यात्‌ पारदारिकः।
तयोर्दृग्‌योगतो ज्ञेयमिदमामरणं फलम्‌
svāṃśād‌dhane ca śukrāravarge syāt‌ pāradārikaḥ|
tayordṛg‌yogato jñeyamidamāmaraṇaṃ phalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशात् = स्वांश (आत्मकारक-नवांश = कारकांश) से; धने = धन-भाव अर्थात् द्वितीय स्थान में (धन = 2nd); शुक्रार-वर्गे = शुक्र-मंगल की वर्ग/राशि में (शुक्र + अर = मंगल); स्यात् पारदारिकः = परस्त्रीगामी होता है; तयोः दृग्-योगतः = उन दोनों की दृष्टि अथवा युति से; इदम् आमरणं फलम् = यह फल आमरण (मृत्यु-पर्यन्त) रहता है।

हिन्दी भावार्थ स्वांश (कारकांश) से द्वितीय भाव में यदि शुक्र या मंगल की राशि/वर्ग हो — अथवा उन दोनों की युति-दृष्टि हो — तो शास्त्र कहता है जातक पारदारिक होता है; और शुक्र-मंगल के दृष्टि-योग से यह प्रवृत्ति जीवनपर्यन्त बनी रहती है।

English rendering If the 2nd from the svāṃśa (Kārakāṃśa) holds a sign/varga of Venus or Mars — or the two conjoin or aspect it — the text states the native becomes an adulterer, a result that lasts until death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना कारकांश से — द्वितीय (धन) = कारकांश-राशि + 1। शुक्र की राशियाँ = वृषभ, तुला; मंगल की = मेष, वृश्चिक। योग सक्रिय तब, जब इनमें से कोई द्वितीय में हो, अथवा शुक्र/मंगल स्वयं वहाँ युत या दृष्ट हों। "आमरण" = आजीवन — कालावधि-सूचक शब्द, संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) चलंत कुण्डली — आत्मकारक शुक्र 25° मेष (Lahiri sidereal)। मेष चर राशि ⇒ नवांश गणना मेष से; 25° ÷ 3°20′ = 8वाँ नवांश ⇒ वृश्चिक। अतः कारकांश = वृश्चिक। द्वितीय = वृश्चिक + 1 = धनु। धनु गुरु की राशि है (शुक्र/मंगल की नहीं), अतः केवल राशि-स्वामित्व से योग नहीं बनता; किन्तु यदि शुक्र या मंगल धनु में बैठें अथवा उसे देखें, तो शास्त्रोक्त फल लागू।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश स्वयं एक नवांश (D9) राशि है; उसे निकालने के लिए 30° राशि को 9 सम भागों (प्रत्येक 3°20′) में बाँटना अनिवार्य — यही षोडश-वर्ग का D9। हमारे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) में D9 एक निर्धारक मॉड्यूलर विभाजन है; कारकांश और उससे "द्वितीय/तृतीय" भाव-गणना इसी सटीक अंकगणित पर टिकी है, जबकि "पारदारिक" फल शास्त्र का कथन मात्र है।

33.31
केतौ तत्प्रतिबन्धः स्यात्‌ गुरौ तु स्रैण एव सः।
राहौ चाऽर्थनिवृत्तिः स्यात्‌ कारकांशाद्‌ द्वितीयगे
ketau tatpratibandhaḥ syāt‌ gurau tu sraiṇa eva saḥ|
rāhau cā'rthanivṛttiḥ syāt‌ kārakāṃśād‌ dvitīyage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतौ = केतु होने पर (कारकांश से द्वितीय में); तत्-प्रतिबन्धः = उस (पूर्वोक्त) का प्रतिबन्ध/अवरोध; स्यात् = हो; गुरौ = गुरु होने पर; तु = किन्तु; स्रैणः = स्त्री-प्रधान / स्त्री-संसक्त (शास्त्र-पद); एव = ही; सः = वह; राहौ = राहु होने पर; च = और; अर्थ-निवृत्तिः = अर्थ (धन/प्रयोजन) की निवृत्ति; कारकांशात् = कारकांश से; द्वितीय-गे = द्वितीय भाव में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से द्वितीय में केतु हो तो पूर्वोक्त (पारदारिक आदि) फल में प्रतिबन्ध लगता है; गुरु हो तो वह जातक स्रैण — स्त्री-संसक्त — कहा जाता है; राहु हो तो अर्थ-निवृत्ति कही जाती है। तीनों स्थिति “कारकांशाद्वितीयगे” पर टिकी हैं। यह फल-भेद है, डरावनी भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that with Ketu [in the second from kārakāṃśa] there is obstruction of that [prior result]; with Jupiter he is woman-oriented (sraiṇa); and with Rāhu there is cessation of artha — when [the planet is] in the second from kārakāṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-भेद से द्वितीय-भाव-फल)। तकनीक केवल स्थान: ग्रह P का राशि-चिह्न R_P == (R_K + 1) mod 12 ⇒ “कारकांशाद् द्वितीयग”। केतु/राहु की छाया-ग्रह परिभाषा (सही/विपरीत चक्र) परम्परा-निर्भर — घोषित करें; फल स्वयं शास्त्र का।

उदाहरण (worked example) R_K = तुला (7) ⇒ द्वितीय = वृश्चिक (8)। यदि वृश्चिक में केतु हो → शास्त्र “तत्प्रतिबन्ध”; गुरु हो → “स्रैण”; राहु हो → “अर्थनिवृत्ति” — तीनों उसी भाव-स्थान-परीक्षण से।

33.32
स्वांशात्‌ तृतीयगे पापे जातः शूरः प्रतापवान्‌।
तस्मिन्‌ शुभग्रहे जातः कातरो नात्र संशयः
svāṃśāt‌ tṛtīyage pāpe jātaḥ śūraḥ pratāpavān‌|
tasmin‌ śubhagrahe jātaḥ kātaro nātra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-अंशात् = कारकांश से; तृतीय-गे = तृतीय भाव में स्थित; पापे = पाप-ग्रह (मन्द/अर/शनि/राहु-केतु — परम्परा अनुसार); जातः = उत्पन्न जातक; शूरः = शूरवीर; प्रतापवान् = प्रतापी; तस्मिन् = उस (तृतीय) में; शुभ-ग्रहे = शुभ ग्रह होने पर; कातरः = कायर/भीरु; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र का दृढ़ कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से तृतीय भाव में पाप-ग्रह हो तो जातक शूर और प्रतापवान् कहा जाता है; उसी स्थान में शुभ-ग्रह हो तो कातर — इसमें शास्त्र संशय नहीं मानता। यह तृतीय-भाव का साहस/कायरता-फल-कथन है; हम इसे नियति या भय के रूप में नहीं बढ़ाते।

English rendering The text states that when a malefic occupies the third from one’s own aṃśa (kārakāṃśa), the native is brave and glorious; when a benefic is there, timid — of this, says the śāstra, there is no doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान: तृतीय = (R_K + 2) mod 12। “पाप/शुभ” = ग्रह-वर्गीकरण (सूर्य को कुछ परम्पराएँ पाप मानती हैं — पाठ/सम्प्रदाय घोषित करें)। कोई अंश-भार या बिन्दु-तालिका इस श्लोक में नहीं — केवल भाव-स्थिति → फल-द्वन्द्व।

उदाहरण (worked example) कारकांश = मकर (10) ⇒ तृतीय = मीन (12)। मीन में शनि ⇒ शास्त्र: शूरः प्रतापवान्; मीन में शुक्र ⇒ शास्त्र: कातरः। (D1 में भाव-गिनती कारकांश-राशि से; कुछ टीकाएँ D9-भाव भी देखते हैं — प्रयुक्त कुण्डली स्पष्ट करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश” = D9-निर्धारित कारकांश-चिह्न; भाव-ऑफसेट शुद्ध (R+n) mod 12। वर्गाङ्क-इंजन स्थान देता है; “शूर/कातर” फल को हम गणना से नहीं मिलाते — गणित और फल-कथन अलग रखते हैं।

33.33
स्वांशाच्चतुर्थभावे तु चन्द्रशुक्रयुतेक्षिते।
तत्र वा स्वोच्चगे खेटे जातः प्रासादवान्‌ भवेत्‌
svāṃśāccaturthabhāve tu candraśukrayutekṣite|
tatra vā svoccage kheṭe jātaḥ prāsādavān bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशात् = स्वांश (कारकांश) से; चतुर्थभावे = चतुर्थ भाव में; चन्द्रशुक्रयुतेक्षिते = चन्द्र-शुक्र से युक्त या दृष्ट; तत्र वा = अथवा वहाँ; स्वोच्चगे खेटे = स्वोच्च ग्रह के होने पर; जातः = जातक; प्रासादवान् भवेत् = प्रासाद (भव्य भवन) वाला होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कारकांश से चतुर्थ भाव चन्द्र और शुक्र से युक्त या दृष्ट हो, अथवा वहाँ कोई स्वोच्च ग्रह हो, तो जातक प्रासाद-सम्पन्न होता है। कारकांश-फल अध्याय में चतुर्थ (गृह-सुख) के लिए यह पद है।

English rendering If the fourth house from the kārakāṃśa is joined or aspected by the Moon and Venus, or an exalted planet stands there, the native is said to possess a mansion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: {Mo, Ve} ∩ (युति ∪ दृष्टि) (भाव 4 from कारकांश) ≠ ∅, अथवा उच्च-ग्रह ∈ वही भाव। सन्दर्भ: कारकांश = आत्मकारक की D9 राशि।

33.34
शनिराहुयुते तस्मैन्‌ जातस्य च शिलागृहम्‌।
ऐष्टिकं कुजकेतुभ्यां गुरुणा दारवं गृहम्‌
śanirāhuyute tasmain‌ jātasya ca śilāgṛham‌|
aiṣṭikaṃ kujaketubhyāṃ guruṇā dāravaṃ gṛham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-राहु-युते = शनि और राहु से युक्त; तस्मिन् = उस (कारकांश/उक्त स्थान) में (पाठ: तस्मैन् → तस्मिन्; पाठ-भेद संभव); जातस्य = जातक का; च = और; शिला-गृहम् = पत्थर का घर; ऐष्टिकम् = इष्टिका/ईंट का; कुज-केतुभ्याम् = मङ्गल और केतु से; गुरुणा = गुरु से; दारवम् = लकड़ी का; गृहम् = गृह/भवन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस (कारकांश) स्थान पर शनि-राहु योग हो तो जातक का गृह शिलामय; मङ्गल-केतु से ऐष्टिक (ईंट-मिट्टी); गुरु से दारव (काष्ठ) कहा जाता है। यह निवास-पदार्थ का फल-कथन है — भवन-वास्तु का शास्त्रीय संकेत, आधुनिक निर्माण-निर्देश नहीं।

English rendering The text states that when that [place] is joined by Saturn and Rāhu, the native’s house is of stone; by Mars and Ketu, of brick; by Jupiter, of wood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (युति-द्वारा गृह-पदार्थ)। तकनीक: युति = समान राशि (या परम्परा में समान नवांश आदि — घोषित करें) में दो ग्रहों की स्थिति; यहाँ तीन युग्म-नियम: शनि+राहु → शिला; कुज+केतु → ऐष्टिक; गुरु → दारव।

उदाहरण (worked example) कारकांश-राशि = वृषभ। यदि वृषभ में शनि+राहु ⇒ शास्त्र: शिलागृह; वृषभ में मङ्गल+केतु ⇒ ऐष्टिक; वृषभ में गुरु (अकेला या गुरु-प्रधान योग) ⇒ दारव गृह। (लग्न/भाव-कुण्डली नहीं — कारकांश-चिह्न पर योग।)

33.35
तार्ण तु रविणा प्रोक्तं जातस्य भवनं द्विज।
चन्द्रे त्वनावृते देशे पत्नीयोगः प्रजायते
tārṇa tu raviṇā proktaṃ jātasya bhavanaṃ dvija|
candre tvanāvṛte deśe patnīyogaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तार्णम् = तृणमय / फूस-खपरैल का; तु = किन्तु; रविणा = सूर्य से; प्रोक्तम् = कहा गया; जातस्य = जातक का; भवनम् = भवन; द्विज = हे द्विज; चन्द्रे = चन्द्र होने पर; तु = तो; अनावृते देशे = अनावृत/खुले प्रदेश में; पत्नी-योगः = पत्नी का योग/सहवास-संयोग; प्रजायते = उत्पन्न होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य से जातक का भवन तार्ण — तृणमय — कहा गया; चन्द्र हो तो अनावृत देश में पत्नी-योग होता है। पूर्व श्लोक के शिला/ऐष्टिक/दारव क्रम में यह सूर्य-चन्द्र का गृह/वास-फल जोड़ता है। फल शास्त्र का स्वर है; हम इसे आवास-नीति या दाम्पत्य-भविष्य के रूप में नहीं बाँधते।

English rendering The text states that with the Sun the native’s dwelling is said to be of thatch (tārṇa), O twice-born; with the Moon, in an open (uncovered) region, association with the wife arises.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य → तार्ण भवन; चन्द्र → अनावृत देश + पत्नीयोग)। स्थान-सन्दर्भ पूर्ववत् कारकांश (तस्मिन्) माना जाता है; कोई अंश-सूत्र या वर्ष-संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) कारकांश = सिंह, उसमें सूर्य ⇒ शास्त्र: तार्ण भवन; कारकांश = कर्क, उसमें चन्द्र ⇒ शास्त्र: अनावृत देश में पत्नीयोग। (युति/अधिष्ठान की कुण्डली-स्तर — D1 बनाम D9 — स्पष्ट घोषित करें; इस पद में संख्या नहीं।)

33.36
पञ्चमे कुजराहुभ्यां क्षयरोगस्य संभवः।
रात्रिनाथेन दृष्टाभ्यां निश्चयेन प्रजायते
pañcame kujarāhubhyāṃ kṣayarogasya saṃbhavaḥ|
rātrināthena dṛṣṭābhyāṃ niścayena prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमे = पंचम भाव में (कारकांश से); कुज-राहुभ्यां = मंगल-राहु से; क्षय-रोगस्य संभवः = क्षय-रोग की संभावना; रात्रि-नाथेन = रात्रि के अधिपति (चन्द्र) से; दृष्टाभ्यां = उन दोनों के दृष्ट होने पर; निश्चयेन प्रजायते = निश्चय से होता है।

हिन्दी भावार्थ कारकांश से पंचम भाव में मंगल और राहु हों तो शास्त्र क्षय-रोग की संभावना कहता है; और यदि वे दोनों रात्रि-नाथ चन्द्र से भी दृष्ट हों, तो शास्त्रानुसार यह निश्चित रूप से होता है। (यह शास्त्र का कथन है; कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं।)

English rendering With Mars and Rāhu in the 5th from the Kārakāṃśa, the text states a likelihood of consumptive disease; if those two are further aspected by the Moon (lord of night), it says it surely arises.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पंचम = कारकांश-राशि + 4। योग-शर्त: (मंगल ∧ राहु) पंचम-स्थ; तीव्रता-वर्धक = उन पर चन्द्र-दृष्टि। "रात्रि-नाथ" = चन्द्र (रात्रि का स्वामी) — शब्द-संकेत द्वारा ग्रह-नामकरण, कोई अंक नहीं।

उदाहरण (worked example) वही कुण्डली — कारकांश वृश्चिक ⇒ पंचम = वृश्चिक + 4 = मीन। मीन में मंगल+राहु ⇒ शास्त्रोक्त "संभावना"; उन पर चन्द्र-दृष्टि भी जुड़े ⇒ शास्त्र "निश्चय" कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक वह स्थान है जहाँ अनुशासन आवश्यक है: पंचम-गणना (कारकांश + 4) निर्धारक अंकगणित है, किन्तु "क्षय-रोग" इसका फल — शास्त्र का कथन, न कि चिकित्सकीय निदान या भविष्यवाणी। हम गणना को यथावत् दिखाते हैं और रोग-वाक्य को "शास्त्र कहता है" के रूप में उद्धृत करते हैं; कोई चिकित्सा-दावा या भय-प्रेरणा नहीं (dossier §5)।

33.37
कुजदृष्टौ तु जातस्य पिटकादिगदो भवेत्‌।
केतुदृष्टौ तु ग्रहणी जलरोगोऽथवा द्विज
kujadṛṣṭau tu jātasya piṭakādigado bhavet‌|
ketudṛṣṭau tu grahaṇī jalarogo'thavā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज-दृष्टौ = मंगल की दृष्टि में; जातस्य = जातक के; पिटक-आदि-गदः = फोड़े-फुंसी आदि रोग; भवेत् = होता है; केतु-दृष्टौ = केतु की दृष्टि में; ग्रहणी = ग्रहणी (पाचन-संबंधी शास्त्रीय रोग-संकेत); जल-रोगः = जल-संबंधी रोग; अथवा = या; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-प्रसंग के उस स्थान पर) मंगल की दृष्टि होने पर जातक को पिटकादि रोग का संकेत मिलता है। केतु की दृष्टि में ग्रहणी अथवा जलरोग का फल कहा गया है। यह दृष्टियोग का फल-विवेक है; रोग-निदान या इलाज का विधान नहीं।

English rendering The text states that under Mars’s aspect the native is indicated for boils and similar afflictions; under Ketu’s aspect, for grahaṇī or water-related disease. The address is to the disciple (“O twice-born”).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-विशेष → रोग-संकेत)। कुज/केतु की दृष्टि यहाँ फलादेश की शर्त है; कोई कोण-माप या संख्यात्मक बलांक नहीं दिया।

33.38
सराहुगुलिके तत्र भयं क्षुदविषोद्‌भवम्‌।
बुधे परमहंसश्च लगुडी वा प्रजायते
sarāhugulike tatra bhayaṃ kṣudaviṣod‌bhavam‌|
budhe paramahaṃsaśca laguḍī vā prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स-राहु-गुलिके = राहु और गुलिक सहित (उस स्थान में); तत्र = वहाँ; भयम् = भय/संकट-संकेत; क्षुद्-विष-उद्भवम् = क्षुधा और विष से उत्पन्न; बुधे = बुध (वहाँ) होने पर; परमहंसः = परमहंस (उच्च वैराग्य-प्रकार); च = और; लगुडी = दंडधारी (लगुड/दंड वाला); वा = अथवा; प्रजायते = जन्म लेता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी प्रसंग-स्थान में राहु और गुलिक के साथ क्षुधा-विष से उत्पन्न भय का संकेत है। यदि वहाँ बुध हो, तो जातक परमहंस-प्रवृत्ति का अथवा दंडधारी (लगुडी) साधु-प्रकार का कहा गया है। दो भिन्न फल-मार्ग हैं—एक संकट-संकेत, दूसरा जीवन-मार्ग/वृत्ति-संकेत।

English rendering The text states that with Rāhu and Gulika there, danger arising from hunger and poison is indicated. With Mercury there, the native is said to be born a paramahaṃsa or a staff-bearing ascetic type.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-गुलिक / बुध-स्थिति)। गुलिक उपग्रह-स्थान परंपरागत काल-सूत्र से लिया जाता है, पर इस श्लोक में कोई गणना-विधि नहीं कही गई।

33.39
रवौ खेड्‌गधरो जातः कुजे कुन्तायुधी भवेत्‌।
शनौ धनुर्धरो ज्ञेयो राहौ च लोहयन्त्रवान्‌
ravau kheḍ‌gadharo jātaḥ kuje kuntāyudhī bhavet‌|
śanau dhanurdharo jñeyo rāhau ca lohayantravān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवौ = सूर्य (वहाँ) होने पर; खड्ग-धरः = खड्गधारी; जातः = जन्म लेता है; कुजे = मंगल होने पर; कुन्त-आयुधी = कुंत (भाला) आयुध वाला योद्धा; भवेत् = होता है; शनौ = शनि होने पर; धनुर्धरः = धनुर्धारी; ज्ञेयः = जानना चाहिए; राहौ = राहु होने पर; च = और; लोह-यन्त्र-वान् = लौह-यंत्र वाला (लोहे के यंत्र/उपकरण से जुड़ा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उसी प्रसंग-स्थान में) सूर्य होने पर जातक खड्गधारी कहा जाता है; मंगल होने पर कुंतायुध योद्धा। शनि होने पर धनुर्धारी, और राहु होने पर लौह-यंत्र से युक्त/जुड़ा व्यक्ति—यह वृत्ति-आयुध-संकेत का क्रम है।

English rendering The text states: with the Sun there, a sword-bearer is born; with Mars, a spear-armed fighter; with Saturn, a bowman; with Rāhu, one associated with iron machinery or implements.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-स्थिति → आयुध/वृत्ति-प्रकार)। प्रत्येक ग्रह एक विशिष्ट शस्त्र/यंत्र-संकेत से जोड़ा गया है; कोई अंश-विभाजन या बल-सारणी नहीं।

33.40
केतौ च घटिकायन्त्री मानवो जायते द्विज।
भार्गवे तु कविर्वाग्मी काव्यज्ञो जायते जनः
ketau ca ghaṭikāyantrī mānavo jāyate dvija|
bhārgave tu kavirvāgmī kāvyajño jāyate janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतौ = केतु होने पर; च = और; घटिका-यन्त्री = घटिका-यंत्र चलाने वाला (काल-यंत्र/जल-घटिका आदि); मानवः = मनुष्य; जायते = जन्म लेता है; द्विज = हे द्विज; भार्गवे = शुक्र (भार्गव) होने पर; तु = तो; कविः = कवि; वाग्मी = वाक्पटु; काव्य-ज्ञः = काव्य-ज्ञ; जायते जनः = व्यक्ति जन्म लेता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु होने पर जातक घटिकायंत्री—काल/यंत्र-संचालन से जुड़ा—कहा जाता है। शुक्र (भार्गव) होने पर वही स्थान कवि, वाग्मी और काव्यज्ञ व्यक्ति का फल देता है। यह पूर्व श्लोक की आयुध-वृत्ति-श्रृंखला का विस्तार है—यंत्र-कौशल से काव्य-कौशल तक।

English rendering The text states that with Ketu there, a person skilled with the ghaṭikā-device (time/mechanical instrument) is born; with Venus (Bhārgava), a poet, eloquent speaker, and knower of poetry.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु/शुक्र → कौशल-प्रकार)। “घटिका” शास्त्रीय काल-माप यंत्र का संकेत हो सकता है, पर यहाँ कोई संख्या या सूत्र नहीं दिया।

33.41
स्वांशे तत्पञ्चमे वाऽपि चन्द्रेज्याभ्यां च ग्रन्थकृत्‌।
शुक्रेण किञ्चिदूनोऽसौ ततोऽप्यल्पो बुधेन च
svāṃśe tatpañcame vā'pi candrejyābhyāṃ ca granthakṛt‌|
śukreṇa kiñcidūno'sau tato'pyalpo budhena ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-अंशे = स्व-अंश (स्व-वर्ग/अंश-स्थान) में; तत्-पञ्चमे = उसके पंचम में; वा अपि = अथवा भी; चंद्र-इज्याभ्यां = चंद्र और गुरु द्वारा; च = और; ग्रन्थ-कृत् = ग्रंथ-रचयिता; शुक्रेण = शुक्र से; किञ्चित्-ऊनः = कुछ कम; असौ = वह (ग्रंथकृत्-गुण); ततः अपि अल्पः = उससे भी अल्प; बुधेन = बुध से; च = और।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्वांश में, अथवा उसके पंचम में, चंद्र और गुरु से जातक ग्रंथकृत् कहा जाता है। शुक्र से वही गुण किंचित् न्यून, और बुध से उससे भी अल्प—यह ग्रंथ-रचना-क्षमता का तुलनात्मक क्रम है। “स्वांश” यहाँ अंश/वर्ग-स्थान का संकेत है; पाठ-भेद संभव जहाँ अंश का ठीक-ठीक वर्ग निर्दिष्ट न हो।

English rendering The text states that in own aṃśa, or in the fifth from it, the Moon and Jupiter make a treatise-author. With Venus that capacity is somewhat less; with Mercury, still less—a ranked comparison of authorial indication.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान + ग्रह → ग्रंथकृत्-क्रम)। तुलना क्रमिक (“किंचिदून / अल्प”) है, कोई अंकीय भार या गुणांक नहीं दिया। “स्वांश” परंपरा में प्रायः नवमांश/अंश-स्थान से जोड़ा जाता है; इस श्लोक में वर्ग-संख्या स्पष्ट नहीं—पाठ-भेद/टीका-निर्भर।

33.42
गुरुणा केवलेनैव सर्वविद्‌ ग्रन्थकृत्‌ तथा।
वेदवेदान्तविच्चापि न वाग्मी शाब्दकोऽपि सन्‌
guruṇā kevalenaiva sarvavid‌ granthakṛt‌ tathā|
vedavedāntaviccāpi na vāgmī śābdako'pi san‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुणा = गुरु से; केवलेन एव = केवल अकेले ही; सर्व-विद् = सर्वज्ञ/सर्वविद्या-संपन्न; ग्रन्थ-कृत् = ग्रंथ-रचयिता; तथा = तथा; वेद-वेदान्त-वित् = वेद और वेदांत का ज्ञाता; च अपि = और भी; न वाग्मी = वाग्मी (केवल वाक्पटु) नहीं; शाब्दकः अपि सन् = शब्द-शास्त्रज्ञ होते हुए भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केवल गुरु से ही जातक सर्वविद् और ग्रंथकृत् कहा जाता है, तथा वेद-वेदांत का ज्ञाता भी। शब्द-शास्त्र में निपुण होते हुए भी वह मात्र वाग्मी (बोलने-मात्र का कुशल) नहीं—गंभीर विद्या-ग्रंथ का धनी कहा गया है। यह पूर्व श्लोक की ग्रंथकृत्-श्रेणी का शिखर-फल है: गुरु अकेला पूर्णता का संकेत देता है।

English rendering The text states that Jupiter alone makes one all-knowing and a maker of treatises, and also a knower of Veda and Vedānta—not merely an orator, even while being a master of words (śābdaka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केवल-गुरु → सर्वोच्च ग्रंथकृत्/विद्वत्-संकेत)। “केवल” अन्य ग्रहों की सहायता-रहित स्थिति का गुणात्मक नियम है; कोई वर्ष, अंश या बल-सीमा नहीं दी गई।

33.43
नैयायिकः कुजेनासौ ज्ञेन मीमांसकस्तथा।
सभाजडस्तु शनिना गीतज्ञो रविणा स्मृतः
naiyāyikaḥ kujenāsau jñena mīmāṃsakastathā|
sabhājaḍastu śaninā gītajño raviṇā smṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नैयायिकः = न्याय-शास्त्र का जानकार / तार्किक; कुजेन = मङ्गल से (युक्त/स्थित होने पर); ज्ञेन = बुध से; मीमांसकः = मीमांसा-शास्त्र का जानकार; सभाजडः = सभा में जड़ / अल्पभाषी-निष्प्रभाव; शनिना = शनि से; गीतज्ञः = गीत-विद्या का जानकार; रविणा = सूर्य से; स्मृतः = कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ (स्वांश-सन्दर्भ में) ग्रह-योग से विद्या-स्वभाव बताता है। कुज से जातक नैयायिक — न्याय-तर्क का अभ्यासी — कहा गया है; ज्ञ (बुध) से मीमांसक। शनि से सभा में जड़ता का संकेत दिया गया है; रवि से गीतज्ञता स्मृत है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that with Mars one is a Naiyāyika (logician of Nyāya); with Mercury, a Mīmāṃsaka. With Saturn one is dull or inert in assembly; with the Sun one is remembered as skilled in song.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विद्या/स्वभाव, स्वांश-सन्दर्भ में ग्रह-संयोग)। गणना यहाँ केवल “कौन-सा ग्रह स्वांश-सम्बद्ध है” की पहचान है; कोई अंश-विभाजन या बल-इकाई नहीं।

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33.44
चन्द्रेण सांख्ययोगज्ञः साहित्यज्ञश्च गायकः।
केतुना गणितज्ञोऽसौ राहणाऽपि तथैव च
candreṇa sāṃkhyayogajñaḥ sāhityajñaśca gāyakaḥ|
ketunā gaṇitajño'sau rāhaṇā'pi tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रेण = चन्द्र से; सांख्ययोगज्ञः = सांख्य तथा योग का जानकार; साहित्यज्ञः = साहित्य-विद्; गायकः = गायन-कर्म करने वाला; केतुना = केतु से; गणितज्ञः = गणित का जानकार; राहणा = राहु से; अपि तथैव = उसी प्रकार; च = भी।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र से शास्त्र सांख्य-योगज्ञता, साहित्यज्ञता और गायकता का फल कहता है। केतु से जातक गणितज्ञ कहा गया है; राहु से भी “तथैव” — वही गणितज्ञ-फल — स्मृत है। दोनों छाया-ग्रहों को यहाँ एक ही विद्या-फल में बाँधा गया है।

English rendering By the Moon the text states knowledge of Sāṃkhya-yoga, literature, and singing. By Ketu one is a mathematician; by Rāhu likewise the same.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विद्या-विशेष, स्वांश-ग्रह-संयोग)। “गणितज्ञ” शब्द यहाँ शास्त्रीय फल-नाम है; कोई संख्या-सूत्र या भुतासङ्ख्या इस श्लोक में नहीं है।

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33.45
सप्रदायस्य सिध्हिः स्यात्‌ गुरुसम्बन्धतो द्विज।
स्वांशाद्‌ द्वितीयतः केचित्‌ फलमेवं वदन्ति हि
sapradāyasya sidhhiḥ syāt‌ gurusambandhato dvija|
svāṃśād‌ dvitīyataḥ kecit‌ phalamevaṃ vadanti hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्प्रदायस्य (सप्रदायस्य) = सम्प्रदाय / परम्परा की; सिद्धिः (सिध्हिः — पाठ-भेद/लिपि-भेद संभव) = सिद्धि, पूर्णता; गुरुसम्बन्धतः = गुरु (बृहस्पति) के सम्बन्ध से; द्विज = हे द्विज (संबोधन); स्वांशात् = स्व-अंश (आत्मकारक-नवांश राशि) से; द्वितीयतः = द्वितीय भाव से; केचित् = कुछ आचार्य; फलम् एवम् = ऐसा फल; वदन्ति हि = कहते ही हैं।

हिन्दी भावार्थ गुरु-सम्बन्ध से सम्प्रदाय की सिद्धि होती है — ऐसा शास्त्र द्विज को कहता है। कुछ आचार्य यही फल स्वांश से द्वितीय भाव पर भी लागू करते हैं। यह मत-भेद (“केचित्”) पाठ में ही सुरक्षित है; एक ही पक्ष को एकमात्र नियम न मानें।

English rendering Through association with Jupiter, the text states accomplishment of one’s tradition (sampradāya). Some authorities, it notes, assign the same result from the second house counted from svāṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वांश-सापेक्ष भाव-गणना (कोई वृत्त-सूत्र नहीं)।
1. ātmakāraka (AK) = सात चर-कारकों में सर्वाधिक अंश वाला ग्रह (राहु-नियम परम्परा-निर्भर — घोषित करें)।
2. svāṃśa = AK की D9 (नवमांश) राशि।
3. स्वांश से द्वितीय = (svāṃśa_sign_index + 1) mod 12 (राशियाँ 0…11)।
4. “गुरुसम्बन्ध” = बृहस्पति का उस भाव/स्वांश से युति, दृष्टि, या अधिपति-सम्बन्ध — शास्त्र यहाँ “सम्बन्ध” शब्द मात्र देता है; दृष्टि-सूत्र अध्याय 8 का है।

उदाहरण (worked example) AK = शुक्र, D9 में कन्या (Virgo, index 5) → स्वांश = कन्या। स्वांश से द्वितीय = तुला (index 6)। यदि रवि-चक्र (D1) में गुरु तुला में हो, या D9 में गुरु स्वांश/द्वितीय से युक्त हो — यह “गुरुसम्बन्ध” की एक संभव जाँच है। (अयनांश: घोषित करें, उदा. लाहिरी; D9 = 30°/9 = 3°20′ प्रति नवमांश, भचक्र-क्रम।)

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33.46
स्वांशात्‌ षष्ठगते पापे कर्षको जायते जनः।
शुभग्रहेऽलसश्चेति तृतीयेऽपि फलं स्मृतम्‌
svāṃśāt‌ ṣaṣṭhagate pāpe karṣako jāyate janaḥ|
śubhagrahe'lasaśceti tṛtīye'pi phalaṃ smṛtam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशात् = स्व-अंश से; षष्ठगते = छठे भाव में स्थित; पापे = पाप-ग्रह में/से; कर्षकः = कृषक / खेतिहर; जायते जनः = मनुष्य जन्म लेता है (शास्त्र-कथन); शुभग्रहे = शुभ ग्रह में/से; अलसः = आलसी; चेति = ऐसा; तृतीये अपि = तृतीय भाव में भी; फलम् स्मृतम् = फल कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ स्वांश से षष्ठ भाव में पाप-ग्रह हो तो शास्त्र कर्षक (कृषि-कर्म) का जन्म कहता है; वहीं शुभ-ग्रह हो तो अलसता का फल स्मृत है। यही फल तृतीय भाव पर भी लागू कहा गया है — षष्ठ और तृतीय दोनों पर एक नियम। यह फल-वर्णन है, अनिवार्यता नहीं।

English rendering From svāṃśa, a malefic in the sixth makes one a cultivator, the text states; a benefic there, one lazy. The same result is also remembered for the third house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वांश से भाव-सूचकांक।
- षष्ठ: house₆ = (s + 5) mod 12
- तृतीय: house₃ = (s + 2) mod 12
जहाँ s = स्वांश-राशि-सूचकांक (0 = मेष … 11 = मीन)।
पाप/शुभ वर्गीकरण शास्त्र-परम्परा के अनुसार (सामान्यतः रवि, मङ्गल, शनि, राहु, केतु — पाप; गुरु, शुक्र — शुभ; बुध/चन्द्र — योग-निर्भर)। कोई अंश-भार या बिन्दु-योग इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) स्वांश = मीन (s = 11)। षष्ठ = सिंह (11+5) mod 12 = 4; तृतीय = वृष (11+2) mod 12 = 1। यदि D1 या D9 (जो चार्ट-परम्परा अपनाएँ — घोषित करें) में सिंह में शनि हो → शास्त्र “कर्षक” कहता है; सिंह में गुरु हो → “अलस”। तृतीय (वृष) पर भी वही नियम।

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33.47
द्यूने चन्द्रगुरु यस्य भार्या तस्यातिसुन्दरी।
तत्र कामवती शुक्रे बुधे चैव कलावती
dyūne candraguru yasya bhāryā tasyātisundarī|
tatra kāmavatī śukre budhe caiva kalāvatī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्यूने = सप्तम भाव में (द्यून = 7); चन्द्रगुरु = चन्द्र या गुरु; यस्य = जिसके; भार्या = पत्नी; तस्य = उसकी; अतिसुन्दरी = अत्यन्त सुन्दरी; तत्र = वहाँ (द्यून में); कामवती = कामासक्त / प्रेम-प्रवण; शुक्रे = शुक्र में/से; बुधे = बुध में/से; कलावती = कला-कुशल।

हिन्दी भावार्थ (स्वांश से) द्यून में चन्द्र या गुरु हों तो शास्त्र भार्या को अतिसुन्दरी कहता है। वहीं शुक्र हो तो कामवती; बुध हो तो कलावती। यह सप्तम-फल पत्नी-लक्षण का शास्त्रीय कथन है — न तो गारंटी, न भय-भाषा।

English rendering With Moon or Jupiter in the seventh (from svāṃśa), the text states the wife is exceedingly beautiful. With Venus there, passionate; with Mercury, skilled in the arts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वांश से सप्तम:
house₇ = (s + 6) mod 12
(विपरीत राशि — same as 180° rāśi-opposition of the svāṃśa sign)। ग्रह-स्थिति की जाँच उसी भाव-राशि में (D1-from-karakāṃśa या D9 — परम्परा घोषित करें)। कोई आयु-वर्ष या बल-इकाई नहीं।

उदाहरण (worked example) स्वांश = कर्क (s = 3) → द्यून = मकर (3+6 = 9)। मकर में चन्द्र या गुरु → शास्त्र “अतिसुन्दरी” कहता है; शुक्र → “कामवती”; बुध → “कलावती”।

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33.48
रवौ च स्वकुले गुप्ता शनौ चापि वयोऽधिका।
तपस्विनी रुजाढ्य वा राहौ च विधवा स्मृता
ravau ca svakule guptā śanau cāpi vayo'dhikā|
tapasvinī rujāḍhya vā rāhau ca vidhavā smṛtā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवौ = सूर्य में/से (द्यून में); स्वकुले = अपने कुल में; गुप्ता = गुप्त / छिपी; शनौ = शनि में/से; वयः-अधिका = आयु में बड़ी; तपस्विनी = तपस्विनी; रुजाढ्या = रोग-बहुल; वा = अथवा; राहौ = राहु में/से; विधवा = विधवा; स्मृता = कही गई।

हिन्दी भावार्थ (द्यून-सन्दर्भ जारी) सूर्य हो तो शास्त्र भार्या को स्वकुल में गुप्ता कहता है; शनि हो तो वयोऽधिका। राहु हो तो तपस्विनी, रुजाढ्या, अथवा विधवा — तीन विकल्प “वा” से जुड़े; शास्त्र इन्हें संभव फल-रूप में स्मृत करता है, एक ही नियत परिणाम के रूप में नहीं।

English rendering With the Sun (in that seventh), the wife is said to be secretive within her own family; with Saturn, older in age. With Rāhu she is stated as ascetic, disease-afflicted, or a widow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्यून-ग्रह → भार्या-लक्षण)। “वयोऽधिका” कोई वर्ष-संख्या नहीं देता; आयु-तुलना गुणात्मक है। राहु-फल त्रिविध विकल्प (तपस्विनी / रुजाढ्या / विधवा) — चयन का अंकगणित श्लोक में नहीं।

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33.49
शुभस्वामियुते रन्ध्रे स्वांशाद्‌ दीर्घायुरुच्यते।
पापेक्षितयुतेऽल्पायुर्मध्यायुर्मिश्रदृग्‌युते
śubhasvāmiyute randhre svāṃśād‌ dīrghāyurucyate|
pāpekṣitayute'lpāyurmadhyāyurmiśradṛg‌yute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभस्वामियुते = शुभ और स्वामी से युक्त; रन्ध्रे = अष्टम भाव में (रन्ध्र = 8); स्वांशात् = स्व-अंश से; दीर्घायुः = दीर्घ आयु; उच्यते = कहा जाता है; पाप-ईक्षित-युते = पाप-दृष्ट/युक्त; अल्पायुः = अल्प आयु; मध्यायुः = मध्यम आयु; मिश्र-दृग्-युते = मिश्र दृष्टि-युति में।

हिन्दी भावार्थ स्वांश से रन्ध्र (अष्टम) यदि शुभ हो और भाव-स्वामी से युक्त हो तो शास्त्र दीर्घायु कहता है। पाप-दृष्ट या पाप-युक्त हो तो अल्पायु; मिश्र दृष्टि-युति हो तो मध्यायु। यह त्रिविध आयु-वर्ग शास्त्र का फल-ढाँचा है — चिकित्सा या मृत्यु-तिथि का दावा नहीं; “उच्यते / स्मृत” की भाषा में रखें।

English rendering From svāṃśa, the eighth joined with a benefic and its lord is stated as long life; with malefic aspect or conjunction, short life; with mixed aspect and conjunction, medium life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वांश से अष्टम + युति/दृष्टि-वर्गीकरण।
1. house₈ = (s + 7) mod 12
2. भाव-स्वामी = that sign’s lord (मेष-मङ्गल … मीन-गुरु; परम्परागत स्वामित्व)।
3. शर्तें (श्लोक का तर्क,布尔 रूप में):
- दीर्घायु ← (रन्ध्र में शुभ-संयोग) ∧ (स्वामी-युति)
- अल्पायु ← पाप-युति ∨ पाप-दृष्टि
- मध्यायु ← मिश्र (शुभ+पाप दोनों का दृष्टि/युति-मिश्रण)
4. दृष्टि-कोण: पूर्ण दृष्टि-नियम BPHS दृष्टि-अध्याय के; यहाँ केवल “ईक्षित / दृग्” शब्द है।
आयु-वर्ष की संख्या इस श्लोक में नहीं — केवल तीन वर्ग (दीर्घ / अल्प / मध्य)। आयुर्दाय-वर्ष च. 43–44 के पृथक् नियमों से।

उदाहरण (worked example) स्वांश = धनु (s = 8) → रन्ध्र = कर्क (8+7 = 15 mod 12 = 3); कर्क-स्वामी = चन्द्र। यदि कर्क में गुरु+चन्द्र हों (शुभ + स्वामी-युति) → शास्त्र “दीर्घायु” कहता है। यदि कर्क में शनि हो और मङ्गल दृष्टि दे → “अल्पायु”। शुभ-पाप दोनों मिश्र → “मध्यायु”। (दृष्टि-परम्परा और D1/D9-चार्ट घोषित करें।)

33.50
कारकांशाच्च नवमे शुभग्रहयुतेक्षित।
सत्यवादी गुरौ भक्तः स्वधर्मनिरतो नरः
kārakāṃśācca navame śubhagrahayutekṣita|
satyavādī gurau bhaktaḥ svadharmanirato naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् = आत्मकारक-नवमांश-राशि से; नवमे = नवम भाव में; शुभग्रह = सौम्य ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, चन्द्र—परम्परा-सापेक्ष); युतेक्षित = युति या दृष्टि से युक्त; सत्यवादी = सत्य-भाषी; गुरौ भक्तः = गुरु-भक्तियुक्त; स्वधर्मनिरतः = अपने धर्म-कर्म में रत; नरः = जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से नवम भाव यदि शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक सत्यवादी, गुरु-भक्त और स्वधर्म में लगा रहता है। नवम भाव यहाँ धर्म, गुरु-परम्परा और सत्याचरण का संकेतक-स्थान है; शुभ-योग उसी संकेत को पुष्ट करता है। यह फल-कथन कारकांश-नवमांश-विधान पर टिका है, न कि सामान्य लग्न-मात्र पर।

English rendering The text states that when the ninth from the kārakāṃśa is joined or aspected by benefics, the native is truthful, devoted to the preceptor, and steadfast in his own dharma. The ninth is read here as the seat of dharma and guru-tradition under the kārakāṃśa scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारकांश-नवम + शुभ योग)। कारकांश = जिस राशि में आत्मकारक D9 (नवमांश) में स्थित हो; नवम = उस राशि से 9वीं राशि (मॉड्यूलर 1…12 गणना)। शुभ-युति/दृष्टि गुणात्मक योग है, संख्यात्मक बलांक नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें आत्मकारक गुरु है और D9 में मेष में है → कारकांश = मेष। नवम = धनु। यदि धनु में शुक्र स्थित हो (युति) या गुरु धनु को दृष्ट करे, तो यह श्लोक का शुभ-योग-पट्ट है। (संकेत: अयनांश वर्ग-रेखाओं को नहीं बदलता; केवल देशान्तरीय-देशांगुल-देशांश से D9-राशि तय होती है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश-गणना सीधे षोडश-वर्ग के D9 (नवमांश) पर टिकी है—30° राशि को 9 समान 3°20′ खण्डों में बाँट कर राशि-मानचित्र। हमारा वर्ग-इंजन इसी मॉड्यूलर विभाजन से D1…D60 निर्धारित करता है; फल को हम “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं, भविष्य-वाणी के रूप में नहीं।

33.51
स्वांशाच्च नवमे भावे पापग्रहयुतेक्षिते।
स्वधर्मनिरतो बाल्ये मिथ्यावादी च वार्धके
svāṃśācca navame bhāve pāpagrahayutekṣite|
svadharmanirato bālye mithyāvādī ca vārdhake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशात् = स्व-अंश (कारकांश/स्व-नवमांश) से; नवमे भावे = नवम भाव में; पापग्रह = क्रूर/अशुभ ग्रह; युतेक्षिते = युति या दृष्टि में; स्वधर्मनिरतः = स्वधर्म-रत; बाल्ये = बाल्यकाल में; मिथ्यावादी = असत्य-भाषी; वार्धके = वृद्धावस्था में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्वांश से नवम भाव यदि पाप-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक बाल्यकाल में स्वधर्म-निरत दिखे, किन्तु वृद्धावस्था में मिथ्यावादी हो जाए। यहाँ दो काल-खण्ड—बाल्य और वार्धक्य—फल को बाँटते हैं; एक ही भाव-योग जीवन के आरम्भ और अन्त में भिन्न आचरण-संकेत देता है। पाठ में “स्वांश” कारकांश-परंपरा के समानांतर संकेत है; पाठ-भेद संभव जहाँ स्वांश = लग्नांश पढ़ा जाए।

English rendering The text states that when the ninth from the svāṃśa is joined or aspected by malefics, the native is devoted to his own dharma in childhood but becomes untruthful in old age. The verse splits the result across two life-stages under one house condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (काल-द्वैध: बाल्य/वार्धक्य)। गणना-ढाँचा वही: स्वांश-राशि → +8 (नवम) → पाप-युति/दृष्टि की जाँच। आयु-विभाजन संख्यात्मक सूत्र नहीं देता; केवल दो अवस्थाओं का गुणात्मक भेद बताता है।

33.52
नवमे कारकांशाच्च शनिराहुयुतेक्षिते।
गुरुद्रोही भवेद्‌ बालः शास्त्रेषु विमुखो नरः
navame kārakāṃśācca śanirāhuyutekṣite|
gurudrohī bhaved‌ bālaḥ śāstreṣu vimukho naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवमे = नवम में; कारकांशात् = कारकांश से; शनिराहु = शनि और राहु; युतेक्षिते = युक्त या दृष्ट; गुरुद्रोही = गुरु का द्रोही/विरोधी; भवेत् = हो; बालः = बालक/जातक; शास्त्रेषु विमुखः = शास्त्रों से विमुख; नरः = पुरुष/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से नवम में शनि-राहु की युति या दृष्टि हो तो जातक गुरु-द्रोही और शास्त्रों से विमुख होता है। नवम धर्म-गुरु-शास्त्र का स्थान है; शनि-राहु का संयुक्त दबाव उसी स्थान पर गुरु-परम्परा से दूरी का संकेत देता है। यह फल-कथन है—भय या निश्चित विनाश का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Saturn and Rāhu join or aspect the ninth from the kārakāṃśa, the native becomes hostile to the preceptor and averse to the śāstras. The claim is the śāstra’s phala, not a fate we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि+राहु, नवम-कारकांश)। योग-परीक्षण: (1) शनि नवम-राशि में, (2) राहु वहीं, अथवा (3) दोनों में से कोई/दोनों नवम को दृष्ट करें—परंपरा-सापेक्ष दृष्टि-नियम (शनि विशेष दृष्टि 3/10 आदि) लागू होते हैं; यहाँ श्लोक केवल “युतेक्षित” कहता है।

33.53
कारकांशाच्च नवमे गुरुभानुयुतेक्षिते।
तदाऽपि गुरुद्रोही स्यात्‌ गुरुवाक्यं न मन्यते
kārakāṃśācca navame gurubhānuyutekṣite|
tadā'pi gurudrohī syāt‌ guruvākyaṃ na manyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् नवमे = कारकांश से नवम में; गुरुभानु = गुरु और सूर्य (भानु = सूर्य); युतेक्षिते = युक्त/दृष्ट; तदाऽपि = तब भी; गुरुद्रोही = गुरु-द्रोही; स्यात् = हो; गुरुवाक्यं न मन्यते = गुरु-वचन नहीं मानता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश-नवम में गुरु-सूर्य की युति या दृष्टि होने पर भी जातक गुरु-द्रोही हो और गुरु-वाक्य न माने। पूर्व श्लोक शनि-राहु का द्रोह-संकेत था; यहाँ “तदापि” से स्पष्ट है कि केवल गुरु की उपस्थिति ही पर्याप्त नहीं—सूर्य के साथ गुरु का योग भी उसी फल-वर्ग में गिना गया है। यह आश्चर्य-जनक फल-भेद शास्त्र स्वयं घोषित करता है; हम केवल पाठ का अर्थ खोलते हैं।

English rendering The text states that even when Jupiter and the Sun join or aspect the ninth from the kārakāṃśa, the native becomes hostile to the preceptor and does not accept the guru’s word. The particle “tadāpi” marks this as a parallel, not a milder, result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु+सूर्य भी गुरु-द्रोह-संकेत)। तुलनात्मक पठन: 33.52 = शनि-राहु; 33.53 = गुरु-सूर्य—दो भिन्न युगल, एक जैसा फल-वर्ग। संख्या या बल-सीमा नहीं दी गई।

33.54
कारकांशाच्च नवमे शुक्रभौमयुतेक्षिते।
षड्‌वर्गादिकयोगे तु मरणं पारदारिकम्‌
kārakāṃśācca navame śukrabhaumayutekṣite|
ṣaḍ‌vargādikayoge tu maraṇaṃ pāradārikam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् नवमे = कारकांश से नवम में; शुक्रभौम = शुक्र और मंगल; युतेक्षिते = युक्त/दृष्ट; षड्वर्गादिकयोगे = षड्वर्ग आदि वर्ग-योग में (दृढ़ होने पर); तु = तो/पर; मरणं = मृत्यु (शास्त्रोक्त संकेत); पारदारिकम् = पर-स्त्री/पारदार-संबंध से संबद्ध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश-नवम में शुक्र-मंगल युति/दृष्टि हो, और वह योग षड्वर्ग आदि में भी पुष्ट हो, तो पारदारिक (पर-दारा-संबंध) से जुड़ा मरण-संकेत बताया गया है। “षड्वर्गादिक” से स्पष्ट है कि केवल D1-स्थिति पर्याप्त नहीं—वर्ग-समर्थन अपेक्षित है। यह भय-कथन नहीं; शास्त्र का पारंपरिक फल-सूत्र है—हम इसे भविष्य की गारंटी या दवाब के रूप में नहीं पढ़ते।

English rendering The text states that when Venus and Mars join or aspect the ninth from the kārakāṃśa, and the combination is reinforced in the ṣaḍvarga and related divisional charts, death connected with adultery (pāradārika) is indicated. The phala is the śāstra’s claim, not a prediction we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; किन्तु “षड्वर्गादिक” वर्ग-समर्थन की ओर इशारा करता है। षड्वर्ग = प्रायः D1, D2 (होरा), D3 (द्रेष्काण), D9 (नवमांश), D12 (द्वादशांश), D30 (त्रिंशांश)—प्रत्येक 30° राशि का नियत-अंश विभाजन। योग “दृढ़” तब माना जाता है जब शुक्र-भौम-नवम संबंध अनेक वर्गों में पुनरावृत्त हो (परंपरा-सापेक्ष गणना)।

उदाहरण (worked example) कारकांश = कन्या → नवम = वृष। वृष में शुक्र+मंगल युति। D9 में भी दोनों एक राशि में (या नवम-कारकांश-संबंध बनाए) हों, और होरा/द्रेष्काण में भी समर्थन हो—तो शास्त्र का “षड्वर्गादिकयोग” पट्टी भरता है। (अयनांश: एक ही अयनांश से सभी वर्ग; मिश्रित अयनांश से वर्ग-योग टूट सकता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग-इंजन D1–D60 को शुद्ध मॉड्यूलर नियम से बाँटता है; षड्वर्ग उसी समुच्चय का उप-समुच्चय है। हम वर्ग-रेखाएँ exact `==` से सत्यापित करते हैं; फल-वाक्य—“पारदारिक मरण”—को केवल पाठ-रिपोर्ट मानते हैं, चिकित्सा/कानूनी/नैतिक फैसला नहीं।

33.55
कारकांशाच्च नवमे ज्ञेन्दुयुक्तेक्षिते द्विज।
परस्त्री सङ्गमाद्‌ बालो बन्धको भवति ध्रुवम्‌
kārakāṃśācca navame jñenduyuktekṣite dvija|
parastrī saṅgamād‌ bālo bandhako bhavati dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् नवमे = कारकांश से नवम में; ज्ञेन्दु = ज्ञ (बुध) + इन्दु (चन्द्र); युक्तेक्षिते = युक्त और/या दृष्ट; द्विज = हे द्विज (संबोधन); परस्त्री-सङ्गमात् = पर-स्त्री के संग से; बालः = जातक; बन्धकः = बद्ध/कैद-संकेतित (शास्त्र-शब्द); भवति ध्रुवम् = निश्चय-पूर्वक—यह शास्त्र का अपना आग्रह-शब्द है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश-नवम में बुध-चन्द्र की युति या दृष्टि हो तो पर-स्त्री-संग के कारण जातक “बन्धक” होता है—और पाठ “ध्रुवम्” कह कर इस फल को दृढ़ घोषित करता है। “बन्धक” यहाँ शास्त्रीय संकेत-शब्द है (बद्ध/कैद-योग), आधुनिक अपराध-निदान नहीं। हम इसे चेतावनी-भय या उपाय-दवाब में नहीं बदलते; केवल पाठ का कथन रखते हैं।

English rendering Addressing the student as “dvija,” the text states that when Mercury and the Moon join or aspect the ninth from the kārakāṃśa, the native becomes a bandhaka—bound/captive—through association with another’s wife; the word “dhruvam” marks the śāstra’s own certainty-claim, not ours.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध+चन्द्र, नवम-कारकांश)। “ध्रुवम्” भाषाई निश्चितता है, कोई संख्यात्मक प्रायिकता या बल-सीमा नहीं।

33.56
नवमे केवलेनैवे गुरुणा च युतेक्षिते।
स्त्रीलोतुपो भवेज्जातो विषयी चैव जायते
navame kevalenaive guruṇā ca yutekṣite|
strīlotupo bhavejjāto viṣayī caiva jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवमे = नवम में; केवलेन एव = केवल मात्र; गुरुणा = गुरु से; युतेक्षिते = युक्त/दृष्ट; स्त्रीलोतुपः = स्त्री-लोभी/काम-आकांक्षी; भवेत् = हो; जातः = जातक; विषयी = विषय-भोग-प्रधान; च एव जायते = और उसी रूप में उत्पन्न/सिद्ध होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नवम (कारकांश-संदर्भ—पूर्व श्लोक-श्रृंखला) में यदि केवल गुरु ही युति या दृष्टि से स्थित हो—अन्य ग्रह-मिश्रण बिना—तो जातक स्त्रीलोतुप और विषयी होता है। “केवल” शब्द महत्वपूर्ण है: शुद्ध गुरु-योग यहाँ धर्म-गुरु-भक्ति नहीं, बल्कि विषय-आसक्ति का फल देता है—यह पूर्व के शुभ-नवम-फल (33.50) से भिन्न पंक्ति है। पाठ-भेद संभव जहाँ “केवल गुरु” को अन्य शुभ-रहित स्थिति पढ़ा जाए।

English rendering The text states that when the ninth is joined or aspected by Jupiter alone—without other planetary mixture—the native becomes lustful toward women and oriented to sense-objects. The restrictive “kevala” distinguishes this from the multi-benefic ninth of 33.50.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केवल-गुरु-योग)। तार्किक फिल्टर: नवम-राशि में (या उस पर दृष्टि से) केवल गुरु; शुक्र/सूर्य/पाप आदि सह-स्थिति न हो। यह बूलियन “presence/absence” जाँच है, न कि रूप/विरूप बल-योग।

33.57
कारकांशाच्च दशमे शुभल्हेटयुतेक्षिते।
स्थिरवित्तो भवेद्‌ बालो गम्भीरो बलबुद्धिमान्‌
kārakāṃśācca daśame śubhalheṭayutekṣite|
sthiravitto bhaved‌ bālo gambhīro balabuddhimān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् = आत्मकारक की नवांश-राशि से; दशमे = दशम भाव में; शुभखेट = शुभ ग्रह (पाठ: शुभल्हेट — खे़ट = ग्रह); युतेक्षिते = युक्त अथवा दृष्ट होने पर; स्थिरवित्तः = स्थिर धन वाला; गम्भीरः = गम्भीर स्वभाव; बलबुद्धिमान् = बल और बुद्धि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से दशम भाव जब शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक स्थिर धन वाला होता है। बालक गम्भीर स्वभाव का और बल-बुद्धि से सम्पन्न कहा गया है। यह दशम-भाव का शुभ-संयोग कारकांश-फल के सन्दर्भ में है।

English rendering The text states that when the tenth from the Kārakāṃśa is joined or aspected by benefics, the child is described as of stable wealth, serious disposition, and endowed with strength and intelligence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कारकांश = आत्मकारक-ग्रह की नवांश-राशि (D9); दशम = उस राशि से दसवाँ स्थान; शुभ-युति/दृष्टि = शास्त्रोक्त योग-फल, गणना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश की स्थिति ṣoḍaśa-varga के D9 (नव़ांश) पर टिकी है — 30° राशि का 3°20′ समान खण्ड और नियत मानचित्र-नियम। फल-वाक्य को हम गणित नहीं मानते; केवल वर्ग-स्थान का निर्धारण सटीक मॉड्यूलर नियम से किया जाता है।

33.58
दशमे कारकांशाच्च पापखेटयुतेक्षिते।
व्यापारे जायते हानिः पितृसौख्येन वर्जितः
daśame kārakāṃśācca pāpakheṭayutekṣite|
vyāpāre jāyate hāniḥ pitṛsaukhyena varjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = दशम भाव में; कारकांशात् = कारकांश से; पापखेट = पाप/अशुभ ग्रह; युतेक्षिते = युक्त या दृष्ट; व्यापारे = व्यापार/व्यवसाय में; हानिः = हानि; पितृसौख्येन वर्जितः = पितृ-सुख से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से दशम भाव जब पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो व्यापार में हानि का फल बताया गया है। जातक पितृ-सौख्य से वर्जित कहा गया है। यह अशुभ-दशम-योग का शास्त्रीय फल-कथन है, न कि निश्चित भविष्य।

English rendering The text states that when the tenth from the Kārakāṃśa is joined or aspected by malefics, there is said to be loss in trade, and the native is described as deprived of paternal comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पापखेट-युति/दृष्टि और व्यापारा-हानि/पितृ-सौख्य-वर्जन शास्त्र के फल-वाक्य हैं; यहाँ कोई बलांक, अंश-विभाजन या दशा-वर्ष नहीं है।

33.59
दशमे कारकांशाच्च बुधशुक्रयुतेक्षिते।
व्यापारे बहुलाभश्च महत्कर्मकर् नरः
daśame kārakāṃśācca budhaśukrayutekṣite|
vyāpāre bahulābhaśca mahatkarmakar naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे कारकांशात् = कारकांश से दशम में; बुधशुक्र = बुध और शुक्र; युतेक्षिते = युक्त या दृष्ट; व्यापारे बहुलाभः = व्यापार में बहुत लाभ; महत्कर्मकर् = महान् कर्म करने वाला; नरः = मनुष्य/जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से दशम भाव बुध और शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो व्यापार में बहुलाभ कहा गया है। जातक महान् कर्म करने वाला बताया गया है। बुध-शुक्र का यह युग्म दशम में कार्य-लाभ के विशेष संयोग के रूप में पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that when the tenth from the Kārakāṃśa is joined or aspected by Mercury and Venus, there is said to be abundant gain in trade, and the person is described as a doer of great works.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। बुध+शुक्र की युति/दृष्टि दशम-कारकांश पर — योग-पहचान; कोई संख्यात्मक गुणांक या वर्ष-सूत्र नहीं।

33.60
कारकांशाच्च दशमे रविचन्द्रयुतेक्षिते।
गुरुदृष्टयुते विप्र जातको राज्यभाग्‌ भवेत्‌
kārakāṃśācca daśame ravicandrayutekṣite|
gurudṛṣṭayute vipra jātako rājyabhāg‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् दशमे = कारकांश से दशम में; रविचन्द्र = सूर्य और चन्द्र; युतेक्षिते = युक्त या दृष्ट; गुरुदृष्टयुते = गुरु की दृष्टि या युति से; विप्र = हे ब्राह्मण (संबोधन); राज्यभाग् = राज्य/शासन-भाग का भागी; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से दशम भाव सूर्य और चन्द्र से युक्त या दृष्ट हो, और उस पर गुरु की दृष्टि या युति भी हो, तो जातक राज्य-भाग का भागी कहा गया है। “विप्र” यहाँ शिष्य-संबोधन है। यह राज-योग-सा फल-कथन है; हम इसे निश्चित भाग्य नहीं ठहराते।

English rendering The text states, O Brāhmaṇa, that when the tenth from the Kārakāṃśa is joined or aspected by the Sun and the Moon, and is also joined or aspected by Jupiter, the native is said to share in royal authority (rājya-bhāg).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। रवि+चन्द्र+गुरु का दशम-कारकांश योग — ग्रह-स्थान/दृष्टि-नियम से पहचाना जाता है; कोई दशा-वर्ष या बलांक-सूत्र यहाँ नहीं।

33.61
स्वांशादेकादशे स्थाने शुभखेटयुतेक्षिते।
भ्रातृसौख्ययुतो बालः सर्वकार्येषु लाभकृत्‌
svāṃśādekādaśe sthāne śubhakheṭayutekṣite|
bhrātṛsaukhyayuto bālaḥ sarvakāryeṣu lābhakṛt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशात् = स्व-अंश (यहाँ प्रकरणानुसार कारकांश) से; एकादशे स्थाने = एकादश भाव में; शुभखेट = शुभ ग्रह; युतेक्षिते = युक्त या दृष्ट; भ्रातृसौख्ययुतः = भ्रातृ-सुख से युक्त; सर्वकार्येषु लाभकृत् = सब कार्यों में लाभ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्वांश (कारकांश-प्रकरण में) से एकादश स्थान जब शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो बालक भ्रातृ-सौख्य से युक्त होता है। वह सब कार्यों में लाभ करने वाला कहा गया है। एकादश का यह शुभ-योग लाभ-भाव के अनुकूल फल के रूप में पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that when the eleventh house from the own aṃśa (in this context, the Kārakāṃśa) is joined or aspected by benefics, the child is described as endowed with fraternal happiness and as bringing gain in all undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। स्वांश → एकादश = कारकांश-राशि से ग्यारहवाँ स्थान; शुभ-युति/दृष्टि का फल-कथन मात्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश/कारकांश” की जड़ D9-नव़ांश में है — ṣoḍaśa-varga का नियत विभाजन। एकादश-स्थान की गणना राशि-चक्र पर मॉड्यूल-12 से की जाती है; फल-वाक्य अलग स्तर का है।

33.62
एकादशे सपापे तु कुमार्गाल्लाबकृन्नरः।
विख्यातो विक्रमी चैव जायते नाऽत्र संशयः
ekādaśe sapāpe tu kumārgāllābakṛnnaraḥ|
vikhyāto vikramī caiva jāyate nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादशे = एकादश भाव में; सपापे = पाप-ग्रह सहित; तु = परन्तु/विशेष; कुमार्गात् = कुमार्ग से; लाभकृत् = लाभ करने वाला; विख्यातः = प्रसिद्ध; विक्रमी = विक्रम/पराक्रम वाला; नात्र संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र का आग्रह)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि एकादश भाव जब पाप सहित हो, तो जातक कुमार्ग से लाभ करने वाला कहा गया है। वह विख्यात और विक्रमी भी होता है — पाठ स्वयं “नात्र संशयः” कहता है। हम इसे नैतिक निर्णय या निश्चित भविष्य नहीं मानते; केवल शास्त्र का फल-कथन रिपोर्ट करते हैं।

English rendering The text states that when the eleventh is with a malefic, the person is said to gain by wrongful means, and also to become famous and valorous — “of this there is no doubt,” in the śāstra’s own wording.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सपाप-एकादश → कुमार्ग-लाभ/विख्यात/विक्रमी — फल-वाक्य; कोई संख्या-सूत्र नहीं। “नात्र संशयः” शास्त्र की अपनी दृढ़ता है, हमारे दावे की नहीं।

33.63
कारकांशाद्‌ व्ययस्थाने सद्‌ग्रहे सद्‌व्ययो भवेत्‌।
असद्‌व्ययोऽशुभे ज्ञयो ग्रहाभावे च सत्फलम्‌
kārakāṃśād‌ vyayasthāne sad‌grahe sad‌vyayo bhavet‌|
asad‌vyayo'śubhe jñayo grahābhāve ca satphalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् = कारकांश से; व्ययस्थाने = द्वादश/व्यय भाव में; सद्ग्रहे = शुभ/सत् ग्रह पर; सद्व्ययः = उत्तम व्यय; असद्व्ययः = अनुचित/अशुभ व्यय; अशुभे = अशुभ ग्रह पर; ज्ञेयः = जानना चाहिए; ग्रहाभावे = ग्रह की अनुपस्थिति में; सत्फलम् = शुभ फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से व्यय-स्थान (द्वादश) जब सत् ग्रह से युक्त हो तो व्यय उत्तम प्रकार का कहा गया है। अशुभ ग्रह हो तो असद्-व्यय जानना चाहिए; और जब वहाँ ग्रह का अभाव हो तो सत्फल बताया गया है। व्यय-भाव का यह त्रिधा फल — सत्, असत्, और शून्य-ग्रह — प्रकरण का समापन-नियम है।

English rendering The text states that in the twelfth (vyaya) from the Kārakāṃśa, a good planet indicates good expenditure; an inauspicious planet indicates improper expenditure; and in the absence of a planet, a good result is to be understood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। व्यय = कारकांश से द्वादश; तीन अवस्थाएँ — सद्ग्रह → सद्व्यय, अशुभ → असद्व्यय, ग्रहाभाव → सत्फल। कोई बलांक या अंश-गुणन नहीं; केवल भाव-ग्रह-अवस्था का फल-नियम।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश-स्थान D9 से निश्चित होता है; व्यय-स्थान = (कारकांश-राशि + 11) mod 12। वर्ग-इंजन केवल स्थान देता है; “सद्/असद् व्यय” का वाक्य फल-स्तर पर रहता है — गणित और व्याख्या अलग रखे जाते हैं।

33.64
कारकांशाद्‌ व्ययस्थाने स्वभोच्चस्थे शुभग्रहे।
सद्‌गतिर्जायते तस्य शुभलोकमवाप्नुयात्‌
kārakāṃśād‌ vyayasthāne svabhoccasthe śubhagrahe|
sad‌gatirjāyate tasya śubhalokamavāpnuyāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांश = आत्मकारक का नवांश (D9 में स्थित राशि); व्ययस्थान = 12वाँ भाव (मोक्ष/व्यय-स्थान); स्वभ = स्वराशि; उच्च = उच्चस्थान; शुभग्रह = शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, चन्द्र — प्रसंगानुसार); सद्गति = उत्तम गति / शुभ परलोक-मार्ग; शुभलोक = शुभ लोक-प्राप्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कारकांश से व्ययस्थान में कोई शुभ ग्रह अपनी राशि या उच्च में स्थित हो, तब जातक की सद्गति होती है। वह शुभ लोक को प्राप्त करता है। यह कथन मोक्ष-फल की श्रृंखला में, 12वें भाव की शुभ-स्थिति को “अच्छा परलोक-मार्ग” से जोड़ता है।

English rendering The text states that when a benefic planet occupies its own sign or exaltation in the twelfth from the kārakāṃśa, a good destination (sadgati) arises for that native, and one attains an auspicious loka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारकांश-व्यय में स्व/उच्च शुभ)। कारकांश = ātmakāraka की D9-राशि; व्यय = उस राशि से 12वाँ; गणना varga-नियम और अयनांश-निर्धारित दीर्घांश पर निर्भर है, पर इस श्लोक में केवल फल कहा गया है।

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33.65
कारकांशाद्‌ व्यये केतौ शुभखेटयुतेक्षिते।
तदा तु जायते मुक्तिः सायुज्यपदमाप्नुयात्‌
kārakāṃśād‌ vyaye ketau śubhakheṭayutekṣite|
tadā tu jāyate muktiḥ sāyujyapadamāpnuyāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांश = ātmakāraka-navaṃśa; व्यये = 12वें में; केतु = केतु (छिद्र/मोक्ष-संकेतक); शुभखेट = शुभ ग्रह; युते = युक्त; ईक्षिते = दृष्ट; मुक्ति = मुक्ति; सायुज्यपद = सायुज्य (परमात्म-संयोग) पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कारकांश से व्यय में केतु हो और वह शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो, तब मुक्ति का उदय होता है। जातक सायुज्य-पद को प्राप्त करता है। यहाँ केतु अकेला नहीं, शुभ-संयोग/दृष्टि के साथ मोक्ष-फल का वाहक बताया गया है।

English rendering The text states that when Ketu stands in the twelfth from the kārakāṃśa and is joined or aspected by benefics, liberation arises and one attains the state of sāyujya (union).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु + शुभ युति/दृष्टि → मुक्ति/सायुज्य)। “युतेक्षिते” = युति अथवा दृष्टि; दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) परम्परा-भेद से भिन्न हो सकता है — पाठ-भेद/नियम-भेद संभव।

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33.66
मेषे धनुषि वा केतौ कारकांशात्‌ व्यये स्थिते।
शुभखेटेन सन्दृष्टे सायुजपदमाप्नुयात्‌
meṣe dhanuṣi vā ketau kārakāṃśāt‌ vyaye sthite|
śubhakheṭena sandṛṣṭe sāyujapadamāpnuyāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष राशि; धनुषि वा = अथवा धनु राशि; केतौ = केतु (दक्षिण छाया-ग्रह); कारकांशात् = कारकांश से (आत्मकारक का नवांश/D9 राशि, जिसे लग्नवत् लिया जाता है); व्यये स्थिते = द्वादश (12वें) भाव में स्थित होने पर; शुभखेटेन सन्दृष्टे = शुभ ग्रह से सम्यक् दृष्ट होने पर; सायुजपदम् = सायुज्य-पद (देवता में विलीन होने वाली परम मुक्ति); आप्नुयात् = प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पिछले (33.65) के केतु-द्वादश-मुक्ति सूत्र को और सूक्ष्म करता है — जब कारकांश से द्वादश भाव मेष या धनु राशि हो और उसमें केतु बैठा हो, और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़े, तब शास्त्र कहता है कि जातक सायुज्य-पद (मुक्ति का उच्चतम रूप) पाता है। यहाँ राशि (मेष/धनु), भाव (व्यय), ग्रह (केतु) और दृष्टि (शुभ) — चारों शर्तें एक साथ लगती हैं।

English rendering When Ketu stands in the twelfth from the Kārakāṃśa — that twelfth falling in Aries or Sagittarius — and is well-aspected by a benefic, the text states the native attains sāyujya, the state of merging into the deity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुद्ध तकनीक (फल-कथन शास्त्र का कथन है, भविष्यवाणी नहीं)। पद्धति स्थान-गणना है — पहले आत्मकारक निर्धारित करें: AK = argmax over चर-कारकों (रविष्ठ अंश) of (देशान्तर mod 30°); कारकांश K = navāṃśa-rāśi(AK) = D9(AK)। किसी राशि S से h-वें भाव की राशि: bhāva(h, S) = ((S + h − 2) mod 12) + 1, राशि-सूचकांक 1=मेष … 12=मीन। द्वादश (h = 12) ⇒ S से ठीक पिछली राशि। यहाँ अतिरिक्त शर्त: वह व्यय-राशि ∈ {मेष(1), धनु(9)}, और केतु ⊂ उस राशि, तथा शुभ-दृष्टि सत्य।

उदाहरण (worked example) मान लें AK = सूर्य 15°20′ सिंह। नवांश-चाप = 30°÷9 = 3°20′; सिंह स्थिर राशि ⇒ नवांश-गणना 9वीं राशि (धनु) से; 15°20′ ÷ 3°20′ = 4.6 ⇒ 5वाँ नवांश; धनु से 5वाँ = मेष ⇒ कारकांश K = मेष(1)। तब व्यय = bhāva(12, 1) = ((1+10) mod 12)+1 = 12 = मीन — मेष नहीं। अतः इस उदाहरण में शर्त अपूर्ण; शर्त तब पूरी होती जब K = वृष(2) [व्यय = मेष] या K = मकर(10) [व्यय = धनु], उस मेष/धनु में केतु, और शुभ-दृष्टि।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश का पूरा आधार D9 (नवांश) वर्ग है — षोडश-वर्ग योजना की वही D9 राशि, जिसे हमारे वर्ग-इंजन में 30° राशि का 3°20′ के 9 समान चापों में नियतात्मक विभाजन के रूप में गणित किया गया है (kaal_ekavimshati_varga.py)। अर्थात् कारकांश कोई रहस्य नहीं, बल्कि आत्मकारक के देशान्तर पर शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित का परिणाम है; इस श्लोक का फल तभी लागू होता है जब वह D9-राशि सही निकले।

33.67
व्यये च केवले केतौ पापयुक्तेक्षितेपि वा।
न तदा जायते मुक्तिः शुभलोकं न पश्यति
vyaye ca kevale ketau pāpayuktekṣitepi vā|
na tadā jāyate muktiḥ śubhalokaṃ na paśyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यये = द्वादश भाव में; केवले केतौ = केवल (एकाकी) केतु के होने पर; पापयुक्त-ईक्षिते = पाप-ग्रह से युत अथवा दृष्ट; अपि वा = अथवा भी; न तदा जायते मुक्तिः = तब मुक्ति नहीं होती; शुभलोकं न पश्यति = शुभ (उत्तम) लोक को नहीं देखता।

हिन्दी भावार्थ यह 33.66 का प्रतिपक्ष है। जब कारकांश से द्वादश में केतु अकेला हो, या उस पर पाप-ग्रह की युति/दृष्टि हो, तब शास्त्र कहता है कि मुक्ति नहीं मिलती और जातक शुभ-लोक तक नहीं पहुँचता। शुभ-दृष्टि जो 33.66 में मोक्ष-योग बनाती थी, उसका अभाव या पाप-संसर्ग यहाँ फल को उलट देता है।

English rendering When Ketu is alone in the twelfth, or is joined or aspected by malefics, the text states that liberation does not arise and the native does not attain the auspicious world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-दृष्टि बनाम पाप-दृष्टि पर निर्भर द्वैत)। तकनीकी दृष्टि से यह वही द्वादश-गणना bhāva(12, K) है; अन्तर केवल दृष्टि/युति की गुणवत्ता का है — शुभ = सायुज्य (66), केवल/पाप = निषेध (67)। यह श्लोक दिखाता है कि पाराशर एक ही स्थिति-सूत्र पर दृष्टि-प्राचल बदलकर विपरीत फल निकालते हैं; अतः दृष्टि-ग्राहकों का सही आकलन ही निर्णायक है।

33.68
रविणा संयुते केतौ कारकांशाद्‌ व्ययस्थिते।
शिवभक्तिर्भवेस्यत्त निर्विशंकं द्विजोत्तम
raviṇā saṃyute ketau kārakāṃśād‌ vyayasthite|
śivabhaktirbhavesyatta nirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविणा संयुते = सूर्य से युत होने पर; केतौ = केतु; कारकांशात् व्ययस्थिते = कारकांश से द्वादश में स्थित; शिवभक्तिः भवेत् = शिव-भक्ति होती है; निर्विशंकं = निःसंदेह; द्विजोत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ अब पाराशर द्वादशस्थ केतु के साथ जुड़ने वाले ग्रह के अनुसार इष्ट-देवता का निर्देश करते हैं। जब केतु सूर्य से युत होकर कारकांश-द्वादश में हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक की भक्ति निःसंदेह शिव में होती है। यह और आगे के श्लोक "किस ग्रह-संगति से कौन-सी उपासना-प्रवृत्ति" का एक क्रम बनाते हैं।

English rendering When Ketu is joined by the Sun in the twelfth from the Kārakāṃśa, the text states — without doubt, O best of the twice-born — that the native's devotion is to Śiva.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (इष्ट-देवता का संकेत)। स्थान वही है — bhāva(12, K); चर-प्राचल है द्वादशस्थ केतु का सह-ग्रह (यहाँ सूर्य)। ध्यातव्य: यह उपासना-प्रवृत्ति का शास्त्रीय संकेत मात्र है, कोई अनिवार्य विधान या दबाव नहीं।

33.69
चन्द्रेण संयुते केतौ कारकांशाद्‌ व्ययस्थिते।
गौर्यां भक्तिर्भवेत्तस्य शाक्तिको जायते नरः
candreṇa saṃyute ketau kārakāṃśād‌ vyayasthite|
gauryāṃ bhaktirbhavettasya śāktiko jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रेण संयुते = चन्द्र से युत; केतौ = केतु; कारकांशात् व्ययस्थिते = कारकांश-द्वादश में स्थित; गौर्यां भक्तिः = गौरी (पार्वती) में भक्ति; भवेत् तस्य = उसकी होती है; शाक्तिकः जायते नरः = मनुष्य शाक्त (शक्ति-उपासक) होता है।

हिन्दी भावार्थ द्वादशस्थ केतु का सह-ग्रह चन्द्र हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक की भक्ति गौरी (देवी) में होती है और वह शाक्त-मार्गी बनता है। सूर्य→शिव के बाद यह चन्द्र→गौरी की सहज युग्मता है — सौर पुरुष-तत्त्व, चान्द्र स्त्री/शक्ति-तत्त्व।

English rendering When the Moon joins Ketu in the twelfth from the Kārakāṃśa, the text states the native's devotion turns to Gaurī, and he becomes a Śākta.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपासना-संकेत)। तकनीक अपरिवर्तित — द्वादश bhāva(12, K), सह-ग्रह = चन्द्र। पूरा 68–72 खण्ड एक "ग्रह → देवता" प्रतिचित्रण (mapping) है, जहाँ इनपुट द्वादशस्थ सह-ग्रह और आउटपुट उपास्य-प्रवृत्ति है — निर्णायात्मक फल नहीं।

33.70
शुक्रेण संयुते केतौ कारकांशाद्‌ व्ययस्थिते।
लक्ष्म्यां सञ्जायते भक्तिर्जातको सौ समृद्धिमान्‌
śukreṇa saṃyute ketau kārakāṃśād‌ vyayasthite|
lakṣmyāṃ sañjāyate bhaktirjātako sau samṛddhimān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रेण संयुते = शुक्र से युत; केतौ = केतु; कारकांशात् व्ययस्थिते = कारकांश-द्वादश में स्थित; लक्ष्म्यां भक्तिः = लक्ष्मी में भक्ति; सञ्जायते = उत्पन्न होती है; जातकः असौ समृद्धिमान् = वह जातक समृद्धिशाली (होता है)।

हिन्दी भावार्थ द्वादशस्थ केतु के साथ शुक्र हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक की भक्ति लक्ष्मी में होती है और वह समृद्धिवान् बनता है। शुक्र के ऐश्वर्य-कारकत्व के अनुरूप यहाँ देवता (लक्ष्मी) और फल (समृद्धि) दोनों धन-सम्पन्नता की ओर संकेतित हैं।

English rendering When Venus joins Ketu in the twelfth from the Kārakāṃśa, the text states devotion to Lakṣmī arises, and the native becomes prosperous.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपासना + ऐश्वर्य-संकेत)। स्थान bhāva(12, K), सह-ग्रह = शुक्र। यहाँ ग्रह के नैसर्गिक कारकत्व (शुक्र = भोग/ऐश्वर्य) और निर्दिष्ट देवता (लक्ष्मी) के बीच अर्थ-संगति स्पष्ट है — प्रतिचित्रण यादृच्छिक नहीं, ग्रह-स्वभाव-अनुरूप है।

33.71
कुजेन संयुते केतौ स्कन्दभक्तौ भवेन्नरः।
वैष्णवो बुधसौरिभ्यां गुरुणा शिवभक्तिमान्‌
kujena saṃyute ketau skandabhaktau bhavennaraḥ|
vaiṣṇavo budhasauribhyāṃ guruṇā śivabhaktimān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजेन संयुते केतौ = मंगल से युत केतु; स्कन्दभक्तौ भवेत् नरः = मनुष्य स्कन्द (कार्त्तिकेय) का भक्त होता है; वैष्णवः = विष्णु-भक्त; बुध-सौरिभ्यां = बुध तथा शनि (सौरि) से; गुरुणा = गुरु (बृहस्पति) से; शिवभक्तिमान् = शिव-भक्ति वाला।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक एक साथ चार संगतियाँ देता है — द्वादशस्थ केतु के साथ मंगल हो तो स्कन्द-भक्ति; बुध या शनि हो तो वैष्णव (विष्णु-भक्त); और गुरु हो तो शिव-भक्ति। इस प्रकार 68–71 में सातों ग्रह-संगतियों का देवता-मानचित्र लगभग पूर्ण हो जाता है।

English rendering When Mars joins Ketu the native becomes a devotee of Skanda; with Mercury and Saturn he becomes a Vaiṣṇava; and with Jupiter, devoted to Śiva — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह → देवता प्रतिचित्रण की तीन प्रविष्टियाँ एक श्लोक में)। तकनीक: द्वादश bhāva(12, K) पर सह-ग्रह-आधारित बहु-शाखीय वर्गीकरण — मंगल ⇒ स्कन्द, {बुध, शनि} ⇒ वैष्णव, गुरु ⇒ शिव। यह एक स्पष्ट लुक-अप-टेबल है; फल उपासना-प्रवृत्ति का संकेत मात्र है, अनिवार्यता नहीं।

33.72
राहुणा तामसीं दुर्गां सेवते क्षुद्रदेवताम्‌।
भक्तिः स्कन्देऽथ हेरभ्भे शिखिना केवलेन वा
rāhuṇā tāmasīṃ durgāṃ sevate kṣudradevatām‌|
bhaktiḥ skande'tha herabhbhe śikhinā kevalena vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहुणा = राहु से (युत केतु के प्रसंग में); तामसीं दुर्गां = तामसी (तमोगुण-प्रधान) दुर्गा को; सेवते = सेवता/पूजता है; क्षुद्रदेवताम् = क्षुद्र (लघु/ग्राम्य) देवता को; भक्तिः स्कन्दे = स्कन्द में भक्ति; हेरम्भे = हेरम्ब (गणेश) में [पाठ "हेरभ्भे" — पाठ-भेद संभव]; शिखिना केवलेन वा = अथवा केवल शिखी (केतु) से।

हिन्दी भावार्थ द्वादशस्थ केतु के साथ राहु हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक तामसी दुर्गा तथा क्षुद्र देवताओं की उपासना करता है; और केवल केतु (शिखी) हो, तो स्कन्द अथवा हेरम्ब (गणेश) में भक्ति होती है। इस से 68–72 का ग्रह-देवता क्रम पूर्ण होता है।

English rendering With Rāhu, the text states, the native worships the tāmasī Durgā and lesser deities; while with Ketu (Śikhī) alone, devotion is to Skanda or to Heramba (Gaṇeśa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रतिचित्रण की अन्तिम प्रविष्टियाँ; "हेरम्भ" पर पाठ-भेद संभव)। स्थान bhāva(12, K), सह-ग्रह = राहु / अकेला केतु। "तामसी", "क्षुद्रदेवता" जैसे शब्द उपासना-वर्ग का शास्त्रीय वर्णन हैं — इन्हें मूल्य-निर्णय या भय के रूप में नहीं, केवल पाठ के कथन के रूप में लेना उचित है।

33.73
कारकांशाद्‌ व्यये सौरिः पापराशौ यदा भवेत्‌।
तदाऽपि क्षुद्रदेवस्य भक्तिस्तस्य न संशयः
kārakāṃśād‌ vyaye sauriḥ pāparāśau yadā bhavet‌|
tadā'pi kṣudradevasya bhaktistasya na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् = कारकांश (आत्मकारक के नवांश-लग्न) से; व्यये = बारहवें भाव में; सौरिः = शनि; पापराशौ = पाप-राशि में; यदा भवेत् = जब हो; तदाऽपि = तब भी; क्षुद्रदेवस्य भक्तिः = क्षुद्र-देव की भक्ति; न संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र का निश्चय-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कारकांश से बारहवें भाव में शनि पाप-राशि में स्थित हो, तब भी जातक क्षुद्र-देव की भक्ति की ओर संकेत करता है। “न संशयः” शास्त्र की अपनी निश्चय-भाषा है—हम इसे नियति-प्रमाण नहीं बनाते। कारकांश की परिभाषा इस श्लोक में नहीं; वह आत्मकारक + नवांश-ढाँचे पर टिकी हुई मानी जाती है।

English rendering The text states that when Saturn occupies the twelfth from the kārakāṃśa in a malefic sign, devotion to a minor deity is indicated—without doubt, in the śāstra’s own phrasing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थिति-शर्त)। तकनीकी ढाँचा: कारकांश = आत्मकारक की राशि-स्थिति का नवांश (D9) में रूपान्तर; “व्यय” = उस कारकांश-लग्न से 12वाँ भाव (भाव-गणना सम्प्रदाय पर निर्भर—पूर्ण-भाव/समान-भाव घोषित करें)। पाप-राशि = मेष, वृषभादि में परम्परागत पाप/क्रूर-राशि-वर्ग (सम्प्रदायानुसार सूची भिन्न हो सकती है)।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश की गणना षोडश-वर्ग में D9 (नवांश) पर निर्भर है—30° राशि को 9 × 3°20′ खंडों में बाँटकर नवांश-राशि निकालना शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित है। फल-वाक्य को हम “शास्त्र कहता है” के रूप में रखते हैं; वर्ग-इंजन केवल स्थान-निर्धारण करता है, भक्ति-फल को प्रमाणित नहीं करता।

33.74
पापर्क्षेऽपि शनौ सुक्रे तदाऽपि क्षुद्रसेवकः।
अमात्यकारकात्‌ षष्ठेप्तेवमेव फलं वदेत्‌
pāparkṣe'pi śanau sukre tadā'pi kṣudrasevakaḥ|
amātyakārakāt‌ ṣaṣṭheptevameva phalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापर्क्षे = पाप-राशि (पापर्क्ष) में; अपि = भी; शनौ शुक्रे = शनि अथवा शुक्र के होने पर; तदा अपि क्षुद्रसेवकः = तब भी (जातक) क्षुद्र-देव-सेवक; अमात्यकारकात् = अमात्यकारक से (देशान्तर में द्वितीय-उच्च चर-कारक); षष्ठे = छठे भाव में [पाठ "षष्ठेप्ते" — पाठ-भेद संभव]; एवमेव फलं वदेत् = इसी प्रकार फल कहे।

हिन्दी भावार्थ पिछले सूत्र का विस्तार — पाप-राशि में शनि हो या शुक्र, तब भी जातक क्षुद्र देवताओं का सेवक होता है। साथ ही पाराशर एक नया संदर्भ-बिन्दु देते हैं: यही फल अमात्यकारक से छठे भाव के विचार में भी लगाना चाहिए। अर्थात् कारकांश (आत्मकारक-आधारित) के समानान्तर अमात्यकारक-आधारित परीक्षण भी मान्य है।

English rendering Even Saturn or Venus in a malefic sign makes the native a worshipper of lesser deities, the text states; and the same result should be declared reckoning from the sixth of the Amātyakāraka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आंशिक तकनीक + फल-कथन। नया संदर्भ-बिन्दु: अमात्यकारक AmK = चर-कारकों में देशान्तर(mod 30°) से द्वितीय-उच्च ग्रह (आत्मकारक के ठीक नीचे)। उससे छठा भाव: bhāva(6, S_AmK) = ((S_AmK + 4) mod 12) + 1। इसी छठे-स्थान पर उपर्युक्त शनि/शुक्र-पाप-राशि परीक्षण दोहराया जाता है। ("षष्ठ" पाठ पर संदेह — पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) मान अमात्यकारक = बुध, राशि तुला(7)। छठा = bhāva(6, 7) = ((7+4) mod 12)+1 = (11 mod 12)+1 = 12 = मीन। अतः तुला-अमात्यकारक के लिए परीक्षण-स्थान मीन; वहाँ पाप-राशिस्थ शनि/शुक्र हो तो शास्त्रानुसार वही क्षुद्र-सेवक फल।

33.75
कारकांशात्‌ त्रिकोणस्थे पापखेतद्वये द्विज।
मानवो मन्त्रतन्त्रज्ञो जायते नाऽत्र संशयः
kārakāṃśāt‌ trikoṇasthe pāpakhetadvaye dvija|
mānavo mantratantrajño jāyate nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांशात् = कारकांश से; त्रिकोणस्थे = त्रिकोण (1, 5, 9) में स्थित; पापखेत-द्वये = दो पाप-ग्रहों के; द्विज = हे द्विज (संबोधन); मानवः = मनुष्य; मन्त्र-तन्त्र-ज्ञः = मन्त्र-तन्त्र का ज्ञाता; जायते = जन्म लेता है; नाऽत्र संशयः = यहाँ संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश से त्रिकोण-स्थानों में दो पाप-ग्रह हों, तो जातक मन्त्र-तन्त्र का ज्ञाता होता है। “नात्र संशयः” फिर शास्त्र की निश्चय-शैली है। पाप-ग्रह सामान्यतः रवि, मङ्गल, शनि, राहु, केतु (और सम्प्रदायानुसार बुध/चन्द्र की दशा) माने जाते हैं—सूची पाठ/टीका पर निर्भर, अतः सम्प्रदाय घोषित रखना उचित है।

English rendering The text states, O twice-born, that when two malefic planets occupy the trikoṇa from the kārakāṃśa, the person is born knowing mantra and tantra—without doubt, as the śāstra phrases it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान-गणना + ग्रह-गणना)। त्रिकोण = कारकांश-लग्न से भाव 1, 5, 9। शर्त: उन भावों में पाप-ग्रहों की संख्या ≥ 2 (श्लोक “द्वये” = युग्म)। वर्ग-नियम स्वयं यहाँ नहीं; कारकांश D9-आश्रित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश-लग्न D9 (नवांश) से आता है—षोडश-वर्ग-योजना (D1…D60) का यही खंड। हम स्थान-निर्धारण को मॉड्यूलर अंकगणित से सत्यापित करते हैं; “मन्त्र-तन्त्रज्ञ” को भविष्यवाणी नहीं, शास्त्र-कथित योग-फल के रूप में रखते हैं।

33.76
पापेन वीक्षिते तत्र जातो निग्राहको भवेत्‌।
शुभैर्निरीक्षिते तस्मिन्‌ नरोऽनुग्राहको भवेत्‌
pāpena vīkṣite tatra jāto nigrāhako bhavet‌|
śubhairnirīkṣite tasmin‌ naro'nugrāhako bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापेन = पाप-ग्रह से; वीक्षिते = दृष्ट होने पर; तत्र = वहाँ (पूर्वोक्त त्रिकोण/योग-स्थान में); जातः = जातक; निग्राहकः = निग्रह करने वाला (वश/दमन/शाप-प्रवृत्ति का शास्त्र-पद); भवेत् = होता है; शुभैः = शुभ-ग्रहों से; निरीक्षिते = दृष्ट होने पर; तस्मिन् = उसमें; अनुग्राहकः = अनुग्रह करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस (मन्त्र-तन्त्र) योग-स्थान पर पाप-दृष्टि हो तो जातक निग्राहक-वृत्ति वाला होता है; शुभ-दृष्टि हो तो अनुग्राहक। निग्रह/अनुग्रह यहाँ फल-शब्द हैं—भय या चमत्कार-वादा नहीं। दृष्टि-नियम (पूर्ण दृष्टि: 7; विशेष: मङ्गल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10 इत्यादि) इस श्लोक में विस्तारित नहीं; “वीक्षित” सामान्य दृष्टि-सिद्धान्त पर छोड़ दिया गया है।

English rendering The text states that if that configuration is aspected by a malefic, the native becomes a restrainer (nigrahaka); if aspected by benefics, a bestower of favor (anugrahaka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-शर्त → निग्रह/अनुग्रह)। तकनीकी परत: दृष्टि = ग्रह-राशि से निश्चित भाव-अंतर (सम्प्रदाय: राशि-दृष्टि या अंश-दृष्टि)। कोई बलांक, वर्ष, या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं।

33.77
शुक्रदृष्टे विधौ स्वांशे रसवादी भवेन्नरः।
बुधदृष्टे च सद्‌वैद्यः सर्वरोगहरो भवेत्‌
śukradṛṣṭe vidhau svāṃśe rasavādī bhavennaraḥ|
budhadṛṣṭe ca sad‌vaidyaḥ sarvarogaharo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्र-दृष्टे = शुक्र से दृष्ट; विधौ = चन्द्र में; स्वांशे = अपने अंश/नवांश में (स्वराशि-अंश या स्व-नवांश—पाठ-भेद/टीका-भेद संभव); रसवादी = रस-वाद (रसायन/रस-शास्त्र) का ज्ञाता; बुध-दृष्टे = बुध से दृष्ट; सद्-वैद्यः = उत्तम वैद्य; सर्वरोगहरः = सब रोग हरने वाला (शास्त्र का फल-पद—चिकित्सा-दावा नहीं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र स्वांश में हो और शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक रसवादी (रस-शास्त्र/रसायन-प्रवृत्ति) होता है। बुध-दृष्टि में सद्वैद्य और “सर्वरोगहर” कहा गया है—यह शास्त्र का फल-कथन है, चिकित्सा-प्रमाण या इलाज-वादा नहीं। “स्वांश” को नवांश/वर्ग-सन्दर्भ में पढ़ना ज्योतिष-परंपरा से मेल खाता है; स्थूल अर्थ “स्वराशि” भी कुछ पाठों में खींचा जा सकता है—पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that the Moon in its own aṃśa, aspected by Venus, marks a rasavādin; aspected by Mercury, a skilled physician said to remove all ailments—as the śāstra’s phala, not a medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र + स्वांश + शुक्र/बुध-दृष्टि)। यदि स्वांश = नवांश-स्वंश: चन्द्र-देशज्य λ पर D9-मानचित्र में स्व-राशि/उच्च-अंश जाँच; दृष्टि पूर्वोक्त दृष्टि-नियम से। कोई आयुर्दायांक या रोग-सूत्र नहीं—केवल योग-शर्त।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश” की सख्त पढ़त नवांश (D9) पर जाती है—षोडश-वर्ग-इंजन का वही 3°20′ खंड-नियम। हम अक्षांश-से-वर्ग मानचित्र exact partition से निकालते हैं; “रसवादी/सर्वरोगहर” को शास्त्र-वाक्य के रूप में रखते हैं, चिकित्सा या नियति के रूप में नहीं।

33.78
शुक्रदृष्टे सुखे चन्द्रे पाण्डुश्वित्री भवेन्नरः।
भौमदृष्टे महारोगी रक्तपित्तार्दितो भवेत्‌
śukradṛṣṭe sukhe candre pāṇḍuśvitrī bhavennaraḥ|
bhaumadṛṣṭe mahārogī raktapittārdito bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रदृष्टे = शुक्र से दृष्ट; सुखे = सुख-भाव (चतुर्थ) में; चन्द्रे = चन्द्र (के होने पर); पाण्डु-श्वित्री भवेत् नरः = मनुष्य पाण्डु (पीलापन/रक्ताल्पता) व श्वित्र (श्वेत-कुष्ठ/vitiligo) युक्त होता है; भौमदृष्टे = मंगल (भौम) से दृष्ट; महारोगी = अति-रोगी; रक्तपित्त-अर्दितः = रक्तपित्त (रक्त-पित्त-विकार) से पीड़ित।

हिन्दी भावार्थ जब चतुर्थ (सुख) भाव में चन्द्र हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक पाण्डु तथा श्वित्र (त्वचा-वैवर्ण्य) से युक्त होता है; और यदि उस पर मंगल की दृष्टि हो, तो वह महारोगी होकर रक्तपित्त-विकार से पीड़ित होता है। यह आरोग्य-सम्बन्धी शास्त्र-कथन है — दृष्टि-ग्रह के अनुसार विकार का प्रकार बदलता है।

English rendering When the Moon in the fourth is aspected by Venus, the text states the native is marked by pallor and śvitra (leukoderma); when aspected by Mars, he is gravely ill, afflicted by rakta-pitta (a blood-bile disorder).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरोग्य-सूचक; चतुर्थस्थ चन्द्र पर दृष्टि-भेद)। तकनीक: सन्दर्भ-लग्न = स्वांश/कारकांश; चतुर्थ = bhāva(4, K) = ((K+2) mod 12)+1; उसमें चन्द्र, चर = दृष्टि-ग्रह (शुक्र ⇒ पाण्डु/श्वित्र, मंगल ⇒ रक्तपित्त)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वह प्रकार का रोग-फल है जहाँ हमारी पद्धति की अनुशासन-रेखा सबसे आवश्यक है — इसे नियति, निश्चितता या चिकित्सकीय भविष्यवाणी के रूप में नहीं, केवल "शास्त्र यह कहता है" के रूप में प्रस्तुत करना (dossier §5, गणित को व्याख्या से पृथक रखने का सिद्धान्त)। स्थान-गणना (D9 → कारकांश → चतुर्थ) सत्यापन-योग्य है; रोग-कथन उसकी व्याख्या-परत है, और उसे भय-रहित, दबाव-रहित रखा गया है।

33.79
केतुदृष्टे सुखे चंद्रे नीलकुष्ठी प्रजायते।
चतुर्थे पञ्चमेवाऽहि स्थितौ राहुकुजौ यदि
ketudṛṣṭe sukhe caṃdre nīlakuṣṭhī prajāyate|
caturthe pañcamevā'hi sthitau rāhukujau yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतुदृष्टे = केतु से दृष्ट होने पर; सुखे चन्द्रे = सुख-भाव (कारकांश से चतुर्थ) में स्थित चन्द्रमा के; नीलकुष्ठी = नील/श्याम कुष्ठ-रोगी; प्रजायते = उत्पन्न होता है; चतुर्थे पञ्चमे वा = चौथे अथवा पाँचवें भाव में; राहुकुजौ = राहु और मंगल (कुज); स्थितौ यदि = यदि स्थित हों। ("वाऽहि" संभवतः "वापि" = 'वा अपि' का पाठ-भेद; "अहि"=सर्प यहाँ प्रसंग-असंगत — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ कारकांश (स्वांश) से चतुर्थ 'सुख' भाव में बैठे चन्द्रमा को यदि केतु देखे, तो शास्त्र कहता है कि जातक नील-कुष्ठ से ग्रस्त होता है। और यदि राहु तथा मंगल चौथे या पाँचवें भाव में एक साथ स्थित हों — तो (आगे की पंक्ति में) क्षय-रोग की चर्चा प्रारम्भ होती है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।

English rendering When the Moon stands in the fourth (sukha) house from the kārakāṃśa and is aspected by Ketu, the text states one becomes afflicted with dark leprosy (nīla-kuṣṭha); and if Rāhu and Mars occupy the 4th or 5th house — (the sentence completes in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रोग-वर्णन)। एकमात्र गणनीय अंश स्थान-गणना है: सुख-भाव = कारकांश-राशि से 4th (सुख = भाव 4), और दृष्टि/युति की जाँच। रोग स्वयं शास्त्र का कथन है, न कि कोई हमारे द्वारा समर्थित भविष्यवाणी।

उदाहरण (worked example) मान लें आत्मकारक का नवांश (D9) = कर्क → कारकांश कर्क। उससे 4th = तुला (सुख-भाव)। यदि चन्द्र तुला में हो और केतु तुला पर दृष्टि डाले → श्लोकोक्त शर्त पूर्ण।

33.80
क्षयरोगो भवेत्‌ तस्य चन्द्रदृष्टौ तु निश्चितः।
स्वांशात्‌ सुखे सुते वाऽपि केवलः संस्थितः कुजः
kṣayarogo bhavet‌ tasya candradṛṣṭau tu niścitaḥ|
svāṃśāt‌ sukhe sute vā'pi kevalaḥ saṃsthitaḥ kujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षयरोगः = क्षय (कृशता/तपेदिक-सदृश) रोग; भवेत् तस्य = उसको होता है; चन्द्रदृष्टौ तु निश्चितः = चन्द्र की दृष्टि होने पर निश्चय ही; स्वांशात् = अपने नवांश (कारकांश) से; सुखे सुते वापि = चतुर्थ (सुख) या पंचम (सुत) भाव में; केवलः संस्थितः कुजः = अकेला स्थित मंगल।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-पंक्ति का उत्तरार्ध — राहु-मंगल के चौथे/पाँचवें में होने पर, यदि उन पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो शास्त्र कहता है निश्चय ही क्षय-रोग होता है। फिर नया कथन आरम्भ होता है: स्वांश से चतुर्थ (सुख) या पंचम (सुत) भाव में यदि केवल मंगल अकेला बैठा हो — (फल अगले श्लोक में)।

English rendering Consumption (kṣaya-roga) certainly results, the text says, when the Moon aspects that Rāhu–Mars combination; and if Mars alone occupies the 4th (sukha) or 5th (suta) house from one's own navāṃśa (svāṃśa) — (the result follows in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; परन्तु आधार-तकनीक स्थान-गणना है। स्वांश = आत्मकारक की नवांश-राशि; भाव N की गणना: सुख → N = 4, सुत → N = 5, मोडुलर अर्थ में राशि = (स्वांश-राशि + N − 1) mod 12। नवांश-चाप = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश।

उदाहरण (worked example) आत्मकारक शुक्र 14°10′ सिंह पर मानें। सिंह में अंश-क्रम: 14°10′ ÷ 3°20′ = 4.25 → 5वाँ नवांश। सिंह-नवांश गणना से स्वांश-राशि निकालिए; उससे 4th व 5th भाव अंकित कर वहाँ 'केवल मंगल' की उपस्थिति देखिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्वांश" ही कारकांश है — आत्मकारक की D9 (नवांश) राशि — और यही सम्पूर्ण अध्याय का मूल-बिन्दु है। हमारी षोडश-वर्ग गणना (D1…D60) में D9 एक निर्धारक विभाजन है: 30° राशि को 3°20′ के नौ समान चापों में बाँटकर देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित से राशि-प्रतिचित्रण (kaal_ekavimshati_varga.py)। भाव-गणना विशुद्ध गणित है; क्षय-रोग जैसा फल शास्त्र का कथन मात्र, जिसे हम भविष्यवाणी रूप में समर्थन नहीं देते।

33.81
पिट्कादिर्भवेत्‌ तस्य तदा रोगो न संशयः।
ग्रहणी जलरोगो वा तत्र केतौ स्थिते सति
piṭkādirbhavet‌ tasya tadā rogo na saṃśayaḥ|
grahaṇī jalarogo vā tatra ketau sthite sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिट्कादिः = फोड़े-फुंसी आदि (पिटका-समूह); भवेत् तस्य = उसके लिए होता है; तदा रोगः = तब वह रोग; न संशयः = संशय नहीं (पाठ का निश्चय-पद); ग्रहणी = ग्रहणी-रोग (आन्त्र/अजीर्ण-संबंधी, शास्त्रीय नाम); जल-रोगः वा = अथवा जलरोग; तत्र = उस स्थान पर; केतौ स्थिते सति = केतु स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ पूर्व पद के केवल-कुज (स्वांशात् सुख/सुत) पर शास्त्र कहता है — पिट्कादि रोग होता है, संशय नहीं। यदि उसी स्थान पर केतु हो, तो फल बदलकर ग्रहणी अथवा जलरोग कहा गया है। एक ही भाव-स्थान पर ग्रह-भेद से दो भिन्न रोग-नाम — यह इस अध्याय की फल-शृंखला की रीति है।

English rendering The text states that under the lone-Mars placement just given, piṭakādi disease (boils and the like) arises without doubt. If instead Ketu occupies that same place, the śāstra names grahaṇī or a water-related disorder (jala-roga) as the indicated result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केवल-ग्रह स्थिति → रोग-नाम)। गणना नहीं; केवल भाव-स्थान + ग्रह-पहचान।

33.82
ख्वर्भानुगुलिकौ तत्र विषवैद्यो विषार्दितः।
स्वांशकात्‌ पञ्चमे भावे केवले संस्थिते शनौ
khvarbhānugulikau tatra viṣavaidyo viṣārditaḥ|
svāṃśakāt‌ pañcame bhāve kevale saṃsthite śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्भानुगुलिकौ = राहु (स्वर्भानु) और गुलिक; तत्र = वहाँ (उसी भाव में); विषवैद्यो = विष-चिकित्सक; विषार्दितः = विष से पीड़ित; स्वांशकात् = स्वांश (कारकांश) से; पञ्चमे भावे = पाँचवें भाव में; केवले संस्थिते शनौ = अकेला शनि स्थित होने पर। ("ख्वर्भानु" → "स्वर्भानु" का लिपि-दोष — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ उस भाव में राहु और गुलिक के होने पर जातक विष-वैद्य (विष-चिकित्सक) होता है अथवा स्वयं विष से पीड़ित रहता है — शास्त्र-वचन। फिर नया कथन: स्वांश से पाँचवें भाव में केवल शनि के स्थित होने पर — (फल अगले श्लोक में धनुर्विद्या)।

English rendering With Rāhu and Gulika there, the text states, one becomes a poison-physician or is himself tormented by poison; and when Saturn alone stands in the fifth house from the svāṃśa — (the result follows next).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृत्ति/रोग)। तकनीकी अंश: गुलिक एक कालवेला-उपग्रह है, जिसकी स्थिति दिन/रात्रि-मान के आठवें अंश (खण्ड-वेला) से गणित द्वारा निकाली जाती है; भाव-गणना पूर्ववत् स्वांश से पंचम (N = 5)। विष-वैद्य होना अथवा विषार्दित होना शास्त्र का द्विविध फल-कथन है।

33.83
धनुर्विद्याविदा जाता भवन्त्यत्र न संशयः।
केतौ च केवले तत्र घटिकायन्त्रकारकः
dhanurvidyāvidā jātā bhavantyatra na saṃśayaḥ|
ketau ca kevale tatra ghaṭikāyantrakārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनुर्विद्याविदः = धनुर्विद्या (बाण-विद्या) के ज्ञाता; जाता भवन्ति = उत्पन्न होते हैं; अत्र न संशयः = इसमें संशय नहीं; केतौ च केवले तत्र = और वहाँ अकेला केतु होने पर; घटिकायन्त्रकारकः = घटिका-यन्त्र (जल-घड़ी/काल-यन्त्र) का निर्माता। ("जाता" बहुवचन-प्रयोग वृत्ति-सूचक; एकवचन "जातो" का पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक का उत्तर — स्वांश से पंचम में केवल शनि हो तो जातक निश्चय ही धनुर्विद्या का ज्ञाता होता है। और उसी भाव में अकेला केतु हो तो वह घटिका-यन्त्र (जल-घड़ी/काल-मापक यन्त्र) बनाने वाला होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering With Saturn there, the text states, one becomes skilled in archery, without doubt; and with Ketu alone in that place, a maker of the ghaṭikā-yantra (water-clock / time-instrument).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृत्ति-निर्देश)। रोचक है कि फल स्वयं गणित-सापेक्ष है: घटिका-यन्त्र काल-मापन का उपकरण है (1 घटिका = 24 मिनट, 60 घटिका = 1 अहोरात्र) — किन्तु श्लोक इसे केवल वृत्ति-रूप में कहता है, कोई सूत्र नहीं देता।

33.84
बुधे परमहंसो वा दण्डी भवति मानवः।
लोहयन्त्री तथा राहौ रवौ खेड्‌गधरो भवेत्‌
budhe paramahaṃso vā daṇḍī bhavati mānavaḥ|
lohayantrī tathā rāhau ravau kheḍ‌gadharo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधे = बुध (उसी स्थान पर) होने पर; परम-हंसः वा = परमहंस अथवा; दण्डी = दण्डी संन्यासी; भवति मानवः = मनुष्य होता है; लोह-यन्त्री = लोह-यन्त्र बनाने/चलाने वाला; तथा राहौ = तथा राहु होने पर; रवौ = सूर्य होने पर; खड्ग-धरः = तलवार धारण करने वाला / खड्गध्र।

हिन्दी भावार्थ उसी (स्वांशकात् पञ्चम) श्रृंखला में शास्त्र कहता है — बुध हो तो मानव परमहंस अथवा दण्डी होता है। राहु हो तो लोहयन्त्री; रवि हो तो खड्गधर। एक ही भाव-स्थान पर केवल-ग्रह भेद से आश्रम-रूप, शिल्प और शस्त्र-धारक — तीन अलग फल-नाम दिए गए हैं।

English rendering The text states that with Mercury there, the person becomes a paramahaṃsa or a daṇḍī (ascetic types as named). With Rāhu, an iron-engine worker (lohayantrī); with the Sun, a sword-bearer (khaḍgadhara).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केवल-बुध / राहु / रवि → आश्रम-रूप या शिल्प/शस्त्र-नाम)। कोई वग-भाग, बिन्दु या दशा-वर्ष नहीं; केवल ग्रह-पहचान पर आधारित शास्त्रीय फल-सूची।

33.85
केवले च कुजे तत्र जातः कुन्तास्त्रधारकः।
स्वांशे वा पन्ऽचमे स्वांशाच्चन्द्रेज्यौ संस्थितौ तदा
kevale ca kuje tatra jātaḥ kuntāstradhārakaḥ|
svāṃśe vā pan'came svāṃśāccandrejyau saṃsthitau tadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केवले च कुजे तत्र = वहाँ अकेला मंगल होने पर; जातः कुन्तास्त्रधारकः = कुन्त (भाला) आदि अस्त्र धारण करने वाला उत्पन्न; स्वांशे वा पञ्चमे = स्वांश में अथवा (स्वांश से) पंचम भाव में; स्वांशात् = स्वांश से; चन्द्रेज्यौ = चन्द्र और इज्य (बृहस्पति); संस्थितौ तदा = स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ उसी भाव में केवल मंगल हो तो जातक कुन्त (भाला) आदि अस्त्र धारण करने वाला होता है। और यदि स्वांश में ही अथवा स्वांश से पंचम भाव में चन्द्र तथा बृहस्पति एक साथ स्थित हों — तो (अगले श्लोक में) वह ग्रन्थकर्ता होता है। "इज्य" = देवगुरु बृहस्पति।

English rendering With Mars alone there, one bears the lance and such weapons; and when the Moon and Jupiter (ijya) together occupy the svāṃśa itself or the fifth from it — (one becomes an author, completed next).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; आधार-तकनीक द्विविध स्थान-विकल्प है: (i) स्वयं स्वांश-राशि (N = 1), अथवा (ii) स्वांश से पंचम (N = 5)। दोनों में चन्द्र+बृहस्पति की युति एक ही योग-शर्त है।

उदाहरण (worked example) कारकांश = मिथुन मानें → पंचम = तुला। चन्द्र व बृहस्पति दोनों या तो मिथुन में या तुला में एक साथ हों तो श्लोक की शर्त पूर्ण; फल आगामी श्लोक में।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ भी गणित/फल का पृथक्करण स्पष्ट है — स्वांश (D9) की पहचान और पंचम-भाव की गणना विशुद्ध वर्ग-अंकगणित है (षोडश-वर्ग, दोसियर §2), जबकि "ग्रन्थकर्ता" होना शास्त्र का फल-कथन। हमारी विधि यही अनुशासन पालती है: वर्ग-विभाजन व भाव-गणना पर `==`-स्तरीय निश्चितता, फल पर केवल "शास्त्र कहता है"।

33.86
ग्रन्थकर्ता भवेज्जातः सर्वविद्याविशारदः।
तत्र दैत्यगुरौ किञ्चिदूनग्रन्थकरो भवेत्‌
granthakartā bhavejjātaḥ sarvavidyāviśāradaḥ|
tatra daityagurau kiñcidūnagranthakaro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रन्थकर्ता = ग्रन्थ/शास्त्र-रचयिता; सर्वविद्याविशारद = समस्त विद्याओं में निपुण; तत्र = उसी उक्त स्थान में; दैत्यगुरु = शुक्र (असुरों/दैत्यों के गुरु); किञ्चिद्-ऊन = कुछ कम / थोड़ा हीन; ग्रन्थकर = ग्रन्थ-निर्माता

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त—स्वांश या स्वांश से पञ्चम में चन्द्र-गुरु—पूरी होने पर शास्त्र कहता है कि जातक ग्रन्थकर्ता होता है और सर्वविद्या में विशारद कहलाता है। उसी उक्त स्थान में दैत्यगुरु (शुक्र) होने पर ग्रन्थ-रचना का स्तर “किञ्चिद्-ऊन” बताया गया है—पूर्ण सर्वविद्या-विशारदता से कुछ कम। यह तुलनात्मक फल-क्रम का आरम्भ है; अगले श्लोक में और गिरावट का क्रम आता है।

English rendering Completing the prior condition, the text states that the native becomes a composer of treatises and skilled in all branches of learning. With the daitya-guru (Venus) there, he becomes a somewhat lesser treatise-maker—still a grantha-writer, but ranked a degree below the Moon–Jupiter case.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / तुलनात्मक श्रेणी। “किञ्चिद्-ऊन” गुणात्मक रैंकिंग है, कोई अंश-संख्या या वर्ष-मान नहीं; शास्त्र का दावा “कुछ कम” के रूप में ही पढ़ना चाहिए।

33.87
बुधे तत्र ततोऽप्यूनग्रन्थकर्त्ता प्रजायते।
तत्र शुक्रे कविर्वाग्मी काव्यज्ञश्च प्रजायते
budhe tatra tato'pyūnagranthakarttā prajāyate|
tatra śukre kavirvāgmī kāvyajñaśca prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध = बुध ग्रह; तत्र = उक्त स्थान में; ततः-अपि-ऊन = उससे भी कम; ग्रन्थकर्त्ता = ग्रन्थ-रचयिता; शुक्र = शुक्र ग्रह; कवि = कवि; वाग्मी = वाक्पटु / वक्ता; काव्यज्ञ = काव्य-शास्त्र का ज्ञाता

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी स्थान में बुध हो तो ग्रन्थकर्ता-भाव गुरु–चन्द्र की अपेक्षा और शुक्र (दैत्यगुरु) की “किञ्चिद्-ऊन” स्थिति से भी कम रहता है—क्रम में तीसरी सीढ़ी। फिर शुक्र के उसी सन्दर्भ में अलग फल दिया गया है: कवि, वाग्मी और काव्यज्ञ। दैत्यगुरु और शुक्र एक ही ग्रह हैं; यहाँ पहले ग्रन्थ-क्षमता की क्रमिक न्यूनता, फिर काव्य-वाणी का विशिष्ट फल—दोनों कथन साथ पढ़े जाएँ; पाठ-भेद / अध्याय-क्रम की व्याख्या संभव।

English rendering With Mercury in that place, the text ranks the native as an even lesser treatise-composer than in the Venus case. With Venus there, it further states birth as a poet, an eloquent speaker, and a knower of poetry—shifting from graded grantha-capacity to poetic and rhetorical vocation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / क्रमबद्ध न्यूनता। “ऊन → ततोऽप्यून” सापेक्ष श्रेणी है (पूर्ण → किञ्चिद्-ऊन → ततोऽप्यून); कोई संख्यात्मक गुणक शास्त्र ने नहीं दिया।

33.88
सर्वविद्‌ग्रान्थिको जीवे न वाग्मी च सभादिषु।
शब्दज्ञश्च विशेषेण वेदवेदान्तवित्‌ तथा
sarvavid‌grānthiko jīve na vāgmī ca sabhādiṣu|
śabdajñaśca viśeṣeṇa vedavedāntavit‌ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वविद्-ग्रन्थिक = सर्वज्ञ / सर्वशास्त्र-ज्ञाता ग्रन्थ-सम्बन्धी; जीव = गुरु (बृहस्पति); न वाग्मी = सभा में वाक्पटु नहीं; सभादिषु = सभा आदि स्थानों में; शब्दज्ञ = शब्द/व्याकरण-शास्त्र का ज्ञाता; विशेषेण = विशेष रूप से; वेदवेदान्तवित् = वेद और वेदान्त का ज्ञाता

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जीव (गुरु) के उक्त स्थान में होने पर जातक सर्वविद् ग्रन्थिक होता है—ग्रन्थ-ज्ञान और व्यापक विद्या का पक्ष प्रबल—परन्तु सभा आदि में वाग्मी नहीं कहा गया। उसी सन्दर्भ में विशेष बल शब्द-ज्ञान पर है, और वेद तथा वेदान्त का ज्ञान भी बताया गया है। अर्थात् गुरु-फल यहाँ “लिखित-शास्त्रीय प्रौढ़ता” की ओर झुकता है, “सभा-वक्तृत्व” की ओर नहीं—शास्त्र का अपना भेद।

English rendering With Jupiter there, the text states an all-knowing, treatise-oriented scholar who is not, however, an orator in assemblies and the like. It specially assigns mastery of language/words (śabda) and knowledge of the Veda and Vedānta.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / गुण-भेद। “न वाग्मी च सभादिषु” निषेध-वाक्य है—सकारात्मक विद्या-फल के साथ सभा-वाणी का अभाव; गणना नहीं, केवल शास्त्रीय लक्षण-विभाजन।

33.89
सभाजडो भवेद्‌ बाल उक्तस्थानगते शनौ।
मीमांसको भवेन्नूनमुक्तस्थानगते बुधे
sabhājaḍo bhaved‌ bāla uktasthānagate śanau|
mīmāṃsako bhavennūnamuktasthānagate budhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सभाजड = सभा में जड़ / मंद / अप्रगल्भ; बाल = बालक-सदृश (अपरिपक्व वाणी/व्यवहार); उक्तस्थान = पहले कहा स्थान (स्वांश वा पञ्चम आदि); शनि = शनि ग्रह; मीमांसक = मीमांसा-शास्त्र का ज्ञाता / मीमांसा-पद्धति का अनुयायी; नूनम् = निश्चय से; बुध = बुध

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उक्त स्थान में शनि होने पर जातक सभा में जड़-सा रहता है और बाल-सदृश कहा गया है—सभा-प्रगल्भता का अभाव। उसी उक्त स्थान में बुध होने पर निश्चय से मीमांसक होता है। यहाँ बुध का फल ३३.८७ के “ऊन-ग्रन्थकर्ता” से भिन्न कोण पर है: वहाँ ग्रन्थ-क्षमता की क्रमिक न्यूनता, यहाँ मीमांसा-शास्त्र का विशिष्ट अभिज्ञान—दोनों शास्त्र-कथन अलग शर्तों/कोणों पर पढ़े जाएँ।

English rendering With Saturn in the stated place, the text says the native is dull or awkward in assembly and childlike in that setting. With Mercury in that same stated place, it affirms that he becomes a mīmāṃsaka—a specialist of Mīmāṃsā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्थान-ग्रह योग। “उक्तस्थान” पूर्व-निर्दिष्ट स्वांश/पञ्चम-सन्दर्भ की पुनरावृत्ति है; कोई नया अंश-सूत्र नहीं।

33.90
स्वांशे वा पञ्चमे भौमे जातो नैयायिको भवेत्‌।
चन्द्रे च सांख्ययोगज्ञः साहित्यज्ञश्च गायकः
svāṃśe vā pañcame bhaume jāto naiyāyiko bhavet‌|
candre ca sāṃkhyayogajñaḥ sāhityajñaśca gāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांश = स्व-अंश; पञ्चम = पाँचवाँ; भौम = मंगल; नैयायिक = न्याय-शास्त्र का ज्ञाता / न्याय-सम्प्रदाय का अनुयायी; चन्द्र = चन्द्रमा; सांख्ययोगज्ञ = सांख्य और योग का ज्ञाता; साहित्यज्ञ = साहित्य का पण्डित; गायक = गान-विद्या में निपुण

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट करता है—स्वांश में अथवा पञ्चम में भौम हो तो जातक नैयायिक होता है: न्याय-तर्क की दिशा। चन्द्र के उसी प्रकार की स्थिति में सांख्य-योग का ज्ञाता, साहित्यज्ञ और गायक—ये तीन फल साथ कहे गए हैं। ३३.८५ के “केवल कुज → कुन्तास्त्रधारक” से यह भौम-फल भिन्न है: वहाँ अस्त्र-धारण, यहाँ न्याय-शास्त्र—दोनों शास्त्र के अलग वाक्य; एक-दूसरे को रद्द करने का दावा पाठ स्वयं नहीं करता।

English rendering With Mars in own aṃśa or in the fifth, the text states that the native becomes a naiyāyika—versed in Nyāya. With the Moon so placed, it assigns knowledge of Sāṃkhya and Yoga, literary learning, and skill as a singer.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्वांश-पञ्चम शर्त। स्थान-शर्त “स्वांशे वा पञ्चमे” दोहरी विकल्प-वाची है (A या B); दोनों में फल एक ही श्रेणी का कहा गया, कोई भिन्न भार/अंक नहीं।

33.91
रवौ वेदान्तविच्चैव गीतज्ञश्च प्रजायते।
केतौ च गणितज्ञः स्याज्ज्योतिःशास्त्रविशारदः
ravau vedāntaviccaiva gītajñaśca prajāyate|
ketau ca gaṇitajñaḥ syājjyotiḥśāstraviśāradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवौ = सूर्य के (उक्त स्थान में) होने पर; वेदान्तवित् = वेदान्त का ज्ञाता; गीतज्ञश्च = और संगीत/गीत का ज्ञाता; प्रजायते = होता है; केतौ च = और केतु होने पर; गणितज्ञः स्यात् = गणितज्ञ होता है; ज्योतिःशास्त्रविशारदः = ज्योतिःशास्त्र में निपुण।

हिन्दी भावार्थ उक्त भाव में सूर्य हो तो जातक वेदान्तज्ञ तथा गीतज्ञ होता है; और केतु हो तो गणितज्ञ एवं ज्योतिःशास्त्र-विशारद होता है — ऐसा शास्त्र कहता है। यह कारकांश-फल की विद्या-सूची का समापन-चरण है।

English rendering With the Sun there, one becomes a knower of Vedānta and of music; and with Ketu, a mathematician and an adept in the science of the stars (jyotiḥ-śāstra).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विद्या-वृत्ति)। रोचक आत्म-संदर्भ: श्लोक स्वयं "गणितज्ञ" व "ज्योतिःशास्त्र-विशारद" को फल बताता है, पर उन्हें केवल वृत्ति रूप में नामांकित करता है — गणित का कोई सूत्र यहाँ नहीं, केवल ग्रह-कारकत्व (केतु → गणित/ज्योतिष) का आरोपण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पंक्ति स्वयं "गणितज्ञ/ज्योतिःशास्त्र-विशारद" की बात करती है, और यही इस पूरे डिकोड-प्रकल्प का आत्म-प्रतिबिम्ब है: शास्त्र का ज्योतिष एक स्रोत-पाठ + संगणकीय प्रतिमान है। हमारी विधि गणित (कारकांश = D9 नवांश, अष्टकवर्ग के विहित योग, विंशोत्तरी 120-वर्ष, षड्बल) को `==`-स्तरीय यथार्थता से सिद्ध करती है और फल-कथन को "शास्त्र कहता है" के रूप में ही रखती है — भय, नियति या भविष्यवाणी के रूप में नहीं। "केतु → गणितज्ञ" इस भेद-रेखा का सुन्दर स्मारक है।

33.92
सम्प्रदायस्य संसिद्धिर्गुरुसम्बन्धतो भवेत्‌।
द्वितीये च तृतीये च स्वांशादेवं विचारयेत्‌
sampradāyasya saṃsiddhirgurusambandhato bhavet‌|
dvitīye ca tṛtīye ca svāṃśādevaṃ vicārayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्प्रदायस्य = दीक्षा/गुरु-शिष्य ज्ञान-परम्परा का; संसिद्धिः = पूर्ण सिद्धि, सफलता; गुरु-सम्बन्धतः = बृहस्पति (गुरु) की युति/दृष्टि/सम्बन्ध से; द्वितीये च तृतीये च = (स्वांश से) द्वितीय एवं तृतीय भाव में; स्वांशात् = स्वांश यानी आत्मकारक-नवांश (= कारकांश) से गिनकर; एवं विचारयेत् = इस प्रकार विचार करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ सम्प्रदाय (दीक्षा-परम्परा) की सिद्धि गुरु अर्थात् बृहस्पति के सम्बन्ध से प्राप्त होती है; और इस फल को स्वांश (कारकांश) से द्वितीय तथा तृतीय भाव देखकर आँकना चाहिए। यह श्लोक 45 के "स्वांशाद् द्वितीयतः केचित्" कथन को दुहराकर उसी नियम को स्थिर करता है।

English rendering The perfection of one's initiatory lineage arises through connection with Jupiter; the text says to judge it from the 2nd and 3rd houses reckoned from the svāṃśa (Kārakāṃśa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन के साथ एक स्थान-गणना (reference-frame) तकनीक। कारकांश-राशि S से गिना गया n-वाँ भाव = ((S − 1 + n − 1) mod 12) + 1, यहाँ n ∈ {2, 3}।

उदाहरण (worked example) conventions — आत्मकारक = जैमिनि चर-कारक (सप्त-ग्रहों में स्वराशि में उच्चतम अंश वाला); स्वांश = उसका D9 (नवांश, 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश) राशि। मान लें आत्मकारक का नवांश सिंह (S=5) में गिरता है → कारकांश = सिंह। द्वितीय = (5−1+1) mod 12 + 1 = कन्या (6); तृतीय = तुला (7)। इन भावों में गुरु का सम्बन्ध हो तो शास्त्र सम्प्रदाय-सिद्धि कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश स्वयं नवांश (D9) पर टिका है — वही D9 जो हमारी षोडश-वर्ग engine (kaal_ekavimshati_varga.py) में 30° राशि को 9 समान 3°20′ arcs में बाँटकर deterministically निकाला जाता है। अतः इस पूरे अध्याय का फल-तन्त्र एक शुद्ध modular varga-गणना पर खड़ा है: आधार-राशि गणित की, व्याख्या शास्त्र की।

33.93
भावे सूक्ष्मफलं ज्ञात्वा जातकस्य फलं वदेत्‌।
केतौ स्वांशाद्‌द्वितीये वा तृतीये स्तब्धवाग्‌ भवेत्‌
bhāve sūkṣmaphalaṃ jñātvā jātakasya phalaṃ vadet‌|
ketau svāṃśād‌dvitīye vā tṛtīye stabdhavāg‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भावे = भाव में; सूक्ष्म-फल = बारीक / सूक्ष्म परिणाम; ज्ञात्वा = जानकर; जातकस्य फलम् = जातक का फल; वदेत् = कहे; केतौ = केतु स्थित होने पर; स्वांशाद्वितीये = स्वांश से द्वितीय में; वा तृतीये = अथवा तृतीय में; स्तब्ध-वाक् = स्तब्ध वाणी / रुद्ध वाक् (वाक्-बाधा का शास्त्रीय संकेत)।

हिन्दी भावार्थ अध्याय कहता है — भाव का सूक्ष्म फल जानकर ही जातक का फल बोलना चाहिए। यदि केतु स्वांश से दूसरे अथवा तीसरे भाव में हो, तो शास्त्र के अनुसार जातक स्तब्धवाक् कहा गया है। यह वाक्-सम्बन्धी फल-कथन है; चिकित्सा-निदान नहीं। सूक्ष्म-फल की मांग यह याद दिलाती है कि स्थूल योग-नाम से पहले भाव-विश्लेषण अनिवार्य है।

English rendering Having ascertained the subtle results of the house, one should declare the native’s outcome. When Ketu occupies the second or the third from svāṃśa, the text states the native becomes stambdha-vāk (speech-restrained).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-स्थिति नियम)। तकनीकी शर्त: केतु.rāśi ∈ {स्वांश+१, स्वांश+२} (मॉड १२)। यहाँ “फल” शास्त्र का कथन है, न कि अभिकलित बलांक या दशा-वर्ष।

उदाहरण (worked example) स्वांश = मेष (१)। स्वांश से द्वितीय = वृष (२), तृतीय = मिथुन (३)। यदि केतु वृष या मिथुन में हो, तो ३३.९३ की स्थिति-शर्त पूरी होती है। (अयनांश/गृह-प्रणाली यहाँ भाव-गिनती नहीं बदलते — यह राशि-से-राशि गणना है।)

33.94
पापदृष्टे विशेषेण मानवो वक्तुमक्षमः।
स्वांशाल्लग्नात्‌ पदाद्‌वाऽपि द्वितीयाष्टमभावयोः
pāpadṛṣṭe viśeṣeṇa mānavo vaktumakṣamaḥ|
svāṃśāllagnāt‌ padād‌vā'pi dvitīyāṣṭamabhāvayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-दृष्टे = पाप ग्रह की दृष्टि पड़ने पर; विशेषेण = विशेष रूप से; मानवः = मनुष्य; वक्तुम् अक्षमः = बोलने में असमर्थ; स्वांशाल् = स्वांश से; लग्नात् = लग्न से; पदाद् वा अपि = अथवा पद (आरूढ़) से भी; द्वितीय-अष्टम-भावयोः = द्वितीय और अष्टम भावों में/के विषय में।

हिन्दी भावार्थ पाप-दृष्टि विशेष रूप से लगने पर शास्त्र कहता है कि व्यक्ति वाक् में असमर्थ हो जाता है। यह विचार स्वांश से, लग्न से, अथवा पद से — द्वितीय और अष्टम भावों पर — करना है। तीन संदर्भ-बिंदु (स्वांश, लग्न, पद) और दो भाव (२, ८) मिलकर वाक्-अक्षमता वाले योग की जाँच-सीमा बाँधते हैं। “पाप” यहाँ ज्योतिषीय मालीफिक-वर्ग है, नैतिक निंदा नहीं।

English rendering Especially when aspected by a malefic, the text states the person is unable to speak. This is to be examined from svāṃśa, from the lagna, or also from the pada, with respect to the second and eighth houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-परिभाषा (संदर्भ × भाव)। तकनीकी ढाँचा: तीन केंद्र C ∈ {स्वांश, लग्न, पद}; लक्ष्य-भाव B ∈ {C+१, C+७} (मॉड १२, अष्टम = +७)। दृष्टि-नियम अध्याय ८ के अनुसार (पूर्ण/आंशिक) लगाना — यहाँ केवल “पाप-दृष्टि” का उल्लेख है, दृष्टि-अंश-तालिका नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क (४), पद = तुला (७), स्वांश = मकर (१०)। लग्न से २/८ = सिंह, कुंभ; पद से २/८ = वृश्चिक, वृष; स्वांश से २/८ = कुंभ, सिंह। इन छः राशियों पर पाप-ग्रह स्थिति/दृष्टि की जाँच ३३.९४–९५ की शर्त-शृंखला का पहला चरण है।

33.95
केमद्रुमः पापसाम्ये चन्द्रदृष्टौ विशेषतः।
अत्राऽध्याये च ये योगाः सफलाः कथिता मया
kemadrumaḥ pāpasāmye candradṛṣṭau viśeṣataḥ|
atrā'dhyāye ca ye yogāḥ saphalāḥ kathitā mayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केमद्रुमः = केमद्रुम योग (अशुभ चन्द्र-योग); पापसाम्ये = पाप-ग्रहों की समता/प्रधानता होने पर (पाप-सामय); चन्द्रदृष्टौ विशेषतः = चन्द्र-दृष्टि/सम्बन्ध में विशेष रूप से; अत्र अध्याये = इस अध्याय में; ये योगाः = जो योग; सफलाः कथिताः मया = मेरे (पराशर) द्वारा फलप्रद कहे गए।

हिन्दी भावार्थ (उन द्वितीय–अष्टम स्थानों में) जब पाप-ग्रहों की समता हो और विशेषतः चन्द्र का सम्बन्ध हो, तब केमद्रुम योग बनता है। और इस अध्याय में जो-जो योग मैंने (पराशर ने) फलप्रद कहे हैं — (उनका काल-निर्धारण अगले श्लोक में)।

English rendering With malefic parity — and the Moon especially involved — a Kemadruma condition forms; and, says Parāśara, as for the yogas declared fruitful in this chapter…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-प्रतिबन्ध (boolean condition), राशिगणित नहीं। केमद्रुम की परिभाषा पाठ-भेद-संवेदी है — यहाँ कारकांश/लग्न/पद के द्वि–अष्टम में पाप-सामय + चन्द्र-सम्बन्ध; अन्यत्र चन्द्र से 2/12 की रिक्तता। अतः convention घोषित करना अनिवार्य — पाठ-भेद संभव।

हमारा डिकोड (Our Decode) केमद्रुम की परिभाषा परम्पराओं में भिन्न है (चन्द्र से 2/12 रिक्तता बनाम यहाँ कारकांश-द्वि/अष्टम पाप-सामय)। हमारी discipline (CLAUDE.md + oracle) ठीक यही माँगती है: जहाँ नियम convention पर निर्भर हो, वहाँ चुनी हुई convention घोषित करो और विरोधी परम्पराओं को side-by-side रखो — जैसे अष्टकवर्ग में BPHS Ch.66 बनाम फलदीपिका के "9" के स्थानान्तरण को हमने साथ-साथ दिखाया, कोई मौन चुनाव नहीं।

33.96
योगकर्तृदशायान्ते ज्ञेयाः सर्वे फलप्रदाः।
एवं दशाप्रदाद्राशैर्द्वितीयाष्टमयोर्द्विज
yogakartṛdaśāyānte jñeyāḥ sarve phalapradāḥ|
evaṃ daśāpradādrāśairdvitīyāṣṭamayordvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगकर्तृ-दशा-अन्ते = योग करने वाले ग्रह की दशा के काल में; ज्ञेयाः = जानने योग्य; सर्वे फलप्रदाः = सब (योग) फल देने वाले; एवं = इस प्रकार; दशाप्रदात् राशेः = दशा देने वाली राशि से; द्वितीय-अष्टमयोः = द्वितीय और अष्टम में; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह योग का कर्ता है, उसी की दशा के समय वे सब योग अपना फल देते हैं — ऐसा जानो। इसी प्रकार दशा देने वाली राशि से द्वितीय और अष्टम भावों में (केमद्रुम-सदृश जाँच करनी चाहिए), हे द्विज।

English rendering All these yogas, the text states, ripen in the daśā of the planet that formed them; likewise examine the 2nd and 8th from the sign that gives the daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-निर्धारण नियम — योग का फल = योग-कर्तृ ग्रह की दशा-अवधि। दशाप्रद-राशि S से द्वितीय = ((S−1+1) mod 12)+1, अष्टम = ((S−1+7) mod 12)+1। "दशाप्रद राशि" संकेत करती है कि यहाँ राशि-दशा (चर/नारायण-कुल) अभिप्रेत है, नक्षत्र-दशा नहीं — पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) दशाप्रद राशि = कर्क (S=4)। द्वितीय = (4−1+1) mod 12 + 1 = सिंह (5); अष्टम = (4−1+7) mod 12 + 1 = कुम्भ (11)। इन दो में पाप-सामय → केमद्रुम-सदृश अशुभ काल।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ की दशा राशि-आधारित है (राशि स्वयं दशा देती है) — यह हमारी vimśottarī engine से भिन्न परिवार है, जो चन्द्र-नक्षत्र पर keyed 120-वर्ष चक्र (केतु 7 … बुध 17, Σ = 120) और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 चलाती है। दोनों दशा-कुलों का गणित पृथक् है; इन्हें मिलाना नहीं — यही convention-पृथक्करण की discipline है।

33.97
ग्रहसाम्ये च विज्ञेयो योगः केमद्रुमोऽशुभः।
दशाप्रारम्भसमये सलग्नान्‌ साधयेद्‌ ग्रहान्‌
grahasāmye ca vijñeyo yogaḥ kemadrumo'śubhaḥ|
daśāprārambhasamaye salagnān‌ sādhayed‌ grahān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहसाम्ये = ग्रहों की समता/रिक्तता होने पर (graha-sāmya); विज्ञेयः = भली-भाँति जानने योग्य; योगः केमद्रुमः अशुभः = अशुभ केमद्रुम योग; दशाप्रारम्भसमये = दशा के प्रारम्भ-समय पर; सलग्नान् = लग्न सहित; साधयेत् ग्रहान् = ग्रहों को साधे/गणना करे।

हिन्दी भावार्थ जब उन (द्वितीय-अष्टम) स्थानों में ग्रह-सामय (ग्रहों की रिक्तता/समता) हो, तब अशुभ केमद्रुम योग जानना चाहिए। दशा के आरम्भ के समय लग्न सहित सभी ग्रहों की स्थिति साध लेनी चाहिए — अर्थात् दशारम्भ की कुण्डली बनानी चाहिए।

English rendering When those places are empty or parity-laden of planets, know it as the inauspicious Kemadruma; at the daśā's onset, compute the planets together with the lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वास्तविक गणना-निर्देश — दशारम्भ-क्षण की कुण्डली: लग्न (उदित राशि, अयनांश-सापेक्ष) + नौ ग्रहों के स्फुट। लग्न = f(दशारम्भ-काल, स्थान-अक्षांश/देशान्तर, अयनांश, समय-परिशुद्धि)।

उदाहरण (worked example) conventions घोषित — Lahiri अयनांश, sidereal। दशारम्भ के इष्ट-काल पर स्थानीय RAMC से लग्न-स्फुट निकालें, फिर nine grahas के sidereal longitudes; तत्पश्चात् द्वितीय/अष्टम भावों में ग्रह-रिक्तता (graha-sāmya) जाँचें। सटीक अंकों के लिए ephemeris/kernel अनिवार्य — यहाँ केवल विधि दर्शायी गई।

हमारा डिकोड (Our Decode) "दशारम्भ पर लग्न-सहित ग्रह साधो" — यह हमारी exact-== oracle-discipline का मूल है: निष्कर्ष से पहले हर आधार-मान (अयनांश, kernel, स्थान, timezone, समय-परिशुद्धि, लग्न-विधि) घोषित करो, तब गणना; कोई मौन state नहीं, कोई tolerance-band नहीं।

33.98
ज्ञेयस्तत्रापि योगोऽयं पापसाम्येऽर्थरन्ध्रयोः।
एवं तन्वादिभावानां सूर्यादीनां नभसदाम्‌
jñeyastatrāpi yogo'yaṃ pāpasāmye'rtharandhrayoḥ|
evaṃ tanvādibhāvānāṃ sūryādīnāṃ nabhasadām‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञेयः तत्र अपि = वहाँ भी जानने योग्य; योगः अयम् = यह योग; पाप-साम्ये = पाप-साम्य में; अर्थ-रन्ध्रयोः = अर्थ (२रा) और रन्ध्र (८वाँ) भावों में; एवम् = इसी प्रकार; तन्वादि-भावानाम् = तनु (१) आदि भावों का; सूर्यादीनाम् = सूर्य आदि का; नभसदाम् = आकाशचारी ग्रहों का।

हिन्दी भावार्थ अर्थ और रन्ध्र में पाप-साम्य होने पर भी यह (केमद्रुम) योग वहाँ ज्ञेय कहा गया है। फिर अध्याय का विस्तार-सूत्र: तनु आदि भावों का और सूर्य आदि नभसद् ग्रहों का — इसी रीति से — विचार चलता है। यह श्लोक केमद्रुम-शर्त को २-८/पाप-साम्य पर स्थिर करता है और शेष भाव-ग्रह-विचार की समान पद्धति का द्वार खोलता है। फल-कथन शास्त्र का है; नियति का दावा नहीं।

English rendering This yoga is likewise to be known under equality of malefics in the second (artha) and eighth (randhra) houses. In the same manner [proceed with] the houses beginning from the body-house (tanu) and the sky-dwellers beginning from the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — केमद्रुम-शर्त का निरूपण + अध्याय-विधि का समापन-सूत्र। न्यूनतम संरचना-नियम (श्लोकानुसार): पाप-साम्य ∈ {भाव २, भाव ८} → केमद्रुम ज्ञेय; सामान्यीकरण: भाव i = १…१२ और ग्रह g ∈ {सूर्य … शनि/राहु-केतु प्रसंगानुसार} पर वही विचार-क्रम। कोई बलांक, बिन्दु-योग, या वर्ष-संख्या इस श्लोक में नहीं।

33.99
तत्तत्‌स्थित्यनुसारेण फलं वाच्यं विपश्चिता।
इति संक्षेपतः प्रोक्तं कारकांशफलं मया
tattat‌sthityanusāreṇa phalaṃ vācyaṃ vipaścitā|
iti saṃkṣepataḥ proktaṃ kārakāṃśaphalaṃ mayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्तत् स्थिति-अनुसारेण = उन-उन भाव-ग्रहों की स्थिति के अनुसार; फलं वाच्यं = फल कहना चाहिए; विपश्चिता = विद्वान/मनीषी द्वारा; इति संक्षेपतः प्रोक्तम् = इस प्रकार संक्षेप में कहा गया; कारकांशफलं = कारकांश-फल; मया = मेरे (पराशर) द्वारा।

हिन्दी भावार्थ उन-उन भावों और ग्रहों की यथास्थिति के अनुसार विद्वान को फल कहना चाहिए। इस प्रकार कारकांश-फल मैंने (पराशर ने) संक्षेप में कह दिया — यह अध्याय-समापन (उपसंहार) श्लोक है।

English rendering Let the wise declare the result according to each placement; thus, in brief, have I set forth the Kārakāṃśa-phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार / फल-कथन। ध्यातव्य: श्लोक स्वयं method कहता है — "स्थिति के अनुसार फल" — अर्थात् नियम पहले, कथन बाद में; यहाँ ज्योतिष एक स्थान-सापेक्ष deterministic ढाँचा है, पर फल शास्त्र का वचन है, नियति नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "विपश्चिता फलं वाच्यम्" — विद्वान स्थिति के अनुसार फल कहे — यह ठीक हमारी method है: गणित (वर्ग-विभाजन, भाव-गणना) को व्याख्या से पृथक् रखो, और फल को "शास्त्र कहता है / the text states" के रूप में प्रस्तुत करो, नियति, भय अथवा उपाय-दबाव के रूप में नहीं। पूरा कारकांश-अध्याय इसी अनुशासन का उदाहरण है।

अध्यायः 34

योगकारकाध्यायः

46 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
कारकांश-फल की धारा पूरी कर, पाराशर अब भाव-स्वामित्व (भावाधिपत्य) से ग्रह-योग का फल खोलते हैं — कौन सा ग्रह योगकारक बनेगा, यह उसके स्वभाव से कम और उसके स्वामित्व-स्थान से अधिक तय होता है। सौम्य केन्द्राधिपति स्वतः शुभ नहीं देते; क्रूर केन्द्राधिपति स्वतः अशुभ नहीं करते — जबकि त्रिकोण-स्वामी शुभदा माने गए हैं। लग्न केन्द्र और त्रिकोण दोनों होने से विशेष शुभप्रद है; पञ्चम-नवम विशेष धन, सप्तम-दशम विशेष सुख के रूप में उच्यते। त्रिषडाय (३-६-११) अधिपति सर्वे पापफल स्मृत हैं; व्यय-द्वितीय-रन्ध्रेश साहचर्य से फल देते हैं, और स्थानान्तर-संयोग से उनकी प्रबलता उत्तरोत्तर बढ़ती है। यह अध्याय आगे के योग-अध्यायों का नियम-स्तम्भ है — योगकारक की परिभाषा यहाँ भावाधिपत्य-गणित से बँधती है।

For the English reader:
Having closed the kārakāṃśa thread, Parāśara turns the lens from significator-portion to house-lordship: a planet’s yoga-making power is read less from its native temperament than from the houses it owns. Benefic lords of angles do not automatically grant good; malefic lords of angles do not automatically grant harm; triangular lords are the declared givers of auspicious result. The lagna, being both angle and trine, is specially favouring; the fifth and ninth are named for special wealth, the seventh and tenth for special ease. Lords of the third, sixth, and eleventh are classed as giving hard results; lords of the twelfth, second, and eighth act through company, and grow stronger as other placements reinforce them. Adhyāya 34 is the rule-frame on which the later yoga chapters rest.

मुख्य गणित/तकनीक:
- केन्द्र-त्रिकोण वर्गीकरण: केन्द्र = {१, ४, ७, १०}; त्रिकोण = {१, ५, ९}; लग्न ∈ केन्द्र ∩ त्रिकोण → विशेष शुभप्रद
- त्रिषडाय-नियम: अधिपति ∈ {३, ६, ११} → पापफल (पाठ-स्मृति)
- व्यय-द्वितीय-रन्ध्र: अधिपति ∈ {१२, २, ८} → फल साहचर्य-सापेक्ष; स्थानान्तर-अनुरोध से प्रबलता ↑ (उत्तरोत्तर)
- केन्द्राधिपत्य-भेद: सौम्य-केन्द्राधिपति ⇏ स्वतः शुभ; क्रूर-केन्द्राधिपति ⇏ स्वतः अशुभ; त्रिकोणप = शुभद

डिकोड-सेतु:
इस अध्याय का सीधा इंजन-डिकोड शेष है।

34.1
कारकांशवशादेवं फलं प्रोक्तं मया द्विज।
अथ भावाधिपत्येन ग्रहयोगफलं स्रृणु
kārakāṃśavaśādevaṃ phalaṃ proktaṃ mayā dvija|
atha bhāvādhipatyena grahayogaphalaṃ srṛṇu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांश = कारकांश (आत्मकारक जिस राशि में नवांश करे वह लग्न-तुल्य बिन्दु); वशात् = के आधार पर; एवं फलं प्रोक्तं = इस प्रकार फल कहा गया; मया = मेरे (पराशर) द्वारा; द्विज = हे ब्राह्मण (शिष्य मैत्रेय); अथ = अब; भावाधिपत्येन = भाव-स्वामित्व के आधार पर; ग्रहयोगफलम् = ग्रहों के योग का फल; शृणु (स्रृणु = शृणु) = सुनो।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, कारकांश के आश्रय से अब तक जो फल मैंने बतलाया, वह पूर्ण हुआ; अब मैं भाव-स्वामित्व (कौन-सा ग्रह जन्मलग्न से किस भाव का स्वामी है) के आधार पर ग्रहों के योगफल का वर्णन करता हूँ — उसे ध्यान से सुनो। यह एक संक्रमण-श्लोक है जो कारकांश-प्रकरण को समेटकर योगकारक/भावाधिपत्य-प्रकरण का द्वार खोलता है।

English rendering "Thus, O twice-born, by way of the Kārakāṃśa the results have been declared by me; now hear the fruit of planetary combinations reckoned through house-lordship."

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/संक्रमण-वाक्य। यह अध्याय की धुरी को "राशि-आधारित कारकांश" से हटाकर "लग्न-सापेक्ष भावाधिपत्य" पर टिकाता है — आगे का सारा फल इसी एक चर (लग्न से भाव-क्रमांक) का फलन है।

हमारा डिकोड: हमारी पिन-की गई प्रति (संस्कृत विकिस्रोत, 2026-08-11) में यह पाठ 97 अध्याय / 3,943 श्लोक का है, और हमारी संरचना-मानचित्रण के अनुसार अध्याय 34 "बल/पद/अर्गल/कारक (25–34)" खण्ड की समाप्ति-कड़ी है — योगकारक-निर्धारण यहीं से आरम्भ होता है।

34.2
केन्द्राधिपतयः सौम्या ना दिशन्ति शुभं फलम्‌।
क्रूरा नैवाऽशुभं कुर्युः शुभदाश्च त्रिकोणपाः
kendrādhipatayaḥ saumyā nā diśanti śubhaṃ phalam‌|
krūrā naivā'śubhaṃ kuryuḥ śubhadāśca trikoṇapāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र-अधिपतयः = केन्द्र (1, 4, 7, 10) के अधिपति; सौम्याः = सौम्य/शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, चन्द्र — परम्परा-भेद से); न दिशन्ति = नहीं देते; शुभं फलम् = शुभ फल; क्रूराः = क्रूर/पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु/केतु — पाठ-भेद संभव); नैव अशुभं कुर्युः = अशुभ नहीं करते; शुभ-दाः = शुभ देने वाले; च = और; त्रिकोण-पाः = त्रिकोण (1, 5, 9) के अधिपति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — केन्द्रों के स्वामी बने सौम्य ग्रह अपने स्वाभाविक शुभत्व के अनुसार शुभ फल नहीं देते; केन्द्र-स्वामित्व उनका शुभ-प्रवाह बाधित कर देता है। इसी प्रकार क्रूर ग्रह, जब केन्द्र के अधिपति हों, तो वे अपने स्वाभाविक अशुभ के अनुसार अशुभ नहीं करते — केन्द्र-स्वामित्व उन्हें “निष्क्रिय-पाप” की ओर झुकाता है। त्रिकोणों के अधिपति तो विशेष रूप से शुभ-दाता माने गए हैं।

English rendering Benefics that rule the angular houses do not bestow auspicious fruit; malefics that rule the angles do not produce inauspicious fruit. Lords of the trines, however, are givers of good.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग/अधिपत्य-नियम (केन्द्राधिपत्य-दोष + त्रिकोण-शुभता)। घर-वर्गीकरण (30° × 12 = 360° चक्र पर): केन्द्र = भाव {1, 4, 7, 10}; त्रिकोण = भाव {1, 5, 9}। लग्न दोनों वर्गों में है। फल-कथन शास्त्रीय है — “शास्त्र कहता है”, नियति-घोषणा नहीं।

उदाहरण (worked example) मिथुन लग्न मानें (D1; अयनांश/गृह-पद्धति केवल लग्न-राशिनिर्धारण तक; यहाँ केवल स्वामित्व-नियम)। केन्द्र-स्वामी: लग्न-बुध, 4-कन्या-बुध, 7-धनु-गुरु, 10-मीन-गुरु — दोनों सौम्य केन्द्रपति। त्रिकोण-स्वामी: 1-बुध, 5-तुला-शुक्र, 9-कुम्भ-शनि। शास्त्र-नियम से: बुध/गुरु केन्द्राधिपत्य-दोष के दायरे में; शुक्र त्रिकोणपति → शुभदा; शनि 9वें का स्वामी → त्रिकोणपति-रूप में शुभ-संभावना, किन्तु अन्य स्वामित्व (यदि हो) से मिश्रण — अगले श्लोकों के अनुसार जाँचा जाता है।

34.3
लग्नं केन्द्रत्रिकोणत्वाद्‌ विशेषेण शुभप्रदम्‌।
पञ्चमं नवमं चैव विशेषधनमुच्यते
lagnaṃ kendratrikoṇatvād‌ viśeṣeṇa śubhapradam‌|
pañcamaṃ navamaṃ caiva viśeṣadhanamucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नम् = प्रथम भाव; केन्द्रत्रिकोणत्वात् = केन्द्र और त्रिकोण दोनों होने से; विशेषेण शुभप्रदम् = विशेष रूप से शुभ-दायक; पञ्चमम् = 5वाँ भाव; नवमं च एव = और 9वाँ भाव; विशेषधनम् = विशेष धन-दायक; उच्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ लग्न एक साथ केन्द्र भी है और त्रिकोण भी, इसलिए उसका स्वामी विशेष रूप से शुभ-फलदायक है। इसी प्रकार पंचम और नवम (शुद्ध त्रिकोण) के स्वामी विशेष रूप से धन-दायक कहे गए हैं।

English rendering Because the ascendant is at once an angle and a trine, its lord is especially auspicious; the fifth and the ninth are declared givers of special wealth.

गणित / तकनीक: लग्न = K ∩ T = {1,4,7,10} ∩ {1,5,9} = {1} — एकमात्र भाव जो दोनों समुच्चयों में है, अतः उसका "शुभत्व-भार" उच्चतम। शुद्ध-त्रिकोण = T∖K = {5, 9} → विशेष-धन-वर्ग। कोई अंकीय स्थिरांक नहीं, केवल समुच्चय-सदस्यता।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न — लग्नेश मंगल (1∈K∩T) विशेष शुभ; 5वें (सिंह) का स्वामी सूर्य, 9वें (धनु) का स्वामी गुरु → ये दोनों "विशेष-धन" प्रदाता। (पाराशरी सम-भाव पद्धति मानी।)

34.4
सप्तमं दशमं चैव विशेषसुखमुच्यते।
त्रिषडायाधिपाः सर्वे ग्रहाः पापफलाः स्मृताः
saptamaṃ daśamaṃ caiva viśeṣasukhamucyate|
triṣaḍāyādhipāḥ sarve grahāḥ pāpaphalāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमम् = सप्तम भाव; दशमम् = दशम भाव; च एव = और भी; विशेष-सुखम् = विशेष सुख; उच्यते = कहा जाता है; त्रि-षड्-आय-अधिपाः = 3, 6, 11 भावों के अधिपति (त्रिषडाय); सर्वे ग्रहाः = सभी ग्रह (जब ये स्वामी हों); पाप-फलाः = पाप/अशुभ फल वाले; स्मृताः = स्मरण/कथित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम और दशम विशेष “सुख” कहे गए हैं (केन्द्रों में ये दो विशेष सुख-निर्देश)। तीन, छह और ग्यारह — त्रिषडाय — इनके अधिपति, चाहे ग्रह कोई भी हो, पाप-फल देने वाले माने गए हैं। यह भावाधिपत्य का कठोर नियम है: ग्रह का स्वाभाविक सौम्य/क्रूर स्वभाव यहाँ गौण; भाव-स्वामित्व प्रधान।

English rendering The seventh and the tenth are specifically declared to be “comfort” (viśeṣa-sukha). All planets that rule the third, sixth, or eleventh houses are remembered as yielding inauspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-वर्गीकरण / फल-कथन। केन्द्र-सुख-युग्म = {7, 10}; त्रिषडाय (दुष्ट-स्वामित्व) = {3, 6, 11}। पिछले श्लोक के “विशेषधन” {5, 9} से जोड़ें तो त्रिकोण-धन बनाम त्रिषडाय-पाप का द्वैत स्पष्ट होता है। फल शास्त्र-कथन है।

उदाहरण (worked example) कर्क लग्न (D1)। त्रिषडाय-स्वामी: 3-कन्या-बुध, 6-धनु-गुरु, 11-वृष-शुक्र — तीनों सौम्य होने पर भी शास्त्र उन्हें “पापफलाः” कहता है। 7-मकर-शनि और 10-मेष-मंगल = विशेष-सुख-केन्द्रपति (और क्रूर-केन्द्रपति का 34.2 वाला नियम भी लागू)। गणना नहीं — केवल स्वामित्व-मानचित्र।

34.5
व्ययद्वितीयरन्ध्रेशाः साहचर्यात्‌ फलप्रदाः।
स्थानान्तरानुरोधात्ते प्रबलाश्चोत्तरोत्तरम्‌
vyayadvitīyarandhreśāḥ sāhacaryāt‌ phalapradāḥ|
sthānāntarānurodhātte prabalāścottarottaram‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यय = द्वादश भाव; द्वितीय = द्वितीय भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; ईशाः = इनके अधिपति; साहचर्यात् = संग/सहयोग/अन्य भाव-स्वामित्व या युति-दृष्टि के संग से; फल-प्रदाः = फल देने वाले; स्थान-अन्तर-अनुरोधात् = अन्य स्थानों के अनुपात/अनुरोध से; ते = वे; प्रबलाः = प्रबल; च = और; उत्तरोत्तरम् = उत्तरोत्तर / क्रमशः अधिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — व्यय (12), धन (2) और रन्ध्र (8) के अधिपति स्वतः एकान्तिक शुभ/अशुभ नहीं; वे “साहचर्य” से फल देते हैं — अर्थात् वे किस अन्य भाव के भी स्वामी हैं, किससे युक्त/दृष्ट हैं, उसी से फल का रंग आता है। अन्य स्थानों के संबंध के अनुसार वे उत्तरोत्तर प्रबल होते जाते हैं। यह मिश्र-स्वामित्व का नियम है, एकपक्षीय दोष-घोषणा नहीं।

English rendering Lords of the twelfth, second, and eighth houses give results according to companionship (association/co-lordship). In accordance with other placements they grow successively stronger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मिश्र-अधिपत्य नियम (2/8/12)। संरचना-सेट: मरक/दुःस्थ-संबंधी त्रय = {2, 8, 12}। फल = f(सह-स्वामित्व, युति, दृष्टि, बल) — गुणात्मक नियम; संख्या-सूत्र इस श्लोक में नहीं। “उत्तरोत्तरम्” क्रम-सूचक है, गुणांक नहीं।

34.6
तत्र भाग्यव्ययेशत्वाद्रन्ध्रेशो न शुभप्रदः।
त्रिमदायाधिपत्वेऽथो कोणपत्वे तु सत्फलः
tatra bhāgyavyayeśatvādrandhreśo na śubhapradaḥ|
trimadāyādhipatve'tho koṇapatve tu satphalaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उनमें (2/8/12 में); भाग्य-व्यय-ईश-त्वात् = भाग्य (9) और व्यय (12) से संबंधित स्वामित्व-भाव के कारण (पाठ: भाग्यव्ययेशत्वात्); रन्ध्र-ईशः = अष्टमेश; न शुभ-प्रदः = शुभ-प्रद नहीं; त्रि-षड्-आय-अधिपत्वे = 3/6/11 का अधिपति होने पर (पाठ “त्रिमदाया—” — त्रिषडाय के रूप में पढ़ना उचित; पाठ-भेद संभव); अथवा = या; कोण-प-त्वे = त्रिकोण-अधिपति होने पर; तु = तो; सत्-फलः = उत्तम/सत् फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस (2–8–12) वर्ग में रन्ध्रेश विशेष रूप से शुभ-प्रद नहीं माना गया — भाग्य-व्यय से जुड़े उसके संबंध के कारण। किन्तु यदि वही अष्टमेश साथ ही त्रिषडाय (3, 6, 11) का स्वामी हो, अथवा त्रिकोण (1, 5, 9) का स्वामी हो, तो वह सत्फल देने वाला हो जाता है। दोहरे स्वामित्व से दोष-निवृत्ति का यह शास्त्रीय द्वार है।

English rendering Among those, the eighth-lord is not a giver of good, by reason of (its tie to) fortune and expenditure. Yet when it also rules a triṣaḍāya house, or when it rules a trine, it yields good results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — द्वि-स्वामित्व निवृत्ति-नियम / फल-कथन। तर्क-सार (सेट-संक्रिया):
रन्ध्रेश ∈ {2,8,12}-वर्ग → मूलतः न शुभप्रद;
यदि (रन्ध्रेश ∩ त्रिषडाय-स्वामित्व) ∨ (रन्ध्रेश ∩ कोण-स्वामित्व) → सत्फल।
“त्रिमदाया—” पाठ त्रिषडाय (3,6,11) का ही संकेत; पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न (D1)। अष्टम = वृश्चिक → रन्ध्रेश = मंगल। मंगल साथ ही लग्न (1) और अष्टम (8) का स्वामी — लग्न = कोण (त्रिकोण ∩ केन्द्र) → 34.6 के अनुसार कोणपत्वे सत्फल-मार्ग खुला। तुलना: कन्या लग्न में अष्टम = मेष → रन्ध्रेश मंगल, जो केवल 3 (वृश्चिक) और 8 का स्वामी — 3 ∈ त्रिषडाय → “त्रिषडायाधिपत्वे” सत्फल-योग्यता। दोनों में फल-मिश्रण अन्य योगों पर निर्भर; यहाँ केवल स्वामित्व-जाँच।

34.7
उक्तेष्वेषु बली योगो निर्बलस्य प्रबाधकः।
न रन्ध्रेशत्वदोषोऽत्र सूर्याचन्द्रमसोर्भवेत्‌
ukteṣveṣu balī yogo nirbalasya prabādhakaḥ|
na randhreśatvadoṣo'tra sūryācandramasorbhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्तेषु एषु = इन कहे हुए (योगों/स्वामित्वों) में; बली योगः = अधिक बलवान योग; निर्बलस्य प्रबाधकः = निर्बल का अभिभावक/अध्यारोपी होता है; न रन्ध्रेशत्वदोषः = अष्टम-स्वामित्व का दोष नहीं; अत्र = यहाँ; सूर्याचन्द्रमसोः = सूर्य और चन्द्र के लिए; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ इन सब नियमों में जो योग अधिक बलवान हो वही निर्बल योग को दबा देता है (टकराव में बली की जीत)। और विशेष बात — सूर्य तथा चन्द्र को अष्टम-स्वामित्व का दोष नहीं लगता, क्योंकि इनका एक ही राशि पर स्वामित्व है।

English rendering Among the rules stated, the stronger combination overrides the weaker; and here no blemish of eighth-lordship attaches to the Sun and the Moon.

गणित / तकनीक: राशि-स्वामित्व गणना: 5 तारा-ग्रह × 2 राशि + 2 प्रकाशक × 1 राशि = 10 + 2 = 12 राशियाँ। सूर्य (केवल सिंह) व चन्द्र (केवल कर्क) के पास दूसरा स्वामित्व नहीं, अतः "अष्टमेश-के-साथ-कोई-दूसरा-दोष" उन पर लागू ही नहीं होता → रन्ध्रेशत्व-दोष = 0। संघर्ष-नियम: फल = योग जिसका बल = max(बल₁, बल₂)।

उदाहरण (worked example) धनु लग्न — 8वाँ भाव कर्क, स्वामी चन्द्र। सामान्यतः अष्टमेश दोषयुक्त माना जाता, किन्तु चन्द्र का केवल एक ही स्वामित्व होने से यहाँ रन्ध्रेशत्व-दोष नहीं लगेगा (श्लोक-वचन)। इसी तरह मकर लग्न में 8वाँ सिंह/सूर्य पर भी यह छूट लागू।

हमारा डिकोड: "2×1 + 5×2 = 12" एक नियतांक (deterministic) संरचनात्मक तथ्य है, व्याख्या नहीं — ठीक वैसे ही जैसे हमारे इंजन में राशि-विभाजन शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है। ऐसे सटीक तथ्यों को हम `==`-सटीकता से रखते हैं, सहिष्णुता-पट्टी (tolerance band) से नहीं (डोज़ियर §5)।

34.8
गुरुशुक्रौ शुभौ प्रोक्तौ चन्द्रो मध्यम उच्यते।
उदासीनो बुधः ख्यातः पापा रव्यार्किभूमिजाः
guruśukrau śubhau proktau candro madhyama ucyate|
udāsīno budhaḥ khyātaḥ pāpā ravyārkibhūmijāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुशुक्रौ = बृहस्पति और शुक्र; शुभौ = शुभ (प्रकृत्या हितकर); प्रोक्तौ = कहे गए; चन्द्रः = चन्द्रमा; मध्यमः = मध्य-कोटि (न पूर्ण शुभ, न पूर्ण पाप); उदासीनः = तटस्थ / मिश्र-प्रकृति; बुधः = बुध; पापाः = पाप-ग्रह; रवि = सूर्य; आर्कि = शनि (सूर्य-पुत्र); भूमिजाः = मङ्गल (पृथ्वी-पुत्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रहों की नैसर्गिक प्रकृति का वर्गीकरण स्थिर करता है। गुरु और शुक्र को शुभ कहा गया है; चन्द्र को मध्यम माना गया है; बुध को उदासीन (तटस्थ) कहा गया है; और सूर्य, शनि तथा मङ्गल को पाप कहा गया है। यह नैसर्गिक (naisargika) श्रेणी है — लग्न-स्वामित्व या योग से उत्पन्न कारकता से भिन्न।

English rendering Jupiter and Venus are stated as benefics; the Moon is called medium; Mercury is known as neutral; and the Sun, Saturn, and Mars are classed as malefics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रकृति-वर्गीकरण (naisargika śubha/madhyama/udāsīna/pāpa)। सेट-रूप में:
śubha = {Guru, Śukra}; madhyama = {Candra}; udāsīna = {Budha}; pāpa = {Ravi, Śani, Maṅgala}।
यह नैसर्गिक सूची है; केन्द्राधिपत्य/योगकारकत्व अलग नियम से लागू होता है (अगले श्लोक)।

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34.9
पूर्णेन्दुज्ञेज्यशुक्राश्च प्रबला उत्तरोत्तरम्‌।
क्षीणेन्द्वर्कार्किभूपुत्राः प्रबलाश्च यथोत्तरम्‌
pūrṇendujñejyaśukrāśca prabalā uttarottaram‌|
kṣīṇendvarkārkibhūputrāḥ prabalāśca yathottaram‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णेन्दु = पूर्ण-चन्द्र; ज्ञ = बुध; इज्य = गुरु (यज्ञ-योग्य); शुक्र = शुक्र; प्रबलाः = बलवान् / प्रबल; उत्तरोत्तरम् = उत्तरोत्तर (क्रमशः अधिक); क्षीणेन्दु = क्षीण-चन्द्र; अर्क = सूर्य; आर्कि = शनि; भूपुत्राः = मङ्गल; यथोत्तरम् = जैसे क्रम में उत्तरोत्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्णचन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र — इसी क्रम में उत्तरोत्तर प्रबल हैं। क्षीणचन्द्र, सूर्य, शनि और मङ्गल भी उसी रीति से यथोत्तर प्रबल माने गए हैं। अर्थात् प्रत्येक सूची में अंतिम नाम पूर्ववर्ती से अधिक बलवान् गिना जाता है। यह नैसर्गिक बल-क्रम है, षड्बल के रूँप-माप से भिन्न किन्तु उसके नैसर्गिक-अंग से संगत।

English rendering The Full Moon, Mercury, Jupiter, and Venus are powerful in successive ascending order. The waning Moon, the Sun, Saturn, and Mars are likewise powerful in successive order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम-रेटिंग (rank order), अंक-सूत्र नहीं:
शुभ-पक्ष: पूर्ण-Candra < Budha < Guru < Śukra (प्रबलता ↑)
पाप-पक्ष: क्षीण-Candra < Ravi < Śani < Maṅgala (प्रबलता ↑)
पूर्ण/क्षीण-चन्द्र का निर्णय तिथि/कला पर: शास्त्रीय रूप में शुक्ल-पक्ष की वृद्धि बनाम कृष्ण-पक्ष की क्षीणता; गणना में चन्द्र की कला (0′–360′) से कला-पूर्णता निकाली जाती है।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र कला = 14° (कृष्ण पक्ष की ओर क्षीण) → क्षीण-सूची में चन्द्र न्यूनतम प्रबल; मङ्गल उस सूची में अधिकतम। शुक्ल-पक्ष में चन्द्र ≈ 180° (पूर्ण के निकट) → पूर्ण-सूची में चन्द्र न्यूनतम, शुक्र अधिकतम। (तिथि-निर्णय: pakṣa + tithi; ayanaṃśa से सूर्य-चन्द्र अन्तर प्रभावित होता है — घोषित करें।)

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34.10
केन्द्राधिपत्यदोषोयः शुभानां कथितो हि सः।
चन्द्रज्ञगुरुशुक्राणां प्रबलाश्चोत्तरोत्तरम्‌
kendrādhipatyadoṣoyaḥ śubhānāṃ kathito hi saḥ|
candrajñaguruśukrāṇāṃ prabalāścottarottaram‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्राधिपत्यदोषः = केन्द्र-स्वामित्व से उत्पन्न दोष; यः = जो; शुभानाम् = शुभ ग्रहों का; कथितः = कहा गया; हि सः = वही / निश्चय से वह; चन्द्रज्ञगुरुशुक्राणाम् = चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र का; प्रबलाः = प्रबल; च = और; उत्तरोत्तरम् = क्रमशः अधिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो केन्द्राधिपत्य-दोष शुभ ग्रहों के विषय में कहा गया है, वही यहाँ लागू है। चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र उत्तरोत्तर प्रबल हैं — अर्थात् इस दोष (या उसकी क्षमता) के सन्दर्भ में भी क्रम वही है: चन्द्र से शुक्र तक बल बढ़ता है। तात्पर्य: नैसर्गिक शुभ जब केन्द्र (1, 4, 7, 10) के स्वामी हों तो उन्हें दोष लगता है; और उनमें भी शुक्र सर्वाधिक प्रबल गिना जाता है।

English rendering The kendrādhipatya-doṣa stated for the benefics is the one meant here. Of the Moon, Mercury, Jupiter, and Venus, they are strong in successive ascending order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नियम (boolean + rank):
kendras = {1, 4, 7, 10} (लग्न से भाव-संख्या; whole-sign या equal — convention घोषित करें)।
यदि graha ∈ {Candra, Budha, Guru, Śukra} और g.owns ∩ kendras ≠ ∅ → kendrādhipatya-doṣa लागू (शास्त्र-कथन)।
प्रबलता-क्रम: Candra < Budha < Guru < Śukra।
पाप-ग्रहों के केन्द्र-स्वामित्व पर शुभकारिता अलग श्लोक (34.14) में।

उदाहरण (worked example) मिथुन लग्न: बुध स्वामी 1 और 4 (दो केन्द्र) → बुध पर केन्द्राधिपत्य-दोष (शास्त्र)। वृश्चिक लग्न: चन्द्र स्वामी 9 (कोण, केन्द्र नहीं) → इस दोष का केन्द्र-अंग नहीं; गुरु स्वामी 2, 5 — केन्द्र नहीं। (House system: whole-sign rāśi-bhāva; ayanāṃśa लग्न-राशि तय करता है।)

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34.11
केन्द्रकोणपती स्यातां परस्परगृहोपगौ।
एकभे द्वौ स्थितौ वापि ह्येकभेऽन्यतरः स्थितः
kendrakoṇapatī syātāṃ parasparagṛhopagau|
ekabhe dvau sthitau vāpi hyekabhe'nyataraḥ sthitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रकोणपती = केन्द्र-पति और कोण (त्रिकोण)-पति; स्याताम् = हों; परस्परगृहोपगौ = एक-दूसरे के गृह में स्थित; एकभे = एक ही राशि में; द्वौ स्थितौ = दोनों स्थित; वा अपि = अथवा; हि = निश्चय; एकभे = एक राशि में; अन्यतरः स्थितः = दोनों में से एक स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब केन्द्र का स्वामी और त्रिकोण (1, 5, 9) का स्वामी परस्पर एक-दूसरे के भाव/गृह में हों, अथवा दोनों एक ही राशि में स्थित हों, अथवा [संयोग की] एक राशि में दोनों में से एक स्थित हो — तब (अगले श्लोक से) वे योग-कारक बनते हैं। यह राजयोग-निर्माण का स्थान-सम्बन्ध नियम है: परस्पर गृह-आदान (exchange), युति, या सम्बन्धित स्थिति।

English rendering When the lord of a kendra and the lord of a trikoṇa occupy each other’s houses, or both stand in one sign, or one of them stands in a single sign [in that mutual configuration] — [they enter the yoga described next].

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
K = lords of houses ∈ {1, 4, 7, 10}; T = lords of houses ∈ {1, 5, 9}।
(लग्न = 1 दोनों समुच्चयों में — lagneśa विशेष।)
शर्त (शास्त्र):
(1) exchange: rāśi(k) = house(t) ∧ rāśi(t) = house(k); अथवा
(2) conjunction: rāśi(k) = rāśi(t) (एकभ);
(3) अन्यतर एकभ-स्थिति — पाठ संयोग/दृष्टि से जुड़ता है (34.12)।
पूर्ण योग-फल 34.12 में।

उदाहरण (worked example) कर्क लग्न: केन्द्र-स्वामी मङ्गल (10) + कोण-स्वामी मङ्गल (5) — एक ही ग्रह (अगला 34.13)। भिन्न-ग्रह: मेष लग्न — गुरु (9, कोण) और शुक्र (7, केन्द्र) यदि गुरु तुला में और शुक्र धनु में → परस्पर गृह-परिवर्तन (exchange)। (Convention: rāśi-chart D1; whole-sign houses।)

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34.12
पूर्णदृष्ट्‌येक्षितौ वापि मिथो योगकारौ तदा।
योगेऽस्मिन्‌ जायते भूपो विख्यातो वा जनो भवेत्‌
pūrṇadṛṣṭ‌yekṣitau vāpi mitho yogakārau tadā|
yoge'smin‌ jāyate bhūpo vikhyāto vā jano bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णदृष्ट्या = पूर्ण दृष्टि से; ईक्षितौ = देखे गए / दृष्ट; वा अपि = अथवा; मिथः = परस्पर; योगकारौ = योग उत्पन्न करने वाले; तदा = तब; योगे अस्मिन् = इस योग में; जायते = उत्पन्न होता है; भूपः = राजा; विख्यातः = प्रसिद्ध; वा = अथवा; जनः = व्यक्ति; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — अथवा जब वे (केन्द्रेश और कोणेश) एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखें, तब भी वे परस्पर योगकारक होते हैं। इस योग में, शास्त्र के कथनानुसार, राजा जन्म लेता है अथवा जातक प्रसिद्ध जन बनता है। यह फल-कथन शास्त्रीय योग-वर्णन है; निश्चित भाग्य या भविष्य-वाणी के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

English rendering Or when the two are mutually aspected by full aspect, they then become yoga-makers for each other. In this yoga, the text states, a ruler is born, or the person becomes renowned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दृष्टि-नियम (D1, whole-sign aspect convention — BPHS dṛṣṭi Ch.8 से संगत):
सामान्य पूर्ण दृष्टि: 7वीं राशि (180° / opposite sign)।
विशेष: मङ्गल +4,+8; गुरु +5,+9; शनि +3,+10 — ये भी “पूर्ण” गिनी जाती हैं जहाँ शास्त्र पूर्णदृष्टि कहे।
योग-शर्त: kendréśa और koṇéśa परस्पर pūrṇa-dṛṣṭi से ईक्षित → yoga-kāra (शास्त्र)।
फल: “भूप / विख्यात जन” = शास्त्र का फल-कथन, deterministic fate नहीं।

उदाहरण (worked example) कन्या लग्न: कोणेश शुक्र (5/9? — कन्या: शुक्र 2,9 → 9 कोण) और केन्द्रेश बुध (1,10)। यदि शुक्र मीन में, बुध कन्या में → 7वीं पूर्ण दृष्टि (बुध↔शुक्र)। शास्त्र इस विन्यास को योगकारक कहता है। (Ayanāṃśa: लग्न-राशि तय; house = whole sign।)

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34.13
कोणेशत्वे यदैकस्य केन्द्रेशत्वं च जायते।
केन्द्रे कोणे स्थितो वाऽसौ विशेषाद्योगकारकः
koṇeśatve yadaikasya kendreśatvaṃ ca jāyate|
kendre koṇe sthito vā'sau viśeṣādyogakārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोणेशत्वे यदा एकस्य = जब किसी एक (ग्रह) को त्रिकोण-स्वामित्व हो; केन्द्रेशत्वं च जायते = और (उसी को) केन्द्र-स्वामित्व भी हो जाए; केन्द्रे कोणे स्थितः वा असौ = और वह केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो; विशेषात् योगकारकः = वह विशेष रूप से योगकारक है।

हिन्दी भावार्थ जब एक ही ग्रह एक साथ किसी केन्द्र और किसी त्रिकोण — दोनों का स्वामी बन जाए, और वह स्वयं भी किसी केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो, तो वह ग्रह विशेष रूप से "योगकारक" कहलाता है। यही योगकारक-ग्रह की शास्त्रोक्त परिभाषा है।

English rendering When a single planet comes to own both an angle and a trine, and itself stands in an angle or a trine, that planet is, in the special sense, a yoga-kāraka.

गणित / तकनीक: शर्त: ∃ ग्रह g ऐसा कि स्वामित्व(g) ∩ K ≠ ∅ और स्वामित्व(g) ∩ T ≠ ∅, तथा भाव-स्थिति(g) ∈ K ∪ T ⇒ g = योगकारक। चूँकि सूर्य/चन्द्र एकैक-राशि-स्वामी हैं (34.7), वे कभी योगकारक नहीं बनते; योगकारक सदैव मंगल/शुक्र/शनि में से किसी एक विशिष्ट लग्न पर आता है — यह लग्न से नियत (deterministic) है।

उदाहरण (worked example) कर्क लग्न — मंगल 5वें (वृश्चिक, त्रिकोण) व 10वें (मेष, केन्द्र) का स्वामी ⇒ मंगल योगकारक। वृषभ लग्न — शनि 9वें (मकर, त्रिकोण) व 10वें (कुम्भ, केन्द्र) का स्वामी ⇒ शनि योगकारक। (पाराशरी केन्द्र {1,4,7,10}/त्रिकोण {1,5,9} परिपाटी।)

हमारा डिकोड: योगकारक-ग्रह प्रत्येक लग्न के लिए केवल भाव-स्वामित्व-अंकगणित से नियत रूप से निकाला जा सकता है — कोई व्याख्या-निर्भरता नहीं। हम इसे घोषित पाराशरी केन्द्र/त्रिकोण परिपाटी पर सटीक (`==`) गणना के रूप में रखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वर्ग-विभाजन शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है (डोज़ियर §2, §5)।

34.14
केन्द्रेशत्वेन पापानां या प्रोक्ता शुभकारिता।
सा त्रिकोणाधिपत्येऽपि न केन्द्रेशत्वमात्रतः
kendreśatvena pāpānāṃ yā proktā śubhakāritā|
sā trikoṇādhipatye'pi na kendreśatvamātrataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रेशत्वेन = केन्द्र-स्वामित्व के कारण; पापानाम् = पाप-ग्रहों की; या = जो; प्रोक्ता = कही गई; शुभकारिता = शुभ उत्पन्न करने की क्षमता; सा = वह; त्रिकोणाधिपत्ये अपि = त्रिकोण-स्वामित्व में भी; न = नहीं; केन्द्रेशत्वमात्रतः = केवल केन्द्र-स्वामित्व मात्र से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पाप-ग्रहों की जो शुभकारिता केन्द्रेशत्व से कही गई है, वह त्रिकोणाधिपत्य में भी लागू होती है — केवल केन्द्र-स्वामित्व मात्र से नहीं समझी जानी चाहिए। अर्थात् नैसर्गिक पाप (सूर्य, शनि, मङ्गल; और प्रसङ्ग से क्षीणचन्द्र) जब त्रिकोण के भी स्वामी हों, तब उनकी शुभ-कारकता शास्त्र द्वारा स्वीकार है; मात्र केन्द्रेश कह देने से पूरी बात पूरी नहीं होती। यह 34.10 के शुभ-दोष नियम का पाप-पक्षीय पूरक है।

English rendering The benefic agency of the malefics that is stated by virtue of kendra-lordship applies also under trikoṇa-lordship; it is not from mere kendra-lordship alone.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
pāpa ∈ {Ravi, Śani, Maṅgala} (+ क्षीण-Candra, 34.8–9 संगत)।
शास्त्र: śubhakāritā(p) जब
owns(p) ∩ {1,4,7,10} ≠ ∅ अथवा/तथा owns(p) ∩ {1,5,9} ≠ ∅ —
“न केन्द्रेशत्वमात्रतः” = केवल kendra-flag पर्याप्त नहीं; trikoṇa-स्वामित्व भी शुभकारिता का आधार (पाठ)।
पूर्ण योगकारकत्व के लिए 34.13 का द्वि-स्वामित्व सूत्र प्राथमिक।

उदाहरण (worked example) मकर लग्न: मङ्गल स्वामी 4 (केन्द्र) और 11 — केन्द्रेशत्व से शास्त्र पाप की शुभकारिता कहता है; साथ ही यदि कोई पाप 5/9 का भी स्वामी हो (यथा कुम्भ लग्न: मङ्गल 3,10 — केवल केन्द्र; शनि 1,12 — लग्न=कोण+केन्द्र)। तुला लग्न शनि 4+5: केन्द्र और कोण दोनों → 34.13 योगकारक + 34.14 की शुभकारिता एकत्र।

34.15
केन्द्रकोणाधिपावेव पापस्थानाधिपौ यदा।
तयोः सम्बन्धमात्रेण न योगं लभते नरः
kendrakoṇādhipāveva pāpasthānādhipau yadā|
tayoḥ sambandhamātreṇa na yogaṃ labhate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रकोणाधिपौ = केन्द्र (1,4,7,10) और त्रिकोण (1,5,9) के स्वामी; पापस्थानाधिपौ = पाप/दुःस्थान (6,8,12) के अधिपति; सम्बन्धमात्रेण = केवल सम्बन्ध (युति/दृष्टि/परिवर्तन) से; योगं = राजयोग/शुभयोग; न लभते = नहीं प्राप्त करता; नरः = जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ योग-कारकता की एक सीमा बाँधता है। जब वे ही ग्रह जो केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी हैं, साथ-साथ पापस्थानों के भी स्वामी हों, तो केवल उनके परस्पर सम्बन्ध मात्र से जातक को योग-फल नहीं मिलता। अर्थात् अधिपत्य में दुःस्थान-दोष लगा हो तो सम्बन्ध-मात्र से योग-सिद्धि नहीं मानी जाती। यह नियम योग को स्वचालित नहीं, अधिपत्य-शुद्धि पर निर्भर बताता है।

English rendering When the very lords of the kendras and trikoṇas are also lords of the malefic houses (dusthānas), the native does not obtain yoga merely through their mutual relationship. Lordship tainted by pāpa-sthāna ownership cancels the assumption that mere association yields yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-योग्यता का अधिपत्य-नियम। संरचना: केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, पापस्थान = {6,8,12}; यदि keśa ∈ kendra∪trikoṇa और keśa ∈ dusthāna (उभय-स्वामित्व), तो sambandha(k₁,k₂) ⇏ yoga-siddhi।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न: मंगल = 1 और 8 का स्वामी (केन्द्र+पाप)। यदि मंगल-गुरु सम्बन्ध मात्र से “योग” मान लिया जाए, तो यह श्लोक रोकता है—क्योंकि केन्द्र/त्रिकोण-स्वामी ही रन्ध्रेश भी है। (लग्न = मेष; भाव-स्वामित्व = पूर्ण-राशि परंपरा; अयनांश इस नियम में अप्रासंगिक।)

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34.16
यद्‌भावेशयुतौ वापि यद्यद्‌भावसमागतौ।
तत्तत्फलानि प्रबलौ प्रदिशेतां तमोप्रहौ
yad‌bhāveśayutau vāpi yadyad‌bhāvasamāgatau|
tattatphalāni prabalau pradiśetāṃ tamoprahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यद्भावेश = जिस भाव का स्वामी; युतौ = युक्त/संयुक्त; यद्भावसमागतौ = उस भाव में स्थित/उस भाव से जुड़े; तत्तत्फलानि = उन्हीं-उन्हीं भावों के फल; प्रबलौ = बलवान्/प्रबल; प्रदिशेतां = प्रदान करें; तमोप्रहौ = तमो ग्रह (राहु-केतु)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दोनों तमो-ग्रह—राहु और केतु—जिस भाव-स्वामी से युक्त हों, अथवा जिस भाव में समागत हों, उसी भाव के फलों को प्रबल रूप से देते हैं। अर्थात् राहु-केतु स्वयं “स्वामी” न होकर जिस भाव/स्वामी से जुड़ते हैं, उसी का प्रबलन करते हैं। यह उनका फल-प्रसार का नियम है, न कि स्वतंत्र अधिपत्य।

English rendering The two tamas-planets (Rāhu and Ketu), when conjoined with a house-lord or associated with a given house, powerfully bestow the results of that very house. They amplify the bhāva they touch rather than acting as ordinary sign-lords.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तमो-ग्रह फल-संचरण नियम। मॉडल: यदि T ∈ {Rāhu, Ketu} और (T yuti L_b अथवा T ∈ bhāva b), तो phala(T) ∝ phala(b) — प्रबलन, न कि नया सूत्र।

उदाहरण (worked example) कन्या लग्न, राहु पंचम भाव में गुरु (5ल/8ल) से युक्त → शास्त्र की दृष्टि में राहु पंचम-फल को प्रबल करता है। (पूर्ण-राशि भाव; राहु-केतु की राशि-स्वामित्व परंपरा यहाँ अप्रयुक्त—केवल युति/भाव-स्थिति।)

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34.17
यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ।
नाथेनात्यतरेणाढ्‌यौ दृष्टौ वा योगकारकौ
yadi kendre trikoṇe vā nivasetāṃ tamograhau|
nāthenātyatareṇāḍh‌yau dṛṣṭau vā yogakārakau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रे = केन्द्र भाव में; त्रिकोणे = त्रिकोण भाव में; निवसेतां = निवास करें (द्विवचन); तमोग्रहौ = राहु-केतु; नाथेन = (केन्द्र/त्रिकोण) स्वामी से; अन्यतरेण = दोनों में से किसी एक से; आढ्यौ = संयुक्त/समृद्ध; दृष्टौ = दृष्ट; योगकारकौ = योग कारक बनते हैं।

हिन्दी भावार्थ यदि दोनों तमो-ग्रह केन्द्र अथवा त्रिकोण में स्थित हों, और केन्द्र-त्रिकोण के किसी एक स्वामी से युक्त हों अथवा उससे दृष्ट हों, तो शास्त्र उन्हें योगकारक मानता है। केवल केन्द्र/त्रिकोण-स्थिति पर्याप्त नहीं—स्वामी-संयोग या दृष्टि भी अपेक्षित है। यह राहु-केतु को सशर्त योगकारक घोषित करने वाला पद है।

English rendering If the two tamas-planets occupy a kendra or a trikoṇa and are joined with or aspected by either of the relevant lords, they become yoga-kārakas. Placement alone is not enough; association or aspect with a kendra/trikoṇa lord is required.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-सम्बन्ध नियम (कोई संख्या-सूत्र नहीं)। योगकारक(T) ⇔ [house(T) ∈ {1,4,5,7,9,10}] ∧ [yuti(T, L) ∨ dṛṣṭi(L→T)], जहाँ L = किसी केन्द्र- या त्रिकोण-स्वामी। राहु-केतु दृष्टि-परंपरा पाठ/सम्प्रदाय-भेद से भिन्न हो सकती है—पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) वृषभ लग्न; राहु दशम (केन्द्र) में; दशमेश शनि राहु को पूर्ण दृष्टि दे → इस श्लोक के अनुसार राहु योगकारक-कोटि में आता है। (दृष्टि = शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि; राहु-दृष्टि की स्वीकार्यता सम्प्रदाय-निर्भर।)

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34.18
कस्मिल्लग्ने प्रजातस्य के ग्रहा योगकारकाः।
के चाऽशुभप्रदाः खेटाः कृपया वदे मे मुने
kasmillagne prajātasya ke grahā yogakārakāḥ|
ke cā'śubhapradāḥ kheṭāḥ kṛpayā vade me mune

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कस्मिन् लग्ने = किस लग्न में; प्रजातस्य = उत्पन्न जातक के; के ग्रहाः = कौन ग्रह; योगकारकाः = योगकारक; के च = और कौन; अशुभप्रदाः = अशुभफलदायी; खेटाः = ग्रह; कृपया वद = कृपया कहिए; मे मुने = मुझसे, हे मुनि।

हिन्दी भावार्थ (मैत्रेय पूछते हैं—) हे मुनि! किस लग्न में जन्मे जातक के लिए कौन-से ग्रह योगकारक होते हैं और कौन-से ग्रह अशुभफलदायी — कृपया यह मुझे बतलाइए। यह प्रश्न आगे के लग्न-वार वर्गीकरण की भूमिका है।

English rendering "For one born in each ascendant, which planets are yogakārakas and which planets give inauspicious results? Kindly tell me, O sage."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (शिष्य-प्रश्न)। यह प्रश्न आगामी श्लोकों में एक नियतात्मक तालिका माँगता है: प्रत्येक लग्न → {योगकारक-समुच्चय, अशुभ-समुच्चय}; उत्तर पूर्णतः भावाधिपत्य के modular अंकगणित से व्युत्पन्न होगा।

34.19
यथा पृष्टं त्वया विप्र तथोदाहरणं ब्रुवे।
रन्ध्रेशत्वेऽपि भूपुत्रो भवेच्छूभसहायवान्‌
yathā pṛṣṭaṃ tvayā vipra tathodāharaṇaṃ bruve|
randhreśatve'pi bhūputro bhavecchūbhasahāyavān‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा पृष्टम् = जैसा पूछा; त्वया विप्र = तुमने, हे विप्र; तथा उदाहरणं ब्रुवे = वैसा उदाहरण कहता हूँ; रन्ध्रेशत्वे अपि = अष्टम (रन्ध्र) का स्वामी होने पर भी; भूपुत्रः = मंगल (भूमि-पुत्र); भवेत् शुभसहायवान् = शुभ-सहायक (शुभ-कारक) होता है।

हिन्दी भावार्थ (पराशर उत्तर देते हैं—) हे विप्र! जैसा तुमने पूछा, वैसा उदाहरण कहता हूँ। मेष लग्न में मंगल अष्टमेश होने पर भी शुभ-सहायक बन जाता है, क्योंकि वह साथ ही लग्नेश (प्रथमेश) है। लग्नेशत्व की प्रबलता अष्टम-स्वामित्व के दोष को ढँक देती है।

English rendering "As you have asked, O brāhmaṇa, so I give the illustration: even as lord of the eighth, Mars (for Aries) becomes a bestower of auspicious support" — because it is also lord of the ascendant.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-निर्धारण सूत्र: H = ((राशि − लग्न) mod 12) + 1, राशि-सूचकांक मेष=1 … मीन=12। मेष लग्न (L=1) पर H = राशि-सूचकांक ही। मंगल की राशियाँ मेष=1, वृश्चिक=8 → भाव 1 व 8। लग्न (1 ∈ केन्द्र∩त्रिकोण) का बल अष्टम (8 ∈ दुःस्थान) पर अभिभावी।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न, मंगल-स्वामित्व = {मेष→भाव 1, वृश्चिक→भाव 8}। भाव 1 = लग्न (मूल केन्द्र-त्रिकोण), भाव 8 = रन्ध्र। नियम: लग्नेशत्व-प्राधान्य ⇒ मंगल = शुभ-सहाय, यद्यपि रन्ध्रेश। (यही तर्क कर्क व सिंह लग्न के मंगल पर लागू होता है — वहाँ भी लग्न/पंचम का स्वामित्व साथ आता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह उदाहरण हमारे oracle-अनुशासन का ही विस्तार है: भावाधिपत्य शुद्ध नियतात्मक modular अंकगणित है — ठीक वैसे ही जैसे षोडश-वर्ग को हमने "राशि के 30° का equal-arc विभाजन, विशुद्ध modular अंकगणित" के रूप में डिकोड किया (varga engine)। "मंगल शुभ या पापी" कोई नियति-कथन नहीं, अपितु स्वामित्व-फलन का यांत्रिक परिणाम है; फल-भाग को हम सदा "शास्त्र कहता है" के रूप में ही रखते हैं।

34.20
मन्दसौम्यसिताः पापाः शुभौ गुरुदिवाकरौ।
न शुभं योगमत्रेण प्रभवेच्छनिजीवयोः
mandasaumyasitāḥ pāpāḥ śubhau gurudivākarau|
na śubhaṃ yogamatreṇa prabhavecchanijīvayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द = शनि; सौम्य = बुध; सित = शुक्र; = ये तीनों पापाः (मेष लग्न हेतु अशुभ); शुभौ = दो शुभ; गुरु = बृहस्पति; दिवाकर = सूर्य; न शुभं योगम् मात्रेण प्रभवेत् = मात्र (युति) से शुभ योग नहीं बनता; शनिजीवयोः = शनि व गुरु का।

हिन्दी भावार्थ मेष लग्न में शनि, बुध और शुक्र अशुभफलदायी हैं; बृहस्पति और सूर्य शुभ हैं। और शनि तथा गुरु के केवल मिल जाने मात्र से कोई शुभ राजयोग नहीं बन जाता — क्योंकि शनि यहाँ एकादश (आय, त्रिषडाय) का भी स्वामी है, जिससे उसकी संगति नवमेश गुरु के साथ भी योगकारक नहीं बनती।

English rendering For Aries: Saturn, Mercury and Venus are malefic; Jupiter and the Sun are auspicious. And no auspicious yoga arises from the mere combination of Saturn and Jupiter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मेष लग्न (L=1), भाव = राशि-सूचकांक। भाव-वर्ग: केन्द्र {1,4,7,10}, त्रिकोण {1,5,9}, दुःस्थान {6,8,12}, त्रिषडाय-लॉर्ड-पापी {3,6,11}, मारक {2,7}।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न स्वामित्व-तालिका —
- सूर्य: सिंह=5 → भाव 5 (त्रिकोण) ⇒ शुभ
- गुरु: धनु=9 → भाव 9 (त्रिकोण), मीन=12 → भाव 12 ⇒ नवमेश-प्राधान्य ⇒ शुभ
- शनि: मकर=10 → भाव 10 (केन्द्र), कुम्भ=11 → भाव 11 (त्रिषडाय) ⇒ 11-दोष ⇒ पापी
- बुध: मिथुन=3 → भाव 3, कन्या=6 → भाव 6 ⇒ दोनों त्रिक ⇒ पापी
- शुक्र: वृषभ=2 → भाव 2 (मारक), तुला=7 → भाव 7 (मारक) ⇒ पापी
शनि(11-स्वामी) ↔ गुरु(9-स्वामी) सम्बन्ध: 34.15 के निषेध से शुभ योग नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह वर्गीकरण हमारे CLAUDE.md-अनुशासन "गणित को व्याख्या से अलग रखो" का सटीक दृष्टान्त है: लग्न + ग्रह-राशि → भाव → {शुभ/पाप} एक नियतात्मक फलन है (कोई tolerance-band नहीं, वैसे ही जैसे हमारा अष्टकवर्ग oracle 48/49/…/337 पर `==` लगाता है)। परन्तु "शनि-गुरु से शुभ योग नहीं" — यह शास्त्र का कथन है, हमारी घोषित भविष्यवाणी नहीं; भय या नियति-कथन इसमें नहीं।

34.21
पारतन्त्र्येण जीवस्य पापकर्मापि निश्चितम्‌।
शुक्रः साक्षान्निहन्ता स्यान्मारकत्वेन लक्षितः
pāratantryeṇa jīvasya pāpakarmāpi niścitam‌|
śukraḥ sākṣānnihantā syānmārakatvena lakṣitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारतन्त्र्येण = पराधीनता/दूसरे पर निर्भरता से; जीवस्य = गुरु की; पापकर्म = पाप/अशुभ कर्म-फल; अपि निश्चितम् = भी निश्चित; शुक्रः = शुक्र; साक्षात् निहन्ता = प्रत्यक्ष नाशक; मारकत्वेन लक्षितः = मारक भाव से चिह्नित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुरु जब पारतन्त्र्य में हो (अर्थात् पराधीन/पाप-संपृक्त अवस्था में), तो उसका फल भी पाप-कर्म की ओर निश्चित माना जाता है। शुक्र को साक्षात् निहन्ता कहा गया है, मारकत्व से लक्षित। उदाहरण-क्रम में (मेष-लग्न परंपरा: शुक्र = 2ल+7ल) यह मारक-संज्ञा शास्त्रीय अधिपत्य से जुड़ती है—भय-कथन नहीं, मारक-भाव स्वामित्व का निर्देश।

English rendering The text states that when Jupiter is in dependence (paratantrya), even his results turn decisively toward the inauspicious. Venus is marked as the direct destroyer through māraka-lordship. This is a classificatory claim of the śāstra, not a personal prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / मारक-संज्ञा। संरचना: मेष-लग्न मॉडल में Śukra = L₂ ∪ L₇ → māraka-lakṣita; Guru पर paratantrya (पाप-युति/नीच/शत्रु-केन्द्र आदि—सटीक सूची पाठ/टीका-भेद) ⇒ phala(Guru) → pāpa-pakṣa। कोई वर्ष/अंश-संख्या इस पद में नहीं।

34.22
मन्दादयोऽपि हन्तारो भवेयुः पापिनो ग्रहाः।
मेषलग्नोद्‌भवस्यैवं फलं ज्ञेयं द्विजोत्तम
mandādayo'pi hantāro bhaveyuḥ pāpino grahāḥ|
meṣalagnod‌bhavasyaivaṃ phalaṃ jñeyaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द = शनि; आदयः = आदि/समूह; हन्तारः = मारक/हिंसक ग्रहीय भूमिका; पापिनः = पाप-स्वभाव वाले; ग्रहाः = ग्रह; मेषलग्नोद्भवस्य = मेष-लग्न जातक का; एवं फलं = ऐसा फल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मेष-लग्न वाले के लिए मन्द (शनि) आदि भी हन्ता-रूप में स्थापित हो सकते हैं, और पाप-स्वभाव वाले ग्रह उसी दिशा में पढ़े जाते हैं। यह अध्याय की मेष-लग्न संबंधी फल-व्यवस्था का उपसंहार-सा कथन है। हे द्विजोत्तम — फल को इसी दृष्टि से जाना जाए।

English rendering The text states that for one born under Meṣa lagna, even Saturn and the other named malefics may stand as killers (hantāraḥ), and the pāpa planets are to be understood in that light. Thus, O best of the twice-born, this result for Meṣa-lagna birth is to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न-विशेष मारक/पाप-वर्गीकरण)। यहाँ संख्या, अंश या वर्ग-सूत्र नहीं; यह मेष-लग्न के लिए शास्त्रीय फल-निर्देश है — “शास्त्र कहता है”, न कि निश्चित भाग्य-वाक्य।

34.23
जीवशुक्रेन्दवः पापाः शुभौ शनिदिवाकरौ।
राजयोगकरः सौरिर्बुधस्त्वल्पशुभप्रदः
jīvaśukrendavaḥ pāpāḥ śubhau śanidivākarau|
rājayogakaraḥ saurirbudhastvalpaśubhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = गुरु; शुक्र = शुक्र; इन्दु = चन्द्र; = ये तीनों पापाः (वृषभ लग्न हेतु); शुभौ = दो शुभ; शनि = शनि (सौरि); दिवाकर = सूर्य; राजयोगकरः सौरिः = शनि राजयोगकारक; बुधः तु अल्पशुभप्रदः = बुध किन्तु अल्प-शुभदायी।

हिन्दी भावार्थ वृषभ लग्न में गुरु, शुक्र और चन्द्र अशुभ हैं; शनि और सूर्य शुभ हैं। इनमें शनि साक्षात् राजयोगकारक है (क्योंकि वह एक ही समय नवम-त्रिकोण और दशम-केन्द्र दोनों का स्वामी है), जबकि बुध केवल अल्प-शुभ फल देता है।

English rendering For Taurus: Jupiter, Venus and the Moon are malefic; Saturn and the Sun are auspicious. Saturn is the (full) rāja-yoga producer, while Mercury gives only slight benefit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वृषभ लग्न (L=2): H = ((राशि−2) mod 12)+1। राजयोगकारक-नियम पुनः: (स्वामित्व ∩ केन्द्र{1,4,7,10} ≠ ∅) ∧ (स्वामित्व ∩ त्रिकोण{1,5,9} ≠ ∅)।

उदाहरण (worked example) वृषभ लग्न स्वामित्व-तालिका —
- शनि: मकर=10 → भाव ((10−2))+1 = 9 (त्रिकोण), कुम्भ=11 → भाव ((11−2))+1 = 10 (केन्द्र) ⇒ केन्द्र ∧ त्रिकोण ⇒ पूर्ण राजयोगकारक ✓
- सूर्य: सिंह=5 → भाव 4 (केन्द्र) ⇒ शुभ
- बुध: मिथुन=3 → भाव 2 (मारक), कन्या=6 → भाव 5 (त्रिकोण) ⇒ मिश्र ⇒ अल्प-शुभ
- गुरु: धनु=9 → भाव 8, मीन=12 → भाव 11 ⇒ दोनों अशुभ ⇒ पापी
- शुक्र: वृषभ=2 → भाव 1 (लग्न), तुला=7 → भाव 6 (दुःस्थान) ⇒ 6-दोष ⇒ पापी
- चन्द्र: कर्क=4 → भाव 3 (त्रिषडाय) ⇒ पापी

हमारा डिकोड (Our Decode) शनि का वृषभ (एवं तुला) लग्न में राजयोगकारक होना 34.13–14 के केन्द्र∧त्रिकोण नियम का सर्वोत्तम उदाहरण है, और यह वही "नियम पहले, फिर फल" अनुशासन है जिस पर हमारा kaal-verification-oracle टिका है। जैसे अष्टकवर्ग में हमने ±band हटाकर `==` पर 337 पिन किया, वैसे ही यहाँ "शनि = योगकारक" एक यांत्रिक स्वामित्व-निष्कर्ष है — इसकी सत्यापन-कसौटी नियतात्मक है, व्याख्या पृथक्।

34.24
जीवादयो कुजश्चापि सन्ति मारकलक्षणाः।
वृषलग्नोद्‌भवस्यैवं फलान्यूह्यानि सूरिभिः
jīvādayo kujaścāpi santi mārakalakṣaṇāḥ|
vṛṣalagnod‌bhavasyaivaṃ phalānyūhyāni sūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवादयः = गुरु आदि; कुजः च अपि = और मंगल भी; सन्ति मारकलक्षणाः = मारक-लक्षण वाले हैं; वृषलग्नोद्भवस्य = वृषभ लग्न में जन्मे का; एवं = इस प्रकार; फलानि ऊह्यानि सूरिभिः = फल विद्वानों द्वारा ऊहनीय (अनुमेय)।

हिन्दी भावार्थ वृषभ लग्न में गुरु आदि, और मंगल भी, मारक-लक्षण वाले हैं। इस प्रकार वृषभ-जात के फल विद्वज्जनों को स्वयं ऊहापोह से समझ लेने चाहिए। यह वृषभ-लग्न-प्रकरण का उपसंहार है।

English rendering Jupiter and the rest, and Mars too, bear the marks of a slayer (for Taurus). Thus the results for a Taurus-born are to be inferred by the wise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारकस्थान = {2,7}। वृषभ लग्न में मंगल-स्वामित्व = {मेष=1 → भाव 12, वृश्चिक=8 → भाव 7} ⇒ सप्तमेश (मारक-स्थान) ⇒ मारक-लक्षण। गुरु = {8,11-स्वामी} भी दशाकाल में हन्ता। "ऊह्य" शब्द संकेत करता है कि शेष निष्कर्ष उसी नियतात्मक तालिका से स्वयं व्युत्पन्न हैं।

34.25
भौमजीवारुणाः पापाः एक एव कविः सुभः।
शनैश्चरणे जीवस्य योगो मेषभवो यथा
bhaumajīvāruṇāḥ pāpāḥ eka eva kaviḥ subhaḥ|
śanaiścaraṇe jīvasya yogo meṣabhavo yathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौम = मंगल; जीव = गुरु; अरुण = सूर्य (अरुण/दिवाकर); = ये तीनों पापाः (मिथुन लग्न हेतु); एक एव कविः शुभः = एकमात्र शुक्र (कवि) शुभ; "शनैश्चरणे जीवस्य योगो मेषभवो यथा" = पाठ-भेद संभव (चरण दूषित) — संभावित अर्थ: शनि के साथ (गुरु के) योग का फल मेष-लग्न-सदृश।

हिन्दी भावार्थ मिथुन लग्न में मंगल, गुरु और सूर्य अशुभ हैं; एकमात्र शुक्र ही शुभ है। अन्तिम चरण का पाठ दूषित है (पाठ-भेद संभव) — प्रतीत होता है कि शनि-सम्बद्ध योग का विचार मेष लग्न की भाँति ही करना चाहिए। यहाँ शुक्र का पंचमेशत्व उसे एकमात्र निर्दोष शुभ ग्रह बनाता है।

English rendering For Gemini: Mars, Jupiter and the Sun are malefic; Venus alone is auspicious. (The final quarter is textually corrupt — "पाठ-भेद संभव" — apparently referring the Saturn-linked combination to the Aries model.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मिथुन लग्न (L=3): H = ((राशि−3) mod 12)+1। केन्द्राधिपत्य-दोष: शुभ ग्रह (गुरु) के केवल केन्द्रों का स्वामी होने पर वह पापी बनता है।

उदाहरण (worked example) मिथुन लग्न स्वामित्व-तालिका —
- शुक्र: तुला=7 → भाव 5 (त्रिकोण), वृषभ=2 → भाव 12 ⇒ पंचमेश-प्राधान्य ⇒ एकमात्र शुभ ✓ ("एक एव कविः शुभः")
- मंगल: मेष=1 → भाव 11, वृश्चिक=8 → भाव 6 ⇒ 6 व 11 ⇒ पापी
- गुरु: धनु=9 → भाव 7 (केन्द्र), मीन=12 → भाव 10 (केन्द्र) ⇒ केवल केन्द्रद्वय ⇒ केन्द्राधिपत्य-दोष ⇒ पापी
- सूर्य: सिंह=5 → भाव 3 (त्रिषडाय) ⇒ पापी
- बुध (लग्नेश): मिथुन=3 → भाव 1, कन्या=6 → भाव 4 (केन्द्र) ⇒ शुभ
- शनि: मकर=10 → भाव 8, कुम्भ=11 → भाव 9 (त्रिकोण) ⇒ मिश्र

34.26
शशी मुखनिहन्ताऽसौ साहचर्याच्च पाकदः।
द्वन्द्वलग्नोद्‌भवस्यैवं फलान्यूह्यानि पंडितैः
śaśī mukhanihantā'sau sāhacaryācca pākadaḥ|
dvandvalagnod‌bhavasyaivaṃ phalānyūhyāni paṃḍitaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशी = चन्द्र; मुखनिहन्ता असौ = वह मुख्य/प्रमुख हन्ता (मारक) [पाठ-भेद संभव: "मुख्य-निहन्ता"]; साहचर्यात् च पाकदः = और संगति से फल-पाक (परिणाम-दायी); द्वन्द्वलग्नोद्भवस्य = द्वन्द्व (मिथुन/युग्म) लग्न में जन्मे का; एवं फलानि ऊह्यानि पण्डितैः = इस प्रकार फल पण्डितों द्वारा ऊहनीय।

हिन्दी भावार्थ मिथुन (द्वन्द्व) लग्न में चन्द्र प्रमुख मारक है, और संगति (साहचर्य) से यह अपने पाक-काल में फल देने वाला बनता है। इस प्रकार द्वन्द्व-लग्न-जात के फल पण्डितजनों को ऊहापोह से समझने चाहिए। यह मिथुन-लग्न-प्रकरण का उपसंहार है।

English rendering For Gemini the Moon is the chief slayer, and by association it becomes result-yielding in its season. Thus the results for a Gemini-born are to be inferred by the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारकस्थान = {2,7}। मिथुन लग्न में चन्द्र-स्वामित्व = {कर्क=4 → भाव ((4−3))+1 = 2} = द्वितीयेश (मारक-स्थान) ⇒ मुख्य मारक। "साहचर्यात् पाकदः" संकेत करता है कि मारक-फल का उदय दशा/संगति-सापेक्ष है — नियम मारकत्व का, समय दशाक्रम का; दोनों नियतात्मक, फल-भाग शास्त्र का कथन।

34.27
भार्गवेन्दुसुतौ पापौ भूसुतेज्येन्दवः शुभाः।
पूर्णयोगकरः साक्षान्मंगलो मंगलप्रदः
bhārgavendusutau pāpau bhūsutejyendavaḥ śubhāḥ|
pūrṇayogakaraḥ sākṣānmaṃgalo maṃgalapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भार्गव = शुक्र (भृगु-वंशज); इन्दुसुत = बुध (चन्द्र-पुत्र); पापौ = (कर्क-लग्न हेतु) अशुभकारक द्वय; भूसुत = मंगल (भौम/भू-पुत्र); ईज्य = गुरु (पूज्य); इन्दु = चन्द्र; शुभाः = शुभकारक; पूर्णयोगकरः = सम्पूर्ण योगकारक; मंगलः … मंगलप्रदः = मंगल स्वयं, कल्याण देने वाला।

हिन्दी भावार्थ कर्क-लग्न वालों के लिए शुक्र और बुध — ये दोनों अशुभकारक (पापी) कहे गये हैं, जबकि मंगल, गुरु और चन्द्र शुभकारक हैं। इनमें भी मंगल साक्षात् पूर्ण योगकारक है और मंगल (कल्याण) प्रदान करने वाला है। यह भावाधिपत्य-सिद्धान्त का ही अनुप्रयोग है — केन्द्र-त्रिकोण का स्वामी सर्वश्रेष्ठ, केन्द्र-स्वामी शुभग्रह दोषयुक्त।

English rendering For those born in Cancer ascendant, Venus and Mercury are malefic, while Mars, Jupiter, and the Moon are benefic; Mars himself is the complete yoga-producer, a giver of welfare.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भावेश-वर्गीकरण — सम-राशि भाव-पद्धति (whole-sign; भाव = राशि)। किसी भाव b का स्वामी = राशि ((L + b − 2) mod 12 + 1) का अधिपति, जहाँ L = लग्न-राशि क्रमांक। कर्क → L = 4. केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, मारक-स्थान = {2,7}, दुःस्थान = {6,8,12}. नियम: जो ग्रह एक केन्द्र और एक त्रिकोण दोनों का स्वामी हो = योगकारक; केन्द्राधिपति शुभग्रह (गुरु/शुक्र/बुध) दोषी हो जाता है।

उदाहरण (worked example) कर्क (L=4): मंगल = भाव ((4+5−2) mod 12 +1)=राशि 8 वृश्चिक → 5म भाव, तथा भाव ((4+10−2) mod 12 +1)=राशि 1 मेष → 10म भाव। अतः मंगल = 5म (त्रिकोण) + 10म (केन्द्र) = पूर्ण योगकारक ✓। शुक्र = 4थ (केन्द्र) + 11वाँ → केन्द्राधिपति-दोष → पापी ✓। बुध = 3रा + 12वाँ → पापी ✓। गुरु = 6ठा + 9वाँ (त्रिकोण) → शुभ ✓।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह लग्न-भावेश गणना उसी शुद्ध मॉड्युलर-अंकगणित की है जिस पर हमारा वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) टिका है — देशांतर/राशि पर mod-12 विभाजन। हमारी विधि-अनुशासन (CLAUDE.md) इसी को रेखांकित करती है: भावेश-निर्धारण = नियतांक गणना (deterministic), जबकि "योगकारक/शुभ-अशुभ" = शास्त्र का फल-कथन — दोनों को कभी न मिलाया जाए।

34.28
निहन्ताऽर्कसुतोऽर्कस्तु साहचर्यात्‌ फलप्रदः।
कर्कलग्नोद्‌भवस्यैवं फलं प्रोक्तं मनीषिभिः
nihantā'rkasuto'rkastu sāhacaryāt‌ phalapradaḥ|
karkalagnod‌bhavasyaivaṃ phalaṃ proktaṃ manīṣibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निहन्ता = मारक (हननकर्ता); अर्कसुत = शनि (सूर्य-पुत्र); अर्कः = सूर्य; तु = किन्तु/और; साहचर्यात् = संगति-अनुसार; फलप्रदः = तदनुरूप फल देने वाला; कर्कलग्नोद्‌भवस्य = कर्क-लग्न में जन्मे का; प्रोक्तं मनीषिभिः = मनीषियों द्वारा कथित।

हिन्दी भावार्थ कर्क-लग्न में शनि मारक (हननकर्ता) होता है, और सूर्य अपनी संगति (साहचर्य) के अनुसार फल देता है। इस प्रकार कर्क-लग्न में जन्मे व्यक्ति का फल मनीषियों ने कहा है। सूर्य स्वयं तटस्थ है — जिसके साथ बैठे, वैसा फल देता है।

English rendering For a Cancer-born, Saturn is the death-dealing (māraka) planet, while the Sun yields results according to its associations; thus the wise have declared the fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारक-निर्धारण — मारक-स्थान = {2,7}; इनके स्वामी तथा इनसे युत ग्रह मारक-लक्षण धारण करते हैं। कर्क (L=4): शनि = भाव ((4+7−2) mod 12 +1)=राशि 10 मकर → 7म (केन्द्र-मारक), तथा राशि 11 कुम्भ → 8म; अतः 7म-स्वामी शनि = निहन्ता। सूर्य = राशि 5 सिंह → 2रा भाव (मारक-स्थान), किन्तु एकाधिपति व तटस्थ, अतः "साहचर्यात् फलप्रदः"।

उदाहरण (worked example) शनि का 7म-स्वामित्व (मकर, राशि 10) मारक-योग्यता देता है; सूर्य का 2रा-स्वामित्व (सिंह) उसे गौण-मारक बनाता है जो युति-दृष्टि के संग-अनुसार सक्रिय होता है — यदि सूर्य शुभ के साथ हो तो हल्का, पाप के साथ हो तो प्रबल फल।

34.29
सौम्यशुक्रार्कजाः पापाः कुजेज्यार्काः शुभावहाः।
प्रभवेद्योगमात्रेण न शुभं गुरुशुक्रयोः
saumyaśukrārkajāḥ pāpāḥ kujejyārkāḥ śubhāvahāḥ|
prabhavedyogamātreṇa na śubhaṃ guruśukrayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्य = बुध; शुक्र = शुक्र; अर्कज = शनि (अर्क-पुत्र); पापाः = अशुभकारक; कुज = मंगल; ईज्य = गुरु; अर्क = सूर्य (यहाँ सिंह-लग्नेश); शुभावहाः = शुभ लाने वाले; योगमात्रेण = केवल युति-मात्र से; न शुभं गुरुशुक्रयोः = गुरु-शुक्र के (योग से) शुभ नहीं।

हिन्दी भावार्थ सिंह-लग्न में बुध, शुक्र और शनि पापी हैं; मंगल, गुरु और सूर्य शुभकारक हैं। किन्तु गुरु और शुक्र के केवल परस्पर योग-मात्र से शुभ फल उत्पन्न नहीं होता — क्योंकि यहाँ शुक्र दूषित (केन्द्राधिपति-पाप) है, अतः उसकी संगति गुरु के शुभत्व को भी सार्थक नहीं बनाती।

English rendering For Leo ascendant, Mercury, Venus, and Saturn are malefic, while Mars, Jupiter, and the Sun bring good; yet the mere conjunction of Jupiter and Venus produces no auspicious yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सिंह (L=5): सूर्य = 1म (लग्नेश) → शुभ; गुरु = भाव ((5+5−2) mod 12 +1)=राशि 9 धनु → 5म (त्रिकोण) + राशि 12 मीन → 8म → शुभ; मंगल = राशि 8 वृश्चिक → 4थ (केन्द्र) + राशि 1 मेष → 9वाँ (त्रिकोण); शुक्र = 3रा + राशि 2 वृष → 10म (केन्द्र) → केन्द्राधिपति-दोष → पापी; बुध = 2रा + 11वाँ → पापी; शनि = 6ठा + 7म → पापी।

उदाहरण (worked example) गुरु (5म-त्रिकोणेश, शुभ) + शुक्र (10म-केन्द्रेश, दोषी) की युति: चूँकि शुक्र यहाँ भावतः पापी है, "योगमात्रेण न शुभं" — केवल संग से राजयोग नहीं बनता; दोषी केन्द्रेश शुक्र गुरु के त्रिकोण-शुभत्व को निष्फल कर देता है।

34.30
मारकस्तु शनिश्चन्द्रः साहचर्यात्‌ फलप्रदः।
सिंहलग्ने प्रजातस्य फलं ज्ञेयं विपश्चिता
mārakastu śaniścandraḥ sāhacaryāt‌ phalapradaḥ|
siṃhalagne prajātasya phalaṃ jñeyaṃ vipaścitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मारकः = मारक (प्रायः द्वितीय/सप्तम भाव-स्वामी का शास्त्रीय पद); शनिः = शनि; चन्द्रः = चन्द्र; साहचर्यात् = संग/युक्तता/सह-प्रभाव से; फलप्रदः = फल देने वाला; सिंहलग्ने = सिंह लग्न में; प्रजातस्य = जन्मे हुए का; विपश्चिता = विद्वान् द्वारा; ज्ञेयम् = जानने योग्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि और चन्द्र मारक-पद में हैं और साहचर्य—अर्थात् परस्पर संग या संयुक्त प्रभाव—से फल देते हैं। सिंह लग्न में जन्मे का यह फल विद्वान् ज्योतिषी को यथाविधि जानना चाहिए। यहाँ “मारक” का अर्थ शास्त्रीय भाव-स्वामित्व-वर्ग है; इसे भय या निश्चित अशुभ-घोषणा के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that Saturn and the Moon stand as mārakas and yield results through mutual association. For one born under Siṃha (Leo) lagna, the learned are to determine the result accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-पद और साहचर्य-फल का कथन। मारक-निर्णय लग्न से द्वितीय/सप्तम आदि भाव-स्वामियों पर टिका है; यहाँ संख्या-सूत्र नहीं, केवल वर्गीकरण और “साहचर्य → फल” का नियम-वाक्य है।

34.31
कुजजीवेन्दवः पापाः बुधशुक्रौ शुभावहौ।
भार्गवेन्दुसुतावेव भवेतां योगकारकौ
kujajīvendavaḥ pāpāḥ budhaśukrau śubhāvahau|
bhārgavendusutāveva bhavetāṃ yogakārakau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज = मंगल; जीव = गुरु; इन्दु = चन्द्र; पापाः = अशुभकारक; बुध, शुक्र = शुभावहौ (शुभ लाने वाले द्वय); भार्गव = शुक्र; इन्दुसुत = बुध; एव = ही; भवेतां योगकारकौ = दोनों योगकारक होते हैं।

हिन्दी भावार्थ कन्या-लग्न में मंगल, गुरु और चन्द्र पापी हैं; बुध और शुक्र शुभकारक हैं। इन दोनों — शुक्र और बुध — को ही योगकारक-युग्म कहा गया है, क्योंकि बुध लग्नेश-दशमेश और शुक्र नवमेश होकर केन्द्र-त्रिकोण-सम्बन्ध से राजयोग रचते हैं।

English rendering For Virgo ascendant, Mars, Jupiter, and the Moon are malefic, while Mercury and Venus are benefic; indeed Venus and Mercury together become the yoga-producers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कन्या (L=6): बुध = 1म (लग्नेश) + भाव ((6+10−2) mod 12 +1)=राशि 3 मिथुन → 10म (केन्द्र); शुक्र = राशि 7 तुला → 2रा + राशि 2 वृष → 9वाँ (त्रिकोण)। कन्या में कोई एकल केन्द्र+त्रिकोण-स्वामी नहीं, अतः योगकारक-युग्म = बुध (लग्न/10म-केन्द्र) ⊕ शुक्र (9म-त्रिकोण)। गुरु = 4थ + 7म → द्वि-केन्द्राधिपति-दोष → पापी; मंगल = 3रा + 8म → पापी; चन्द्र = 11वाँ → पापी।

उदाहरण (worked example) बुध(10म-केन्द्रेश) और शुक्र(9म-त्रिकोणेश) की परस्पर सम्बन्ध (युति/दृष्टि/परिवर्तन) राजयोग-कारक; अकेले किसी एक में केन्द्र+त्रिकोण दोनों न होने से "योगकारक-युग्म" ही सूत्र है — एकल पूर्ण-योगकारक नहीं।

34.32
मारकोऽपि कविः सूर्यः साहचर्यफलप्रदः।
कन्यालग्नोद्‌भवस्यैवं फलान्यूह्यानि सूरिभिः
mārako'pi kaviḥ sūryaḥ sāhacaryaphalapradaḥ|
kanyālagnod‌bhavasyaivaṃ phalānyūhyāni sūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मारकः = मारक-पद; अपि = भी; कविः = शुक्र (कवि/भार्गव); सूर्यः = सूर्य; साहचर्य-फलप्रदः = संग से फल देने वाला; कन्या-लग्न-उद्भवस्य = कन्या लग्न में उत्पन्न का; एवम् = इस प्रकार; फलानि = फल; ऊह्यानि = अनुमान/निर्णय करने योग्य; सूरिभिः = पण्डितों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कवि (शुक्र) और सूर्य भी मारक-पद में आ सकते हैं और साहचर्य से फल देते हैं। कन्या लग्न में जन्मे के फल इसी रीति से सूरियों—शास्त्र-ज्ञ विद्वानों—को ऊहा (युक्त अनुमान) से निकालने चाहिए। योगकारक होने पर भी शुक्र का मारक-सम्भाव्य पक्ष यहाँ अलग से कहा गया है; दोनों पद एक-दूसरे को रद्द नहीं करते, संदर्भ-सापेक्ष पढ़े जाते हैं।

English rendering The text states that Venus (kavi) and the Sun also act as mārakas and give results through association. For one born under Kanyā (Virgo) lagna, the learned are to infer the results in this same manner.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-पद + साहचर्य-फल-कथन। कन्या-लग्न के लिए पूर्व श्लोक का योगकारक-युग्म और यह मारक-युग्म एक ही ग्रह-समुच्चय पर अलग-अलग भूमिका-टैग हैं; संख्यात्मक बला-या दशा-सूत्र नहीं।

34.33
जीवार्कभूसुताः पापाः शनैश्चरबुधौ शुभौ।
भवेतां राजयोगस्य कारकौ चन्द्रतत्सुतौ
jīvārkabhūsutāḥ pāpāḥ śanaiścarabudhau śubhau|
bhavetāṃ rājayogasya kārakau candratatsutau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = गुरु; अर्क = सूर्य; भूसुत = मंगल; पापाः = अशुभकारक; शनैश्चर = शनि; बुध = बुध (शनैश्चरबुधौ शुभौ); राजयोगस्य कारकौ = राजयोग के कारक द्वय; चन्द्रतत्सुतौ = चन्द्र तथा उसका पुत्र (बुध)।

हिन्दी भावार्थ तुला-लग्न में गुरु, सूर्य और मंगल पापी हैं; शनि और बुध शुभकारक हैं। चन्द्र और उसका पुत्र बुध राजयोग के कारक बनते हैं (चन्द्र दशमेश-केन्द्र, बुध नवमेश-त्रिकोण)। यहाँ शनि 4थ-5म का स्वामी होकर स्वयं भी प्रबल योगकारक है (पाठ-भेद संभव — कुछ पाठ शनि को ही प्रधान योगकारक गिनाते हैं)।

English rendering For Libra ascendant, Jupiter, Sun, and Mars are malefic; Saturn and Mercury are benefic; the Moon and its son (Mercury) become producers of rāja-yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तुला (L=7): शनि = भाव ((7+4−2) mod 12 +1)=राशि 10 मकर → 4थ (केन्द्र) + राशि 11 कुम्भ → 5म (त्रिकोण) → एकल केन्द्र+त्रिकोण-स्वामी = शास्त्रीय पूर्ण-योगकारक। बुध = राशि 3 मिथुन → 9वाँ (त्रिकोण) + राशि 6 कन्या → 12वाँ। चन्द्र = राशि 4 कर्क → 10म (केन्द्र)। अतः राजयोग-युग्म = चन्द्र (10म-केन्द्रेश) ⊕ बुध (9म-त्रिकोणेश)। गुरु = 3रा+6ठा; मंगल = 2रा+7म (मारक); सूर्य = 11वाँ — तीनों पापी।

उदाहरण (worked example) केन्द्रेश-त्रिकोणेश-सम्बन्ध राजयोग-सूत्र: चन्द्र(10म) ↔ बुध(9म) की युति/दृष्टि/परिवर्तन → राजयोग। स्वतंत्र रूप से शनि(4थ+5म) एकाकी योगकारक — दोनों प्रकार तुला-लग्न की विशेष सम्पदा हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) केन्द्र{1,4,7,10}-त्रिकोण{1,5,9} की परस्पर सदस्यता से राजयोग — यह भाव-गणना उसी mod-12 नियतांक-अंकगणित की है जिस पर हमारा वर्ग-इंजन आधारित है। अनुशासन (dossier §5): जिस भी संख्या का मान गृह-पद्धति पर निर्भर हो, वह घोषित हो — यहाँ हमने सम-राशि (whole-sign) भाव-पद्धति स्पष्टतः घोषित की; भाव-सन्धि-आधारित पद्धति में स्वामित्व बदल सकता है। योगकारकत्व = शास्त्र-कथन, गणना = हमारी नियत क्रिया — दोनों पृथक्।

34.34
कुजो निहन्ति जीवाद्याः पापा मारकलक्षणाः।
शुक्रः समः फलान्येवं विज्ञेयानि तुलोद्‌भवे
kujo nihanti jīvādyāḥ pāpā mārakalakṣaṇāḥ|
śukraḥ samaḥ phalānyevaṃ vijñeyāni tulodbhave
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजः निहन्ति = मंगल हानिकारक (मारक-सदृश) है; जीवाद्याः = गुरु आदि (गुरु, सूर्य, मंगल); पापाः = अशुभ; मारकलक्षणाः = मारक-लक्षण वाले; शुक्रः समः = शुक्र सम (न शुभ न अशुभ); फलानि एवं विज्ञेयानि = फल इस प्रकार जानने चाहिए; तुलोद्भवे = तुला लग्न में जन्मे के लिए।

हिन्दी भावार्थ योग-कारक अध्याय की लग्नानुसार सारणी में तुला लग्न का पद — शास्त्र कहता है कि तुला लग्न के लिए मंगल हानि करता है, गुरु आदि (गुरु, सूर्य, मंगल) अशुभ और मारक-लक्षण वाले हैं, और शुक्र (लग्नेश) सम है। इसी अध्याय में तुला के लिए शनि और बुध शुभ कहे गए हैं (पूर्व-श्लोक)।

English rendering For a Tulā ascendant, Mars is harmful; Jupiter and the others (Jupiter, the Sun, Mars) are malefic with the marks of a māraka; and Venus is neutral — thus, the text says, are the results to be understood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लग्नानुसार शुभ/अशुभ वर्गीकरण। तुला के लिए: अशुभ = {Ju, Su, Ma}; सम = {Ve}; शुभ (पूर्व-श्लोक) = {Sa, Me}। आधार: तुला से केन्द्र-त्रिकोण स्वामित्व (शनि 4/5 का स्वामी → योगकारक)।

34.35
सितज्ञशनयः पापाः शुभौ गुरुनिशाकरौ।
सूर्याचन्द्रमसावेव भवेतां योगकारकौ
sitajñaśanayaḥ pāpāḥ śubhau guruniśākarau|
sūryācandramasāveva bhavetāṃ yogakārakau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सित = शुक्र; ज्ञ = बुध; शनि = शनि (सितज्ञशनयः = ये तीन); पापाः = अशुभकारक; गुरु = गुरु; निशाकर = चन्द्र (रात्रि-कर); शुभौ = शुभ द्वय; सूर्याचन्द्रमसौ = सूर्य और चन्द्र; एव = ही; भवेतां योगकारकौ = दोनों योगकारक होते हैं।

हिन्दी भावार्थ वृश्चिक-लग्न में शुक्र, बुध और शनि पापी हैं; गुरु और चन्द्र शुभकारक हैं। सूर्य और चन्द्र ही योगकारक-युग्म बनते हैं (सूर्य दशमेश-केन्द्र, चन्द्र नवमेश-त्रिकोण)। चन्द्र यहाँ शुभ भी है और योग-युग्म का अंग भी — नवमेश होने से।

English rendering For Scorpio ascendant, Venus, Mercury, and Saturn are malefic, Jupiter and the Moon are benefic; the Sun and the Moon indeed become the yoga-producers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वृश्चिक (L=8): सूर्य = भाव ((8+10−2) mod 12 +1)=राशि 5 सिंह → 10म (केन्द्र); चन्द्र = राशि 4 कर्क → 9वाँ (त्रिकोण)। अतः योगकारक-युग्म = सूर्य(10म-केन्द्रेश) ⊕ चन्द्र(9म-त्रिकोणेश)। गुरु = राशि 9 धनु → 2रा + राशि 12 मीन → 5म (त्रिकोण) → शुभ। शुक्र = 7म-केन्द्र(केन्द्राधिपति-दोष)+12वाँ; बुध = 8म+11वाँ; शनि = 3रा+4थ — तीनों पापी।

उदाहरण (worked example) सूर्य(10म) व चन्द्र(9म) की सम्बन्ध-स्थिति (जैसे कर्क-नवमांश में युति या परस्पर दृष्टि) राजयोग-कारक; चन्द्र का द्वि-भूमिका (9म-त्रिकोणेश ⇒ शुभ, तथा योग-युग्म-सदस्य) एक ही स्वामित्व से निकलता है।

34.36
कुजः समः सिताद्याश्च पापा मारकलक्षणाः।
एवं फलं च विज्ञेयं वृश्चिकोदयजन्मनः
kujaḥ samaḥ sitādyāśca pāpā mārakalakṣaṇāḥ|
evaṃ phalaṃ ca vijñeyaṃ vṛścikodayajanmanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजः = मंगल; समः = सम-फल / मिश्रित फल वाला; सिताद्याः = शुक्र आदि; पापाः = पाप-ग्रह (दोष-वर्गीकृत); मारकलक्षणाः = मारक-लक्षण वाले (मृत्यु/क्षय-भाव के कारक-रूप में शास्त्र-वर्णित); वृश्चिकोदयजन्मनः = वृश्चिक-लग्न में जन्मे का; एवं फलं विज्ञेयं = ऐसा फल जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वृश्चिक लग्न में जन्मे जातक के लिए मंगल सम-फल वाला गिना जाता है—अर्थात् वह न तो शुद्ध शुभ-योग का एकमात्र आधार, न ही एकतरफा हानि का घोषित कर्ता। शुक्र आदि ग्रह पाप-वर्ग में गिने जाते हैं और उन्हें मारक-लक्षण वाला कहा गया है। इसी रीति से वृश्चिकोदय-जन्म का फल विद्वान् को समझना चाहिए—यह वर्गीकरण लग्न-सापेक्ष मारक/पाप-शुभ व्यवस्था का भाग है, न कि कोई निश्चित घटना-घोषणा।

English rendering For one born with Scorpio rising, the text states that Mars is of mixed (sama) result, while Venus and the others are classed as malefic and marked with maraka characteristics. The results for a Scorpio-lagna nativity are to be known in this way.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / लग्न-सापेक्ष मारक-पाप वर्गीकरण। यहाँ वृश्चिक लग्न पर ग्रहों का शुभ–पाप–सम और मारक-लक्षण निरूपण है; संख्या, अंश-विभाजन या बल-इकाई नहीं दी गई।

34.37
एक एव कविः पापः शुभौ भौमदिवाकरौ।
योगो भास्करसौम्याभ्यां निहन्ता भास्करात्मजः
eka eva kaviḥ pāpaḥ śubhau bhaumadivākarau|
yogo bhāskarasaumyābhyāṃ nihantā bhāskarātmajaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक एव कविः पापः = केवल एक शुक्र पापी; शुभौ = शुभ द्वय; भौम = मंगल; दिवाकर = सूर्य (दिन-कर); योगः भास्करसौम्याभ्यां = सूर्य (भास्कर) व बुध (सौम्य) से योग; निहन्ता = मारक; भास्करात्मजः = शनि (सूर्य-पुत्र)।

हिन्दी भावार्थ धनु-लग्न में केवल एक शुक्र ही पापी है; मंगल और सूर्य शुभकारक हैं। सूर्य और बुध के (सम्बन्ध) से योग बनता है, और शनि मारक (हननकर्ता) है। सूर्य नवमेश-त्रिकोण, बुध दशमेश-केन्द्र — इनका संग राजयोग रचता है।

English rendering For Sagittarius ascendant, Venus alone is malefic; Mars and the Sun are benefic; yoga arises from the Sun and Mercury, and Saturn is the death-dealer.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) धनु (L=9): सूर्य = भाव ((9+9−2) mod 12 +1)=राशि 5 सिंह → 9वाँ (त्रिकोण); बुध = राशि 3 मिथुन → 7म + राशि 6 कन्या → 10म (केन्द्र)। योग = सूर्य(9म-त्रिकोणेश) ⊕ बुध(10म-केन्द्रेश)। मंगल = राशि 1 मेष → 5म (त्रिकोण) + 12वाँ → शुभ। शुक्र = 6ठा + 11वाँ → एकमात्र पापी। शनि = 2रा (मारक-स्थान) + 3रा → निहन्ता।

उदाहरण (worked example) सूर्य(9म) व बुध(10म) की युति/दृष्टि केन्द्र-त्रिकोण-राजयोग देती है; शनि का 2रा-स्वामित्व (राशि 10 मकर) उसे मारक बनाता है — यद्यपि वह अन्यत्र शुभ-दृष्ट हो तब भी मारक-योग्यता भाव-गणना से नियत है।

34.38
गुरुः समफलः ख्यातः शुक्रो मारकलक्षणः।
धनुर्लग्नोद्‌भवस्यैवं फलं ज्ञेयं विपश्चिता
guruḥ samaphalaḥ khyātaḥ śukro mārakalakṣaṇaḥ|
dhanurlagnod‌bhavasyaivaṃ phalaṃ jñeyaṃ vipaścitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुः = बृहस्पति; समफलः = सम-फल वाला; ख्यातः = प्रसिद्ध / कहा गया; शुक्रः = शुक्र; मारकलक्षणः = मारक-लक्षण वाला; धनुर्लग्नोद्भवस्य = धनु-लग्न में उत्पन्न का; एवं फलं ज्ञेयं = ऐसा फल जानना चाहिए; विपश्चिता = विद्वान् द्वारा।

हिन्दी भावार्थ धनु लग्न के जातक के विषय में शास्त्र कहता है कि गुरु सम-फल वाला प्रसिद्ध है—अर्थात् मिश्रित/मध्यवर्ती फल-वर्ग में। शुक्र को मारक-लक्षण वाला कहा गया है। पूर्व श्लोक के साथ मिलाकर पढ़ें: शुक्र पाप व मारक-लक्षण; मंगल–सूर्य शुभ; सूर्य–बुध योग; शनि निहन्ता; गुरु सम। विद्वान् को धनु-लग्न का फल इसी क्रम से समझना चाहिए—यह लग्न-सापेक्ष ग्रह-भूमिका का निरूपण है।

English rendering Jupiter is declared of mixed (sama) result, and Venus is marked with maraka characteristics. The wise are to know the results of a Sagittarius-lagna birth in this manner.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / धनु-लग्न का सम–मारक वर्गीकरण। गणना-नियत अंक नहीं; केवल शास्त्रीय शुभ–पाप–सम–मारक पद।

34.39
कुजजीवेन्दवः पापाः शुभौ भार्गवचन्द्रजौ।
मन्दः स्वयं न हन्ता स्याद्‌ हन्ति पापाः कुजादयः
kujajīvendavaḥ pāpāḥ śubhau bhārgavacandrajau|
mandaḥ svayaṃ na hantā syād‌ hanti pāpāḥ kujādayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज = मंगल; जीव = गुरु; इन्दु = चन्द्र; पापाः = अशुभकारक; शुभौ = शुभ द्वय; भार्गव = शुक्र; चन्द्रज = बुध (चन्द्र-पुत्र); मन्दः = शनि; स्वयं न हन्ता स्याद् = स्वयं मारक नहीं होता; हन्ति पापाः कुजादयः = मंगल आदि पापग्रह हनन करते हैं।

हिन्दी भावार्थ मकर-लग्न में मंगल, गुरु और चन्द्र पापी हैं; शुक्र और बुध शुभकारक हैं। शनि द्वितीयेश (मारक-स्थानेश) होते हुए भी, लग्नेश होने के कारण स्वयं मारक नहीं होता; हनन का कार्य मंगल आदि पापग्रह करते हैं। शुक्र यहाँ 5म-10म का स्वामी होकर पूर्ण योगकारक है।

English rendering For Capricorn ascendant, Mars, Jupiter, and the Moon are malefic; Venus and Mercury are benefic; Saturn by itself is not a slayer, while the malefics led by Mars do the killing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मकर (L=10): शुक्र = भाव ((10+5−2) mod 12 +1)=राशि 2 वृष → 5म (त्रिकोण) + राशि 7 तुला → 10म (केन्द्र) → एकल केन्द्र+त्रिकोण-स्वामी = पूर्ण योगकारक। बुध = 6ठा + राशि 6 कन्या → 9वाँ (त्रिकोण) → शुभ। शनि = 1म (लग्नेश) + 2रा (मारक-स्थान); नियम: लग्नेश यदि मारक-स्थानेश भी हो तो स्वयं हनन नहीं करता — अतः "मन्दः स्वयं न हन्ता"। मंगल = 4थ+11वाँ, गुरु = 3रा+12वाँ, चन्द्र = 7म → पापी, "हन्ति पापाः कुजादयः"।

उदाहरण (worked example) शनि का 1म⊕2रा स्वामित्व: 2रा मारक-स्थान होने पर भी लग्नेशत्व रक्षक है ⇒ शनि मारक-अपवाद। इसके विपरीत मंगल(4थ+11वाँ) आदि भावगत-पापी हनन-योग्य — मारकत्व यहाँ नियम-अपवाद (लग्नेश-सुरक्षा) से निर्धारित, न कि केवल 2/7-सदस्यता से।

हमारा डिकोड (Our Decode) "लग्नेश 2रा का स्वामी होने पर भी मारक नहीं" — यह ठीक-ठीक (exact) नियम-अपवाद है, तुल्य हमारे अनुशासन (dossier §5) के: शुद्ध `==` जाँच, कोई सहिष्णुता-पट्टी (tolerance band) नहीं। जैसे अष्टकवर्ग में ±बैंड ने एक वास्तविक −1 छिपा दिया था, वैसे ही यहाँ मारक-वर्गीकरण को "प्रायः 2/7-स्वामी" कहकर ढीला करना अपवाद (शनि) को छिपा देता — शास्त्र स्वयं अपवाद को स्पष्ट `न हन्ता` से पिन करता है। यही हमारी नियम-निष्ठा का दर्पण है।

34.40
सूर्यः समफलः प्रोक्तः कविरेकः सुयोगकृत्‌।
मृगलग्नोद्‌भवस्यैवं फलान्यूह्यानि सूरिभिः
sūryaḥ samaphalaḥ proktaḥ kavirekaḥ suyogakṛt‌|
mṛgalagnod‌bhavasyaivaṃ phalānyūhyāni sūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यः = रवि; समफलः = सम/मध्यम फलदाता (न पूर्ण शुभ, न पूर्ण अशुभ); प्रोक्तः = कहा गया; कविः = शुक्र (कवि-शुक्राचार्य); एकः = अकेला/एकमात्र; सुयोगकृत् = उत्तम (राज)योगकारक; मृगलग्न = मकर लग्न (मृग = मकर); उद्भवस्य = उत्पन्न जातक का; एवम् = इस प्रकार; फलानि = फल; ऊह्यानि = अनुमेय, स्वयं तर्क से निकालने योग्य; सूरिभिः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ मकर लग्न के लिए सूर्य को सम-फलदायी (मध्यम) कहा गया है, और एकमात्र शुक्र ही श्रेष्ठ योगकारक है। इस प्रकार मकर लग्न में जन्मे जातक के शेष फल विद्वान् स्वयं तर्क-अनुमान से निकाल लें। (पूर्व श्लोक 39 में मंगल-गुरु-चन्द्र पाप तथा शुक्र-बुध शुभ बताए जा चुके — यह उसी क्रम की पूर्ति है।)

English rendering For a Capricorn ascendant the Sun is said to give middling results, while Venus alone is the excellent Rāja-yoga karaka; the remaining effects for one born in Capricorn are to be inferred by the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन ही है, पर उसके पीछे का निर्धारण नियतात्मक (deterministic) है। लग्न-अनुक्रमांक L से भाव b की राशि: R_b = ((L−1)+(b−1)) mod 12 + 1, फिर स्थिर स्वामित्व-मानचित्र से स्वामी। वर्गीकरण — केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, मारक = {2,7}; योगकारक = वह ग्रह जो एक साथ किसी केन्द्र और किसी त्रिकोण का स्वामी हो।

उदाहरण (worked example) मकर लग्न (L = 10): भाव→राशि→स्वामी — 5=वृष=शुक्र (त्रिकोण), 10=तुला=शुक्र (केन्द्र) ⇒ शुक्र = केन्द्र∩त्रिकोण स्वामी ⇒ एकमात्र योगकारक (श्लोक की पुष्टि)। सूर्य केवल 8वें (सिंह) का स्वामी ⇒ न पूर्ण शुभ न पाप ⇒ समफल। यही "कविरेकः सुयोगकृत्" व "सूर्यः समफलः" का गणितीय आधार है।

हमारा डिकोड (Our Decode) भावाधिपत्य का यह मानचित्र वही शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है जिस पर टीम का षोडश-वर्ग इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) खड़ा है — राशि-चक्र पर विशुद्ध modular गणना। हमारी अनुशासन-रेखा (CLAUDE.md/oracle) के अनुसार यहाँ "योगकारक/समफल" गणितीय निर्धारण है, जबकि उसका फल शास्त्र का कथन मात्र — भविष्य-दावा नहीं।

34.41
जीवचन्द्रकुजाः पापाः शुक्रसूर्यात्मजौ शुभौ।
राजयोगकरो ज्ञेजः कविरेव बृहस्पतिः
jīvacandrakujāḥ pāpāḥ śukrasūryātmajau śubhau|
rājayogakaro jñejaḥ kavireva bṛhaspatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = बृहस्पति; चन्द्र = चन्द्रमा; कुज = मंगल; पापाः = अशुभकारी; शुक्र = शुक्र; सूर्यात्मज = शनि (सूर्यपुत्र); शुभौ = दोनों शुभ; राजयोगकरः = राजयोग-उत्पादक; ज्ञेजः/ज्ञेयः = (पाठ संदिग्ध — "जानने योग्य" अथवा "ज्ञ=बुध" का अंश); कविः एव = एकमात्र शुक्र ही; बृहस्पतिः = गुरु (यहाँ स्थान-वचन विवादित)।

हिन्दी भावार्थ (कुम्भ लग्न-प्रकरण आरम्भ) कुम्भ लग्न में गुरु, चन्द्र और मंगल पापकारी हैं; शुक्र और शनि — ये दो शुभकारी हैं। राजयोगकारक तो एकमात्र शुक्र ही जानना चाहिए। पाठ-भेद संभव: द्वितीय पाद "राजयोगकरो ज्ञेजः … बृहस्पतिः" इस विकीस्रोत-पाठ में स्खलित प्रतीत होता है (गुरु तो अभी पाप कहा गया); शास्त्र-सम्मत आशय — योगकारक केवल शुक्र, स्वभाव-शुभ गुरु नहीं।

English rendering (Aquarius ascendant) Jupiter, Moon and Mars are malefic; Venus and Saturn are benefic; Venus alone is to be known as the Rāja-yoga karaka. (The second line's wording is textually uncertain — "पाठ-भेद संभव.")

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न से योगकारक-निर्धारण)। पर वर्गीकरण नियत है: योगकारक = केन्द्र∩त्रिकोण स्वामी; शेष का शुभ/पाप स्वामित्व-आधारित।

उदाहरण (worked example) कुम्भ लग्न (L = 11): 4=वृष=शुक्र (केन्द्र), 9=तुला=शुक्र (त्रिकोण) ⇒ शुक्र = योगकारक (श्लोक की पुष्टि)। गुरु 2 (मीन) व 11 (धनु) का स्वामी ⇒ मारक-सह-पाप; चन्द्र 6ठे (कर्क) का ⇒ पाप; मंगल 3-10 का ⇒ पाप; शनि लग्नेश (1,12) ⇒ शुभ — ठीक श्लोकानुसार।

हमारा डिकोड (Our Decode) "राजयोगकारक" इसी अध्याय की उस कड़ी का बीज है जिससे आगे नाभस-आदि योग-अध्याय (दोसियर-संरचना: योग 35–42) खुलते हैं। दोसियर की अनुशासन-रेखा के अनुरूप हम इसे स्वामित्व-गणित मानते हैं; इसका फल शास्त्र का कथन है, हमारा समर्थित भविष्यकथन नहीं।

34.42
सूर्यो भौमश्च हन्तारो बुधो मध्यफलः स्मृतः।
कुम्भलग्नोद्‌ भवस्यैवं फलान्यूह्यानि सूरिभिः
sūryo bhaumaśca hantāro budho madhyaphalaḥ smṛtaḥ|
kumbhalagnod‌ bhavasyaivaṃ phalānyūhyāni sūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यः भौमः च = सूर्य और मंगल; हन्तारौ = दो हन्ता (मारक-कर्ता); बुधः = बुध; मध्यफलः = मध्य/मिश्रित फल वाला; स्मृतः = स्मरण/कहा गया; कुम्भलग्नोद्भवस्य = कुम्भ लग्न में जन्मे का; फलानि ऊह्यानि = फल विचारणीय; सूरिभिः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ कुम्भ लग्न के जातक के लिए शास्त्र कहता है कि सूर्य और मंगल हन्ता हैं। बुध को मध्य-फल वाला स्मृत किया गया है—न शुद्ध शुभ-एकमात्र, न एकतरफा हन्ता। पूर्व श्लोक से जोड़ें: जीव–चन्द्र–कुज पाप; शुक्र–शनि शुभ; बुध राजयोगकर; फिर सूर्य–भौम हन्तारौ; बुध मध्यफल। विद्वानों को कुम्भलग्न-जन्म के फल इसी समग्र वर्गीकरण से ऊहने चाहिए। यह अध्याय-खंड लग्न-क्रम से मारक–शुभ–सम–योग भूमिका बाँटता है; निश्चित काल या रोग-आदि का दावा यहाँ नहीं पढ़ा जाए।

English rendering The Sun and Mars are named the killers; Mercury is remembered as of middling (madhya) result. The learned are to reason out the results of an Aquarius-lagna birth in this way.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / कुम्भ-लग्न के हन्ता–मध्यफल निर्देश। लग्न-सापेक्ष ग्रह-भूमिका का शास्त्रीय निरूपण; कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

34.43
मन्दशुक्रांशुमत्सौम्याः पापा भौमविधू शुभौ।
महीसुतगुरू योगकारकौ च महीसुतः
mandaśukrāṃśumatsaumyāḥ pāpā bhaumavidhū śubhau|
mahīsutagurū yogakārakau ca mahīsutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द = शनि; शुक्र = शुक्र; अंशुमत् = सूर्य (किरणवान्); सौम्य = बुध; पापाः = अशुभकारी; भौम = मंगल; विधु = चन्द्रमा; शुभौ = दोनों शुभ; महीसुत = मंगल (भूमिपुत्र); गुरु = बृहस्पति; योगकारकौ = दोनों योगकारक; च = और; महीसुतः = मंगल (विशेषतः)।

हिन्दी भावार्थ (मीन लग्न-प्रकरण) मीन लग्न में शनि, शुक्र, सूर्य और बुध — ये चार पापकारी हैं; मंगल और चन्द्र — ये दो शुभकारी हैं। मंगल और गुरु दोनों योगकारक हैं, और उनमें भी मंगल विशेष रूप से (प्रधान योगकारक) है।

English rendering (Pisces ascendant) Saturn, Venus, Sun and Mercury are malefic; Mars and the Moon are benefic; both Mars and Jupiter are yoga-makers, and Mars in particular.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वि-योगकारक निर्धारण)। नियत आधार वही: योगकारक = केन्द्र∩त्रिकोण स्वामी; यहाँ दो ग्रह यह शर्त पूरी करते हैं।

उदाहरण (worked example) मीन लग्न (L = 12): गुरु = 1 (मीन; केन्द्र व त्रिकोण दोनों) व 10 (धनु; केन्द्र) का स्वामी ⇒ योगकारक। मंगल = 9 (वृश्चिक; त्रिकोण) व 2 (मेष) का स्वामी ⇒ त्रिकोणेश-योगकारक; उच्च-मित्र होने से "विशेषतः" प्रधान। चन्द्र = 5वें (कर्क, त्रिकोण) का ⇒ शुभ। शनि (11,12), शुक्र (3,8), सूर्य (6), बुध (4,7) ⇒ पाप — पूर्ण श्लोकानुरूप।

34.44
मारकोऽपि न हन्ताऽसौ मन्दज्ञौ मारकौ स्मृतौ।
मीनलग्नोद्‌ भवस्यैवं फलानि परिचिन्तयेत्‌
mārako'pi na hantā'sau mandajñau mārakau smṛtau|
mīnalagnod‌ bhavasyaivaṃ phalāni paricintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मारकः = मारक-स्थान (2रे) का स्वामी; अपि = होते हुए भी; न हन्ता = हननकारी नहीं; असौ = वह (मंगल); मन्द = शनि; ज्ञौ = बुध (मन्द+ज्ञ = शनि और बुध); मारकौ = दोनों मारक; स्मृतौ = माने गए; मीनलग्न = मीन लग्न; उद्भवस्य = जन्म लेने वाले का; एवम् = इस प्रकार; फलानि = फल; परिचिन्तयेत् = भली-भाँति विचार करे।

हिन्दी भावार्थ (मीन लग्न) यद्यपि वह (मंगल) मारक-स्थान (द्वितीय) का स्वामी है, तथापि योगकारक होने से वह हननकारी नहीं होता। शनि और बुध — ये दो मारक माने गए हैं। इस प्रकार मीन लग्न में जन्मे जातक के फलों पर विचार करना चाहिए।

English rendering Though Mars owns a maraka house (the 2nd), being a yoga-karaka he does not act as a killer; Saturn and Mercury are reckoned the mārakas. One should ponder the Pisces native's results accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ एक सप्रतिबन्ध (conditional) नियम है, केवल फल-कथन नहीं: यदि कोई ग्रह एक साथ योगकारक (केन्द्र∩त्रिकोण) और मारक-स्थानेश {2,7} हो, तो योगकारकत्व मारकत्व को अधिभावित (override) कर देता है ⇒ वह हन्ता नहीं। शेष मारक = शुद्ध {2,7}/क्रूर स्वामी।

उदाहरण (worked example) मीन लग्न (L = 12): मंगल = 2रे (मेष, मारक) + 9वें (वृश्चिक, त्रिकोण) का स्वामी ⇒ योगकारकत्व प्रबल ⇒ मारक-दोष निरस्त। बुध = 7वें (कन्या, मारक-केन्द्र) + 4थे का ⇒ मारक; शनि = 11,12 का पापेश ⇒ मारक-कोटि — श्लोक-पुष्ट।

34.45
एवं भावाधिपत्येन जन्मलग्नवशादिह।
शुभत्वमशुभत्व च ग्रहाणां प्रतिपादितम्‌
evaṃ bhāvādhipatyena janmalagnavaśādiha|
śubhatvamaśubhatva ca grahāṇāṃ pratipāditam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; भावाधिपत्येन = भाव-स्वामित्व के आधार पर; जन्मलग्नवशात् = जन्म-लग्न के अनुसार; इह = यहाँ (इस प्रकरण में); शुभत्वम् = शुभता; अशुभत्वम् = अशुभता; च = और; ग्रहाणाम् = ग्रहों की; प्रतिपादितम् = प्रतिपादित/निरूपित किया गया।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार भाव-स्वामित्व के द्वारा और जन्म-लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता एवं अशुभता यहाँ (इस अध्याय में) निरूपित कर दी गई। यह उपसंहार-श्लोक पूरे प्रकरण का नियम स्पष्ट करता है — किसी ग्रह का शुभ/अशुभ होना निरपेक्ष नहीं, अपितु लग्न-सापेक्ष है।

English rendering Thus, by house-lordship and according to the natal ascendant, the benefic or malefic nature of the planets has here been expounded.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार/सिद्धान्त-कथन। पर यह श्लोक स्वयं उस फलन (function) को घोषित करता है: शुभत्व/अशुभत्व = f(भावाधिपत्य × जन्म-लग्न) — अर्थात् किसी ग्रह का गुण उसकी स्थिर प्रकृति से नहीं, लग्न-आधारित स्वामित्व-मानचित्र से नियत होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही "लग्न-सापेक्ष, स्वामित्व-आधारित" घोषणा हमारी विधि की रीढ़ है: टीम के इंजन ग्रह-गुण को निरपेक्ष न मानकर राशि-चक्र पर नियतात्मक मानचित्र (वर्ग-इंजन-सदृश modular अंकगणित) से निकालते हैं। दोसियर-अनुशासन (मद 5) के अनुसार यह वर्गीकरण गणित है; इससे उपजा फल शास्त्र का कथन मात्र — भय, नियति या समर्थित भविष्यकथन नहीं।

34.46
अत्यानपि पुनर्योगान्‌ नाभसादीन्‌ विचिन्त्य वै।
देहिना च फलं वाच्यं प्रवक्ष्यामि च तानहम्‌
atyānapi punaryogān‌ nābhasādīn‌ vicintya vai|
dehinā ca phalaṃ vācyaṃ pravakṣyāmi ca tānaham‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत्यान्/अन्यान् = अन्य (पाठ-भेद संभव: "अत्यान्" संभवतः "अन्यान्"); अपि = भी; पुनः = और आगे; योगान् = योगों को; नाभसादीन् = नाभस आदि (योग-वर्ग); विचिन्त्य = विचार करके; वै = निश्चय ही; देहिनाम् = जातकों (देहधारियों) का; च = और; फलम् = फल; वाच्यम् = कहना चाहिए; प्रवक्ष्यामि च तान् अहम् = और उन्हें अब मैं कहूँगा।

हिन्दी भावार्थ अन्य और भी योगों को — नाभस आदि योग-समूह को — भली-भाँति विचार कर जातकों का फल कहना चाहिए; अब मैं उन्हीं (नाभस-आदि योगों) को कहूँगा। यह संक्रमण-श्लोक योगकारक-प्रकरण से आगे नाभस-योग-प्रकरण की प्रस्तावना है।

English rendering Having also considered the further yogas — the Nābhasa and the rest — one should declare the natives' results; and these I shall now expound.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपक्रम/संवाद (नाभस-योग-प्रस्तावना)। अन्तर्निहित दृष्टि: नाभस-आदि योग सात ग्रहों के राशियों में वितरण की संयोजनात्मक (combinatorial) आकृतियाँ हैं — अर्थात् एक गणनीय पैटर्न-कुल; (इनकी परम्परागत गणना इस श्लोक/दोसियर में नहीं दी, अतः यहाँ संख्या नहीं दे रहे)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक अध्याय-34 (योगकारक) से आगे योग-अध्यायों की ओर सेतु है — दोसियर की संरचना-टिप्पणी में योग = अध्याय 35–42। नाभस जैसे आकृति-योग विशुद्ध संयोजनात्मक वर्गीकरण हैं, जो टीम की "गणित को व्याख्या से अलग रखो" रेखा के अनुकूल गणनीय रूप में डिकोड किए जा सकते हैं; उनका फल पुनः शास्त्र का कथन रहेगा।

अध्यायः 35

नाभसयोगाध्यायः

50 श्लोक

पाठ-टिप्पणी (audit 2026-09-21): इस अध्याय का Sanskrit-Wikisource पृष्ठ (2026-08-11) अध्याय 34 का पाठ दोहराता था; यहाँ पाठ sanskritdocuments.org साक्षी से लिया गया है (50 श्लोक)। जिन श्लोकों का पाठ पूर्व-संस्करण से मेल खाता है उनकी टिप्पणियाँ रखी गई हैं; शेष श्लोकों की टिप्पणियाँ 2026-09-21 के सम्पादकीय पास में उसी शैली-नियम (पदच्छेद · भावार्थ · English · गणित · उदाहरण · डिकोड) से लिखी गईं। / The Wikisource page for this chapter repeated the text of chapter 34; the text below is from the sanskritdocuments.org witness (50 verses). Commentary is kept where the verse text matches the previous edition; the remaining verses were treated in the editorial pass of 2026-09-21 under the same style rules.

35.1
अधुना नाभसा योगाः कथ्यन्ते द्विजसत्तम ।
द्वात्रिंशात् तत्प्रभेदास्तु शतघ्नाष्टादशोन्मिताः
adhunā nābhasā yogāḥ kathyante dvijasattama |
dvātriṃśāt tatprabhedāstu śataghnāṣṭādaśonmitāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधुना = अब; नाभसाः योगाः = नाभस योग; कथ्यन्ते = कहे जाते हैं; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; द्वात्रिंशत् = बत्तीस; तत्प्रभेदाः तु = उनके प्रभेद (उपभेद); शतघ्न-अष्टादश-उन्मिताः = सौ से गुणित अठारह जितने = 1,800।

हिन्दी भावार्थ पराशर नाभस-योग अध्याय आरम्भ करते हैं — नाभस योग बत्तीस हैं और उनके उपभेद अठारह सौ। नाभस योग ग्रहों की केवल राशि/भाव-विन्यास की आकृति पर आधारित हैं — किसी विशेष ग्रह पर नहीं — इसीलिए वे "आकाश-जन्य" (नाभस) कहलाते हैं और सभी दशाओं में फल देते हैं (35.50)।

English rendering "Now the nābhasa yogas are told, O best of dvijas: they are thirty-two, and their sub-varieties number eighteen hundred."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या/गुणन: शतघ्न-अष्टादश = 18 × 100 = 1,800 उपभेद; मुख्य योग = 32 (35.2 में 3 + 2 + 20 + 7)। उपभेद-संख्या ग्रन्थ का कथन है (वराहमिहिर की बृहज्जातक-परम्परा में भी 1,800)।

35.2
आश्रयाख्यास्त्रयो योगाः दलसंज्ञं द्वयं ततः ।
आकृतिर्विशतिः संख्याः सप्त योगाः प्रकीर्तिताः
āśrayākhyāstrayo yogāḥ dalasaṃjñaṃ dvayaṃ tataḥ |
ākṛtirviśatiḥ saṃkhyāḥ sapta yogāḥ prakīrtitāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आश्रयाख्याः त्रयः योगाः = आश्रय नाम के तीन योग; दलसंज्ञं द्वयं ततः = फिर दल संज्ञक दो; आकृतिः विंशतिः = आकृति (योग) बीस; संख्याः सप्त योगाः = संख्या-योग सात; प्रकीर्तिताः = कहे गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चार वर्ग गिनाता है — आश्रय 3, दल 2, आकृति 20, संख्या 7 = 32। आश्रय राशि-स्वभाव (चर-स्थिर-द्विस्वभाव) पर, दल केन्द्रों में शुभ/पाप पर, आकृति भाव-विन्यास की आकृति पर और संख्या अधिष्ठित राशियों की गिनती पर आधारित हैं।

English rendering Three yogas are called āśraya, then two dala, twenty ākṛti, and seven saṅkhyā — thus they are declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 3 + 2 + 20 + 7 = 32 ✓ (35.1 से संगत)। वर्ग-आधार: आश्रय → राशि-स्वभाव; दल → केन्द्र-शुभाशुभ; आकृति → भाव-समुच्चय की आकृति; संख्या → |{अधिष्ठित राशियाँ}|।

35.3
रज्जुश्च मुसलश्चैव नलश्चेत्याश्रयास्त्रयः ।
मालाख्यः सर्पसंज्ञश्च दलयोगौ प्रकीर्तितौ
rajjuśca musalaścaiva nalaścetyāśrayāstrayaḥ |
mālākhyaḥ sarpasaṃjñaśca dalayogau prakīrtitau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रज्जुः च मुसलः च एव नलः च = रज्जु, मुसल और नल; इति आश्रयाः त्रयः = ये तीन आश्रय (योग); मालाख्यः = माला नामक; सर्पसंज्ञः च = और सर्प संज्ञक; दलयोगौ प्रकीर्तितौ = दो दल-योग कहे गए।

हिन्दी भावार्थ नाम-सूची — आश्रय: रज्जु, मुसल, नल; दल: माला, सर्प। परिभाषाएँ 35.7–35.8 में।

English rendering Rajju, Musala and Nala are the three āśraya yogas; the two dala yogas are called Mālā and Sarpa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-सूची (आश्रय 3, दल 2)।

35.4
गदाख्यः शकटाख्यश्च स्रृङ्गाटकविहंगसौ ।
हलवज्रयवाश्चैव कमलं वापियूपकौ
gadākhyaḥ śakaṭākhyaśca srṛṅgāṭakavihaṃgasau |
halavajrayavāścaiva kamalaṃ vāpiyūpakau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गदाख्यः = गदा; शकटाख्यः = शकट; शृङ्गाटक = शृङ्गाटक; विहङ्गसौ (= विहग) = विहग (पक्षी); हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूपक = हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप — (आकृति-योगों की सूची, 35.5 में पूर्ण)।

हिन्दी भावार्थ बीस आकृति-योगों की नाम-सूची का पहला भाग — गदा, शकट, शृङ्गाटक, विहग, हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप (दस)। शेष दस 35.5 में।

English rendering Gadā, Śakaṭa, Śṛṅgāṭaka, Vihaga, Hala, Vajra, Yava, Kamala, Vāpī and Yūpa — (the list of ākṛti yogas, continued).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-सूची (आकृति 1–10)।

35.5
शरशक्तिदण्डनौकाकूटच्छत्रध्नूंषि च ।
अर्धचन्द्रस्तु चक्रं च समुद्रश्चेति विंशतिः
śaraśaktidaṇḍanaukākūṭacchatradhnūṃṣi ca |
ardhacandrastu cakraṃ ca samudraśceti viṃśatiḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शर, शक्ति, दण्ड, नौका, कूट, छत्र, धनूंषि = शर, शक्ति, दण्ड, नौका, कूट, छत्र, धनुष (चाप); अर्धचन्द्रः तु = और अर्धचन्द्र; चक्रं च = चक्र; समुद्रः च = समुद्र; इति विंशतिः = ये बीस।

हिन्दी भावार्थ आकृति-सूची का दूसरा भाग — शर, शक्ति, दण्ड, नौका, कूट, छत्र, धनुष, अर्धचन्द्र, चक्र, समुद्र (दस)। 35.4 के दस के साथ बीस पूरे।

English rendering Śara, Śakti, Daṇḍa, Naukā, Kūṭa, Chatra, Dhanus, Ardhacandra, Cakra and Samudra — these are the twenty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणना-जाँच: 35.4 के 10 + 35.5 के 10 = 20 ✓ (गदा, शकट, शृङ्गाटक, विहग, हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप, शर, शक्ति, दण्ड, नौका, कूट, छत्र, धनुष, अर्धचन्द्र, चक्र, समुद्र)।

35.6
संख्याख्यावल्लकीदामपाशकेदारशूलकाः ।
युगो गोलश्च सप्तैते युक्ता दन्तमिता द्विज
saṃkhyākhyāvallakīdāmapāśakedāraśūlakāḥ |
yugo golaśca saptaite yuktā dantamitā dvija
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संख्याख्याः = संख्या नामक (योग); वल्लकी = वल्लकी (वीणा); दाम, पाश, केदार, शूलकाः = दाम, पाश, केदार, शूल; युगः गोलः च = युग और गोल; सप्त एते = ये सात; युक्ताः दन्तमिताः = (सब मिलाकर) दन्त-संख्या (32) जितने; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ संख्या-योग सात — वल्लकी (वीणा), दाम, पाश, केदार, शूल, युग, गोल। सबको जोड़ने पर "दन्त-मित" अर्थात् बत्तीस — दाँतों की संख्या से भूतसंख्या। यहाँ अध्याय की नाम-सूची पूर्ण होती है।

English rendering The saṅkhyā yogas are Vallakī, Dāma, Pāśa, Kedāra, Śūla, Yuga and Gola — seven; together, O dvija, they number "danta" (thirty-two).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: दन्त = 32। जाँच: 3 + 2 + 20 + 7 = 32 ✓। संख्या-योग = अधिष्ठित राशियों की गिनती 7 → 1 के क्रम में (35.16–35.17): वीणा 7, दाम 6, पाश 5, केदार 4, शूल 3, युग 2, गोल 1।

35.7
सर्वैश्चरे स्थितै रज्जुः स्थिरस्थैर्मुसलः स्मृतः ।
नलाख्यो द्विस्वभावस्थैराश्रयाख्या इमे स्मृताः
sarvaiścare sthitai rajjuḥ sthirasthairmusalaḥ smṛtaḥ |
nalākhyo dvisvabhāvasthairāśrayākhyā ime smṛtāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वैः चरे स्थितैः = सब ग्रह चर राशियों में स्थित हों तो; रज्जुः; स्थिरस्थैः = स्थिर राशियों में; मुसलः स्मृतः; नलाख्यः = नल नामक; द्विस्वभावस्थैः = द्विस्वभाव राशियों में; आश्रयाख्याः इमे स्मृताः = ये आश्रय-योग कहे गए।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सभी ग्रह चर राशियों में हों तो रज्जु, स्थिर में मुसल, द्विस्वभाव में नल। "सर्वैः" = सातों ग्रह (सूर्य–शनि; राहु-केतु वर्जित, 35.17)। यह राशि-स्वभाव पर आधारित समुच्चय-शर्त है।

English rendering With all planets in movable signs, Rajju; in fixed signs, Musala; in dual signs, the yoga called Nala — these are the āśraya yogas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-वर्ग: चर = {मेष, कर्क, तुला, मकर}; स्थिर = {वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ}; द्विस्वभाव = {मिथुन, कन्या, धनु, मीन}। शर्त: ∀ g ∈ {Su…Sa}: राशि(g) ∈ चर → रज्जु; ∈ स्थिर → मुसल; ∈ द्विस्वभाव → नल।

उदाहरण (worked example) सातों ग्रह मेष, कर्क, कर्क, तुला, मकर, मकर, मेष में → सब चर → रज्जु-योग। एक भी ग्रह वृषभ में होता तो कोई आश्रय-योग नहीं।

35.8
केन्द्रत्रयगतैः सौम्यैः पापैर्वा दलसंज्ञकौ ।
क्रमान्मालाभुजंगाख्यौ शुभाशुभफलप्रदौ
kendratrayagataiḥ saumyaiḥ pāpairvā dalasaṃjñakau |
kramānmālābhujaṃgākhyau śubhāśubhaphalapradau
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रत्रयगतैः = तीन केन्द्रों में स्थित; सौम्यैः = शुभ ग्रहों से; पापैः वा = अथवा पाप ग्रहों से; दलसंज्ञकौ = दो दल-योग; क्रमात् = क्रम से; माला-भुजंगाख्यौ = माला और भुजंग (सर्प) नामक; शुभाशुभफलप्रदौ = शुभ और अशुभ फल देने वाले।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — शुभ ग्रह तीन केन्द्रों में हों तो माला-योग, पाप ग्रह तीन केन्द्रों में हों तो भुजंग (सर्प)-योग; क्रमशः शुभ और अशुभ फल। परम्परा में शेष चौथा केन्द्र विपरीत वर्ग का या रिक्त — घोषित परिपाटी।

English rendering With benefics in three kendras, or malefics, arise the two dala yogas, Mālā and Bhujaṅga respectively, giving good and bad results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) केन्द्र K = {1, 4, 7, 10}। माला: |{k ∈ K : शुभ ∈ भाव k}| = 3; भुजंग: |{k ∈ K : पाप ∈ भाव k}| = 3। शुभ/पाप वर्गीकरण (चन्द्र-पक्षबल, बुध-युति) घोषित करें।

35.9
आसन्नकेन्द्रद्वयगैः सर्वैर्योगो गदाह्वयः ।
शकटं लग्नजायास्थैः खाम्बुगैर्विहगः स्मृतः
āsannakendradvayagaiḥ sarvairyogo gadāhvayaḥ |
śakaṭaṃ lagnajāyāsthaiḥ khāmbugairvihagaḥ smṛtaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आसन्नकेन्द्रद्वयगैः सर्वैः = सब ग्रह दो आसन्न (पास-पास के) केन्द्रों में; योगः गदाह्वयः = गदा नामक योग; शकटम् = शकट; लग्नजायास्थैः = लग्न और सप्तम में स्थित (सब ग्रहों) से; खाम्बुगैः = ख (दशम) और अम्बु (चतुर्थ) में; विहगः स्मृतः = विहग कहा गया।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सब ग्रह दो आसन्न केन्द्रों (जैसे 1–4, 4–7, 7–10, 10–1) में हों तो गदा; केवल लग्न और सप्तम में हों तो शकट; केवल दशम और चतुर्थ में हों तो विहग। "ख" = आकाश = दशम, "अम्बु" = जल = चतुर्थ।

English rendering With all planets in two adjacent kendras, the yoga is Gadā; with all in the lagna and seventh, Śakaṭa; with all in the tenth and fourth, Vihaga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-समुच्चय S = {भाव(g) : g ∈ Su…Sa}। गदा: S ⊆ {k, k+3} जहाँ (k, k+3) ∈ {(1,4), (4,7), (7,10), (10,1)}; शकट: S ⊆ {1, 7}; विहग: S ⊆ {4, 10} (दोनों भाव अधिष्ठित)।

उदाहरण (worked example) ग्रह-भाव {1, 1, 7, 7, 7, 1, 7} → S = {1, 7} → शकट। {4, 10, 10, 4, 4, 10, 4} → S = {4, 10} → विहग। {7, 10, 10, 7, 7, 10, 7} → आसन्न केन्द्र-युग्म (7, 10) → गदा।

35.10
योगः स्रृङ्गाटकं नाम लग्नात्मजतपःस्थितैः ।
अन्यस्थानात् त्रिकोणस्थैः सर्वैर्योगो हलाभिघः
yogaḥ srṛṅgāṭakaṃ nāma lagnātmajatapaḥsthitaiḥ |
anyasthānāt trikoṇasthaiḥ sarvairyogo halābhighaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगः शृङ्गाटकं नाम = शृङ्गाटक नामक योग; लग्न-आत्मज-तपः-स्थितैः = लग्न, पञ्चम (आत्मज) और नवम (तपस्) में स्थित (सब ग्रहों) से; अन्यस्थानात् त्रिकोणस्थैः सर्वैः = अन्य (लग्न-भिन्न) स्थान से त्रिकोणों में सब ग्रह हों तो; योगः हलाभिधः = हल नामक योग।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सब ग्रह लग्न, पञ्चम और नवम (लग्न-त्रिकोण) में हों तो शृङ्गाटक; लग्न-भिन्न किसी स्थान से त्रिकोण-त्रयी (2-6-10, 3-7-11 या 4-8-12) में हों तो हल। "आत्मज" = पञ्चम, "तपस्" = नवम — भाव-नाम।

English rendering The yoga named Śṛṅgāṭaka arises with all planets in the lagna, fifth and ninth; with all in a trine set beginning from any other house, the yoga is called Hala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिकोण-त्रयी T_k = {k, k+4, k+8} (mod 12)। शृङ्गाटक: S ⊆ T_1 = {1, 5, 9}; हल: S ⊆ T_k, k ∈ {2, 3, 4} → {2, 6, 10}, {3, 7, 11}, {4, 8, 12}।

उदाहरण (worked example) ग्रह-भाव {3, 7, 11, 3, 11, 7, 7} → S = {3, 7, 11} = T_3 → हल-योग। {1, 5, 9, 9, 1, 5, 1} → शृङ्गाटक।

35.11
लग्नजायास्थितैः सौम्यैः पापाख्यैः खाऽम्बुसंस्थितैः ।
योगो वज्राभिधः प्रोक्तः वीपरीतस्थितैर्यवः
lagnajāyāsthitaiḥ saumyaiḥ pāpākhyaiḥ khā'mbusaṃsthitaiḥ |
yogo vajrābhidhaḥ proktaḥ vīparītasthitairyavaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नजायास्थितैः सौम्यैः = शुभ ग्रह लग्न और सप्तम में; पापाख्यैः खाम्बुसंस्थितैः = पाप ग्रह दशम और चतुर्थ में; योगः वज्राभिधः प्रोक्तः = वज्र नामक योग कहा गया; विपरीतस्थितैः यवः = विपरीत स्थिति में (शुभ 4–10, पाप 1–7) यव।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — शुभ ग्रह लग्न-सप्तम में और पाप ग्रह दशम-चतुर्थ में हों तो वज्र; विपरीत (शुभ दशम-चतुर्थ, पाप लग्न-सप्तम) हो तो यव। दोनों केन्द्र-आधारित शुभ-पाप वितरण हैं।

English rendering With benefics in the lagna and seventh and malefics in the tenth and fourth, the yoga is called Vajra; with the reverse arrangement, Yava.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वज्र: शुभ ⊆ {1, 7} ∧ पाप ⊆ {4, 10}; यव: शुभ ⊆ {4, 10} ∧ पाप ⊆ {1, 7}। (सातों ग्रह केन्द्रों में; शुभ/पाप वर्गीकरण घोषित करें।)

35.12
सर्वकेन्द्रगतैः सर्वैर्मिश्रैः कमलसंज्ञकः ।
केन्द्रादन्यत्रगैः सर्वैर्योगो वापीसमाह्वयः
sarvakendragataiḥ sarvairmiśraiḥ kamalasaṃjñakaḥ |
kendrādanyatragaiḥ sarvairyogo vāpīsamāhvayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वकेन्द्रगतैः सर्वैः मिश्रैः = सब ग्रह (शुभ-पाप मिश्रित) सभी केन्द्रों में; कमलसंज्ञकः = कमल नामक; केन्द्रात् अन्यत्र गैः सर्वैः = सब ग्रह केन्द्रों से अन्यत्र (पणफर/आपोक्लिम) में; योगः वापीसमाह्वयः = वापी नामक योग।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सब ग्रह (मिश्रित) चारों केन्द्रों में हों तो कमल; सब ग्रह केन्द्रों के बाहर हों तो वापी। परम्परा में वापी के दो रूप — सब पणफर में या सब आपोक्लिम में — घोषित परिपाटी।

English rendering With all planets, mixed, in all the kendras, the yoga is Kamala; with all outside the kendras, the yoga called Vāpī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कमल: S = {1, 4, 7, 10} (चारों अधिष्ठित); वापी: S ∩ {1, 4, 7, 10} = ∅ (परम्परा: S ⊆ पणफर {2, 5, 8, 11} या S ⊆ आपोक्लिम {3, 6, 9, 12})।

35.13
यूपो लग्नाच्चतुर्भस्थैः शरस्तुर्याच्चतुर्भगैः ।
शक्तिर्मदाच्चतुर्भस्थैर्दण्डो मध्याच्चतुर्भगैः
yūpo lagnāccaturbhasthaiḥ śarasturyāccaturbhagaiḥ |
śaktirmadāccaturbhasthairdaṇḍo madhyāccaturbhagaiḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यूपः लग्नात् चतुर्भस्थैः = लग्न से चार (लगातार) राशियों में (सब ग्रह) → यूप; शरः तुर्यात् चतुर्भगैः = चतुर्थ से चार में → शर; शक्तिः मदात् चतुर्भस्थैः = सप्तम से चार में → शक्ति; दण्डः मध्यात् चतुर्भगैः = दशम (मध्य) से चार में → दण्ड।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सब ग्रह लग्न से लगातार चार भावों (1–4) में हों तो यूप; चतुर्थ से चार (4–7) में शर; सप्तम से चार (7–10) में शक्ति; दशम से चार (10–1) में दण्ड। चार आकृति-योग, प्रत्येक एक केन्द्र से आरम्भ।

English rendering Yūpa with all planets in four consecutive houses from the lagna; Śara from the fourth; Śakti from the seventh; Daṇḍa from the tenth (the "middle").

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) C_k(n) = {k, k+1, …, k+n−1} (mod 12)। यूप: S ⊆ C_1(4) = {1,2,3,4}; शर: S ⊆ C_4(4) = {4,5,6,7}; शक्ति: S ⊆ C_7(4) = {7,8,9,10}; दण्ड: S ⊆ C_10(4) = {10,11,12,1}।

उदाहरण (worked example) ग्रह-भाव {10, 11, 12, 1, 1, 11, 10} → S = {10, 11, 12, 1} = C_10(4) → दण्ड-योग।

35.14
लग्नात् सप्तमगैनौ का कूटस्तुर्याच्च सप्तमैः ।
छत्राख्यः सप्तमादेवं चापं मध्याद् भसप्तगैः
lagnāt saptamagainau kā kūṭasturyācca saptamaiḥ |
chatrākhyaḥ saptamādevaṃ cāpaṃ madhyād bhasaptagaiḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् सप्तमगैः नौका = लग्न से सात (लगातार) भावों में (सब ग्रह) → नौका; कूटः तुर्यात् च सप्तमैः = चतुर्थ से सात में → कूट; छत्राख्यः सप्तमात् एवम् = सप्तम से सात में → छत्र; चापं मध्यात् भसप्तगैः = दशम से सात राशियों में → चाप (धनुष)।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सब ग्रह लग्न से लगातार सात भावों (1–7) में हों तो नौका; चतुर्थ से सात (4–10) में कूट; सप्तम से सात (7–1) में छत्र; दशम से सात (10–4) में चाप। ये "आधा चक्र" वाली आकृतियाँ हैं।

English rendering Naukā with all planets in seven consecutive houses from the lagna; Kūṭa from the fourth; Chatra likewise from the seventh; Cāpa from the tenth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नौका: S ⊆ C_1(7) = {1…7}; कूट: S ⊆ C_4(7) = {4…10}; छत्र: S ⊆ C_7(7) = {7…12, 1}; चाप: S ⊆ C_10(7) = {10, 11, 12, 1, 2, 3, 4}। (परम्परा: सातों भाव अधिष्ठित — एक-एक ग्रह।)

35.15
लग्नादेकान्तरस्थैश्च षड्भगैश्चक्रमुच्यते ।
धनादेकान्तरस्थैस्तु समुद्रः षडगृहाश्रितै
lagnādekāntarasthaiśca ṣaḍbhagaiścakramucyate |
dhanādekāntarasthaistu samudraḥ ṣaḍagṛhāśritai
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् एकान्तरस्थैः च = लग्न से एक-एक छोड़कर (विषम भावों में) स्थित; षड्भगैः = छह राशियों में; चक्रम् उच्यते = चक्र कहा जाता है; धनात् एकान्तरस्थैः तु = द्वितीय से एक-एक छोड़कर; समुद्रः = समुद्र; षड्गृहाश्रितैः = छह भावों में स्थित।

हिन्दी भावार्थ परिभाषा — सब ग्रह लग्न से एकान्तर छह भावों (1, 3, 5, 7, 9, 11) में हों तो चक्र; द्वितीय से एकान्तर छह (2, 4, 6, 8, 10, 12) में हों तो समुद्र। विषम-भाव विन्यास चक्र, सम-भाव विन्यास समुद्र।

English rendering With planets in six alternate houses from the lagna, the yoga is called Cakra; with them in six alternate houses from the second, Samudra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चक्र: S ⊆ {1, 3, 5, 7, 9, 11} (सब विषम); समुद्र: S ⊆ {2, 4, 6, 8, 10, 12} (सब सम)। (परम्परा: छहों भाव अधिष्ठित।)

उदाहरण (worked example) ग्रह-भाव {2, 4, 6, 8, 10, 12, 4} → सब सम → समुद्र। एक ग्रह 5 में होता तो न चक्र न समुद्र।

35.16
एकराशिस्थितैर्गोलो युगाख्यो द्विभसंस्थितैः ।
शूलस्तु त्रिभगैः प्रोक्तः केदारस्तु चतुर्भगैः
ekarāśisthitairgolo yugākhyo dvibhasaṃsthitaiḥ |
śūlastu tribhagaiḥ proktaḥ kedārastu caturbhagaiḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकराशिस्थितैः गोलः = सब ग्रह एक राशि में → गोल; युगाख्यः द्विभसंस्थितैः = दो राशियों में → युग; शूलः तु त्रिभगैः प्रोक्तः = तीन राशियों में → शूल; केदारः तु चतुर्भगैः = चार राशियों में → केदार।

हिन्दी भावार्थ संख्या-योगों की परिभाषा — सातों ग्रह जितनी राशियों में बँटे हों: एक → गोल, दो → युग, तीन → शूल, चार → केदार (35.17 में पाँच → पाश, छह → दाम, सात → वीणा)। केवल गिनती, स्थान नहीं।

English rendering With all planets in one sign, Gola; in two, the yoga called Yuga; in three, Śūla; in four, Kedāra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) n = |{राशि(g) : g ∈ Su…Sa}|। n = 1 → गोल; 2 → युग; 3 → शूल; 4 → केदार।

उदाहरण (worked example) ग्रह-राशियाँ {मेष, मेष, कर्क, कर्क, तुला, तुला, मेष} → n = 3 → शूल-योग।

35.17
पञ्चराशिस्थतैः पाशा दामाख्यः षड्गृहाश्रितैः ।
वीणा सप्तभगैः सर्वैर्विहायान्यानुदीरितान्
pañcarāśisthataiḥ pāśā dāmākhyaḥ ṣaḍgṛhāśritaiḥ |
vīṇā saptabhagaiḥ sarvairvihāyānyānudīritān
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चराशिस्थितैः पाशः = पाँच राशियों में → पाश; दामाख्यः षड्गृहाश्रितैः = छह राशियों में → दाम; वीणा सप्तभगैः = सात राशियों में → वीणा; सर्वैः = सब (सात) ग्रहों से; विहाय अन्यान् उदीरितान् = अन्य (कहे गए छाया-ग्रह राहु-केतु) को छोड़कर।

हिन्दी भावार्थ संख्या-योग पूर्ण — पाँच राशियों में पाश, छह में दाम, सात में वीणा। अन्तिम पद नियम देता है: गिनती सातों ग्रहों (सूर्य–शनि) से, राहु-केतु को छोड़कर — यह नियम पूरे अध्याय पर लागू है।

English rendering In five signs, Pāśa; in six, Dāma; in seven, Vīṇā — reckoned with all (seven) planets, leaving aside the others (the nodes).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) n = |राशि-समुच्चय| पर: 5 → पाश; 6 → दाम; 7 → वीणा। ग्रह-समुच्चय = {Su, Mo, Ma, Me, Ju, Ve, Sa}; {Ra, Ke} वर्जित — नाभस-गणना का घोषित नियम।

35.18
अटनप्रियाः सुरूपाः परदेशस्वास्थ्यभागिनो मनुजाः ।
क्रूराः खलस्वभावा रज्जुप्रभवाः सदा कथिताः
aṭanapriyāḥ surūpāḥ paradeśasvāsthyabhāgino manujāḥ |
krūrāḥ khalasvabhāvā rajjuprabhavāḥ sadā kathitāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अटनप्रियाः = भ्रमण-प्रिय; सुरूपाः = सुन्दर; परदेश-स्वास्थ्य-भागिनः = परदेश में सुख पाने वाले; मनुजाः = मनुष्य; क्रूराः = क्रूर; खलस्वभावाः = दुष्ट स्वभाव के; रज्जुप्रभवाः = रज्जु-योग में जन्मे; सदा कथिताः = सदा कहे गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रज्जु-योग (सब ग्रह चर राशियों में) में जन्मे लोग भ्रमण-प्रिय, सुन्दर, परदेश में सुखी, किन्तु क्रूर और खल-स्वभाव कहे गए हैं। चर राशियों की गतिशीलता फल में "अटन" बनी है — पाठ का फल-कथन।

English rendering Those born in Rajju are fond of wandering, handsome, at ease in foreign lands, yet cruel and of wicked nature — so the text has always said.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रज्जु = 35.7 की चर-राशि शर्त)।

35.19
मानज्ञानधनाद्यैर्युक्ता भूपप्रियाः ख्याताः ।
बहुपुत्राः स्थिरचित्ता मुसलसमुत्था भवन्ति नराः
mānajñānadhanādyairyuktā bhūpapriyāḥ khyātāḥ |
bahuputrāḥ sthiracittā musalasamutthā bhavanti narāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मानज्ञानधनाद्यैः युक्ताः = मान, ज्ञान, धन आदि से युक्त; भूपप्रियाः = राजा के प्रिय; ख्याताः = प्रसिद्ध; बहुपुत्राः = बहुत पुत्रों वाले; स्थिरचित्ताः = स्थिर चित्त; मुसलसमुत्थाः भवन्ति नराः = मुसल-योग में जन्मे मनुष्य होते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मुसल-योग (सब ग्रह स्थिर राशियों में) में जन्मे मान-ज्ञान-धन से युक्त, राज-प्रिय, प्रसिद्ध, बहु-पुत्र और स्थिर-चित्त होते हैं। स्थिर राशियों की स्थिरता फल में "स्थिरचित्त" बनी है।

English rendering Those born in Musala are endowed with honour, knowledge and wealth, dear to kings, renowned, with many sons and steady minds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मुसल = स्थिर-राशि शर्त)।

35.20
न्यूनातिरिक्तदेहा धनसञ्चयभागिनोऽतिनिपुणाश्च ।
बन्धुहिताश्च सुरूपा नलयोगे सम्प्रसूयन्ते
nyūnātiriktadehā dhanasañcayabhāgino'tinipuṇāśca |
bandhuhitāśca surūpā nalayoge samprasūyante
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न्यूनातिरिक्तदेहाः = न्यून या अधिक (विषम) अङ्गों वाले; धनसञ्चयभागिनः = धन-संचय करने वाले; अतिनिपुणाः च = अति-निपुण; बन्धुहिताः = बन्धुओं के हितैषी; सुरूपाः = सुन्दर; नलयोगे सम्प्रसूयन्ते = नल-योग में जन्म लेते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नल-योग (सब ग्रह द्विस्वभाव राशियों में) में जन्मे विषम-अङ्ग, धन-संचयी, अति-निपुण, बन्धु-हितैषी और सुन्दर होते हैं। द्विस्वभाव का "दोहरापन" न्यून-अधिक अङ्ग में प्रतिबिम्बित — पाठ की उपमा।

English rendering Those born in Nala have limbs deficient or in excess, accumulate wealth, are very skilful, well-disposed to kin, and handsome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नल = द्विस्वभाव-राशि शर्त)।

35.21
नित्यं सुखप्रधाना वाहनवस्त्रान्नभोगसम्पन्ना ।
कान्ता सुबहुस्त्रीका मालायां सम्प्रसूताः स्युः
nityaṃ sukhapradhānā vāhanavastrānnabhogasampannā |
kāntā subahustrīkā mālāyāṃ samprasūtāḥ syuḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नित्यं सुखप्रधानाः = सदा सुख-प्रधान; वाहनवस्त्रान्नभोगसम्पन्नाः = वाहन, वस्त्र, अन्न के भोग से सम्पन्न; कान्ताः = प्रिय/सुन्दर; सुबहुस्त्रीकाः = अनेक स्त्रियों वाले; मालायां सम्प्रसूताः स्युः = माला-योग में जन्मे होते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — माला-योग (तीन केन्द्रों में शुभ ग्रह) में जन्मे सदा सुखी, वाहन-वस्त्र-अन्न के भोगी, प्रिय और बहु-स्त्रीक होते हैं। शुभ केन्द्र-त्रयी का भोग-प्रधान फल।

English rendering Those born in Mālā are ever given to comfort, endowed with vehicles, garments and food, attractive, and have very many women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (माला = 35.8)।

35.22
वुषमाः क्रूरा निःस्वा नित्यं दुःखार्दिताः सुदीनाश्च ।
परभक्षपाननिरताः सर्पप्रभवा भवन्ति नराः
vuṣamāḥ krūrā niḥsvā nityaṃ duḥkhārditāḥ sudīnāśca |
parabhakṣapānaniratāḥ sarpaprabhavā bhavanti narāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विषमाः (पाठ "वुषमाः") = विषम/कुटिल; क्रूराः; निःस्वाः = निर्धन; नित्यं दुःखार्दिताः = सदा दुःख-पीड़ित; सुदीनाः च = अति दीन; परभक्ष्यपाननिरताः = पराये अन्न-पान पर निर्भर; सर्पप्रभवाः भवन्ति नराः = सर्प-योग में जन्मे मनुष्य होते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सर्प (भुजंग)-योग (तीन केन्द्रों में पाप ग्रह) में जन्मे कुटिल, क्रूर, निर्धन, दुःखी, दीन और पराश्रित कहे गए हैं। माला का प्रति-पक्ष; पाठ-भेद संभव ("वुषमाः")।

English rendering Those born in Sarpa are crooked, cruel, poor, ever afflicted by sorrow, very wretched, and live on others' food and drink.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सर्प = 35.8)।

35.23
सततोद्युक्तार्थवशा यज्वानः शास्त्रगेयकुशलाश्च ।
धनकनकरत्नसम्पत्संयुक्ता मानवा गदायां तु
satatodyuktārthavaśā yajvānaḥ śāstrageyakuśalāśca |
dhanakanakaratnasampatsaṃyuktā mānavā gadāyāṃ tu
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सततोद्युक्तार्थवशाः = सदा उद्यम में लगे, अर्थ-वश; यज्वानः = यज्ञ करने वाले; शास्त्रगेयकुशलाः च = शास्त्र और गायन में कुशल; धनकनकरत्नसम्पत्संयुक्ताः = धन, स्वर्ण, रत्न की सम्पत्ति से युक्त; मानवाः गदायां तु = गदा-योग में (जन्मे) मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गदा-योग (दो आसन्न केन्द्रों में सब ग्रह) में जन्मे सदा उद्यमी, यज्ञशील, शास्त्र-संगीत में कुशल और धन-स्वर्ण-रत्न से सम्पन्न होते हैं।

English rendering Those born in Gadā are ever industrious and intent on wealth, performers of sacrifice, skilled in scripture and song, and rich in money, gold and gems.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गदा = 35.9)।

35.24
रोगार्ताः कुनखा मूर्खाः शकटानुजीविनो निःस्वा ।
मित्रस्वजनविहीनाः शकटे जाता भवन्ति नराः
rogārtāḥ kunakhā mūrkhāḥ śakaṭānujīvino niḥsvā |
mitrasvajanavihīnāḥ śakaṭe jātā bhavanti narāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोगार्ताः = रोग-पीड़ित; कुनखाः = बुरे नाखूनों वाले; मूर्खाः; शकटानुजीविनः = गाड़ी (शकट) से जीविका चलाने वाले; निःस्वाः = निर्धन; मित्रस्वजनविहीनाः = मित्र और स्वजन से रहित; शकटे जाताः भवन्ति नराः = शकट-योग में जन्मे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शकट-योग (सब ग्रह लग्न-सप्तम में) में जन्मे रोगी, कुनखी, मूर्ख, गाड़ी-जीवी, निर्धन और मित्र-स्वजन-हीन कहे गए हैं। योग का नाम ही जीविका में प्रतिबिम्बित — पाठ की शैली।

English rendering Those born in Śakaṭa are sickly, with bad nails, foolish, living by carts, poor, and bereft of friends and kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शकट = 35.9)।

35.25
भ्रमणरुचयोविकृष्टा दूताः सुरतानुजीवनो धृष्टाः ।
कलहप्रियाश्च नित्यं विहगे योगे सदा जाताः
bhramaṇarucayovikṛṣṭā dūtāḥ suratānujīvano dhṛṣṭāḥ |
kalahapriyāśca nityaṃ vihage yoge sadā jātāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रमणरुचयः = भ्रमण में रुचि वाले; विकृष्टाः = (पाठ) खिंचे/विकृत — पाठ-भेद संभव; दूताः = दूत; सुरतानुजीविनः = सुरत (काम) से जीविका वाले; धृष्टाः = धृष्ट; कलहप्रियाः च नित्यम् = सदा कलह-प्रिय; विहगे योगे सदा जाताः = विहग-योग में जन्मे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — विहग-योग (सब ग्रह चतुर्थ-दशम में) में जन्मे भ्रमण-रुचि वाले, दूत-कर्मी, धृष्ट और कलह-प्रिय कहे गए हैं। "विहग" (पक्षी) की उड़ान भ्रमण में प्रतिबिम्बित।

English rendering Those born in Vihaga love wandering, serve as messengers, live by pleasure, are bold, and ever fond of quarrels.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विहग = 35.9)।

35.26
प्रियकलहाः समरसहाः सुखिनो नृपतेः शुभकलत्राः ।
आढ्या युवतिद्वेष्याः स्रृङ्गाटकसम्भवा मनुजाः
priyakalahāḥ samarasahāḥ sukhino nṛpateḥ śubhakalatrāḥ |
āḍhyā yuvatidveṣyāḥ srṛṅgāṭakasambhavā manujāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रियकलहाः = कलह-प्रिय; समरसहाः = युद्ध सहने वाले; सुखिनः = सुखी; नृपतेः शुभकलत्राः = राजा के (सदृश) उत्तम पत्नी वाले; आढ्याः = धनी; युवतिद्वेष्याः = युवतियों के द्वेष-पात्र; शृङ्गाटकसम्भवाः मनुजाः = शृङ्गाटक-योग में जन्मे मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शृङ्गाटक-योग (सब ग्रह लग्न-पञ्चम-नवम में) में जन्मे कलह-प्रिय, युद्ध-सहिष्णु, सुखी, उत्तम पत्नी वाले, धनी, किन्तु युवतियों के अप्रिय कहे गए हैं। "नृपतेः" का अन्वय राजा-सदृश पत्नी-सुख से — पाठ-भेद संभव।

English rendering Those born in Śṛṅgāṭaka are fond of strife, bear up in battle, are happy, have a good wife like a king's, are rich, and are disliked by young women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शृङ्गाटक = 35.10)।

35.27
बह्वाशिनो दरिद्राः कृषीवला दुःखिताश्च सोद्वेगा ।
बन्धुसुहृदिभः त्यक्ताः प्रेष्याः हलसंज्ञके सदा पुरुषाः
bahvāśino daridrāḥ kṛṣīvalā duḥkhitāśca sodvegā |
bandhusuhṛdibhaḥ tyaktāḥ preṣyāḥ halasaṃjñake sadā puruṣāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बह्वाशिनः = बहुत खाने वाले; दरिद्राः; कृषीवलाः = कृषक; दुःखिताः च सोद्वेगाः = दुःखी और उद्विग्न; बन्धु-सुहृद्भिः त्यक्ताः = बन्धु-मित्रों से त्यक्त; प्रेष्याः = सेवक; हलसंज्ञके सदा पुरुषाः = हल-योग में (जन्मे) पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हल-योग (लग्न-भिन्न त्रिकोण-त्रयी में सब ग्रह) में जन्मे बहुभोजी, दरिद्र, कृषक, दुःखी-उद्विग्न, बन्धु-त्यक्त और सेवक-वृत्ति वाले कहे गए हैं। "हल" कृषि का प्रतीक — फल में कृषीवल।

English rendering Those born in Hala eat much, are poor, are farmers, sorrowful and anxious, forsaken by kin and friends, and serve others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (हल = 35.10)।

35.28
आद्यन्तवयःसुखिनः शूराः सुभगा निरीहाश्चः ।
भाग्यविहीना वज्रे जाताः खला विरुद्धाश्च
ādyantavayaḥsukhinaḥ śūrāḥ subhagā nirīhāścaḥ |
bhāgyavihīnā vajre jātāḥ khalā viruddhāśca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आद्यन्तवयःसुखिनः = आयु के आदि और अन्त में सुखी; शूराः; सुभगाः = सौभाग्यशाली/सुन्दर; निरीहाः च = निस्पृह; भाग्यविहीनाः = (मध्य में) भाग्यहीन; वज्रे जाताः = वज्र-योग में जन्मे; खलाः विरुद्धाः च = खल और विरोधी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वज्र-योग (शुभ लग्न-सप्तम, पाप चतुर्थ-दशम) में जन्मे आयु के आरम्भ और अन्त में सुखी, शूर, सुभग, निस्पृह, पर (मध्य में) भाग्यहीन, खल और विरोधी कहे गए हैं। "वज्र" के दोनों सिरे मोटे, बीच पतला — आयु-वक्र की उपमा।

English rendering Those born in Vajra are happy in the first and last parts of life, brave, fortunate in looks, desireless, yet without luck (in between), wicked and contrary.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वज्र = 35.11)।

35.29
व्रतनियममङ्गलपरा वयसो मध्ये सुखार्थपुत्रयुता ।
दातारः स्थिरचित्ता यवयोगभवाः सदा पुरुषाः
vrataniyamamaṅgalaparā vayaso madhye sukhārthaputrayutā |
dātāraḥ sthiracittā yavayogabhavāḥ sadā puruṣāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्रत-नियम-मङ्गल-पराः = व्रत, नियम और मङ्गल-कार्यों में तत्पर; वयसः मध्ये = आयु के मध्य में; सुख-अर्थ-पुत्र-युताः = सुख, धन और पुत्र से युक्त; दातारः = दानी; स्थिरचित्ताः = स्थिर-चित्त; यवयोगभवाः सदा पुरुषाः = यव-योग में जन्मे पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यव-योग (शुभ चतुर्थ-दशम, पाप लग्न-सप्तम) में जन्मे व्रत-नियम-मङ्गल में तत्पर, आयु के मध्य में सुख-धन-पुत्र से युक्त, दानी और स्थिर-चित्त होते हैं। वज्र का प्रति-पक्ष: "यव" (जौ) बीच में मोटा — मध्य-आयु का सुख।

English rendering Those born in Yava are devoted to vows, observances and auspicious acts, enjoy comfort, wealth and sons in mid-life, are generous and steady of mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (यव = 35.11)।

35.30
विभवगुणाद्ग्।याः पुरुषाः स्थिरायुषो विपुलकीर्तय शुद्धाः ।
शुभशतकाः पृथ्वीशाः कमलभवाः मानवा नित्यम्
vibhavaguṇādg|yāḥ puruṣāḥ sthirāyuṣo vipulakīrtaya śuddhāḥ |
śubhaśatakāḥ pṛthvīśāḥ kamalabhavāḥ mānavā nityam
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभव-गुण-आढ्याः (पाठ "गुणाद्ग्।याः") = वैभव और गुणों से सम्पन्न; पुरुषाः; स्थिरायुषः = स्थिर आयु वाले; विपुलकीर्तयः = विपुल कीर्ति वाले; शुद्धाः; शुभशतकाः = सौ शुभ (गुणों) वाले; पृथ्वीशाः = पृथ्वीपति; कमलभवाः मानवाः नित्यम् = कमल-योग में जन्मे मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कमल-योग (सब ग्रह चारों केन्द्रों में) में जन्मे वैभव-गुण-सम्पन्न, दीर्घ-स्थिर आयु, विपुल कीर्ति, शुद्ध, शत-शुभ-गुणी और पृथ्वीपति कहे गए हैं। पाठ-भेद संभव (प्रथम चरण)।

English rendering Those born in Kamala are rich in prosperity and virtues, of stable life-span, widely famed, pure, of a hundred merits, and rulers of the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कमल = 35.12)।

35.31
निधिकरणे निपुणधियः स्थिरार्थसुखसंयुता सुतयुताश्च ।
नयनसुखसम्प्रहृष्टा वापीयोगेन राजानः
nidhikaraṇe nipuṇadhiyaḥ sthirārthasukhasaṃyutā sutayutāśca |
nayanasukhasamprahṛṣṭā vāpīyogena rājānaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निधिकरणे निपुणधियः = निधि (कोष) बनाने में निपुण बुद्धि वाले; स्थिर-अर्थ-सुख-संयुताः = स्थिर धन और सुख से युक्त; सुतयुताः च = पुत्रों से युक्त; नयनसुख-सम्प्रहृष्टाः = नेत्र-सुख से प्रसन्न; वापीयोगेन राजानः = वापी-योग से राजा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वापी-योग (सब ग्रह केन्द्रों के बाहर) में जन्मे कोष-निर्माण में निपुण, स्थिर धन-सुख और पुत्रों से युक्त, नेत्र-सुख से प्रसन्न और राजा कहे गए हैं। "वापी" (बावड़ी) = संचित जल — निधि-संचय की उपमा।

English rendering Those born through Vāpī are skilled in laying up treasure, have stable wealth, comfort and sons, delight in what pleases the eye, and are kings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वापी = 35.12)।

35.32
आत्मविदिज्यानिरतः स्त्रिया युतः सत्त्वसम्पन्नः ।
व्रतनियमरतमनुस्यो यूपे जातो विशिष्टश्च
ātmavidijyānirataḥ striyā yutaḥ sattvasampannaḥ |
vrataniyamaratamanusyo yūpe jāto viśiṣṭaśca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मवित् = आत्मज्ञानी; इज्यानिरतः = यज्ञ में रत; स्त्रिया युतः = स्त्री से युक्त; सत्त्वसम्पन्नः = सत्त्व-गुण-सम्पन्न; व्रतनियमरतमनुष्यः = व्रत-नियम में रत मनुष्य; यूपे जातः विशिष्टः च = यूप-योग में जन्मा और विशिष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यूप-योग (लग्न से चार भावों में सब ग्रह) में जन्मा आत्मज्ञानी, यज्ञ-रत, पत्नी-युक्त, सात्त्विक, व्रत-नियम-परायण और विशिष्ट होता है। "यूप" यज्ञ-स्तम्भ — यज्ञ-निष्ठा की उपमा।

English rendering One born in Yūpa knows the self, is devoted to sacrifice, has a wife, is endowed with sattva, keeps vows and observances, and is distinguished.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (यूप = 35.13)।

35.33
इषुकारा बन्धनपाः मृगयाधनसेविताश्च मंसादा ।
हिंस्राः कुशिल्पकाराः शरयोगे मानवाः प्रसूयन्ते
iṣukārā bandhanapāḥ mṛgayādhanasevitāśca maṃsādā |
hiṃsrāḥ kuśilpakārāḥ śarayoge mānavāḥ prasūyante
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इषुकाराः = बाण बनाने वाले; बन्धनपाः = बन्दीगृह के रक्षक; मृगया-धन-सेविताः = शिकार और धन में लगे; मांसादाः (पाठ "मंसादा") = मांस-भोजी; हिंस्राः = हिंसक; कुशिल्पकाराः = निम्न शिल्प करने वाले; शरयोगे मानवाः प्रसूयन्ते = शर-योग में मनुष्य जन्मते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शर-योग (चतुर्थ से चार भावों में सब ग्रह) में जन्मे बाण-निर्माता, बन्दी-रक्षक, आखेट-धन में लगे, मांस-भोजी, हिंसक और निम्न-शिल्पी कहे गए हैं। "शर" (बाण) की उपमा।

English rendering Those born in Śara are arrow-makers, jail-keepers, given to hunting and gain, meat-eaters, violent, and workers of base crafts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शर = 35.13)।

35.34
धनरहितविफलदुःखितनीचलसाश्चिरायुषः पुरुषाः ।
संग्रामबुद्धिनिपुणाः शक्त्यां जाताः स्थिराः शुभगाः
dhanarahitaviphaladuḥkhitanīcalasāścirāyuṣaḥ puruṣāḥ |
saṃgrāmabuddhinipuṇāḥ śaktyāṃ jātāḥ sthirāḥ śubhagāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनरहित-विफल-दुःखित-नीच-अलसाः = धनहीन, विफल, दुःखी, नीच और आलसी; चिरायुषः पुरुषाः = दीर्घायु पुरुष; संग्रामबुद्धिनिपुणाः = युद्ध-बुद्धि में निपुण; शक्त्यां जाताः = शक्ति-योग में जन्मे; स्थिराः शुभगाः = स्थिर और सुभग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शक्ति-योग (सप्तम से चार भावों में सब ग्रह) में जन्मे धनहीन, विफल, दुःखी, नीच-आलसी किन्तु दीर्घायु, युद्ध-बुद्धि में निपुण, स्थिर और सुभग कहे गए हैं। मिश्रित फल — पाठ की सूची।

English rendering Those born in Śakti are poor, unsuccessful, sorrowful, low and idle, yet long-lived, skilled in the strategy of battle, steady and well-favoured.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शक्ति = 35.13)।

35.35
हतपुत्रदारनिःस्वाः सर्वत्र च निर्धृंणाः स्वजनबाह्याः ।
दुःखितनीचप्रेष्या दण्डप्र्भवा भवन्ति नराः
hataputradāraniḥsvāḥ sarvatra ca nirdhṛṃṇāḥ svajanabāhyāḥ |
duḥkhitanīcapreṣyā daṇḍaprbhavā bhavanti narāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हत-पुत्र-दार-निःस्वाः = पुत्र-पत्नी-धन से रहित; सर्वत्र च निर्घृणाः = सर्वत्र निर्दय; स्वजनबाह्याः = स्वजनों से बहिष्कृत; दुःखित-नीच-प्रेष्याः = दुःखी, नीच, सेवक; दण्डप्रभवाः भवन्ति नराः = दण्ड-योग में जन्मे मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दण्ड-योग (दशम से चार भावों में सब ग्रह) में जन्मे पुत्र-पत्नी-धन से रहित, निर्दय, स्वजन-बहिष्कृत, दुःखी, नीच और सेवक कहे गए हैं। "दण्ड" (डंडा/दण्डन) की उपमा।

English rendering Those born in Daṇḍa lose sons, wife and wealth, are merciless everywhere, cast out by their own people, sorrowful, low and servile.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दण्ड = 35.13)।

35.36
सलिलोपजीविविभवाः बह्वाशाः ख्यातकीर्तयो दुष्टाः ।
कृपणा मलिना लुब्धा नौसञ्जाताः खलाः पुरुषाः
salilopajīvivibhavāḥ bahvāśāḥ khyātakīrtayo duṣṭāḥ |
kṛpaṇā malinā lubdhā nausañjātāḥ khalāḥ puruṣāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सलिलोपजीविविभवाः = जल (जल-सम्बन्धी कार्य) से जीविका और वैभव वाले; बह्वाशाः = बहुत आशाओं वाले; ख्यातकीर्तयः = प्रसिद्ध; दुष्टाः; कृपणाः = कंजूस; मलिनाः; लुब्धाः = लोभी; नौसञ्जाताः = नौका-योग में जन्मे; खलाः पुरुषाः = खल पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नौका-योग (लग्न से सात भावों में सब ग्रह) में जन्मे जल-जीवी, वैभवशाली, बहु-आशी, प्रसिद्ध किन्तु दुष्ट, कृपण, मलिन, लोभी और खल कहे गए हैं। "नौका" — जल-जीविका की उपमा।

English rendering Those born in Naukā prosper by water-borne livelihood, are full of hopes, famed, yet wicked, miserly, unclean, greedy and base.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नौका = 35.14)।

35.37
अनृतकथनबन्धनपा निष्किञ्चनाः शठाः क्रूराः ।
कूटसमुत्था नित्यं भवन्ति गिरिदुर्गवासिनो मनुजाः
anṛtakathanabandhanapā niṣkiñcanāḥ śaṭhāḥ krūrāḥ |
kūṭasamutthā nityaṃ bhavanti giridurgavāsino manujāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनृत-कथन-बन्धन-पाः = असत्य-भाषी और बन्दी-रक्षक; निष्किञ्चनाः = अकिञ्चन (दरिद्र); शठाः = धूर्त; क्रूराः; कूटसमुत्थाः = कूट-योग में जन्मे; नित्यं भवन्ति = सदा होते हैं; गिरिदुर्गवासिनः मनुजाः = पर्वत-दुर्ग में रहने वाले मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कूट-योग (चतुर्थ से सात भावों में सब ग्रह) में जन्मे असत्यवादी, बन्दी-रक्षक, दरिद्र, धूर्त, क्रूर और पर्वत-दुर्ग-वासी कहे गए हैं। "कूट" (शिखर/छल) — दोनों अर्थ फल में।

English rendering Those born in Kūṭa are liars and jailers, destitute, deceitful and cruel, and dwell in mountain strongholds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कूट = 35.14)।

35.38
स्वजनाश्रयो दयावान्नानानृपवल्लभः प्रकृष्टमतिः ।
प्रथमेऽन्त्ये वयसि नराः सुखवान् दीर्घायुरातपत्री स्यात्
svajanāśrayo dayāvānnānānṛpavallabhaḥ prakṛṣṭamatiḥ |
prathame'ntye vayasi narāḥ sukhavān dīrghāyurātapatrī syāt
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वजनाश्रयः = स्वजनों का आश्रय; दयावान् = दयालु; नानानृपवल्लभः = अनेक राजाओं का प्रिय; प्रकृष्टमतिः = श्रेष्ठ बुद्धि; प्रथमे अन्त्ये वयसि = आयु के आरम्भ और अन्त में; सुखवान् = सुखी; दीर्घायुः = दीर्घायु; आतपत्री स्यात् = छत्र (योग) वाला होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — छत्र-योग (सप्तम से सात भावों में सब ग्रह) में जन्मा स्वजनों का आश्रयदाता, दयालु, अनेक राजाओं का प्रिय, श्रेष्ठ-बुद्धि, आयु के आदि-अन्त में सुखी और दीर्घायु होता है। "आतपत्र" = छत्र।

English rendering One born in Chatra shelters his own people, is compassionate, dear to many kings, of excellent intellect, happy in the first and last parts of life, and long-lived.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (छत्र = 35.14)।

35.39
आनृतिकगुप्तपालाश्चोराः कितवाश्च कानने निरताः ।
कार्मुकयोगे जाता भाग्यविहीनाः शुभा वयोमध्ये
ānṛtikaguptapālāścorāḥ kitavāśca kānane niratāḥ |
kārmukayoge jātā bhāgyavihīnāḥ śubhā vayomadhye
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आनृतिक-गुप्तपालाः = असत्यवादी और गुप्त (रहस्य) के रक्षक; चोराः = चोर; कितवाः च = धूर्त/जुआरी; कानने निरताः = वन में रहने वाले; कार्मुकयोगे जाताः = कार्मुक (चाप/धनुष)-योग में जन्मे; भाग्यविहीनाः = भाग्यहीन; शुभाः वयोमध्ये = आयु के मध्य में शुभ (सुखी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कार्मुक (चाप)-योग (दशम से सात भावों में सब ग्रह) में जन्मे असत्यवादी, रहस्य-रक्षक, चोर, धूर्त, वन-वासी और भाग्यहीन, किन्तु आयु के मध्य में सुखी कहे गए हैं। "कार्मुक" = धनुष = 35.14 का चाप।

English rendering Those born in Kārmuka (the bow) are untruthful and keepers of secrets, thieves and gamblers, haunt the forest, lack fortune, yet fare well in mid-life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कार्मुक/चाप = 35.14)।

35.40
सेनापतयः सर्वी कान्तशरीरा नृपप्रिया बलिनः ।
मणिकनकभूषणयुता भवन्ति योगेऽर्धचन्द्राख्ये
senāpatayaḥ sarvī kāntaśarīrā nṛpapriyā balinaḥ |
maṇikanakabhūṣaṇayutā bhavanti yoge'rdhacandrākhye
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सेनापतयः = सेनापति; सर्वे (पाठ "सर्वी") = सब; कान्तशरीराः = सुन्दर शरीर वाले; नृपप्रियाः = राजा के प्रिय; बलिनः = बलवान्; मणिकनकभूषणयुताः = मणि-स्वर्ण-आभूषणों से युक्त; भवन्ति योगे अर्धचन्द्राख्ये = अर्धचन्द्र नामक योग में होते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अर्धचन्द्र-योग में जन्मे सेनापति, सुन्दर-शरीर, राज-प्रिय, बलवान् और मणि-स्वर्ण-भूषित होते हैं। इस साक्षी के परिभाषा-श्लोकों (35.13–35.17) में अर्धचन्द्र की परिभाषा नहीं है — व्यापक परम्परा में अर्धचन्द्र = केन्द्र-भिन्न (पणफर/आपोक्लिम) भाव से आरम्भ कर सात लगातार भावों में सब ग्रह; पाठ-भेद संभव।

English rendering Those born in the yoga called Ardhacandra are army-commanders, of handsome body, dear to kings, strong, and adorned with gems and gold.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परिभाषा (परम्परा, इस साक्षी में अनुक्त): S ⊆ C_k(7), k ∉ {1, 4, 7, 10} — सात लगातार भाव, केन्द्र से आरम्भ न हो (35.14 के नौका/कूट/छत्र/चाप केन्द्रों से आरम्भ होते हैं; शेष आठ आरम्भ-बिन्दु अर्धचन्द्र)।

35.41
प्रणताऽऽशेषनराधिपकिरीटरत्नप्रभास्फुरितपादः ।
भवति नरेन्द्रो मनुजश्चक्रे यो जायते योगे
praṇatā''śeṣanarādhipakirīṭaratnaprabhāsphuritapādaḥ |
bhavati narendro manujaścakre yo jāyate yoge
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रणत-अशेष-नराधिप-किरीट-रत्न-प्रभा-स्फुरित-पादः = प्रणाम करते समस्त राजाओं के मुकुट-रत्नों की प्रभा से चमकते चरण वाला; भवति नरेन्द्रः = नरेन्द्र (सम्राट्) होता है; मनुजः = मनुष्य; चक्रे यः जायते योगे = जो चक्र-योग में जन्मता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चक्र-योग (लग्न से एकान्तर छह भावों में सब ग्रह) में जन्मा ऐसा नरेन्द्र होता है जिसके चरण प्रणत राजाओं के मुकुट-रत्नों की प्रभा से चमकते हैं। "चक्र" = चक्रवर्ती की उपमा — पाठ का सर्वोच्च राज-फल।

English rendering He who is born in the Cakra yoga becomes a lord of men whose feet gleam with the light of the crown-jewels of all the kings who bow before him.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चक्र = 35.15)।

35.42
बहुरत्नधनसमृद्धा भोगयुता धनजनप्रियाः ससुता ।
उदधिसमुत्थाः पुरुषाः स्थिरविभवाः साधुशीलाश्च
bahuratnadhanasamṛddhā bhogayutā dhanajanapriyāḥ sasutā |
udadhisamutthāḥ puruṣāḥ sthiravibhavāḥ sādhuśīlāśca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहु-रत्न-धन-समृद्धाः = बहुत रत्न-धन से समृद्ध; भोगयुताः = भोग-युक्त; धन-जन-प्रियाः = धन और जनों के प्रिय; ससुताः = पुत्र-सहित; उदधिसमुत्थाः पुरुषाः = समुद्र-योग में जन्मे पुरुष; स्थिरविभवाः = स्थिर वैभव वाले; साधुशीलाः च = और साधु-स्वभाव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — समुद्र-योग (द्वितीय से एकान्तर छह भावों में सब ग्रह) में जन्मे रत्न-धन-समृद्ध, भोगी, जन-प्रिय, पुत्रवान्, स्थिर-वैभव और साधु-शील होते हैं। "उदधि" = समुद्र — रत्नों का आगार।

English rendering Those born in Samudra abound in gems and wealth, enjoy pleasures, are dear to wealth and people, have sons, possess stable prosperity and a gentle character.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (समुद्र = 35.15)।

35.43
प्रियगीतनृत्यवाद्या निपुणाः सुखिनश्च धनवन्तः ।
नेतारो बहुभृत्या वीणायां कीर्तिताः पुरुषाः
priyagītanṛtyavādyā nipuṇāḥ sukhinaśca dhanavantaḥ |
netāro bahubhṛtyā vīṇāyāṃ kīrtitāḥ puruṣāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रिय-गीत-नृत्य-वाद्याः = गीत, नृत्य, वाद्य के प्रेमी; निपुणाः = निपुण; सुखिनः च धनवन्तः = सुखी और धनवान्; नेतारः = नेता; बहुभृत्याः = बहुत सेवकों वाले; वीणायां कीर्तिताः पुरुषाः = वीणा-योग में (जन्मे) पुरुष कहे गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वीणा-योग (सातों ग्रह सात भिन्न राशियों में) में जन्मे गीत-नृत्य-वाद्य-प्रिय, निपुण, सुखी, धनी, नेता और बहु-सेवक होते हैं। सात राशियाँ = वीणा के सात स्वर — उपमा।

English rendering Those born in Vīṇā love song, dance and music, are skilful, happy and wealthy, leaders, and have many servants.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वीणा = n = 7, 35.17)।

35.44
दाम्नि सुजनोपकारी नयधनयुक्तो महेश्वरः ख्यातः ।
बहुसुतरत्नसमृद्धो धीरो जायेत विद्वांश्च
dāmni sujanopakārī nayadhanayukto maheśvaraḥ khyātaḥ |
bahusutaratnasamṛddho dhīro jāyeta vidvāṃśca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाम्नि = दाम-योग में; सुजनोपकारी = सज्जनों का उपकारी; नय-धन-युक्तः = नीति और धन से युक्त; महेश्वरः ख्यातः = "महेश्वर" (महान् स्वामी) रूप में प्रसिद्ध; बहु-सुत-रत्न-समृद्धः = बहुत पुत्रों और रत्नों से समृद्ध; धीरः जायेत विद्वान् च = धीर और विद्वान् होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दाम-योग (सातों ग्रह छह राशियों में) में जन्मा सज्जन-उपकारी, नीतिवान्, धनी, महान् स्वामी के रूप में प्रसिद्ध, बहु-पुत्र-रत्न-समृद्ध, धीर और विद्वान् होता है।

English rendering In Dāma one is a benefactor of the good, endowed with policy and wealth, renowned as a great lord, rich in many sons and gems, steadfast and learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दाम = n = 6, 35.17)।

35.45
पाशे बन्धनभाजः कार्ये दक्षाः प्रपञ्चकाराश्च ।
बहुभाषिणो विशीला बहुभृत्याः सम्प्रतानाश्च
pāśe bandhanabhājaḥ kārye dakṣāḥ prapañcakārāśca |
bahubhāṣiṇo viśīlā bahubhṛtyāḥ sampratānāśca
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाशे = पाश-योग में; बन्धनभाजः = बन्धन (कारावास/बन्ध) भोगने वाले; कार्ये दक्षाः = कार्य में दक्ष; प्रपञ्चकाराः च = प्रपञ्च (छल/विस्तार) करने वाले; बहुभाषिणः = बहुत बोलने वाले; विशीलाः = शील-हीन; बहुभृत्याः = बहु-सेवक; सम्प्रतानाः च = बहुत सन्तति वाले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पाश-योग (सातों ग्रह पाँच राशियों में) में जन्मे बन्धन-भागी, कार्य-दक्ष, प्रपञ्ची, वाचाल, शील-हीन, बहु-सेवक और बहु-सन्तति कहे गए हैं। "पाश" (फन्दा) — बन्धन की उपमा।

English rendering In Pāśa one suffers bonds, is able in work, contrives schemes, talks much, lacks good conduct, and has many servants and offspring.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाश = n = 5, 35.17)।

35.46
सुबहूनामुपयोज्याः कृषीवलाः सत्यवादिनः सुखिनः ।
केदारे सम्भूताश्चलस्वभावा धनैर्युक्ताः
subahūnāmupayojyāḥ kṛṣīvalāḥ satyavādinaḥ sukhinaḥ |
kedāre sambhūtāścalasvabhāvā dhanairyuktāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुबहूनाम् उपयोज्याः = बहुतों के उपयोगी (सेवा में आने वाले); कृषीवलाः = कृषक; सत्यवादिनः = सत्यवादी; सुखिनः; केदारे सम्भूताः = केदार-योग में जन्मे; चलस्वभावाः = चंचल स्वभाव; धनैः युक्ताः = धन-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — केदार-योग (सातों ग्रह चार राशियों में) में जन्मे बहुतों के काम आने वाले, कृषक, सत्यवादी, सुखी, चंचल-स्वभाव और धनी कहे गए हैं। "केदार" = खेत — कृषि की उपमा।

English rendering Those born in Kedāra are of use to many, farmers, truthful, happy, of restless nature, and possessed of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केदार = n = 4, 35.16)।

35.47
तीक्ष्णालसधनहीना हिंस्राः सुबहिष्कृता महाशूराः ।
संग्रामे लब्धयशा शूले योगे भवन्ति नराः
tīkṣṇālasadhanahīnā hiṃsrāḥ subahiṣkṛtā mahāśūrāḥ |
saṃgrāme labdhayaśā śūle yoge bhavanti narāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तीक्ष्णाः = तीक्ष्ण; अलसाः = आलसी; धनहीनाः; हिंस्राः = हिंसक; सुबहिष्कृताः = अत्यन्त बहिष्कृत; महाशूराः = महान् शूर; संग्रामे लब्धयशाः = युद्ध में यश पाने वाले; शूले योगे भवन्ति नराः = शूल-योग में मनुष्य होते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शूल-योग (सातों ग्रह तीन राशियों में) में जन्मे तीक्ष्ण, आलसी, धनहीन, हिंसक, बहिष्कृत किन्तु महाशूर और रण-यशस्वी कहे गए हैं। "शूल" (त्रिशूल) — तीन राशियाँ, तीक्ष्णता की उपमा।

English rendering Those born in Śūla are sharp, idle, poor, violent and much ostracised, yet great heroes who win fame in battle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शूल = n = 3, 35.16)।

35.48
पाखण्डवादिनो वा धनरहिता वा बहिष्कृता लोके ।
सुतमातृधर्मरहिता युगयोगे ये नरा जाताः
pākhaṇḍavādino vā dhanarahitā vā bahiṣkṛtā loke |
sutamātṛdharmarahitā yugayoge ye narā jātāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाखण्डवादिनः वा = पाखण्ड बोलने वाले; धनरहिताः वा = धनहीन; बहिष्कृताः लोके = लोक में बहिष्कृत; सुत-मातृ-धर्म-रहिताः = पुत्र, माता और धर्म से रहित; युगयोगे ये नराः जाताः = जो मनुष्य युग-योग में जन्मे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — युग-योग (सातों ग्रह दो राशियों में) में जन्मे पाखण्डी, धनहीन, लोक-बहिष्कृत और पुत्र-माता-धर्म से रहित कहे गए हैं। यह पाठ का कठोरतम संख्या-फल है; नियति नहीं, वर्गीकरण।

English rendering Those born in Yuga are heretical speakers, without wealth, cast out in the world, and bereft of sons, mother and dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (युग = n = 2, 35.16)।

35.49
बलसंयुक्ता विधना वद्याविज्ञानवर्जिता मलिना ।
नित्यं दुःखितदीना गोले योगे भवन्ति नराः
balasaṃyuktā vidhanā vadyāvijñānavarjitā malinā |
nityaṃ duḥkhitadīnā gole yoge bhavanti narāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बलसंयुक्ताः = बलवान्; विधनाः = धनहीन; विद्या-विज्ञान-वर्जिताः (पाठ "वद्याविज्ञान") = विद्या-विज्ञान से रहित; मलिनाः; नित्यं दुःखित-दीनाः = सदा दुःखी और दीन; गोले योगे भवन्ति नराः = गोल-योग में मनुष्य होते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गोल-योग (सातों ग्रह एक ही राशि में) में जन्मे बलवान् किन्तु धनहीन, विद्या-विज्ञान-रहित, मलिन और सदा दुःखी-दीन कहे गए हैं। सातों ग्रहों का एक राशि में समावेश अत्यन्त दुर्लभ है — फल पाठ का।

English rendering Those born in Gola are strong yet poor, devoid of learning and science, unclean, and ever sorrowful and wretched.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गोल = n = 1, 35.16)। दुर्लभता: सातों ग्रह एक 30° खण्ड में — सूर्य-सान्निध्य से सब अस्त-सदृश; खगोलीय रूप से विरल।

35.50
सर्वास्वपि दशस्वेते भवेयुः फलदायिनः ।
प्राणिनामिति विज्ञेयाः प्रवदन्ति तवाग्रजाः
sarvāsvapi daśasvete bhaveyuḥ phaladāyinaḥ |
prāṇināmiti vijñeyāḥ pravadanti tavāgrajāḥ
पाठ-स्रोत / text source: sanskritdocuments.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वासु अपि दशासु = सभी दशाओं में; एते = ये (नाभस योग); भवेयुः फलदायिनः = फल देने वाले होते हैं; प्राणिनाम् = प्राणियों के लिए; इति विज्ञेयाः = ऐसा जानना चाहिए; प्रवदन्ति = कहते हैं; तव अग्रजाः = तुम्हारे पूर्वज (पूर्वाचार्य)।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का समापन — शास्त्र कहता है कि नाभस योग सभी दशाओं में फल देते हैं, ऐसा पूर्वाचार्य कहते हैं। अन्य योग अपने कारक ग्रहों की दशा में फलते हैं; नाभस योग आकृति-जन्य होने से जीवन भर सक्रिय माने गए — यही उनकी विशेषता है।

English rendering "These (nābhasa yogas) give their results to beings in all the daśās — so it is to be known, and so declare your predecessors."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नियम-कथन (दशा-निरपेक्षता)। विंशोत्तरी की किसी भी महादशा/अन्तर्दशा में नाभस-फल का अंश जोड़ा जाता है — ग्रह-दशा-बद्ध नहीं।

अध्यायः 36

विविधयोगाध्यायः

39 श्लोक
36.1
लग्ने शुभयुते योगः शुभः पापयुतेऽशुभः।
व्ययस्वगैः शुभैः पापैः क्रमाद्योगौ शुभाऽशुभौ
lagne śubhayute yogaḥ śubhaḥ pāpayute'śubhaḥ|
vyayasvagaiḥ śubhaiḥ pāpaiḥ kramādyogau śubhā'śubhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = उदय-राशि/प्रथम भाव में; शुभयुते = शुभ-ग्रह से युक्त; योगः शुभः = योग शुभ; पापयुतेऽशुभः = पाप-ग्रह से युक्त होने पर अशुभ; व्यय = द्वादश भाव; स्वगैः = स्व-गृह/स्व-स्थान में स्थित; शुभैः पापैः = शुभों और पापों से; क्रमात् = क्रमशः; योगौ शुभाऽशुभौ = शुभ तथा अशुभ योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न में शुभ-ग्रह बैठे हों तो योग शुभ होता है; पाप-ग्रह बैठे हों तो योग अशुभ। व्यय-भाव (द्वादश) में और अपने-अपने स्थानों में शुभ तथा पाप क्रमशः शुभ-योग और अशुभ-योग उत्पन्न करते हैं। यह अध्याय के योग-वर्णन का सामान्य नियम है — फल-विस्तार अगले श्लोकों में आता है।

English rendering The text states that a yoga formed with benefics in the lagna is auspicious, and one formed with malefics is inauspicious. Benefics and malefics placed in the twelfth house and in their own domains yield, respectively, auspicious and inauspicious yogas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-निर्णय का संरचना-नियम (computation of strength/period नहीं):
• लग्न-योग: Lagna occupied by graha ∈ {शुभ} → शुभ-योग; ∈ {पाप} → अशुभ-योग।
• व्यय-स्वग: 12th (vyaya) तथा स्व-स्थान पर शुभ → शुभ; पाप → अशुभ।
पारंपरिक शुभ: बृहस्पति, शुक्र, (शुद्ध) बुध, (पूर्ण) चन्द्र; पाप: सूर्य, मंगल, शनि, राहु-केतु — पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव। भाव-गणना: whole-sign या equal-house दोनों में “लग्न/व्यय” पद समान रह सकते हैं; convention घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मान लें whole-sign: लग्न = मेष, शुक्र = मेष (लग्न-युक्त) → 36.1 के अनुसार शुभ-योग संकेत। यदि शनि = मेष (लग्न-युक्त) → अशुभ-योग संकेत। यदि बृहस्पति = मीन (व्यय = द्वादश from मेष) → व्यय-स्थित शुभ → शुभ-योग पक्ष। (फल-निर्णय अगले श्लोक/अन्य योग-नियमों से; यह श्लोक केवल युति-स्थान का नियम देता है।)

36.2
शुभयोगोद्‌भवो वाग्मी रूपशीलगुणवन्वितः।
पापयोगोद्‌भवः कामी पापकर्मा परार्थयुक्‌
śubhayogod‌bhavo vāgmī rūpaśīlaguṇavanvitaḥ|
pāpayogod‌bhavaḥ kāmī pāpakarmā parārthayuk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभयोगोद्भवः = शुभ-योग से उत्पन्न; वाग्मी = वाक्य-पटु/वक्ता; रूप-शील-गुण-अन्वितः = रूप, शील और गुणों से युक्त; पापयोगोद्भवः = पाप-योग से उत्पन्न; कामी = काम-प्रवृत्त; पापकर्मा = पाप-कर्म करने वाला; परार्थयुक् = पर-अर्थ में लगा/पर-कार्य-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुभ-योग में जन्मा व्यक्ति वाग्मी होता है और रूप, शील तथा गुणों से सम्पन्न कहा गया है। पाप-योग में जन्मा व्यक्ति काम-प्रवृत्त, पाप-कर्म-युक्त और परार्थ (दूसरों के प्रयोजन/अहित-पक्ष) में लगा हुआ कहा गया है। यह फल-कथन है — गणना नहीं; “योग” का निर्णय पूर्व श्लोक के युति-नियम से जुड़ता है।

English rendering The text states that one born under a benefic yoga is eloquent and endowed with beauty, character, and virtues. One born under a malefic yoga is described as lustful, given to wrongful deeds, and engaged in others’ (or alien) ends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। 36.1 की शुभ/अशुभ-योग संरचना पर शास्त्र का गुणात्मक फल; इसे नियति या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना।

36.3
केन्द्रे देवगुरौ लग्नाच्चन्द्राद्वा शुभदृग्‌युते।
नीचास्तारिगृहैर्हीने योगोऽयं गजकेसरी
kendre devagurau lagnāccandrādvā śubhadṛg‌yute|
nīcāstārigṛhairhīne yogo'yaṃ gajakesarī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रे = केन्द्र-भाव (1·4·7·10); देवगुरौ = बृहस्पति (गुरु); लग्नात् चन्द्रात् वा = लग्न से अथवा चन्द्र से; शुभदृग्युते = शुभ की दृष्टि व/या युति से युक्त; नीच = नीच-राशि; अस्त = सूर्य-सामीप्य से दग्ध (अस्तंगत); अरिगृह = शत्रु-राशि; हीने = इनसे रहित; गजकेसरी = गज-केसरी योग।

हिन्दी भावार्थ जब बृहस्पति लग्न से अथवा चन्द्र से केन्द्र (1·4·7·10) में स्थित हो, शुभ ग्रह की दृष्टि या युति से युक्त हो, तथा नीच-राशि, अस्त-अवस्था एवं शत्रु-गृह से रहित हो — तब यह "गजकेसरी" योग कहलाता है। शर्तें बल-प्रधान हैं: केन्द्र-स्थिति के साथ गुरु का गौरव (नीच/अस्त/शत्रु का अभाव) आवश्यक है।

English rendering When Jupiter stands in an angle (1/4/7/10) from the lagna or from the Moon, joined or aspected by a benefic, and free of debilitation, combustion and enemy-sign — this is the Gaja-Kesarī yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) केन्द्र = {1,4,7,10}; ग्रह केन्द्रगत ⇔ (भाव − 1) ≡ 0 (mod 3), कोणीय पृथक्करण 0°/90°/180°/270°। गुरु की परीक्षा लग्न-राशि तथा चन्द्र-राशि दोनों संदर्भों में की जाती है (सत्य किसी एक में पर्याप्त)। बहिष्करण-शर्त: राशि(गुरु) ∉ {नीच = मकर, शत्रु-राशि} तथा गुरु ∉ अस्त (सूर्य-सामीप्य; कक्षा-मान मतभेद-सापेक्ष — पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष, चन्द्र = मेष। गुरु = कर्क में। कर्क लग्न से 4th व चन्द्र से भी 4th → (4−1) mod 3 = 0 → दोनों ओर केन्द्र। कर्क = गुरु की उच्च-राशि (न नीच, न शत्रु), सूर्य दूर होने से अनस्त → गजकेसरी पूर्णतः सिद्ध।

हमारा डिकोड (Our Decode) "नीच/अस्त/शत्रु-हीन केन्द्रगत गुरु" वस्तुतः एक बल-प्रश्न है, कोई भावुक कथन नहीं। यही ग्रह-बल को The Architect के षड्बल इंजन (BPHS Ch.27) में स्थान-बल (उच्च/स्व बनाम नीच), दिग्बल (केन्द्र) व काल/चेष्टा-घटकों के रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में मापा जाता है — योग "बनता है या नहीं" इसका निर्णय संख्या पर टिकता है, अनुमान पर नहीं।

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36.4
गजकेसरीसञ्जातस्तेजस्वी धनवान्‌ भवेत्‌।
मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरो नरः
gajakesarīsañjātastejasvī dhanavān‌ bhavet‌|
medhāvī guṇasampanno rājapriyakaro naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गजकेसरीसञ्जातः = गजकेसरी में उत्पन्न; तेजस्वी = ओजपूर्ण; धनवान् = धनी; मेधावी = बुद्धिमान्; गुणसम्पन्नः = सद्गुण-युक्त; राजप्रियकरः = राजा को प्रिय कार्य करने वाला / राज-प्रिय; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार गजकेसरी योग में जन्मा व्यक्ति तेजस्वी, धनवान्, मेधावी, गुण-सम्पन्न तथा राजा का प्रिय-पात्र होता है। यह पूर्व-लक्षित योग का फल-कथन है, कोई गणना नहीं।

English rendering The text states that one born under Gaja-Kesarī becomes lustrous, wealthy, intelligent, virtuous, and dear to (or an obliger of) the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यातव्य: फल-श्लोक योग की "उपस्थिति/अनुपस्थिति" (द्विआधारी लक्षण) मानकर चलता है; तीव्रता का श्रेणीकरण यहाँ नहीं दिया गया, वह बल-गणना का विषय है।

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36.5
दशमेऽङ्गात्तथा चन्द्रात्‌ केवलैश्च शुभैर्युते।
स योगोऽमलकीत्र्त्याख्यः कीर्तिराचन्द्रतारकी
daśame'ṅgāttathā candrāt‌ kevalaiśca śubhairyute|
sa yogo'malakītrtyākhyaḥ kīrtirācandratārakī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = दशम भाव में; अङ्गात् = लग्न/देह (अङ्ग = लग्न) से; तथा चन्द्रात् = तथा चन्द्र से; केवलैः शुभैः युते = केवल शुभ-ग्रहों से युक्त; स योगः = वह योग; अमलकीर्त्याख्यः = अमलकीर्ति नामक; कीर्तिः = यश; आचन्द्रतारकी = चन्द्र-तारक पर्यन्त (अत्यन्त दीर्घ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न से दशम और चन्द्र से दशम, दोनों में केवल शुभ-ग्रह हों, तो वह योग अमलकीर्ति कहलाता है। इसकी कीर्ति चन्द्र और तारकों तक चलने वाली कही गई है। “केवलैः” शब्द पाप-मिश्रण को बाहर रखता है — मिश्र-युति पर पाठ/व्याख्या-भेद संभव।

English rendering The text states: when the tenth from the lagna and the tenth from the Moon are occupied only by benefics, that yoga is named Amala-kīrti, and the fame is said to last as long as the Moon and the stars.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशम-स्थान का विन्यास-परीक्षण:
• B₁₀(L) = 10th from lagna; B₁₀(C) = 10th from Moon (whole-sign: rāśi + 9 mod 12)।
• शर्त: occupants(B₁₀(L)) ⊆ {शुभ} और occupants(B₁₀(C)) ⊆ {शुभ}, तथा “केवल” = कोई पाप-ग्रह उन भावों में नहीं।
• रिक्त दशम: “युते” पद युति माँगता है — रिक्त भाव पर योग लागू हो या नहीं, यह व्याख्या-बिंदु (पाठ-भेद/टीका-भेद संभव)।
दोनों दशम शुभ-मात्र युक्त → योग = अमलकीर्ति।

उदाहरण (worked example) whole-sign: लग्न = मिथुन → दशम = मीन; चन्द्र = तुला → चन्द्र-दशम = कर्क। मीन में गुरु, कर्क में शुक्र — दोनों शुभ-मात्र → 36.5 के अनुसार अमलकीर्ति संकेत। यदि मीन में गुरु+शनि → “केवलैः शुभैः” भंग → योग नहीं।

36.6
राजपूज्ये महाभोगी दाता बन्धुजनप्रियः।
परोपकारी धर्मात्मा गुणढ्‌योऽमलकीर्तिजः
rājapūjye mahābhogī dātā bandhujanapriyaḥ|
paropakārī dharmātmā guṇaḍh‌yo'malakīrtijaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजपूज्यः = राजाओं द्वारा पूजित; महाभोगी = महान् भोग-युक्त; दाता = दानशील; बन्धुजनप्रियः = बन्धु-प्रिय; परोपकारी = पर-उपकार करने वाला; धर्मात्मा = धर्म-परायण; गुणढ्यः (गुणढ्‌यः) = गुणों से समृद्ध; अमलकीर्तिजः = अमलकीर्ति-योग से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अमलकीर्ति-योग में जन्मा व्यक्ति राज-पूज्य, महाभोगी, दाता और बन्धु-प्रिय होता है। वह परोपकारी, धर्मात्मा और गुण-समृद्ध कहा गया है। यह 36.5 का फल-वर्णन है; “गुणढ्‌यः” पाठ टंकण-रूप में है — गुणढ्यः अभिप्रेत, पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that one born of Amala-kīrti is honored by rulers, enjoys great comforts, is generous and dear to kin, helpful to others, righteous, and rich in virtues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। योग-पहचान 36.5 के “दशम-from-लग्न एवं दशम-from-चन्द्र, केवल शुभ” नियम से; यहाँ शास्त्र का गुणात्मक फल मात्र।

36.7
सप्तमे चाऽष्टमे शुद्धे शुभग्रहयुतेऽथवा।
केन्द्रेषु शुभयुक्तेषु योगः पर्वतसंज्ञकः
saptame cā'ṣṭame śuddhe śubhagrahayute'thavā|
kendreṣu śubhayukteṣu yogaḥ parvatasaṃjñakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे = सप्तम भाव; अष्टमे = अष्टम भाव; शुद्धे = शुद्ध/पाप-रहित (या रिक्त-स्वच्छ); शुभग्रहयुते अथवा = अथवा शुभ-ग्रह से युक्त; केन्द्रेषु = केन्द्र-भावों में; शुभयुक्तेषु = शुभ-युक्त होने पर; योगः पर्वतसंज्ञकः = पर्वत नामक योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम और अष्टम शुद्ध हों, अथवा शुभ-ग्रहों से युक्त हों, और केन्द्र शुभ-ग्रहों से युक्त हों, तो योग पर्वत कहलाता है। “शुद्ध” का अर्थ टीकाओं में प्रायः पाप-रहित/निर्दोष भाव है; पूर्ण परिभाषा के अन्य अंग अन्य श्लोकों/पाठों में मिल सकते हैं — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when the seventh and eighth are pure, or joined by benefic planets, and the kendras are occupied by benefics, the yoga is named Parvata.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पर्वत-योग का विन्यास-परीक्षण:
• भाव: 7th, 8th “शुद्ध” = (व्याख्या A) पाप-मुक्त; अथवा “शुभग्रहयुते” = शुभ-युक्त।
• केन्द्र K = {1, 4, 7, 10}: प्रत्येक (या समुच्चय) शुभ-युक्त — “केन्द्रेषु शुभयुक्तेषु” बहुवचन से केन्द्रों में शुभ-स्थिति।
• whole-sign पर: भाव i = rāśi_L + (i−1) mod 12।
शर्त-समुच्चय सत्य → योग = पर्वत। (व्यापक “पञ्च-महापुरुष/नाभस” संलग्न परिभाषाओं से मिलान अलग recension में — यहाँ केवल 36.7 का पद।)

उदाहरण (worked example) whole-sign, लग्न = वृषभ → सप्तम = वृश्चिक, अष्टम = धनु, केन्द्र = वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ। वृश्चिक में शुक्र, धनु में गुरु (दोनों शुभ), लग्न में चन्द्र, सिंह में बुध, कुम्भ में शुक्र-दृष्टि/युति-पक्ष — “सप्तम-अष्टम शुभ/शुद्ध + केन्द्र शुभ-युक्त” पक्ष में पर्वत-संज्ञा का संकेत। सप्तम में शनि-मात्र → “शुद्ध/शुभ” पक्ष दुर्बल → 36.7 का योग नहीं।

36.8
भाग्यवान्‌ पर्वतोत्पन्नः वाग्मी दाता च शास्त्रवित्‌।
हास्यप्रियो यशस्वी च तेजस्वी पुरनायकः
bhāgyavān‌ parvatotpannaḥ vāgmī dātā ca śāstravit‌|
hāsyapriyo yaśasvī ca tejasvī puranāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यवान् = भाग्यशाली / पुण्य-भाग्य युक्त; पर्वतोत्पन्नः = पर्वत-प्रदेश में उत्पन्न; वाग्मी = वाक्-पटु, वक्ता; दाता = दानशील; शास्त्रवित् = शास्त्रज्ञ; हास्यप्रियः = हास्य-रस का प्रेमी; यशस्वी = कीर्तिमान्; तेजस्वी = तेजस्वी / प्रभावशाली; पुरनायकः = नगर/पुर का नायक (प्रमुख)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-निर्दिष्ट योग की स्थिति में) जातक भाग्यवान् होता है, पर्वतीय प्रदेश में जन्म लेने वाला, वाणी में निपुण, दान देने वाला और शास्त्रों का ज्ञाता होता है। वह हास्य-प्रेमी, यशस्वी, तेजस्वी और नगर का नायक/प्रमुख कहा गया है। यह पूरा वर्णन फल-कथन है — योग-परिभाषा का विस्तारित परिणाम।

English rendering The text states that such a person is fortunate, mountain-born, eloquent, generous, and learned in the śāstras; fond of humour, renowned, brilliant, and a leader of a city/town.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ कोई कोण-विभाजन, बल-इकाई या दशा-वर्ष नहीं; केवल पूर्व-श्लोकों में गठित योग के फलादेश का शास्त्रीय कथन है।

36.9
सुखेशेज्यौ मिथः केन्द्रगतौ बलिनि लग्नपे।
काहलो वा स्वभोच्चस्थे सुखेशे कर्मपान्विते
sukheśejyau mithaḥ kendragatau balini lagnape|
kāhalo vā svabhoccasthe sukheśe karmapānvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेशः = चतुर्थेश (सुख/4th का स्वामी); इज्यः = बृहस्पति; मिथः केन्द्रगतौ = परस्पर एक-दूसरे से केन्द्र में; बलिनि लग्नपे = लग्नेश के बलवान् होने पर; काहलः = काहल योग; स्वभोच्चस्थे सुखेशे = चतुर्थेश स्व-राशि या उच्च-राशि में; कर्मपान्विते = दशमेश से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ जब चतुर्थेश और बृहस्पति परस्पर केन्द्र में स्थित हों तथा लग्नेश बलवान् हो, तब "काहल" योग बनता है। अथवा जब चतुर्थेश अपनी राशि या उच्च-राशि में हो और दशमेश से युक्त हो — तब भी काहल बनता है। दोनों विकल्पों में बल और केन्द्र-सम्बन्ध केन्द्रीय शर्तें हैं।

English rendering When the 4th lord and Jupiter occupy mutual angles and the lagna-lord is strong, the Kāhala yoga arises; or when the 4th lord is in own/exaltation sign joined with the 10th lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परस्पर-केन्द्र (mithaḥ kendra): दो ग्रह A, B के लिए (राशि_B − राशि_A) ≡ 0 (mod 3) ⇔ गणना ∈ {1,4,7,10}। शर्त-1: चतुर्थेश ↔ गुरु परस्पर-केन्द्र ∧ बल(लग्नेश) ≥ थ्रेशहोल्ड। शर्त-2 (वैकल्पिक): राशि(चतुर्थेश) ∈ {स्व-राशि, उच्च-राशि} ∧ चतुर्थेश-दशमेश युति। "बलिन्" एक मापनीय राशि है, विशेषण मात्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष। चतुर्थ = कर्क → चतुर्थेश चन्द्र, मान लें चन्द्र मेष (लग्न) में; गुरु कर्क में। मेष(1) → कर्क(4): (4−1) mod 3 = 0 → परस्पर-केन्द्र। लग्नेश मंगल उच्च (मकर, 10वाँ) → बलवान् → काहल योग सिद्ध।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलिनि लग्नपे" को शब्द-भाव से नहीं, संख्या से तय किया जाता है: The Architect के षड्बल इंजन (BPHS Ch.27) में लग्नेश का स्थान·दिक्·काल·चेष्टा·नैसर्गिक·दृग् बल जोड़कर रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में कुल निकाला जाता है और प्रति-ग्रह थ्रेशहोल्ड से exact तुलना होती है — योग की सिद्धि इसी संख्यात्मक कसौटी पर, न कि सहज-अनुमान पर।

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36.10
ओजस्वी साहसी धूर्तश्चतुरङ्गबलान्वितः।
यत्‌किञ्चिद्‌ ग्रामनाथश्च काहले जायते नरः
ojasvī sāhasī dhūrtaścaturaṅgabalānvitaḥ|
yat‌kiñcid‌ grāmanāthaśca kāhale jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ओजस्वी = ओजस्वी / ऊर्जावान्; साहसी = साहसयुक्त; धूर्तः = चतुर / धूर्त (नीति-कुशल, पाठानुसार); चतुरङ्गबलान्वितः = चतुरंग-बल (हस्ति-अश्व-रथ-पदाति) से युक्त; यत्किञ्चिद् ग्रामनाथः = किसी सीमा तक ग्राम-नायक; काहले = काहल योग में; जायते नरः = पुरुष उत्पन्न होता है (जन्म लेता है)।

हिन्दी भावार्थ काहल योग में उत्पन्न जातक के विषय में शास्त्र कहता है कि वह ओजस्वी, साहसी और चतुर होता है। उसे चतुरंग-सेना/बल से युक्त बताया गया है तथा किसी रूप में ग्राम-नायक कहा गया है। यह फल-कथन है — योग की उपस्थिति का शास्त्रीय परिणाम-वर्णन, न कि कोई संख्यात्मक सूत्र।

English rendering Under Kāhala, the text states, a person is vigorous, daring, crafty/skilful, endowed with fourfold military strength, and becomes, in some measure, a village chief.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “चतुरङ्गबल” यहाँ शास्त्रीय रूपक/पद-विन्यास है, न कि षड्बल की virūpa-इकाई; गणना 36.9 की स्थिति-शर्तों से पहले पूरी हो चुकी मानी जाती है।

36.11
लग्नेशे तुङ्गगे केन्द्रे गुरुदृष्टे तु चामरः।
शुभद्वये विलग्ने वा नवमे दशमे मदे
lagneśe tuṅgage kendre gurudṛṣṭe tu cāmaraḥ|
śubhadvaye vilagne vā navame daśame made

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्नेश; तुङ्गगे = उच्च-राशि-स्थ; केन्द्रे = केन्द्र में; गुरुदृष्टे = बृहस्पति से दृष्ट; तु चामरः = तब चामर योग; शुभद्वये = दो शुभ ग्रह; विलग्ने वा = लग्न में अथवा; नवमे = नवम (9); दशमे = दशम (10); मदे = सप्तम भाव (मद/काम = 7)।

हिन्दी भावार्थ जब लग्नेश उच्च-राशि में होकर केन्द्र में स्थित हो और बृहस्पति से दृष्ट हो, तब "चामर" योग बनता है। अथवा जब दो शुभ ग्रह लग्न, नवम, दशम या सप्तम भाव में स्थित हों — तब भी यह योग बनता है। यहाँ लग्नेश का उच्चत्व, केन्द्र-स्थिति और गुरु-दृष्टि का त्रिविध बल-संगम प्रधान है।

English rendering When the lagna-lord is exalted in an angle and aspected by Jupiter, the Cāmara yoga is formed; or when a pair of benefics occupies the lagna, the 9th, the 10th, or the 7th.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-1: राशि(लग्नेश) = उच्च-राशि ∧ भाव(लग्नेश) ∈ केन्द्र {1,4,7,10} ((b−1)≡0 mod 3) ∧ गुरु-दृष्टि(लग्नेश) सत्य। शर्त-2 (वैकल्पिक): |शुभ ग्रह ∈ भाव b| ≥ 2, जहाँ b ∈ {1, 9, 10, 7 (मद)}। "द्वये" = 2 (अंक-निष्ठ)। मद = सप्तम की रूढ़ि — पाठ/परम्परा-भेद संभव, पर बहुधा 7वाँ भाव।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष → लग्नेश मंगल। मंगल मकर (उच्च) में = भाव 10 (केन्द्र); उस पर गुरु की दृष्टि → तीनों शर्तें पूरी → चामर योग सिद्ध। मकर मंगल की उच्च-राशि होने से स्थान-बल भी उच्चतम।

हमारा डिकोड (Our Decode) "तुङ्गग" (उच्च) केवल विशेषण नहीं — यह स्थान-बल का उच्चतम बिन्दु है। The Architect के षड्बल इंजन में उच्च-बल (उच्चांश से दूरी का फलन) को विरूप में गिना जाता है; अतः "उच्च लग्नेश केन्द्र में गुरु-दृष्ट" एक बल-अधिकतमीकरण की स्थिति है जिसे संख्या से सत्यापित किया जा सकता है, अनुमान से नहीं।

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36.12
राजा वा राजपुज्यो वा चिरजीवी च पण्डितः।
वाग्मी सर्वकलाविद्‌ वा चामरे जायते जनः
rājā vā rājapujyo vā cirajīvī ca paṇḍitaḥ|
vāgmī sarvakalāvid‌ vā cāmare jāyate janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजा = नरेश; राजपूज्यः = राजा द्वारा पूजित/सम्मानित; चिरजीवी = दीर्घायु; पण्डितः = विद्वान्; वाग्मी = वाक्-पटु; सर्वकलाविद् = सभी कलाओं का ज्ञाता; चामरे = चामर योग में; जायते जनः = व्यक्ति उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ चामर योग में जन्मे व्यक्ति के विषय में शास्त्र कहता है कि वह राजा होता है अथवा राज-सम्मान का पात्र, दीर्घायु और पण्डित होता है। वह वाग्मी और सर्वकला-विद् भी कहा गया है। पूरा श्लोक फल-वर्णन है।

English rendering The text states that under Cāmara a person is a king or one honoured by a king, long-lived and learned; eloquent, or skilled in all the arts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। आयु, राजपद आदि यहाँ संख्यात्मक आयुर्दाय-सूत्र नहीं, बल्कि चामर-योग का शास्त्रीय फलादेश हैं; गणना 36.11 की स्थिति-शर्तों तक सीमित रहती है।

36.13
सवले लग्नपे पुत्रषष्ठपौ केन्द्रगौ मिथः।
शंखो वा लग्नकर्मेशौ चरे बलिनि भाग्यपे
savale lagnape putraṣaṣṭhapau kendragau mithaḥ|
śaṃkho vā lagnakarmeśau care balini bhāgyape

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सबले लग्नपे = लग्नेश के बलवान् होने पर; पुत्रषष्ठपौ = पंचमेश (पुत्र/5) व षष्ठेश (6) के स्वामी; केन्द्रगौ मिथः = परस्पर केन्द्र में; शंखः वा = शंख योग, अथवा; लग्नकर्मेशौ = लग्नेश व दशमेश (कर्म/10); चरे = चर राशि में; बलिनि भाग्यपे = नवमेश (भाग्य/9) के बलवान् होने पर।

हिन्दी भावार्थ जब लग्नेश बलवान् हो तथा पंचमेश और षष्ठेश परस्पर केन्द्र में स्थित हों, तब "शंख" योग बनता है। अथवा जब लग्नेश और दशमेश चर राशियों में हों और नवमेश बलवान् हो — तब भी शंख योग बनता है। दोनों विकल्प बल तथा केन्द्र/चर-राशि सम्बन्ध पर आधारित हैं।

English rendering When the lagna-lord is strong and the lords of the 5th and 6th occupy mutual angles, the Śaṅkha yoga arises; or when the lagna-lord and 10th lord are in movable signs and the 9th lord is strong.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-1: बल(लग्नेश) ≥ थ्रेशहोल्ड ∧ पंचमेश ↔ षष्ठेश परस्पर-केन्द्र ((राशि₅ − राशि₆) ≡ 0 mod 3)। शर्त-2 (वैकल्पिक): राशि(लग्नेश), राशि(दशमेश) ∈ चर-गण {मेष, कर्क, तुला, मकर} ∧ बल(नवमेश) ≥ थ्रेशहोल्ड। भाव-कूट: पुत्र=5, षष्ठ=6, कर्म=10, भाग्य=9 — अंक-निष्ठ।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष। पंचमेश सूर्य (सिंह-स्वामी) मेष में; षष्ठेश बुध (कन्या-स्वामी) कर्क में → मेष(1)→कर्क(4): (4−1) mod 3 = 0 → परस्पर-केन्द्र। लग्नेश मंगल मकर (उच्च) में बलवान् → शंख योग सिद्ध। वैकल्पिक जाँच: लग्नेश व दशमेश दोनों चर राशियों में + नवमेश बलवान्।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस श्लोक में "सबले लग्नपे" और "बलिनि भाग्यपे" — दो बार बल की शर्त — योग को मापनीय बनाती है। The Architect के षड्बल इंजन (BPHS Ch.27) में प्रत्येक ग्रह का कुल रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) निकालकर उसकी प्रति-ग्रह सीमा से exact-`==` अनुशासन में तुलना होती है; अतः शंख योग की सिद्धि "बल" शब्द के भाव पर नहीं, संगणित संख्या पर निर्भर है — गणित को व्याख्या से पृथक् रखने की वही पद्धति।

36.14
धनस्त्रीपुत्रसंयुक्तो दयालुः पुण्यवान्‌ सुधीः।
पुण्यकर्मा चिरञ्जीवी शंखयोगोद्‌भवो नरः
dhanastrīputrasaṃyukto dayāluḥ puṇyavān‌ sudhīḥ|
puṇyakarmā cirañjīvī śaṃkhayogod‌bhavo naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन = सम्पत्ति; स्त्री = पत्नी/दाम्पत्य; पुत्र = सन्तति; संयुक्तः = युक्त, सम्पन्न; दयालुः = करुणाशील; पुण्यवान् = पुण्यकर्मा; सुधीः = श्रेष्ठ-बुद्धि; चिरञ्जीवी = दीर्घायु; शंखयोगोद्‌भवः = शंख-योग में जन्मा।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पूर्वोक्त शंख-योग (श्लोक 13 में परिभाषित) का फल कहता है। शास्त्र कहता है कि शंख-योग में उत्पन्न व्यक्ति धन, दाम्पत्य-सुख और सन्तति से सम्पन्न, स्वभाव से दयालु, पुण्यकर्मों में रत, तीक्ष्ण-बुद्धि तथा दीर्घजीवी होता है। यह योग की परिणति-गाथा है, विधान नहीं।

English rendering The text states that one born under the Śaṅkha-yoga is endowed with wealth, spouse and progeny, is compassionate, of meritorious deeds, keen intellect, and long life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शंख-योग का फल)। यह श्लोक कोई गणना नहीं गढ़ता; यह पूर्व-श्लोक की ज्यामितीय शर्त (लग्नेश-बलवान्, 5म-6ष्ठ स्वामी परस्पर केन्द्र में, चर राशि में बली भाग्येश) के "फल" को शब्द देता है — योग की उपस्थिति एक गणनीय विन्यास है, उसका फल शास्त्र का कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहीं वह अनुशासन-रेखा है जिस पर हमारी पूरी इंजन-विधि टिकी है: योग-रचना (कौन-सा स्वामी किस भाव में) एक निर्णायक, गणनीय विन्यास है — पर उसका फल शास्त्र का कथन है, नियति नहीं। हम गणित (वर्ग-विभाजन, अष्टकवर्ग बिन्दु, बल-इकाई) को "==" से जाँचते हैं, और फल-वाक्यों को सदा "शास्त्र कहता है" के रूप में उद्धृत करते हैं — भय या निश्चयवाद के रूप में कभी नहीं (dossier §5)।

36.15
सबले भाग्यपे भेरी खगैः स्वान्त्योदयास्तगैः।
सबले भाग्यपे वाऽसौ केन्द्रे शुक्रेज्यलग्नपैः
sabale bhāgyape bherī khagaiḥ svāntyodayāstagaiḥ|
sabale bhāgyape vā'sau kendre śukrejyalagnapaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सबले = बलयुक्त होने पर; भाग्यपे = भाग्येश (9वें भाव का स्वामी); भेरी = भेरी-योग; खगैः = ग्रहों द्वारा; स्व = द्वितीय भाव (धन); अन्त्य = द्वादश भाव; उदय = लग्न (प्रथम); अस्त = सप्तम भाव; शुक्र-इज्य-लग्नपैः = शुक्र, गुरु (इज्य) एवं लग्नेश से; केन्द्रे = 1/4/7/10 भाव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र भेरी-योग की दो वैकल्पिक रचनाएँ बताता है। प्रथम — भाग्येश बलवान् हो और ग्रह द्वितीय, द्वादश, लग्न तथा सप्तम भावों में स्थित हों। द्वितीय (वा = अथवा) — भाग्येश बलवान् हो तथा शुक्र, गुरु और लग्नेश केन्द्रों में स्थित हों। दोनों में से कोई भी विन्यास भेरी-योग रचता है।

English rendering When the ninth lord is strong and the planets occupy the 2nd, 12th, 1st and 7th houses — or, alternatively, when the ninth lord is strong and Venus, Jupiter and the lagna-lord are in the kendras — the Bherī-yoga is formed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह एक विन्यास-शर्त (बूलियन ज्यामिति) है, अंक-गणना नहीं। दो पर्याय:
(क) बल(L9) > सीमा ∧ ग्रह ∈ {H2, H12, H1, H7}
(ख) बल(L9) > सीमा ∧ {शुक्र, गुरु, L1} ∈ केन्द्र{H1,H4,H7,H10}
यहाँ "सबल" शब्द भाग्येश की मापी-जा-सकने-वाली शक्ति की माँग करता है — यही इसे "तकनीकी" बनाता है।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न लें। भाग्येश = गुरु (धनु/H9 का स्वामी); गुरु कर्क (H4, उच्च) में — बलवान् व केन्द्रस्थ। शुक्र एवं गुरु केन्द्रों में, लग्नेश मंगल मकर (H10, उच्च) में — पर्याय (ख) पूर्ण, भेरी-योग सिद्ध। (संधि: उच्च-बल दिग्-बल के साथ ষड्बल-गणना से पुष्ट।)

हमारा डिकोड (Our Decode) "सबले भाग्यपे" का "बल" कोई भावुक विशेषण नहीं — यह ষड्बल (BPHS Ch.27; स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्, 1 रूप = 60 विरूप) की संख्यात्मक राशि है, जिसे प्रति-ग्रह देहली से तुलना करके "बलवान्" कहा जाता है (dossier §4)। योग की उपस्थिति इसी संगणनीय शक्ति-परीक्षण पर टिकी है, अनुमान पर नहीं।

36.16
धनस्त्रीपुत्रसंयुक्तो भूपः कीर्तिगुणान्वितः।
आचारवान्‌ सुखी भोगी भेरीयोगे जनो भवेत्‌
dhanastrīputrasaṃyukto bhūpaḥ kīrtiguṇānvitaḥ|
ācāravān‌ sukhī bhogī bherīyoge jano bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनस्त्रीपुत्रसंयुक्तः = धन + स्त्री + पुत्र से युक्त; भूपः = नरेश/शासक-तुल्य; कीर्तिगुणान्वितः = कीर्ति और गुणों से युक्त; आचारवान् = सदाचार-संपन्न; सुखी = सुख-युक्त; भोगी = भोग-सामग्री का अनुभवकर्ता; भेरीयोगे = भेरी-योग में; जनः = मनुष्य; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ यह भेरी-योग का फल-श्लोक है। शास्त्र कहता है — भेरी-योग में जन्मा व्यक्ति धन, स्त्री और पुत्र-संपत्ति से जुड़ा, कीर्ति और सद्गुणों वाला, आचारवान्, सुखी तथा भोग-संपन्न होता है; उसे भूप-तुल्य पद भी बताया गया है। यह फल-सूची योग की “परिणाम-भाषा” है, न कि काल-गणना।

English rendering The text states that one born under Bherī-yoga is endowed with wealth, spouse, and children; is kingly, famed and virtuous, of good conduct, happy, and given to enjoyment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। रचना ३६.१५ में; यहाँ केवल phala-सूची। “भूपः” आदि को शास्त्रीय उपमा/फल-शब्दावली के रूप में पढ़ें — नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

36.17
सबले लग्नपे खेटाः केन्द्रे कोणे स्वभोच्चगाः।
मृगङ्गयोगो जातोऽत्र भूपो वा तत्समः सुखी
sabale lagnape kheṭāḥ kendre koṇe svabhoccagāḥ|
mṛgaṅgayogo jāto'tra bhūpo vā tatsamaḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सबले लग्नपे = जब लग्नेश सबल हो; खेटाः = ग्रह; केन्द्रे = १/४/७/१० में; कोणे = त्रिकोण (१/५/९) में; स्वभोच्चगाः = स्व-राशि या उच्च-राशि में गत; मृगङ्गयोगः = मृगङ्ग-योग (नाम; मृदङ्ग-पाठ संभव); जातः = उत्पन्न/स्थित; अत्र = यहाँ; भूपः = नरेश; वा = अथवा; तत्समः = उसके समान; सुखी = सुखी।

हिन्दी भावार्थ जब लग्नेश बलवान् हो और ग्रह केन्द्रों तथा कोणों में स्वक्षेत्र या उच्च में हों, तब शास्त्र इस स्थिति को मृगङ्ग-योग कहता है। ऐसे योग में जन्मे को भूप या भूप-सदृश और सुखी कहा गया है। नाम “मृगङ्ग” कुछ संहिताओं में “मृदङ्ग” (नगाड़ा/वाद्य) के रूप में भी मिलता है — पाठ-भेद संभव।

English rendering When the lagna-lord is strong and the planets stand in kendras and trikoṇas in their own or exaltation signs, the text names Mṛgaṅga-yoga; the native is said to be a king or his equal, and happy. (Reading Mṛdaṅga is also attested elsewhere — पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-रचना (लग्नेश-बल + केन्द्र/कोण × स्व/उच्च)। जाँच समुच्चय: लग्नेश “सबल”; प्रत्येक/प्रमुख ग्रह ∈ {केन्द्र ∪ त्रिकोण} ∧ (राशि = स्व ∨ उच्च)। “सबल” की संख्यात्मक परिभाषा इस पद्य में नहीं — षड्बल-सीमा यहाँ थोपी न जाए।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह, लग्नेश सूर्य उच्च (मेष, ९वाँ — कोण) में; चंद्र कर्क (स्व, १२ नहीं — केन्द्र नहीं) की बजाय मान लें शुक्र तुला (स्व) ३ में नहीं बल्कि … सरल चित्र: लग्न वृष, लग्नेश शुक्र तुला (६) नहीं — शुक्र वृष (स्व, लग्न-केन्द्र) सबल; गुरु धनु (स्व, ८?) — बेहतर: लग्न कर्क, लग्नेश चंद्र उच्च वृष (११) नहीं। क्लासिकल जाँच-उदाहरण: लग्न = मकर, लग्नेश शनि तुला (उच्च, १० — केन्द्र) में; सूर्य सिंह (स्व, ८) को छोड़कर गुरु कर्क (उच्च, ७ — केन्द्र) — केन्द्र/कोण + स्व/उच्च का नमूना। (केवल D1 स्थान; अयनांश से राशि-सीमा बदल सकती है।)

36.18
केमेशे कर्मगे तुङ्गे कर्मेशे भाग्यपान्विते।
योगः श्रीनाथसंज्ञोऽत्र जातः शुक्रसमो नृपः
kemeśe karmage tuṅge karmeśe bhāgyapānvite|
yogaḥ śrīnāthasaṃjño'tra jātaḥ śukrasamo nṛpaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केमेशे = केमेश (बहुधा सप्तमेश-अर्थ से जोड़ा जाता है; पाठ-भेद/अर्थ-संदेह संभव); कर्मगे = दशम-भाव में स्थित; तुङ्गे = उच्च-राशि में; कर्मेशे = दशमेश; भाग्यपान्विते = नवमेश से युक्त/सहित; योगः = योग; श्रीनाथसंज्ञः = श्रीनाथ नामक; अत्र = यहाँ; जातः = जन्मा; शुक्रसमः = शुक्र के समान; नृपः = नरेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र श्रीनाथ-योग की रचना बताता है — जब केमेश (पारंपरिक समांतर पाठ में प्रायः सप्तमेश) कर्म-भाव में उच्च हो, और कर्मेश भाग्येश (नवमेश) से युक्त हो। ऐसे योग में जन्मे को “शुक्र-सदृश नृप” कहा गया है। “केमेश” शब्द की व्युत्पत्ति-स्पष्टता संदिग्ध है; फल और दूसरी शर्त (कर्मेश + भाग्येश) स्थिर पाठ से पढ़ी जाती है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text names Śrīnātha-yoga when the “kemeśa” (commonly taken as the seventh-lord; reading uncertain) occupies the tenth in exaltation and the tenth-lord is joined with the ninth-lord; the native is said to be a king comparable to Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-रचना (भाव-स्वामी स्थान + युति + उच्च)। प्रतीकात्मक शर्तें:
(१) केमेश ∈ दशम ∧ राशि(केमेश) = उच्च-राशि(केमेश);
(२) कर्मेश युति/संयुक्त भाग्येश (नवमेश)।
उच्च-राशि ग्रह-निरपेक्ष नियत हैं (उदा. शुक्र = मीन, सूर्य = मेष, …)। “शुक्रसमो नृपः” = फल-उपमा, गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या → सप्तम = मीन, सप्तमेश = गुरु; गुरु का उच्च = कर्क। यदि कर्क = दशम (लग्न तुला पर दशम = कर्क) — लग्न = तुला लें: सप्तमेश = मंगल, मंगल-उच्च = मकर = दशम (तुला से १० = मकर) ✓; कर्मेश = शनि; भाग्येश (९ = मिथुन) = बुध; यदि शनि–बुध युति हो तो श्रीनाथ-शर्त (सप्तमेश-उच्च-दशम + कर्मेश–भाग्येश) पूरी। (केमेश = सप्तमेश मानकर; अन्य पाठ पर पुनर्गणना।)

36.19
कर्मेशे सुतगे केन्द्रे बुधेऽर्के सबले स्वभे।
चन्द्रात्‌ कोणे गुरौ ज्ञे वा कुजे लाभे च शारदः
karmeśe sutage kendre budhe'rke sabale svabhe|
candrāt‌ koṇe gurau jñe vā kuje lābhe ca śāradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशमेश; सुतगे = पञ्चम (पुत्र) भाव में; केन्द्रे = केन्द्रस्थ; बुधे-अर्के = बुध एवं सूर्य; सबले = बलवान्; स्वभे = स्वराशि में; चन्द्रात् कोणे = चन्द्र से त्रिकोण (5/9) में; गुरौ = गुरु; ज्ञे = बुध; कुजे लाभे = मंगल एकादश भाव में; शारदः = शारदा-योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शारदा-योग की अनेक पर्याय-शर्तें देता है — दशमेश पञ्चम में (तथा केन्द्र-सम्बद्ध) हो; बुध और सूर्य बलवान् होकर स्वराशि में हों; गुरु चन्द्र से त्रिकोण में हो; अथवा बुध/मंगल एकादश भाव में हों। ऐसे विन्यासों से शारदा-योग बनता है। (पंक्ति-पाठ में शब्द-क्रम विवादास्पद — पाठ-भेद संभव।)

English rendering When the tenth lord is in the fifth, Mercury and the Sun are strong in their own signs, Jupiter is in a trine from the Moon, and Mercury or Mars occupies the eleventh — the Śāradā-yoga is formed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पर्याय-शर्तों का संयोग:
(L10 ∈ H5) ∧ (बुध, सूर्य बली ∧ स्वराशि में) ∧ (गुरु ∈ त्रिकोण{5,9} चन्द्र-से) ∧ (बुध ∨ मंगल ∈ H11)
"चन्द्र से त्रिकोण" = चन्द्र-राशि को आधार मानकर 5/9 गिनना — शुद्ध चक्रीय (mod 12) स्थान-गणना। अंकीय स्थिरांक नहीं; विन्यास-नियम।

उदाहरण (worked example) दशमेश पञ्चम में — मान लें कर्क लग्न, दशमेश मंगल (मेष/H10 का स्वामी) पञ्चम (वृश्चिक, स्वराशि) में; बुध व सूर्य स्वराशि (कन्या, सिंह) में बलवान्; चन्द्र वृष में हो तो उससे त्रिकोण (कन्या/मकर) में गुरु — शर्त-समुच्चय आंशिक रूप से पूर्ण। शारदा-योग-प्रवृत्ति।

हमारा डिकोड (Our Decode) "सबले स्वभे" — स्वराशि-स्थिति (राशि-स्वामित्व) एवं बल — दोनों संगणनीय हैं: राशि-स्वामित्व D1 का नियतात्मक फल (dossier §2, वर्ग-इंजन), और "सबल" ষड्बल की मापी शक्ति (dossier §4)। "चन्द्र से त्रिकोण" वही mod-12 चक्रीय अंकगणित है जिस पर हमारी पूरी भाव-गणना खड़ी है।

36.20
धनस्त्रीपुत्रसंयुक्तः सुखी विद्वान्‌ नृपप्रियः।
तपस्वी धर्मसंयुक्तः शारदे जायते जनः
dhanastrīputrasaṃyuktaḥ sukhī vidvān‌ nṛpapriyaḥ|
tapasvī dharmasaṃyuktaḥ śārade jāyate janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनस्त्रीपुत्रसंयुक्तः = धन–स्त्री–पुत्र से युक्त; सुखी = सुखी; विद्वान् = पंडित/ज्ञानी; नृपप्रियः = नरेशों का प्रिय; तपस्वी = तप-शील; धर्मसंयुक्तः = धर्म से जुड़ा; शारदे = शारद-योग में; जायते = जन्म लेता है; जनः = व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ यह शारद-योग का फल है। शास्त्र कहता है — ऐसे योग में जन्मा जन धन, स्त्री और पुत्र से संपन्न, सुखी, विद्वान्, राजाओं का प्रिय, तपस्वी स्वभाव का और धर्म-युक्त होता है। विद्या–धर्म–तप की एक साथ उपस्थिति इस फल-सूची की विशेषता है।

English rendering The text states that one born in Śārada-yoga is joined with wealth, spouse, and children; is happy, learned, dear to kings, given to austerity, and aligned with dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। रचना ३६.१९ में; यहाँ केवल phala। “नृपप्रियः / तपस्वी” आदि शास्त्र की फल-भाषा हैं — चिकित्सकीय, विधिक या आर्थिक भविष्यवाणी नहीं।

36.21
धर्मलग्नगते सौम्ये पञ्चमे सदसद्युते।
पापे च चतुरस्रस्थे योगोऽयं मत्स्यसंज्ञकः
dharmalagnagate saumye pañcame sadasadyute|
pāpe ca caturasrasthe yogo'yaṃ matsyasaṃjñakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मलग्नगते = धर्म (९) या लग्न में स्थित; सौम्ये = बुध में/बुध; पञ्चमे = पंचम भाव में; सदसद्युते = सत् (शुभ) और असत् (पाप) से युक्त — मिश्र युति; पापे = पाप-ग्रह; च = और; चतुरस्रस्थे = चतुरस्र-स्थान में (ज्योतिष में प्रायः ४ और ८; कभी वर्ग/कोण-अर्थ); योगः = योग; अयम् = यह; मत्स्यसंज्ञकः = मत्स्य नाम वाला।

हिन्दी भावार्थ जब बुध धर्म-भाव या लग्न में हो, पंचम में शुभ–पाप की मिश्र युति हो, और पाप-ग्रह चतुरस्र (पारंपरिक रूप से चतुर्थ–अष्टम) में स्थित हों, तब शास्त्र इस योग को मत्स्य-संज्ञक कहता है। नाम “मत्स्य” (मीन) रचना की आकृति/संज्ञा है; फल अगले श्लोकों की परंपरा में आता है — इस पद्य में केवल नाम और रचना है।

English rendering The text names Matsya-yoga when Mercury occupies the ninth or the lagna, the fifth holds a mixed conjunction of benefic and malefic, and a malefic stands in a caturasra house (classically the fourth and eighth).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-रचना (स्थान + मिश्र-युति + चतुरस्र)। जाँच:
(१) बुध ∈ {लग्न, ९};
(२) पंचम में ≥१ शुभ ∧ ≥१ पाप (सदसद्-युति);
(३) पाप ∈ चतुरस्र — बहुमत पाठ में भाव ४ और ८ (लग्न से)।
“सौम्य” = बुध (यहाँ); “पाप” = सूर्य/मंगल/शनि/राहु–केतु परंपरा-अनुसार (मूल श्लोक सूची नहीं देता — घोषणा आवश्यक)। चतुरस्र-परिभाषा पर पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क; बुध = कर्क (लग्न) या मीन (९) ✓। पंचम = वृश्चिक: मान लें गुरु (शुभ) + शनि (पाप) युति → सदसद् ✓। पाप मंगल = तुला (४) या कुंभ (८) में → चतुरस्र ✓। तब शास्त्र की मत्स्य-संज्ञा लागू। (D1 भाव; चतुरस्र = ४/८ मानकर।)

36.22
कालज्ञः करुणामूर्तिर्गुणधीबलरूपवान्‌।
यशोविद्यातपस्वी च मत्स्ययोगे हि जायते
kālajñaḥ karuṇāmūrtirguṇadhībalarūpavān‌|
yaśovidyātapasvī ca matsyayoge hi jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कालज्ञः = काल/समय का ज्ञाता; करुणामूर्तिः = करुणा की मूर्ति; गुण-धी-बल-रूपवान् = गुण, बुद्धि, बल और रूप से युक्त; यशस् = कीर्ति; विद्या = शास्त्र/ज्ञान; तपस्वी = तपस्वी; मत्स्ययोगे = मत्स्य-योग में; जायते = जन्म लेता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मत्स्य-योग में जन्मा व्यक्ति काल का ज्ञाता, करुणा का स्वरूप, तथा गुण–बुद्धि–बल–रूप से सम्पन्न होता है। वही यश, विद्या और तप से भी युक्त कहा गया है। यह फल-कथन है — योग की उपस्थिति में शास्त्र का अपना परिणाम-वर्णन, कोई निश्चित नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that one born under Matsya-yoga becomes a knower of time, an embodiment of compassion, and is endowed with virtue, intellect, strength, and form; fame, learning, and austerity are also attributed. This is a phala statement of the śāstra, not a guarantee of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। मत्स्य-योग की परिभाषा पूर्व-श्लोकों में आती है; यहाँ केवल परिणाम-सूची है। जाँच-क्रम: पहले योग-शर्त की सत्यता (ग्रह-स्थान), फिर फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें।

36.23
पुत्रारिमदगाः सौम्याः स्वभोच्चसुहृदंशगाः।
त्रिलाभोदयगाः पापाः कूर्मयोगः स्वभोच्चगाः
putrārimadagāḥ saumyāḥ svabhoccasuhṛdaṃśagāḥ|
trilābhodayagāḥ pāpāḥ kūrmayogaḥ svabhoccagāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र = ५म भाव; अरि = ६म भाव; मद = ७म भाव; सौम्याः = शुभ ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र, और प्रायः चन्द्र); स्व-भ = स्वराशि; उच्च = उच्च स्थान; सुहृद्-अंश = मित्र-राशि का अंश (अंश = प्रायः नवांश D9; पाठ-भेद संभव); त्रि = ३य भाव; लाभ = ११म भाव; उदय = लग्न (१म); पापाः = क्रूर ग्रह (सूर्य, मङ्गल, शनि, राहु-केतु परम्परा में); कूर्मयोगः = कूर्म-योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कूर्म-योग की रचना इस प्रकार बाँधता है: सौम्य ग्रह पुत्र–अरि–मद (५–६–७) भावों में हों और स्व-भ, उच्च या सुहृद्-अंश में स्थित हों; तथा पाप ग्रह त्रि–लाभ–उदय (३–११–लग्न) में हों और वे भी स्व-भ या उच्च हों। दोनों पक्ष एक साथ पूरे होने पर कूर्म-योग कहा जाता है। अंश-पाठ में पाठ-भेद संभव — कुछ संस्करणों में अंश-शर्त स्पष्ट नहीं होती।

English rendering Kūrma-yoga is formed when benefics occupy the 5th, 6th, and 7th houses in own sign, exaltation, or a friendly aṃśa, and malefics occupy the 3rd, 11th, and lagna in own sign or exaltation. The joint fulfillment of both conditions is the yoga as stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-शर्त (boolean placement), कोई संख्या-सूत्र नहीं:

- सौम्य S ∈ {बुध, गुरु, शुक्र, (चन्द्र)}:
house(S) ∈ {5, 6, 7} ∧ dignity(S) ∈ {स्वराशि, उच्च, सुहृद्-अंश}
- पाप P ∈ {सूर्य, मङ्गल, शनि, …}:
house(P) ∈ {1, 3, 11} ∧ dignity(P) ∈ {स्वराशि, उच्च}
- कूर्मयोग = (सभी सौम्य शर्तें) ∧ (सभी पाप शर्तें)

भाव-गिनती लग्न से क्रमशः १…१२ (whole-sign या चुनी हुई भाव-पद्धति — घोषित करें)। अंश = D9 (नवांश) जब “अंश” शब्द ग्रहण किया जाए: D9-राशि = floor((λ mod 30°) ÷ (30°/9)) का राशिक्रम-नियम BPHS Ch.6 अनुसार।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; गुरु = सिंह (५म, मित्र-राशि), शुक्र = कन्या (६म, स्वराशि), बुध = तुला (७म, मित्र); सूर्य = मेष (लग्न, उच्च), मङ्गल = मिथुन (३य, मित्र/निर्बल — स्व/उच्च नहीं), शनि = कुम्भ (११म, स्वराशि)। यहाँ मङ्गल की स्व/उच्च शर्त अधूरी → कूर्म-योग पूर्ण नहीं। यदि मङ्गल भी मेष/मकर/वृश्चिक जैसे स्वीकृत स्व/उच्च-स्थान में १/३/११ में हो, तो शर्तें पूर्ण होतीं। (Convention: whole-sign houses; ayanāṃśa only needed if degrees decide dignity boundary.)

हमारा डिकोड (Our Decode) “अंश” जब नवांश समझा जाए, तो यह षोडश-वर्ग के D9 (नवांश) नियम पर टिका है — ३०° राशि का ९ समान भागों में विभाजन, शुद्ध मापांक-अंकगणित। योग की सत्यता “लगभग” नहीं; प्रत्येक ग्रह-शर्त `true`/`false` से सिद्ध होती है — exact-`==` अनुशासन का भाव-योग रूप।

36.24
कूर्मयोगे जनो भूपो धीरो धर्मगुणान्वितः।
कीर्तिमानुपकारी च सुखी मानवनायकः
kūrmayoge jano bhūpo dhīro dharmaguṇānvitaḥ|
kīrtimānupakārī ca sukhī mānavanāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कूर्मयोगे = कूर्म-योग में; जनः = व्यक्ति; भूपः = राजा/प्रभु; धीरः = धैर्यवान्; धर्म-गुण-अन्वितः = धर्म और गुण से युक्त; कीर्तिमान् = यशस्वी; उपकारी = परोपकारी; सुखी = सुख-सम्पन्न; मानव-नायकः = मनुष्यों का नायक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कूर्म-योग में जन्मा जन भूप-सदृश, धीर, धर्म-गुण से युक्त, कीर्तिमान्, उपकारी, सुखी और मानव-नायक होता है। यह फल-सूची योग-परिभाषा (३६.२३) के बाद आती है। फल को योग की गणितीय/स्थानिक जाँच से अलग रखें — पहले योग सिद्ध हो, तब शास्त्र का फल-वाक्य पढ़ें।

English rendering The text states that one under Kūrma-yoga becomes kingly, steadfast, endowed with dharma and virtue, famous, helpful, happy, and a leader among people. Report this as the śāstra’s phala, not as an endorsed destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कूर्म-योग की शर्तें ३६.२३ में हैं; यहाँ केवल परिणाम। डिकोड-अनुशासन: placement-engine `true` दे तभी फल-पाठ सक्रिय; अन्यथा “योग अनुपस्थित”।

36.25
भाग्येशे धनभावास्थे धनेशे भाग्यभावगे।
लग्नेशे केन्द्रकोणस्थे खड्‌गयोगः स कथ्यते
bhāgyeśe dhanabhāvāsthe dhaneśe bhāgyabhāvage|
lagneśe kendrakoṇasthe khaḍ‌gayogaḥ sa kathyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येश = ९म भाव का स्वामी; धनभाव = २य भाव; धनेश = २य भाव का स्वामी; भाग्यभाव = ९म भाव; लग्नेश = लग्न-स्वामी; केन्द्र = १, ४, ७, १०; कोण = त्रिकोण = १, ५, ९; खड्गयोगः = खड्ग-योग; कथ्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र खड्ग-योग तीन शर्तों से बाँधता है: भाग्येश धन-भाव में हो, धनेश भाग्य-भाव में हो, और लग्नेश केन्द्र या कोण में हो। ९म और २य स्वामियों का परस्पर-आदान (९↔२) धन-भाग्य अक्ष को जोड़ता है; लग्नेश की केन्द्र/कोण स्थिति योग को स्थिर करती है। तीनों एक साथ पूरे हों तभी “खड्गयोगः स कथ्यते”।

English rendering Khaḍga-yoga is declared when the 9th lord occupies the 2nd house, the 2nd lord occupies the 9th, and the lagna-lord stands in a kendra or trikoṇa. All three conditions together constitute the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वामित्व + भाव-स्थिति (lordship map):

- L₉ = lord(house 9 from Lagna); L₂ = lord(house 2); L₁ = lord(house 1)
(राशि-स्वामी: मेष-मङ्गल, वृष-शुक्र, … कुम्भ-शनि, मीन-गुरु — पारंपरिक आधिपत्य)
- house(L₉) = 2
- house(L₂) = 9
- house(L₁) ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10} (केन्द्र ∪ कोण; लग्न दोनों में गिना जाता है)
- खड्गयोग = तीनों ∧

Convention: whole-sign houses by default; equal/Placidus आदि से भाव-स्वामी बदल सकते हैं — घोषित करें।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या → L₁ = बुध, L₂ = शुक्र (तुला २य), L₉ = शुक्र (वृष ९म) — यहाँ L₂ = L₉ = शुक्र (एक ही ग्रह दोनों भावों का स्वामी)। शर्त: शुक्र धन-भाव (तुला, २य) में हो और भाग्य-भाव (वृष, ९म) में हो — एक ग्रह दो भावों में एक साथ नहीं रह सकता, अतः इस लग्न पर ९↔२ विनिमय दो भिन्न स्वामियों की माँग करता है; कन्या-लग्न में L₂ = L₉ = शुक्र होने से शास्त्रीय “धनेशे भाग्यभावगे / भाग्येशे धनभावास्थे” का परस्पर-रूप असंभव (पाठ-भेद/योग-अनुपस्थिति)।
दूसरा: लग्न = मेष → L₁ = मङ्गल, L₂ = शुक्र, L₉ = गुरु। यदि गुरु = वृष (२य), शुक्र = धनु (९म), मङ्गल = कर्क (४म केन्द्र) → तीनों शर्तें `true` → खड्ग-योग।

36.26
खड्‌गयोगे समुत्पन्नो धनभाग्यसुखान्वितः।
शास्त्रज्ञो बुद्धिवीर्याढ्‌यः कृतज्ञः कुशलो नरः
khaḍ‌gayoge samutpanno dhanabhāgyasukhānvitaḥ|
śāstrajño buddhivīryāḍh‌yaḥ kṛtajñaḥ kuśalo naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) खड्गयोगे = खड्ग-योग में; समुत्पन्नः = उत्पन्न/जन्मा; धन-भाग्य-सुख-अन्वितः = धन, भाग्य और सुख से युक्त; शास्त्रज्ञः = शास्त्र जानने वाला; बुद्धि-वीर्य-आढ्यः = बुद्धि और वीर्य से समृद्ध; कृतज्ञः = कृतज्ञ; कुशलः = निपुण; नरः = पुरुष/व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि खड्ग-योग में जन्मा व्यक्ति धन–भाग्य–सुख से युक्त, शास्त्रज्ञ, बुद्धि-वीर्य से आढ्य, कृतज्ञ और कुशल होता है। यह ३६.२५ की परिभाषा का फल-पक्ष है। फल-वाक्य को योग-शर्त की कठोर जाँच से अलग रखें — “शास्त्र कहता है”, “हम भविष्य ठोकते हैं” नहीं।

English rendering The text states that one born under Khaḍga-yoga is endowed with wealth, fortune, and happiness; is learned in the śāstras; rich in intellect and valor; grateful; and skillful. Present this as textual phala, not as predicted fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संख्या-यन्त्र ३६.२५ की lordship-शर्तों में है; यहाँ केवल गुण-सूची।

36.27
केन्द्रे मूलत्रिकोणस्ते भाग्येशे वा स्वभोच्चगे।
लग्नाधिपे बलाढ्‌ये च लक्ष्मीयोगः प्रकीर्त्यते
kendre mūlatrikoṇaste bhāgyeśe vā svabhoccage|
lagnādhipe balāḍh‌ye ca lakṣmīyogaḥ prakīrtyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र = १, ४, ७, १०; मूलत्रिकोण = ग्रह का मूलत्रिकोण-राशि (सूर्य-सिंह; चन्द्र-वृष; मङ्गल-मेष; बुध-कन्या; गुरु-धनु; शुक्र-तुला; शनि-कुम्भ); भाग्येश = ९म स्वामी; स्व-भ = स्वराशि; उच्च = उच्च; लग्नाधिप = लग्न-स्वामी; बलाढ्य = बल से समृद्ध; लक्ष्मीयोगः = लक्ष्मी-योग; प्रकीर्त्यते = घोषित/कथित होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र लक्ष्मी-योग तब कहता है जब भाग्येश (९मेश) केन्द्र में हो, अथवा मूलत्रिकोण में हो, अथवा स्व-भ/उच्च में हो — और साथ ही लग्नाधिप बलाढ्य हो। “वा” से भाग्येश की प्रतिष्ठा-विकल्प खुलते हैं; लग्नेश का बल अनिवार्य सह-शर्त है। बल का माप शास्त्रीय षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) से किया जा सकता है।

English rendering Lakṣmī-yoga is declared when the 9th lord occupies a kendra, or its mūlatrikoṇa, or its own/exaltation sign, and the lagna-lord is strong (balāḍhya). The “or” branches the 9th-lord’s dignity options; lagna-lord strength is the required companion condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

- L₉ = lord(9); L₁ = lord(1)
- भाग्येश-शर्त (कोई एक):
house(L₉) ∈ {1, 4, 7, 10}
∨ rāśi(L₉) = mūlatrikoṇa(L₉)
∨ rāśi(L₉) ∈ {own, exaltation}
- लग्नेश-शर्त: bal(L₁) “आढ्य” — शास्त्रीय तुलना में षड्बल Σ ≥ ग्रह-विशिष्ट सीमा (रुप/विरुप; १ रुप = ६० विरुप), BPHS Ch.27 नियम से
- लक्ष्मीयोग = भाग्येश-शर्त ∧ लग्नेश-बलाढ्य

Convention: ayanāṃśa degrees for exact exaltation-span if degree-window used; mūlatrikoṇa often sign-level in yoga texts (पाठ-भेद संभव on degree-limits).

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह → L₁ = सूर्य, L₉ = मङ्गल (मेष ९म)। मङ्गल = मेष (९म = केन्द्र नहीं, पर मूलत्रिकोण और स्वराशि) → भाग्येश-शर्त `true`। सूर्य का षड्बल यदि ≥ सूर्य-सीमा (उदा. स्थानाबल + दिक्बल + … का योग पर्याप्त) → लग्नेश बलाढ्य → लक्ष्मी-योग। यदि सूर्य नीच/अस्त/निर्बल षड्बल में हो, तो केवल भाग्येश-शर्त से योग पूर्ण नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलाढ्य” को अस्पष्ट विशेषण न छोड़कर षड्बल के छह घटकों (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) के योग में बाँधना — Ch.27 का गणना-मार्ग — हमारी decode-पद्धति का सीधा अनुप्रयोग है। योग `true`/`false` तब तक अधूरा है जब तक लग्नेश-बल संख्या में न तौला जाए; tolerance-band से “लगभग बलवान्” नहीं — exact threshold से तुलना।

36.28
सुरूपो गुणवान्‌ भूपो बहुपुत्रधनान्वितः।
यशस्वी धर्मसम्पन्नो लक्ष्मीयोगे जनो भवेत्‌
surūpo guṇavān‌ bhūpo bahuputradhanānvitaḥ|
yaśasvī dharmasampanno lakṣmīyoge jano bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुरूपः = सुन्दर रूप वाला; गुणवान् = गुण-सम्पन्न; भूपः = राजा; बहु-पुत्र-धन-अन्वितः = अनेक पुत्र और धन से युक्त; यशस्वी = यश वाला; धर्म-सम्पन्नः = धर्म से पूर्ण; लक्ष्मीयोगे = लक्ष्मी-योग में; जनः भवेत् = व्यक्ति होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लक्ष्मी-योग में जन सुरूप, गुणवान्, भूप-सदृश, बहु-पुत्र-धन से युक्त, यशस्वी और धर्म-सम्पन्न होता है। यह ३६.२७ की परिभाषा का फल-श्लोक है। “बहुपुत्रधन” को शास्त्र का गुण-वर्णन मानें — जनसांख्यिकीय या वित्तीय भविष्यवाणी नहीं; न भय, न दबाव-उपाय।

English rendering The text states that under Lakṣmī-yoga a person is fair of form, virtuous, kingly, endowed with many children and wealth, famous, and rich in dharma. Report the phala as the śāstra’s claim, not as a personal forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गणना ३६.२७ की भाग्येश-प्रतिष्ठा + लग्नेश-बल शर्तों में है; यहाँ केवल फल-सूची।

36.29
लग्ने स्थिरे भृगौ केन्द्रे चन्द्रकोणे शभान्विते।
मानस्थानगते सौरे योगोऽयं कुसुमाभिधः
lagne sthire bhṛgau kendre candrakoṇe śabhānvite|
mānasthānagate saure yogo'yaṃ kusumābhidhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने स्थिरे = लग्न स्थिर राशि में; भृगु = शुक्र; केन्द्रे = 1/4/7/10 स्थान; चन्द्र-कोणे = चन्द्र त्रिकोण (5/9) में; शुभ-अन्विते = शुभ ग्रह से युक्त; मान-स्थान = 10वाँ भाव (मान/कीर्ति); सौर = शनि; कुसुम-अभिधः = कुसुम नामक योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न स्थिर राशि में हो, शुक्र केन्द्र में हो, चन्द्र त्रिकोण में हो और शुभ से युक्त हो, तथा शनि मानस्थान (दशम) में स्थित हो, तब वह योग कुसुम कहलाता है। यह स्थिर लग्न, शुक्र-केन्द्र, चन्द्र-कोण और शनि-दशम की संयुक्त संरचना है।

English rendering The text states: when the lagna is in a fixed sign, Venus occupies a kendra, the Moon is in a trine and associated with a benefic, and Saturn is in the tenth (māna-sthāna), that combination is named Kusuma-yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-परिभाषा (स्थान-शर्त)। जाँच शुद्ध भाव-अधिकार और राशि-प्रकार पर है: लग्न ∈ {स्थिर: वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ}; शुक्र ∈ {1,4,7,10}; चन्द्र ∈ {5,9} + शुभ-योग/दृष्टि; शनि ∈ 10। भाव-गणना के लिए गृह-पद्धति घोषित करनी चाहिए (सामान्यतः पूर्ण-राशि / whole-sign; कुछ परंपराएँ equal/Placidus भी प्रयुक्त करती हैं)।

उदाहरण (worked example) मानें D1 (राशि-कुंडली), whole-sign houses, लग्न = सिंह (स्थिर)। शुक्र = वृश्चिक (4वाँ केन्द्र), चन्द्र = धनु (5वाँ कोण) और गुरु से युक्त, शनि = वृष (10वाँ)। चारों शर्तें पूरी → पाठ के अनुसार कुसुम-योग का गठन। (अयनांश केवल ग्रह-राशि सीमा पर प्रभाव डालता है; यहाँ उदाहरण पूर्ण-राशि स्थानों पर है।)

36.30
भूपो वा भूपतुल्यो वा दता भोगी सुखी जनः।
कुलमुख्यो गुणी विद्वान्‌ जायते कुसुमाह्वये
bhūpo vā bhūpatulyo vā datā bhogī sukhī janaḥ|
kulamukhyo guṇī vidvān‌ jāyate kusumāhvaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूपः = राजा; भूप-तुल्यः = राजा-सदृश; दाता = दानशील; भोगी = भोग-संपन्न; सुखी = सुखयुक्त; कुल-मुख्यः = कुल का प्रमुख; गुणी = गुणवान्; विद्वान् = विद्यासंपन्न; कुसुम-आह्वये = कुसुम नामक योग में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कुसुम-योग में उत्पन्न व्यक्ति राजा अथवा राजा-तुल्य, दाता, भोगी और सुखी होता है। वह कुल का मुख्य, गुणी और विद्वान् कहा गया है। यह पूर्व-श्लोक के योग का फल-कथन है।

English rendering The text states that one born under Kusuma-yoga is a king or the equal of a king, a giver, an enjoyer of comforts, and happy — a leading figure of the family, endowed with virtue and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह 36.29 की संरचना का परिणाम-वर्णन है; संख्या या अंश-विभाजन नहीं। फल को शास्त्र का दावा मानकर पढ़ें, नियति-घोषणा नहीं।

36.31
द्वितीये पञ्चमे जीवे बुधशुक्रयुतेक्षिते।
क्षत्रे तयोर्वा सम्प्रप्ते योगः स च कलानिधिः
dvitīye pañcame jīve budhaśukrayutekṣite|
kṣatre tayorvā samprapte yogaḥ sa ca kalānidhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये = द्वितीय भाव में; पञ्चमे = पंचम में; जीव = गुरु; बुध-शुक्र = बुध और शुक्र; युते-ईक्षिते = युक्त अथवा दृष्ट; क्षत्रे = क्षेत्र/स्व-राशि में (पाठानुसार); तयोः = उन दोनों का; सम्प्रप्ते = प्राप्त होने पर; कला-निधिः = कलानिधि योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु द्वितीय या पंचम में हो और बुध-शुक्र से युक्त अथवा दृष्ट हो, अथवा उन दोनों (बुध-शुक्र) के क्षेत्र/स्थिति-सम्बंध की शर्त पूरी हो, तब वह योग कलानिधि है। (क्षत्रे तयोर्वा सम्प्रप्ते — संक्षेप पाठ; पाठ-भेद संभव।) योग धन-विद्या भाव और कला-कारक ग्रहों के संयोग पर टिका है।

English rendering The text states: when Jupiter is in the second or fifth house, joined or aspected by Mercury and Venus — or when those two obtain the stated field-condition — the yoga is Kalānidhi. (The compact clause on kṣetra may admit recensional variants.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-परिभाषा (भाव + युति/दृष्टि)। जाँच: गुरु.भाव ∈ {2,5} ∧ (युति/दृष्टि ∈ {बुध, शुक्र}); वैकल्पिक शाखा: बुध-शुक्र की क्षेत्र-स्थिति (पाठानुसार)। दृष्टि-नियम परंपरा-बद्ध हैं (पूर्ण दृष्टि: गुरु 5/7/9; शुक्र-बुध 7; आदि) — उपयोग से पहले दृष्टि-तालिका घोषित करें।

उदाहरण (worked example) whole-sign, लग्न = मेष। गुरु = वृष (2), बुध = वृष (गुरु से युक्त), शुक्र = कन्या से गुरु पर 7वीं दृष्टि → बुध-युति + शुक्र-दृष्टि। शर्त पूर्ण → पाठ के अनुसार कलानिधि।

36.32
कलानिधिसमुत्पन्नो गुणवान्‌ भूपवन्दितः।
रोगहीनः सुखी जातो धनविद्यासमन्वितः
kalānidhisamutpanno guṇavān‌ bhūpavanditaḥ|
rogahīnaḥ sukhī jāto dhanavidyāsamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कला-निधि-समुत्पन्नः = कलानिधि-योग में उत्पन्न; गुणवान् = गुणसंपन्न; भूप-वन्दितः = राजाओं द्वारा सम्मानित; रोग-हीनः = रोग-रहित (शास्त्र-कथन); सुखी = सुखी; धन-विद्या-समन्वितः = धन और विद्या से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कलानिधि-योग में उत्पन्न व्यक्ति गुणवान्, नरेशों द्वारा वंदित, रोगहीन, सुखी तथा धन और विद्या से समन्वित होता है। यह 36.31 का फल-श्लोक है। “रोगहीन” को शास्त्र का पारंपरिक फल-शब्द समझें — चिकित्सा-निदान या गारंटी नहीं।

English rendering The text states that one born of Kalānidhi is virtuous, honored by kings, free from disease (as the śāstra phrases it), happy, and endowed with wealth and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संख्यात्मक गणना नहीं; पूर्व योग की शर्त-पूर्ति पर शास्त्र का गुणात्मक वर्णन मात्र।

36.33
लग्नेशतद्‌गतर्क्षेशतद्‌गतर्क्षेशतदंशपाः।
केन्द्रे कोणे स्वतुङ्गे वा योगः कल्पद्रुमो मतः
lagneśatad‌gatarkṣeśatad‌gatarkṣeśatadaṃśapāḥ|
kendre koṇe svatuṅge vā yogaḥ kalpadrumo mataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेश = लग्न-स्वामी; तद्-गत-ऋक्षेश = लग्नेश जिस राशि में हो उसका स्वामी (विनियामक/dispositer); तद्-गत-ऋक्षेश = उस दूसरे का भी विनियामक; तद्-अंश-पाः = उनके अंश (नवमांश आदि) के स्वामी; केन्द्रे = 1/4/7/10; कोणे = 5/9; स्व-तुङ्गे = स्वराशि या उच्च; कल्प-द्रुमः = कल्पद्रुम योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश, लग्नेश के राशि-स्वामी, उस स्वामी के भी राशि-स्वामी, तथा इनके अंश-स्वामी — यदि केन्द्र, कोण, स्वराशि या उच्च में हों — तो वह योग कल्पद्रुम माना जाता है। यह श्रृंखला-विनियामक (dispositor chain) और वर्ग-स्वामी की संयुक्त शर्त है। “अंश” यहाँ प्रायः नवमांश (D9) के स्वामित्व की ओर संकेत करता है; कुछ पाठों में अंश-व्याप्ति विस्तृत हो सकती है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: the lagna-lord, the lord of the sign occupied by that lagna-lord, the lord of the sign occupied by that second lord, and the lords of their aṃśas — if placed in kendra, trine, own sign, or exaltation — constitute the yoga held to be Kalpadruma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्रृंखला-जाँच (exact placement, no tolerance):
1. L₀ = lord(lagna-rāśi)
2. L₁ = lord(rāśi of L₀)
3. L₂ = lord(rāśi of L₁)
4. Aᵢ = aṃśa-lords of the relevant grahas (convention: navāṃśa D9; declare if another aṃśa is used)
5. Each of {L₀, L₁, L₂, Aᵢ} must satisfy: house ∈ {1,4,5,7,9,10} ∨ rāśi ∈ {own, exaltation}

Navāṃśa map (standard 3°20′ arcs): navāṃśa-index = ⌊(λ mod 30°) / (30°/9)⌋ = ⌊(λ mod 30°) / (10°/3)⌋; odd signs count from own sign, even from 7th — declare the odd/even rule used. Whole-sign vs degree-house for kendra/koṇa must be stated.

उदाहरण (worked example) whole-sign + D9 (30°/9 = 3°20′), lagna = कन्या → L₀ = बुध। बुध = मकर → L₁ = शनि। शनि = तुला → L₂ = शुक्र। मानें बुध, शनि, शुक्र और उनके D9-स्वामी क्रमशः केन्द्र/कोण/स्व/उच्च में — चारों शर्तें `==` true → पाठानुसार कल्पद्रुम। एक भी श्रृंखला-सदस्य शर्त से बाहर → योग नहीं (tolerance नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “अंशपाः” सीधे षोडश-वर्ग की गणना से जुड़ता है — विशेषकर D9 (नवमांश), जो 30° राशि को 9 समान चापों (प्रत्येक 3°20′) में बाँटता है; यह मॉड्यूलर विभाजन varga-engine में नियत है। योग की सत्यता वर्ग-स्वामी और राशि-स्वामी दोनों की exact placement पर टिकी है — उसी exact-`==` अनुशासन से, जो अष्टकवर्ग फिक्स्चर में भी अपनाया गया: कोई ±बैंड नहीं, शर्त या पूरी या नहीं।

36.34
सर्वैश्वर्ययुतो भूपो धर्मात्मा बलसंयुतः।
युद्धप्रियो दयालुश्च पारिजाते नरो भवेत्‌
sarvaiśvaryayuto bhūpo dharmātmā balasaṃyutaḥ|
yuddhapriyo dayāluśca pārijāte naro bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-ऐश्वर्य-युतः = समस्त ऐश्वर्य से युक्त; भूपः = राजा; धर्म-आत्मा = धर्मात्मा; बल-संयुतः = बलवान्; युद्ध-प्रियः = युद्ध-प्रेमी; दयालुः = दयालु; पारिजाते = पारिजात (योग) में; नरः भवेत् = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पारिजात में उत्पन्न/स्थित नर सर्वैश्वर्य-युक्त भूप, धर्मात्मा, बलसंयुत, युद्धप्रिय और दयालु होता है। ध्यान रहे: 36.33 में योग का नाम कल्पद्रुम है, जबकि इस फल-श्लोक में “पारिजाते” आता है — दोनों नाम निकट-संबंधी योग-परंपरा में चलते हैं; इस पाठ में फल-नाम पारिजात है (पाठ-भेद/नाम-क्रम संभव)। फल को शास्त्र-कथन मानें।

English rendering The text states that under Pārijāta a person becomes a king endowed with all prosperity, righteous, strong, fond of battle, and compassionate. (Note: 36.33 names Kalpadruma; this phala-verse says Pārijāta — related naming in the yoga sequence; recensional variation possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गणना 36.33 की श्रृंखला-शर्त पर निर्भर; यहाँ केवल शास्त्र का गुणात्मक परिणाम है। नाम-भेद (कल्पद्रुम ↔ पारिजात) को बिना जोड़े हुए, पाठ यथावत् रखें।

36.35
स्वान्त्याष्टस्थैर्द्वितीयेशाद्‌ हरियोगः शुभग्रहैः।
कामेशाद्‌ बन्धुधर्माष्टस्थितैः सौम्यैर्हराभिधः
svāntyāṣṭasthairdvitīyeśād‌ hariyogaḥ śubhagrahaiḥ|
kāmeśād‌ bandhudharmāṣṭasthitaiḥ saumyairharābhidhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व = द्वितीय; अन्त्य = द्वादश; अष्ट = अष्टम; स्थिताः = स्थित; द्वितीय-ईशात् = द्वितीयेश से; हरि-योगः = हरि योग; शुभ-ग्रहैः = शुभ ग्रहों द्वारा; काम-ईशात् = सप्तमेश (कामेश) से; बन्धु = चतुर्थ; धर्म = नवम; अष्ट = अष्टम; सौम्यैः = सौम्य/शुभ ग्रहों से; हर-अभिधः = हर नामक योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीयेश से गिने गए द्वितीय, द्वादश और अष्टम भावों में शुभ ग्रह हों तो हरि-योग होता है। कामेश (सप्तमेश) से गिने गए बन्धु (4), धर्म (9) और अष्टम में सौम्य ग्रह हों तो हर नामक योग होता है। दोनों शुभ-ग्रहों की सापेक्ष भाव-स्थिति पर आधारित हैं।

English rendering The text states: benefics occupying the 2nd, 12th, and 8th from the lord of the second constitute Hari-yoga; benefics occupying the 4th, 9th, and 8th from the lord of the seventh (kāmeśa) constitute the yoga called Hara.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सापेक्ष-भाव गणना (whole-sign उदाहरण):
- द्वितीयेश = lord(house 2 from lagna)
- Hari: शुभ ∈ {2, 12, 8} from द्वितीयेश (अर्थात् house_of(benefic) ≡ house_of(द्वितीयेश) + {1, 11, 7} (mod 12), 1-based offset सावधानी से)
- कामेश = lord(house 7)
- Hara: शुभ ∈ {4, 9, 8} from कामेश

शुभ-ग्रह समूह सामान्यतः गुरु, शुक्र, बुध (शुद्ध), चन्द्र (पक्षानुसार); रवि/मंगल/शनि को शुभ न गिनें जब तक विशेष नियम न हो — परंपरा घोषित करें। तीनों स्थानों की पूर्ति की माँग पाठ “स्थैः … स्थितैः” बहुवचन से झलकती है; अंशिक पूर्ति का नियम पाठ में स्पष्ट नहीं।

उदाहरण (worked example) lagna = मेष (whole-sign)। द्वितीय = वृष → द्वितीयेश = शुक्र; शुक्र = कन्या मानें। कन्या से 2=तुला, 12=सिंह, 8=मेष। यदि गुरु तुला, बुध सिंह, शुक्र स्वयं मेष-दृष्टि/स्थिति आदि से तीनों भरे — हरि। कामेश (तुला-स्वामी शुक्र) से 4, 9, 8 में सौम्य → हर।

36.36
लग्नेशाद्‌ बन्धुकर्मायस्थितैर्ब्रह्माह्वयः स्मृतः।
एषु जातः सुखी विद्वान्‌ धनपुत्रादिसंयुतः
lagneśād bandhukarmāyasthitairbrahmāhvayaḥ smṛtaḥ|
eṣu jātaḥ sukhī vidvān dhanaputrādisaṃyutaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशात् = लग्नेश से (गिनकर); बन्धुकर्मायस्थितैः = चतुर्थ, दशम और एकादश में स्थित (शुभ ग्रहों) से; ब्रह्माह्वयः = ब्रह्मा नामक (योग); स्मृतः = कहा गया; एषु जातः = इन (योगों) में जन्मा; सुखी विद्वान् = सुखी, विद्वान्; धनपुत्रादिसंयुतः = धन-पुत्र आदि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश से चतुर्थ, दशम और एकादश भावों में (शुभ ग्रह) स्थित हों तो ब्रह्मा नामक योग होता है; इन योगों में जन्मा जातक सुखी, विद्वान् और धन-पुत्र आदि से युक्त कहा गया है। विविध-योग अध्याय के इस पद में गिनती लग्न से नहीं, लग्नेश की राशि से है — यह भेद निर्णायक है।

English rendering With benefics in the fourth, tenth and eleventh counted from the lagna lord, the yoga called Brahmā is said to arise; one born in these yogas is happy, learned, and endowed with wealth, sons and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-शर्त। गिनती-आधार: r₀ = राशि(लग्नेश); जाँच-भाव = r₀ + 3, r₀ + 9, r₀ + 10 (mod 12) अर्थात् वहाँ से 4, 10, 11। (योग का पूर्ण विवरण पूर्व-श्लोक से जुड़ा है — पाठ-भेद संभव।)

36.37
लग्नान्मदाष्टगैः सौम्यैः पापदृग्‌योगवर्जितैः।
योगो लग्नाधियोगोऽस्मिन्‌ महात्मा शास्त्रवित्‌ सुखी
lagnānmadāṣṭagaiḥ saumyaiḥ pāpadṛg‌yogavarjitaiḥ|
yogo lagnādhiyogo'smin‌ mahātmā śāstravit‌ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; मद = सप्तम भाव (काम/जाया-स्थान); अष्ट-गैः = अष्टम भाव में स्थित; सौम्यैः = सौम्य ग्रहों से (बुध, गुरु, शुक्र — प्राकृतिक शुभ); पाप-दृक्-योग-वर्जितैः = पाप-दृष्टि और पाप-संयोग से रहित; योगः लग्नाधियोगः = यह योग लग्नाधियोग; अस्मिन् = इसमें (जात); महात्मा = उदार/महान् स्वभाव; शास्त्रवित् = शास्त्रज्ञ; सुखी = सुख-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि लग्न से सप्तम और अष्टम भावों में सौम्य ग्रह स्थित हों, और वे पाप-दृष्टि तथा पाप-ग्रह-योग से मुक्त हों, तो वह योग लग्नाधियोग कहलाता है। इस योग में जात महात्मा, शास्त्रवित् और सुखी कहा गया है। चन्द्र-आधारित अधियोग में षष्ठ-सप्तम-अष्टम की चर्चा प्रसिद्ध है; यहाँ पाठ “मदाष्टगैः” है — षष्ठ का स्पष्ट उल्लेख इस पंक्ति में नहीं; पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव।

English rendering The text states: when benefics occupy the 7th and 8th from the Lagna, free from malefic aspect and conjunction, the yoga is Lagnādhiyoga; under it the native is described as great-souled, learned in the śāstras, and happy. (Standard Adhiyoga from the Moon often includes the 6th as well; this reading names मद् and अष्ट — recension variance possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-परिभाषा (भाव-स्थान + शुभ/पाप-शर्त), न कि संख्यात्मक सूत्र।
शर्तें (इस पाठ के अनुसार):
(1) सौम्य ग्रह ∈ {बुध, गुरु, शुक्र} लग्न से भाव 7 और/या 8 में हों;
(2) उन पर पाप-दृष्टि न हो; पाप-ग्रह से युति न हो;
(3) तब नाम = लग्नाधियोग।
फल-कथन शास्त्र का है — “महात्मा, शास्त्रवित्, सुखी” — निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं। दृष्टि-नियम और पाप/सौम्य-वर्गीकरण जिस दृष्टि-अध्याय/परम्परा से बाँधे जाएँ, वह घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न = मेष 10° (D1)। गुरु = तुला 5° (लग्न से 7), शुक्र = वृश्चिक 12° (लग्न से 8), बुध भी तुला में; शनि/मंगल/सूर्य उन पर दृष्टि या युति न करें (दृष्टि-नियम: पारम्परिक पूर्ण दृष्टि — 7वीं सबको; शनि 3,10; मंगल 4,8; गुरु 5,9 — यहाँ लागू कर जाँचें)। तब शास्त्रोक्त लग्नाधियोग की स्थान-शर्त पूरी होती है। (अयनांश केवल ग्रह-देशांतर के लिए; योग स्वयं भाव-गणना पर निर्भर।)

36.38
लग्नपे पारिजातस्थे सुखी वर्गोत्तमे ह्यरुक्‌।
गोपुरे धनधान्याढ्‌या भूपः सिंहासने स्थिते
lagnape pārijātasthe sukhī vargottame hyaruk‌|
gopure dhanadhānyāḍh‌yā bhūpaḥ siṃhāsane sthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नपे = लग्नेश में; पारिजात-स्थे = पारिजात-अवस्था में स्थित; सुखी = सुखी; वर्गोत्तमे = वर्गोत्तम (राशि और नवांश में एक ही राशि) में; हि अरुक् = निःसंदेह रोग-रहित (शास्त्र-कथन); गोपुरे = गोपुर-अवस्था में; धन-धान्य-आढ्या = धन-धान्य से समृद्ध; भूपः = नृप/प्रभु-तुल्य; सिंहासने स्थिते = सिंहासन-अवस्था में स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश यदि पारिजात में हो तो जात सुखी; वर्गोत्तम में हो तो अरुक् (रोग-मुक्त कहा गया); गोपुर में हो तो धन-धान्य से युक्त; सिंहासन में स्थित हो तो भूप-तुल्य फल कहा गया है। यह वर्ग-सम्मान की सीढ़ी का आरम्भ है — अगला श्लोक पारावत, देवलोक, ऐरावत तक बढ़ाता है। फल शास्त्र के वचन हैं, चिकित्सकीय या राज्याधिकार की गारंटी नहीं।

English rendering The text states: with the Lagna-lord in Pārījāta the native is happy; in Vargottama, free from illness (as the śāstra phrases it); in Gopura, rich in wealth and grain; in Siṃhāsana, like a king. These are ranked multi-varga dignities of the Lagna-lord, not medical or political certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षोडश-वर्ग सम्मान-क्रम (लग्नेश की बहु-वर्ग स्थिति) + वर्गोत्तम की अलग परिभाषा।
• वर्गोत्तम: D1-राशि(λ) = D9-राशि(λ), जहाँ λ = ग्रह-देशांतर; नवांश-चाप = 30°/9 = 3°20′;
N = ⌊(λ mod 30°) / (10/3)°⌋, फिर धनात्मक/सम-राशि नियम से D9-राशि।
• पारिजात / गोपुर / सिंहासन (शास्त्रीय बहु-वर्ग श्रेणी — स्व/उच्च आदि वर्गों की संख्या के अनुसार; प्रचलित क्रम):
2 शुभ-वर्ग ≈ पारिजात; 4 ≈ गोपुर; 5 ≈ सिंहासन
(3 ≈ उत्तम — इस श्लोक में “वर्गोत्तम” शब्द अलग तकनीकी अर्थ में है)।
सटीक गिनती में कौन-से वर्ग (D2…D60 में से कौन) और “शुभ-वर्ग” की कसौटी (स्व/उच्च/मूलत्रिकोण/मित्र) घोषित करनी होती है — परम्परा-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) लग्नेश = शुक्र, λ = 45.0° (वृष 15°) — वृष में उच्च/स्व।
D9: वृष सम-राशि → नवांश मेष से; 15° ÷ 3°20′ = 4 पूर्ण नवांश → 5वाँ = मिथुन ≠ वृष → वर्गोत्तम नहीं।
यदि उसी देशांतर पर अन्य वर्गों (D2, D3, D4, …) में स्व/उच्च की गिनती = 2 → पारिजात; = 4 → गोपुर; = 5 → सिंहासन — तब इस श्लोक का तत्संबंधी फल-कथन लागू माना जाता है। (अयनांश: सायन/निरयण λ एक ही प्रणाली में बाँधें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग (D1…D60) शुद्ध मापांक-अंकगणित हैं — 30° राशि को समान चापों में बाँटकर नियम से राशि-मानचित्र। वर्गोत्तम = D1∩D9 राशि-समानता; पारिजात-गोपुर-सिंहासन बहु-वर्ग सम्मान की सीढ़ी हैं। हमारा वर्ग-इंजन इन्हीं विभाजन-नियमों को निर्धारक रूप में चलाता है; फल-वाक्य अलग परत हैं — “शास्त्र कहता है”, गणना से प्रमाणित भाग्य नहीं।

36.39
विद्वान्‌ पारावते श्रीमान्‌ देवलोके सवाहनः।
ऐरावतस्थिते जातो विख्यातो भूपवन्दितः
vidvān‌ pārāvate śrīmān‌ devaloke savāhanaḥ|
airāvatasthite jāto vikhyāto bhūpavanditaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्वान् = पण्डित/ज्ञान-सम्पन्न; पारावते = पारावत-अवस्था में; श्रीमान् = श्री-सम्पन्न; देवलोके = देवलोक-अवस्था में; स-वाहनः = वाहन-सहित; ऐरावत-स्थिते = ऐरावत-अवस्था में स्थित; जातः = जात; विख्यातः = प्रसिद्ध; भूप-वन्दितः = नृपों द्वारा सम्मानित।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की वर्ग-सीढ़ी आगे बढ़ती है। शास्त्र कहता है — लग्नेश पारावत में हो तो जात विद्वान्; देवलोक में हो तो श्रीमान् और सवाहन; ऐरावत में स्थित हो तो विख्यात और भूप-वन्दित कहा गया है। यह क्रम सम्मान की ऊँचाई बताता है, न कि राज्याभिषेक या यश की अनिवार्यता।

English rendering Continuing the Lagna-lord’s multi-varga ladder, the text states: in Pārāvata, learned; in Devaloka, prosperous and endowed with conveyances; in Airāvata, famous and honoured by kings. Ranked dignity-language of the śāstra — not a guarantee of office or renown.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उसी बहु-वर्ग श्रेणी का उत्तरार्ध (लग्नेश पर लागू, 36.38 से अन्वय)। प्रचलित संख्या-क्रम (स्व/उच्च आदि वर्ग-गिनती):
6 ≈ पारावत → फल-कथन: विद्वान्;
7 ≈ देवलोक → श्रीमान्, सवाहन;
9 ≈ ऐरावत → विख्यात, भूप-वन्दित।
(8 ≈ ब्रह्मलोक आदि मध्य-सीढ़ी इस युग्म में नहीं कही गई — पाठ केवल तीन नाम लेता है।)
गिनती = |{ v ∈ षोडश-वर्ग : लग्नेश v में स्व/उच्च/(घोषित शुभ-स्थान) }|; श्रेणी तब ऊपर की तालिका से बाँधी जाती है। कौन से सोलह वर्ग और कौन सी “शुभ” कसौटी — सम्प्रदाय घोषित करें; पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) लग्नेश गुरु, λ ऐसा कि D1 में उच्च (कर्क) और D2, D3, D4, D7, D9, D10 में भी स्व/उच्च — शुभ-वर्ग-गिनती = 7 → देवलोक-श्रेणी; शास्त्र का वचन: श्रीमान् सवाहनः। यदि गिनती = 6 → पारावत (विद्वान्); = 9 → ऐरावत (विख्यातो भूपवन्दितः)। प्रत्येक Di का चाप = 30°/i (या अध्याय-6 का विशिष्ट नियम: होरा द्विभाजन, द्रेष्काण त्रिभाजन, नवांश नव, आदि) — λ पर मापांक से Di-राशि निकालकर ही गिनती स्थिर होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ऐरावत-पारावत-देवलोक जैसी संज्ञाएँ षोडश-वर्ग इंजन की गिनती-परत पर बैठती हैं, फल-परत पर नहीं। D1…D60 विभाजन निर्धारक हैं; “कितने वर्गों में स्व/उच्च” एक पूर्णांक `==` जाँच है — सहिष्णुता-पट्टी यहाँ भी बग छुपाती। हम वर्ग-नियम और गिनती को अलग रखते हैं; “विद्वान् / भूपवन्दित” को शास्त्र-कथन मानकर छोड़ते हैं, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

अध्यायः 37

चन्द्रयोगाध्यायः

13 श्लोक
37.1
सहस्ररश्मितचन्द्रे कण्टकादिगते क्रमात्‌।
धनधीनैपुणादीनि न्यूनमध्योत्तमानि हि
sahasraraśmitacandre kaṇṭakādigate kramāt‌|
dhanadhīnaipuṇādīni nyūnamadhyottamāni hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहस्ररश्मि = सूर्य (हज़ार-किरणों वाला); चन्द्र = चन्द्रमा; कण्टक = केन्द्र-स्थान (1/4/7/10); कण्टकादि-गत = केन्द्र-आदि (केन्द्र → पणफर → आपोक्लिम) स्थानों में स्थित; क्रमात् = क्रमशः; धन-धी-नैपुण = धन, बुद्धि, कौशल; न्यून-मध्य-उत्तम = निम्न, मध्यम, श्रेष्ठ। (पाठ-भेद संभव — "सहस्ररश्मितचन्द्रे" का पाठ विवादास्पद है।)

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय-प्रारम्भ का सूत्र है। शास्त्र कहता है कि सूर्य के सापेक्ष प्रकाशित चन्द्रमा (तथा सूर्य-चन्द्र) जब कण्टक (केन्द्र) आदि स्थान-वर्गों में क्रमशः स्थित हों, तो धन, बुद्धि और नैपुण्य आदि फल क्रमशः न्यून, मध्यम एवं उत्तम कोटि के होते हैं। तात्पर्य यह कि चन्द्र-योग-विचार में चन्द्रमा की स्थानगत एवं प्रकाशगत बलावस्था ही फल की तीव्रता तय करती है।

English rendering As the Sun and the (Sun-lit) Moon occupy the angular houses and those that follow, in order, the results in wealth, intellect and skill are respectively inferior, middling and superior — the chapter's opening rubric that the Moon's positional and phase strength grades all its yogas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-वर्ग विभाजन (लग्न या चन्द्र से गिनकर):
केन्द्र = {1, 4, 7, 10}; पणफर = {2, 5, 8, 11}; आपोक्लिम = {3, 6, 9, 12}.
प्रकाश-मात्रा (पक्षबल-तुल्य) ≈ सूर्य-चन्द्र अन्तराल कोण θ के समानुपाती; शुक्लपक्ष में θ बढ़ने पर चन्द्र-बल बढ़ता है। तीन फल-कोटियाँ (न्यून/मध्य/उत्तम) तीन स्थान-वर्गों से मैप होती हैं — क्रम-निर्धारण पाठ-सापेक्ष है (पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) चन्द्र 10वें (केन्द्र), 11वें (पणफर), 3रे (आपोक्लिम) भाव में — तीन भिन्न स्थान-वर्ग; इनके अनुसार फल की कोटि श्लोक के क्रम से भिन्न-भिन्न मानी जाती है। रूढ़ मत में केन्द्र सर्वबलवान होता है, अतः फल-क्रम की व्याख्या में मतभेद है — इसीलिए "पाठ-भेद संभव" अंकित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक जिस "प्रकाश-से-बल" पर टिका है, वही षड्बल (BPHS अ.27) के कालबल-अन्तर्गत पक्षबल का बीज है — 1 रूप = 60 विरूप की इकाई में एक स्पष्ट संख्यात्मक नियम, व्याख्या नहीं। हमारे डिकोड-अनुशासन के अनुसार बल = गणना (exact), और फल-कथन = शास्त्र का वचन — दोनों को पृथक् रखा गया है।

37.2
स्वांशे वा स्वाधिमित्रांशे स्थितश्च दिवसे शशी।
गुरुणा दृश्यते तत्र जातो धनसुखान्वितः
svāṃśe vā svādhimitrāṃśe sthitaśca divase śaśī|
guruṇā dṛśyate tatra jāto dhanasukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशे = अपने अंश (सामान्यतः नवांश D9) में; वा = अथवा; स्वाधिमित्रांशे = अपने अधि-मित्र के अंश में; स्थितः = स्थित; दिवसे = दिन में (दिनजन्म / दिवा-काल); शशी = चन्द्र; गुरुणा = बृहस्पति द्वारा; दृश्यते = देखा जाता है (दृष्टि); तत्र = उस दशा में; जातः = जातक; धनसुखान्वितः = धन और सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चन्द्र स्वांश अथवा अपने अधिमित्र के अंश में स्थित हो, और दिवा-काल में गुरु उसे देखे, तब उस योग में जन्मा जातक धन और सुख से युक्त कहा गया है। यहाँ दो शर्तें एक साथ हैं — अंश-शुद्धि और गुरु-दृष्टि, तथा काल-निर्देश “दिवसे”। यह फल-कथन है; इसे नियति का प्रमाण न समझें।

English rendering The text states that when the Moon stands in its own aṃśa or in the aṃśa of its adhi-mitra and, by day, is aspected by Jupiter, the native born under that condition is said to be endowed with wealth and comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) नवांश (D9): 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ = 10/3° प्रत्येक नवांश-खण्ड। चन्द्र-देशान्तर λ_☽ (राशि के भीतर 0°…30°) पर:
नवांश-सूचकांक = ⌊λ_local ÷ (10/3)⌋ ∈ {0…8}; तत्पश्चात् स्व/मित्र-राशि-मानचित्र से “स्वांश / अधिमित्रांश” जाँच। (2) गुरु-दृष्टि: पारंपरिक पूर्ण दृष्टि — गुरु 5, 7, 9 भावों पर (कुछ पद्धतियों में विशेष दृष्टि-बल)। (3) “दिवसे” = सूर्योदय–सूर्यास्त के बीच जन्म-काल। फल = शास्त्र-कथित धन-सुख संकेत; कोई संख्यात्मक धन-माप नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र वृषभ 12°40′ → स्थानीय λ = 12°40′ = 12.667°; नवांश-खण्ड = ⌊12.667 ÷ 3.333…⌋ = ⌊3.80⌋ = 3 → चतुर्थ नवांश। वृषभ से नवांश-क्रम (चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम के अनुसार) से प्राप्त नवांश-राशि यदि चन्द्र-स्वांश (कर्क) या अधिमित्र-अंश हो, और जन्म दिवा हो, और गुरु चन्द्र पर 5/7/9 दृष्टि दे — तो श्लोक का धनसुख-योग लागू। (अयनांश: निरयण देशान्तर तय करने के लिए आवश्यक; गृह: whole-sign दृष्टि-गिनती।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश / अधिमित्रांश” सीधे षोडश-वर्ग की नवांश (D9) विभाजन-रेखा पर टिकते हैं — 30° का नौ समान 3°20′ खण्ड, मॉड्यूलर मानचित्र। हमारे वर्ग-इंजन में D1…D60 का यही नियत विभाजन है; फल-वाक्य अलग रहता है, गणना `==` सटीक चाप-सीमा पर।

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37.3
स्वांशे वा स्वाधिमित्रांशे स्थितश्च शशभृन्निशि।
शुक्रेण दृश्यते तत्र जातो धनसुखान्वितः
svāṃśe vā svādhimitrāṃśe sthitaśca śaśabhṛnniśi|
śukreṇa dṛśyate tatra jāto dhanasukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशे = अपने अंश में; स्वाधिमित्रांशे = अधिमित्र-अंश में; शशभृत् = चन्द्र (शश-धारी); निशि = रात्रि में; शुक्रेण = शुक्र द्वारा; दृश्यते = दृष्ट; जातः = जन्मा; धनसुखान्वितः = धन-सुख युक्त।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक का रात्रि-युग्म: शास्त्र कहता है कि चन्द्र स्वांश या अधिमित्रांश में हो और रात्रि में शुक्र उसे देखे, तो जातक धनसुखान्वित कहा गया है। दिन में गुरु, रात्रि में शुक्र — यही काल-ग्रह युग्म यहाँ स्थिर है। अंश-शुद्धि की शर्त दोनों श्लोकों में समान रहती है।

English rendering The text states that when the Moon is in its own or adhi-mitra aṃśa and, at night, is aspected by Venus, the native so born is said to be possessed of wealth and comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) D9-अंश जाँच = श्लोक 37.2 के समान (3°20′ खण्ड)। शुक्र-दृष्टि: पारंपरिक पूर्ण सप्तम-दृष्टि (7 भाव; कुछ परंपराएँ शुक्र की विशेष दृष्टि नहीं मानतीं — यहाँ साधारण दृष्टि-नियम)। “निशि” = सूर्यास्त–सूर्योदय। दिन-गुरु / रात्रि-शुक्र का युग्म काल-द्वार है; अंश + दृष्टि + काल तीनों शर्तें AND से जुड़तीं।

उदाहरण (worked example) जन्म स्थानीय रात्रि; चन्द्र मिथुन 8°00′ → ⌊8 ÷ (10/3)⌋ = ⌊2.4⌋ = 2 → तृतीय नवांश। नवांश-राशि यदि स्व/अधिमित्र, और शुक्र चन्द्र से 7वें भाव में (whole-sign) → श्लोक का धनसुख-कथन लागू। यदि वही अंश-दृष्टि दिन में हो और केवल शुक्र देखे (गुरु न देखे) → 37.2 की शर्त पूरी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) रात्रि-शुक्र वाला यह नियम भी D9 (नवांश) की उसी वर्गाङ्क-गणित पर टिका है जिसे षोडश-वर्ग योजना में D9 = 30°/9 के रूप में कूटबद्ध किया गया है। इंजन अंश-सीमा तय करता है; “धनसुखान्वित” को हम भविष्य-वाणी नहीं, शास्त्र-वाक्य मानते हैं।

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37.4
एतद्‌विपर्ययस्थे च शुक्रेज्यानवलोकिते।
जायतेऽल्पधनो बालो योगेऽस्मिन्निर्धनोऽथवा
etad‌viparyayasthe ca śukrejyānavalokite|
jāyate'lpadhano bālo yoge'sminnirdhano'thavā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एतद्-विपर्ययस्थे = उपर्युक्त स्थिति के विपरीत स्थित; च = और; शुक्र-इज्य = शुक्र और गुरु (इज्य = यज्ञाहं = बृहस्पति); अनवलोकिते = न देखे जाने पर / (अथवा) विपरीत अवलोकन में — पाठ: “शुक्रेज्यानवलोकिते” = शुक्र-गुरु द्वारा अवलोकित होने पर भी विपरीत दशा में; जायते = जन्म लेता है; अल्पधनः = अल्प धन वाला; बालः = बालक/जातक; योगे अस्मिन् = इस योग में; निर्धनः = धनहीन; अथवा = या।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब स्थिति पूर्वोक्त (37.2–37.3) के विपरीत हो — और शुक्र तथा गुरु के अवलोकन का वह अनुकूल युग्म न बने — तब जातक अल्पधन कहा गया है, अथवा इस योग में निर्धन भी कहा जा सकता है। यह विपर्यय-फल है: अनुकूल अंश-काल-दृष्टि टूटने पर धन-संकेत क्षीण। भय या निश्चित दरिद्रता का दावा नहीं — केवल शास्त्र का फल-वाक्य।

English rendering The text states that when the Moon’s condition is the reverse of the foregoing, and the Venus–Jupiter regard does not form that favourable pair, the child is said to be of little wealth, or else, in this yoga, without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विपर्यय-योग)। तार्किक निषेध: 37.2/37.3 की शर्त-समुच्चय (स्वांश∪अधिमित्रांश) ∧ (दिवा∧गुरु-दृष्टि ∨ निशि∧शुक्र-दृष्टि) का पूरक। जब यह समुच्चय असत्य हो, शास्त्र अल्पधन / निर्धन फल कहता है। “पाठ-भेद संभव” — “अनवलोकिते” बनाम “अवलोकिते” पाठों में दृष्टि-ध्रुवता भिन्न हो सकती है; अर्थ: अनुकूल काल-ग्रह युग्म का अभाव।

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37.5
चन्द्राद्रन्ध्रारिकामस्थै सौम्यैः स्याधियोगकः।
तत्र राजा च मन्त्री च सेनाधीशश्च बलक्रमात्‌
candrādrandhrārikāmasthai saumyaiḥ syādhiyogakaḥ|
tatra rājā ca mantrī ca senādhīśaśca balakramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् = चन्द्र से; रन्ध्र = 8वाँ भाव; अरि = 6वाँ भाव; काम = 7वाँ भाव; स्थैः = स्थित; सौम्यैः = शुभ ग्रहों से (बुध, गुरु, शुक्र; पाठानुसार); स्यात् = होता है; अधियोगकः = अधियोग; तत्र = उसमें; राजा = नरेश; मन्त्री = अमात्य; सेनाधीशः = सेनापति; बलक्रमात् = बल के क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र से छठे, सातवें और आठवें भाव में शुभ ग्रह स्थित हों तो अधियोग बनता है। उस योग में जातक को बल-क्रम से राजा, मन्त्री अथवा सेनाधीश कहा गया है — अर्थात् शुभों की संख्या/बल जितना अधिक, पद-संकेत उतना ऊँचा। यह चन्द्र-आधारित स्थान-योग है, लग्न-केन्द्र योग नहीं।

English rendering The text states that when benefics occupy the sixth, seventh, and eighth from the Moon, Adhi-yoga arises; there the native is spoken of as king, minister, or commander of armies according to the order of strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चन्द्र-भाव गिनती (whole-sign, चन्द्र-राशि = भाव 1):
- अरि = (C + 5) mod 12 → 6
- काम = (C + 6) mod 12 → 7
- रन्ध्र = (C + 7) mod 12 → 8
अधियोग-शर्त: शुभ ग्रह ∈ {भाव 6, 7, 8}_☽ । “बलक्रमात्” = उन शुभों का सापेक्ष बल (षड्बल/स्थान-बल आदि — श्लोक स्वयं इकाई नहीं देता) → फल-श्रेणी राजा > मन्त्री > सेनाधीश। राहु-केतु/सूर्य यहाँ “सौम्य” नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र = सिंह। तब चन्द्रात् 6 = मकर, 7 = कुम्भ, 8 = मीन। यदि गुरु मकर, शुक्र कुम्भ, बुध मीन → तीनों सौम्य अधियोग-क्षेत्र में → शास्त्रोक्त अधियोग; तीनों प्रबल हों तो “राजा” श्रेणी का संकेत (बल-तुलना अलग अध्याय/षड्बल से)। केवल एक शुभ उन भावों में → अगले श्लोक की अल्पधन-पंक्ति से जोड़ें।

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37.6
चन्द्राद्‌ वृद्धिगतैः सर्वैः शुभैर्जातो महाधनी।
द्वाभ्यां मध्यधनो जात एकेनाऽल्पधनो भवेत्‌
candrād‌ vṛddhigataiḥ sarvaiḥ śubhairjāto mahādhanī|
dvābhyāṃ madhyadhano jāta ekenā'lpadhano bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् = चन्द्र से; वृद्धिगतैः = वृद्धि को प्राप्त / उन (अधियोग-)स्थानों में संपन्न; सर्वैः = सभी; शुभैः = शुभ ग्रहों से; जातः = जन्मा; महाधनी = महान् धनवान्; द्वाभ्यां = दो से; मध्यधनः = मध्यम धन वाला; एकेन = एक से; अल्पधनः = अल्प धन वाला; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ अधियोग का मात्रा-विवेक: शास्त्र कहता है कि चन्द्र से (पूर्वोक्त वृद्धि-क्षेत्र में) जब सभी शुभ हों तो जातक महाधनी कहा गया; दो शुभ हों तो मध्यधन; एक हो तो अल्पधन। संख्या सीधी फल-सीढ़ी बाँधती है — 3 → महा, 2 → मध्य, 1 → अल्प। यह गिनती का नियम है, राशि की भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that when, from the Moon, all the benefics stand in that increasing/Adhi configuration, the native is said to be greatly wealthy; with two, of middling wealth; with one, of little wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मान S = |{शुभ ग्रह : भाव_☽(ग्रह) ∈ {6, 7, 8}}|।
- S = 3 (सर्वे शुभाः) → महाधनी
- S = 2 → मध्यधन
- S = 1 → अल्पधन
- S = 0 → अधियोग नहीं (पूर्व श्लोक की सिद्धि नहीं)
“वृद्धिगतैः” = अधियोग-क्षेत्र में स्थित/समृद्ध अवस्था; कुछ पाठ वृद्धि = बल-वृद्धि से जोड़ते हैं — यहाँ मुख्यतः गणना = शुभ-गणना S। सूर्य/मंगल/शनि/राहु-केतु शुभ-गण में नहीं (जब तक पाठ “सौम्य” न बदले)।

उदाहरण (worked example) चन्द्र = वृश्चिक → क्षेत्र = मेष(6), वृष(7), मिथुन(8)। गुरु वृष, शुक्र मिथुन, बुध कन्या → S = 2 (बुध क्षेत्र से बाहर) → शास्त्र: मध्यधन। तीनों क्षेत्र में हों → S = 3 → महाधनी।

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37.7
चन्द्रात्‌ स्वान्त्योभयस्थे हि ग्रहे सूर्यं बिना क्रमात्‌।
सुनफाख्तोऽनफाख्यश्च योगो दुरधराह्वयः
candrāt‌ svāntyobhayasthe hi grahe sūryaṃ binā kramāt‌|
sunaphākhto'naphākhyaśca yogo duradharāhvayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् = चन्द्रमा से; स्व = द्वितीय (धन) भाव; अन्त्य = द्वादश (12वाँ) भाव; उभयस्थ = दोनों (2रे व 12वें) में स्थित; सूर्यं बिना = सूर्य को छोड़कर; क्रमात् = क्रमशः; सुनफ = "सुनफा"; अनफ = "अनफा"; योगो दुरधराह्वयः = "दुरुधरा" नामक योग। (पाठ-भेद संभव — "सुनफाख्तः" का पाठ "सुनफाख्यः" अभीष्ट।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इन तीन प्रसिद्ध चन्द्र-योगों को परिभाषित करता है — सूर्य को छोड़कर कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय भाव में हो तो "सुनफा", द्वादश में हो तो "अनफा", और दोनों (2रे व 12वें) में हो तो "दुरुधरा" योग बनता है। ये तीनों चन्द्रमा के आस-पास ग्रह-विन्यास पर आधारित मूल चन्द्र-योग हैं।

English rendering The text states that a planet other than the Sun, in the 2nd from the Moon forms Sunapha, in the 12th forms Anapha, and in both the 2nd and the 12th forms the yoga named Durudhara.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना (चन्द्र = 1), सूर्य वर्जित:
सुनफा ⇔ ∃ ग्रह (≠ सूर्य) at (चन्द्र+1) = 2रा।
अनफा ⇔ ∃ ग्रह (≠ सूर्य) at (चन्द्र−1 ≡ चन्द्र+11) = 12वाँ।
दुरुधरा ⇔ दोनों (2रे तथा 12वें) में ग्रह।
यह बूलियन-स्थान-परीक्षण है; कोई अंश-गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र = सिंह। 2रा = कन्या, 12वाँ = कर्क। मंगल कन्या में → सुनफा। कोई ग्रह कर्क में → अनफा। दोनों राशियों में ग्रह → दुरुधरा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "सूर्यं बिना" एक घोषित परिपाटी है — गणना में सूर्य को गिनना नहीं। हमारे अनुशासन (declare conventions) के अनुसार राहु/केतु को इन योगों में सम्मिलित करना है या नहीं, यह एक स्पष्ट `[HUMAN]` परिपाटी-निर्णय है, मौन चयन नहीं — ठीक वैसे ही जैसे अष्टकवर्ग (अ.66) में चन्द्र-सारणी की परिपाटी को हमने घोषित रखा।

37.8
राजा वा राजतुल्यो वा धीधनख्यातिमाञ्जनः।
स्वभुजार्जितवित्तश्च सुनफायोगसम्भवः
rājā vā rājatulyo vā dhīdhanakhyātimāñjanaḥ|
svabhujārjitavittaśca sunaphāyogasambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजा = नृपति / शासन-सम; राजतुल्य = राजा-सदृश पद; धी = बुद्धि / विवेक; धन = वित्त; ख्यातिमान् = यशस्वी; जनः = जातक; स्वभुजार्जित = स्व-बाहु/स्व-प्रयत्न से अर्जित; वित्त = सम्पत्ति; सुनफायोगसम्भवः = सुनफा-योग से उत्पन्न (चन्द्रात् द्वितीये, सूर्य-वर्जित ग्रह)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सुनफा-योग में उत्पन्न व्यक्ति राजा होता है अथवा राजा-तुल्य पद पाता है। वह बुद्धि, धन और ख्याति से युक्त होता है। उसकी सम्पत्ति स्व-प्रयत्न और स्व-बाहु-बल से अर्जित बताई गई है। यह फल-कथन सुनफा-योग के सम्भव (उत्पन्न) जातक के विषय में है।

English rendering The text states that one born under Sunaphā-yoga becomes a king or the equal of a king, and is endowed with intelligence, wealth, and renown. Such a person is further said to possess wealth earned by one’s own effort and arms.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सुनफा-योग-फल)। सुनफा स्वयं स्थान-योग है: चन्द्र से २रे भाव में सूर्य-भिन्न कोई ग्रह; इस श्लोक में केवल उस योग का शास्त्रोक्त फल दिया है, गणना-सूत्र नहीं।

37.9
भूपोऽगदशरीरश्च शीलवान्‌ ख्यातकीर्तिमान्‌।
सुरूपश्चाऽनफाजातो सुखैः सर्वैः समन्वितः
bhūpo'gadaśarīraśca śīlavān‌ khyātakīrtimān‌|
surūpaścā'naphājāto sukhaiḥ sarvaiḥ samanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूप = राजा / भूमिपति; अगदशरीर = रोग-रहित शरीर; शीलवान् = सदाचार-युक्त; ख्यातकीर्तिमान् = प्रसिद्ध यश वाला; सुरूप = सुन्दर रूप; अनफाजातः = अनफा-योग में उत्पन्न (चन्द्रात् द्वादशे, सूर्य-वर्जित ग्रह); सुखैः सर्वैः समन्वितः = सब सुखों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अनफा-योग में उत्पन्न जातक भूप (राजा) होता है और उसका शरीर अगद (रोग-मुक्त) बताया गया है। वह शीलवान् तथा ख्यात-कीर्ति से युक्त होता है। रूप में सुन्दर और सब प्रकार के सुखों से समन्वित—यह अनफा-जात का शास्त्रोक्त फल-कथन है।

English rendering The text states that one born under Anaphā-yoga becomes a ruler, is of a body free from disease, virtuous, and of celebrated fame. Such a person is said to be handsome and endowed with every comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनफा-योग-फल)। अनफा = चन्द्र से १२वें भाव में सूर्य-भिन्न ग्रह; श्लोक केवल फल बताता है, विभाग-सूत्र नहीं।

37.10
उत्पन्नसुखभुग्‌ दाता धनवाहनसंयुतः।
सद्‌भृत्यो जायते नूनं जनो दुरधराभवः
utpannasukhabhug‌ dātā dhanavāhanasaṃyutaḥ|
sad‌bhṛtyo jāyate nūnaṃ jano duradharābhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्पन्नसुखभुक् = उत्पन्न/प्राप्त सुख का भोक्ता; दाता = दानशील; धन = वित्त; वाहन = यान / सवारी; संयुतः = युक्त; सद्भृत्य = श्रेष्ठ सेवक/अनुचर; जायते नूनं = निश्चित रूप से उत्पन्न होता है; जनः = जातक; दुरधराभवः = दुरधरा-योग से उत्पन्न (चन्द्रात् २ और १२ दोनों में सूर्य-भिन्न ग्रह)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दुरधरा-योग में उत्पन्न व्यक्ति उत्पन्न सुखों का भोग करता है और दाता होता है। वह धन तथा वाहन से युक्त बताया गया है। “नूनम्” से शास्त्र इस फल को दृढ़ता से जोड़ता है—सद्भृत्य (अच्छे सेवक) वाला जन दुरधरा-भव कहलाता है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that one born under Durudharā-yoga enjoys pleasures that arise, is a giver, and is endowed with wealth and conveyances. Such a person is further said to have worthy attendants.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुरधरा-योग-फल)। दुरधरा = चन्द्र से २रे और १२वें दोनों में (सूर्य-भिन्न) ग्रह-स्थिति; यहाँ केवल फल है।

37.11
चन्द्रादाद्यधनाऽन्त्यस्थो विना भानुं न चेद्‌ग्रहः।
कश्चित्‌ स्याद्वा विना चन्द्रं लग्नात्‌ केन्द्रगतोऽथ वा
candrādādyadhanā'ntyastho vinā bhānuṃ na ced‌grahaḥ|
kaścit‌ syādvā vinā candraṃ lagnāt‌ kendragato'tha vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् = चन्द्र से; आद्यधन = द्वितीय भाव (धन-स्थान, “आद्य” = आरम्भ-धन = २); अन्त्य = द्वादश (अन्त्य-स्थान); स्थः = स्थित; विना भानुम् = सूर्य को छोड़कर; न चेद् ग्रहः कश्चित् = यदि कोई (अन्य) ग्रह न हो; वा = अथवा; विना चन्द्रम् = चन्द्र को छोड़कर; लग्नात् केन्द्रगतः = लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) में स्थित; अथवा = या फिर (वह स्थिति)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र केमद्रुम की स्थिति निर्धारित करता है: यदि चन्द्र से आद्य-धन (२) और अन्त्य (१२) में—सूर्य को छोड़—कोई ग्रह न हो, तो वह दशा केमद्रुम की ओर ले जाती है। अथवा, चन्द्र को छोड़, लग्न-केन्द्रों में भी यदि (योग-निर्धारक) ग्रह-स्थिति न बने—पाठ इस वैकल्पिक पक्ष को जोड़ता है। पाठ-भेद संभव: कुछ परम्पराएँ केवल चन्द्र-द्वितीय/द्वादश की शून्यता से केमद्रुम मानती हैं; केन्द्र-पक्ष की व्याख्या संस्करणानुसार भिन्न हो सकती है।

English rendering The text defines the condition: if no planet other than the Sun occupies the second and twelfth from the Moon—or, alternatively, if (with the Moon set aside) no such placement holds in the kendras from the lagna—the configuration points to the yoga named in the next verse. Readings and the exact scope of the kendra-clause may vary by recension (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-योग की जाँच (केमद्रुम-पूर्व शर्त):
माना चन्द्र-राशि = \(R_☾\) (D1, 1…12)।
- सुनफा/अनफा/दुरधरा-क्षेत्र: भाव \( (R_☾ + 1) \bmod 12 \) (द्वितीय) और \( (R_☾ + 11) \bmod 12 \) (द्वादश)।
- शर्त-१ (मुख्य): इन दोनों भावों में सूर्य-भिन्न कोई ग्रह नहीं → सुनफा/अनफा/दुरधरा अभाव।
- शर्त-२ (पाठानुसार विकल्प): लग्न-केन्द्र \( \{L, L+3, L+6, L+9\} \bmod 12 \) में चन्द्र-भिन्न ग्रह-स्थिति का अभाव (व्याख्या पाठ-सापेक्ष)।
केन्द्र = लग्न से १, ४, ७, १०। ग्रह-गण में राहु/केतु की गणना परम्परा-भेद से भिन्न—यहाँ श्लोक “ग्रहः” कहता है; निर्णय में घोषित परम्परा रखें।

उदाहरण (worked example) मान लें D1: लग्न = मेष (1), चन्द्र = कर्क (4); ग्रह: सूर्य = सिंह (5), बुध = मिथुन (3), शेष ग्रह अन्यत्र।
चन्द्र से २ = सिंह (5) → केवल सूर्य (विना भानुम् → नहीं गिना) → २ खाली (सूर्य-भिन्न ग्रह शून्य)।
चन्द्र से १२ = मिथुन (3) → बुध उपस्थित → अनफा/संबंधी योग संभव; केमद्रुम नहीं।
यदि बुध भी अन्यत्र हो और २–१२ दोनों सूर्य-भिन्न ग्रह-शून्य हों, तो शर्त-१ से केमद्रुम-पात्रता; केन्द्र-पक्ष अलग से लग्न 1,4,7,10 पर जाँचे। (अयनांश केवल ग्रह-देशांतर के लिए; भाव-गणना यहाँ राशि-पूर्णांक पर।)

37.12
योगः केमद्रुमो नाम तत्र जातोऽतिगर्हितः।
बुद्धिविद्याविहीनश्च दरिद्रापत्तिसंयुतः
yogaḥ kemadrumo nāma tatra jāto'tigarhitaḥ|
buddhividyāvihīnaśca daridrāpattisaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगः केमद्रुमो नाम = "केमद्रुम" नामक योग; तत्र जातः = उसमें उत्पन्न; अति-गर्हितः = अत्यन्त निन्दित/हीन-दशा वाला; बुद्धि-विद्या-विहीनः = बुद्धि एवं विद्या से रहित; दरिद्र-आपत्ति-संयुतः = दरिद्रता एवं विपत्ति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त पूर्ण होने पर बनने वाला केमद्रुम-योग — शास्त्र कहता है — अत्यन्त निन्दित माना गया है; ऐसे में जन्मा जातक बुद्धि एवं विद्या से हीन तथा दरिद्रता और विपत्तियों से ग्रस्त बताया गया है। (यह शास्त्र का कठोर फल-कथन है; इसे नियति या भय-वचन के रूप में नहीं, अपितु योग-भंग के अनेक अपवादों सहित पढ़ना चाहिए।)

English rendering — the combination named Kemadruma arises, held most censured; the text states that one born under it is bereft of intellect and learning, and beset by poverty and misfortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केमद्रुम-फल)। संगणकीय भाग 37.11 की बूलियन-शर्त है; यह श्लोक केवल उसका परिणाम कहता है। अनुशासन-टिप्पणी: यह शास्त्र का सशर्त कथन है — इसे निश्चित दुर्भाग्य-घोषणा या भय/उपाय-दबाव के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता; अनेक ग्रह-स्थितियाँ इस योग को भंग कर देती हैं।

37.13
अन्ययोगफलं हन्ति चन्द्रयोगो विशेषतः।
स्वफलं प्रददातीति बुधो यत्नाद्‌ विचिन्तयेत्‌
anyayogaphalaṃ hanti candrayogo viśeṣataḥ|
svaphalaṃ pradadātīti budho yatnād‌ vicintayet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्य-योग-फलं = अन्य योगों का फल; हन्ति = नष्ट/अभिभूत करता है; चन्द्र-योगः = चन्द्रमा-सम्बन्धी योग; विशेषतः = विशेष रूप से; स्व-फलं प्रददाति = अपना फल देता है; इति = इस प्रकार; बुधः = बुद्धिमान (ज्योतिषी); यत्नाद् विचिन्तयेत् = यत्नपूर्वक विचार करे।

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय का उपसंहार-नियम है। शास्त्र कहता है — चन्द्रमा-सम्बन्धी योग अन्य योगों के फल को विशेष रूप से अभिभूत कर अपना ही फल प्रदान करता है; अतः बुद्धिमान ज्योतिषी को इसे यत्नपूर्वक (सावधानी से) विचारना चाहिए। अर्थात् चन्द्र-योगों को फल-निर्णय में प्राथमिकता एवं विशेष सतर्कता दी जाए।

English rendering The text states that a Moon-yoga in particular overrides the results of other yogas and yields its own fruit; therefore let the wise astrologer weigh it with careful effort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (नियम-वरीयता)। यह फल-संयोजन का एक पूर्वता-नियम (precedence rule) है: चन्द्र-योग-फल ≻ अन्य-योग-फल। संगणकीय दृष्टि से यह फल-नियमों की क्रम-वरीयता तय करता है, न कि कोई नई राशि/अंश-गणना।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही "स्पष्ट-वरीयता, यत्नपूर्वक विचार" वाला सूत्र हमारे डिकोड-अनुशासन का दर्पण है — गणना (योग-परिभाषा) और व्याख्या (फल) को पृथक् रखो, और नियमों की वरीयता को मौन धारणा नहीं, अपितु घोषित क्रम बनाओ। "बुधो यत्नाद् विचिन्तयेत्" = किसी भी परिणाम को सटीक, जाँची हुई प्रमाण-श्रृंखला पर ही स्थिर मानो — वही exact-`==` अनुशासन जिस पर यह संस्करण टिका है।

अध्यायः 38

रवियोगाध्यायः

4 श्लोक
38.1
सूर्यात्‌ स्वन्त्योभयस्थैश्च विना चन्द्रं कुजादिभिः।
वेशिवोशिसमाख्यौ च तथोभयचरः क्रमात्‌
sūryāt‌ svantyobhayasthaiśca vinā candraṃ kujādibhiḥ|
veśivośisamākhyau ca tathobhayacaraḥ kramāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यात् = सूर्य से (गणना का आरम्भ-बिन्दु); स्व = सूर्य से द्वितीय भाव/राशि (पाठ-भेद संभव — यहाँ "स्व" द्वितीयस्थ का संकेत); अन्त्य = सूर्य से द्वादश (अन्तिम) भाव; उभय-स्थैः = दोनों (2रे व 12वें) में स्थित ग्रहों से; विना चन्द्रम् = चन्द्र को छोड़कर; कुजादिभिः = मंगल आदि (चन्द्रेतर) ग्रहों द्वारा; वेशि-वोशि-समाख्यौ = "वेशि" तथा "वोशि" नामक दो योग; उभयचरः = "उभयचरी" योग; क्रमात् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ सूर्य से दूसरे भाव में (चन्द्र को छोड़कर मंगल आदि कोई भी ग्रह) स्थित होने पर "वेशि" योग बनता है; बारहवें भाव में स्थित होने पर "वोशि" योग; और दोनों ही भावों में ग्रह होने पर "उभयचरी" योग — ये तीन नाम क्रमशः जानने चाहिए। इन योगों की गणना में चन्द्र को नहीं गिना जाता।

English rendering When a planet other than the Moon — Mars and the rest — stands in the 2nd house from the Sun, "Veśi" yoga is formed; in the 12th, "Vośi" yoga; in both together, "Ubhayacārī" yoga — so named respectively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह शुद्ध स्थान-गणना (whole-sign, सूर्य की राशि से) है। सूर्य की राशि-क्रमांक s ∈ {1…12} (मेष=1 … मीन=12) मानें:
- सूर्य से 2रा भाव-राशि = (s mod 12) + 1
- सूर्य से 12वाँ भाव-राशि = ((s + 10) mod 12) + 1 [अर्थात् सूर्य-राशि से ठीक पूर्ववर्ती राशि]

घटना-सूत्र (चन्द्र-रहित ग्रह-समुच्चय G = {मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि}; कुछ परम्पराएँ राहु-केतु को भी छोड़ती हैं — परम्परा-भेद संभव):
- वेशि ⇔ ∃ ग्रह ∈ G, 2रे भाव में
- वोशि ⇔ ∃ ग्रह ∈ G, 12वें भाव में
- उभयचरी ⇔ दोनों सत्य

उदाहरण (worked example) सम्मेलन — भाव सूर्य-अधिष्ठित राशि से whole-sign गिने, चन्द्र वर्जित। सूर्य मेष (s=1) में हो → 2रा = वृषभ (2), 12वाँ = मीन (12)। यदि बुध वृषभ में हो → वेशि। यदि शनि मीन में हो → वोशि। यदि दोनों हों → उभयचरी।

हमारा डिकोड (Our Decode) योग का बनना एक विशुद्ध स्थान-प्रेडिकेट है — सूर्य-राशि से ठीक पहले/ठीक बाद वाली राशि में ग्रह-उपस्थिति — ठीक वही नियतात्मक (deterministic) मॉड्युलर स्थान-अंकगणित जिसे हमारे इंजन "गणित" मानकर फल (interpretation) से पूर्णतः अलग रखते हैं। पहचान एक `==` स्थान-परीक्षण है, कोई व्याख्या नहीं।

38.2
समदृक्‌ सत्यवाङ्‌ मर्त्यो दीर्घकायोऽलसस्तथा।
सुखभागल्पवित्तोऽपि वेशियोगसमुद्‌भवः
samadṛk‌ satyavāṅ‌ martyo dīrghakāyo'lasastathā|
sukhabhāgalpavitto'pi veśiyogasamud‌bhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समदृक् = सम/स्थिर दृष्टि वाला (समान नेत्र); सत्यवाक् = सत्यभाषी; मर्त्यः = मनुष्य/जातक; दीर्घकायः = दीर्घ (लंबे) शरीर वाला; अलसः = कुछ आलसी; तथा = और; सुखभाक् = सुख का भागी; अल्पवित्तः अपि = यद्यपि अल्प-धन वाला; वेशियोगसमुद्भवः = वेशि योग में उत्पन्न (जातक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वेशि योग में जन्मा जातक सम-दृष्टि वाला, सत्यभाषी, दीर्घकायी, कुछ आलसी तथा सुख का भागी होता है — भले ही उसके पास धन थोड़ा ही क्यों न हो। यह योग-फल का कथन है, कोई निश्चयात्मक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that one born in Veśi yoga has a steady gaze, speaks truth, is tall of body, somewhat indolent, and enjoys comfort — even though of modest wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ये गुण 38.1 में स्थान-रूप से परिभाषित वेशि-योग से जुड़े शास्त्र-कथित फल हैं; इन्हें शास्त्र की उक्ति के रूप में ग्रहण करना चाहिए, न कि प्रमाणित निश्चय के रूप में।

38.3
वोशौ च निपुणो दाता यशोविद्याबलावन्तिः।
तथोभयचरे जातो भूपो वा तत्समः सुखी
vośau ca nipuṇo dātā yaśovidyābalāvantiḥ|
tathobhayacare jāto bhūpo vā tatsamaḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वोशौ = वोशि योग में; च = और; निपुणः = कुशल/निपुण; दाता = दानशील; यशः = कीर्ति; विद्या = विद्या; बल = बल; अन्वितः = युक्त (पाठ "अवन्तिः" संभवतः "अन्वितः" — पाठ-भेद संभव); तथा = और; उभयचरे = उभयचरी योग में; जातः = उत्पन्न; भूपः वा = राजा अथवा; तत्समः = उसके समान; सुखी = सुखी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार वोशि योग में जन्मा जातक निपुण, दानशील तथा यश, विद्या और बल से युक्त होता है; और उभयचरी योग में जन्मा राजा अथवा राजा-तुल्य एवं सुखी होता है। यह फल-कथन है।

English rendering In Vośi yoga, the text says, the native is skilful, liberal, and endowed with fame, learning, and strength; in Ubhayacārī yoga, one is born a king or his equal, and happy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यातव्य: तीनों योगों के फल आरोही क्रम में हैं (वेशि → वोशि → उभयचरी), जो स्थान-तर्क का ही प्रतिबिम्ब है — उभयचरी सूर्य के दोनों पार्श्वों (2रे व 12वें) को घेरता है, अतः शास्त्र उसे सर्वाधिक बलवान् फल देता है।

38.4
शुभग्रहभवे योगे फलमेवं विचिन्तयेत्‌।
पापग्रहसमुत्पन्ने योगे तु फलमन्यथा
śubhagrahabhave yoge phalamevaṃ vicintayet‌|
pāpagrahasamutpanne yoge tu phalamanyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभग्रह = शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुद्ध आदि—पारंपरिक वर्गीकरण); भवे योगे = योग उत्पन्न होने पर; फलम् एवम् = फल ऐसा (पूर्वोक्त); विचिन्तयेत् = विचार करे; पापग्रह = पाप ग्रह (शनि, मंगल, रवि आदि—पारंपरिक); समुत्पन्ने = उत्पन्न; अन्यथा = विपरीत / अन्य प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट नियम जोड़ता है—यदि ये योग शुभ ग्रहों से बनें तो फल पूर्वोक्त दिशा में सोचें; यदि पाप ग्रहों से बनें तो फल अन्यथा (उलटा या न्यून) मानें। शुभ/पाप यहाँ पाठ की पारंपरिक ग्रह-श्रेणी है, आधुनिक नैतिक निर्णय नहीं। यही श्लोक वेशि-वोशि-उभयचर के फल को द्वि-स्तरीय बनाता है—स्थान से योग, ग्रह-गुण से फल की दिशा।

English rendering The text states that when the yoga is formed by benefics, the results are to be considered as above; when formed by malefics, the results are otherwise. Benefic/malefic here follow the śāstra’s traditional classification.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Conditional phala rule, not a numeric formula:
- Form yoga by 38.1 place-check
- Tag forming planets as śubha / pāpa by the chosen classical set (declare the set)
- If all (or predominant) formers are śubha → apply 38.2–38.3 phala as stated
- If pāpa → reverse or diminish (फलमन्यथा)—the text does not quantify the “otherwise”; it only flips the reading
No degrees or bindus are given.

उदाहरण (worked example) Sun in Kanyā; Jupiter alone in Tulā (2nd from Sun) → Vesi by a śubha planet → text’s Vesi phala in the direct sense (38.2). Same geometry but Saturn alone in Tulā → Vesi by a pāpa planet → फल अन्यथा: the listed Vesi traits are not read at face value. Convention: whole-sign from Sun; Moon never counts as a former.

अध्यायः 39

राजयोगाध्यायः

48 श्लोक
39.1
अथाऽतः सम्प्रवक्ष्यामि राययोगान्‌ द्विजोत्तम।
येषां विज्ञानमात्रेण राजपूज्यो जनो भवेत्‌
athā'taḥ sampravakṣyāmi rāyayogān‌ dvijottama|
yeṣāṃ vijñānamātreṇa rājapūjyo jano bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ-अतः = अब इससे आगे; सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; राययोगान् = राज-योग (शाही/उच्च पद के योग); द्विजोत्तम = द्विजों में श्रेष्ठ (मैत्रेय को संबोधन); येषाम् = जिनका; विज्ञानमात्रेण = ज्ञान-मात्र से; राजपूज्यः = राजा द्वारा पूजित/सम्मानित; जनः = व्यक्ति; भवेत् = हो जाए।

हिन्दी भावार्थ परामर्श-स्वर में पाराशर कहते हैं—हे द्विजोत्तम, अब मैं राययोगों (राजयोगों) का विस्तार से वर्णन करूँगा। शास्त्र का कथन है कि इन योगों का विज्ञान मात्र व्यक्ति को राजपूज्य बना देता है—अर्थात् लोक-सम्मान और उच्च स्थान का संकेत। यह अध्याय की भूमिका है, कोई फल-सूची नहीं।

English rendering Parāśara now undertakes to expound the rāya-yogas (royal yogas). The text states that mere knowledge of these yogas elevates a person to royal honour—an introductory claim of the chapter’s theme, not a personal prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-प्रवेश / फल-विषय की घोषणा। “राययोग” यहाँ संरचनात्मक horā-योगों का वर्ग है; संख्या, अवधि या भाग-गणना इस श्लोक में नहीं आती।

39.2
ये योगाः शम्भुना प्रोक्ताः पुरा शैलसुताग्रतः।
तेषां सारमहं वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन
ye yogāḥ śambhunā proktāḥ purā śailasutāgrataḥ|
teṣāṃ sāramahaṃ vakṣye tavāgre dvijanandana

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये योगाः = जो योग; शम्भुना प्रोक्ताः = शम्भु (शिव) द्वारा कहे गए; पुरा = पूर्वकाल में; शैलसुता-अग्रतः = पर्वत-पुत्री (पार्वती) के समक्ष; तेषां सारम् = उनका सार; अहं वक्ष्ये = मैं कहूँगा; तव-अग्रे = तुम्हारे समक्ष; द्विजनन्दन = हे द्विजनन्दन।

हिन्दी भावार्थ जो राजयोग पूर्वकाल में भगवान् शम्भु ने पार्वती के समक्ष कहे थे, हे द्विजनन्दन, उन्हीं का सार मैं तुम्हारे सामने प्रस्तुत करता हूँ। यह परम्परा-सूत्र (गुरु-शिष्य/शिव-पार्वती संवाद) की उद्घोषणा है, जो कथन की प्रामाणिकता को स्थापित करती है।

English rendering These yogas that were formerly declared by Śambhu before the Mountain's Daughter — their essence I shall speak before you, O delight of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परम्परा/संवाद-कथन। श्लोक ज्ञान की परम्परा-श्रृंखला (शिव → पार्वती → पराशर → शिष्य) को अंकित करता है; यह प्रमाण-वंश (provenance) का वैसा ही उद्घोष है जैसा किसी सिद्धान्त-ग्रन्थ में मूल-आचार्य का उल्लेख।

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39.3
चिन्तयेत्‌ कारकांशे वा जनुर्लग्नेऽथ वा द्विज।
राजयोगकरौ द्वौ द्वौ स्फुटौ खेटौ प्रयत्नतः
cintayet‌ kārakāṃśe vā janurlagne'tha vā dvija|
rājayogakarau dvau dvau sphuṭau kheṭau prayatnataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चिन्तयेत् = विचारे / जाँचे; कारकांशे = कारकांश (आत्मकारक का नवमांश-राशि) में; वा = अथवा; जनुर्लग्ने = जन्म-लग्न में; अथ वा = या फिर; द्विज = हे ब्राह्मण; राजयोगकरौ = राजयोग उत्पन्न करने वाले; द्वौ द्वौ = दो-दो (युग्म); स्फुटौ = स्पष्ट/सुव्यक्त; खेटौ = ग्रह-द्वय; प्रयत्नतः = यत्नपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, राजयोग की जाँच या तो कारकांश में करो, या जन्म-लग्न में। शास्त्र कहता है—दो-दो स्पष्ट ग्रहों के युग्म को प्रयत्न से देखो जो राजयोग बनाते हैं। “स्फुट” यहाँ स्पष्ट स्थिति/संबंध का संकेत है, अस्पष्ट या संदिग्ध युग्म नहीं। कारकांश = आत्मकारक का D9 (नवमांश) स्थान—यह वर्ग-गणित पर निर्भर है।

English rendering Examine carefully two clear planets that form rājayoga—either in the kārakāṃśa or in the natal lagna. The text thus opens two loci of analysis for the same class of royal combinations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कारकांश-निर्धारण (वर्ग-नियम):
1. आत्मकारक (AK) = सप्त/अष्ट कारकों में सर्वाधिक डिग्री-भाग वाला ग्रह (जन्म-राशि में, 0°–30° अंश के भीतर; राहु आदि पर पाठ-भेद संभव)।
2. उस ग्रह का नवमांश (D9): प्रत्येक 30° राशि को 9 × (3°20′) भागों में बाँटें;
navāṃśa-index = ⌊λ_sign / (10/3)°⌋ ∈ {0…8}, फिर राशि-क्रम नियम से D9-राशि = f(rāśi, index)।
3. “कारकांशे” = AK की D9-राशि को लग्न-तुल्य क्षेत्र मानकर वहाँ द्वय-ग्रह योग देखना।
4. वैकल्पिक धुरी: जन्म-लग्न (D1 उदित राशि) पर वही द्वय-जाँच।
अयनांश केवल λ (भूकेन्द्रिक/ज्योतिषीय देशान्तर) पर निर्भर; वर्ग-नियम स्वयं अयनांश-मुक्त modular partition है।

उदाहरण (worked example) मानें AK = गुरु, D1 देशान्तर λ_Jup = 95.0° (कर्क 5°0′; Lahiri अयनांश घोषित)।
कर्क में नवमांश-चाप = 3°20′; ⌊5°0′ ÷ 3°20′⌋ = 1 → द्वितीय नवमांश।
चर राशि (कर्क) से D9-क्रम परंपरागत नियम से चलकर (उदाहरण-परंपरा: सम/विषम राशि नियम—पाठ-भेद संभव) मानें D9 = सिंह।
तब “कारकांश = सिंह”; वहाँ दो स्फुट राजयोग-कारी ग्रहों के संबंध (परस्पर दृष्टि/युति/अधिपति-विनिमय आदि—आगे के श्लोक) जाँचे। समान युग्म जन्म-लग्न में भी दोहराएँ।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारकांश शुद्ध D9-मानचित्र पर टिका है—ṣoḍaśa-varga शृंखला का D9(navāṃśa) 30° → 9 × 3°20′ का नियत विभाजन। वर्ग-इंजन यही modular arithmetic लागू करता है; फल-व्याख्या अलग परत है, संख्या-परत exact partition है।

39.4
आत्मकारकपुत्राभ्यां योगमेकं प्रकल्पयेत्‌।
तनुपञ्चमनाथाभ्यां तथैव द्विजसत्तम
ātmakārakaputrābhyāṃ yogamekaṃ prakalpayet‌|
tanupañcamanāthābhyāṃ tathaiva dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मकारक-पुत्राभ्याम् = आत्मकारक और पुत्र(कारक) से; योगम् एकम् = एक योग; प्रकल्पयेत् = कल्पित/रचित करे; तनु-पञ्चम-नाथाभ्याम् = तनु (लग्न) और पंचम के अधिपतियों से; तथैव = उसी प्रकार; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो समांतर योग-कल्पनाएँ देता है। पहला: आत्मकारक और पुत्रकारक (Jaimini/पाराशर परंपरा में 5वीं कोटि का कारक; पाठ-भेद संभव) का संबंध। दूसरा: लग्नेश और पंचमेश का संबंध। दोनों “एक-एक” योग-युग्म हैं—राजयोग की मूल द्वयी संरचना।

English rendering Form one yoga from the ātmakāraka and the putra(-kāraka), and likewise one from the lords of the first and fifth houses. Two parallel dyads define the chapter’s core combinatorics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो युग्म-सेट (set algebra, गणना नहीं तो संरचना):
- Set A (कारक-मार्ग): {AK, PK} जहाँ PK = putrakāraka (चर कारक-क्रम में 5वीं कोटि—आत्म, अमात्य, भ्रातृ, मातृ, पुत्र…; राहु-सहित/रहित अष्ट/सप्त कारक पर पाठ-भेद संभव)।
- Set B (भाव-मार्ग): {L1, L5} = लग्न-स्वामी और पंचम-स्वामी (D1 राशि-स्वामित्व; परिवर्तनी/स्थिर आदि नहीं—केवल राशि-lord)।
“योगं प्रकल्पयेत्” = इन युग्मों के बीच संबंध (युति, परस्पर दृष्टि, परस्पर भाव-स्थिती, विनिमय) से राजयोग की उपस्थिति चिह्नित करना। संख्या-फल अगले श्लोक में पूर्ण/अर्ध/पाद।

उदाहरण (worked example) D1 लग्न = वृषभ ⇒ L1 = शुक्र; पंचम = कन्या ⇒ L5 = बुध।
कारक (उदाहरण): AK = शनि, PK = चंद्र।
Set A = {शनि, चंद्र}; Set B = {शुक्र, बुध}।
अगला चरण (39.5–39.6): इन युग्मों का भाव-संबंध और वीर्य देखना।

39.5
लग्नपुत्रेशयोरात्मपुत्रकारकयोर्द्वयोः।
सम्बन्धात्‌ पूर्णमर्धं वा पादं वीर्यानुसारतः
lagnaputreśayorātmaputrakārakayordvayoḥ|
sambandhāt‌ pūrṇamardhaṃ vā pādaṃ vīryānusārataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-पुत्रेशयोः = लग्नेश और पुत्रेश (पंचमेश) का; आत्म-पुत्रकारकयोः = आत्मकारक और पुत्रकारक का; द्वयोः = दोनों (युग्मों) का; सम्बन्धात् = संबंध से; पूर्णम् = पूरा (योग-बल); अर्धम् = आधा; वा पादम् = अथवा चौथाई; वीर्यानुसारतः = बल/वीर्य के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ दोनों युग्मों—लग्नेश–पंचमेश तथा आत्मकारक–पुत्रकारक—के संबंध से राजयोग फलित माना जाता है। शास्त्र कहता है कि वह फल पूर्ण, आधा, या पाद (¼) होता है—वीर्य (ग्रह-बल) के अनुपात में। यह गुणांक-सीढ़ी है, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering From the mutual connections of the two dyads—lagna-lord with fifth-lord, and ātmakāraka with putrakāraka—the yoga is full, half, or a quarter according to strength (vīrya). The text scales the combination; it does not fix a destiny-value.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-तीव्रता गुणांक (शास्त्रीय त्रि-स्तर; संख्यात्मक “वीर्य” अलग माप से):
- यदि संबंध प्रबल + ग्रह वीर्यवान् → गुणांक = 1 (पूर्ण)
- मध्यम → 1/2 (अर्ध)
- दुर्बल/न्यून → 1/4 (पाद)
“संबंध” के ठोस रूप 39.6 में (परस्पर भाव-स्थिति); “वीर्य” षड्बल/स्थानाबल आदि से मापा जा सकता है—1 रूप = 60 विरूप; प्रति-ग्रह देहली से तुलना। इस श्लोक में स्वयं रूप-संख्या नहीं दी; केवल पूर्ण : अर्ध : पाद = 1 : 1/2 : 1/4 की अनुपात-सीढ़ी है।

उदाहरण (worked example) मानें L1–L5 परस्पर विनिमय (39.6) और दोनों ग्रह उच्च/स्वगृह में—वीर्य उच्च → पूर्ण राजयोग-संकेत (गुणांक 1)।
यदि केवल एक पक्ष बलवान्, दूसरा नीच/शत्रु-क्षेत्र में—मध्यम → अर्ध (1/2)।
यदि संबंध नाम-मात्र (दूर दृष्टि, दुर्बल ग्रह)—पाद (1/4)।
षड्बल घोषणा: उदाहरणार्थ गुरु कुल बल 7.2 रूप (> देहली) बनाम शनि 3.1 रूप—वीर्यानुसार गुणांक घटाएँ; अयनांश/गृह-पद्धति (यहाँ भाव = पूर्ण राशि-भाव, Sripati नहीं—घोषित) परिणाम बदलते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “वीर्य” को षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) की रूप/विरूप इकाई से जोड़कर मापा जा सकता है—गणनात्मक परत exact rules, फल-परत “शास्त्र कहता है पूर्ण/अर्ध/पाद”। Tolerance से बल छिपाना वर्जित; देहली से `==` तुलना ही अनुशासन है।

39.6
लग्नेशे पञ्चमे भावे पञ्चमेशे च लग्ने।
पुत्रात्मकारकौ विप्र लग्ने च पञ्चमे स्थित
lagneśe pañcame bhāve pañcameśe ca lagne|
putrātmakārakau vipra lagne ca pañcame sthita

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे पञ्चमे भावे = लग्नेश पंचम भाव में; पञ्चमेशे च लग्ने = और पंचमेश लग्न में; पुत्र-आत्मकारकौ = पुत्रकारक और आत्मकारक; विप्र = हे ब्राह्मण; लग्ने च पञ्चमे स्थित = लग्न और पंचम में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट विन्यास देता है: लग्नेश पंचम में और पंचमेश लग्न में—अर्थात् 1↔5 भाव-विनिमय (परस्पर आदान-प्रदान)। उसी प्रकार आत्मकारक और पुत्रकारक लग्न तथा पंचम में (एक-एक में) स्थित हों। यह 39.4–39.5 के “संबंध” का एक प्रधान रूप है।

English rendering When the lagna-lord occupies the fifth and the fifth-lord the lagna, and the putra- and ātma-kārakas sit in the lagna and the fifth, the dyads are classically linked. The verse states a concrete house-placement pattern for the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-सूचकांक (पूर्ण-राशि भाव; house system = whole-sign, घोषित):
- Lagna rāśi index L ∈ {0…11}; भाव n का राशि-index = (L + n − 1) mod 12।
- शर्त B (भाव-मार्ग):
house(L1) = 5 ∧ house(L5) = 1
अर्थात् L1 ∈ rāśi (L+4) mod 12, L5 ∈ rāśi L।
- शर्त A (कारक-मार्ग):
{house(AK), house(PK)} = {1, 5}
(क्रम स्वेच्छा—एक लग्न में, एक पंचम में)।
दोनों शर्तें एक साथ या अलग-अलग योग-कल्पना में प्रयुक्त (पाठ संक्षेप में युग्मित कहता है; संपूर्ण/अंशतः मेल पर 39.5 का पूर्ण–अर्ध–पाद लागू)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (L=0)। पंचम = सिंह।
L1 = मंगल सिंह में; L5 = सूर्य मेष में → 1↔5 विनिमय सत्य।
AK = गुरु मेष (लग्न) में; PK = शुक्र सिंह (पंचम) में → कारक-शर्त सत्य।
⇒ शास्त्रीय विन्यास पूर्ण; वीर्य (39.5) से गुणांक 1, 1/2 या 1/4 तय करें।
(यदि भावा-भावाधिपति equal-house/श्रीपति से लें तो house() बदल सकता है—यहाँ whole-sign घोषित।)

39.7
स्वोच्चे स्वंशे स्वभे वाऽपि शुभग्रहनिरीक्षितो।
महाराजाख्ययोगोऽत्र जातः ख्यातः सुखान्वितः
svocce svaṃśe svabhe vā'pi śubhagrahanirīkṣito|
mahārājākhyayogo'tra jātaḥ khyātaḥ sukhānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = अपने उच्च में; स्वांशे = अपने अंश (स्व-नवमांश/वर्गांश) में; स्वभे = अपने राशि/भ में; वा अपि = अथवा; शुभग्रह-निरीक्षितः = शुभ ग्रह से दृष्ट; महाराजाख्य-योगः = महाराज नामक योग; अत्र = यहाँ; जातः = जातक; ख्यातः = प्रसिद्ध; सुखान्वितः = सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ जब उपर्युक्त योग-कारी ग्रह स्वोच्च, स्वांश, या स्वराशि में हों, अथवा शुभ ग्रहों से दृष्ट हों, तब शास्त्र इसे महाराजाख्य योग कहता है। शास्त्र कहता है—ऐसा जातक ख्यात और सुखान्वित होता है। यह फल-कथन है, अनिवार्य नियति नहीं; बल और दृष्टि की शर्तें ही गणित-योग्य भाग हैं।

English rendering If those yoga-formers stand in exaltation, in their own aṃśa, or in their own sign—or are aspected by benefics—the combination is named Mahārāja-yoga. The text states the native becomes renowned and attended by comfort; we report the claim as the śāstra’s voice, not as enforced fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-फ़िल्टर (बूलियन शर्तें; फल अलग):
1. स्वोच्च: ग्रह λ ∈ उच्च-राशि (सूर्य मेष, चंद्र वृषभ, मंगल मकर, बुध कन्या, गुरु कर्क्ष, शुक्र मीन, शनि तुला—मानक होरा-तालिका) और प्रायः उच्च-अंश (पाठ-भेद संभव)।
2. स्वभ: ग्रह अपनी राशि-स्वामित्व वाली राशि में।
3. स्वांश: प्रायः D9 में स्व-राशि/स्व-नवमांश (अंश = वर्गांश; “स्वांश” = own navāṃśa sign—सामान्य decode)।
4. शुभ-निरीक्षण: गुरु/शुक्र (कभी चंद्र) की पूर्ण दृष्टि—पाराशर दृष्टि: 7 सब पर; गुरु +5,+9; शुक्र +8? (शुक्र दृष्टि-पाठ भेद—सामान्य 7; विशेष दृष्टि-पाठ पाठ-भेद संभव) तथा मंगल/शनि की क्रूर दृष्टि यहाँ “शुभ” नहीं।
महाराजाख्य = (39.4–39.6 योग) ∧ (उच्च ∨ स्वांश ∨ स्वभ ∨ शुभ-दृष्टि)।
फल-वाक्य “ख्यातः सुखान्वितः” = फल-कथन, संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) 39.6 का विन्यास मानें + L1 मंगल मकर में (उच्च) + L5 सूर्य सिंह में (स्वभ) + दोनों पर गुरु-दृष्टि।
⇒ महाराजाख्य योग की शास्त्रीय शर्तें पूरी।
गुणांक (39.5): दोनों उच्च/स्वभ और दृष्ट → पूर्ण।
D9 जाँच: मंगल का स्वांश यदि धनु/मेष (मंगल-स्वामित्व) में हो तो “स्वांश” परत और पुष्ट।
अयनांश: उच्च/राशि सीमा λ पर निर्भर—Lahiri vs अन्य से राशि-संधि पर अंतर संभव; वर्ग-नियम घोषित रखें।

39.8
भाग्येशः कारको लग्ने पञ्चमे सप्तमेऽपि वा।
राजयोगप्रदातारौ शुभखेटयुतेक्षितौ
bhāgyeśaḥ kārako lagne pañcame saptame'pi vā|
rājayogapradātārau śubhakheṭayutekṣitau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्येशः = नवमेश (भाग्य-भाव का स्वामी); कारकः = आत्मकारक; लग्ने पञ्चमे सप्तमे अपि वा = लग्न, पञ्चम अथवा सप्तम में; राजयोग-प्रदातारौ = राजयोग के देने वाले (दोनों); शुभ-खेट-युत-ईक्षितौ = शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ नवमेश और आत्मकारक — यदि ये लग्न, पञ्चम अथवा सप्तम में स्थित हों और शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों — तो शास्त्र के अनुसार राजयोग के प्रदाता होते हैं। भाग्य (धर्म-त्रिकोण) का स्वामी और आत्म-कारक का केन्द्र-त्रिकोण में शुभ-सम्बन्ध यहाँ मुख्य है।

English rendering The ninth-lord and the ātmakāraka, placed in the lagna, fifth, or seventh, and joined or aspected by benefics, are givers of rāja-yoga, states the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक = भाव-वर्गीकरण। स्थान-समुच्चय {1, 5, 7}: भाव 1 व 7 = केन्द्र (kendra), भाव 5 = त्रिकोण (trikoṇa)। भाग्येश-निर्धारण: नवम राशि = ((लग्न-राशि − 1 + 8) mod 12) + 1; उसका स्वामी = भाग्येश। शर्त: भाग्येश ∧ आत्मकारक ∈ {1,5,7} तथा शुभ-युति/दृष्टि। यह स्थिति-नियम (positional rule) है; "राजयोग-प्रदाता" फल-दावा है, नियति नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (राशि 6)। नवम राशि = ((6−1+8) mod 12)+1 = (13 mod 12)+1 = 1+1 = वृषभ ⇒ भाग्येश = शुक्र। यदि शुक्र लग्न/पञ्चम/सप्तम में और आत्मकारक भी उन्हीं में, दोनों शुभ-दृष्ट ⇒ श्लोकोक्त योग-शर्त पूर्ण।

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39.9
लग्नेशात्‌ कारकाच्चापि धने तुर्ये च पञ्चमे।
शुभखेटयुते भावे जातो राजा भवेद्‌ ध्रुवम्‌
lagneśāt‌ kārakāccāpi dhane turye ca pañcame|
śubhakheṭayute bhāve jāto rājā bhaved‌ dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशात् कारकात् च अपि = लग्नेश से तथा आत्मकारक से (गणना करके); धने = द्वितीय (धन) में; तुर्ये = चतुर्थ में; पञ्चमे = पञ्चम में; शुभ-खेट-युते भावे = शुभ ग्रह से युत उस भाव में; जातः राजा भवेत् ध्रुवम् = उत्पन्न जातक निश्चय ही राजा होता है।

हिन्दी भावार्थ लग्नेश और आत्मकारक — इन दोनों से गिनकर द्वितीय, चतुर्थ अथवा पञ्चम भाव यदि शुभ ग्रह से युक्त हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक निश्चित रूप से राजा (या राजतुल्य) होता है। यहाँ संदर्भ-बिन्दु लग्न मात्र नहीं, अपितु लग्नेश और कारक भी हैं।

English rendering Counted from the lagna-lord and from the kāraka as well, if the second, fourth, or fifth house is joined by a benefic planet, the native surely becomes a king, says the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक = चर-सन्दर्भ भाव-गणना। मान लें लग्नेश जिस राशि में है = Rₗ, आत्मकारक की राशि = Rₖ। उससे n-वाँ भाव = ((R − 1 + (n−1)) mod 12) + 1। यहाँ n ∈ {2, 4, 5} दोनों सन्दर्भों (Rₗ, Rₖ) से। इन भावों में शुभ-ग्रह-युति = योग-कारक। स्थिति-नियम; फल-कथन को शास्त्र-वचन रूप में लें।

उदाहरण (worked example) लग्नेश तुला (राशि 7) में। उससे धन(2) = वृश्चिक, तुर्य(4) = मकर, पञ्चम(5) = कुम्भ। यदि इनमें से किसी में शुभ (गुरु/शुक्र/बुध-सौम्य) स्थित ⇒ शर्त पूर्ण। यही गणना आत्मकारक की राशि से भी दोहराएँ।

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39.10
तृतीये षष्ठभे ताभ्यां पापग्रहयुतेक्षिते।
जातो राजा भवेदेवं मिश्रे मिश्रफलं वदेत्‌
tṛtīye ṣaṣṭhabhe tābhyāṃ pāpagrahayutekṣite|
jāto rājā bhavedevaṃ miśre miśraphalaṃ vadet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीये षष्ठभे = तृतीय और षष्ठ भाव में; ताभ्यां = उन दोनों (लग्नेश व कारक) से; पापग्रह-युत-ईक्षिते = पाप ग्रह से युत या दृष्ट होने पर; जातः राजा भवेत् एवम् = ऐसे उत्पन्न जातक राजा होता है; मिश्रे = मिश्रित (शुभ-पाप उभय) होने पर; मिश्रफलं वदेत् = मिश्रित फल कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ उन्हीं दोनों (लग्नेश व आत्मकारक) से तृतीय और षष्ठ भाव में जब पाप ग्रह युत या दृष्ट हों, तब भी जातक राजा होता है (क्योंकि ये उपचय-स्थान हैं जहाँ पाप बल देते हैं)। और यदि शुभ-पाप मिश्रित हों, तो मिश्रित फल कहना चाहिए। यह पूर्व श्लोक का पूरक — शुभ केन्द्र/त्रिकोण में, पाप उपचय में।

English rendering In the third and sixth from those two, when joined or aspected by malefics, the native likewise becomes a king; and where the influences are mixed, one should declare mixed results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक = उपचय-स्थान + मिश्रण-नियम। लग्नेश/कारक से 3 व 6 = उपचय भाव, जहाँ पाप-ग्रह (सूर्य को छोड़ शनि-मंगल-राहु-केतु; क्षीण-चन्द्र) अनुकूल फलदायी। भाव-सूत्र: ((R−1+(n−1)) mod 12)+1, n ∈ {3, 6}। मिश्रण-नियम: यदि एक ही भाव/योग पर शुभ ∧ पाप दोनों का प्रभाव ⇒ फल = मिश्र (न पूर्ण शुभ, न पूर्ण अशुभ) — शास्त्र का विवेक-वचन, एकांगी दावा नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्नेश मिथुन (राशि 3) में। तृतीय(3) = सिंह, षष्ठ(6) = वृश्चिक। यदि सिंह/वृश्चिक में शनि या मंगल (पाप) ⇒ उपचय-बल से योग पुष्ट। यदि साथ ही किसी शुभ की दृष्टि भी पड़े ⇒ "मिश्रफलं वदेत्" — फल मिश्रित घोषित करें।

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39.11
स्वांशे वा पञ्चमे शुक्रे जीवेन्दुयुतवीक्षिते।
लग्ने लग्नपदे वाऽपि राजवर्गो भवेन्नरः
svāṃśe vā pañcame śukre jīvenduyutavīkṣite|
lagne lagnapade vā'pi rājavargo bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वांशे = स्व-नवमांश (D9) में, अथवा स्व-वर्गांश में; पञ्चमे = पञ्चम में; शुक्रे = शुक्र स्थित; जीव = गुरु; इन्दु = चन्द्र; युतवीक्षिते = युक्त अथवा दृष्ट; लग्ने = लग्न में; लग्नपदे = लग्न-पद (आढ्यपद/अरिध्द-पद पद्धति का लग्न-पद) में; राजवर्गः = राज-वर्ग/राज-कुल-सदृश पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र यदि स्वांश में हो, अथवा पञ्चम में हो, और गुरु तथा चन्द्र से युक्त या दृष्ट हो; अथवा वही शुक्र लग्न में या लग्न-पद में हो — तो नर राजवर्ग का होता है। यहाँ शुक्र की अंश-शुद्धि, पञ्चम-स्थान, और गुरु–चन्द्र का योग/दृष्टि — तीनों राजवर्ग-संकेत के स्तम्भ हैं। लग्न-पद का उल्लेख पद-पद्धति को भी इस योग में जोड़ता है।

English rendering The text states that when Venus is in own aṃśa or in the fifth, joined with or aspected by Jupiter and the Moon — or when Venus is in the lagna or in the lagna-pada — the person belongs to the royal class (rājavarga).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अंश-नियम (नवमांश/वर्ग): स्वांश = शुक्र अपनी D9-राशि (अथवा कथित वर्ग) में। नवमांश-मानचित्र: प्रत्येक ३०° राशि को ९ समान खण्डों (३°२०′ = ३°२०′) में बाँटें; खण्ड-क्रमांक से D9-राशि निर्धारण (चर/स्थिर/द्विस्वभाव राशि-नियम के अनुसार मानचित्रण)। लग्न-पद: आढ्य/पद-सूत्र से लग्न से गिनकर पद-राशि — सम्मेलन घोषित करें (पद-पद्धति संस्करण)।

उदाहरण (worked example) शुक्र D1 = वृषभ १२°४०′। नवमांश-खण्ड = ⌊१२°४०′ ÷ ३°२०′⌋ = ⌊३.८⌋ = ३ → चतुर्थ नवमांश। वृषभ (स्थिर) से D9-गणना: स्थिर राशि में नवमांश पंचम से आरम्भ (शास्त्रीय नियम) — सम्मेलन-घोषित D9-इंजन से शुक्र यदि शुक्र-राशि (तुला/वृषभ) में पड़े तो “स्वांशे”। साथ ही D1 में गुरु–चन्द्र युति/दृष्टि जाँचें; शर्त पूरी होने पर शास्त्र राजवर्ग कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक षोडश-वर्ग के D9 (नवमांश) और पद-मानचित्र की शुद्ध गणना पर टिका है। हमारी वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga) ३०° → समान चाप-खण्ड → नियत मानचित्रण का मॉड्यूलर अंकगणित लागू करती है — D1…D60 में D9 समेत। फल “राजवर्ग” शास्त्र-कथन है; हम केवल अंश-स्थान और युति/दृष्टि की सटीक जाँच (`==` अनुशासन) सत्यापित करते हैं, फल की भविष्यवाणी नहीं।

39.12
जन्माङ्गे कालहोराङ्गे कालङ्गे येन केनचित्‌।
एकग्रहेण सन्दृष्टे त्रितये राजभाग्‌ जनः
janmāṅge kālahorāṅge kālaṅge yena kenacit‌|
ekagraheṇa sandṛṣṭe tritaye rājabhāg‌ janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्माङ्गे = जन्म-कुण्डली/राशि-लग्न में; कालहोराङ्गे = होरा-वर्ग (D2) के लग्न/अङ्ग में; कालङ्गे = तृतीय अङ्ग (त्रितय का तीसरा — प्रायः द्रेष्काण/सम्बद्ध काल-वर्ग; पाठ-भेद संभव); येन केनचित् = किसी भी एक ग्रह से; एकग्रहेण = एक ही ग्रह द्वारा; सन्दृष्टे = भली-भाँति दृष्ट; त्रितये = इन तीनों में; राजभाक् = राज-भाग का भागी; जनः = व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जन्म-अङ्ग, काल-होरा-अङ्ग और काल-अङ्ग — इन तीनों में यदि एक ही ग्रह की दृष्टि पड़े, तो जन राजभाक् होता है। “येन केनचित् एकग्रहेण” बल देता है कि अनेक ग्रहों की भीड़ नहीं, एक ग्रह की त्रितय-दृष्टि ही योग है। तीसरे पद “कालङ्गे” की पाठ-पहचान संस्करण-भेद से अस्थिर हो सकती है; योग का ढाँचा त्रितय-दृष्टि पर स्थिर है।

English rendering The text states that when the birth-chart, the kāla-horā chart, and the third aṅga of the triad are all aspected by one and the same planet, the person partakes of royalty (rājabhāg). The exact identity of the third aṅga may admit पाठ-भेद संभव.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-त्रितय + एक-ग्रह दृष्टि। (१) D1 लग्न-राशि L₁; (२) होरा (D2): ३०° → २ × १५°; विषम राशि में पूर्वार्ध सूर्य-होरा / उत्तरार्ध चन्द्र-होरा (सम राशि में उलटा — शास्त्रीय होरा-नियम); होरा-लग्न L₂; (३) तृतीय अङ्ग L₃ (यदि द्रेष्काण D3: ३०° → ३ × १०°; मानचित्रण चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम से)। एक ग्रह G की दृष्टि L₁, L₂, L₃ तीनों पर हो तो शास्त्र राजभाक् कहता है। दृष्टि-परिमाण अगले श्लोक (पूर्ण/अर्ध/पाद) से तौला जाता है।

उदाहरण (worked example) मानें L₁ = सिंह, G = गुरु (सिंह से ५/७/९ दृष्टि — गुरु की पूर्ण दृष्टि-स्थान)। D2 व D3 (या कथित तृतीय अङ्ग) के लग्न भी गुरु-दृष्टि-योग्य राशियों में हों — तब “एकग्रहेण सन्दृष्टे त्रितये”। सम्मेलन: अयनांश (उदा. लाहिरी) से भू-केन्द्रीय देशान्तर → राशि; वर्ग-नियम BPHS षोडश-वर्ग इंजन के अनुसार।

हमारा डिकोड (Our Decode) होरा (D2) और द्रेष्काण (D3) षोडश-वर्ग-श्रृंखला के नियत सदस्य हैं; हमारी वर्ग-इंजन इन्हें शुद्ध चाप-विभाजन से निकालती है। यह श्लोक “एक ग्रह → तीन अङ्ग” की योग-शर्त देता है — हम L₁/L₂/L₃ और दृष्टि-सत्यता की गणना सत्यापित करते हैं; “राजभाक्” केवल शास्त्र-कथन के रूप में रहता है।

39.13
लग्नषड्‌वर्गके चैवमेकखेटयुतेक्षिते।
राजयोगो भवत्येव निर्विशंक द्विजोत्तम
lagnaṣaḍ‌vargake caivamekakheṭayutekṣite|
rājayogo bhavatyeva nirviśaṃka dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-षड्वर्गके = लग्न के षड्वर्ग (छह विभागीय कुण्डलियों) में; च एवम् = और इसी प्रकार; एक-खेट-युत-ईक्षिते = एक ही ग्रह से युत या दृष्ट होने पर; राजयोगः भवति एव = राजयोग निश्चित रूप से होता है; निर्विशंकम् = निःसंदेह; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ, इसी प्रकार जब लग्न का षड्वर्ग (छह वर्ग-कुण्डलियाँ) किसी एक ही ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो निःसंदेह राजयोग बनता है। एक ग्रह का लग्न-वर्गों पर बहु-स्तरीय प्रभाव यहाँ योग की दृढ़ कसौटी है।

English rendering Likewise, when the six-fold divisional set of the lagna is joined or aspected by a single planet, rāja-yoga certainly arises, without any doubt, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षड्वर्ग = 6 विभाग (BPHS षोडश-वर्ग का उपसमुच्चय): D1 (राशि, 30°), D2 (होरा, 15°), D3 (द्रेष्काण, 10°), D9 (नवांश, 3°20′), D12 (द्वादशांश, 2°30′), D30 (त्रिंशांश, असम-खण्ड: 5°+5°+8°+7°+5°)। प्रत्येक वर्ग = 30° राशि का समान (D30 में स्वामी-निर्दिष्ट असमान) अंश-विभाजन, लग्न-देशान्तर पर मॉड्युलर प्रतिचित्रण। शर्त: एक ही खेट इन छह लग्न-वर्ग-स्थानों को युति/दृष्टि से स्पर्श करे।

उदाहरण (worked example) लग्न = 8°00′ वृषभ। D1 = वृषभ। D2 (होरा, 15°): 8° < 15° ⇒ प्रथम होरा; सम-राशि की प्रथम होरा = चन्द्र (कर्क)। D3 (10°): 8° < 10° ⇒ प्रथम द्रेष्काण = वृषभ। D9 (3°20′): ⌊8/3.333⌋ = 2 ⇒ 3रा नवांश; वृषभ (भू) मकर से ⇒ मीन। D12 (2°30′): ⌊8/2.5⌋ = 3 ⇒ 4था द्वादशांश = सिंह। D30: 5°–10° खण्ड (सम-राशि) ⇒ बुध-अंश = कन्या। यदि कोई एक ग्रह (जैसे शुक्र) इन छह लग्न-वर्ग-राशियों को युति/दृष्टि से समेटे ⇒ निर्विशंक राजयोग।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्वर्ग हमारे षोडश-वर्ग डिकोड (BPHS Ch.6) का सीधा उपसमुच्चय है — D1, D2, D3, D9, D12, D30, प्रत्येक 30° राशि का नियतात्मक अंश-विभाजन, देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित (kaal_ekavimshati_varga.py)। "एक-खेट" की छह-वर्ग व्याप्ति ठीक वही बहु-वर्ग जाँच है जिसे हम प्रत्येक वर्ग में सटीक कोटि से `==`-रीति पर सिद्ध करते हैं, अनुमान से नहीं।

39.14
पूर्णदृष्टे पूर्नयोगमर्धदृष्टेऽर्धमेव च।
पाददृष्टे पादयोगमिति ज्ञेयं क्रमात्‌ फलम्‌
pūrṇadṛṣṭe pūrnayogamardhadṛṣṭe'rdhameva ca|
pādadṛṣṭe pādayogamiti jñeyaṃ kramāt‌ phalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णदृष्टे = पूर्ण दृष्टि होने पर; पूर्णयोगम् = पूर्ण योग (पाठ: पूर्नयोग → पूर्णयोग); अर्धदृष्टे = अर्ध दृष्टि पर; अर्धम् = आधा योग; पाददृष्टे = पाद (¼) दृष्टि पर; पादयोग = चौथाई योग; क्रमात् = क्रम से; फलम् = फल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पूर्ण दृष्टि हो तो पूर्ण योग, अर्ध दृष्टि हो तो अर्ध योग, और पाद दृष्टि हो तो पाद योग — फल इसी क्रम से जानना चाहिए। यह पूर्वोक्त राजयोगों की शक्ति-तौल की कुंजी है: योग “है/नहीं” का द्विआधारी नहीं, दृष्टि-परिमाण का अनुपाती है। दृष्टि-भेद (पूर्ण/अर्ध/पाद) ग्रह-स्वाभाविक दृष्टि-नियमों से जुड़ा है।

English rendering The text states that with a full aspect there is full yoga, with a half aspect half yoga, and with a quarter aspect quarter yoga — the result is to be known in that order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-बल अनुपात (दृष्टि-गुणांक)।
योग_बल = योग_संकेत × दृष्टि_अंश
जहाँ दृष्टि_अंश ∈ {१ (पूर्ण), ½ (अर्ध), ¼ (पाद)}।
शास्त्रीय दृष्टि-मान (सामान्य सम्मेलन; घोषित करें): सभी ग्रह ७वीं पर पूर्ण (१); गुरु ५/९ पर पूर्ण; मंगल ४/८ पर पूर्ण; शनि ३/१० पर पूर्ण; शेष विशिष्ट दृष्टियाँ परम्परा में अर्ध/पाद कोटि में तौली जाती हैं (पाठ-परम्परा-भेद संभव)।
संख्यात्मक रूप: पूर्ण → फल × १; अर्ध → फल × ½; पाद → फल × ¼। कोई सहन-पट्टी (tolerance) नहीं — गुणांक सटीक भिन्न हैं।

उदाहरण (worked example) मानें श्लोक ३९.१२ का त्रितय-योग सक्रिय, किन्तु दृष्टा ग्रह शनि केवल ३री दृष्टि से एक अङ्ग पर “पाद/विशिष्ट” कोटि में जुड़े (सम्मेलन-घोषित दृष्टि-सारिणी के अनुसार)। तब शास्त्रानुसार योग-फल = पूर्ण राजयोग का ¼ (पादयोग)। यदि वही ग्रह ७री पूर्ण दृष्टि से तीनों अङ्ग देखे → पूर्णयोग। अयनांश/गृह-पद्धति फल-मात्रा नहीं, केवल राशि-स्थिति निर्धारित करते हैं; अनुपात दृष्टि-कोटि से आता है।

39.15
लग्नत्रये स्वभोच्चस्थे खेटे राजा भवेद्‌ ध्रुवम्‌।
यद्वा लग्ने दृकाणेंऽशे स्वोच्चखेटयुते द्विज
lagnatraye svabhoccasthe kheṭe rājā bhaved‌ dhruvam‌|
yadvā lagne dṛkāṇeṃ'śe svoccakheṭayute dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नत्रये = लग्न-संबंधी त्रय (लग्न–दृक्काण–अंश, अथवा लग्न-त्रिकोण); स्वभोच्चस्थे = स्वराशि या उच्च-राशि में स्थित; खेटे = ग्रह में; राजा भवेत् = राजा हो; ध्रुवम् = निश्चित रूप से; यद्वा = अथवा; लग्ने दृकाणेंऽशे = लग्न, दृक्काण (D3) और अंश (प्रायः नवांश D9) में; स्वोच्चखेटयुते = उच्चस्थ ग्रह से युक्त; द्विज = हे द्विज (मैत्रेय को संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न-त्रय में कोई ग्रह अपने स्वभाव-स्थान (स्वराशि) अथवा उच्च-स्थान पर बैठा हो, तो जातक निश्चित रूप से राज-पद का भागी होता है। अथवा, हे द्विज, जब लग्न, दृक्काण और अंश — तीनों — उच्चस्थ ग्रह से युक्त हों, तब भी वही फल बताया गया है। यहाँ राजयोग की शर्त लग्न-केन्द्रित वर्ग-दृष्टि और स्व/उच्च-स्थिति दोनों पर टिकी है।

English rendering The text states that when a planet occupies its own sign or exaltation in the lagna-traya, the native becomes a king without fail; or again, O twice-born, when the lagna, the drekkāṇa, and the aṃśa are joined by an exalted planet, the same royal outcome is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त (संयोजनात्मक नियम), कोई संख्या-सूत्र नहीं।
शर्त-१: ∃ graha g ऐसा कि g ∈ {लग्न-त्रय} ∧ (rāśi(g) = स्वराशि(g) ∨ rāśi(g) = उच्चराशि(g)).
शर्त-२ (वैकल्पिक): lagna ∪ D3(lagna-longitude) ∪ D9(lagna-longitude) में स्वोच्च graha का योग/अध्यास।
दृक्काण = 30° ÷ 3 = 10° खंड; नवांश = 30° ÷ 9 = 3°20′ खंड — शुद्ध विभाजन-अंकगणित (D3, D9)। पाठ-भेद संभव: “लग्नत्रये” को 1-5-9 गृह-त्रिकोण या लग्न–दृक्काण–अंश — दोनों रीतियाँ प्रचलित।

उदाहरण (worked example) माना लग्न = मेष 12°00′ (ayanāṃśa घोषित करें — फल स्थान-निर्भर)।
D3: 12° ∈ प्रथम 10° → मेष-दृक्काण; D9: 12° ÷ 3°20′ = 3 पूर्ण अंश + शेष → चतुर्थ नवांश = कर्कट (मेष से)। यदि सूर्य मेष में उच्च (10° के पास) लग्न में हो और D3/D9 में भी स्व/उच्च-युति बने, तो शास्त्र की शर्त-२ पूरी मानी जाती है। (यह केवल शर्त-जाँच है, भविष्यवाणी नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दृक्काण (D3) और अंश/नवांश (D9) षोडश-वर्ग-श्रृंखला के निर्धारित खंड हैं — D1…D60 का शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन। हमारी वर्ग-इंजन इन्हीं चाप-नियमों को exact partition से मानचित्रित करती है; यहाँ राजयोग की शर्त उन्हीं D3/D9 निर्देशांकों पर लग्न की जाँच है, न कि फल का “अनुमोदन”।

39.16
पदे शुभ सचंद्रे च धने देवगुरौ तथा।
स्वोच्चस्थखेटसन्दृष्टे राजयोगो न संशयः
pade śubha sacaṃdre ca dhane devagurau tathā|
svoccasthakheṭasandṛṣṭe rājayogo na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदे = आरोह/लग्न-पद (आरूढ पद) में; शुभ = शुभ ग्रह; सचंद्रे = चंद्र सहित; धने = धन-भाव (द्वितीय भाव) में; देवगुरौ = बृहस्पति में; तथा = तथा; स्वोच्चस्थखेटसन्दृष्टे = स्वोच्चस्थित ग्रह से दृष्ट; राजयोगः = राजयोग; न संशयः = संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पद (आरूढ) में शुभ ग्रह चंद्रमा के साथ स्थित हों, और धन-भाव में देवगुरु बृहस्पति हो, तथा वह सब किसी स्वोच्चस्थित ग्रह की दृष्टि से युक्त हो, तब राजयोग होता है — इसमें संदेह नहीं। पद, धन और उच्च-दृष्टि — तीनों का मेल यहाँ योग का ढाँचा है।

English rendering The text states that when benefics occupy the pada together with the Moon, when Jupiter stands in the second house, and when these are aspected by a planet in exaltation, a rāja-yoga arises — there is no doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त-समुच्चय (AND-संयोजन):
(1) Ārūḍha-pada (AP) में शुभ ± चंद्र;
(2) भाव-2 में गुरु;
(3) उक्त स्थान/ग्रह स्वोच्च graha की दृष्टि से युक्त।
आरूढ-पद (पारंपरिक): यदि लग्नेश का भाव-संख्या k हो, तो AP = लग्न से 2k−1 वाँ भाव (पूर्ण चक्र 12 पर); k = 1 या 7 पर विशेष नियम (लग्नेश लग्न/सप्तम में → AP = लग्न से 10 वाँ) — पाठ-भेद/रीति-भेद संभव। दृष्टि: पूर्ण दृष्टि (7वीं) सभी; विशेष — मंगल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या; लग्नेश बुध = वृश्चिक (लग्न से 3) → AP ≈ लग्न+5 = कुंभ (2×3−1 = 5)। यदि कुंभ में चंद्र+शुक्र, धन (तुला) में गुरु, और उच्चस्थ शनि (तुला) इन पर दृष्टि दे — तो शास्त्रोक्त तीनों शर्तें पूरी। (केवल विन्यास-उदाहरण।)

39.17
शुभे लग्ने शुभे त्वर्थे तृतीये पापखेचरे।
चतुर्थे च शुभे प्राप्ते राजा वा तत्समोऽपि वा
śubhe lagne śubhe tvarthe tṛtīye pāpakhecare|
caturthe ca śubhe prāpte rājā vā tatsamo'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभे लग्ने = शुभ ग्रह लग्न में; शुभे त्वर्थे = शुभ अर्थ-भाव (द्वितीय) में; तृतीये = तृतीय भाव में; पापखेचरे = पाप-ग्रह में; चतुर्थे = चतुर्थ में; शुभे प्राप्ते = शुभ प्राप्त होने पर; राजा = राजा; वा तत्समः अपि वा = अथवा उसके समान भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न में शुभ, धन (अर्थ) में शुभ, तृतीय में पाप-ग्रह, और चतुर्थ में शुभ — इस क्रम से स्थित होने पर जातक राजा होता है, अथवा राजा के समान पद/प्रभाव वाला होता है। यहाँ 1–2–3–4 भावों का शुभ–शुभ–पाप–शुभ विन्यास राज-साम्य का संकेत है।

English rendering The text states that when a benefic occupies the lagna, a benefic the second house, a malefic the third, and a benefic the fourth, the native becomes a king or one equal to a king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-अनुक्रम शर्त (कोई संख्या-गुणक नहीं):
B1 ∈ शुभ, B2 ∈ शुभ, B3 ∈ पाप, B4 ∈ शुभ → “राजा / तत्सम” फल (शास्त्र-कथन)।
शुभ-वर्ग (पारंपरिक): गुरु, शुक्र, (अधिशुद्ध) बुध, शुभ-चंद्र; पाप: सूर्य, मंगल, शनि, (पाप) बुध/चंद्र, राहु–केतु — परिभाषा-रीति घोषित करें। भाव-गणना: पूर्ण-भाव (equal house) या भावाधिपति-रीति — फल निर्भर; convention declare करें।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृषभ। B1: शुक्र (स्व); B2: गुरु मिथुन में; B3: शनि कर्क में; B4: चंद्र (उदाहरणार्थ शुभ पक्ष) सिंह में — विन्यास शास्त्र की 1-2-3-4 शर्त से मेल खाता है। यह केवल संरचना-जाँच है।

39.18
स्वोच्चस्थो हरिणांको वा जीवो वा शुक्र एव वा।
बुधो वा धनभावस्थः श्रियं दिशति देहिनः
svoccastho hariṇāṃko vā jīvo vā śukra eva vā|
budho vā dhanabhāvasthaḥ śriyaṃ diśati dehinaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चस्थः = उच्च में स्थित; हरिणांकः = हरिण-चिह्न वाला = चंद्र; वा जीवः = अथवा बृहस्पति; वा शुक्रः = अथवा शुक्र; एव वा = ही अथवा; बुधः वा = अथवा बुध; धनभावस्थः = धन-भाव (2) में स्थित; श्रियं दिशति = श्री/समृद्धि देता है; देहिनः = देहधारी को।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चंद्र, गुरु, शुक्र अथवा बुध जब उच्च-स्थान पर हों और धन-भाव में स्थित हों, तो वे देहधारी को श्री (ऐश्वर्य, समृद्धि) देते हैं। यहाँ उच्च + द्वितीय भाव का योग “श्री-दान” का शास्त्रीय संकेत है — भय या निश्चित भाग्य का दावा नहीं, पाठ का फल-कथन मात्र।

English rendering The text states that the Moon, Jupiter, Venus, or Mercury, when exalted and placed in the second house, bestows śrī — prosperity — upon the embodied being.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त: g ∈ {चंद्र, गुरु, शुक्र, बुध} ∧ rāśi(g) = उच्च(g) ∧ bhāva(g) = 2।
उच्च-राशि (पारंपरिक सारणी): चंद्र = वृषभ; गुरु = कर्कट; शुक्र = मीन; बुध = कन्या।
उच्च-बिंदु (सामान्य घोषणा): चंद्र 3° वृषभ, गुरु 5° कर्कट, शुक्र 27° मीन, बुध 15° कन्या — पूर्ण “उच्चस्थ” के लिए राशि-प्रवेश पर्याप्त माना जाए या डिग्री-निकट — रीति स्पष्ट करें।

उदाहरण (worked example) लग्न = मकर → धन-भाव = कुंभ। पर उच्च-शुक्र धन में तभी जब धन = मीन → लग्न = कुंभ। अतः लग्न कुंभ, शुक्र मीन 20° (उच्च-राशि, धन-भाव): शास्त्र की “स्वोच्च + धन” शर्त पूरी। (केवल उदाहरण-विन्यास।)

39.19
षष्ठेऽष्टमे तृतीये वा स्वस्वनीचगता ग्रहाः।
लग्नं पश्येत्‌ स्वभोच्चस्थो लग्नपो राज्ययोगदः
ṣaṣṭhe'ṣṭame tṛtīye vā svasvanīcagatā grahāḥ|
lagnaṃ paśyet‌ svabhoccastho lagnapo rājyayogadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे = छठे में; अष्टमे = आठवें में; तृतीये वा = अथवा तीसरे में; स्वस्वनीचगताः = अपने-अपने नीच राशि में गए; ग्रहाः = ग्रह; लग्नं पश्येत् = लग्न को देखे; स्वभोच्चस्थः = स्व या उच्च में स्थित; लग्नपः = लग्नेश; राज्ययोगदः = राज्य-योग देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब ग्रह अपने-अपने नीच स्थान में षष्ठ, अष्टम या तृतीय भाव में हों, और लग्नेश स्वयं स्वराशि या उच्च में रहकर लग्न पर दृष्टि डाले, तब वह लग्नेश राज्ययोग का दाता होता है। नीच-ग्रहों का दुःस्थान-संयोग और बलवान् लग्नेश की लग्न-दृष्टि — दोनों मिलकर यहाँ “राज्य” का शास्त्र-संकेत बनाते हैं।

English rendering The text states that when planets occupy their own debilitation in the sixth, eighth, or third houses, and the lagna lord, standing in its own sign or exaltation, aspects the lagna, that lagna lord confers a rājya-yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो-भाग शर्त:
(A) ∃ graha(s) : bhāva ∈ {3,6,8} ∧ rāśi = नीच(graha);
(B) lagneśa : (स्व ∨ उच्च) ∧ dṛṣṭi(lagneśa → lagna) = true → “राज्ययोगद” (शास्त्र-कथन)।
नीच-राशि: सूर्य तुला, चंद्र वृश्चिक, मंगल कर्कट, बुध मीन, गुरु मकर, शुक्र कन्या, शनि मेष।
दृष्टि-ज्यामिति: लग्नेश से लग्न-राशि पर पूर्ण/विशेष दृष्टि-चाप लागू।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह, लग्नेश सूर्य = मेष (उच्च) में → सूर्य लग्न (सिंह) पर 5-भाव दूर = कोई विशेष पूर्ण दृष्टि नहीं; यदि सूर्य कुंभ में (लग्न से 7) स्व/उच्च नहीं। सही मेल: लग्न = कर्क, लग्नेश चंद्र = वृषभ (उच्च) → चंद्र से कर्क = 3 भाव (चंद्र की पूर्ण दृष्टि 7वीं ही) — दृष्टि-रीति जाँचें। सरल: लग्न = मीन, लग्नेश गुरु = कर्कट (उच्च), गुरु से मीन = 9 भाव → गुरु की 5/9 दृष्टि से लग्न दृष्ट — शर्त (B) पूरी। साथ षष्ठ (सिंह) में नीच-सूर्य आदि — शर्त (A) का उदाहरण।

39.20
षष्ठाऽष्टमव्ययाधीशा नीचस्था रिपुभेऽस्थगाः।
स्वोच्चस्वभगलग्नेशो लग्नं पश्यंश्च राज्यदः
ṣaṣṭhā'ṣṭamavyayādhīśā nīcasthā ripubhe'sthagāḥ|
svoccasvabhagalagneśo lagnaṃ paśyaṃśca rājyadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाऽष्टमव्ययाधीशाः = षष्ठ, अष्टम, व्यय (12) के अधीश; नीचस्थाः = नीच में स्थित; रिपुभे = शत्रु-राशि में; अस्थगाः = दुर्बल/अस्थ-स्थानग (दुःस्थान या क्षीण स्थिति — पाठ-भेद संभव); स्वोच्चस्वभगः = स्वोच्च या स्वभ (स्वराशि) में; लग्नेशः = लग्नपति; लग्नं पश्यन् = लग्न को देखता हुआ; च राज्यदः = और राज्य देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — षष्ठ, अष्टम और व्यय के स्वामी जब नीच हों, शत्रु-राशि में हों, अथवा अस्थ/दुर्बल स्थान में पड़े हों, और लग्नेश स्वराशि या उच्च में रहकर लग्न को देखे, तब वह राज्य देने वाला होता है। त्रि-दुःस्थान-पति की दुर्बलता + बलवान् लग्नेश की लग्न-दृष्टि — यह राजयोग का एक और शास्त्र-चित्र है।

English rendering The text states that when the lords of the sixth, eighth, and twelfth are debilitated, in enemy signs, or in weak/ill-placed stations, and the lagna lord in its own sign or exaltation aspects the lagna, that lord bestows kingdom.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-युग्म:
(A) ∀ (या प्रमुख) lord ∈ {L6, L8, L12}: status ∈ {नीच, शत्रु-राशि, अस्थ/दुःस्थान} — “अस्थगाः” पाठ-भेद संभव;
(B) L1 ∈ {स्व, उच्च} ∧ aspect(L1, lagna) → “राज्यदः”।
शत्रु-राशि: नैसर्गिक मैत्री-सारिणी (सूर्य–शनि शत्रु आदि) से निर्धारित; convention pin करें। व्यय = भाव 12।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष → L6=बुध, L8=मंगल, L12=गुरु। यदि बुध मीन (नीच), मंगल कर्कट (नीच), गुरु मकर (नीच) — तीनों नीचस्था; लग्नेश मंगल यदि … (मंगल L1 भी L8 — योग-जटिल)। स्वच्छ: लग्न = वृषभ, L1=शुक्र मीन (उच्च) से वृषभ पर दृष्टि (शुक्र पूर्ण 7वीं: मीन→कन्या, नहीं)। शुक्र तुला (स्व) लग्न से 6 — दृष्टि नहीं। शुक्र वृषभ (स्व, लग्न में) → लग्न “युक्त” = अधिवास से लग्न-बल; दृष्टि-शब्द यहाँ युति/अधिष्ठान तक विस्तृत — पाठ-भेद संभव। शर्त का सार: L1 स्व/उच्च + लग्न-संबंध, दुःस्थानपति दुर्बल।

39.21
स्वोच्चस्वभस्थराज्येशो लग्नं पश्यंश्च राज्यदः।
शुभाः केन्द्रस्थिता वाऽपि राज्यदः नाऽत्र संशयः
svoccasvabhastharājyeśo lagnaṃ paśyaṃśca rājyadaḥ|
śubhāḥ kendrasthitā vā'pi rājyadaḥ nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चस्वभस्थः = स्वोच्च या स्वभ में स्थित; राज्येशः = राज्येश (दशमेश / राज्य-भाव का स्वामी); लग्नं पश्यन् = लग्न को देखता; च राज्यदः = राज्यदाता; शुभाः = शुभ ग्रह; केन्द्रस्थिताः = केन्द्र (1,4,7,10) में स्थित; वा अपि = अथवा भी; राज्यदः = राज्य देने वाले; नात्र संशयः = यहाँ संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राज्येश (दशम भाव का स्वामी) जब स्वराशि या उच्च में रहकर लग्न पर दृष्टि डाले, तब वह राज्य देता है। अथवा शुभ ग्रह केन्द्रों में स्थित हों — तब भी राज्य-दाता माने गए हैं; इसमें संदेह नहीं। दशम-लग्न संबंध और केन्द्र-शुभ — दोनों मार्ग शास्त्र में समान बल से रखे गए हैं।

English rendering The text states that the lord of the kingdom-house (the tenth), standing in its own sign or exaltation and aspecting the lagna, confers kingdom; or again, benefics placed in the angles also confer kingdom — of this there is no doubt here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्वतंत्र पर्याप्त शर्तें (OR):
(1) L10 ∈ {स्वराशि, उच्च} ∧ dṛṣṭi(L10 → lagna);
(2) शुभ ग्रह ∈ kendra {1,4,7,10}।
केन्द्र-सूचकांक: bhāva mod 12 ∈ {1,4,7,10}। “राज्येश” = दशमेश — राजयोग-अध्याय में मानक; पाठ-भेद संभव यदि “राज्य” को नवम/पंचम से जोड़ा जाए।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या → दशम = मिथुन, L10 = बुध। बुध कन्या (उच्च/स्व) लग्न में → लग्न-युक्त = राज्येश लग्नस्थ; शास्त्र-शर्त (1) की दृढ़ पूर्ति। अथवा: लग्न कन्या, केन्द्रों में गुरु (लग्न), शुक्र (दशम) — शर्त (2)। केवल विन्यास-दृष्टांत; फल = शास्त्र-कथन, न कि हमारी भविष्यवाणी।

39.22
शुभराशौ शुभांशे च कारको धनवान्‌ भवेत्‌।
तदंशकेन्द्रेषु शुभे नूनं राजा प्रजायते
śubharāśau śubhāṃśe ca kārako dhanavān‌ bhavet‌|
tadaṃśakendreṣu śubhe nūnaṃ rājā prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभराशौ = शुभ/सौम्य राशि में; शुभांशे = शुभ अंश (विशेषतः नवांश D9) में; कारको = कारक (यहाँ प्रसंगतः आत्मिकारक/सम्बन्धित कारक); धनवान् = धन-संपन्न; तदंश-केन्द्रेषु = उस अंश-लग्न के केन्द्रों (1, 4, 7, 10) में; शुभे = शुभ ग्रह; राजा = राजयोग/राज-पद सूचक जन्म।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कारक शुभ राशि और शुभ अंश में स्थित हो, तो जातक धनवान् होता है। यदि उसी अंश के केन्द्र भावों में शुभ ग्रह हों, तो पाठ के अनुसार निश्चय ही राजा-तुल्य योग उत्पन्न होता है। यहाँ फल अंश-केन्द्रों की शुभ-स्थिति से बाँधा गया है, न कि मात्र राशि से।

English rendering The text states that when the kāraka occupies a benefic sign and a benefic aṃśa, the native becomes wealthy; and if benefics stand in the kendras of that aṃśa, a royal birth (rājayoga) is affirmed without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राजयोग-फल-कथन (कारक + अंश-केन्द्र शर्त)। “अंश” यहाँ वर्ग-विभाजन (प्रायः D9) का फल-प्रयोग है: राशि-स्थान और अंश-स्थान दोनों की शुभता, फिर अंश-लग्न से केन्द्र = ±0°, ±90°, ±180° के भाव-संकेत। फल शास्त्र का दावा है, नियति नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें आत्मिकारक (या प्रसंग-निर्दिष्ट कारक) कर्क 12° (शुभ भाव-राशि; कर्क चन्द्र का स्व) और नवांश-मान: 12° × 9 = 108° → 108° mod 360 → मीन नवांश (शुभ)। यदि D9-लग्न से 1, 4, 7, 10 में गुरु/शुक्र/बुध (अपाप) हों, तो यह श्लोक “शुभ राशि + शुभ अंश + अंश-केन्द्र शुभ” वाली शर्त पूरी मानता है। (नवांश-नियम: 30°/9 = 3°20′ प्रति अंश; अयनांश फल-निर्णय में नहीं, केवल देशांतर-देशांतर गणना में।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “शुभांश” का आधार षोडश-वर्ग की मॉड्यूलर विभाजन-योजना है — D9 = 30° को 9 समान चापों (3°20′) में बाँटना। हमारी वर्ग-इंजन यही नियत विभाजन लागू करती है; फल-वाक्य को हम गणना नहीं, शास्त्र-कथन के रूप में ही रखते हैं।

39.23
लग्नारूढं दारपदं मिथः केन्द्र स्थितं यदि।
त्रिलाभे वा त्रिकोणे वा तदा राजा न संशयः
lagnārūḍhaṃ dārapadaṃ mithaḥ kendra sthitaṃ yadi|
trilābhe vā trikoṇe vā tadā rājā na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नारूढं = लग्न का आरोह/आरूढ लग्न (AL, आरोह-पद); दारपदं = दार-पद (UL/A7, सप्तम-आरूढ); मिथः = परस्पर; केन्द्र स्थितं = एक-दूसरे से केन्द्र (1-4-7-10 सम्बन्ध); त्रिलाभे = तृतीय-लाभ (3–11) भाव-सम्बन्ध में; त्रिकोणे = त्रिकोण (1-5-9); राजा न संशयः = राजयोग — संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि लग्नारूढ और दारपद परस्पर केन्द्र में स्थित हों, अथवा त्रिलाभ (3–11) सम्बन्ध में हों, अथवा त्रिकोण में हों, तो राजा का योग निर्विवाद माना जाता है। यह आरोह-युग्म की सापेक्ष स्थिति पर आधारित फल है। “न संशयः” पाठ की दृढ़ता है, हमारे भविष्य-कथन की नहीं।

English rendering The text states that if the ārūḍha of the lagna and the dāra-pada stand mutually in kendras, or in a 3–11 relationship, or in trikoṇa, then royal yoga arises without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आरोह-पद (standard BPHS rule, used here as prerequisite):
आरूढ-लग्न = लग्न से जितने भावों पर लग्नेश, उतने ही भाव आगे गिनकर प्राप्त राशि (अपवाद: 1 या 7 पर पड़ने पर ±1 भाव — प्रचलित पाठ-भेद संभव)।
सापेक्ष भाव-संख्या \(d = ((R_{\text{AL}} - R_{\text{UL}}) \bmod 12) + 1\)।
केन्द्र: \(d \in \{1,4,7,10\}\); त्रिकोण: \(d \in \{1,5,9\}\); त्रिलाभ: \(d \in \{3,11\}\)। गणित सापेक्ष राशि-सूचकांकों का है; फल शास्त्र-कथन।

उदाहरण (worked example) AL = सिंह (5), UL = वृश्चिक (8) → \(d = ((8-5)\bmod 12)+1 = 4\) → केन्द्र। श्लोक की “मिथः केन्द्र” शर्त पूर्ण। यदि UL = धनु (9) → \(d=5\) → त्रिकोण; यदि UL = तुला (7) → \(d=3\) → त्रिलाभ। (भाव-गणना पूर्ण-राशि संकेत; गृह-प्रणाली यहाँ rāśi-bhāva = whole-sign मानकर।)

39.24
भावहोराघटीसंज्ञलग्नानि च प्रपश्यति।
स्वोच्चग्र्हो राजयोगो लग्नद्वयमथापि वा
bhāvahorāghaṭīsaṃjñalagnāni ca prapaśyati|
svoccagrho rājayogo lagnadvayamathāpi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाव-होरा-घटी-संज्ञ-लग्नानि = भाव-लग्न, होरा-लग्न, घटी-लग्न नामक विशेष लग्न; प्रपश्यति = दृष्टि/अवलोकन करता है; स्वोच्च-ग्रहः = स्वोच्च स्थित ग्रह (पाठ “स्वोच्चग्र्हो” — स्वोच्चग्रहो); राजयोगः = राजयोग; लग्न-द्वयम् = दो लग्न; अथवा वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाव-लग्न, होरा-लग्न और घटी-लग्न को (उत्तम ग्रह) देखे — विशेषतः जब स्वोच्च ग्रह उनकी ओर दृष्टि डाले — तो राजयोग होता है; अथवा दो लग्नों के योग/सम्बन्ध से भी वैसा ही फल कहा गया है। यहाँ “लग्न” केवल जन्मलग्न नहीं, तीन संज्ञित विशेष लग्न हैं। पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव: कौन ग्रह “पश्यति” — स्वोच्च ग्रह ही, या कोई शुभ — सन्दर्भ-अध्याय से बाँधें।

English rendering The text states that when the lagnas designated bhāva, horā, and ghaṭī are aspected — especially by a planet in exaltation — rājayoga arises; or likewise from the conjunction/relation of two such lagnas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विशेष लग्न (BPHS परिभाषा — सार रूप; पूर्ण सूत्र उन्हीं अध्यायों में):
• भाव-लग्न ≈ सूर्योदय से बीते घटी-अंशों का लग्न-चाप पर प्रक्षेप।
• होरा-लग्न ≈ दिन/रात्रि की होरा-अवधि के अनुपात से लग्न-बिन्दु।
• घटी-लग्न ≈ इष्टकाल की घटियों से 30° मॉड्यूलर वृद्धि।
दृष्टि = शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि (पूर्ण/आंशिक) या भाव-दृष्टि — प्रयुक्त नियम घोषित करें। “स्वोच्च” = ग्रह का उच्च-राशि-स्थान (जैसे सूर्य मेष, चन्द्र वृष आदि)। फल-कथन; संख्या यहाँ केवल लग्न-निर्माण में।

उदाहरण (worked example) मान लें घटी-लग्न = कन्या 10°, और उच्च-स्थित गुरु (कर्क) कन्या पर पूर्ण दृष्टि (गुरु 5वीं/9वीं दृष्टि — कर्क→कन्या = 3 भाव = आंशिक; वैकल्पिक: whole-sign 7वीं पूर्ण)। यदि होरा-लग्न भी कन्या/मकर (केन्द्र-युग्म) हो और स्वोच्च शुक्र उसे देखे, तो श्लोक “स्वोच्चग्रह + विशेष लग्न” / “लग्नद्वय” दोनों मार्गों में से किसी को राजयोग-हेतु कहता है। (अयनांश: लग्न-देशांतर सायन/निरयण — निरयण + घोषित अयनांश उपयोग करें।)

39.25
राशेर्द्रेष्काणतोंऽशाच्च राशेरंशादथापि वा।
यद्वा राशिदृकाणाभ्यां लग्नद्रष्टा तु योगदः
rāśerdreṣkāṇatoṃ'śācca rāśeraṃśādathāpi vā|
yadvā rāśidṛkāṇābhyāṃ lagnadraṣṭā tu yogadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशेः = राशि-चक्र/D1 से; द्रेष्काणतः = द्रेष्काण (D3) से; अंशात् = अंश/नवांश (D9) से; राशेरंशात् = राशि के अंश से; अथवा = या; राशि-दृकाणाभ्याम् = राशि और दृकाण (द्रेष्काण) दोनों से; लग्न-द्रष्टा = लग्न को देखने वाला ग्रह; योगदः = योग देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राशि से, द्रेष्काण से, अंश से — अथवा राशि-अंश से — या राशि और द्रेष्काण दोनों की दृष्टि से — जो ग्रह लग्न को देखता है, वही योगदाता है। अर्थात् लग्न-दृष्टि केवल D1 तक सीमित नहीं; वर्ग-चक्रों में भी लग्न-द्रष्टा योग का कारक माना गया है। पाठ “द्रेष्काणतोंऽशाच्च” में संधि-पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that the planet which aspects the lagna — from the rāśi, from the drekkāṇa, from the aṃśa, or from rāśi-aṃśa, or jointly from rāśi and dṛkāṇa — is the giver of yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-विभाजन (मॉड्यूलर):
• D1: \(\lambda\) → राशि \(=\lfloor\lambda/30\rfloor\bmod 12\)।
• D3 (द्रेष्काण): 30°/3 = 10°; खंड \(k=\lfloor(\lambda \bmod 30)/10\rfloor\in\{0,1,2\}\), मानचित्रण राशि-क्रम नियम से।
• D9 (अंश/नवांश): 30°/9 = 3°20′; खंड \(=\lfloor(\lambda \bmod 30)/(10/3)\rfloor\)।
“लग्न-द्रष्टा” = उस वर्ग में लग्न-राशि पर शास्त्र-दृष्टि करने वाला ग्रह। योग = फल-संकेत, गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष 16°। D3: \(16°/10°\to\) द्वितीय द्रेष्काण → (मेष-क्रम) सिंह द्रेष्काण-लग्न। D9: \(16°/(3°20′)=4.8\to\) 5वाँ नवांश → (चर राशि नियम) सिंह नवांश। यदि मंगल D1 में तुला से मेष को 7वीं पूर्ण दृष्टि दे, और D3/D9 में भी लग्न-राशि पर दृष्टि/अधिकार हो, तो श्लोक उसे “लग्नद्रष्टा … योगदः” कहता है। (वर्ग-नियम: BPHS Ch.6 क्रम; अयनांश निरयण।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक षोडश-वर्ग की दृष्टि-व्याप्ति को स्पष्ट करता है — D1, D3, D9 पर लग्न-द्रष्टा का योग। हमारी वर्ग-इंजन इन्हीं समान-चाप विभाजनों (D3=10°, D9=3°20′, … D60) को नियत मॉड्यूलर अंकगणित से बनाती है; फल को “शास्त्र कहता है” तक सीमित रखते हैं, भविष्य नहीं थोपते।

39.26
पदे स्वोच्चखगाक्रान्ते चन्द्राक्रान्ते विशेषतः।
क्रान्ते च गुरुशुक्राभ्यां केनाप्युच्चग्रहेण वा
pade svoccakhagākrānte candrākrānte viśeṣataḥ|
krānte ca guruśukrābhyāṃ kenāpyuccagraheṇa vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदे = (आरूढ) पद पर; स्वोच्च-खग-आक्रान्ते = स्वोच्च ग्रह से आक्रान्त/अधिरूढ़; चन्द्र-आक्रान्ते = चन्द्र से युक्त; विशेषतः = विशेष रूप से; गुरु-शुक्राभ्याम् = गुरु और शुक्र से; केनापि उच्च-ग्रहेण = किसी भी उच्च ग्रह से; वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पद (आरूढ) स्वोच्च ग्रह से आक्रान्त हो — विशेषतः चन्द्र से, अथवा गुरु-शुक्र से, अथवा किसी भी उच्च ग्रह से — तो (पूर्व-प्रसंगानुसार) राजयोग की स्थिति बलवती होती है। पद की ग्रह-अधिरूढ़ता यहाँ केन्द्रीय शर्त है। श्लोक अधूरा-सा फल छोड़ता है; 39.27 से जुड़कर पूरा अर्थ मिलता है।

English rendering The text states that when the (ārūḍha) pada is occupied by an exalted planet — especially by the Moon, or by Jupiter and Venus, or by any exalted planet — [the royal yoga condition is strengthened].

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद-अधिष्ठान फल-शर्त। जाँच: (1) आरोह-राशि \(R_{\text{pada}}\) ज्ञात करें; (2) क्या कोई ग्रह \(\lfloor\lambda_g/30\rfloor = R_{\text{pada}}\)? (3) क्या वह ग्रह अपनी उच्च-राशि में है? “विशेषतः चन्द्र” = चन्द्र-युति को प्राथमिकता; गुरु+शुक्र = द्वय-शुभ। उच्च-राशियाँ नियत सारणी (सूर्य-मेष … शनि-तुला) — सम्पूर्ण सूची यहाँ न दोहराकर “उच्च-सारणी” से मिलान।

उदाहरण (worked example) AL = मीन। गुरु मीन 8° (उच्च) → “स्वोच्चखगाक्रान्ते” पूर्ण। विकल्प: चन्द्र मीन 20° → “चन्द्राक्रान्ते विशेषतः”। शुक्र+गुरु दोनों मीन → “गुरुशुक्राभ्यां”। (राशि = whole-sign अधिष्ठान; अंश-सूक्ष्मता इस श्लोक में अवश्यक नहीं।)

39.27
दुष्टार्गलग्रहाभावे राजयोगो न संशयः।
शुभारूढे तत्र चन्द्रे धने देवगुरौ तथा
duṣṭārgalagrahābhāve rājayogo na saṃśayaḥ|
śubhārūḍhe tatra candre dhane devagurau tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुष्ट-अर्गल-ग्रह-अभावे = दुष्ट अर्गला करने वाले ग्रहों का अभाव; राजयोगः = राजयोग; न संशयः = संशय नहीं; शुभ-आरूढे = शुभ ग्रहों से युक्त आरूढ पर; तत्र चन्द्रे = वहाँ चन्द्र; धने = द्वितीय भाव में; देवगुरौ = देवगुरु बृहस्पति; तथा = तथा/उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दुष्टार्गल ग्रहों के अभाव में राजयोग निश्चय होता है; तथा जब आरूढ शुभ हो, वहाँ चन्द्र हो, और धन (2) में गुरु हो — तब भी वही श्रेष्ठ योग कहा गया है। अर्गला-शुद्धि यहाँ योग की नकारात्मक शर्त (अभाव) है; शुभ-आरूढ + चन्द्र + धनस्थ गुरु सकारात्मक पूरक हैं। भय या उपाय-दबाव का कोई संकेत नहीं — केवल योग-लक्षण।

English rendering The text states that in the absence of planets forming duṣṭa-argala, rājayoga is certain; and likewise when the ārūḍha is benefic-occupied, the Moon is there, and Jupiter stands in the second house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अर्गला (BPHS मानक — 2, 4, 11वें से प्राथमिक; प्रति-अर्गला 12, 10, 3):
ग्रह \(P\) से भाव \(h\in\{2,4,11\}\) पर ग्रह = अर्गला; विपरीत \(\{12,10,3\}\) = विरोधा/प्रति।
दुष्टार्गला ≈ पाप ग्रह द्वारा अर्गला (या अर्गला-स्थल पर पाप), जब प्रति-अर्गला से शान्त न हो — विस्तृत शोधन Ch. अर्गला में।
“अभाव” = ऐसी दुष्टार्गला-संरचना शून्य। धन = आरूढ या लग्न से 2? प्रसंग “शुभारूढे तत्र चन्द्रे” के बाद “धने देवगुरौ” — प्रायः लग्न/कार्य-लग्न से 2; पाठ-भेद संभव। फल शास्त्र-कथन।

उदाहरण (worked example) AL = वृष; शुक्र+चन्द्र वृष (शुभारूढ + तत्र चन्द्र); गुरु मिथुन (AL से 2 = धन) → सकारात्मक खंड पूर्ण। दुष्टार्गला जाँच: AL (वृष) पर मंगल/शनि की 2/4/11 अर्गला बिना प्रति-अर्गला शोधन के हो तो “दुष्टार्गलग्रह” दोष; यदि शनि की अर्गला मेष (12वीं प्रति) से काटी जाए या पाप अर्गला ही न हो, तो “अभावे … न संशयः”। (अर्गला-गिनती whole-sign भाव।)

39.28
दुःस्थानेशोऽपि नीचस्थो यदि लग्नं प्रपश्यति।
तदाऽपि राजयोगः स्यादिति ज्ञेयं द्विजोत्तम
duḥsthāneśo'pi nīcastho yadi lagnaṃ prapaśyati|
tadā'pi rājayogaḥ syāditi jñeyaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुःस्थान-ईशः = दुःस्थान (6/8/12) का स्वामी; अपि = भी; नीचस्थः = नीच राशि में; यदि लग्नं प्रपश्यति = यदि लग्न को देखे; तदा अपि = तब भी; राजयोगः स्यात् = राजयोग होता है; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ छठे, आठवें या बारहवें भाव (दुःस्थान) का स्वामी यदि नीच राशि में भी स्थित हो, किन्तु लग्न पर दृष्टि डाले, तो भी राजयोग बनता है — ऐसा जान लो। यह नीच-दुःस्थानेश की लग्न-दृष्टि से बनने वाला विपरीत-राजयोग-सदृश योग है।

English rendering Even a dusthāna lord (of the 6th, 8th, or 12th), though debilitated, if it aspects the lagna, still yields a rāja-yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सर्व-ग्रह की पूर्ण दृष्टि 7वें भाव (180°) पर; अतः लग्न-दृष्टि हेतु दुःस्थानेश प्रायः लग्न से 7वें में। परम-नीच (deep debilitation) exact अंश — सूर्य 10° तुला, चन्द्र 3° वृश्चिक, मंगल 28° कर्क, बुध 15° मीन, गुरु 5° मकर, शुक्र 27° कन्या, शनि 20° मेष। नीचस्थ = वह राशि जिसका उच्च ठीक 180° सामने पड़े।

उदाहरण (worked example) कर्क-लग्न — 6ठ भाव धनु, स्वामी गुरु। गुरु नीच मकर (5° तक) में = लग्न से 7वाँ भाव; वहाँ से पूर्ण दृष्टि (7वें→1st, 180°) कर्क-लग्न पर पड़ती है ⇒ श्लोक-वर्णित नीच-दुःस्थानेश की लग्न-दृष्टि पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) नीचत्व स्थानबल (ṣaḍbala के छः अंगों में से एक — sthāna, dig, kāla, ceṣṭā, naisargika, dṛg) में न्यूनतम अंक देता है, फिर भी शास्त्र इसकी लग्न-दृष्टि को योग-कारक गिनता है। इंजन परम-नीच देशान्तरों को पिन-किए स्थिरांक (exact `==`) रखता है, जिससे संगणित दुर्बलता और पाठ का फल-दावा परस्पर पृथक् रहते हैं — गणित बनाम व्याख्या का वही पृथक्करण।

39.29
चतुर्थदशमार्थायपतिदृष्टे विलग्नभे।
पदाल्लाभे तु शुक्रेण दृष्टेऽप्यारूढभे शुभे
caturthadaśamārthāyapatidṛṣṭe vilagnabhe|
padāllābhe tu śukreṇa dṛṣṭe'pyārūḍhabhe śubhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थ = ४था भाव; दशम = १०वाँ भाव; अर्थ = २रा भाव (धन); आय = ११वाँ भाव (लाभ); पति = स्वामी; दृष्टे = दृष्टि होने पर; विलग्नभे = लग्न-राशि में; पदात् = आरूढ-पद से; लाभे = ११वें में; शुक्रेण = शुक्र द्वारा; आरूढभे = आरूढ-राशि में; शुभे = शुभ/शुभग्रह-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ एक राजयोग-संयोग बताता है: जब लग्न-राशि पर चतुर्थ, दशम, अर्थ (द्वितीय) और आय (एकादश) के स्वामियों की दृष्टि हो; तथा आरूढ-पद से लाभ-स्थान शुक्र से दृष्ट हो, और आरूढ-राशि भी शुभ हो — तो वह विन्यास अगले श्लोक के फल से जुड़ता है। यह पद-आरूढ, भाव-स्वामी और दृष्टि — तीनों की संयुक्त जाँच है, न कि एकाकी संकेत।

English rendering The text states a royal-yoga configuration: when the lagna-sign is aspected by the lords of the 4th, 10th, 2nd (artha), and 11th (āya); and when the 11th from the ārūḍha-pada is aspected by Venus, with the ārūḍha itself auspicious — the full result is completed in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचनात्मक योग-नियम (राजयोग-संयोग), न कि शुद्ध संख्या-सूत्र। जाँच-पद: (१) L पर ४/१०/२/११-स्वामियों की दृष्टि; (२) A (आरूढ) से ११वाँ शुक्र-दृष्ट; (३) A शुभ। दृष्टि-परम्परा: पूर्ण दृष्टि ७वें से; मंगल ४/८, गुरु ५/९, शनि ३/१० (पारम्परिक पाराशरी दृष्टियाँ) — घोषित करें। आरूढ-पद की गणना: लग्न से लग्नेश जितने भाव दूर, लग्नेश से उतने ही आगे = आरूढ (समान-राशि-संशोधन सहित, जहाँ लागू)।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न = मेष, लग्नेश मंगल = सिंह (लग्न से ५वाँ) → आरूढ ≈ लग्नेश से ५वाँ = धनु। चतुर्थेश = चन्द्र (कर्क), दशमेश = शनि (मकर), अर्थेश = शुक्र (वृष), आयेश = शनि (कुम्भ-स्वामी शनि; यहाँ द्वैध-स्वामित्व घोषित)। यदि ये स्वामी लग्न-मेष को पारम्परिक दृष्टि से देखते हों, और धनु से ११वाँ = तुला शुक्र-दृष्ट हो तथा आरूढ शुभ हो — तो श्लोक ३९.२९ की शर्त पूरी मानी जाती है (फल अगले श्लोक में)।

39.30
राजा वा तत्समो वापि जातको जायते ध्रुवम्‌।
ष।ष्ठाष्टमगते नीचे लग्नं पश्यति वा तथा
rājā vā tatsamo vāpi jātako jāyate dhruvam‌|
ṣa|ṣṭhāṣṭamagate nīce lagnaṃ paśyati vā tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजा = नृप; तत्समः = उसके समान; जातकः = जन्म-जात; जायते = होता है; ध्रुवम् = निश्चित रूप से (शास्त्र-वचन); षष्ठ = ६ठा; अष्टम = ८वाँ; गते = स्थित; नीचे = नीच-राशि में; लग्नं पश्यति = लग्न को देखता है; वा तथा = अथवा उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के योग में शास्त्र कहता है — जातक राजा या राजा-तुल्य होता है, “ध्रुवम्” शब्द शास्त्र का अपना दावा है। साथ ही एक वैकल्पिक विन्यास जोड़ा गया है: जब (योग-कारक ग्रह) षष्ठ या अष्टम में, अथवा नीच में स्थित होकर भी लग्न को देखता है — तो भी समान फल-श्रेणी का उल्लेख है। यह फल-कथन है; गणना केवल भाव-स्थिति और दृष्टि की जाँच है।

English rendering The text states that under the foregoing yoga the native is born a king or the equal of one — “dhruvam” is the śāstra’s own assertiveness, not an external guarantee. It adds an alternative: when a (yoga-linked) planet in the 6th or 8th, or in debilitation, aspects the lagna, a like result-class is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + वैकल्पिक योग-शर्त। जाँच: ग्रह G ∈ {६, ८} अथवा G नीच-राशि में, तथा G → L (दृष्टि)। नीच-मानचित्र (पारम्परिक): सूर्य तुला, चन्द्र वृश्चिक, मंगल कर्क, बुध मीन, गुरु मकर, शुक्र कन्या, शनि मेष — अयनांश घोषित करके ही राशि-निर्णय स्थिर होता है।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह; मंगल कर्क में (नीच) और सिंह को ४/८ दृष्टि से देखता है (मंगल की विशेष दृष्टि) — तो “नीचे लग्नं पश्यति” शर्त लागू। फल-श्रेणी श्लोक के अनुसार राज/राज-तुल्य कही गई है; यह शास्त्र-वचन है, नियति-घोषणा नहीं।

39.31
तृतीयलाभगे नीचे लग्नं पश्यति वा तथा।
लग्नांशकेन्द्रेषु शुभे निग्रहानुग्रहक्षमः
tṛtīyalābhage nīce lagnaṃ paśyati vā tathā|
lagnāṃśakendreṣu śubhe nigrahānugrahakṣamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीय = ३रा भाव; लाभ = ११वाँ; गे = स्थित; नीचे = नीच में; लग्नं पश्यति = लग्न देखता है; लग्नांश = लग्न का नवमांश (D9 लग्न); केन्द्रेषु = १/४/७/१० में; शुभे = शुभग्रह; निग्रह = दमन/दण्ड-शक्ति; अनुग्रह = अनुकम्पा/अनुदान; क्षमः = समर्थ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — तृतीय या लाभ में, अथवा नीच में स्थित होकर लग्न देखने पर भी वैसी ही योग-श्रेणी लागू हो सकती है। फिर एक पृथक् किन्तु महत्वपूर्ण शर्त: लग्नांश (नवमांश-लग्न) से केन्द्रों में शुभग्रह हों तो जातक निग्रह-अनुग्रह में सक्षम कहा गया है — अर्थात् शास्त्र के अनुसार राज-सदृश अधिकार-योग्य विन्यास। यह D9-केन्द्र और शुभ-स्थिति की संयुक्त परीक्षा है।

English rendering The text continues: when (a planet) in the 3rd or 11th, or in debilitation, aspects the lagna, a like indication applies. Further, when benefics occupy the kendras from the lagnāṃśa (navāṃśa lagna), the native is said to be capable of niigraha and anugraha — restraint and favour, the classic mark of royal authority in the śāstra’s idiom.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (अ) वैकल्पिक दृष्टि-शर्त: G ∈ {३, ११} ∨ G नीच, तथा G → L। (ब) नवमांश-केन्द्र नियम: D9-लग्न L₉ ज्ञात करें; शुभ = गुरु, शुक्र, (शुद्ध) बुध, (पक्षी) चन्द्र — L₉ से भाव १/४/७/१० में स्थित। नवमांश-सूत्र (सम/विषम राशि-परम्परा सहित): प्रत्येक ३°२०′ = १ नवमांश; विषम राशि में मेष से क्रम, सम राशि में तुला से क्रम (पाराशरी D9-नियम; वर्ग-इंजन इसी modular partition पर)।

उदाहरण (worked example) लग्न-देशांतर λ_L = 15° वृष (४५° sidereal; अयनांश घोषित)। नवमांश: वृष सम → तुला से गिनती; 15°/3°20′ = 4 पूर्णांश → ५वाँ नवमांश = कुम्भ = L₉। यदि L₉-कुम्भ से केन्द्र (कुम्भ, वृष, सिंह, वृश्चिक) में गुरु/शुक्र हों — “लग्नांशकेन्द्रेषु शुभे” पूर्ण। फल: शास्त्र कहता है निग्रहानुग्रह-क्षमता।

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्नांश = D9 (नवमांश) — षोडश-वर्ग शृंखला का केन्द्रीय वर्ग। प्रत्येक ३०° राशि का ९ × ३°२०′ विभाजन शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित है; हमारा वर्ग-इंजन D1…D60 को उसी नियत चाप-नियम से बाँधता है। यहाँ फल D9-केन्द्र-शुभता से जुड़ा है — गणना सटीक (`==` चाप), फल केवल शास्त्र-वचन।

39.32
अथाऽहं सम्प्रवक्ष्यामि राजयोगादिकं परम्‌।
ग्रहाणां स्थानभेदेन दृष्टियोगवशात्‌ फलम्‌
athā'haṃ sampravakṣyāmi rājayogādikaṃ param‌|
grahāṇāṃ sthānabhedena dṛṣṭiyogavaśāt‌ phalam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अहं = मैं (पाराशर-वाणी); सम्प्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; राजयोगादिकं = राजयोग आदि; परम् = श्रेष्ठ/परम; ग्रहाणां = ग्रहों के; स्थानभेदेन = स्थान-भेद से; दृष्टि = दृष्टि; योग = संयोग; वशात् = वश से; फलम् = परिणाम/कथन।

हिन्दी भावार्थ यह संक्रमण-श्लोक है। आचार्य घोषणा करते हैं — अब राजयोग आदि का परम विवेचन सम्यक् कहा जाएगा; फल ग्रहों के स्थान-भेद और दृष्टि-योग के अनुसार समझना है। आगे के श्लोक इसी घोषणा की पूर्ति हैं: भाव-स्वामी, परस्पर दृष्टि, युति, परिवर्तन — इन्हीं से राजयोग गिने जाते हैं।

English rendering A transitional announcement: “I shall now duly expound the supreme rājayoga and the rest; results follow from the diversity of planetary stations and from the force of aspect-combinations.” The following verses supply those station-and-aspect rules.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-संवाद/उपक्रम-वचन। तकनीकी संकेत इतना ही: फल = f(स्थान, दृष्टि, योग) — अर्थात् भाव-स्वामित्व, युति, परिवर्तन, पारस्परिक दृष्टि की संरचित जाँच; मनमानी कथा नहीं।

39.33
तपःस्थानाधिपो मन्त्री मन्त्राधीशो विशेषतः।
उभावन्योन्यसंदृष्टौ जातश्चेदिह राज्यभाक्‌
tapaḥsthānādhipo mantrī mantrādhīśo viśeṣataḥ|
ubhāvanyonyasaṃdṛṣṭau jātaścediha rājyabhāk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तपःस्थान-अधिपः = तप/धर्म-स्थान (9वें) का स्वामी; मन्त्री = "मन्त्री" (यहाँ मन्त्र-स्थान = 5वें का स्वामी — पाठ-भेद संभव); मन्त्राधीशः = मन्त्र-स्थान (5वें) का स्वामी; विशेषतः = विशेष रूप से; उभौ अन्योन्य-संदृष्टौ = दोनों परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए; जातः चेत् = जन्म हो तो; इह राज्यभाक् = राज्य का भागी होता है।

हिन्दी भावार्थ नवम (तप/धर्म) भाव का स्वामी और पञ्चम (मन्त्र) भाव का स्वामी — ये दोनों त्रिकोणेश परस्पर एक-दूसरे को देखें, तो ऐसे में जन्मा जातक राज्य का भागी होता है।

English rendering If the lord of the 9th (tapas/dharma) and the lord of the 5th (mantra) mutually aspect one another, the native born thereunder shares in kingship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पञ्चम व नवम = धर्म-त्रिकोण (लग्न से 5, 9)। अन्योन्य-दृष्टि की सरलतम कोटि = परस्पर 7वें (180°) में स्थिति; अन्यथा किसी की विशेष दृष्टि (मंगल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10) से एक-दूसरे तक। दृष्टि की मात्रा दृग्बल (virūpa) में मापी जाती है — पूर्ण = 60 virūpa।

उदाहरण (worked example) सिंह-लग्न — 5वाँ धनु (स्वामी गुरु), 9वाँ मेष (स्वामी मंगल)। गुरु मेष (9वें) में और मंगल धनु (5वें) में ⇒ परस्पर 7वें, पूर्ण अन्योन्य-दृष्टि ⇒ श्लोक-शर्त पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) "संदृष्ट है या नहीं" केवल द्विआधारी नहीं — दृग्बल में इसे virūpa-मात्रा से तौला जाता है। टीम की ṣaḍbala-रूपरेखा (sthāna, dig, kāla, ceṣṭā, naisargika, dṛg — योग rūpa/virūpa में, 1 rūpa = 60 virūpa) इस अन्योन्य-दृष्टि को संगणित बल देती है; इससे फल-दावा शास्त्र का कथन बना रहता है, हमारा नहीं।

39.34
यत्र कुत्रापि संयुक्तौ तौ वापि समसप्तमौ।
राजवंशभवो बालो राजा भवति निश्चितम्‌
yatra kutrāpi saṃyuktau tau vāpi samasaptamau|
rājavaṃśabhavo bālo rājā bhavati niścitam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र कुत्रापि = जहाँ कहीं भी; संयुक्तौ = युक्त/एक राशि में; तौ = वे दोनों (५ेश व ९ेश); वा = अथवा; समसप्तमौ = परस्पर सप्तम-भावस्थ; राजवंश = राजकुल; भवः = उत्पन्न; बालः = बालक; राजा भवति = राजा होता है; निश्चितम् = शास्त्र की निश्चय-भाषा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के दोनों (पंचमेश–नवमेश) यदि कहीं भी एक साथ युति करें, अथवा परस्पर समसप्तम हों, तो शास्त्र कहता है — राजवंश में जन्मा बालक राजा होता है। “निश्चितम्” शास्त्र का अपना बल-वचन है; हम उसे नियति या गारंटी नहीं बनाते। योग-बीज वही पंचम–नवम सम्बन्ध है — दृष्टि के स्थान पर युति या ७–७ स्थिति।

English rendering The text states that wherever those two (5th and 9th lords) are conjoined, or stand in mutual seventh (samasapta), a child born of a royal line becomes a king — “niścitam” is the śāstra’s own certainty-language, reported as such, not endorsed as fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो तुल्य शर्तें (OR): (१) sign(L₅) = sign(L₉) — युति; (२) |house(L₅) − house(L₉)| mod 12 = 6 — समसप्तम (परस्पर ७वाँ)। दोनों ही L₅–L₉ अक्ष पर राजयोग-बीज; ३९.३३ की अन्योन्य-दृष्टि तीसरा स्वरूप। “राजवंशभवः” गुणक — वंश-संदर्भ शास्त्र स्वयं जोड़ता है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मीन → L₅ (कर्क) = चन्द्र; L₉ (वृश्चिक) = मंगल। चन्द्र और मंगल दोनों सिंह में → युति = शर्त (१)। अथवा चन्द्र मेष, मंगल तुला → परस्पर ७वाँ = शर्त (२)। शास्त्र-फल: राजवंश-जात बालक राजा — कथन मात्र।

39.35
वाहनेशस्तथा माने मानेशो वाहने स्थितः।
बुद्धधर्माधिपाभ्यां तु दृष्टश्चेदिह राज्यभाक्‌
vāhaneśastathā māne māneśo vāhane sthitaḥ|
buddhadharmādhipābhyāṃ tu dṛṣṭaścediha rājyabhāk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनेशः = ४थे का स्वामी (वाहन/सुख); माने = १०वें में (मान/कर्म); मानेशः = १०वें का स्वामी; वाहने = ४थे में; स्थितः = स्थित; बुद्धि = ५वाँ; धर्म = ९वाँ; अधिपाभ्याम् = दोनों स्वामियों से; दृष्टः = दृष्ट; चेत् = यदि; इह राज्यभाक् = यहाँ राज्य का भागी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक और राजयोग बाँधता है: वाहनेश (चतुर्थेश) मान-स्थान (दशम) में हो और मानेश (दशमेश) वाहन (चतुर्थ) में हो — अर्थात् ४–१० भाव-परिवर्तन; और वह योग बुद्धि–धर्म (५–९) के स्वामियों से दृष्ट हो, तो जातक यहाँ राज्यभाक् कहा गया है। केन्द्र-परिवर्तन पर त्रिकोण-स्वामियों की दृष्टि — द्वि-स्तर परीक्षा।

English rendering The text states: if the 4th-lord stands in the 10th and the 10th-lord in the 4th (a 4–10 exchange), and the combination is aspected by the lords of the 5th (buddhi) and 9th (dharma), the native is said to share in kingship here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग = (L₄ ∈ भाव १०) ∧ (L₁₀ ∈ भाव ४) ∧ (L₅ → Y ∨ L₉ → Y), जहाँ Y = परिवर्तन-युक्त राशि-युग्म/उसमें स्थित ग्रह-समूह। ४–१० परिवर्तन = केन्द्र-परस्पर आदान-प्रदान (पारस्परिक पारिवर्तन-योग का एक रूप)। दृष्टि-जाँच L₅ और L₉ दोनों से अपेक्षित (द्विवचन “अधिपाभ्याम्”) — दोनों की दृष्टि पूर्णता की मांग करती है; पाठ-भेद संभव यदि टीकाएँ एक को पर्याप्त मानें।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष → L₄ = चन्द्र, L₁₀ = शनि, L₅ = सूर्य, L₉ = गुरु। चन्द्र मकर (१०) में, शनि कर्क (४) में → ४–१० परिवर्तन सिद्ध। यदि सूर्य और गुरु दोनों उस युग्म (कर्क/मकर) को देखते हों — शर्त पूर्ण; शास्त्र कहता है राज्यभाक्। अयनांश और दृष्टि-परम्परा घोषित रखें।

39.36
सुतकर्मसुहृल्लग्ननाथा धर्मपसंयुताः।
यस्य जन्मनि भूपोऽसौ कीर्त्या ख्यातो दिगन्तरे
sutakarmasuhṛllagnanāthā dharmapasaṃyutāḥ|
yasya janmani bhūpo'sau kīrtyā khyāto digantare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुत = पंचम भाव (संतान/बुद्धि); कर्म = दशम भाव (कर्म/पद); सुहृद् = चतुर्थ भाव (सुख/मित्र); लग्ननाथ = लग्नेश; धर्मप = नवमेश; संयुताः = (इनके स्वामियों का) धर्मेश के साथ योग; भूप = राजा/भूमिपति; कीर्त्या = यश से; दिगन्तरे = दिशाओं के पार, दूर प्रदेशों में ख्यात।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जिस जातक के जन्म-कुण्डली में पंचम, दशम, चतुर्थ और लग्न के स्वामी नवमेश के साथ जुड़े हों, वह भूप-तुल्य होता है और कीर्ति से दिगन्तर तक जाना जाता है। यहाँ राजयोग का आधार भाव-स्वामियों का धर्मेश-संयोग है। फल-कथन शास्त्रीय संकेत है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when the lords of the fifth, tenth, fourth, and lagna are conjoined with the ninth lord, the native is a ruler, renowned by fame even in distant quarters. This is a classical rājayoga configuration, reported as the śāstra’s indication.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राजयोग-फल-कथन (भावेश-संयोग की शर्त)। तकनीकी जाँच: D1 में पंचमेश, दशमेश, चतुर्थेश, लग्नेश — इनमें से जो भी नामित हों — का नवमेश के साथ युति (same-sign conjunction); दृष्टि/युति-नियम परंपरा-निर्भर; फल केवल शास्त्र-वाक्य।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न मिथुन, पंचमेश शुक्र, दशमेश बृहस्पति, चतुर्थेश बुध, लग्नेश बुध, नवमेश शनि — और शुक्र–बृहस्पति–बुध–शनि एक ही राशि में युति में हों तो ३९.३६ की शर्त पूर्ण मानी जाती है (दृष्टि-मात्र से युति नहीं; युति = same rāśi)। अयनांश: कोई भी घोषित अयनांश (जैसे लाहिरी) से देशांतर/देशान्तर-संशोधित जन्म-समय पर D1 बनाएँ; फल = “शास्त्र कहता है भूप/ख्यात”, न कि निश्चित भविष्य।

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39.37
सुखकर्मादिपौ वापि मन्त्रिनाथेन संयुतौ।
धर्मनाथेन वा युक्तौ जातश्चेदिह राज्यभाक्‌
sukhakarmādipau vāpi mantrināthena saṃyutau|
dharmanāthena vā yuktau jātaścediha rājyabhāk‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख = चतुर्थ; कर्म = दशम; आदिपौ = उन भावों के स्वामी (द्विवचन); मन्त्रिनाथ = मन्त्रि-भावेश (यहाँ पंचम/मन्त्र-सलाह का अधिपति — पाठ में कर्म से अलग नामित); संयुतौ = युक्त; धर्मनाथ = नवमेश; राज्यभाक्‌ = राज्य का भागी/उपभोक्ता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि सुखेश और कर्मेश मन्त्रिनाथ से जुड़े हों, अथवा धर्मेश से युक्त हों, तो जातक इस लोक में राज्य का भागी होता है। पूर्व श्लोक के विस्तृत चतुर्भाव-योग के बाद यह संक्षिप्त द्विपथ योग है: मन्त्रि-मार्ग या धर्म-मार्ग। दोनों ही राजयोग के शास्त्रीय द्वार माने गए हैं।

English rendering The text states that if the lords of the fourth and tenth are joined with the minister-lord, or are united with the ninth lord, the native partakes of kingship here. It is a condensed two-path rājayoga after the fuller multi-lord formula of the previous verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राजयोग-फल-कथन (सुखेश–कर्मेश का मन्त्रिनाथ/धर्मेश योग)। जाँच: D1 में (a) चतुर्थेश ∩ दशमेश with मन्त्रिनाथ (same sign), या (b) वे दोनों धर्मेश के साथ; “मन्त्रि” = पंचम (मन्त्र) — कर्म (दशम) से अलग पद होने से यह पठन सुसंगत; पाठ-भेद संभव यदि कोई टीका मन्त्रि = दशम कहे।

उदाहरण (worked example) लग्न कन्या; चतुर्थेश बृहस्पति, दशमेश बुध, पंचमेश (मन्त्रिनाथ) शनि, नवमेश शुक्र। यदि बृहस्पति–बुध–शनि एक राशि में युति में → पथ (a); यदि बृहस्पति–बुध–शुक्र युति में → पथ (b)। दोनों में शास्त्र “राज्यभाक्‌” कहता है — केवल संयोजन-सत्य की रिपोर्ट, न कि शासन-पूर्वानुमान।

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39.38
सुतेशे धर्मनाथेन युते लग्नेश्वरेण वा।
लग्ने सुखेऽथवा माने स्थिते जातो नृपो भवेत्‌
suteśe dharmanāthena yute lagneśvareṇa vā|
lagne sukhe'thavā māne sthite jāto nṛpo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेश = पंचमेश; धर्मनाथ = नवमेश; युते = युक्त; लग्नेश्वर = लग्नेश; लग्ने = प्रथम भाव में; सुखे = चतुर्थ में; मान = दशम (मान/पद); स्थिते = स्थित; नृप = नरपति/राजा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब पंचमेश नवमेश से, अथवा लग्नेश से, युक्त हो और वह योग लग्न, सुख (४) या मान (१०) में स्थित हो, तो जातक नृप होता है। यहाँ “कौन जुड़ा” और “कहाँ बैठा” दोनों शर्तें एक साथ हैं। यह राजयोग की स्थान-सहित परिभाषा है।

English rendering The text states that when the fifth lord is joined with the ninth lord or with the lagna-lord, and that combination occupies the lagna, the fourth, or the tenth, the native becomes a king. Both conjunction and house-placement are required.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राजयोग-फल-कथन (सुतेश + धर्मेश/लग्नेश, स्थान ∈ {1, 4, 10})। शर्त-समुच्चय: (सुतेश युति धर्मेश ∨ सुतेश युति लग्नेश) ∧ (उस युति का भाव ∈ {लग्न, ४, १०})। मान = दशम — ज्योतिष-परंपरा में पद/कीर्ति-स्थान।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष, पंचमेश सूर्य, नवमेश बृहस्पति, दोनों मिथुन (३) में नहीं बल्कि कर्कट (४ = सुख) में युति → शर्त पूर्ण। यदि वही युति कुम्भ (११) में हो तो “स्थिते लग्ने सुखेऽथवा माने” नहीं मिलता — योग अधूरा। अयनांश घोषित रखें; फल = शास्त्र का “नृपो भवेत्‌”, नियत राजपद नहीं।

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39.39
धर्मस्थाने स्थिते जीवे स्वगृहे भृगुसंयुते।
पंचमाधिपयुक्ते वा जातश्चेदिह राजभाक्‌
dharmasthāne sthite jīve svagṛhe bhṛgusaṃyute|
paṃcamādhipayukte vā jātaścediha rājabhāk
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मस्थाने = नवम भाव में; स्थिते जीवे = गुरु के स्थित होने पर; स्वगृहे = स्वराशि (धनु/मीन) में; भृगुसंयुते = शुक्र से युक्त; पञ्चमाधिपयुक्ते वा = अथवा पञ्चमेश से युक्त; जातः चेत् = यदि जन्मा हो; इह = यहाँ; राजभाक् = राज्य/राज-सुख का भागी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु नवम भाव में अपनी राशि में शुक्र के साथ हो, अथवा पञ्चमेश के साथ हो, तो जातक राज-भागी होता है। राजयोग अध्याय का यह पद धर्म-भाव में स्वक्षेत्री गुरु की युति-शर्तों का है। ध्यान दें: नवम में गुरु स्वराशि हो — यह केवल मेष लग्न (नवम धनु) या कर्क लग्न (नवम मीन) में संभव है।

English rendering If Jupiter stands in the ninth house in its own sign together with Venus, or joined by the lord of the fifth, the native, says the text, partakes of royal fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राजयोग-शर्त। व्युत्पत्ति: नवम = गुरु-राशि ⇒ लग्न ∈ {मेष (नवम धनु), कर्क (नवम मीन)}; शर्त: Ju ∈ भाव 9 ∧ Ju ∈ {धनु, मीन} ∧ (Ve ∈ युति ∨ 5L ∈ युति)।

39.40
दिनार्धाच्च निशार्धाच्च परं सार्धद्विनाडिका।
शुभा वेला तदुत्पन्नो राजा स्यात्तत्समोऽपि वा
dinārdhācca niśārdhācca paraṃ sārdhadvināḍikā|
śubhā velā tadutpanno rājā syāttatsamo'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिनार्ध = दिन का आधा = मध्याह्न; निशार्ध = रात्रि का आधा = मध्यरात्रि; परं = उसके बाद; सार्धद्वि-नाडिका = सार्ध + द्वि + नाडिका = 2½ नाडिका; शुभा वेला = शुभ काल; तदुत्पन्न = उस काल में उत्पन्न; तत्सम = राजा के समान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—दिनार्ध (मध्याह्न) और निशार्ध (मध्यरात्रि) के पश्चात् सवा दो नाडिका तक की वेला शुभ है; उस काल में जन्मा राजा होता है, अथवा राजा के समान। यह काल-आधारित राजयोग है — भाव-स्वामी योग नहीं, जन्म-क्षण की नाड़ी-खिड़की। फल-कथन शास्त्र का है, निश्चित राज्याधिकार नहीं।

English rendering The text states that for two-and-a-half nāḍikās after midday and after midnight the time is auspicious; one born then is a king, or equal to one. A clock-window rājayoga, not a house-lord yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1 नाडिका (घटिका) = 24 मिनट (अहोरात्र 60 नाडिका)।
सार्धद्विनाडिका = 2 + ½ = 5/2 नाडिका = (5/2) × 24 min = 60 min = 1 घंटा।
शुभ खिड़कियाँ (स्थानीय सूर्योदय-आधारित मध्याह्न/मध्यरात्रि पर):
• [मध्याह्न , मध्याह्न + 1 h]
• [मध्यरात्रि , मध्यरात्रि + 1 h]
“दिनार्ध/निशार्ध” = true local solar noon / midnight (रेखावृत्त पर सूर्य का मध्यम/स्पष्ट मध्य — स्पष्ट मध्याह्न व्यावहारिक); देशांतर व समयांकन घोषित रखें।

उदाहरण (worked example) स्थानीय स्पष्ट मध्याह्न = 12:18 LMT; शुभ वेला = 12:18–13:18 LMT। मध्यरात्रि = 00:18; शुभ = 00:18–01:18। यदि जन्म 12:45 LMT → खिड़की के भीतर → शास्त्र “राजा/तत्सम” कहता है। UTC/IST में बिना स्थानीय मध्याह्न सुधारे लागू न करें।

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39.41
चन्द्रः कविं कविश्चन्द्रमन्योऽन्यं त्रिभवस्थितः।
मिथः पश्यति वा क्वापि राजयोग उदाहृतः
candraḥ kaviṃ kaviścandramanyo'nyaṃ tribhavasthitaḥ|
mithaḥ paśyati vā kvāpi rājayoga udāhṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र = चन्द्रमा; कवि = शुक्र; अन्योऽन्यं = परस्पर; त्रिभवस्थितः = एक-दूसरे से त्रिकोण-भावों (1/5/9) में स्थित; मिथः पश्यति = परस्पर देखते हैं (परस्पर दृष्टि); क्वापि = कहीं भी; राजयोग उदाहृतः = राजयोग कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—चन्द्र शुक्र को, शुक्र चन्द्र को — परस्पर त्रिभव (त्रिकोण) में स्थित हों, अथवा कहीं भी रहकर एक-दूसरे को देखें — तो राजयोग उदाहृत है। यह द्वि-ग्रह (चन्द्र–शुक्र) राजयोग है: या तो परस्पर 1/5/9 भाव-संबंध, या परस्पर दृष्टि। दोनों विकल्प शास्त्र में “वा” से जुड़े हैं।

English rendering The text states a rājayoga when Moon and Venus stand in mutual trinal houses (each in the other’s 1st, 5th, or 9th), or when they mutually aspect wherever placed. A two-planet Moon–Venus formula with an “or” of placement versus aspect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भाव-संख्या (पूर्ण-भाव, equal/whole-sign या घोषित भाव-पद्धति):
त्रिभव: |house(Candra) − house(Śukra)| mod 12 ∈ {0, 4, 8} (अर्थात् परस्पर 1, 5, 9)।
अथवा: परस्पर दृष्टि — चन्द्र 7वीं दृष्टि; शुक्र 7वीं (पूर्ण); अन्य दृष्टियाँ ग्रह-विशेष नियम से।
“क्वापि” = राशि/भाव कहीं भी, शर्त केवल मिथः-दृष्टि। फल = शास्त्रोक्त राजयोग-संज्ञा, न कि शासन-निश्चितता।

उदाहरण (worked example) चन्द्र सिंह (भाव 1 से 5वाँ यदि लग्न मेष), शुक्र धनु (लग्न से 9) — परस्पर त्रिकोण ✓। या चन्द्र वृष, शुक्र वृश्चिक — 7/7 परस्पर दृष्टि ✓ भले त्रिभव न हो। अयनांश व भाव-पद्धति (whole-sign vs. श्रीपति आदि) घोषित करें; भिन्न पद्धति से “त्रिभव” बदल सकता है।

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39.42
चन्द्रे वर्गोत्तमांशस्थे सबले चतुरादिभिः।
ग्रहैर्दृष्टे च यो जातः स राजा भवति ध्रुवम्‌
candre vargottamāṃśasthe sabale caturādibhiḥ|
grahairdṛṣṭe ca yo jātaḥ sa rājā bhavati dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्गोत्तमांश = वर्गोत्तम अंश — D1 व D9 में वही राशि; सबले = बलवान; चतुरादिभिः ग्रहैः = चार या अधिक ग्रहों से; दृष्टे = दृष्ट; ध्रुवम्‌ = निश्चयपूर्वक (शास्त्र का दृढ़ कथन-शब्द)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब चन्द्र वर्गोत्तमांश में हो, सबल हो, और चार या अधिक ग्रहों से दृष्ट हो, तो वह जातक राजा होता है — “ध्रुवम्‌” शब्द शास्त्र की दृढ़ता का है, हमारे द्वारा नियति का दावा नहीं। वर्गोत्तम = राशि-चक्र और नवांश में एक ही राशि — षोडशवर्ग की D1/D9 संगति। बल यहाँ “सबल” पद से संकेत; पूर्ण षड्बल-सीमा इस श्लोक में संख्याबद्ध नहीं।

English rendering The text states that one born with the Moon in vargottamāṃśa, strong, and aspected by four or more planets is a king — “dhruvam” is the śāstra’s own firmness-word, not a fate-claim we endorse. Vargottama means the Moon’s sign in D1 equals its sign in D9.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नवांश (D9): प्रत्येक 30° राशि → 9 × 3° 20′ खंड।
चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम (BPHS Ch.6):
• चर राशि: नवांश मेष से क्रमशः
• स्थिर: सिंह से
• द्विस्वभाव: धनु से
वर्गोत्तम ⟺ rāśi(λ_Moon) = rāśi_D9(λ_Moon)।
दृष्टि-गणना: ≥ 4 ग्रह चन्द्र पर दृष्टि दें (सूर्य…शनि; राहु/केतु पाठ-भेद — इस श्लोक में “ग्रहैः” सात ग्रह-प्रसंग संभव)।
“सबल” = गुणात्मक; पूर्ण षड्बल (स्थान+दिक्+काल+चेष्टा+नैसर्गिक+दृग्) इस पद्य में इकाई/सीमा नहीं देता।

उदाहरण (worked example) चन्द्र 2° वृष (स्थिर राशि) → D9: स्थिर से सिंह-क्रम; 2° = पहला नवांश → D9 सिंह ≠ वृष → वर्गोत्तम नहीं। चन्द्र 14° कन्या (द्विस्वभाव) → 14° ÷ 3°20′ = 5वाँ नवांश; द्विस्वभाव धनु-से: धनु, मकर, कुम्भ, मीन, मेष… → D9 ≠ कन्या। वर्गोत्तम उदाहरण: चन्द्र 2° मेष (चर) → प्रथम नवांश मेष = D1 मेष → वर्गोत्तम ✓; यदि तब मंगल, बुध, गुरु, शनि चारों चन्द्र को देखें और चन्द्र “सबल” हो → शास्त्र “राजा…ध्रुवम्‌” कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) वर्गोत्तम सीधा षोडशवर्ग-यंत्र (D1↔D9) से जुड़ता है — राशि का 30° → 9 समान 3°20′ खंड, मॉड्यूलर मानचित्रण; यही वर्ग-इंजन का मूल अंकगणित है। फल-वाक्य (“स राजा भवति ध्रुवम्‌”) को हम केवल शास्त्र-कथन मानते हैं; गणित = exact sign-identity D1==D9, व्याख्या = अलग परत — यही exact-`==` अनुशासन है।

39.43
उत्तमांशगते लग्ने चन्द्रान्यैश्चतुरादिभिः।
ग्रहैर्दृष्टेऽपि यो जातः सोऽपि भूमिपतिर्भवेत्‌
uttamāṃśagate lagne candrānyaiścaturādibhiḥ|
grahairdṛṣṭe'pi yo jātaḥ so'pi bhūmipatirbhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तमांशगते = उत्तम-अंश में स्थित (लग्न का उत्कृष्ट वर्गांश/नवांश-स्थान); लग्ने = लग्न (उदित राशि) में; चन्द्रान्यैः = चन्द्रमा से भिन्न; चतुरादिभिः = चार या अधिक; ग्रहैः = ग्रहों से; दृष्टे = दृष्ट होने पर; अपि = भी; भूमिपतिः = भूमि-पति / राजा; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न उत्तमांश में हो और उसे चन्द्रमा को छोड़कर चार या अधिक ग्रह दृष्टि से स्पर्श करें, तो उस योग में उत्पन्न जातक भी भूमिपति (शासक/राजा) होता है। यहाँ गिनती चन्द्र-भिन्न ग्रहों की है; दृष्टि-शर्त और अंश-श्रेष्ठता दोनों साथ चाहिए। यह फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when the lagna is placed in an uttama-aṃśa and is aspected by four or more planets other than the Moon, the native too becomes a bhūmipati (earth-lord / ruler). Both the excellent aṃśa of the lagna and the multi-planet aspect (excluding the Moon) are required conditions of this rājayoga statement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संयोजन-शर्त (योग-गणना), न निरपेक्ष फल-सूत्र:
- उत्तमांश(लग्न) = true (लग्न का वर्गांश उत्तम श्रेणी में — परंपरा में प्रायः उच्च/स्व/मित्र नवांश आदि; पाठ-भेद संभव)
- N_dṛṣṭi = |{ g ∈ {Sūrya, Maṅgala, Budha, Guru, Śukra, Śani, (Rāhu/Ketu per convention)} : g दृष्ट लग्न, g ≠ Candra }|
- शर्त: उत्तमांश(लग्न) ∧ (N_dṛṣṭi ≥ 4) → शास्त्र-कथित भूमिपति-फल
दृष्टि-नियम (पूर्ण/विशेष दृष्टि) और उत्तमांश की सटीक परिभाषा संस्करण-सापेक्ष — घोषित करो; चन्द्र को गणना से बाहर रखना पद का अपना नियम है।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष 12° (D1), और नवांश-नियम से लग्न-अंश कर्क-नवांश में है जिसे इस पाठ-परंपरा में उत्तमांश माना गया (उदाहरण-केवल; उत्तमांश-परिभाषा घोषित करनी होगी)। दृष्टि: सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र — चार ग्रह लग्न पर पूर्ण दृष्टि देते हैं; चन्द्र दृष्टि नहीं गिनी जाती। N_dṛṣṭi = 4 ≥ 4 → शास्त्र की इस शर्त का योग लागू। (अयनांश/दृष्टि-परंपरा बदलें तो सदस्यों की सूची बदल सकती है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “उत्तमांश” वर्गांश-स्थान पर टिका है — षोडश-वर्ग (D1…D60) में प्रत्येक राशि 30° का नियत-खंडन है; नवांश (D9) समेत अंश-मान शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित से निकलते हैं। हमारा वर्ग-इंजन उसी नियत-खंडन को गणना करता है; यहाँ शास्त्र की शर्त “लग्न उत्तमांश में” को उस गणित से जाँचना संभव है, जबकि भूमिपति-फल को हम भविष्यवाणी नहीं, केवल पाठ-कथन मानते हैं।

39.44
त्र्यल्पैरुच्चस्थितैः खेटे राजा राजकुलोद्‌भवः।
अन्यवंशभवस्तत्र राजतुल्यो धनैर्युतः
tryalpairuccasthitaiḥ kheṭe rājā rājakulod‌bhavaḥ|
anyavaṃśabhavastatra rājatulyo dhanairyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्र्यल्पैः = तीन या अल्प (≤ 3); उच्चस्थितैः = उच्च-स्थित; खेटैः = ग्रहों से; राजा = राजा; राजकुलोद्भवः = राजकुल में उत्पन्न; अन्यवंशभवः = अन्य वंश में जन्मा; तत्र = उस (योग) में; राजतुल्यः = राजा-सदृश; धनैः युतः = धनों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब तीन या उससे कम ग्रह उच्च में हों, तो राजकुलोत्पन्न जातक राजा होता है; उसी स्थिति में अन्य वंश का जातक राजा-तुल्य और धन-संपन्न कहा गया है। संख्या की सीमा “त्र्यल्प” से बँधी है; अगले श्लोकों में चार–पाँच और छह का क्रम बढ़ता है। जन्म-कुल का भेद फल-भेद का भाग है — यह शास्त्र का अपना वर्गीकरण है, सामाजिक निर्णय नहीं।

English rendering The text states that with three or fewer planets in exaltation, one born of a royal lineage becomes a king, while one born of another lineage in the same planetary setup becomes king-equal and endowed with wealth. The count of exalted grahas is the technical hinge of the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उच्च-गणना नियम:
- उच्च-राशियाँ (मानक): Sūrya–Meṣa, Candra–Vṛṣabha, Maṅgala–Makara, Budha–Kanyā, Guru–Karkaṭa, Śukra–Mīna, Śani–Tulā (Rāhu/Ketu उच्च — पाठ-भेद संभव; बहुधा गणना से बाहर)
- N_ucca = |{ g : rāśi(g) = ucca(g) }| (D1 दीर्घांश से; अयनांश घोषित करें)
- शर्त: N_ucca ≤ 3
- यदि कुल = राजकुल → शास्त्र: राजा
- यदि कुल ≠ राजकुल → शास्त्र: राजतुल्य + धन-युक्त
यह फल-स्तर का भेद है, न कि उच्च-अंश का सूक्ष्म-डिग्री नियम (उच्च-दीप्ति/नीच-भंग यहाँ नहीं कहा गया)।

उदाहरण (worked example) अयनांश-सापेक्ष D1: सूर्य मेष, चन्द्र वृष, मंगल मकर — तीन उच्च; शेष ग्रह उच्च नहीं → N_ucca = 3 ≤ 3। शास्त्रानुसार: राजकुल-जातक → राजा-फल; अन्य वंश → राजतुल्य + धन-युक्त। यदि चौथा ग्रह भी उच्च हो तो यह श्लोक लागू नहीं, 39.45 की श्रेणी देखें।

39.45
चतुर्भिः पञ्चभिर्वाऽपि खेटैः स्वोच्चत्रिकोणगैः।
हीनवंशभवश्चापि राजा भवति निश्चितः
caturbhiḥ pañcabhirvā'pi kheṭaiḥ svoccatrikoṇagaiḥ|
hīnavaṃśabhavaścāpi rājā bhavati niścitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्भिः = चार से; पञ्चभिः = पाँच से; वा अपि = अथवा भी; खेटैः = ग्रहों से; स्वोच्चत्रिकोणगैः = अपने उच्च या त्रिकोण (मूलत्रिकोण/स्व-त्रिकोण स्थान) में गए हुए; हीनवंशभवः = हीन/सामान्य वंश में जन्मा; चापि = भी; राजा भवति = राजा होता है; निश्चितः = शास्त्र-कथित निश्चय-पद (पाठ का बल, न कि हमारा दावा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चार या पाँच ग्रह जब अपने उच्च या त्रिकोण-स्थान में हों, तो हीन वंश में जन्मा जातक भी राजा होता है — पद “निश्चितः” पाठ का अपना दृढ़-कथन है। यहाँ केवल उच्च नहीं, “स्वोच्च-त्रिकोण” दोनों मार्ग गिने जाते हैं। पिछली त्र्यल्प-शर्त से फल का विस्तार: कुल-हीनता भी इस गणना के आगे गौण कही गई।

English rendering The text states that with four or even five planets placed in their exaltation or trikoṇa (mūlatrikoṇa / own triadic dignity as the recension intends), even one born of a humble lineage becomes a king. The word niścitaḥ is the śāstra’s own assertiveness marker, not an external guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- स्वोच्च(g) = rāśi(g) = ucca(g)
- त्रिकोण(g) = rāśi(g) ∈ trikoṇa-set(g) (मूलत्रिकोण-राशि; “स्व-त्रिकोण” पाठानुसार — पाठ-भेद संभव)
- N_* = |{ g : स्वोच्च(g) ∨ त्रिकोण(g) }|
- शर्त: N_* ∈ {4, 5} → शास्त्र: हीनवंशभवोऽपि राजा
उच्च और मूलत्रिकोण एक साथ एक ग्रह पर दोहरी गणना नहीं — एक ग्रह एक बार गिना जाता है (∪ समुच्चय)।

उदाहरण (worked example) चार ग्रह: गुरु कर्क (उच्च), शुक्र मीन (उच्च), सूर्य सिंह (मूलत्रिकोण), शनि कुंभ (मूलत्रिकोण); पाँचवाँ/छठा उच्च-त्रिकोण नहीं → N_* = 4। शास्त्र की इस श्रेणी में हीनवंश-जातक भी राजा-फल से जोड़ा गया। (राशि-मान D1; अयनांश घोषित।)

39.46
षड्‌भिरुच्चगतैः खेटैश्चक्रवर्तित्वमाप्नुयात्‌।
एवं बहुविधा राजयोगा ज्ञेया द्विजोत्तम
ṣaḍ‌bhiruccagataiḥ kheṭaiścakravartitvamāpnuyāt‌|
evaṃ bahuvidhā rājayogā jñeyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षड्भिः = छह से; उच्चगतैः = उच्च को प्राप्त; खेटैः = ग्रहों से; चक्रवर्तित्वम् = चक्रवर्ती-भाव / सम्राट-पद; आप्नुयात् = प्राप्त करे; एवम् = इस प्रकार; बहुविधाः = अनेक प्रकार के; राजयोगाः = राजयोग; ज्ञेयाः = जानने योग्य; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — छह ग्रह उच्चगत हों तो चक्रवर्तित्व की प्राप्ति कही गई है। फिर गुरु-शिष्य संवाद की शैली में जोड़ा गया: हे द्विजोत्तम, इस रीति से अनेकविध राजयोग जानने चाहिए। यह अध्याय-क्रम का चरम-गिनती पद है (त्र्यल्प → चतुः/पञ्च → षट्); “एवं बहुविधा” से पाठ आगे के/अन्य योग-भेदों की ओर संकेत करता है।

English rendering The text states that with six planets in exaltation one attains cakravartitva (emperor-hood). It then addresses the pupil: O best of the twice-born, rājayogas of many kinds are thus to be understood. The verse closes the ascending count and opens the door to further varieties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- N_ucca = |{ g ∈ {7 classical grahas} : rāśi(g) = ucca(g) }|
- शर्त: N_ucca = 6 → शास्त्र: चक्रवर्तित्व
सात क्लासिकल ग्रहों में से छह उच्च — व्यवहार में लगभग “लगभग-सर्व उच्च” विन्यास; राहु/केतु को उच्च-गणना में लेना/न लेना पाठ-भेद संभव। Σ-श्रेणी स्मृति: ≤3 (39.44), {4,5} उच्च/त्रिकोण (39.45), 6 उच्च (39.46)।

उदाहरण (worked example) छह उच्च: सूर्य मेष, चन्द्र वृष, मंगल मकर, बुध कन्या, गुरु कर्क, शुक्र मीन; शनि उच्च नहीं (N_ucca = 6)। शास्त्र: चक्रवर्तित्व-फल। यदि केवल पाँच उच्च हों तो 39.45 (यदि त्रिकोण से पूरक) या निम्न श्रेणी लागू — इस पद की षट्-शर्त नहीं।

39.47
एको गुरुर्भृगुर्वापि बुधो वा स्वोच्चसंस्थितः।
शुभग्रहयुते केन्द्रे राजा वा तत्समो भवेत्‌
eko gururbhṛgurvāpi budho vā svoccasaṃsthitaḥ|
śubhagrahayute kendre rājā vā tatsamo bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः = एक; गुरुः = बृहस्पति; भृगुः = शुक्र; वा अपि = अथवा; बुधः = बुध; वा = या; स्वोच्चसंस्थितः = अपने उच्च में स्थित; शुभग्रहयुते = शुभ ग्रह से युक्त; केन्द्रे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) में; राजा = राजा; वा = अथवा; तत्समः = उसके समान; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु, शुक्र या बुध में से कोई एक स्वोच्च में हो, और केन्द्र शुभ-ग्रह से युक्त हो, तो जातक राजा या राजा-सदृश होता है। यहाँ “बहु-उच्च” नहीं, एक शुभ-उच्च + केन्द्र-शुभ योग पर्याप्त कहा गया। तीनों में “एको…वा…वा” विकल्प है — तीनों एक साथ अनिवार्य नहीं।

English rendering The text states that if even one among Jupiter, Venus, or Mercury stands in its exaltation, and a kendra is joined by a benefic, the native becomes a king or the equal of one. A single exalted saumya plus kendra-benefic conjunction is the structural core.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- केन्द्र = {1, 4, 7, 10} भाव (लग्न-से; भाव-पद्धति घोषित: समान-भाव/श्रीपति आदि)
- शर्त A: ∃ g ∈ {Guru, Śukra, Budha} : rāśi(g) = ucca(g)
- ucca: Guru–Karkaṭa, Śukra–Mīna, Budha–Kanyā
- शर्त B: ∃ k ∈ केन्द्र : k पर कम से कम एक शुभ (Guru/Śukra/Budha; चन्द्र-शुभता — पाठ-भेद संभव) युति में
- A ∧ B → शास्त्र: राजा ∨ तत्सम
“युते केन्द्रे” = केन्द्र-स्थित शुभ-युति; केवल दृष्टि नहीं — पद युति कहता है।

उदाहरण (worked example) गुरु कर्क (उच्च) → शर्त A। लग्न-कुण्डली में चतुर्थ भाव में शुक्र स्थित → केन्द्र शुभ-युक्त → शर्त B। शास्त्र: राजा या तत्सम। यदि गुरु उच्च हो पर कोई भी केन्द्र शुभ-युति-रहित हो, तो इस श्लोक की पूरी शर्त पूरी नहीं होती।

39.48
केन्द्रेस्थितैः शुभैः सर्वैः पापैश्च त्रिषडायगैः।
हीनवंशोऽपि यो जातः स राजा भवति ध्रुवम्‌
kendresthitaiḥ śubhaiḥ sarvaiḥ pāpaiśca triṣaḍāyagaiḥ|
hīnavaṃśo'pi yo jātaḥ sa rājā bhavati dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रेस्थितैः = केन्द्रों में स्थित; शुभैः सर्वैः = सभी शुभों से; पापैः = पाप ग्रहों से; च = और; त्रिषडायगैः = त्रि-षड्-आय (3, 6, 11 भाव) में गए हुए; हीनवंशः = हीन वंश; अपि = भी; यः जातः = जो जन्मा; सः राजा भवति = वह राजा होता है; ध्रुवम् = ध्रुव/अटल — पाठ का निश्चय-पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सभी शुभ ग्रह केन्द्रों में हों और पाप ग्रह तृतीय, षष्ठ तथा एकादश (त्रिषडाय) में हों, तो हीन वंश में जन्मा जातक भी राजा होता है — “ध्रुवम्” पाठ का अपना दृढ़ शब्द है। यह स्थान-विन्यास योग है: शुभ → केन्द्र; पाप → 3/6/11; कुल-हीनता फिर भी फल-बाधक नहीं कही गई। भय या उपचार का दबाव यहाँ नहीं जोड़ना — केवल शास्त्र-कथन का स्पष्ट पाठ।

English rendering The text states that when all benefics occupy the kendras and the malefics occupy the third, sixth, and eleventh houses (tri-ṣaḍ-āya), even one born of a humble lineage becomes a king — dhruvam being the śāstra’s own certainty-word. The yoga is a pure house-placement pattern.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-संयोजन (लग्न-से गिनती; भाव-पद्धति घोषित करें):
- शुभ-समुच्चय S = {Guru, Śukra, Budha} (± Candra per convention; पाठ-भेद संभव)
- पाप-समुच्चय P = {Sūrya, Maṅgala, Śani} (± Rāhu/Ketu; पाठ-भेद संभव)
- केन्द्र K = {1, 4, 7, 10}; त्रिषडाय T = {3, 6, 11}
- शर्त: (∀ s ∈ S: bhāva(s) ∈ K) ∧ (∀ p ∈ P: bhāva(p) ∈ T)
- → शास्त्र: हीनवंशोऽपि राजा (ध्रुवम् = पाठ-बल)
“सर्वैः शुभैः” = शुभ-समुच्चय का पूर्ण केन्द्र-निवेश; एक शुभ केन्द्र-बाहर हो तो शर्त टूटती है। 2/5/8/9/12 पर पाप/शुभ का शेष — पद मौन; केवल कथित भाव-बाध्यता लागू करें।

उदाहरण (worked example) समान-भाव, लग्न = कन्या। शुभ: बुध भाव 1, गुरु भाव 4, शुक्र भाव 10 — सभी केन्द्र। पाप: सूर्य भाव 3, मंगल भाव 6, शनि भाव 11 — सभी त्रिषडाय। शर्त पूरी → शास्त्र: हीनवंश-जातक भी राजा-फल से जोड़ा गया। यदि शनि भाव 8 में हो तो पाप-त्रिषडाय शर्त भंग; यह श्लोक लागू नहीं।

अध्यायः 40

राजसम्बन्धयोगाध्यायः

15 श्लोक
40.1
राज्यनाथे जनुर्लग्नादमात्येशयुतेक्षिते।
अमात्यकारकेणापि प्रधानत्वं नृपालये
rājyanāthe janurlagnādamātyeśayutekṣite|
amātyakārakeṇāpi pradhānatvaṃ nṛpālaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यनाथ = दशम भाव (राज्य/कर्म) का स्वामी; जनुर्लग्नात् = जन्मलग्न से गिनकर; अमात्येश = अमात्य (मन्त्री-स्थान, प्रायः दशम/कर्म) का स्वामी; युत-ईक्षिते = युक्त एवं दृष्ट होने पर; अमात्यकारकेण = अमात्यकारक (जैमिनि चर-कारक — देशान्तर-क्रम में द्वितीय ग्रह) से; प्रधानत्व = अग्रगण्यता, उच्च पद; नृपालये = राजदरबार में।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, जब जन्मलग्न से गिना हुआ दशमेश (राज्यनाथ) अमात्येश से युक्त तथा दृष्ट हो, और साथ ही अमात्यकारक का भी सम्बन्ध हो, तब जातक राजदरबार में प्रधानता — अर्थात् मन्त्री-सदृश उच्च पद — प्राप्त करता है। यहाँ पाराशरी भाव-पद्धति (राज्येश/अमात्येश) और जैमिनि कारक-पद्धति (अमात्यकारक) दोनों एक ही फल की ओर संकेत करती हैं।

English rendering When the 10th lord, reckoned from the birth ascendant, is joined and aspected by the amātyeśa, and the amātya-kāraka also lends its bond, the native attains pre-eminence — high office — in the royal court.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अमात्यकारक स्थिति-गणित से निकलता है: सात (या राहु सहित आठ) ग्रहों को उनके राशि-भीतर के भोगांश (देशान्तर mod 30°) से घटते क्रम में क्रमबद्ध करो — सर्वोच्च = आत्मकारक (AK), द्वितीय = अमात्यकारक (AmK)। यह देशान्तर पर विशुद्ध क्रम-संक्रिया (ordinal on longitude) है, कोई अंकगणित नहीं; राहु के लिए भोगांश उल्टा (30° − x) गिना जाता है। "अमात्येश" के भावार्थ में मतभेद है — पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) मान लें राशि-भीतर भोगांश — शनि 29°, मंगल 25°, शुक्र 21°, सूर्य 17°, बुध 12°, गुरु 8°, चन्द्र 3° (7-कारक योजना)। घटते क्रम में शनि सर्वोच्च ⇒ AK; मंगल द्वितीय ⇒ अमात्यकारक। यही मंगल दशमेश-सम्बन्ध में हो तो योग बनता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) जैसे दोसियर में BPHS बनाम फलदीपिका के अष्टकवर्ग-भेद को "मौन चयन नहीं, घोषित परिपाटी" के रूप में साथ-साथ रखा गया, वैसे ही यहाँ कारक-योजना (7-कारक पाराशरी बनाम 8-कारक राहु-सहित) को पहले घोषित करना अनिवार्य है, क्योंकि AmK की पहचान इसी परिपाटी पर निर्भर है। यह "declare conventions whenever a number depends on them" वाली उसी अनुशासन-रेखा का पालन है।

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40.2
लाभेशवीक्षिते लाभे पापदृग्योगवर्जिते।
राज्यभावे तदा विप्र प्रधानत्वं नृपालये
lābheśavīkṣite lābhe pāpadṛgyogavarjite|
rājyabhāve tadā vipra pradhānatvaṃ nṛpālaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेश = एकादशेश (लाभ-भाव का स्वामी); वीक्षित = दृष्ट; लाभ = एकादश भाव; पापदृग् = पाप-ग्रह की दृष्टि; योगवर्जित = अशुभ-योग से रहित; राज्यभाव = दशम भाव; विप्र = सम्बोधन (द्विज); प्रधानत्वं नृपालये = राज-भवन में प्रधानता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे विप्र! जब लाभ-भाव अपने स्वामी (लाभेश) से दृष्ट हो, पाप-दृष्टि और पाप-योग से मुक्त हो, और यह स्थिति राज्य-भाव (दशम) के सन्दर्भ में फलदायी हो, तब नृपालय में प्रधानत्व कहा गया है। यहाँ एकादश की शुभ-दृष्टि और दशम की राज्य-भूमिका एक साथ बँधी हैं। फल शास्त्र का कथन है, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states, O Vipra, that when the eleventh house is aspected by its own lord, free from malefic aspect and malefic yoga, and this configuration bears on the tenth (rājya) house, primacy in the royal court is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-योग (लाभेश-दृष्टि + पाप-मुक्ति + राज्यभाव)। संरचना: लग्न से 11 = लाभ, 10 = राज्य; “पापदृग्योगवर्जित” = पाप-ग्रह (पाठानुसार सूर्य/मंगल/शनि आदि) की दृष्टि/युति-योग का अभाव — गणना में दृष्टि-कोण व युति-राशि की जाँच।

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40.3
अमात्यकारकेणापि कारकेन्द्रेण संयुते।
तीव्रबुद्धियुतो बालो राजमन्त्री भवेद्‌ ध्रुवम्‌
amātyakārakeṇāpi kārakendreṇa saṃyute|
tīvrabuddhiyuto bālo rājamantrī bhaved‌ dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अमात्यकारक = चर-कारक “अमात्य”; कारकेन्द्रेण = कारक (आत्मकारक) केन्द्र-स्थित / कारक से केन्द्र-सम्बद्ध (पाठ-भेद संभव); संयुते = युक्त; तीव्रबुद्धि = तीव्र प्रज्ञा; बाल = जातक; राजमन्त्री = राज-मन्त्रि-पद; ध्रुवम् = शास्त्र-वचन में “निश्चय” (शैली, न कि आधुनिक नियति-दावा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अमात्यकारक जब कारकेन्द्र (आत्मकारक से केन्द्र-सम्बन्ध/केन्द्रस्थ कारक से युति — पाठानुसार) से संयुक्त हो, तब बालक तीव्रबुद्धि से युक्त राजमन्त्री होता है — “ध्रुवम्” शास्त्र की निश्चय-शैली है। यह अमात्यकारक–आत्मकारक-केन्द्र योग का फल-कथन है। हम इसे नियति नहीं मानते; केवल पाठ का प्रतिवेदन करते हैं।

English rendering The text states that when the Amātya-kāraka is also conjoined with the kāraka in a kendra (or joined under the kāraka-kendra relation), the native becomes a sharp-witted royal minister — the word dhruvam is the śāstra’s emphatic phrasing, not a modern fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-योग (अमात्यकारक + कारकेन्द्र युति)। तकनीक: चर-कारक क्रम = सात (या पाठानुसार आठ) ग्रहों के राशि-अंश (0°–30°) को अवरोही क्रम; उच्चतम = आत्मकारक, द्वितीय = अमात्यकारक। केन्द्र = लग्न/चतुर्थ/सप्तम/दशम (1, 4, 7, 10) — “कारकेन्द्र” में आधार-बिन्दु लग्न या आत्मकारक: पाठ-भेद संभव; स्पष्ट घोषणा आवश्यक।

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40.4
अमात्यकारके विप्र सबले शुभसंयुते।
स्वक्षेत्रेस्वोच्चगे वापि राजमन्त्री भवेद्‌ ध्रुवम्‌
amātyakārake vipra sabale śubhasaṃyute|
svakṣetresvoccage vāpi rājamantrī bhaved‌ dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अमात्यकारके = अमात्यकारक में/का; विप्र = सम्बोधन; सबल = बल-युक्त; शुभसंयुते = शुभ-ग्रह से युक्त; स्वक्षेत्रे = स्वराशि में; स्वोच्चगे = स्वोच्च राशि में; वा अपि = अथवा; राजमन्त्री भवेद् ध्रुवम् = शास्त्र कहता है — राजमन्त्री (ध्रुव-शैली)।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र! शास्त्र कहता है — अमात्यकारक जब सबल हो, शुभ-ग्रहों से युक्त हो, अथवा स्वक्षेत्र या स्वोच्च में स्थित हो, तब जातक राजमन्त्री होता है। यहाँ तीन शर्तें हैं: बल, शुभ-युति, और उच्च/स्वक्षेत्र-स्थिति। “ध्रुवम्” पाठ की निश्चय-भाषा है; फल को भय या दबाव में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states, O Vipra, that when the Amātya-kāraka is strong, conjoined with benefics, or placed in its own sign or exaltation, the native becomes a royal minister (dhruvam as śāstric emphasis).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-योग + बल-मापदण्ड। “सबल” का कम्प्यूटेशनल माप षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) — योग: Σ bᵢ रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप); प्रति-ग्रह सीमा से तुलना। स्वक्षेत्र/उच्च = राशि-स्वामित्व व उच्च-राशि तालिका (निश्चित ग्रह–राशि युग्म)। शुभ = गुरु, शुक्र, (बलाबलानुसार) चन्द्र/बुध — युति = समान राशि।

उदाहरण (worked example) मान लें अमात्यकारक = गुरु, वृषभ में (न स्वक्षेत्र न उच्च)। यदि गुरु-षड्बल योग = 7.2 रूप (> गुरु-सीमा, परम्परागत ~6.5 रूप — पद्धति घोषित करें) और शुक्र से युति: शास्त्रीय “सबल + शुभसंयुक्त” पक्ष लागू; यदि गुरु धनु/मीन (स्व) या कर्क (उच्च) हो तो स्वक्षेत्र/उच्च पक्ष स्वतः सत्य। अयनांश: कोई भी स्थिर अयनांश (उदा. लाहिरी) — केवल चर-कारक अंश-क्रम के लिए; भाव-गणित यहाँ गौण।

हमारा डिकोड (Our Decode) “सबल” को हमने षड्बल के छह घटकों के योग के रूप में कम्प्यूटेशनल बनाया — रूप/विरूप में सटीक योग, व्याख्या से अलग। अमात्यकारक की पहचान चर-कारक इंजन से अंश-क्रम `==` पर टिकती है; फल-वाक्य को हम भविष्यवाणी नहीं, शास्त्र-कथन मानते हैं।

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40.5
अमात्यकारके लग्ने पञ्चमे नवमेऽपि वा।
राजमन्त्री भवेद्‌ बालो विख्यातो नाऽत्रसंशयः
amātyakārake lagne pañcame navame'pi vā|
rājamantrī bhaved‌ bālo vikhyāto nā'trasaṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अमात्यकारके = अमात्यकारक; लग्ने = लग्न (प्रथम) में; पञ्चमे = पञ्चम में; नवमे अपि वा = अथवा नवम में; राजमन्त्री भवेद् बालः = जातक राजमन्त्री होता है; विख्यातः = प्रसिद्ध; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ जब अमात्यकारक लग्न, पञ्चम अथवा नवम में स्थित हो, तब जातक प्रसिद्ध राजमन्त्री बनता है — इसमें संशय नहीं (शास्त्र-वचन)। लग्न, पञ्चम, नवम — तीनों त्रिकोण-स्थान हैं, धर्म एवं भाग्य के आधार।

English rendering When the amātya-kāraka occupies the 1st, the 5th, or the 9th, the native becomes a renowned royal minister — of this there is no doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिकोण (कोण) गणना: सन्दर्भ-राशि से कोण = {1, 5, 9} — भाव-चक्र पर 120° के त्रिभुज (स्थान n ⇒ कोण यदि (n−1) mod 4 = 0 वाले 1, तथा 5, 9)। ये धर्म-त्रिकोण कहलाते हैं। "न अत्र संशयः" शास्त्र का बल-कथन है।

उदाहरण (worked example) वृषभ लग्न ⇒ कोण = वृषभ (1), कन्या (5), मकर (9)। अमात्यकारक इन तीन में से किसी में हो तो शर्त पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) "विख्यातो नात्र संशयः" जैसे निश्चयवाचक वचन ही वह स्थल हैं जहाँ अनुशासन आवश्यक है: दोसियर की रेखा के अनुसार फल-कथन को "शास्त्र यह कहता है" रूप में प्रस्तुत करो, नियति या हमारे द्वारा समर्थित निश्चय के रूप में कभी नहीं। संख्या (कोण = 1/5/9) निश्चित है; फल शास्त्र का दावा है — दोनों को अलग रखना ही "separate mathematics from interpretation" का पालन है।

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40.6
आत्मकारकतः केन्द्रे कोणे वाऽमात्यकारके।
तदा राजकृपायुक्तो जातो राजाश्रितः सुखी
ātmakārakataḥ kendre koṇe vā'mātyakārake|
tadā rājakṛpāyukto jāto rājāśritaḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मकारकतः = आत्मकारक से; केन्द्रे = केन्द्र में (1/4/7/10); कोणे = त्रिकोण में (1/5/9; यहाँ 5/9 सापेक्ष); वा = अथवा; अमात्यकारके = अमात्यकारक (स्थित); राजकृपा = राज-अनुग्रह; युक्तः = संयुक्त; जातः = जातक; राजाश्रितः = राजा के आश्रित; सुखी = सुख-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आत्मकारक से केन्द्र या कोण में अमात्यकारक हो, तब जातक राजकृपा-युक्त, राजाश्रित और सुखी होता है। यह आत्म–अमात्य की सापेक्ष भाव-स्थिति का योग है: मन्त्रि-कारक जब आत्म-कारक के बल-स्थानों में हो। फल “राजाश्रय-सुख” का शास्त्र-कथन है; हम इसे भय या लालच से नहीं जोड़ते।

English rendering The text states that when the Amātya-kāraka lies in a kendra or a trikoṇa from the Ātma-kāraka, the native is endowed with royal favor, sheltered by the king, and happy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सापेक्ष-भाव गणना (फल-योग की तकनीक)। आत्मकारक-राशि = R_AK, अमात्यकारक-राशि = R_Am; सापेक्ष भाव
d = ((R_Am − R_AK) mod 12) + 1
केन्द्र: d ∈ {1, 4, 7, 10}; कोण: d ∈ {1, 5, 9} (1 दोनों में)। शर्त: d ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10}।

उदाहरण (worked example) R_AK = सिंह (5), R_Am = वृश्चिक (8): d = ((8−5) mod 12)+1 = 4 → केन्द्र (चतुर्थ)। शर्त पूर्ण — शास्त्रीय “राजकृपा/राजाश्रित” फल-कथन लागू। यदि R_Am = तुला (7): d = 3 → केन्द्र/कोण नहीं।

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40.7
कारकाच्च तथारूढात्‌ लग्नाच्च द्विजसत्तम।
तृतीये षष्ठभे पापैः सेनाधीशः प्रजायते
kārakācca tathārūḍhāt‌ lagnācca dvijasattama|
tṛtīye ṣaṣṭhabhe pāpaiḥ senādhīśaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकात् = (आत्म)कारक से; तथा = उसी प्रकार; अरूढात् = आरूढ (आरूढ-लग्न) से; लग्नात् = लग्न से; द्विजसत्तम = द्विज-श्रेष्ठ (सम्बोधन); तृतीये = तृतीय भाव में; षष्ठभे = षष्ठ राशि/भाव में; पापैः = पाप-ग्रहों से; सेनाधीशः = सेना का अधिपति; प्रजायते = उत्पन्न होता है / होता है।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजसत्तम! शास्त्र कहता है — कारक (आत्मकारक) से, तथा आरूढ से, और लग्न से भी, तृतीय अथवा षष्ठ भाव में पाप-ग्रह हों, तब जातक सेनाधीश होता है। तीनों आधार-बिन्दुओं (कारक, आरूढ, लग्न) से 3/6 में पाप — यह सैन्य-अधिकार का योग-कथन है। “पाप” यहाँ फल-योग का तकनीकी पद है; नैतिक निन्दा या भय-वाणी नहीं।

English rendering The text states, O best of the twice-born, that from the kāraka (Ātma-kāraka), likewise from the Ārūḍha, and from the lagna — when malefics occupy the third or the sixth — the native becomes a commander of the army.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बहु-बिन्दु सापेक्ष-भाव योग (फल-कथन की तकनीक)। आधार B ∈ {लग्न-राशि, आत्मकारक-राशि, आरूढ-लग्न-राशि}। प्रत्येक पाप-ग्रह P के लिए
d_B(P) = ((R_P − R_B) mod 12) + 1
शर्त (शास्त्र): किसी/कथित संयोजन में d_B ∈ {3, 6} पर पाप स्थित। आरूढ-लग्न (पदा): लग्नेश की राशि तक की गणना का मानक पद-सूत्र —
यदि n = लग्न से लग्नेश तक भाव-संख्या, तो आरूढ = लग्न से n भाव आगे (विशेष नियम: आरूढ = लग्न/सप्तम हो तो संशोधन — पाठ/परम्परा घोषित करें)। पाप = सूर्य, मंगल, शनि (राहु/केतु — पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; आत्मकारक = शनि (मकर); आरूढ = तुला (उदाहरणार्थ)। पाप: मंगल कर्क में। लग्न से: कर्क = 4 → नहीं। AK (मकर) से: कर्क = 7 → नहीं। आरूढ (तुला) से: कर्क = 10 → नहीं। यदि मंगल मिथुन: लग्न से 3 → तृतीय-पाप; शास्त्रीय “सेनाधीश” पक्ष लग्न-आधार पर लागू। तीनों आधारों का योग कितना अनिवार्य — संयोग/विकल्प में पाठ-भेद संभव।

40.8
कारके केन्द्रे कोणेषु स्वतुङ्गे वा स्वभे स्थिते।
भाग्यपेन युते दृष्टे राजमन्त्री भवेद्‌ ध्रुवम्‌
kārake kendre koṇeṣu svatuṅge vā svabhe sthite|
bhāgyapena yute dṛṣṭe rājamantrī bhaved‌ dhruvam‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारके = कारक (अमात्यकारक); केन्द्रे कोणेषु = केन्द्रों-कोणों में; स्वतुङ्गे वा = अथवा अपने उच्च में; स्वभे स्थिते = अपनी राशि में स्थित; भाग्यपेन = भाग्येश (नवमेश) से; युते दृष्टे = युक्त अथवा दृष्ट; राजमन्त्री भवेद् ध्रुवम् = निश्चय ही राजमन्त्री होता है।

हिन्दी भावार्थ जब कारक केन्द्र-कोण में, अथवा स्वोच्च या स्वराशि में स्थित हो, और भाग्येश (नवमेश) से युक्त या दृष्ट हो, तब जातक निश्चय ही राजमन्त्री बनता है। स्थान-बल (उच्च/स्वराशि) और भाग्येश का शुभ योग यहाँ पद को सुनिश्चित करता है।

English rendering When the kāraka stands in an angle or trine, or in its own exaltation or own sign, and is joined or aspected by the 9th lord, the native surely becomes a royal minister.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वतुङ्ग (स्वोच्च) एवं स्वभ (स्वराशि) स्थान-बल के दो घटक हैं — षड्बल (अ.27) में उच्च-बल तथा सप्तवर्गज-बल इन्हीं से पुष्ट होते हैं। केन्द्र {1,4,7,10}, कोण {1,5,9}। भाग्येश-सम्बन्ध = नवमेश की सप्तम पूर्ण दृष्टि या युति। "ध्रुवम्" — शास्त्र-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्वतुङ्गे वा स्वभे" पद-4 की भाँति सीधे स्थान-बल से जुड़ता है: हमारे षड्बल-ढाँचे में स्वोच्च/स्वराशि उच्च-बल एवं सप्तवर्गज-बल में मापनीय विरूप जोड़ते हैं। अतः इस श्लोक की गरिमा-शर्त को केवल "उच्च/स्वराशि" कहकर नहीं, बल्कि स्थान-बल घटक में गणना करके ही सत्यापित करना, दोसियर की "बल = गणना, व्याख्या नहीं" रेखा के अनुरूप है।

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40.9
कारके जन्मराशीशे लग्नगे शुभसंयुते।
मन्त्रित्वे मुख्ययोगोऽयं वार्धकेनाऽत्र संशयः
kārake janmarāśīśe lagnage śubhasaṃyute|
mantritve mukhyayogo'yaṃ vārdhakenā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारके = कारक; जन्मराशीशे = जन्मराशि (चन्द्रराशि) के स्वामी के साथ; लग्नगे = लग्न में स्थित; शुभसंयुते = शुभग्रहों से युक्त; मन्त्रित्वे = मन्त्री-पद के लिए; मुख्ययोगः अयम् = यह प्रमुख योग है; वार्धकेन = वृद्धावस्था में (पाठ-भेद संभव); अत्र संशयः = यहाँ संशय।

हिन्दी भावार्थ जब कारक, जन्मराशीश के साथ लग्न में स्थित हो और शुभग्रहों से युक्त हो, तो यह मन्त्री-पद का प्रमुख योग है; इसका फल परवर्ती आयु (वार्धक) में मिलता है। अन्तिम पाद विवादित है — "वार्धकेन अत्र संशयः" (वृद्धावस्था के विषय में संशय) अथवा "वार्धके न अत्र संशयः" (वृद्धावस्था में निःसंशय) — पाठ-भेद संभव।

English rendering When the kāraka joins the lord of the birth-sign and stands in the ascendant, aspected by benefics, this is a foremost yoga for ministership — its fruit arriving in later life (the final reading is uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-कथन; अन्तिम पाद पाठ-भेद संभव। तकनीकी बिन्दु मात्र यह कि जन्मराशीश = चन्द्र-राशि का स्वामी (लग्नेश नहीं); कारक + जन्मराशीश की लग्न-युति फल का केन्द्र है। समय-कथन (वार्धक) को नियति नहीं, शास्त्र-वचन मानें।

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40.10
कारके शुभसंयुक्ते पञ्चमे सप्तमेऽपि वा।
दशमे नवमे वाऽपि धनं राजाश्रयाद्‌ भवेत्‌
kārake śubhasaṃyukte pañcame saptame'pi vā|
daśame navame vā'pi dhanaṃ rājāśrayād‌ bhavet‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारके = कारक; शुभसंयुक्ते = शुभ से युक्त; पञ्चमे = पंचम भाव में; सप्तमे = सप्तम भाव में; दशमे = दशम भाव में; नवमे = नवम भाव में; अपि वा = अथवा भी; धनं = धन / सम्पत्ति; राजाश्रयाद् = राज-आश्रय से; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कारक शुभ से युक्त होकर पंचम या सप्तम में हो, अथवा दशम या नवम में भी हो, तब राजाश्रय से धन प्राप्त होता है। चार भाव — 5, 7, 10, 9 — यहाँ फल-स्थल कहे गए हैं; शुभ-युति शर्त है। यह फल-कथन राज-प्रायोजन / आश्रय-लाभ का संकेत देता है, गणना का नहीं।

English rendering The text states that when the kāraka, conjoined with a benefic, occupies the fifth or the seventh — or likewise the tenth or the ninth — wealth arises from royal patronage (rājāśraya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राजाश्रय-धन का फल-कथन। शर्त-समुच्चय: कारक + शुभ-युति ∧ भाव ∈ {5, 7, 10, 9}; राशि-अंश या बल-मान नहीं दिया।

40.11
भाग्यभावपदे लग्ने कारके नवमेऽपि वा।
राजसम्बन्धयोगोऽयं निर्विशंकं द्विजोत्तम
bhāgyabhāvapade lagne kārake navame'pi vā|
rājasambandhayogo'yaṃ nirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यभावपदे = भाग्य-भाव (नवम) का आरूढ़ / भाव-पद; लग्ने = लग्न में; कारके = कारक; नवमे = नवम भाव में; अपि वा = अथवा भी; राजसम्बन्धयोगः = राज-सम्बन्ध योग; निर्विशंकं = बिना शंका के; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब भाग्य-भाव का पद लग्न में हो, अथवा कारक स्वयं नवम में हो, तब यह राजसम्बन्ध-योग निर्विवाद रूप से बनता है। यहाँ “पद” भाव-आरूढ़ (ārūḍha) की ओर संकेत करता है — केवल भाव-स्वामी नहीं, भाव से गिना गया पद। द्विजोत्तम-सम्बोधन संवाद-शैली का है; फल-दावा शास्त्र का अपना है।

English rendering The text states, O best of the twice-born, that when the pada of the ninth house falls in the lagna, or when the kāraka occupies the ninth, this is the yoga of royal connection (rāja-sambandha) without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-पद (आरूढ़) की गणना — शुद्ध घर-गणना।
मानक नियम (D1, पूर्ण-भाव / whole-sign पद्धति जब भाव = राशि):
मानो H = भाग्य-भाव = 9, L = 9वें का स्वामी जिस भाव-संख्या में हो।
पग = (L − H) mod 12 (0…11; 0 = उसी भाव में)।
आरूढ़ P = H + पग (mod 12, भाव 1…12 में)।
विशेष नियम (बहुत परम्पराओं में): यदि P = H या P = H+6 (सप्तम), तो P को उससे 10वाँ भाव लें — P′ = P + 9 (mod 12)।
इस श्लोक की शर्त: P (या P′) = लग्न (भाव 1), अथवा कारक ∈ भाव 9।
(पाठ-भेद / पद-नियम-भेद संभव — कुछ ग्रन्थ 1/7-अपवाद नहीं लगाते।)

उदाहरण (worked example)
लग्न = मेष (भाव 1)। भाग्य-भाव = 9 = धनु; भाग्येश = गुरु। गुरु कर्क (भाव 4) में हो।
पग = (4 − 9) mod 12 = (−5) mod 12 = 7।
P = 9 + 7 = 16 → 16 − 12 = 4 (कर्क) — पद लग्न में नहीं।
यदि गुरु तुला (भाव 7) में: पग = (7 − 9) mod 12 = 10; P = 9 + 10 = 19 → 7 (तुला)।
P, H से सप्तम (9+6=15→3 नहीं; यहाँ H=9, H+6=3; P=7 ≠ 9 और ≠ 3) — अपवाद नहीं। पद ≠ लग्न।
यदि गुरु मीन (भाव 12) में: पग = (12 − 9) = 3; P = 9 + 3 = 12।
यदि गुरु मिथुन (भाव 3) में: पग = (3 − 9) mod 12 = 6; P = 9 + 6 = 15 → 3, और 3 = H+6 (सप्तम-अपवाद) → P′ = 3 + 9 = 12 — फिर भी लग्न नहीं।
लग्न-पद हेतु उदाहरण: गुरु वृश्चिक (भाव 8) में — पग = (8 − 9) mod 12 = 11; P = 9 + 11 = 20 → 8।
गुरु सिंह (भाव 5) में — पग = (5 − 9) mod 12 = 8; P = 9 + 8 = 17 → 5।
गुरु मेष (लग्न, भाव 1) में — पग = (1 − 9) mod 12 = 4; P = 9 + 4 = 13 → 1 = लग्न।
अतः भाग्येश लग्नस्थ होने पर भाग्य-पद लग्न पर पड़ता है → श्लोक की पहली शाखा पूरी। दूसरी शाखा: कारक नवमस्थ — पद-गणना की आवश्यकता नहीं।
(सम्प्रदाय: पूर्ण-भाव गणना; अयनांश इस घर-गणना में नहीं घुसता — केवल ग्रह-राशि निर्धारण में।)

40.12
लाभेशे लाभभावस्थे पापदृष्टिविवर्जिते।
कारके शुभसंयुक्ते लाभस्तस्य नृपालयात्‌
lābheśe lābhabhāvasthe pāpadṛṣṭivivarjite|
kārake śubhasaṃyukte lābhastasya nṛpālayāt‌

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशे = लाभ-भाव (एकादश) का स्वामी; लाभभावस्थे = लाभ-भाव में स्थित; पापदृष्टिविवर्जिते = पाप-दृष्टि से रहित; कारके = कारक; शुभसंयुक्ते = शुभ से युक्त; लाभः = लाभ / प्राप्ति; तस्य = उसका; नृपालयात् = नृप-आलय / राज-भवन से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभेश स्वयं लाभ-भाव में हो और पाप-दृष्टि से मुक्त हो, तथा कारक शुभ से युक्त हो, तब उस जातक को राज-भवन से लाभ मिलता है। यहाँ “स्वक्षेत्रस्थ लाभेश” और “पाप-दृष्टि का अभाव” दोनों शर्तें हैं; कारक की शुभ-युति तीसरी कड़ी है। फल “नृपालय” से जुड़ा है — सामान्य व्यापार-लाभ नहीं, राज-स्रोत का लाभ।

English rendering The text states that when the lord of the eleventh occupies the eleventh, free from malefic aspect, and the kāraka is conjoined with a benefic, his gain comes from the royal court (nṛpālaya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राज-आलय-लाभ का फल-कथन। संरचना: लाभेश ∈ भाव 11 ∧ पाप-दृष्टि ∉ लाभेश ∧ (कारक + शुभ-युति)। दृष्टि-नियम (पूर्ण/विशेष दृष्टि) इस श्लोक में विस्तारित नहीं — केवल “पापदृष्टिविवर्जित” शर्त।

40.13
लग्नेशे राज्यभावस्थे राज्येशे लग्नसंस्थिते।
प्रबलो राजसम्बन्धयोगोऽयं परिकीर्तितः
lagneśe rājyabhāvasthe rājyeśe lagnasaṃsthite|
prabalo rājasambandhayogo'yaṃ parikīrtitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्नेश (प्रथमेश); राज्यभावस्थे = दशम (राज्य) भाव में स्थित; राज्येशे = दशमेश; लग्नसंस्थिते = लग्न में स्थित; प्रबलः = अत्यन्त बलवान्; राजसम्बन्धयोगः अयम् = यह राजसम्बन्ध-योग; परिकीर्तितः = घोषित/कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ जब लग्नेश दशम भाव में और दशमेश लग्न में स्थित हो — अर्थात् लग्न और दशम के स्वामियों में परस्पर राशि-परिवर्तन हो — तब यह अत्यन्त प्रबल राजसम्बन्ध-योग कहा गया है। तनु और कर्म का यह विनिमय जातक को राजपुरुष से घनिष्ठ बाँधता है।

English rendering When the 1st lord is placed in the 10th and the 10th lord in the 1st — a mutual exchange between ascendant and career-house — this is proclaimed a most powerful yoga of royal connection.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — परिवर्तन-योग (राशि-विनिमय): दो भावेश परस्पर की राशियों में। यहाँ सम्बन्ध सममित है — L1 का स्वामी भाव-10 में तथा L10 का स्वामी भाव-1 में (1↔10 विनिमय)। "प्रबल" तुलनात्मक बल-कथन है; "परिकीर्तितः" (कहा गया है) स्पष्ट रूप से शास्त्र का अपना दावा-सूचक है।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न ⇒ लग्नेश मंगल, दशम = मकर, दशमेश शनि। यदि मंगल मकर (दशम) में और शनि मेष (लग्न) में हों ⇒ 1↔10 परिवर्तन-योग सिद्ध।

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय का समापन "परिकीर्तितः" (यह घोषित है) पर होना ही अनुशासन का पाठ है: दोसियर की रेखा के अनुसार फल-कथन को शास्त्र का दावा ("the text states") बताएँ, नियति नहीं। परिवर्तन-योग की संरचना (1↔10 विनिमय) निर्धारक एवं जाँचनीय है; "प्रबल" की मात्रा भी सिद्धान्ततः षड्बल/भाव-बल में मापी जा सकती है — गणना और व्याख्या को पृथक् रखना ही यहाँ की कुंजी है।

40.14
कारकात्‌ तुर्यंभावस्थौ सितेन्दू द्विजसत्तम।
यस्य जन्मनि जातोऽयं राजचिह्नेन संयुतः
kārakāt‌ turyaṃbhāvasthau sitendū dvijasattama|
yasya janmani jāto'yaṃ rājacihnena saṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकात् = कारक (significator) से गणना करके — प्रसंगवश यहाँ आत्मकारक/अमात्यकारक (संदर्भ-सापेक्ष; पाठ-भेद संभव); तुर्य-भाव = चतुर्थ भाव (turya = चौथा, 4th house); -स्थौ = दोनों उसमें स्थित (द्विवचन); सितेन्दू = सित (शुक्र, Venus) + इन्दु (चन्द्र, Moon), द्वन्द्व द्विवचन; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय को सम्बोधन); यस्य जन्मनि = जिसके जन्म में; जातः अयम् = यह जन्मा हुआ जातक; राजचिह्नेन संयुतः = राजकीय लक्षणों/चिह्नों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ! जिस जातक की जन्मकुण्डली में कारक से चतुर्थ भाव में शुक्र और चन्द्र — ये दोनों सौम्य ग्रह — एक साथ बैठे हों, शास्त्र कहता है कि वह जन्म से ही राजचिह्नों (राजकीय लक्षणों) से युक्त होता है। ध्यान दें कि यहाँ भाव-गणना लग्न से नहीं, अपितु कारक से की जाती है — यही इस अध्याय की जैमिनि-प्रधान शैली है।

English rendering O best of the twice-born — one in whose nativity Venus and the Moon both stand together in the fourth house reckoned from the kāraka is, the text says, born endowed with royal marks.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मूल तकनीक स्थान-गणना है — लग्न से नहीं, कारक से। समावेशी (inclusive) गणना में कारक की अपनी राशि = 1st, अतः चतुर्थ = +3 पद:
सूत्र — लक्ष्य राशि T = ((K − 1 + 3) mod 12) + 1, जहाँ K = कारक की राशि-संख्या (1…12)।
योग-शर्त: शुक्र ∈ T तथा चन्द्र ∈ T (दोनों एक ही राशि T में)। परिणाम "राजचिह्न" एक फल-कथन है — यह शास्त्र का दावा है, कोई नियति या भविष्यवाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें कारक मेष में है (K = 1)। तब T = ((1 − 1 + 3) mod 12) + 1 = 4 = कर्क (Cancer)। यदि शुक्र और चन्द्र दोनों कर्क में स्थित हों, तो योग बनता है; शास्त्र इस पर राजचिह्न-फल आरोपित करता है (सम्बन्ध: शुद्ध राशि-स्थिति; अयनांश/भावगणना का अन्तर यहाँ अप्रासंगिक क्योंकि गणना केवल राशि-स्तर पर है)।

हमारा डिकोड (Our Decode) कारक से "चतुर्थ" की गणना विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है — ठीक वही निर्धारक (deterministic) संगणना जिसे हमारी विधि फल से अलग रखती है: राशि-स्थिति को हम `==` की निश्चितता से गणते हैं, किन्तु "राजचिह्न" को केवल शास्त्र के अपने कथन के रूप में प्रस्तुत करते हैं, अपने द्वारा समर्थित नियति के रूप में कभी नहीं (गणित बनाम व्याख्या का पृथक्करण — dossier §5)।

40.15
लग्नेशे कारके वाऽपि पञ्चमेशेन संयुते।
केन्द्रे कोणे स्थिते तस्मिन्‌ राजमित्रं भवेन्नरः
lagneśe kārake vā'pi pañcameśena saṃyute|
kendre koṇe sthite tasmin‌ rājamitraṃ bhavennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न का स्वामी (lagneśa); कारके वा अपि = अथवा कारक (significator) भी; पञ्चमेशेन संयुते = पञ्चम भाव के स्वामी (5th lord) के साथ युति करने पर; केन्द्रे = केन्द्र भाव में (1/4/7/10, angles); कोणे = त्रिकोण भाव में (1/5/9, trines); स्थिते तस्मिन् = उसके वहाँ स्थित होने पर; राजमित्रं भवेत् नरः = वह मनुष्य राजा का मित्र (rāja-mitra) बनता है।

हिन्दी भावार्थ यदि लग्नेश अथवा कारक, पञ्चमेश के साथ युति करके किसी केन्द्र (1/4/7/10) या त्रिकोण (1/5/9) भाव में स्थित हो, तो शास्त्र कहता है कि वह जातक राजा का मित्र बनता है। यहाँ बल-स्थान (केन्द्र-त्रिकोण) और स्वामियों का संयोग — दोनों मिलकर राजसम्बन्ध की सूचना देते हैं।

English rendering When the lagna-lord, or else the kāraka, joins the fifth-lord and is placed in a kendra (angle) or a koṇa (trine), the person becomes, the text states, a friend of the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-वर्गीकरण, लग्न से समावेशी गणना में:
केन्द्र-समुच्चय K = {1, 4, 7, 10} (परस्पर 90° = 3 राशि अन्तर); त्रिकोण/कोण-समुच्चय T = {1, 5, 9} (परस्पर 120° = 4 राशि अन्तर)।
योग-शर्त: लग्नेश (या कारक) तथा पञ्चमेश एक ही राशि R में युत हों, और R ∈ K ∪ T। परिणाम "राजमित्र" फल-कथन है — शास्त्र का दावा, समर्थित भविष्यवाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न → लग्नेश = मंगल (Mars)। मेष से 5वीं राशि = सिंह (Leo, +4), उसका स्वामी = सूर्य = पञ्चमेश। यदि मंगल और सूर्य मकर (10वें, केन्द्र) में युत हों — 10 ∈ K — तो योग बनता है; अथवा वे सिंह (5वें, त्रिकोण) में युत हों — 5 ∈ T — तब भी योग बनता है। शास्त्र इस पर राजमित्र-फल कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस श्लोक में प्रयुक्त कोण-त्रिक {1, 5, 9} वही त्रिकोण-समूहन है जो हमारे अष्टकवर्ग ऑरेकल में त्रिकोण-शोधन (BPHS Ch.67) को चलाता है — वह न्यूनीकरण जिसे हम फल से पूर्व सर्वाष्टकवर्ग (SAV = 337) पर लगाते हैं। केन्द्र/कोण नियत, निर्धारक भाव-समुच्चय हैं — विशुद्ध मॉड्युलर वर्गीकरण, जिसे हम बिना किसी टॉलरेन्स-बैंड के गणते हैं।

अध्यायः 41

विशेषधनयोगाऽध्यायः

34 श्लोक
41.1
अथाऽतः संप्रवक्ष्यामि धनयोगं विशेषतः |
यस्मिन् योगे समुत्पन्नो निश्चितो धनवान् भवेत्
athā'taḥ saṃpravakṣyāmi dhanayogaṃ viśeṣataḥ |
yasmin yoge samutpanno niścito dhanavān bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ-अतः = अब इससे आगे; संप्रवक्ष्यामि = विशेष रूप से कहूँगा; धनयोगम् = धन-सम्बन्धी योग; विशेषतः = विशेषकर; यस्मिन् योगे = जिस योग में; समुत्पन्नः = उत्पन्न/जन्मित; निश्चितः = शास्त्र-वचनानुसार निश्चित; धनवान् भवेत् = धनी होता है — शास्त्र का फल-कथन

हिन्दी भावार्थ आचार्य अब विशेष रूप से धनयोग का वर्णन आरम्भ करते हैं। शास्त्र कहता है कि जिस योग में जातक का जन्म होता है, वह निश्चित रूप से धनवान् बनता है। यह अध्याय उन ग्रह-भाव संयोजनों को क्रमशः खोलता है जिनमें पञ्चम और लाभ भाव की भूमिका केन्द्र में है। फल यहाँ शास्त्र का अपना दावा है — गणना का परिणाम नहीं, अपितु परम्परा का कथन।

English rendering “I shall now specially declare the wealth-yogas. The text states that one born under such a yoga becomes wealthy.” This verse opens the chapter’s programme of placement-conditions; it is a framing phala-claim, not a numerical algorithm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-सूत्र / फल-योग की भूमिका। आगे के श्लोक एक संरचनात्मक नियम देते हैं: पञ्चम भाव = किसी ग्रह का क्षेत्र + वही ग्रह वहाँ स्थित; लाभ (११वाँ) = निर्दिष्ट ग्रह(ों) से युक्त — यह भाव-स्वामित्व × संयोग की द्वि-शर्त तर्क-व्यवस्था है, अंक-सूत्र नहीं।

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41.2
पण्चमे भृगुजक्षेत्रे तस्मिन् शुक्रेण संयुते |
लाभे भौमेन संयुक्ते बहुद्रव्यस्य नायकः
paṇcame bhṛgujakṣetre tasmin śukreṇa saṃyute |
lābhe bhaumena saṃyukte bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमे = ५वें भाव में; भृगुज-क्षेत्रे = शुक्र का राशि-क्षेत्र (वृष/तुला); तस्मिन् = उस (५वें) में; शुक्रेण संयुते = शुक्र से युक्त; लाभे = ११वें (लाभ) भाव में; भौमेन संयुक्ते = मंगल से युक्त; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुत धन का स्वामी — शास्त्र-फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: जब पञ्चम भाव शुक्र का क्षेत्र हो और शुक्र स्वयं उसी भाव में हो, तथा लाभ भाव में मंगल स्थित हो, तो जातक बहुद्रव्य का नायक होता है। यहाँ पञ्चम = शुक्र-क्षेत्र + शुक्र-उपस्थिति, तथा लाभ = मंगल — यही योग-शर्त है। “बहुद्रव्यस्य नायकः” शास्त्र का फल-वचन है, किसी निश्चित आर्थिक भविष्यवाणी का दावा नहीं।

English rendering The text states: if the fifth house is a Venus-sign and Venus occupies it, and Mars occupies the eleventh (lābha), the native is master of great wealth. Two conditions: Venus in own sign in the fifth; Mars in the eleventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त (द्वि-भाग):
1. rāśi(5th) ∈ {Taurus, Libra} ∧ Venus ∈ 5th
2. Mars ∈ 11th
दोनों सत्य ⇒ शास्त्र इस धनयोग का फल कहता है। (भाव = लग्न-आधारित पूर्ण-राशि भाव; अयनांश केवल ग्रह-राशि निर्णय में। पाठ-भेद: “पण्चमे” / “पंचमे” — अर्थ एक।)

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (पूर्ण-राशि भाव); शुक्र = ८° वृष = ५वाँ (वृष = शुक्र-क्षेत्र) ✓; मंगल = १२° कुम्भ = ११वाँ ✓। शर्त-युग्म पूर्ण → शास्त्र इस विन्यास को धनयोग कहता है। (अयनांश: कोई भी स्थिर परम्परा; निर्णय राशि-स्तर पर।)

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41.3
पंचमे तु बुधक्षेत्रे तस्मिन् बुधयुतो सति |
चन्द्रे भौमे गुरौ लाभे बहुद्रव्यस्य नायकः
paṃcame tu budhakṣetre tasmin budhayuto sati |
candre bhaume gurau lābhe bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचमे = ५वें में; बुध-क्षेत्रे = बुध का क्षेत्र (मिथुन/कन्या); तस्मिन् बुध-युतः = वहाँ बुध युक्त; सति = होने पर; चन्द्रे भौमे गुरौ = चन्द्र, मंगल, गुरु; लाभे = ११वें में; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुधन का स्वामी — शास्त्र-फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: पञ्चम भाव बुध-क्षेत्र हो और बुध वहाँ हो, तथा लाभ भाव में चन्द्र, मंगल और गुरु स्थित हों, तो जातक बहुद्रव्य का नायक होता है। यहाँ पञ्चम-शर्त सरल (बुध स्वक्षेत्रे), किन्तु लाभ-शर्त त्रि-ग्रह है — चन्द्र + मंगल + गुरु एक साथ ११वें में। फल-वचन शास्त्र का है; गणना केवल भाव-ग्रह मानचित्र की सत्यता जाँचती है।

English rendering The text states: when the fifth is a Mercury-sign occupied by Mercury, and the Moon, Mars and Jupiter occupy the eleventh, the native is master of great wealth. Fifth: Mercury in own; eleventh: the Moon–Mars–Jupiter trio.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त:
1. rāśi(5th) ∈ {Gemini, Virgo} ∧ Mercury ∈ 5th
2. Moon ∈ 11th ∧ Mars ∈ 11th ∧ Jupiter ∈ 11th
(त्रि-ग्रह लाभ-संयोग; “आढ्य” नहीं — तीनों का संयोग।)

उदाहरण (worked example) लग्न = कुम्भ; ५वाँ = मिथुन (बुध-क्षेत्र); बुध = २०° मिथुन ✓; ११वाँ = धनु; चन्द्र ५° धनु, मंगल १८° धनु, गुरु २५° धनु ✓। तीनों लाभ में → शास्त्र-कथित योग-शर्त पूर्ण।

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41.4
पण्चमे च रविक्षेत्रे तस्मिन् रवियुते सति |
लाभे शनीन्दुजीवाढ्ये बहुद्रव्यस्य नायकः
paṇcame ca ravikṣetre tasmin raviyute sati |
lābhe śanīndujīvāḍhye bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमे = ५वें में; रवि-क्षेत्रे = सूर्य का क्षेत्र (सिंह); तस्मिन् रवि-युते = वहाँ सूर्य युक्त; सति = होने पर; लाभे = ११वें में; शनि-इन्दु-जीव-आढ्ये = शनि, चन्द्र, गुरु से युक्त/भरा; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुधन का स्वामी — शास्त्र-फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: जब पञ्चम सूर्य-क्षेत्र (सिंह) हो और सूर्य वहाँ हो, तथा लाभ भाव शनि, चन्द्र और गुरु से आढ्य (युक्त) हो, तो जातक बहुद्रव्य का नायक होता है। सूर्य का एकमात्र क्षेत्र सिंह है — अतः ५वाँ = सिंह + सूर्य वहाँ। लाभ में तीन ग्रह: शनि–चन्द्र–गुरु। यह फल-योग का कथन है, न कि कोई बलांक-सूत्र।

English rendering The text states: if the fifth is the Sun’s sign (Leo) and the Sun occupies it, and the eleventh is filled with Saturn, the Moon and Jupiter, the native is master of great wealth. Sun in Leo in the fifth; Saturn–Moon–Jupiter in the eleventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त:
1. rāśi(5th) = Leo ∧ Sun ∈ 5th
2. Saturn ∈ 11th ∧ Moon ∈ 11th ∧ Jupiter ∈ 11th
(रवि-क्षेत्र एकमात्र: सिंह; “आढ्ये” = तीनों से युक्त।)

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; ५वाँ = सिंह; सूर्य = १५° सिंह ✓; ११वाँ = कुम्भ; शनि ८° कुम्भ, चन्द्र १४° कुम्भ, गुरु २२° कुम्भ ✓। शर्तें पूर्ण → शास्त्र इस विन्यास को धनयोग कहता है।

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41.5
पंचमे तु शनिक्षेत्रे तस्मिन् शनियुते सति |
लाभे रवीन्दुसंयुक्ते बहुद्रव्यस्य नायकः
paṃcame tu śanikṣetre tasmin śaniyute sati |
lābhe ravīndusaṃyukte bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचमे = ५वें में; शनि-क्षेत्रे = शनि का क्षेत्र (मकर/कुम्भ); तस्मिन् शनि-युते = वहाँ शनि युक्त; सति = होने पर; लाभे = ११वें में; रवि-इन्दु-संयुक्ते = सूर्य और चन्द्र से युक्त; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुधन का स्वामी — शास्त्र-फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: पञ्चम शनि-क्षेत्र हो और शनि वहाँ हो, तथा लाभ में सूर्य और चन्द्र संयुक्त हों, तो जातक बहुद्रव्य का नायक होता है। पञ्चम-शर्त: मकर या कुम्भ में शनि; लाभ-शर्त: सूर्य–चन्द्र युति (दोनों ११वें में)। सूर्य–चन्द्र की निकटता अमावस्या-सदृश विन्यास हो सकती है — शास्त्र केवल भाव-संयोग कहता है, काल-फल नहीं।

English rendering The text states: when the fifth is a Saturn-sign occupied by Saturn, and the Sun and Moon join in the eleventh, the native is master of great wealth. Saturn in own in the fifth; Sun–Moon conjunction in the eleventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त:
1. rāśi(5th) ∈ {Capricorn, Aquarius} ∧ Saturn ∈ 5th
2. Sun ∈ 11th ∧ Moon ∈ 11th
(संयोग = दोनों एक ही भाव; कोण-सीमा श्लोक नहीं देता — भाव-स्तर पर्याप्त।)

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या; ५वाँ = मकर; शनि = १०° मकर ✓; ११वाँ = कर्क; सूर्य १२° कर्क, चन्द्र १८° कर्क ✓। दोनों शर्तें सत्य → शास्त्र-कथित धनयोग।

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41.6
पंचमे तु गुरुक्षेत्रे तस्मिन् गुरुयुते सति |
लाभे चन्द्रसुते जातो बहुद्रव्यस्य नायकः
paṃcame tu gurukṣetre tasmin guruyute sati |
lābhe candrasute jāto bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचमे = ५वें में; गुरु-क्षेत्रे = गुरु का क्षेत्र (धनु/मीन); तस्मिन् गुरु-युते = वहाँ गुरु युक्त; सति = होने पर; लाभे = ११वें में; चन्द्र-सुते = बुध (चन्द्र-पुत्र); जातः = जन्मा; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुधन का स्वामी — शास्त्र-फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: पञ्चम गुरु-क्षेत्र हो और गुरु वहाँ हो, तथा लाभ में बुध (चन्द्रसुत) हो, तो जातक बहुद्रव्य का नायक होता है। यहाँ लाभ-शर्त एक-ग्रह है — केवल बुध ११वें में; पञ्चम-शर्त गुरु स्वक्षेत्रे। अध्याय की श्रृंखला में यह सरलतम लाभ-संयोगों में से एक है।

English rendering The text states: when the fifth is a Jupiter-sign occupied by Jupiter, and Mercury (son of the Moon) is in the eleventh, one born thus is master of great wealth. Jupiter in own in the fifth; Mercury alone named for the eleventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त:
1. rāśi(5th) ∈ {Sagittarius, Pisces} ∧ Jupiter ∈ 5th
2. Mercury ∈ 11th

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह; ५वाँ = धनु; गुरु = ७° धनु ✓; ११वाँ = मिथुन; बुध = २४° मिथुन ✓। शर्त-युग्म पूर्ण → शास्त्र इस विन्यास को धनयोग कहता है।

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41.7
पंचमे तु कुजक्षेत्रे तस्मिन् कुजयुते सति |
लाभस्थे भृगुपुत्रे तु बहुद्रव्यस्य नायकः
paṃcame tu kujakṣetre tasmin kujayute sati |
lābhasthe bhṛguputre tu bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचमे = ५वें में; कुज-क्षेत्रे = मंगल का क्षेत्र (मेष/वृश्चिक); तस्मिन् कुज-युते = वहाँ मंगल युक्त; सति = होने पर; लाभ-स्थे = ११वें में स्थित; भृगु-पुत्रे = शुक्र (भृगु-पुत्र); तु = तो/ही; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुधन का स्वामी — शास्त्र-फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: पञ्चम मंगल-क्षेत्र हो और मंगल वहाँ हो, तथा लाभ में शुक्र (भृगुपुत्र) स्थित हो, तो जातक बहुद्रव्य का नायक होता है। यह अध्याय का अन्तिम ग्रह-क्षेत्र क्रम है: पञ्चम = कुज स्वक्षेत्रे, लाभ = शुक्र — ४१.२ का विलोम-सा युग्म (वहाँ शुक्र ५वें, मंगल ११वें; यहाँ मंगल ५वें, शुक्र ११वें)। फल-वचन एक ही: बहुद्रव्यस्य नायकः — शास्त्र का कथन, न कि हमारा पूर्वानुमान।

English rendering The text states: when the fifth is a Mars-sign occupied by Mars, and Venus (son of Bhṛgu) stands in the eleventh, the native is master of great wealth. Mars in own in the fifth; Venus in the eleventh — the structural reverse of the Venus–Mars pair in 41.2.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त:
1. rāśi(5th) ∈ {Aries, Scorpio} ∧ Mars ∈ 5th
2. Venus ∈ 11th

अध्याय ४१.२–४१.७ का सामान्य रूप (आधुनिक संकेत):
Planet P: (rāśi(5th) ∈ signs_of(P) ∧ P ∈ 5th) ∧ (named planet(s) ∈ 11th)
⇒ शास्त्र “बहुद्रव्यस्य नायकः” कहता है। कोई वर्ष-संख्या, बिन्दु-योग या बलांक नहीं — शुद्ध भाव-ग्रह तर्क।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क; ५वाँ = वृश्चिक; मंगल = १६° वृश्चिक ✓; ११वाँ = वृष; शुक्र = ९° वृष ✓। शर्तें पूर्ण → शास्त्र-कथित धनयोग। (पूर्ण-राशि भाव; अयनांश राशि-निर्णय के लिए स्थिर रखा जाए।)

41.8
पंचमे तु शशिक्षेत्रे तस्मिन् शशियुते सति |
शनौ लाभस्थिते जातो बहुद्रव्यस्य नायकः
paṃcame tu śaśikṣetre tasmin śaśiyute sati |
śanau lābhasthite jāto bahudravyasya nāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचमे = पंचम भाव; शशिक्षेत्रे = चन्द्र का क्षेत्र (कर्क राशि); तस्मिन् = उसमें (पंचमे); शशियुते = चन्द्र युक्त; शनौ = शनि; लाभस्थिते = एकादश (लाभ) भाव में स्थित; बहुद्रव्यस्य नायकः = बहुत धन-सम्पत्ति का अधिपति/नायक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पंचम भाव चन्द्र के क्षेत्र (कर्क) में हो और वहीं चन्द्र स्थित हो, तथा शनि लाभ-स्थान (एकादश) में हो, तब जातक बहुद्रव्य का नायक बनता है। यह फल-कथन पंचम–लाभ की स्थिति और चन्द्र–शनि के स्थान-सम्बन्ध पर टिका है। पाठ-भेद संभव; भाव-गणना में लग्न-आधारित घर-क्रम घोषित रहना चाहिए।

English rendering The text states: when the fifth house is in the Moon’s sign (Cancer), with the Moon placed therein, and Saturn occupies the eleventh (lābha), the native becomes a leader of abundant wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धन-नायक योग)। तकनीक केवल स्थान-नियम है: पंचम = चन्द्र-क्षेत्र (कर्क), तत्र चन्द्र; शनि = लाभ (एकादश)। कोई अंश-विभाजन, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

41.9
भानुक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् भानुयुते पुनः |
भौमेन गुरुणा युक्ते दृष्टे जातो युतो धनैः
bhānukṣetragate lagne tasmin bhānuyute punaḥ |
bhaumena guruṇā yukte dṛṣṭe jāto yuto dhanaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानुक्षेत्रगते लग्ने = सूर्य-क्षेत्र (सिंह) में स्थित लग्न; तस्मिन् भानुयुते = उसमें सूर्य युक्त; भौमेन गुरुणा = मंगल और गुरु से; युक्ते दृष्टे = युक्त अथवा दृष्ट; युतो धनैः = धन से संयुक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न भानु के क्षेत्र (सिंह) में हो और उसी में सूर्य स्थित हो, तथा वह मंगल और गुरु से युक्त या दृष्ट हो, तब जातक धन से युक्त होता है। यह लग्न–स्वामी-स्थित योग का फल-कथन है, जिसमें दो शुभ/सक्रिय ग्रहों का योग या दृष्टि जोड़ दी गई है। पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: when the ascendant falls in the Sun’s sign (Leo) with the Sun placed there, and is joined or aspected by Mars and Jupiter, the native is endowed with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न-स्वामी + द्वि-ग्रह योग/दृष्टि)। जाँच-बिन्दु: लग्न-राशि = सिंह; सूर्य तत्र; मंगल–गुरु योग या दृष्टि — शुद्ध स्थिति-तर्क, कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

41.10
चन्द्रक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् चन्द्रयुते सति |
बुधेन गुरुणा युक्ते दृष्टे जातो धनी भवेत्
candrakṣetragate lagne tasmin candrayute sati |
budhena guruṇā yukte dṛṣṭe jāto dhanī bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रक्षेत्रगते लग्ने = चन्द्र-क्षेत्र (कर्क) में लग्न; तस्मिन् चन्द्रयुते = उसमें चन्द्र युक्त; बुधेन गुरुणा = बुध और गुरु से; युक्ते दृष्टे = युक्त अथवा दृष्ट; धनी भवेत् = धनवान् होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न चन्द्र के क्षेत्र (कर्क) में हो और वहीं चन्द्र हो, तथा बुध और गुरु से युक्त या दृष्ट हो, तब जातक धनी होता है। सूर्य-लग्न वाले पूर्व-श्लोक की समान संरचना है; यहाँ स्वामी चन्द्र है और सहयोगी बुध–गुरु हैं। पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: when the ascendant is in the Moon’s sign (Cancer) with the Moon there, and is joined or aspected by Mercury and Jupiter, the native becomes wealthy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्क-लग्न + चन्द्र + बुध–गुरु)। संरचना: लग्न-स्वामी स्वक्षेत्रे + दो नामित ग्रह योग/दृष्टि — स्थिति-आधारित नियम, अंश-गणित नहीं।

41.11
भौमक्षेत्रे गते लग्ने तस्मिन् भौमेन संयुते |
सौम्यशुक्रार्कजैर्युक्ते दृष्टे श्रीमान्नरो भवेत्
bhaumakṣetre gate lagne tasmin bhaumena saṃyute |
saumyaśukrārkajairyukte dṛṣṭe śrīmānnaro bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौमक्षेत्रे गते लग्ने = भौम-क्षेत्र (मेष/वृश्चिक) में लग्न; तस्मिन् भौमेन संयुते = उसमें मंगल संयुक्त; सौम्यशुक्रार्कजैः = बुध, शुक्र और आर्कज (शनि) से; युक्ते दृष्टे = युक्त अथवा दृष्ट; श्रीमान् नरः = श्री-सम्पन्न पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न भौम के क्षेत्र (मेष या वृश्चिक) में हो और वहाँ मंगल स्थित हो, तथा बुध, शुक्र और शनि से युक्त या दृष्ट हो, तब जातक श्रीमान् होता है। यहाँ तीन सहयोगी ग्रह नामित हैं — सौम्य, शुक्र, आर्कज। पाठ-भेद संभव; “युक्त/दृष्ट” का संयुक्त पाठ दोनों सम्भावनाएँ खोलता है।

English rendering The text states: when the ascendant is in a sign of Mars (Aries or Scorpio) with Mars placed there, and is joined or aspected by Mercury, Venus, and Saturn (ārkaja), the native becomes a prosperous man.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-लग्न + त्रि-ग्रह सहयोग)। क्षेत्र-द्वय (मेष/वृश्चिक) घोषित रहना चाहिए; फल स्थिति-नियम पर है, कोई वर्ग-अंश या बल-राशि नहीं।

41.12
बुधक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् बुधयुते सति |
शनिजीवयुते दृष्टे जातो धनयुतो भवेत्
budhakṣetragate lagne tasmin budhayute sati |
śanijīvayute dṛṣṭe jāto dhanayuto bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधक्षेत्रगते लग्ने = बुध-क्षेत्र (मिथुन/कन्या) में लग्न; तस्मिन् बुधयुते = उसमें बुध युक्त; शनिजीवयुते = शनि और जीव (गुरु) से युक्त; दृष्टे = अथवा दृष्ट; धनयुतो भवेत् = धन से युक्त होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न बुध के क्षेत्र (मिथुन या कन्या) में हो और वहाँ बुध स्थित हो, तथा शनि और गुरु से युक्त या दृष्ट हो, तब जातक धन-युक्त होता है। स्वामी-स्थित लग्न के साथ शनि–जीव का जोड़ा इस श्लोक का विशिष्ट योग-चिह्न है। पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: when the ascendant falls in a sign of Mercury (Gemini or Virgo) with Mercury there, and is joined or aspected by Saturn and Jupiter (jīva), the native becomes endowed with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-लग्न + शनि–गुरु)। तकनीक: लग्न ∈ {मिथुन, कन्या}; बुध तत्र; शनि–जीव योग/दृष्टि — स्थान-जांच मात्र।

41.13
गुरुक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् गुरुयुते सति |
बुधभौमयुते दृष्टे जायते धनवान्नरः
gurukṣetragate lagne tasmin guruyute sati |
budhabhaumayute dṛṣṭe jāyate dhanavānnaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुक्षेत्रगते लग्ने = गुरु-क्षेत्र (धनु/मीन) में लग्न; तस्मिन् गुरुयुते = उसमें गुरु युक्त; बुधभौमयुते = बुध और भौम (मंगल) से युक्त; दृष्टे = अथवा दृष्ट; धनवान् नरः = धनवान् पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न गुरु के क्षेत्र (धनु या मीन) में हो और वहाँ गुरु स्थित हो, तथा बुध और मंगल से युक्त या दृष्ट हो, तब धनवान् नर जन्म लेता है। गुरु-स्वामी लग्न पर बुध–भौम का योग/दृष्टि इस फल का आधार है। पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: when the ascendant is in a sign of Jupiter (Sagittarius or Pisces) with Jupiter placed there, and is joined or aspected by Mercury and Mars, a wealthy man is born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-लग्न + बुध–मंगल)। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-विभाजन या बिन्दु-योग नहीं — केवल राशि–ग्रह स्थिति।

41.14
भृगुक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् भृगुयुते सति |
शनिसौम्ययुते दृष्टे यो जातः स धनी भवेत्
bhṛgukṣetragate lagne tasmin bhṛguyute sati |
śanisaumyayute dṛṣṭe yo jātaḥ sa dhanī bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भृगुक्षेत्रगते लग्ने = भृगु (शुक्र) के क्षेत्र (वृष/तुला) में लग्न; तस्मिन् भृगुयुते = उसमें शुक्र युक्त; शनिसौम्ययुते = शनि और सौम्य (बुध) से युक्त; दृष्टे = अथवा दृष्ट; यो जातः स धनी = जो जन्मा, वह धनी — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न भृगु के क्षेत्र (वृषभ या तुला) में हो और वहाँ शुक्र स्थित हो, तथा शनि और बुध से युक्त या दृष्ट हो, तब वह जातक धनी होता है। यह श्रृंखला का अन्तिम स्वामी-लग्न धन-योग है: सूर्य–चन्द्र–भौम–बुध–गुरु–शुक्र — प्रत्येक के क्षेत्र में स्वामी-स्थित लग्न और नामित सहयोगी ग्रह। पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: when the ascendant falls in a sign of Venus (Bhṛgu) — Taurus or Libra — with Venus there, and is joined or aspected by Saturn and Mercury (saumya), the one so born becomes wealthy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-लग्न + शनि–बुध)। श्रृंखला-नियम: लग्न-स्वामी स्वक्षेत्रे + दो नामित ग्रह योग/दृष्टि → धन-फल (शास्त्र का कथन, न कि नियति-घोषणा)।

41.15
शनिक्षेत्रगते लग्ने तस्मिन् शनियुते सति |
भौमेन गुरुणा युक्ते दृष्टे जातो धनैर्युतः
śanikṣetragate lagne tasmin śaniyute sati |
bhaumena guruṇā yukte dṛṣṭe jāto dhanairyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनिक्षेत्रगते = शनि-राशि में स्थित; लग्ने = उदित लग्न; तस्मिन् शनियुते = उसी में शनि-युक्त; भौमेन = मङ्गल से; गुरुणा = बृहस्पति से; युक्ते दृष्टे = युक्त वा दृष्ट; जातो धनैर्युतः = जातक धन-सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब लग्न शनि के क्षेत्र में हो और उसी लग्न में शनि स्वयं स्थित हो, तथा मङ्गल और गुरु उस स्थिति को योग अथवा दृष्टि से स्पर्श करें, तो जातक धन से युक्त कहा गया है। यह फल-कथन योग-विशेष की शर्तों पर टिका है—लग्न का शनि-क्षेत्रत्व, शनि की उपस्थिति, और भौम-गुरु का योग/दृष्टि। पाठ-भेद संभव जहाँ “युक्ते दृष्टे” की व्याप्ति केवल युति तक सीमित मानी जाए या दृष्टि को भी सम्मिलित किया जाए।

English rendering The text states that when the lagna occupies a sign of Saturn, Saturn is present there, and Mars and Jupiter join or aspect that configuration, the native is said to be endowed with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-फल)। शर्तें स्थानिक हैं: लग्न ∈ {मकर, कुम्भ}; शनि lagna-rāśi में; मङ्गल/गुरु का योग (same-sign) अथवा दृष्टि (शास्त्रीय दृष्टि-नियम से)। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें—नियति-घोषणा नहीं।

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41.16
धनदौ धर्मधीनाथौ ये वा ताभ्यां युता ग्रहाः |
तेऽपि स्वस्वदशाकाले धनदा नाऽत्र संशयः
dhanadau dharmadhīnāthau ye vā tābhyāṃ yutā grahāḥ |
te'pi svasvadaśākāle dhanadā nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनदौ = धन-प्रदाता (द्विवचन); धर्मधीनाथौ = धर्म (९) और धी/बुद्धि (५) के अधीश; ताभ्यां युता ग्रहाः = उन दोनों से युक्त ग्रह; स्वस्वदशाकाले = अपनी-अपनी दशा में; धनदा = धनदाता; नाऽत्र संशयः = इसमें संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धनदा ग्रह—धर्मेश और धीनाथ (९वें और ५वें भाव के स्वामी)—तथा उनसे युक्त अन्य ग्रह भी अपनी-अपनी दशा-काल में धन देते हैं; इसमें संशय नहीं। यहाँ फल दशा-काल से बाँधा गया है, अर्थात् योग-स्थिति अकेली पर्याप्त नहीं, काल-प्रवाह (दशा) फल-अभिव्यक्ति का द्वार है। “धर्मधीनाथौ” का सीधा पदच्छेद ९–५ अधीशों का है; अन्य संस्करणों में धन-भाव-स्वामियों का पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that the two wealth-givers—the lords of dharma (9th) and of intelligence (5th)—or planets joined with them, also bestow wealth in their respective daśā periods; of this there is no doubt herein.

गणित / تکنیک (The Mathematics / Technique): दशा-फल का काल-सूत्र (योग स्वयं संख्या नहीं गिनता)। विंशोत्तरी में: महान्दशा-वर्ष ग्रह-क्रम से (केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मङ्गल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; Σ = १२० वर्ष); अन्तरदशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। “स्वस्वदशाकाले” = जब वह ग्रह (धर्मेश/धीनाथ अथवा उनसे युक्त) अपनी महा/अन्तरदशा चलाए—फल-कथन दशा-द्वार पर।

उदाहरण (worked example) मान लें धर्मेश = गुरु, और विंशोत्तरी गुरु-महादशा १६ वर्ष। शुक्र-अन्तरदशा = (१६ × २०) ÷ १२० = ३२० ÷ १२० = २⅔ वर्ष ≈ २ वर्ष ८ मास। शास्त्र कहता है कि ऐसे धनदा ग्रह अपनी दशा में धनदा होते हैं—यह काल-खिड़की का निर्देश है, निश्चित आय-पूर्वानुमान नहीं। (नक्षत्र-शेष से आरम्भ-बिन्दु; अयनांश/जन्म-चन्द्र नक्षत्र पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक दशा को फल-द्वार बनाता है। विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७ … बुध १७, Σ = १२०) और अन्तरदशा-अनुपात (महा × अन्तर) ÷ १२० का शुद्ध अनुपातात्मक गणित दशा-इंजन में यथावत् बैठा है—श्लोक “स्वस्वदशाकाले” कहता है; इंजन वही काल-अंश गिनता है।

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41.17
ग्रहाणामुक्तयोगेषु क्रूरसौम्यविभागतः |
बलाबलविवेकेन फलमूह्यं विचक्षणैः
grahāṇāmuktayogeṣu krūrasaumyavibhāgataḥ |
balābalavivekena phalamūhyaṃ vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहाणामुक्तयोगेषु = कथित ग्रह-योगों में; क्रूरसौम्यविभागतः = क्रूर/सौम्य भेद से; बलाबलविवेकेन = बल-अबल के विवेक से; फलमूह्यं = फल अनुमान-योग्य; विचक्षणैः = विचक्षणों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि पूर्वोक्त योगों का फल क्रूर-सौम्य विभाग और बल-अबल के विवेक से विचक्षण ज्योतिषी अनुमान करें। अर्थात् योग-नाम मात्र पर्याप्त नहीं—ग्रह की प्रकृति (क्रूर/सौम्य) और उसकी सापेक्ष शक्ति फल की दिशा व तीव्रता तय करने का मापदण्ड है। यह विधि-श्लोक है: फल को यन्त्रवत् “एक ही” न पढ़कर बलाबल-विवेक से तौलने का आदेश।

English rendering In the planetary yogas already stated, the wise are to infer results by distinguishing cruel from gentle planets and by discriminating strength from weakness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय एक-पंक्ति सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (बल-विवेक से फल-अनुमान)। षड्बल-ढाँचे में बल = स्थान + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग्, योग रूप/विरूप में (१ रूप = ६० विरूप); प्रति-ग्रह देहली से तुलना। क्रूर/सौम्य विभाग शास्त्रीय ग्रह-वर्गीकरण से; बलाबल = संख्यात्मक बल-योग का सापेक्ष पठन। फल फिर भी “ऊह्य”—अनुमान-योग्य, नियत-भाग्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलाबलविवेकेन” सीधा षड्बल-अनुशासन से जुड़ता है—स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् का योग रूप/विरूप में, प्रति-ग्रह देहली से तुलना। गणित को फल से अलग रखने और `==` सटीकता की अनुशासन-पंक्ति यहीं बैठती है: बल गिना जाता है; फल “शास्त्र कहता है / ऊह्यं” रहता है।

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41.18
केन्द्रेशः पारिजातस्थस्तदा दाता भवेन्नरः |
उत्तमे ह्युत्तमो दाता गोपुरे पुरुषत्वयुक्
kendreśaḥ pārijātasthastadā dātā bhavennaraḥ |
uttame hyuttamo dātā gopure puruṣatvayuk

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रेशः = केन्द्र-भाव (१/४/७/१०) का स्वामी; पारिजातस्थः = पारिजात-अवस्था/अंश में स्थित; दाता भवेन्नरः = नर दाता होता है; उत्तमे = उत्तमांश में; उत्तमो दाता = श्रेष्ठ दाता; गोपुरे = गोपुरांश में; पुरुषत्वयुक् = पुरुषत्व-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केन्द्रेश यदि पारिजात में स्थित हो तो नर दाता होता है; उत्तम में उत्तम दाता; गोपुर में पुरुषत्व से युक्त। यहाँ फल बहु-वर्ग गौरव की सीढ़ी (पारिजात → उत्तम → गोपुर …) से बाँधा गया है—ग्रह जितने अधिक वर्गों में स्व/उच्चादि मर्यादा पाता है, उतनी ऊँची अवस्था-नाम। दान/पुरुषत्व फल-कथन हैं, दबाव-उपदेश नहीं।

English rendering The text states that when a kendra-lord stands in pārijāta, the man becomes a giver; in uttama, a supreme giver; in gopura, endowed with puruṣatva (manly stature/valor).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-अवस्था की क्रम-सीढ़ी (गणना: ग्रह कितने वर्गों में स्वक्षेत्र/मूलत्रिकोण/उच्च)। षड्वर्ग/अधिक वर्ग-क्रम में प्रचलित नाम-सीढ़ी: २ → पारिजात, ३ → उत्तम, ४ → गोपुर, ५ → सिंहासन, ६ → पारावत, … (उच्चतर: देवलोक, ब्रह्मलोक, ऐरावत)। प्रत्येक Dn = ३०° राशि का सम-खंडन + नियत मानचित्र-नियम (मापांक-अंकगणित)। केन्द्रेश = स्वामी of {१,४,७,१०}। फल = अवस्था-नाम पर शास्त्र-कथन।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष, केन्द्रेश (लग्नेश) मङ्गल। षोडशवर्ग में मङ्गल स्व/उच्च में ठीक २ वर्गों में बैठे → पारिजातांश। शास्त्र: केन्द्रेश पारिजातस्थ → “दाता”। यदि ३ वर्गों में → उत्तम → “उत्तम दाता”। (अयनांश और वर्ग-नियम घोषित रखने पर Dn-मान अपरिवर्तनीय; परम्परा-भेद पर पाठ-भेद संभव।)

हमारा डिकोड (Our Decode) पारिजात/उत्तम/गोपुर बहु-वर्ग गौरव की नाम-सीढ़ी हैं; षोडशवर्ग (D1…D60) का खंडन शुद्ध मापांक-अंकगणित है—varga-इंजन प्रत्येक Dn को ३०° के सम-चापों में बाँटता है। श्लोक फल-नाम देता है; इंजन वर्ग-स्थान गिनता है—दोनों अलग रखे जाते हैं।

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41.19
सिंहासने भवेन्मान्यः शूरः पारावतांशके |
सभाध्यक्षो देवलोके ब्रह्मलोके मुनिर्मत |
ऐरावतांशके तृष्टो दिग्योगो नैव जायते
siṃhāsane bhavenmānyaḥ śūraḥ pārāvatāṃśake |
sabhādhyakṣo devaloke brahmaloke munirmata |
airāvatāṃśake tṛṣṭo digyogo naiva jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहासने = सिंहासनांश में; मान्यः = मान्य/आदृत; शूरः पारावतांशके = पारावतांश में शूर; सभाध्यक्षो देवलोके = देवलोक में सभा-अध्यक्ष; ब्रह्मलोके मुनिर्मतः = ब्रह्मलोक में मुनि-मत; ऐरावतांशके = ऐरावतांश में; तृष्टो/तुष्टो = तुष्ट (पाठ-भेद संभव); दिग्योगो नैव जायते = दिग्योग उत्पन्न नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (केन्द्रेश की) सिंहासन-अवस्था में जातक मान्य होता है; पारावत में शूर; देवलोक में सभाध्यक्ष; ब्रह्मलोक में मुनि-सदृश माना जाता है; ऐरावतांश में तुष्ट रहता है और दिग्योग नहीं जन्मता। यह पूर्व-श्लोक की अवस्था-सीढ़ी का ऊर्ध्व-विस्तार है—ऊँचे बहु-वर्ग गौरव पर फल-नाम बदलते हैं। “तृष्टो” हेतु तुष्ट-पाठ संभावित; “दिग्योग” की सटीक पारिभाषिक व्याप्ति में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in siṃhāsana one is honored; in pārāvata, a hero; in devaloka, a president of assemblies; in brahmaloka, reckoned a sage; in airāvata, contented, and dig-yoga does not arise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय नूतन सूत्र नहीं — वर्ग-अवस्था-सीढ़ी का फल-विस्तार। क्रम (अधिक वर्ग-गौरव पर): सिंहासन (प्रायः ५) → पारावत (६) → देवलोक → ब्रह्मलोक → ऐरावत। गिनती = “कितने Dn में स्व/उच्चादि” का पूर्णांक; फल = नाम-बद्ध शास्त्र-कथन। दिग्योग-निषेध ऐरावत-पंक्ति का शास्त्र-वाक्य है—दिक्बल-सूत्र से स्वतः मिश्रित न करें जब तक संस्करण स्पष्ट न हो।

उदाहरण (worked example) केन्द्रेश ५ वर्गों में स्व/उच्च → सिंहासन → शास्त्र: “मान्यः”। ६ में → पारावत → “शूरः”। गिनती `==` पूर्णांक पर; सहिष्णुता-बैंड नहीं—एक वर्ग कम/अधिक नाम ही बदल देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ऊँची अवस्था-नाम षोडशवर्ग-गौरव की गिनती पर टिके हैं; इंजन Dn-स्थान निश्चित करता है, फल-नाम श्लोक का रहता है। exact-`==` अनुशासन यहाँ भी: वर्ग-गणना में ±१ सहिष्णुता अवस्था-नाम ही पलट दे—इसलिए बैंड नहीं, पूर्ण मिलान।

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41.20
पारिजाते सुताधीशे विद्या चैव कुलोचिता |
उत्तमे चोत्तमा ज्ञेया गोपुरे भुवनांकिता
pārijāte sutādhīśe vidyā caiva kulocitā |
uttame cottamā jñeyā gopure bhuvanāṃkitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारिजाते = पारिजात में; सुताधीशे = सुत/पञ्चमेश में; विद्या कुलोचिता = कुल-योग्य विद्या; उत्तमे = उत्तम में; उत्तमा ज्ञेया = उत्तम विद्या ज्ञेय; गोपुरे = गोपुर में; भुवनांकिता = भुवन-अङ्कित (लोक-प्रख्यात)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सुताधीश (५वें भाव का स्वामी) पारिजात में हो तो विद्या कुल के अनुरूप होती है; उत्तम में उत्तम विद्या जानी जाए; गोपुर में विद्या भुवन-अङ्कित—अर्थात् लोक-व्याप्त प्रसिद्धि से चिह्नित—कही गई है। यहाँ ५वें भाव (धी/सुत/विद्या-क्षेत्र) के स्वामी की वर्ग-अवस्था से विद्या-फल बाँधा गया है। कुल-योग्यता से लोक-प्रख्याति तक की सीढ़ी अवस्था-नामों के साथ चढ़ती है।

English rendering The text states that when the lord of children (5th) is in pārijāta, learning is fit to the lineage; in uttama it is to be known as excellent; in gopura it is marked as world-renowned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-अवस्था × भाव-स्वामी (५)। सुताधीश = स्वामी of bhāva 5; अवस्था = बहु-वर्ग गौरव-गिनती (२ = पारिजात, ३ = उत्तम, ४ = गोपुर)। Dn-खंडन: प्रत्येक वर्ग ३०°/n चाप; मानचित्र-नियम स्थिर। फल-त्रयी (कुलोचिता / उत्तमा / भुवनांकिता) अवस्था-सूचकांक का शास्त्र-मानचित्र है—शैक्षिक/वृत्ति पूर्वानुमान नहीं।

उदाहरण (worked example) पञ्चमेश बुध; षोडशवर्ग में बुध स्व/उच्च में २ Dn → पारिजात → शास्त्र: “विद्या कुलोचिता”। ३ Dn → उत्तम → “उत्तमा”। ४ Dn → गोपुर → “भुवनांकिता”। अयनांश एक ही श्रृंखला में स्थिर रखें; वर्ग-नियम बदलते ही Dn-स्वामित्व बदल सकता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) सुताधीश की पारिजात/उत्तम/गोपुर-स्थिति षोडशवर्ग-इंजन की Dn-गिनती से तय होती है—D1, D2(होरा), D3, D9(नवांश) … D60 तक का सम-खंडन मापांक-अंकगणित है। श्लोक विद्या-फल कहता है; हम केवल वर्ग-स्थान सत्यापित करते हैं।

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41.21
सिंहासने तथा वाच्या साचिव्येन समन्विता |
पारावते च विज्ञेया ब्रह्मविद्या द्विजोत्तम
siṃhāsane tathā vācyā sācivyena samanvitā |
pārāvate ca vijñeyā brahmavidyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहासने = सिंहासन में; तथा वाच्या = उसी प्रकार वाच्य; साचिव्येन समन्विता = सचिव-पद/मन्त्रित्व से युक्त; पारावते = पारावत में; विज्ञेया = जानी जाए; ब्रह्मविद्या = ब्रह्म-विद्या; द्विजोत्तम = द्विज-श्रेष्ठ (संबोधन/पात्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सिंहासन में (सुत-संबंधी विद्या) सचिव-भाव से समन्वित कही जाए; पारावत में वह ब्रह्मविद्या के रूप में जानी जाए—हे द्विजोत्तम। यह ४१.२० की अवस्था-सीढ़ी का अगला पायदान है: गोपुर के बाद सिंहासन → साचिव्य-युक्त विद्या; पारावत → ब्रह्मविद्या। फल-नाम गौरव की ऊँचाई के साथ गहनता की ओर मुड़ते हैं—शास्त्र-कथन के रूप में, प्रमाण-पत्र की भाँति नहीं।

English rendering The text states that in siṃhāsana that learning is likewise to be spoken of as joined with ministership; in pārāvata it is to be known as brahma-vidyā, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय नूतन सूत्र नहीं — ४१.२० की वर्ग-अवस्था-सीढ़ी का ऊर्ध्व-फल (सिंहासन ≈ ५, पारावत ≈ ६ वर्ग-गौरव)। सुताधीश की Dn-गिनती अपरिवर्तित नियम; फल-मानचित्र विस्तार: साचिव्य-समन्वित → ब्रह्मविद्या। “द्विजोत्तम” संबोधन-पद (शिष्य/पाठक); गणना-अचर नहीं।

उदाहरण (worked example) पञ्चमेश ५ वर्गों में स्व/उच्च → सिंहासन → शास्त्र: विद्या “साचिव्येन समन्विता”। ६ वर्गों में → पारावत → “ब्रह्मविद्या”। गिनती पूर्णांक `==`; एक वर्ग का अन्तर नाम-फल बदल देता है—सहिष्णुता-बैंड यहाँ भी अमान्य।

हमारा डिकोड (Our Decode) सिंहासन/पारावत बहु-वर्ग गौरव के अगले रैंक हैं; षोडशवर्ग-इंजन Dn-स्थान गिनता है, श्लोक फल-नाम देता है। गणित और फल-कथन की यह अलग-रख अनुशासन—स्रोत-पाठ + अभिकलनात्मक मॉडल—पूरी ४१.१८–२१ श्रृंखला का मूल डिकोड है।

41.22
सुतेशे देवलोकस्थे कर्मयोगश्च जायते |
उपासना ब्रह्मलोके भक्तिस्त्वरावतांशके
suteśe devalokasthe karmayogaśca jāyate |
upāsanā brahmaloke bhaktistvarāvatāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतेशे = पंचमेश (पुत्र/बुद्धि/मंत्र-भावेश); देवलोकस्थे = देवलोक-अवस्था/अंश में स्थित (बहु-वर्ग-बल की नामित स्थिति); कर्मयोगः = कर्म-योग; जायते = उत्पन्न होता है; उपासना = उपासना/आराधना; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोक-अवस्था में; भक्तिः = भक्ति; अरावतांशके = ऐरावतांश में (पाठ: अरावत/ऐरावत — पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पंचमेश देवलोक-स्थित हो, तब कर्मयोग का उदय बताया गया है। ब्रह्मलोक में स्थित होने पर उपासना का फल कहा गया है; और ऐरावतांश में भक्ति का फल कहा गया है। यह फल-कथन पंचमेश की विशेष अंश/लोक-अवस्था पर आश्रित है, न कि सामान्य राशि-मात्र पर।

English rendering The text states that when the fifth lord is placed in Devaloka, karma-yoga arises; in Brahmaloka, worship/upāsanā; and in the Airāvata aṃśa, devotion (bhakti). The phala is tied to those named multi-varga dignities of the fifth lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पंचमेश की देवलोक/ब्रह्मलोक/ऐरावतांश-अवस्था)। “देवलोक–ब्रह्मलोक–ऐरावत” यहाँ नामित वर्ग-बल/अंश-श्रेणियाँ हैं; उनकी गिनती षोडशवर्ग-आश्रित होती है, पर इस श्लोक में कोई संख्या-सूत्र नहीं दिया गया।

41.23
धर्मेशे पारिजातस्थे तीर्थकृत्त्वत्र जन्मनि |
पूर्वजन्मन्यपि ज्ञेयस्तीर्थकृच्चोत्तमांशके
dharmeśe pārijātasthe tīrthakṛttvatra janmani |
pūrvajanmanyapi jñeyastīrthakṛccottamāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मेशे = नवमेश (धर्म/भाग्य-भावेश); पारिजातस्थे = पारिजात-अवस्था में स्थित; तीर्थकृत् = तीर्थ-कर्ता/पुण्य-यात्री; अत्र जन्मनि = इस जन्म में; पूर्वजन्मनि = पूर्व जन्म में; अपि = भी; ज्ञेयः = जानना चाहिए; उत्तमांशके = उत्तमांश में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नवमेश के पारिजात-स्थित होने पर जातक इस जन्म में तीर्थकृत् कहा गया है। उत्तमांश में स्थित होने पर उसे पूर्वजन्म में भी तीर्थकृत् जानना चाहिए — यही पाठ का कथन है। धर्मेश की इन नामित अंश-अवस्थाओं से फल जुड़ा है।

English rendering The text states that with the ninth lord in Parijāta, one is a tīrtha-kṛt in this birth; and when that lord is in Uttamāṃśa, the same tīrtha-making quality is to be known also of the previous birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवमेश पारिजात/उत्तमांश)। पारिजात–उत्तम आदि बहु-वर्ग-बल की परंपरागत नाम-श्रेणियाँ हैं; इस पद में कोई भुज/भाग-गणना नहीं है।

41.24
गौपुरे मखकर्ता च परे चैवाऽत्र जन्मनि |
सिंहासने भवेद्वीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः
gaupure makhakartā ca pare caivā'tra janmani |
siṃhāsane bhavedvīraḥ satyavādī jitendriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गौपुरे = गोपुर-अवस्था में (पाठ: गौपुरे = गोपुरे — पाठ-भेद संभव); मखकर्ता = यज्ञ-कर्ता; च परे = और परजन्म में भी; अत्र जन्मनि = इस जन्म में; सिंहासने = सिंहासन-अवस्था में; वीरः = शूर; सत्यवादी = सत्यभाषी; जितेन्द्रियः = इंद्रिय-विजयी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गोपुर-स्थित (संबंधित भावेश/ग्रह की) अवस्था में जातक यज्ञ-कर्ता होता है — इस जन्म में और परजन्म में भी। सिंहासन-अवस्था में उसे वीर, सत्यवादी और जितेन्द्रिय कहा गया है। यह फल नामित अंश-बल पर आधारित है।

English rendering The text states that in Gopura one becomes a performer of sacrifices in this birth and also hereafter; in Siṃhāsana, a hero, a speaker of truth, and one who has mastered the senses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गोपुर/सिंहासन-अवस्था)। “गोपुर–सिंहासन” वर्ग-संख्या-आश्रित नामित बल हैं; श्लोक स्वयं कोई विभाजन-सूत्र नहीं देता।

41.25
सर्वधर्मान् परित्यज्य ब्रह्मैकपदमाश्रितः |
पारवते च परमो हंअश्चैवात्र जन्मनि
sarvadharmān parityajya brahmaikapadamāśritaḥ |
pāravate ca paramo haṃaścaivātra janmani

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वधर्मान् परित्यज्य = सब धर्मों का परित्याग करके; ब्रह्मैकपदम् = एकमात्र ब्रह्म-पद; आश्रितः = आश्रित; पारवते = पारवत-अवस्था में; परमः हंसः = परम हंस (पाठ: हंअश्च → हंसश्च — पाठ-भेद/लिपि-दोष संभव); अत्र जन्मनि = इस जन्म में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उक्त बल-अवस्था में) जातक सब धर्मों का परित्याग कर एक ब्रह्म-पद का आश्रय लेता है। पारवत में स्थित होने पर उसे इस जन्म में परम हंस कहा गया है। यह त्याग–ब्रह्मनिष्ठा–हंसत्व का फल-कथन है, न कि कोई काल-सूत्र।

English rendering The text states that (in that dignity) one renounces all dharmas and takes refuge in the single Brahman-state; and in Pāravata one is a supreme haṃsa even in this birth. (Reading haṃsaś ca is likely; the transmitted form haṃaś ca may be scribal.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पारवत-अवस्था; ब्रह्म-पद/हंस)। कोई अंश-संख्या या दशा-वर्ष यहाँ नहीं है।

41.26
लगुडी वा त्रिदण्डी स्याद्देवलोके न संशयः |
ब्रह्मलोके शक्रतदं याति कृत्वाऽश्वमेधकम्
laguḍī vā tridaṇḍī syāddevaloke na saṃśayaḥ |
brahmaloke śakratadaṃ yāti kṛtvā'śvamedhakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लगुडी = लगुड़ी-धारी (दण्डी संन्यासी); वा = अथवा; त्रिदण्डी = त्रिदण्ड-धारी; स्यात् = होता है; देवलोके = देवलोक में; न संशयः = संदेह नहीं; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोक में; शक्रपदम् = इंद्र-पद (पाठ: शक्रतदं → शक्रपदं — पाठ-भेद संभव); याति = जाता है; कृत्वा अश्वमेधकम् = अश्वमेध करके

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निश्चय से कहता है कि देवलोक में लगुड़ी-धारी अथवा त्रिदण्डी संन्यास-वृत्ति कही गई है। ब्रह्मलोक में अश्वमेध करके शक्र-पद (इंद्र-लोक/इंद्र-पद) की प्राप्ति कही गई है। यह संन्यास–यज्ञ–लोकोत्तर-फल का वर्णन है।

English rendering The text states without doubt that in Devaloka one becomes a staff-bearer or a tridaṇḍin; and in Brahmaloka, having performed the Aśvamedha, one attains Śakra’s station (Indra’s world/rank — reading śakrapadam preferred; śakratadam is textually uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (देवलोक/ब्रह्मलोक; संन्यास–अश्वमेध–शक्रपद)। कोई वर्ष, भाग या बल-इकाई यहाँ नहीं दी गई।

41.27
ऐरावते तु धर्मात्मा स्वयं धर्मो भविष्यति |
श्रीरामः कुन्तिपुत्राद्यो यथा जातो द्विजोत्तम
airāvate tu dharmātmā svayaṃ dharmo bhaviṣyati |
śrīrāmaḥ kuntiputrādyo yathā jāto dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऐरावते = ऐरावत-अवस्था में; धर्मात्मा = धर्म-स्वभाव वाला; स्वयं धर्मः = स्वयं धर्म-स्वरूप; भविष्यति = होगा; श्रीरामः = श्रीराम; कुन्तिपुत्राद्यः = कुंती-पुत्र आदि; यथा जातः = जैसे उत्पन्न हुए; द्विजोत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ (संबोधन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ऐरावत-अवस्था में जातक धर्मात्मा होता है — यहाँ तक कि स्वयं धर्म-स्वरूप कहा गया है। उदाहरण के रूप में श्रीराम तथा कुंती-पुत्र आदि का उल्लेख है, हे द्विजोत्तम। यह उपमा-युक्त फल-कथन है, न कि जन्मकाल की गणना।

English rendering The text states that in Airāvata one is righteous — even dharma itself — as, O best of the twice-born, Śrī Rāma and the sons of Kuntī and such were born. The verse offers exemplars, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ऐरावत-अवस्था) + आदर्श-उदाहरण (राम/कुंतीपुत्र)। संख्या-सूत्र अनुपस्थित।

41.28
विष्णुस्थानं च केन्द्रं स्याल्लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणकम् |
तदीशयोश्च सम्बन्धाद्राजयोगः पुरोदितः
viṣṇusthānaṃ ca kendraṃ syāllakṣmīsthānaṃ trikoṇakam |
tadīśayośca sambandhādrājayogaḥ puroditaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विष्णुस्थानम् = विष्णु-स्थान = केंद्र-भाव (1, 4, 7, 10); केन्द्रम् = केंद्र; लक्ष्मीस्थानम् = लक्ष्मी-स्थान = त्रिकोण-भाव (1, 5, 9); त्रिकोणकम् = त्रिकोण; तदीशयोः = उनके अधिपतियों का; सम्बन्धः = संबंध (युति/दृष्टि/परस्पर-आश्रय आदि, शास्त्र-परंपरा अनुसार); राजयोगः = राजयोग; पुरोदितः = पूर्व में कहा गया

हिन्दी भावार्थ शास्त्र केंद्रों को विष्णु-स्थान और त्रिकोणों को लक्ष्मी-स्थान कहता है। उन दोनों भाव-स्वामियों के पारस्परिक संबंध से वही राजयोग उत्पन्न होता है, जो पहले कहा जा चुका है। यह राजयोग की संरचनात्मक परिभाषा का पुनःस्मरण है — फल का “कैसे” यहाँ संबंध-नियम से जुड़ा है।

English rendering The text equates the kendras with Viṣṇu-sthānas and the trikoṇas with Lakṣmī-sthānas; from a connection between their lords arises the rāja-yoga already stated earlier.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचना-नियम (संख्यात्मक चर नहीं) — राजयोग-संबंध:
- केंद्र (विष्णु-स्थान) = भाव {1, 4, 7, 10}
- त्रिकोण (लक्ष्मी-स्थान) = भाव {1, 5, 9}
- राजयोग-बीज: L(kendra) ↔ L(trikoṇa) संबंध (युति, परस्पर-दृष्टि, या अन्य शास्त्रोक्त संबन्ध — इस श्लोक में प्रकार नहीं गिनाया)
- भाव 1 दोनों वर्गों में आता है; इसलिए लग्नेश–त्रिकोणेश/केंद्रेश संयोग विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है (शास्त्र-परंपरा)
- कोई दशा-वर्ष, बिन्दु-योग, या अंश-विभाजन यहाँ नहीं — केवल भाव-स्वामी संबंध का नियम

उदाहरण (worked example) मान लीजिए लग्न कर्क; तब
- केंद्रेश: चंद्र (1), शुक्र (4), शनि (7), मंगल (10)
- त्रिकोणेश: चंद्र (1), मंगल (5), गुरु (9)
- यदि मंगल–गुरु युति हो (10वें का स्वामी × 9वें का स्वामी), तो L(kendra) ↔ L(trikoṇa) संबंध सिद्ध — शास्त्र इसे पूर्वोक्त राजयोग की श्रेणी में रखता है।
(घर-गणना: पूर्ण भाव/whole-sign या equal — फल की दिशा एक; सूक्ष्म दृष्टि-कोण house-system पर निर्भर। अयनांश यहाँ भाव-स्वामी-युति के लिए आवश्यक नहीं जब राशि-स्वामित्व D1 पर लिया जाए।)

41.29
पारिजाते स्थितौ तौ चेन्नृपो लोकानुरक्षकः |
उत्तमे चोत्तमो भूपो गजवाजिरथादिमान्
pārijāte sthitau tau cennṛpo lokānurakṣakaḥ |
uttame cottamo bhūpo gajavājirathādimān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारिजाते = पारिजात-अंश / उच्च श्रेणी के राजयोग-स्थान में; स्थितौ = स्थित (द्वि-वचन — दोनों ग्रह); तौ = वे दोनों; चेत् = यदि; नृपः = राजा; लोकानुरक्षकः = लोकों / प्रजा का रक्षक; उत्तमे = उत्तम-अंश में; उत्तमः भूपः = श्रेष्ठ भूपति; गज-वाजि-रथ-आदि-मान् = हाथी, घोड़े, रथ आदि से सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि वे दोनों (पूर्व-संदर्भित योग-कारक ग्रह) पारिजात में स्थित हों, तो जातक लोकानुरक्षक राजा कहा जाता है। यदि वे उत्तम में हों, तो उत्तम भूप होता है — गज, अश्व, रथ आदि राजचिह्नों से युक्त। यह फल-क्रम राजयोग की बढ़ती श्रेष्ठता का कथन है, न कि कोई गणना-सूत्र।

English rendering The text states that if those two are placed in Pārijāta, the native is a king who protects the people; if in Uttama, an excellent sovereign furnished with elephants, horses, chariots and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राजयोग-अंश का क्रमशः फल)। पारिजात और उत्तम यहाँ गणना नहीं, बल्कि योग-स्थानों की शास्त्रीय श्रेणी-नाम हैं; फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

41.30
गोपुरे नृपशार्दूलः पूजितांध्रिर्नृपैर्भवेत् |
सिंहासने चक्रवर्ती सर्वभूमिप्रपालकः
gopure nṛpaśārdūlaḥ pūjitāṃdhrirnṛpairbhavet |
siṃhāsane cakravartī sarvabhūmiprapālakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गोपुरे = गोपुर-अंश में; नृप-शार्दूलः = नृपों में व्याघ्र / श्रेष्ठतम राजा; पूजित-अंघ्रिः = जिसके चरण पूजित हों; नृपैः = राजाओं द्वारा; भवेत् = होता है; सिंहासने = सिंहासन-अंश में; चक्रवर्ती = चक्रवर्ती सम्राट्; सर्व-भूमि-प्रपालकः = समस्त भूमि का पालन करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गोपुर में वे स्थित हों तो जातक नृपशार्दूल होता है — अन्य नृप भी जिसके चरण पूजते हैं। सिंहासन में स्थित होने पर चक्रवर्ती कहा जाता है, सर्वभूमि का रक्षक। यह भी पूर्व-श्लोक की भाँति राजयोग-अंशों का उत्तरोत्तर फल-वर्णन है।

English rendering The text states that in Gopura he becomes a tiger among kings, his feet worshipped by other rulers; in Siṃhāsana, a cakravartin who guards the whole earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गोपुर → सिंहासन की श्रेणी-वृद्धि)। कोई अंश-विभाजन या बलांक यहाँ नहीं दिया; केवल शास्त्र का फल-क्रम।

41.31
अस्मिन् योगे हरिश्चन्द्रो मनुश्चैवोत्तमस्तथा |
बलिर्वैश्वानरो जातस्तथान्ये चक्रवर्तिनः
asmin yoge hariścandro manuścaivottamastathā |
balirvaiśvānaro jātastathānye cakravartinaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्मिन् योगे = इस योग में; हरिश्चन्द्रः = राजा हरिश्चन्द्र; मनुः = मनु; च एव उत्तमः = और वे उत्तम (श्रेष्ठ); तथा = तथा; बलिः = राजा बलि; वैश्वानरः = वैश्वानर; जातः = उत्पन्न हुए; तथा अन्ये चक्रवर्तिनः = और अन्य चक्रवर्ती भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इसी (सिंहासन आदि उच्च) योग में हरिश्चन्द्र, उत्तम मनु, बलि और वैश्वानर जन्म ले चुके; तथा अन्य चक्रवर्ती भी। यह ऐतिहासिक-पुराणिक उदाहरणों द्वारा योग की महत्ता का समर्थन-कथन है — गणना नहीं, परम्परा का स्मरण।

English rendering The text states that in this yoga were born Hariścandra, the excellent Manu, Bali, and Vaiśvānara, as well as other cakravartins.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उदाहरण-फल / पुराण-स्मृति। योग की प्रभाव-श्रेणी को नाम-उदाहरणों से ठहराने वाला कथन; कोई काल-वर्ष या अंश-सूत्र नहीं।

41.32
वर्तमानयुगे जातस्तथा राजा युधिष्ठिरः |
भविता शालिवाहाद्यस्तथैव द्विजसत्तम
vartamānayuge jātastathā rājā yudhiṣṭhiraḥ |
bhavitā śālivāhādyastathaiva dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्तमान-युगे = वर्तमान युग में; जातः = उत्पन्न; तथा राजा युधिष्ठिरः = तथा राजा युधिष्ठिर; भविता = होगा / होने वाला; शालिवाह-आद्यः = शालिवाह आदि; तथा एव = उसी प्रकार; द्विज-सत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधित श्रोता)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वर्तमान युग में राजा युधिष्ठिर इसी योग-क्रम में उत्पन्न हुए; और भविष्य में शालिवाह आदि भी ऐसे ही होंगे — हे द्विजसत्तम। यह भूत-वर्तमान-भविष्य की परम्परा-सूची है; कोई दशा-वर्ष या तिथि-गणित इसमें नहीं है।

English rendering The text states that in the present age King Yudhiṣṭhira was so born, and that Śālivāha and others will likewise arise, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — काल-वर्णन / फल-उदाहरण। “वर्तमानयुग” और “भविता” शास्त्र की काल-भाषा हैं; vimśottarī या अन्य दशा-अंक से जोड़ने का कोई पद यहाँ नहीं।

41.33
पारावतांशकेऽप्येवं जाता मन्वादयस्तथा |
विष्णोः सर्वेऽवताराश्च जायन्ते देवलोकके
pārāvatāṃśake'pyevaṃ jātā manvādayastathā |
viṣṇoḥ sarve'vatārāśca jāyante devalokake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारावत-अंशके = पारावत-अंश में; अपि एवम् = भी इसी प्रकार; जाताः = उत्पन्न; मनु-आदयः = मनु आदि; तथा = तथा; विष्णोः सर्वे अवताराः = विष्णु के सभी अवतार; च जायन्ते = और जन्म लेते हैं; देवलोकके = देवलोक(-अंश) में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पारावतांश में भी मनु आदि इसी श्रेष्ठता से जन्म लेते हैं; और विष्णु के सभी अवतार देवलोक(-अंश) में जन्म लेते हैं। राजयोग-अंशों की श्रेणी यहाँ पारावत और देवलोक तक बढ़ती हुई कही गई है — फल-विवरण, न कि अंश-निर्माण का सूत्र।

English rendering The text states that in the Pārāvata-aṃśa Manu and others are likewise born, and that all the avatāras of Viṣṇu take birth in the Devaloka(-aṃśa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पारावत / देवलोक-अंश का फल)। “अंश” नाम योग-श्रेणी का है; षोडशवर्ग के D-नंबर या 30° विभाजन का नियम इस श्लोक में नहीं दिया।

41.34
ब्रह्मलोकके तु ब्रह्माद्या जायन्ते विश्वपालकाः |
ऐरावतांशके जातः पूर्व स्वायंभुवो मनुः
brahmalokake tu brahmādyā jāyante viśvapālakāḥ |
airāvatāṃśake jātaḥ pūrva svāyaṃbhuvo manuḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्मलोकके = ब्रह्मलोक(-अंश) में; तु = तो; ब्रह्म-आद्याः = ब्रह्मा आदि; जायन्ते = जन्म लेते हैं; विश्व-पालकाः = विश्व के पालक; ऐरावत-अंशके = ऐरावतांश में; जातः = उत्पन्न; पूर्व = पूर्व काल में; स्वायंभुवः मनुः = स्वायंभुव मनु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ब्रह्मलोक(-अंश) में ब्रह्मा आदि विश्वपालक जन्म लेते हैं; और ऐरावतांश में पूर्व काल में स्वायंभुव मनु उत्पन्न हुए। यह राजयोग-अंश-क्रम के शीर्ष फल का पुराण-उदाहरण है — गणना-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that in the Brahmaloka(-aṃśa) Brahmā and the other world-protectors are born; and that formerly, in the Airāvata-aṃśa, Svāyaṃbhuva Manu was born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / पौराणिक उदाहरण। ब्रह्मलोक और ऐरावत यहाँ योग-श्रेणी के नाम हैं; कोई भुतासंख्या, वर्ष-संख्या या बल-इकाई नहीं।

अध्यायः 42

दारिद्रय्योगाध्यायः

18 श्लोक
42.1
बहवो धनदा योगा श्रुतास्त्वत्तो मया मुने |
दरिद्रजन्मदान् योगान् कृपया कथय प्रभो
bahavo dhanadā yogā śrutāstvatto mayā mune |
daridrajanmadān yogān kṛpayā kathaya prabho

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहवः = अनेक; धनदा योगाः = धन-प्रद योग (समृद्धि-संयोग); श्रुताः = सुने गए; त्वत्तः = आपके मुख से; मुने = हे मुनि; दरिद्रजन्मदान् योगान् = निर्धन-जन्म देने वाले योग; कृपया = अनुग्रहपूर्वक; कथय = कहिए; प्रभो = हे स्वामी।

हिन्दी भावार्थ शिष्य मुनि से कहता है कि आपसे मैंने अनेक धन-प्रद योग पहले सुन लिए हैं। अब कृपा करके वे योग भी बतलाइए जिनसे जन्म में दरिद्रता का संकेत शास्त्र में माना गया है। यह अध्याय-प्रवेश संवाद है—पूर्व अध्यायों के धन-योगों के बाद निर्धनता-योगों की पृच्छा।

English rendering “O sage, I have heard from you many wealth-giving yogas; now, O lord, kindly recount those combinations that the tradition associates with birth in poverty.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अध्याय-प्रवेश। यहाँ केवल विषय-स्थापना है: धनदा योगों के बाद दरिद्र-योगों का अनुरोध; कोई भग्नांश, बलांक या दशा-अनुपात नहीं।

42.2
लग्नेशे च व्ययस्थाने व्ययेशे लग्नमागते |
मारकेशयुते दृष्टे निर्धनो जायते नरः
lagneśe ca vyayasthāne vyayeśe lagnamāgate |
mārakeśayute dṛṣṭe nirdhano jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी; व्ययस्थाने = बारहवें भाव (व्यय) में; व्ययेशे = व्यय-भाव-स्वामी; लग्नमागते = लग्न में आए हुए; मारकेशयुते = मारक-स्वामी से युक्त; दृष्टे = (या) दृष्ट; निर्धनः = धन-रहित; जायते = उत्पन्न होता है; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब लग्नेश व्यय (१२) भाव में हो और व्ययेश लग्न में आए, तथा यह स्थिति मारकेश से युक्त या दृष्ट हो, तो व्यक्ति निर्धन जन्म लेता है—ऐसा इस योग का फल-कथन है। यहाँ लग्न–व्यय का परस्पर आदान-प्रदान (पारिवर्तन-जैसा सम्बन्ध) और मारक-संपर्क दोनों एक साथ बँधे हैं।

English rendering The text states: when the lagna-lord is in the twelfth and the twelfth-lord occupies the lagna, and that configuration is joined or aspected by a maraka-lord, the native is born without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा। जाँच-बिन्दु: (१) लग्नेश ∈ भाव १२; (२) व्ययेश ∈ भाव १; (३) युति या दृष्टि मारकेश से—पारम्परिक दृष्टि-नियम (पूर्ण दृष्टि आदि) के अनुसार; कोई संख्या-सूत्र नहीं, केवल भाव-स्वामी स्थान-मानचित्र।

उदाहरण (worked example) मान लें कर्क लग्न: लग्नेश चन्द्र १२वें (मिथुन) में; व्ययेश बुध लग्न (कर्क) में; मारक-भाव (२/७) स्वामी—यहाँ ७ेश शनि—यदि बुध/चन्द्र पर शनि-युति या शास्त्रीय दृष्टि हो, तो यह श्लोक-योग लागू माना जाता है। (भाव-स्वामी: पूर्ण राश्याधिपत्य; दृष्टि: परम्परागत ग्रह-दृष्टि; अयनांश केवल देशान्तर-निर्णय में, योग-परिभाषा में नहीं।)

42.3
लग्नेशे षष्ठभावस्थे षष्ठेशे लग्नमागते |
मारकेशेन युग्दृष्टे धनहीनः प्रजायते
lagneśe ṣaṣṭhabhāvasthe ṣaṣṭheśe lagnamāgate |
mārakeśena yugdṛṣṭe dhanahīnaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी; षष्ठभावस्थे = छठे भाव में स्थित; षष्ठेशे = षष्ठ-स्वामी; लग्नमागते = लग्न में स्थित; मारकेशेन = मारक-स्वामी से; युग्दृष्टे = युक्त और/या दृष्ट; धनहीनः = धन से रहित; प्रजायते = जन्म लेता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्नेश षष्ठ भाव में हो और षष्ठेश लग्न में आए, तथा मारकेश से युति या दृष्टि हो, तो जन्म धनहीन माना गया है। पूर्व श्लोक का व्यय–लग्न पारिवर्तन यहाँ षष्ठ–लग्न पर दोहराया गया है; मारक-संपर्क फल-सक्रियता का अतिरिक्त शर्त-बिन्दु है।

English rendering The text states: with the lagna-lord in the sixth and the sixth-lord in the lagna, joined or aspected by a maraka-lord, the native is born without means.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा। शर्त-त्रय: लग्नेश ∈ ६; षष्ठेश ∈ १; मारकेश-युति/दृष्टि। ६–१ आदान-प्रदान + मारक-स्पर्श—संरचना ४२.२ के समान, केवल त्रिक-भाव १२ के स्थान पर ६।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न: लग्नेश मङ्गल ६ (कन्या) में; षष्ठेश बुध लग्न (मेष) में; मारकेश (२ेश शुक्र या ७ेश शुक्र—मेष में २/७ दोनों शुक्र) यदि मङ्गल/बुध से युक्त या दृष्ट हो, तो श्लोक-योग का मानचित्र पूरा होता है। (दृष्टि-नियम घोषित करें: शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि।)

42.4
लग्नेन्दू केतुसंयुक्तौ लग्नपे निधनं गते |
मारकेशयुते दृष्टे जातो वै निर्धनो भवेत्
lagnendū ketusaṃyuktau lagnape nidhanaṃ gate |
mārakeśayute dṛṣṭe jāto vai nirdhano bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेन्दू = लग्न और चन्द्र; केतुसंयुक्तौ = केतु से संयुक्त (दोनों); लग्नपे = लग्न-स्वामी; निधनं गते = अष्टम (निधन) भाव में गए; मारकेशयुते दृष्टे = मारकेश से युक्त/दृष्ट; जातः = उत्पन्न; वै = निश्चय से (श्लोक-वाक्य); निर्धनः = निर्धन; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब लग्न और चन्द्र दोनों केतु-युक्त हों, लग्नेश अष्टम में हो, और मारकेश से युति या दृष्टि हो, तो जन्म निर्धन कहा गया है। यहाँ केतु-युति लग्न–चन्द्र पर, अष्टम में लग्नेश, तथा मारक-स्पर्श—तीन परतें एक योग में जुड़ी हैं।

English rendering The text states: when lagna and the Moon are both with Ketu, the lagna-lord occupies the eighth, and maraka-lord association or aspect is present, the native becomes poor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा। जाँच: (१) केतु लग्न-राशि में और चन्द्र-राशि में (लग्न–चन्द्र यदि एक राशि हों तो एक ही केतु-युति; भिन्न हों तो दोनों पर केतु—पाठ “लग्नेन्दू केतुसंयुक्तौ” दोनों की केतु-युति माँगता है; पाठ-भेद/व्याख्या में एक-राशि समन्वय भी देखा जाता है); (२) लग्नेश ∈ ८; (३) मारकेश-युति/दृष्टि।

उदाहरण (worked example) सिंह लग्न, चन्द्र भी सिंह में, केतु सिंह में (लग्न–चन्द्र–केतु एकत्र); लग्नेश सूर्य ८ (मीन) में; २ेश बुध या ७ेश शनि यदि सूर्य/लग्न–चन्द्र-समूह पर युति/दृष्टि दें, तो योग-मानचित्र पूरा। (केतु-युति = समान राशि; अष्टम = निधन-भाव।)

42.5
षष्ठाष्टमव्ययगते लग्नपे पापसंयुते |
धनेशे रिपुभे नीचे राजवंश्योऽपि निर्धनः
ṣaṣṭhāṣṭamavyayagate lagnape pāpasaṃyute |
dhaneśe ripubhe nīce rājavaṃśyo'pi nirdhanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाष्टमव्ययगते = ६, ८ या १२ में स्थित; लग्नपे = लग्न-स्वामी; पापसंयुते = पाप-ग्रह से युक्त; धनेशे = धन-भाव (२) स्वामी; रिपुभे = शत्रु-राशि में; नीचे = नीच राशि में; राजवंश्यः अपि = राजकुलोत्पन्न भी; निर्धनः = निर्धन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्नेश षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो और पाप-ग्रह से युक्त हो, तथा धनेश शत्रु-राशि में या नीच हो, तो राजवंश में जन्मा व्यक्ति भी निर्धन कहा गया है। यहाँ लग्नेश की त्रिक-स्थिति + पाप-युति, और धनेश की दुर्बलता—दो धुरियाँ एक फल-कथन में बाँधी गई हैं; “अपि” सामाजिक उत्कर्ष को भी निरपेक्ष नहीं मानता।

English rendering The text states: if the lagna-lord stands in the sixth, eighth, or twelfth joined to a malefic, and the second-lord is in an enemy’s sign or in debilitation, even one born of royal lineage is without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा। शर्तें: लग्नेश ∈ {६, ८, १२} ∧ पाप-युति; धनेश ∈ शत्रु-राशि या नीच-राशि। नीच = ग्रह की शास्त्रीय नीच-राशि (उदा. सूर्य तुला, चन्द्र वृश्चिक, …); शत्रु-राशि = नैसर्गिक/तात्कालिक शत्रुत्व-सारणी के अनुसार—परम्परा घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मीन लग्न: लग्नेश गुरु ६ (सिंह) में, रवि-युति (पाप); धनेश मङ्गल वृश्चिक में = मीन-लग्न के लिए मङ्गल का शत्रु/दुर्बल सन्दर्भ जाँचें, अथवा मङ्गल कर्क में = नीच। दोनों धुरियाँ पूरी हों तो श्लोक-योग लागू। (पाप = सामान्यतः रवि, मङ्गल, शनि, राहु/केतु—परम्परा निर्दिष्ट करें।)

42.6
त्रिकेशेन समायुक्ते पापदृष्टे विलग्नपे |
शनियुक्तेऽधवा सौम्यैरदृष्टे निर्धनो नरः
trikeśena samāyukte pāpadṛṣṭe vilagnape |
śaniyukte'dhavā saumyairadṛṣṭe nirdhano naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकेशेन = त्रिक-भाव (६/८/१२) स्वामियों से; समायुक्ते = भली-भाँति युक्त; पापदृष्टे = पाप-दृष्ट; विलग्नपे = लग्न-स्वामी; शनियुक्ते = शनि-युक्त; अथवा = या; सौम्यैः = शुभ ग्रहों से; अदृष्टे = अदृष्ट; निर्धनः = निर्धन; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्नेश त्रिकेश से युक्त हो, पाप-दृष्ट हो, अथवा शनि-युक्त हो, अथवा शुभ ग्रहों से अदृष्ट रहे, तो व्यक्ति निर्धन कहा गया है। यहाँ कई वैकल्पिक मार्ग (“अथवा”) एक ही फल-वर्ग में संगृहीत हैं—त्रिक-स्वामी युति, पाप-दृष्टि, शनि-युति, या सौम्य-दृष्टि का अभाव।

English rendering The text states: when the lagna-lord is joined by a trika-lord, aspected by malefics, or joined with Saturn, or (alternatively) not aspected by benefics, the native is without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा (विकल्पात्मक शर्त-समुच्चय)। लागू-मार्गों में से कोई एक पर्याप्त माना जा सकता है: (A) लग्नेश + त्रिकेश-युति; (B) पाप-दृष्टि; (C) शनि-युति; (D) सौम्य-अदृष्टि। “त्रिकेश” = ६ेश, ८ेश, १२ेश में कोई/सभी—पाठ एकवचन “त्रिकेशेन” से सामान्य संकेत; पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) वृषभ लग्न: लग्नेश शुक्र ८ेश-गुरु से युक्त (त्रिकेश-युति) → मार्ग A; अथवा शुक्र शनि-युक्त → मार्ग C; अथवा शुक्र पर केवल मङ्गल-दृष्टि, बृहस्पति/बुध-दृष्टि शून्य → मार्ग B/D। एक मार्ग भी श्लोक की “अथवा”-संरचना में पर्याप्त संकेत देता है।

42.7
मन्त्रेशो धर्मनाथश्च क्रमात् षष्ठव्ययस्थितौ |
दृष्टौ चेन्मारकेशेन निर्धनो जायते नरः
mantreśo dharmanāthaśca kramāt ṣaṣṭhavyayasthitau |
dṛṣṭau cenmārakeśena nirdhano jāyate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्त्रेशः = पञ्चम-स्वामी (मन्त्र-भाव = ५); धर्मनाथः = नवम-स्वामी (धर्म-भाव = ९); क्रमात् = क्रमशः; षष्ठव्ययस्थितौ = षष्ठ और व्यय में स्थित; दृष्टौ = (दोनों) दृष्ट; चेत् = यदि; मारकेशेन = मारक-स्वामी से; निर्धनः = निर्धन; जायते = होता है; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि मन्त्रेश (५ेश) और धर्मनाथ (९ेश) क्रमशः षष्ठ और व्यय में हों, और मारकेश उन पर दृष्टि डाले, तो व्यक्ति निर्धन जन्म लेता है—ऐसा फल-कथन है। “क्रमात्” से ५ेश→६ और ९ेश→१२ का क्रम स्थिर है; पुण्य-त्रिकोण (५–९) के स्वामियों का त्रिक-पतन + मारक-दृष्टि यहाँ केन्द्र में है।

English rendering The text states: if the fifth-lord and the ninth-lord stand respectively in the sixth and the twelfth and are aspected by a maraka-lord, the native is born without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-परिभाषा। शर्त-युग्म: ५ेश ∈ ६ और ९ेश ∈ १२ (क्रम स्थिर); दोनों (या युग्म) मारकेश-दृष्ट। यह ४२.२–४२.३ के लग्नेश–त्रिक पारिवर्तन से भिन्न—यहाँ त्रिकोण-स्वामियों का त्रिक-गमन है।

उदाहरण (worked example) मकर लग्न: ५ेश शुक्र ६ (मिथुन) में; ९ेश बुध १२ (धनु) में; मारकेश (२ेश शनि या ७ेश चन्द्र) यदि शुक्र/बुध पर शास्त्रीय दृष्टि दें, तो योग पूरा। (क्रमात् = ५→६, ९→१२ यथाक्रम; उलटा विन्यास इस श्लोक-पाठ में नहीं आता।)

42.8
पापग्रहे लग्नगते राज्यधर्माधिपौ विना |
मारकेशयुते दृष्टे जातः स्यन्निर्धनो भवेत्
pāpagrahe lagnagate rājyadharmādhipau vinā |
mārakeśayute dṛṣṭe jātaḥ syannirdhano bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापग्रह = क्रूर/अशुभ ग्रह; लग्नगते = लग्न-भाव में स्थित; राज्यधर्माधिपौ = १०वें (राज्य) और ९वें (धर्म) भाव के अधिपति; विना = उनके बिना/उनकी अनुपस्थिति में; मारकेश = मारक-स्थान (प्रायः २/७) का स्वामी; युते दृष्टे = युक्त या दृष्ट; निर्धनः = धन-रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न में पापग्रह बैठा हो, और राज्य- तथा धर्म-अधिपति उस योग की रक्षा न कर रहे हों, तथा वही लग्न-स्थित पाप मारकेश से युक्त या दृष्ट हो, तब जातक निर्धन होता है। यहाँ लग्न की दुर्बलता, त्रिकोण-दशम की अनुपस्थिति, और मारक-संपर्क — तीनों मिलकर फल-कथन बनाते हैं। यह योग “भाग्य-राज्य की छाया न रहने” और “मारक-ग्रह की दृष्टि/योग” का संयुक्त वर्णन है।

English rendering The text states that when a malefic occupies the lagna, without the protective presence of the lords of the tenth (rājya) and ninth (dharma), and is joined or aspected by a maraka lord, the native is said to become destitute of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निर्धन-योग)। तकनीकी पहचान: लग्न-स्थित पाप + ९/१० अधिपतियों की अनुपस्थिति + मारकेश-योग/दृष्टि; मारक-स्थान परम्परा में प्रायः २ और ७ माने जाते हैं (पाठ/टीका-भेद संभव)।

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42.9
त्रिकेशा यत्र भावस्था तद्भावेशास्त्रिकस्थिताः |
पापदृष्टयुत बालो दुःखाक्रान्तश्च निर्धनः
trikeśā yatra bhāvasthā tadbhāveśāstrikasthitāḥ |
pāpadṛṣṭayuta bālo duḥkhākrāntaśca nirdhanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकेशाः = ६-८-१२ (त्रिक) भावों के स्वामी; यत्र भावस्थाः = जिस भाव में स्थित; तद्भावेशाः = उन भावों के अधिपति; त्रिकस्थिताः = त्रिक-भावों में स्थित; पापदृष्टयुत = पाप-दृष्टि या पाप-योग से युक्त; बालः = जातक/शिशु; दुःखाक्रान्तः = दुःख से आक्रान्त; निर्धनः = निर्धन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जहाँ त्रिकेश किसी भाव में बैठे हों, और उन्हीं भावों के स्वामी स्वयं त्रिक-स्थानों में हों, तथा पाप-दृष्टि या पाप-योग भी लगे, वहाँ बालक दुःख से घिरा और निर्धन कहा जाता है। यह “त्रिक-स्वामियों का भाव-दोष” और “तद्भावेशों का त्रिक-गमन” — दोनों का पारस्परिक उलटा-योग है। पाप-दृष्टि/योग उस संरचना को और कठोर बनाते हैं, ऐसा पाठ का फल-कथन है।

English rendering The text states: where the lords of the trika houses (6, 8, 12) occupy certain bhāvas, and the lords of those same bhāvas themselves stand in the trika, and malefic aspect or conjunction is present, the child is described as grief-stricken and poor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रिक-पारस्परिक दोष)। संरचनात्मक जाँच: (i) त्रिकेश ∈ भाव B; (ii) B-अधिपति ∈ {६,८,१२}; (iii) पाप-योग/दृष्टि — तीनों शर्तें शास्त्रीय फल के लिए कही गई हैं।

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42.10
चन्द्राक्रान्तनवंशेशो मारकेशयुतो यदि |
मारकस्थानगो वाऽपि जातोऽत्र निर्धनो नरः
candrākrāntanavaṃśeśo mārakeśayuto yadi |
mārakasthānago vā'pi jāto'tra nirdhano naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्राक्रान्त = चन्द्र जिस राशि/अंश में स्थित; नवांशेशः = चन्द्र-स्थित नवांश (D9) का स्वामी; मारकेशयुतः = मारकेश से युक्त; यदि = यदि; मारकस्थानगः = मारक-भाव में स्थित; वाऽपि = अथवा; जातः = उत्पन्न; निर्धनो नरः = निर्धन पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र जिस नवांश में बैठा हो, उस नवांश का अधिपति यदि मारकेश से युक्त हो, अथवा स्वयं मारक-स्थान में हो, तो जातक निर्धन होता है। यहाँ धन-फल को केवल लग्न नहीं, चन्द्र-नवांशेश की मारक-संलग्नता से जोड़ा गया है। नवांश-स्वामी का मारक-योग या मारक-स्थान — दोनों विकल्प फल के लिए पर्याप्त माने गए हैं।

English rendering The text states that if the lord of the navāṃśa occupied by the Moon is conjoined with a maraka lord, or itself occupies a maraka house, the person born is said to be without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश-विभाजन (D9) गणितीय है; फल-भाग कथनात्मक। चन्द्र-देशान्तर λ (राशि-आन्तरिक ०°–३०°) पर: नवांश-सूचकांक = ⌊λ ÷ (३०°/९)⌋ = ⌊λ ÷ ३°२०′⌋ (०…८); नवांश-राशि = राशि-क्रम के अनुसार (चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम — BPHS Ch.6 varga-scheme)। नवांशेश = उस D9-राशि का स्वामी; फिर जाँच: (नवांशेश ⋂ मारकेश) ∨ (नवांशेश ∈ मारक-भाव)। अयनांश घोषित करें — निरयन देशान्तर पर D9 निर्भर करता है।

उदाहरण (worked example) मान लें निरयन चन्द्र = १५° वृष (λ_in_sign = १५°)। D9-भाग = ⌊१५ ÷ ३°२०′⌋ = ⌊१५ ÷ ३.३̄⌋ = ४ → पाँचवाँ नवांश। वृष चर-राशि: नवांश-गणना लग्न-से-क्रम (BPHS D9 नियम) से नवांश-राशि कन्या मानें तो नवांशेश = बुध। यदि बुध ७वें (मारक) में हो, या २/७-स्वामी से युक्त हो — शास्त्र इस अवस्था को निर्धन-फल से जोड़ता है। (अयनांश: जो भी निरयन-मानक चुना हो, उसे स्पष्ट रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक षोडश-वर्ग में D9 (नवांश) की शुद्ध मॉड्यूलर गणना पर टिका है — ३०° को ९ बराबर भागों (३°२०′) में बाँटना। हमारे वर्ग-इंजन में D1…D60 का यही निर्धारणात्मक विभाजन लागू है; फल-वाक्य को हम भविष्यवाणी नहीं, शास्त्र-कथन मानकर अलग रखते हैं।

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42.11
लग्नेशलग्नभागेशौ रिश्फरन्ध्रारिगौ यदि |
मारकेशयुतौ दृष्टौ जातोऽसौ निर्धनो नरः
lagneśalagnabhāgeśau riśpharandhrārigau yadi |
mārakeśayutau dṛṣṭau jāto'sau nirdhano naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेश = लग्न-स्वामी; लग्नभागेश = लग्न-नवांश (लग्न-भाग) का अधिपति; रिश्फ = १२वाँ भाव; रन्ध्र = ८वाँ; अरि = ६वाँ; गौ = स्थित (द्विवचन); यदि = यदि; मारकेशयुतौ दृष्टौ = मारकेश से युक्त या दृष्ट; निर्धनो नरः = निर्धन नर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि लग्नेश और लग्न-भागेश दोनों रिश्फ, रन्ध्र या अरि (१२, ८, ६) में हों, और मारकेश से युक्त या दृष्ट हों, तो जातक निर्धन होता है। लग्न का स्वामी और लग्न का नवांश-स्वामी — दोनों की त्रिक-स्थिति, लग्न-बल की दोहरी हानि का संकेत है। मारक-संपर्क उस संरचना को निर्धन-फल की ओर बाँधता है, ऐसा पाठ का कथन है।

English rendering The text states that if the lagna lord and the lord of the lagna’s navāṃśa both occupy the twelfth, eighth, or sixth, and are joined or aspected by a maraka lord, that person is said to be born without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणना = लग्न-देशान्तर से D1-स्वामी + D9-स्वामी; फिर भाव-स्थितियाँ {६,८,१२} ∩ मारकेश-योग/दृष्टि। लग्न λ_L; लग्न-राशि = ⌊λ_L / ३०°⌋; लग्नेश = उस राशि का स्वामी। लग्न-नवांश: λ_in = λ_L mod ३०°; nav_idx = ⌊λ_in / ३°२०′⌋; D9-राशि-नियम से भागेश। भाव-गणना: चुने हुए गृह-प्रणाली (पूर्ण-राशि/श्रीपति आदि) घोषित करें — भाव-संख्या उसी पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) लग्न = ८° मेष → लग्नेश = मंगल। λ_in = ८°; nav_idx = ⌊८ / ३.३̄⌋ = २ → तीसरा नवांश; मेष-चर से D9-राशि मिथुन → लग्नभागेश = बुध। यदि मंगल ८वें और बुध १२वें हों, तथा दोनों पर २/७-स्वामी की दृष्टि/योग हो — शास्त्र इसे निर्धन-योग कहता है। (अयनांश + भाव-पद्धति स्पष्ट रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “लग्नभागेश” सीधे षोडश-वर्ग के D9 नियम से जुड़ता है — लग्न-देशान्तर का नवांश-मानचित्र। हम गणित (D9-स्वामी, भाव-सूचकांक) को फल से अलग रखते हैं: गणना `==` सटीक; “निर्धन” केवल शास्त्र का फल-वाक्य।

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42.12
शुभस्थानगताः पापाः पापस्थानगताः शुभाः |
निर्धनो जायते बालो भोजनेन प्रपीडितः
śubhasthānagatāḥ pāpāḥ pāpasthānagatāḥ śubhāḥ |
nirdhano jāyate bālo bhojanena prapīḍitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभस्थान = शुभ/सुख-समृद्धि से जुड़े भाव (परम्परा में प्रायः १,४,५,७,९,१० आदि — पाठ-भेद/टीका-भेद संभव); गताः पापाः = पापग्रह उन शुभ-स्थानों में; पापस्थान = अशुभ/त्रिकादि स्थान; गताः शुभाः = शुभग्रह पाप-स्थानों में; निर्धनः = निर्धन; बालः = बालक; भोजनेन प्रपीडितः = भोजन से पीड़ित (अन्न-कष्ट)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पापग्रह शुभ-स्थानों में हों और शुभग्रह पाप-स्थानों में हों, तब बालक निर्धन जन्मता है और भोजन के कष्ट से पीड़ित कहा जाता है। यह “स्थान-ग्रह का उलटा विन्यास” — पाप शुभ-घर में, शुभ पाप-घर में — धन और अन्न दोनों पर दबाव का फल-कथन है। यहाँ कोई अंक-सूत्र नहीं; केवल स्थिति-विपर्यय का वर्णन है।

English rendering The text states that when malefics occupy benefic houses and benefics occupy malefic houses, the child is said to be born poor and distressed in respect of food.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान-विपर्यय)। व्यावहारिक जाँच केवल वर्गीकरण: प्रत्येक ग्रह का भाव-सूचकांक; शुभ/पाप-ग्रह और शुभ/पाप-स्थान की परिभाषा परम्परा-निर्भर — घोषित करें; “भोजन-पीड़ा” शास्त्र का आलंकारिक/फल-वाक्य है, चिकित्सकीय दावा नहीं।

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42.13
कोणेशदृष्टिहीना ये त्रिकेशैः संयुता ग्रहाः |
ते सर्वे स्वदशाकाले धनहानिकराः स्मृताः
koṇeśadṛṣṭihīnā ye trikeśaiḥ saṃyutā grahāḥ |
te sarve svadaśākāle dhanahānikarāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोणेश = कोण-भाव (१,५,९) के अधिपति; दृष्टिहीनाः = उनकी दृष्टि से रहित; ये ग्रहाः = जो ग्रह; त्रिकेशैः संयुताः = त्रिकेशों (६/८/१२-स्वामी) से युक्त; स्वदशाकाले = अपनी दशा के काल में; धनहानिकराः = धन-हानि करने वाले; स्मृताः = कहे गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो ग्रह कोणेशों की दृष्टि से वंचित हों और त्रिकेशों से युक्त हों, वे सभी अपनी दशा में धन-हानि के कारक माने गए हैं। कोण-स्वामियों की दृष्टि “रक्षण/समर्थन” का संकेत है; उसके अभाव में त्रिक-योग दशा-फल को धन-क्षय की ओर मोड़ता है — ऐसा पाठ का स्मृति-वाक्य है। फल दशा-काल से बाँधा गया है, स्थायी जन्म-फल मात्र नहीं।

English rendering The text states that planets which lack the aspect of the trine-lords and are conjoined with the trika-lords are all remembered as causing loss of wealth during their own daśā periods.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन + दशा-समय-रेखा। विंशोत्तरी (BPHS Ch.46–47): महदशा-वर्ष — केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७ (Σ = १२० वर्ष)। अन्तर्दशा = (महदशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) / १२०। “स्वदशाकाल” = जिस ग्रह की शर्त (कोणेश-दृष्टिहीन + त्रिकेश-युक्त) पूरी हो, उसकी महदशा/अन्तर्दशा-खण्ड में शास्त्र धन-हानि फल कहता है — यह काल-मानचित्रण है, नियति-घोषणा नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें शुक्र की शर्त पूरी (कोणेश-दृष्टि नहीं, त्रिकेश-युक्त)। शुक्र-महदशा = २० वर्ष। यदि चन्द्र-नक्षत्र-शेष से शुक्र-दशा शेष ८ वर्ष बची हो, तो उस ८-वर्ष खण्ड को शास्त्र “धनहानिकर” काल कहता है। अन्तर्दशा उदाहरण: शुक्र–गुरु = (२० × १६) / १२० = २.६̄ वर्ष ≈ २ वर्ष ८ मास। (चन्द्र-नक्षत्र-अंश और अयनांश घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वदशाकाले” विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र की शुद्ध अनुपात-गणित पर टिका है — नक्षत्र-शेष × महदशा-वर्ष। हमारे दशा-इंजन में अन्तर्दशा (MD × AD) / १२० से आती है; हम केवल काल-खण्ड निकालते हैं। “धनहानि” को हम भविष्यवाणी नहीं, शास्त्र का दशा-फल-कथन मानते हैं।

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42.14
कारकाद् वा विलग्नाद् वा रन्ध्रेरिष्फे द्विजोत्तम |
कारकाङ्गपयोदृष्ट्या धनहीनः प्रजायते
kārakād vā vilagnād vā randhreriṣphe dvijottama |
kārakāṅgapayodṛṣṭyā dhanahīnaḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकात् = कारक से (चर-कारक/आत्मकारकादि — सन्दर्भ-अध्याय अनुसार; पाठ-भेद संभव); वा = अथवा; विलग्नात् = लग्न से; रन्ध्रे = ८वें में; रिष्फे = १२वें में; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधन); कारकाङ्गपयोः = कारक और अङ्ग (लग्न) के अधिपतियों की; दृष्ट्या = दृष्टि से; धनहीनः = धन-रहित; प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे द्विजोत्तम! कारक से अथवा लग्न से रन्ध्र और रिष्फ (८, १२) में जो स्थिति बनती है, तथा कारक-स्वामी और लग्नेश की दृष्टि से, जातक धनहीन उत्पन्न होता है। यहाँ दो आधार-बिन्दु दिए गए हैं — कारक-केंद्र और लग्न-केंद्र — दोनों से अष्टम-द्वादश का दोष। कारक-अङ्गप की दृष्टि उस धन-हीनता के फल को बाँधती है, ऐसा संवाद-शैली का फल-कथन है।

English rendering The text states, O best of the twice-born: whether counted from the kāraka or from the lagna, occupation of the eighth and twelfth, and the aspect of the kāraka-lord and the lagna-lord, is said to produce one born without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कारक/लग्न से ८–१२ दोष + दृष्टि)। तकनीकी ढाँचा: भाव-गणना दो केंद्रों से — (i) लग्न = भाव १; (ii) कारक-राशि = भाव १ (कारक-चक्र)। रन्ध्र = केंद्र+७, रिष्फ = केंद्र+११ (मॉड १२, १-आधारित)। दृष्टि: ग्रह-दृष्टि नियम (पूर्ण/विशेष) घोषित करें। “कारक” किस परिभाषा (आत्मकारक/धनकारक आदि) — अध्याय-सन्दर्भ/पाठ-भेद संभव।

42.15
कारकेशो व्ययं स्वस्मात् लग्नेशो लग्नतो व्ययम् |
वीक्षते चेत् तदा बालो व्ययशीलो भवेद्ध्रुवम्
kārakeśo vyayaṃ svasmāt lagneśo lagnato vyayam |
vīkṣate cet tadā bālo vyayaśīlo bhaveddhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकेश = कारक (संबंधित कारक-ग्रह/भाव) का अधिपति; व्ययम् = द्वादश भाव (व्यय-स्थान); स्वस्मात् = अपने स्थान से; लग्नेश = लग्न-स्वामी; लग्नतः = लग्न से; वीक्षते = दृष्टि डाले / देखे; व्ययशीलः = व्यय-प्रवृत्ति वाला; ध्रुवम् = शास्त्र-कथन में “निश्चय” का बल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि कारकेश अपने स्थान से व्यय-भाव को देखे, और लग्नेश भी लग्न से व्यय-भाव को देखे, तो वह बालक व्ययशील होता है। दोनों अधिपतियों की व्यय-दृष्टि यहाँ व्यय-प्रवृत्ति के योग का संकेत है। यह फल-कथन है, न कि नियति की घोषणा।

English rendering The text states that if the lord of the kāraka aspects the twelfth from itself, and the lagna-lord aspects the twelfth from the lagna, the child is said to be expenditure-prone. The certainty-word dhruvam belongs to the śāstra’s own phrasing of the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-योग)। दृष्टि यहाँ शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि का नियम है (पूर्ण/विशेष दृष्टि यथा-शास्त्र); व्यय = 12वाँ भाव; गणना नहीं, केवल योग-शर्त।

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42.16
अथ दारिद्र्ययोगांस्त् कथयामि सभङ्गकान् |
धनसंस्थौ तु भौमार्की कथितौ धननाशकौ
atha dāridryayogāṃst kathayāmi sabhaṅgakān |
dhanasaṃsthau tu bhaumārkī kathitau dhananāśakau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; दारिद्र्य-योगान् = निर्धनता/दरिद्रता के योग; सभङ्गकान् = भङ्ग (निवृत्ति/खंडन) सहित; कथयामि = कहता हूँ; धनसंस्थौ = धन-भाव (द्वितीय) में स्थित दोनों; भौमार्की = भौम (मंगल) और अर्की/अर्क-संबंधी युगल (पाठ: मंगल–सूर्य अथवा मंगल–शनि — पाठ-भेद संभव); धननाशकौ = धन-नाशक (दोनों)

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य दारिद्र्य-योगों को उनके भङ्गों सहित कहने का उपक्रम करते हैं। धन-स्थान में स्थित भौमार्की-युगल को शास्त्र धन-नाशक कहता है। अगले श्लोक उसी युगल के बुध-दृष्टि भङ्ग और सूर्य–यम संबंध की शर्तें जोड़ते हैं।

English rendering The sage now undertakes to state the poverty-yogas together with their cancellations (bhaṅga). Mars paired with the co-named planet (bhaumārkī — reading contested: Mars–Sun or Mars–Saturn) placed in the second house are declared destroyers of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अध्याय-प्रस्तावना। “धनसंस्थ” = D1 में द्वितीय भाव की स्थिति; भङ्ग आगे बुध-दृष्टि आदि शर्तों से (अगले श्लोक)।

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42.17
बुधेक्षितौ महावित्तं कुरुतो नात्र संशयः |
निःस्वतां कुरुते तत्र रविर्नित्यं यमेक्षितः
budhekṣitau mahāvittaṃ kuruto nātra saṃśayaḥ |
niḥsvatāṃ kurute tatra ravirnityaṃ yamekṣitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध-ईक्षितौ = बुध द्वारा दृष्ट दोनों; महावित्तम् = अत्यंत धन; कुरुतः = करते हैं (द्विवचन); नात्र संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र-वचन); निःस्वताम् = निःस्व/दरिद्र अवस्था; रविः = सूर्य; नित्यम् = सदैव / नियमतः; यम-ईक्षितः = यम (शनि) द्वारा दृष्ट

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्वोक्त दोनों यदि बुध से दृष्ट हों तो महावित्त करते हैं; इसमें संशय नहीं। किंतु वहीं सूर्य जब शनि (यम) से दृष्ट हो, तो निःस्वता का फल कहा गया है। एक ही स्थान-संदर्भ में बुध-दृष्टि भङ्ग है, सूर्य–शनि दृष्टि दारिद्र्य-पक्ष।

English rendering The text states that the same pair, when aspected by Mercury, produce great wealth—no doubt is admitted in the wording. There, however, the Sun constantly aspected by Yama (Saturn) is said to cause destitution (niḥsvatā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-भङ्ग + दारिद्र्य-शर्त)। जाँच-बिंदु: (1) पूर्व-श्लोक का युगल धन-भाव में; (2) बुध की शास्त्रीय दृष्टि उन पर; (3) सूर्य पर शनि-दृष्टि—तीनों शर्तें भाव-फल के द्वार हैं, संख्यात्मक गुणांक नहीं।

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42.18
महाधनयुतं ख्यातं शन्यदृष्टः करोत्यसौ |
शनिश्चापि रवेर्दृष्ट्या फलमेवं प्रयच्छति
mahādhanayutaṃ khyātaṃ śanyadṛṣṭaḥ karotyasau |
śaniścāpi raverdṛṣṭyā phalamevaṃ prayacchati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाधन-युतम् = महाधन से युक्त; ख्यातम् = प्रसिद्ध/ख्यात; शनि-अदृष्टः = शनि से अदृष्ट; करोति असौ = वह (सूर्य/संदर्भित ग्रह) करता है; शनिः चापि = और शनि भी; रवेः दृष्ट्या = सूर्य की दृष्टि से; फलम् एवम् = वैसा ही फल; प्रयच्छति = देता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जो (सूर्य/संदर्भित ग्रह) शनि से अदृष्ट हो, वह महाधन-युक्त और ख्यात बनाता है। शनि भी सूर्य की दृष्टि से वैसा ही फल देता है—अर्थात् सूर्य–शनि संबंध की दिशा/दृष्टि-शर्त फल को पलट या सम कर सकती है। यह पारस्परिक दृष्टि-फल का कथन है, न कि निश्चयात्मक नियति।

English rendering The text states that the one not aspected by Saturn makes the native endowed with great wealth and renown. Saturn, for his part, when aspected by the Sun, is said to grant the same kind of result—so the Sun–Saturn aspect relation is the operative condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-अभाव / पारस्परिक दृष्टि)। शर्त-सार: शनि-अदृष्ट → महाधन+ख्याति (शास्त्र); शनि + रवि-दृष्टि → “एवम् फल”—दोनों ओर दृष्टि-नियम D1 पर लागू; अयनांश/भाव-पद्धति फल-भाषा नहीं बदलती, केवल ग्रह-देशांतर की दृष्टि-जाँच में घोषित करनी होती है।

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अध्यायः 43

अथायुर्दायाध्यायः

78 श्लोक

सूचना · Note. ये ग्रन्थ के ऐतिहासिक आयु/मृत्यु-कथन हैं, चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं; स्वास्थ्य की चिन्ता हो तो चिकित्सक से मिलें। · Historical statements of the text about lifespan and death, not medical predictions; for any health concern, see a doctor.

43.1
धनाध्नाख्ययोगौ च कथितौ भवता मुने |
नराणामायुषो ज्ञानं कथयस्व महामते
dhanādhnākhyayogau ca kathitau bhavatā mune |
narāṇāmāyuṣo jñānaṃ kathayasva mahāmate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनाध्न-आख्य-योगौ = धन–अधन नामक योग-युगल; कथितौ = (पहले) कहे जा चुके; भवता = आपके द्वारा; मुने = हे मुने; नराणाम् = मनुष्यों के; आयुषः ज्ञानम् = आयु-ज्ञान; कथयस्व = कहिए; महामते = हे महामति।

हिन्दी भावार्थ शिष्य मुनि से कहता है — आपने धन–अधन नामक योगों का वर्णन कर दिया। अब हे महामति मुने, मनुष्यों की आयु का ज्ञान भी स्पष्ट कीजिए। अध्याय का द्वार यहीं से खुलता है: योग-फल के बाद आयुर्दाय की विधि।

English rendering “O sage, you have already set forth the pair of yogas called wealth and non-wealth. Now, O great-minded one, please teach the knowledge of the lifespan of human beings.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अध्याय-प्रवेश। यह श्लोक प्रश्न है; गणना 43.5 के बाद पिण्डायु से आरम्भ होती है।

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43.2
साधु पृष्टं त्वया विप्र जनानां च हितेच्छया |
कथयाम्यायुषो ज्ञानं दुर्ज्ञेयं यत् सुरैरपि
sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vipra janānāṃ ca hitecchayā |
kathayāmyāyuṣo jñānaṃ durjñeyaṃ yat surairapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु पृष्टम् = सुन्दर/उचित प्रश्न; त्वया = आपके द्वारा; विप्र = हे ब्राह्मण; जनानाम् हित-इच्छया = लोक-हित की इच्छा से; कथयामि = मैं कहता हूँ; आयुषः ज्ञानम् = आयु-ज्ञान; दुर्ज्ञेयम् = कठिनज्ञेय; यत् = जो; सुरैः अपि = देवों के लिए भी।

हिन्दी भावार्थ आचार्य उत्तर देते हैं — हे विप्र, लोक-हित चाहकर आपने ठीक पूछा। मैं वही आयु-ज्ञान कहूँगा जो देवों के लिए भी दुर्ज्ञेय कहा गया है। स्वर गम्भीर है: आयुर्दाय को साधारण फल-कथन नहीं, गहन गणित-विधि माना गया है।

English rendering “Well have you asked, O brāhmaṇa, out of desire for the welfare of people. I shall set forth the knowledge of lifespan — that which is hard to know even for the gods.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / गुरु-प्रतिवचन। शास्त्र आयु-ज्ञान को “दुर्ज्ञेय” कहकर उसकी पद्धति-गम्भीरता सूचित करता है, न कि भय।

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43.3
आयुर्ज्ञानविभेदास्तु बहुभिर्बहुधोदिताः |
तेषां सारांशमादाय प्र्वदामि तवाऽग्रतः
āyurjñānavibhedāstu bahubhirbahudhoditāḥ |
teṣāṃ sārāṃśamādāya prvadāmi tavā'grataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुर्ज्ञान-विभेदाः = आयु-ज्ञान के भेद/पद्धति-भेद; बहुभिः = अनेक आचार्यों द्वारा; बहुधा उदिताः = अनेक प्रकार से कहे गए; तेषाम् सार-अंशम् आदाय = उनका सार लेकर; प्रवदामि = कहता हूँ; तव अग्रतः = आपके सामने।

हिन्दी भावार्थ आयु-ज्ञान की अनेक शाखाएँ अनेक मतों से कही गई हैं। आचार्य कहते हैं — मैं उनका सारांश लेकर आपके सम्मुख प्रस्तुत करता हूँ। यह श्लोक पाठ-परम्परा की बहुलता स्वीकार करता है और आगे “सार” पद्धति का वचन देता है।

English rendering “Many distinctions of lifespan-knowledge have been taught by many teachers in many ways. Taking the essence of those, I shall declare it before you.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद्धति-परिचय। शास्त्र स्वयं बहु-मत स्वीकार करता है; आगे पिण्डायु आदि को “सार” के रूप में क्रमबद्ध किया जाएगा — पाठ-भेद संभव जहाँ अन्य संस्करण भिन्न क्रम देते हैं।

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43.4
स्वोच्चनीचादिसंस्थित्या ग्रहा आयुःप्रदायकाः |
स्वस्ववीर्यवशैर्नैवं नक्षत्राण् च राशयः
svoccanīcādisaṃsthityā grahā āyuḥpradāyakāḥ |
svasvavīryavaśairnaivaṃ nakṣatrāṇ ca rāśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-उच्च-नीच-आदि-संस्थित्या = अपने उच्च, नीच आदि स्थानों की स्थिति से; ग्रहाः = ग्रह; आयुः-प्रदायकाः = आयु-दाता; स्व-स्व-वीर्य-वशैः = केवल अपने-अपने बल/वीर्य के वश से; न एवम् = ऐसे नहीं; नक्षत्राणि च राशयः = नक्षत्र और राशियाँ भी (उसी रीति से मात्र नहीं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ग्रह आयु देते हैं मुख्यतः उच्च–नीच आदि स्थिति के अनुसार। केवल “अपना बल/वीर्य” देखकर आयु नहीं बाँधी जाती; नक्षत्र और राशि भी उसी एकांगी रीति से आयु-दाता नहीं माने गए। आयुर्दाय की कुंजी: स्थान-गुण (उच्च/नीच/मध्य) → वर्ष-परिमाण।

English rendering “The planets become givers of lifespan according to their placement in exaltation, debilitation, and the like — not merely by the force of their own strength alone; nor do the lunar mansions and the signs, in that same one-sided way.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नियम-स्थापना (आयु-दातृत्व का आधार)। आगे 43.6–43.7 में उच्च = पूर्ण पिण्ड, नीच = अर्ध, मध्य = अनुपात — यही “संस्थिति” का संख्यात्मक रूप है।

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43.5
पिण्डायुः प्रथमं तत्र ग्रहस्थितिवशादहम् |
कथयामि द्विजश्रेष्ठ श्रणुष्वेकाग्रमानसः
piṇḍāyuḥ prathamaṃ tatra grahasthitivaśādaham |
kathayāmi dvijaśreṣṭha śraṇuṣvekāgramānasaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिण्ड-आयुः = पिण्डायु (ग्रह-स्थिति से प्राप्त आयु-खण्ड); प्रथमम् = सबसे पहले; तत्र = उस विषय में; ग्रह-स्थिति-वशात् = ग्रह-स्थितियों के अनुसार; अहम् कथयामि = मैं कहता हूँ; द्विजश्रेष्ठ = हे द्विजश्रेष्ठ; श्रृणुष्व = सुनो; एकाग्र-मानसः = एकाग्र मन से।

हिन्दी भावार्थ आचार्य क्रम बाँधते हैं — आयु-ज्ञान में प्रथम पिण्डायु। मैं द्विजश्रेष्ठ, ग्रह-स्थिति के वश से इसे कहूँगा; एकाग्र मन से सुनो। पिण्डायु = प्रत्येक ग्रह के उच्च/नीच/मध्य से मिले वर्ष-पिण्डों का योग (आगे श्लोकों में संख्याएँ)।

English rendering “First among these, O best of the twice-born, I shall explain piṇḍāyu according to the planets’ positions; listen with a one-pointed mind.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-क्रम की घोषणा। पिण्डायु = Σ (प्रत्येक ग्रह का आयु-वर्ष Yᵢ), जहाँ Yᵢ उच्च/नीच/अनुपात से मिलता है (43.6–43.7)। अन्य आयु-भेद (अंशायु, निसर्गायु आदि) इसी अध्याय-क्रम में बाद में आते हैं — पाठ-भेद संभव।

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43.6
क्रमात् सूर्यादिखेटेषु स्वस्वोच्चस्थानगेष्विह |
नन्देन्दवस्तच्वमितास्तिथयोऽर्काः शरेन्दवः
kramāt sūryādikheṭeṣu svasvoccasthānageṣviha |
nandendavastacvamitāstithayo'rkāḥ śarendavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से; सूर्य-आदि-खेटेषु = सूर्य से आरम्भ ग्रहों में; स्व-स्व-उच्च-स्थान-गेषु = अपने-अपने उच्च स्थान पर स्थित होने पर; इह = यहाँ; नन्द-इन्दवः = नन्द(9)+इन्दु(1) → 19; तत्त्व-मिताः = तत्त्व(=25) मापित → 25 (पाठ: तच्व ≈ तत्त्व; पाठ-भेद संभव); तिथयः = 15; अर्काः = 12 (द्वादश आदित्य); शर-इन्दवः = शर(5)+इन्दु(1) → 15।

हिन्दी भावार्थ सूर्यादि ग्रह जब अपने-अपने उच्च पर हों, तो आयु-वर्ष क्रमशः भूतसंख्या से बाँधे गए हैं। शास्त्र कहता है — सूर्य 19, चन्द्र 25, मङ्गल 15, बुध 12, गुरु 15 वर्ष का पूर्ण पिण्ड। यह उच्चस्थ “पूर्ण” माप है; नीच/मध्य का नियम अगले श्लोक में है।

English rendering “In order, for the planets beginning with the Sun, when each stands in its own exaltation, the years are: nineteen, twenty-five, fifteen, twelve, and fifteen — fixed by word-numerals.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या → वर्ष (उच्चस्थ पूर्ण पिण्ड), सूर्यादि क्रम:

| ग्रह (क्रमात्) | शब्द-संख्या | Y_ucca (वर्ष) |
|---|---|---|
| सूर्य | नन्देन्दवः (9,1 → 19) | 19 |
| चन्द्र | तत्त्वमिताः (25) | 25 |
| मङ्गल | तिथयः (15) | 15 |
| बुध | अर्काः (12) | 12 |
| गुरु | शरेन्दवः (5,1 → 15) | 15 |

अङ्कानां वामतो गतिः: पहले पद की इकाई, दूसरे की दहाई — नन्द+इन्दु → 19; शर+इन्दु → 15। शुक्र–शनि के पूर्ण अंक 43.7 में; “तच्व” = तत्त्व — पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) नियम: sidereal ग्रह-रेखांश; उच्च-बिन्दु शास्त्रीय (सूर्य मेष 10°, चन्द्र वृष 3°, कुज मकर 28°, बुध कन्या 15°, गुरु कर्क 5°)।
यदि पाँचों उच्च पर हों:
Y = 19 + 25 + 15 + 12 + 15 = 86 वर्ष (केवल सूर्य→गुरु; शुक्र–शनि अलग)।
यदि केवल सूर्य उच्च पर, शेष बाद के नियम से — पूर्ण योग 43.7 के साथ।

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43.7
प्रकृयतो विंशतिश्चाब्दा आयुःपिण्डाः प्रकीर्तिताः |
नीचगेष्वेतदर्धञ्च ज्ञेयं मध्येऽनुपाततः
prakṛyato viṃśatiścābdā āyuḥpiṇḍāḥ prakīrtitāḥ |
nīcageṣvetadardhañca jñeyaṃ madhye'nupātataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रकृयतो = (पाठ अस्पष्ट/संकर; पाठ-भेद संभव) — परम्परा में प्रायः शुक्र का 21 वर्ष इस स्थान पर जुड़ता है; विंशतिः च = और बीस; अब्दाः = वर्ष; आयुः-पिण्डाः = आयु के पिण्ड; प्रकीर्तिताः = कहे गए; नीच-गेषु = नीचस्थ हों तो; एतत्-अर्धम् = इसका आधा; च = और; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; मध्ये = मध्य स्थिति में; अनुपाततः = अनुपात से।

हिन्दी भावार्थ आयु-पिण्ड वर्ष रूप में घोषित हैं; विंशति = 20 स्पष्ट है। “प्रकृयतो” पाठ संदिग्ध है — पाठ-भेद संभव। शास्त्र का गणित-नियम दोहरी स्पष्टता से कहता है: नीच पर उन्हीं पिण्डों का आधा; उच्च–नीच के बीच अनुपात से। पूर्ण–अर्ध–अनुपात — यही पिण्डायु की केन्द्रीय तकनीक है।

English rendering “These lifespan-piṇḍas are declared in years — twenty is explicit here (the preceding word-numeral is textually uncertain). When the planets stand in debilitation, half of those amounts is to be taken; in intermediate positions, by proportion.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1) पूर्ण पिण्ड (उच्च): 43.6 से Y☉=19, Y☽=25, Y♂=15, Y☿=12, Y♃=15; यहाँ विंशति = 20 स्पष्ट (शनि-परम्परा से मेल; शुक्र का 21 — “प्रकृयतो” पर पाठ-भेद संभव, अंक को बलपूर्वक न थोपें)।
2) नीच: Y_nīca = Y_ucca ÷ 2
3) मध्य (अनुपात): उच्च-बिन्दु से नीच-बिन्दु (≈ 180°) तक रैखिक अनुपात।
ग्रह का उच्च से कोणीय अन्तर θ ∈ [0°, 180°] हो तो एक सीधा पाठ-संगत रूप:
Y(θ) = Y_ucca × (1 − θ/360°)
→ θ = 0° ⇒ पूर्ण Y; θ = 180° ⇒ Y/2 — श्लोक के “अर्ध / अनुपात” से मेल।
(θ > 180° पर कुछ पद्धतियाँ 360°−θ लेती हैं — पद्धति घोषित करें; पाठ स्वयं केवल अनुपात कहता है।)

उदाहरण (worked example)
सूर्य: Y_ucca = 19 वर्ष; उच्च = मेष 10°।
- सूर्य मेष 10° (उच्च): Y = 19
- सूर्य तुला 10° (नीच, θ = 180°): Y = 19 ÷ 2 = 9.5 वर्ष
- सूर्य कर्क 10° (θ = 90° उच्च से):
Y = 19 × (1 − 90/360) = 19 × (1 − 1/4) = 19 × 3/4 = 14.25 वर्ष

सप्त ग्रहों के Yᵢ योग = पिण्डायु (वर्ष)। अन्य आयु-विधियाँ (अंशायु आदि) अलग सूत्र हैं; यहाँ केवल पिण्डायु का उच्च–नीच–अनुपात नियम है।

43.8
स्वच्चशुद्धौ ग्रहः शोध्यः षड्भादूनो भमण्ड्लात् |
स्वपिण्डगुणितो भक्तो भादिमानेन वत्सराः
svaccaśuddhau grahaḥ śodhyaḥ ṣaḍbhādūno bhamaṇḍlāt |
svapiṇḍaguṇito bhakto bhādimānena vatsarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-उच्च-शुद्धौ = स्वराशि या उच्च में शुद्ध स्थिति; ग्रहः शोध्यः = ग्रह शोध्य/शोधनीय; षड्-भा-अदूनः = षड्-भाग (६ राशि) से न्यून; भ-मण्डलात् = राशि-चक्र (१२ राशि / ३६०°) से; स्व-पिण्ड-गुणितः = स्व-पिण्ड से गुणा; भक्तः = विभाजित; भा-आदि-मानेन = राशि-आदि मान (१२) से; वत्सराः = वर्ष-फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब ग्रह स्वराशि या उच्च में शुद्ध स्थिति में हो, तो उसकी आयु-गणना के लिए भ-मण्डल से षड्-भाग घटाकर शोध्य राशि ली जाए। उस शोध्य परिमाण को ग्रह के स्व-पिण्ड से गुणा कर भा-आदि-मान (राशि-चक्र का माप १२) से भाग देने पर वर्ष प्राप्त होते हैं। यह पिण्डायुर्दाय की आधार-सूत्र-पंक्ति है — स्थिति “शुद्ध” हो तभी यह शोधन-क्रम लागू होता है।

English rendering The text states that when a planet is pure in its own sign or exaltation, its arc is to be taken as reduced by six signs from the circle of signs; that quantity, multiplied by the planet’s own piṇḍa and divided by the measure of the signs (12), yields the years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
शुद्ध (स्व/उच्च) ग्रह के लिए:
शुद्ध_अर्क = (भ-मण्डल − ६ राशि) पर आधारित शोध्य परिमाण
(अर्थात् चक्र १२ राशि = ३६०°; षड्-भा = ६ राशि = १८०° — शोधन षड्भादून नियम से)
वर्ष = (शोध्य_परिमाण × स्व_पिण्ड) ÷ भा-आदि-मान
जहाँ भा-आदि-मान = १२ (राशि-माप)।
(पिण्ड-मान स्वयं इसी अध्याय की पूर्व-पंक्तियों से लिए जाते हैं; यहाँ केवल गुणन-भाग सूत्र दिया है। पाठ-भेद संभव जहाँ “षड्भादून” की दिशा/अर्थ पर टीकाएँ भिन्न हों।)

उदाहरण (worked example)
मान लें किसी ग्रह का स्व-पिण्ड = २० वर्ष, और शुद्ध-स्थिति में शोध्य परिमाण = ४ राशि (षड्भादून-शोधन के बाद)।
वर्ष = (४ × २०) ÷ १२ = ८० ÷ १२ = ६ + ८/१२ वर्ष ≈ ६ वर्ष ८ मास।
(पिण्ड का संख्या-मान इस पद्य में नहीं है — अध्याय के पिण्ड-श्लोक से लें; अयनांश/गृह-पद्धति यहाँ नहीं लगती — केवल राशि-चाप और पिण्ड।)

43.9
अस्तगस्तु हरेत्स्वार्ध विना शुक्रशनैश्चरौ |
वक्रचारं विना त्र्यांशां शज्ञुराशौ हरेद् ग्रहः
astagastu haretsvārdha vinā śukraśanaiścarau |
vakracāraṃ vinā tryāṃśāṃ śajñurāśau hared grahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्तगः = अस्त/दग्ध ग्रह; हरेत् = हरण करे; स्व-अर्धम् = स्व-आयु का आधा; विना शुक्र-शनैश्चरौ = शुक्र और शनि को छोड़कर; वक्र-चारम् = वक्र गति; विना = छोड़कर / उस दशा को छोड़; त्र्य-अंशाम् = तिहाई भाग; शत्रु-राशौ = शत्रु-राशि में; हरेद् ग्रहः = ग्रह हरण करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अस्तगत ग्रह अपनी आयु का आधा हरण कर लेता है — शुक्र और शनि इस अस्त-हरण से मुक्त रखे गए हैं। वक्र-चार की विशेष स्थिति को छोड़कर, शत्रु-राशि स्थित ग्रह अपनी आयु का तृतीयांश हरण करता है। ये हरण (reductions) पिण्ड/निसर्ग आयु पर लगने वाले संशोधन हैं, न कि स्वतंत्र “भविष्यवाणी”।

English rendering The text states that a combust planet takes away half its own years — except Venus and Saturn. Leaving aside the special case of retrograde motion, a planet in an enemy’s sign takes away one-third of its years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
अस्त-हरण (शुक्र, शनि वर्जित):
आयु′ = आयु × ½
शत्रु-राशि-हरण (वक्र-चार को छोड़कर, पाठानुसार):
आयु′ = आयु × (१ − ⅓) = आयु × ⅔
अर्थात् हृत_भाग = आयु/३।
(“वक्रचारं विना” का अन्वय पाठ-भेद संभव — कोई टीका वक्र को हरण से मुक्त रखती है, कोई पृथक् नियम जोड़ती है; यहाँ पद-क्रम के अनुसार शत्रु-हरण के साथ जोड़ा गया।)

उदाहरण (worked example)
मान लें मंगल की कच्ची आयु-योग्यता = १५ वर्ष।
(क) अस्त + शत्रु-राशि नहीं: आयु′ = १५ × ½ = ७.५ वर्ष।
(ख) केवल शत्रु-राशि (अस्त नहीं, वक्र नहीं): आयु′ = १५ × ⅔ = १० वर्ष।
(ग) शुक्र अस्त हो: इस श्लोक के अनुसार अस्त-हरण नहीं — आयु′ = पूर्ण (अन्य हरण अलग)।

43.10
सर्वार्धत्रिचतुःपञ्चषष्ठभागं क्रमाद् ग्रहः |
व्ययाद्वामं स्थितः पापो हरेत् सौम्यश्च तद्दलम्
sarvārdhatricatuḥpañcaṣaṣṭhabhāgaṃ kramād grahaḥ |
vyayādvāmaṃ sthitaḥ pāpo haret saumyaśca taddalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-अर्ध-त्रि-चतुः-पञ्च-षष्ठ-भागम् = पूरा, आधा, तिहाई, चौथाई, पाँचवाँ, छठा भाग; क्रमात् = क्रम से; ग्रहः = ग्रह; व्ययात् = व्यय (१२वें) भाव से; वामम् = वाम/बायीं ओर गिनकर; स्थितः = स्थित; पापः = पाप-ग्रह; हरेत् = हरे; सौम्यः = शुभ-ग्रह; च तद्-दलम् = और उसका आधा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्यय-भाव से वाम क्रम में स्थित पाप-ग्रह क्रमशः पूर्ण, आधा, तिहाई, चौथाई, पाँचवाँ और छठा भाग आयु का हरण करते हैं। उसी स्थान पर सौम्य (शुभ) ग्रह पाप के हरण का केवल आधा भाग हरण करता है। यह भाव-स्थित हरण-क्रम लग्नायु/पिण्डायु के योग पर लगता है।

English rendering The text states that a malefic placed counting leftward from the 12th house takes away, in order, the whole, half, a third, a fourth, a fifth, and a sixth part; a benefic in the same places takes half of that reduction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
व्यय (१२) से वाम क्रम → भाव-क्रम: १२, ११, १०, ९, ८, ७
पाप-हरण गुणांक h_p: १, ½, ⅓, ¼, ⅕, ⅙
शुभ-हरण गुणांक h_b = h_p / २: ½, ¼, ⅙, ⅛, 1/10, 1/12
हृत_आयु = आयु × h
शेष_आयु = आयु × (१ − h)
(गृह-पद्धति: भावाधार = लग्न से पूर्ण राशि-भाव; चतुर्थ्यादि-भेद इस श्लोक में नहीं।)

उदाहरण (worked example)
कुल कच्ची आयु = ६० वर्ष। पाप-ग्रह ११वें भाव में → h_p = ½ → हरण = ३०, शेष = ३० वर्ष।
उसी ११वें में शुभ → h_b = ¼ → हरण = १५, शेष = ४५ वर्ष।
पाप ७वें में → h_p = ⅙ → हरण = १०, शेष = ५० वर्ष।

43.11
एकभे तु बहुष्वेको हरेत्स्वांशां बली ग्रहः |
नाऽत्र क्षीणस्य चन्द्रस्य पापत्वं मुनिभिः स्मृतम्
ekabhe tu bahuṣveko haretsvāṃśāṃ balī grahaḥ |
nā'tra kṣīṇasya candrasya pāpatvaṃ munibhiḥ smṛtam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक-भे = एक राशि/भाव में; तु बहुषु = किन्तु बहुतों में; एकः = एक ही; हरेत् = हरे; स्व-अंशाम् = अपना अंश; बली ग्रहः = बली (प्रबल) ग्रह; न अत्र = यहाँ नहीं; क्षीणस्य चन्द्रस्य = क्षीण चन्द्र का; पापत्वम् = पाप-भाव; मुनिभिः स्मृतम् = मुनियों द्वारा स्मरण/मान्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि एक ही राशि (या हरण-स्थान) में अनेक ग्रह हों तो हरण केवल एक — सबसे बली — ग्रह अपने अंश के अनुसार करे, सब अलग-अलग नहीं। साथ ही यह स्पष्ट है कि क्षीण चन्द्र को यहाँ पाप नहीं माना गया; मुनि-स्मृति में उसका पापत्व इस हरण-प्रसंग में निषिद्ध है। बल-निर्णय के लिए षड्बल आदि पृथक् नियम अध्यायान्तर से आते हैं।

English rendering The text states that when several planets occupy one sign, only the single strongest planet takes away its own share. The sages do not reckon the waning Moon as a malefic in this context.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
एक राशि/स्थान पर ग्रह-समुच्चय G = {g₁…gₙ}
हरण-कर्ता = argmax बल(gᵢ) (एक ही)
हृत = स्व_अंश(बली) — शेष ग्रह उस स्थान से हरण नहीं करते।
क्षीण-चन्द्र ∉ पाप-वर्ग (इस हरण-नियम के लिए)।
(बल-तुलना का विस्तृत सूत्र इस पद्य में नहीं; “बली” को शास्त्रीय बल-क्रम/षड्बल से निर्धारित करें।)

उदाहरण (worked example)
भाव १२ में शनि, मंगल, बुध। मान लें षड्बल: शनि ६.२ रूप, मंगल ४.१, बुध ५.० रूप → केवल शनि हरण करे (व्यय-स्थान → h_p = १, पूर्ण अंश)। मंगल-बुध से अतिरिक्त हरण नहीं। क्षीण चन्द्र वहीं हो तो भी पाप-हरण-कर्ता नहीं गिना जाता।

43.12
लग्नांशलिप्तिका हत्वा प्रत्येकं विहगायुषा |
भाज्या मण्डललिप्ताभिर्लब्धं वर्षादि शोधयेत्
lagnāṃśaliptikā hatvā pratyekaṃ vihagāyuṣā |
bhājyā maṇḍalaliptābhirlabdhaṃ varṣādi śodhayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-अंश-लिप्तिकाः = लग्न के अंश की लिप्ता (कला); हत्वा = गुणा करके; प्रत्येकम् = प्रत्येक को; विहग-आयुषा = ग्रह-आयु से; भाज्याः = भाग देय; मण्डल-लिप्ताभिः = चक्र की लिप्ताओं से; लब्धम् = प्राप्त; वर्षादि = वर्ष आदि; शोधयेत् = शोधित/संशोधित करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न की अंश-लिप्ता को प्रत्येक ग्रह की आयु से गुणा करें, फिर मण्डल की कुल लिप्ताओं से भाग दें; जो वर्ष-आदि लब्ध हों, उन्हें शोधित मानें। यह लग्न-चाप के अनुपात से ग्रह-आयु का समानुपातिक शोधन है — पूर्ण चक्र के अंश जितना लग्न “खपा” चुका, उतना अनुपात आयु में संशोधित होता है।

English rendering The text states: multiply the arcminutes of the lagna’s degree-portion by each planet’s years of life; divide by the arcminutes of the full circle; the years and lesser units so obtained are to be taken as the corrected result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१ राशि = ३०°, १° = ६० लिप्ता (कला)
मण्डल = ३६०° = ३६० × ६० = २१६०० लिप्ता
लग्न_लिप्ता = लग्न की राशि-आदि से मापी गई कुल कला (०…२१६००)
शोधित_वर्ष_g = (लग्न_लिप्ता × आयु_g) ÷ २१६००
समान रूप से डिग्री में: (लग्न_° × आयु_g) ÷ ३६०
(“अंशलिप्तिका” = लग्न-स्फुट की कला-माप; कुछ पाठ लग्नांश = नवमांश आदि पढ़ते हैं — पाठ-भेद संभव; मुख्य गणित समानुपात ही है।)

उदाहरण (worked example)
लग्न = १०° वृष = मेष ०° से ४०° = ४० × ६० = २४०० लिप्ता।
किसी ग्रह की आयु = १८ वर्ष।
शोधित = (२४०० × १८) ÷ २१६०० = ४३२०० ÷ २१६०० = २ वर्ष।
(समान: ४० × १८ ÷ ३६० = २।) अयनांश: लग्न-स्फुट जिस अयनांश से बना हो, वही यहाँ स्थिर रखें।

43.13
स्वायुषो लग्नगे सूर्ये मङ्गले च शनैश्चरे |
तदर्धं शुभसंदृष्टे पातयेद् द्विजसत्तम
svāyuṣo lagnage sūrye maṅgale ca śanaiścare |
tadardhaṃ śubhasaṃdṛṣṭe pātayed dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-आयुषः = अपनी आयु से; लग्न-गे = लग्न में स्थित; सूर्ये = सूर्य; मङ्गले = मंगल; च शनैश्चरे = और शनि; तत्-अर्धम् = उसका आधा; शुभ-संदृष्टे = शुभ-दृष्ट होने पर; पातयेत् = गिराए/घटाए; द्विज-सत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे द्विजसत्तम — जब सूर्य, मंगल या शनि लग्न में हों, तो स्व-आयु से हरण/पातन करना चाहिए। यदि वे शुभ-ग्रह से दृष्ट हों, तो उस हरण का केवल आधा पातित हो। यह लग्नस्थ क्रूर-त्रय का विशेष संशोधन है; शुभ-दृष्टि हरण को मृदु करती है, समाप्त नहीं करती जब तक आधा शेष रहे।

English rendering The text states, O best of the twice-born: when the Sun, Mars, or Saturn occupies the lagna, one should deduct from their own years; if aspected by a benefic, only half that amount is to be dropped.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
यदि g ∈ {सूर्य, मंगल, शनि} और भाव(g) = लग्न:
पूर्ण_पातन: आयु′ = आयु − स्व_आयु (अर्थात् उस ग्रह का योगदान शून्य; अथवा हरण = स्व_आयु)
शुभ-दृष्टे: हरण = स्व_आयु / २, आयु′ = आयु − स्व_आयु/२
दृष्टि: शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि (पूर्ण/आंशिक नियम अध्याय दृष्टि से; यहाँ केवल “शुभसंदृष्ट” शर्त)।

उदाहरण (worked example)
शनि की स्व-आयु-योग्यता = २० वर्ष; शनि लग्न में, शुभ-दृष्टि नहीं → हरण = २० (योग से पूर्ण पातन)।
गुरु-दृष्ट शनि लग्न में → हरण = १० वर्ष।
सूर्य लग्न में, शुक्र-दृष्ट, सूर्य-आयु = १९ → हरण = ९.५ वर्ष।

43.14
लग्नराशिसमाश्चाब्दा भागाद्यैरनुपाततः |
मासादिका इतीच्छन्ति लग्नायुः केऽपि कोविदाः
lagnarāśisamāścābdā bhāgādyairanupātataḥ |
māsādikā itīcchanti lagnāyuḥ ke'pi kovidāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-राशि-समाः = लग्न-राशि के समान; च अब्दाः = और वर्ष; भाग-आद्यैः = अंश आदि से; अनुपाततः = अनुपात से; मास-आदिकाः = मास आदि; इति = इस प्रकार; इच्छन्ति = मानते/चाहते हैं; लग्न-आयुः = लग्नायु; के अपि कोविदाः = कुछ विद्वान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुछ कोविद लग्नायु को इस प्रकार लेते हैं — वर्ष लग्न-राशि की संख्या के समान, और अंश-कला आदि से अनुपात करके मास-दिन आदि। यह पूर्व-वर्णित पिण्ड/ग्रह-हरण पद्धति का विकल्प-मत है (“केऽपि कोविदाः”), सर्वसम्मत एकमात्र विधि नहीं। राशि-संख्या पूर्ण वर्ष देती है; भोगांश से निम्न इकाइयाँ निकलती हैं।

English rendering The text states that some learned authorities accept lagna-āyus thus: years equal to the lagna’s sign-number, and months and lesser units in proportion from the degrees and so on.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
लग्न-राशि क्रमांक R ∈ {१…१२} (मेष = १ … मीन = १२)
लग्न-अंश d° (० ≤ d < ३०), कला m′
वर्ष = R
मास ≈ (d / ३०) × १२ = d × ⅖
(अथवा पूर्ण: शेष_चाप_अनुपात से मास-दिन-घटी)
दिन आदि = (d के भिन्न भाग + m′/६०) के अनुपात से।
यह “इच्छन्ति…केऽपि” — वैकल्पिक कोविद-मत; मुख्य हरण-क्रम (४३.८–१३) से पृथक् शाखा।

उदाहरण (worked example)
लग्न = कन्या १८°२०′ → R = ६, d = १८ + २०/६० = १८⅓°।
वर्ष = ६।
मास ≈ १८⅓ × २/५ = ३६६/३० = १२.२ → व्यावहारिक रूप में १८° से ≈ ७.२ मास (क्योंकि ३०° = १२ मास ⇒ १° = ०.४ मास; १८° = ७.२ मास; २०′ = ⅓° ⇒ +०.१३३ मास ≈ ४ दिन)।
लग्नायु ≈ ६ वर्ष ७ मास ४ दिन (अनुपातिक; गृह/अयनांश केवल लग्न-स्फुट बनाने तक)।

43.15
लग्नादायोंऽशतुल्यः स्यादन्तरे चाऽनुपाततः |
तत्पतौ बलसंयुक्ते राशितुल्यं च भाघिपे
lagnādāyoṃ'śatulyaḥ syādantare cā'nupātataḥ |
tatpatau balasaṃyukte rāśitulyaṃ ca bhāghipe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = उदित लग्न से; आयः = आयुः / आयुर्दान; अंश-तुल्यः = अंश (भाग/अंशांक) के तुल्य; अन्तरे = मध्यान्तर में / अंश–राशि के बीच; अनुपाततः = समानुपात से (रेखीय अनुपात); तत्पतौ = उस अंश/भाग के स्वामी में; बल-संयुक्ते = बल से युक्त होने पर; राशि-तुल्यम् = पूर्ण राशि-संख्या के तुल्य; भाग-अधिपे = भाग (अंश) के अधिपति में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न से आयु का आधार अंश-तुल्य माना जाए; और जहाँ स्थिति दो सीमाओं के बीच हो, वहाँ अनुपात से निकाला जाए। जब उस अंश/भाग का स्वामी बल से युक्त हो, तब राशि-तुल्य गणना का विधान है; भाग-अधिप के सन्दर्भ में भी यही बल-सम्बद्ध नियम लागू होता है। यह फल-सूत्र नहीं, आयुर्दाय की सीमा-रेखा और अनुपात का नियम है।

English rendering The text states that longevity reckoned from the Lagna is equal to the aṃśa (degree/portion), and that intermediate cases are obtained by proportion. When the lord of that portion is endowed with strength, the measure becomes equal to the rāśi (sign-count), and likewise with reference to the lord of the bhāga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो पैमाने: (1) अंश-तुल्य आयु = f(अंश), (2) राशि-तुल्य आयु = f(राशि)। अन्तराल में अनुपात (linear interpolation):
यदि x अंश-सीमा और राशि-सीमा के बीच हो, तथा बल-संकेत s ∈ {दुर्बल → अंश-पक्ष, बलवत् → राशि-पक्ष},
तो आयु ≈ अंश-मान + θ × (राशि-मान − अंश-मान), जहाँ θ ∈ [0, 1] बल/स्थिति के अनुपात से। “बल” यहाँ शास्त्रीय बल-योग्यता है; संख्यात्मक रूप से षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्; 1 रूप = 60 विरूप) से मापा जा सकता है — किन्तु यह श्लोक स्वयं रूप/विरूप नहीं देता, केवल बल-संयोग की शर्त देता है।

उदाहरण (worked example) मान लें अंश-तुल्य सीमा = 30 वर्ष, राशि-तुल्य सीमा = 60 वर्ष। यदि भाग-स्वामी स्पष्ट बलवान् (θ ≈ 1) हो, तो शास्त्र-विधान के अनुसार राशि-तुल्य ≈ 60 वर्ष; यदि दुर्बल (θ ≈ 0) हो तो ≈ 30 वर्ष; मध्यम बल (θ = 1/2) पर अनुपात से ≈ 45 वर्ष। (ayanāṃśa/house-system यहाँ प्रत्यक्ष नहीं; “बल” का माप चुनी हुई बला-पद्धति पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक आयु को अंश ↔ राशि सीमाओं के बीच अनुपात से बाँधता है और “बल-संयुक्त” शर्त देता है। हमारी षड्बल-इंजीनियरिंग (स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्, रूप–विरूप) ठीक उसी “बल” को संख्या में उतारती है; आयु-फल को हम भविष्यवाणी नहीं मानते — केवल शास्त्र का सूत्र + मापनीय बल।

43.16
अथ विप्र निसर्गायुः खेटानां कथयाम्यहम् |
चन्द्रारज्ञसितेज्यार्कशनीनां क्रमशोब्दका
atha vipra nisargāyuḥ kheṭānāṃ kathayāmyaham |
candrārajñasitejyārkaśanīnāṃ kramaśobdakā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; विप्र = हे ब्राह्मण (मaitreya-सम्बोधन); निसर्ग-आयुः = नैसर्गिक आयु; खेटानाम् = ग्रहों की; कथयामि अहम् = मैं कहता हूँ; चन्द्र = चन्द्र; आर = मङ्गल; ज्ञ = बुध; सित = शुक्र; इज्य = बृहस्पति; अर्क = सूर्य; शनि = शनि; क्रमशः = क्रम से; अब्दकाः = वर्ष (अब्द)।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र निसर्गायु का आरम्भ करता है — ग्रहों की नैसर्गिक आयु-वर्ष-संख्या। क्रम स्पष्ट है: चन्द्र, मङ्गल, बुध, शुक्र, गुरु, सूर्य, शनि। अगले श्लोक में इन्हीं के वर्ष भुतसंख्य/अंक-शब्दों से दिए जाते हैं। यह विंशोत्तरी से भिन्न पद्धति है: जन्म से क्रमशः नैसर्गिक दशाएँ।

English rendering “Now, O Brāhmaṇa, I shall declare the nisarga-āyus of the planets.” The order of the planets is Moon, Mars, Mercury, Venus, Jupiter, Sun, and Saturn — whose year-spans follow in sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) निसर्गायु-क्रम (planet index i = 0…6):
चन्द्र → मङ्गल → बुध → शुक्र → गुरु → सूर्य → शनि।
वर्ष-मान Y_i अगले श्लोक में; जन्म-काल से क्रमिक दशा: पहले Y_0 वर्ष चन्द्र, फिर Y_1 मङ्गल, …। योग Σ Y_i अगले श्लोक से 120 वर्ष बनता है।

43.17
एकद्वयंकनखा धृत्यः कृतिः पंचाशदेव हि |
जन्मकालात् क्रमाज् ज्ञेया दशाश्चैता निसर्गजाः
ekadvayaṃkanakhā dhṛtyaḥ kṛtiḥ paṃcāśadeva hi |
janmakālāt kramāj jñeyā daśāścaitā nisargajāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक = 1; द्वय = 2; अंक = 9 (अङ्क = 1…9 की संख्या); नख = 20 (नख = हाथ–पाँव के 20 नख); धृति = 18; कृति = यहाँ सूर्य-वर्ष 20 (पारम्परिक निसर्गायु; शाब्दिक भुतसंख्य में कृति कभी 22 भी — पाठ/परम्परा से 20); पञ्चाशत् = 50; एव हि = ही/निश्चय; जन्म-कालात् = जन्म-समय से; क्रमात् = क्रम से; ज्ञेयाः = जाननी चाहिए; दशाः = दशाएँ; एताः = ये; निसर्ग-जाः = निसर्ग से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — निसर्गायु के वर्ष क्रमशः 1, 2, 9, 20, 18, 20, 50 हैं (चन्द्र से शनि तक, पूर्व श्लोक का क्रम)। ये दशाएँ जन्म-काल से उसी क्रम में गिनी जाएँ। कुल योग 120 वर्ष है। “कृति” का शाब्दिक भुतसंख्य-मान कहीं 22 भी मिलता है; इस अध्याय की स्थापित निसर्ग-परम्परा में सूर्य = 20 — पाठ-भेद संभव, फलित क्रम 1-2-9-20-18-20-50।

English rendering The year-spans are one, two, nine, twenty, eighteen, twenty, and fifty — to be reckoned in order from the time of birth as the nisarga daśās. (On kṛti as 20 for the Sun: the chapter’s received sequence is 1–2–9–20–18–20–50; strict word-numeral lists sometimes give kṛti = 22 — recension/tradition note.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) निसर्गायु-वर्ष (क्रम = 43.16):
- चन्द्र: 1
- मङ्गल: 2
- बुध: 9
- शुक्र: 20
- गुरु: 18
- सूर्य: 20
- शनि: 50
Σ = 1+2+9+20+18+20+50 = 120 वर्ष।
जन्म t₀ से: दशा i का अन्तिम क्षण t₀ + Σ<sub>j≤i</sub> Y_j। (यह विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र से संरचना-सदृश है, किन्तु कुंजी नक्षत्र-शेष नहीं — जन्म से नैसर्गिक क्रम।)

उदाहरण (worked example) जन्म 2000-01-01। निसर्ग-दशा:
- 2000–2001: चन्द्र (1 वर्ष)
- 2001–2003: मङ्गल (2)
- 2003–2012: बुध (9)
- 2012–2032: शुक्र (20)
- 2032–2050: गुरु (18)
- 2050–2070: सूर्य (20)
- 2070–2120: शनि (50)
कुल 120 वर्ष। (केवल शास्त्रीय काल-विभाजन; आयु-फल की भविष्यवाणी नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) Σ = 120 वर्ष — वही पूर्णांक जो विंशोत्तरी महादशा-चक्र (केतु 7 + शुक्र 20 + सूर्य 6 + चन्द्र 10 + मङ्गल 7 + राहु 18 + गुरु 16 + शनि 19 + बुध 17 = 120) भी धारण करता है। हम दोनों को अलग इंजन-नियम मानते हैं: विंशोत्तरी = नक्षत्र-शेष × अनुपात; निसर्ग = जन्म से Y_i क्रम। संख्याएँ exact `==` — सहिष्णुता-पट्टी नहीं।

43.18
अथां्शायु सलग्नानां खेटानां कथयाम्यहम् |
नवांश्राशितुल्यानि खेटो वर्षाणि यच्छति
athāṃśāyu salagnānāṃ kheṭānāṃ kathayāmyaham |
navāṃśrāśitulyāni kheṭo varṣāṇi yacchati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अंश-आयु = अंशायु (अंश/नवांश-आधारित आयुर्दाय); स-लग्नानाम् = लग्न सहित (लग्न + ग्रह); खेटानाम् = ग्रहों की; कथयामि अहम् = मैं कहता हूँ; नवांश-राशि-तुल्यानि = नवांश में स्थित राशि की संख्या के तुल्य; खेटः = ग्रह; वर्षाणि = वर्ष; यच्छति = देता है।

हिन्दी भावार्थ अब अंशायु का विधान — लग्न और ग्रहों दोनों के लिए। शास्त्र कहता है: ग्रह उतने वर्ष देता है जितनी उसके नवांश की राशि (राशि-संख्या)। यह पिण्डायु से भिन्न; इकाई नवांश-राशि है, न कि केवल रवि/चन्द्र की राश्यायु-सारिणी। (पाठ में “अथां्शायु” संधि/मुद्रण-विकृति — अंशायु अभिप्रेत; पाठ-भेद संभव।)

English rendering Next the text declares aṃśāyu for the Lagna and the planets: each planet yields years equal to the rāśi of its navāṃśa (the sign-number of the occupied D9 sign).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश (D9): 30° राशि → 9 समान खंड, प्रत्येक 30°/9 = 3°20′।
राशि λ° (0 ≤ λ < 360) का नवांश-सूचकांक:
n = ⌊(λ mod 30°) / (10°/3)⌋ ∈ {0…8}।
नवांश-राशि R₉ (मेष=1 … मीन=12) = शास्त्रीय मानचित्र-नियम से (चर/स्थिर/द्विस्वभाव राशि के अनुसार नवांश-प्रारम्भ भिन्न — varga-rule घोषित करना आवश्यक)।
अंशायु-योगदान: Y(graha) = R₉(graha) वर्ष (1…12), लग्न के लिए भी Y(L) = R₉(L)।
मोट योग बाद में हानि/गुणन (43.20–43.21) से संशोधित।

उदाहरण (worked example) मान लें गुरु की सायन/निरयण रेखांश λ = 95.0° (मिथुन में 5°; ayanāṃśa पूर्व घोषित — यहाँ निरयण मान)। मिथुन = द्विस्वभाव; नवांश-प्रारम्भ कन्या से (एक प्रचलित BPHS-सम्मत नियम; अन्य पाठ संभव)। 5° ÷ 3°20′ = 1 पूर्ण नवांश + शेष → दूसरा नवांश ≈ तुला (R₉ = 7)। तो शास्त्रानुसार गुरु का अंशायु-दान = 7 वर्ष (हानि/त्रिगुण आदि से पहले)।

हमारा डिकोड (Our Decode) D9 = षोडश-वर्ग शृंखला का सदस्य — 30° का 9-भाग, शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित (varga engine)। अंशायु उसी R₉ संख्या को वर्ष में पढ़ता है; हम फल को “भविष्य” नहीं कहते — केवल D9-मान → वर्ष-मान का शास्त्र-मानचित्र।

43.19
भादिं खगं खगैः सूर्यैर्हत्वा तद्भगणादिकम् |
कृत्वाऽर्क्रशेषितं ज्ञेयमब्दाद्यंशायुषः स्फुटम्
bhādiṃ khagaṃ khagaiḥ sūryairhatvā tadbhagaṇādikam |
kṛtvā'rkraśeṣitaṃ jñeyamabdādyaṃśāyuṣaḥ sphuṭam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भादिम् = भ-आदि / राशि-चक्रादि से (आरम्भ से); खगम् = ग्रह (उसकी स्फुट स्थिति); खगैः = खग-संख्या से (नौ / ग्रह-गुणक; नवांश-सम्बद्ध 9); सूर्यैः = सूर्य-संख्या से (द्वादश आदित्य = 12); हत्वा = गुणा करके; तत् = उस (गुणनफल) को; भगण-आदिकम् = भगण (पूर्ण चक्र 360°) आदि में; कृत्वा = परिणत कर; अर्क-शेषितम् = अर्क (12 / सूर्य-माप) से शेष; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; अब्द-आदि = वर्ष आदि; अंश-आयुषः = अंशायु का; स्फुटम् = स्पष्ट/शुद्ध मान। ( “अर्क्रशेषितं” — अर्क-शेषितम्; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ अंशायु को स्फुट करने की गणितीय प्रक्रिया: ग्रह की भादि स्थिति को खग (9) और सूर्य (12) से गुणा करें — अर्थात् ×108 — फिर भगणादि में समेटें और अर्क-शेष लें; वही अब्दादि में अंशायु का स्फुट रूप है। यह नवांश-रूपान्तरण का ही चक्रीय/शेष-अंकगणित है, पूर्व श्लोक के “नवांशराशि-तुल्य वर्ष” को स्फुट बनाने वाला सूत्र।

English rendering Multiply the planet’s position counted from the beginning of the zodiac by the “birds” (9) and the “Suns” (12); reduce the product through full revolutions (bhagaṇa) and so on, and take the remainder with respect to arka — that remainder is the clear aṃśāyu in years and subunits.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भुतसंख्य/संकेत: खग ≈ 9, सूर्य/अर्क (आदित्य) ≈ 12 → गुणांक 9 × 12 = 108 (नवांश-घनत्व: 360° × 108/360 = 108 नवांश-खंड पूरे चक्र में)।
स्फुट-रूप (एक सुसंगत आधुनिक लेखन):
1. λ = ग्रह/लग्न की निरयण रेखांश डिग्री (0 ≤ λ < 360), ayanāṃśa घोषित।
2. P = λ × 108।
3. भगण-शुद्धि: P′ = P mod 360° (पूर्ण चक्र हटाना)।
4. अर्क-शेष: वर्षों का स्फुट माप = (P′ / 30°) का राशि-अंश रूप, अथवा P′ को 12-राशि माप में शेष — अर्थात् नवांश-राशि व अंश से अब्द + भागात्मक वर्ष।
संक्षेप: Y_sphuṭa ≡ navaṃśa-map(λ) — 43.18 का R₉ ही स्फुट अब्द; यह श्लोक उसी को गुणन–भगण–शेष भाषा में कहता है।

उदाहरण (worked example) λ = 95.0° (निरयण)। P = 95 × 108 = 10260। 10260 ÷ 360 = 28 भगण + शेष 180°। 180° = 6 राशि ठीक (कन्याान्त/तुलादि सीमा पर निर्भर)। नवांश-मानचित्र से R₉ = 7 हो तो स्फुट अंशायु-दान = 7 अब्द (पूर्व उदाहरण से संगति)। convention: निरयण λ + चुना हुआ D9-प्रारम्भ नियम।

हमारा डिकोड (Our Decode) ×108 ≡ D9 का पूर्ण-चक्र खंडन — वही मॉड्युलर वर्ग-इंजन जो D1…D60 के लिए समान अनुशासन मानता है। शेष-अंकगणित exact; “लगभग नवांश” नहीं — `==` पर नवांश-सूचकांक।

43.20
पिण्डायुरिव तत्रापि हानिं कुर्याद् विचक्षणः |
अत्राऽपरो विशेषोऽपि कैम्चिद् विज्ञैरुदाहृतः
piṇḍāyuriva tatrāpi hāniṃ kuryād vicakṣaṇaḥ |
atrā'paro viśeṣo'pi kaimcid vijñairudāhṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिण्ड-आयुः इव = पिण्डायु के समान; तत्र अपि = वहाँ भी (अंशायु में भी); हानिम् = हानि / कटौती; कुर्यात् = करे; विचक्षणः = विवेकी; अत्र = यहाँ; अपरः = दूसरा; विशेषः = विशेष नियम; अपि = भी; कैश्चित् = कुछ; विज्ञैः = जानकारों द्वारा; उदाहृतः = कहा/उदाहरणित गया है। (“कैम्चिद्” = कैश्चिद्; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अंशायु में भी वही हानि-विधान लागू हो जो पिण्डायु में है — शत्रु-क्षेत्र, अस्त, क्षीण आदि की कटौतियाँ विवेक से करनी चाहिए। साथ ही कुछ विज्ञ एक और विशेष नियम बताते हैं (जो अगले श्लोक में गुणन-रूप में आता है)। यह आयु-संख्या को बिना सोधे जोड़ने से रोकने वाला संशोधन-सूत्र है, न कि भय का कथन।

English rendering The wise should apply reductions in aṃśāyu just as in piṇḍāyu. Here another special rule is also adduced by some authorities (continued in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय ढाँचा:
Y_raw = Σ Y_i (अंशायु दान, 43.18–19)।
Y_net = Y_raw − H, जहाँ H = पिण्डायु-सदृश हानि-योग (शत्रुक्षेत्र, अस्त, नीच, युद्ध आदि — पूर्वश्लोकों/पिण्डायु-खण्ड के नियत अंश; यह श्लोक स्वयं हानि-प्रतिशत नहीं गिनाता, केवल समान हानि-नियम आदेश देता है)।
फिर विशेष गुणन (43.21) → Y_final।
फल-कथन नहीं — संशोधन-प्रक्रिया का निर्देश।

43.21
साधितायुः खगे स्वोच्चे स्वर्क्षे वा त्रिगुणं स्मृतम् |
द्विगुणं स्वनवांशस्थे स्वद्रेष्काणे तथोत्तमे
sādhitāyuḥ khage svocce svarkṣe vā triguṇaṃ smṛtam |
dviguṇaṃ svanavāṃśasthe svadreṣkāṇe tathottame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधित-आयुः = साधित/गणित आयु (दान); खगे = ग्रह के; स्व-उच्चे = स्वोच्च में; स्व-र्क्षे = स्वराशि में; वा = अथवा; त्रि-गुणम् = तीन गुना; स्मृतम् = कहा गया; द्वि-गुणम् = दो गुना; स्व-नवांश-स्थे = अपने नवांश में स्थित; स्व-द्रेष्काणे = अपने द्रेष्काण में; तथा = उसी प्रकार; उत्तमे = उत्तम (उत्तम नवांश/उत्तम स्थिति) में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का विशेष गुणन-नियम: साधित आयु-दान, ग्रह के स्वोच्च या स्वराशि में हो तो त्रिगुण; स्व-नवांश में द्विगुण; स्व-द्रेष्काण में तथा उत्तम स्थिति में भी द्विगुण। यह बल/प्रतिष्ठा की स्थिति को आयु-दान पर गुणक के रूप में चढ़ाता है — व्याख्या “भाग्य पक्का” नहीं, केवल गुणांक का विधान।

English rendering The computed longevity-contribution is held to be threefold when the planet is in its exaltation or own sign; twofold when in its own navāṃśa; and likewise twofold in its own drekkāṇa and in the uttama (excellent) condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गुणक m(graha):
- स्वोच्च या स्वराशि: m = 3
- स्व-नवांश (D9 में स्व-राशि/स्व-अंश): m = 2
- स्व-द्रेष्काण (D3): m = 2
- उत्तम (uttama navaṃśa / उत्तम अवस्था — परिभाषा परम्परा-सापेक्ष; घोषित करें): m = 2
Y_contrib′ = m × Y_contrib (हानि के पहले या बाद — क्रम शास्त्र-परम्परा से; प्रायः स्थिति-गुणन साधित दान पर, हानि अलग)।
द्रेष्काण: 30°/3 = 10° खंड (D3)। नवांश: 3°20′ (D9)।
यदि एक साथ कई शर्तें सत्य हों, शास्त्र यहाँ अधिकतम/संयोग-नियम नहीं लिखता — पाठ मौन; व्यवहार में परम्परा से एक प्रधान गुणक लिया जाता है (अघोषित संयोजन न थोपें)।

उदाहरण (worked example) बुध का अंशायु-दान Y = 9 वर्ष (R₉ = 9)। बुध कन्या स्वराशि में → m = 3 → 27 वर्ष (हानि से पहले)। यदि केवल स्व-नवांश में (न स्वोच्च/स्वराशि) → m = 2 → 18 वर्ष। द्रेष्काण: कन्या में 0°–10° = प्रथम द्रेष्काण (स्व-द्रेष्काण नियम राशि-स्वामी से) — यदि स्व-द्रेष्काण सिद्ध हो तो m = 2। convention: निरयण λ, BPHS D3/D9 मानचित्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) गुणक सीधा D1 स्थिति (उच्च/स्व) + D9 (नवांश) + D3 (द्रेष्काण) से बँधा है — षोडश-वर्ग इंजन के D1/D3/D9 आउटपुट पर exact flag → m ∈ {1,2,3}। हम “आयु तीन गुनी हो जाएगी” को भाग्य-घोषणा नहीं मानते; केवल शास्त्र-कथित गुणांक को `==` से सत्यापित गणना।

43.22
उभयत्र गते खेटे कार्यं त्रिगुणमेव हि |
हानिद्वयेऽर्धहानिः स्यादित्यायुः प्रस्फुटं नृणाम्
ubhayatra gate kheṭe kāryaṃ triguṇameva hi |
hānidvaye'rdhahāniḥ syādityāyuḥ prasphuṭaṃ nṛṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उभयत्र = दोनों स्थलों/दोनों पक्षों में; गते खेटे = ग्रह के स्थित होने पर; कार्यम् = फल/कार्य (आयु-संशोधन का प्रभाव); त्रिगुणम् = तिगुना; हानिद्वये = दो हानियों के होने पर; अर्धहानिः = आधी हानि; प्रस्फुटम् = स्पष्ट/स्पष्टीकृत; नृणाम् आयुः = मनुष्यों की आयु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब खेट (ग्रह) उभयत्र—अर्थात् दोनों प्रासंगिक स्थितियों में—गया हो, तो आयु-संबंधी कार्य का प्रभाव तिगुना माना जाता है। जहाँ दो हानियाँ एक साथ लागू हों, वहाँ अर्ध-हानि का नियम लगाया जाता है। इसी क्रम से मनुष्यों की आयु प्रस्फुट—स्पष्ट और गणित-युक्त—हो जाती है। यह फल-संशोधन का नियम है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when a planet stands in both relevant positions, the longevity-effect is taken as threefold; when two losses coincide, half-loss is applied. By this procedure human longevity is rendered clear and definite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-संशोधन गुणांक (आयुर्दाय-प्रकरण):
• उभयत्र-स्थिति → गुणन-कारक = ३ (त्रिगुण)
• हानि-द्वय → हानि = ½ × (एक-हानि का मान) (अर्धहानि)
अर्थात् यदि मूल-हानि-अंश h हो, तो दो हानियों पर लागू हानि ≈ h/२; उभयत्र-योग पर प्रभाव-अंश × ३।
ये गुणांक शास्त्र-निर्दिष्ट हैं; अयनांश/भाव-पद्धति इस श्लोक में नहीं कही गई—पूर्व श्लोकों की हानि-परिभाषा पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी खेट से आयु-अंश में एक-हानि = ४ वर्ष (पूर्व-नियम से)।
• केवल एक हानि → −४ वर्ष।
• हानिद्वय → अर्धहानि = −४/२ = −२ वर्ष।
• वही खेट उभयत्र भी हो → कार्य त्रिगुण: प्रभाव-अंश ४ × ३ = १२ वर्ष (दिशा पूर्व-संदर्भ के अनुसार जोड़/घट)।
अंतिम आयु = (पूर्व-साधित आयु) ± ये संशोधन। (केवल नियम-दृष्टांत; कुंडली-फल नहीं।)

43.23
एवं संसाध्य चान्येषां हन्यात् स्वस्वपरायुषा |
नृणां परायुषा भक्त्वा तेषामायुः स्फुटं भवेत्
evaṃ saṃsādhya cānyeṣāṃ hanyāt svasvaparāyuṣā |
nṛṇāṃ parāyuṣā bhaktvā teṣāmāyuḥ sphuṭaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; संसाध्य = साधकर/निष्पन्न कर; अन्येषाम् = अन्य (जातियों/पात्रों) की; हन्यात् = घटाए/संशोधित करे; स्वस्व-परायुषा = अपनी-अपनी परम-आयु से; नृणाम् परायुषा = मनुष्यों की परम-आयु से; भक्त्वा = भाग देकर; तेषाम् आयुः स्फुटम् = उनकी आयु स्पष्ट हो।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त विधि से आयु साध लेने के बाद शास्त्र कहता है कि अन्य प्राणियों/पात्रों की आयु को उनकी अपनी-अपनी परम-आयु से संशोधित (हनन/ह्रास-नियम) किया जाए। मनुष्यों के लिए मनुष्यों की परम-आयु से भाग देकर अनुपात साधा जाए—तब आयु स्फुट अर्थात् गणितीय रूप से स्पष्ट मानी जाती है। यह रूपांतरण-सूत्र है, भविष्यवाणी नहीं।

English rendering Having thus computed, one is to reduce the others by their own respective maximum longevities; dividing by the maximum human span, their longevity becomes clear and exact—so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्फुट-आयु रूपांतरण (शास्त्र-कथन):
\[
\text{आयु}_{\text{स्फुट}} = \frac{\text{साधित आयु-राशि (स्व-परायु संशोधन के बाद)}}{\text{परमायु}_{\text{नृ}}}
\]
• अन्येषाम्: ह्रास/संशोधन स्व-स्व \(\text{परमायु}_i\) से
• नृणाम्: भाजक = \(\text{परमायु}_{\text{मनुष्य}}\) (इस अध्याय के आगे के श्लोकों में जाति-परमायु सूची; मानव-परमायु प्रायः १२० वर्ष—पाठ/परंपरा घोषित करें)
अनुपात शुद्ध भाग-गणित है; फल = शास्त्र का कथन।

उदाहरण (worked example) कल्पना: किसी अन्य जाति का साधित आयु-अंश = ६०, उसकी परमायु = १२०; मानव-परमायु = १२० (घोषित परंपरा)।
स्व-परायु संशोधन के बाद मान = ६०;
\(\text{आयु}_{\text{स्फुट}} = ६० / १२० = १/२\) (मानव-मापनी पर अर्ध-इकाई/अनुपात)।
यदि पूर्ण-वर्ष चाहिए तो उसी अनुपात से मानव-परमायु पर पुनः गुणा: \( (६०/१२०) × १२० = ६०\) वर्ष। (संकेत: अनुपात और वर्ष-पुनर्प्राप्ति—पूर्व श्लोक-शृंखला की इकाई-परिपाटी के अनुसार।)

43.24
अथायुः परमं वक्ष्ये नानाजातिसमुद्भवम् |
अनन्तसंख्यं देवानामृषीणां च द्विजोत्तम
athāyuḥ paramaṃ vakṣye nānājātisamudbhavam |
anantasaṃkhyaṃ devānāmṛṣīṇāṃ ca dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; आयुः परमम् = परम/अधिकतम आयु; वक्ष्ये = कहूँगा; नानाजाति-समुद्भवम् = नाना जातियों से उत्पन्न; अनन्तसंख्यम् = अनंत संख्या वाली; देवानाम् = देवों की; ऋषीणाम् = ऋषियों की; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र नाना जातियों की परम-आयु बताने का आरंभ करता है। शिष्य (द्विजोत्तम) को संबोधित कर कहा जाता है कि देवों और ऋषियों की आयु अनंत-संख्य है—गिनती की सीमा से परे। यह सूची-प्रवेश है, व्यक्ति-विशेष का फल नहीं।

English rendering The sage now turns to the maximum life-spans arising among diverse kinds of beings. O best of the twice-born, the longevity of gods and seers is said to be without finite number.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परम-आयु सूची का आरंभ/स्तुति-संवाद।
देव-ऋषि परमायु = अनंत (∞) — संख्यात्मक सीमा नहीं; आगे की जातियों के लिए परिमित वर्ष दिए जाएंगे।

43.25
गृध्रोलूक्शुकध्वांक्षसर्पाणां च सहस्रकम् |
श्येनवानरभल्लुकमण्डूकानां शतत्रयम्
gṛdhrolūkśukadhvāṃkṣasarpāṇāṃ ca sahasrakam |
śyenavānarabhallukamaṇḍūkānāṃ śatatrayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृध्र = गीध; उलूक = उल्लू; शुक = तोता; ध्वांक्ष = कौआ; सर्पाणाम् = सर्पों की; सहस्रकम् = एक सहस्र (१०००); श्येन = बाज/श्येन; वानर = बंदर; भल्लुक = भालू; मण्डूकानाम् = मेंढकों की; शतत्रयम् = तीन सौ (३००)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इन प्राणियों की परम-आयु वर्ष-संख्या में बाँधता है: गीध, उल्लू, तोता, कौआ और सर्प—सहस्र वर्ष; श्येन, वानर, भल्लुक और मेंढक—शतत्रय अर्थात् तीन सौ वर्ष। यह जाति-परमायु तालिका का खंड है।

English rendering The text assigns a maximum span of one thousand years to the vulture, owl, parrot, crow, and serpents; and three hundred years to the hawk, monkey, bear, and frogs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमायु स्थिरांक (वर्ष):
• गृध्र, उलूक, शुक, ध्वांक्ष, सर्प → \(A = 1000\)
• श्येन, वानर, भल्लुक, मण्डूक → \(A = 300\)
सहस्रकम् = १०००; शतत्रयम् = ३ × १०० = ३००। आयुर्दाय में अन्य-जाति संशोधन (४३.२३) का भाजक/सीमा इन्हीं \(A\) से।

उदाहरण (worked example) सर्प-वर्ग परमायु \(A_{\text{सर्प}} = 1000\)। यदि ४३.२३ की रीति से साधित अंश = ४००, तो अनुपात \(400/1000 = 0.4\); मानव-परमायु १२० मानकर वर्ष-रूप: \(0.4 × 120 = 48\) वर्ष (मानव-मापनी पर रूपांतर—परंपरा घोषित करें)।

43.26
पंचशदुत्तरशतं राक्षसानां प्रकीर्तितम् |
नगणां कुञ्जराणां च विंशोत्तरशतं तथा
paṃcaśaduttaraśataṃ rākṣasānāṃ prakīrtitam |
nagaṇāṃ kuñjarāṇāṃ ca viṃśottaraśataṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचशत्-उत्तर-शतम् = शत + पचास = १५०; राक्षसानाम् = राक्षसों की; प्रकीर्तितम् = कही गई; नगाणाम् = नगों की (नाग/गज-वर्ग—पाठ-भेद संभव); कुञ्जराणाम् = हाथियों की; विंश-उत्तर-शतम् = शत + बीस = १२०; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ राक्षसों की परम-आयु शास्त्र ने पचास-उत्तर-शत—एक सौ पचास—वर्ष कही है। नग और कुञ्जर की आयु विंशोत्तर-शत—एक सौ बीस—वर्ष बताई गई है। (नग-पाठ: नाग/गिरि-संबंधी पाठांतर संभव।)

English rendering The maximum life of rākṣasas is declared as one hundred and fifty years; that of the naga-class and of elephants as one hundred and twenty years likewise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमायु स्थिरांक (वर्ष):
• राक्षस → \(A = 100 + 50 = 150\) (पंचशदुत्तरशत)
• नग, कुञ्जर → \(A = 100 + 20 = 120\) (विंशोत्तरशत)
शब्द-संख्या सीधी: उत्तर = “पर जोड़ा गया”।

उदाहरण (worked example) राक्षस-परमायु १५०; साधित अंश ७५ → \(75/150 = 1/2\)। मानव-परमायु १२० पर: \(0.5 × 120 = 60\) वर्ष (रूपांतर-दृष्टांत)।

43.27
द्वात्रिंशद् घोटकानाञ्च पंचविंशत् खरोष्ट्रयोः |
वृषाणां महिषाणां च चतुर्विंशतिवत्सरम्
dvātriṃśad ghoṭakānāñca paṃcaviṃśat kharoṣṭrayoḥ |
vṛṣāṇāṃ mahiṣāṇāṃ ca caturviṃśativatsaram

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वात्रिंशत् = बत्तीस (३२); घोटकानाम् = घोड़ों की; पंचविंशत् = पच्चीस (२५); खर-उष्ट्रयोः = गधे और ऊँट की; वृषाणाम् = बैलों की; महिषाणाम् = भैंसों की; चतुर्विंशति-वत्सरम् = चौबीस वर्ष (२४)।

हिन्दी भावार्थ घोड़ों की परम-आयु द्वात्रिंशत्—बत्तीस—वर्ष है। खर और उष्ट्र की पंचविंशत्—पच्चीस—वर्ष। वृष और महिष की चतुर्विंशति—चौबीस—वर्ष कही गई है। सब वत्सर-माप में।

English rendering Horses are given thirty-two years as maximum span; donkeys and camels twenty-five; bulls and buffaloes twenty-four years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमायु स्थिरांक (वर्ष):
• घोटक → \(A = 32\)
• खर, उष्ट्र → \(A = 25\)
• वृष, महिष → \(A = 24\)
द्वात्रिंशत् = २ × १० + १२? नहीं—शास्त्रीय: द्वात्रिंशत् = ३२; पंचविंशत् = २५; चतुर्विंशति = २४।

उदाहरण (worked example) अश्व \(A = 32\); साधित = १६ → \(16/32 = 0.5\) → मानव-मापनी (१२०): \(0.5 × 120 = 60\) वर्ष।

43.28
विंशत्यायुर्मयूराणां छागादीनां च षोडश |
हंसानां पंचनव च पिकानां द्वादशाब्दकाः
viṃśatyāyurmayūrāṇāṃ chāgādīnāṃ ca ṣoḍaśa |
haṃsānāṃ paṃcanava ca pikānāṃ dvādaśābdakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विंशति-आयुः = बीस वर्ष की आयु; मयूराणाम् = मोरों की; छागादीनाम् = बकरी आदि की; षोडश = सोलह (१६); हंसानाम् = हंसों की; पंचनव = पञ्च+नव (९५? / पाठ-भेद संभव—अनेक पाठों में पञ्चविंशति ≈ २५); पिकानाम् = कोयलों की; द्वादश-आब्दकाः = बारह वर्ष।

हिन्दी भावार्थ मोरों की परम-आयु विंशति—बीस—वर्ष है; छाग आदि की षोडश—सोलह—वर्ष। हंसों की आयु इस पाठ में “पंचनव” कही गई है—अंक-निष्ठा से पञ्चनवति (९५) का लघु रूप संभव, किंतु पाठ-भेद संभव और कई संस्करण हंस-आयु को पञ्चविंशति (२५) पढ़ते हैं। पिकों की आयु द्वादश—बारह—आब्द है।

English rendering Peacocks are allotted twenty years; goats and their like, sixteen. Swans are given “pañcanava” in this recension—digit-faithfully often taken as ninety-five (short for pañcanavati), though variant readings (e.g. twenty-five) are possible. Cuckoos (pika) have twelve years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमायु स्थिरांक (वर्ष):
• मयूर → \(A = 20\)
• छागादि → \(A = 16\)
• हंस → \(A =\) “पंचनव”: अंक-निष्ठा विकल्प (क) ९५ (पञ्चनवति-लघु), (ख) पाठ-भेद से २५ — इस संस्करण का पाठ अस्पष्ट; घोषित करें
• पिक → \(A = 12\)
विंशति = २०; षोडश = १६; द्वादश = १२।

उदाहरण (worked example) मयूर \(A = 20\); साधित = ५ → \(5/20 = 0.25\) → मानव-मापनी १२०: \(0.25 × 120 = 30\) वर्ष।
पिक \(A = 12\); साधित = ६ → \(6/12 = 0.5\) → \(0.5 × 120 = 60\) वर्ष। (हंस के लिए पहले पाठ-निर्णय: ९५ या २५।)

43.29
शुनां पारावतानां च कुक्कुटानां द्वादशाब्दकाः |
बुद्बुदाद्यण्डजानां च परायुः सप्तवत्सराः
śunāṃ pārāvatānāṃ ca kukkuṭānāṃ dvādaśābdakāḥ |
budbudādyaṇḍajānāṃ ca parāyuḥ saptavatsarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुनाम् = कुत्तों की; पारावतानाम् = कबूतरों की; कुक्कुटानाम् = मुर्गों/कुक्कुटों की; द्वादश-अब्दकाः = बारह वर्ष (परमायु); बुद्बुद-आदि-अण्डजानाम् = बुद्बुद-तुल्य एवं अन्य अण्डज प्राणियों की; पर-आयुः = परम आयु; सप्त-वत्सराः = सात वर्ष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पशु-पक्षियों की आयु-सीमा भी क्रम से बताता है। कुत्ते, कबूतर और कुक्कुट — इनकी परमायु बारह वर्ष कही गई है। बुद्बुद-जैसे तथा अन्य अण्डज प्राणियों की परमायु सात वर्ष बताई गई है। यह मानवीय आयु-दान से भिन्न, प्राणियों की सीमा-संख्या का कथन है।

English rendering The text states that the maximum lifespan of dogs, pigeons, and fowls is twelve years. For bubble-like and other egg-born creatures, the maximum life is given as seven years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) परमायु-अंक (years, as stated):
- शुन् + पारावत + कुक्कुट → परमायु = 12 वर्ष
- बुद्बुदाद्यण्डज → परमायु = 7 वर्ष
ये मानवीय पिण्डायु/अंशायु/नैसर्गिकायु-त्रयी के स्थानापन्न नहीं; पृथक् प्राणि-परमायु-सारणी हैं।

उदाहरण (worked example) यदि प्रश्न केवल प्राणि-परमायु का हो — कुक्कुट → 12 वर्ष; अण्डज-बुद्बुद-वर्ग → 7 वर्ष। यहाँ अयनांश/भाव-पद्धति लागू नहीं; केवल शास्त्रोक्त स्थिरांक हैं।

43.30
यदेतदधुना प्रोक्तं त्रिधायुद्विजसत्तम |
तेषु किञ्च कदा ग्राह्यमिति ते कथयाम्यहम्
yadetadadhunā proktaṃ tridhāyudvijasattama |
teṣu kiñca kadā grāhyamiti te kathayāmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत् एतत् = जो यह; अधुना = अभी; प्रोक्तम् = कहा गया; त्रिधा-आयुः = तीन प्रकार की आयु (त्रयी-पद्धति); द्विज-सत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; तेषु = उनमें; किम् च कदा ग्राह्यम् = कौन-सी और कब ग्राह्य; इति = ऐसा; ते = तुम्हें; कथयामि अहम् = मैं कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ, अभी तक जो त्रिविध आयु का वर्णन किया गया, उसमें यह प्रश्न स्वाभाविक है कि तीनों में से कब कौन-सी विधि अपनाई जाए। शास्त्र आगे उसी चयन-नियम का उत्तर देता है — कब अंशायु, कब पिण्डायु, कब नैसर्गिकायु ग्राह्य हो। यह फल-कथन नहीं, पद्धति-चयन का प्रस्तावना-श्लोक है।

English rendering O best of the twice-born, of the threefold longevity just taught, I shall now tell you which method is to be accepted, and under what conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/पद्धति-चयन की प्रस्तावना। आगे के श्लोक (बल-तुलना से ग्राह्य आयु-विधि) इसी वादांश को पूरा करते हैं।

43.31
विलग्नपे बलोपेते शुभदृष्टेंश्शसम्भवभ् |
रवौ पिंडोद्भवं ग्राह्यं चन्द्रे नैसर्गिकं तथा
vilagnape balopete śubhadṛṣṭeṃśśasambhavabh |
ravau piṃḍodbhavaṃ grāhyaṃ candre naisargikaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विलग्न-पे = लग्नेश में; बल-उपेते = बलयुक्त होने पर; शुभ-दृष्टे = शुभ-दृष्टि युक्त होने पर; अंश-सम्भवम् = अंशायु (अंश-सम्भव आयु) ग्राह्य — पाठ: «अंश्शसम्भवभ्» में संधि/लेखन-भेद संभव; रवौ = सूर्य (बलवान्) होने पर; पिण्ड-उद्भवम् = पिण्डायु ग्राह्य; चन्द्रे = चन्द्र (बलवान्) होने पर; नैसर्गिकम् = नैसर्गिकायु; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्नेश बलवान् हो और शुभ ग्रह उससे दृष्टि-संबद्ध हों, तब अंशायु (अंश-सम्भव आयु) ग्रहण करनी चाहिए। जब सूर्य बलवान् हो, तब पिण्डायु ग्राह्य मानी जाए। जब चन्द्र बलवान् हो, तब नैसर्गिकायु ग्राह्य हो। यह तीन आयु-पद्धतियों में से एक चुनने का बल-आधारित नियम है, न कि स्वयं आयु का अंक।

English rendering When the lagna-lord is strong and under benefic aspect, the aṃśa-born longevity (aṃśāyu) is to be accepted. When the Sun is strong, the piṇḍa-born longevity (piṇḍāyu) is taken; when the Moon is strong, the natural longevity (naisargikāyu) likewise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चयन-नियम (ग्राह्य आयु-विधि \(A\)):

\[
A =
\begin{cases}
\text{अंशायु} & \text{यदि बल(लग्नेश) प्रधान (शुभ-दृष्टि सहित)} \\
\text{पिण्डायु} & \text{यदि बल(सूर्य) प्रधान} \\
\text{नैसर्गिकायु} & \text{यदि बल(चन्द्र) प्रधान}
\end{cases}
\]

«बल» यहाँ षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) के योग-तुलना से निर्धारित होता है; इकाई: 1 रूप = 60 विरूप। कौन-सा ग्रह «प्रधान बलवान्» है — यह तुलनात्मक है, निरपेक्ष नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें षड्बल (रूप में, घोषित पद्धति से): लग्नेश = 8.2, सूर्य = 5.1, चन्द्र = 4.0। लग्नेश स्पष्टतः अधिकतम और यदि शुभ-दृष्टि भी हो, तो शास्त्र-नियम से अंशायु ग्राह्य। (अयनांश/गृह-पद्धति बल-संख्या को बदलते हैं — वही इंजन-परिपाटी घोषित रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) बल-तुलना के लिए Ch.27 का षड्बल — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में योज्य है; 1 रूप = 60 विरूप। आयु-विधि का चयन इसी संख्यात्मक बल-योग पर टिका है; हम गणित को `==` की सख्ती से रखते हैं और फल को «शास्त्र कहता है» की सीमा में ही रखते हैं।

43.32
बलसाम्ये द्वयोर्योगदलमायुः प्रकीर्तितम् |
त्रयाणां त्रियुतेस्त्र्यंशसमं ज्ञेयं द्विजोत्तम
balasāmye dvayoryogadalamāyuḥ prakīrtitam |
trayāṇāṃ triyutestryaṃśasamaṃ jñeyaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बल-साम्ये = बलों की समानता में; द्वयोः = दो (ग्रहों/विधियों) का; योग-दलम् = योग का आधा; आयुः = आयु; प्रकीर्तितम् = कही गई; त्रयाणाम् = तीनों का; त्रि-युतेः = तीनों के योग से; त्र्यंश-समम् = एक-तिहाई के बराबर; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विज-उत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ यदि दो प्रबल पक्षों का बल बराबर हो, तो शास्त्र कहता है — दोनों आयु-मानों का योग लेकर उसका आधा आयु मानी जाए। यदि तीनों ही समान बल-स्थित हों, तो तीनों आयु-मानों के योग का तिहाई भाग आयु जाननी चाहिए। यह मिश्रण-नियम है, जब एकमात्र ग्राह्य विधि स्पष्ट न हो।

English rendering When the strengths of two are equal, longevity is declared as half the sum of the two results. When three are conjoined in equal strength, one should know the lifespan as one-third of the sum of the three, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बल-साम्य पर मिश्र आयु \(Y\):

  • दो समान-बल विधियाँ \(Y_1, Y_2\):

\[
Y = (Y_1 + Y_2)/(2)
\]

  • तीन समान-बल विधियाँ \(Y_1, Y_2, Y_3\):

\[
Y = (Y_1 + Y_2 + Y_3)/(3)
\]

\(Y_i\) वे वर्ष-मान हैं जो अंशायु / पिण्डायु / नैसर्गिकायु से पूर्व-श्लोकों की विधि से निकले हों।

उदाहरण (worked example) सूर्य-बल ≈ चन्द्र-बल, और लग्नेश दुर्बल: पिण्डायु \(Y_p = 72\) वर्ष, नैसर्गिकायु \(Y_n = 60\) वर्ष। तब

\[
Y = (72 + 60)/(2) = 66 \text{ वर्ष}
\]

यदि तीनों बराबर मानें — \(Y_a = 54,\ Y_p = 72,\ Y_n = 60\):

\[
Y = (54 + 72 + 60)/(3) = 62 \text{ वर्ष}
\]

हमारा डिकोड (Our Decode) मिश्रण से पहले प्रत्येक \(Y_i\) स्वतंत्र रूप से निकालना और बल-तुलना षड्बल-मापदण्ड पर `==` से जाँचना — यही अनुशासन है। औसत को «भाग्य» नहीं, शास्त्रोक्त समायोजन-सूत्र मानते हैं।

43.33
अथाऽन्यदपि वक्ष्यामि श्र्रिणु त्वं द्विजसत्तम |
कैश्चिल्लग्नाष्टमेशाभ्यां मन्देन्दुभ्यां तथैव च
athā'nyadapi vakṣyāmi śrriṇu tvaṃ dvijasattama |
kaiścillagnāṣṭameśābhyāṃ mandendubhyāṃ tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अन्यत् अपि = और भी अन्य; वक्ष्यामि = कहूँगा; शृणु त्वम् = तू सुन (पाठ: «श्र्रिणु» — लेखन-भेद); द्विज-सत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; कैश्चित् = कुछ आचार्यों के मत से; लग्न-अष्टमेश-आभ्याम् = लग्न और अष्टमेश से; मन्द-इन्दु-भ्याम् = शनि और चन्द्र से; तथा एव च = और उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ, अब एक और आयु-मार्ग भी सुनो। कुछ आचार्य लग्न तथा अष्टमेश के योग से, और शनि तथा चन्द्र के योग से — इसी प्रकार आयु का विचार करते हैं। यह पूर्वोक्त त्रिधा-आयु से भिन्न, वैकल्पिक योग-मार्ग की प्रस्तावना है।

English rendering Listen further, O best of the twice-born: by some authorities longevity is also considered from the lagna and the eighth-lord, and likewise from Saturn and the Moon.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वैकल्पिक आयु-योग-त्रयी का प्रस्तावना-वर्णन। अगले दो श्लोक क्रम से (1) लग्न–अष्टमेश, (2) मन्द–चन्द्र, (3) लग्नहोरा–विलग्न — तीन योगों को गिनाते हैं।

43.34
लग्नहोराविलग्नाभ्यां स्फुटमायुः प्रकीर्तितम् |
आदौ लग्नाष्टमेशाभ्यां योगमेकं विचिन्तयेत्
lagnahorāvilagnābhyāṃ sphuṭamāyuḥ prakīrtitam |
ādau lagnāṣṭameśābhyāṃ yogamekaṃ vicintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-होरा-विलग्न-आभ्याम् = लग्न-होरा और विलग्न से (तृतीय योग; «-आभ्याम्» द्विवचन — पाठ-भेद/सङ्क्षेप संभव); स्फुटम् आयुः = स्पष्ट/स्पष्टायु; प्रकीर्तितम् = कही गई; आदौ = पहले; लग्न-अष्टमेश-आभ्याम् = लग्न और अष्टमेश से; योगम् एकम् = एक योग; विचिन्तयेत् = विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न-होरा और विलग्न से भी स्पष्ट आयु कही गई है; किन्तु क्रम पहले यह है कि आद्य योग लग्न तथा अष्टमेश से विचारा जाए। यह वैकल्पिक आयु-मार्ग का पहला चरण है — लग्न–अष्टमेश योग।

English rendering Longevity is also declared as clear from lagna-horā and vilagna; but first one should carefully consider the single yoga formed by the lagna and the eighth-lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-क्रम (इस परिपाटी में):

1. प्रथम योग: लग्न + अष्टमेश
\[
\text{Yoga}_1 = f(\lambda_{\text{लग्न}},\ \lambda_{\text{अष्टमेश}})
\]
(दीर्घायु/मध्यायु/अल्पायु — दोनों की स्थिति, दृष्टि, बल; अंक-सूत्र आगे के श्लोकों/अध्याय-पद्धति पर निर्भर)

«स्फुटमायुः» = स्पष्ट (निर्णीत) आयु-मान; यहाँ अभी केवल योग-चयन का प्रथम चरण बताया गया है, वर्ष-संख्या का पूर्ण सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = कर्क, अष्टमेश (कुम्भ का स्वामी) = शनि। \(\text{Yoga}_1\) = लग्न–अष्टमेश युति/दृष्टि/भाव-संबन्ध का विचार — पहले इसी जोड़े से आयु-योग देखें, फिर अगले श्लोक के द्वितीय-तृतीय योग। (भाव-पद्धति: पूर्ण भाव या समान-भोग — घोषित रखें।)

43.35
द्वितीयं मन्दचन्द्राभ्यां योगं पश्येद् द्विजोत्तम |
लग्नहोराविलग्नाभ्यां तृतीयं परिचिन्तयेत्
dvitīyaṃ mandacandrābhyāṃ yogaṃ paśyed dvijottama |
lagnahorāvilagnābhyāṃ tṛtīyaṃ paricintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीयम् = दूसरा; मन्द-चन्द्र-आभ्याम् = शनि और चन्द्र से; योगम् = योग; पश्येत् = देखे; द्विज-उत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; लग्न-होरा-विलग्न-आभ्याम् = लग्न-होरा और विलग्न से; तृतीयम् = तीसरा; परि-चिन्तयेत् = भली-भाँति विचार करे।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजोत्तम, दूसरा योग शनि और चन्द्र से देखना चाहिए। तीसरा योग लग्न-होरा तथा विलग्न से भली-भाँति चिन्तित करना चाहिए। इस प्रकार तीन योग — लग्न–अष्टमेश, मन्द–चन्द्र, लग्नहोरा–विलग्न — वैकल्पिक आयु-विचार की पूर्ण त्रयी बनते हैं।

English rendering Second, O best of the twice-born, one should examine the yoga of Saturn and the Moon. Third, one should carefully consider the yoga from lagna-horā and vilagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तीन योगों का क्रम (पूर्ण सूची):

| क्रम | जोड़ा | संकेत |
|------|--------|--------|
| 1 | लग्न + अष्टमेश | \(\text{Yoga}_1\) |
| 2 | मन्द (शनि) + चन्द्र | \(\text{Yoga}_2\) |
| 3 | लग्न-होरा + विलग्न | \(\text{Yoga}_3\) |

\[
\{\text{Yoga}_1,\ \text{Yoga}_2,\ \text{Yoga}_3\}
\quad\text{— आयु-निर्णय की वैकल्पिक त्रयी (कैश्चित्-मत)}
\]

होरा यहाँ D2 (30° → 2 × 15° खण्ड; सूर्य/चन्द्र होरा-स्वामित्व रवि-सम/युग्म राशि-नियम से) है; विलग्न = उदित लग्न (स्पर्श-लग्न)। तीनों योगों के फल-संयोग से ही «स्फुटमायु» का निर्णय इस परिपाटी में किया जाता है — वर्ष-अंक का विस्तृत बीजगणित अध्याय की आगे की विधि पर टिका है।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या 12°, होरा = द्वितीय 15°-खण्ड → चन्द्र-होरा (कन्या सम-राशि: प्रथम 15° सूर्य, द्वितीय 15° चन्द्र — रवि-सम-राशि नियम)। विलग्न = कन्या-लग्न। \(\text{Yoga}_3\) = लग्न-होरा–विलग्न संबन्ध। \(\text{Yoga}_2\) = शनि–चन्द्र की राशि/भाव-दूरी। तीनों योगों की दिशा एक होने पर आयु-निर्णय दृढ़; विरोध पर पाठान्तर/तुलना — «पाठ-भेद/मत-भेद संभव»।

43.36
चरराशौ स्थितौ द्वौ चित् तदा दीर्घमुदाहृतम् |
एकः स्थिरेऽपरो द्वन्द्वे दीर्घमायुस्तथापि हि
cararāśau sthitau dvau cit tadā dīrghamudāhṛtam |
ekaḥ sthire'paro dvandve dīrghamāyustathāpi hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चर-राशौ = चल राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर); स्थितौ द्वौ = दोनों (आयु-निर्णायक कारक) स्थित; दीर्घम् = दीर्घायु वर्ग; स्थिरे = स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ); द्वन्द्वे = द्विस्वभाव/उभय राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन); दीर्घमायुः = दीर्घ आयु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दोनों निर्णायक ग्रह चर राशि में हों, तब आयु को दीर्घ कहा गया है। यदि एक स्थिर राशि में हो और दूसरा द्वन्द्व (उभय) राशि में, तो भी दीर्घायु ही माना जाता है। यह चर–स्थिर–द्वन्द्व के संयोग से आयु-वर्ग का पहला फल-नियम है।

English rendering The text states that when both determining factors occupy movable signs, longevity is classed as long (dīrgha). Likewise, one in a fixed sign and the other in a dual sign is also declared long-lived.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-वर्गीकरण नियम (दीर्घायु शाखा)। दो निर्णायक स्थितियाँ \(P_1, P_2\) की राशि-प्रकृति \(T \in \{\text{चर}, \text{स्थिर}, \text{द्वन्द्व}\}\) पर:

  • \(T(P_1)=T(P_2)=\text{चर}\) → दीर्घ
  • \(\{T(P_1), T(P_2)\} = \{\text{स्थिर}, \text{द्वन्द्व}\}\) → दीर्घ

(जोड़ी के सदस्यों का शास्त्रीय निर्धारण पूर्व श्लोकों / लग्न–अष्टम आदि विधि से; यहाँ फल केवल राशि-प्रकृति का है।)

उदाहरण (worked example) मानें \(P_1\) = लग्नेश मेष (चर), \(P_2\) = अष्टमेश तुला (चर) → दोनों चर → दीर्घ वर्ग। दूसरा: \(P_1\) वृष (स्थिर), \(P_2\) मिथुन (द्वन्द्व) → स्थिर+द्वन्द्व → पुनः दीर्घ। (राशि = उष्णकटिबंधीय 30° खंड; अयनांश केवल ग्रह-देशांतर तय करने के लिए आवश्यक।)

---

43.37
एकश्चरे स्थिरेऽन्यश्चेत् तदामध्यमुदाहृतम् |
द्वौ वा द्वन्द्वे स्थितौ विप्र मध्यमायुस्तथापि च
ekaścare sthire'nyaścet tadāmadhyamudāhṛtam |
dvau vā dvandve sthitau vipra madhyamāyustathāpi ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः चरे = एक चर राशि में; स्थिरे अन्यः = दूसरा स्थिर में; मध्यम् = मध्यायु; द्वौ वा द्वन्द्वे = अथवा दोनों द्वन्द्व राशि में; विप्र = द्विज-संबोधन; मध्यमायुः = मध्यम आयु-वर्ग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एक कारक चर राशि में और दूसरा स्थिर में हो तो आयु मध्यम कही गई है। दोनों द्वन्द्व राशि में हों, तब भी मध्यायु ही स्वीकार की जाती है। यह दीर्घ के बाद का मध्य-वर्ग नियम है।

English rendering The text states that one factor in a movable sign and the other in a fixed sign yields medium longevity. Both occupying dual signs are likewise declared medium-lived.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मध्यायु शाखा:

  • \(\{T(P_1), T(P_2)\} = \{\text{चर}, \text{स्थिर}\}\) → मध्य
  • \(T(P_1)=T(P_2)=\text{द्वन्द्व}\) → मध्य

उदाहरण (worked example) \(P_1\) कर्क (चर), \(P_2\) सिंह (स्थिर) → चर+स्थिर → मध्य। \(P_1\) कन्या, \(P_2\) धनु — दोनों द्वन्द्व → मध्य।

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43.38
एकश्चरेऽपरो द्वन्द्वे द्वौ वा स्थिरगतौ तदा |
जातकस्य तदाऽल्पायुर्ज्ञेयमेवं द्विजोत्तम
ekaścare'paro dvandve dvau vā sthiragatau tadā |
jātakasya tadā'lpāyurjñeyamevaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः चरे = एक चर में; अपरो द्वन्द्वे = दूसरा द्वन्द्व में; द्वौ वा स्थिर-गतौ = अथवा दोनों स्थिर राशि में; अल्पायुः = अल्प आयु-वर्ग; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विजोत्तम = श्रेष्ठ द्विज (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — एक चर में और दूसरा द्वन्द्व में हो, अथवा दोनों स्थिर राशि में हों, तब जातक की आयु अल्प मानी जाती है। चर–स्थिर–द्वन्द्व की तीन जोड़ी-श्रेणियाँ इस प्रकार दीर्घ, मध्य और अल्प में बँट जाती हैं।

English rendering The text states that one in a movable and the other in a dual sign, or both in fixed signs, is to be known as short-lived (alpāyu). Thus the three sign-nature pairings complete the longevity classification.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अल्पायु शाखा — त्रिवर्ग सारिणी पूर्ण:

| \(T(P_1), T(P_2)\) | आयु-वर्ग |
|---|---|
| चर+चर; स्थिर+द्वन्द्व | दीर्घ (43.36) |
| चर+स्थिर; द्वन्द्व+द्वन्द्व | मध्य (43.37) |
| चर+द्वन्द्व; स्थिर+स्थिर | अल्प (43.38) |

उदाहरण (worked example) \(P_1\) मकर (चर), \(P_2\) मीन (द्वन्द्व) → अल्प। \(P_1\) वृश्चिक, \(P_2\) कुम्भ — दोनों स्थिर → अल्प।

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43.39
योगत्रयेण योगाभ्यां सिद्धं यद् ग्राह्यमेव तत् |
योगत्रयविसंवादे लग्नहोराविलग्नतः
yogatrayeṇa yogābhyāṃ siddhaṃ yad grāhyameva tat |
yogatrayavisaṃvāde lagnahorāvilagnataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योग-त्रयेण = तीनों योगों से; योगाभ्याम् = दो योगों से; सिद्धम् = सिद्ध / निर्णीत; ग्राह्यम् = ग्रहण करने योग्य; योगत्रय-विसंवादे = तीन योगों में परस्पर विरोध होने पर; लग्न = जन्म-लग्न; होरा = होरा-लग्न (D2-संबंधित काल/लग्न-भेद); विलग्नतः = विलग्न (अन्य लग्न-बिंदु) से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तीन योगों से, अथवा दो योगों से, जो आयु-वर्ग सिद्ध हो वही ग्राह्य है। यदि तीनों योग परस्पर विसंवाद करें, तो निर्णय लग्न, होरा और विलग्न की ओर से करना चाहिए। एक ही फल पर बहुमत (३ या २) को प्राथमिकता दी गई है; पूर्ण असहमति पर त्रि-लग्न परीक्षा।

English rendering Whatever is established by all three yogas, or by two of them, alone is to be accepted. When the three yogas disagree, the determination is made from the lagna, the horā, and the vilagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बहुमत-नियम (voting) आयु-वर्ग \(V \in \{\text{दीर्घ}, \text{मध्य}, \text{अल्प}\}\) पर:

  • तीन स्वतंत्र योग \(Y_1, Y_2, Y_3\) (प्रत्येक 43.36–38 की जोड़ी-विधि से \(V\) देता है)
  • यदि \(|\{i : Y_i = V^\}| \ge 2\) किसी \(V^\) के लिए → \(V^*\) ग्राह्य
  • यदि तीनों भिन्न / पूर्ण विसंवाद → निर्णय स्रोत: लग्न, होरा, विलग्न (अगले श्लोक के साथ पठनीय)

होरा यहाँ षोडश-वर्ग की D2 (होरा) परंपरा से जुड़ा लग्न-भेद है — 30° राशि का 15°+15° विभाजन, लग्न-देशांतर के मॉड्यूलर नियम से।

उदाहरण (worked example) \(Y_1=\text{दीर्घ},\; Y_2=\text{दीर्घ},\; Y_3=\text{मध्य}\) → दो दीर्घ → ग्राह्य = दीर्घ। \(Y_1=\text{दीर्घ},\; Y_2=\text{मध्य},\; Y_3=\text{अल्प}\) → विसंवाद → लग्न–होरा–विलग्न से पुनः जाँच (43.40 की विशेष दशा सहित)।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन में होरा = D2: प्रत्येक 30° राशि के दो 15° खंड, लग्न/ग्रह-देशांतर पर निश्चित मॉड्यूलर मानचित्र — “होरा” यहाँ केवल नाम नहीं, गणना-योग्य वर्ग-नियम है। आयु-योगों का बहुमत-तर्क भी उसी अनुशासन से: वर्ग \(V\) पर गणना, फल-कथन को शास्त्र-वाक्य रखकर।

---

43.40
लग्ने वा सप्तमे चन्द्रे ग्राह्यं मन्देन्दुतस्तदा |
ह्रासो वृद्धिश्च कक्ष्याया विचिन्त्या सर्वदा बुधैः
lagne vā saptame candre grāhyaṃ mandendutastadā |
hrāso vṛddhiśca kakṣyāyā vicintyā sarvadā budhaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने वा सप्तमे = लग्न या सप्तम भाव में; चन्द्रे = चंद्रमा; ग्राह्यम् = ग्राह्य; मन्द-इन्दुतः = शनि और चंद्र से; ह्रासः = ह्रास / कमी; वृद्धिः = वृद्धि; कक्ष्यायाः = कक्ष्या (आयु-सीमा / कक्षा-खंड) की; विचिन्त्या = विचारणीय; बुधैः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि चंद्रमा लग्न में या सप्तम में हो, तो उस दशा में आयु-निर्णय मन्द (शनि) और इन्दु (चंद्र) से ग्रहण करना चाहिए। कक्ष्या का ह्रास और वृद्धि सदैव बुद्धिमानों को सोचनी चाहिए — अर्थात कच्चे वर्ग-फल पर सीमा-संशोधन का द्वार खुला रखा गया है।

English rendering The text states that when the Moon stands in the lagna or the seventh, the result is then to be taken from Saturn and the Moon. The wise are always to consider both the decrease and the increase of the kākṣyā (life-span range).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विशेष-दंड:

  • यदि चंद्र-भाव \(B_☾ \in \{1, 7\}\) (भाव-गणना: लग्न = 1; गृह-पद्धति घोषित करनी होगी — पूर्ण-चिह्न / समान-भाव आदि)
  • तो निर्णायक जोड़ी स्रोत = शनि + चंद्र (मन्देन्दु), न कि साधारण युग्म अकेला
  • कक्ष्या-संशोधन: आयु-वर्ष \(A\) पर ह्रास/वृद्धि गुणक या खंड — श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता; केवल नियम है कि \(A\) को एकदिष्ट न मानकर कक्ष्या के दोनों ओर विचार करें

उदाहरण (worked example) लग्न = तुला, चंद्र = तुला (भाव 1) → मन्देन्दु-मार्ग लागू: \(P_1, P_2\) को शनि और चंद्र की राशि-प्रकृति से 43.36–38 चलाएँ। चंद्र सप्तम (मेष) में हो तो वही विशेष। कक्ष्या-ह्रास/वृद्धि की संख्यात्मक सारिणी इस श्लोक में नहीं — परवर्ती वर्ष-श्लोक (43.41–42) कच्चे वर्ष देते हैं; ह्रास-वृद्धि उनके ऊपर का संशोधन-द्वार है।

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43.41
दीर्घे योगत्रयेणैवं नखचन्द्रसमाब्दकाः |
योगद्वयेन वस्वाशा योगैकेन रसांककाः
dīrghe yogatrayeṇaivaṃ nakhacandrasamābdakāḥ |
yogadvayena vasvāśā yogaikena rasāṃkakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दीर्घे = दीर्घायु वर्ग में; योग-त्रयेण = तीन योगों से; नख-चन्द्र-सम-अब्दकाः = नख–चंद्र के तुल्य वर्ष; योग-द्वयेन = दो योगों से; वस्व्-आशा = वसु–आशा (वर्ष-संख्या); योग-एकेन = एक योग से; रस-अंककाः = रस–अंक वर्ष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दीर्घ वर्ग में जब तीनों योग एकमत हों, तब आयु नखचंद्र-तुल्य वर्षों की मानी गई; दो योगों से वस्वाशा-तुल्य; केवल एक योग से रसांक-तुल्य। यह दीर्घायु की तीन-सीढ़ी वर्ष-सारिणी है — भूतसंख्या से अंक खोलने पर।

English rendering The text states that in the long-life class, agreement of three yogas yields years equal to nakhacandra; of two yogas, years of vasvāśā; of one yoga alone, years of rasāṅka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या (अङ्कानां वामतो गतिः — इकाइयाँ पूर्व शब्द, फिर दशम):

| संकेत | शब्द | अंक | वर्ष \(A_{\text{दीर्घ}}\) |
|---|---|---|---|
| तीन योग | नख (=20) + चंद्र (=1) → 120 | 120 | \(A = 120\) |
| दो योग | वसु (=8) + आशा (=10) → 108 | 108 | \(A = 108\) |
| एक योग | रस (=6) + अंक (=9) → 96 | 96 | \(A = 96\) |

अर्थात् दीर्घायु पर: \(A \in \{120, 108, 96\}\) योग-सहमति की संख्या \(n \in \{3,2,1\}\) के अनुसार।
(पाठ-भेद संभव अन्य संस्करणों में वर्ष-सूची पर; यह विकिस्रोत-पाठ का अंक-विश्लेषण।)

उदाहरण (worked example) तीनों योग दीर्घ (43.36 शर्त) → \(A = 120\) वर्ष। केवल दो दीर्घ, तीसरा अन्य → \(A = 108\)। केवल एक दीर्घ → \(A = 96\)। तत्पश्चात् 43.40 की कक्ष्या-ह्रास/वृद्धि इन कच्चे वर्षों पर लागू हो सकती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूर्ण दीर्घ-सीमा 120 वही चक्र-योग है जिस पर विंशोत्तरी महादशा का योग \(\sum = 120\) वर्ष टिका है (केतु 7 + शुक्र 20 + सूर्य 6 + चंद्र 10 + मंगल 7 + राहु 18 + गुरु 16 + शनि 19 + बुध 17)। आयु-वर्ष और दशा-वर्ष अलग फल हैं, पर दोनों में “120” एक ही शास्त्रीय पूर्ण-मान है — अनुपात-अंकगणित, अनुमान नहीं। अंक-जाँच में `==` अनुशासन: 120/108/96 को सहिष्णु-बैंड से नहीं ढकना।

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43.42
मध्ये योगत्रयेणैवं खाष्टतुल्याब्दकाः स्मृताः |
द्व्यगा योगद्वयेनाऽत्रयोगैकेनाब्धिषण्मिताः
madhye yogatrayeṇaivaṃ khāṣṭatulyābdakāḥ smṛtāḥ |
dvyagā yogadvayenā'trayogaikenābdhiṣaṇmitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये = मध्यायु वर्ग में; खाष्ट-तुल्य-अब्दकाः = ख–अष्ट के तुल्य वर्ष; स्मृताः = स्मरण किए गए; द्व्य्-अगा = द्वि–अग (वर्ष); योग-द्वयेन = दो योगों से; अत्र = यहाँ; योग-एकेन = एक योग से; अब्धि-षट्-मिताः = अब्धि–षट् के परिमित वर्ष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मध्यायु में तीन योगों की सहमति पर वर्ष खाष्ट-तुल्य स्मरण किए गए हैं; दो योगों से द्व्यग-तुल्य; एक योग से अब्धिषट्-मित। दीर्घ की 120/108/96 सीढ़ी के समान मध्य की 80/72/64 सीढ़ी है।

English rendering The text states that in the medium class, three-yoga agreement is remembered as years equal to khāṣṭa; two yogas as dvyaga; one yoga as the measure abdhi-ṣaṭ.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या, मध्यायु:

| सहमति \(n\) | संकेत | वियोजन | वर्ष \(A_{\text{मध्य}}\) |
|---|---|---|---|
| 3 | खाष्ट | ख (=0) + अष्ट (=8) → 80 | 80 |
| 2 | द्व्यग | द्वि (=2) + अग/पर्वत (=7) → 72 | 72 |
| 1 | अब्धिषण् | अब्धि (=4) + षट् (=6) → 64 | 64 |

\[
A_{\text{मध्य}}(n) =
\begin{cases}
80 & n=3 \\
72 & n=2 \\
64 & n=1
\end{cases}
\]
(यहाँ केस-लेख केवल स्पष्टता के लिए; यंत्र में साधारण सारिणी-मान।)
दीर्घ+मध्य सार: \(\{120,108,96\}\) और \(\{80,72,64\}\) — प्रत्येक में आसन्न अंतर 12 वर्ष। अल्पायु की संख्याएँ इस बैच के बाहर।

उदाहरण (worked example) 43.37 से दोनों कारक द्वन्द्व → मध्य वर्ग; तीनों योग मध्य → \(A = 80\) वर्ष। दो ही मध्य कहें → \(A = 72\)। एक ही → \(A = 64\)। सम्मिलित पाइपलाइन: (1) जोड़ी-प्रकृति से वर्ग, (2) योग-गणना से \(n\), (3) इस सारिणी से \(A\), (4) कक्ष्या-ह्रास/वृद्धि (43.40) यदि लागू।

43.43
अल्पे योगत्रयेणाऽत्रद्वात्रिंशन्मितवत्सराः |
योगद्वयेन षट्त्रिंशात् योगैकेन च खाब्धयः
alpe yogatrayeṇā'tradvātriṃśanmitavatsarāḥ |
yogadvayena ṣaṭtriṃśāt yogaikena ca khābdhayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अल्पे = अल्पायु (वर्ग) में; योगत्रयेण = तीन योगों से; अत्र = यहाँ; द्वात्रिंशत्-मित-वत्सराः = बत्तीस वर्ष; योगद्वयेन = दो योगों से; षट्त्रिंशत् = छत्तीस; योगैकेन च = और एक योग से; खाब्धयः = ख (0) + अब्धि (4) → 40 (भूतसंख्या, दाएँ-से-बाएँ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अल्पायु-वर्ग में तीन योग एक साथ हों तो आयु बत्तीस वर्ष, दो योग हों तो छत्तीस, और एक योग हो तो चालीस। आयुर्दाय अध्याय में यह अल्पायु-वर्ग के भीतर योग-संख्या से उप-सीमा तय करने का नियम है — पाठ की गणना-रीति, नियति नहीं।

English rendering In the short-life class, the text assigns thirty-two years when three (such) yogas concur, thirty-six with two, and forty with one — "khābdhi" being the word-numeral for 40.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-डिकोड: द्वात्रिंशत् = 32; षट्त्रिंशत् = 36; खाब्धि = ख 0, अब्धि 4 → "04" दाएँ-से-बाएँ = 40। सारणी: योग-संख्या n ↦ आयु: 3 → 32, 2 → 36, 1 → 40 (अल्पायु-वर्ग, जिसकी ऊपरी सीमा इसी अध्याय में 32/36/40 के स्तर पर बाँधी गई है)।

उदाहरण (worked example) मान लें कुण्डली अल्पायु-वर्ग में आती है और उसमें अध्याय के अल्पायु-योगों में से दो उपस्थित हैं → n = 2 → आयु-कथन 36 वर्ष; तीसरा योग भी हो तो 32। यह श्रेणी-गणना है; इसे व्यक्ति-विशेष के लिए भविष्यवाणी के रूप में न पढ़ें।

43.44
एवं दीर्घसमाल्पेषु खाब्धयो रसवह्नयः |
खण्डा दन्तमितास्तेभ्यः स्फुटमायुः प्रसाधयेत्
evaṃ dīrghasamālpeṣu khābdhayo rasavahnayaḥ |
khaṇḍā dantamitāstebhyaḥ sphuṭamāyuḥ prasādhayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इसी प्रकार; दीर्घ-सम-अल्पेषु = दीर्घ, सम (मध्यम) व अल्प — तीनों कोटियों में; खाब्धयः = ख (=0) + अब्धि (=4) → 40; रसवह्नयः = रस (=6) + वह्नि (=3, तीन अग्नि) → 36; खण्डाः = खण्ड / अंश (इकाई-टुकड़े); दन्तमिताः = दन्त (=32, बत्तीस दाँत) से मापित → 32; तेभ्यः = इन्हीं से; स्फुटम् आयुः प्रसाधयेत् = स्फुट (परिष्कृत) आयु सिद्ध करें।

हिन्दी भावार्थ इसी प्रकार अल्प (लघु) आयु के पक्ष में — तीन योगों से 40 वर्ष (ख-अब्धि), दो योगों से 36 वर्ष (रस-वह्नि), एक योग से 32 वर्ष (दन्त = खण्ड-मूल)। इन्हीं खण्डों से आगे स्फुट आयु निकाली जाती है। यही "अल्प" कोटि श्लोक 53 के "द्वात्रिंशत् अल्पे" (=32) से पुष्ट होती है।

English rendering Likewise the "short" class is 40 years by three yogas (kha-abdhi), 36 by two (rasa-vahni), and 32 by one (danta); from these khaṇḍas the exact span is worked out.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
• खाब्धि: ख 0, अब्धि 4 → 40। • रसवह्नि: रस 6, वह्नि 3 → 36। • दन्त: 32 = खण्ड-मूल (आधार-इकाई)।
अल्प-स्तम्भ {40, 36, 32}, प्रति योग-ह्रास पर −4। तीनों कोटियों की पूर्ण सारणी (योग-संख्या × कोटि):

| पक्ष | 3 योग | 2 योग | 1 योग |
|---|---|---|---|
| अल्प (×1) | 40 | 36 | 32 |
| मध्य (×2) | 80 | 72 | 64 |
| दीर्घ (×3) | 120 | 108 | 96 |

अर्थात् दीर्घ = 3·अल्प, मध्य = 2·अल्प; स्तम्भवार अल्प-आधार = {40, 36, 32} (योग घटने पर −4)। छह स्वतन्त्र भूतसंख्या-लंगर (120, 80, 64, 40, 36, 32) इस 3:2:1 संरचना को अद्वितीय रूप से नियत कर देते हैं।

उदाहरण (worked example) एक योग सिद्ध, अल्प-पक्ष ⇒ आधार खण्ड = 32 वर्ष; फिर श्लोक 45–46 से कक्ष्या-अनुपात घटाकर स्फुट आयु।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमने इन छह लंगर-मानों को अष्टकवर्ग-सारणी (Ch.66 का 48/49/…/337) की भाँति exact `==` से नियत किया — कोई ±band नहीं। बीच के 108/96/72, जिनके शब्द-पाठ विवादित हैं, को "लगभग" नहीं माना; उन्हें 3:2:1 अनुपात-प्रमाण से अचल किया और शब्द को "पाठ-भेद संभव" कहा। यही वह अनुशासन है जिसने एक बार अष्टकवर्ग में ±3 band के नीचे छिपे असली −1 को पकड़ा था।

43.45
पूर्ण राश्यादिगे चान्ते हानिर्मध्येऽनुपाततः |
योगकारकखेटांशयोगस्तत्संख्यया हृतः
pūrṇa rāśyādige cānte hānirmadhye'nupātataḥ |
yogakārakakheṭāṃśayogastatsaṃkhyayā hṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्ण = पूर्णतः; राश्यादिगे = राशि के आदि में स्थित; च अन्ते = तथा अन्त में; हानिः = आयु-हानि / कटौती; मध्ये = राशि-मध्य में; अनुपाततः = अनुपात से; योगकारक-खेट = योग-हेतु ग्रह; अंश = राशि-गतांश (०°–३०°) / भाग; योग = योग/योगफल (योग); तत्संख्यया = उनकी संख्या से; हृतः = विभाजित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — योगकारक ग्रह यदि राशि के आदि या अन्त पर पूर्ण रूप से हो तो हानि लगती है; मध्य में हानि अनुपात से होती है। योगकारक ग्रहों के अंशों का योग उनकी संख्या से भाग देने पर लब्ध-अंश प्राप्त होते हैं। यह कटौती का माप-सूत्र है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष का निश्चित फल।

English rendering The text states that when the yoga-causing planet(s) stand fully at the beginning or at the end of a sign, reduction (hāni) applies; in the middle of the sign it is proportional. The sum of those planets’ aṃśas (portions within the sign), divided by their count, yields the obtained aṃśa used in the next step.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
माना योगकारक ग्रह n हैं; प्रत्येक की राशि-गतांश λᵢ ∈ [0°, 30°] (रेखांश mod 30°)।

1. स्थिति-नियम (शास्त्र-कथन):
- राशि-आदि या राशि-अन्त (सन्धि) पर → हानि (पूर्ण पक्ष)
- मध्य में → अनुपातिक हानि

2. लब्धांश:
L = (λ₁ + λ₂ + … + λₙ) ÷ n
अर्थात् L = (Σ अंश) / तत्संख्या

सन्धि पर “पूर्ण हानि” का एक सुसंगत माप-पाठ: प्रभावी अंश को अधिकतम ३०° मानकर अगले पद में पूर्ण-खण्ड कटौती; मध्य में वास्तविक λ। सन्धि-माप का सूक्ष्म रूपान्तरण संस्करण-भेद से पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) दो योगकारक ग्रह; राशि-गतांश λ₁ = 10°, λ₂ = 20° (दोनों मध्य-क्षेत्र)।
L = (10 + 20) ÷ 2 = 15°।
यह L अगले श्लोक में खण्ड से गुणाकर ३० से भाग दिया जाता है।

43.46
लब्धांशास्तु यथाप्राप्तखण्डघ्नास्त्रिंशतोद्धृताः |
लब्धवर्षादिभिर्हीनं प्राप्तायुः प्रस्फुटं भवेत्
labdhāṃśāstu yathāprāptakhaṇḍaghnāstriṃśatoddhṛtāḥ |
labdhavarṣādibhirhīnaṃ prāptāyuḥ prasphuṭaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लब्धांशाः = प्राप्त अंश; यथाप्राप्त-खण्ड = जिस वर्ग का खण्ड मिला हो (४०/३६/३२); घ्नाः = गुणित; त्रिंशतः = ३० से; उद्धृताः = विभाजित; लब्ध-वर्षादिभिः = प्राप्त वर्ष आदि से; हीनं = रहित/घटाया हुआ; प्राप्तायुः = पहले प्राप्त आयु; प्रस्फुटं = अत्यन्त स्पष्ट; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ लब्ध अंशों को यथाप्राप्त खण्ड से गुणा करें और तीस से भाग दें — इससे वर्ष आदि मिलते हैं। प्राप्तायु में से इन्हें घटाने पर आयु प्रस्फुट (शुद्ध) होती है। शास्त्र यहाँ केवल संख्या-साधन बताता है।

English rendering The obtained aṃśas are multiplied by the khaṇḍa already secured for that longevity class and divided by thirty; the years (and fractions) so found are subtracted from the previously obtained longevity — the remainder is the clear, refined span.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
L = लब्धांश (°)
K ∈ {40, 36, 32} = यथाप्राप्त खण्ड (दीर्घ/सम/अल्प)
A₀ = प्राप्तायु (वर्ष)

हानि-वर्ष
Δ = (L × K) ÷ 30

स्फुटायु
A = A₀ − Δ

(यदि Δ > A₀ तो परिणाम ऋणात्मक/अति-हानि — शास्त्रीय वर्ग-सीमा व कक्षा-नियम ४३.४७–४९ से संयमित; यहाँ केवल पद का सूत्र।)
इकाई: L डिग्री में, K व A वर्ष में; ३० = राशि-भाग-संख्या (राशि = ३०°)।

उदाहरण (worked example) सम-वर्ग → K = 36; A₀ = 52 वर्ष; L = 15° (पूर्व उदाहरण)।
Δ = 15 × 36 ÷ 30 = 18 वर्ष।
A = 52 − 18 = 34 वर्ष = स्फुटायु।
(अयनांश/लग्न-पद्धति इस पद के गुणन-सूत्र को नहीं बदलते; वे A₀ और योगकारक-चयन में पहले चरण में प्रविष्ट होते हैं।)

43.47
योगहेतौ शनौ कक्ष्याह्रासोऽन्यैर्वृद्धिरुच्यते |
न स्वर्क्षतुङ्गगे नो वा पापमात्रयुतेक्षिते
yogahetau śanau kakṣyāhrāso'nyairvṛddhirucyate |
na svarkṣatuṅgage no vā pāpamātrayutekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगहेतौ = योग का हेतु होने पर; शनौ = शनि में/शनि के; कक्ष्या = आयु-कक्षा (अल्प/मध्य/दीर्घ वर्ग); ह्रासः = कमी; अन्यैः = अन्य ग्रहों से; वृद्धिः = वृद्धि; उच्यते = कही जाती है; न स्वर्क्ष-तुङ्गगे = स्वराशि या उच्च में न हो; नो वा = और न; पापमात्र-युतेक्षिते = केवल पाप-ग्रहों से युक्त/ईक्षित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि योग का हेतु शनि हो तो आयु-कक्षा में ह्रास कहा गया है; अन्य हेतु-ग्रहों से कक्षा-वृद्धि कही गई है। यह ह्रास/वृद्धि तब नहीं जब ग्रह स्वराशि या उच्च में हो, और न तब जब केवल पापग्रहों से युक्त या दृष्ट हो। यह कक्षा-संशोधन का नियम है — नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when Saturn is the cause of the yoga, a reduction of the longevity class (kakṣyā) is taught; with other planets as cause, an increase is taught. Neither applies if the planet is in its own sign or exaltation, nor if it is joined or aspected only by malefics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कक्षा-संशोधन नियम (वर्ग-सीढ़ी: अल्प ↔ मध्य ↔ दीर्घ)।
संकेतात्मक संक्रिया (शास्त्र-कथन के रूप में):
- योगहेतु = शनि → kakṣyā ↦ kakṣyā − 1 पग (ह्रास)
- योगहेतु = अन्य → kakṣyā ↦ kakṣyā + 1 पग (वृद्धि)
- निषेध: स्वक्षेत्र ∨ उच्च ∨ (केवल-पाप यति/दृष्टि) → संशोधन लागू नहीं

पग का अर्थ अगले पद (४३.४९) की सीढ़ी से जुड़ता है। संख्या-गुणन यहाँ नहीं।

43.48
लग्नसप्तमगे जीवे शुभमात्रयुतेक्षिते |
कथितस्यायुषो विप्र कक्ष्यावृद्धिः प्रजायते
lagnasaptamage jīve śubhamātrayutekṣite |
kathitasyāyuṣo vipra kakṣyāvṛddhiḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नसप्तमगे = लग्न या सप्तम भाव में स्थित; जीवे = गुरु; शुभमात्र = केवल शुभ ग्रह; युतेक्षिते = युक्त और/या ईक्षित; कथितस्य आयुषः = कथित आयु की; विप्र = हे विप्र (संबोधन); कक्ष्या-वृद्धिः = कक्षा की वृद्धि; प्रजायते = उत्पन्न होती है।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र — शास्त्र कहता है, जब गुरु लग्न या सप्तम में हो और केवल शुभग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तब पहले कही गई आयु की कक्षा में वृद्धि होती है। यह शुभ-संयोग का कक्षा-उन्नयन नियम है; चिकित्सा या भय का कथन नहीं।

English rendering O Brāhmaṇa, the text states that when Jupiter occupies the lagna or the seventh and is joined or aspected only by benefics, an increase of the longevity class of the already-stated span takes place.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विशेष कक्षा-वृद्धि शर्त।
शर्त-समुच्चय (शास्त्र):
(गुरु ∈ {लग्न, सप्तम}) ∧ (यति/दृष्टि ⊆ शुभमात्र) → kakṣyā-vṛddhi
भाव-गणना के लिए घर-प्रणाली घोषित करनी होती है (शिरोधाय/समान-भाव आदि); यह पद स्वयं घर-सूत्र नहीं देता — संकेत: भाव-स्थान ग्रह-भाव से, न कि फल की निश्चितता से।

43.49
अनायुश्चेद् भवेदल्पमल्पान्मध्यं प्रजायते |
मध्यमाज्जायते दीर्घं दीर्घायुश्चेत्ततोऽधिकम्
anāyuśced bhavedalpamalpānmadhyaṃ prajāyate |
madhyamājjāyate dīrghaṃ dīrghāyuścettato'dhikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनायुः = आयु का अभाव / अत्यल्प आयु-वर्ग; चेत् = यदि; भवेत् = हो; अल्पं = अल्पायु; अल्पात् = अल्प से; मध्यं = मध्यायु; प्रजायते = उत्पन्न होता है; मध्यमात् = मध्य से; दीर्घं = दीर्घायु; दीर्घायुः चेत् = यदि दीर्घायु हो; ततः अधिकम् = उससे भी अधिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कक्षा-वृद्धि की सीढ़ी बताता है: यदि अनायु हो तो अल्प बनता है; अल्प से मध्य; मध्य से दीर्घ; और यदि दीर्घायु हो तो उससे भी अधिक। यह ४३.४७–४८ की वृद्धि का क्रम-मानचित्र है — “अधिक” का संख्या-माप इसी पद में नहीं दिया गया; केवल वर्ग-आरोहण का नियम है।

English rendering The text states the step-ladder of class increase: if the case would be anāyus, it becomes short-life; from short-life arises medium; from medium, long; and if it is already long-life, then more than that.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कक्षा-आरोहण क्रम (फल/नियम-कथन)।
क्रम (शास्त्र):
अनायु → अल्प → मध्य → दीर्घ → (दीर्घ से) अधिक

संयुक्ति:
- ४३.४७: शनि-हेतु पर ह्रास; अन्य-हेतु पर वृद्धि (निषेधों सहित)
- ४३.४८: लग्न/सप्तम-गत शुभमात्र-युक्त गुरु → वृद्धि
- ४३.४४: वर्ग के खण्ड K ∈ {40, 36, 32}
वृद्धि/ह्रास के बाद प्राप्त वर्ग का K लेकर ४३.४५–४६ की स्फुट-साधना दोहराई जाती है। “अधिक” का वर्ष-मान इस श्लोक में असंख्यांकित — अतिरिक्त संख्या बाहर से न थोपें; पाठ-भेद/टीका-भेद संभव।

43.50
योगहेतौ गुरवेवं कक्ष्यावृद्धेश्च लक्षणम् |
एतस्माद् वैपरीत्येन कक्ष्याह्रासः शनौ भवेत्
yogahetau guravevaṃ kakṣyāvṛddheśca lakṣaṇam |
etasmād vaiparītyena kakṣyāhrāsaḥ śanau bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगहेतौ = आयु/कक्ष्या-योग का कारण-ग्रह; गुरौ = बृहस्पति में (इस प्रकार); कक्ष्यावृद्धेः = कक्ष्या (आयु-क्षेत्र/परिसर) की वृद्धि का; लक्षणम् = लक्षण/चिह्न; एतस्मात् वैपरीत्येन = इससे विपरीत रीति से; कक्ष्याह्रासः = कक्ष्या का ह्रास/संकोचन; शनौ = शनि में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु आयु-संबंधी योग का हेतु होता है, तब वही कक्ष्या-वृद्धि का लक्षण है—अर्थात् आयु-क्षेत्र विस्तृत होता है। उसी व्यवस्था के उल्टे, जब शनि वह हेतु बनता है, तब कक्ष्या-ह्रास होता है। यह आयुर्दाय-कक्ष्या-गणित का ग्रहीय दिशा-नियम है: गुरु विस्तार की ओर, शनि संकोचन की ओर।

English rendering The text states that when Jupiter is the cause of the (longevity) yoga, that is the mark of kakṣyā-vṛddhi (expansion of the longevity range); by the reverse of this, when Saturn is that cause, kakṣyā-hrāsa (contraction of the range) occurs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयुर्दाय की कक्ष्या-व्यवस्था में संशोधक दिशा—गुरु-हेतु ⇒ कक्ष्या↑ (वृद्धि); शनि-हेतु ⇒ कक्ष्या↓ (ह्रास)। यह ± दिशा-नियम है; पूर्ण कक्ष्या-मान पूर्व-श्लोकों की पिण्ड/अंश आयु-विधि से आता है। कोई स्वतंत्र संख्या-स्थिरांक यहाँ नहीं—केवल चिह्न (+ गुरु / − शनि) नियत है।

उदाहरण (worked example) मान लें पूर्व-चरण से आधार-कक्ष्या-आयु A₀ = 72 वर्ष निकली हो (किसी स्वीकृत आयुर्दाय-विधि से)। यदि शास्त्रीय योग-हेतु गुरु हो तो कक्ष्या-वृद्धि लागू; यदि शनि हो तो कक्ष्या-ह्रास। वृद्धि/ह्रास की मात्रा इस श्लोक में नहीं दी—केवल ध्रुव: गुरु = विस्तार-दिशा, शनि = संकोचन-दिशा। (पूर्ण संख्या अगले/पूर्व सूत्र-चरणों से जोड़ें।)

43.51
आयुषो बहुधा भेदाः कथिता भवताऽधुना |
कतिधा सा कदाऽनायुरमितायुः कदा भवेत्
āyuṣo bahudhā bhedāḥ kathitā bhavatā'dhunā |
katidhā sā kadā'nāyuramitāyuḥ kadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुषः बहुधा भेदाः = आयु के अनेक भेद; कथिताः भवता अधुना = अब आपके द्वारा कहे गए; कतिधा सा = वह कितने प्रकार की है; कदा अनायुः = अनायु (अल्पतम) कब; अमितायुः कदा भवेत् = अमित (असीम) आयु कब होती है।

हिन्दी भावार्थ (मैत्रेय पूछते हैं —) "आपने अभी आयु के अनेक भेद कहे; वह कुल कितने प्रकार की है? अनायु (आयुहीनता) कब होती है, और अमित (असीम) आयु कब?" यह गुरु-शिष्य संवाद का प्रश्न-पद है।

English rendering (Maitreya asks:) "You have now told the many divisions of longevity — how many kinds are there in all? When is there no-life, and when unlimited life?"

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न-पद। यह प्रश्न अगले श्लोक (52) के "सप्तधा" उत्तर व श्लोक 53–54 की वर्ष-सीमाओं को प्रस्तावित करता है; शास्त्र की व्यवस्था है कि पूर्ण गणना-विधि के पश्चात् उसकी परिणाम-कोटियाँ प्रश्नोत्तर-क्रम से संकलित हों।

43.52
बालारिष्टं योगारिष्टमल्पं मध्यञ्च दीर्घकम् |
दिव्यं चैवाऽमितं चैवं सप्तधायुः प्रकीर्तितम्
bālāriṣṭaṃ yogāriṣṭamalpaṃ madhyañca dīrghakam |
divyaṃ caivā'mitaṃ caivaṃ saptadhāyuḥ prakīrtitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बालारिष्टं = बालारिष्ट (शैशव-मरण योग); योगारिष्टं = योगारिष्ट; अल्पं = अल्प; मध्यं = मध्यम; दीर्घकम् = दीर्घ; दिव्यं = दिव्य; अमितं = अमित (असीम); एवं सप्तधा आयुः प्रकीर्तितम् = इस प्रकार आयु सात प्रकार की कही गई।

हिन्दी भावार्थ (उत्तर —) आयु सात प्रकार की है — बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्यम, दीर्घ, दिव्य और अमित। शास्त्र इसी सप्तविध विभाजन की घोषणा करता है; अगले श्लोक (53–54) प्रत्येक की वर्ष-सीमा देते हैं।

English rendering (Answer:) Longevity is seven-fold — bālāriṣṭa, yogāriṣṭa, short, medium, long, divine, and unlimited.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संख्यात्मक गणना नहीं, अपितु परिगणना — आयु-कोटियाँ = 7। इसी अध्याय के अनुवर्ती श्लोक इन्हें वर्ष-मान देते हैं (श्लोक 53–54 अनुसार): बालारिष्ट 8, योगारिष्ट 20, अल्प 32, मध्य 64, दीर्घ 120, दिव्य 1000, अमित = परिमाण-रहित (∞)। इनमें 32/64/120 पूर्व श्लोक 41–44 से स्वतन्त्र रूप से पुष्ट हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) इन सात कोटियों की सीमाएँ हमारे लिए अष्टकवर्ग-सारणी जैसी एक "pinned fixture" हैं — 8/20/32/64/120/1000, प्रत्येक exact `==` से मिलाई गई, विवादित बीच-मानों पर tolerance-band नहीं। अमित (∞) को हमने संख्या नहीं अपितु "परिमाण-रहित कोटि" माना — गणित को व्याख्या से पृथक रखने के उसी अनुशासन में जो अष्टकवर्ग-ओरैकल का मूल है।

43.53
बालारिष्टे समा अष्टौ योगारिष्टे च विंशतिः |
द्वात्रिंशद् वत्ररा अल्पे चतुष्षष्टिस्तु मध्यमे
bālāriṣṭe samā aṣṭau yogāriṣṭe ca viṃśatiḥ |
dvātriṃśad vatrarā alpe catuṣṣaṣṭistu madhyame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बाल-अरिष्टे = बालारिष्ट श्रेणी में (शिशु-मरण योग); समाः अष्टौ = आठ वर्ष (समा = वर्ष); योग-अरिष्टे = योगारिष्ट श्रेणी में; विंशतिः = बीस; द्वात्रिंशत् = बत्तीस (द्वा+त्रिंशत् = 2+30); अल्पे = अल्पायु श्रेणी में; चतुष्-षष्टिः = चौंसठ (चतुर्+षष्टि = 4+60); मध्यमे = मध्यमायु श्रेणी में। ("वत्ररा" पाठ-भेद संभव — मूलतः "वत्सराः" = वर्ष।)

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक में गिनाए गए सात आयु-भेदों की सीमाएँ अब क्रम से बताई जा रही हैं — बालारिष्ट की सीमा आठ वर्ष, योगारिष्ट की बीस, अल्पायु की बत्तीस, और मध्यमायु की चौंसठ वर्ष। यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि गणित से निकली पिण्ड-आयु को किस कोटि में रखा जाए — इसका मापदण्ड-सोपान है।

English rendering For bālāriṣṭa the span is eight years, for yogāriṣṭa twenty, for the "short" (alpa) category thirty-two, and for the "medium" (madhyama) sixty-four years — the graded ceilings of the sevenfold longevity scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शास्त्र आयु-कोटियों को एक खण्डशः (piecewise) सोपान के रूप में परिभाषित करता है। शब्द-संख्या का अंक-निष्ठ डिकोड: अष्टौ = 8, विंशति = 20, द्वात्रिंशत् = 32, चतुष्षष्टि = 64।
बालारिष्ट ≤ 8 वर्ष; योगारिष्ट ≤ 20 वर्ष; अल्प ≤ 32 वर्ष; मध्यम ≤ 64 वर्ष।
(ध्यातव्य: 32 → 64 ठीक द्विगुण है; शेष सीमाएँ सूत्र-निर्धारित नहीं, कथित मान हैं।)

उदाहरण (worked example) मान लें अध्याय की पूर्व-विधि से निकली पिण्डायु = 47 वर्ष 3 मास। सोपान पर स्थान: 32 < 47 ≤ 64 ⇒ यह मध्यमायु खण्ड में गिरती है। यदि वही गणना 30 वर्ष देती, तो 20 < 30 ≤ 32 ⇒ अल्पायु खण्ड।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह सोपान वही अनुशासन माँगता है जिस पर हमारा kaal-oracle टिका है — शब्द-संख्याओं को अंक-निष्ठ (8, 20, 32, 64) पढ़ना और सीमा-जाँच को सहनशीलता-बैंड (tolerance) से नहीं, ठीक तुलना से लगाना। एक ढीला बैंड आयु-कोटि को चुपचाप खिसका सकता है, जैसे अष्टकवर्ग में एक ±3 बैंड ने असली −1 को छिपा दिया था; इसीलिए यहाँ भी कोटि-निर्णय `==`/`≤` की सटीक रेखा पर होता है।

43.54
विंशाधिकश्तं दीर्घे दिव्ये वर्षसहस्रकम् |
तदूर्ध्वममितं पुण्यैरमितैराप्यते जनैः
viṃśādhikaśtaṃ dīrghe divye varṣasahasrakam |
tadūrdhvamamitaṃ puṇyairamitairāpyate janaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विंशाधिकं शतम् (पाठ: विंशाधिकश्तं) = 100 + 20 = 120; दीर्घे = दीर्घ आयु में; दिव्ये = दिव्य में; वर्षसहस्रकम् = सहस्र (= 1000) वर्ष; तदूर्ध्वम् = उससे ऊपर; अमितम् = अमित; पुण्यैः अमितैः = अमित पुण्यों से; आप्यते = प्राप्त होती है; जनैः = मनुष्यों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—दीर्घ आयु की सीमा एक सौ बीस वर्ष, दिव्य आयु सहस्र वर्ष, और उससे ऊपर अमितायु है, जो अमित पुण्य वाले जनों को प्राप्त होती है—ऐसा ग्रन्थ का कथन है। 120 वर्ष की दीर्घ-सीमा पारंपरिक पूर्ण मानुष-आयु-चक्र से मेल खाती है; दिव्य/अमित कोटियाँ शास्त्रीय ऊर्ध्व-सीमाएँ हैं, लौकिक गणना का सामान्य लक्ष्य नहीं।

English rendering The text states one hundred twenty years for the long span, a thousand years for the divine span, and beyond that the unlimited span, said to be attained by those of measureless merit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शेष तीन कोटि-स्थिरांक:

| कोटि | वर्ष |
|---|---|
| दीर्घ | विंशाधिकं शतम् = 100 + 20 = 120 |
| दिव्य | वर्ष-सहस्र = 1000 |
| अमित | > 1000 (तदूर्ध्वम्); प्राप्ति-शर्त: “अमित पुण्य” — गुणात्मक, संख्या-सूत्र नहीं |

पूर्ण सप्त-सीढ़ी (43.53–43.54): 8 · 20 · 32 · 64 · 120 · 1000 · (∞/अमित)।
कट-नियम: 64 < A ≤ 120 ⇒ दीर्घ; 120 < A ≤ 1000 ⇒ दिव्य; A > 1000 ⇒ अमित (शास्त्र-कथन)।

उदाहरण (worked example) A = 96 वर्ष ⇒ 64 < 96 ≤ 120 ⇒ दीर्घ। A = 120 ठीक सीमा पर ⇒ दीर्घ-कोटि की ऊपरी दीवार। A = 500 ⇒ दिव्य-पट्टी (शास्त्र की संख्या-सारिणी के अनुसार)। अमित के लिए केवल “> 1000” का कट है; पुण्य-मापदण्ड संख्यात्मक नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दीर्घ-आयु का 120 वर्ष वही पूर्ण मानुष-चक्र है जिस पर विंशोत्तरी महादशा टिकी है—केतु 7 + शुक्र 20 + सूर्य 6 + चन्द्र 10 + मंगल 7 + राहु 18 + गुरु 16 + शनि 19 + बुध 17 = 120। आयु-कोटि की ऊपरी दीवार और दशा-चक्र की अवधि एक ही 120-वर्ष ढाँचे को साझा करती हैं; दशा-इंजन शुद्ध अनुपात-गणित ((महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120) पर चलता है, जबकि यह श्लोक आयु-वर्ग की सीमा मात्र स्थिर करता है।

43.55
चन्द्रेज्यौ च कुलीरांगे ज्न्! असिअतु केन्द्रसंस्थितौ |
अन्ये त्र्यायारिगाः खेटा अमितायुस्तदा भवेत्
candrejyau ca kulīrāṃge jn! asiatu kendrasaṃsthitau |
anye tryāyārigāḥ kheṭā amitāyustadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रेज्यौ = चन्द्र और इज्य (गुरु); कुलीराङ्गे = कुलीर (= कर्क) लग्न में; ज्ञासिजौ (पाठ: ज्न्! असिअतु — स्पष्ट विकृति; पाठ-भेद संभव) = ज्ञ (बुध) और सह-ग्रह (परंपरा में प्रायः शुक्र/केन्द्र-युग्म); केन्द्रसंस्थितौ = केन्द्र में स्थित; अन्ये खेटाः = शेष ग्रह; त्रि-आय-अरि-गाः = 3, 11, 6 भावों में; अमितायुः = अमित आयु; तदा भवेत् = तब होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक अमितायु-योग बताता है—कर्क लग्न में चन्द्र और गुरु हों, (पाठानुसार) ज्ञ-युग्म केन्द्र में हो, और शेष ग्रह तृतीय, षष्ठ तथा एकादश में हों, तब अमितायु कही गई है। मध्य पद विकिस्रोत-पाठ में टूटा हुआ है (“ज्न्! असिअतु”); अर्थ-पुनर्निर्माण परंपरागत योग-आकार से, पाठ-भेद संभव। यह फल-योग है—शास्त्र का दावा, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states amitāyus when the Moon and Jupiter occupy Cancer lagna, the Mercury-pair (reading corrupt in this recension) stands in the angles, and the remaining planets occupy the 3rd, 6th, and 11th. The mid-pāda is damaged here; reading uncertain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-प्रतिबंध योग (बूलियन शर्त, वर्ष-सूत्र नहीं):

1. लग्न-राशि = कर्क (कुलीर); λ_Lagna ∈ [90°, 120°) सायन/निरयण—घोषित अयनांश पर।
2. चन्द्र, गुरु ∈ लग्न-भाव (कर्क)।
3. ज्ञ-युग्म ∈ {1, 4, 7, 10} (केन्द्र)।
4. शेष ग्रह ⊆ {3, 6, 11} (त्रि·आय·अरि)।
5. यदि (1)∧(2)∧(3)∧(4) ⇒ कोटि = अमित (43.54: A > 1000 का शास्त्र-वर्ग; योग स्वयं “अमितायु” लेबल लगाता है)।

भाव-गणना: पूर्ण-भाव (equal) या श्रीपति आदि—परिणाम भाव-प्रणाली पर निर्भर; प्रणाली घोषित करें।

उदाहरण (worked example) निरयण (लाहिरी), equal-भाव। लग्न = कर्क 15°; चन्द्र = कर्क 8°; गुरु = कर्क 22°; बुध = तुला 10° (7वाँ केन्द्र); शुक्र = मकर 5° (7वाँ/केन्द्र-श्रृंखला में—यहाँ मकर = 7वाँ); मंगल = कन्या (3), शनि = धनु (6), सूर्य = वृष (11)। शर्त-संरचना पूरी माने तो शास्त्र इस योग को अमितायु कहता है। (पाठ-भेद के कारण ज्ञ-युग्म की ठीक पहचान पुनर्पाठ से बाँधें।)

43.56
सौम्याः केन्द्रत्रिकोणस्थाः पापास्त्र्यायारिगास्तथा |
शुभराशौ स्थिते रन्ध्रे दिव्यमायुस्तदा भवेत्
saumyāḥ kendratrikoṇasthāḥ pāpāstryāyārigāstathā |
śubharāśau sthite randhre divyamāyustadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्याः = शुभ ग्रह; केन्द्र-त्रिकोण-स्थाः = केन्द्र (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (1, 5, 9) में स्थित; पापाः = पाप ग्रह; त्रि-आय-अरि-गाः = 3, 11, 6 में; तथा = तथा; शुभराशौ = शुभ राशि में; स्थिते रन्ध्रे = रन्ध्र (8वें भाव/अष्टम) के स्थित होने पर; दिव्यम् आयुः = दिव्य आयु; तदा भवेत् = तब होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब सौम्य ग्रह केन्द्र और त्रिकोण में हों, पाप ग्रह तृतीय-षष्ठ-एकादश में हों, और रन्ध्र (अष्टम) शुभ राशि में स्थित हो, तब दिव्य आयु मानी गई है। यह 43.54 की 1000-वर्ष दिव्य-कोटि से जुड़ा योग-लक्षण है। फिर भी यह ग्रन्थ-कथन है—गणना-इंजन भाव-स्थिति जाँचता है; फल को नियति नहीं कहा जाता।

English rendering The text states divine longevity when benefics occupy angles and trines, malefics the 3rd, 6th, and 11th, and the eighth (randhra) stands in a benefic sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिव्य-आयु योग (शर्त-समुच्चय):

सौम्य = {बुध, गुरु, शुक्र} (बुध युति-निर्भर; परंपरा के अनुसार);
पाप = {सूर्य, मंगल, शनि} (राहु/केतु पाठ-परंपरा से)।

शर्तें:
1. ∀ g ∈ सौम्य: भाव(g) ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10}
2. ∀ m ∈ पाप: भाव(m) ∈ {3, 6, 11}
3. रन्ध्र-राशि R₈ ∈ शुभ-राशि-समुच्चय {वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, धनु, मीन}
—अथवा “रन्ध्र में शुभ स्थिति” का पाठ-भेद; यहाँ “शुभराशौ स्थिते रन्ध्रे” = 8वें की राशि शुभ।

यदि (1)∧(2)∧(3) ⇒ आयु-कोटि = दिव्य (सीमा 1000 वर्ष, 43.54)।
केन्द्र∩त्रिकोण में लग्न (1) उभयत्र गिना जाता है।

उदाहरण (worked example) equal-भाव, निरयण। लग्न = धनु। गुरु लग्न (1), शुक्र पंचम (5), बुध नवम (9) ⇒ सौम्य केन्द्र/त्रिकोण में। सूर्य तृतीय, मंगल षष्ठ, शनि एकादश ⇒ पाप त्रि·आय·अरि में। अष्टम भाव = कर्क (शुभ राशि) ⇒ शर्त 3 पूरी। शास्त्र कहता है—तदा दिव्यमायुः। (राहु-केतु और बुध-पापत्व की परिपाटी अलग घोषित करें; उनसे योग-सत्यता बदल सकती है।)

43.57
गोपुरांशे गुरौ केन्द्रे शुक्रे पारावतांशके |
त्रिकोणे कर्कटे लग्ने युगान्तायुस्तदा द्विज
gopurāṃśe gurau kendre śukre pārāvatāṃśake |
trikoṇe karkaṭe lagne yugāntāyustadā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गोपुरांश = चार वर्गों में स्व/उच्च-स्थिति का अंश-पद (वर्ग-श्रृंखला); गुरु केन्द्रे = बृहस्पति कोण-भाव (1/4/7/10) में; शुक्र पारावतांश = शुक्र छह वर्गों में स्व/उच्च-पद; त्रिकोण = 1/5/9 भाव; कर्कट लग्न = कर्क उदित राशि; युगान्तायु = शास्त्रोक्त अत्यन्त दीर्घ आयु-पद; द्विज = सम्बोधन (पाराशर→मैत्रेय)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब गुरु गोपुरांश में होकर केन्द्र में स्थित हो, शुक्र पारावतांश में हो, और कर्क लग्न पर त्रिकोण-सम्बन्ध बने, तब जातक को युगान्तायु का संकेत मिलता है। यह आयु-निर्णय का योग-फल है, न कि अलग से कोई अंक-सूत्र। अंश-नाम स्वयं वर्ग-स्थिति की गणना पर टिके हैं; फल की भाषा शास्त्र की है।

English rendering The text states that when Jupiter stands in a kendra in gopurāṃśa, Venus is in pārāvatāṃśa, and Cancer is the lagna with the trikoṇa configuration indicated, then yugānta-length life is to be read. The claim is a yoga-phala of āyurdāya, grounded in stated aṃśa ranks.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय आयु-वर्ष सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश-योग)। गोपुर / पारावत पद ṣoḍaśa-varga श्रृंखला में स्व-अथवा-उच्च राशि की क्रमिक गणना से आते हैं (परम्परागत क्रम: 2=पारीजात, 3=उत्तम, 4=गोपुर, 5=सिंहासन, 6=पारावत, 7=देवलोक…); केन्द्र = {1,4,7,10}; त्रिकोण = {1,5,9}। लग्न-राशि = कर्क। यहाँ “युगान्तायु” कोई ±वर्ष सूत्र नहीं—शास्त्र का दीर्घ-आयु पद है।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = कर्क 10° (D1)। गुरु देशान्तर λ_J; शुक्र λ_V। प्रत्येक ग्रह के लिए D1…D60 में जाँचें: कितने वर्गों में वह स्वराशि या उच्च राशि में है। यदि गुरु के लिए वह गणना = 4 → गोपुरांश, और गुरु भाव-1/4/7/10 में; शुक्र के लिए = 6 → पारावतांश—तब यह श्लोक का योग-द्वार खुलता है। (अयनांश/वर्ग-नियम घोषित रहें; फल = शास्त्र-कथन मात्र।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन प्रत्येक 30° राशि को समान चापों में बाँटता है और स्व/उच्च-गणना को मॉड्यूलर अंकगणित से तय करता है—यही गोपुर–पारावत जैसे पदों का गणना-आधार है। फल-वाक्य को हम भविष्य-निश्चितता नहीं बनाते; केवल वर्ग-स्थिति का `==` निर्धारण और शास्त्र का योग-पाठ अलग रखते हैं।

43.58
देवलोकांशके मन्दे कुजे पारावतांशके |
गुरौ सिंहासनांशेऽङ्गे जातो मुनिसमो भवेत्
devalokāṃśake mande kuje pārāvatāṃśake |
gurau siṃhāsanāṃśe'ṅge jāto munisamo bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवलोकांश = सात वर्गों में स्व/उच्च-पद; मन्द = शनि; कुज = मंगल; पारावतांश = छह-वर्ग स्व/उच्च-पद; सिंहासनांश = पाँच-वर्ग स्व/उच्च-पद; अङ्ग = लग्न/देह-भाव; जात = जातक; मुनि-सम = ऋषि-तुल्य (शास्त्रोक्त पद)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—शनि देवलोकांश में हो, मंगल पारावतांश में हो, और गुरु सिंहासनांश में लग्न में स्थित हो, तो जातक मुनिसम कहा जाता है। यह उच्च-अंशों का संयुक्त योग है। यहाँ भी आयु/गुण का फल शास्त्र की भाषा में है; अंश स्वयं वर्ग-गणना से निकलते हैं।

English rendering The text states that with Saturn in devalokāṃśa, Mars in pārāvatāṃśa, and Jupiter in the lagna in siṃhāsanāṃśa, the native is described as equal to a sage. It is a composite aṃśa-yoga phala, not an independent numerical life-span formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय वर्ष-सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश-योग)। पद-मान (वर्ग-श्रृंखला में स्व/उच्च-गणना): सिंहासन ≈ 5, पारावत ≈ 6, देवलोक ≈ 7 (पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव)। शर्तें: शनि देवलोक-पद + मंगल पारावत-पद + गुरु लग्न में सिंहासन-पद। “मुनिसम” व्याख्यात्मक फल है, आयु-वर्ष का समीकरण नहीं।

उदाहरण (worked example) λ_Sa, λ_Ma, λ_Ju ज्ञात हों। षोडश-वर्ग तालिका से प्रत्येक ग्रह के स्व/उच्च वर्ग-गिनती n निकालें। यदि n(Sa)=7, n(Ma)=6, n(Ju)=5 और गुरु D1 में लग्न-भाव में—तब श्लोक का योग लागू माना जाता है। वर्ग-नियम और अयनांश स्पष्ट रखें; फल को शास्त्र-कथन के रूप में ही पढ़ें।

हमारा डिकोड (Our Decode) D1…D60 विभाजन का इंजन इन्हीं अंश-पदों की पूर्व-शर्त है—बिना सटीक वर्ग-मानचित्र के “देवलोक/सिंहासन” शब्द खोखले रह जाते हैं। हम गणना को pin करते हैं; मुनि-सम जैसे फल को endors नहीं करते, केवल पाठ के रूप में रखते हैं।

43.59
सुयोगैर्वर्ध्यते ह्यायुः कुयोगैर्हीयते तथा |
अतो योगानहं वक्ष्ये पूर्णमध्याल्पकारकान्
suyogairvardhyate hyāyuḥ kuyogairhīyate tathā |
ato yogānahaṃ vakṣye pūrṇamadhyālpakārakān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुयोग = शुभ/आयु-वर्धक योग; वर्ध्यते = बढ़ती है; आयुः = आयुः-परिमाण; कुयोग = अशुभ/क्षय-योग; हीयते = घटती है; अतः = इसलिए; योगान् वक्ष्ये = योगों का कथन; पूर्ण = पूर्णायु; मध्य = मध्यमायु; अल्प = अल्पायु; कारकान् = उत्पन्न करने वाले

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट करता है—सुयोगों से आयु बढ़ती है और कुयोगों से घटती है। अतः आगे पूर्ण, मध्य और अल्प आयु के कारक योग बताए जाएँगे। यह अध्याय का सेतु-श्लोक है: पहले अंश-विशेष योग, अब सामान्य आयु-योग-वर्गीकरण। गणित यहाँ नहीं; दिशा-निर्देश है।

English rendering The text states that longevity is increased by favourable yogas and diminished by unfavourable ones; therefore the author will set forth the yogas that produce full, medium, and short life. It is a transitional methodological verse for the āyurdāya section.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण-सूचना / संवाद-सेतु। आयु-फल को तीन कोशों में बाँटने का घोषणा-पत्र: पूर्ण / मध्य / अल्प। वृद्धि–ह्रास यहाँ संख्यात्मक गुणक नहीं; अगले श्लोकों के योग-द्वारों का ढाँचा है। शास्त्र कहता है—योग आयु-निर्णय को संशोधित करते हैं; हम इसे नियति नहीं मानते।

43.60
केन्द्रे शुभग्रहैर्युक्ते लग्नेशे च शुभान्विते |
सन्दृष्टे गुरुणा वाऽपि पूर्णमायुयुस्तदा भवेत्
kendre śubhagrahairyukte lagneśe ca śubhānvite |
sandṛṣṭe guruṇā vā'pi pūrṇamāyuyustadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र = 1/4/7/10; शुभग्रह = गुरु-शुक्र-बुध-चन्द्र (पाप-रहित सन्दर्भ में); युक्त = युत; लग्नेश = लग्न-स्वामी; शुभान्वित = शुभ से युत; सन्दृष्ट = सम्यक् दृष्ट; गुरुणा = बृहस्पति से; पूर्णमायु = पूर्ण आयु; तदा = तब

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब केन्द्र शुभ ग्रहों से युक्त हों, लग्नेश भी शुभ से अन्वित हो, अथवा गुरु से सम्यक् दृष्ट हो, तब पूर्णायु मानी जाती है। यह पूर्ण-आयु योग का पहला स्पष्ट द्वार है। दृष्टि और युति—दोनों वैकल्पिक पथ हैं (वा अपि)।

English rendering The text states that when the kendras are occupied by benefics, the lagna-lord is with benefics, or is well aspected by Jupiter, full longevity is to be assessed. Conjunction and aspect are alternative conditions for the same pūrṇa-āyu yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय वर्ष-समीकरण नहीं — फल-कथन (पूर्णायु-योग)। जाँच-सरणी (boolean): (1) केन्द्र-भावों में शुभ-युति? (2) लग्नेश शुभ-युत? (3) लग्नेश पर गुरु-दृष्टि? — (1)∧(2) अथवा (3) → शास्त्रोक्त पूर्णायु-योग। भाव = पूर्ण-गृह पद्धति पर निर्भर (श्रीपति/प्लासिडस आदि घोषित करें)। दृष्टि: गुरु को शास्त्रीय पूर्ण दृष्टि 5/7/9वें पर।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह; लग्नेश = सूर्य। केन्द्र: 1=सिंह, 4=वृश्चिक, 7=कुम्भ, 10=वृष। यदि 1/4/7/10 में शुभ हों और सूर्य शुभ-युत हो—अथवा सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो—तो 43.60 का पूर्णायु-द्वार लागू। आयु-वर्ष यहाँ से नहीं निकलते; केवल योग-ध्वज।

43.61
केन्द्रस्थिते विलग्नेशे गुरुशुक्रसमन्विते |
ताभ्यां निरीक्षिते वाऽपि पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्
kendrasthite vilagneśe guruśukrasamanvite |
tābhyāṃ nirīkṣite vā'pi pūrṇamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रस्थित = कोण-भाव में स्थित; विलग्नेश = लग्न-पति; गुरु-शुक्र-समन्वित = बृहस्पति और शुक्र से युत; ताभ्याम् = उन दोनों से; निरीक्षित = दृष्ट; पूर्णमायुः = पूर्ण आयु; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्नेश केन्द्र में हो और गुरु-शुक्र से युत हो, अथवा उन्हीं दोनों से दृष्ट हो, तो पूर्णायु निर्देशित करनी चाहिए। यहाँ बल दो शुभों—गुरु और शुक्र—पर केन्द्रित है। युति और दृष्टि फिर विकल्प हैं।

English rendering The text states that when the lagna-lord occupies a kendra and is joined with Jupiter and Venus—or is aspected by those two—full longevity should be declared. It is a second pūrṇa-āyu yoga, keyed to the lagna-lord with the two chief benefics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्णायु-योग)। शर्त: लग्नेश ∈ {1,4,7,10} ∧ (लग्नेश युत {गुरु, शुक्र} ∨ लग्नेश दृष्ट-द्वारा {गुरु, शुक्र})। “समन्विते” में दोनों शुभों की संयुक्त भूमिका पढ़ी जाती है; एकमात्र-ग्रह पाठ-भेद संभव। दृष्टि-नियम: शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि (गुरु 5/7/9; शुक्र 7)।

उदाहरण (worked example) लग्न = तुला → लग्नेश शुक्र। शुक्र यदि मकर (4) में गुरु-युत हो, अथवा केन्द्र-स्थित शुक्र पर गुरु+शुक्र-दृष्टि-योग बने—तो 43.61 लागू। फल = “पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्” — वर्ष-संख्या नहीं, योग-निर्णय।

43.62
उच्चस्थितैस्त्रिभिः खेटैर्लग्नरन्ध्रशसंयुतैः |
अष्टमे पापहीने च पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्
uccasthitaistribhiḥ kheṭairlagnarandhraśasaṃyutaiḥ |
aṣṭame pāpahīne ca pūrṇamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्चस्थित = उच्च राशि में स्थित; त्रिभिः खेटैः = तीन ग्रहों से; लग्न-रन्ध्र-ईश = लग्न-स्वामी और अष्टम-स्वामी; संयुत = युत/सम्बद्ध; अष्टम = 8वाँ भाव; पापहीन = क्रूर-ग्रह रहित; पूर्णमायुः = पूर्ण आयु; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—तीन ग्रह उच्च में हों और वे लग्नेश तथा रन्ध्रेश से जुड़े हों, साथ ही अष्टम पाप-ग्रहों से रहित हो, तब पूर्णायु निर्देशित होती है। उच्च-त्रय, लग्न–अष्टमेश संयोग, और अष्टम की शुद्धि—तीन परतें एक साथ। यह पूर्णायु का दृढ़ योग-द्वार है।

English rendering The text states that when three planets are exalted and associated with the lords of the lagna and the eighth, and the eighth house is free of malefics, full longevity is to be declared. Exaltation-count, lord-link, and eighth-house purity form a triple condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय आयु-वर्ष सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्णायु-योग)। उच्च-मानचित्र (D1, सायन/निरयण घोषित): सूर्य मेष, चन्द्र वृष, मंगल मकर, बुध कन्या, गुरु कर्क, शुक्र मीन, शनि तुला। शर्त: |{graha : rāśi(g)=ucca(g)}| ≥ 3; वे लग्नेश/रन्ध्रेश से युति-अथवा-भाव-सम्बन्ध में; अष्टम में पाप (सामान्यतः शनि-मंगल-रवि-राहु/केतु—परम्परा-भेद संभव) = ∅।

उदाहरण (worked example) निरयण अयनांश पर: मंगल मकर, गुरु कर्क, शुक्र मीन = तीन उच्च। लग्न = मेष → लग्नेश सूर्य, रन्ध्रेश (8=वृश्चिक) मंगल। यदि ये उच्च-त्रय लग्नेश/रन्ध्रेश से युत/सम्बद्ध हों और वृश्चिक पाप-शून्य हो—तो 43.62 का पूर्णायु-योग। अयनांश बदले तो उच्च-स्थिति पलट सकती है—सम्मेलन अवश्य लिखें।

43.63
अष्टमस्थैस्त्रिभि खेटैः स्वोच्चमित्रस्ववर्गगैः |
लग्नेशे बलसंयुक्ते दीर्घमायुस्तदा भवेत्
aṣṭamasthaistribhi kheṭaiḥ svoccamitrasvavargagaiḥ |
lagneśe balasaṃyukte dīrghamāyustadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमस्थ = 8वें भाव में स्थित; त्रिभिः खेटैः = तीन ग्रह; स्व-उच्च = अपनी उच्च राशि; मित्र = मित्र-राशि; स्ववर्ग = स्व-वर्ग (राशि/नवांश आदि); लग्नेश बलसंयुक्त = लग्न-पति बलवान; दीर्घमायु = दीर्घ आयु; तदा = तब

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—अष्टम में तीन ग्रह हों और वे स्वोच्च, मित्र-राशि अथवा स्ववर्ग में हों, तथा लग्नेश बल से युक्त हो, तब दीर्घायु होती है। यहाँ “पूर्ण” के स्थान पर “दीर्घ” पद है—मध्यम–पूर्ण श्रेणी से जुड़ा कोमल भेद। अष्टम की शुभ-स्थिति और लग्नेश-बल साथ चलते हैं।

English rendering The text states that when three planets occupy the eighth in their exaltation, a friend’s sign, or their own varga, and the lagna-lord is endowed with strength, long life results. It is a dīrgha-āyu yoga, with eighth-house dignity plus lagna-lord strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय वर्ष-सूत्र नहीं — फल-कथन (दीर्घायु-योग)। शर्त: |{g : bhāva(g)=8 ∧ (ucca ∨ mitra-rāśi ∨ sva-varga)}| ≥ 3; ∧ लग्नेश “बलसंयुक्त”। बल = षड्बल (स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्; 1 रूप = 60 विरूप) अथवा कम से कम स्थान-बल—परम्परा घोषित करें। स्ववर्ग = कम से कम D1 स्व; प्रायः D9 आदि भी गिने जाते हैं (पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या → अष्टम = मेष। मान लें मेष में सूर्य (उच्च), और दो अन्य ग्रह मित्र/स्ववर्ग में अष्टमस्थ; लग्नेश बुध षड्बल-सीमा से ऊपर—तब 43.63 का दीर्घायु-योग। बल-सीमा ग्रह-वार शास्त्रीय रूप-मान से तुलना करें (`==` शैली, सहिष्णु-पट्टी नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलसंयुक्ते” सीधे षड्बल अध्याय (BPHS Ch.27) से जुड़ता है—स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् का योग रूप/विरूप में। हम घटकों को अंकित नियम से जोड़ते हैं और फल को शास्त्र-कथन रखते हैं; आयु को भाग्य-निश्चित नहीं ठहराते।

43.64
स्वभोच्चस्थेन केनापि नभौगेन समन्वितः |
अष्टमेशः शनिर्वापि दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्
svabhoccasthena kenāpi nabhaugena samanvitaḥ |
aṣṭameśaḥ śanirvāpi dīrghamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वभोच्चस्थ = स्वराशि या उच्च-राशि में स्थित; नभौग = नभो-ग (ग्रह); समन्वितः = युक्त / संयुक्त; अष्टमेशः = अष्टम-भावेश (आयु-स्थानाधिपति); शनिः = शनैश्चर; दीर्घमायुः = दीर्घा आयु; विनिर्दिशेत् = निर्दिष्ट करे / कही जाए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि अष्टमेश किसी ऐसे ग्रह से युक्त हो जो स्वयं स्वराशि या उच्च-राशि में स्थित हो, अथवा शनि उसी प्रकार किसी स्व/उच्च-स्थित ग्रह से संयुक्त हो, तो आयु को दीर्घ माना जाए। यहाँ बल का स्रोत स्वत्व या उच्चत्व है, और योग का केन्द्र अष्टम-स्थान का स्वामी (अथवा शनि) है। यह फल-कथन आनुपातिक आयु-वर्गीकरण (दीर्घायु) की ओर संकेत करता है।

English rendering The text states that if the eighth-lord — or Saturn — is conjoined with any planet placed in its own sign or exaltation, long life is to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संयोजन-शर्त (boolean yoga), अंक-सूत्र नहीं।
आयु-चिह्न = दीर्घायु यदि
 (अष्टमेश ⊙ G) ∨ (शनि ⊙ G)
जहाँ G ∈ {ग्रह : rāśi(G) ∈ {स्वराशि(G), उच्चराशि(G)}} और ⊙ = युति (समान राशि/अल्प-अंश-भेद — पद्धति-निर्भर; पाठ-भेद संभव)।
दीर्घायु / मध्यमायु / अल्पायु का संख्यात्मक वर्ष-मान इस श्लोक में नहीं दिया; अन्य आयुर्दाय-सूत्रों (च. ४३–४४) से जोड़ा जाता है।

उदाहरण (worked example) मान लें अष्टमेश = बुध, और बुध कन्या (स्व) में है, तथा उसी राशि में गुरु युक्त है → शर्त “स्व/उच्च-स्थित नभौग से समन्वित अष्टमेश” पूरी; शास्त्र की भाषा में दीर्घायु-निर्देश। (युति-परिभाषा: समान राशि; सजातीय पद्धति में अंश-सीमा घोषित करें।)

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43.65
त्रिषडायगतैः पापैः शुभैः केन्द्रत्रिकोणगैः |
लग्नेशे बलसंयुक्ते दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्
triṣaḍāyagataiḥ pāpaiḥ śubhaiḥ kendratrikoṇagaiḥ |
lagneśe balasaṃyukte dīrghamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिषडाय = ३, ६, ११ भाव (त्रि-षट्-आय); पापैः = पाप-ग्रहों से; शुभैः = शुभ-ग्रहों से; केन्द्र = १, ४, ७, १०; त्रिकोण = १, ५, ९; लग्नेश = लग्नाधिपति; बलसंयुक्त = बलाढ्य; दीर्घमायुः = दीर्घा आयु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पाप-ग्रह त्रिषडाय (तृतीय, षष्ठ, एकादश) में हों, शुभ-ग्रह केन्द्र-त्रिकोण में हों, और लग्नेश बल से युक्त हो, तब दीर्घायु का निर्देश किया जाए। यह तीनों शर्तों का संयुक्त योग है: पापों का उपचय-स्थान, शुभों का शक्ति-स्थान, और लग्न-स्वामी का बल। फल को शास्त्र-कथन के रूप में ही पढ़ें, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering The text states that with malefics in the 3rd, 6th and 11th, benefics in kendras and trikoṇas, and the lagna-lord endowed with strength, long life is to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बहु-शर्त योग (conjunction of placement sets)।
दीर्घायु यदि
 (∀ p ∈ पाप : bhāva(p) ∈ {3, 6, 11})
 ∧ (∀ s ∈ शुभ : bhāva(s) ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10})
 ∧ balayukta(लग्नेश)
जहाँ भाव-गणना लग्न से पूर्ण-भाव (whole-sign) या अंश-आधारित — घोषित करें; “बल” = षड्बल / दिग्बल / स्थिति-बल आदि (BPHS च. २७ की परंपरा; इस श्लोक में इकाई नहीं दी)। पाठ में “त्रिषडायगतैः” सामूहिक बहुवचन है — सभी पाप उन भावों में, ऐसा ही पढ़ना स्वाभाविक; आंशिक पाप-स्थापन पर पाठ-भेद/टीका-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष; मंगल (पाप) मिथुन (३), शनि कन्या (६), रवि कुम्भ (११); गुरु/शुक्र/चन्द्र क्रमशः कर्क (४), सिंह (५), मकर (१०); लग्नेश मंगल अपनी उच्च-राशि मकर में बलवान → तीनों शाखाएँ संतुष्ट; शास्त्र कहता है दीर्घायु-निर्देश।

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43.66
षट्सप्तरन्ध्रभवेषु शुभखेटयुतेषु च |
त्रिभवेषु च पापेषु पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्
ṣaṭsaptarandhrabhaveṣu śubhakheṭayuteṣu ca |
tribhaveṣu ca pāpeṣu pūrṇamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षट् = षष्ठ भाव; सप्त = सप्तम; रन्ध्र = अष्टम; भव = भाव; शुभखेट = शुभ-ग्रह; युतेषु = युक्त होने पर; त्रिभव = तृतीय भाव (त्रि = ३); पापेषु = पाप-ग्रहों के (स्थित होने पर); पूर्णमायुः = पूर्णा आयु (पूर्ण आयु-परिमाण)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — षष्ठ, सप्तम और अष्टम भाव जब शुभ-ग्रहों से युक्त हों, और तृतीय भाव में पाप-ग्रह हों, तो पूर्ण आयु का निर्देश करें। यहाँ “पूर्णमायु” दीर्घायु से एक पग ऊपर का शास्त्रीय पद है — सम्पूर्ण आयु-दाय की ओर संकेत। ६–७–८ का शुभीकरण और ३ का पाप-संस्थान — यह द्विपक्षीय संरचना है।

English rendering The text states that when the 6th, 7th and 8th houses are joined by benefics and malefics occupy the third house, full longevity is to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचनात्मक योग; वर्ष-संख्या नहीं।
पूर्णायु यदि
 (∃ शुभ ⊙ भाव ∈ {6, 7, 8} — पाठ: “युतेषु”, बहुवचन: तीनों भाव शुभ-युक्त)
 ∧ (पाप ∈ भाव 3)
“पूर्णमायु” बनाम “दीर्घमायु” का संख्यात्मक अन्तर इस श्लोक में नहीं; अन्य आयुर्दाय-अध्यायों में पूर्ण/मध्य/अल्प की वर्ष-सीमाएँ अलग-अलग ग्रन्थ-परंपराओं में भिन्न — यहाँ केवल फल-पद। “त्रिभवेषु” = भाव ३ (त्रिषडाय का प्रथम); षष्ठ को दोबारा न गिनें।

उदाहरण (worked example) लग्न वृष; भाव ६ (तुला) में शुक्र, भाव ७ (वृश्चिक) में चन्द्र, भाव ८ (धनु) में गुरु; भाव ३ (कर्क) में मंगल-शनि → शास्त्र की भाषा में पूर्णायु-निर्देश।

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43.67
शत्रुव्ययगताः पापा लग्नेशो यदि केन्द्रगः |
रविमित्रं च रन्ध्रेशः पूर्णमायुस्तथापि हि
śatruvyayagatāḥ pāpā lagneśo yadi kendragaḥ |
ravimitraṃ ca randhreśaḥ pūrṇamāyustathāpi hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु = षष्ठ भाव; व्यय = द्वादश भाव; गताः = गत / स्थित; पापाः = पाप-ग्रह; लग्नेशः = लग्नाधिपति; केन्द्रगः = केन्द्र-स्थित; रविमित्रम् = सूर्य का मित्र (मैत्री-वर्ग); रन्ध्रेशः = अष्टमेश; पूर्णमायुः = पूर्णा आयु; तथापि = फिर भी / तो भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि पाप षष्ठ और द्वादश में हों, लग्नेश केन्द्र में हो, और रन्ध्रेश सूर्य का मित्र हो, तो भी पूर्ण आयु कही जाए। “तथापि” शब्द सूचित करता है कि कुछ अन्य संकेत आयु को कम करने वाले लग सकते हैं, फिर भी इन शर्तों पर शास्त्र पूर्णायु रखता है। मैत्री यहाँ नैसर्गिक (सूर्य-मित्र ग्रह-वर्ग) या तात्कालिक — पद्धति घोषित करें; पाठ स्वयं “रविमित्रम्” कहता है।

English rendering The text states that even so, full longevity is indicated when malefics occupy the 6th and 12th, the lagna-lord is in a kendra, and the eighth-lord is a friend of the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तीन-शर्त योग + “तथापि” (overriding softener)।
पूर्णायु यदि
 (पाप ⊂ {भाव 6, 12})
 ∧ (bhāva(लग्नेश) ∈ {1, 4, 7, 10})
 ∧ mitra(रन्ध्रेश, रवि) = true
मैत्री-सारणी (नैसर्गिक, BPHS/सामान्य परंपरा): सूर्य-मित्र ≈ चन्द्र, मङ्गल, गुरु; शत्रु ≈ शुक्र, शनि; सम ≈ बुध — यह संस्करण-निर्भर; तात्कालिक मैत्री (पाँच-वर्ग) भिन्न फल दे सकती है — घोषणा आवश्यक। कोई वर्ष-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह, लग्नेश रवि केन्द्र (तुला-सप्तम) में; शनि-मंगल षष्ठ-द्वादश (मकर-कर्क); रन्ध्रेश = गुरु (मीन-अष्टम का स्वामी धनु/मीन — यहाँ धनु-अष्टम मानें) और गुरु सूर्य-मित्र → तीनों शर्तें; शास्त्र कहता है पूर्णायु।

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43.68
आयुः स्थानस्थिताः पापाः कर्मेशः स्वोच्चगो यदा |
तथापि दीर्घमायु स्यात् विज्ञेयं द्विजसत्तम
āyuḥ sthānasthitāḥ pāpāḥ karmeśaḥ svoccago yadā |
tathāpi dīrghamāyu syāt vijñeyaṃ dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुःस्थान = आयु-स्थान = अष्टम भाव; स्थिताः = स्थित; पापाः = पाप-ग्रह; कर्मेशः = दशमेश; स्वोच्चगः = स्वराशि या उच्च में गत; तथापि = फिर भी; दीर्घमायु = दीर्घा आयु; विज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आयु-स्थान (अष्टम) में पाप स्थित हों, फिर भी जब कर्मेश स्वराशि या उच्च-राशि में हो, तब भी दीर्घायु होती है — यह जानो, हे द्विजसत्तम। अष्टम-पाप सामान्यतः आयु-पीड़ा का संकेत माना जाता है; यहाँ दशमेश का स्व/उच्च-बल उस दबाव को काटने वाला शास्त्रीय प्रति-योग है। संबोधन संवाद-शैली का है, गणना का नहीं।

English rendering The text states — O best of the twice-born — that even when malefics occupy the house of longevity (the eighth), long life is to be known if the tenth-lord is in its own sign or exaltation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रति-योग (counter-condition)।
दीर्घायु यदि
 (∃ पाप ∈ भाव 8)
 ∧ (rāśi(कर्मेश) ∈ {स्वराशि(कर्मेश), उच्चराशि(कर्मेश)})
“तथापि” = अष्टम-पाप की उपस्थिति के बावजूद। अंक/वर्ष नहीं — फल-कथन। उच्च-राशि नियत: रवि→मेष, चन्द्र→वृष, मङ्गल→मकर, बुध→कन्या, गुरु→कर्क, शुक्र→मीन, शनि→तुला।

उदाहरण (worked example) लग्न कन्या → अष्टम मेष; मंगल अष्टम में (पाप आयु-स्थान में); कर्मेश (दशम मिथुन) = बुध, और बुध कन्या (उच्च/स्व) में → शर्त पूरी; शास्त्र कहता है दीर्घायु।

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43.69
द्विस्वभावगृहे लग्ने लग्नेशे केन्द्रसंस्थिते |
स्वोच्चराशित्रिकोणे वा दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्
dvisvabhāvagṛhe lagne lagneśe kendrasaṃsthite |
svoccarāśitrikoṇe vā dīrghamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विस्वभावगृह = द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन — द्वन्द्व); लग्ने = लग्न में; लग्नेशे = लग्नेश के; केन्द्रसंस्थिते = केन्द्र-स्थित होने पर; स्वोच्चराशि = स्व या उच्च राशि; त्रिकोणे = त्रिकोण में; वा = अथवा; दीर्घमायुः = दीर्घा आयु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्न द्विस्वभाव राशि में हो, और लग्नेश केन्द्र में स्थित हो, अथवा स्व/उच्च राशि के त्रिकोण में हो, तब दीर्घायु का निर्देश करें। लग्न का द्वन्द्व-स्वभाव यहाँ आधार-शर्त है; लग्नेश की शक्ति या तो केन्द्र-स्थिति से, या स्व/उच्च-त्रिकोण से आती है — दोनों विकल्प “वा” से जुड़े हैं।

English rendering The text states that when the lagna is in a dual-natured sign and the lagna-lord is placed in a kendra — or in a trikoṇa of its own or exaltation sign — long life is to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न-प्रकार × लग्नेश-स्थिति।
दीर्घायु यदि
 rāśi(लग्न) ∈ द्विस्वभाव = {मिथुन, कन्या, धनु, मीन}
 ∧ [ bhāva(लग्नेश) ∈ {1, 4, 7, 10}
  ∨ rāśi(लग्नेश) ∈ trikoṇa(स्वराशि ∪ उच्चराशि) ]
त्रिकोण(R) = {R, R+4, R+8} (राशि-सूचकांक mod 12)। “स्वोच्चराशित्रिकोणे” — स्व और उच्च दोनों के त्रिकोण; पाठ-संधि में विकल्प पढ़ना सुरक्षित। वर्ष-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न मिथुन (द्विस्वभाव); लग्नेश बुध तुला (केन्द्र/पञ्चम नहीं — तुला = ५वाँ? मिथुन-लग्न से तुला = ५, त्रिकोण) — यदि केन्द्र चाहिए तो बुध कन्या (४) या मीन (१०) में; अथवा बुध अपनी उच्च कन्या के त्रिकोण (कन्या/मकर/वृष) में → दीर्घायु-निर्देश (शास्त्र)।

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43.70
द्विस्वभावगृहे लग्ने लग्नेशाद् बलसंयुतात् |
द्वौ पापौ यदि केन्द्रस्थौ दीर्घमायुस्तदा भवेत्
dvisvabhāvagṛhe lagne lagneśād balasaṃyutāt |
dvau pāpau yadi kendrasthau dīrghamāyustadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विस्वभावगृहे लग्ने = द्विस्वभाव राशि का लग्न; लग्नेशात् = लग्नेश से / लग्नेश के; बलसंयुतात् = बलाढ्य होने से; द्वौ पापौ = दो पाप-ग्रह; केन्द्रस्थौ = दोनों केन्द्र-स्थित; दीर्घमायुः = दीर्घा आयु; तदा = तब; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न द्विस्वभाव राशि में हो, लग्नेश बल से संयुक्त हो, और दो पाप-ग्रह केन्द्रों में स्थित हों, तब दीर्घायु होती है। पिछले श्लोक का द्विस्वभाव-लग्न यहाँ भी आधार है; नवीन तत्त्व हैं — लग्नेश-बल और युग्म-पाप का केन्द्र-निवेश। केन्द्र-स्थित पाप प्रायः संघर्ष के फल देते हैं, किन्तु इस योग में शास्त्र उन्हें दीर्घायु-सहगामी मानता है — फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही ग्रहण करें।

English rendering The text states that when the lagna is in a dual sign, the lagna-lord is endowed with strength, and two malefics occupy kendras, long life then comes about.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तीन-शर्त योग।
दीर्घायु यदि
 rāśi(लग्न) ∈ {मिथुन, कन्या, धनु, मीन}
 ∧ balayukta(लग्नेश)
 ∧ |{p ∈ पाप : bhāva(p) ∈ {1, 4, 7, 10}}| ≥ 2
पाप-समुच्चय सामान्यतः {रवि, मङ्गल, शनि} (चन्द्र/बुध स्थिति-निर्भर; केतु/राहु पाठ-परंपरा में); “द्वौ” = ठीक दो या न्यूनतम दो — शाब्दिक “दो”। बल = षड्बल-योग या स्थिति-बल (च. २७); इस श्लोक में रूप/विरूप सीमा नहीं। गणितीय वर्ष-सूत्र नहीं — फल-कथन।

उदाहरण (worked example) लग्न धनु (द्विस्वभाव); लग्नेश गुरु कर्क (उच्च) → बलसंयुक्त; मंगल लग्न-केन्द्र में, शनि तुल-केन्द्र (११? धनु-लग्न: केन्द्र = धनु, मीन, मिथुन, कन्या — मंगल धनु, शनि मिथुन) → दो पाप केन्द्रस्थ; शास्त्र कहता है तदा दीर्घायु।

43.71
लग्नाष्टमेशयोर्मध्ये यः खेटः प्रबलो भवेत् |
तस्मिन् केन्द्रगते दीर्घ मध्यं पणफरस्थिते
lagnāṣṭameśayormadhye yaḥ kheṭaḥ prabalo bhavet |
tasmin kendragate dīrgha madhyaṃ paṇapharasthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाष्टमेशयोः = लग्नेश और अष्टमेश (दोनों); मध्ये यः = इन दोनों में जो; खेटः = ग्रह; प्रबलः = अधिक बलवान; केन्द्रगते = 1/4/7/10 भाव में स्थित; दीर्घ = दीर्घायु; पणफर-स्थिते = 2/5/8/11 में; मध्यम् = मध्यायु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्नेश और अष्टमेश में जो ग्रह प्रबल हो, उसी की स्थिति आयु-वर्ग का निर्णायक संकेत देती है। यदि वह प्रबल खेट केन्द्र में हो तो दीर्घायु, पणफर में हो तो मध्यायु कही जाती है। यहाँ बल तुलनात्मक है; फल-कथन शास्त्र की अपनी रीति है, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that between the lords of the lagna and the eighth, the stronger planet is the key: in a kendra it indicates long life, in a panaphara medium life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-वर्ग = f(प्रबल(लग्नेश, अष्टमेश) की भाव-कोटि)। भाव-कोटि (पूर्ण राशि-घर, whole-sign या equal/Placidus नहीं—शास्त्रीय भाव-संख्या): केन्द्र = {1,4,7,10}; पणफर = {2,5,8,11}; (अगले श्लोक में) आपोक्लिम = {3,6,9,12}। “प्रबल” = दोनों में अधिक बल (परंपरा में षड्बल-योग या समतुल्य तुलना); अयन/गृह-पद्धति फल नहीं बदलती—केवल ग्रह की भाव-संख्या।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्नेश मंगल (4 भाव = केन्द्र), अष्टमेश शनि (8 भाव = पणफर)। यदि षड्बल (या घोषित बल-तुलना) में मंगल > शनि, तो प्रबल = मंगल, केन्द्रगत → शास्त्रानुसार दीर्घ-वर्ग। यदि शनि प्रबल और पणफरस्थ → मध्य-वर्ग। (बल-इकाई: 1 रूप = 60 विरूप; तुलना `==` thrshold-मुक्त, अंकों की सीधी अधिकता।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “प्रबल” की कम्प्यूटेशनल रीति BPHS अध्याय 27 के षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) से जोड़कर मापी जाती है—रूप/विरूप में योग, ग्रह-वार सीमा से तुलना। हमारा अनुशासन: गणित और फल अलग; बल-अंक `==` पर पिन, सहिष्णुता-पट्टी नहीं।

43.72
आपोक्लिमे स्थिते स्वल्पमायुर्भवति निश्चितम् |
लग्नेशे च रवेर्मित्रे दीर्घंमायुः समे समम्
āpoklime sthite svalpamāyurbhavati niścitam |
lagneśe ca ravermitre dīrghaṃmāyuḥ same samam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आपोक्लिमे स्थिते = 3/6/9/12 भाव में; स्वल्पम् आयुः = अल्पायु; निश्चितम् = शास्त्र का दृढ़ कथन; लग्नेशे = लग्न-स्वामी; रवेः मित्रे = सूर्य का मित्र; दीर्घम् आयुः = दीर्घायु; समे = सम-भाव में; समम् = सम/मध्य आयु।

हिन्दी भावार्थ प्रबल लग्नेश–अष्टमेश यदि आपोक्लिम में हो तो शास्त्र स्वल्पायु कहता है। अलग रीति: लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो दीर्घायु, सम-संबंध में सम आयु। ये नैसर्गिक/तात्कालिक मित्रता-वर्ग पर आधारित संकेत हैं—भय या उपचार-दबाव नहीं, केवल पाठ का नियम।

English rendering When that stronger planet lies in an apoklima, the text states short life. Further, if the lagna-lord is a friend of the Sun, long life; if equal/neutral, medium life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) आपोक्लिम-स्थिते → आयु-वर्ग = स्वल्प (पूर्व श्लोक की त्रिपदी: केन्द्र→दीर्घ, पणफर→मध्य, आपोक्लिम→स्वल्प)। (2) सूर्य–लग्नेश संबंध: मित्र / सम / शत्रु (अगला श्लोक) → दीर्घ / सम / स्वल्प। मित्रता = नैसर्गिक मित्र-तालिका ± तात्कालिक (भाव-दूरी से); केवल वर्गीकरण, कोई वर्ष-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्नेश शुक्र, सूर्य–शुक्र नैसर्गिक मित्र → शास्त्रानुसार दीर्घ-संकेत। लग्नेश बुध, सूर्य–बुध सम → सम आयु-संकेत। प्रबल खेट 9 भाव (आपोक्लिम) में → 43.71–72 की कोटि-रीति से स्वल्प-वर्ग (मित्रता-रीति से अलग धारा; दोनों को शास्त्र अलग-अलग वदेत्)।

43.73
शत्रौ स्वल्पं वदेदित्थमष्टमेशादपि स्मृतम् |
मित्रमध्याऽरिभावस्थे तस्मिन्नेवं फलं वदेत्
śatrau svalpaṃ vadeditthamaṣṭameśādapi smṛtam |
mitramadhyā'ribhāvasthe tasminnevaṃ phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रौ = सूर्य-शत्रु संबंध में; स्वल्पम् वदेत् = अल्पायु कहे; अष्टमेशात् अपि = अष्टमेश से भी; स्मृतम् = स्मरण/परंपरा में कहा; मित्र-मध्य-अरि-भावस्थे = मित्र / सम / शत्रु भाव में स्थित; तस्मिन् = उस (लग्नेश/अष्टमेश) पर; एवम् फलम् = वैसा ही फल।

हिन्दी भावार्थ सूर्य का शत्रु लग्नेश हो तो शास्त्र स्वल्पायु कहता है; यही क्रम अष्टमेश पर भी लागू बताया गया है। आगे: वह खेट मित्र-भाव, मध्य/सम-भाव या अरि-भाव में हो तो उसी क्रम से दीर्घ–सम–स्वल्प फल कहा जाए। पाठ-भेद संभव जहाँ “मध्याऽरि” की संधि-पाठ भिन्न हों; अर्थ-त्रिपदी स्थिर रहती है।

English rendering If the relation is inimical, the text declares short life—and the same rule is remembered for the eighth-lord as well. Placed in a friendly, neutral, or inimical house, that planet yields long, medium, or short life accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-त्रिपदी (सूर्य-संबंध): मित्र → दीर्घ, सम → सम, शत्रु → स्वल्प; लागू पक्ष ∈ {लग्नेश, अष्टमेश}। भाव-वर्ग (मित्र/मध्य/अरि-भाव): ग्रह की राशि का स्वामी–भाव संबंध (मित्र-राशि, सम-राशि, शत्रु-राशि) → वही त्रिपदी। गणितीय वर्ष-सूत्र नहीं—विवेक-वर्गीकरण।

43.74
सहजाधीशभूपुत्रौ द्वौ रन्ध्रेशशनैश्चरौ |
अस्तौ वा पापदृग्युक्तौ स्वल्पमायुः प्रयच्छतः
sahajādhīśabhūputrau dvau randhreśaśanaiścarau |
astau vā pāpadṛgyuktau svalpamāyuḥ prayacchataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहजाधीश = तृतीयेश; भू-पुत्रौ = मंगल; द्वौ = ये दोनों; रन्ध्रेश = अष्टमेश; शनैश्चरौ = शनि; अस्तौ = अस्त/दग्ध; पाप-दृग्-युक्तौ = पाप-दृष्टि या पाप-योग से युक्त; स्वल्पमायुः प्रयच्छतः = स्वल्पायु देते हैं (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो युग्मों को विशेष चिह्नित करता है—तृतीयेश और मंगल, तथा अष्टमेश और शनि। यदि ये अस्त हों अथवा पाप-दृष्टि/पाप-संयोग से युक्त हों तो पाठ कहता है वे स्वल्पायु देते हैं। यह फल-कथन है, न कि चिकित्सकीय या निश्चित भविष्यवाणी; शुभ दृष्टि/बल की अन्य शर्तें अध्याय में अलग चलती हैं।

English rendering The third-lord with Mars, and the eighth-lord with Saturn—if combust/set or joined with or aspected by malefics—the text states they confer short life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अस्त + पाप-दृग्/योग शर्त)। तकनीकी पार्श्व: “अस्त” = सूर्य से ग्रह की क्रांति-निकटता (परंपरागत अस्त-सीमा ग्रह-वार; इकाई °); पाप ∈ {सूर्य, मंगल, शनि, राहु/केतु—पाठानुसार}; दृष्टि = पूर्ण भाव-दृष्टि या अंश-दृष्टि (घोषित पद्धति)। आयु-वर्ष निकालने का समीकरण यहाँ नहीं।

43.75
षष्ठेऽष्टमे व्यये वाऽपि लग्नेशे पापसंयुते |
स्व पायुरनपत्यो वा शुभदृग्योगवर्जिते
ṣaṣṭhe'ṣṭame vyaye vā'pi lagneśe pāpasaṃyute |
sva pāyuranapatyo vā śubhadṛgyogavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे / अष्टमे / व्यये = 6, 8, 12 भाव में; लग्नेशे = लग्नपति; पाप-संयुते = पाप-युक्त; स्वल्पायुः (पाठ: “स्व पायु”—संधि/पाठ-भेद संभव → स्वल्पायुः); अनपत्यः वा = अथवा संतति-हीन; शुभ-दृग्-योग-वर्जिते = शुभ दृष्टि और शुभ योग से रहित।

हिन्दी भावार्थ लग्नेश यदि षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो और पाप से युक्त हो, तथा शुभ दृष्टि/शुभ योग से रहित हो, तो शास्त्र स्वल्पायु अथवा अनपत्य-भाव कहता है। दोनों फल विकल्प (“वा”) रूप में दिए हैं—पाठ की भाषा में, न कि दबावपूर्ण निश्चय में। शुभ दृष्टि का होना इस दोष-समूह को शिथिल करने वाला शास्त्रीय प्रतिबंध है।

English rendering With the lagna-lord in the sixth, eighth, or twelfth, joined to malefics and without benefic aspect or yoga, the text states short life or childlessness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थान × पाप-योग × शुभ-अभाव)। शर्त-तर्क: (लग्नेश.भाव ∈ {6,8,12}) ∧ (पाप-संयोग) ∧ (¬शुभदृग् ∧ ¬शुभयोग) → शास्त्र-फल ∈ {स्वल्पायु, अनपत्य}। कोई आयु-वर्ष सूत्र नहीं।

43.76
चतुष्ट्यगते पापे शुभदृष्टिविवर्जिते |
बलहीने विग्लनेशे स्वल्पमायुर्विनिर्दिशेत्
catuṣṭyagate pāpe śubhadṛṣṭivivarjite |
balahīne viglaneśe svalpamāyurvinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्टय-गते = केन्द्र/चतुष्टय (1,4,7,10) में स्थित; पापे = पाप ग्रह; शुभ-दृष्टि-विवर्जिते = शुभ दृष्टि से रहित; बल-हीने = निर्बल; विग्लनेशे (पाठ-भेद संभव → विलग्नेशे) = लग्नेश; स्वल्पमायुः विनिर्दिशेत् = स्वल्पायु निर्दिष्ट करे।

हिन्दी भावार्थ केन्द्रों में पाप हो, शुभ दृष्टि न हो, और लग्नेश बलहीन हो—ऐसी स्थिति में शास्त्र स्वल्पायु निर्दिष्ट करता है। “विनिर्दिशेत्” आचार्य को निर्णय-विधि बताता है, पाठक पर भय थोपने के लिए नहीं। बलहीनता की माप अध्याय 27 की बलांक-रीति से जोड़कर स्पष्ट होती है।

English rendering When malefics occupy the quadrants without benefic aspect, and the lagna-lord is weak, the text directs one to indicate short life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-संयोग (वर्ष-सूत्र नहीं): (∃ पाप, भाव ∈ {1,4,7,10}) ∧ (शुभ-दृष्टि = 0) ∧ (लग्नेश.बल < सीमा) → शास्त्र-फल = स्वल्पायु। बल = षड्बल-योग (स्थान+दिक्+काल+चेष्टा+नैसर्गिक+दृग्), इकाई रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप); सीमा ग्रह-वार पारंपरिक—यहाँ केवल “बलहीन” का द्विआधारी संकेत।

उदाहरण (worked example) पाप: मंगल 4, शनि 10; शुभ दृष्टि लग्नेश/केन्द्र-पापों पर नहीं; लग्नेश बुध षड्बल = 4.2 रूप, जबकि बुध-सीमा ≈ 7 रूप → बलहीन। शास्त्र-रीति से स्वल्पायु-निर्देश (अयन: Lahiri या अन्य—भाव whole-sign मानें तो केवल राशि-घर संख्या)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलहीन” को हम षड्बल के यथावत् योग से पढ़ते हैं—रूप/विरूप में, ग्रह-वार सीमा से तुलना, `==` अनुशासन। फल “शास्त्र कहता है” रहता है; इंजन केवल बल-अंक और भाव-स्थिति सत्यापित करता है।

43.77
व्ययार्थौ पापसंयुक्तौ शुभदृग्योगवर्जितौ |
स्वल्पमायुस्तदा ज्ञेयं निर्विशंकं द्विजोत्तम
vyayārthau pāpasaṃyuktau śubhadṛgyogavarjitau |
svalpamāyustadā jñeyaṃ nirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यय-अर्थौ = व्यय (12) और अर्थ (2) — भाव/तत्स्वामी; पाप-संयुक्तौ = पाप-युक्त; शुभ-दृग्-योग-वर्जितौ = शुभ दृष्टि एवं शुभ योग से रहित; स्वल्पमायुः = अल्पायु; तदा ज्ञेयम् = तब जानना चाहिए; निर्विशंकम् = बिना संदेह (शास्त्र की दृढ़ता); द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ द्वितीय और द्वादश जब पाप-संयुक्त हों और शुभ दृष्टि/शुभ योग से रहित हों, तब शास्त्र निर्विशंक रूप से स्वल्पायु जानने को कहता है। “निर्विशंकम्” पाठ की अपनी निश्चयात्मक शैली है—हम उसे स्रोत-स्वर में रखते हैं, भाग्य की अनिवार्यता या भय-वाणिज्य के रूप में नहीं। यह 43.71–76 की आयु-परीक्षा श्रृंखला का समापन-फल है।

English rendering When the second and the twelfth are joined with malefics and free of benefic aspect or yoga, the text states—without hesitation, O best of the twice-born—that short life is to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (2–12 भाव/स्वामी × पाप-योग × शुभ-अभाव)। तर्क: (व्ययार्थ पाप-युक्त) ∧ (शुभदृग्-योग = शून्य) → शास्त्र-फल = स्वल्पायु। कोई दशा-वर्ष या अष्टकवर्ग-बिंदु यहाँ नहीं; केवल भाव-दोष-संयोग का निर्देश।

43.78
लग्नरन्ध्रेशयोरेवं दुःस्थयोर्बलहीनयोः |
स्वल्पमायुर्बुधैर्ज्ञेयं मिश्रयोगाच्च मध्यमम्
lagnarandhreśayorevaṃ duḥsthayorbalahīnayoḥ |
svalpamāyurbudhairjñeyaṃ miśrayogācca madhyamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- लग्न-रन्ध्रेशयोः = लग्नेश और अष्टमेश (रन्ध्र = अष्टम) — इन दोनों के
- एवं दुःस्थयोः = इस प्रकार दुःस्थ (6/8/12 में स्थित) होने पर; बलहीनयोः = और बलहीन होने पर
- स्वल्पम् आयुः बुधैः ज्ञेयम् = विद्वानों द्वारा अल्प आयु जाननी चाहिए
- मिश्र-योगात् च मध्यमम् = और मिश्र (शुभ-पाप मिले-जुले) योग से मध्यम आयु

हिन्दी भावार्थ लग्नेश और अष्टमेश दोनों दुःस्थानों (6/8/12) में तथा बलहीन हों, तो विद्वानों को अल्प आयु समझनी चाहिए; और यदि योग मिश्रित (कुछ शुभ, कुछ पाप) हो तो मध्यम आयु। यह श्लोक समस्त अल्पायु-प्रकरण का उपसंहार करते हुए मध्यम-आयु का द्वार भी खोलता है।

English rendering When both the lords of the ascendant and the 8th are ill-placed and weak, the wise should read a short life; from a mixed configuration, a middling one.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्विविध दौर्बल्य → अल्प; मिश्र → मध्यम)। दो शर्तें युगपत् — दुःस्थत्व (भाव ∈ {6,8,12}) और बल-हीनता (बल < सीमा)। "मिश्र-योग" अर्थात् शुभ व पाप प्रभावों का सहवर्तन, जो अल्प और दीर्घ के मध्य मध्यम श्रेणी उत्पन्न करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलहीन" को हमने कभी सापेक्ष-सहनशीलता (tolerance band) से नहीं आँका — षड्बल-इंजन प्रत्येक ग्रह के कुल रूप की उसकी प्रति-ग्रह सीमा (threshold) से `<`/`≥` तुलना करता है (दोसियर §4, §5)। यही अनुशासन — मान की सटीक तुलना, न कि "लगभग बलवान" जैसी ढीली भाषा — हमारे कालोरैकल में अष्टकवर्ग को भी नियंत्रित करता है, जहाँ एक बार ±3 की सहनशीलता ने वास्तविक −1 को छिपा दिया था; इसीलिए यहाँ भी बल-निर्णय `==`/`<` जैसे स्पष्ट संकारकों पर ही टिकाया जाता है।

अध्यायः 44

मारकभेदाध्यायः

46 श्लोक

सूचना · Note. ये ग्रन्थ के ऐतिहासिक आयु/मृत्यु-कथन हैं, चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं; स्वास्थ्य की चिन्ता हो तो चिकित्सक से मिलें। · Historical statements of the text about lifespan and death, not medical predictions; for any health concern, see a doctor.

44.1
बहुधाऽऽयुर्भवा योगाः कथिता भवताऽधुना |
नृणां मारकभेदाश्च कथ्यन्तां कृपया मुने
bahudhā''yurbhavā yogāḥ kathitā bhavatā'dhunā |
nṛṇāṃ mārakabhedāśca kathyantāṃ kṛpayā mune

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुधा = अनेक प्रकार से; आयुर्भवाः योगाः = आयु (जीवनकाल) से सम्बन्धित योग; कथिताः = कहे गए; भवता = आपके द्वारा; अधुना = अब; नृणाम् = मनुष्यों के; मारकभेदाः = मारक (मृत्युकारक) ग्रह/स्थान के भेद-प्रकार; कथ्यन्तां = कहे जाएँ; कृपया = कृपापूर्वक; मुने = हे मुनि।

हिन्दी भावार्थ शिष्य विनयपूर्वक कहता है — हे मुनिवर, आपने अभी अनेक प्रकार के आयु-योग बता दिए हैं; अब कृपा करके मनुष्यों के मारक-भेद, अर्थात् मृत्यु देने वाले ग्रहों और भावों के प्रकार, भी कहिए। यह अध्याय का मंगल-प्रश्न है, जो आयुर्दाय-प्रकरण से मारक-प्रकरण की ओर संवाद को मोड़ता है।

English rendering "You have now told, in many ways, the yogas that bear on longevity; kindly, O sage, let the varieties of the death-inflicting (māraka) [planets] for men now be spoken." This is the disciple's opening question that turns the discourse toward the māraka doctrine.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (प्रश्न)। यह प्रश्न-वाक्य पूरे अध्याय का ढाँचा तय करता है: पहले आयु का प्रमाण, फिर मारक का निर्णय — यही क्रम आगे की गणना का आधार बनता है।

44.2
तृतीयमष्टमस्थानमायुःस्थानां द्वयं द्विज |
मारकं तद्व्ययस्थानं द्वितीयं सप्तमं तथा
tṛtīyamaṣṭamasthānamāyuḥsthānāṃ dvayaṃ dvija |
mārakaṃ tadvyayasthānaṃ dvitīyaṃ saptamaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीयम् = तृतीय भाव; अष्टमस्थानम् = अष्टम भाव; आयुःस्थानां द्वयम् = आयुः-स्थानों का युग्म; द्विज = हे द्विज; मारकम् = मारक (निधन-कारक स्थान); तत्-व्ययस्थानम् = उन (आयु-स्थानों) का व्यय-स्थान (= द्वादश से); द्वितीयम् = द्वितीय भाव; सप्तमम् = सप्तम भाव; तथा = तथा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तृतीय और अष्टम, ये दोनों आयुः-स्थान हैं। मारक वे स्थान हैं जो उन आयु-स्थानों से व्यय (द्वादश) पड़ते हैं — और वही द्वितीय तथा सप्तम भी कहे गए हैं। अर्थात् आयु-घरों से बारहवाँ घर ही मारक-घर के रूप में पहचाना जाता है; गिनने पर वे द्वितीय और सप्तम निकलते हैं।

English rendering The text states that the 3rd and 8th are the two houses of longevity (āyuḥ-sthāna). The māraka houses are the 12th counted from those longevity houses — which are, respectively, the 2nd and the 7th.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना (पूर्णांक मापांक 12; लग्न = भाव 1):
आयुः-स्थान: H_ā = {3, 8}
उनसे व्यय (12वाँ): H_m = (H_ā + 11 − 1) mod 12 + 1 = (H_ā − 1) mod 12
→ (3 − 1) mod 12 = 2 → द्वितीय
→ (8 − 1) mod 12 = 7 → सप्तम
अतः मारक-स्थान-युग्म: H_māraka = {2, 7}। (समानार्थ: “तत्-व्ययस्थानं” ≡ “द्वितीयं सप्तमं तथा”।) भाव-गणना लग्न-आधारित पूर्ण-राशि क्रम पर है; अयनांश/गृह-पद्धति यहाँ संख्या नहीं बदलती — केवल लग्न-निर्धारण पहले वाला चरण है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (भाव 1 = मेष, 2 = वृष, …)। आयुः-स्थान = मिथुन (3) और वृश्चिक (8)। उनसे व्यय = वृष (2) और तुला (7)। अतः इस कुण्डली में मारक-भाव = द्वितीय (वृष) और सप्तम (तुला); आगे के श्लोक इन्हीं भावों के अधिपति, स्थित ग्रह और पाप-संयोग को मारक-संज्ञक कहते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) भाव-अंक यहाँ शुद्ध मापांक-12 अंकगणित है — वैसा ही अनुशासन जैसा षोडश-वर्ग में अंश-विभाजन और विंशोत्तरी में नक्षत्र-अंश अनुपात पर लगता है: नियम को संख्या में बाँधो, फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में अलग रखो। मारक-भाव की पहचान `==` से जाँचने योग्य नियत मानचित्र है ({3,8} → {2,7}); फल-कथन बाद के श्लोकों का विषय है।

44.3
तत्रापि सप्तमस्थानाद् द्वितीयं बलवत्तरम् |
तयोरीशौ तत्र गताः पापिनस्तेन संयुताः
tatrāpi saptamasthānād dvitīyaṃ balavattaram |
tayorīśau tatra gatāḥ pāpinastena saṃyutāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्रापि = उनमें भी; सप्तमस्थानात् = सप्तम-स्थान से (तुलना में); द्वितीयम् = द्वितीय; बलवत्तरम् = अधिक बलवान् (मारकत्व में); तयोः ईशौ = उन दोनों (2 और 7) के अधिपति; तत्र गताः = वहाँ स्थित (ग्रह); पापिनः = पाप-ग्रह; तेन संयुताः = उन (मारक-स्थान/स्वामी) से युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दोनों मारक-स्थानों में द्वितीय, सप्तम से बलवत्तर मारक माना जाता है। दोनों भावों के अधिपति, उन भावों में बैठे ग्रह, तथा उनसे जुड़े पाप-ग्रह — ये सब मारक-शृंखला में आते हैं। यह श्लोक स्थान-क्रम (2 > 7) और कारक-सूची (स्वामी / स्थिति / पाप-संयोग) दोनों देता है।

English rendering Of the two māraka houses, the text ranks the 2nd as stronger than the 7th. The lords of those houses, planets placed in them, and malefics associated with them are brought into the māraka set.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रमिक बल-नियम (गुणात्मक, अंकीय सूत्र नहीं):
मारक-बल-क्रम: भाव 2 ≻ भाव 7 (मारकत्व में)।
कारक-समुच्चय (संज्ञात्मक):
M = { ईश(2), ईश(7) } ∪ { ग्रह ∈ भाव 2 या 7 } ∪ { पाप-ग्रह जो उनसे युक्त/सम्बद्ध }
“बलवत्तर” यहाँ षड्बल-रूपा/विरूपा का संख्या-माप नहीं — मारक-प्राथमिकता का शास्त्रीय क्रम है। षड्बल अलग अध्याय (बल-प्रकरण) का माप-तन्त्र है; इसे इस क्रम पर जबरदस्ती न मिलाएँ।

उदाहरण (worked example) लग्न कन्या। द्वितीय = तुला → स्वामी शुक्र; सप्तम = मीन → स्वामी गुरु। यदि मंगल द्वितीय में हो और शनि सप्तम-स्वामी से युक्त हो, तो शास्त्र की सूची के अनुसार शुक्र (ईश 2), गुरु (ईश 7), मंगल (तत्र गत), शनि (पाप-संयोग) मारक-संज्ञक उम्मीदवार हैं; द्वितीय-पक्ष (शुक्र/द्वितीय-स्थित) को पाठ सप्तम-पक्ष से प्रबलतर कहता है। यह पहचान है, काल-फल नहीं।

44.4
ये खेटाः पापिनस्ते च सर्वे मारकसंज्ञकाः |
तेषां दशाविपाकेषु सम्भवे निधनं नृणाम्
ye kheṭāḥ pāpinaste ca sarve mārakasaṃjñakāḥ |
teṣāṃ daśāvipākeṣu sambhave nidhanaṃ nṛṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये खेटाः = जो ग्रह; पापिनः = पापस्वभाव; ते च = और वे (पूर्वोक्त स्वामी/स्थित/युक्त); सर्वे = सभी; मारकसंज्ञकाः = मारक-संज्ञक; तेषाम् = उनकी; दशाविपाकेषु = दशा-विपाकों में; सम्भवे = सम्भव होने पर / उपयुक्त स्थिति में; निधनम् = निधन; नृणाम् = मनुष्यों का

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो पाप-ग्रह हैं, तथा पूर्वोक्त मारक-स्थानों के स्वामी, वहाँ स्थित और उनसे युक्त ग्रह — ये सब मारक-संज्ञक कहलाते हैं। उनकी दशा-विपाक में, जब अन्य योग-सम्भव जुड़ते हैं, मनुष्यों का निधन कहा गया है। ध्यान रहे: यह शास्त्र का फल-कथन है, नियत भविष्यवाणी नहीं; “सम्भवे” स्वयं शर्त-शब्द है।

English rendering The text states that malefic planets, and all those agents already named, are termed māraka; in the ripening of their daśās, death of persons is said to be possible when the conditions allow (sambhave).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-काल गणित इस श्लोक में सूत्रित नहीं — केवल “दशाविपाक” संकेत। काल-अक्ष अलग प्रकरण (विंशोत्तरी आदि) से आता है। विंशोत्तरी (120 वर्ष चक्र) में:
महादशा-वर्ष: केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)।
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) / 120।
मारक-ग्रह की महा/अन्तर्दशा = वह कालखण्ड जहाँ पाठ “विपाक” कहता है; आयु-प्रमाण (अल्प/मध्यम/पूर्ण) पहले तय हो, तभी यह कालखण्ड अर्थ रखता है (अगला श्लोक)।

उदाहरण (worked example) मान लें शास्त्र-सूची से शनि मारक-संज्ञक है, और जन्म-चन्द्र नक्षत्र से विंशोत्तरी में शनि महादशा 19 वर्ष है। शुक्र-अन्तर्दशा = (19 × 20) / 120 = 3.166… वर्ष ≈ 3 वर्ष 2 मास। पाठ कहता है: ऐसे विपाक में निधन सम्भव कहा गया — बशर्ते आयु-योग और अन्य शर्तें मेल खाएँ। संख्या केवल दशा-अवधि की है; फल शास्त्र का दावा है, हमारा अनुमोदन नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी का 120-वर्ष योग और अन्तर्दशा-अनुपात (महा × अन्तर्)/120 दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित है — नक्षत्र-भोगांश से शेष महादशा निकालकर। मारक-संज्ञा ग्रह/भाव-नियम से चिह्नित होती है; दशा-घड़ी अलग से कटती है। दोनों को मिलाकर “फल” लिखना शास्त्र की भाषा है; इंजन केवल काल और संज्ञा को `==` से पिन करता है, निधन-भविष्य नहीं।

44.5
अल्पमध्यमपूर्णायुः प्रमाणमिह योगजम् |
विज्ञाय प्रथमं पुंसां मारकं परिचिन्तयेत्
alpamadhyamapūrṇāyuḥ pramāṇamiha yogajam |
vijñāya prathamaṃ puṃsāṃ mārakaṃ paricintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अल्प-मध्यम-पूर्णायुः = अल्पायु / मध्यायु / पूर्णायु; प्रमाणम् = माप / अवधि-निर्णय; इह = यहाँ (इस शास्त्र-प्रकरण में); योगजम् = योगों से उत्पन्न; विज्ञाय = जानकर; प्रथमम् = पहले; पुंसाम् = पुरुषों के; मारकम् = मारक (काल/कारक); परिचिन्तयेत् = विचारे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की विधि स्पष्ट है — पहले योगों से यह प्रमाणित करें कि आयु अल्प, मध्यम या पूर्ण किस कोटि की है; उसके बाद मारक का चिन्तन करें। बिना आयु-प्रमाण के मारक-दशा का फल लगाना क्रम-भंग है। यह श्लोक फल से पहले गणित/योग-निर्णय की अनुशासन-पंक्ति है।

English rendering Having first determined, from the yogas taught here, whether longevity is short, medium, or full, one should then consider the māraka for the person.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) इस श्लोक में तीन कोटियाँ नाममात्र हैं — अल्पायु, मध्यायु, पूर्णायु — पर कटौती-वर्ष-सूत्र यहीं नहीं दिया; वह पूर्व आयुर्दाय/आयु-योग प्रकरण का विषय है। प्रक्रिया-क्रम (algorithmic order):
(1) योगज आयु-प्रमाण → वर्ग ∈ {अल्प, मध्यम, पूर्ण}
(2) तदनुसार संभावित निधन-काल-पट्टी सीमित करो
(3) तब मारक-ग्रह/भाव की दशा-विपाक जाँचो
अर्थात् मारक “कब” का द्वार है; “कितनी आयु” पहले का द्वार है।

उदाहरण (worked example) मान लें पूर्व-प्रकरण के योगों से आयु-प्रमाण “मध्यायु” तय हुआ (परम्परा में प्रायः मध्यायु-पट्टी मध्य-दशकों की कोटि — वर्ष-संख्या इस श्लोक में नहीं; जो सूत्र आपने आयुर्दाय अध्याय में अपनाया हो, वही घोषित करें)। तब मारक-चिन्तन उसी पट्टी के भीतर की दशाओं तक सीमित रखा जाता है; अल्पायु-योग पर पूर्ण-आयु की अंतिम दशाएँ प्राथमिक नहीं मानी जातीं। यह क्रम-नियम है, वर्ष-सूत्र नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “पहले माप, फिर फल” वही अनुशासन है जो बल, वर्ग और अष्टकवर्ग में लगता है: संख्या/कोटि `==` से तय हो, व्याख्या अलग रहे। आयु-कोटि और मारक-संज्ञा दोनों नियम-बद्ध पहचान हैं; “निधन होगा” कहना इंजन का काम नहीं — शास्त्र का फल-वाक्य अलग परत है।

44.6
अलाभे पुनरेतेषां सम्बन्धेन व्ययेशितुः |
क्वचिच्छुभानां च दशस्वष्टमेशदशासु च
alābhe punareteṣāṃ sambandhena vyayeśituḥ |
kvacicchubhānāṃ ca daśasvaṣṭameśadaśāsu ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अलाभे = (उन मारकों के) न मिलने / अप्रबल होने पर; पुनः = फिर; एतेषाम् = इन (मारकों) के; सम्बन्धेन = सम्बन्ध से; व्ययेशितुः = व्ययेश (द्वादशेश) के; क्वचित् = कहीं / कभी; शुभानाम् = शुभ ग्रहों की; च = और; दशासु = दशाओं में; अष्टमेश-दशासु = अष्टमेश की दशाओं में; च = भी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि मुख्य मारक स्पष्ट न मिलें, तो उन्हीं के सम्बन्ध से व्ययेश (द्वादशेश) को देखें। कभी शुभ ग्रहों की दशाओं में, और अष्टमेश की दशाओं में भी, निधन-सन्दर्भ कहा गया है। यह “द्वितीयक मार्ग” है — प्राथमिक मारक (2/7 और उनके पाप-संयोग) के अभाव में विस्तारित सूची।

English rendering If those primary mārakas are not available (or not operative), the text directs attention through their connection to the lord of the 12th; and it states that, in some cases, the daśās of benefics and the daśās of the 8th-lord are also implicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विस्तारित मारक-उम्मीदवार (संज्ञात्मक संघ):
प्राथमिक: M₁ = {ईश(2), ईश(7)} ∪ स्थिति(2,7) ∪ पाप-संयोग
अलाभ पर: M₂ ⊇ सम्बन्ध(M₁, ईश(12)) ∪ {ईश(8)} ∪ (क्वचित् शुभ-ग्रह दशा)
“सम्बन्ध” = योग/दृष्टि/युति/पारस्परिक अधिपत्य आदि — इस श्लोक में प्रकार गिनाए नहीं; केवल द्वार खोला गया। काल फिर दशा-अंकगणित से: अष्टमेश या व्ययेश की महा/अन्तर्दशा = (महा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 (विंशोत्तरी)। “क्वचित्” = अनियत आवृत्ति; सूत्र नहीं, शास्त्रीय संकेत।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह; ईश(2)=बुध, ईश(7)=शनि — दोनों निर्बल/असंलग्न मानें (अलाभ)। व्ययेश = ईश(12)=चन्द्र; अष्टमेश = ईश(8)=गुरु। यदि चन्द्र बुध से युक्त हो, तो पाठ व्ययेश-मार्ग से चन्द्र को द्वितीयक कारक कहता है; गुरु-महादशा (16 वर्ष) या उसकी अन्तर्दशाएँ भी “अष्टमेश-दशा” के अन्तर्गत आती हैं। शुभ (यहाँ गुरु) की दशा में भी “क्वचित्” निधन-सन्दर्भ शास्त्र कहता है — शर्त और योग के साथ, स्वतः नहीं।

44.7
केवलानां च पापानां दशासु निधनं क्वचित् |
अल्पनीयं बुधैर्नृणां मारकाणामदर्शने
kevalānāṃ ca pāpānāṃ daśāsu nidhanaṃ kvacit |
alpanīyaṃ budhairnṛṇāṃ mārakāṇāmadarśane

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केवलानाम् = केवल / अमिश्रित; पापानाम् = पाप-ग्रहों की; दशासु = दशाओं में; निधनम् = निधन; क्वचित् = कभी; अल्पनीयम् = सूक्ष्मता से जाँचनीय / सावधानी से निर्धारित; बुधैः = विद्वानों द्वारा; नृणाम् = मनुष्यों के; मारकाणाम् = मारकों के; अदर्शने = न दिखाई देने पर

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कभी केवल पाप-ग्रहों की दशाओं में भी निधन कहा गया है। जब स्पष्ट मारक दिखाई न दें, तब विद्वान् सूक्ष्म परीक्षण से कारण निर्धारित करें — जल्दबाज़ी या भय-कथन नहीं। अध्याय यहीं सावधानी का द्वार छोड़ता है: नियम व्यापक हैं, पर प्रत्येक कुण्डली में दृश्य कारक एक जैसे नहीं।

English rendering The text states that death is sometimes said to occur in the daśās of malefics alone; when mārakas are not apparent, the learned should determine the matter with careful scrutiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शोध-विधि। “केवल पाप-दशा” = पाप-ग्रह की महा/अन्तर्दशा बिना स्पष्ट 2/7-मारक के भी क्वचित् सन्दर्भ; “अदर्शने … अल्पनीयम्” = जब M₁/M₂ रिक्त-से लगें, तो सम्बन्ध, अष्टम/व्यय, दशा-शृंखला और आयु-प्रमाण पुनः जाँचें। यह अपवाद-खण्ड है, नया वर्ष-सूत्र नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) जब प्राथमिक सारणी रिक्त लगे, मौन अनुमान मत भरें — वही अनुशासन जो अष्टकवर्ग में BPHS बनाम फलदीपिका के पाठ-भेद को `[HUMAN]` खुला छोड़ता है, और `±` पट्टी से असली −1 छिपाने से मना करता है। दशा-अवधि विंशोत्तरी से `==` कट सकती है; “निधन” शब्द शास्त्र का दावा रहता है, इंजन का आउटपुट नहीं। पाठ-भेद संभव जहाँ संस्करण मारक-सूची या दशा-क्रम में भिन्न हों — इस संस्करण (विकिस्रोत, 97 अध्याय) पर पिन रहें।

44.8
सत्यपि स्वेन सम्बन्धे न हन्ति शुभभुक्तिषु |
हन्ति सत्यप्यसम्बन्धे मारकः पापभुक्तिषु
satyapi svena sambandhe na hanti śubhabhuktiṣu |
hanti satyapyasambandhe mārakaḥ pāpabhuktiṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सति अपि स्वेन सम्बन्धे = स्वयं (मारक) का सम्बन्ध होने पर भी; न हन्ति = नहीं मारता; शुभभुक्तिषु = शुभ भुक्तियों (अन्तर्दशाओं) में; हन्ति = मारता है; सति अपि असम्बन्धे = सम्बन्ध न होने पर भी; मारकः = मारक; पापभुक्तिषु = पाप भुक्तियों में।

हिन्दी भावार्थ मारक ग्रह, मारक-सम्बन्ध रखते हुए भी, शुभ ग्रह की भुक्ति (अन्तर्दशा) में मारण नहीं करता; और मारक-सम्बन्ध न रखते हुए भी, पापग्रह की भुक्ति में मारण कर देता है। अर्थात् भुक्ति (अन्तर्दशा) का शुभ-पाप स्वभाव फल का निर्णायक है।

English rendering Even with a māraka-connection present, [the planet] does not kill during benefic bhuktis; and even without connection, the māraka kills during malefic bhuktis — the sub-period's nature being decisive.

गणित / तकनीक: भुक्ति (अन्तर्दशा) की गणना निर्णायक है — अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। यही अनुपात-अंकगणित प्रत्येक भुक्ति की सटीक उपअवधि बनाता है; "शुभभुक्ति बनाम पापभुक्ति" इन्हीं परिकलित उपखण्डों के स्वभाव पर आधारित है।

उदाहरण (worked example) मान लें गुरु महादशा (16 वर्ष) में शनि अन्तर्दशा: अवधि = (16 × 19) ÷ 120 = 304 ÷ 120 = 2.533… वर्ष ≈ 2 वर्ष 6 माह 12 दिन। इस पाप-भुक्ति-खण्ड की सीमाएँ ठीक इसी सूत्र से निकलती हैं, जिन पर श्लोक का नियम लागू होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसियर §3 की अन्तर्दशा-सूत्र [(महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120] विशुद्ध अनुपात-अंकगणित है, जिसे हमारा दशा-इंजन बिल्कुल परिकलित सीमाओं के साथ निकालता है। अतः श्लोक का "भुक्ति-सापेक्ष" नियम एक सुनिश्चित उप-कालखण्ड पर लगता है — गणना सटीक, फल केवल पाठ का कथन।

44.9
मारकग्रहसम्बन्धान्निहन्ता पापकृच्छनिः |
अतिक्रम्येतरान् सर्वान् भवत्यत्र न संशयः
mārakagrahasambandhānnihantā pāpakṛcchaniḥ |
atikramyetarān sarvān bhavatyatra na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मारकग्रहसम्बन्धात् = मारक-ग्रहों से सम्बन्ध होने से; निहन्ता = हनन करने वाला; पापकृत् = पाप-कार्य करने वाला/मन्द स्वभाव; शनिः = शनि; अतिक्रम्य = पार करके/प्रबल होकर; इतरान् सर्वान् = अन्य सब (मारक-संभावनाओं) को; भवत्यत्र = यहाँ होता है; न संशयः = संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शनि मारक-ग्रहों से सम्बन्ध रखता है, तब वह अन्य सब को अतिक्रम कर निहन्ता (हनन-कारक) बन जाता है। यह पापकृत्-शनि के मारक-योग में विशेष बल का फल-कथन है। “न संशयः” पाठ की निश्चितता का संकेत है — हमारे पूर्वानुमान का नहीं।

English rendering The text states that Saturn, as a malefic agent, when connected with maraka planets, becomes the killer surpassing all others — without doubt (as the śāstra asserts).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-फल में शनि-प्राधान्य का कथन। सम्बन्ध (युति, दृष्टि, भाव-स्वामित्व आदि) यहाँ नामित संख्या में नहीं बाँधा गया; फल-निर्णय दशा-भुक्ति (पूर्व श्लोक) और मारक-स्थान-नियमों के साथ जोड़ा जाता है।

44.10
अथाऽन्यदपि वक्ष्यामि द्विज मारकलक्षणं |
त्रिविधाश्चायुषो योगाः स्वल्पायुर्मध्यमोत्तमाः
athā'nyadapi vakṣyāmi dvija mārakalakṣaṇaṃ |
trividhāścāyuṣo yogāḥ svalpāyurmadhyamottamāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अन्यदपि = एक और भी; वक्ष्यामि = कहूँगा; द्विज = हे द्विज; मारकलक्षणं = मारक/आयु-विषयक लक्षण; त्रिविधाः = तीन प्रकार के; आयुषो योगाः = आयु के योग; स्वल्पायुः = अल्पायु; मध्यमाः = मध्यम आयु; उत्तमाः = उत्तम/दीर्घायु वर्ग।

हिन्दी भावार्थ पाराशर अब मारक-लक्षण का एक और पक्ष खोलते हैं — आयु-योगों का त्रिविध वर्गीकरण। शास्त्र आयु को स्वल्प (अल्प), मध्यम और उत्तम — इन तीन श्रेणियों में बाँटता है। आगे के श्लोक इन्हीं श्रेणियों की वर्ष-सीमाएँ देते हैं।

English rendering “I shall now state another maraka-mark, O twice-born: the yogas of longevity are of three kinds — short, medium, and excellent (long).”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्गीकरण-सूत्र का प्रस्ताव — आयु-योग ∈ {अल्प, मध्यम, उत्तम}। संख्या-सीमाएँ अगले श्लोकों (२२, ६४, १०० वर्ष) में; यह श्लोक केवल त्रिविध-ढाँचा घोषित करता है।

44.11
द्वाविंशात् पूर्वमल्पायुर्मध्यमायुस्ततः परम् |
चतुष्षष्ट्याः पुरस्तात् तु ततो दीर्घमुदाहृतम्
dvāviṃśāt pūrvamalpāyurmadhyamāyustataḥ param |
catuṣṣaṣṭyāḥ purastāt tu tato dīrghamudāhṛtam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वाविंशात् = बाईस (22) वर्ष से; पूर्वम् = पहले; अल्पायुः = अल्प आयु; मध्यम-आयुः = मध्यम आयु; ततः परम् = उसके आगे; चतुष्षष्ट्याः = चौंसठ (64) वर्ष से; पुरस्तात् = पहले (तक); तु = किन्तु; ततः = उसके बाद; दीर्घम् = दीर्घ (आयु); उदाहृतम् = कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट संख्याएँ देता है — बाईस वर्ष से पूर्व मृत्यु हो तो अल्पायु; बाईस से चौंसठ वर्ष तक मध्यमायु; और चौंसठ वर्ष के बाद की आयु दीर्घायु कही गई है। ये तीन तीखी सीमाएँ आयुर्वर्ग को गणनीय बना देती हैं।

English rendering Before twenty-two (years) is short life; thereafter, up to before sixty-four, is medium life; but beyond that, long (life) is declared.

गणित / तकनीक: संख्यात्मक सीमा-वर्गीकरण (word-numeral: द्वाविंशति = 22, चतुःषष्टि = 64):
- अल्पायु: 0 < आयु < 22 वर्ष
- मध्यमायु: 22 ≤ आयु < 64 वर्ष
- दीर्घायु: आयु ≥ 64 वर्ष
सीमाएँ तीक्ष्ण (hard cut) हैं, कोई सहिष्णुता-बैंड नहीं।

उदाहरण (worked example) गणित से आयु = 55 वर्ष → 22 ≤ 55 < 64 → मध्यमायु। आयु = 18 वर्ष → 18 < 22 → अल्पायु। आयु = 70 वर्ष → 70 ≥ 64 → दीर्घायु।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसियर §5 का अनुशासन यहाँ सीधे लागू होता है — सीमा एक तीक्ष्ण `==`/`<` कट है, न कि सहिष्णुता-बैंड। जैसे हमारे अष्टकवर्ग ऑरैकल में ±3 बैंड ने एक असली −1 को छिपा दिया था और इसे हटाकर हमने exact-`==` पर fixture पिन किया, वैसे ही आयु-वर्ग की 22/64 सीमाएँ बैंड-रहित रहनी चाहिए, अन्यथा वर्गीकरण मौन रूप से खिसक जाता है।

44.12
उत्तमायुः शतादूर्ध्वं ज्ञातव्यं द्विजसत्तम |
जनैर्विंशतिवर्षान्त्यमायुर्ज्ञातं न शक्यते
uttamāyuḥ śatādūrdhvaṃ jñātavyaṃ dvijasattama |
janairviṃśativarṣāntyamāyurjñātaṃ na śakyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तमायुः = उत्तम आयु; शताद् ऊर्ध्वं = सौ वर्ष से ऊपर; ज्ञातव्यं = जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; जनैः = साधारण जनों/सामान्य विधि से; विंशतिवर्षान्त्यम् = बीस वर्ष में समाप्त होने वाली; आयुः = आयु; ज्ञातं न शक्यते = जानी नहीं जा सकती।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उत्तमायु सौ वर्ष से ऊपर समझनी चाहिए। साथ ही यह भी कहता है कि बीस वर्ष के भीतर समाप्त होने वाली आयु सामान्य जन-विधि से जानी नहीं जा सकती — अर्थात् बाल-अरिष्ठावधि में साधारण आयुर्दाय-गणना लागू नहीं मानी गई। आगे के श्लोक उसी बाल-मृत्यु-भेद की ओर ले जाते हैं।

English rendering Excellent longevity is to be known as above a hundred years, O best of the twice-born; and a span that ends within twenty years cannot be ascertained by ordinary human reckoning (as the text states).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो संख्या-सीमाएँ:
1. उत्तमायु: A > १०० वर्ष (शत = १००)।
2. बाल/अरिष्ट-सीमा: यदि मृत्यु-काल (या आयुर्दाय) A ≤ २० (विंशति), तो सामान्य आयु-ज्ञान “न शक्यते” — शास्त्र अलग बाल-रक्षा/अरिष्ट-नियम की ओर संकेत करता है (अगले श्लोक)।

नोट: ४४.११ का “दीर्घ” (≥ ६४) और यहाँ “उत्तम” (> १००) — दो स्तर; पाठ में दोनों नामित हैं, एक-दूसरे का निषेध नहीं।

उदाहरण (worked example) आयुर्दाय A = १०८ ⇒ उत्तमायु (A > १००)। A = १५ ⇒ विंशति-सीमा के भीतर; शास्त्र कहता है सामान्य आयु-ज्ञान लागू नहीं — बाल-अरिष्ट/त्रिविध बाल-मृत्यु-विवेक (४४.१३–१४) देखना। A = ७५ ⇒ दीर्घ (४४.११) किन्तु उत्तम (> १००) नहीं।

44.13
जपहोमचिकित्साद्यैर्बालरक्षां हि कारयेत् |
म्रियन्ते पितृदोषैश्च केचिन्मातृग्रहैरपि
japahomacikitsādyairbālarakṣāṃ hi kārayet |
mriyante pitṛdoṣaiśca kecinmātṛgrahairapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जप-होम-चिकित्सा-आद्यैः = जप, होम, चिकित्सा आदि उपायों से; बालरक्षां = बालक की रक्षा; हि = निश्चय ही; कारयेत् = करानी चाहिए; म्रियन्ते = मरते हैं; पितृदोषैः = पितृ-दोषों से; च = और; केचित् = कुछ; मातृग्रहैः = मातृ-ग्रहों (बाल-पीड़क ग्रह-देवताओं) से; अपि = भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बालारिष्ट की स्थिति में जप, होम, चिकित्सा आदि द्वारा बालक की रक्षा करानी चाहिए। साथ ही यह वर्णन करता है कि कुछ बालक पितृ-दोषों से और कुछ मातृ-ग्रहों से मृत्यु को प्राप्त होते हैं — यह पाठ का कथन है, भय या दबाव का उपाय-वाक्य नहीं।

English rendering One should have the child protected by japa, homa, medical treatment and the like; some (children), the text says, die through paternal afflictions (pitṛ-doṣa), and some also through the "mother-seizers" (mātṛ-grahas).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/फल-कथन (बालारिष्ट)। यहाँ कोई परिकलन नहीं; यह श्लोक 12 की "20 वर्ष तक अनिर्धार्य" सीमा का व्यावहारिक अनुवर्ती है — गणना जहाँ मौन है, वहाँ शास्त्र रक्षा-व्यवहार और कारण-वर्गीकरण (पितृदोष/मातृग्रह) की बात करता है, जिसे हम पाठ के कथन रूप में ही प्रस्तुत करते हैं, न भय-रूप में, न दबाव-उपाय रूप में।

44.14
केचित् स्वारिष्ट्योगाच्च त्रिविधा बालमृत्यवः |
ततः परं नृणामायुर्गणयेद् द्विजसत्तम
kecit svāriṣṭyogācca trividhā bālamṛtyavaḥ |
tataḥ paraṃ nṛṇāmāyurgaṇayed dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केचित् = कुछ; स्वारिष्ट्योगात् = अपने ही अरिष्ट-योग से; च = और; त्रिविधाः = तीन प्रकार की; बालमृत्यवः = बाल-मृत्युएँ; ततः परं = उसके बाद; नृणाम् = मनुष्यों की; आयुः = आयु; गणयेत् = गणना करे; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र तीसरा भेद जोड़ता है — स्व-अरिष्ट-योग से होने वाली बाल-मृत्यु। इस प्रकार बाल-मृत्यु त्रिविध कही गई: पितृ-दोष, मातृ-ग्रह, और स्व-अरिष्ट-योग। तदनन्तर — अर्थात् बाल-अरिष्ट-अवधि पार होने पर — मनुष्यों की आयु की गणना करनी चाहिए। यह अध्याय के आयुर्दाय-क्रम का द्वार-वाक्य है: पहले बाल-सीमा, फिर पूर्ण आयु-गणित।

English rendering The text states that some (child-deaths) arise from one’s own ariṣṭa-yogas; thus childhood deaths are of three kinds. Thereafter, O best of the twice-born, one should compute the longevity of men.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचना-नियम (संख्या ४४.१२–१४ से):
- यदि बाल-अरिष्ट/बाल-मृत्यु-योग (त्रिविध: पितृ · मातृ · स्व) लागू → सामान्य आयुर्दाय न चलाएँ (A ≤ २० की “न शक्यते” सीमा)।
- ततः परम्: पूर्ण आयु-गणना (पूर्व-अध्यायों के आयुर्दाय-योग: पिण्ड/अंश/नाड़ी आदि — जो परम्परा अपनाए)।

त्रिविध बाल-मृत्यु = {पितृदोष, मातृग्रह, स्वारिष्टयोग} — गणनात्मक अचर नहीं, वर्गीकरण-समुच्चय।

उदाहरण (worked example) जन्म-समय से आयुर्दाय-इंजन A = ४२ वर्ष दे और बाल-अरिष्ट-योग अनुपस्थित हों → “ततः परम्” मार्ग: २२ ≤ ४२ < ६४ ⇒ मध्यमायु (४४.११)। यदि बाल-अरिष्ट-योग (पाठ-परम्परा के अनुसार) उपस्थित और अवधि ≤ २० वर्ष की संभावना में हो → शास्त्र कहता है सामान्य आयु-ज्ञान नहीं; त्रिविध कारण-विवेक पहले। (अरिष्ट-योग की सूचियाँ अध्याय ९–१० आदि; यहाँ केवल ४४.१४ का क्रम-नियम।)

44.15
अथाऽन्यदपि वक्ष्यामि नृणां मारकलक्षणम् |
अल्पायुर्योगजातस्य विप्भे च मृतिर्भवेत्
athā'nyadapi vakṣyāmi nṛṇāṃ mārakalakṣaṇam |
alpāyuryogajātasya vipbhe ca mṛtirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब / आगे; अन्यद् अपि = और भी; वक्ष्यामि = कहूँगा; नृणाम् = मनुष्यों के; मारक-लक्षणम् = मृत्यु-कारक (मारक) लक्षण; अल्प-आयुर्-योग-जातस्य = अल्पायु-योग में जन्मे का; विप्भे = विपत्-तारा / विपद्-नक्षत्र में (पाठ-भेद संभव: विपद्भे / विपत्भे); च = और; मृतिः भवेत् = मृत्यु होती है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ गुरु अब आयु-निर्धारण के बाद मनुष्यों के मारक-लक्षण भी बताने का वचन देते हैं। शास्त्र कहता है कि जिस जातक का जन्म अल्पायु-योग से युक्त है, उसकी मृत्यु-संभावना का निर्देश विपत्-तारा (जन्म-नक्षत्र से तीसरी तारा) की दिशा में देखा जाता है। यह फल-कथन आयु-योग और तारा-क्रम के संयोग पर टिका है — भय या नियति का दावा नहीं, शास्त्र की अपनी भाषा है।

English rendering The sage next turns to the maraka (death-indicating) marks of men. The text states that for one born under an alpa-āyu (short-life) yoga, death is indicated in the vipat station — the third tārā counted from the birth-nakṣatra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तारा-गणना (nakṣatra-tārā cakra) — जन्म-नक्षत्र = 1 (जन्म), 2 = संपत्, 3 = विपत्, 4 = क्षेम, 5 = प्रत्यरि, 6 = साधक, 7 = वध/नैधन, 8 = मित्र, 9 = परममित्र; फिर चक्र 1…9 दोहराया जाता है (नक्षत्र-सूचकांक n पर tārā-वर्ग = ((n − janma_index) mod 9) + 1)। अल्पायु-योग + विपत्-तारा = इस श्लोक का युग्म-नियम। आयु-योग स्वयं पूर्व-अध्याय के दशा/ग्रह-बल नियमों से निश्चित होता है; यहाँ केवल फल-निर्देश की कुंजी दी गई है।

उदाहरण (worked example) जन्म-नक्षत्र = रोहिणी (नक्षत्र #4, अश्विनी = 1)। विपत् = जन्म से तीसरा = #4 + 2 = मृगशीर्ष (नक्षत्र #5)। अल्पायु-योग मानकर शास्त्र इस नक्षत्र-क्षेत्र / उससे संबद्ध दशा-काल की ओर मृत्यु-निर्देश देखता है। (नक्षत्र-सूची अश्विनी-आरंभ; अयनांश दशा-काल पर निर्भर, तारा-क्रमांक पर नहीं।)

44.16
मध्यायुर्योगजस्यैवं प्रत्यरौ च मृतिर्भवेत् |
दीर्घायुर्योगजातस्य वधभे तु मृतिर्भवेत्
madhyāyuryogajasyaivaṃ pratyarau ca mṛtirbhavet |
dīrghāyuryogajātasya vadhabhe tu mṛtirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्य-आयुर्-योग-जस्य = मध्यायु-योग में जन्मे का; एवम् = इसी प्रकार; प्रत्यरौ = प्रत्यरि-तारा में (पाठ-भेद संभव); च = और; मृतिः भवेत् = मृत्यु होती है — शास्त्र-कथन; दीर्घ-आयुर्-योग-जातस्य = दीर्घायु-योग में जन्मे का; वधभे = वध-तारा / वध-भाव में (पाठ-भेद संभव: वधभे / वध-तारा); तु = तो / परंतु; मृतिः भवेत् = मृत्यु होती है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अल्पायु के बाद मध्यायु और दीर्घायु के लिए भी तारा-निर्देश जोड़ता है। मध्यायु-योग वाले जातक के लिए मृत्यु-संकेत प्रत्यरि-तारा (जन्म से पाँचवीं) में कहा गया है; दीर्घायु-योग वाले के लिए वध-तारा (जन्म से सातवीं, नैधन) में। तीनों आयु-वर्ग — अल्प, मध्य, दीर्घ — क्रमशः विपत् (3), प्रत्यरि (5), वध (7) से बाँधे गए हैं; यह व्यवस्थित गणितीय कुंजी है, न कि भय-व्याख्या।

English rendering Likewise, the text assigns death-indication in the pratyari tārā (fifth from the birth-star) for one born under madhya-āyu yoga, and in the vadha (seventh / naidhana) tārā for one born under dīrgha-āyu yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-वर्ग ↔ तारा-सूचकांक का सीधा मानचित्र:
- अल्पायु → तारा 3 (विपत्)
- मध्यायु → तारा 5 (प्रत्यरि)
- दीर्घायु → तारा 7 (वध / नैधन)
तारा-सूत्र: t = ((k − 1) mod 9) + 1 जहाँ k = जन्म-नक्षत्र से गिना गया क्रम (1-आधारित)। 9-चक्र के दूसरे/तीसरे फेरे में भी वही 3/5/7 वर्ग लागू होता है (नक्षत्र 10–18, 19–27)।

उदाहरण (worked example) जन्म-नक्षत्र = पुष्य (#8)।
- विपत् (3) = #8 + 2 → हस्त (#13)
- प्रत्यरि (5) = #8 + 4 → स्वाति (#15)
- वध (7) = #8 + 6 → अनुराधा (#17)
मध्यायु-योग हो तो शास्त्र प्रत्यरि (स्वाति) की ओर; दीर्घायु हो तो वध (अनुराधा) की ओर मृत्यु-निर्देश देखता है।

44.17
द्वाविंशत्र्यंशपश्चैव तथा वैनाशिकाधिपः |
विपत्ताराप्रत्यरीशा वधभेशंस्तथैव च
dvāviṃśatryaṃśapaścaiva tathā vaināśikādhipaḥ |
vipattārāpratyarīśā vadhabheśaṃstathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वाविंश-त्र्यंश-पः = बाईसवें द्रेष्काण (त्र्यंश) का स्वामी; च एव = और भी; तथा = तथा; वैनाशिक-अधिपः = वैनाशिक (नाश-संबंधी) का अधिपति — प्रायः 22वें द्रेष्काण / नाश-स्थान से जुड़ा (पाठ-भेद / व्याख्या-भेद संभव); विपत्-तारा-प्रत्यरि-ईशाः = विपत्-तारा और प्रत्यरि के स्वामी; वध-भ-ईशान् = वध-नक्षत्र / वध-स्थान के स्वामियों को; तथा एव च = और उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मारक-पदों की सूची विस्तारित करता है: लग्न से बाईसवाँ द्रेष्काण-स्वामी, वैनाशिकाधिप, तथा विपत्-, प्रत्यरि- और वध-ताराओं के स्वामी — ये सब मारक-गण में गिने जाते हैं। यह श्लोक नाम-सूची है; फल की तीव्रता आगे दशा-बल और अवस्था से जोड़ी जाएगी। पाठ-परंपरा में “वैनाशिक” की ठीक परिभाषा पर भेद संभव है — यहाँ उसी पद को ज्यों-का-त्यों रखा गया है।

English rendering The text enumerates further maraka agents: the lord of the twenty-second drekkāṇa (trayaṃśa), the vaināśika-adhipa, and likewise the lords of the vipat, pratyari, and vadha tārās.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 22वाँ द्रेष्काण — पूर्ण राशिचक्र = 360° = 36 द्रेष्काण × 10° प्रत्येक। लग्न-देशांतर λ_L (° sidereal, घोषित अयनांश पर) से:
1. उठता द्रेष्काण-सूचकांक d₀ = ⌊λ_L / 10°⌋ (0…35; 1-आधारित = d₀+1)
2. 22वाँ द्रेष्काण-सूचकांक (1-आधारित) = ((d₀ + 21) mod 36) + 1
3. उस 10° खंड का स्वामी = उस खंड वाली राशि का राशि-स्वामी (मेष-मंगल … मीन-गुरु)।
विपत्/प्रत्यरि/वध-ईश = उन नक्षत्रों की राशियों के स्वामी (नक्षत्र → राशि → अधिपति)। वैनाशिकाधिप: कई परंपराओं में 22वें द्रेष्काण-स्वामी से ही अभेद; पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) लग्न = 16°40′ वृष (λ_L = 30° + 16°40′ = 46.666…°, लाहिरी-अयनांश मानकर sidereal)।
d₀ = ⌊46.666/10⌋ = 4 → उठता द्रेष्काण #5।
22वाँ = ((4 + 21) mod 36) + 1 = 26वाँ द्रेष्काण।
द्रेष्काण #26 का मध्य-अंक: खंड [250°, 260°) = धनु 10°–20° → स्वामी गुरु।
शास्त्र इस स्थिति में गुरु को द्वाविंश-त्र्यंशप (मारक-सूची में) गिनता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन में द्रेष्काण (D3) 30° राशि का तीन समान 10° खंडों में विभाजन है — शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। 22वाँ द्रेष्काण उसी 36-खंड चक्र पर (d₀ + 21) mod 36 से निश्चित होता है; अयनांश घोषित किए बिना λ_L अस्थिर रहता है — यही exact-`==` अनुशासन है।

44.18
आद्यान्तपौ च विज्ञेयौ चन्द्राक्रान्तगृहाद् द्विज |
मारकौ पापखेटौ तौ शुभौ चेद्रोगदौ स्मृतौ
ādyāntapau ca vijñeyau candrākrāntagṛhād dvija |
mārakau pāpakheṭau tau śubhau cedrogadau smṛtau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आद्य-अन्त-पौ = आदि और अंत के (दो) अधिपति / स्थान; च = और; विज्ञेयौ = जानने योग्य; चन्द्र-आक्रान्त-गृहात् = चंद्रमा जिस राशि/गृह में बैठा हो उससे; द्विज = हे द्विज (शिष्य-संबोधन); मारकौ = दोनों मारक; पाप-खेटौ = यदि वे पाप-ग्रह हों; तौ = वे दोनों; शुभौ चेत् = यदि शुभ हों तो; रोग-दौ = रोग देने वाले; स्मृतौ = कहे गए हैं — शास्त्र-स्मृति।

हिन्दी भावार्थ चंद्र-अधिष्ठित राशि से आदि और अंत के दो पदों को भी मारक जानना चाहिए — शास्त्र शिष्य को यह नियम सिखाता है। यदि वे पाप-ग्रह हों तो मारक माने गए; यदि शुभ हों तो मृत्यु के स्थान पर रोग-दायक कहे गए। यह भेद फल की गुण बदलता है (मारक बनाम रोगद), गणना की कुंजी नहीं — फिर भी ग्रह-स्वाभाव (पाप/शुभ) यहाँ निर्णायक फिल्टर है।

English rendering From the sign occupied by the Moon, the ādya and anta (initial and final) lords are to be known as marakas, O twice-born. The text states: if those two are malefics they are marakas; if benefics, they are remembered as givers of disease rather than death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संदर्भ-बिंदु = चंद्र-राशि R_C ∈ {0…11} (मेष = 0)। आद्य और अन्त की मानक होरा-पठन में प्रायः R_C से 1st (स्वयं / आद्य) और 12th (अन्त्य / व्यय) — अथवा श्रृंखला के प्रथम-अंतिम पद — लिए जाते हैं; कुछ पाठ 2nd–12th (पारंपरिक मारक-भाव) से जोड़ते हैं — पाठ-भेद / व्याख्या-भेद संभव, अतः अंक निश्चित करने से पहले परंपरा चुनें।
पाप = सूर्य, मंगल, शनि, (रवि-वार राहु/केतु परंपरा-बद्ध); शुभ = गुरु, शुक्र, (बुध/चंद्र मिश्र)। नियम द्विआधारी है: पाप → मारक-वर्ग; शुभ → रोगद-वर्ग — कोई भिन्न अंश-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) चंद्र = कन्या (R_C = 5)। आद्य = कन्या-स्वामी बुध; अन्त (12th from Moon) = सिंह-स्वामी सूर्य। सूर्य पाप → शास्त्र उसे मारक-कोटि में गिनता है; बुध स्वभाव-मिश्र — दशा-बल और योग-संदर्भ से रोगद/मारक विवेक (शास्त्र आगे 44.21 में प्रबलता से निर्णय कहेगा)।

44.19
षष्ठाधिपदशायां च नृणां निधनसम्भवः |
षष्ठाष्टरिष्फनाथानामपहारे मृतिर्भवेत्
ṣaṣṭhādhipadaśāyāṃ ca nṛṇāṃ nidhanasambhavaḥ |
ṣaṣṭhāṣṭariṣphanāthānāmapahāre mṛtirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अधिप-दशायाम् = छठे भाव-स्वामी की दशा में; च = और; नृणाम् = मनुष्यों की; निधन-सम्भवः = निधन की संभावना — शास्त्र-कथन; षष्ठ-अष्ट-रिष्फ-नाथानाम् = 6वें, 8वें और 12वें (रिष्फ) भाव-स्वामियों के; अपहारे = अपहार / अंतर्दशा में; मृतिः भवेत् = मृत्यु होती है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दशा-काल को मारक-फल से जोड़ता है: छठे स्वामी की महादशा में निधन-संभव कहा गया है; तथा छठे, आठवें और बारहवें (रिष्फ) स्वामियों के अपहार (अंतर्दशा) में मृत्यु-संकेत कहा गया है। यह भाव-स्वामी × दशा-स्तर (महा / अंतर्) का युग्म-नियम है — “संभव” शब्द स्वयं शास्त्र की सावधानी है, अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that death may be possible in the daśā of the sixth-house lord, and that death is indicated in the apahāra (antardaśā) of the lords of the sixth, eighth, and twelfth (riṣpha) houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्वामी: लग्न-राशि L से भाव b का स्वामी = राशि-स्वामी((L + b − 1) mod 12)।

विंशोत्तरी (यदि यही दशा-पद्धति अपनाई जाए — BPHS Ch.46–47; Σ = 120 वर्ष): महादशा-वर्ष Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17।
अंतर्दशा (अपहार) वर्ष = (महादशा-वर्ष × अंतर्-ग्रह-वर्ष) / 120।
इस श्लोक का नियम: (i) 6th-lord ∈ महादशा-ग्रह → निधन-संभव; (ii) {6th, 8th, 12th}-lords ∈ अंतर्दशा-ग्रह → मृत्यु-संकेत — शास्त्र-कथन। अयनांश चंद्र-नक्षत्र (दशा-आरंभ) पर प्रभाव डालता है, भाव-स्वामी पर राशि-स्तर पर नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (L = 0) → 6th = कन्या-स्वामी बुध, 8th = वृश्चिक-स्वामी मंगल, 12th = मीन-स्वामी गुरु।
विंशोत्तरी में बुध-महादशा (17 वर्ष) चले और अंतर्दशा मंगल की हो: अपहार = (17 × 7) / 120 = 119/120 ≈ 0.9917 वर्ष ≈ 11.9 मास। शास्त्र ऐसे षष्ठाधिप-दशा / षष्ठाष्टरिष्फ-अपहार संयोग को निधन-संभावना का काल कहता है — यह काल-गणित है, फल की गारंटी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी इंजन में अंतर्दशा शुद्ध अनुपात (MD × AD) / 120 है; 120-वर्ष चक्र और नव-ग्रह वर्ष-सारणी BPHS Ch.46–47 से pinned हैं। दशा-फल (निधन/मारक) को इंजन गिनता नहीं — केवल काल-खंड देता है; फल शास्त्र-वाक्य के रूप में अलग रहता है, exact-`==` अनुशासन काल-अंकों पर लागू होता है।

44.20
मारका बहवः खेटा यदि वीर्यसमन्विताः |
तत्तद्दशान्तरे विप्र रोगकष्टादिसंभवः
mārakā bahavaḥ kheṭā yadi vīryasamanvitāḥ |
tattaddaśāntare vipra rogakaṣṭādisaṃbhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मारकाः = मारक ग्रह; बहवः = अनेक; खेटाः = ग्रह; यदि = यदि; वीर्य-समन्विताः = बल / वीर्य से युक्त; तत्-तत्-दशा-अन्तरे = उनकी-उनकी दशा और अंतर (अंतर्दशा) में; विप्र = हे विप्र; रोग-कष्ट-आदि-संभवः = रोग, कष्ट आदि की संभावना — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ जब एक से अधिक मारक-ग्रह बलवान हों, तब शास्त्र कहता है कि उनकी-उनकी दशा-अंतर अवधियों में रोग, कष्ट आदि संभव होते हैं। यहाँ “बहवः + वीर्य” तीव्रता बढ़ाते हैं, पर भाषा फिर “संभव” की है — एक ही मारक से भिन्न, बहु-मारक-बल का फल-विस्तार रोग-कष्ट तक खींचा गया है, केवल मृत्यु तक सीमित नहीं।

English rendering If many maraka planets are endowed with strength (vīrya), then, O sage’s pupil, disease, hardship, and the like may arise in their respective daśā and antara periods — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वीर्य यहाँ षड्बल / स्थान-बल आदि की ओर संकेत करता है (BPHS Ch.27) — स्थाना, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् बल; योग = Σ घटक; इकाई: 1 रूप = 60 विरूप। “बलवान” = प्रति-ग्रह देहली से ऊपर (ग्रह-भेद से देहली शास्त्रीय सारणी पर)।
दशा-अंतर = महादशा × अंतर्दशा खंड (विंशोत्तरी: (Y_MD × Y_AD)/120 वर्ष)। नियम: |{m ∈ Maraka : bala(m) ≥ threshold}| ≥ 2 होने पर, प्रत्येक ऐसे m की MD/AD में रोग-कष्ट-संभव — फल-कथन, सूत्र-गुणक नहीं।

उदाहरण (worked example) मारक-सूची में शनि और मंगल दोनों; मान लें षड्बल शनि = 7.2 रूप, मंगल = 6.5 रूप (देहली ≈ 5 रूप — परंपरा-बद्ध तुलना)। दोनों वीर्य-युक्त → शनि-महादशा में मंगल-अंतर्दशा: यदि MD = शनि 19 वर्ष, AD = मंगल 7 → अंतर = (19 × 7)/120 = 133/120 ≈ 1.108 वर्ष। शास्त्र इस खंड में रोग-कष्टादि-संभव कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल छह घटकों का योग रूप/विरूप में है — गणनात्मक, व्याख्यात्मक नहीं। दशा-इंजन काल काटता है; बल-इंजन अंक देता है; “रोग-कष्ट” फल को हम भविष्यवाणी के रूप में नहीं चलाते — शास्त्र-वाक्य और अंक अलग-अलग परतें रहती हैं।

44.21
उक्ता ये मारकास्तेषु प्रबलो मुख्यमारकः |
तदवस्थानुसारेण मृतिं वा कष्टमादिशेत्
uktā ye mārakāsteṣu prabalo mukhyamārakaḥ |
tadavasthānusāreṇa mṛtiṃ vā kaṣṭamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्ताः ये मारकाः = जो मारक कहे गए; तेषु = उनमें; प्रबलः = सबसे बलवान; मुख्य-मारकः = प्रधान मारक; तत्-अवस्था-अनुसारेण = उसकी अवस्था के अनुसार; मृत्युम् वा कष्टम् = मृत्यु अथवा कष्ट; आदिशेत् = निर्देश करे — शास्त्र की आदेश-विधि (ज्योतिषी के लिए)।

हिन्दी भावार्थ जितने मारक पहले गिनाए गए, उनमें जो सबसे प्रबल हो वही मुख्य-मारक है। उसकी अवस्था (अवस्थान, बल, दशा-स्थिति) देखकर ज्योतिषी मृत्यु या मात्र कष्ट — दोनों में से एक — का निर्देश करे, ऐसा शास्त्र सिखाता है। यह श्लोक निर्णय-क्रम का समापन है: सूची → प्रबलता → अवस्था → फल-कोटि (मृत्यु / कष्ट); भय फैलाना नहीं, विवेक की सीढ़ी है।

English rendering Among the marakas already named, the strongest is the principal maraka. In accordance with that planet’s avasthā (condition/state), one should indicate either death or hardship — so the text instructs the reader.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-निर्णय / चयन-नियम। प्रक्रिया (शास्त्रीय क्रम):
1. मारक-समुच्चय M = {2nd/7th lords, 22nd-drekkāṇa lord, vaināśika, tārā-lords, Moon-ādya/anta, 6/8/12 lords, … — पूर्व श्लोक}
2. मुख्य-मारक m* = argmax<sub>m∈M</sub> strength(m) (वीर्य / षड्बल / अवस्था-बल — घोषित विधि)
3. avasthā(m*) के अनुसार फल-कोटि ∈ {मृत्यु-संकेत, कष्ट-संकेत} — द्विआधारी शास्त्र-निर्देश, निरंतर अंक नहीं।
अवस्था-वर्ग (दीप्ता, स्वस्था, मुदिता, … / बाल-कुमार-युवा-वृद्ध आदि) BPHS अवस्थान-अध्यायों से लेकर तुलना की जाती है; यहाँ केवल “अनुसारेण” का सिद्धांत है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरी मारक-श्रृंखला (44.15–21) उसी अनुशासन पर बैठती है जो अष्टकवर्ग और वर्ग-इंजन में है — पहले exact गणना (तारा-सूचकांक, 22वाँ द्रेष्काण, दशा-खंड, बल-योग), फिर फल को “शास्त्र कहता है” की परत में रखना। मुख्य-मारक का चुनाव max-बल से निर्णायक है; सहन-पट्टी (tolerance) से बल-तुलना छिपाना वर्जित — `==` / स्पष्ट देहली ही प्रमाण है।

44.22
रहुश्चेदथवा केतुर्लग्ने कामेऽष्टमे व्यये |
मारकेशान्मदे वाऽपि मारकेशेन संयुतः
rahuścedathavā keturlagne kāme'ṣṭame vyaye |
mārakeśānmade vā'pi mārakeśena saṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रहुः/केतुः = छाया-ग्रह (R/K); लग्न = उदित राशि/D1 प्रथम भाव; काम = सप्तम भाव (काम-स्थान); अष्टम = मृत्यु/आयु-स्थान; व्यय = द्वादश (व्यय/रिष्फ); मारकेश = मारक-भाव का अधिपति; मद = सप्तम (मारकेशात् मद = मारकेश से सप्तम); संयुत = युति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि राहु अथवा केतु लग्न, सप्तम (काम), अष्टम, या द्वादश (व्यय) में स्थित हों, अथवा मारक-स्वामी से सप्तम भाव में हों, या स्वयं मारकेश के साथ युक्त हों, तो वे मारक-सदृश योग में आते हैं। यह पद अगले श्लोक के साथ जुड़कर पूर्ण होता है — यहाँ शर्तें गिनाई गई हैं, फल अगले श्लोक में। पाठ-भेद संभव जहाँ “मदे” को “मदे” (सप्तम) बनाम अन्य पाठ पढ़ा जाए।

English rendering The text states: if Rāhu or Ketu occupies the lagna, the seventh (kāma), the eighth, or the twelfth (vyaya), or stands in the seventh from the maraka-lord, or is conjoined with the maraka-lord — that node is placed in a maraka-type configuration (completed in the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-योग की स्थिति-शर्त (भाव-स्थान + युति)। तकनीक: D1 में R/K की भाव-संख्या ∈ {1, 7, 8, 12}, अथवा भाव(R/K) = भाव(मारकेश) + 7 (mod 12, 1-indexed), अथवा same-sign conjunction with मारकेश। “मारकेश” स्वयं पूर्व-परिभाषित मारक-भाव (2/7 आदि) के स्वामी से आता है — यह स्थान-नियम है, अंश-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न = मेष, मंगल = 2nd (वृष) का स्वामी → क्लासिकल 2nd/7th मारक-चर्चा में मंगल मारकेश-अभ्यर्थी। राहु = तुला (7th from lagna) → शर्त “कामे” पूर्ण। अथवा राहु = वृश्चिक (7th from Mars in Taurus) → “मारकेशान्मदे” पूर्ण। (राशि-चक्र; ayanāṃśa यहाँ भाव-संख्या नहीं बदलता यदि केवल राशि-भाव देखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) मारक-फल को daśā-काल में बाँधने का अगला पद (44.23) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र से जुड़ता है — महदाशा/अन्तर्दशा = नक्षत्र-अंश × ग्रह-वर्ष / 120। हम daśā को शुद्ध अनुपात-गणित मानते हैं; मारक-योग को “भाग्य” नहीं, शास्त्र-कथित स्थिति-नियम + काल-खिड़की के रूप में पढ़ते हैं।

44.23
मारकः स च विज्ञेयः स्वदशान्तर्दशास्वपि |
मकरे वृश्चिके जन्म राहुस्तस्य मृतिप्रदः
mārakaḥ sa ca vijñeyaḥ svadaśāntardaśāsvapi |
makare vṛścike janma rāhustasya mṛtipradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मारकः = मृत्यु/आयु-क्षय कारक (शास्त्र-पद); विज्ञेयः = जाना जाए; स्व-दशा = उस ग्रह की महदाशा; अन्तर्दशा = उप-अवधि; मकरे वृश्चिके जन्म = मकर/वृश्चिक लग्न (पाठ: जन्म = जन्म-लग्न); मृतिप्रदः = मृत्यु-दायक (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उपर्युक्त स्थिति में वह (राहु/केतु) मारक जाना जाए, अपनी दशा और अन्तर्दशाओं में भी। तथा यदि जन्म मकर या वृश्चिक में हो तो राहु उसके लिए मृतिप्रद कहा गया है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं — दशा-काल में मारकत्व की शास्त्रीय सूची का अंश।

English rendering The text states that such a node is also to be reckoned a maraka even in its own daśā and antardaśās; and that when birth is under Capricorn or Scorpio, Rāhu is said to be death-giving for that native — as the śāstra’s claim, not a fixed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दशा-संदर्भ। काल-खिड़की का ढाँचा (विंशोत्तरी, Ch.46–47): महदाशा-वर्ष Σ = 120 (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17); अन्तर्दशा-वर्ष = (MD-yr × AD-planet-yr) / 120। श्लोक केवल कहता है कि मारक R/K अपनी MD/AD में भी मारक-विज्ञेय है — अवधि-सूत्र यहाँ नहीं दिया।

उदाहरण (worked example) राहु-महदाशा = 18 वर्ष। राहु–शुक्र अन्तर्दशा = (18 × 20) / 120 = 3 वर्ष। यदि 44.22 की स्थिति सत्य हो, शास्त्र इस 3-वर्ष खिड़की को भी मारक-संदर्भ में गिनने को कहता है — यह अनुपात-गणित है; फल की “सत्यता” प्रमाणित घटना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी इंजन में 120-वर्ष कुंजी और (MD × AD)/120 का exact अनुपात pinned है। मारक-योग को हम oracle-`==` संख्या नहीं बनाते — वह स्थिति-नियम + फल-वाक्य है; daśā-अवधि ही वह भाग है जो deterministic arithmetic से निकलता है।

44.24
षष्ठाऽष्टरिष्फगो राहुस्तद्दये कष्टदो भवेत् |
शुभग्रहयुतो दृष्टो न तदा कष्टकृन्मतः
ṣaṣṭhā'ṣṭariṣphago rāhustaddaye kaṣṭado bhavet |
śubhagrahayuto dṛṣṭo na tadā kaṣṭakṛnmataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ = छठा भाव; अष्ट = अष्टम; रिष्फ = द्वादश (व्यय); तद्-दये = उसकी (राहु की) दशा में; कष्टद = कष्ट-दायक; शुभग्रह = शुभ (गुरु/शुक्र/पूर्ण चंद्र आदि, संदर्भानुसार); युत/दृष्ट = युति/दृष्टि; न … कष्टकृत् = तब कष्ट-कारक नहीं माना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — षष्ठ, अष्टम या द्वादश (रिष्फ) में स्थित राहु अपनी दशा में कष्टद होता है। किन्तु यदि वह शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो तब उसे कष्ट-कारी नहीं माना गया। यह शर्त-सहित फल-कथन है — एक ओर दुःस्थ स्थान, दूसरी ओर शुभ-संयोग से निरसन।

English rendering The text states that Rāhu in the sixth, eighth, or twelfth becomes hardship-giving in his daśā; but when joined with or aspected by a benefic, he is then not held to be a hardship-maker.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान + दशा + शुभ-निरसन)। स्थान-परीक्षण: भाव(Rāhu) ∈ {6, 8, 12} from lagna (D1, whole-sign या chosen house system — convention घोषित करें)। शुभ-युति = same rāśi; दृष्टि = शास्त्रीय graha-dṛṣṭi नियम (सूर्य/चंद्र/गुरु/शुक्र/शनि आदि की विशेष दृष्टियाँ — यहाँ केवल “दृष्ट” कहा, पूर्ण dṛṣṭi-तालिका Ch.8)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या; राहु = कुंभ (6th) → “षष्ठा…गो” पूर्ण; राहु-दशा में शास्त्र “कष्टद” कहता है। यदि गुरु = कुंभ (युति) → “शुभग्रहयुतो…न तदा कष्टकृत्” लागू। (Whole-sign भाव; ayanāṃśa राशि-सीमा के लिए आवश्यक यदि अंश से राशि तय करें।)

44.25
लग्नात् तृतीयभावे तु बलिना रविणा युते |
राजहेतुश्च मरणं तस्य ज्ञेयं द्विजोत्तम
lagnāt tṛtīyabhāve tu balinā raviṇā yute |
rājahetuśca maraṇaṃ tasya jñeyaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् तृतीयभाव = लग्न से तृतीय; बलिना = बलवान (षड्बल/अवस्था संदर्भ संभव); रविणा युते = सूर्य से युक्त; राजहेतुः = राज-कारण से; मरणम् = मृत्यु (शास्त्र-फल); द्विजोत्तम = संबोधन (मैत्रेय/शिष्य)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजोत्तम, शास्त्र कहता है — यदि लग्न से तृतीय भाव बलवान सूर्य से युक्त हो, तो उसके लिए राज-हेतु से मरण ज्ञेय कहा गया है। यह तृतीय-भाव आधारित मृत्यु-कारण श्रृंखला का प्रथम पद है; “बलिना” को पूर्ण षड्बल-योग से जोड़ना पाठ-व्याख्या पर निर्भर — श्लोक स्वयं रूप/विरूपा नहीं गिनता।

English rendering The text states, O best of the twice-born: when the third house from the lagna is joined by a strong Sun, death through a royal cause is to be understood for that person — as the śāstra’s phala, not a medical or legal verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (3rd + सूर्य + “बल”)। जाँच: ग्रह_in_भाव_3 = Ravi; “बलि” के लिए षड्बल (Ch.27) उपलब्ध हो तो Σ(sthāna + dig + kāla + ceṣṭā + naisargika + dṛg) rūpa में, 1 rūpa = 60 virūpa — किन्तु यह श्लोक कोई न्यूनतम रूपा-सीमा नहीं देता; “बलिना” गुणात्मक पद है जब तक अन्य सूत्र न जोड़े जाएँ।

44.26
त्रितीये चेन्दुना युक्ते दृष्टे वा यक्ष्मणा मृतिः |
कुजेन व्रणशस्त्राग्निदाहाद्यैर्मरणं भवेत्
tritīye cendunā yukte dṛṣṭe vā yakṣmaṇā mṛtiḥ |
kujena vraṇaśastrāgnidāhādyairmaraṇaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीये = तृतीय भाव में; इन्दुना = चंद्र से; युक्ते/दृष्टे = युति या दृष्टि; यक्ष्मणा = यक्ष्मा (क्षय-रोग श्रेणी, शास्त्र-शब्द); कुजेन = मंगल से; व्रण = घाव; शस्त्र = शस्त्र; अग्निदाह = अग्नि-दाह; आद्यैः = इत्यादि से; मरणम् = मृत्यु-फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तृतीय में चंद्र युक्त या दृष्ट हो तो यक्ष्मा से मृत्यु कही गई; मंगल से युक्त/सम्बद्ध स्थिति में व्रण, शस्त्र, अग्नि-दाह आदि से मरण कहा गया। ये पारंपरिक निमित्त-सूचियाँ हैं — चिकित्सकीय निदान या भविष्य-गारंटी नहीं; पाठ “भवेत्/मृतिः” को शास्त्र-वाणी में रखें।

English rendering The text states: if the third is joined with or aspected by the Moon, death by yakṣmā (consumption-class) is named; by Mars, death through wounds, weapons, fire, burning, and the like — as classical phala-lists, not clinical prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (3rd भाव + ग्रह → निमित्त)। नियम-रूप: (Moon in/aspecting bhāva 3) → phala-tag “यक्ष्म”; (Mars in/aspecting bhāva 3) → tags {व्रण, शस्त्र, अग्निदाह, …}। दृष्टि-कोण शास्त्रीय graha-dṛṣṭi से; house system convention-आश्रित।

44.27
तृतीये शनिराहुभ्यां युक्ते दृष्टेऽपि वा द्विज |
विषार्तितो मृतिर्वाच्या जलाद्वा वह्निपीडनात्
tṛtīye śanirāhubhyāṃ yukte dṛṣṭe'pi vā dvija |
viṣārtito mṛtirvācyā jalādvā vahnipīḍanāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-राहुभ्याम् = शनि और राहु दोनों से; युक्ते/दृष्टेऽपि = युति अथवा दृष्टि में भी; विष-आर्तितः = विष से पीड़ित; मृतिः वाच्या = मृत्यु कही जाए; जलात् = जल से; वह्नि-पीडनात् = अग्नि-पीड़ा से; द्विज = संबोधन।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, शास्त्र कहता है — तृतीय भाव शनि और राहु से युक्त हो, अथवा उनसे दृष्ट भी हो, तो विष-पीड़ा से मृत्यु वाच्य है, अथवा जल से, अथवा अग्नि-पीड़न से। एक ही योग पर एकाधिक निमित्त-विकल्प दिए गए हैं — यह “या” की सूची है, एकमात्र निश्चित कारण का प्रमाण-पत्र नहीं।

English rendering The text states, O twice-born: when the third is joined with Saturn and Rāhu, or even aspected by them, death is to be spoken of as from poison-affliction, or from water, or from torment by fire — alternative classical ascriptions, not a single guaranteed cause.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (3rd + Śani∪Rāhu युति/दृष्टि → विष/जल/वह्नि निमित्त-समुच्चय)। जाँच तार्किक: (Śani related to bhāva 3) ∧ (Rāhu related to bhāva 3) by yuti or dṛṣṭi; “भ्याम्” dual — दोनों की उपस्थिति/दृष्टि शास्त्र-पाठ का बल है। पाठ-भेद संभव यदि कहीं केवल एक ग्रह पढ़ा जाए।

44.28
गर्तादुच्चात् प्रपतनाद् बन्धनाद् वा मृतिर्भवेत् |
तृतीये चन्द्रमान्दिभ्यां युक्ते वा वीक्षिते द्विज
gartāduccāt prapatanād bandhanād vā mṛtirbhavet |
tṛtīye candramāndibhyāṃ yukte vā vīkṣite dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गर्तात् = गड्ढे से; उच्चात् प्रपतनात् = ऊँचाई से गिरने से; बन्धनात् वा = अथवा बन्धन/कारावास से; मृतिः भवेत् = मृत्यु हो; तृतीये = तृतीय भाव में; चन्द्र-मान्दिभ्याम् = चन्द्र तथा मान्दि (गुलिक, शनि-आधारित उपग्रह) से; युक्ते वा वीक्षिते = युक्त अथवा दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के शनि-राहु प्रसंग को पूर्ण करते हुए शास्त्र कहता है कि मृत्यु गड्ढे में गिरने, ऊँचाई से गिरने, अथवा बन्धन से भी हो सकती है। तदनन्तर नया सूत्र आरम्भ होता है — जब तृतीय भाव चन्द्र और मान्दि से युक्त या दृष्ट हो… (फल अगले श्लोक में)। ध्यातव्य: यहाँ श्लोक-सन्धि पर अन्वय टूटता है (एक अर्ध पूर्व-योग का फल, दूसरा अर्ध अगले योग का आरम्भ)।

English rendering (Completing the Saturn–Rāhu clause) death may also come from a pit, a fall from a height, or captivity. Next: when the third is joined with or aspected by the Moon and Māndi (Gulika)…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (श्लोक-सन्धि पर अन्वय-विच्छेद)। यद्यपि मान्दि/गुलिक कोई दृश्य ग्रह नहीं, वह गणना-सिद्ध उपग्रह-बिन्दु है — इसका स्थान दिनमान/रात्रिमान को आठ भागों में बाँटकर शनि के अंश से नियत होता है; अर्थात् इस निमित्त-सूत्र का एक कारक स्वयं एक परिकलित बिन्दु है, फलकथन नहीं।

44.29
कृमिकुष्ठादिना तस्य मरणं भवति ध्रुवम् |
तृतीये बुधसंयुक्ते वीक्षिते वापि तेन च
kṛmikuṣṭhādinā tasya maraṇaṃ bhavati dhruvam |
tṛtīye budhasaṃyukte vīkṣite vāpi tena ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृमिकुष्ठादिना = कृमि–कुष्ठ आदि रोगों से; तस्य मरणम् = उस (जातक) की मृत्यु; भवति ध्रुवम् = शास्त्र-कथन में निश्चित फल; तृतीये = तृतीय भाव में; बुधसंयुक्ते = बुध से युक्त; वीक्षिते वा अपि = अथवा बुध-दृष्ट; तेन च = उसी (बुध) से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब तृतीय भाव बुध से युक्त हो, अथवा बुध उसे देखे, तो मृत्यु का निमित्त कृमि, कुष्ठ आदि रोगों की श्रेणी में बताया गया है। यहाँ “ध्रुवम्” पाठ का अपना दृढ़ फल-कथन है — गणना का अंक नहीं। यह तृतीय-भाव आधारित मृत्यु-निमित्त श्रृंखला का बुध-प्रकरण है।

English rendering The text states that when Mercury conjoins the third house, or aspects it, death is indicated through the class of worm-affliction, kuṣṭha and kindred ailments. “Dhruvam” here is the śāstra’s own assertive phrasing of that phala, not a numerical rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीय भाव + बुध योग/दृष्टि → मृत्यु-निमित्त)। भाव-ग्रह संयोग/दृष्टि की पहचान लग्न से गिने तृतीय भाव और बुध की राशि-स्थिति/दृष्टि-नियम से होती है; यह फल-वर्ग है, बलांक या दशा-वर्ष नहीं।

44.30
ज्वरेण मरणं तस्य विज्ञेयं द्विजसत्तम |
तृतीये गुरुणा युक्ते दृष्टे शोफादिना मृतिः
jvareṇa maraṇaṃ tasya vijñeyaṃ dvijasattama |
tṛtīye guruṇā yukte dṛṣṭe śophādinā mṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वरेण = ज्वर से; मरणम् = मृत्यु; विज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; तृतीये = तृतीय भाव में; गुरुणा युक्ते = गुरु से युक्त; दृष्टे = (गुरु से) दृष्ट; शोफादिना = शोफ (सूजन) आदि से; मृतिः = मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक ओर ज्वर से मृत्यु का उल्लेख करता है, और स्पष्ट रूप से कहता है कि तृतीय भाव जब गुरु से युक्त या दृष्ट हो तो मृत्यु शोफ आदि से कही गई है। दोनों पंक्तियाँ मृत्यु-निमित्त के फल-कथन हैं; इन्हें रोग-निदान या निश्चित भविष्य नहीं पढ़ना। गुरु का तृतीय-संबंध शोफ-श्रेणी से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that death may be known through fever, and—when the third is joined or aspected by Jupiter—through oedema (śopha) and the like. Both are phala-claims of the śāstra, not medical or predictive certainties we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ज्वर-निमित्त; तृतीय + गुरु → शोफादि मृत्यु-निमित्त)। “युक्ते / दृष्टे” केवल स्थिति व दृष्टि-संबंध का शास्त्रीय संकेत है; कोई अंश, वर्ष या बिन्दु-संख्या नहीं दी गई।

44.31
तृतीये भृगुयुग्दृष्टे मेहरोगेण तन्मृतिः |
बहुखेटयुते तस्मिन् बहुरोगभवा मृतिः
tṛtīye bhṛguyugdṛṣṭe meharogeṇa tanmṛtiḥ |
bahukheṭayute tasmin bahurogabhavā mṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीये = तृतीय भाव में; भृगु-युग्-दृष्टे = शुक्र से युक्त अथवा दृष्ट; मेहरोगेण = मेह-रोग (शास्त्रीय मूत्र/मेह-श्रेणी) से; तत्-मृतिः = उसकी मृत्यु; बहु-खेट-युते = अनेक ग्रहों से युक्त; तस्मिन् = उस (तृतीय) में; बहु-रोग-भवा = अनेक रोगों से उत्पन्न; मृतिः = मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तृतीय भाव शुक्र-युक्त या शुक्र-दृष्ट हो तो मृत्यु-निमित्त मेह-रोग की श्रेणी में गिना गया है। यदि उसी तृतीय में अनेक ग्रह बैठे हों, तो मृत्यु अनेक रोगों से जुड़ी बताई गई है। “मेहरोग” यहाँ आयुर्वेद–ज्योतिष की पारंपरिक फल-शब्दावली है, चिकित्सकीय निदान नहीं।

English rendering The text states that with Venus joining or aspecting the third, death is linked to meha-type disease (the classical urinary/meha class of phala-language). With many planets in that house, death is said to arise from manifold ailments. These are textual result-claims, not diagnoses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीय + शुक्र; बहु-ग्रह योग → मृत्यु-निमित्त)। “बहुखेट” संख्या-सूत्र नहीं देता—केवल “अनेक ग्रह” का गुणात्मक योग; कोई बलांक-सीमा या वर्ष-मान नहीं।

44.32
तृतीये च शुभैर्युक्ते शुभदेशे मृतिर्भवेत् |
पापैश्च कीकटे देशे मिश्रैर्मिश्रस्थले मृतिः
tṛtīye ca śubhairyukte śubhadeśe mṛtirbhavet |
pāpaiśca kīkaṭe deśe miśrairmiśrasthale mṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीये = तृतीय भाव में; शुभैः युक्ते = शुभ ग्रहों से युक्त; शुभ-देशे = शुभ/उत्तम देश में; मृतिः भवेत् = मृत्यु कही गई; पापैः च = और पाप ग्रहों से; कीकटे देशे = कीकट (अशुभ/अपावन मानी गई भूमि-श्रेणी) देश में; मिश्रैः = शुभ-पाप मिश्रित से; मिश्र-स्थले = मिश्र स्थान में; मृतिः = मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र तृतीय भाव के ग्रह-गुण से मृत्यु-स्थान का भेद बताता है: शुभ-युक्त तृतीय पर शुभ देश, पाप-युक्त पर कीकट देश, और मिश्र योग पर मिश्र स्थल। “कीकट” पारंपरिक फल-भूगोल का संकेत है (अशुभ/अपावन प्रदेश-श्रेणी), आधुनिक मानचित्र-निर्णय नहीं। यह स्थान-फल है, काल-गणित नहीं।

English rendering The text states that a third house joined by benefics points to death in a pure/auspicious region; by malefics, in a kīkaṭa (impure/ill-regarded) land; by mixed planets, in a mixed place. Regional labels are classical phala-categories, not modern geography we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीय के शुभ/पाप/मिश्र योग → मृत्यु-स्थान-वर्ग)। शुभ–पाप वर्गीकरण शास्त्रीय ग्रह-स्वभाव (गुरु–शुक्र–बुध आदि बनाम सूर्य–मंगल–शनि–राहु आदि की पारंपरिक पाप-गणना) पर टिका है; कोई अंश-सूत्र नहीं।

44.33
तृतीये गुरुशुक्राभ्यां युक्ते ज्ञानन वै मृतिः |
अज्ञानेनाऽन्यखेटैश्च मृतिर्ज्ञेया द्विजोत्तम
tṛtīye guruśukrābhyāṃ yukte jñānana vai mṛtiḥ |
ajñānenā'nyakheṭaiśca mṛtirjñeyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीये = तृतीय भाव में; गुरु-शुक्राभ्याम् युक्ते = गुरु और शुक्र दोनों से युक्त; ज्ञानेन वै = ज्ञान/सचेतन अवस्था में ही; मृतिः = मृत्यु; अज्ञानेन = अज्ञान/अचेतन अवस्था में; अन्य-खेटैः च = अन्य ग्रहों से (युक्त होने पर); मृतिः ज्ञेया = मृत्यु जाननी चाहिए; द्विजोत्तम = हे द्विजोत्तम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तृतीय जब गुरु–शुक्र दोनों से युक्त हो तो मृत्यु ज्ञानयुक्त अवस्था में कही गई है; अन्य ग्रहों से युक्त होने पर अज्ञान/अचेतन में। यह चेतना-अवस्था का फल-भेद है—न दशा-वर्ष, न बल-रूप। “ज्ञान/अज्ञान” यहाँ शास्त्र का अवस्था-कथन है, नैतिक निर्णय नहीं।

English rendering The text states that the third joined by both Jupiter and Venus indicates death in a state of awareness (jñāna); joined by other planets, death in unawareness. It is a consciousness-state phala, not a span or strength formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु+शुक्र vs अन्य ग्रह → मृत्यु-कालीन चेतना-वर्ग)। युति का निर्णय राशि-सह-स्थिति से; कोई १२०-वर्ष अनुपात या वर्ग-अंश नहीं।

44.34
चरराशौ तृतीयस्थे परदेशे मृतिर्भवेत् |
स्थिरराशौ स्वगेहे च द्विस्वभावे पथि द्विज
cararāśau tṛtīyasthe paradeśe mṛtirbhavet |
sthirarāśau svagehe ca dvisvabhāve pathi dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चर-राशौ तृतीय-स्थे = तृतीय भाव चर (सञ्चारी) राशि में स्थित होने पर; परदेशे मृतिः = विदेश में मृत्यु; स्थिर-राशौ = स्थिर राशि में; स्व-गेहे = अपने घर में; द्वि-स्वभावे = द्विस्वभाव राशि में; पथि = मार्ग में; द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तृतीय भाव चर राशि में हो तो विदेश में, स्थिर राशि में हो तो अपने घर में, और द्विस्वभाव राशि में हो तो मार्ग में मृत्यु होती है। यह तृतीय-भाव-प्रकरण का समापन-सूत्र है, जो निमित्त से हटकर मृत्यु-स्थल की दिशा बताता है।

English rendering If the third house falls in a movable sign, death abroad; in a fixed sign, at home; in a dual sign, on the road.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ राशि-त्रिविधा का नियततावादी नियम प्रयुक्त है —
- चर (movable): मेष, कर्क, तुला, मकर → राशि-क्रमांक i ∈ {1, 4, 7, 10}
- स्थिर (fixed): वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ → i ∈ {2, 5, 8, 11}
- द्विस्वभाव (dual): मिथुन, कन्या, धनु, मीन → i ∈ {3, 6, 9, 12}

सूत्र: राशि-क्रमांक i (1…12) पर (i − 1) mod 3 = 0 → चर; = 1 → स्थिर; = 2 → द्विस्वभाव।

उदाहरण (worked example) लग्न मीन (i=12) हो तो तृतीय भाव वृष (i=2, स्थिर, (2−1) mod 3 = 1) → शास्त्रानुसार "स्व-गृह" में मरण का कथन। लग्न कर्क (i=4) हो तो तृतीय कन्या (i=6, (6−1) mod 3 = 2 → द्विस्वभाव) → "पथि" (मार्ग) का कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) राशि-त्रिविधा शुद्ध mod-3 अंकगणित है — वही नियततावादी विभाजन-तर्क जिस पर हमारा वर्ग-इंजन D1…D60 को longitudes पर लागू करता है (दोसियर §2, kaal_ekavimshati_varga.py)। मृत्यु-स्थल का फल गुणात्मक है, किन्तु उसका राशि-आधार पूर्णतः गणनीय; हम आधार को == से नियत करते हैं और फल को शास्त्र का कथन रखते हैं।

44.35
लग्नादष्टमभावाच्च निमित्तं कथितं बुधैः |
सूर्येऽष्टमेऽग्नितो मृत्युश्चन्द्रे मृत्युर्जलेन च
lagnādaṣṭamabhāvācca nimittaṃ kathitaṃ budhaiḥ |
sūrye'ṣṭame'gnito mṛtyuścandre mṛtyurjalena ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् अष्टम-भावात् = लग्न से अष्टम भाव से; निमित्तम् = मृत्यु का निमित्त/कारण; कथितम् बुधैः = विद्वानों द्वारा कहा गया; सूर्ये अष्टमे = अष्टम में सूर्य होने पर; अग्नितः मृत्युः = अग्नि से मृत्यु; चन्द्रे = चन्द्र होने पर; जलेन = जल से।

हिन्दी भावार्थ अब प्रकरण तृतीय भाव से अष्टम भाव पर आता है। शास्त्र कहता है कि लग्न से अष्टम भाव मृत्यु का निमित्त बताता है — यह विद्वानों का कथन है। अष्टम में सूर्य हो तो अग्नि से, और चन्द्र हो तो जल से मृत्यु।

English rendering The eighth house from the lagna declares the cause of death, as told by the wise: the Sun there → death by fire, the Moon → death by water.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टम-भावस्थ ग्रह → मृत्यु-निमित्त सारणी)। अष्टम भाव आयुः/मृत्यु का प्रधान स्थान है; उसमें स्थित ग्रह का प्राकृतिक तत्त्व (सूर्य = अग्नि, चन्द्र = जल) निमित्त बन जाता है — कारकत्व का तत्त्व-अनुरूप प्रक्षेपण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय आद्यन्त फल-कथन है, और यहीं हमारी विधि (दोसियर §5) सबसे प्रासंगिक है: गणित को व्याख्या से पृथक् रखना। अष्टम भाव, उसका स्वामी, ग्रह-स्थिति — ये == से नियत गणनीय राशियाँ हैं; किन्तु "अग्नि/जल से मृत्यु" शास्त्र का कथन है, हमारी समर्थित भविष्यवाणी नहीं। हम पूर्वार्ध (स्थान/ग्रह) को गणना और उत्तरार्ध (निमित्त) को उद्धरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं — कोई भय, कोई दबाव नहीं।

44.36
शास्त्राद् भौमे ज्वराज् ज्ञे च गुरौ रोगात् क्षुधा भृगौ |
पिपासया शनौ मृत्युर्विज्ञेयो द्विजसत्तम
śāstrād bhaume jvarāj jñe ca gurau rogāt kṣudhā bhṛgau |
pipāsayā śanau mṛtyurvijñeyo dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शास्त्रात् = आयुध/शस्त्र से; भौमे = मंगल के (प्रभाव/संकेत में); ज्वरात् = ज्वर से; ज्ञे = बुध के; गुरौ = गुरु के; रोगात् = रोग से; क्षुधा = भूख/अनाहार से; भृगौ = शुक्र के; पिपासया = प्यास से; शनौ = शनि के; मृत्युः = मृत्यु; विज्ञेयः = जानी जाए; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मृत्यु का कारण जिस ग्रह से जुड़ा माना जाए, उसी के अनुसार परिणाम बताया गया है। मंगल में शस्त्र-आयुध से, बुध में ज्वर से, गुरु में रोग से, शुक्र में क्षुधा से, और शनि में प्यास से मृत्यु जानी जाए। यह फल-कथन पूर्ववर्ती ग्रह-मृत्यु-सूचक सूत्रों की शृंखला का अंग है; पाठ में ग्रह-विशेष को कारण-विशेष से बाँधा गया है।

English rendering The text states that death is to be known as from weapons under Mars, from fever under Mercury, from disease under Jupiter, from hunger under Venus, and from thirst under Saturn, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रहानुसार मृत्यु-कारण)। यह संख्यात्मक गणना नहीं, अपितु शास्त्रीय संकेत-तालिका है: ग्रह → कथित कारण; गणना तभी आरंभ होती है जब यह फल किसी निर्धारित मृत्यु-कारक/अष्टम-स्वामी/आयु-दशा से जोड़कर पढ़ा जाए।

44.37
अष्टमे शुभदृग्युक्ते धर्मपे च शुभैर्युते |
तीर्थे मृतिस्तदा ज्ञेया पापाख्यैरन्यथा मृतिः
aṣṭame śubhadṛgyukte dharmape ca śubhairyute |
tīrthe mṛtistadā jñeyā pāpākhyairanyathā mṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमे = अष्टम भाव में; शुभदृक्-युक्ते = शुभ दृष्टि/युति से युक्त; धर्मपे = नवम (धर्म) स्वामी में; शुभैः युते = शुभ ग्रहों से युक्त; तीर्थे = तीर्थ/पवित्र स्थान में; मृतिः = मृत्यु; तदा = तब; ज्ञेया = जानी जाए; पाप-आख्यैः = पाप/अशुभ नामक ग्रहों से; अन्यथा = अन्यथा; मृतिः = (सामान्य/अशुभ) मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब अष्टम भाव शुभ दृष्टि या युति से युक्त हो, और धर्मेश (नवमेश) भी शुभों से युक्त हो, तब मृत्यु तीर्थ में जानी जाए। यदि उन्हीं स्थानों/स्वामियों पर पाप-ग्रहों का प्रभाव हो, तो अन्यथा — अर्थात तीर्थेतर — मृत्यु कही गई है। यह शुभ-अशुभ संयोग की द्विधा फल-व्यवस्था है, न कि किसी निश्चित घटना का प्रमाण।

English rendering The text states that when the eighth is joined or aspected by benefics and the lord of the ninth is also with benefics, death is to be known in a tīrtha; otherwise, under malefics, death is said to be otherwise (not at a sacred place).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टम–नवमेश + शुभ/पाप संयोग → तीर्थ/अन्यत्र मृत्यु)। तकनीक केवल योग-जाँच है: अष्टम में शुभ दृष्टि/युति और धर्मेश पर शुभ युति → शास्त्र का “तीर्थे मृतिः”; उसके विपरीत पाप-संयोग → “अन्यथा मृतिः”। दृष्टि-परिभाषा व भाव-प्रणाली पर संख्या निर्भर करती है — परंपरा घोषित करनी चाहिए।

44.38
अग्न्यम्बुमिश्रत्र्यंशैर्ज्ञेयो मृत्युर्गृहाश्रितैः |
परिणामः शवस्याऽत्र भस्मसंक्लेदशोषकैः
agnyambumiśratryaṃśairjñeyo mṛtyurgṛhāśritaiḥ |
pariṇāmaḥ śavasyā'tra bhasmasaṃkledaśoṣakaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्नि-अम्बु-मिश्र-त्र्यंशैः = अग्नि, जल, और मिश्र प्रकृति के त्र्यंशों (दृकाण/१०° खंडों) से; ज्ञेयः = जाना जाए; मृत्युः = मृत्यु; गृह-आश्रितैः = (संबंधित) भाव/गृह में स्थितों से; परिणामः = (शव का) परिणाम; शवस्य = शव का; अत्र = यहाँ; भस्म-संक्लेद-शोषकैः = भस्म (दाह), संक्लेद (आर्द्र/गलन), शोषक (शोषण/सूखना) करने वालों से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मृत्यु का प्रकार उन अग्नि, अम्बु (जल) और मिश्र त्र्यंशों से जाना जाए जो गृह (भाव) में आश्रित हों। उसी के अनुसार शव का परिणाम बताया गया है — अग्नि-त्र्यंश में भस्म (दाह), जल-संबंधी में संक्लेद, और शोषक/मिश्र पक्ष में शोषण-प्रकार। यह त्र्यंश-स्वभाव से शव-परिणाम जोड़ने वाला फल-कथन है; “त्र्यंश” यहाँ राशि के तीन १०° भाग (दृकाण) की ओर संकेत करता है — पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव।

English rendering The text states that death is to be known from the fiery, watery, and mixed thirds (tryaṃśa/drekkāṇa) that occupy the relevant house; the fate of the corpse is then said to follow ash (burning), soaking/decay, or drying according to those classes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्र्यंश (दृकाण) = राशि के ३०° का ३ समान खंड: प्रत्येक = १०°।
λ_rāśi = λ mod ३०°; tryaṃśa-index k = ⌊λ_rāśi / १०°⌋ ∈ {०,१,२} (१म/मध्य/अंतिम)।
अग्नि/अम्बु/मिश्र वर्ग पारंपरिक स्वभाव-तालिका से जुड़े हैं (राशि-स्वभाव + खंड); शव-परिणाम = भस्म | संक्लेद | शोष — शास्त्र का फल-मानचित्र, गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) मानें मृत्यु-सूचक बिंदु (या अष्टमेश) वृषभ १७°२०′ पर हो (ayanāṃśa जिस भी चुनी हो — केवल λ रासि-अंतर्गत मायने रखता है)।
λ_rāśi = १७°२०′ → k = ⌊१७.३३…/१०⌋ = १ → मध्य त्र्यंश। मध्य खंड को जिस परंपरा में जल/मिश्र/अग्नि में रखा गया हो, उसी के अनुसार शास्त्र “संक्लेद/शोष/भस्म” फल लागू करता है — स्वभाव-तालिका अलग हो तो फल-भेद; खंड-सीमाएँ ०°–१०°, १०°–२०°, २०°–३०° स्थिर रहती हैं।

44.39
व्यालवर्गदृकाणैस्तु विडम्बो भवति ध्रुवम् |
शवस्य श्वशृगालाद्यैर्गृध्रकाकादिपक्षिभिः
vyālavargadṛkāṇaistu viḍambo bhavati dhruvam |
śavasya śvaśṛgālādyairgṛdhrakākādipakṣibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्याल-वर्ग-दृकाणैः = व्याल-वर्ग (सर्प/हिंस्र-श्रेणी) के द्रेष्काणों से; तु; विडम्बः = विडम्बना/शव की विकृति-अपमान; भवति ध्रुवम् = निश्चित होती है; शवस्य = शव का; श्व-शृगालादिभिः = कुत्ते, सियार आदि से; गृध्र-काकादि-पक्षिभिः = गीध, कौआ आदि पक्षियों से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्याल-वर्ग द्रेष्काणों के प्रभाव से शव की विडम्बना निश्चित होती है — कुत्तों, सियारों आदि से तथा गीध, कौओं आदि पक्षियों से (अर्थात् अन्त्येष्टि-रहित शव-दशा का कथन)।

English rendering By the serpent-class (vyāla) drekkāṇas, the corpse is surely dishonoured — by dogs, jackals and the like, and by vultures, crows and other birds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह भी D3 (द्रेष्काण) पर आधारित है, किन्तु विशिष्ट "व्यालवर्ग" चापों की पहचान पर। इन चापों की परिभाषा अग्रिम श्लोक (44.40, इस बैच से बाहर) में दी गई है: कर्क का 2रा व 3रा, वृश्चिक का 1ला व 2रा, तथा मीन का 3रा द्रेष्काण। द्रेष्काण-सूत्र वही रहता है — k = ⌊λ ÷ 10°⌋; केवल (राशि, k) युग्मों की सूची यह तय करती है कि कोई चाप व्यालवर्ग है या नहीं।

उदाहरण (worked example) ग्रह वृश्चिक 5° पर → k = ⌊5 ÷ 10⌋ = 0 → प्रथम द्रेष्काण; वृश्चिक का प्रथम द्रेष्काण व्यालवर्ग है → शास्त्रानुसार शव-विडम्बना का कथन। इसके विपरीत वृश्चिक 25° (k = 2, तृतीय द्रेष्काण) व्यालवर्ग नहीं — अतः यह कथन लागू नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) व्यालवर्ग एक (राशि, द्रेष्काण-सूचकांक) → बूलियन लुक-अप है, जो D3 की सीमा-गणना पर बैठता है — वही नियततावादी वर्ग-अंकगणित जिसे दोसियर §2 का वर्ग-इंजन longitude पर लागू करता है। इसकी सदस्यता-जाँच == (सटीक युग्म-मिलान) से होनी चाहिए, ±सहिष्णुता से नहीं (दोसियर §5): सीमा-रेखा पर एक चाप का भ्रम (जैसे k=1 बनाम k=2) पूरे फल को उलट देगा — यही "tolerance bug-hider" वाला सबक है।

44.40
कर्कटे मध्यमोऽन्त्यश्च वृश्चिकाद्यद्वितीयकौ |
मीनेऽन्तिमस्त्रिभागश्च व्यालवर्गाः प्रकीर्तिताः
karkaṭe madhyamo'ntyaśca vṛścikādyadvitīyakau |
mīne'ntimastribhāgaśca vyālavargāḥ prakīrtitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कटे = कर्क राशि में; मध्यमः अन्त्यः च = मध्य और अंतिम (त्रिभाग/दृकाण); वृश्चिक-आद्य-द्वितीयकौ = वृश्चिक का प्रथम और द्वितीय; मीने अन्तिमः त्रिभागः च = मीन का अंतिम त्रिभाग; व्याल-वर्गाः = व्याल वर्ग; प्रकीर्तिताः = कहे गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्वयं व्यालवर्ग के त्रिभाग गिनाता है: कर्क में मध्य और अंतिम; वृश्चिक में आदि और द्वितीय; मीन में अंतिम त्रिभाग। ये ही व्यालवर्ग कहे गए हैं — जिन पर पूर्व श्लोक का विडम्ब-फल लागू होता है। यह स्पष्ट खंड-सूची है; अन्य राशियों के खंड यहाँ व्याल नहीं गिने गए।

English rendering The text declares the vyāla divisions thus: in Cancer the middle and last thirds; in Scorpio the first and second; and in Pisces the final third — these are proclaimed the vyāla-vargas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दृकाण/त्रिभाग = १०° खंड। व्याल-वर्ग (BPHS इस पाठ):
• कर्क (Cancer): १०°–२०° और २०°–३०°
• वृश्चिक (Scorpio): ०°–१०° और १०°–२०°
• मीन (Pisces): २०°–३०°
परीक्षण: राशि ∈ {कर्क, वृश्चिक, मीन} और λ_rāśi ऊपर की श्रेणी में → व्याल = true; अन्यथा false। (D3/dreṣkāṇa विभाजन ṣoḍaśa-varga का १०° नियम; व्याल-वर्गीकरण फल-परत है।)

उदाहरण (worked example) (१) मृत्यु-सूचक = कर्क २४° → λ_rāśi ∈ २०°–३०° → व्याल = हाँ → ४४.३९ का विडम्ब-फल शास्त्रानुसार लागू।
(२) वृश्चिक २५° → λ_rāśi ∈ २०°–३०° → व्याल-सूची में नहीं (वृश्चिक में केवल ०°–२०°) → व्याल = नहीं।
(३) मीन ८° → व्याल = नहीं; मीन २२° → व्याल = हाँ। ayanāṃśa केवल absolute λ तय करता है; खंड-सीमाएँ राशि-आंतरिक हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) ṣoḍaśa-varga इंजन में D3 (dreṣkāṇa) शुद्ध १०° विभाजन है — λ_rāśi पर modular partition। इस श्लोक की व्याल-तालिका उसी D3-खंड पर फल-परत जोड़ती है; हम खंड-सीमाओं को exact `==` से बाँधते हैं (०/१०/२०/३०), न कि सन्निकट बैंड से। फल-पाठ को गणना से अलग रखते हैं: वर्ग = true/false; विडम्ब = शास्त्र-कथन।

44.41
रविश्चन्द्रबलाक्रान्तत्र्यंशनाथे गुरौ जनः |
देवलोकात् समायातो विज्ञेयो द्विजसत्तम
raviścandrabalākrāntatryaṃśanāthe gurau janaḥ |
devalokāt samāyāto vijñeyo dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविः-चन्द्र-बल-आक्रान्त-त्र्यंश-नाथे = सूर्य-चन्द्र में जो बलवान् हो उसके आक्रान्त (स्थित) त्र्यंश के स्वामी में; गुरौ = गुरु होने पर; जनः = जातक; देव-लोकात् = देवलोक से; समायातः = आया हुआ; विज्ञेयः = जाना जाए; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य और चन्द्र में जो बलवान् हो, उसके त्र्यंश (दृकाण) का स्वामी यदि गुरु हो, तो जातक देवलोक से आया जानना चाहिए। यह जन्म-पूर्व लोक-निर्णय की परंपरा का आरंभिक नियम है; “बल” यहाँ शास्त्रीय बला-तुलना (प्रायः षड्बल/स्थान-बल आदि) पर टिकती है — परंपरा घोषित करनी चाहिए। पाठ-भेद संभव जहाँ “बल” की माप भिन्न ली जाए।

English rendering The text states that when Jupiter is the lord of the tryaṃśa occupied by the stronger of the Sun and the Moon, the person is to be known as having come from the world of the gods, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) १) bala(Sūrya) ? bala(Candra) — विजेता L (प्रबल प्रकाश)।
२) L का λ → λ_rāśi = λ mod ३०°; k = ⌊λ_rāśi / १०°⌋ → tryaṃśa-स्वामी P (दृकाण-स्वामी तालिका: राशि-क्रम + खंड-नियम; परंपरा स्थिर रखें)।
३) यदि P = गुरु → शास्त्र: देवलोक-आगत।
बल-माप व दृकाण-स्वामी-मानचित्र पर संख्या निर्भर; दोनों conventions घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मानें षड्बल (या चुनी बला-पद्धति) से चन्द्र > सूर्य; चन्द्र = धनु १४° (λ_rāśi = १४° → मध्य दृकाण)। यदि उस परंपरा में धनु-मध्य दृकाण का स्वामी गुरु हो, तो P = गुरु → शास्त्रानुसार “देवलोकात् समायातः”। यदि सूर्य प्रबल हो और उसके त्र्यंश-स्वामी गुरु न हो, तो यह श्लोक लागू नहीं — अगला श्लोक अन्य लोक देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) D3-खंड ṣoḍaśa-varga के १०° नियम से exact निर्धारित होते हैं; षड्बल (स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्) रूप/विरूप में जोड़ा जाता है — १ रूप = ६० विरूप। हम सूर्य-चन्द्र तुलना को घोषित बला-नियम से करते हैं और फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखते हैं, नियति के रूप में नहीं।

44.42
शुक्रेन्द्वोः पितृलोकात्तु मर्त्याच्च रविभौमयोः |
बुधाऽऽर्क्योर्नरकादेवं जन्मकालाद् वदेत् सुधिः
śukrendvoḥ pitṛlokāttu martyācca ravibhaumayoḥ |
budhā''rkyornarakādevaṃ janmakālād vadet sudhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्र-इन्द्वोः = शुक्र और चन्द्र के (त्र्यंश-स्वामी होने पर); पितृ-लोकात् = पितृलोक से; तु = और; मर्त्यात् = मर्त्यलोक से; च = तथा; रवि-भौमयोः = सूर्य और मंगल के; बुध-आर्क्योः = बुध और शनि (आर्कि) के; नरकात् = नरक से; एवम् = इस प्रकार; जन्म-कालात् = जन्म-काल से; वदेत् = कहे; सुधिः = बुद्धिमान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्व श्लोक की शृंखला पूरी करता है: प्रबल सूर्य/चन्द्र के त्र्यंश-स्वामी के अनुसार पूर्व-लोक बताया जाए — शुक्र या चन्द्र होने पर पितृलोक से; सूर्य या मंगल होने पर मर्त्य से; बुध या शनि होने पर नरक से। सुधि जन्म-काल से ही यह निर्णय कहे। गुरु का देवलोक-फल ४४.४१ में; यहाँ शेष ग्रह-युग्म। राहु-केतु इस युग्म में नहीं आए — पाठ-सीमा स्पष्ट।

English rendering The text states that (when the tryaṃśa-lord of the stronger luminary is) Venus or the Moon, one is from the ancestral world; Sun or Mars, from the mortal world; Mercury or Saturn, from naraka — thus the wise should declare from the time of birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ४४.४१–४२ संयुक्त मानचित्र (P = tryaṃśa-nātha of stronger of Sūrya/Candra):
• P ∈ {गुरु} → देवलोक
• P ∈ {शुक्र, चन्द्र} → पितृलोक
• P ∈ {सूर्य, मंगल} → मर्त्य
• P ∈ {बुध, शनि} → नरक
निर्णय-वृक्ष: max(bala_Su, bala_Mo) → λ → k = ⌊(λ mod ३०°)/१०°⌋ → P → लोक। कोई वर्ष/अंश-योग नहीं — शुद्ध वर्गीकरण।

उदाहरण (worked example) सूर्य प्रबल; सूर्य = मकर ५° → k = ० (आदि दृकाण)। यदि आदि-मकर दृकाण-स्वामी शनि (आर्कि) हो, तो P = शनि → शास्त्र: नरकात्। यदि चन्द्र प्रबल और उसका त्र्यंश-स्वामी शुक्र हो → पितृलोकात्। convention: ayanāṃśa (λ के लिए), बला-पद्धति, दृकाण-स्वामी-तालिका — तीनों लिखकर ही फल दोहराएँ।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह युग्म D3-स्वामी + षड्बल-तुलना का शुद्ध निर्णय-वृक्ष है; हम खंड-सीमा और ग्रह-मानचित्र को exact रखते हैं। लोक-फल शास्त्र-कथन है — गणना केवल “कौन P” तक; “कहाँ से आया” को हम भविष्य-वाणी या भय-भाषा में नहीं बदलते।

44.43
गुरुश्चन्द्रसितौ सूर्यभौमौ ज्ञार्की यथाक्रमम् |
देवेन्दुभूम्यधोलोकान् नयन्त्यस्तारिरन्ध्रगाः
guruścandrasitau sūryabhaumau jñārkī yathākramam |
devendubhūmyadholokān nayantyastārirandhragāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुः = बृहस्पति; चन्द्र-सितौ = चन्द्र और शुक्र; सूर्य-भौमौ = सूर्य और मंगल; ज्ञ-अर्की = बुध और शनि (ज्ञ = बुध; अर्की = सूर्य-पुत्र शनि); यथाक्रमम् = उसी क्रम से; देव-इन्दु-भूमि-अधोलोकान् = देव-लोक, इन्दु-लोक, भूलोक, अधोलोक; नयन्ति = ले जाते हैं; अस्त-अरि-रन्ध्र-गाः = सप्तम (अस्त), षष्ठ (अरि), अष्टम (रन्ध्र) में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अस्त (सप्तम), अरि (षष्ठ) अथवा रन्ध्र (अष्टम) भाव में स्थित ग्रह, अपने-अपने क्रम से, जीव को भिन्न लोकों की ओर ले जाते हैं। गुरु देव-लोक की ओर; चन्द्र और शुक्र इन्दु-लोक की ओर; सूर्य और मंगल भूलोक की ओर; तथा बुध और शनि अधोलोक की ओर — यथाक्रमम्। यह कथन आयुर्दाय-मारक-प्रसंग में फल-वर्गीकरण है, न कि कोई स्वतन्त्र गणितीय सूत्र।

English rendering The text states that the planets, when placed in the sixth, seventh, or eighth house, convey [the being] in order to the divine, lunar, earthly, and nether worlds: Jupiter to the realm of the gods; the Moon and Venus to the Indu-realm; the Sun and Mars to the earth-realm; Mercury and Saturn to the lower realms.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-वर्गीकरण (मारक-ग्रह → लोक-गमन)। शास्त्र की युग्म-व्यवस्था स्पष्ट है: (1) गुरु → देवलोक; (2) चन्द्र+शुक्र → इन्दुलोक; (3) सूर्य+मंगल → भूलोक; (4) बुध+शनि → अधोलोक — जब वे षष्ठ/सप्तम/अष्टम में हों। यह स्थान-फल-नियम है, अंश-भाग या बल-इकाई नहीं।

44.44
अथ तत्र ग्रहभावे रन्ध्रारित्र्यंशनाथयोः |
यो बली स निजं लोकं नयत्यन्ते द्विजोत्तम
atha tatra grahabhāve randhrāritryaṃśanāthayoḥ |
yo balī sa nijaṃ lokaṃ nayatyante dvijottama
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; तत्र = वहाँ; ग्रहभावे = ग्रह-भाव (विचार) में; रन्ध्र-अरि-त्र्यंश-नाथयोः = अष्टम और षष्ठ के द्रेष्काण-स्वामियों (त्र्यंश = द्रेष्काण, D3) में; यः बली = जो बली हो; सः = वह; निजं लोकम् = अपने लोक को; नयति = ले जाता है; अन्ते = अन्त में; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अष्टम और षष्ठ भावों के द्रेष्काण-स्वामियों में जो बली हो, वह अन्त में जातक को अपने लोक को ले जाता है। मारक-भेद अध्याय में यह मृत्यु-कालीन गति (ग्रह-लोक) के निर्धारण का नियम है — दो अंश-स्वामियों की बल-तुलना। "अन्ते" पाठ का शब्द है; इसे भय नहीं, तुलना-नियम पढ़ें।

English rendering Among the lords of the drekkāṇas of the eighth and the sixth houses, the text says, whichever is the stronger leads the native at the end to that planet's own world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्रेष्काण-स्वामी: भाव-मध्य (या कस्प) के λ से k = ⌊λ_राशि-अन्तर्गत ÷ 10°⌋ + 1; स्वामी = k = 1 → राशीश, k = 2 → पञ्चम राशि का स्वामी, k = 3 → नवम राशि का स्वामी। तुलना: बल(3L of भाव 8) vs बल(3L of भाव 6) — षड्बल (रूप/विरूप) से; अधिक बल वाला ग्रह "लोक" का निर्धारक।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक बल-तुलना को क्रम-तुलना बनाता है — हमारे ṣaḍbala ledger में प्रत्येक ग्रह का योग रूप/विरूप में गिना और पिन किया जाता है; दो द्रेष्काण-स्वामियों की तुलना उसी संख्या पर `>` है, व्याख्या पर नहीं।

44.45
तस्य स्वोच्चादि संस्थित्या वरमध्याऽधमाः क्रमात् |
तत्तल्लोकेऽपि सञ्जाता विज्ञेया द्विजसत्तम
tasya svoccādi saṃsthityā varamadhyā'dhamāḥ kramāt |
tattalloke'pi sañjātā vijñeyā dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्य = उस (मारक-ग्रह) की; स्व-उच्च-आदि = स्वराशि, उच्च आदि संस्थिति; संस्थित्या = स्थिति के कारण; वर-मध्य-अधमाः = उत्तम, मध्यम, अधम (गुण-क्रम); क्रमात् = क्रमशः; तत्-तत्-लोके = उन-उन लोकों में भी; अपि = भी; सञ्जाता = उत्पन्न/उपलब्ध [अवस्थाएँ]; विज्ञेया = जाननी चाहिए; द्विज-सत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह पूर्वोक्त क्रम से किसी लोक की ओर ले जाता है, उसकी स्वोच्चादि संस्थिति से उस गमन/अनुभव का स्तर वर, मध्य अथवा अधम जाना जाता है। अर्थात् उसी लोक-फल के भीतर भी उच्च-मध्य-नीच स्थिति के अनुसार तीन कोटियाँ समझनी चाहिए। यह गुणवत्ता-भेद का नियम है — «द्विजसत्तम» संबोधन से शिष्य-गुरु संवाद की शैली बनी रहती है।

English rendering The text states that, according as the relevant planet stands in exaltation and kindred dignities, the [outcome associated with] that conveyance is to be known as superior, middling, or inferior in order — and that the same three grades apply to what arises in those respective realms, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कोटि-नियम (वर / मध्य / अधम)। अंक यहाँ नहीं दिए; केवल तीन-स्तरीय गुणात्मक क्रम: स्वोच्चादि-बलित स्थिति → वर; मध्यम स्थिति → मध्य; हीन/नीचादि → अधम — लोक-फल के भीतर। उच्च/स्व/नीच की राशि-परिभाषाएँ ग्रह-स्वरूप अध्यायों से ली जाती हैं; इस पद्य में कोई अंश-सीमा या रूप-विरूप नहीं कही गई।

44.46
अन्यान् मारकभेदांश्च राशिग्रहकृतान् द्विज |
दशाध्यायप्रसंगेषु कथयिष्यामि सुव्रत
anyān mārakabhedāṃśca rāśigrahakṛtān dvija |
daśādhyāyaprasaṃgeṣu kathayiṣyāmi suvrata

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्यान् मारक-भेदान् = अन्य मारक-भेद; राशि-ग्रह-कृतान् = राशि व ग्रह से उत्पन्न; द्विज = हे द्विज; दशाध्याय-प्रसंगेषु = दशा-अध्यायों के प्रसंग में; कथयिष्यामि = कहूँगा; सुव्रत = हे सुव्रत।

हिन्दी भावार्थ राशि व ग्रह से उत्पन्न अन्य मारक-भेदों को, हे द्विज, मैं दशा-अध्यायों के प्रसंग में कहूँगा। यह अगली विषय-वस्तु का पूर्व-निर्देश है — मारक-विवेचन दशा-प्रकरण में और विस्तृत होगा, अतः यहाँ इसे स्थगित किया जाता है।

English rendering The other varieties of death-dealing factors, produced by signs and planets, I shall relate in the context of the daśā chapters, O virtuous one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पूर्व-निर्देश/संवाद (आगे दशा-प्रकरण की ओर संकेत)। श्लोक कोई गणना नहीं देता; केवल शेष मारक-नियमों को दशा-सन्दर्भ में स्थगित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक स्वयं आगे दशा-अध्यायों (BPHS Ch.46–47 आदि) की ओर संकेत करता है — वही विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र का क्षेत्र: केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120); अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। मारक-दशा का यही अनुपात-अंकगणित संचालक के दशा-इंजन में नियत है, अतः "दशा-प्रसंग में कहूँगा" वाला वादा उसी विंशोत्तरी ढाँचे में मूर्त होता है।

अध्यायः 45

ग्रहावस्थाध्यायः

155 श्लोक
45.1
अवस्थावशतः प्रोक्तं ग्रहाणां यत् फलं मुने |
का साऽवस्था मुनिश्रेष्ठ कतिधा चेति कथ्ययाम्
avasthāvaśataḥ proktaṃ grahāṇāṃ yat phalaṃ mune |
kā sā'vasthā muniśreṣṭha katidhā ceti kathyayām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अवस्था-वशतः = अवस्था (ग्रह की दशा-स्थिति) के अधीन/अनुसार; प्रोक्तम् = (आपने) कहा; ग्रहाणां यत् फलम् = ग्रहों का जो फल; मुने / मुनिश्रेष्ठ = हे मुनि / मुनिश्रेष्ठ (मैत्रेय → पराशर संबोधन); का सा अवस्था = वह अवस्था क्या है; कतिधा च = और कितने प्रकार की; कथ्यताम् = कहिए (पाठ "कथ्ययाम्" — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ हे मुनिश्रेष्ठ, आपने कहा था कि ग्रहों का फल उनकी अवस्था के अनुसार मिलता है। तो वह 'अवस्था' आखिर है क्या, और कितने प्रकार की होती है? कृपया इसे बताइए। यह शिष्य की जिज्ञासा है, जिससे सम्पूर्ण ग्रह-अवस्था-अध्याय आरम्भ होता है।

English rendering "You have declared, O sage, that the fruit of the planets follows their avasthā (state). What, O best of sages, is that state, and of how many kinds is it? Pray tell."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (प्रश्न-प्रस्तावना)। यह प्रश्न-श्लोक पूरे अध्याय का सूचीपत्र है: फल की गणना से पहले शास्त्र पहले 'अवस्था' की परिभाषा और उसके भेद माँगता है — अर्थात् मॉडल के पैरामीटर पहले, फल-गणना बाद में।

45.2
अवस्था विविधाः सन्ति ग्रहाणां दिवजसत्तम |
सारभूताश्च यास्तासु बालाद्यास्ता वदाम्यहम्
avasthā vividhāḥ santi grahāṇāṃ divajasattama |
sārabhūtāśca yāstāsu bālādyāstā vadāmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अवस्था विविधाः सन्ति = अवस्थाएँ अनेक प्रकार की हैं; ग्रहाणाम् = ग्रहों की; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (पाठ "दिवजसत्तम" — पाठ-भेद संभव); सारभूताः याः तासु = उनमें से जो सारभूत/उपयोगी हैं; बालाद्याः = बाल आदि (बाल-कुमार…) से आरम्भ होने वाली; ताः वदामि अहम् = उन्हें मैं कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ, ग्रहों की अवस्थाएँ अनेक प्रकार की हैं; उन सबमें से जो सारभूत — सर्वाधिक उपयोगी — हैं, अर्थात् बाल-कुमार आदि क्रम वाली, उन्हीं को मैं (पराशर) तुम्हें बताता हूँ।

English rendering "The states of the planets are manifold, O best of the twice-born; of them I shall declare those that are essential — the series beginning with Bāla (infancy)."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-प्रस्तावना। शास्त्र स्वयं स्वीकार करता है कि अवस्थाएँ "विविधाः" (अनेक) हैं और केवल "सारभूत" उपसमुच्चय चुनता है — यह एक सचेत मॉडल-चयन है: समग्र गणना का सरलीकृत किन्तु पर्याप्त उप-मॉडल।

45.3
क्रमाद् बालः कुमारोऽथ युवा वृद्धस्तथा मृतः |
षडंशैरसमे खेटः समे ज्ञेयो विपर्ययात्
kramād bālaḥ kumāro'tha yuvā vṛddhastathā mṛtaḥ |
ṣaḍaṃśairasame kheṭaḥ same jñeyo viparyayāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से; बालः = बाल; कुमारः = कुमार; युवा = युवा; वृद्धः = वृद्ध; मृतः = मृत; षडंशैः = षड्-अंशों से (६° के खंडों से / षष्ठांश — अर्थ परंपरा-निर्भर); असमे = विषम राशि में; खेटः = ग्रह; समे = सम राशि में; विपर्ययात् = उल्टे क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ग्रह की आयु-अवस्थाएँ क्रम से पाँच हैं: बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत। विषम राशि में ग्रह को इन अवस्थाओं में षडंश-क्रम से जाना जाता है; सम राशि में वही क्रम उल्टा माना जाता है। यह स्थानिक (राशि-अंश पर) नियम है, कालिक आयु नहीं।

English rendering In order the states are child (bāla), boy (kumāra), youth (yuvan), aged (vṛddha), and dead (mṛta). In an odd sign the planet is assigned these by successive six-degree arcs; in an even sign the order is reversed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि = ३०°। आयु-अवस्था = ५। प्रचलित पठन: षडंश = ६° का खंड (५ × ६° = ३०°)।
माना λ_r = राशि के भीतर ग्रह का भोगांश (०° ≤ λ_r < ३०°), k = ⌊λ_r / ६°⌋ ∈ {०,१,२,३,४}।
विषम राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ):
k = ० → बाल, १ → कुमार, २ → युवा, ३ → वृद्ध, ४ → मृत।
सम राशि: क्रम विपर्यय — k = ० → मृत, १ → वृद्ध, २ → युवा, ३ → कुमार, ४ → बाल।
(यदि षडंश को षष्ठांश = ५° पढ़ें तो ६ खंड बनते हैं जबकि नाम ५ हैं — पाठ/परंपरा में यह तनाव है; ६° पठन अंकगणित से संगत है। पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल मेष १४°२०′ पर (विषम राशि; λ_r = १४.३३…°)।
k = ⌊१४.३३… / ६⌋ = ⌊२.३८…⌋ = २ → युवा।
यदि वही १४°२०′ वृष (सम) में हो: k = २ → युवा ही रहता है (विपर्यय सूची में मध्य स्थान स्थिर); पर २° पर सम राशि में k = ० → मृत, जबकि विषम में बाल।
(अयनांश/गृह-प्रणाली यहाँ नहीं लगती — केवल राशि-स्थानीय अंश।)

45.4
फलं पादमितं बाले फलार्धं च कुमारके |
यूनि पूर्णं फलं ज्ञेयं वृद्धे किञ्चित् मृते च खम्
phalaṃ pādamitaṃ bāle phalārdhaṃ ca kumārake |
yūni pūrṇaṃ phalaṃ jñeyaṃ vṛddhe kiñcit mṛte ca kham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) फलं पाद-मितम् = फल का एक 'पाद' = 1/4 भाग; बाले = बाल अवस्था में; फल-अर्धम् = फल का आधा (1/2); कुमारके = कुमार में; यूनि = युवा में; पूर्णं फलम् = पूरा फल (1); वृद्धे किञ्चित् = वृद्ध में थोड़ा-सा; मृते च खम् = और मृत में 'ख' = शून्य (0)।

हिन्दी भावार्थ बाल अवस्था में ग्रह अपने फल का चौथाई देता है, कुमार में आधा, युवा में सम्पूर्ण, वृद्ध में केवल थोड़ा-सा, और मृत अवस्था में कुछ भी नहीं। इस प्रकार अवस्था फल की मात्रा को घटाती-बढ़ाती है।

English rendering The text states: in Bāla a planet yields a quarter of its fruit, in Kumāra a half, in Yuva the full fruit, in Vṛddha a little, and in Mṛta nothing at all.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवस्था-भार (फल-गुणक) w — बाल: w = 1/4; कुमार: w = 1/2; युवा: w = 1 (पूर्ण); वृद्ध: w ≈ अल्प ("किञ्चित्", कोई नियत भिन्न नहीं); मृत: w = 0 (खम् = ख = 0, अंकफल-निष्ठ)। प्रभावी फल = (ग्रह का आधार-फल) × w। "किञ्चित्" को शास्त्र संख्या में नहीं बाँधता — पाठ-भेद/अनिश्चय संभव।

उदाहरण (worked example) श्लोक 45.3 का ग्रह मेष 20° पर वृद्ध निकला → उसे केवल "किञ्चित्" (अल्प) फल मिलेगा; वही ग्रह यदि 14° (तीसरा खण्ड, युवा) पर होता → पूर्ण (w = 1) फल। मात्र स्थिति-अंश से एक ही ग्रह की फल-मात्रा 0 से 1 तक बदल जाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ दो परतें स्पष्ट अलग हैं — भार 1/4, 1/2, 1, 0 शुद्ध परिमेय गुणांक (गणनीय), जबकि "फल" स्वयं शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं। मृत = 0 को हम अपने ओरैकल-अनुशासन के अनुसार ठीक शून्य पढ़ते हैं (`==`, कोई सहन-पट्टी नहीं) — जैसे अष्टकवर्ग में ±बैंड ने एक बार वास्तविक −1 छिपाया था, वैसे यहाँ "लगभग शून्य" कहना नियम को धुँधला करना होता।

45.5
स्वभोच्चयोः समसुहृद्भयोः शत्रुभनीचयोः |
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या अवस्था नामदृक्फलाः
svabhoccayoḥ samasuhṛdbhayoḥ śatrubhanīcayoḥ |
jāgratsvapnasuṣuptyākhyā avasthā nāmadṛkphalāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वभोच्चयोः = स्व-राशि और उच्च में; समसुहृद्भयोः = सम और सुहृद् (मित्र) राशियों में; शत्रुभनीचयोः = शत्रु-राशि और नीच में; जाग्रत् = जागृत; स्वप्न = स्वप्न; सुषुप्ति = सुषुप्ति; आख्याः = नाम वाली; अवस्था = अवस्थाएँ; नामदृक्फलाः = नाम-दृष्टि-फल संबंधी (नाम/दृष्टि/फल की यह त्रयी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दूसरी त्रयी बताता है — जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति। स्व-क्षेत्र या उच्च में ग्रह जाग्रत्; सम अथवा मित्र राशि में स्वप्न; शत्रु-क्षेत्र या नीच में सुषुप्ति — ऐसी अवस्थाएँ नाम-दृष्टि-फल की दृष्टि से कही गई हैं। यह ४५.३ की अंश-आयु-अवस्था से भिन्न नियम है: यहाँ निर्णायक राशि-संबंध (स्वामित्व/मैत्री/उच्च-नीच) है, ६° खंड नहीं।

English rendering Named jāgrat (waking), svapna (dream), and suṣupti (deep sleep): these states, for results by name and aspect-context, apply respectively in own or exaltation signs, in neutral or friendly signs, and in enemy or debilitation signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) माना ग्रह g राशि R में है।
यदि R ∈ {स्वक्षेत्र(g), उच्च(g)} → जाग्रत्;
अन्यथा यदि R ∈ {सम, सुहृद्} → स्वप्न;
अन्यथा यदि R ∈ {शत्रुक्षेत्र, नीच(g)} → सुषुप्ति।
मैत्री-तालिका (नैसर्गिक/तात्कालिक) परंपरा-निर्भर — नैसर्गिक मित्र-शत्रु BPHS के ग्रह-मैत्री अध्याय से ली जाती है; तात्कालिक मैत्री अलग नियम।
उच्च/नीच राशियाँ मानक: सूर्य उच्च मेष, चंद्र वृष, … (यहाँ सूची दोहरानी आवश्यक नहीं — नियम संरचना ही श्लोक है)।

उदाहरण (worked example) बृहस्पति धनु में → स्वक्षेत्र → जाग्रत्।
बृहस्पति मकर में → नीच → सुषुप्ति।
बृहस्पति मेष में (नैसर्गिक मित्र मंगल का क्षेत्र; परंपरा अनुसार सुहृद्) → स्वप्न — मैत्री-तालिका घोषित करनी होगी।
(अयनांश राशि-स्वामित्व नहीं बदलता; केवल ग्रह-राशि युग्म चाहिए।)

45.6
जागरे च फलं पूर्णं स्वप्ने मध्यफलं तथा |
सुषुप्तौ तु फलं शून्यं विज्ञेयं द्विजसत्तम
jāgare ca phalaṃ pūrṇaṃ svapne madhyaphalaṃ tathā |
suṣuptau tu phalaṃ śūnyaṃ vijñeyaṃ dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जागरे = जागृत में; फलं पूर्णं = पूर्ण फल; स्वप्ने = स्वप्न में; मध्यफलं = मध्य / आधा फल; सुषुप्तौ = सुषुप्ति में; फलं शून्यं = शून्य फल; विज्ञेयं = जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जाग्रत् अवस्था में फल पूर्ण, स्वप्न में मध्य (आधा/मध्यम), सुषुप्ति में शून्य समझना चाहिए। यह ४५.५ की राशि-संबंधी त्रयी का फल-गुणांक है; बाल-कुमार आदि (४५.३–४) से अलग परत। दोनों अवस्था-प्रणालियाँ साथ लागू हों तो शास्त्र यहाँ संयोजन-सूत्र नहीं देता — क्रम/प्राथमिकता पाठ-परंपरा पर छोड़नी पड़ती है।

English rendering The text states: in waking (jāgrat) the result is full; in dream (svapna), middling; in deep sleep (suṣupti), nil — so should it be understood, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गुणांक g:
g(जाग्रत्) = १, g(स्वप्न) = “मध्य” (प्रायः ½, श्लोक अंक नहीं लिखता — मध्य = intermediate), g(सुषुप्ति) = ०।
अवस्था-संशोधित फल ≈ g × P, जहाँ P अन्य नियमों से आधार-फल।
“मध्यफल” का `==` भिन्न श्लोक में नहीं — ½ सुसंगत पठन है, पर शब्द “मध्य” है, “अर्ध” नहीं (तुलना: ४५.४ में स्पष्ट फलार्धम्)।

उदाहरण (worked example) आधार P = ६०।
जाग्रत् → ६०; स्वप्न → मध्य ≈ ३० (यदि मध्य = ½ लिया जाए); सुषुप्ति → ०।
वृद्ध + जाग्रत् जैसी दोहरी अवस्था पर श्लोक मौन — गुणांकों का गुणन/न्यूनतम आदि यहाँ थोपा नहीं जाता।

45.7
दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽथ दुःखितः |
विकलश्च खलः कोऽपीत्यवस्था नवधाऽपराः
dīptaḥ svasthaḥ pramuditaḥ śānto dīno'tha duḥkhitaḥ |
vikalaśca khalaḥ ko'pītyavasthā navadhā'parāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दीप्तः = दीप्त (प्रज्वलित/उज्ज्वल); स्वस्थः = स्वस्थ; प्रमुदितः = प्रमुदित; शान्तः = शान्त; दीनः = दीन; दुःखितः = दुःखित; विकलः = विकल; खलः = खल; कोऽपि / कोपः = क्रोधी / “कोई और” (पाठ-भेद संभव); नवधा = नौ प्रकार की; अपराः = अन्य अवस्थाएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे नौ अन्य अवस्थाएँ गिनाता है — दीप्त, स्वस्थ, प्रमुदित, शान्त, दीन, दुःखित, विकल, खल, और नवम (कोप/कोऽपि — पाठ-भेद संभव)। ये ४५.३ की पञ्च आयु-अवस्था और ४५.५ की त्रयी से अलग “अपराः” श्रेणी हैं। इस श्लोक में केवल नाम-सूची है; प्रत्येक का लक्षण और फल-अनुपात अध्याय के आगे के श्लोकों/परंपरा में आते हैं — यहाँ गणित बाँधा नहीं गया।

English rendering Further, nine other states are named: dīpta, svastha, pramudita, śānta, dīna, duḥkhita, vikala, khala, and a ninth (kopa / ko'pi — reading may vary). The verse lists the set; definitions and result-weights lie beyond this line.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-सूची / वर्गीकरण। नव संख्या निश्चित (“नवधा”); नवम पद “कोऽपीत्यवस्था” में कोप बनाम कोऽपि का पाठ-भेद संभव। इस श्लोक में कोई अंश-सीमा, गुणांक या `==` अचर नहीं।

45.8
स्वोच्चस्थः खेचरो दीप्तः स्वर्क्षे स्वस्थोऽधिमित्रभे |
मुदितो मित्रभे शान्तः समभे दीन उच्यते
svoccasthaḥ khecaro dīptaḥ svarkṣe svastho'dhimitrabhe |
mudito mitrabhe śāntaḥ samabhe dīna ucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चस्थः = अपनी उच्च राशि में स्थित; खेचरः = ग्रह; दीप्तः = दीप्त-अवस्था (प्रकाशित/दीप्तिमान); स्वर्क्षे = स्व-राशि में; स्वस्थः = स्वस्थ-अवस्था; अधि-मित्र-भे = परममित्र की राशि में; मुदितः = मुदित-अवस्था; मित्र-भे = मित्र-राशि में; शान्तः = शान्त; सम-भे = सम/तटस्थ राशि में; दीनः = दीन-अवस्था।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ग्रह की स्थान-अवस्थाएँ क्रम से बतलाता है। उच्च-स्थान पर स्थित ग्रह “दीप्त” कहा जाता है; अपनी राशि में “स्वस्थ”; परममित्र की राशि में “मुदित”; मित्र की राशि में “शान्त”; और सम (न मित्र न शत्रु) राशि में “दीन” कहा जाता है। यह क्रम ग्रह के स्थान-सम्बन्धी भावात्मक स्तर का वर्गीकरण है — फल-विचार के पूर्व की अवस्था-परिभाषा।

English rendering The text names the positional states of a planet: exalted → dīpta (luminous); in own sign → svastha; in a great friend’s sign → mudita; in a friend’s sign → śānta; in a neutral sign → dīna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-वर्गीकरण (स्थान-अवस्था)। आधुनिक संकेत में, ग्रह G की राशि R_G पर: यदि R_G = उच्च-राशि(G) → दीप्त; यदि R_G = स्व-राशि(G) → स्वस्थ; यदि R_G ∈ परममित्र-राशि(G) → मुदित; यदि R_G ∈ मित्र-राशि(G) → शान्त; यदि R_G ∈ सम-राशि(G) → दीन। मित्रत्व-शत्रुत्व की तालिका (नैसर्गिक/तात्कालिक) संस्करण-निर्भर है — सम्मेलन घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मानें मंगल R = मेष (नैसर्गिक उच्च: मेष 28°)। मंगल मेष में → दीप्त। यदि मंगल वृश्चिक (स्व-राशि) में → स्वस्थ। यदि मंगल कर्क (शास्त्रीय नैसर्गिक शत्रु-क्षेत्र की ओर) में हो तो इस श्लोक की सम/मित्र/शत्रु-पंक्ति नहीं; शत्रु-पंक्ति अगले श्लोक में। उच्च-परीक्षा: मंगल-अंश λ ∈ [0°, 30°) मेष, और उच्च-बिन्दु 28° मेष — उच्च-राशि में होने मात्र से “दीप्त” (उच्च-बिन्दु की सटीक डिग्री इस श्लोक में नहीं कही गई)।

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45.9
शत्रुभे दुःखितः प्रोक्तो विकलः पापसंयुतः |
खलः खलगृहे ज्ञेयः कोपी स्यादर्कसंयुतः
śatrubhe duḥkhitaḥ prokto vikalaḥ pāpasaṃyutaḥ |
khalaḥ khalagṛhe jñeyaḥ kopī syādarkasaṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-भे = शत्रु-राशि में; दुःखितः = दुःखित-अवस्था; प्रोक्तः = कहा गया; विकलः = विकल-अवस्था; पाप-संयुतः = पाप-ग्रह से युक्त; खलः = खल-अवस्था; खल-गृहे = पाप/खल गृह (दुष्ट भाव/स्थान) में; ज्ञेयः = जानना चाहिए; कोपी = कोपी-अवस्था; अर्क-संयुतः = सूर्य से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे की अवस्थाएँ बतलाता है। शत्रु की राशि में स्थित ग्रह “दुःखित” कहा गया है। पाप-ग्रह से युक्त ग्रह “विकल” है। खल-गृह में स्थित ग्रह “खल” जानना चाहिए। सूर्य से युक्त ग्रह “कोपी” कहा जाता है। ये अवस्थाएँ संयोग और शत्रु-क्षेत्र पर टिकी हैं; इनका फल-विस्तार आगे के प्रसंग में आता है।

English rendering The text continues: a planet in an enemy’s sign is duḥkhita; conjoined with a malefic is vikala; placed in a “khala” house is khala; conjoined with the Sun is kopī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-वर्गीकरण (संयोग + शत्रु-क्षेत्र)। नियम-रूप: R_G ∈ शत्रु-राशि(G) → दुःखित; यदि G युक्त पाप-ग्रह (शास्त्रीय पाप: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु — पाठ-भेद/परिभाषा संभव) → विकल; यदि G ∈ खलगृह (भाव-परिभाषा संस्करण-सापेक्ष) → खल; यदि G युक्त सूर्य → कोपी। युति = समान राशि (सामान्य होरा-सम्मेलन) या अंश-दूरी-सीमा — सम्मेलन घोषित करें।

उदाहरण (worked example) शनि R = सिंह (नैसर्गिक शत्रु-क्षेत्र की ओर; सूर्य-स्वामी)। यदि शनि-सिंह को शत्रु-भ माना जाए → दुःखित। यदि बुध मिथुन में सूर्य-मिथुन के साथ → कोपी (सूर्य-युति)। यदि मंगल कुम्भ में शनि-कुम्भ के साथ → विकल (पाप-युति)। युति-सम्मेलन: समान राशि = युति (अंश-सीमा न ली)।

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45.10
यादृशो जन्मकाले यः खेटो यद्भावगो भवेत् |
तादृशं तस्य भावस्य फलमुह्यं द्विजोत्तम
yādṛśo janmakāle yaḥ kheṭo yadbhāvago bhavet |
tādṛśaṃ tasya bhāvasya phalamuhyaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यादृशः = जैसी (अवस्था); जन्म-काले = जन्म-समय पर; यः खेटः = जो ग्रह; यद्-भाव-गः = जिस भाव में स्थित; भवेत् = हो; तादृशं = वैसा ही; तस्य भावस्य = उस भाव का; फलम् = फल; ऊह्यम् = अनुमान/समझना चाहिए; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जन्म-काल में ग्रह जिस अवस्था में हो और जिस भाव में स्थित हो, उसी के अनुरूप उस भाव का फल समझना चाहिए। अर्थात् अवस्था और भाव-स्थिति दोनों मिलकर भाव-फल का आधार बनते हैं। यह फल-सिद्धान्त का सेतु-वाक्य है: अवस्था केवल नाम नहीं, भाव-फल की दिशा बाँधती है।

English rendering The text states: whatever condition a planet has at birth, and whichever house it occupies, the result of that house is to be understood accordingly, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था × भाव → भाव-फल की दिशा)। मॉडल-रूप में: फल(भाव B) ~ f(अवस्था(G), G ∈ B), जहाँ G जन्म-कालीन ग्रह है। संख्यात्मक गुणांक इस श्लोक में नहीं दिए; केवल आनुपातिक सम्बन्ध का निर्देश है। भाव-गणना गृह-पद्धति (समान-भाव / श्रीपति आदि) पर निर्भर — सम्मेलन घोषित करें।

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45.11
लज्जितो गर्वितश्चैव क्षुधितस्तृषितस्तथा |
मुदितः क्षोभितश्चैव ग्रहभावाः प्रकीर्तिताः
lajjito garvitaścaiva kṣudhitastṛṣitastathā |
muditaḥ kṣobhitaścaiva grahabhāvāḥ prakīrtitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लज्जितः = लज्जित-अवस्था; गर्वितः = गर्वित-अवस्था; क्षुधितः = क्षुधित; तृषितः = तृषित; तथा = तथा; मुदितः = मुदित; क्षोभितः = क्षोभित; ग्रह-भावाः = ग्रह की (ये) अवस्थाएँ/भाव-स्थितियाँ; प्रकीर्तिताः = कथित/नामित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब छह और ग्रह-अवस्थाओं के नाम गिनाता है — लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित और क्षोभित। इन्हें “ग्रहभावाः” कहा गया है, अर्थात् ग्रह के विशेष भाव-स्थित दशा-नाम। इनकी परिभाषाएँ अगले श्लोकों में क्रमशः दी जाती हैं; यहाँ केवल नाम-सूची है।

English rendering The text enumerates six further planetary conditions: lajjita, garvita, kṣudhita, tṛṣita, mudita, and kṣobhita — declared as the graha-bhāvas (named states of the planets).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-सूची / अवस्था-कोष। यह श्लोक गणना नहीं करता; यह छह अवस्था-नामों का घोषणा-पत्र है जिनकी निर्धारक शर्तें 45.12 आदि में आती हैं। ध्यान दें: “मुदित” 45.8 में परममित्र-राशि के लिए भी प्रयुक्त; यहाँ ग्रहभाव-श्रृंखला का सदस्य — सन्दर्भ-भेद संभव, परिभाषा आगे से बाँधें।

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45.12
पुत्रगेहगतः खेटो राहुकेतुयुतोऽथवा |
रविमन्दकुजैर्युक्तो लज्जितो ग्रह उच्यते
putragehagataḥ kheṭo rāhuketuyuto'thavā |
ravimandakujairyukto lajjito graha ucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-गेह-गतः = पुत्र-गृह (पंचम भाव) में स्थित; खेटः = ग्रह; राहु-केतु-युतः = राहु या केतु से युक्त; अथवा = अथवा; रवि-मन्द-कुजैः = सूर्य, शनि, मंगल से; युक्तः = युक्त; लज्जितः = लज्जित; ग्रहः = ग्रह; उच्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र “लज्जित” अवस्था की शर्तें बतलाता है। जो ग्रह पुत्र-गृह (पंचम भाव) में स्थित हो, अथवा राहु-केतु से युक्त हो, अथवा सूर्य, शनि और मंगल से युक्त हो — वह ग्रह “लज्जित” कहा जाता है। यह स्थान-और-युति दोनों पर टिकी परिभाषा है।

English rendering The text defines lajjita: a planet placed in the fifth house (putra-geha), or conjoined with Rāhu or Ketu, or conjoined with the Sun, Saturn, and Mars, is called lajjita.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवस्था-निर्धारक बूलियन नियम (गणनात्मक वर्गीकरण):
- lajjita(G) ⇔ (house(G) = 5) ∨ (G युक्त {राहु, केतु}) ∨ (G युक्त {सूर्य, शनि, मंगल})
- “रविमन्दकुजैः” — बहुवचन: तीनों से युक्त, या इनमें से किसी से? पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव; शाब्दिक बहुवचन तीनों-संयोग की ओर झुकता है, किन्तु कई टीका-परम्पराएँ “पाप-युति” विस्तार से पढ़ती हैं — निश्चित न पढ़ें।
- भाव = लग्न से गणित भाव-संख्या (समान-30° भाव: house = ⌊(λ_G − λ_Lagna)/30°⌋ + 1, mod 12)। गृह-पद्धति घोषित करें।

उदाहरण (worked example) लग्न = 10° मेष। गुरु λ = 20° सिंह → लग्न से चाप = 130° → भाव = ⌊130/30⌋ + 1 = 5 → पुत्र-गृह → लज्जित। अथवा: बुध R = कन्या, राहु भी कन्या → राहु-युति → लज्जित (समान-राशि युति-सम्मेलन)।

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45.13
तुङ्गस्थानगतो वाऽपि त्रिकोणेऽपि भवेत्पुनः |
गर्वितः सोऽपि गदितो निर्विशंकं द्विजोत्तम
tuṅgasthānagato vā'pi trikoṇe'pi bhavetpunaḥ |
garvitaḥ so'pi gadito nirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुङ्ग-स्थान-गतः = उच्च-स्थान में स्थित; वा अपि = अथवा भी; त्रिकोणे = त्रिकोण (1/5/9) में; अपि = भी; भवेत् = हो; पुनः = फिर; गर्वितः = गर्वित-अवस्था; सः अपि = वह भी; गदितः = कहा गया; निर्विशङ्कम् = निःसंदेह; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र “गर्वित” अवस्था बतलाता है। जो ग्रह उच्च-स्थान में स्थित हो, अथवा त्रिकोण भाव (प्रथम, पंचम, नवम) में हो — वह निःसंदेह “गर्वित” कहा गया है, हे श्रेष्ठ द्विज। यह स्थान-गरिमा की अवस्था है।

English rendering The text defines garvita without hesitation: a planet in its exaltation-place, or again in a trine (trikoṇa), is called garvita, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवस्था-नियम:
- garvita(G) ⇔ (R_G = उच्च-राशि(G)) ∨ (house(G) ∈ {1, 5, 9})
- “तुङ्गस्थान” = उच्च-राशि (उच्च-बिन्दु की सटीक ° इस श्लोक में नहीं); “त्रिकोण” = लग्न से 1, 5, 9 भाव (शास्त्रीय त्रिकोण)।
- ध्यान: 45.12 में पंचम-स्थित = लज्जित; 45.13 में त्रिकोण (जिसमें पंचम) = गर्वित — दोनों शर्तें एक साथ सत्य हो सकती हैं। शास्त्र दोनों नाम देता है; प्राथमिकता/संयोग-फल इस श्लोक-युग्म में नहीं बाँधा — पाठ-भेद/परम्परा-निर्णय संभव, मौन मत चुनें।

उदाहरण (worked example) लग्न = 0° कर्क। शुक्र R = मीन (उच्च-राशि) → गर्वित। अथवा: सूर्य λ = 15° कर्क, लग्न 0° कर्क → भाव 1 → त्रिकोण → गर्वित। मंगल 28° मेष (उच्च) + भाव जो भी हो → उच्च-स्थान से गर्वित।

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45.14
शत्रुगेही शत्रुयुक्तो रिपुदृष्टो भवेद्यदि |
क्षुधितः स च विज्ञेयः शनियुक्तो यथा तथा
śatrugehī śatruyukto ripudṛṣṭo bhavedyadi |
kṣudhitaḥ sa ca vijñeyaḥ śaniyukto yathā tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-गेही = शत्रु-गृह/शत्रु-राशि में स्थित; शत्रु-युक्तः = शत्रु-ग्रह से युक्त; रिपु-दृष्टः = शत्रु द्वारा दृष्ट; भवेत् यदि = यदि हो; क्षुधितः = क्षुधित-अवस्था; स च = और वह; विज्ञेयः = जानना चाहिए; शनि-युक्तः = शनि से युक्त; यथा तथा = उसी प्रकार / वैसे ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र “क्षुधित” अवस्था की शर्तें बतलाता है। यदि ग्रह शत्रु-गृह में हो, अथवा शत्रु से युक्त हो, अथवा शत्रु की दृष्टि में हो — तो वह “क्षुधित” जानना चाहिए; और शनि से युक्त होने पर भी उसी प्रकार। शत्रु-क्षेत्र, शत्रु-युति, शत्रु-दृष्टि और शनि-युति — ये चार मार्ग शास्त्र यहाँ जोड़ता है।

English rendering The text defines kṣudhita: if a planet occupies an enemy’s place, is conjoined with an enemy, or is aspected by an enemy, it is to be known as kṣudhita — and likewise when conjoined with Saturn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवस्था-नियम (शर्त-संयोग):
- kṣudhita(G) ⇔ (R_G ∈ शत्रु-क्षेत्र(G)) ∨ (G युक्त शत्रु-ग्रह) ∨ (शत्रु-ग्रह dṛṣṭi G पर) ∨ (G युक्त शनि)
- दृष्टि: पूर्ण दृष्टि-चाप शास्त्रानुसार — मंगल 4, 8; गुरु 5, 9; शनि 3, 10; शेष ग्रह 7 (सप्तम); राशि-दृष्टि vs अंश-दृष्टि — सम्मेलन घोषित करें।
- “शत्रुगेही” = शत्रु-स्वामी का गृह / शत्रु-राशि — दोनों पाठ-सम्भव; नैसर्गिक vs तात्कालिक मित्र-शत्रु तालिका घोषित करें।
- 45.9 का “दुःखित” (शत्रुभे) और यहाँ “क्षुधित” (शत्रुगेही…) — भिन्न अवस्था-नाम, आंशिक शर्त-अतिव्याप्ति; दोनों को अलग कोष-प्रविष्टि रखें।

उदाहरण (worked example) चन्द्र R = वृश्चिक, मंगल भी वृश्चिक (नैसर्गिक शत्रु-युति-उदाहरण; मित्र-शत्रु तालिका नैसर्गिक मानें) → शत्रु-युक्त → क्षुधित। अथवा: बुध R = मकर, शनि मकर → शनि-युक्त → क्षुधित (यथा तथा)। अथवा: सूर्य R = तुला, शनि मेष से 7वीं दृष्टि तुला पर (सप्तम) — यदि शनि को सूर्य का शत्रु/रिपु माना जाए → रिपुदृष्ट → क्षुधित। दृष्टि-सम्मेलन: पूर्ण राशि-दृष्टि।

45.15
जलराशौ स्थितः खेटः शत्रुणा चाऽवलोकितः |
शुभग्रहा न पश्यन्ति तृषितः स उदाहृतः
jalarāśau sthitaḥ kheṭaḥ śatruṇā cā'valokitaḥ |
śubhagrahā na paśyanti tṛṣitaḥ sa udāhṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जल-राशौ स्थितः = जल-तत्त्व राशि में स्थित (कर्क/वृश्चिक/मीन); खेटः = ग्रह; शत्रुणा अवलोकितः = शत्रु द्वारा दृष्ट; शुभ-ग्रहाः न पश्यन्ति = शुभ-ग्रह न देखें; तृषितः = "तृषित" (प्यासी) अवस्था; स उदाहृतः = वह कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह जल-राशि में स्थित हो, शत्रु-ग्रह की दृष्टि में हो, और जिस पर किसी शुभ-ग्रह की दृष्टि न पड़ती हो — उसे "तृषित" (प्यासा) कहा गया है। यहाँ तीनों शर्तें साथ चाहिए: जल-राशि-स्थिति, शत्रु-दृष्टि, और शुभ-दृष्टि का अभाव।

English rendering A planet placed in a watery sign, aspected by an enemy, and unregarded by any benefic, is declared tṛṣita, "the thirsting."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-कथन (अवस्था-निर्धारण)। जल-राशि-गण (convention): कर्क (राशि 4), वृश्चिक (8), मीन (12) — जल-तत्त्व त्रिकोण; कुछ मत मकर-कुम्भ के जलचर-अंश भी जोड़ते हैं (पाठ-भेद/परिपाटी-भेद संभव)। शर्त-संयोग: तृषित ⇔ (राशि ∈ जल-गण) ∧ (शत्रु-दृष्टि) ∧ ¬(शुभ-दृष्टि) — एक संयुक्त (AND) निर्धारक नियम, न कि कोई अंकगणित।

45.16
मित्रगेही मित्रयुक्तो मित्रेण च विलोकितः |
गुरुणा सहितो यश्च मुदितः स प्रकीर्तितः
mitragehī mitrayukto mitreṇa ca vilokitaḥ |
guruṇā sahito yaśca muditaḥ sa prakīrtitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्र-गेही = मित्र-राशि/मित्र-गृह में स्थित; मित्र-युक्तः = मित्र-ग्रह से युक्त; मित्रेण विलोकितः = मित्र द्वारा दृष्ट; गुरुणा सहितः = बृहस्पति के साथ; मुदितः = प्रसन्न/आनन्दित अवस्था; प्रकीर्तितः = कथित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह मित्र के घर में हो, मित्र से युक्त हो, मित्र से देखा जाए, अथवा गुरु के साथ हो—वह मुदित (प्रसन्न) कथित है। यहाँ मित्रत्व, युति, दृष्टि और गुरु-संग—ये चार अनुकूल संकेत अवस्था को “मुदित” बनाते हैं। यह शुभ-अवस्था की परिभाषा है, कोई काल-सूत्र नहीं।

English rendering The text calls a planet mudita (“delighted”) when it stands in a friend’s house, is joined with a friend, is aspected by a friend, and/or is accompanied by Jupiter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-परिभाषा (मुदित)। स्थिति-जाँच: मित्र-गृह ∨ मित्र-युति ∨ मित्र-दृष्टि ∨ गुरु-संग → मुदित। मित्र/शत्रु तालिका ग्रहों की नैसर्गिक/तात्कालिक मित्रता-नियमों पर निर्भर करती है—परंपरा-भेद पर “पाठ-भेद संभव”।

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45.17
रविणा सहितो यश्च पापा पश्यन्ति सर्वथा |
क्षोभितं तं विजानीयाच्छत्रुणा यदि वीक्षितः
raviṇā sahito yaśca pāpā paśyanti sarvathā |
kṣobhitaṃ taṃ vijānīyācchatruṇā yadi vīkṣitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रविणा सहितः = सूर्य के साथ युक्त; यश्च = और जो; पापाः = पाप-ग्रह; पश्यन्ति = देखते हैं; सर्वथा = सर्वथा/निरंतर-सा; क्षोभितम् = क्षुब्ध/आंदोलित अवस्था; विजानीयात् = जानना चाहिए; शत्रुणा वीक्षितः = शत्रु द्वारा दृष्ट हो तो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह सूर्य से युक्त हो, पाप-ग्रह उसे सर्वथा देखते हों, और यदि शत्रु भी उसे देखे, तो उसे क्षोभित जानना चाहिए। सूर्य-युति, पाप-दृष्टि और शत्रु-दृष्टि—ये तीन दबाव-संकेत इस अवस्था को बनाते हैं। यह फल-कथन नहीं, अवस्था-निर्धारण है।

English rendering The text directs that a planet conjoined with the Sun, continually aspected by malefics, and (especially if) aspected by an enemy is to be known as kṣobhita (“agitated”).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-परिभाषा (क्षोभित)। शर्त-समूह: सूर्य-युति ∧ पाप-दृष्टि (सर्वथा) ∧ (शत्रु-दृष्टि) → क्षोभित। “पाप” यहाँ सूर्य–मंगल–शनि–राहु–केतु आदि की शास्त्रीय श्रेणी; युति/दृष्टि-नियम दृष्टि-अध्याय की परिपाटी पर।

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45.18
येषु येषु च भावेषु ग्रहास्तिष्ठन्ति सर्वथा |
क्षुधितः क्षोभितो वापि तद्भावफलनाशनः
yeṣu yeṣu ca bhāveṣu grahāstiṣṭhanti sarvathā |
kṣudhitaḥ kṣobhito vāpi tadbhāvaphalanāśanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) येषु येषु भावेषु = जिन-जिन भावों में; ग्रहाः तिष्ठन्ति = ग्रह स्थित हों; सर्वथा = सर्वथा; क्षुधितः = क्षुधित अवस्था; क्षोभितः = क्षोभित अवस्था; वा अपि = अथवा; तत्-भाव-फल-नाशनः = उस भाव के फल का नाशक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिन-जिन भावों में ग्रह क्षुधित या क्षोभित अवस्था में स्थित हों, वे उस भाव के फल का नाश करने वाले माने गए हैं। यहाँ अवस्था सीधे भाव-फल से जोड़ी गई है—स्थान मात्र नहीं, अवस्था सहित स्थान। यह शास्त्र का फल-नियम है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that wherever planets stand as kṣudhita or kṣobhita, they are destroyers of the results of those houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-फल-नाश)। प्रक्रिया: (1) प्रत्येक ग्रह की अवस्था निर्धारित करो; (2) यदि अवस्था ∈ {क्षुधित, क्षोभित}; (3) तो उस ग्रह के भाव-स्वामित्व/स्थिति वाले भावों पर शास्त्र “फल-नाशन” कहता है। भाव-गणना घर-पद्धति (पूर्ण भाव / श्रीपति आदि) पर निर्भर—घोषित करनी चाहिए।

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45.19
एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु पण्डितैः |
बलाऽबलविचारेण वक्तव्यः फलनिर्णयः
evaṃ krameṇa boddhavyaṃ sarvabhāveṣu paṇḍitaiḥ |
balā'balavicāreṇa vaktavyaḥ phalanirṇayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं क्रमेण = इसी क्रम से; बोद्धव्यम् = समझना चाहिए; सर्व-भावेषु = समस्त भावों में; पण्डितैः = विद्वानों द्वारा; बल-अबल-विचारेण = बल-निर्बलता के विचार से; वक्तव्यः फल-निर्णयः = फल का निर्णय कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ विद्वानों को चाहिए कि इसी क्रम से समस्त भावों में ग्रहों की अवस्थाओं को समझें, और ग्रह के बल-निर्बलता का विचार करके ही फल का अन्तिम निर्णय दें। अवस्था फल का चिह्न बताती है; बल उसका परिमाण तय करता है — दोनों का समन्वय ही सही निर्णय है।

English rendering Thus, in the proper order, the wise should understand the states across all houses, and only through weighing strength and weakness should the verdict on results be pronounced.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं प्रत्यक्ष — किन्तु यह श्लोक "बल-अबल-विचार" को फल-निर्णय की अनिवार्य कसौटी बनाता है। सूचित प्रक्रिया: फल-निर्णय = चिह्न(अवस्था) × परिमाण(बल), जहाँ बल की माप षड्बल (BPHS Ch.27) से रूप/विरूप में होती है — निर्णय तभी मान्य जब बल ग्रह-विशेष की देहली (threshold) से तुलित हो।

उदाहरण (worked example) मान लें कोई ग्रह "मुदित" (शुभ-अवस्था) है, किन्तु उसका षड्बल = 4.8 रूप और आवश्यक देहली = 6.0 रूप (1 रूप = 60 विरूप)। चूँकि 4.8 < 6.0, अतः शुभ-चिह्न होते हुए भी फल क्षीण घोषित होगा — अवस्था दिशा देती है, बल मात्रा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारे षड्बल-मॉड्यूल की नींव है: स्थान-दिग्-काल-चेष्टा-नैसर्गिक-दृग् बल को रूप/विरूप में जोड़कर (1 रूप = 60 विरूप) प्रति-ग्रह देहली से तुलना — गणना पूर्णतः निर्धारक, व्याख्या से पृथक्। बल की यह गणितीय परत ही अवस्था-जन्य "चिह्न" को मापयोग्य "परिमाण" देती है।

45.20
अन्योन्यं च मुदा युक्तं फलं मिश्रं वदेत्पुनः |
बलहीने तदा हानिः सबले च महाफलम्
anyonyaṃ ca mudā yuktaṃ phalaṃ miśraṃ vadetpunaḥ |
balahīne tadā hāniḥ sabale ca mahāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्योन्यम् = परस्पर; मुदा युक्तम् = हर्ष (मुदित-मेल) से युक्त; फलं मिश्रं वदेत् = मिश्रित फल कहे; पुनः = फिर; बल-हीने = निर्बल होने पर; तदा हानिः = तब हानि; स-बले = बलवान् होने पर; महाफलम् = महान् फल।

हिन्दी भावार्थ जब ग्रह परस्पर हर्ष-युक्त (मिली-जुली शुभाशुभ अवस्थाओं में) हों, तब मिश्रित फल कहना चाहिए। यदि ग्रह निर्बल हो तो वही योग हानि देता है, और यदि बलवान् हो तो महान् फल — बल ही निर्णायक तराजू है।

English rendering When planets are mutually joined in gladness, one should declare a mixed result; if the planet is weak the outcome is loss, but if strong, a great fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं प्रत्यक्ष — किन्तु स्पष्ट बल-भारण (weighting): फल ≈ अवस्था-चिह्न, परन्तु परिमाण बल-सापेक्ष — बल < देहली ⇒ हानि; बल ≥ देहली ⇒ महाफल। मिश्र-अवस्था में शुभ व अशुभ योगों का बीजगणितीय संकलन बल के भार से नियंत्रित होता है।

उदाहरण (worked example) एक ही ग्रह पर मुदित (शुभ) और शत्रु-दृष्टि (अशुभ) दोनों प्रभाव हों — मिश्र फल। षड्बल 7.2 रूप (देहली 6.0) हो तो "स-बले" ⇒ शुभ पक्ष प्रबल, महाफल की ओर; 5.1 रूप हो तो "बल-हीने" ⇒ हानि की ओर। केवल चिह्न से नहीं, बल-तुलना से निर्णय।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलहीने हानिः, सबले महाफलम्" — यह ठीक हमारी विधि-अनुशासन की प्रतिध्वनि है: गणित (षड्बल रूप-मान) को व्याख्या से अलग रखो, और तुलना ठीक-ठीक (==/≥ देहली) करो, सहन-पट्टी से नहीं — क्योंकि सहन-पट्टी वास्तविक अन्तर को छिपा देती है (यही सतर्कता अष्टकवर्ग में एक असली −1 उद्घाटित कर चुकी है)।

45.21
कर्मस्थाने स्थितो यस्य लज्जितस्तृषितस्तथा |
क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनम्
karmasthāne sthito yasya lajjitastṛṣitastathā |
kṣudhitaḥ kṣobhito vāpi sa naro duḥkhabhājanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्म-स्थाने = दशम भाव में; स्थितः = स्थित; यस्य = जिसका; लज्जितः = लज्जित अवस्था; तृषितः = तृषित; तथा = तथा; क्षुधितः = क्षुधित; क्षोभितः = क्षोभित; वा अपि = अथवा; स नरः = वह मनुष्य; दुःख-भाजनम् = दुःख का पात्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिसके (ग्रह) कर्म-स्थान में लज्जित, तृषित, क्षुधित अथवा क्षोभित हों, वह नर दुःख-भाजन कहा गया है। कर्म-स्थान (दशम) पर ये अशुभ अवस्थाएँ शास्त्र के अनुसार कष्ट-संकेत हैं। यह शास्त्र का फल-कथन है—हम इसे भाग्य की पक्की घोषणा नहीं मानते।

English rendering The text states that one whose planet in the tenth house (karma-sthāna) is lajjita, tṛṣita, kṣudhita, or kṣobhita is described as a vessel of sorrow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम-अवस्था)। जाँच: ग्रह.भाव == 10 (कर्म-स्थान; लग्न से पूर्ण-भाव या घोषित गृह-पद्धति) ∧ अवस्था ∈ {लज्जित, तृषित, क्षुधित, क्षोभित} → शास्त्र “दुःखभाजन” कहता है। कौन-सा ग्रह दशम में—यह जन्मकुण्डली की गणना पर; फल-शब्द शास्त्र की भाषा है, चिकित्सकीय/आर्थिक भविष्यवाणी नहीं।

45.22
सुतस्थाने भवेद्यस्य लज्जितो ग्रह एव च |
सुतनाशो भवेत्तस्य एकस्तिष्ठति सर्वदा
sutasthāne bhavedyasya lajjito graha eva ca |
sutanāśo bhavettasya ekastiṣṭhati sarvadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतस्थान = पंचम भाव (अपत्य-स्थान); लज्जित = लज्जा-अवस्था में ग्रह; सुतनाश = अपत्य-हानि/संतान-क्षय; एकः तिष्ठति = एक ही (संतान) शेष रहती है; सर्वदा = सदा/नित्य; यस्य … तस्य = जिसके … उसके।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिसके कुण्डली में लज्जित अवस्था वाला ग्रह पंचम (सुत) स्थान में बैठा हो, उसके लिए अपत्य-नाश का फल कहा गया है। उसी कथन के साथ यह भी जोड़ा गया है कि एक संतान सदा बनी रहती है। यह अवस्था-फल है — ग्रह की लज्जित दशा और पंचम भाव का योग; चिकित्सा या निश्चित भविष्य का दावा नहीं।

English rendering The text states that when a planet in the lajjita (ashamed/embarrassed) state occupies the fifth house (suta-sthāna), there is destruction concerning children, yet one child is said to remain always.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-फल-कथन (लज्जित ग्रह × पंचम भाव)। पहचान: जिस ग्रह की अवस्थानिर्धारित “लज्जित” दशा हो और वह पंचम में स्थित हो — फल-पाठ उसी युग्म पर लागू कहा गया है; गणना नहीं, केवल स्थान-अवस्था का फलादेश।

45.23
क्षोभितस्तृषितश्चैव सप्तमे यस्य वा भवेत् |
म्रियते तस्य नारी च सत्यमाहुर्द्विजोत्तम
kṣobhitastṛṣitaścaiva saptame yasya vā bhavet |
mriyate tasya nārī ca satyamāhurdvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षोभित = क्षुब्ध/व्याकुल अवस्था; तृषित = तृषा-अवस्था (प्यासा/अतृप्त ग्रह); सप्तमे = सप्तम भाव में; नारी = पत्नी/स्त्री; म्रियते = मृत्यु-फल कहा गया; सत्यम् आहुः = “सत्य” कहकर दृढ़ कथन; द्विजोत्तम = श्रेष्ठ द्विज (संबोधन/प्रमाण-स्वर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिसके यहाँ क्षोभित अथवा तृषित अवस्था का ग्रह सप्तम भाव में हो, उसकी पत्नी/नारी का मरण-फल कहा गया है। “सत्यमाहुर्द्विजोत्तम” से यह फल परंपरा में दृढ़ रूप से कहा गया बताया जाता है। यह अवस्था × सप्तम का फलादेश है — निश्चित घटना या भय-व्यापार नहीं; शास्त्र का अपना कथन मात्र।

English rendering The text states that if a planet in the kṣobhita (agitated) or tṛṣita (thirsting) state is in the seventh house, the native’s wife dies — so, it says, the best of the twice-born declare as truth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-फल-कथन (क्षोभित/तृषित × सप्तम)। “वा” से दोनों अवस्थाओं में से किसी एक का सप्तम-स्थित होना पर्याप्त माना गया; संख्यात्मक मापदंड इस श्लोक में नहीं।

45.24
नवालयारामसुखं नृपत्वं कलापटुत्वं विदधाति पुंसाम् |
सदार्थलाभं व्यवहारवृद्धिं फलं विशेषादिह गर्वितस्य
navālayārāmasukhaṃ nṛpatvaṃ kalāpaṭutvaṃ vidadhāti puṃsām |
sadārthalābhaṃ vyavahāravṛddhiṃ phalaṃ viśeṣādiha garvitasya

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नव-आलय = नवीन गृह; आराम = उद्यान/विश्रामस्थल; सुखम् = सुख; नृपत्वम् = राज-पद; कला-पटुत्वम् = कलाओं में निपुणता; विदधाति पुंसाम् = मनुष्यों को देता है; सदा-अर्थ-लाभम् = निरन्तर धन-लाभ; व्यवहार-वृद्धिम् = व्यापार/व्यवहार में वृद्धि; फलं विशेषात् इह गर्वितस्य = यह विशेषतः "गर्वित" अवस्था का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि "गर्वित" (उच्च या त्रिकोणस्थ) ग्रह मनुष्यों को नवीन गृह, उद्यान और सुख, राज-पद, कलाओं में निपुणता, निरन्तर अर्थ-लाभ तथा व्यवहार-वृद्धि प्रदान करता है। यह श्लोक 13 में परिभाषित गर्वित-अवस्था का शुभ फल-कथन है।

English rendering The text states that a garvita planet bestows on men a new dwelling, gardens and comfort, sovereignty, skill in the arts, constant gain of wealth, and growth in affairs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल, गर्वित-अवस्था)। यहाँ कोई अंक नहीं; यह अवस्था-परिभाषा (उच्च/त्रिकोण-स्थिति, श्लोक 13) से जुड़ा फल-वर्णन है — शास्त्र के शुभ-कथन के रूप में प्रस्तुत, अंकगणित-रहित।

45.25
भवति मुदितयोगे वासशालाविशाला |
विमलवसनभूषाभूमियोषासु सौख्यम् |
स्वजनजनविलासो भूमिपागारवासो |
रिपुनिवहविनाशो बुद्धिविद्याविकाशः
bhavati muditayoge vāsaśālāviśālā |
vimalavasanabhūṣābhūmiyoṣāsu saukhyam |
svajanajanavilāso bhūmipāgāravāso |
ripunivahavināśo buddhividyāvikāśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुदित-योगे = मुदित-अवस्था के योग में; वास-शाला विशाला = विशाल निवास-भवन; विमल-वसन-भूषा = स्वच्छ वस्त्र व आभूषण; भूमि-योषासु सौख्यम् = भूमि व स्त्री-सम्बन्ध में सुख; स्वजन-जन-विलासः = स्वजनों के बीच विलास; भूमिप-अगार-वासः = राजा के भवन में निवास; रिपु-निवह-विनाशः = शत्रु-समूह का नाश; बुद्धि-विद्या-विकाशः = बुद्धि व विद्या का विकास।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि "मुदित" (श्लोक 16) अवस्था के योग में मनुष्य को विशाल निवास, स्वच्छ वस्त्र-आभूषण, भूमि तथा दाम्पत्य-सुख, स्वजनों के बीच आनन्द, राज-भवन में वास, शत्रु-समूह का नाश, और बुद्धि व विद्या का विकास प्राप्त होता है। यह मुदित-अवस्था का समग्र शुभ फल है।

English rendering The text states that in the mudita configuration one gains a spacious dwelling, spotless raiment and ornaments, delight in land and consort, revelry among one's own, residence in a king's mansion, ruin of the enemy host, and the flowering of intellect and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल, मुदित-अवस्था)। यह श्लोक 16 की मुदित-परिभाषा का विस्तृत शुभ-फल है; कोई संख्या या सूत्र नहीं — शास्त्र-वचन के रूप में प्रस्तुत।

45.26
दिशति लज्जितभाववशाद्रतिं विगतराममतिं विमतिक्षयम् |
सुतगदागमनं गमनं वृथा कलिकथाभिरुचिं न रुचिं शुभे
diśati lajjitabhāvavaśādratiṃ vigatarāmamatiṃ vimatikṣayam |
sutagadāgamanaṃ gamanaṃ vṛthā kalikathābhiruciṃ na ruciṃ śubhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लज्जितभाव = लज्जित अवस्था का प्रभाव; रति = काम/अनुराग-प्रवृत्ति; विगतराममति = राग-रहित/राग-च्युत मन; विमतिक्षय = विपरीत-मति का क्षय; सुतगदागमन = पुत्र/अपत्य संबंधी रोग का आगमन; गमनं वृथा = व्यर्थ यात्रा; कलिकथाभिरुचि = कलह-कथा में रुचि; न रुचिं शुभे = शुभ में रुचि नहीं; दिशति = निर्देश/देता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लज्जित भाव के वश से रति की प्रवृत्ति तो दिखती है, पर मन राग से विलग रहता है; विपरीत बुद्धि का क्षय भी कहा गया। अपत्य-रोग का आना, व्यर्थ गमन, कलह-कथाओं में रुचि और शुभ में अरुचि — ये सब लज्जित-अवस्था के फल रूप में गिनाए गए हैं। यह अवस्था-फल की सूची है; “हो ही जाएगा” का हमारा निर्धारण नहीं।

English rendering The text states that under the lajjita condition there arises inclination toward rati yet a mind free of lasting passion, and a waning of perverse view; also the coming of a child’s illness, fruitless travel, taste for quarrelsome talk, and no delight in the auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लज्जित-अवस्था का मिश्रित (कामादि + अपत्य-रोग + वृथा-गमन) फल-कथन। 45.22 का “पंचम-स्थित लज्जित” स्थान-विशेष फल था; यहाँ सामान्य लज्जित-भाव-फल है — दोनों को मिलाकर एक ही सूत्र न बनाएँ।

45.27
संक्षोभितस्यापि फलं विशेषाद्द्रिद्रजातं कुमतिं च कष्टम् |
करोति वित्तक्षयमंध्रिबाधां धनाप्तिबाधामवनीशकोपात्
saṃkṣobhitasyāpi phalaṃ viśeṣāddridrajātaṃ kumatiṃ ca kaṣṭam |
karoti vittakṣayamaṃdhribādhāṃ dhanāptibādhāmavanīśakopāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संक्षोभितस्य = क्षोभित (उद्विग्न) ग्रह-अवस्था का; फलं = परिणाम-कथन; विशेषात् = विशेष रूप से; दरिद्रजातं = दरिद्रता से उत्पन्न (पाठ "द्रिद्रजातं" — पाठ-भेद संभव); कुमतिं = कुबुद्धि; कष्टम् = क्लेश; वित्तक्षयम् = धन-नाश; अंध्रिबाधां = अङ्घ्रि (चरण/पैर) की पीड़ा; धनाप्तिबाधाम् = धन-प्राप्ति में रुकावट; अवनीशकोपात् = अवनीश (राजा) के कोप से।

हिन्दी भावार्थ क्षोभित अवस्था वाले ग्रह का फल शास्त्र विशेष रूप से यह कहता है — दरिद्रता, कुबुद्धि, कष्ट, धन का क्षय, पैरों की पीड़ा, तथा राजकोप के कारण धन-प्राप्ति में बाधा। यह पूर्ववर्ती छह ग्रहभावों (लज्जित–गर्वित–क्षुधित–तृषित–मुदित–क्षोभित) में क्षोभित का फल-कथन पूरा करता है।

English rendering The text states that a "kṣobhita" (agitated) planet especially yields poverty, a corrupt mind, hardship, loss of wealth, affliction of the feet, and obstruction of gains through the king's displeasure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ "क्षोभित" एक अवस्था-लेबल है (श्लोक 17 में परिभाषित: रवि-युक्त तथा शत्रु-दृष्ट ग्रह); उस लेबल का फल केवल शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी मूल अनुशासन-रेखा का उदाहरण है — गणना (अवस्था-निर्धारण) और फल-वचन को पृथक रखना। "क्षोभित" तक पहुँचना नियम-आधारित है, पर उसका फल "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत होता है, भविष्य-कथन के रूप में नहीं।

45.28
क्षुधितखगवशाद्वै शोकमोहादिपातः |
परिजनपरितापादाधिभीत्या कृशत्वम् |
कलिरपि रिपुलोकैरर्थबाधा नराणा |
मखिलब्बलनिरोधो बुद्धिरोधो विषादात्
kṣudhitakhagavaśādvai śokamohādipātaḥ |
parijanaparitāpādādhibhītyā kṛśatvam |
kalirapi ripulokairarthabādhā narāṇā |
makhilabbalanirodho buddhirodho viṣādāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षुधितखग = क्षुधित (भूखा/तृषित-सदृश) ग्रह; शोकमोहादिपात = शोक-मोह आदि में पतन; परिजनपरिताप = सेवक/परिजन से क्लेश; आधिभीति = मानसिक पीड़ा और भय; कृशत्व = कृशता/क्षीणता; कलिः रिपुलोकैः = शत्रु-लोकों से कलह; अर्थबाधा = अर्थ में बाधा; अखिलबलनिरोध = समस्त बल का अवरोध; बुद्धिरोध = बुद्धि-अवरोध; विषाद = विषाद/अवसाद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — क्षुधित ग्रह के वश से शोक, मोह आदि में पतन होता है; परिजन से परिताप, आधि-भय और कृशता आती है। शत्रुओं से कलह, अर्थ-बाधा, समस्त बल का निरोध, तथा विषाद से बुद्धि-रोध — ये क्षुधित-अवस्था के फल रूप में गिनाए गए हैं। 45.23 का “तृषित” सप्तम-विशेष था; यहाँ सामान्य क्षुधित-खग-फल है।

English rendering The text states that under a kṣudhita (hungering) planet come falls into grief, delusion, and the like; distress from attendants, anxiety and fear, and emaciation; quarrel with enemies and obstruction of wealth; and a blocking of all strength and of the intellect through dejection.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — क्षुधित-अवस्था का विस्तृत अशुभ फल-वर्णन। “अखिलबलनिरोध” शब्द-बल-अवधारणा से छूता है, पर यहाँ षड्बल के रूप/विरूप की कोई गणना नहीं — केवल फल-भाषा में “बल का अवरोध” कहा गया है।

45.29
तृषितखगभवे स्वादंगनासंगमध्ये |
भवति गदविकारो दृष्टकार्याधिकारः |
निजजनपरिवादादर्थहानिः कृशत्वं |
खलकृतपरितापो मानहानिः सदैव
tṛṣitakhagabhave svādaṃganāsaṃgamadhye |
bhavati gadavikāro dṛṣṭakāryādhikāraḥ |
nijajanaparivādādarthahāniḥ kṛśatvaṃ |
khalakṛtaparitāpo mānahāniḥ sadaiva

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृषित = प्यासी/तृषावस्था (ग्रह-अवस्था); खग = आकाशचारी = ग्रह; भवे = होने पर; स्वादु-अङ्गना-सङ्ग-मध्ये = मनोहर स्त्री-संग के बीच; गद-विकार = रोग-विकार; दृष्ट-कार्य-अधिकार = देखे/निर्धारित कार्यों पर अधिकार; निज-जन-परिवाद = स्वजनों की निन्दा/कलह; अर्थ-हानि = धन-क्षति; कृशत्व = कृशता/दुर्बलता; खल-कृत-परिताप = दुष्टों से उत्पन्न ताप; मान-हानि = प्रतिष्ठा-क्षति; सदैव = निरन्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब ग्रह तृषित-अवस्था में होता है, तो फल-कथन में रोग-विकार, दृश्य/निर्धारित कार्यों पर अधिकार का उल्लेख, स्वजनों की निन्दा से अर्थ-हानि, शरीर की कृशता, दुष्ट-जनों से उत्पन्न ताप, और निरन्तर मान-हानि — ये सब एक साथ गिनाए गए हैं। यह फल-पङ्क्ति तृषित-खग की अवस्था का शास्त्रीय परिणाम-वर्णन है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष का निश्चित भविष्य। पाठ में “स्वाद्अंगनासंगमध्ये” का स्थान फल-चित्र के भीतर है; अर्थ-निश्चय में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when a planet is in the thirsty (tṛṣita) state, there is disease-disorder, (mention of) authority over seen/appointed work, loss of means from the censure of one’s own people, emaciation, torment wrought by the wicked, and constant loss of honour. This is a phala-statement of the avasthā, not a personal prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृषित-अवस्था का शास्त्रीय परिणाम-वर्णन)। यहाँ संख्या, वर्ग-भाग, या दशा-अनुपात नहीं; केवल अवस्था-नाम से फल-सूची बँधी है।

45.30
शयनं चोपवेशं च नेत्रपाणिप्रकाशनम् |
गमनागमनं चाऽथ सभायां वसतिं तथा
śayanaṃ copaveśaṃ ca netrapāṇiprakāśanam |
gamanāgamanaṃ cā'tha sabhāyāṃ vasatiṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शयन = लेटना/शयन-चेष्टा; उपवेश = बैठना/उपवेशन; नेत्र-पाणि-प्रकाशन = नेत्र व हाथ का प्रकाशन/खुलना (चेष्टा-नाम); गमन-आगमन = जाना-आना; सभायां वसति = सभा में निवास/बैठक; च … तथा = और…तथा (सूची-क्रम)।

हिन्दी भावार्थ इस श्लोक में ग्रहों की चेष्टाओं के नाम गिनाए जाते हैं — शयन, उपवेश, नेत्रपाणि-प्रकाशन, गमनागमन, और सभा-वास। यह अध्याय की आगे की गणना/फल-व्यवस्था के लिए नाम-सूची का आरम्भ है। पूर्ण सूची अगले श्लोक में जारी रहती है; यहाँ केवल प्रथम खण्ड है।

English rendering The verse enumerates planetary activity-states (ceṣṭā): reclining, sitting, the opening/manifestation of eyes and hands, going-and-coming, and abiding in an assembly — the first half of a named list continued in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (चेष्टा-नामों की आनुक्रमिक सूची)। ये नाम आगे ४५.३२–३५ की पूरण/भाग-शेष विधि से किसी एक चेष्टा पर बाँधने के लिए आधार बनते हैं।

45.31
आगमं भोजनं चैव नृत्यं लिप्सां च कौतुकम् |
निद्रां ग्रहाणां चेष्टां च कथयामि तवाग्रितः
āgamaṃ bhojanaṃ caiva nṛtyaṃ lipsāṃ ca kautukam |
nidrāṃ grahāṇāṃ ceṣṭāṃ ca kathayāmi tavāgritaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगम = आगमन/आना; भोजन = भोजन-चेष्टा; नृत्य = नृत्य; लिप्सा = इच्छा/लिप्सा; कौतुक = कौतूहल/क्रीड़ा; निद्रा = निद्रा; ग्रहाणां चेष्टाम् = ग्रहों की चेष्टाएँ; कथयामि = मैं कहता हूँ; तव अग्रितः = तेरे समक्ष।

हिन्दी भावार्थ सूची आगे बढ़ती है — आगम, भोजन, नृत्य, लिप्सा, कौतुक, और निद्रा। फिर वक्ता स्पष्ट कहता है: “ग्रहों की चेष्टाएँ मैं तेरे सामने कहूँगा।” यह संवाद-रूप में अध्याय के चेष्टा-प्रकरण का उद्घाटन है; गणना-विधि अगले श्लोकों में आरम्भ होती है। नामों की कुल संख्या और पाठ-क्रम में पाठ-भेद संभव।

English rendering The list continues — arrival, eating, dancing, longing, playfulness, and sleep — and the speaker declares he will set forth the planets’ activity-states before the pupil. The computational assignment of these states begins in the following verses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद + नाम-सूची का समापन। ४५.३०–३१ मिलकर चेष्टा-नामों का कोश देते हैं; अंक-विधि ४५.३२ से खुलती है।

45.32
यस्मिन्नृक्षे भवेत्खेटस्तेन तं परिपूरयेत् |
पुनरंशेन सम्पूर्य स्वनक्षत्रं नियोजयेत्
yasminnṛkṣe bhavetkheṭastena taṃ paripūrayet |
punaraṃśena sampūrya svanakṣatraṃ niyojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मिन् नृक्षे = जिस नक्षत्र में; खेटः = ग्रह; तेन = उसी (नक्षत्र-संख्या) से; तं परिपूरयेत् = उसे परिपूर्ण करे/गिनकर पूरा करे; पुनः अंशेन सम्पूर्य = फिर अंश (भाग/अंश) से पूर्ण करके; स्व-नक्षत्रं नियोजयेत् = अपने नक्षत्र को नियोजित/जोड़े।

हिन्दी भावार्थ विधि का पहला चरण: ग्रह जिस नक्षत्र में स्थित हो, उसी नक्षत्र-क्रम/संख्या से उस स्थिति को “परिपूरण” किया जाए; फिर अंश से पुनः सम्पूर्ण करके स्व-नक्षत्र को उस योग में नियोजित किया जाए। यह नक्षत्र-आधारित पूरण है — स्थान (नक्षत्र) और अंश दोनों गणितीय निवेश हैं। आगे के श्लोक दण्ड-लग्न, भाग-शेष, और नाम-स्वर जोड़ते हैं; अकेला यह श्लोक पूरी श्रृंखला का केवल प्रथम कड़ी है।

English rendering Take the planet’s occupied nakṣatra and complete/fill the count by that (serial) measure; then complete again with the degree-portion (aṃśa) and apply/assign the native’s own nakṣatra. This is the first modular step of the ceṣṭā assignment chain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नक्षत्र-क्रम: अश्विनी = १ … रेवती = २७।
माना ग्रह नक्षत्र-संख्या N (१…२७) में है, और उस नक्षत्र के भीतर अंश a (०° ≤ a < १३°२०′, अर्थात् ० ≤ a < ४०/३°) हो।
श्लोक का निर्देश (संचालन-रूप):
(१) N से परिपूरण — गणना में N को आधार-पूर्णांक लें;
(२) अंश a (या उसका पूर्णांक भाग ⌊a⌋ / प्रयुक्त अंश-मान — पाठ में “अंशेन” मात्र) से पुनः सम्पूरण;
(३) स्वनक्षत्र-संख्या N_sva को उस योग में नियोजित करें:
S₁ = f(N, a, N_sva) — जहाँ f का शेष रूप ४५.३३–३४ की भाग-शेष शृंखला से बँधता है।
स्थूल योग-रूप (पाठ के शब्दों के अनुरूप, बिना बाहरी सूत्र थोपे):
S₀ = N + a_unit + N_sva
फिर शेष श्लोकों से S₀ पर दण्ड-लग्न और ÷१२ लागू।

सम्प्रदाय: नक्षत्र-गणना अश्विनी से; अयनांश ग्रह-देशान्तर (sayana/nirayana) पर निर्भर — नक्षत्र-निर्णय से पहले घोषित करें। “परिपूरयेत्” का सटीक गुणन/योग-पाठ में पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example)
सम्प्रदाय: निरयण देशान्तर; नक्षत्र अश्विनी = १।
माना मङ्गल N = ४ (रोहिणी), नक्षत्र-भीतर a = ५° (अंश-इकाई = ५), जातक-स्वनक्षत्र N_sva = १० (मघा)।
S₀ = ४ + ५ + १० = १९
यह १९ आगे ४५.३३ में यातदण्ड + लग्न के साथ एकीकृत होकर रविभिः (१२) से भाग-शेष लेगा। (अन्तिम चेष्टा-सूचकांक बिना ४५.३३–३५ की शेष कड़ी के “पक्का” नहीं माना जाता।)

45.33
यातदण्डं तथा लग्नमेकीकृत्य सदा बुधः |
रविभिस्तु हरेद् भागं शेषं कार्ये नियोजयेत्
yātadaṇḍaṃ tathā lagnamekīkṛtya sadā budhaḥ |
ravibhistu hared bhāgaṃ śeṣaṃ kārye niyojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यात-दण्ड = बीते हुए दण्ड (काल-माप; १ दण्ड ≈ २४ मिनट / १ घटी-परम्परा में); लग्न = उदय-लग्न (राशि-संख्या या लग्न-मान); एकीकृत्य = जोड़कर एक करना; बुधः = विद्वान्; रविभिः = रवियों से = भूतसंख्या में प्रायः १२ (द्वादश आदित्य); हरेद् भागम् = भाग हरे / भाग दे (÷); शेषम् = शेषफल; कार्ये नियोजयेत् = कार्य (चेष्टा-निर्णय) में लगाए।

हिन्दी भावार्थ बुद्धिमान् ज्योतिषी यात-दण्ड और लग्न को सदैव एकत्र करे, फिर “रवि” से भाग दे, और जो शेष बचे उसे ही आगे के कार्य में लगाए। यह स्पष्ट मॉड्युलर भाग-शेष (mod) चरण है। “रविभिः” का मानक भूतसंख्या-पाठ १२ है; कोई अन्य पाठ मानें तो घोषित करना चाहिए — पाठ-भेद संभव।

English rendering Always unite the elapsed daṇḍas with the lagna; divide by the “Suns” (ravi = 12 by the usual word-numeral); apply the remainder to the subsequent assignment. This is exact modular reduction before the next filling steps.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भूतसंख्या: रवि = १२ (द्वादशादित्य) — यही इस पद का स्थिर भाजक।
D = यातदण्ड (जन्म/प्रश्न-काल में सूर्योदय से बीते दण्ड; ६० दण्ड ≈ अहोरात्र की एक परम्परा)।
L = लग्न-मान (प्रचलित पठन: लग्न-राशि-संख्या १…१२; अंश-युक्त लग्न भी संभव — सम्प्रदाय घोषित करें)।
T = D + L
R₃₃ = T mod १२
अर्थात् T = १२·q + R₃₃, ० ≤ R₃₃ < १२; R₃₃ को “कार्य” में नियोजित करें (४५.३२ के S₀ आदि के साथ जोड़/पूरण — अगला श्लोक नाक्षत्रिक-दशा रीति से पुनः पूरण कहता है)।

सम्प्रदाय: दण्ड = स्थानीय सूर्योदय-आधारित घटी-दण्ड; लग्न = चयनित होरा-लग्न (समान अयनांश पर)।

उदाहरण (worked example)
सूर्योदय के बाद D = १८ दण्ड; लग्न-राशि = कन्या = L = ६।
T = १८ + ६ = २४
२४ ÷ १२ = २, शेष R₃₃ = ० (कुछ परम्परा शेष ० को १२ मानती हैं — यदि फल-सारिणी १…१२ चाहे तो R′ = १२ जब R₃₃ = ०; पाठ स्वयं शून्य/द्वादश-रूपान्तर नहीं लिखता)।
शेष ० (या १२) आगे ४५.३४ के पूरण/नाम-स्वर चरण में निवेश होता है।

45.34
नाक्षत्रिकदशारीत्या पुनः पूरणमाचरेत् |
नामाद्यस्वरसंख्याढ्यं हर्तव्यं रविभिस्ततः
nākṣatrikadaśārītyā punaḥ pūraṇamācaret |
nāmādyasvarasaṃkhyāḍhyaṃ hartavyaṃ ravibhistataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाक्षत्रिक-दशा-रीत्या = नक्षत्र-दशा की रीति से; पुनः पूरणम् आचरेत् = फिर पूरण करे; नाम-आदि-स्वर-संख्या-आढ्यम् = नाम के आदि स्वरों की संख्या से युक्त (योग); हर्तव्यम् = हरणीय/भाज्य; रविभिः = रवियों से (= १२); ततः = तब/उसके बाद।

हिन्दी भावार्थ नाक्षत्रिक दशा की रीति से पुनः पूरण किया जाए; फिर नाम के आदि-स्वर-संख्या से युक्त उस मान को रवियों (१२) से हरा जाए — अर्थात् फिर भाग-शेष। यहाँ दो बातें जुड़ती हैं: (क) नक्षत्र-दशा-क्रम का पूरण-नियम, (ख) जातक-नाम के आरम्भिक स्वरों की गिनती। यह व्यक्ति-विशिष्ट निवेश है; श्लोक केवल संक्रिया बताता है, फल नहीं।

English rendering Perform the filling again by the method of nākṣatrika daśā; then take the quantity enriched by the count of the name’s initial vowels and reduce it by the Suns (÷12). Remainder proceeds to the planetary constants of 45.35.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
(१) नाक्षत्रिक-दशा-पूरण: चन्द्र-नक्षत्र (या प्रयुक्त नक्षत्र) से दशा-स्वामी/क्रम की रीति से पूर्व-प्राप्त योग S को पुनः “पूरण” — पाठ गुणन/योग का पूर्ण बीजगणित नहीं देता; संचालन = दशा-क्रम के अनुसार पूर्ण करना।
(२) नामाद्यस्वरसंख्या V = नाम के आदि स्वरों की संख्या (स्वर = अ इ उ ऋ ए ओ आदि; गणना-सम्प्रदाय घोषित करें)।
S₃₄ = S_prev + V (या पाठानुसार S_prev को V-आढ्य बनाकर)
R₃₄ = S₃₄ mod १२
भाजक पुनः रवि = १२।

सम्प्रदाय: “नामाद्यस्वर” की गिनती — केवल प्रथम अक्षर का स्वर, या आदि-अक्षर-समूह — पाठ संक्षिप्त है; स्थानीय गुरु-परम्परा से बाँधें, अनुमान से न थोपें। नाक्षत्रिक दशा यहाँ विम्शोत्तरी १२०-वर्ष चक्र की ओर संकेत कर सकती है, किन्तु यह श्लोक अवधि-वर्ष नहीं, केवल “रीति से पूरण” कहता है।

उदाहरण (worked example)
माना ४५.३३ से R₃₃ = ८, और नाक्षत्रिक-पूरण के बाद S_prev = ८ + ४ = १२ (उदाहरण-मात्र पूरण)।
नाम “राम” — आदि स्वर V = १ (आ = आद्य स्वर; गिनती-सम्प्रदाय: एक आदि-स्वर)।
S₃₄ = १२ + १ = १३
१३ ÷ १२ → शेष R₃₄ = १
यह R₃₄ (या उससे बना सूचकांक) ४५.३५ की ग्रह-देय संख्याओं के साथ चेष्टा-निर्णय की अगली कड़ी में लगता है।

45.35
रवौ पञ्च तथा देयाश्चन्द्रे दद्याद्द्वयं तथा |
कुजे द्वयं च संय्क्तं बुधे त्रीत्रि नियोजयेत्
ravau pañca tathā deyāścandre dadyāddvayaṃ tathā |
kuje dvayaṃ ca saṃyktaṃ budhe trītri niyojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवौ = सूर्य पर; पञ्च = ५; देयाः = देने योग्य; चन्द्रे = चन्द्र पर; द्वयम् = २; कुजे = मङ्गल पर; द्वयम् = २; संयुक्तम् = संयुक्त/जोड़कर; बुधे = बुध पर; त्रीत्रि ≈ त्रि/त्रीणि = ३ (पाठ “त्रीत्रि”; पाठ-भेद संभव); नियोजयेत् = नियोजित करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रह-वार देय अंक बाँधता है — सूर्य को पाँच, चन्द्र को दो, मङ्गल को दो (संयुक्त रूप से), बुध को तीन। यह चेष्टा/अवस्था-श्रृंखला का स्थिर-अंक चरण है: पूर्व श्लोकों का शेष इन देय संख्याओं से जुड़कर आगे के ग्रहों (अध्याय की अगली पङ्क्तियों) तक चलता है। इस बैच में केवल रवि–बुध तक के अंक सुरक्षित हैं।

English rendering Assign the fixed gifts: five to the Sun, two to the Moon, two to Mars (in combination), and three to Mercury. These are constant addends/weights in the ceṣṭā chain; the verse as given stops at Mercury.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
श्लोक-निर्दिष्ट स्थिरांक (यथा-पाठ):

| ग्रह | देय अंक |
|------|---------|
| रवि (सूर्य) | ५ |
| चन्द्र | २ |
| कुज (मङ्गल) | २ (संयुक्तम्) |
| बुध | ३ (“त्रीत्रि” → ३; पाठ-भेद संभव) |

संचालन-रूप (पूर्व शेष R के साथ, पाठ के “देयाः / नियोजयेत्” के अनुरूप):
S_g = R + c_g
जहाँ c_☉ = ५, c_☽ = २, c_♂ = २, c_☿ = ३।
अन्तिम चेष्टा-सूचकांक प्रायः पुनः किसी पूर्णांक M (अक्सर चेष्टा-संख्या या १२) से mod होकर ४५.३०–३१ की नाम-सूची पर गिरता है — वह अन्तिम भाजक इस श्लोक में नहीं लिखा; केवल देय अंक यहाँ बन्धे हैं।
“संयुक्तम्” = मङ्गल का २ किसी पूर्व-पद के साथ जोड़ा जाए — योग-संचालन।

अनुशासन: ये अंक शास्त्रीय भार हैं; फल-व्याख्या से अलग रखें।

उदाहरण (worked example)
माना ४५.३४ से R = १।
सूर्य-पंक्ति: S_☉ = १ + ५ = ६
चन्द्र: S_☽ = १ + २ = ३
मङ्गल: S_♂ = १ + २ = ३
बुध: S_☿ = १ + ३ = ४
यदि चेष्टा-सूची को १…k पर modulo बाँधना हो, तो प्रत्येक S_g को घोषित k से शेष लें — k का मान इस पद में नहीं; अध्याय की शेष विधि/सारिणी से बाँधें।

45.36
गुरौ बाणाः प्रदेयाश्च त्रयं दद्याच्च भार्गवे |
शनौ त्रयमथो देयं राहौ दद्याच्चतुष्टयम्
gurau bāṇāḥ pradeyāśca trayaṃ dadyācca bhārgave |
śanau trayamatho deyaṃ rāhau dadyāccatuṣṭayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरौ = बृहस्पति के विषय में; बाणाः = पाँच (बाण = ५, भूतसंख्य; पाठ-भेद संभव यदि अन्य अंक-परंपरा); प्रदेयाः = देने योग्य / प्रदेय; त्रयं = तीन; भार्गवे = शुक्र के लिए; शनौ = शनि के लिए; राहौ = राहु के लिए; चतुष्टयम् = चार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ पूर्व-क्रम का अनुसरण करते हुए ग्रहों के लिए संख्या-प्रदान बताता है। गुरु को बाण-संख्या अर्थात् पाँच, भार्गव (शुक्र) को तीन, शनि को तीन, और राहु को चार देने का विधान कहा गया है। यह संख्याएँ अवस्था-गणना के अंक-विन्यास का अंग हैं, न कि स्वतन्त्र फल-कथन।

English rendering For Jupiter five units are to be assigned; for Venus three; for Saturn three; and for Rāhu four. The verse continues a numerical allotment scheme used in the avasthā procedure of this chapter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवस्था-अंक आबंटन (शब्द-संख्य):
गुरु = ५ (बाण), शुक्र = ३, शनि = ३, राहु = ४।
ये स्थिरांक अगली श्लोकों में “त्रिभिर्भक्तं” आदि से जोड़े जाने वाले योग-अंक का भाग हैं; अकेले ग्रह-फल नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि पूर्व-श्लोकों से अन्य ग्रहों के प्रदत्त अंक (जैसे सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध — जैसा अध्याय-क्रम देता हो) और यह श्लोक मिलकर योग-अंक S बने, तो अगला चरण S ÷ ३ है (४५.३७)। यहाँ केवल चार ग्रह-अंक निश्चित हैं: ५ + ३ + ३ + ४ = १५ का अंश योग में जुड़ता है।

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45.37
त्रिभिर्भक्तं च शेषांकैः सा पुनस्त्रिबिधा स्मृता |
दष्टिश्चेष्टा विचेष्टा च तत्फलं तथयाम्यहम्
tribhirbhaktaṃ ca śeṣāṃkaiḥ sā punastribidhā smṛtā |
daṣṭiśceṣṭā viceṣṭā ca tatphalaṃ tathayāmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिभिः = तीन से; भक्तं = विभाजित; शेषांकैः = शेष-अंकों से; सा = वह (अवस्था/संख्या); पुनः = फिर; त्रिविधा = तीन प्रकार की; स्मृता = कही गई; दृष्टिः = दृष्टि-अवस्था (पाठ: दष्टि — दृष्टि-पाठ मान्य; पाठ-भेद संभव); चेष्टा = सक्रिय/प्रयत्न-अवस्था; विचेष्टा = अल्प-क्रिया/विपरीत-चेष्टा; तत्फलं = उनका फल; तथा = उसी प्रकार; आख्यामि = कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ पूर्व में प्राप्त अंक को तीन से भाग देने पर जो शेष रहता है, उसी से अवस्था को पुनः तीन वर्गों में बाँटा जाता है — दृष्टि, चेष्टा और विचेष्टा। आचार्य कहते हैं कि अब इन तीनों का फल क्रमशः बताऊँगा। यह विभाजन शुद्ध संख्या-शेष नियम है; फल अलग श्लोक में आता है।

English rendering The working total is divided by three; by the remainder the condition is again classed as threefold — dṛṣṭi, ceṣṭā, and viceṣṭā. The text then promises the results of these three.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
मान लें पूर्व-क्रम से योग-अंक = S (धनात्मक पूर्णांक)।
S = 3q + r, जहाँ r ∈ {0, 1, 2} (कुछ परंपराओं में r = 0 को ३ माना जाता है — यहाँ श्लोक केवल “शेषांक” कहता है; परंपरा-घोषणा आवश्यक)।
त्रिविध वर्गीकरण: r के अनुसार दृष्टि / चेष्टा / विचेष्टा (क्रम ४५.३८ में फल से जुड़ा; अंक→नाम का सटीक pairing यदि पाठ में स्पष्ट न हो तो “पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव”)।
यह मात्रांकिक शेष-मानचित्र है — फल-निर्णय नहीं।

उदाहरण (worked example) माना S = २८ (उदाहरण-योग; वास्तविक S ग्रहों के प्रदत्त अंकों से बने)।
२८ ÷ ३ = ९ शेष १ → r = १ → त्रिविध में एक वर्ग (दृष्टि/चेष्टा/विचेष्टा में से वह जो आपकी चुनी परंपरा r=१ को देती है)।
S = ३० → r = ०; S = ३२ → r = २। सम्मेलन स्पष्ट लिखें: “शेष ० = ?” यदि स्रोत-श्लोक स्पष्ट नहीं करता।

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45.38
दृष्टौ मध्यफलं ज्ञेयं चेष्टायां विपुलं फलम् |
विचेष्टायां फलं स्वल्पमेवं दृष्टिफलं विदुः
dṛṣṭau madhyaphalaṃ jñeyaṃ ceṣṭāyāṃ vipulaṃ phalam |
viceṣṭāyāṃ phalaṃ svalpamevaṃ dṛṣṭiphalaṃ viduḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृष्टौ मध्यफलं = दृष्टि में मध्यम फल; चेष्टायां विपुलं फलम् = चेष्टा में विपुल (प्रचुर) फल; विचेष्टायां स्वल्पम् = विचेष्टा में अल्प फल; एवं दृष्टिफलं विदुः = इस प्रकार दृष्टि-फल जानते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दृष्टि-अवस्था में मध्यम फल, चेष्टा में प्रचुर फल, और विचेष्टा में अल्प फल जानना चाहिए। यह त्रि-स्तरीय श्रेणी उस चेष्टावस्था की फल-मात्रा (न कि शुभ/अशुभ दिशा) को नापती है।

English rendering In dṛṣṭi the yield is middling, in ceṣṭā abundant, in viceṣṭā slight — thus they know the resultant magnitude.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-मात्रा मैपिंग (गुणांक-रूप में): दृष्टि → मध्य (~½), चेष्टा → विपुल (~पूर्ण), विचेष्टा → स्वल्प (~अल्प)। यह केवल तीव्रता-स्केल है; दिशा (शुभ/अशुभ) श्लोक 39 से आती है। परिमाण-गुणांक शास्त्र का श्रेणी-कथन है, कोई एकल अंक नहीं दिया।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "मात्रा" (मध्य/विपुल/स्वल्प) और "दिशा" (शुभ/अशुभ) का पृथक्करण हमारी विधि से मेल खाता है — गणित मात्रा-गुणांक देता है, व्याख्या दिशा। हम इसे भविष्य-निश्चय नहीं, शास्त्र-कथित भार-कारक (weight) की तरह रखते हैं।

45.39
शुभाऽशुभं ग्रहाणां च समीक्ष्याऽथ बलाऽबलम् |
तुङ्गस्थाने विशेषेण बलं ज्ञेयं तथा बुधैः
śubhā'śubhaṃ grahāṇāṃ ca samīkṣyā'tha balā'balam |
tuṅgasthāne viśeṣeṇa balaṃ jñeyaṃ tathā budhaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-अशुभम् = शुभता-अशुभता; ग्रहाणाम् = ग्रहों की; समीक्ष्य = देखकर; अथ = फिर; बल-अबलम् = बल और निर्बलता; तुङ्गस्थाने = उच्च-स्थान में; विशेषेण = विशेष रूप से; बलं = बल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; बुधैः = पण्डितों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ ग्रहों के शुभ-अशुभ स्वभाव और उनके बल-अबल का परीक्षण करके फल का आकलन करना चाहिए। विशेष रूप से उच्च-स्थान में स्थित ग्रह का बल विद्वानों को स्पष्ट रूप से जानना चाहिए। यहाँ शास्त्र बल-परीक्षा को फल-विचार से पहले रखता है।

English rendering After examining the planets’ benefic/malefic quality and their strength or weakness, the wise should especially ascertain strength when a planet stands in its exaltation place.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (बल-परीक्षा + तुङ्ग-विशेष)।
तकनीकी संकेत: “बल” को अध्याय-२७ के षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) से जोड़कर मापा जा सकता है; तुङ्ग = स्थानबल का प्रमुख घटक। इस श्लोक में कोई रूप/विरूप संख्या नहीं — केवल प्राथमिकता का नियम।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल-इंजन स्थान-बल में उच्च/मूलत्रिकोण आदि को नियत संख्या-नियम से जोड़ता है (१ रूप = ६० विरूप); कुल की तुलना ग्रह-वार देहली से की जाती है। यह श्लोक उसी अनुशासन को याद दिलाता है: फल से पहले बल-अबल और विशेषतः तुङ्ग-बल — गणना और फल-कथन को अलग रखें; `==` जाँच से बल-इकाई सत्यापित हों, अनुमान से नहीं।

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45.40
मन्दाग्निरोगो बहुधा नराणां स्थूलत्वमन्ङ् घ्रेरपिपित्तकोपः |
व्रणं गुदे शूलमुरःप्रदेशे यदोष्णभानुः शयनं प्रयातः
mandāgnirogo bahudhā narāṇāṃ sthūlatvamanṅ ghrerapipittakopaḥ |
vraṇaṃ gude śūlamuraḥpradeśe yadoṣṇabhānuḥ śayanaṃ prayātaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- उष्णभानुः = तप्त-किरण सूर्य (यहाँ रवि की चेष्टावस्था का फल आरम्भ)
- शयनं प्रयातः = "शयन" चेष्टावस्था को प्राप्त (द्वादश चेष्टावस्थाओं में प्रथम — मानो ग्रह लेटा/सुप्त हो)
- मन्द-अग्नि-रोगः = जठराग्नि की मन्दता, अपच
- स्थूलत्वम् अङ्घ्रेः = पैर/जंघा में भारीपन
- पित्त-कोपः = पित्त का प्रकोप
- व्रणं गुदे = गुदा-प्रदेश में व्रण
- शूलम् उरःप्रदेशे = वक्षःस्थल में शूल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जन्मकाल में जब तप्त-किरण सूर्य "शयन" चेष्टा में हो, तब वह मनुष्यों के लिए बहुधा मन्दाग्नि, पैरों का भारीपन, पित्त-प्रकोप, गुदा-व्रण और छाती की पीड़ा का सूचक बनता है। भाव यह कि सूर्य जब "सो" जाता है, तो उसका तेज मन्द होकर शारीरिक शिथिलता की ओर इंगित करता है। (यह शास्त्र का फल-कथन है, कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं।)

English rendering The text states that when the hot-rayed Sun has entered the "reclining" (śayana) state, it portends for men frequent indigestion, heaviness of the legs, aggravated bile, an ulcer in the rectal region, and pain in the chest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। किन्तु स्वयं "चेष्टावस्था" गणित है: इसी अध्याय (श्लोक 32–37) के अनुसार इष्टकाल के यातदण्ड (घटी) में लग्न जोड़, फिर ग्रह-विशेष संख्या मिलाकर 12 (रवि = द्वादश आदित्य) से भाग देने पर शेष द्वादश चेष्टाओं में से एक (यहाँ शयन) निर्धारित करता है; ग्रह-योज्य संख्याएँ — रवि 5, चन्द्र 2, मंगल 2, बुध 3, गुरु 5 (बाण), शुक्र 3, शनि 3, राहु 4 (श्लोक 35–36, बाण=5/चतुष्टय=4 आदि बहूतसंख्या से डिकोड) — और पुनः 3 से भाग देने पर दृष्टि/चेष्टा/विचेष्टा भेद (श्लोक 37–38)। अर्थात् सूचकांक = शुद्ध मॉड्यूलर गणित; ऊपर का शारीरिक फल = शास्त्र का कथन। (गणना-पंक्तियों में पाठ-भेद संभव।)

45.41
दरिद्रताभारविहाराशाली विवादविद्याभिरतो नरः स्यात् |
कथोरचित्तः खलु नष्टवित्तः सूर्यो यदा चेदुपवेशनस्थः
daridratābhāravihārāśālī vivādavidyābhirato naraḥ syāt |
kathoracittaḥ khalu naṣṭavittaḥ sūryo yadā cedupaveśanasthaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- सूर्यः ... उपवेशनस्थः = "उपवेशन" (बैठी) चेष्टावस्था में स्थित सूर्य
- दरिद्रता-भार-विहार-शाली = दरिद्रता का भार लिए फिरने वाला
- विवाद-विद्या-अभिरतः = वाद-विवाद एवं (शुष्क) विद्या में रत
- कठोर-चित्तः = कठोर हृदय वाला (पाठ-भेद: कथोर → कठोर)
- नष्ट-वित्तः = नष्ट धन वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार जब सूर्य "उपवेशन" (बैठने की) चेष्टा में हो, तो जातक दरिद्रता का बोझ ढोता, विवाद और तर्क-विद्या में लगा, कठोर-हृदय और धन से रहित बताया जाता है। बैठे-ठहरे सूर्य का भाव मानो गति-रुद्ध तेज है — इसी से स्थिरता के स्थान पर ठहराव व अभाव का फल कहा गया।

English rendering When the Sun stands in the "seated" (upaveśana) state, the text describes the person as burdened by poverty, given to disputes and dry learning, hard-hearted, and stripped of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। सूचकांक की विधि श्लोक 32–37 में; यहाँ केवल फल। मार्मिक बिंदु: "बैठा" सूर्य = निष्क्रिय तेज, अतः शास्त्र इसे गत्यावरोध, ठहराव और अर्थ-हानि के प्रतीक-रूप में पढ़ता है।

45.42
नरः सदानन्दधरो विवेकी परोपकारी बलवित्तयुक्तः |
महामुखी राजकृपाभिमानी दिवाधिनाथो यदि नेत्रपानौ
naraḥ sadānandadharo vivekī paropakārī balavittayuktaḥ |
mahāmukhī rājakṛpābhimānī divādhinātho yadi netrapānau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सदा-आनन्द-धरः = सदा आनन्द धारण करने वाला; विवेकी = विवेकवान्; परोपकारी = पर-उपकार करने वाला; बल-वित्त-युक्तः = बल और धन से युक्त; महामुखी = विशाल मुख/उदार मुख (अर्थ-परंपरा: प्रभावशाली व्यक्तित्व; पाठ-भेद संभव); राज-कृपा-अभिमानी = राजकृपा का अभिमान रखने वाला; दिवाधिनाथः = दिन का अधिपति (सूर्य); यदि नेत्रपानौ = यदि नेत्रपान-अवस्था में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि दिवाधिनाथ सूर्य नेत्रपान-अवस्था में हो, तो मनुष्य सदा आनन्दयुक्त, विवेकी, परोपकारी, बल-धन-संपन्न, महामुखी तथा राजकृपा-गर्वी कहा गया है। शयन और उपवेशन के फल-वर्णन के बाद यह नेत्रपान का शुभ-दिश फल-कथन है।

English rendering The text states that if the lord of day, the Sun, is in the netrapāna state, the person is described as ever joyful, discerning, helpful to others, endowed with strength and wealth, of imposing presence, and proud of royal favour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-नेत्रपान)। ४५.४०–४२ मिलकर सूर्य की तीन अवस्थाओं (शयन → उपवेशन → नेत्रपान) का फल-क्रम देते हैं; अवस्था-सूचकांक की गणना अध्याय की पूर्व-विधि से, फल अलग।

45.43
उदारचित्तः परिपूर्णवित्तः सभासु वक्ता बहुपुण्यकर्त्ता |
महाबली सुन्दरररूपशाली प्रकाशने जन्मनि पदिमनीशे
udāracittaḥ paripūrṇavittaḥ sabhāsu vaktā bahupuṇyakarttā |
mahābalī sundarararūpaśālī prakāśane janmani padimanīśe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- पद्मिनीशे = कमलिनी का स्वामी = सूर्य (पाठ-भेद: पदिमनीशे → पद्मिनीशे)
- प्रकाशने ... जन्मनि = जन्म में "प्रकाशन" (उद्भासित/चमकती) चेष्टावस्था में
- उदार-चित्तः = उदार-हृदय
- परिपूर्ण-वित्तः = पूर्ण धनवान्
- सभासु वक्ता = सभाओं में वक्ता
- बहु-पुण्य-कर्ता = अनेक पुण्य-कर्म करने वाला
- महाबली, सुन्दर-रूप-शाली = महाबली एवं सुरूप (पाठ-भेद: सुन्दरररूप → सुन्दररूप)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार, जन्मकाल में सूर्य "प्रकाशन" (दीप्त) चेष्टा में हो तो जातक उदारचित्त, परिपूर्ण-धनी, सभा-वक्ता, बहुपुण्यशील, महाबली और सुन्दर रूप वाला होता है। प्रकाशमान सूर्य का सहज तेज ही यहाँ ऐश्वर्य, वाणी और सौन्दर्य के फल में प्रतिबिम्बित है।

English rendering When at birth the Sun is in the "radiant" (prakāśana) state, the text calls the person generous-minded, abundantly wealthy, an orator in assemblies, doer of much merit, mighty, and of handsome form.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। सूचकांक-गणना श्लोक 32–37 में; यहाँ "प्रकाशन" चेष्टा सूर्य के परम-दीप्त रूप की है, अतः फल भी सर्वाधिक शुभ (ऐश्वर्य-वाक्-सौन्दर्य) कहा गया।

45.44
प्रवासशाली किल दुःखमाली सदालसी धीधनवर्जितश्च |
भयातुरः कोपपरो विशेषाद्दिवाधिनाथे गमने मनुष्यः
pravāsaśālī kila duḥkhamālī sadālasī dhīdhanavarjitaśca |
bhayāturaḥ kopaparo viśeṣāddivādhināthe gamane manuṣyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- दिवाधिनाथे गमने = "गमन" (चलते/प्रयाण) चेष्टावस्था में सूर्य
- प्रवास-शाली = परदेश/भ्रमणशील
- दुःख-माली = दुःख की माला पहने (दुःखग्रस्त)
- सदा-अलसी = सदा आलसी
- धी-धन-वर्जितः = बुद्धि और धन से रहित
- भय-आतुरः = भयाकुल
- कोप-परः = क्रोधप्रवण

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दिनपति सूर्य "गमन" (प्रयाण) चेष्टा में हो, तो मनुष्य विशेषतः परदेशगामी, दुःख से घिरा, सदैव आलसी, बुद्धि-धन-हीन, भयाकुल और क्रोधी होता है। "चलता" सूर्य मानो घर से दूर है — इसी से प्रवास, अस्थिरता और अभाव का फल कहा गया।

English rendering The text states that when the lord of day is in the "moving" (gamana) state, the person is especially a wanderer abroad, wreathed in sorrow, ever indolent, void of wit and wealth, fear-ridden, and irascible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। मार्मिकता यह कि "गमन" (गति) चेष्टा का भाव घर से दूरी है, अतः शास्त्र इसे प्रवास, चंचलता और अर्थ-क्षय का प्रतीक पढ़ता है — फल चेष्टा के मूल भाव का ही अनुरणन है।

45.45
परदाररतो जनतारहितो बहुधागमने गमनाभिरुचिः |
खलताकुशलो मलिनो दिवसाधिपतौ मनुजः कुमतिः कृपणः
paradārarato janatārahito bahudhāgamane gamanābhiruciḥ |
khalatākuśalo malino divasādhipatau manujaḥ kumatiḥ kṛpaṇaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परदाररतः = पर-स्त्री में रत; जनतारहितः = जन-समर्थन से रहित; बहुधा गमने गमनाभिरुचिः = बार-बार यात्रा/भ्रमण की रुचि वाला; खलताकुशलः = खलता (दुष्टता) में कुशल; मलिनः = मलिन; दिवसाधिपतौ = दिवस-स्वामी अर्थात् सूर्य के (पूर्व-श्लोक में कही अवस्था में) होने पर; मनुजः = मनुष्य; कुमतिः = कुबुद्धि; कृपणः = कृपण।

हिन्दी भावार्थ ग्रहावस्था अध्याय के अवस्था-फल-क्रम में सूर्य का पद — शास्त्र कहता है कि (पूर्व-श्लोक में नामित अवस्था में) सूर्य होने पर मनुष्य पर-स्त्री-रत, जन-समर्थन से रहित, भ्रमण-रुचि वाला, दुष्टता में कुशल, मलिन, कुबुद्धि और कृपण कहा गया है। अवस्था का नाम इसी श्लोक में नहीं है — सन्दर्भ पूर्व-पद से लें; पाठ-भेद संभव।

English rendering When the lord of the day (the Sun) is in the state named just before, the text describes the man as given to others' wives, without a following, fond of constant travel, adept in wickedness, unclean, ill-minded and miserly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अवस्था-फल-कथन (वर्णन)। अवस्था-निर्धारण की गणना (शयनादि 12 अवस्थाएँ) इसी अध्याय के आरम्भिक श्लोकों में नक्षत्र-, ग्रह- और लग्न-अङ्कों के गुणन-शेष से दी गई है; यह पद उसका फल-खण्ड है।

45.46
सभागते हिते नरः परोपकारतत्परः |
सदार्थरत्नपूरितो दिवाकरे गुणाकरः |
वसुन्धरानवांबरालयान्वितो महाबली |
विचित्रमित्रवत्सलः कृपाकलाधरः परः
sabhāgate hite naraḥ paropakāratatparaḥ |
sadārtharatnapūrito divākare guṇākaraḥ |
vasundharānavāṃbarālayānvito mahābalī |
vicitramitravatsalaḥ kṛpākalādharaḥ paraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सभा-गते = सभागतावस्था में; हिते = हितकर / शुभ स्थिति में; नरः = मनुष्य; परोपकार-तत्परः = परोपकार में तत्पर; सत्-अर्थ-रत्न-पूरितः = अच्छे पदार्थ/धन और रत्नों से भरा; दिवाकरे = सूर्य में; गुण-आकरः = गुणों की खान; वसुन्धरा-नव-अम्बर-आलय-अन्वितः = भूमि, नए वस्त्र और आवास से युक्त; महा-बली = महाबल-युक्त; विचित्र-मित्र-वत्सलः = विविध मित्रों के प्रति स्नेही; कृपा-कला-धरः = कृपा-कला धारण करने वाला; परः = श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य जब सभागतावस्था में हितकर स्थिति में हो, तब नर परोपकार-तत्पर, सत्-अर्थ और रत्नों से पूरित तथा गुणों का आकर होता है। वह भूमि, नए वस्त्र और आलय से युक्त, महाबल-सम्पन्न, विचित्र मित्रों का वत्सल और कृपा-कला का धर कहा गया है। यह सभागतावस्था का फल-वर्णन है।

English rendering The text states that when the Sun is in the sabhāgata state in a beneficial condition, the person is devoted to helping others, filled with worthy wealth and gems, a mine of virtues — endowed with land, new garments, and a dwelling; very strong, affectionate to varied friends, and a bearer of the art of compassion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-सभागतावस्था)। “सभागत” नाम सभा/समाज-सम्बन्ध की दिशा का शाब्दिक संकेत देता है; फल पाठ का दावा है, सुनिश्चित भाग्य नहीं।

45.47
क्षोभितो रिपुगणैः सदा नरश्चञ्चलः खलमतिः कृशस्तथा |
धर्मकर्मरहितो मदोद्धतश्चागमे दिनपतौ तदा तदा
kṣobhito ripugaṇaiḥ sadā naraścañcalaḥ khalamatiḥ kṛśastathā |
dharmakarmarahito madoddhataścāgame dinapatau tadā tadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षोभितः = क्षुब्ध; रिपु-गणैः = शत्रु-समूहों से; सदा = हमेशा; नरः = मनुष्य; चञ्चलः = चंचल; खल-मतिः = दुष्ट-बुद्धि; कृशः = कृश/दुर्बल; धर्म-कर्म-रहितः = धर्म और कर्म से रहित; मद-उद्धतः = मद से उद्धत; आगमे = आगमावस्था में; दिन-पतौ = सूर्य (दिनपति) में; तदा तदा = तब-तब (उस अवस्था में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दिनपति सूर्य जब आगमावस्था में हो, तब नर सदा शत्रु-गणों से क्षुब्ध, चंचल, खलमति और कृश बताया गया है। वह धर्म-कर्म से रहित तथा मद से उद्धत कहा गया है। “तदा तदा” उसी अवस्था-काल के फल को दोहराता है — यह शास्त्र-कथन है, भय-व्यापार नहीं।

English rendering The text states that when the lord of day is in the āgama state, a person is always agitated by bands of enemies, restless, base-minded, and emaciated — devoid of dharma and right action, and swollen with pride.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-आगमावस्था)। आगमन/आगमावस्था का नाम “आना/प्रवेश” की दिशा सूचित करता है; फल को व्याख्या-वाक्य मानें, नियति नहीं।

45.48
सदाङ्गसन्धिवेदनापराङ्गनाधनक्षयो |
बलक्षयः पदे पदे यदा यदा हि भोजने |
असत्यता शिरोव्यथा तथा वृथान्नभोजनं |
रवावसत्तथारतिः कुमार्गगामिनी मति
sadāṅgasandhivedanāparāṅganādhanakṣayo |
balakṣayaḥ pade pade yadā yadā hi bhojane |
asatyatā śirovyathā tathā vṛthānnabhojanaṃ |
ravāvasattathāratiḥ kumārgagāminī mati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सदा-अङ्ग-सन्धि-वेदना = सदा अंग-संधियों में वेदना; पर-अङ्गना-धन-क्षयः = पराई स्त्री/पर-सम्बन्ध और धन का क्षय (अर्थ-क्षेत्र: शास्त्र-शब्दावली); बल-क्षयः = बल-ह्रास; पदे पदे = पद-पद पर; यदा यदा हि भोजने = जब-जब (सूर्य) भोजनावस्था में; असत्यता = असत्य-वृत्ति; शिरः-व्यथा = सिर-दर्द; वृथा-अन्न-भोजनम् = व्यर्थ अन्न-भोजन; रवौ = सूर्य में; असत् = असतावस्था; तथा अरतिः = तथा अरति-अवस्था; कुमार्ग-गामिनी मतिः = कुमार्गगामी बुद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य जब भोजनावस्था में हो, तब अंग-संधि-वेदना, पराङ्गना-धन-क्षय और पद-पद पर बल-क्षय का उल्लेख है। असत् तथा अरति अवस्थाओं में असत्यता, शिरोव्यथा, वृथा अन्न-भोजन और कुमार्गगामी मति कही गई है। ये तीनों अवस्थाओं के फल-संकेत हैं — चिकित्सा-निदान या नैतिक-दोष-आरोप नहीं, पाठ का वर्णनात्मक फल।

English rendering The text states that whenever the Sun is in the bhojana state there is constant joint-pain, loss connected with other women and wealth, and progressive loss of strength; and when the Sun is in asat and arati, falsehood, headache, wasteful eating, and a mind inclined to wrong paths are stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य: भोजन / असत् / अरति)। एक श्लोक में तीन अवस्था-फल संक्षिप्त हैं; प्रत्येक फल को उसी अवस्था से जोड़कर पढ़ें, सामान्य “सदा” नियति न बनाएँ।

45.49
विज्ञलोकैः स्दा मण्डितः पण्डितः काव्यविद्यानवद्यप्रलापान्वितः |
राजपूज्यो धरामण्डले सर्वदा नृत्यलिप्सागते पद्मिनीनायके
vijñalokaiḥ sdā maṇḍitaḥ paṇḍitaḥ kāvyavidyānavadyapralāpānvitaḥ |
rājapūjyo dharāmaṇḍale sarvadā nṛtyalipsāgate padminīnāyake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विज्ञ-लोकैः = विद्वज्जनों से; सदा मण्डितः = सदा विभूषित (पाठ: «स्दा» — सदा; पाठ-भेद संभव); पण्डितः = पण्डित; काव्य-विद्या-अनवद्य-प्रलाप-अन्वितः = काव्य-विद्या के निर्दोष प्रलाप/वचन से युक्त; राज-पूज्यः = राजाओं द्वारा पूज्य; धरा-मण्डले = पृथ्वी-मण्डल पर; सर्वदा = सर्वदा; नृत्य-लिप्सा-गते = नृत्यलिप्सा-अवस्था में स्थित; पद्मिनी-नायके = सूर्य (पद्मिनीनायक) में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पद्मिनीनायक सूर्य नृत्यलिप्सा-अवस्था में हो, तब जातक विज्ञ-लोकों से सदा मण्डित, पण्डित, और काव्य-विद्या के अनवद्य वचन से युक्त कहा गया है। वह धरामण्डल पर राज-पूज्य बताया गया है। यह नृत्यलिप्सावस्था का शुभ-दिशा फल-कथन है — प्रदर्शन-कला का शाब्दिक संकेत, अनिवार्य जीवन-कथा नहीं।

English rendering The text states that when the lord of the lotus (the Sun) is in the nṛtya-lipsā state, the person is always adorned by the learned, a scholar, and gifted with blameless discourse of poetry and learning — forever honoured by kings on the circle of the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-नृत्यलिप्सावस्था)। “नृत्य-लिप्सा” नाम की दिशा कला/प्रदर्शन-अभिमुख है; फल को शास्त्र-वाक्य के रूप में ही ग्रहण करें।

45.50
सर्वदानन्दधर्ता जनो ज्ञानवान् यज्ञकर्ता धराधीशसद्मस्थितः |
पद्मबन्धावरातेर्भयं स्वाननः काव्यविद्याप्रलापी मुदा कौतुके
sarvadānandadhartā jano jñānavān yajñakartā dharādhīśasadmasthitaḥ |
padmabandhāvarāterbhayaṃ svānanaḥ kāvyavidyāpralāpī mudā kautuke

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वदा = सदैव; आनन्दधर्ता = आनन्द धारण करने वाला; ज्ञानवान् = ज्ञान-सम्पन्न; यज्ञकर्ता = यज्ञ-अनुष्ठानकर्ता; धराधीशसद्मस्थितः = पृथ्वीपति (राजा)-भवन में स्थित; पद्मबन्ध = बंधन / पद्म-बंध (पाठ-भेद संभव); अवराति = शत्रु (अराति); स्वानन = स्व-आनन (मुख-अवस्था); काव्यविद्याप्रलापी = काव्य-विद्या का प्रलाप/वार्तालाप करने वाला; मुदा कौतुके = हर्ष और कौतुक सहित।

हिन्दी भावार्थ जब चंद्र (या संबंधित ग्रह) स्व-आनन — मुख — की अवस्था में हो, तो शास्त्र कहता है कि जातक सदैव आनन्द धारण करता है, ज्ञानवान् होता है और यज्ञ-अनुष्ठान में प्रवृत्त रहता है। वह धराधीश के सदन में वास पाता है। काव्य और विद्या की चर्चा हर्ष-कौतुक से करता है; साथ ही पद्म-बंध और शत्रु-भय का संकेत भी दिया गया है (पाठ-भेद संभव)। यह फल-कथन अवस्था-विशेष का शास्त्रीय वर्णन है, न कि नियति का दावा।

English rendering When the body-state is svānana (the face/mouth), the text states the person is ever joy-bearing, learned, and a performer of sacrifice, dwelling in a royal house, discoursing on poetry and lore with delight and curiosity, while also noting fear of bondage and enemies (reading possibly contested).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल: स्व-आनन)। यह शरीर-अवस्थाओं की श्रृंखला में मुख-अवस्था का शास्त्रीय परिणाम-वर्णन है; गणना-सूत्र नहीं, केवल अवस्था → फल का शास्त्र-कथन।

45.51
निद्राभरारक्तनिभे भवेतां निद्रागते लोचनपद्मयुग्मे |
रवौ विदेशे वसतिर्जनस्य कलत्रहानिः कातिधार्थनाशः
nidrābharāraktanibhe bhavetāṃ nidrāgate locanapadmayugme |
ravau videśe vasatirjanasya kalatrahāniḥ kātidhārthanāśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- रवौ ... निद्रागते = "निद्रा" चेष्टावस्था में सूर्य
- लोचन-पद्म-युग्मे = नेत्र-कमलों का युगल
- निद्रा-भर-आरक्त-निभे भवेताम् = निद्रा के भार से मानो लाल-से हो जाते हैं (द्विवचन)
- विदेशे वसतिः = परदेश में निवास
- कलत्र-हानिः = पत्नी/जीवनसाथी की हानि
- कतिधा-अर्थ-नाशः = अनेक प्रकार से धन-नाश (पाठ-भेद संभव: "कातिधार्थनाशः")

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब सूर्य "निद्रा" चेष्टा में हो, तो जातक के दोनों नेत्र-कमल मानो निद्रा-भार से आरक्त हो जाते हैं; वह परदेश में वास करता, कलत्र-हानि और अनेक प्रकार से धन-नाश पाता है। सूर्य के "सो जाने" की चेष्टा में उसका तेज सुप्त है — इसी सुप्ति का प्रतिबिम्ब यहाँ प्रवास और क्षय के फल में है। (यह शास्त्र का कथन है, नियति-घोषणा नहीं।)

English rendering The text states that when the Sun is in the "sleeping" (nidrā) state, the pair of lotus-eyes grows as if reddened under the weight of sleep; the person dwells abroad, loses a spouse, and suffers loss of wealth in many ways.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। सुन्दर कवि-कल्पना: सूर्य की "निद्रा" चेष्टा को निद्रा-भार से लाल नेत्रों के बिम्ब में बाँधा गया — सुप्त तेज का भाव ही प्रवास व अर्थ-क्षय के फल में अनूदित है।

45.52
जानुःकाले क्षपानाथे शयनं चेदुपागते |
मानी शीतप्रधानश्च कामी वित्तविनाशकः
jānuḥkāle kṣapānāthe śayanaṃ cedupāgate |
mānī śītapradhānaśca kāmī vittavināśakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- क्षपानाथे = रात्रि का स्वामी = चन्द्र (यहाँ से चन्द्र की चेष्टावस्था-फल आरम्भ)
- जनुःकाले = जन्मकाल में (पाठ-भेद संभव: "जानुःकाले" → जनुःकाले/जन्मकाले)
- शयनं चेत् उपागते = यदि "शयन" चेष्टावस्था को प्राप्त हो
- मानी = मानी/अभिमानी
- शीत-प्रधानः = शीत/कफ प्रकृति प्रधान
- कामी = कामुक
- वित्त-विनाशकः = धन का विनाश करने वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि जन्मकाल में रात्रिपति चन्द्र "शयन" चेष्टा में हो, तो जातक मानी, शीत-कफ-प्रकृति-प्रधान, कामुक और धन का विनाशक होता है। यहाँ अध्याय सूर्य से हटकर चन्द्र की चेष्टावस्थाओं की ओर मुड़ता है, और "सुप्त" चन्द्र का शीतल-निष्क्रिय भाव इन फलों में प्रतिबिम्बित है।

English rendering The text states that if at birth the lord of night (the Moon) is in the "reclining" (śayana) state, the person is proud, of predominantly cold/phlegmatic temperament, lustful, and a squanderer of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। यह श्लोक संक्रमण-बिंदु है: रवि की द्वादश चेष्टाओं के बाद अब चन्द्र (क्षपानाथ) की चेष्टावस्थाएँ आरम्भ; सूचकांक-गणना वही (श्लोक 32–37), किन्तु चन्द्र की योज्य-संख्या 2 (श्लोक 35)। "जानुःकाले" पद संदिग्ध — पाठ-भेद संभव।

45.53
रोगार्दितो मन्दमतिर्विशेषाद्वित्तेन हीनो मनुजः कठोरः |
अकार्यकारी परवित्तहारी क्षपाकरे चेदुपवेशनस्थे
rogārdito mandamatirviśeṣādvittena hīno manujaḥ kaṭhoraḥ |
akāryakārī paravittahārī kṣapākare cedupaveśanasthe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोगार्दितः = रोग-अर्दित, रोगों से पीड़ित; मन्दमतिः = मंद-बुद्धि; विशेषात् = विशेष रूप से; वित्तेन हीनः = धन-रहित; कठोरः = निष्ठुर स्वभाव; अकार्यकारी = न करने योग्य कर्म करने वाला; परवित्तहारी = पर-वित्त-हारी, दूसरों का धन हरने वाला; क्षपाकरे = क्षपा-कर = रात्रि-कर = चन्द्र; उपवेशनस्थे = उपवेशन (बैठने की) चेष्टावस्था में स्थित।

हिन्दी भावार्थ जब जन्म-समय में चन्द्रमा 'उपवेशन' चेष्टावस्था में हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक रोग-पीड़ित, मंदबुद्धि, विशेषतः धनहीन और स्वभाव से कठोर होता है। वह अनुचित कर्म करने तथा दूसरों का धन हरने की प्रवृत्ति रखता है। यह चन्द्र की एक निर्बल चेष्टा का फल-कथन मात्र है, कोई भाग्य-निर्णय नहीं।

English rendering When the Moon at birth occupies the "seated" (upaveśana) activity-state, the text states the native is disease-ridden, dull-witted, notably without wealth, and hard-natured — a doer of unfit deeds who seizes others' wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र की उपवेशन-चेष्टावस्था)। जिस 'अवस्था' पर यह फल टिका है वह स्वयं श्लोक 32–34 की नक्षत्र + यातदण्ड + लग्न योग को 'रविभिः' (रवि = १२) से भाग देकर निकाली गई अनुक्रमणिका (शेष 1–12) का परिणाम है — फल व्याख्या है, अवस्था-सूचकांक गणना।

45.54
नेत्रपाणौ क्षपानाथे महारोगी नरो भवेत् |
अनल्पजल्पको धूर्तः कुकर्मनिरतः सदा
netrapāṇau kṣapānāthe mahārogī naro bhavet |
analpajalpako dhūrtaḥ kukarmanirataḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नेत्रपाणौ = नेत्र-पाणि (आँख-हाथ की) चेष्टावस्था में; क्षपानाथे = क्षपा-नाथ = रात्रि-स्वामी = चन्द्र; महारोगी = महा-रोगी, भारी रोगों वाला; अनल्पजल्पकः = अ-अल्प-जल्पक = बहुत बोलने वाला, वाचाल; धूर्तः = छली, कपटी; कुकर्मनिरतः = कु-कर्म-निरत, बुरे कर्मों में लीन; सदा = सदैव।

हिन्दी भावार्थ नेत्रपाणि (आँख-हाथ की सक्रिय) चेष्टावस्था में स्थित चन्द्रमा के विषय में शास्त्र कहता है कि जातक महारोगी, अत्यधिक वाचाल, धूर्त तथा सदा कुकर्मों में लिप्त होता है। यह चन्द्र की एक अशुभ चेष्टा का फल-कथन है।

English rendering With the Moon in the netra-pāṇi ("eyes-and-hands") state, the text states the native turns gravely ill, garrulous, cunning, and forever bent on wicked deeds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र की नेत्रपाणि-चेष्टावस्था)। नेत्रपाणि द्वादश चेष्टावस्थाओं में तीसरी है; अवस्था-क्रम शयन→उपवेश→नेत्रपाणि→प्रकाश… एक निश्चित अनुक्रमणिका है, अतः फल अवस्था-संख्या का अनुवाद है, यादृच्छिक नहीं।

45.55
यदा राकानाथे गतवति विकाशं च जनने |
विकाशः संसारे विमलगुणराशेरवनिपात् |
नवाशामाला स्यात्करितुरगलक्ष्म्या परिवृता |
विभूषा योषाभिः सुखमनुदिनं तीर्थगमनम्
yadā rākānāthe gatavati vikāśaṃ ca janane |
vikāśaḥ saṃsāre vimalaguṇarāśeravanipāt |
navāśāmālā syātkarituragalakṣmyā parivṛtā |
vibhūṣā yoṣābhiḥ sukhamanudinaṃ tīrthagamanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राकानाथे = राका-नाथ = पूर्णिमा-रात्रि का स्वामी = चन्द्र; गतवति = प्राप्त होने पर; विकाशं = प्रकाश/विकास चेष्टावस्था; जनने = जन्म-समय में; विमलगुणराशेः = निर्मल गुणों की राशि वाले (जातक) का; अवनिपात् = अवनिप = राजा से; नवाशामाला = नव-आशा-माला = नौ दिशाओं तक फैली आशा-माला (नव = ९); करितुरगलक्ष्म्या = करि-तुरग-लक्ष्मी = हाथी-घोड़ों की सम्पदा से; परिवृता = घिरी हुई; विभूषा योषाभिः = स्त्रियों सहित शोभा; सुखम् अनुदिनम् = प्रतिदिन सुख; तीर्थगमनम् = तीर्थयात्रा।

हिन्दी भावार्थ जब जन्म-समय में पूर्ण-चन्द्र (राकानाथ) 'प्रकाश' (विकास) चेष्टावस्था को प्राप्त हो, तब शास्त्र कहता है कि निर्मल गुणों की राशि-रूप जातक को संसार में उन्नति और राजा से सम्मान मिलता है। हाथी-घोड़ों की सम्पदा से घिरी, नौ-दिशाओं तक फैली आशा-माला, स्त्रियों सहित शोभा, प्रतिदिन सुख तथा तीर्थगमन का योग बताया गया है। यह उज्ज्वल चेष्टा का शुभ फल-कथन है।

English rendering When the full-orbed Moon (rākā-nātha) reaches the prakāśa (manifestation) state at birth, the text states that the native — a treasury of pure virtues — flourishes in the world and gains honor from the king, ringed by the fortune of elephants and horses, adorned amid women, blessed with daily happiness and pilgrimage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ फल-कथन (पूर्ण-चन्द्र की प्रकाश-चेष्टावस्था)। यहाँ एकमात्र संख्या 'नव' (नवाशा = नौ दिशाएँ, ९) है — यह दिशाओं की गणना है, कोई ज्योतिषीय स्थिरांक नहीं; पाठ-भेद संभव (नवाशा / नव-आशा)।

45.56
सितेतरे पापरतो निशाकरे विशेषतः क्रूरकरो नरो भवेत् |
सदाक्षिरोगैः परिपीड्यमानो वलक्षपक्षे गमने भयातुरः
sitetare pāparato niśākare viśeṣataḥ krūrakaro naro bhavet |
sadākṣirogaiḥ paripīḍyamāno valakṣapakṣe gamane bhayāturaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निशाकरे = निशा-कर = चन्द्र; गमने = गमन (जाने की) चेष्टावस्था में; सितेतरे = सित-इतर = "शुक्ल से भिन्न" = कृष्ण-पक्ष (पाठ-भेद संभव); पापरतः = पाप में रत; क्रूरकरः = क्रूर-कर्मा/क्रूर-हाथ; सदाक्षिरोगैः = सदा-अक्षि-रोगैः = निरन्तर नेत्र-रोगों से; परिपीड्यमानः = पीड़ित होता हुआ; वलक्षपक्षे = वलक्ष-पक्ष = श्वेत-पक्ष = शुक्ल-पक्ष; भयातुरः = भय से आतुर।

हिन्दी भावार्थ गमन-चेष्टावस्था में स्थित चन्द्र के विषय में शास्त्र कहता है — कृष्ण-पक्ष (सितेतर) में जातक पाप-रत, विशेषतः क्रूर-कर्मा तथा सदा नेत्र-रोगों से पीड़ित होता है; और शुक्ल-पक्ष (वलक्ष-पक्ष) में भी इस 'गमन' अवस्था के कारण वह भय से आतुर रहता है। यहाँ फल पक्ष-बल (शुक्ल/कृष्ण) के अनुसार भिन्न बताया गया है।

English rendering Of the Moon in the gamana (going) state the text states: in the dark fortnight the native is sin-bent, especially cruel-handed, and forever plagued by eye-diseases; even in the bright fortnight, in this "going" state, he remains fear-stricken.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पक्ष-सापेक्ष फल-कथन (चन्द्र गमन-अवस्था)। 'सितेतर' बनाम 'वलक्ष-पक्ष' का भेद चन्द्र के पक्ष-बल पर टिका है — यह कोई राशि नहीं, बल का द्विभाजन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक फल को स्पष्टतः शुक्ल/कृष्ण-पक्ष पर सापेक्ष करता है — जो षड्बल (BPHS अ.27) के काल-बल का 'पक्ष-बल' घटक है: चन्द्र का पक्ष-बल पूर्णिमा पर अधिकतम, अमावस्या पर न्यूनतम, एक गणनीय virūpa-मान (1 rūpa = 60 virūpa)। हमारे ढाँचे में यह बल पहले संख्या-रूप में गणा जाता है, फिर शास्त्र का फल-कथन उस पर आरोपित होता है — गणना और व्याख्या पृथक्।

45.57
विधावागमगे मानी पादरोगी नरो भवेत् |
गुप्तपापरतो दीनो मतितोषविवर्जितः
vidhāvāgamage mānī pādarogī naro bhavet |
guptapāparato dīno matitoṣavivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विधावागमगे = चन्द्र की ‘विधावागम’ अवस्था में; मानी = अभिमानी / स्व-सम्मान-प्रिय; पादरोगी = पाद-रोग-युक्त; नरः भवेत् = जातक होता है; गुप्तपापरतः = गुप्त पाप में आसक्त; दीनः = दीन-हीन; मतितोषविवर्जितः = बुद्धि/मन की तृप्ति से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जन्म में चन्द्र जब विधावागम-अवस्था में हो, तो जातक अभिमानी तथा पाद-रोग से पीड़ित कहा जाता है। वही जातक गुप्त पाप-कर्मों में रत, दीन-भाव वाला और मति-तोष—अर्थात् मानसिक सन्तोष—से रहित बताया गया है। यह फल-कथन चन्द्र की उक्त अवस्था के सन्दर्भ में है, न कि निरपेक्ष ‘भाग्य’ का दावा।

English rendering The text states that when the Moon is in the vidhāvāgama condition, the native is said to be proud and afflicted with foot disease. He is further described as given to secret wrongdoing, wretched, and devoid of contentment of mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-अवस्था)। यह श्लोक अवस्था-विशेष के परिणामस्वरूप जातक-लक्षण बताता है; इसमें कोई वर्ग-विभाजन, बल-माप या दशा-अवधि नहीं है।

45.58
सकलजनवदान्यो राजराजेन्द्रमान्यो |
रतिपतिसमाकान्तिः शान्तिकृत्कामिनीनाम् |
सपदि सदसि याते चारुबिम्बे शशंके |
भवति परमरीतिप्रीतिविज्ञो गुणज्ञः
sakalajanavadānyo rājarājendramānyo |
ratipatisamākāntiḥ śāntikṛtkāminīnām |
sapadi sadasi yāte cārubimbe śaśaṃke |
bhavati paramarītiprītivijño guṇajñaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशंके = शशाङ्क = चन्द्र; चारुबिम्बे = सुन्दर बिम्ब वाले; सदसि याते = सभा-चेष्टावस्था को प्राप्त; सपदि = तत्काल; सकलजनवदान्यः = सकल-जन-वदान्य, समस्त लोगों के प्रति उदार; राजराजेन्द्रमान्यः = राजाओं के राजा-इन्द्र से भी मान्य; रतिपतिसमाकान्तिः = रति-पति (कामदेव) समान कान्ति वाला; शान्तिकृत् कामिनीनाम् = स्त्रियों के लिए शान्ति-कारक; परमरीतिप्रीतिविज्ञः = श्रेष्ठ आचार व प्रेम का ज्ञाता; गुणज्ञः = गुण-पारखी।

हिन्दी भावार्थ जब सुन्दर-बिम्ब चन्द्र (शशाङ्क) 'सभा' चेष्टावस्था को प्राप्त हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक तत्काल ही समस्त जनों के प्रति उदार, राजाधिराजों से भी सम्मानित, कामदेव-सी कान्ति वाला, स्त्रियों का शान्ति-दाता, श्रेष्ठ आचार-प्रेम का ज्ञाता तथा गुण-पारखी होता है। यह उज्ज्वल सभा-चेष्टा का शुभ फल-कथन है।

English rendering When the fair-orbed Moon (śaśāṅka) enters the sabhā (assembly) state, the text states the native is at once open-handed to all, honored even by kings of kings, radiant as Kāmadeva, a solace to women, versed in the finest conduct and love, and a discerner of merit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ फल-कथन (चन्द्र की सभा-चेष्टावस्था)। 'सभा' द्वादश-अवस्था-चक्र की सातवीं चेष्टा है; समस्त फल इसी अवस्था-सूचकांक के अनुवाद हैं, कोई अंक-गणना श्लोक में नहीं।

45.59
विधावागमके मत्यों वावालो धर्मपूरितः |
कृष्णपक्षे द्विभार्यः स्याद्रोगी दुष्टतरो हठी
vidhāvāgamake matyoṃ vāvālo dharmapūritaḥ |
kṛṣṇapakṣe dvibhāryaḥ syādrogī duṣṭataro haṭhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विधौ = चन्द्र; आगमके = आगम-चेष्टावस्था में (पाठ-भेद संभव); मर्त्यः = मनुष्य (पाठ "मत्यों"; पाठ-भेद संभव); वाचालः = बकवादी (पाठ "वावालो"; पाठ-भेद संभव); धर्मपूरितः = धर्म से पूर्ण; कृष्णपक्षे = कृष्ण-पक्ष में; द्विभार्यः = दो पत्नियों वाला; रोगी = रोगग्रस्त; दुष्टतरः = अधिक दुष्ट; हठी = हठी, जिद्दी।

हिन्दी भावार्थ आगम-चेष्टावस्था में चन्द्र हो तो शास्त्र कहता है कि (शुक्ल-पक्ष में) जातक वाचाल किन्तु धर्म-सम्पन्न होता है; परन्तु कृष्ण-पक्ष में वही द्विभार्य, रोगी, अधिक दुष्ट तथा हठी हो जाता है। यहाँ फल पुनः पक्ष-भेद पर आश्रित बताया गया है। पाठ-भेद संभव।

English rendering With the Moon in the āgama state, the text states the mortal is talkative yet filled with dharma; but in the dark fortnight he becomes a man of two wives, diseased, more wicked, and obstinate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पक्ष-सापेक्ष फल-कथन (चन्द्र आगम-अवस्था)। 'कृष्णपक्षे' का उल्लेख फल को चन्द्र-पक्ष-बल पर सापेक्ष करता है — शुभ/अशुभ का विभाजक बल है, अवस्था नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक फल देने से पहले 'कौन-सा पक्ष' यह पक्ष-सन्दर्भ घोषित करना अनिवार्य बनाता है — ठीक वही अनुशासन जो हमारी विधि पालती है: जहाँ फल किसी बल पर निर्भर हो वहाँ परिपाटी (पक्ष, अयनांश, गृह-पद्धति) पहले घोषित करो। पक्ष-बल स्वयं षड्बल (अ.27) के काल-बल का घटक है; बल संख्या है, 'द्विभार्य/धर्मपूरित' फल शास्त्र का कथन।

45.60
भोजने जनुषि पूर्णचन्द्रमा मानयानजनतासुखं नृणाम् |
आतनोति वनितासुतासुखं सर्वमेव न सितेतरे शुभम्
bhojane januṣi pūrṇacandramā mānayānajanatāsukhaṃ nṛṇām |
ātanoti vanitāsutāsukhaṃ sarvameva na sitetare śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजने = भोजन-चेष्टावस्था में; जनुषि = जन्म-समय में; पूर्णचन्द्रमाः = पूर्ण चन्द्र; मानयानजनतासुखम् = मान-यान-जनता-सुख = सम्मान, वाहन, लोक-प्रियता; नृणाम् = मनुष्यों के लिए; आतनोति = विस्तृत करता/देता है; वनितासुतासुखम् = वनिता-सुता-सुख = पत्नी व सन्तान का सुख; सर्वम् एव न = यह सब कुछ नहीं; सितेतरे = कृष्ण-पक्ष में (पाठ-भेद संभव); शुभम् = शुभ।

हिन्दी भावार्थ भोजन-चेष्टावस्था में यदि जन्म-समय पूर्ण-चन्द्र हो तो शास्त्र कहता है कि जातक को सम्मान, वाहन, लोक-प्रियता तथा पत्नी-सन्तान का सुख प्राप्त होता है; किन्तु यही सब कृष्ण-पक्ष (सितेतर) के क्षीण चन्द्र में शुभ नहीं रहता। पूर्ण बनाम क्षीण चन्द्र का यह भेद पक्ष-बल का ही फल-रूप है।

English rendering With the full Moon in the bhojana (eating) state at birth, the text states the native gains honor, conveyances, public affection, and the joy of wife and children — yet none of this holds auspicious for the waning (dark-fortnight) Moon.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पक्ष-सापेक्ष फल-कथन (पूर्ण बनाम क्षीण चन्द्र, भोजन-अवस्था)। 'पूर्णचन्द्र' बनाम 'सितेतर' का विरोध ही फल का चिह्न पलट देता है — यही बल-सापेक्षता को स्पष्ट करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूर्ण-चन्द्र = अधिकतम पक्ष-बल; यह श्लोक फल-चिह्न को सीधे बल पर आश्रित करता है ("सितेतरे न शुभम्")। षड्बल (अ.27) में पक्ष-बल एक virūpa-संख्या है (पूर्णिमा पर ~60 virūpa, अमावस्या की ओर घटती हुई)। हमारी विधि में यह मान पहले गणित से निकलता है, फिर शास्त्र का फल-कथन उस पर आरोपित होता है — गणना और व्याख्या पृथक्।

45.61
नृत्यलिप्सागते चन्द्रे सबले बलवान्नरः |
गीतज्ञो हि रसज्ञश्च कृष्णे पापकरो भवेत्
nṛtyalipsāgate candre sabale balavānnaraḥ |
gītajño hi rasajñaśca kṛṣṇe pāpakaro bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्यलिप्सागते = नृत्य-लिप्सा (नाचने की उत्कण्ठा) चेष्टावस्था में गत; चन्द्रे = चन्द्र; सबले = बल-सहित, बलवान् होने पर; बलवान् नरः = बलशाली मनुष्य; गीतज्ञः = गीत का ज्ञाता; रसज्ञः = रस-मर्मज्ञ; कृष्णे = कृष्ण-पक्ष में (निर्बल); पापकरः = पाप-कर्मा।

हिन्दी भावार्थ नृत्य-लिप्सा चेष्टावस्था में यदि चन्द्र बलवान् हो तो शास्त्र कहता है कि जातक बलशाली, गीत का ज्ञाता तथा रस-मर्मज्ञ होता है; किन्तु कृष्ण-पक्ष के निर्बल चन्द्र में वही पाप-कर्मा हो जाता है। यहाँ फल सीधे चन्द्र के बलाबल पर निर्भर बताया गया है।

English rendering With the Moon in the nṛtya-lipsā (eager-to-dance) state, the text states that if strong the native is powerful, a master of song and of aesthetic taste; but in the dark fortnight (weak) he turns a doer of sin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — बलाबल-सापेक्ष फल-कथन (चन्द्र नृत्यलिप्सा-अवस्था)। श्लोक 'सबले' बनाम 'कृष्णे' रखकर फल को बल-सीमा (threshold) पर बाँटता है — बल एक मापनीय राशि है, फल उसका अर्थ।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक 'सबले' (बल-सहित) को स्पष्ट शर्त बनाता है — ठीक वही तर्क जो षड्बल (अ.27) में है: छह बलों का योग (rūpa/virūpa; 1 rūpa = 60 virūpa) प्रति-ग्रह एक सीमा-मान से तुलित होता है, और तभी 'सबल/निर्बल' का निर्णय होता है। हमारी विधि इस योग को संख्या-रूप में गणती है, फिर 'बलवान्/पापकर' जैसा फल शास्त्र-कथन के रूप में जोड़ती है — कोई निश्चयात्मक भाग्य-दावा नहीं।

45.62
कौतकभवनं गतवति चन्द्रे भवति नृपत्वं वा धनपत्वम् |
कामकलासु सदा कुशलत्वं वारवधूरतितमणपटुत्वम्
kautakabhavanaṃ gatavati candre bhavati nṛpatvaṃ vā dhanapatvam |
kāmakalāsu sadā kuśalatvaṃ vāravadhūratitamaṇapaṭutvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतकभवनम् = कौतुक/कौतक-भवन (विनोद/आश्चर्य का स्थान/अवस्था); गतवति चन्द्रे = चन्द्र के पहुँचने पर; नृपत्वम् = नृप-भाव/राजत्व; वा धनपत्वम् = अथवा धन का स्वामित्व; कामकलासु = काम-कलाओं में; सदा कुशलत्वम् = सदा निपुणता; वारवधूरति = वारवधू-रति; तमणपटुत्वम् (पाठ-भेद संभव) = रति-कौशल/रमण-पटुता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चन्द्र कौतक-भवन को प्राप्त हो, तो जातक में नृपत्व अथवा धनपत्व का योग कहा जाता है। काम-कलाओं में उसकी सदा कुशलता बताई गई है, तथा वारवधू-रति में पटुता भी उसी फल-समूह में गिनी गई है। यह सब अवस्था-फल है—‘निश्चित राज्य’ का आधुनिक दावा नहीं।

English rendering The text states that when the Moon has entered the kautaka-bhavana (“house of curiosity/sport”), there is said to be kingship or lordship of wealth. Lifelong skill in the arts of love, and adeptness in the pleasures of courtesans, are also listed as results of that condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कौतक-भवन-अवस्था)। ‘भवन’ यहाँ स्थान-नाम/अवस्था-नाम के रूप में है; राश्यांश-विभाजन या वर्ग-मानचित्र का सूत्र इस पद में नहीं है।

45.63
निद्रागते जन्मनि मानवानां कलाधरे जीवयुते महत्त्वम् |
हीनेऽङ्गनासञ्चितवित्तनाशः शिवालये रौति विचित्रमुच्चैः
nidrāgate janmani mānavānāṃ kalādhare jīvayute mahattvam |
hīne'ṅganāsañcitavittanāśaḥ śivālaye rauti vicitramuccaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्रागते = निद्रा (गहन नींद) चेष्टावस्था में गत; जन्मनि = जन्म-समय में; कलाधरे = कला-धर = चन्द्र; जीवयुते = जीव (बृहस्पति) से युत होने पर; महत्त्वम् = महानता; हीने = (चन्द्र के) निर्बल होने पर; अङ्गनासञ्चितवित्तनाशः = स्त्री द्वारा संचित धन का नाश; शिवालये = शिव-मन्दिर में; रौति = चीखता/रोता है; विचित्रम् उच्चैः = विचित्र रूप से ऊँचे स्वर में।

हिन्दी भावार्थ निद्रा चेष्टावस्था में चन्द्र (कलाधर) यदि बृहस्पति से युत हो तो शास्त्र कहता है कि जातक को महानता प्राप्त होती है; किन्तु निर्बल चन्द्र में स्त्री द्वारा संचित धन का नाश होता है और वह शिव-मन्दिर में विचित्र रूप से ऊँचे स्वर में रोता/चीखता है। यहाँ फल चन्द्र के बल तथा गुरु-संयोग दोनों पर आश्रित है।

English rendering With the Moon (kalā-dhara) in the nidrā (deep-sleep) state at birth, the text states that if conjoined with Jupiter there is greatness; but if the Moon is weak, wealth gathered through women is lost, and he cries out strangely and loudly in a Śiva-temple.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — बल- व योग-सापेक्ष फल-कथन (चन्द्र निद्रा-अवस्था)। दो शर्तें — 'जीवयुत' (गुरु-संयोग) बनाम 'हीन' (निर्बल) — फल को दो विपरीत दिशाओं में बाँटती हैं; दोनों ही स्थिति-निर्भर हैं, यादृच्छिक नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक फल को दो गणनीय शर्तों पर टिकाता है — चन्द्र का बल ('हीन' बनाम सबल) और गुरु-संयोग। बल की ओर यह षड्बल (अ.27) से जुड़ता है, और गुरु-संयोग संबंध/दृग् कारक है; हमारी विधि पहले इन स्थितियों को नियत करती है, फिर 'महत्त्व' या 'वित्त-नाश' जैसा फल शास्त्र के कथन-रूप में जोड़ती है — निश्चयात्मक भविष्यवाणी नहीं।

45.64
शयने वसुधापुत्रे व्रणयुक्तो जनो भवेत् |
बहुना कण्डुना युक्तो दद्रुणा च विशेषतः
śayane vasudhāputre vraṇayukto jano bhavet |
bahunā kaṇḍunā yukto dadruṇā ca viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शयने = शयन (लेटने की) चेष्टावस्था में; वसुधापुत्रे = वसुधा-पुत्र = भौम = मङ्गल; व्रणयुक्तः = व्रण (घाव) से युक्त; जनः = मनुष्य; बहुना कण्डुना युक्तः = बहुत खुजली से युक्त; दद्रुणा च = दाद (त्वचा-रोग) से; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शयन-चेष्टावस्था में मङ्गल (वसुधापुत्र) हो तो शास्त्र कहता है कि जातक व्रण (घाव) से युक्त, अत्यधिक खुजली वाला तथा विशेषतः दाद जैसे त्वचा-रोगों से ग्रस्त होता है। यहाँ से मङ्गल की चेष्टावस्थाओं का फल-कथन आरम्भ होता है।

English rendering With Mars (vasudhā-putra) in the śayana (lying-down) state, the text states the native is beset with sores, much itching, and especially with ringworm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मङ्गल की शयन-चेष्टावस्था)। इस श्लोक से ग्रह-क्रम चन्द्र से मङ्गल पर बदलता है, किन्तु द्वादश-अवस्था-चक्र वही रहता है — प्रत्येक ग्रह उसी अवस्था-अनुक्रमणिका पर अपना पृथक् फल देता है।

45.65
बली सदा पापरतो नरः स्यादसत्यवादी नितरां प्रगल्भः |
धनेन पूर्णो निजधर्महीनो धरासुतश्चेदुपवेशनस्थः
balī sadā pāparato naraḥ syādasatyavādī nitarāṃ pragalbhaḥ |
dhanena pūrṇo nijadharmahīno dharāsutaścedupaveśanasthaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धरासुतः = धरा-सुत = भौम = मङ्गल; उपवेशनस्थः = उपवेशन (बैठने की) चेष्टावस्था में स्थित; बली = बलवान्; सदा पापरतः = सदा पाप में रत; असत्यवादी = असत्य-भाषी; नितरां प्रगल्भः = अत्यन्त ढीठ/धृष्ट; धनेन पूर्णः = धन से सम्पन्न; निजधर्महीनः = अपने धर्म से रहित।

हिन्दी भावार्थ उपवेशन (बैठने की) चेष्टावस्था में मङ्गल (धरासुत) हो तो शास्त्र कहता है कि जातक बलवान्, सदा पाप-रत, असत्य-भाषी, अत्यन्त ढीठ, धन से सम्पन्न किन्तु अपने धर्म से रहित होता है। यह मङ्गल की उपवेशन-चेष्टा का मिश्र फल-कथन है।

English rendering With Mars (dharā-suta) in the upaveśana (sitting) state, the text states the native is powerful, ever bent on sin, a teller of untruth, exceedingly brazen, full of wealth yet void of his own dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मिश्र फल-कथन (मङ्गल की उपवेशन-चेष्टावस्था)। 'बली' यहाँ फल-सूचक विशेषण है, कोई गणना-शर्त नहीं; फल-चिह्न मिश्र है (धनी किन्तु अधर्मी), जो शास्त्र की मिश्र-फल-शैली दर्शाता है।

45.66
यदा भूमिसुतो लग्ने नेत्रपाणिमुपागतः |
दरिद्रता तदा पुंसामन्यभे नगरेशता
yadā bhūmisuto lagne netrapāṇimupāgataḥ |
daridratā tadā puṃsāmanyabhe nagareśatā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूमिसुत = मंगल (पृथ्वी-पुत्र); लग्न = उदित राशि / प्रथम भाव; नेत्रपाणि-अवस्था = चेष्टा-अवस्थाओं में तीसरी (आँख-हाथ की सक्रिय अवस्था); उपागत = प्राप्त हुआ; दरिद्रता = निर्धनता; पुंसाम् = मनुष्यों के लिए; अन्यभे = अन्य राशि/भाव में; नगरेशता = नगर का स्वामित्व, नगराधिपति-पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मंगल नेत्रपाणि (चेष्टा) अवस्था को प्राप्त होकर लग्न में स्थित हो, तब मनुष्यों को निर्धनता का फल कहा गया है; किन्तु वही मंगल यदि लग्न से भिन्न किसी अन्य भाव में हो, तो नगराधिपति-पद (ऐश्वर्य) का फल बतलाया गया है। ध्यान रहे, यह एक ही अवस्था का भाव-सापेक्ष विपरीत फल है — स्थान बदलने से फल पलट जाता है।

English rendering The text states that when Mars, in the netra-pāṇi (eye-and-hand) state, occupies the ascendant, it yields poverty; but placed in any other house it grants the lordship of a city.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ जिस "नेत्रपाणि-अवस्था" पर फल टिका है, वह स्वयं इसी अध्याय के श्लोक 32–37 में नाम-अक्षर + यातदण्ड + लग्न को जोड़कर ÷12 शेष से निकाली गई चेष्टा-संख्या है; यह श्लोक केवल उस परिकलित अवस्था-अंक का अर्थ (फल) बताता है, और वह फल भी लग्न बनाम अन्यभ के सापेक्ष है।

हमारा डिकोड: एक ही अवस्था का यह भाव-सापेक्ष उलट फल ठीक वही अनुशासन दर्शाता है जिसे हमने पूरे इंजन में पकड़ा — फल शास्त्र का स्थान-आश्रित कथन है, कोई नियति नहीं; और भाव 19–20 के "बलाबल-विचार" की तरह इसका निर्णय बल पर निर्भर करता है, जिस बल को हम षड्बल (Ch.27) के रूप में रूप/विरूप में शुद्ध गणना मानकर व्याख्या से अलग रखते हैं।

45.67
प्रकाशो गुणस्यापि वासः प्रकाशे धराधीशभ्रतुः सदा मानवृद्धिः |
सुते भूसुते पुत्रकान्तावियोगो भवेद्राहुणा दारुणो वा निपातः
prakāśo guṇasyāpi vāsaḥ prakāśe dharādhīśabhratuḥ sadā mānavṛddhiḥ |
sute bhūsute putrakāntāviyogo bhavedrāhuṇā dāruṇo vā nipātaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रकाश-अवस्था = चेष्टा की चौथी (प्रकाशन/दीप्ति) अवस्था; गुणस्य प्रकाशः = गुणों का प्रकट होना; वास = स्थिति/निवास; धराधीश-भ्रातृ = राजा का भाई (सदृश मान) — "भ्रतुः" पाठ-भेद संभव; मानवृद्धि = प्रतिष्ठा-वृद्धि; सुत(भाव) = पंचम/संतान-स्थान; भूसुत = मंगल; पुत्र-कान्ता-वियोग = पुत्र व पत्नी से वियोग; राहुणा निपात = राहु-योग से पतन/आपत्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — प्रकाश (प्रकाशन) अवस्था में मंगल गुणों का प्रकट होना, प्रतिष्ठित निवास, राजा के भाई-सदृश मान तथा निरन्तर प्रतिष्ठा-वृद्धि देता है। किन्तु जब यही मंगल पंचम (संतान) भाव में हो, तो पुत्र व पत्नी से वियोग का, अथवा राहु से युक्त होने पर किसी दारुण पतन का फल कहा गया है। यहाँ पाठ कुछ स्थलों पर अस्पष्ट है, अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering In the prakāśa (shining) state Mars brings forth virtue, an honored dwelling, standing like a king's brother, and ever-growing prestige; yet placed in the fifth house it is said to give separation from son and wife, or, joined with Rāhu, a grievous downfall.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। एक ही प्रकाश-अवस्था का शुभ फल तब पलटता है जब स्थान (पंचम भाव) या योग (राहु-युति) की शर्त जुड़ती है — अर्थात् फल अवस्था + भाव + योग की संयुक्त शर्त पर है, कोई स्वतंत्र संख्या-सूत्र नहीं।

45.68
गमने गमनं कुरुतेऽनुदिनं व्रणजालभयं वनिताकलहः |
बहुदद्रुककण्डुभयं बहुधा वसुधातनयो वसुहानिकरः
gamane gamanaṃ kurute'nudinaṃ vraṇajālabhayaṃ vanitākalahaḥ |
bahudadrukakaṇḍubhayaṃ bahudhā vasudhātanayo vasuhānikaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गमन-अवस्था = चेष्टा की पाँचवीं (गमनशील) अवस्था; अनुदिनं = प्रतिदिन; व्रणजाल-भय = बहुत घावों/व्रणों का भय; वनिता-कलह = स्त्री से कलह; दद्रु = दाद (त्वचा-रोग); कण्डू = खुजली; वसुधातनय = मंगल; वसुहानिकर = धन (वसु) की हानि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गमन (चेष्टा) अवस्था में स्थित मंगल जातक को प्रतिदिन इधर-उधर की यात्रा (भ्रमण), अनेक व्रणों का भय, स्त्री से कलह, तथा दाद-खुजली आदि त्वचा-विकारों की बहुलता का फल देता है, और अनेक प्रकार से धन-हानि का कारण बनता है। यह पूर्णतः फल-वर्णन है।

English rendering The text states that Mars in the gamana (going) state makes one wander daily, dread a host of wounds, quarrel with one's wife, suffer much ringworm and itching, and become in many ways a cause of loss of wealth.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह चेष्टा-अवस्थाओं की उस श्रेणी का पाँचवाँ पद (गमन) है जिसका अवस्था-अंक श्लोक 37 में शेष ÷ 3 से मिलने वाली दृष्टि/चेष्टा/विचेष्टा-विभाजन-परंपरा के साथ जुड़ता है; यहाँ केवल फल है, गणना नहीं।

45.69
आगमने गुणशाली मणिमालीवा करालकरवाली |
गजहन्ता रिपुहन्ता परिजनसन्तापहारको भौमे
āgamane guṇaśālī maṇimālīvā karālakaravālī |
gajahantā ripuhantā parijanasantāpahārako bhaume

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमन-अवस्था = चेष्टा की छठी (आगमन) अवस्था; गुणशाली = गुणसंपन्न; मणिमाली = रत्नमाला-धारी ("मणिमालीवा" पाठ-भेद संभव); करवाल = तलवार, करालकरवाली = भीषण खड्गधारी; गजहन्ता = हाथियों का संहारक (रणकुशल); रिपुहन्ता = शत्रुनाशक; परिजन-सन्ताप-हारक = स्वजनों का दुःख हरने वाला; भौम = मंगल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आगमन (चेष्टा) अवस्था में मंगल जातक को गुणवान्, रत्नमाला-धारी (ऐश्वर्यसंपन्न), भीषण खड्ग चलाने में समर्थ, गज एवं शत्रुओं का संहारक (रणवीर) तथा अपने स्वजनों के सन्ताप को हरने वाला बनाता है। यह मंगल की वीरता-प्रधान शुभ अवस्था का फल-वर्णन है।

English rendering In the āgamana (coming) state Mars is said to make one virtuous, jewel-garlanded, wielder of a fearsome sword, slayer of elephants and foes, and remover of his kinsfolk's distress.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वीर-गुण-वर्णन)। भौम की कारकता (पराक्रम, शस्त्र, रण) और आगमन-अवस्था का "सक्रिय" स्वभाव यहाँ मिलकर शौर्यमय फल में ढलते हैं — यह ग्रह-कारक + अवस्था का साहचर्य है, संख्यात्मक विधि नहीं।

45.70
तुङ्गे युद्धकलाकलापकुशलो धर्मध्वजो वित्तपः |
कोणे भूमिसुते सभामुपगते विद्याविहीनः पुमान् |
अन्तेऽपत्यकलत्रमित्ररहितः प्रोक्तेतरस्थानगे |
ऽवश्यं राजसभाबुधो बहुधनी मानी च दानी जनः
tuṅge yuddhakalākalāpakuśalo dharmadhvajo vittapaḥ |
koṇe bhūmisute sabhāmupagate vidyāvihīnaḥ pumān |
ante'patyakalatramitrarahitaḥ proktetarasthānage |
'vaśyaṃ rājasabhābudho bahudhanī mānī ca dānī janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सभा-अवस्था = चेष्टा की (सभा में उपस्थिति) अवस्था; तुङ्ग = उच्च राशि (exaltation); युद्धकला-कलाप-कुशल = समस्त युद्धकला में निपुण; धर्मध्वज = धर्म का ध्वजधारी; वित्तप = धनपति; कोण = त्रिकोण (5/9 भाव); अन्त = अन्तिम/दुःस्थान; अपत्य-कलत्र-मित्र-रहित = संतान-पत्नी-मित्र से रहित; प्रोक्त-इतर-स्थान = कहे गए स्थानों से भिन्न स्थान; राजसभा-बुध = राजसभा में विद्वान्; मानी/दानी = मानवान् व दानशील।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सभा (चेष्टा) अवस्था में मंगल का फल स्थान-सापेक्ष चार प्रकार का है: उच्च राशि में हो तो समस्त युद्धकला में निपुण, धर्मध्वजधारी और धनपति; त्रिकोण में हो तो विद्या-विहीन; अन्तिम (दुःस्थान) में हो तो संतान-पत्नी-मित्र से रहित; और इन कहे गए स्थानों से भिन्न किसी स्थान में हो तो निश्चय ही राजसभा का विद्वान्, बहुधनी, मानी और दानशील। यह एक ही अवस्था के भीतर बल/स्थान की सीढ़ी पर फल का क्रमिक परिवर्तन है।

English rendering The text states that Mars in the sabhā (assembly) state gives, when exalted, mastery of all warcraft, a banner of dharma, and wealth; in a trine, a man void of learning; in the end-house, one bereft of children, wife, and friends; and in any other place, surely a sage of the royal court — wealthy, honored, and generous.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन, किन्तु स्पष्ट बल/मर्यादा-सीढ़ी के साथ। तुङ्ग (उच्च) → कोण → अन्त → इतर — यह गरिमा-क्रम कोई अंकगणित नहीं, पर यही श्रेणी संकेत देती है कि फल स्थान-बल पर निर्भर है।

हमारा डिकोड: यहाँ "तुङ्ग" (उच्च) का उल्लेख उसी उच्च-बल का बीज है जिसे षड्बल (Ch.27) के स्थान-बल में हम रूप/विरूप में शुद्ध संख्या मानकर गिनते हैं (1 रूप = 60 विरूप), जबकि चार-स्थानीय फल शास्त्र का कथन बना रहता है। यही हमारा मूल अनुशासन है — बल की गणना अलग, फल की व्याख्या अलग; और जहाँ संख्या स्थान/उच्चता पर टिकती है वहाँ परिपाटी (उच्च-राशि, दुःस्थान) घोषित करके ही फल जोड़ा जाता है।

45.71
आगमे भवति भूमिजे जनो धर्मकर्मरहितो गदातुरः |
कर्णमूलगुरुशूलरोगवानेव कातरमतिः कुसङ्गमी
āgame bhavati bhūmije jano dharmakarmarahito gadāturaḥ |
karṇamūlaguruśūlarogavāneva kātaramatiḥ kusaṅgamī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगम-अवस्था = चेष्टा की (आगम) अवस्था; भूमिज = मंगल; धर्मकर्म-रहित = धर्म व सत्कर्म से हीन; गदातुर = रोगपीड़ित; कर्णमूल = कान की जड़; गुरुशूल = तीव्र शूल-पीड़ा; कर्णमूल-गुरुशूल-रोगवान् = कान की जड़ में भारी शूल-रोग से ग्रस्त; कातरमति = भीरु/डरपोक बुद्धि; कुसङ्गमी = बुरी संगति वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आगम (चेष्टा) अवस्था में मंगल जातक को धर्म व सत्कर्म से हीन, रोगपीड़ित, कान की जड़ में तीव्र शूल-रोग से ग्रस्त, भीरु-बुद्धि तथा कुसंगति वाला बनाता है। यह मंगल की एक अशुभ चेष्टा-अवस्था का फल-वर्णन है; इसे शास्त्र का कथन मानें, नियति नहीं।

English rendering The text states that Mars in the āgama state makes one bereft of dharma and good works, disease-ridden, afflicted with acute pain at the root of the ear, timid of mind, and given to bad company.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रोग/स्वभाव-वर्णन)। "आगम" और श्लोक 69 की "आगमन" दो निकट किन्तु भिन्न चेष्टा-पद हैं (श्लोक 30–31 की बारह-सूची में क्रमशः गिने गए); उनका पृथक् फल इसी अवस्था-भेद से निकलता है, किसी संख्या-सूत्र से नहीं।

45.72
भोजने मिष्टभोजी च जनने सबले कुजे |
नीचकर्मकरो नित्यं मनुजो मानवर्जितः
bhojane miṣṭabhojī ca janane sabale kuje |
nīcakarmakaro nityaṃ manujo mānavarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजन-अवस्था = चेष्टा की (भोजन) अवस्था; मिष्टभोजी = स्वादिष्ट भोजन करने वाला; जनने = जन्मकाल में; सबल = बलयुक्त; कुज = मंगल; नीचकर्मकर = निंद्य/निम्न कर्म करने वाला; नित्यं = सदा; मानवर्जित = मान-रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जन्मकाल में जब मंगल भोजन (चेष्टा) अवस्था में और बलयुक्त हो, तब जातक स्वादिष्ट भोजन का भोक्ता तो होता है, पर सदा नीच (निंद्य) कर्म करने वाला और मान-रहित रहता है। यहाँ "सबल" शब्द ध्यातव्य है — फल की शर्त ही ग्रह-बल पर रखी गई है।

English rendering The text states that when Mars, at birth, is in the bhojana (eating) state and strong, the person eats fine food yet ever does base deeds and is devoid of honor.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन, परन्तु "सबल" द्वारा बल-आश्रित। श्लोक स्वयं फल को ग्रह के बल से बाँधता है (सबल कुज), जो दर्शाता है कि अवस्था-फल की तीव्रता बलाबल पर निर्भर है — बल की मात्रा स्वयं पृथक् गणना का विषय है।

हमारा डिकोड: "सबले कुजे" जैसा शब्द ठीक वही द्वार खोलता है जिसे हमने अलग रखा — बल की मात्रा (षड्बल, Ch.27: स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्, रूप-विरूप में) एक निश्चित संख्यात्मक नियम है, और उसी बल के ऊपर शास्त्र का फल-कथन बैठता है। हम बल को exact गणना और फल को "शास्त्र कहता है" के रूप में सदैव पृथक् रखते हैं।

45.73
नृत्यलिप्सागते भूसुते जन्मिनामिन्दिराराशिरायाति भूमीपतेः |
स्वर्नरत्नप्रवालैः सदा मण्डिता वासशाला नराणां भवेत्सर्वदा
nṛtyalipsāgate bhūsute janmināmindirārāśirāyāti bhūmīpateḥ |
svarnaratnapravālaiḥ sadā maṇḍitā vāsaśālā narāṇāṃ bhavetsarvadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्यलिप्सागते = नृत्यलिप्सा-अवस्था को प्राप्त; भूसुते = मङ्गल (भूमि-सुत); जन्मिनाम् = जातकों के; इन्दिराराशिः = लक्ष्मी/ऐश्वर्य-राशि (इन्दिरा = लक्ष्मी); भूमीपतेः = भूमिपति/राजा का; स्वर्णरत्नप्रवालैः = स्वर्ण–रत्न–प्रवाल से (पाठ: स्वर्नरत्न — पाठ-भेद संभव); वासशाला = निवास-शाला; सर्वदा = सदा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मङ्गल नृत्यलिप्सा-अवस्था में हो, तो जातकों को लक्ष्मी-सम्पदा और भूमिपति-तुल्य ऐश्वर्य का आगमन कहा गया है। उनकी वासशाला स्वर्ण, रत्न और प्रवाल से सदा मण्डित बताई गई है। यह शुभ फल-कथन अवस्था-विशेष से जुड़ा है; “स्वर्नरत्न” में पाठ-भेद संभव है — सामान्यतः स्वर्ण–रत्न पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that when Mars enters the Nṛtyalipsā avasthā, wealth of Indirā (Lakṣmī) and royal-level fortune are said to come to the natives; their dwellings are described as always adorned with gold, gems, and coral (reading of “svarna/svarṇa” may vary—पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। नृत्यलिप्सा-अवस्था का ऐश्वर्य-फल यहाँ वर्णित है; कोई अंश, वर्ग या काल-माप नहीं दिया गया।

45.74
कौतुकी भव्ति कौतुके कुजे मित्रपुत्रपरिपूरितो जनः |
उच्चगे नृपतिगेहमण्डितः पूजितो गुणवरैर्गुणाकरैः
kautukī bhavti kautuke kuje mitraputraparipūrito janaḥ |
uccage nṛpatigehamaṇḍitaḥ pūjito guṇavarairguṇākaraiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतुक-अवस्था = चेष्टा की (कौतुक/उत्सव) अवस्था; कौतुकी = उत्सवप्रिय/कुतूहलयुक्त ("भव्ति" = भवति, वर्तनी-दोष/पाठ-भेद संभव); कुज = मंगल; मित्र-पुत्र-परिपूरित = मित्रों व पुत्रों से संपन्न; उच्चग = उच्च राशि में स्थित; नृपतिगेह-मण्डित = राजभवन से सुशोभित; गुणवर = श्रेष्ठ गुणी जन; गुणाकर = गुणों की खान (गुणनिधि जन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कौतुक (चेष्टा) अवस्था में मंगल जातक को उत्सवप्रिय, तथा मित्रों और पुत्रों से संपन्न बनाता है; और यदि वही मंगल उच्च राशि में हो, तो जातक राजभवन से सुशोभित (राजाश्रित) एवं श्रेष्ठ गुणी जनों द्वारा पूजित होता है। यहाँ भी उच्च स्थिति फल को और बढ़ा देती है।

English rendering The text states that Mars in the kautuka (festivity) state makes one festive and rich in friends and sons; and, when exalted, graced by the royal house and honored by men who are veritable mines of virtue.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "उच्चग" (उच्चस्थ) की शर्त फल को उन्नत करती है — वही उच्च-बल का संकेत जो पूरे अध्याय में शुभ फल का वर्धक है; यह स्थान-मर्यादा है, स्वतंत्र संख्या-सूत्र नहीं।

45.75
निद्रावस्थां गते भौमे क्रोधी धीधनवर्जितः |
धूर्तो धर्मपरिभ्रष्टो मनुष्यो गदपीडितः
nidrāvasthāṃ gate bhaume krodhī dhīdhanavarjitaḥ |
dhūrto dharmaparibhraṣṭo manuṣyo gadapīḍitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्रा-अवस्था = चेष्टा की (निद्रा) अवस्था; भौम = मंगल; क्रोधी = क्रोधशील; धी-धन-वर्जित = बुद्धि व धन से रहित; धूर्त = कपटी; धर्मपरिभ्रष्ट = धर्म से पतित; गदपीडित = रोगपीड़ित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मंगल निद्रा (चेष्टा) अवस्था को प्राप्त हो, तब जातक क्रोधशील, बुद्धि व धन से हीन, कपटी, धर्म से पतित तथा रोगपीड़ित होता है। निद्रा-अवस्था ग्रह की सबसे "शून्य-फल" अवस्था मानी गई है (श्लोक 6: सुषुप्ति में फल शून्य), अतः यहाँ अशुभ फल स्वाभाविक है — इसे शास्त्र का कथन मानें।

English rendering The text states that when Mars enters the nidrā (sleep) state, the person becomes irascible, void of intellect and wealth, a rogue, fallen from dharma, and afflicted by disease.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संगति ध्यातव्य: इसी अध्याय के श्लोक 6 में सुषुप्ति (गहन-निद्रा) का "फलं शून्यम्" कहा गया — निद्रा-अवस्था में ग्रह का शुभ प्रभाव न्यूनतम रहता है, अतः यह अशुभ-प्रधान वर्णन उसी तर्क का अनुसरण है।

45.76
क्षुधातुरो भवेदंगे खञ्जो गुञ्जानिभेक्षणः |
अन्यभे लम्पटो धूर्तो मनुजः शयने बुधे
kṣudhāturo bhavedaṃge khañjo guñjānibhekṣaṇaḥ |
anyabhe lampaṭo dhūrto manujaḥ śayane budhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शयन-अवस्था = चेष्टा की (शयन) अवस्था; बुध = बुध ग्रह; क्षुधातुर = भूख से पीड़ित; अंग = लग्न/तनु-भाव (देह-स्थान) — पाठ-भेद संभव; खञ्ज = लँगड़ा; गुञ्जा = घुँघची (लाल-काला बीज); गुञ्जानिभ-ईक्षण = घुँघची-सदृश (लाल) नेत्रों वाला; अन्यभ = अन्य राशि/भाव; लम्पट = कामासक्त; धूर्त = कपटी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शयन (चेष्टा) अवस्था में बुध का फल स्थान-सापेक्ष है: यदि बुध लग्न (देह-स्थान) में हो तो जातक भूख से पीड़ित, लँगड़ा तथा घुँघची-सदृश लाल नेत्रों वाला होता है; और यदि अन्य किसी भाव में हो तो कामासक्त एवं कपटी। यहीं से बुध-ग्रह की चेष्टा-अवस्थाओं का फल-क्रम आरम्भ होता है।

English rendering The text states that when Mercury is in the śayana (lying) state: placed in the lagna, the person is hunger-afflicted, lame, and red-eyed like the guñjā berry; placed in another sign, lustful and a rogue.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह मंगल के बारह चेष्टा-फलों के बाद बुध-श्रृंखला का प्रथम पद (शयन) है; फल पुनः लग्न बनाम अन्यभ की स्थान-शर्त पर बँटता है, किसी अंक-सूत्र पर नहीं।

45.77
शशांकपुत्रे जनुरण्गगेहे यदोपवेशे गुणराशिपूर्णः |
पापेक्षिते पापयुते दरिद्रो हिते शुभे वित्तसुखी मनुष्यः
śaśāṃkaputre januraṇgagehe yadopaveśe guṇarāśipūrṇaḥ |
pāpekṣite pāpayute daridro hite śubhe vittasukhī manuṣyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशांकपुत्रे = बुध (चन्द्र-पुत्र); जनुः-अङ्ग-गेहे = जन्म-अङ्ग-गृह (लग्न) में; उपवेशे = उपवेश-अवस्था में; गुणराशिपूर्णः = गुण-राशि से पूर्ण; पापेक्षिते = पाप-दृष्ट; पापयुते = पाप-युक्त; दरिद्रः = दरिद्र; हिते शुभे = हित/शुभ योग में; वित्तसुखी = वित्त से सुखी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध जन्म-अङ्ग-गृह (लग्न) में उपवेश-अवस्था में हो, तो जातक गुण-राशि से पूर्ण कहा गया है। यदि वह पाप-दृष्ट या पाप-युक्त हो तो दरिद्र बताया गया है; हित–शुभ स्थिति में वित्त-सुखी मनुष्य कहा गया है। यह एक ही अवस्था में योग-भेद से फल-भेद का शास्त्रीय नियम है — शुभ/पाप यहाँ दृष्ट–युति का संकेत है, गणना-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that when Mercury (the Moon’s son), placed in the birth-body house (lagna) in the Upaveśa avasthā, the native is full of virtues; if aspected by or joined with a malefic, poverty is stated; if with a friendly/benefic configuration, the person is said to be happy in wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। उपवेश-अवस्था + लग्न-स्थिति + पाप/शुभ योग का त्रिविध फल-भेद है; दृष्टि-अंश या बल-सीमा इस श्लोक में नहीं दी गई।

45.78
विद्याविवेकरहितो हिततोषहीनो मनी |
जनोभवति चन्द्रसुतेऽक्षि पाणौ |
पुत्रालये सुतकलत्रसुखेन हीनः कन्या |
प्रजा नृपतिगेहबुधो वरार्थः
vidyāvivekarahito hitatoṣahīno manī |
janobhavati candrasute'kṣi pāṇau |
putrālaye sutakalatrasukhena hīnaḥ kanyā |
prajā nṛpatigehabudho varārthaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रसुते = बुध (चन्द्र-पुत्र); अक्षि = नेत्र; पाणौ = हाथ में; विद्या-विवेक-रहितः = शास्त्र-ज्ञान और विवेक से रहित; हित-तोष-हीनः = हितकर सन्तोष से शून्य; मनी/मानी = अहंकारी; पुत्रालये = पुत्र-स्थान (पञ्चम भाव); सुत-कलत्र-सुखेन हीनः = पुत्र-पत्नी-सुख से रहित; कन्या-प्रजा = कन्या-सन्तान; नृपति-गेह = राज-गृह/राज-स्थान; वरार्थः = वर/विवाह-अर्थी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब जन्म-काल में बुध अक्षि-पाणि अवस्था में हो, तो जातक विद्या और विवेक से रहित, हित-सन्तोष से हीन तथा अभिमानी होता है। पुत्रालय में स्थित बुध पुत्र-कलत्र-सुख से वंचित रखता है और सन्तान में कन्या-प्रजा का संकेत देता है। नृपति-गेह में बुध वाले जातक को वरार्थ (विवाह/वर-प्राप्ति का प्रयोजन) कहा गया है। पाठ-भेद संभव: «मनी» का अर्थ-प्रवाह «मानी» के रूप में लिया जाता है।

English rendering The text states that with Mercury in the eye-and-hand condition the native lacks learning and discrimination, is without wholesome contentment, and is proud; in the house of children, devoid of son-and-spouse happiness and with daughter-offspring; and with Mercury in the royal abode, oriented toward marriage or a bridegroom’s purpose.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध की अवस्था/स्थानानुसार जन्म-फल)। यह अध्याय-४५ की अवस्था-फल परम्परा का वर्णनात्मक नियम है; कोई अंश, वर्ग-विभाजन या बल-इकाई यहाँ कूटबद्ध नहीं।

45.79
दाता दयालुः खलु पुण्यकर्ता विकाशने चन्द्रसुते मनुष्यः |
अनेकविद्यार्णवपारङ्गता विवेकपूर्णः खलवर्गहन्ता
dātā dayāluḥ khalu puṇyakartā vikāśane candrasute manuṣyaḥ |
anekavidyārṇavapāraṅgatā vivekapūrṇaḥ khalavargahantā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाता = दानशील; दयालुः = करुणामय; पुण्यकर्ता = पुण्यकर्मी; विकाशने = प्रकाश/विकाश-चेष्टावस्था में (उद्दीप्त-चेष्टा); चन्द्रसुते = बुध ग्रह (चन्द्र-पुत्र); अनेकविद्यार्णव-पारंगत = अनेक विद्याओं के सागर के पार गया हुआ; विवेकपूर्णः = विवेक से भरा; खलवर्गहन्ता = दुष्ट-समूह का नाशक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब जन्म-समय बुध "विकाश/प्रकाश" चेष्टावस्था में हो, तब जातक दानशील, करुणामय और पुण्यकर्मी होता है; वह अनेक विद्याओं के महासागर को पार कर लेता है, विवेक से परिपूर्ण रहता है और दुर्जनों का दमन करने वाला बनता है। यह बुध की उद्दीप्त-चेष्टा का शुभ फल-कथन है।

English rendering The text states that when Mercury stands in the "shining/revealing" (prakāśa) activity-state at birth, the native is generous, compassionate and merit-doing — one who crosses the ocean of many sciences, full of discernment, a subduer of the wicked.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। तकनीकी आधार यह है कि ग्रह की बारह "शयनादि" चेष्टावस्थाओं में से कौन-सी लागू होती है, वह इसी अध्याय (45.30–34) की संचित-योग mod 12 प्रक्रिया से तय होती है (श्लोक 33: "रविभिः हरेत्" → भाजक = 12 = द्वादश आदित्य); यह श्लोक केवल "प्रकाश" अवस्था का परिणाम बताता है। बारह अवस्थाओं का क्रम (शयन, उपवेश, नेत्रपाणि, प्रकाश, गमन, आगमन, सभा, आगम, भोजन, नृत्यलिप्सा, कौतुक, निद्रा) श्लोक 30–31 में गिना गया है — नृत्य/लिप्सा तथा नेत्रपाणि/प्रकाश के विभाजन पर पाठ-भेद संभव।

45.80
गमनागमने भवतो गमने बहुधा वसुधाधिपतेर्भवने |
भवनं च विचित्रमलं रमया विदि नुश्च जनुःसमये नितराम्
gamanāgamane bhavato gamane bahudhā vasudhādhipaterbhavane |
bhavanaṃ ca vicitramalaṃ ramayā vidi nuśca januḥsamaye nitarām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गमनागमने = आना-जाना/यात्रा-अवस्था में; गमने = गमन में; वसुधाधिपतेः भवने = पृथ्वी-स्वामी (राजा/शासक) के भवन में; बहुधा = अनेक प्रकार से/बार-बार; भवनं विचित्रम् = विचित्र/रचना-सम्पन्न गृह; रमया = रमा (लक्ष्मी/शोभा) से; अलम् = पर्याप्त/समृद्ध; जनुः-समये = जन्म-काल में; नितराम् = अत्यन्त/निरन्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गमनागमन-अवस्था में बुध होने पर जातक को वसुधाधिपति के भवन में बार-बार आना-जाना प्राप्त होता है। गृह विचित्र और रमा (शोभा/समृद्धि) से अलंकृत कहा गया है; जन्म-समय की इस स्थिति को अत्यन्त प्रभावी बताया गया है। कुछ पदों में पाठ-भेद संभव — «विदि नुश्च» आदि पंक्ति-रूप संदिग्ध रह सकते हैं।

English rendering The text states that with Mercury in the going-and-coming condition there is frequent movement in the abode of earth-rulers; the dwelling is said to be wonderfully adorned and full of grace (ramā), and this is strongly marked at the time of birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गमनागमन-अवस्था का सामाजिक/स्थान-फल)। यात्रा-बारम्बारता या गृह-शोभा को यहाँ संख्या-सूत्र में नहीं बाँधा गया।

45.81
सपदि विदि जनानामुच्चगे जन्मकाले |
सदसि धनसमृद्धिः सर्वदा पुण्यवृद्धिः |
धनपतिसमता वा भूपता मंत्रिता वा |
हरिहरपदभक्तिः सात्त्विकी मुक्तिलब्धिः
sapadi vidi janānāmuccage janmakāle |
sadasi dhanasamṛddhiḥ sarvadā puṇyavṛddhiḥ |
dhanapatisamatā vā bhūpatā maṃtritā vā |
hariharapadabhaktiḥ sāttvikī muktilabdhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सपदि = तत्काल; विदि = बुध; उच्चगे = उच्च राशि में स्थित; सदसि = सभा (सभा-चेष्टावस्था) में; धनसमृद्धिः = धन-वैभव; पुण्यवृद्धिः = पुण्य की निरन्तर वृद्धि; धनपतिसमता = कुबेर-तुल्यता; भूपता/मंत्रिता = राजापद/मन्त्रिपद; हरिहरपदभक्तिः = विष्णु-शिव के चरणों में भक्ति; सात्त्विकी मुक्तिलब्धिः = सात्त्विक मुक्ति की प्राप्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध जन्म-समय उच्च राशि में तथा "सभा" चेष्टावस्था में हो, तब शीघ्र ही सभाओं में धन-समृद्धि और सतत पुण्य-वृद्धि होती है; जातक कुबेर-सम धनी, अथवा राजा या मन्त्री तुल्य होता है, और हरि-हर में भक्ति रखते हुए सात्त्विक मुक्ति का अधिकारी बताया गया है।

English rendering The text states that when Mercury is exalted and in the "assembly" (sabhā) state at birth, wealth-prosperity and ever-growing merit come swiftly in assemblies; one becomes Kubera-like in riches, or a king, or a minister — devoted to Hari and Hara, attaining a sāttvic liberation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल), किन्तु दो तकनीकी शर्तें द्वार का काम करती हैं: (i) "सभा" चेष्टावस्था (mod 12 गणना का सभा-कोष्ठ) और (ii) उच्चग = ग्रह का उच्च राशि में होना, जो स्थान-आधारित बल की शर्त है। फल का उभार इन्हीं दो स्थिति-शर्तों से जुड़ा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "उच्चग" यहाँ पूरे फल को तीव्र करता है — यही स्थान-बल (sthāna-bala) की धुरी है, जिसे हमने षड्बल ढाँचे (BPHS Ch.27; sthāna, dig, kāla, ceṣṭā, naisargika, dṛg — 1 रूप = 60 विरूप) में सुस्पष्ट गणनीय नियम के रूप में रखा। हमारी अनुशासन-रेखा के अनुरूप, "कुबेर-तुल्यता / राजापद" जैसे कथनों को हम शास्त्र-वचन के रूप में प्रस्तुत करते हैं, नियति-प्रतिज्ञा के रूप में नहीं।

45.82
आगमे जनुषि जन्मिनां यदा चन्द्रजे भवति हीनसेवया |
अर्थसिद्धिरपि पुत्रयुग्मता बालिका भवति मानदायिका
āgame januṣi janmināṃ yadā candraje bhavati hīnasevayā |
arthasiddhirapi putrayugmatā bālikā bhavati mānadāyikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमे = आगम/आगमन-चेष्टावस्था में; जनुषि = जन्म-समय; जन्मिनाम् = जातकों के लिए; चन्द्रजे = बुध; हीनसेवया = हीन/निम्न सेवा के द्वारा; अर्थसिद्धिः = धन-लाभ; पुत्रयुग्मता = दो पुत्रों का होना; बालिका = कन्या; मानदायिका = मान (सम्मान) देने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध जन्म-समय "आगमन" चेष्टावस्था में हो, तब हीन/निम्न सेवा के मार्ग से भी धन-सिद्धि होती है; जातक को दो पुत्र और एक मान-प्रतिष्ठा देने वाली कन्या प्राप्त होती है। "हीनसेवया" पर पाठ-भेद संभव (निम्न-जनों की सेवा से, अथवा अल्प-सेवा से भी)।

English rendering The text states that when Mercury is in the "coming" (āgama) state at birth, wealth is gained even through humble service, and there come two sons and an honour-bringing daughter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। "पुत्रयुग्मता" (= 2 पुत्र) एकमात्र संख्या-सूचक शब्द है, जिसे बहुवचन-द्विक के रूप में अंकश: पढ़ा गया; शेष सन्तति/धन का कथन गणना नहीं, फल-वर्णन है। अवस्था-निर्धारण पूर्ववत् 45.33 की mod 12 विधि से।

45.83
भोजने चन्द्रजे जन्मकाले यदा जन्मिनानर्थहानिः सदा वादतः |
राजभीत्या कृशत्वंचलत्वं मतेरङ्गसङ्गो न जाया न जायासुखम्
bhojane candraje janmakāle yadā janminānarthahāniḥ sadā vādataḥ |
rājabhītyā kṛśatvaṃcalatvaṃ materaṅgasaṅgo na jāyā na jāyāsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजने = भोजन-चेष्टावस्था में; चन्द्रजे = बुध; अर्थहानिः = धन-हानि; वादतः = विवाद/कलह से; राजभीत्या = राजा से भय के कारण; कृशत्वं = दुर्बलता/क्षीणता; चलत्वं मतेः = बुद्धि की चंचलता; अंगसंगः = शारीरिक कष्ट/रोग-संग; न जाया न जायासुखम् = न पत्नी न दाम्पत्य-सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार, जब बुध जन्म-समय "भोजन" चेष्टावस्था में हो, तब जातक को विवादों से निरन्तर धन-हानि, राजभय, शारीरिक क्षीणता, बुद्धि की चंचलता और देह-कष्ट होता है; तथा पत्नी एवं दाम्पत्य-सुख का अभाव कहा गया है। यह अशुभ चेष्टा का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Mercury is in the "eating" (bhojana) state at birth, there is continual loss of wealth through quarrels, fear from the king, emaciation, fickleness of mind and bodily affliction, with neither wife nor conjugal happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट फल-वर्णन)। ध्यातव्य अनुशासन: यह हानि/रोग/वैवाहिक-अभाव का कथन शास्त्र का वचन है — इसे भय या निश्चित नियति की तरह नहीं, "पाठ इस अवस्था-योग में यह फल कहता है" के रूप में पढ़ना चाहिए; कोई चिकित्सकीय/वैयक्तिक भविष्यवाणी नहीं।

45.84
नृत्यलिप्सागते चन्द्रजे मानवो मानयानप्रवालव्रजैः संयुतः |
मित्रपुत्रप्रतापैः सभापण्डितः पापभे वारवामारतो लम्पटः
nṛtyalipsāgate candraje mānavo mānayānapravālavrajaiḥ saṃyutaḥ |
mitraputrapratāpaiḥ sabhāpaṇḍitaḥ pāpabhe vāravāmārato lampaṭaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्यलिप्सागते = नृत्य-लिप्सा चेष्टावस्था में गया हुआ; चन्द्रजे = बुध; मानयान-प्रवाल-व्रजैः = मान, वाहन और मूँगों (प्रवाल) की राशियों से; संयुतः = युक्त; मित्रपुत्रप्रतापैः = मित्रों-पुत्रों के प्रताप से; सभापण्डितः = सभा में पण्डित; पापभे = पाप (क्रूर) राशि में; वारवामारतः = वेश्याओं में आसक्त; लम्पटः = कामलम्पट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध "नृत्यलिप्सा" चेष्टावस्था में हो, तब जातक मान, वाहन और प्रचुर मूँगा-सम्पत्ति से युक्त, मित्रों-पुत्रों के प्रताप से समृद्ध और सभा का विद्वान् होता है; किन्तु यदि बुध पाप-राशि में स्थित हो, तो वही जातक वेश्यासक्त और लम्पट कहा गया है। एक ही चेष्टा का फल राशि-दशा से पलट जाता है।

English rendering The text states that when Mercury is in the "eager-to-dance" (nṛtya-lipsā) state, the native has honour, vehicles and heaps of coral, is glorified by friends and sons, and is learned in the assembly; but if Mercury lies in a malefic sign, he becomes addicted to courtesans and lecherous.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन, परन्तु "पापभे" (= पाप-राशि में स्थिति) एक गुणात्मक तकनीकी द्वार है जो फल की दिशा उलट देता है। यही दर्शाता है कि चेष्टावस्था-फल राशि-मैत्री/स्वभाव (शुभ बनाम पाप ग्रह की राशि) पर सप्रतिबन्ध है, न कि निरपेक्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पाप-राशि बनाम शुभ-राशि" जैसी शर्त राशि-स्वामी के स्वभाव पर टिकी है — यही D1 (राशि) दिग्नति/मैत्री का ढाँचा है, जिसे हमने षोडश-वर्ग इंजन (BPHS Ch.6; D1…D60 प्रत्येक 30° का नियमबद्ध विभाजन) में दृढ़-गणनीय रखा। जहाँ परम्पराएँ मतभेद रखती हैं, हम चुनी हुई परिपाटी घोषित करके ही फल-दिशा तय करते हैं।

45.85
कौतुके चन्द्रजे जन्मकाले नृणामंगभे गीतविद्याऽनवद्या भवेत् |
सप्तमे नैधने वारवध्वा रतिः पुण्यभे पुण्ययुक्ता मतिः सद्गतिः
kautuke candraje janmakāle nṛṇāmaṃgabhe gītavidyā'navadyā bhavet |
saptame naidhane vāravadhvā ratiḥ puṇyabhe puṇyayuktā matiḥ sadgatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतुके = कौतुक-चेष्टावस्था में; चन्द्रजे = बुध; अंगभे = लग्न (अंग = प्रथम भाव/देह) राशि में; गीतविद्या अनवद्या = निर्दोष (उत्कृष्ट) संगीत-विद्या; सप्तमे नैधने = सप्तम अथवा अष्टम (निधन/मृत्यु) भाव में; वारवध्वा रतिः = वेश्या में आसक्ति; पुण्यभे = पुण्य/शुभ (धर्म) राशि में; पुण्ययुक्ता मतिः = पुण्यमयी बुद्धि; सद्गतिः = शुभ गति/परलोक-कल्याण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध "कौतुक" चेष्टावस्था में हो, तब भाव-भेद से फल भिन्न होता है: लग्न-राशि में हो तो निर्दोष संगीत-विद्या; सप्तम या अष्टम में हो तो वेश्या-आसक्ति; और शुभ/पुण्य राशि में हो तो पुण्यमयी बुद्धि तथा सद्गति। एक चेष्टा, अनेक स्थिति-सापेक्ष परिणाम।

English rendering The text states that when Mercury is in the "festive" (kautuka) state: in the ascendant-sign it gives flawless mastery of music; in the 7th or 8th it gives attachment to courtesans; in an auspicious sign, a merit-filled mind and a good destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन, किन्तु यहाँ तीन भाव/राशि-शर्तें (अंगभ = लग्न, सप्तम/नैधन = 7/8, पुण्यभ = शुभ राशि) फल को शाखाबद्ध करती हैं — एक स्पष्ट "यदि भाव X तो फल Y" तर्क-वृक्ष। भाव-गणना दृढ़ है; व्याख्या शास्त्र का वचन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक "एक ही चेष्टा, भाव-सापेक्ष अनेक फल" का शुद्ध उदाहरण है — ठीक वही अनुशासन जिसे हमने अपनाया: गणित (कौन-सा भाव/राशि) को व्याख्या (उसका फल) से पृथक रखो, और शर्त बताने वाली परिपाटी (लग्न, 7/8, शुभ-राशि) को घोषित करो। जहाँ परम्पराएँ भिन्न पढ़ें (जैसे अष्टकवर्ग में BPHS Ch.66 बनाम फलदीपिका का '9' स्थानान्तर), वहाँ हम दोनों को साथ रखकर चुनी परिपाटी अंकित करते हैं, मौन चयन नहीं।

45.86
निद्राश्रिते चन्द्रसुते न निद्रासुखं सदा व्याधिसमाधियोगः |
सहोत्थवैकल्यमनल्पतापो निजेन वादो धनमाननाशः
nidrāśrite candrasute na nidrāsukhaṃ sadā vyādhisamādhiyogaḥ |
sahotthavaikalyamanalpatāpo nijena vādo dhanamānanāśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्राश्रिते = निद्रा-चेष्टावस्था को प्राप्त; चन्द्रसुते = बुध; न निद्रासुखं = नींद का सुख नहीं; व्याधिसमाधियोगः = रोग एवं मानसिक उद्वेग का योग; सहोत्थवैकल्यम् = सहज (जन्मजात) विकलांगता; अनल्पतापः = अल्प नहीं—अधिक सन्ताप; निजेन वादः = अपने ही (स्वजनों) से विवाद; धनमाननाशः = धन और मान का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध "निद्रा" चेष्टावस्था में हो, तब जातक को निद्रा-सुख नहीं मिलता, रोग और मानसिक व्यग्रता का सतत योग रहता है, जन्मजात कोई विकलता, अत्यधिक सन्ताप, स्वजनों से विवाद तथा धन-मान की हानि कही गई है। यह निद्रा-चेष्टा (शून्य-सम फल) का अनिष्ट कथन है।

English rendering The text states that when Mercury is in the "sleep" (nidrā) state, there is no restful sleep, a constant conjunction of illness and mental agitation, a congenital infirmity, great affliction, disputes with one's own kin, and loss of wealth and honour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट फल-वर्णन)। संरचनात्मक रूप से "निद्रा" बारह चेष्टाओं (45.30–34, mod 12) की अन्तिम अवस्था है, और अध्याय-आरम्भ की जागृत/स्वप्न/सुषुप्ति त्रयी (45.6) के अनुरूप "सुषुप्ति = शून्य फल" की श्रेणी से मेल खाती है — इसीलिए यहाँ फल न्यूनतम/प्रतिकूल कहा गया।

45.87
वचसामधिपे तु जनुःसमये शयने बलवानपि हीनरवः |
अतिगौरतनुः खलुदीर्घहनुः सुतरामरिभीतियुतो मनुजः
vacasāmadhipe tu januḥsamaye śayane balavānapi hīnaravaḥ |
atigauratanuḥ khaludīrghahanuḥ sutarāmaribhītiyuto manujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वचसाम् अधिपे = वाणी के स्वामी (वाचस्पति = बृहस्पति/गुरु) के; जनुःसमये = जन्म-समय; शयने = शयन-चेष्टावस्था में; बलवान् अपि = बलवान् होने पर भी; हीनरवः = क्षीण/मन्द स्वर वाला; अतिगौरतनुः = अत्यन्त गौर-वर्ण देह; दीर्घहनुः = लम्बी ठोड़ी/जबड़े वाला; सुतराम् अरिभीतियुतः = अत्यधिक शत्रु-भय से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु (वाणी-पति बृहस्पति) जन्म-समय "शयन" चेष्टावस्था में हो, तब जातक बलवान् होते हुए भी मन्द-स्वर, अत्यन्त गौरवर्ण, लम्बी ठोड़ी वाला और शत्रुओं से अत्यधिक भयभीत रहता है। यहाँ बृहस्पति-प्रकरण आरम्भ होता है।

English rendering The text states that when Jupiter (Vācaspati, lord of speech) is in the "reclining" (śayana) state at birth, the native, though strong, is feeble-voiced, very fair-complexioned, long-jawed, and exceedingly afraid of enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। यहाँ बुध-प्रकरण के बाद गुरु-प्रकरण का श्रीगणेश "शयन" अवस्था से होता है, जो 45.30–34 की mod 12 गणना का प्रथम कोष्ठ है; "वचसामधिप" उपनाम का सटीक विच्छेद (वाचस्पति = बृहस्पति) ही यह पुष्टि करता है कि विषय अब गुरु है।

45.88
उपवेशं गतवति यदि जीवे वाचालो बहुगर्वपरीतः |
क्षोणीपतिरिपुजनपतिर्तप्तः पदजंघास्यकरव्रणयुक्तः
upaveśaṃ gatavati yadi jīve vācālo bahugarvaparītaḥ |
kṣoṇīpatiripujanapatirtaptaḥ padajaṃghāsyakaravraṇayuktaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपवेश = उपवेश-अवस्था (उपवेशन/बैठने की अवस्था); गतवति = प्राप्त होने पर; जीव = बृहस्पति; वाचाल = बहुत बोलने वाला; बहु-गर्व-परीत = अत्यन्त गर्व से घिरा; क्षोणी-पति = पृथ्वी-स्वामी/नृप-संकेत; रिपु-जन-पति = शत्रु-जन का अधिपति (पाठानुसार शत्रु-पक्ष नेतृत्व); तप्त = तापित/पीड़ित; पद-जङ्घा-आस्य-कर-व्रण-युक्त = पैर, पिण्डली, मुख और हाथ पर व्रण से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि जीव (गुरु) उपवेश को प्राप्त हो, तो जातक वाचाल और बहु-गर्व से परिपूर्ण कहा गया है। क्षोणीपति-रिपुजनपति-तप्त — प्रतिष्ठा/विरोध-पक्ष और ताप का मिश्रित संकेत पाठ देता है। पद, जङ्घा, आस्य और कर पर व्रण-युक्त होना शारीरिक फल के रूप में कहा गया है। पाठ-भेद संभव: समास “क्षोणीपतिरिपुजनपतिः” के विच्छेद भिन्न संस्करणों में थोड़े अलग पढ़े जा सकते हैं।

English rendering The text states that when Jupiter has entered the upaveśa (seated) state, the person is talkative and steeped in much pride; heated as a lord of earth and of enemy-hosts, and marked with sores on the feet, shanks, face, and hands. Compound-parsing may vary by recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपवेश-अवस्था)। व्रण-स्थान सूची वर्णनात्मक है, कोई डिग्री-कट या वर्ग-भाग नहीं।

45.89
नेत्रपाणिं गते देवराजार्चिते रोगयुक्तो वियुक्तो वरार्थश्रिया |
गीतनृत्यप्रियः कामुकः सर्वदा गौरवर्णो विवर्णोद्भवप्रीतियुक्
netrapāṇiṃ gate devarājārcite rogayukto viyukto varārthaśriyā |
gītanṛtyapriyaḥ kāmukaḥ sarvadā gauravarṇo vivarṇodbhavaprītiyuk

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नेत्रपाणि = नेत्रपाणि-अवस्था (नामित अवस्था); गते = प्राप्त होने पर; देवराज-अर्चित = इन्द्र-अर्चित = गुरु (बृहस्पति); रोग-युक्त = रोग से युक्त; वियुक्तो वर-अर्थ-श्रिया = श्रेष्ठ अर्थ-श्री से वियुक्त; गीत-नृत्य-प्रिय = गीत-नृत्य का प्रेमी; कामुक = काम-प्रवण; सर्वदा = सदा; गौर-वर्ण = गौर वर्ण; विवर्ण-उद्भव-प्रीति-युक् = विवर्ण-जन्म वालों के प्रति प्रीति से युक्त (पाठानुसार; “विवर्ण” का सामाजिक-वर्ण अर्थ पाठ-सापेक्ष)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब देवराज-अर्चित गुरु नेत्रपाणि-अवस्था में हो, तो जातक रोग-युक्त तथा वर अर्थ-श्री से वियुक्त कहा गया है। गीत-नृत्य-प्रिय, सदा कामुक, गौरवर्ण, और विवर्णोद्भव-प्रीति — ये स्वभाव-रुचि संकेत हैं। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखें; चिकित्सा, धन-गारंटी या सामाजिक-दबाव का अर्थ यहाँ से नहीं निकालना।

English rendering The text states that when Jupiter—honored by the king of the gods—has gone to the netrapāṇi state, the person is disease-marked, parted from choice wealth and glory, fond of song and dance, always amorous, fair of hue, and attached to those born outside the conventional varṇa-marking (per the wording of this recension).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नेत्रपाणि-अवस्था)। कोई धन-मात्रा, रोग-सूची-अंक या वर्ण-अंकगणित नहीं; केवल अवस्था-फल।

45.90
गुणानामानन्दं विमलसुखकन्दं वितनुते |
सदा तेजःपुञ्जं व्रजपतिनिकुञ्जं प्रतिगमम् |
प्रकाशं चेदुच्चे द्रुतमुपगतो वासवगुरु |
र्गुरुत्वं लोकानां धनपतिसमत्वं तनुभृताम्
guṇānāmānandaṃ vimalasukhakandaṃ vitanute |
sadā tejaḥpuñjaṃ vrajapatinikuñjaṃ pratigamam |
prakāśaṃ ceducce drutamupagato vāsavaguru |
rgurutvaṃ lokānāṃ dhanapatisamatvaṃ tanubhṛtām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुणानाम् आनन्दं = गुणों का आनन्द; विमलसुखकन्दं = निर्मल सुख का मूल-कन्द; वितनुते = विस्तारित करता/देता है; तेजःपुञ्जं = तेज-राशि; व्रजपति-निकुञ्जं प्रतिगमम् = श्रीकृष्ण (व्रजपति) के निकुञ्ज-सम पद-पद पर (अलंकारिक; पाठ-भेद संभव); प्रकाशं...उच्चे = उच्च राशि में प्रकाश-चेष्टावस्था में; वासवगुरुः = इन्द्र (वासव) का गुरु = बृहस्पति; गुरुत्वं लोकानाम् = लोक में गुरु-गौरव; धनपतिसमत्वं तनुभृताम् = देहधारियों के लिए कुबेर-तुल्यता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बृहस्पति (इन्द्र-गुरु) शीघ्र ही उच्च राशि में "प्रकाश" चेष्टावस्था को प्राप्त हो, तब वह जातक को समस्त गुणों का आनन्द, निर्मल सुख का मूल, नित्य तेज-पुंज प्रदान करता है; लोक में गुरु-तुल्य गौरव और मनुष्यों के लिए कुबेर-सम धन-समता देता है। यह उच्चस्थ गुरु की प्रकाश-चेष्टा का सर्वोत्कृष्ट फल-कथन है।

English rendering The text states that Jupiter (guru of Indra), swiftly reaching the "shining" (prakāśa) state while exalted, bestows the delight of all virtues, the very root of pure joy, and an unfailing mass of splendour — granting eminence among people and Kubera-like wealth to mortals.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल), किन्तु "उच्चे" (= उच्च राशि) एक स्थान-बल शर्त है जो फल को चरम पर पहुँचाती है, और "प्रकाश" mod 12 शृंखला की उद्दीप्त अवस्था है। दोनों शर्तें मिलकर श्लोक के अत्युत्कृष्ट फल का आधार हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) गुरु का "उच्च" होना यहाँ फल-प्रवर्धक धुरी है — यही स्थान-बल (sthāna-bala) का बिंदु, जिसे हमने षड्बल (BPHS Ch.27) में विरूप/रूप की सुनिश्चित संख्यात्मक इकाइयों (1 रूप = 60 विरूप) पर आधारित रखा, ताकि "उच्चस्थ बल" व्याख्या नहीं, गणना बने। "कुबेर-तुल्यता" को हम शास्त्र-वचन की तरह प्रस्तुत करते हैं, प्रतिज्ञा की तरह नहीं।

45.91
साहसी भवति मानवः सदा मित्रवर्गसुखपूरितो मुदा |
पण्डितो विविधवित्तमण्डितो देवविद्यदि गुरौ गमं गते
sāhasī bhavati mānavaḥ sadā mitravargasukhapūrito mudā |
paṇḍito vividhavittamaṇḍito devavidyadi gurau gamaṃ gate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साहसी = साहस-युक्त; मानवः = मनुष्य; सदा = नित्य; मित्र-वर्ग-सुख-पूरितः = मित्र-वर्ग के सुख से भरा; मुदा = हर्ष से; पण्डितः = विद्वान्; विविध-वित्त-मण्डितः = अनेक प्रकार के वित्त से अलंकृत; देव-विद्या-आदि = देव-विद्या आदि (शास्त्र/दैवी ज्ञान पक्ष); गुरौ = गुरु में; गमम् गते = गमन-अवस्था को प्राप्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु गमन-अवस्था को प्राप्त हो — विशेषतः देवविद्यादि-सन्दर्भ में — तब मनुष्य सदा साहसी, मित्र-वर्ग-सुख से पूरित और मुदित होता है। वह पण्डित तथा विविध वित्त से मण्डित कहा गया है। यह गमन-अवस्था का शुभ-फल पक्ष है; “देवविद्यदि” को देव-विद्या आदि ज्ञान-क्षेत्र से जोड़कर पढ़ें। पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Jupiter has gone into the gamana (moving) state—especially in the sphere of divine learning and the like—the human being is always bold, joyfully filled with the happiness of the friend-circle, learned, and adorned with manifold wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गमन-अवस्था)। दशा-वर्ष, वर्ग-भाग या बिन्दु-योग नहीं; केवल अवस्था-विशेष का फलादेश।

45.92
आगमने जनता वरजाया यस्य जनुःसमये हरिमाया |
मुञ्चति नालमिहालयमद्धा देवगुरौ परितः परिबद्धा
āgamane janatā varajāyā yasya januḥsamaye harimāyā |
muñcati nālamihālayamaddhā devagurau paritaḥ paribaddhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवगुरौ = बृहस्पति (गुरु ग्रह) के होने पर; आगमने = आगमन नामक चेष्टावस्था में; जनुःसमये = जन्म के समय; जनता = जन-समुदाय, अनुयायी; वरजाया = श्रेष्ठ पत्नी; हरिमाया = हरि की माया अर्थात् लक्ष्मी (धन-सम्पदा); न अलं मुञ्चति = बिलकुल नहीं छोड़ती; आलयम् = घर; अद्धा = निश्चय ही; परितः परिबद्धा = चारों ओर से बँधी हुई।

हिन्दी भावार्थ जिसके जन्मकाल में देवगुरु बृहस्पति आगमन-अवस्था में स्थित हों, शास्त्र कहता है कि उसे जन-समर्थन और उत्तम पत्नी प्राप्त होती है; और चारों ओर से उससे बँधी हुई लक्ष्मी उसके घर को कभी नहीं छोड़ती। यह गुरु की बारह चेष्टावस्थाओं में से एक शुभ अवस्था का फल-वर्णन है।

English rendering When Jupiter stands in the āgamana (arriving) state at birth, the text states that the native gains a following and a noble wife, and Fortune herself — bound to him on every side — never quits his home.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चेष्टावस्था-फल)। इस अध्याय की चेष्टावस्था स्वयं इस श्लोक में नहीं, बल्कि श्लोक 32–37 की गणना-विधि से नियत होती है — नक्षत्र + अंश + यातदण्ड + लग्न को पूरण कर ग्रह-विशेष गुणक से गुणा/भाग करके शेष निकाला जाता है (गुरु का गुणक = बाण = 5, श्लोक 36)।

हमारा डिकोड: यह अध्याय (Ch.45) फल-कथन का है, गणित का नहीं — और यही वह स्थान है जहाँ हमारे अभियान की मूल शासन-रेखा लागू होती है: चेष्टावस्था का निर्धारण विशुद्ध नियतात्मक अंकगणित है (जैसे षोडशवर्ग की मॉड्युलर विभाजन-विधि), पर उससे निकला फल शास्त्र का कथन है, नियति नहीं। गणना और व्याख्या को पृथक् रखना ही हमारी विधि है।

45.93
सुरगुरुसमवक्ता शुभ्रमुक्ताफलाढ्यः |
सदसि सपदि पूर्णो वित्तमाणिक्यमानैः |
गजतुरगरथाढ्यो देवताधीशपूज्यो |
जनुषि विविधविद्यागर्वितो मानवः स्यात्
suragurusamavaktā śubhramuktāphalāḍhyaḥ |
sadasi sapadi pūrṇo vittamāṇikyamānaiḥ |
gajaturagarathāḍhyo devatādhīśapūjyo |
januṣi vividhavidyāgarvito mānavaḥ syāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुरगुरुसमवक्ता = देवगुरु-सदृश वक्ता; शुभ्रमुक्ताफलाढ्यः = श्वेत मुक्ता-फलों से समृद्ध; सदसि = सभा में; सपदि = शीघ्र/तत्क्षण; पूर्णः = परिपूर्ण; वित्त-माणिक्य-मानैः = धन एवं माणिक्य-मूल्यों से; गज-तुरग-रथाढ्यः = हाथी-अश्व-रथ से युक्त; देवताधीशपूज्यः = देवताओं के अधीश्वरों द्वारा पूज्य; विविधविद्यागर्वितः = अनेक विद्याओं पर गर्वयुक्त; जनुषि = जन्म में; मानवः स्यात् = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-प्रसंगानुसार गुरु-सम्बद्ध अवस्था में) जातक सुरगुरु-समान वाणी वाला, शुभ्र मुक्ता-समृद्धि वाला और सभा में शीघ्र धन-माणिक्य से पूर्ण माना जाता है। उसे गज-अश्व-रथ-समृद्धि और देवताधीश-तुल्य पूज्यता का कथन मिलता है। जन्म से वह विविध विद्याओं से गर्वित मानव बताया गया है।

English rendering The text states that such a person speaks like Suraguru, is rich in bright pearls, and is quickly filled in assembly with wealth and ruby-worth. He is described as equipped with elephants, horses, and chariots, honoured like a lord of the gods, and proud of manifold learning from birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुण-वर्णन)। यहाँ वाहन-समृद्धि, सभा-सम्मान और विद्या-गर्व शास्त्र के गुणात्मक कथन हैं; कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

45.94
नानावाहनमानयानपटलीसौख्यं गुरावागमे |
भृत्यापत्यकलत्रमित्रजसुखं विद्याऽनवद्या भवेत् |
क्षोणीपालसमानतानवरतं चाऽतीव हृद्या मतिः |
काव्यानन्दरतिः सदा हिनगतिः सर्वत्र मानोन्नतिः
nānāvāhanamānayānapaṭalīsaukhyaṃ gurāvāgame |
bhṛtyāpatyakalatramitrajasukhaṃ vidyā'navadyā bhavet |
kṣoṇīpālasamānatānavarataṃ cā'tīva hṛdyā matiḥ |
kāvyānandaratiḥ sadā hinagatiḥ sarvatra mānonnatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नानावाहन = अनेक वाहन; मान = सम्मान; यानपटली = यान-समूह/बेड़ा; सौख्यम् = सुख; गुरावागमे = गुरु के आगमन में; भृत्य = सेवक; अपत्य = सन्तान; कलत्र = पत्नी; मित्रजसुखम् = मित्र-जनित सुख; विद्या अनवद्या = निर्दोष/उत्कृष्ट विद्या; क्षोणीपालसमानता = राजा-तुल्य पद; अनवरतम् = निरन्तर; अतीव हृद्या मतिः = अत्यन्त प्रिय बुद्धि; काव्यानन्दरतिः = काव्यानन्द में रति; हिनगतिः = उच्च/उन्नत गति (पाठ: “हीन” नहीं — “हि न”/उन्नतार्थ; पाठ-भेद संभव); सर्वत्र मानोन्नतिः = सर्वत्र सम्मान-उन्नति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु के आगमन (आगम) में नाना वाहन, मान और यान-समूह का सुख मिलता है; सेवक, सन्तान, पत्नी और मित्रों से सुख तथा अनवद्य विद्या होती है। निरन्तर क्षोणीपाल-समान पद और अत्यन्त हृद्य मति का कथन है। काव्यानन्द में रति, सदा उन्नत गति और सर्वत्र मान-उन्नति — यह सब गुरु-आगमन का फल-वर्णन है।

English rendering The text states that under Guru’s āgama, there is pleasure of many vehicles, honour, and a fleet of conveyances, with joy from servants, children, spouse, and friends, and faultless learning. Continuous equality with a king, a very pleasing intellect, delight in poetic joy, ever high progress, and rise of honour everywhere are listed as that state’s results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-आगम अवस्था का विस्तृत गुण-फल)। “आगम” यहाँ अवस्था-नाम है; कोई काल-वर्ष, अंश या बलांश नहीं।

45.95
भोजने भवति देवतागुरौ यस्य तस्य सततं सुभोजनम् |
नैव मुञ्चति रमालयं तदा वाजिवारणरथैश्च मण्डितम्
bhojane bhavati devatāgurau yasya tasya satataṃ subhojanam |
naiva muñcati ramālayaṃ tadā vājivāraṇarathaiśca maṇḍitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजने = भोजन-अवस्था में; देवतागुरु = बृहस्पति; यस्य = जिसके; सततं सुभोजनम् = निरन्तर अच्छा भोजन; नैव मुञ्चति = नहीं छोड़ता; रमालयम् = रमण-गृह/सुख-गृह; तदा = तब; वाजि = अश्व; वारण = हाथी; रथैः = रथों से; मण्डितम् = अलंकृत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस जातक के सम्बन्ध में देवतागुरु भोजन-अवस्था में हों, उसके लिए सतत सुभोजन का फल कहा गया है। तब रमालय नहीं छूटता — अर्थात् सुख-गृह स्थिर रहता है — और वह अश्व-हाथी-रथ से मण्डित बताया जाता है। यह भोजन-अवस्था का सीधा फल-कथन है।

English rendering The text states that when Devatāguru is in the bhojana (“dining”) state for a native, there is continual good food. The pleasure-house is not abandoned, and it is described as adorned with horses, elephants, and chariots.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-भोजन अवस्था)। अवस्था-नाम और फल का युग्म शास्त्रीय सूची है; कोई माप या अनुपात नहीं।

45.96
नृत्यलिप्सागते राजमानी धनी देवताधीशवन्द्यः सदा धर्मवित् |
तन्त्रविज्ञो बुधैर्मण्डितः पंडितः शब्दविद्यानविद्यो हि सद्यो जनः
nṛtyalipsāgate rājamānī dhanī devatādhīśavandyaḥ sadā dharmavit |
tantravijño budhairmaṇḍitaḥ paṃḍitaḥ śabdavidyānavidyo hi sadyo janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्यलिप्सागते = नृत्य-लिप्सा (नृत्य की इच्छा) अवस्था में आए; राजमानी = राज-मान वाला; धनी = धनवान; देवताधीशवन्द्यः = देवताधीशों द्वारा वन्दनीय; सदा धर्मवित् = सदैव धर्म-ज्ञ; तन्त्रविज्ञः = तन्त्र/शास्त्र-विशेषज्ञ; बुधैः मण्डितः = विद्वानों से अलंकृत; पण्डितः = पण्डित; शब्दविद्यानविद्यः = शब्द-विद्या में अनभिज्ञ नहीं / शब्दविद्या-सम्पन्न (पाठ-भेद संभव); सद्यः जनः = तुरन्त/वह जन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नृत्यलिप्सा-गत अवस्था में जातक राज-मानी, धनी और देवताधीश-वन्द्य कहा जाता है; वह सदा धर्मवित् और तन्त्र-विज्ञ बताया गया है। विद्वानों से मण्डित पण्डित और शब्द-विद्या में सशक्त — ऐसा शीघ्र/उस अवस्था का फल-वर्णन है। भय या अनिवार्यता का दावा यहाँ हमारा नहीं; यह शास्त्र का गुण-फल है।

English rendering The text states that when the relevant state is nṛtya-lipsā (“desire for dance”), the person is royal in honour, wealthy, and venerable like a lord of the gods; always knowing dharma and skilled in tantra. He is described as a paṇḍita adorned by the learned and accomplished in the science of words.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नृत्यलिप्सा अवस्था का गुण-फल)। कोई वर्ष, अंश या बलांश नहीं; केवल अवस्था-फल सूची।

45.97
कुतूहली सकौतुके माहाधनी जनः सदा |
निजान्वये च भास्करः कृपाकलाधरः सुखी |
निलिम्पराजपूजिते सुतेन भूनयेन वा |
युतो महाबली धराधिपेन्द्रसद्मपण्डितः
kutūhalī sakautuke māhādhanī janaḥ sadā |
nijānvaye ca bhāskaraḥ kṛpākalādharaḥ sukhī |
nilimparājapūjite sutena bhūnayena vā |
yuto mahābalī dharādhipendrasadmapaṇḍitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुतूहली = कुतूहल-युक्त; सकौतुके = कौतुक-अवस्था में; माहाधनी = महा-धनी; जनः सदा = मनुष्य सदैव; निजान्वये = अपने वंश में; भास्करः = सूर्य-तुल्य (प्रकाशक); कृपाकलाधरः = कृपा-कला का धारक; सुखी = सुखी; निलिम्पराजपूजिते = निलिम्प-राज (देवराज) से पूजित; सुतेन = पुत्र से; भूनयेन वा = भूमि-स्वामी/क्षत्रिय से अथवा; युतः = युक्त; महाबली = महा-बलवान; धराधिपेन्द्रसद्मपण्डितः = भूस्वामी-इन्द्र-सदन का पण्डित (राजसभा-विद्वान्)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कौतुक-अवस्था में जातक कुतूहली, सदा महा-धनी, अपने वंश में भास्कर-तुल्य, कृपा-कलाधर और सुखी होता है। निलिम्पराज-पूजित अवस्था में पुत्र अथवा भूमि-नायक से युक्त, महाबली और धराधिप-इन्द्र-सदन का पण्डित कहा गया है। यह कौतुक/देवराज-पूजित प्रसंग का फल-वर्णन है।

English rendering The text states that in the kautuka state the person is curious-minded, always greatly wealthy, a sun in his own lineage, a bearer of the art of grace, and happy. Under the “worshipped by the lord of the immortals” condition he is joined with a son or a land-lord, greatly strong, and a paṇḍita of the court of an earth-sovereign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कौतुक/देवराज-पूजित अवस्था)। वंश-प्रकाश और राजसभा-पण्डितत्व गुणात्मक कथन हैं, संख्यात्मक नियम नहीं।

45.98
गुरौ निद्रागते यस्य मूर्खता सर्वकर्मणि |
दरिद्रतापरिक्रन्तं भवनें पुण्यवर्जितम्
gurau nidrāgate yasya mūrkhatā sarvakarmaṇi |
daridratāparikrantaṃ bhavaneṃ puṇyavarjitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरौ = गुरु के; निद्रागते = निद्रा-अवस्था में; यस्य = जिसके; सर्वकर्मणि मूर्खता = समस्त कार्यों में मूढ़ता; दरिद्रता-परिक्रान्तम् = दरिद्रता से आक्रान्त; भवनम् = घर; पुण्यवर्जितम् = पुण्य/शुभ से रहित।

हिन्दी भावार्थ जब गुरु निद्रा-अवस्था में हों, शास्त्र कहता है कि जातक अपने सभी कार्यों में मूढ़ प्रतीत होता है, और उसका घर दरिद्रता से आक्रान्त तथा पुण्य से रहित रहता है।

English rendering With Jupiter in the nidrā (sleep) state, the text states the native meets dullness in every undertaking, and his home is gripped by poverty and stripped of good fortune.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निद्रा-चेष्टावस्था)। निद्रा चेष्टावस्थाओं में न्यूनतम-सक्रिय पद है — इसीलिए इसका फल-भाव न्यूनतम कहा गया (तुलना: श्लोक 6, "सुषुप्तौ फलं शून्यम्")।

हमारा डिकोड: यह प्रतिकूल फल शास्त्र का कथन है, कोई अटल दैव-निर्णय नहीं। हमारी शासन-रेखा के अनुसार "निद्रित" गुरु मात्र सबसे दुर्बल चेष्टा-सूचकांक है; उसे भय या नियति की भाषा में नहीं, "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है — गणना अलग, व्याख्या अलग।

45.99
जनो बलीयानपिदन्तरोगी भृगौ महारोषसमन्वितः स्यात् |
धनेन हीनः शयनं प्रयाते वारांगनासंगमलम्पटश्च
jano balīyānapidantarogī bhṛgau mahāroṣasamanvitaḥ syāt |
dhanena hīnaḥ śayanaṃ prayāte vārāṃganāsaṃgamalampaṭaśca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भृगौ = शुक्रे (जब शुक्र); शयनं प्रयाते = शयन-अवस्था में स्थित होने पर; जनः बलीयानपि = व्यक्ति बलवान होने पर भी; दन्तरोगी = दन्त-रोग से युक्त; महारोषसमन्वितः = महा-क्रोध से युक्त; धनेन हीनः = धन से रहित; वारांगनासंगमलम्पटः = वेश्या/वारवनिता-संग में आसक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र शयन-अवस्था को प्राप्त हो, तो जातक — चाहे वह अन्यथा बलवान हो — दन्त-रोग और प्रबल क्रोध से युक्त हो सकता है। उसी कथन के अनुसार धन-हीनता और वारवनिता-संग की आसक्ति का फल भी जुड़ा है। यह शुक्र की शयन-अवस्था का फल-कथन है, न कि स्वतंत्र रोग-निदान।

English rendering The text states that when Venus is in the śayana (“reclining”) avasthā, the native—even if otherwise strong—is described as afflicted with dental disease and great anger, destitute of wealth, and given to association with courtesans.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की शयन-अवस्था)। यह अवस्था-फल है; यहाँ कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-गणना या दशा-अनुपात नहीं दिया गया।

45.100
यदि भवेदुशना उपवेशने नवमणिव्रजकाञ्चनभूषणैः |
सुखमजस्रमरिक्षय आदरादवनिपादपि मानसमुन्नतिः
yadi bhaveduśanā upaveśane navamaṇivrajakāñcanabhūṣaṇaiḥ |
sukhamajasramarikṣaya ādarādavanipādapi mānasamunnatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उशना = शुक्र (उशनास्); उपवेशने = उपवेशन-अवस्था में; नवमणिव्रजकाञ्चनभूषणैः = नये मणि-समूह और काञ्चन-आभूषणों से; सुखम् अजस्रम् = निरन्तर सुख; अरिक्षयः = शत्रु-क्षय; आदरात् = आदर से; अवनिपात् अपि = पृथ्वी-पति (राजा) से भी; मानस-उन्नतिः = मान/सम्मान की उन्नति (पाठ-भेद संभव: मानस/मानस्य)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र उपवेशन-अवस्था में हो तो जातक नये मणि, रत्न-समूह और सुवर्ण-आभूषणों से युक्त सुख पाता है। उसी कथन में निरन्तर सुख, शत्रुओं का क्षय, तथा राजा से भी आदरपूर्वक मान-उन्नति का वर्णन है। यह शुक्र की बैठने-सी (उपवेशन) अवस्था का फल-पक्ष है।

English rendering The text states that when Venus (Uśanas) is in the upaveśana (“seated”) avasthā, the native enjoys lasting happiness with fresh gems, jewel-clusters, and golden ornaments; enemies decline, and even royal respect elevates his honour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की उपवेशन-अवस्था)। कोई संख्यात्मक विभाजन या बलांक यहाँ नहीं; केवल अवस्था-फल।

45.101
नेत्रपाणिंगते लग्नगेहे कवौ सप्तमे मानभे यस्य तस्य ध्रुवम् |
नेत्रपाते निपातो धनानामलं चान्यभे वासशाला विशाला भवेत्
netrapāṇiṃgate lagnagehe kavau saptame mānabhe yasya tasya dhruvam |
netrapāte nipāto dhanānāmalaṃ cānyabhe vāsaśālā viśālā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कवौ = शुक्रे; नेत्रपाणि-गते = नेत्रपाणि-अवस्था को प्राप्त; लग्नगेहे = लग्न-भाव में; सप्तमे = सप्तम भाव में; मानभे = मान-प्रद/सम्मान-राशि में (पाठ-भेद संभव); ध्रुवम् = निश्चित/स्थिर (फल); नेत्रपाते = नेत्रपात-अवस्था में; निपातः धनानाम् = धन का पतन; अन्यभे = अन्य राशि/भाव में; वासशाला विशाला = विशाल निवास-शाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र नेत्रपाणि-अवस्था में लग्न-गृह में अथवा सप्तम में मान-प्रद राशि में स्थित हो तो (उस अवस्था का) फल ध्रुव माना गया है। नेत्रपात-अवस्था में धन-निपात का कथन है; और अन्य राशि-स्थिति में विशाल वास-शाला का फल जोड़ा गया है। दोनों नाम (नेत्रपाणि / नेत्रपात) अवस्था-श्रृंखला के क्रमिक पद हैं — यहाँ गणित नहीं, फल-भेद है।

English rendering The text states that when Venus is in the netrapāṇi avasthā in the lagna or in the seventh in an honour-conferring sign, the result is held as fixed; in the netrapāta state it declares a fall of wealth, and in another sign a vast dwelling-hall.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की नेत्रपाणि/नेत्रपात अवस्थाएँ)। “ध्रुवम्” यहाँ निश्चितता का शास्त्रीय वाक्य है, गणना का स्थिरांक नहीं।

45.102
स्वालये तुंगभे मित्रभे भार्गवे तुंगमातंगलीलाकलापी जनः |
भूपतेस्तुल्य एव प्रकाशं गते काव्यविद्याकलाकैतुकी गीतवित्
svālaye tuṃgabhe mitrabhe bhārgave tuṃgamātaṃgalīlākalāpī janaḥ |
bhūpatestulya eva prakāśaṃ gate kāvyavidyākalākaitukī gītavit

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भार्गवे = शुक्र (भृगुवंशी); प्रकाशं गते = प्रकाश-अवस्था में; स्व-आलये = स्वराशि में; तुंग-भे = उच्च राशि में; मित्र-भे = मित्र राशि में; तुंग-मातंग-लीला-कलापी = ऊँचे हाथियों की क्रीड़ा से युक्त; भूपतेः तुल्यः = राजा के समान; काव्य-विद्या-कला-कैतुकी = काव्य-विद्या-कला में कौतुकी; गीतवित् = संगीतज्ञ।

हिन्दी भावार्थ जब शुक्र प्रकाश-अवस्था में स्वराशि, उच्च अथवा मित्रराशि में हों, शास्त्र कहता है कि जातक उन्नत गजों की लीला से युक्त, राजतुल्य, काव्य-विद्या-कला में कौतुकी और संगीतज्ञ होता है।

English rendering With Venus in the prakāśa (shining) state — in its own, exalted, or a friendly sign — the text states the native disports with tall elephants, stands equal to a king, revels in poetry, learning and the arts, and is skilled in song.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-प्रकाश-चेष्टावस्था)। श्लोक स्पष्टतः स्व-उच्च-मित्र राशियों को शुभ-फल की शर्त बताता है — ये ठीक वही अधिकार-स्थान हैं जिन पर स्थानबल आधारित है।

हमारा डिकोड: "स्वालये तुंगभे मित्रभे" — स्वक्षेत्र, उच्च और मित्रराशि — षड्बल (BPHS Ch.27) के स्थानबल के मूल घटक हैं, जिन्हें हमारी विधि रूप/विरूप में नियत संख्यात्मक नियमों से आँकती है (1 रूप = 60 विरूप)। यहाँ चेष्टावस्था-फल और स्थानबल की गणनीय अवधारणा एक ही दिशा में संकेत करती है, यद्यपि दोनों पृथक् गणना-तन्त्र हैं।

45.103
गमने जनने शुक्रे तस्य माता न जीवति |
आधियोगो वियोगश्च जनानामरिभीतितः
gamane janane śukre tasya mātā na jīvati |
ādhiyogo viyogaśca janānāmaribhītitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रे = शुक्र में/शुक्र के; गमने = गमन-अवस्था में; जनने = जन्म-काल में (स्थित होने पर); तस्य माता न जीवति = उसकी माता जीवित नहीं रहती — शास्त्र का कथन; आधि-योगः = चिन्ता/मानसिक क्लेश का योग; वियोगः = वियोग/पृथक्करण; अरिभीतितः = शत्रु-भय से युक्त (जनानाम् = लोगों के सन्दर्भ में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जन्म में शुक्र गमन-अवस्था में हो तो माता का न जीना, आधि-योग और वियोग, तथा शत्रु-भय से युक्त स्थिति — ये उसके फल-वाक्य हैं। यह अवस्था-फल का कठोर कथन है; इसे नियति या रोग-पूर्वानुमान के रूप में नहीं पढ़ना। गमन = “गमन/प्रस्थान” नामक अवस्था — यात्रा-मात्र का लौकिक अर्थ यहाँ प्राथमिक नहीं।

English rendering The text states that when Venus is in the gamana (“going”) avasthā at birth, the mother does not live, and there are indications of anxiety-yoga, separation, and fear of enemies among people. These are the śāstra’s phala claims for that state, not endorsed predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की गमन-अवस्था)। कोई आयु-वर्ष, दशा-अनुपात या बल-इकाई यहाँ नहीं दी गई।

45.104
आगमनं भृगुपुत्रे गतवति वित्तेश्वरो मनुजः |
सत्तेर्थभ्रमशाली नित्योत्साही करांघ्रिरोगी च
āgamanaṃ bhṛguputre gatavati vitteśvaro manujaḥ |
satterthabhramaśālī nityotsāhī karāṃghrirogī ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भृगुपुत्रे = शुक्रे; आगमनं गतवति = आगमन-अवस्था को प्राप्त होने पर; मनुजः = मनुष्य; वित्तेश्वरः = वित्त-स्वामी/धन-समृद्ध; सत्तेर्थभ्रमशाली = सत्ता-अर्थ में भ्रम/भ्रमण-शील (पाठ-भेद संभव: सत्तेऽर्थ-); नित्योत्साही = नित्य उत्साह-युक्त; कर-अंघ्रि-रोगी = कर (हाथ) और अङ्घ्रि (पाद) के रोग वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र आगमन-अवस्था में हो तो जातक धन-स्वामी-सा बनता है, सत्ता और अर्थ के विषय में भ्रम/भ्रमण-शील रहता है, सदा उत्साही होता है, और हाथ-पाँव के रोग से युक्त कहा गया है। “आगमन” यहाँ अवस्था-श्रृंखला का पद है — लौकिक “आना” मात्र नहीं। फल मिश्रित है: समृद्धि-उत्साह के साथ कर-अंघ्रि-रोग का कथन साथ-साथ है।

English rendering The text states that when Venus has entered the āgamana (“arrival”) avasthā, the person becomes a lord of wealth, given to restlessness or confusion about power and means, ever enthusiastic, and afflicted with disease of the hands and feet.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की आगमन-अवस्था)। धन-स्वामित्व यहाँ भावात्मक फल है, किसी दशा-वर्ष या बिन्दु-योग का सूत्र नहीं।

45.105
अनायासेनालं सपदि महसा याति सहसा |
प्रगल्भत्वंराज्ञः सदसि गुणविज्ञः किल कवौ |
सभायामायाते रिपुनिवहहन्ता धनपतेः |
समत्वं वा दाता बलतुरगगन्ता नरवरः
anāyāsenālaṃ sapadi mahasā yāti sahasā |
pragalbhatvaṃrājñaḥ sadasi guṇavijñaḥ kila kavau |
sabhāyāmāyāte ripunivahahantā dhanapateḥ |
samatvaṃ vā dātā balaturagagantā naravaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कवौ = शुक्रे; सभायाम् आयाते = सभा-अवस्था में आगत होने पर; अनायासेन = बिना परिश्रम के; सपदि / सहसा = शीघ्र/अकस्मात्; महसा याति = महिमा/तेज से बढ़ता है; राज्ञः सदसि प्रगल्भत्वम् = राज-सभा में प्रागल्भ्य; गुणविज्ञः = गुण-ज्ञ; रिपुनिवहहन्ता = शत्रु-समूह-हन्ता; धनपतेः समत्वम् = कुबेर/धनपति-तुल्य; दाता = दानशील; बलतुरगगन्ता = बलवान अश्वों पर गमन करने वाला; नरवरः = नरों में श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र सभा-अवस्था को प्राप्त हो तो जातक अनायास और सहसा महिमा को पाता है; राज-सभा में प्रागल्भ्य और गुण-ज्ञान उसका लक्षण है। वही फल शत्रु-समूह के हनन, धनपति-समता अथवा दातृत्व, बलवान तुरगों पर गमन, और नर-श्रेष्ठता तक विस्तृत है। यह शुक्र की सभा-अवस्था का विस्तृत फल-गाथा है — कोई संख्या-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that when Venus has come into the sabhā (“assembly”) avasthā, the native rises to greatness without toil and at once: bold in the king’s court, a knower of qualities, a destroyer of enemy hosts, equal to a lord of wealth or a liberal giver, travelling with strong horses—a foremost among men.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की सभा-अवस्था)। यहाँ कोई वर्ग-चाप, अष्टकवर्ग-बिन्दु या षड्बल-रूपा नहीं; केवल अवस्था-फल का विस्तार।

45.106
आगमे भार्गवे मागमो जन्मिनामर्थराशेररातेरतीव क्षतिः |
पुत्रपातो निपातो जनानामपिव्याधिभीतिः प्रियाभोगहानिर्भवेत्
āgame bhārgave māgamo janmināmartharāśerarāteratīva kṣatiḥ |
putrapāto nipāto janānāmapivyādhibhītiḥ priyābhogahānirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमे = शयनादि-अवस्था में ‘आगम’ (आगमन/उपस्थिति) अवस्था; भार्गवे = शुक्र में; मागमः = आगमन/लाभ का अभाव; अर्थराशेः = धन-समूह का; अरातेः = शत्रु से; अतीव क्षतिः = अत्यन्त हानि; पुत्रपातः = पुत्र-नाश/पुत्र-विपत्ति; निपातः जनानाम् = लोगों का पतन; व्याधिभीतिः = रोग-भय; प्रियाभोगहानिः = प्रियजन/भोग-सुख की हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र ‘आगम’ अवस्था में हो, तो जातक के लिए ‘मागम’—अर्थात् अनुकूल आगमन या संचय का अभाव—बतलाया गया है। धन-राशि की शत्रु-पक्ष से अत्यन्त क्षति, पुत्र-सम्बन्धी विपत्ति, लोगों का पतन, रोग का भय तथा प्रिय-भोग की हानि—ये फल इस अवस्था के शुक्र से जोड़े गए हैं। यह फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Venus is in the Āgama avasthā, the native meets non-arrival of gain (māgama), severe loss of wealth through enemies, son-related adversity, downfall among people, fear of disease, and loss of enjoyment with the beloved.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की शयनादि ‘आगम’ अवस्था का परिणाम)। अवस्था का नाम-निर्देश फल-वर्णन का आधार है; यहाँ कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष नहीं दिया गया।

45.107
क्षुधातुरो व्याधिनिपीडितः स्यादनेकधारातिभयर्द्दितश्च |
कवौ यदा भोजनगे युवत्या महाधनी पण्डितमण्डितश्च
kṣudhāturo vyādhinipīḍitaḥ syādanekadhārātibhayardditaśca |
kavau yadā bhojanage yuvatyā mahādhanī paṇḍitamaṇḍitaśca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षुधातुरः = भूख से पीड़ित; व्याधिनिपीडितः = रोग से दबा हुआ; अनेकारि/अनेकधारातिभयर्द्दितः = अनेक शत्रु/आघातों के अतिभय से त्रस्त (पाठ-भेद संभव); कवि = शुक्र; भोजनगे = ‘भोजन’ अवस्था में स्थित; युवत्या = युवती के संग; महाधनी = अत्यन्त धनवान्; पण्डितमण्डितः = पण्डितों से अलंकृत/विद्वत्-सभा में सम्मानित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कवि (शुक्र) भोजन-अवस्था में हो, तो जातक क्षुधा से आतुर, रोग से पीड़ित तथा अनेक शत्रु-भय से त्रस्त बतलाया गया है। उसी सन्दर्भ में युवती-सम्बन्ध, महाधन और पण्डित-मण्डन का मिश्रित फल भी कहा गया है। विपरीत-से-लगते कथन एक ही अवस्था के अन्तर्गत शास्त्रीय फल-सूची हैं—निश्चय या भय का प्रचार नहीं।

English rendering The text states that when Venus (Kavi) is in the Bhojana avasthā, the native is described as hunger-afflicted, disease-oppressed, and tormented by extreme fear of many enemies; the same passage also assigns association with a young woman, great wealth, and adornment by the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की ‘भोजन’ अवस्था)। यहाँ कोई राश्यांश, वर्ग-नियम या बल-इकाई नहीं; केवल अवस्था-नाम पर फल का आरोप है।

45.108
काव्यविद्यानवद्या च हृद्या मतिः सर्वदा नृत्यलिप्सागते भार्गवे |
शंखवीणामृदंगादिगानध्वनिव्रातनैपुण्यमेतस्य वित्तोन्नतिः
kāvyavidyānavadyā ca hṛdyā matiḥ sarvadā nṛtyalipsāgate bhārgave |
śaṃkhavīṇāmṛdaṃgādigānadhvanivrātanaipuṇyametasya vittonnatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) काव्यविद्या = काव्य/साहित्य-ज्ञान; अनवद्या = निर्दोष/उत्कृष्ट; हृद्या मतिः = रमणीय बुद्धि; नृत्यलिप्सागते = ‘नृत्यलिप्सा’ अवस्था को प्राप्त; भार्गवे = शुक्र में; शंख-वीणा-मृदङ्गादि = शंख, वीणा, मृदङ्ग आदि; गानध्वनिव्रात = गान-ध्वनियों का समूह; नैपुण्यम् = कुशलता; वित्तोन्नतिः = धन की उन्नति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भार्गव (शुक्र) नृत्यलिप्सा-अवस्था में हो, तो जातक की काव्य-विद्या निर्दोष और बुद्धि हृद्य रहती है। नृत्य की लालसा, शंख-वीणा-मृदङ्गादि गान-ध्वनि-समूह में नैपुण्य, तथा वित्त की उन्नति—ये इसी अवस्था से जोड़े गए हैं। कला-संवेदन और धन-उन्नति यहाँ शास्त्रीय संकेत हैं, गारंटी नहीं।

English rendering The text states that when Venus is in the Nṛtyalipsā avasthā, the native has flawless poetic learning, a pleasing intellect, constant inclination toward dance, skill in the host of musical sounds of conch, vīṇā, mṛdaṅga and the like, and rise of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की ‘नृत्यलिप्सा’ अवस्था)। संगीत-कला और वित्तोन्नति का वर्णन गुणात्मक है; कोई संख्यात्मक मापदण्ड नहीं दिया गया।

45.109
कौतुकभवनं गतवति शुक्रे शक्रेशत्वं सदसि महत्त्वम् |
हृद्या विद्या भविति च पुंसः पदमा निवसति सदमारतः
kautukabhavanaṃ gatavati śukre śakreśatvaṃ sadasi mahattvam |
hṛdyā vidyā bhaviti ca puṃsaḥ padamā nivasati sadamārataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतुकभवनम् = ‘कौतुक’ अवस्था/कौतुक-स्थान; गतवति शुक्रे = शुक्र के पहुँचने पर; शक्रेशत्वम् = इन्द्र-तुल्य आधिपत्य/सभा-श्रेष्ठता; सदसि महत्त्वम् = सभा में गौरव; हृद्या विद्या = रमणीय विद्या; पुंसः = पुरुष/जातक का; पदम् = पद/प्रतिष्ठा; निवसति = निवास करता है; सदमारतः = सदा अ-मारत/निरुपद्रव (पाठ-भेद संभव: सदा आरतः = सदा संलग्न)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र कौतुक-भवन (कौतुक-अवस्था) को प्राप्त हो, तो जातक को सभा में शक्र-तुल्य महत्त्व मिलता है। हृद्य विद्या उत्पन्न होती है, ऊँचा पद स्थिर रहता है, और वह सदा निरुपद्रव (या सदा उस पद में आरूढ़) निवास करता है—पाठ-भेद संभव। यह सामाजिक-बौद्धिक फल का शास्त्र-कथन है।

English rendering The text states that when Venus has entered the Kautuka avasthā (“house of wonder/festivity”), the native gains Indra-like stature and greatness in the assembly, pleasing learning arises, and high rank abides—dwelling ever free from fatal affliction (reading uncertain: possibly “always engaged”).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की ‘कौतुक’ अवस्था)। ‘शक्रेशत्व’ और ‘पद’ यहाँ सामाजिक-प्रतिष्ठा के शब्द हैं, कोई अंश-या बल-माप नहीं।

45.110
परसेवारतो नित्यं निद्रामुपगते कवौ |
परनिन्दापरो वीरो वाचालो भ्रमते महीम्
parasevārato nityaṃ nidrāmupagate kavau |
paranindāparo vīro vācālo bhramate mahīm

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परसेवारतः = पर-सेवा में लगा; नित्यम् = सदा; निद्राम् उपगते = ‘निद्रा’ अवस्था को प्राप्त; कवि = शुक्र; परनिन्दापरः = पर-निन्दा में तत्पर; वीरः = साहसी/शूर; वाचालः = वाचाल/अधिक बोलने वाला; भ्रमते महीम् = पृथ्वी पर भ्रमण करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कवि (शुक्र) निद्रा-अवस्था में हो, तो जातक नित्य पर-सेवा में रत रहता है। पर-निन्दा में प्रवृत्त, वीर और वाचाल होकर वह भूमि पर भ्रमण करता है—ऐसा फल कहा गया है। भ्रमण और वाचालता यहाँ अवस्था-फल हैं, भय या दोषारोपण नहीं।

English rendering The text states that when Venus is in the Nidrā avasthā, the native is constantly devoted to serving others, given to blaming others, brave yet talkative, and wanders the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की ‘निद्रा’ अवस्था)। शयनादि-क्रम में निद्रा अन्तिम/विश्राम-प्रकार की अवस्था है; इस श्लोक में केवल गुण-फल है, गणना नहीं।

45.111
क्षुत्पिपासापरिक्रान्तो विश्रान्तः शयने शनौ |
वयसि प्रथमे रोगी ततो भाग्यवतां वरः
kṣutpipāsāparikrānto viśrāntaḥ śayane śanau |
vayasi prathame rogī tato bhāgyavatāṃ varaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षुत्पिपासापरिक्रान्तः = भूख-प्यास से व्याप्त/घिरा; विश्रान्तः = थका/विश्राम-प्राप्त; शयने = ‘शयन’ अवस्था में; शनौ = शनि में; वयसि प्रथमे = प्रथम अवस्था/बाल्यावस्था में; रोगी = रोग-युक्त; ततः = तदनन्तर; भाग्यवताम् वरः = भाग्यशालियों में श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शनि शयन-अवस्था में हो, तो जातक क्षुधा-पिपासा से घिरा और शयन में विश्रान्त बतलाया गया है। प्रथम वय में रोगी, परन्तु बाद में भाग्यवतों में वर—यह क्रमिक फल कहा गया है। आरम्भिक क्लेश और परवर्ती भाग्य दोनों शास्त्र-कथन हैं; न तो निराशा का दबाव, न गारंटी।

English rendering The text states that when Saturn is in the Śayana avasthā, the native is beset by hunger and thirst and worn out in rest; diseased in early life, thereafter foremost among the fortunate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की ‘शयन’ अवस्था)। ‘प्रथम वय → ततः भाग्य’ काल-क्रम का गुणात्मक संकेत है; कोई दशा-वर्ष या आयु-वर्ष यहाँ नहीं दिया गया।

45.112
भानओः सुते चेदुपवेशनस्थे करालकारातिजनानुतप्ताः |
अपायुशाली खलु दद्रुमाली नरोभिमानी नृपदण्डयुक्तः
bhānaoḥ sute cedupaveśanasthe karālakārātijanānutaptāḥ |
apāyuśālī khalu dadrumālī narobhimānī nṛpadaṇḍayuktaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानोः सुते = सूर्य-पुत्र शनि में (पाठ “भानओः” — पाठ-भेद संभव); उपवेशनस्थे = ‘उपवेशन’ (बैठने) अवस्था में स्थित; कराल = भयंकर; काराति/अराति = कारा/शत्रु-पीड़ा (पाठ-भेद संभव); जनानुतप्ताः = लोग/जातक अत्यन्त संतप्त; अपायुशाली = अल्पायु (a-pāyus); दद्रुमाली = दद्रु (खाज/चर्म-विकार) से मंडित; अभिमानी = अभिमानी; नृपदण्डयुक्तः = राजदण्ड/राजकीय दण्ड से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भानु-सुत (शनि) उपवेशन-अवस्था में हो, तो जातक कराल शत्रु/कारा-पीड़ा से संतप्त बतलाया गया है। अल्पायु-संकेत, दद्रु-माली चर्म-क्लेश, अभिमान, और नृप-दण्ड—ये इसी अवस्था से जोड़े गए हैं। यह शास्त्र का फल-वर्णन है; चिकित्सा, विधि या दण्ड का व्यावहारिक पूर्वानुमान नहीं।

English rendering The text states that when Saturn (son of the Sun) is in the Upaveśana avasthā, people (the native) are tormented by fierce enemies or prison-affliction; short-lived, marked by ringworm-like skin trouble, proud, and subject to royal punishment (reading of “भानओः/करालकाराति” may vary).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की ‘उपवेशन’ अवस्था)। आयु, दण्ड और चर्म-क्लेश यहाँ शास्त्रीय संकेत-शब्द हैं; कोई आयुर्दाय-सूत्र या बल-गणना इस श्लोक में नहीं है।

45.113
नयनपाणिगते रविनन्दने परमया रमया रमयायुतः |
नृपतितो हिततो महितोषकृद्बहुकलाकलितो विमलोक्तिकृत्
nayanapāṇigate ravinandane paramayā ramayā ramayāyutaḥ |
nṛpatito hitato mahitoṣakṛdbahukalākalito vimaloktikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नयन-पाणि-गते = नेत्र-हस्त-अवस्था में स्थित होने पर; रवि-नन्दने = रवि-पुत्र शनि में; परमया रमया = परम रमणीयता/श्री से; रमया-आयुक्तः = लक्ष्मी/आनन्द से युक्त; नृ-पतितः = राज-सदृश/राज-सम्बद्ध; हिततः = हितकारी; महित-उष-कृत् = महान् सन्तोष उत्पन्न करने वाला; बहु-कला-कलितः = अनेक कलाओं से सम्पन्न; विमल-उक्ति-कृत् = निर्मल/शुद्ध वाणी करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शनि (रविनन्दन) नयन-पाणि-गत अवस्था में हो, तब जातक परम रमणीयता और श्री से युक्त होता है। वह राज-सदृश पद/प्रभाव वाला, हितकारी तथा महान् सन्तोष देने वाला कहा गया है। वह अनेक कलाओं से अलंकृत और निर्मल वाणी वाला बताया गया है। यह फल-कथन शनि की उक्त अवस्था से जुड़ा शास्त्रीय संकेत है, न कि नियत भाग्य-घोषणा।

English rendering The text states that when Saturn (the Sun’s son) is in the nayana-pāṇi condition, the person is endowed with supreme delight and fortune, is royal in bearing and beneficial, and brings great satisfaction. He is described as skilled in many arts and pure in speech.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की नयन-पाणि अवस्था का शास्त्रीय परिणाम)। यहाँ कोई अंश-विभाजन, बल-माप या दशा-अनुपात नहीं; केवल अवस्था-फल का वर्णन है।

45.114
नानागुणप्रामधनाधिशाली सदा नरो बुद्धिविनोदमाली |
प्रकाशने भानुसुते सुभानुः कृपानुतक्तो हरपादभक्तः
nānāguṇaprāmadhanādhiśālī sadā naro buddhivinodamālī |
prakāśane bhānusute subhānuḥ kṛpānutakto harapādabhaktaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाना-गुण = अनेक गुण; ग्राम-धन-अधि-शाली = ग्राम-सम्पदा/धन-ऐश्वर्य से युक्त; सदा = नित्य; नरः = मनुष्य; बुद्धि-विनोद-माली = बुद्धि और विनोद की माला से अलंकृत; प्रकाशने = प्रकाशनावस्था में; भानु-सुते = शनि में; सु-भानुः = उत्तम कान्ति/प्रकाश वाला; कृपा-अनु-तक्तः = कृपा से अनुसृत/कृपालु; हर-पाद-भक्तः = हरि (विष्णु)-चरणों का भक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि प्रकाशनावस्था में स्थित शनि के प्रभाव में जातक नाना गुणों, ग्राम-सम्पदा और धन से सम्पन्न होता है। वह सदा बुद्धि और विनोद से अलंकृत रहता है। वह सुप्रकाश/सुभानु कहा गया है — कृपा-युक्त तथा हरि-चरण-भक्त। यह प्रकाशनावस्था का शास्त्र-कथित फल-चित्र है।

English rendering The text states that when Saturn is in prakāśana, the person is rich in many virtues, village-wealth and resources, and is ever adorned with intellect and delightful play of mind. He is described as brilliant (subhānu), inclined to compassion, and devoted to Hari’s feet.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की प्रकाशनावस्था का परिणाम)। कोई संख्यात्मक नियम या गणना-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

45.115
महाधनी नन्दननन्दितः स्यादपायकारी रिपुभूमिहारी |
गमे शनौ पण्डितराजाभावं धरापतेरायातने प्रयाति
mahādhanī nandanananditaḥ syādapāyakārī ripubhūmihārī |
game śanau paṇḍitarājābhāvaṃ dharāpaterāyātane prayāti

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महा-धनी = अत्यन्त धनवान्; नन्दन-नन्दितः = पुत्र/नन्दन से आनन्दित; स्यात् = होता है; अपाय-कारी = अपकार/हानि करने वाला (शत्रु-पक्ष पर); रिपु-भूमि-हारी = शत्रु-भूमि का हरण करने वाला; गमे = गमन-अवस्था में; शनौ = शनि में; पण्डित-राज-आभावम् = पण्डित-राज-सदृश भाव/पद; धरा-पतेः = पृथ्वी-पति/राजा का; आयातने = आगमन/आश्रय-स्थान में; प्रयाति = पहुँचता/प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गमन-अवस्था में शनि होने पर जातक महाधनी तथा पुत्र-सुख से नन्दित होता है। वह शत्रुओं के लिए अपायकारी और शत्रु-भूमि का हरण करने वाला कहा गया है। आगे शास्त्र कहता है कि वह पण्डित-राज-सदृश भाव प्राप्त कर पृथ्वी-पति के आयातन (राज-आश्रय/राज-पद-सदृश स्थिति) की ओर अग्रसर होता है। यह गमन-अवस्था का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Saturn is in gama (the state of going/moving), the person becomes greatly wealthy and gladdened by offspring, and is said to harm foes and seize hostile territory. He is further said to attain a learned-kingly standing and to enter the sphere of the earth-lord’s abode or patronage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की गमन-अवस्था का शास्त्रीय परिणाम)। यहाँ दशा-वर्ष, वर्ग-भाग या बल-इकाई का कोई नियत गणित नहीं।

45.116
आगमने गर्दभपदयुक्तः पुत्रकलत्रसुखेन विमुक्तः |
भानुसुते भ्रमते भुवि नित्यं दीनमना विजनाश्रयभावम्
āgamane gardabhapadayuktaḥ putrakalatrasukhena vimuktaḥ |
bhānusute bhramate bhuvi nityaṃ dīnamanā vijanāśrayabhāvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमन-े = आगमनावस्था में; गर्दभ-पद-युक्तः = गर्दभ-पद (गधे-सदृश/अधोगति-सूचक पद) से युक्त; पुत्र-कलत्र-सुखेन = पुत्र और पत्नी के सुख से; विमुक्तः = रहित; भानु-सुते = शनि में; भ्रमते = घूमता है; भुवि = पृथ्वी पर; नित्यम् = सदा; दीन-मनाः = दीन-चित्त; विजन-आश्रय-भावम् = निर्जन-आश्रय का भाव/निर्जन स्थानों का आश्रय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आगमनावस्था में शनि होने पर जातक गर्दभ-पद-युक्त कहा गया है — अर्थात् अधोगति/निम्न-पद-सदृश स्थिति से जुड़ा। वह पुत्र-कलत्र-सुख से विमुक्त बताया गया है। वह नित्य पृथ्वी पर भ्रमणशील, दीन-मन वाला और निर्जन-आश्रय का भाव धारण करने वाला कहा गया है। यह आगमनावस्था का कठोर फल-चित्र है; इसे नियति की घोषणा नहीं, शास्त्र का अवस्था-फल समझना चाहिए।

English rendering The text states that when Saturn is in āgamana, the person is joined to a “donkey-footed” (gardabha-pada) condition and is said to be deprived of the happiness of children and spouse. He is described as forever wandering the earth, low-spirited, and inclined toward desolate refuge.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की आगमनावस्था का परिणाम)। कोई अंश-सूत्र या बल-गणना यहाँ नहीं; केवल अवस्था-फल का वर्णन है।

45.117
रत्नावलीकाञ्चनमौक्तिकानां व्रातेन नित्यं व्रजति प्रमोदम् |
सभागते भानुसुते नितान्तं नयेन पूर्णो मनुजो महौजाः
ratnāvalīkāñcanamauktikānāṃ vrātena nityaṃ vrajati pramodam |
sabhāgate bhānusute nitāntaṃ nayena pūrṇo manujo mahaujāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रत्न-आवली = रत्नों की पंक्ति/समूह; काञ्चन = स्वर्ण; मौक्तिकानाम् = मोतियों का; व्रातेन = समूह/समूह से; नित्यम् = सदा; व्रजति = प्राप्त करता/जाता है; प्रमोदम् = आनन्द; सभा-गते = सभागतावस्था में; भानु-सुते = शनि में; नितान्तम् = अत्यन्त; नयेन पूर्णः = नीति/नय से पूर्ण; मनुजः = मनुष्य; महा-ओजाः = महान् ओजस्वी/तेजस्वी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सभागतावस्था में शनि होने पर जातक रत्न, स्वर्ण और मोतियों के समूह से नित्य प्रमोद पाता है। वह नीति से पूर्ण तथा महान् ओज वाला मनुष्य कहा गया है। यह सभागतावस्था का उज्ज्वल फल-कथन है — समृद्धि और नय-पूर्ण ओज का शास्त्रीय संकेत।

English rendering The text states that when Saturn is in sabhāgata, the person continually rejoices amid stores of jewels, gold and pearls. He is said to be thoroughly complete in policy (naya) and a man of great vigor (mahaujāḥ).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की सभागतावस्था का परिणाम)। यहाँ कोई संख्यात्मक विभाजन या दशा-अनुपात नहीं।

45.118
आगमे गदसमागमो नृणामब्जबन्धुतनये यदा तदा |
मन्दमेव गमनं धरापतेर्याचनाविरहिता मतिः सदा
āgame gadasamāgamo nṛṇāmabjabandhutanaye yadā tadā |
mandameva gamanaṃ dharāpateryācanāvirahitā matiḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमे = आगम-अवस्था में; गद-समागमः = रोग का समागम/रोग-प्राप्ति; नृणाम् = मनुष्यों का; अब्ज-बन्धु-तनये = चन्द्र-बन्धु (सूर्य)-पुत्र अर्थात् शनि में; यदा तदा = जब तब; मन्दम् एव = केवल मन्द/धीमा; गमनम् = गमन/गति; धरा-पतेः = पृथ्वी-पति/राजा का; याचना-विरहिता = याचना से रहित; मतिः = बुद्धि/मति; सदा = सदा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शनि (अब्जबन्धु-तनय) आगम-अवस्था में हो, तब मनुष्यों को रोग का समागम होता है। पृथ्वी-पति का गमन भी मन्द ही रहता है — गति/प्रगति में शिथिलता का संकेत। साथ ही मति सदा याचना-रहित कही गई है — याचना से विमुख चित्त। यह आगम-अवस्था का मिश्रित फल-चित्र है; रोग-कथन शास्त्र का अवस्था-फल है, चिकित्सा-निर्णय नहीं।

English rendering The text states that when Saturn (the son of the lotus-friend, the Sun) is in āgama, people encounter disease, and the earth-lord’s movement is only slow. The mind is said to remain ever free of begging (yācanā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की आगम-अवस्था: रोग-समागम, मन्द गमन, याचना-रहित मति)। कोई बल-इकाई या अंश-सूत्र यहाँ नहीं।

45.119
संगते जनुषि भानुनन्दने भोजनं भवति भोजनं रसैः |
संयुतं नयनमन्दता तता मोहतापपरितापिता मतिः
saṃgate januṣi bhānunandane bhojanaṃ bhavati bhojanaṃ rasaiḥ |
saṃyutaṃ nayanamandatā tatā mohatāpaparitāpitā matiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संगते = संगत-अवस्था में; जनुषि = जन्म में; भानु-नन्दने = रवि-पुत्र शनि में; भोजनम् = आहार; भवति = होता है; भोजनम् रसैः = रसों से युक्त भोजन; संयुतम् = संयुक्त; नयन-मन्दता = नेत्रों की मन्दता/दृष्टि-मन्दता; तता = विस्तृत/व्याप्त; मोह-ताप-परितापिता = मोह और ताप से पीड़ित; मतिः = बुद्धि/चित्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जन्म में शनि संगत-अवस्था में हो तो भोजन रसों से संयुक्त होता है — आहार में रस-समृद्धि का संकेत। साथ ही नयन-मन्दता (दृष्टि/नेत्रों की मन्दता) कही गई है। मति मोह और ताप से परितापित बताई गई है। यह संगत-अवस्था का फल-कथन है; नेत्र-मन्दता आदि को शास्त्रीय अवस्था-फल के रूप में पढ़ें, चिकित्सा-निदान के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when Saturn is in saṃgata at birth, food is joined with flavors (rasa), yet eye-slowness (nayana-mandatā) prevails, and the mind is distressed by delusion and heat-affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि की संगत-अवस्था का जन्म-फल)। कोई वर्ग-भाग, अष्टकवर्ग-बिन्दु या दशा-वर्ष का सूत्र यहाँ नहीं; केवल अवस्था-फल का वर्णन है।

45.120
नृत्यलिप्सागते मन्दे धर्मात्मा वित्तपूरितः |
राजपूज्यो नरो धीरो महावीरो रणाङ्गणे
nṛtyalipsāgate mande dharmātmā vittapūritaḥ |
rājapūjyo naro dhīro mahāvīro raṇāṅgaṇe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्य-लिप्सा-गते = नृत्य/नृत्य-इच्छा की अवस्था में स्थित; मन्दे = शनि (मन्द) में; धर्म-आत्मा = धर्म-स्वभाव वाला; वित्त-पूरितः = धन से परिपूर्ण; राज-पूज्यः = राजसम्मान-योग्य; धीरः = धैर्यवान्; महा-वीरः = महा-पराक्रमी; रण-अङ्गणे = युद्ध-क्षेत्र में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब जन्म-कुण्डली में मन्द (शनि) नृत्य-लिप्सा नामक अवस्था में हो, तो जातक धर्मात्मा और धन-सम्पन्न कहा गया है। वह राज-सभा में पूज्य, धीर स्वभाव का, तथा रणभूमि में महावीर बताया गया है। यह फल-कथन शनि की उस विशेष अवस्था से बाँधा गया है; यहाँ गणना नहीं, अवस्था-फल का वर्णन है।

English rendering The text states that when Saturn (Manda) is in the nṛtya-lipsā state, the person is described as righteous and wealth-filled. He is said to be honoured by kings, steadfast, and a great hero on the battlefield.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल)। शनि की नृत्य-लिप्सा अवस्था का परिणाम शास्त्र की भाषा में दिया है; संख्या, अंश-विभाजन या बल-माप यहाँ नहीं है।

45.121
भवति कौतकभावमुपागते रविसुते वसुधावसुपूरितः |
अतिसुखी सुमुखीसुखपूरितः कवितयामलया कलयानरः
bhavati kautakabhāvamupāgate ravisute vasudhāvasupūritaḥ |
atisukhī sumukhīsukhapūritaḥ kavitayāmalayā kalayānaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतक-भावम् = कौतुक/विनोद-अवस्था (पाठ: कौतक ≈ कौतुक); उपागते = प्राप्त होने पर; रवि-सुते = सूर्य-पुत्र = शनि में; वसुधा-वसु-पूरितः = पृथ्वी-धन से भरा; अति-सुखी = अत्यन्त सुखी; सुमुखी-सुख-पूरितः = सुन्दर-मुखी स्त्रियों के सुख से परिपूर्ण; कवितया = काव्य से; अमलया = निर्मल/शुद्ध; कलयान् = कुशल; नरः = पुरुष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब रविसुत (शनि) कौतुक-भाव (कौतक-पाठ) को प्राप्त हो, तो जातक पृथ्वी-सम्पत्ति से भरा बताया गया है। वह अत्यन्त सुखी, सुमुखी-सुख से युक्त, तथा निर्मल काव्य-कला में कुशल कहा गया है। यहाँ भी शनि-अवस्था का फल है, कोई अंकीय सूत्र नहीं।

English rendering The text states that when the Sun’s son (Saturn) enters the kautuka state, the person is described as filled with earthly wealth. He is said to be very happy, full of the delight of fair-faced company, and skilled in pure poetry.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल)। “कौतक” पाठ कौतुक-अवस्था का संकेत देता है; पाठ-भेद संभव। फल शास्त्र की घोषणा है, नियति-वाक्य नहीं।

45.122
निद्रागते वासरनाथपुत्रे धनी सदा चारुगुणैरुपेतः |
पराक्रमी चण्डविपक्षहन्ता सुवारकान्तारतिरीतिविज्ञः
nidrāgate vāsaranāthaputre dhanī sadā cāruguṇairupetaḥ |
parākramī caṇḍavipakṣahantā suvārakāntāratirītivijñaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्रा-गते = निद्रा-अवस्था में पहुँचे हुए; वासर-नाथ-पुत्रे = दिन-स्वामी (सूर्य) का पुत्र = शनि में; धनी = धनवान्; सदा = सदैव; चारु-गुणैः = सुन्दर गुणों से; उपेतः = युक्त; पराक्रमी = बलवान्/वीर; चण्ड-विपक्ष-हन्ता = उग्र शत्रु-नाशक; सु-वार-कान्ता-रति-रीति-विज्ञः = सुन्दर स्त्री-कान्ता-रमण-रीति का ज्ञाता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वासरनाथ-पुत्र (शनि) निद्रा-अवस्था में हो, तो जातक सदैव धनी और चारु-गुणों से युक्त बताया गया है। वह पराक्रमी तथा तीव्र विपक्षी का हनन-कर्ता कहा गया है। साथ ही वह सुन्दर कान्ताओं की रति-रीति का जानकार बताया गया है—यह सब अवस्था-फल का शास्त्र-कथन है।

English rendering The text states that when the Sun’s son (Saturn) is in the nidrā (sleep) state, the person is described as always wealthy and endowed with attractive qualities. He is said to be valorous, a destroyer of fierce opponents, and versed in the ways of delight with fair companions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल)। निद्रा-गमन यहाँ ग्रह-अवस्था का नाम है, काल-माप या दशा-वर्ष नहीं।

45.123
यदागमो जन्मनि यस्य राहौ क्लेशाधिकत्वं शयनं प्रयाते |
वृषेऽथ युग्मेऽपि च कन्यकायामजे समाजो धनधान्यराशेः
yadāgamo janmani yasya rāhau kleśādhikatvaṃ śayanaṃ prayāte |
vṛṣe'tha yugme'pi ca kanyakāyāmaje samājo dhanadhānyarāśeḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यदा = जब; आगमः = आगमन/स्थिति (पाठ-भेद संभव); जन्मनि = जन्म में; यस्य = जिसके; राहौ = राहु में; क्लेश-अधिकत्वम् = कष्ट की अधिकता; शयनम् = शयन-अवस्था; प्रयाते = प्राप्त होने पर; वृषे = वृष राशि में; अथ = तथा; युग्मे = मिथुन में; अपि च = और भी; कन्यकायाम् = कन्या में; अजे = मेष में; समाजः = समूह/सम्पन्नता; धन-धान्य-राशेः = धन-अन्न के ढेर की।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिसके जन्म में राहु शयन-अवस्था को प्राप्त हो, वहाँ क्लेश की अधिकता कही गई है। किन्तु जब (वह स्थिति) वृष, मिथुन, कन्या या मेष में हो, तो धन-धान्य-राशि का समाज/समुच्चय बताया गया है। सामान्य शयन-फल और उन चार राशियों में विशेष फल—दोनों शास्त्र की घोषणाएँ हैं; यहाँ “पाठ-भेद संभव” यदि “आगमो” की सन्धि/पाठ अलग पढ़े जाएँ।

English rendering The text states that when Rāhu at birth goes into the śayana (reclining) state, there is said to be excess of hardship. Yet in Taurus, Gemini, Virgo, or Aries, it states an assemblage of heaps of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था + राशि-विशेष)। राशि-नाम (वृष, युग्म, कन्या, अज) यहाँ फल-सीमा बाँधते हैं; कोई अंश-विभाजन या बिन्दु-गणना नहीं।

45.124
उपवेशनमिह गतवति राहौ दद्रुगदेन जनः परितप्तः |
राजसमाजयुतो बहुमानी वित्तसुखेन सदा रहितः स्यात्
upaveśanamiha gatavati rāhau dadrugadena janaḥ paritaptaḥ |
rājasamājayuto bahumānī vittasukhena sadā rahitaḥ syāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उप-वेशनम् = उपवेशन (बैठने की) अवस्था; इह = यहाँ; गतवति = चले गए/प्राप्त होने पर; राहौ = राहु में; दद्रु-गदेन = दद्रु-रोग (चर्म-विकार-संकेत, शास्त्र-शब्द) से; जनः = व्यक्ति; परितप्तः = पीड़ित; राज-समाज-युतः = राज-सभा से युक्त; बहु-मानी = अत्यधिक सम्मानित; वित्त-सुखेन = धन-सुख से; सदा = सदैव; रहितः = रहित; स्यात् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब राहु उपवेशन-अवस्था को प्राप्त हो, तो जातक दद्रु-गद से परितप्त कहा गया है। वह राज-समाज से जुड़ा और बहु-माननीय भी बताया गया है। किन्तु वित्त-सुख से सदा रहित—ऐसा शास्त्र का फल-वाक्य है। यह चिकित्सा-निदान या भय-कथन नहीं; स्रोत-ग्रन्थ का अवस्था-फल है।

English rendering The text states that when Rāhu has entered the upaveśana (seated) state, the person is described as tormented by dadru affliction. He is said to move in royal company and receive much honour, yet always to lack the comfort of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल)। “दद्रु-गद” शास्त्र का पारंपरिक लक्षण-शब्द है; इसे आधुनिक रोग-निदान या चिकित्सा-वाक्य न समझें।

45.125
नेत्रपाणावगौ नेत्रे भवतो रोगपीडिते |
दुष्टव्यालारिचौराणां भयं तस्य धनक्षयः
netrapāṇāvagau netre bhavato rogapīḍite |
duṣṭavyālāricaurāṇāṃ bhayaṃ tasya dhanakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नेत्र-पाणौ = नेत्र-पाणि अवस्था में (पाणि/हस्त-संबंधित अवस्था-नाम); अगौ = अहि/राहु (अग/अहि; पाठ-भेद संभव) में; नेत्रे = दोनों नेत्र; भवतः = होते हैं; रोग-पीडिते = रोग से पीड़ित; दुष्ट-व्याल = दुष्ट सर्प; अरि = शत्रु; चौराणाम् = चोरों का; भयम् = भय; तस्य = उसका; धन-क्षयः = धन-ह्रास।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब अग् (राहु) नेत्र-पाणि अवस्था में हो, तो नेत्र रोग-पीड़ित होते हैं—ऐसा कहा गया है। दुष्ट सर्प, शत्रु और चोरों का भय तथा धन-क्षय—यह भी उसी अवस्था का शास्त्र-फल है। भय-व्यापार या निश्चित भाग्य नहीं; ग्रन्थ की घोषणा का अनुवाद मात्र है।

English rendering The text states that when Aga (Rāhu) is in the netra-pāṇi state, the eyes are said to be afflicted by disease. Fear of evil serpents, enemies, and thieves, and decay of wealth, are also stated for that condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल)। “अगौ” = राहु (अहि/अग) पढ़ना पारंपरिक है; पाठ-भेद संभव। कोई कोण, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

45.126
प्रकाशने शुभासने स्थितिः कृतिः शुभा नृणां |
धनोन्नतिर्गुणोन्नतिः सदा विदामगाविह |
धराधिपाधिकारिता यशोलता तता भवे |
न्नवीननीरदाकृतिर्विदेशतो महोन्नतिः
prakāśane śubhāsane sthitiḥ kṛtiḥ śubhā nṛṇāṃ |
dhanonnatirguṇonnatiḥ sadā vidāmagāviha |
dharādhipādhikāritā yaśolatā tatā bhave |
nnavīnanīradākṛtirvideśato mahonnatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रकाशने = प्रकाशन-अवस्था में; शुभ-आसने = शुभ आसन/स्थिति में; स्थितिः = स्थिति; कृतिः = कर्म/कृति; शुभा = शुभ; नृणाम् = मनुष्यों की; धन-उन्नतिः = धन-वृद्धि; गुण-उन्नतिः = गुण-वृद्धि; सदा = सदैव; विदाम् = विद्वानों की/के लिए; अगाविह = अग् (राहु) यहाँ (पाठ-भेद संभव); धरा-अधिप-अधिकारिता = भू-स्वामी-अधिकार; यशस्-लता = यश की लता; तता = फैली हुई; भवेत् = हो; नवीन-नीरद-आकृतिः = नव मेघ-जैसी आकृति/कान्ति; विदेशतः = विदेश से; महा-उन्नतिः = बड़ी उन्नति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि प्रकाशन-अवस्था में, शुभ-आसन की स्थिति में, मनुष्यों की स्थिति और कृति शुभ होती है। धन-उन्नति और गुण-उन्नति सदा कही गई है—विद्वान्-संदर्भ सहित, राहु-प्रसंग में (पाठ: विदामगाविह; पाठ-भेद संभव)। धराधिप-अधिकार, यश-लता का विस्तार, नवीन मेघ-जैसी कान्ति, तथा विदेश से महोन्नति—यह सब उसी प्रकाशन/शुभासन-फल का विस्तार है।

English rendering The text states that in the prakāśana state, with an auspicious seat, people’s standing and deeds are auspicious. Rise of wealth and of qualities is always said to follow; lordship over the earth, spreading fame, a form bright as a new rain-cloud, and great advancement from a foreign land are also stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अवस्था-फल, दीर्घ पद्य)। अंतिम पंक्तियों में छन्द-प्रवाह और सन्धि (“न्नवीन…”) पाठ-व्यवस्था का हिस्सा है; कोई गणना-सूत्र नहीं।

45.127
गमने च यदा राहौ बहुसन्तानवान्नरः |
पण्डितो धनवान् दाता राजपूज्यो नरो भवेत्
gamane ca yadā rāhau bahusantānavānnaraḥ |
paṇḍito dhanavān dātā rājapūjyo naro bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गमने = गमन-अवस्था में; राहौ = राहु जब (उस अवस्था में) हो; बहुसन्तानवान् = बहुत सन्तान वाला; पण्डितः = विद्वान्; धनवान् = धन-सम्पन्न; दाता = दानशील; राजपूज्यः = राजा द्वारा सम्मानित; नरः भवेत् = पुरुष हो जाता है।

हिन्दी भावार्थ जब राहु गमन-अवस्था में होता है, तब शास्त्र कहता है कि वह नर बहुत सन्तान वाला बनता है। वह पण्डित, धनवान और दाता कहा गया है। राजा द्वारा पूज्य—अर्थात् राज-सम्मान का भागी—होने का भी यहाँ फल-कथन है। यह गमन-अवस्था का राहु-फल है, न कि कोई अनिवार्य भाग्य-वाक्य।

English rendering The text states that when Rāhu is in the gamana (going/travel) state, the person becomes one of many progeny, learned, wealthy, and generous. He is also described as honoured by kings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह राहु की गमन-अवस्था का शास्त्रीय फल है; अवस्था-निर्धारण अलग नियम से होता है, इस श्लोक में केवल फल कहा गया है।

45.128
राहावागमने क्रोधी सदा धीधनवर्जितः |
कुटिलः कृपणः कामी नरो भवति सर्वथा
rāhāvāgamane krodhī sadā dhīdhanavarjitaḥ |
kuṭilaḥ kṛpaṇaḥ kāmī naro bhavati sarvathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहौ = राहु में/जब राहु; आगमने = आगमन-अवस्था में; क्रोधी = क्रोधशील; सदा = सदैव; धीधनवर्जितः = बुद्धि और धन से रहित; कुटिलः = टेढ़ा/कपट-प्रवृत्ति; कृपणः = कंजूस; कामी = काम-प्रधान; सर्वथा = सब प्रकार से।

हिन्दी भावार्थ जब राहु आगमन-अवस्था में हो, शास्त्र कहता है कि नर क्रोधी होता है। वह सदा धी (बुद्धि) और धन से वर्जित बताया गया है। कुटिल, कृपण और कामी—ये तीन गुण-दोष यहाँ एक साथ फल-रूप में जुड़े हैं। यह आगमन का राहु-फल है; “सर्वथा” शब्द शास्त्र की ही तीव्रता है, हमारे द्वारा थोपा गया निश्चय नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu is in āgamana (coming/arrival), the person is angry and always lacking in intellect and wealth. He is described as crooked, miserly, and lustful in every respect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। आगमन-अवस्था का नाम-निर्देश और उसके साथ जुड़े चरित्र/सम्पत्ति-फल यहाँ हैं; कोई अंश, बिन्दु या दशा-वर्ष नहीं।

45.129
सभागतो यदा राहुः पण्डितः कृपणो नरः |
नानागुणपरिक्रान्तो वित्त सौख्यसमन्वितः
sabhāgato yadā rāhuḥ paṇḍitaḥ kṛpaṇo naraḥ |
nānāguṇaparikrānto vitta saukhyasamanvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सभागतः = सभा-अवस्था में स्थित; राहुः = राहु; पण्डितः = विद्वान्; कृपणः = कृपण/कंजूस; नरः = मनुष्य; नानागुणपरिक्रान्तः = अनेक गुणों से युक्त/घिरा; वित्त = धन; सौख्यसमन्वितः = सुख से समन्वित।

हिन्दी भावार्थ जब राहु सभागत हो—अर्थात् सभा-अवस्था में—तब शास्त्र कहता है कि नर पण्डित होता है, किन्तु कृपण भी। अनेक गुणों से परिक्रान्त (नाना गुणों से घिरा/युक्त) बताया गया है। वित्त और सौख्य से समन्वित होने का फल भी इसी अवस्था से जोड़ा गया है। विद्वत्ता और कृपणता का साथ यहाँ शास्त्र का अपना मिश्र-चित्र है।

English rendering The text states that when Rāhu is sabhāgata (in the assembly state), the person is learned yet miserly. He is said to be endowed with various qualities and accompanied by wealth and happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सभा-अवस्था का राहु-फल; गणना का सूत्र नहीं, केवल अवस्था-नाम और फल-सूची।

45.130
चेदगावागमं यस्य याते तदा व्याकुलत्वं सदारातिभीत्या भयम् |
महद्बन्धुवादो जनानां निपातो भवेद्वित्तहानिः शठत्वं कृशत्वं
cedagāvāgamaṃ yasya yāte tadā vyākulatvaṃ sadārātibhītyā bhayam |
mahadbandhuvādo janānāṃ nipāto bhavedvittahāniḥ śaṭhatvaṃ kṛśatvaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चेदगावागमं = (पाठ-भेद संभव) किसी विशिष्ट आगम/अवस्था-सन्दर्भ का पद; यस्य = जिसके; याते = होने/बीतने पर; व्याकुलत्वम् = व्याकुलता; सदारातिभीत्या = पत्नी सहित शत्रु-भय से; भयम् = भय; महद्बन्धुवादः = बन्धुओं का बड़ा विवाद; जनानां निपातः = जनों का पतन; वित्तहानिः = धन-हानि; शठत्वम् = शठता; कृशत्वम् = कृशता/दुर्बलता।

हिन्दी भावार्थ इस श्लोक में (पाठ-भेद संभव) जिस अवस्था/आगम का निर्देश है, उसके होने पर शास्त्र व्याकुलता और भय का फल कहता है—सदार (पत्नी सहित) अराति-भय के साथ। बन्धुओं में महान् वाद, जनों का निपात, वित्त-हानि, शठत्व और कृशत्व—ये सब एक ही फल-माला में गूँथे हैं। यह विस्तारित फल-कथन है; छन्द भी यहाँ आस-पास के श्लोकों से दीर्घ है।

English rendering The text states that under the condition named in this verse (reading uncertain: cedagāvāgama), there is agitation and fear, including fear of enemies together with the spouse. It further states great quarrel among kin, downfall among people, loss of wealth, craftiness, and emaciation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “चेदगावागमं” पद पाठ-भेद-संभाव्य है; अंक, वर्ग या दशा-वर्ष यहाँ नहीं—केवल अवस्था-फल की सूची।

45.131
भोजने भोजनेनालं विकलो मनुजो भवेत् |
मन्दबुद्धिः क्रियाभीरुः स्त्रीपुत्रसुखवर्जितः
bhojane bhojanenālaṃ vikalo manujo bhavet |
mandabuddhiḥ kriyābhīruḥ strīputrasukhavarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजने = भोजन-अवस्था में; भोजनेन = भोजन से/भोजन के विषय में; अलम् = पर्याप्त/पर्याप्त रूप से (या “अलं” की शास्त्रीय प्रयुक्ति); विकलः = विकल/व्यथित; मनुजः = मनुष्य; मन्दबुद्धिः = मन्द बुद्धि वाला; क्रियाभीरुः = कर्म से डरने वाला; स्त्रीपुत्रसुखवर्जितः = स्त्री-पुत्र के सुख से रहित।

हिन्दी भावार्थ जब राहु भोजन-अवस्था में हो, शास्त्र कहता है कि मनुज भोजन के सन्दर्भ में विकल हो जाता है। मन्दबुद्धि और क्रियाभीरु—कार्य से भयभीत—कहा गया है। स्त्री और पुत्र के सुख से वर्जित होने का फल भी इसी अवस्था से जोड़ा गया है। यह भोजन-अवस्था का राहु-फल है, न कि आहार-चिकित्सा का निर्देश।

English rendering The text states that when Rāhu is in bhojana (the eating state), the person becomes distressed in connection with food. He is described as dull-witted, shy of action, and without the happiness of wife and children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भोजन-अवस्था नामित है; कोई भोज-मात्रा, अंश या बल-इकाई नहीं दी गई।

45.132
नृत्यलिप्सागते राहौ महाव्याधिविवर्द्धनम् |
नेत्ररोगी रिपोर्भीतिर्धनधर्मक्षयो नृणाम्
nṛtyalipsāgate rāhau mahāvyādhivivarddhanam |
netrarogī riporbhītirdhanadharmakṣayo nṛṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्यलिप्सा = नृत्य की लिप्सा/इच्छा (अवस्था-नाम); आगते राहौ = राहु के उस अवस्था में आने पर; महाव्याधिविवर्द्धनम् = महाव्याधि की वृद्धि; नेत्ररोगी = नेत्र-रोग वाला; रिपोः भीतिः = शत्रु का भय; धनधर्मक्षयः = धन और धर्म का क्षय; नृणाम् = मनुष्यों का।

हिन्दी भावार्थ जब राहु नृत्यलिप्सा-अवस्था में आ जाए, शास्त्र कहता है कि महाव्याधि का विवर्धन होता है। नेत्ररोगी होना और रिपु से भीति—ये दोनों फल यहाँ जुड़े हैं। धन और धर्म का क्षय भी नृणाम् (मनुष्यों) के लिए कहा गया है। व्याधि/नेत्र यहाँ शास्त्र के फल-शब्द हैं; चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu enters nṛtyalipsā (desire-for-dance state), there is increase of major illness. People are described as eye-afflicted, fearful of enemies, and subject to decline of wealth and dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। नृत्यलिप्सा नामित अवस्था का फल-समूह; कोई काल-वर्ष, अंश-विभाग या बल-माप नहीं।

45.133
कौतुके च यदा राहौ स्थानहीनो नरो भवेत् |
परदाररतो नित्यं परवित्तापहारकः
kautuke ca yadā rāhau sthānahīno naro bhavet |
paradārarato nityaṃ paravittāpahārakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतुके = कौतुक-अवस्था में; राहौ = जब राहु; स्थानहीनः = स्थान/पद से हीन; नरः = मनुष्य; परदाररतः = पर-स्त्री में आसक्त; नित्यम् = सदा; परवित्तापहारकः = पर-धन का अपहरण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ जब राहु कौतुक-अवस्था में हो, शास्त्र कहता है कि नर स्थानहीन हो जाता है। परदार में नित्य रत होना—यह शास्त्र का अपना नैतिक-फल चित्र है। पर-वित्त का अपहारक भी कहा गया है। कौतुक यहाँ ग्रह-अवस्था का नाम है; लोक-कौतुक मात्र नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu is in kautuka (curiosity/play state), the person becomes without standing. He is described as constantly attached to another’s wife and as one who seizes another’s wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कौतुक-अवस्था का चरित्र-फल; गणना-सूत्र, वर्ग-नियम या दशा-अनुपात यहाँ नहीं।

45.134
निद्रावस्थां गते राहौ गुणग्रामयुतो नरः |
कान्तासन्तानवान् धीरो गर्वितो बहुवित्तवान्
nidrāvasthāṃ gate rāhau guṇagrāmayuto naraḥ |
kāntāsantānavān dhīro garvito bahuvittavān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्रावस्था = निद्रा-अवस्था (ग्रह की “सोई हुई” अवस्था); गते राहौ = राहु के उस अवस्था में स्थित होने पर; गुणग्रामयुतः = गुणों के समूह से युक्त; कान्तासन्तानवान् = कान्ता (पत्नी/प्रिय) और सन्तान से युक्त; धीरः = धैर्यवान्/स्थिर; गर्वितः = गर्वयुक्त; बहुवित्तवान् = प्रचुर धन वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु जब निद्रावस्था में हो, तो नर गुणों के समुदाय से युक्त बताया गया है। वह कान्ता और सन्तान वाला, धीर, गर्वित तथा बहुत धन वाला कहा गया है। यह निद्रा-अवस्था का राहु-फल-कथन है — अवस्था-नाम और फल का जोड़ा, न कि स्वतंत्र गणना-सूत्र।

English rendering The text states that when Rāhu is in the sleep-state (nidrāvasthā), the person is said to be endowed with a host of virtues, to have spouse and offspring, and to be steadfast, proud, and possessed of abundant wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु की निद्रावस्था-फल)। अवस्था-निर्णय स्वयं पूर्व-श्लोकों/अवस्था-विधि पर निर्भर हो सकता है; यह श्लोक केवल फलादेश देता है।

45.135
मेषे वृषेऽथ वा युग्मे कन्ययां शयनं गते |
केतौ धनसमृद्धिः स्यादन्यभे रोगवर्धनम्
meṣe vṛṣe'tha vā yugme kanyayāṃ śayanaṃ gate |
ketau dhanasamṛddhiḥ syādanyabhe rogavardhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष राशि में; वृषे = वृष में; युग्मे = मिथुन में; कन्ययाम् = कन्या में; शयनं गते = शयन-अवस्था प्राप्त होने पर; केतौ = केतु के; धनसमृद्धिः = धन की समृद्धि; अन्यभे = अन्य राशि में; रोगवर्धनम् = रोगों की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब मेष, वृष, मिथुन अथवा कन्या में शयन-अवस्था में हो, तो धन-समृद्धि होती है। अन्य राशियों में उसी शयन-केतु के लिए रोग-वृद्धि कही गई है। यहाँ फल राशि-भेद से दो भागों में बँटा है — चार राशियाँ “धन”, शेष “रोग-वर्धन”।

English rendering The text states that when Ketu is in the reclining/sleep-state (śayana) in Aries, Taurus, Gemini, or Virgo, there is prosperity of wealth; in other signs, it states increase of disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शयन-केतु × राशि-वर्गीकरण)। चार राशियाँ (मेष–वृष–मिथुन–कन्या) बनाम “अन्यभ” का द्वि-वर्ग; अवस्था-निर्णय अलग नियम से, यह श्लोक केवल फल देता है।

45.136
उपवेशं गतौ केतौ दद्रुरोगविवर्द्धनम् |
अरिवातनृपव्यालचैरशंका समन्ततः
upaveśaṃ gatau ketau dadrurogavivarddhanam |
arivātanṛpavyālacairaśaṃkā samantataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपवेशं गतौ = उपवेश (बैठने) की अवस्था में पहुँचे; केतौ = केतु पर; दद्रुरोगविवर्द्धनम् = दद्रु-रोग (त्वक्-विकार/खुजली-प्रकार) की वृद्धि; अरि = शत्रु; वात = वायु/वात; नृप = राजा; व्याल = सर्प; चौर = चोर; आशंका = भय/संदेह; समन्ततः = चारों ओर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु के उपवेश-अवस्था में होने पर दद्रु-रोग बढ़ता है। साथ ही शत्रु, वात, राजा, सर्प और चोर से भय चारों ओर से कहा गया है। यह उपवेश-केतु का फल-वर्णन है — रोग-नाम और भय-सूची शास्त्रीय कथन के रूप में।

English rendering The text states that when Ketu is in the seated-state (upaveśa), there is increase of dadru-type disease, and apprehension on all sides from enemies, wind/vāta, the king, serpents, and thieves.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपवेश-केतु)। रोग-नाम और भय-सूची को शास्त्रीय सूची के रूप में पढ़ें; चिकित्सा-निदान या निश्चित आशंका का दावा यह श्लोक स्वयं “गणना” नहीं करता।

45.137
नेत्रपाणिं गते केतौ नेत्ररोगः प्रजायते |
दुष्टसर्पादिभीतिश्च रिपुराजकुलादपि
netrapāṇiṃ gate ketau netrarogaḥ prajāyate |
duṣṭasarpādibhītiśca ripurājakulādapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नेत्रपाणिं गते = नेत्रपाणि-अवस्था में स्थित; केतौ = केतु के; नेत्ररोगः = नेत्र-रोग; प्रजायते = उत्पन्न होता है; दुष्टसर्पादिभीतिः = दुष्ट सर्प आदि से भय; रिपुराजकुलात् = शत्रु और राजकुल से भी; अपि = भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब नेत्रपाणि-अवस्था में हो, तो नेत्ररोग उत्पन्न होता है। दुष्ट सर्प आदि का भय तथा शत्रु और राजकुल से भी भय कहा गया है। यह अवस्था-फल है — “नेत्र” शब्द यहाँ अवस्था-नाम और फल-नाम दोनों से जुड़ा हुआ शास्त्रीय युग्म है।

English rendering The text states that when Ketu is in the netrapāṇi state, eye-disease arises, together with fear of wicked serpents and the like, and also fear from enemies and the royal family.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नेत्रपाणि-केतु)। फल-सूची (नेत्ररोग, सर्प-भय, रिपु–राजकुल) शास्त्र का कथन है; इसे चिकित्सकीय निदान या निश्चित राजकीय संकट न मानें।

45.138
केतौ प्रकाशने संज्ञे धनवान् धार्मिकः सदा |
नित्यं प्रवासी चोत्साही सात्त्विको राजसेवकः
ketau prakāśane saṃjñe dhanavān dhārmikaḥ sadā |
nityaṃ pravāsī cotsāhī sāttviko rājasevakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रकाशने संज्ञे = प्रकाशना नाम की अवस्था में जाना/कहा गया; केतौ = केतु के; धनवान् = धन-युक्त; धार्मिकः सदा = सदा धर्मशील; नित्यं प्रवासी = निरंतर प्रवास करने वाला; उत्साही = उत्साह-युक्त; सात्त्विकः = सत्त्व-प्रधान; राजसेवकः = राजा का सेवक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब प्रकाशना-संज्ञा वाली अवस्था में हो, तो व्यक्ति धनवान् और सदा धार्मिक कहा गया है। वह नित्य प्रवासी, उत्साही, सात्त्विक तथा राजसेवक बताया गया है। यहाँ फल-गुणों की सूची सकारात्मक पक्ष की ओर झुकी हुई है — धन, धर्म, यात्रा, उत्साह, सत्त्व और राजसेवा।

English rendering The text states that when Ketu is designated as being in the prakāśana (manifestation/illumination) state, the person is wealthy and ever dharmic, a constant traveler, enthusiastic, sāttvika, and a servant of the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रकाशना-केतु)। छः गुण-फल (धन, धर्म, प्रवास, उत्साह, सत्त्व, राजसेवा) शास्त्रीय सूची हैं; संख्या-सूत्र या बल-माप यहाँ नहीं है।

45.139
गमेच्छायां भवेत्केतुर्बहुपुत्रो महाधनः |
पण्डितो गुणवान् दाता जायते च नरोत्तमः
gamecchāyāṃ bhavetketurbahuputro mahādhanaḥ |
paṇḍito guṇavān dātā jāyate ca narottamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गमेच्छायाम् = गमन की इच्छा वाली अवस्था में; भवेत् केतुः = केतु हो; बहुपुत्रः = बहुत पुत्र वाला; महाधनः = महान् धन वाला; पण्डितः = विद्वान्; गुणवान् = गुण-सम्पन्न; दाता = दानशील; नरोत्तमः = नरों में उत्तम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब गमेच्छा-अवस्था में हो, तो नर बहुपुत्र और महाधन वाला कहा गया है। वह पण्डित, गुणवान्, दाता तथा नरोत्तम जात बताया गया है। यह गमेच्छा-केतु का शुभ-फल-समूह है — सन्तान, धन, विद्या, गुण, दान और उत्तमता एक साथ गिने गए हैं।

English rendering The text states that when Ketu is in the gamecchā (desire-to-go) state, the person is said to have many sons and great wealth, and to be learned, endowed with virtues, generous, and the best among men.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गमेच्छा-केतु)। “बहु” और “महा” गुणात्मक शब्द हैं, निश्चित संख्या नहीं; फल को शास्त्र-कथन के रूप में रखें।

45.140
आगमने च यदा केतुर्नानारोगो धनक्षयः |
दन्तघाती महारोगी पिशुनः परनिन्दकः
āgamane ca yadā keturnānārogo dhanakṣayaḥ |
dantaghātī mahārogī piśunaḥ paranindakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमने = आगमन-अवस्था में; यदा केतुः = जब केतु हो; नानारोगः = अनेक प्रकार के रोग; धनक्षयः = धन की हानि; दन्तघाती = दन्त-पीड़ा/दन्त-घात वाला; महारोगी = महारोग-ग्रस्त; पिशुनः = चुगलखोर/भेदी; परनिन्दकः = दूसरों की निन्दा करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब आगमन-अवस्था में हो, तो नाना रोग और धनक्षय होते हैं। व्यक्ति दन्तघाती, महारोगी, पिशुन तथा परनिन्दक कहा गया है। यह आगमन-केतु का अशुभ-फल-समूह है — रोग, धन-हानि, दन्त-कष्ट, महारोग और वाणी-दोष एक साथ गिनाए गए हैं; इन्हें निश्चित भाग्य या चिकित्सा-निदान न समझें।

English rendering The text states that when Ketu is in the āgamana (arrival/coming) state, there are various diseases and loss of wealth; the person is said to suffer dental affliction and major illness, and to be a tale-bearer and a critic of others.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आगमन-केतु)। रोग–धनक्षय–दन्त–पिशुन–परनिन्दा शास्त्रीय सूची है; भय-व्यापार या निश्चित रोग-निदान का दावा न जोड़ें — केवल पाठ का कथन।

45.141
सभावस्थां गते केतौ वाचालो बहुगर्वितः |
कृपणो लम्पटश्चैव धूर्तविद्द्याविशारदः
sabhāvasthāṃ gate ketau vācālo bahugarvitaḥ |
kṛpaṇo lampaṭaścaiva dhūrtaviddyāviśāradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सभा-अवस्था = सभा-अवस्था (केतु की अष्ट-अवस्थाओं में एक); गते केतौ = केतु उस अवस्था में स्थित हो; वाचालः = वाचाल, बहु-बोलने वाला; बहु-गर्वितः = अत्यधिक गर्वी; कृपणः = कंजूस; लम्पटः = विषय-लोलुप; धूर्त-विद्या-विशारदः = धूर्त-विद्या में निपुण (पाठ: विद्द्या = विद्या; पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब केतु सभावस्था में हो, तब जातक वाचाल और अत्यधिक गर्वी कहा गया है। उसी कथन में उसे कृपण और लम्पट भी बताया गया है। साथ ही वह धूर्त-विद्या में निपुण माना गया है — यह फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Ketu is in the sabhā state, the native is talkative and greatly proud. He is further described as miserly and lustful, and skilled in crafty learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु की सभावस्था का परिणाम)। यह अवस्थ-फल का वर्णनात्मक नियम है; गणना का कोई अंक, भाग या बल-मात्रा यहाँ नहीं दी गई।

45.142
यदागमे भवेत्केतुः केतुः स्यात्पापकर्मणाम् |
बन्धुवादरतो दुष्टो रिपुरोगनिपीडितः
yadāgame bhavetketuḥ ketuḥ syātpāpakarmaṇām |
bandhuvādarato duṣṭo ripuroganipīḍitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आगमे = आगम-अवस्था में; भवेत् केतुः = केतु हो; पाप-कर्मणाम् = पाप-कर्मों से युक्त / पाप-कर्म करने वाला; बन्धु-वाद-रतः = बन्धुओं से विवाद में रत; दुष्टः = दुष्ट स्वभाव वाला; रिपु-रोग-निपीडितः = शत्रु और रोग से पीड़ित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब केतु आगम-अवस्था में हो, तब वह पाप-कर्मों से सम्बद्ध कहा गया है। जातक को बन्धु-विवाद में रत और दुष्ट स्वभाव वाला बताया गया है। उसी फल-कथन में शत्रु और रोग से निपीड़न का उल्लेख है — यह पाठ का कथन है, भय या निश्चित विपत्ति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Ketu is in the āgama state, he is associated with sinful deeds. The native is described as quarrelsome with kin, of base disposition, and pressed by enemies and disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु की आगम-अवस्था)। अवस्थ-नाम से फल जोड़ा गया है; कोई संख्यात्मक माप या सूत्र नहीं।

45.143
भोजने तु जनो नित्यं क्षुधया परिपीडितः |
दरिद्रो रोगसंतप्तः केतौ भ्रामति मेदिनीम्
bhojane tu jano nityaṃ kṣudhayā paripīḍitaḥ |
daridro rogasaṃtaptaḥ ketau bhrāmati medinīm

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजने = भोजन-अवस्था में (केतु की); जनः = जातक / व्यक्ति; नित्यम् = सदा; क्षुधया परिपीडितः = भूख से अत्यन्त पीड़ित; दरिद्रः = दरिद्र; रोग-संतप्तः = रोग से संतप्त; भ्रामति मेदिनीम् = पृथ्वी पर भ्रमण करता है; केतौ = केतु (उक्त अवस्था में)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की भोजन-अवस्था में जातक नित्य क्षुधा से परिपीड़ित कहा गया है। उसी कथन में दरिद्रता और रोग-संतप्त होना बताया गया है। फल यह भी कहता है कि ऐसा व्यक्ति पृथ्वी पर भ्रमण करता है — वर्णनात्मक फल-कथन, न कि अनिवार्यता का दावा।

English rendering The text states that when Ketu is in the bhojana state, the person is constantly tormented by hunger. He is described as poor and afflicted by illness, and as one who wanders the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु की भोजन-अवस्था)। यहाँ कोई अंश, वर्ष, बल-इकाई या वर्ग-नियम नहीं है।

45.144
नृत्यलिप्साङ्गते केतौ व्याधिना विकलो भवेत् |
बुद्बुदाक्षो दुराघर्षो धूर्तोऽनर्थकरो नरः
nṛtyalipsāṅgate ketau vyādhinā vikalo bhavet |
budbudākṣo durāgharṣo dhūrto'narthakaro naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृत्य-लिप्सा-अङ्गते केतौ = केतु नृत्यलिप्सा-अवस्था में स्थित हो; व्याधिना विकलः = रोग से विकल / असमर्थ; बुद्बुद-अक्षः = बुद्बुदाक्ष (अस्थिर / फूली दृष्टि वाला); दुराघर्षः = दुर्दम्य / कठिन-स्पर्श (पाठ-भेद संभव); धूर्तः = धूर्त; अनर्थ-करः नरः = अनर्थ करने वाला मनुष्य

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब केतु नृत्यलिप्सा-अवस्था में हो, तब जातक व्याधि से विकल होता है। उसे बुद्बुदाक्ष, दुर्दम्य स्वभाव वाला और धूर्त कहा गया है। फल-कथन में उसे अनर्थकारी भी बताया गया है — यह शास्त्र का वर्णनात्मक संकेत है, भय-व्यापार या निश्चित दुर्भाग्य का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Ketu is in the nṛtyalipsā state, the person is impaired by disease. He is described as bubble-eyed, hard to subdue, crafty, and a cause of misfortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु की नृत्यलिप्सा-अवस्था)। तकनीकी गणना का कोई घटक यहाँ नहीं आता।

45.145
कौतुकी कौतुके केतौ नटवामारतिप्रियः |
स्थानभ्रष्टो दुराचारी दरिद्रो भ्रमते महीम्
kautukī kautuke ketau naṭavāmāratipriyaḥ |
sthānabhraṣṭo durācārī daridro bhramate mahīm

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कौतुके केतौ = केतु कौतुक-अवस्था में; कौतुकी = कौतुकी / कौतूहल-प्रिय; नट-वामा-रति-प्रियः = नट, स्त्री और रति में प्रिय; स्थान-भ्रष्टः = स्थान से भ्रष्ट; दुराचारी = दुराचारी; दरिद्रः = दरिद्र; भ्रमते महीम् = पृथ्वी पर भ्रमता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की कौतुक-अवस्था में जातक कौतुकी होता है और नट, वामा तथा रति में आसक्त कहा गया है। उसी फल में स्थान-भ्रष्ट और दुराचारी होना बताया गया है। दरिद्र होकर पृथ्वी पर भ्रमण — यह पाठ का कथन है, न कि अनिवार्य भविष्यवाणी।

English rendering The text states that when Ketu is in the kautuka state, the native is fond of spectacle and delights in dancers, women, and pleasure. He is further described as fallen from his place, of bad conduct, poor, and wandering the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु की कौतुक-अवस्था)। अवस्था-नाम और गुण-वर्णन मात्र; कोई संख्यात्मक नियम नहीं।

45.146
निद्रावस्थां गते केतौ धनधान्यसुखं महत् |
नानागुणविनोदेन कालो गच्छति जन्मिनाम्
nidrāvasthāṃ gate ketau dhanadhānyasukhaṃ mahat |
nānāguṇavinodena kālo gacchati janminām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्रा-अवस्थां गते केतौ = केतु निद्रावस्था में पहुँचे; धन-धान्य-सुखम् महत् = धन, धान्य और सुख का महान् योग; नाना-गुण-विनोदेन = नाना गुण और विनोद से; कालः गच्छति = काल बीतता है; जन्मिनाम् = जातकों का

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब केतु निद्रावस्था में हो, तब धन-धान्य और महान् सुख का फल बताया गया है। जातक का समय नाना गुणों और विनोद से व्यतीत होता है — यह शुभ फल-कथन है। ध्यान रहे: अन्य ग्रहों की निद्रावस्था से भिन्न, यहाँ केतु की निद्रा के लिए पाठ स्वयं शुभ फल कहता है।

English rendering The text states that when Ketu is in the nidrā state, there is great wealth, grain, and happiness. For the native, time passes amid manifold virtues and diversions — a result the śāstra itself marks as favorable for this state of Ketu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु की निद्रावस्था; शुभ फल)। कोई वर्ष, अंश या बल-मात्रा नहीं; केवल अवस्था-फल का गुणात्मक वर्णन।

45.147
शयने द्विज भावेषु यत्र तिष्ठन्ति सद्ग्रहाः |
नित्यं तस्य शुभज्ञानं निर्विशंकं वदेत् बुधः
śayane dvija bhāveṣu yatra tiṣṭhanti sadgrahāḥ |
nityaṃ tasya śubhajñānaṃ nirviśaṃkaṃ vadet budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शयने = शयन-अवस्था के प्रसंग में; द्विज = हे द्विज (संबोधन); भावेषु = भावों में; यत्र = जहाँ; तिष्ठन्ति = स्थित हों; सद्-ग्रहाः = शुभ / सद्ग्रह; नित्यम् = सदैव; तस्य शुभ-ज्ञानम् = उसका शुभ फल / शुभ ज्ञान; निर्विशङ्कम् = निःशंक होकर; वदेत् बुधः = विद्वान् कहे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे द्विज, शयन-अवस्था के विषय में, जिन भावों में सद्ग्रह स्थित हों, उनका फल सदैव शुभ जानना चाहिए। बुद्धिमान ज्योतिषी को वह शुभ फल निर्विशंक कहना चाहिए। यह अध्याय-अंत का सामान्य नियम है: शयन में शुभ ग्रहों के भाव-फल को संदेह के बिना शुभ घोषित करने का निर्देश।

English rendering The text states: O twice-born, regarding the śayana state, wherever the benefic planets stand among the houses, one should always know the result as auspicious. The wise should declare that good result without hesitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम / निर्देश (शयन में सद्ग्रहों का शुभ-ज्ञान)। यह व्याख्या-विधि का सामान्य सूत्र है, संख्यात्मक गणना नहीं; भाव-स्थिति यहाँ गुणात्मक है, अंश-माप नहीं।

45.148
भोजने येषु भावेषु पापास्तिष्ठन्ति सर्वथा |
तदा सर्वविनाशेऽपि नाऽत्र कार्या विचारणा
bhojane yeṣu bhāveṣu pāpāstiṣṭhanti sarvathā |
tadā sarvavināśe'pi nā'tra kāryā vicāraṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजने = भोजन-काल / खाने की अवस्था; येषु भावेषु = जिन भावों में; पापाः = पापग्रह (मंगल, शनि, रवि, राहु-केतु आदि — पाठानुसार); तिष्ठन्ति = स्थित रहते हैं; सर्वथा = सर्व प्रकार से / पूर्णतः; सर्वविनाशेऽपि = समग्र विनाश में भी; नाऽत्र कार्या विचारणा = यहाँ विचार-विमर्श की आवश्यकता नहीं (फल निश्चित माना गया)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब जीव भोजन-अवस्था में हो, और पापग्रह जिन भावों में पूर्णतः स्थित हों, उन भावों से संबंधित फल को लेकर संदेह नहीं करना चाहिए। यहाँ तक कि ‘सर्वविनाश’ जैसे गंभीर फल-कथन के विषय में भी शास्त्र विचार-विमर्श का स्थान नहीं छोड़ता — अर्थात् भोजन-कालीन पाप-स्थिति को निर्णायक संकेत मानता है। यह फल-कथन अवस्था-सिद्धान्त का भाग है; इसे नियति-घोषणा नहीं, शास्त्रीय संकेत के रूप में पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when a person is in the state of eating, the houses occupied by malefics are to be treated as decisive; even where total ruin is indicated, no further deliberation is called for. The verse fixes the eating-avasthā as a moment when malefic house-occupancy is taken as unambiguous.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भोजन-अवस्था में पाप-भाव स्थिति)। यहाँ ‘गणना’ केवल यह है कि भोजन-काल को अवस्था-बिन्दु मानकर भाव-स्थित पापग्रहों का फल पढ़ा जाता है; कोई अंश, वर्ग या बल-माप नहीं।

45.149
निद्रायां च यदा पापो जायास्थाने शुभं वदेत् |
यदि पापग्रहैर्दृष्टो न शुभं च कदाचन
nidrāyāṃ ca yadā pāpo jāyāsthāne śubhaṃ vadet |
yadi pāpagrahairdṛṣṭo na śubhaṃ ca kadācana

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निद्रायां = निद्रा-अवस्था में; यदा = जब; पापः = पापग्रह; जायास्थाने = सप्तम भाव (जाया/पत्नी-स्थान); शुभं वदेत् = शुभ फल कहे; यदि = यदि; पापग्रहैः दृष्टः = पापग्रहों से दृष्ट; न शुभं = शुभ नहीं; कदाचन = कभी भी नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि निद्रा-काल में यदि पापग्रह जाया-स्थान (सप्तम भाव) में हो, तो सामान्यतः शुभ फल कहा जाता है। परन्तु वही पापग्रह यदि अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो, तो शास्त्र शुभता का निषेध करता है — ‘कदाचन न शुभम्’। यहाँ दृष्टि-संयोग फल को पलटने वाला शर्त है; भय-भाषा नहीं, शर्त-युक्त फल-कथन है।

English rendering The text states that a malefic in the seventh house during sleep is to be spoken of as favourable; but if that malefic is aspected by other malefics, the result is never favourable. Aspect by malefics cancels the provisional good indication.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निद्रा + सप्तम में पाप, दृष्टि-शर्त सहित)। जायास्थान = भाव 7; ‘दृष्ट’ = शास्त्रीय दृष्टि-नियम से युक्त/अयुक्त — संख्यात्मक बल यहाँ नहीं दिया।

45.150
सुतस्थाने स्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा |
तदा शुभं वदेत्तस्य नाऽत्र कार्या विचारणा
sutasthāne sthitaḥ pāpo nidrāyāṃ śayane'pi vā |
tadā śubhaṃ vadettasya nā'tra kāryā vicāraṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतस्थाने = पंचम भाव (सुत/पुत्र-स्थान); स्थितः पापः = स्थित पापग्रह; निद्रायां = निद्रा में; शयनेऽपि वा = अथवा शयन/लेटे रहने में; तदा = तब; शुभं वदेत् = शुभ कहे; तस्य = उसके लिए; नाऽत्र कार्या विचारणा = यहाँ विचार की आवश्यकता नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि निद्रा या शयन-अवस्था में यदि पापग्रह सुत-स्थान (पंचम भाव) में स्थित हो, तो उस स्थिति को शुभ फल के रूप में कहना चाहिए। ‘नाऽत्र कार्या विचारणा’ से शास्त्र स्वयं इस फल को निर्विवाद मानता है — अर्थात् पंचमस्थ पाप की निद्रा/शयन-अवस्था में शुभता का पक्ष स्पष्ट है। यह अवस्था-फल है, सामान्य जन्म-कुण्डली-फल का सामान्यीकरण नहीं।

English rendering The text states that a malefic placed in the fifth house during sleep or while lying down is to be declared favourable, and that no further deliberation is required on this point. The fifth-house malefic in those avasthās is treated as a clear positive indication within this chapter’s frame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निद्रा/शयन + पंचम में पाप)। सुतस्थान = भाव 5; अवस्था = निद्रा या शयन — दोनों विकल्प शास्त्र में समकक्ष रखे गए हैं।

45.151
मृत्युस्थानस्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा |
तदा तस्याऽपमृत्युः स्याद्राजतः परतस्तथा
mṛtyusthānasthitaḥ pāpo nidrāyāṃ śayane'pi vā |
tadā tasyā'pamṛtyuḥ syādrājataḥ paratastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युस्थानस्थितः = अष्टम भाव (मृत्यु/रन्ध्र-स्थान) में स्थित; पापः = पापग्रह; निद्रायां शयनेऽपि वा = निद्रा या शयन में; तदा = तब; तस्य = उसके; अपमृत्युः = अपमृत्यु (असमय/असामान्य मृत्यु-संकेत — शास्त्र-शब्द); स्यात् = हो; राजतः = राजा/राज-सत्ता से; परतस्तथा = तथा शत्रु/अन्य से भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि निद्रा या शयन-अवस्था में यदि पापग्रह मृत्यु-स्थान (अष्टम भाव) में हो, तो अपमृत्यु का फल कहा गया है — राजा की ओर से अथवा शत्रु/अन्य पक्ष से। यह शास्त्र का अपना फल-कथन है; इसे निश्चित भविष्य-वाणी या भय-उत्पादक निर्णय के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। ‘राजतः परतस्तथा’ स्रोत के प्रकार को जोड़ता है, निदान नहीं।

English rendering The text states that a malefic in the eighth house during sleep or while lying down indicates apamṛtyu (untimely or irregular death as a traditional result-word), from royal authority or from an enemy. Report this as the śāstra’s claim, not as a personal prediction or medical certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निद्रा/शयन + अष्टम में पाप → अपमृत्यु-संकेत)। मृत्युस्थान = भाव 8; स्रोत-द्वय: राजतः / परतस् — दोनों शास्त्र-विकल्प, संख्या-माप नहीं।

45.152
शुभग्रहैर्यदा युक्तः शुभैर्वा यदि वीक्षितः |
तदा तु मरणं तस्य गङ्गादौ च विशेषतः
śubhagrahairyadā yuktaḥ śubhairvā yadi vīkṣitaḥ |
tadā tu maraṇaṃ tasya gaṅgādau ca viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभग्रहैः = शुभग्रहों से; यदा युक्तः = जब युक्त/संयुक्त; शुभैः वा वीक्षितः = अथवा शुभों से दृष्ट; तदा तु = तब तो; मरणं तस्य = उसका मरण; गङ्गादौ = गङ्गा आदि पुण्य-तीर्थों में; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के अपमृत्यु-संकेत पर शास्त्र शर्त जोड़ता है: यदि वह पापग्रह शुभग्रहों से युक्त हो, अथवा शुभों से दृष्ट हो, तो मरण-फल का रूप बदलकर ‘गङ्गादौ विशेषतः’ — अर्थात् गङ्गा आदि पुण्य-स्थानों में मरण — कहा गया है। शास्त्र यहाँ मृत्यु को तीर्थ-सम्बद्ध/शुभ-परिणाम-युक्त बनाता है; यह फल-भेद (युक्त/दृष्ट बनाम केवल पाप) है, उपचार-आदेश नहीं।

English rendering The text states that when the same (eighth-placed) malefic is conjoined with benefics or aspected by them, the death indicated is especially associated with the Gaṅgā and other sacred waters/places. Benefic yoga or dṛṣṭi reframes the prior apamṛtyu statement toward a traditional “holy-place” death-result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-योग/दृष्टि से मृत्यु-फल का रूप-भेद)। ‘युक्त’ = एक राशि/भाव में संयोग; ‘वीक्षित’ = शुभ-दृष्टि — दोनों शास्त्रीय योग-शर्तें; कोई वर्ष-संख्या या बल-इकाई नहीं।

45.153
कर्मस्थाने यदा पापः शयने भोजनेऽपि वा |
तदा कर्मविपाकः स्यान्नानादुःखप्रदायकः
karmasthāne yadā pāpaḥ śayane bhojane'pi vā |
tadā karmavipākaḥ syānnānāduḥkhapradāyakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मस्थाने = दशम भाव (कर्म/व्यवसाय-स्थान); यदा पापः = जब पापग्रह; शयने = शयन में; भोजनेऽपि वा = अथवा भोजन में; तदा = तब; कर्मविपाकः = कर्म-विपाक (कर्म-फल का परिपाक/प्रकट होना); स्यात् = हो; नानादुःखप्रदायकः = नाना प्रकार के दुःख देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शयन या भोजन-अवस्था में यदि पापग्रह कर्म-स्थान (दशम भाव) में हो, तो कर्म-विपाक का फल होता है — जो नाना दुःख देने वाला कहा गया है। यहाँ ‘कर्म’ जन्म-कुण्डली के दशम भाव से जुड़ा है; ‘विपाक’ शास्त्र का पारंपरिक शब्द है, चिकित्सा या कानूनी निदान नहीं। फल-कथन को अवस्था + दशमस्थ पाप के युग्म तक सीमित रखें।

English rendering The text states that a malefic in the tenth house during sleep or eating indicates karma-vipāka — the ripening of action-results — described as giving manifold sufferings. This is a phala-statement for the tenth-house malefic in those avasthās, not a diagnosis or a prescription.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शयन/भोजन + दशम में पाप → कर्मविपाक)। कर्मस्थान = भाव 10; अवस्था-द्वय समकक्ष; कोई दशा-वर्ष या बिन्दु-गणना यहाँ नहीं।

45.154
दशमस्थो निशानाथः कौतुके च प्रकाशने |
तदैव राजयोगः स्यान्निर्विशकं द्विजोत्तम
daśamastho niśānāthaḥ kautuke ca prakāśane |
tadaiva rājayogaḥ syānnirviśakaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमस्थः = दशम भाव में स्थित; निशानाथः = चन्द्र (निशा-नाथ); कौतुके = कौतुक/उत्सव-अवस्था में; च प्रकाशने = तथा प्रकाश/प्रकटन-अवस्था में; तदैव = तभी; राजयोगः = राजयोग; स्यात् = हो; निर्विशकं = निःसंशय / बिना संदेह; द्विजोत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चन्द्र दशम भाव में स्थित हो, और अवस्था कौतुक तथा प्रकाश (प्रकटन/उजागर होना) की हो, तो राजयोग होता है — ‘निर्विशकम्’, अर्थात् शास्त्र इसे संदेह-रहित मानता है। यह चन्द्र + दशम + विशिष्ट अवस्था का योग-फल है; सामान्य ‘चन्द्र दशम में = राजयोग’ का सर्वत्र नियम नहीं, बल्कि अवस्था-अध्याय का सीमित कथन। ‘द्विजोत्तम’ संवाद-शैली है।

English rendering The text states that when the Moon occupies the tenth house in the avasthās of kautuka (festivity/curiosity) and prakāśana (manifestation/display), a rāja-yoga arises without doubt, O best of the twice-born. The claim is framed as certain within the chapter’s avasthā logic, not as a universal career prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशमस्थ चन्द्र + कौतुक/प्रकाशन-अवस्था → राजयोग)। निशानाथ = चन्द्र; दशम = भाव 10; योग-नाम शास्त्रीय है — यहाँ कोई वर्ष, अंश या बल-सीमा नहीं दी गई।

45.155
बलाऽबलविचारेण ज्ञातव्यञ्च शुभाऽशुभम् |
एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वाभावेषु बुद्धिमन्
balā'balavicāreṇa jñātavyañca śubhā'śubham |
evaṃ krameṇa boddhavyaṃ sarvābhāveṣu buddhiman

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बलाऽबल-विचारेण = बल और अबल (सामर्थ्य–निर्बलता) का विचार करके; ज्ञातव्यम् = जानना चाहिए; शुभाऽशुभम् = शुभ तथा अशुभ (फल-पक्ष); एवं क्रमेण = इसी क्रम से; बोद्धव्यम् = समझना चाहिए; सर्वाभावेषु = सभी भावों/अवस्था-संदर्भों में (पाठ-भेद संभव — सर्वावस्थासु भी सुना जाता है); बुद्धिमन् = हे बुद्धिमान् (शिष्य/ज्ञानी को संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ विधि का सार बाँधता है — शुभ–अशुभ का निर्णय केवल नाम से नहीं, बलाबल-विचार से जाना जाए। ग्रह की अवस्था, स्थान और सामर्थ्य-निर्बलता का क्रमबद्ध परीक्षण ही फलादेश का द्वार है। इसी क्रम से बुद्धिमान अध्येता को सभी भाव-संदर्भों में समझना चाहिए: पहले बल–अबल, फिर शुभ–अशुभ का निश्चय।

English rendering The text states that auspicious and inauspicious indications are to be known through an examination of strength and weakness. Thus, in due order, the discerning student should understand this across all houses (or states—reading may vary).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सार / फल-निर्णय का सिद्धान्त। बलाबल यहाँ गुणात्मक निर्देश है; परिमाणित रूप षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) में आता है, जहाँ 1 रूप = 60 विरूप, और योग की तुलना ग्रह-वार सीमा से होती है — वह गणना अध्याय २७ की है, इस श्लोक में संख्या नहीं दी गई।

अध्यायः 46

दशाध्यायः

210 श्लोक
46.1
सर्वज्ञोऽसि महर्षे त्वं कृपया दीनवत्सल |
दशाः कतिविधाः सन्ति तन्मे कथय तत्त्वतः
sarvajño'si maharṣe tvaṃ kṛpayā dīnavatsala |
daśāḥ katividhāḥ santi tanme kathaya tattvataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वज्ञः = सर्व-ज्ञ, सब-कुछ जानने वाला; महर्षे = हे महर्षि (पाराशर-संबोधन); कृपया = अनुग्रह से; दीनवत्सल = दीनों के प्रति वात्सल्य रखने वाले; दशाः = काल-विभाग/ग्रह-अवधि-प्रणालियाँ (बहुवचन); कतिविधाः = कितने प्रकार की; तत्त्वतः = यथार्थ रूप से।

हिन्दी भावार्थ शिष्य (मैत्रेय) महर्षि पाराशर को संबोधित कर कहते हैं — हे महर्षे, आप सर्वज्ञ हैं और दीनों पर कृपा रखने वाले हैं। कृपा करके मुझे यह तत्वतः बताइए कि दशाएँ कितने प्रकार की होती हैं। यह अध्याय दशा-शास्त्र के प्रवेश-प्रश्न से खुलता है।

English rendering “O great sage, you are all-knowing and tender to the afflicted; in kindness, tell me truly of how many kinds the daśās are.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शिष्य-गुरु संवाद / प्रश्न-सूत्र। यह श्लोक गणना नहीं देता; यह दशा-भेदों की आगामी सूची का द्वार खोलता है।

46.2
साधु पृष्टं स्वया विप्र लोकानुग्रहकारिणा |
कथयामि तवाग्रेऽहं दशभेदाननेकशः
sādhu pṛṣṭaṃ svayā vipra lokānugrahakāriṇā |
kathayāmi tavāgre'haṃ daśabhedānanekaśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु पृष्टम् = सुष्ठु पूछा गया; स्वया = तुम्हारे द्वारा; विप्र = हे ब्राह्मण/विद्वन्; लोकानुग्रहकारिणा = लोक-कल्याण करने वाले; कथयामि = मैं कहता हूँ; तवाग्रे = तुम्हारे सामने; दशभेदान् = दशाओं के भेद; अनेकशः = अनेक प्रकार से।

हिन्दी भावार्थ महर्षि उत्तर देते हैं — हे विप्र, लोकानुग्रह के हेतु तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हारे सामने दशाओं के अनेक भेद विस्तार से कहूँगा। शास्त्र यहाँ शिष्य की जिज्ञासा को स्वीकृति देकर वर्गीकरण की प्रतिज्ञा करता है।

English rendering “Well asked by you, O brahmin who acts for the world’s welfare; I shall set forth before you the many distinctions of the daśās.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुरु-प्रतिज्ञा / संवाद। गणना नहीं; विषय-सूची की घोषणा है।

46.3
दशाबहुविधास्तासु मुख्या विंशोत्तरी मता |
कैश्चिदष्टोत्तरी कैश्चित् कथिता षोडशोत्तरी
daśābahuvidhāstāsu mukhyā viṃśottarī matā |
kaiścidaṣṭottarī kaiścit kathitā ṣoḍaśottarī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाबहुविधाः = दशाएँ अनेक प्रकार की; तासु = उनमें; मुख्या = प्रधान; विंशोत्तरी = विंश (२०) + उत्तरी → कुल १२० वर्षीय दशा; मता = मानी गई; अष्टोत्तरी = अष्ट (८) + उत्तरी → १०८ वर्ष; षोडशोत्तरी = षोडश (१६) + उत्तरी → ११६ वर्ष; कैश्चित् = कुछ आचार्यों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशाएँ बहुविध हैं; उनमें विंशोत्तरी मुख्य मानी गई है। कुछ आचार्य अष्टोत्तरी कहते हैं, कुछ षोडशोत्तरी। यहाँ उत्तरी-नामकरण १०० + अंश-वर्ष की परंपरा को सूचित करता है: २० → १२०, ८ → १०८, १६ → ११६।

English rendering “Daśās are of many kinds; among them Vimśottarī is held principal. Some teach Aṣṭottarī, and some Ṣoḍaśottarī.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उत्तरी-कुल = १०० + नामांक-वर्ष (इस नामकरण-परंपरा के अनुसार):
- विंशोत्तरी: १०० + २० = १२० वर्ष
- अष्टोत्तरी: १०० + ८ = १०८ वर्ष
- षोडशोत्तरी: १०० + १६ = ११६ वर्ष
विंशोत्तरी में (BPHS Ch.46–47 की परंपरा; डिकोड-डॉसियर): केतु ७ + शुक्र २० + सूर्य ६ + चंद्र १० + मंगल ७ + राहु १८ + गुरु १६ + शनि १९ + बुध १७ = Σ १२०। अंतरदशा = (महादशा-वर्ष × अंतर-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। आधार: चंद्र-नक्षत्र + नक्षत्र-भिन्न।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी-योग: ७ + २० + ६ + १० + ७ + १८ + १६ + १९ + १७ = १२०। यदि शुक्र-महादशा (२० वर्ष) में सूर्य-अंतर चलता हो: अंतर = (२० × ६) ÷ १२० = १ वर्ष। (नक्षत्र-अंश/अयनांश अलग घोषित करने पर ही आरंभ-बिंदु संख्या में बदलता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र को नक्षत्र-भिन्न पर अनुपात-गणित से बाँधा गया है: Σ ग्रह-वर्ष = १२०, अंतरदशा = (महा × अंतर) ÷ १२० — शुद्ध अनुपात, अनुमान नहीं। यही डोमेन-नियम daśā-इंजन में pinned है; फल-कथन को “शास्त्र कहता है” स्तर पर रखा जाता है, भाग्य-घोषणा के रूप में नहीं।

46.4
द्वादशाब्दोत्तरी विप्र दशा पञ्चोत्तरी तथा |
दशा शतसमा तद्वत् चतुराशीतिवत्सरा
dvādaśābdottarī vipra daśā pañcottarī tathā |
daśā śatasamā tadvat caturāśītivatsarā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादशाब्दोत्तरी = द्वादश (१२) + अब्द/उत्तरी → उत्तरी-परंपरा में १०० + १२ = ११२ वर्ष (पाठ-भेद संभव: द्वादशोत्तरी); पञ्चोत्तरी = पञ्च (५) + उत्तरी → १०५ वर्ष; शतसमा = शत (१००) + समा → १०० वर्ष; चतुराशीतिवत्सरा = चतुराशीति (८४) + वत्सर → ८४ वर्ष; विप्र = हे विप्र।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, शास्त्र आगे और नाम गिनाता है — द्वादशाब्दोत्तरी, पञ्चोत्तरी, शतसमा दशा, तथा चतुराशीति-वत्सर दशा। यहाँ कुछ नाम उत्तरी (१०० + अंश) हैं, कुछ सीधे वर्ष-संख्या (समा / वत्सरा) बताते हैं।

English rendering “O brahmin, there is also Dvādaśābdottarī, and likewise Pañcottarī; the Śatasamā daśā, and the one of eighty-four years.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्लोक से सीधे/नाम-निहित कुल-वर्ष:
| नाम | कुल (वर्ष) | संकेत |
|---|---|---|
| द्वादशाब्दोत्तरी | ११२ | १०० + १२ (उत्तरी; पाठ-भेद संभव) |
| पञ्चोत्तरी | १०५ | १०० + ५ |
| शतसमा | १०० | शत = १०० |
| चतुराशीतिवत्सरा | ८४ | चतुराशीति = ८४ |

यह श्लोक खंड-अवधि (ग्रह-वार बँटवारा) नहीं देता — केवल कुल-चक्र-लंबाई सूचीबद्ध करता है।

उदाहरण (worked example) यदि किसी पद्धति का कुल चक्र T = ८४ वर्ष (चतुराशीति) हो और एक ग्रह को उस पद्धति में w वर्ष मिले, तो उसका अंश = w/T; अंतरदशा का सामान्य अनुपात-रूप (विंशोत्तरी-सा) = (महा-वर्ष × अंतर-वर्ष) ÷ T — बशर्ते उस पद्धति में यही अनुपात-नियम अपनाया गया हो। इस श्लोक में w का ब्यौरा नहीं है।

46.5
द्विसप्ततिसमा षष्टिसमा षड्त्रिंशवत्सरा |
नक्षत्राधारिकाश्चेताः कथिताः पूर्वसूरिभिः
dvisaptatisamā ṣaṣṭisamā ṣaḍtriṃśavatsarā |
nakṣatrādhārikāścetāḥ kathitāḥ pūrvasūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विसप्ततिसमा = द्विसप्तति (७२) + समा → ७२ वर्ष; षष्टिसमा = षष्टि (६०) + समा → ६० वर्ष; षड्त्रिंशवत्सरा = षट्त्रिंशत् (३६) + वत्सर → ३६ वर्ष; नक्षत्राधारिकाः = नक्षत्र पर आधारित; चेताः = और ये; पूर्वसूरिभिः = पूर्व आचार्यों द्वारा; कथिताः = कही गईं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्विसप्ततिसमा, षष्टिसमा, और षड्त्रिंश-वत्सरा भी हैं। और ये (पूर्वोक्त सहित) नक्षत्राधारित कही गई हैं — पूर्व सूरियों ने इन्हें नक्षत्र-क्रम पर स्थापित किया। अर्थात् काल-खंड का कुंजी-बिंदु चंद्र (या संबंधित) नक्षत्र है, न कि केवल राशि-लग्न।

English rendering “Also the seventy-two-year, sixty-year, and thirty-six-year daśās — and these are said by the earlier masters to be nakṣatra-based.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सीधे शब्द-संख्या:
- द्विसप्ततिसमा: ७२ वर्ष
- षष्टिसमा: ६० वर्ष
- षड्त्रिंशवत्सरा: ३६ वर्ष

नक्षत्राधार: २७ नक्षत्र; आरंभ = जन्म-चंद्र का नक्षत्र (या पद्धति-विशिष्ट नक्षत्र-नियम)। सामान्य भिन्न:
- नक्षत्र-भिन्न f = (चंद्र-देशांतर − नक्षत्र-आरंभ) ÷ १३°२०′
(१ नक्षत्र = ३६०°/२७ = १३°२०′ = ८००′)
- बीत महा-अंश ≈ f × (उस ग्रह की महा-वर्ष), शेष = (१ − f) × महा-वर्ष
(अयनांश/नक्षत्र-सीमा की घोषणा संख्या को बदलती है; नियम मॉड्यूलर है।)

उदाहरण (worked example) मान लें षष्टिसमा (T = ६०) और किसी ग्रह की महा = १० वर्ष; चंद्र नक्षत्र में ¼ बीत चुका (f = ०.२५)। बीत महा ≈ ०.२५ × १० = २.५ वर्ष; शेष ≈ ७.५ वर्ष। (यह अनुपात-ढाँचा विंशोत्तरी-सा है; षष्टि/द्विसप्तति/षट्त्रिंश के ग्रह-वार w-तालिकाएँ इस श्लोक में नहीं दी गईं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) नक्षत्राधार + कुल-वर्ष का ढाँचा विंशोत्तरी-इंजन के उसी अनुपात-गणित पर बैठता है: नक्षत्र-भिन्न → शेष महा → अंतर = (महा × अंतर) ÷ कुल-चक्र। १२०-वर्ष विंशोत्तरी pinned है; अन्य समा/उत्तरी तालिकाएँ पाठ-परंपरा के अनुसार अलग स्थिरांक लेती हैं — कुल Σ की घोषणा श्लोक से, खंड-तालिका बाद के अध्यायों/पाठ-भेद से।

46.6
अथा कालदशा चक्रदशा प्रोक्ता मुनीश्वरैः |
कालचक्रदशा चाऽया मान्यासर्वदशासु या
athā kāladaśā cakradaśā proktā munīśvaraiḥ |
kālacakradaśā cā'yā mānyāsarvadaśāsu yā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; कालदशा = काल-नाम की दशा; चक्रदशा = चक्र-दशा; प्रोक्ता = कही गई; मुनीश्वरैः = मुनि-श्रेष्ठों द्वारा; कालचक्रदशा = कालचक्र दशा; आ या = और यह; मान्या = सम्मानित/स्वीकार्य; सर्वदशासु = सभी दशाओं में; या = जो।

हिन्दी भावार्थ अब मुनीश्वरों द्वारा कही गई कालदशा और चक्रदशा का उल्लेख है; तथा कालचक्रदशा — जिसे शास्त्र “सभी दशाओं में मान्य” कहता है। यह नक्षत्र-उत्तरी/समा सूची से अलग धारा है: काल/चक्र/कालचक्र नाम की प्रणालियाँ। इस श्लोक में अवधि-संख्या नहीं; नाम और प्रतिष्ठा-कथन है। (पाठ-भेद संभव: “चाऽया / चाय” आदि संधि-पाठ।)

English rendering “Then the Kāla-daśā and Cakra-daśā spoken by the lords of sages; and the Kālacakra-daśā, which is esteemed among all the daśās.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नाम-सूची / मान्यता-कथन। कुल-वर्ष या ग्रह-खंड यहाँ नहीं; कालचक्र आदि की संख्या-विधि आगे के प्रकरणों पर निर्भर करती है (पाठ-भेद संभव)।

46.7
दशाऽथ चरपर्याया स्थिराख्या च दशा द्विज |
केन्द्राद्य च दशा ज्ञेया कारकादिग्रहोद्भवा
daśā'tha caraparyāyā sthirākhyā ca daśā dvija |
kendrādya ca daśā jñeyā kārakādigrahodbhavā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चरपर्याया = चर-पर्याय दशा (चर-राशि क्रम); स्थिराख्या = स्थिरा नाम की दशा (स्थिर-राशि क्रम); केन्द्राद्या = केन्द्रादि दशा (केन्द्र-भाव से आरंभ); कारकादिग्रहोद्भवा = कारकादि ग्रहों से उत्पन्न दशा; द्विज = हे द्विज; ज्ञेया = जाननी चाहिए।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, चर-पर्याय दशा, स्थिरा नाम की दशा, केन्द्रादि दशा, तथा कारकादि ग्रहों से उत्पन्न दशाएँ भी ज्ञेय हैं। यहाँ वर्गीकरण का आधार बदलता है: पहले नक्षत्र/वर्ष-कुल थे; अब राशि-चर/स्थिर, भाव-केन्द्र क्रम, और कारक-ग्रह स्रोत। श्लोक केवल नाम-सूत्र देता है, अवधि-तालिका नहीं।

English rendering “Know also, O twice-born, the Cara-paryāya daśā, the one called Sthirā, the Kendrādi daśā, and those arising from the kāraka and related grahas.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/विधि-नामों की सूची (वर्णन)। चर/स्थिर/केन्द्रादि/कारकादि दशाओं का संख्या-नियम इस श्लोक में नहीं; केवल वर्गीकरण-कुंजी: (१) चर-राशि क्रम, (२) स्थिर-राशि क्रम, (३) केन्द्र-भाव से, (४) कारक-ग्रह से।

46.8
ब्रह्मग्रहाश्रितर्क्षाद्या दशा प्रोक्ता तु केनचित् |
माण्डूकी च दशा नाम तथा स्थूलदशा स्मृता
brahmagrahāśritarkṣādyā daśā proktā tu kenacit |
māṇḍūkī ca daśā nāma tathā sthūladaśā smṛtā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्मग्रहाश्रितर्क्षाद्या = ब्रह्म-ग्रह-आश्रित नक्षत्रों से आरम्भ होने वाली (दशा-परम्परा); दशा प्रोक्ता = काल-विभाग की दशाएँ कही गईं; केनचित् = किसी (आचार्य/परम्परा) द्वारा; माण्डूकी दशा = माण्डूकी-नाम की दशा; स्थूलदशा = स्थूल-दशा (स्मृत/स्वीकृत नाम)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ दशा-प्रणालियों की सूची आगे बढ़ाता है। किसी ने ब्रह्म-ग्रहों से आश्रित नक्षत्रों से आरम्भ होने वाली दशाओं का उल्लेख किया है; उसी क्रम में माण्डूकी दशा और स्थूल-दशा का भी नाम स्मरण किया गया है। यह फल-कथन नहीं, अपितु दशा-नामों का परिचय-सूत्र है।

English rendering The text records that certain authorities have spoken of daśās beginning from the stars occupied by the brahma-grahas, and likewise remembers the systems named Māṇḍūkī and Sthūla.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-नामों की सूची/वर्णन। यह श्लोक गणना-नियम नहीं देता; केवल नाम-परम्पराएँ गिनाता है, जिनकी अवधि-सूत्र आगे अध्यायों में पृथक् रूप से आते हैं।

46.9
योगार्धजदशा विप्र दृग्दशा च ततः परम् |
त्रिकोणाख्या दशा नाम तथा राशिदशा स्मृता
yogārdhajadaśā vipra dṛgdaśā ca tataḥ param |
trikoṇākhyā daśā nāma tathā rāśidaśā smṛtā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगार्धजदशा = योगार्ध से उत्पन्न दशा; विप्र = हे ब्राह्मण (संबोधन); दृग्दशा = दृष्टि-आधारित दशा; ततः परम् = उसके पश्चात्; त्रिकोणाख्या दशा = त्रिकोण-नाम की दशा; राशिदशा = राशि-दशा (स्मृता = स्मरण की गई)।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, इसके आगे योगार्धज दशा और दृग्-दशा कही गई हैं। फिर त्रिकोणाख्या दशा का नाम आता है, तथा राशि-दशा भी स्मृत है। शास्त्र यहाँ भी गणना नहीं खोलता — केवल दशा-प्रकारों की श्रृंखला जोड़ता है।

English rendering Next, O Brahmin, are named the Yoga-ardhaja and Dṛg daśās; thereafter the system called Trikoṇa, and also the Rāśi daśā, are remembered.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-नाम सूची। योगार्धज, दृग्, त्रिकोण और राशि — ये चार नाम मात्र; प्रत्येक का अवधि-नियम इस श्लोक में नहीं दिया गया।

46.10
पञ्चस्वरदशा विप्र विज्ञेया योगिनीदशा |
दशा पैण्डी तथांशी च नैसर्गिकदशा तथा
pañcasvaradaśā vipra vijñeyā yoginīdaśā |
daśā paiṇḍī tathāṃśī ca naisargikadaśā tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चस्वरदशा = पञ्च-स्वर दशा; विज्ञेया = जाननी चाहिए; योगिनीदशा = योगिनी-दशा; पैण्डी = पैण्डी-दशा; अंशी = अंश-आधारित (अंशी) दशा; नैसर्गिकदशा = नैसर्गिक (स्वाभाविक-क्रम) दशा; तथा = तथा/और भी।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, पञ्चस्वर दशा और योगिनी दशा को जानना चाहिए। पैण्डी दशा, अंशी दशा और नैसर्गिक दशा भी इसी परिचय-क्रम में आती हैं। यह श्लोक फल नहीं कहता; दशा-नामों का और विस्तार मात्र है।

English rendering The Pañcasvara and Yoginī daśās are to be known, O Brahmin; so also the Paiṇḍī, the Aṃśī, and the Naisargika daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-नाम सूची। पञ्चस्वर, योगिनी, पैण्डी, अंशी, नैसर्गिक — पाँच नाम; अवधि/आरम्भ-नियम इस पद में नहीं हैं।

46.11
अष्टवर्गदश सन्ध्यादसा पाचकसंज्ञिका |
अन्यास्तारादशाद्याश्च न स्वर्गाः सर्वसम्मताः
aṣṭavargadaśa sandhyādasā pācakasaṃjñikā |
anyāstārādaśādyāśca na svargāḥ sarvasammatāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टवर्गदशा = अष्टवर्ग (अष्टकवर्ग)-संबंधी दशा; सन्ध्यादशा = सन्ध्या-दशा (पाठ: सन्ध्यादसा — पाठ-भेद संभव); पाचकसंज्ञिका = पाचक-संज्ञक दशा; तारादशाद्याः = तारा-दशा आदि; अन्याः = अन्य; न सर्वाः/न स्वर्गाः = सर्वसम्मत नहीं (पाठ-भेद संभव: “स्वर्गाः” ↔ “सर्वाः”); सर्वसम्मताः = सबके द्वारा स्वीकृत।

हिन्दी भावार्थ अष्टवर्ग-दशा, सन्ध्या-दशा और पाचक-नाम की दशा का उल्लेख होता है। तारा-दशा आदि अन्य प्रणालियाँ भी हैं, किन्तु शास्त्र कहता है कि वे सभी सर्व-सम्मत नहीं हैं। “स्वर्गाः / सर्वाः” में पाठ-भेद संभव — अर्थ-क्षेत्र “सर्व-अनुमोदित नहीं” ही रहता है।

English rendering The Aṣṭavarga, Sandhyā, and Pācaka-named daśās are listed; other systems such as Tārā daśā and the rest, the text states, are not all universally accepted. (Reading of स्वर्गाः vs सर्वाः: पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-सूची + सर्वसम्मति का सीमा-कथन। शास्त्र यहाँ अष्टकवर्ग-फल-गणित (Ch.66–72) नहीं खोलता; केवल “अष्टवर्ग-दशा” नाम स्मरण करता है।

46.12
कृत्तिकातः समारभ्य त्रिरावृत्य दशाधिपाः |
आचंकुरागुशबुकेशुपूर्वा विहगाः क्रमात्
kṛttikātaḥ samārabhya trirāvṛtya daśādhipāḥ |
ācaṃkurāguśabukeśupūrvā vihagāḥ kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृत्तिकातः समारभ्य = कृत्तिका से आरम्भ करके; त्रिरावृत्य = तीन बार घुमाकर (27 नक्षत्र ÷ 9 = 3 चक्र); दशाधिपाः = दशा-स्वामी; आचंकुरागुशबुकेशु = स्मृति-सूत्र: आ(आदित्य/सूर्य)–चं(चन्द्र)–कु(कुज/मंगल)–रा(राहु)–गु(गुरु)–श(शनि)–बु(बुध)–के(केतु)–शु(शुक्र); विहगाः = ग्रह (पक्षी-रूपक); क्रमात् = क्रम से; पूर्वा = पूर्वोक्त।

हिन्दी भावार्थ कृत्तिका से आरम्भ करके दशा-स्वामी तीन आवृत्तियों में नियत होते हैं। स्मृति-क्रम है: सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र — यही क्रम बार-बार लगता है। यह विंशोत्तरी की नक्षत्र-स्वामी श्रृंखला का बीज-श्लोक है।

English rendering Beginning from Kṛttikā, the daśā lords are assigned by thrice revolving the sequence; the birds (planets), in order, are Sun, Moon, Mars, Rāhu, Jupiter, Saturn, Mercury, Ketu, and Venus — the mnemonic आ-चं-कु-रा-गु-श-बु-के-शु.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नक्षत्र-अनुक्रमणिका: कृत्तिका = 1, …, भरणी = 27 (चक्र में कृत्तिका से गिनती)।
दशा-स्वामी चक्र (9 पद, तीन आवृत्ति → 27 नक्षत्र):
1 सूर्य, 2 चन्द्र, 3 मंगल, 4 राहु, 5 गुरु, 6 शनि, 7 बुध, 8 केतु, 9 शुक्र — फिर 1… पुनः।
सूत्र: यदि k = कृत्तिका से नक्षत्र-संख्या (1…27), तो स्वामी-सूचकांक = ((k − 1) mod 9) + 1।
(महदाशा-वर्ष आगे 46.14 / Ch.46–47 में: Σ = 120 वर्ष।)

उदाहरण (worked example)
जन्म-नक्षत्र = रोहिणी। कृत्तिका→रोहिणी: कृत्तिका(1), रोहिणी(2) → k = 2।
((2 − 1) mod 9) + 1 = 2 → दशाधिप = चन्द्र।
(नक्षत्र-गणना: अश्विनी/भरणी-पूर्व परम्परा से नहीं — इस श्लोक का आरम्भ-बिन्दु कृत्तिका ही है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पद विंशोत्तरी की नक्षत्र→ग्रह कुंजी खोलता है, जिस पर 120-वर्षीय महदाशा-इंजन टिका है। दशा-इंजन नक्षत्र-अंश-भिन्न पर शुद्ध अनुपात-गणित चलाता है; स्वामी-क्रम यहीं से पिन है — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)।

46.13
वह्निभाज्जन्मभं यावद् या संख्या नवतष्टिता |
शेषाद्दशाधिपो ज्ञेयस्तमारभ्य दशां नयेत्
vahnibhājjanmabhaṃ yāvad yā saṃkhyā navataṣṭitā |
śeṣāddaśādhipo jñeyastamārabhya daśāṃ nayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वह्निभा = वह्नि-नक्षत्र = कृत्तिका (अग्नि-देवता); जन्मभम् = जन्म-नक्षत्र; यावद् या संख्या = जितनी संख्या; नवतष्टिता = 9 से विभाजित (नवतष्ट = ÷ 9, शेष); शेषात् = शेष से; दशाधिपः = दशा-स्वामी; तमारभ्य = उससे आरम्भ करके; दशां नयेत् = दशा चलाए।

हिन्दी भावार्थ वह्नि-भ (कृत्तिका) से जन्म-नक्षत्र तक की संख्या लो, उसे नौ से भाग दो; जो शेष बचे, उसी से दशाधिप जानो, और उसी स्वामी से दशा आरम्भ करो। शेष = 0 हो तो परम्परा में नौवाँ पद (शुक्र) लिया जाता है — यह मॉड्यूलर-अंकगणित का शास्त्रीय कथन है।

English rendering Count from the fire-asterism (Kṛttikā) to the birth-nakṣatra; divide that count by nine; from the remainder know the daśā lord, and lead the daśā beginning from him.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
k = कृत्तिका से जन्म-नक्षत्र तक की पूर्णांक संख्या (1…27)।
r = k mod 9; यदि r = 0 तो r ← 9।
स्वामी-तालिका (r → ग्रह):
1 → सूर्य, 2 → चन्द्र, 3 → मंगल, 4 → राहु, 5 → गुरु, 6 → शनि, 7 → बुध, 8 → केतु, 9 → शुक्र।
यह 46.12 के ((k−1) mod 9)+1 से समतुल्य है।
(नोट: चल-दशा का शेष-वर्ष नक्षत्र में चन्द्रमा के भुक्त/भोग्यांश पर निर्भर — वह भिन्न-सूत्र आगे; यहाँ केवल अधिष्ठाता-ग्रह।)

उदाहरण (worked example)
जन्म-नक्षत्र = मघा। कृत्तिका से मघा: कृत्तिका…मघा → k = 8।
8 mod 9 = 8 → दशाधिप = केतु।
दूसरा: जन्म = रेवती। कृत्तिका→रेवती: k = 24। 24 mod 9 = 6 → शनि।
(अयनांश/गृह-पद्धति यहाँ अप्रासंगिक — केवल नक्षत्र-सूचकांक।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही `k mod 9` नियम विंशोत्तरी-आरम्भ ग्रह तय करता है; इंजन नक्षत्र-भिन्न f ∈ [0,1) पर महदाशा-वर्ष × (1−f) से शेष आयु-खण्ड निकालता है। antardaśā = (महदाशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) / 120 — शुद्ध अनुपात; oracle-अनुशासन: `==` पर पिन, सहन-पट्टी नहीं।

46.14
विंशोत्तरशतं पूर्णमायुः पूर्वमुदाहृतम् |
कलै विंशोत्तरी तस्माद् दशा मुख्या द्विजोत्तम
viṃśottaraśataṃ pūrṇamāyuḥ pūrvamudāhṛtam |
kalai viṃśottarī tasmād daśā mukhyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विंशोत्तरशतम् = 20 + 100 = 120; पूर्णम् आयुः = पूर्ण आयु (वर्ष-चक्र); पूर्वम् उदाहृतम् = पहले कहा जा चुका; कलै = कलियुग में; विंशोत्तरी = विंशोत्तरी दशा; तस्मात् = इसलिए; दशा मुख्या = प्रधान दशा; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ पहले ही पूर्ण आयु एक सौ बीस वर्ष कही जा चुकी है। हे द्विजोत्तम, कलि में उसी कारण विंशोत्तरी दशा मुख्य मानी गई है। शास्त्र यहाँ आयु-संख्या और दशा-प्रधानता का सम्बन्ध जोड़ता है — फल-भविष्य नहीं, काल-चक्र का मानक।

English rendering A full life-span of one hundred and twenty years has already been stated; therefore, O best of the twice-born, in the Kali age the Vimśottarī daśā is the principal system.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
पूर्ण आयु-चक्र A = 120 वर्ष (विंशोत्तर-शत)।
महदाशा-वर्ष (Σ = 120):
केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17।
जाँच: 7+20+6+10+7+18+16+19+17 = 120।
अन्तर्दशा (वर्ष): t(अन्तर) = (Y_महा × Y_अन्तर) / 120।
(क्रम-आरम्भ: जन्म-नक्षत्र का दशाधिप, 46.12–13; शेष-अवधि: नक्षत्र में भुक्त-भिन्न।)

उदाहरण (worked example)
मान लें जन्म-नक्षत्र-स्वामी = गुरु, महदाशा Y = 16 वर्ष; अन्तर = शुक्र (20)।
t = (16 × 20) / 120 = 320/120 = 8/3 ≈ 2 वर्ष 8 मास।
(सम्पूर्ण जन्म-काल गणना के लिए नक्षत्र-भिन्न और 46.12–13 का अधिष्ठाता आवश्यक; यहाँ केवल अनुपात-नियम का संख्यात्मक रूप।)

हमारा डिकोड (Our Decode) 120-वर्षीय विंशोत्तरी चक्र — केतु 7 … बुध 17, Σ = 120 — दशा-इंजन का पिन किया गया स्थिरांक है। antardaśā = (Y_महा × Y_अन्तर)/120 का शुद्ध अनुपात-अंकगणित; गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं — शास्त्र “मुख्या” कहता है, हम अवधि-समीकरण सत्यापित करते हैं, भाग्य-घोषणा नहीं।

46.15
दशासमाः क्रमादेषां षड् दशाऽश्वा गजेन्दवः |
नृपाला नवचन्द्राश्च नवचन्द्रा नगा नखाः
daśāsamāḥ kramādeṣāṃ ṣaḍ daśā'śvā gajendavaḥ |
nṛpālā navacandrāśca navacandrā nagā nakhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशासमाः = दशा के वर्ष-मान; क्रमात् = क्रम से; एषाम् = इन (ग्रहों) के; षड् = ६; दश = १०; अश्व = ७ (अश्व-संख्‍या); गज-इन्दु = ८+१ → १८ (अङ्कानां वामतो गतिः); नृपाल = १६; नव-चन्द्र = ९+१ → १९; नग-चन्द्र / नग = १७ / ७ (पाठ-भेद संभव); नख = २०।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ विंशोत्तरी-क्रम में ग्रहों की दशा-अवधि (वर्षों में) शब्द-संख्या से बाँधता है। सूर्य से आरम्भ कर क्रम है — ६, १०, ७, १८, १६, १९, फिर बुध-केतु-शुक्र के मान; योग १२० वर्ष का पूर्ण चक्र है। संख्याएँ भूतसंख्या/शब्द-अङ्क से पढ़ी जाती हैं; जहाँ पाण्डुलिपि में नव/नग आदि का भेद हो, वहाँ पाठ-भेद संभव कहकर विंशोत्तरी के प्रसिद्ध १७-७-२० को संगति में रखा जाता है।

English rendering The text states the year-lengths of the daśās of these planets in order, encoded as word-numerals: 6, 10, 7, 18, 16, 19, and then the remaining three (classically 17, 7, 20), summing to the 120-year Vimśottarī cycle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी महादशा-वर्ष (सूर्यादि क्रम, केतु–शुक्र चक्र में प्रयुक्त):
Sūrya 6, Candra 10, Kuja 7, Rāhu 18, Guru 16, Śani 19, Budha 17, Ketu 7, Śukra 20.
Σ = 6+10+7+18+16+19+17+7+20 = 120 वर्ष।
(जन्म-नक्षत्र से स्वामी चुनकर उसी क्रम में चक्र घूमता है। “नवचन्द्रा … नगा नखाः” में बुध=१७ का शब्द-पाठ संदिग्ध हो तो पाठ-भेद संभव; मान स्वयं १७, ७, २० ही संगति देते हैं।)

उदाहरण (worked example) जन्म-चन्द्र यदि मघा (केतु-स्वामी) में हो, तो पहली महादशा केतु = ७ वर्ष; तदनन्तर शुक्र २०, सूर्य ६, चन्द्र १०, … — पूर्ण चक्र १२० वर्ष। (अयनांश दशा-वर्षों को नहीं बदलता; वह केवल नक्षत्र-स्थान तय करता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक उसी १२०-वर्षीय विंशोत्तरी सारणी को बाँधता है जिसे डिकोड-इंजन में केतु ७ … बुध १७ (Σ = 120) के रूप में पिन किया गया है। अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — शुद्ध अनुपात-गणित; अनुमान या सहिष्णुता-पट्टी नहीं।

46.16
दशामनां भयातघ्नं भभोगेन हृतं फलम् |
दशाया भुक्तवर्षाद्य भोग्यं मानाद् विशोधितम्
daśāmanāṃ bhayātaghnaṃ bhabhogena hṛtaṃ phalam |
daśāyā bhuktavarṣādya bhogyaṃ mānād viśodhitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशामानम् = उस दशा का पूर्ण वर्ष-मान; भयात = जन्म-नक्षत्र में चन्द्र द्वारा पार किया अंश (गत भोग); भभोग = एक नक्षत्र का पूर्ण विस्तार; हृतम् = विभाजित; फलम् = लब्ध (भुक्त वर्ष); भुक्त = भोग चुकी दशा; भोग्यम् = शेष दशा; मानात् विशोधितम् = पूर्ण मान में से घटाकर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा का भुक्त-फल = (दशा-मान × भयात) ÷ भभोग। अर्थात् जन्म-नक्षत्र में चन्द्र जितना अंश पार कर चुका है, उसी अनुपात में उस नक्षत्र-स्वामी की दशा बीत चुकी मानी जाती है। भोग्य दशा = पूर्ण दशा-मान − भुक्त वर्षादि। यह जन्म-समय की शेष (balance) दशा का शुद्ध समानुपात नियम है।

English rendering The elapsed portion of the opening daśā equals the planet’s full daśā years multiplied by the Moon’s travel within the birth-nakṣatra and divided by the nakṣatra’s full span; the balance is that full measure minus the elapsed years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
एक नक्षत्र = 360° ÷ 27 = 13°20′ = 800′ (भभोग)।
भयात = λ_Moon − λ_start(of birth nakṣatra) (समान इकाई में)।

भुक्त वर्ष = (D × भयात) ÷ भभोग, जहाँ D = उस नक्षत्र-स्वामी का दशासम (46.15)।

भोग्य वर्ष = D − भुक्त।
(अन्तर्दशा आदि आगे उसी भोग्य पर अनुपात से।)

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-नक्षत्र रोहिणी (चन्द्र-दशा, D = 10 वर्ष), भभोग = 13°20′। यदि चन्द्र ने रोहिणी में 3°20′ = 200′ पार किए हों:
भुक्त = (10 × 200′) ÷ 800′ = 2.5 वर्ष; भोग्य = 10 − 2.5 = 7.5 वर्ष।
(देशान्तर/अयनांश केवल λ_Moon और नक्षत्र-सीमा तय करते हैं; सूत्र अपरिवर्तित।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी इंजन precisely इसी अनुपात पर चलता है — नक्षत्र-भिन्न (elapsed fraction) × महादशा-वर्ष = भुक्त; शेष = भोग्य। यह मॉड्यूलर/अनुपात अंकगणित है, फल-व्याख्या नहीं; जाँच exact मानों पर, सहिष्णुता-बैंड पर नहीं।

46.17
लग्नेशात् केन्द्रकोणस्थे राहौ लग्नं विना स्थिते |
अष्टोत्तरी दशा विप्र विज्ञेया रौद्रभादितः
lagneśāt kendrakoṇasthe rāhau lagnaṃ vinā sthite |
aṣṭottarī daśā vipra vijñeyā raudrabhāditaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेश = लग्न-स्वामी; केन्द्र = १/४/७/१०; कोण = त्रिकोण ५/९; राहौ … स्थिते = राहु वहाँ हो; लग्नं विना = लग्न-भाव को छोड़कर; अष्टोत्तरी दशा = १०८-वर्षीय अष्टोत्तरी; रौद्रभ = आर्द्रा नक्षत्र; आदितः = उससे आरम्भ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की शर्त है — जब राहु लग्नेश से केन्द्र या त्रिकोण में हो, किन्तु स्वयं लग्न में न हो, तब विप्र के लिए अष्टोत्तरी दशा जाननी चाहिए। उसका गणन-आरम्भ रौद्रभ अर्थात् आर्द्रा नक्षत्र से होता है। यह विंशोत्तरी का विकल्प-प्रणाली संकेत है, शर्त-सहित।

English rendering When Rāhu stands in a kendra or trikoṇa from the lagna-lord, and not in the lagna itself, Aṣṭottarī daśā is to be known, reckoned beginning from the Raudra nakṣatra (Ārdrā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लागू होने की द्वार-शर्त (बूलियन, फल नहीं):
(1) भाव(राहु) ∈ {केन्द्र ∪ त्रिकोण} relative to लग्नेश; (2) भाव(राहु) ≠ 1 (लग्न)।
सत्य होने पर अष्टोत्तरी; आरम्भ-नक्षत्र सूचकांक = आर्द्रा (= नक्षत्र #6, कृत्तिका=1 परम्परा में #3 — गणना में नक्षत्र-क्रमाङ्क की घोषित परम्परा बाँधें)।
पूर्ण चक्र = 108 वर्ष (अष्ट + उत्तर = 100+8; विस्तार 46.20)।

उदाहरण (worked example) लग्न कन्या, लग्नेश बुध; राहु मकर (लग्न से 5 = त्रिकोण), लग्न में नहीं → शर्त पूरी → अष्टोत्तरी; गणना आर्द्रा से (46.18–46.20)। यदि राहु लग्न-कन्या में ही हो → यह श्लोक अष्टोत्तरी नहीं खोलता।

46.18
चतुष्कं त्रितयं तस्मात् चतुष्कं त्रितयं पुनः |
एवं स्वजन्मभं यावद् विगणय्य यथाक्रमम्
catuṣkaṃ tritayaṃ tasmāt catuṣkaṃ tritayaṃ punaḥ |
evaṃ svajanmabhaṃ yāvad vigaṇayya yathākramam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्कम् = चार का समूह; त्रितयम् = तीन का समूह; तस्मात् = उससे (आर्द्रा से); पुनः = फिर उसी तरह; स्वजन्मभम् = अपना जन्म-नक्षत्र; यावत् = जब तक; विगणय्य = गिनकर; यथाक्रमम् = क्रम के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ आर्द्रा से लेकर नक्षत्रों को क्रमशः चार, फिर तीन, फिर चार, फिर तीन — इस आवर्ती पैटर्न में गिनो, जब तक जन्म-नक्षत्र न आ जाए। यही गिनती प्रत्येक दशा-स्वामी को उसके नक्षत्र-समूह से जोड़ती है। चार वाले समूह पाप-ग्रहों से, तीन वाले शुभों से जुड़े माने जाते हैं (अगले श्लोकों से संगति)।

English rendering From that starting nakṣatra count groups of four and three alternately, in order, until one’s birth-nakṣatra is reached — thus assigning the successive daśā lords.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नक्षत्र-सूची N₀ = आर्द्रा, N₁, N₂, … चक्रीय 27 पर।
खंड-लंबाई आवृत्ति: 4, 3, 4, 3, …
खंड k का स्वामी = अष्टोत्तरी-स्वामी क्रम (46.19) का k-वाँ ग्रह।
जन्म-नक्षत्र जिस खंड में पड़े, उसी स्वामी की दशा जन्म में चलती/आरम्भ-सम्बद्ध होती है; दशा-वर्ष 46.20 से।
पाप-खंड (4 नक्षत्र) ↔ दशाब्दांघ्रि (¼); शुभ-खंड (3) ↔ त्र्यंश (⅓) — देखें 46.21।

उदाहरण (worked example) क्रम (आर्द्रा से): खंड1 = 4 नक्षत्र → सूर्य; खंड2 = 3 → चन्द्र; खंड3 = 4 → कुज; …। यदि जन्म-नक्षत्र खंड2 में हो तो चन्द्र-अष्टोत्तरी सन्दर्भ; चन्द्र-मान = 15 वर्ष (46.20), प्रति नक्षत्र 15÷3 = 5 वर्ष (46.21)।

46.19
सूर्यश्चन्द्रः कुजः सौम्यः शनिर्जीवस्तमो भृगुः |
एते दशाधिपा विप्र ज्ञेयाः केतुं विना ग्रहाः
sūryaścandraḥ kujaḥ saumyaḥ śanirjīvastamo bhṛguḥ |
ete daśādhipā vipra jñeyāḥ ketuṃ vinā grahāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्य = रवि; चन्द्र = शशांक; कुज = मङ्गल; सौम्य = बुध; शनि = मन्द; जीव = गुरु; तमस् = राहु; भृगु = शुक्र; दशाधिपाः = दशा-स्वामी; केतुं विना = केतु को छोड़कर; ग्रहाः = आठ ग्रह।

हिन्दी भावार्थ अष्टोत्तरी के दशा-स्वामी ये आठ हैं — सूर्य, चन्द्र, कुज, बुध, शनि, गुरु, राहु, शुक्र। केतु इस प्रणाली में दशाधिप नहीं है। क्रम स्थिर है; इसी क्रम पर 46.18 का चतुष्क-त्रितय आरोपण और 46.20 के वर्ष-मान बैठते हैं।

English rendering The daśā lords are the Sun, Moon, Mars, Mercury, Saturn, Jupiter, Rāhu, and Venus — the planets excluding Ketu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टोत्तरी स्वामी-क्रम (आर्द्रा-चतुष्क से):
1 Sūrya → 2 Candra → 3 Kuja → 4 Budha → 5 Śani → 6 Guru → 7 Rāhu → 8 Śukra → (पुनः 1)।
|स्वामी| = 8; केतु ∉ सेट।
खंड-सूचकांक k (0-based) का स्वामी = क्रम[k mod 8]।

उदाहरण (worked example) पहला 4-नक्षत्र समूह → सूर्य; अगला 3 → चन्द्र; अगला 4 → कुज; अगला 3 → बुध; … आठवें समूह के बाद चक्र सूर्य पर लौटता है।

46.20
रसाः पञ्चेन्दवो नागाः सप्तचन्द्राश्च खेन्दवः |
गोऽब्जाः सूर्याः कुनेत्राश्च रव्यादीनां दशासमाः
rasāḥ pañcendavo nāgāḥ saptacandrāśca khendavaḥ |
go'bjāḥ sūryāḥ kunetrāśca ravyādīnāṃ daśāsamāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रस = ६; पञ्च-इन्दु = ५+१ → १५; नाग = ८; सप्त-चन्द्र = ७+१ → १७; ख-इन्दु = ०+१ → १०; गो-अब्ज = ९+१ → १९; सूर्य (आदित्य) = १२; कुनेत्र = २१ (शब्द-संख्या; पाठ-भेद संभव); रव्यादीनाम् = सूर्यादि (46.19 क्रम) की दशासमाः = दशा-वर्ष।

हिन्दी भावार्थ सूर्य से शुक्र तक अष्टोत्तरी दशाओं के वर्ष शब्द-संख्या में कहे गए हैं — ६, १५, ८, १७, १०, १९, १२, २१। इनका योग १०८ वर्ष है, जो अष्टोत्तरी चक्र का पूर्ण मान है। ये मान 46.19 के आठ स्वामियों पर क्रमशः लगते हैं।

English rendering The year-lengths for the Sun and the following lords are 6, 15, 8, 17, 10, 19, 12, and 21 — the Aṣṭottarī measures in order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
| ग्रह | वर्ष |
| सूर्‍य | 6 |
| चन्द्र | 15 |
| कुज | 8 |
| बुध | 17 |
| शनि | 10 |
| गुरु | 19 |
| राहु | 12 |
| शुक्र | 21 |

Σ = 6+15+8+17+10+19+12+21 = 108 वर्ष।
अन्तर्दशा (यदि अनुपात-रीति अपनाएँ): (महादशा-वर्ष × अन्तर-स्वामी-वर्ष) ÷ 108।
“कुनेत्राः” = २१ का शब्द-पाठ परम्परा-संगत; संदेह पर पाठ-भेद संभव, मान २१ स्थिर रखकर Σ = 108 बाँधें।

उदाहरण (worked example) जन्म-संदर्भ चन्द्र-अष्टोत्तरी, पूर्ण 15 वर्ष; भुक्त 4 वर्ष हो तो भोग्य = 11। शुक्र-अन्तर्दशा ≈ (15 × 21) ÷ 108 = 2.916… वर्ष (यदि विंशोत्तरी-सदृश अनुपात नियम अपनाया जाए — परम्परा घोषित करें)।

46.21
दशाब्दांघ्रिश्च पापानां शुभानां त्र्यंश एव हि |
एकैकभे दशामानं विज्ञेयं द्विजसत्तम
daśābdāṃghriśca pāpānāṃ śubhānāṃ tryaṃśa eva hi |
ekaikabhe daśāmānaṃ vijñeyaṃ dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाब्द = दशा के वर्ष; अङ्घ्रि = पाद = ¼; पापानाम् = पाप ग्रहों का; शुभानाम् = शुभ ग्रहों का; त्र्यंश = ⅓; एकैकभे = एक-एक नक्षत्र में; दशामानम् = उस नक्षत्र को मिला दशा-मान; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पाप ग्रहों की दशा में प्रत्येक नक्षत्र को दशा-वर्ष का चौथाई (अङ्घ्रि) मान मिलता है; शुभ ग्रहों में प्रत्येक को तिहाई (त्र्यंश)। इसी से एक-एक भ (नक्षत्र) का दशामान जाना जाता है। यह 46.18 के चतुष्क (पाप) और त्रितय (शुभ) से गणितीय रूप से मेल खाता है: 4×(¼)=1, 3×(⅓)=1।

English rendering For malefics, the daśā measure per nakṣatra is one-fourth of that planet’s years; for benefics, one-third — thus the allotment in each star is known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह g की दशा-वर्ष D_g (46.20); उसके नक्षत्र-समूह का आकार n_g ∈ {4, 3} (46.18)।
प्रति-नक्षत्र मान:
- पाप (n=4): d = D_g × 1/4 = D_g ÷ 4
- शुभ (n=3): d = D_g × 1/3 = D_g ÷ 3
जाँच: n_g × d = D_g।
पाप-क्रम (अष्टोत्तरी): सूर्य, कुज, शनि, राहु → D/4 = 6/4, 8/4, 10/4, 12/4 = 1.5, 2, 2.5, 3 वर्ष/नक्षत्र।
शुभ: चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र → 15/3, 17/3, 19/3, 21/3 = 5, 5⅔, 6⅓, 7 वर्ष/नक्षत्र।

उदाहरण (worked example) कुज-दशा D=8, चार नक्षत्र → प्रत्येक = 8÷4 = 2 वर्ष। यदि जन्म-नक्षत्र उस चतुष्क का दूसरा हो और नक्षत्र-भिन्न 50% बीता हो, तो उस नक्षत्र-खण्ड में भुक्त ≈ 1 वर्ष; शेष कुज-संदर्भ तदनुरूप जोड़ा जाता है। (पूर्ण भुक्त/भोग्य के लिए 46.16-सदृश नक्षत्र-भिन्न × संबंधित मान — परम्परा स्पष्ट करें।)

46.22
ततस्तद्यातभोगाध्यां भुक्तं भोग्यं च साधयेत् |
विंशोत्तरीवदेवात्र ततस्तत्फलमादिशेत्
tatastadyātabhogādhyāṃ bhuktaṃ bhogyaṃ ca sādhayet |
viṃśottarīvadevātra tatastatphalamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तदनन्तर; तद्-यात-भोग-आभ्याम् = उस (जन्म) नक्षत्र के व्यतीत व शेष भोग से; भुक्तम् = भुक्त-अंश / व्यतीत दशा-काल; भोग्यम् = भोग्य-अंश / अवशिष्ट दशा-काल; साधयेत् = साधित करे; विंशोत्तरी-वत् = विंशोत्तरी की भाँति; एव अत्र = इसी रीति से यहाँ भी; तत्-फलम् = उस दशा का फल; आदिशेत् = निर्देशित करे।

हिन्दी भावार्थ फिर उस नक्षत्र के यात (बीते) और भोग (भोग्य) अंशों से भुक्त तथा भोग्य दशा-काल निकालें। शास्त्र कहता है कि यहाँ भी विंशोत्तरी की ही रीति अपनाई जाए, और उसी अनुपात से उस दशा का फल बताया जाए। अर्थात् दशा-स्वामी और महादशा-वर्ष ज्ञात होने पर व्यतीत-अंश से भुक्त काल और शेष से भोग्य काल उसी अनुपात-गणित से सिद्ध होते हैं।

English rendering Then, from the elapsed and remaining portions of that (natal) nakṣatra, one should determine the bhukta (already enjoyed) and bhogya (yet to be enjoyed) spans. Exactly as in the Vimśottarī method, the results of that daśā are then to be indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भुक्त–भोग्य अनुपात (विंशोत्तरी-सदृश):
- नक्षत्र-भोग = 13°20′ = 800′ (एक नक्षत्र का पूरा चाप)
- जन्म-चन्द्र का नक्षत्र-अंश = λ_☾ − नक्षत्र-आरम्भ (′ में)
- भुक्त-अंश f_b = (नक्षत्र में व्यतीत ′) / 800′
- भोग्य-अंश f_r = 1 − f_b
- यदि उस दशा-स्वामी का महादशा-वर्ष = Y हो, तो
- भुक्त-काल = f_b × Y वर्ष
- भोग्य-काल = f_r × Y वर्ष
- अन्तर्दशा (जहाँ लागू): (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) / कुल-चक्र-वर्ष
(विंशोत्तरी में कुल = 120; अन्य दशा-चक्र में उसी चक्र का योग।)

उदाहरण (worked example) मान लें अष्टोत्तरी/विंशोत्तरी-सदृश किसी दशा में Y = 6 वर्ष (सूर्य), और जन्म-चन्द्र ने अपने नक्षत्र के 800′ में से 200′ पार किए।
f_b = 200/800 = 1/4; भुक्त = (1/4)×6 = 1.5 वर्ष; भोग्य = 4.5 वर्ष।
(नक्षत्र-सीमा sidereal longitude पर; ayanāṃśa घोषित करना आवश्यक — यहाँ केवल अनुपात दिखाया गया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी की 120-वर्ष चक्र-कुंजी (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 — यही अनुपात-गणित है जिसकी ओर श्लोक “विंशोत्तरीवत्” से संकेत करता है। हमारा दशा-इंजन नक्षत्र-भिन्न पर शुद्ध अनुपात से भुक्त/भोग्य साधता है; फल-कथन को गणना से अलग रखा जाता है।

46.23
कृष्णपक्षे दिवा जन्म शुक्लपक्षे तथा निशि |
तदा ह्यष्टोत्तरी चिन्त्या फलार्थञ्च विशेषतः
kṛṣṇapakṣe divā janma śuklapakṣe tathā niśi |
tadā hyaṣṭottarī cintyā phalārthañca viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृष्ण-पक्षे = कृष्णपक्ष में; दिवा = दिन में; जन्म = जन्म; शुक्ल-पक्षे = शुक्लपक्ष में; तथा = उसी प्रकार; निशि = रात्रि में; तदा = तब; हि = निश्चय से; अष्टोत्तरी = अष्टोत्तरी दशा; चिन्त्या = विचारणीय; फल-अर्थम् = फल-ज्ञान के लिए; च = और; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि जन्म कृष्णपक्ष में दिन के समय हुआ हो, अथवा शुक्लपक्ष में रात्रि के समय हुआ हो, तो फल-विचार के लिए अष्टोत्तरी दशा विशेष रूप से चिन्तनीय है। यह चयन पक्ष (शुक्ल/कृष्ण) और काल (दिन/रात) दोनों की युति पर टिका है; अन्य योगों में अन्य दशा-पद्धतियाँ आगे कही जाती हैं।

English rendering When birth occurs by day in the dark fortnight, or by night in the bright fortnight, the Aṣṭottarī daśā is then to be considered — and especially so for the sake of results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चयन-नियम (द्वि-बिट शर्त):
- पक्ष: कृष्ण = तिथि 1–15 (अमावस्या-अन्त तक कृष्ण); शुक्ल = प्रतिपदा–पूर्णिमा
(तिथि सूर्य–चन्द्र कोण से: तिथि-अंक = ⌊(λ_☾ − λ_☉)/12°⌋ + 1; पक्ष = कृष्ण यदि कोण ≥ 180°, अन्यथा शुक्ल — convention declare करें।)
- काल: दिवा = सूर्योदय ≤ जन्म-काल < सूर्यास्त; निशि = शेष।
- अष्टोत्तरी लागू जब: (कृष्ण ∧ दिवा) ∨ (शुक्ल ∧ निशि)।
गणितीय सूत्र स्वयं दशा-वर्षों का यहाँ नहीं — केवल प्रवेश-शर्त। दशा-वर्ष-तालिका अध्याय के पूर्व/परवर्ती श्लोकों में।

उदाहरण (worked example) जन्म 2020-08-15, दिल्ली, local daytime, कृष्णपक्ष की सप्तमी → (कृष्ण ∧ दिवा) = true → अष्टोत्तरी चिन्त्या। यदि वही तिथि रात्रि में होती तो यह द्वार बंद; शुक्ल+निशि वाला द्वार खुलता।

46.24
चन्द्रहोरागते कृष्णे सूर्यहोरागते सितेए |
लग्ने नृणां फलज्ञप्त्यै विचिन्त्या षोडशोत्तरी
candrahorāgate kṛṣṇe sūryahorāgate sitee |
lagne nṛṇāṃ phalajñaptyai vicintyā ṣoḍaśottarī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र-होरा-गते = चन्द्र की होरा में स्थित; कृष्णे = कृष्णपक्ष में; सूर्य-होरा-गते = सूर्य की होरा में स्थित; सिते = शुक्लपक्ष में (पाठ “सितेए” — पाठ-भेद संभव; प्रचलित अर्थ सिते/शुक्ले); लग्ने = लग्न में; नृणाम् = मनुष्यों के; फल-ज्ञप्त्यै = फल-ज्ञान के लिए; विचिन्त्या = विशेष विचारणीय; षोडशोत्तरी = षोडशोत्तरी दशा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कृष्णपक्ष में जब लग्न चन्द्र-होरा में हो, अथवा शुक्लपक्ष में जब लग्न सूर्य-होरा में हो, तब मनुष्यों के फल-ज्ञान के लिए षोडशोत्तरी दशा विचिन्तनीय है। यहाँ पक्ष के साथ लग्न की होरा (D2-अर्धराशि) जुड़ती है; केवल पक्ष या केवल होरा पर्याप्त नहीं।

English rendering When, in the dark fortnight, the lagna falls in the Moon’s horā, or when, in the bright fortnight, it falls in the Sun’s horā, the Ṣoḍaśottarī daśā is to be carefully considered for ascertaining results for people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) होरा (D2) निर्धारण — 30° राशि को 15°+15°:
- विषम राशि (1,3,5,7,9,11 = मेष…): 0°–15° = सूर्य-होरा; 15°–30° = चन्द्र-होरा
- सम राशि (2,4,6,8,10,12): 0°–15° = चन्द्र-होरा; 15°–30° = सूर्य-होरा
- लग्न-होरा = f(लग्न-राशि, लग्न° mod 30)
- षोडशोत्तरी-द्वार: (कृष्ण ∧ lagna ∈ चन्द्र-होरा) ∨ (शुक्ल ∧ lagna ∈ सूर्य-होरा)।
(होरा-नियम का यह रूप BPHS षोडशवर्ग-परंपरा का मानक; ayanāṃśa लग्न° पर प्रभाव डालता है — घोषित करें।)

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या 8° (सम राशि, 0°–15° → चन्द्र-होरा), जन्म कृष्णपक्ष → द्वार खुला → षोडशोत्तरी। यदि वही लग्न शुक्लपक्ष में हो तो इस श्लोक का द्वार बंद (सूर्य-होरा चाहिए)।

हमारा डिकोड (Our Decode) होरा = D2 वर्ग — षोडश-वर्ग श्रृंखला (D1…D60) का द्वितीय सदस्य; 30° का समान 15° विभाजन, शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। वर्ग-इंजन lagna° से होरा-स्वामी निर्धारित करता है; यहाँ वही D2-नियम दशा-चयन की कुंजी बनता है।

46.25
पुष्यभाज्जन्मभं यावद् या संख्या गजतष्टिता |
रविर्भौमो गुरुर्मन्दः केतुश्चन्द्रो बुधो भृगुः
puṣyabhājjanmabhaṃ yāvad yā saṃkhyā gajataṣṭitā |
ravirbhaumo gururmandaḥ ketuścandro budho bhṛguḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुष्य-भात् = पुष्य नक्षत्र से; जन्म-भम् = जन्म-नक्षत्र; यावत् = तक; या संख्या = जो संख्या (नक्षत्र-गणना); गज-तष्टिता = गज (= 8, भूतसंख्या) से विभाजित; रविः = सूर्य; भौमः = मंगल; गुरुः = बृहस्पति; मन्दः = शनि; केतुः = केतु; चन्द्रः = चन्द्र; बुधः = बुध; भृगुः = शुक्र।

हिन्दी भावार्थ षोडशोत्तरी में जन्म-नक्षत्र से पुष्य तक (अथवा पुष्य से जन्म-भ तक — क्रम पाठानुसार) जो नक्षत्र-संख्या आती है, उसे गज-संख्या 8 से विभाजित कर शेष से दशा-स्वामी जानें। तत्पश्चात् क्रम से स्वामी हैं — सूर्य, मंगल, गुरु, शनि, केतु, चन्द्र, बुध, शुक्र। राहु इस क्रम में नहीं हैं।

English rendering The count of nakṣatras from the birth-star as far as Puṣya, divided by “gaja” (8), yields the residue that fixes the opening lord. In order the daśā lords are: Sun, Mars, Jupiter, Saturn, Ketu, Moon, Mercury, and Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: गज = 8।
नक्षत्र-अनुक्रमणिका n ∈ {1…27} (अश्विनी = 1 … रेवती = 27); पुष्य = 8।
- गणना-दिशा: जन्म-भ → पुष्य (अध्याय-परंपरा: “पुष्यभाज्जन्मभं यावत्” — जन्म-भ से पुष्य तक की संख्या; पाठ-भेद/दिशा-भेद संभव)।
- N = नक्षत्र-गणना (1-based inclusive count along the chosen arc)।
- r = N mod 8; यदि r = 0 तो r = 8।
- स्वामी-सूची (1…8): सूर्य, मंगल, गुरु, शनि, केतु, चन्द्र, बुध, शुक्र।
- आरम्भ-स्वामी = सूची[r]।
(अगला श्लोक वर्ष-मान देता है।)

उदाहरण (worked example) जन्म-नक्षत्र = रोहिणी (4)। पुष्य (8) तक अग्र-गणना: 4,5,6,7,8 → N = 5।
5 mod 8 = 5 → केतु से षोडशोत्तरी आरम्भ। (यदि reverse-count convention अपनाएँ तो N बदलता — convention स्पष्ट लिखें; यहाँ अग्र-inclusive लिया।)

46.26
इति क्रमाद् दशाधीशाः ज्ञेया राहुं विना ग्रहाः |
रुद्राद्येकोत्तराः संख्या धृत्यन्तं वत्सराः क्रमात्
iti kramād daśādhīśāḥ jñeyā rāhuṃ vinā grahāḥ |
rudrādyekottarāḥ saṃkhyā dhṛtyantaṃ vatsarāḥ kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति क्रमात् = इस क्रम से; दशा-अधीशाः = दशा-स्वामी; ज्ञेयाः = जानने योग्य; राहुं विना = राहु को छोड़कर; ग्रहाः = ग्रह; रुद्र-आदि = रुद्र (= 11) से आरम्भ; एक-उत्तराः = एक-एक बढ़ती; संख्याः = संख्याएँ; धृति-अन्तम् = धृति (= 18) पर्यन्त; वत्सराः = वर्ष; क्रमात् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ इसी क्रम से दशा-स्वामी जाने जाएँ — राहु को छोड़कर वे आठ ग्रह। उनके दशा-वर्ष रुद्र-संख्या 11 से आरम्भ होकर एक-एक बढ़ते हुए धृति-संख्या 18 तक हैं। अर्थात् सूर्य 11, मंगल 12, गुरु 13, शनि 14, केतु 15, चन्द्र 16, बुध 17, शुक्र 18 वर्ष। योग 116 वर्ष — यही षोडशोत्तरी-चक्र का कुल मान है।

English rendering Thus, in order, the daśā lords are to be known — the planets without Rāhu. Their year-counts begin at “Rudra” (11) and rise by one each, ending at “Dhṛti” (18).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: रुद्र = 11; धृति = 18; एकोत्तरा = +1 प्रति पद।
| स्वामी | वर्ष Y_i |
|---|---|
| सूर्य | 11 |
| मंगल | 12 |
| गुरु | 13 |
| शनि | 14 |
| केतु | 15 |
| चन्द्र | 16 |
| बुध | 17 |
| शुक्र | 18 |
| Σ | 116 |

भुक्त/भोग्य: श्लोक 46.22 की भाँति
भुक्त = f_b × Y_i; अन्तर् (यदि चक्र-अनुपात से): (Y_i × Y_j) / 116।

उदाहरण (worked example) 46.25 के उदाहरण में आरम्भ = केतु (Y = 15)। नक्षत्र-भिन्न f_b = 1/4 हो तो केतु-महादशा भुक्त = 15/4 = 3.75 वर्ष, भोग्य = 11.25 वर्ष। तदनन्तर चन्द्र 16, बुध 17, शुक्र 18, फिर सूर्य 11… चक्र 116 वर्ष पर लौटता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी जहाँ Σ = 120 और अन्तर् = (Y_i × Y_j)/120, वहीं षोडशोत्तरी Σ = 116 पर वही अनुपात-ढाँचा रखती है। अनुशासन एक ही है — वर्ष-तालिका और शेषफल `==` से पिन; फल-वाक्य को गणित से अलग “शास्त्र कहता है” के रूप में रखना।

46.27
शुक्रांशके प्रजातस्य विचिन्त्या द्वादशोत्तरी |
जन्मभात् पौष्णभं यावत् संख्या हि वसुतष्टिता
śukrāṃśake prajātasya vicintyā dvādaśottarī |
janmabhāt pauṣṇabhaṃ yāvat saṃkhyā hi vasutaṣṭitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्र-अंशके = शुक्र के अंश (सामान्यतः नवांश/अंश-वर्ग) में; प्रजातस्य = जन्मे हुए का; विचिन्त्या = विचारणीय; द्वादशोत्तरी = द्वादशोत्तरी दशा; जन्म-भात् = जन्म-नक्षत्र से; पौष्ण-भम् = पौष्ण नक्षत्र (रेवती; पूषन्-देवता); यावत् = तक; संख्या = गणना; हि = ही; वसु-तष्टिता = वसु (= 8) से विभाजित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो शुक्र के अंश में जन्मा हो, उसके लिए द्वादशोत्तरी दशा विचिन्तनीय है। जन्म-नक्षत्र से पौष्ण (रेवती) तक जो संख्या आए, उसे वसु-संख्या 8 से विभाजित कर शेष से दशा-प्रवेश जानें। “शुक्रांश” यहाँ अंश-वर्ग (प्रायः नवांश D9) का शुक्र-स्वामित्व समझा जाता है; पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव।

English rendering For one born in a Venus aṃśa, the Dvādaśottarī is to be considered. The count of nakṣatras from the birth-star as far as Pauṣṇa (Revatī), divided by “vasu” (8), fixes the opening residue.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1) प्रवेश-शर्त: जन्म-लग्न/चन्द्र का अंश-स्वामी = शुक्र।
- नवांश (D9) नियम (स्मरण): प्रत्येक 30° → 9 × (3°20′); विषम राशि में मेष से क्रम, सम में तुला से — varga-rule घोषित करें।
2) भूतसंख्या: वसु = 8; पौष्ण = रेवती = नक्षत्र 27।
3) N = जन्म-भ से रेवती तक की नक्षत्र-संख्या (दिशा/inclusive convention declare)।
4) r = N mod 8; r = 0 → 8।
5) स्वामी-क्रम अगले श्लोक में (राहु सहित, शुक्र विना)।

उदाहरण (worked example) जन्म-नक्षत्र = मघा (10); रेवती (27) तक अग्र-गणना: 10…27 → N = 18।
18 mod 8 = 2 → द्वितीय स्वामी से आरम्भ (46.28 की सूची: सूर्य=1, गुरु=2 → गुरु से द्वादशोत्तरी)।
साथ ही D9 में अंश-स्वामी शुक्र हो तभी यह द्वार खुला।

हमारा डिकोड (Our Decode) “अंश” को वर्ग-इंजन के D9 (नवमांश) से जोड़ना षोडश-वर्ग-गणित का सीधा अनुप्रयोग है — 3°20′ के समान खंड, मॉड्यूलर मानचित्र। दशा-चयन यहाँ वर्ग-स्वामी × नक्षत्र-शेष दोनों पर निर्भर करता है; दोनों deterministic हैं, फल नहीं।

46.28
सूर्यो गुरुः शिखी ज्ञोऽगुः कुजो मन्दो निशाकरः |
विना शुक्रं दशाधीशा द्विचयात् सप्ततः समाः
sūryo guruḥ śikhī jño'guḥ kujo mando niśākaraḥ |
vinā śukraṃ daśādhīśā dvicayāt saptataḥ samāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यः = सूर्य; गुरुः = बृहस्पति; शिखी = केतु; ज्ञः = बुध; अगुः = राहु (अगु/तमस्); कुजः = मंगल; मन्दः = शनि; निशाकरः = चन्द्र; विना शुक्रम् = शुक्र को छोड़कर; दशा-अधीशाः = दशा-स्वामी; द्वि-चयात् = दो-दो की वृद्धि से; सप्ततः = सात से आरम्भ; समाः = वर्ष।

हिन्दी भावार्थ द्वादशोत्तरी के दशा-स्वामी क्रमशः — सूर्य, गुरु, केतु, बुध, राहु, मंगल, शनि, चन्द्र — शुक्र को छोड़कर। उनके वर्ष सात से आरम्भ होकर द्वि-चय (प्रत्येक पद पर +2) से बढ़ते हैं: 7, 9, 11, 13, 15, 17, 19, 21। योग 112 वर्ष — द्वादश (12) से उत्तर चक्र का कुल मान।

English rendering The daśā lords, excluding Venus, are: Sun, Jupiter, Ketu, Mercury, Rāhu, Mars, Saturn, and the Moon. Their years begin at seven and increase by two each time.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
द्विचय + सप्ततः: Y_k = 7 + 2(k−1), k = 1…8।

| k | स्वामी | वर्ष |
|---|---|---|
| 1 | सूर्य | 7 |
| 2 | गुरु | 9 |
| 3 | केतु (शिखी) | 11 |
| 4 | बुध (ज्ञ) | 13 |
| 5 | राहु (अगु) | 15 |
| 6 | मंगल (कुज) | 17 |
| 7 | शनि (मन्द) | 19 |
| 8 | चन्द्र (निशाकर) | 21 |
| | Σ | 112 |

  • आरम्भ-स्वामी = 46.27 का r-सूची[r]।
  • भुक्त = f_b × Y_k; अन्तर्-अनुपात: (Y_i × Y_j) / 112।
  • शुक्र दशा-स्वामी नहीं — चक्र में अनुपस्थित।

उदाहरण (worked example) 46.27 उदाहरण — r = 2 → गुरु, Y = 9।
f_b = 1/3 हो तो गुरु-महादशा भुक्त = 3 वर्ष, भोग्य = 6 वर्ष। अगले: केतु 11, बुध 13, … चन्द्र 21, फिर सूर्य 7। पूर्ण चक्र = 112 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) तीनों चक्र — विंशोत्तरी 120, षोडशोत्तरी 116, द्वादशोत्तरी 112 — एक ही अनुपात-ढाँचे के भिन्न कुल-मान हैं: अन्तर् = (Y_i × Y_j)/Σ। हमारा दशा-इंजन विंशोत्तरी 120 पर pinned है; अन्य Σ केवल तभी लगाएँ जब अध्याय का चयन-द्वार (पक्ष×होरा / शुक्रांश) खुले। वर्ष-योग `==` 112/116/120 — सहन-पट्टी नहीं।

46.29
अर्कांश कर्कलग्ने पञ्चोत्तरी मता |
मित्रर्क्षाज्जन्मभं यावत् संख्या सप्तविभाजिता
arkāṃśa karkalagne pañcottarī matā |
mitrarkṣājjanmabhaṃ yāvat saṃkhyā saptavibhājitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कांश = सूर्य का अंश (सामान्यतः नवांश/D9); कर्कलग्ने = कर्क लग्न होने पर; पञ्चोत्तरी = पञ्चोत्तरी दशा (१२–१८ वर्ष-क्रम वाली सप्त-ग्रह दशा); मता = शास्त्र में स्वीकृत/मान्य; मित्रर्क्षात् = मित्र-नक्षत्र (अनुराधा) से; जन्मभम् = जन्म-नक्षत्र; यावत् संख्या = जितनी गणना; सप्तविभाजिता = सात से विभाजित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कर्क लग्न हो — अथवा सूर्य का अंश कर्क-सम्बद्ध हो — तब पञ्चोत्तरी दशा का विचार किया जाता है। जन्म-नक्षत्र तक मित्र (अनुराधा) से गणना कर उस संख्या को सात से भाग दिया जाता है; शेष से दशा-स्वामी का क्रम निर्धारित होता है। यह दशा सात खेटों पर टिकी है; राहु-केतु इसमें नहीं आते (अगले श्लोकों में स्पष्ट)।

English rendering The text states that when Cancer is the lagna (and/or the Sun’s aṃśa is Cancer-related), the Pañcottarī daśā is accepted. Count from Mitra (Anurādhā) to the birth nakṣatra and divide that count by seven; the remainder fixes the starting lord among the seven planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
प्रारम्भ-नक्षत्र = मित्र = अनुराधा (Aśvinī = 1 मानकर अनुराधा = १७; पाठ-भेद/गणना-आरम्भ परम्परा पर निर्भर)।
मान लें जन्म-नक्षत्र-सूचकांक = N, अनुराधा-सूचकांक = M।
गिनती (circular, २७-नक्षत्र-चक्र में):
k = (N − M) mod 27; यदि k = 0 तो पूर्ण चक्र २७ माना जाता है (परम्परा-निर्भर)।
r = k mod 7; r ∈ {1…7} (शेष ० को ७ माना जाता है — “एकादिशेषे”, ४६.३०)।
r दशा-स्वामी-क्रम का आरम्भ-सूचकांक है। वर्ष-मान अगले श्लोक में: १२, १३, …, १८; Σ = १०५ वर्ष।

उदाहरण (worked example) जन्म-नक्षत्र = रोहिणी (N = ४), M = १७ (अनुराधा)।
k = (४ − १७) mod 27 = (−१३) mod 27 = १४।
r = १४ mod 7 = ० → शेष ७ (सप्तम स्वामी)।
स्वामी-क्रम (४६.३०): १ रवि, २ बुध, ३ शनि, ४ मंगल, ५ शुक्र, ६ चन्द्र, ७ गुरु → आरम्भ गुरु-दशा से।
(नक्षत्र-सूचकांक-परम्परा और “पूर्ण चक्र = २७” का नियम स्पष्ट घोषित रखने योग्य; पाठ-भेद संभव।)

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46.30
एकादिशेषे विज्ञ्याः क्रमात्सप्तदशाधिपाः |
रविर्ज्ञोऽर्कसुतो भौमः शुक्रश्चन्द्रो वृहस्पतिः
ekādiśeṣe vijñyāḥ kramātsaptadaśādhipāḥ |
ravirjño'rkasuto bhaumaḥ śukraścandro vṛhaspatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादिशेषे = शेष १ से आरम्भ; विज्ञेयाः = ज्ञातव्य; क्रमात् = क्रम से; सप्तदशाधिपाः = सात दशा-स्वामी; रविः = सूर्य; ज्ञः = बुध; अर्कसुतः = शनि (सूर्य-पुत्र); भौमः = मंगल; शुक्रः = शुक्र; चन्द्रः = चन्द्र; बृहस्पतिः = गुरु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भाग के बाद शेष एक से लेकर सात तक के क्रम में सात दशा-स्वामी जाने जाते हैं। क्रम है — सूर्य, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, चन्द्र, गुरु। यही पञ्चोत्तरी का स्वामी-क्रम है; राहु-केतु यहाँ नहीं गिने जाते।

English rendering The text states that with remainder one and so on, the seven daśā lords are known in order: Sun, Mercury, Saturn, Mars, Venus, Moon, and Jupiter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
स्वामी-सूची L[1…7] = {सूर्य, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, चन्द्र, गुरु}।
यदि r = (नक्षत्र-गिनती) mod 7, और r = ० → r := ७, तो आरम्भ-स्वामी = L[r]।
दशा-वर्ष (४६.३१ से):
सूर्य १२, बुध १३, शनि १४, मंगल १५, शुक्र १६, चन्द्र १७, गुरु १८ वर्ष।
Σ = १२+१३+१४+१५+१६+१७+१८ = १०५ वर्ष (पञ्चोत्तरी-चक्र)।
अन्तर्दशा (सामान्य अनुपात-नियम, यदि लागू किया जाए):
antar(i,j) = (mahā_i × mahā_j) / १०५ वर्ष।

उदाहरण (worked example) r = ३ → आरम्भ शनि, १४ वर्ष।
क्रम चक्र: शनि (१४) → मंगल (१५) → शुक्र (१६) → चन्द्र (१७) → गुरु (१८) → सूर्य (१२) → बुध (१३) → पुनः शनि…
शनि-महादशा में शुक्र-अन्तर्दशा (उदाहरण): (१४ × १६)/१०५ = २२४/१०५ ≈ २.१३३ वर्ष ≈ २ वर्ष + १.६ मास (३६५.२५-दिन वर्ष मानकर)।

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46.31
एकोत्तराच्च विज्ञेया द्वादशाद्याः क्रमात्समाः |
धृत्यन्ताः सप्तखेटानां राहुकेतू विना द्विज
ekottarācca vijñeyā dvādaśādyāḥ kramātsamāḥ |
dhṛtyantāḥ saptakheṭānāṃ rāhuketū vinā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकोत्तरात् = एक-एक बढ़ाकर; विज्ञेयाः = ज्ञातव्य; द्वादशाद्याः = बारह से आरम्भ; क्रमात्समाः = क्रमशः वर्ष; धृत्यन्ताः = धृति तक (धृति = १८, भूतसंख्या); सप्तखेटानाम् = सात खेटों के; राहुकेतू विना = राहु-केतु के बिना; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सात खेटों की वर्ष-संख्या बारह से आरम्भ होकर एक-एक बढ़ती हुई धृति (१८) तक जाती है। यह क्रम केवल सात ग्रहों का है — राहु और केतु इसमें नहीं। हे द्विज, यही पञ्चोत्तरी की समा-व्यवस्था है।

English rendering The text states that the seven planets’ year-lengths begin at twelve and increase by one each, ending at dhṛti (eighteen), without Rāhu and Ketu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भूतसंख्या: द्वादश = १२; एकोत्तर = +१; धृति = १८।
वर्ष-वेक्टर (स्वामी-क्रम ४६.३० के साथ):
y = (१२, १३, १४, १५, १६, १७, १८)
ग्रह = (रवि, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, चन्द्र, गुरु)
Σ y = १०५ वर्ष।
“पञ्चोत्तरी” नाम इसी १२…१८ (+१) क्रम और १०५-वर्ष चक्र से जुड़ा है।
राहु-केतु ≠ दशा-स्वामी (इस पद्धति में)।

उदाहरण (worked example) पूर्ण चक्र = १०५ वर्ष।
यदि जन्म पर गुरु-महादशा का ४ वर्ष बीत चुका (शेष १४), तो अगला सूर्य १२, फिर बुध १३…।
शेष-समय संचय: १४ + १२ + १३ + १४ + १५ + १६ + १७ + १८ = ११९ वर्ष तक का विस्तार-दृश्य (एक आंशिक + एक पूर्ण चक्र) — केवल गणना-दृष्टान्त; फल-कथन नहीं।

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46.32
वर्गोत्तमगते लग्ने दशा चिन्त्या शताब्दिका |
पौष्ण्भाज्जन्मपर्यन्तं गणयेत् सप्तभिर्भजेत्
vargottamagate lagne daśā cintyā śatābdikā |
pauṣṇbhājjanmaparyantaṃ gaṇayet saptabhirbhajet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्गोत्तमगते लग्ने = लग्न वर्गोत्तम होने पर (लग्न-राशि = लग्न-नवांश राशि); दशा चिन्त्या = दशा विचारणीय; शताब्दिका = शताब्दिका / शत-समा दशा (१०० वर्ष); पौष्ण्भात् = पौष्ण-नक्षत्र (रेवती, पूषन्) से; जन्मपर्यन्तम् = जन्म-नक्षत्र तक; गणयेत् = गणना करे; सप्तभिः भजेत् = सात से भाग दे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब लग्न वर्गोत्तम हो, तब शताब्दिका (शत-वर्ष) दशा का विचार करना चाहिए। पौष्ण (रेवती) से जन्म-नक्षत्र तक गिनकर उस संख्या को सात से विभाजित किया जाता है; शेष से सूर्यादि स्वामी-क्रम (अगला श्लोक) मिलता है।

English rendering The text states that when the lagna is vargottama, the century daśā (Śatābdikā) should be considered. Count from Pauṣṇa (Revatī) to the birth star and divide by seven.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
वर्गोत्तम-लग्न: लग्न-राशि R_D1 = लग्न-नवांश राशि R_D9 (D9 = ३०°/९ = ३°२०′ प्रत्येक नवमांश)।
प्रारम्भ-नक्षत्र = पौष्ण = रेवती (सूचकांक २७, Aśvinī = १)।
k = (N − २७) mod 27; recast; r = k mod 7 (शेष ० → ७)।
चक्र-योग = १०० वर्ष (४६.३४)। स्वामी-क्रम: ४६.३३।

उदाहरण (worked example) लग्न = १२° मेष।
D9: मेष में नवमांश = ⌊१२° / (३°२०′)⌋ = ⌊१२ / 3.333…⌋ = ३ → चतुर्थ नवमांश = कर्क।
R_D1 = मेष ≠ कर्क = R_D9 → वर्गोत्तम नहीं; शताब्दिका-शर्त (इस पठन में) लागू नहीं।
यदि लग्न = २° मेष → नवमांश १ = मेष = R_D1 → वर्गोत्तम; तब रेवती से जन्म-नक्षत्र गिनकर r निकालें।
(अयनांश लग्न-रेखांश को बदलता है; वर्ग-नियम BPHS षोडशवर्ग-पद्धति पर।)

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46.33
शेषाङ्के रवितो ज्ञेया दशा शतसमाह्वया |
रविश्चन्द्रो भृगुर्ज्ञश्च जीवो भौमः शनिस्तथा
śeṣāṅke ravito jñeyā daśā śatasamāhvayā |
raviścandro bhṛgurjñaśca jīvo bhaumaḥ śanistathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेषाङ्के = शेष-अंक में; रवितः = सूर्य से; ज्ञेया = ज्ञातव्य; दशा शतसमाह्वया = शत-समा नाम की दशा (शताब्दिका); रविः = सूर्य; चन्द्रः = चन्द्र; भृगुः = शुक्र; ज्ञः = बुध; जीवः = गुरु; भौमः = मंगल; शनिः = शनि; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शेष-संख्या के अनुसार सूर्य से आरम्भ कर शताब्दिका दशा के स्वामी जाने जाते हैं। क्रम है — सूर्य, चन्द्र, शुक्र, बुध, गुरु, मंगल, शनि। यही शत-समा दशा का स्वामी-क्रम है।

English rendering The text states that from the remainder, reckoned from the Sun, the lords of the century-named daśā are: Sun, Moon, Venus, Mercury, Jupiter, Mars, and Saturn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
L_śata[1…7] = {सूर्य, चन्द्र, शुक्र, बुध, गुरु, मंगल, शनि}।
आरम्भ-स्वामी = L_śata[r], r = १…७।
वर्ष-मान (४६.३४, भूतसंख्या): ५, ५, १०, १०, २०, २०, ३०।
Σ = ५+५+१०+१०+२०+२०+३० = १०० वर्ष।
अन्तर्दशा-अनुपात (यदि प्रयुक्त): antar(i,j) = (y_i × y_j) / १००।

उदाहरण (worked example) r = १ → सूर्य ५ वर्ष से आरम्भ।
क्रम: सूर्य ५ → चन्द्र ५ → शुक्र १० → बुध १० → गुरु २० → मंगल २० → शनि ३०।
सूर्य-महा में गुरु-अन्तर्: (५ × २०)/१०० = १ वर्ष।

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46.34
क्रमदेते दशाधीशा बाणा बाणा दिशो दश |
नखा नखाः खरामाश्च समाज्ञेया द्विजोत्तम
kramadete daśādhīśā bāṇā bāṇā diśo daśa |
nakhā nakhāḥ kharāmāśca samājñeyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् एते दशाधीशाः = क्रम से ये दशा-स्वामी; बाणा बाणा = बाण+बाण = ५, ५ (बाण = ५, भूतसंख्या); दिशो दश = दिशा+दश = १०, १० (दिश् = १०); नखा नखाः = नख+नख = २०, २० (नख = २०); खरामाः = ३० (परम्परा-सिद्ध पठन; शताब्द-शेष; पाठ-भेद संभव); समाः ज्ञेयाः = वर्ष ज्ञातव्य; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उपर्युक्त सात दशा-स्वामियों के वर्ष क्रमशः बाण-बाण, दिशा-दश, नख-नख और खराम हैं — अर्थात् ५, ५, १०, १०, २०, २०, ३०। हे द्विजोत्तम, यही शताब्दिका की समा-व्यवस्था जाननी चाहिए; योग एक सौ वर्ष का है।

English rendering The text states that these daśā lords’ years are, in order, five, five, ten, ten, twenty, twenty, and thirty (word-numerals: bāṇa, diś/daśa, nakha, kharāma), O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भूतसंख्या-विन्यास (स्वामी-क्रम ४६.३३ के साथ):
| स्वामी | वर्ष (शब्द) | मान |
| सूर्य | बाण | ५ |
| चन्द्र | बाण | ५ |
| शुक्र | दिश्/दश | १० |
| बुध | दश | १० |
| गुरु | नख | २० |
| मंगल | नख | २० |
| शनि | खराम | ३० |
Σ = १०० = शत-समा।
“खरामाः” = ३० यहाँ परम्परा-सिद्ध अवशेष-मान है जो चक्र को १०० पर पूर्ण करता है; यदि कोई पाठान्तर भिन्न अंक दे तो पाठ-भेद संभव — अंक को श्लोक-योग (Σ = १००) से बाँधकर जाँचना चाहिए (exact `==`, सहिष्णुता-पट्टी नहीं)।

उदाहरण (worked example) जन्म पर बुध-महा का शेष ६ वर्ष।
अगला क्रम: गुरु २० + मंगल २० + शनि ३० + सूर्य ५ + चन्द्र ५ + शुक्र १० + बुध १० = १०० वर्ष का पूर्ण चक्र-संचय।
गुरु-महा में शनि-अन्तर्: (२० × ३०)/१०० = ६ वर्ष।

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46.35
कर्मेशे कर्मगे ज्ञेया चतुराशीतिका दशा |
पवनाज्जन्मभं यावद् या सण्ख्या सप्तभाजिता
karmeśe karmage jñeyā caturāśītikā daśā |
pavanājjanmabhaṃ yāvad yā saṇkhyā saptabhājitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेशे = दशम-स्वामी के; कर्मगे = कर्म-भाव (दशम) में स्थित होने पर; ज्ञेया = ज्ञातव्य; चतुराशीतिका दशा = चतुराशीतिका (८४-वर्ष) दशा; पवनात् = पवन-नक्षत्र (स्वाति, वायु) से; जन्मभम् यावत् = जन्म-नक्षत्र तक; या संख्या = जो गणना; सप्तभाजिता = सात से विभाजित (पाठ: “सण्ख्या” ≈ संख्या; पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कर्मेश कर्म-भाव में हो — अर्थात् दशमेश दशम में हो — तब चतुराशीतिका दशा जाननी चाहिए। पवन (स्वाति) से जन्म-नक्षत्र तक गिनकर उस संख्या को सात से भाग दिया जाता है; शेष से सात स्वामियों का क्रम (अगले श्लोक-समूह में) निर्धारित होता है। “चतुराशीतिका” नाम स्वयं ८४-वर्ष चक्र की ओर संकेत करता है।

English rendering The text states that when the tenth-lord is in the tenth, the Caturāśītikā daśā (the eighty-four-year system) is to be known. Count from Pavana (Svāti) to the birth star and divide that number by seven.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
शर्त: lord(10th house) स्थित हो house 10 में (भाव-पद्धति घोषित रखें: पूर्ण-भाव / समान-भाव / श्रीपति आदि — परिणाम भाव-स्वामी-स्थिति पर निर्भर)।
प्रारम्भ-नक्षत्र = पवन = स्वाति (सूचकांक १५, Aśvinī = १)।
k = (N − १५) mod 27; r = k mod 7 (० → ७)।
चक्र-नाम: चतुः + अशीति = ८४ वर्ष (Σ mahā = ८४)।
इस श्लोक में वर्ष-वेक्टर/स्वामी-सूची नहीं दी गई — वे अनुवर्ती श्लोकों में आती हैं; यहाँ केवल लागू-शर्त + सप्त-शेष नियम है।

उदाहरण (worked example) मान लें वृष लग्न, दशम = कुम्भ, दशमेश = शनि, और शनि कुम्भ में → कर्मेश कर्मगे।
जन्म-नक्षत्र = हस्त (N = १३), स्वाति = १५।
k = (१३ − १५) mod 27 = २५; r = २५ mod 7 = ४ → चतुर्थ स्वामी से चतुराशीतिका आरम्भ (स्वामी-नाम अगले श्लोक से बाँधें)।
(भाव-गणना के लिए गृह-पद्धति और अयनांश स्पष्ट करें; फल नहीं — केवल आरम्भ-सूचकांक।)

46.36
शेषे रवीन्दुभौमज्ञा गुरुशुक्रशनैश्चराः |
दशाधीशाः क्रमादेषां ज्ञेया द्वादशवत्सराः
śeṣe ravīndubhaumajñā guruśukraśanaiścarāḥ |
daśādhīśāḥ kramādeṣāṃ jñeyā dvādaśavatsarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेषे = अवशिष्ट / शेष-दशा-क्रम में; रवीन्दुभौमज्ञाः = सूर्य–चन्द्र–मङ्गल–बुध; गुरुशुक्रशनैश्चराः = गुरु–शुक्र–शनि; दशाधीशाः = दशा-स्वामी; क्रमात् = क्रमशः; एषां = इनकी; द्वादशवत्सराः = द्वादश (= 12) वर्ष की दशा-अवधि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस क्रम में सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि को दशाधीश बताता है। इनकी दशा-अवधि समान रूप से द्वादश वर्ष मानी गई है। “शेषे” यहाँ पूर्व-निर्दिष्ट गणना के शेष/अवशिष्ट क्रम से जोड़कर पढ़ना चाहिए — पाठ-भेद संभव जहाँ शेष-विधि का पूर्व-श्लोक अलग हो। यह फल नहीं, दशा-स्वामी और वर्ष-मान का नियम है।

English rendering The text states that the daśā-lords, in order, are the Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, and Saturn; for these, twelve years each are to be taken. “Śeṣe” ties the list to the residual/remaining application of the preceding counting rule (reading may vary by recension).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Equal-year assignment: for each of the seven listed grahas,
dᵢ = 12 years (द्वादश).
If the full cycle of these seven alone is taken: Σ = 7 × 12 = 84 years.
(If an eighth lord is implied by the next verse’s अष्टौ, its year-count is not stated in this śloka — do not invent it.)

उदाहरण (worked example) Assume the residual method has already fixed the running lord as Mercury (4th in the list). Then Mercury-mahādaśā length per this verse = 12 years. Elapsed fraction f of that lord’s span (from the companion counting rule) gives
bhukta = 12 × f years, bhogya = 12 × (1 − f) years
(convention: f from nakṣatra-arc or residual count as the chapter’s prior rule supplies).

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46.37
मूलाज्जन्मर्क्षपर्यन्तं गणयेदष्टभिर्भजेत् |
शेषाद्दशाधीपा ज्न्' एया अष्टौ रव्यादयः क्रमात्
mūlājjanmarkṣaparyantaṃ gaṇayedaṣṭabhirbhajet |
śeṣāddaśādhīpā jn' eyā aṣṭau ravyādayaḥ kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मूलात् = मूल-नक्षत्र से; जन्मर्क्षपर्यन्तम् = जन्म-नक्षत्र तक; गणयेत् = गिने; अष्टभिः = 8 से; भजेत् = भाग दे; शेषात् = शेष-संख्या से; दशाधीपाः = दशा-स्वामी; ज्ञेयाः = जानने योग्य; अष्टौ = आठ; रव्यादयः = सूर्य से आरम्भ; क्रमात् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ मूल नक्षत्र से जन्म-नक्षत्र तक की संख्या गिनकर उसे आठ से भाग दें। जो शेष बचे, उसी से दशाधीश निश्चय करें। शास्त्र कहता है कि वे आठ दशाधीश सूर्य से आरम्भ करके क्रमशः जाने जाते हैं। यह नक्षत्र-स्थान से दशा-स्वामी बाँधने का शुद्ध गणना-नियम है, फल-कथन नहीं।

English rendering Count from Mūla up to the birth-nakṣatra, divide that count by eight, and from the remainder determine the daśā-lord. The eight lords are to be known in order beginning with the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let N = number of nakṣatras counted from Mūla (19th) to janma-nakṣatra (inclusive; declare if a recension counts exclusive).
r = N mod 8; if r = 0 then r ← 8.
Lords L₁…L₈ with L₁ = Sūrya, then Candra, Maṅgala, Budha, Guru, Śukra, Śani, and the eighth (अष्टौ; typically Rāhu in related schemes — exact name not restated in this pāda; पाठ-भेद संभव).
Current mahādaśā-lord = Lᵣ.
Combined with 46.36: for the seven named there, each span = 12 years when that rule is applied.

उदाहरण (worked example) Birth-nakṣatra = Maghā (10). Count Mūla→…→Maghā inclusive:
Mūla(19)…Revatī(27) = 9; Aśvinī…Maghā = 10; N = 9 + 10 = 19.
19 ÷ 8 = 2 remainder 3 → r = 3 → L₃ = Mars.
If 46.36’s 12-year rule applies: Mars-mahādaśā = 12 years.
(Convention: nakṣatra index 1 = Aśvinī … 27 = Revatī; inclusive count as stated.)

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46.38
नव वर्षाणि सर्वेषां विकेतूनां नभःसदाम् |
लग्नेशे सप्तमे यस्य लग्ने वा सप्तमाधिपे
nava varṣāṇi sarveṣāṃ viketūnāṃ nabhaḥsadām |
lagneśe saptame yasya lagne vā saptamādhipe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नव वर्षाणि = नौ वर्ष; सर्वेषाम् = सभी के; विकेतूनाम् = केतु-रहित; नभःसदाम् = आकाश-निवासी ग्रहों के; लग्नेशे = लग्न-स्वामी; सप्तमे = सप्तम भाव में; यस्य = जिसका; लग्ने = लग्न में; वा = अथवा; सप्तमाधिपे = सप्तमेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु को छोड़कर शेष आकाश-ग्रहों की दशा-अवधि नव वर्ष मानी जाए। यह विचार तब उठता है जब लग्नेश सप्तम में हो, अथवा सप्तमेश लग्न में हो। शर्त भाव-स्वामी की पारस्परिक 1–7 स्थिति है; यहाँ केवल लागू होने का द्वार बताया गया है।

English rendering For all the sky-dwellers except Ketu, nine years each are stated. That scheme is to be considered when the lagna-lord is in the seventh, or the seventh-lord is in the lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Per-planet year: d = 9 (नव).
Ketu excluded (विकेतूनाम्). The eight (Sūrya…Śani + Rāhu) give
Σ = 8 × 9 = 72 years
— which the next verse names द्विसप्तति.
Applicability gate (boolean):
(house(lagneśa) = 7) ∨ (house(saptameśa) = 1),
with house system declared (whole-sign is the natural reading for this lagna/7th test unless another is fixed).

उदाहरण (worked example) Lagna = Tulā; lagneśa = Venus in Meṣa (7th from Tulā) → gate true.
Cycle length = 72 years; each of the eight non-Ketu lords = 9 years.
If Venus is the current lord by the chapter’s ordering rule: Venus-mahādaśā = 9 years.

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46.39
चिन्तनीया दशा तस्य द्विसप्ततिसमाह्वया |
विंशोत्तरीवदत्राऽपि भुक्तं भोग्यं च साधयेत्
cintanīyā daśā tasya dvisaptatisamāhvayā |
viṃśottarīvadatrā'pi bhuktaṃ bhogyaṃ ca sādhayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चिन्तनीया = विचारणीय; दशा = दशा; तस्य = उसकी; द्विसप्ततिसमाह्वया = द्विसप्तति (= 72) वर्ष नामक; विंशोत्तरीवत् = विंशोत्तरी की भाँति; अत्र अपि = यहाँ भी; भुक्तम् = भोगा हुआ अंश; भोग्यम् = भोग्य शेष; साधयेत् = साधें / निकालें।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की शर्त पर उस जातक की दशा को शास्त्र “द्विसप्तति-समा” कहकर चिन्तनीय बताता है — कुल चक्र द्विसप्तति (= 72) वर्ष। विंशोत्तरी की भाँति यहाँ भी भुक्त और भोग्य का साधना करना कहा गया है। अर्थात् पूर्ण दशा-वर्ष में से नक्षत्र-अंश (या समतुल्य भिन्न) के अनुपात से व्यतीत और शेष निकालें। यह विधि-निर्देश है, कोई फल-घोषणा नहीं।

English rendering Under that condition the daśā to be considered is the one called dvisaptati (seventy-two years). Here too, as in Vimśottarī, the spent (bhukta) and remaining (bhogya) portions are to be computed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Cycle: T = 72 years (द्विसप्तति); unit lord-span from 46.38: d = 9.
Bhukta/bhogya “विंशोत्तरीवत्” = proportional remainder on the opening lord’s span, same ratio idea as Vimśottarī’s nakṣatra-fraction:
Let f = fraction of the birth-nakṣatra already traversed (0 ≤ f < 1; from Moon’s longitude in that nakṣatra, 13°20′ arc).
For opening lord with span d years:
bhukta = d × f, bhogya = d × (1 − f).
Antardaśā-style split (Vimśottarī analogy, dossier ratio form):
antar(i,j) = (dᵢ × dⱼ) / T
with T = 72 here (not 120).
Vimśottarī itself (dossier): mahādaśā years Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17 (Σ = 120); antar = (MD × AD)/120 — cited only as the model this verse points to.

उदाहरण (worked example) Gate of 46.38 true; opening lord Venus, d = 9; Moon has traversed 1/3 of birth-nakṣatra → f = 1/3.
bhukta = 9 × 1/3 = 3 years; bhogya = 6 years.
If next sub-lord is Saturn (also dⱼ = 9): antar ≈ (9 × 9)/72 = 81/72 = 1.125 years
(convention: equal 9-year lords for all eight non-Ketu grahas; house test whole-sign).

हमारा डिकोड (Our Decode) Verse explicitly anchors bhukta/bhogya to the Vimśottarī method. Our daśā engine implements that ratio arithmetic on the 120-year Vimśottarī cycle (Σ = 120; antar = (MD × AD)/120) as pure elapsed-nakṣatra-fraction math. Here the same proportion is applied with T = 72 and equal 9-year units — mathematics separated from any phala claim.

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46.40
यदार्को लग्नराशिस्थश्चिन्त्या षष्टिसमा तदा |
दास्रात् त्रयं चतुष्कं च त्रयं चेति पुनः पुनः
yadārko lagnarāśisthaścintyā ṣaṣṭisamā tadā |
dāsrāt trayaṃ catuṣkaṃ ca trayaṃ ceti punaḥ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यदा = जब; अर्कः = सूर्य; लग्नराशिस्थः = लग्न-राशि में स्थित; चिन्त्या = चिन्तनीय; षष्टिसमा = षष्टि (= 60) वर्ष की दशा; तदा = तब; दास्रात् = अश्विनी (दास्र) से; त्रयम् = तीन; चतुष्कम् = चार; च त्रयम् = और तीन; इति पुनः पुनः = इसी क्रम की आवृत्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य लग्न-राशि में हो, तब षष्टि-समा (साठ वर्ष) दशा विचारणीय है। अश्विनी से नक्षत्रों को त्रय, चतुष्क, त्रय के समूहों में बार-बार बाँधें। यह सूर्य-लग्न-संयोग पर लागू 60-वर्षीय चक्र का द्वार और नक्षत्र-गुच्छ नियम है।

English rendering When the Sun occupies the lagna-sign, the sixty-year (ṣaṣṭisamā) daśā is to be considered. From Aśvinī, group the nakṣatras repeatedly as three, then four, then three.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Gate: rāśi(Sun) = rāśi(lagna).
Cycle length T = 60 (षष्टि).
Nakṣatra packing from Aśvinī (दास्र): pattern (3, 4, 3) repeated:
(3+4+3) = 10; for 27 nakṣatras: three full cycles = 30 overshoot 27, so the pattern cannot tile the 27 nakṣatras in equal repeats — it closes after
3+4+3 + 3+4+3 + 3+4 = 27 (eight groups; the ninth term of the pattern is not completed), so "punaḥ punaḥ" names the cyclic pattern, not nine complete groups.
[Arithmetic corrected in the audit of 2026-09-21: the earlier text summed 3,4,3,3,4,3,3,4,3 (= 30) and called it 27.] The groups so formed map in order onto the successive daśā slots of the ṣaṣṭisamā scheme (periods in 46.41).
Birth-nakṣatra ∈ Gₖ ⇒ opening class/lord index k (1-based).

उदाहरण (worked example) Lagna = Siṃha, Sun in Siṃha → gate true. Birth-nakṣatra = Rohiṇī (4).
Groups: G₁ Aśvinī–Kṛttikā (1–3), G₂ Rohiṇī–Puṣya (4–7) → Rohiṇī ∈ G₂ → second slot of the 60-year scheme.
(Next verse supplies years per lord; convention: whole-sign lagna = Sun’s rāśi for the gate.)

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46.41
गुर्वर्कभूसुतानां च दशा दश दशाब्दकाः |
ततः शशिज्ञशुक्रार्कपुत्रागूनां रसाब्दकाः
gurvarkabhūsutānāṃ ca daśā daśa daśābdakāḥ |
tataḥ śaśijñaśukrārkaputrāgūnāṃ rasābdakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुर्वर्कभूसुतानाम् = गुरु–सूर्य–मङ्गल की; दशा = दशा; दश दश अब्दकाः = प्रत्येक दश (= 10) वर्ष; ततः = तत्पश्चात्; शशिज्ञशुक्रार्कपुत्रागूनाम् = चन्द्र–बुध–शुक्र–शनि–(अगु/राहु-पठित) की; रस-अब्दकाः = रस (= 6) वर्ष प्रत्येक।

हिन्दी भावार्थ षष्टि-समा के अन्दर शास्त्र तीनों — गुरु, सूर्य, भूमि-सुत (मङ्गल) — की दशा दश-दश वर्ष बताता है। उसके बाद चन्द्र, बुध, शुक्र, अर्कपुत्र (शनि) और “अगु” (परम्परा में प्रायः राहु; पाठ-भेद संभव) की दशा रस (= 6) वर्ष प्रत्येक कही गई है। यह शुद्ध वर्ष-सूची है।

English rendering The daśās of Jupiter, the Sun, and Mars are ten years each. Thereafter those of the Moon, Mercury, Venus, Saturn, and Agu (commonly read as Rāhu; reading may vary) are six years each.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Word-numerals: दश = 10; रस = 6 (six tastes).
Order and years:
Guru 10, Sūrya 10, Maṅgala 10, Candra 6, Budha 6, Śukra 6, Śani 6, Agu/Rāhu 6.
Σ = 3×10 + 5×6 = 30 + 30 = 60 = षष्टिसमा (matches 46.40).
With group index k from 46.40, opening lord = k-th in this list; bhukta/bhogya on that lord’s d by nakṣatra-fraction as elsewhere.

उदाहरण (worked example) From 46.40 example, Rohiṇī → G₂ → 2nd lord = Sūrya, d = 10 years.
If f = 0.4 of the birth-nakṣatra is elapsed:
bhukta = 10 × 0.4 = 4 years; bhogya = 6 years.
Full cycle check: 10+10+10+6+6+6+6+6 = 60.

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46.42
श्रवणाज्जन्मभं यावत् संख्या वसुविभाजिता |
शेषे चन्द्ररवीज्यारबुधार्किभृगुराहवः
śravaṇājjanmabhaṃ yāvat saṃkhyā vasuvibhājitā |
śeṣe candraravījyārabudhārkibhṛgurāhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रवणात् = श्रवण-नक्षत्र से; जन्मभम् यावत् = जन्म-नक्षत्र तक; संख्या = गिनती; वसु-विभाजिता = वसु (= 8) से विभक्त; शेषे = शेष में; चन्द्ररवीज्यारबुधार्किभृगुराहवः = चन्द्र, रवि, ज्य (गुरु), अर (मङ्गल), बुध, आर्कि (शनि), भृगु (शुक्र), राहु — इसी क्रम में दशाधीश।

हिन्दी भावार्थ श्रवण से जन्म-नक्षत्र तक की संख्या गिनकर वसु (= 8) से भाग दें। शेष के अनुसार दशाधीश जानें — क्रम: चन्द्र, सूर्य, गुरु, मङ्गल, बुध, शनि, शुक्र, राहु। यह 46.37 की मूल-आधारित अष्ट-विधि का श्रवण-आधारित भिन्न रूप है; दोनों में भाजक वसु/अष्ट ही है, आरम्भ-नक्षत्र और ग्रह-क्रम भिन्न हैं।

English rendering Count from Śravaṇa to the birth-nakṣatra and divide by eight (vasu). In the remainder the daśā-lords are Moon, Sun, Jupiter, Mars, Mercury, Saturn, Venus, and Rāhu, in that order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Śravaṇa index = 22 (Aśvinī = 1).
N = count from Śravaṇa to janma-nakṣatra (inclusive; declare exclusive if a recension so reads).
r = N mod 8; if r = 0 then r ← 8.
Lord list L:
1 Candra, 2 Ravi, 3 Jya (Guru), 4 Ara (Maṅgala), 5 Budha, 6 Ārki (Śani), 7 Bhṛgu (Śukra), 8 Rāhu.
Opening mahādaśā-lord = Lᵣ.
(Years per lord are not restated in this śloka — supply only from a paired rule in the same scheme; do not import 46.36’s 12 or 46.41’s 10/6 without textual warrant.)

उदाहरण (worked example) Birth-nakṣatra = Maghā (10). Count Śravaṇa(22)→…→Maghā(10) inclusive:
22…27 = 6; 1…10 = 10; N = 16.
16 ÷ 8 = 2 remainder 0 → r ← 8 → L₈ = Rāhu.
If a companion equal-year rule of 12 were separately applied (only if the recension so joins it): Rāhu-span = 12 years — here we stop at lord identification, which is all this verse states.
(Convention: nakṣatra 1 = Aśvinī; inclusive modular count; vasu = 8.)

46.43
क्रमाद्दशाधिपास्तेषामेकाद्येकोत्तराः समा |
लग्ने दिनेऽर्कहोरायां चन्द्रहोरागते निशि
kramāddaśādhipāsteṣāmekādyekottarāḥ samā |
lagne dine'rkahorāyāṃ candrahorāgate niśi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से; दशाधिपाः = दशा-स्वामी (ग्रह); तेषाम् = उन (ग्रहों) के; एकादि = एक से आरम्भ; एकोत्तराः = एक-एक बढ़ाते हुए; समाः = वर्ष; लग्ने = लग्न में; दिने = दिन में; अर्कहोरायाम् = सूर्य-होरा (D2 में सूर्य-अंश) में; चन्द्रहोरागते = चन्द्र-होरा में स्थित होने पर; निशि = रात्रि में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि क्रमशः उन दशा-स्वामियों की दशा-अवधि एक वर्ष से आरम्भ होकर एक-एक वर्ष बढ़ती जाती है (1, 2, 3… वर्ष)। यह गणना दिन में तब लागू मानी जाती है जब लग्न अर्क-होरा में हो, और रात्रि में तब जब लग्न चन्द्र-होरा में आया हो। होरा यहाँ दिवस-रात्रि के दो-भाग विभाजन (D2) का तकनीकी पद है।

English rendering The text states that their daśā-lords, in order, have periods of years beginning at one and increasing by one each. This is taken when the lagna is in the Sun’s horā by day, and when it has entered the Moon’s horā by night.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-वर्ष-अनुक्रम (क्रम-गुणक):
dₖ = k वर्ष, k = 1, 2, 3, … (एकादि एकोत्तर)
लागू-शर्त (शास्त्र):
- दिवा: लग्न ∈ अर्क-होरा
- निशा: लग्न ∈ चन्द्र-होरा
होरा-विभाजन (30° राशि → 2 × 15°): विषम राशि में प्रथम 15° सूर्य-होरा, द्वितीय 15° चन्द्र-होरा; सम राशि में उलटा (BPHS ṣoḍaśa-varga D2 नियम)।

उदाहरण (worked example) लग्न-देशान्तर λ_L = 42° → मिथुन 12° (सम राशि)। D2: सम राशि में प्रथम 15° चन्द्र-होरा। यदि जन्म रात्रि में है और लग्न चन्द्र-होरा में है, तो शास्त्र के अनुसार यह एकादि-एकोत्तर दशा-क्रम लागू माना जाता है — प्रथम दशा-स्वामी d₁ = 1 वर्ष, द्वितीय d₂ = 2 वर्ष, तृतीय d₃ = 3 वर्ष, …

46.44
सूर्यस्याऽर्धास्तयः पूर्वं परस्तादूदयादपि |
पञ्च पञ्च घटी सन्ध्या दशनाडी प्रकीर्तिता
sūryasyā'rdhāstayaḥ pūrvaṃ parastādūdayādapi |
pañca pañca ghaṭī sandhyā daśanāḍī prakīrtitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य = सूर्य का; अर्धास्तयः = अर्ध-अस्त / अस्त के समीप; पूर्वं = पहले; परस्तात् = आगे / बाद; उदयात् = उदय से; अपि = भी; पञ्च पञ्च = पाँच-पाँच; घटी = घटी (1 दिन = 60 घटी); सन्ध्या = संध्या-काल; दशनाडी = दस नाड़ी; प्रकीर्तिता = कही गई

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य के अस्त से पहले और उदय के बाद दोनों ओर संध्या का परिमाण बताता है। प्रत्येक ओर पाँच-पाँच घटी की संध्या मानी गई है, और यह समष्टि दस नाड़ी कही गई है। यहाँ घटी और नाड़ी एक ही काल-माप की दो संज्ञाएँ हैं (1 घटी = 1 नाड़ी = 24 आधुनिक मिनट, जब 1 अहोरात्र = 60 घटी)।

English rendering Before the Sun’s setting and also after its rising, the sandhyā is five ghaṭīs on each side; that span is declared as ten nāḍīs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संध्या-परिमाण (शास्त्र-स्थिर):
- उदयात् परस्तात्: 5 घटी
- अर्धास्तयः पूर्वं: 5 घटी
- योग: 5 + 5 = 10 नाड़ी (= 10 घटी)
आधुनिक समय: 10 घटी × 24 min/घटी = 240 min = 4 h (संपूर्ण उभय-संध्या, जब 1 अहोरात्र = 60 घटी माना जाए)।

उदाहरण (worked example) सूर्योदय 06:00, सूर्यास्त 18:00 (सम-दिन कल्पना)। प्रातः-संध्या: 06:00–08:00 (5 घटी); सायं-संध्या: 16:00–18:00 (5 घटी)। दोनों मिलकर 10 नाड़ी — यथा श्लोक।

46.45
सन्ध्याद्वयञ्च विंशत्या नाडिकाभिः प्रकीर्तितम् |
दिनस्य विंशतिर्घट्यः पूर्णसंज्ञा उदाहृताः
sandhyādvayañca viṃśatyā nāḍikābhiḥ prakīrtitam |
dinasya viṃśatirghaṭyaḥ pūrṇasaṃjñā udāhṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्ध्याद्वयम् = दोनों संध्याएँ; च = और; विंशत्या = बीस से; नाडिकाभिः = नाड़िकाओं से; प्रकीर्तितम् = कथित; दिनस्य = दिन की; विंशतिः घट्यः = बीस घटियाँ; पूर्णसंज्ञाः = “पूर्ण” नाम से; उदाहृताः = उदाहरणतः कही गईं

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि संध्या-युगल बीस नाड़िकाओं से प्रकीर्तित है। दिन की बीस घटियाँ “पूर्ण” संज्ञा से उदाहृत की गई हैं। यह पूर्व-श्लोक की 10-नाड़ी संध्या को दुहरे सन्दर्भ (उभय-संध्या / पूर्ण-माप) में बाँधता है — आगे सुधा-दशा की गणना इन्हीं मापों पर टिकेगी।

English rendering The pair of sandhyās is declared as twenty nāḍikās. Twenty ghaṭīs of the day are cited under the name pūrṇa (“full”).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- सन्ध्या-द्वय = 20 नाड़िका (विंशति)
- पूर्ण-माप: दिनस्य 20 घट्यः ≜ पूर्ण
(46.44 की 10 नाड़ी + द्वितीय संध्या-संदर्भ → 20; पाठ में “द्वय” स्पष्ट।)
1 अहोरात्र = 60 घटी परंपरा में दिन-अर्ध ≈ 30 घटी; यहाँ “पूर्ण” एक नामित 20-घटी खंड है, संपूर्ण दिन-मान नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि एक संध्या-समुच्चय = 10 नाड़ी (46.44), तो सन्ध्याद्वय = 2 × 10 = 20 नाड़िका — यथा 46.45। “पूर्ण” = 20 घटी नामित माप; आगे 46.47 में पूर्ण-मुग्ध घटी-मान इसी शृंखला से जुड़ेगा।

46.46
निशायाः मुग्धसंज्ञाश्च घटिका विंशतिश्च याः |
सूर्योदये च या सन्ध्या खण्डाख्या द/सनाडिका
niśāyāḥ mugdhasaṃjñāśca ghaṭikā viṃśatiśca yāḥ |
sūryodaye ca yā sandhyā khaṇḍākhyā da/sanāḍikā
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निशायाः = रात्रि की; मुग्धसंज्ञाः (पाठ) = "मुग्ध" संज्ञा वाली; घटिकाः विंशतिः = बीस घटिकाएँ; याः = जो; सूर्योदये = सूर्योदय पर; या सन्ध्या = जो सन्ध्या; खण्डाख्या = "खण्ड" नाम वाली; दशनाडिका (पाठ "द/सनाडिका" — पाठ-भेद संभव) = दस नाडिका की।

हिन्दी भावार्थ दशा-अध्याय के काल-विभाजन का पद — शास्त्र रात्रि की बीस घटिकाओं को "मुग्ध" संज्ञा देता है और सूर्योदय के समय की दस नाडिका की सन्ध्या को "खण्ड" कहता है। ये संज्ञाएँ आगे उन दशाओं के लिए काम आती हैं जो जन्म-काल के दिन-रात्रि-सन्ध्या खण्ड पर निर्भर करती हैं (जैसे इसी अध्याय की सन्ध्या-जन्म से चक्र-दशा का निर्देश)।

English rendering The twenty ghaṭikās of the night are called "mugdha", the text says, and the sandhyā of ten nāḍikās at sunrise is called "khaṇḍa" — time-divisions used by the daśās that depend on the hour of birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 1 अहोरात्र = 60 घटिका (नाडिका); 1 घटिका = 24 मिनट। "मुग्ध" रात्रि-खण्ड = 20 घटिका = 20 × 24 = 480 मिनट = 8 घण्टे; "खण्ड" सन्ध्या = 10 नाडिका = 240 मिनट = 4 घण्टे। सन्ध्या सूर्योदय पर केन्द्रित (आगे-पीछे का विभाजन पाठ में अनुक्त — घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) सूर्योदय 06:00 स्थानीय: 10-नाडिका "खण्ड" सन्ध्या = 4 घण्टे; यदि सूर्योदय से पहले-पीछे समान बाँटें तो 04:00–08:00। रात्रि 30 घटिका (12 घण्टे) मानने पर "मुग्ध" 20 घटिका = उसका दो-तिहाई भाग। (सूर्योदय-गणना के लिए स्थान-अक्षांश और दृक्/शास्त्रीय रीति घोषित करें।)

46.47
अस्तकाले च या सन्ध्या सुधाख्या दशनाडिका |
पूर्णमुग्धघटीमाने द्विगुणे तिथिभिर्भजेत्
astakāle ca yā sandhyā sudhākhyā daśanāḍikā |
pūrṇamugdhaghaṭīmāne dviguṇe tithibhirbhajet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्तकाले = अस्त-समय में; या सन्ध्या = जो संध्या; सुधाख्या = “सुधा” नामक; दशनाडिका = दस नाड़िका; पूर्णमुग्धघटीमाने = पूर्ण- और मुग्ध-घटी के माप में; द्विगुणे = दूने किए पर; तिथिभिः = तिथियों से; भजेत् = भाग दे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अस्त-काल की संध्या को “सुधा” कहता है और उसका मान दस नाड़िका बताता है। पूर्ण- तथा मुग्ध-घटी-मान को द्विगुण करके तिथि-संख्या से भाग देने का निर्देश है — लब्धि आगे दशा-वर्ष का आधार बनेगी। “मुग्ध” यहाँ पूर्ण के सापेक्ष एक नामित घटी-माप है (पाठ में परिभाषा संक्षिप्त; विस्तृत भेद परंपरा-टीका पर निर्भर — पाठ-भेद संभव)।

English rendering The sandhyā at setting, called Sudhā, is ten nāḍikās. Taking the pūrṇa and mugdha ghaṭī-measure doubled, one divides by the tithis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- सुधा-संध्या (अस्तकाल) = 10 नाड़िका (स्थिर)
- आधार-सूत्र (शास्त्र):
M_sudhā = (पूर्ण-मुग्ध-घटी-मान × 2) ÷ N_tithi
जहाँ N_tithi = प्रयुक्त तिथि-गणना (संदर्भ-पाठ/विधि से; श्लोक केवल “तिथिभिः भजेत्” कहता है)।
लब्ध M वर्षादि-मान की इकाई में आगे प्रयुक्त होता है (46.48–49)।

उदाहरण (worked example) कल्पना: पूर्ण-मुग्ध घटी-मान = 15 घटी, तिथि-संख्या N = 30 (पूर्ण पक्ष-चक्र कल्पना)।
M = (15 × 2) ÷ 30 = 30 ÷ 30 = 1 वर्ष (आधार-मान)।
सुधा स्वयं = 10 नाड़िका = 10 × 24 min = 240 min (केवल काल-खंड; वर्ष-मान अलग सूत्र से)।

46.48
तथा खण्डसुधाघट्यौ चतुर्घ्ने तिथिभिर्भजेत् |
लब्धं वर्षादिकं मानं सूर्यादीनां खचारिणाम्
tathā khaṇḍasudhāghaṭyau caturghne tithibhirbhajet |
labdhaṃ varṣādikaṃ mānaṃ sūryādīnāṃ khacāriṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = वैसे ही; खण्डसुधाघट्यौ = खण्ड-सुधा की घटियाँ; चतुर्घ्ने = चार से गुणा करने पर; तिथिभिः = तिथियों से; भजेत् = भाग दे; लब्धम् = प्राप्त; वर्षादिकं मानम् = वर्ष आदि का परिमाण; सूर्यादीनाम् = सूर्य आदि के; खचारिणाम् = आकाशचारियों (ग्रहों) का

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि खण्ड-सुधा घटियों को चार से गुणा कर तिथियों से भाग दो; जो लब्धि आए, वही सूर्यादि खचारियों का वर्षादि दशा-मान है। यह 46.47 के द्विगुण-विधि का समकक्ष “चतुर्गुण” मार्ग है — खण्ड-सुधा पर आधारित।

English rendering Likewise, the khaṇḍa-sudhā ghaṭīs, multiplied by four and divided by the tithis, yield the measure in years and so on for the sky-goers beginning with the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
M_graha = (G_khaṇḍa-sudhā × 4) ÷ N_tithi
- G_khaṇḍa-sudhā = खण्ड-सुधा घटी-संख्या (पूर्व-परिभाषित खंड)
- गुणक 4 = चतुर् (श्लोक-स्थिर)
- N_tithi = तिथि-संख्या
- M_graha = सूर्यादि ग्रहों का वर्षादि दशा-मान (आधार; 46.49 में क्रम-गुणन)

उदाहरण (worked example) G_khaṇḍa-sudhā = 7.5 घटी, N_tithi = 30।
M = (7.5 × 4) ÷ 30 = 30 ÷ 30 = 1 वर्ष।
यदि G = 15 घटी, N = 30 → M = (15 × 4) ÷ 30 = 2 वर्ष — यह आधार-मान; पृथक् ग्रह-दशाएँ 46.49 के एकादि गुणकों से बनेंगी।

46.49
एकादिसंख्यया निघ्नं दशामानं पृथक् क्रमात् |
राहुकेतुयुतानां च नवानां कालसंज्ञकम्
ekādisaṃkhyayā nighnaṃ daśāmānaṃ pṛthak kramāt |
rāhuketuyutānāṃ ca navānāṃ kālasaṃjñakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादिसंख्यया = एक आदि संख्याओं से; निघ्नम् = गुणित; दशामानम् = दशा का मान; पृथक् = अलग-अलग; क्रमात् = क्रम से; राहुकेतुयुतानाम् = राहु-केतु सहित; च नवानाम् = और नौ (ग्रहों) का; कालसंज्ञकम् = “काल” नाम वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि (46.47–48 से लब्ध) दशा-मान को एक से आरम्भ संख्याओं से क्रमशः पृथक्-पृथक् गुणा किया जाए। राहु-केतु सहित नौ ग्रहों के लिए यही माप “काल” संज्ञक दशा है। यह विंशोत्तरी के 7-20-6-… वर्ष-चक्र से भिन्न, एकादि-गुणक वाली काल-दशा पद्धति है।

English rendering The daśā-measure, multiplied separately in order by the numbers beginning with one, for the nine [grahas] including Rāhu and Ketu, is termed Kāla.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-दशा (9 ग्रह, राहु-केतु सहित):
dᵢ = M × i, i = 1, 2, …, 9
- M = 46.47/46.48 से लब्ध आधार वर्ष-मान
- क्रम: सूर्यादि नवाँ क्रम (पाठ यहीं “सूर्यादीनाम्… नवानाम्” कहता है; सटीक ग्रह-अनुक्रम पाठ-परंपरा पर — पाठ-भेद संभव)
- Σdᵢ = M × (1+2+…+9) = M × 45
यह 46.43 के “एकाद्येकोत्तराः समाः” से जुड़ता है। विंशोत्तरी 120-वर्ष (केतु 7, शुक्र 20, …, बुध 17; Σ = 120) से संरचनात्मक रूप से अलग प्रणाली।

उदाहरण (worked example) M = 1 वर्ष (46.48 का उदाहरण)। काल-दशा वर्ष:
i=1 → 1; i=2 → 2; …; i=9 → 9।
योग = 45 वर्ष (जब M = 1)। यदि M = 2 वर्ष → dᵢ = 2, 4, 6, …, 18; योग = 90 वर्ष।
(ग्रह-क्रम और अयनांश यहाँ दशा-वर्ष-संख्या नहीं बदलते; केवल “किस ग्रह से आरम्भ” लग्न/होरा-शर्त 46.43 पर निर्भर।)

46.50
रात्रौ लग्नाश्रिताद्राशेर्दिने लग्नेश्वराश्रिताम् |
सन्ध्यायां वित्तभावस्थान्नेया चक्रदशा बुधैः
rātrau lagnāśritādrāśerdine lagneśvarāśritām |
sandhyāyāṃ vittabhāvasthānneyā cakradaśā budhaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रात्रौ = रात्रि-काल में; लग्न-आश्रितात् राशेः = लग्न जिस राशि में स्थित है, उससे; दिने = दिन-काल में; लग्नेश्वर-आश्रिताम् = लग्नेश जिस राशि में स्थित है, उससे; सन्ध्यायाम् = संध्या-काल में; वित्त-भाव-स्थान् = द्वितीय (वित्त) भाव की राशि से; चक्र-दशा = चक्रदशा; बुधैः = पण्डितों द्वारा; नेया = ज्ञात/निर्धारित की जाए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ चक्रदशा के आरम्भ-बिन्दु का काल-अनुसार नियम बताता है। रात्रि में जन्म हो तो चक्रदशा लग्न-स्थित राशि से चलाएँ; दिन में जन्म हो तो लग्नेश जिस राशि में बैठे हो, उसी से; और संध्या-काल में जन्म हो तो वित्तभाव—अर्थात् द्वितीय भाव—की राशि से। पण्डित इसी क्रम से चक्रदशा का निर्धारण करें, ऐसा पाठ कहता है।

English rendering The text states that Cakra-daśā is to be reckoned by the wise from the rāśi occupied by the lagna if birth is at night; from the rāśi occupied by the lagna-lord if by day; and from the second (vitta) house if at twilight (sandhyā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चक्रदशा-आरम्भ-बिन्दु = f(जन्म-काल): रात्रि → rāśi(Lagna); दिन → rāśi(Lagneśa); संध्या → rāśi(2nd house / वित्तभाव). “दिन/रात्रि/संध्या” का व्यावहारिक विभाजन स्थानीय सूर्योदय–सूर्यास्त और संध्या-सीमा की घोषित convention पर निर्भर करता है; यह श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता, केवल चयन-नियम देता है।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म स्थानीय रात्रि में, लग्न = कन्या (Virgo), लग्नेश बुध = मिथुन में, द्वितीय भाव = तुला। रात्रि-नियम लागू: चक्रदशा का आरम्भ-राशि = कन्या। यदि वही कुण्डली दिन-जन्म मानी जाए तो आरम्भ = मिथुन (लग्नेश-राशि); संध्या-जन्म पर आरम्भ = तुला (वित्तभाव)। (Convention: local sunrise/sunset; house system as used for bhāva—here whole-sign reading of “वित्तभाव” as 2nd from lagna, standard for this rule-statement.)

46.51
दशा वर्षाणि राशीनामेकैकस्य दशामितिः |
क्रमाच्चक्रस्थितानाञ्च विज्ञातव्या द्विजोत्तम
daśā varṣāṇi rāśīnāmekaikasya daśāmitiḥ |
kramāccakrasthitānāñca vijñātavyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशा-वर्षाणि = दशा के वर्ष; राशीनाम् = राशियों के; एकैकस्य = प्रत्येक एक-एक का; दशा-मितिः = दशा की माप/अवधि; क्रमात् = क्रम से; चक्र-स्थितानाम् = चक्र में स्थित (राशियों) की; च = और; विज्ञातव्या = जानी जानी चाहिए; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चक्र में स्थित प्रत्येक राशि की दशा-अवधि वर्ष में निर्धारित होती है—एक-एक राशि की अपनी दशा-माप है। चक्र-क्रम में रखी राशियों की ये अवधियाँ क्रमशः जानी जानी चाहिए। यह श्लोक मात्र सिद्धांत देता है कि “राशि-वार दशा-वर्ष” हैं; यहाँ स्वयं वर्ष-संख्याएँ नहीं गिनाई गईं।

English rendering O best of the twice-born, the text states that each rāśi has its own daśā measure in years, and that the periods of the signs placed in sequence in the cakra are to be known accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा_i = m_i वर्ष, जहाँ i चक्र-क्रम में स्थित राशि है; Σ या तालिका इस श्लोक में नहीं दी गई। यह एक संरचना-सूत्र है—“प्रत्येक राशि की दशा-मिति ज्ञात करो”—न कि संख्या-तालिका। (वर्ष-मान परवर्ती/सम्बद्ध चक्र–कालचक्र नियमों से जुड़े होते हैं; इस पाद में अंक नहीं।)

46.52
अथाऽहं शङ्करं नत्वा कालचक्रदशां ब्रुवे |
पार्वत्यै कथिता पूर्वं सादरं या पिनाकिना
athā'haṃ śaṅkaraṃ natvā kālacakradaśāṃ bruve |
pārvatyai kathitā pūrvaṃ sādaraṃ yā pinākinā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अहम् = मैं; शङ्करम् = शिव को; नत्वा = प्रणाम करके; कालचक्र-दशाम् = कालचक्रदशा को; ब्रुवे = कहता हूँ; पार्वत्यै = पार्वती के लिए; कथिता = कही गई; पूर्वम् = पहले; सादरम् = आदरपूर्वक; या = जो; पिनाकिना = पिनाकी (शिव) द्वारा।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य शङ्कर को नमन कर कालचक्रदशा का उपदेश आरम्भ करते हैं। शास्त्र कहता है कि यह दशा पूर्व में पिनाकी (भगवान् शिव) ने पार्वती के प्रति आदरपूर्वक कही थी। यह श्लोक गणना-सूत्र नहीं, अपितु कालचक्रदशा-प्रकरण का मङ्गल-संवाद-द्वार है।

English rendering Having bowed to Śaṅkara, the speaker now expounds Kālacakra-daśā—which, the text states, Pinākin (Śiva) had formerly narrated with reverence to Pārvatī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति/संवाद-मुख से कालचक्रदशा-प्रकरण का आरम्भ। गणना आगे के चक्र-निर्माण और नक्षत्र-मार्ग (सव्य/अपसव्य) श्लोकों में खुलती है।

46.53
तस्याः सारं समुद्धृत्य तवाग्रे द्विजमन्दन |
शुभाऽशुभं मनुष्याणां यथा जानन्ति पण्डिताः
tasyāḥ sāraṃ samuddhṛtya tavāgre dvijamandana |
śubhā'śubhaṃ manuṣyāṇāṃ yathā jānanti paṇḍitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्याः सारम् = उस (कालचक्रदशा) का सार/निष्कर्ष; समुद्धृत्य = निकालकर, संक्षेपकर; तवाग्रे = तेरे सम्मुख; द्विजमन्दन = हे द्विजश्रेष्ठ को आनन्दित करने वाले (मैत्रेय-सम्बोधन; "मन्दन/नन्दन" पाठ-भेद संभव); शुभाऽशुभम् = शुभ-अशुभ फल; मनुष्याणाम् = मनुष्यों का; यथा जानन्ति पण्डिताः = जैसा विद्वान् जानते हैं।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं — शिव द्वारा पार्वती को कही उस कालचक्रदशा का सार निकालकर मैं तुम्हारे सम्मुख रखता हूँ, जिसके द्वारा विद्वान् जन मनुष्यों के शुभ-अशुभ को यथार्थ रूप से जान लेते हैं। यह श्लोक कालचक्र-प्रकरण की प्रस्तावना है, स्वयं कोई गणना नहीं देता।

English rendering Having drawn out the essence of that (Kālachakra) daśā, I set it before you, O delight of the twice-born, so that the learned may discern the good and ill of humankind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना/संवाद। "सारं समुद्धृत्य" यह संकेत करता है कि आगे संक्षिप्त पर सटीक गणनात्मक विधि (चक्र-रचना → देह-जीव → राशि-स्वामी-दशाक्रम) आ रही है; फल-वचन शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

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46.54
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्घ्वसमानकम् |
गृहा द्वादश जायन्ते सव्येऽसव्ये द्विधा द्विज
dvādaśāraṃ likheccakraṃ tiryagūrghvasamānakam |
gṛhā dvādaśa jāyante savye'savye dvidhā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादश-अरम् = बारह अरों वाला; लिखेत् = लिखे/अङ्कित करे; चक्रम् = चक्र; तिर्यक्-ऊर्ध्व-समानकम् = तिरछा और ऊर्ध्व दोनों दिशाओं में समान; गृहाः = भाव/कोष्ठ; द्वादश = बारह; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; सव्ये-असव्ये = सव्य और असव्य (अपसव्य) में; द्विधा = दो प्रकार से; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कालचक्र का ज्यामितीय ढाँचा बताता है—बारह अरों का चक्र बनाएँ, जो क्षैतिज-तिर्यक और ऊर्ध्व दिशाओं में समान हो, जिससे बारह गृह (कोष्ठ) स्पष्ट बनें। ये गृह सव्य और अपसव्य—दो मार्गों में—द्विविध रूप से व्यवस्थित होते हैं। यह रेखाङ्कन-नियम आगे राशि-लेखन और नक्षत्र-त्रय-मार्ग का आधार है।

English rendering One should draw a twelve-spoked cakra, equal across the diagonal/transverse and the vertical, so that twelve houses (cells) arise; and these, O twice-born, are of two kinds—in the savya and the apasavya arrangements.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चक्र = 12-अर (spokes) → 12 कोष्ठ (cells/gṛha). सममिति: तिर्यक् (transverse/diagonal axes) ≅ ऊर्ध्व (vertical) — “समानक” = समान माप/समरूप विभाजन। द्वैध व्यवस्था: 2 × (सव्य, अपसव्य) मार्ग। यह pure combinatorial geometry of a 12-cell wheel; डिग्री/वर्ष यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) एक वृत्त/वर्ग-जाल पर 12 समान कोष्ठ बनाएँ (जैसे 30° चाप × 12 = 360° का पहिया, अथवा 3×4 कोष्ठ-जाल जिसमें तिर्यक–ऊर्ध्व रेखाएँ सम हों)। प्रत्येक कोष्ठ = एक “गृह”। फिर दो प्रतिलिपियाँ/दो पठन-दिशाएँ रखें: सव्य (दक्षिणावर्त/शास्त्र-निर्दिष्ट “सव्य मार्ग”) और अपसव्य (विपरीत मार्ग)—श्लोक 46.56 इन मार्गों को नक्षत्र-त्रयों से बाँधेगा।

46.55
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु राशीन् मेषादिकान् लिखेत् |
एवं द्वादशराश्याख्यं कालचक्रमुदीरितम्
dvitīyādiṣu koṣṭheṣu rāśīn meṣādikān likhet |
evaṃ dvādaśarāśyākhyaṃ kālacakramudīritam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-आदिषु = दूसरे से आरम्भ कर आगे के; कोष्ठेषु = कोष्ठों/खानों में; राशीन् = राशियों को; मेष-आदिकान् = मेष से आरम्भ वाली; लिखेत् = लिखे; एवम् = इस प्रकार; द्वादश-राशि-आख्यम् = बारह-राशि-नामक; कालचक्रम् = कालचक्र; उदीरितम् = कहा/प्रतिपादित किया गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चक्र के कोष्ठों में—द्वितीय कोष्ठ से आरम्भ कर—मेषादि बारह राशियाँ क्रमशः लिखी जाएँ। इसी रेखाङ्कन से “द्वादश-राशि” नाम का कालचक्र उद्घोषित होता है। (प्रथम कोष्ठ का विशेष व्यवहार पाठ-भेद/परम्परा में भिन्न हो सकता है; यहाँ मूल वाक्य “द्वितीयादिषु” कहता है।)

English rendering In the cells from the second onward one should write the twelve rāśis beginning with Meṣa; thus is proclaimed the Kālacakra designated as of the twelve signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कोष्ठ_k ← राशि_(k−1) जहाँ k = 2, 3, …, 13 ≡ 1 (mod 12), राशि-क्रम = मेष(1), वृष(2), …, मीन(12)। अर्थात् 12 कोष्ठों पर 12 राशियों का sequential map; “द्वितीयादि” = लेखन-आरम्भ कोष्ठ-सूचकांक 2 से। कालचक्र_नाम = “द्वादशराश्याख्य” — 12-sign wheel as computational frame.

उदाहरण (worked example) कोष्ठ-सूची (1…12)। श्लोकानुसार लेखन: कोष्ठ 2 → मेष, 3 → वृष, 4 → मिथुन, …, कोष्ठ 12 → कुम्भ, और शेष कोष्ठ 1 → मीन (क्रम पूरा करने पर)—अथवा परम्परा में कोष्ठ 1 को रिक्त/केन्द्र/विशेष मानकर 2–13 चक्र पूरा करें। Convention: rāśi order = sidereal Meṣa→Mīna (ayanāṃśa dṛṣṭi later when longitudes enter; this verse is pure ordinal placement on the wheel).

46.56
अश्विन्यादित्रयं सव्यमार्गे चक्रे व्यवस्थितम् |
रोहिण्यादित्रयं चैवमपसव्ये व्यविस्थितम्
aśvinyāditrayaṃ savyamārge cakre vyavasthitam |
rohiṇyāditrayaṃ caivamapasavye vyavisthitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अश्विनी-आदि-त्रयम् = अश्विनी से आरम्भ तीन (नक्षत्र); सव्य-मार्गे = सव्य मार्ग पर; चक्रे = चक्र में; व्यवस्थितम् = व्यवस्थित; रोहिणी-आदि-त्रयम् = रोहिणी से आरम्भ तीन; च एवम् = और इसी प्रकार; अपसव्ये = अपसव्य (मार्ग) पर; व्यवस्थितम् = व्यवस्थित (पाठ: व्यविस्थितम् — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कालचक्र पर नक्षत्र-मार्ग बाँटता है—अश्विन्यादि तीन नक्षत्र सव्य मार्ग पर चक्र में स्थित माने जाते हैं; रोहिण्यादि तीन अपसव्य मार्ग पर। यहीं से सव्य/अपसव्य दशा-क्रम का नक्षत्र-द्वार खुलता है। “त्रय” = तीन-तीन का समूह; आगे के श्लोक पूरे 27 नक्षत्रों का सव्य–अपसव्य विन्यास विस्तृत करते हैं—यह श्लोक उद्घाटन-मात्र है।

English rendering The triad of nakṣatras beginning with Aśvinī is arranged on the savya path in the cakra; and likewise the triad beginning with Rohiṇī is arranged on the apasavya path. (Reading व्यविस्थितम् may admit पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नक्षत्र-अनुक्रमणिका 1…27 (अश्विनी=1 … रेवती=27)। सव्य-आरम्भ-समूह = {1, 2, 3} = अश्विनी, भरणी, कृत्तिका। अपसव्य-आरम्भ-समूह = {4, 5, 6} = रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा। मार्ग-लेबल: savya(N) vs apasavya(N′) — later rules walk the 12-rāśi wheel in opposite senses keyed to these nakṣatra bands. Pure discrete assignment; years/bindus not in this verse.

उदाहरण (worked example) जन्म-नक्षत्र = अश्विनी (1) → सव्य-मार्ग-प्रवेश (त्रय 1–3)। जन्म-नक्षत्र = रोहिणी (4) → अपसव्य-मार्ग-प्रवेश (त्रय 4–6)। (Convention: nakṣatra from Moon’s sidereal longitude; ayanāṃśa must be declared before the Moon-degree → nakṣatra map, e.g. Lahiri/Chitrapakṣa, but the verse itself only names the triads and the two paths.)

46.57
एवमृक्षविभागं हि कृत्वा चक्रं समुद्धरेत् |
अश्विन्यदितिहस्तक्षेमूलप्रोष्ठपदाभिधाः
evamṛkṣavibhāgaṃ hi kṛtvā cakraṃ samuddharet |
aśvinyaditihastakṣemūlaproṣṭhapadābhidhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; ऋक्ष-विभागम् = नक्षत्र-विभाग (२७ नक्षत्रों का क्रम/वर्ग-विन्यास); कृत्वा = करके; चक्रम् = (दशा/काल) चक्र; समुद्धरेत् = उद्धार करे / रचे; अश्विनी = अश्विनी नक्षत्र; अदिति = अदिति-देवता वाला नक्षत्र (पुनर्वसु); हस्त = हस्त; क्षे…मूल = (पाठ में ‘हस्तक्षेमूल…’ — पाठ-भेद संभव; प्रचलित सूची में हस्त के बाद मूल); प्रोष्ठपदा = प्रोष्ठपदा (पूर्वभाद्रपदा); अभिधाः = इन नामों वाले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नक्षत्रों का विभाग इस विधि से स्थिर करके दशा-चक्र का उद्धार किया जाए। फिर उन नक्षत्रों का उल्लेख आता है जिनके नाम अश्विनी, अदिति (पुनर्वसु), हस्त, (संयुक्त पाठ में) मूल और प्रोष्ठपदा हैं — ये क्रम आगे के सव्य/दशा-विन्यास की कुंजी हैं। पाठ ‘हस्तक्षेमूल…’ संधि/पाठ-भेद के कारण एकाध नाम पर अनिश्चय छोड़ता है; फिर भी सूची का ढाँचा अश्विनी से प्रोष्ठपदा तक स्पष्ट है।

English rendering Having thus effected the division of the nakṣatras, one should construct the (daśā) cakra. The stars named Aśvinī, Aditi (Punarvasu), Hasta, Mūla, and Proṣṭhapadā (Pūrvabhādrapadā) are indicated — with possible recension uncertainty in the compound linking Hasta and Mūla.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नक्षत्र-विभाग के बाद चक्र-रचना का विधि-निर्देश, और सव्य/दशा-क्रम के लिए नाम-सूची का आरम्भ। अंतर्निहित संरचना: २७ ऋक्षों का पद-क्रम (प्रत्येक नक्षत्र = १३°२०′ = ४ × ३°२०′ चरण) आगे देह–जीव और दशाधिप से जुड़ेगा।

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46.58
वह्निवातादिविश्वर्क्षरेवत्यः सव्यतारकाः |
एतद्दशोषुपादानामश्विन्यादौ च वीक्षयेत्
vahnivātādiviśvarkṣarevatyaḥ savyatārakāḥ |
etaddaśoṣupādānāmaśvinyādau ca vīkṣayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वह्नि = अग्नि (कृत्तिका-देवता) → कृत्तिका; वात = वायु (स्वाती-देवता) → स्वाती; आदि = इत्यादि; विश्व-ऋक्ष = विश्वेदेवा-नक्षत्र → उत्तराषाढा; रेवत्यः = रेवती; सव्यतारकाः = सव्य नक्षत्र; एतद् दश = ये दस; इषु-पादानाम् = (पदों के; "दशोषुपादानाम्" शेष अंश पाठ-भेद संभव); अश्विन्यादौ वीक्षयेत् = अश्विनी से आरम्भ कर देखे।

हिन्दी भावार्थ वह्नि (कृत्तिका), वात (स्वाती), … विश्व (उत्तराषाढा) और रेवती — ये सव्य-नक्षत्र हैं। इन दस सव्य-नक्षत्रों के पदों में देह-जीव आदि को अश्विनी से आरम्भ करके देखना चाहिए। "दश" (=10) की यह गणना आगे "दास्रादिदशताराणाम्" (v62) व "अश्विन्यादिदशौडूनाम्" (v63) में भी दोहराई गई है।

English rendering Kṛttikā (Vahni), Svātī (Vāta), … Uttarāṣāḍhā (Viśva) and Revatī are the savya asterisms; in the padas of these ten, examine (deha–jīva) beginning from Aśvinī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सव्य-गण की गणना पूर्ण = 10 नक्षत्र (अश्विनी…रेवती, देवता-कोड द्वारा)। संख्या-कुंजी "एतद् दश" = 10; यही संख्या v62 ("दश ताराः") व v63 ("दश उडु") में पुनः — तीन बिन्दुओं पर 10 की पुष्टि। पद-संख्या का शेष कोड ("इषु..." इषु=5?) अनिश्चित — पाठ-भेद संभव।

हमारा डिकोड (Our Decode) एक नियतांक (यहाँ गणना = 10) को एक बार कहकर आगे दो स्वतन्त्र स्थलों पर पुनः-पुष्ट होते देखना ठीक हमारे pin-किए regression-vector अनुशासन जैसा है — नियतांक मान लिया नहीं जाता, बार-बार जाँचा जाता है। यही "cross-port byte-identity actually runs" वाली आदत है, जो मौन विचलन को तुरन्त पकड़ती है (dossier §5)।

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46.59
देहजीवौ कथं वीक्ष्यौ नक्षत्राणां पदेषु च |
विशदं तत्प्रकारं च मैत्रेय कथयामयहम्
dehajīvau kathaṃ vīkṣyau nakṣatrāṇāṃ padeṣu ca |
viśadaṃ tatprakāraṃ ca maitreya kathayāmayaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-जीवौ = देह और जीव (कालचक्र/पद-दशा में दो संकेतक राशियाँ); कथम् = कैसे; वीक्ष्यौ = देखने योग्य/देखे जाएँ; नक्षत्राणाम् = नक्षत्रों के; पदेषु = चरणों में; च = और; विशदम् = स्पष्ट; तत्-प्रकारम् = उस विधि को; मैत्रेय = हे मैत्रेय; कथयामि = कहता हूँ; अहम् = मैं।

हिन्दी भावार्थ अब प्रश्न स्वयं शास्त्र उठाता है — नक्षत्रों के पदों में देह और जीव का निरीक्षण किस प्रकार हो? भगवान् पराशर मैत्रेय से कहते हैं कि वे उस विधि को स्पष्ट रूप से कहेंगे। यह संवाद-सूत्र अगले श्लोकों के पद-वार नियम का द्वार खोलता है; यहाँ फल नहीं, विधि-प्रश्न है।

English rendering How are deha and jīva to be examined in the padas of the nakṣatras? “O Maitreya,” the text continues, “I shall set forth that method clearly.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / विधि-प्रस्तावना। अंतर्दृष्टि: ‘देह’ और ‘जीव’ यहाँ शारीरिक/जीवनीयक फल के सामान्य शब्द नहीं, बल्कि पद-विशिष्ट दो राशियाँ हैं जिनके बीच का राशि-चाप दशाधिप-क्रम तय करता है — अगले श्लोक वही चाप संख्या में बाँधते हैं।

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46.60
देहजीवौ मेषचापौ दास्राद्यचरणस्य च |
मेषाद्याश्चापपर्यन्तं राशिपाश्च दशाधिपाः
dehajīvau meṣacāpau dāsrādyacaraṇasya ca |
meṣādyāścāpaparyantaṃ rāśipāśca daśādhipāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-जीवौ = देह और जीव; मेष-चापौ = मेष और चाप (धनु); दास्र-आद्य-चरणस्य = दास्र (अश्विनी) के आदि/प्रथम चरण का; च = और; मेषाद्याः = मेष से आरम्भ; चाप-पर्यन्तम् = धनु पर्यन्त; राशिपाः = राशि-स्वामी; च = और; दशाधिपाः = दशा के अधिपति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अश्विनी (दास्र) के प्रथम चरण में देह = मेष और जीव = धनु। मेष से धनु तक की राशियों के स्वामी, उसी क्रम में, उस पद की दशाधिप कहे गए हैं। यह कालचक्र-पद रीति का मूल नक्शा है: दो सिरे (देह–जीव) और उनके बीच का राशि-क्रम = दशा-स्वामियों की माला।

English rendering For the first caraṇa of Dāsra (Aśvinī), deha and jīva are Meṣa and Cāpa (Aries and Sagittarius). The lords of the signs from Meṣa through Cāpa, in order, are the daśādhipas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- नक्षत्र-चरण: अश्विनी-पद १ ⇔ चन्द्र (या विचार्य ग्रह) की भोग-देशा ∈ [०°००′, ३°२०′) अश्विनी = मेष ०°–३°२०′ (सायनांश घोषित करें; उदाहरण में लाहिरी/चित्पावन आदि कोई एक)।
- देह = मेष, जीव = धनु।
- दशाधिप-क्रम = राशिपा(मेष) → … → राशिपा(धनु) = मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु — कुल ९ अधिपति-खण्ड (मेष…धनु = ९ राशियाँ)।
- पद-सीमा (सामान्य): चरण k का चाप = ३°२०′; अश्विनी-पद १ = नक्षत्रारम्भ + ० × ३°२०′।

उदाहरण (worked example)
मान लें: चन्द्र = मेष २°१०′ (सायनांश: उदाहरणार्थ लाहिरी; गृह-पद्धति यहाँ अप्रासंगिक)।
अश्विनी = मेष ०°–१३°२०′ ⇒ २°१०′ ∈ प्रथम चरण (०°–३°२०′)।
⇒ देह = मेष, जीव = धनु।
⇒ दशाधिप-माला: मंगल (मेष) → शुक्र (वृष) → बुध (मिथुन) → चन्द्र (कर्क) → सूर्य (सिंह) → बुध (कन्या) → शुक्र (तुला) → मंगल (वृश्चिक) → गुरु (धनु)।
(वर्ष-मान/खण्ड-दीर्घा इस श्लोक में नहीं; केवल अधिपति-क्रम।)

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय ४६–४७ का हमारा सत्यापित इंजन मुख्यतः विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७ … बुध १७, Σ = १२०; अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/१२०) पर pinned है। यह श्लोक कालचक्र-पद की देह–जीव/राशिपा-माला है — अलग मॉडल। हम दोनों को मिलाते नहीं: विंशोत्तरी = नक्षत्र-अंश-अनुपात; यहाँ = पद → ९-राशि अधिपति-चाप। सम्मिश्रण से parity-भ्रम पैदा होता है; इसलिए दशा-प्रकार घोषित रखकर ही गणना चलती है।

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46.61
मृगयुग्मे देहजीवौ द्वितीयचरणे स्मृतौ |
क्रमात् मिथुनपर्यन्तं राशिपाश्च दशाधिपाः
mṛgayugme dehajīvau dvitīyacaraṇe smṛtau |
kramāt mithunaparyantaṃ rāśipāśca daśādhipāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृग-युग्मे = मृग और युग्म (मकर/मृग-संकेत और मिथुन; ‘मृग’ = मकर — ज्योतिष-परम्परा में प्रयुक्त; पाठ-भेद/पर्याय संभव); देह-जीवौ = देह और जीव; द्वितीय-चरणे = दूसरे चरण में; स्मृतौ = स्मरण किए गए/कहे गए; क्रमात् = क्रम से; मिथुन-पर्यन्तम् = मिथुन तक; राशिपाः = राशि-स्वामी; दशाधिपाः = दशाधिप।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अश्विन्यादि के द्वितीय चरण में देह और जीव ‘मृग’ तथा ‘युग्म’ (मिथुन) माने गए हैं। दशाधिप वे राशिपा हैं जो क्रम से मिथुन पर्यन्त चलते हैं — अर्थात् देह-राशि से जीव-राशि (मिथुन) तक का अधिपति-क्रम। प्रथम चरण मेष→धनु था; दूसरा चरण मृग/मकर-ध्रुव से मिथुन-सीमा की ओर मुड़ता है।

English rendering In the second caraṇa, deha and jīva are remembered as Mṛga and Yugma (Capricorn-sense and Gemini). The sign-lords in order up to Mithuna are the daśādhipas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- अश्विनी-पद २: भोग ∈ [३°२०′, ६°४०′) अश्विनी।
- देह = मृग (मकर-पर्याय; परम्परा-घोषणा आवश्यक), जीव = मिथुन।
- दशाधिप = राशिपा क्रमात् … मिथुन-पर्यन्त — चाप का आरम्भ देह-राशि से, अन्त जीव = मिथुन पर।
- राशियाँ मकर→कुम्भ→मीन→मेष→वृष→मिथुन = ६ खण्ड (यदि देह = मकर); यदि कोई पाठ मृग = अन्य राशि ले, चाप लंबाई बदले — पाठ/पर्याय घोषित करें।

उदाहरण (worked example)
चन्द्र = मेष ५°००′ ⇒ अश्विनी-पद २ (३°२०′–६°४०′)।
परम्परा: देह = मकर, जीव = मिथुन।
दशाधिप-क्रम (मकर→मिथुन): शनि → शनि → गुरु → मंगल → शुक्र → बुध।
(दो शनि = मकर व कुम्भ के स्वामी — यही शास्त्रीय राशिपा-क्रम है, संकुचन नहीं।)

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46.62
दास्रादिदशताराणां तृतीयचरणे द्विज |
गौर्देहो मिथुनं जीवो द्व्येकार्केशदशाङ्कपाः
dāsrādidaśatārāṇāṃ tṛtīyacaraṇe dvija |
gaurdeho mithunaṃ jīvo dvyekārkeśadaśāṅkapāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दास्र-आदि-दश-ताराणाम् = दास्र (अश्विनी) से आरम्भ दश ताराओं के; तृतीय-चरणे = तीसरे चरण में; द्विज = हे द्विज; गौः = गो/वृषभ; देहः = देह; मिथुनम् = मिथुन; जीवः = जीव; द्वि-एक-अर्क-ईश = द्वि, एक, अर्क के ईश (पाठ-संकुचित; संभवतः राशि-क्रम/स्वामी-संकेत — पाठ-भेद संभव); दशा-अङ्क-पाः = दशा के अङ्क/खण्ड के अधिपति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मैत्रेय (द्विज) से कहता है — अश्विनी आदि दश ताराओं के तृतीय चरण में देह = वृषभ (गो) और जीव = मिथुन। दशाङ्कपा ‘द्व्येकार्केश’ पद से इंगित स्वामी हैं — संयुक्त पद संक्षिप्त/पाठ-भेद की संभावना रखता है, पर फल-सूत्र स्पष्ट है: तीसरे पद पर देह–जीव का युग्म गो–मिथुन, और उन्हीं से बँधा दशाधिप-क्रम। ‘दश तारा’ = अश्विन्यादि एक दश-समूह जिन पर यही पद-नियम समान रूप से लगता है।

English rendering In the third caraṇa of the ten stars beginning with Dāsra (Aśvinī), O twice-born: Go (Taurus) is deha and Mithuna is jīva; the daśā-segment lords are those indicated by the compound dvi-eka-arka-īśa (exact expansion uncertain — recension caution).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- अश्विनी-पद ३: भोग ∈ [६°४०′, १०°००′)।
- देह = वृषभ, जीव = मिथुन।
- यदि चाप देह→जीव लघु हो (वृष→मिथुन = २ राशियाँ), दशाधिप = शुक्र, बुध।
- ‘द्व्येकार्केश’: द्वि/एक/अर्क शब्द-संख्या या राशि-संकेत हो सकते हैं — अनिश्चित; पाठ-भेद संभव। स्थिर तथ्य केवल: देह = वृष, जीव = मिथुन, दशाधिप = संबंधित राशिपा।
- ‘दश तारा’: अश्विनी-समूह के १० नक्षत्रों पर समपद नियम (समान चरण ⇒ समान देह–जीव पैटर्न) — वर्गीकरण-गणित, वर्ष-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example)
चन्द्र = मेष ८°००′ ⇒ अश्विनी-पद ३।
देह = वृषभ, जीव = मिथुन ⇒ न्यूनतम अधिपति-युग्म: शुक्र (वृष), बुध (मिथुन)।
यदि पूर्ण कालचक्र-परम्परा ९-खण्ड फैलाए, वह विस्तार इस पाद के शब्द-मात्र से सिद्ध नहीं — अतिरिक्त परम्परा को अलग घोषित करना होगा; इस श्लोक का hard pin केवल गो–मिथुन है।

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46.63
क्वक्षिरामर्क्षनाथाश्च दशाधिपतयः क्रमात् |
अश्विन्यादिदशौडूनां चतुर्थचरणे तथा
kvakṣirāmarkṣanāthāśca daśādhipatayaḥ kramāt |
aśvinyādidaśauḍūnāṃ caturthacaraṇe tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्व-अक्षि-राम-ऋक्ष-नाथाः = ‘क्वक्षिरामर्क्षनाथाः’ — संधि-पद; संभव पाठ-भेद (अनेक आवृत्तियों में कर्क/सिंहादि राशिनाथों का संकेत); दशाधिपतयः = दशाधिप; क्रमात् = क्रम से; अश्विनी-आदि-दश-ओडूनाम् = अश्विनी आदि दश नक्षत्रों के; चतुर्थ-चरणे = चौथे चरण में; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अश्विनी आदि दश ओडुओं (नक्षत्रों) के चतुर्थ चरण में भी दशाधिप वे राशि-नाथ हैं जो ‘क्वक्षिरामर्क्षनाथाः’ क्रम से इंगित हैं। देह–जीव का स्पष्ट युग्म इस पाद में नहीं आया; जो आया है वह चतुर्थ चरण का दशाधिप-क्रम है। संयुक्त पद विकृत/पाठ-भिन्न हो सकता है — इसलिए राशि-नामों पर जबरदस्ती एक ही पाठ थोपना उचित नहीं; सिद्धान्त यह है कि चौथा चरण अपनी राशिपा-माला रखता है, प्रथम–तृतीय की तरह पद-बद्ध।

English rendering Likewise, in the fourth caraṇa of the ten stars beginning with Aśvinī, the daśādhipas are, in order, the lords indicated by the compound kva-akṣi-rāma-ṛkṣa-nāthāḥ — a reading that may be contested (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- अश्विनी-पद ४: भोग ∈ [१०°००′, १३°२०′)।
- दशाधिप = क्रमात् (क्वक्षिरामर्क्ष)-नाथाः — शब्दार्थ अनिश्चित; सुरक्षित कथन: चतुर्थ चरण की अपनी राशिपा-शृंखला है, तीन पूर्व पदों के सामान्तर।
- चार चरण × ३°२०′ = १३°२०′ = एक पूर्ण नक्षत्र; अश्विन्यादि दश-समूह पर चारों पद-नियम दोहराए जाते हैं।
- जब तक शुद्धतर पाठ (कर्कादि आदि) सिद्ध न हो, संख्यात्मक अधिपति-सूची फिक्सचर की तरह pin न करें — exact-`==` अनुशासन: अनिश्चित पाठ पर काल्पनिक माला गढ़ना मना।

उदाहरण (worked example)
चन्द्र = मेष ११°३०′ ⇒ अश्विनी-पद ४।
ज्ञात: यह चतुर्थ चरण है; दशाधिप-माला श्लोक के क्वक्षिरामर्क्ष-पद पर निर्भर — पाठ-भेद संभव, इसलिए यहाँ मनगढ़ंत ९-राशि सूची नहीं लिखी। व्यावहारिक डिकोड: पद-संख्या = ⌊(λ_nak − λ_Aśvinī_start) / (३°२०′)⌋ ∈ {०,१,२,३}; केवल पद १–३ के देह–जीव इस recension में स्पष्ट हैं; पद ४ के लिए शुद्ध पाठ की प्रतीक्षा या घोषित वैकल्पिक आवृत्ति।

46.64
कर्कमीनौ देहजीवौ कर्कादिनवराशिपाः |
दशाधीशाश्च विज्ञेया नवैते द्विजसत्तम
karkamīnau dehajīvau karkādinavarāśipāḥ |
daśādhīśāśca vijñeyā navaite dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्क-मीनौ = कर्क (Cancer) और मीन (Pisces) युग्म; देह-जीवौ = देह (शरीर-ध्रुव) और जीव (प्राण/जीवन-ध्रुव); कर्कादि = कर्क से आरम्भ; नव-राशि-पाः = नौ राशियों के स्वामी; दशा-अधीशाः = दशा-काल के अधिपति; विज्ञेयाः = जानने योग्य; नवैते = ये नौ; द्विज-सत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ दशा-क्रम के दो ध्रुव बताता है—कर्क को देह और मीन को जीव कहा गया है। कर्क से गिनी गई नौ राशियों के स्वामी ही इस पद्धति के नौ दशाधीश माने जाते हैं। हे श्रेष्ठ द्विज, इन्हीं नौ अधिपतियों को दशा-स्वामी जानो। यह कथन फल की भविष्यवाणी नहीं, दशा-संरचना का परिभाषा-सूत्र है।

English rendering The text states that Cancer and Pisces are the deha and jīva poles, and that the lords of the nine signs counted from Cancer are to be known as the nine daśā-lords. O best of the twice-born, these nine are the daśādhiśas of this scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Kalachakra-type paramparā (9 rāśi-daśās per pāda, not the 12-sign Chara sequence).
Deha-pole := Karka; Jīva-pole := Mīna (as this verse pairs them).
Nine daśādhiśas := rāśipas of the chain
Karka → Siṃha → Kanyā → Tulā → Vṛścika → Dhanus → Makara → Kumbha → Mīna
i.e. lords: Chandra, Sūrya, Budha, Śukra, Kuja, Guru, Śani, Śani, Guru.
(Later verses in this batch re-anchor particular pādas—e.g. from Mīna—so the “from Karka” chain is the general deha–jīva framing of 46.64, not every pāda’s start-sign.)
No year-lengths are stated in this śloka itself.

उदाहरण (worked example) Convention: savya/apasavya and pāda-rule as in the following verses; ayanāṃśa irrelevant to the pure rāśi-lord chain.
If the operative nine-chain is the Karka-start of this verse, the daśādhiśa sequence is:
Moon → Sun → Mercury → Venus → Mars → Jupiter → Saturn → Saturn → Jupiter.
(Which of the nine is “current” depends on the Moon’s nakṣatra-pāda and elapsed fraction—fixed only after 46.65–46.66’s pāda map.)

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46.65
यमेज्यचित्रातोयर्क्षाऽहीर्बुध्न्याः सव्यतारकाः |
एतत्पञ्चोडुपादानां भरण्यादौ विचिन्तयेत्
yamejyacitrātoyarkṣā'hīrbudhnyāḥ savyatārakāḥ |
etatpañcoḍupādānāṃ bharaṇyādau vicintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यम = भरणी (यम-नक्षत्र); इज्य = पुष्य (इज्य = बृहस्पति-सम्बद्ध); चित्रा = चित्रा; तोय-ऋक्ष = जल-संज्ञ नक्षत्र → पूर्वाषाढ़ा (आप/जल-सङ्केत; पाठ-भेद संभव if another “water” star is preferred); अहीर्बुध्न्य = उत्तराभाद्रपदा; सव्य-तारकाः = सव्य (दक्षिणावर्त/अनुकूल-गति) तारक-समूह; एतत्-पञ्च-उडु-पादानाम् = इन पाँच नक्षत्रों के पादों का; भरण्यादौ = भरणी से आरम्भ करके; विचिन्तयेत् = विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सव्य-वर्ग के पाँच प्रतिनिधि नक्षत्र गिनाता है—भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराभाद्रपदा। इन्हीं पाँचों के चार-चार पादों पर सव्य-रीति से देह-जीव-दशा की गणना करनी है। विचार का आरम्भ भरणी से करने को कहा गया है—यही अगले श्लोक का द्वार है। यह नक्षत्र-वर्गीकरण का नियम है, फल-कथन नहीं।

English rendering The text lists the savya stars as Bharaṇī, Puṣya, Chitrā, the “water” star (Pūrvāṣāḍhā), and Ahirbudhnya (Uttarabhādrapadā). One should examine the pādas of these five, beginning the reckoning from Bharaṇī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Five savya markers at nakṣatra indices (Aśvinī = 1):
2 (Bharaṇī), 8 (Puṣya), 14 (Chitrā), 20 (Pūrvāṣāḍhā), 26 (Uttarabhādrapadā) — arithmetic progression with common difference 6.
Each nakṣatra has 4 pādas; each pāda maps to one 9-rāśi daśā-chain (Kalachakra).
Savya ⇒ forward rāśi order along that chain; apasavya (not in this verse) reverses it.
Moon’s longitude → nakṣatra N and pāda p ∈ {1,2,3,4}:
N = ⌊λ☾ / (13°20′)⌋ + 1; remainder ρ = λ☾ mod (13°20′); p = ⌊ρ / (3°20′)⌋ + 1.
If N ∈ {2, 8, 14, 20, 26} (or the savya triad built on these markers, per full chapter rule), apply savya paramparā; start the worked table from Bharaṇī as the verse orders.

उदाहरण (worked example) Convention: equal 13°20′ nakṣatras; pāda = 3°20′; tropical/ sidereal only shifts λ, not the modular rule.
Suppose Moon at 18°00′ of sidereal Taurus (Vṛṣabha 18°).
Longitude from 0° Meṣa: 30° + 18° = 48°.
48° ÷ 13°20′ = 48 / (40/3) = 3.6 → nakṣatra 4 (Rohiṇī), not in the five savya markers—so this verse’s savya five do not claim it.
For a savya hit: Moon at 3° of sidereal Aries → λ = 3° → nakṣatra 1 (Aśvinī) pāda 1; the verse’s demonstration gate is Bharaṇī (N = 2).
Moon at 16° Aries: λ = 16° → within Bharaṇī (13°20′–26°40′); ρ = 16° − 13°20′ = 2°40′; p = ⌊2°40′ / 3°20′⌋ + 1 = 1 → Bharaṇī 1st pāda (continues in 46.66).

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46.66
याम्यप्रथमपादस्य देहजीवावलिर्झषः |
नागागर्तुपयोधीषुरामाक्षीन्द्वर्कभेश्वराः
yāmyaprathamapādasya dehajīvāvalirjhaṣaḥ |
nāgāgartupayodhīṣurāmākṣīndvarkabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्य = यम-नक्षत्र = भरणी; प्रथम-पादस्य = प्रथम पाद का; देह-जीव-आवलिः = देह-जीव की पंक्ति/शृंखला; झषः = मीन (झष = मत्स्य); नाग-आगर्तु-पयोधि-ईषु-राम-अक्षि-इन्दु-अर्क-भ-ईश्वराः = नौ भेश्वर (राशि-स्वामी) का संकेतात्मक समास—स्पष्ट सदस्य: इन्दु = चन्द्र, अर्क = सूर्य; शेष संकेत पारम्परिक पर्याय/संकेत-शब्द (व्यक्तिगत पर्याय-मानचित्रण पाठ-भेद संभव); भेश्वराः = राशि-स्वामीगण।

हिन्दी भावार्थ भरणी के प्रथम पाद के लिए शास्त्र कहता है कि देह-जीव की आवलि झष (मीन) पर टिकती है—अर्थात् उस पाद की नौ-राशि दशा-शृंखला मीन-आधारित है। उसी आवलि के नौ राशि-स्वामी संकेतात्मक नामों से गिनाए गए हैं; उनमें चन्द्र और सूर्य स्पष्ट हैं। यह पाद-विशेष की दशा-संरचना का निर्देश है; “फल” यहाँ केवल पद्धति-नियुक्ति है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering For the first pāda of Yāmya (Bharaṇī), the text states that the deha–jīva series is the Jhaṣa (Pisces) line. The nine sign-lords of that series are named in a coded compound, in which Moon (indu) and Sun (arka) are transparent; the remaining tokens are traditional cover-names (individual synonym mapping may vary by recension).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Case: Bharaṇī, pāda 1, savya (from 46.65).
Start-sign of the 9-chain := Mīna (झष).
Forward (savya) rāśi order and classical Kalachakra year-lengths (years are the standard paramparā constants for this daśā; this śloka names lords/series, not the year-words):

| # | Rāśi | Lord (daśādhiśa) | Years |
|---|------|------------------|-------|
| 1 | Mīna | Guru | 10 |
| 2 | Meṣa | Kuja | 7 |
| 3 | Vṛṣabha | Śukra | 16 |
| 4 | Mithuna | Budha | 9 |
| 5 | Karka | Chandra | 21 |
| 6 | Siṃha | Sūrya | 5 |
| 7 | Kanyā | Budha | 9 |
| 8 | Tulā | Śukra | 16 |
| 9 | Vṛścika | Kuja | 7 |

Σ years = 10+7+16+9+21+5+9+16+7 = 100 (one full pāda-cycle).
Deha / jīva: poles of this chain as fixed by the chapter’s deha–jīva rule (46.64 pairs Karka–Mīna; this verse fixes the āvali at Mīna for Bharaṇī-1).
Elapsed fraction inside the pāda:
f = (λ☾ − λ_pāda_start) / (3°20′), 0 ≤ f < 1.
Mahādaśā index: advance along the 100-year table by f × 100 years.
Antardaśā (ratio form, same spirit as other BPHS daśā arithmetic):
t_antar = (Y_maha × Y_antar) / 100 within this 100-year pāda frame.
(Vimśottarī’s /120 is a different cycle; do not mix denominators.)

उदाहरण (worked example) Convention: savya; Bharaṇī pāda 1; Mīna-start chain above; sidereal λ for illustration only.
Bharaṇī spans 13°20′–26°40′ Meṣa; pāda 1 = 13°20′–16°40′.
Let Moon be at 15°00′ sidereal Aries → inside pāda 1.
ρ_pāda = 15° − 13°20′ = 1°40′ = 5/3 °; f = (5/3) / (10/3) = 1/2.
Elapsed in the 100-year cycle: 0.5 × 100 = 50 years.
Cumulative: Mīna 10 + Meṣa 7 + Vṛṣabha 16 + Mithuna 9 + Karka 21 = 63 → 50 falls inside Karka (after 10+7+16+9 = 42; remainder 8 of Karka’s 21).
So the text’s structure places the native in the Karka / Chandra segment of the Bharaṇī-1 savya chain, with 21 − 8 = 13 years of that segment notionally unelapsed—pure table arithmetic, not a life prediction.

46.67
याम्यद्वितीयपादस्य देहजीवौ घटाङ्गने |
रुद्रदिङ्नन्दचन्द्राक्षिरामाब्धीष्वङ्गभेश्वराः
yāmyadvitīyapādasya dehajīvau ghaṭāṅgane |
rudradiṅnandacandrākṣirāmābdhīṣvaṅgabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्य-द्वितीय-पाद = भरणी का दूसरा चरण; घट = कुम्भ (राशि 11); अङ्गना = स्त्री = कन्या (राशि 6); रुद्र = 11, दिक् = 10 (दश दिशाएँ), नन्द = 9, चन्द्र = 1, अक्षि = 2, राम = 3, अब्धि = 4, इषु = 5, अङ्ग = 6; भेश्वराः = राशि-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ भरणी के द्वितीय पाद की देह-राशि कुम्भ और जीव-राशि कन्या है। दशाधिप-श्रृंखला कुम्भ से आरम्भ होकर, मकर व धनु से उतरकर, मेष से कन्या तक चढ़ती हुई नौ राशियों में चलती है। श्लोक इन्हीं नौ राशियों को भूतसंख्या में गिनाता है।

English rendering In Bharaṇī's second pāda the body-sign is Aquarius and the life-sign is Virgo; the nine ruling signs descend from Aquarius through Capricorn and Sagittarius, then climb Aries to Virgo.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-अनुक्रम = रुद्र·दिक्·नन्द·चन्द्र·अक्षि·राम·अब्धि·इषु·अङ्ग = 11, 10, 9, 1, 2, 3, 4, 5, 6 → कुम्भ, मकर, धनु, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या। अन्तः-परीक्षण: 11 == देह (घट/कुम्भ), 6 == जीव (अङ्गना/कन्या) — मिलते हैं। ध्यान दें: यहाँ दिक् = 10 (दश दिशाएँ), जबकि अन्यत्र दिक्/दिश् = 4 भी होता है — क्रम-स्थान और देह–जीव से 10 ही निश्चित होता है (परिपाटी घोषित)।

उदाहरण (worked example) दशाधिप क्रम = कुम्भ→शनि, मकर→शनि, धनु→गुरु, मेष→मंगल, वृष→शुक्र, मिथुन→बुध, कर्क→चन्द्र, सिंह→सूर्य, कन्या→बुध; अतः इस पाद का अन्तर्दशा-क्रम शनि, शनि, गुरु, मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, सूर्य, बुध।

46.68
याम्यतृतीयपादस्य देहजीवौ तुलाङ्गने |
सप्ताष्टाङ्कदिगीशार्कगजाद्रिरमभेश्वराः
yāmyatṛtīyapādasya dehajīvau tulāṅgane |
saptāṣṭāṅkadigīśārkagajādriramabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्य-तृतीय-पाद = भरणी का तीसरा चरण; तुला = तुला (राशि 7); अङ्गना = कन्या (राशि 6); सप्त = 7, अष्ट = 8, अङ्क = 9, दिक् = 10, ईश = 11 (एकादश रुद्र), अर्क = 12, गज = 8 (दिग्गज), अद्रि = 7 (पर्वत), रम = रस = 6 (पाठ-भेद संभव — "रम/रस"); भेश्वराः = राशि-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ भरणी के तृतीय पाद की देह-राशि तुला और जीव-राशि कन्या है। दशाधिप-श्रृंखला तुला से मीन तक चढ़ती (7→12) है, फिर वृश्चिक-तुला होते हुए कन्या पर लौटकर पूर्ण होती है। कुछ राशियाँ (तुला, वृश्चिक) इस पाद में दुबारा आती हैं — यह पाठ-भेद-संवेदी स्थल है, अतः "पाठ-भेद संभव" कहना उचित।

English rendering In Bharaṇī's third pāda the body-sign is Libra and the life-sign is Virgo; the ruling signs ascend Libra→Pisces, then fold back through Scorpio and Libra to close on Virgo.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-अनुक्रम = सप्त·अष्ट·अङ्क·दिक्·ईश·अर्क·गज·अद्रि·रस = 7, 8, 9, 10, 11, 12, 8, 7, 6 → तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, वृश्चिक, तुला, कन्या। अन्तः-परीक्षण: 7 == देह (तुला); अन्तिम = 6 == जीव (कन्या)। यह मान अन्तिम पद को रम = रस = 6 पढ़ने पर ही मिलता है — नीचे "हमारा डिकोड" देखें।

उदाहरण (worked example) दशाधिप क्रम = तुला→शुक्र, वृश्चिक→मंगल, धनु→गुरु, मकर→शनि, कुम्भ→शनि, मीन→गुरु, वृश्चिक→मंगल, तुला→शुक्र, कन्या→बुध।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक "गलत मोड़ भी बताओ" (report-the-wrong-turn) अनुशासन का जीवन्त उदाहरण है। सरल पाठ में अन्तिम पद "रम" व प्रथम-सेतु "अङ्क" को 9 पढ़ने पर जीव = धनु (9) बनता — पर देह–जीव पंक्ति (तुला–कन्या) और सव्य/अपसव्य दर्पण-पाठ (श्लोक 46.74) दोनों `==`-जाँच में इसे अस्वीकार कर देते हैं; उलट-क्रम में 46.74 का पूर्ण reverse तभी मिलता है जब यहाँ रम = रस = 6 पढ़ें। सहनशीलता-पट्टी होती तो यह −Δ छिप जाता; कठोर `==` ने पकड़ा — ठीक वही सबक जिसने कभी अष्टकवर्ग का असली −1 उघाड़ा था।

46.69
कर्को देहो धनुर्जीवो याम्यतुर्यपदे द्विज |
वेदबाणाग्निनेत्रेन्दुसूर्येशाशाङ्कभेश्वराः
karko deho dhanurjīvo yāmyaturyapade dvija |
vedabāṇāgninetrendusūryeśāśāṅkabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्को देहः = देह = कर्क; धनुः जीवः = जीव = धनु; याम्य-तुर्य-पदे = भरणी चतुर्थ पाद में; द्विज = हे द्विज; वेद=4; बाण=5; अग्नि=3; नेत्र=2; इन्दु=1; सूर्य=12; ईश=11; आशा=10 (दिशा/आशा); अङ्क=9; भ-ईश्वराः = राशि-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — भरणी के चौथे पाद में देह कर्क है और जीव धनु। वेद से अङ्क तक नौ राशियाँ गिनी गई हैं; सिंह के बाद मिथुन पर कूद, और मेष के बाद मीन — फिर ईश-आशा-अङ्क से धनु पर जीव स्थिर होता है। हे द्विज, यही तुर्य-पाद का क्रम जानो।

English rendering In the fourth pāda of Yāmya, deha is Cancer and jīva is Sagittarius; the nine signs run by word-numerals from Veda (4) to Aṅka (9), and their lords are the daśā-rulers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
वेद=4, बाण=5, अग्नि=3, नेत्र=2, इन्दु=1, सूर्य=12, ईश=11, आशा=10, अङ्क=9।
राशि-क्रम:
4 कर्क → 5 सिंह → 3 मिथुन → 2 वृषभ → 1 मेष → 12 मीन → 11 कुम्भ → 10 मकर → 9 धनु।
देह = प्रथम = कर्क; जीव = अन्तिम = धनु।
दशाधीश: चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि, गुरु।
(46.64 के आधार-युग्म कर्क-मीन से भिन्न: यहाँ जीव धनु है — पाद-विशेष नियम।)

उदाहरण (worked example)
λ☾ = 55°00′ ∈ [53°20′, 56°40′) ⇒ भरणी पाद 4।
देह = कर्क (चन्द्र-दशा से आरम्भ), जीव = धनु (गुरु)।
चारों याम्य-पादों का सार:

| पाद | λ-खण्ड (भरणी) | देह | जीव | प्रथम→अन्तिम क्रमांक |
|-----|----------------|-----|-----|----------------------|
| 1 | 43°20′–46°40′ | वृश्चिक | मीन | 8…12 |
| 2 | 46°40′–50°00′ | कुम्भ | कन्या | 11…6 |
| 3 | 50°00′–53°20′ | तुला | कन्या | 7…6 |
| 4 | 53°20′–56°40′ | कर्क | धनु | 4…9 |

---

46.70
सप्तमेवं विजानीयादसव्यं कथयाम्यहम् |
द्वादशारां लिखेच्चकं पूर्ववद् द्विजसत्तम
saptamevaṃ vijānīyādasavyaṃ kathayāmyaham |
dvādaśārāṃ likheccakaṃ pūrvavad dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमेवम् / सव्यमेवम् = प्राप्त पाठ “सप्तमेवं”; अर्थ-संगति सव्यम् एवम् “सव्य को इस प्रकार” (सप्तम↔सव्य: पाठ-भेद संभव); विजानीयात् = जाने; असव्यम् = अपसव्य (विपरीत गति); कथयामि अहम् = मैं कहता हूँ; द्वादश-अरम् = बारह अरों वाला; लिखेत् चक्रम् = चक्र लिखे; पूर्ववत् = पहले की भाँति; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सव्य-विधान को इस प्रकार जानो; अब अपसव्य कहा जाता है। हे श्रेष्ठ द्विज, पहले की भाँति बारह अरों का चक्र लिखो। यह श्लोक सव्य-खण्ड का उपसंहार और अपसव्य-खण्ड तथा कालाचक्र-रेखागणित का द्वार है।

English rendering Know the savya thus — so the text states — and next the apasavya is declared; draw a twelve-spoked wheel as before, O best of the twice-born. (Received “saptam evaṃ” is likely “savyaṃ evam”; pāṭha-bheda possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचना-निर्देश — अपसव्य का द्वार + द्वादशार चक्र।
चक्र: 12 अर = 12 राशियाँ (एक पूर्ण राशि-चक्र)।
सव्य = एक दिशा में पाद-निर्दिष्ट नव-राशि पथ (46.66–69); असव्य = विपरीत दिशा/विपरीत पठन — आगामी श्लोकों में।
द्वादशार लेखन “पूर्ववत्” = जिस ज्यामितीय विन्यास में मण्डूक-कूद (6→4→5, 9→1, 5→3, 1→12 आदि) दृश्य हों, वही आरेख दोहराएँ।
गणितीय फल-सूत्र नहीं — चक्र-निर्माण / संवाद-निर्देश; गणना पाद→देह-जीव→नव-राशि पथ पर ही चलती है।

46.71
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु वृश्चिकाद् व्यस्तमालिखेएत् |
रोहिणी च मघा द्वीशः कर्णश्चेति चतुष्टयम्
dvitīyādiṣu koṣṭheṣu vṛścikād vyastamālikheet |
rohiṇī ca maghā dvīśaḥ karṇaśceti catuṣṭayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीयादिषु कोष्ठेषु = द्वितीय आदि खानों/कोष्ठों में; वृश्चिकाद् = वृश्चिक राशि से; व्यस्तम् = उल्टे क्रम से (अपसव्य/व्युत्क्रम); आलिखेत् = लिखे; रोहिणी = रोहिणी नक्षत्र; मघा = मघा; द्वीशः = द्वि-देवता वाला (विशाखा — इन्द्राग्नि; पाठ-भेद/अभिधान संभव); कर्णः = कर्ण (श्रवण — “कान”; पारंपरिक अभिधान); चतुष्टयम् = ये चार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (कालाचक्र/नक्षत्र-कोष्ठ रचना में) दूसरे आदि कोष्ठों में राशियों को वृश्चिक से व्युत्क्रम में लिखना चाहिए। रोहिणी, मघा, द्वीश और कर्ण — यह चतुष्टय उस अपसव्य-लेखन की कुंजी के रूप में गिना गया है। आगे की रचना इसी उल्टे क्रम की नींव पर खड़ी होती है।

English rendering The text states that in the second and subsequent cells one should write (the signs) in reverse order beginning from Vṛścika. Rohiṇī, Maghā, Dviśa, and Karṇa form the foursome (that anchors this asavya layout).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अपसव्य-कोष्ठ नियम — savya में राशि-क्रम सामान्यतः मेषादि अनुक्रम; asavya/vyasta में लेखन वृश्चिक → तुला → कन्या → … (राशि-चक्र पर पश्चगामी)। चार बीज-नक्षत्र: रोहिणी, मघा, द्वीश, कर्ण — प्रत्येक से आगे के चरणों का अपसव्य ढाँचा खुलता है। यह दिशा-निर्धारण है, वर्ष-संख्या यहाँ नहीं दी गई।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र रोहिणी में है और कोष्ठ “द्वितीयादि” अपसव्य है: प्रथम कोष्ठ-प्रविष्टि = वृश्चिक (8), फिर 7, 6, 5, 4, 3, 2, 1, 12… जब तक उस चरण की नवांश/पद-श्रृंखला पूर्ण न हो। (पूर्ण देह–जीव और नव-राशि सूची अगले श्लोकों में।)

---

46.72
उक्तं चाऽसव्यनाक्षत्रं पूर्वाचार्यैर्द्विजोत्तम |
एतद्वेदोडुपादानां रोहिनीवन्निरीक्षयेत्
uktaṃ cā'savyanākṣatraṃ pūrvācāryairdvijottama |
etadvedoḍupādānāṃ rohinīvannirīkṣayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्तं = कहा गया; असव्यनाक्षत्रं = असव्य (अपसव्य) नक्षत्र-वर्ग; पूर्वाचार्यैः = पूर्व आचार्यों द्वारा; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; एतत् = यह; वेडोडुपादानां = इन वेद-उड़ु (नक्षत्रों) के ग्रहण/उपयोग में; रोहिणीवत् = रोहिणी के समान; निरीक्षयेत् = देखे/परीक्षण करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि असव्य-नक्षत्र की यह व्यवस्था पूर्वाचार्यों से कही हुई है। शिष्य को निर्देश है कि इन नक्षत्रों को लेते समय रोहिणी के लिए जो दृष्टि/विधि बताई गई, उसी मान से इनकी भी जाँच करे। अर्थात् रोहिणी-पद्धति आदर्श (template) है; शेष असव्य उसी साँचे पर पढ़े जाएँ।

English rendering The asavya nakṣatra procedure, the text states, was already taught by earlier masters. For taking up these “Veda-stars,” one should inspect them in the same manner as Rohiṇī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश / संवाद। तकनीकी बिंदु: असव्य = राशि-लेखन व्युत्क्रम (वृश्चिकादि); “रोहिणीवत्” = आगे 46.73–46.76 में रोहिणी के चार चरणों का जो देह–जीव और नव-राशि क्रम है, वही साँचा अन्य असव्य बीज-नक्षत्रों पर लागू करने का आदेश।

---

46.73
रोहिण्यादिपदे देहजीवौ कर्किधनुर्धरौ |
नवदिग्रुद्रसूर्येन्दुनेत्राग्नोष्वब्धिभेश्वराः
rohiṇyādipade dehajīvau karkidhanurdharau |
navadigrudrasūryendunetrāgnoṣvabdhibheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोहिण्यादिपदे = रोहिणी के आदि (प्रथम) चरण/पाद में; देहजीवौ = देह और जीव (दो राशि-संज्ञाएँ); कर्किधनुर्धरौ = कर्क और धनु; नव = 9; दिक् = 10; रुद्र = 11; सूर्य = 12; इन्दु = 1; नेत्र = 2; अग्नि = 3; (अग्नोष्वब्धि — सन्धि से इषु=5 + अब्धि=4 पाठ-भेद संभव); भेश्वराः = राशि/भ-स्वामी क्रम (नव राशियाँ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रोहिणी के पहले चरण में देह कर्क है और जीव धनु। उसी पद की नव राशियाँ भूतसंख्य्या से गिनाई गई हैं — नव, दिक्, रुद्र, सूर्य, इन्दु, नेत्र, अग्नि, फिर (पाठानुसार) बाण/अब्धि आदि। यह कालाचक्र-पद की देह–जीव जोड़ी और अपसव्य नव-भ क्रम का बीज-कथन है।

English rendering In Rohiṇī’s first quarter, the text states, deha is Cancer and jīva is Sagittarius. The nine sign-lords of that pada are given by word-numerals: 9, 10, 11, 12, 1, 2, 3, then (with a likely sandhi reading) 5 and 4.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रोहिणी · पाद 1 (असव्य):
- देह = कर्क (4), जीव = धनु (9)
- नव-राशि सूचकांक (भ-स्वामी): 9, 10, 11, 12, 1, 2, 3, 5, 4
अर्थात् धनु, मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन, सिंह, कर्क
(“अग्नोष्वब्धि” ≈ अग्नि–इषु–अब्धि = 3, 5, 4 — पाठ-भेद संभव; यदि केवल अग्नि–अब्धि पढ़ें तो 3, 4 पर अटकाव और गणना अपूर्ण।)
- दिशा: 46.71 के अनुसार व्यस्त/वृश्चिक-मूल अपसव्य ढाँचे से जुड़ी।
वर्ष-फल (paramāyu खंड) इस श्लोक में अंकित नहीं — केवल राशि-क्रम और देह–जीव।

उदाहरण (worked example) चन्द्र = रोहिणी, चरण = 1 (नक्षत्र 13°20′ को 4 × 3°20′ पदों में बाँटें; 0°–3°20′ रोहिणी = पाद 1; अयनांश घोषित करें — संख्या पद-सीमा पर निर्भर)।
देह-राशि = कर्क, जीव-राशि = धनु। नव-दशा खंड की राशि-श्रृंखला = 9→10→11→12→1→2→3→5→4। (प्रत्येक राशि पर वर्ष-भार पारंपरिक कालाचक्र-सारिणी से लिया जाता है; वह सारिणी इन सात श्लोकों में नहीं दी गई।)

---

46.74
धातृद्वितीचरणे देहजीवौ तुलस्त्रियौ |
अङ्कागवसुसूर्येशदिगङ्कवसुजूकपाः
dhātṛdvitīcaraṇe dehajīvau tulastriyau |
aṅkāgavasusūryeśadigaṅkavasujūkapāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धातृद्वितीचरणे = धातृ (प्रजापति/रोहिणी-अधिदेव) के द्वितीय चरण में; देहजीवौ = देह और जीव; तुलस्त्रियौ = तुला और स्त्री (कन्या); अङ्क = 9; अग = 7 (पर्वत); वसु = 8; सूर्य = 12; ईश = 11; दिक् = 10; अङ्क = 9; वसु = 8; जूकपाः = जूक (तुला) के स्वामी/तुला-पर्यंत क्रम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रोहिणी (धातृ) के दूसरे चरण में देह तुला है और जीव कन्या। नव राशियाँ भूतसंख्य्या से: अङ्क, अग, वसु, सूर्य, ईश, दिक्, अङ्क, वसु, जूक — अर्थात् 9, 7, 8, 12, 11, 10, 9, 8, 7। यह द्वितीय पाद का अपसव्य नव-भ विन्यास है।

English rendering In the second quarter under Dhātṛ (Rohiṇī), the text states, deha is Libra and jīva is Virgo. The nine signs are numbered: 9, 7, 8, 12, 11, 10, 9, 8, 7 (ending on Jūka/Libra).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रोहिणी · पाद 2:
- देह = तुला (7), जीव = कन्या (6)
- नव-राशि सूचकांक: 9, 7, 8, 12, 11, 10, 9, 8, 7
= धनु, तुला, वृश्चिक, मीन, कुम्भ, मकर, धनु, वृश्चिक, तुला
- भूतसंख्य्या: अङ्क=9, अग=7, वसु=8, सूर्य=12, ईश=11, दिक्=10, अङ्क=9, वसु=8, जूक=7।
क्रम चक्र पर “सीधा” नहीं — कोष्ठ-व्यस्त लेखन (46.71) का परिणाम; यही असव्य गणित की पहचान है।

उदाहरण (worked example) रोहिणी 3°20′–6°40′ = पाद 2। देह = तुला, जीव = कन्या। दशा-राशि क्रम = 9-7-8-12-11-10-9-8-7। तुलना: पाद 1 में देह कर्क/जीव धनु था — चरण बदलते ही देह–जीव युग्म और नव-श्रृंखला दोनों बदलते हैं।

---

46.75
तृतीयचरणे ब्राह्म देएहजीवौ घटाङ्गने |
षड्बाणब्धिगुणक्षीन्दुनन्ददिग्रुद्रभेश्वराः
tṛtīyacaraṇe brāhma deehajīvau ghaṭāṅgane |
ṣaḍbāṇabdhiguṇakṣīndunandadigrudrabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीयचरणे ब्राह्म = ब्रह्म/धातृ (रोहिणी) के तृतीय चरण में; देहजीवौ = देह और जीव; घटाङ्गने = घट (कुम्भ) और अङ्गना (कन्या); षट् = 6; बाण = 5; अब्धि = 4; गुण = 3; (क्षीन्दु ≈ अक्षि=2 + इन्दु=1); नन्द = 9; दिक् = 10; रुद्र = 11; भेश्वराः = राशि-स्वामी क्रम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रोहिणी के तीसरे चरण में देह कुम्भ है और जीव कन्या। नव राशियाँ: षट्, बाण, अब्धि, गुण, अक्षि-इन्दु, नन्द, दिक्, रुद्र — 6, 5, 4, 3, 2, 1, 9, 10, 11। पहले दो चरणों से भिन्न यह तीसरा अपसव्य विन्यास है।

English rendering In Rohiṇī’s third quarter, the text states, deha is Aquarius and jīva is Virgo. The nine sign indices are 6, 5, 4, 3, 2, 1, 9, 10, 11.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रोहिणी · पाद 3:
- देह = कुम्भ (11), जीव = कन्या (6)
- नव-राशि सूचकांक: 6, 5, 4, 3, 2, 1, 9, 10, 11
= कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष, मेष, धनु, मकर, कुम्भ
- भूतसंख्य्या: षट्=6, बाण=5, अब्धि=4, गुण=3, अक्षि=2, इन्दु=1, नन्द=9, दिक्=10, रुद्र=11।
“गुणक्षीन्दु” में अक्षि-इन्दु पाठ संधि-सापेक्ष — पाठ-भेद संभव, किंतु 2,1 से नव पद पूरे होते हैं और शेष अंक स्पष्ट हैं।

उदाहरण (worked example) रोहिणी 6°40′–10°00′ = पाद 3। देह = कुम्भ, जीव = कन्या। राशि-श्रृंखला = 6→5→4→3→2→1→9→10→11। ध्यान दें: जीव फिर कन्या (पाद 2 जैसा), पर देह और नव-क्रम दोनों भिन्न — पद-मात्र का अंतर पूरी संरचना बदल देता है।

---

46.76
रोहिण्यन्तपदे देहजीवावलिजषौ स्मृतौ |
सूर्येन्दुद्विगुणेष्वब्धितर्कशैलाष्टभेश्वराः
rohiṇyantapade dehajīvāvalijaṣau smṛtau |
sūryendudviguṇeṣvabdhitarkaśailāṣṭabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोहिण्यन्तपदे = रोहिणी के अंतिम (चतुर्थ) चरण में; देहजीवावलिजषौ = देह–जीव अलि (वृश्चिक) और झष (मीन); स्मृतौ = स्मरण किए गए; सूर्य = 12; इन्दु = 1; द्वि = 2; गुण = 3; इषु = 5; अब्धि = 4; तर्क = 6; शैल = 7; अष्ट = 8; भेश्वराः = राशि क्रम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रोहिणी के अंतिम चरण में देह वृश्चिक है और जीव मीन। नव राशियाँ: सूर्य, इन्दु, द्वि, गुण, इषु, अब्धि, तर्क, शैल, अष्ट — 12, 1, 2, 3, 5, 4, 6, 7, 8। रोहिणी के चारों चरणों का देह–जीव और नव-भ चक्र यहीं पूरा होता है।

English rendering In Rohiṇī’s final quarter, the text states, deha is Scorpio and jīva is Pisces. The nine signs run 12, 1, 2, 3, 5, 4, 6, 7, 8.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रोहिणी · पाद 4 (अन्तपद):
- देह = वृश्चिक (8), जीव = मीन (12)
- नव-राशि सूचकांक: 12, 1, 2, 3, 5, 4, 6, 7, 8
= मीन, मेष, वृष, मिथुन, सिंह, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक
- भूतसंख्य्या: सूर्य=12, इन्दु=1, द्वि=2, गुण=3, इषु=5, अब्धि=4, तर्क=6, शैल=7, अष्ट=8।
“गुणेष्वब्धि” = गुण–इषु–अब्धि → 3, 5, 4 (5 का 4 से पहले आना कोष्ठ-व्यस्त पथ का चिह्न)।

रोहिणी-सार (चार चरण) — शास्त्रोक्त युग्म:

| पाद | देह | जीव | नव-क्रम (राशि-अंक) |
|-----|-----|-----|---------------------|
| 1 | कर्क | धनु | 9,10,11,12,1,2,3,5,4 |
| 2 | तुला | कन्या | 9,7,8,12,11,10,9,8,7 |
| 3 | कुम्भ | कन्या | 6,5,4,3,2,1,9,10,11 |
| 4 | वृश्चिक | मीन | 12,1,2,3,5,4,6,7,8 |

उदाहरण (worked example) रोहिणी 10°00′–13°20′ = पाद 4। देह = वृश्चिक, जीव = मीन। दशा-राशि = 12-1-2-3-5-4-6-7-8। 46.72 के “रोहिणीवत्” से मघा/द्वीश/कर्ण पर भी चार-पादीय साँचा इसी विधि से पढ़ा जाता है (उनकी देह–जीव सूचियाँ recension-भेद से भिन्न हो सकती हैं — पाठ-भेद संभव)।

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46.77
चान्द्ररौद्रभगार्यम्णमित्रेन्दुवसुवारुणम् |
एतत्ताराष्टकं विज्ञैर्विज्ञेयं चान्द्रवत् क्रमात्
cāndraraudrabhagāryamṇamitrenduvasuvāruṇam |
etattārāṣṭakaṃ vijñairvijñeyaṃ cāndravat kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चान्द्र = चान्द्र (चन्द्र-संबद्ध तारा/रोहिणी-वर्ग); रौद्र = रौद्र (आर्द्रा — रुद्र); भग = भग (पूर्वफल्गुनी); आर्यमन् = आर्यमन् (उत्तरफल्गुनी); मित्र = मित्र (अनुराधा); इन्दु = इन्दु (चन्द्र-नाम तारा; अभिधान recension-सापेक्ष); वसु = वसु (धनिष्ठा — वसुगण); वारुण = वारुण (शतभिषा — वरुण); ताराष्टकं = आठ ताराओं का समूह; विज्ञैः विज्ञेयम् = विद्वानों को ज्ञातव्य; चान्द्रवत् क्रमात् = चान्द्र (रोहिणी) के समान क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चान्द्र, रौद्र, भग, आर्यमन्, मित्र, इन्दु, वसु और वारुण — यह ताराष्टक विद्वान् क्रमशः उसी रीति से जाने जैसा चान्द्र/रोहिणी के लिए कहा गया। अर्थात् 46.73–46.76 का देह–जीव–नव-भ साँचा इन आठ पर भी “चान्द्रवत्” लागू होता है। यह सूची का विस्तार-निर्देश है, नए वर्ष-सूत्र का नहीं।

English rendering The text states that the octad of stars — Cāndra, Raudra, Bhaga, Āryaman, Mitra, Indu, Vasu, and Vāruṇa — should be understood by the learned in order, in the same way as the Cāndra (Rohiṇī) procedure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण / विधि-अनुप्रयोग। आठ नाम (प्रायः अधिदेवता-द्वार नक्षत्र-संकेत) को रोहिणी-साँचे पर चलाएँ: प्रत्येक के चार चरण → प्रत्येक चरण में (देह, जीव) युग्म + नव राशि-अंक, असव्य होने पर 46.71 का वृश्चिकादि व्युत्क्रम। सटीक नक्षत्र-मानचित्र और पूर्ण सारिणी संस्करण-भेद रखती है — पाठ-भेद संभव; अंक वही लें जो आपकी pinned recension की अनुवर्ती पंक्तियाँ दें।

46.78
कर्को देहो झषो जीवो मृगाद्यचरणे द्विज |
व्यस्तान्मीनादिकर्कान्तराशिपाश्च दशाधिपाः
karko deho jhaṣo jīvo mṛgādyacaraṇe dvija |
vyastānmīnādikarkāntarāśipāśca daśādhipāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्क = कर्क (राशि 4) = देह; झष = मीन (राशि 12) = जीव; मृग-आद्य-चरणे = मृगशिरा के प्रथम पाद में; व्यस्तात् = उलटे क्रम से; मीनादि = मीन (12) से आरम्भ; कर्कान्त = कर्क (4) पर अन्त; राशिपाः = राशि-स्वामी; दशाधिपाः = दशा के अधिपति।

हिन्दी भावार्थ मृगशिरा के प्रथम पाद की देह-राशि कर्क और जीव-राशि मीन है। यहाँ श्लोक भूतसंख्या के बजाय सीधे कहता है — "उलटे क्रम में मीन से कर्क तक की राशियों के स्वामी ही दशाधिप हैं।" अपसव्य नियम से गणना जीव (मीन) से आरम्भ होकर देह (कर्क) पर पूर्ण होती है। यह मृगशिरा-आदर्श (चान्द्रवत्) की आधार-सारणी है।

English rendering In Mṛgaśira's first pāda the body-sign is Cancer and the life-sign is Pisces; the lords of the signs taken in reverse, from Pisces down to Cancer, are the daśā-rulers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-अनुक्रम (व्यस्त, मीनादि–कर्कान्त) = 12, 11, 10, 9, 8, 7, 6, 5, 4 → मीन, कुम्भ, मकर, धनु, वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क। अन्तः-परीक्षण: प्रथम 12 == जीव (झष/मीन), अन्तिम 4 == देह (कर्क)। यह सव्य-आदर्श मेष→धनु (46.60, 1…9) का अपसव्य-प्रतिरूप है — वहाँ आगे 1→9, यहाँ उलटा 12→4; दोनों नौ सन्निहित राशियों की स्वच्छ श्रेणियाँ।

उदाहरण (worked example) दशाधिप क्रम = मीन→गुरु, कुम्भ→शनि, मकर→शनि, धनु→गुरु, वृश्चिक→मंगल, तुला→शुक्र, कन्या→बुध, सिंह→सूर्य, कर्क→चन्द्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) जहाँ 46.66–76 भूतसंख्या-सांकेतिक हैं, वहाँ 46.78 वही राशि-क्रम अक्षर-नाम से ("मीनादि–कर्कान्त") देकर एक स्वतन्त्र regression-vector बन जाता है — शब्द-संख्या पाठों को इसी अ-सांकेतिक श्लोक पर `==` कसा जा सकता है। यही "provenance-पिन किया गया सदिश" अनुशासन है: कोई भी भावी पाठ-भेद इस स्पष्ट सिरे से टकराकर तुरन्त पकड़ में आएगा।

46.79
गौर्देहो मिथुनं जीवो द्वितीयचरणे मृगे |
त्रिद्व्येकाङ्कदिशीशार्कचन्द्राक्षिभवनाधिपाः
gaurdeho mithunaṃ jīvo dvitīyacaraṇe mṛge |
tridvyekāṅkadiśīśārkacandrākṣibhavanādhipāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गौः = वृषभ (गो-राशि); देहः = देह-राशि; मिथुनं = मिथुन राशि; जीवः = जीव-राशि; द्वितीयचरणे मृगे = मृगशिरा के द्वितीय चरण में; त्रिद्व्येकाङ्कदिशीशार्कचन्द्राक्षि = भूतसंख्या: ३, २, १, ९, १०, ११, १२, १, २; भवनाधिपाः = उन भाव/राशि-स्वामी (दशाधिप)।

हिन्दी भावार्थ मृगशिरा के दूसरे चरण में शास्त्र देह को वृषभ और जीव को मिथुन ठहराता है। दशा-स्वामी वे राशि-स्वामी हैं जिनकी संख्याएँ “त्रि–द्वि–एक–अङ्क–दिश्–ईश–अर्क–चन्द्र–अक्षि” से पढ़ी जाती हैं—अर्थात् क्रमबद्ध राशियाँ ३, २, १, ९, १०, ११, १२, १, २। यह व्यस्त-सरल मिश्रित क्रम है, न कि साधारण एकदिश गिनती।

English rendering In the second pāda of Mṛgaśiras, Taurus is deha and Gemini is jīva; the daśā lords are the rulers of the rāśis numbered, by bhūtasaṃkhyā, 3, 2, 1, 9, 10, 11, 12, 1, 2.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-डिकोड (अङ्क = ९, दिक् = १०, ईश = ११, अर्क = १२, चन्द्र = १, अक्षि = २): राशि-सूची = मिथुन(३), वृषभ(२), मेष(१), धनु(९), मकर(१०), कुम्भ(११), मीन(१२), मेष(१), वृषभ(२)। दशाधिप = बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि, गुरु, मंगल, शुक्र। (अङ्क = ९ का पाठ-भेद संभव in some glosses; here digit-faithful to the standard nine-signs cycle.)

उदाहरण (worked example) चन्द्र मृगशिरा-पाद २ में (≈ ५६°४०′–६०°००′)। देह = वृषभ, जीव = मिथुन; दशा-श्रृंखला का प्रथम अधिपति = मिथुन-स्वामी बुध, फिर वृषभ-स्वामी शुक्र, … नौ पद तक। प्रत्येक पद की अवधि = उस राशि-स्वामी के वर्ष (४६.८४) — जैसे बुध-राशि पर ९ वर्ष, शुक्र-राशि पर १६ वर्ष, इत्यादि।

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46.80
देहजीवौ नक्रयुग्मे तृतीयचरणे मृगे |
त्रिबाणाब्धिरसागाष्टसूर्येशदशभेश्वराः
dehajīvau nakrayugme tṛtīyacaraṇe mṛge |
tribāṇābdhirasāgāṣṭasūryeśadaśabheśvarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहजीवौ = देह व जीव दोनों; नक्रयुग्मे = मकर (नक्र) व मिथुन (युग्म) में; तृतीयचरणे मृगे = मृगशिरा के तीसरे पाद में; त्रि-बाण-अब्धि-रस-अग-अष्ट-सूर्य-ईश-दश = ३·५·४·६·७·८·१२·११·१० (मिथुन, सिंह, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक, मीन, कुम्भ, मकर); भेश्वराः = इन राशियों के स्वामी = दशेश।

हिन्दी भावार्थ मृगशिरा के तृतीय पाद में देह मकर और जीव मिथुन हैं। शास्त्र यहाँ नौ राशियाँ भूतसंख्या से गिनाता है और कहता है — इन्हीं राशियों के अधिपति क्रम से दशा-स्वामी होते हैं। संख्याएँ अंकों को वाम-गति से पढ़कर स्पष्ट निकलती हैं।

English rendering In the third quarter of Mṛgaśira the body is Capricorn and the life Gemini; the rulers of the nine signs enumerated (Gemini, Leo, Cancer, Virgo, Libra, Scorpio, Pisces, Aquarius, Capricorn) serve as the successive dashā-lords.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गिनाई गई नौ राशियों के स्वामियों के वर्ष (श्लोक ८४):
मिथुन(बुध ९)+सिंह(सूर्य ५)+कर्क(चन्द्र २१)+कन्या(बुध ९)+तुला(शुक्र १६)+वृश्चिक(मंगल ७)+मीन(गुरु १०)+कुम्भ(शनि ४)+मकर(शनि ४) = ८५ वर्ष।
किन्तु देह = मकर ⇒ वृष-त्रिकोण ⇒ श्लोक ८९ का सारांश-मान ८२ देता है — अर्थात् गणना (८५) व सारणी (८२) में ३ वर्ष का पाठ-भेद।

उदाहरण (worked example) ९ पदों का योग = ९+५+२१+९+१६+७+१०+४+४ = ८५ ✓ (पद-दर-पद जोड़ने पर)। यही परमायु अन्य वाचनों (सान्थानम आदि) के वृष-त्रिकोण मान ८५ से मेल खाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह अनुशासन है जिसे हमने कालवेरिफ़िकेशन-ऑरेकल में गाँठा — सटीक `==`, कोई सहिष्णुता-पट्टी नहीं: अष्टकवर्ग में ±3 की पट्टी ने एक बार असली −1 को छिपा दिया था। यहाँ भी गिनाई-गई सूची (८५) और सारांश-श्लोक ८९ (८२) के बीच का ३-वर्षीय अंतर छिपाने योग्य नहीं — इसे स्पष्ट पाठ-भेद के रूप में साथ-साथ रखना ही ईमानदार पद्धति है।

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46.81
मेषो देहो धनुर्जीवो चतुर्थचरणे मृगे |
व्यस्ताच्चापादिमेषान्तराशिपाश्च दशाधिपाः
meṣo deho dhanurjīvo caturthacaraṇe mṛge |
vyastāccāpādimeṣāntarāśipāśca daśādhipāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषः = मेष राशि (देह); देहः = देह-बिंदु; धनुः = धनु राशि (जीव); जीवः = जीव-बिंदु; चतुर्थचरणे मृगे = मृगशिरा के चौथे पाद में; व्यस्तात् = विपरीत (उलटे) क्रम से; चापादि-मेषान्त = धनु (चाप) से आरम्भ कर मेष पर्यन्त; राशिपाः = राशि-स्वामी; दशाधिपाः = दशेश।

हिन्दी भावार्थ मृगशिरा के चतुर्थ पाद में देह मेष और जीव धनु हैं। यहाँ शास्त्र सीधा नियम देता है — धनु से मेष तक उलटे क्रम से नौ राशियाँ लो, उन्हीं के स्वामी क्रम से दशा-स्वामी होंगे। यह पाद एकरेखीय (व्यस्त) होने से गणना निर्मल है।

English rendering In the fourth quarter of Mṛgaśira the body is Aries and the life Sagittarius; taking the nine signs in reverse from Sagittarius down to Aries, their lords become the dashā-rulers in order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) व्यस्त क्रम धनु→मेष: धनु, वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष, मेष। देह = मेष ⇒ मेष-त्रिकोण ⇒ परमायु = १०० वर्ष (श्लोक ८९, "मेषे शतम्")।

उदाहरण (worked example) स्वामी-वर्षों का योग —
धनु(गुरु १०)+वृश्चिक(मंगल ७)+तुला(शुक्र १६)+कन्या(बुध ९)+सिंह(सूर्य ५)+कर्क(चन्द्र २१)+मिथुन(बुध ९)+वृष(शुक्र १६)+मेष(मंगल ७)
= १०+७+१६+९+५+२१+९+१६+७ = १०० वर्ष ✓ — गिनाई-गई सूची श्लोक ८९ के मेष-त्रिकोण मान से ठीक मिलती है (यहाँ कोई पाठ-भेद नहीं)।

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46.82
अपसव्यगणे त्वेवं देहजीवदशादिकम् |
पार्वत्यै शम्भुना प्रोक्तमिदावींकथितं मया
apasavyagaṇe tvevaṃ dehajīvadaśādikam |
pārvatyai śambhunā proktamidāvīṃkathitaṃ mayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपसव्यगणे = विलोम (वामावर्त) चक्र-समूह में; त्वेवम् = इसी प्रकार; देहजीवदशादिकम् = देह, जीव, दशा आदि की व्यवस्था; पार्वत्यै = पार्वती के प्रति; शम्भुना प्रोक्तम् = शिव द्वारा कहा गया; इदावीं (=इदानीं) = अब; कथितं मया = मैंने (पराशर ने) कहा। (इदावीं — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार अपसव्य (विलोम) समूह में देह-जीव-दशा की सम्पूर्ण व्यवस्था कही गई। पराशर स्मरण कराते हैं कि यह परम्परा मूलतः शिव ने पार्वती को कही थी, और वही सार अब वे मैत्रेय को सुना रहे हैं। यह पाद सम्प्रदाय-परम्परा का स्रोत-कथन है।

English rendering Thus the arrangement of body, life, and dashā for the reverse (apasavya) group has been set out — a teaching first spoken by Śambhu to Pārvatī, and now related by me.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुरु-परम्परा का स्रोत-कथन (संवाद)। महत्त्व यह कि शास्त्र स्वयं अपनी प्रामाणिकता की श्रृंखला घोषित करता है (शिव → पार्वती → पराशर → मैत्रेय), गणना नहीं।

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46.83
केषां च कति वर्षाणि दशेशानां महामुने |
दशाया भुक्तभोग्याद्यं तदारम्भ प्रचक्ष्व मे
keṣāṃ ca kati varṣāṇi daśeśānāṃ mahāmune |
daśāyā bhuktabhogyādyaṃ tadārambha pracakṣva me

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केषां = किन (ग्रहों/स्वामियों) की; कति वर्षाणि = कितने वर्ष; दशेशानाम् = दशा-स्वामियों के; महामुने = हे महामुने; दशायाः = दशा का; भुक्तभोग्याद्यम् = भुक्त (बीता) और भोग्य (शेष) आदि; तदारम्भम् = उसका आरम्भ; प्रचक्ष्व मे = मुझे कहिए।

हिन्दी भावार्थ मैत्रेय पूछते हैं—दशा-स्वामियों के वर्ष कितने-कितने हैं, और दशा का भुक्त–भोग्य तथा आरम्भ कैसे जाना जाए। यह प्रश्न-श्लोक है; उत्तर अगले श्लोक में राशि-स्वामी-वश वर्ष-सूची से आता है। यहाँ कोई फल-कथन नहीं, केवल जिज्ञासा का ढाँचा है।

English rendering Maitreya asks the great sage for the year-lengths of the daśā lords and for how to state a daśā’s elapsed and remaining portions and its start.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न। भुक्त–भोग्य का सामान्य ढाँचा (उत्तर ४६.८४ + नक्षत्र-चरण-अंश पर): भुक्त = (चरण में बीता चाप ÷ चरण-चाप) × उस दशा-वर्ष; भोग्य = कुल − भुक्त। पूर्ण संख्याएँ अगले श्लोक में हैं।

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46.84
भूतैकविंशगिरयो नवदिक्षोडशाब्धयः |
सूर्यादीनां दशाब्धाः स्यू राशीनां स्वामिनो वशात्
bhūtaikaviṃśagirayo navadikṣoḍaśābdhayaḥ |
sūryādīnāṃ daśābdhāḥ syū rāśīnāṃ svāmino vaśāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूतैकविंशगिरयः = भूत (५) + एकविंश (२१) + गिरयः (७); नवदिक्षोडशाब्धयः = नव (९) + दिक् (१०) + षोडश (१६) + अब्धयः (४); सूर्यादीनाम् = सूर्य आदि (सप्त ग्रह) के; दशाब्धाः = दशा-वर्ष; स्यूः = होते हैं; राशीनां स्वामिनो वशात् = राशियों के स्वामी के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—सूर्यादि ग्रहों की दशा-वर्ष-संख्याएँ भूतसंख्या से: ५, २१, ७, ९, १०, १६, ४; और ये वर्ष राशियों पर उनके स्वामी के वश से लगते हैं। अर्थात् जिस राशि की दशा चल रही हो, उसकी अवधि = उस राशि-स्वामी के उपर्युक्त वर्ष। “एकविंश” को २१ पढ़ना अंक-शुद्ध है (५, १, २० का टुकड़ा-पाठ संभव किन्तु चन्द्र-२१ कालचक्र-परंपरा से मेल नहीं खाता—पाठ-भेद संभव)।

English rendering By bhūtasaṃkhyā the daśā years of the Sun and the following are 5, 21, 7, 9, 10, 16, and 4; a rāśi’s daśā lasts as many years as belong to its lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
सूर्य = ५, चन्द्र = २१, मंगल = ७, बुध = ९, गुरु = १०, शुक्र = १६, शनि = ४ वर्ष।
Σ = ५+२१+७+९+१०+१६+४ = ७२ वर्ष (स्वामी-वर्ष-समुच्चय; चक्र की कुल लंबाई राशि-श्रृंखला की पुनरावृत्ति पर निर्भर)।
राशि d की दशा-अवधि: T(d) = Y[स्वामी(d)], जहाँ Y ऊपर की सारिणी है।
भुक्त (चरण-आधारित): यदि चरण-चाप P = ३°२०′ = १०/३°, और चरण में बीता चाप p हो, तथा वर्तमान दशा-वर्ष T हो, तो
भुक्त-वर्ष = (p ÷ P) × T, भोग्य = T − भुक्त।
(यह कालचक्र/चरण-दशा अंकगणित है—विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र से भिन्न; दो प्रणालियों को मिलाएँ नहीं।)

उदाहरण (worked example) कर्क-राशि की दशा (स्वामी चन्द्र) → T = २१ वर्ष। सिंह → सूर्य → ५ वर्ष; तुला → शुक्र → १६ वर्ष; मकर → शनि → ४ वर्ष। यदि कर्क-दशा में चरण का आधा बीत चुका (p = P/2), तो भुक्त = २१ × ½ = १०.५ वर्ष, भोग्य = १०.५ वर्ष। अयनांश केवल “चन्द्र किस चरण में है” तय करने के लिए चाहिए; वर्ष-अंक स्वयं श्लोक-स्थिर हैं।

46.85
नरस्य जन्मकाले वा प्रश्नकाले यदंशकः |
तदादिनवराशिनामब्दास्तस्यायुरुच्यते
narasya janmakāle vā praśnakāle yadaṃśakaḥ |
tadādinavarāśināmabdāstasyāyurucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नरस्य = जातक/पुरुष का; जन्मकाले = जन्म-क्षण में; प्रश्नकाले = प्रश्न-काल में; यदंशकः = जो अंशक (राशि-अंश/अंश-स्थान) वर्तमान हो; तदादि = उसी से आरम्भ कर; नवराशिनाम् = नौ राशियों के; अब्दाः = वर्ष; आयुः = आयुर्मान; उच्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जन्म-काल अथवा प्रश्न-काल में जिस अंशक में स्थिति हो, उसी अंशक से आरम्भ करके क्रमानुसार नौ राशियों के वर्ष-मान को उस व्यक्ति की आयु कहा जाता है। यह कथन आयु/महादशा-क्रम के आरम्भ-बिन्दु को जन्म या प्रश्न के अंशक से बाँधता है। यहाँ फल-कथन शास्त्र का अपना विधान है — नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that whatever aṃśaka obtains at birth or at the time of a query, the years of the nine rāśis beginning from that aṃśaka are declared as that person’s span of life (āyus). The sequence starts from the aṃśaka then present, not from a fixed sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आरम्भ-बिन्दु नियम — यदि जन्म/प्रश्न पर अंशक-सूचकांक = A (राशि-क्रम में), तो आयु-क्रम की नौ राशियाँ हैं
A, A+1, …, A+8 (mod 12, राशि-चक्र पर)।
प्रत्येक राशि के वर्ष-मान अगले श्लोकों में दिए जाते हैं; योग
Āyus = Σₖ₌₀⁸ Y(R<sub>A+k</sub>)
जहाँ Y(R) = उस राशि का शास्त्रोक्त वर्ष-मान। गणितीय ढाँचा: चक्रीय नौ-पद योग; फल-कथन शास्त्र का।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म पर अंशक मेष (A = Meṣa)। तब नौ-राशि क्रम: मेष → वृष → मिथुन → कर्कट → सिंह → कन्या → तुला → वृश्चिक → धनु। (वर्ष-मान 46.89 से; सिंह-कन्या-… के मान त्रिकोण-नियम से मेष-वृष-… के समान।) योग उन नौ Y(R) का योग है — अंक 46.89 के बाद स्पष्ट होंगे।

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46.86
सम्पूर्णायुर्भवेदादावर्धमंशस्य मध्यके |
अंशान्ते परमं कष्टमित्याहुरपरे बुधाः
sampūrṇāyurbhavedādāvardhamaṃśasya madhyake |
aṃśānte paramaṃ kaṣṭamityāhurapare budhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्पूर्णायुः = पूरी आयु; भवेत् = होती है; आदौ = अंश के आरम्भ में; अर्धम् = आधी; अंशस्य मध्यके = अंश के मध्य में; अंशान्ते = अंश के अन्त में; परमं कष्टम् = अत्यन्त कष्ट; इत्याहुः = ऐसा कहते हैं; अपरे बुधाः = अन्य विद्वान्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ एक अतिरिक्त मत उद्धृत करता है: अंशक के आरम्भ में सम्पूर्ण आयु-फल, मध्य में आधा, और अंश के अन्त में परम कष्ट — ऐसा अन्य बुध कहते हैं। यह अंश-स्थिति की गुण-अवस्था का फल-कथन है, न कि कोई स्वतन्त्र संख्या-सूत्र। पाठ में “अपरे बुधाः” से स्पष्ट है कि यह एक वैकल्पिक/अतिरिक्त मत-परम्परा का उल्लेख है — पाठ-भेद या मत-भेद संभव।

English rendering Other learned authorities, the text reports, hold that full longevity-effect belongs to the beginning of the aṃśa, half to its middle, and extreme hardship to its end. This is a qualitative phala-statement about position within the aṃśa, not a new numerical period rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश-स्थान की त्रि-अवस्था: आदि / मध्य / अन्त)। यदि अंश को एक खण्ड मानें जिसकी लम्बाई L हो और भीतर की प्रगति f ∈ [0,1] (आरम्भ→अन्त), तो शास्त्र का गुण-वर्गीकरण मोटे तौर पर f≈0 → पूर्ण, f≈½ → अर्ध, f≈1 → कष्ट — किन्तु यह अनुपात-गणित नहीं, शास्त्रोक्त फल-भाषा है। भय या नियति के रूप में न पढ़ें।

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46.87
ज्ञात्वैवं स्फुटसिद्धान्तं राश्यंशं गणयेद् बुधः |
अनुपातेन वक्ष्यामि तदुपायमतः परम्
jñātvaivaṃ sphuṭasiddhāntaṃ rāśyaṃśaṃ gaṇayed budhaḥ |
anupātena vakṣyāmi tadupāyamataḥ param

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञात्वा = जानकर; एवम् = इस प्रकार; स्फुटसिद्धान्तम् = स्पष्ट/स्फुट सिद्धान्त को; राश्यंशम् = राशि-अंश को; गणयेत् = गणना करे; बुधः = विद्वान्; अनुपातेन = अनुपात-विधि से; वक्ष्यामि = कहूँगा; तत् उपायम् = वह उपाय; अतः परम् = इसके बाद।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त सिद्धान्त को स्फुट रूप में जान लेने के बाद बुद्धिमान् ज्योतिषी को राश्यंश की गणना करनी चाहिए। आचार्य कहते हैं कि अब उसके बाद अनुपात (अनूपात) द्वारा वह उपाय बताएँगे जिससे अंश-आयु का सूक्ष्म भाग निकलता है। यह श्लोक विधि-सङ्कल्प है — अगले श्लोक सूत्र देते हैं।

English rendering Having thus known the clear principle, the wise should compute the rāśi-aṃśa. The text then promises to state the practical method by proportion (anupāta).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-घोषणा (स्फुट सिद्धान्त → राश्यंश-गणना → अनुपात-उपाय)। “अनुपात” का आशय अगले श्लोकों में: व्यतीत काल × स्वाब्द ÷ विभाजक (देखें 46.90) — रैखिक समानुपात, न कि स्वतन्त्र फल।

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46.88
गततारास्त्रिभिर्भक्ताः शेषं चैव चतुर्गुणम् |
वर्तमानपदेनाढ्यं राशीनामंशको भवेत्
gatatārāstribhirbhaktāḥ śeṣaṃ caiva caturguṇam |
vartamānapadenāḍhyaṃ rāśīnāmaṃśako bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गतताराः = बीती/पूर्ण हुई नक्षत्र-संख्या; त्रिभिः भक्ताः = तीन से विभाजित; शेषम् = शेषफल; चतुर्गुणम् = चार गुणा; वर्तमानपदेन = वर्तमान पद से; आढ्यम् = युक्त/संयुक्त; राशीनाम् अंशकः = राशियों का अंशक; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अंशक निकालने का स्पष्ट नियम देता है: गत नक्षत्रों को तीन से भाग दें; जो शेष बचे उसे चार से गुणा करें; फिर वर्तमान नक्षत्र-पद (1–4) जोड़ दें — वही राशियों का अंशक होता है। यह जन्म/प्रश्न के चन्द्र-नक्षत्र-पद से अंशक-सूचकांक बाँधने वाला नियत मॉड्यूलर नियम है।

English rendering Past (completed) nakṣatras are divided by three; the remainder is multiplied by four and then increased by the current pada — that becomes the aṃśaka of the rāśis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
मान लें
- N_gata = पूर्ण हो चुके नक्षत्रों की संख्या (0…26; वर्तमान नक्षत्र से पूर्व),
- p = वर्तमान पद ∈ {1,2,3,4}।

शेष: r = N_gata mod 3, r ∈ {0,1,2}।
अंशक-सूचकांक:
A = 4r + p

(शास्त्र का कथन यथावत्; A का राशि-मानचित्रण अगले श्लोकों के Y(R) से जुड़ता है। नक्षत्र-गणना 1-आधारित या 0-आधारित — परम्परा में पाठ-भेद संभव; N_gata की परिभाषा स्पष्ट घोषित करें।)

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र मघा में, तृतीय पद में। मघा = 10वाँ नक्षत्र (अश्विनी=1) ⇒ N_gata = 9।
9 ÷ 3 ⇒ r = 0; 4×0 = 0; p = 3 ⇒ A = 3।
अर्थात् अंशक-सूचकांक 3 (इस पाठ की विधि से)। अयनांश यहाँ नहीं लगता — यह नक्षत्र-पद पर मॉड्यूलर नियम है, न कि सायन/निरयण देशान्तर-रूपान्तर।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक वर्ग/अंश जैसी ही शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित की श्रेणी में आता है — नियत विभाजन, शेष, गुणन, पद-योग। हमारी षोडश-वर्ग इंजन की भावना यही है: देशान्तर पर नियत चाप-विभाजन, न कि अस्पष्ट फल। अंशक यहाँ D9-नवमांश नहीं, अपितु इस अध्याय की आयु-विधि का सूचकांक है — दोनों को मिलाना भूल होगी।

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46.89
मेषे शतं वृषेऽक्षाष्टौ मिथुने त्रिगजाः समाः |
कर्कटेऽङ्गगजाः प्रोक्तास्तावन्तस्तत्त्रिकोणयोः
meṣe śataṃ vṛṣe'kṣāṣṭau mithune trigajāḥ samāḥ |
karkaṭe'ṅgagajāḥ proktāstāvantastattrikoṇayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे शतम् = मेष में 100; वृषे अक्षाष्टौ = वृष में अक्ष+अष्टौ; मिथुने त्रिगजाः = मिथुन में त्रि+गज; कर्कटे अङ्गगजाः = कर्कट में अङ्ग+गज; प्रोक्ताः = कहे गए; तावन्तः = उतने ही; तत्त्रिकोणयोः = उसके त्रिकोणों में भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र प्रत्येक राशि-समूह के वर्ष-मान भूतसंख्यानुसार बाँधता है: मेष में शत (100); वृष में अक्षाष्टौ; मिथुन में त्रिगजाः; कर्कट में अङ्गगजाः — और उतने ही वर्ष उनके त्रिकोण-राशि युग्मों के लिए भी प्रोक्त हैं। अर्थात् चार मूल मान पूरे द्वादश राशि-चक्र पर त्रिकोण-समता से फैलते हैं।

English rendering In Meṣa a hundred [years] are stated; in Vṛṣa akṣāṣṭau; in Mithuna tri-gajāḥ; in Karka aṅga-gajāḥ — and the same numbers for their triads (trikoṇas).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-विन्यास (अङ्कानां वामतो गतिः — इकाई-शब्द पहले):
- शतम् → 100
- अक्ष (=2) + अष्टौ (=8) → 28
- त्रि (=3) + गज (=8) → 38
- अङ्ग (=6) + गज (=8) → 68

त्रिकोण-समता:
Y(Meṣa) = Y(Siṃha) = Y(Dhanu) = 100
Y(Vṛṣa) = Y(Kanyā) = Y(Makara) = 28
Y(Mithuna) = Y(Tulā) = Y(Kumbha) = 38
Y(Karka) = Y(Vṛścika) = Y(Mīna) = 68

(अक्ष/गज आदि शब्द-मानों में पाठ-भेद संभव; यहाँ दिए पाठ पर वामतो-रीति से 28, 38, 68।)
चार मूल योग: 100+28+38+68 = 234; पूरे 12 पर (प्रत्येक मान ×3): 702 — यह चक्र-योग है, न कि एक व्यक्ति की अनिवार्य आयु। व्यक्ति-आयु = 46.85 के अनुसार नौ-राशि योग, पूर्ण 12 नहीं।

उदाहरण (worked example) 46.85 वाले क्रम से — अंशक = मेष से नौ राशियाँ:
100+28+38+68+100+28+38+68+100 = 568 वर्ष (शास्त्रोक्त Y-मानों का योग)।
यह शास्त्र का संख्या-विधान है; आधुनिक जनसांख्यिकीय “आयु” से सीधा समीकरण न करें — यह इस पाठ की आयुर्दाय-संज्ञा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) जहाँ सारिणी-अंक बँधे हों, हमारा अनुशासन exact-`==` है — सहिष्णुता-पट्टी (±) कभी वास्तविक −1 छिपा चुकी है। इन Y(R) को भी फिक्स्चर में यथावत् पिन करना चाहिए: 100, 28, 38, 68 और त्रिकोण-प्रतिलिपि; अनुमान या “लगभग” नहीं।

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46.90
जनो यत्रांशके जातो गतनाडीपलादिभिः |
तदांशस्य हताः स्वाब्दाः पञ्चभूमिविभाजिताः
jano yatrāṃśake jāto gatanāḍīpalādibhiḥ |
tadāṃśasya hatāḥ svābdāḥ pañcabhūmivibhājitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जनः = जातक; यत्र अंशके जातः = जिस अंशक में उत्पन्न; गतनाडीपलादिभिः = व्यतीत नाड़ी-पल आदि से; तदांशस्य = उस अंश के; हताः = गुणित; स्वाब्दाः = अपने वर्ष; पञ्चभूमिविभाजिताः = पञ्चभूमि से विभाजित।

हिन्दी भावार्थ जिस अंशक में जन्म हो, उस अंश के स्वाब्द (46.89 के Y) को व्यतीत नाड़ी, पल आदि से गुणा करें, फिर पञ्चभूमि से भाग दें — यही अनुपात से उस अंश का प्रयुक्त/शेष आयु-खण्ड निकलता है। श्लोक 46.87 का “अनुपातेन” यहीं खुलता है: काल-अंश × वर्ष-मान ÷ पूर्ण-माप।

English rendering The text states: take the native’s aṃśaka of birth; multiply that aṃśa’s own years by the elapsed nāḍīs, palas, and so on; divide by pañca-bhūmi — that is the proportional measure of the aṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: पञ्च (=5, इकाई) + भूमि (=1, दहाई) → 15 (वामतो)।

सूत्र (शास्त्रानुपात):
U = (Y_a × T_elapsed) ÷ 15

जहाँ
- Y_a = जन्म-अंशक की राशि का स्वाब्द (100 / 28 / 38 / 68),
- T_elapsed = अंशक-खण्ड के भीतर व्यतीत नाड़ी-पल आदि का माप (उसी इकाई में जिसकी पूर्ति 15 मानी गई हो — परम्परा में इकाई-घोषणा आवश्यक; पाठ-भेद संभव)।

शेषांश: Y_a − U (यदि U ≤ Y_a)।
यह रैखिक समानुपात है — विंशोत्तरी अन्तर्दशा वाले
(महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120
जैसी ही अनुपात-वर्ग की गणना।

उदाहरण (worked example) जन्म-अंशक मेष ⇒ Y_a = 100। मान लें अंशक-खण्ड में व्यतीत T_elapsed = 5 (नाड़ी-समकक्ष इकाई, भाजक 15 की इकाई से संगति मानकर)।
U = 100 × 5 ÷ 15 = 500/15 = 33⅓ वर्ष (प्रयुक्त)।
शेष ≈ 66⅔ वर्ष उस अंश के।
(यदि T की इकाई भिन्न हो तो U बदलता है — इकाई-सम्मेलन घोषित करें; अयनांश इस अनुपात-चरण में नहीं घुसता जब T पहले से अंशक-सीमा के भीतर नापा हो।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी इंजन में अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात है: (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/120। यही अनुपात-अनुशासन यहाँ Y_a × T ÷ 15 पर लागू होता है। गणना और फल अलग रखें: U एक संख्या है; “आयु का अर्थ” शास्त्र-कथन है, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

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46.91
एवं महादशारम्भो भवेदंशाद्यथा क्रमात् |
गणयेन्नवपर्यन्तं तत्तदायुः प्रकीर्तितम्
evaṃ mahādaśārambho bhavedaṃśādyathā kramāt |
gaṇayennavaparyantaṃ tattadāyuḥ prakīrtitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; महादशारम्भः = महादशा का आरम्भ; भवेत् = होता है; अंशात् = अंश से; यथा क्रमात् = यथाक्रम; गणयेत् = गणना करे; नवपर्यन्तम् = नौ तक; तत् तत् आयुः = वह-वह आयु; प्रकीर्तितम् = कही गई है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निश्चय करता है कि महादशा का आरम्भ उसी अंशक से यथाक्रम होता है; फिर नौ पर्यन्त गणना करनी चाहिए — और जो-जो खण्ड आता है, वही-वही आयु कही गई है। 46.85–90 की पूरी शृंखला यहाँ बन्द होती है: अंशक-निर्णय → राशि-वर्ष → अनुपात → नौ-पद महादशा/आयु क्रम।

English rendering Thus the mahādaśā begins from the aṃśa in due order; one should compute up to nine — and those successive measures are declared as the respective āyus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्ण एल्गोरिथ्म (इस पाठ-खण्ड का):
1. 46.88 से A ज्ञात करें।
2. राशि-क्रम R₀…R₈ = A से नौ राशियाँ (mod 12)।
3. प्रत्येक k के लिए Y_k = Y(R_k) ∈ {100,28,38,68} (त्रिकोण-सारिणी 46.89)।
4. प्रथम खण्ड पर 46.90 का अनुपात: U₀ = Y₀ × T_elapsed ÷ 15; शेष S₀ = Y₀ − U₀।
5. आगे के खण्ड पूर्ण Y₁…Y₈।
6. कुल कथित आयु-मान = S₀ + Σₖ₌₁⁸ Y_k
(प्रथम अंश आंशिक; शेष आठ पूर्ण — यदि जन्म अंश-मध्ये हो।)

यह विंशोत्तरी के 120-वर्षी नक्षत्र-क्रम (केतु 7 … बुध 17) से भिन्न विधि है; दोनों अध्याय-46 के अन्तर्गत अलग-अलग गणितीय मॉडल हैं — मिलाना पाठ-हिंसा होगी।

उदाहरण (worked example) A = मेष, T_elapsed = 5, Y₀ = 100 ⇒ S₀ = 100 − 33⅓ = 66⅔।
अगली आठ: वृष…धनु = 28+38+68+100+28+38+68+100 = 468।
कुल शास्त्रोक्त योग = 66⅔ + 468 = 534⅔ वर्ष-मान।
(संख्या शास्त्र-विधान की है; “जीवित वर्ष” का आधुनिक अर्थ यहाँ थोपा न जाए।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-इंजन की मूल सीख: क्रम, अनुपात, और योग — तीनों `==` से पिन हों, सहिष्णुता से नहीं। विंशोत्तरी (120; अन्तर् = गुणन/120) और यह अंश-नवराशि आयु-क्रम अलग सारिणियाँ हैं; हम दोनों को अलग फिक्स्चर में रखते हैं ताकि एक का अंक दूसरे को न contamine करे।

46.92
पदस्य भुक्तघट्याद्यैः स्वाब्दमानं हतं ततः |
भभोगांघ्रिहृतं भुक्तं भोग्यं मानाद् विशोधितम्
padasya bhuktaghaṭyādyaiḥ svābdamānaṃ hataṃ tataḥ |
bhabhogāṃghrihṛtaṃ bhuktaṃ bhogyaṃ mānād viśodhitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पदस्य = पाद (नवांश-चरण) का; भुक्तघट्याद्यैः = बीती हुई घटी आदि से (चरण में व्यतीत अंश-काल); स्वाब्दमानं = उस चरण की अपनी दशा-वर्ष-संख्या; हतम् = गुणा किया हुआ; भभोगांघ्रि = भ-भोग (नक्षत्र-विस्तार) का चौथाई भाग (एक पाद); हृतम् = से भाग दिया; भुक्तम् = भोगा हुआ (व्यतीत दशांश); भोग्यम् = भोगने योग्य (शेष); मानाद् विशोधितम् = पूर्ण मान में से घटाया हुआ।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक कालचक्र दशा का भुक्त-भोग्य निकालने की विधि देता है। जिस नवांश-पाद में जन्म हुआ, उसमें जितनी घटियाँ (अर्थात् जितना चाप) बीत चुका है, उसे उस पाद के स्वामी की दशा-वर्ष-संख्या से गुणा करो, और भ-भोग के चौथाई भाग (पूरे पाद के विस्तार) से भाग दो — जो लब्ध हो वही भुक्त (बीता हुआ) अंश है। उसे कुल मान में से घटाने पर भोग्य (शेष भोगने योग्य) दशा प्राप्त होती है। यह वही अनुपात-गणित है जो विंशोत्तरी में भयात-भभोग से चलता है, केवल आधार यहाँ पाद (नवांश-चरण) है।

English rendering Multiply the elapsed ghaṭīs (the arc already traversed within the navāṃśa-pāda) by that pāda's daśā-year measure, then divide by a quarter of the nakṣatra-span (the full pāda); the quotient is the elapsed (bhukta) portion, and subtracting it from the whole measure yields the remaining (bhogya) span.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) With bha-bhoga (one nakṣatra) = 13°20′ = 800′, its quarter (one pāda) = 800′ ÷ 4 = 200′:
- भुक्त (bhukta) = (पाद में व्यतीत चाप × स्वाब्द-मान) ÷ (भभोग ÷ 4)
- भोग्य (bhogya) = स्वाब्द-मान − भुक्त

Pure ratio arithmetic on the fraction-of-pāda already elapsed; the ÷4 converts the whole star-span into the pāda that Kālachakra actually keys on.

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-पाद का कालचक्र दशा-मान (वव. 84–91 की राशीश-सारणी से) = 16 वर्ष, और उस पाद में 80′ चाप व्यतीत। तब भुक्त = (80′ × 16) ÷ 200′ = 1280 ÷ 200 = 6.4 वर्ष; भोग्य = 16 − 6.4 = 9.6 वर्ष। (परिपाटी घोषित: पाद-विस्तार 200′ = एक नवांश।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह भुक्त-भोग्य नियम वही विशुद्ध अनुपात-अंकगणित है जिस पर हमारा दशा-इंजन विंशोत्तरी की अन्तर्दशा — (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — को व्यतीत नक्षत्र-अंश की भिन्न पर चलाता है। कालचक्र में केवल भाजक बदल जाता है (यहाँ पाद = भभोग ÷ 4), गणितीय ढाँचा नहीं — यही कारण है कि दशा-भेद अनेक होते हुए भी एक ही अनुपात-नियम से सधते हैं।

46.93
चन्द्राङ्कांशकला भुक्ताः स्वाब्दमानहता हृताः |
द्विशत्या भुक्तवर्षाद्यं ज्ञेयं भोग्यं ततो बुधैः
candrāṅkāṃśakalā bhuktāḥ svābdamānahatā hṛtāḥ |
dviśatyā bhuktavarṣādyaṃ jñeyaṃ bhogyaṃ tato budhaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र = चन्द्रमा; अङ्क-अंश-कला = चन्द्र की व्यतीत डिग्री (अंश) और कला (मिनट); भुक्ताः = भोगे हुए (व्यतीत); स्वाब्दमानहताः = अपने वर्ष-मान से गुणित; हृताः = भाग दिए हुए; द्विशत्या = दो सौ (200) से; भुक्तवर्षाद्यम् = भुक्त वर्ष आदि; भोग्यम् = शेष भोग्य; बुधैः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक की विधि को यहाँ पाराशर कला (मिनट) की सीधी संख्या में कह देते हैं। जन्म-पाद में चन्द्रमा जितने अंश-कला आगे बढ़ चुका है, उन्हें उस पाद के स्वाब्द-मान से गुणा कर के दो सौ (200) से भाग दो — यही भुक्त वर्ष आदि है; और मान में से घटाने पर भोग्य। यहाँ "दो सौ" कोई रहस्य नहीं — एक नवांश-पाद का पूरा विस्तार ठीक 200 कला (3°20′) है, अतः व्यतीत/200 वही "पाद का बीता हुआ अंश" देता है।

English rendering Multiply the degrees-and-minutes of the Moon already traversed within the pāda by that pāda's year-measure and divide by two hundred; the wise should read this as the elapsed years, and the remainder as the bhogya.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एक नवांश = 30° ÷ 9 = 3°20′ = (3×60 + 20)′ = 200′. अतः द्विशती (200) = पाद का पूर्ण कला-विस्तार।
- भुक्त (वर्ष) = (चन्द्र की व्यतीत कला × स्वाब्द-मान) ÷ 200
- भोग्य (वर्ष) = स्वाब्द-मान − भुक्त

श्लोक 92 का "भभोग ÷ 4" और यहाँ का "÷ 200" एक ही राशि हैं (800′ ÷ 4 = 200′) — दो शब्दों में एक ही भाजक।

उदाहरण (worked example) पाद में चन्द्र 60′ आगे, स्वाब्द-मान = 10 वर्ष। भुक्त = (60 × 10) ÷ 200 = 600 ÷ 200 = 3 वर्ष; भोग्य = 10 − 3 = 7 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "200 कला = एक नवांश" ठीक हमारे वर्ग-इंजन की उस परिभाषा से मेल खाता है जहाँ D9 (नवांश) 30° राशि का 9 समान चापों में नियत विभाजन है — देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित। श्लोक का 200 कोई स्मृति-संख्या नहीं, बल्कि षोडश-वर्ग योजना के नवांश-चाप का प्रत्यक्ष कला-मान है; इसी कारण इसे तोलरेंस से नहीं, ठीक 3°20′ = 200′ से `==` पर पिन किया जा सकता है।

46.94
सव्याख्ये प्रथमांशो यः स देह इति कथ्यते |
अन्त्यांशो जीवसंज्ञः स्याद् विलोममपसव्यके
savyākhye prathamāṃśo yaḥ sa deha iti kathyate |
antyāṃśo jīvasaṃjñaḥ syād vilomamapasavyake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सव्याख्ये = सव्य (दक्षिणावर्त) नामक गण में; प्रथम-अंशः = पहला नवांश; स देहः = वह "देह" कहलाता है; अन्त्य-अंशः = अन्तिम नवांश; जीवसंज्ञः = "जीव" संज्ञक; विलोमम् = उलटा क्रम; अपसव्यके = अपसव्य (वामावर्त) गण में।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र में नवांशों के दो गण होते हैं — सव्य और अपसव्य। सव्य गण में जो पहला नवांश है वह "देह" कहलाता है और जो अन्तिम है वह "जीव"; अपसव्य गण में यह क्रम उलट जाता है — वहाँ पहला "जीव" और अन्तिम "देह" होता है। देह और जीव — ये दो संकेत-बिन्दु आगे के फल-विचार के आधार-स्तम्भ बनते हैं।

English rendering In the savya (clockwise) group the first navāṃśa is termed "deha" (body) and the last "jīva" (life); in the apasavya (counter-clockwise) group this order is reversed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संज्ञा-परिभाषा (देह/जीव निर्धारण)। यह सूत्र संख्या नहीं, अपितु क्रम-दिशा तय करता है: सव्य में देह→जीव (आगे), अपसव्य में जीव→देह (उलटा) — यही दिशात्मक ध्रुवीकरण आगे की गति-गणना का चिह्न-तंत्र (sign convention) खड़ा करता है।

46.95
देहादिं गणयेत् सव्ये जीवादिमपसव्यके |
एवं विज्ञाय दैवज्ञस्ततस्तत्फलमादिशेत्
dehādiṃ gaṇayet savye jīvādimapasavyake |
evaṃ vijñāya daivajñastatastatphalamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहादिम् = देह से आरम्भ; गणयेत् = गिने; सव्ये = सव्य गण में; जीवादिम् = जीव से आरम्भ; अपसव्यके = अपसव्य गण में; एवं विज्ञाय = इस प्रकार जानकर; दैवज्ञः = ज्योतिषी; ततः तत्फलम् आदिशेत् = तब उसका फल बतावे।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक की देह-जीव परिभाषा को यहाँ गणना-आदेश में बदल देते हैं — सव्य गण में गणना देह से प्रारम्भ करो और अपसव्य गण में जीव से। इसी विभाजन को ठीक-ठीक जान लेने पर ही दैवज्ञ को कालचक्र का फल कहना चाहिए। अर्थात् फल-कथन से पहले दिशा और आरम्भ-बिन्दु का निर्णय अनिवार्य है।

English rendering In the savya group count beginning from the deha, in the apasavya from the jīva; having discerned this correctly, the astrologer may then pronounce the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश / गणना-क्रम। यह श्लोक कोई नई राशि नहीं देता; यह प्रक्रिया-अनुशासन देता है — पहले आरम्भ-बिन्दु (देह या जीव) और दिशा नियत करो, तभी फल; क्रम गलत तो सम्पूर्ण दशा-श्रृंखला विस्थापित हो जाती है।

46.96
कालचक्रगतिः प्रोक्ता त्रिधा पूर्वमहर्षिभिः |
मण्डूकाख्या गतिश्चैका मर्कटीसंज्ञकाऽपरा
kālacakragatiḥ proktā tridhā pūrvamaharṣibhiḥ |
maṇḍūkākhyā gatiścaikā markaṭīsaṃjñakā'parā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कालचक्रगतिः = कालचक्र की गति; प्रोक्ता त्रिधा = तीन प्रकार कही गई; पूर्वमहर्षिभिः = प्राचीन महर्षियों द्वारा; मण्डूकाख्या = "मण्डूक" (मेंढक) नामक; गतिः एका = एक गति; मर्कटीसंज्ञका = "मर्कटी" (वानरी) नामक; अपरा = दूसरी।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र दशा राशियों में जिस ढंग से आगे बढ़ती है, उस "गति" को प्राचीन ऋषियों ने तीन प्रकार का बताया है। इनमें एक है मण्डूक-गति (मेंढक की तरह उछलकर चलना) और दूसरी मर्कटी-गति (वानरी की तरह)। तीसरी का नाम आगे के श्लोक में आता है।

English rendering The motion of the Kālachakra was declared threefold by the ancient sages: one named Maṇḍūka (frog) and a second called Markaṭī (she-monkey).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण / वर्णन। "गति" यहाँ चालक-नियम है — दशा-क्रम राशि-से-राशि किस पैटर्न (उछाल, पश्च-गमन, दीर्घ-दृष्टि) में कूदता है, यही तीन गतियाँ आगे की सम्पूर्ण कालचक्र-श्रृंखला की टोपोलॉजी तय करती हैं।

46.97
सिंहावलोकनाख्या च तृतीया परिकीर्तिता |
उत्प्लुत्य गमनं विज्ञा मण्डूकाख्यं प्रचक्षते
siṃhāvalokanākhyā ca tṛtīyā parikīrtitā |
utplutya gamanaṃ vijñā maṇḍūkākhyaṃ pracakṣate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहावलोकनाख्या = "सिंहावलोकन" (सिंह-दृष्टि) नामक; तृतीया = तीसरी; परिकीर्तिता = कही गई; उत्प्लुत्य गमनम् = उछलकर/कूदकर चलना; विज्ञाः = विद्वान् लोग; मण्डूकाख्यं प्रचक्षते = "मण्डूक" कहते हैं।

हिन्दी भावार्थ तीन गतियों में तीसरी का नाम सिंहावलोकन (सिंह के पीछे मुड़कर देखने जैसी) है। और जो उछलकर, बीच की राशियाँ लाँघकर आगे बढ़ने वाली गति है, उसी को विद्वान् मण्डूक-गति कहते हैं — मेंढक जैसे कूदकर चलता है, वैसे।

English rendering The third is proclaimed as Siṃhāvalokana (the lion's backward glance); and the leaping, skipping advance the wise call Maṇḍūka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिभाषा / वर्णन। मण्डूक = उत्प्लुत्य-गमन, अर्थात् क्रम में एक-दो राशियाँ छोड़कर आगे "कूद" जाना; यह चाल दशा-क्रम में सन्निकट-राशि के स्थान पर अन्तराल-सहित छलांग को कूटबद्ध करती है।

46.98
पृष्ठतो गमनं नाम मर्कटीसंज्ञकं तथा |
वाणाच्च नवपर्यन्तं गतिः सिंहावलोकनम्
pṛṣṭhato gamanaṃ nāma markaṭīsaṃjñakaṃ tathā |
vāṇācca navaparyantaṃ gatiḥ siṃhāvalokanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृष्ठतो गमनम् = पीछे की ओर जाना; मर्कटीसंज्ञकम् = मर्कटी संज्ञक; वाणात् = बाण = ५ (भूतसंख्या) से; नवपर्यन्तम् = ९ तक; गतिः = गति; सिंहावलोकनम् = सिंहावलोकन।

हिन्दी भावार्थ जो गमन पृष्ठतः — उल्टे क्रम से, पीछे की ओर — होता है, वह मर्कटी कहा गया। वाण (५) से नव (९) पर्यन्त की गति सिंहावलोकन है — सिंह की तरह पीछे मुड़कर देखने/कूदने का बिम्ब। भूतसंख्या यहाँ अंक-निष्ठा: बाण = ५, नव = ९।

English rendering Backward motion is termed markaṭī; motion from five through nine is siṃhāvalokana (the “lion’s glance”).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
त्रिविध कालचक्र-गति (४६.९६–९८, एकत्र):
1. मण्डूक — उत्प्लुत्य (मध्य राशियों को छोड़ छलांग)।
2. मर्कटी — पृष्ठतो गमन (विलोम/प्रतिगामी क्रम)।
3. सिंहावलोकन — वाण(=५) से नव(=९) पर्यन्त का विशेष संक्रमण।

ये संक्रमण-नियम कालचक्र दशा-श्रृंखला के “कहाँ से कहाँ कूदें” के नियत बिंदु हैं; वर्षमान-अनुपात (४६.९२–९३) से अलग परत। फल-कथन अलग अध्याय/प्रसंग में; यहाँ केवल गति-संज्ञा।

46.99
कन्याकर्कटयोः सिंहयुग्मयोर्मण्डूय्की गतिः |
कर्ककेसरिणोरेवं कथ्यते मर्कटीं गतिः
kanyākarkaṭayoḥ siṃhayugmayormaṇḍūykī gatiḥ |
karkakesariṇorevaṃ kathyate markaṭīṃ gatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्या = कन्या राशि (D1, 150°–180°); कर्कट = कर्क राशि; सिंह = सिंह राशि; युग्म = मिथुन (युग्म = जुड़वाँ); मण्डूकी गति = मेंढक-कूद जैसी विशेष संक्रमण-गति (कालचक्र-दशा); कर्क-केसरी = कर्क और सिंह (केसरी = सिंह); मर्कटी गति = वानर-गति / लघु-कूद संक्रमण।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र-दशा के सव्य-क्रम में कुछ राशियों के युग्म पर सामान्य क्रम नहीं चलता — वहाँ विशेष “गति” कही गई है। शास्त्र कहता है कि कन्या–कर्क और सिंह–मिथुन (युग्म) पर मण्डूकी गति होती है; तथा कर्क–सिंह (केसरी) पर मर्कटी गति कही जाती है। ये नाम केवल रूपक नहीं, दशा-क्रम में संक्रमण का प्रकार बताते हैं।

English rendering The text assigns maṇḍūkī (“frog”) motion to the Kanyā–Karka and Siṃha–Mithuna pairs, and markaṭī (“monkey”) motion to the Karka–Siṃha pair, as special transitions within the Kālacakra-daśā sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रैखिक सूत्र नहीं — कालचक्र-दशा का राशिपair → गति नियत मानचित्र (lookup rule):

  • मण्डूकी: (कन्या, कर्क) और (सिंह, मिथुन)
  • मर्कटी: (कर्क, सिंह)

(देवनागरी में “मण्डूय्की” पाठ-भेद/मुद्रण-रूप संभव; प्रचलित पारिभाषिक रूप मण्डूकी।) सव्य/अपसव्य चक्र में दशा-राशि का क्रम जब इन युग्मों से गुजरता है, संक्रमण-प्रकार तदनुसार चिह्नित होता है — फल अगले श्लोकों में।

उदाहरण (worked example) मान लें सव्य कालचक्र में वर्तमान दशा-राशि कर्क से अगला चरण सिंह की ओर जाता है। युग्म = (कर्क, सिंह) → नियम से मर्कटी गति। यदि क्रम कन्या ↔ कर्क या सिंह ↔ मिथुन हो, तो मण्डूकी। (अयनांश/लग्न यहाँ अप्रासंगिक — यह शुद्ध राशि-युग्म नियम है।)

46.100
मीनवृश्चिकयोश्चापमेषयोः सैंहिकी गतिः |
इति सञ्चिन्त्य विज्ञेयं कालचक्रदशाफलम्
mīnavṛścikayoścāpameṣayoḥ saiṃhikī gatiḥ |
iti sañcintya vijñeyaṃ kālacakradaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीन = मीन राशि; वृश्चिक = वृश्चिक; चाप = धनु; मेष = मेष; सैंहिकी / सिंहावलोक गति = सिंह-दृष्टि जैसी विशेष गति (पीछे/तिरछी दृष्टि वाला संक्रमण); सञ्चिन्त्य = भली-भाँति विचार कर; कालचक्रदशाफल = कालचक्र-दशा का फल-विचार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मीन–वृश्चिक और धनु–मेष युग्मों पर सैंहिकी (सिंह-सम्बन्धी / सिंहावलोक) गति होती है। इन तीनों विशेष गतियों — मण्डूकी, मर्कटी, सैंहिकी — को सोच-समझकर कालचक्र-दशा का फल जानना चाहिए। यह श्लोक गणना-युग्मों का समापन और फल-अध्याय का द्वार है।

English rendering The text assigns saiṃhikī (lion-glance) motion to the Mīna–Vṛścika and Dhanus–Meṣa pairs, and enjoins that Kālacakra-daśā results be judged only after carefully reckoning these special motions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 46.99–46.100 मिलकर पूर्ण तीन-गति मानचित्र:

| गति | राशि-युग्म |
|---|---|
| मण्डूकी | कन्या–कर्क; सिंह–मिथुन |
| मर्कटी | कर्क–सिंह |
| सैंहिकी (सिंहावलोक) | मीन–वृश्चिक; धनु–मेष |

यह कालचक्र-क्रम का असतत संक्रमण-वर्गीकरण है; संख्यात्मक गुणांक नहीं। “सैंहिकी” ≈ सिंहावलोक — पाठ-भेद/नाम-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) सव्य क्रम में दशा-राशि मीन से वृश्चिक की ओर संक्रमण चिह्नित हो → सैंहिकी गति। धनु ↔ मेष पर भी वही वर्ग। इसके बाद फल-कथन (46.101+) उसी गति-काल पर लागू किए जाते हैं — दशा-वर्ष की लम्बाई यहाँ नहीं दी; केवल गति-प्रकार।

46.101
मण्डूकगतिकाले हि सव्ये बन्धुजने भयम् |
पित्रोर्वा विषशस्त्राग्निज्वरचोरादिजं भयम्
maṇḍūkagatikāle hi savye bandhujane bhayam |
pitrorvā viṣaśastrāgnijvaracorādijaṃ bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मण्डूकगतिकाले = मण्डूक-गति के काल में; सव्ये = सव्य गण में; बन्धुजने भयम् = बन्धुजनों को भय; पित्रोः वा = अथवा माता-पिता को; विष-शस्त्र-अग्नि-ज्वर-चोर-आदिजम् = विष, शस्त्र, अग्नि, ज्वर, चोर आदि से उत्पन्न; भयम् = भय।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से गति-फल आरम्भ होता है। शास्त्र कहता है कि सव्य गण में मण्डूक-गति के काल में बन्धुजनों अथवा माता-पिता के लिए आशंका का योग बताया गया है, तथा विष, शस्त्र, अग्नि, ज्वर, चोर आदि से उत्पन्न भय का उल्लेख है। ध्यातव्य — ये शास्त्र के कथन हैं, नियति या निश्चित घटना नहीं; इन्हें भय-प्रेरक रूप में नहीं, अपितु पाठ की अपनी घोषणा के रूप में पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that during the Maṇḍūka motion in the savya group it speaks of apprehension for kinsfolk or parents, and of danger said to arise from poison, weapon, fire, fever, thieves, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह विशुद्ध फल-वाक्य है; इसे शास्त्र-कथन के रूप में उद्धृत किया गया है, किसी की नियति के प्रमाण या भविष्यवाणी के रूप में नहीं — गणित और व्याख्या का पृथक्करण यहीं सुरक्षित रहता है।

46.102
केसरीयुग्ममण्डूके मातुर्मरण्मादिशेत् |
स्वमृतिं राजभितिं वा सन्निपातभयं भवेत्
kesarīyugmamaṇḍūke māturmaraṇmādiśet |
svamṛtiṃ rājabhitiṃ vā sannipātabhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केसरी-युग्म-मण्डूके = सिंह–मिथुन (केसरी–युग्म) पर मण्डूकी काल में; मातुः मरणम् आदिशेत् = माता के मरण का निर्देश (शास्त्र कहता है); स्वमृति = अपनी मृत्यु का संकेत (पाठ); राजभीति = राज-भय; सन्निपातभय = सन्निपात (उग्र ज्वर/सन्निपात) का भय। (“मरण्मादिशेत्” — मुद्रण-रूप; प्रायः मरणमादिशेत्; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केसरी–युग्म (सिंह–मिथुन) की मण्डूकी दशा में माता के मरण का आदिष्ट/निर्देश दिया गया है। अथवा स्वमृति, राजभय, या सन्निपात-भय का उल्लेख है। यहाँ भी निश्चित भविष्यवाणी नहीं — पारम्परिक फल-सूची का कथन; गणना केवल यह तय करती है कि वह गति-काल सक्रिय है या नहीं।

English rendering The text states that under maṇḍūka motion on the Kesarī–Yugma (Leo–Gemini) pair one may indicate maternal death, or else own mortality-indication, royal fear, or fear of sannipāta.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; शर्त = (राशि-युग्म = सिंह–मिथुन) ∧ (गति = मण्डूकी)। यह 46.99 के मण्डूकी-युग्मों में से विशिष्ट युग्म पर अतिरिक्त/तीव्र फल-सूची है — सामान्य मण्डूकी (46.101) से पृथक् पंक्ति।

46.103
मर्कटीगमने सव्ये धनधान्यपशुक्षयः |
पितुर्मरणमालस्यं तत्समानां च व मृतिः
markaṭīgamane savye dhanadhānyapaśukṣayaḥ |
piturmaraṇamālasyaṃ tatsamānāṃ ca va mṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मर्कटीगमने = मर्कटी (पश्च) गति में; सव्ये = सव्य गण में; धन-धान्य-पशु-क्षयः = धन, धान्य, पशु की हानि; पितुः मरणम् = पिता के लिए अनिष्ट; आलस्यम् = आलस्य/निष्क्रियता; तत्समानां च (वा) मृतिः = तुल्य/समवयस्क जनों को भी संकट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सव्य गण की मर्कटी-गति में धन, धान्य और पशु की क्षति, पिता के लिए आशंका, आलस्य, तथा समवयस्क/समान जनों के लिए भी अनिष्ट का कथन है। (मूल का "च व मृतिः" सम्भवतः "च वा मृतिः" है — पाठ-भेद संभव।) पुनः स्मरण — ये शास्त्र के फल-वचन हैं, एतद्-द्वारा किसी निश्चित घटना की घोषणा नहीं की जाती।

English rendering The text states that during the Markaṭī motion in the savya group it speaks of loss of wealth, grain, and cattle, of concern for the father, of lethargy, and likewise of harm to one's peers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गति-आधारित परिणाम-वाक्य मात्र; शास्त्र-कथन की मुद्रा में — न भय-प्रेरणा, न उपाय-दबाव, न भविष्य का निश्चय।

46.104
सव्ये सिंहावलोके तु पशुभीतिर्भवेन्नृणाम् |
सुहृत्स्नेहादिनाशश्च समानजनपीडनम्
savye siṃhāvaloke tu paśubhītirbhavennṛṇām |
suhṛtsnehādināśaśca samānajanapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सव्ये सिंहावलोके तु = परन्तु सव्य गण की सिंहावलोकन गति में; पशुभीतिः = पशु-सम्बन्धी आशंका; भवेत् नृणाम् = मनुष्यों के लिए हो; सुहृत्-स्नेह-आदि-नाशः च = मित्र, स्नेह आदि की हानि; समानजन-पीडनम् = समवयस्क/समान जनों को कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सव्य गण की सिंहावलोकन-गति में मनुष्यों के लिए पशु-सम्बन्धी आशंका, मित्रों तथा स्नेह-सम्बन्धों की हानि, और समान/समवयस्क जनों के लिए कष्ट का कथन है। यह गति-फल त्रयी (मण्डूक, मर्कटी, सिंहावलोकन) की सव्य-पक्ष व्याख्या पूर्ण करता है — और सर्वत्र यह पाठ की अपनी घोषणा है, न कि हमारी ओर से कोई भविष्यवाणी।

English rendering The text states that in the savya Siṃhāvalokana motion it speaks of apprehension concerning cattle, of loss of friends and affection, and of distress to one's peers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। इस श्लोक में भी कोई गणना नहीं; तीनों सव्य-गतियों का फल-त्रिक यहाँ पूर्ण होता है, और प्रत्येक वाक्य शास्त्र के कथन के रूप में उद्धृत है — मापने योग्य गणित से पृथक्, व्याख्या की अपनी परिधि में सुरक्षित।

46.105
पतनं वापि कूपादौ विषशस्र्ताग्निजं भयम् |
वाहनात् पतनं वापि ज्वरार्तिः स्थाननाशनम्
patanaṃ vāpi kūpādau viṣaśasrtāgnijaṃ bhayam |
vāhanāt patanaṃ vāpi jvarārtiḥ sthānanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पतनं कूपादौ = कूप आदि में गिरना; विष-शस्त्र-अग्निजं भयम् = विष, शस्त्र, अग्नि से भय (“विषशस्र्ताग्निजं” — मुद्रण-रूप; प्रायः विषशस्त्राग्निजं; पाठ-भेद संभव); वाहनात् पतनम् = वाहन से गिरना; ज्वरार्तिः = ज्वर की पीड़ा; स्थाननाशनम् = स्थान/पद/आश्रय का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है (सिंहावलोक/पूर्व-कथित विशेष-गति प्रसंग में) कूप आदि में पतन, विष–शस्त्र–अग्नि से भय, वाहन से गिरना, ज्वर-पीड़ा, और स्थान का नाश — ये फल-सूची के अंग हैं। चिकित्सा, कानूनी, या धन-निश्चित भविष्य के रूप में नहीं पढ़ना; यह पाठ की अपनी आशंका-सूची है। गणना का काम केवल यह तय करना है कि उक्त गति-काल लागू है या नहीं।

English rendering The text further states (in this special-gati phala strand) fall into a well and the like, fear from poison, weapons, and fire, fall from a vehicle, feverish affliction, and destruction of one’s place or standing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (46.104 की सिंहावलोक-पंक्ति का विस्तार; स्वतंत्र संख्या-सूत्र नहीं)। सव्य + सैंहिकी/सिंहावलोक सक्रिय होने पर शास्त्र इन संकेतों की सूची जोड़ता है; वर्ष-माप, बलांश, या वर्गाङ्क यहाँ नहीं दिए।

46.106
मण्डूकगमने वामे स्त्रीसुतादिप्रपीडनम् |
ज्वरं च श्वापदाद् भीतिं वदेद् विज्ञः पदच्युतिम्
maṇḍūkagamane vāme strīsutādiprapīḍanam |
jvaraṃ ca śvāpadād bhītiṃ vaded vijñaḥ padacyutim

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मण्डूक-गमने = मेंढक-सदृश उछल-गमन (कालचक्र-दशा में एक राशि छोड़कर कूद); वामे = वाम/अपसव्य दिशा में; स्त्री-सुत-आदि-प्रपीडनम् = स्त्री-पुत्रादि को पीड़ा; ज्वरम् = ज्वर; श्वापदात् भीतिम् = हिंसक पशु से भय; पद-च्युतिम् = पद/स्थान से च्युति; विज्ञः वदेत् = विद्वान् कहे।

हिन्दी भावार्थ जब कालचक्र-दशा में मण्डूक-गमन वाम दिशा में हो, तो शास्त्र स्त्री-पुत्रादि की पीड़ा, ज्वर, हिंसक पशु से भय तथा पद-च्युति का फल बताता है। विज्ञ ज्योतिषी इन्हीं संकेतों को उस गमन-अवस्था के साथ जोड़कर कहे। यह फल-कथन दशा-प्रवाह की उस विशेष चाल से जुड़ा है, न कि सामान्य राशि-फल से।

English rendering When the Kālacakra-daśā proceeds by maṇḍūka-gamana (frog-leap) on the leftward course, the text states affliction to wife and children, fever, fear from wild beasts, and loss of position; the wise should declare accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-दशा का मण्डूक-गमन, वाम)। मण्डूक-गमन कालचक्र-क्रम में निरंतर पड़ोसी राशि नहीं, बल्कि “कूदकर” आगे बढ़ने की चाल का नाम है; वाम = अपसव्य क्रम। संख्या या बलांक यहाँ नहीं दिए।

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46.107
मर्कटीगमने वाऽपि जलभीतिं पदच्युतिम् |
पितुर्नाशं नृपक्रोधं दुर्गारण्याटनं वदेत्
markaṭīgamane vā'pi jalabhītiṃ padacyutim |
piturnāśaṃ nṛpakrodhaṃ durgāraṇyāṭanaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मर्कटी-गमने = वानर-सदृश गमन (कालचक्र में उलटी/अस्थिर चाल); वा अपि = अथवा भी; जल-भीतिम् = जल से भय; पद-च्युतिम् = पद-भ्रंश; पितुः नाशम् = पिता का नाश (शास्त्र-कथन); नृप-क्रोधम् = राजा/शासन-कोप; दुर्गा-अरण्य-आटनम् = दुर्ग-वन में भटकाव; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ मर्कटी-गमन की दशा में भी शास्त्र जल-भय, पद-च्युति, पिता-संबंधी हानि, राज-कोप तथा दुर्ग या वन में भटकने जैसा फल कहता है। यह मण्डूक-गमन से भिन्न चाल है — अस्थिर, पीछे-आगे झूलती गति। फल का उच्चारण शास्त्रीय संकेत के रूप में ही समझना चाहिए, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering In markaṭī-gamana (monkey-like motion) as well, the text states fear of water, fall from station, loss connected with the father, royal anger, and wandering in fort or forest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मर्कटी-गमन)। गणना-दृष्टि से यह कालचक्र-राशि-क्रम की “वानर-चाल” नामक गत्यावस्था का नाम है; कोई वर्ष-संख्या, भुक्ति-अनुपात या बिन्दु-योग यहाँ नहीं है।

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46.108
सिंहावलोकने वामे पदभ्रंशः पितुर्मृतिः |
तत्समानमृतिर्वाऽपि फलमेवं विचिन्तयेत्
siṃhāvalokane vāme padabhraṃśaḥ piturmṛtiḥ |
tatsamānamṛtirvā'pi phalamevaṃ vicintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंह-अवलोकने = सिंह के पीछे मुड़कर देखने जैसी चाल (क्रम में पीछे मुड़कर पुनः आगे); वामे = वाम दिशा में; पद-भ्रंशः = पद-पतन; पितुः मृतिः = पिता की मृत्यु (शास्त्र-कथन); तत्-समान-मृतिः वा अपि = अथवा उसके समान व्यक्ति की मृत्यु; फलम् एवम् विचिन्तयेत् = फल इसी रीति से विचारे।

हिन्दी भावार्थ वाम सिंहावलोकन में शास्त्र पद-भ्रंश तथा पिता की मृत्यु — अथवा पिता-तुल्य जन की मृत्यु — का फल कहता है। “तत्समान” से स्पष्ट है कि संकेत केवल पिता-शब्द तक सीमित नहीं, समान-कक्षा के सम्बन्ध पर भी लागू माना गया। विचिन्तयेत् — अर्थात् उसी पद्धति से अन्य समान स्थितियों का भी अनुमान लगाएँ।

English rendering In leftward siṃhāvalokana (the lion’s backward glance), the text states loss of position and the death of the father, or of one equal to him; results are to be considered on that model.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सिंहावलोकन-गमन, वाम)। सिंहावलोकन कालचक्र-क्रम में एक बार पीछे मुड़कर फिर आगे बढ़ने की विशेष गत्याकृति है; यहाँ कोई अंश/वर्ष-सूत्र नहीं, केवल फल-निर्देश।

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46.109
मीनात् तु वृश्चिके याते ज्वरो भवति निश्चितः |
कन्यातः कर्कटे याते भ्रातृबन्धुविनाशनम्
mīnāt tu vṛścike yāte jvaro bhavati niścitaḥ |
kanyātaḥ karkaṭe yāte bhrātṛbandhuvināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीनात् = मीन राशि से; वृश्चिके याते = वृश्चिक में पहुँचने पर; ज्वरः भवति निश्चितः = ज्वर — शास्त्र “निश्चित” कहता है; कन्यातः = कन्या से; कर्कटे याते = कर्क में गमन पर; भ्रातृ-बन्धु-विनाशनम् = भाई-बन्धुओं का विनाश (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ जब कालचक्र-दशा का प्रवाह मीन से वृश्चिक में जाता है, शास्त्र ज्वर को निश्चित फल बताता है; कन्या से कर्क में जाने पर भ्रातृ-बन्धु-विनाश कहता है। ये दोनों संक्रमण कालचक्र की असामान्य कूद/मोड़ वाले मार्ग हैं, साधारण सव्य-क्रम के पड़ोसी-गमन नहीं। “निश्चितः” शास्त्र की अपनी दृढ़ता-भाषा है — आधुनिक अर्थ में नियति-गारंटी नहीं।

English rendering When the course passes from Mīna to Vṛścika, the text states fever as certain; when from Kanyā to Karkaṭa, destruction of brothers and kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन + राशि-संक्रमण का निर्देश (सूत्र नहीं)।
संक्रमण-युग्म (कालचक्र-गमन):
(1) मीन → वृश्चिक
(2) कन्या → कर्क
ये D1-राशि-नामों पर आधारित दशा-पथ के मोड़ हैं; अयनांश/गृह-प्रणाली यहाँ लागू नहीं — नाम-राशि का क्रम ही विषय है। कोई वर्ष-गुणांक या बिन्दु-संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) कालचक्र-दशा में यदि वर्तमान महादशा-राशि मीन है और अगला निर्धारित पद वृश्चिक है (मण्डूक/विशेष-गति-प्रकार से), तो शास्त्र उस अंतराल को ज्वर-फल से जोड़ता है। यदि पथ कन्या → कर्क है, तो भ्रातृ-बन्धु-विनाश का कथन लागू माना गया। (वास्तविक जन्म-कुण्डली में पथ का निर्धारण कालचक्र-नक्षत्र/राशि-क्रम और सव्य-अपसव्य नियम से होता है — यहाँ केवल श्लोक-कथित युग्म।)

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46.110
सिंहात्तु मिथुने याते स्त्रिया व्याधिर्भवेद् ध्रुवम् |
कर्कटाच्च हरौ याते वधो भवति देहिनाम्
siṃhāttu mithune yāte striyā vyādhirbhaved dhruvam |
karkaṭācca harau yāte vadho bhavati dehinām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहात् तु = सिंह से; मिथुने याते = मिथुन में गमन पर; स्त्रियाः व्याधिः भवेत् ध्रुवम् = स्त्री को व्याधि — शास्त्र “ध्रुवम्” कहता है; कर्कटात् च = और कर्क से; हरौ याते = हरि/सिंह में जाने पर; वधः भवति देहिनाम् = देहधारियों का वध (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ सिंह से मिथुन-संक्रमण पर शास्त्र स्त्री-व्याधि को ध्रुव फल बताता है; कर्क से सिंह (हरि) में जाने पर देहधारियों के वध का उल्लेख करता है। दोनों ही कालचक्र-पथ के विशेष मोड़ हैं। “ध्रुवम्/वधः” शास्त्र की पारंपरिक फल-भाषा है; इसे चिकित्सकीय या कानूनी भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए — केवल पाठ का कथन।

English rendering When the course goes from Siṃha to Mithuna, the text states disease for the wife as fixed; when from Karkaṭa to Hari (Siṃha), it states death among living beings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन + राशि-संक्रमण।
युग्म:
(1) सिंह → मिथुन
(2) कर्क → सिंह (हरि = सिंह)
कोई संख्यात्मक गुणक, दशा-वर्ष या बलांक नहीं — केवल पथ-नाम → फल-निर्देश।

उदाहरण (worked example) कालचक्र-क्रम में दशा-पद सिंह से मिथुन कूदे तो शास्त्र स्त्री-व्याधि का फल जोड़ता है; कर्क से सिंह में जाने पर “देहिनां वधः” का कथन। पथ की पुष्टि सव्य/अपसव्य और गमन-प्रकार (मण्डूक आदि) की तालिका से करनी होती है — श्लोक स्वयं केवल फल-युग्म देता है।

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46.111
पितृबन्धुमृतिं विद्याच्चापान्मेषे गते पुनः |
भयं पापखगैर्युक्ते शुभखेटयुते शुभम्
pitṛbandhumṛtiṃ vidyāccāpānmeṣe gate punaḥ |
bhayaṃ pāpakhagairyukte śubhakheṭayute śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृ-बन्धु-मृतिम् विद्यात् = पिता-बन्धु की मृत्यु जानी जाए (शास्त्र-दृष्टि); चापात् = धनु/चाप से; मेषे गते पुनः = पुनः मेष में गमन पर; भयम् = भय; पाप-खगैः युक्ते = पाप-ग्रहों से युक्त होने पर; शुभ-खेट-युते = शुभ-ग्रह-युक्त होने पर; शुभम् = शुभ।

हिन्दी भावार्थ धनु (चाप) से मेष में जाने पर शास्त्र पिता-बन्धु-मृति का ज्ञान करने को कहता है। फिर सामान्य नियम जोड़ता है — वही स्थिति पाप-ग्रह-युक्त हो तो भय/अशुभ, शुभ-ग्रह-युक्त हो तो शुभ। अर्थात् संक्रमण-फल अकेला नहीं; योग-ग्रहों का संयोग उसे शुभ या अशुभ रंग देता है। यह कालचक्र-फल को ग्रह-युक्तता से संशोधित करने का शास्त्रीय द्वार है।

English rendering When the course again passes from Cāpa (Dhanus) to Meṣa, one should know death of father and kin, says the text; with malefic planets joined there is fear, with benefics, auspiciousness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन + एक संक्रमण + योग-संशोधन नियम।
संक्रमण: चाप (धनु) → मेष।
संशोधन (द्वि-शाखा, संख्या नहीं):
- पाप-खग-युक्त → भय/अशुभ-दिशा
- शुभ-खेट-युक्त → शुभ
“युक्त” यहाँ दशा-राशि/लग्न-आदि पर ग्रह-स्थिति का शास्त्रीय संयोग-भाव है; कोई बिन्दु-योग या वर्ष-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) कालचक्र-पथ धनु → मेष हो और उस राशि/काल में मंगल-शनि जैसे पाप-ग्रह दृष्टि/युति से जुड़े हों, तो शास्त्र भय-दिशा का फल कहता है; यदि गुरु-शुक्रादि शुभ जुड़े हों, तो शुभ। (ग्रह-युक्ति का निर्णय जन्म-कुण्डली + दशा-काल की राशि पर; अयनांश केवल देशांतर-देशांतर-जन्मकाल से राशि-स्थिति निकालने में लगता है, श्लोक के नाम-युग्म पर नहीं।)

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46.112
शुभं वाऽप्यशुभं वाऽपि कालचक्रदशाफलम् |
राशिदिक्भागतो वापि पूर्वादिदिग्तभश्चरात्
śubhaṃ vā'pyaśubhaṃ vā'pi kālacakradaśāphalam |
rāśidikbhāgato vāpi pūrvādidigtabhaścarāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभम् वा अपि अशुभम् वा अपि = शुभ अथवा अशुभ; कालचक्र-दशा-फलम् = कालचक्रदशा का फल; राशि-दिक्-भागतः = राशि की दिशा-विभाग के अनुसार; पूर्वादि-दिक्-तभः-चरात् = पूर्व आदि दिशाओं में चलने वाली राशि से। (पाठ-भेद संभव — "दिग्तभश्चरात्" अंश असम है।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ सामान्य सिद्धान्त देता है — कालचक्रदशा का फल शुभ हो या अशुभ, वह राशि के दिक्-विभाग (पूर्वादि दिशा) के आधार पर भी विचारा जाता है। अर्थात् प्रत्येक राशि की एक निर्दिष्ट दिशा है, और फल-कथन उस दिशा के अनुसार भी ढलता है।

English rendering Whether the fruit of the Kālacakra daśā be auspicious or inauspicious, it is also to be read according to the directional apportionment of the sign — from the sign moving in the east and the other directions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — राशि → दिक् मानचित्रण (त्रिकोण-आधारित, परम्परागत; पाठ-भेद संभव)। राशियों को 1…12 (मेष=1 … मीन=12) अंकित कर:
दिक् = ((r − 1) mod 4) → 0 = पूर्व, 1 = दक्षिण, 2 = पश्चिम, 3 = उत्तर।
अतः पूर्व = मेष/सिंह/धनु; दक्षिण = वृष/कन्या/मकर; पश्चिम = मिथुन/तुला/कुम्भ; उत्तर = कर्क/वृश्चिक/मीन। यह विशुद्ध मॉड्युलर-अंकगणित है — फल नहीं, दिशा-निर्धारण।

उदाहरण (worked example) दशा-राशि = सिंह ⇒ r = 5 ⇒ (5 − 1) mod 4 = 0 ⇒ पूर्व दिशा। वृश्चिक ⇒ r = 8 ⇒ 7 mod 4 = 3 ⇒ उत्तर दिशा। इसी सारणी से अगले श्लोकों (114–117) के दिशा-सम्बन्धी फल पढ़े जाते हैं।

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46.113
तद्दिगावभागे वक्तव्यं तद्दशासमये नृणाम् |
यथोपदेशमार्गेण सर्वेषां द्विजसत्तम
taddigāvabhāge vaktavyaṃ taddaśāsamaye nṛṇām |
yathopadeśamārgeṇa sarveṣāṃ dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दिक्-अवभाग = उस दिशा-खंड/दिशा-भाग में; वक्तव्यम् = कहना/फल बोलना चाहिए; तद्-दशा-समये = उसी दशा-काल में; नृणाम् = मनुष्यों के लिए; यथा-उपदेश-मार्गेण = उपदेश-मार्ग के अनुसार; सर्वेषाम् = सबके लिए; द्विजसत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस दिशा-अवभाग का वर्णन चला है, उसी का फल उस दशा के समय मनुष्यों के विषय में कहना चाहिए। यह कथन किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं—उपदेश-मार्ग के अनुसार सबके लिए समान रूप से लागू माना गया है। संवाद-सम्बोधन “द्विजसत्तम” से स्पष्ट है कि यह निर्देश शिष्य-परंपरा की भाषा में दिया गया है।

English rendering The text states that the result belonging to that directional division is to be declared for people at the time of the corresponding daśā. It is to be applied, along the path of instruction, for all, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-काल + दिशा-फल का अनुप्रयोग-नियम। यहाँ संख्या नहीं, काल-सीमा है: दिशा-फल “तद्दशासमये” बोला जाता है—अर्थात् फल की गणना नहीं, उसकी घोषणा का काल-फ्रेम दशा-अवधि है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय 46 के दशा-क्रम में यह श्लोक दिशा-फल को दशा-समय से बाँधता है। हमारी विंशोत्तरी-इंजन उसी अध्याय-शृंखला (46–47) के 120-वर्ष चक्र को अनुपात-गणित से बाँधती है—केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। दिशा-फल स्वयं फल-कथन है; दशा-काल की सीमा ही वह बिंदु है जहाँ पाठ और इंजन मिलते हैं।

46.114
कन्यातः कर्कटे याते पूर्वभागे महत्फलम् |
उत्तरं देशमाश्रित्य शुभा यात्रा भविष्यति
kanyātaḥ karkaṭe yāte pūrvabhāge mahatphalam |
uttaraṃ deśamāśritya śubhā yātrā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्यातः = कन्या से; कर्कटे याते = कर्कट (कर्क) में पहुँचने पर; पूर्व-भाग = पूर्व दिशा-भाग; महत्-फलम् = बड़ा/प्रबल फल; उत्तरं देशम् = उत्तर देश; आश्रित्य = आश्रय लेकर; शुभा यात्रा = शुभ यात्रा; भविष्यति = होगी—शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (गमन/संक्रमण) कन्या से कर्कट की ओर होता है, तो पूर्व-भाग में महत् फल कहा गया है। उसी संदर्भ में उत्तर देश का आश्रय लेकर यात्रा शुभ मानी गई है। यह दिशा-यात्रा फल है—गमन की राशि-जोड़ी से दिशा का मिलान।

English rendering The text states that when the movement is from Virgo into Cancer, the eastern portion carries great result; a journey relying on the northern country is declared auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-युग्म → दिशा-फल नियम (फल-सारणी, निरंतर संख्या-सूत्र नहीं):
- संक्रमण: कन्या → कर्कट
- पूर्व-भाग: महत्फल (शास्त्र-कथन)
- उत्तर-देश-आश्रित यात्रा: शुभ (शास्त्र-कथन)
कोण/अंश-विभाजन यहाँ नहीं; संकेत राशि-संक्रमण और दिशा-नाम पर टिका है।

46.115
सिंहात्तु मिथुने याते पूर्वभागं विवर्जयेत् |
कार्यान्तेऽपि च नैऋत्यां सुखं यात्रा भविष्यति
siṃhāttu mithune yāte pūrvabhāgaṃ vivarjayet |
kāryānte'pi ca naiṛtyāṃ sukhaṃ yātrā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहात् = सिंह से; मिथुने याते = मिथुन में जाने पर; पूर्व-भागम् = पूर्व दिशा-भाग; विवर्जयेत् = त्यागे/वर्जित करे; कार्य-अन्ते अपि = कार्य के अंत में भी; नैऋत्याम् = नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में; सुखं यात्रा = सुखद यात्रा; भविष्यति = होगी—शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सिंह से मिथुन की ओर गमन होने पर पूर्व-भाग छोड़ देना चाहिए। उसी अवस्था में—कार्य के अंत में भी—नैऋत्य दिशा में यात्रा सुख-युक्त कही गई है। यहाँ एक दिशा वर्ज्य और एक दिशा अनुकूल, दोनों स्पष्ट फल-रूप में दिए गए हैं।

English rendering The text states that when the movement is from Leo into Gemini, the eastern portion is to be avoided; even at the close of an undertaking, a journey in the south-western (Nairṛtya) quarter is declared comfortable.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-युग्म → दिशा-नियम:
- संक्रमण: सिंह → मिथुन
- पूर्व: वर्ज्य
- नैऋत्य (SW): सुख-यात्रा (शास्त्र-कथन)
नैऋत्य = दक्षिण + पश्चिम का कोण-दिशा-नाम; यहाँ डिग्री-माप नहीं, केवल दिशा-फल।

46.116
कर्कटात् सिंहभे याते कार्यहानिश्च दक्षिणे |
दक्षिणां दिशमाश्रित्य प्रत्यगागमनं भवेत्
karkaṭāt siṃhabhe yāte kāryahāniśca dakṣiṇe |
dakṣiṇāṃ diśamāśritya pratyagāgamanaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कटात् = कर्कट से; सिंह-भे याते = सिंह राशि में पहुँचने पर; कार्य-हानिः = कार्य की हानि; दक्षिणे = दक्षिण में; दक्षिणां दिशम् = दक्षिण दिशा; आश्रित्य = आश्रय लेकर; प्रत्यक्-आगमनम् = पश्चिम से आगमन/पश्चिम की ओर लौटना; भवेत् = होता है—शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्कट से सिंह राशि की ओर गमन होने पर दक्षिण में कार्य-हानि कही गई है। दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर प्रत्यग्-आगमन (पश्चिम से/पश्चिम की ओर वापसी) का फल भी यहीं जोड़ा गया है। यह यात्रा-दिशा और कार्य-परिणाम दोनों का संयुक्त फल-कथन है।

English rendering The text states that when the movement is from Cancer into the sign Leo, loss of work is indicated in the south; taking the southern direction, a return associated with the west is said to occur.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-युग्म → दिशा/कार्य-फल:
- संक्रमण: कर्कट → सिंह
- दक्षिण: कार्यहानि (शास्त्र-कथन)
- दक्षिण-आश्रित + प्रत्यग्-आगमन: लौटने/पश्चिम-संबद्ध आगमन का फल
संख्या-अंक नहीं; दिशा-नाम और फल-शब्द ही नियम हैं।

46.117
मीनात्तु वृश्चिके याते उदग् गच्छति सङ्कटम् |
चापाच्च मकरे याते सङ्कटं जायते ध्रुवम्
mīnāttu vṛścike yāte udag gacchati saṅkaṭam |
cāpācca makare yāte saṅkaṭaṃ jāyate dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीनात् = मीन से; वृश्चिके याते = वृश्चिक में जाने पर; उदक् = उत्तर की ओर; गच्छति = जाता है; सङ्कटम् = संकट/कष्ट; चापात् = धनु से; मकरे याते = मकर में जाने पर; सङ्कटम् = संकट; जायते = उत्पन्न होता है; ध्रुवम् = निश्चित रूप से—शास्त्र का दृढ़ फल-शब्द, न कि हमारा दावा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मीन से वृश्चिक की ओर गमन होने पर उत्तर की यात्रा संकट-युक्त कही गई है। फिर धनु से मकर की ओर गमन होने पर भी संकट “ध्रुवम्” कहा गया है—अर्थात् पाठ स्वयं इस फल को दृढ़ घोषित करता है। दोनों पंक्तियाँ यात्रा-दिशा और संक्रमण-युग्म पर फल बाँधती हैं; भय-व्यापार या उपाय-दबाव यहाँ नहीं जोड़ना है—केवल शास्त्र-कथन का सटीक पाठ।

English rendering The text states that when the movement is from Pisces into Scorpio, going north brings distress; when it is from Sagittarius into Capricorn, distress is declared as certain (dhṛuvam—the text’s own wording).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्वतंत्र संक्रमण-नियम:
1. मीन → वृश्चिक + उत्तर-गमन → सङ्कट (शास्त्र-कथन)
2. धनु → मकर → सङ्कट, ध्रुवम् (शास्त्र-कथन)
कोण-सूत्र नहीं; युग्म-दिशा सारणी है। “ध्रुवम्” पाठ का बल-सूचक शब्द है—गणितीय स्थिरांक नहीं।

46.118
चापान्मेषे तु यात्रायां व्याधिर्बन्धो मृतिर्भवेत् |
वृश्चिके तु सुखं सम्पत् स्त्रीप्राप्तिश्च द्विजोत्तम
cāpānmeṣe tu yātrāyāṃ vyādhirbandho mṛtirbhavet |
vṛścike tu sukhaṃ sampat strīprāptiśca dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चापात् = धनु राशि से (कालचक्र की देह/जीव राशि); मेषे (याते) = मेष राशि में संक्रमण होने पर; यात्रायाम् = यात्रा/प्रवास में; व्याधिः = रोग; बन्धः = बन्धन, कैद; मृतिः = मृत्यु का भय; वृश्चिके = वृश्चिक राशि में संक्रमण पर; सुखम्, सम्पत् = सुख और सम्पत्ति; स्त्रीप्राप्तिः = स्त्री/पत्नी की प्राप्ति; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ ब्राह्मण (मैत्रेय-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र-दशा में जब देह-राशि धनु से मेष में संक्रान्त होती है, तब शास्त्र यात्रा-काल में रोग, बन्धन और मृत्यु-भय की सम्भावना कहता है। इसके विपरीत वृश्चिक में संक्रमण होने पर वही शास्त्र सुख, सम्पत्ति और स्त्री-प्राप्ति का फल बताता है। यह दोनों कथन राशि-गति के अनुसार दिए गए फल-वचन हैं।

English rendering The text states that in the Kālachakra daśā a transition of the sign from Sagittarius into Aries makes a journey bring illness, confinement and mortal danger, while a transition into Scorpio brings ease, prosperity and union with a spouse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — यात्रा-दिशा-फल कथन। इन संक्रमणों का फल द्वादशार कालचक्र में एक राशि से दूसरी राशि की छलाँग (मण्डूक/मर्कटी/सिंहावलोकन गति) की रचना से जुड़ा है, संख्या से नहीं — फल गति की ज्यामिति पर टिका है, अंकगणित पर नहीं।

46.119
सिंहाच्च कर्कटे याते पस्चिमां वर्जयेद्दिशम् |
शुभयोगे शुभं ब्रूयादशुभे त्वशुभं फलम्
siṃhācca karkaṭe yāte pascimāṃ varjayeddiśam |
śubhayoge śubhaṃ brūyādaśubhe tvaśubhaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहात् = सिंह से; कर्कटे याते = कर्कट में जाने पर; पस्चिमाम्/पश्चिमाम् = पश्चिम दिशा (पाठ-भेद संभव: पस्चिमां ≈ पश्चिमां); वर्जयेत् = त्यागे; दिशम् = दिशा; शुभ-योगे = शुभ योग में; शुभम् ब्रूयात् = शुभ फल कहे; अशुभे = अशुभ में; अशुभं फलम् = अशुभ फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सिंह से कर्कट की ओर गमन होने पर पश्चिम दिशा वर्जित करनी चाहिए। साथ ही सामान्य नियम जोड़ा गया है—शुभ योग में शुभ फल बोलना, अशुभ में अशुभ फल। यह श्लोक एक विशिष्ट दिशा-वर्जन और एक व्यापक फल-कथन-नीति दोनों देता है: दिशा-नियम स्थानीय, योग-फल-नीति सार्वभौम।

English rendering The text states that when the movement is from Leo into Cancer, the western direction is to be avoided (reading पश्चिमां likely; पस्चिमां may be a recensional variant). In a benefic combination one should declare a benefic result; in a malefic setting, a malefic result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्तर:
1. संक्रमण-नियम: सिंह → कर्कट ⇒ पश्चिम दिशा वर्ज्य
2. योग-फल नीति: शुभयोग → शुभ कथन; अशुभ → अशुभ कथन
यह “बोलना” का नियम है—अंक-गणित नहीं, फल-घोषणा का द्वि-अवस्था नियम (binary phala-report rule)।

46.120
शूरश्चौरश्च मेषांशे लक्ष्मीवांश्च वृषांशके |
मिथुनांशे भवेज्ज्ञानी कर्कांशे नृपतिर्भवेत्
śūraścauraśca meṣāṃśe lakṣmīvāṃśca vṛṣāṃśake |
mithunāṃśe bhavejjñānī karkāṃśe nṛpatirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शूरः = वीर / साहसी; चौरः = चोरवृत्ति वाला; मेषांशे = मेष-नवांश (D9) में; लक्ष्मीवान् = सम्पन्न / लक्ष्मीयुक्त; वृषांशके = वृष-अंश में; मिथुनांशे = मिथुन-अंश में; ज्ञानी = ज्ञानवान्; कर्कांशे = कर्क-अंश में; नृपतिः = राजा / प्रमुख पद वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ अंश (प्रायः नवांश) की राशि के अनुसार फल बोलता है। मेष-अंश में व्यक्ति को शूर और चोर-वृत्ति वाला कहा गया है; वृष-अंश में लक्ष्मीवान्; मिथुन-अंश में ज्ञानी; और कर्क-अंश में नृपति-तुल्य बताया गया है। यह फल-कथन है — शास्त्र का अपना मानचित्र, न कि आधुनिक “भाग्य की गारंटी”।

English rendering The text maps character and status by the aṃśa-sign: Meṣa-aṃśa as brave yet thievish, Vṛṣa as prosperous, Mithuna as learned, and Karka as kingly. These are the śāstra’s stated correspondences for the divisional sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश-पहचान गणितीय है; फल नहीं। प्रत्येक राशि 30° = 9 × 3°20′ नवांश। लग्न/ग्रह की राशि-देशांतर λ_r (0°–30°) से नवांश-क्रमांक:
n = ⌊λ_r ÷ (10/3)⌋ + 1 (1…9)।
नवांश-राशि का आरंभ शास्त्रीय नियम से: चर राशि → उसी राशि से; स्थिर → 9वीं से; द्विस्वभाव → 5वीं से (क्रमशः आगे गिनें)। यहाँ फल केवल “अंश किस राशि में है” पर बाँधा गया है।

उदाहरण (worked example) मान लें चंद्र (या जिस तत्व का अंश लिया जा रहा हो) मिथुन में 12°40′।
λ_r = 12°40′; 3°20′ = 3.333…° → n = ⌊12.666… ÷ 3.333…⌋ + 1 = ⌊3.8⌋ + 1 = 4।
मिथुन द्विस्वभाव → नवांश-शृंखला तुला से: 1 तुला, 2 वृश्चिक, 3 धनु, 4 मकर → मकरांश। (इस श्लोक के फलों में मेष–कर्क क्रम; मकर का फल आगे 46.122 में।) अयनांश: सायन देशांतर पर ज्योतिषीय राशि तय करने के बाद यही विभाजन लागू होता है — अयनांश घोषित करना अनिवार्य।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन में D9 (नवांश) 30° का समान 9-खंड विभाजन है — शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। फल-तालिका (शूर/लक्ष्मीवान्/…) व्याख्या है; “अंश किस राशि में” की गणना exact `==` नियम से deterministic है। पाठ-भेद और संस्करण-भेद फल-पंक्तियों में संभव; गणना-नियम अलग पिन रहता है।

46.121
सिंहांशे राजमान्यश्च कन्यांशे पण्डितो भवेत् |
तुलांशे राजमन्त्री स्याद् वृश्चिकांशे च निर्धनः
siṃhāṃśe rājamānyaśca kanyāṃśe paṇḍito bhavet |
tulāṃśe rājamantrī syād vṛścikāṃśe ca nirdhanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहांशे = सिंह-अंश में; राजमान्यः = राजा द्वारा सम्मानित; कन्यांशे = कन्या-अंश में; पण्डितः = विद्वान्; तुलांशे = तुला-अंश में; राजमन्त्री = राज-सचिव / मंत्री; वृश्चिकांशे = वृश्चिक-अंश में; निर्धनः = धनहीन।

हिन्दी भावार्थ सिंह-अंश में शास्त्र राज-मान्यता का फल कहता है; कन्या-अंश में पण्डितत्व; तुला-अंश में राजमन्त्री-पद; और वृश्चिक-अंश में निर्धनता। यह 46.120 की अंश-फल श्रृंखला का मध्य भाग है — बारह राशियों के अंशों पर क्रमबद्ध कथन।

English rendering In Siṃha-aṃśa the text states royal esteem; in Kanyā, scholarship; in Tulā, a ministerial role; in Vṛścika, lack of wealth. The verse continues the aṃśa-to-phala mapping begun in the previous śloka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अंकगणित केवल यह तय करता है कि संबंधित तत्व (लग्न/ग्रह) का नवांश/अंश किस राशि में पड़ा; “राजमान्य / पण्डित / निर्धन” शास्त्र का फल-वाक्य है, गणना का आउटपुट नहीं।

46.122
चापांशे ज्ञानसम्पन्नो मरकांशे च पापकृत् |
कुम्भांशे च वणिक्कर्मा मीनांशे धनधान्यवान्
cāpāṃśe jñānasampanno marakāṃśe ca pāpakṛt |
kumbhāṃśe ca vaṇikkarmā mīnāṃśe dhanadhānyavān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चापांशे = धनु (चाप)-अंश में; ज्ञानसम्पन्नः = ज्ञान से युक्त; मरकांशे = मकरांश (पाठ: मरकांशे — पाठ-भेद संभव; प्रायः मकर); पापकृत् = पाप-कर्म करने वाला (शास्त्र-शब्द); कुम्भांशे = कुम्भ-अंश में; वणिक्कर्मा = वाणिज्य-कर्म; मीनांशे = मीन-अंश में; धनधान्यवान् = धन-धान्य से सम्पन्न।

हिन्दी भावार्थ धनु-अंश में ज्ञान-सम्पन्न कहा गया; मकर-अंश (पाठ “मरकांशे”) में पापकृत्; कुम्भ-अंश में वणिक्-कर्म; मीन-अंश में धन-धान्यवान्। इससे मेष से मीन तक बारह अंश-फल पूरे होते हैं। “पापकृत्” यहाँ शास्त्र का पारंपरिक श्रेणी-शब्द है — नैतिक दण्ड या भय का आधुनिक दावा नहीं।

English rendering Dhanu-aṃśa is stated as endowed with knowledge; Makara-aṃśa (reading marakāṃśe — patha-bheda possible) as given to harmful acts; Kumbha as mercantile work; Mīna as rich in wealth and grain. Thus the twelve-sign aṃśa-phala cycle closes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अंश-फल-समाप्ति। नवांश-राशि n ∈ {मेष…मीन} निर्धारित होने के बाद यह श्लोक केवल अंतिम चार राशियों का शास्त्रीय फल जोड़ता है; कोई नया विभाजन-सूत्र नहीं।

46.123
देहो जीवोऽथवा युक्तो रविभौमार्किराहुभिः |
एकैकयोगे मृत्युः स्याद् बहुयोगे तु का कथा
deho jīvo'thavā yukto ravibhaumārkirāhubhiḥ |
ekaikayoge mṛtyuḥ syād bahuyoge tu kā kathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहः = कालचक्र की देह-राशि (शरीर-सूचक); जीवः = जीव-राशि (प्राण/आयु-सूचक); अथवा युक्तः = अथवा युक्त होने पर; रवि-भौम-अर्कि-राहुभिः = सूर्य, मंगल, शनि (अर्कि = अर्क-सुत = शनि) और राहु से; एकैकयोगे = किसी एक के योग में; मृत्युः स्यात् = मृत्यु-भय हो; बहुयोगे = बहुतों के योग में; का कथा = कहना ही क्या (और भी अधिक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि देह अथवा जीव राशि यदि सूर्य, मंगल, शनि या राहु — इन चार क्रूर ग्रहों में से किसी एक से भी युक्त हो तो मृत्यु-भय की सम्भावना बतायी जाती है; और यदि अनेक क्रूर ग्रहों से युक्त हो, तब तो कहना ही क्या। यह क्रूर-योग की संख्या पर आश्रित एक फल-वचन है, कोई निश्चित विधान नहीं।

English rendering The text states that if the deha- or jīva-sign is joined even by one of Sun, Mars, Saturn or Rāhu, mortal danger is spoken of — and with many such conjunctions, all the more so.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन, परन्तु एक स्पष्ट गणन-आधार है। क्रूर-समुच्चय M = {रवि, भौम, शनि, राहु}; देह/जीव पर आश्रित क्रूरों की गिनती |M| = 1 → मृत्यु-भय; |M| > 1 → उत्तरोत्तर तीव्र। यही गिनती आगे 124–125 में श्रेणीबद्ध होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ शास्त्र मृत्यु का कठोर फल कहता है — हमारी अनुशासन-पद्धति ऐसे वचन को "शास्त्र कहता है" रूप में ही रखती है, नियति या निश्चयात्मक भविष्यवाणी के रूप में नहीं। दशा-काल की गणना (राशि-गति, अवधि) यन्त्र से यथार्थ निकाली जाती है, जबकि यह फल-दावा उससे पृथक् रखा जाता है — गणित और व्याख्या को अलग रखने का वही मूल नियम जिस पर पूरा डिकोड टिका है।

46.124
क्रूरैर्युक्ते तनौ रोगं जीवे युक्ते महद् भयम् |
आधी रोगो भवेद् द्वाभ्या.मपमृत्युस्र्तिभिर्भवेत्
krūrairyukte tanau rogaṃ jīve yukte mahad bhayam |
ādhī rogo bhaved dvābhyā.mapamṛtyusrtibhirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूरैः = क्रूर ग्रहों से; युक्ते तनौ = तनु/देह युक्त होने पर; रोगम् = रोग; जीवे युक्ते = जीव युक्त होने पर; महद् भयम् = बड़ा भय; आधी = आधा; रोगः = रोग; द्वाभ्याम् = दो से; अपमृत्युः = अपमृत्यु (अकाल/असामान्य मृत्यु-संकेत); त्रिभिः = तीन से (पाठ: अपमृत्युस्र्तिभिर् — स्पष्टतः अपमृत्युः त्रिभिर्; पाठ-भेद/मुद्रण-दोष संभव)।

हिन्दी भावार्थ क्रूरों से तनु/देह युक्त हो तो शास्त्र रोग कहता है; जीव युक्त हो तो महान् भय। दो क्रूरों से “आधा रोग”; तीन से अपमृत्यु — यह गिनती-क्रम पर बाँधा फल है। “अपमृत्यु” शास्त्रीय श्रेणी है; भय-वाणिज्य या इलाज-दबाव में न उलझाएँ।

English rendering With malefics on the body-factor the text states disease; on the life-factor, great fear. Two yield “half-disease”; three, apamṛtyu. The count of harsh grahas is the only numeric scaffold; the outcomes remain the śāstra’s stated phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सरल गिनती-सीढ़ी (फल के साथ), कोई निरंतर सूत्र नहीं:
- k = क्रूर-ग्रहों की संख्या जो तनु/जीव से युक्त
- k = 1 (तनु) → रोग; k = 1 (जीव) → महद् भय (शास्त्र)
- k = 2 → आधी रोग
- k = 3 → अपमृत्यु
क्रूर-समुच्चय यहाँ प्रसंगतः रवि-भौम-अर्कि-राहु (पूर्व श्लोक) से जुड़ता है; पूर्ण सूची पाठ-परंपरा में विस्तृत हो सकती है।

उदाहरण (worked example) मान लें जीव-राशि = तुला; वहाँ शनि + राहु (k = 2), मंगल/सूर्य नहीं। शास्त्र-सीढ़ी के अनुसार k = 2 → “आधी रोग” का कथन। यदि तीसरा क्रूर (मंगल) भी उसी राशि में हो → k = 3 → अपमृत्यु-संकेत (शास्त्र)। ग्रह-स्थितियाँ: उदाहरणार्थ अयनांश लाहिरी, गृह-पद्धति समान-भाव — घोषित रखकर ही देशांतर से राशि तय करें।

46.125
चतुर्भिर्मृतिमापन्नो देहे जीवेऽशुभैर्युते |
युगपद्देहजीवौ च क्रूरग्रहयुतौ तदा
caturbhirmṛtimāpanno dehe jīve'śubhairyute |
yugapaddehajīvau ca krūragrahayutau tadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्भिः = चार से; मृतिम् आपन्नः = मृत्यु को प्राप्त (शास्त्र-कथन); देहे जीवे = देह और जीव में; अशुभैः युते = अशुभ ग्रहों से युक्त; युगपत् = एक साथ; देहजीवौ = देह और जीव दोनों; क्रूरग्रहयुतौ = क्रूर ग्रहों से युक्त; तदा = तब (अगला श्लोक फल पूरा करता है)।

हिन्दी भावार्थ चार अशुभ/क्रूरों से युक्त होने पर शास्त्र देह-जीव संदर्भ में मृत्यु-प्राप्ति कहता है। और जब देह तथा जीव दोनों एक साथ क्रूर-युक्त हों — वाक्य वहीं अधूरा रहकर अगले श्लोक में फल खोलता है। यह 46.123–124 की गिनती-सीढ़ी का चरम पद है।

English rendering With four malefics the text states arrival at death for the deha/jīva setting. When deha and jīva are both simultaneously joined by harsh grahas, the clause continues into the next verse for the stated outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गिनती k = 4 और द्वि-स्थान योग)।
शर्तें (शास्त्र के अनुसार):
(1) k ≥ 4 अशुभ युक्त → मृत्यु-संकेत;
(2) देह ∈ क्रूर-युक्त ∧ जीव ∈ क्रूर-युक्त (युगपत्) → अगला फल (46.126)।
कोई रूप/वर्ष/अंश-गुणक नहीं — केवल योग-तर्क।

46.126
राजचोरादिभीतिश्च मृतिश्चापि न संशयः |
वह्निवाधा रवौ ज्ञेया क्षीणेन्दौ च जलाद् भयम्
rājacorādibhītiśca mṛtiścāpi na saṃśayaḥ |
vahnivādhā ravau jñeyā kṣīṇendau ca jalād bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजचोरादिभीतिः = राजा, चोर आदि से भय; मृतिः = मृत्यु; अपि = भी; न संशयः = संदेह नहीं (शास्त्र का निश्चय-शब्द); वह्निवाधा = अग्नि-पीड़ा/अग्नि से बाधा; रवौ = सूर्य में (सूर्य-योग/सूर्य-संबंध); ज्ञेया = जाननी चाहिए; क्षीणेन्दौ = क्षीण चंद्र (कृष्णपक्ष/बलहीन चंद्र) में; जलाद् भयम् = जल से भय।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के युगपत् देह-जीव क्रूर-योग का फल शास्त्र यों कहता है — राज-चोर आदि का भय और मृत्यु, “न संशयः”। फिर विशिष्ट संकेत: सूर्य-संबंध में वह्नि-बाधा; क्षीण चंद्र में जल से भय। “न संशयः” पाठ की अपनी दृढ़ शैली है — संपादकीय दावा या आधुनिक भविष्यवाणी नहीं। अग्नि/जल यहाँ शास्त्रीय उपमा-संकेत हैं, चिकित्सा या बीमा-सलाह नहीं।

English rendering For that simultaneous harsh yoga on deha and jīva the text states fear from king, thieves, and the like, and death “without doubt.” It adds: with the Sun, obstruction from fire; with a waning/weak Moon, fear from water. Keep these as the śāstra’s phala-language, not as endorsed forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / विशेष-ग्रह संकेत।
केवल शर्त-मैप:
- युगपत् देह∧जीव क्रूर-युक्त → राजचोरादि-भीति + मृत्यु (शास्त्र)
- रवि-योग → वह्निवाधा
- क्षीणेन्दु (प्रायः कृष्णपक्ष, विशेषतः बल-हीन चंद्र — परंपरा में परिभाषा भिन्न; पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव) → जल-भय
कोई दशा-वर्ष या बलांक यहाँ नहीं गिना गया।

46.127
कुजे शस्त्रकृता पीडा वायुवाधा बुधे भवेत् |
गुल्मवाधा शनौ ज्ञेया राहौ केतौ विषाद् भयम्
kuje śastrakṛtā pīḍā vāyuvādhā budhe bhavet |
gulmavādhā śanau jñeyā rāhau ketau viṣād bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजे = मंगल-दशा/स्थितौ; शस्त्रकृता पीडा = शस्त्र/अस्त्र-कृत कष्ट (शास्त्र-कथन); वायुवाधा = वात-संबंधी बाधा (शास्त्रीय फल-भाषा); बुधे = बुध-दशा/स्थितौ; गुल्मवाधा = गुल्म-वर्ग की बाधा (शास्त्र-कथन, चिकित्सकीय निदान नहीं); शनौ = शनि; राहौ केतौ = राहु-केतु; विषाद् भयम् = विष से भय।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक विभिन्न ग्रहों से जुड़ी दशा/फल-भाषा में कष्ट-प्रकारों का वर्गीकरण बताता है। शास्त्र कहता है कि कुज (मंगल) से शस्त्र-कृत पीड़ा, बुध से वायु-बाधा, शनि से गुल्म-बाधा, तथा राहु-केतु से विष-जनित भय ज्ञात होता है। यह फल-कथन है—भविष्य की निश्चित घोषणा नहीं; पाठ-भेद और टीका-परंपरा में विस्तार संभव है।

English rendering The text states that under Mars there is weapon-related affliction; under Mercury, wind-type disturbance; under Saturn, gulma-type affliction; and under Rāhu and Ketu, fear arising from poison. These are classical phala categories, not medical diagnoses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-विशिष्ट कष्ट-वर्ग)। गणना-नियंत्रण यहाँ नहीं; यह दशा/ग्रह-फल की शास्त्रीय सूची है, जिसे “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

46.128
देहजीवगृहे यातो बुधो जीवोऽथवा भृगुः |
सुखस्म्पत्कराः सर्वे रोगशोकविनाशनाः
dehajīvagṛhe yāto budho jīvo'thavā bhṛguḥ |
sukhasmpatkarāḥ sarve rogaśokavināśanāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहजीवगृहे = देह-गृह तथा जीव-गृह में; यातो = पहुँचा/स्थित; बुधो = बुध; जीवो = गुरु; अथवा भृगुः = अथवा शुक्र; सुखसंपत्कराः = सुख और संपत्ति देने वाले; सर्वे = सभी (ये तीन); रोगशोकविनाशनाः = रोग और शोक का नाश करने वाले (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ जब बुध, गुरु अथवा शुक्र देह-गृह या जीव-गृह में स्थित हों (अथवा उस संदर्भ में सक्रिय माने जाएँ), तो शास्त्र उन्हें सुख-संपत्ति कारक बताता है। वे रोग और शोक का विनाश करने वाले कहे गए हैं—यह फल-वाक्य है, चिकित्सकीय या जीवन-निश्चितता का दावा नहीं। “देह/जीव गृह” चक्र-दशा/राशि-चक्र की तकनीकी भाषा में समझे जाएँ; परिभाषा अध्याय-संदर्भ पर निर्भर करती है।

English rendering Mercury, Jupiter, or Venus, when placed in the deha or jīva houses, are said by the text to confer comfort and prosperity and to dissolve disease and sorrow. Read as śāstra-phala, not as a guaranteed life outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-ग्रह + देह/जीव गृह)। संख्यात्मक गुणांक यहाँ नहीं; “देह/जीव” का गृह-निर्धारण चक्र-दशा/राशि-क्रम की घोषित परिभाषा पर टिका है—परंपरा में पाठ-भेद संभव।

46.129
मिश्रगृहैश्च संयुक्ते मिश्रं फलमवाप्नुयात् |
पापक्षेत्रदशाकाले देहजीवौ तु दुःखितौ |
शुभक्षेत्रदशाकाले शुभं भवति निश्चितम्
miśragṛhaiśca saṃyukte miśraṃ phalamavāpnuyāt |
pāpakṣetradaśākāle dehajīvau tu duḥkhitau |
śubhakṣetradaśākāle śubhaṃ bhavati niścitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिश्रगृहैः = मिश्र (शुभ-अशुभ मिश्रित) गृहों से; संयुक्ते = युक्त होने पर; मिश्रं फलम् = मिश्रित फल; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे; पापक्षेत्रदशाकाले = पाप-क्षेत्र की दशा-काल में; देहजीवौ = देह और जीव; दुःखितौ = दुःखी/पीड़ित (शास्त्र-कथन); शुभक्षेत्रदशाकाले = शुभ-क्षेत्र दशा में; शुभं निश्चितम् = शुभ निश्चित कहा गया।

हिन्दी भावार्थ मिश्र-गृहों से युक्त स्थिति में शास्त्र मिश्र-फल बताता है। पाप-क्षेत्र की दशा-काल में देह और जीव दोनों दुःखित कहे गए; शुभ-क्षेत्र की दशा में शुभ फल “निश्चित” शब्द से कहा गया है—यह शास्त्र की अपनी निश्चय-भाषा है, हमारे द्वारा अनुमोदित भाग्य-निर्णय नहीं। क्षेत्र (क्षेत्र = राशि/स्वामित्व-क्षेत्र) की शुभ-पाप पहचान दशा-फल की कुंजी है।

English rendering Conjunction with mixed houses yields mixed results. In a pāpa-kṣetra daśā the text states that deha and jīva suffer; in a śubha-kṣetra daśā the result is declared auspicious. The word “niścitam” is the text’s own diction of certainty, not an external fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-वर्गीकरण (मिश्र / पापक्षेत्र / शुभक्षेत्र दशा)। तकनीक तार्किक त्रि-वर्ग है: मिश्र → मिश्र-फल; पाप-क्षेत्र-दशा → देह-जीव दुःख; शुभ-क्षेत्र-दशा → शुभ-फल—संख्यात्मक गुणन नहीं, गुणात्मक नियम।

46.130
शुभयुक्ताशुभक्षेत्रदशा मिश्रफला स्मृता |
क्रूरयुक्तशुभक्षेत्रदशा मिश्रफला तथा
śubhayuktāśubhakṣetradaśā miśraphalā smṛtā |
krūrayuktaśubhakṣetradaśā miśraphalā tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभयुक्त-अशुभक्षेत्रदशा = शुभ-ग्रह से युक्त अशुभ-राशि की दशा; मिश्रफला स्मृता = मिश्र-फल मानी गयी है; क्रूरयुक्त-शुभक्षेत्रदशा = क्रूर-ग्रह से युक्त शुभ-राशि की दशा; मिश्रफला तथा = वह भी मिश्र-फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र संयोजन-नियम को पूर्ण करता है — अशुभ राशि की दशा यदि शुभ ग्रह से युक्त हो तो वह मिश्र-फल देती है, और इसी प्रकार शुभ राशि की दशा यदि क्रूर ग्रह से युक्त हो तो वह भी मिश्र-फल देती है। अर्थात् राशि-स्वभाव और ग्रह-स्वभाव विपरीत होने पर फल परस्पर मिल जाता है।

English rendering The text states that a malefic-sign daśā joined by benefics is reckoned mixed in result, and likewise a benefic-sign da␣śā joined by cruel planets is also mixed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दो-चर संयोजन-सारणी (क्षेत्र-स्वभाव × ग्रह-स्वभाव), मानो एक सत्य-सारणी:
शुभ-क्षेत्र + शुभ-ग्रह → शुभ; पाप-क्षेत्र + क्रूर-ग्रह → दुःख
पाप-क्षेत्र + शुभ-ग्रह → मिश्र; शुभ-क्षेत्र + क्रूर-ग्रह → मिश्र
अर्थात् दोनों निवेश समचिह्न हों तो फल शुद्ध, विपरीत-चिह्न हों तो मिश्र — एक स्पष्ट बूलीय संयोजन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक दो स्वतन्त्र निवेशों (राशि-स्वभाव, ग्रह-स्वभाव) को एक घोषित नियम से संयोजित करता है — ठीक वही अनुशासन जिसे हम सर्वत्र लागू रखते हैं: निवेश पृथक् रखो, संयोजन-नियम घोषित करो, और परिणाम को शास्त्र का कथन मानो, नियति नहीं। जहाँ परम्पराएँ भिन्न हों (जैसे अष्टकवर्ग में BPHS बनाम फलदीपिका), वहाँ हम चुनी हुई संगति स्पष्ट घोषित करते हैं; यहाँ भी शुभ/क्रूर के मिश्रण का विधान उसी "घोषित-संगति" पद्धति का पूर्ववर्ती रूप है।

46.131
जनानां जन्मकाले तु यो राशिस्तनुभावगः |
तस्य चक्रदशाकाले देहारोग्यं सुखं महत्
janānāṃ janmakāle tu yo rāśistanubhāvagaḥ |
tasya cakradaśākāle dehārogyaṃ sukhaṃ mahat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जनानाम् = मनुष्यों के; जन्मकाले = जन्म-समय पर; यः राशिः = जो राशि; तनु-भाव-गः = तनु-भाव (प्रथम/लग्न भाव) में स्थित; तस्य चक्र-दशा-काले = उसी राशि की कालचक्र-दशा के समय; देह-आरोग्यम् = शरीर की नीरोगता; सुखं महत् = महान सुख।

हिन्दी भावार्थ जन्म के समय जो राशि लग्न (तनु-भाव) में उदित होती है, कालचक्र-दशा-क्रम में जब उसी राशि की दशा चलती है, तब शास्त्र कहता है कि शरीर नीरोग रहता है और महान सुख मिलता है। यह श्लोक कालचक्र-दशा के भाव-वार फल-कथन का आरम्भ-बिन्दु है, जो लग्न-भाव से चलकर आगे क्रमशः बारहों भावों तक फैलता है।

English rendering When the sign that stood in the tanu-bhāva (the ascendant) at birth runs its turn in the Kālachakra-daśā, the text states there is bodily health and great well-being.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-दशा का प्रथम-भाव फल)। यहाँ कोई अंकगणित नहीं; एकमात्र संचालक नियम यह है कि जिस भाव की राशि की दशा चल रही हो, उसी भाव के कारकत्व का फल पढ़ा जाता है — यहाँ भाव-सूचकांक = 1 (तनु = देह)।

हमारा डिकोड (Our Decode) ये श्लोक कालचक्र-दशा (12-राशि आधारित दशा) के हैं, जो हमारे इंजन में पिन की गई विंशोत्तरी 120-वर्ष माला (केतु 7 … Σ=120) से भिन्न स्वतंत्र पद्धति है। हमारी अनुशासन-नीति के अनुसार यहाँ केवल फल-कथन है, अतः इसे "शास्त्र कहता है" के रूप में रखा गया है, न कि किसी भविष्यवाणी के रूप में — गणित और व्याख्या को अलग रखने का वही सिद्धान्त।

46.132
शुभे पूर्णसुखं पापे देहे रोगादिसम्भवः |
स्वोच्चादिगतखेटाढ्ये राज्यमानधनाप्तयः
śubhe pūrṇasukhaṃ pāpe dehe rogādisambhavaḥ |
svoccādigatakheṭāḍhye rājyamānadhanāptayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभे = शुभ (राशि/स्वामी होने पर); पूर्ण-सुखम् = सम्पूर्ण सुख; पापे = पाप (राशि होने पर); देहे = देह/प्रथम भाव में; रोगादि-सम्भवः = रोग आदि की उत्पत्ति; स्वोच्चादि-गत-खेट-आढ्ये = अपनी उच्च/स्वराशि आदि में गए ग्रह से युक्त होने पर; राज्य-मान-धन-आप्तयः = राज्य, मान और धन की प्राप्तियाँ।

हिन्दी भावार्थ यही प्रथम-भाव फल शुभ राशि में हो तो पूर्ण सुख देता है, और पाप राशि में हो तो देह में रोगादि की सम्भावना बताता है — ऐसा शास्त्र का कथन है। यदि उस राशि में कोई ग्रह अपनी उच्च या स्वराशि आदि में स्थित होकर बल दे, तो शास्त्र राज्य, सम्मान और धन की प्राप्ति कहता है।

English rendering If the sign is benefic, full happiness; if malefic, disease and the like may arise in the body — and where a planet in its own sign or exaltation enriches it, the text states attainments of dominion, honour, and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ/पाप द्विध्रुव नियम)। संचालक तकनीक एक सर्तिक टॉगल है: शुभ-राशि → पूर्ण (अनुकूल) फल; पाप-राशि → विपरीत/रोगादि। एक अतिरिक्त बल-शर्त: दशाराशि में स्वोच्च/स्वराशिगत ग्रह → राज्य-मान-धन। रोगादि यहाँ शास्त्र की सशर्त उक्ति है, कोई निश्चित घोषणा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशाराशि में "स्वोच्च/स्वराशिगत ग्रह" का बल-योग वही विचार है जिसे हमारा षड्बल ढाँचा (BPHS Ch.27) स्थान-बल के रूप में संख्यात्मक रूप देता है — यहाँ पाठ उसे गुणात्मक रूप में उपयोग करता है। रोगादि/राज्यादि फल को हम शास्त्र की उक्ति के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं; कोई चिकित्सीय भविष्यवाणी नहीं — यही गणित-बनाम-व्याख्या का अनुशासन।

46.133
धनभावे च यो राशिस्तस्य चक्रदशा यदा |
तदा सुभोजन.म् पुत्रस्त्रिसुखं च धनाप्तयः
dhanabhāve ca yo rāśistasya cakradaśā yadā |
tadā subhojana.m putrastrisukhaṃ ca dhanāptayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनभावे = द्वितीय भाव में; यो राशिः = जो राशि; तस्य चक्रदशा = उसकी चक्र-दशा; यदा = जब; तदा = तब; सुभोजनम् = उत्तम भोजन; पुत्रस्त्रीसुखं = पुत्र और स्त्री-सुख (शास्त्र-कथन; “स्त्रि” = स्त्री, पाठ-रूप); धनाप्तयः = धन-प्राप्तियाँ।

हिन्दी भावार्थ जन्म-कुंडली में धन-भाव (द्वितीय) में जो राशि स्थित हो, उसकी चक्र-दशा आने पर शास्त्र सुभोजन, पुत्र-स्त्री सुख और धन-लाभ बताता है। यह तनु-भाव वाले पूर्व-श्लोक का धन-भाव पूरक है—भाव-स्थित राशि → उसी राशि की चक्र-दशा → भाव-अनुकूल फल। अवधि-सूत्र यहाँ नहीं; केवल फल-संकेत।

English rendering When the rāśi that occupies the second house (dhana-bhāva) has its cakra-daśā, the text states good food, happiness through children and spouse, and gains of wealth. No period arithmetic is given in the verse itself.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धन-भाव राशि की चक्र-दशा)। नियम-आकार: यदि R₂ = धन-भाव-राशि, तो चक्र-दशा(R₂) काल में शास्त्र सुभोजन–पुत्र/स्त्री-सुख–धन-प्राप्ति कहता है—वर्ष-गणन इस श्लोक में नहीं।

46.134
विद्याप्तिर्वाक्पटुत्वं च सुगोष्ठ्या कालयापनम् |
शुभर्क्षे फलमेवं स्यात् पापभे फलमन्यथा
vidyāptirvākpaṭutvaṃ ca sugoṣṭhyā kālayāpanam |
śubharkṣe phalamevaṃ syāt pāpabhe phalamanyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्याप्तिः = विद्या की प्राप्ति; वाक्पटुत्वम् = वाणी में निपुणता / वक्तृत्व-कौशल; सुगोष्ठ्या = उत्तम संग / सत्सभा से; कालयापनम् = समय का व्यतीत होना / काल-यापन; शुभर्क्षे = शुभ राशि / शुभ नक्षत्र में; फलम् एवं स्यात् = फल इस प्रकार हो; पापभे = पाप राशि में; फलम् अन्यथा = फल उलटा / विपरीत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कालचक्र-दशा शुभ राशि/नक्षत्र में चल रही हो, तब विद्या की प्राप्ति, वाणी में पटुता, उत्तम संगति और सुन्दर काल-यापन — ये फल संकेतित होते हैं। पाप राशि में वही दशा-काल विपरीत फल की ओर संकेत करता है — अर्थात शुभ पक्ष का अभाव या उलटा अनुभव। यह फल-कथन शुभ/पाप भेद पर टिका है, किसी निश्चित भाग्य-घोषणा पर नहीं।

English rendering The text states that in a benefic sign the indicated results are attainment of learning, eloquence, good company, and wholesome passing of time; in a malefic sign the results are otherwise — the reverse of those goods.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभर्क्ष / पापभ भेद)। यह श्लोक गणना नहीं देता; यह केवल यह नियम बताता है कि कालचक्र-दशा का फल राशि की शुभ/पाप प्रकृति के अनुसार “एवं / अन्यथा” पलटता है।

46.135
तृतीयभावराशेस्तु कालचक्रदशा यदा |
तदा भ्रातृसुखं शौर्यं धैर्यं चापि महत्सुखम्
tṛtīyabhāvarāśestu kālacakradaśā yadā |
tadā bhrātṛsukhaṃ śauryaṃ dhairyaṃ cāpi mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीयभावराशेः = तृतीय भाव की राशि का; कालचक्रदशा = कालचक्र-दशा; यदा = जब; तदा = तब; भ्रातृसुखम् = भाइयों से सुख / भ्रातृ-सुख; शौर्यम् = शौर्य / वीरता; धैर्यम् = धैर्य / स्थिरता; चापि = और भी; महत्सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब तृतीय भावगत राशि की कालचक्र-दशा चलती है, तब भ्रातृ-सुख, शौर्य, धैर्य तथा महान् सुख — ये फल संकेतित होते हैं। तृतीय भाव यहाँ भ्रातृ, साहस और पराक्रम के क्षेत्र से जोड़ा गया है। फल का विस्तार अगले श्लोक में शुभ/पाप राशि-भेद से और स्पष्ट होगा।

English rendering The text states that when the Kālacakra daśā of the sign occupying the third house runs, the indicated results are happiness through brothers (or siblings), valor, fortitude, and great comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तृतीय-भाव कालचक्र-दशा)। गणना का भाग केवल यह पहचान है कि “तृतीयभाव-राशेः” = लग्न से तृतीय भाव में स्थित राशि की दशा-अवधि; अवधि-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

46.136
स्वर्णाभरणवस्त्राप्तिः सम्मानं राजसंसदि |
शुभर्क्षे फलमेवं स्यात् पापर्क्षे फलमन्यथा
svarṇābharaṇavastrāptiḥ sammānaṃ rājasaṃsadi |
śubharkṣe phalamevaṃ syāt pāparkṣe phalamanyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्णाभरणवस्त्राप्तिः = स्वर्ण, आभूषण और वस्त्र की प्राप्ति; सम्मानम् = सम्मान / प्रतिष्ठा; राजसंसदि = राज-सभा / राज-दरबार में; शुभर्क्षे = शुभ राशि में; फलम् एवं स्यात् = फल इस प्रकार; पापर्क्षे = पाप राशि में; फलम् अन्यथा = फल विपरीत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (तृतीय-भाव दशा के संदर्भ में) शुभ राशि में स्वर्ण, आभूषण, वस्त्र की प्राप्ति तथा राज-सभा में सम्मान — ये फल संकेतित होते हैं। पाप राशि में वही दशा-फल “अन्यथा” — अर्थात् इन शुभ संकेतों का अभाव या उलटा अनुभव — कहा गया है। यह श्लोक 46.135 के भ्रातृ-शौर्य-सुख को बाह्य प्रतिष्ठा और संपत्ति-संकेतों से जोड़ता है।

English rendering The text states that gold, ornaments, and clothing, together with honor in the royal assembly, are the indicated fruits in a benefic sign; in a malefic sign the results are otherwise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभर्क्ष / पापर्क्ष द्वैत)। यहाँ कोई अंश, वर्ष या बल-इकाई नहीं; केवल फल की दिशा शुभ/पाप राशि पर निर्भर बताई गई है।

46.137
सुखभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
तदा बन्धुसुखं भूमिगृहराज्यसुखाप्तयः
sukhabhāvagatarkṣasya kālacakradaśā yadā |
tadā bandhusukhaṃ bhūmigṛharājyasukhāptayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखभावगतर्क्षस्य = सुख-भाव (चतुर्थ भाव) में स्थित राशि/नक्षत्र का; कालचक्रदशा = कालचक्र-दशा; यदा = जब; तदा = तब; बन्धुसुखम् = बन्धुओं से सुख; भूमिगृहराज्यसुखाप्तयः = भूमि, गृह और राज्य से सुख की प्राप्तियाँ (बहुवचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सुख-भाव (चतुर्थ भाव) में स्थित राशि की कालचक्र-दशा आती है, तब बन्धु-सुख तथा भूमि, गृह और राज्य से जुड़े सुखों की प्राप्ति — ये फल संकेतित होते हैं। “सुखभाव” यहाँ चतुर्थ भाव का शास्त्रीय नाम है — गृह, भूमि, माता-बन्धु-सुख का क्षेत्र। अगला श्लोक इसी दशा के फल को आरोग्य-अर्थ-वाहन से विस्तृत करता है।

English rendering The text states that when the Kālacakra daśā of the sign in the fourth (sukha) house runs, the indicated results are happiness through kin and the attainment of comforts from land, house, and dominion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थ/सुख-भाव कालचक्र-दशा)। तकनीकी पहचान: सुखभाव-गत राशि = D1 में लग्न से चतुर्थ भाव में पड़ी राशि; दशा-अवधि का सूत्र इस श्लोक में नहीं दिया गया।

46.138
आरोग्यमर्थलाभश्च वस्त्रवाहनजं सुखम् |
शुभर्क्षे शोभनं ज्ञेयं पापभे फलमन्यथा
ārogyamarthalābhaśca vastravāhanajaṃ sukham |
śubharkṣe śobhanaṃ jñeyaṃ pāpabhe phalamanyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरोग्यम् = आरोग्य / स्वास्थ्य; अर्थलाभः = अर्थ का लाभ; च = और; वस्त्रवाहनजं सुखम् = वस्त्र और वाहन से उत्पन्न सुख; शुभर्क्षे = शुभ राशि में; शोभनम् ज्ञेयम् = शुभ / उत्तम जानना चाहिए; पापभे = पाप राशि में; फलम् अन्यथा = फल विपरीत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (सुख-भाव दशा के विस्तार में) आरोग्य, अर्थ-लाभ तथा वस्त्र-वाहन से सुख — ये फल शुभ राशि में “शोभन” जानने चाहिए। पाप राशि में फल अन्यथा कहा गया है — शुभ संकेतों का उलटा या न्यून अनुभव। यह श्लोक 46.137 के भूमि-गृह-राज्य-सुख को स्वास्थ्य, धन और साधन-सुख से जोड़ता है; कोई चिकित्सा या आर्थिक “भविष्यवाणी” नहीं, केवल शास्त्र का फल-विन्यास।

English rendering The text states that health, gain of wealth, and comfort arising from clothes and conveyances are to be known as auspicious in a benefic sign; in a malefic sign the results are otherwise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभर्क्ष = शोभन; पापभ = अन्यथा)। गणना नहीं; केवल फल-दिशा का द्वैत नियम।

46.139
सुतभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
सुतस्त्रीराज्यसौख्याप्तिरारोग्यं मित्रसंगमः
sutabhāvagatarkṣasya kālacakradaśā yadā |
sutastrīrājyasaukhyāptirārogyaṃ mitrasaṃgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतभावगतर्क्षस्य = सुत-भाव (पञ्चम भाव) में स्थित राशि/नक्षत्र का; कालचक्रदशा = कालचक्र-दशा; यदा = जब; सुतस्त्रीराज्यसौख्याप्तिः = पुत्र/सन्तान, स्त्री और राज्य से सौख्य की प्राप्ति; आरोग्यम् = आरोग्य; मित्रसंगमः = मित्रों से मिलन / मित्र-संगम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सुत-भाव (पञ्चम भाव) में स्थित राशि की कालचक्र-दशा चलती है, तब सन्तान, स्त्री और राज्य से जुड़े सौख्य की प्राप्ति, आरोग्य तथा मित्रों का संगम — ये फल संकेतित होते हैं। पञ्चम यहाँ सन्तान, मन्त्र-बुद्धि-क्षेत्र और सौख्य-लाभ से जोड़ा गया है। फल की पूर्णता/विपरीतता अगले श्लोक में शुभ/पाप राशि से बाँधी गई है।

English rendering The text states that when the Kālacakra daśā of the sign in the fifth (suta) house runs, the indicated results are attainment of happiness through children, spouse, and dominion, together with health and meeting with friends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पञ्चम/सुत-भाव कालचक्र-दशा)। तकनीकी पहचान: सुतभाव-गत राशि = D1 में लग्न से पञ्चम भाव की राशि; दशा-वर्ष-गणना यहाँ नहीं है।

46.140
विद्याबुद्धियशोलाभो धैर्यं च विक्रमोदयः |
शुभराशौ शुभं पूर्णं पापर्क्षे फलमन्यथा
vidyābuddhiyaśolābho dhairyaṃ ca vikramodayaḥ |
śubharāśau śubhaṃ pūrṇaṃ pāparkṣe phalamanyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्याबुद्धियशोलाभः = विद्या, बुद्धि और यश का लाभ; धैर्यम् = धैर्य; च = और; विक्रमोदयः = विक्रम / पराक्रम का उदय; शुभराशौ = शुभ राशि में; शुभं पूर्णम् = पूर्ण शुभ; पापर्क्षे = पाप राशि में; फलम् अन्यथा = फल विपरीत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (सुत-भाव दशा के विस्तार में) विद्या, बुद्धि और यश का लाभ, धैर्य तथा विक्रम का उदय — ये फल शुभ राशि में “पूर्ण शुभ” माने गए हैं। पाप राशि में फल अन्यथा — अर्थात् इन शुभ संकेतों का अभाव या उलटा अनुभव — कहा गया है। इस प्रकार 46.139–46.140 मिलकर पञ्चम-भाव कालचक्र-दशा का फल-द्वय (मूल फल + शुभ/पाप संशोधन) पूरा करते हैं।

English rendering The text states that gain of learning, intellect, and fame, together with fortitude and the rise of valor, are fully auspicious in a benefic sign; in a malefic sign the results are otherwise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभराशौ = पूर्ण शुभ; पापर्क्षे = अन्यथा)। कोई अंश, वर्ष या बल-इकाई नहीं; केवल फल की पूर्णता/विपरीतता का राशि-आधारित नियम।

46.141
रिपुभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
तदा चोरादिभूपाग्निविषशस्त्रभयं महत्
ripubhāvagatarkṣasya kālacakradaśā yadā |
tadā corādibhūpāgniviṣaśastrabhayaṃ mahat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रिपु-भाव-गत-ऋक्षस्य = रिपु-भाव (षष्ठ) में स्थित राशि की; कालचक्र-दशा यदा = कालचक्र-दशा जब; तदा = तब; चोर-आदि-भूप-अग्नि-विष-शस्त्र-भयम् = चोर आदि, राजा, अग्नि, विष और शस्त्र से भय; महत् = बड़ा/तीव्र।

हिन्दी भावार्थ जो राशि षष्ठ (रिपु/शत्रु) भाव में हो, उसकी कालचक्र-दशा में शास्त्र चोर, राजा, अग्नि, विष और शस्त्र से महान भय की सम्भावना कहता है। यह दुःस्थान (षष्ठ) का फल है, अतः यहाँ आधार-कथन ही अनिष्ट-प्रधान है — शास्त्र की सशर्त उक्ति, कोई निश्चित घोषणा नहीं।

English rendering When the sign of the ripu-bhāva (the sixth) runs its Kālachakra-daśā, the text states there is grave apprehension from thieves and the like, from the ruler, fire, poison, and weapons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भय-सूचक फल-कथन (कालचक्र-दशा का षष्ठ-भाव फल)। भाव-सूचकांक = 6 (रिपु, दुःस्थान); फल षष्ठ-भाव-कारकत्व (शत्रु, रोग, ऋण, आघात) का दशा-प्रक्षेप है — अनिष्ट-प्रधान।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वह स्थल है जहाँ हमारा अनुशासन लागू होता है: "भय" को हम शास्त्र की उक्ति ("शास्त्र कहता है") के रूप में रखते हैं, न कि भय-प्रेरक भविष्यवाणी के रूप में। हमारी CLAUDE.md/ऑरैकल-नीति के अनुसार फल-वचन कभी नियति या निश्चितता के रूप में नहीं, और कोई उपाय-दबाव नहीं।

46.142
प्रमेहगुल्मपण्ड्वादिरोगाणामपि संभवः |
पापर्क्षे फलमेवं स्यात् शुभर्क्षे मिश्रमादिशेत्
pramehagulmapaṇḍvādirogāṇāmapi saṃbhavaḥ |
pāparkṣe phalamevaṃ syāt śubharkṣe miśramādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रमेह-गुल्म-पाण्डु-आदि-रोगाणाम् = प्रमेह (मूत्र/मधुमेह-वर्ग), गुल्म (उदर-गाँठ), पाण्डु (रक्ताल्पता/कामला) आदि रोगों की (पाठ-भेद संभव: "पण्ड्व" → पाण्डु); अपि सम्भवः = भी सम्भावना; पापर्क्षे = पाप राशि में; फलम् एवम् स्यात् = ऐसा (पूर्ण) फल; शुभर्क्षे = शुभ राशि में; मिश्रम् आदिशेत् = मिश्र फल कहना।

हिन्दी भावार्थ षष्ठ-भाव-राशि की कालचक्र-दशा में प्रमेह, गुल्म, पाण्डु आदि रोगों की सम्भावना भी शास्त्र बताता है। यहाँ ध्रुवता उलट जाती है: पाप राशि में यही (अनिष्ट) फल पूर्ण होता है, और शुभ राशि में मिश्र फल कहना चाहिए।

English rendering The text states there may also arise ailments such as prameha, gulma, and pāṇḍu; in a malefic sign this result holds in full, while in a benefic sign a mixed result is to be declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ/पाप टॉगल, षष्ठ भाव — उलटी ध्रुवता)। ध्यातव्य तकनीकी बिन्दु: शुभ-भावों (1–5, 7) में शुभ-राशि → पूर्ण, पाप-राशि → विपरीत; परन्तु दुःस्थान षष्ठ में यह पलट जाता है — पाप-राशि → पूर्ण (अनिष्ट), शुभ-राशि → मिश्र। रोग-नाम शास्त्र की सशर्त उक्ति हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) रोग-कथन को हम मात्र शास्त्र का वचन मानते हैं, कोई चिकित्सीय निदान या भविष्यवाणी नहीं — यही हमारी "गणित बनाम व्याख्या" पृथक्करण-नीति। जहाँ परम्पराएँ ध्रुवता या पाठ पर मतभेद रखें, हम चयनित परिपाटी घोषित करते हैं (यहाँ षष्ठ की उलटी शुभ/पाप-ध्रुवता) और "पाठ-भेद संभव" अंकित करते हैं।

46.143
जायाभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
तदा पाणिग्रहः पत्नीपुत्रलाभादिकं सुखम्
jāyābhāvagatarkṣasya kālacakradaśā yadā |
tadā pāṇigrahaḥ patnīputralābhādikaṃ sukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जायाभाव = सप्तम भाव (पत्नी/विवाह/साझेदारी-स्थान); गत = स्थित; ऋक्ष = नक्षत्र; कालचक्रदशा = कालचक्र-दशा; यदा = जब; तदा = तब; पाणिग्रहः = विवाह/पाणिग्रहण; पत्नी = पत्नी; पुत्र = पुत्र; लाभ = प्राप्ति; आदिकम् = इत्यादि; सुखम् = सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब सप्तम भाव में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा आती है, तब विवाह (पाणिग्रह), पत्नी-संबंधी सुख, पुत्र-लाभ आदि सुख-संकेत बताए गए हैं। यह कालचक्र-दशा के जाया-भाव-स्थित नक्षत्र से जुड़ा फल-कथन है। आगे का श्लोक शुभ/पाप राशि से इसकी पूर्णता या अर्धता तय करता है।

English rendering The text states that when the Kālacakra daśā of the nakṣatra placed in the seventh house (jāyā-bhāva) is running, indications of marriage, gain of spouse and children, and related happiness are described. The next verse scales that result by benefic or malefic sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-दशा × सप्तम-भाव-नक्षत्र)। समय-खिड़की = भाव में पड़े नक्षत्र की कालचक्र-दशा-अवधि; फल-मात्रा अगले श्लोक के “पूर्ण / दल” नियम से जुड़ी है।

46.144
कृषियोधनवस्त्राप्तिर्नृपपूजा महद्यशः |
शुभराशौ फलं पूर्णं पापराशौ च तद्दलम्
kṛṣiyodhanavastrāptirnṛpapūjā mahadyaśaḥ |
śubharāśau phalaṃ pūrṇaṃ pāparāśau ca taddalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृषि = खेती/कृषि-कार्य; योध = युद्ध/योद्धा-संबंध; नवस्त्र = नवीन वस्त्र (पाठ: नवस्त्राप्ति); आप्तिः = प्राप्ति; नृपपूजा = राज-सम्मान/शासकीय आदर; महत् = बड़ा; यशः = यश; शुभराशौ = शुभ राशि में; फलम् = फल; पूर्णम् = पूरा; पापराशौ = पाप राशि में; च = और; तत् = वह (पूर्वोक्त फल); दलम् = आधा (दल = अर्ध-भाग)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी सप्तम-भाव-नक्षत्र की कालचक्र-दशा में कृषि, योद्धा/युद्ध-संबंधी लाभ, नवीन वस्त्रों की प्राप्ति, राज-पूजा और बड़ा यश भी फल-रूप में कहा गया है। शुभ राशि में यह फल पूर्ण; पाप राशि में उसी फल का आधा (तद्दलम्) निर्देशित है। “दल” यहाँ स्पष्ट अर्ध-मात्रा का शास्त्रीय संकेत है।

English rendering The text states gains connected with agriculture, martial enterprise, new clothing, royal honor, and great renown during that seventh-house-nakṣatra Kālacakra period. In a benefic sign the result is full; in a malefic sign it is half (tad-dalam) of that stated fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-मात्रा नियम (द्वि-स्तरीय गुणांक)। शुभ राशि → फल-गुणांक = 1 (पूर्ण); पाप राशि → फल-गुणांक = 1/2 (दल)। यह अनुपात शास्त्र का अपना मापक है, संख्यात्मक “वर्ष/अंश” सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) सप्तम भाव में मीन (शुभ जलीय राशि) पर नक्षत्र पड़े → शास्त्र के अनुसार पूर्वोक्त सुख-फल “पूर्ण” माना जाता है। यदि वही भाव-अंश वृश्चिक (पाप/तीक्ष्ण माना जाने वाला) में हो → उसी फल-वर्णन को “तद्दलम्” अर्थात् आधा प्रबल मानें। (राशि-शुभत्व की पारंपरिक सूची पर निर्भर; पाठ-भेद/टीका-भेद संभव।)

46.145
मृत्युभावस्थितर्क्षस्य कालचक्रदशा तदा |
स्थाननाशं महद् दुःखं बन्धुनाशं धनक्षयम्
mṛtyubhāvasthitarkṣasya kālacakradaśā tadā |
sthānanāśaṃ mahad duḥkhaṃ bandhunāśaṃ dhanakṣayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युभाव = अष्टम भाव (आयु/मृत्यु/व्यय-स्थान — शास्त्रीय नाम); स्थित = स्थित; ऋक्ष = नक्षत्र; कालचक्रदशा = कालचक्र-दशा; तदा = तब; स्थाननाशम् = पद/स्थान का नाश; महत् = बड़ा; दुःखम् = दुःख; बन्धुनाशम् = बन्धु-हानि; धनक्षयम् = धन का क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब अष्टम भाव में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा चलती है, तब स्थान-नाश, बड़ा दुःख, बन्धु-हानि और धन-क्षय के संकेत बताए गए हैं। यह अष्टम-भाव-नक्षत्र की कालचक्र-दशा का फल-कथन है। इसे भय या निश्चित विपत्ति नहीं, बल्कि शास्त्र की पारंपरिक फल-भाषा के रूप में रखना चाहिए; अगला श्लोक शुभ/पाप से मात्रा घटाता-बढ़ाता है।

English rendering The text states that when the Kālacakra daśā of the nakṣatra placed in the eighth house (mṛtyu-bhāva) operates, it indicates loss of position, great sorrow, loss of kin, and decline of wealth. Read as classical phala language for that house-nakṣatra period, not as a fixed fate claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-दशा × अष्टम-भाव-नक्षत्र)। मात्रा-नियंत्रण अगले श्लोक में: पाप राशि → पूर्ण; शुभ राशि → आधा (तद्दलम्) — षष्ठ-फल के “मिश्र” नियम से भिन्न, यहाँ स्पष्ट दल-अनुपात है।

46.146
दारिद्र्यमन्नविद्वोपमरिभीतिं च निर्दिशेत् |
पापराशौ फलं पूर्णं शुभराशौ च तद्दलम्
dāridryamannavidvopamaribhītiṃ ca nirdiśet |
pāparāśau phalaṃ pūrṇaṃ śubharāśau ca taddalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारिद्र्यम् = दरिद्रता/अभाव; अन्न = अन्न/भोजन; विद्वोपम् = अन्न-विच्छेद/अभाव (पाठ: अन्नविद्वोपम् — अन्न-विच्छेद का संकेत); अरिभीतिम् = शत्रु से भय; च = और; निर्दिशेत् = निर्देश करे; पापराशौ = पाप राशि में; फलम् = फल; पूर्णम् = पूरा; शुभराशौ = शुभ राशि में; तत् = वह; दलम् = आधा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी अष्टम-भाव-नक्षत्र की कालचक्र-दशा में दारिद्र्य, अन्न-अभाव और शत्रु-भय भी निर्देशित किए गए हैं। पाप राशि में यह फल पूर्ण कहा गया है; शुभ राशि में उसी फल का आधा (तद्दलम्)। कठोर फल-शब्दों को भी “शास्त्र कहता है” की सीमा में रखना चाहिए — न भय-व्यापार, न निश्चित विपत्ति का दावा।

English rendering The text further directs poverty, scarcity of food, and fear of enemies for that eighth-house-nakṣatra Kālacakra period. In a malefic sign the stated result is full; in a benefic sign it is half. Keep the wording as the śāstra’s claim, not as endorsed certainty or fear-pressure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-मात्रा नियम (द्वि-स्तरीय गुणांक)। पाप राशि → गुणांक = 1 (पूर्ण); शुभ राशि → गुणांक = 1/2 (दल)। ध्यान दें: षष्ठ-फल (46.142) में शुभ पर “मिश्र” था; यहाँ अष्टम-फल पर शुभ = स्पष्ट अर्ध — दोनों नियम अलग हैं।

उदाहरण (worked example) अष्टम भाव में मेष (पाप-सूर्य-स्वामी परंपरा में प्रायः अशुभ-वर्ग में गिना जाने वाला) → शास्त्र के अनुसार स्थाननाश-धनक्षय-दारिद्र्य आदि “पूर्ण”। यदि अष्टम में वृष (शुभ) → वही फल-वर्णन “तद्दलम्” अर्थात् आधा प्रबल। (शुभ/पाप-राशि-सूची परंपरा-सापेक्ष; पाठ-भेद संभव।)

46.147
धर्मभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
तदा पुत्रकलत्रार्थकृषिगेहसुखं वदेत्
dharmabhāvagatarkṣasya kālacakradaśā yadā |
tadā putrakalatrārthakṛṣigehasukhaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मभाव = नवम भाव (धर्म/भाग्य/पिता/तीर्थ-स्थान); गत = स्थित; ऋक्ष = नक्षत्र; कालचक्रदशा = कालचक्र-दशा; यदा = जब; तदा = तब; पुत्र = पुत्र; कलत्र = पत्नी/कलत्र; अर्थ = धन/अर्थ; कृषि = कृषि; गेह = गृह/घर; सुखम् = सुख; वदेत् = कहे/बताए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब नवम भाव में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा आती है, तब पुत्र, पत्नी (कलत्र), धन (अर्थ), कृषि और गृह-सुख के संकेत बताए गए हैं। यह धर्म-भाव-स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा का शुभ फल-कथन है। भाव-क्रम में षष्ठ-अशुभ, सप्तम-मिश्र/शुभ, अष्टम-कठोर, नवम-शुभ — कालचक्र-दशा के भाव-फल-क्रम का एक खंड यहाँ पूरा होता है।

English rendering The text states that when the Kālacakra daśā of the nakṣatra occupying the ninth house (dharma-bhāva) is current, one should declare happiness connected with children, spouse, wealth, agriculture, and the home. It is the auspicious phala-statement for the ninth-house-nakṣatra period in this house-sequence of Kālacakra results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-दशा × नवम-भाव-नक्षत्र)। इस श्लोक में शुभ/पाप-दल नियम नहीं जुड़ा; केवल धर्म-भाव-नक्षत्र की दशा पर पुत्र-कलत्र-अर्थ-कृषि-गेह सुख “वदेत्” कहा गया है।

46.148
सत्कर्मधर्मसंसिद्धिं महज्जनपरिग्रहम् |
शुभराशौ शुभं पूर्णं पापराशौ च तद्दलम्
satkarmadharmasaṃsiddhiṃ mahajjanaparigraham |
śubharāśau śubhaṃ pūrṇaṃ pāparāśau ca taddalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्कर्म = शुभ कर्म / धर्मयुक्त क्रिया; धर्म-संसिद्धि = धर्म में सिद्धि; महज्जन-परिग्रह = श्रेष्ठ जनों का आश्रय/संग्रह; शुभ-राशि = सौम्य राशि (जहाँ दशा-नक्षत्र स्थित); पूर्ण = सम्पूर्ण फल; पाप-राशि = क्रूर/पाप राशि; तद्-दल = उसका आधा (दल = अर्ध-भाग)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस दशा-काल में सत्कर्म और धर्म की सिद्धि तथा महान्/श्रेष्ठ जनों का आश्रय प्राप्त होता है। यदि संबंधित नक्षत्र शुभ राशि में हो तो यह फल पूर्ण माना गया है; पाप राशि में वही फल आधे परिमाण में कहा गया है। यह फल-कथन है, न कि निश्चित भाग्य-निर्णय।

English rendering The text states attainment of success in righteous acts and dharma, together with the support or company of the great. In a benefic sign the result is full; in a malefic sign it is half of that.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ/पाप राशि पर पूर्ण बनाम अर्ध-फल का अनुपात)। यहाँ “दल” शास्त्रीय अर्ध-परिमाण है: शुभ → पूर्ण; पाप → ½; गणना का कोई नया अंश-सूत्र नहीं, केवल फल-मात्रा का निर्देश।

46.149
कर्मभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
राज्याप्तिर्भूपसम्मानं पुत्रदारादिजं सुखम्
karmabhāvagatarkṣasya kālacakradaśā yadā |
rājyāptirbhūpasammānaṃ putradārādijaṃ sukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्म-भाव = दशम भाव (कर्म/पद/प्रभाव); गत-ऋक्ष = उस भाव में स्थित नक्षत्र; कालचक्र-दशा = कालचक्र दशा-प्रणाली; यदा = जब; राज्याप्ति = राज्य/पद/शासन-प्राप्ति (शास्त्रीय फल-शब्द); भूप-सम्मान = राजा/शासक का सम्मान; पुत्र-दार-आदि-जं सुखम् = पुत्र, पत्नी आदि से उत्पन्न सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कर्मभाव (दशम) में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा चलती है, तब राज्य/पद-प्राप्ति, भूप/शासक का सम्मान तथा पुत्र-दारादि से सुख — ये फल वर्णित हैं। यह दशा-फल का वर्णन है; इसे नियति या “अवश्यम्भावी” घटना के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering When the Kālacakra daśā of the nakṣatra placed in the tenth house (karma-bhāva) is running, the text states attainment of high office/status, honour from rulers, and happiness arising from children, spouse, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशम-स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा पर)। दशा-पहचान का नियम: दशम भाव में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा = यह फल-खण्ड; स्वयं कालचक्र-अवधि-गणना इस श्लोक में नहीं दी गई।

46.150
सत्कर्मफलमैश्वर्यं सद्गोष्ठ्या कालयापनम् |
शुभराशौ फलं पूर्णं पापराशौ च मिश्रितम्
satkarmaphalamaiśvaryaṃ sadgoṣṭhyā kālayāpanam |
śubharāśau phalaṃ pūrṇaṃ pāparāśau ca miśritam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्कर्म-फल = शुभ कर्मों का परिणाम; ऐश्वर्य = समृद्धि/वैभव (शास्त्र-शब्द); सद्-गोष्ठी = सत्संग / श्रेष्ठ मण्डली; काल-यापन = समय व्यतीत करना (सुखपूर्वक); शुभ-राशि = सौम्य राशि; पूर्ण फल; पाप-राशि = क्रूर राशि; मिश्रित = मिला-जुला / अधूरा-मिश्र फल।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के कर्मभाव-कालचक्र-दशा-फल का विस्तार: शास्त्र कहता है — सत्कर्म का फल, ऐश्वर्य, सज्जनों की गोष्ठी में काल व्यतीत करना। शुभ राशि में यह फल पूर्ण; पाप राशि में मिश्रित कहा गया है। “मिश्रित” यहाँ पूर्ण सिद्धि और निषेध के बीच का मध्यम फल-स्तर है।

English rendering Continuing the tenth-house Kālacakra period, the text states the fruit of good deeds, prosperity, and time spent in worthy company. In a benefic sign the result is full; in a malefic sign it is mixed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्ण vs मिश्रित)। राशि-गुण (शुभ/पाप) फल-मात्रा को तीन स्तरों में बाँटता है: पूर्ण · मिश्रित · (अन्य श्लोकों में) दल/खण्डित; यह अनुपातिक फल-वर्गीकरण है, कोणीय गणना नहीं।

46.151
लाभभावस्थितर्क्षस्य कालचक्रदशा यदा |
पुत्रस्त्रीबन्धुसौख्याप्तिर्भूपप्रीतिर्महत्सुखम्
lābhabhāvasthitarkṣasya kālacakradaśā yadā |
putrastrībandhusaukhyāptirbhūpaprītirmahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभ-भाव = एकादश भाव (लाभ/प्राप्ति/मित्र-मण्डल); स्थित-ऋक्ष = उस भाव में स्थित नक्षत्र; कालचक्र-दशा; पुत्र-स्त्री-बन्धु-सौख्याप्ति = पुत्र, स्त्री, बन्धुओं से सुख की प्राप्ति; भूप-प्रीति = शासक/राजा की प्रसन्नता; महत्-सुख = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभभाव (एकादश) में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा चलती है, तब पुत्र-स्त्री-बन्धु-सुख, भूप/शासक की प्रीति और महान् सुख — ये फल वर्णित हैं। यह एकादश-स्थित नक्षत्र की दशा का फल-खण्ड है।

English rendering When the Kālacakra daśā of the nakṣatra placed in the eleventh house (lābha-bhāva) is running, the text states happiness from children, spouse, and kin, the favour of rulers, and great comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (एकादश-स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा पर)। नियम-रूप: भाव-n में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा → उस भाव का फल-खण्ड; यहाँ n = 11।

46.152
धनवस्त्राप्तिरारोग्यं सतां सङ्गश्च जायते |
शुभराशौ फलं पूर्णं पापराशौ च खण्डितम्
dhanavastrāptirārogyaṃ satāṃ saṅgaśca jāyate |
śubharāśau phalaṃ pūrṇaṃ pāparāśau ca khaṇḍitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-वस्त्र-आप्ति = धन और वस्त्र की प्राप्ति; आरोग्य = निरोगता/स्वस्थता (शास्त्र-शब्द, चिकित्सा-निर्णय नहीं); सतां सङ्ग = सज्जनों का संग; जायते = उत्पन्न होता है (शास्त्र-कथन); शुभ-राशि → पूर्ण फल; पाप-राशि → खण्डित = खंडित/टूटा/अपूर्ण फल।

हिन्दी भावार्थ लाभभाव-कालचक्र-दशा-फल का विस्तार: शास्त्र कहता है — धन-वस्त्र की प्राप्ति, आरोग्य, और सज्जनों का संग। शुभ राशि में फल पूर्ण; पाप राशि में खण्डित कहा गया है। “खण्डित” का अर्थ है फल टूटा-फूटा या अधूरा — न कि कोई निश्चित विपत्ति।

English rendering Continuing the eleventh-house period, the text states gain of wealth and garments, soundness of body, and the company of the good. In a benefic sign the result is full; in a malefic sign it is broken or incomplete.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्ण vs खण्डित)। शुभ/पाप राशि पर फल-मात्रा: पूर्ण · मिश्रित · दल · खण्डित — अध्याय में दोहराया गया श्रेणी-क्रम; संख्यात्मक गुणांक इस श्लोक में नहीं।

46.153
व्ययभावगतर्क्षस्य कालचक्रदशा तदा |
उद्योगभङ्गमालस्यं देहपीडां पदच्युतिम्
vyayabhāvagatarkṣasya kālacakradaśā tadā |
udyogabhaṅgamālasyaṃ dehapīḍāṃ padacyutim

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यय-भाव = द्वादश भाव (व्यय/ह्रास/निवृत्ति); गत-ऋक्ष = उस भाव में स्थित नक्षत्र; कालचक्र-दशा तदा = तब उस दशा में; उद्योग-भङ्ग = उद्यम/प्रयास का भंग; आलस्य = आलस्य/शिथिलता; देह-पीडा = देह में पीड़ा (शास्त्र-कथन; चिकित्सा-निदान नहीं); पद-च्युति = पद से च्युति/गिरना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब व्ययभाव (द्वादश) में स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा चलती है, तब उद्योग-भंग, आलस्य, देह-पीड़ा और पद-च्युति — ये फल वर्णित हैं। यह द्वादश-दशा का फल-वर्णन है; इसे भय या “नाश निश्चित” के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए — केवल शास्त्र का संकेत।

English rendering When the Kālacakra daśā of the nakṣatra placed in the twelfth house (vyaya-bhāva) is running, the text states disruption of effort, lethargy, bodily affliction, and loss of position — as traditional indications, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्वादश-स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा पर)। भाव-क्रम 10 → 11 → 12 पूर्ण: कर्म · लाभ · व्यय — तीनों पर एक ही नियम (भाव-स्थित नक्षत्र की कालचक्र-दशा = फल-कुंजी)।

46.154
दारिद्यं कर्मवैफल्यं तथा व्यर्थव्ययं वदेत् |
पापराशौ फलं त्वेवं शुभराशौ च तद्दलम्
dāridyaṃ karmavaiphalyaṃ tathā vyarthavyayaṃ vadet |
pāparāśau phalaṃ tvevaṃ śubharāśau ca taddalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारिद्य = दरिद्रता/अभाव (शास्त्र-शब्द); कर्म-वैफल्य = कर्मों की विफलता; व्यर्थ-व्यय = व्यर्थ खर्च; वदेत् = कहे (आचार्य-निर्देश); पाप-राशि → फल एवं (इस प्रकार पूर्ण-निषेधात्मक फल); शुभ-राशि → तद्-दल = उसी (निषेध-फल) का आधा।

हिन्दी भावार्थ व्ययभाव-दशा-फल का विस्तार: शास्त्र कहता है — दरिद्रता, कर्म-वैफल्य और व्यर्थ व्यय का कथन करे। पाप राशि में यह फल इसी रूप में (पूर्ण निषेध-दिशा में); शुभ राशि में उसी का आधा कहा गया है। ध्यान दें: शुभ राशि यहाँ निषेध-फल को कम करती है (दल), उसे शुभ-फल में नहीं पलटती — द्वादश-खण्ड का विशिष्ट नियम।

English rendering Continuing the twelfth-house period, the text states poverty, failure of endeavours, and wasteful expenditure. In a malefic sign this result stands as stated; in a benefic sign it is half of that — the malefic thrust is reduced, not reversed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप → पूर्ण निषेध-फल; शुभ → तद्दल = ½)। व्यय-खण्ड में अनुपात उलटा है: शुभ राशि फल को “पूर्ण शुभ” नहीं बनाती, अपितु अशुभ-वर्णन को आधा करती है — दशम/एकादश के “शुभ→पूर्ण, पाप→दल/मिश्रित/खण्डित” से भिन्न दिशा।

46.155
लग्नादिव्ययपर्यन्तं भानां चरदशां ब्रुवे |
तस्मात् तदीशपर्यन्तं संख्यामत्र दशां विदुः
lagnādivyayaparyantaṃ bhānāṃ caradaśāṃ bruve |
tasmāt tadīśaparyantaṃ saṃkhyāmatra daśāṃ viduḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-आदि = लग्न से लेकर; व्यय-पर्यन्तं = द्वादश (व्यय) तक; भानां = राशियों की (भ = राशि); चर-दशां = चरदशा (गतिशील/जैमिनि राशि-दशा); ब्रुवे = कहता हूँ; तस्मात् = उस (राशि) से; तत्-ईश-पर्यन्तं = उसके स्वामी तक; संख्याम् = (राशियों की) गिनती; अत्र = यहाँ; दशां विदुः = दशा (के वर्ष) जानते हैं।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य कालचक्रदशा से हटकर एक नयी पद्धति — चरदशा — का उपदेश करते हैं, जो लग्न से द्वादश तक की राशियों पर आधारित है। यहाँ दशा-वर्षों का निर्धारण नक्षत्र से नहीं, अपितु गणना से होता है: किसी राशि से लेकर उसके स्वामी की स्थित राशि तक जितनी राशियाँ गिनी जायें, वही उस राशि की दशा का मान है।

English rendering From the ascendant through the twelfth I now declare the Chara (moving) daśā of the signs: the count of signs from a sign up to (the sign occupied by) its lord — that, they hold, is its daśā here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चरदशा का काल-मान = राशि-गणना (नक्षत्र-अंश नहीं)। किसी राशि R के लिए,
दशा-वर्ष(R) = (R से उसके स्वामी की राशि तक गिनी गयी राशियों की संख्या) − 1।
प्रचलित परम्परा-सम्मत परिपाटी (convention घोषित): गणना समावेशी (दोनों राशियाँ गिनकर) करके 1 घटाते हैं; यदि स्वामी अपनी ही राशि में हो तो 0 के स्थान पर 12 वर्ष लिए जाते हैं। गणना की दिशा (क्रम/व्युत्क्रम) श्लोक 156 से निश्चित होती है। मूल श्लोक केवल "संख्या" कहता है — "−1" व "स्व-राशि → 12" परिपाटी-निर्णय हैं (पाठ-भेद/मत-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (विषम राशि)। मेष का स्वामी मंगल यदि सिंह में स्थित हो, तो 156 के अनुसार विषम राशि होने से क्रम (सीधी) गणना — मेष(1)→वृष(2)→मिथुन(3)→कर्क(4)→सिंह(5) = 5 राशियाँ; 5 − 1 = 4 → मेष की चरदशा = 4 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) दॉज़ियर में सत्यापित दशा-इंजन विंशोत्तरी का है — चन्द्र के नक्षत्र-अंश पर आधारित 120-वर्ष चक्र, विशुद्ध अनुपात-गणित (Ketu 7 … Mercury 17, Σ = 120)। यह चरदशा उससे भिन्न कुल की है — नक्षत्र-अंश नहीं, अपितु राशि-गणना पर टिकी पूर्णांक-अंकगणित। इसे हम मूल-पाठ के रूप में, अपनी परिपाटी घोषित करते हुए प्रस्तुत करते हैं; हमारा `==`-पिन किया गया oracle विंशोत्तरी को सत्यापित करता है, इस चरदशा को नहीं — अतः यहाँ कोई "सत्यापित" दावा नहीं, केवल शास्त्र-कथन।

46.156
मेषादित्रित्रिभैर्ज्ञेयं पदमोजपदे क्रमात् |
दशाब्दानयने कार्या गणना व्युत्क्रमात् समे
meṣāditritribhairjñeyaṃ padamojapade kramāt |
daśābdānayane kāryā gaṇanā vyutkramāt same

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेष-आदि = मेष से आरम्भ कर; त्रि-त्रि-भैः = तीन-तीन राशियों के समूह से; ज्ञेयं पदम् = पद (चतुर्थांश/समूह) जानना चाहिए; ओज-पदे = विषम पद में; क्रमात् = सीधी (अनुलोम) दिशा में; दशा-अब्द-आनयने = दशा-वर्ष निकालने में; कार्या गणना = गणना करनी चाहिए; व्युत्क्रमात् = उल्टी (प्रतिलोम) दिशा में; समे = सम (राशि/पद) में।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक श्लोक 155 की "गणना" की दिशा नियत करता है। मेष से तीन-तीन राशियों के पद बनाकर देखें: विषम (ओज) राशि/पद में गणना अनुलोम (सीधी, राशि-क्रम में) की जाती है, और सम राशि/पद में दशा-वर्ष निकालते समय गणना व्युत्क्रम (उल्टी) की जाती है। (त्रि-त्रि-पद-विभाजन की सटीक भूमिका पर पाठ-भेद/मतान्तर संभव — किन्तु संचालन-नियम स्पष्ट है: विषम → अनुलोम, सम → प्रतिलोम।)

English rendering From Aries onward, taken three by three, mark the padas: in an odd pada the reckoning runs in direct order, while for the even the count for the daśā-years is to be made in reverse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिशा-नियम (श्लोक 155 की गणना के लिए):
• राशि विषम (ओज) → स्वामी तक अनुलोम (राशि-क्रम, +1 दिशा में) गिनें।
• राशि सम → स्वामी तक प्रतिलोम (व्युत्क्रम, −1 दिशा में) गिनें।
तत्पश्चात् दशा-वर्ष = गिनी गयी राशियाँ − 1 (परिपाटी 155 के अनुसार)। यह एक शुद्ध पूर्णांक-मॉड्यूलर गणना है: दिशा का चयन केवल राशि-सम/विषम की समता (parity) पर निर्भर — कोई व्याख्यात्मक चर नहीं।

उदाहरण (worked example) राशि = वृष (सम)। वृष का स्वामी शुक्र यदि मकर में हो, तो सम होने से प्रतिलोम (व्युत्क्रम) गणना — वृष(1)→मेष(2)→मीन(3)→कुम्भ(4)→मकर(5) = 5 राशियाँ; 5 − 1 = 4 → वृष की चरदशा = 4 वर्ष। (यदि भूल से अनुलोम गिनते तो वृष→…→मकर = 9 राशियाँ, 9 − 1 = 8 वर्ष — अतः समता-नियम का पालन अनिवार्य है, अन्यथा मान बदल जाता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह विषम-अनुलोम/सम-प्रतिलोम नियम ठीक उस श्रेणी का नियतात्मक (deterministic) गणित है जिसे हमारी पद्धति ठीक-`==` जाँच से पकड़ती है — दिशा एक द्विआधारी parity-फलन है, मान एक पूर्णांक। जैसे अष्टकवर्ग में ±सहनशीलता-पट्टी ने एक वास्तविक −1 को छिपा दिया था, वैसे ही यहाँ भी सही मान की परख सटीक गिनती से होनी चाहिए, अनुमान से नहीं; उदाहरण में दिखाया 4 बनाम 8 वर्ष का अन्तर यही सिखाता है कि convention (दिशा व −1) घोषित किये बिना संख्या अर्थहीन है।

46.157
वृश्चिकाधिपती द्वौ च केतुभौमौ स्मृतौ द्विज |
शनिराहु च कुम्भस्य स्वामिनौ परिकीर्तितो
vṛścikādhipatī dvau ca ketubhaumau smṛtau dvija |
śanirāhu ca kumbhasya svāminau parikīrtito

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिकाधिपती द्वौ = वृश्चिक के दो अधिपति; केतु-भौमौ = केतु और भौम (मङ्गल); स्मृतौ = स्मरण किए गए; द्विज = हे द्विज; शनि-राहु = शनि और राहु; कुम्भस्य स्वामिनौ = कुम्भ के स्वामी; परिकीर्तितौ = घोषित किए गए।

हिन्दी भावार्थ चर-दशा के विशेष नियम में वृश्चिक राशि के दो अधिपति माने गए—केतु और मङ्गल। कुम्भ राशि के दो स्वामी शनि और राहु कहे गए। सामान्य एक-स्वामी नियम इन दो राशियों पर लागू नहीं; द्वि-नाथ निर्णय आगे के श्लोकों में दिया है। (पाठ-भेद संभव: अन्य पद्धतियों में केवल मङ्गल/शनि; यहाँ इस पाठ का द्वैत स्पष्ट है।)

English rendering O twice-born, the two lords of Scorpio are remembered as Ketu and Mars; Saturn and Rāhu are declared the two lords of Aquarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वि-नाथ क्षेत्र (चर-दशा मॉडल):
- वृश्चिक (R = ८): {मङ्गल, केतु}
- कुम्भ (R = ११): {शनि, राहु}
अन्य १० राशियाँ: एक-नाथ (सूर्यादि पारम्परिक स्वामी)। दशा-वर्ष निकालते समय इन दो राशियों पर L का चयन ४६.१५८–१६१ के निर्णय-वृक्ष से होता है; चुने हुए L पर फिर ४६.१५५–१५६ की संख्या×दिशा लागू।

उदाहरण (worked example) वृश्चिक-दशा: मङ्गल तुला में, केतु मिथुन में—दोनों “अन्यत्र”; बल-निर्णय ४६.१६०–१६१ से। कुम्भ-दशा: शनि कुम्भ में, राहु मेष में—एक स्वक्षेत्र, एक परत्र ⇒ ४६.१५९–१६० के अनुसार परत्र स्थित नाथ (राहु) से गणना।

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46.158
द्विनाथक्षेत्रयोरत्र क्रियते निर्णयोऽधुना |
द्वावेवाधिपती विप्र युक्तौ स्वर्क्षे स्थितौ यदि
dvināthakṣetrayoratra kriyate nirṇayo'dhunā |
dvāvevādhipatī vipra yuktau svarkṣe sthitau yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विनाथक्षेत्रयोः = दो स्वामियों वाले क्षेत्रों (वृश्चिक, कुम्भ) का; अत्र = यहाँ; निर्णयः = निर्णय; क्रियते अधुना = अब किया जाता है; द्वाव् एव अधिपती = दोनों ही अधिपति; विप्र = हे विप्र; युक्तौ = जुड़े/स्थित; स्वर्क्षे = अपने क्षेत्र में; यदि = यदि।

हिन्दी भावार्थ अब द्वि-नाथ राशियों का स्पष्ट निर्णय आरम्भ होता है। हे विप्र, यदि दोनों अधिपति अपने ही क्षेत्र में (स्वर्क्ष में) स्थित हों—अर्थात् दोनों उसी राशि में हों—तो वह प्रथम केस है, जिसका वर्ष-फल अगले श्लोक में आता है। यह शर्त “दोनों स्वर्क्ष” की जाँच चर-दशा एल्गोरिथ्म का पहला द्वार है।

English rendering The determination for the dual-lord signs is now stated. O sage, if both lords are situated in their own sign—

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) निर्णय-वृक्ष, शाखा १ (पूर्व-शर्त):
- राशि R ∈ {वृश्चिक, कुम्भ}; नाथ-युग्म L₁, L₂।
- यदि R(L₁) = R और R(L₂) = R (दोनों स्वर्क्ष / युक्त स्वर्क्ष): → शाखा ४६.१५९क (वर्ष = १२)।
- अन्यथा: अगली शाखाएँ (एक स्वक्षेत्र + एक परत्र; अथवा दोनों अन्यर्क्ष)।

उदाहरण (worked example) कुम्भ-दशा: शनि और राहु दोनों कुम्भ में ⇒ दोनों स्वर्क्ष-स्थित ⇒ अगला श्लोक लागू: १२ वर्ष (दिशा-गणना अनावश्यक—पूर्ण स्वक्षेत्र-निवास)।

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46.159
वर्ष द्वादशकं तत्र न चेदेकादि चिन्तयेत् |
एकः स्वक्षेत्रयोऽन्यस्तु परत्र यदि संस्थितः
varṣa dvādaśakaṃ tatra na cedekādi cintayet |
ekaḥ svakṣetrayo'nyastu paratra yadi saṃsthitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ष द्वादशकं = बारह वर्ष; तत्र = उस दशा में; न चेत् = यदि नहीं (दोनों स्वर्क्ष नहीं); एकादि चिन्तयेत् = एक आदि (अगले क्रम) का विचार करे; एकः स्वक्षेत्रयः = एक अपने क्षेत्र में; अन्यस्तु = और दूसरा; परत्र = अन्यत्र; यदि संस्थितः = यदि स्थित हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि दोनों अधिपति स्वर्क्ष में हों तो उस राशि की चर-दशा बारह वर्ष की होती है। यदि वह स्थिति न हो, तो “एक आदि” के क्रम से आगे विचार करना चाहिए। विशेषतः यदि एक नाथ अपने क्षेत्र में हो और दूसरा अन्य राशि में स्थित हो, तो अगला नियम (४६.१६०) लागू होता है—परत्र स्थित नाथ से दशा नयनी है।

English rendering The text states twelve years in that case. If not, one should consider the subsequent cases: if one lord is in its own field and the other is placed elsewhere—

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- केस A (४६.१५८ पूर्ण): R(L₁) = R(L₂) = R ⇒ दशा-वर्ष = १२।
- केस B (यह श्लोक): ठीक एक नाथ स्वर्क्ष, दूसरा परत्र:
- स्वर्क्ष-नाथ को छोड़कर परत्र स्थित नाथ L* चुनें;
- ४६.१५५–१५६: दिशा D में R से R(L*) तक n (दोनों सहित) ⇒ वर्ष = n।
- केस C: दोनों अन्यर्क्ष → ४६.१६०–१६१ (बल)।

उदाहरण (worked example) वृश्चिक (पद ३, क्रम D = +१): मङ्गल वृश्चिक में (स्वर्क्ष), केतु कन्या में (परत्र)। L* = केतु। क्रम: वृश्चिक → धनु → मकर → कुम्भ → मीन → मेष → वृष → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या ⇒ n = ११ → दशा = ११ वर्ष। (दोनों स्वर्क्ष होते तो १२।)

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46.160
तदाऽन्यत्र स्थितं नाथं परिगृह्य दशां नयेत् |
द्वावप्यन्यर्क्षगौ तौ चेत् तमोर्मध्ये च यो बली
tadā'nyatra sthitaṃ nāthaṃ parigṛhya daśāṃ nayet |
dvāvapyanyarkṣagau tau cet tamormadhye ca yo balī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदा = तब; अन्यत्र स्थितं नाथं = अन्यत्र स्थित स्वामी को; परिगृह्य = ग्रहण कर; दशां नयेत् = दशा निकाले; द्वाव् अपि अन्यर्क्षगौ = दोनों ही अन्य राशिगत; तौ चेत् = यदि वे; तमोः मध्ये = उन दोनों में; यः बली = जो बली हो।

हिन्दी भावार्थ अतः एक-स्वर्क्ष/एक-परत्र स्थिति में परत्र स्थित नाथ को लेकर ही दशा-वर्ष गिने जाते हैं। यदि दोनों अधिपति अन्य राशियों में चले गए हों, तो उन दोनों में जो बलवान् हो, उसी से दशा ग्रहण की जाती है। बल का निकष अगले श्लोक में “अग्रह / सग्रह” से स्पष्ट है।

English rendering Then, taking the lord that is placed elsewhere, one should compute the daśā. If both lords have gone to other signs, of those two the stronger is taken.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- केस B (पूर्ण): L = {L ∈ {L₁,L₂} : R(L) ≠ R}; |L| = १ ⇒ उसी L* से n, D।
- केस C: R(L₁) ≠ R और R(L₂) ≠ R ⇒ L* = argmax बल(L₁, L₂); बल-नियम ४६.१६१।
- चुने L पर: वर्ष = n_D(R → R(L)) ∈ {१…१२}।

उदाहरण (worked example) कुम्भ (पद ४, व्युत्क्रम D = −१): शनि मीन में, राहु तुला में—दोनों अन्यर्क्ष। मान लें राहु सग्रह (अन्य ग्रह युक्त), शनि अग्रह ⇒ L = राहु (४६.१६१)। व्युत्क्रम: कुम्भ → मकर → धनु → … → तुला तक गिनती ⇒ n = ५ → ५ वर्ष। (यदि बल उलटा: L = शनि; कुम्भ → मीन व्युत्क्रम में: कुम्भ → मकर → … नहीं—व्युत्क्रम मीन की ओर: कुम्भ → मीन? व्युत्क्रम = राशि-घटती: ११→१०→… या ११→१२? सम-पद व्युत्क्रम = राशि-क्रम के विपरीत = मकर दिशा: ११→१०→…; मीन = १२, क्रम में आगे। व्युत्क्रम से कुम्भ→मकर→… मीन तक नहीं पहुँचते सीधे—मीन व्युत्क्रम-पथ पर कुम्भ से: ११→१०→९→…→१→१२? परिपत्र: दिशा −१: ११, १०, ९, …, १, १२। कुम्भ(११)→मीन(१२) व्युत्क्रम में पूर्ण चक्र लगभग: ११→१०→…→१→१२ = १२ पद? Inclusive count from 11 reverse to 12: sequence 11,10,9,8,7,6,5,4,3,2,1,12 = 12 signs → 12 years if Saturn alone in Mīna as stronger. State: n depends on path.)

सुस्पष्ट संख्या: कुम्भ→मीन, व्युत्क्रम (घटती दिशा, १२ राशियों का चक्र): पथ = ११, १०, ९, ८, ७, ६, ५, ४, ३, २, १, १२ ⇒ n = १२ → १२ वर्ष।

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46.161
तत एव दशा ग्राह्या क्रमाद् वोत्क्रमतो द्विजः |
बलस्याऽत्र विचारे स्यादग्रहात् सग्रहो बली
tata eva daśā grāhyā kramād votkramato dvijaḥ |
balasyā'tra vicāre syādagrahāt sagraho balī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत एव = उसी से ही; दशा ग्राह्या = दशा ग्रहण करनी; क्रमाद् वा उत्क्रमतः = क्रम से अथवा उत्क्रम से; द्विजः = हे द्विज; बलस्य अत्र विचारे = बल के विचार में यहाँ; अग्रहात् = अग्रह (अकेला, बिना सह-ग्रह) से; सग्रहः = सग्रह (अन्य ग्रह से युक्त); बली = बलवान् होता है।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, बलवान् नाथ से ही दशा ली जाए—और वर्ष-गणना पद के अनुसार क्रम अथवा उत्क्रम से हो। बल-विचार का यहाँ स्पष्ट नियम: जो नाथ अन्य ग्रह से युक्त (सग्रह) है, वह अकेले स्थित (अग्रह) नाथ से बली माना जाता है। यह द्वि-नाथ-क्षेत्रों की चर-दशा का अन्तिम निर्णायक सूत्र है; शास्त्र यहीं बल की प्राथमिकता बाँधता है, फल-व्याख्या नहीं।

English rendering From that stronger lord alone the daśā is to be taken, in direct or reverse order as required, O twice-born. In weighing strength here, the text states that a lord with a companion planet is stronger than one without.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बल-तुलना (केस C, द्वि-नाथ):
- सग्रह = राशि R(L) पर |ग्रह-समुच्चय| ≥ २ (L के साथ ≥१ अन्य ग्रह); अग्रह = अकेला L।
- नियम: सग्रह ≻ अग्रह (४६.१६१)।
- L निर्धारित → दिशा D (४६.१५६) → वर्ष = n_D(R → R(L))।
- यदि दोनों सग्रह या दोनों अग्रह: यह श्लोक अकेला मापदण्ड नहीं देता—पाठ-भेद/परम्परा-अतिरिक्त नियम संभव; इस पाठ में केवल सग्रह>अग्रह घोषित।

उदाहरण (worked example) वृश्चिक-दशा (क्रम, पद ३): मङ्गल कन्या में अकेला (अग्रह); केतु मिथुन में गुरु-युक्त (सग्रह) ⇒ L* = केतु। क्रम: वृश्चिक(८)→…→मिथुन(३): ८,९,१०,११,१२,१,२,३ ⇒ n = ८ → चर-दशा = ८ वर्ष। (अग्रह मङ्गल चुनने पर कन्या तक: ८…६ ⇒ n = ३—भिन्न परिणाम; शास्त्र सग्रह को प्राथमिकता देता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-अध्याय (४६–६५) में विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र हमारे इंजन में अनुपात-अंकगणित से पिन है (केतु ७ … बुध १७, Σ = १२०; अन्तर्दशा = (महा×अन्तर)/१२०)। यह श्लोक-समूह उसी दशा-परिवार का चर-दशा अंग है—राशि-स्वामी दूरी × क्रम/व्युत्क्रम, द्वि-नाथ पर सग्रह-बल—जहाँ विंशोत्तरी नक्षत्र-अंश पर चलती है, वहाँ चर राशि-पद और द्वि-स्वामित्व पर; दोनों में हम गणित और फल-कथन को अलग रखते हैं: वर्ष = शुद्ध गणना, फल = “शास्त्र कहता है” मात्र।

46.162
द्वावेव सग्रहौ तौ चेत् बली तत्राधिकग्रहः |
ग्रहयोगसमानत्वे ज्ञेयं राशिबलाद् बलम्
dvāveva sagrahau tau cet balī tatrādhikagrahaḥ |
grahayogasamānatve jñeyaṃ rāśibalād balam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वौ एव = वे दोनों ही (राशि/पक्ष); सग्रहौ = ग्रह-युक्त; तौ चेत् = यदि वे; बली = बलवान्; तत्र = उनमें; अधिकग्रहः = अधिक-बल वाला ग्रह; ग्रहयोगसमानत्वे = ग्रह-योग (ग्रह-बल) समान होने पर; राशिबलात् = राशि-बल से; बलम् = बल (निर्णय)।

हिन्दी भावार्थ यदि दोनों राशियाँ ग्रह-युक्त हों, तो उनमें वह राशि बलवान् मानी जाती है जिसमें अधिक-बल वाला ग्रह बैठा हो। यदि दोनों पक्षों के ग्रह-योग समान हों, तो बल का निर्णय राशि-बल से करना चाहिए — यही शास्त्र की तुलना-विधि है।

English rendering If both (signs under comparison) are occupied by grahas, the stronger is the one that holds the stronger graha; when graha-yoga is equal, strength is to be judged from rāśi-bala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तुलना-नियम (caradaśā/राशि-निर्णय संदर्भ में): (1) यदि दोनों राशि s-graha हों → विजेता = argmax(graha_bala on rāśi); (2) यदि graha-yoga समान → विजेता = argmax(rāśi_bala)। यहाँ “बल” षड्बल-कुल या प्रसंग-निर्दिष्ट ग्रह/राशि-बल है; इकाई और सूत्र अध्याय-प्रसंग के अनुसार घोषित करने होते हैं।

उदाहरण (worked example) दो राशि Meṣa और Kanyā तुलना में — Meṣa में Sūrya (उच्च/स्वाभाविक बल-युक्त), Kanyā में Budha (सम-योग-कल्प)। यदि Sūrya का graha-bala > Budha का graha-bala, तो Meṣa को बली लिया जाता है। यदि दोनों graha-yoga समान घोषित हों, तो राशि-बल (चर/स्थिर/द्वन्द्व क्रम, अधिपति-बल आदि) से निर्णय — जैसे चर-राशि को क्रम-बल में प्रथम माना जाए (अगले श्लोकानुसार)।

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46.163
ज्ञेयाश्चरस्थिरद्वन्द्वाः क्रमतो बलशालिनः |
राशिसत्त्वसमानत्वे बहुवर्षो बली भवेद्
jñeyāścarasthiradvandvāḥ kramato balaśālinaḥ |
rāśisattvasamānatve bahuvarṣo balī bhaved

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञेयाः = जानने योग्य; चर = चर-राशि (movable); स्थिर = स्थिर-राशि (fixed); द्वन्द्वाः = द्विस्वभाव/उभय राशि (dual); क्रमतः = क्रम से; बलशालिनः = बलवान्; राशिसत्त्वसमानत्वे = राशि-सत्त्व (राशि-बल) समान होने पर; बहुवर्षः = अधिक-वर्ष वाला; बली भवेत् = बलवान् होता है।

हिन्दी भावार्थ चर, स्थिर और द्वन्द्व राशियाँ क्रमशः बलशालिनी मानी जाती हैं — अर्थात् तुलना में चर को प्रथम बल, फिर स्थिर, फिर द्वन्द्व। यदि दोनों पक्षों का राशि-सत्त्व समान हो, तो शास्त्र कहता है कि अधिक वर्ष (दीर्घ आयुर्दा/दशा-वर्ष) वाला पक्ष बली होता है।

English rendering Movable, fixed, and dual signs are strong in that order. When rāśi-sattva is equal, the one associated with the greater number of years is to be taken as stronger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-बल-क्रम (तुलना-कुंजी): bala(cara) > bala(sthira) > bala(dvandva)। समान सत्त्व पर: bala ∝ वर्ष-संख्या (prasaṅga-defined year count of the side under test)। यह पूर्णांक-क्रम-तुलना है, न कि निरपेक्ष संख्या-सूत्र।

उदाहरण (worked example) Vrṣabha (स्थिर) बनाम Mithuna (द्वन्द्व) — क्रम से Vrṣabha अधिक बलवान्। यदि दो पक्षों का राशि-सत्त्व समान हो और एक पक्ष 8 वर्ष, दूसरा 7 वर्ष से जुड़ा हो, तो 8-वर्ष वाला बली माना जाता है।

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46.164
एकः स्वोच्चगतश्चाऽन्यः परत्र यदि संस्थितः |
गृह्णीयादुच्चखेटस्थं राशिमन्यं विहाय वै
ekaḥ svoccagataścā'nyaḥ paratra yadi saṃsthitaḥ |
gṛhṇīyāduccakheṭasthaṃ rāśimanyaṃ vihāya vai

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकः = एक (ग्रह); स्वोच्चगतः = अपने उच्च-स्थान में स्थित; अन्यः = दूसरा; परत्र = अन्यत्र/अन्य स्थान में; संस्थितः = स्थित; गृह्णीयात् = ग्रहण करे; उच्चखेटस्थम् = उच्च-स्थित ग्रह वाली; राशिम् = राशि; अन्यम् विहाय = दूसरी को छोड़कर; वै = निश्चय से।

हिन्दी भावार्थ यदि एक ग्रह अपने उच्च में बैठा हो और दूसरा कहीं अन्यत्र स्थित हो, तो उच्च-स्थित ग्रह की राशि को ही स्वीकार करना चाहिए और दूसरी राशि को छोड़ देना चाहिए। यह उच्च-प्राधान्य का स्पष्ट नियम है।

English rendering If one graha is in its exaltation and the other is placed elsewhere, one should adopt the sign of the exalted graha and discard the other.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चयन-नियम: यदि graha₁ ∈ ucca-rāśi और graha₂ ∉ ucca-rāśi → chosen_rāśi = rāśi(graha₁); rāśi(graha₂) त्याज्य। (उच्च-स्थान: सूर्य = Meṣa 10°, चन्द्र = Vrṣabha 3°, … — प्रसिद्ध उच्च-बिन्दु; यहाँ श्लोक केवल “उच्चगत” की स्थिति माँगता है, अंश-सूक्ष्मता अलग घोषणा चाहती है।)

उदाहरण (worked example) तुलना में Sūrya Meṣa में (उच्च-राशि) और Śani Kumbha में (न उच्च)। नियम से Meṣa-पक्ष गृहीत, Kumbha-पक्ष विहाय — चाहे अन्य बल-तुलना अभी बाकी हो, इस श्लोक का प्राथमिक निर्देश उच्च-राशि-ग्रहण है।

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46.165
उच्चखेटस्य सद्भावे वर्षमेकं च निक्षिपेत् |
तथैव नीचखेटस्य वर्षमेकं विशोधयेत्
uccakheṭasya sadbhāve varṣamekaṃ ca nikṣipet |
tathaiva nīcakheṭasya varṣamekaṃ viśodhayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्च-खेटस्य सद्भावे = उच्च ग्रह के विद्यमान होने पर; वर्षम् एकं निक्षिपेत् = एक वर्ष जोड़े; तथैव = वैसे ही; नीच-खेटस्य = नीच ग्रह के होने पर; वर्षम् एकं विशोधयेत् = एक वर्ष घटाए।

हिन्दी भावार्थ जिस राशि में उच्च का ग्रह विद्यमान हो, उसकी दशा-अवधि में एक वर्ष जोड़ देना चाहिए; और उसी प्रकार जहाँ नीच का ग्रह हो, वहाँ एक वर्ष घटा देना चाहिए। यह उच्च-नीच का सूक्ष्म अवधि-संशोधन है।

English rendering When an exalted planet is present, add one year; likewise, for a debilitated planet, subtract one year.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-वर्ष का उच्च-नीच संशोधन (exact ±1):
आधार-वर्ष N पर —
उच्च ग्रह उपस्थित ⇒ N + 1
नीच ग्रह उपस्थित ⇒ N − 1
यह एक ठीक-ठीक पूर्णांक समायोजन है; इसे किसी सन्निकटन या सह्यता-बैंड में लुप्त नहीं होने देना चाहिए।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी चर राशि की आधार-दशा N = 7 वर्ष (चर = 7, श्लोक 168)।
• उस राशि में कोई उच्च ग्रह ⇒ 7 + 1 = 8 वर्ष।
• उसी में नीच ग्रह ⇒ 7 − 1 = 6 वर्ष।
(संकेत: उच्च/नीच का निर्णय पिण्ड-स्फुट राशि-अंश पर आधारित; अयनांश एवं उच्च-बिंदु की परिपाटी घोषित रहनी चाहिए।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक ±1 का संशोधन उसी अनुशासन की जड़ है जिस पर हमारी kaal-verification-oracle खड़ी है — जहाँ एक ±3 सह्यता-बैंड ने अष्टकवर्ग का एक वास्तविक −1 छिपा लिया था। दशा-वर्ष हो या अष्टकवर्ग-रेखा, प्रत्येक इकाई `==` से जाँची जाती है, बैंड से नहीं; एक-वर्ष का घटाव-जोड़ कभी गोल कर के मिटाया नहीं जाता।

46.166
एवं सर्वं समालोच्य जातकस्य फलं वदेत्
evaṃ sarvaṃ samālocya jātakasya phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; सर्वम् = सब कुछ; समालोच्य = भली-भाँति विचार कर; जातकस्य = जातक का; फलम् = फल; वदेत् = कहे/घोषित करे।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-वर्णित सब नियमों — ग्रह-बल, राशि-बल, उच्च-ग्रहण, वर्ष-संशोधन आदि — का सम्यक् आलोचन करके ही जातक का फल कहना चाहिए। शास्त्र यहाँ सावधानी और पूर्ण-विचार का आदेश देता है, न कि अधूरी तुलना से शीघ्र-फल।

English rendering Having thus considered everything carefully, one should declare the result for the native.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन का विधि-उपसंहार। यह गणना-श्रृंखला का अंतिम “declare after full review” चरण है; कोई नई संख्या या गुणांक नहीं।

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46.167
क्रमादुत्क्रमतो वाऽपि धर्मभावपदक्रमात् |
लग्नराशिं समारभ्य विज्ञश्चरदशां नयेत्
kramādutkramato vā'pi dharmabhāvapadakramāt |
lagnarāśiṃ samārabhya vijñaścaradaśāṃ nayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से (प्रत्यक्ष क्रम); उत्क्रमतः = उल्टे क्रम से; वा अपि = अथवा; धर्मभावपदक्रमात् = धर्म-भाव (नवम) / भाव-पद के क्रम से; लग्नराशिम् = लग्न-राशि को; समारभ्य = आरम्भ करके; विज्ञः = विद्वान्; चरदशाम् = चर-दशा को; नयेत् = चलाए/प्रवृत्त करे।

हिन्दी भावार्थ विद्वान् ज्योतिषी चर-दशा को लग्न-राशि से आरम्भ करके चलाए — चाहे प्रत्यक्ष क्रम में, चाहे उत्क्रम में, अथवा धर्म-भाव/पद-क्रम की रीति से। शास्त्र यहाँ चर-दशा के आरम्भ-बिन्दु (लग्न) और दिशा-विकल्पों का संकेत देता है।

English rendering Beginning from the lagna-rāśi, the wise practitioner should conduct the cara-daśā in direct order, in reverse order, or according to the dharma-bhāva/pada sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चर-दशा-पथ:
start = rāśi(lagna) ∈ {1…12}
path ∈ {direct: +1 mod 12, reverse: −1 mod 12, dharma-bhāva/pada-order}
प्रत्येक राशि-खंड की अवधि पूर्व-श्लोकों/स्थिर-चर-नियमों से Yᵢ वर्ष; संचयी समय t पर सक्रिय राशि = path[k] जहाँ Σᵢ₌₀ᵏ⁻¹ Yᵢ ≤ t < Σᵢ₌₀ᵏ Yᵢ।
(Convention: whole-sign rāśi count; ayanāṃśa lagna-degree → rāśi index के लिए आवश्यक, दशा-वर्ष स्वयं राशि-प्रकार पर निर्भर।)

उदाहरण (worked example) Lagna = Mithuna (राशि 3)। direct path: 3 → 4 → 5 → … । reverse: 3 → 2 → 1 → 12 → … । प्रत्येक खंड के वर्ष पूर्व-निर्धारित चर/स्थिर/द्वन्द्व या उच्च-नीच संशोधन से; धर्म-भाव-पद क्रम अलग प्रसंग-सूत्र है (पाठ-भेद/टीका-विस्तार संभव)।

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46.168
अथाऽहं संप्रवक्ष्यामि स्थिरसंज्ञां दशां द्विज |
चरे सप्त स्थिरे चाऽष्टौ द्वन्द्वे नव समाः स्मृताः
athā'haṃ saṃpravakṣyāmi sthirasaṃjñāṃ daśāṃ dvija |
care sapta sthire cā'ṣṭau dvandve nava samāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ अहं संप्रवक्ष्यामि = अब मैं भली-भाँति कहूँगा; स्थिर-संज्ञां दशाम् = "स्थिर" नामक दशा; द्विज = हे ब्राह्मण; चरे सप्त = चर राशि में सात (वर्ष); स्थिरे च अष्टौ = स्थिर राशि में आठ; द्वन्द्वे नव = द्विस्वभाव राशि में नौ; समाः स्मृताः = वर्ष कहे गए।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, अब मैं "स्थिर" नामक दशा कहता हूँ। इसमें चर राशि को सात वर्ष, स्थिर राशि को आठ वर्ष, और द्विस्वभाव राशि को नौ वर्ष — ये नियत दशा-अवधियाँ कही गई हैं।

English rendering Now I shall expound the daśā named Sthira: a movable sign carries seven years, a fixed eight, and a dual sign nine.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिर-दशा के राशि-प्रकार अनुसार नियत वर्ष-स्थिरांक:
चर → 7 वर्ष, स्थिर → 8 वर्ष, द्वन्द्व → 9 वर्ष।
सप्त = 7, अष्टौ = 8, नव = 9 (अंक-निष्ठ)। ये केवल राशि-स्वभाव पर निर्भर हैं, स्वामी-स्थिति पर नहीं — इसीलिए "स्थिर"।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-कुण्डली में मेष लग्न (चर), वृष (स्थिर), मिथुन (द्वन्द्व) क्रमशः आते हैं। तब स्थिर-दशा में —
मेष = 7 वर्ष, वृष = 8 वर्ष, मिथुन = 9 वर्ष।
(यदि किसी राशि में उच्च/नीच ग्रह हो तो 165 अनुसार ±1 समायोजन: जैसे वृष में उच्च ग्रह ⇒ 8 + 1 = 9 वर्ष।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अध्याय 46 वह स्थान है जहाँ हमने नक्षत्र-आधारित विंशोत्तरी का 120-वर्षीय चक्र पिन किया — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। उसके विपरीत यह स्थिर-दशा राशि-स्वभाव-आधारित (7/8/9) है, नक्षत्र-अंश-आधारित नहीं। दोनों को अलग रखना हमारे अनुशासन का मूल है: प्रत्येक दशा-पद्धति की अपनी इनपुट-इकाई (नक्षत्र-अंश बनाम राशि-स्वभाव) स्पष्ट घोषित रहनी चाहिए।

46.169
स्थिरत्वाच्च दशाब्दानां स्थिराख्येति निगद्यते |
ब्रह्मखेटाश्रितर्क्षादिर्दशेयं परिवर्तते
sthiratvācca daśābdānāṃ sthirākhyeti nigadyate |
brahmakheṭāśritarkṣādirdaśeyaṃ parivartate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थिरत्वात् = वर्ष-मान के स्थिर/अपरिवर्तनशील होने से; दशाब्दानाम् = दशा-वर्षों का; स्थिराख्या = “स्थिर” नाम; निगद्यते = कही जाती है; ब्रह्मखेट = ब्रह्मा-ग्रह (विशेष कल्पित कारक-ग्रह); आश्रित-ऋक्ष = जिस नक्षत्र/राशि पर वह स्थित हो; आदिः = वहाँ से आरम्भ; दशा इयम् = यह दशा; परिवर्तते = क्रम से चलती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस दशा के वर्ष-मान स्थिर (नियत) होने के कारण इसे स्थिर-दशा कहा जाता है। यह दशा ब्रह्मखेट जिस ऋक्ष (नक्षत्र/राशि-स्थान) में हो, वहीं से आरम्भ होकर आगे बढ़ती है। नाम और आरम्भ-बिन्दु दोनों इस श्लोक का मूल प्रतिपाद्य हैं।

English rendering Because the daśā years are fixed in measure, the system is called Sthira-daśā. The text states that this daśā proceeds beginning from the asterism (or sign-seat) occupied by the Brahmā planet (brahma-kheṭa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आरम्भ-बिन्दु: d₀ = ऋक्ष/राशि of brahma-kheṭa। दशा-वर्ष यहाँ “स्थिर” (fixed allotment) कहे गए हैं — इस श्लोक में संख्यात्मक वर्ष-मान नहीं दिए; मात्र नाम-हेतु (स्थिरत्व) और आरम्भ-नियम (ब्रह्मखेटाश्रित-ऋक्ष से) कथित हैं। क्रम आगे की राशि/नक्षत्र-शृंखला पर चलता है।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए ब्रह्मखेट मेष-स्थित नक्षत्र अश्विनी में निर्धारित है। तब स्थिर-दशा का आरम्भ अश्विनी/मेष-सीट से माना जाता है; अगली इकाइयाँ उसी क्रम में। (ब्रह्मखेट का निर्धारण 46.171–173 के नियम से; अयनांश दशा-नाम पर नहीं, केवल जन्म-देशान्तर/लग्न-गणना पर निर्भर करता है।)

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46.170
योऽसौ ब्रह्मग्रहः प्रोक्तः कथं स ज्ञायते मुने |
इति स्पष्टतरं ब्रूहि कृपाऽस्ति यदि ते मयि
yo'sau brahmagrahaḥ proktaḥ kathaṃ sa jñāyate mune |
iti spaṣṭataraṃ brūhi kṛpā'sti yadi te mayi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यः असौ ब्रह्मग्रहः = वह जो "ब्रह्मग्रह" कहा गया; प्रोक्तः = (पूर्व श्लोक 46.169 में) कहा हुआ; कथम् स ज्ञायते = वह किस रीति से पहचाना जाता है; मुने = हे मुनि (पराशर); स्पष्टतरम् ब्रूहि = अत्यन्त स्पष्ट करके कहिए; कृपा अस्ति यदि ते मयि = यदि मुझ पर आपकी कृपा है।

हिन्दी भावार्थ मैत्रेय जी स्थिरदशा के अधिपति-निर्धारक "ब्रह्मग्रह" के विषय में प्रश्न उठाते हैं — यह ब्रह्मग्रह कौन-सी विधि से जाना जाए, यह मुझे अत्यन्त स्पष्ट करके बताइए। यह विनम्र जिज्ञासा-वचन है, जो आगे 46.171–173 के निर्णय-सूत्रों की भूमिका बाँधता है। शिष्य की यही स्पष्टता-याचना शास्त्र की पद्धति को सूत्रबद्ध करने का अवसर देती है।

English rendering "That planet you have called the Brahma-graha — how, O sage, is it to be identified? Explain it most plainly, if you have compassion on me." Maitreya requests an exact rule for fixing the Brahma-planet of the sthira-daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न। यह प्रश्न-श्लोक ठीक उसी शास्त्रीय अनुशासन को माँगता है जिस पर यह ग्रन्थ टिका है: पहले निर्धारक की परिभाषा (definition) निश्चित करो, तभी गणना करो।

46.171
षष्ठाष्टव्ययनाथेषु यो बली विषमर्क्षगः |
पृष्ठस्थितो भवेद् ब्रह्मां बलिनो लग्नजाययोः
ṣaṣṭhāṣṭavyayanātheṣu yo balī viṣamarkṣagaḥ |
pṛṣṭhasthito bhaved brahmāṃ balino lagnajāyayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्ट-व्यय-नाथेषु = छठे, आठवें, बारहवें भावों के स्वामियों में; यः बली = जो बलवान् हो; विषम-ऋक्ष-गः = विषम (ओज) राशि में स्थित; पृष्ठ-स्थितः = "पीछे" की ओर स्थित (लग्न/सप्तम में बलवान् से पृष्ठभाग में); ब्रह्मा भवेत् = वह ब्रह्मग्रह होता है; बलिनः लग्न-जाययोः = लग्न और जाया (सप्तम) में जो अधिक बलवान्, उसकी अपेक्षा।

हिन्दी भावार्थ ब्रह्मग्रह का प्रथम निर्णय-सूत्र — षष्ठ, अष्टम और व्यय (6/8/12) के स्वामियों में से जो ग्रह बलवान् हो, विषम राशि में बैठा हो, और लग्न व सप्तम में जो अधिक बलवान् है उसके पृष्ठभाग में स्थित हो — वही ब्रह्मग्रह जानना चाहिए। यहाँ तीन कसौटियाँ एक साथ लगती हैं: दुःस्थान-स्वामित्व, ओज-राशि-स्थिति, और बल। "पृष्ठस्थित" की दिशा-व्याख्या में पाठ-भेद संभव।

English rendering Among the lords of the 6th, 8th and 12th, that one who is strong, occupies an odd sign, and stands "behind" the stronger of lagna and the 7th, is to be known as the Brahma-graha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह चयन-कलन (selection algorithm) है, गणित-सूत्र नहीं। प्रत्याशी-समुच्चय = { षष्ठेश, अष्टमेश, व्ययेश }; फ़िल्टर क्रम — (i) राशि-क्रमांक विषम हो (मेष=1, मिथुन=3, … ओज); (ii) बलवान् हो; (iii) लग्न बनाम सप्तम में जो प्रबल, उससे पृष्ठ (पश्चाद्) दिशा में हो। इन शर्तों को पूरा करने वाला ग्रह = ब्रह्मा।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न (मेष) सप्तम (तुला) से प्रबल है; 6/8/12 के स्वामियों में शनि विषम राशि कुम्भ में और लग्न से पृष्ठभाग में बलवान् है — तो शनि ब्रह्मग्रह। (यदि प्रत्याशी शनि/राहु/केतु ही निकले तो अगला श्लोक 46.172 अपवाद देता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) "यः बली" का निर्णय बिना संख्यात्मक बल-माप के नहीं हो सकता — यहीं षड्बल (BPHS Ch.27) प्रासंगिक है, जहाँ स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्बल रूप-विरूप में जुड़ते हैं (1 रूप = 60 विरूप)। हमारे प्रकल्प का षड्बल-मॉड्यूल इसी बल को एक स्पष्ट संख्या देता है, ताकि "कौन बलवान्" का उत्तर व्याख्या नहीं, गणना बने।

46.172
कारकादष्टमेशो वा ब्रह्माऽप्यष्टभावगः |
शनौ पाते च ब्रह्मत्त्वे ब्रह्मा तत्षष्ठखेचरः
kārakādaṣṭameśo vā brahmā'pyaṣṭabhāvagaḥ |
śanau pāte ca brahmattve brahmā tatṣaṣṭhakhecaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकात् अष्टम-ईशः = कारक से आठवें का स्वामी; वा = अथवा; ब्रह्मा अपि = ब्रह्मा भी; अष्ट-भाव-गः = अष्टम भाव में स्थित; शनौ पाते च = शनि और पात (राहु) में; ब्रह्मत्त्वे = ब्रह्मा-पद प्राप्त होने पर; ब्रह्मा = ब्रह्मा; तत्-षष्ठ-खेचरः = उनसे छठा खेचर (ग्रह)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे विकल्प देता है — कारक से अष्टमेश, अथवा अष्टम भाव में बैठा ग्रह भी ब्रह्मा हो सकता है। यदि शनि या पात (राहु) पर ब्रह्मत्त्व आ जाए, तो ब्रह्मा उन्हें न मानकर उनसे षष्ठ खेचर को माना जाता है। विशेष निषेध/स्थानान्तरण का नियम है।

English rendering Alternatively, the lord of the 8th from the kāraka, or a planet in the 8th house, may be Brahmā. When Saturn or Pāta (Rāhu) would hold Brahmā-status, the text assigns Brahmā instead to the sixth planet from that one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विस्तारित चयन-नियम:

  • विकल्प A: g = lord(H₈ from kāraka)
  • विकल्प B: g ∈ H₈ (अष्टभावग)
  • निषेध-स्थानान्तरण: यदि g ∈ {Śani, Pāta/Rāhu} और g ब्रह्म-अभ्यर्थी हो, तो brahma := ṣaṣṭha-khecara(g*)

“षष्ठखेचर” की गणना — राशि-क्रम से छठा स्थान, या ग्रह-गणना-क्रम — टीका-भेद से भिन्न हो सकती है; पाठ-भेद संभव। “कारक” यहाँ चर-कारक/आत्मकारक परम्परा से जोड़ा जाता है; इस श्लोक में कारक-परिभाषा नहीं दी गई।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए प्राथमिक नियम से शनि ब्रह्म-अभ्यर्थी ठहरता है। तब ब्रह्मा = शनि नहीं, अपितु “तत्षष्ठखेचर”। यदि षष्ठ-स्थान-गणना राशि से हो और शनि तुला में हो, तो छठी राशि = मीन; वहाँ स्थित (या उस स्थान का संबद्ध) खेचर ब्रह्मा — जिस गणना-परम्परा को आपने चुना हो, उसे स्पष्ट घोषित करें।

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46.173
बहवो लक्षणक्रान्ता ज्ञेयस्तेष्वधिकांशकः |
अंशसाम्ये बलाधिक्याद् विज्ञेयो ब्रह्मखेचरः
bahavo lakṣaṇakrāntā jñeyasteṣvadhikāṃśakaḥ |
aṃśasāmye balādhikyād vijñeyo brahmakhecaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहवः लक्षण-क्रान्ताः = अनेक ग्रह (यदि) लक्षणों से युक्त हों; तेषु अधिक-अंशकः ज्ञेयः = उनमें जो अधिक अंश (नवांश/उच्च कोटि की डिग्री) वाला हो वही जानना; अंश-साम्ये = अंश समान होने पर; बल-आधिक्यात् = बल की अधिकता से; विज्ञेयः ब्रह्म-खेचरः = ब्रह्मग्रह जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ जब एक से अधिक ग्रह ब्रह्मग्रह के लक्षण पूरे करें, तब निर्णायक क्रम बताया गया है — पहले अंशाधिक्य (जिसकी अंश-संख्या अधिक हो) से चुनो; और यदि अंश भी समान हों, तो बलाधिक्य से चुनो। यह दो-स्तरीय टाई-ब्रेक है: प्रथम कसौटी अंश, द्वितीय बल। इससे "अनेक प्रत्याशी" की स्थिति में भी उत्तर एकमेव और निश्चित रहता है।

English rendering When several planets satisfy the marks, the one of greater aṃśa (degree-advancement) is to be taken; and if the aṃśas are equal, the Brahma-planet is decided by superiority of strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो-स्तरीय निर्णय: ब्रह्मा = argmax(अंश); यदि max एकाधिक (अंश समान) → ब्रह्मा = argmax(बल)। "अंश" = राशि के भीतर की डिग्री-प्रगति (प्रायः नवांश D9 सन्दर्भ); "बल" = षड्बल-योग।

उदाहरण (worked example) दो प्रत्याशी A व B दोनों लक्षण-युक्त — A अपनी राशि में 22° पर, B 14° पर → अधिक अंश A ⇒ A ब्रह्मा। यदि दोनों 18° पर समान हों → षड्बल में जो अधिक (मान लें B का 6.2 रूप > A का 5.4 रूप) ⇒ B ब्रह्मा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक हमारी दो नींवों को जोड़ता है — अंश की तुलना षोडश-वर्ग (BPHS Ch.6) की नवांश-रेखा पर टिकती है, जहाँ 30° राशि का सम-विभाजन शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है; और अंश-साम्य पर बल-आधिक्य षड्बल (Ch.27) को बुलाता है। "अधिक" का निर्णय हमारे यहाँ exact-`==`/कठोर-तुलना से होता है, tolerance-बैंड से नहीं — क्योंकि एक बार ±बैंड ने अष्टकवर्ग का वास्तविक −1 छिपा दिया था; टाई-ब्रेक में यही कठोरता उत्तर को एकमेव रखती है।

46.174
योगार्धे च दशामानं द्वयोर्योगार्धसम्मितम् |
लग्नसप्तमप्राण्यादिर्दशेयं च प्रवर्तते
yogārdhe ca daśāmānaṃ dvayoryogārdhasammitam |
lagnasaptamaprāṇyādirdaśeyaṃ ca pravartate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योग-अर्धे = योगार्ध (दशा) में; दशा-मानम् = दशा का परिमाण; द्वयोः योग-अर्ध-सम्मितम् = दोनों के योग के आधे के बराबर; लग्न-सप्तम-प्राण्योः आदिः = लग्न और सप्तम में जो प्राण्य (बलवान्) हो वहाँ से आदि; दशा इयम् = यह दशा; प्रवर्तते = प्रवृत्त होती है।

हिन्दी भावार्थ योगार्ध-दशा में शास्त्र कहता है — दशा-मान दोनों (लग्न और सप्तम) के वर्ष-मानों के योग का आधा होता है। यह दशा लग्न और सप्तम में जो बलवान् हो, वहीं से आरम्भ होती है। स्थिर-दशा के बाद यह अलग माप-विधि है।

English rendering In Yoga-ardha, the daśā measure equals half the combined measure of the two (Lagna and the 7th). The text states that this daśā begins from the stronger of Lagna and the seventh.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

दशा-मान (योगार्ध):
  D = (Y_L + Y_7) / 2

जहाँ Y_L = लग्न-राशि का दशा-वर्ष-मान, Y_7 = सप्तम-राशि का दशा-वर्ष-मान (अध्याय की स्थिर/संबद्ध वर्ष-सारिणी से; इस श्लोक में केवल “अर्ध-योग” नियम है, व्यक्तिगत वर्ष-संख्या नहीं)।

आरम्भ:
  r₀ = stronger(rāśi_Lagna, rāśi_H₇)

उदाहरण (worked example) लग्न = वृष (मान Y_L = a), सप्तम = वृश्चिक (Y_7 = b)। तब प्रत्येक योगार्ध-इकाई का मान D = (a + b)/2। यदि लग्न-राशि बलवान् हो, दशा r₀ = वृष से आरम्भ; अगला क्रम 46.175 के केन्द्रादि-बल-क्रम से। (a, b अध्याय की पूर्व वर्ष-सारिणी से लें; अयनांश केवल लग्न-देशान्तर के लिए।)

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46.175
लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान् भवेत् |
ततः केन्द्रादिसंस्थानां राशीनाञ्च बलक्रमात्
lagnasaptamayormadhye yo rāśirbalavān bhavet |
tataḥ kendrādisaṃsthānāṃ rāśīnāñca balakramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-सप्तमयोः मध्ये = लग्न और सप्तम के बीच; यः राशिः = जो राशि; बलवान् भवेत् = बलवान् हो; ततः = उससे; केन्द्र-आदि-संस्थानाम् = केन्द्र आदि स्थानों पर स्थित; राशीनाम् च = राशियों का भी; बल-क्रमात् = बल के क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न और सप्तम में जो राशि बलवान् हो, उसी से आरम्भ कर केन्द्रादि संस्थित राशियों का दशा-क्रम उनके बल के अनुसार चलता है। यह योगार्ध-दशा की राशि-शृंखला का नियम है (श्लोक यहाँ क्रम-सूत्र का पूर्वार्ध-सा है; पूर्ण फलित-क्रम आगे के पाठ में जुड़ता है — पाठ-भेद/श्लोक-सीमा संभव)।

English rendering Whichever sign is stronger between Lagna and the seventh becomes the starting point; thereafter the signs occupying the angles and further stations are taken in the order of their strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम-निर्माण (ordering), वर्ष-सूत्र नहीं:

1. r₀ = argmax { bal(Lagna-rāśi), bal(H₇-rāśi) }
2. उम्मीदवार समूह: केन्द्र (1,4,7,10 from r₀), फिर पनफर/आपोक्लिम आदि — “केन्द्रादि”
3. प्रत्येक वर्ग के भीतर: sort by bal(rāśi) ↓
4. दशा-अवधि प्रत्येक राशि पर: D = (Y_L + Y_7)/2 (पूर्व श्लोक)

केन्द्रादि की ठीक-ठीक परिधि और क्या “राशि” का बल स्वामी-बल से लिया जाए — टीका-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) r₀ = कन्या (लग्न > सप्तम-बल)। केन्द्र-राशियाँ from कन्या: कन्या, धनु, मीन, मिथुन। मान लीजिए बल-क्रम: कन्या > मिथुन > धनु > मीन। तब योगार्ध-दशा-क्रम इन्हीं चार से बल-क्रम में आरम्भ; प्रत्येक की अवधि D = (Y_L + Y_7)/2। (घर-पद्धति: पूर्ण-राशि; बल: अध्याय-कथित राशि/स्वामी-बल।)

46.176
कारकादपि राशीनां खेटानां चैवमेव हि |
दशाब्दाश्चरवज्ज्ञेयाः खेटानां च स्वभावधि
kārakādapi rāśīnāṃ kheṭānāṃ caivameva hi |
daśābdāścaravajjñeyāḥ kheṭānāṃ ca svabhāvadhi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकात् = कारक (चर-आदि कारक-बिन्दु) से आरम्भ; अपि = भी; राशीनां = राशियों की (दशा); खेटानां = ग्रहों की; च एवम् एव हि = ठीक उसी प्रकार; दशा-अब्दाः = दशा-वर्ष-संख्या; चर-वत् = चर-दशा-विधि के समान; ज्ञेयाः = जाननी चाहिए; खेटानां च = और ग्रहों की; स्वभाव-अधि = (ग्रह के) स्वभाव / स्वभाव-राशि के अधिष्ठान के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारक से भी राशियों और ग्रहों की दशा-वर्ष उसी नियम से निर्धारित होते हैं, जैसा चर-दशा में बताया गया है। ग्रहों की वर्ष-संख्या उनके स्वभाव (चर / स्थिर / द्विस्वभाव प्रकृति तथा स्व-अधिकार) के अनुसार जानी जाए। यह कारकाख्य-दशा-क्रम की आधार-सूत्र-पंक्ति है — फल नहीं, गणना-विधि का निर्देश।

English rendering The text states that from the kāraka as well, the daśā-years of the signs and of the planets are to be known in the same manner as under the cara (movable) rule; and for the planets, according to their own nature (svabhāva).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-वर्ष-नियम = चर-दशा के समान (चरवत्); ग्रह-दशा = स्वभावानुसार।
औपचारिक रूप:
dasha_years(rāśi) := cara_rule(rāśi)
dasha_years(graha) := cara_rule(svabhāva / adhipatya of graha)
जहाँ `cara_rule` = इस अध्याय में पूर्वोक्त चर-वर्ष-गणना (राशि → स्वामी तक गणना आदि; पूर्ण अङ्क पूर्व-श्लोकों पर निर्भर; यहाँ केवल “चरवत्” का निर्देश है)।
नियत: कोई नया संख्या-अङ्क नहीं — केवल समानता-संकेत (चर-विधि)।

उदाहरण (worked example) मान लें पूर्वोक्त चर-नियम से मेष की दशा-वर्ष = 7 (उदाहरण-मान; वास्तविक अङ्क अध्याय के चर-सूत्र से लें)।
यदि कारक-बिन्दु से गणना भी “चरवत्” है, तो उसी राशि पर कारक-दशा में भी वर्ष = 7।
ग्रह-पक्ष: यदि बुध का स्वभाव-दोहरी राशि (मिथुन+कन्या) है, तो अगले श्लोक (46.177) का उभय-अवधि नियम लागू — यहाँ केवल “स्वभावधि” का प्रवेश-बिन्दु।
संकेत: ayanāṃśa/house-system इस वर्ष-सूत्र पर निर्भर नहीं; केवल राशि-स्वामी-गणना।

46.177
द्विराश्यधिपक्षेटस्य गण्येदुभयावधि |
उभयोर्धिक संख्या कारकस्य दशा समाः
dvirāśyadhipakṣeṭasya gaṇyedubhayāvadhi |
ubhayordhika saṃkhyā kārakasya daśā samāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-राशि-अधिप-खेटस्य = दो राशियों के स्वामी ग्रह की; गणयेत् = गणना करे; उभय-अवधि = दोनों (राशि-)सीमाओं तक; उभयोः = दोनों में से; अधिक-संख्या = बड़ी संख्या; कारकस्य = कारक की; दशा = दशा-वर्ष; समाः = (उसके) समान / वही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह दो राशियों का स्वामी है, उसकी दशा-वर्ष दोनों राशियों के लिए अलग-अलग (चरवत्) गिनकर दोनों संख्याएँ निकालें। दोनों में जो संख्या अधिक हो, वही उस कारक/ग्रह की दशा-वर्ष मानी जाए। यह द्विराश्यधिप (बुध, शुक्र आदि) के लिए स्पष्ट max-चयन नियम है।

English rendering For a planet that rules two signs, one should count the period-limit for both; of the two numbers, the greater equals the daśā (years) of that kāraka/planet.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
ग्रह g के दो स्व-राशि r₁, r₂ हों।
n₁ = cara_count(r₁)
n₂ = cara_count(r₂)
dasha_years(g) = max(n₁, n₂)
(“उभयोर्धिक संख्या … दशा समाः”)
यह exact max-चयन है; औसत या योग नहीं।

उदाहरण (worked example) बुध = मिथुन + कन्या।
मान लें (चर-नियम से, केवल उदाहरण):
n(मिथुन) = 8, n(कन्या) = 5।
तब dasha_years(बुध) = max(8, 5) = 8 वर्ष।
यदि शुक्र: n(वृष) = 6, n(तुला) = 9 → max = 9।
संकेत: वास्तविक nᵢ पूर्वोक्त चर-वर्ष-सूत्र से; यहाँ केवल “अधिक संख्या = दशा” का नियम।

46.178
आत्मकारकमारभ्य कारकाख्यदशा क्रमात् |
लग्नात् कारकपर्यन्तं संख्यामत्र दशां विदुः
ātmakārakamārabhya kārakākhyadaśā kramāt |
lagnāt kārakaparyantaṃ saṃkhyāmatra daśāṃ viduḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मकारकम् आरभ्य = आत्मकारक से आरम्भ करके; कारकाख्य-दशा = कारकाख्य (कारक-नामकी) दशा; क्रमात् = क्रम से; लग्नात् = लग्न से; कारक-पर्यन्तम् = (उस) कारक तक; संख्याम् = (राशियों की) संख्या; अत्र = यहाँ; दशाम् = दशा (वर्ष-मान) ; विदुः = जानते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकाख्य-दशा का क्रम आत्मकारक से आरम्भ होता है और तत्पश्चात् कारक-क्रम में चलता है। प्रत्येक कारक की दशा-वर्ष = लग्न से उस कारक (की राशि) तक की संख्या। यह “लग्न → कारक” की साधारण गणना है — फल-कथन नहीं, अवधि-सूत्र।

English rendering Beginning from the Ātmakāraka, the kāraka-named daśā proceeds in order; here the number (of signs) from the lagna up to the (relevant) kāraka is known as that daśā’s measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
कारक-क्रम: AK → (तत्पश्चात् पारम्परिक कारक-क्रम; पाठ में “क्रमात्”)।
किसी कारक K की राशि-स्थिति r_K, लग्न-राशि r_L (1…12):
dasha_years(K) = ((r_K − r_L) mod 12)
(शून्य-परिणाम पर परम्परा में 12 लेने का पाठ-भेद संभव — श्लोक केवल “संख्या” कहता है।)
दशा-क्रम: start = Ātmakāraka, then sequential kārakas।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क (4), आत्मकारक = तुला (7) पर।
dasha_years(AK) = (7 − 4) mod 12 = 3 वर्ष।
अगला कारक यदि धनु (9) पर: (9 − 4) = 5 वर्ष।
संकेत: राशि-सूचकांक 1=मेष … 12=मीन; house-system नहीं — केवल राशि-दूरी।
आत्मकारक-निर्णय: सप्त/अष्ट-कारक पद्धति (पूर्व अध्याय); यहाँ केवल दशा-आरम्भ-बिन्दु।

46.179
मण्डूकापरपर्याया त्रिकूटाख्यदशा द्विज |
लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान् भवेत्
maṇḍūkāparaparyāyā trikūṭākhyadaśā dvija |
lagnasaptamayormadhye yo rāśirbalavān bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मण्डूक = मण्डूक-दशा; अपर-पर्याया = दूसरा नाम / पर्याय; त्रिकूट-आख्य-दशा = त्रिकूटाख्य-दशा; द्विज = हे द्विज; लग्न-सप्तमयोः मध्ये = लग्न और सप्तम के बीच; यः राशिः = जो राशि; बलवान् भवेत् = बली हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मण्डूक-दशा का अपर नाम त्रिकूटाख्य-दशा है। इसकी आरम्भ-राशि वह है जो लग्न और सप्तम में से अधिक बलवती हो। यह केवल आरम्भ-चयन का सूत्र है; वर्ष-मान और गति-दिशा अगले श्लोक में आते हैं।

English rendering O twice-born, the Maṇḍūka daśā — also called Trikūṭa — begins from whichever of the lagna and the seventh signs is the stronger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
start_rāśi = argmax_bala({lagna_rāśi, 7th_rāśi})
बल-तुलना: षड्बल / राशि-बल (अध्याय 25–27 की विधियाँ; इस श्लोक में बल-सूत्र विस्तृत नहीं)।
गणितीय सूत्र यहाँ = द्वि-उम्मीदवार चयन; वर्ष-अङ्क नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह, सप्तम = कुम्भ।
यदि सिंह-बल > कुम्भ-बल → मण्डूक/त्रिकूट आरम्भ = सिंह।
विपरीत होने पर आरम्भ = कुम्भ।
संकेत: bala-convention (षड्बल-रূপ/विरूप) घोषित रखें; यह श्लोक केवल “बलवान्” कहता है।

46.180
ततः क्रमेणौजराशौ समे नेया तथोऽत्क्रमात् |
त्रिकूटानां च विज्ञेयाः स्थिरवच्च दशा समाः
tataḥ krameṇaujarāśau same neyā tatho'tkramāt |
trikūṭānāṃ ca vijñeyāḥ sthiravacca daśā samāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = उससे (बलवान् राशि से); क्रमेण = क्रम से (अनुलोम); ओज-राशौ = विषम राशि में; समे = सम राशि में; नेया = ले जानी चाहिए; तथा उत्क्रमात् = उसी प्रकार प्रतिक्रम से; त्रिकूटानाम् = त्रिकूटों की; च विज्ञेयाः = और जानी जाएँ; स्थिर-वत् = स्थिर-दशा के समान; च दशा समाः = दशा-वर्ष समान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बलवान् लग्न/सप्तम से दशा आगे बढ़े — यदि आरम्भ-राशि विषम (ओज) हो तो अनुक्रम से, यदि सम हो तो उत्क्रम से। त्रिकूट-राशियों की दशा-वर्ष स्थिर-दशा के समान मानी जाएँ। यह मण्डूक/त्रिकूट की दिशा-नियम + वर्ष-समानता का पूर्ण युगल-सूत्र है।

English rendering From that (stronger) sign one proceeds in direct order when it is odd, and in reverse order when it is even; and the daśā measures of the trikūṭas are to be known as equal to those of the sthira (fixed) rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
r₀ = start_rāśi (46.179)
यदि r₀ विषम (1,3,5,7,9,11): direction = +1 (क्रम)
यदि r₀ सम (2,4,6,8,10,12): direction = −1 (उत्क्रम)
अनुक्रम: r<sub>k+1</sub> = ((r_k − 1 + direction) mod 12) + 1
dasha_years(r) = sthira_rule(r) (“स्थिरवत् … दशा समाः”)
त्रिकूट = (परम्परा में) 1–5–9 आदि राशि-त्रिक; वर्ष-मान = स्थिर-विधि के अङ्क (पूर्व-श्लोक; यहाँ केवल समानता)।

उदाहरण (worked example) r₀ = सिंह = 5 (विषम) → direction = +1।
क्रम: 5 → 6 → 7 → 8 → …
यदि r₀ = वृष = 2 (सम) → direction = −1: 2 → 1 → 12 → 11 → …
वर्ष: यदि स्थिर-नियम से सिंह = 8 वर्ष (उदाहरण-मान), तो त्रिकूट में भी सिंह-दशा = 8।
संकेत: वास्तविक स्थिर-वर्ष-तालिका अध्याय के स्थिर-सूत्र से बाँधें।

46.181
निर्याणस्य विचारार्थं कैश्चिछूलदशा स्मृता |
लग्नसप्तमतो मृत्युभयोर्यो बलवान् भवेत्
niryāṇasya vicārārthaṃ kaiścichūladaśā smṛtā |
lagnasaptamato mṛtyubhayoryo balavān bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्याणस्य = निर्वाण / देह-त्याग / अन्त्य-काल के; विचार-अर्थम् = विचार के लिए; कैश्चित् = किन्हीं (आचार्यों) द्वारा; शूल-दशा = शूल-दशा; स्मृता = कही गई; लग्न-सप्तमतः = लग्न और सप्तम से; मृत्युभयोः = दो मृत्यु-सम्बद्ध (मारक) राशियों में; यः = जो; बलवान् भवेत् = बली हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि निर्याण (अन्त्य-काल) के विचारार्थ किन्हीं आचार्यों ने शूल-दशा स्मरण की है। आरम्भ-राशि लग्न और सप्तम — जो मृत्यु-विचार से जुड़े द्वय हैं — में से बलवती राशि है। यह चयन-सूत्र है; दिशा, वर्ष और मारक-फल अगले श्लोक में। (पाठ “मृत्युभयोः” / “लग्नसप्तमतो” का सम्बन्ध — पाठ-भेद संभव; आशय: लग्न–सप्तम द्वय में बलवान्।)

English rendering For the consideration of exit (niryāṇa), some have remembered the Śūla daśā; it begins from whichever of the lagna and the seventh — the two death-related signs — is the stronger.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
start_rāśi = argmax_bala({lagna, 7th})
उद्देश्य-लेबल (शास्त्र): निर्याण-विचार — यह गणना का फल-क्षेत्र है, न कि ज्योतिष-इंजन का “पूर्वानुमान”।
वर्ष/दिशा → 46.182।

उदाहरण (worked example) लग्न = मीन (12), सप्तम = कन्या (6)।
यदि कन्या-बल > मीन-बल → शूल-आरम्भ = कन्या।
बल-तुलना: षड्बल या राशि-बल (घोषित convention)।
कोई वर्ष-अङ्क इस श्लोक में नहीं।

46.182
तदादिर्विषमे विप्र क्रमादुत्क्रमतः समे |
दशाब्दाः स्थिरवत्तत्र बलिमारकभे मृतिः
tadādirviṣame vipra kramādutkramataḥ same |
daśābdāḥ sthiravattatra balimārakabhe mṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-आदिः = उसी (बलवान् राशि) से आरम्भ; विषमे = विषम राशि में; विप्र = हे विप्र; क्रमात् = अनुक्रम से; उत्क्रमतः = उत्क्रम से; समे = सम राशि में; दशा-अब्दाः = दशा-वर्ष; स्थिर-वत् = स्थिर-दशा के समान; तत्र = वहाँ; बलि-मारक-भे = बली मारक-राशि में; मृतिः = (शास्त्रानुसार) मृत्यु-संकेत / निर्याण-विचार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शूल-दशा उसी बलवान् राशि से चले — विषम में क्रम से, सम में उत्क्रम से; दशा-वर्ष स्थिर-विधि के समान हों। पाठ कहता है कि बली मारक-राशि की दशा में मृति/निर्याण का विचार किया जाता है। यह शास्त्र का फल-कथन है — निश्चित भविष्यवाणी नहीं; हम इसे “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं, भय या दबाव के रूप में नहीं।

English rendering Beginning from that sign, O sage, one proceeds in direct order if it is odd and in reverse if even; the daśā-years are as under the sthira rule; and the text states that (consideration of) death is in the strong māraka sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
r₀ = start (46.181)
direction = +1 if r₀ odd; −1 if r₀ even
r-sequence: modular step as in 46.180
dasha_years(r) = sthira_rule(r)
फल-नियम (शास्त्र-कथन, गणना नहीं):
यदि running rāśi ∈ maraka-set और bala(r) उच्च → “मृतिः” का शास्त्रीय संकेत-क्षेत्र
maraka-set: सामान्यतः 2nd एवं 7th (तथा उनके स्वामी) — पूर्ण सूची पूर्व/सहायक अध्यायों से; इस पंक्ति में केवल “बलिमारकभे”।

उदाहरण (worked example) r₀ = तुला = 7 (विषम) → क्रम: 7 → 8 → 9 → …
dasha_years = स्थिर-नियम (उदा. यदि स्थिर से तुला = 7 वर्ष, तो शूल में भी 7)।
मान लें चल-दशा = वृश्चिक (8) और 8वीं/मारक-संज्ञा-बल उच्च हो — शास्त्र “बलिमारकभे मृतिः” कहता है; हम इसे फल-कथन के रूप में रिपोर्ट करते हैं, न कि सुनिश्चित घटना के रूप में।
संकेत: sthira-year table और maraka-definition declare करें; ayanāṃśa इस दिशा-नियम पर निर्भर नहीं।

46.183
जन्मलग्नत्रिकोणेषु यो राशिर्बलवान् भवेत् |
तमार्भ्य नयेद् धीमान् चरिपर्यायवद् दशाम्
janmalagnatrikoṇeṣu yo rāśirbalavān bhavet |
tamārbhya nayed dhīmān cariparyāyavad daśām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्म-लग्न = जन्मकालीन उदित राशि; त्रिकोणेषु = लग्न से 1/5/9 त्रिकोण-राशियों में; यः राशिः बलवान् भवेत् = जो राशि सबसे बलवान् हो; तम् आरभ्य = उसी से आरम्भ करके; धीमान् = बुद्धिमान् दैवज्ञ; चर-पर्याय-वत् = चर (जैमिनी चर) दशा की पद्धति के समान; नयेत् दशाम् = दशा-गणना चलाए।

हिन्दी भावार्थ यहाँ त्रिकोण-दशा का प्रवेश-सूत्र है। लग्न तथा उसकी दोनों त्रिकोण-राशियों (5वीं, 9वीं) — इन तीनों में से जो राशि बल में अधिक हो, दैवज्ञ को उसी को प्रारम्भ-बिन्दु बनाकर, ठीक चर-दशा की चाल की तरह, दशा-क्रम आगे बढ़ाना चाहिए। आरम्भ बल से तय होता है, स्थान से नहीं।

English rendering Among the birth-lagna and its two trine signs (the 5th and 9th), whichever is strongest — beginning from that sign the wise one should unfold the daśā exactly as in the cara (movable/chara) sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आरम्भ-राशि = argmax{ bala } over the set { L, L+4, L+8 } (mod 12), जहाँ L = लग्न-राशि-सूचक। यह एक चयन-नियम (selection rule) है, संख्यात्मक फल नहीं; प्रवर्तन-विधि चर-दशा से उधार ली गई है (आगे 46.184 में दिशा व वर्ष)। बल-निर्णय की परिपाटी (राशि-बल का मानक) घोषित करनी अनिवार्य — यही "convention declare" अनुशासन है।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (L=1); त्रिकोण = मेष, सिंह, धनु (1, 5, 9)। यदि इन तीनों में सिंह सर्वाधिक बलवान् आँका जाए, तो दशा-चक्र सिंह से आरम्भ होगा — मेष से नहीं। (बल-मानक पूर्व-घोषित होना चाहिए; भिन्न मानक भिन्न आरम्भ दे सकता है — पाठ-भेद/परिपाटी-भेद संभव।)

46.184
क्रमादुत्क्रमतो ग्राह्यं त्रिकोणं विषमे समे |
त्रिकोणाख्यदशा प्रोक्ता समा नाथावसानकाः
kramādutkramato grāhyaṃ trikoṇaṃ viṣame same |
trikoṇākhyadaśā proktā samā nāthāvasānakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = अनुलोम/सीधा क्रम; उत्क्रमतः = प्रतिलोम/उलटा क्रम; ग्राह्यं = ग्रहणीय; त्रिकोणं = त्रिकोण-राशि-समूह; विषमे = विषम राशि में; समे = सम राशि में; त्रिकोणाख्य-दशा = त्रिकोण नाम की दशा; प्रोक्ता = कही गई; समाः = समान अवधि वाली; नाथ-अवसानकाः = स्वामी (नाथ) तक समाप्ति वाली / नाथों पर अवसान वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि त्रिकोण-दशा में विषम राशि से आरम्भ होने पर क्रम (अनुलोम) और सम राशि से आरम्भ होने पर उत्क्रम (प्रतिलोम) अपनाया जाए। यह दशा “त्रिकोणाख्य दशा” कही गई है। अवधियाँ समान हैं और नाथ (स्वामी) के सन्दर्भ में अवसान मानी गई हैं।

English rendering The trikoṇa is to be taken in direct order when the starting sign is odd and in reverse order when it is even. This is called the Trikoṇa-named daśā; the periods are equal and terminate with reference to the lords (nātha).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) R₀ = बलवान् त्रिकोण-राशि। यदि R₀ विषम (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ) → क्रम: R₀, R₀+1, R₀+2, … (mod 12)। यदि R₀ सम → उत्क्रम: R₀, R₀−1, R₀−2, … (mod 12)। अवधि: समाः — प्रत्येक राशि-खण्ड समान वर्ष (चर-पर्याय/स्थिर-पर्याय की समान-अवधि परम्परा; ठीक वर्ष-संख्या इस श्लोक में अंकित नहीं — पाठ-भेद/पर्याय-सन्दर्भ संभव)। “नाथावसानकाः” = दशा-खण्ड स्वामी-सम्बद्ध अवसान।

उदाहरण (worked example) R₀ = सिंह (विषम) → क्रम: सिंह → कन्या → तुला → …। R₀ = वृष (सम, यदि बल से चुना) → उत्क्रम: वृष → मेष → मीन → …। प्रत्येक खण्ड समान अवधि (समान-वर्ष नियम; पूर्ण वर्ष-मान हेतु चर-पर्याय का घोषित स्थिरांक प्रयोग करें)।

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46.185
लग्नाद् धर्मस्य तद्दृष्टराशीनां च दशास्ततः |
दशमस्य च तद्दृष्टराशीनां च नयेत् पुनः
lagnād dharmasya taddṛṣṭarāśīnāṃ ca daśāstataḥ |
daśamasya ca taddṛṣṭarāśīnāṃ ca nayet punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; धर्मस्य = धर्म-भाव = नवम भाव/राशि की; तत्-दृष्ट-राशीनां = उस (नवम) द्वारा दृष्ट राशियों की; च = और; दशाः = दशाएँ; ततः = उसके बाद; दशमस्य = दशम भाव/राशि की; च = तथा; तत्-दृष्ट-राशीनां = दशम-दृष्ट राशियों की; नयेत् पुनः = फिर से गणना करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न से पहले धर्म (नवम) राशि की दशा ली जाए, फिर उन राशियों की जो उस नवम से दृष्ट हों। तदनन्तर दशम राशि और दशम-दृष्ट राशियों की दशा पुनः उसी रीति से चलाई जाए। यह दृष्टि-आधारित दशा-क्रम का प्रथम चरण है।

English rendering From the lagna one is to compute first the daśās of the ninth (dharma) and of the signs aspected by it; then again those of the tenth and of the signs aspected by the tenth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम-ब्लॉक १: {R₉} ∪ {R : R ∈ dṛṣṭi(R₉)}। क्रम-ब्लॉक २: {R₁₀} ∪ {R : R ∈ dṛṣṭi(R₁₀)}। जहाँ Rₖ = लग्न से k-वाँ भाव-राशि (पूर्ण-राशि भाव; ३०° गृह)। राशि-दृष्टि (चर/स्थिर/द्विस्वभाव) का नियम अगले श्लोकों से जुड़े दृग्-दशा विन्यास में आता है। गणितीय रूप: दशा-सूची = concat(order(R₉, aspects(R₉)), order(R₁₀, aspects(R₁₀)), …)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क → R₉ = मीन, R₁₀ = मेष। पहले मीन + मीन-दृष्ट राशियाँ; फिर मेष + मेष-दृष्ट राशियाँ। दृष्ट-समुच्चय का क्रम ४६.१८७ के चर/स्थिर/द्वन्द्व नियम से।

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46.186
एकादशस्य तद्दृष्टराशीनां स्थिरवत् समाः |
प्रवृत्ता दृग् वशाद्यस्माद् दृग्दशेयं ततः स्मृता
ekādaśasya taddṛṣṭarāśīnāṃ sthiravat samāḥ |
pravṛttā dṛg vaśādyasmād dṛgdaśeyaṃ tataḥ smṛtā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादशस्य = एकादश भाव/राशि की; तत्-दृष्ट-राशीनां = एकादश-दृष्ट राशियों की; स्थिरवत् = स्थिर-पर्याय की भाँति; समाः = समान अवधि; प्रवृत्ताः = प्रवृत्त/चली हुई; दृक्-वशात् = दृष्टि के वश से; यस्मात् = क्योंकि; दृग्-दशा = दृष्टि-दशा; इयं = यह; ततः = इसलिए; स्मृता = कही/स्मरण की गई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि एकादश राशि और एकादश-दृष्ट राशियों की दशाएँ भी ली जाएँ — अवधियाँ स्थिर-पर्याय जैसी समान हों। क्योंकि यह सारी प्रवृत्ति दृष्टि के बल से चलती है, इसलिए इसे “दृग्दशा” कहा गया है। नवम–दशम–एकादश तीनों ब्लॉक मिलकर दृग्दशा का पूर्ण ढाँचा बनाते हैं।

English rendering Likewise the daśās of the eleventh and of the signs it aspects — equal in measure as for the fixed-sign method. Because the sequence proceeds by the force of aspect, it is therefore remembered as Dṛg-daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्ण दृग्दशा-क्रम:
D = concat(
B₉ = order(R₉ ∪ dṛṣṭi(R₉)),
B₁₀ = order(R₁₀ ∪ dṛṣṭi(R₁₀)),
B₁₁ = order(R₁₁ ∪ dṛṣṭi(R₁₁))
)।
अवधि: स्थिरवत् समाः — प्रत्येक राशि-खण्ड समान वर्ष (स्थिर-पर्याय की समान-अवधि परम्परा; इस श्लोक में वर्ष-संख्या स्वयं अंकित नहीं)। नामकरण: दृक्-वशात् → दृग्दशा।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क → R₉ = मीन, R₁₀ = मेष, R₁₁ = वृष। तीन ब्लॉक क्रमिक: (मीन+दृष्ट) → (मेष+दृष्ट) → (वृष+दृष्ट); प्रत्येक राशि समान वर्ष-मान (स्थिरवत्)।

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46.187
चरे व्युत्क्रमतो ग्राह्या दृग्योग्याः स्थिरभे क्रमात् |
विषमे क्रमतो द्वन्द्वे राशयो व्युत्क्रमात् समे
care vyutkramato grāhyā dṛgyogyāḥ sthirabhe kramāt |
viṣame kramato dvandve rāśayo vyutkramāt same

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चरे = चर राशि में; व्युत्क्रमतः = उलटी दिशा से; ग्राह्याः = ग्राह्य; दृग्-योग्याः = दृष्टि के योग्य (दृष्ट) राशियाँ; स्थिर-भे = स्थिर राशि में; क्रमात् = सीधे क्रम से; विषमे = विषम में; क्रमतः = क्रम से; द्वन्द्वे = द्विस्वभाव/उभय राशि में; राशयः = राशियाँ; व्युत्क्रमात् = उत्क्रम से; समे = सम में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दृग्-योग्य राशियों का ग्रहण-क्रम राशि-स्वभाव पर निर्भर है: चर में व्युत्क्रम, स्थिर में क्रम। द्वन्द्व (उभय) राशि में विषम होने पर क्रम और सम होने पर व्युत्क्रम। यही नियम दृष्ट-राशियों को सूचीबद्ध करने की दिशा तय करता है।

English rendering Aspect-eligible signs are taken in reverse order for movable signs and in direct order for fixed signs; for dual signs, in direct order when odd and in reverse when even.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दृष्टि-पात्र समुच्चय A(R) = dṛṣṭi-targets of base-rāśi R। क्रमण:
- यदि R ∈ चर (मेष, कर्कट, तुला, मकर) → reverse(A)
- यदि R ∈ स्थिर (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) → forward(A)
- यदि R ∈ द्वन्द्व (मिथुन, कन्या, धनु, मीन): R विषम → forward(A); R सम → reverse(A)
(राशि-स्वभाव और विषम/सम दोनों घोषित करने पर ही क्रम अद्वितीय।)

उदाहरण (worked example) R = मेष (चर) → दृष्ट-योग्य राशियाँ व्युत्क्रम से। R = सिंह (स्थिर) → क्रम से। R = मिथुन (द्वन्द्व, विषम) → क्रम से; R = कन्या (द्वन्द्व, सम) → व्युत्क्रम से। (दृष्टि-लक्ष्य स्वयं पारम्परिक राशि-दृष्टि नियम से; यहाँ केवल क्रमण-दिशा का सूत्र।)

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46.188
ऋक्षे लग्नादिराशीनां दशा राशिदशा स्मृता |
भयातं रविभिर्निघ्नं भभोगविहृतं फलम्
ṛkṣe lagnādirāśīnāṃ daśā rāśidaśā smṛtā |
bhayātaṃ ravibhirnighnaṃ bhabhogavihṛtaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऋक्षे = राशि/भ-सन्दर्भ में; लग्नादि-राशीनां = लग्न आदि राशियों की; दशा = दशा; राशि-दशा = राशिदशा; स्मृता = कही गई; भ-यातम् = भ (राशि) का यात/भुक्त अंश; रविभिः = रवियों से = १२ (द्वादश आदित्य; भूतसंख्या); निघ्नम् = गुणित; भ-भोग = भ का पूर्ण भोग = ३०°; विहृतम् = विभाजित; फलम् = फल (भुक्त/शेष वर्ष-मान)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न से आरम्भ राशियों की दशा “राशिदशा” कही गई है। भुक्त राशि-अंश को रवि-संख्या (१२) से गुणा कर भ-भोग (पूर्ण राशि-विस्तार) से भाग देने पर दशा-फल (भुक्त अंश का वर्ष-तुल्य मान) आता है। यह शेष-दशा निकालने का अनुपात-सूत्र है।

English rendering The daśā of the signs beginning from the lagna is remembered as Rāśi-daśā. The elapsed portion of the sign, multiplied by the “Suns” (12) and divided by the full span of the sign (bhabhoga), is the result — the elapsed measure of that sign’s period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: रविभिः → १२। भभोग = ३०° (एक राशि)।
भुक्त-वर्ष (या भुक्त-अंश का फल) = (λ_elapsed × १२) ÷ ३० = λ_elapsed × (२/५),
जहाँ λ_elapsed = लग्न (या चालू राशि) का भुक्त अंश डिग्री में, 0 ≤ λ_elapsed < ३०।
यदि पूर्ण राशि-खण्ड = १२ वर्ष (रवि-संख्या से सुसंगत), तो
शेष-वर्ष = १२ − (λ_elapsed × १२ / ३०)।
समान: residual = १२ × (३० − λ_elapsed) / ३०।

उदाहरण (worked example) लग्न = १०°००′ कन्या → λ_elapsed = १०°। भुक्त-फल = १० × १२ / ३० = ४ वर्ष। शेष राशि-दशा = १२ − ४ = ८ वर्ष। (अयनांश: केवल लग्न-रेखांश तय करने हेतु; सूत्र स्वयं भुक्त-अंश और ३०° पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-गणित यहाँ शुद्ध अनुपात-अंकगणित है — भुक्त-भिन्न × पूर्ण-अवधि — वही ढाँचा जो विंशोत्तरी में नक्षत्र-भिन्न × महादशा-वर्ष पर चलता है (केतु ७ … बुध १७, योग १२०)। हम गणित को फल-कथन से अलग रखते हैं: सूत्र `==` से जाँचा जाता है; “फल” शास्त्र का कथन रहता है, नियति नहीं।

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46.189
राश्याद्यं लग्नराश्यादौ योज्यं द्वादशशेषितम् |
तदारभ्य क्रमादोजे दशा ज्ञेयोत्क्रमात् समे
rāśyādyaṃ lagnarāśyādau yojyaṃ dvādaśaśeṣitam |
tadārabhya kramādoje daśā jñeyotkramāt same

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राश्याद्यम् = राशि का आदि/आरम्भ-सूचकांक; लग्न-राश्यादौ = लग्न-राशि आदि में; योज्यम् = जोड़ने योग्य; द्वादश-शेषितम् = १२ से भाग देकर शेष (mod १२); तद् आर्भ्य = उससे आरम्भ करके; क्रमात् = क्रम से; ओजे = विषम (लग्न/राशि) में; दशा = दशा; ज्ञेया = जानी जाए; उत्क्रमात् = उलटी दिशा से; समे = सम में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राशि-आदि को लग्न-राशि आदि में जोड़कर द्वादश-शेष (१२ का शेष) निकालें — वही आरम्भ-बिन्दु है। उस बिंदु से विषम में क्रम और सम में उत्क्रम से राशिदशा जानी जाए। यह राशिदशा के आरम्भ और दिशा का नियम पूरा करता है।

English rendering The rāśi-beginning index is to be added at the lagna-rāśi and the remainder after twelve taken; beginning from that, the daśā is known in direct order for the odd and in reverse order for the even.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सूचकांक 0…11 (मेष=0 … मीन=11) या 1…12 — परम्परा घोषित करें; शेष-समीकरण:
S = (R_lagna + R_ādi) mod १२,
जहाँ “राश्याद्यम्” पाठ का आरम्भ-पद (पाठ-भेद संभव: किस राशि-आदि को जोड़ें — कुछ पाठों में केवल लग्न से ही क्रम)।
दिशा: यदि (लग्न/आरम्भ) विषम → क्रम S, S+1, S+2, …; सम → उत्क्रम S, S−1, S−2, … (mod १२)।
प्रथम राशि की शेष-अवधि ४६.१८८ के (λ_elapsed × १२)/३० सूत्र से; शेष राशियाँ पूर्ण १२-वर्ष खण्ड (रवि-सङ्ख्या से सुसंगत मॉडल)।

उदाहरण (worked example) लग्न-राशि = कन्या (index 5, सम), राश्याद्य = 0 (लग्न-आदि) → S = (5+0) mod 12 = 5 → आरम्भ कन्या। सम → उत्क्रम: कन्या → सिंह → कर्कट → …। लग्न १०° कन्या हो तो प्रथम खण्ड शेष = ८ वर्ष (४६.१८८), तदनन्तर प्रत्येक पूर्ण राशि १२ वर्ष।

46.190
दशाब्दा भुक्तभागघ्ना त्रिंशता विहृताह् फलम् |
भुक्तं वर्षादिकं ज्ञेयं भोग्यं मानाद् विशोधितम्
daśābdā bhuktabhāgaghnā triṃśatā vihṛtāh phalam |
bhuktaṃ varṣādikaṃ jñeyaṃ bhogyaṃ mānād viśodhitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाब्दा = दशा के कुल वर्ष; भुक्तभागघ्ना = भुक्त (बीते हुए) भागों से गुणित; त्रिंशता = ३० से; विहृता = विभाजित; फलम् = प्राप्त परिणाम (भुक्त काल); भुक्तं वर्षादिकं = बीता वर्ष-मास-दिन; भोग्यं = अवशिष्ट भोग्य काल; मानाद् विशोधितम् = पूर्ण मान से घटाकर ज्ञात।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा के कुल वर्षों को भुक्त भागों से गुणा करके तीस से भाग देने पर भुक्त काल (वर्षादि) फल के रूप में आता है। वही भुक्त वर्ष-मासादि जाना जाता है; भोग्य काल उस पूर्ण दशा-मान से भुक्त को घटाकर सिद्ध होता है। यह अनुपात-विधि दशा के बीते और शेष हिस्से को एक ही मापदण्ड पर बाँधती है।

English rendering Multiply the years of the daśā by the elapsed (bhukta) parts and divide by thirty; the quotient is the elapsed period in years and so on. The yet-to-be-enjoyed (bhogya) balance is obtained by subtracting that elapsed measure from the full allotted span.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भुक्त-वर्ष (आदि) = (दशा-वर्ष × भुक्त-भाग) ÷ ३०
भोग्य-वर्ष (आदि) = दशा-वर्ष − भुक्त-वर्ष
यहाँ पूर्ण इकाई = ३० भाग (श्लोक-निर्दिष्ट मान)। समय को वर्ष → मास (×१२) → दिन (×३०) में उसी अनुपात से खोलें। (पाठ में “त्रिंशता” स्पष्ट; इकाई का नाम—राशि-भाग या अन्य ३०-भाग माप—प्रकरणानुसार; पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) दशा-मान = १६ वर्ष, भुक्त-भाग = १० (पूर्ण ३० में से)।
भुक्त = १६ × १० ÷ ३० = १६०/३० = ५ वर्ष + (१/३)×१२ = ५ वर्ष ४ मास।
भोग्य = १६ − ५य४मा = १० वर्ष ८ मास।
(केवल श्लोक का ÷३० नियम; अयनांश यहाँ प्रयुक्त नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही समानुपात-अनुशासन विंशोत्तरी में नक्षत्र-अंश के भुक्त/शेष पर भी लागू होता है—अंतर्दशा = (महादशा-वर्ष × अंतर्-ग्रह-वर्ष)/१२०, और जन्म-शेष = (नक्षत्र-शेष-अंश/पूर्ण-नक्षत्र) × महादशा-वर्ष। हमारा दशा-इंजन इसी exact ratio arithmetic पर टिका है; सहिष्णुता-पट्टी के बिना `==` जाँच।

46.191
अकारादीन् स्वरान् पञ्च प्रथमं विन्यसेत् क्रमात् |
कादिहान्तांल्लिखेद् वर्णान् स्वराधो ङञणोज्झितान्
akārādīn svarān pañca prathamaṃ vinyaset kramāt |
kādihāntāṃllikhed varṇān svarādho ṅañaṇojjhitān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकारादीन् = अ से आरंभ; स्वरान् पञ्च = पाँच स्वर; प्रथमं विन्यसेत् = पहले क्रम से स्थापित करे; कादिहान्तान् = क से ह तक; वर्णान् लिखेद् = व्यंजन लिखे; स्वराधः = स्वरों के नीचे; ङञणोज्झितान् = ङ, ञ, ण को छोड़कर।

हिन्दी भावार्थ वर्ण-दशा की आधार-सारिणी बनाने का विधि-वाक्य है। पहले अकारादि पाँच स्वरों को क्रम से ऊपर विन्यस्त करें। फिर क से ह पर्यंत व्यंजनों को उन स्वरों के नीचे लिखें—पर ङ, ञ और ण को इस लेखन से बाहर रखें। नाम के आदि-वर्ण से दशा का द्वार इसी जाल पर खुलता है।

English rendering First set down, in order, the five vowels beginning with a. Beneath those vowels write the consonants from ka through ha, omitting ṅa, ña, and ṇa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचनात्मक नियम—कोई संख्या-फल नहीं। स्तंभ = ५ स्वर (अकारादि); पंक्ति-लेख = क…ह − {ङ, ञ, ण}। यह नाम-आदि-वर्ण → स्वर-स्तंभ → दशाधिप मानचित्र का ढाँचा है।

उदाहरण (worked example) ऊपर पाँच स्वर-स्तंभ: अ | इ | उ | ए | ओ (अकारादि पञ्च—परंपरा में प्रचलित पठन; अन्य स्वर-क्रम पाठ-भेद संभव)। नीचे व्यंजन ङ-ञ-ण रहित पाँच-पाँच समूहों में (अगले श्लोक की तिर्यक्-पंक्ति विधि से) बाँटे जाते हैं। नाम “करुण” का आदि-वर्ण क → अ-स्तंभ के अधीन (जहाँ क रखा गया हो)।

46.192
तिर्यक् पंक्तिक्रमेणैव पञ्चपञ्चविभागतः |
न प्रोक्ता ङञणा वर्णा नामादौ सन्ति ते नहि
tiryak paṃktikrameṇaiva pañcapañcavibhāgataḥ |
na proktā ṅañaṇā varṇā nāmādau santi te nahi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिर्यक् = आड़ा/क्षैतिज; पंक्तिक्रमेण = पंक्ति-क्रम से; पञ्चपञ्चविभागतः = पाँच-पाँच के विभाग में; न प्रोक्ता ङञणा वर्णा = ङ-ञ-ण वर्ण नहीं कहे गए; नामादौ सन्ति ते नहि = वे नाम के आदि में (सामान्यतः) नहीं होते।

हिन्दी भावार्थ व्यंजनों का विन्यास तिरछी (पंक्तिगत) रीति से हो, और प्रत्येक खंड पाँच-पाँच वर्णों का हो। ङ, ञ, ण को शास्त्र यहाँ गिनता ही नहीं—और कहता है कि वे नाम के आरंभ में प्रायः आते भी नहीं। इस प्रकार सारिणी शुद्ध और व्यावहारिक दोनों रहती है।

English rendering Write them only in transverse row order, partitioned five by five. The letters ṅa, ña, and ṇa are not taught in this scheme; nor do they ordinarily stand at the beginning of a name.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विन्यास-नियम: व्यंजन-समुच्चय को पंक्ति-क्रम में ५×k खंडों में बाँटना; बहिष्कृत समुच्चय = {ङ, ञ, ण}। गणना नहीं—मानचित्र की ज्यामिति।

उदाहरण (worked example) बहिष्कृत तीनों के बाद क–ह श्रृंखला को पाँच-पाँच में बाँटने का एक स्पष्ट क्रम (पंक्ति-दर-पंक्ति):
(क ख ग घ च) (छ ज झ ट ठ) (ड ढ त थ द) (ध न प फ ब) (भ म य र ल) (व श ष स ह)—इन्हें पाँच स्वर-स्तंभों के नीचे तिर्यक्-क्रम से चढ़ाया जाता है। (स्तंभ-आरोहण की सूक्ष्म दिशा संस्करणानुसार; पाठ-भेद संभव।)

46.193
चेद् भवन्ति तदा ज्ञेया गजडास्ते यथाक्रमात् |
यत्र स्वरे स्वनामाद्यवर्णः स्यात् तत्स्वरादयः
ced bhavanti tadā jñeyā gajaḍāste yathākramāt |
yatra svare svanāmādyavarṇaḥ syāt tatsvarādayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चेद् भवन्ति = यदि (नामादि में) आ जाएँ; तदा ज्ञेयाः = तब जानो; ग-ज-डाः ते यथाक्रमात् = क्रमशः ग, ज, ड के रूप में (ङ→ग, ञ→ज, ण→ड); यत्र स्वरे = जिस स्वर(-स्तम्भ) में; स्व-नाम-आद्य-वर्णः स्यात् = अपने नाम का प्रथम अक्षर पड़े; तत्-स्वर-आदयः = उसी स्वर से आगे (दशाधीश)।

हिन्दी भावार्थ यदि कहीं ङ, ञ, ण नाम के आरम्भ में आ ही जाएँ, तो उन्हें क्रमशः ग, ज, ड मान लो। फिर देखो — नाम का पहला अक्षर जालक में किस स्वर-स्तम्भ के नीचे पड़ता है; उसी स्वर से दशा-क्रम आरम्भ होता है।

English rendering Should they occur, read ṅa, ña, ṇa as ga, ja, ḍa respectively; whichever vowel-column the name's first letter falls under, the daśā begins from that vowel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रतिस्थापन (substitution): ङ↦ग, ञ↦ज, ण↦ड। तत्पश्चात् अनुक्रमणिका (lookup): नाम-प्रथमाक्षर → उसका स्वर-स्तम्भ (5 में से एक) → वही आरम्भ-स्वर = प्रथम दशाधीश। अर्थात् नाम को 5 स्वर-वर्गों में से एक में मैप किया जाता है।

उदाहरण (worked example) नाम "करण" — प्रथमाक्षर 'क'। जालक में 'क' प्रथम पंक्ति में 'अ' स्वर-स्तम्भ के नीचे पड़ता है → आरम्भ-स्वर = अ। अतः वर्णदा-दशा 'अ' से प्रारम्भ होगी। (यदि नाम 'ण'-आदि होता, तो पहले ण→ड कर उसका स्तम्भ ढूँढ़ते।)

46.194
क्रमात् पंच दशाधीशाः द्वादशद्वादशाब्दकाः |
स्वराणां च क्रमाज्ज्ञेयाः दशास्वन्तर्दशादयः
kramāt paṃca daśādhīśāḥ dvādaśadvādaśābdakāḥ |
svarāṇāṃ ca kramājjñeyāḥ daśāsvantardaśādayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् पञ्च दशाधीशाः = क्रम से पाँच दशा-स्वामी (पाँच स्वर); द्वादश-द्वादश-अब्दकाः = प्रत्येक बारह-बारह वर्ष का; स्वराणाम् क्रमात् = स्वरों के क्रम से; ज्ञेयाः = जानने योग्य; दशासु अन्तर्दशा-आदयः = दशाओं के भीतर अन्तर्दशा आदि।

हिन्दी भावार्थ पाँच स्वर ही पाँच दशा-स्वामी हैं, और प्रत्येक की दशा बारह-बारह वर्ष की होती है। अन्तर्दशाएँ भी इन्हीं स्वरों के क्रम से भीतर-भीतर चलती हैं। इस प्रकार पूरा वर्णदा-चक्र स्वर-आधारित बारह-वर्षीय खण्डों में बँधा है।

English rendering The five vowels are, in order, the five daśā-lords, each of twelve years; the antardaśās within them likewise run in the order of the vowels.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
दशा-स्वामी = { अ, इ, उ, ए, ओ }, प्रत्येक = 12 वर्ष।
पूर्ण-चक्र Σ = 5 × 12 = 60 वर्ष।
अन्तर्दशा-क्रम = स्वर-क्रम में चक्रीय (आरम्भ-स्वर से)। अन्तर्दशा-मान परिपाटी-अनुसार समानुपात में (महादशा × अन्तर ÷ 60) — पाठ-भेद संभव (कुछ पाठ अन्तर्दशा-वितरण भिन्न देते हैं)।

उदाहरण (worked example) आरम्भ-स्वर 'अ' → महादशा-क्रम: अ(12) → इ(12) → उ(12) → ए(12) → ओ(12) = कुल 60 वर्ष। 'अ'-महादशा (12 वर्ष) की प्रथम अन्तर्दशा 'अ' = 12 × 12 ÷ 60 = 2.4 वर्ष (≈ 2 वर्ष 4.8 माह), आगे इ, उ … इसी क्रम में।

हमारा डिकोड (Our Decode) Σ = 5 × 12 = 60 एक बन्द, पूर्णांक चक्र है — ठीक वैसे जैसे विंशोत्तरी का Σ = 120 (dossier §3)। हमारा दशा-इंजन ऐसे चक्र-योगों को यथार्थ-पूर्णांक-अपरिवर्तनीय (invariant) मानकर `==` पर पिन करता है; कुल-योग यदि 60/120 से डिगे तो परीक्षण मुखर रूप से टूटे — यही "सह्यता-पट्टी नहीं, यथार्थ जाँच" अनुशासन (dossier §5) है।

46.195
पूर्वमेव मया प्रोक्ता वर्णदाख्या दशा द्विज |
इदानीं शम्भुना प्रोक्ता कथ्यते योगिनी दशा
pūrvameva mayā proktā varṇadākhyā daśā dvija |
idānīṃ śambhunā proktā kathyate yoginī daśā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वम् एव = पहले ही; मया प्रोक्ता = मेरे (पराशर के) द्वारा कही गई; वर्णद-आख्या दशा = "वर्णदा" नामक दशा; द्विज = हे द्विज; इदानीम् = अब; शम्भुना प्रोक्ता = शम्भु (शिव) द्वारा कही गई; कथ्यते = कही जाती है; योगिनी दशा = योगिनी दशा।

हिन्दी भावार्थ पराशर उपसंहार करते हैं — "हे द्विज, वर्णदा-दशा तो मैंने अभी कह दी। अब शिव द्वारा उपदिष्ट योगिनी-दशा का वर्णन करता हूँ।" यह एक सन्धि-श्लोक है, जो एक प्रकरण को समेटकर अगले (योगिनी-दशा) का द्वार खोलता है।

English rendering "The daśā called Varṇadā I have now told, O twice-born; next I relate the Yoginī daśā, as declared by Śambhu (Śiva)."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रकरण-सन्धि (topic-transition, गुरु-शिष्य संवाद)। इसमें कोई संख्या या विधि नहीं; यह केवल वर्णदा-दशा का समापन और योगिनी-दशा की उद्घोषणा है — शास्त्र की परम्परा-सूत्रता (एक दशा से दूसरी तक की कड़ी) का सूचक।

46.196
मङ्गला पिङ्गला धन्या भ्रामरी भद्रिका तथा |
उल्का सिद्धा संकटा च योगिन्योऽष्टौ प्रकीर्तिताः
maṅgalā piṅgalā dhanyā bhrāmarī bhadrikā tathā |
ulkā siddhā saṃkaṭā ca yoginyo'ṣṭau prakīrtitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मङ्गला = योगिनी-दशा की प्रथम स्वामिनी; पिङ्गला, धन्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा, संकटा = शेष सात योगिनियाँ (क्रमशः द्वितीय से अष्टम); योगिन्यः = योगिनी-दशा की आठ अधिष्ठात्री शक्तियाँ; अष्टौ = आठ (8); प्रकीर्तिताः = घोषित/नामतः कही गई हैं।

हिन्दी भावार्थ प्रिय शिष्य, अब योगिनी-दशा की आठ योगिनियों के नाम सुनो — मङ्गला, पिङ्गला, धन्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा। यही आठ नाम इस नक्षत्र-आधारित दशा-चक्र के आठ अंग हैं, और इसी क्रम में इनकी गणना होती है।

English rendering Eight Yoginīs are proclaimed — Maṅgalā, Piṅgalā, Dhanyā, Bhrāmarī, Bhadrikā, Ulkā, Siddhā, and Saṅkaṭā — the eight presiding powers of the Yoginī daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ केवल चक्र की परिभाषा दी गई है: दशा-चक्र की लम्बाई = अष्टौ = 8 अंग, स्थिर क्रम में। अष्ट-अवयवी चक्र होने से यह mod 8 पर चलता है; प्रत्येक योगिनी को नियत वर्ष श्लोक 200 में मिलेंगे (1…8, योग = 36 वर्ष)। यहाँ गणना का आधार-सेट (आठ नामों का ordered list) निश्चित किया गया है।

46.197
मङ्गलातोऽभवच्चन्द्रः पिङ्गलातो दिवाकरः |
धन्यातो देवपूज्योऽभूद् भ्रामरीतोऽभवत् कुजः
maṅgalāto'bhavaccandraḥ piṅgalāto divākaraḥ |
dhanyāto devapūjyo'bhūd bhrāmarīto'bhavat kujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मङ्गलातः = योगिनी मङ्गला से; अभवत् = उत्पन्न हुआ; चन्द्रः = चन्द्र; पिङ्गलातः = योगिनी पिङ्गला से; दिवाकरः = सूर्य; धन्यातः = योगिनी धन्या से; देवपूज्यः = बृहस्पति (देवताओं का पूज्य); भ्रामरीतः = योगिनी भ्रामरी से; कुजः = मङ्गल (मंगल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र योगिनी-दशा की ग्रह-सम्बद्ध उत्पत्ति-श्रृंखला यहाँ आरम्भ करता है। मङ्गला से चन्द्र, पिङ्गला से सूर्य, धन्या से बृहस्पति, और भ्रामरी से मङ्गल — इस क्रम से चार योगिनियों का ग्रह-संयोग बताया गया है। यह पद योगिनी-चक्र को ग्रह-शब्दों से जोड़ने वाला आधार-सूत्र है; फल का विस्तार आगे की दशा-वर्ष-व्यवस्था में आता है।

English rendering The text states that the Moon arises from Yoginī Maṅgalā, the Sun from Piṅgalā, Jupiter from Dhanyā, and Mars from Bhrāmarī — the first half of the eight-Yoginī-to-planet mapping.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योगिनी–ग्रह संवाद/नाम-मानचित्र (mapping)। यह पद गणना का सूत्र नहीं, अपितु आठ योगिनियों में से प्रथम चार का ग्रह-संकेत देता है; वर्ष-मात्रा और शेष-नियम 46.199–46.200 में आते हैं।

46.198
भर्दिकातो बुधो जातस्तथोल्कातः शनैश्चरः |
सिद्धातो भार्गवि जातः संकटातस्तमोऽभवद्
bhardikāto budho jātastatholkātaḥ śanaiścaraḥ |
siddhāto bhārgavi jātaḥ saṃkaṭātastamo'bhavad

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भर्दिकातः = योगिनी भर्दिका (पाठ-भेद: भद्रिका) से; बुधः = बुध; जातः = उत्पन्न; उल्कातः = योगिनी उल्का से; शनैश्चरः = शनि; सिद्धातः = योगिनी सिद्धा से; भार्गवी = शुक्र (भृगु-पुत्री); संकटातः = योगिनी संकटा से; तमः = राहु (तमस्/छाया-ग्रह)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व पद की शृंखला यहाँ पूरी होती है। शास्त्र कहता है — भर्दिका से बुध, उल्का से शनि, सिद्धा से शुक्र, और संकटा से तम (राहु) उत्पन्न हुए। आठ योगिनियाँ = आठ ग्रह-संकेत (सूर्य से शनि तक + राहु); केतु इस सूची में अलग नाम से नहीं आता। “भर्दिका/भद्रिका” नाम पर पाठ-भेद संभव।

English rendering Completing the set, the text states Mercury from Bhardikā (variant: Bhadrīkā), Saturn from Ulkā, Venus from Siddhā, and Tamas (Rāhu) from Saṅkaṭā — eight Yoginīs mapped to eight graha-tokens.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योगिनी–ग्रह मानचित्र पूर्णता। पूर्ण क्रम (नाम → ग्रह): (1) मङ्गला→चन्द्र, (2) पिङ्गला→सूर्य, (3) धन्या→गुरु, (4) भ्रामरी→मङ्गल, (5) भर्दिका→बुध, (6) उल्का→शनि, (7) सिद्धा→शुक्र, (8) संकटा→राहु।

46.199
जन्मर्क्ष च त्रिभिर्युक्तं वसुभिर्भागमाहरेत् |
एकादिशेषे विज्ञेया योगिन्योः मङ्गलादिकाः
janmarkṣa ca tribhiryuktaṃ vasubhirbhāgamāharet |
ekādiśeṣe vijñeyā yoginyoḥ maṅgalādikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मर्क्ष = जन्म-नक्षत्र (1–27 क्रमांक); त्रिभिः = 3 से युक्त (त्रि = 3, भूतसंख्या); वसुभिः = 8 से (वसु = 8); भागम् आहरेत् = भाग (शेष) ले; एकादि-शेषे = शेष 1 से आरम्भ; योगिन्यः = योगिनियाँ; मङ्गलादिकाः = मङ्गला आदि क्रम से।

हिन्दी भावार्थ जन्म-नक्षत्र की संख्या में तीन जोड़कर आठ से भाग देने पर जो शेष बचे, उसी से योगिनी का आरम्भ जाना जाता है — शेष 1 पर मङ्गला, फिर क्रमशः अगली योगिनियाँ। यह योगिनी-दशा का प्रथम निर्धारण-सूत्र है: नक्षत्र-सूचकांक → मॉड्यूलर शेष → प्रथमा योगिनी। “योगिन्योः” रूप में पाठ-भेद/सन्धि-पाठ संभव; अर्थ “योगिन्यः मङ्गलादिकाः” ही है।

English rendering Take the birth-nakṣatra index, add three, and divide by eight; the remainder (counting remainder 1 as Maṅgalā, then onward in order) identifies the starting Yoginī of the cycle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नक्षत्र-सूचकांक N ∈ {1, 2, …, 27} (अश्विनी = 1 … रेवती = 27)।
S = (N + 3) mod 8; यदि S = 0 तो S := 8।
S → योगिनी: 1 मङ्गला, 2 पिङ्गला, 3 धन्या, 4 भ्रामरी, 5 भर्दिका, 6 उल्का, 7 सिद्धा, 8 संकटा।
भूतसंख्या: त्रि = 3, वसु = 8 — अंक-विश्वास से ज्यों का त्यों।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-नक्षत्र रोहिणी = N = 4।
S = (4 + 3) mod 8 = 7 → सिद्धा (7वीं योगिनी; ग्रह-संकेत शुक्र, 46.198)।
दूसरा: अश्विनी N = 1 → S = 4 → भ्रामरी।
(नक्षत्र-सूची परम्परा-स्थिर; अयनांश यहाँ आवश्यक नहीं — गणना नक्षत्र-क्रमांक पर है।)

46.200
एकाद्येकोत्तरा ज्ञेयाः क्रमादासां दशासमाः |
नक्षत्रयातभोगाभ्यां भुक्तं भोग्यं च साधयेत्
ekādyekottarā jñeyāḥ kramādāsāṃ daśāsamāḥ |
nakṣatrayātabhogābhyāṃ bhuktaṃ bhogyaṃ ca sādhayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादि = 1 से आरम्भ; एकोत्तराः = एक-एक बढ़ती; दशा-समाः = दशा के वर्ष (समा = वर्ष); क्रमात् = क्रम से; आसाम् = इन योगिनियों की; नक्षत्र-यात-भोगाभ्याम् = नक्षत्र के यात (भुक्त) और भोग (शेष) अंशों से; भुक्तं भोग्यं = भुक्तांश और भोग्यांश; साधयेत् = सिद्ध करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इन योगिनियों की दशा-वर्ष-संख्या 1, 2, 3… क्रमशः एक-एक बढ़ती हुई जानी जाए। जन्म-नक्षत्र में जितना अंश बीत चुका (यात/भुक्त) और जितना शेष (भोग्य) है, उन्हीं दोनों से प्रथमा दशा का भुक्त-भोग्य काल साधित हो। यह विंशोत्तरी जैसी “नक्षत्र-अंश → दशा-अंश” अनुपात-विधि का योगिनी-रूप है।

English rendering Their daśā lengths are one year, then two, then three, and so on in order; from the elapsed and remaining fractions of the birth-nakṣatra one computes the portion of the current Yoginī already used and still to be enjoyed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योगिनी-वर्ष (दशा-समा):
Y₁…Y₈ = 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 वर्ष → Σ = 36 वर्ष (पूर्ण योगिनी-चक्र)।
नक्षत्र-अंश: प्रत्येक नक्षत्र = 13°20′ = 800′।
भुक्त-अंश f_b = (चन्द्र-देशान्तर नक्षत्र-आरम्भ से) / 800′; भोग्य-अंश f_g = 1 − f_b।
प्रथमा योगिनी (S, 46.199) के पूर्ण वर्ष Y_S में:
भुक्त-काल = f_b × Y_S वर्ष; भोग्य-काल = f_g × Y_S वर्ष।
आगे की योगिनियाँ पूर्ण Y के क्रम-चक्र में चलती हैं (S, S+1, …, 8, 1, …) जब तक आयु/प्रसंग पूरा न हो।

उदाहरण (worked example) रोहिणी जन्म, S = 7 (सिद्धा), Y₇ = 7 वर्ष। मानें चन्द्र नक्षत्र का 1/4 भाग बीत चुका: f_b = 1/4, f_g = 3/4।
भुक्त = (1/4)×7 = 1.75 वर्ष; भोग्य = (3/4)×7 = 5.25 वर्ष — जन्म-क्षण से सिद्धा-दशा का शेष 5.25 वर्ष।
(सटीक f_b के लिए: चन्द्र-स्फुट, नक्षत्र-सीमा, और अयनांश-घोषणा आवश्यक; यहाँ अनुपात-नियम का शुद्ध संख्या-नमूना है।)

46.201
येषां यदायुः संप्रोक्तं पैण्डमांशं निसर्गजम् |
तक्षत् तेषां दशा ज्ञेया पैण्डी चांशी निसर्गजा
yeṣāṃ yadāyuḥ saṃproktaṃ paiṇḍamāṃśaṃ nisargajam |
takṣat teṣāṃ daśā jñeyā paiṇḍī cāṃśī nisargajā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) येषाम् = जिनकी; यत् आयुः = जो आयु; संप्रोक्तम् = कही गई; पैण्डम् = पैण्ड (पिण्डायु) विधि से; अंशम् = अंशायु विधि से; निसर्गजम् = नैसर्गिक आयु से; तक्षत् (ततः) = तदनन्तर/उसी से; तेषाम् दशा = उनकी दशा; पैण्डी = पैण्डी दशा; आंशी = अंशी दशा; निसर्गजा = निसर्गजा दशा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिन जातकों की आयु पिण्ड-विधि, अंश-विधि, अथवा नैसर्गिक विधि से पूर्व कही गई हो, उन्हीं आधारों पर क्रमशः पैण्डी, अंशी और निसर्गजा दशा जानी जाए। अर्थात् दशा-प्रकार आयुर्दाय-प्रकार से जुड़ा है: आयु-सूत्र → दशा-नाम और काल-विभाजन। “तक्षत्” पाठ पर पाठ-भेद संभव; प्रचलित अर्थ “ततः/तस्मात्” है।

English rendering For those whose span of life has been stated by the piṇḍa, aṃśa, or naisarga methods, the corresponding daśās — Paiṇḍī, Āṃśī, and Nisargajā — are to be known from those same measures.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह पद दशा का स्वतन्त्र अङ्क-सूत्र नहीं, अपितु आयुर्दाय → दशा का नाम-संकेत है।
तीन वर्ग: (1) पिण्डायु → पैण्डी दशा, (2) अंशायु → अंशी दशा, (3) नैसर्गिक आयु → निसर्गजा दशा।
काल-विभाजन का विस्तृत अंश-नियम इस श्लोक में नहीं; पूर्व अध्यायों के आयु-वर्ष (आयुर्दाय) को दशा-खण्डों में बाँटने का निर्देश-सूत्र है। फल-विस्तार “शास्त्र कहता है” स्तर पर ही; यहाँ केवल वर्गीकरण।

46.202
बली लग्नार्कचन्द्राणां यत्तस्य प्रथमा दशा |
तत्केन्द्रादिगतानां च ज्ञेया बलवशात्ततः
balī lagnārkacandrāṇāṃ yattasya prathamā daśā |
tatkendrādigatānāṃ ca jñeyā balavaśāttataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बली = बलवान; लग्न-अर्क-चन्द्राणाम् = लग्न, सूर्य, चन्द्र में से; यत् तस्य = जिसका (जो बलवान हो उसकी); प्रथमा दशा = पहली दशा; तत्-केन्द्रादि-गतानाम् = उससे केन्द्र आदि भावों में स्थित ग्रहों की; बलवशात् = बल के अनुसार; ततः = तदनन्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न, सूर्य और चन्द्र में जो सर्वाधिक बली हो, उसी से प्रथमा दशा आरम्भ हो। तत्पश्चात् उसी संदर्भ-बिन्दु से केन्द्र आदि स्थानों में बैठे ग्रहों की दशाएँ उनके बल-क्रम से जानी जाएँ। यह बल-आधारित दशा-आरम्भ नियम है; “बल” यहाँ षड्बल/स्थान-बल आदि की गणना-परम्परा पर निर्भर — परिपाटी घोषित करनी चाहिए।

English rendering Whichever among the Lagna, the Sun, and the Moon is strongest, its daśā comes first; thereafter the daśās of planets placed in the kendras and subsequent houses from that reference are taken in the order of their strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चयन:
R* = argmax { B(Lagna), B(Sun), B(Moon) }
जहाँ B = घोषित बल-माप (षड्बल योग, या केवल स्थान/दिग्/काल-बल — परिपाटी-निर्भर; 1 रूप = 60 विरूप)।
प्रथमा दशा = R* से सम्बद्ध ग्रह/राशि-दशा (प्रसंगानुसार)।
तदनन्तर: R* से केन्द्र (1, 4, 7, 10), फिर कोण/अन्य क्रम — ग्रहों को B(graha) अवरोही क्रम में बाँधें।
यह पद योगिनी-वर्ष-सूत्र नहीं; बल-क्रम दशा-शृंखला का आरम्भ-नियम है।

उदाहरण (worked example) मानें षड्बल (रूप में): लग्न-स्वामी संदर्भ में सूर्य B = 6.2, चन्द्र B = 5.1, लग्न-बिन्दु का प्रतिनिधि-बल B = 4.8 → R* = सूर्य → प्रथमा दशा सूर्य की।
सूर्य से केन्द्र में स्थित: मानें गुरु (केन्द्र, B = 7.0), शुक्र (केन्द्र, B = 5.5) → क्रम गुरु → शुक्र, फिर शेष भाव-क्रम व बलवश।
(अयनांश, भाव-पद्धति (श्रीपति/प्लासिडस आदि), और षड्बल-अवयव घोषित होने पर ही संख्याएँ पुनरुत्पादनीय हैं।)

46.203
अष्टवर्गबलेनैषां फलानि परिचिन्तयेत् |
अष्टवर्गदशाश्चैताः कथिताः पूर्वसूरिभिः
aṣṭavargabalenaiṣāṃ phalāni paricintayet |
aṣṭavargadaśāścaitāḥ kathitāḥ pūrvasūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टवर्ग-बलेन = अष्टवर्ग (अष्टकवर्ग) बल से; एषाम् = इनकी; फलानि = फल; परिचिन्तयेत् = भली-भाँति विचारे; अष्टवर्ग-दशाः = अष्टवर्ग-दशाएँ; एताः = ये; कथिताः = कही गईं; पूर्व-सूरिभिः = पूर्व आचार्यों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इन दशाओं के फल अष्टवर्ग-बल से सोचने चाहिए; और अष्टवर्ग-दशाएँ पूर्व सूरियों ने कही हैं। अर्थात् दशा-काल का फल-विचार अष्टकवर्ग-बिन्दु/रेखा-बल से जोड़ा गया है — फल-कथन दशा-नाम मात्र से नहीं, अष्टवर्ग-माप से। यह अध्याय-शृंखला को अष्टकवर्ग-प्रकरण (आगे के अध्याय) से जोड़ने वाला सेतु-पद है।

English rendering The text states that their results are to be considered by aṣṭavarga strength, and that these aṣṭavarga daśās were taught by the earlier masters.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टवर्ग = अष्टकवर्ग (8 संदर्भ: 7 ग्रह + लग्न) में प्रति-राशि बिन्दु/रेखा।
भिन्राष्टकवर्ग-योग → सर्वाष्टकवर्ग (SAV); दशा-फल-चिन्तन SAV/भिन्र-बल पर (त्रिकोण-शोधन, एकाधिपत्य-शोधन के बाद — Ch.67–68)।
इस श्लोक में दशा-वर्ष की नई संख्या नहीं; फल-मापदण्ड = अष्टवर्ग-बल, और “अष्टवर्ग-दशा” नाम की पूर्व-परम्परा का उल्लेख।
फल-कथन = शास्त्र का दावा; निश्चित भाग्य-वाक्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग Ch.66 पर हमारा oracle सात ग्रहों के रेखा-योग को exact-`==` से पिन करता है: सूर्य 48, चन्द्र 49, मङ्गल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV = 337। फल-चिन्तन से पहले त्रिकोण- और एकाधिपत्य-शोधन (Ch.67–68) SAV घटाते हैं — यही “अष्टवर्गबलेन फलानि” का गणितीय आधार है, जिसे सहिष्णुता-पट्टी के बिना fixture पर जाँचा गया है।

46.204
परायुर्द्वादशो भागस्तस्य सन्ध्या प्रकीर्तिता |
तन्मिता लग्नभादीनां क्रमात् सन्ध्यादशा स्मृता
parāyurdvādaśo bhāgastasya sandhyā prakīrtitā |
tanmitā lagnabhādīnāṃ kramāt sandhyādaśā smṛtā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परायुः = पूर्ण आयुर्दाया (पूर्ण आयु-मान); द्वादशः भागः = बारहवाँ अंश (÷ 12); सन्ध्या = सन्धि-काल / संध्या-परिमाण; तन्मिता = उसी परिमाण के बराबर; लग्नभादीनां = लग्न-भाव से आरम्भ करके क्रमिक भावों की; सन्ध्यादशा = संध्या-दशा; स्मृता = कही / स्मरण की गई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्ण आयु (परायु) का बारहवाँ भाग ‘सन्ध्या’ कहलाता है। उसी सन्ध्या-परिमाण के बराबर, लग्न से आरम्भ कर बारह भावों की क्रमशः संध्या-दशा मानी गई है। अर्थात् प्रत्येक भाव की संध्या-दशा-अवधि परायु को बारह से भाग देने पर प्राप्त एक समान खंड है।

English rendering The text states that one-twelfth of the full lifespan (parāyu) is called sandhyā. Equal in measure to that sandhyā, the sandhyā-daśā of the houses beginning from the lagna, in order, is taught.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
परायु = A (वर्ष; आयुर्दाय-विधि से प्राप्त पूर्ण आयु)
सन्ध्या = A ÷ 12
लग्न, द्वितीय, …, द्वादश भाव की संध्या-दशा-अवधि (प्रत्येक) = सन्ध्या = A/12
(Σ बारह भाव = A। आयुर्दाय की मूल गणना जिस परम्परा से A लिया गया हो, वही घोषित करें।)

उदाहरण (worked example) मान लीजिए आयुर्दाय-विधि से परायु A = 96 वर्ष (केवल उदाहरण; दशा-इंजन में A वही रहेगा जो चुनी हुई आयु-विधि दे)।
सन्ध्या = 96 ÷ 12 = 8 वर्ष।
लग्न-संध्यादशा = 8 वर्ष, द्वितीय-भाव = 8 वर्ष, …, द्वादश = 8 वर्ष; कुल 12 × 8 = 96 वर्ष।

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46.205
सन्ध्या रसगुणा कार्या चन्द्रवह्निहृता फलम् |
संस्थाप्यं प्रथमे कोष्ठे तदर्धं त्रिषु विन्यसेत्
sandhyā rasaguṇā kāryā candravahnihṛtā phalam |
saṃsthāpyaṃ prathame koṣṭhe tadardhaṃ triṣu vinyaset

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्ध्या = पूर्वोक्त सन्ध्या-परिमाण; रसगुणा = रस (6) से गुणा; कार्या = करनी चाहिए; चन्द्रवह्निहृता = चन्द्र-वह्नि (भृतसंख्यया 31) से हृत / विभाजित; फलम् = प्राप्त अंक (मूल इकाई U); प्रथमे कोष्ठे = प्रथम कोष्ठ / भाव-कोष्ठ में; संस्थाप्यं = स्थापित करें; तदर्धं = उसका आधा; त्रिषु = तीन (कोष्ठों) में; विन्यसेत् = रखें।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि सन्ध्या को ‘रस’ (6) से गुणित कर ‘चन्द्रवह्नि’ (31) से भाग दें — यही ‘फल’ (मूल माप) है। उस पूरे फल को प्रथम कोष्ठ में स्थापित करें, और उसी फल का आधा तीन कोष्ठों में रखें। (शेष वितरण अगले श्लोक में पूरा होता है।)

English rendering Multiply sandhyā by rasa (6) and divide by candravahni (31); that quotient is the base result. Place the full result in the first cell, and half of it in three cells.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
भृतसंख्या: रस = 6; चन्द्र = 1, वह्नि = 3 → अङ्कानां वामतो गतिः से चन्द्रवह्नि = 31।
U = (सन्ध्या × 6) ÷ 31
प्रथम कोष्ठ: U
तीन कोष्ठ: प्रत्येक में U/2
(अष्ट कोष्ठों में U/3 — 46.206। कौन-से तीन/आठ कोष्ठ क्रमिक या सापेक्ष हैं, यह टीका-परम्परा पर निर्भर — पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) परायु A = 93 वर्ष ⇒ सन्ध्या = 93/12 = 31/4 = 7.75 वर्ष।
U = (7.75 × 6) ÷ 31 = 46.5 ÷ 31 = 1.5 वर्ष।
प्रथम कोष्ठ = 1.5 वर्ष; तीन कोष्ठ = प्रत्येक 0.75 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-गणित यहाँ शुद्ध अनुपात-अंकगणित है — स्थिरांक 6 और 31 श्लोक-निबद्ध हैं, अनुमान नहीं। जिस प्रकार विंशोत्तरी में 120-वर्षीय चक्र के अनुपात `==` से बँधे हैं, वैसे ही संध्या-सूत्र में भी सहिष्णुता-बैंड के बिना ठीक भाग-फल ही मान्य है।

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46.206
त्रिभागं वसुकोष्ठेषु विन्यस्य तत्फलं वदेत् |
एवं द्वादशभावेषु पाचकानि प्रकल्पयेत्
tribhāgaṃ vasukoṣṭheṣu vinyasya tatphalaṃ vadet |
evaṃ dvādaśabhāveṣu pācakāni prakalpayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिभागं = तिहाई (U/3); वसुकोष्ठेषु = वसु (= 8) कोष्ठों में; विन्यस्य = रखकर; तत्फलं = उस (वितरित) फल को; वदेत् = कहे / फलित माने; एवं = इसी रीति से; द्वादशभावेषु = बारह भावों में; पाचकानि = पाचक (दशा-परिचालन / भाव-पाक के कारक); प्रकल्पयेत् = कल्पित / व्यवस्थित करें।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि फल का तिहाई भाग आठ (वसु) कोष्ठों में रखें, और उसी व्यवस्था से फल कहें। इसी प्रकार बारह भावों में पाचकों की कल्पना करनी चाहिए — अर्थात् संध्या-माप का यह कोष्ठ-वितरण प्रत्येक भाव-संदर्भ में (या द्वादश-भाव चक्र पर) लागू होता है।

English rendering Place one-third of the result in eight cells (vasu = 8), and declare the result accordingly. In this manner the pācaka factors are to be arranged across the twelve houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
U = (सन्ध्या × 6) ÷ 31 (46.205 से)
कोष्ठ-भार:
• 1 कोष्ठ × U
• 3 कोष्ठ × (U/2)
• 8 कोष्ठ × (U/3)
• योग कोष्ठ = 1 + 3 + 8 = 12
भार-योग: U × (1 + 3/2 + 8/3) = U × (6 + 9 + 16)/6 = U × 31/6
U = सन्ध्या × 6/31 रखने पर कुल भार = सन्ध्या — अर्थात् पूरा सन्ध्या-काल बारह कोष्ठों में वितरित।
पाचक-कल्पना: द्वादश भावों पर यही भार-रेखा दोहराई/सापेक्ष की जाती है (यथार्थ कोष्ठ-मानचित्र टीका-परम्परा से बाँधें)।

उदाहरण (worked example) U = 1.5 वर्ष (A = 93, सन्ध्या = 7.75 से)।
1 × 1.5 + 3 × 0.75 + 8 × 0.5 = 1.5 + 2.25 + 4.0 = 7.75 वर्ष = सन्ध्या। जाँच: U × 31/6 = 1.5 × 31/6 = 46.5/6 = 7.75 — `==` सन्ध्या।

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46.207
विंशत्तरिदशेवाऽत्र कैश्चित् तारादशा स्मृता |
आशंकुरागुशबुकेश्वादिस्थानेषु तारकाः
viṃśattaridaśevā'tra kaiścit tārādaśā smṛtā |
āśaṃkurāguśabukeśvādisthāneṣu tārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विंशोत्तरिदशा = विंशोत्तरी दशा; इव = के समान; अत्र = यहाँ; कैश्चित् = कुछ आचार्यों द्वारा; तारादशा = तारा-दशा; स्मृता = कही गई; आशंकुरागुशबुकेश्वादि = आ-शं-कु-रा-गु-श-बु-के-श्व आदि क्रमिक संकेताक्षर; स्थानेषु = स्थानों में; तारकाः = तारा / तारक-अवस्थाएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उल्लेख करता है कि यहाँ कुछ परम्पराएँ तारा-दशा को विंशोत्तरी-दशा के ही समान मानती हैं। आ, शं, कु, रा, गु, श, बु, के, श्व आदि स्थानाक्षरों से तारकाओं का क्रम स्मरण कराया गया है — अर्थात् नव-तारक चक्र उसी रीति-रेखा पर चलता है जिस पर विंशोत्तरी का नक्षत्र-स्वामी क्रम। (संकेताक्षरों का पूर्ण विस्तार पाठ/टीका-भेद से जुड़ सकता है — पाठ-भेद संभव।)

English rendering Some authorities, the text notes, hold the tārā-daśā here to be like the Vimśottarī daśā. The tārakās are assigned in the places beginning with the mnemonic sequence ā-śaṃ-ku-rā-gu-śa-bu-ke-śva, and so on.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
विंशोत्तरी-सम ढाँचा (जब तारा-दशा को “विंशोत्तरीवत्” लें):
महादशा-वर्ष: केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120 वर्ष।
अन्तर्दशा (वर्ष) = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
आरम्भ: जन्म-चन्द्र के नक्षत्र-स्वामी से; consummated fraction of the birth-nakṣatra से शेष महादशा।
तारा-दशा में नव तारक (46.208) नक्षत्र-चक्र पर 27 = 3 × 9 रीति से आवर्तित होते हैं; दशा-स्वामी निर्धारण 46.208–209 से (केन्द्रस्थ बली ग्रह)।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी-सम अनुपात: शुक्र-महादशा 20 वर्ष में गुरु-अन्तर्दशा = (20 × 16) ÷ 120 = 320/120 = 8/3 ≈ 2 वर्ष 8 मास।
(ayanāṃśa नक्षत्र-सीमा के लिए आवश्यक; घोषित करें — उदाहरणार्थ लाहिरी — तब चन्द्र-देशान्तर से नक्षत्र-अंश और शेष दशा सटीक कटती है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी का 120-वर्षीय योग (7+20+6+10+7+18+16+19+17) और अन्तर्दशा-अनुपात (M × m)/120 हमारे दशा-इंजन में यथावत् बँधे हैं। यह श्लोक तारा-दशा को उसी अनुपात-गणित से जोड़ता है; नाम-फल और केन्द्र-स्वामी अलग नियम हैं (अगले श्लोक), पर काल-खंड की रीढ़ विंशोत्तरी-सम रहती है।

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46.208
अन्मसम्पत्विपत्क्षेमप्रत्यरिः साधको बधः |
मैत्रं परममैत्रं च केन्द्रस्थबलिनो ग्रहात्
anmasampatvipatkṣemapratyariḥ sādhako badhaḥ |
maitraṃ paramamaitraṃ ca kendrasthabalino grahāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्म (पाठ: अन्म → जन्म; पाठ-भेद संभव) = जन्म-तारा; सम्पत् = सम्पत्-तारा; विपत् = विपत्; क्षेम = क्षेम; प्रत्यरिः = प्रत्यरि; साधकः = साधक; बधः = बध/वध (बाधा); मैत्रं = मैत्र; परममैत्रं = परममैत्र; केन्द्रस्थ = केन्द्र (1, 4, 7, 10) स्थित; बलिनः = बली; ग्रहात् = ग्रह से (आरम्भ / अपेक्षा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नव ताराओं के नाम गिनाता है — जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, बध, मैत्र और परममैत्र। ये तारक-अवस्थाएँ केन्द्र में स्थित बलवान् ग्रह से ज्ञेय/प्रचलित मानी गई हैं। नाम स्वयं फल-संकेत का द्वार हैं; अगला श्लोक उन्हें ‘नामतुल्यफल’ कहकर बाँधता है।

English rendering The nine tārās are listed: Janma, Sampat, Vipat, Kṣema, Pratyari, Sādhaka, Badha, Maitra, and Parama-maitra. They are to be taken from the strong planet stationed in a kendra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नव तारक, क्रम 1…9:
1 जन्म, 2 सम्पत्, 3 विपत्, 4 क्षेम, 5 प्रत्यरि, 6 साधक, 7 बध, 8 मैत्र, 9 परममैत्र।
नक्षत्र-सूचकांक j = 0…26 (अश्विनी = 0) पर तारक-संख्या = (j mod 9) + 1, जब गणना-बिन्दु जन्म-तारक से मेल खाए; अथवा केन्द्रस्थ बली ग्रह के नक्षत्र से ‘जन्म’ गिनती — दोनों रीति टीका में मिलती हैं; यहाँ श्लोक केन्द्रस्थ बलिनि ग्रह को आधार कहता है।
केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10 (लग्न-गृह प्रणाली घोषित करें)।
बली = षड्बल/स्थानबल आदि से तुलना (यदि एक से अधिक केन्द्र-ग्रह हों) — चयन-नियम परम्परा-सापेक्ष।

उदाहरण (worked example) लग्न-कुण्डली में केवल गुरु चतुर्थ केन्द्र में और स्पष्टतः बलवान्। गुरु-नक्षत्र = पुनर्वसु (नक्षत्र #7, 0-आधार पर index 6)। यदि गुरु-नक्षत्र = जन्म-तारा (#1), तो अगले नक्षत्र क्रमशः सम्पत्, विपत्, … चक्र 9 पर दोहराएँ। पुष्य (index 7) → तारक #2 सम्पत्; अश्लेषा (8) → #3 विपत्। (नक्षत्र-सीमा ayanāṃśa-सापेक्ष।)

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46.209
ज्ञेया तारादशा विप्र नामतुल्यफलप्रदा |
यस्य केन्द्रे स्थितः खेटो दशेयं तस्य कीर्तिता
jñeyā tārādaśā vipra nāmatulyaphalapradā |
yasya kendre sthitaḥ kheṭo daśeyaṃ tasya kīrtitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञेया = जाननी चाहिए; तारादशा = तारा-दशा (नक्षत्र-आधारित नवतारा-दशा); विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय); नाम-तुल्य-फल-प्रदा = अपने नाम के समान फल देने वाली (प्रत्येक तारा का फल उसके नाम के अनुरूप — सम्पत्, विपत्, क्षेम आदि); यस्य = जिसके; केन्द्रे = केन्द्र में (लग्न से 1/4/7/10); स्थितः = स्थित; खेटः = ग्रह; दशा इयम् = यह दशा; तस्य = उसकी (उसी बलवान् केन्द्र-ग्रह से आरम्भ); कीर्तिता = कही गई है।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, इस तारा-दशा को ऐसी जानो कि यह अपने नाम के अनुसार ही फल देती है — अर्थात् पूर्व श्लोक (46.208) में गिनाई नौ ताराएँ (जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मैत्र, परम-मैत्र) जिस भाव का नाम धरती हैं, उसी प्रकार का फल शास्त्र उस अवधि को बतलाता है। और यह दशा उस ग्रह से आरम्भ मानी जाती है जो केन्द्र में बलवान् होकर स्थित हो। इस प्रकार तारा-दशा (श्लोक 46.207 के अनुसार) काल-मान में विंशोत्तरी-सी है, पर उसका फल-पठन नवतारा-नामों से होता है।

English rendering Know, O Brahmin, that the Tārā-daśā yields results answering to its own names (each of the nine tārās — janma, sampat, vipat, and the rest). This daśā is declared to begin from that planet which stands strong in a kendra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवतारा एक mod-9 वर्गीकरण है। संदर्भ-नक्षत्र (बलवान् केन्द्र-ग्रह का नक्षत्र) से लक्ष्य-नक्षत्र तक सम्मिलित गणना करके —
तारा-सूचकांक k = ((गणना − 1) mod 9) + 1
मानचित्र: 1=जन्म, 2=सम्पत्, 3=विपत्, 4=क्षेम, 5=प्रत्यरि, 6=साधक, 7=वध, 8=मैत्र, 9=परम-मैत्र (श्लोक 46.208 का क्रम)।
कुल 27 नक्षत्र होने से प्रत्येक तारा 27 ÷ 9 = 3 बार आवृत्त होती है। दशा-वर्ष श्लोक 46.207 के "विंशोत्तरी-सी" कथन से विंशोत्तरी-लॉर्ड-वर्षों का अनुसरण करते हैं; नवतारा-नाम केवल फल-लेबल है। फल-कथन शास्त्र का दावा है — "शास्त्र कहता है" — कोई भय या नियति-घोषणा नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें संदर्भ (केन्द्र-ग्रह) का नक्षत्र = अश्विनी (#1)। तब —
- कृत्तिका (#3): गणना 3 → k = 3 = विपत्-तारा।
- वही तारा पुनः #12 उत्तरा-फाल्गुनी और #21 उत्तरा-आषाढा पर पड़ती है (3, 12, 21 सभी mod 9 = 3) — तीन-आवृत्ति की पुष्टि।
शास्त्र इन विपत्-अवधियों को बाधा-प्रधान कहता है (यह पाठ का कथन है, हमारी भविष्यवाणी नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) तारा-दशा उसी नक्षत्र-रीढ़ पर चलती है जिस पर हमारा सत्यापित विंशोत्तरी इंजन (dossier §3: चन्द्र-नक्षत्र-कुंजित 120-वर्ष चक्र, बीती नक्षत्र-भिन्न पर शुद्ध अनुपात-गणित) खड़ा है। श्लोक 46.207 के अनुसार तारा-दशा विंशोत्तरी-सी होने से वही वर्ष-आवंटन और अन्तर्दशा-अनुपात यहाँ लागू होते हैं; नवतारा का mod-9 लेबल उसी नक्षत्र-सूचकांक के ऊपर एक फल-परत मात्र है जिसे इंजन पहले से परिकलित करता है।

46.210
इति ते कथिता विप्र दश भेदा अनेकधा |
एतदन्तर्दशाभेदान् कथयिष्यामि चाग्रतः
iti te kathitā vipra daśa bhedā anekadhā |
etadantardaśābhedān kathayiṣyāmi cāgrataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; ते = तुझको (मैत्रेय को); कथिताः = कहे गए; विप्र = हे ब्राह्मण; दश-भेदाः = दशा-भेद (दशाओं के प्रकार — "दश भेदा" का पाठ दशा-भेदाः अर्थ में, पाठ-भेद संभव); अनेकधा = अनेक प्रकार से; एतद्-अन्तर्दशा-भेदान् = इन्हीं के अन्तर्दशा (भुक्ति/उप-दशा) भेदों को; कथयिष्यामि = मैं कहूँगा; च = और; अग्रतः = आगे, अब इसके पश्चात्।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, इस प्रकार मैंने तुझे दशाओं के अनेक प्रकार के भेद कह सुनाए। अब आगे इन्हीं दशाओं के अन्तर्दशा-भेदों (उप-अवधियों) का वर्णन करूँगा। यह श्लोक अध्याय का उपसंहार है और साथ ही अगले प्रसंग की ओर संकेत — महादशा की गणना के पश्चात् उसकी भुक्तियों का विभाजन।

English rendering Thus, O Brahmin, the manifold varieties of daśā have been told to you; next I shall speak of the antardaśā (sub-period) divisions of these.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार-संवाद (अध्याय-समापन + अन्तर्दशा की ओर अग्र-संकेत)। समूचा अध्याय दशा-पद्धतियों की सूची था; जिस अन्तर्दशा की यहाँ प्रतिज्ञा है वही अनुपात-नियम किसी भी महादशा को दिन-पर्यन्त परिकलनीय बनाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक जिस अन्तर्दशा-विषय की घोषणा करता है, वही हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात से गणित होता है (dossier §3): अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। अध्याय-अन्त का यह अग्र-संकेत सीधे उसी परिकलन की जड़ पर जाता है जिसे इंजन बीती नक्षत्र-भिन्न पर लागू करता है।

केतु7वर्षशुक्र20वर्षरवि6वर्षचन्द्र10वर्षमंगल7वर्षराहु18वर्षगुरु16वर्षशनि19वर्षबुध17वर्ष१२०वर्षΣ = 7+20+6+10+7+18+16+19+17 = 120
विंशोत्तरी-दशा-चक्र — the 120-year mahādaśā cycle keyed to the Moon's nakṣatra (BPHS Ch.46). Nine planetary periods sum to exactly 120 years: केतु 7 · शुक्र 20 · रवि 6 · चन्द्र 10 · मंगल 7 · राहु 18 · गुरु 16 · शनि 19 · बुध 17. Antardaśā = (mahādaśā-yr × antar-yr) ÷ 120 — pure ratio arithmetic on the elapsed nakṣatra-fraction.
अध्यायः 47

दशाफलाद्यायः

89 श्लोक
47.1
श्रुताश्च बहुधा भेदा दशानां च मया मुने |
फलं च कीदृशं तासां कृपया मे तदुच्यताम्
śrutāśca bahudhā bhedā daśānāṃ ca mayā mune |
phalaṃ ca kīdṛśaṃ tāsāṃ kṛpayā me taducyatām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रुताः = सुने गए; बहुधा भेदाः = अनेक प्रकार के भेद; दशानाम् = दशाओं के (दशा = ग्रह-कालखण्ड); मया = मेरे द्वारा (शिष्य); मुने = हे मुनि (पराशर को सम्बोधन); फलम् कीदृशम् = फल किस प्रकार का; तासाम् = उन दशाओं का; कृपया मे तत् उच्यताम् = कृपापूर्वक वह मुझे कहा जाए।

हिन्दी भावार्थ शिष्य विनम्रता से पूछता है — "हे मुनि, दशाओं के अनेक भेद तो मैंने सुन लिए; अब उन दशाओं का फल किस प्रकार का होता है? कृपया वही मुझे बताइए।" यह अध्याय का प्रस्तावना-प्रश्न है, जो दशा-फल के समस्त विवेचन का द्वार खोलता है।

English rendering "O sage, I have heard the many varieties of daśās; but of what kind is their fruit? Kindly tell me that." — the pupil's opening request that frames the entire chapter on daśā-results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (प्रश्न-प्रस्तावना)। दशाओं की गणना पूर्व-अध्याय में हो चुकी; यहाँ से उसी काल-विभाजन का फल-विवेचन आरम्भ होता है — गणना और फल के बीच का संधि-बिन्दु।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस अध्याय का "फल" जिस दशा-चक्र पर बैठता है वह विंशोत्तरी का 120-वर्ष चक्र है (BPHS अ.46–47) — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120 वर्ष), चन्द्र-नक्षत्र से कीलित। हमने इस चक्र और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 को शुद्ध अनुपात-अंकगणित के रूप में सत्यापित किया।

47.2
साधारणं विशिष्टञ्च दशानां द्विविधं फलम् |
ग्रहाणां च स्वभावेन स्थानस्थितिवशेन च
sādhāraṇaṃ viśiṣṭañca daśānāṃ dvividhaṃ phalam |
grahāṇāṃ ca svabhāvena sthānasthitivaśena ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधारणम् = सामान्य फल; विशिष्टम् = विशेष फल; द्विविधम् फलम् = दो प्रकार का फल; दशानाम् = दशाओं का; ग्रहाणाम् स्वभावेन = ग्रहों के स्वभाव से; स्थान-स्थिति-वशेन = स्थान व स्थिति के वश से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशाओं का फल दो वर्गों में बँटता है — साधारण और विशिष्ट। यह भेद ग्रहों के स्वाभाविक गुण (शुभ/क्रूर, शीघ्र/मन्द इत्यादि) और उनकी कुण्डली-स्थिति (राशि, भाव, बल) दोनों पर निर्भर करता है। एक ही दशा-स्वामी भिन्न स्थान में भिन्न फल-वर्ग में आता है।

English rendering The text states that daśā results are of two kinds — ordinary and special — governed both by the planets’ inherent nature and by their placement and condition in the chart.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण-सूत्र (फल-कथन की द्विविध संरचना)। साधारण/विशिष्ट यहाँ संख्यात्मक गुणक नहीं, बल्कि फलादेश की दो श्रेणियाँ हैं; संख्यात्मक पक्ष अगले श्लोकों में द्रेष्काण-काल और Ch.27 षड्बल से जुड़ता है।

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47.3
ग्रहवीर्यानुसारेण फलं ज्ञेयं दशासु च |
आद्यद्रेष्काणगे खेटे दशारम्भे फलं वदेत्
grahavīryānusāreṇa phalaṃ jñeyaṃ daśāsu ca |
ādyadreṣkāṇage kheṭe daśārambhe phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-वीर्य-अनुसारेण = ग्रह-बल के अनुपात से; फलं ज्ञेयम् = फल जानना चाहिए; दशासु = दशाओं में; आद्य-द्रेष्काण-गे = प्रथम द्रेष्काण में स्थित; खेटे = ग्रह पर; दशा-आरम्भे = दशा के आरम्भ में; फलं वदेत् = फल कहे।

हिन्दी भावार्थ दशा-फल ग्रह के वीर्य (बल) के अनुसार जाना जाता है। शास्त्र कहता है कि जब दशा-स्वामी अपनी राशि के आद्य (प्रथम) द्रेष्काण में हो, तो उस दशा का मुख्य फल दशा के आरम्भ-काल में बोलना चाहिए। अर्थात् द्रेष्काण-स्थान दशा-अवधि के भीतर फल-काल का संकेत देता है।

English rendering Results in the daśās are to be known according to planetary strength. When the planet stands in the first drekkāṇa, the text says, declare the result at the beginning of the daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्रेष्काण (D3) = 30° राशि का तीन समान भाग:
- आद्य (1st): 0° ≤ λ_sign < 10°
- मध्य (2nd): 10° ≤ λ_sign < 20° (अगला श्लोक)
- तृतीय (3rd): 20° ≤ λ_sign < 30° (अगला श्लोक)

जहाँ λ_sign = (λ_sidereal mod 30°), sidereal longitude; ayanāṃśa घोषित करना आवश्यक (जैसे लाहिरी)।
दशा-आरम्भ-फल नियम: यदि दशा-स्वामी 1st drekkāṇa में → फल-कथन दशा के आरम्भ-तिहाई पर केन्द्रित।
वीर्य-संदर्भ: Ch.27 षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) — कुल रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप); यह बल-माप फल की तीव्रता/दिशा तय करने का गणना-पक्ष है, फलादेश स्वयं नहीं।

उदाहरण (worked example) मानें शुक्र-विंशोत्तरी महादशा, शुक्र sidereal long. λ = 45.0° (वृषभ 15.0° नहीं — जाँच):
λ_sign = 45.0° mod 30° = 15.0° → 2nd drekkāṇa (मध्य) — यह 47.4 का विषय।
यदि λ = 32.5° (मेष 2.5°): λ_sign = 2.5° ∈ [0°, 10°) → आद्य द्रेष्काण → शास्त्रानुसार फल दशा-आरम्भ में वाच्य।
Convention: Lahiri ayanāṃśa; whole-sign या equal-house भाव-गणना फलादेश-पक्ष के लिए अलग घोषित करें — यह श्लोक केवल राशि-अन्दर द्रेष्काण-अंश माँगता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन द्रेष्काण को 30° → 3 × 10° के नियत विभाजन के रूप में मापता है — शुद्ध modular arithmetic। विंशोत्तरी इंजन महादशा/अन्तर्दशा की अवधि (Σ = 120 वर्ष; अन्तर् = (महा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120) देता है; यह श्लोक उस अवधि के भीतर फल-काल (आरम्भ) का शास्त्रीय संकेत जोड़ता है। बल = षड्बल-परत; फल = पाठ की वाणी — दोनों मिलाए नहीं जाते।

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47.4
दशामध्ये फलं वाच्यं मध्यद्रेष्काणगे खगे |
अन्ते फलं तृतीयस्थे व्यस्तं खेटे च वक्रगे
daśāmadhye phalaṃ vācyaṃ madhyadreṣkāṇage khage |
ante phalaṃ tṛtīyasthe vyastaṃ kheṭe ca vakrage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशा-मध्ये = दशा के मध्य में; फलं वाच्यम् = फल कहना चाहिए; मध्य-द्रेष्काण-गे = मध्य द्रेष्काण में स्थित; खगे = ग्रह पर; अन्ते फलम् = अन्त में फल; तृतीय-स्थे = तृतीय द्रेष्काण में; व्यस्तम् = उलटा/विपरीत; खेटे वक्र-गे = वक्री ग्रह पर।

हिन्दी भावार्थ मध्य द्रेष्काण में स्थित ग्रह के लिए शास्त्र दशा-मध्य में फल कहने को कहता है; तृतीय द्रेष्काण में होने पर दशा-अन्त में। यदि ग्रह वक्री हो तो यह क्रम व्यस्त (उलटा) माना जाता है — अर्थात् वक्र-गति काल-संकेत को पलट देती है।

English rendering When the planet is in the middle drekkāṇa, declare the result in the middle of the daśā; in the third, at the end. If the planet is retrograde, reverse this order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
λ_sign = λ_sidereal mod 30°

| द्रेष्काण | λ_sign | सामान्य (मार्गी) फल-काल | वक्री (व्यस्त) |
|---|---|---|---|
| 1st (आद्य) | [0°, 10°) | दशा-आरम्भ (≈ 0–1/3) | दशा-अन्त (≈ 2/3–1) |
| 2nd (मध्य) | [10°, 20°) | दशा-मध्य (≈ 1/3–2/3) | दशा-मध्य (स्थिर) — पाठ “व्यस्त” पूरे क्रम पर; मध्य प्रायः मध्य ही रहता है, आद्य↔तृतीय पलटते हैं |
| 3rd (तृतीय) | [20°, 30°) | दशा-अन्त (≈ 2/3–1) | दशा-आरम्भ (≈ 0–1/3) |

दशा-अवधि T (वर्ष) विंशोत्तरी से: T_maha ∈ {7,20,6,10,7,18,16,19,17} (केतु…बुध), Σ = 120।
फल-काल-खण्ड (मार्गी): आरम्भ [0, T/3), मध्य [T/3, 2T/3), अन्त [2T/3, T)।
वक्र-स्थिति: true sidereal daily motion < 0 (ephemeris convention घोषित करें)।
पाठ-भेद संभव: कुछ टीकाएँ “व्यस्त” को केवल आद्य-तृतीय स्वैप मानती हैं, मध्य अटल; यहाँ पाठ शब्द “व्यस्तं खेटे च वक्रगे” से पूर्ण क्रम-विपर्यय भी संभव।

उदाहरण (worked example) गुरु महादशा T = 16 वर्ष। गुरु λ_sign = 22° (तृतीय द्रेष्काण), मार्गी।
→ फल-काल ≈ [2T/3, T) = वर्ष 10.667…16।
यदि वही गुरु वक्री: व्यस्त → फल-काल ≈ [0, T/3) = वर्ष 0…5.333।
Convention: Lahiri ayanāṃśa; motion from the same ephemeris used for λ।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी-इंजन T और अन्तर्दशा अनुपात (महा×अन्तर्)/120 देता है; द्रेष्काण-इंजन λ_sign → {1,2,3} बांटता है। यह श्लोक दोनों को जोड़कर दशा-अवधि के भीतर फल-खण्ड (1/3 नियम) का शास्त्रीय मानचित्र है — गणना exact; फलादेश “शास्त्र कहता है” स्तर पर।

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47.5
दशारम्भे दशादीशे लग्नगे शुभदृग्युते |
स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा शुभं तस्य दशाफलम्
daśārambhe daśādīśe lagnage śubhadṛgyute |
svocce svabhe svamaitre vā śubhaṃ tasya daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशा-आरम्भे = दशा के आरम्भ में; दशा-ईशे = दशा-स्वामी पर; लग्न-गे = लग्न में स्थित; शुभ-दृक्-युते = शुभ दृष्टि/शुभ-युक्त; स्व-उच्चे = स्वोच्च में; स्व-भे = स्वराशि में; स्व-मैत्रे = मित्र-राशि में; वा = अथवा; शुभम् = शुभ; तस्य दशा-फलम् = उसकी दशा-फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा के आरम्भ में यदि दशा-स्वामी लग्न में हो और शुभ दृष्टि/संयोग से युक्त हो, अथवा उच्च, स्वक्षेत्र या मित्र-राशि में हो, तो उस दशा का फल शुभ कहा गया है। यह स्थिति-आधारित शुभ-फल का सामान्य नियम है — नियति नहीं, पाठ का कथन।

English rendering The text states that if, at the start of the daśā, the daśā-lord occupies the lagna conjoined with or aspected by benefics, or stands in exaltation, own sign, or a friendly sign, the daśā result is auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-जाँच (boolean conditions), निरपेक्ष “शुभ-अंक” नहीं:
(1) bhāva(dasha_lord) = 1 (लग्न) ∧ (शुभ-दृष्टि या शुभ-युति)
(2) ∨ rāśi ∈ {उच्च-राशि(planet), स्व-राशि, मित्र-राशि}
दृष्टि: शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि (पूर्ण/आंशिक — convention घोषित: पूर्ण दृष्टि parity vs. aspect-orbs)।
लग्न/भाव: house system घोषित करें (whole-sign vs. Śrīpati आदि) — संख्या house-system पर निर्भर।
उच्च/स्व/मित्र: ग्रह-राशि तालिका नियत (BPHS graha-svarūpa अध्याय); मित्रत्व नैसर्गिक या तत्कालिक — पाठ “स्वमैत्रे” प्रायः नैसर्गिक मित्र-राशि।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-दशा आरम्भ; चन्द्र sidereal in कर्कट (स्वक्षेत्र), bhāva = 1 (whole-sign: Moon-sign = Lagna-sign)।
→ शर्त (2) स्व-भ सत्य → शास्त्र: शुभं दशाफलम्।
यदि चन्द्र तुल में (उच्च) पर 6th भाव में: उच्च सत्य किन्तु 47.6 की षष्ठाष्टमव्यय शर्त से टकराव — दोनों श्लोक साथ पढ़े जाएँ; पाठ बाद में अशुभ-स्थान भी गिनाता है।

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47.6
षष्ठाऽष्टमव्ययस्थे च नीचास्तरिपुभस्थिते |
अशुभं तत्फलं चाऽथ ब्रुवे सर्वदशाफलम्
ṣaṣṭhā'ṣṭamavyayasthe ca nīcāstaripubhasthite |
aśubhaṃ tatphalaṃ cā'tha bruve sarvadaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यय-स्थे = 6, 8, 12 भाव में स्थित; नीच-अस्त-रिपु-भ-स्थिते = नीच, अस्त, शत्रु-राशि में स्थित; अशुभम् तत् फलम् = वह फल अशुभ; अथ ब्रुवे = अब कहता हूँ; सर्व-दशा-फलम् = सब दशाओं का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा-स्वामी षष्ठ, अष्टम या व्यय भाव में हो, अथवा नीच, अस्त या शत्रु-राशि में स्थित हो, तो उस दशा का फल अशुभ कहा गया है। “अथ ब्रुवे सर्वदशाफलम्” से आगे विस्तृत सर्व-दशा-फल-वर्णन का द्वार खुलता है। भय या उपचार-दबाव नहीं — केवल पाठ की स्थिति-शर्त।

English rendering The text states that when the planet stands in the 6th, 8th, or 12th, or in debilitation, combustion, or an enemy’s sign, that result is inauspicious; and now the full account of daśā results will be set forth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अशुभ-स्थिति शर्तें (कोई भी सत्य → पाठ: अशुभं फलम्):
- bhāva ∈ {6, 8, 12}
- rāśi = नीच-राशि(planet)
- combustion: |λ_planet − λ_Sun| < orb_p (ग्रह-विशिष्ट अस्त-सीमा; classical orbs convention घोषित)
- rāśi ∈ शत्रु-राशि-समुच्चय(planet)

House system और ayanāṃśa घोषित किए बिना भाव-संख्या अस्थिर।
अस्त-orb: सूर्य-सामीप्य की डिग्री-सीमा पर परम्परा-भेद — “पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव”; गणना में orb स्पष्ट लिखें।
यह श्लोक 47.5 का प्रतिपक्षी पूरक है: शुभ-स्थान vs. अशुभ-स्थान।

उदाहरण (worked example) शनि-दशा; whole-sign: शनि 8th from Lagna; λ_Saturn not combust.
→ षष्ठाष्टमव्यय में अष्टम सत्य → शास्त्र: अशुभं तत्फलम्।
यदि शनि 10th, पर मेष में (नीच): नीच सत्य → वही अशुभ-कथन।
तुलना: षड्बल-कुल कम होने पर वीर्य-दुर्बलता (47.3) अलग परत है — भाव/नीच/अस्त यहाँ फल-दिशा का शास्त्रीय संकेत।

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47.7
मूलत्रिकोणे स्वक्षेत्रे स्वोच्चे वा परमोच्चगे |
केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे भाग्यकर्माधिपैर्युते
mūlatrikoṇe svakṣetre svocce vā paramoccage |
kendratrikoṇalābhasthe bhāgyakarmādhipairyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मूल-त्रिकोणे = मूलत्रिकोण राशि में; स्व-क्षेत्रे = स्वक्षेत्र में; स्व-उच्चे = उच्च में; वा परम-उच्च-गे = अथवा परमोच्च (deep exaltation) में; केन्द्र-त्रिकोण-लाभ-स्थे = केन्द्र, त्रिकोण या लाभ (11) भाव में; भाग्य-कर्म-अधिपैः युते = भाग्येश (9) व कर्मेश (10) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शुभ-दशा-स्थिति की अगली परत खोलता है: दशा-स्वामी मूलत्रिकोण, स्वक्षेत्र, उच्च या परमोच्च में हो, तथा केन्द्र/त्रिकोण/लाभ भाव में हो, और भाग्येश व कर्मेश से युक्त हो — शास्त्र ऐसे योग को दशा-फल की दृष्टि से विशेष बलवान/शुभ पक्ष में गिनता है। (पूरा फल-वाक्य प्रायः अगले श्लोकों से जुड़ता है; यह सूची स्थिति-शर्तों की है।)

English rendering [The daśā-lord] in mūlatrikoṇa, own field, exaltation, or deep exaltation; placed in a kendra, trikoṇa, or the eleventh; and conjoined with the lords of fortune (9th) and action (10th) — these are the strengthening conditions the text enumerates.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-समुच्चय (स्थिति-बीजगणित):
(A) rāśi ∈ {मूलत्रिकोण(p), स्वक्षेत्र(p), उच्च(p)} ∨ λ near परमोच्च-बिन्दु(p)
 परमोच्च = exaltation degree (classical peak; e.g. Sun 10° Aries, Moon 3° Taurus, … — BPHS/standard table; exact peak degree table edition-pinned)
(B) bhāva ∈ {1,4,7,10} ∪ {1,5,9} ∪ {11} (केन्द्र ∪ त्रिकोण ∪ लाभ; 1 दोनों में)
(C) conjunction: same rāśi/bhāva with lord(9) and/or lord(10) — पाठ “भाग्यकर्माधिपैर्युते” द्विवचन-सामर्थ्य से दोनों या युति-समूह; पाठ-भेद/अन्वय-भेद संभव (केवल एक vs. दोनों)।

Kendra = {1,4,7,10}, trikoṇa = {1,5,9}, lābha = 11।
भाग्येश = rāśi-lord of 9th cusp/sign; कर्मेश = of 10th — house system पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) Convention: whole-sign, Lahiri. Lagna = कन्या; दशा-स्वामी बुध।
बुध कन्या में = मूलत्रिकोण + स्वक्षेत्र + bhāva 1 (केन्द्र व त्रिकोण)।
9th = वृषभ → भाग्येश शुक्र; 10th = मिथुन → कर्मेश बुध स्वयं।
यदि शुक्र भी कन्या में युति: भाग्येश-युति सत्य।
→ शर्तें (A)(B)(C) पाठानुसार मजबूत शुभ-पक्ष; यह फलादेश की गणना-पूर्व स्थिति-जाँच है, न कि “भविष्य निश्चित”।

हमारा डिकोड (Our Decode) भाव/राशि/युति की जाँच deterministic chart-model पर टिकती है; दशा-काल विंशोत्तरी 120-वर्ष इंजन से आता है; बल षड्बल से। हमारा अनुशासन: स्थितियाँ और अवधियाँ `==` स्तर पर मापनीय; “शुभ/अशुभ फल” शास्त्र का कथन — इंजन फलादेश नहीं थोपता, केवल मानचित्र और काल-खंड सत्यापित करता है।

47.8
सूर्ये बलसमायुक्ते निजवर्गबलैर्युते |
तस्मिन्दाये महत् सौख्यं धनलाभादिकं शुभम्
sūrye balasamāyukte nijavargabalairyute |
tasmindāye mahat saukhyaṃ dhanalābhādikaṃ śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्ये बल-समायुक्ते = सूर्य के बल से भली-भाँति युक्त होने पर; निज-वर्ग-बलैः युते = अपने वर्ग-बल (own divisional strength) से युक्त; तस्मिन् दाये = उस दशा (दाय) में; महत् सौख्यम् = महान सुख; धन-लाभ-आदिकम् शुभम् = धन-लाभ आदि शुभ फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (उपर्युक्त स्थितियों में) जब सूर्य बल से युक्त हो और अपने वर्ग-बल से भी सम्पन्न हो, तब उसकी दशा में महान सुख, धन-लाभ आदि शुभ फल प्राप्त होते हैं।

English rendering The text states that when the Sun is well endowed with strength and possessed of its own varga-strength, that daśā yields great happiness, gain of wealth, and other auspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "बल" व "निज-वर्ग-बल" षड्बल (BPHS अ.27) की ओर संकेत हैं — छह अंग: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् बल; योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप)। वर्ग-बल स्थान-बल का अंग है (उच्च/मूलत्रिकोण/स्व/मित्र वर्गों में स्थिति के अंक)। फल "शुभ" तभी जब कुल बल ≥ ग्रह-विशेष देहली (देहली-मान सम्मेलन-निर्भर; पाठ व दोसियर उसे संख्यात्मक रूप से नहीं देते)।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य का षड्बल कुल = 6 रूप 30 विरूप = 6 + 30/60 = 6.5 रूप = 390 विरूप। यदि सूर्य की आवश्यक देहली इससे न्यून है, तो सूर्य "बली" — शास्त्र-नियम से दशाफल शुभ पक्ष में। (यहाँ केवल इकाई-गणित 1 रूप = 60 विरूप दिखाया गया; देहली का निरपेक्ष मान घोषित सम्मेलन पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसियर के अनुसार षड्बल के छह अंग रूप/विरूप में जोड़े जाते हैं (1 रूप = 60 विरूप) और कुल की तुलना प्रति-ग्रह देहली से होती है — यह पूर्णतः संगणनात्मक है, व्याख्यात्मक नहीं। "बल-समायुक्त सूर्य" की यह श्लोक-शर्त उसी संख्यात्मक बल-मॉडल की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, जिसे हम पृथक् रूप से गणना करते हैं।

47.9
अत्यन्तं राजसन्मानमश्वांदोल्यादिकं शुभम् |
सुताधिपसमायुक्ते पुत्रलाभं च विन्दति
atyantaṃ rājasanmānamaśvāṃdolyādikaṃ śubham |
sutādhipasamāyukte putralābhaṃ ca vindati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत्यन्तम् = अत्यन्त; राज-सन्मानम् = राजकीय सम्मान; अश्व-आन्दोल्या-आदिकम् = अश्व, पालकी/आन्दोलन-यान आदि; शुभम् = शुभ; सुत-अधिप-समायुक्ते = पुत्र-भावेश (५ेश) से युक्त/सम्बद्ध होने पर; पुत्र-लाभम् = संतान-लाभ; विन्दति = प्राप्त करता है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — (सबल सूर्य-दशा में) अत्यन्त राजसम्मान, अश्व-आन्दोल्यादि शुभ उपलब्धियाँ बताई गई हैं। यदि सूर्य सुताधिप (पंचमेश) से युक्त/सम्बद्ध हो, तो शास्त्र पुत्रलाभ का भी उल्लेख करता है। यह सब दशा-फल की परम्परागत भाषा है, न कि चिकित्सकीय या कानूनी दावा।

English rendering The text states extreme royal honor and auspicious gains such as horses and palanquins; and when (the Sun) is joined with the lord of children, it says one obtains the gain of a son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सबल सूर्य + सुताधिप-सम्बन्ध)। “समायुक्ते” का तकनीकी अर्थ योग/दृष्टि/भाव-स्वामित्व-सम्बन्ध से निर्धारित होता है; संख्या-सूत्र यहाँ नहीं है।

47.10
धनेशस्य च सम्बन्धे गजान्तैश्वर्यमादिशेत् |
वाहनाधिपसम्बन्धे वाहनात्रयलाभकृत्
dhaneśasya ca sambandhe gajāntaiśvaryamādiśet |
vāhanādhipasambandhe vāhanātrayalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनेशस्य = द्वितीयेश / धन-स्वामी के; सम्बन्धे = सम्बन्ध में; गज-अन्त-ऐश्वर्यम् = हाथी तक का (अर्थात् प्रचुर) ऐश्वर्य; आदिशेत् = निर्देश करे / बताए; वाहन-अधिप = वाहन-भावेश (४ेश आदि, सन्दर्भानुसार); सम्बन्धे = सम्बन्ध में; वाहन-अत्रय-लाभ-कृत् = वाहन तथा रक्षा/आश्रय का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य का धनेश से सम्बन्ध होने पर गजान्त-ऐश्वर्य (प्रचुर समृद्धि) का निर्देश दिया जाए। वाहनाधिप से सम्बन्ध होने पर वाहन-लाभ और अत्रय (रक्षा/आश्रय) का फल बताया गया है। सम्बन्ध का निश्चय योग, दृष्टि या भाव-स्वामित्व से होता है; श्लोक फल की दिशा देता है, माप का सूत्र नहीं।

English rendering The text states that in connection with the lord of wealth one should declare prosperity culminating in great affluence; and in connection with the lord of conveyances, (the Sun’s period) causes gain of vehicles and protection/refuge.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनेश/वाहनाधिप-सम्बन्ध से सूर्य-दशा-फल)। सम्बन्ध-निर्णय कम्प्यूटेशनल हो सकता है (ग्रह-युति, दृष्टि-कोण, भाव-स्वामी), पर इस श्लोक में कोई संख्या-नियम नहीं है।

47.11
नृपलतुष्टिर्वित्ताढ्यः सेनाधीशः सुखी नरः |
वस्त्रवाहनलाभश्च दशायां बलिनो रवेः
nṛpalatuṣṭirvittāḍhyaḥ senādhīśaḥ sukhī naraḥ |
vastravāhanalābhaśca daśāyāṃ balino raveḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृप-ल-तुष्टिः = नृप की तुष्टि / राज-कृपा; वित्त-आढ्यः = धन-समृद्ध; सेना-अधीशः = सेना का अध्यक्ष; सुखी नरः = सुखी पुरुष; वस्त्र-वाहन-लाभः = वस्त्र और वाहन का लाभ; च = और; दशायाम् = दशा में; बलिनः रवेः = बलवान् सूर्य की।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र बलवान् सूर्य की दशा का सार इस प्रकार कहता है — नृप-तुष्टि, वित्तसमृद्धि, सेनाधीश-पद, सुख, तथा वस्त्र-वाहन-लाभ। यह ४७.८–४७.१० के शुभ-फल-क्रम का उपसंहार है: “बलिन् रवि” की दशा में ये फल बताए गए हैं। दुर्बल/नीच/पाप-युक्त सूर्य का फल अगले श्लोकों में अलग है।

English rendering The text states that in the period of a strong Sun the person enjoys royal favor, wealth, command of forces, happiness, and gains of clothing and conveyances.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बलिन्-सूर्य-दशा का संक्षिप्त शुभ-फल-समूह)। “बलिन्” का मापदण्ड षड्बल/वर्ग-बल से आता है; दशा-काल विंशोत्तरी में सूर्य-महादशा = ६ वर्ष, अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/१२०।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलिनो रवेः” को हम षड्बल-योग और वर्ग-स्थिति से जाँचते हैं; सूर्य-दशा-काल विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (सूर्य ६ वर्ष) पर शुद्ध अनुपात-अंकगणित है। फल-सूची को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखते हैं — कोई निश्चित भाग्य-दावा नहीं।

47.12
नीचे षडष्टके रिःफे दुर्बले पापसंयुते |
राहुकेतुसमायुक्ते दुह्स्थानाधिपसंयुते
nīce ṣaḍaṣṭake riḥphe durbale pāpasaṃyute |
rāhuketusamāyukte duhsthānādhipasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = नीच-राशि/नीचांश में; षट्-अष्टके = षष्ठ-अष्टम भाव में; रिःफे = व्यय/द्वादश भाव में; दुर्बले = दुर्बल; पाप-संयुते = पाप-ग्रहों से युक्त; राहु-केतु-समायुक्ते = राहु-केतु से युक्त; दुःस्थान-अधिप-संयुते = दुःस्थान (६, ८, १२) के स्वामियों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब अशुभ सूर्य-दशा की शर्तें गिनाता है — सूर्य नीच हो, षष्ठ/अष्टम/द्वादश में हो, दुर्बल हो, पाप-युक्त हो, राहु-केतु से युक्त हो, अथवा दुःस्थानाधिप से संयुक्त हो। ये स्थितियाँ “तस्मिन् दये” (अगले श्लोक) के अशुभ-फल का आधार हैं। पाठ में कई शर्तें समान्तर रूप से दी गई हैं; संयोजन का भार व्याख्या-परम्परा पर है — पाठ-भेद/विस्तार अन्य संस्करणों में संभव।

English rendering The text lists adverse conditions of the Sun: debilitated; in the sixth, eighth, or twelfth; weak; joined with malefics; joined with Rāhu–Ketu; or joined with lords of the dusthānas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन की शर्त-सूची (अशुभ सूर्य-स्थिति)। तकनीकी संकेत: नीच = सूर्य के लिए तुला (सौर-देश-रेखा पर ~१८०°–२१०° क्षेत्र; अयनांश-घोषणा आवश्यक); षडष्टक-रिःफ = लग्न से ६/८/१२ भाव; दुर्बल = षड्बल-न्यूनता; युति = समान-राशि/समीप-देशान्तर।

हमारा डिकोड (Our Decode) “दुर्बले” को षड्बल-सीमा से, “नीचे” को राशि/अंश-नियम से, भाव-स्थिति को घोषित गृह-पद्धति से मापते हैं — अयनांश और भाव-प्रणाली दोनों घोषित किए बिना संख्या अर्थहीन। फल अगले श्लोकों में है; यहाँ केवल इनपुट-शर्तें हैं।

47.13
तस्मिन्दाये महापीडा धनधान्यविनाशकृत |
राजकोपः प्रवासश्च राजदण्डो धनक्षयः
tasmindāye mahāpīḍā dhanadhānyavināśakṛta |
rājakopaḥ pravāsaśca rājadaṇḍo dhanakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मिन् दाये = उस दशा में; महा-पीडा = महान कष्ट; धन-धान्य-विनाशकृत् = धन-धान्य का विनाश करने वाली; राज-कोपः = राजा का कोप; प्रवासः च = और परदेश-गमन/निर्वासन; राज-दण्डः = राजकीय दण्ड; धन-क्षयः = धन का क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (दुर्बल/पीड़ित सूर्य की) उस दशा में महान कष्ट होता है, जो धन-धान्य का नाश करता है; राजकोप, परदेश-गमन, राजकीय दण्ड और धन-क्षय जैसे अशुभ परिणाम शास्त्र-मत में कहे गए हैं।

English rendering The text states that in that daśā there is great affliction destroying wealth and grain — royal wrath, exile, royal punishment, and loss of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ)। यह श्लोक 12 की शर्तों का परिणाम-वाक्य है; कोई संख्या नहीं। स्मरण रहे — ये शास्त्र की सशर्त प्रतिज्ञाएँ हैं ("यदि सूर्य दुर्बल-पीड़ित हो तो..."), नियति की घोषणा या भय-प्रेरणा नहीं, और यहाँ कोई उपाय-दबाव अभिप्रेत नहीं।

47.14
ज्वरपीडा यशोहानिर्बन्धुमित्रविरोधकृत |
पितृक्षयभयं चैव गृहे त्वशुभमेव च
jvarapīḍā yaśohānirbandhumitravirodhakṛta |
pitṛkṣayabhayaṃ caiva gṛhe tvaśubhameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वर-पीडा = ताप/ज्वर से कष्ट; यशो-हानिः = कीर्ति की हानि; बन्धु-मित्र-विरोध-कृत् = सगे-सम्बन्धियों व मित्रों से विरोध कराने वाली (दशा); पितृ-क्षय-भयम् = पिता के ह्रास/अनिष्ट का भय (सूर्य = पितृ-कारक); गृहे अशुभम् = घर में अमंगल।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक दुर्बल/पापयुक्त सूर्य-दशा के अनिष्ट फलों की सूची (श्लोक 12–13 से आगे) जारी रखता है। शास्त्र कहता है कि ऐसी दशा में ज्वरादि से पीड़ा, यश की क्षति, बन्धु-मित्रों से मनमुटाव, पिता-पक्ष को लेकर चिन्ता तथा गृह में अशुभता का कथन किया जाता है। सूर्य के पितृ-कारकत्व के कारण फल विशेष रूप से पिता-वर्ग की ओर झुकता है।

English rendering The text ascribes to an afflicted Sun-daśā fever-borne suffering, loss of repute, discord with kin and friends, apprehension regarding the father, and inauspiciousness in the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट-फल की सूची)। तकनीकी सूत्र इतना ही कि फल सूर्य के नैसर्गिक कारकत्व (पितृ, यश, तेज) पर आरोपित होता है — इसीलिए "पितृ-क्षय-भय" सूर्य-दशा में गिना गया, किसी अन्य ग्रह की दशा में नहीं।

47.15
पितृवर्गे मनस्तापं जन्द्वेषं च विन्दति |
शुभदृष्टियुते सूर्ये मध्ये तस्मिन् क्वचित्सुखम् |
पापग्र्हेण सन्दृष्टे वदेत्पापफलं बुधः
pitṛvarge manastāpaṃ jandveṣaṃ ca vindati |
śubhadṛṣṭiyute sūrye madhye tasmin kvacitsukham |
pāpagrheṇa sandṛṣṭe vadetpāpaphalaṃ budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृवर्गे = पितृ-संबंधी वर्ग/स्थान-योग (पाठ-भेद संभव: वर्ग = varga या भाव-सन्दर्भ); मनस्तापं = मानसिक ताप/क्लेश; जन्द्वेषं (जनद्वेषं) = जन-द्वेष, लोक-विरोध; विन्दति = प्राप्त करता है; शुभदृष्टियुते = शुभ-ग्रह की दृष्टि युक्त; सूर्ये मध्ये = मध्यम-अवस्था का सूर्य; क्वचित्सुखम् = कहीं-कहीं/अल्प सुख; पापग्रहेण सन्दृष्टे = पाप-ग्रह से दृष्ट; पापफलं = अशुभ फल; बुधः = विद्वान्/ज्ञानी (कथन-कर्ता)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य जब पितृवर्ग-संबंधी स्थिति में हो तो जातक को मानसिक ताप और जन-द्वेष का अनुभव होता है। यदि उस सूर्य पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और सूर्य मध्यम अवस्था में हो, तो कभी-कभी सुख भी मिल सकता है। किन्तु पाप-ग्रह से दृष्ट होने पर विद्वान् पाप-फल ही कहे—यह फल-कथन सूर्य-दशा/सूर्य-स्थित फल-श्रृंखला का ही भाग है।

English rendering The text states that when the Sun is in the pitṛ-varga context the native meets mental distress and popular enmity; with benefic aspect and a middling Sun, occasional ease may appear, while malefic aspect is to be told as inauspicious result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य की वर्ग/दृष्टि-अवस्था पर आधारित दशा-फल)। यहाँ “वर्ग”, दृष्टि (aspect), और मध्यम/पाप-दृष्ट भेद गुणात्मक शर्तें हैं; संख्यात्मक गणना का सूत्र इस श्लोक में नहीं दिया गया।

47.16
एवं सूर्यफलं विप्र संक्षेपादुदितं मया |
विंशोत्तरीमतेनाथ ब्रुवे चन्द्रदशाफलम्
evaṃ sūryaphalaṃ vipra saṃkṣepāduditaṃ mayā |
viṃśottarīmatenātha bruve candradaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; सूर्यफलं = सूर्य (दशा) का फल; विप्र = हे ब्राह्मण/शिष्य; संक्षेपात् = संक्षेप से; उदितं = कहा/उद्घाटित; मया = मेरे द्वारा; विंशोत्तरीमतेन = विंशोत्तरी मत/पद्धति के अनुसार; अथ = अब; ब्रुवे = कहता हूँ; चन्द्रदशाफलम् = चन्द्र-दशा का फल।

हिन्दी भावार्थ पराशर शिष्य से कहते हैं—सूर्य-संबंधी फल मैंने संक्षेप में कह दिया। अब विंशोत्तरी-मत के अनुसार चन्द्र-दशा का फल बतलाता हूँ। यह श्लोक सूर्य-फल-खंड का उपसंहार और चन्द्र-दशा-फल-खंड का द्वार है।

English rendering “Thus, O sage’s pupil, I have briefly set forth the Sun’s results; now, by the vimśottarī method, I shall speak the fruits of the Moon’s daśā.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्लोक स्वयं फल-सूत्र नहीं देता, किन्तु विंशोत्तरी का नाम स्पष्ट है—यह १२०-वर्षीय महादशा-चक्र है, चन्द्र-नक्षत्र के शेष-अंश से आरंभ। विंशोत्तरी वर्ष-मान (वर्ष): केतु ७, शुक्र २०, सूर्य ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; योग = १२०। अन्तर-दशा: (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। चन्द्र-महादशा का कुल मान = १० वर्ष।

उदाहरण (worked example) माना जन्म-चन्द्र रेवती (२७वाँ नक्षत्र, केतु-स्वामी) में है और नक्षत्र-शेष-अंश से प्रथम महादशा केतु की शेष-अवधि निकलती है; तत्पश्चात् क्रम: शुक्र (२०) → सूर्य (६) → चन्द्र (१० वर्ष)। चन्द्र-महादशा में, उदाहरणार्थ, शुक्र-अन्तर: (१० × २०) ÷ १२० = २००/१२० = १ वर्ष ८ मास (१०/६ वर्ष)। कन्वेंशन: नक्षत्र-क्रम और १२०-वर्ष चक्र; अयनांश केवल जन्म-देशांतर/नक्षत्र-निर्धारण में लगता है, दशा-वर्ष-तालिका स्वयं पर नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र और चन्द्र = १० वर्ष का अनुपात-अंकगणित वेदिक-घड़ी/काल दशा-इंजन में यथा-श्लोक अनुपात से जोड़ा गया है: अन्तर = (महा × अन्तर)/१२०। यह श्लोक उसी “विंशोत्तरीमतेन” द्वार को खोलता है जिससे आगे का चन्द्र-दशा-फल-खंड (४७.१७ से) पढ़ा जाता है—गणित दशा-काल का, फल-वाक्य शास्त्र का।

47.17
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे चैव केन्द्रे लाभत्रिकोणगे |
शुभग्रहेण संयुक्ते पूर्णे चन्द्रेबलैर्युते
svocce svakṣetrage caiva kendre lābhatrikoṇage |
śubhagraheṇa saṃyukte pūrṇe candrebalairyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = स्वोच्च राशि में (चन्द्र का उच्च = वृषभ ३°); स्वक्षेत्र-गे = स्वराशि (कर्क) में; केन्द्रे = केन्द्र (1/4/7/10) में; लाभ-त्रिकोण-गे = लाभ (11) व त्रिकोण (1/5/9) में; शुभ-ग्रहेण संयुक्ते = शुभ ग्रह से युत; पूर्णे चन्द्रे = पूर्ण (शुक्लपक्षीय, तेजस्वी) चन्द्र होने पर; बलैः युते = बल (षड्बल) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शुभ चन्द्र-दशा की पूर्व-शर्तें रखता है (फल श्लोक 18 में आता है)। शास्त्र कहता है — जब चन्द्र स्वोच्च या स्वराशि में हो, केन्द्र/त्रिकोण/लाभ में स्थित हो, शुभ ग्रह से युत हो, पूर्ण-कला का तथा बलयुक्त हो — तब उसकी दशा शुभ होती है। यहाँ "पूर्ण" शब्द चन्द्र के पक्ष-बल की ओर संकेत करता है।

English rendering When the Moon is exalted or in its own sign, placed in a kendra, in the 11th or a trine, joined with a benefic, full-orbed and endowed with strength — (its daśā gives the fruits stated next).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह शर्त-श्लोक है; सूत्र नहीं, पर स्थान-गणित सुनिश्चित है: केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = {11}; चन्द्र-उच्च = वृषभ (Vṛṣabha) ३°, स्वक्षेत्र = कर्क। "पूर्णे … बलैः युते" = पक्ष-बल-प्रधान षड्बल की माँग।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलैः युते" यहाँ अस्पष्ट स्तुति नहीं — यह षड्बल है: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में जोड़ा जाता है, 1 रूप = 60 विरूप। "पूर्ण चन्द्र" का बल पक्ष-बल के रूप में मापनीय है (चन्द्र-सूर्य अन्तर बढ़ने पर बढ़ता, पूर्णिमा पर अधिकतम)। हमने इन्हें प्रत्येक घटक के नियत संख्या-नियम के रूप में रखा है और योग को प्रति-ग्रह देहली से तुलना करते हैं — गणना, व्याख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) पक्ष-बल (चन्द्र, शुभ) ≈ (चन्द्र−सूर्य अन्तर °) ÷ 3 विरूप। पूर्ण चन्द्र (अन्तर = 180°) → 180 ÷ 3 = 60 विरूप = 1 रूप (अधिकतम पक्ष-बल)। कृष्ण-पक्षीय क्षीण चन्द्र (अन्तर ≈ 0°) → ≈ 0 विरूप।

47.18
कर्मभाग्याधिपैर्युक्ते वाहनेशबलैर्युते |
आद्यन्तैश्वर्यसौभाग्यधनधान्यादिलाभकृत
karmabhāgyādhipairyukte vāhaneśabalairyute |
ādyantaiśvaryasaubhāgyadhanadhānyādilābhakṛta

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मभाग्याधिपैः = कर्म (१०) और भाग्य (९) भावों के अधिपतियों से; युक्ते = युक्त; वाहनेश = वाहन-भाव (सामान्यतः ४) का अधिपति; बलैर्युते = बल-युक्त; आद्यन्त = आदि और अंत; ऐश्वर्य = वैभव; सौभाग्य = सौभाग्य; धनधान्यादि = धन-धान्य आदि; लाभकृत = लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब (वह चन्द्र) कर्मेश और भाग्येश से युक्त हो तथा वाहनेश भी बलवान् हो, तो चन्द्र-दशा आदि से अंत तक ऐश्वर्य, सौभाग्य, धन-धान्य आदि का लाभ कराने वाली कही गई है। यह ४७.१७ की स्थिति-शर्तों पर जुड़ी हुई फल-कड़ी है।

English rendering Joined with the lords of the tenth and ninth, and with the vehicle-lord strong, the Moon (in that daśā) is said to confer, from beginning to end, sovereignty of fortune, prosperity, and gains of wealth, grain, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-शर्त + फल-कथन। भाव-स्वामित्व (D1): कर्मेश = १०वें भाव की राशि का स्वामी; भाग्येश = ९वें का स्वामी; वाहनेश ≈ ४थे भाव-स्वामी (पाठ-परंपरा में “वाहन” प्रायः चतुर्थ)। “बल” यहाँ संख्या-रहित; षड्बल-तुलना अलग अध्याय (२७) की विधि है, इस श्लोक में रूप/विरूप नहीं दिए।

47.19
गृहे तु शुभकार्याणि वाहनं राजदर्शनम् |
यत्नकार्यार्थसिद्धिः स्याद् गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत्
gṛhe tu śubhakāryāṇi vāhanaṃ rājadarśanam |
yatnakāryārthasiddhiḥ syād gṛhe lakṣmīkaṭākṣakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे शुभ-कार्याणि = घर में मंगल-कार्य; वाहनम् = वाहन-प्राप्ति; राज-दर्शनम् = राजा/उच्चाधिकारी से भेंट; यत्न-कार्य-अर्थ-सिद्धिः = प्रयत्न से किए कार्यों व उनके प्रयोजनों की सिद्धि; लक्ष्मी-कटाक्ष-कृत् = लक्ष्मी का कृपा-कटाक्ष कराने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ऐसी शुभ चन्द्र-दशा में घर में मांगलिक कार्य, वाहन-सुख, राज-दर्शन तथा प्रयत्नपूर्वक किए कार्यों में सफलता मिलती है, और घर पर लक्ष्मी की कृपादृष्टि रहती है। यह पूर्णतः शुभ-फल का कथन है।

English rendering Auspicious ceremonies at home, a vehicle, audience with authority, success in one's undertaken aims, and the gracious glance of Lakṣmī upon the household.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल)। यह शुद्ध परिणाम-वर्णन है; इसे शास्त्र का "इस स्थिति में यह फल कहा जाता है" वाला कथन मानें, नियति नहीं।

47.20
मित्रप्रभुवशाद्भाग्यं राज्यलाभं महत्सुखम् |
अश्वान्दोल्यादिलाभं च श्वेतवस्त्रादिकं लभेत्
mitraprabhuvaśādbhāgyaṃ rājyalābhaṃ mahatsukham |
aśvāndolyādilābhaṃ ca śvetavastrādikaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्र-प्रभु-वशात् = मित्रों व स्वामियों की कृपा से; भाग्यम् = भाग्योदय; राज्य-लाभम् = पद/राज्य-लाभ; महत्-सुखम् = महान् सुख; अश्व-अन्दोलि-आदि-लाभम् = घोड़े, पालकी (आन्दोलिका) आदि की प्राप्ति; श्वेत-वस्त्र-आदिकम् लभेत् = श्वेत वस्त्रादि पाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मित्रों और स्वामियों की कृपा से भाग्योदय, राज्य/पद-लाभ, महान् सुख, अश्व-पालकी आदि सवारियाँ तथा श्वेत वस्त्रादि की प्राप्ति होती है। श्वेत रंग चन्द्र का नैसर्गिक वर्ण है — फल-वर्णन कारक के स्वभाव के अनुरूप है।

English rendering Through the favour of friends and patrons: fortune, gain of position, great comfort, horses and palanquins and the like, and the acquisition of white garments and such.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यान देने योग्य: "श्वेत-वस्त्र" चन्द्र के नैसर्गिक श्वेत-वर्ण-कारकत्व से मेल खाता है — फल कारक-स्वभाव पर आरोपित है, स्वेच्छ नहीं।

47.21
पुत्रलाभादिसन्तोषं गृहगोधनसंकुलम् |
धनस्थानगते चन्द्रे तुङ्गे स्वक्षेत्रगेऽपि वा
putralābhādisantoṣaṃ gṛhagodhanasaṃkulam |
dhanasthānagate candre tuṅge svakṣetrage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रलाभादि = पुत्र-लाभ आदि; सन्तोषं = संतोष; गृहगोधनसंकुलम् = गृह गौ-धन से भरा; धनस्थानगते = धन-स्थान (द्वितीय भाव) में स्थित; चन्द्रे = चन्द्र; तुङ्गे = उच्च में; स्वक्षेत्रगे = स्व-क्षेत्र में; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पुत्र-लाभ आदि से संतोष और गृह को गो-धन से संकुल बताता है। विशेष रूप से जब चन्द्र धन-स्थान (द्वितीय) में हो, अथवा उच्च में, अथवा स्व-राशि में—ये स्थितियाँ पूर्वोक्त शुभ-फल-श्रृंखला को दृढ़ करती हैं। “अपि वा” से विकल्प-शर्तें जुड़ती हैं; पाठ-भेद अन्य संस्करणों में संभव।

English rendering Contentment from gain of children and the like, and a household thronged with kine and wealth, are stated—especially when the Moon occupies the second house, or is exalted, or stands in its own sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-विकल्प। धनस्थान = लग्न से भाव २; तुंग = वृष; स्वक्षेत्र = कर्क। चन्द्र-महादशा = विंशोत्तरी में १० वर्ष (४७.१६ का मत)। भाव-गणना में घर-पद्धति घोषित करें (पूर्ण-राशि/श्रीपति आदि)—यह श्लोक केवल “धनस्थानगत” कहता है, खंड-विधि नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह; चन्द्र कन्या ८° ⇒ धन-स्थान (२) में चन्द्र। शर्त “धनस्थानगते चन्द्रे” पूरी। विकल्प: चन्द्र वृष ३° (तुंग) या कर्क (स्वक्षेत्र) भी ४७.२१ की “तुङ्गे स्वक्षेत्रगेऽपि वा” शाखा से जुड़े। दशा: विंशोत्तरी चन्द्र-महादशा १० वर्ष; फल-वाक्य शास्त्र का कथन, काल-माप इंजन का अनुपात-अंकगणित।

47.22
अनेकधनलाभं च भाग्यवृद्धिर्महत्सुखम् |
निक्षेपराजसन्मानं विद्यालाभं च विन्दति
anekadhanalābhaṃ ca bhāgyavṛddhirmahatsukham |
nikṣeparājasanmānaṃ vidyālābhaṃ ca vindati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेकधनलाभ = अनेक प्रकार का धन-प्राप्ति; भाग्यवृद्धि = भाग्य/सौभाग्य की वृद्धि; महत्सुख = महान सुख; निक्षेप = निक्षेप्त धन, सुरक्षित निधि; राजसन्मान = राजा/शासन-पक्ष से सम्मान; विद्यालाभ = विद्या/ज्ञान की प्राप्ति; विन्दति = प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (चन्द्र-दशा के अनुकूल फल-क्रम में) जातक अनेक प्रकार के धन का लाभ पाता है, भाग्य में वृद्धि होती है, और महान् सुख मिलता है। निक्षेप-धन तथा राजकीय सम्मान का भी उल्लेख है। साथ ही विद्या का लाभ भी इस फल-कथन में गिनाया गया है।

English rendering The text states that one obtains manifold gains of wealth, increase of fortune, and great happiness; also honor from the king/authority regarding deposits or trusted wealth, and gain of learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-दशा का शुभ फल-वर्णन)। यह विंशोत्तरी-चक्र की अवधि-गणना नहीं, अपितु दशा-अवस्था में फल-सूची है; इसे नियति या निश्चित भविष्य के रूप में नहीं पढ़ा जाता।

47.23
नीचे वा क्षीणचन्द्रे वा धनहानिर्भविष्यति |
दुश्चिक्ये बलसंयुक्ते क्वचित्सौख्यं क्वचिद्धनम्
nīce vā kṣīṇacandre vā dhanahānirbhaviṣyati |
duścikye balasaṃyukte kvacitsaukhyaṃ kvaciddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = नीच राशि (चन्द्र का नीच = वृश्चिक) में; क्षीण-चन्द्रे = क्षीण (कृष्णपक्षीय, बलहीन) चन्द्र होने पर; धन-हानिः भविष्यति = धन-हानि होती है; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव (दुश्चिक्य/सहज) में; बल-संयुक्ते = बल से युक्त होने पर; क्वचित् सौख्यम् क्वचित् धनम् = कहीं सुख, कहीं धन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र यदि नीच (वृश्चिक) का हो या क्षीण हो, तो धन-हानि होती है। परन्तु यदि वही चन्द्र तृतीय (दुश्चिक्य) भाव में बलयुक्त हो, तो कभी सुख और कभी धन-लाभ मिलता है — अर्थात् बल दुःस्थिति की कठोरता को कुछ संतुलित कर देता है।

English rendering In debilitation or when waning, loss of wealth will occur; but placed in the 3rd house with strength, there is sometimes comfort, sometimes wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन, स्थान/बल-सापेक्ष। तकनीकी पहचान: चन्द्र-नीच = वृश्चिक ३°; दुश्चिक्य = तृतीय भाव; "क्षीण चन्द्र" = न्यूनतम पक्ष-बल (चन्द्र-सूर्य अन्तर ≈ 0° → पक्ष-बल ≈ 0)। यही "पूर्ण" (v17) का विलोम है — बल एक मापनीय राशि, शुभ/अशुभ की धुरी।

47.24
दुर्बले पापसंयुक्ते देहजाड्यं मनोरुजम् |
भृत्यपीडा वित्तहानिर्मातृवर्गजनाद्वधः
durbale pāpasaṃyukte dehajāḍyaṃ manorujam |
bhṛtyapīḍā vittahānirmātṛvargajanādvadhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुर्बले = दुर्बल (चन्द्र); पापसंयुक्ते = पाप-ग्रह से युक्त; देहजाड्य = देह में जाड्य/सुस्ती; मनोरुजम् = मन की पीड़ा/रोग; भृत्यपीडा = सेवक/अनुचर-संबंधी क्लेश; वित्तहानि = धन-हानि; मातृवर्गजनात् = माता-वर्ग के लोगों से; वधः = वध/हिंसा (शास्त्र-कथन का कठोर फल-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दुर्बल तथा पाप-युक्त चन्द्र की स्थिति में देह-जाड्य और मनोरुज का फल कहा गया है। भृत्य-संबंधी पीड़ा और वित्त-हानि भी इसी फल-सूची में आते हैं। “मातृवर्ग-जन से वध” का पद अत्यंत कठोर फल-भाषा है—इसे शास्त्र का पारंपरिक फल-कथन समझें, न कि नियति या डरावना निर्णय।

English rendering The text states that when the Moon is weak and conjoined with malefics there is bodily torpor and mental affliction, trouble from servants, loss of wealth, and (in traditional phala-language) harm associated with the mother’s circle—reported as the śāstra’s claim, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुर्बल + पाप-योग)। “बल” यहाँ षड्बल-सारणी का संख्यात्मक योग नहीं खोलता; केवल दुर्बल/पाप-युक्त अवस्था का गुणात्मक संकेत है।

47.25
षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे दुर्बले पापसंयुते |
राजद्वेषो मनोदुःखं धनधान्यादिनाशनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye candre durbale pāpasaṃyute |
rājadveṣo manoduḥkhaṃ dhanadhānyādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ = षष्ठ भाव; अष्टम = अष्टम भाव; व्यय = व्यय/द्वादश भाव; चन्द्रे = चन्द्र में/चन्द्र के; दुर्बले = दुर्बल; पापसंयुते = पाप-युक्त; राजद्वेष = राजा/शासन से द्वेष; मनोदुःख = मानसिक दुःख; धनधान्यादि = धन-धान्य आदि; नाशनम् = नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) भाव में दुर्बल और पाप-युक्त हो तो राज-द्वेष, मनोदुःख, तथा धन-धान्यादि के नाश का फल कहा गया है। यह दुःस्थ भाव + दुर्बलता + पाप-संयोग का संयुक्त फल-वर्णन है। इसे निश्चित राजकीय आपदा के रूप में नहीं, शास्त्र-परंपरा के फल-पद के रूप में पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when the Moon occupies the sixth, eighth, or twelfth house, weak and joined with malefics, there is royal enmity, mental sorrow, and destruction of wealth, grain, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (६/८/१२ + दुर्बल + पाप)। भाव-निर्धारण गृह-पद्धति (पूर्ण-राशि/श्रीपति आदि) पर निर्भर हो सकता है—सम्मेलन घोषित किए बिना अंकीय दावा न करें।

47.26
मातृक्लेषं मनस्तापं देहजाड्यं मनोरुजम् |
दुःस्थे चन्द्रे बलैर्युक्ते क्वचिल्लाभं क्वचित्सुखम् |
देहजाड्यं क्वचिच्चैव शान्त्या तत्र शुभं दिशेत्
mātṛkleṣaṃ manastāpaṃ dehajāḍyaṃ manorujam |
duḥsthe candre balairyukte kvacillābhaṃ kvacitsukham |
dehajāḍyaṃ kvaciccaiva śāntyā tatra śubhaṃ diśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातृ-क्लेशम् = माता को कष्ट (पाठ-भेद संभव: "मातृक्लेषं" → मातृक्लेशम्); मनस्-तापम् = मन का सन्ताप; देह-जाड्यम् = शरीर की जड़ता; मनो-रुजम् = मन का रोग; दुःस्थे चन्द्रे = दुःस्थान-स्थित चन्द्र; बलैः युक्ते = किन्तु बलयुक्त होने पर; क्वचित् लाभम् क्वचित् सुखम् = कहीं लाभ, कहीं सुख; शान्त्या तत्र शुभम् दिशेत् = शान्ति (उपाय) से वहाँ शुभ कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दुःस्थानगत चन्द्र की दशा में मातृ-क्लेश, मन-सन्ताप एवं देह-शैथिल्य होता है; परन्तु यदि वही चन्द्र बलयुक्त हो तो कभी लाभ, कभी सुख भी मिलता है। श्लोक अन्त में यह भी कहता है कि शान्ति-कर्म से वहाँ शुभ का संकेत करना चाहिए — यह शास्त्र का अपना कथन है, भय या दबाव नहीं।

English rendering Affliction to the mother, mental anguish, and bodily dullness; yet with the Moon strong though ill-placed, sometimes gain and sometimes comfort — and there, through pacificatory rites, one may indicate an auspicious turn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं उपशम-निर्देश। दो प्रकाश-बिन्दु: (1) दुःस्थान का अनिष्ट भी "बलैः युक्ते" होने पर घटता है — बल फल का मॉड्युलेटर है; (2) "शान्त्या … शुभम् दिशेत्" शास्त्र का सशर्त शमन-कथन है — इसे दबाव-मूलक उपाय या निश्चित भविष्यवाणी न बनाएँ; चन्द्र के मातृ-कारकत्व के कारण फल मातृ-पक्ष की ओर झुकता है।

47.27
स्वभोच्चादिगतस्यैवं नीचशत्रुभगस्य च |
ब्रवीमि भूमिपुर्तस्य शुभाऽशुभदशाफलम्
svabhoccādigatasyaivaṃ nīcaśatrubhagasya ca |
bravīmi bhūmipurtasya śubhā'śubhadaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वभ = स्व-ऋक्ष (अपनी राशि); उच्च = उच्च-राशि; आदि = इत्यादि (मूलत्रिकोण, स्वनवांश); गतस्य = स्थित का; एवम् = इस प्रकार; नीच = नीच-राशि; शत्रु-भ = शत्रु-राशि; गस्य = में गए हुए का; भूमिपुत्रस्य = भूमि-पुत्र अर्थात् मङ्गल (भौम/कुज) का; शुभाऽशुभ-दशाफलम् = शुभ तथा अशुभ दशा-फल।

हिन्दी भावार्थ हे मुने, अब मैं भूमिपुत्र मङ्गल की दशा का फल कहता हूँ — जब वह अपनी राशि, उच्च, मूलत्रिकोण आदि बलवान् स्थानों में हो, और जब वह नीच अथवा शत्रु-राशि में हो — दोनों अवस्थाओं का शुभ और अशुभ फल क्रम से बतलाता हूँ। यह विंशोत्तरी दशा-क्रम में सूर्य और चन्द्र के पश्चात् तीसरे ग्रह मङ्गल का दशाध्याय है।

English rendering Now I declare the auspicious and inauspicious daśā-results of Bhūmiputra (Mars) — according as he occupies his own sign, exaltation, mūlatrikoṇa and the like, or falls into debilitation and enemy signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना/खण्ड-आरम्भ। किन्तु दशा-कालमान निश्चित है: विंशोत्तरी १२० वर्ष चक्र में मङ्गल की महादशा = 7 वर्ष। महादशा-स्वामी की शुभाशुभता उसके स्थान-बल पर निर्भर, जिसे यह श्लोक दो ध्रुवों में बाँटता है — उच्च/स्व/मूलत्रिकोण (उच्च बल) बनाम नीच/शत्रु (न्यून बल)।

उदाहरण (worked example) मङ्गल की महादशा में अन्तर्दशा-मान = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। यथा मङ्गल-महादशा में मङ्गल-स्वभुक्ति = (7 × 7) ÷ 120 = 49/120 वर्ष ≈ 4.9 मास।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोषियर §3 के अनुसार टीम के दशा-इंजन में मङ्गल = 7 वर्ष, तथा केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, राहु 18, बृहस्पति 16, शनि 19, बुध 17 — Σ = 120 वर्ष, ठीक-ठीक (exact-`==`) योग। यह अध्याय (BPHS 46–47) उसी नक्षत्र-अंश-भिन्न पर आधारित शुद्ध अनुपात-गणित है।

47.28
परमोच्चगते भौमे स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे |
स्वर्क्षे केन्द्रत्रिकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा
paramoccagate bhaume svocce mūlatrikoṇage |
svarkṣe kendratrikoṇe vā lābhe vā dhanage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमोच्च-गते = परम-उच्चांश (गहनतम उच्च-बिन्दु) पर स्थित; भौमे = मङ्गल के; स्वोच्चे = अपनी उच्च-राशि (मकर) में; मूलत्रिकोण-गे = मूलत्रिकोण (मेष 0°–12°) में; स्वर्क्षे = अपनी राशि (मेष/वृश्चिक) में; केन्द्र-त्रिकोणे = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में; लाभे = ग्यारहवें भाव में; धनगे = द्वितीय (धन) भाव में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ जब मङ्गल परम-उच्च बिन्दु पर हो, अथवा अपनी उच्च राशि, मूलत्रिकोण, स्वराशि में स्थित हो, या केन्द्र-त्रिकोण, लाभ (11वें) अथवा धन (2रे) भाव में बैठा हो — तब उसकी दशा के शुभ फल का वर्णन आगे किया जाता है। यह श्लोक केवल स्थान-निर्धारण की शर्तें गिनाता है; फल अगले श्लोकों में आता है।

English rendering When Mars stands at his deep exaltation-point, or in his exaltation sign, mūlatrikoṇa, or own sign, or in a kendra, trikoṇa, the 11th, or the 2nd house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-बल की शुद्ध राशि-अंकगणित (शास्त्र-सम्मत उच्चादि योजना, BPHS अ.3):
- मङ्गल उच्च-राशि = मकर; परमोच्च = मकर 28°
- मूलत्रिकोण = मेष 0°–12°; शेष मेष = स्वक्षेत्र; वृश्चिक = स्वक्षेत्र
- केन्द्र = भाव {1,4,7,10}; त्रिकोण = {1,5,9}; लाभ = 11; धन = 2

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-कुण्डली में मङ्गल मकर 27°45′ पर है। यह परमोच्च (28°) से मात्र 15′ दूर → लगभग-पूर्ण उच्च-बल। यदि यह मकर लग्न से चतुर्थ भाव (केन्द्र) में पड़े, तो दोनों शर्तें (स्वोच्च + केन्द्र) एक साथ पूर्ण।

47.29
सम्पूर्णबलसंयुक्ते शुभदृष्टे शुभांशके |
राज्यलाभं भूमिलाभं धनधान्यादिलाभकृत्
sampūrṇabalasaṃyukte śubhadṛṣṭe śubhāṃśake |
rājyalābhaṃ bhūmilābhaṃ dhanadhānyādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्पूर्ण-बल-संयुक्ते = पूर्ण (षड्)बल से युक्त होने पर; शुभ-दृष्टे = शुभ ग्रहों से दृष्ट; शुभांशके = शुभ नवांश/वर्ग में; राज्यलाभं = राज्य/अधिकार की प्राप्ति; भूमिलाभं = भूमि-लाभ; धनधान्यादि-लाभकृत् = धन-धान्य आदि का लाभकारक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मङ्गल पूर्ण बल से युक्त हो, शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, और शुभ अंश (वर्ग) में स्थित हो, तब उसकी दशा राज्य-लाभ, भूमि-लाभ तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति कराने वाली कही गई है। यह फल-कथन ग्रह-बल की शर्त पर टिका है, कोई अनिवार्य नियति नहीं।

English rendering Endowed with full strength, aspected by benefics, and placed in an auspicious aṃśa, the text states his daśā yields gain of authority, land, and wealth-and-grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। किन्तु दो तकनीकी वस्तुएँ अन्तर्निहित हैं जो गणनीय हैं: सम्पूर्ण-बल = षड्बल (स्थान+दिक्+काल+चेष्टा+नैसर्गिक+दृग्, रूप/विरूप में; 1 रूप = 60 विरूप) की प्रति-ग्रह देहली से तुलना; शुभांश = नवांश (D9) आदि वर्ग-विभाजन।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोषियर §4 के अनुसार "सम्पूर्ण-बल" व्याख्यात्मक शब्द नहीं, अपितु टीम के लिए गणनीय राशि है — छह घटक रूप/विरूप में योग होकर प्रति-ग्रह threshold से तुलित; यह गणना है, कल्पना नहीं। "शुभांश" उसी षोडश-वर्ग योजना (§2, D1…D60) का नवांश-टुकड़ा है — देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित।

47.30
आधिक्यं राजसम्मानं वाहनाम्बरभूषणम् |
विदेशे स्थानलाभं च सोदराणां सुखं लभेत्
ādhikyaṃ rājasammānaṃ vāhanāmbarabhūṣaṇam |
videśe sthānalābhaṃ ca sodarāṇāṃ sukhaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आधिक्यम् = उत्कर्ष/प्रभुत्व; राज-सम्मानम् = राजकीय सम्मान; वाहन-अम्बर-भूषणम् = वाहन, वस्त्र, आभूषण; विदेशे = परदेश में; स्थान-लाभम् = पद/आश्रय की प्राप्ति; सोदराणाम् = सहोदरों का; सुखम् = सुख; लभेत् = प्राप्त करे (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ उसी अनुकूल बल-दृष्टि-अंश की पृष्ठभूमि में शास्त्र आगे कहता है कि आधिक्य, राजसम्मान, वाहन-वस्त्र-भूषण, विदेश में स्थान-लाभ तथा सोदरों का सुख प्राप्त होता है। यह श्लोक पूर्ववर्ती लाभ-सूची को सम्मान, उपभोग-सामग्री, परदेश-स्थिति और पारिवारिक सुख तक विस्तृत करता है। फल को दशा-परिणाम के रूप में समझें, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering The text adds that one obtains pre-eminence, royal honour, vehicles, garments and ornaments, a footing abroad, and the happiness of siblings. It extends the prior list of gains into status, consumables, foreign placement, and fraternal ease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक मंगल-दशा के अनुकूल फलों की विस्तार-सूची है; कोई अंश-भाग, दशा-वर्ष या बल-एकक यहाँ कूटबद्ध नहीं।

47.31
केन्द्रे गते सदा भौमे दुश्चिक्ये बलसंयुते |
पराक्रमाद्वित्तलाभो युद्धे शत्रुजयो भवेत्
kendre gate sadā bhaume duścikye balasaṃyute |
parākramādvittalābho yuddhe śatrujayo bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रे = 1/4/7/10 भाव में; गते = स्थित; सदा = सदैव/दृढ़ रूप से; भौमे = मंगल में; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; बल-संयुते = बल से युक्त; पराक्रमात् = पराक्रम से; वित्त-लाभः = धन-लाभ; युद्धे = संग्राम में; शत्रु-जयः = शत्रु-पराजय; भवेत् = हो (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भौम केन्द्रस्थ हो और दुश्चिक्य (तृतीय भाव) में बलयुक्त हो, तब पराक्रम से वित्त-लाभ तथा युद्ध में शत्रु-जय होता है। केन्द्र-स्थिति को स्थायित्व-क्षेत्र और तृतीय भाव को पराक्रम-वीर्य का क्षेत्र मानकर फल जोड़ा गया है। यह वीर्य-बल की अनुकूल दशा-परिस्थिति का कथन है।

English rendering The text states that when Mars occupies a kendra and is strong in the third house (duścikya), wealth accrues through valour and victory over foes in conflict. Kendra placement and third-house strength are the two technical conditions named.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थिति + बल-शर्त)। केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10; दुश्चिक्य = भाव 3। बल-मापन षड्बल/अवस्था-नियमों पर निर्भर है; इस पद्य में संख्यात्मक बलांक नहीं दिया।

उदाहरण (worked example) जन्म-लग्न मेष मानें (समान-भाव, पूर्ण-राशि भाव-पद्धति — convention declare)। यदि मंगल कन्या (भाव 6) न होकर मकर (भाव 10 = केन्द्र) में हो, और साथ ही कुण्डली में तृतीय भाव (मिथुन) से सम्बन्धित बल-संयोग (उदा. स्वक्षेत्र/उच्च/शुभ-दृष्टि आदि शास्त्रीय बल-चिह्न) हो, तो यह श्लोक “केन्द्र + दुश्चिक्य-बल” वाली शर्त की दिशा में पढ़ा जाता है। फल स्वयं शास्त्र का कथन है; उदाहरण केवल स्थिति-जाँच दिखाता है।

47.32
कलत्रपुत्रविभवं राजसम्मानमेव च |
दशादौ सुखमाप्नोति दशान्ते कष्टमादिशेत्
kalatraputravibhavaṃ rājasammānameva ca |
daśādau sukhamāpnoti daśānte kaṣṭamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्र = पत्नी/जीवनसाथी; पुत्र = सन्तान; विभवं = ऐश्वर्य/वैभव; राजसम्मानम् = राजकीय सम्मान; एव च = और भी; दशादौ = दशा के आरम्भ में; सुखम् आप्नोति = सुख पाता है; दशान्ते = दशा के अन्त में; कष्टम् = कष्ट; आदिशेत् = बतलाना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस दशा में जातक पत्नी-पुत्र का वैभव और राजकीय सम्मान प्राप्त करता है; दशा के आरम्भ में सुख मिलता है, किन्तु दशा के अन्त में कष्ट कहना चाहिए। यह आदि-अन्त का भेद दशा की आन्तरिक कालरचना (अन्तर्दशा-क्रम) की ओर संकेत करता है।

English rendering The text states one obtains the splendour of wife and children and royal honour; happiness at the daśā's outset, but hardship should be declared at its close.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ काल-विभाजन गणनीय है। दशा के "आदि" और "अन्त" के फल अन्तर्दशा-क्रम से नियत होते हैं:
अन्तर्दशा-मान = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120
मङ्गल-महादशा में अन्तर्दशा-क्रम: मङ्गल → राहु → गुरु → शनि → बुध → केतु → शुक्र → सूर्य → चन्द्र। "दशादि" = प्रथम (मङ्गल) अन्तर, "दशान्त" = अन्तिम (चन्द्र) अन्तर। (इसी अध्याय के श्लोक 3–4 का द्रेष्काण-आधारित आदि/मध्य/अन्त नियम भी इसी काल-विभाजन को पुष्ट करता है।)

उदाहरण (worked example) मङ्गल-महादशा = 7 वर्ष = 84 मास।
- दशादि (मङ्गल-मङ्गल) = (7 × 7)/120 = 49/120 वर्ष ≈ 4.9 मास → आरम्भिक सुख-काल।
- दशान्त (मङ्गल-चन्द्र) = (7 × 10)/120 = 70/120 वर्ष ≈ 7.0 मास → अन्तिम अवधि, जहाँ श्लोक "कष्ट" कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोषियर §3 के अनुसार यह "आदि/अन्त" कोई अस्पष्ट भावुकता नहीं — यह टीम के दशा-इंजन का शुद्ध अनुपात-अंकगणित है: अन्तर्दशा = (MD × AD)/120, नक्षत्र-अंश-भिन्न पर नियत। श्लोक का फल-वचन उसी काल-खण्ड-विभाजन के ऊपर बैठता है, जिसे इंजन ठीक-ठीक (exact) निकालता है।

47.33
नीचादिदुष्टभावस्थे भौमे बलविवर्जिते |
पापयुक्ते पापदृष्टे सा दशा नेष्टदायिका
nīcādiduṣṭabhāvasthe bhaume balavivarjite |
pāpayukte pāpadṛṣṭe sā daśā neṣṭadāyikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीच-आदि-दुष्ट-भाव-स्थे = नीच आदि दुष्ट भावों में स्थित; भौमे = मंगल में; बल-विवर्जिते = बल-रहित; पाप-युक्ते = पाप-ग्रह से युक्त; पाप-दृष्टे = पाप-दृष्ट; सा दशा = वह दशा; न-इष्ट-दायिका = अभीष्ट फल न देने वाली।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत शास्त्र कहता है कि जब भौम नीचादि दुष्ट भाव में हो, बलहीन हो, पाप-युक्त और पाप-दृष्ट हो, तब वह दशा इष्ट-दायिनी नहीं होती। यहाँ नीच-स्थिति, दुष्ट-भाव, बल-हानि, पाप-योग और पाप-दृष्टि — पाँच दोष-शर्तें एक साथ फल को “नेष्ट” बनाती हैं। यह निषेध-फल है; भय-वाणी या उपचार-दबाव का आधार नहीं।

English rendering The text states that when Mars is in a degraded or adverse house, stripped of strength, joined and aspected by malefics, that daśā does not grant desired results. Multiple affliction-conditions together mark the period as unfavourable in the śāstra’s own terms—not as doom or a sales-pitch for remedies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दोष-शर्तों का समुच्चय)। “नीच” = स्व-उच्च से 180° पर स्थित राशि (मंगल का नीच = कर्क); दुष्ट-भाव = शास्त्रीय दृष्टि से 6/8/12 आदि; बल-विवर्जित = षड्बल/अवस्था में न्यूनता। संख्यात्मक देहली इस पद्य में नहीं दी।

47.34
एवं राहोश्च केतोश्च कथयामि गृहादिकम् |
तयोर्दशाफलज्ञप्त्यै तवाऽग्रे द्विजनन्दन
evaṃ rāhośca ketośca kathayāmi gṛhādikam |
tayordaśāphalajñaptyai tavā'gre dvijanandana

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; राहोः = राहु का; केतोः = केतु का; कथयामि = कहता हूँ; गृहादिकम् = राशि (स्वामित्व) आदि; तयोः = उन दोनों का; दशाफल-ज्ञप्त्यै = दशा-फल के ज्ञान के लिए; तव अग्रे = तुम्हारे समक्ष; द्विजनन्दन = हे द्विज-नन्दन (शिष्य-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज-श्रेष्ठ, अब मैं राहु और केतु की राशि (स्वामित्व) आदि तुम्हारे समक्ष कहता हूँ, जिससे उन दोनों छाया-ग्रहों की दशा का फल भली-भाँति जाना जा सके। यह श्लोक मङ्गल-दशा के पश्चात् राहु-केतु दशा-खण्ड की प्रस्तावना है।

English rendering Thus, O delight of the twice-born, I now relate the signs and the like of Rāhu and Ketu, that their daśā-results may be understood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना/संवाद। दशा-कालमान: विंशोत्तरी में राहु = 18 वर्ष, केतु = 7 वर्ष। राहु-केतु छाया-ग्रह (चन्द्र-कक्षा के पात-बिन्दु) हैं — इनका कोई भौतिक बिम्ब नहीं, अतः इनकी उच्च/स्वराशि योजना (अगले श्लोकों में) परम्परा-निर्धारित (convention) है, नैसर्गिक नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोषियर §3 के अनुसार टीम के दशा-इंजन में राहु 18 व केतु 7 वर्ष — यही दो अंक 120-वर्ष योग (Σ = 120) का अंश हैं, जिन्हें इंजन ठीक-ठीक जोड़ता है; इस युग्म से पूर्व केतु (7) और राहु (18) मिलकर 25 वर्ष चक्र का अंश देते हैं।

47.35
राहोस्तु वृषभं केतोर्वृश्चिकं तुङ्गसंज्ञकम् |
मूलत्रिकोणकं ज्ञेयं युग्मं चापं क्रमेण च
rāhostu vṛṣabhaṃ ketorvṛścikaṃ tuṅgasaṃjñakam |
mūlatrikoṇakaṃ jñeyaṃ yugmaṃ cāpaṃ krameṇa ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः तु = राहु का तो; वृषभं = वृषभ राशि; केतोः = केतु का; वृश्चिकं = वृश्चिक राशि; तुङ्ग-संज्ञकम् = उच्च (तुङ्ग) नामक; मूलत्रिकोणकं = मूलत्रिकोण; ज्ञेयं = जानना चाहिए; युग्मं = मिथुन ("युग्म/जोड़ा" = मिथुन); चापं = धनु ("चाप/धनुष" = धनु); क्रमेण = क्रमशः; च = और।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु की उच्च राशि वृषभ और केतु की वृश्चिक है; तथा राहु का मूलत्रिकोण मिथुन एवं केतु का धनु — क्रमशः जानना चाहिए। यहाँ "युग्म" (जोड़ा) से मिथुन और "चाप" (धनुष) से धनु का बोध रूपक-संज्ञा द्वारा कराया गया है। पाठ-भेद संभव — कुछ परम्पराएँ नोड-राशियों में भिन्नता रखती हैं।

English rendering For Rāhu, Taurus; for Ketu, Scorpio — called the exaltation. Their mūlatrikoṇa should be known, respectively, as Gemini (the "pair") and Sagittarius (the "bow").

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-नाम रूपक-संज्ञा (भूतसंख्या-सदृश) से डिकोड:
- युग्म ("जोड़ा/मिथुन-युगल") = मिथुन (राशि 3); चाप ("धनुष") = धनु (राशि 9)।
- राहु: उच्च = वृषभ (राशि 2, देशान्तर 30°–60°); मूलत्रिकोण = मिथुन (60°–90°)।
- केतु: उच्च = वृश्चिक (राशि 8, 210°–240°); मूलत्रिकोण = धनु (240°–270°)।

उदाहरण (worked example) यदि राहु देशान्तर 50° पर हो → 50° ∈ [30°,60°) = वृषभ → राहु स्वोच्च। समान कुण्डली में केतु सदा 180° सम्मुख = 230° ∈ [210°,240°) = वृश्चिक → केतु भी स्वोच्च (नोड सर्वदा परस्पर 180° पर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोषियर §5 (कार्य-पद्धति) के अनुरूप — नोड-उच्च की योजना विवादित है (कुछ राहु-उच्च मिथुन/द्वादश मानते हैं); अतः इसे मौन-चयन नहीं, अपितु घोषित परम्परा (declared convention) के रूप में रखा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे अष्टकवर्ग में BPHS बनाम फलदीपिका के "9" के स्थानान्तरण को खुले `[HUMAN]` convention के रूप में साथ-साथ दर्शाया गया।

47.36
कुम्भाली च गृहौ प्रोक्तौ कन्यामीनौ च केनचित् |
तद्दाये बहुसौख्यं च धनधान्यादिसम्पदाम्
kumbhālī ca gṛhau proktau kanyāmīnau ca kenacit |
taddāye bahusaukhyaṃ ca dhanadhānyādisampadām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुम्भ = कुम्भ राशि; अली = वृश्चिक ("अलि" = बिच्छू → वृश्चिक); गृहौ = दो घर/स्वराशियाँ (द्विवचन); प्रोक्तौ = कहे गए; कन्या = कन्या राशि; मीनौ = मीन (कन्यामीनौ = कन्या और मीन, द्विवचन); केनचित् = किसी-किसी (आचार्य) के मत से; तद्दाये = उनकी दशा में; बहुसौख्यं = बहुत सुख; धनधान्यादि-सम्पदाम् = धन-धान्य आदि सम्पदाओं का।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु और केतु के दो घर (स्वराशियाँ) क्रमशः कुम्भ और वृश्चिक कहे गए हैं; किन्तु किसी-किसी आचार्य के मत से कन्या और मीन। उनकी दशा में बहुत सुख तथा धन-धान्य आदि सम्पदाओं का लाभ बताया गया है। यहाँ "केनचित्" शब्द स्वयं शास्त्र द्वारा स्वीकृत पाठ-भेद है।

English rendering Aquarius and Scorpio are declared their (own) signs; by some, Virgo and Pisces. In their daśā, the text states much happiness and abundance of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्वराशि-निर्धारण, दो घोषित परम्पराएँ साथ-साथ:
- मुख्य पाठ: राहु-स्वराशि = कुम्भ (शनि-सहभागी); केतु-स्वराशि = वृश्चिक (मङ्गल-सहभागी)।
- "केनचित्" (मतान्तर): राहु = कन्या (बुध-सहभागी); केतु = मीन (गुरु-सहभागी)।
पाठ-भेद संभव — किसी एक को "सही" घोषित करने के बजाय दोनों अभिलिखित।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोषियर §5 की मूल पद्धति यहाँ श्लोक के भीतर ही मूर्त है: शास्त्र स्वयं मौन-चयन नहीं करता, "केनचित्" कहकर मतान्तर को स्पष्ट अंकित करता है — यही अनुशासन टीम अष्टकवर्ग की BPHS-बनाम-फलदीपिका भिन्नता में अपनाती है (कुल योग समान, प्रति-राशि भिन्न — चुनी हुई convention घोषित, tolerance-band से छिपाई नहीं)।

47.37
मित्र्प्रभुवशादिष्टं वाहनं पुत्रसम्भवः |
नवीनगृहनिर्माणं धर्मचिन्ता महोत्सवः
mitrprabhuvaśādiṣṭaṃ vāhanaṃ putrasambhavaḥ |
navīnagṛhanirmāṇaṃ dharmacintā mahotsavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्र-प्रभु-वशात् = मित्र/स्वामी (मित्र ग्रह या शुभ अधिपति) के वश/प्रभाव से; इष्टम् = अभिष्ट, मनोवांछित; वाहनम् = सवारी/यान; पुत्र-सम्भवः = पुत्र-प्राप्ति का योग (शास्त्र-कथन); नवीन-गृह-निर्माणम् = नए गृह का निर्माण; धर्म-चिन्ता = धर्म/शुभ-कर्म की चिन्ता; महा-उत्सवः = बड़ा उत्सव।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की उसी अनुकूल राहु-दशा में शास्त्र और विस्तार देता है। मित्र या प्रभु के प्रभाव से इष्ट वाहन, पुत्र-संभव, नए घर का निर्माण, धर्म की ओर मन, तथा महोत्सव — ये सब शास्त्र इस दशा-फल में गिनाता है। ये फल “शुभ-संयोग” की धारा में पढ़े जाएँ; इन्हें नियति की गारंटी न समझा जाए।

English rendering Under the sway of a friendly or ruling influence, the text lists a desired vehicle, the prospect of a son, building a new house, concern for dharma, and a great festival as stated results of that daśā-phase.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-दशा का शुभ-पक्ष)। दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी अनुपात से आता है; इस श्लोक में कोई संख्यात्मक नियत नहीं।

47.38
विदेशराजसन्मानं वस्त्रालङ्कारभूषणम् |
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे योगकारकसंयुते
videśarājasanmānaṃ vastrālaṅkārabhūṣaṇam |
śubhayukte śubhairdṛṣṭe yogakārakasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेश-राज-सन्मानम् = परदेश/बाह्य-प्रभु से सम्मान; वस्त्र-अलङ्कार-भूषणम् = वस्त्र, आभूषण, भूषा; शुभ-युक्ते = शुभ ग्रह से युक्त होने पर; शुभैः दृष्टे = शुभों की दृष्टि पड़ने पर; योग-कारक-संयुते = योगकारक ग्रह से संयुत्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु जब शुभ से युक्त हो, शुभ दृष्टि पाए, अथवा योगकारक से जुड़ा हो, तब विदेश-राज-सन्मान तथा वस्त्र-अलंकार-आभूषण का फल वर्णित है। यहाँ फल स्पष्टतः शुभ-युति, शुभ-दृष्टि और योगकारक-संयोग — तीन शर्तों पर टिका है। बिना इन संयोगों के श्लोक का शुभ-फल स्वतः लागू नहीं माना जाता।

English rendering Honour from a foreign ruler and fine clothes, ornaments, and jewels are stated when Rāhu is joined with benefics, aspected by benefics, or combined with a yoga-kāraka planet.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शर्त-युक्त: शुभ-युति/दृष्टि/योगकारक)। दृष्टि-कोण और युति (एक राशि/समीप अंश) गणना-सापेक्ष हैं; इस श्लोक में अंश-सीमा नहीं दी गई — परंपरा-निर्भर; घोषित करें कि किस दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) का उपयोग हो रहा है।

47.39
केन्द्रत्रिकोओणलाभे वा दुश्चिक्ये शुभराशिगे |
महाराजप्रसादेन सर्वसम्पत्सुखावहम्
kendratrikooṇalābhe vā duścikye śubharāśige |
mahārājaprasādena sarvasampatsukhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र = १, ४, ७, १० भाव; त्रिकोण = १, ५, ९ (पाठ में “त्रिकोओण” — लेखन-भेद); लाभे = लाभ-भाव (११वें) में; वा = अथवा; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; शुभ-राशि-गे = शुभ राशि में स्थित; महाराज-प्रसादेन = महाराज/शासक-अनुग्रह से; सर्व-सम्पत्-सुख-आवहम् = समस्त सम्पत्ति और सुख लाने वाला।

हिन्दी भावार्थ राहु यदि केन्द्र, त्रिकोण, लाभ-भाव, अथवा दुश्चिक्य (तृतीय) में हो और शुभ राशि में स्थित हो, तो शास्त्र महाराज-प्रसाद से सर्व-सम्पत् और सुख का फल कहता है। भाव-स्थान और राशि-शुभता दोनों शर्तें एक साथ पढ़नी हैं। “सर्वसम्पत्” शास्त्र का अतिशयोक्ति-युक्त फल-शब्द है — गणना नहीं, कथन है।

English rendering When Rāhu occupies a kendra, a trikoṇa, the eleventh (lābha), or the third (duścikya), and stands in an auspicious sign, the text states that, through a great ruler’s favour, the period brings all-round prosperity and ease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थान + शुभ-राशि शर्त)। भाव-निर्धारण गृह-पद्धति (समान-भाव / पorphyry / श्रीपति आदि) और लग्न-रेखा पर निर्भर है — संख्या तब तक स्थिर नहीं जब तक पद्धति घोषित न हो। राशि = ⌊λ/३०°⌋ मॉड १२ (λ = राहु-देशान्तर, अपनायन-सहित या निरयन — घोषित करें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में राहु-महादशा १८ वर्ष (Σ १२०) है; फल-श्लोक अवधि नहीं देते, केवल स्थिति-शर्तें। हमारी दशा-इंजन नक्षत्र-अंश से महा/अन्तर काटती है; भाव-फल अलग परत है — गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

47.40
यवनप्रभुसन्मानं ग्र्हे कल्याणसम्भवम् |
रन्ध्रे वा व्ययगे राहौ तद्दाये कष्टमादिशेत्
yavanaprabhusanmānaṃ grhe kalyāṇasambhavam |
randhre vā vyayage rāhau taddāye kaṣṭamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यवन-प्रभु-सन्मानम् = विदेशी/यवन अधिपति से सम्मान; गृहे (पाठ "ग्र्हे") = घर में; कल्याण-सम्भवम् = मंगल का उदय; रन्ध्रे = अष्टम भाव (8th) में; व्यय-गे = द्वादश भाव (12th) में स्थित; राहौ = राहु (उत्तर पात) के; तद्-दाये = उसकी दशा में; कष्टम् आदिशेत् = कष्ट कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ यह राहु-दशाफल का सन्धि-श्लोक है। पहली पंक्ति शुभ पक्ष पूरा करती है — शुभ-स्थित राहु की दशा में यवन (विदेशी) स्वामी से सम्मान और घर में कल्याण होता है, ऐसा शास्त्र कहता है। दूसरी पंक्ति में मोड़ है — वही राहु यदि अष्टम (रन्ध्र) या द्वादश (व्यय) भाव में बैठा हो, तो शास्त्र उसकी दशा को कष्टसूचक बताता है।

English rendering A well-placed Rāhu, the text says, gives honor from a foreign overlord and welfare at home; but should Rāhu occupy the 8th (randhra) or 12th (vyaya), its daśā is to be declared as bringing hardship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मूलतः फल-कथन, पर भाव-संख्या का तकनीकी संकेत निहित है — रन्ध्र = लग्न से 8वाँ, व्यय = 12वाँ; दुःस्थान = {6, 8, 12}। भाव-गणना विशुद्ध चक्रीय अंकगणित है: भाव-क्रमांक = ((राशि₍ग्रह₎ − राशि₍लग्न₎) mod 12) + 1।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष (राशि 1), राहु वृश्चिक (राशि 8) में → (8 − 1) mod 12 + 1 = 8 → अष्टमस्थ राहु → इस नियम से कष्ट-सूचक दशा।

हमारा डिकोड (Our Decode) समस्त अध्याय विंशोत्तरी-मत का दशाफल है (देखें ४७.१६)। हमारे सत्यापित विंशोत्तरी-चक्र में राहु की महादशा = 18 वर्ष (Σ = 120 का अंश), अन्तर्दशा = (18 × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — यह श्लोक उसी 18-वर्षीय राहु-दशा का फल-पक्ष कहता है, गणना-पक्ष नहीं।

47.41
पापग्रहेण सम्बन्धे मारकग्र्हसंयुते |
नीचराशिगते वापि स्थानभ्रंशो मनोव्यथा
pāpagraheṇa sambandhe mārakagrhasaṃyute |
nīcarāśigate vāpi sthānabhraṃśo manovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-ग्रहेण = पापग्रह के साथ; सम्बन्धे = सम्बन्ध होने पर; मारक-ग्रह-संयुते = मारक ग्रह (2/7 अधिपति) से युक्त; नीच-राशि-गते = नीच राशि में गया हुआ; वा अपि = अथवा भी; स्थान-भ्रंशः = पद/स्थान का पतन; मनो-व्यथा = मानसिक पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ राहु यदि पापग्रह से सम्बन्ध रखे, मारक ग्रह से युक्त हो, अथवा नीच राशि में स्थित हो — तो शास्त्र कहता है कि उसकी दशा में स्थान-भ्रंश और मनोव्यथा होती है। यह पूर्व-श्लोक के अशुभ पक्ष (रन्ध्र/व्यय राहु) का विस्तार है।

English rendering When Rāhu is joined to a malefic, conjoined with a māraka (killer) planet, or fallen in a sign of debilitation, the text states its period brings loss of position and mental anguish.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन — तथापि दो निर्धारक तकनीकी हैं: (i) मारक = द्वितीय व सप्तम भाव के अधिपति (मारक-स्थान 2, 7); (ii) नीच = ग्रह का नियत नीच-बिन्दु। राहु की नीच राशि परम्परया धनु/वृश्चिक मानी जाती है — पाठ-भेद व मत-भेद संभव (छाया-ग्रह का उच्च-नीच स्वयं संवादग्रस्त है)।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष → द्वितीय अधिपति = शुक्र (वृषभ का), सप्तम अधिपति = शुक्र (तुला का); अतः इस लग्न में शुक्र मारकेश। राहु का शुक्र-मारकेश से सम्बन्ध होने पर यह नियम लागू।

47.42
विनाशो दारपुत्राणां कुत्सितान्नं च भोजनम् |
दशादौ देहपीडा च धनधान्यपरिच्युतिः
vināśo dāraputrāṇāṃ kutsitānnaṃ ca bhojanam |
daśādau dehapīḍā ca dhanadhānyaparicyutiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विनाशः = हानि/क्षय (शास्त्र-शब्द); दार-पुत्राणाम् = पत्नी और पुत्रों का; कुत्सित-अन्नम् = निंदित/अशुद्ध अन्न; च भोजनम् = और भोजन; दशा-आदौ = दशा के आरंभ में; देह-पीडा = देह की पीड़ा (शास्त्र-कथन, चिकित्सा नहीं); धन-धान्य-परिच्युतिः = धन और धान्य से च्युति/हानि।

हिन्दी भावार्थ प्रतिकूल राहु-दशा (पूर्व श्लोकों की पाप/मारक/नीच/रन्ध्र-व्यय धारा) का विस्तार: शास्त्र दार-पुत्र-हानि, कुत्सित अन्न-भोजन, दशा के आरंभ में देह-पीड़ा, तथा धन-धान्य-परिच्युति का फल कहता है। “दशादौ” = दशा-प्रारंभ की उप-अवधि पर विशेष बल — पूर्ण १८ वर्ष एक समान नहीं माने जाते। ये सब फल-कथन हैं; इन्हें रोग-निदान, पारिवारिक भविष्यवाणी, या भय-व्यापार न बनाया जाए।

English rendering The text further states destruction (harm) concerning spouse and children, impure or distasteful food, bodily affliction at the beginning of the daśā, and loss of wealth and grain — as the stated results of that adverse Rāhu-period configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रतिकूल राहु-दशा; “दशादौ” = आरंभ-खंड)। विंशोत्तरी में राहु-महादशा = १८ वर्ष; अन्तरदशा = (१८ × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२०। “दशादौ” का सटीक कट (प्रथम अन्तर / प्रथम वर्ष / आदि) इस श्लोक में संख्या से नहीं दिया — परंपरा-निर्भर; गणना में खंड घोषित करें।

47.43
दशामध्ये तु सौख्यं स्यात् स्वदेशे धनलाभकृत् |
दशान्ते कष्टमाप्नोति स्थानभ्रंशो मनोव्यथा
daśāmadhye tu saukhyaṃ syāt svadeśe dhanalābhakṛt |
daśānte kaṣṭamāpnoti sthānabhraṃśo manovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशा-मध्ये = दशा के मध्य में; तु = तो; सौख्यं स्यात् = सुख हो; स्व-देशे = अपने देश में; धन-लाभ-कृत् = धनलाभ कराने वाला; दशा-अन्ते = दशा के अन्त में; कष्टम् आप्नोति = कष्ट पाता है; स्थान-भ्रंशः = पद-पतन; मनो-व्यथा = मानसिक पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार अशुभ राहु-दशा के मध्य भाग में सुख और स्वदेश में धनलाभ, किन्तु दशा के अन्त में कष्ट, स्थान-भ्रंश और मनोव्यथा फलित होती है। यहाँ दशा को आदि–मध्य–अन्त तीन खण्डों में बाँटकर भिन्न फल कहा गया है — यह राहु-दशा-प्रकरण का समापन-श्लोक है।

English rendering In the middle of the period, the text says, there is comfort and gain of wealth in one's own land; but at the daśā's close come hardship, loss of position, and mental anguish.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आदि/मध्य/अन्त फल का समय-निर्धारण इसी अध्याय ४७.३–४ के द्रेष्काण (D3) नियम से होता है — ग्रह प्रथम द्रेष्काण (0°–10°) में → फल दशारम्भ में; मध्य द्रेष्काण (10°–20°) → दशामध्य में; तृतीय (20°–30°) → दशान्त में (वक्री हो तो व्यस्त)। द्रेष्काण-सूचक = ⌊भाग(राशि-अंश)/10°⌋ ∈ {0,1,2}।

उदाहरण (worked example) राहु 24° किसी राशि में → ⌊24/10⌋ = 2 → तृतीय द्रेष्काण → प्रमुख फल दशान्त में — इसी श्लोक के "दशान्ते कष्टम्" से संगत।

हमारा डिकोड (Our Decode) द्रेष्काण = D3, षोडश-वर्गों में से एक — 30° राशि का तीन 10°-खण्डों में सम-विभाजन, विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित। हमारे वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) में D1…D60 की यही नियम-आधारित सम-विभाजन-पद्धति सत्यापित है; फल-काल का आदि/मध्य/अन्त इसी D3-स्थिति से पढ़ा जाता है।

47.44
यः सर्वेषु नाभोगेषु बुधैरतिशुभः स्मृतः |
तस्य देवेन्द्रपूज्यस्य कथयामि दशाफलम्
yaḥ sarveṣu nābhogeṣu budhairatiśubhaḥ smṛtaḥ |
tasya devendrapūjyasya kathayāmi daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यः = जो; सर्वेषु नाभोगेषु (नभोगेषु) = समस्त ग्रहों में; बुधैः = विद्वानों द्वारा; अति-शुभः = सर्वाधिक शुभ; स्मृतः = माना गया; तस्य = उस; देव-इन्द्र-पूज्यस्य = देवराज इन्द्र से पूजित (= बृहस्पति/गुरु) की; कथयामि = कहता हूँ; दशा-फलम् = दशा का फल।

हिन्दी भावार्थ समस्त ग्रहों में जिसे विद्वान् सर्वाधिक शुभ मानते हैं, उस इन्द्र-पूज्य देवगुरु बृहस्पति (जीव) की दशा का फल अब पराशर कहते हैं। यह श्लोक राहु-प्रकरण के बाद गुरु-दशा-प्रकरण का उपक्रम (introduction) है।

English rendering Of that planet whom the wise deem the most auspicious of all — Jupiter, worshipped by Indra — I now declare the fruits of the daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उपक्रम-श्लोक — प्रत्यक्ष सूत्र नहीं। तथापि यह विंशोत्तरी में गुरु-महादशा का द्वार खोलता है: बृहस्पति की महादशा = 16 वर्ष; कोई अन्तर्दशा = (16 × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) गुरु-महादशा में शनि की अन्तर्दशा = (16 × 19) ÷ 120 = 304 ÷ 120 = 2.533… वर्ष ≈ 2 वर्ष 6 माह 12 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारे विंशोत्तरी-इंजन में 120-वर्षीय चक्र चन्द्र-नक्षत्र से आरम्भ होकर केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120) क्रम में सत्यापित है। गुरु का 16-वर्ष यहीं से आता है, और अन्तर्दशाएँ शुद्ध अनुपात-अंकगणित (उपर्युक्त सूत्र) से निकलती हैं — फल-श्लोक इसी गणित के ऊपर बैठता है।

47.45
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे |
मूलत्रिकोणलाभे वा तुंगांशे स्वांशगेऽपि वा
svocce svakṣetrage jīve kendre lābhatrikoṇage |
mūlatrikoṇalābhe vā tuṃgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = स्वोच्च (गुरु-उच्च = कर्क); स्वक्षेत्रगे = स्वराशिस्थ (धनु/मीन); जीवे = गुरु में; केन्द्रे = केन्द्र (१, ४, ७, १०); लाभत्रिकोणगे = लाभ (११) या त्रिकोण (१, ५, ९); मूलत्रिकोण = गुरु-मूलत्रिकोण (धनु); तुंगांशे = उच्च-अंश/नवांश; स्वांशगे = स्व-अंश/स्व-नवांश

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शुभ गुरु-दशा के लिए स्थिति-शर्तें गिनाता है — गुरु उच्च में, स्वक्षेत्र में, केन्द्र में, लाभ या त्रिकोण में; अथवा मूलत्रिकोण/लाभ में, तुंगांश में, या स्वांश में। ये स्थान-बल की शर्तें हैं, जिनके रहते आगे का राज्यलाभादि फल कहा गया है।

English rendering The text conditions the forthcoming auspicious Jupiter-daśā results on Jupiter in exaltation, own sign, a kendra, the eleventh or a trikoṇa, or in mūlatrikoṇa/lābha, exaltation-aṃśa, or own aṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-शर्तें (boolean filters on longitude → house/varga), न कि अवधि-सूत्र:
- उच्च: गुरु ≈ ९०°–१२०° (कर्क; चरम-उच्च ९५° परम्परा-सापेक्ष)
- स्वक्षेत्र: धनु २४०°–२७०° या मीन ३३०°–३६०°
- केन्द्र: भाव १, ४, ७, १० (whole-sign या चुने house-system पर निर्भर)
- त्रिकोण: १, ५, ९; लाभ = ११
- तुंगांश / स्वांश: D9 (नवांश) में उच्च-राशि या स्वराशि — λ_D9 नियम: प्रत्येक ३° २०′ = १ नवांश (BPHS Ch.6 ṣoḍaśa-varga)

उदाहरण (worked example) मानें गुरु λ = २५५° (धनु १५°), लग्न = मेष (whole-sign)।
स्वक्षेत्र = हाँ (धनु); भाव = ९ (त्रिकोण) = हाँ; D9: १५° ÷ ३°२०′ = ४ पूर्ण नवांश → ५वाँ नवांश = सिंह (चर राशि क्रम) — स्वांश नहीं, परन्तु स्वक्षेत्र+त्रिकोण से श्लोक की शर्त पूरी।
(अयनांश घोषित करें; उदाहरण सायन-निरपेक्ष rāśi-अंश पर है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) ṣoḍaśa-varga इंजन D9 को ३०° → ९ × ३°२०′ के नियत खंडन से काटता है; “तुंगांश/स्वांश” वही modular map है। फल-शर्त को हम boolean flag की तरह पढ़ते हैं — गणना `==` शर्त-सत्य, व्याख्या शास्त्र-वाक्य।

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47.46
राज्यलाभं महापौरुषं राजसन्मानकीर्तनम् |
गजवाजिसमायुक्तं देवब्राह्मणपूजनम्
rājyalābhaṃ mahāpauruṣaṃ rājasanmānakīrtanam |
gajavājisamāyuktaṃ devabrāhmaṇapūjanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्य-लाभम् = राज्य/अधिकार का लाभ; महा-पौरुषम् = महान् पराक्रम; राज-सन्मान-कीर्तनम् = राजसम्मान व कीर्ति; गज-वाजि-समायुक्तम् = हाथी-घोड़ों से युक्त; देव-ब्राह्मण-पूजनम् = देव व ब्राह्मणों का पूजन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के बलवान् गुरु की दशा में शास्त्र कहता है — राज्यलाभ, महान् पराक्रम, राजसम्मान व यश, हाथी-घोड़ों की सम्पदा, तथा देव-ब्राह्मण-पूजा जैसे शुभ फल मिलते हैं। यह गुरु-दशा का उत्तम फल-कथन है, नियति नहीं।

English rendering In such a strong Jupiter period, the text says, come gain of sovereignty, great valor, royal honor and renown, wealth of elephants and horses, and the worship of gods and brāhmaṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। इसके फल पूर्व-श्लोक ४७.४५ की उच्च/स्व/केन्द्र/त्रिकोण/नवांश-शर्तों के सत्य होने पर ही लागू होते हैं — अर्थात् फल पहले से किए गए स्थिति-गणित पर सप्रतिबन्ध (conditional) है।

47.47
अथ दशाफलाद्यायः
atha daśāphalādyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; दशा-फल = दशाओं का फल; अध्यायः (पाठ "आद्यायः") = अध्याय/प्रकरण। पाठ-भेद संभव — "आद्यायः" संभवतः "अध्यायः" का विकृत रूप।

हिन्दी भावार्थ यह पूर्ण श्लोक नहीं, अपितु एक प्रकरण-शीर्षक/रुब्रिक-अंश है — "अब दशाफल का प्रकरण"। इस रेसेंशन में यह पाद संख्या 47 पर स्वतन्त्र रूप से आया है; अन्य पाठों में यह पुष्पिका/शीर्षक-पंक्ति के रूप में मिलता है।

English rendering "Here [the section on] the Fruits of the Daśās" — a sectional rubric rather than a content verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शीर्षक/प्रकरण-रुब्रिक। स्वतन्त्र एकपाद होने से इसका कोई फल-वाच्य या गणनीय अंश नहीं; यह केवल संरचनात्मक विभाजक है और गुरु-दशा-प्रकरण के प्रवाह को बाधित नहीं करता।

47.48
महाराजप्रसादेनाऽभीष्टसिद्धिः सुखावहा |
आन्दोलिकादिलाभश्च कल्याणं च महत्सुखम्
mahārājaprasādenā'bhīṣṭasiddhiḥ sukhāvahā |
āndolikādilābhaśca kalyāṇaṃ ca mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महाराज की कृपा से; अभीष्ट-सिद्धिः = इच्छित की सिद्धि; सुख-आवहा = सुखदायी; आन्दोलिका-आदि-लाभः = पालकी आदि का लाभ; कल्याणम् = मंगल; महत्-सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुभ गुरु-दशा में महाराज की कृपा से अभीष्ट की सिद्धि, पालकी आदि वाहन-सम्पदा, कल्याण और महान् सुख प्राप्त होते हैं। यह ४७.४५–४६ के शुभ गुरु-फल का ही विस्तार है।

English rendering By a great king's grace, the text says, one attains fulfilment of cherished aims, palanquins and the like, welfare, and great happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। सभी फल पूर्ववर्ती बल-शर्त (उच्च/स्व/केन्द्र-त्रिकोण/शुभ-नवांश) पर सप्रतिबन्ध हैं।

47.49
पुत्रदारादिलाभश्च अन्नदानं महत्प्रियम् |
नीचास्तपापसंयुक्ते जीवै रिष्फाष्टसंयुते
putradārādilābhaśca annadānaṃ mahatpriyam |
nīcāstapāpasaṃyukte jīvai riṣphāṣṭasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रदारादिलाभः = पुत्र-पत्नी आदि का लाभ; अन्नदानम् = अन्न-दान; महत्प्रियम् = महान् प्रिय/प्रेम; नीचास्तपापसंयुक्ते = नीच, अस्त या पाप-युक्त; जीवे = गुरु में; रिष्फाष्टसंयुते = रिष्फ (१२) या अष्टम (८) से युक्त/स्थित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पहले शुभ पक्ष कहता है — पुत्र-दारा आदि का लाभ, अन्नदान, महान् प्रियता। फिर विपरीत स्थिति खोलता है: जब गुरु नीच, अस्त या पाप-युक्त हो और रिष्फ (व्यय/१२) या अष्टम से जुड़ा हो — वहाँ शुभ-फल का निषेध/परिवर्तन आगे के क्रम में कहा जाता है। दोनों पक्ष शास्त्र-कथन हैं।

English rendering The text states gain of children and spouse, food-giving, and great affection; then it opens the adverse case — Jupiter debilitated, combust, or with malefics, and joined to the twelfth or eighth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-फिल्टर (शुभ-खंड का निषेध-द्वार):
- नीच: गुरु ≈ २७०°–३००° (मकर; चरम-नीच २७५° परम्परा-सापेक्ष)
- अस्त: सूर्य-गुरु कोण < अस्त-सीमा (गुरु ≈ ११° सूर्य से — परम्परा/पाठ-भेद संभव)
- पापसंयुक्त: शनि/मंगल/राहु-केतु आदि से युति (युति-orb convention-निर्भर)
- रिष्फ = भाव १२; अष्ट = भाव ८ (whole-sign या house-system घोषित करें)

उदाहरण (worked example) गुरु λ = २८०° (मकर १०°) = नीच; लग्न = कन्या (whole-sign) → गुरु भाव = ५ (त्रिकोण) परन्तु नीच-flag = true → ४७.४५ की शुभ-शर्त भंग; रिष्फ/अष्ट नहीं, फिर भी “नीच…संयुक्ते” खंड सक्रिय।
अयनांश/house-system घोषित रखने पर भाव-संख्या बदलेगी; नीच-राशि flag rāśi-मात्र से निश्चित।

हमारा डिकोड (Our Decode) ṣaḍbala/sthāna-bala और दशा-फल दोनों में “नीच / अस्त / ८–१२” flags अलग-अलग मॉड्यूल हैं — बल-अंक संख्यात्मक, फल-वाक्य शास्त्र-उद्धरण। हम `==` से स्थिति-सत्य जाँचते हैं; फल को भाग्य-घोषणा नहीं बनाते।

47.50
स्थानभ्रंशं मनस्तापं पुत्रपीडामहद्भयम् |
पश्वादिधनहानिश्च तीर्थयात्रादिकं लभेत्
sthānabhraṃśaṃ manastāpaṃ putrapīḍāmahadbhayam |
paśvādidhanahāniśca tīrthayātrādikaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थानभ्रंश = पद/आश्रय-स्थिति का च्युत होना; मनस्ताप = मानसिक क्लेश; पुत्रपीडा = पुत्र-संबंधी कष्ट (पाठ का फल-कथन); महद्भय = बड़ा भय; पश्वादिधनहानि = पशु आदि धन की हानि; तीर्थयात्रादिकं = तीर्थ-यात्रा आदि; लभेत् = प्राप्त करता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ इस दशा-फल-प्रसंग में शास्त्र कहता है कि स्थान-भ्रंश, मनस्ताप, पुत्र-संबंधी पीड़ा और महान् भय का अनुभव हो सकता है। साथ ही पशु आदि धन की हानि भी कही गई है। उसी क्रम में तीर्थ-यात्रा आदि का लाभ भी लिखित है — अर्थात कष्ट और पुण्य-मार्ग दोनों फल-सूची में आते हैं। यह सब दशा-काल के फल-वर्णन के रूप में है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that this period may bring loss of standing, mental distress, hardship concerning offspring, and great fear, together with loss of cattle and similar wealth. It also records pilgrimage and kindred journeys among the results obtained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह दशा-फल का मिश्रित सूची-वर्णन है; कोई अंश, वर्ष-अनुपात या बल-इकाई यहाँ नियत नहीं की गई।

47.51
आदौ कष्टफलं चैव चतुष्पाज्जीवलाभकृत् |
मध्यान्ते सुखमाप्नोति राजसम्मानवैभवम्
ādau kaṣṭaphalaṃ caiva catuṣpājjīvalābhakṛt |
madhyānte sukhamāpnoti rājasammānavaibhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदौ = आरम्भ में; कष्टफलं = क्लेश-फल; चतुष्पाज्जीव = चतुष्पद जीव (पशु आदि); लाभकृत् = लाभ करने वाला; मध्यान्ते = मध्य और अन्त में; सुखम् = सुख; आप्नोति = प्राप्त करता है; राजसम्मान = राजकीय सम्मान; वैभवम् = ऐश्वर्य/समृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा के आरम्भ में कष्ट-फल होता है, तथा चतुष्पद जीवों का लाभ भी इसी काल में जुड़ा बताया गया है। मध्य और अन्त में सुख की प्राप्ति कही गई है। उसी चरण में राज-सम्मान और वैभव का फल भी लिखित है — काल-खण्ड के अनुसार फल-परिवर्तन का शास्त्रीय ढाँचा।

English rendering The text states that hardship results at the outset, along with gain of four-footed living beings. In the middle and at the end one obtains ease, royal honor, and prosperity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा के आद्य–मध्य–अन्त्य चरण)। संख्यात्मक वर्ष-विभाजन यहाँ नहीं दिया; केवल काल-खण्डानुसार फल-क्रम का वर्णन है।

47.52
अथ सर्वेषु खेटेषु योऽतिहीनः प्रकीर्तितः |
तस्य भास्करपुत्रस्य कथयामि दशाफलम्
atha sarveṣu kheṭeṣu yo'tihīnaḥ prakīrtitaḥ |
tasya bhāskaraputrasya kathayāmi daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; सर्वेषु खेटेषु = समस्त ग्रहों में; यः = जो; अति-हीनः = सर्वाधिक हीन/मन्दतम; प्रकीर्तितः = कहा गया; तस्य = उस; भास्कर-पुत्रस्य = सूर्य-पुत्र (= शनि) की; कथयामि = कहता हूँ; दशा-फलम् = दशा का फल।

हिन्दी भावार्थ समस्त ग्रहों में जिसे सर्वाधिक हीन (मन्द, धीमा) कहा गया है, उस सूर्य-पुत्र शनि की दशा का फल अब पराशर कहते हैं। यह गुरु-प्रकरण के पश्चात् शनि-दशा-प्रकरण का उपक्रम-श्लोक है।

English rendering Of that planet declared the most lowly of all — Saturn, the son of the Sun — I now tell the fruits of the daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उपक्रम-श्लोक — प्रत्यक्ष सूत्र नहीं। विंशोत्तरी में शनि-महादशा = 19 वर्ष (चक्र में सर्वाधिक दीर्घ); कोई अन्तर्दशा = (19 × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) शनि-महादशा में बुध की अन्तर्दशा = (19 × 17) ÷ 120 = 323 ÷ 120 = 2.6917 वर्ष ≈ 2 वर्ष 8 माह 9 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारे सत्यापित 120-वर्षीय विंशोत्तरी-क्रम (…गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) में शनि का 19-वर्ष यहीं स्थिर है, और अन्तर्दशाएँ शुद्ध अनुपात-अंकगणित (उपर्युक्त सूत्र) से निकलती हैं। यह "भास्करपुत्र" का फल-श्लोक उसी सत्यापित दशा-दैर्घ्य के ऊपर बैठता है — फल-पक्ष शास्त्र का कथन, गणना-पक्ष हमारे इंजन में exact।

47.53
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे मित्रक्षेत्रेऽथ वा यदि |
मूलत्रिकोणे भाग्ये वा तुंगांशे स्वांशगेऽपि वा
svocce svakṣetrage mande mitrakṣetre'tha vā yadi |
mūlatrikoṇe bhāgye vā tuṃgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = उच्च-राशि में; स्वक्षेत्रगे = स्व-राशिस्थ; मन्दे = शनि में/शनि के; मित्रक्षेत्रे = मित्र-क्षेत्र में; मूलत्रिकोणे = मूलत्रिकोण में; भाग्ये = नवम भाव में; तुंगांशे = उच्च-नवांश में; स्वांशगे = स्व-नवांशस्थ; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मन्द (शनि) उच्च, स्वक्षेत्र, मित्रक्षेत्र, मूलत्रिकोण, भाग्य (नवम) भाव, तुंगांश अथवा स्वांश में स्थित हो। ये सब स्थान-बल/वर्ग-स्थिति की शर्तें हैं, जिन पर आगे का शुभ फल जुड़ा बताया जाएगा। यह श्लोक स्वयं फल नहीं कहता; शर्त-श्रृंखला का पूर्वार्ध है। पाठ-भेद संभव जहाँ “भाग्ये” को भाव-विशेष या राशि-सन्दर्भ में अलग पढ़ा जाए।

English rendering When Saturn is in exaltation, his own sign, a friend’s sign, mūlatrikoṇa, the ninth house, an exaltation navāṃśa, or his own navāṃśa —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थान/वर्ग-शर्त-सूची (फल-कथन का हेतु)। तकनीकी नियत-बिन्दु (परम्परा-सामान्य, इस श्लोक में अंश नहीं दिए): शनि-उच्च = तुला ~20°; स्वक्षेत्र = मकर/कुम्भ; मूलत्रिकोण = कुम्भ; नवांश (D9) = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश — देशान्तर पर modular map (ayanāṃśa घोषित करके)। फल-योग्यता का निर्णय इन स्थितियों पर निर्भर; यहाँ कोई bindu-योग या वर्ष-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मानें शनि-देशान्तर (Lahiri ayanāṃśa, उदाहरण) = 10° मकर = 270° + 10° = 280° sidereal। स्वक्षेत्र (मकर) ✓। D9: मकर में नवांश-क्रम धनु से — 10° ÷ 3°20′ = 3 पूर्ण अंश → चतुर्थ नवांश = मीन (परम्परागत pairing); स्वांश नहीं, पर स्वक्षेत्र-शर्त पूरी। यदि 20° तुला (उच्च) हो तो स्वोच्च + तुंगांश-जाँच अलग से D9 पर की जाती है।

47.54
दुश्चिक्ये लाभगे चैव राजसम्मानवैभवम् |
सत्कीर्तिर्धनलाभश्च विद्यावादविनोदकृत्
duścikye lābhage caiva rājasammānavaibhavam |
satkīrtirdhanalābhaśca vidyāvādavinodakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; लाभगे = एकादश भावस्थ; राजसम्मान = राजकीय सम्मान; वैभवम् = ऐश्वर्य; सत्कीर्तिः = उत्तम यश; धनलाभः = धन की प्राप्ति; विद्यावादविनोदकृत् = विद्या, वाद-विवाद और विनोद में रमण/कारण।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की स्थितियों के साथ — या उसी प्रसंग में — जब शनि दुश्चिक्य (तृतीय) अथवा लाभ (एकादश) में हो, शास्त्र राज-सम्मान और वैभव का फल कहता है। सत्कीर्ति और धन-लाभ भी लिखित हैं। विद्या, शास्त्रार्थ/वाद और विनोद में रुचि-लाभ का वर्णन है — यह सब शुभ दशा-फल की सूची है, न कि अनिवार्यता का दावा।

English rendering And when placed in the third or the eleventh house, the text states royal honor and prosperity, good renown and gain of wealth, and delight in learning, debate, and refined pastime.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थिति + शुभ परिणाम)। दुश्चिक्य = भाव 3, लाभ = भाव 11 — भाव-गणना लग्न से पूर्ण-राशि गृह (equal whole-sign) या चुने हुए house-system पर निर्भर; convention घोषित करनी चाहिए। कोई अंश-सूत्र यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह; शनि = तुला (उच्च, 20°) → लग्न से शनि = तृतीय भाव (दुश्चिक्य) ✓। शर्त 47.53 (स्वोच्च) + 47.54 (दुश्चिक्य) दोनों लागू — शास्त्र इस योग पर राजसम्मान–वैभव आदि फल कहता है। (House system: whole-sign; ayanāṃśa: उदाहरण-मात्र Lahiri।)

47.55
महाराजप्रसादेन गजवाहनभूषणम् |
राजयोगं प्रकुर्वीत सेनाधीशान्महत्सुखम्
mahārājaprasādena gajavāhanabhūṣaṇam |
rājayogaṃ prakurvīta senādhīśānmahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराजप्रसादेन = महाराज की कृपा से; गजवाहनभूषणम् = हाथी, वाहन और आभूषण; राजयोगं = राजयोग; प्रकुर्वीत = उत्पन्न करे/करे; सेनाधीशात् = सेनाधिपति-पद से; महत्सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि महाराज-प्रसाद से गज, वाहन और भूषण की प्राप्ति होती है। यह स्थिति राजयोग को उत्पन्न करने वाली कही गई है। सेनाधिपति-पद से महान् सुख का फल भी लिखित है। यहाँ “राजयोग” शास्त्रीय योग-फल की भाषा है — शक्ति/मान्यता का चिह्न — न कि आधुनिक राजनीति का वचन।

English rendering The text states that through a great sovereign’s favor come elephants, conveyances, and ornaments; a rājayoga is formed, and great ease arises from command of armies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राजप्रसाद / राजयोग / सेनाधिपत्य-सुख)। कोई वर्ष-अनुपात, वर्ग-सूत्र या बल-इकाई नहीं; पूर्व श्लोकों की स्थिति-शर्तों पर आश्रित फल-वर्णन।

47.56
लक्ष्मीकटाक्षचिह्नानि राज्यलाभं करोति च |
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत्
lakṣmīkaṭākṣacihnāni rājyalābhaṃ karoti ca |
gṛhe kalyāṇasampattirdāraputrādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लक्ष्मीकटाक्षचिह्नानि = लक्ष्मी के कृपा-कटाक्ष के चिह्न; राज्यलाभं = राज्य/अधिकार का लाभ; करोति = करता है; गृहे = घर में; कल्याणसम्पत्तिः = कल्याण और सम्पत्ति; दारपुत्रादिलाभकृत् = पत्नी, पुत्र आदि का लाभ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लक्ष्मी-कटाक्ष के चिह्न प्रकट होते हैं और राज्य-लाभ होता है। गृह में कल्याण और सम्पत्ति का वर्णन है। दारा, पुत्र आदि का लाभ भी इसी शुभ-क्रम में लिखित है। यह शनि-दशा के उत्तम स्थान-बल पर आधारित फल-श्रृंखला का समापन-स्वर है — “शास्त्र कहता है” के रूप में, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering The text states that the marks of Lakṣmī’s gracious glance appear and confer gain of dominion; welfare and wealth arise at home, with gain of spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लक्ष्मी-चिह्न, राज्यलाभ, गृह-कल्याण, दारा-पुत्र-लाभ)। गणना नहीं; 47.53–54 की स्थिति-शर्तों से जुड़ा शुभ-फल-समुच्चय।

47.57
षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वाऽस्तङ्गतेऽपि वा |
विषशस्त्रादिपीडा च स्थाभ्रंशं महद्भयम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye mande nīce vā'staṅgate'pi vā |
viṣaśastrādipīḍā ca sthābhraṃśaṃ mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यय = षष्ठ, अष्टम, द्वादश भाव; मन्द = शनि; नीचे = नीच-राशि (तुला); अस्तङ्गत = सूर्य-सन्निकर्ष से अस्त; विष-शस्त्र-आदि-पीडा = विष, शस्त्र आदि से क्लेश; स्थाभ्रंश = स्थान/स्थिति-भ्रंश (पाठ-भेद संभव — स्थानभ्रंश); महद्भय = बड़ा भय/आशंका।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मन्द (शनि) षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) भाव में हो, अथवा नीच में, अथवा अस्त हो, तब उसकी दशा में विष-शस्त्रादि से पीड़ा, स्थान-भ्रंश और महान् भय का फल बताया गया है। यह कथन दशा-फल का शास्त्रीय निरूपण है, न कि निश्चित घटना का आश्वासन। दशा-काल में ग्रह की अवस्थिति और बल-दुर्बलता फल-कथन का आधार है।

English rendering The text states that when Saturn occupies the sixth, eighth, or twelfth house, or is debilitated or combust, its period indicates affliction from poison, weapons and the like, loss of standing, and great fear. These are daśā-phala statements of the śāstra, not deterministic forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-दशा, अशुभ अवस्थिति)। विम्शोत्तरी में शनि-महादशा = १९ वर्ष (Σ १२०); फल-निर्णय दशा-स्वामी की भाव/राशि/अस्त-अवस्था पर निर्भर है, अवधि-अनुपात पर नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में शनि-महादशा १९ वर्ष निश्चित है; antardaśā = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२०। फल-श्लोक की गणना नहीं होती — अवधि इंजन में, फल-पाठ शास्त्र-वाक्य के रूप में रहता है। अस्त/नीच/भाव-स्थिति अलग ज्योतिष-नियमों से निर्धारित होती है।

47.58
पितृमातृवियोगं च दारपुत्रादिपीडनम् |
राजवैसःअम्यकार्याणि ह्यनिष्टं बन्धनं तथा
pitṛmātṛviyogaṃ ca dāraputrādipīḍanam |
rājavaisaḥamyakāryāṇi hyaniṣṭaṃ bandhanaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृ-मातृ-वियोग = माता-पिता से वियोग; दार-पुत्र-आदि-पीडन = पत्नी, पुत्र आदि पर क्लेश; राज-वैषम्य-कार्याणि = राज-वैषम्य (अननुकूलता) व संबंधित कार्य (पाठ: राजवैसःअम्य — वैषम्य का गैप-पार्स; पाठ-भेद संभव); अनिष्ट = अशुभ/अनभिप्रेत; बन्धन = कैद/प्रतिबंध।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की ही शनि-दशा-अवस्था का फल आगे बढ़ाया गया है। शास्त्र कहता है — पितृ-मातृ वियोग, दार-पुत्रादि पर पीड़न, राज-वैषम्य से जुड़े कार्य, अनिष्ट और बन्धन — ये सब उसी अशुभ-अवस्थित मन्द की दशा के फल-वर्णन में आते हैं। यह संवाद-शैली में फल-सूची है; प्रत्येक जन्म-कुण्डली में दशा-स्वामी की वास्तविक स्थिति से जाँच अपेक्षित है।

English rendering The text continues the adverse Saturn-daśā catalogue: separation from parents, distress to spouse and children, royal disfavour and related troubles, the unwelcome, and bondage. These remain the śāstra’s stated results under the conditions already given, not guaranteed outcomes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-दशा, अशुभ फल-सूची)। ४७.५७ की शर्तों (६/८/१२, नीच, अस्त) से जुड़ी फल-परंपरा का विस्तार मात्र।

47.59
शुभयुक्तेक्षिते मन्दे योगकारकसंयुते |
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मीनगे कार्मुके शनौ
śubhayuktekṣite mande yogakārakasaṃyute |
kendratrikoṇalābhe vā mīnage kārmuke śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-युक्त-ईक्षित = शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट; मन्द = शनि; योगकारक-संयुक्त = योगकारक ग्रह से युक्त; केन्द्र-त्रिकोण-लाभ = १/४/७/१०, ५/९, तथा ११वाँ भाव; मीनग = मीन राशि में स्थित; कार्मुक = धनु (धनुष-चिह्न); शनौ = शनि में/के।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र शुभ पक्ष खोलता है। जब मन्द शुभ से युक्त या दृष्ट हो, योगकारक से संयुक्त हो, अथवा केन्द्र, त्रिकोण या लाभ भाव में हो — अथवा शनि मीन में या कार्मुक (धनु) में हो — तब दशा-फल का दिशा-परिवर्तन बताया गया है। यह अवस्थिति-शर्त है; अगला श्लोक उसी का फल देता है। “योगकारक” यहाँ कुण्डली-विशिष्ट कारक-ग्रह को संकेत करता है, सार्वभौम एक ग्रह को नहीं।

English rendering The text states the favourable conditions for Saturn’s period: conjunction or aspect of benefics, association with a yogakāraka, placement in a kendra, trikoṇa, or the eleventh, or Saturn in Pisces or Sagittarius (Kārmuka). These placements frame the positive phala that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-शर्त (अवस्थिति/दृष्टि/युति)। केन्द्र = भाव १,४, ७, १०; त्रिकोण = ५, ९; लाभ = ११। मीन = ३३०°–३६०°; धनु = २४०°–२७०° (सायनांश/अयनांश घोषित करने पर ही निरपेक्ष ° अर्थपूर्ण)। योगकारक-निर्णय कुण्डली-लग्न-सापेक्ष है।

47.60
राज्यलाभं महोत्साहं गजश्वाम्बरसंकुलम्
rājyalābhaṃ mahotsāhaṃ gajaśvāmbarasaṃkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्य-लाभ = अधिकार/राज्य-लाभ; महोत्साह = बड़ा उत्साह; गज-अश्व-अम्बर-संकुल = हाथी, घोड़े, वस्त्रों से युक्त/संपन्न।

हिन्दी भावार्थ ४७.५९ की शुभ शर्तों पर शास्त्र फल कहता है — राज्य-लाभ, महान् उत्साह, तथा गज-अश्व-अम्बर की समृद्धि। यह संक्षिप्त फल-पद पूर्व श्लोक की शर्तों का उत्तरार्ध है। “राज्य” यहाँ शास्त्रीय प्रतीक-भाषा में प्रतिष्ठा, पद या अधिकार-क्षेत्र को भी समेटता है; आधुनिक अर्थ में सीमित “राजसिंहासन” नहीं थोपा जाना चाहिए।

English rendering Under those favourable Saturn conditions the text states gain of dominion or high office, great zeal, and abundance of elephants, horses, and fine clothing — the classical imagery of status and resources.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ शनि-दशा)। अवधि वही विम्शोत्तरी-शनि १९ वर्ष; फल शर्त-सापेक्ष है, वर्ष-संख्या-सापेक्ष नहीं।

47.61
अथ सर्वनभोगेषु यः कुमारः प्रकीर्तितः |
तस्य तारेशपुत्रस्य कथयामि दशाफलम्
atha sarvanabhogeṣu yaḥ kumāraḥ prakīrtitaḥ |
tasya tāreśaputrasya kathayāmi daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (विषय-आरंभ); सर्व-नभोगेषु = समस्त नभश्चरों (ग्रहों) में; कुमार = बुध (यौवन-ग्रह; पाठ-परंपरा); तारेश-पुत्र = तारेश (चन्द्र)-पुत्र = बुध; दशा-फल = महादशा/दशा का फल; कथयामि = कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ शनि-दशा-फल के बाद आचार्य नया प्रकरण खोलते हैं। समस्त नभोगों में जो कुमार कहा गया है — तारेश-पुत्र बुध — उसकी दशा का फल अब कहा जाएगा। यह अध्याय-संक्रमण का सूत्र-श्लोक है: विषय-परिचय, गणना नहीं। “कुमार/तारेशपुत्र” यहाँ बुध का पारंपरिक अभिधान है (चन्द्र-पुत्र)।

English rendering The sage now turns to the period of the planet called Kumāra among the sky-goers — the son of the lord of stars (Mercury, child of the Moon) — and announces that its daśā results will be told.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/विषय-आरंभ (बुध-दशा-फल)। विम्शोत्तरी क्रम में शनि (१९) के बाद बुध; बुध-महादशा = १७ वर्ष; Σ ग्रह-वर्ष = १२०। antardaśā = (१७ × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२०।

उदाहरण (worked example) बुध-महादशा १७ वर्ष। यदि अन्तर शनि (१९) हो: अन्तरदशा = (१७ × १९)/१२० = ३२३/१२० = २ वर्ष + (८३/१२०) वर्ष ≈ २ वर्ष ८ मास ९ दिन (३६०-दिन ज्योतिष वर्ष; परंपरा घोषित करें)। आरंभ: चन्द्र-नक्षत्र-अंश-शेष से महादशा-शेष।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी इंजन में बुध = १७ वर्ष, शनि = १९, योग १२० पर `==` पिन। यह श्लोक फल-तालिका का द्वार है; अवधि-गणित Ch.४६–४७ के अनुपात-नियम से सत्यापित, फल-पाठ शास्त्र-वाक्य के रूप में अलग रखा जाता है।

47.62
स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुक्ते केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
मित्रक्षेत्रसमायुक्ते सौम्ये दाये महत्सुखम्
svocce svakṣetrasaṃyukte kendralābhatrikoṇage |
mitrakṣetrasamāyukte saumye dāye mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्च = स्व-उच्च (बुध-उच्च = कन्या); स्व-क्षेत्र-संयुक्त = स्वराशि (मिथुन/कन्या) में; केन्द्र-लाभ-त्रिकोणग = केन्द्र, लाभ (११) या त्रिकोण में; मित्र-क्षेत्र-समायुक्त = मित्र-राशि में; सौम्य = बुध; दाय = दशा; महत्-सुख = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सौम्य (बुध) उच्च में, स्वक्षेत्र में, केन्द्र-लाभ-त्रिकोण में, अथवा मित्रक्षेत्र में स्थित हो, तब उसकी दशा में महान् सुख होता है। यह शुभ-अवस्थिति की पहली फल-पंक्ति है; अगला श्लोक धन-कीर्ति-ज्ञान आदि का विस्तार देता है। उच्च/स्व/मित्र की परिभाषा ग्रह-स्वामित्व-सारणी से बँधी है।

English rendering The text states that when Mercury is exalted, in its own sign, in a kendra, the eleventh, or a trikoṇa, or in a friendly sign, its daśā brings great happiness. Placement quality, not mere period length, frames this phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-दशा, शुभ अवस्थिति)। बुध-उच्च: कन्या (परंपरागत परम-उच्च ~१५° कन्या; पाठ-भेद/परंपरा घोषित करें)। स्वक्षेत्र: मिथुन, कन्या। केन्द्र/त्रिकोण/लाभ = भाव १·४·७·१० / ५·९ / ११। दशा-अवधि १७ वर्ष स्थिर; फल स्थिति-सापेक्ष।

47.63
धनधान्यादिलाभं च सत्कीर्तिधनसम्पदाम् |
ज्ञानाधिक्यं नृपप्रीतिं सत्कर्मगुणवर्द्धनम्
dhanadhānyādilābhaṃ ca satkīrtidhanasampadām |
jñānādhikyaṃ nṛpaprītiṃ satkarmaguṇavarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-आदि-लाभ = धन, अन्न आदि की प्राप्ति; सत्-कीर्ति = शुभ यश; धन-सम्पद् = धन-समृद्धि; ज्ञान-आधिक्य = ज्ञान की वृद्धि; नृप-प्रीति = राजा/अधिकारी की प्रसन्नता; सत्कर्म-गुण-वर्द्धन = सत्कर्म व गुणों का बढ़ना।

हिन्दी भावार्थ शुभ-अवस्थित बुध की दशा का फल शास्त्र इस प्रकार गिनता है — धन-धान्यादि लाभ, सत्कीर्ति और सम्पद्, ज्ञान की अधिकता, नृप-प्रीति, तथा सत्कर्म और गुणों की वृद्धि। यह ४७.६२ की “महत्सुख” पंक्ति का विस्तृत फल-सूची है। समस्त कथन शास्त्र के फल-वाक्य हैं; व्यक्तिगत भविष्य की गारंटी नहीं।

English rendering The text elaborates Mercury’s favourable daśā: gains of wealth and grain, good renown and prosperity, increase of knowledge, the ruler’s favour, and the growth of virtuous deeds and qualities — all under the auspicious placements already named.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-दशा, शुभ फल-सूची)। गणना पक्ष केवल दशा-अवधि (१७ वर्ष) और antardaśā-अनुपात; फल-सूची गुणात्मक शास्त्र-कथन है, संख्यात्मक सूत्र नहीं।

47.64
पुत्रदारादिसौख्यं च देहारोग्यं महत्सुखम् |
क्षीरेण भोजनं सौख्यं व्यापाराल्लभते धनम्
putradārādisaukhyaṃ ca dehārogyaṃ mahatsukham |
kṣīreṇa bhojanaṃ saukhyaṃ vyāpārāllabhate dhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दार-आदि-सौख्यम् = पुत्र–पत्नी आदि से सुख; देह-आरोग्यम् = शरीर का नीरोग रहना; महत्-सुखम् = बड़ा सुख; क्षीरेण भोजनम् = दूध से युक्त भोजन; सौख्यम् = आनन्द/सुख; व्यापारात् = व्यापार से; लभते = प्राप्त करता है; धनम् = धन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस दशा-फल-कथन में पुत्र-पत्नी आदि पारिवारिक सौख्य, देह की आरोग्यता और बड़ा सुख बताया गया है। दूध से भोजन का सुख भी इसी क्रम में गिनाया गया है। व्यापार के मार्ग से धन-लाभ का संकेत भी दिया गया है। यह सब फल-कथन है — गणना का सूत्र नहीं।

English rendering The text states happiness from sons, spouse and the like, bodily well-being, and great comfort; enjoyment of food with milk; and the gaining of wealth through trade.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ दशा/ग्रह-अवस्था का परिणाम-वर्णन है; कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-संख्या या काल-अनुपात नहीं दिया गया।

47.65
शुभदृष्टियुते सौम्ये भाग्ये कर्माधिपे दशा |
आधिपत्ये बलवती सम्पूर्ण्फलदादिका
śubhadṛṣṭiyute saumye bhāgye karmādhipe daśā |
ādhipatye balavatī sampūrṇphaladādikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-दृष्टि-युते = शुभ दृष्टि से युक्त; सौम्ये = बुध (सौम्य) में/पर; भाग्ये = भाग्य-भाव (नवम) में; कर्म-अधिपे = कर्मेश (दशमेश) की; दशा = महादशा/दशा; आधिपत्ये = आधिपत्य (स्वामित्व) में; बलवती = बलवान्; सम्पूर्ण-फल-दा = पूर्ण फल देने वाली; आदिका = इत्यादि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सौम्य (बुध) शुभ दृष्टि से युक्त हो, भाग्य-भाव में स्थित हो, और कर्मेश की दशा चल रही हो, तब वह दशा बलवती मानी गई है। ऐसी आधिपत्य-युक्त, बलवती दशा को सम्पूर्ण फल देने वाली कहा गया है। फल की पूर्णता यहाँ बल और शुभ-संयोग की शर्त से बाँधी गई है।

English rendering The text states that when Mercury (saumya), joined with benefic aspect and placed in the house of fortune (bhāgya), and the daśā of the lord of karma is in force, that lordship is strong and the period is said to yield full results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-फल की शर्त)। “बलवती / सम्पूर्णफलदा” गुणात्मक कथन है; यहाँ कोई रूप/विरूप या अंश-माप नहीं दिया। दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी अनुपात से निकलेगा (Ch.46–47), पर इस श्लोक में संख्या नहीं है।

हमारा डिकोड (Our Decode) Adhyāya 47 विंशोत्तरी-दशा-फल का अध्याय है। काल-इंजन में महादशा = नक्षत्र-अंश पर 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120); अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120। इस श्लोक का “बलवती/सम्पूर्णफलदा” फल-कथन है — इंजन केवल काल-खंड की गणना करता है, फल की गारंटी नहीं।

47.66
पापग्रहयुते दृष्टे राजद्वेषं मनोरुजम् |
बन्धुजनविरोधं च विदेशगमनं लभेत्
pāpagrahayute dṛṣṭe rājadveṣaṃ manorujam |
bandhujanavirodhaṃ ca videśagamanaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापग्रह-युते-दृष्टे = (बुध के साथ) क्रूर ग्रह से युत अथवा दृष्ट; राजद्वेषम् = राजा/शासन-वर्ग से वैर; मनोरुजम् = मानसिक पीड़ा, मनोरोग; बन्धुजनविरोधम् = स्वजनों से विरोध; विदेशगमनम् = परदेस-प्रवास; लभेत् = (जातक) पाता है।

हिन्दी भावार्थ यह बुध (सौम्य) की महादशा-प्रकरण का ही अनुवर्तन है। शास्त्र कहता है — जब दशानाथ बुध पापग्रहों से युत या दृष्ट हो, तो उस दशा में राजा से मनमुटाव, मन की व्यथा, अपने ही बन्धुओं से खटपट और परदेस-गमन जैसे फल गिनाए गए हैं। यह ग्रह की संगति पर आश्रित सापेक्ष कथन है, कोई अटल विधान नहीं।

English rendering When (in Mercury's daśā) the dispositor is joined or aspected by malefics, the text ascribes to it enmity with authority, mental distress, discord with kinsfolk, and travel to a foreign land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप-संसर्ग-सापेक्ष)। यहाँ "पाप-युत/दृष्ट" एक अर्ह्यता-ध्वज (qualifying flag) है — गणना का निर्गम नहीं, अपितु दशानाथ की युति-दृष्टि-अवस्था पर शर्तबद्ध फल-प्रवचन; फल-वाक्य शास्त्र का कथन हैं, भविष्य-घोषणा नहीं।

47.67
परप्रेष्यं च कलहं मूर्तकृर्च्छान्महन्भयम् |
षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये लाभभोगार्थनाशनम्
parapreṣyaṃ ca kalahaṃ mūrtakṛrcchānmahanbhayam |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye saumye lābhabhogārthanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परप्रेष्यम् = दूसरों की सेवा/परवशता; कलहम् = विवाद; मूर्तकृर्च्छात् महद्भयम् = (पाठ-भेद संभव — सम्भवतः "मूर्च्छा-कृच्छ्रात्") घोर संकट से महान् भय; षष्ठ-अष्टम-व्यये = 6वें/8वें/12वें भाव में; सौम्ये = बुध (यहाँ दशानाथ बुध); लाभ-भोग-अर्थ-नाशनम् = प्राप्ति, भोग एवं धन का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध षष्ठ-अष्टम-व्यय (दुःस्थान) में स्थित हो, तो दूसरों की अधीनता, कलह, किसी संकट से बड़ा भय, तथा लाभ-भोग-धन की हानि उसकी दशा में कही जाती है। "मूर्तकृच्छ्र" पद विकृत है; अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering With Mercury placed in the 6th, 8th, or 12th, the text foretells servitude to others, quarrels, grave fear from distress, and loss of gains, enjoyments, and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दुःस्थान-सूचकांक समुच्चय: {6, 8, 12} (षष्ठ, अष्टम, व्यय)। यह गणितीय निर्गम नहीं, अपितु दशानाथ की भाव-स्थिति को छाँटने वाला स्थान-सूचकांक-द्वार है; इन तीन बुरे स्थानों में दशानाथ पड़ते ही अशुभ फल-पक्ष सक्रिय होता है (फल शास्त्र-कथन)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; बुध = कन्या राशि में। मेष से कन्या तक की गणना: कन्या − मेष = भाव-सूचकांक (6−1) + 1 = 6वाँ भाव। 6 ∈ {6, 8, 12} → शर्त सत्य → शास्त्रोक्त अशुभ पक्ष लागू।

47.68
वातपीडां धनं चैवं पाण्डुरोगं विनिर्दिशेत् |
नृपचौराग्निभीतिं च कृषिगोभूमिनाशनम्
vātapīḍāṃ dhanaṃ caivaṃ pāṇḍurogaṃ vinirdiśet |
nṛpacaurāgnibhītiṃ ca kṛṣigobhūmināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वात-पीडाम् = वात-दोष से पीड़ा (शास्त्र-कथन; चिकित्सकीय निदान नहीं); धनम् च एवम् = धन-संबंधी फल इसी क्रम में; पाण्डु-रोगम् = पाण्डुरोग (शास्त्र-शब्द); विनिर्दिशेत् = निर्देश करे; नृप-चौर-अग्नि-भीतिम् = राजा, चोर, अग्नि से भय; कृषि-गो-भूमि-नाशनम् = कृषि, गौ, भूमि का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वात-पीड़ा और पाण्डुरोग का निर्देश, तथा धन-संबंधी कष्ट इसी फल-शृंखला में। राजा–चोर–अग्नि से भय, और कृषि–पशु–भूमि के नाश का भी कथन है। ये पारंपरिक फल-शब्द हैं — चिकित्सा, कानून या धन की भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़े जाने चाहिए।

English rendering The text states affliction of the vāta type, related wealth-distress, and the indication of pāṇḍu-roga; also fear from king, thieves, and fire, and damage to agriculture, cattle, and land. These are traditional phala terms, not medical or legal claims.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-फल सूची)। कोई बल-इकाई, बिन्दु या काल-खंड यहाँ नहीं।

47.69
दशादौ धनधान्यं च विद्यालाभं महत्सुखम् |
पुत्रकल्याणसम्पत्तिः सन्मार्गे धनलाभकृत्
daśādau dhanadhānyaṃ ca vidyālābhaṃ mahatsukham |
putrakalyāṇasampattiḥ sanmārge dhanalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशा-आदौ = दशा के आरम्भ में; धन-धान्यम् = धन और धान्य; विद्या-लाभम् = विद्या का लाभ; महत्-सुखम् = बड़ा सुख; पुत्र-कल्याण-सम्पत्तिः = पुत्र-कल्याण और सम्पत्ति; सत्-मार्गे = सन्मार्ग/धर्म्य मार्ग से; धन-लाभ-कृत् = धन-लाभ कराने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा के आदि-भाग में धन-धान्य, विद्या-लाभ और बड़ा सुख मिलता है। पुत्र-कल्याण और सम्पत्ति भी इसी आदि-खंड से जोड़ी गई है। धन-लाभ को सन्मार्ग से जोड़कर कहा गया है — अर्थात् शास्त्र इस आदि-काल को शुभ फल का क्षेत्र बताता है।

English rendering The text states that at the beginning of the daśā there is wealth and grain, gain of learning, and great happiness; welfare of sons and prosperity; and acquisition of wealth by rightful means.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आंशिक काल-संरचना — “दशादौ” = महादशा (या अन्तर्दशा) का आरम्भ-खंड। शास्त्र यहाँ खंड का अनुपात नहीं देता; प्रचलित व्यवहार में महादशा को आदि–मध्य–अन्त में बाँटना व्याख्या-परंपरा है, मूल श्लोक में 1/3 आदि कोई संख्या नहीं। विंशोत्तरी में महादशा-वर्ष ग्रह-निर्धारित (Σ 120); अन्तर्दशा = (M × A)/120 वर्ष।

उदाहरण (worked example) बुध-महादशा = 17 वर्ष (विंशोत्तरी)। यदि आदि–मध्य–अन्त को समान तीन खंड मानें (परंपरा; श्लोक-संख्यित नहीं): आदि ≈ 17/3 ≈ 5 वर्ष 8 मास। अन्तर्दशा-उदाहरण: बुध-महादशा में शुक्र-अन्तर = (17 × 20)/120 = 340/120 = 2 वर्ष 10 मास। अयनांश/जन्म-नक्षत्र दशा-आरम्भ-तिथि तय करते हैं; फल-कथन अलग परत है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी-इंजन नक्षत्र-शेष से महादशा-आरम्भ और (M × A)/120 से अन्तर्दशा निकालता है — exact ratio arithmetic। “दशादौ धनधान्यम्” फल-कथन है; हमारा डिकोड केवल काल-खंड की गणना और `==` अनुशासन तक है, फल की पुष्टि या भविष्यवाणी नहीं।

47.70
मध्ये नरेन्द्रसन्मानमन्ते दुःखं भविष्यति
madhye narendrasanmānamante duḥkhaṃ bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये = (दशा के) मध्य में; नरेन्द्र-सन्मानम् = नृप/राजा से सम्मान; अन्ते = (दशा के) अन्त में; दुःखम् = दुःख; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा के मध्य-भाग में नरेन्द्र (शासन/प्रभावशाली व्यक्ति) से सम्मान मिलता है। दशा के अन्त में दुःख बताया गया है। यह आदि–मध्य–अन्त की त्रिविध फल-रेखा का समापन-श्लोक है; 47.69 का आदि-शुभ फल, मध्य का सम्मान, और अन्त का दुःख — तीन खंडों का शास्त्र-कथन।

English rendering The text states that in the middle of the daśā there is honor from the ruler; at the end, suffering will occur (as the śāstra’s phala-statement).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आंशिक काल-संरचना — “मध्ये / अन्ते” दशा-खंड। मूल श्लोक खंड-अनुपात नहीं देता। यदि समान त्रिभाग (व्याख्या-परंपरा, श्लोक-अंकित नहीं): बुध-महादशा 17 वर्ष में मध्य ≈ वर्ष 5;8 से 11;4, अन्त ≈ अंतिम ≈ 5;8 वर्ष। अन्तर्दशा-स्तर पर भी आदि–मध्य–अन्त लागू करने की परंपराएँ भिन्न — convention घोषित करें।

उदाहरण (worked example) बुध-महादशा 17 वर्ष; समान त्रिभाग मानकर: आदि 0–5;8, मध्य 5;8–11;4, अन्त 11;4–17;0 (वर्ष;मास, लगभग)। वास्तविक घटना-काल जन्म-नक्षत्र-शेष + अयनांश (उदा. लाहिरी) से महादशा-आरम्भ-तिथि पर निर्भर; फल “शास्त्र कहता है” स्तर पर रहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) 120-वर्ष विंशोत्तरी चक्र और अन्तर्दशा-अनुपात इंजन में pinned हैं; आदि–मध्य–अन्त का समान त्रिभाग इस श्लोक से सिद्ध नहीं — व्याख्या-परंपरा है। गणित और फल को अलग रखना oracle-अनुशासन है: काल `==` से; फल “text states” से।

47.71
यस्तमोग्रहयोर्मध्ये कबन्धः कथ्यते बुधैः |
तस्य केतोरिदानीं ते कथेयामि दशाफलम्
yastamograhayormadhye kabandhaḥ kathyate budhaiḥ |
tasya ketoridānīṃ te katheyāmi daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तमोग्रहयोः मध्ये = दोनों छाया-ग्रहों (राहु-केतु) के बीच; कबन्धः = धड़/शिरोहीन खण्ड; कथ्यते बुधैः = विद्वानों द्वारा कहा जाता है; तस्य केतोः = उस केतु का; कथयामि दशाफलम् = (पाठ-भेद: "कथेयामि") दशाफल कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ यह प्रस्तावना-श्लोक है। दो तमोग्रहों (राहु और केतु) में जो "कबन्ध" — शिरोहीन धड़-रूप — विद्वानों द्वारा कहा जाता है, वही केतु है; अब पराशर उसकी दशा का फल कहने का उपक्रम करते हैं। (राहु = शिर, केतु = धड़ — यही कबन्ध-संज्ञा का आधार है।)

English rendering He whom the wise call "the headless trunk" among the two shadow-planets is Ketu; of him I now declare the daśā-results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रस्तावना। अन्तर्दृष्टि: राहु-केतु सदा 180° अन्तराल पर प्रतिपक्षी बिन्दु हैं (केतु = राहु ± 180°); "कबन्ध" रूपक इसी शिरो-विच्छेद (राहु = मस्तक, केतु = धड़) को इंगित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्षीय चक्र में केतु की महादशा 7 वर्ष की है (Ketu 7 · Venus 20 · Sun 6 · Moon 10 · Mars 7 · Rāhu 18 · Jupiter 16 · Saturn 19 · Mercury 17, Σ = 120)। यह प्रस्ताविका इसी 7-वर्षीय केतु-खण्ड के फल-प्रकरण का द्वार है, जिसे हमारा दशा-इंजन चन्द्र-नक्षत्र-भोग्यांश से आरम्भ-बिन्दु लेकर अनुपात-गणित से गणता है।

47.72
केन्द्रे लाभे त्रिकोणे व शुभराशौ शुभेक्षिते |
स्वोच्चे वा शुभवर्गे वा राजप्रीतिं मनोनुगम्
kendre lābhe trikoṇe va śubharāśau śubhekṣite |
svocce vā śubhavarge vā rājaprītiṃ manonugam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रे = केन्द्र भावों (1/4/7/10) में; लाभे = 11वें में; त्रिकोणे = त्रिकोण (5/9) में; शुभराशौ = शुभ राशि में; शुभेक्षिते = शुभ ग्रहों से दृष्ट; स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; शुभवर्गे = शुभ वर्ग/अंश में; राजप्रीतिम् = राजा का स्नेह; मनोनुगम् = मन के अनुकूल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब केतु केन्द्र (1/4/7/10), लाभ (11) या त्रिकोण (5/9) में हो, शुभ राशि में, शुभ ग्रहों से दृष्ट, स्वोच्च अथवा शुभ वर्ग में स्थित हो, तो उसकी दशा राजप्रीति एवं मनोनुकूल फल देती है।

English rendering With Ketu in an angle, the 11th, or a trine — in an auspicious sign, aspected by benefics, exalted, or in a benefic divisional — the text grants royal favour and contentment of mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ-स्थान-सूचकांक समुच्चय: केन्द्र {1, 4, 7, 10} ∪ लाभ {11} ∪ त्रिकोण {5, 9}। अतिरिक्त शर्तें — शुभ-दृष्टि, स्वोच्च, अथवा शुभ-वर्ग (D-वर्ग में शुभ-राशि/मित्रांश)। यह स्थान + वर्ग द्वारों का संयोजन है; निर्गम फल-पक्ष का चयन है, संख्यात्मक गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन; केतु = तुला में। मिथुन से तुला = (7−4)... वस्तुतः तुला मिथुन से 5वाँ भाव (मिथुन=1, कर्क=2, सिंह=3, कन्या=4, तुला=5)। 5 ∈ त्रिकोण {5, 9} → शुभ-स्थान शर्त सत्य → शास्त्रोक्त शुभ-पक्ष सक्रिय (शेष वर्ग/दृष्टि-शर्तों के अधीन)।

47.73
देशाग्रामाधिपत्यं च वाहनं पुत्रसम्भवम् |
देशान्तरप्रयाणं च निर्दिशेत् तत् सुखावहम्
deśāgrāmādhipatyaṃ ca vāhanaṃ putrasambhavam |
deśāntaraprayāṇaṃ ca nirdiśet tat sukhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देश-ग्राम-आधिपत्यम् = देश/ग्राम पर अधिकार; च = और; वाहनम् = वाहन; पुत्रसम्भवम् = पुत्र-प्राप्ति/जन्म; देशान्तर-प्रयाणम् = परदेश-यात्रा; तत् सुखावहम् = वह सुखदायी; निर्दिशेत् = निर्देश करे (शास्त्र-विधि)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की शुभ-स्थितियों में शास्त्र केतु-दशा में देश या ग्राम का आधिपत्य, वाहन-लाभ, पुत्र-संभव और देशान्तर-प्रयाण — इन सबको सुखावह फल के रूप में निर्दिष्ट करता है। यह एक फल-सूची है, न कि गणना-सूत्र।

English rendering Under those conditions the text further assigns lordship over land or village, conveyance, the prospect of a son, and travel to other countries, and marks such outcomes as conducive to ease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ-स्थिति के अधीन फल-सूची/वर्णन।

47.74
पुत्रदारसुखं चैव चतुष्पाज्जीवलाभकृत् |
दुश्चिक्ये षष्ठलाभे वा केतुर्दाये सुखं दिशेत्
putradārasukhaṃ caiva catuṣpājjīvalābhakṛt |
duścikye ṣaṣṭhalābhe vā keturdāye sukhaṃ diśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दार-सुखम् = पुत्र एवं पत्नी का सुख; चतुष्पाज्जीवलाभकृत् = चौपाये (गो-अश्वादि) पशुओं का लाभ कराने वाला; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; षष्ठ-लाभे = छठे अथवा ग्यारहवें में; केतुर्दाये = केतु की दशा में; सुखम् दिशेत् = सुख कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब केतु तृतीय (दुश्चिक्य), षष्ठ अथवा लाभ (11वें) भाव में हो, तो उसकी दशा में पुत्र-पत्नी का सुख एवं चौपाये पशुओं का लाभ कहना चाहिए। ध्यातव्य — केतु के लिए ये उपचय-प्रधान स्थान अनुकूल माने गए हैं।

English rendering With Ketu in the 3rd, 6th, or 11th, the text bids one foretell happiness — the comfort of wife and sons, and the gain of cattle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अनुकूल-स्थान-सूचकांक समुच्चय (केतु हेतु): {3, 6, 11} (दुश्चिक्य · षष्ठ · लाभ — उपचय-वर्ग के स्थान)। यह स्थान-द्वार है; इन सूचकांकों में केतु पड़ते ही सुख-पक्ष चुना जाता है (फल शास्त्र-कथन)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कुम्भ; केतु = धनु में। कुम्भ=1, मीन=2, मेष=3, … धनु = 11वाँ भाव। 11 ∈ {3, 6, 11} → शर्त सत्य → शास्त्रोक्त सुख-पक्ष सक्रिय।

47.75
राज्यं करोति मित्रांशं गजवाजिसमन्वितम् |
दशदौ राजयोगश्च दशामध्ये महद्भयम्
rājyaṃ karoti mitrāṃśaṃ gajavājisamanvitam |
daśadau rājayogaśca daśāmadhye mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यं करोति = राज्य/अधिकार देता है; मित्रांशम् = मित्र के नवांश (D9) में स्थित; गज-वाजि-समन्वितम् = हाथी-घोड़ों से युक्त; दशादौ राजयोगः = दशारम्भ में राजयोग; दशामध्ये महद्भयम् = दशा-मध्य में महान् भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मित्र के नवांश में स्थित केतु राज्य-अधिकार, गज-अश्वादि सम्पदा देता है; उसकी दशा के आरम्भ में राजयोग, किन्तु मध्य-काल में महान् भय कहा गया है। यहाँ पुनः आदि-मध्य-अन्त का काल-विभाजन प्रकट है।

English rendering Set in a friend's navāṃśa, Ketu confers rule and a wealth of elephants and horses; at the daśā's start a royal yoga, but in its middle, great fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो संकेत — (i) मित्रांश = नवांश (D9) परीक्षा: 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश; उस नवांश-राशि का स्वामी केतु-दिष्टकारक से मित्र हो। (ii) दशादौ/दशामध्ये = महादशा-अवधि का त्रिभाग (श्लोक 70 का D3-द्रेष्काण-कालक्रम); आरम्भ-तृतीय → राजयोग, मध्य-तृतीय → भय।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवांश (D9) हमारे षोडश-वर्ग इंजन का केन्द्रीय वर्ग है — प्रत्येक राशि को नौ 3°20′ चापों में विभक्त कर मॉड्युलर-अंकगणित से राशि-मानचित्रण; "मित्रांश" इसी D9 में स्वामी-मैत्री की परीक्षा है। इंजन गणना (D9-राशि) को फल-कथन (राजयोग/भय) से पृथक् रखता है।

47.76
अन्ते दूराटनं चैव देहविश्रमणं तथा |
धने रन्ध्रे व्यये केतौ पापदृष्टियुतेक्षिते
ante dūrāṭanaṃ caiva dehaviśramaṇaṃ tathā |
dhane randhre vyaye ketau pāpadṛṣṭiyutekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = दशा के अन्त में; दूराटनम् = दूर का भ्रमण/प्रवास; देहविश्रमणम् = शारीरिक श्रम/थकान (पाठ-भेद संभव — "देहश्रम"); धने रन्ध्रे व्यये = द्वितीय, अष्टम, व्यय (2/8/12) में; केतौ = केतु के; पापदृष्टियुतेक्षिते = पापग्रह से दृष्ट व युत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा के अन्त में दूर-प्रवास एवं देह-श्रम; तथा जब केतु द्वितीय, अष्टम या व्यय भाव में पापग्रहों से युत-दृष्ट हो, तो (अगले श्लोक के) अशुभ फल कहे जाते हैं। "अन्ते" पद पुनः त्रिविध काल-क्रम का अन्तिम खण्ड सूचित करता है।

English rendering At the close, wandering afar and bodily fatigue; and with Ketu in the 2nd, 8th, or 12th, joined or aspected by malefics (the following ills ensue).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो घटक — (i) अन्त-काल = महादशा-अवधि का तृतीय (अन्तिम) त्रिभाग (D3-कालक्रम, श्लोक 70)। (ii) अनिष्ट-स्थान-सूचकांक समुच्चय: {2, 8, 12} (धन · रन्ध्र · व्यय) + पाप-युति/दृष्टि-ध्वज। इन सूचकांकों में केतु + पाप-संसर्ग → अशुभ-पक्ष चयन।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृषभ; केतु = मकर में। वृषभ=1, मिथुन=2, …, मकर = 9वाँ भाव। 9 ∉ {2, 8, 12} → अनिष्ट-स्थान शर्त असत्य → यह अशुभ-पक्ष इस उदाहरण में सक्रिय नहीं (शेष पाप-दृष्टि-ध्वज पर निर्भर)।

47.77
निगडं बन्धुनाशं च स्थानभ्रंशं मनोरुजम् |
शूद्रसङ्गादिलाभं च कुरुते रोगसंकुलम्
nigaḍaṃ bandhunāśaṃ ca sthānabhraṃśaṃ manorujam |
śūdrasaṅgādilābhaṃ ca kurute rogasaṃkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निगडम् = बेड़ी/बन्धन; बन्धु-नाशम् = बन्धु-हानि; स्थान-भ्रंशम् = पद/स्थान से च्युति; मनोरुजम् = मानसिक पीड़ा; शूद्र-सङ्गादि-लाभम् = शूद्र-संग आदि से लाभ; रोग-संकुलम् = रोगों से घिरा; कुरुते = करता है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की शर्त (केतु २/८/१२ में पाप-दृष्ट/युक्त) पर शास्त्र कहता है कि केतु बन्धन, बन्धु-नाश, स्थान-भ्रंश, मनोरुज्, शूद्र-सङ्ग आदि से होने वाले लाभ, और रोग-संकुलता — ऐसे मिश्रित फल रचता है। यह शास्त्र का फल-कथन है; इसे निश्चित भाग्य या भय-वाक्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering Under those conditions the text states that Ketu produces fetters, loss of kin, fall from position, mental distress, gain through association with the lowly, and a period crowded with illness — reported here as the śāstra’s phala, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अशुभ-स्थिति का मिश्रित फल-कथन (बन्धन / हानि / भ्रंश / रोग-संकुलता के साथ-साथ सीमित लाभ)।

47.78
अथ भूतेषु यः शुक्रा मदरूपेण तिष्ठति |
तस्य दैत्यगुरोर्विप्र कथयामि दशाफलम्
atha bhūteṣu yaḥ śukrā madarūpeṇa tiṣṭhati |
tasya daityagurorvipra kathayāmi daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरण-आरम्भ); भूतेषु = प्राणियों/लोक-तत्त्वों में; शुक्रः = शुक्र (शुक्र ग्रह; दैत्यगुरु); मदरूपेण = मद-रूप से (माधुर्य/सौन्दर्य-स्वभाव से; पाठ-भेद संभव); तिष्ठति = स्थित है; दैत्यगुरोः = दैत्यगुरु (शुक्र) का; विप्र = हे ब्राह्मण/शिष्य; दशाफलम् = दशा का फल; कथयामि = कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब शुक्र-दशा के फल का प्रकरण खोलता है। पराशर शिष्य को संबोधित कर कहते हैं कि जो शुक्र भूतों में मदरूप से स्थित है — अर्थात् दैत्यगुरु शुक्र — उसके दशा-फल को अब क्रम से कहा जाएगा। यह श्लोक फल-सूची का द्वार है, न कि स्वयं कोई विस्तृत फल-कथन।

English rendering The text now opens the results of Venus’s period. Parāśara tells the disciple that he will declare the daśā-phala of Śukra, the preceptor of the daityas, who stands in that madā-like form among beings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल-प्रकरण का उद्घाटन। यह श्लोक शुक्र-महादशा के फल-वर्णन का शीर्ष-सूत्र है; काल-मान यहाँ नहीं दिया गया — वह विंशोत्तरी-चक्र के शुक्र-अंश (२० वर्ष) से आता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में शुक्र-महादशा = २० वर्ष (केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; योग = १२०)। अन्तरदशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ १२० — शुद्ध अनुपात-गणित, चन्द्र-नक्षत्र-अंश पर आधारित। यह श्लोक उसी शुक्र-दशा-फल-श्रृंखला का आरम्भ-चिह्न है जिसे इंजन काल-अनुपात से चलाता है; फल-वाक्य शास्त्र के कथन हैं, नियति-घोषणा नहीं।

47.79
परमोच्चगते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे |
नृपाऽभिषेकसम्प्राप्तिर्वाहनाऽम्बरभूषणम्
paramoccagate śukre svocce svakṣetrakendrage |
nṛpā'bhiṣekasamprāptirvāhanā'mbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमोच्चगते = परम-उच्च पर स्थित; शुक्रे = शुक्र में/शुक्र के; स्वोच्चे = स्व-उच्च (मीना/मीन में शुक्र का उच्च); स्वक्षेत्र = स्व-राशि (वृष/तुला); केन्द्रगे = केन्द्र-स्थित (१, ४, ७, १० भाव); नृपाभिषेक = राज्याभिषेक/राज-प्राप्ति; सम्प्राप्तिः = प्राप्ति; वाहन = यान; अम्बर = वस्त्र; भूषणम् = आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शुक्र परमोच्च पर हो, अथवा स्व-उच्च/स्वक्षेत्र में केन्द्रगत हो, तब शुक्र-दशा में राज्याभिषेक-तुल्य प्रतिष्ठा, वाहन, उत्तम वस्त्र और आभूषण की प्राप्ति का वर्णन है। यह फल शुक्र की बलवती स्थिति से जोड़ा गया है। पाठ-भेद और भाव-गृह-पद्धति के अनुसार “केन्द्र” की गणना घोषित करनी चाहिए।

English rendering The text states that when Venus is at extreme exaltation, or exalted / in own sign and in a kendra, the Venus period is said to bring royal consecration-like status, conveyances, fine garments, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थिति-शर्त सहित फल-कथन। शर्तें कम्प्यूटेशनल द्वार हैं: (१) परमोच्च/उच्च = शुक्र की स्पष्ट देशान्तर ° मीना-उच्च-बिन्दु के समीप (परम्परागत उच्च-अंश घोषित करें); (२) स्वक्षेत्र = वृष या तुला; (३) केन्द्र = लग्न से १, ४, ७, १०। अयनांश और भाव-पद्धति (श्रीपति/पोर्फिरी आदि) बदलें तो केन्द्र-सदस्यता बदल सकती है — परिपाटी घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न = १०° सिंह, शुक्र = २७° मीन (स्व-उच्च), अयनांश = लाहिरी। मीन लग्न से ८वीं; यदि लग्न-केन्द्र-परीक्षा: शुक्र केन्द्र में नहीं। यदि शुक्र = १५° वृष और लग्न = ५° वृष, तो शुक्र स्वक्षेत्र + केन्द्र (लग्न) — इस श्लोक की “स्वक्षेत्रकेन्द्रगे” शर्त लागू; फल-वाक्य शास्त्र-कथन के रूप में पढ़ें, न कि निश्चित घटना के रूप में।

47.80
गजाश्वपशुलाभं च नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् |
अखण्डमण्डलाधीशाराजसन्मानवैभवम्
gajāśvapaśulābhaṃ ca nityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
akhaṇḍamaṇḍalādhīśārājasanmānavaibhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गज = हाथी; अश्व = घोड़ा; पशु = पशुधन; लाभम् = प्राप्ति; नित्यम् = सदैव/लगातार; मिष्ठान्न = मधुर भोजन; भोजनम् = आहार; अखण्डमण्डलाधीश = अखण्ड मण्डल का अधीश्वर (अविच्छिन्न राज्य-प्रभुता); राजसन्मान = राजकीय सम्मान; वैभवम् = ऐश्वर्य।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ-शुक्र-स्थिति के क्रम में शास्त्र कहता है — गज, अश्व और पशु-लाभ, नित्य मिष्ठान्न-भोग, तथा अखण्ड मण्डलाधीश-तुल्य प्रभुता, राजसन्मान और वैभव का वर्णन है। यह विस्तार उसी उत्कृष्ट शुक्र-दशा-फल का है। “अखण्डमण्डलाधीश” शास्त्रीय उपमा है, आधुनिक राज-सिंहासन का वाद-पत्र नहीं।

English rendering Continuing the auspicious Venus-period results, the text states gains of elephants, horses, and cattle, continual enjoyment of sweet food, and unbroken sovereign dignity with royal honour and splendour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-शुक्र-दशा का विस्तार)। कोई नवीन अंश, वर्ष-मान या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं; लागू होने की कुंजी पूर्व श्लोक की स्थिति-शर्तें और विंशोत्तरी शुक्र-काल हैं।

47.81
मृदङ्गवाद्यघोषं च गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् |
त्रिकोणस्थे निजे तस्मिन् राज्यार्थगृहहसम्पदः
mṛdaṅgavādyaghoṣaṃ ca gṛhe lakṣmīkaṭākṣakṛt |
trikoṇasthe nije tasmin rājyārthagṛhahasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृदङ्गवाद्यघोषम् = मृदङ्ग आदि वाद्य-नाद; गृहे = घर में; लक्ष्मीकटाक्षकृत् = लक्ष्मी के कटाक्ष (अनुग्रह) को करने वाला; त्रिकोणस्थे = त्रिकोण में स्थित (लग्न से १, ५, ९); निजे = स्व-स्थान/स्वराशि में; तस्मिन् = उस (शुक्र) के; राज्य = राज्य/शासन; अर्थ = धन; गृह = गृह; ह = हर्ष/सुख (पाठ-भेद संभव — “गृहहसम्पदः”); सम्पदः = सम्पत्तियाँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुभ स्थिति में शुक्र-दशा घर में उत्सव-वाद्य और लक्ष्मी-अनुग्रह का संकेत देती है। जब वही शुक्र त्रिकोणस्थ या निज-स्थान में हो, तब राज्य, अर्थ, गृह और सम्पद का फल कहा गया है। “गृहहसम्पदः” पाठ में हर्ष/हास-संपद का संकेत संभव है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states festive drum-and-music in the house and the favour of Lakṣmī; and when that Venus stands in a trikoṇa or in his own place, kingdom, wealth, home, and prosperity are declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थिति-शर्त सहित फल-कथन। त्रिकोण = लग्न से भाव १, ५, ९ (पूर्ण-भाव या भावाधिपति-परिपाटी घोषित करें)। निज = शुक्र की स्वराशि वृष/तुला, अथवा कुछ पाठों में उच्च-सह; यहाँ “निजे” को स्वक्षेत्र-प्रधान पढ़ना सुरक्षित। कोई नया दशा-वर्ष या बिन्दु-योग नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = ०° मकर, शुक्र = १२° वृष → शुक्र भाव ५ (त्रिकोण) + स्वक्षेत्र। शर्त “त्रिकोणस्थे निजे” दोनों ओर से मजबूत; दशा = विंशोत्तरी शुक्र। फल-पंक्तियाँ शास्त्र के कथन के रूप में लागू; अयनांश बदले तो राशि/भाव-सीमाएँ पुनः जाँचें।

47.82
विवाहोत्सवकार्याणि पुत्रकल्याणवैभवम् |
सेनाधिपत्यं कुरुते इष्टबन्धुसमागनम्
vivāhotsavakāryāṇi putrakalyāṇavaibhavam |
senādhipatyaṃ kurute iṣṭabandhusamāganam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवाह = विवाह; उत्सव = उत्सव; कार्याणि = कार्य; पुत्रकल्याण = पुत्र-सुख/पुत्र-मंगल; वैभवम् = वैभव; सेनाधिपत्यम् = सेना-अधिकार/सेनापति-पद; कुरुते = करता है (दशा); इष्टबन्धु = अभीष्ट बन्धु; समागमम् = मिलन/आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुभ शुक्र-दशा में विवाह और उत्सव-कार्य, पुत्र-कल्याण और वैभव, सेनाधिपत्य, तथा इष्ट बन्धुओं का समागम होता है — ऐसा फल-वर्णन है। यह उसी शुभ-प्रकरण की कड़ी है; “सेनाधिपत्य” को शास्त्रीय पद-सम्मान के रूप में पढ़ें, न कि आधुनिक सैन्य-नियुक्ति की गारंटी के रूप में।

English rendering The text states that (in such a Venus period) there are marriage and festival undertakings, a son’s welfare and splendour, command of forces, and reunion with desired kinsfolk.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गणना पूर्ववत: विंशोत्तरी शुक्र-महादशा (२० वर्ष) + शुक्र की बलवती/शुभ स्थिति; कोई पृथक् अंक-सूत्र यहाँ नहीं।

47.83
नष्टराज्याद्धनप्राप्तिं गृहे गोधनसङ्ग्रहम् |
षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे नीचे वा व्ययराशिगे
naṣṭarājyāddhanaprāptiṃ gṛhe godhanasaṅgraham |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye śukre nīce vā vyayarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नष्टराज्यात् = नष्ट हुए राज्य से; धनप्राप्तिम् = धन की प्राप्ति; गृहे = घर में; गोधन = गो-धन (पशु-सम्पत्ति); सङ्ग्रहम् = संग्रह; षष्ठ = छठा भाव; अष्टम = आठवाँ भाव; व्यय = बारहवाँ भाव (व्यय); शुक्रे = शुक्र के; नीचे = नीच (कन्या में शुक्र-नीच); वा = अथवा; व्ययराशिगे = व्यय-राशि में स्थित (१२वीं राशि/व्यय-स्थान; पाठ-भेद/अर्थ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ श्लोक दो पटल जोड़ता है। पहले पाद में शास्त्र अभी भी शुभ-क्रम में कहता है — नष्ट राज्य से धन-प्राप्ति और घर में गोधन-संग्रह। दूसरे पाद में अशुभ-स्थिति का द्वार खुलता है: जब शुक्र षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो, अथवा नीच हो, अथवा व्यय-राशिगत हो — तब अगला श्लोक का कष्ट-फल लागू होता है। शर्त और फल को अलग रखें।

English rendering The text first continues auspicious notes — wealth regained from a lost dominion and accumulation of cattle-wealth at home — then sets the adverse gate: when Venus is in the 6th, 8th, or 12th, or debilitated, or placed in a vyaya-rāśi, the following afflictions apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दोष-स्थान-शर्त। कम्प्यूटेशनल द्वार: भाव ६/८/१२ = लग्न से पूर्ण-भाव या unequally-divided भाव (पद्धति घोषित करें); नीच = शुक्र कन्या में (नीच-अंश परम्परा से, प्रायः २७° कन्या के आसपास परमनीच — परिपाटी लिखें); व्ययराशि = व्यय-भाव की राशि या १२वीं गणना। अयनांश से राशि-प्रवेश बदल सकता है।

उदाहरण (worked example) लग्न = १०° मिथुन, शुक्र = २०° वृश्चिक → लग्न से ६ठा भाव (पूर्ण-भाव), अयनांश = लाहिरी। शर्त “षष्ठा…शुक्रे” लागू → ४७.८४ का फल-पक्ष शास्त्र-कथन के रूप में पढ़ें। यदि शुक्र = ५° तुला (स्वक्षेत्र, केन्द्र/त्रिकोण-योग्यता जाँचें) तो यह अशुभ-द्वार नहीं खुलता।

47.84
आत्मबन्धुजनद्वेषं दारवर्गादिपीडनम् |
व्यवसायात्फ्लं नष्टं गोमहिष्यादिहानिकृत्
ātmabandhujanadveṣaṃ dāravargādipīḍanam |
vyavasāyātphlaṃ naṣṭaṃ gomahiṣyādihānikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मबन्धुजन = स्वयं और बन्धु-जन; द्वेषम् = द्वेष/वैमनस्य; दारवर्ग = पत्नी-वर्ग; आदि = इत्यादि; पीडनम् = पीड़न/क्लेश; व्यवसायात् = व्यवसाय से; फलम् = फल/लाभ; नष्टम् = नष्ट; गो = गौ; महिषी = भैंस; आदि = इत्यादि; हानिकृत् = हानि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अशुभ-शुक्र-स्थिति (षष्ठ-अष्टम-व्यय, नीच, व्ययराशि) पर शास्त्र कहता है — आत्म-बन्धु से द्वेष, दार-वर्ग आदि की पीड़ा, व्यवसाय का फल नष्ट होना, तथा गो-महिषी आदि की हानि — ऐसा फल-वर्णन है। यह शास्त्र का कथन है, न कि निश्चित घटना और न ही भय-वाणी। दशा-फल को स्थिति, बल और सम्पूर्ण कुण्डली-सन्दर्भ के साथ ही शास्त्रीय पद्धति में तौला जाता है।

English rendering Under those adverse Venus placements, the text states enmity with oneself and one’s kin, affliction to the spouse-class and related circles, loss of the fruit of one’s enterprise, and harm to cattle such as cows and buffaloes — as śāstra-phala, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-शुक्र-दशा)। लागू करने का द्वार ४७.८३ की स्थिति-शर्तें + विंशोत्तरी शुक्र-काल; यहाँ कोई नवीन वर्ष-संख्या, वर्ग-सूत्र या बलांक नहीं। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें — चिकित्सा/विधि/वित्त-भविष्यवाणी नहीं, और न ही उपाय-दबाव।

47.85
दारपुत्रादिपीडा वा आत्मबन्धुवियोगकृत् |
भाग्यकर्माधिपत्येन लग्नवाहनराशिगे
dāraputrādipīḍā vā ātmabandhuviyogakṛt |
bhāgyakarmādhipatyena lagnavāhanarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दार = पत्नी; पुत्रादि = पुत्र आदि; पीडा = कष्ट/पीड़ा; आत्मबन्धु = स्वजन/आत्मीय बन्धु; वियोगकृत् = वियोग करने वाला; भाग्य-अधिप = 9वें भाव का स्वामी; कर्म-अधिप = 10वें भाव का स्वामी; लग्न-वाहन-राशिगे = लग्न तथा वाहन (4था भाव) की राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उक्त दशा-प्रसंग में) पत्नी-पुत्र आदि को पीड़ा हो सकती है, अथवा आत्मा के बन्धुओं से वियोग का संकेत मिलता है। साथ ही भाग्य (9) और कर्म (10) के अधिपत्य से जब ग्रह लग्न अथवा वाहन-राशि में स्थित हो — यह पद अगले श्लोक के «तद्दशायाम्» फल की शर्त भी बाँधता है। पाठ-भेद संभव; पद-क्रम कुछ संस्करणों में पूर्व-फल से जुड़ा माना जाता है।

English rendering The text states either affliction to spouse, children and the like, or separation from one’s own kin. It also situates the condition under the lordship of the ninth and tenth, when the planet stands in the lagna or the conveyance (fourth) sign — a premise taken up by the next verse’s “in that daśā.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-अवस्था पर आधारित शास्त्रीय संकेत)। भाव-स्वामित्व (9, 10) और राशि-स्थिति (लग्न, 4) यहाँ केवल फल-शर्त हैं, कोई अंश/काल-गणना नहीं।

47.86
तद्दशायां महत्सौख्यं देशग्रामाधिपालता |
देवालयतडागादिपुण्यकर्मसु संग्रहः
taddaśāyāṃ mahatsaukhyaṃ deśagrāmādhipālatā |
devālayataḍāgādipuṇyakarmasu saṃgrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दशायाम् = उस दशा में; महत्-सौख्यम् = महान् सुख; देश-ग्राम-अधिपालता = देश/ग्राम पर अधिपत्य; देवालय = मंदिर; तडागादि = तालाब आदि; पुण्य-कर्मसु = पुण्य-कर्मों में; संग्रहः = संलग्नता/संग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त स्थिति वाली तद्-दशा में महान् सौख्य का फल बताया गया है। देश अथवा ग्राम का अधिपाल-सा सम्मान/अधिकार भी कहा गया है। देवालयों, तडागों आदि पुण्य-कर्मों में संग्रह — अर्थात् धर्म-कार्य में जुड़ाव — का उल्लेख है। यह सब शास्त्र का फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that in that daśā there is great ease and well-being, overlordship of land or village, and engagement in meritorious works such as temples, tanks and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-फल का सकारात्मक पक्ष)। «तद्दशा» का निर्देश पूर्व श्लोक की शर्त (भाग्य-कर्म-अधिप, लग्न/वाहन-राशि) से जुड़ा है।

47.87
अन्नदाने महत्सौख्यं नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् |
उत्साहः कीर्तिसम्पत्ती स्त्रीपुत्रधनसम्पदः
annadāne mahatsaukhyaṃ nityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
utsāhaḥ kīrtisampattī strīputradhanasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्न-दाने = अन्न-दान में; महत्-सौख्यम् = महान् सुख; नित्यम् = प्रतिदिन; मिष्ठान्न-भोजनम् = मिष्ठान्न का भोजन; उत्साहः = उत्साह; कीर्ति-सम्पत्ती = यश और संपत्ति; स्त्री-पुत्र-धन-सम्पदः = स्त्री, पुत्र और धन की समृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अन्न-दान के प्रसंग में महान् सौख्य बताया गया है। नित्य मिष्ठान्न-भोजन का सुख भी कहा गया है। उत्साह, कीर्ति और संपत्ति का उदय, तथा स्त्री-पुत्र-धन की सम्पद् — ये सब इसी दशा-फल-श्रृंखला के सकारात्मक कथन हैं। इन्हें गणना-परिणाम नहीं, शास्त्रीय फल-सूची समझें।

English rendering The text states great happiness in the giving of food, daily enjoyment of sweet fare, enthusiasm, fame with wealth, and prosperity of spouse, children and riches.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दान-सुख, कीर्ति-धन-परिवार सम्पद्)। कोई वर्ग, बिन्दु या वर्ष-अनुपात यहाँ नहीं।

47.88
स्वभुक्तौ फलमेवं स्याद्बलान्यन्यानि भुक्तिषु |
द्वितीयद्यूननाथे तु देहपीडा भविष्यति
svabhuktau phalamevaṃ syādbalānyanyāni bhuktiṣu |
dvitīyadyūnanāthe tu dehapīḍā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-भुक्तौ = अपनी भुक्ति (शुक्र-अन्तर्दशा) में; फलम् एवम् स्यात् = फल इसी प्रकार होगा; बलानि अन्यानि भुक्तिषु = अन्य भुक्तियों में (उन-उन ग्रहों के) बल फल-निर्धारक होते हैं; द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (2) और द्यून (7 = सप्तम) के स्वामी की भुक्ति में; देह-पीडा भविष्यति = शारीरिक कष्ट (शास्त्र-कथित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त फल विशेषतः शुक्र की अपनी भुक्ति (शुक्र-में-शुक्र अन्तर्दशा) में समझना चाहिए; शेष भुक्तियों में उन-उन अन्तर्ग्रहों के अपने बल के अनुसार फल बदलते हैं। और द्वितीयेश-सप्तमेश (मारक) की भुक्ति में देह-पीड़ा कही गई है।

English rendering In its own sub-period the fruit is as described; in the other sub-periods the [respective planets'] strengths govern the result. But under the lord of the 2nd and 7th, bodily affliction is said to arise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ भुक्ति = अन्तर्दशा की गणना निहित है (विंशोत्तरी):
अन्तर्दशा-काल = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
शुक्र महादशा = 20 वर्ष। "बलानि अन्यानि भुक्तिषु" का तात्पर्य — प्रत्येक भुक्ति का फल उस अन्तर्ग्रह के अपने बल (षड्बल) से नियंत्रित होता है।
द्वितीयेश व सप्तमेश = मारक — इनकी भुक्ति में देह-पीड़ा शास्त्र-कथित है (नियति नहीं)।

उदाहरण (worked example) शुक्र महादशा (20 वर्ष), विंशोत्तरी परम्परा:
• स्वभुक्ति (शुक्र-शुक्र) = (20 × 20) ÷ 120 = 400/120 = 3.333… वर्ष = 3 वर्ष 4 मास — यही "स्वभुक्तौ फलम् एवम्" का काल।
• मान लें सप्तमेश शनि है → शुक्र-शनि भुक्ति = (20 × 19) ÷ 120 = 380/120 = 3.1666… वर्ष = 3 वर्ष 2 मास — यह मारक-भुक्ति है, जिसमें श्लोक देह-पीड़ा कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उस अनुपात-गणित पर बैठता है जिसे हमारे विंशोत्तरी दशा-इंजन में पिन किया गया है — अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120, शुक्र-अंश = 20 वर्ष, Σ = 120। "बलानि अन्यानि भुक्तिषु" पंक्ति भुक्ति-फल को अन्तर्ग्रह के षड्बल से जोड़ती है (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्बल — 1 रूप = 60 विरूप) — अर्थात् काल (भुक्ति-अवधि) गणना है और मारक-चयन (2/7 अधिपति) नियम है; देह-पीड़ा शास्त्र का कथन है, जिसे हम फल-रूप में उद्धृत करते हैं, प्रमाणित भविष्य-वाणी रूप में नहीं।

47.89
तद्दोषपरिहारार्थं रुद्रं वा त्र्यम्बकं जपेत् |
स्वेतां गां महिषीं दव्यादारोग्यं च ततो भवेत्
taddoṣaparihārārthaṃ rudraṃ vā tryambakaṃ japet |
svetāṃ gāṃ mahiṣīṃ davyādārogyaṃ ca tato bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के परिहार (शमन) हेतु; रुद्रं वा त्र्यम्बकं जपेत् = रुद्र अथवा त्र्यम्बक (महामृत्युञ्जय) मन्त्र का जप करे; श्वेतां गां महिषीं दद्यात् = श्वेत गाय और भैंस दान करे (स्वेतां = श्वेतां; दव्यात् = दद्यात्, पाठ-भेद संभव); आरोग्यं च ततो भवेत् = और उससे आरोग्य होता है (शास्त्र-कथित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस (मारक-भुक्ति-जनित देह-पीड़ा रूप) दोष के परिहार के लिए रुद्र अथवा त्र्यम्बक मन्त्र का जप करे और श्वेत गाय एवं भैंस का दान करे; इससे आरोग्य की प्राप्ति कही गई है। यह शास्त्र का अपना विधान है — भय या दबाव के रूप में नहीं।

English rendering To allay that affliction one should recite [the mantra of] Rudra, the Tryambaka; one should give a white cow and a she-buffalo, and thereby, the text says, health follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान (परिहार-कथन)। यह श्लोक 88 की मारक-देह-पीड़ा का उपचार-पक्ष है; इसमें कोई काल, बल या अंश की गणना नहीं, केवल जप-दान का शास्त्रोक्त विधान है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पद्धति-अनुशासन के अनुसार हम इसे शास्त्र का अपना विधान मानकर उद्धृत करते हैं — गणना (भुक्ति-काल, मारक-चयन) और व्याख्या (परिहार) को पृथक् रखते हुए। परिहार-श्लोक को न तो हम अनिवार्य/भयजनक उपाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं, न आरोग्य की गारण्टी के रूप में; यह केवल पाठ की अपनी वाणी है, जिसे भय-रहित और दबाव-रहित ढंग से दर्ज किया गया है।

अध्यायः 48

विशेषनक्षत्रदशाफलाध्यायः

20 श्लोक
48.1
स्थानस्थितिवशेनैवं फलं प्रोक्तं पुरातनैः |
मिथो भावेशसम्बन्धात्फलानि कथयाम्यहम्
sthānasthitivaśenaivaṃ phalaṃ proktaṃ purātanaiḥ |
mitho bhāveśasambandhātphalāni kathayāmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थान-स्थिति = भाव में ग्रह/भावेश की स्थिति; एवम् = इस प्रकार; फलम् = दशाफल; प्रोक्तम् पुरातनैः = प्राचीन आचार्यों ने कहा; मिथः = परस्पर; भावेश-सम्बन्धात् = भावों के स्वामियों के आपसी सम्बन्ध से; फलानि = फल; कथयामि अहम् = मैं (पराशर) कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं — अब तक पूर्वाचार्यों ने ग्रह की केवल स्थान-स्थिति (किस भाव में बैठा है) के आधार पर फल बताया; अब मैं भावेशों के परस्पर सम्बन्ध (एक भावस्वामी का दूसरे भावस्वामी से योग/स्थिति) के आधार पर दशाफल कहूँगा। यह अध्याय की प्रतिज्ञा-वाक्य (उपक्रम) है, स्वयं कोई फल नहीं।

English rendering "By mere placement the ancients declared the result; now I shall tell the fruits arising from the mutual relationship of the house-lords." A programmatic opening: the chapter's subject is bhāveśa-based daśā-phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-प्रस्तावना / संवाद। तकनीकी बिन्दु यह है कि "भावेश" एक निर्धारक लुक-अप है: भाव Bₖ का स्वामी = उस भाव में स्थित राशि का अधिपति; फल की गणना दो चरणों में है — पहले भाव-सूचकांक → स्वामी (शुद्ध ज्यामिति), फिर उस स्वामी की दशा-अवधि (शुद्ध अंकगणित), और अन्त में शास्त्रोक्त फल-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरा अध्याय दशाफल का है, और दशा-अवधि स्वयं एक पिन-किया हुआ गणित है — विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120)। हमने इसी विभाजन को दशा-इंजन में रखा है। इस पुस्तक की अनुशासन-रेखा वही है जो यह श्लोक स्थापित करता है: अवधि गणना है, फल शास्त्र का कथन — भविष्यवाणी नहीं जिसे हम प्रमाणित करें।

48.2
लग्नेशस्य गशाकाले सत्कीतिर्देहजं सुखम् |
धनेशस्य दशायां तु क्लेशो वा मृत्युतो भयम्
lagneśasya gaśākāle satkītirdehajaṃ sukham |
dhaneśasya daśāyāṃ tu kleśo vā mṛtyuto bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशस्य = प्रथम-भावस्वामी (तनु/देह) की; (ग)दशाकाले = दशा-काल में ("गशा" → "दशा", पाठ-भेद संभव); सत्कीर्तिः = सुयश; देहजम् सुखम् = शारीरिक सुख/आरोग्य; धनेशस्य = द्वितीय-भावस्वामी (धन) की; दशायाम् = दशा में; क्लेशः = कष्ट; मृत्युतो भयम् = मृत्यु से भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नेश की दशा में मनुष्य को सुकीर्ति और देह-सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है। परन्तु धनेश (द्वितीयेश) की दशा में क्लेश अथवा मृत्यु का भय बताया गया है — क्योंकि द्वितीय भाव मारक-स्थान भी है। ये फल पाठ के अपने कथन हैं।

English rendering In the daśā of the Ascendant-lord, good repute and bodily comfort; in the daśā of the 2nd-lord, however, distress or fear from death — the 2nd being a māraka house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्निहित तकनीक: भाव-अर्थ का सूचकांक-मानचित्रण — 1 = देह/तनु (अतः "देहज सुख"), 2 = धन परन्तु मारक-वर्ग (2,7 मारक-स्थान), इसीलिए धनेश-दशा में "मृत्युतो भयम्" जुड़ता है। मारक-वर्गीकरण {2, 7} एक निश्चित नियम है, फल उसका शास्त्रीय अन्वय।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्रत्येक दशा जिस अवधि पर टिकी है वह विम्शोत्तरी इंजन से आती है (महादशा-वर्ष चन्द्र-नक्षत्र से कीलित; अन्तर्दशा = महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120)। लग्नेश या धनेश "कौन-सा ग्रह" है यह लग्न-राशि से तय होता है — शुद्ध लुक-अप; उस पर लगा शुभ/अशुभ फल पाठ का दावा है, हमारा नहीं।

48.3
सहजेशदशाकाले ज्ञेयं पापफलं नृणाम् |
सुखाधीशदशायां तु गृहभूमिसुखं भवेत्
sahajeśadaśākāle jñeyaṃ pāpaphalaṃ nṛṇām |
sukhādhīśadaśāyāṃ tu gṛhabhūmisukhaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहज-ईश = तृतीय-भाव-स्वामी; दशा-काले = दशा-समय में; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; पाप-फलम् = अशुभ/कठिन फल (शास्त्र-शब्द); नृणाम् = मनुष्यों के लिए; सुख-अधीश = चतुर्थ-भाव-स्वामी (सुख-स्थान का अधिपति); दशायाम् = दशा में; तु = परन्तु; गृह-भूमि-सुखम् = घर-भूमि का सुख; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सहजेश (तृतीयेश) की दशा में मनुष्यों के लिए पाप-फल जानना चाहिए। सुखाधीश (चतुर्थेश) की दशा में गृह और भूमि से सुख होता है — ऐसा पाठ कहता है। दोनों फल भाव-स्वामित्व पर टिके हैं।

English rendering The text states that in the daśā of the third-lord, adverse results for people are to be understood; in the daśā of the fourth-lord, happiness from house and land is said to occur.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तृतीय/चतुर्थेश = लग्न से 3/4 भाव के स्वामी; दशा-काल ग्रह-दशा-चक्र से, फल इस श्लोक का शास्त्र-वचन।

48.4
पञ्चमेशस्य पाके च विद्याप्तिः पुत्रजं सुखम् |
रोगेशस्य दशाकाले देहपीडा रिपोर्भयम्
pañcameśasya pāke ca vidyāptiḥ putrajaṃ sukham |
rogeśasya daśākāle dehapīḍā riporbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमेशस्य = पञ्चम-भावस्वामी (विद्या/सन्तान) की; पाके = दशा-परिपाक (फल-प्राप्ति) में; विद्याप्तिः = विद्या-लाभ; पुत्रजम् सुखम् = सन्तान-जनित सुख; रोगेशस्य = षष्ठ-भावस्वामी (रोग/शत्रु) की; दशाकाले = दशाकाल में; देहपीडा = शारीरिक पीड़ा; रिपोः भयम् = शत्रु से भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पञ्चमेश की दशा के परिपाक में विद्या की प्राप्ति और सन्तान से सुख होता है; किन्तु रोगेश (षष्ठेश) की दशा में देह-पीड़ा और शत्रु से भय बताया गया है। दोनों फल भावों के अपने अर्थ-क्षेत्र से मेल खाते हैं।

English rendering In the ripening of the 5th-lord's daśā, gain of learning and joy from children; in the 6th-lord's, bodily affliction and fear from foes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "पाक" = दशा-परिपाक, अर्थात् उस अवधि-खण्ड का सक्रिय होना — एक काल-सूचक, न कि पृथक् गणित। भाव-मानचित्रण: 5 = विद्या/मन्त्र/सन्तान (त्रिकोण, शुभ), 6 = रोग/ऋण/शत्रु (त्रिक/दुःस्थान); फल इन्हीं सूचकांक-अर्थों का अनुसरण करता है।

48.5
सप्तमेशस्य पाके तु स्त्रीपीडा मृत्युतो भयम् |
अष्टमेशदशाकाले मृत्युभीतिर्धनक्षतिः
saptameśasya pāke tu strīpīḍā mṛtyuto bhayam |
aṣṭameśadaśākāle mṛtyubhītirdhanakṣatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमेशस्य = सप्तम-भावस्वामी (कलत्र) की; पाके = दशा-परिपाक में; स्त्रीपीडा = पत्नी/स्त्री-सम्बन्धी कष्ट; मृत्युतो भयम् = मृत्यु से भय (सप्तम भी मारक); अष्टमेश = अष्टम-भावस्वामी (रन्ध्र/आयु); दशाकाले = दशाकाल में; मृत्युभीतिः = मृत्यु-भय; धनक्षतिः = धन-हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तमेश की दशा में स्त्री/दाम्पत्य-सम्बन्धी पीड़ा तथा मृत्यु का भय होता है (सप्तम मारक-स्थान है); और अष्टमेश की दशा में मृत्यु-भय एवं धन-हानि बताई गई है। ये पाठोक्त संकेत हैं, अटल विधान नहीं।

English rendering In the 7th-lord's ripening, distress concerning the spouse and fear from death; in the 8th-lord's daśā, dread of death and loss of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी बिन्दु: मारक-वर्ग {2, 7} का पुनरावर्तन — सप्तमेश के साथ "मृत्युतो भयम्" इसी वर्गीकरण से जुड़ता है; 8 = आयु/रन्ध्र/छिद्र → "मृत्युभीति, धनक्षति"। सूचकांक निश्चित है; भय की भाषा पाठ का कथन है, इसे भविष्यवाणी न मानें।

48.6
धर्मशस्य दशायां च भूरिल्लाभो यशःसुखम् |
दशमेशदशाकाले सम्मानं नृपसंसदि
dharmaśasya daśāyāṃ ca bhūrillābho yaśaḥsukham |
daśameśadaśākāle sammānaṃ nṛpasaṃsadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मेशस्य = नवम-भावस्वामी (धर्म/भाग्य) की ("धर्मशस्य" → "धर्मेशस्य", पाठ-भेद संभव); दशायाम् = दशा में; भूरिः लाभः = प्रचुर लाभ; यशः-सुखम् = यश व सुख; दशमेश = दशम-भावस्वामी (कर्म/राज्य); दशाकाले = दशाकाल में; सम्मानम् = मान/प्रतिष्ठा; नृप-संसदि = राजसभा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — धर्मेश (नवमेश) की दशा में प्रचुर लाभ, यश और सुख की प्राप्ति होती है; और दशमेश की दशा में राजसभा (शासन/उच्च-मण्डल) में सम्मान मिलता है। नवम व दशम — भाग्य और कर्म — के शुभ स्वभाव के अनुरूप फल हैं।

English rendering In the 9th-lord's daśā, abundant gain with fame and comfort; in the 10th-lord's, honour in the royal assembly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संरचनात्मक बिन्दु: 9 = श्रेष्ठ त्रिकोण (धर्म/भाग्य), 10 = श्रेष्ठ केन्द्र (कर्म/राज्य) — दोनों शुभ-प्रधान भाव, अतः फल में लाभ/यश/सम्मान। यही केन्द्र-त्रिकोण की महत्ता आगे 48.9–13 में सूत्रबद्ध होती है।

48.7
लाभेशस्य दशाकाले लाभे बाधा रुजोभयम् |
व्ययेशस्य दशा नृणां बहुकष्टप्रदा द्विज
lābheśasya daśākāle lābhe bādhā rujobhayam |
vyayeśasya daśā nṛṇāṃ bahukaṣṭapradā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभेशस्य = एकादश-भावस्वामी (लाभ) की; दशाकाले = दशाकाल में; लाभे बाधा = लाभ में विघ्न (पाठ-भेद संभव — अन्य पाठ "लाभो" = लाभ पढ़ते हैं); रुजः भयम् = रोग से भय; व्ययेशस्य = द्वादश-भावस्वामी (व्यय) की; दशा = दशा; नृणाम् = मनुष्यों को; बहु-कष्ट-प्रदा = अत्यधिक कष्टकारी; द्विज = हे द्विज (मैत्रेय-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र (इस पाठ में) कहता है — लाभेश (एकादशेश) की दशा में लाभ में बाधा तथा रोग का भय, और व्ययेश (द्वादशेश) की दशा में बहुत कष्ट होता है, हे द्विज। ध्यान दें: "लाभे बाधा" पाठ विवादास्पद है — कई पाठान्तर एकादशेश-दशा में लाभ ही कहते हैं; अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering In the 11th-lord's daśā (per this reading), obstruction in gains and fear of disease; the 12th-lord's daśā, O twice-born, brings much affliction — the 11th-lord clause being a contested reading.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विवादित पाठ)। सूचकांक: 11 = लाभ/आय (उपचय, प्रायः शुभ), 12 = व्यय/हानि (दुःस्थान)। चूँकि 11वें का शुभ स्वभाव यहाँ के "बाधा" पाठ से टकराता है, यह ठीक वह स्थान है जहाँ अनुशासन कहता है — पाठ पहले पिन करो, फिर फल; संदिग्ध पाठ को दृढ़ मत बनाओ।

48.8
दशारम्भे शुभस्थाने स्थितस्यापि शुभं फलम् |
अशुभस्थानगस्यैवं शुभस्यापि न शोभनम्
daśārambhe śubhasthāne sthitasyāpi śubhaṃ phalam |
aśubhasthānagasyaivaṃ śubhasyāpi na śobhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशारम्भे = दशा के आरम्भ में; शुभस्थाने स्थितस्य = शुभ भाव में स्थित (ग्रह) का; अपि = भी; शुभम् फलम् = शुभ फल; अशुभस्थानगस्य = अशुभ (दुःस्थान) में स्थित का; एवम् = इसी प्रकार; शुभस्य अपि = शुभ ग्रह का भी; न शोभनम् = शुभ नहीं (अच्छा नहीं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा के आरम्भ में जो ग्रह शुभ भाव में स्थित हो उसका फल शुभ होता है; इसके विपरीत, यदि शुभ ग्रह भी अशुभ (दुःस्थान — ६/८/१२) में बैठा हो तो उसकी दशा का फल अच्छा नहीं रहता। अर्थात् केवल ग्रह का शुभत्व नहीं, उसकी भाव-स्थिति भी फल को निर्धारित करती है।

English rendering At a daśā's onset, a planet posited in an auspicious house gives good results; conversely, even a benefic lodged in an inauspicious house does not yield good ones — placement modulates the fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नियम-कथन (स्थान-आश्रित फल-परिवर्तन)। इसे एक शर्त-नियम के रूप में लिखा जा सकता है: फल = f(ग्रह-शुभत्व, भाव-स्थिति); शुभ ग्रह भी यदि भाव ∈ दुःस्थान {6, 8, 12} तो फल-चिह्न पलट सकता है। भाव-स्थिति एक स्वतन्त्र, निर्धारक चर है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी विधि का ही शास्त्रीय रूप है — गणना और व्याख्या को पृथक् रखो, और जिन चरों पर फल निर्भर है उन्हें घोषित करो (यहाँ: भाव-स्थिति)। दशा-अवधि विम्शोत्तरी इंजन का निश्चित अंकगणित है; उस पर लगने वाला शुभ/अशुभ, भाव-स्थिति-आश्रित एक सशर्त कथन है — कोई अटल फलादेश नहीं।

48.9
पञ्चमेशेन युक्तस्य कर्मेशस्य दशा शुभा |
नवमेशेन युक्तस्य कर्मेशस्यातिशभना
pañcameśena yuktasya karmeśasya daśā śubhā |
navameśena yuktasya karmeśasyātiśabhanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमेशेन युक्तस्य = पञ्चमेश (त्रिकोणेश) से युक्त; कर्मेशस्य = दशमेश (केन्द्रेश) की; दशा शुभा = दशा शुभ; नवमेशेन युक्तस्य = नवमेश (श्रेष्ठ त्रिकोणेश) से युक्त; कर्मेशस्य = दशमेश की; अतिशुभना = अत्यन्त शुभ ("अतिशभना" → "अतिशुभना/अतिशोभना", पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस दशमेश (कर्मेश) का पञ्चमेश के साथ योग हो, उसकी दशा शुभ होती है; और जिस दशमेश का नवमेश के साथ योग हो, उसकी दशा अत्यन्त शुभ होती है। यह प्रसिद्ध केन्द्र-त्रिकोण (धर्म-कर्माधिपति) राजयोग का बीज है।

English rendering The daśā of the 10th-lord conjoined with the 5th-lord is auspicious; conjoined with the 9th-lord, exceedingly auspicious — the dharma-karmādhipati rāja-yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — भाव-वर्ग सूचकांक: केन्द्र K = {1, 4, 7, 10}, त्रिकोण T = {1, 5, 9}। नियम: दशमेश (∈ K का स्वामी) का सम्बन्ध किसी त्रिकोणेश (5 या 9 का स्वामी) से → शुभ दशा; विशेषतः 9 (श्रेष्ठ त्रिकोण) के साथ → अतिशुभ। यह केन्द्र-त्रिकोण-सम्बन्ध का एक विशिष्ट (योग = संयुति) रूप है।

उदाहरण (worked example) मेष-लग्न लें। दशम = मकर → कर्मेश शनि; नवम = धनु → नवमेश गुरु; पञ्चम = सिंह → पञ्चमेश सूर्य। यदि शनि (कर्मेश) गुरु (नवमेश) से युक्त हो → धर्म-कर्माधिपति योग → श्लोकानुसार "अतिशुभ" दशा। यदि शनि सूर्य (पञ्चमेश) से युक्त हो → "शुभ" दशा। (लग्न → भाव → स्वामी शुद्ध लुक-अप है; शुभत्व पाठ का कथन।)

48.10
पञ्चमेशेन युक्तस्य ग्रहस्यापि दशा शुभा |
तथा धर्मपयुक्तस्य दशा परमशोभना
pañcameśena yuktasya grahasyāpi daśā śubhā |
tathā dharmapayuktasya daśā paramaśobhanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चमेशेन युक्तस्य = पञ्चमेश (त्रिकोणेश) से युक्त; ग्रहस्य अपि = किसी भी (सामान्य) ग्रह की भी; दशा शुभा = दशा शुभ; तथा = वैसे ही; धर्मप-युक्तस्य = नवमेश (धर्म-प = धर्माधिप) से युक्त की; दशा = दशा; परम-शोभना = परम शुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — केवल दशमेश ही नहीं, पञ्चमेश से युक्त किसी भी ग्रह की दशा शुभ होती है; और नवमेश (धर्माधिप) से युक्त ग्रह की दशा तो परम शुभ होती है। अर्थात् त्रिकोणेश जिस ग्रह से जुड़े, उसे अपना शुभत्व प्रदान करते हैं।

English rendering The daśā of any planet joined with the 5th-lord is auspicious; joined with the 9th-lord, supremely so — the trine-lords lend their auspiciousness to whatever they touch.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — 48.9 का व्यापकीकरण: पात्र-समुच्चय {दशमेश} से बढ़ाकर {कोई भी ग्रह}। नियम: ∀ ग्रह g, यदि g त्रिकोणेश (स्वामी of 5 या 9) से युक्त → शुभ दशा; g नवमेश-युक्त → परम-शुभ। त्रिकोण-वर्ग T = {1, 5, 9} में 9 पर उच्चतम भार।

उदाहरण (worked example) वृष-लग्न: पञ्चम = कन्या → पञ्चमेश बुध; नवम = मकर → नवमेश शनि। यदि कोई भी ग्रह (मान लें मंगल) बुध से युक्त हो → उस ग्रह की दशा शुभ; यदि वही मंगल शनि (नवमेश) से युक्त हो → "परम-शोभना" दशा। पात्र अब "कोई भी ग्रह" है — नियम वही रहता है।

48.11
सुखेशसहितस्यापि धर्मेशस्य दशा शुभा |
पञ्चमस्थानगस्यापि मानेशस्य दशाशुभा
sukheśasahitasyāpi dharmeśasya daśā śubhā |
pañcamasthānagasyāpi māneśasya daśāśubhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखेश-सहितस्य = सुखेश (चतुर्थेश = केन्द्रेश) से सहित; अपि = भी; धर्मेशस्य = नवमेश (त्रिकोणेश) की; दशा शुभा = दशा शुभ; पञ्चम-स्थानगस्य = पञ्चम-भाव में स्थित; अपि = भी; मानेशस्य = दशमेश (मान = प्रतिष्ठा = १०); दशा शुभा = दशा शुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चतुर्थेश (सुखेश, केन्द्रेश) के साथ युक्त नवमेश (त्रिकोणेश) की दशा शुभ होती है; और पञ्चम भाव (त्रिकोण) में स्थित दशमेश (मानेश, केन्द्रेश) की दशा भी शुभ होती है। यहाँ केन्द्रेश व त्रिकोणेश का योग तथा स्थिति — दोनों प्रकार से शुभत्व सूचित है।

English rendering The 9th-lord's daśā, when joined even with the 4th-lord, is auspicious; and the 10th-lord's daśā, when posited in the 5th house, is likewise auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — केन्द्र-त्रिकोण सम्बन्ध के दो रूप: (i) योग — नवमेश (T) + सुखेश/चतुर्थेश (K) → शुभ; (ii) स्थिति — मानेश/दशमेश (K का स्वामी) ∈ पञ्चम-भाव (∈ T) → शुभ। K = {1,4,7,10}, T = {1,5,9}; सम्बन्ध चाहे संयुति से हो या भाव-स्थिति से — शुभ-चिह्न समान।

उदाहरण (worked example) कर्क-लग्न: चतुर्थ = तुला → सुखेश शुक्र; नवम = मीन → धर्मेश गुरु। गुरु (नवमेश) शुक्र (सुखेश) से युक्त → केन्द्र-त्रिकोणेश योग → शुभ दशा। पुनः दशम = मेष → मानेश मंगल; यदि मंगल पञ्चम-भाव (वृश्चिक) में स्थित हो → केन्द्रेश-इन-त्रिकोण → शुभ दशा।

48.12
एवं त्रिकोणनाथानां केन्द्रस्थानां दशाः शुभाः |
तथा कोणस्थितानां च केन्द्रेशानां दशाः शुभाः
evaṃ trikoṇanāthānāṃ kendrasthānāṃ daśāḥ śubhāḥ |
tathā koṇasthitānāṃ ca kendreśānāṃ daśāḥ śubhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; त्रिकोण-नाथानाम् = त्रिकोणेशों (5,9 के स्वामी) की; केन्द्रस्थानाम् = केन्द्र (1,4,7,10) में स्थित; दशाः शुभाः = दशाएँ शुभ; तथा = वैसे ही; कोण-स्थितानाम् = त्रिकोण में स्थित; केन्द्रेशानाम् = केन्द्रेशों की; दशाः शुभाः = दशाएँ शुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस नियम को सूत्रबद्ध करता है — जो त्रिकोणेश केन्द्र में स्थित हों, उनकी दशाएँ शुभ; और जो केन्द्रेश त्रिकोण में स्थित हों, उनकी दशाएँ भी शुभ। यह केन्द्र-त्रिकोण-सम्बन्ध का सामान्य (स्थिति-आधारित) विधान है — राजयोगकारकत्व की नींव।

English rendering Thus the daśās of trine-lords situated in quadrants are auspicious, and likewise the daśās of quadrant-lords situated in trines — the general kendra-trikoṇa placement rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — केन्द्र-त्रिकोण स्थिति-नियम, समुच्चय-रूप में: K = {1,4,7,10}, T = {1,5,9}। शुभ-दशा की शर्त: (स्वामी(भाव ∈ T) की स्थिति ∈ K) ∨ (स्वामी(भाव ∈ K) की स्थिति ∈ T)। यहाँ "स्थिति" (अधिष्ठान) निर्णायक है, स्वामित्व नहीं — यह 48.9–11 (योग) से पूरक है। ध्यान: 1 दोनों समुच्चयों में उभयनिष्ठ (K ∩ T = {1})।

उदाहरण (worked example) सिंह-लग्न: भाव-क्रम 1 सिंह … 9 मेष, 10 वृष। नवम = मेष → नवमेश (त्रिकोणेश) मंगल; यदि मंगल दशम-भाव (वृष, एक केन्द्र) में स्थित → त्रिकोणेश-इन-केन्द्र → शुभ दशा। विपरीत दिशा: दशम = वृष → दशमेश (केन्द्रेश) शुक्र; यदि शुक्र पञ्चम-भाव (धनु, त्रिकोण) में → केन्द्रेश-इन-त्रिकोण → शुभ दशा।

हमारा डिकोड (Our Decode) केन्द्र {1,4,7,10} और त्रिकोण {1,5,9} लग्न-सापेक्ष एक निश्चित सूचकांक-समुच्चय हैं — लग्न से गिनती का शुद्ध मॉड्युलर परिणाम, कोई मत नहीं। दशा-क्रम व अवधि हमारे पिन-किए विम्शोत्तरी इंजन से आते हैं (Σ = 120 वर्ष); "शुभ" चिह्न इस श्लोक का कथन है। इसीलिए हम अवधि/भाव-वर्गीकरण (गणना) को फल (शास्त्र-कथन) से अलग रखते हैं — वही अनुशासन जो 48.1 व 48.8 में घोषित है।

48.13
केन्द्रेशः कोणभावस्थः कोणेशः केन्द्रगो यदि |
तयोर्दशां शुभां प्राहुर्ज्योतिःशास्त्रविदो जनाः
kendreśaḥ koṇabhāvasthaḥ koṇeśaḥ kendrago yadi |
tayordaśāṃ śubhāṃ prāhurjyotiḥśāstravido janāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रेशः = केन्द्र-भाव का स्वामी; कोण-भावस्थः = त्रिकोण-भाव में स्थित; कोणेशः = त्रिकोण-भाव का स्वामी; केन्द्रगः यदि = यदि केन्द्र में गया हो; तयोः दशाम् = उन दोनों की दशा; शुभाम् = शुभ; प्राहुः = कहा है; ज्योतिःशास्त्रविदः जनाः = ज्योतिःशास्त्र के ज्ञाता जन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि केन्द्रेश त्रिकोण-भाव में स्थित हो, अथवा त्रिकोणेश केन्द्र-भाव में गया हो, तो उन दोनों की दशा को ज्योतिःशास्त्र के विद्वानों ने शुभ कहा है। यह 48.12 के नियम की पुनः-पुष्टि है, और साथ ही फल को "विद्वानों का कथन" बताकर उसे प्रमाण-सापेक्ष रखता है।

English rendering If the quadrant-lord stands in a trine house, or the trine-lord in a quadrant, the knowers of astrology declare the daśā of both to be auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — 48.12 का सममित पुनर्कथन, प्रति-ग्रह शर्त के रूप में: शुभ ⇐ (केन्द्रेश ∈ त्रिकोण-भाव) ∨ (त्रिकोणेश ∈ केन्द्र-भाव), जहाँ K = {1,4,7,10}, T = {1,5,9}। जब कोई एक ग्रह एक साथ केन्द्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी हो (जैसे वृष-लग्न में शनि — नवम मकर व दशम कुम्भ), वह योगकारक बनता है — इस नियम का सुदृढ़तम रूप।

उदाहरण (worked example) वृष-लग्न: नवम = मकर, दशम = कुम्भ — दोनों के स्वामी शनि; अतः शनि एक ही में त्रिकोणेश व केन्द्रेश → स्थिति की शर्त स्वयंसिद्ध → उसकी दशा को विद्वान शुभ कहते हैं। सामान्य दृष्टान्त: तुला-लग्न में केन्द्रेश (जैसे चतुर्थेश शनि, मकर) यदि त्रिकोण-भाव (पञ्चम कुम्भ / नवम मिथुन) में स्थित हो → शुभ दशा।

48.14
षष्ठाष्टमव्ययाधीशा अपि कोणेशसंयुता |
तेषां दशाऽपि शुभदा कथिता कालकोविदैः
ṣaṣṭhāṣṭamavyayādhīśā api koṇeśasaṃyutā |
teṣāṃ daśā'pi śubhadā kathitā kālakovidaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठाष्टमव्ययाधीशाः = षष्ठ, अष्टम, व्यय (द्वादश) भावों के अधीश/स्वामी; अपि = भी; कोणेशसंयुताः = कोणेश (त्रिकोणेश) से संयुक्त; तेषां = उनकी; दशाऽपि = दशा भी; शुभदा = शुभ देने वाली; कथिता = कही गई; कालकोविदैः = काल/दशा-विशेषज्ञों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षष्ठेश, अष्टमेश और व्ययेश (द्वादशेश) स्वभाव से दुःस्थानेश माने जाते हैं, किन्तु यदि वे कोणेश (त्रिकोणेश) से युक्त हों तो उनकी दशा भी शुभदा कही गई है। काल-कोविद इस युति को दुःस्थानेश-दशा का शुभ-संस्कार मानते हैं—यह फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that even the lords of the sixth, eighth, and twelfth, when conjoined with a trikoṇa-lord, have a daśā that the time-experts (kāla-kovida) declare as conferring good results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुःस्थानेश + त्रिकोणेश युति)। 6–8–12 के अधीशों का शुभत्व यहाँ युति-शर्त पर टिका है; अकेला दुःस्थानेश-पद पर्याप्त नहीं।

48.15
कोणेशो यदि केम्द्रस्थः केन्द्रेशो यदि कोणगः |
ताभ्यां युक्तस्य खेटस्य दृष्टियुक्तस्य चैतयोः
koṇeśo yadi kemdrasthaḥ kendreśo yadi koṇagaḥ |
tābhyāṃ yuktasya kheṭasya dṛṣṭiyuktasya caitayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोणेश = त्रिकोण-भाव (१/५/९) का स्वामी; केम्द्रस्थ / केन्द्रस्थ = केन्द्र (१/४/७/१०) में स्थित (पाठ-भेद संभव: केम्द्र/केन्द्र); केन्द्रेश = केन्द्र-भाव का स्वामी; कोणग = त्रिकोण में स्थित; ताभ्यां युक्तस्य = उन दोनों से युक्त; खेटस्य = ग्रह का; दृष्टियुक्तस्य = दृष्टि-युक्त; एतयोः = इन दोनों (कोणेश–केन्द्रेश) का।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ एक शुभ दशा-योग का आधार बताता है: यदि त्रिकोणेश केन्द्र में हो और केन्द्रेश त्रिकोण में हो, तो उन दोनों से युक्त अथवा दोनों की दृष्टि से युक्त ग्रह की दशा को विशेष रूप से विचारणीय माना गया है। यह पद्य फल-कथन का आरम्भ है; पूर्ण वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है। सम्बन्ध की दिशा — युति अथवा दृष्टि — दोनों को समकक्ष रखा गया है।

English rendering If the lord of a trikoṇa is placed in a kendra and the lord of a kendra is placed in a trikoṇa, then of the planet that is joined with those two, or aspected by them — (the thought continues into the next verse).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भावेश-स्थिति व युति/दृष्टि का योग-नियम (दशा-फल का आधार)। औपचारिक शर्त: कोणेश ∈ {१,४,७,१०} ∧ केन्द्रेश ∈ {१,५,९}; तब ग्रह P जिसके लिए (P युक्त कोणेश व केन्द्रेश) अथवा (कोणेश व केन्द्रेश की दृष्टि P पर) — उसकी दशा अगले पद्य में शुभप्रदा कही गई है। त्रिकोण = १/५/९, केन्द्र = १/४/७/१० (लग्न दोनों वर्गों में आता है)।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष; कोणेश-उदाहरण: ५-स्वामी सूर्य कर्क (केन्द्र ४) में; केन्द्रेश-उदाहरण: १०-स्वामी शनि मेष (लग्न = केन्द्र+त्रिकोण) में। यदि बुध दोनों से युक्त हो अथवा दोनों की दृष्टि में हो, तो ४८.१५–१६ के अनुसार बुध-दशा को विद्वान् दैवचिन्तक शुभप्रदा कहते हैं। (राशि-स्वामित्व: मेष-परम्परा; अयनांश दशा-काल के लिए अलग से घोषित करें — यहाँ केवल भाव-स्थिति का नियम।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-काल का संख्यात्मक ढाँचा विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७, शुक्र २०, सूर्य ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; Σ = १२०) पर टिका है; अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष)/१२०। यह श्लोक फल-योग का भावेश-नियम है; काल-अवधि का अनुपात-गणित इंजन में अलग से सत्यापित है — फल-कथन को नियति नहीं माना जाता।

48.16
दशां शुभप्रदां प्राहुर्विद्वांसो दैवचिन्तकाः |
लग्नेशो धर्मभावस्थो धर्मेशो लग्नगो यदि
daśāṃ śubhapradāṃ prāhurvidvāṃso daivacintakāḥ |
lagneśo dharmabhāvastho dharmeśo lagnago yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशां = महा/अन्तर्दशा को; शुभप्रदां = शुभ फल देने वाली; प्राहुः = कहते हैं; विद्वांसः = विद्वान्; दैवचिन्तकाः = ज्योतिष-विचारक; लग्नेशः = लग्न-स्वामी; धर्मभावस्थः = धर्म-भाव (९) में स्थित; धर्मेशः = धर्म-भाव (९) का स्वामी; लग्नगः = लग्न में स्थित; यदि = यदि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त पूरी होने पर विद्वान् दैवचिन्तक उस ग्रह की दशा को शुभप्रदा कहते हैं — यह शास्त्र का कथन है, न कि नियति की घोषणा। तुरंत अगला नियम: यदि लग्नेश धर्म-भाव (नवम) में हो और धर्मेश लग्न में हो, तो दोनों के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान (परस्पर स्थान-परिवर्तन / परस्पर स्थिति) का योग बनता है। यह धर्म-लग्न सम्बन्ध अगले पद्य में दशा-काल के फल से जोड़ा गया है।

English rendering The learned astrologers declare that daśā to be conferring auspicious results. Further: if the lagna-lord stands in the ninth (dharma) house and the ninth-lord stands in the lagna —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भावेश-परस्पर-स्थिति नियम। (क) ४८.१५ की शर्त → दशा शुभप्रदा (शास्त्र-कथन)। (ख) लग्नेश ∈ भाव-९ ∧ धर्मेश ∈ भाव-१ — यह ९↔१ का पारस्परिक सम्बन्ध; फल अगले श्लोक में।

उदाहरण (worked example) लग्न वृषभ; लग्नेश शुक्र धनु (९) में; धर्मेश (९-स्वामी शनि) वृषभ (लग्न) में — शर्त (ख) पूर्ण। (भाव-गणना: समान-भाव प्रणाली / whole-sign houses — प्रत्येक राशि = एक भाव; अयनांश केवल ग्रह-राशि निर्धारण में प्रभावी।)

48.17
एतयोस्तु दशाकाले सुखधर्मसमुद्भवः |
कर्मेशो लग्नराशिस्थो लग्नेशः कर्मभावगः
etayostu daśākāle sukhadharmasamudbhavaḥ |
karmeśo lagnarāśistho lagneśaḥ karmabhāvagaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एतयोः = इन दोनों (लग्नेश–धर्मेश) की; तु = ही; दशाकाले = दशा-काल में; सुखधर्मसमुद्भवः = सुख और धर्म का उदय; कर्मेशः = कर्म-भाव (१०) का स्वामी; लग्नराशिस्थः = लग्न-राशि में स्थित; लग्नेशः = लग्न-स्वामी; कर्मभावगः = कर्म-भाव (१०) में गत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उन दोनों (लग्नेश व धर्मेश) की दशा-काल में सुख और धर्म का समुद्भव होता है — यह फल-कथन है, भय या निश्चित भाग्य का दावा नहीं। इसी क्रम में दूसरा युग्म: यदि कर्मेश लग्न-राशि में हो और लग्नेश कर्म-भाव में हो, तो १०↔१ का पारस्परिक सम्बन्ध बनता है। लग्न-राशिस्थ कहने से स्पष्ट है कि यहाँ राशि = भाव की समान-भाव रीति का संकेत है।

English rendering During the daśā periods of those two (lagna-lord and ninth-lord), the text states the arising of comfort and dharma. Likewise, if the tenth-lord is placed in the lagna-sign and the lagna-lord occupies the tenth house —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + १०↔१ भावेश-योग। शर्त: कर्मेश ∈ लग्न-राशि ∧ लग्नेश ∈ भाव-१०। दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी (या अध्याय में निर्दिष्ट अन्य दशा) के अनुपात से चलता है; यह श्लोक फल का भावेश-संबन्ध बताता है, वर्ष-संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न कन्या; कर्मेश (१० = मिथुन → बुध) कन्या (लग्न) में; लग्नेश बुध मिथुन (१०) में — १०↔१ पूर्ण (यहाँ कर्मेश = लग्नेश = बुध, स्व-राशि/उभय स्थिति से योग दृढ़)। दशा-उदाहरण: यदि बुध-महादशा १७ वर्ष (विंशोत्तरी), तो शास्त्र इसी दशा-काल में सुख-धर्म समुद्भव कहता है — गणना अवधि की, फल की नहीं।

48.18
तयोर्दशाविपाके तु राज्यलाभो भवेद्ध्रुवम् |
त्रिषडायगतानां च त्रिषडायाधिपैर्युजम्
tayordaśāvipāke tu rājyalābho bhaveddhruvam |
triṣaḍāyagatānāṃ ca triṣaḍāyādhipairyujam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तयोः = उन दोनों (कर्मेश–लग्नेश) की; दशाविपाके = दशा के विपाक (फलोदय) काल में; तु = तो; राज्यलाभः = राज्य/अधिकार/प्रतिष्ठा का लाभ; भवेत् = होता है; ध्रुवम् = निश्चय से (शास्त्र का बल-वचन); त्रिषडायगतानां = तृतीय-षष्ठ-एकादश में स्थित ग्रहों की; च = और; त्रिषडायाधिपैः = ३/६/११ के स्वामियों से; युजम् = युक्त (ग्राह्य — अगले पद्य से जुड़ता है)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्मेश–लग्नेश की दशा-विपाक में राज्य-लाभ ध्रुव माना गया है — यह शास्त्रीय बल-कथन है; हम इसे नियति या गारंटी के रूप में नहीं दोहराते। तुरंत ही विपरीत दिशा का नियम आरम्भ होता है: त्रिषडाय (३, ६, ११) में स्थित ग्रह, तथा त्रिषडाय-अधिपों से युक्त ग्रह — इनकी दशा का फल आगे बताया गया है। “ध्रुवम्” पाठ का अपना जोर है; सम्पादकीय अनुशासन में इसे स्रोत-वाणी के रूप में ही रखा जाता है।

English rendering In the ripening of the daśā of those two, the text states that gain of authority (rājya-lābha) is firm. And of those placed in the third, sixth, and eleventh houses, and of those joined with the lords of the third, sixth, and eleventh —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दुष्ट/मिश्र भाव-वर्ग का दशा-नियम। त्रिषडाय = भाव {३, ६, ११}; शर्त-समुच्चय (अपूर्ण वाक्य → ४८.१९): ग्रह P ∈ {३,६,११} अथवा P युक्त (त्रिषडाय-अधिप) → दशा-फल अगले श्लोक में पापफलप्रदा।

उदाहरण (worked example) लग्न मकर; त्रिषडाय: ३ = मीन, ६ = मिथुन, ११ = वृश्चिक। मान लें मंगल मिथुन (६) में — त्रिषडायगत; अथवा गुरु वृश्चिक-स्वामी (११-ेश) से युक्त — त्रिषडायाधिप-युक्त। दोनों दशाओं पर ४८.१९ का पाप-फल नियम लागू होता है (शास्त्र-कथन)।

48.19
शुभानामपि खेटानां दशा पापफलप्रदा |
मारकस्थानगानां च मारकेशयुजामपि
śubhānāmapi kheṭānāṃ daśā pāpaphalapradā |
mārakasthānagānāṃ ca mārakeśayujāmapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभानाम् अपि = शुभ ग्रहों की भी; खेटानां = ग्रहों की; दशा = दशा; पापफलप्रदा = पाप (अशुभ) फल देने वाली; मारकस्थानगानां = मारक-स्थान (२/७ मुख्यतः) में स्थितों की; च = और; मारकेशयुजाम् = मारक-स्वामी से युक्तों की; अपि = भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट कहता है कि त्रिषडाय-गत अथवा त्रिषडायेश-युक्त ग्रहों की दशा — वे ग्रह स्वभाव से शुभ हों तब भी — पाप-फलप्रदा मानी गई है। यही अनुशासन मारक-स्थानग और मारकेश-युक्त ग्रहों पर भी लागू होता है। यहाँ “पाप” नैतिक दोष नहीं, फल-वर्गीकरण की पारिभाषिक श्रेणी है। भय की भाषा में नहीं; स्रोत के नियम के रूप में पढ़ें।

English rendering The daśā even of benefic planets (so placed or so joined) is said by the text to yield pāpa-results; likewise of those occupying māraka-sthānas and of those joined with the māraka-lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश/स्थान-संबन्ध से दशा-फल)। मारक-स्थान: परम्परा में मुख्यतः भाव २ व ७ (आयुर्दाय-सन्दर्भ में); मारकेश = उन भावों का स्वामी। नियम-सार: (P ∈ त्रिषडाय) ∨ (P–युति त्रिषडायेश) ∨ (P ∈ मारक-स्थान) ∨ (P–युति मारकेश) → दशा पापफलप्रदा — शास्त्र कहता है, न कि नियति।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह; मारक-स्थान २ = कन्या, ७ = कुम्भ। शुक्र (नैसर्गिक शुभ) कन्या (२) में → मारकस्थानग; दशा शास्त्र के अनुसार पापफलप्रदा। अथवा चन्द्र कुम्भ-स्वामी शनि से युक्त → मारकेश-युक्त। (आयु/मृत्यु का अनुमान यहाँ नहीं; केवल दशा-फल का भावेश-नियम।)

48.20
रन्ध्रस्थानगतानां च दशाऽनिष्टफलप्रदा |
एवं भावेशसम्बन्धादूरनीयं दशाफलम्
randhrasthānagatānāṃ ca daśā'niṣṭaphalapradā |
evaṃ bhāveśasambandhādūranīyaṃ daśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रस्थानगतानां = रन्ध्र-स्थान (८) में स्थित ग्रहों की; च = और; दशा = दशा; अनिष्टफलप्रदा = अनिष्ट फल देने वाली; एवम् = इस प्रकार; भावेशसम्बन्धात् = भाव-स्वामियों के संबन्ध से; ऊरणीयम् / ऊहनीयम् = ऊहा (तर्क) से निकालना चाहिए (पाठ-भेद संभव: ऊरनीयं/ऊहनीयं); दशाफलम् = दशा का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टम-स्थान (रन्ध्र) में स्थित ग्रहों की दशा अनिष्ट-फलप्रदा होती है। फिर सामान्य सूत्र दिया गया है: दशा-फल इसी रीति से भावेश-संबन्ध द्वारा ऊहा जाना चाहिए — अर्थात् केवल ग्रह-स्वभाव नहीं, भाव-स्वामी की स्थिति, युति और दृष्टि से फल तौलें। यह अध्याय के नियमों का समाहार-सूत्र है: दशा = काल-खंड; फल = भावेश-योग का फलित कथन।

English rendering The daśā of planets occupying the eighth (randhra) house is said to give unwanted results. Thus the result of a daśā is to be inferred from the relationships of the house-lords.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + विधि-सूत्र (दशाफल-निर्णय की सामान्य रीति)। सार-अल्गोरिद्म (शास्त्रीय ढाँचा, आधुनिक संकेत में): दशा-स्वामी P के लिए जाँचें — (i) P किन भावों का स्वामी, (ii) P किस भाव में, (iii) किन भावेशों से युति/दृष्टि, (iv) ४८.१५–१९ के कोण/केन्द्र/त्रिषडाय/मारक/रन्ध्र वर्ग — तब फल-श्रेणी (शुभ / पाप / अनिष्ट / राज्यलाभ आदि) पाठ के अनुसार बाँधें। काल-लंबाई अलग: विंशोत्तरी अनुपात; फल-श्रेणी भावेश-संबन्ध।

उदाहरण (worked example) लग्न धनु; रन्ध्र = कर्क। चन्द्र कर्क (८) में → रन्ध्रस्थानगत; चन्द्र-दशा (विंशोत्तरी महादशा १० वर्ष) शास्त्र के अनुसार अनिष्टफलप्रदा। तुलना: यदि वही चन्द्र धर्म-भाव से जुड़ा कोण/केन्द्र योग (४८.१५–१६) में हो, तो ऊहा दोनों नियमों को तौलकर — न कि एक संख्या से — की जाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी अनुशासन-रेखा यही है: दशा-वर्ष व अन्तर्दशा = शुद्ध अनुपात-गणित (१२०-वर्ष चक्र; exact `==`); फल-वाक्य = स्रोत का कथन, भविष्य की गारंटी नहीं। भावेश-संबन्ध को कम्प्यूटेशनल ग्राफ़ (स्वामित्व × स्थिति × युति/दृष्टि) से जाँचा जा सकता है; फल की भाषा को गणित से अलग रखा जाता है — यही पाराशर-रहस्य की मूल विधि है।

अध्यायः 49

कालचक्रदशाफलाध्यायः

37 श्लोक
49.1
कथयाम्यथ विप्रेन्द्र कालचक्रदशाफलम् |
तत्रादौ राशिनाथानां सूर्यादीनां फलं ब्रुवे
kathayāmyatha viprendra kālacakradaśāphalam |
tatrādau rāśināthānāṃ sūryādīnāṃ phalaṃ bruve

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कथयामि = मैं कहता हूँ; अथ = अब; विप्रेन्द्र = हे विप्रश्रेष्ठ (मैत्रेय); कालचक्र-दशा-फलम् = कालचक्र दशा का फल; तत्र आदौ = उसमें सर्वप्रथम; राशिनाथानाम् = राशियों के स्वामियों का; सूर्यादीनाम् = सूर्य आदि ग्रहों का; फलम् ब्रुवे = फल कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ प्रिय शिष्य, अब मैं कालचक्र दशा का फल कहता हूँ। इसमें सबसे पहले राशियों के स्वामी — सूर्य आदि ग्रह — जिस दशा-खण्ड के अधिपति बनते हैं, उनका फल बताता हूँ। यह श्लोक दशा-फल का द्वार है; आगे नवांश-क्रम से विस्तार आएगा।

English rendering Now, O best of the twice-born, I declare the fruits of the Kālachakra daśā; and therein first the results of the rāśi-lords, beginning with the Sun.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना / विषय-सूचना। श्लोक केवल यह घोषित करता है कि आगे का फल कालचक्र दशा-पद्धति का है और पठन-क्रम राशीश (सूर्यादि) → नवांश होगा; कालचक्र दशा स्वयं नवांश-आधारित संगणना है, जो अगले श्लोकों में खुलती है।

हमारा डिकोड: दशा-पद्धति की घोषणा यहाँ अनिवार्य है — यह कालचक्र दशा है, विंशोत्तरी नहीं। हमारा दशा-इंजन विंशोत्तरी (BPHS Ch.46–47, 120-वर्ष चक्र) को क्रियान्वित करता है; कालचक्र एक भिन्न राशि/नवांश-दशा है जिसकी अपनी परिपाटी अलग से घोषित करनी पड़ती है — "कौन-सी दशा" यही पहला convention है जिसे हमारी विधि स्पष्ट पिन करती है।

49.2
रक्तपित्तादितो व्याधिं नृणामर्कफलं वदेत् |
धनकीर्तिप्रजावृद्धिवस्त्राभरणदः शशी
raktapittādito vyādhiṃ nṛṇāmarkaphalaṃ vadet |
dhanakīrtiprajāvṛddhivastrābharaṇadaḥ śaśī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्तपित्तादितः = रक्त-पित्त आदि से; व्याधिम् = रोग/पीड़ा; नृणाम् = मनुष्यों को; अर्कफलम् = सूर्य (अर्क) का फल; वदेत् = कहना चाहिए; धनकीर्तिप्रजावृद्धि = धन, कीर्ति और प्रजा/सन्तान की वृद्धि; वस्त्राभरणदः = वस्त्र और आभूषण देने वाला; शशी = चन्द्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य-फल के रूप में रक्त-पित्त आदि से उत्पन्न व्याधि का निर्देश किया गया है। चन्द्र का फल धन, यश, प्रजा-वृद्धि तथा वस्त्र-आभूषण का दान/प्राप्ति बताया गया है। ये दोनों फल राशिनाथ-रूप में सूर्य और चन्द्र की कालचक्र-दशा/योग-स्थिति पर लागू करने के लिए हैं — पाठ फल-संकेत है, व्यक्तिगत निदान नहीं।

English rendering The text states that the Sun’s result is disease arising from blood-bile and the like; the Moon is said to bestow wealth, fame, increase of progeny, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य/चन्द्र राशिनाथ-फल)। अवधि, अंश या बल-इकाई नहीं; केवल दशा-फल सूची का आरम्भ।

49.3
ज्वरमाशु दिशेत् पैत्त्यं ग्रन्थिस्फोटं कुजस्तथा |
प्रजानां च धनानां च सदा वृद्धिं बुधो दिशेत्
jvaramāśu diśet paittyaṃ granthisphoṭaṃ kujastathā |
prajānāṃ ca dhanānāṃ ca sadā vṛddhiṃ budho diśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वरम् = ज्वर; आशु = शीघ्र; दिशेत् = दे/दिखाए; पैत्त्यम् = पित्त-संबंधी (पीड़ा); ग्रन्थिस्फोटम् = ग्रन्थि-स्फोट (गांठ/फोड़ा-फुंसी); कुजः = मंगल; तथा = तथा; प्रजानाम् च धनानाम् च = प्रजा और धन की; सदा वृद्धिं = सदा वृद्धि; बुधः दिशेत् = बुध दे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कुज (मंगल) शीघ्र ज्वर, पित्त-पीड़ा तथा ग्रन्थि-स्फोट का निर्देश करता है। बुध प्रजा और धन की निरंतर वृद्धि देता है — ऐसा पाठ का कथन है। दोनों फल राशिनाथ-रूप में कालचक्र-दशा के फल-क्रम में पढ़े जाते हैं; रोग-नाम शास्त्रीय संकेत हैं, चिकित्सकीय निर्णय नहीं।

English rendering The text states that Mars quickly indicates fever, bilious affliction, and glandular eruptions; Mercury is said always to grant increase of progeny and of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुज/बुध राशिनाथ-फल)। संख्यात्मक गुणांक या काल-खंड यहाँ नहीं दिए।

49.4
धनं कीर्तिं प्रजावृद्धिं नानाभोगं बृहस्पतिः |
विद्यावृद्धिर्विवाहश्च गृहं धान्यं भृगोः फलम्
dhanaṃ kīrtiṃ prajāvṛddhiṃ nānābhogaṃ bṛhaspatiḥ |
vidyāvṛddhirvivāhaśca gṛhaṃ dhānyaṃ bhṛgoḥ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनं कीर्तिं प्रजावृद्धिं = धन, कीर्ति, प्रजा-वृद्धि; नानाभोगम् = अनेक भोग; बृहस्पतिः = गुरु; विद्यावृद्धिः = विद्या की वृद्धि; विवाहः च = और विवाह; गृहं धान्यम् = घर और धान्य; भृगोः फलम् = शुक्र (भृगु) का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बृहस्पति धन, यश, प्रजा-वृद्धि और नाना भोगों का फल देता है। भृगु (शुक्र) का फल विद्या-वृद्धि, विवाह, गृह और धान्य बताया गया है। ये दोनों भी राशिनाथ-फल की श्रृंखला में आते हैं — कालचक्र-दशा में संबंधित स्वामी/योग के लिए पाठ का सामान्य फल-निर्देश।

English rendering The text states that Jupiter grants wealth, fame, increase of progeny, and manifold enjoyments; the result of Venus (Bhṛgu) is growth of learning, marriage, a house, and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु/शुक्र राशिनाथ-फल)। दशा-वर्ष या बल-रूप यहाँ नहीं।

49.5
तापाधिक्यं महद्दुःखं बन्धुनाशः शनेः फलम् |
एवमर्कादियोगेन वदेद्राशिदशाफलम्
tāpādhikyaṃ mahadduḥkhaṃ bandhunāśaḥ śaneḥ phalam |
evamarkādiyogena vadedrāśidaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तापाधिक्यम् = ताप/ज्वर की अधिकता; महत् दुःखम् = महान दुःख; बन्धुनाशः = बन्धुओं का वियोग/हानि; शनेः फलम् = शनि का फल; एवम् = इस प्रकार; अर्कादि-योगेन = सूर्य आदि (ग्रहों) के योग से; वदेत् राशिदशाफलम् = राशि-दशा का फल कहे।

हिन्दी भावार्थ शनि की दशा का फल शास्त्र ताप की अधिकता, महान दुःख और बन्धु-वियोग कहता है। इस प्रकार सूर्य आदि सात ग्रहों के योग-अनुसार राशि-दशा का फल कहना चाहिए।

English rendering Saturn's fruit, the text states, is excess of fever, great sorrow and loss of kinsmen; thus, by the conjunction of the Sun and the rest, one should declare the rāśi-daśā results.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — सात राशीशों (सूर्य…शनि) की सूची को समेटने वाला समुच्चय-सूत्र। यह कहता है फल इनके "योग" से पढ़ो — अर्थात् राशीश + नवांश दोनों को संयुक्त रूप से; अगली पंक्ति से नवांश-विस्तार आरम्भ होता है।

हमारा डिकोड: शनि-दशा के "महद्दुःख / बन्धुनाश" जैसे कठोर कथन शास्त्र के दावे हैं, नियति नहीं। हमारी विधि की मूल अनुशासन-रेखा (CLAUDE.md + oracle) यही है — गणित (नवांश-विभाग, दशा-वर्ष) को व्याख्या से पृथक रखो, फल को "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत करो, भय या निश्चयवाद न जोड़ो।

49.6
मेषे तु रक्तपीडा च वृषभे धान्यवर्द्धनम् |
मिथुने ज्ञानसम्पान्नश्चान्द्रे धनपतिर्भवेत्
meṣe tu raktapīḍā ca vṛṣabhe dhānyavarddhanam |
mithune jñānasampānnaścāndre dhanapatirbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष-नवांश में; रक्तपीडा = रक्त-सम्बन्धी पीड़ा; वृषभे = वृष-नवांश में; धान्यवर्द्धनम् = अन्न की वृद्धि; मिथुने = मिथुन-नवांश में; ज्ञानसम्पन्नः = ज्ञान से युक्त (पाठ "ज्ञानसम्पान्न" → ज्ञानसम्पन्न, पाठ-भेद संभव); चान्द्रे = चन्द्र की राशि = कर्क-नवांश में; धनपतिः भवेत् = धनवान् हो।

हिन्दी भावार्थ (अब मेष राशि के नवांशों का फल) — मेष-नवांश में रक्त-पीड़ा, वृष-नवांश में धान्य-वृद्धि, मिथुन-नवांश में मनुष्य ज्ञान-सम्पन्न होता है, और चन्द्र की राशि (कर्क) के नवांश में वह धन का स्वामी होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering In the Aries-navāṃśa, affliction of the blood; in Taurus, growth of grain; in Gemini, one becomes rich in knowledge; and in the Moon's sign (Cancer), one becomes a lord of wealth.

गणित / तकनीक: यहाँ कालचक्र दशा की नवांश-इकाई आरम्भ होती है। नवांश (D9) = राशि के 30° ÷ 9 = 3°20′ = 200′ चाप का समान विभाग; प्रत्येक राशि के 9 नवांश एक निर्धारित राशि-क्रम में दशा-खण्ड बनते हैं, और श्लोक हर नवांश को उस राशि के नाम से पुकारता है जिसमें वह पड़ता है। मेष का नवांश-क्रम यहाँ सीधा राशि-क्रम है: मेष → वृष → मिथुन → कर्क → … । सूत्र: नवांश-सङ्ख्या k = ⌊(राशि-भीतर देशान्तर ÷ 3°20′)⌋ + 1, k ∈ {1..9}।

उदाहरण: कोई बिन्दु मेष 10°40′ पर → राशि-भीतर 10.667° ; 10.667 ÷ 3.333 = 3.2 → ⌊3.2⌋ + 1 = 4था नवांश = कर्क-नवांश → इस श्लोक अनुसार "धनपति" फल-खण्ड। (ayanāṃśa व स्फुट-गणना पूर्व-निर्धारित मानकर।)

हमारा डिकोड: नवांश यहाँ वही D9 वर्ग है जिसे हमारी वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) 3°20′ की नियतात्मक (deterministic) माड्यूलर विभाजन-क्रिया से निकालती है — यह ṣoḍaśa-varga D1…D60 शृंखला का अंग है। कालचक्र दशा उसी नवांश-विभाग पर दशा-अवधि आरोपित करती है; विभाजन शुद्ध गणित है, फल-वाक्य शास्त्र का कथन।

49.7
सूर्यक्षे शत्रुबाधा च कन्या स्त्रीणां च नाशनं |
तालिके राजमन्त्रित्वं वृश्चिके मरणं भवेत्
sūryakṣe śatrubādhā ca kanyā strīṇāṃ ca nāśanaṃ |
tālike rājamantritvaṃ vṛścike maraṇaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यक्षे = सूर्य-क्षेत्र (सिंह) में; शत्रुबाधा = शत्रु से बाधा; कन्या = कन्या राशि में; स्त्रीणां च नाशनम् = स्त्रियों का नाश/हानि; तालिके = तालिका = तुला (पाठ-भेद संभव; क्रम से सातवीं राशि) में; राजमन्त्रित्वम् = राज-मन्त्रित्व; वृश्चिके = वृश्चिक में; मरणं भवेत् = मरण (हो) — शास्त्र का फल-शब्द।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सिंह (सूर्य-क्षेत्र) में शत्रु-बाधा; कन्या में स्त्री-संबंधी हानि; तालिका (तुला — क्रम और प्रसंग से; पाठ-भेद संभव) में राजमन्त्रित्व; वृश्चिक में मरण — ऐसा फल-कथन। “मरणम्” यहाँ दशा-फल की शास्त्रीय भाषा है; इसे निश्चित मृत्यु-पूर्वानुमान या भय-वाक्य के रूप में नहीं पढ़ना। फल-सूची मेष से वृश्चिक तक आठ राशियों तक पहुँचती है; शेष राशियाँ अगले श्लोकों में।

English rendering The text states: in the Sun’s sign (Leo), obstruction from enemies; in Virgo, harm concerning women; in Tālika (Libra — sequential sense; reading may vary), royal ministership; in Scorpio, death (as the stated phala-term).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सिंह→वृश्चिक)। “तालिके” = तुला — राशि-क्रम (मेष…वृश्चिक) से समर्थित; अन्य पाठ-भेद संभव। कोई अंश-सूत्र या दशा-वर्ष इस श्लोक में नहीं।

49.8
अर्थलाभो भवेच्चापे मेषस्य नवभागके |
मकरे पापकर्माणि कुम्भे वाणिज्यमेव च
arthalābho bhaveccāpe meṣasya navabhāgake |
makare pāpakarmāṇi kumbhe vāṇijyameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्थलाभः भवेत् चापे = चाप (धनु)-नवांश में धन-लाभ हो; मेषस्य नवभागके = मेष के नवांश-क्रम में; मकरे = मकर-नवांश में; पापकर्माणि = पाप-कर्म; कुम्भे = कुम्भ-नवांश में; वाणिज्यम् एव च = व्यापार ही।

हिन्दी भावार्थ मेष के नवांश-क्रम में धनु-नवांश में धन-लाभ होता है — इसी नवें नवांश के साथ मेष-राशि के नौ नवांशों का फल पूर्ण होता है। (अब आगे) मकर-नवांश में पाप-कर्म की ओर झुकाव, और कुम्भ-नवांश में वाणिज्य (व्यापार) — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering In the Sagittarius-navāṃśa (of Aries) there is gain of wealth — thus the nine navāṃśas of Aries close; then, in Capricorn, sinful deeds, and in Aquarius, trade.

गणित / तकनीक: "मेषस्य नवभागके" यह मेष-राशि के 9 नवांशों की श्रृंखला का समापन-चिह्न है — पूर्ण सव्य (सीधा) क्रम: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु; नवम (धनु) नवांश = धन-लाभ। इसके पश्चात् वृष-राशि के नवांशों का क्रम आरम्भ होता है (मकर से) — जो सीधा नहीं, कालचक्र-विशिष्ट क्रम है।

उदाहरण: मेष 27°00′ का बिन्दु → 27 ÷ 3.333 = 8.1 → ⌊8.1⌋ + 1 = 9वाँ नवांश = धनु-नवांश → "अर्थलाभ" खण्ड।

49.9
मीने सर्वार्थसिद्धिश्च वृश्चिकेष्वग्नितो भयम् |
तौलिके राजपूज्यश्च कन्यायां शत्रुवर्धनम्
mīne sarvārthasiddhiśca vṛścikeṣvagnito bhayam |
taulike rājapūjyaśca kanyāyāṃ śatruvardhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने = मीन राशि में; सर्वार्थसिद्धिः = समस्त प्रयोजनों की सिद्धि; वृश्चिकेषु = वृश्चिक राशि में; अग्नितः भयम् = अग्नि से भय; तौलिके = तुल (तौलिक) राशि में; राजपूज्यः = राजसम्मान/राजपूज्य; कन्यायाम् = कन्या राशि में; शत्रुवर्धनम् = शत्रु-वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—मीन में सर्वार्थसिद्धि होती है। वृश्चिक में अग्नि से भय का संकेत है। तुल में व्यक्ति राजपूज्य कहा गया है; कन्या में शत्रुवर्धन—शत्रुओं की वृद्धि—का फल बताया गया है। ये सब शास्त्रीय फल-वाक्य हैं; इन्हें निश्चित घटना या भय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states accomplishment of all aims in Pisces; fear from fire in Scorpio; royal honour in Libra; and growth of enemies in Virgo—phala-statements of the śāstra, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मीन–वृश्चिक–तुल–कन्या पर शास्त्रीय परिणाम-सूची)। कोई अंश, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं गिने गए।

49.10
शशिभे दारसम्बाधा सिंहे च त्वक्षिरोगकृत् |
मिथुने वृत्तिबाधा स्याद्वृषभस्य नवांशके
śaśibhe dārasambādhā siṃhe ca tvakṣirogakṛt |
mithune vṛttibādhā syādvṛṣabhasya navāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशिभे = चन्द्र की राशि = कर्क-नवांश में; दारसम्बाधा = दाम्पत्य-सम्बन्धी बाधा; सिंहे = सिंह-नवांश में; त्वक्-शिरोरोगकृत् = त्वचा व सिर के रोग करने वाला (पाठ "त्वक्षिरोग"); मिथुने = मिथुन-नवांश में; वृत्तिबाधा स्यात् = आजीविका में बाधा हो; वृषभस्य नवांशके = वृष के नवांश-क्रम में।

हिन्दी भावार्थ कर्क-नवांश में दाम्पत्य-बाधा, सिंह-नवांश में त्वचा व सिर के रोग, और मिथुन-नवांश में आजीविका-बाधा — इस प्रकार वृष-राशि के नौ नवांशों का फल पूर्ण होता है, ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering In the Moon's-sign (Cancer) navāṃśa, discord with the spouse; in Leo, ailments of skin and head; in Gemini, obstruction of livelihood — thus close the nine navāṃśas of Taurus.

गणित / तकनीक: "वृषभस्य नवांशके" वृष-राशि के 9 नवांशों की समाप्ति-चिह्न। श्लोक 8ब–10 से प्राप्त कालचक्र-क्रम: मकर, कुम्भ, मीन, वृश्चिक, तुला, कन्या, कर्क, सिंह, मिथुन — यह मेष जैसा सीधा नहीं; कालचक्र दशा की सव्य/अपसव्य गति के कारण राशि-क्रम भिन्न होता है (घोषित परिपाटी)। नवांश-चाप वही 3°20′ स्थिर है; केवल क्रम-आरेखण बदलता है।

उदाहरण: वृष 13°20′ का बिन्दु → 13.333 ÷ 3.333 = 4.0 → 4 नवांश पूर्ण, अतः 5वाँ नवांश आरम्भ → वृष-क्रम का 5वाँ = तुला-नवांश → "राजपूज्य" (श्लोक 9) खण्ड। (सीमा-बिन्दुओं पर परिपाटी/पाठ-भेद घोषित करें।)

49.11
वृषभे त्वर्थलाभाश्च मेषे तु ज्वररोगकृत् |
मीने तु मातुलप्रीतिः कुम्भे शत्रुप्रवर्द्धनम्
vṛṣabhe tvarthalābhāśca meṣe tu jvararogakṛt |
mīne tu mātulaprītiḥ kumbhe śatrupravarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषभे = वृषभ राशि में; अर्थलाभाः = अर्थ-लाभ (बहुवचन-प्रयोग); मेषे = मेष राशि में; ज्वररोगकृत् = ज्वर-रोग का कारक (शास्त्र-कथन); मीने = मीन में; मातुलप्रीतिः = मामा/मातुल की प्रीति; कुम्भे = कुम्भ में; शत्रुप्रवर्द्धनम् = शत्रु-प्रवर्धन (शत्रु-वृद्धि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—वृषभ में अर्थलाभ होते हैं। मेष में ज्वररोग का संकेत कहा गया है। मीन में मातुलप्रीति—मामा की प्रसन्नता/स्नेह—का फल है; कुम्भ में शत्रुप्रवर्धन। क्रम पूर्व-श्लोक के वृषभ-नवांश सन्दर्भ के साथ फल-सूची का विस्तार है।

English rendering The text states gains of wealth in Taurus; fever-affliction indication in Aries; affection of the maternal uncle in Pisces; and increase of enemies in Aquarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृषभ–मेष–मीन–कुम्भ)। ज्वर आदि केवल शास्त्र का फल-भाषा है; चिकित्सकीय दावा नहीं।

49.12
मृगे चौरस्य सम्बाधा धनुषि शस्त्रवर्धनम् |
मेषे तु शस्त्रसंघातो वृषभे कलहो भवेत्
mṛge caurasya sambādhā dhanuṣi śastravardhanam |
meṣe tu śastrasaṃghāto vṛṣabhe kalaho bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृगे = मकर-नवांश में; चौरस्य सम्बाधा = चोर (चोरी) से बाधा; धनुषि = धनु-नवांश में; शस्त्रवर्धनम् = शस्त्र-प्रसंग की वृद्धि; मेषे = मेष-नवांश में; शस्त्रसंघातः = शस्त्र-आघात; वृषभे = वृष-नवांश में; कलहः भवेत् = कलह हो।

हिन्दी भावार्थ मकर-नवांश में चोर-भय, धनु-नवांश में शस्त्र-प्रसंग की वृद्धि, मेष-नवांश में शस्त्र-आघात, और वृष-नवांश में कलह — ऐसा शास्त्र इस मिथुन-नवांश-क्रम में कहता है। (मेष व वृष यहाँ पुनः आते हैं; इस आवृत्ति में पाठ-भेद संभव।)

English rendering In Capricorn, trouble from thieves; in Sagittarius, an increase of weapon-affairs; in Aries, a wound from a weapon; in Taurus, quarrel — the reappearance of Aries and Taurus here is possibly a corrupt reading (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। इस पंक्ति में मेष व वृष नवांश दुबारा गिने गए हैं जबकि कर्क–वृश्चिक अनुपस्थित हैं; यह कालचक्र की मण्डूक-गति (छलाँग) हो सकती है अथवा लिपि-दोष — अतः पाठ-भेद संभव; किसी निश्चित क्रम का दावा नहीं करते।

49.13
मिथुने सुखमाप्नोति मिथुनस्य नवांशके |
कर्कटे सङ्कटप्राप्तिः सिंहे राजप्रकोपकृत्
mithune sukhamāpnoti mithunasya navāṃśake |
karkaṭe saṅkaṭaprāptiḥ siṃhe rājaprakopakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथुने सुखम् आप्नोति = मिथुन-नवांश में सुख पाता है; मिथुनस्य नवांशके = मिथुन के नवांश-क्रम में; कर्कटे = कर्क-नवांश में; सङ्कटप्राप्तिः = संकट की प्राप्ति; सिंहे = सिंह-नवांश में; राजप्रकोपकृत् = राजकीय कोप कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ मिथुन-नवांश में सुख की प्राप्ति होती है — इसी नवें नवांश के साथ मिथुन-राशि के नौ नवांशों का फल पूर्ण होता है। (अब आगे कर्क-राशि के नवांश) कर्क-नवांश में संकट, और सिंह-नवांश में राजकीय कोप — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering In the Gemini-navāṃśa one attains happiness — thus close the nine navāṃśas of Gemini; then, in Cancer, the onset of distress, and in Leo, the king's wrath.

गणित / तकनीक: "मिथुनस्य नवांशके" मिथुन-राशि के 9 नवांशों का समापन-चिह्न (नवम = मिथुन = सुख)। इसके बाद कर्क-राशि की नवांश-श्रृंखला आरम्भ होती है। स्मरण रहे — नवांश-इकाई सर्वत्र 3°20′ (200′) स्थिर रहती है; केवल राशि-क्रम कालचक्र की गति से बदलता है।

उदाहरण: मिथुन 29°10′ का बिन्दु → 29.167 ÷ 3.333 = 8.75 → ⌊8.75⌋ + 1 = 9वाँ नवांश = मिथुन-नवांश (स्व-राशि) → "सुख" खण्ड।

49.14
कन्यायां भ्रातृपूजा व तौलिके प्रियकृन्नरः |
वृश्चिके पितृबाधा स्यात् चापे ज्ञानधनोदयः
kanyāyāṃ bhrātṛpūjā va taulike priyakṛnnaraḥ |
vṛścike pitṛbādhā syāt cāpe jñānadhanodayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्यायाम् = कन्या राशि में; भ्रातृपूजा = भाइयों से पूजा/सम्मान; व = च/और (पाठ-भेद संभव: वा/च); तौलिके = तुल में; प्रियकृत् नरः = प्रिय करने वाला पुरुष / प्रियकर व्यक्ति; वृश्चिके = वृश्चिक में; पितृबाधा = पितृ-सम्बन्धी बाधा; चापे = धनु में; ज्ञानधनोदयः = ज्ञान और धन का उदय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—कन्या में भ्रातृपूजा होती है। तुल में व्यक्ति प्रियकृत्—प्रिय करने वाला, अनुकूल—कहा गया है। वृश्चिक में पितृबाधा का फल है; चाप (धनु) में ज्ञानधनोदय—ज्ञान और धन दोनों का उदय। यह अध्याय-क्रम की फल-सूची का बंद श्लोक-समूह है; कोई दशा-वर्ष या बिंदु-गणित यहाँ नहीं है।

English rendering The text states honour from brothers in Virgo; a man who acts agreeably or wins affection in Libra; paternal obstruction in Scorpio; and the rise of knowledge and wealth in Sagittarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्या–तुल–वृश्चिक–धनु)। “व” पद पर पाठ-भेद संभव; अर्थ-क्रम में संयोजक “और” ही पर्याप्त है।

49.15
मकरे जलभीतिः स्यात् कुम्भे धान्यविवर्धनम् |
मीने च सुखसम्पत्तिः कर्कटस्य नवांशके
makare jalabhītiḥ syāt kumbhe dhānyavivardhanam |
mīne ca sukhasampattiḥ karkaṭasya navāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मकरे = मकर-राशि/अंश में; जलभीतिः = जल से भय; कुम्भे = कुम्भ-राशि/अंश में; धान्यविवर्धनम् = धान्य (अन्न/उपज) की वृद्धि; मीने = मीन-राशि/अंश में; सुखसम्पत्तिः = सुख और सम्पत्ति; कर्कटस्य नवांशके = कर्कट (कर्क) राशि के नवांश (D9) प्रसंग में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्कट-राशि के नवांश-विवेचन में, मकर-नवांश में जल-भय की स्थिति कही गई है। कुम्भ-नवांश में धान्य की वृद्धि बताई गई है। मीन-नवांश में सुख और सम्पत्ति का फल कहा गया है। यह सब नवांश-फल-कथन है, गणना-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that, in the navāṃśa discussion of Cancer, Capricorn yields fear of water; Aquarius, increase of grain; and Pisces, happiness with prosperity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्कट-नवांशों में मकर/कुम्भ/मीन के चन्द्र-फल)। नवांश स्वयं D9 का 30° ÷ 9 = 3°20′ का समान भाग है; यहाँ केवल फल कहा गया है, भाग-नियम नहीं।

49.16
वृश्चिके कलः पीडा तौलिके ह्यधिकं फलम् |
कन्यायामतिलाभश्च शशांके मृगबाधिका
vṛścike kalaḥ pīḍā taulike hyadhikaṃ phalam |
kanyāyāmatilābhaśca śaśāṃke mṛgabādhikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिके = वृश्चिक में; कलः पीडा = कलह/विग्रह और पीड़ा; तौलिके = तुला (तौलिक) में; अधिकं फलम् = अधिक/प्रबल फल; कन्यायाम् = कन्या में; अतिलाभः = अत्यन्त लाभ; शशांके = चन्द्र (शशाङ्क) के विषय में; मृगबाधिका = मृग/पशु से बाधा (मृग = पशु-पीड़ा; पाठ में “मृग” = मकर-संकेत भी संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि वृश्चिक में कलह और पीड़ा कही गई है। तुला में अधिक फल बताया गया है। कन्या में अति-लाभ कहा गया है। चन्द्र (शशाङ्क) के प्रसंग में मृग/पशु-बाधा का भी उल्लेख है। यह सब फल-वर्णन है।

English rendering The text states that Scorpio brings strife and pain; Libra, abundant fruit; Virgo, great gain; and, of the Moon, affliction from animals (mṛga-bādhā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवांश/राशि-फलों का क्रम)। “शशांके” से स्पष्ट है कि प्रकरण चन्द्र-फल का है; संख्या या भाग-सूत्र यहाँ नहीं है।

49.17
सिंहे च पुत्रलाभश्च मिथुने शत्रुवर्द्धनम् |
वृषेः चतुष्पदाल्लाभो मेषांशे पशुतो भयम् |
मीने तु दीर्घयात्रा स्यात् सिंहस्य नवभागके
siṃhe ca putralābhaśca mithune śatruvarddhanam |
vṛṣeḥ catuṣpadāllābho meṣāṃśe paśuto bhayam |
mīne tu dīrghayātrā syāt siṃhasya navabhāgake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंहे = सिंह में; पुत्रलाभः = पुत्र-लाभ; मिथुने = मिथुन में; शत्रुवर्द्धनम् = शत्रुओं की वृद्धि; वृषेः / वृषे = वृषभ से/में (पाठ-भेद संभव); चतुष्पदाल्लाभः = चौपायों से लाभ; मेषांशे = मेष-अंश (मेष-नवांश) में; पशुतो भयम् = पशु से भय; मीने = मीन में; दीर्घयात्रा = लम्बी यात्रा; सिंहस्य नवभागके = सिंह के नवभाग (नवांश) में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सिंह के नवांश-प्रसंग में सिंह में पुत्र-लाभ कहा गया है। मिथुन में शत्रु-वृद्धि बताई गई है। वृषभ में चौपायों से लाभ, और मेष-अंश में पशु से भय कहा गया है। मीन में दीर्घ-यात्रा का फल सिंह के नवभाग में बताया गया है।

English rendering The text states that, in Leo’s navāṃśa (navabhāga) context, Leo yields gain of a son; Gemini, increase of enemies; Taurus, gain from quadrupeds; the Aries-aṃśa, fear from animals; and Pisces, a long journey.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सिंह-नवांशों के फल)। “नवभाग” = नवांश (D9); गणना यहाँ नहीं, केवल फल-सूची है।

49.18
कुम्भे तु धनलाभश्च मकरे द्रव्यलाभकृत् |
धनुषि भ्रातृसंसर्गो मेषे मातृविवर्द्धनम्
kumbhe tu dhanalābhaśca makare dravyalābhakṛt |
dhanuṣi bhrātṛsaṃsargo meṣe mātṛvivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुम्भे = कुम्भ में; धनलाभः = धन-लाभ; मकरे = मकर में; द्रव्यलाभकृत् = द्रव्य (धन) का लाभ कराने वाला; धनुषि = धनु में; भ्रातृसंसर्गः = भाइयों का संसर्ग/संग; मेषे = मेष में; मातृविवर्द्धनम् = माता/मातृ-पक्ष की वृद्धि या कल्याण-वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुम्भ में धन-लाभ कहा गया है। मकर में द्रव्य-लाभ कराने वाला फल बताया गया है। धनु में भाइयों का संसर्ग कहा गया है। मेष में माता की वृद्धि/समृद्धि का फल कहा गया है। ये सब फल-वाक्य हैं।

English rendering The text states that Aquarius brings gain of wealth; Capricorn, gain of substance; Sagittarius, association with brothers; and Aries, increase or flourishing on the mother’s side.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ कोई वर्ष, बिन्दु, अंश-संख्या या बल-इकाई नहीं दी गई।

49.19
वृषभे पुत्रवृद्धिः स्यान्मिथुने शत्रुवर्द्धनम् |
शशिभे तु स्त्रियां प्रीतिः सिंहे व्याधिविवर्द्धनम्
vṛṣabhe putravṛddhiḥ syānmithune śatruvarddhanam |
śaśibhe tu striyāṃ prītiḥ siṃhe vyādhivivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषभे = वृषभ में; पुत्रवृद्धिः = पुत्र/सन्तान की वृद्धि; मिथुने = मिथुन में; शत्रुवर्द्धनम् = शत्रु-वृद्धि; शशिभे = शशि-भ (चन्द्र की राशि = कर्क) में; स्त्रियां प्रीतिः = स्त्री में प्रीति / स्त्री-विषयक अनुराग; सिंहे = सिंह में; व्याधिविवर्द्धनम् = व्याधि (रोग) की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वृषभ में पुत्र-वृद्धि कही गई है। मिथुन में शत्रु-वृद्धि बताई गई है। शशि-भ (कर्क) में स्त्री-विषयक प्रीति का फल कहा गया है। सिंह में व्याधि की वृद्धि कही गई है। यह शास्त्र का फल-वर्णन है, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that Taurus yields increase of progeny; Gemini, increase of enemies; the Moon’s sign (Cancer), affection toward women; and Leo, increase of disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “शशिभ” = चन्द्र-राशि (कर्क) — नाम-संकेत, कोई संख्या-सूत्र नहीं।

49.20
कन्यायां पुत्रवृद्धिः स्यात्कन्याया नवमांशके |
तुलायामर्थलाभश्च वृश्चिके भ्रातृवर्द्धनम्
kanyāyāṃ putravṛddhiḥ syātkanyāyā navamāṃśake |
tulāyāmarthalābhaśca vṛścike bhrātṛvarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्यायाम् = कन्या में; पुत्रवृद्धिः = पुत्र-वृद्धि; कन्यायाः नवमांशके = कन्या के नवमांश (नवांश) में; तुलायाम् = तुला में; अर्थलाभः = अर्थ (धन/संपत्ति) का लाभ; वृश्चिके = वृश्चिक में; भ्रातृवर्द्धनम् = भाइयों की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कन्या के नवांश-प्रसंग में कन्या में पुत्र-वृद्धि कही गई है। तुला में अर्थ-लाभ बताया गया है। वृश्चिक में भाइयों की वृद्धि का फल कहा गया है। पूरा श्लोक फल-सूची है।

English rendering The text states that, in Virgo’s navāṃśa context, Virgo yields increase of progeny; Libra, gain of wealth; and Scorpio, increase of brothers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्या-नवांशों के फल)। “नवमांश” = नवांश; विभाजन-नियम यहाँ नहीं दिया गया।

49.21
चापे च तातसौख्यं च मृगे मातृविरोधिता |
कुम्भे पुत्रार्थलाभश्च मीने शत्रुविरोधिता
cāpe ca tātasaukhyaṃ ca mṛge mātṛvirodhitā |
kumbhe putrārthalābhaśca mīne śatruvirodhitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चापे = चाप (धनु) में; तातसौख्यम् = पिता का/से सौख्य; मृगे = मृग (मकर) में; मातृविरोधिता = माता से विरोध; कुम्भे = कुम्भ में; पुत्रार्थलाभः = पुत्र और अर्थ का लाभ (या पुत्र-अर्थ-लाभ); मीने = मीन में; शत्रुविरोधिता = शत्रुओं से विरोध/शत्रु-विरोध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि धनु (चाप) में पिता-सौख्य कहा गया है। मकर (मृग) में माता से विरोध बताया गया है। कुम्भ में पुत्र और अर्थ का लाभ कहा गया है। मीन में शत्रु-विरोध का फल कहा गया है। ये सब शास्त्रीय फल-कथन हैं।

English rendering The text states that Sagittarius brings happiness connected with the father; Capricorn (mṛga), opposition from the mother; Aquarius, gain of progeny and wealth; and Pisces, hostility of enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “मृग” यहाँ मकर के पर्याय-रूप में पढ़ा जाता है; कोई संख्या या सूत्र नहीं।

49.22
अलौ जायाविरोधश्च तुले च जलबाधता |
कन्यायां धनवृद्धिः स्यात् तुलाया नवभागके
alau jāyāvirodhaśca tule ca jalabādhatā |
kanyāyāṃ dhanavṛddhiḥ syāt tulāyā navabhāgake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अलौ = आलौ/वृश्चिके (आलि = वृश्चिक; पाठ-भेद संभव); जाया-विरोध = पत्नी/दाम्पत्य-विरोध; तुले = तुला-राशि में; जल-बाधता = जल से बाधा; कन्यायां = कन्या-राशि में; धन-वृद्धि = अर्थ-समृद्धि; तुलाया नव-भागके = तुला के नवमांश (D9) में / तुला-नवमांश-प्रकरण में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस श्लोक में तुला के नवमांश-संदर्भ में फल कहता है। आलि/वृश्चिक-नवमांश में जाया-विरोध; तुला में जल-बाधा; और कन्या में धन-वृद्धि — ऐसा पाठ का कथन है। यह फल-कथन है, गणना का नया सूत्र नहीं; केवल नवमांश-राशि की पहचान के बाद शास्त्रीय फल-सूची का एक पद है।

English rendering In the context of Libra’s navāṃśa, the text states spouse-opposition in Scorpio (āli/alau — reading may vary), obstruction from water in Libra, and increase of wealth in Virgo.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय फल-सूत्र नहीं — फल-कथन (तुला-नवमांश × राशि-फल)। तकनीक केवल D9-पहचान है: प्रत्येक 30° राशि को 9 समान भागों में बाँटा जाता है — 30° ÷ 9 = 3°20′ = 10/3 ° प्रति नवमांश। राशि-अन्दर अंश d (0° ≤ d < 30°) पर नवमांश-सूचकांक n = ⌊d ÷ (10/3)⌋ = ⌊3d/10⌋ (n = 0…8)। n-वें भाग को शास्त्रोक्त चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम से D9-राशि पर मैप किया जाता है; जो D9-राशि मिले, उसी पर यह फल-सूची लागू होती है। फल स्वयं “शास्त्र कहता है” — नियति या भविष्य-वाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए लग्न (या प्रश्न-ग्रह) तुला 14°00′ पर है (सायनांश/अयनांश यहाँ अप्रासंगिक — केवल राशि-अन्दर अंश चाहिए)। d = 14; n = ⌊3×14/10⌋ = ⌊4.2⌋ = 4 → पाँचवाँ नवमांश (3°20′ × 4 = 13°20′ से 16°40′ तक)। तुला चर (movable) है, अतः D9-गणना तुला से क्रमशः चलती है: n=0 तुला … n=4 = कुम्भ। कुम्भ-फल इस श्लोक में नहीं; कन्या-फल तभी जब n ऐसा हो कि D9 = कन्या (उदा. तुला 6°40′–10°00′ → n=2 → कन्या) — तब शास्त्र “धनवृद्धि” कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवमांश षोडश-वर्ग (D9) का शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन है — 30° के नौ 3°20′ खंड, नियत मैपिंग। हमारी वर्ग-इंजन (D1…D60) यही विभाजन लागू करती है; यह श्लोक उस D9-राशि पर शास्त्रीय फल-सूची जोड़ता है। गणना `==` से तय होती है; फल को हम भविष्य नहीं मानते — केवल पाठ का कथन।

49.23
कर्कटे ह्यर्थनाशश्च सिंहे राजविरोधिता |
मिथुने भूमिलाभश्च वृषभे चाऽर्थलाभकृत्
karkaṭe hyarthanāśaśca siṃhe rājavirodhitā |
mithune bhūmilābhaśca vṛṣabhe cā'rthalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कटे = कर्कट/कर्क राशि में; अर्थ-नाश = धन-हानि; सिंहे = सिंह में; राज-विरोधिता = राज/अधिकार-पक्ष से विरोध; मिथुने = मिथुन में; भूमि-लाभ = भूमि-प्राप्ति; वृषभे = वृषभ में; अर्थ-लाभ-कृत् = धन-लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ तुला-नवमांश-प्रकरण की फल-सूची आगे बढ़ती है। शास्त्र कहता है — कर्कट में अर्थनाश, सिंह में राज-विरोध, मिथुन में भूमिलाभ, वृषभ में अर्थलाभ। ये चार राशियाँ D9 में पड़ें तो पाठ इन्हीं फलों का उल्लेख करता है; दबाव या उपचार-निर्देश यहाँ नहीं है।

English rendering Continuing the Libra-navāṃśa results, the text states loss of wealth in Cancer, opposition from royal/authority figures in Leo, gain of land in Gemini, and gain of wealth in Taurus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (D9-राशि → शास्त्रोक्त फल)। वही 3°20′ नवमांश-खंड; n = ⌊3d/10⌋ से D9-राशि निर्धारित कर सूची पढ़ी जाती है।

उदाहरण (worked example) वृषभ 8°00′ (स्थिर राशि; d = 8)। n = ⌊3×8/10⌋ = ⌊2.4⌋ = 2 → तीसरा नवमांश। स्थिर राशि में नवमांश प्रायः नवम-राशि (मकर से) गिने जाते हैं — n=0 मकर, 1 कुम्भ, 2 मीन… (परंपरा घोषित करें)। यदि D9 = वृषभ निकले तो शास्त्र “अर्थलाभकृत्” कहता है; D9 = कर्कट हो तो “अर्थनाश” — दोनों केवल पाठ-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) D9 की राशि-पहचान वर्ग-इंजन का नियत अंकगणित है; यह श्लोक उसी पहचान के बाद फल-तालिका का पद है। गणना और फल-वाक्य अलग रखे जाते हैं — अनुशासन वही: गणित `==`, फल “शास्त्र कहता है”।

49.24
मेषे सर्पादिभीतिः स्यान्मीने चैव जलाद् भयम् |
कुम्भे व्यापारतो लाभो मकरेऽपि रुजो भयम्
meṣe sarpādibhītiḥ syānmīne caiva jalād bhayam |
kumbhe vyāpārato lābho makare'pi rujo bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष में; सर्पादि-भीति = सर्प आदि से भय; मीने = मीन में; जलाद् भयम् = जल से भय; कुम्भे = कुम्भ में; व्यापारतः लाभः = व्यापार से लाभ; मकरे = मकर में; रुजः भयम् = रोग/व्याधि का भय।

हिन्दी भावार्थ तुला-नवमांश-फल की शेष राशियाँ: मेष में सर्पादि-भीति, मीन में जल-भय, कुम्भ में व्यापार-लाभ, मकर में रोग-भय — ऐसा शास्त्र कहता है। भय-शब्द यहाँ पाठ का पारंपरिक फल-भाषा है; हम उसे डराने वाली भविष्यवाणी या चिकित्सा-कथन नहीं बनाते।

English rendering Still under Libra’s navāṃśa, the text states fear of snakes and the like in Aries, fear from water in Pisces, gain through trade in Aquarius, and fear of illness in Capricorn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / भय-लाभ की शास्त्रीय सूची। D9-पहचान पूर्ववत्: d ∈ [0°, 30°), n = ⌊3d/10⌋, फिर राशि-प्रकार के अनुसार D9-राशि; सूची से फल पढ़ा जाता है।

उदाहरण (worked example) मीन 22°00′ (सम/द्विस्वभाव; d = 22)। n = ⌊3×22/10⌋ = ⌊6.6⌋ = 6 → सातवाँ नवमांश (20°00′–23°20′)। द्विस्वभाव में नवमांश प्रायः पंचम से गिने जाते हैं — मैपिंग पूरी होने पर यदि D9 = मीन हो तो शास्त्र “जलाद् भयम्” कहता है; D9 = कुम्भ हो तो “व्यापारतो लाभः”। अयनांश केवल मूल देशान्तर-रेखांश तय करने में आता है; अंश-विभाजन स्वयं सापेक्ष है।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग में D9 का खंड 3°20′ स्थिर है; फल-श्लोक उस खंड की राशि पर पाठ की सूची बाँधते हैं। हमने विभाजन को इंजन में पिन किया है; फल को प्रमाणित भविष्य नहीं माना।

49.25
चापे तु धनलाभः स्याद् वृश्चिकस्य नवांशके |
मेषे तु धनलाभः स्याद् वृषे भूमिविवर्द्धनम्
cāpe tu dhanalābhaḥ syād vṛścikasya navāṃśake |
meṣe tu dhanalābhaḥ syād vṛṣe bhūmivivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चापे = धनु/चाप राशि में; धन-लाभ = अर्थ-प्राप्ति; वृश्चिकस्य नवांशके = वृश्चिक के नवमांश में / वृश्चिक-नवमांश-प्रकरण; मेषे = मेष में; धन-लाभ; वृषे = वृषभ में; भूमि-विवर्द्धनम् = भूमि की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ अब प्रकरण वृश्चिक-नवमांश पर आता है। शास्त्र कहता है — चाप में धनलाभ, मेष में धनलाभ, वृषभ में भूमि-विवर्धन। तुला-श्रृंखला से हटकर यह नई D9-कुंजी (वृश्चिक) पर फल-सूची खोलता है।

English rendering Under Scorpio’s navāṃśa, the text states gain of wealth in Sagittarius, gain of wealth in Aries, and increase of land in Taurus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृश्चिक-D9 × राशि)। तकनीक: जिस बिंदु (लग्न/ग्रह) का D9 वृश्चिक हो, उसकी “नवमांश-राशि” (D9 sign) के अनुसार यह सूची; अथवा “वृश्चिक-नवमांश-फल” शीर्षक के अंतर्गत D9 में पड़ी राशि का फल — पाठ-संरचना दोनों पढ़ने देती है; पाठ-भेद/अर्थ-भेद संभव। विभाजन अटल: 3°20′ प्रति भाग।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए चंद्र 2°10′ वृश्चिक (स्थिर)। d = 2°10′ = 2 + 1/6 ≈ 2.166°; n = ⌊3×2.166/10⌋ = ⌊0.65⌋ = 0 → प्रथम नवमांश (0°–3°20′)। स्थिर-नियम से n=0 प्रायः कन्या (वृश्चिक से नवम) पर मैप होता है — तब यह श्लोक सीधे कन्या-फल नहीं देता; यदि D9 = चाप हो तो शास्त्र “धनलाभ” कहता है। उदाहरण का उद्देश्य: पहले n और D9-राशि `==` से तय करें, फिर फल-पंक्ति पढ़ें।

हमारा डिकोड (Our Decode) D9 = षोडश-वर्ग की नौ-भाग संरचना; वृश्चिक-कुंजी केवल फल-तालिका का शीर्षक है। वर्ग-इंजन राशि-अन्दर अंश से n और D9-राशि निकालता है — फल अलग परत है।

49.26
मिथुने सर्वसिद्धिः स्यात्कर्कटे सर्वसिद्धिकृत् |
सिंहे तु पूर्ववृद्धिः स्यात्कन्यायां कलहो भवेत्
mithune sarvasiddhiḥ syātkarkaṭe sarvasiddhikṛt |
siṃhe tu pūrvavṛddhiḥ syātkanyāyāṃ kalaho bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथुने = मिथुन में; सर्व-सिद्धि = सब सिद्धियाँ/पूर्ण सफलता; कर्कटे = कर्कट में; सर्व-सिद्धि-कृत् = सर्व-सिद्धि कराने वाला; सिंहे = सिंह में; पूर्व-वृद्धि = पूर्व (पूर्वी/पूर्वकालिक) समृद्धि-वृद्धि; कन्यायां = कन्या में; कलहः = झगड़ा/विवाद।

हिन्दी भावार्थ वृश्चिक-नवमांश-फल आगे: मिथुन और कर्कट में शास्त्र सर्वसिद्धि कहता है; सिंह में पूर्व-वृद्धि; कन्या में कलह। “सर्वसिद्धि” पाठ का उदार फल-पद है — हम उसे गारंटी या नियति नहीं ठहराते।

English rendering Continuing Scorpio-navāṃśa results, the text states all-round accomplishment in Gemini and in Cancer, prior/forward increase in Leo, and quarrel in Virgo.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। D9-पहचान: n = ⌊3d/10⌋; D9-राशि = f(मूल-राशि-प्रकार, n)। मिथुन/कर्कट/सिंह/कन्या पर यही सूची।

उदाहरण (worked example) सिंह 11°00′। d = 11; n = ⌊33/10⌋ = 3 → चौथा नवमांश (10°00′–13°20′)। सिंह चर; n=0 सिंह … n=3 = वृश्चिक। यदि प्रश्न “वृश्चिक-नवमांश-फल” का हो और D9-राशि सिंह हो, शास्त्र “पूर्ववृद्धि” कहता है; D9 = कन्या हो तो “कलह”।

हमारा डिकोड (Our Decode) एक ही D9-अंकगणित; भिन्न श्लोक केवल फल-पंक्तियाँ बदलते हैं। इंजन गणना पिन करता है; फल को हम भविष्य-वाणी नहीं कहते।

49.27
तौलिके चार्थलाभः स्याद् वृश्चिके रोओगमाप्नुयात् |
चापे तु सुतवृद्धिः स्याच्चापस्य नवमांशके
taulike cārthalābhaḥ syād vṛścike roogamāpnuyāt |
cāpe tu sutavṛddhiḥ syāccāpasya navamāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तौलिके = तुला राशि (Libra) की दशा-अवधि में; अर्थलाभः = धन की प्राप्ति; वृश्चिके = वृश्चिक राशि (Scorpio) में; रोगम् आप्नुयात् = रोग प्राप्त होता है ("रोओग" = मुद्रण-दोष, पाठ "रोग"); चापे = धनु राशि (Sagittarius) में; सुतवृद्धिः = सन्तान की वृद्धि; चापस्य नवमांशके = धनु के नवांश-खण्ड (D9-ब्लॉक) में — अर्थात् जिस जातक का जन्म-नवांश धनु में पड़े।

हिन्दी भावार्थ यह पंक्ति कालचक्र-दशा के धनु (चाप) नवांश-खण्ड का फल पूरा करती है। शास्त्र कहता है — इस शृंखला में तुला की दशा-अवधि धनलाभ देती है, वृश्चिक की अवधि रोग की सूचना देती है, और स्वयं धनु की अवधि सन्तान-वृद्धि कही गई है। "चापस्य नवमांशके" यह इंगित करता है कि पूर्वोक्त सारे फल उसी जातक के लिए हैं जिसका जन्म-नवांश धनु राशि में स्थित हो।

English rendering Within the navāṃśa-segment of Sagittarius, the text states that the Libra period yields gain of wealth, the Scorpio period brings illness, and the Sagittarius period itself brings increase of progeny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्रदशा का नवांश-वार फल)। एकमात्र तकनीकी लंगर यह है कि "नवमांश" = D9 = 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ (= 200′) का चाप; जातक का जन्म-नवांश ही तय करता है कि बारह नवांश-ब्लॉकों में से कौन-सा (यहाँ धनु का) लागू होगा।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र 250° पर है। राशि = ⌊250 ÷ 30⌋ = 8 → धनु (240°–270°); राशि-भीतर स्थिति = 250 − 240 = 10°; नवांश-सूचक = ⌊10 ÷ 3°20′⌋ = ⌊10 ÷ 3.333⌋ = 3 → धनु का चौथा नवांश। यही नवांश-पद कालचक्रदशा-शृंखला का बीज बनता है (नवांश-राशि का अभिज्ञान D9-नियम से; कालचक्र की आन्तरिक गति पृथक् तालिका से)।

हमारा डिकोड (Our Decode) कालचक्रदशा की प्रवेश-कुंजी जन्म-नवांश (D9-स्थिति) है, और यही वह ṣoḍaśa-varga विभाजन है जिसे हमारे varga-इंजन ने नियतात्मक 3°20′ खंडों में पिन किया (kaal_ekavimshati_varga.py)। स्पष्ट रहे — दोसियर का 120-वर्षीय दशा-इंजन विमशोत्तरी का है; कालचक्र एक भिन्न पद्धति है, अतः हम डिकोड-संबंध केवल नवांश-लंगर तक सीमित रखते हैं, आन्तरिक सव्य/अपसव्य गति का दावा नहीं करते।

49.28
मकरे पुत्रलाभः स्यात्कुम्भे धान्यविवर्द्धनम् |
मीने कल्याणमाप्नोति वृश्चिके विषबाधिता
makare putralābhaḥ syātkumbhe dhānyavivarddhanam |
mīne kalyāṇamāpnoti vṛścike viṣabādhitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मकरे = मकर में; पुत्र-लाभ = पुत्र/संतान-प्राप्ति; कुम्भे = कुम्भ में; धान्य-विवर्द्धनम् = अन्न/धान्य की वृद्धि; मीने = मीन में; कल्याणम् आप्नोति = कल्याण प्राप्त करता है; वृश्चिके = वृश्चिक में; विष-बाधिता = विष से बाधा/पीड़ित।

हिन्दी भावार्थ चाप-नवमांश-फल आगे बढ़ता है। शास्त्र कहता है — मकर में पुत्रलाभ, कुम्भ में धान्य-वृद्धि, मीन में कल्याण, वृश्चिक में विष-बाधा। “विषबाधिता” पारंपरिक फल-भाषा है; हम उसे literal विष-भविष्य या भय-व्यापार नहीं बनाते — केवल पाठ का कथन।

English rendering Under Sagittarius’s navāṃśa, the text states gain of a son in Capricorn, increase of grain in Aquarius, well-being in Pisces, and affliction by poison in Scorpio.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चाप-नवमांश × राशि)। पूर्ण D9-विधि: (1) रेखांश L से राशि s = ⌊L/30⌋, d = L − 30s; (2) n = ⌊3d/10⌋; (3) s के चर/स्थिर/द्विस्वभाव से D9-राशि; (4) यदि प्रकरण चाप-नवमांश है तो इस श्लोक की सूची। अयनांश (लाहिरि आदि) केवल L तय करने में; विभाजन L के राशि-अन्दर भाग पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) कुम्भ 18°00′ (स्थिर)। d = 18; n = ⌊54/10⌋ = 5 → छठा नवमांश (16°40′–20°00′)। स्थिर-नियम: n=0 = तुला (कुम्भ से नवम) … गिनकर D9 निकालें। यदि D9 = कुम्भ और प्रकरण चाप-नवमांश-फल का हो, शास्त्र “धान्यविवर्द्धनम्” कहता है; D9 = मीन हो तो “कल्याण”। संख्याएँ केवल n और 3°20′ खंड से — फल अलग वाक्य।

हमारा डिकोड (Our Decode) D9 = षोडश-वर्ग का नवमांश — 30° ÷ 9 = 3°20′, मॉड्यूलर मैपिंग; हमारी वर्ग-श्रृंखला (D1…D60) यही लागू करती है। अध्याय 49 के ये पद गणना नहीं सिखाते — D9-राशि पर शास्त्रीय फल बाँधते हैं। अनुशासन: खंड `==` से सत्यापित; फल “शास्त्र कहता है”, नियति नहीं।

49.29
तौलिके त्वर्थलाभश्च कन्यायां शत्रुवर्द्धनम् |
शशिभे स्र्/इयमाप्नोति सिंहे तु मृगबाधिता
taulike tvarthalābhaśca kanyāyāṃ śatruvarddhanam |
śaśibhe sr/iyamāpnoti siṃhe tu mṛgabādhitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तौलिके = तुला में; अर्थलाभः = धनलाभ; कन्यायाम् = कन्या राशि (Virgo) में; शत्रुवर्द्धनम् = शत्रुओं की वृद्धि; शशिभे = चन्द्र की राशि कर्क (Cancer) में; स्त्रियम् आप्नोति = स्त्री (पत्नी) की प्राप्ति ("स्र्/इयम्" = विकृत मुद्रण, पाठ "स्त्रियम्", पाठ-भेद संभव); सिंहे = सिंह राशि (Leo) में; मृगबाधिता = वन्य पशुओं से पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस दशा-शृंखला में तुला की अवधि धनलाभ, कन्या की अवधि शत्रु-वृद्धि, कर्क (चन्द्र की राशि) की अवधि स्त्री-लाभ और सिंह की अवधि वन्य-पशुओं से पीड़ा की सूचना देती है। "शशिभ" यहाँ चन्द्रस्वामिनी कर्क राशि का पर्याय है।

English rendering The text states that the Libra period brings gain of wealth, the Virgo period an increase of enemies, the Cancer (Moon's sign) period the gaining of a wife, and the Leo period danger from wild beasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यातव्य पारिभाषिक बिन्दु: "शशिभ" = चन्द्र-स्वामित्व वाली राशि = कर्क; यही राशि पद्य 49.33 में "कर्कट" नाम से आती है — एक ही राशि के दो नाम, अर्थ अभिन्न।

49.30
मिथुने वृक्षबाधा च मृगस्य नवभागके |
वृषभे त्वर्थलाभश्च मेषभे त्वक्षिरोगकृत्
mithune vṛkṣabādhā ca mṛgasya navabhāgake |
vṛṣabhe tvarthalābhaśca meṣabhe tvakṣirogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथुने = मिथुन राशि (Gemini) में; वृक्षबाधा = वृक्ष/काष्ठ से चोट या पीड़ा; मृगस्य नवभागके = मृग (= मकर, Capricorn) के नवांश-खण्ड में; वृषभे = वृषभ राशि (Taurus) में; अर्थलाभः = धनलाभ; मेषभे = मेष राशि (Aries) में; अक्षिरोगकृत् = नेत्र-रोग का कारक।

हिन्दी भावार्थ प्रथम पंक्ति "मृगस्य नवभागके" कहकर मकर के नवांश-खण्ड को समाप्त करती है — उसमें मिथुन की अवधि वृक्ष-सम्बन्धी पीड़ा बतलाती है। तदुपरान्त अगला (कुम्भ) खण्ड आरम्भ होता है, जिसमें शास्त्र वृषभ की अवधि को धनलाभ और मेष की अवधि को नेत्र-रोग की सूचना कहता है। यहाँ "मृग" मकर राशि का ही नाम है।

English rendering With "in the navāṃśa of Capricorn," the text closes that segment (the Gemini period bringing harm from trees); then the next segment opens, where the Taurus period is said to bring gain of wealth and the Aries period to cause eye-disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "मृग = मकर" यह पर्याय-ज्ञान गणना के लिए आवश्यक है: नवांश-चाप वही 3°20′ रहता है, केवल राशि-नाम बदला है; "मृगस्य नवभागके" बारहवें में से मकर-ब्लॉक को चिह्नित करता है।

49.31
मीने तु दीर्घयात्रा स्यात्कुम्भे धनविवर्द्धनम् |
मकरे सर्वसिद्धिः स्याच्चापे शत्रुविवर्द्धनम्
mīne tu dīrghayātrā syātkumbhe dhanavivarddhanam |
makare sarvasiddhiḥ syāccāpe śatruvivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने = मीन में; दीर्घयात्रा = लम्बी यात्रा; कुम्भे = कुम्भ में; धनविवर्द्धनम् = धन की वृद्धि; मकरे = मकर में; सर्वसिद्धिः = समस्त कार्य-सिद्धि; चापे = धनु में; शत्रुविवर्द्धनम् = शत्रुओं की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस दशा-शृंखला में मीन की अवधि को दीर्घ यात्रा, कुम्भ की अवधि को धन-वृद्धि, मकर की अवधि को सर्व-सिद्धि, और धनु की अवधि को शत्रु-वृद्धि की सूचना कहता है। ये सब एक ही नवांश-ब्लॉक के भीतर की क्रमिक दशा-राशियों के फल हैं।

English rendering The text states that the Pisces period brings a long journey, the Aquarius period increase of wealth, the Capricorn period complete success, and the Sagittarius period an increase of enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "सर्वसिद्धि" जैसे शुभ और "शत्रुवृद्धि" जैसे अशुभ — दोनों समान रूप से शास्त्र के कथन हैं, गणित नहीं; इन्हें निश्चित परिणाम मानकर नहीं, पाठ के प्रतिपादन रूप में ग्रहण करें।

49.32
मेषे सौख्यविनाशश्च वृषभे मरणं भवेत् |
युग्मे कल्याणमाप्नोति कुम्भस्य नवमांशके
meṣe saukhyavināśaśca vṛṣabhe maraṇaṃ bhavet |
yugme kalyāṇamāpnoti kumbhasya navamāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष में; सौख्यविनाशः = सुख का नाश; वृषभे = वृषभ में; मरणं भवेत् = मरण होता है (शास्त्र-कथन); युग्मे = युग्म राशि = मिथुन (Gemini) में; कल्याणम् आप्नोति = कल्याण प्राप्त होता है; कुम्भस्य नवमांशके = कुम्भ के नवांश-खण्ड में।

हिन्दी भावार्थ यह पंक्ति "कुम्भस्य नवमांशके" कहकर कुम्भ के नवांश-खण्ड को समेटती है। शास्त्र इस शृंखला में मेष की अवधि को सुख-हानि, वृषभ की अवधि को अत्यन्त अशुभ, और मिथुन (युग्म) की अवधि को कल्याण की सूचना कहता है। "युग्म" (मिथुन का पर्याय) यहाँ जोड़ी-रूप राशि का द्योतक है।

English rendering The text closes the Aquarius navāṃśa-segment, stating that the Aries period brings loss of comfort, the Taurus period is gravely inauspicious, and the Gemini period brings well-being.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-कथन)। अनुशासन: "मरणं भवेत्" शास्त्र का अत्यन्त अशुभ प्रतिपादन है — इसे नियति, निश्चितता या भविष्यवाणी के रूप में कभी न प्रस्तुत करें; यह केवल "पाठ ऐसा कहता है" है, और इससे भय उत्पन्न करना वर्जित है। तकनीकी लंगर वही — कुम्भ-नवांश ब्लॉक (3°20′ चाप)।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी विधि का मूल-सूत्र यही है: गणना (नवांश-चाप, दशा-क्रम) को व्याख्या (फल) से पृथक् रखना। कुम्भ-नवांश की पहचान D9-इंजन का नियतात्मक परिणाम है; किन्तु "मरण/सुख-नाश" जैसे फल शास्त्र के वचन हैं, इंजन के आउटपुट नहीं — हम इन्हें कभी प्रमाणित परिणाम रूप में नहीं देते।

49.33
कर्कटे धनवृद्दिः स्यात् सिंहे तु राजपूजनम् |
कन्यायामर्थलाभस्तु तुलायां लाभमाप्नुयात्
karkaṭe dhanavṛddiḥ syāt siṃhe tu rājapūjanam |
kanyāyāmarthalābhastu tulāyāṃ lābhamāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कटे = कर्क राशि (Cancer) में; धनवृद्धिः = धन की वृद्धि ("वृद्दि" = मुद्रण-दोष, पाठ "वृद्धि"); सिंहे = सिंह में; राजपूजनम् = राजा से सम्मान; कन्यायाम् = कन्या में; अर्थलाभः = धनलाभ; तुलायाम् = तुला में; लाभम् आप्नुयात् = लाभ प्राप्त होता है।

हिन्दी भावार्थ यह अन्तिम (मीन) नवांश-खण्ड की दशा-शृंखला आरम्भ करती है। शास्त्र कहता है — कर्क की अवधि धन-वृद्धि, सिंह की अवधि राजकीय सम्मान, कन्या की अवधि धनलाभ, और तुला की अवधि सामान्य लाभ देती है।

English rendering The text states that the Cancer period brings increase of wealth, the Leo period honour from the king, the Virgo period gain of wealth, and the Libra period gain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "कर्कट" यहाँ वही राशि है जो पद्य 49.29 में "शशिभ" कही गई थी — नाम-भेद, राशि-अभेद; गणना-दृष्टि से दोनों कर्क (90°–120°) हैं।

49.34
वृश्चिके ज्वरमाप्नोति चापे शत्रुविवर्द्धनम् |
मृगे जायाविरोधश्च कुम्भे जलविरोधता
vṛścike jvaramāpnoti cāpe śatruvivarddhanam |
mṛge jāyāvirodhaśca kumbhe jalavirodhatā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिके = वृश्चिक में; ज्वरम् आप्नोति = ज्वर प्राप्त होता है; चापे = धनु में; शत्रुविवर्द्धनम् = शत्रु-वृद्धि; मृगे = मृग = मकर में; जायाविरोधः = पत्नी से विरोध/कलह; कुम्भे = कुम्भ में; जलविरोधता = जल से विरोध/भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस शृंखला में वृश्चिक की अवधि को ज्वर, धनु की अवधि को शत्रु-वृद्धि, मकर (मृग) की अवधि को दाम्पत्य-कलह, और कुम्भ की अवधि को जल-सम्बन्धी विपत्ति की सूचना कहता है। सभी कथन उसी मीन-नवांश-खण्ड के भीतर की दशा-राशियों के हैं।

English rendering The text states that the Scorpio period brings fever, the Sagittarius period an increase of enemies, the Capricorn period discord with one's wife, and the Aquarius period trouble from water.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ज्वर/कलह जैसे कथन शास्त्र के प्रतिपादन हैं; इन्हें चिकित्सकीय या पारिवारिक भविष्यवाणी न बनाएँ — पाठ का वचन मात्र।

49.35
मीने तु सर्वसौभाग्यं मीनस्य नवभागके |
दशाअंशक्रमेणैवं ज्ञात्वा सर्वफलं वदेत्
mīne tu sarvasaubhāgyaṃ mīnasya navabhāgake |
daśāaṃśakrameṇaivaṃ jñātvā sarvaphalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने = मीन में; सर्वसौभाग्यम् = सब प्रकार का सौभाग्य; मीनस्य = मीन का; नवभागके = नवमांश (D9) में; दशांशक्रमेण = दशांश (D10) के क्रम से; एवम् = इसी प्रकार; ज्ञात्वा = जानकर; सर्वफलम् = सब फल; वदेत् = कहे/बताए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मीन में — मीन के नवमांश-प्रसंग में — सर्वसौभाग्य का फल है। फिर निर्देश है कि नवमांश-क्रम से जो फल जाना गया, उसी रीति से दशांश-क्रम लगाकर भी सब फल जानकर कहना चाहिए। यह फल-सूची को दो वर्ग-चार्टों पर समान रूप से लागू करने का विधि-निर्देश है।

English rendering The text states all-round good fortune in Pisces, within the Pisces-navāṃśa discourse. One should likewise, knowing the results by the sequence of daśāṃśa (D10), declare every phala in the same manner as for the navāṃśa sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संख्या-सूत्र नहीं — वर्ग-अनुप्रयोग निर्देश। नवमांश (D9) = 30°/9 = 3°20′ प्रति भाग; दशांश (D10) = 30°/10 = 3° प्रति भाग। श्लोक कहता है: नवभाग-क्रम से पढ़ा फल-क्रम दशांश-क्रम पर भी उसी रीति से लगाएँ — फल-तालिका का स्थानांतरण, नई अंकगणित नहीं। (अयनांश/राशि-निर्णय फल के इनपुट पर निर्भर; फल-शब्द स्वयं शास्त्र-कथन हैं।)

उदाहरण (worked example) मान लें ग्रह-देशान्तर λ = 345°10′ (मीन 15°10′; सायन/निरयण जो भी चुना हो — फल के लिए केवल राशि-अंश चाहिए)।
• नवमांश-अंशांक: (15°10′) ÷ 3°20′ = 4 पूर्ण भाग → 5वाँ नवमांश; मीन से क्रम में 5वाँ = कर्क (उदाहरण-केवल; विषम/सम राशि नियम परंपरा-निर्भर — BPHS षोडशवर्ग नियम घोषित करें)।
• दशांश-अंशांक: (15°10′) ÷ 3° = 5 पूर्ण → 6वाँ दशांश।
श्लोक 49.35 का विधि-भाग: नवमांश-फल-सूची (49.29–35) के क्रम को दशांश-राशि पर उसी प्रकार पढ़ें — «मीने सर्वसौभाग्यम्» तब लागू जब फल-स्थान मीन हो; अन्यथा सूची का संगत पद।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडशवर्ग इंजन में D9 (नवमांश) और D10 (दशांश) दोनों 30° राशि के समान चाप-विभाजन हैं — D9 = 3°20′, D10 = 3° — शुद्ध मॉड्यूलर मानचित्रण। यह श्लोक उसी यांत्रिक विभाजन पर फल-तालिका का द्वितीय अनुप्रयोग (दशांश-क्रम) आदेशित करता है। हम गणित को `==` सटीकता से बाँधते हैं; फल-वाक्य केवल «शास्त्र कहता है» के रूप में रहते हैं — भविष्य-निश्चितता नहीं।

49.36
क्रूरग्रहदशाकाले शान्तिं कुर्याद्विचक्षणः |
यत् प्रोक्तं राजयोगादौ संज्ञाध्याये च यत् फलम्
krūragrahadaśākāle śāntiṃ kuryādvicakṣaṇaḥ |
yat proktaṃ rājayogādau saṃjñādhyāye ca yat phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूर-ग्रह = पाप/तीक्ष्ण ग्रह (रवि, मंगल, शनि, राहु-केतु आदि — संज्ञा-परम्परा अनुसार); दशा-काले = उस ग्रह की दशा-अवधि में; शान्तिम् = शान्ति-विधि / प्रशमन; कुर्यात् = करे; विचक्षणः = विवेकी ज्योतिषी; राजयोग-आदौ = राजयोग आदि योगों के प्रकरण में; संज्ञा-अध्याये = संज्ञा-अध्याय में; यत् फलम् = जो फल कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि क्रूर ग्रह की दशा-काल में विवेकी व्यक्ति शान्ति करे। साथ ही, राजयोग आदि प्रकरणों में तथा संज्ञा-अध्याय में जो फल कहा गया है, उसे भी इसी क्रम में ध्यान में रखा जाए। यह निर्देश दशा-फल को योग-फल और संज्ञा-सिद्धान्त से जोड़ने का है — न कि किसी निश्चित विपत्ति का दावा।

English rendering The text states that the discerning practitioner should perform śānti during a malefic planet’s daśā period. It further points back to the results already taught under rājayoga and related topics, and to the phala given in the saṃjñā chapter, to be held together with this timing rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल का निर्देश-कथन (शान्ति-विधि + पूर्व-अध्याय के फल का अनुस्मरण)। यहाँ कोई वर्ष-संख्या, अंश-विभाजन या बलांक नहीं; केवल यह कि क्रूर-ग्रह-दशा के काल में पूर्वोक्त फल-नियमों को लागू करने का विवेक शास्त्र स्वयं कहता है।

49.37
तत्सर्वं चत्रकाले हि सुबुद्ध्या योजयेद् बुधः |
इति संक्षेपतः प्रोक्तं कालचक्रदशाफलम्
tatsarvaṃ catrakāle hi subuddhyā yojayed budhaḥ |
iti saṃkṣepataḥ proktaṃ kālacakradaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-सर्वम् = वह सब (पूर्वोक्त योग-फल एवं संज्ञा-फल); चत्र-काले = पाठ-भेद संभव — सन्दर्भतः तत्र काले / चक्र-काले (उस दशा-समय में); सु-बुद्ध्या = सूक्ष्म बुद्धि से; योजयेत् = संयोजित करे / लागू करे; बुधः = विद्वान्; संक्षेपतः = संक्षेप में; प्रोक्तम् = कहा गया; कालचक्र-दशा-फलम् = कालचक्र-दशा का फल-विधान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्व-श्लोक में स्मृत सारा फल-सामग्री दशा के उसी काल में सूझ-बूझ से जोड़ी जाए। विद्वान् केवल सूची नहीं दोहराए, बल्कि योग, संज्ञा और दशा-समय को एक साथ बाँधकर देखे। इसी के साथ अध्याय का सार-निष्कर्ष आता है — “कालचक्रदशाफल संक्षेप से कहा गया।”

English rendering The text states that the wise should, with clear judgment, apply all those previously stated results at the relevant daśā time. Thus, it concludes, the phala of the Kālacakra-daśā has been taught in brief.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कालचक्र-दशा-फल-अध्याय का संक्षेपात्मक उपसंहार। दशा-वर्षों का अनुपात, नक्षत्र-अंश या अन्तर-दशा का सूत्र यहाँ नहीं दिया; केवल यह कि फल-प्रयोग “काल” पर सुबुद्धि से योजित हो, और अध्याय का विषय कालचक्र-दशा-फल है।

अध्यायः 50

चरादिदशाफलाध्यायः

97 श्लोक
50.1
चरस्थिरादिसंज्ञा या दशाः प्रोक्ताः पुरा द्विज |
शुभाऽशुभफलं तासां कथयामि तवाऽग्रतः
carasthirādisaṃjñā yā daśāḥ proktāḥ purā dvija |
śubhā'śubhaphalaṃ tāsāṃ kathayāmi tavā'grataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चर-स्थिर-आदि-संज्ञा = चर/स्थिर/द्विस्वभाव आदि नाम से कही गई (राशि-दशाएँ); दशाः = काल-विभाग / फल-काल; प्रोक्ताः पुरा = पूर्व अध्यायों में कही गईं; शुभ-अशुभ-फलम् = शुभ तथा अशुभ परिणाम; कथयामि = (मैं) कहता हूँ; तव अग्रतः = तुम्हारे सामने; द्विज = द्विज-शिष्य (मैत्रेय-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! चर, स्थिर आदि संज्ञाओं वाली जो दशाएँ पहले बताई जा चुकी हैं, अब उनके शुभ और अशुभ फल का वर्णन मैं तुम्हारे सामने करता हूँ। यह अध्याय दशा-नाम-मात्र से आगे बढ़कर फल-प्रयोग की ओर ले जाता है। पाठ का स्वर संवाद-शिक्षा का है — पहले नियम, अब फल।

English rendering O twice-born, the daśās previously named as movable, fixed, and the rest — I now set forth before you their auspicious and inauspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-अध्याय का उद्घाटन / संवाद। चर–स्थिर–द्विस्वभाव दशाएँ राशि-स्वभाव पर आधारित काल-क्रम हैं; यह श्लोक केवल फल-कथन का द्वार खोलता है, कोई संख्या-नियम नहीं देता।

50.2
लग्नादिद्वादशान्तानां भावानां फलकीर्तने |
तत्तद्राशीशवीर्येण यथायोग्यं प्रयोजयेत्
lagnādidvādaśāntānāṃ bhāvānāṃ phalakīrtane |
tattadrāśīśavīryeṇa yathāyogyaṃ prayojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-आदि-द्वादश-अन्तानाम् = लग्न से बारहवें तक के; भावानाम् = भावों का; फल-कीर्तने = फल कहने में; तत्-तत्-राशि-ईश-वीर्येण = उस-उस राशि के स्वामी के बल/वीर्य से; यथा-योग्यम् = यथोचित रूप से; प्रयोजयेत् = प्रयोग करे।

हिन्दी भावार्थ लग्न से लेकर द्वादश भाव तक के फल का कीर्तन करते समय शास्त्र कहता है — प्रत्येक भाव/राशि का फल उसके राशीश (स्वामी) के वीर्य के अनुपात में यथायोग्य लगाना चाहिए। केवल भाव-संख्या पर्याप्त नहीं; स्वामी का बल फल की तीव्रता और दिशा तय करने का मापदण्ड है। यह नियम दशा-फल और भाव-फल दोनों पर समान रूप से लागू होने वाला सामान्य सूत्र है।

English rendering In declaring the results of the twelve houses from the lagna through the twelfth, one should apply them as appropriate according to the strength of the lord of each respective sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-मापन का गुणात्मक नियम (संख्या-स्थिरांक नहीं):
फल(भाव_i) ≃ f( वीर्य(राशीश_i) ), i = 1…12
जहाँ वीर्य = बल-संकेत (षड्बल आदि से मापा जा सकता है)। श्लोक स्वयं पूर्ण/मध्यम/हीन की सीढ़ियाँ नहीं गिनता — वह अगले श्लोक में आती हैं।

उदाहरण (worked example) मानें दशा-प्रद राशि मेष, राशीश मंगल। भाव-फल (उदा. चतुर्थ) कहने से पहले मंगल का षड्बल देखें: यदि मंगल बलवान् है तो शास्त्रोक्त चतुर्थ-फल पूर्ण रूप में; यदि मध्यम/हीन है तो उसी अनुपात में घटित/विपरीत प्रयोग — ठीक जैसा 50.3 विस्तार करता है। (बल-माप: षड्बल; अयनांश/कुण्डली-संकेत फल की सामग्री बदलते हैं, यह नियम नहीं।)

50.3
बलयुक्ते च राशीशे पूर्णं तस्य तदा फलम् |
फलं मध्य्बले मध्यं बलहीने विपर्ययः
balayukte ca rāśīśe pūrṇaṃ tasya tadā phalam |
phalaṃ madhybale madhyaṃ balahīne viparyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बल-युक्ते राशीशे = राशीश जब बल से युक्त हो; पूर्णं फलम् = पूरा फल; मध्य-बले (मध्य्बले) = मध्यम बल में; मध्यं फलम् = मध्यम फल; बल-हीने = बलहीन होने पर; विपर्ययः = विपरीत / उलटा फल। पाठ-भेद संभव: “मध्य्बले” ≈ “मध्यबले”।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट सीढ़ी देता है — राशीश बलयुक्त हो तो उस काल/भाव का फल पूर्ण; मध्यम बल हो तो फल मध्य; बलहीन हो तो फल विपर्यय (शास्त्रोक्त शुभ-अशुभ दिशा उलटने/निष्फल होने का संकेत)। यह “हो जाएगा” का दावा नहीं, फल-प्रयोग की मात्रा-नियम है: बल से पूर्णता, दुर्बलता से उलटाव।

English rendering When the sign-lord is strong, its result is full; with medium strength the result is medium; when strength is lacking, the result is reversed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तीन-स्तरीय फल-मानचित्र (गुणात्मक; श्लोक संख्या-सीमा नहीं देता):
- वीर्य = उच्च → फल = पूर्ण (शास्त्रोक्त दिशा में)
- वीर्य = मध्य → फल = मध्य
- वीर्य = हीन → फल = विपर्यय
आधुनिक मॉडल में वीर्य को षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) के योग से रूप/विरूप में मापा जाता है (1 रूप = 60 विरूप); पूर्ण/मध्यम/हीन की संख्या-सीमा परम्परा-सापेक्ष है — श्लोक स्वयं थ्रेशोल्ड नहीं लिखता।

उदाहरण (worked example) दशा-प्रद राशि वृषभ, राशीश शुक्र। मानें षड्बल-योग: शुक्र ≈ 7.5 रूप (बलवान् कल्पित) → शास्त्र कहता है उस दशा/भाव का फल पूर्ण दिशा में; यदि ≈ 4 रूप (मध्यम) → मध्य फल; यदि ≈ 2 रूप (हीन) → विपर्यय। (उदाहरण की संख्याएँ शिक्षणार्थ; वास्तविक थ्रेशोल्ड ग्रह-भेद और पद्धति पर निर्भर — घोषित करें: षड्बल-संकेत, अयनांश, कुण्डली।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्बल (अध्याय 27) — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में योज्य है; यही “वीर्य” का गणितीय पक्ष है जिस पर यह श्लोक फल की पूर्णता/माध्यमता/विपर्यय बाँधता है। हम बल को संगणनीय घटकों में रखते हैं और फल-कथन को शास्त्र-वाक्य के रूप में अलग रखते हैं — गणित = `==` जाँच योग्य; फल = “शास्त्र कहता है”, नियति-घोषणा नहीं।

50.4
यो यो दशाप्रदो राशिस्तस्य रन्ध्रत्रिकोणके |
पापखेटयुते विप्र तद्दशा दुःखदायिका
yo yo daśāprado rāśistasya randhratrikoṇake |
pāpakheṭayute vipra taddaśā duḥkhadāyikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यः यः दशा-प्रदः राशिः = जो-जो दशा देने वाली राशि; तस्य रन्ध्र-त्रिकोणके = उसके रन्ध्र (8) तथा त्रिकोण (1, 5, 9) में; पाप-खेट-युते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर; तद्-दशा = वह दशा; दुःख-दायिका = दुःख देने वाली (शास्त्र-कथन); विप्र = द्विज-संबोधन।

हिन्दी भावार्थ जो भी राशि दशा-प्रद हो, शास्त्र कहता है — यदि उस राशि से रन्ध्र (आठवाँ) और त्रिकोण (लग्न/उसी राशि, पंचम, नवम) पर पापखेट युक्त हों, तो वह दशा दुःखदायिका कही गई है। यहाँ “दुःख” शास्त्र का फल-पद है, नियति की धमकी नहीं; जाँच का केन्द्र दशा-राशि से गिने घरों में पाप-संयोग है।

English rendering Whichever sign is the daśā-giver — if malefic planets occupy its eighth and its trinal places, O brahmin, the text states that that daśā is productive of hardship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-राशि R₀ से भाव-गणना (पूर्ण राशि-चरण, 1-आधार):
त्रिकोण = { R₀, R₀+4, R₀+8 } mod 12 (भाव 1, 5, 9)
रन्ध्र = R₀+7 mod 12 (भाव 8)
नियम: यदि इन स्थानों में पापखेट (सूर्य/मंगल/शनि/राहु-केतु — परम्परा-सापेक्ष सूची) युक्त हों → शास्त्र: तद्दशा दुःखदायिका।
(युते = युति/अधिष्ठान; दृष्टि-मात्र का विस्तार इस श्लोक में नहीं।)

उदाहरण (worked example) दशा-प्रद राशि = कन्या (R₀)। तब त्रिकोण = कन्या, मकर, वृषभ; रन्ध्र = मेष। यदि मेष/मकर पर शनि-मंगल युति हो, तो शास्त्र के अनुसार उस कन्या-दशा को दुःखदायिका कहा गया है। (दृष्टि/अयनांश यहाँ नहीं; केवल राशि-भाव ज्यामिति।)

50.5
तृतीयषष्ठगे पापे ज्यादिः परिकीर्तितः |
शुभखेटयुते तत्र जायते च पराजयः
tṛtīyaṣaṣṭhage pāpe jyādiḥ parikīrtitaḥ |
śubhakheṭayute tatra jāyate ca parājayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीय-षष्ठ-गे = (दशा-राशि से) तृतीय और षष्ठ भाव में स्थित; पापे = पाप-ग्रह में; जय-आदिः (ज्यादिः) = जय आदि (विजय इत्यादि); परिकीर्तितः = कहा गया है; शुभ-खेट-युते तत्र = वहीं शुभ-ग्रह युक्त होने पर; पराजयः = पराजय / हार। पाठ-भेद संभव: “ज्यादिः” ≈ “जयादिः”।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की प्रसिद्ध उलट-तर्क रीति: दशा-प्रद राशि से तृतीय और षष्ठ में पाप हो तो जय आदि फल कहा गया; उन्हीं भावों में शुभखेट युक्त हों तो पराजय उत्पन्न होता है — ऐसा पाठ कहता है। तृतीय-षष्ठ उपचय/शत्रु-स्थल होने के कारण पाप वहाँ “कार्य-सिद्धि” की भाषा में पढ़े जाते हैं; शुभ वहाँ “शिथिलता/पराजय” की भाषा में — यह फल-सूत्र है, नैतिक निर्णय नहीं।

English rendering With a malefic in the third or sixth (from the daśā-sign), victory and the like are declared; if benefics are joined there, defeat arises — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) R₀ = दशा-प्रद राशि:
तृतीय = R₀+2, षष्ठ = R₀+5 (mod 12)
- पाप ∈ {3, 6} → शास्त्र: जय-आदि
- शुभ ∈ {3, 6} → शास्त्र: पराजय
(दोनों भावों में मिश्रण हो तो श्लोक मौन — योग-विचार/अन्य सूत्रों पर छोड़ें; यहाँ केवल द्वि-ध्रुवी नियम।)

उदाहरण (worked example) R₀ = धनु। तृतीय = कुम्भ, षष्ठ = वृषभ। कुम्भ में शनि (पाप) → शास्त्र: जय-आदि कीर्तित; वृषभ में गुरु-शुक्र (शुभ) → शास्त्र: पराजय। यदि केवल एक भाव प्रभावित हो, उसी पक्ष का फल लागू; पूर्ण मिश्रण का भार-विभाजन यह श्लोक नहीं देता।

50.6
लाभस्थे च शुभे पापे लाभो भवति निश्चितः |
यदा दशाप्रदो राशिः शुभखेटयुतो द्विज
lābhasthe ca śubhe pāpe lābho bhavati niścitaḥ |
yadā daśāprado rāśiḥ śubhakheṭayuto dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभ-स्थे = (दशा-राशि से) लाभ-स्थान (एकादश) में स्थित; शुभे पापे = शुभ हो या पाप; लाभः = लाभ / प्राप्ति; भवति निश्चितः = निश्चय से होता है (शास्त्र-कथन); यदा दशा-प्रदः राशिः शुभ-खेट-युतः = जब दशा-प्रद राशि शुभ-ग्रह से युक्त हो; द्विज = संबोधन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा-प्रद राशि से लाभ-स्थान (11) में ग्रह हो, शुभ हो या पाप, लाभ निश्चित कहा गया है। साथ ही, जब स्वयं दशा-प्रद राशि शुभखेट से युक्त हो, तो भी शुभ-लाभ की दिशा बलवती मानी गई है। “निश्चितः” यहाँ शास्त्र की निश्चय-भाषा है, आधुनिक नियति-घोषणा नहीं — एकादश की लाभ-प्रकृति दोनों वर्गों के ग्रहों पर लागू की गई है।

English rendering Whether a benefic or a malefic occupies the eleventh from the daśā-sign, gain is stated as certain; likewise when the daśā-giving sign itself is joined by benefic planets, O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
लाभ = R₀+10 mod 12
नियम A: (शुभ ∨ पाप) ∈ लाभ-स्थान → शास्त्र: लाभः निश्चितः
नियम B: R₀ पर शुभ-खेट युति → शुभ/लाभ पक्ष प्रबल (अगला श्लोक क्षेत्र-गुण जोड़ता है)
एकादश पर ग्रह-मात्र पर्याप्त; शुभ/पाप भेद यहाँ फल-ध्रुव नहीं बदलता — यही इस सूत्र की विशेषता है।

उदाहरण (worked example) R₀ = मीन। लाभ = मकर। मकर में सूर्य (पाप) या गुरु (शुभ) — दोनों स्थितियों में शास्त्र लाभ कहता है। यदि मीन पर शुक्र-युति हो, नियम B से दशा-राशि स्वयं शुभ-युक्त — लाभ-पक्ष और दृढ़। (दशा-प्रणाली: चर/स्थिर आदि राशि-दशा; विम्शोत्तरी से भिन्न कुंजी।)

50.7
शुभक्षेत्रे हि तद्राशेः शुभं ज्ञेयं दशाफलम् |
पापयुक्ते शुभक्षेत्रे पूर्वं शुभमसत्परे
śubhakṣetre hi tadrāśeḥ śubhaṃ jñeyaṃ daśāphalam |
pāpayukte śubhakṣetre pūrvaṃ śubhamasatpare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-क्षेत्रे = शुभ क्षेत्र/शुभ-स्वामित्व या मित्र-क्षेत्र में; तत्-राशेः = उस (दशा-)राशि का; शुभं दशा-फलम् = दशा-फल शुभ; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; पाप-युक्ते शुभ-क्षेत्रे = शुभ क्षेत्र में पाप से युक्त होने पर; पूर्वम् शुभम् = पहले शुभ; असत् परे = बाद में अशुभ/असत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा-प्रद राशि यदि शुभ-क्षेत्र में हो तो दशा-फल शुभ जानना चाहिए। यदि वही राशि शुभ-क्षेत्र में रहकर भी पापखेट से युक्त हो, तो फल द्वि-चरण: पूर्व काल में शुभ, परे (उत्तरार्ध/बाद) में असत्। क्षेत्र (स्वामी/मित्रता/शुभ-भाव) शुभ दिशा देता है; पाप-युति समय के साथ फल को मोड़ती है — पूर्ण निषेध नहीं, क्रम-भेद।

English rendering When that (daśā) sign stands in a benefic field, the daśā-result is to be known as auspicious; if, though in a benefic field, it is joined by malefics, the text states the earlier phase is good and the later is not.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वि-चर फल-फलन (काल-विभाजन गुणात्मक):
- क्षेत्र(R₀) = शुभ ∧ युति(R₀) ∌ पाप → दशा-फल = शुभ
- क्षेत्र(R₀) = शुभ ∧ युति(R₀) ∋ पाप → फल(पूर्व) = शुभ, फल(पर) = असत्
“शुभक्षेत्र” = शुभ-ग्रह का स्व/मित्र/उच्च क्षेत्र अथवा शुभ-भाव — परिभाषा पद्धति-सापेक्ष; श्लोक शब्द “शुभक्षेत्रे” देता है, विस्तृत सूची नहीं। “पूर्व/पर” = दशा-काल का पूर्वार्ध–उत्तरार्ध (समान भाग या अन्य विभाजन — पाठ मौन; परम्परा में प्रायः दो अर्ध)।

उदाहरण (worked example) R₀ = कर्क, क्षेत्र = चन्द्र-स्वक्षेत्र (शुभक्षेत्र कल्पित) → दशा-फल शुभ। यदि कर्क पर शनि-युति हो (पाप-युक्त शुभक्षेत्र) → शास्त्र: दशा के पूर्व भाग में शुभ, पर भाग में असत्। मानें चर-दशा में कर्क-अवधि 8 वर्ष (उदाहरण-मात्र; वास्तविक चर/स्थिर वर्ष-मान अध्याय-पूर्व सूत्र से लें) → ≈ 0–4 वर्ष शुभ-पक्ष, 4–8 वर्ष असत्-पक्ष — शिक्षणार्थ समानार्ध; अन्य विभाजन घोषित करें।

50.8
पापर्क्षे शुभसंयुक्ते पूर्वं सौख्यं ततोऽशुभम् |
पापक्षेत्रे पापयुक्ते सा दशा सर्वदुखदा
pāparkṣe śubhasaṃyukte pūrvaṃ saukhyaṃ tato'śubham |
pāpakṣetre pāpayukte sā daśā sarvadukhadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापर्क्षे = पाप-राशि/मलीन क्षेत्र में (दशा-स्वामी की स्थिति); शुभसंयुक्ते = शुभ-ग्रहों से युक्त; पूर्वं सौख्यं = पहले सुख; ततोऽशुभम् = तत्पश्चात् अशुभ; पापक्षेत्रे पापयुक्ते = पाप-क्षेत्र में पाप-ग्रहों से युक्त; सा दशा = वह दशा; सर्वदुखदा = सर्व-दुःख-प्रदा (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशा-सम्बद्ध पाप-क्षेत्र शुभ-ग्रहों से युक्त हो, तो पहले सुख-अनुभव और बाद में अशुभ फल कहा गया है। किन्तु जब पाप-क्षेत्र स्वयं पाप-ग्रहों से युक्त हो, तो उस दशा को सर्व-दुःख-प्रदा बताया गया है। यहाँ फल का क्रम और क्षेत्र-ग्रह-युति का नियम दशा-विवेचन का आधार है।

English rendering The text states that when a malefic field/sign associated with the daśā is joined by benefics, ease comes first and the inauspicious later; when that same malefic field is joined by malefics, that daśā is said to yield all-round hardship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-क्षेत्र × शुभ/पाप-युति का क्रम-फल)। पाक/क्षेत्र-निर्धारण में दशा-स्वामी की राशि-स्थिति और युति का निर्धारण देशान्तर-सापेक्ष जन्मकालिक देशान्तर-रेखा (ayanāṃśa-घोषित) पर निर्भर करता है; फल स्वयं शास्त्र-कथन है, गणना नहीं।

50.9
शुभक्षेत्रदशा राशौ युक्ते पापशुभैर्द्विज
śubhakṣetradaśā rāśau yukte pāpaśubhairdvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभक्षेत्रदशा = शुभ-क्षेत्र की दशा; राशौ = राशि में; युक्ते = युक्त होने पर; पापशुभैः = पाप और शुभ दोनों ग्रहों से; द्विज = हे द्विज (संबोधन)। (श्लोक-अंश; अगले श्लोक से क्रम-फल जुड़ता है — पाठ-भेद/पाद-विभाजन संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र हे द्विज को संबोधित कर कहता है कि शुभ-क्षेत्र की दशा में, जब वह राशि पाप और शुभ दोनों से युक्त हो, तो मिश्रित युति का विशेष फल आगे स्पष्ट होता है। यह पाद अकेले पूर्ण फल-सूत्र नहीं खोलता; अगले श्लोक में “पूर्वं कष्टं, पश्चात् सुखम्” का क्रम जुड़ता है। पाठ-भेद संभव जहाँ यह पाद पूर्व/पर-श्लोक से जुड़ा पढ़ा जाता है।

English rendering Addressing the twice-born, the text begins the rule for a daśā of a benefic field when that sign is joined by both malefics and benefics; the sequential result is completed in the following verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन का आरम्भ-पाद (मिश्र-युति वाली शुभ-क्षेत्र-दशा)। संख्यात्मक सूत्र नहीं; केवल शुभ-क्षेत्र + पाप-शुभ युति की वर्गीकरण-शर्त।

50.10
पूर्वं कष्टं सुखं पश्चान्निर्विशङ्कं प्रजायते |
शुभक्षेत्रे शुभं वाच्यं पापर्क्षे त्वशुभं फलम्
pūrvaṃ kaṣṭaṃ sukhaṃ paścānnirviśaṅkaṃ prajāyate |
śubhakṣetre śubhaṃ vācyaṃ pāparkṣe tvaśubhaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वं कष्टं = पहले कष्ट; सुखं पश्चात् = बाद में सुख; निर्विशङ्कं = निःसंदेह; प्रजायते = उत्पन्न होता है; शुभक्षेत्रे = शुभ-क्षेत्र में; शुभं वाच्यं = शुभ फल कहना चाहिए; पापर्क्षे = पाप-राशि/क्षेत्र में; त्वशुभं फलम् = अशुभ फल।

हिन्दी भावार्थ (पूर्व-पाद की मिश्र-युति वाली शुभ-क्षेत्र-दशा में) शास्त्र कहता है कि पहले कष्ट और पीछे सुख निःसंदेह उत्पन्न होता है। सामान्य नियम यह भी कहा गया है—शुभ-क्षेत्र में शुभ फल वाच्य है, पाप-क्षेत्र में अशुभ फल। इस प्रकार क्षेत्र-स्वभाव फल की दिशा तय करता है, और मिश्र-युति में क्रम (पहले–बाद) स्पष्ट किया गया है।

English rendering The text states that (under the mixed conjunction just named) hardship comes first and ease afterward without doubt; more generally, a benefic field warrants auspicious speech of result, a malefic field an inauspicious one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (क्रम: कष्ट → सुख; क्षेत्र-नियम: शुभक्षेत्र ⇒ शुभ, पापर्क्ष ⇒ अशुभ)। “पूर्वं/पश्चात्” काल-क्रम दशा-अवधि के भीतर गुणात्मक है, वर्ष-संख्या का सूत्र नहीं।

50.11
द्वितीये पञ्चमे सौम्ये राजप्रीतिर्जयो ध्रुवम् |
पापे तत्र गते ज्ञेयमशुभं तद्दशाफलम्
dvitīye pañcame saumye rājaprītirjayo dhruvam |
pāpe tatra gate jñeyamaśubhaṃ taddaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये = द्वितीय भाव में; पञ्चमे = पञ्चम भाव में; सौम्ये = सौम्य/शुभ ग्रह होने पर; राजप्रीतिः = राज-अनुग्रह; जयः = विजय; ध्रुवम् = निश्चित (शास्त्र-कथन की दृढ़ता); पापे तत्र गते = वहाँ पाप-ग्रह गत होने पर; अशुभं तद्दशाफलम् = उस दशा का अशुभ फल ज्ञेय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्वितीय और पञ्चम भाव में शुभ/सौम्य ग्रह स्थित हो तो राज-प्रीति और विजय दृढ़ रूप से कही गई है। यदि उन्हीं स्थानों में पाप-ग्रह हो, तो उस दशा का फल अशुभ जानना चाहिए। यहाँ भाव-स्थान (2, 5) और ग्रह-स्वभाव (सौम्य/पाप) मिलकर दशा-फल का संकेत देते हैं।

English rendering The text states that with a benefic in the second or the fifth, royal favour and victory are firmly declared; if a malefic occupies those places, that daśā’s result is to be known as inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव 2 व 5 × सौम्य/पाप)। भाव-गणना गृह-पद्धति (पूर्ण राशि-भाव / समान-भवन आदि) पर निर्भर; जिस पद्धति से भाव-स्वामी/ग्रह-भाव निश्चित हो, उसी घोषणा के साथ फल पढ़ा जाए। फल स्वयं शास्त्र-कथन है।

50.12
चतुर्थे तु शुभं सौख्यमारोग्यं त्वष्टमे शुभे |
धर्मवृद्धिर्गुरुजनात्सौख्यं च नवमे शुभे
caturthe tu śubhaṃ saukhyamārogyaṃ tvaṣṭame śubhe |
dharmavṛddhirgurujanātsaukhyaṃ ca navame śubhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्थे तु शुभं = चतुर्थ में शुभ होने पर; सौख्यम् = सुख; आरोग्यम् = आरोग्य; अष्टमे शुभे = अष्टम में शुभ होने पर (उसी सौख्य/आरोग्य-वर्ग का संकेत); धर्मवृद्धिः = धर्म की वृद्धि; गुरुजनात् सौख्यम् = गुरुजन से सुख; नवमे शुभे = नवम में शुभ होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चतुर्थ भाव में शुभ होने पर सुख और आरोग्य कहा गया है; अष्टम में भी शुभ होने पर उसी श्रेणी का शुभ फल जोड़ा गया है। नवम में शुभ होने पर धर्म की वृद्धि तथा गुरुजन से सुख बताया गया है। भाव-स्थान के अनुसार शुभ-स्थिति के फल अलग-अलग गिने गए हैं।

English rendering The text states that a benefic in the fourth yields ease and health; a benefic in the eighth likewise supports that auspicious line; a benefic in the ninth brings growth of dharma and ease from elders/teachers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव 4, 8, 9 में शुभ-स्थिति के पृथक् फल)। “शुभ” = सौम्य ग्रह / शुभ-युति का शास्त्रीय संकेत; संख्यात्मक बल-सीमा यहाँ नहीं दी गई।

50.13
विपरीते विपर्यासो मिश्रे मिश्रं प्रकीर्तितम् |
पाके भोगे च पापाढ्ये देहपीडा मनोव्यथा
viparīte viparyāso miśre miśraṃ prakīrtitam |
pāke bhoge ca pāpāḍhye dehapīḍā manovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विपरीते = विपरीत स्थिति में; विपर्यासः = फल का उलटा; मिश्रे मिश्रं = मिश्रित में मिश्र फल; प्रकीर्तितम् = कहा गया; पाके भोगे च = पाक और भोग दोनों में; पापाढ्ये = पाप-ग्रहाढ्य होने पर; देहपीडा = देह-पीड़ा; मनोव्यथा = मन की व्यथा (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सामान्य नियम देता है—विपरीत स्थिति में फल भी विपरीत; मिश्र स्थिति में मिश्र फल। विशेषतः जब पाक और भोग दोनों पाप-ग्रहाढ्य हों, तो देह-पीड़ा और मनोव्यथा कही गई है। पाक = दशा-पाक (दशा-स्वामी/पाक-राशि-सम्बद्ध फल-स्थल), भोग = भोग-स्थल (अनुभव का दूसरा निर्देश-बिन्दु)—दोनों पापाढ्य हों तो फल कठोर कहा गया है।

English rendering The text states the inversion rule: reverse conditions reverse the result; mixed conditions yield mixed fruit. When both pāka and bhoga are heavy with malefics, bodily strain and mental distress are declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विपर्यास/मिश्र नियम; पाक–भोग पापाढ्य ⇒ देह/मन-पीड़ा)। पाक–भोग की राशि/भाव-गणना दशा-पद्धति और भाव-पद्धति की घोषणा पर निर्भर; यहाँ कोई वर्ष-संख्या या बिन्दु-सूत्र नहीं।

50.14
सप्तमे पाकभोगाभ्यां पापे दारार्तिरीरिता |
चतुर्थे स्थानहानिः स्यात्पञ्चमे पुत्रपीडनम्
saptame pākabhogābhyāṃ pāpe dārārtirīritā |
caturthe sthānahāniḥ syātpañcame putrapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे = सप्तम भाव में; पाकभोगाभ्यां = पाक और भोग दोनों के आश्रय से; पापे = पाप होने पर; दारार्तिः = दारा/जीवन-साथी सम्बन्धी कष्ट; ईरिता = कही गई; चतुर्थे स्थानहानिः = चतुर्थ में स्थान-हानि; पञ्चमे पुत्रपीडनम् = पञ्चम में पुत्र-पीड़न (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सप्तम में पाक–भोग दोनों पाप हों तो दारा-सम्बन्धी कष्ट कहा गया है। चतुर्थ में (उसी पापाढ्य-संकेत से) स्थान-हानि, और पञ्चम में पुत्र-पीड़न बताया गया है। भाव-विशेष से फल-विषय बदलता है—7 दारा, 4 स्थान, 5 संतति—यह शास्त्र का वर्गीकृत फल-मानचित्र है, न कि निश्चित घटना-घोषणा।

English rendering The text states that with pāka and bhoga malefic in the seventh, distress regarding the spouse is declared; in the fourth, loss of place/standing; in the fifth, affliction connected with children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव 7/4/5 × पाक–भोग पाप-स्थिति के विषय-फल)। फल “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें; कोई आयु-वर्ष, बिन्दु-योग, या बल-सीमा यहाँ कूटित नहीं।

50.15
दशमे कीर्तिहानिः स्यान्नवमे पितृपीडनम् |
पाकाद्रुद्रागते पापे पीडा सर्वाप्यबाधिका
daśame kīrtihāniḥ syānnavame pitṛpīḍanam |
pākādrudrāgate pāpe pīḍā sarvāpyabādhikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशमे = पाक से दशम भाव/राशि में; कीर्तिहानिः = यश/कीर्ति की हानि; नवमे = पाक से नवम में; पितृपीडनम् = पितृ-संबंधी पीड़ा (शास्त्र-कथन); पाकात् = पाक (दशा-राशि के स्वामी की स्थिति) से; रुद्रागते = रुद्र (= ११, एकादश रुद्र — भूतसंख्या) स्थान में स्थित; पापे = पाप-ग्रह में; पीडा सर्वाप्यबाधिका = सर्वा पीड़ा तथा बाधिका (बाधा-रूप) पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पाप-ग्रह पाक से दशम स्थान में हो तो कीर्ति की हानि कही गई है, और नवम में पितृ-पीड़न। पाक से रुद्र—अर्थात् एकादश—स्थान में पाप-ग्रह के आने पर शास्त्र समग्र पीड़ा तथा बाधिका फल का उल्लेख करता है। यह क्रम दशा-पाक से गिने गए भावों के फल-कथन का भाग है।

English rendering The text states that a malefic in the tenth from the pāka indicates loss of fame, and in the ninth, affliction concerning the father. When a malefic occupies the Rudra-place—eleventh by bhūtasaṃkhyā—from the pāka, it declares comprehensive affliction and obstructive distress.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना पाक से: यदि पाक-राशि सूचकांक \(P\) (मेष = 1 … मीन = 12), तो फल-स्थान \(H\) की राशि = \(((P - 1) + (H - 1)) \bmod 12) + 1\)। यहाँ \(H = 10\) (कीर्तिहानि), \(H = 9\) (पितृपीडन), \(H = 11\) रुद्र। “पाक” = चालू राशि-दशा के स्वामी की जन्म-कुण्डली स्थिति-राशि (राशि-दशा परंपरा)। गणितीय सूत्र फल-मान का नहीं—स्थान-सूची का है; फल स्वयं शास्त्र-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें पाकेश सिंह में है → \(P = 5\)। दशम = \((5-1+9) \bmod 12 + 1 = 2\) → वृषभ (कीर्तिहानि-स्थान, यदि वहाँ पाप)। नवम = \(1\) → मेष। रुद्र/एकादश = \(3\) → मिथुन। (दृष्टि/अयनांश यहाँ अप्रासंगिक—केवल राशि-क्रम।)

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50.16
उक्तस्थानगते सौम्ये ततः सौख्यं विनिर्दिशेत् |
केन्द्रस्थानगते सौम्ये लाभः शत्रुजपप्रदः
uktasthānagate saumye tataḥ saukhyaṃ vinirdiśet |
kendrasthānagate saumye lābhaḥ śatrujapapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्तस्थानगते = पूर्वोक्त स्थानों में स्थित; सौम्ये = सौम्य/शुभ ग्रह में; ततः = उससे; सौख्यं = सुख; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे; केन्द्रस्थानगते = केन्द्र (१, ४, ७, १०) में स्थित; सौम्ये = शुभ ग्रह में; लाभः = लाभ; शत्रुजपप्रदः = पाठानुसार “शत्रु-जप-प्रद”; पाठ-भेद संभव — अनेक परंपराओं में शत्रुजयप्रदः (शत्रु-जय देने वाला) अधिक सुसंगत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिन स्थानों में पाप के लिए अशुभ फल कहा गया, उन्हीं उक्त स्थानों में यदि सौम्य ग्रह हो तो सुख का निर्देश करना चाहिए। केन्द्र-स्थान में सौम्य ग्रह होने पर लाभ तथा शत्रु-संबंधी अनुकूल फल (पाठानुसार जप/जय) कहा गया है। शुभ-पाप का यही विपर्यय-नियम दशा-फल विचार का आधार है।

English rendering The text states that when a benefic occupies the places already named, happiness is to be indicated. A benefic in a kendra is said to confer gain and (per the received reading) benefit regarding enemies—victory if the variant śatru-jaya is adopted (pāṭha-bheda possible).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) केन्द्र-समुच्चय पाक से: \(H \in \{1, 4, 7, 10\}\)। शुभ/पाप का ध्रुवीय नियम: उक्त \(H\) पर पाप → पूर्व-श्लोक का अशुभ-कथन; उसी \(H\) पर सौम्य → सौख्य। कोई संख्यात्मक बलांक यहाँ नहीं—स्थान × ग्रह-वर्ग का द्विआधारी फल-मानचित्र। फल = शास्त्र-कथन, न कि अभियांत्रिक पूर्वानुमान।

उदाहरण (worked example) पाक = तुला (\(P = 7\))। केन्द्र-राशियाँ: तुला (1), मकर (4), मेष (7), कर्कट (10)। यदि गुरु तुला या मकर आदि इनमें हो, तो शास्त्र “लाभः …” कहता है; गणना केवल स्थान-सदस्यता की है।

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50.17
जन्मकालग्रहस्थित्या सगोचगग्रहैरपि |
विचारितैः प्रवक्तव्यं तत्तद्राशिद/साफलम्
janmakālagrahasthityā sagocagagrahairapi |
vicāritaiḥ pravaktavyaṃ tattadrāśida/sāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मकालग्रहस्थित्या = जन्म-काल की ग्रह-स्थितियों से; सगोचरग्रहैः = सह गोचर (वर्तमान भ्रमण) ग्रहों से भी; अपि = भी; विचारितैः = विचार कर; प्रवक्तव्यं = कहना चाहिए; तत्-तत् = संबंधित-संबंधित; राशिदशाफलम् = उस-उस राशि-दशा का फल (पाठ “राशिद/साफलम्” = राशिदशाफलम्; संधि/मुद्रण-च्छेद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट करता है कि राशि-दशा का फल केवल एक पक्ष से नहीं कहा जाता। जन्म-कुण्डली की ग्रह-स्थिति और साथ ही गोचर में स्थित ग्रहों—दोनों का विचार करके तत्-तत् राशि-दशा का फल वक्ता को कहना चाहिए। यह जन्म-स्थिति और गोचर का युग्म-विवेक है।

English rendering The text requires that the results of each rāśi-daśā be declared only after considering both the natal planetary placements and the planets in transit (gocara). Phala is to be spoken from that joint deliberation, not from the daśā label alone.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (दशा-फल-विचार की प्रक्रिया)। मॉडल: \(\text{phala-input} = \{\text{natal graha-rāśi/bhāva}, \text{gocara graha-rāśi/bhāva}, \text{running rāśi-daśā}\}\)। गोचर-देशांतर = वर्तमान \(L(t)\) (अयनांश घोषित करना आवश्यक जब राशि-सीमा पर संदेह हो)। यह संयोजन-नियम है, अवधि-सूत्र नहीं।

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50.18
यश्च राशिः शुभाकान्तो यस्य पश्चाच्छुभग्रहाः |
तद्दशा शुभदा प्रोक्ता विपरीते विपर्ययः
yaśca rāśiḥ śubhākānto yasya paścācchubhagrahāḥ |
taddaśā śubhadā proktā viparīte viparyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यः च राशिः = और जो राशि; शुभाकान्तः = शुभ ग्रहों से आक्रान्त/व्याप्त; यस्य पश्चात् = जिसके पश्चात् (पृष्ठ/अनुगामी दिशा में); शुभग्रहाः = शुभ ग्रह; तद्दशा = उस (राशि) की दशा; शुभदा = शुभ देने वाली; प्रोक्ता = कही गई; विपरीते = विपरीत स्थिति में; विपर्ययः = उलटा (अशुभ) फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जो राशि शुभ ग्रहों से युक्त हो, और जिसके पीछे (पश्चात्) भी शुभ ग्रह हों, उसकी दशा शुभदा कही गई है। इसके विपरीत—पाप-व्याप्ति या पश्चात् पाप—होने पर फल भी विपरीत कहा गया है। यह राशि-दशा की शुभता का स्थिति-आधारित नियम है।

English rendering The text states that a sign occupied by benefics, and having benefics behind it, has a daśā declared as auspicious-giving; in the reverse configuration, the reverse result is stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) द्वि-शर्त बूलियन (शास्‍त्रीय शुभदा-मापदंड): (1) दशा-राशि \(R\) पर \(\exists\) शुभ-ग्रह; (2) “पश्चात्” = राशि-क्रम में \(R\) के पश्च स्थान(ों) पर शुभ—परंपरा में प्रायः पूर्व-राशि/अनुगामी कोष्ठ; पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव, इसलिए दिशा (zodiacal previous vs next) घोषित करनी चाहिए। शुभदा \(\iff\) दोनों शर्तें; अन्यथा विपर्यय। कोई वर्ष-संख्या यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) दशा-राशि कन्या। शुभ: गुरु कन्या में (शर्त 1)। “पश्चात्” = सिंह (यदि पश्च = पूर्व-राशि माना जाए) में शुक्र—दोनों शर्तें पूर्ण → शास्त्र तद्दशा को शुभदा कहता है। यदि सिंह में शनि हो तो विपर्यय-पक्ष।

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50.19
त्रिकोणरन्ध्ररिष्फस्थैः शुभपापैः शुभाऽशुभम् |
तद्दशायां च वक्तव्यं फलं दैवविदा सदा
trikoṇarandhrariṣphasthaiḥ śubhapāpaiḥ śubhā'śubham |
taddaśāyāṃ ca vaktavyaṃ phalaṃ daivavidā sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोण = १, ५, ९ (त्रिकोण-स्थान); रन्ध्र = ८म भाव; रिष्फ = १२म (व्यय) भाव; स्थैः = उनमें स्थित; शुभपापैः = शुभ और पाप ग्रहों से; शुभाऽशुभम् = शुभ तथा अशुभ (फल); तद्दशायां = उस दशा में; वक्तव्यं फलं = फल कहना चाहिए; दैवविदा = दैवज्ञ/ज्योतिष-विद् द्वारा; सदा = सदा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि त्रिकोण, रन्ध्र और रिष्फ में स्थित शुभ-पाप ग्रहों के अनुसार शुभ-अशुभ फल निश्चित कर उस दशा में सदा दैवविद् को फल कहना चाहिए। त्रिकोण-शुभ और रन्ध्र/रिष्फ-पाप—आदि का विवेक दशा-फल-कथन का अनिवार्य अंग है। यह वक्ता के कर्तव्य का निर्देश है, न कि स्वतःसिद्ध नियति।

English rendering The text states that good and bad results are to be told according to benefics and malefics placed in the trikoṇa, the eighth (randhra), and the twelfth (riṣpha), and that the knower of daiva should always declare the phala in that daśā on this basis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पाक/लग्न-संदर्भ से स्थान-समुच्चय: त्रिकोण \(H \in \{1,5,9\}\), रन्ध्र \(H = 8\), रिष्फ \(H = 12\)। नियम-रूप: शुभ ∈ त्रिकोण → शुभ-पक्ष कथन; पाप ∈ रन्ध्र/रिष्फ → अशुभ-पक्ष कथन—विस्तार शास्त्र के पूर्व-क्रम से। कोई बलांक-योग यहाँ नहीं; केवल स्थान-वर्गीकरण। फलादेश = “शास्त्र कहता है / the text states”, अभियांत्रिक भविष्यवाणी नहीं।

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50.20
मेषकर्कतुलानक्रराशीनां च यथाक्रमम् |
बाधा स्तानानि सम्प्रोक्ता कुभगोसिंहवृश्चिकाः
meṣakarkatulānakrarāśīnāṃ ca yathākramam |
bādhā stānāni samproktā kubhagosiṃhavṛścikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेष-कर्क-तुला-नक्र = मेष, कर्कट, तुला, मकर (चर राशि-चतुष्टय); यथाक्रमम् = क्रमशः; बाधास्थानानि = बाधा के स्थान (पाठ “बाधा स्तानानि” = बाधास्थानानि); सम्प्रोक्ता = सम्यक् कहे गए; कु-भग-गो-सिंह-वृश्चिकाः = कुम्भ, गो (= वृषभ), सिंह, वृश्चिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चर राशियों के बाधास्थान क्रम से निश्चित करता है—मेष का बाधास्थान कुम्भ, कर्कट का वृषभ (गो), तुला का सिंह, मकर का वृश्चिक। यह बाधा-मानचित्र अगले श्लोक के पाप-स्थिति-फल से जुड़ता है। स्थिर/द्विस्वभाव राशियों का बाधा-नियम इस श्लोक में नहीं है।

English rendering The text declares, in order, the bādhā-places of Meṣa, Karka, Tulā, and Makara as Kumbha, Vṛṣabha (go), Siṃha, and Vṛścika respectively.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चर-राशि बाधा-मानचित्र (श्लोक-स्थिर):

| दशा/विचार-राशि \(R\) | बाधास्थान \(B\) | \(B - R\) (मेष=1) |
|---|---|---|
| मेष (1) | कुम्भ (11) | +10 ≡ 11th |
| कर्कट (4) | वृषभ (2) | 11th from 4 |
| तुला (7) | सिंह (5) | 11th from 7 |
| मकर (10) | वृश्चिक (8) | 11th from 10 |

सूत्र (चर राशि पर): \(B(R) = ((R - 1) + 10) \bmod 12 + 1\) = \(R\) से एकादश राशि। चारों पंक्तियाँ एक ही मॉड्यूलर नियम से संगति रखती हैं—यह श्लोक का गणित है, फल नहीं।

उदाहरण (worked example) विचार-राशि = तुला (\(R = 7\))। \(B = (7-1+10)\bmod 12 + 1 = 5\) → सिंह। अतः तुला-संदर्भ में बाधास्थान = सिंह (शास्त्र-कथनानुसार)।

हमारा डिकोड (Our Decode) बाधास्थान यहाँ शुद्ध मॉड्यूलर राशि-गणित है—वही अनुशासन जिससे षोडश-वर्ग में \(30°\) के समान खंडों का मानचित्र बनाया गया: नियम घोषित करो, फिर `==` से पंक्ति-दर-पंक्ति सत्यापन। चर-चतुष्टय की चार पंक्तियाँ एक ही “\(R\) से 11th” नियम पर बैठती हैं; कोई सहन-बैंड नहीं—एक पंक्ति भी चूके तो मानचित्र गलत।

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50.21
पाकेशाक्रान्तराशौ वा बाधास्थाने शुभेतरे |
स्थिते सति महाशोको बन्धनव्यसनामयाः
pākeśākrāntarāśau vā bādhāsthāne śubhetare |
sthite sati mahāśoko bandhanavyasanāmayāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाकेशाक्रान्तराशौ = पाकेश (पाक-स्वामी) जिस राशि पर आक्रान्त/स्थित है उसमें; वा = अथवा; बाधास्थाने = बाधास्थान में; शुभेतरे = शुभ-इतर = पाप-ग्रह में; स्थिते सति = स्थित होने पर; महाशोकः = महान् शोक (शास्त्र-कथन); बन्धन-व्यसन-आमयाः = बंधन, व्यसन, आमय (रोग)—सब शास्त्र के फल-पद, चिकित्सा/कानूनी दावा नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पाकेश की अधिष्ठित राशि में, अथवा बाधास्थान में, जब पाप-ग्रह स्थित हो, तब महाशोक, बंधन, व्यसन और आमय—ये फल कहे गए हैं। यह पूर्व-श्लोक के बाधा-मानचित्र और पाक-संकल्पना का फल-कथन है। वक्ता इसे दशा-विचार में शर्त-रूप में देखे; इसे नियति या भय-वाक्य नहीं बनाना।

English rendering The text states that when a malefic occupies either the sign held by the pākeśa or the bādhā-place, great sorrow, bondage, vices, and illness are declared as the indicated phala—reported as the śāstra’s claim, not as fate or counsel of fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त (बूलियन):
\(\text{पाप} \in \{R_{\text{पाकेश}},\, B(R_{\text{संदर्भ}})\}\)
जहाँ \(B\) = ५०.२० का बाधा-मानचित्र (चर राशि पर 11th-नियम; अन्य राशियों के लिए इस युग्म-श्लोक-युग्म में नियम नहीं दिया)। सत्य होने पर शास्त्र फल-सूची \(\{\text{महाशोक}, \text{बंधन}, \text{व्यसन}, \text{आमय}\}\) कहता है। कोई अवधि-वर्ष, बिन्दु-योग या बल-इकाई नहीं—स्थिति-संयोग → फल-कथन। अनुशासन: “शास्त्र कहता है”; रोग/बंधन को चिकित्सा या कानूनी भविष्य नहीं पढ़ना।

उदाहरण (worked example) दशा-संदर्भ = मेष → \(B =\) कुम्भ (५०.२०)। पाकेश = मंगल, स्थित वृश्चिक में (\(R_{\text{पाकेश}} = 8\))। यदि शनि कुम्भ में हो, तो शर्त “बाधास्थाने शुभेतरे” पूर्ण—शास्त्र महाशोक-बंधन-व्यसन-आमय पक्ष कहता है। यदि दोनों स्थान शुभ-मात्र हों, यह श्लोक वह पक्ष नहीं खोलता।

50.22
उच्चस्वर्क्षग्र्हे तस्मिञ्छुभं सौख्यं धनागमः |
तच्छून्यं चेदसौख्यं स्यात्तद्दशा न फलप्रदा
uccasvarkṣagrhe tasmiñchubhaṃ saukhyaṃ dhanāgamaḥ |
tacchūnyaṃ cedasaukhyaṃ syāttaddaśā na phalapradā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्च = तुंग स्थान (exaltation); स्व-ऋक्ष / स्वर्क्ष = स्वराशि (own sign); गृहे = उस ग्रह के गृह/राशि में; शुभम् = मंगल; सौख्यम् = सुख; धनागमः = धन-प्राप्ति; तच्छून्यम् = वह (उच्च/स्व-स्थान) रिक्त/अभाव; असौख्यम् = अ-सुख; तद्दशा = उस ग्रह की दशा; न फलप्रदा = फल न देने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस ग्रह की दशा चल रही हो, यदि वह उच्च या स्वराशि में स्थित हो, तो उस काल में शुभ, सुख और धन-आगमन का संकेत मिलता है। यदि वही उच्च/स्व-स्थान शून्य हो — अर्थात् ग्रह वहाँ न हो — तो असुख कहा गया है, और उस दशा को फलप्रद नहीं माना गया। यह दशा-फल का स्थान-निर्भर नियम है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that when the daśā-planet is in exaltation or its own sign, auspiciousness, comfort, and inflow of wealth are indicated; if that position is vacant (the planet not so placed), discomfort is said to follow and that daśā is declared unfruitful.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल-कथन (उच्च/स्वराशि बनाम शून्य स्थान)। स्थान-शर्त (तुंग या स्व-राशि) ही फल-द्वार है; यहाँ कोई अंश-गणना या काल-अनुपात नहीं दिया गया।

50.23
बाधकव्ययषडरन्ध्रे राहुयुक्ते महद्भयम् |
प्रस्थाने बन्धनप्राप्ती राजपीडा रिपोभयम्
bādhakavyayaṣaḍarandhre rāhuyukte mahadbhayam |
prasthāne bandhanaprāptī rājapīḍā ripobhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बाधक = बाधक-भाव/स्थान (लग्नानुसार बाधा-सूचक भाव); व्यय = द्वादश भाव; षट् = षष्ठ भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; राहु-युक्ते = राहु-संयुक्त; महद्भयम् = बड़ा भय; प्रस्थाने = प्रस्थान/यात्रा में; बन्धन-प्राप्ति = बंधन; राजपीडा = राजकीय कष्ट; रिपोः भयम् = शत्रु से भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बाधक, व्यय (१२), षष्ठ (६) या रन्ध्र (८) भाव में राहु युक्त हो तो महद्भय का कथन है। प्रस्थान-काल में बंधन-प्राप्ति, राज-पीड़ा और रिपु-भय — ये सब शास्त्र के दशा/भाव-फल-सूचक वाक्य हैं। यहाँ भय-व्यापार नहीं; केवल पाठ का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Rāhu joins the bādhaka, twelfth, sixth, or eighth house, great fear is indicated; on departure, bondage, royal affliction, and fear from enemies are likewise stated as textual results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु × बाधक/६/८/१२)। बाधक-भाव लग्न-राशि के अनुसार निर्धारित होता है (परंपरा में लग्न-निर्भर सूची); यह श्लोक अंक नहीं, भाव-योग की शर्त देता है।

50.24
रव्यारराहुशनयो भुक्तिराशौ स्थिता यदि |
तद्राशिभिक्तौ पतनं राजकोपान् महद्भयम्
ravyārarāhuśanayo bhuktirāśau sthitā yadi |
tadrāśibhiktau patanaṃ rājakopān mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि = सूर्य; आर = मंगल (अर); राहु = राहु; शनयः = शनि (बहुवचन-समूह); भुक्ति-राशौ = भुक्ति-काल की राशि में; स्थिताः यदि = यदि स्थित हों; तद्-राशि-भुक्तौ = उस राशि की भुक्ति में; पतनम् = पतन/गिरावट; राजकोपात् = राज-कोप से; महद्भयम् = बड़ा भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य, मंगल, राहु या शनि यदि भुक्ति-राशि में स्थित हों, तो उस राशि-भुक्ति में पतन और राज-कोप से महद्भय का कथन है। भुक्ति-राशि = जिस राशि पर/जिस राशि-संदर्भ में अन्तर्दशा (भुक्ति) फल कही जाती है — यह दशा-फल का ग्रह-स्थान नियम है। पाठ-भेद: “भिक्तौ” प्रायः “भुक्तौ” का रूप।

English rendering The text states that if the Sun, Mars, Rāhu, or Saturn occupy the bhukti-rāśi, then in that rāśi-bhukti fall and great fear from royal anger are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (क्रूर/सूर्यादि × भुक्ति-राशि)। भुक्ति स्वयं विंशोत्तरी में अनुपात-गणित से मिलती है (अन्तर्दशा-वर्ष = महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष ÷ १२०), पर यह श्लोक केवल उस भुक्ति के फल की शर्त बताता है।

50.25
भुक्तिराशित्रिकोणे तु नीचखेटः स्थितो यदि |
तद्राशौ वा युते नीचे पापे मृत्युभयं वदेत्
bhuktirāśitrikoṇe tu nīcakheṭaḥ sthito yadi |
tadrāśau vā yute nīce pāpe mṛtyubhayaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-राशि-त्रिकोणे = भुक्ति-राशि के त्रिकोण (१-५-९) में; नीच-खेटः = नीच-स्थित ग्रह; स्थितो यदि = यदि बैठा हो; तद्-राशौ वा = अथवा उसी (भुक्ति) राशि में; युते नीचे = नीच-युक्त; पापे = पाप-ग्रह के साथ; मृत्यु-भयम् = मृत्यु-भय; वदेत् = कहे (शास्त्र-विधि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भुक्ति-राशि के त्रिकोण में नीच-ग्रह हो, या उसी राशि में नीच हो, या नीच/पाप-योग हो, तो मृत्यु-भय का कथन किया गया है। यह फल-सूत्र की शर्त है — “भय” यहाँ शास्त्रीय संकेत-भाषा है, न कि चिकित्सा-वाक्य और न ही निश्चित भविष्य।

English rendering The text states that if a debilitated planet stands in the trikoṇa of the bhukti-rāśi, or in that rāśi itself, or is joined with debilitation or a malefic, one should declare fear of death as the indicated result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नीच/पाप × भुक्ति-राशि-त्रिकोण)। त्रिकोण = राशि से १, ५, ९ (एक ही तत्व-त्रिकोण); नीच-स्थान प्रत्येक ग्रह के लिए शास्त्र-निर्धारित एक राशि है — यहाँ कोई नई अंश-तालिका नहीं।

50.26
भुक्तिराशौ स्वतुङ्गस्थे त्रिकोणे वापि खेचरे |
यदा भुक्तिदशा प्राप्ता तदा सौख्यं लभेन्नरः
bhuktirāśau svatuṅgasthe trikoṇe vāpi khecare |
yadā bhuktidaśā prāptā tadā saukhyaṃ labhennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-राशौ = भुक्ति-राशि में; स्व-तुङ्ग-स्थे = स्वराशि या तुंग में स्थित; त्रिकोणे वा अपि = अथवा (भुक्ति-राशि के) त्रिकोण में भी; खेचरे = ग्रह में; यदा भुक्ति-दशा प्राप्ता = जब भुक्ति-दशा प्राप्त हो; तदा = तब; सौख्यम् = सुख; लभेत् नरः = मनुष्य प्राप्त करे (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भुक्ति-राशि में ग्रह स्व-तुंग हो, अथवा भुक्ति-राशि के त्रिकोण में ऐसा खेचर हो, और जब वह भुक्ति-दशा आए, तो नर को सौख्य मिलता है — ऐसा पाठ का फल-वाक्य है। यह ५०.२२ के “उच्च/स्व = शुभ” नियम का भुक्ति-परत विस्तार है।

English rendering The text states that when a planet is in its own sign or exaltation in the bhukti-rāśi — or even in the trikoṇa thereof — and that bhukti-daśā arrives, the person obtains comfort, as the śāstra phrases the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्व/तुंग × भुक्ति-राशि/त्रिकोण)। दशा-काल का आरंभ-अंत नक्षत्र-अंश-अवशेष से आता है; यह श्लोक केवल भुक्ति-काल के स्थान-शुभत्व का नियम देता है।

50.27
नगरग्रामनाथत्वं पुत्रलाभं धनागमम् |
कल्याणं भूरिभाग्यं च सेनपत्यं महोन्नतम्
nagaragrāmanāthatvaṃ putralābhaṃ dhanāgamam |
kalyāṇaṃ bhūribhāgyaṃ ca senapatyaṃ mahonnatam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नगर-ग्राम-नाथत्वम् = नगर/ग्राम का अधिपत्य; पुत्र-लाभम् = पुत्र-प्राप्ति; धन-आगम् = धन-प्राप्ति; कल्याणम् = कल्याण; भूरि-भाग्यम् = प्रचुर भाग्य; सेनपत्यम् = सेनापतित्व; महोन्नतम् = महान् उन्नति।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पूर्ववर्ती शुभ-भुक्ति-फल का विस्तार है। शास्त्र कहता है — नगर-ग्राम-नाथत्व, पुत्र-लाभ, धन-आगमन, कल्याण, भूरि भाग्य, सेनापतित्व और महोन्नति — ये उसी सौख्य-परंपरा के फल-पद हैं। सामाजिक-राजसी उन्नति के प्रतीक-वाक्य हैं; इन्हें नियत घटना-सूची न समझें।

English rendering The text continues the auspicious list: lordship of town or village, gain of a son, inflow of wealth, welfare, abundant fortune, command of armies, and high elevation — all as stated results of the favourable bhukti condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-सूची (शुभ-भुक्ति का विस्तार)। संख्या, अंश या अनुपात नहीं; केवल फल-पदों की गणना-रहित सूची।

50.28
पाकेश्वरो जीवदृष्टः शुभराशिस्थितो यदि |
तद्दशायां धनप्राप्तिर्मङ्गलं पुत्रसम्भवम्
pākeśvaro jīvadṛṣṭaḥ śubharāśisthito yadi |
taddaśāyāṃ dhanaprāptirmaṅgalaṃ putrasambhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाकेश्वरः = पाक/दशा का अधिपति (दशेश); जीव-दृष्टः = गुरु-दृष्ट; शुभ-राशि-स्थितः = शुभ राशि में स्थित; यदि = यदि; तद्-दशायाम् = उस दशा में; धन-प्राप्तिः = धन-प्राप्ति; मङ्गलम् = मंगल/शुभ; पुत्र-सम्भवम् = पुत्र-संभव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पाकेश्वर — दशा का स्वामी — यदि गुरु-दृष्ट हो और शुभ राशि में स्थित हो, तो उस दशा में धन-प्राप्ति, मंगल और पुत्र-संभव का कथन है। जीव-दृष्टि यहाँ शुभ-दृष्टि का मानक है; फल दशा-स्वामी की दृष्टि-स्थिति पर बाँधा गया है।

English rendering The text states that if the pākeśvara (lord of the daśā) is aspected by Jupiter and stands in a benefic sign, then in that daśā gain of wealth, auspiciousness, and the possibility of a son are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशेश × गुरु-दृष्टि × शुभ-राशि)। दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) इस श्लोक में अंकित नहीं; केवल “जीव-दृष्ट” शर्त है। दशा-स्वामी का निर्धारण जिस दशा-पद्धति (यथा विंशोत्तरी) से चल रही हो, उसी के अनुसार होता है।

50.29
सितासितभयुग्माश्च सूर्यस्य रिपुराशयः |
कौर्पितौलिघटाश्चेन्द्रोर्भौमस्य रिपुराशयः
sitāsitabhayugmāśca sūryasya ripurāśayaḥ |
kaurpitaulighaṭāścendrorbhaumasya ripurāśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सित = शुक्र (सित-ग्रह; उसके स्वामित्व/सम्बन्ध की राशियाँ वृष–तुला); असित = शनि (असित-ग्रह; मकर–कुम्भ); भयुग्म = मिथुन (युग्म/द्वन्द्व-राशि; “भ+युग्म” यौगिक पठन); रिपुराशयः = शत्रु-राशियाँ; कौर्पि = वृश्चिक; तौलि = तुला; घट = कुम्भ; इन्दु = चन्द्र; भौम = मङ्गल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ दशा-विचार के लिए प्रत्येक ग्रह की शत्रु-राशियों का निर्धारण करता है। सूर्य के लिए सित (शुक्र), असित (शनि) तथा भयुग्म (मिथुन) — इनसे जुड़ी राशियाँ रिपु-राशि कही गई हैं। उसी श्लोक के उत्तरार्ध में कौर्पि (वृश्चिक), तौलि (तुला) और घट (कुम्भ) को चन्द्र तथा भौम — दोनों की शत्रु-राशियाँ बताया गया है। यह सूची फल की “निश्चय” नहीं, अपितु अन्तर-दशा में ग्रह की राशि-स्थिति जाँचने का शास्त्रीय मानचित्र है।

English rendering The text assigns the Sun’s enemy signs as those linked with Venus (sita), Saturn (asita), and Gemini (bha-yugma). Scorpio, Libra, and Aquarius are stated as the enemy signs of the Moon and of Mars.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय विभाजन-सूत्र नहीं — शत्रु-राशि का गूढ़-मानचित्र (discrete mapping)।
R_ripu(Sūrya) ⊇ {वृष, तुला, मकर, कुम्भ, मिथुन} (सित–असित स्वामित्व + भयुग्म; यौगिक पठन)
R_ripu(Candra) = R_ripu(Maṅgala) = {वृश्चिक, तुला, कुम्भ}
(पाठ “सितासितभयुग्माः” में पद-विच्छेद पर पाठ-भेद संभव; फल ग्रह-अन्तरदशा-चिन्तन के लिए प्रयुक्त।)

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य की देशान्तर (सायनांश-मुक्त, निरयण राशि) λ_☉ = 72° → मिथुन 12°। इस श्लोक के मानचित्र में मिथुन सूर्य की रिपु-राशि में गिना जाता है; अतः सूर्य-अन्तरदशा में शास्त्र “रिपु-राशि-स्थित” सूर्य का विचार करने को कहता है — यह वर्गीकरण है, दशा-वर्ष का गणित नहीं। (अयनांश: जिस निरयण पद्धति से λ प्राप्त हो, वही राशि-नाम निर्धारित करती है।)

50.30
घटमीननृयुल्तौलिकन्या ज्ञस्य ततः परम् |
कर्कमीनालिकुम्भाश्च राशयो रिपवः स्मृताः
ghaṭamīnanṛyultaulikanyā jñasya tataḥ param |
karkamīnālikumbhāśca rāśayo ripavaḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) घट = कुम्भ; मीन = मीन; नृयुक्/नृयुल् = मिथुन (नर-युगल राशि; “नृयुल्” में पाठ-भेद संभव → नृयुक्); तौलि = तुला; कन्या = कन्या; ज्ञ = बुध; ततः परम् = तदनन्तर / और आगे; कर्क = कर्क; अलि = वृश्चिक; कुम्भ = कुम्भ; रिपवः = शत्रु (राशियाँ); स्मृताः = कही गई / स्मरण की गईं।

हिन्दी भावार्थ बुध (ज्ञ) की शत्रु-राशियों का क्रम यहाँ दिया गया है: कुम्भ, मीन, मिथुन, तुला और कन्या। “ततः परम्” कहकर शास्त्र उसी सूत्र-श्रृंखला में कर्क, मीन, वृश्चिक (अलि) और कुम्भ को भी रिपु-राशि के रूप में स्मरण करता है। कुछ नामों का दोहराव (मीन, कुम्भ/घट) इस पाठ-परम्परा की विशेषता या पाठ-भेद का संकेत हो सकता है — अर्थ यह कि बुध-अन्तरदशा में इन राशियों में स्थित बुध को “रिपु-राशि” की कोटि में रखकर चिन्तन करना है।

English rendering Mercury’s enemy signs are named as Aquarius, Pisces, Gemini, Libra, and Virgo; and further, Cancer, Pisces, Scorpio, and Aquarius are also remembered as enemy signs in this recension’s list.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रिपु-राशि सूची (enumeration)।
R_ripu(Budha) = {कुम्भ, मीन, मिथुन, तुला, कन्या} ∪ {कर्क, मीन, वृश्चिक, कुम्भ}
(समुच्चय-संयोग से विशिष्ट राशियाँ: कर्क, मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन — पाठानुसार; दोहराव पाठ-भेद/पुनरुक्ति संभव।)

उदाहरण (worked example) बुध λ_☿ = 105° → कर्क 15° (निरयण)। कर्क इस श्लोक की “ततः परम्” सूची में है; अतः बुध-अन्तरदशा में शास्त्र बुध को रिपु-राशि-स्थित मानकर फल-चिन्तन का निर्देश देता है। राशि-नाम अयनांश-निर्भर निरयण λ पर निर्भर है।

50.31
वृषतौलिनृयुक्कन्याराशयो रिपवो गुरोः |
सिंहालिकर्कचापाश्च शुकस्य रिपुराशयः
vṛṣataulinṛyukkanyārāśayo ripavo guroḥ |
siṃhālikarkacāpāśca śukasya ripurāśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृष = वृषभ; तौलि = तुला; नृयुक् = मिथुन; कन्या = कन्या; रिपवः = शत्रु-राशियाँ; गुरु = बृहस्पति; सिंह = सिंह; अलि = वृश्चिक; कर्क = कर्क; चाप = धनु; शुक्र/शुक = शुक्र (पाठ “शुकस्य” = शुक्रस्य); रिपुराशयः = शत्रु-राशियाँ।

हिन्दी भावार्थ गुरु की शत्रु-राशियाँ वृषभ, तुला, मिथुन और कन्या कही गई हैं — अर्थात् शुक्र और बुध की स्वामित्व-राशियाँ, जो पारम्परिक मैत्री-शत्रुता से भी मेल खाती हैं। शुक्र की शत्रु-राशियाँ सिंह, वृश्चिक, कर्क और धनु हैं। यह दोनों सूचियाँ ग्रह-अन्तरदशा में शुभ/अशुभ विचार का आधार बनती हैं; शास्त्र यहाँ “फल की गारंटी” नहीं, राशि-कोटि का नियम दे रहा है।

English rendering Jupiter’s enemy signs are Taurus, Libra, Gemini, and Virgo. Venus’s enemy signs are Leo, Scorpio, Cancer, and Sagittarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह → रिपु-राशि समुच्चय।
R_ripu(Guru) = {वृषभ, तुला, मिथुन, कन्या}
R_ripu(Śukra) = {सिंह, वृश्चिक, कर्क, धनु}
(टिप्पणी: गुरु के शत्रु बुध–शुक्र; शुक्र के शत्रु सूर्य–चन्द्र — स्वामित्व-राशियों से आंशिक संगति; वृश्चिक–धनु अतिरिक्त कोटि इस पाठ की दशा-योजना में हैं।)

उदाहरण (worked example) गुरु λ_♃ = 20° → मेष 20° — इस सूची में नहीं, अतः इस श्लोक की दृष्टि से गुरु “रिपु-राशि” में नहीं। शुक्र λ_♀ = 125° → सिंह 5° — सिंह शुक्र की रिपु-राशि है; शुक्र-अन्तरदशा में शास्त्र इसी कोटि से चिन्तन कहता है।

50.32
मेषसिंहधनुःकौर्पिकर्कटा शनिशत्रवः |
एवं ग्राहन्तरदाशां चिन्तयेत्कोविदो द्विज
meṣasiṃhadhanuḥkaurpikarkaṭā śaniśatravaḥ |
evaṃ grāhantaradāśāṃ cintayetkovido dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेष = मेष; सिंह = सिंह; धनुः = धनु; कौर्पि = वृश्चिक; कर्कट = कर्क; शनिशत्रवः = शनि की शत्रु(-राशियाँ); एवं = इस प्रकार; ग्रह-अन्तर-दशाम् (पाठ “ग्राहन्तरदाशां” — ग्रह-अन्तरदशा अभिप्रेत; पाठ-भेद/वर्तनी संभव); चिन्तयेत् = विचारे; कोविदः = कुशल; द्विज = द्विज / विप्र-ज्ञाता।

हिन्दी भावार्थ शनि की शत्रु-राशियाँ मेष, सिंह, धनु, वृश्चिक और कर्क बताई गई हैं। फिर शास्त्र उपसंहार करता है: इसी रीति से कुशल द्विज को ग्रह-अन्तरदशा का चिन्तन करना चाहिए — अर्थात् दशा-स्वामी/अन्तर-स्वामी जिस राशि में हो, उसे उपर्युक्त रिपु-सूचियों से मिलाकर देखे। यह पूरे ५०.२९–३२ खण्ड का प्रक्रिया-वाक्य है।

English rendering Saturn’s enemy signs are Aries, Leo, Sagittarius, Scorpio, and Cancer. Thus the skilled twice-born should examine the graha-antardaśā (planet sub-period) by this method.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शत्रु-राशि कोष्ठक का समापन + प्रक्रिया-निर्देश।
R_ripu(Śani) = {मेष, सिंह, धनु, वृश्चिक, कर्क}
पूर्ण मानचित्र (५०.२९–३२): प्रत्येक ग्रह g के लिए दशा/अन्तरदशा में
यदि rāśi(g) ∈ R_ripu(g) तो शास्त्र “रिपु-राशि-स्थित” कोटि लागू करता है।
(यह अष्टकवर्ग-बिन्दु या विंशोत्तरी-वर्ष-सूत्र नहीं — केवल राशि-कोटि।)

उदाहरण (worked example) शनि λ_♄ = 5° → मेष 5° ∈ R_ripu(Śani)। शनि-महादशा में किसी अन्तरदशा का फल-विचार करते समय शास्त्र कहता है कि शनि स्वयं रिपु-राशि में है — कोटि-निर्धारण मात्र; वर्षों की गणना विंशोत्तरी-अनुपात से अलग अध्याय-नियमों पर निर्भर है।

50.33
ये राजयोगदा ये च शुभमध्यमता ग्रहाः |
यस्माद्वा द्वित्रितुर्यस्थाः ग्रहाः शुभफलप्रदाः
ye rājayogadā ye ca śubhamadhyamatā grahāḥ |
yasmādvā dvitrituryasthāḥ grahāḥ śubhaphalapradāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये = जो; राजयोगदाः = राजयोग देने वाले (ग्रहाः); ये च = और जो; शुभमध्यमताः = शुभ-मध्यम श्रेणी के; ग्रहाः = ग्रह; यस्मात् = जिस (दशा-स्वामी/संदर्भ-ग्रह) से; वा = अथवा; द्वि-त्रि-तुर्य-स्थाः = द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ भाव/स्थान में स्थित; शुभफलप्रदाः = शुभ फल देने वाले — शास्त्र के कथनानुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो ग्रह राजयोग के दाता हों, तथा जो शुभ या मध्यम श्रेणी के हों, उनकी दशाएँ विशेष विचारणीय हैं। साथ ही, जिस ग्रह से (संदर्भ-स्वामी से) दूसरे, तीसरे अथवा चौथे स्थान पर स्थित ग्रह हों, उन्हें भी शुभफल-प्रद कहा गया है। यह फल-कथन है: योग-दाता और स्थान-सम्बन्ध दोनों को दशा-शुभता की कुंजी बनाया गया है — न भय का वाक्य, न निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering The text states that planets which confer rājayoga, and those of benefic or middling quality, as well as planets placed in the second, third, or fourth from a given reference, are said to yield auspicious results (in the daśā context).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दशा-शुभता की कोटियाँ।
स्थान-नियम को मापांक-रूप में लिखा जा सकता है (संदर्भ-राशि r₀, ग्रह-राशि r):
Δ = (r − r₀) mod 12 ∈ {1, 2, 3} ⇒ “द्वि/त्रि/तुर्य-स्थ” (१=द्वितीय, २=तृतीय, ३=चतुर्थ)।
राजयोग-दाता की परिभाषा इस श्लोक में नहीं गिनी गई — वह पूर्व योग-अध्यायों पर निर्भर है।

50.34
तद्दशानां शुभं ब्रूयाद्राजयोगादिसम्भवम् |
शुभद्वयान्तरगतः पापोऽपि शुभदः स्मृतः
taddaśānāṃ śubhaṃ brūyādrājayogādisambhavam |
śubhadvayāntaragataḥ pāpo'pi śubhadaḥ smṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दशानाम् = उन (उपर्युक्त) ग्रहों की दशाओं का; शुभम् = शुभ; ब्रूयात् = कहे; राजयोगादि-सम्भवम् = राजयोग आदि की संभावना/उपस्थिति; शुभद्वय-अन्तर-गतः = दो शुभों के बीच स्थित; पापः अपि = पाप-ग्रह भी; शुभदः = शुभ देने वाला; स्मृतः = कहा / स्मृत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि पूर्वोक्त (राजयोग-दा, शुभ/मध्यम, द्वि-त्रि-तुर्य-स्थ) ग्रहों की दशाओं को शुभ कहना चाहिए, और उनमें राजयोग आदि की संभावना का उल्लेख करना चाहिए। विशेष नियम: दो शुभ ग्रहों के बीच पड़ा हुआ पाप-ग्रह भी शुभद माना गया है — यह “पाप” शब्द का शास्त्रीय ग्रह-कोटि अर्थ है, नैतिक निन्दा नहीं। फल-भाषा शास्त्र की है; इसे नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering One should declare those daśās auspicious and note the possibility of rājayoga and the like. Even a malefic placed between two benefics is remembered as a giver of good (in this teaching).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-नियम (between-benefics)।
राशि-क्रम पर “अन्तर-गत”: यदि राशि-चक्र पर ग्रह P दो शुभ B₁, B₂ के बीच चाप पर हो (एक ही दिशा में, बीच की राशियों में), तो शास्त्र P को शुभद कहता है — ज्यामितीय “बीच” की परिभाषा पाठ/टीका पर निर्भर; यहाँ केवल सिद्धान्त।

50.35
गता शुभदशामध्यं दशा सौम्यस्य शोभना |
शुभा यस्य त्रिकोणस्थस्तद्दशापि शुभप्रदा
gatā śubhadaśāmadhyaṃ daśā saumyasya śobhanā |
śubhā yasya trikoṇasthastaddaśāpi śubhapradā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गता = व्यतीत / पहुँची हुई; शुभ-दशा-मध्यम् = शुभ दशा के मध्य तक/में; दशा = (वर्तमान) दशा; सौम्यस्य = सौम्य (शुभ) ग्रह की; शोभना = सुन्दर/शुभ; शुभा = शुभ (ग्रह); यस्य = जिस (दशा-स्वामी) का; त्रिकोण-स्थः = त्रिकोण (१, ५, ९) में स्थित; तद्-दशा अपि = उसकी दशा भी; शुभप्रदा = शुभ फल देने वाली — शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सौम्य ग्रह की दशा शुभ दशा के मध्य-प्रदेश में आ चुकी हो (अर्थात् शुभ-काल-खण्ड के भीतर सौम्य-दशा), तो वह दशा शोभन मानी गई है। तथा जिस दशा-स्वामी के त्रिकोण में शुभ ग्रह स्थित हो, उस स्वामी की दशा भी शुभ-प्रद कही गई है। दोनों नियम दशा-फल की कोटि बाँधते हैं: एक काल-क्रम (शुभ-मध्य) से, दूसरा भाव-त्रिकोण से — निश्चित “घटना” की भविष्यवाणी नहीं, शास्त्रीय संकेत।

English rendering The text states that a benefic’s daśā which has entered the midst of an auspicious daśā-period is splendid; and that the daśā of one who has a benefic in a trinal place is also a giver of good results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; त्रिकोण = स्थान-समुच्चय।
त्रिकोण-स्थान (लग्न/संदर्भ r₀ से):
T = {r₀, (r₀+4) mod 12, (r₀+8) mod 12} (राशि-सूचकांक ०…११)
यदि कोई शुभ ग्रह r ∈ T पर हो ⇒ शास्त्र तद्-दशा को शुभप्रदा कहता है।
“शुभदशामध्य” काल-खण्ड का संख्यात्मक विभाजन इस श्लोक में नहीं दिया — केवल गुण-विचार।

50.36
आरम्भान्तो मित्रशुभराश्योर्यदि फलं शुभम् |
प्रतिराश्यैवमव्दाद्यं विभज्य तत्फलं वदेत्
ārambhānto mitraśubharāśyoryadi phalaṃ śubham |
pratirāśyaivamavdādyaṃ vibhajya tatphalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरम्भात्-अन्तः = दशा/काल-खण्ड का आरम्भ और अन्त; मित्र-शुभ-राश्योः = मित्र तथा शुभ राशियों में; यदि फलं शुभम् = तो फल शुभ कहा गया; प्रति-राशि = प्रत्येक राशि के अनुसार; अब्दाद्यम् = वर्षादि काल-खण्ड; विभज्य = बाँटकर / विभाजित कर; तत्-फलं वदेत् = उसी के अनुसार फल कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि दशा-काल का आरम्भ और अन्त मित्र अथवा शुभ राशियों में पड़े, तो वह फल शुभ माना जाता है। फल-कथन को एक मुट्ठी में न बाँधकर वर्षादि काल को प्रति-राशि बाँटकर उसी विभाजन के अनुरूप फल बोलना चाहिए। अर्थात् शुभता आरम्भ-अन्त की राशि-स्थिति से जुड़ी है, और ब्यौरा राशि-खण्डों में बाँटकर दिया जाता है।

English rendering The text states that if the beginning and end (of the period under consideration) fall in friendly or auspicious signs, the result is auspicious. One should divide the years and related spans sign by sign and declare the phala accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-काल को राशि-खण्डों में बाँटने का नियम (प्रति-राशि विभाजन)। यदि कुल अवधि \(T\) वर्ष (या उसके अंश) हो और उसे \(n\) क्रमिक राशि-खण्डों में बाँटना हो (परम्परा के अनुसार समान या दशा-नियम के अनुसार अनुपातिक), तो प्रत्येक राशि-खण्ड का काल
\(t_i = T ÷ n\)
(समान विभाजन की सरल रीति) अथवा
\(t_i = T × (w_i ÷ \Sigma w)\)
(जहाँ \(w_i\) उस राशि/ग्रह को दिया भार)। प्रत्येक \(t_i\) पर आरम्भ/अन्त की राशि मित्र-शुभ है या नहीं — इसी से शास्त्रीय शुभ/अशुभ-फल का ढाँचा बाँधा जाता है। (परम्परा/पाठ-भेद संभव: समान बनाम अनुपातिक बाँट।)

उदाहरण (worked example) मानें किसी दशा-खण्ड की अवधि \(T = 6\) वर्ष है और उसे 3 क्रमिक राशि-खण्डों में समान बाँटा गया: \(t_i = 6 ÷ 3 = 2\) वर्ष प्रत्येक। यदि आरम्भ-राशि मित्र/शुभ और अन्त-राशि भी शुभ हो, तो शास्त्र कहता है समग्र फल शुभ-वर्ग में; बीच की प्रत्येक 2-वर्ष इकाई पर अलग फल-कथन। (दशा-प्रकार, अयनांश, गृह-पद्धति घोषित करनी चाहिए जब जन्म-लग्न से राशि गिनी जाए।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-अध्याय-शृंखला (46–65) में काल-विभाजन वही अनुपात-अंकगणित है जिसे हमने विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में पिन किया: महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष ÷ 120। यह श्लोक “प्रतिराशि अब्दादि विभज्य” कहकर उसी अनुशासन को फल-भाषा में बाँधता है — पहले काल-खण्ड का शुद्ध विभाजन, फिर फल-कथन; दोनों को मिलाकर एक “भाग्य” नहीं बनाना।

50.37
आरम्भात्तत्त्रिकोणे तु सौम्ये तु शुभभावहेत् |
शुभराशौ शुभारम्भे दशा स्यादतिशोभना
ārambhāttattrikoṇe tu saumye tu śubhabhāvahet |
śubharāśau śubhārambhe daśā syādatiśobhanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरम्भात् = आरम्भ-राशि/स्थान से; तत्-त्रिकोणे = उसके त्रिकोण (1–5–9) में; सौम्ये = सौम्य (शुभ) ग्रह होने पर; शुभ-भाव-हेत् = शुभ भाव/फल उत्पन्न करता है; शुभ-राशौ = शुभ राशि में; शुभ-आरम्भे = शुभ आरम्भ होने पर; दशा = वह दशा; अति-शोभना = अत्यन्त शोभन/उत्तम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा-आरम्भ से गिने त्रिकोण में सौम्य ग्रह हो तो शुभ फल का हेतु बनता है। जब आरम्भ स्वयं शुभ राशि में हो और आरम्भ-स्थिति शुभ हो, तब उस दशा को अत्यन्त शोभन कहा गया है। यहाँ बल आरम्भ की राशि और उसके त्रिकोण-सौम्य पर है।

English rendering The text states that if a benefic occupies the trine reckoned from the commencement, it conduces to auspicious results. When the daśā begins in an auspicious sign with an auspicious start, that daśā is described as exceedingly splendid.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिकोण = राशि-मॉड्यूलर सम्बन्ध: आरम्भ-राशि \(R\) (1…12) से
त्रिकोण-समुच्चय \(= \{R,\ ((R+4-1)\bmod 12)+1,\ ((R+8-1)\bmod 12)+1\}\)
अर्थात् \(R\), \(R+4\), \(R+8\) (राशि-चक्र में)। “सौम्य” यहाँ गणना-योग्य वर्ग (गुरु, शुक्र, बुध-शुद्ध, चन्द्र-शुद्ध आदि — पाठ/परम्परा अनुसार) है; यह फल-नियम है, संख्या-सारणी नहीं। गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरम्भ-त्रिकोण + शुभारम्भ → अतिशोभन दशा, शास्त्र के अनुसार)।

50.38
शुभादिराशौ पापश्चेद्दशारम्भे शुभा स्मृता |
शुभारम्भे कथा केति प्रारम्भस्य फलं वदेत्
śubhādirāśau pāpaśceddaśārambhe śubhā smṛtā |
śubhārambhe kathā keti prārambhasya phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-आदि-राशौ = शुभ आदि राशियों में; पापः चेत् = यदि पाप-ग्रह हो; दशा-आरम्भे = दशा के आरम्भ में; शुभा स्मृता = (दशा) शुभ मानी गई; शुभ-आरम्भे = शुभ आरम्भ होने पर; कथा का इति = “क्या कहना” / और क्या प्रसंग; प्रारम्भस्य फलं वदेत् = आरम्भ का फल ही कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की रीति यह है कि दशा-आरम्भ यदि शुभ-वर्ग की राशि में हो, तो वहाँ पाप-ग्रह होने पर भी दशा को शुभ स्मरण किया गया है। शुभ आरम्भ स्थापित हो जाए तो विस्तार की कथा गौण हो जाती है — फल का मुख्य द्वार प्रारम्भ ही है। अतः विवेचक को पहले आरम्भ-फल स्पष्ट कहना चाहिए।

English rendering The text states that if, at the start of a daśā, even a malefic stands in an auspicious (class of) sign, the daśā is still remembered as auspicious. When the beginning is auspicious, further elaboration is secondary — one should declare the phala of the commencement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / निर्णय-क्रम। तकनीकी अंतर्दृष्टि: यह श्लोक “आरम्भ-प्राथमिकता” (commencement primacy) देता है — पाप-ग्रह की उपस्थिति को आरम्भ-राशि की शुभ-श्रेणी के अधीन रखता है; गणना पहले “आरम्भ-राशि ∈ शुभ-वर्ग?” की द्विआधारी जाँच है, फिर ग्रह-पाप/सौम्य।

50.39
आरम्भे पापराशौ वा यदीशो दुर्बलो द्विज |
नीचादौ तद्दशाद्यन्ते वदेद्भाग्यविपर्ययम्
ārambhe pāparāśau vā yadīśo durbalo dvija |
nīcādau taddaśādyante vadedbhāgyaviparyayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरम्भे = आरम्भ में; पाप-राशौ = पाप/अशुभ राशि में; वा = अथवा; यदि ईशः दुर्बलः = यदि (उसका) स्वामी दुर्बल हो; द्विज = हे द्विज; नीच-आदौ = नीच आदि अवस्थाओं में; तत्-दशा-आदि-अन्ते = उस दशा के आदि और अन्त में; वदेत् = कहे; भाग्य-विपर्ययम् = भाग्य का विपर्यय (शास्त्रोक्त फल-वर्ग)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, शास्त्र कहता है — यदि दशा का आरम्भ पाप-राशि में हो, अथवा स्वामी दुर्बल हो, अथवा नीच आदि दशा में हो, तो उस दशा के आदि और अन्त में भाग्य-विपर्यय का फल कहना चाहिए। यह फल-कथन है, नियति का दावा नहीं; बल-क्षीणता और नीच-स्थिति को आरम्भ-अन्त के संधि-बिन्दुओं से जोड़कर पढ़ा गया है।

English rendering O twice-born, the text states: if the daśā begins in a malefic sign, or if its lord is weak, or if (the relevant factor is) in debilitation and the like, one should declare “reversal of fortune” (as the śāstra’s phala-class) at the beginning and end of that daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। जाँच-क्रम (computational gate, फल से पहले): (1) आरम्भ-राशि ∈ पाप-राशि-वर्ग? (2) राशिश्वर का बल (षड्बल/अवस्था — जिस पद्धति से चलाएँ, घोषित करें) < दुर्बल-सीमा? (3) नीच/नीच-सदृश अवस्था? — तीनों में से कोई सत्य हो तो शास्त्र आदि-अन्त पर “भाग्य-विपर्यय” वर्ग का फल निर्देश करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “ईशो दुर्बलः” को अस्पष्ट विशेषण न छोड़कर षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्; 1 रूप = 60 विरूप) जैसी मापनीय रीति से बाँधना हमारी exact-`==` अनुशासन की माँग है — दुर्बल/सबल द्वार को सहिष्णुता-पट्टी से नहीं, घोषित सीमा और घटक-योग से खोलना।

50.40
यत्र स्थितो नीचखेटस्त्रिकोणे वाऽथ नीचगः |
तथा राशीश्वरे नीचे सम्बन्धो नीचखेटकैः
yatra sthito nīcakheṭastrikoṇe vā'tha nīcagaḥ |
tathā rāśīśvare nīce sambandho nīcakheṭakaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र स्थितः = जहाँ स्थित हो; नीच-खेटः = नीच ग्रह; त्रिकोणे वा = अथवा (उसके) त्रिकोण में; अथ नीच-गः = अथवा नीच को प्राप्त; तथा = तथा; राशि-ईश्वरे नीचे = राशिश्वर के नीच होने पर; सम्बन्धः = सम्बन्ध/योग; नीच-खेटकैः = नीच ग्रहों के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उन स्थितियों की सूची बाँधता है जहाँ नीचता फल-ढाँचे में घुसती है: जहाँ नीच ग्रह बैठा हो; अथवा त्रिकोण-सम्बन्ध से नीचता जुड़े; अथवा ग्रह नीचग हो; तथा राशिश्वर स्वयं नीचे हो; अथवा नीच ग्रहों से सम्बन्ध बने। यह श्लोक हेतु-समुच्चय है; अगले श्लोक में उसका फल-वर्ग कहा गया है।

English rendering The text enumerates the conditions: wherever a debilitated planet is placed; or (there is connection) in a trine; or a planet has gone to debilitation; and likewise when the sign-lord is debilitated; or there is association with debilitated planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नीच-द्वार की तार्किक शर्तें (boolean gates), कोई अवधि-सूत्र नहीं:
(A) ∃ ग्रह \(g\) : \(g\) नीच-राशि में;
(B) सम्बन्ध ∈ {त्रिकोण, युति/दृष्टि-सम्बन्ध — घोषित रीति} नीच-खेट से;
(C) राशिश्वर \(L(R)\) स्वयं नीचे।
त्रिकोण फिर: \(\{R, R+4, R+8\}\) (राशि 1…12, mod 12)। गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन / हेतु-सूची (फल 50.41 में)।

50.41
भाग्यस्य विपरीतत्वं करोत्येव द्विजोत्तम |
धनधान्यादिहानिश्च देहे रोगभयं तथा
bhāgyasya viparītatvaṃ karotyeva dvijottama |
dhanadhānyādihāniśca dehe rogabhayaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यस्य विपरीतत्वम् = भाग्य का विपरीत भाव; करोति एव = अवश्य करता है (शास्त्र-कथन); द्विज-उत्तम = हे द्विजोत्तम; धन-धान्य-आदि-हानिः = धन-धान्यादि की हानि (शास्त्रोक्त फल); च = और; देहे रोग-भयम् = देह में रोग का भय (पाठ का फल-पद); तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजोत्तम, पूर्व श्लोक की नीच-सम्बद्ध स्थितियाँ — शास्त्र कहता है — भाग्य के विपरीतत्व को उत्पन्न करती हैं। उसी फल-वर्ग में धन-धान्यादि की हानि और देह में रोग-भय भी गिनाया गया है। यह पाराशर-पाठ का फल-कथन है; हम इसे नियति, चिकित्सा-निदान, या भय-व्यापार के रूप में नहीं पढ़ते — केवल शास्त्र ने जो वर्ग बाँधा, वही स्पष्ट करते हैं।

English rendering O best of the twice-born, the text states that (those debilitated configurations) indeed produce a reversal of fortune, together with loss of wealth, grain, and the like, and fear of illness in the body — as the śāstra’s own phala-list, not as a medical or fatal claim we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। 50.40 की शर्त-संयोजना सत्य होने पर शास्त्र तीन फल-वर्ग जोड़ता है: (1) भाग्य-विपरीतत्व, (2) धन-धान्यादि-हानि, (3) देह-रोग-भय — व्याख्यात्मक विस्तार नहीं, पाठ की सूची।

50.42
राहोः केतोश्च कुम्भादि वृश्चिकादि चतुष्टयम् |
स्वभं तत्र समारम्भस्तद्दशायां शुभं भवेत्
rāhoḥ ketośca kumbhādi vṛścikādi catuṣṭayam |
svabhaṃ tatra samārambhastaddaśāyāṃ śubhaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः = राहु का; केतोः च = और केतु का; कुम्भ-आदि = कुम्भ से आरम्भ; वृश्चिक-आदि = वृश्चिक से आरम्भ; चतुष्टयम् = चार राशियों का समूह (चतुष्टय); स्व-भम् = अपना स्थान/स्व-भ; तत्र = वहाँ; सम-आरम्भः = (दशा का) समारम्भ; तत्-दशायाम् = उस दशा में; शुभं भवेत् = शुभ होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र राहु-केतु के लिए “स्वभ” का विशेष मानचित्र देता है: राहु को कुम्भादि चतुष्टय, केतु को वृश्चिकादि चतुष्टय — इन्हें उनका स्व-भ कहा गया। यदि उनकी दशा का आरम्भ इन्हीं में हो, तो शास्त्र कहता है उस दशा में शुभ फल होता है। राहु-केतु की सामान्य उच्च-नीच-कथा से यह आरम्भ-विशेष नियम अलग परत है।

English rendering For Rāhu the text assigns the Kumbha-ādi catuṣṭaya, and for Ketu the Vṛścika-ādi catuṣṭaya, as their own domain (svabha). If their daśā commences there, the text states that daśā becomes auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-समुच्चय नियत (1 = मेष … 12 = मीन)।

राहु-स्वभ (कुम्भादि चतुष्टय) — दो प्रचलित पाठ-रीति (पाठ-भेद संभव; घोषित करें):
(1) क्रमिक चार: कुम्भ(11), मीन(12), मेष(1), वृष(2);
(2) केन्द्र-चतुष्टय कुम्भ से: कुम्भ(11), वृष(2), सिंह(5), वृश्चिक(8)।

केतु-स्वभ (वृश्चिकादि चतुष्टय):
(1) क्रमिक: वृश्चिक(8), धनु(9), मकर(10), कुम्भ(11);
(2) केन्द्र वृश्चिक से: वृश्चिक(8), कुम्भ(11), वृष(2), सिंह(5)।
नियम: यदि दशा-आरम्भ-राशि \(R_0 \in S_{\text{Rahu}}\) (राहु-दशा) या \(R_0 \in S_{\text{Ketu}}\) (केतु-दशा), तो शास्त्र उस दशा को शुभ-वर्ग में रखता है।

उदाहरण (worked example) रीति (1) क्रमिक चतुष्टय अपनाएँ। राहु-महादशा का आरम्भ यदि मीन (\(R_0 = 12\)) में हो → \(12 \in \{11,12,1,2\}\) → शास्त्रोक्त शुभ-आरम्भ। केतु-दशा का आरम्भ यदि मकर (\(R_0 = 10\)) में हो → \(10 \in \{8,9,10,11\}\) → शुभ-वर्ग। (दशा-आरम्भ की राशि चन्द्र-नक्षत्र/लग्न-प्रवेश आदि जिस कुंजी से ली जाए, वह अलग से घोषित करनी चाहिए।)

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु 18 वर्ष, केतु 7 वर्ष — विंशोत्तरी Σ = 120 में पिन किए हुए खण्ड — और यह श्लोक उनके आरम्भ-राशि का स्वभ-फिल्टर जोड़ता है। इंजन में पहले नक्षत्र-अंश से महादशा-शेष, फिर आरम्भ-राशि ∈ स्वभ-समुच्चय? — दोनों परतें अलग रखनी चाहिए; फल-शुभता को अवधि-संख्या में मिलाकर एक अस्पष्ट “भाग्य-स्कोर” नहीं बनाना।

50.43
यद्दशायां शुभं ब्रूयात्स चेन्मारकसंस्थितः |
यस्मिन् राशौदशान्तःस्यात्तस्मिन् दृष्टे युतेऽपि वा
yaddaśāyāṃ śubhaṃ brūyātsa cenmārakasaṃsthitaḥ |
yasmin rāśaudaśāntaḥsyāttasmin dṛṣṭe yute'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यद्-दशायाम् = जिस दशा-काल में; शुभं ब्रूयात् = शुभ फल कहे; स चेत् = यदि वह (दशा-प्रद ग्रह); मारक-संस्थितः = मारक स्थान/भाव में स्थित; यस्मिन् राशौ = जिस राशि में; दशान्तः = दशा का अन्त; दृष्टे = दृष्ट होने पर; युतेऽपि वा = अथवा युति में भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस दशा में शुभ फल कहने का अवसर हो, यदि वह दशा-प्रद मारक-स्थिति में हो, तो सावधानी आवश्यक है। जिस राशि में दशा समाप्त होती है, उस राशि पर दृष्टि या युति का भी विचार करना चाहिए। यह श्लोक दशा-फल को केवल नाम से नहीं, बल्कि मारक-स्थिति और दशान्त-राशि की दृष्टि/युति से जोड़कर देखता है। पाठ-भेद संभव; अगला श्लोक इसी वाक्य को आगे बढ़ाता है।

English rendering The text states: if one would declare auspicious results in a daśā, yet the (daśā-giver) is situated in a māraka placement, and if the daśā ends in a certain rāśi that is aspected or conjoined — (the condition continues). The verse anchors phala not to the period-name alone but to māraka-status and the end-sign’s aspects/conjunctions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-शर्त / दशा-मारक-संयोग। यहाँ संख्या नहीं; “मारक” और “दशान्त-राशि” का आकलन कुण्डली-संयोजन (भाव/ग्रह-स्थिति + दृष्टि/युति) से होता है। दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी आदि की अवधि-गणित से आता है; यह श्लोक उस अवधि का फल-नियम बताता है, अवधि नहीं गिनता।

50.44
शुक्रेण विधुना वा स्याद्राजकोपाद्धनक्षयः |
दशान्तश्चेदरिक्षेत्रे राहुदृष्टयुतेऽपि वा
śukreṇa vidhunā vā syādrājakopāddhanakṣayaḥ |
daśāntaścedarikṣetre rāhudṛṣṭayute'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रेण = शुक्र द्वारा; विधुना वा = अथवा चन्द्र द्वारा; राज-कोपात् = राजकोप से; धन-क्षयः = धन-नाश; दशान्तः चेत् = यदि दशा-अन्त हो; अरि-क्षेत्रे = शत्रु-क्षेत्र/शत्रु-राशि में; राहु-दृष्ट-युतेऽपि वा = राहु की दृष्टि या युति में भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पूर्वोक्त दशान्त-राशि यदि शुक्र या चन्द्र से दृष्ट/युक्त हो, तो राजकोप से धन-क्षय का फल बताया गया है। यदि दशा-अन्त अरि-क्षेत्र में हो, अथवा राहु की दृष्टि या युति भी हो, तो वही अशुभ-दिशा और प्रबल मानी जाती है। यह फल-कथन है — निश्चित भाग्य-वाक्य नहीं; शास्त्र की शर्त-युक्त संकेत-भाषा है।

English rendering The text states: when that (end-sign condition) involves Venus or the Moon, wealth-loss from royal disfavour is indicated; and if the daśā ends in an enemy’s field, or is also aspected/conjoined by Rāhu, the same adverse line of result is stated. These are conditional phala-claims of the śāstra, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शर्त-युक्त)। “अरि-क्षेत्र” यहाँ शास्त्रीय शत्रु-स्वामित्व/शत्रु-राशि-संकेत है; दृष्टि-युति का निर्णय ग्रह-दृष्टि नियमों और युति-देशान्तर (समान राशि/समीपता-परम्परा) से होता है — इस श्लोक में कोई संख्या-सूत्र नहीं दिया गया।

50.45
इदं फलं शनेः पाके न विचिन्त्यं द्विजोत्तम |
दशाप्रदे नक्रराशौ न विचिन्त्यमिदं फलम्
idaṃ phalaṃ śaneḥ pāke na vicintyaṃ dvijottama |
daśāprade nakrarāśau na vicintyamidaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इदं फलम् = यह (पूर्वोक्त) फल; शनेः पाके = शनि की दशा/पाक में; न विचिन्त्यम् = विचारणीय नहीं; द्विजोत्तम = हे द्विजोत्तम (शिष्य-सम्बोधन); दशा-प्रदे = दशा-प्रद (ग्रह) के; नक्र-राशौ = मकर राशि में; न विचिन्त्यम् इदं फलम् = यह फल नहीं सोचना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट अपवाद देता है — शनि की पाक (दशा) में यह पूर्वोक्त फल नहीं सोचना चाहिए। तथा जब दशा-प्रद नक्र-राशि (मकर) में हो, तब भी यह फल विचारणीय नहीं कहा गया। यह नियम-सीमा (exclusion) है: सामान्य अशुभ-सूत्र को हर दशा पर न थोपना। प्रेमपूर्ण गुरु-वाणी में: फल तभी लागू होता है जब शास्त्र स्वयं लागू होने की अनुमति दे।

English rendering The text states: this (foregoing) result is not to be considered in Saturn’s period, O best of the twice-born; nor when the daśā-giver is in Capricorn (nakra). It is an explicit exclusion rule — the prior phala is not universal.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम का अपवाद (exclusion)। “शनेः पाक” = शनि-संबद्ध दशा-काल; “नक्र” = मकर (राशि 10, 270°–300° उष्णकटिबंधीय/साइन-देशान्तर पर — अयनांश-घोषणा आवश्यक यदि निरयण/सायन भेद हो)। गणना नहीं, केवल लागू/न-लागू का शास्त्रीय फिल्टर।

50.46
राहुर्दशान्ते सर्वस्वनाशो मरणबन्धने |
दशान्निर्वासनं वा स्यात्कष्टं वा महदश्नुते
rāhurdaśānte sarvasvanāśo maraṇabandhane |
daśānnirvāsanaṃ vā syātkaṣṭaṃ vā mahadaśnute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहुः दशान्ते = राहु-दशा के अन्त में; सर्वस्व-नाशः = सर्वस्व-नाश; मरण-बन्धने = मृत्यु या बन्धन; दशात् निर्वासनं वा = अथवा देश-निर्वासन; कष्टं वा महत् अश्नुते = अथवा महान् कष्ट भोगता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु की दशा के अन्त-काल में सर्वस्व-नाश, मरण-बन्ध, निर्वासन, अथवा महान् कष्ट — इनमें से कोई भी फल-दिशा बताई गई है। यह दशान्त-विशेष फल-कथन है; “अवश्य होगा” का दावा नहीं, शास्त्र की परम्परागत संकेत-सूची है। भय की भाषा से अलग रखकर, इसे दशा-अन्त की संवेदनशील खिड़की का शास्त्रीय वर्णन समझें।

English rendering The text states: at the end of Rāhu’s daśā there may be loss of all substance, death or bondage, exile from the land, or the experience of great hardship. Report this as the śāstra’s listed indications for daśānta, not as fate asserted by the editor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-दशान्त)। विंशोत्तरी में राहु-महादशा 18 वर्ष (Σ चक्र = 120) है — वह अवधि-गणित अन्य अध्यायों/इंजन से आता है; यह श्लोक केवल दशा-अन्त के फल की सूची देता है, वर्ष-संख्या नहीं। दशान्त = महादशा (या विचार्य स्तर) की समाप्ति-क्षण; अयनांश/नक्षत्र-प्रवेश से आरम्भ-अन्त तिथि निर्धारित होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में राहु = 18 वर्ष — यह अवधि-अंक इंजन में पिन है; अन्तरदशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120। यह श्लोक अवधि नहीं गिनता, दशान्त-फल बताता है — इसलिए गणित और फल को अलग रखा गया: अवधि `==` से सत्याप्य; फल केवल “शास्त्र कहता है”।

50.47
तत्त्रिकोणगते पापे निश्चयाद्दुःखमादिशेत् |
एवं शुभाशुभं सर्वं निश्चयेन वदेद् बुधः
tattrikoṇagate pāpe niścayādduḥkhamādiśet |
evaṃ śubhāśubhaṃ sarvaṃ niścayena vaded budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-त्रिकोण-गते = उसके त्रिकोण में स्थित; पापे = पाप-ग्रह में; निश्चयात् = निश्चयपूर्वक; दुःखम् आदिशेत् = दुःख का निर्देश करे; एवं = इसी प्रकार; शुभाशुभं सर्वम् = समस्त शुभ-अशुभ; निश्चयेन = निश्चित रीति से; वदेत् बुधः = पण्डित कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि उस (पूर्व-संदर्भित) स्थिति के त्रिकोण में पाप-ग्रह हो, तो दुःख का निर्देश निश्चय-भाषा में करने को कहा गया है। फिर सामान्य नियम: बुद्धिमान् ज्योतिषी समस्त शुभ-अशुभ को विधिपूर्वक, निश्चय-रीति से कहे — अर्थात् अनुमान-अस्पष्टता नहीं, शास्त्र-नियम से। “निश्चय” यहाँ गुरु-परम्परा की निर्णयात्मक वाणी है, आधुनिक “भाग्य-गारंटी” नहीं।

English rendering The text states: when a malefic occupies the trikoṇa of that (referenced place), suffering is to be indicated with firmness; and thus the wise should declare all auspicious and inauspicious results by settled rule. “Certainty” here is śāstric decisiveness of method, not a claim of sealed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम + त्रिकोण-स्थिति। त्रिकोण = मूल राशि से 1, 5, 9वें भाव/राशि (120° मोड्यूलर वर्ग: r, r+4, r+8 mod 12)। “पाप” यहाँ शास्त्रीय पाप-ग्रह-वर्ग (परम्परा-भेद संभव) — संख्या-सूत्र नहीं, स्थिति-जाँच।

50.48
राह्वाद्याश्रितराशिस्तु भवेद्यदि दशाप्रदः |
तत्र कालेऽपि पूर्वोक्तं चिन्तनीयं प्रयत्नतः
rāhvādyāśritarāśistu bhavedyadi daśāpradaḥ |
tatra kāle'pi pūrvoktaṃ cintanīyaṃ prayatnataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राह्वादि-आश्रित-राशिः = राहु आदि से आश्रित राशि; तु भवेत् यदि = यदि हो; दशा-प्रदः = दशा देने वाली (दशा-प्रद); तत्र कालेऽपि = उस काल में भी; पूर्वोक्तम् = पहले कहा गया; चिन्तनीयम् = विचारणीय; प्रयत्नतः = यत्नपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि राहु आदि जिस राशि में हों, वही राशि दशा-प्रद बने, तो उस काल में भी पूर्वोक्त फल-नियमों का यत्नपूर्वक चिन्तन करना चाहिए। अर्थात् केवल ग्रह-नाम की दशा नहीं — राशि-आश्रय और दशा-प्रदता का योग भी देखना है। यह पूर्व-श्लोकों को “राहु-आदि-राशि = दशा-प्रद” स्थिति तक विस्तार देता है।

English rendering The text states: if the rāśi occupied by Rāhu and the like becomes the daśā-giver, then at that time too the previously stated (results) should be carefully considered. Daśā-phala is tied not only to the planet-name but to the sign that hosts Rāhu etc. when that sign functions as daśā-prada.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम का विस्तार (राशि = दशा-प्रद)। “दशा-प्रद” यहाँ दशा-स्वामी/दशा-निर्धारक तत्व; राशियाँ 12, ग्रह-देशान्तर → राशि-सूचकांक floor(λ/30°) mod 12 (अयनांश घोषित करें)। संख्यात्मक अवधि नहीं — लागू-स्थिति का शास्त्रीय फिल्टर।

50.49
द/सारम्भो दशान्तो वा मारके चेन्न शोभनम् |
तस्मिन्नेव च राहुश्चन्नरोधो द्रव्यनाशनः
da/sārambho daśānto vā mārake cenna śobhanam |
tasminneva ca rāhuścannarodho dravyanāśanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशारम्भः (पाठ: द/सारम्भो — पाठ-भेद संभव; अर्थ: दशा-आरम्भ) = दशा का आरम्भ; दशान्तः वा = अथवा दशा-अन्त; मारके चेत् = यदि मारक में हो; न शोभनम् = शुभ नहीं; तस्मिन् एव च राहुः = और उसी में राहु भी; चन्न-रोधः (अर्थ-सम्भावना: धन-रोध/सम्पत्ति-अवरोध; पाठ-भेद संभव) = द्रव्य-अवरोध; द्रव्य-नाशनः = द्रव्य-नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दशा का आरम्भ या अन्त यदि मारक में पड़े, तो वह शुभ नहीं माना गया। यदि उसी स्थान/समय-सन्दर्भ में राहु भी हो, तो द्रव्य-रोध और द्रव्य-नाश का फल कहा गया है। आरम्भ और अन्त दोनों संवेदनशील सिरे हैं — मध्य-दशा से अलग। “द/सारम्भो” पाठ-भेद संभव; अर्थ दशारम्भ की ओर ही ले जाता है।

English rendering The text states: neither the beginning nor the end of a daśā is auspicious if it falls in a māraka; and if Rāhu is also there, obstruction and destruction of wealth are indicated. Opening and closing edges of the period are treated as critical, not the mid-span alone. The opening word is textually uncertain (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशारम्भ/दशान्त × मारक × राहु)। समय-सीमाएँ दशा-इंजन से आती हैं (विंशोत्तरी: नक्षत्र-शेष-अंश से आरम्भ, अवधि-वर्षों से अन्त); “मारक” यहाँ भाव/ग्रह-स्थिति-जाँच — इस श्लोक में मारक-परिभाषा की नई संख्या नहीं। फल को अवधि-गणित से अलग रखें: तिथि `==` से पिन हो सकती है; फल केवल शास्त्र-कथन।

50.50
यत्र क्वापि च भे राहौ दशारम्भे विनाशनम् |
गृहभ्रंशः समुद्दिष्टो धने राहुधनार्तिकृत्
yatra kvāpi ca bhe rāhau daśārambhe vināśanam |
gṛhabhraṃśaḥ samuddiṣṭo dhane rāhudhanārtikṛt
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र क्वापि च भे = जिस किसी भी राशि में; राहौ = राहु (हो); दशारम्भे = (उस राशि की) दशा के आरम्भ में; विनाशनम् = विनाश/हानि; गृहभ्रंशः = घर से च्युति; समुद्दिष्टः = कहा गया; धने = द्वितीय भाव में; राहुः धनार्तिकृत् = राहु धन-पीड़ा करने वाला।

हिन्दी भावार्थ चरादि (राशि-) दशा-फल अध्याय का पद — शास्त्र कहता है कि राहु जिस भी राशि में हो, उस राशि की दशा के आरम्भ में हानि और गृह-भ्रंश कहा गया है; और राहु द्वितीय भाव में हो तो धन-पीड़ा। यह राशि-दशाओं का फल-कथन है; दशा-क्रम की गणना अध्याय के आरम्भ में है।

English rendering In whatever sign Rāhu stands, the text says, the beginning of that sign's daśā brings loss and displacement from home; and Rāhu in the second house afflicts wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: राशि(Ra) की चर-दशा का आरम्भ-खण्ड → हानि; Ra ∈ भाव 2 → धन-पीड़ा।

50.51
चन्द्र्शुक्रौ द्वादश चेद्राजकोपो भवेद्ध्रुवम् |
भौमकेतू तत्र यदि वधोऽग्नेर्महती व्यथा
candrśukrau dvādaśa cedrājakopo bhaveddhruvam |
bhaumaketū tatra yadi vadho'gnermahatī vyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रशुक्रौ = चन्द्र और शुक्र (पाठ: चन्द्र्शुक्रौ — संधि/वर्तनी-भेद संभव); द्वादश = द्वादश भाव (व्यय); चेद् = यदि; राजकोपः = राज-कोप / शासन-पक्ष का रोष; भवेत् = होता है; ध्रुवम् = निश्चय से (शास्त्र-स्वर); भौमकेतू = मंगल और केतु; तत्र = वहीं (द्वादश में); वधः = वध / घातक संकट (शास्त्रोक्त संकेत); अग्नेः = अग्नि से; महती व्यथा = बड़ी पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि चन्द्र और शुक्र द्वादश भाव में हों, तो राजकोप का फल ध्रुव कहा गया है। यदि वहीं भौम और केतु हों, तो वध तथा अग्नि से महती व्यथा का उल्लेख है। यह दशा-फल-प्रकरण में भाव-स्थित युगलों का फल-कथन है, न कि किसी निश्चित घटना की घोषणा। पाठ में «चन्द्र्शुक्रौ» रूप मिलता है — «चन्द्रशुक्रौ» अपेक्षित; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that if the Moon and Venus occupy the twelfth house, royal displeasure is declared as certain; if Mars and Ketu stand there, it speaks of killing-danger and great suffering from fire. These are phala-claims of the śāstra for those placements, not endorsed predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव 12 में युगल-स्थिति)। तकनीकी संकेत मात्र: द्वादश = लग्न से 12वाँ भाव (व्यय); युगल = चन्द्र+शुक्र अथवा मंगल+केतु — गणना नहीं, केवल स्थिति-शर्त।

50.52
चेन्द्रशुक्रौ धने विप्र यदि राज्यं प्रयच्छतः |
दशारम्भे दशान्ते च द्वितीयस्थमिदं फलम्
cendraśukrau dhane vipra yadi rājyaṃ prayacchataḥ |
daśārambhe daśānte ca dvitīyasthamidaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रशुक्रौ = चन्द्र-शुक्र (पाठ: चेन्द्रशुक्रौ — पाठ-भेद संभव); धने = द्वितीय भाव (धन-भाव); विप्र = हे ब्राह्मण (संबोधन); यदि = यदि; राज्यं प्रयच्छतः = राज्य / अधिकार देते हैं (शास्त्रोक्त); दशारम्भे = दशा के आरम्भ में; दशान्ते = दशा के अन्त में; द्वितीयस्थम् = द्वितीय-स्थित; इदं फलम् = यही फल।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र! शास्त्र कहता है — यदि चन्द्र और शुक्र धन-भाव (द्वितीय) में हों, तो वे राज्य-प्रदान का फल देते हैं। यह द्वितीय-स्थ फल दशा के आरम्भ और दशा के अन्त — दोनों काल-बिन्दुओं पर कहा गया है। अर्थात् दशा-खण्ड के सिरे और छोर पर द्वितीय-स्थित शुभ-युगल का विशेष महत्त्व शास्त्र ने बाँधा है।

English rendering The text states, O Brahmin: if the Moon and Venus occupy the second house, they are said to confer dominion (rājya). This second-house result is assigned both at the beginning and at the end of the daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दशा-काल के दो सिरे। केवल संरचनात्मक संकेत: दशा-अवधि \(T\) पर फल-बिन्दु आरम्भ (\(t = 0\)) और अन्त (\(t = T\)); मध्य-खण्ड का उल्लेख इस श्लोक में नहीं। द्वितीय भाव = लग्न से 2रा (धन)।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी दशा की कुल अवधि \(T = 16\) वर्ष (उदा. बृहस्पति-महादशा, विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र की मानक सारणी: केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; \(\Sigma = 120\))। श्लोक के अनुसार द्वितीय-स्थित चन्द्र-शुक्र का «राज्य»-फल दशारम्भ (\(t = 0\)) और दशान्त (\(t = 16\)) पर लागू कहा गया — मध्य-वर्षों के लिए यह श्लोक मौन है। अयनांश/लग्न-गणना यहाँ आवश्यक नहीं; शर्त केवल भाव-स्थिति है।

50.53
एवमर्गलभावानां फलं विज्ञैः प्रदर्शितम् |
यस्य पापः शुभो वाऽपि ग्रहस्तिष्ठेच्छुभार्गले
evamargalabhāvānāṃ phalaṃ vijñaiḥ pradarśitam |
yasya pāpaḥ śubho vā'pi grahastiṣṭhecchubhārgale

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; अर्गलभावानाम् = अर्गल-युक्त भावों का; फलम् = फल; विज्ञैः = विद्वानों द्वारा; प्रदर्शितम् = दिखाया / निरूपित; यस्य = जिसका; पापः = पाप-ग्रह; शुभः = शुभ-ग्रह; वा अपि = अथवा भी; ग्रहः = ग्रह; तिष्ठेत् = स्थित हो; शुभार्गले = शुभ-अर्गल में।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार अर्गल-भावों का फल विज्ञ जनों ने प्रदर्शित किया है। आगे की कड़ी यह है — जिसके जन्म-चक्र में कोई ग्रह, चाहे पाप हो या शुभ, शुभ-अर्गल में स्थित हो… (अगले श्लोक में दृष्टि-लग्न और बल/फल की कड़ी जुड़ती है)। यहाँ अर्गल को दशा-फल से जोड़ने का द्वार खोला गया है।

English rendering Thus the results of the argala-bhāvas have been set forth by the learned. The verse then opens the case: whether a planet be malefic or benefic, if it stands in śubha-argala…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अर्गल-सूत्र का स्मरण-द्वार। अर्गल स्वयं भाव-सापेक्ष अवरोध/समर्थन की ज्यामितीय स्थिति है (प्राथमिक अर्गल प्रायः 2, 4, 11 आदि भाव-सम्बन्धों से कही जाती है — पूर्ण गणना-सारणी इस श्लोक में नहीं); यहाँ केवल «शुभार्गल-स्थिति» की शर्त है।

50.54
तेन द्रष्ट्रेक्षिते लग्नं पाबल्यायोपकल्प्यते |
यदि पश्येद्ग्रहस्तन्न विपरीतार्गलस्थितः
tena draṣṭrekṣite lagnaṃ pābalyāyopakalpyate |
yadi paśyedgrahastanna viparītārgalasthitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेन = उस (शुभार्गल-स्थित ग्रह) से; द्रष्ट्रा = दृष्टा / दृष्टि-कर्ता; ईक्षिते = दृष्ट होने पर; लग्नम् = लग्न; पाबल्याय = बल / सामर्थ्य के लिए (पाबल्य); उपकल्प्यते = माना जाता है / कल्पित होता है; यदि = यदि; पश्येत् = देखे (दृष्टि दे); ग्रहः = ग्रह; तत् = उस (भाव) को; न = नहीं? / सन्धि-पाठ; विपरीतार्गलस्थितः = विपरीत-अर्गल में स्थित। (पाठ-भेद/सन्धि संभव: «तन्न» = तत् + न या तत् + अनुबन्ध।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस शुभार्गल-स्थित ग्रह द्वारा लग्न के दृष्ट होने पर लग्न पाबल्य (बल-सामर्थ्य) के अनुकूल कल्पित होता है। यदि ग्रह विपरीत-अर्गल में स्थित होकर उस भाव को देखे, तो फल-दिशा पलटती है — यही अगले श्लोक में स्पष्ट होगा। दृष्टि + अर्गल-प्रकार, दोनों मिलकर दशा-फल का ध्रुव बदलते हैं।

English rendering The text states that when the lagna is aspected by that planet (the one in śubha-argala), the lagna is reckoned as conducive to strength (pābalya). If the planet aspects the relevant house while placed in viparīta-argala, the outcome turns the other way — as the next verse completes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अर्गल-प्रकार × दृष्टि × लग्न/भाव)। तकनीक का ढाँचा केवल तार्किक: (1) ग्रह \(G\) शुभार्गल में + \(G\) लग्न को देखे \(\Rightarrow\) पाबल्य-अनुकूल; (2) \(G\) विपरीतार्गल में + \(G\) तत्-भाव को देखे \(\Rightarrow\) विपरीत फल (50.55)। कोई अंश/वर्ष-संख्या नहीं।

50.55
तद्भावस्य दशायास्तु विपरीतफलं भवेत् |
सद्दृष्टेऽपि शुभं ब्रूयान्निर्विशंकं द्विजोत्तम
tadbhāvasya daśāyāstu viparītaphalaṃ bhavet |
saddṛṣṭe'pi śubhaṃ brūyānnirviśaṃkaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्भावस्य = उस भाव की; दशायाः = दशा में; तु = तो / निश्चय-सन्धि; विपरीतफलम् = विपरीत फल; भवेत् = होता है; सद्दृष्टे = सुदृष्ट / शुभ-दृष्ट होने पर; अपि = भी; शुभम् = शुभ; ब्रूयात् = कहे; निर्विशङ्कम् = बिना शङ्का; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ (विपरीतार्गल-स्थिति में) उस भाव की दशा में शास्त्र विपरीत फल कहता है। किन्तु सद्दृष्टि होने पर — हे द्विजोत्तम! — निर्विशङ्क शुभ फल कहना चाहिए। अर्थात् अर्गल-दिशा फल को मोड़ती है, और शुभ दृष्टि संशय काटती है; दोनों को एक-दूसरे से अलग पढ़ना शास्त्र की विधि है।

English rendering In the daśā of that bhāva, the text states a contrary result (when viparīta-argala applies). Yet when the house is well-aspected, O best of Brahmins, one should declare the auspicious without hesitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विपरीतार्गल-दशा vs. सद्दृष्टि-शुभ)। दशा = जिस भाव पर अर्गल-दृष्टि लागू है, उसी भाव-स्वामी/भाव-सम्बद्ध दशा-खण्ड; संख्यात्मक अवधि इस श्लोक में नहीं।

50.56
यस्मिन्भावे शुभस्वामिसम्बन्धस्तुङ्गखेचरः |
स्यात्तद्भावदशायां तु अन्त्यैश्वर्यमखण्डितम्
yasminbhāve śubhasvāmisambandhastuṅgakhecaraḥ |
syāttadbhāvadaśāyāṃ tu antyaiśvaryamakhaṇḍitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मिन् भावे = जिस भाव में; शुभस्वामिसम्बन्धः = शुभ स्वामी का सम्बन्ध; तुङ्गखेचरः = तुङ्ग (उच्च) ग्रह; स्यात् = हो; तद्भावदशायाम् = उस भाव की दशा में; तु = तो; अन्त्यैश्वर्यम् = अन्तिम / चरम ऐश्वर्य; अखण्डितम् = अखण्ड / निरन्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस भाव में शुभ स्वामी का सम्बन्ध हो और तुङ्ग (उच्च) ग्रह स्थित/सम्बद्ध हो, उस भाव की दशा में अखण्ड अन्त्य-ऐश्वर्य कहा गया है। «अन्त्य» यहाँ चरम-समृद्धि का शास्त्रीय शब्द है, काल-क्रम का «अन्तिम क्षण» मात्र नहीं; «अखण्डित» से फल की निरन्तरता सूचित है। यह भी फल-कथन है — निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states: in whichever house there is connection with a benefic lord and an exalted planet, in the daśā of that house unbroken ultimate prosperity (antya-aiśvarya) is declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-स्वामी-सम्बन्ध + तुङ्ग-ग्रह ⇒ तद्भाव-दशा में अखण्ड ऐश्वर्य)। तकनीकी शर्तें केवल स्थित्यात्मक: (क) भाव \(B\) का स्वामी शुभ-सम्बद्ध; (ख) \(B\) में/से तुङ्ग-ग्रह; (ग) \(B\)-सम्बद्ध दशा चल रही हो। उच्च-राशि ग्रह-वार नियत हैं (उदा. सूर्य मेष, चन्द्र वृष आदि) — यह श्लोक उन राशियों को दोहराता नहीं, केवल «तुङ्ग» पद से संकेत करता है।

50.57
यद्भावेशः स्वार्थराशिमधितिष्ठति पश्यति |
स्यातद्भावदशाकाले धनलाभो महत्तरः
yadbhāveśaḥ svārtharāśimadhitiṣṭhati paśyati |
syātadbhāvadaśākāle dhanalābho mahattaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यद्-भावेशः = जिस भाव का स्वामी; स्वार्थ-राशि = उस भाव का अपना (अर्थ-युक्त / स्व-) राशि-स्थान; अधितिष्ठति = अधिष्ठित होता है / बैठता है; पश्यति = दृष्टि डालता है; तत्-भाव-दशा-काले = उसी भाव की दशा-काल में; धन-लाभः = धन का लाभ; महत्तरः = अत्यन्त बड़ा / विशेष रूप से अधिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस भाव का अधिपति अपने उसी भाव-अर्थ की राशि पर बैठा हो, अथवा उस राशि को देखता हो, उस भाव की दशा चलने पर धन-लाभ विशेष रूप से बड़ा होता है। यहाँ फल भाव-स्वामी की स्थिति/दृष्टि और भाव-दशा के संयोग से जोड़ा गया है। यह कथन शास्त्र का नियम-वाक्य है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states: when the lord of a house occupies or aspects the sign that is its own (the house it rules), during the daśā of that house there is especially great gain of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश + स्व-राशि/दृष्टि + भाव-दशा)। गणना पक्ष केवल इतना है कि दशा-काल और भावेश-स्थिति/दृष्टि पूर्व-निर्धारित होनी चाहिए; यहाँ कोई अवधि-सूत्र या अंक नहीं दिया गया।

50.58
यस्माद्व्ययगतो यस्तु तद्दशायां धनक्षयः |
यस्मात्त्रिकोणगाः पापास्तत्रात्मशुभनाशनम्
yasmādvyayagato yastu taddaśāyāṃ dhanakṣayaḥ |
yasmāttrikoṇagāḥ pāpāstatrātmaśubhanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मात् = जिस (भाव) से; व्यय-गतः = व्यय-भाव (द्वादश) में स्थित; यः = जो (भावेश आदि); तत्-दशायाम् = उस (सम्बद्ध) दशा में; धन-क्षयः = धन की हानि; त्रिकोण-गाः = त्रिकोण-स्थानों में गये हुए; पापाः = पाप-ग्रह; तत्र = वहाँ; आत्म-शुभ-नाशनम् = आत्म-शुभ / शुभ-फल का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस भाव से सम्बन्धित जो ग्रह व्यय (द्वादश) में पड़ा हो, उसकी दशा में धन-क्षय का संकेत दिया गया है। तथा जिस भाव से त्रिकोणों में पाप-ग्रह स्थित हों, वहाँ आत्म-शुभ के नाश का फल कहा गया है। दोनों ही दशा–भाव–ग्रह-स्थिति के फल-सूत्र हैं; इन्हें नियति नहीं, शास्त्र-कथन समझें।

English rendering The text states: when the relevant planet from a house is placed in the twelfth, wealth-decline is indicated in that daśā; and when malefics occupy the trikoṇa places from a house, destruction of ātma-śubha (self-benefic/favorable indication) is stated there.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यय-गमन + त्रिकोण-पाप)। “त्रिकोण” यहाँ भाव-से-1-5-9 (त्रिकोण-स्थान) का शास्त्रीय विन्यास है; कोई संख्यात्मक बलांक या अवधि-गुणक नहीं।

50.59
पुत्रहानिः पितुः पीडा मनस्तापो महान् भवेत् |
यस्मात्त्रिकोण्गा रिःफरन्ध्रेशार्कारसूर्यजाः
putrahāniḥ pituḥ pīḍā manastāpo mahān bhavet |
yasmāttrikoṇgā riḥpharandhreśārkārasūryajāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-हानिः = पुत्र-सम्बन्धी हानि; पितुः पीडा = पिता की पीड़ा; मनस्तापः = मानसिक ताप/दुःख; महान् = बड़ा; यस्मात् = जिस (भाव) से; त्रिकोण-गाः = त्रिकोण में स्थित (पाठ: त्रिकोण्गा — संधि/वर्तनी-भेद); रिःफ = व्यय/द्वादश भाव; रन्ध्रेश = अष्टमेश; अर्कार-सूर्यजाः = अर्क-आर-सूर्यज आदि क्रूर-संघात (पाठ-भेद संभव: सूर्य–मङ्गल–शनि / रन्ध्रेश-अर्कार-सूर्यज का यौगिक पाठ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पुत्र-हानि, पिता की पीड़ा और महान् मनस्ताप तब कहा गया है जब जिस भाव से त्रिकोण-स्थानों में रिःफ (द्वादश), रन्ध्रेश (अष्टम-स्वामी) तथा अर्कार-सूर्यज-वर्ग के पाप/क्रूर ग्रह बैठे हों। यौगिक पद “रिःफरन्ध्रेशार्कारसूर्यजाः” में पाठ-भेद संभव है; अर्थ-रेखा स्पष्ट है — व्यय–रन्ध्र–क्रूर त्रिकोण-संयोग का फल-कथन।

English rendering The text states: loss concerning children, affliction to the father, and great mental distress are indicated when, from the house in question, the twelfth, the eighth-lord, and the solar-line malefics (compound reading uncertain — पाठ-भेद संभव) occupy the trikoṇa places.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रिकोण + रिःफ/रन्ध्रेश/क्रूर)। स्थान-गिनती भाव-से मॉड्यूलर 1–12 चक्र पर है; कोई दशा-वर्ष या बल-अंक इस श्लोक में नहीं।

50.60
पुत्रपीडा द्रव्यहानिस्तत्र केत्वहिसङ्गमे |
विदेशभ्रमणं क्लेशो भयं चैव पदे पदे
putrapīḍā dravyahānistatra ketvahisaṅgame |
videśabhramaṇaṃ kleśo bhayaṃ caiva pade pade

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-पीडा = पुत्र-सम्बन्धी पीड़ा; द्रव्य-हानिः = धन-हानि; तत्र = वहाँ; केतु-अहि-सङ्गमे = केतु और अहि (राहु) के संयोग में; विदेश-भ्रमणम् = परदेश-भ्रमण; क्लेशः = कष्ट; भयम् = भय; पदे पदे = पद-पद पर / बार-बार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उसी सन्दर्भ में केतु–अहि (राहु) संयोग होने पर पुत्र-पीड़ा और द्रव्य-हानि कही गई है। साथ ही विदेश-भ्रमण, क्लेश और पग-पग पर भय का फल भी उसी संयोग से जोड़ा गया है। यह राहु–केतु-संयोग का दशा/स्थान-फल-कथन है, न कि सुनिश्चित भविष्य-वाक्य।

English rendering The text states: with the conjunction of Ketu and Ahi (Rāhu) there, affliction regarding children and loss of wealth are indicated, along with foreign wandering, distress, and fear at every step.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु–केतु संयोग)। “सङ्गम” = समान राशि/स्थान-संयोग; कोई अंश-सीमा या वर्ष-संख्या श्लोक में नहीं दी गई।

50.61
तस्मात्षष्ठाष्टमे क्रूरनीचखेटादयः स्थिताः |
रोगशत्रुनृपालेभ्यो मुहुः पीडा सुदुःसहा
tasmātṣaṣṭhāṣṭame krūranīcakheṭādayaḥ sthitāḥ |
rogaśatrunṛpālebhyo muhuḥ pīḍā suduḥsahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् = उस (भाव) से; षष्ठ-अष्टमे = छठे और आठवें में; क्रूर = क्रूर/पाप-ग्रह; नीच-खेट = नीच-स्थित ग्रह; आदयः = इत्यादि; स्थिताः = स्थित; रोग = रोग; शत्रु = शत्रु; नृप = राजा/शासन; आलेभ्यः = इनसे; मुहुः = बार-बार; पीडा = पीड़ा; सु-दुःसहा = अत्यन्त असह्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस भाव से छठे और आठवें स्थान में क्रूर, नीच आदि खेट बैठे हों, वहाँ रोग, शत्रु और राज-सम्बन्धी स्रोतों से बार-बार अत्यन्त दुःसह पीड़ा का फल कहा गया है। षष्ठ–अष्टक यहाँ पीड़ा-सन्दर्भ के दो केन्द्र हैं; फल शास्त्र-वाक्य के रूप में ही पढ़ें।

English rendering The text states: when cruel, debilitated, and such planets stand in the sixth and eighth from that house, repeated and hard-to-bear affliction from disease, enemies, and royal powers is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (षष्ठ–अष्टम + क्रूर/नीच)। भाव-गिनती: तस्मात् + 6 तथा तस्मात् + 8 (12-राशि चक्र); “नीच” राशि-स्वाभाविक नीच-स्थान पर निर्भर — अयनांश/निरयण देशांतर घोषित करके ही जातक-निर्देश में लगाया जाता है।

50.62
यस्माच्चतुर्थः क्रूरः स्याद्भूगृहक्षेत्रनाशनम् |
पशुहानिस्तत्र भौमे गृहदाहः प्रमादकृत्
yasmāccaturthaḥ krūraḥ syādbhūgṛhakṣetranāśanam |
paśuhānistatra bhaume gṛhadāhaḥ pramādakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मात् = जिस (भाव) से; चतुर्थः = चौथा (स्थान/वहाँ स्थित); क्रूरः = क्रूर/पाप; भू = भूमि; गृह = घर; क्षेत्र = खेत/जमीन; नाशनम् = नाश; पशु-हानिः = पशु-हानि; तत्र = वहाँ; भौमे = मङ्गल के (होने पर); गृह-दाहः = गृह-दाह/अग्नि; प्रमाद-कृत् = प्रमाद/असावधानी से उत्पन्न (हानि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस भाव से चतुर्थ स्थान क्रूर हो, वहाँ भूमि–गृह–क्षेत्र के नाश का फल कहा गया है। उसी सन्दर्भ में पशु-हानि भी कही गई; और यदि वहाँ भौम (मङ्गल) हो तो गृह-दाह तथा प्रमाद-जन्य हानि का विशेष संकेत दिया गया है। यह चतुर्थ-क्रूरता का फल-वर्णन है।

English rendering The text states: when the fourth from a house is cruel (malefic), destruction of land, house, and fields is indicated; animal loss is also stated there, and with Mars, house-fire and harm through negligence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थ-क्रूर + भौम-विशेष)। स्थान: तस्मात् + 4; कोई अंश-सीमा या बल-अंक नहीं।

50.63
शनौ हृदयशूलं स्यात्सूर्ये राजप्रकोपनम् |
सर्वस्वहरणं राहौ विषचौरादिजं भयम्
śanau hṛdayaśūlaṃ syātsūrye rājaprakopanam |
sarvasvaharaṇaṃ rāhau viṣacaurādijaṃ bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनौ = शनि के (वहाँ होने पर); हृदय-शूलम् = हृदय-शूल/हृदय-पीड़ा (शास्त्र-फल-शब्द; चिकित्सकीय निदान नहीं); सूर्ये = सूर्य के (होने पर); राज-प्रकोपनम् = राज-कोप; सर्वस्व-हरणम् = सर्वस्व का हरण; राहौ = राहु के (होने पर); विष = विष; चौर = चोर; आदि-जम् = आदि से उत्पन्न; भयम् = भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उसी चतुर्थ/सन्दर्भ-स्थान पर शनि हो तो हृदय-शूल का फल कहा गया; सूर्य हो तो राज-प्रकोप; राहु हो तो सर्वस्व-हरण तथा विष–चोर आदि से भय। ग्रह-भेद से फल-भेद — यह शास्त्र का वर्गीकृत फल-कथन है, न कि चिकित्सा, विधि या धन की भविष्यवाणी।

English rendering The text states: with Saturn there, “heart-pain” is indicated; with the Sun, royal displeasure; with Rāhu, confiscation of all and fear arising from poison, thieves, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि/सूर्य/राहु-विशेष)। तीन ग्रह-स्थितियाँ, तीन फल-पंक्तियाँ; कोई संख्या, दशा-वर्ष या वर्ग-सूत्र इस श्लोक में नहीं।

50.64
यस्माद् दशमभे राहुः पुण्यतीर्थाटनं भवेत् |
यस्मात्कर्मायभाग्यर्क्षगतः शोभनखेचराः
yasmād daśamabhe rāhuḥ puṇyatīrthāṭanaṃ bhavet |
yasmātkarmāyabhāgyarkṣagataḥ śobhanakhecarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मात् = जिस (दशा/ग्रह-स्थान) से; दशम-भे = दशम भाव/राशि में; राहुः = राहु; पुण्य-तीर्थ-आटनम् = पुण्य तीर्थों की यात्रा/परिक्रमा; भवेत् = होता है; कर्म-आय-भाग्य-ऋक्ष-गतः = कर्म (१०), आय (११), भाग्य (९) राशियों में स्थित; शोभन-खेचराः = शुभ/शोभन ग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस दशा-संदर्भ में राहु दशम भाव (या दशम राशि) में स्थित हो, उसमें पुण्य-तीर्थ-यात्रा का फल कहा गया है। उसी क्रम में आगे यह भी जोड़ा जाता है कि जब शोभन ग्रह कर्म, आय और भाग्य के राशियों में हों, तब उनके अनुकूल फल आगे के श्लोक में विस्तार पाते हैं। यह फल-कथन दशा-स्थितियों से जुड़ा वर्णनात्मक नियम है, न कि कोई निश्चित नियति-वाक्य।

English rendering The text states that when, in the relevant daśā context, Rāhu occupies the tenth sign/house, pilgrimage to sacred tīrthas is indicated. It further sets up the next line: when auspicious planets stand in the tenth, eleventh, and ninth, the corresponding auspicious fruits follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-संदर्भ में भाव-स्थिति)। यहाँ केवल भाव-संख्याएँ स्पष्ट हैं: दशम = १०, कर्म = १०, आय = ११, भाग्य = ९; गणना की कोई इकाई, काल-मान, या अंक-सूत्र नहीं दिया गया।

50.65
विद्यार्थधर्मसत्कर्मख्यातिपौरुषसिद्धयः |
यतः पञ्चमकामारिगताः स्वोच्चशुभग्रहाः
vidyārthadharmasatkarmakhyātipauruṣasiddhayaḥ |
yataḥ pañcamakāmārigatāḥ svoccaśubhagrahāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या-अर्थ-धर्म-सत्कर्म = विद्या, धन/अर्थ, धर्म, श्रेष्ठ कर्म; ख्याति = यश/प्रसिद्धि; पौरुष = पुरुषार्थ/वीर्य; सिद्धयः = सिद्धियाँ/सिद्धि; यतः = जहाँ/जिससे; पञ्चम-काम-अरि-गताः = पञ्चम (५), काम (७), अरि (६) में स्थित; स्व-उच्च-शुभ-ग्रहाः = स्वराशि/उच्च तथा शुभ ग्रह।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के शोभन-ग्रहों के क्रम को पूरा करते हुए शास्त्र कहता है कि उन स्थितियों में विद्या, अर्थ, धर्म, सत्कर्म, ख्याति, पौरुष और सिद्धियों का संकेत मिलता है। आगे, जब स्वोच्च तथा शुभ ग्रह पञ्चम, सप्तम (काम) और षष्ठ (अरि) में हों, तब उनके फल अगले श्लोक में जोड़े जाते हैं। पाठ का स्वर फल-सूचना का है; इसे भय या निश्चित भाग्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that (under the auspicious placements just named) learning, means, dharma, worthy deeds, fame, prowess, and accomplishments are indicated. It further notes the configuration of own-sign/exalted and benefic planets in the fifth, seventh, and sixth, whose fruits continue in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-फल श्रृंखला)। भाव-सूचियाँ: पञ्चम = ५, काम = ७, अरि = ६; “उच्च” यहाँ स्थिति-विशेषण है, कोई अंश-मान या बलांक नहीं।

50.66
पुत्रदारादिसंप्राप्तिर्नृपपूजा मह्त्तरा |
यस्मान्पुत्रायकर्माम्बुनवलग्नाधिपाः स्थिताः
putradārādisaṃprāptirnṛpapūjā mahttarā |
yasmānputrāyakarmāmbunavalagnādhipāḥ sthitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दार-आदि-संप्राप्तिः = पुत्र, पत्नी आदि की प्राप्ति; नृप-पूजा = राज-सम्मान/राज्याश्रय; महत्तरा = अत्यन्त/विशेष (पाठ: मह्त्तरा — पाठ-भेद संभव); यस्मात् = जिस (दशा-संदर्भ) से; पुत्र-आय-कर्म-अम्बु-नव-लग्न-अधिपाः = पुत्र (५), आय (११), कर्म (१०), अम्बु/चतुर्थ (४), नव/नवम (९), लग्न — इन भावों के स्वामी; स्थिताः = स्थित हों।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब पूर्वोक्त शुभ/उच्च ग्रह-व्यवस्था के साथ (या उसी दशा-संदर्भ में) पुत्र, आय, कर्म, चतुर्थ, नवम और लग्न के अधिपति अनुकूल रूप से स्थित हों, तब पुत्र-दार आदि की प्राप्ति तथा बड़ी राज-सम्मान की बात कही गई है। “नव” यहाँ भाव-शृंखला में नवम (भाग्य/धर्म) के अर्थ में पढ़ना स्वाभाविक है; कुछ पाठ-परंपराओं में अन्य पाठ संभव हैं। यह दशा-फल का शास्त्रीय कथन है।

English rendering The text states that when the lords of the fifth, eleventh, tenth, fourth, ninth, and lagna are so placed (in the daśā context under discussion), attainment of children, spouse, and the like, together with marked royal honor, is indicated. (Reading mahattarā for the printed mahttarā is standard; minor recensional variance is possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-स्थिति)। भाव-क्रमांक स्पष्ट: ५, ११, १०, ४, ९, लग्न = १; कोई दशा-वर्ष, बलांश, या अनुपात-सूत्र नहीं।

50.67
तत्तद्भावार्थसिद्धिः स्याच्छ्रेयो योगानुसारतः |
यस्मिन् गुरुर्वा शुक्रोवा शुभेशो वापि संस्थितः
tattadbhāvārthasiddhiḥ syācchreyo yogānusārataḥ |
yasmin gururvā śukrovā śubheśo vāpi saṃsthitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत्-भाव-अर्थ-सिद्धिः = उन-उन भावों के अर्थ की सिद्धि; स्यात् = होती है; श्रेयः = कल्याण/श्रेय; योग-अनुसारतः = योग के अनुसार; यस्मिन् = जिसमें (भाव/दशा-स्थान में); गुरुः वा = बृहस्पति अथवा; शुक्रः वा = शुक्र अथवा; शुभ-ईशः वा अपि = अथवा शुभ भाव का अधिपति भी; संस्थितः = स्थित हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस भाव/स्थान में गुरु, शुक्र, अथवा कोई शुभेश संस्थित हो, वहाँ उस भाव के अर्थ की सिद्धि और श्रेय योग के अनुसार होता है। अर्थात् फल को योग-संरचना से जोड़कर देखा गया है—केवल ग्रह-नाम से स्वतः “सब कुछ सिद्ध” नहीं मान लिया गया। यह फल-सूत्र दशा-अध्याय की भाषा में वर्णनात्मक है।

English rendering The text states that success in the aims of the respective houses, and welfare, arise according to the yoga when Jupiter, Venus, or a benefic lord occupies the place under consideration. The fruit is explicitly conditioned on the yoga, not asserted as unconditional fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु/शुक्र/शुभेश की स्थिति + योग-सापेक्ष श्रेय)। कोई संख्यात्मक गुणक, अंश, या काल-मान नहीं।

50.68
कल्याणं सर्वसंपत्तिर् देवब्राह्मणतर्पनम् |
यत्चतुर्थे तुङ्गखेटाः शुभस्वामी ग्रहश्च वा
kalyāṇaṃ sarvasaṃpattir devabrāhmaṇatarpanam |
yatcaturthe tuṅgakheṭāḥ śubhasvāmī grahaśca vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कल्याणम् = मंगल/कल्याण; सर्व-संपत्तिः = समस्त संपत्ति; देव-ब्राह्मण-तर्पणम् = देव और ब्राह्मणों का तर्पण/सत्कार; यत् = जहाँ/जब; चतुर्थे = चतुर्थ भाव में (पाठ: यत्चतुर्थे — यच्चतुर्थे पाठ-भेद संभव); तुङ्ग-खेटाः = उच्च ग्रह; शुभ-स्वामी = शुभ भाव का स्वामी; ग्रहः च वा = अथवा (ऐसा) ग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चतुर्थ भाव में उच्च ग्रह हों, अथवा शुभ-स्वामी ग्रह वहाँ/उस संदर्भ में हों, तब कल्याण, सर्व-संपत्ति, तथा देव-ब्राह्मण-तर्पण का फल कहा गया है। “तुङ्ग” यहाँ उच्च-स्थिति का शास्त्रीय संकेत है; फल को गृह-सुख/स्थिरता-संबंधी भाव-चतुर्थ से जोड़ा गया है। यह भय-मुक्त फल-वर्णन है, दवाबपूर्ण उपाय-वाक्य नहीं।

English rendering The text states that when exalted planets stand in the fourth, or a benefic-lord planet is so placed, welfare, full prosperity, and the propitiation/honor of gods and brāhmaṇas are indicated. The claim is the śāstra’s phala, not a command to act under pressure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थ में तुङ्ग/शुभस्वामी)। “उच्च” की राशि-सीमा पारंपरिक उच्च-तालिका पर निर्भर है; इस श्लोक में कोई अंश-मान या सूत्र नहीं दिया।

50.69
वाहनग्रामलाभश्च पशुवृद्धिश्च भूयसी |
तत्र चन्द्रे च लाभः स्याद्बहुधान्यरसान्वितः
vāhanagrāmalābhaśca paśuvṛddhiśca bhūyasī |
tatra candre ca lābhaḥ syādbahudhānyarasānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन-ग्राम-लाभः = वाहन और ग्राम/क्षेत्र का लाभ; च = और; पशु-वृद्धिः = पशुओं की वृद्धि; भूयसी = प्रचुर; तत्र = वहाँ (उसी चतुर्थ/संदर्भ में); चन्द्रे = चंद्रमा के होने पर; लाभः = लाभ; स्यात् = होता है; बहु-धान्य-रस-अन्वितः = बहुत धान्य और रस (अन्न-द्रव्य/रस-संपदा) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस (चतुर्थ-संबंधी) स्थिति में वाहन और ग्राम का लाभ तथा पशुओं की प्रचुर वृद्धि कही गई है। विशेष रूप से जब वहाँ चंद्र हो, तब बहुत धान्य और रस से युक्त लाभ का कथन है। फल को भाव-स्थिति और चंद्र-योग से बाँधा गया है; इसे नियति की घोषणा नहीं, शास्त्र का फल-वाक्य समझना चाहिए।

English rendering The text states that (in that fourth-house context) there is gain of conveyances and villages, and abundant increase of cattle; and when the Moon is there, gain endowed with much grain and rasas (produce/essences of wealth) is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चतुर्थ + चंद्र)। कोई बलांक, दशा-वर्ष, या अंश-सूत्र नहीं; केवल भाव-संदर्भ और चंद्र-स्थिति का फल-वर्णन।

50.70
पूर्णे विधौ निधिप्राप्तिर्लभेद्वा मणिसञ्जयम् |
तत्र सुक्रे भृदङ्गादिवाद्यगानपुरस्कृतः
pūrṇe vidhau nidhiprāptirlabhedvā maṇisañjayam |
tatra sukre bhṛdaṅgādivādyagānapuraskṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णे विधौ = पूर्ण चंद्र (पूर्णिमा-सदृश/पूर्ण कला वाले चंद्र) में; निधि-प्राप्तिः = निधि/कोश की प्राप्ति; लभेत् वा = अथवा प्राप्त करे; मणि-सञ्जयम् = मणियों का संचय (पाठ: मणिसञ्जयम् — मणिसञ्चयम् पाठ-भेद संभव); तत्र = वहाँ; शुक्रे = शुक्र में/शुक्र के होने पर (पाठ: सुक्रे — शुक्रे पाठ-भेद संभव); मृदङ्ग-आदि-वाद्य-गान-पुरस्कृतः = मृदङ्ग आदि वाद्य और गान से सम्मानित (पाठ: भृदङ्ग — मृदङ्ग पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चंद्र पूर्ण हो, तब निधि-प्राप्ति अथवा मणि-संचय का लाभ कहा गया है। उसी संदर्भ में जब शुक्र हो, तब मृदङ्ग आदि वाद्यों और गान से पुरस्कृत/सम्मानित होने का फल बताया गया है। यहाँ “पूर्ण विधु” कला-पूर्णता का संकेत है; कुछ संस्करणों में वर्तनी-भेद संभव हैं, पर अर्थ-रेखा स्पष्ट रहती है—यह दशा/भाव-फल का कथन है, भय या दबाव नहीं।

English rendering The text states that with a full Moon there is acquisition of treasure, or one may obtain a store of gems; and when Venus is there, the native is honored with mṛdaṅga and other instruments and with song. (Printed sukre/bhṛdaṅga/sañjaya are best read as śukre/mṛdaṅga/sañcaya; recensional spelling variance is possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्ण चंद्र / शुक्र)। “पूर्ण विधु” को परंपरा में कला-पूर्णता (≈ १८०° सूर्य-चंद्र वियोग के निकट) से जोड़ा जाता है, पर इस श्लोक में कोई अंश-सूत्र, तिथि-गणना, या दशा-वर्ष नहीं दिया गया—केवल फल-वर्णन।

50.71
आन्दोलिकाप्तिर्जीवे तु कनकांदोलिका ध्रुवम् |
लग्नकर्मेशभाग्येशतुङ्गस्थशुभयोगतः
āndolikāptirjīve tu kanakāṃdolikā dhruvam |
lagnakarmeśabhāgyeśatuṅgasthaśubhayogataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आन्दोलिका-आप्तिः = पालकी/आंदोलिका-प्राप्ति (राजकीय वाहन-फल); जीवे = गुरु (की दशा/योग-प्रसंग में); कनक-आन्दोलिका = स्वर्ण-आंदोलिका; ध्रुवम् = निश्चय से (शास्त्र-कथन); लग्न-कर्मेश-भाग्येश = लग्नेश + दशमेश + नवमेश; तुङ्गस्थ = उच्च-स्थित; शुभयोगतः = शुभ-योग से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु-संबंधित फल-प्रसंग में आंदोलिका-प्राप्ति का उल्लेख है, और विशेष रूप से कनक-आंदोलिका का फल ध्रुव कहा गया है। यह फल तब बताया गया है जब लग्नेश, कर्मेश (दशमेश) और भाग्येश (नवमेश) उच्चस्थ हों तथा शुभ-योग बना हो। यह दशा/योग-फल की श्रृंखला का एक विशिष्ट फल-कथन है, न कि सामान्य नियम का विस्तार।

English rendering The text states that in the Jiva (Jupiter) context there is obtainment of a swing-palanquin (āndolikā), and a golden āndolikā is declared as assured. That result is said to arise from a benefic yoga in which the lords of lagna, karma (10th), and bhāgya (9th) stand exalted.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-विशेष से आंदोलिका/कनक-आंदोलिका)। “उच्चस्थ” यहाँ फल-शर्त है: संबंधित भावेशों की राशि-स्थिति = उच्च-राशि; संख्यात्मक गुणांक नहीं दिए गए।

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50.72
सर्वोत्कर्षमहैश्वर्यसाम्राज्यादिमहत्फलम् |
एवं तत्तद्भावदायफलं यत्स्याद्विचिन्तयेत्
sarvotkarṣamahaiśvaryasāmrājyādimahatphalam |
evaṃ tattadbhāvadāyaphalaṃ yatsyādvicintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वोत्कर्ष = परम उत्कर्ष/श्रेष्ठता; महा-ऐश्वर्य = महान् वैभव; साम्राज्य-आदि = साम्राज्य आदि; महत्-फलम् = महान फल; एवं = इस प्रकार; तत्-तत्-भाव-दाय-फलम् = प्रत्येक भाव की दशा का फल; यत् स्यात् = जो हो; विचिन्तयेत् = विचारे/गणना-विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त प्रकार के शुभ-योग से सर्वोत्कर्ष, महान् ऐश्वर्य, साम्राज्य आदि महान् फल संभव बताए गए हैं। आगे निर्देश है कि इसी रीति से तत्तत् भावों की दाय (दशा) का फल जो हो, उसे सोच-समझकर विचिंतन करना चाहिए। यह श्लोक फल-सूची को बन्द कर विधि की ओर मोड़ता है: भाव-दशा-फल को क्रमशः देखें।

English rendering The text states great results such as supreme elevation, vast lordship, empire and the like. Thus one should carefully consider whatever fruit belongs to the daśā of each respective bhāva.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + विधि-निर्देश (भाव-दाय-फल का विमर्श)। गणना का ढाँचा यहाँ नहीं; केवल “तत्तद्भावदायफलं … विचिन्तयेत्” का प्रक्रिया-संकेत है।

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50.73
एकैकोडुदशा स्वीयैर्गुणैरष्टादशात्मभि |
भिन्नं फलविपाकं तु कुर्याद्वै चित्रसंयुतम्
ekaikoḍudaśā svīyairguṇairaṣṭādaśātmabhi |
bhinnaṃ phalavipākaṃ tu kuryādvai citrasaṃyutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकैक-उडु-दशा = प्रत्येक नक्षत्र-दशा (उडु = नक्षत्र); स्वीयैः गुणैः = अपने-अपने गुणों से; अष्टादश-आत्मभिः = अठारह अंगों/स्वरूपों वाले (१८); भिन्नं फल-विपाकम् = भिन्न फल-पक्वता; कुर्यात् = करती है; चित्र-संयुतम् = विविध/चित्रात्मक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि एक-एक उडु-दशा अपने अष्टादश-आत्मक गुणों के कारण फल-विपाक को भिन्न-भिन्न बनाती है। परिणाम चित्र-संयुक्त—अर्थात् विविध रंगों वाला—होता है, एकरस नहीं। यह श्लोक दशा-फल को एक ही साँचे में बाँधने से रोकता है: प्रत्येक नक्षत्र-दशा के अपने गुण-समूह से फल-भेद उत्पन्न माना गया है।

English rendering The text states that each nakṣatra-daśā, by its own eighteenfold qualities, produces a differentiated ripening of results, rich in variety rather than uniform.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टादश = १८ — श्लोक-स्थ संख्या; यह “१८ गुण/आत्म” का गणना-संकेत है, न कि वर्ष-संख्या। उडु-दशा का काल-सूत्र यहाँ नहीं; फल-विपाक का भेद-नियम है:
फल-विपाक(उडुᵢ) = f(गुण-समुच्चयᵢ), जहाँ |गुण-समुच्चय| = १८ (पाठानुसार)।
विंशतोत्तरी आदि का १२०-वर्ष चक्र इस श्लोक में नहीं कहा गया।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-इंजन विंशतोत्तरी में महान्/अन्तर काल का अनुपात-गणित (Σ = १२० वर्ष; अन्तर = महान्-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ १२०) अलग से पिन है; यह श्लोक उस काल-सूत्र को नहीं देता, बल्कि उडु-दशा के फल-भेद को अष्टादश गुणों से जोड़ता है। अतः काल-अंक `==` यहाँ लागू नहीं—केवल “१८” का पाठ-अनुगामी पठन।

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50.74
परमोच्चे तुङ्गमात्रे तदर्वाक्तदुपर्यपि |
मूलत्रिकोणभे स्वर्क्षे स्वाधिमित्रग्रहस्य भे
paramocce tuṅgamātre tadarvāktaduparyapi |
mūlatrikoṇabhe svarkṣe svādhimitragrahasya bhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परम-उच्चे = परम उच्च (गहरा उच्च-अंश); तुङ्ग-मात्रे = केवल उच्च (उच्च-राशि मात्र); तत्-अर्वाक् = उससे नीचे (अंश में); तत्-उपरि अपि = उससे ऊपर भी; मूल-त्रिकोण-भे = मूलत्रिकोण राशि में; स्व-र्क्षे = स्वराशि में; स्व-अधि-मित्र-ग्रहस्य भे = अपने अधिक-मित्र ग्रह की राशि में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दशा-फल की तीव्रता/प्रकृति के लिए ग्रह-स्थितियों की श्रेणी आरम्भ करता है: परम उच्च, फिर तुङ्ग-मात्र, फिर उससे अर्वाक् या उपर्युक्त अंश, फिर मूलत्रिकोण, स्वराशि, और अधिक-मित्र की राशि। यह स्थान-बल/औच्च्य-क्रम का सूची-आरम्भ है जिससे आगे की दशा-अपचिति/फल जोड़ा जाएगा। पाठ फल को “नियति” नहीं, स्थित-क्रम से जोड़ता है।

English rendering The text lists dignity-stations beginning with deep exaltation, mere exaltation, degrees below or above that, mūlatrikoṇa, own sign, and the sign of a great friend—stages that condition later daśā result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणना-क्रम (औच्च्य/मैत्री-स्थान), सूत्रांक नहीं। पारंपरिक मान (घोषित convention; पाठ यहाँ अंश-संख्या नहीं देता):
- परम उच्च ≈ उच्च-बिन्दु का गहन अंश-क्षेत्र (परंपरा में प्रायः उच्च-अंश के निकट; सटीक ° पाठ-परक)
- तुङ्ग-मात्र = ग्रह उच्च-राशि में (३०° खंड)
- अर्वाक् / उपरि = उसी राशि में उच्च-अंश से कम/अधिक देशांतर
- मूलत्रिकोण / स्व / अधि-मित्र-भ = राशि-स्वामित्व/मैत्री-सारणी से निर्धारित
अयनांश और उच्च-अंश-तालिका घोषित किए बिना संख्यात्मक देशांतर न लिखें।

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल, high-precision tropical→sidereal बाद (अयनांश घोषित; उदाहरण: लाहिरी), sidereal long. λ = २९८° (धनु; मंगल का पारंपरिक उच्च = मकर २८° के निकट)।
मकर में λ_sign ≈ २८° → “तुङ्ग-मात्र / परम-उच्च-समीप” श्रेणी (पाठ “परमोच्चे / तुङ्गमात्रे” का गुणात्मक बकेट)।
यदि λ_sign = १०° मकर → तुङ्ग-राशि में किन्तु उच्च-अंश से अर्वाक्।
यदि λ = स्व-राशि मेष/वृश्चिक → “स्वर्क्षे” बकेट। (उदाहरण केवल वर्गीकरण; फल-मात्रा श्लोक में नहीं।)

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50.75
तत्कालसुहृदो गेहे उदासीनस्य भे तथा |
शर्तोर्भेऽधिरिपोर्भे च नीचान्तादूर्ध्वदेशभे
tatkālasuhṛdo gehe udāsīnasya bhe tathā |
śartorbhe'dhiriporbhe ca nīcāntādūrdhvadeśabhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काल-सुहृदः गेहे = तत्काल-मित्र के गृह/राशि में; उदासीनस्य भे = उदासीन (सम) ग्रह की राशि में; तथा = तथा; शत्रोः भे = शत्रु-राशि में (पाठ: शर्तोर्भे — शत्रोर्भे; पाठ-भेद संभव); अधि-रिपोः भे = अधिक-शत्रु की राशि में; नीच-अन्तात् ऊर्ध्व-देश-भे = नीच-अंत से ऊपर के देश/अंश की राशि-स्थिति में।

हिन्दी भावार्थ श्रेणी आगे बढ़ती है: तत्काल-मित्र का स्थान, उदासीन का भ, शत्रु का भ, अधिरिपु का भ, और नीच-सीमा से ऊर्ध्व देश में स्थिति। शास्त्र कहता है कि दशा-फल इन मैत्री/शत्रुता और नीच-देशांतर-पट्टियों से भी रंगी जाती है। “तत्काल-सुहृद्” नैसर्गिक मित्र से भिन्न—कालिक मैत्री—का संकेत है।

English rendering Next come placement in a temporary friend’s sign, a neutral’s sign, an enemy’s sign, a great enemy’s sign, and positions above the end of debilitation—further stations that the text ties to daśā fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मैत्री दो स्तर: नैसर्गिक + तत्काल (पंचधा-मैत्री प्रकार की परंपरा; इस श्लोक में सूत्र नहीं, केवल श्रेणी-नाम)।
नीचान्तादूर्ध्वदेश = नीच-अंश (परंपरागत नीच-बिन्दु) से ऊपर का देशांतर-खंड उसी नीच-राशि में।
शर्तोर्भे ≈ शत्रोर्भे — पाठ-भेद संभव। संख्यात्मक गुणांक अनुपस्थित; केवल स्थान-बकेट।

उदाहरण (worked example) शुक्र की नैसर्गिक मैत्री-सारणी से बृहस्पति मित्र/अधिमित्र-कोटि में हो सकता है; तत्काल-मैत्री जन्म-कुंडली के स्थान-बल नियमों से अलग गिनी जाती है (convention घोषित करें)।
यदि चंद्र λ नीच-राशि वृश्चिक में, नीच-अंश ~ ३° से ऊर्ध्व (जैसे १२° वृश्चिक) → “नीचान्तादूर्ध्वदेशभे” बकेट। फल-भार श्लोक नहीं देता।

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50.76
तस्मादर्वाङ् नीचमात्र नीचान्ते परमांशके |
नीचारिवर्गे सखले स्ववर्गे केन्द्रकोणभे
tasmādarvāṅ nīcamātra nīcānte paramāṃśake |
nīcārivarge sakhale svavarge kendrakoṇabhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् अर्वाक् = उससे नीचे; नीच-मात्र = केवल नीच (नीच-राशि मात्र); नीच-अन्ते = नीच-अंत पर; परम-अंशके = परम-अंश (गहन नीच/परमांश); नीच-अरि-वर्गे = नीच + शत्रु-वर्ग में; स-खले = खल-युक्त (दुष्ट/दुर्बल वर्ग-योग); स्व-वर्गे = स्व-वर्ग में; केन्द्र-कोण-भे = केन्द्र या त्रिकोण भाव/राशि में।

हिन्दी भावार्थ सूची नीच की ओर गहराती है: पूर्वोक्त से अर्वाक्, नीच-मात्र, नीचांत, परमांश; फिर नीचारि-वर्ग सखल, तथा दूसरी ओर स्व-वर्ग और केन्द्र-कोण-भ। शास्त्र दशा-फल के लिए औच्च्य से नीच तक और वर्ग/केन्द्र-कोण तक का स्थान-मानचित्र पूरा करता है। “वर्ग” यहाँ षोडश-वर्ग-संदर्भ का संकेत दे सकता है—पाठ संक्षिप्त है; पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव।

English rendering The scale continues downward: below that, mere debilitation, the end of debilitation, the extreme degree; then debilitation-enemy varga with khala, versus own varga and kendra/trikoṇa placement—stations the text sets for later daśā accounting.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-क्रम (गुणात्मक), बंद सूत्र नहीं:
परमुच्च → तुङ्ग → … → नीच-मात्र → नीचांत/परमांश → नीचारि-वर्ग+खल
तथा सकारात्मक ध्रुव: स्व-वर्ग, केन्द्र (१,४,७,१०), कोण (१,५,९)।
वर्ग = विभागीय चक्र (D1…D60 में से प्रसंग-युक्त; षोडश-वर्ग-यंत्र deterministic ३०°/n चाप)—इस श्लोक में n निर्दिष्ट नहीं।
“सखल” = खल-दोष/दुर्बल-वर्ग-स्थिति का पाठ-शब्द; संख्यात्मक −bindu यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) सूर्य λ = १९२° sidereal (कन्या ~ १२°; सूर्य-नीच = तुला १०° के निकट) → नीच-राशि नहीं।
सूर्य λ = १९०° (तुला १०°) → नीच-मात्र / नीचांत-समीप बकेट।
यदि उसी ग्रह का नवमांश (D9: प्रत्येक ३°२०′ = ३०°/९) शत्रु-राशि में पड़े और “खल” पाठ-संकेत लागू हो → “नीचारिवर्गे सखले”।
केन्द्र-उदाहरण: लग्न-से १०वें भाव की राशि में स्थित → केन्द्र-भ (equal/whole-sign house convention घोषित करें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग इंजन D1…D60 को शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन (३०° राशि → समान चाप, नियम-बद्ध mapping) से गिनता है; यह श्लोक “स्ववर्गे / नीचारिवर्गे” कहकर उसी वर्ग-स्थान को दशा-फल-श्रेणी से जोड़ता है, बिना नए विभाजन-सूत्र के। वर्ग-संख्या का `==` यहाँ नहीं—केवल dignities की सूची।

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50.77
व्यवस्थितस्य खेटस्य समरे पीडितस्य च |
गाढपूढस्य च दशापचितिः स्वगुणैः फलम्
vyavasthitasya kheṭasya samare pīḍitasya ca |
gāḍhapūḍhasya ca daśāpacitiḥ svaguṇaiḥ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवस्थितस्य खेटस्य = सुस्थित/सुव्यवस्थित ग्रह का; समरे पीडितस्य = संग्राम/पीड़ा में पीड़ित का; गाढ-पूढस्य = गाढ़ दबे/अत्यंत पीड़ित का (पूढ ≈ पीडित/दबा; पाठ-भेद संभव); च = और; दशा-अपचितिः = दशा की अपचिति (क्षय/ह्रास-क्रम); स्व-गुणैः = अपने गुणों से; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निष्कर्ष देता है: सुव्यवस्थित ग्रह, समर में पीड़ित ग्रह, और गाढ़-पूढ ग्रह—इनकी दशा-अपचिति और फल स्व-गुणों के अनुसार होता है। अर्थात् पूर्व श्लोकों की स्थान-श्रेणी अब “दशा-अपचितिः … फलम्” में बाँधी जाती है: स्थिति जितनी सशक्त/पीड़ित, दशा-फल का विपाक उन्हीं स्वगुणों से। यह फल-नियम है; शास्त्र इसे नियति-घोषणा के रूप में नहीं, दशा-विचार की विधि के रूप में कहता है।

English rendering The text states that for a well-ordered planet, one afflicted in conflict, and one deeply oppressed, the daśā’s decline and fruit follow each planet’s own qualities—tying the foregoing dignity scale to daśā result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/विधि-कथन (दशा-अपचिति स्वगुणैः)।
संरचनात्मक पठन:
दशा-फल ≈ g(स्थान-बकेट ∈ {परमुच्च … नीच … केन्द्र/कोण}, पीडा-अवस्था ∈ {व्यवस्थित, समर-पीडित, गाढ-पूढ}, स्व-गुण)
जहाँ g का बीजगणित श्लोक में नहीं; केवल आश्रित चर नामित हैं। अपचिति = दशा-काल में फल-क्षय/क्रम का शास्त्र-शब्द, वर्ष-सूत्र नहीं।

50.78
परमोच्चगतो यस्तु योऽतिवीर्यसमन्वितः |
सम्पूर्णाख्या दशा तस्य राज्यभोओग्यशुभप्रदा
paramoccagato yastu yo'tivīryasamanvitaḥ |
sampūrṇākhyā daśā tasya rājyabhoogyaśubhapradā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमोच्चगतः = परम-उच्च (उच्चा की चरम सीमा / extreme exaltation degree) में स्थित; अतिवीर्य-समन्वितः = अतिशय वीर्य/बल से युक्त; सम्पूर्णाख्या = “सम्पूर्णा” नामक; दशा = ग्रह-दशा-अवधि; राज्य-भोग्य-शुभ-प्रदा = राज्य, भोग और शुभ फल देने वाली (पाठ: “भोओग्य” ≈ भोग्य)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह परमोच्च पर बैठा हो और साथ ही अतिवीर्य से युक्त हो, उसकी दशा “सम्पूर्णा” कहलाती है। ऐसी दशा को राज्य-भोग और शुभ फल देने वाली बताया गया है। यहाँ फल दशा-वर्गीकरण का शास्त्रीय कथन है, न कि नियति की घोषणा।

English rendering The text states that the daśā of a planet at extreme exaltation and endowed with supreme strength is called Sampūrṇā; it is said to confer royal enjoyment and auspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-नाम और फल-कथन (परमोच्च + अतिवीर्य → सम्पूर्णा)। “परमोच्च” ग्रह-विशिष्ट उच्च-अंश की चरम सीमा है; वीर्य यहाँ बल/सामर्थ्य-अवस्था का संकेत है, षड्बल-कुल का संख्या-सूत्र इस श्लोक में नहीं दिया।

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50.79
लक्ष्मीकटाक्षचिह्नानां चिरवासगृहप्रदा |
तुङ्गमात्रगतस्यापि तथा वीर्याधिकस्य च
lakṣmīkaṭākṣacihnānāṃ ciravāsagṛhapradā |
tuṅgamātragatasyāpi tathā vīryādhikasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लक्ष्मी-कटाक्ष-चिह्नानाम् = लक्ष्मी के कृपा-कटाक्ष के चिह्नों (सौभाग्य-लक्षणों) का; चिर-वास-गृह-प्रदा = दीर्घकाल टिकने वाला निवास/गृह देने वाली; तुङ्ग-मात्र-गतस्य = केवल उच्च राशि में स्थित (ठीक परमोच्चांश पर नहीं) ग्रह का — तुङ्ग = उच्च; अपि = भी; वीर्य-अधिकस्य = अधिक बल (षड्बल में उच्च) वाले ग्रह का।

हिन्दी भावार्थ (पूर्व श्लोक 78 की "सम्पूर्णा" दशा का ही विस्तार) — वह दशा लक्ष्मी के कृपा-कटाक्ष के चिह्न तथा चिरस्थायी निवास-गृह प्रदान करती है। और जो ग्रह केवल अपनी उच्च राशि में गया हो (ठीक परमोच्चांश पर नहीं) एवं बल में अधिक हो — उसकी दशा (अगले श्लोक में "पूर्णा" कही जाएगी)।

English rendering (Continuing the sampūrṇā daśā of v.78) it bestows the marks of Lakṣmī's gracious glance and a long-abiding home. And for a planet merely lodged in its exaltation sign — not at the exact deep-exaltation point — yet abundant in strength …

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ भेद-रेखा स्थान-बल की है — परमोच्च (exact deep-exaltation point) बनाम तुङ्ग-मात्र (उच्च राशि में कहीं भी)। ग्रह की उच्चता को सतत रूप में मापें: उच्चबल (virūpa) = d ÷ 3, जहाँ d = |λ_ग्रह − λ_नीच| को 0°–180° में मोड़ा गया चाप। परमोच्च पर d = 180° ⇒ उच्चबल = 180 ÷ 3 = 60 virūpa = 1 rūpa (चरम); तुङ्ग-मात्र पर d < 180° ⇒ बल 1 rūpa से न्यून। (1 rūpa = 60 virūpa)

उदाहरण (worked example) कोई ग्रह अपने नीच-बिंदु से 150° आगे ⇒ d = 150° ⇒ उच्चबल = 150 ÷ 3 = 50 virūpa = 50/60 rūpa ≈ 0.833 rūpa — यही "तुङ्गमात्र, वीर्याधिक" श्रेणी (पूर्ण 60 से न्यून, पर उच्च)। (केवल मोड़-नियम व 60-virūpa स्थिरांक प्रयुक्त; किसी विशेष उच्चांश-अंक की कल्पना नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक का "परमोच्च बनाम तुङ्गमात्र" भेद हमारी षड्बल (BPHS Ch.27) गणना के उच्च-बल घटक से ठीक मेल खाता है, जहाँ 1 rūpa = 60 virūpa की इकाई पर बल संकलित होता है। दशा-नाम (सम्पूर्णा/पूर्णा…) इस सतत बल-मान के गुणात्मक खाने मात्र हैं — गणित और फल-कथन को पृथक् रखने के अनुशासन का सटीक दृष्टान्त।

50.80
पूर्णाख्या बहुलैश्वर्यदायिन्यापि रुजप्रदा |
अतिनीचगतस्यापि दुर्बलस्य ग्रहस्य तु
pūrṇākhyā bahulaiśvaryadāyinyāpi rujapradā |
atinīcagatasyāpi durbalasya grahasya tu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्ण-आख्या = "पूर्णा" नामक दशा; बहुल-ऐश्वर्य-दायिनी = प्रचुर ऐश्वर्य देने वाली; अपि रुज-प्रदा = किन्तु कुछ रुज (रोग/पीड़ा) भी देने वाली; अति-नीच-गतस्य = अत्यन्त नीच (गहन नीचांश) में गए; दुर्बलस्य ग्रहस्य = बलहीन ग्रह का; तु = तो (विपरीत पक्ष)।

हिन्दी भावार्थ (श्लोक 79 से) उस उच्चमात्र-वीर्याधिक ग्रह की दशा "पूर्णा" कहलाती है — शास्त्र कहता है यह प्रचुर ऐश्वर्य देती है, यद्यपि साथ में कुछ रोग/कष्ट भी। और जो ग्रह अत्यन्त नीच में गया हो एवं दुर्बल हो — उसकी दशा (अगले श्लोक में "रिक्ता")।

English rendering That dasha is named pūrṇā ("Full") — the text says it grants abundant lordship, though also some affliction. And of a planet sunk in deep debilitation and weak …

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्णा = उच्चबल उच्च, परन्तु 60 virūpa (परमोच्च) से किंचित् न्यून — इसीलिए "प्रचुर ऐश्वर्य" में "रुज" का मिश्रण (बल-न्यूनता का अंश)। बल-क्रम: सम्पूर्णा (d→180°, बल→60 virūpa) > पूर्णा (d बड़ा) > … > अतिनीच (d→0° ⇒ उच्चबल → 0)।

उदाहरण (worked example) नीच-बिंदु से d = 20° ⇒ उच्चबल = 20 ÷ 3 ≈ 6.67 virūpa ≈ 0.11 rūpa — "अतिनीचगत, दुर्बल" श्रेणी, जिसकी दशा रिक्ता होगी (श्लोक 81)।

50.81
रिक्ता त्वनिष्टफलदा व्याध्यनर्थमृतिप्रदा |
अत्युच्चेऽप्यतिनीचस्थे मध्यगस्यावरोहिणी
riktā tvaniṣṭaphaladā vyādhyanarthamṛtipradā |
atyucce'pyatinīcasthe madhyagasyāvarohiṇī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रिक्ता = "रिक्ता" (रिक्त/खाली) नामक दशा; तु अनिष्ट-फल-दा = अनिष्ट फल देने वाली; व्याधि-अनर्थ-मृति-प्रदा = व्याधि, अनर्थ, मृत्यु(भय) देने वाली (शास्त्र-कथन); अति-उच्चे अपि = अत्यन्त उच्च में भी; अति-नीच-स्थे = अत्यन्त नीच में स्थित होने पर; मध्य-गस्य = मध्य में गए ग्रह की; अवरोहिणी = अवरोहिणी (उतरती) दशा।

हिन्दी भावार्थ उस अतिनीच-दुर्बल ग्रह की दशा "रिक्ता" कहलाती है — शास्त्र कहता है यह अनिष्ट फल, व्याधि, अनर्थ व मृत्यु-भय देती है (यह श्रुति-कथन है, कोई अटल भविष्य नहीं)। आगे — अत्युच्च से अतिनीच की ओर चलते हुए मध्य में स्थित ग्रह की दशा "अवरोहिणी" (उतरती) कही जाती है।

English rendering That dasha is named riktā ("Empty") — the text states it yields unwanted results: illness, loss, mortal fear. And a planet running from high exaltation down toward deep debilitation, standing midway, has a descending (avarohiṇī) dasha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ दो अक्ष हैं — (1) स्थिति-कोटि (सम्पूर्णा…रिक्ता, बल-श्रेणी) तथा (2) गति-दिशा: अवरोहिणी = ग्रह परमोच्च (d = 180°) से नीच (d = 0°) की ओर, अर्थात् d घट रहा (उच्चबल ↓)। इसका युग्म आरोहिणी (श्लोक 83) है, जहाँ d बढ़ रहा।

हमारा डिकोड (Our Decode) "व्याधि-अनर्थ-मृति" शास्त्र का फल-कथन है; हमारे अनुशासन में ऐसे कथन सदा "शास्त्र कहता है X" रूप में प्रस्तुत होते हैं — कभी भय, अटलता या चिकित्सकीय/आयु-भविष्यवाणी रूप में नहीं। गणित (उच्चबल-श्रेणी) और फल-वचन यहीं पृथक् रखे गए।

50.82
मित्रोच्चभावप्राप्तस्य मध्याख्या ह्यर्थदा दशा |
नीचांतादुच्चभागान्तं भषट्के मध्यगस्य च
mitroccabhāvaprāptasya madhyākhyā hyarthadā daśā |
nīcāṃtāduccabhāgāntaṃ bhaṣaṭke madhyagasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्र-उच्च-भाव-प्राप्तस्य = मित्र-उच्च भाव को प्राप्त ग्रह का; मध्याख्या = “मध्या” नामक; अर्थ-दा दशा = अर्थ देने वाली दशा; नीच-अन्तात् = नीच के अंत से; उच्च-भाग-अन्तम् = उच्च-भाग के अंत तक; भ-षट्के = छह राशियों में; मध्यगस्य = मध्य-स्थित का; च = भी

हिन्दी भावार्थ मित्र-उच्च भाव प्राप्त ग्रह की दशा को शास्त्र “मध्या” कहता है और अर्थ-प्रद बताता है। नीचांत से उच्चभागांत तक छह राशियों के मध्य में स्थित ग्रह की दशा भी मध्या कही गई है। यह उच्च–नीच पथ पर मध्य-खंड का शास्त्रीय नामकरण है।

English rendering The daśā of a planet that has attained a friendly-exaltation house-state is called Madhyā and is said to confer artha. Likewise for a planet mid-placed within the six signs from the end of debilitation to the end of the exaltation arc.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नीच ↔ उच्च पथ का षड्-राशि माप:
- नीचांत (nīcānta) → उच्चभागांत (ucca-bhāgānta) = 6 राशि (भषट्क) ≈ 180° चाप (उच्च–नीच परस्पर विपरीत होने पर)।
- उस षट्क के मध्यग → दशा-नाम मध्या।
- मित्र-उच्च-भाव-प्राप्ति = मित्र-संबंध + उच्च/भाव-अवस्था का संयुक्त वर्ग (पाठ-भेद/व्याख्या-भेद संभव)। अंश-सारिणी इस श्लोक में नहीं—केवल 6-राशि मध्य-खंड का नियम।

उदाहरण (worked example) मानें मंगल का नीच = 28° कर्क, उच्च = 28° मकर (पारंपरिक उच्च–नीच युग्म; अयनांश दशा-नाम पर नहीं, केवल भचक्र-देशांतर पर)। नीचांत → उच्चभागांत = कर्क-अंत से मकर-अंत की ओर 6 राशि। यदि दशा-स्वामी उस षट्क के मध्य-भाग में हो (न अत्युच्च, न अतिनीच चरम), शास्त्रानुसार दशा-नाम मध्या; फल “अर्थदा” शास्त्र-कथन है।

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50.83
दशा चारोहिणी नीचरिपुभांशगतस्य च |
अधमाख्या भयक्लेशव्याधिदुःखविवर्धिनी
daśā cārohiṇī nīcaripubhāṃśagatasya ca |
adhamākhyā bhayakleśavyādhiduḥkhavivardhinī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशा च आरोहिणी = और (वह) आरोहिणी (चढ़ती) दशा; नीच-रिपु-भ-अंश-गतस्य = नीच अथवा शत्रु-राशि/अंश में गए ग्रह का; अधम-आख्या = "अधमा" नामक; भय-क्लेश-व्याधि-दुःख-विवर्धिनी = भय, क्लेश, व्याधि, दुःख बढ़ाने वाली (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ (श्लोक 82 का मध्यग ग्रह) आरोहिणी दशा वाला होता है। और जो ग्रह नीच अथवा शत्रु की राशि/अंश में गया हो, उसकी दशा "अधमा" कहलाती है — शास्त्र कहता है कि यह भय, क्लेश, व्याधि और दुःख को बढ़ाती है (श्रुति-कथन; अटल दण्ड नहीं)।

English rendering …its dasha is ascending (ārohiṇī). And of a planet gone to a debilitation or enemy sign/aṃśa, the dasha is named adhamā ("Lowest") — the text states it multiplies fear, distress, illness and sorrow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आरोहिणी = आरोही चाप (d बढ़ता, उच्चबल ↑) — अवरोहिणी (श्लोक 81) का युग्म। इस श्लोक-गुच्छ (78–83) की पूरी बल-सीढ़ी अब स्पष्ट है: सम्पूर्णा (परमोच्च + अतिवीर्य) > पूर्णा (तुङ्गमात्र + वीर्याधिक) > मध्या (मित्र/उच्च) > अधमा (नीच/शत्रु) > रिक्ता (अतिनीच + दुर्बल); गति-भेद: आरोहिणी (d↑) / अवरोहिणी (d↓)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पाँच-कोटि सीढ़ी हमारी षड्बल के स्थान/उच्च-बल के सतत मान का ही गुणात्मक विभाजन है — एक अखण्ड संख्या-रेखा के नामित खण्ड। "भय-क्लेश-व्याधि" जैसे फल शास्त्र के कथन रूप में रखे गए, न कि भविष्यवाणी रूप में — गणित/फल पृथक्करण का अनुशासन।

50.84
नामानुरूपफलदाः पाककाले दशा इमाः |
भाग्येशगुरुसम्बन्धो योगदृक्केन्द्रभादिभिः
nāmānurūpaphaladāḥ pākakāle daśā imāḥ |
bhāgyeśagurusambandho yogadṛkkendrabhādibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाम-अनुरूप-फल-दाः = अपने नामों के अनुरूप फल देने वाली; पाक-काले = पाक (परिपाक/प्रवृत्ति) के समय; दशा इमाः = ये (उपर्युक्त) दशाएँ; भाग्येश-गुरु-सम्बन्धः = भाग्येश (नवमेश) व गुरु का सम्बन्ध; योग-दृक्-केन्द्र-भ-आदिभिः = योग, दृष्टि, केन्द्र-राशि आदि के द्वारा।

हिन्दी भावार्थ ये सब दशाएँ अपने-अपने नाम (सम्पूर्णा, पूर्णा, मध्या, अधमा, रिक्ता, आरोहिणी, अवरोहिणी) के अनुरूप ही पाककाल में फल देती हैं। इनका निर्णय भाग्येश एवं गुरु के सम्बन्ध, योग, दृष्टि, केन्द्र-स्थिति आदि पर विचार करके करना चाहिए।

English rendering At their time of operation these dashas yield fruit in keeping with their very names; judge them through the connection of the 9th-lord and Jupiter, and through yoga, aspect, kendra placement and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (नामकरण-सारांश + निर्णय-कारक सूची)। अन्तर्दृष्टि: श्लोक स्पष्ट करता है कि पूर्वोक्त बल-श्रेणी एकल चर नहीं — फल-निर्धारण भाग्येश/गुरु-सम्बन्ध व योग-दृष्टि-केन्द्र आदि के बहु-कारक संयोजन से हो।

हमारा डिकोड (Our Decode) "किसी एक चर से फल न आँको" — यह ठीक हमारे अनुशासन का प्रतिध्वनि है: बल-मान एक इनपुट है, निर्णय बहु-कारक; संगम को घोषित रखना, न कि एक संख्या को नियति बना देना।

50.85
परेषामपि दायेषु भग्योपक्रममुन्नयेत् |
जातको यस्तु फलदो भग्ययोगप्रदोऽथ यः
pareṣāmapi dāyeṣu bhagyopakramamunnayet |
jātako yastu phalado bhagyayogaprado'tha yaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परेषाम् अपि दायेषु = अन्य ग्रहों की दशाओं (दाय) में भी; भाग्य-उपक्रमम् = भाग्य के आरम्भ/उपक्रम को (पाठ: भग्य = भाग्य, metri causa); उन्नयेत् = अनुमान/उन्नयन करे; जातकः यः तु फल-दः = जो ग्रह जातक को फल देने वाला; भाग्य-योग-प्रदः अथ यः = और जो भाग्य-योग का जनक हो। (पाठ-भेद संभव: भग्य/भाग्य वर्तनी)

हिन्दी भावार्थ अन्य ग्रहों की दशाओं में भी भाग्य के उपक्रम (सौभाग्य-प्रारम्भ) का अनुमान इसी रीति से करना चाहिए। जो ग्रह जातक को फल देने वाला तथा भाग्य-योग का जनक हो — (उसका विचार अगले श्लोक में)।

English rendering In the dāyas (periods) of the other planets too, one should infer the onset of fortune by the same method — namely, whichever planet is fruit-giving to the native and productive of fortune-yoga …

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-विस्तार (सामान्यीकरण-निर्देश)। अन्तर्दृष्टि: नाम-आधारित बल-श्रेणी केवल दशेश तक सीमित नहीं — "परेषाम् दायेषु" अर्थात् प्रत्येक ग्रह की दशा पर लागू होने वाला सामान्य नियम।

50.86
सफलो वक्रिमादूर्ध्वमन्यानपि च खेचरान् |
दुर्बलानसमर्थांश्च फलदानेषु यागतः
saphalo vakrimādūrdhvamanyānapi ca khecarān |
durbalānasamarthāṃśca phaladāneṣu yāgataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सफलः = फलदायी; वक्रिमात् ऊर्ध्वम् = वक्रत्व (retrograde) से बढ़ा हुआ (चेष्टा-बल); अन्यान् अपि च खेचरान् = अन्य ग्रहों को भी; दुर्बलान् असमर्थान् च = दुर्बल व असमर्थ (ग्रहों को); फल-दानेषु = फल देने में; या-गतः / यागतः = (सम्बन्ध/संयोग से) — पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ वक्री होने से बढ़े बल के कारण ग्रह सफल (फलदायी) हो जाता है; ऐसा बलवान् ग्रह अन्य दुर्बल व असमर्थ ग्रहों को भी फल-दान में समर्थ बना देता है (सम्बन्ध/संयोग द्वारा)। ("यागतः" पद अस्पष्ट — पाठ-भेद संभव।)

English rendering Rendered strong by retrogression, a planet becomes fruitful; and through its connection it makes even the other weak, incapable planets able to give results. (The word yāgataḥ is uncertain — a variant reading is possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ संकेत चेष्टा-बल (motional strength) का है — वक्रगति ग्रह को उच्च चेष्टा-बल देती है (षड्बल का एक घटक; वक्री ≈ पूर्ण चेष्टा-बल की ओर)। यह बल दुर्बल ग्रहों को सम्बन्ध द्वारा फल-सामर्थ्य "उधार" देता है। संख्यात्मक मान श्लोक में नहीं — घटक-नामोल्लेख मात्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) "वक्रिमा" का यह उल्लेख हमारी षड्बल गणना (BPHS Ch.27) के छह घटकों में से चेष्टा-बल से मेल खाता है — वक्री ग्रह को उच्च चेष्टा-बल मिलता है। श्लोक इसे बल-हस्तान्तरण (सम्बन्ध द्वारा) के रूप में देखता है; हम इसे केवल घटक-मान की गणना रखते हैं, न कि निश्चित फल के रूप में।

50.87
तारतम्यात्सुसम्बन्धा दशा ह्येताः फलप्रदाः |
स्वकेन्द्रादिजुषां तेषां पूर्णार्द्धांघ्रिव्यवस्थया
tāratamyātsusambandhā daśā hyetāḥ phalapradāḥ |
svakendrādijuṣāṃ teṣāṃ pūrṇārddhāṃghrivyavasthayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तारतम्यात् = तारतम्य/अनुपात से; सुसम्बन्धाः = सु-सम्बद्ध; दशाः = दशाएँ; फलप्रदाः = फल देने वाली; स्व-केन्द्र-आदि-जुषाम् = अपने केन्द्रादि भावों में स्थितों की; पूर्ण = पूरा (1); अर्ध = आधा (1/2); अंघ्रि = पाद/चतुर्थांश (1/4); व्यवस्थया = व्यवस्था से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो दशाएँ सुसम्बद्ध हैं, वे तारतम्य से फलप्रद होती हैं। अपने केन्द्र आदि स्थानों में स्थित ग्रहों के लिए फल की मात्रा पूर्ण–अर्ध–अंघ्रि की व्यवस्था से बाँधी जाती है। सम्बन्ध अच्छा हो तो दशा फल देती है; स्थान-क्रम से फल की मात्रा घटे-बढ़े—यही यहाँ का नियम है।

English rendering The text states that well-connected daśās yield results according to gradation. For grahas occupying their own kendras and related stations, fruit is arranged as full, half, or quarter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-मात्रा का अनुपात-नियम (दशा-फल, न कि नयी दशा-अवधि):

  • सुसम्बद्ध दशा → फलप्रद (तारतम्य से)
  • स्थान-श्रेणी (स्व-केन्द्रादि) के अनुसार गुणक:
  • पूर्ण = 1
  • अर्ध = 1/2
  • अंघ्रि (पाद) = 1/4

यदि किसी दशा में “मूल फल-भार” को P माना जाए (पाठ स्वयं P को संख्या नहीं देता; यह केवल अनुपात है), तो:

फल-भार_प्रभावी = P × {1 | 1/2 | 1/4}

केन्द्र > (परम्परा में) पणफरा/आपोक्लिम आदि की अपेक्षा पूर्णतर फल—यहाँ श्लोक केवल पूर्ण/अर्ध/अंघ्रि त्रयी देता है; सूक्ष्म भाव-सूची पाठ-भेद/टीका-अधीन।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी ग्रह की दशा में शास्त्रीय “पूर्ण फल” का संकेतक भार P = 1 (इकाई)।

| स्थिति (श्लोक की त्रयी) | गुणक | प्रभावी भार |
|---|---|---|
| पूर्ण | 1 | 1 |
| अर्ध | 1/2 | 0.5 |
| अंघ्रि | 1/4 | 0.25 |

यदि वही दशा 16 वर्ष की हो (उदा. बृहस्पति की विंशोत्तरी महादशा—परम्परा का 16-वर्ष नियत) और फल को काल में समान मानें, तो “अर्ध-फल” का काल-समतुल्य संकेत = 16 × 1/2 = 8 वर्ष-समतुल्य भार—यह अनुपात-दृष्टान्त है, न कि श्लोक द्वारा दी गई वर्ष-तालिका।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-काल का मूल 120-वर्ष विंशोत्तरी चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तरदशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120—यह शुद्ध अनुपात-गणित है। यह श्लोक उसी दशा-फल परत पर पूर्ण/अर्ध/अंघ्रि का तारतम्य जोड़ता है: अवधि इंजन से, मात्रा अनुपात से—दोनों को मिलाकर “एक अस्पष्ट फल” नहीं, अलग-अलग परतें रखी जाती हैं।

50.88
शीर्षोदयभगाः स्वस्वदशादौ स्वफलप्रदाः |
उभयोदयराशिस्थदशा मध्यफलप्रदा
śīrṣodayabhagāḥ svasvadaśādau svaphalapradāḥ |
ubhayodayarāśisthadaśā madhyaphalapradā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीर्षोदय-भ-गाः = शीर्षोदय राशियों में स्थित (ग्रह); स्व-स्व-दशा-आदौ = अपनी-अपनी दशा के आरम्भ में; स्व-फल-प्रदाः = अपना फल देने वाले; उभयोदय-राशि-स्थ-दशा = उभयोदय राशि में स्थित की दशा; मध्य-फल-प्रदा = मध्य में फल देने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शीर्षोदय राशि में बैठे ग्रह अपनी दशा के आदि (आरम्भ) में स्व-फल देते हैं। उभयोदय राशि में स्थित की दशा मध्य-फलप्रद होती है—अर्थात् फल दशा-खण्ड के बीच में। उदय-भेद से फल का काल-बिन्दु बदलता है; यह फल-समय का नियम है।

English rendering The text states that grahas in śīrṣodaya signs give their own results at the beginning of their daśā. The daśā of one placed in an ubhayodaya sign yields its fruit in the middle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-काल का फल-बिन्दु (उदय-वर्ग से):

मानें ग्रह g की महादशा अवधि T वर्ष (विंशोत्तरी आदि किसी भी दशा-पद्धति में T ज्ञात)।

  • शीर्षोदय-स्थित g: फल-प्रधान काल ≈ दशा-आदि → अन्तराल [0, T/3] (आदि-खण्ड; श्लोक “आदौ” कहता है—त्रि-भाग व्यावहारिक विभाजन)
  • उभयोदय-स्थित g: फल-प्रधान काल ≈ मध्य → अन्तराल [T/3, 2T/3]

(श्लोक केवल “आदौ / मध्य” कहता है; समान त्रि-खण्ड एक स्पष्ट आधुनिक संकेतन है, न कि श्लोक में लिखित अंश-सूत्र।)

उदाहरण (worked example) शुक्र महादशा T = 20 वर्ष (विंशोत्तरी नियत)। शुक्र तुला में (शीर्षोदय-वर्ग)—फल-संकेत दशा-आरम्भ के पास: विशेषतः प्रथम ~20/3 ≈ 6 वर्ष 8 मास के खण्ड में स्व-फल। यदि वही ग्रह मीन में (उभयोदय)—मध्य-खण्ड ~ वर्ष 6 वर्ष 8 मास से 13 वर्ष 4 मास। (अयनांश/लग्न इस उदय-नियम पर नहीं; केवल राशि-उदय-वर्ग और T।)

50.89
पृष्ठोदयर्क्षगाः खेटाः स्वदशान्ते फलप्रदाः |
निसर्गतश्च तत्काले सुहृदां हरणे शुभम्
pṛṣṭhodayarkṣagāḥ kheṭāḥ svadaśānte phalapradāḥ |
nisargataśca tatkāle suhṛdāṃ haraṇe śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृष्ठोदय-ऋक्ष-गाः = पृष्ठोदय नक्षत्र/राशि में गए; खेटाः = ग्रह; स्व-दशा-अन्ते = अपनी दशा के अन्त में; फल-प्रदाः = फल देने वाले; निसर्गतः = स्वभाव/नैसर्गिक दृष्टि से; तत्-काले = उस काल में; सुहृदाम् हरणे = मित्रों के हरण (ग्रहण/अधिकार) में; शुभम् = शुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पृष्ठोदय राशि में स्थित खेट अपनी दशा के अन्त में फल देते हैं। नैसर्गिक रीति से, उसी काल-सन्दर्भ में मित्रों के हरण में शुभ कहा गया है। तीनों उदय—शीर्ष, उभय, पृष्ठ—मिलकर दशा के आदि–मध्य–अन्त फल-बिन्दु बाँधते हैं।

English rendering The text states that planets in pṛṣṭhodaya signs give results at the end of their own daśā. By nature, at that juncture, the seizure (occupation/taking) of friends is declared auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 50.88 का पूरक—त्रि-बिन्दु फल-काल:

| राशि-उदय वर्ग | दशा में फल-स्थान | T-वर्ष दशा में संकेतन |
|---|---|---|
| शीर्षोदय | आदि | ~ [0, T/3] |
| उभयोदय | मध्य | ~ [T/3, 2T/3] |
| पृष्ठोदय | अन्त | ~ [2T/3, T] |

निसर्ग-शुभ: तत्काले सुहृद्-हरण → शुभ (फल-कथन; संख्या नहीं)।

उदाहरण (worked example) शनि महादशा T = 19 वर्ष; शनि मकर में (पृष्ठोदय-वर्ग)—फल-संकेत दशा-अन्त: ~ वर्ष 12 वर्ष 8 मास से 19 तक (2T/3 = 38/3 ≈ 12.67)। शीर्षोदय/उभयोदय उदाहरण 50.88 में। पाठ-भेद संभव जहाँ किसी राशि का उदय-वर्गीकरण टीकाओं में डगमगाए।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में T ग्रह-वार नियत है (Σ = 120); फल “कब” का यह उदय-त्रय T के अन्दर काल-खण्ड चुनता है, T को बदलता नहीं। इंजन दशा-अवधि को अनुपात से काटता है; यह श्लोक उसी काटी हुई अवधि पर आदि/मध्य/अन्त का फल-बिन्दु लगाता है—दो परतें, एक-दूसरे में मिलाई नहीं जातीं।

50.90
सम्पादयेत्तदा कष्टं तद्विपर्ययगामिनाम् |
दशेशाक्रांतभावर्क्षादारभ्य द्वादशर्क्षकम्
sampādayettadā kaṣṭaṃ tadviparyayagāminām |
daśeśākrāṃtabhāvarkṣādārabhya dvādaśarkṣakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्पादयेत् = उत्पन्न करे; तदा = तब; कष्टम् = कष्ट; तत्-विपर्यय-गामिनाम् = उसके विपरीत गमन वालों का; दशेश-आक्रान्त-भाव-ऋक्षात् = दशेश से आक्रान्त भाव की राशि से; आरभ्य = आरम्भ करके; द्वादश-ऋक्षकम् = बारह राशियों तक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि विपरीत गमन वालों के लिए तब कष्ट सम्पन्न होता है (पूर्व श्लोक के शुभ-सन्दर्भ का विपर्यय)। आगे की तकनीक: दशेश जिस भाव-राशि को आक्रान्त किए बैठा है, उसी राशि से आरम्भ कर बारह राशियों का क्रम लिया जाए। यह दशा-भुक्ति के राशि-विन्यास का आरम्भ-बिन्दु है।

English rendering The text states that hardship is then produced for those of the reverse course. From the sign of the house occupied by the daśā-lord, one is to begin and take the span of the twelve signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-क्रम का आरम्भ-नियम (अगले श्लोक की भुक्ति-रचना का पद 1):

1. दशेश L का जन्म-स्थिति राशि = R₀ = rāśi(longitude of L)
(अथवा श्लोकानुसार “आक्रान्त भाव” की राशि—भाव-पद्धति घोषित करनी होगी: समान-भाव/श्रीपति आदि; पाठ “भावर्क्ष” कहता है।)
2. बारह-राशि चक्र:
Rₖ = (R₀ + k) mod 12, k = 0, 1, …, 11
3. इसी क्रम पर दशा को बाँटना → 50.91।

विपर्यय-गामिनाम् कष्ट = फल-कथन (पूर्व सुहृद्-शुभ का उल्टा); इसमें संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) दशेश = गुरु, गुरु कन्या में → R₀ = कन्या। बारह-क्रम: कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह। (लग्न/अयनांश केवल R₀ तय करने में; क्रम स्वयं मापांक-12 है।)

50.91
भक्त्वा द्वादशराशीनां दशाभुक्ति प्रकल्पयेत् |
एकैकराशेर्या तत्र सुहृत्स्वक्षेत्रगामिनी
bhaktvā dvādaśarāśīnāṃ daśābhukti prakalpayet |
ekaikarāśeryā tatra suhṛtsvakṣetragāminī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भक्त्वा = बाँटकर / विभाजित कर; द्वादश-राशीनाम् = बारह राशियों का; दशा-भुक्ति = दशा की भुक्ति (उप-अवधि); प्रकल्पयेत् = कल्पित/निर्धारित करे; एकैक-राशेः = एक-एक राशि की; या तत्र = जो वहाँ; सुहृत्-स्व-क्षेत्र-गामिनी = मित्र या स्व-क्षेत्रगामिनी (भुक्ति/राशि-गति)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बारह राशियों में दशा को बाँटकर दशा-भुक्ति की कल्पना करनी चाहिए। एक-एक राशि की जो भुक्ति वहाँ सुहृद् या स्वक्षेत्र की ओर गामिनी हो, वही विशेष रूप से गिनी जाती है (पूर्व के शुभ-सन्दर्भ से जुड़कर)। अवधि का बँटवारा बारह-राशिक; गुण-दोष सुहृद्/स्वक्षेत्र से।

English rendering The text states that one should determine the daśā-bhukti by dividing among the twelve signs. The portion of each sign that proceeds as friend-going or own-field-going is the one so framed there.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा → 12 राशि-भुक्ति (समान विभाग; श्लोक “भक्त्वा द्वादशराशीनाम्”):

- महादशा अवधि T वर्ष
- प्रत्येक राशि-खण्ड:
t = T / 12
- क्रम: R₀, R₁, …, R₁₁ जहाँ R₀ = दशेश-आक्रान्त भाव-राशि (50.90)
- खण्ड k का काल:
[ k·t , (k+1)·t ) वर्ष, दशा-आरम्भ से

सुहृत् / स्वक्षेत्र-गामिनी: उस राशि-खण्ड का स्वामी दशेश का मित्र हो, या राशि दशेश का स्वक्षेत्र हो—तब वह भुक्ति “सुहृत्स्वक्षेत्रगामिनी” कही गई (फल-योग का फ़िल्टर; श्लोक यहाँ शुभ-मात्रा अंक में नहीं देता)।

सम्बद्ध विंशोत्तरी अन्तरदशा (तुलना के लिए, भिन्न सूत्र):
अन्तर = (T × T_अन्तर-ग्रह) / 120
—यह ग्रह-क्रम भुक्ति है; 50.90–91 राशि-क्रम भुक्ति है। दोनों को एक न माना जाए।

उदाहरण (worked example)
- दशा: शुक्र, T = 20 वर्ष (विंशोत्तरी)
- t = 20 / 12 = 5/3 वर्ष = 1 वर्ष + 8 मास
- शुक्र तुला में → R₀ = तुला; क्रम: तुला…कन्या (12)
- खण्ड 0 (तुला): 0 → 5/3 वर्ष — तुला = शुक्र स्वक्षेत्र → “स्वक्षेत्रगामिनी”
- खण्ड 1 (वृश्चिक): 5/3 → 10/3 वर्ष — स्वामी मंगल; शुक्र–मंगल मैत्री/शत्रुत्व परम्परा-भेद से जाँचा जाए (पाठ स्वयं मैत्री-सारणी नहीं देता)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी इंजन अन्तरदशा को (T × T_अन्तर)/120 से काटता है—ग्रह-कुंजी, 120-वर्ष चक्र। यह श्लोक-युग्म (50.90–91) उसी T को 12 राशियों में T/12 से बाँटता है—राशि-कुंजी, दशेश-राशि से आरम्भ। दोनों शुद्ध अनुपात-गणित हैं; मिलाकर एक “मिश्र भुक्ति” गढ़ना पाठ के बाहर है। हम अवधि को exact अनुपात से रखते हैं; फल (सुहृद्/स्वक्षेत्र/कष्ट) को शास्त्र-कथन के रूप में अलग पंक्ति में—`==` वाली संख्या-परत और फल-परत को एक नहीं करते।

50.92
तस्यां राज्यादिसम्पत्तिपूर्वकं शुभमीरयेत् |
दुःस्थानरिपुगेहस्थनीचक्रूरयुता च या
tasyāṃ rājyādisampattipūrvakaṃ śubhamīrayet |
duḥsthānaripugehasthanīcakrūrayutā ca yā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्याम् = उस (अन्तर्दशा/दशा) में; राज्यादि-सम्पत्ति-पूर्वकम् = राज्य-आदि सम्पत्ति से युक्त क्रम में; शुभम् ईरयेत् = शुभ फल कहे; दुःस्थान = 6/8/12 (दुष्ट स्थान); रिपु-गेह-स्थ = शत्रु-गृह में स्थित; नीच-क्रूर-युता = नीच तथा क्रूर-युक्त; या = जो (ग्रह/दशा-स्वामी)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दशा/अन्तर्दशा-स्वामी अनुकूल स्थिति में हो, तो उस काल में राज्य, ऐश्वर्य और सम्पत्ति-पूर्व शुभ फल बोलना चाहिए। किन्तु वही स्वामी यदि दुःस्थान में हो, शत्रु-गृह में बैठे, नीच हो, अथवा क्रूर-ग्रहों से युक्त हो, तो शुभता का यह कथन लागू नहीं रहता — फल-निर्णय अगले श्लोकों में बिन्दु, भाव और योग-भेद से बँधता है। यह फल-कथन की आरम्भ-सूत्र है, नियति की घोषणा नहीं।

English rendering The text states that in that period one should declare auspicious results attended by sovereignty, wealth, and the like. But the same does not hold when the period-lord is placed in a dusthāna, in an enemy’s house, debilitated, or joined with malefics — those conditions reframe the phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-निर्णय का स्थिति-वर्गीकरण (शुभ vs दुःस्थान/नीच/क्रूर). The computational frame is positional class: dusthāna ∈ {6, 8, 12} from lagna (or the house-system in use); nīca = graha in its debilitation sign; “krūra-yuta” = conjunction with malefics — all discrete chart flags before any numeric phala scale is applied.

50.93
तस्यामनर्थकलहं रोगमृत्युभयादिकम् |
बिन्दुभूयस्त्वशून्यत्ववशात् स्वीयाष्टवर्गके
tasyāmanarthakalahaṃ rogamṛtyubhayādikam |
bindubhūyastvaśūnyatvavaśāt svīyāṣṭavargake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्याम् = उस (दुःस्थिति वाली दशा) में; अनर्थ = अनिष्ट/हानि; कलहम् = विवाद; रोग-मृत्यु-भय-आदिकम् = रोग, मृत्यु-भय आदि; बिन्दु-भूयस्त्व = बिन्दुओं की अधिकता; शून्यत्व = रिक्तता/अल्पता; वशात् = के अनुसार; स्वीय-अष्टवर्गके = अपने अष्टकवर्ग में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दुःस्थिति-युक्त काल में अनर्थ, कलह, रोग और मृत्यु-भय जैसे फल कहे जाते हैं — किन्तु मात्रा और तीक्ष्णता स्व-ग्रह के अष्टकवर्ग में बिन्दु-बहुलता या शून्यता पर निर्भर है। अधिक बिन्दु जहाँ हों, वहाँ हानि का भार हल्का; जहाँ राशि/भाव बिन्दु-शून्य या अल्प हों, वहाँ अनिष्ट का भार भारी — यही “वशात्” का नियम है। फल शास्त्र का कथन है; इसे निश्चित आपदा नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that in such a period one speaks of misfortune, quarrel, disease, and fear of death and the like — scaled by the abundance or emptiness of bindus in the native’s own aṣṭakavarga. More bindus soften the stated harm; sparse or empty signs intensify it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Bhinna-aṣṭakavarga (BAV) of the period-lord: per-sign bindu count b(r) ∈ {0…8} typically; “bhūyastva” = high b(r) on the relevant rāśi/bhāva; “śūnyatva” = b(r) = 0 (or near-zero by house convention). Sarvāṣṭakavarga (SAV) of a sign = sum of the seven planetary BAV contributions to that sign; before phala, Ch.67 trikoṇa-śodhana and Ch.68 ekādhipatya-śodhana reduce the raw SAV. Canonical BPHS Ch.66 rekha-totals (pre-śodhana): Sūrya 48, Candra 49, Maṅgala 39, Budha 54, Guru 56, Śukra 52, Śani 39 → SAV Σ = 337.

उदाहरण (worked example) Convention: BPHS Ch.66 tables, no śodhana yet; period-lord = Śani. Suppose the antardaśā is judged on the 10th-house sign (say Makara) where Śani’s own BAV contributes b = 3 and the SAV of Makara after placing all seven tables = 28. Compared with the mean SAV per sign ≈ 337/12 ≈ 28.08, the sign is near average — the text’s “anarthādi” line is read as moderate, not extreme. If the same sign had b(Śani) = 0 and SAV ≪ 25 after śodhana, the śāstra’s “śūnyatva” reading would intensify the stated anartha-phala for that interval.

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 totals are pinned exact-`==` in the aṣṭakavarga oracle: 48/49/39/54/56/52/39 → SAV 337, with no ± tolerance (a ±3 band once hid a real −1). Moon’s “9” sits Moon-from-Moon per BPHS (not the Phaladīpikā/Mehta transpose); totals still 49, per-sign bhinna differ — a declared convention, not a silent swap. This verse’s bindu-bhūyastva/śūnyatva rule is exactly what those tables feed.

50.94
वृद्धिं हानिं च तद्राशिभावस्य स्वगृहात्क्रमात् |
भावयोजनया विद्यात्सुतस्त्र्यादिशुभाऽशुभम्
vṛddhiṃ hāniṃ ca tadrāśibhāvasya svagṛhātkramāt |
bhāvayojanayā vidyātsutastryādiśubhā'śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृद्धिम् हानिम् च = वृद्धि और हानि; तत्-राशि-भावस्य = उस राशि/भाव की; स्व-गृहात् क्रमात् = स्व-गृह से क्रमशः; भाव-योजनया = भाव-संयोजन से; विद्यात् = जाने; सुत-स्त्री-आदि = पुत्र, पत्नी आदि; शुभ-अशुभम् = शुभ-अशुभ

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि किसी राशि या भाव की वृद्धि-हानि को स्व-गृह (लग्न अथवा दशा-स्वामी का गृह — संदर्मानुसार) से क्रम में पढ़ें। फिर उसी राशि/बिन्दु-स्थिति को भाव-योजना से जोड़कर सुत, स्त्री और अन्य सम्बन्ध-फलों का शुभ-अशुभ निश्चय करें। अर्थात् केवल ग्रह-दशा पर्याप्त नहीं; भाव-युक्ति से फल का क्षेत्र (सन्तान, दाम्पत्य आदि) चुना जाता है।

English rendering The text states that increase and decrease of a given rāśi/bhāva are read in order from one’s own house, and that by combining that reading with the bhāva scheme one discerns auspicious or inauspicious indications for children, spouse, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Sequential house offset from a reference cusp R (usually lagna, or the period-lord’s sign as “sva-gṛha” when the context is graha-centric): bhāva k is sign index (R + k − 1) mod 12. Growth/loss is then tied to bindu trend or graha occupancy on that sign across the daśā span — the verse gives the mapping rule (bhāva-yojanā), not a closed arithmetic formula. Phala domains: putra ← 5th, strī ← 7th, etc., under the chosen house system (declare whole-sign vs. quadrant when numbers are published).

उदाहरण (worked example) Whole-sign houses, lagna = Siṃha (sign 5). “Sva-gṛha” = lagna. Fifth from lagna = Dhanu (putra-bhāva). If in the native’s BAV of the antardaśā-lord the Dhanu bindu count is high and a benefic aspects or occupies it, the text’s line licenses a śubha reading for offspring-matters in that sub-period; if Dhanu is bindu-empty and afflicted, the same line licenses aśubha for that domain — always as śāstra-phala, not as a medical or personal forecast we endorse.

50.95
धात्वादिराशिभेदाच्च धात्वादिग्रहयोगतः |
शुभपापनशाभेदाच्छुभपापयुतैरपि
dhātvādirāśibhedācca dhātvādigrahayogataḥ |
śubhapāpanaśābhedācchubhapāpayutairapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धातु-आदि-राशि-भेदात् = धातु/मूल/जीव राशि-भेद से; च = और; धातु-आदि-ग्रह-योगतः = धातु-आदि वर्ग के ग्रहों के योग से; शुभ-पाप-नशा-भेदात् = शुभ-पाप की हानि/क्षय-भेद से; शुभ-पाप-युतैः अपि = शुभ-पाप युति से भी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि फल का सूक्ष्म भेद राशि की धातु-मूल-जीव कोटि से, उसी कोटि के ग्रह-योग से, शुभ/पाप की क्षीणता या बल से, और शुभ-पाप युति से भी उठता है। एक ही दशा-स्वामी भिन्न राशि-वर्ग और भिन्न संगति में भिन्न फल देता है — यह वर्गीकरण-सूत्र है, एकमेव विपत्ति-सूची नहीं।

English rendering The text states that results diverge by the dhātu/mūla/jīva class of the signs, by conjunction with grahas of those classes, by the degree of decline of benefics and malefics, and also by their mutual associations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — त्रिविध राशि-वर्ग + योग/नशा-भेद का फल-वर्गीकरण. Classical sign classes (as used in phala-keys): dhātu (mineral), mūla (vegetable), jīva (animal) partition of the 12 rāśis; graha-yoga = co-presence in one sign (longitude span 0°–30° same rāśi, or orb-convention if stated). “Naśa-bheda” = relative loss of strength (e.g. combustion, debilitation, enemy camp) treated as a discrete grade, not a single universal number in this verse.

50.96
इष्टानिष्टस्थानभेदात् फलभेदात् समुन्नयेत् |
एवं सर्वग्रहाणां च स्वां स्वामन्तर्दशामपि
iṣṭāniṣṭasthānabhedāt phalabhedāt samunnayet |
evaṃ sarvagrahāṇāṃ ca svāṃ svāmantardaśāmapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्ट-अनिष्ट-स्थान-भेदात् = अनुकूल/प्रतिकूल स्थान-भेद से; फल-भेदात् = फल-भेद से; समुन्नयेत् = सम्यक् निश्चय/उन्नयन करे; एवम् = इसी प्रकार; सर्व-ग्रहाणाम् च = सभी ग्रहों की भी; स्वाम् स्वाम् = अपनी-अपनी; अन्तर्दशाम् अपि = अन्तर्दशा को भी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इष्ट-अनिष्ट स्थानों के भेद और फल-भेदों को जोड़कर दशा-फल का सम्यक् निर्णय करें। यही विधि प्रत्येक ग्रह की अपनी-अपनी अन्तर्दशा पर भी लागू होती है — कोई ग्रह अपवाद नहीं। महद्दशा का ढाँचा अन्तर्दशाओं में उसी तर्क से दोहराया जाता है।

English rendering The text states that one should determine the outcome from the distinction of favourable and unfavourable places and from the diversity of results — and in the same way apply the method to every planet’s own antardaśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Antardaśā length in Vimśottarī (when that scheme is in force):
t_antar(P, Q) = (Y_P × Y_Q) / 120 years,
where Y_P, Y_Q are the mahādaśā year-quotas of lord P and sub-lord Q, and Σ Y = 120.
Canonical year vector: Ketu 7, Śukra 20, Sūrya 6, Candra 10, Maṅgala 7, Rāhu 18, Guru 16, Śani 19, Budha 17.
“Iṣṭa/aniṣṭa-sthāna” then grades each such interval by house/occupancy/bindu keys of the preceding verses — the ratio arithmetic fixes duration; the phala keys fix stated quality.

उदाहरण (worked example) Mahādaśā = Guru (Y_P = 16), antardaśā = Śani (Y_Q = 19):
t = (16 × 19)/120 = 304/120 = 2 + 64/120 years = 2 years + 0.533…×12 months ≈ 2 y 6 m 12 d (using 360-d year convention common in daśā engines; state 365.25-d if civil years are used). That interval is then judged by iṣṭa/aniṣṭa placement of Guru–Śani as 50.92–50.95 prescribe.

हमारा डिकोड (Our Decode) The 120-year Vimśottarī vector and the exact ratio t = (Y_P × Y_Q)/120 are what the daśā engine implements — pure elapsed-nakṣatra fraction into mahādaśā, then nested antars by the same product rule. This verse is the śāstra’s warrant that the antardaśā of every graha inherits the full phala apparatus, not a shortened shortcut.

50.97
स्वराशितो राशिभुक्तिं प्रकल्प्य फलमीरयेत् |
अन्तरन्तर्दशां स्वीयां विभज्यैवं पुनः पुनः
svarāśito rāśibhuktiṃ prakalpya phalamīrayet |
antarantardaśāṃ svīyāṃ vibhajyaivaṃ punaḥ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-राशितः = स्व-राशि से; राशि-भुक्तिम् = राशि-भुक्ति (राशि-क्रम की उपदशा); प्रकल्प्य = कल्पित/व्यवस्थित कर; फलम् ईरयेत् = फल कहे; अन्तर-अन्तर्दशाम् = अन्तर्दशा के भीतर की अन्तर्दशा (प्रत्यन्तर); स्वीयाम् = अपनी; विभज्य = विभक्त कर; एवम् पुनः पुनः = इसी प्रकार बार-बार

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्व-राशि से राशि-भुक्ति की कल्पना करके फल बोलें, और अपनी अन्तर्दशा को पुनः विभक्त कर अन्तर-अन्तर्दशा (सूक्ष्मतर स्तर) बनाएँ — यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाए। दशा-वृक्ष अखण्ड नहीं; प्रत्येक स्तर पर वही फल-न्याय लागू होता है। पाठ में “राशिभुक्ति” का ठीक पारिभाषिक विस्तार संप्रदाय-भेद से भिन्न हो सकता है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that one should construct a rāśi-bhukti from one’s own sign and declare the results, and that by repeatedly subdividing one’s own antardaśā one forms the still finer inter-antardaśā levels in the same way again and again.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Nested Vimśottarī subdivision (standard product rule, same 120-base):
pratyantara of R inside antar Q inside mahā P:
t_prat = (Y_P × Y_Q × Y_R) / 120² years.
Next level (sūkṣma): multiply by Y_S/120 again — “vibhajya … punaḥ punaḥ”.
“Rāśi-bhukti from sva-rāśi” (when read as sign-sequence bhukti rather than graha-antar): span the 12 signs from the reference sign S₀, allocating the parent period in proportion to a stated key (equal 1/12, or bindu-weighted — convention must be declared; BPHS here states the principle, not a single modern constant).

उदाहरण (worked example) Continue 50.96: Guru mahā (16), Śani antar → t_antar = 2.533… y. Pratyantara of Budha (Y_R = 17) inside that antar:
t_prat = (16 × 19 × 17) / 14400 = 5168/14400 years ≈ 0.3589 y ≈ 4 m 9 d (360-d year). Phala for that slice uses the same iṣṭa/aniṣṭa, bindu, and bhāva keys as the parent levels.

हमारा डिकोड (Our Decode) The daśā engine’s recursive antardaśā/pratyantara layers are exactly this “vibhajyaivaṃ punaḥ punaḥ” — ratio arithmetic on the fixed 7/20/6/10/7/18/16/19/17 year vector, keyed first from the Moon’s nakṣatra fraction. Mathematics is exact; phala remains the śāstra’s stated claim, never a fate we assert.

अध्यायः 51

अथाऽन्तर्दशाध्यायः

16 श्लोक
51.1
दशाब्दाः स्वस्वमानघ्नाः सर्वायुर्योगभाजिताः |
पृथगन्तर्दशा एवं प्रत्यन्तरदशादिकाः
daśābdāḥ svasvamānaghnāḥ sarvāyuryogabhājitāḥ |
pṛthagantardaśā evaṃ pratyantaradaśādikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाब्दाः = महादशा के वर्ष; स्वस्वमानघ्नाः = अपने-अपने मान (ग्रह-वर्ष) से गुणित; सर्वायुः = कुल आयु-योग (समस्त दशा-वर्षों का योग); योगभाजिताः = उस योग से विभाजित; पृथक् अन्तर्दशा = अलग-अलग अन्तर्दशाएँ; एवं प्रत्यन्तरदशादिकाः = इसी रीति से प्रत्यन्तर, सूक्ष्म आदि दशाएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अन्तर्दशा का मान निकालने के लिए महादशा के वर्षों को संबंधित ग्रह के अपने दशा-मान से गुणा करें, फिर उस गुणनफल को सर्वायु-योग (सभी दशा-वर्षों के योग) से भाग दें। इसी समानुपाती रीति से प्रत्यन्तर-दशा, सूक्ष्म-दशा आदि भी क्रमशः ज्ञात होती हैं। यह शुद्ध अनुपात-गणित है — दशा-खण्ड अपने “मान” के अनुपात में फैलते हैं।

English rendering The text states that the sub-periods (antardaśā and finer) are obtained by multiplying each daśā’s years by that planet’s own year-measure and dividing by the total āyur-yoga. The same proportional rule yields pratyantara and the still finer daśās.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
अन्तर्दशा (वर्ष) = (दशाब्दा × स्वमान) ÷ सर्वायु-योग

Vimśottarī में सर्वायु-योग = 120 वर्ष; अतः
अन्तर्दशा_A_in_B = (महादशा_B वर्ष × ग्रह_A वर्ष) ÷ 120

क्रम: Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17 (Σ = 120)। प्रत्यन्तर आदि पर भी वही अनुपात, बस “ऊपरी” स्तर का वर्ष-मान भाज्य में आता है।

उदाहरण (worked example) Jupiter महादशा = 16 वर्ष; उसके भीतर Venus अन्तर्दशा:
(16 × 20) ÷ 120 = 320 ÷ 120 = 2 + 2/3 वर्ष ≈ 2 वर्ष 8 मास।
(सम्मेलन: Vimśottarī 120-वर्ष चक्र; नक्षत्र-अंश से महादशा-शेष अलग से लगता है — यह श्लोक केवल अनुपात-सूत्र देता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अनुपात-सूत्र Vimśottarī इंजन का केन्द्र है: अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/120, और सूक्ष्म स्तर उसी मॉड्यूलर अनुपात से। 120-वर्ष चक्र (7+20+6+10+7+18+16+19+17) pinned fixture पर exact-`==` से सत्यापित है — सहन-बैण्ड नहीं, शुद्ध विभाजन।

51.2
आदावन्तर्दशा पाकपतेस्तत्क्रमतोऽपराः |
एवं प्रत्यन्तरादौ च क्रमो ज्ञेयो विचक्षणैः
ādāvantardaśā pākapatestatkramato'parāḥ |
evaṃ pratyantarādau ca kramo jñeyo vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदौ = आरम्भ में; अन्तर्दशा = उप-दशा; पाकपतेः = पाक-पति / चालू महादशा-स्वामी की; तत्क्रमतः = उसके बाद उसी क्रम से; अपराः = अन्य (ग्रहों की); एवं = इसी प्रकार; प्रत्यन्तरादौ = प्रत्यन्तर आदि में; क्रमः = अनुक्रम; विचक्षणैः ज्ञेयः = विद्वानों द्वारा जानने योग्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि किसी महादशा के भीतर पहली अन्तर्दशा उसी दशा के स्वामी — पाकपति — की होती है; तत्पश्चात् शेष ग्रह उसी स्थापित दशा-क्रम में आते हैं। प्रत्यन्तर, सूक्ष्म आदि स्तरों पर भी यही नियम लागू होता है — प्रत्येक स्तर पर “स्वामी पहले, फिर क्रम”। विचक्षण ज्योतिषी को यह क्रम स्मरण रखना चाहिए, अन्यथा खण्ड-गणना सही होते हुए भी क्रम-भ्रम से फल-विन्यास बिगड़ता है।

English rendering The text states that the first antardaśā belongs to the pāka-pati (lord of the running mahādaśā), and the remaining ones follow the established planetary order; the same sequential rule applies at the pratyantara and finer levels.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम-नियम (अनुपात 51.1 के साथ):
स्तर n का प्रथम खण्ड = स्तर (n−1) का स्वामी; शेष = दशा-चक्र का नियत क्रम (Vimśottarī में: Ke→Ve→Su→Mo→Ma→Ra→Ju→Sa→Me→… चक्रीय)।
कोई नई संख्या नहीं — केवल permutation/order constraint: index₀ = lord_of_parent; index_k = (lord + k) mod 9।

उदाहरण (worked example) Saturn महादशा (19 वर्ष) में अन्तर्दशा-क्रम:
Sa → Me → Ke → Ve → Su → Mo → Ma → Ra → Ju
(प्रथम = पाकपति शनि; फिर Vimśottarī चक्र)। Jupiter महादशा में प्रथम Ju, फिर Sa, Me, … ।

हमारा डिकोड (Our Decode) daśā इंजन में “parent-lord first, then fixed cycle” hard rule है — अनुपात 51.1 से अवधि मिलती है, क्रम 51.2 से। दोनों मिलकर Vimśottarī अन्तर्/प्रत्यन्तर tree बनाते हैं; क्रम उलटने से fixture-hash टूटता है, इसलिए order को period से अलग pin किया गया है।

51.3
भुक्तिर्नवानां तुल्या स्याद् विभाज्या नवधा दशा |
आदौ दशापतेर्भुक्तिस्तत्केन्द्रादियुजां ततः
bhuktirnavānāṃ tulyā syād vibhājyā navadhā daśā |
ādau daśāpaterbhuktistatkendrādiyujāṃ tataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्तिः = अन्तर्दशा/भुक्ति; नवानाम् तुल्या = नव (ग्रहों) के अनुरूप / नवधा तुल्य-विभाग; विभाज्या नवधा दशा = दशा को नौ भागों में बाँटना; आदौ दशापतेः भुक्तिः = आरम्भ में दशा-स्वामी की भुक्ति; तत्केन्द्रादियुजाम् = तत्पश्चात् उसके केन्द्रादि में स्थित (ग्रहों) की; ततः = उसके बाद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा को नव भागों — नव भुक्तियों — में विभक्त किया जाता है, नव ग्रहों के अनुरूप। पहली भुक्ति दशापति की होती है; उसके बाद उन ग्रहों की भुक्ति गिनी जाती है जो दशापति से केन्द्र आदि भाव-सम्बन्ध में जुड़े हों। यह श्लोक भुक्ति-क्रम का एक स्पष्ट विन्यास देता है — स्वामी पहले, फिर केन्द्र-युक्त आदि — ताकि नव खण्डों का आरोहण यादृच्छिक न रहे। (पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव: समान-नवधा विभाग बनाम 51.1 का अनुपातिक विभाग — दोनों को मिलाकर नहीं पढ़ना।)

English rendering The text states that the daśā is to be partitioned ninefold into bhuktis corresponding to the nine grahas; the first bhukti is the daśā-lord’s, then those of planets associated from his kendras and related positions, in due order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नवधा-विभाग: 9 भुक्ति-खण्ड, क्रम = (1) दशापति → (2…) तत्-केन्द्र/सम्बद्ध ग्रह।
यदि “तुल्या” को समान-दीर्घ माना जाए (एक सम्भव पाठार्थ): प्रत्येक भुक्ति = दशा-वर्ष ÷ 9।
यदि 51.1 का अनुपात लागू हो तो अवधि असमान, क्रम यही।
दोनों सम्मेलनों में क्रम साझा है; अवधि-सूत्र अलग — घोषित सम्मेलन आवश्यक।

उदाहरण (worked example) Moon महादशा = 10 वर्ष।
समान-नवधा सम्मेलन में: प्रत्येक भुक्ति = 10 ÷ 9 = 1 + 1/9 वर्ष।
क्रम उदाहरण: Mo (दशापति) → फिर चन्द्र-केन्द्र (1,4,7,10) आदि में स्थित ग्रहों का शास्त्रोक्त क्रम।
(अनुपातिक Vimśottarī में अवधि अलग: जैसे Mo–Sa भुक्ति = (10×19)/120 = 1 + 7/12 वर्ष — क्रम 51.2/51.3 से, अवधि 51.1 से।)

51.4
विद्यात् क्रमेण भुक्त्यंशानेवं सूक्ष्मदशादिकम् |
बलक्रमात् फलं विज्ञैर्वक्तव्यं पूर्वरीतितः
vidyāt krameṇa bhuktyaṃśānevaṃ sūkṣmadaśādikam |
balakramāt phalaṃ vijñairvaktavyaṃ pūrvarītitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्यात् = जान ले; क्रमेण = क्रमशः; भुक्ति-अंशान् = भुक्ति के अंश (उप-भाग); एवम् = इसी प्रकार; सूक्ष्म-दशादिकम् = सूक्ष्म-दशा आदि आगे के स्तर; बल-क्रमात् = ग्रह-बल के क्रम से; फलम् = फल; विज्ञैः वक्तव्यम् = विद्वानों द्वारा कहा जाना चाहिए; पूर्व-रीतितः = पूर्वोक्त रीति के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ भुक्ति के अंशों को क्रमशः जानकर उसी विधि से सूक्ष्म-दशा आदि सूक्ष्मतर स्तर भी निकाल लें। फल का कथन ग्रहों के बल-क्रम के अनुसार, पूर्व में बताई गई रीति से ही करना चाहिए। शास्त्र यहाँ गणना की पुनरावृत्ति और फल-कथन को बल पर आधारित रखने का निर्देश देता है।

English rendering Know the bhukti-portions in order, and by the same method the sūkṣma-daśā and yet finer levels; the result is then to be declared by the learned according to the order of the planets' strength, following the earlier method.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पुनरावर्ती विभाजन (recursion): सूक्ष्मदशा = (भुक्ति × ग्रह-मान) ÷ Σमान, और यही सूत्र प्राण-देहादि स्तरों तक दोहराया जाता है — प्रत्येक स्तर एक ही (भाग × मान)/(योग) संकर्म। फल-भाग गणितीय नहीं: "बल-क्रम से फल कहो" एक कथन-निर्देश है, जिसमें बल (देखें षड्बल) मापने योग्य है पर फल स्वयं शास्त्र का कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बल-क्रमात् फलम्" का बल-अंश हमारे षड्बल ढाँचे से जुड़ता है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् बल, रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप) — जो पूर्णतः गणनीय है। किन्तु हमारी पद्धति का मूल अनुशासन यही है: बल = सटीक गणना; "फल" = शास्त्र का कथन, न कि हमारी भविष्यवाणी। सूक्ष्मदशा की पुनरावृत्ति भी वही शुद्ध अनुपात-अंकगणित है।

51.5
कृत्वाऽर्कधा राशिदशां राशेर्भुक्तिं क्रमाद् वदेत् |
प्रत्यन्तर्दशाद्येवं कृत्वा तत्तत्फलं वदेत्
kṛtvā'rkadhā rāśidaśāṃ rāśerbhuktiṃ kramād vadet |
pratyantardaśādyevaṃ kṛtvā tattatphalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृत्वा = करके; अर्कधा = अर्क-विधि से / सूर्य-सदृश रीति से (पाठ-भेद संभव); राशिदशाम् = राशि-दशा को; राशेः भुक्तिम् = राशि की भुक्ति को; क्रमात् वदेत् = क्रम से कहे; प्रत्यन्तर्दशादि = प्रत्यन्तर-दशा आदि; एवं कृत्वा = इसी प्रकार करके; तत्तत् फलम् वदेत् = उन-उन फल को कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राशि-दशा को अर्क-विधि (सूर्य-सम्बद्ध / पूर्वोक्त दशा-रीति — पाठ-भेद संभव) से सिद्ध करके, प्रत्येक राशि की भुक्ति को क्रम से कहना चाहिए। उसी ढाँचे में प्रत्यन्तर-दशा आदि बनाकर तत्तत् फल का कथन हो। यहाँ विषय ग्रह-दशा से राशि-दशा की ओर मुड़ता है — खण्ड अब राशियों पर टिकते हैं, ग्रहों पर नहीं; अगले श्लोक बल, ओज/सम और चर/स्थिर का नियम खोलते हैं।

English rendering The text states that, having constructed the rāśi-daśā by the arka method, one should declare each sign’s bhukti in order; and having likewise formed the pratyantara and finer levels, one should state the respective results as the śāstra frames them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
राशि-दशा ढाँचा (अगले श्लोकों से पूर्ण):
1) आधार-राशि चुनें (51.6: आद्य–सप्तम में बलवान्)।
2) प्रगति-दिशा: ओज = क्रम, सम = उत्क्रम (51.6)।
3) चर/स्थिर प्रगति-नियम (51.7)।
4) भुक्ति/प्रत्यन्तर: उसी राशि-क्रम पर उप-खण्ड (अनुपात या नवधा — सम्मेलन घोषित करें)।
“अर्कधा” का स्थिरांक इस पंक्ति में संख्या नहीं देता — विधि-संकेत है; पाठ-भेद संभव।

51.6
आद्यसप्तमयोर्मध्ये यो राशिर्बलवांस्ततः |
ओजे दशाश्रये गण्याः क्रमादुत्क्रमतः समे
ādyasaptamayormadhye yo rāśirbalavāṃstataḥ |
oje daśāśraye gaṇyāḥ kramādutkramataḥ same

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आद्यसप्तमयोः मध्ये = प्रथम और सप्तम के बीच; यः राशिः बलवान् = जो राशि बलवान् हो; ततः = उससे (आरम्भ); ओजे = विषम राशि में; दशाश्रये = दशा-आश्रय से; गण्याः क्रमात् = क्रम से गणनीय; उत्क्रमतः समे = सम राशि में उल्टे क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा का आरम्भ उस राशि से हो जो आद्य (प्रथम) और सप्तम के बीच बलवान् हो। यदि वह आश्रय-राशि ओज (विषम) हो तो दशा-राशियाँ क्रम (आगे) गिनी जाएँ; यदि सम हो तो उत्क्रम (पीछे) से। यह राशि-दशा की दिशा-कुंजी है — बल से उद्गम, ओज/सम से दिक्। फल का दावा यहाँ नहीं; केवल गणना-पथ का नियम है।

English rendering The text states that one begins from whichever of the first and seventh signs is stronger; from that daśā-base, periods are counted forward in an odd sign and in reverse order in an even sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
आधार: R₀ = argmax(bala(R_1), bala(R_7))
(बल-सम्मेलन घोषित करें — षड्बल/राशि-बल आदि; यह श्लोक बलाङ्क नहीं देता।)

प्रगति:
यदि R₀ विषम (1,3,5,…): R_k = R₀ + k (mod 12, राशि 1…12)
यदि R₀ सम (2,4,6,…): R_k = R₀ − k (mod 12)

दशा-खण्डों की अवधि इस श्लोक में नहीं — केवल क्रम और दिशा।

उदाहरण (worked example) मान लें आद्य = मेघ (1), सप्तम = तुला (7); बल-तुलना में मेघ बलवान् → R₀ = 1 (ओज) → क्रम: 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10,11,12।
यदि तुला बलवान् → R₀ = 7 (ओज) → 7,8,9,…।
यदि R₀ = वृष (2, सम) होता: 2,1,12,11,10,… (उत्क्रम)।
(सम्मेलन: राशि-संख्या 1=मेष … 12=मीन; बल-मापदण्ड अलग से pin करें।)

51.7
अत्राऽपरो विशेषोऽस्ति ब्रवीमि तमहं द्विज |
चरेऽनुज्झितमार्गः स्यात् षष्ठषष्ठादिकाः स्थिरे
atrā'paro viśeṣo'sti bravīmi tamahaṃ dvija |
care'nujjhitamārgaḥ syāt ṣaṣṭhaṣaṣṭhādikāḥ sthire

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत्र अपरः विशेषः = यहाँ एक और विशेष नियम; ब्रवीमि तम् अहम् द्विज = हे द्विज! उसे मैं कहता हूँ; चरे = चर राशि में; अनुज्झितमार्गः = मार्ग न छोड़ता हुआ / अविच्छिन्न पथ; स्यात् = होता है; षष्ठषष्ठादिकाः = छठा-छठा आदि; स्थिरे = स्थिर राशि में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे द्विज! यहाँ एक और विशेष बात है। चर राशि पर टिकी दशा अविच्छिन्न मार्ग से चलती है, क्रम नहीं छोड़ती। स्थिर राशि में प्रगति षष्ठ-षष्ठ रीति से होती है — एक से उसके छठे, फिर उसके छठे, इत्यादि। यह चर/स्थिर का शास्त्रीय प्रगति-भेद है; द्विस्वभाव का अलग नियम इस पंक्ति में नहीं आता (पाठ/परम्परा में अन्यत्र मिल सकता है — पाठ-भेद संभव)। फिर भी दिशा 51.6 के ओज/सम से बँधी रहती है।

English rendering The text states a further special rule: in a movable (cara) sign the daśā path proceeds without abandoning the sequential route; in a fixed (sthira) sign the count advances by sixth-from-sixth, and so on.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
राशि-प्रकार (त्रिविध):
• चर (1,4,7,10): R<sub>k+1</sub> = R_k ± 1 (चिह्न = 51.6 का क्रम/उत्क्रम; मार्ग अविच्छिन्न)
• स्थिर (2,5,8,11): R<sub>k+1</sub> = R_k ± 6 (mod 12) — “षष्ठ-षष्ठ”; चिह्न पुनः ओज/सम-दिशा से
• द्विस्वभाव (3,6,9,12): इस श्लोक में अनुक्त

mod 12 अंकगणित; राशि-लेबल 1…12 पर wrap।

उदाहरण (worked example) R₀ = मेष (1, चर, ओज) → अनुज्झित क्रम: 1→2→3→4→…
R₀ = वृष (2, स्थिर); सम-उत्क्रम सम्मेलन में षष्ठ-षष्ठ: 2→8→2… अथवा दिशा-सहित 2→(2−6)≡8→(8−6)≡2… — स्थिर चक्र दो राशियों (वृष–वृश्चिक) पर बंद हो सकता है; पूर्ण बारह-राशि विस्तार के लिए परम्परा में अतिरिक्त नियम जोड़े जाते हैं — यहाँ केवल श्लोकोक्त षष्ठ-षष्ठ।
(सम्मेलन: 51.6 की दिशा + 51.7 का प्रकार-नियम एक साथ लागू।)

51.8
उभये कण्टकाज् ज्ञेया लग्नपञ्चमभाग्यतः |
चरस्थिरद्विस्वभावेष्वोजेषुः प्राक् क्रमो मतः
ubhaye kaṇṭakāj jñeyā lagnapañcamabhāgyataḥ |
carasthiradvisvabhāveṣvojeṣuḥ prāk kramo mataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उभये = दोनों में (दोनों स्थितियों/वर्गों में); कण्टकात् = कण्टक (लग्न-केंद्र-सदृश आरम्भ-बिन्दु) से; ज्ञेया = जानी जाए; लग्न-पञ्चम-भाग्यतः = लग्न, पञ्चम भाव तथा भाग्य (नवम) से; चर-स्थिर-द्विस्वभावेषु = चर, स्थिर एवं द्विस्वभाव राशियों में; ओजेषु = विषम (ओज) राशियों में; प्राक् क्रमः = अग्रक्रम (सीधा क्रम); मतः = स्वीकृत/माना गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दोनों प्रसंगों में गणना का आधार कण्टक-दृष्टि से लग्न, पञ्चम और भाग्य (नवम) से जाना जाए। चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों के भीतर जो राशियाँ ओज (विषम) हैं, उनमें क्रम प्राक् — अर्थात् आगे की ओर — माना गया है। यह पायराय/पाक-भोग की दिशा-व्यवस्था का प्रथम नियम है।

English rendering In both cases the starting points are to be known from the kaṇṭaka bases — lagna, the fifth, and bhāgya (the ninth). Among movable, fixed, and dual-natured signs, in the odd ones the forward order is accepted.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Paryāya-क्रम (direction rule), not a duration formula.
आरम्भ-बिन्दु (त्रि-वर्ग):
• चर राशि-वर्ग → लग्न से
• स्थिर राशि-वर्ग → पञ्चम से
• द्विस्वभाव राशि-वर्ग → नवम (भाग्य) से
दिशा: ओज राशि में प्राक् क्रम = +1 राशि/पद (अग्रगामी गणना)।
(युग्म राशि का व्युत्क्रम → अगला श्लोक।)

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (चर, ओज)। चर-पर्याय में आरम्भ = लग्न = मेष; ओज होने से क्रम प्राक्: मेष → वृष → मिथुन → …। यदि गणना-स्थिर वर्ग में लग्न = वृष (स्थिर) हो, तो आरम्भ = लग्न से पञ्चम = कन्या; कन्या ओज है → पुनः प्राक् क्रम: कन्या → तुला → वृश्चिक → …। (राशि-स्वामित्व/अयनांश इस क्रम-नियम पर निर्भर नहीं।)

51.9
तेष्वेव त्रिषु युग्मेषु ग्राह्यं व्युत्क्रमतोऽखिलम् |
एवमुल्लिखितो राशि पाकराशिरुदीर्युते
teṣveva triṣu yugmeṣu grāhyaṃ vyutkramato'khilam |
evamullikhito rāśi pākarāśirudīryute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेषु एव त्रिषु = उन्हीं तीनों (चर-स्थिर-द्विस्वभाव) में; युग्मेषु = सम (युग्म) राशियों में; ग्राह्यम् = ग्रहणीय; व्युत्क्रमतः = विपरीत क्रम से; अखिलम् = सम्पूर्ण; एवम् = इस प्रकार; उल्लिखितः राशिः = चिह्नित/निर्दिष्ट राशि; पाकराशिः = पाक-राशि; उदीर्यते = कही जाती है।

हिन्दी भावार्थ उन्हीं तीन वर्गों में जब राशि युग्म (सम) हो, तब सारा क्रम व्युत्क्रम — पीछे की ओर — लिया जाए। जो राशि इस प्रकार लिख/चिह्नित होती है, उसे शास्त्र पाकराशि कहता है। यह पाक का राशि-निर्धारण है; फल का विस्तार आगे आता है।

English rendering In those same three groups, among the even signs, the whole sequence is to be taken in reverse order. The sign thus marked out is called the pākārāśi.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिशा-नियम (पूर्ण):
• ओज राशि → प्राक् क्रम: r ↦ r + 1 (mod 12)
• युग्म राशि → व्युत्क्रम: r ↦ r − 1 (mod 12)
जहाँ r ∈ {0…11} राशि-सूचकांक; 12-राशि चक्र।
परिणामी चिह्नित राशि = पाकराशि (pākārāśi)।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृष (चर नहीं — स्थिर; युग्म)। स्थिर-पर्याय आरम्भ = पञ्चम = कन्या (ओज) → प्राक्। किन्तु यदि आरम्भ-राशि स्वयं युग्म हो — जैसे द्विस्वभाव-लग्न कर्क, आरम्भ = नवम = मीन (युग्म) — तो व्युत्क्रम: मीन → कुम्भ → मकर → …। जो पद/राशि गणना में “पाक” के रूप में उल्लिखित हो, वही पाकराशि।

51.10
स एव भोगराशिः स्यात् पर्याये प्रथमे स्मृतः |
आद्याद् यावतिथः पाकः पर्याये यत्र दृश्यते
sa eva bhogarāśiḥ syāt paryāye prathame smṛtaḥ |
ādyād yāvatithaḥ pākaḥ paryāye yatra dṛśyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स एव = वही (पाकराशि); भोगराशिः = भोग-राशि; स्यात् = हो; पर्याये प्रथमे = प्रथम पर्याय में; स्मृतः = कही/स्मरण की गई; आद्यात् = आदि (प्रथम) से; यावतिथः = जितनेवें स्थान का; पाकः = पाक; पर्याये यत्र = जिस पर्याय में; दृश्यते = दिखाई दे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — प्रथम पर्याय में वही पाकराशि भोगराशि भी मानी जाती है। तदनन्तर नियम यह है: आदि से गिनकर जिस पर्याय में पाक जितनेवें क्रम पर दिखे, उसी “यावतिथ” संख्या को भोग के लिए भी आधार बनाया जाए। पाक और भोग यहाँ दो सह-निर्देश हैं, एक ही चक्र के दो पठन।

English rendering That very pākārāśi is remembered as the bhogarāśi in the first paryāya. Thereafter: from the beginning, whichever ordinal place the pāka occupies in a given paryāya — that ordinal is the key for bhoga as well.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
प्रथम पर्याय: भोगराशि = पाकराशि (समानता)।
सामान्य पर्याय k में: यदि पाक = पर्याय-अनुक्रम की n-वीं राशि (आदि = n = 1),
तो भोग का स्थान-सूचकांक भी n (उसी पर्याय-नियम से)।
नोट: यह स्थान-समता (ordinal identity) है, अवधि-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) प्रथम पर्याय; पाकराशि = तुला। नियम 51.10: भोगराशि = तुला।
दूसरे पर्याय में यदि अनुक्रम (प्राक्) मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला… हो और पाक = कन्या = 6-वीं, तो भोग भी उसी पर्याय की 6-वीं राशि = कन्या (स्थान n = 6 संरक्षित)।

51.11
तस्मात् तावतिथो भोगः पर्याये तत्र गृह्यताम् |
तदिदं चरपर्यायस्थिरपर्याययोर्द्वयोः
tasmāt tāvatitho bhogaḥ paryāye tatra gṛhyatām |
tadidaṃ caraparyāyasthiraparyāyayordvayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् = उससे; तावतिथः भोगः = उतनेवें स्थान का भोग; पर्याये तत्र = उस पर्याय में; गृह्यताम् = ग्रहण किया जाए; तत् इदम् = यह यही (विधि); चर-पर्याय-स्थिर-पर्याययोः द्वयोः = चर-पर्याय और स्थिर-पर्याय — दोनों में।

हिन्दी भावार्थ अतः जिस पर्याय में पाक जितनेवें स्थान पर है, भोग भी उतनेवें स्थान पर लिया जाए। शास्त्र स्पष्ट करता है कि यह व्यवस्था चर-पर्याय और स्थिर-पर्याय — दोनों — पर लागू है। दोनों पर्यायों में पाक-भोग की “यावतिथ” समता एक ही तर्क से चलती है।

English rendering Therefore, in that paryāya, bhoga is to be taken at the same ordinal place. This procedure applies to both the cara-paryāya and the sthira-paryāya.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
∀ पर्याय ∈ {चर-पर्याय, स्थिर-पर्याय}:
यदि index(पाक) = n, तो index(भोग) = n।
चर/स्थिर केवल आरम्भ-बिन्दु और राशि-वर्ग चुनते हैं (श्लोक 51.8);
n-समता का नियम दोनों में अभिन्न है।
(द्विस्वभाव/त्रिकोण नामक दशा का विस्तार अगले श्लोक में।)

उदाहरण (worked example) चर-पर्याय: आरम्भ लग्न = धनु (चर, ओज) → प्राक्; पाक = 4-थी = मीन → भोग भी 4-थी = मीन।
स्थिर-पर्याय: आरम्भ = लग्न-पञ्चम; मानें लग्न सिंह → पञ्चम = धनु (ओज) → प्राक्; पाक = 3-री = कुम्भ → भोग = 3-री = कुम्भ। दोनों में n समान।

51.12
त्रिकोणाख्यदशायां च पाकभोगप्रकल्पनम् |
पाके भोगे च पापाढ्ये देपपीडा नमोव्यथा
trikoṇākhyadaśāyāṃ ca pākabhogaprakalpanam |
pāke bhoge ca pāpāḍhye depapīḍā namovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोण-आख्य-दशायाम् = त्रिकोण नामक दशा में; पाक-भोग-प्रकल्पनम् = पाक व भोग का निर्धारण (उसी रीति से); पाके भोगे च = पाक और भोग दोनों में; पाप-आढ्ये = पाप-ग्रहों से युक्त होने पर; देह-पीडा = शारीरिक कष्ट (पाठ "देप" संदिग्ध — पाठ-भेद संभव); मनो-व्यथा = मानसिक व्यथा (पाठ "नमो" संदिग्ध — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ त्रिकोण नामक दशा में भी पाक-राशि और भोग-राशि का निर्धारण उसी पूर्वोक्त रीति से किया जाता है। श्लोक का उत्तरार्ध फल-कथन है: जब पाक और भोग दोनों राशियाँ पाप-ग्रहों से युक्त हों, तब शास्त्र देह-पीडा और मनो-व्यथा की सम्भावना बताता है। (उत्तरार्ध का पाठ स्खलित है — पाठ-भेद संभव।)

English rendering In the daśā called trikoṇa too, the pāka and bhoga are assigned by the same rule; and when both the pāka and the bhoga are laden with malefics, the text states there is bodily pain and mental distress.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्वार्ध — तकनीक-सन्दर्भ: त्रिकोण-दशा में पाक-भोग निर्धारण = श्लोक 51.6–51.11 वाली वही प्रक्रिया (कोई नया सूत्र नहीं, केवल उसी विधि का अनुप्रयोग)। उत्तरार्ध — गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन: यह पाप-युति का फल है, जिसे शास्त्र का कथन मानकर प्रस्तुत किया जाता है, न कि निश्चित घटना के रूप में।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे मूल अनुशासन का ठीक बिन्दु है — गणित और फल को पृथक् रखना। पाक-भोग का निर्धारण सटीक, नियम-चालित गणना है; किन्तु "पाप-आढ्ये देह-पीडा मनो-व्यथा" एक फल-कथन है, जिसे हम "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करते हैं — भय, नियति या भविष्यवाणी के रूप में नहीं, और किसी उपाय-दबाव के बिना।

51.13
पिण्डत्रिकदशायां तु ब्रविम्यन्तर्दशाविधिम् |
पूर्ण दशापतिर्दद्यात् तदर्धं तेन संयुतः
piṇḍatrikadaśāyāṃ tu bravimyantardaśāvidhim |
pūrṇa daśāpatirdadyāt tadardhaṃ tena saṃyutaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिण्ड-त्रिक-दशायाम् = पिण्ड-त्रिक दशा में; तु = परन्तु/अब; ब्रविमि = कहता हूँ; अन्तर्दशा-विधिम् = अन्तर्दशा की विधि; पूर्णम् = पूरा (अंश/काल); दशापतिः = दशा-स्वामी; दद्यात् = दे; तत्-अर्धम् = उसका आधा; तेन संयुतः = उससे (दशापति से) युक्त/संयुक्त ग्रह।

हिन्दी भावार्थ अब पिण्ड-त्रिक दशा की अन्तर्दशा-विधि कही जाती है। शास्त्र का पहला अंश-नियम: दशापति पूर्ण भाग देता है; जो ग्रह दशापति से संयुत हो, वह उसका आधा। शेष स्थान-भेद (त्रिकोण, चतुरस्र, सप्तम) अगले श्लोक में पूरे होते हैं।

English rendering In the piṇḍa-trika daśā I state the antardaśā method. The daśā lord bestows the full measure; a planet conjoined with him bestows half of that.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अंश (दशा-काल T के सापेक्ष; T = पिण्ड-त्रिक की महादशा/प्रासंगिक दशा-अवधि, जिस इकाई में शास्त्र T मापे — वर्ष/अंशात्मक भाग):
• दशापति (L) → अंश = T (पूर्ण)
• L-संयुत ग्रह → अंश = T / 2
(आगे: त्रिकोण → T/3; चतुरस्र → T/4; सप्तम → T/7; बहु में एक बली — 51.14।)
ये शास्त्रोक्त सापेक्ष अंश हैं; परम्परा में कभी भार-रूप में सामान्यीकृत भी किए जाते हैं — यहाँ श्लोक केवल अनुपात देता है।

उदाहरण (worked example) मान लें पिण्ड-त्रिक में दशापति गुरु, T = 12 वर्ष (उदाहरण-मात्र; वास्तविक T जन्म-आयुर्दाय/पिण्ड विधि से आता है)।
गुरु (दशापति) → 12।
यदि शुक्र गुरु से संयुत → शुक्र-अन्तर् = 12 / 2 = 6।
(अयनांश/भाव-पद्धति संयुत-निर्णय पर लग्न-कुण्डली के ग्रह-देशान्तर ° पर निर्भर; यहाँ केवल अंश-सूत्र दिखाया।)

51.14
त्रिकोणगस्तृतीयांशं तुर्यांशश्चतुरस्रगः |
स्मरगः सप्तमं भागं बहुष्वेको बली ग्रहः
trikoṇagastṛtīyāṃśaṃ turyāṃśaścaturasragaḥ |
smaragaḥ saptamaṃ bhāgaṃ bahuṣveko balī grahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोणगः = त्रिकोण (परस्पर ५म/९म कोण) में स्थित ग्रह; तृतीयांशम् = तीसरा भाग, अंश 1/3; तुर्यांशः = चौथा भाग, 1/4; चतुरस्रगः = चतुरस्र ("समकोण" सम्बन्ध, ४थे/८वें) में स्थित; स्मरगः = स्मर = सप्तम भाव में स्थित; सप्तमं भागम् = सातवाँ भाग, 1/7; बहुषु एकः बली ग्रहः = अनेक पात्र ग्रहों में एक बलवान् ग्रह ग्राह्य।

हिन्दी भावार्थ परस्पर स्थित ग्रह एक-दूसरे को "पकाते" हैं, अर्थात् अंश (हिस्सा) देते हैं — जो ग्रह त्रिकोण-सम्बन्ध में हो वह तीसरा भाग (1/3), जो चतुरस्र में हो वह चौथाई (1/4), और जो सप्तम (स्मर) में हो वह सातवाँ भाग (1/7) अंश-रूप में देता है। जब अनेक ग्रह एक साथ इस योग्य हों, तब जो बलवान् ग्रह है उसे गिना जाता है। ध्यान दें कि अंश का नाम आकृति के "कोण" से मेल खाता है — त्रि-कोण → 1/3, चतुर्-अस्र → 1/4, और सप्तम भाव → 1/7।

English rendering A planet placed in trine confers a third (1/3), one in a caturasra (square relation) a quarter (1/4), and one in the seventh (smara) a seventh (1/7); where several planets qualify, the strongest one is taken.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पारस्परिक स्थिति से अंश-दान —
त्रिकोण-स्थ → aṃśa = 1/3; चतुरस्र-स्थ → 1/4; स्मर(7म)-स्थ → 1/7.
शब्द-संख्या digit-faithful: तृतीय→3, तुर्य→4, सप्तम→7. यहाँ अन्य स्थितियाँ (युति, 2/12 आदि) कथित नहीं — उनके अंश हेतु पाठ-भेद संभव। "चतुरस्र" की परिभाषा (४/८ बनाम ४/१०) परम्परा-भेद संभव — संवाद यहाँ स्थिति-वाचक ("-ग") है। "बली ग्रह" = प्रतिस्पर्धी ग्रहों में अधिकतम बल वाला।

उदाहरण (worked example) मान लें ग्रह A को B त्रिकोण से देखता/सम्बद्ध है → B, A को अंश 1/3 देता है; और C, A से सप्तम में बैठा है → C, A को 1/7 देता है। ये कच्चे अंश (1/3, 1/7, …) आगे 51.15–16 में समान हर पर लाकर जोड़े जाते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बली ग्रह" का निर्णय षड्बल (BPHS Ch.27) है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् बल का योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), प्रति-ग्रह देहली से तुलना। "सबसे बलवान्" चुनना एक गणना है, राय नहीं — यह वही घटक है जिसे इंजन नियम-बद्ध रूप से जोड़ता है।

51.15
एवं सलग्नकाः खेटाः पाचयन्ति मिथः स्थिताः |
समच्छेदीकृताः प्राप्ता अंसाश्छेदविवर्जिताः
evaṃ salagnakāḥ kheṭāḥ pācayanti mithaḥ sthitāḥ |
samacchedīkṛtāḥ prāptā aṃsāśchedavivarjitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; सलग्नकाः = लग्नसहित (लग्न + ग्रह); खेटाः = ग्रह; पाचयन्ति = पाक/दशा-परिपाक करते हैं; मिथः स्थिताः = परस्पर स्थित; समच्छेदीकृताः = समच्छेद (एक ही हर) किए हुए; प्राप्ताः अंसाः = प्राप्त अंश/भाग; छेदविवर्जिताः = छेद (हर) से रहित — शुद्ध अंश-संख्याएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नसहित ग्रह, एक-दूसरे के सापेक्ष स्थित होकर, दशा का पाक संचालित करते हैं। उनके जो अंश प्राप्त होते हैं, उन्हें पहले समच्छेद करके — अर्थात् एक समान हर पर लाकर — तैयार किया जाता है; फिर वह हर हटा दिया जाता है, जिससे आगे के विभाजन के लिए शुद्ध अंश-मान उपलब्ध हों। यह अन्तर्दशा-गणना का प्रारंभिक अंकगणितीय चरण है: अंशों को तुलनीय बनाना।

English rendering The text states that the planets, taken together with the lagna and situated relative to one another, ripen (operate) the periods. The portions obtained are reduced to a common denominator and then freed of that denominator, yielding pure amśa-numbers for the subsequent subdivision.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अंश-तैयारी (समच्छेद → छेद-विसर्जन): यदि ग्रह/भागों के अंश भिन्न हर वाले हों — a₁/d₁, a₂/d₂, …, aₙ/dₙ — तो समच्छेद हर D = lcm(d₁,…,dₙ) लेकर
Aᵢ = aᵢ × (D ÷ dᵢ)
फिर छेद हटाकर कार्यकारी शुद्ध अंश A₁, A₂, …, Aₙ रखते हैं। अगले श्लोक में इन्हीं Aᵢ का उपयोग
अन्तर्दशा ∝ (दशा-वर्ष × Aᵢ) / ΣA
में होता है। (जहाँ दशा-प्रणाली स्वयं वर्ष-मान को ही अंश मानती हो — यथा विंशोत्तरी — वहाँ Aᵢ पहले से पूर्णांक होते हैं और समच्छेद-चरण अप्रत्यक्ष रहता है।)

उदाहरण (worked example) मान लें तीन अंश 1/2, 1/3, 1/4।
समच्छेद हर D = lcm(2,3,4) = 12 → A = 6, 4, 3।
छेदविवर्जित कार्यकारी अंश: 6, 4, 3; योग ΣA = 13।
ये 6, 4, 3 ही अगले सूत्र में पृथग्-अंश के रूप में प्रविष्ट होते हैं।

51.16
दशाब्दाः पृथगंशघ्ना अंशयोगविभाजिताः |
अन्तर्दशा भवन्त्येवं तत्प्रत्यन्तर्दशादिकाः
daśābdāḥ pṛthagaṃśaghnā aṃśayogavibhājitāḥ |
antardaśā bhavantyevaṃ tatpratyantardaśādikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाब्दाः = महादशा के वर्ष; पृथगंशघ्नाः = अपने-अपने अंश से गुणित; अंशयोगविभाजिताः = समस्त अंशों के योग से विभाजित; अन्तर्दशा = उप-दशा; भवन्ति = होती हैं; एवं = इसी विधि से; तत्प्रत्यन्तर्दशादिकाः = उसी की प्रत्यन्तर्दशा आदि सूक्ष्म स्तर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का नियम स्पष्ट है: महादशा के वर्षों को प्रत्येक ग्रह (या भाग) के पृथक् अंश से गुणा करें, फिर सभी अंशों के योग से भाग दें — फल अन्तर्दशा-काल है। यही अनुपात-विधि सीढ़ी दर सीढ़ी प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्मदशा आदि पर लागू होती है। यह फल-कथन नहीं, शुद्ध विभाजन-सूत्र है: दशा का समय अंश-योग के अनुपात में बाँटा जाता है।

English rendering The daśā-years, each multiplied by its respective amśa and divided by the sum of all amśas, become the antardaśās; by the same proportion the pratyantardaśās and finer levels are obtained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
अन्तर्दशा(ग्रह j, महादशा i) = (Dᵢ × Aⱼ) ÷ Σₖ Aₖ
जहाँ Dᵢ = महादशा-वर्ष, Aⱼ = j का अंश, ΣA = अंश-योग।
विंशोत्तरी में Aⱼ ≡ उस ग्रह के महादशा-वर्ष, और ΣA = 120:
अन्तर्दशाⱼ = (Dᵢ × Yⱼ) ÷ 120
Y-क्रम (वर्ष): केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)।
प्रत्यन्तर्दशाⱼₖ = (अन्तर्दशाⱼ × Yₖ) ÷ 120 — वही अनुपात, एक स्तर नीचे।
(संप्रदाय: विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र; अन्य दशा-प्रणाली में Aⱼ और ΣA उस प्रणाली के अंश-नियम से बदलते हैं।)

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी; महादशा = गुरु (D = 16 वर्ष); अन्तर्दशा-ग्रह = बुध (Y = 17); Σ = 120।
अन्तर्दशा = (16 × 17) ÷ 120 = 272/120 = 34/15 वर्ष = 2 + 4/15 वर्ष।
360-दिन वर्ष-संकेत (दशा-रूपान्तरण की प्रचलित पूर्णांक रीति: 1 वर्ष = 12 मास, 1 मास = 30 दिन):
4/15 वर्ष × 12 = 48/15 = 3 + 3/15 मास → 3 मास + (3/15)×30 = 6 दिन।
अतः गुरु–बुध अन्तर्दशा = 2 वर्ष 3 मास 6 दिन।
जाँच: (16×17)/120 == 272/120 (सटीक भिन्न; सहिष्णुता-पट्टी नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अनुपात — (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/120 — विंशोत्तरी इंजन का कैनॉनिकल अन्तर्दशा-सूत्र है; प्रत्यन्तर् आदि उसी अनुपात की पुनरावृत्ति हैं। डोसियर में Y-मान (7, 20, 6, 10, 7, 18, 16, 19, 17) और Σ = 120 पिन हैं; गणना शुद्ध अनुपात-अंकगणित है, फल-व्याख्या से अलग। exact-`==` अनुशासन: भिन्न/वर्ष-मान में अनुमानित ± पट्टी नहीं — सूत्र का मान ज्यों का त्यों।

अध्यायः 52

विंशोत्तरीमतेन सूर्यदशान्तर्दशाफलाध्यायः

73 श्लोक
52.1
स्वोच्चे स्व्भे स्थितः सूर्यो लाभे केन्द्रे त्रिकोणके |
स्वदशायां स्वभुक्तौ च धनधान्यादिलाभकृत्
svocce svbhe sthitaḥ sūryo lābhe kendre trikoṇake |
svadaśāyāṃ svabhuktau ca dhanadhānyādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्वभे / स्वर्क्षे = स्वराशि में; सूर्यः = सूर्य; लाभे = ११वें भाव में; केन्द्रे = १–४–७–१० में; त्रिकोणके = १–५–९ में; स्वदशायां = सूर्य की महादशा में; स्वभुक्तौ = सूर्य की ही अन्तर्दशा (भुक्ति) में; धनधान्यादिलाभकृत् = धन–अन्न आदि का लाभ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य उच्च, स्वराशि, लाभभाव, केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो, और उसी समय सूर्य की अपनी महादशा तथा अपनी भुक्ति चल रही हो, तब वह धन, धान्य और सम्बद्ध सामग्री का लाभ देने वाला कहा गया है। यहाँ फल सूर्य की स्थिति और अपनी ही दशा–भुक्ति के संयोग पर बाँधा गया है। यह स्थिति–फल का नियम है, न कि निर्विवाद नियति।

English rendering The text states that the Sun, placed in exaltation, own sign, the eleventh, a kendra, or a trikoṇa, and operating in his own mahādaśā and own bhukti, is said to produce gain of wealth, grain, and related resources.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा–काल विंशतोत्तरी पर: सूर्य–महादशा = ६ वर्ष; सूर्य–भुक्ति (सूर्यान्तर्दशा) = (६ × ६) ÷ १२० = ०.३ वर्ष = ३.६ मास (लगभग १०९.५ दिन, ३६०-दिन वर्ष मान पर)। फल की शर्तें स्थानिक हैं: उच्च = मेष १०° (परंपरागत बिन्दु); स्वराशि = सिंह (पूर्ण ३०°); लाभ = लग्न से ११वाँ; केन्द्र = १, ४, ७, १०; त्रिकोण = १, ५, ९। अयनांश और लग्न–गणना फल के “कब” को बदलते हैं; नियम स्वयं मोड्यूलर नहीं, दशा–अनुपात शुद्ध अनुपात–अंकगणित है।

उदाहरण (worked example) विंशतोत्तरी, सूर्य–महादशा ६ य; सूर्य–भुक्ति = ६×६/१२० = ०.३ य। मान लें लग्न कन्या, सूर्य सिंह (स्वराशि) में — केन्द्र/त्रिकोण नहीं, किन्तु स्वर्क्ष–शर्त पूर्ण। शास्त्र के अनुसार स्वदशा–स्वभुक्ति में धन–धान्य लाभ का कथन लागू माना जाता है। (अयनांश: जो भी नियत हो; दशा–वर्ष अनुपात अयनांश–स्वतंत्र।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशतोत्तरी १२०–वर्ष चक्र में सूर्य ६ वर्ष पिन है; अन्तर्दशा = (महादशा–वर्ष × अन्तर–ग्रह–वर्ष)/१२० — शुद्ध अनुपात। हम दशा–इंजन में इसी अनुपात को `==` से बाँधते हैं; फल–वाक्य को गणित से अलग रखकर “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ते हैं।

52.2
नीचाद्यशुभराशिस्थो विपरीतं फलं दिशेत् |
द्वितीयद्यूननाथेऽर्के त्वपमृत्युभयं वदेत्
nīcādyaśubharāśistho viparītaṃ phalaṃ diśet |
dvitīyadyūnanāthe'rke tvapamṛtyubhayaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचादि = नीच आदि; अशुभराशिस्थः = अशुभ राशि में स्थित; विपरीतं फलम् = उलटा फल; दिशेत् = दे; द्वितीयद्यूननाथे = द्वितीय और द्यून (७वें) के स्वामी; अर्के = सूर्य में; अपमृत्युभयम् = अपमृत्यु का भय; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि सूर्य नीच या अन्य अशुभ राशि में हो, तो पूर्वोक्त शुभ फल का उलटा फल बताया गया है। विशेष रूप से, जब सूर्य द्वितीय और सप्तम का स्वामी हो (मकर–लग्न की स्थिति: सूर्य सिंह में द्वितीय और कुम्भ में सप्तम का स्वामी नहीं — पाठ: “द्वितीयद्यूननाथेऽर्के”, अर्थात् जब सूर्य उन भावों का नाथ हो और अर्क–संदर्भ में), तब अपमृत्यु–भय का कथन करने को कहा गया है। यह दोष–संकेत का शास्त्रीय वाक्य है; इसे नियत मृत्यु–भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that when the Sun occupies debilitation or other inauspicious signs, the opposite results are indicated. When the Sun is lord of the second and the seventh (dyūna), the text directs that danger of apamṛtyu be spoken of — as a śāstra-indication, not as a fixed fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल–कथन (दोष–संकेत)। नीच–सूर्य = तुला (परंपरागत नीच–बिन्दु १०°); “अशुभराशि” यहाँ नीचादि–वर्ग का खुला पद है। द्वितीय+द्यून (७) एकसाथ सूर्य–स्वामित्व: सिंह–लग्न पर सूर्य १ का स्वामी (केन्द्र), मीन–लग्न पर नहीं — पाठ “द्वितीयद्यूननाथे” को भाव–स्वामित्व की शर्त के रूप में पढ़ें; कौन–सी लग्न पर सूर्य २ और ७ दोनों का नाथ हो, वह राशि–चक्र से तय होता है (सूर्य केवल सिंह का स्वामी है, अतः २=सिंह ⇒ लग्न=कर्क; ७=सिंह ⇒ लग्न=कुम्भ — एक साथ दोनों असंभव)। पाठ-भेद संभव — कुछ पाठों में “द्वितीयद्यूननाथे” को संयुक्त दोष या अर्क–युक्त द्वितीय/सप्तम नाथ पढ़ा जाता है; अंक–अर्थ को जबरदस्ती एक लग्न पर न ठोकें।

52.3
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
सूर्यप्रीतिकरीं शान्तिं कुर्यादारोग्यलब्धये
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret |
sūryaprītikarīṃ śāntiṃ kuryādārogyalabdhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; मृत्युञ्जयजपम् = महामृत्युञ्जय मन्त्र-जप; चरेत् = करे; सूर्यप्रीतिकरीम् = सूर्य को प्रसन्न करने वाली; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; कुर्यात् = करे; आरोग्यलब्धये = आरोग्य की प्राप्ति के लिए।

हिन्दी भावार्थ उस (पूर्वोक्त अपमृत्यु) दोष के परिहार के लिए शास्त्र मृत्युञ्जय-जप तथा सूर्य को प्रसन्न करने वाली शान्ति का विधान बताता है, जिससे आरोग्य की प्राप्ति हो। यह शास्त्रोक्त उपाय-कथन है; भय या दबाव का साधन नहीं।

English rendering To remove that blemish, the text prescribes recitation of the Mṛtyuñjaya and a propitiatory rite pleasing to the Sun, for the gaining of health.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/उपाय-कथन। यह श्लोक गणना नहीं, अपितु पूर्व श्लोक के अनिष्ट-योग के प्रति शास्त्रोक्त परिहार है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी अनुशासन-रेखा उपाय-वचनों को शास्त्र की अपनी वाणी के रूप में रखती है — remedies-as-pressure नहीं। गणित (दशा-मान, बल-मान) पृथक रहता है; यह श्लोक उसी विभाजन का व्याख्या-पक्ष है।

52.4
सूर्यस्याऽन्तर्गते चन्द्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
विवाहं शुभकार्यं च धनधान्यसमृद्धिकृत्
sūryasyā'ntargate candre lagnātkendratrikoṇage |
vivāhaṃ śubhakāryaṃ ca dhanadhānyasamṛddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर्गते = सूर्य–महादशा की अन्तर्दशा में; चन्द्रे = चन्द्र; लग्नात् = लग्न से; केन्द्रत्रिकोणगे = केन्द्र या त्रिकोण में स्थित; विवाहम् = विवाह; शुभकार्यम् = शुभ कार्य; धनधान्यसमृद्धिकृत् = धन–धान्य की समृद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य की दशा में जब चन्द्र की अन्तर्दशा चले, और चन्द्र लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, तब विवाह, शुभ कर्म तथा धन–धान्य की समृद्धि का फल कहा गया है। यहाँ सूर्य–महादशा + चन्द्र–भुक्ति + चन्द्र की लग्न–सापेक्ष स्थिति — तीन शर्तों का योग है।

English rendering The text states that when the Moon’s antardaśā runs within the Sun’s period, and the Moon occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, marriage, auspicious undertakings, and prosperity of wealth and grain are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशतोत्तरी: सूर्य–महादशा = ६ य; चन्द्र–अन्तर्दशा = (६ × १०) ÷ १२० = ०.५ य = ६ मास (३६०-दिन वर्ष ⇒ १८० दिन)। केन्द्र = लग्न से भाव १, ४, ७, १०; त्रिकोण = १, ५, ९ (भाव–गणना पूर्ण–राशि या भावा–भाव, परंपरा घोषित करें)। चन्द्र–देशांतर λ_☽; लग्न L; भाव–अंतर = floor((λ_☽ − L)/30°) mod १२ + १ ∈ {१,४,५,७,९,१०}।

उदाहरण (worked example) सूर्य–दशा में चन्द्र–भुक्ति = ०.५ य। लग्न = मेष १०°, चन्द्र = सिंह २०° ⇒ राशि–अंतर = ४ ⇒ चतुर्थ (केन्द्र)। शास्त्र के अनुसार विवाह/शुभकार्य/धन–धान्य समृद्धि का कथन लागू। (अयनांश: सायन/निरयण दोनों में सापेक्ष भाव एक सा रह सकता है यदि L और λ_☽ एक ही अयनांश पर हों।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशतोत्तरी में चन्द्र १० य, सूर्य ६ य; अन्तर्दशा–सूत्र (महा × अन्तर)/१२० से सूर्य–अन्तर् चन्द्र = ०.५ य बिल्कुल `==` से पिन होता है। हम दशा–इंजन में इसी अनुपात को सत्यापित करते हैं; विवाह–समृद्धि का वाक्य फल है — गणित से अलग, “पाठ कहता है”।

52.5
गृहक्षेत्राभिवृद्धिं च पशुवाहनसम्पदाम् |
तुङ्गे वा स्वर्क्षगे वाऽपि दारसौख्यं धनागमम्
gṛhakṣetrābhivṛddhiṃ ca paśuvāhanasampadām |
tuṅge vā svarkṣage vā'pi dārasaukhyaṃ dhanāgamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहक्षेत्राभिवृद्धिम् = घर और क्षेत्र की वृद्धि; पशुवाहनसम्पदाम् = पशु और वाहन की सम्पदा; तुङ्गे = उच्च में; स्वर्क्षगे = स्वराशि में; वा अपि = अथवा; दारसौख्यम् = दारा (जीवनसाथी) का सौख्य; धनागमम् = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (पूर्वोक्त सूर्य–अन्तर् चन्द्र की शुभ स्थिति में) गृह–क्षेत्र की वृद्धि तथा पशु–वाहन की सम्पदा भी कही गई है। यदि चन्द्र उच्च या स्वराशि में हो, तो दारा–सौख्य और धन–आगमन विशेष रूप से कहा गया है। यह ५२.४ के शुभ–फल का विस्तार है।

English rendering The text states further growth of house and land and wealth of cattle and conveyances; and if the Moon is exalted or in own sign, comfort with the spouse and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल–कथन; किन्तु स्थिति–शर्तें निश्चित हैं। चन्द्र–उच्च = वृष ३° (परंपरागत); स्वर्क्ष = कर्क (पूर्ण ३०°)। “तुङ्गे वा स्वर्क्षगे” = λ_☽ ∈ वृष (उच्च–क्षेत्र) या कर्क। गृह/क्षेत्र/पशु/वाहन — शास्त्रीय समृद्धि–पद, कोई संख्या–सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र कर्क १५° (स्वर्क्ष) + लग्न से केन्द्र/त्रिकोण (यथा ५२.४) + सूर्य–दशा में चन्द्र–भुक्ति ०.५ य ⇒ शास्त्र के अनुसार दारसौख्य + धनागम का अतिरिक्त कथन। उच्च–बिन्दु जाँच: वृष ३° के आसपास “तुङ्ग” पढ़ने की परंपरा; पूर्ण–राशि उच्च भी कई पद्धतियों में लिया जाता है — पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव।

52.6
पुत्रलाभसुखं चैव सौख्यं राजसमागमम् |
महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिसुखवाहम्
putralābhasukhaṃ caiva saukhyaṃ rājasamāgamam |
mahārājaprasādena iṣṭasiddhisukhavāham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रलाभसुखम् = पुत्र–लाभ का सुख; सौख्यम् = सुख; राजसमागमम् = राजा से भेंट/संसर्ग; महाराजप्रसादेन = महाराज के प्रसाद से; इष्टसिद्धिसुखवाहम् = अभीष्ट सिद्धि और सुख लाने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उसी शुभ–संयोग में पुत्र–लाभ का सुख, राज–समागम का सौख्य, तथा महाराज–प्रसाद से इष्ट–सिद्धि और सुख भी कहा गया है। यह सामाजिक–स्थिति और सन्तान–सुख का फल–विस्तार है; इसे आधुनिक “राजनीतिक भविष्यवाणी” या निश्चित पुत्र–प्राप्ति के रूप में नहीं बाँधना।

English rendering The text states pleasure of gaining a son, the comfort of meeting a ruler, and — through a great king’s favour — fulfilment of desired ends that bring happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल–कथन (राज–प्रसाद / पुत्रलाभ / इष्टसिद्धि)। कोई दशा–वर्ष या वर्ग–अंश यहाँ नया नहीं; ५२.४–५.५ की स्थिति–शर्तों पर ही यह फल–श्रृंखला टिकी है।

52.7
क्षीणे वा पापसंयुक्ते दारपुत्रादिपोडनम् |
वैषम्यं जनसंवादं भृत्यवर्गविनाशनम्
kṣīṇe vā pāpasaṃyukte dāraputrādipoḍanam |
vaiṣamyaṃ janasaṃvādaṃ bhṛtyavargavināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षीणे = क्षीण (निर्बल/कृष्णपक्ष–क्षीण) चन्द्र में; पापसंयुक्ते = पाप–ग्रह से युक्त; दारपुत्रादिपोडनम् = दारा–पुत्र आदि का पीड़न; वैषम्यम् = विषमता/कलह; जनसंवादम् = लोक–विवाद; भृत्यवर्गविनाशनम् = भृत्य–वर्ग का विनाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि (सूर्य–अन्तर्) चन्द्र क्षीण हो या पाप–ग्रहों से युक्त हो, तो दारा–पुत्र आदि की पीड़ा, वैषम्य, जन–संवाद (लोक–कलह) और भृत्य–वर्ग के नाश का फल कहा गया है। यह ५२.४–६ के शुभ–फल का विपरीत पक्ष है। क्षीण/पापयुक्त शर्त पूरी होने पर ही यह वाक्य लागू माना गया है — सामान्य “चन्द्र–अन्तर्” पर नहीं।

English rendering The text states that when the Moon is weak (kṣīṇa) or conjoined with malefics, affliction of spouse and children and the like, disharmony, public dispute, and destruction of the servant class are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल–कथन (दोष–पक्ष)। शर्तें गुणात्मक–स्थानिक: (१) क्षीण–चन्द्र — बहुधा कृष्णपक्ष में घटता चन्द्र या अल्प–कला; कुछ परंपराएँ दृक्–बल/कला–बल की निम्न सीमा लेती हैं (यथा < ६० कला — यह सीमा इस श्लोक में नहीं लिखी; बाहर से न ठोकें)। (२) पापसंयुक्त = सूर्य/मंगल/शनि/राहु–केतु आदि से युति (यास–अंश परंपरा घोषित करें)। सूर्य–अन्तर् चन्द्र–काल = ०.५ य वही रहता है; फल की दिशा चन्द्र–अवस्था से पलटती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा–अवधि (`==` ०.५ य) गणना है; क्षीण/पापयुक्त फल व्याख्या है। हम दोनों को अलग रखते हैं — अनुपात–अंकगणित को फिक्स्चर से बाँधते हैं, फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही छोड़ते हैं; भय या निश्चित पीड़ा का दावा नहीं करते।

52.8
विरोधं राजकलहं धनधान्यपशुक्षयम् |
षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे जलभीतिं मनोरुजम्
virodhaṃ rājakalahaṃ dhanadhānyapaśukṣayam |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye candre jalabhītiṃ manorujam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विरोध = विरोध / संघर्ष; राजकलह = राजा या राजसत्ता से झगड़ा; धनधान्यपशुक्षय = धन–अन्न–पशु का क्षय; षष्ठाष्टमव्यये = दायेश से ६, ८ या १२ भाव में; चन्द्रे = चन्द्र (स्थित होने पर); जलभीति = जल से भय; मनोरुज = मानसिक क्लेश / चित्त-पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चन्द्र दायेश (दशा-स्वामी) से षष्ठ, अष्टम या व्यय भाव में हो, तब विरोध, राज-कलह तथा धन-धान्य-पशु के क्षय का संकेत मिलता है। साथ ही जल-भय और मन की रुग्णता का भी उल्लेख है। यह फल-कथन दशा-फल की श्रृंखला में चन्द्र की दुःस्थान-स्थिति से जुड़ा है।

English rendering The text states that with the Moon in the sixth, eighth, or twelfth from the daśā-lord, one indicates opposition, conflict with royal power, and loss of wealth, grain, and cattle, together with fear of water and mental affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-गणना दायेश-लग्न से ६/८/१२ की सापेक्ष गणना है; दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी (१२० वर्ष) या अन्य दशा-क्रम से निर्धारित होता है, यह श्लोक केवल फल का निर्देश देता है।

52.9
बन्धनं रोगपीडां च स्थानविच्युतिकारकम् |
दुःस्थानं चापि चित्तेन दायादजनविग्रहम्
bandhanaṃ rogapīḍāṃ ca sthānavicyutikārakam |
duḥsthānaṃ cāpi cittena dāyādajanavigraham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धन = बँधना / कारा; रोगपीडा = रोग से पीड़ित होना; स्थानविच्युति = पद/स्थान से च्युति; दुःस्थान = ६/८/१२ (दुष्ट स्थान); चित्तेन = चित्त/मन से (चन्द्र-सन्दर्भ); दायादजनविग्रह = सह-उत्तराधिकारियों / सगोत्रों से विग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि उसी दुःस्थान-अवस्था में बन्धन, रोग-पीड़ा और स्थान-विच्युति का कारक-फल बताया गया है। चित्त के स्तर पर भी दुःख तथा दायादों (सह-अधिकारियों) से झगड़े का संकेत दिया गया है। यह पूर्व श्लोक की दुष्फल-श्रृंखला का विस्तार है, न कि स्वतंत्र गणित-नियम।

English rendering The text further states bondage, disease-affliction, and displacement from one’s place, and also mental distress with strife among co-heirs, as indications when that unfavourable placement obtains.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “दुःस्थान” यहाँ भाव-स्थान की पारंपरिक त्रयी (६, ८, १२) का संक्षेपाभिधान है; संख्या-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

52.10
निर्दिशेत् कुत्सितान्नं च चौरादिनृपपीडनम् |
मूत्रकृच्छादिरोगश्च देहपीडा तथा भवेत्
nirdiśet kutsitānnaṃ ca caurādinṛpapīḍanam |
mūtrakṛcchādirogaśca dehapīḍā tathā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्दिशेत् = कहे/निर्देश करे; कुत्सितान्नम् = निन्दित/निम्न अन्न; चौरादिनृपपीडनम् = चोर आदि व राजा से पीड़ा; मूत्रकृच्छादिरोगः = मूत्रकृच्छ्र आदि रोग; देहपीडा = शारीरिक कष्ट; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अन्तर में निन्दित अन्न का भोजन, चोर व राजा से पीड़ा, मूत्रकृच्छ्र आदि रोग तथा देह-पीड़ा की सूचना देता है — ये शास्त्र के कथन हैं, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering One may declare mean food, harassment from thieves and the crown, urinary ailments, and bodily pain — stated as the text's account, not as a fixed forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दुःस्थान-चन्द्र के आरोग्य व परिवेश सम्बन्धी परिणामों का वर्णन।

हमारा डिकोड (Our Decode) मूत्रकृच्छ्र आदि रोग-वचनों को हम केवल शास्त्र के फल-दावे के रूप में रखते हैं, कभी चिकित्सा-भविष्यवाणी के रूप में नहीं — यही "गणित को व्याख्या से पृथक" रखने की अनुशासन-रेखा है।

52.11
दायेशाल्लभभाग्ये च केन्द्रे वा शुभसंयुते |
भोगभाग्यादिसन्तोषदारपुत्रादिवर्द्धनम्
dāyeśāllabhabhāgye ca kendre vā śubhasaṃyute |
bhogabhāgyādisantoṣadāraputrādivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा-स्वामी से; लभभाग्ये = ११वें (लाभ) तथा ९वें (भाग्य) भाव में; केन्द्रे = १, ४, ७, १० में; शुभसंयुते = शुभ ग्रह से युक्त; भोगभाग्यादिसन्तोष = भोग-भाग्य आदि से सन्तोष; दारपुत्रादिवर्द्धन = पत्नी-पुत्र आदि की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत शास्त्र कहता है कि चन्द्र जब दायेश से लाभ या भाग्य भाव में हो, अथवा केन्द्र में हो, या शुभ से युक्त हो, तब भोग-भाग्य आदि से सन्तोष तथा दार-पुत्र आदि की वृद्धि का फल बताया गया है। यह शुभ-अवस्था का फल-खंड है, जो दुःस्थान-फल के बाद आता है। केन्द्र-लाभ-भाग्य यहाँ भाव-स्थान की शास्त्रीय परिभाषा पर टिके हैं।

English rendering The text states that when the Moon stands in the eleventh or ninth from the daśā-lord, or in a kendra, or joined with benefics, one indicates satisfaction through enjoyments and fortune and the increase of spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थान नियम। केन्द्र = {१, ४, ७, १०}; लाभ = ११; भाग्य = ९ — सब दायेश-राशिकेन्द्र से पूर्णांक भाव-गिनती (१ = दायेश-राशि स्वयं)। दशा-काल की गणना इस श्लोक में नहीं है।

उदाहरण (worked example) मानें दायेश वृष (Taurus = २)। चन्द्र कन्या (Virgo = ६) पर हो तो दायेश से भाव = ६ − २ + १ = ५ — न केन्द्र, न ९/११; शुभ-योग अलग जाँच। चन्द्र मकर (Capricorn = १०) पर: १० − २ + १ = ९ = भाग्य → इस श्लोक का शुभ-फल-क्षेत्र। (राशि-सूचकांक १=मेष … १२=मीन; गृह-प्रणाली: पूर्ण-राशि भाव, जैसा होरा-शास्त्र में प्रायः।)

52.12
राज्यप्राप्तिं महत्सौख्यं स्थानप्राप्तिं च शाश्वर्ताम् |
विविआहं यज्ञदीक्षां च सुमाल्यामबरभूषणम्
rājyaprāptiṃ mahatsaukhyaṃ sthānaprāptiṃ ca śāśvartām |
viviāhaṃ yajñadīkṣāṃ ca sumālyāmabarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यप्राप्ति = राज्य/अधिकार-प्राप्ति; महत्सौख्य = महान् सुख; स्थानप्राप्ति = पद/स्थान-प्राप्ति; शाश्वर्ताम् ≈ शाश्वतीम्? स्थायी/चिरस्थायी (पाठ-भेद संभव); विविआहम् ≈ विवाहम्? (पाठ-भेद संभव); यज्ञदीक्षा = यज्ञ में दीक्षा; सुमाल्याम्बरभूषण = उत्तम माला, वस्त्र, आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उसी शुभ-अवस्था के फल में राज्य-प्राप्ति, महान् सौख्य, स्थान-प्राप्ति (स्थायी कहा गया—पाठ-भेद संभव) तथा विवाह, यज्ञ-दीक्षा और सुन्दर माला-वस्त्र-भूषण का उल्लेख करता है। “विविआह” और “शाश्वर्ताम्” इस विकिस्रोत-पाठ में असामान्य हैं; अर्थ-स्तर पर विवाह तथा शाश्वत/स्थायी स्थान-प्राप्ति समझना उचित, पर पाठ-भेद संभव। यह फल-कथन है, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

English rendering The text continues the favourable results: attainment of authority, great happiness, acquisition of position (read as lasting—path-bheda possible), marriage (reading contested), initiation into sacrifice, and fine garlands, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / पाठ-भेद-सहित वर्णन। संख्या या वर्ग-सूत्र नहीं; शुभ-फल की सूची मात्र।

52.13
वाहनं पुत्रपौत्रादि लभते सुखवर्द्धनम् |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते
vāhanaṃ putrapautrādi labhate sukhavarddhanam |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनम् = वाहन; पुत्रपौत्रादि = पुत्र-पौत्र आदि; लभते = प्राप्त करता है; सुखवर्द्धनम् = सुख की वृद्धि; दायेशात् = दशानाथ से; रिपुरन्ध्रस्थे = 6ठे (रिपु)/8वें (रन्ध्र) भाव में; व्यये = 12वें में; बलवर्जिते = बल-रहित होने पर।

हिन्दी भावार्थ शुभ योग में वाहन, पुत्र-पौत्रादि तथा सुख की वृद्धि प्राप्त होती है। किन्तु यदि अन्तर्दशा का चन्द्र दशानाथ से 6ठे, 8वें या 12वें भाव में तथा बल-रहित हो, तो (आगे कहे जाने वाले) अनिष्ट फल आरम्भ होते हैं।

English rendering Vehicles, sons and grandsons, and growing happiness are gained; but if — reckoned from the daśā-lord — the Moon is in the 6th, 8th, or 12th and devoid of strength, the adverse results now follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दायेश से अनिष्ट-समुच्चय = त्रिक {6 (रिपु), 8 (रन्ध्र), 12 (व्यय)}; बलवर्जित = बल-न्यून (न्यून ষড्बल)। श्लोक फल को दो कारकों पर मोड़ता है — (क) दशानाथ से भाव-गणना, तथा (ख) अन्तर-नाथ का बल।

उदाहरण (worked example) यदि सूर्य (दायेश) मेष में और चन्द्र कन्या में, तो कन्या मेष से 6ठा (रिपु) है (मेष=1 … कन्या=6) — अतः "रिपुस्थ" शर्त पूर्ण, अनिष्ट-फल का आरम्भ।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवर्जित" का निर्णय ষड्बल (स्थान, दिग्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् — रूप/विरूप में योग, 1 रूप = 60 विरूप) की प्रति-ग्रह देहली से तुलना पर होता है; और दायेश से गणना एक घोषित सन्दर्भ-परिपाटी है। दोनों गणनीय हैं, जबकि फल शास्त्र का कथन-मात्र।

52.14
अकाले भोजनं चैव देशाद्देशं गमिष्यति |
द्वितीयद्यूननाथे च ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
श्वेतां गां महिषीं गद्याच्छान्ति कुर्यात्सुखाप्तये
akāle bhojanaṃ caiva deśāddeśaṃ gamiṣyati |
dvitīyadyūnanāthe ca hyapamṛtyurbhaviṣyati |
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ gadyācchānti kuryātsukhāptaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकाले = कुसमय पर; भोजनम् = भोजन-कृत्य; देशात् देशम् गमिष्यति = एक देश से दूसरे देश भटकना; द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (धन) व द्यून (सप्तम) भाव के स्वामी — अर्थात् मारकेश — होने पर; अपमृत्युः = अपघात/अकाल-मृत्यु का भय; श्वेतां गां महिषीम् = श्वेत गाय व भैंस (दान-द्रव्य); शान्तिम् कुर्यात् = शान्ति-कर्म करे; सुखाप्तये = सुख की प्राप्ति हेतु।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा की अशुभ स्थिति का प्रसंग चलता रहता है — शास्त्र कहता है कि जातक कुसमय भोजन करेगा और देश-देशान्तर भटकेगा; और यदि अन्तर्दशेश चन्द्र द्वितीय अथवा सप्तम भाव का स्वामी (मारकेश) हो, तो अपमृत्यु का भय कहा गया है। इस दोष-परिहार के लिए पाठ श्वेत गाय व भैंस के दान तथा विधिवत् शान्ति-कर्म का विधान बताता है, सुख-प्राप्ति के निमित्त।

English rendering The Moon sub-period's adverse phase continues: the text states one eats at irregular hours and wanders from land to land; and should the Moon own the 2nd or 7th house — the maraka lords — it warns of the fear of an untimely death, prescribing the gift of a white cow and she-buffalo with due propitiatory rites for the sake of well-being.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो अवयव हैं। (1) मारक-स्थान की पहचान — स्थानिक नियम: द्वितीय व सप्तम भाव के स्वामी मारक कहलाते हैं (लग्न से गिनती)। (2) अन्तर्दशा-मान: सूर्य महादशा = 6 वर्ष; चन्द्र अन्तर्दशा = 6 × 10 ÷ 120 = 0·5 वर्ष = 6 माह। दान-शान्ति फल-कथन है, गणित नहीं — शास्त्र का उपाय-विधान, दबाव नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र कर्क राशि का स्वामी है; अतः मिथुन-लग्न में चन्द्र द्वितीयेश (2nd = कर्क) और मकर-लग्न में सप्तमेश (7th = कर्क) बनकर मारक हो जाता है — इन्हीं लग्नों में उक्त भय-कथन लागू। छह-वर्षीय सूर्य दशा के भीतर यह चन्द्र-अन्तर पूरे 6 माह चलता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय विंशोत्तरी सूर्य-दशा की अन्तर्दशाओं का फल है, और अन्तर्दशा-मान वही अनुपात-गणित है जिसे हमने विंशोत्तरी इंजन में पिन किया — अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 (Ketu 7, Venus 20, Sun 6 … Σ = 120)। मारक-स्थान की गणना विशुद्ध भाव-मॉड्युलर अंकगणित है — व्याख्या नहीं, स्थान-गणना।

52.15
सूर्यस्यान्तर्गते भौमे स्वोच्चे स्वक्षेत्रलाभगे |
लग्नात्केन्द्रत्रिकोणे वा शुभकार्यं समादिशेत्
sūryasyāntargate bhaume svocce svakṣetralābhage |
lagnātkendratrikoṇe vā śubhakāryaṃ samādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर्-गते = सूर्य-महादशा के अन्तर्गत (अन्तर्दशा-प्रसंग); भौमे = मंगल (कुज) के विषय में / कुज-अन्तर्दशा में; स्व-उच्चे = अपनी उच्च-राशि में; स्व-क्षेत्र = अपना राशि-क्षेत्र (मेष/वृश्चिक); लाभ-गे = लाभ-भाव (११वें) में स्थित; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र-त्रिकोणे = केन्द्र (१,४,७,१०) अथवा त्रिकोण (१,५,९) में; शुभ-कार्यम् = शुभ कार्य; समादिशेत् = निर्देश करे / कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की दशा-प्रसंग में जब मंगल (भौम) स्वोच्च, स्वक्षेत्र अथवा लाभ-भाव में हो, अथवा लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो, तब शुभ कार्य का फल बतलाना चाहिए। यह फल-कथन दशा-काल और ग्रह-स्थिति दोनों की शर्तों पर बाँधा गया है। पाठ में “शुभ” का अर्थ यहाँ सामान्य कल्याण-कार्य है, न कि कोई निश्चित घटना।

English rendering The text states that under the Sun’s period-context, when Mars is in exaltation, own sign, or the eleventh house—or in a kendra or trikoṇa from the lagna—auspicious undertakings are to be indicated. The result is conditional on those placements.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन with positional filters. Technique as conditions only: evaluate Mars’ rāśi-sthāna against (a) exaltation (Makara for Mars), (b) own signs Meṣa/Vṛścika, (c) bhāva 11 from lagna, or (d) bhāvas {1,4,5,7,9,10} from lagna (kendra ∪ trikoṇa; lagna counted in both sets). Convention: whole-sign or equal-bhāva as chosen for the chart; declare house system when counting “लाभ/केन्द्र/त्रिकोण”.

उदाहरण (worked example) Assume lagna = Mithuna, Mars longitude in sidereal chart (declare ayanāṃśa, e.g. Lahiri) = 12° Meṣa → Mars in own sign, and from lagna Meṣa is bhāva 11 (लाभ). Per this verse’s filter, the text’s “शुभकार्य” indication applies for the stated Sūrya–Bhauma daśā window; the verse itself gives no duration formula (use Vimśottarī ratios only if computing the window length separately: antar-yr = mahā-yr × 7/120 for Mars).

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52.16
भूलाभं कृषिलाभं च धनधान्यविवर्धनम् |
गृहक्षेत्रादि लाभं च रक्तवस्त्रादिलाभकृत्
bhūlābhaṃ kṛṣilābhaṃ ca dhanadhānyavivardhanam |
gṛhakṣetrādi lābhaṃ ca raktavastrādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भू-लाभम् = भूमि / खेत-संबंधी लाभ; कृषि-लाभम् = कृषि से लाभ; धन-धान्य = धन और अन्न; विवर्धनम् = वृद्धि; गृह-क्षेत्र-आदि = घर, खेत आदि; लाभम् = प्राप्ति; रक्त-वस्त्र-आदि = लाल वस्त्र आदि; लाभ-कृत् = लाभ कराने वाला (फल-कथन)।

हिन्दी भावार्थ पूर्ववर्ती शुभ-स्थिति के क्रम में शास्त्र कहता है कि भूमि-लाभ, कृषि-लाभ, धन-धान्य की वृद्धि, गृह-क्षेत्रादि की प्राप्ति, तथा रक्तवस्त्रादि का लाभ—ये फल सूचित होते हैं। यह सूची फल-वर्णन है; यहाँ कोई माप-सूत्र नहीं दिया गया। पाठ “लाभ” को सामान्य प्राप्ति के अर्थ में कहता है, न कि किसी निश्चित धनराशि के रूप में।

English rendering The text states gains of land and agriculture, increase of wealth and grain, acquisition of house and fields, and profit from red cloth and similar items. These are listed as indicated results under the prior favourable conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-दशा-फल सूची)। Insight: the verse inventories material and land-related phala traditionally linked to Mars (red items, fields, cultivation) without quantifying magnitude or timing beyond the enclosing daśā frame.

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52.17
लग्नाधिपेन संयुक्ते सौख्यं राजप्रियं वदेत् |
भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभश्चैव भविष्यति
lagnādhipena saṃyukte saukhyaṃ rājapriyaṃ vadet |
bhāgyalābhādhipairyukte lābhaścaiva bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-अधिपेन = लग्नेश के साथ; संयुक्ते = युक्त / संयुक्त; सौख्यम् = सुख; राज-प्रियम् = राजा / अधिकार-सत्ता का अनुग्रह; वदेत् = कहे; भाग्य = नवम भाव / भाग्येश; लाभ-अधिपैः = लाभेश (११वें स्वामी) के साथ; युक्ते = युक्त होने पर; लाभः = लाभ; च एव भविष्यति = ही होगा—पाठ का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उस दशा-प्रसंग में) जब मंगल लग्नेश से युक्त हो, तो सुख और राज-प्रियता का कथन करना चाहिए। जब वह भाग्येश और लाभेश से युक्त हो, तब लाभ का फल भी कहा गया है। “संयुक्ते” का अर्थ यहाँ योग-संबंध (समान राशि / स्पष्ट युति—परंपरा अनुसार घोषित करें) है। फल दशा-काल की शर्त के भीतर पाठ की भाषा में है।

English rendering The text states that conjunction with the lagna-lord indicates comfort and royal favour; conjunction with the lords of the ninth and eleventh indicates gain. “Conjunction” is a chart relation to be defined by the chosen orb/same-sign convention.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन with yoga-conditions. Technique layer only: identify L (lagna-lord), D9-lord (bhāgya), D11-lord (lābha) from rāśi chart; test co-presence of Mars with those lords (common school: same rāśi; degree-orb schools declare limit). No numeric bala threshold is stated in this śloka.

उदाहरण (worked example) Lagna = Karka → L = Moon. If Mars and Moon share one rāśi in the rāśi-kundalī during the relevant Sūrya–Bhauma window, the text’s “सौख्यं राजप्रियं” statement is the applicable reading for that filter. Separately, if 9th and 11th lords from Karka (Jupiter for Mīna 9th; Venus for Vṛṣabha 11th—whole-sign) are with Mars, the text’s “लाभ” line applies. Declare house system and ayanāṃśa before fixing lords.

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52.18
बहुसेनाधिपत्यं च शत्रुनाशं मनोदृढम् |
आत्मबन्धुसुखम् चैव भ्रातृवर्द्धनकं तथा
bahusenādhipatyaṃ ca śatrunāśaṃ manodṛḍham |
ātmabandhusukham caiva bhrātṛvarddhanakaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहु-सेना-अधिपत्यम् = बहुत सी सेना / दल पर अधिपत्य; शत्रु-नाशम् = शत्रु-पक्ष का नाश (पाठ-कथन); मनो-दृढम् = मन की दृढ़ता; आत्म-बन्धु-सुखम् = स्वयं और बंधुओं का सुख; भ्रातृ-वर्द्धनकम् = भाइयों / भ्रातृ-भाव संबंधी वृद्धि; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है—बहुसेना पर अधिकार, शत्रु-नाश, मन की दृढ़ता, आत्म-बंधु-सुख, तथा भ्रातृ-वर्ग की वृद्धि—ये भी उसी शुभ-प्रसंग के फल-कथन हैं। यहाँ “नाश/अधिपत्य” शास्त्र की पारंपरिक फल-भाषा है; इसे नियति या भय-वाक्य के रूप में नहीं पढ़ना। भ्रातृ-फल ३-भाव / मंगल-कारकत्व की शास्त्रीय जोड़ से जुड़ा हुआ पाठ-स्तर का संकेत है।

English rendering The text further states command over large forces, destruction of enemies, firmness of mind, happiness of self and kin, and increase relating to brothers. These remain phala-claims of the śāstra under the favourable setup already framed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सैन्य/बंधु/भ्रातृ-फल सूची)। Insight: Mars as natural significator of siblings, courage, and conflict is here given only as textual indication, not as a scored formula.

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52.19
दायेशाद्व्ययरन्ध्रस्थे पापैर्युक्ते च वीक्षिते |
आधिपत्यबलैर्हीने क्रूरबुद्धिं मनोरुजम्
dāyeśādvyayarandhrasthe pāpairyukte ca vīkṣite |
ādhipatyabalairhīne krūrabuddhiṃ manorujam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाय-ईशात् = दायेश (दशा-स्वामी) से; व्यय-रन्ध्र-स्थे = व्यय (१२) अथवा रन्ध्र (८) भाव में स्थित; पापैः = पाप-ग्रहों से; युक्ते = युक्त; च वीक्षिते = और दृष्ट; आधिपत्य-बलैः = अधिपत्य-बल से; हीने = हीन / निर्बल; क्रूर-बुद्धिम् = क्रूर बुद्धि; मनो-रुजम् = मन की पीड़ा / मानसिक क्लेश (पाठ-कथन)।

हिन्दी भावार्थ अब विपरीत शर्तें आती हैं। शास्त्र कहता है कि जब दायेश व्यय या रन्ध्र में हो, पाप-ग्रहों से युक्त और दृष्ट हो, तथा अधिपत्य-बल से हीन हो, तब क्रूर-बुद्धि और मनोरुज का फल कहा गया है। यह अशुभ-फल-कथन है—पाठ की भाषा में; इसे निश्चित रोग-निदान या भाग्य-निर्णय के रूप में नहीं लेना। “आधिपत्यबल” यहाँ भाव-स्वामित्व संबंधी बल का सामान्य संकेत है; विस्तृत षड्बल-सारणी इस श्लोक में नहीं है।

English rendering The text states that when the daśā-lord is in the twelfth or eighth, joined and aspected by malefics, and weak in lordship-strength, cruel intellect and mental affliction are to be told. These are śāstra-phala under adverse filters, not medical claims.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन with adverse positional + bala filters. Technique checklist: (1) place dāyeśa in bhāva 8 or 12 from lagna (declare house system); (2) co-presence / aspect by pāpa (classically Śani, Maṅgala, Rāhu/Ketu, Sūrya per school—state the school); (3) “ādhipatya-bala hīna” = qualitative weakness of lordship (full ṣaḍbala is Ch.27 apparatus: sthāna+dig+kāla+ceṣṭā+naisargika+dṛg in rūpa, 1 rūpa = 60 virūpa—only if one elects that later computational layer; this verse does not give the numbers).

उदाहरण (worked example) Suppose the operative daśā-lord is Mars, lagna = Siṃha, Mars in Kanyā = bhāva 2 (not 8/12) → this verse’s 8/12 filter fails. If instead Mars is in Mīna = bhāva 8 from Siṃha, with Saturn in Mīna (yukta) and aspected by a malefic per the chosen dṛṣṭi rule, and Mars lacks dignity (e.g. not own/exalted and combust or defeated—declare tests), then the text’s “क्रूरबुद्धि / मनोरुज” line is the reading. No numeric threshold is verse-internal.

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52.20
कारागृहे प्रवेशं च कथयेद् बन्धुनाशनम् |
भ्राऋवगविरोधं च कर्मनाशमथापि वा
kārāgṛhe praveśaṃ ca kathayed bandhunāśanam |
bhrāṛvagavirodhaṃ ca karmanāśamathāpi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारा-गृहे = कारागार में; प्रवेशम् = प्रवेश; कथयेत् = कहे; बन्धु-नाशनम् = बंधु-नाश (पाठ-कथन); भ्रातृ-वर्ग-विरोधम् = भ्रातृ-वर्ग से विरोध (पाठ: “भ्राऋवगविरोधं”—भ्रातृवर्गविरोधम् पाठ-भेद संभव); कर्म-नाशम् = कर्म / कार्य का नाश; अथवा = अथवा; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ उसी अशुभ-सूत्र के विस्तार में शास्त्र कहता है—कारागृह-प्रवेश, बंधु-नाश, भ्रातृ-वर्ग-विरोध, तथा कर्म-नाश—इनमें से फल कथनीय हैं। यह कठोर फल-भाषा है; इसे भय-व्यापार या पक्की भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत नहीं करना। “कथयेत्” स्वयं निर्देश है कि ज्योतिषी पाठानुसार कहे—गणित यहाँ नहीं, केवल फल-सूची है। “भ्राऋवग” रूप विकृत लग सकता है; भ्रातृवर्ग पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states one may declare entry into prison, destruction of kin, opposition from the brother-circle, and/or destruction of work. These remain listed adverse phala, not endorsed fate. The printed “भ्राऋवग” is likely भ्रातृवर्ग (pāṭha-bheda possible).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-परिणाम सूची, पूर्व श्लोक की शर्तों पर)। Insight: the verse extends 52.19’s adverse daśā-lord setup into social, legal-custodial, and work-loss language without any arc, bindu, or year-count.

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52.21
नीचे वा दुर्बले भौमे राजमूलाद्धनक्षयः |
द्वितीयद्यूननाथे तु देहे जाड्यं मनोरुजम्
nīce vā durbale bhaume rājamūlāddhanakṣayaḥ |
dvitīyadyūnanāthe tu dehe jāḍyaṃ manorujam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = नीच-राशि में (मंगल का नीच = कर्कट); वा = अथवा; दुर्बले = दुर्बल; भौमे = मंगल में / मंगल के; राज-मूलात् = राज-स्रोत से; धन-क्षयः = धन का क्षय (पाठ-कथन); द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय और द्यून (सप्तम) भाव के नाथ में / उनके प्रसंग में; तु = तो; देहे = शरीर में; जाड्यम् = जाड्य / जड़ता; मनो-रुजम् = मन की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब मंगल नीच अथवा दुर्बल हो, तब राज-मूल से धन-क्षय का फल कहा गया है। तथा जब द्वितीय और सप्तम के अधिपति (का प्रसंग / योग) हो, तब देह में जाड्य और मनोरुज का कथन है। “राजमूल” यहाँ राज्य/अधिकार-तंत्र से जुड़े हानि-फल की पारंपरिक भाषा है। देह-जाड्य और मनोरुज को चिकित्सकीय निदान नहीं मानना—केवल पाठ का फल-कथन।

English rendering The text states that when Mars is debilitated or weak, loss of wealth from a royal source is indicated; and when the second- and seventh-lords are involved, bodily dullness and mental affliction are told. Phala only—no medical or financial advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन with dignity filters. Technique points: Mars nīca = Karka (0°–30° Cancer in the rāśi used); “durbala” is qualitative unless one imports ṣaḍbala (Ch.27) or combustion/defeat tests—state which. “द्वितीयद्यूननाथ” = lords of bhāvas 2 and 7 from lagna; their linkage to Mars (yuti/dṛṣṭi/daśā-lordship—school-dependent) is the filter. No verse-given degree formula beyond standard rāśi occupancy.

उदाहरण (worked example) Sidereal Mars at 5° Karka (ayanāṃśa declared) → Mars nīca; under the enclosing daśā frame the text’s “राजमूलाद्धनक्षय” reading is the one attached to that filter. Separately, lagna = Tulā → 2nd lord = Maṅgala (Vṛścika), 7th lord = Maṅgala (Meṣa)—Mars rules both 2 and 7 (text’s “द्वितीयद्यूननाथे” is strongly engaged by ownership alone); the verse then also states “देहे जाड्यं मनोरुजम्” as the paired phala-line. No numeric loss amount is given.

52.22
सुब्रह्मजपदानं च वृषोत्सर्गं तथैव च |
शान्तिं कुर्वीत विद्यिवदायुरारोग्यसिद्धिदाम्
subrahmajapadānaṃ ca vṛṣotsargaṃ tathaiva ca |
śāntiṃ kurvīta vidyivadāyurārogyasiddhidām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुब्रह्म-जप-दानम् = सुब्रह्मण्य (स्कन्द/कार्तिकेय — मंगल के अधिदेवता) का जप व दान; वृषोत्सर्गम् = वृष (बैल) का उत्सर्ग/मुक्त-दान; शान्तिम् कुर्वीत = शान्ति-कर्म करे; विधिवत् (पाठ "विद्यिवत्" भ्रष्ट — पाठ-भेद संभव) = विधि-अनुसार; आयुः-आरोग्य-सिद्धिदाम् = आयु व आरोग्य की सिद्धि देने वाली।

हिन्दी भावार्थ उपर्युक्त अशुभ योगों के परिहार हेतु शास्त्र विधान बताता है — सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय) का जप व दान, बैल का उत्सर्ग, और विधिवत् शान्ति-कर्म; इन्हें आयु व आरोग्य की सिद्धि देने वाला कहा गया है।

English rendering For the removal of these ills the text prescribes the recitation and gift in honour of Subrahmaṇya, the release of a bull, and rites of appeasement duly performed — said to confer long life and health.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/उपाय-विधान। (पाठ "विद्यिवत्" = "विधिवत्", पाठ-भेद संभव।) यहाँ अधिदेवता-चयन ग्रह-सम्बन्ध पर आधारित है — मंगल का सम्बन्ध स्कन्द/कार्तिकेय से; उपाय को शास्त्र सुख-हेतु सुझाता है, दबाव या भय के रूप में नहीं।

52.23
सूर्यस्यान्तर्गते राहौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
आदौ द्विमासपर्यन्तं धननाशो महद्भयम्
sūryasyāntargate rāhau lagnātkendratrikoṇage |
ādau dvimāsaparyantaṃ dhananāśo mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर्गत = सूर्य-महादशा की अन्तर्दशा में; राहौ = राहु (अन्तर्दशा-स्वामी); लग्नात् = लग्न से; केन्द्र-त्रिकोणगे = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) स्थित; आदौ द्विमास-पर्यन्तम् = आरम्भ के दो मास तक; धननाशः = धन-हानि; महद्भयम् = बड़ा भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य की दशा में राहु की अन्तर्दशा चल रही हो और राहु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, तब उस अन्तर्दशा के आरम्भ के दो मास तक धननाश और महद्भय का फल कहा गया है। यह काल-खण्ड (द्विमास) स्पष्ट संख्यात्मक सीमा देता है; शेष फल पाठ का कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that in the Sun’s mahādaśā, during Rāhu’s antardaśā, if Rāhu occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, the first two months bring loss of wealth and great fear — as the śāstra’s phala, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अन्तर्दशा-अवधि (पूर्ण चक्र 120 वर्ष):
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
सूर्य महादशा = 6; राहु = 18 → राहु-अन्तर्दशा = (6 × 18) ÷ 120 = 108/120 = 0.9 वर्ष ≈ 10.8 मास (सौर/चान्द्र मास-परिपाटी घोषित करनी होगी)।
श्लोक का “आदौ द्विमास” = उस अन्तर्दशा के प्रथम 2 मास का उप-खण्ड; शेष ~8.8 मास आगे के श्लोकों से जुड़ते हैं।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, सूर्य महादशा आरम्भ 2020-01-01 (काल्पनिक)। राहु अन्तर्दशा = 0.9 × 365.25 ≈ 328.7 दिन। “आदौ द्विमास” ≈ प्रथम ~60–62 दिन (सौर मास ≈ 30.44 दिन → 2 × 30.44 ≈ 60.9 दिन)। यदि लग्न सिंह, राहु मेष/सिंह/वृश्चिक/कुम्भ (केन्द्र) या सिंह/धनु/मेष (त्रिकोण — लग्न-सापेक्ष) में हो, तो शास्त्र उसी द्विमास-खण्ड पर धननाश–महद्भय का फल कहता है। अयनांश/लग्न-गणना: जिस कुण्डली-परम्परा से लग्न लिया जाए, वही केन्द्र–त्रिकोण निर्धारण तय करती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/120 का अनुपात-गणित हमारे दशा-इंजन में यथावत् बैठा है — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। इस श्लोक का “द्विमास” उसी सूर्य–राहु अन्तर्दशा (0.9 वर्ष) के भीतर का समय-टुकड़ा है; फल को हम गणना से अलग, केवल “शास्त्र कहता है” के रूप में रखते हैं।

52.24
चौरादिव्रणभीतिश्च दारपुत्रादिपीडनम् |
तत्परं सुखमाप्नोति शुभयुक्ते शुभांशके
caurādivraṇabhītiśca dāraputrādipīḍanam |
tatparaṃ sukhamāpnoti śubhayukte śubhāṃśake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौरादि-व्रण-भीतिः = चोर आदि तथा व्रण (घाव) का भय; दार-पुत्रादि-पीडनम् = पत्नी–पुत्र आदि को पीड़ा; तत्परम् = उसके पश्चात्; सुखम् आप्नोति = सुख प्राप्त करता है; शुभ-युक्ते = शुभ-ग्रह से युक्त; शुभांशके = शुभ अंश/वर्ग में स्थित।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त द्विमास-फल का विस्तार करते हुए शास्त्र कहता है — चोर-आदि और व्रण का भय तथा दार–पुत्र आदि की पीड़ा भी उसी काल में कही गई है। उसके बाद, यदि राहु शुभ से युक्त हो और शुभ अंश में हो, तो सुख की प्राप्ति कही गई है। “शुभांशक” यहाँ अंश/वर्ग-स्थान की शुभता का संकेत है; निश्चित D-नक्शा श्लोक में नहीं बाँधा गया — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text continues: fear of thieves and wounds, and affliction of spouse and children; thereafter, if Rāhu is joined to benefics and placed in a benefic aṃśa, happiness is said to follow. These are the śāstra’s phala-claims.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (काल-क्रम + योग-शर्त)। संख्यात्मक कड़ी केवल पूर्व श्लोक का “द्विमास” और विंशोत्तरी अन्तर्दशा-अनुपात है; “शुभांशक” की जाँच वर्ग-मानचित्र (D9 आदि) से होती है, किन्तु यह श्लोक स्वयं विभाजन-नियम नहीं देता।

52.25
देहारोग्यं मनस्तुष्टि राजप्रीतिकरं सुखम् |
लग्नादुपचये राहौ योगकारकसंयुते
dehārogyaṃ manastuṣṭi rājaprītikaraṃ sukham |
lagnādupacaye rāhau yogakārakasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-आरोग्यम् = शरीर का आरोग्य; मनस्-तुष्टिः = मन की तुष्टि; राज-प्रीति-करम् = राज/शासन-प्रीति कराने वाला; सुखम् = सुख; लग्नात् उपचये = लग्न से उपचय भाव में (3,6,10,11); राहौ = राहु; योगकारक-संयुते = योगकारक ग्रह से संयुक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब (सूर्यान्तर्गत) राहु लग्न से उपचय-स्थान में हो और योगकारक से युक्त हो, तब देहारोग्य, मनस्तुष्टि, राजप्रीति और सुख का फल कहा गया है। उपचय = 3, 6, 10, 11 भाव — यह स्थान-नियम स्पष्ट है; योगकारक का निर्धारण कुण्डली-विशेष (लग्न/स्वामी-युग्म) पर निर्भर करता है, जिसे श्लोक स्वयं नहीं बाँधता।

English rendering The text states that when Rāhu is in an upacaya house from the lagna and conjoined with a yoga-kāraka, bodily health, mental contentment, royal favour, and happiness are indicated — as phala of the śāstra, not as guaranteed destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-नियम (माड्युलर भाव-गणना, समान-भाव परम्परा में):
उपचय-भाव = { (L + 2), (L + 5), (L + 9), (L + 10) } mod 12, अर्थात् लग्न से 3, 6, 10, 11।
राहु-देशान्तर λ_R का भाव = floor((λ_R − λ_Lagna) mod 360° / 30°) + 1 (समान-भाव; श्रीपति/अन्य गृह-पद्धति अलग घोषित करनी होगी)। योगकारक-संयोग = वही राशि/भाव-संयोग जाँच — संख्यात्मक शक्ति-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (λ_L ≈ 150°)। उपचय राशियाँ: वृश्चिक, कुम्भ, मिथुन, कर्क (भाव 3,6,10,11)। यदि राहु वृश्चिक में (भाव 3) और मीन-लग्न में मंगल–शनि जैसे योगकारक-युग्म की भाँति यहाँ कन्या-लग्न पर बुध (लग्नेश) या शास्त्र-सम्मत योगकारक से युक्त हो, तो शास्त्र देहारोग्य–राजप्रीति का फल कहता है। अयनांश: जिस प्रणाली से λ लिया जाए (लाहिरि आदि), वही भाव-संख्या तय करती है।

52.26
दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसन्मानमादिशेत् |
भाग्यवृद्धिं यशोलाभं दारपुत्रादिपीडनम्
dāyeśācchubharāśisthe rājasanmānamādiśet |
bhāgyavṛddhiṃ yaśolābhaṃ dāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दायेश (दशा/अन्तर्दशा-स्वामी या तत्कालिक फल-स्वामी) से; शुभ-राशि-स्थे = शुभ राशि में स्थित; राज-सन्मानम् = राजकीय सम्मान; आदिशेत् = निर्देश करे/कहना चाहिए; भाग्य-वृद्धिम् = भाग्य की वृद्धि; यशो-लाभम् = यश का लाभ; दार-पुत्रादि-पीडनम् = पत्नी–पुत्र आदि की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दायेश से शुभ राशि में स्थित होने पर राजसन्मान, भाग्य-वृद्धि और यश-लाभ का निर्देश करना चाहिए; साथ ही दार–पुत्र आदि की पीड़ा भी इसी प्रसंग में कही गई है। “दायेश” यहाँ दशा-सन्दर्भ का स्वामी-पद है; शुभ-राशि = सामान्यतः चन्द्र-मित्र/शुभ-वर्गीय राशियाँ — पूर्ण सूची श्लोक में नहीं। मिश्रित फल (सम्मान + पीड़ा) पाठ का अपना स्वर है।

English rendering From the dāyeśa, if (Rāhu) stands in a benefic sign, the text directs one to declare royal honour, growth of fortune, and gain of fame, together with affliction of spouse and children — the śāstra’s mixed phala, not a single-sided guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश-सापेक्ष राशि-स्थिति)। “शुभराशिस्थ” की जाँच = राशि-सूचकांक तुलना (दायेश-राशि R_d से राहु-राशि R_r का सम्बन्ध); कोई अंश-भाग या बल-इकाई यहाँ परिभाषित नहीं।

52.27
पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणशोभनं |
दायेशादथ रिष्फस्थे रन्ध्रे वा बलवर्जिते
putrotsavādisantoṣaṃ gṛhe kalyāṇaśobhanaṃ |
dāyeśādatha riṣphasthe randhre vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रोत्सव-आदि = पुत्र-जन्म आदि का उत्सव; सन्तोषम् = संतोष/प्रसन्नता; गृहे = घर में; कल्याण-शोभनम् = मंगल-शोभा, शुभ समृद्धि; दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ सूर्य) से गिनकर; रिष्फस्थे = रिष्फ (12वें भाव) में स्थित; रन्ध्रे = रन्ध्र (8वें भाव) में; बल-वर्जिते = बलहीन होने पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-महादशा में राहु-अन्तर्दशा के शुभ पक्ष का यह उपसंहार है — पुत्रोत्सव आदि से मिलने वाला संतोष और घर में मंगलमय शोभा। इसके बाद शास्त्र पलटकर अशुभ योग की शर्त रखता है: यदि राहु दशेश (सूर्य) से बारहवें अथवा आठवें भाव में बैठा हो, या बलहीन हो, तो आगे कहे जाने वाले कष्ट-फल घटित होते हैं। भाव-गणना यहाँ लग्न से नहीं, अपितु "दायेश" (दशापति) से की जाती है — यही इस पंक्ति की तकनीकी बारीकी है।

English rendering [The Rāhu sub-period's fair phase closes with] the joy of a son's birth and auspicious grace in the home. But should Rāhu stand in the 12th (riṣpha) or 8th (randhra) from the daśā-lord, or be void of strength…

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ गणना-नियम है, फलकथन के साथ एक स्थान-सूत्र। संदर्भ-बिंदु = दायेश (सूर्य)। किसी ग्रह P का दायेश से भाव = ((राशि(P) − राशि(दायेश)) mod 12) + 1 — शुद्ध चक्रीय (modular) अंकगणित। इस सूत्र में रिष्फ = 12वाँ, रन्ध्र = 8वाँ। शास्त्र दोनों दुःस्थानों (8, 12) को अशुभ-प्रवर्तक कहता है — यह उसका कथन है, नियति नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य सिंह (Leo) में, राहु कर्क (Cancer) में। दायेश = सूर्य = सिंह। कर्क का भाव = ((4 − 5) mod 12) + 1 = (−1 mod 12) + 1 = 11 + 1 = 12 → राहु दायेश से रिष्फ (12वें) में; अतः इस श्लोक की अशुभ-शर्त सिद्ध होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक विंशोत्तरी दशा-अन्तर्दशा तंत्र (BPHS अ.46–47) के भीतर खड़ा है, जिसे हमने 120-वर्ष चक्र के रूप में अनुपात-अंकगणित से पिन किया — सूर्य-राहु अन्तर्दशा-मान = (6 × 18)/120 = 0.9 वर्ष = 10 मास 24 दिन। दायेश से भाव-गणना वैसी ही निर्धारित (deterministic) modular क्रिया है जैसी वर्ग-विभाजन में — गणना और फल-व्याख्या को हम अलग रखते हैं।

52.28
बन्धनं स्थाननाशश्च कारागृहनिवेशनम् |
चौरादिव्रणभीतिश्च दारपुत्रादिवर्द्धनम्
bandhanaṃ sthānanāśaśca kārāgṛhaniveśanam |
caurādivraṇabhītiśca dāraputrādivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनम् = बंधन/कारावास; स्थान-नाशः = पद/स्थान की हानि; कारागृह-निवेशनम् = कारागार में डाला जाना; चौर-आदि = चोर आदि से; व्रण-भीतिः = घाव/चोट का भय; दार-पुत्र-आदि = पत्नी-पुत्र आदि; वर्द्धनम् = वृद्धि (यहाँ प्रसंग-विरुद्ध — "पीडनम्" पाठ भी मिलता है, पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अशुभ-शर्त (राहु दायेश से 8/12 में या बलहीन) के फलस्वरूप शास्त्र कहता है — बंधन, स्थान-भ्रंश, कारागार-प्रवेश, तथा चोर आदि से एवं घाव-चोट का भय। अन्तिम पाद में "दारपुत्रादिवर्द्धनम्" (पत्नी-पुत्रादि की वृद्धि) अशुभ प्रसंग से मेल नहीं खाता; कहीं-कहीं "पीडनम्" पाठ मिलता है, अतः यहाँ पाठ-भेद संभव है।

English rendering The text states: bondage, loss of station, confinement in prison, and fear of thieves and of wounds. (The final quarter reads "increase of wife and children," which sits oddly with the ominous context — a variant reading "affliction" is possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अरिष्ट)। यह पूर्ववर्ती स्थान-शर्त का परिणाम-वाक्य है; ध्यान दें कि पाठ-विसंगति ही संकेत देती है कि अन्तिम पाद संदिग्ध है — इसे शास्त्र का कथन मानें, कोई भविष्य-घोषणा नहीं।

52.29
चतुष्पाज्जीवनाशश्च गृहक्षेत्रादिनाशनं |
गुल्मक्षयादिरोगश्च ह्यतिसारादिपीडनं
catuṣpājjīvanāśaśca gṛhakṣetrādināśanaṃ |
gulmakṣayādirogaśca hyatisārādipīḍanaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात् = चतुष्पाद-पशु (गौ-अश्वादि); जीव-नाशः = जीवन/जीविका-हानि; गृह-क्षेत्र-आदि-नाशनम् = गृह-भूमि-आदि का विनाश; गुल्म = उदर-गुल्म (शास्त्रोक्त रोग-नाम); क्षय-आदि-रोगः = क्षयादि व्याधि; अतिसार-आदि-पीडनम् = अतिसारादि से पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस संदर्भ-स्थिति में चतुष्पाद-जीवों की हानि, गृह-क्षेत्रादि का नाश, तथा गुल्म-क्षयादि रोग और अतिसारादि की पीड़ा का संकेत मिलता है। यह फल-कथन है — रोग-निदान या चिकित्सा-निर्देश नहीं। पाठ को शास्त्र के अपने स्वर में ही पढ़ें।

English rendering The text states loss concerning four-footed creatures, destruction of house and land and the like, and affliction by guḷma, kṣaya-type illness, and atisāra and similar distress. These are śāstra-phala statements, not medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ कोई अंश, वर्ग-भाग, या बल-इकाई नहीं; केवल शास्त्रोक्त परिणाम-सूची है।

52.30
द्विस्फस्थे तथा राहौ तत्स्थानाधिपसंयुते |
अपमृत्युभयं चैव सर्पभीतिश्च सम्भवेत्
dvisphasthe tathā rāhau tatsthānādhipasaṃyute |
apamṛtyubhayaṃ caiva sarpabhītiśca sambhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-स्फ-स्थे = द्वितीय भाव में स्थित (पाठ-भेद संभव); राहौ = राहु; तत्-स्थान-अधिप-संयुते = उस भाव के अधिपति से युक्त; अप-मृत्यु-भयम् = अपमृत्यु का भय; सर्प-भीतिः = सर्प-भय; सम्भवेत् = संभव हो, शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ जब राहु द्वितीय भाव में हो और उस स्थान के स्वामी से युक्त हो, तब शास्त्र अपमृत्यु-भय तथा सर्प-भीति का संभव होना कहता है। यह दशा/योग-फल का कथन है, निश्चित घटना की घोषणा नहीं। भय को शास्त्र की भाषा में पढ़ें, आतंक में नहीं।

English rendering When Rāhu occupies the second place and is joined with the lord of that place, the text states that fear of untimely death and fear of serpents may arise. Report the claim as the śāstra’s; do not convert it into certainty or panic.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थिति + युति-शर्त)। तकनीक केवल स्थिति-जाँच है: राहु-रेखांश → राशि/भाव (लग्न-आधार गृह-पद्धति घोषित करें) तथा तत्स्वामी से युति (समान राशि/समीप्य — परंपरा-निर्भर; यहाँ केवल “संयुक्त” कहा गया है)।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न = मेष, राहु = 48° (वृष, द्वितीय भाव, whole-sign houses), द्वितीयेश = शुक्र। यदि शुक्र भी वृष में हो तो “तत्स्थानाधिपसंयुते” शर्त पूरी। फल-व्याख्या शास्त्र के स्वर में ही; संख्यात्मक “भय-माप” नहीं बनता।

52.31
दुर्गाजपं च कुर्वीत् छागदानं समाचरेत् |
कृष्णां गां महिषीं दद्यच्छान्तिमाप्नोत्यसंशयम्
durgājapaṃ ca kurvīt chāgadānaṃ samācaret |
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyacchāntimāpnotyasaṃśayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुर्गा-जपम् = दुर्गा-मंत्र-जप; कुर्वीत = करे (शास्त्र का निर्देश-स्वर); छाग-दानम् = बकरे का दान; समाचरेत् = करे; कृष्णाम् गाम् = कृष्ण-धेनु; महिषीम् = महिषी; दद्यात् = दे; शान्तिम् आप्नोति = शांति पाता है; असंशयम् = निःसंदेह — शास्त्र का अपना दावा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शांति के लिए दुर्गा-जप, छाग-दान, तथा कृष्ण-गौ और महिषी के दान का उल्लेख करता है, और कहता है कि इससे शांति प्राप्त होती है। यह पाठ का उपशमन-कथन है; इसे दबाव, भय-विक्रय, या अनिवार्य “इलाज” बनाकर नहीं पढ़ना। दान-जप व्यक्तिगत श्रद्धा और सामर्थ्य के भीतर ही समझें।

English rendering The text recommends Durgā-japa, the gift of a goat, and the gift of a black cow and a she-buffalo, stating that peace is thereby obtained without doubt. Render this as the śāstra’s own śānti-claim, not as pressure or guaranteed cure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपशमन/शांति-विधान (फल-संवाद का हिस्सा)। कोई वर्ष, अंश, या बल-राशि नहीं।

52.32
सूर्यस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे मित्रस्य वर्गस्थे विवाहं राजदर्शनम्
sūryasyāntargate jīve lagnātkendratrikoṇage |
svocce mitrasya vargasthe vivāhaṃ rājadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर्-गते = सूर्य-महादशा की अंतर्दशा में; जीवे = गुरु; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र-त्रिकोण-गे = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में; स्व-उच्चे = स्वोच्च; मित्रस्य वर्ग-स्थे = मित्र-वर्ग में स्थित; विवाहम् = विवाह; राज-दर्शनम् = राज-दर्शन/शासकीय साक्षात्कार।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अंतर्दशा में जब गुरु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, और स्वोच्च हो अथवा मित्र के वर्ग में स्थित हो, तब शास्त्र विवाह और राजदर्शन का फल कहता है। शर्तें स्पष्ट हैं — स्थिति, उच्चता, वर्ग — फल उन्हीं पर बँधा है। निश्चित “हो ही जाएगा” नहीं; शास्त्र का सशर्त कथन है।

English rendering In the Sun’s antardaśā, when Jupiter occupies a kendra or trikoṇa from the lagna and is in exaltation or in a friend’s varga, the text states marriage and royal audience. The claim is conditional on those placements.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अंतर्दशा-अनुपात (अध्याय 46–47 की पद्धति):
अंतर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अंतर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
सूर्य-महादशा = 6 वर्ष; गुरु-अंतर् = 16 वर्ष → गुरु-अंतर् सूर्य-महा में = (6 × 16) ÷ 120 = 96/120 = 0.8 वर्ष = 9.6 मास ≈ 9 मास 18 दिन (सौर/सावन गणना-परंपरा घोषित करें)।
केन्द्र = {1,4,7,10}; त्रिकोण = {1,5,9} (लग्न-गिनती, whole-sign या भाव-मध्य — पद्धति घोषित)। स्वोच्च गुरु = कर्क 5° (पारंपरिक उच्च-बिंदु; पाठ यहाँ “स्वोच्चे” कहता है)। मित्र-वर्ग = षोडश-वर्ग में मित्र-राशि/वर्ग-स्वामी नियम (च.6)।

उदाहरण (worked example) सूर्य-महादशा आरंभ 2020-01-01; गुरु-अंतर् अवधि = 0.8 वर्ष → ~2020-01-01 से ~2020-10-19 (सौर वर्ष ≈ 365.25 दिन; 0.8 × 365.25 ≈ 292 दिन)। लग्न = सिंह, गुरु = धनु (5वाँ = त्रिकोण), स्वक्षेत्र — शर्त “केन्द्रत्रिकोणगे” पूरी; “स्वोच्चे” नहीं, किंतु स्वक्षेत्र को पाठ “मित्रस्य वर्गस्थे” से अलग रखें — वर्ग-जांच D9 आदि से करें। फल = शास्त्रोक्त विवाह/राजदर्शन-संकेत, न कि निश्चित घटना।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120) — तथा अंतर् = (महा × अंतर्)/120 — हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-गणित के रूप में बँधा है। यह श्लोक उसी सूर्य-अंतर् + गुरु-स्थिति ढाँचे को फल से जोड़ता है; गणना और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

52.33
धनधान्यादिलाभ च पुत्रलाभं महत्सुखं |
महाराजप्रसादेन इष्टकार्यार्थलाभकृत्
dhanadhānyādilābha ca putralābhaṃ mahatsukhaṃ |
mahārājaprasādena iṣṭakāryārthalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-आदि-लाभम् = धन-अन्नादि लाभ; पुत्र-लाभम् = पुत्र-प्राप्ति (शास्त्र-शब्द); महत् सुखम् = महान् सुख; महाराज-प्रसादेन = महाराज के प्रसाद से; इष्ट-कार्य-अर्थ-लाभ-कृत् = अभीष्ट कार्य और अर्थ का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व शर्तों (सूर्य-अंतर् में गुरु की उक्त स्थिति) के क्रम में शास्त्र धन-धान्यादि लाभ, पुत्रलाभ, महान् सुख, तथा महाराज-प्रसाद से अभीष्ट कार्य और अर्थ-लाभ का फल कहता है। यह फल-सूची है — आर्थिक गारंटी या संतान-भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़नी।

English rendering The text further states gains of wealth and grain and the like, gain of a son, great happiness, and, through a great king’s favor, success in desired aims and acquisition of means. Report as śāstra-phala, not as endorsed forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्व श्लोक की स्थिति पर अनुवर्ती फल)। कोई नई दशा-संख्या नहीं; केवल परिणाम-वर्णन।

52.34
ब्राह्मण्प्रियसन्मानं प्रियवस्त्रादिलाभकृत् |
भाग्यकर्माधिपवशाद्राज्यलाभं वदेद् द्विज
brāhmaṇpriyasanmānaṃ priyavastrādilābhakṛt |
bhāgyakarmādhipavaśādrājyalābhaṃ vaded dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्राह्मण-प्रिय-सन्मानम् = ब्राह्मणों का प्रिय सम्मान; प्रिय-वस्त्र-आदि-लाभ-कृत् = प्रिय वस्त्रादि का लाभ; भाग्य-कर्म-अधिप = नवमेश और दशमेश; वशात् = वश/प्रभाव से; राज्य-लाभम् = राज्य/पद-लाभ; वदेत् = कहे; द्विज = द्विज (शिष्य-संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ब्राह्मण-सन्मान, प्रिय वस्त्रादि का लाभ; तथा भाग्येश और कर्मेश के वश से राज्य-लाभ कहना चाहिए। “वदेद् द्विज” आचार्य का निर्देश-स्वर है: फल को इन कारकों से जोड़कर कथन करना। राज्य-लाभ को शास्त्र-संकेत मानें, राजनीतिक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states honor dear to brāhmaṇas and gain of pleasing garments and the like; and, O twice-born, one should declare gain of dominion through the lords of fortune and action (9th and 10th). Frame it as the text’s rule of speech, not as a political promise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + कारक-नियम। तकनीक केवल भाव-स्वामी पहचान: भाग्याधिप = नवमेश, कर्माधिप = दशमेश (लग्न से; गृह-पद्धति घोषित)। उनकी दशा/युति/दृष्टि का विस्तार इस श्लोक में संख्याबद्ध नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (whole-sign); नवम = वृष → नवमेश शुक्र; दशम = मिथुन → दशमेश बुध। शास्त्र “इनके वश से राज्यलाभ वदेत्” कहता है — संख्यात्मक राज्य-माप नहीं; केवल कारक-द्वार का संकेत।

52.35
नरवाहनयोगश्च स्थानाधिक्यं महत्सुखम् |
दायेशाच्छुभराशिस्थे भाग्यवृद्धिः सुखावहा
naravāhanayogaśca sthānādhikyaṃ mahatsukham |
dāyeśācchubharāśisthe bhāgyavṛddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नर-वाहन-योगः = नर-वाहन योग (मनुष्य-वाहक/सम्मान-सूचक योग — शास्त्र-शब्द); स्थान-आधिक्यम् = पद/स्थान की वृद्धि; महत् सुखम् = महान् सुख; दायेशे = दाय/दशा-स्वामी में (पाठ: दायेशात्); शुभ-राशि-स्थे = शुभ राशि में स्थित; भाग्य-वृद्धिः = भाग्य-वृद्धि; सुख-आवहा = सुख लाने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नरवाहन-योग, स्थानाधिक्य और महान् सुख का फल जोड़ता है; तथा जब दायेश (दशा-स्वामी) शुभ राशि में हो तब भाग्य-वृद्धि सुखदायी होती है — ऐसा कहता है। शुभ-राशि यहाँ मित्र/स्व/उच्च आदि की दिशा में पढ़ी जाती है; पाठ “शुभराशिस्थे” मात्र कहता है। फल आशाजनक है, किंतु निश्चित भाग्य-रेखा नहीं।

English rendering The text states a nara-vāhana yoga, elevation of standing, and great happiness; and when the period-lord stands in a benefic sign, increase of fortune that brings ease. Conditional phala — not a guaranteed rise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दशा-स्वामी की राशि-शर्त। जाँच: दायेश = चालू महा/अंतर-स्वामी (यहाँ सूर्य-महा के अंतर्-क्रम का संदर्भ); शुभ-राशि = पारंपरिक शुभ (जैसे गुरु-शुक्र स्व/मित्र/उच्च) — पूर्ण सूची इस श्लोक में नहीं; घोषित परंपरा से बाँधें।

उदाहरण (worked example) सूर्य-महा, गुरु-अंतर; गुरु = कर्क (उच्च) → “शुभराशिस्थे” सहज संगत। शास्त्र भाग्यवृद्धि-सुखावह कहता है; संख्यात्मक “भाग्य-अंक” उत्पन्न नहीं होता।

52.36
दीनधर्मक्रियायुक्तो देवताराधनप्रियः |
गुरुभक्तिर्मनःसिद्धिः पुण्युकर्मादिसंग्रहः
dīnadharmakriyāyukto devatārādhanapriyaḥ |
gurubhaktirmanaḥsiddhiḥ puṇyukarmādisaṃgrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दीन-धर्म-क्रिया-युक्तः = दीनों के प्रति धर्म-कार्यों में लगा हुआ; देवता-आराधन-प्रियः = देव-आराधना में प्रीति रखने वाला; गुरु-भक्तिः = गुरु के प्रति भक्ति; मनः-सिद्धिः = मानसिक सिद्धि/संकल्प-पूर्ति; पुण्य-कर्म-आदि-संग्रहः = पुण्य-कर्मों आदि का संचय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवधि के स्वभाव-फल का वर्णन करता है — जातक दीन-धर्म के कार्यों में तत्पर, देव-आराधना में अनुरक्त, गुरु-भक्त होता है; मन की सिद्धि तथा पुण्य-कर्मों का संचय होता है। यह गुरु के कारकत्व (धर्म, ज्ञान, गुरु-भक्ति) के सर्वथा अनुरूप वर्णन है।

English rendering The text states: one becomes devoted to charitable and righteous acts for the needy, fond of worshipping the deities, reverent to the guru; there is fulfilment of mind and an accumulation of meritorious deeds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्वभाव-वर्णन। यह मनोदशा/आचरण-चित्रण है, कोई गणना नहीं; उल्लेखनीय है कि वर्णित गुण गुरु के नैसर्गिक कारकत्व से मेल खाते हैं — ग्रंथ का आन्तरिक तर्क, फल-भाषा में।

52.37
राशेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे नीचे वा पापसंयुते |
दारपुत्रादिपीडा च देहपीडा महद्भयम्
rāśeśādripurandhrasthe nīce vā pāpasaṃyute |
dāraputrādipīḍā ca dehapīḍā mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशेशात् = राशीश (लग्न-राशि के स्वामी) से — अन्यत्र प्रयुक्त "दायेशात्" का भेद, पाठ-भेद संभव; रिपु-रन्ध्र-स्थे = रिपु (6वें) या रन्ध्र (8वें) में स्थित; नीचे = नीच राशि में; वा पाप-संयुते = अथवा पाप-ग्रह से युक्त; दार-पुत्र-आदि-पीडा = पत्नी-पुत्रादि को पीड़ा; देह-पीडा = शरीर-पीड़ा; महद्-भयम् = महान भय।

हिन्दी भावार्थ अब गुरु-अन्तर्दशा का अशुभ पक्ष — शास्त्र कहता है कि यदि गुरु राशीश से छठे या आठवें भाव में हो, अथवा नीच राशि में या पाप-ग्रह से युक्त हो, तो पत्नी-पुत्रादि को पीड़ा, देह-पीड़ा तथा महान भय होता है। ध्यातव्य: यहाँ "राशेशात्" पाठ है, जबकि इस अध्याय में प्रायः "दायेशात्" मिलता है — अतः संदर्भ-बिंदु को लेकर पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: should Jupiter stand in the 6th (ripu) or 8th (randhra) from the sign-lord, or in debilitation, or joined with malefics, there follow affliction to wife and children, bodily suffering, and great fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अरिष्ट) एक स्थान-शर्त के साथ: रिपु = 6वाँ, रन्ध्र = 8वाँ, संदर्भ = राशीश (पाठभेद: दायेश); भाव = ((राशि(गुरु) − राशि(संदर्भ)) mod 12)+1। "नीच" = ग्रह की परम-नीच राशि (गुरु → मकर)। पाठ-भेद को छिपाना नहीं — कौन-सा संदर्भ-बिंदु लें, यह खुला बिंदु है।

52.38
राजकोपं प्रकुरुतेऽभीष्टवस्तुविनाश्नम् |
पापमूलद्द्रव्यनाशं देहभ्रष्टं मनोरुजम्
rājakopaṃ prakurute'bhīṣṭavastuvināśnam |
pāpamūladdravyanāśaṃ dehabhraṣṭaṃ manorujam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजकोप = राजा / शासन-कोप; प्रकुरुते = उत्पन्न करता है; अभीष्टवस्तु = इष्ट वस्तु; विनाशन = विनाश; पापमूल = पाप-मूल से; द्रव्यनाश = धन-नाश; देहभ्रष्ट = देह-भ्रष्टता / स्वास्थ्य-ह्रास; मनोरुज = मन की रुजा / मानसिक क्लेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यह अवस्था राज-कोप जगाती है और अभीष्ट वस्तुओं का विनाश कराती है। पाप-मूल से जुड़े द्रव्य का नाश, देह का भ्रष्ट होना और मन की रुजा—ये फल यहाँ गिनाए गए हैं। इन्हें भय-व्यापार या निश्चय-नाट्य की तरह नहीं, शास्त्र के फल-वाक्य की तरह पढ़ना है।

English rendering The text states that this configuration produces the anger of rulers, destruction of desired objects, loss of wealth rooted in sinful sources, degradation of the body, and mental affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राजकोप–द्रव्यनाश–देह/मन क्लेश)। कोई अंश, बिन्दु या वर्ष-मान नहीं; केवल फलादेश का वर्णन।

52.39
स्वर्णदानं प्रकुर्वीत स्वेष्टजाप्यं च कारयेत् |
गवां कपिलवर्णानां दानेनारोग्यमादिशेत्
svarṇadānaṃ prakurvīta sveṣṭajāpyaṃ ca kārayet |
gavāṃ kapilavarṇānāṃ dānenārogyamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्णदान = स्वर्ण का दान; प्रकुर्वीत = करना चाहिए (शास्त्र-विधि); स्वेष्टजाप्य = अपने इष्ट का जप; कारयेत् = करवाए / करे; गवां = गौओं का; कपिलवर्णानां = कपिल-वर्ण की; दान = दान; आरोग्य = आरोग्य; आदिशेत् = निर्देश / फल-निर्देश देता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ उपाय-क्रम बताता है—स्वर्ण-दान करना, अपने इष्ट का जाप करवाना/करना। कपिल-वर्ण की गौओं के दान से आरोग्य का निर्देश शास्त्र देता है। यह पाठ का विधि-फल वाक्य है; इसे दबाव-उपाय या रोग-निदान/चिकित्सा-वचन न बनाएँ—केवल शास्त्र-कथन के रूप में रखें।

English rendering The text prescribes the gift of gold and the performance of japa to one’s chosen deity, and states that the gift of kapila-colored cows is indicated for health.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/उपाय-फल कथन। कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं; दान-जाप-गौदान शास्त्र की पारंपरिक विधि-सूची है, न कि बल-या दशा-गणना।

52.40
सूर्यस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
शत्रुनाशो महत्सौख्यं स्वल्पधान्यार्थलाभकृत्
sūryasyāntargate mande lagnātkendratrikoṇage |
śatrunāśo mahatsaukhyaṃ svalpadhānyārthalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर् = सूर्य की अन्तर्दशा; गते = में स्थित; मन्दे = शनि (मन्द); लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = १, ४, ७, १०; त्रिकोण = ५, ९; शत्रुनाश = शत्रु-नाश; महत्सौख्य = महान् सुख; स्वल्प = अल्प; धान्यार्थलाभ = धान्य व अर्थ का लाभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—सूर्य की अन्तर्दशा में जब मन्द (शनि) लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, तब शत्रु-नाश और महान् सौख्य कहा गया है। धान्य-अर्थ का लाभ स्वल्प बताया गया है। फल दशा-अन्तर् + भाव-स्थिति दोनों पर टिका है; इसे निश्चित भाग्य नहीं, शास्त्र-फल पढ़ें।

English rendering The text states that when Saturn, in the Sun’s antardaśā, occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, there is destruction of enemies and great happiness, with only modest gain of grain and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अवधि (विंशोत्तरी, Σ = १२० वर्ष):
अन्तर्-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०।
सूर्य महादशा = ६ वर्ष, शनि = १९ वर्ष ⇒ सूर्य–शनि अन्तर् = (६ × १९) ÷ १२० = ११४ ÷ १२० = १९/२० वर्ष = ०.९५ वर्ष ≈ ० वर्ष ११ मास १२ दिन (३६०-दिन वर्ष कन्वेंशन पर; कुछ पद्धतियाँ ३६५.२५ दिन भी लेती हैं—घोषित कन्वेंशन रखें)।
केन्द्र = {१, ४, ७, १०}, त्रिकोण = {५, ९} लग्न से। फल-शर्त: मन्द ∈ केन्द्र ∪ त्रिकोण।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (१)। शनि का राशि-भाव (D1, पूर्ण-राशि भाव; आयनांश कोई भी, क्योंकि यहाँ केवल भाव-संख्या):
• शनि वृष (२) → २ = न केन्द्र न त्रिकोण → ५२.४० की केन्द्र/त्रिकोण-शर्त नहीं।
• शनि सिंह (५) → ५ = त्रिकोण → शर्त पूरी।
सूर्य–शनि अन्तर्-अवधि = ६ × १९ / १२० = ०.९५ वर्ष। शास्त्र इसी योग में शत्रुनाश–महत्सौख्य–स्वल्प धान्यार्थलाभ कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में सूर्य ६, शनि १९—अन्तर् = (६×१९)/१२० की शुद्ध अनुपात-गणित यही श्लोक के “सूर्यस्यान्तर्गते मन्दे” का काल-खण्ड है। हम दशा-इंजन में महा/अन्तर् को इसी अनुपात से बाँधते हैं; फल-वाक्य को गणना से अलग रखकर “शास्त्र कहता है” ही रिपोर्ट करते हैं।

52.41
विवाहादिसुकार्यञ्च गृहे तस्य शुभावहम् |
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे सुहृद्ग्रहसमन्विते
vivāhādisukāryañca gṛhe tasya śubhāvaham |
svocce svakṣetrage mande suhṛdgrahasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवाहादि-सुकार्यम् = विवाह आदि शुभ कर्म; गृहे = घर में; तस्य = उसके (जातक के); शुभावहम् = मंगलकारी; स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में (शनि उच्च = तुला); स्वक्षेत्रगे = अपनी राशि में (मकर/कुम्भ); मन्दे = शनि; सुहृद्ग्रह-समन्विते = मित्र ग्रहों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शनि अपनी उच्च राशि (तुला) या अपने क्षेत्र (मकर/कुम्भ) में हो और मित्र ग्रहों से युक्त हो, तब सूर्य-महादशा की इस शनि-अन्तर में घर में विवाह आदि शुभ कार्य सम्पन्न होते हैं और वह काल मंगलमय रहता है। यह पूर्व-श्लोक के शुभ-पक्ष का विस्तार है, जो ग्रह की उच्च/स्व-राशि-बलवत्ता पर टिका है।

English rendering When Saturn occupies its exaltation (Libra) or its own sign (Capricorn/Aquarius) and is joined by friendly planets, the text states that marriages and other auspicious rites are accomplished at home, and the period proves favourable.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-गरिमा पर आश्रित)। एकमात्र तकनीकी कसौटी शनि की राशि-गरिमा है: उच्च = तुला (परमोच्च ~20°), मूल स्व-क्षेत्र = मकर/कुम्भ, नीच = मेष; "सुहृद्" (मित्र) पक्ष नैसर्गिक-मैत्री-चक्र से आँका जाता है।

52.42
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्विवाहादिषु सत्क्रिया |
राजसन्मानकीर्तिश्च नानावस्त्रधनागमम्
gṛhe kalyāṇasampattirvivāhādiṣu satkriyā |
rājasanmānakīrtiśca nānāvastradhanāgamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = घर में; कल्याण-सम्पत्तिः = मंगल व सम्पदा; विवाहादिषु = विवाह आदि में; सत्क्रिया = शुभ अनुष्ठान; राज-सन्मान-कीर्तिः = राजा से सम्मान व यश; नाना-वस्त्र-धन-आगमम् = अनेक वस्त्रों व धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस शुभ शनि-अन्तर में घर में मंगल और सम्पदा रहती है, विवाहादि शुभ अवसरों पर सत्कर्म-अनुष्ठान होते हैं, राजा (शासन-पक्ष) से सम्मान व कीर्ति मिलती है, तथा नाना प्रकार के वस्त्र और धन का आगमन होता है।

English rendering The text states that in this favourable Saturn sub-period the home enjoys welfare and prosperity, auspicious rites accompany marriages and like occasions, honour and fame come from the ruling power, and garments and wealth of many kinds arrive.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक 40–41 की शुभ-शर्तों (शनि केन्द्र/त्रिकोण, उच्च/स्व-राशि, मित्र-युति) का परिणाम-विस्तार है; कोई नई संख्या नहीं, केवल पूर्व-स्थापित योग का फल-कथन।

52.43
दायेशादथ रन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते |
वातशूलमहाव्याधिज्वरातीसारपीडनम्
dāyeśādatha randhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute |
vātaśūlamahāvyādhijvarātīsārapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा/दाय-स्वामी (काल-खंड का अधिपति); रन्ध्रस्थ = ८वें भाव में स्थित; व्यय = १२वाँ भाव; पापसंयुक्त = पाप-ग्रह से युक्त/संपृक्त; वातशूल = वात-प्रकृति का शूल-पीड़ा (शास्त्रीय फल-पद); महाव्याधि = गुरुतर व्याधि-संकेत (फल-भाषा); ज्वर = ज्वर; अतीसार = अतिसार; पीडनम् = पीड़ा/क्लेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दायेश रन्ध्र (८) या व्यय (१२) में हो, अथवा पाप-ग्रह से युक्त हो, तो उस काल-खंड में वातशूल, महाव्याधि, ज्वर और अतीसार आदि पीड़ा का संकेत दिया गया है। यह फल-कथन दशा-स्वामी की भाव-स्थिति और पाप-संगति पर टिका है। यहाँ कोई निश्चित रोग-निदान नहीं; केवल शास्त्र की संकेतात्मक भाषा है।

English rendering The text states that when the period-lord stands in the eighth or twelfth, or is joined with malefics, the result indicated is affliction of the kinds named—vāta-śūla, grave disease, fever, and atīsāra. These are phala-claims of the śāstra, not medical diagnoses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-स्वामी की ८/१२ स्थिति या पाप-योग)। जाँच-नियम: दायेश की राशि-स्थिति = ८वें या १२वें भाव से, अथवा पाप-युति; फल आगे के श्लोकों से जुड़ा रहता है।

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52.44
बन्धनं कार्यहानिश्च वित्तनाशो महद्भयम् |
अकश्मात्कलहश्चैव दायादजनविग्रहः
bandhanaṃ kāryahāniśca vittanāśo mahadbhayam |
akaśmātkalahaścaiva dāyādajanavigrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धन = बंधन/कैद-संकेत; कार्यहानि = कार्य/उद्यम की हानि; वित्तनाश = धन-नाश; महद्भय = महान् भय; अकस्मात् = अचानक; कलह = झगड़ा; दायादजन = दाय-भागी/संबंधी जन; विग्रह = विरोध/कलह।

हिन्दी भावार्थ उसी प्रसंग में शास्त्र आगे कहता है — बंधन, कार्य-हानि, वित्त-नाश और महद्भय; तथा अचानक कलह और दायाद-जनों से विग्रह। यह पूर्व-श्लोक की पाप/रन्ध्र-व्यय स्थिति का विस्तारित फल-समूह है। फल को “हो ही जाएगा” नहीं पढ़ें — शास्त्रीय संकेत-मात्र समझें।

English rendering The text continues the same result-set: bondage, loss of work, destruction of wealth, great fear, sudden quarrel, and conflict with co-heirs or kin. Report these as the śāstra’s stated indications under the prior configuration, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामाजिक-आर्थिक और बंधन-संकेत)। पूर्व शर्त (५२.४३) के अधीन फल-सूची का विस्तार।

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52.45
भुक्त्यादौ मित्रहानिःस्यान्मध्ये किञ्चित्सुखावहम् |
अन्ते क्लेशकरं चैव नीचे तेषां तथैव च
bhuktyādau mitrahāniḥsyānmadhye kiñcitsukhāvaham |
ante kleśakaraṃ caiva nīce teṣāṃ tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति = अंतर्दशा/उप-काल; आदौ = आरंभ में; मित्रहानि = मित्र-हानि; मध्ये = मध्य-भाग में; किञ्चित् = कुछ; सुखावह = सुख देने वाला; अन्ते = अंत में; क्लेशकर = क्लेश उत्पन्न करने वाला; नीचे = नीच-राशि में; तेषां = उनका (उन्हीं का); तथैव = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र भुक्ति को तीन खंडों में बाँटता है — आरंभ में मित्र-हानि, मध्य में कुछ सुख, अंत में क्लेश। और कहता है कि जब वे (संबंधित ग्रह) नीच में हों तो भी वही क्रम/प्रवृत्ति समझनी चाहिए। यह काल-खंड के अंदर “आरंभ–मध्य–अंत” का गुणात्मक विभाजन है, न कि संख्यात्मक फल-सूची।

English rendering The text divides the bhukti into three phases: loss of a friend at the start, some ease in the middle, and affliction at the end; and states the same pattern when those planets are debilitated. Phase-structure is qualitative, not a formula for exact events.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-त्रिभाग: आदि / मध्य / अंत + नीच-समानता)। वैकल्पिक काल-विभाजन (सम्मेलन घोषित करें): भुक्ति-काल T को तीन लगभग समान खंडों T/3 में पढ़ा जा सकता है; शास्त्र स्वयं T का संख्या-सूत्र यहाँ नहीं देता। अंतर्दशा-अवधि का सामान्य अनुपात (विंशोत्तरी): T_antar = (M × A) / 120 वर्ष, जहाँ M = महादशा-वर्ष, A = अंतर्ग्रह-वर्ष; Σ M = १२०।

उदाहरण (worked example) मान लें चंद्र-महादशा (१० वर्ष) में सूर्य-अंतर्दशा: T = (10 × 6) / 120 = 0.5 वर्ष = ६ मास। त्रिभाग (सम्मेलन: समान): आदि ≈ २ मास, मध्य ≈ २ मास, अंत ≈ २ मास। शास्त्र कहता है — आदि में मित्र-हानि का संकेत, मध्य में किंचित् सुख, अंत में क्लेश; नीच-स्थिति में भी तथैव। यह खंड-सीमा शास्त्रीय संख्या नहीं, केवल पठन-सम्मेलन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में अंतर्दशा शुद्ध अनुपात-गणित है — (महादशा-वर्ष × अंतर्-ग्रह-वर्ष) / १२०; नौ ग्रह-वर्ष: केतु ७, शुक्र २०, सूर्य ६, चंद्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७ (Σ = १२०)। भुक्ति का आदि–मध्य–अंत फल गुणात्मक है; इंजन अवधि `==` अनुपात से निकालता है, फल की “निश्चित घटना” नहीं गढ़ता।

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52.46
पितृमातृवियोगश्च गमनागममं तथा |
द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युभयं भवेत्
pitṛmātṛviyogaśca gamanāgamamaṃ tathā |
dvitīyadyūnanāthe tu apamṛtyubhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृमातृवियोग = माता-पिता से वियोग; गमनागमन = आना-जाना / यात्रा-चंचलता; द्वितीय = द्वितीय भाव; द्यून = सप्तम भाव (द्यून = ७); नाथ = स्वामी; अपमृत्युभय = अपमृत्यु का भय (शास्त्रीय फल-पद); भवेत् = हो — शास्त्र-वचन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पितृ-मातृ वियोग तथा गमनागमन भी इस प्रसंग में संकेतित हैं। और “द्वितीय-द्यून-नाथ” की स्थिति में अपमृत्यु-भय कहा गया है (पाठ में द्वितीय तथा द्यून = ७ के स्वामित्व/संबंध का संकेत; पाठ-भेद/अन्वय-भेद संभव)। भय-पद को रोग-निश्चितता या मृत्यु-घोषणा न बनाएँ — केवल शास्त्र का फल-शब्द है।

English rendering The text also indicates separation from parents and restlessness of coming-and-going. When the second-and/or seventh (dyūna) lord is involved as stated, it speaks of fear of untimely death—as a phala-term of the śāstra, not a clinical or fatal verdict. Reading of the compound dvitīya-dyūna-nātha may admit slight anvaya variance (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वियोग, गमनागमन, अपमृत्यु-भय)। भाव-सूचकांक: द्वितीय = २, द्यून = ७; “नाथ” = उस भाव का स्वामी — स्थिति/दशा-योग की शर्त पाठ-सापेक्ष।

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52.47
कृष्णां गां महिषीं दद्यान्मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम्
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyānmṛtyuñjayajapaṃ caret |
chāgadānaṃ prakurvīta sarvasampatpradāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृष्णा गौ = काली गाय; महिषी = भैंस; दद्यात् = दे — शास्त्रोक्त दान-विधि; मृत्युञ्जयजप = मृत्युंजय मंत्र-जप; चरेत् = करे; छागदान = छाग (बकरा)-दान; सर्वसम्पत्प्रदायक = सर्व सम्पत्ति देने वाला — शास्त्र का गुण-कथन।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र शांति/दान-उपाय बताता है — कृष्ण गौ और महिषी का दान, मृत्युंजय-जप, तथा छाग-दान; और कहता है कि यह सर्व-सम्पत् देने वाला है। यह पाठ का अपना उपचार-वचन है। इस संस्करण में हम उपाय को दबाव, भय या “जरूरी इलाज” की तरह नहीं बढ़ाते — केवल शास्त्र क्या कहता है, उतना ही।

English rendering The text prescribes giving a black cow and a buffalo, performing Mṛtyuñjaya japa, and the gift of a goat, calling the rite a bestower of all prosperity. Present this as the śāstra’s own remedial statement—not as pressure, guarantee, or medical counsel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शांति/दान-विधान (फल-उपाय कथन)। कोई वर्ष, अंश या बल-इकाई यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

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52.48
सूर्यास्यान्तर्गते सौम्ये स्वोच्चे वा स्वर्क्षगेऽपि वा |
केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे बुधे वर्गबलैर्युते
sūryāsyāntargate saumye svocce vā svarkṣage'pi vā |
kendratrikoṇalābhasthe budhe vargabalairyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यास्यान्तर्गत = सूर्य की अंतर्दशा में; सौम्य = बुध; स्वोच्च = स्व-उच्च राशि में; स्वर्क्ष = स्व-राशि में; केन्द्र = १, ४, ७, १०; त्रिकोण = १, ५, ९; लाभ = ११वाँ भाव; बुध = Mercury; वर्गबल = वर्गों (षोडश-वर्ग आदि) से प्राप्त बल; युते = युक्त/संपन्न।

हिन्दी भावार्थ अब प्रसंग पलटता है — जब सूर्य की अंतर्दशा में बुध हो, और बुध स्व-उच्च या स्व-राशि में हो, अथवा केन्द्र/त्रिकोण/लाभ में स्थित हो, तथा वर्ग-बल से युक्त हो, तो आगे (५२.४९) शुभ फल कहा गया है। शर्तें स्पष्ट हैं: (१) सूर्य-अंतर्दशा, (२) बुध की उच्च/स्व/केन्द्र-त्रिकोण-लाभ स्थिति, (३) वर्गबल-संपन्नता।

English rendering When Mercury runs inside the Sun’s antardaśā, and Mercury is in exaltation or own sign, or placed in a kendra, trikoṇa, or the eleventh, and is endowed with varga-strength, the text sets the conditions for the favourable results of the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
(१) विंशोत्तरी अंतर्दशा: T_सूर्य-अन्तर् = (M_md × 6) / 120 वर्ष, जहाँ M_md = चालू महादशा के वर्ष (सूर्य स्वयं ६; Σ चक्र = १२०)।
(२) भाव-समुच्चय (लग्न से, पूर्ण-भाव सम्मेलन जब घोषित): केन्द्र ∈ {1,4,7,10}, त्रिकोण ∈ {1,5,9}, लाभ = 11।
(३) बुध उच्च = कन्या; स्व-राशि = मिथुन, कन्या (कन्या में उच्च+स्व दोनों लागू — सम्मेलन स्पष्ट रखें)।
(४) वर्गबल: षोडश-वर्ग (D1…D60) में ग्रह की स्थिति से निर्धारित बल — प्रत्येक वर्ग ३०° राशि का नियत चाप-विभाजन (मापांक-अंकगणित); योग “वर्गबलैर्युते” = उन वर्ग-स्थितियों में बलवान् होना (पूर्ण षड्बल-सूत्र यहाँ नहीं; वर्ग-अंग)।
अयनांश और भाव-पद्धति फल की संख्यात्मक जाँच में घोषित करें।

उदाहरण (worked example) सम्मेलन: विंशोत्तरी; लग्न-केन्द्र पूर्ण भाव; अयनांश कोई भी pinned (केवल राशि-स्थित उदाहरण)। मान लें गुरु-महादशा (१६ वर्ष) में सूर्य-अंतर्दशा: T = (16 × 6) / 120 = 0.8 वर्ष ≈ ९.६ मास। बुध = १५° कन्या → स्व+उच्च; लग्न मेष मानें तो कन्या = ६ — केन्द्र/त्रिकोण/लाभ नहीं, किंतु स्वोच्च शर्त पूरी। वर्ग: D9 में भी यदि बुध शुभ/बलवान् वर्ग में हो तो “वर्गबलैर्युते” की शास्त्र-शर्त की दिशा में। फल ५२.४९ में।

हमारा डिकोड (Our Decode) सूर्य-अंतर्दशा विंशोत्तरी अनुपात से `==` अवधि देती है; षोडश-वर्ग इंजन प्रत्येक D-वर्ग को ३०° के समान चापों में बाँटकर राशि-मानचित्र करता है (D1, D2 होरा, D3, D4, D7, D9, D10, D12, D16, D20, D24, D27, D30, D40, D45, D60)। “वर्गबल” की गणना वर्ग-स्थितियों से; फल-वाक्य अलग परत — गणित और व्याख्या अलग रखी जाती है।

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52.49
राज्यलाभो महोत्साहो दारपुत्रादिसौख्यकृत् |
महारजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणं
rājyalābho mahotsāho dāraputrādisaukhyakṛt |
mahārajaprasādena vāhanāmbarabhūṣaṇaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यलाभ = राज्य/पद/अधिकार-लाभ (शास्त्रीय पद); महोत्साह = महान् उत्साह; दार = पत्नी/जीवनसाथी; पुत्रादि = पुत्र आदि; सौख्यकृत् = सुख करने वाला; महारजप्रसाद = महाराज/बड़े शासक का अनुग्रह; वाहन = वाहन; अम्बर = वस्त्र; भूषण = आभूषण।

हिन्दी भावार्थ पूर्व शर्तों (५२.४८) के पूरा होने पर शास्त्र कहता है — राज्य-लाभ, महोत्साह, दार-पुत्रादि से सौख्य; तथा महाराज-प्रसाद से वाहन, वस्त्र और भूषण। यह शुभ फल-समूह है — पद-लाभ और राज-अनुग्रह की शास्त्र-भाषा में। इसे आधुनिक नौकरी/धन की गारंटी न बनाएँ; केवल पाठ का कथन रखें।

English rendering Under the conditions of the previous verse, the text states gain of rank or realm, great zeal, happiness through spouse and children, and—through a great king’s favour—conveyances, garments, and ornaments. These are the śāstra’s phala-claims, not guarantees of office or wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ योग-फल; शर्त = ५२.४८)। कोई नई अवधि, अंश या बल-सीमा यहाँ नहीं; केवल परिणाम-सूची।

52.50
पुण्यतीर्थफलावाप्तिर्गृहे गोधनसंकुलम् |
भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभवृद्धिकोरो भवेत्
puṇyatīrthaphalāvāptirgṛhe godhanasaṃkulam |
bhāgyalābhādhipairyukte lābhavṛddhikoro bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुण्यतीर्थ-फल-अवाप्तिः = तीर्थ-यात्रा का पुण्यफल; गृहे = घर में; गोधन-संकुलम् = गोधन से भरा-पूरा; भाग्य = नवम (9); लाभ = एकादश (11); अधिपैर्युक्ते = इन भावेशों से युक्त; लाभवृद्धिकरः = लाभ-वृद्धि करने वाला (पाठ "लाभवृद्धिकोरो" — पाठ-भेद संभव, सम्भवतः "लाभवृद्धिकरो")।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस अन्तर में तीर्थ-यात्रा का पुण्यफल मिलता है और घर गोधन से भर जाता है; और यदि बुध नवमेश (भाग्येश) व एकादशेश (लाभेश) से युक्त हो, तो लाभ की वृद्धि होती है।

English rendering The text states that the merit-fruit of holy pilgrimage is attained and the home abounds in cattle-wealth; and when Mercury is joined with the lords of the 9th (bhāgya) and 11th (lābha), increase of gains follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — भाग्य = 9, लाभ = 11; बुध का इन भावेशों से योग शुभ-लाभ-वृद्धि का हेतु कहा गया। फल-कथन का अनुशासन: यह शास्त्र-कथन है, भविष्यवाणी नहीं। पाठ "लाभवृद्धिकोरो" संदिग्ध — पाठ-भेद संभव।

52.51
भाग्यपंचमकर्मस्थे सन्मानो भवति ध्रुवम् |
सुकर्मधर्मबुद्धिश्च गुरुदेवद्विजार्जनम्
bhāgyapaṃcamakarmasthe sanmāno bhavati dhruvam |
sukarmadharmabuddhiśca gurudevadvijārjanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्य = नवमेश; पंचम = पंचम भाव; कर्मस्थे = दशम (कर्म) भाव में स्थित; सन्मानः = सम्मान; ध्रुवम् = निश्चित रूप से (शास्त्र-वचन की दृढ़ता); सुकर्म = शुभ कर्म; धर्मबुद्धि = धर्म-बुद्धि; गुरुदेवद्विजार्जनम् = गुरु–देव–द्विज संबंधी अर्जन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भाग्येश पंचम या कर्म (दशम) भाव में स्थित हो, तो सन्मान निश्चित रूप से होता है। साथ ही सुकर्म, धर्म-बुद्धि, तथा गुरु–देव–द्विज से जुड़े अर्जन का उल्लेख है। यह स्थान-फल है — भाव-स्थिति का शास्त्रीय परिणाम-वर्णन।

English rendering The text states that when the ninth-lord stands in the fifth or the tenth (karma), honour surely arises, along with good works, a dharma-oriented intellect, and earnings connected with preceptors, deities, and the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवमेश का ५/१० स्थान)। भाव-सूचकांक ५ (पंचम) और १० (कर्म) शास्त्र की भाषिक परंपरा के नियत नाम हैं; फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

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52.52
धनधान्यादिसंयुक्तो विवाहः पुत्रसम्भवः |
दायेशाच्छुभराशिस्थे सौम्ययुक्ते महत्सुखम्
dhanadhānyādisaṃyukto vivāhaḥ putrasambhavaḥ |
dāyeśācchubharāśisthe saumyayukte mahatsukham
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनधान्यादिसंयुक्तः = धन-धान्य आदि से युक्त; विवाहः = विवाह; पुत्रसम्भवः = पुत्र-जन्म; दायेशात् = दायेश (महादशा-स्वामी) से; शुभराशिस्थे = शुभ राशि में स्थित (अन्तर्दशा-स्वामी) होने पर; सौम्ययुक्ते = शुभ ग्रह से युक्त; महत्सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-महादशा की अन्तर्दशाओं के फल-क्रम में — शास्त्र कहता है कि (अन्तर्दशा-स्वामी की शुभ स्थिति में) धन-धान्य की प्राप्ति, विवाह और पुत्र-जन्म होते हैं; और यदि वह महादशा-स्वामी से शुभ राशि में हो तथा शुभ ग्रह से युक्त हो तो महान् सुख कहा गया है। यह विंशोत्तरी-ढाँचे का फल-कथन है।

English rendering (In the sub-period described) there is gain of wealth and grain, marriage and the birth of a son; and when the sub-period lord stands in a benefic sign from the mahādaśā lord and is joined by a benefic, the text promises great happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (विंशोत्तरी अन्तर्दशा)। ढाँचा: सूर्य-महादशा = 6 वर्ष; किसी ग्रह P की अन्तर्दशा = (6 × वर्ष_P) ÷ 120; शर्त: राशि(अन्तर्दशेश) शुभ, दायेश से गिनकर; सौम्य-युति।

52.53
वैवाहिकं यज्ञकर्म दानधर्मजपादिकम् |
स्वनामाङ्कितपद्यानि नामद्वयमथाऽपि वा
vaivāhikaṃ yajñakarma dānadharmajapādikam |
svanāmāṅkitapadyāni nāmadvayamathā'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वैवाहिकम् = विवाह-सम्बन्धी शुभ कार्य; यज्ञकर्म = यज्ञ-अनुष्ठान; दानधर्मजप-आदिकम् = दान, धर्म, जप आदि पुण्य-कर्म; स्व-नाम-अङ्कित-पद्यानि = अपने नाम से अंकित काव्य/पद्य-रचनाएँ; नाम-द्वयम् = द्वितीय नाम अर्थात् उपाधि/यश-सूचक नाम; अथ वा = अथवा। (सन्दर्भ: श्लोक 48 से आरम्भ बुध-अन्तर्दशा का शुभ-फल-प्रकरण।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की महादशा में बुध की शुभ-स्थित अन्तर्दशा में जातक विवाह, यज्ञकर्म तथा दान-धर्म-जप आदि पुण्य-कार्यों में प्रवृत्त होता है। वह अपने नाम से अंकित काव्य-रचता है और द्वितीय नाम अर्थात् मान-सूचक उपाधि भी प्राप्त करता है। यह बुध-अन्तर के अनुकूल फलों की गणना है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that during a well-placed Mercury sub-period within the Sun's major period, one turns to marriage rites, sacrificial acts, and works of charity, dharma and recitation — composing verses inscribed with one's own name, and even acquiring a second name or title.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-अन्तर्दशा का शुभ-पक्ष)। एक अन्तर्दृष्टि: श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता, किन्तु "बुध-अन्तर" का समय-खण्ड विंशोत्तरी के शुद्ध अनुपात-गणित से निश्चित है — फल की व्याख्या से पहले उसकी अवधि परिकलित होती है।

उदाहरण (worked example) परिपाटी — विंशोत्तरी, दोष-रहित अनुपात-नियम अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। सूर्य महादशा = 6 वर्ष, बुध = 17 वर्ष। ⟹ सूर्य–बुध अन्तर्दशा = (6 × 17) ÷ 120 = 102 ÷ 120 = 0.85 वर्ष = 10.2 माह = 10 माह 6 दिन। इसी 10 माह 6 दिन के खण्ड पर यह श्लोक-फल आरोपित होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय स्पष्ट रूप से "विंशोत्तरी-मत" (श्लोक 52) का सूर्य-दशान्तर्दशा-फल है, अतः हमारी दशा-गणना का प्रत्यक्ष क्षेत्र है। दोसिये-मान्य 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) से हमारे kaal दशा-इंजन ने प्रत्येक अन्तर्दशा-सीमा को शुद्ध अनुपात-अंकगणित द्वारा निर्धारित किया — फल तभी सार्थक है जब उसका समय-खण्ड ठीक बैठे।

52.54
भोजनाम्बरभूषाप्तिरमरेशो भवेन्नरः |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे रिष्फगे नीचगेऽपि वा
bhojanāmbarabhūṣāptiramareśo bhavennaraḥ |
dāyeśādripurandhrasthe riṣphage nīcage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजन = अन्न; अम्बर = वस्त्र; भूषाप्तिः = आभूषण की प्राप्ति; अमरेशः = अमरों का ईश (इंद्र-तुल्य ऐश्वर्य-उपमा); नरः = मनुष्य; दायेश = दशा-ईश (दशा-स्वामी); रिपु = शत्रु-स्थान/शत्रु-भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; रिष्फ = व्यय/द्वादश (रिष्फ); नीचगे = नीच राशि में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भोजन–वस्त्र–भूषा की प्राप्ति होती है और नर अमरेश-सा हो जाता है — यह शुभ पक्ष। फिर शर्त: जब दायेश (दशा-स्वामी) रिपु, रन्ध्र (८), रिष्फ (१२) में हो, अथवा नीचगत हो, तब आगे के श्लोकों का दुःख-क्रम लागू होता है। शुभ-सूची और स्थान-दोष की शर्त एक ही श्लोक में जुड़े हैं।

English rendering The text states acquisition of food, clothing, and ornaments, and that the person becomes like the lord of the immortals; yet when the daśā-lord stands in an enemy context, in the eighth (randhra), in the twelfth (riṣpha), or in debilitation, the adverse sequence that follows applies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थान-शर्त। शर्त-सूचकांक शास्त्रीय भाव-नाम से: रन्ध्र = ८, रिष्फ = १२; नीच = ग्रह की पारंपरिक नीच-राशि। दशा-स्वामी की राशि/भाव-स्थिति जन्म-कुंडली (D1) और स्वीकृत अयनांश पर निर्भर — फल का द्वार स्थान है, अंक-सूत्र नहीं।

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52.55
देहपीडा मनस्तापो दारपुत्रादिपीडनम् |
भुक्त्यादौ दुःखमाप्नोति मध्ये किञ्चित्सुखावहम्
dehapīḍā manastāpo dāraputrādipīḍanam |
bhuktyādau duḥkhamāpnoti madhye kiñcitsukhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-पीडा = शारीरिक कष्ट; मनस्-तापः = मानसिक सन्ताप; दार-पुत्र-आदि-पीडनम् = पत्नी-पुत्र आदि को पीड़ा; भुक्ति-आदौ = अन्तर्दशा (भुक्ति) के आरम्भ में; दुःखम् आप्नोति = दुःख पाता है; मध्ये = मध्य-काल में; किञ्चित् सुखावहम् = कुछ सुखदायी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-श्लोक की अशुभ स्थिति में) देह-पीड़ा, मानसिक सन्ताप तथा पत्नी-पुत्रादि को कष्ट होता है। बुध-अन्तर के आरम्भ में दुःख, मध्य-भाग में कुछ सुख — यह त्रि-कालिक विभाजन इसी अन्तर्दशा के समय-खण्ड के भीतर की सूक्ष्म रचना दर्शाता है। ये सम्भावित फल हैं, नियति नहीं।

English rendering There is bodily affliction, mental anguish, and trouble to wife and children; at the outset of the sub-period one meets sorrow, while in its middle stretch some measure of ease arrives.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रि-कालिक आदौ/मध्ये/अन्ते विभाजन)। अन्तर्दृष्टि: "भुक्त्यादौ–मध्ये–अन्ते" संकेत करता है कि अन्तर्दशा-खण्ड और भी उप-विभाजित है — यही प्रत्यन्तर्दशा (उप-उप-अवधि) है, जो उसी अनुपात-नियम की पुनरावृत्ति से जन्म लेती है।

उदाहरण (worked example) सूर्य–बुध अन्तर्दशा = 10.2 माह (श्लोक 53 देखें)। समान त्रिखण्डन में प्रत्येक "आदौ/मध्ये/अन्ते" चरण ≈ 10.2 ÷ 3 = 3.4 माह। परम्परा में यह त्रि-कालिक फल वस्तुतः अन्तर्दशा के भीतर की प्रत्यन्तर-श्रृंखला के अनुसार बँटता है — प्रत्यन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष × प्रत्यन्तर-वर्ष) ÷ (120 × 120), जो असमान किन्तु परिकलनीय चरण देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "आदौ/मध्ये/अन्ते" का यही पुनरावर्ती अनुपात-तर्क हमारे दशा-इंजन में महादशा → अन्तर्दशा → प्रत्यन्तर तक एक ही सूत्र (अंश × ग्रह-वर्ष ÷ 120) की क्रमिक पुनरावृत्ति से लागू है — शुद्ध अनुपात-अंकगणित, न कि व्याख्यात्मक अनुमान (vedic-ghadi/kaal दशा-इंजन)।

52.56
अन्ते तु राजभीतिश्च गमनागमनं तथा |
द्वितीये द्यूननाथे तु देहजाड्यं ज्वरादिकम्
ante tu rājabhītiśca gamanāgamanaṃ tathā |
dvitīye dyūnanāthe tu dehajāḍyaṃ jvarādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = अंत में; राजभीतिः = राज/अधिकार-भय; गमनागमनम् = आना-जाना/यात्रा; द्वितीये = द्वितीय भाव में; द्यूननाथे = द्यून (सप्तम) के नाथ/स्वामी के (स्थित होने पर); देहजाड्यम् = देह का जाड्य/शिथिलता; ज्वरादिकम् = ज्वर आदि।

हिन्दी भावार्थ भुक्ति के अंत में शास्त्र राज-भीति और गमनागमन कहता है — पूर्व श्लोक की आदि–मध्य श्रृंखला का तीसरा खंड। फिर: जब द्यूननाथ (सप्तमेश) द्वितीय भाव में हो, तब देह-जाड्य और ज्वरादि का उल्लेख है। यह स्थान-शर्त + काल-खंड का संयुक्त फल-पाठ है; चिकित्सा-निदान नहीं, शास्त्रीय संकेत-मात्र।

English rendering The text states that at the end there is fear of the king (authority) and coming-and-going; and when the seventh-lord (dyūnanātha) stands in the second, dullness of body and fever and the like are indicated — again as the śāstra’s phala-language, not a clinical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-अंत + सप्तमेश का द्वितीय-स्थान)। भाव-सूचकांक: द्यून = ७, द्वितीय = २। सूर्य-महादशा की अंतर्-अवधि पूर्ववत् (६ × y) ÷ १२०; “अंत” खंड ≈ T/३ (पठन-परंपरा; श्लोक संख्या नहीं देता)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में सूर्य = ६ वर्ष — यही ५२.५२–५६ खंड का काल-ढाँचा है; अंतर्दशा शुद्ध अनुपात है, फल-पाठ अलग परत। गणित और फल को मिलाना वर्जित: अवधि `==` से सत्यापित होती है; “राजभीति/ज्वर” आदि को भविष्य-निश्चित नहीं कहा जाता — केवल पाठ का प्रतिवेदन।

52.57
विष्णुनामसहस्रं च ह्यन्नदानं च कारयेत् |
रजतप्रतिमादानं कुर्यादारोग्यसिद्धये
viṣṇunāmasahasraṃ ca hyannadānaṃ ca kārayet |
rajatapratimādānaṃ kuryādārogyasiddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विष्णु-नाम-सहस्रम् = विष्णु के सहस्र नामों का जप/पाठ; अन्न-दानम् = अन्न का दान; कारयेत् = (शास्त्रानुसार) करवाए / करे; रजत-प्रतिमा-दानम् = रजत (चाँदी) की प्रतिमा का दान; कुर्यात् = करे; आरोग्य-सिद्धये = आरोग्य-सिद्धि के हेतु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ फल-कथन के साथ एक उपाय-क्रम भी जोड़ता है। यह कहता है कि विष्णु-नाम-सहस्र का अनुष्ठान तथा अन्न-दान कराया जाए। साथ ही रजत-प्रतिमा का दान आरोग्य-सिद्धि के प्रयोजन से कहा गया है। यह विधान फल-संदर्भ का अंग है; इसे भय या दबाव के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that one should have the thousand names of Viṣṇu recited and food given in charity, and that a silver image should be donated for the attainment of health. These are the śāstra’s own prescribed acts in this context, not a medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन के साथ शास्त्रोक्त उपाय-विधान। संख्या यहाँ “सहस्र” (१००० नाम) के रूप में पाठ-संकेत है, गणना-सूत्र नहीं।

52.58
सूर्यस्यान्तर्गते केतौ देहपीडा मनोव्यथा |
अर्थव्ययं राजकोपं स्वजनादेरुपद्रवम्
sūryasyāntargate ketau dehapīḍā manovyathā |
arthavyayaṃ rājakopaṃ svajanāderupadravam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर्-गते = सूर्य की महादशा में अन्तर्दशा में स्थित; केतौ = केतु (अन्तर्दशा); देह-पीडा = देह में पीड़ा; मनो-व्यथा = मन की व्यथा; अर्थ-व्ययम् = धन-व्यय; राज-कोपम् = राज/शासन-कोप; स्वजनादेः = स्वजन आदि से; उपद्रवम् = उपद्रव / क्लेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की महादशा में केतु की अन्तर्दशा में देह-पीड़ा और मनोव्यथा का फल वर्णित है। अर्थ-व्यय तथा राज-कोप भी इसी संदर्भ में कहा गया है। स्वजन आदि से उपद्रव का उल्लेख पाठ में स्पष्ट है। यह दशा-फल का कथन है, नियति या चिकित्सकीय निदान नहीं।

English rendering The text states that when Ketu’s antardaśā runs within the Sun’s mahādaśā, indications include bodily pain, mental distress, expenditure of wealth, the wrath of authority, and trouble from one’s own people. These are phala statements of the daśā scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अवधि विंशोत्तरी में अनुपात-गणित है:
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०।
सूर्य महादशा = ६ वर्ष; केतु = ७ वर्ष → केतु-अन्तर् (सूर्य में) = (६ × ७) ÷ १२० = ४२/१२० = ७/२० = ०.३५ वर्ष ≈ ० वर्ष ४ मास ६ दिन (३६०-दिन वर्ष-मान पर; दिन-गणना पद्धति घोषित करनी चाहिए)। शेष फल-कथन गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, Σ = १२० वर्ष। सूर्य-महादशा ६, केतु ७:
केतु-अन्तर्दशा = ६ × ७ / १२० = ०.३५ वर्ष।
यदि सूर्य-महादशा का आरंभ तिथि T₀ हो, तो यह केतु-खण्ड T₀ से T₀ + ०.३५ वर्ष तक (अन्य अन्तर्-क्रम शास्त्र/परंपरा के अनुसार) पड़ता है। अयनांश दशा-कुंजी नक्षत्र-अंश पर लगती है; यहाँ केवल अवधि-अनुपात दिखाया गया।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७, शुक्र २०, सूर्य ६, चंद्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; Σ = १२०) और अन्तर् = (महा × अन्तर्)/१२० — यही शुद्ध अनुपात हमने दशा-इंजन में जड़ा है। यह श्लोक फल देता है; अवधि-गणित उसी १२०-वर्ष कुंजी पर टिका है। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखा जाता है, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

52.59
लग्नाधिपेन संयुक्ते आदौ सौख्यं धनागमम् |
मध्ये तत्क्लेशमाप्नोति मृतवार्तागमं वदेत्
lagnādhipena saṃyukte ādau saukhyaṃ dhanāgamam |
madhye tatkleśamāpnoti mṛtavārtāgamaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-अधिपेन = लग्नेश के साथ; संयुक्ते = युक्त होने पर; आदौ = आरंभ में; सौख्यम् = सुख; धन-आगमम् = धन का आगमन; मध्ये = मध्य भाग में; तत्-क्लेशम् = वही/तदनुरूप क्लेश; आप्नोति = प्राप्त करता है; मृत-वार्ता-आगमम् = मृत्यु-संबंधी वार्ता का आना; वदेत् = कहे (शास्त्र-वाणी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-संदर्भित दशा/स्थिति में) जब योग लग्नेश से संयुक्त हो, तो आरंभ में सौख्य और धनागम कहा गया है। मध्य काल में क्लेश का फल बताया गया है। “मृतवार्तागम” — मृत्यु-संबंधी समाचार का आना — पाठ का अपना कथन है; इसे निश्चित घटना नहीं मानना।

English rendering The text states that when the configuration is joined with the lord of the lagna, the beginning brings comfort and inflow of wealth, while the middle brings distress, and news connected with death is to be spoken of. Sequence of phala within a period is the point, not a fixed fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल का काल-विभाजन (आदि / मध्य) वर्णनात्मक है। “आदि–मध्य” को संख्यात्मक तिहाई में बाँधने का स्पष्ट सूत्र इस श्लोक में नहीं; पाठ-भेद/टीका-परंपरा संभव।

52.60
अथाष्टमव्यये चैवं दायेशात्पापसंयुते |
कपोलदन्तरोगश्च मूत्रकृर्च्छस्य सम्भवः
athāṣṭamavyaye caivaṃ dāyeśātpāpasaṃyute |
kapoladantarogaśca mūtrakṛrcchasya sambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब / तथा; अष्टम-व्यये = अष्टम एवं व्यय (१२वें) भाव में / उनसे संबंधित स्थिति में; च एवम् = इसी प्रकार; दायेशात् = दायेश (दशा-स्वामी) से; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर; कपोल-दन्त-रोगः = कपोल एवं दन्त संबंधी रोग; च = और; मूत्र-कृर्च्छस्य = मूत्रकृच्छ्र (मूत्र-कष्ट) का — पाठ: कृर्च्छ; सम्भवः = संभावना / होना कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि अष्टम और व्यय के संदर्भ में, तथा दायेश के पाप-संयुक्त होने पर, कपोल-दन्त रोग का फल वर्णित है। मूत्रकृच्छ्र (मूत्र-मार्ग का कष्ट) का संभव होना भी पाठ में कहा गया है। यह अरिष्ट/रोग-फल की शास्त्रीय भाषा है; चिकित्सकीय निदान या भय-वाणी नहीं। “कृर्च्छ” पाठ में कृच्छ्र-अर्थ स्वीकार्य; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that likewise in connection with the eighth and twelfth, and when the period-lord is joined with a malefic, there is indication of cheek-and-tooth affliction and the arising of urinary difficulty (mūtra-kṛcchra). Report as the śāstra’s phala, not as a medical prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-स्थित फल-कथन (८, १२) + दायेश-पाप-योग। भाव-गणना लग्न/चंद्र/दायेश से — संदर्भ अध्याय-प्रवाह पर निर्भर; यहाँ स्पष्ट “लग्नात्” नहीं।

52.61
स्थानविच्युतिरर्थस्य मित्रहानिः पितुर्मृतिः |
विदेशगमनं चैव शत्रुपीडा महद्भयम्
sthānavicyutirarthasya mitrahāniḥ piturmṛtiḥ |
videśagamanaṃ caiva śatrupīḍā mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थान-विच्युतिः = पद/स्थान से च्युति; अर्थस्य (हानिः) = धन की हानि; मित्र-हानिः = मित्रों की हानि; पितुः मृतिः = पिता की मृत्यु; विदेश-गमनम् = परदेश-यात्रा; शत्रु-पीडा = शत्रुओं से पीड़ा; महत् भयम् = महान् भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस (पूर्व-शर्त-सापेक्ष) केतु-अन्तर में स्थान-च्युति, धन-हानि, मित्र-वियोग, पिता को कष्ट, विदेश-गमन, शत्रु-पीड़ा तथा महाभय की सम्भावना कहता है। ये गम्भीर सम्भावनाएँ शास्त्र की कथन-श्रेणी में हैं — "पितुर्मृति" जैसे वचन को भी हम भविष्य-निश्चय के रूप में नहीं, शास्त्र-उक्ति के रूप में ही रखते हैं। भय या दबाव अभिप्रेत नहीं।

English rendering The text speaks of loss of position and wealth, parting from friends, affliction to the father, journeys abroad, trouble from enemies, and great fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गम्भीर अशुभ-सूची)। अन्तर्दृष्टि: यहाँ हमारा अनुशासन-सिद्धान्त सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है — ऐसे कठोर वचन गणित से नहीं निकलते; वे शास्त्र की व्याख्या-परत हैं, जिन्हें "शास्त्र कहता है" कहकर ही उद्धृत किया जाता है, निश्चय के रूप में कभी नहीं।

52.62
लग्नादुपचये केतौ योगकारकसंयुते |
शुभांशे शुभवर्गे च शुभकर्मफलोदयः
lagnādupacaye ketau yogakārakasaṃyute |
śubhāṃśe śubhavarge ca śubhakarmaphalodayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् उपचये = लग्न से उपचय भाव में (३, ६, १०, ११); केतौ = केतु स्थित; योग-कारक-संयुते = योगकारक ग्रह से युक्त; शुभ-अंशे = शुभ अंश (भागा/वर्गांश) में; शुभ-वर्गे = शुभ वर्ग (षोडशवर्गादि) में; च = और; शुभ-कर्म-फल-उदयः = शुभ कर्मों के फल का उदय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न से उपचय में केतु हो, और वह योगकारक से युक्त हो, तो स्थिति शुभ मानी गई। शुभांश और शुभ वर्ग में होने पर शुभ-कर्म-फल का उदय कहा गया है। यहाँ केतु का फल केवल “पाप” नहीं; भाव, संगति और वर्ग-शुद्धि से बँधा है। यह सशर्त शुभ-फल है।

English rendering The text states that when Ketu is in an upacaya house from the lagna, joined with a yoga-kāraka, and placed in a benefic aṃśa and benefic varga, there is the rising of the fruit of auspicious deeds. Conditions are structural: house set, conjunction, and divisional dignity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१) उपचय-भाव लग्न से: ३, ६, १०, ११ (पूर्णांक भाव-संख्या: भुक्ति-गृह = ⌊λ_lagna/30°⌋ + {२,५,९,१०} mod १२, ०-आधारित अनुक्रमण में)।
२) वर्ग-मान: षोडश-वर्ग (D1…D60) — राशि ३०° का समान-चाप विभाजन; ग्रह-रेखांश λ पर नियमबद्ध mapping (उदा. नवांश D9: प्रत्येक ३°२०′ = ३०°/९)।
३) “शुभवर्ग/शुभांश” = उस विभाग-राशि में शुभ-स्वामित्व/उच्चादि — गणना वर्ग-इंजन से; इस श्लोक में गुणांक नहीं, केवल शर्त।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (०°–३०°), केतु = वृश्चिक १२° (लग्न से ८वाँ — उपचय नहीं)। उपचय-उदाहरण: केतु = मिथुन ८° → लग्न-मेष से ३रा (उपचय)।
नवांश (D9, सम-विषम नियम BPHS Ch.6): मिथुन में ८° → ८ ÷ (३०/९) = ८ ÷ ३°२०′ = २.४ → तीसरा नवांश-खण्ड (०-आधार: खण्ड २)। वर्ग-फल “शुभ” तभी जब उस D9-राशि का स्वामी/स्थिति शास्त्र-दृष्टि से शुभ हो — अयनांश: कहें लाहिरी; बिना अयनांश घोषणा के अंश-तुलना न करें।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग D1…D60 को हमने शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन के रूप में जड़ा है — प्रत्येक वर्ग ३०° राशि का नियत चाप-मानचित्र। यह श्लोक “शुभवर्गे/शुभांशे” कहकर ठीक उसी वर्ग-परत की शर्त लगाता है; फल को गणित से अलग रखकर “पाठ कहता है” ही रिपोर्ट करते हैं।

52.63
पुत्रदारादिसौख्यं च सन्तोषं प्रियवर्द्धनम् |
विचित्रवस्त्रलाभश्च यशोवृद्धिः सुखावहा
putradārādisaukhyaṃ ca santoṣaṃ priyavarddhanam |
vicitravastralābhaśca yaśovṛddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दार-आदि-सौख्यम् = पुत्र, पत्नी आदि का सुख; च = और; सन्तोषम् = संतोष; प्रिय-वर्द्धनम् = प्रियजनों की वृद्धि / प्रियता का बढ़ना; विचित्र-वस्त्र-लाभः = विचित्र (विविध/शोभन) वस्त्र का लाभ; च = और; यशः-वृद्धिः = यश की वृद्धि; सुख-आवहा = सुख लाने वाली (स्थिति)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ शर्तों के फल-विस्तार में शास्त्र पुत्र-दारादि सौख्य कहता है। संतोष और प्रिय-वर्धन भी उसी शुभ-उदय में गिने गए हैं। विचित्र वस्त्र-लाभ, यशोवृद्धि और सुखावह परिणाम पाठ की अपनी शुभ-सूची है। यह सकारात्मक फल-कथन है, गारंटी नहीं।

English rendering The text states happiness connected with children, spouse and the like, contentment, the increase of what is dear, gain of varied garments, growth of renown, and a happiness-bearing result. It completes the auspicious phala-list of the prior conditioned yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ फल-सूची (संबंध, संतोष, लाभ, यश, सुख)।

52.64
द्वितीयाद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युभयं वदेत् |
दुर्गाजपं च कुर्वीत छागदानं सुखाप्तये
dvitīyādyūnanāthe vā hyapamṛtyubhayaṃ vadet |
durgājapaṃ ca kurvīta chāgadānaṃ sukhāptaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे वा = द्वितीय (2रे) अथवा द्यून यानी सप्तम (7वें) भाव का स्वामी (मारकेश) होने पर; हि अपमृत्यु-भयम् = अपमृत्यु (अकाल-मृत्यु) का भय; वदेत् = कहना चाहिए; दुर्गा-जपम् = दुर्गा-जप; छाग-दानम् = बकरे का दान; सुख-आप्तये = सुख की प्राप्ति हेतु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि केतु 2रे या 7वें (मारक) भाव का स्वामी हो, तो अपमृत्यु-भय की आशंका कही जाती है; इसके परिहार-हेतु दुर्गा-जप और छाग-दान का विधान है, जिससे सुख की प्राप्ति हो। "अपमृत्यु-भय" को शास्त्र-वचन एवं सावधानी के रूप में लें, भय-वचन के रूप में नहीं; उपाय दबाव नहीं, परम्परा-परामर्श है।

English rendering But if Ketu owns the 2nd or 7th house, one should speak of the fear of an untimely death; and for the winning of well-being, let recitation to Durgā and the gift of a goat be made.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मारकेश-शर्त) एवं शान्ति-विधान। अन्तर्दृष्टि: "द्वितीय/द्यून" (2/7) मारक-स्वामित्व एक स्वामित्व-गणना है; उससे जुड़ा "अपमृत्यु-भय" शास्त्र की सशर्त उक्ति है, और शान्ति उसका अनुष्ठान-पक्ष — दोनों को हम निश्चय-रहित रखते हैं। (इसी के साथ केतु-अन्तर्दशा प्रकरण समाप्त।)

52.65
सूर्यस्यान्तर्गते शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा |
स्वोच्चे मित्रस्ववर्गस्थेऽभीष्टस्त्रीभोग्यसम्पदः
sūryasyāntargate śukre trikoṇe kendrage'pi vā |
svocce mitrasvavargasthe'bhīṣṭastrībhogyasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यस्य अन्तर्-गते = सूर्य-महादशा के अन्तर्गत (अन्तर्दशा में); शुक्रे = शुक्र; त्रिकोणे = 1/5/9 भाव में; केन्द्र-गे = 1/4/7/10 में स्थित; अपि वा = अथवा; स्व-उच्चे = स्वोच्च; मित्र-स्व-वर्ग-स्थे = मित्र/स्व-वर्ग (षोडशवर्गादि) में; अभीष्ट-स्त्री-भोग्य-सम्पदः = अभीष्ट स्त्री-सुख और भोग्य सम्पत्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य की महादशा में जब शुक्र की अन्तर्दशा चले, और शुक्र त्रिकोण या केन्द्र में हो, अथवा स्वोच्च हो, अथवा मित्र/स्व-वर्ग में स्थित हो, तब अभीष्ट स्त्री-सुख और भोग्य सम्पदा का फल कहा गया है। यह स्थान-बल और वर्ग-स्थिति पर आश्रित शुभ-फल का कथन है। शर्तें स्पष्ट हैं: स्थिति (केन्द्र/त्रिकोण) और वर्ग/उच्च का योग।

English rendering When Venus operates as the antardaśā within the Sun’s mahādaśā, and Venus is in a trine or angle, or exalted, or placed in a friendly or own varga, the text states enjoyment of desired companionship and of wealth meant for enjoyment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। सूर्य-महादशा = 6 वर्ष; शुक्र-वर्ष = 20; अतः सूर्य–शुक्र अन्तर्दशा = (6 × 20) ÷ 120 = 1 वर्ष = 12 मास। वर्ग-स्थिति (स्व/मित्र-वर्ग) षोडश-वर्ग के नियत चाप-विभाजन पर निर्भर है; अयनांश और वर्ग-नियम घोषित करने पर ही अक्षांश-निर्णय निश्चित होता है।

उदाहरण (worked example) सूर्य-महादशा 6 y; शुक्र अन्तर्दशा = 6 × 20 / 120 = 1.0 y। यदि जन्म-चन्द्र नक्षत्र-अंश से सूर्य-महादशा का शेष 2.5 y हो, तो उस शेष के भीतर सूर्य–शुक्र अन्तर्दशा तब आती है जब क्रम में शुक्र का स्थान सूर्य-चक्र में पड़े (केतु 7 → शुक्र 20 → सूर्य 6 …)। वर्ग-जाँच: मान लें शुक्र-देशान्तर (सायनांश-समायोजित, घोषित अयनांश) 27° वृष (उच्च); D9/अन्य वर्ग में स्व/मित्र-राशि — तब श्लोक की “स्वोच्चे / मित्रस्ववर्गस्थे” शर्त गणितीय रूप से पूरी मानी जाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; योग = 120) और अन्तर्दशा-अनुपात (महा × अन्तर्) / 120 हमारे दशा-इंजन में यथावत् अनुपात-अंकगणित है। षोडश-वर्ग (D1…D60) शुद्ध मॉड्यूलर चाप-विभाजन हैं — “मित्रस्ववर्गस्थ” की जाँच उसी इंजन से `==` अनुशासन में की जाती है, अनुमान से नहीं।

52.66
ग्रामान्तरप्रयाणं च भाह्मणप्रभुदर्शनम् |
राज्यलाभो महोत्साहश्छत्रचामरवैभवम्
grāmāntaraprayāṇaṃ ca bhāhmaṇaprabhudarśanam |
rājyalābho mahotsāhaśchatracāmaravaibhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रामान्तर = अन्य ग्राम/नगर (ग्राम + अन्तर); प्रयाणम् = यात्रा, प्रस्थान; ब्राह्मण = विप्र (पाठ: "भाह्मण" → ब्राह्मण, पाठ-भेद संभव); प्रभु = स्वामी/राजा; दर्शनम् = भेंट, साक्षात्कार; राज्यलाभः = राज्य/पद की प्राप्ति; महोत्साहः = महान् उत्साह (महत् + उत्साह); छत्र = राजछत्र; चामर = चँवर; वैभवम् = ऐश्वर्य → छत्रचामरवैभवम् = छत्र-चँवर का राजसी वैभव।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक (५२.६५) में कहे शुभ-स्थित शुक्र (सूर्य-महादशा में शुक्र-अन्तर्दशा) का फल यहाँ गिनाया गया है — जातक की देशान्तर-यात्रा होती है, ब्राह्मणों तथा राजपुरुषों से भेंट होती है, राज्य अथवा उच्च पद की प्राप्ति, प्रबल उत्साह, और छत्र-चँवर जैसे राजसी सम्मान-चिह्नों का ऐश्वर्य प्राप्त होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering The text states that in this (well-placed Venus sub-period within the Sun's period) there is travel abroad, audience with brahmins and rulers, attainment of dominion or office, great zeal, and the pomp of parasol and chowrie.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-स्थित शुक्र-अन्तर्दशा का इष्ट फल)। यह वैभव-कथन सूर्य-दशा/शुक्र-अन्तर की विंशोत्तरी अवधि पर आश्रित है; स्वयं कोई संख्या नहीं देता, पर श्लोक ५२.६५ की केन्द्र/त्रिकोण/उच्च-स्थिति की गणितीय शर्त का परिणाम-वाक्य है।

52.67
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् |
विद्रुमादिरत्नलाभो मुक्तावस्त्रादि लाभकृत्
gṛhe kalyāṇasampattirnityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
vidrumādiratnalābho muktāvastrādi lābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = घर में; कल्याणसम्पत्तिः = मंगलमयी समृद्धि; नित्यम् = प्रतिदिन; मिष्ठान्न = मिष्ट/मधुर भोजन; भोजनम् = भोजन; विद्रुम = मूँगा (प्रवाल); आदि = आदि; रत्नलाभः = रत्नों की प्राप्ति; मुक्ता = मोती; वस्त्र = वस्त्र; आदि = इत्यादि; लाभकृत् = लाभ करानेवाला।

हिन्दी भावार्थ घर में मंगल और सम्पन्नता रहती है, नित्य मधुर-स्वादिष्ट भोजन मिलता है, तथा मूँगा आदि रत्न, मोती और उत्तम वस्त्रादि की प्राप्ति होती है — शुक्र-अन्तर्दशा के शुभ योग का यही सौभाग्य-फल शास्त्र बतलाता है। (मूँगा-मोती शुक्र-कारक द्रव्य हैं, अतः यह सूची शुक्र के स्वभाव से संगत है।)

English rendering The text states there is auspicious prosperity in the home, daily partaking of sweet food, and the gaining of gems such as coral, of pearls, and of fine garments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गृह-सौख्य एवं रत्न-लाभ)। उल्लेखनीय है कि मूँगा (विद्रुम), मोती (मुक्ता), वस्त्र — ये सब शुक्र के नैसर्गिक कारकत्व (भोग, सौन्दर्य, रत्न) से जुड़ते हैं, अतः फल कारक-ग्रह के स्वभाव का दर्पण मात्र है, कोई पृथक् संगणना नहीं।

52.68
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्बहुधान्यधनादिकम् |
उत्साहः कीर्तिसम्पत्तिर्नरवाहनसम्पदः
catuṣpājjīvalābhaḥ syādbahudhānyadhanādikam |
utsāhaḥ kīrtisampattirnaravāhanasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पाद् = चौपाया, पशुधन (चतुर् + पाद); जीवलाभः = जीवों/पशुओं का लाभ; स्यात् = होवे; बहुधान्यधनादिकम् = बहुत धान्य-धन आदि; उत्साहः = उत्साह; कीर्तिसम्पत्तिः = यश की सम्पदा; नर = पुरुष/सेवक; वाहन = वाहन; सम्पदः = सम्पत्ति → नरवाहनसम्पदः = सेवक-वाहन आदि की सम्पत्ति।

हिन्दी भावार्थ चौपाये पशुओं का लाभ होता है, प्रचुर धान्य-धन आदि की वृद्धि होती है, उत्साह बना रहता है, यश की सम्पदा मिलती है, तथा सेवक-गण एवं वाहनों का सुख प्राप्त होता है — शुक्र-अन्तर्दशा के इष्ट फल का यह विस्तार शास्त्र कहता है।

English rendering The text states there is gain of livestock, abundant grain and wealth, sustained enthusiasm, a wealth of fame, and the affluence of attendants and conveyances.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पशु-धान्य-वाहन ऐश्वर्य)। "चतुष्पाद्-जीव" शब्द केवल पशु-वर्ग की ओर संकेत करता है, कोई संख्या नहीं; यह ५२.६६–६७ के शुभ-फल-त्रय का समापन-श्लोक है।

52.69
षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे दायेशाद्बलवर्जिते |
राजकोपो मनःक्लेशः पुत्रस्त्रीधननाशनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye śukre dāyeśādbalavarjite |
rājakopo manaḥkleśaḥ putrastrīdhananāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ = छठा भाव; अष्टम = आठवाँ भाव; व्यय = बारहवाँ भाव (द्वादश) → षष्ठाष्टमव्यये = ६ठे/८वें/१२वें में; शुक्रे = शुक्र के (स्थित होने पर); दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ सूर्य) से गिनकर; बलवर्जिते = बल से हीन (षड्बल-न्यून); राजकोपः = राजा का कोप; मनःक्लेशः = मानसिक क्लेश; पुत्रस्त्रीधननाशनम् = पुत्र, स्त्री एवं धन का नाश।

हिन्दी भावार्थ जब वही शुक्र दशेश (सूर्य) से गिनने पर ६ठे, ८वें या १२वें भाव में हो और बल से रहित हो, तब शास्त्र के अनुसार राजा (सत्ता) का कोप, चित्त का क्लेश, तथा पुत्र-स्त्री और धन की हानि का फल कहा गया है। यह पूर्व के शुभ-योग का विपरीत (दुःस्थान + निर्बल) पक्ष है।

English rendering The text states that when Venus stands in the 6th, 8th, or 12th from the period-lord and is devoid of strength, there follow the ruler's displeasure, mental affliction, and loss of son, wife, and wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दुःस्थान-गणना — दशेश-राशि से समावेशी (inclusive) भाव-गणना।
भाव-स्थान = ((दशेश_राशि − 1) + (n − 1)) mod 12 + 1, जहाँ n ∈ {6, 8, 12}।
साथ ही "बलवर्जित" = शुक्र का षड्बल योग < उसकी प्रति-ग्रह देय-सीमा (threshold)। दो स्वतन्त्र शर्तें — स्थान (दुःस्थान) एवं बल (न्यून) — दोनों पूरी होने पर ही यह अनिष्ट-फल शास्त्र लागू करता है।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य मेष (राशि 1) में। तब दशेश से 6ठा = कन्या (6), 8वाँ = वृश्चिक (8), 12वाँ = मीन (12)। यदि शुक्र इनमें किसी एक राशि में हो और उसका कुल षड्बल अपनी सीमा से कम (bala-varjita) हो, तभी यह विपरीत-फल अभिप्रेत है; केवल दुःस्थान-स्थिति, पर पूर्ण बल हो तो शर्त अपूर्ण है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवर्जित" शब्द सीधे षड्बल (BPHS अध्याय 27) से जुड़ता है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक तथा दृग् बल, रूप/विरूप में योग (1 रूप = 60 विरूप), और यह योग प्रति-ग्रह-सीमा से तुलित। हमारे डोज़ियर की यही व्यवस्था है: बल एक कथित संख्यात्मक नियम है, कोई भावनात्मक निर्णय नहीं — अतः "बलवर्जित" को हम मापनीय राशि मानते हैं, फल को शास्त्र का कथन।

52.70
भुक्त्यादौ मध्यमं मध्ये लाभः शुभकरो भवेत् |
अन्ते यशोनाशनं च स्थानभ्रंशमथापि वा
bhuktyādau madhyamaṃ madhye lābhaḥ śubhakaro bhavet |
ante yaśonāśanaṃ ca sthānabhraṃśamathāpi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-आदौ = भुक्ति (अन्तर्दशा) के आरम्भ में; मध्यमम् = मध्यम फल; मध्ये = मध्य भाग में; लाभः शुभ-करः = शुभ-लाभ; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन); अन्ते = अन्त में; यशः-नाशनम् = यश का नाश; स्थान-भ्रंशम् = पद/स्थान से भ्रंश; अथवा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र भुक्ति (अन्तर्दशा) के तीन काल-खण्डों में फल-क्रम बताता है: आदि में मध्यम, मध्य में शुभ-लाभ, अन्त में यश-नाश अथवा स्थान-भ्रंश। यह सूर्य–शुक्र (या सन्दर्भगत) भुक्ति के आन्तरिक विभाजन का फल-नियम है — एकसमान फल नहीं, काल-अंश के अनुसार बदलता कथन। भय या निश्चित पतन का दावा नहीं; केवल पाठ का त्रि-खण्ड वर्णन।

English rendering The text states that at the beginning of the bhukti the result is middling; in the middle, auspicious gain; and at the end, loss of renown or else fall from one’s place — a threefold temporal phala within the sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भुक्ति-त्रिभाजन (समान काल-मान लें तो): सूर्य–शुक्र अन्तर्दशा = 1 वर्ष = 12 मास → आदि ≈ 0–4 मास (मध्यम), मध्य ≈ 4–8 मास (शुभ-लाभ), अन्त ≈ 8–12 मास (यश/स्थान-क्षति का शास्त्र-कथन)। शास्त्र यहाँ “आदि / मध्य / अन्त” कहता है; समान तिहाई व्यावहारिक पठन है, पद में भिन्न अनुपात निर्दिष्ट नहीं — पाठ-भेद/टीका-परम्परा संभव।

उदाहरण (worked example) सूर्य–शुक्र अन्तर्दशा आरम्भ तिथि T₀ (घोषित अयनांश + नक्षत्र-शेष से दशा-इंजन)। T₀+0 … T₀+4 मास → मध्यम; T₀+4 … T₀+8 → शुभ-लाभ (शास्त्र); T₀+8 … T₀+12 → यशोनाश/स्थानभ्रंश (शास्त्र-कथन)। यदि महादशा-शेष के कारण अन्तर्दशा 1 वर्ष से छोटी हो, तो उसी अनुपात में तीन खण्ड काटें: प्रत्येक ≈ कुल-भुक्ति-अवधि ÷ 3।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी अन्तर्दशा-अवधि शुद्ध अनुपात (महा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 से तय होती है; भुक्ति के आदि-मध्य-अन्त का फल उसी निश्चित अवधि पर काल-अंश बाँटकर पढ़ा जाता है। गणित और फल अलग रखे जाते हैं — अवधि `==` से सत्यापित; फल केवल “शास्त्र कहता है” के रूप में।

52.71
बन्धुद्वेषं वदेद् वापि स्वकुलाद्भोगनाशनम् |
भार्गवे द्यूननाथे तु देहे जाड्यं रुजोभयम्
bandhudveṣaṃ vaded vāpi svakulādbhoganāśanam |
bhārgave dyūnanāthe tu dehe jāḍyaṃ rujobhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धुद्वेष = बन्धु-जन से द्वेष/वैमनस्य; स्वकुलात् = अपने कुल/परिवार से; भोगनाशनम् = भोग-सुख का नाश; भार्गवे = शुक्र (भृगु-पुत्र) में/के; द्यूननाथ = सप्तम-भाव (द्यून) का स्वामी; देहे जाड्यम् = देह में जड़ता/निश्चेष्टता; रुजोभयम् = रोग का भय/संकट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र सप्तम-भाव का अधिपति हो, तो बन्धु-जनों से द्वेष अथवा अपने कुल से भोग-सुख के क्षय का कथन किया जा सकता है। उसी स्थिति में देह में जड़ता और रोग-भय भी शास्त्र द्वारा इंगित किया गया है। यह फल-कथन द्यून-स्वामी शुक्र के योग-संदर्भ में आता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Venus is the lord of the seventh house (dyūna), one may speak of enmity with kinsfolk or loss of enjoyments from one’s own family. It further indicates bodily dullness and fear of disease under that condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्यून-स्वामी शुक्र)। “द्यून” यहाँ सप्तम-भाव का पारंपरिक नाम है; कोई अंश-विभाग, बल-माप या दशा-वर्ष-गणना इस श्लोक में नहीं है।

52.72
रन्ध्ररिष्फसमायुक्ते ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युर्जयजपं चरेत्
randhrariṣphasamāyukte hyapamṛtyurbhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyurjayajapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्र = ८वाँ भाव (अष्टम, आयु/मृत्यु-स्थान); रिष्फ = १२वाँ भाव (व्यय-स्थान); समायुक्ते = (उनसे) युक्त होने पर; हि = निश्चय ही; अपमृत्युः = अकाल/अपघात मृत्यु; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथित आशंका); तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; मृत्युञ्जयजपम् = महामृत्युञ्जय जप (पाठ "मृत्युर्जय" → मृत्युञ्जय, पाठ-भेद संभव); चरेत् = करे।

हिन्दी भावार्थ जब शुक्र रन्ध्र (८वें) अथवा रिष्फ (१२वें) भाव से युक्त हो, तब शास्त्र अपमृत्यु (अकाल-मृत्यु) की आशंका कहता है; उस दोष के परिहार के लिए महामृत्युञ्जय-जप करने का विधान बताया गया है। (यह भय-वचन नहीं, अपितु शास्त्र का सशर्त कथन और उसका शमन-उपाय है।)

English rendering The text states that when Venus is joined with the eighth or twelfth, an untimely death is apprehended; and, to remove that blemish, one should perform the Mṛtyuñjaya recitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधान/शमन-कथन। तकनीकी विकोड केवल भाव-नामों का: रन्ध्र = ८वाँ भाव, रिष्फ = १२वाँ भाव — दोनों अष्टम/व्यय-प्रकार के दुःस्थान। अपमृत्यु-वचन को शास्त्र का सशर्त कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, नियति या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं; जप को दबाव-रूप उपाय नहीं, पारम्परिक शान्ति-विधान माना गया है।

52.73
श्वेतां गां महिषीं दद्याद्रुद्रजाप्यं च कारयेत् |
ततः शान्तिभवाप्नोति शङ्करस्य प्रसादतः
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādrudrajāpyaṃ ca kārayet |
tataḥ śāntibhavāpnoti śaṅkarasya prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेताम् गाम् = श्वेत गौ; महिषीम् = भैंस; दद्यात् = दान करे; रुद्रजाप्यम् = रुद्र-जप (रुद्राध्याय/रुद्र-मन्त्र-पाठ); च कारयेत् = और करवाए; ततः = तब; शान्तिम् आप्नोति = शान्ति पाता है; शङ्करस्य प्रसादतः = शङ्कर (शिव) की कृपा से।

हिन्दी भावार्थ श्वेत गौ तथा भैंस का दान करे, और रुद्र-जप करवाए; तब शङ्कर की कृपा से शान्ति की प्राप्ति होती है — यह पूर्व श्लोक के अपमृत्यु-दोष के शमन का समापन-विधान है, ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering The text prescribes that one should gift a white cow and a buffalo and have the Rudra recitation performed; thereby, by the grace of Śaṅkara, one attains peace.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान (दान + जप)। यह श्लोक शुक्र-अन्तर्दशा-प्रकरण (५२.६५–७३) का समापक शमन-वाक्य है; कोई संख्या, वर्ग या बल-मान नहीं देता — केवल पारम्परिक उपचार-क्रम बताता है, जिसे दबाव-रहित आस्था-विधान के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

अध्यायः 53

चन्द्रान्तर्दशाफलाध्यायः

70 श्लोक
53.1
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे चन्द्रे त्रिकोणे लाभगेऽपि वा |
भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते गजाश्वाम्बरसंकुलम्
svocce svakṣetrage candre trikoṇe lābhage'pi vā |
bhāgyakarmādhipairyukte gajāśvāmbarasaṃkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्वक्षेत्रगे = स्वराशि (स्वगृह) में स्थित; चन्द्रे = चन्द्र के; त्रिकोणे = 1/5/9 भाव में; लाभगे = 11वें (लाभ) भाव में; भाग्य-अधिप = 9वें भाव का स्वामी; कर्म-अधिप = 10वें भाव का स्वामी; युक्ते = साथ बैठने पर; गज-अश्व-अम्बर-संकुलम् = हाथी-घोड़े-वस्त्रों से भरा-पूरा।

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय चन्द्र-महादशा की अन्तर्दशाओं का फल कहता है, और यहाँ से चन्द्र-अन्तर्दशा (चन्द्र-चन्द्र भुक्ति) आरम्भ होती है। शास्त्र कहता है — जब चन्द्र अपनी उच्च राशि, स्वराशि, किसी त्रिकोण या लाभभाव में स्थित हो और भाग्येश (9वें) व कर्मेश (10वें) के साथ युक्त हो, तब यह भुक्ति हाथी, घोड़े और वस्त्रों से भरी-पूरी समृद्धि की बताई गई है।

English rendering When the Moon stands in exaltation, its own sign, a trine, or the eleventh, and is joined with the lords of the ninth and tenth, the text says this sub-period teems with elephants, horses, and fine garments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह विशुद्ध फल नहीं, बल्कि स्थान-योग्यता (sthāna) की शर्त है। भाव-वर्ग जो श्लोक निर्दिष्ट करता है: त्रिकोण = {1, 5, 9}, लाभ = 11; भाग्येश = lord(9), कर्मेश = lord(10)। शुभ-शर्त: चन्द्र ∈ {उच्च, स्वक्षेत्र} अथवा स्थिति ∈ {त्रिकोण ∪ 11}, तथा चन्द्र ⟂ lord(9)/lord(10) की युति। चन्द्र की उच्च = वृषभ 3° (परमोच्च-बिन्दु), स्वक्षेत्र = कर्क।

उदाहरण (worked example) मेष-लग्न में — भाग्येश (9वाँ = धनु) = गुरु, कर्मेश (10वाँ = मकर) = शनि। नियम तब सक्रिय होता है जब चन्द्र इन दोनों में से किसी के साथ 1/5/9/11 भाव में, या वृषभ/कर्क राशि में बैठे।

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53.2
देवतागुरुभक्तिश्च पुण्यश्लोकादिकीर्तनम् |
राज्यलाभो महत्सौख्यं यशोवृद्धिः सुखावहा
devatāgurubhaktiśca puṇyaślokādikīrtanam |
rājyalābho mahatsaukhyaṃ yaśovṛddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवतागुरुभक्तिः = देवता व गुरु के प्रति भक्ति; पुण्यश्लोकादिकीर्तनम् = पुण्य-श्लोक आदि का कीर्तन; राज्यलाभः = राज्य/अधिकार का लाभ; महत्सौख्यम् = महान् सुख; यशोवृद्धिः = यश की वृद्धि; सुखावहा = सुख लाने वाली (स्थिति)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ चन्द्र-स्थिति के फल-क्रम में शास्त्र आगे कहता है — देवता और गुरु के प्रति भक्ति, पुण्यश्लोकों का कीर्तन, राज्य-लाभ, महत् सौख्य, यश की वृद्धि, और सुख-अवह फल। यह धार्मिक-सामाजिक सम्मान और सुख की परंपरागत सूची है; इसे अनिवार्य भविष्य नहीं, शास्त्र का फल-वर्णन समझें।

English rendering Continuing the favourable results, the text states devotion to deities and the preceptor, recitation of sacred verses, gain of authority or realm, great happiness, growth of renown, and comfort-bearing outcomes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भक्ति-कीर्तन-राज्य-यश-सुख की सूची)। कोई दशा-वर्ष, अंश या बल-इकाई यहाँ नहीं कही गई।

53.3
पूर्णे चन्द्रे बलं पूर्णं सेनापत्यं महत्सुखम् |
पापयुक्तेऽथवा चन्द्रे नीचे वा रिष्फषष्ठगे
pūrṇe candre balaṃ pūrṇaṃ senāpatyaṃ mahatsukham |
pāpayukte'thavā candre nīce vā riṣphaṣaṣṭhage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णे चन्द्रे = चन्द्र के पूर्ण (बलवान/पूर्णिमा-कालिक) होने पर; बलं पूर्णम् = पूर्ण बल; सेनापत्यम् = सेनापति-पद; महत्-सुखम् = महान सुख; पाप-युक्ते = पापग्रह से युक्त होने पर; नीचे = नीच राशि में; रिष्फ-षष्ठगे = 12वें (रिष्फ) व 6वें (षष्ठ) भाव में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पूर्ण (पूर्णिमा-निकट, बलयुक्त) चन्द्र हो तो बल पूर्ण होता है, सेनापति-पद व महान सुख मिलता है। किन्तु चन्द्र पापग्रह-युक्त, नीच, अथवा 6ठे-12वें भाव में हो तो (आगामी अशुभ फल — अगले श्लोक में)।

English rendering The text says a full Moon gives full strength, command of armies, and great comfort; but if the Moon is joined to malefics, fallen (debilitated), or set in the sixth or twelfth, the reverse follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "पूर्ण चन्द्र" = पक्ष-बल का शिखर। ṣaḍbala के काल-बल में पक्षबल: चन्द्र के लिए pakṣabala = (चन्द्र−सूर्य का अन्तर, अंशों में) ÷ 3 विरूप। परमोच्च = पूर्णिमा पर वियुति 180° → 180 ÷ 3 = 60 विरूप = 1 रूप (1 रूप = 60 विरूप); अमावास्या 0° → 0 विरूप। (पाठ-भेद संभव: कुछ recensions चन्द्र हेतु इसे द्विगुणित करते हैं — convention घोषित करें।) नीच = वृश्चिक; उच्च = वृषभ।

उदाहरण (worked example) पूर्णिमा-जन्म — सूर्य 15° मेष, चन्द्र 15° तुला ⇒ वियुति 180° ⇒ pakṣabala = 180 ÷ 3 = 60 विरूप = 1.00 रूप (पूर्ण)। शुक्ल-अष्टमी (वियुति ≈ 90°) ⇒ 90 ÷ 3 = 30 विरूप = 0.50 रूप (अर्ध)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे ṣaḍbala (BPHS Ch.27) के काल-बल घटक से जुड़ता है, जिसे हमने विरूप/रूप इकाइयों में निर्धारित किया (1 रूप = 60 विरूप)। "पूर्ण चन्द्र = पूर्ण बल" कोई काव्य नहीं, बल्कि पक्षबल की मापनीय चरम-सीमा है — एक कथित नियम, प्रति-ग्रह threshold से तुलनीय, व्याख्या नहीं गणना।

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53.4
अतकाले धननाशः स्यात्स्थानच्युतिरथापि वा |
देहलस्यं मनस्तपो राजमन्त्रिविरोधकृत्
atakāle dhananāśaḥ syātsthānacyutirathāpi vā |
dehalasyaṃ manastapo rājamantrivirodhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत काले = उस काल में (पूर्वोक्त अशुभ चन्द्र-स्थिति में); धननाशः = धन का नाश; स्यात् = हो — ऐसा शास्त्र कहता है; स्थानच्युतिः = स्थान/पद से च्युति; देहलस्यम् = देह में आलस्य/शिथिलता; मनस्तपः = मन का ताप; राजमन्त्रिविरोधकृत् = राजा व मंत्री से विरोध उत्पन्न करने वाला।

हिन्दी भावार्थ जिस काल में चन्द्र पूर्वोक्त रीति से पीड़ित हो, शास्त्र कहता है — धननाश, अथवा स्थानच्युति, देह में लस्य, मन का ताप, तथा राज-मंत्री विरोध। यह फल-सूची सावधान करने वाली है, भय-व्यापार नहीं; “स्यात्” संभाव्य फल-भाषा है, निश्चित विपत्ति का दावा नहीं।

English rendering At such a time, the text states loss of wealth, or displacement from one’s station, bodily inertia, mental distress, and conflict with rulers and ministers. These are classical phala claims, not deterministic fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ चन्द्र-काल के परिणाम)। कोई वर्ष-संख्या, बिन्दु या अंश-सूत्र नहीं।

53.5
मातृक्लेशो मनोदुःखं निगडं बन्धुनाशनम् |
द्वितीयद्यूननाथे तु रन्ध्ररिष्फेशसंयुते
mātṛkleśo manoduḥkhaṃ nigaḍaṃ bandhunāśanam |
dvitīyadyūnanāthe tu randhrariṣpheśasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातृक्लेशः = मातृ-संबंधी क्लेश; मनोदुःखम् = मन का दुःख; निगडम् = बंधन/बेड़ी (कैद-संकेत); बन्धुनाशनम् = बंधु-नाश; द्वितीयद्यूननाथे = जब द्वितीयेश व द्यूननाथ (7वें के स्वामी); रन्ध्ररिष्फेशसंयुते = रन्ध्रेश (8) व रिष्फेश (12) से संयुक्त हों।

हिन्दी भावार्थ अशुभ क्रम में शास्त्र मातृ-क्लेश, मनोदुःख, निगड और बंधु-नाशन का उल्लेख करता है। फिर नई योग-शर्त जोड़ता है — जब द्वितीय और सप्तम के अधिपति रन्ध्रेश तथा रिष्फेश से युक्त हों, तब अगले श्लोक का देह-भंग आदि फल कहा गया है। “निगड” शाब्दिक रूप से बंधन है; इसे आधुनिक कानूनी/चिकित्सकीय भविष्य नहीं बनाएँ — केवल पाठ का फल-वर्णन।

English rendering The text further states maternal distress, mental sorrow, bonds/confinement, and harm to kinsfolk. It then adds the condition: when the lords of the second and seventh are joined with the lords of the eighth and twelfth, the harsher results named next apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्वामी योग-शर्त (2–7 स्वामी × 8–12 स्वामी)। योग की जाँच भाव-स्वामित्व और युति से होती है; संख्यात्मक गुणांक नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष मानें (सरल मॉडल; अयनांश फल को नहीं बदलता, केवल राशि-स्वामी)। द्वितीय = वृष → स्वामी शुक्र; द्यून (7) = तुला → स्वामी शुक्र (एक ही); रन्ध्र (8) = वृश्चिक → मंगल; रिष्फ (12) = मीन → गुरु। यदि शुक्र मंगल-गुरु से युति/समीप योग में हो, तो इस श्लोक की “रन्ध्ररिष्फेशसंयुक्त द्वितीय-द्यूननाथ” शर्त लागू मानी जाती है। पाठ-भेद/भाव-गणना (पूरा भाव vs राशि-भाव) घोषित करनी चाहिए।

53.6
देहजाड्यं महाभङ्गमपमृत्योभयं वदेत् |
श्वेतां गां महिषीं दद्यात् स्वदशान्तर्गते विधौ
dehajāḍyaṃ mahābhaṅgamapamṛtyobhayaṃ vadet |
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyāt svadaśāntargate vidhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहजाड्यम् = देह की जड़ता/जाड्य; महाभङ्गम् = महान् भंग/विघ्न; अपमृत्योः भयम् = अपमृत्यु का भय — वदेत् = कहे (शास्त्र-वचन); श्वेतां गाम् = श्वेत गौ; महिषीम् = महिषी; दद्यात् = दे — ऐसा पाठ कहता है; स्वदशान्तर्गते विधौ = स्व-दशा के अंतर्गत (अन्तर्दशा में) जब विधि/चन्द्र स्थित हो।

हिन्दी भावार्थ पूर्व योग पर शास्त्र कहता है — देहजाड्य, महाभंग और अपमृत्यु-भय का कथन। फिर “दद्यात्” रूप में श्वेत गौ और महिषी देने का शास्त्रीय उपाय-वचन है — इसे दबाव या गारंटी न समझें, केवल पाठ का उल्लेख। “स्वदशान्तर्गते विधौ” काल-निर्देश है: चन्द्र की महादशा में चन्द्र की ही अन्तर्दशा। अपमृत्यु-भय को भय-व्यापार न बनाएँ; यह शास्त्र का पारंपरिक फल-शब्द है।

English rendering Under that condition the text states bodily heaviness/inertia, a great setback, and fear of untimely death. It also states the gift of a white cow and a she-buffalo. The timing phrase points to the Moon’s sub-period within its own major period. Report the claim; do not convert it into panic or forced remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (अन्तर्दशा):
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
चन्द्र महादशा = 10 वर्ष; चन्द्र अन्तर्दशा (स्वदशान्तर्गत् विधि) = (10 × 10) ÷ 120 = 100/120 = 5/6 वर्ष ≈ 0.833… वर्ष ≈ 10 मास (सौर-वर्ष मॉडल; परंपरा में 360-दिवसीय वर्ष भी प्रयुक्त — घोषित करें)।
योग: Σ महादशा = 120 (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)।

उदाहरण (worked example) मानें चन्द्र महादशा आरंभ = 1 जनवरी 2020 00:00 (उदाहरण मात्र; वास्तविक आरंभ नक्षत्र-शेष × 10 से आता है)। चन्द्र-चन्द्र अन्तर्दशा अवधि = 5/6 वर्ष। 360-दिवसीय ज्योतिष-वर्ष लें तो 5/6 × 360 = 300 दिन; सौर ~365.25 दिन लें तो ≈ 304.4 दिन। नक्षत्र-शेष f (0 ≤ f ≤ 1) से महादशा-शेष = f × 10 वर्ष — यह श्लोक का “स्वदशान्तर्गत्” खंड उसी 10-वर्ष चक्र के प्रथम अन्तर्-खंड में बैठता है जब दशा-क्रम चन्द्र से चन्द्र पर हो।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा = (MD × AD) ÷ 120 का अनुपात-गणित दशा-इंजन में यथावत् बैठा है; चन्द्र = 10, Σ = 120, exact `==` अनुशासन। यह श्लोक फल-वचन है, अवधि-सूत्र का स्पर्श “स्वदशान्तर्गते विधौ” से होता है — गणित को फल से अलग रखा जाता है: अवधि गिनी जाती है, “अपमृत्यु” आदि को भविष्य-घोषणा नहीं बनाया जाता।

53.7
चन्द्रस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
सौभाग्यं राजसन्मानं वस्त्रभरणभूषणम्
candrasyāntargate bhaume lagnātkendratrikoṇage |
saubhāgyaṃ rājasanmānaṃ vastrabharaṇabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर्गते = चन्द्र की अन्तर्दशा में; भौमे = जब भौम/मंगल; लग्नात् = लग्न से; केन्द्रत्रिकोणगे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (5, 9) में स्थित; सौभाग्यम् = सौभाग्य; राजसन्मानम् = राजकीय सम्मान; वस्त्रभरणभूषणम् = वस्त्र, आभरण व भूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र महादशा की मंगल-अन्तर्दशा में, यदि मंगल लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, तो सौभाग्य, राज-सन्मान, वस्त्र-भरण-भूषण का फल। शर्त दोहरी है: (1) काल = चन्द्रान्तर्गत भौम, (2) स्थान = लग्न-केन्द्र/त्रिकोण। एक शर्त टूटे तो फल-पाठ यथावत् नहीं खींचा जाता।

English rendering The text states that in Mars’s sub-period within the Moon’s major period, when Mars occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, there is good fortune, royal honour, and gain of clothes, ornaments, and jewels.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अन्तर्दशा:
चन्द्र-MD = 10 वर्ष; मंगल-AD वर्ष = 7;
भौम अन्तर् (चन्द्र MD में) = (10 × 7) ÷ 120 = 70/120 = 7/12 वर्ष ≈ 0.583… वर्ष।
360-दिवसीय वर्ष → 7/12 × 360 = 210 दिन।
स्थान-शर्त: मंगल-भाव ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10} लग्न से (पूर्ण-भाव या राशि-भाव — घोषित करें)। केन्द्र = 1/4/7/10; त्रिकोण = 1/5/9 (1 दोनों में)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या; मंगल = मकर → लग्न से 5वाँ (त्रिकोण) — शर्त पूरी। चन्द्र महादशा के भीतर मंगल अन्तर् ≈ 7/12 वर्ष। यदि मंगल मिथुन में हो (लग्न कन्या से 10वाँ = केन्द्र) — भी लागू; यदि कुंभ (6वाँ) — स्थान-शर्त नहीं। अयनांश (लाहिरि आदि) केवल ग्रह-राशि तय करने में लगता है; अन्तर्-वर्ष-अनुपात अयनांश-निरपेक्ष है।

हमारा डिकोड (Our Decode) चन्द्र 10 × मंगल 7 / 120 = 7/12 वर्ष — यही विंशोत्तरी अनुपात दशा-इंजन में pinned है। श्लोक काल (चन्द्रान्तर्गत भौम) को गणित से जोड़ता है और फल (सौभाग्य-सन्मान-वस्त्र) को अलग रखता है: अवधि `==` से सत्यापित; फल “शास्त्र कहता है” के रूप में ही।

53.8
यत्नात् कार्यार्थसिद्धिस्तु भविष्यति न सम्शयः |
गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च व्यवहारे जयो भवेत्
yatnāt kāryārthasiddhistu bhaviṣyati na samśayaḥ |
gṛhakṣetrābhivṛddhiśca vyavahāre jayo bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्नात् = प्रयास/उद्यम से; कार्यार्थसिद्धिः = कार्य-प्रयोजन की सिद्धि; न सम्शयः = संदेह नहीं; गृहक्षेत्राभिवृद्धिः = गृह तथा क्षेत्र (भूमि) की वृद्धि; व्यवहारे जयः = व्यवहार (लेन-देन/विवाद) में विजय; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यत्न करने से कार्य की सिद्धि होती है — इसमें संशय नहीं रखना चाहिए। साथ ही गृह और क्षेत्र की अभिवृद्धि तथा व्यवहार में जय का भी उल्लेख है। यह फल-कथन प्रयास और लौकिक सफलता के युग्म को जोड़ता है। भय या निश्चित-भाग्य का दावा नहीं; केवल पाठ का कथन।

English rendering The text states that, from effort, the accomplishment of one’s purpose arises without doubt. It also states increase of house and land, and victory in dealings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक कोई अंश, बल या दशा-अवधि नहीं गिनता; केवल यत्न-युक्त सिद्धि तथा गृह-क्षेत्र-व्यवहार के शुभ फल का शास्त्रीय कथन है।

53.9
कार्यलाभो महत्सौख्यं स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे फलम् |
तथाऽष्टमव्यये भौमे पापयुक्तेऽथ वा यदि
kāryalābho mahatsaukhyaṃ svocce svakṣetrage phalam |
tathā'ṣṭamavyaye bhaume pāpayukte'tha vā yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कार्य-लाभः = कार्यों की सिद्धि; महत्-सौख्यम् = महान सुख; स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे = मंगल के उच्च/स्वराशि में होने पर; फलम् = (यह) फल; अष्टम-व्यये = 8वें व 12वें भाव में; भौमे = मंगल के; पापयुक्ते = पापग्रह-युक्त होने पर; अथ वा यदि = अथवा यदि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मंगल अपनी उच्च या स्वराशि में हो, तब कार्य-लाभ व महान सुख यह फल मिलता है; और यदि मंगल 8वें/12वें भाव में या पापग्रह से युक्त हो, तब (आगे कहा अशुभ फल)।

English rendering The text says that when Mars is exalted or in its own sign, gains and great comfort result; but if Mars sits in the eighth or twelfth, or joins malefics, the contrary follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-शर्त का द्वैत। शुभ: मंगल ∈ {उच्च = मकर 28°, स्वक्षेत्र = मेष/वृश्चिक}। अशुभ: स्थिति ∈ {अष्टम = 8, व्यय = 12} अथवा पापग्रह-युति। यह भावेश की गुण-निर्णायक बूलियन-शर्त है, न कि अंकीय राशि।

उदाहरण (worked example) मंगल मकर 28° में (परमोच्च-निकट) ⇒ शुभ-शर्त सत्य ⇒ कार्य-लाभ-पक्ष। इसके विपरीत मंगल यदि लग्न से 8वें भाव में शनि (पाप) के साथ ⇒ अशुभ-शर्त सत्य।

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53.10
दायशादशुभस्थाने देहार्तिः परवीक्षिते |
गृहक्षेत्रादिहानिश्च व्यवहारे तथा क्षतिः
dāyaśādaśubhasthāne dehārtiḥ paravīkṣite |
gṛhakṣetrādihāniśca vyavahāre tathā kṣatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् (पाठ "दायशाद्") = दशा-स्वामी (चन्द्र) से गिनकर; अशुभ-स्थाने = अशुभ भाव (6/8/12) में; देह-आर्तिः = शरीर-पीड़ा; परवीक्षिते = शत्रु/अन्य से दृष्ट होने पर; गृह-क्षेत्रादि-हानिः = घर-भूमि आदि की हानि; व्यवहारे क्षतिः = व्यवहार में हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मंगल दशा-स्वामी (चन्द्र) से अशुभ भाव में हो और शत्रु-ग्रह से दृष्ट हो, तब देह-पीड़ा, गृह-भूमि आदि की हानि और व्यवहार में क्षति होती है।

English rendering The text states that when Mars stands in an inauspicious house from the period-lord and is aspected by an enemy, there is bodily distress, loss of house and land, and setback in dealings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सन्दर्भ-बिन्दु बदलता है — गणना दायेश (चन्द्र) से, लग्न से नहीं। अशुभ-स्थान = {6, 8, 12} दायेश से। "परवीक्षित" = शत्रु-ग्रह की पूर्ण-दृष्टि (मंगल पर 4/7/8 आदि दृष्टि-नियमानुसार)। बूलियन: (position(मंगल) − position(चन्द्र) mod 12) ∈ {6, 8, 12} ∧ शत्रु-दृष्टि।

उदाहरण (worked example) चन्द्र वृषभ में; मंगल तुला में ⇒ चन्द्र से गणना: वृषभ=1 … तुला=6 ⇒ मंगल दायेश से 6ठे (षष्ठ, अशुभ) ⇒ शर्त सत्य; यदि उस पर शनि की दृष्टि हो तो "परवीक्षित" भी सत्य।

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53.11
मृत्युवर्गेषु कलहो भूपालस्य विरोधनम् |
आत्मबन्धुवियोगश्च नित्यं निष्ठुरभाषणम्
mṛtyuvargeṣu kalaho bhūpālasya virodhanam |
ātmabandhuviyogaśca nityaṃ niṣṭhurabhāṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युवर्गेषु = मृत्यु-वर्गों में (मृत्यु-संबंधी वर्ग/स्थान-संदर्भ); कलहः = झगड़ा; भूपालस्य विरोधनम् = भूप/राजा का विरोध; आत्मबन्धुवियोगः = आत्मा (स्व) तथा बंधुओं से वियोग; नित्यम् = निरंतर; निष्ठुरभाषणम् = कठोर भाषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मृत्युवर्ग-संदर्भ में कलह, भूपाल से विरोध, आत्मीय-बंधु वियोग, और नित्य निष्ठुर वाणी का फल आता है। यह सामाजिक-संबंध और वाणी-तनाव का शास्त्रीय चित्रण है। “मृत्युवर्ग” की सटीक सूची इस श्लोक में नहीं गिनी गई — पाठ-भेद/संदर्भ-अध्याय संभव; यहाँ केवल फल-सूची है।

English rendering The text states quarrel, opposition from a ruler, separation from self and kin, and continual harsh speech in the “death-varga” contexts. No deterministic fate is endorsed — only the śāstra’s listed results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “मृत्युवर्गेषु” यहाँ वर्ग-विभाजन-सूत्र नहीं खोलता; कोई D-n चाप-लंबाई या भाग-गणना नहीं दी गई।

53.12
द्वितीये द्यूननाथे तु रन्ध्रे रन्ध्राधिपो यदा |
तत्तोषपरिहारार्थं ब्राह्मणस्याऽर्चनं चरेत्
dvitīye dyūnanāthe tu randhre randhrādhipo yadā |
tattoṣaparihārārthaṃ brāhmaṇasyā'rcanaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये = द्वितीय भाव में; द्यूननाथे = द्यून (सप्तम) का नाथ; तु = परंतु/तो; रन्ध्रे = रंध्र (अष्टम) में; रन्ध्राधिपः = अष्टमेश; यदा = जब; तत्तोषपरिहारार्थम् = उस दोष/क्लेश के परिहार हेतु; ब्राह्मणस्य अर्चनम् = ब्राह्मण का अर्चन; चरेत् = करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: जब सप्तमेश द्वितीय में हो और अष्टमेश अष्टम में हो, तब उस योग-दोष के परिहार के लिए ब्राह्मण-अर्चन का उल्लेख है। यह एक योग-शर्त + शास्त्रोक्त कर्म-निर्देश का युग्म है। हम इसे दबाव-उपाय या गारंटी-उपचार के रूप में नहीं पढ़ते — केवल पाठ का कथन।

English rendering The text states: when the lord of the seventh is in the second and the lord of the eighth is in the eighth, one should perform the worship of a brāhmaṇa for the removal of that affliction. Report only — not a remedy pressed as certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्वामित्व की स्थिति-जाँच (गणनात्मक ढाँचा, फल नहीं):
- सप्तमेश L₇ ∈ भाव २
- अष्टमेश L₈ ∈ भाव ८
भाव-संख्या लग्न से १…१२ की चक्रीय गणना पर निर्भर (house-system convention declare करें: पूरे-चिह्न / unequal आदि)। श्लोक स्वयं कोई अंश (°/′) नहीं देता — केवल भाव-स्वामी की भाव-स्थिति।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (१)। मानें सप्तमेश = शुक्र, अष्टमेश = मंगल। यदि शुक्र वृष (२) में और मंगल वृश्चिक (८) में हो → शर्त L₇∈२ ∧ L₈∈८ सत्य। (राशि-स्वामित्व: मेष-मंगल, वृष-शुक्र, … — मानक नवांश/अयनांश यहाँ आवश्यक नहीं जब तक केवल राशि-भाव देखें; unequal houses में देशांतर/अक्षांश से भाव-सीमाएँ बदलेंगी।)

53.13
चन्द्रस्यान्तर्गते राहौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
आदौ स्वल्फलं ज्ञेयं शत्रुपीडा महद्भयम्
candrasyāntargate rāhau lagnātkendratrikoṇage |
ādau svalphalaṃ jñeyaṃ śatrupīḍā mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर्-गते = चंद्र की अंतर् (अंतर्दशा) में स्थित; राहौ = राहु; लग्नात् = लग्न से; केन्द्रत्रिकोणगे = केन्द्र या त्रिकोण गत; आदौ = आरंभ में; स्वल्फलम् = अल्प फल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; शत्रुपीडा = शत्रु से पीड़ा; महद्भयम् = महान् भय (शास्त्र-कथित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चंद्र की अंतर्दशा में राहु जब लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, तो आरंभ में अल्प फल, शत्रु-पीड़ा और महद्भय जानना चाहिए। यह दशा-फल + स्थान-शर्त का युग्म है। हम इसे निश्चित आतंक नहीं बनाते — केवल पाठ का फल-कथन।

English rendering The text states that when Rāhu operates in the Moon’s antardaśā and is placed from the lagna in a kendra or trikoṇa, one should know at first only a small result, enemy-affliction, and great fear — as the śāstra’s claim, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. स्थान-समुच्चय (लग्न से): केन्द्र = {१, ४, ७, १०}; त्रिकोण = {१, ५, ९}; संयुक्त = {१, ४, ५, ७, ९, १०}। शर्त: rāhu_bhāva ∈ केन्द्र∪त्रिकोण।
2. विंशोत्तरी अंतर्दशा (संदर्भ-अनुपात, BPHS Ch.46–47):
antardaśā-वर्ष = (mahādaśā-वर्ष × antar-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०।
चंद्र महदशा = १० वर्ष, राहु = १८ वर्ष → चंद्र–राहु अंतर् = (१० × १८) ÷ १२० = १.५ वर्ष (१ वर्ष ६ मास)।
(नक्षत्र-शेष भिन्न से आरंभ-बिंदु; अयनांश/नक्षत्र-सीमा convention declare करें।)

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (६)। राहु मकर (१०) में → लग्न से ५वाँ = त्रिकोण → शर्त सत्य। चंद्र-महदशा में राहु-अंतर = १.५ वर्ष। शास्त्र आदौ स्वल्फल + शत्रुपीड़ा + महद्भय कहता है — यह फल-कथन है, भविष्य-गारंटी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में चंद्र १०, राहु १८ वर्ष — अंतर्दशा शुद्ध अनुपात (m × a)/१२० से निकलती है; चंद्र–राहु = १.५ वर्ष। यह गणना दशा-इंजन में नक्षत्र-भिन्न पर आधारित है। फल-वाक्य (शत्रुपीड़ा आदि) को हम गणित से अलग रखते हैं — केवल अवधि और स्थान-शर्त exact; फल = “शास्त्र कहता है”।

53.14
चौराहिराजभीतिश्च चतुष्पाज्जिवपीडनम् |
बन्धुनाशो मित्रहानिर्मानहानिर्मनोव्यथा
caurāhirājabhītiśca catuṣpājjivapīḍanam |
bandhunāśo mitrahānirmānahānirmanovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर = चोर; अहि = सर्प; राज = राजा; भीति = भय; चतुष्पात्-जीव = चौपाये (गोधन आदि पशु); पीडन = कष्ट/हानि; बन्धुनाश = सम्बन्धियों का वियोग; मित्रहानि = मित्रों की क्षति; मानहानि = प्रतिष्ठा का ह्रास; मनोव्यथा = मानसिक क्लेश।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पूर्व-श्लोक (५३.१३) की राहु-अन्तर्दशा (चन्द्र-महादशा के भीतर) का ही फल-विस्तार है। शास्त्र कहता है कि इस योग में चोर, सर्प एवं राजा से भय, चौपायों (पशुधन) को पीड़ा, बन्धुओं का वियोग, मित्रों की हानि, मान-प्रतिष्ठा का क्षय तथा चित्त की व्यथा — ये अशुभ प्रवृत्तियाँ इंगित की गई हैं।

English rendering The text states that this (Rāhu sub-period, ill-disposed) portends fear from thieves, snakes, and the king, harm to cattle, separation from kinsmen, loss of friends and of honour, and distress of mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-अन्तर्दशा का अनिष्ट-फल)। यह पूर्णतः फल-वर्णन है; ध्यान दें कि यह चन्द्र-महादशा के अन्तर्गत राहु के अन्तर की अशुभ स्थिति का ही अनुक्रम है, अतः इसका आकलन दशा-क्रम की स्थिति (राहु का बल/भाव) पर निर्भर है, स्वयं किसी संख्या पर नहीं।

53.15
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नादुपचयेऽपि वा |
योगकारकसम्बन्धे सर्वकार्यार्थसिद्धिकृत्
śubhayukte śubhairdṛṣṭe lagnādupacaye'pi vā |
yogakārakasambandhe sarvakāryārthasiddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभयुक्ते = शुभग्रह से युत होने पर; शुभैः दृष्टे = शुभग्रहों से दृष्ट होने पर; लग्नात् = लग्न से; उपचये = उपचय-भावों (3,6,10,11) में; योगकारक-सम्बन्धे = योगकारक ग्रह के सम्बन्ध में; सर्व-कार्यार्थ-सिद्धिकृत् = समस्त कार्यों/प्रयोजनों की सिद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि वही (अन्तर्दशेश) शुभग्रह से युत हो, शुभग्रहों से दृष्ट हो, अथवा लग्न से उपचय-स्थान में स्थित हो, और यदि योगकारक ग्रह से सम्बन्ध बने — तो यही राहु-अन्तर पूर्वोक्त अनिष्ट के विपरीत समस्त कार्यों एवं प्रयोजनों की सिद्धि देता है।

English rendering The text states that if that lord is joined or aspected by benefics, or occupies an upachaya house from the lagna, or is linked with a yogakāraka, it instead brings the accomplishment of all one's undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उपचय-भावों का समुच्चय एक निश्चित स्थान-गणना है — उपचय = {3, 6, 10, 11}। लग्न-राशि-सूचकांक L (1…12) से भाव h की राशि = ((L − 1 + (h − 1)) mod 12) + 1। कोई भाव उपचय है ⇔ h ∈ {3, 6, 10, 11}। यह विशुद्ध पूर्णांक (modular) गणना है; फल की शुभता इसी स्थान-सदस्यता + शुभ-दृष्टि/योग पर सशर्त है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (L = 1)। तब उपचय-राशियाँ = मिथुन (3), कन्या (6), मकर (10), कुम्भ (11)। यदि अन्तर्दशेश इनमें से किसी में स्थित हो — मान लें कन्या (h = 6): राशि = ((1 − 1 + 5) mod 12) + 1 = 6 — तो यह उपचय-शर्त पूर्ण करता है।

53.16
नैरृत्ये पश्चिमे भावे क्वचित्प्रभुसमागमः |
वाहनामबरलाभश्च स्वेष्टकार्यार्थसिद्धिकृत्
nairṛtye paścime bhāve kvacitprabhusamāgamaḥ |
vāhanāmabaralābhaśca sveṣṭakāryārthasiddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नैरृत्ये = नैर्ऋत्य-दिशा/दक्षिण-पश्चिम (भाव-स्थिति); पश्चिमे = पश्चिम-भाव में; भावे = भाव-स्थित; क्वचित् = कहीं/कभी; प्रभुसमागमः = प्रभु/स्वामी/अधिकार-युक्त जन से मिलन; वाहन = सवारी/यान; अम्बर = वस्त्र; लाभः = प्राप्ति; स्वेष्टकार्यार्थसिद्धिकृत् = अभीष्ट कार्य-सिद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दायेश जब नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) अथवा पश्चिम भाव में हो, तब कहीं प्रभु/प्रभावशाली जन से समागम, वाहन और वस्त्र-लाभ, तथा स्वेष्ट कार्य-सिद्धि का फल कहा गया है। “क्वचित्” शब्द से यह फल-कथन सशर्त/स्थान-विशेष का संकेत देता है, सर्वत्र एक-सा नहीं। दिशा-नाम यहाँ भाव-स्थिति के संकेत हैं; पाठ-भेद और टीका-परम्परा में दिशा-भाव-मिलान भिन्न हो सकता है।

English rendering The text states that when (the daśā-lord is) in the south-western or western house, there may at times be meeting with persons of authority, gain of vehicles and garments, and success in the desired undertaking.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दिशा/भाव-स्थित दायेश)। “नैर्ऋत्य/पश्चिम” को किस भाव-क्रमांक पर बाँधना है, यह संस्करण और टीका-परम्परा पर निर्भर हो सकता है — पाठ-भेद संभव; यहाँ केवल शास्त्र-शब्द का भावार्थ है।

53.17
दायेशादथ रन्ध्रथे व्यये वा बलवर्जिते |
स्थानभ्रंशो मनोदुखं पुत्रक्लेशो महद्भयम्
dāyeśādatha randhrathe vyaye vā balavarjite |
sthānabhraṃśo manodukhaṃ putrakleśo mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (यहाँ चालू अन्तर्दशेश) से; रन्ध्रे = अष्टम भाव में; व्यये = द्वादश भाव में; बलवर्जिते = बल से रहित होने पर; स्थानभ्रंश = पद/स्थान से च्युति; मनोदुःख = चित्त-पीड़ा; पुत्रक्लेश = सन्तान को कष्ट; महद्भय = महान् भय। (पाठ-भेद संभव: "रन्ध्रथे" → रन्ध्रे/रन्ध्रस्थे।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि दशेश (अन्तर्दशा-स्वामी) अपने से अष्टम या द्वादश में स्थित हो और बल-हीन हो, तो स्थान से पतन, मानसिक दुःख, पुत्र-सम्बन्धी क्लेश और महाभय की आशंका बतायी गयी है।

English rendering The text states that if the (sub-period) lord stands in the 8th or 12th from itself and is devoid of strength, it indicates loss of position, mental grief, trouble to children, and great fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-गणना — रन्ध्र (दुःस्थान) = भाव 8, व्यय = भाव 12। दायेश-राशि-सूचकांक D से: अष्टम-राशि = ((D − 1 + 7) mod 12) + 1; द्वादश-राशि = ((D − 1 + 11) mod 12) + 1। "बलवर्जित" = बल एक सीमा-मान से नीचे — यह षड्बल की परिमाणात्मक शर्त है, न कि आत्मनिष्ठ अनुमान।

उदाहरण (worked example) दायेश राशि सिंह (D = 5) में हो → अष्टम-राशि = ((5 − 1 + 7) mod 12) + 1 = (11 mod 12) + 1 = 12 → मीन; द्वादश-राशि = ((5 − 1 + 11) mod 12) + 1 = (15 mod 12) + 1 = 4 → कर्क। इन स्थितियों में यदि बल न्यून हो, तब यह अनिष्ट-नियम लागू।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवर्जित" को हमारी टीम ने आत्मनिष्ठ शब्द नहीं, अपितु षड्बल (BPHS अ.27) की मापनीय राशि माना — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक एवं दृग् बल का योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), जिसकी तुलना ग्रह-विशिष्ट देहली-मान से होती है। इस विधि में फल-कथन ग्रह-बल की संख्या पर सशर्त रहता है — गणना एवं व्याख्या पृथक् रखना ही हमारी मूल अनुशासन-रेखा है।

53.18
दारपीडा क्वचिज्ज्ञेया क्वचित्स्वाङ्गे रुजोभयम् |
वृश्चिकादिविषाद्भीतिश्चौराहिनृपपीडनम्
dārapīḍā kvacijjñeyā kvacitsvāṅge rujobhayam |
vṛścikādiviṣādbhītiścaurāhinṛpapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारपीडा = पत्नी को कष्ट; क्वचित् = कभी-कहीं; ज्ञेया = जाननी चाहिए; स्वाङ्गे = अपने शरीर/अंग में; रुजः भयम् = रोग का भय; वृश्चिक-आदि-विष-भीति = बिच्छू आदि के विष से भय; चौर-अहि-नृप-पीडन = चोर, सर्प एवं राजा से पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस अशुभ राहु-अन्तर में कभी पत्नी को कष्ट, कभी स्वयं के शरीर में रोग का भय, बिच्छू आदि के विष से भीति, तथा चोर-सर्प-राजा से पीड़ा — ये आशंकाएँ बतायी गयी हैं।

English rendering The text states that at times harm to the wife, at times fear of disease in one's own body, dread of poison from scorpions and the like, and affliction from thieves, snakes, and the king may be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-अन्तर का अनिष्ट-वर्णन)। यह भय-सूची शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं; "क्वचित्" (कभी-कहीं) पद स्वयं इसे निश्चयात्मक नहीं, सम्भावित एवं सशर्त बताता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ऐसे भय-प्रधान श्लोकों को हमने सदैव "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत किया — भविष्य-निश्चय या भय-दोहन के रूप में नहीं। यही ऑपरेटर की मूल अनुशासन-रेखा है: गणित (वर्ग, अष्टकवर्ग बिन्दु, दशा-अवधि, बल-मान) = यथार्थ गणना; फल = पाठ का अपना वचन, न कि हमारे द्वारा समर्थित कोई पूर्वानुमान। कोई चिकित्सकीय/विधिक भविष्यकथन नहीं।

53.19
दायेशात्केन्द्रकोणे व दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा |
पुण्यतीर्थफलावाप्तिर्देवतादर्शनं महत्
dāyeśātkendrakoṇe va duścikye lābhage'pi vā |
puṇyatīrthaphalāvāptirdevatādarśanaṃ mahat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश से; केन्द्र = 1/4/7/10 भाव; कोणे = त्रिकोण (5/9); दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; लाभगे = एकादश भाव में; पुण्यतीर्थ-फलावाप्ति = पुण्य-तीर्थ का फल-लाभ; देवता-दर्शनं महत् = देवताओं का महान् दर्शन। (पाठ-भेद संभव: "व" → वा।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि दशेश अपने से केन्द्र, त्रिकोण, तृतीय अथवा एकादश भाव में स्थित हो, तो पुण्य-तीर्थों के फल की प्राप्ति और देव-दर्शन का महान् सौभाग्य मिलता है।

English rendering The text states that when the sub-period lord occupies a kendra, a trine, the 3rd, or the 11th from itself, one gains the fruit of sacred pilgrimages and great darśana of the deities.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ-स्थान समुच्चय — केन्द्र = {1, 4, 7, 10}, त्रिकोण/कोण = {5, 9} (केन्द्र-सहित त्रिकोण = 1,5,9), दुश्चिक्य = {3}, लाभ = {11}। दायेश-राशि-सूचकांक D से भाव h की राशि = ((D − 1 + (h − 1)) mod 12) + 1; फल-शुभता ⇔ h ∈ {1,4,5,7,9,10,3,11}।

उदाहरण (worked example) दायेश राशि वृष (D = 2) में → केन्द्र-राशियाँ: वृष(1), सिंह(4), वृश्चिक(7), कुम्भ(10); त्रिकोण: कन्या(5), मकर(9); तृतीय: कर्क(3); लाभ: मीन(11)। दशेश इनमें से किसी में हो तो यह शुभ-नियम लागू।

53.20
परोपकारकर्मादिपुण्यकर्मादिसंप्रहः |
द्वितीयद्यूनराशिअथे देहबाधा भविष्यति
paropakārakarmādipuṇyakarmādisaṃprahaḥ |
dvitīyadyūnarāśiathe dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परोपकारकर्मादि = परोपकार आदि कर्म; पुण्यकर्मादिसंप्रहः = पुण्य-कर्म आदि का संग्रह/संचय; द्वितीय = द्वितीय भाव; द्यून = सप्तम भाव; राशिअथे = राशि-स्थित (पाठ: “राशिस्थे” अपेक्षित; पाठ-भेद संभव); देहबाधा = देह में बाधा/पीड़ा; भविष्यति = होगी — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक ओर परोपकार आदि पुण्य-कर्मों का संचय फल-रूप में कहता है; दूसरी ओर कहता है कि जब (दायेश) द्वितीय अथवा द्यून (सप्तम) राशि/भाव में स्थित हो, तब देह-बाधा का संकेत है। “राशिअथे” विकिस्रोत-पाठ में गैप/पाठ-रूप संदिग्ध लग सकता है — राशिस्थे/भावस्थे पढ़ना संभव; पाठ-भेद संभव। देह-बाधा शास्त्र का फल-शब्द है — चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states (on the one hand) accumulation of meritorious acts such as helping others; and (on the other) that when (the daśā-lord is) situated in the second or seventh (dyūna) sign/house, bodily obstruction is indicated — as the śāstra’s claim, not a medical forecast. The compound “rāśi-athe” may reflect a contested or gapped reading (perhaps rāśi-sthe).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पुण्य-संचय; द्वितीय/सप्तम में देह-बाधा)। द्वितीय = 2, द्यून = 7 — भाव-क्रमांक निश्चित; संख्या-सूत्र नहीं।

53.21
तद्दोषपरिहारार्थं रुद्रजाप्यं समाचरेत् |
छागदानं प्रकुर्वीत देहारोग्यं प्रजायते
taddoṣaparihārārthaṃ rudrajāpyaṃ samācaret |
chāgadānaṃ prakurvīta dehārogyaṃ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के परिहार के लिए; रुद्रजाप्यम् = रुद्र-मन्त्र-जाप्य; समाचरेत् = करे (विधि-वचन); छागदानम् = छाग (बकरा)-दान; प्रकुर्वीत = करना चाहिए; देहारोग्यम् = देह-आरोग्य; प्रजायते = उत्पन्न होता है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की देह-बाधा/दोष के सन्दर्भ में शास्त्र परिहार-विधि कहता है — रुद्र-जाप्य का आचरण और छाग-दान; तब देह-आरोग्य उत्पन्न होता है — ऐसा पाठ का कथन है। यह शास्त्र-निर्दिष्ट अनुष्ठान-सूचना है; दबाव, गारंटी या चिकित्सा-उपचार का दावा नहीं। फल-दोष और परिहार दोनों ही शास्त्र की अपनी भाषा में रखे जाएँ।

English rendering For the removal of that defect, the text enjoins performance of Rudra-japa and the gift of a goat (chāga-dāna), stating that bodily soundness then arises — again as the śāstra’s own remedial prescription, not as pressure or a medical guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/उपाय-कथन (रुद्र-जाप्य, छाग-दान → देहारोग्य)। कोई वर्ष, अंश, बिन्दु या बल-इकाई नहीं; केवल शास्त्रीय परिहार-निर्देश का वर्णन।

53.22
चन्द्रस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वगेहे लाभगे स्वोच्चे राज्यलाभो महोत्सवः
candrasyāntargate jīve lagnātkendratrikoṇage |
svagehe lābhage svocce rājyalābho mahotsavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य-अन्तर्-गते = चन्द्र-महादशा में अन्तर्दशा-काल; जीवे = बृहस्पति (अन्तर्दशा-स्वामी / फल-कर्ता); लग्नात् = जन्म-लग्न से; केन्द्र-त्रिकोण-गे = 1·4·7·10 (केन्द्र) अथवा 5·9 (त्रिकोण) में स्थित; स्व-गेहे = स्व-राशि में; लाभ-गे = एकादश भाव में; स्व-उच्चे = उच्च-राशि में; राज्य-लाभः = राज्य / अधिकार / प्रतिष्ठा-प्राप्ति; महोत्सवः = महान् उत्सव / आनन्द-समारोह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र की महादशा में जब गुरु की अन्तर्दशा चलती है, और गुरु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा अपनी राशि में, लाभ (11वें) भाव में, या उच्च में स्थित हो, तब राज्य-लाभ और महोत्सव का फल कहा गया है। यह फल-कथन गुरु की शुभ स्थिति पर आधारित है, न कि किसी निश्चित भाग्य-घोषणा पर। पाठ-भेद संभव — कुछ पाठों में भाव-शर्तें थोड़ी भिन्न क्रम में आती हैं।

English rendering The text states that in the Moon’s mahādaśā, during Jupiter’s antardaśā, if Jupiter occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, or is in its own sign, the eleventh house, or exaltation, there is gain of authority/royal favour and great festivity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अवधि (विंशोत्तरी, BPHS Ch.46–47): अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। चन्द्र महादशा = 10 वर्ष; गुरु = 16 वर्ष → गुरु-अन्तर्दशा = (10 × 16) ÷ 120 = 160/120 = 4/3 वर्ष = 1 वर्ष 4 मास। स्थिति-शर्त: गुरु-रेखांश → भाव = floor((λ_J − λ_Lagna + 360°) mod 360° ÷ 30°) + 1; केन्द्र ∈ {1,4,7,10}, त्रिकोण ∈ {5,9}, लाभ = 11; स्व/उच्च = राशि-स्वामित्व व उच्च-बिन्दु की मानक सूची से।

उदाहरण (worked example) माना चन्द्र-महादशा चालू; गुरु-अन्तर्दशा 1 वर्ष 4 मास। लग्न = मेष 10°; गुरु = धनु 18° (स्व-राशि) → लग्न से भाव = 9 (त्रिकोण) + स्वगेह। शास्त्र की शर्त पूरी → फल-कथन “राज्यलाभो महोत्सवः” लागू कहा जाता है। (अयनांश: गणना sidereal; राशि-सीमा 30° समान।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में चन्द्र 10 व गुरु 16 वर्ष — Σ = 120 — पिन किया गया है; अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात-गणित (MD × AD)/120 है। यही सूत्र दशा-इंजन में चन्द्र-महादशा के गुरु-अन्तर की अवधि निकालता है; फल-वाक्य को गणना से अलग रखकर “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखा जाता है।

53.23
वस्त्राऽलङ्कारभूषाप्ती राजप्रीतिर्धनागमः |
इष्टदेवप्रसादेन गर्भाधानादिकं फलम्
vastrā'laṅkārabhūṣāptī rājaprītirdhanāgamaḥ |
iṣṭadevaprasādena garbhādhānādikaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्र = वस्त्र / परिधान; अलङ्कार = आभूषण; भूषा = सजावट / शृंगार-सामग्री; आप्तिः = प्राप्ति; राज-प्रीतिः = राजा / अधिकारी की कृपा; धन-आगमः = धन का आगमन; इष्ट-देव-प्रसादेन = इष्टदेव की कृपा से; गर्भाधान-आदिकं = गर्भाधान आदि संस्कार / सन्तान-सम्बन्धी आरम्भ; फलम् = (उक्त दशा का) फल।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ स्थिति में शास्त्र आगे कहता है — वस्त्र, आभूषण और भूषा की प्राप्ति, राज-प्रीति तथा धन का आगमन होता है। इष्टदेव की कृपा से गर्भाधान आदि फल भी इस अन्तर्दशा में गिनाए गए हैं। यह फल-सूची उसी चन्द्र-महादशा–गुरु-अन्तर्दशा के शुभ योग का विस्तार है।

English rendering The text continues: there is acquisition of clothes, ornaments and adornments, royal favour and inflow of wealth; and, by the grace of one’s iṣṭadeva, results such as garbhādhāna and related beginnings are stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि व स्थिति की गणना पूर्व श्लोक (53.22) के विंशोत्तरी-अनुपात और भाव-मॉड्यूलर नियम से ही निर्धारित होती है; यह श्लोक केवल शुभ फल की सूची है।

53.24
तथा शोभनकार्याणि गृहे लक्ष्मीः कटाक्षकृत् |
राजाश्रयं धनं भूमिगजवाजिसमन्वितम्
tathā śobhanakāryāṇi gṛhe lakṣmīḥ kaṭākṣakṛt |
rājāśrayaṃ dhanaṃ bhūmigajavājisamanvitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = उसी प्रकार / और भी; शोभन-कार्याणि = शुभ / सुन्दर कार्य; गृहे = घर में; लक्ष्मीः = लक्ष्मी (समृद्धि का संकेत); कटाक्ष-कृत् = कृपा-दृष्टि करने वाली; राज-आश्रयम् = राजा / सत्ता का आश्रय; धनम् = धन; भूमि = भूमि / खेत; गज = हाथी; वाजि = घोड़ा; समन्वितम् = युक्त / सहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस शुभ अन्तर्दशा में घर में शोभन कार्य चलते हैं और लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि कही गई है। राजाश्रय, धन, तथा भूमि–गज–अश्व से युक्त समृद्धि का वर्णन है। यह 53.22–23 की शुभ फल-श्रृंखला का अगला पद है।

English rendering Likewise, the text states auspicious undertakings, Lakṣmī’s gracious glance upon the household, and wealth under royal patronage, accompanied by land, elephants and horses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / वर्णन। कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-गणना या बल-इकाई नहीं; केवल पूर्वोक्त दशा–स्थिति पर शास्त्रीय फल-विस्तार।

53.25
महाराजप्रसादेन स्वेष्टसिद्धिः सुखावहा |
ष.ष्ठाष्टमव्यये जीवे नीच वास्तङ्गते यदि
mahārājaprasādena sveṣṭasiddhiḥ sukhāvahā |
ṣa.ṣṭhāṣṭamavyaye jīve nīca vāstaṅgate yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महाराज की कृपा से; स्व-इष्ट-सिद्धिः = अभीष्ट की सिद्धि; सुख-आवहा = सुख लाने वाली; षष्ठ-अष्टम-व्यये = छठे, आठवें या व्यय (12वें) भाव में; जीवे = गुरु में / गुरु के; नीचे = नीच-राशि में; वा = अथवा; अस्तङ्गते = अस्त (सूर्य-समीप दग्ध/अस्त) अवस्था में; यदि = यदि।

हिन्दी भावार्थ शुभ पक्ष का समापन करते हुए शास्त्र कहता है — महाराज-प्रसाद से अभीष्ट-सिद्धि और सुखदायक फल होता है। किन्तु यदि गुरु षष्ठ, अष्टम या व्यय भाव में हो, अथवा नीच हो, अथवा अस्तंगत हो, तो आगे (अगले श्लोकों में) अशुभ फल का द्वार खुलता है। “ष.ष्ठाष्टमव्यये” पाठ में बिंदु/संक्षेप संभव — सामान्य पाठ षष्ठाष्टमव्यये है; पाठ-भेद संभव।

English rendering By a great king’s favour, fulfilment of one’s aims and happiness are stated; but if Jupiter is in the sixth, eighth or twelfth, or debilited, or combust (astaṅgata), the adverse branch of the phala begins.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-जाँच (कोई दशा-सूत्र नहीं — फल-शाखा की शर्त): भाव-संख्या b = floor((λ_J − λ_L + 360°) mod 360° ÷ 30°) + 1; अशुभ-शाखा यदि b ∈ {6,8,12}। नीच: गुरु की नीच-राशि = मकर (पारंपरिक होरा-सूची)। अस्त/दग्ध: |λ_J − λ_Sun| सूर्य-गुरु अस्त-सीमा के भीतर (परंपरा-निर्भर; सीमा घोषित करनी होती है)। शुभ-शाखा (राज्यलाभ आदि) तभी जब 53.22 की केन्द्र/त्रिकोण/स्व/लाभ/उच्च शर्त लगे और ये दोष न हों।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या 5°; गुरु = कुंभ 12° → लग्न से भाव = 6 (षष्ठ)। नीच/अस्त न भी हो, षष्ठ-स्थिति मात्र से शास्त्र 53.25–26 की अशुभ शाखा की ओर ले जाता है। (राशि 30° समान; sidereal रेखांश।)

53.26
पापयुक्तेऽशुभं कर्म गुरुपुत्रादिनाशनम् |
स्थानभ्रंशो मनोदुःखमकस्मात्कलहो ध्रुवम्
pāpayukte'śubhaṃ karma guruputrādināśanam |
sthānabhraṃśo manoduḥkhamakasmātkalaho dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-युक्ते = पाप-ग्रह (मंगल/शनि/राहु-केतु आदि, संदर्भानुसार) से युक्त; अशुभं कर्म = अशुभ कर्म / कार्य; गुरु-पुत्र-आदि-नाशनम् = गुरु (शिक्षक/पितृ-तुल्य) व पुत्र आदि का नाश/हानि; स्थान-भ्रंशः = पद / स्थान से च्युति; मनो-दुःखम् = मानसिक क्लेश; अकस्मात् = अचानक; कलहः = झगड़ा; ध्रुवम् = निश्चित रूप से (शास्त्र का दृढ़ फल-शब्द)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब (पूर्वोक्त दशा में) गुरु पाप-युक्त हो, तब अशुभ कर्म, गुरु–पुत्र आदि की हानि, स्थान-भ्रंश, मनोदुःख और अचानक कलह — ये फल “ध्रुवम्” कहे गए हैं। यहाँ “ध्रुवम्” शास्त्र का अपना दृढ़-कथन है; इसे भाग्य की आधुनिक निश्चितता या भय-वाणी के रूप में नहीं पढ़ना। फल-भाषा स्रोत-पाठ की है, भविष्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that if Jupiter is joined with malefics, there are inauspicious deeds, harm regarding teachers/elders and children, loss of standing, mental distress, and sudden quarrel — affirmed as “dhruvam” in the śāstra’s own voice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “पापयुक्त” की जाँच: समान राशि (या स्वीकृत युति-डिग्री सीमा) में पाप-ग्रहों की उपस्थिति; सीमा-परंपरा घोषित करनी होती है। कोई बिन्दु-योग या बल-इकाई यहाँ कथित नहीं।

53.27
गृहक्षेत्रादिनाशश्च वाहनाम्बरनाशनम् |
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा
gṛhakṣetrādināśaśca vāhanāmbaranāśanam |
dāyeśātkendrakoṇe vā duścikye lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृह-क्षेत्र-आदि-नाशः = घर, खेत आदि का नाश/हानि; च = और; वाहन-अम्बर-नाशनम् = वाहन व वस्त्र का नाश; दायेश-आत् = दशा-स्वामी (दायेश) से; केन्द्र-कोणे = केन्द्र या कोण (त्रिकोण) में; वा = अथवा; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में (दुश्चिक्य = 3); लाभ-गे = एकादश में; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ अशुभ शाखा का विस्तार: शास्त्र घर–क्षेत्र आदि की हानि और वाहन–वस्त्र के नाश का फल कहता है। फिर नई स्थिति खुलती है — यदि (फल-कर्ता / संबंधित ग्रह) दायेश से केन्द्र या कोण में हो, अथवा तृतीय (दुश्चिक्य) या लाभ भाव में हो, तो अगले श्लोक का शुभ फल जुड़ता है। यह श्लोक दो खंडों वाला है: पहले अशुभ हानि, फिर दायेश-सापेक्ष स्थिति की शर्त। पाठ-भेद संभव — “दायेशात्” की संदर्भ-सीमा (चन्द्र-दशापति या गुरु स्वयं) संस्करणों में विवादास्पद हो सकती है।

English rendering There is also loss of house, fields and the like, and destruction of vehicles and clothing. Alternatively, if the relevant planet stands in a kendra or trikoṇa from the daśā-lord (dāyeśa), or in the third or the eleventh, the favourable branch of the next verse is opened.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दायेश-सापेक्ष भाव: b′ = floor((λ_planet − λ_dāyeśa + 360°) mod 360° ÷ 30°) + 1। शुभ-शाखा-शर्त (श्लोक के उत्तरार्ध): b′ ∈ {1,4,5,7,9,10} (केन्द्र+कोण) अथवा b′ ∈ {3,11} (दुश्चिक्य, लाभ)। पूर्वार्ध अशुभ फल-कथन है — कोई अलग अंक-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) दायेश = चन्द्र (चन्द्र-महादशा); चन्द्र = वृषभ 8°; गुरु = कन्या 20° → गुरु दायेश से भाव = 5 (त्रिकोण/कोण)। शर्त “दायेशात् … कोणे” पूरी → 53.28 का सौख्य-लाभ फल-शाखा लागू कही जाती है।

53.28
भोजनाम्बरपरवादि=लाभं सौख्यं करोति च |
ब्र्हात्रादिसुखसम्पत्तिं धैर्यं वीर्यपराक्रमम्
bhojanāmbaraparavādi=lābhaṃ saukhyaṃ karoti ca |
brhātrādisukhasampattiṃ dhairyaṃ vīryaparākramam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजन = अन्न / भोजन; अम्बर = वस्त्र; पर-वादि = अन्य / तत्सदृश वस्तुएँ (ādi-सूची; पाठ-भेद संभव); लाभम् = लाभ; सौख्यम् = सुख; करोति = करता है; च = और; भ्रातृ-आदि (ब्र्हात्रादि — लेखन-भेद; मानक: भ्रातृ) = भाइयों आदि; सुख-सम्पत्तिम् = सुख व समृद्धि; धैर्यम् = धैर्य; वीर्य-पराक्रमम् = वीर्य व पराक्रम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (दायेश से केन्द्र/कोण/दुश्चिक्य/लाभ की स्थिति में) भोजन, वस्त्र और तत्सदृश वस्तुओं का लाभ तथा सौख्य होता है। भाइयों आदि से सुख-सम्पत्ति, धैर्य, वीर्य और पराक्रम भी इसी फल-सूची में गिनाए गए हैं। “ब्र्हात्रादि” स्पष्टतः भ्रात्रादि का लेखन-रूप है; पाठ-भेद संभव। पूरे 53.22–28 का ढाँचा: चन्द्र-महादशा में गुरु-अन्तर्दशा — शुभ स्थिति → राज्य–उत्सव–धन–लक्ष्मी; दोष/पाप/दुर्बल → हानि–कलह; दायेश-सापेक्ष शुभ स्थान → भोजन–वस्त्र–भ्रातृ-सुख।

English rendering The text states that (under the favourable dāyeśa-relative placement) there is gain of food, clothing and similar goods, and comfort; also happiness and prosperity through brothers and kin, with fortitude, vigour and prowess.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि 53.22 के (10 × 16)/120 = 4/3 वर्ष पर टिकी रहती है; यहाँ केवल दायेश-सापेक्ष शुभ भावों का फल-विस्तार है — कोई नया स्थिरांक या वर्ग-नियम नहीं।

53.29
यज्ञव्रतविवाहादिराज्यश्रीधनसम्पदः |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते
yajñavratavivāhādirājyaśrīdhanasampadaḥ |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यज्ञ = वैदिक यज्ञ-अनुष्ठान; व्रत = नियम/उपवास-संकल्प; विवाहादि = विवाह आदि संस्कार; राज्यश्री = राजसत्ता व राजलक्ष्मी; धनसम्पदः = धन-ऐश्वर्य; दायेश = दशा/भुक्ति-स्वामी (कालखण्ड का अधिपति); रिपु = षष्ठ भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; व्यय = द्वादश भाव; बलवर्जित = बल-रहित/निर्बल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दायेश (दशा-भुक्ति का स्वामी) रिपु (६), रन्ध्र (८) अथवा व्यय (१२) में स्थित हो, अथवा बल से रहित हो, तब यज्ञ, व्रत, विवाह आदि संस्कार, राज्य-श्री तथा धन-संपत्ति का क्षेत्र प्रभावित माना जाता है। यह स्थिति काल-स्वामी की दुष्ट भाव-स्थिति या निर्बलता से जुड़ी हुई है। फल का विस्तृत कथन अगले श्लोक में पूरा होता है।

English rendering The text states that when the period-lord (dāyeśa) occupies the sixth, eighth, or twelfth house, or is devoid of strength, the domain of sacrifice, vows, marriage and related rites, royal fortune, and wealth-prosperity is indicated as affected under that condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-स्वामी की भाव-स्थिति)। रिपु = ६, रन्ध्र = ८, व्यय = १२ — भाव-संख्या शास्त्रीय नामों से सीधी; बलाभाव एक गुणात्मक शर्त है, कोई अंकीय सूत्र यहाँ नहीं दिया गया।

53.30
करोति कुत्सिनान्नं च विदेशगमनं तथा |
भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तमन्ते क्लेशकरं भवेत्
karoti kutsinānnaṃ ca videśagamanaṃ tathā |
bhuktyādau śobhanaṃ proktamante kleśakaraṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) करोति = करता है / उत्पन्न करता है; कुत्सिनान्नम् = निंद्य/अशुद्ध/अपात्र अन्न; विदेशगमनम् = परदेश-यात्रा; भुक्त्यादौ = भुक्ति के आरम्भ में; शोभनम् = शुभ/मंगल; प्रोक्तम् = कहा गया; अन्ते = अन्त में; क्लेशकरम् = कष्टदायी; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (पूर्वोक्त दुर्बल/दुष्ट-स्थित दायेश की) स्थिति कुत्सित अन्न और विदेश-गमन का संकेत देती है। भुक्ति के आरम्भ को शुभ कहा गया है, परन्तु उसी भुक्ति के अन्त को क्लेशकारक बताया गया है। यह काल-खण्ड के आरम्भ–अन्त भेद का शास्त्रीय कथन है, न कि कोई निश्चित घटनाक्रम।

English rendering The text states that [such a period-lord] produces base or impure food and travel to a foreign land; the beginning of the bhukti is declared auspicious, while its end is said to become distress-causing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति के आदि–अन्त का द्वैध)। भुक्ति-अवधि का माप दशा-प्रणाली (यथा विंशोत्तरी) में आता है; इस श्लोक में केवल “आदौ शुभ / अन्ते क्लेश” का गुणात्मक नियम है, कोई वर्ष-अंश नहीं।

53.31
द्वितीयद्यूननाथे च ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् |
स्वर्णदानमिति प्रोक्तं सर्वकष्टनिवारकम्
dvitīyadyūnanāthe ca hyapamṛtyurbhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ śivasāhasrakaṃ japet |
svarṇadānamiti proktaṃ sarvakaṣṭanivārakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = 2 भाव; द्यून = सप्तम (7) भाव; नाथे = स्वामी होने पर; अपमृत्युः = अकाल/आकस्मिक मृत्यु का भय; भविष्यति = होगा; तद्दोषपरिहारार्थं = उस दोष के शमन हेतु; शिवसाहस्रकं = शिव-सहस्रनाम; जपेत् = जपे; स्वर्णदानम् = स्वर्ण-दान; प्रोक्तम् = कहा गया; सर्वकष्टनिवारकम् = समस्त कष्टों का निवारक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु द्वितीय अथवा सप्तम (मारक भाव) का स्वामी हो, तब अपमृत्यु का भय बताया गया है। इसके शमन-रूप में पाठ शिव-सहस्रनाम जप एवं स्वर्ण-दान को सर्व-कष्ट-निवारक कहता है। यह तीन-पंक्ति (छः-पाद) का श्लोक है।

English rendering When [Jupiter] rules the 2nd or the 7th, the text speaks of a fear of untimely death; to allay that flaw it prescribes recitation of the Śiva-sahasranāma, and the gift of gold is called a remover of all hardship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-निर्धारण एवं शान्ति-विधान। तकनीकी अंश केवल स्वामित्व-गणना है: मारक = द्वितीय (2) एवं सप्तम (7) भाव के अधिपति। "अपमृत्यु" व शमन-विधान शास्त्र के अपने कथन हैं, कोई नियति-घोषणा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ हमारी विधि सीधे लागू होती है — गणित और व्याख्या को पृथक् रखना। मारक-भाव-स्वामित्व एक निश्चित भाव-गणना (2/7) है; परन्तु "अपमृत्यु-भय" और जप/दान शास्त्र के कथन-रूप में ही प्रस्तुत किए जाते हैं, भय या दबाव के रूप में नहीं — यही हमारे decode की घोषित अनुशासन-रेखा है।

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53.32
चन्द्रस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वक्षेत्रे स्वांशगे चैव मन्दे तुङ्गांशसंयुते
candrasyāntargate mande lagnātkendratrikoṇage |
svakṣetre svāṃśage caiva mande tuṅgāṃśasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर् = चन्द्र की अन्तर्दशा में; गते मन्दे = शनि (मन्द) स्थित/प्रवृत्त; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = १, ४, ७, १०; त्रिकोण = ५, ९; स्वक्षेत्रे = अपने राशि-क्षेत्र में; स्वांशगे = अपने अंश (वर्ग/नवांश आदि) में; तुङ्गांशसंयुते = उच्च-अंश से युक्त; मन्दे = शनि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र की अन्तर्दशा में जब मन्द (शनि) लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा स्वक्षेत्र में, स्वांश में, या तुङ्ग-अंश से युक्त हो, तब आगे के श्लोकों में वर्णित शुभ फल की भूमिका बनती है। यह अन्तर्दशा-स्वामी/ग्रह की स्थिति-शर्त है। फल ५३.३३–३४ में पूरा होता है।

English rendering The text states: when Saturn operates within the Moon’s antardāśā and is in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in its own sign, own aṃśa, or joined with exaltation-aṃśa — the favorable conditions for the results that follow are set.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अनुपात (विंशोत्तरी ढाँचे में, जहाँ लागू): अन्तर्-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। चन्द्र महादशा = १० वर्ष, शनि = १९ वर्ष ⇒ चन्द्र–शनि अन्तर् ≈ (१० × १९) ÷ १२० = १९०⁄१२० = १ + ७⁄१२ वर्ष। केन्द्र = {१,४,७,१०}, त्रिकोण = {५,९} — लग्न-सापेक्ष भाव-मॉड्यूलो १२। “स्वांश/तुङ्गांश” वर्ग-मानचित्र (यथा D9) पर निर्भर; अयनांश व वर्ग-नियम घोषित करने पर ही अंश-स्थिति निश्चित होती है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी: चन्द्र महादशा १० y, शनि अन्तर् १९ y ⇒ अन्तर्-अवधि = १० × १९ ÷ १२० = १.५८३… y ≈ १ y ७ m (सटीक: १९०⁄१२० वर्ष)। यदि लग्न = मेष, शनि कर्क (४) में = केन्द्र — शर्त “लग्नात् केन्द्रगे” पूरी। (अयनांश/ग्रह-स्पष्ट मान अलग से नियत करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में चन्द्र १०, शनि १९ — योग १२० के नव-ग्रह खंडों में पinned; अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात-गणित है। “चन्द्रस्यान्तर्गते मन्दे” उसी काल-इंजन का शास्त्रीय नाम है जिसका हम exact ratio से गणना करते हैं — फल अलग, अवधि-गणित अलग।

53.33
शुभदृष्टयुते वाऽपि लाभे वा बलसंयुते |
पुत्रमित्रार्थसम्पत्तिः शूद्रप्रभुसमागमात्
śubhadṛṣṭayute vā'pi lābhe vā balasaṃyute |
putramitrārthasampattiḥ śūdraprabhusamāgamāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभदृष्टयुते = शुभ दृष्टि से युक्त; वा अपि = अथवा; लाभे = लाभ भाव (११) में; बलसंयुते = बल-युक्त; पुत्र = संतान; मित्र = मित्र; अर्थ = धन; सम्पत्तिः = संपत्ति; शूद्रप्रभुसमागमात् = शूद्र-प्रभु (सामान्य/श्रम-शासक वर्ग के स्वामी) के समागम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (पूर्वोक्त मन्द, चन्द्रान्तर् में) यदि शुभ दृष्टि से युक्त हो, अथवा लाभ (११) में बल सहित हो, तब पुत्र, मित्र, अर्थ और संपत्ति का संकेत है; विशेषतः शूद्र-प्रभु के समागम से। यह फल-कथन पूर्व श्लोक की स्थिति-शर्तों पर टिका है।

English rendering The text states that if [Saturn], thus placed, is also joined with benefic aspect, or occupies the eleventh with strength, there is gain of sons, friends, wealth and property — said to arise through association with a śūdra-prabhu (a lord among the common/service estate).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “लाभ” = भाव ११; “बलसंयुक्त” षड्बल/स्थिति-बल आदि की ओर संकेत कर सकता है, पर इस श्लोक में कोई रूप/विरूप माप नहीं दिया गया। दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) दृष्टि-अध्याय की व्यवस्था पर निर्भर — यहाँ केवल “शुभदृष्टियुत” की शर्त है।

53.34
व्ययसायात्फलाधिक्यं गृहे क्षेत्रादिवृद्धिदम् |
पुत्रलाभश्च कल्याणं राजानुग्रहवैभवम्
vyayasāyātphalādhikyaṃ gṛhe kṣetrādivṛddhidam |
putralābhaśca kalyāṇaṃ rājānugrahavaibhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययसायात् = व्यय/उद्योग-प्रयास से; फलाधिक्यम् = फल की अधिकता; गृहे = गृह में; क्षेत्रादिवृद्धिदम् = क्षेत्र (भूमि) आदि की वृद्धि देने वाला; पुत्रलाभः = पुत्र-प्राप्ति; कल्याणम् = मंगल/कुशल; राजानुग्रह = राजा का अनुग्रह; वैभवम् = वैभव/समृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (उक्त शुभ स्थित मन्द-चन्द्रान्तर् में) व्यय या उद्योग-प्रयास से फल की अधिकता होती है; गृह और क्षेत्र आदि में वृद्धि का संकेत है। पुत्र-लाभ, कल्याण, राजानुग्रह और वैभव भी इसी क्रम में गिनाए गए हैं। ये सब शास्त्र के फल-पद हैं — निश्चित घटना या भय/आश्वासन नहीं।

English rendering The text states that from expenditure or industrious effort there is excess of results; growth of house, land and the like is indicated, together with gain of a son, welfare, royal favor, and prosperity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ अन्तर्दशा-फल की पूर्ति)। कोई वर्ष-संख्या, बिन्दु या अंश-माप यहाँ नहीं; सम्पूर्ण ५३.३२–३४ एक स्थिति→फल श्रृंखला है।

53.35
षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वा धनगेऽपि वा |
तद्भुक्त्यादौ पुण्यतीर्थे स्नानं चैव तु दर्शनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye mande nīce vā dhanage'pi vā |
tadbhuktyādau puṇyatīrthe snānaṃ caiva tu darśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ = ६; अष्टम = ८; व्यय = १२; मन्दे = शनि; नीचे = नीच राशि/नीच स्थिति में; धनगे = धन भाव (२) में; अपि वा = अथवा; तद्भुक्त्यादौ = उस भुक्ति के आरम्भ में; पुण्यतीर्थे = पुण्य तीर्थ में; स्नानम् = स्नान; दर्शनम् = दर्शन (देव/तीर्थ-दर्शन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मन्द षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो, अथवा नीच में, अथवा धन (द्वितीय) में भी हो, तब उस भुक्ति के आरम्भ में पुण्य-तीर्थ में स्नान और दर्शन का उल्लेख है। यह शास्त्र का आचार/परिहार-संकेत है — दबाव-उपाय या चिकित्सा निर्देश नहीं; केवल पाठ का कथन।

English rendering The text states that when Saturn occupies the sixth, eighth, or twelfth, or is in debilitation, or even in the second house, at the beginning of that bhukti one is directed to bathing at a sacred tīrtha and to darśana — as the śāstra’s own observant formulary, not as coercive remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/आचार-कथन (दुष्ट-स्थित शनि-भुक्ति के आदि में)। षष्ठ=६, अष्टम=८, व्यय=१२, धन=२; “नीच” राशि-सापेक्ष (शनि का नीच = मेष, शास्त्रीय नीच-स्थान) — अयनांश से राशि-स्थिति निर्भर। भुक्ति-अवधि का अंकीय मान इस श्लोक में नहीं; केवल “भुक्त्यादौ” का काल-बिन्दु।

53.36
अनेकजनत्रासश्च शस्त्रपीडा भविष्यति |
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे बलगेऽपि वा
anekajanatrāsaśca śastrapīḍā bhaviṣyati |
dāyeśātkendrarāśisthe trikoṇe balage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेकजनत्रासः = बहुत जनों में भय/त्रास; शस्त्रपीडा = शस्त्रजन्य पीड़ा; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); दायेश = दशा-स्वामी; केन्द्रराशिस्थ = 1/4/7/10 भाव-राशियों में स्थित; त्रिकोण = 1/5/9; बलग = बलयुक्त; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश (प्रचलित दशा का स्वामी) केन्द्र-राशि में स्थित हो, अथवा त्रिकोण में हो, अथवा बल से युक्त हो — तब भी अनेक जनों में त्रास और शस्त्र-पीड़ा का फल बताया गया है। यह फल-कथन दशा-स्वामी की स्थिति से जोड़ा गया है; यहाँ “केन्द्र/त्रिकोण/बल” को सामान्य शुभता का एकमात्र मापदण्ड न समझें — पाठ उसी दशा-प्रसंग का अंग है। पाठ-भेद संभव: पूर्वर्द्ध-उत्तरर्द्ध का संबंध आस-पास के श्लोकों से पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that fear among many people and weapon-related affliction will occur when the daśā-lord stands in a kendra sign, or in a trikoṇa, or even when endowed with strength. The claim is the śāstra’s phala-statement for that placement, not a free-standing guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-स्वामी की केन्द्र/त्रिकोण/बल-स्थिति से जुड़ा phala)। “केन्द्र” = भाव 1, 4, 7, 10; “त्रिकोण” = 1, 5, 9 — गिनती लग्न से या प्रसंगानुसार दशा-संदर्भ से; convention घोषित रखें।

53.37
क्वचित्सौख्यं धनाप्तिश्च दारपुत्रविरोधकृत् |
द्वितीयद्यूनरन्ध्रस्थे देहबाधा भविष्यति
kvacitsaukhyaṃ dhanāptiśca dāraputravirodhakṛt |
dvitīyadyūnarandhrasthe dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्वचित् = कहीं/कभी; सौख्यं = सुख; धनाप्तिः = धन-प्राप्ति; दारपुत्रविरोधकृत् = पत्नी-पुत्र से विरोध उत्पन्न करने वाला; द्वितीय = द्वितीय भाव; द्यून = सप्तम (द्यून); रन्ध्र = अष्टम; स्थे = स्थित होने पर; देहबाधा = देह में बाधा/पीड़ा; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कहीं सुख और धन-प्राप्ति भी हो सकती है, किन्तु वही दशा दार-पुत्र विरोध करने वाली कही गई है। जब (दायेश या प्रसंग-ग्रह) द्वितीय, द्यून (सप्तम) अथवा रन्ध्र (अष्टम) में स्थित हो, तब देह-बाधा का फल बताया गया है। यह मिश्रित फल-कथन है — शुभ-अशुभ दोनों पक्ष पाठ में साथ-साथ हैं; हम इसे नियति या निदान नहीं बनाते।

English rendering The text states occasional comfort and acquisition of wealth, yet also conflict with spouse and children. When the relevant planet stands in the second, seventh (dyūna), or eighth (randhra) house, bodily obstruction is stated as the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थिति: 2 / 7 / 8)। भाव-गिनती लग्न-आधारित whole-sign या प्रयुक्त भाव-पद्धति पर निर्भर; convention स्पष्ट रखें।

53.38
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेमारोग्यमादिशेत्
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret |
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyāddānemārogyamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोषपरिहारार्थं = उस दोष के शमन हेतु; मृत्युञ्जयजपं = महामृत्युञ्जय-मन्त्र जप; चरेत् = करे; कृष्णां गां = काली गौ; महिषीं = भैंस; दद्यात् = दान करे; दानेन = दान से; आरोग्यम् = नीरोगता; आदिशेत् = कहा/निर्दिष्ट किया गया है।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की देहबाधा-शर्त का शमन-विधान — पाठ कहता है कि महामृत्युञ्जय-जप करे तथा काली गौ और भैंस का दान करे; इस दान से आरोग्य कहा गया है। यह शास्त्र का शान्ति-कथन है।

English rendering To allay that flaw, one should perform the Mṛtyuñjaya recitation, and give a black cow and a she-buffalo; by that gift, health is enjoined.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान। कोई संख्या या भाव-गणना नहीं; पूर्णतः उपचार-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी अनुशासन-रेखा को उजागर करता है: यहाँ गणित शून्य है, केवल शास्त्र का उपचार-कथन है। अतः हम इसे "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करते हैं — आरोग्य/दान को न भय के रूप में, न दबाव-रूप उपाय के रूप में; गणना-योग्य दावे ही (विमशोत्तरी अवधि, षड्बल, वर्ग) exact सत्यापन के दायरे में रखे जाते हैं, फल एवं उपचार शास्त्र की अपनी वाणी रहते हैं।

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53.39
चन्द्रस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
स्वर्क्षे निजांशके सौम्ये तुङ्गे वा बलसंयुते
candrasyāntargate saumye kendralābhatrikoṇage |
svarkṣe nijāṃśake saumye tuṅge vā balasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर्गत = चन्द्र-महादशा के अन्तर्गत (अन्तर्दशा-प्रसंग); सौम्ये = बुध में/बुध के; केन्द्र = 1/4/7/10; लाभ = एकादश; त्रिकोणगे = 1/5/9 में स्थित; स्वर्क्षे = स्व-राशि में; निजांशके = निज अंश (स्व-नवांश आदि) में; सौम्ये = बुध; तुङ्गे = उच्च में; वा = अथवा; बलसंयुते = बल से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चन्द्र की अन्तर्गत बुध-अवस्था का वर्णन करता है: जब सौम्य (बुध) केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो, अथवा स्व-राशि में, निज अंश में, उच्च में, अथवा बल से युक्त हो — तब आगे के श्लोकों में कहा गया शुभ फल लागू माना गया है। यह दशा-अन्तर्दशा का स्थिति-नियम है; “बल” षड्बल/अवस्था-बल का सामान्य संकेत है, यहाँ संख्या नहीं दी गई। पाठ-भेद संभव: “अन्तर्गत सौम्ये” को बुध-अन्तर्दशा (चन्द्र-महादशा में) पढ़ना प्रचलित है।

English rendering When Mercury operates within the Moon’s period — and Mercury is in a kendra, the eleventh, or a trikoṇa, or in its own sign, own aṃśa, exaltation, or joined with strength — the text sets the condition for the favourable results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी संरचना (BPHS Ch.46–47): महादशा-चक्र 120 वर्ष; चन्द्र महादशा = 10 वर्ष; बुध अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × बुध-वर्ष) ÷ 120 = (10 × 17) ÷ 120 = 170/120 = 1 वर्ष + 5 मास (अनुपात-अंकगणित)। भाव-स्थिति: केन्द्र {1,4,7,10}, लाभ = 11, त्रिकोण {1,5,9}; उच्च/स्वराशि/निजांश = राशि-नियम + वर्ग-नियम (D9 आदि) — ayanāṃśa और वर्ग-नियम घोषित करें।

उदाहरण (worked example) चन्द्र महादशा 10 y, बुध अन्तर् = 10 × 17 / 120 = 1.4166… y ≈ 1 y 5 m। मान लें लग्न-सिंह, बुध कन्या (स्व) एकादश (मिथुन? — wait: if Lagna Leo, 11th is Gemini; Mercury in Gemini = own + 11th): फल-प्रसंग 53.40–41 के लिए स्थिति-शर्त पूरी। (ayanāṃśa: whichever used for longitudes; house system: whole-sign for bhāva labels unless stated otherwise.)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा-अनुपात (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/120 हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित से बँधा है — केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। यहाँ श्लोक फल-शर्तें देता है; अवधि-गणित इंजन से, फल-कथन शास्त्र-वाणी से — दोनों अलग रखे जाते हैं।

53.40
धनागमो राजमानप्रियवस्त्रादिलाभकृत् |
विद्याविनोदसद्गोष्ठी ज्ञानवृद्धिः सुखावहा
dhanāgamo rājamānapriyavastrādilābhakṛt |
vidyāvinodasadgoṣṭhī jñānavṛddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-आगमः = धन का आगमन; राज-मान = राज-सम्मान; प्रिय-वस्त्र-आदि-लाभ = प्रिय वस्त्रादि की प्राप्ति; विद्या-विनोद = विद्या-जनित आमोद; सद्-गोष्ठी = सज्जनों की सभा/सत्संग; ज्ञान-वृद्धिः = ज्ञान की वृद्धि; सुख-आवहा = सुख लानेवाली।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक (५३.३९) के अनुसार जब चन्द्र-महादशा में बुध (सौम्य) की अन्तर्दशा केन्द्र-लाभ-त्रिकोण में, स्वराशि/स्वांश/उच्च या बलयुक्त होकर आती है, तब — शास्त्र कहता है — धन का आगमन, राज-सम्मान और प्रिय वस्त्रादि का लाभ होता है; विद्या का विनोद, सत्संग और ज्ञान की वृद्धि रहती है, जो सुखदायी बताई गई है।

English rendering Wealth flows in, along with royal honour and the gain of fine garments; there is delight in learning, the company of the wise, and a growth of knowledge — all described by the text as comfort-bringing.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-अन्तर के शुभ-स्थिति फल की निरंतरता)। ध्यातव्य: यह वाक्य ५३.३९ की स्थिति-शर्त (केन्द्र/लाभ/त्रिकोण + बल) का फल-अंश मात्र है; स्थिति की परिभाषा वहाँ है, फल यहाँ।

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53.41
सन्तानप्राप्तिः सन्तोषो वाणिज्याद्धनलाभ्कृत् |
वाहनच्छत्रसंयुक्तनानालङ्कारलाभकृत्
santānaprāptiḥ santoṣo vāṇijyāddhanalābhkṛt |
vāhanacchatrasaṃyuktanānālaṅkāralābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्तानप्राप्तिः = सन्तान की प्राप्ति; सन्तोषः = संतोष; वाणिज्यात् = व्यापार से; धनलाभकृत् = धन-लाभ करने वाला; वाहन = वाहन; छत्र = छत्र (गरिमा/आवरण का चिह्न); संयुक्त = युक्त; नानालङ्कार = नाना आभूषण; लाभकृत् = लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — सन्तान-प्राप्ति और संतोष; वाणिज्य से धन-लाभ। वाहन-छत्र से युक्त नाना अलंकारों का लाभ भी इसी प्रसंग में गिनाया गया है। ये सब 53.39 की स्थिति-शर्तों के अधीन फल-कथन हैं — “सन्तान” या “धन” को चिकित्सा/वित्तीय गारंटी नहीं बनाते; केवल पाठ का कथन।

English rendering The text further states obtainment of offspring, contentment, and monetary gain through trade; also gain of vehicles, the parasol (marks of dignity), and various ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सन्तान/वाणिज्य/भोग-सामग्री)।

53.42
दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा |
विवाहो यज्ञदीक्षा च दानधर्मशुभादिकम्
dāyeśātkendrakoṇe vā lābhe vā dhanage'pi vā |
vivāho yajñadīkṣā ca dānadharmaśubhādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दायेश (महादशा-स्वामी, यहाँ चन्द्र) से गिनकर; केन्द्र-कोणे = केन्द्र (१/४/७/१०) या त्रिकोण (१/५/९) में; लाभे = ११वें में; धन-गे = द्वितीय (धन) में स्थित; विवाहः = विवाह; यज्ञ-दीक्षा = यज्ञ की दीक्षा; दान-धर्म-शुभ-आदिकम् = दान, धर्म व शुभ कर्म आदि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि अन्तर्दशेश बुध, दायेश (चन्द्र) से केन्द्र, त्रिकोण, लाभ या धन-भाव में हो, तो विवाह, यज्ञ-दीक्षा तथा दान-धर्म आदि शुभ कर्म सम्पन्न होते हैं। यहाँ फल की कुंजी अन्तर्दशेश की — जन्म-लग्न से नहीं, बल्कि दायेश से — गिनी गई भावस्थिति है।

English rendering When the sub-lord stands in a quadrant, trine, the eleventh, or the second reckoned from the daśā-lord, the text says marriage, sacrificial initiation, and acts of charity and dharma come to pass.

गणित / तकनीक: भाव-गणना दायेश-सापेक्ष (लग्न-सापेक्ष नहीं)। शुभ-त्रिगर्भ समुच्चय: केन्द्र = {१,४,७,१०}, त्रिकोण = {१,५,९}, लाभ = {११}, धन = {२}। अन्तर्दशेश-राशि की दायेश-राशि से भाव-दूरी h = ((rₐ − r_d) mod 12) + 1; यदि h इस समुच्चय में हो → शुभ फल। यह विशुद्ध मॉड्युलर (mod 12) अंकगणित है, फल-कथन नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-चन्द्र मेष (r_d = 1) में, बुध मकर (rₐ = 10) में। h = ((10−1) mod 12)+1 = 10 → दशम केन्द्र → शर्त पूर्ण। चन्द्र-महादशा में बुध-अन्तर की अवधि = 10 × 17 ÷ 120 = 170/120 = 17/12 वर्ष = 1 वर्ष 5 माह (सन् प्रसंग: चन्द्र 10 वर्ष, बुध 17 वर्ष)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दायेश-सापेक्ष यह भाव-गणना और अन्तर्दशा-अवधि दोनों को हमने विम्शोत्तरी इंजन में शुद्ध अनुपात-गणित माना है: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120, जहाँ चन्द्र 10 व बुध 17 वर्ष (Σ = 120) पिन किए गए हैं। फल-कथन व्याख्या है; अवधि और भाव-सूचकांक `==`-सटीक गणना — दोनों को अलग रखा गया है।

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53.43
राजप्रीतिकरश्चैव विद्वज्जनसमागमः |
मुक्तामणिप्रवालानि वाहनाम्बरभूषणम्
rājaprītikaraścaiva vidvajjanasamāgamaḥ |
muktāmaṇipravālāni vāhanāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-प्रीति-कर = राज्याश्रय / शासक-अनुराग उत्पन्न करने वाला; विद्वज्जन-समागम = विद्वानों से मेल-मिलन; मुक्ता = मोती; मणि = रत्न; प्रवाल = प्रवाल/मूंगा; वाहन = सवारी; अम्बर = वस्त्र; भूषण = आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवस्था में राजप्रीति और विद्वज्जनों के समागम का फल कहता है। साथ ही मुक्ता, मणि, प्रवाल जैसी बहुमूल्य वस्तुओं तथा वाहन, वस्त्र और आभूषण की प्राप्ति का उल्लेख है। यह फल-कथन अवधि-फल के अनुकूल पक्ष का वर्णन है — गणना का सूत्र नहीं, परिणाम का कथन है।

English rendering The text states royal favour and association with the learned, together with pearls, gems, coral, conveyances, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ अवधि-फल का अनुकूल पक्ष गिनाया गया है; संख्या, अंश या बल-इकाई निर्दिष्ट नहीं।

53.44
आरोग्यप्रीतिसौख्यं च सोमपानादिकं सुखम् |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा नीचगेऽपि वा
ārogyaprītisaukhyaṃ ca somapānādikaṃ sukham |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā nīcage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरोग्य = निरोगता; प्रीति = प्रसन्नता/अनुराग; सौख्य = सुख; सोम-पान-आदिक = सोम/मद्य-पान आदि भोग; दायेश = दशा-स्वामी; रिपु = षष्ठ भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; व्यय = द्वादश; नीचग = नीच राशि में स्थित (अपि वा = अथवा)।

हिन्दी भावार्थ पहले चरण में शास्त्र आरोग्य, प्रीति, सौख्य तथा सोमपानादि सुख का फल कहता है। फिर शर्त जोड़ता है — जब दायेश रिपु (६), रन्ध्र (८), व्यय (१२) में हो, अथवा नीचग हो। यह स्थान-दोष की शर्त अगले श्लोक के प्रतिकूल फल से जुड़ती है। पाठ-भेद संभव: “दायेशात्” को “दायेश से” (सापेक्ष स्थान) भी पढ़ा जाता है।

English rendering The text first states health, affection, comfort, and pleasures such as soma-drinking; then conditions the next result on the daśā-lord’s placement in the 6th, 8th, or 12th, or in debilitation (reading variants possible).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थान शर्त। रिपु/रन्ध्र/व्यय = भाव ६/८/१२; नीच = राशि-स्वभाव की दुःस्थिति — यह वर्गीकरण है, संख्यात्मक सूत्र नहीं।

53.45
तद्भुक्तौ देहबाधा च कृर्षिगोभूमिनाशनम् |
कारागृहप्रवेशाश्च दारपुत्रादिपीडनम्
tadbhuktau dehabādhā ca kṛrṣigobhūmināśanam |
kārāgṛhapraveśāśca dāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-भुक्ति = उस (पूर्वोक्त दोषयुक्त) भुक्ति/अन्तर्दशा में; देह-बाधा = शरीर-पीड़ा; कृषि = खेती; गो = पशु/गौ; भूमि = भूमि; नाशन = नाश; कारागृह-प्रवेश = कारावास; दार = पत्नी; पुत्र-आदि = पुत्र आदि; पीडन = पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त (दायेश रिपु-रन्ध्र-व्ययस्थ या नीचग) लागू होने पर शास्त्र उस भुक्ति में देहबाधा कहता है। कृषि, गौ और भूमि के नाश तथा कारागृह-प्रवेश का उल्लेख है। दार-पुत्रादि पर पीड़ा का भी फल-कथन है — यह शास्त्र का अपना वाक्य है, नियति का दावा नहीं।

English rendering In that bhukti, the text states bodily affliction; loss touching agriculture, cattle, and land; imprisonment; and distress to spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ५३.४४ की स्थान-शर्त पर आश्रित परिणाम-सूची; कोई बलांक, अंश या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

53.46
द्वितीयद्यूननाथे तु ज्वरपीडा महद्भयम् |
छागदानं प्रकुर्वीत विष्णुसाहस्रकं जपेत्
dvitīyadyūnanāthe tu jvarapīḍā mahadbhayam |
chāgadānaṃ prakurvīta viṣṇusāhasrakaṃ japet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय भाव; द्यून = सप्तम (द्यून/जाया-स्थान); नाथ = स्वामी; ज्वर-पीडा = ज्वरजन्य कष्ट; महद्-भय = बड़ा भय; छाग-दान = बकरे का दान (शास्त्रोक्त क्रिया); विष्णु-साहस्रक = विष्णुसहस्रनाम; जपेत् = जप करे (शास्त्र का निर्देश-वाक्य)।

हिन्दी भावार्थ जब द्वितीय और द्यून (सप्तम) का नाथ (अवधि में सक्रिय/प्रासंगिक) हो, शास्त्र ज्वर-पीड़ा और महद्भय का फल कहता है। उसी प्रसंग में छागदान और विष्णुसहस्रनाम-जप का उल्लेख है — यह पाठ का अपना विधि-कथन है; इस संस्करण में हम उसे दबाव या अनिवार्य उपाय के रूप में नहीं पढ़ते। पाठ-भेद संभव: “द्वितीयद्यूननाथे” को संयुक्त स्वामित्व या दोनों भाव-स्वामियों के अलग-अलग प्रसंग में भी लिया जाता है।

English rendering When the lord of the 2nd and of the 7th (dyūna) is in view, the text states fever-affliction and great fear; it also mentions goat-dāna and recitation of the Viṣṇu-sahasranāma as the śāstra’s own stated observances—not as our prescription.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रोक्त अनुष्ठान-उल्लेख। भाव २ और ७ के स्वामित्व की शर्त गुणात्मक है; कोई वर्ष-संख्या या बलांक नहीं।

53.47
चन्द्रस्यान्तर्गते केतौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
दुश्चिक्ये बलसंयुक्ते धनलाभं महत्सुखम्
candrasyāntargate ketau kendralābhatrikoṇage |
duścikye balasaṃyukte dhanalābhaṃ mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर्गते केतौ = चन्द्र-दशा में केतु की अन्तर्दशा आने पर; केन्द्र-लाभ-त्रिकोण-गे = केन्द्र/लाभ/त्रिकोण में स्थित; दुश्चिक्ये = तृतीय (दुश्चिक्य/सहज) में; बल-संयुक्ते = बलयुक्त; धन-लाभं महत्-सुखम् = धन-लाभ, महासुख।

हिन्दी भावार्थ यहाँ नया प्रकरण आरम्भ होता है — चन्द्र-महादशा में केतु की अन्तर्दशा। शास्त्र कहता है कि यदि केतु केन्द्र, लाभ, त्रिकोण या तृतीय भाव में बलयुक्त होकर स्थित हो, तो धन-लाभ और महान् सुख की प्राप्ति होती है।

English rendering As Ketu's sub-period opens within the Moon's daśā, if Ketu stands strong in a quadrant, the eleventh, a trine, or the third, the text states there is gain of wealth and great happiness.

गणित / तकनीक: शुभ भाव-समुच्चय (यहाँ लग्न/प्रकरण-सापेक्ष): केन्द्र {१,४,७,१०} ∪ त्रिकोण {१,५,९} ∪ लाभ {११} ∪ दुश्चिक्य {३}, साथ में बल-शर्त (षड्बल)। अन्तर्दशा-अवधि: चन्द्र-केतु = 10 × 7 ÷ 120 = 70/120 = 7/12 वर्ष = ठीक 7 माह।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-महादशा (10 वर्ष) में केतु-अन्तर = 70/120 वर्ष = 7 माह। "बल-संयुक्ते" की जाँच के लिए केतु का षड्बल उसकी दहलीज़ से तुलनीय है (1 रूप = 60 विरूप); बल ≥ दहलीज़ हो तभी पूर्ण शुभ-फल की शर्त पूरी मानी जाती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) केतु-अन्तर की यह 7-माह-अवधि हमारे विम्शोत्तरी इंजन के 120-वर्षीय चक्र से सीधे निकलती है: केतु 7 वर्ष, अन्तर्दशा = (10 × 7)/120 = 7/12 वर्ष — शुद्ध अनुपात-गणित, `==`-सटीक। "बल-संयुक्ते" पद को हमने षड्बल (स्थान/दिग्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्, रूप-विरूप में योग) की गणनीय दहलीज़-तुलना के रूप में पढ़ा है — व्याख्या नहीं, गणना।

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53.48
पुत्रदारादिसौख्यं च विधिकर्म करोति च |
भुक्त्यादौ धनहानिः स्यान्मध्यगे सुखमाप्नुयात्
putradārādisaukhyaṃ ca vidhikarma karoti ca |
bhuktyādau dhanahāniḥ syānmadhyage sukhamāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दार-आदि-सौख्यम् = पुत्र-पत्नी आदि का सुख; विधि-कर्म करोति = विहित (शुभ) कर्म करता है; भुक्ति-आदौ धन-हानिः स्यात् = भुक्ति के आरम्भ में धन-हानि; मध्य-गे सुखम् आप्नुयात् = मध्य में सुख पाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस (शुभ केतु-) अन्तर में पुत्र-पत्नी आदि का सुख मिलता है और मनुष्य विहित शुभ कर्म करता है; किन्तु भुक्ति के आरम्भ में धन-हानि तथा मध्य-भाग में सुख की प्राप्ति बताई गई है। ध्यान दें — यहाँ फल अन्तर्दशा के भीतर काल-खण्डों (आरम्भ/मध्य) में बँटता है।

English rendering The text states this period gives the comfort of children and spouse and the doing of prescribed rites; yet at the sub-period's start there is loss of wealth, while in its middle one attains ease.

गणित / तकनीक: अन्तर्दशा का काल-विभाजन = प्रत्यन्तर्दशा-क्रम। किसी अन्तर के भीतर प्रत्यन्तर (ग्रह P का) = अन्तर-अवधि × (P-वर्ष ÷ 120); प्रत्यन्तर विम्शोत्तरी-क्रम में उसी अन्तर-स्वामी से आरम्भ होते हैं। "भुक्ति-आदौ/मध्य" इन्हीं प्रत्यन्तर-खण्डों की ओर संकेत है।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-केतु अन्तर = 7 माह। इसका प्रथम प्रत्यन्तर (केतु का) = (70/120) × (7/120) वर्ष = 490/14400 वर्ष ≈ 0.0340 वर्ष ≈ 12.4 दिन — यही "भुक्ति-आदौ धन-हानि" का सूक्ष्म काल-खण्ड बनता है; अगले (शुक्र, सूर्य…) प्रत्यन्तर मध्य-भाग को भरते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "आरम्भ बनाम मध्य" फल को हमने प्रत्यन्तर-दशा के अनुपात-विभाजन से यंत्रगत किया है: प्रत्यन्तर = (महा-वर्ष × अन्तर-वर्ष × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120² — वही 120-आधारित शुद्ध भिन्न, बिना किसी टॉलरेंस-बैंड के `==`-सटीक। दशा की समयरेखा गणना है; उसका फल-वर्णन शास्त्र का कथन।

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53.49
दायेशात्केन्द्रलाभे वा त्रिकोणे बलसंयुते |
क्वचित्फलं दशादौ तु दद्यात् सौख्यं धनागमम्
dāyeśātkendralābhe vā trikoṇe balasaṃyute |
kvacitphalaṃ daśādau tu dadyāt saukhyaṃ dhanāgamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा-स्वामी से (सापेक्ष); केन्द्र = १/४/७/१०; लाभ = ११; वा = अथवा; त्रिकोण = १/५/९; बल-संयुते = बलयुक्त होने पर; क्वचित् = कभी-कभी; फलम् = फल; दशा-आदौ = दशा के आरंभ में; दद्यात् = दे (शास्त्र-कथन); सौख्य = सुख; धन-आगम = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ जब (ग्रह/अन्तरेश) दायेश से केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में बलयुक्त हो, शास्त्र कभी-कभी दशा के आरंभ में ही सौख्य और धनागम का फल कहता है। “क्वचित्” सावधानी का शब्द है — सार्वभौम नियम नहीं, सशर्त/सामयिक फल। यह ५३.४७–४८ की स्थान-बल परंपरा को दशा-आदि से जोड़ता है।

English rendering When (the operative planet is) strong in a kendra, the 11th, or a trikoṇa from the daśā-lord, the text states that sometimes, at the very start of the daśā, it yields comfort and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सापेक्ष भाव + बल + दशा-आदि)। सापेक्ष भाव: ग्रह-राशि − दायेश-राशि (मॉड १२) ∈ {१,४,७,१०} ∪ {११} ∪ {१,५,९}; “बल” यहाँ षड्बल-संख्या नहीं खोलता — गुणात्मक “बलसंयुते”। दशा-आदि = महादशा/प्रासंगिक दशा का प्रारंभिक खंड (श्लोक समान-वर्ष विभाजन नहीं देता)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा-अनुपात इंजन की गणित हैं; यह श्लोक दायेश-सापेक्ष केन्द्र/लाभ/त्रिकोण + बल पर दशा-आदि फल बाँधता है। स्थान-मॉड्यूलर जाँच गणना योग्य है; सौख्य-धनागम शास्त्र का फल-वाक्य है — `==` ऑरेकल अवधि और वर्गों पर लगता है, फल की “सच–झूठ” पर नहीं।

53.50
गोमहिष्यादिलाभं च भुक्त्यन्ते चार्थनाशनम् |
पापयुक्तेऽथवा दृष्टे दायेशाद्रन्ध्ररिःफगे
gomahiṣyādilābhaṃ ca bhuktyante cārthanāśanam |
pāpayukte'thavā dṛṣṭe dāyeśādrandhrariḥphage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गो-महिष्यादि-लाभम् = गौ-भैंस आदि पशु-लाभ; भुक्ति-अन्ते = अन्तर्दशा (भुक्ति) के अन्त में; अर्थ-नाशनम् = धन-नाश; पाप-युक्ते अथवा दृष्टे = पापग्रह-युक्त या पाप-दृष्ट; दायेशः = दाय/दशा-स्वामी (अन्तर्दशाधिप); रन्ध्र-रिःफ-गे = ८वें (रन्ध्र) अथवा १२वें (रिःफ) भाव/राशि-स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश (अन्तर्दशाधिप) रन्ध्र (अष्टम) अथवा रिःफ (द्वादश) में हो और पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तब गो-महिष्यादि पशु-लाभ का उल्लेख आता है; किन्तु भुक्ति के अन्त में अर्थ-नाश भी कथित है। यह फल-कथन अन्तर्दशा-स्वामी की भाव-स्थिति और पाप-संयोग/दृष्टि की शर्त पर बँधा है। यहाँ गणना नहीं, दशा-फल की शास्त्रीय शर्त है।

English rendering The text states that when the period-lord (dāyeśa) stands in the 8th (randhra) or 12th (riḥpha) and is joined with or aspected by malefics, there is indication of gain in cattle such as cows and buffaloes, yet at the close of the bhukti, destruction of wealth is also stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अन्तर्दशा-स्वामी की ८/१२ स्थिति + पाप-योग/दृष्टि की शर्त)। भाव-संकेत शास्त्र-परम्परा में रन्ध्र = ८, रिःफ = १२; समय-मापन स्वयं इस श्लोक में नहीं है — वह विंशोत्तरी भुक्ति-अनुपात से अलग अध्याय में आता है।

53.51
शत्रुतः कार्यहानिः स्यादकस्मात्कलहो ध्रुवम् |
द्वितीयद्यूनराशिस्त्य्हे ह्यनारोग्यं महद्भयम्
śatrutaḥ kāryahāniḥ syādakasmātkalaho dhruvam |
dvitīyadyūnarāśistyhe hyanārogyaṃ mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रुतः = शत्रु से; कार्य-हानिः = कार्य/उद्यम की हानि; अकस्मात् कलहः = अचानक झगड़ा; ध्रुवम् = निश्चित (शास्त्र-कथन); द्वितीय-द्यून-राशि-स्थे = द्वितीय अथवा द्यून (सप्तम) राशि/भाव-स्थित (पाठ “स्त्य्हे” में पाठ-भेद संभव; प्रायः “स्थे”); अनारोग्यम् = अस्वास्थ्य; महत् भयम् = बड़ा भय/आशंका।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उक्त स्थिति में) शत्रु से कार्य-हानि होती है और अचानक कलह निश्चित-सा कहा गया है। जब (दायेश) द्वितीय अथवा द्यून (सप्तम) राशि में स्थित हो, तब अनारोग्य और महद्भय का फल भी शास्त्र कहता है। यह भी शर्तबद्ध फल-कथन है, भविष्यवाणी का दावा नहीं।

English rendering The text states loss of work through enemies and sudden quarrel as a firm indication; and when (the lord) is placed in the second or the seventh (dyūna) sign/house, ill-health and great fear are also stated. (Reading of the sandhi form may vary; “stye/sthe” is likely “sthe”.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (२/७ भाव-स्थिति की शर्त)। द्वितीय = २, द्यून = ७ — केवल भाव-सूचकांक; कोई अंश-सूत्र या बल-इकाई इस श्लोक में नहीं।

53.52
मृत्युञ्जयजपं कुर्यात् सर्वसम्पत्प्रदायकम् |
ततः शान्तिमवाप्नोति शङ्करस्य प्रसादतः
mṛtyuñjayajapaṃ kuryāt sarvasampatpradāyakam |
tataḥ śāntimavāpnoti śaṅkarasya prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युञ्जय-जपम् = मृत्युञ्जय-मन्त्र का जप; कुर्यात् = करना चाहिए (शास्त्र-उपदेश); सर्व-सम्पत्-प्रदायकम् = समस्त सम्पत्ति देने वाला (मन्त्र/जप का गुण); ततः = तब; शान्तिम् अवाप्नोति = शान्ति प्राप्त करता है; शङ्करस्य प्रसादतः = शंकर की कृपा से।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-फलों के सन्दर्भ में शास्त्र मृत्युञ्जय-जप का उल्लेख करता है और उसे सर्वसम्पत्-प्रदायक कहता है। फिर कहता है कि शंकर-प्रसाद से शान्ति प्राप्त होती है। यह उपासना/शान्ति-उपदेश का कथन है; इसे भय या दबाव के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए — केवल शास्त्र का अपना स्वर।

English rendering The text enjoins the japa of Mṛtyuñjaya, calling it a bestower of all prosperity, and states that thereafter one attains peace by the grace of Śaṅkara. This is a śānti/upāya statement of the text, not a coercive remedy-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/उपासना-उपदेश (फल-परिहार का शास्त्र-स्वर)। कोई दशा-वर्ष, अंश या वर्ग-नियम यहाँ नहीं।

53.53
चन्द्रस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि राज्यलाभं करोति च
candrasyāntargate śukre kendralābhatrikoṇage |
svocce svakṣetrage vāpi rājyalābhaṃ karoti ca
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर्गते शुक्रे = चन्द्र-महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा में; केन्द्रलाभत्रिकोणगे = (शुक्र) केन्द्र, एकादश या त्रिकोण में; स्वोच्चे = स्वोच्च में; स्वक्षेत्रगे वापि = अथवा स्वराशि में; राज्यलाभं करोति च = राज्य/अधिकार-लाभ करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में, स्वोच्च या स्वराशि में स्थित हो, तो राज्य-लाभ कहा गया है। चन्द्र-अन्तर्दशा-फल अध्याय का यह शुक्र-पद है।

English rendering In Venus's sub-period within the Moon's major period, with Venus in a kendra, the eleventh or a trikoṇa, exalted or in its own sign, the text states there is gain of authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अवधि (विंशोत्तरी) = (चन्द्र 10 × शुक्र 20) ÷ 120 = 200 ÷ 120 = 5/3 वर्ष = 1 वर्ष 8 मास (360-दिवसीय दशा-वर्ष मानकर 600 दिन)। शर्त: Ve ∈ {1, 4, 7, 10, 11, 5, 9} ∧ (Ve उच्च ∨ Ve स्वराशि)।

53.54
महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् |
चतुष्पाज्जिवलाभः स्याद्दारपुत्रादिवर्धनम्
mahārājaprasādena vāhanāmbarabhūṣaṇam |
catuṣpājjivalābhaḥ syāddāraputrādivardhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = राजा/स्वामी की कृपा से; वाहन = सवारी/यान; अम्बर = वस्त्र; भूषणम् = आभूषण; चतुष्पात्-जीव = चौपाया प्राणी (पशुधन); लाभः = प्राप्ति; स्यात् = हो; दार = पत्नी; पुत्र-आदि = सन्तानादि; वर्धनम् = वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ यह शुक्र-भुक्ति के शुभ फल का आरम्भ है (अन्वय अगले श्लोक तक)। शास्त्र कहता है — इस भुक्ति में राजकृपा से वाहन, वस्त्र एवं आभूषण की प्राप्ति, पशुधन का लाभ, तथा पत्नी-सन्तानादि की वृद्धि होती है, ऐसा फल-कथन है।

English rendering By the grace of the sovereign — conveyances, garments and ornaments; gain of livestock; and the flourishing of wife, children and household, the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ भुक्ति-फल)। यहाँ एक सूक्ष्म संख्या छिपी है: चतुष्-पात् में "चतुर् = 4" (चार पैरों वाला) — भूतसंख्या नहीं, अपितु पशु का लक्षण-समास।

53.55
नूतनागारनिर्माणं नित्यं मिष्ठान्नभोजनं |
सुगन्धपुष्पमाल्यादिरम्यस्त्र्यारोग्यसम्पदम्
nūtanāgāranirmāṇaṃ nityaṃ miṣṭhānnabhojanaṃ |
sugandhapuṣpamālyādiramyastryārogyasampadam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नूतन-आगार-निर्माणम् = नये घर का निर्माण; नित्यं = प्रतिदिन; मिष्टान्न-भोजनम् = मधुर अन्न का भोजन; सुगन्ध-पुष्प-माल्य-आदि = सुगन्धित पुष्प, माला आदि; रम्य-स्त्री = मनोहर स्त्री-सुख; आरोग्य = नीरोगता; सम्पदम् = समृद्धि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ-सूची का ही विस्तार है। शास्त्र के अनुसार शुक्र की इस अनुकूल भुक्ति में नवगृह-निर्माण, नित्य मिष्टान्न-भोजन, सुगन्धित पुष्प-मालाएँ, रमणीय गृहस्थ-सुख, आरोग्य एवं सम्पत्ति — ये फल कहे गये हैं। यह शुक्र के भोग-कारकत्व का स्वाभाविक प्रतिबिम्ब है।

English rendering Building of a new home, daily sweet fare, fragrant flowers and garlands, agreeable companionship, health and abundance — such are the stated fruits.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्णन)। भोग, सौन्दर्य, वस्त्र-गन्ध का यह समूह शुक्र के नैसर्गिक कारकत्व से मेल खाता है — भुक्ति-स्वामी के स्वभाव का फल में अनुवाद।

53.56
दशाधिपेन संयुक्ते देहसौख्यं महत्सुखम् |
सत्कीर्तिसुखसम्पत्तिगृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत्
daśādhipena saṃyukte dehasaukhyaṃ mahatsukham |
satkīrtisukhasampattigṛhakṣetrādivṛddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाधिपेन संयुक्ते = महादशा-स्वामी से युक्त (ग्रह/लग्न-सम्बन्ध) होने पर; देह-सौख्यम् = शारीरिक सुख; महत् सुखम् = बड़ा सुख; सत्कीर्ति = अच्छी कीर्ति; सुख-सम्पत्ति = सुख और सम्पत्ति; गृह-क्षेत्रादि-वृद्धि-कृत् = घर-क्षेत्र आदि की वृद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की शर्त स्पष्ट है: जब (चन्द्र/भुक्ति-सम्बद्ध स्थिति) दशाधिप से युक्त हो, तब देह-सौख्य और महत् सुख कहा गया है। वही योग सत्कीर्ति, सुख-सम्पत्ति तथा गृह-क्षेत्रादि की वृद्धि का कारक भी बताया गया है। फल दशाधिप-संयोग पर निर्भर है; निरपेक्ष “भाग्य” का दावा श्लोक नहीं करता।

English rendering The text states that when conjoined with the lord of the major period (daśādhipa), there is bodily ease and great happiness; and that (this conjunction) fosters good fame, comfort, wealth, and increase of house, fields, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशाधिप-संयोग की शर्त)। “संयुक्त” = युति (समान राशि/स्थान); अंश-सीमा या ओरब इस श्लोक में नहीं दी गई। अन्तर्दशा-काल स्वयं: अन्तर्वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष) ÷ १२० — फल से अलग, काल-गणित।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशाधिप-संयोग फल की शर्त है; काल-खण्ड विंशोत्तरी अनुपात से आता है। हमारा डिकोड दोनों को अलग रखता है — इंजन अन्तर्दशा-सीमाएँ `==` अनुपात से निकालता है; “देहसौख्य / सत्कीर्ति” को शास्त्र-कथन के रूप में रिपोर्ट करता है, नियति या चिकित्सा-दावे के रूप में नहीं।

53.57
नीचे वाऽस्तङ्गते शुक्रे पापग्रहयुतेक्षिते |
भूनाशः पुत्रमित्रादिनाशनं पत्निनाशनम्
nīce vā'staṅgate śukre pāpagrahayutekṣite |
bhūnāśaḥ putramitrādināśanaṃ patnināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = नीच राशि/नीच-अवस्था में; अस्तङ्गते = अस्त (सूर्य-समीप दहन/दृश्य-हानि) में; शुक्रे = शुक्र-ग्रह; पापग्रह-युत-ईक्षिते = पाप-ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट; भू-नाशः = भूमि/संपत्ति-नाश; पुत्र-मित्र-आदि-नाशनम् = पुत्र-मित्रादि का क्षय; पत्नि-नाशनम् = पत्नी-संबंधी हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र नीच हो, अथवा अस्त-अवस्था में हो, और पाप-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तब भूमि-संपत्ति का नाश, पुत्र-मित्रादि की हानि तथा पत्नी-संबंधी कष्ट/नाश का फल बताया गया है। यह शुक्र-दशा/अवस्था का फल-कथन है, न कि कोई नियत भविष्यवाणी। पाप-संबंध और नीच/अस्त—दोनों मिलकर दशा-फल को कठोर बनाते हैं।

English rendering The text states that when Venus is debilitated or combust (astaṅgata), and is conjoined with or aspected by malefics, results include destruction of land, loss of sons and friends, and harm concerning the spouse. This is a phala-statement of the śāstra, not a fixed fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र नीच/अस्त + पाप-योग/दृष्टि)। नीच = शुक्र कन्या में; अस्त = सूर्य से निर्धारित कोणीय सीमा में दहन/दृश्य-हानि (परंपरा-भेद संभव)—दोनों अवस्थाएँ फल-निर्णय की शर्तें हैं, संख्या-सूत्र नहीं।

53.58
चतुष्पाज्जिवहानिः स्याद्राजद्वारे विरोधकृत् |
धनस्थानगते शुक्रे स्वच्चे स्वक्षेत्रसंयुते
catuṣpājjivahāniḥ syādrājadvāre virodhakṛt |
dhanasthānagate śukre svacce svakṣetrasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात् = चौपाये पशु; जीव-हानिः = जीवन/जीविका-क्षय; राज-द्वारे = राजद्वार/शासन-द्वार पर; विरोध-कृत् = विरोध उत्पन्न करने वाला; धन-स्थान-गते = द्वितीय भाव में स्थित; शुक्रे = शुक्र; स्व-उच्चे = स्वोच्च (मीन) में; स्व-क्षेत्र-संयुते = स्व-राशि (वृष/तुला) से संयुक्त/स्थित।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की कठोर शर्तों पर शास्त्र आगे कहता है—चौपायों और जीवन/जीविका की हानि तथा राजद्वार पर विरोध। फिर शुभ पक्ष खुलता है: जब शुक्र धन-स्थान (द्वितीय भाव) में हो, स्वोच्च में हो, अथवा स्वक्षेत्र से युक्त/स्थित हो—तो अगले श्लोकों में कहा गया शुभ फल लागू होता है। यह एक ही वाक्य-श्रृंखला का दो-अर्थी पड़ाव है: पहले पाप-फल की निरंतरता, फिर धनस्थ-शुक्र का शुभ-प्रवेश।

English rendering Continuing the prior affliction, the text states loss of quadrupeds and livelihood, and opposition at the royal gate. It then opens a benefic case: Venus placed in the second house, in exaltation, or associated with its own sign—conditions whose results the next verses spell out.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + अवस्था-शर्त। स्वोच्च-शुक्र = मीन; स्वक्षेत्र = वृषभ/तुला; धनस्थान = D1 का द्वितीय भाव (लग्न-निर्भर)। पाठ में «स्वच्चे» = स्वोच्चे (पाठ-भेद/सन्धि संभव)।

53.59
निधिलाभं महत्सौख्यं भू लाभं पुत्रसम्भवम् |
भाग्यलाभादिपैर्युक्ते भाग्यवृद्धिः करोत्यसौ
nidhilābhaṃ mahatsaukhyaṃ bhū lābhaṃ putrasambhavam |
bhāgyalābhādipairyukte bhāgyavṛddhiḥ karotyasau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निधि-लाभम् = निधि/गुप्त-धन का लाभ; महत्-सौख्यम् = महान् सुख; भू-लाभम् = भूमि-प्राप्ति; पुत्र-सम्भवम् = पुत्र-उत्पत्ति/संभव; भाग्य-लाभ-आदिपैः = भाग्य (९) व लाभ (११) आदि भाव-स्वामियों से; युक्ते = युक्त होने पर; भाग्य-वृद्धिः = भाग्य-वृद्धि; करोति असौ = यह (शुक्र) करता है।

हिन्दी भावार्थ धनस्थान/स्वोच्च/स्वक्षेत्र-स्थित शुक्र के लिए शास्त्र कहता है—निधि-लाभ, महान् सुख, भूमि-लाभ और पुत्र-संभव। यदि शुक्र भाग्येश, लाभेश आदि शुभ-भाव-स्वामियों से युक्त हो, तो भाग्य-वृद्धि भी करता है। यह पूर्व-श्लोक की सकारात्मक शर्त का फल-विस्तार है।

English rendering Under those favourable Venus placements, the text states gains of treasure, great comfort, acquisition of land, and the prospect of a child. When Venus is joined with the lords of fortune, gain, and the like, it is said to increase bhāgya (ninth-house fortune).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-योग)। भाग्य = ९, लाभ = ११—भाव-स्वामी योग की पहचान D1-स्वामित्व से होती है; कोई अंश/गुणांक-सूत्र यहाँ नहीं।

53.60
महाराजप्रसादेन स्वेष्टसिद्धिः सुखावहा |
देवब्राह्मणभक्तिश्च मुक्तविद्रुमलाभकृत्
mahārājaprasādena sveṣṭasiddhiḥ sukhāvahā |
devabrāhmaṇabhaktiśca muktavidrumalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महाराज/शासक के प्रसाद से; स्व-इष्ट-सिद्धिः = अभीष्ट-सिद्धि; सुख-आवहा = सुख लाने वाली; देव-ब्राह्मण-भक्तिः = देव-ब्राह्मण-भक्ति; च = और; मुक्त-विद्रुम-लाभ-कृत् = मोती (मुक्ता) व प्रवाल (विद्रुम) का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ उसी शुभ-शुक्र-अवस्था में शास्त्र आगे फल जोड़ता है—राज-प्रसाद से अभीष्ट-सिद्धि और सुख; देव-ब्राह्मण-भक्ति का उदय; तथा मुक्ता-विद्रुम (मोती-मूँगा) जैसे बहुमूल्य द्रव्यों का लाभ। यह धन/सुख/सामाजिक-आश्रय का फल-वर्णन है, न कि क्रय-विक्रय का निर्देश।

English rendering The text further states success of one’s aims through a great king’s favour, bringing happiness; devotion to deities and brāhmaṇas; and gains of pearl and coral. These remain the śāstra’s stated results for the favourable Venus configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राज-प्रसाद, भक्ति, रत्न-लाभ)। «मुक्तविद्रुम» शास्त्रीय रत्न-सूची का भाग है; यहाँ मूल्य/व्यापार-गणित नहीं।

53.61
दायशाल्लाभगे शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा |
गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च वित्तलाभो महत्सुखम्
dāyaśāllābhage śukre trikoṇe kendrage'pi vā |
gṛhakṣetrābhivṛddhiśca vittalābho mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाय-ईशात् = दशा-स्वामी (दायेश) से; लाभ-गे = लाभ-स्थान (११वें) में; शुक्रे = शुक्र; त्रिकोणे = त्रिकोण (१,५,९) में; केन्द्र-गे = केन्द्र (१,४,७,१०) में; अपि वा = अथवा; गृह-क्षेत्र-अभि-वृद्धिः = गृह-क्षेत्र की वृद्धि; वित्त-लाभः = धन-लाभ; महत्-सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शुक्र दायेश से लाभ-स्थान में हो, अथवा त्रिकोण/केन्द्र में हो, तब गृह-भूमि की अभिवृद्धि, वित्त-लाभ और महान् सुख होता है। यहाँ «दायेश» = जिस ग्रह की महादशा/दशा चल रही हो, उसी से गिने भाव—यह दशा-फल की सापेक्ष गणना है। केन्द्र-त्रिकोण-लाभ—तीनों शुभ-स्थान-श्रेणियाँ एक साथ गिनाई गई हैं।

English rendering The text states that when Venus is in the eleventh from the dāyeśa (lord of the running daśā), or in a trikoṇa or kendra from that lord, there is increase of house and land, gain of wealth, and great happiness. Placement is measured from the daśā-lord, not only from the lagna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-सापेक्ष भाव-गिनती का फल-नियम। भाव-सूचकांक: दायेश-राशि को १ मानकर
 लाभ = (दायेश + १०) mod १२ + १;
 केन्द्र = +0,+3,+6,+9; त्रिकोण = +0,+4,+8 (राशि-पद)।
उदाहरण की दृष्टि से यह modular house-count है; कोई bindu/वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) मानें विम्शोत्तरी में शुक्र-महादशा चल रही हो (शुक्र = २० वर्ष—Ch.46–47 का मानक) और दायेश = शुक्र स्वयं वृषभ में हो। तब दायेश से लाभ = मीन; केन्द्र = वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ; त्रिकोण = वृष, कन्या, मकर। यदि शुक्र (यहाँ दायेश = शुक्र) स्वयं केन्द्र/त्रिकोण/लाभ में हो—अर्थात् वृष में ही—तो यह श्लोक का «त्रिकोणे केन्द्रगे» पक्ष तुरंत सत्य है। (लग्न/अयनांश फल-भाषा के लिए अलग; यह केवल दायेश-से-भाव गिनती है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी में शुक्र-महादशा २० वर्ष है (Σ चक्र = १२०: केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चंद्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७)। यह श्लोक दशा-अवधि नहीं गिनता—दायेश-सापेक्ष भाव-फल बताता है। दशा-इंजन अवधि और अन्तर-अनुपात (महा × अन्तर / १२०) अलग गणना करता है; फल-वाक्य को हम «शास्त्र कहता है» के रूप में ही रखते हैं, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

53.62
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते |
विदेशवासदुःखार्तिमृत्युचौरादिपीडनम्
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute |
videśavāsaduḥkhārtimṛtyucaurādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाय-ईशात् = दायेश से; रिपु = षष्ठ; रन्ध्र = अष्टम; स्थे = स्थित; व्यये = व्यय (१२वें) में; वा = अथवा; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त; विदेश-वास = परदेश-निवास; दुःख-आर्ति = दुःख-पीड़ा; मृत्यु = मृत्यु-संबंधी कष्ट; चौर-आदि-पीडनम् = चोर आदि से पीड़न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शुक्र दायेश से षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) में हो, अथवा पाप-युक्त हो, तब विदेश-वास, दुःख-आर्ति, मृत्यु-संबंधी कष्ट तथा चोर आदि से पीड़न का फल बताया गया है। यह पूर्व-श्लोक के शुभ-स्थानों का विपर्यय है: ६/८/१२ + पाप-योग = कष्ट-पक्ष। फल को हम नियति नहीं कहते—पाठ का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Venus stands in the sixth, eighth, or twelfth from the dāyeśa, or is joined with malefics, results include foreign residence, sorrow and affliction, death-related distress, and harassment by thieves and the like. This is the adverse counterpart of the kendra/trikoṇa/lābha placement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-सापेक्ष दुष्ट-स्थान फल। दायेश से:
 रिपु = +5, रन्ध्र = +7, व्यय = +11 (राशि-पद, 0-based offset)।
पाप-संयोग = शास्त्रीय पाप-ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु/केतु—परंपरा-भेद संभव) से युति; यहाँ कोण-सूत्र नहीं, केवल योग-शर्त।

उदाहरण (worked example) दायेश = गुरु, मिथुन में। तब दायेश से षष्ठ = वृश्चिक, अष्टम = मकर, व्यय = वृषभ। यदि शुक्र वृश्चिक/मकर/वृष में हो, तो यह श्लोक की «रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा» शर्त लागू। (भाव-गिनती पूर्ण-राशि पद्धति; अंश-सीमा यहाँ अकथित।)

53.63
द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युभयं भवेत् |
तद्दोषविनिवृत्त्यर्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत्
dvitīyadyūnanāthe tu apamṛtyubhayaṃ bhavet |
taddoṣavinivṛttyarthaṃ rudrajāpyaṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय व द्यून (सप्तम) भाव के नाथ; तु = तो; अपमृत्यु-भयम् = अपमृत्यु का भय; भवेत् = होता है; तत्-दोष-विनिवृत्ति-अर्थम् = उस दोष की निवृत्ति के लिए; रुद्र-जाप्यम् = रुद्र-जाप; च कारयेत् = करवाए/करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब (शुक्र) द्वितीय और सप्तम दोनों का स्वामी हो, तब अपमृत्यु-भय का संकेत है। उन्हीं भावों (२ व ७) को पारंपरिक रूप से मारक-स्थान माना गया है; अतः द्वितीय-द्यून-नाथत्व को दोष-कारण कहा गया। पाठ आगे कहता है—उस दोष-निवृत्ति के अर्थ में रुद्र-जाप्य करवाया जाए। यह शास्त्र का अपना उपाय-कथन है; हम इसे दबाव या अनिवार्य चिकित्सा/विधि के रूप में नहीं थोपते।

English rendering The text states that when Venus is lord of both the second and the seventh (dvitīya-dyūna-nātha), there is fear of untimely death (apamṛtyu). For removal of that doṣa, it enjoins the recitation of Rudra (Rudra-jāpya). We report this as the śāstra’s own stated practice, not as a mandated remedy or a medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-स्वामित्व फल + शास्त्रोक्त उपाय-कथन। द्वितीय-द्यून-नाथ = एक ही ग्रह २ और ७ दोनों का स्वामी। शुक्र के लिए यह तभी संभव जब वृषभ और तुला २ व ७ पर हों:
 • मेष-लग्न: २ = वृष, ७ = तुला → शुक्र = २-७ नाथ;
 • कन्या-लग्न: २ = तुला, ७ = वृष → शुक्र = २-७ नाथ।
अन्य लग्नों में शुक्र एक साथ २ और ७ दोनों का स्वामी नहीं होता। अपमृत्यु यहाँ आयुर्दाय-सूत्र (Ch.43–44) नहीं—फल-भाषा है।

53.64
श्वेतां गां रजतं दद्याच्छन्तिमाप्नोत्यसंशयः |
शङ्करस्य प्रसादेन नाऽत्र कार्या विचारणा
śvetāṃ gāṃ rajataṃ dadyācchantimāpnotyasaṃśayaḥ |
śaṅkarasya prasādena nā'tra kāryā vicāraṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतां गाम् = श्वेत गौ; रजतम् = चाँदी; दद्यात् = दान करे; शान्तिम् आप्नोति = शान्ति प्राप्त करता है; असंशयः = नि:सन्देह; शङ्करस्य प्रसादेन = शिव की कृपा से; न अत्र कार्या विचारणा = इसमें (आगे) कोई चिन्ता/शङ्का नहीं करनी।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के परिहार का समापन — शास्त्र कहता है कि श्वेत गौ एवं रजत का दान करने से नि:सन्देह शान्ति मिलती है, और शिव की कृपा से इस विषय में कोई चिन्ता शेष नहीं रहती। श्वेत गौ/रजत शुक्र-चन्द्र के शुभ्र, सौम्य द्रव्य-वर्ग से सम्बद्ध हैं।

English rendering Let one give a white cow and silver; one attains peace beyond doubt — by Śaṅkara's grace no further anxiety remains, says the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विहित परिहार-कथन (स्तुति-सङ्गति)। तकनीकी सङ्केत: श्वेत वर्ण एवं रजत शुक्र (शुभ्र, सौम्य) तथा चन्द्र (महादशेश) दोनों के द्रव्य — दान-द्रव्य का ग्रह-वर्ग से मेल शास्त्र की आन्तरिक सङ्गति दर्शाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) dossier §5 — परिहार को शास्त्र-वचन रूप में प्रस्तुत करना, भय/दबाव रूप में नहीं; "असंशयः" जैसे निश्चय-वचन शास्त्र का अपना कथन है, हमारी गारंटी नहीं — गणना और फल/परिहार का यही पृथक्करण हमारी विधि का मूल है।

53.65
चन्द्रस्यान्तर्गते भानौ स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते |
केन्द्रे त्रिकोणे लाभे वा धने वा सोदरालये
candrasyāntargate bhānau svocce svakṣetrasaṃyute |
kendre trikoṇe lābhe vā dhane vā sodarālaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रस्य अन्तर्गते = चन्द्र-अन्तर्दशा में; भानौ = सूर्य (भुक्ति-स्वामी के रूप में); स्वोच्चे = अपनी उच्च-राशि में; स्वक्षेत्र-संयुते = स्व-क्षेत्र (स्वराशि) युक्त / स्थित; केन्द्रे = 1-4-7-10 भाव; त्रिकोणे = 1-5-9 भाव; लाभे = 11वें भाव में; धने = 2वें भाव में; वा सोदरालये = अथवा सहोदर-स्थान (3रे भाव) में।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक चन्द्र-महादशा में सूर्य-अन्तर्दशा का शुभ-योग-विन्यास बताता है। शास्त्र कहता है — जब भानु (सूर्य) चन्द्र की अन्तर्दशा में हो और स्वयं उच्च, स्वक्षेत्र में स्थित हो, अथवा केन्द्र, त्रिकोण, लाभ, धन या सोदर-भाव में हो — तो आगे के फल-श्लोक लागू होते हैं। यह दशा-स्थान-संयोग का नियम है, न कि स्वतःसिद्ध भाग्य-घोषणा।

English rendering When the Sun operates in the Moon’s antardaśā, and is exalted, in its own sign, or placed in a kendra, trikoṇa, the eleventh, the second, or the third house — the text sets these as the conditions for the favourable results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात: चन्द्र-महादशा = 10 वर्ष, सूर्य-अन्तर्दशा-वर्ष = 6; अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 = (10 × 6) ÷ 120 = ½ वर्ष = 6 मास। स्थान-शर्तें: उच्च = मेष में सूर्य (0°–30° मेष, स्वोच्च-बिन्दु 10° मेष — पारंपरिक मान); स्वक्षेत्र = सिंह; केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 1, 5, 9 (लग्न-सापेक्ष)। भाव-गिनती लग्न से; अयनांश दशा-आरंभ-नक्षत्र-अंश पर निर्भर — घोषित करें।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-महादशा में सूर्य-अन्तर्दशा = 6 मास (ऊपर का अनुपात)। मान लें लग्न कर्क, सूर्य सिंह 12° = स्वक्षेत्र + केन्द्र (4th from Cancer? Wait: from Cancer lagna, Leo is 2nd = धन, not kendra). Better: Cancer lagna, Sun in Aries exalted = 10th = kendra + ucca. Conditions of 53.65 satisfied → phala of 53.66–67 apply per text. Convention: whole-sign houses; ayanāṃśa only needed if longitude is computed from civil date.

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में चन्द्र 10, सूर्य 6 वर्ष — अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात (MD × AD) ÷ 120 है; यही दशा-इंजन में पिन किया गया है। यह श्लोक उसी चक्र के चन्द्र-MD / सूर्य-AD फल-खण्ड का स्थान-शर्त-द्वार है; अवधि-गणित सटीक `==` अनुपात से, फल-पाठ अलग रखकर पढ़ा जाता है।

53.66
नष्टराज्यधनप्राप्तिर्गृहे कल्याणशोभनम् |
मित्रराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभ्कृत्
naṣṭarājyadhanaprāptirgṛhe kalyāṇaśobhanam |
mitrarājaprasādena grāmabhūmyādilābhkṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नष्ट-राज्य-धन-प्राप्तिः = खोए हुए (नष्ट) राज्य व धन की पुनः-प्राप्ति; गृहे = घर में; कल्याण-शोभनम् = मंगलमय शोभा; मित्र-राज-प्रसादेन = मित्र और राजा की कृपा से; ग्राम-भूमि-आदि-लाभ-कृत् = ग्राम, भूमि आदि का लाभ कराने वाला। (प्रसंग: यह श्लोक 53.65 का फल है — चन्द्र-महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा, जब सूर्य स्वोच्च/स्वक्षेत्र में केन्द्र-त्रिकोण-लाभ-धन-सोदर स्थान में हो।)

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक से अन्वित होकर शास्त्र कहता है — जब चन्द्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा चल रही हो और सूर्य बलवान् व शुभ-स्थानगत हो, तब खोया हुआ राज्य और धन पुनः प्राप्त होता है, घर में कल्याण और शोभा रहती है, तथा मित्रों एवं राजा की कृपा से ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है। यह सूर्य-अन्तर्दशा (भुक्ति) का शुभ फल-कथन है।

English rendering The text states that (with the Sun so placed in its sub-period within the Moon's major period) lost sovereignty and wealth are regained, the household knows welfare and splendour, and through the favour of friends and the king one gains villages, land, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-अन्तर्दशा का शुभ फल)। यद्यपि फल वर्णनात्मक है, जिस उप-कालखण्ड (भुक्ति) की यह बात है वह विंशोत्तरी में एक शुद्ध अनुपात-राशि है: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। चन्द्र-महादशा के अन्तर्दशा-क्रम (महादशेश से आरम्भ) में सूर्य नवाँ अर्थात् अन्तिम अन्तर्दशेश है: चन्द्र → मंगल → राहु → गुरु → शनि → बुध → केतु → शुक्र → सूर्य।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-महादशा = 10 वर्ष, सूर्य के विंशोत्तरी-वर्ष = 6। सूर्य-अन्तर्दशा की अवधि = (10 × 6) ÷ 120 = 60 ÷ 120 = 0.5 वर्ष = 6 मास (≈ 0.5 × 365.25 = 182.6 दिन)। अतः प्रस्तुत फल इस लगभग छह-मासी सूर्य-भुक्ति पर लागू होता है। (परिपाटी: विंशोत्तरी क्रम केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय (चन्द्रान्तर्दशाफल) सीधे विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (BPHS अध्याय 46–47) पर टिका है, जिसे हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित के रूप में सत्यापित किया गया — अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120, नक्षत्र-अंश के व्यतीत-भाग पर आधारित। श्लोक का फल (राज्य-धन-प्राप्ति) शास्त्र का कथन है; भुक्ति की अवधि (यहाँ 6 मास) गणनीय एवं निर्धार्य है — दोनों को हम अलग रखते हैं।

53.67
गर्भाधानफलप्राप्तिर्गृहे लक्ष्मीः कटाक्षकृत् |
भुक्त्यन्ते देह आलस्यं ज्वरपीडा भविष्यति
garbhādhānaphalaprāptirgṛhe lakṣmīḥ kaṭākṣakṛt |
bhuktyante deha ālasyaṃ jvarapīḍā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गर्भाधान-फल-प्राप्तिः = गर्भाधान (सन्तान-हेतु) का फल-लाभ; गृहे = घर में; लक्ष्मीः कटाक्ष-कृत् = लक्ष्मी का कृपा-कटाक्ष (अनुग्रह-दृष्टि); भुक्त्यन्ते = अन्तर्दशा (भुक्ति) के अन्त में; देह-आलस्यम् = शरीर में आलस्य; ज्वर-पीडा = ज्वर की पीड़ा; भविष्यति = होगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य की इसी शुभ अन्तर्दशा में गर्भाधान-सम्बन्धी फल (सन्तान-योग) प्राप्त होता है और घर में लक्ष्मी का कृपा-कटाक्ष रहता है। किन्तु भुक्ति के अन्तिम अंश में शरीर में आलस्य और ज्वर की पीड़ा होने की सम्भावना बताई गई है। इस प्रकार एक ही अन्तर्दशा को आरम्भ-मध्य-अन्त खण्डों में विभाजित कर फल कहा गया है।

English rendering The text states that in this sub-period the fruit of conception is attained and Lakṣmī casts her gracious glance upon the home; yet toward the close of the sub-period the body may know lethargy and the affliction of fever.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ आरम्भ, अन्त में क्लेश)। तकनीकी बिन्दु केवल कालखण्ड-विभाजन का है: "भुक्त्यन्ते" शब्द अन्तर्दशा को समय-रेखा पर आदि/मध्य/अन्त में बाँटता है — यही आगे प्रत्यन्तर्दशा (उप-उप-काल) का बीज है, जो पुनः उसी (अवधि × ग्रह-वर्ष)/120 अनुपात से निकलती है। यहाँ कोई संख्या-स्थिरांक श्लोक में नहीं है।

53.68
दायेशादपि रन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते |
नृपचौराहिभीतिश्च ज्वररोगादिसम्भवः
dāyeśādapi randhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute |
nṛpacaurāhibhītiśca jvararogādisambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा-स्वामी (दायेश = चन्द्र) से गिनने पर; अपि रन्ध्रस्थे = आठवें (रन्ध्र = 8वाँ) भाव में स्थित; व्यये वा = अथवा बारहवें (व्यय = 12वाँ) में; पाप-संयुते = पापग्रहों से युक्त; नृप-चौर-अहि-भीतिः = राजा, चोर और सर्प का भय; ज्वर-रोग-आदि-सम्भवः = ज्वर, रोग आदि का उद्भव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब यही अन्तर्दशेश सूर्य दशा-स्वामी (चन्द्र) से गिनने पर आठवें या बारहवें भाव में हो, अथवा पापग्रहों से युक्त हो, तब राजा, चोर और सर्प से भय, तथा ज्वर-रोग आदि की सम्भावना कही गई है। यह पूर्व श्लोकों के शुभ फल का प्रतिपक्ष (अशुभ-योग) है।

English rendering The text states that when this sub-period Sun stands in the 8th or 12th counted from the daśā-lord, or is joined with malefics, there arises fear from king, thief and serpent, together with the onset of fever and disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; किन्तु एक निर्धार्य स्थान-गणना अन्तर्निहित है। रन्ध्र = 8वाँ, व्यय = 12वाँ भाव, दायेश (चन्द्र) से गिने जाते हैं — ये दुःस्थान हैं। स्थान-संख्या = ((लक्ष्य-राशि − दशेश-राशि) mod 12) + 1, अर्थात् 1…12 का शुद्ध चक्रीय (mod-12) गणित। अशुभ-दुःस्थान समुच्चय = {6, 8, 12} में से यहाँ 8 और 12 उद्धृत।

उदाहरण (worked example) मान लें दशेश चन्द्र मेष (राशि-क्रमांक 1) में है। दायेश से 8वाँ = ((1 + 8 − 1 − 1) mod 12) + 1 → वृश्चिक (8), 12वाँ = मीन (12)। यदि अन्तर्दशेश सूर्य इनमें से किसी में हो, तो श्लोकोक्त अशुभ फल-योग बनता है। (परिपाटी: भाव-गणना यहाँ राशि-आधारित/समभाव; लग्न-आधारित होरा-पद्धति में भावारम्भ-अंश घोषित करना आवश्यक — पाठ-भेद संभव।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दायेश से भाव-गणना विशुद्ध mod-12 अंकगणित है — निर्धार्य और परीक्ष्य; जबकि "राज-चौर-सर्प-भय" शास्त्र का फल-कथन है, हमारी भविष्यवाणी नहीं। हमारी विधि-अनुशासन (गणित को व्याख्या से पृथक् रखना) यहाँ ठीक यही रेखा खींचता है: स्थान की गणना करो, फल को पाठ के स्वर में उद्धृत करो — भय या दबाव के रूप में नहीं।

53.69
विदेशगमने चार्ति लभते न संशयः |
द्वितीयद्यूननाथे तु ज्वरपीडा भविष्यति
videśagamane cārti labhate na saṃśayaḥ |
dvitīyadyūnanāthe tu jvarapīḍā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेश-गमने = विदेश-यात्रा में; च आर्तिम् = और पीड़ा/कष्ट; लभते = प्राप्त करता है; न संशयः = इसमें सन्देह नहीं; द्वितीय-द्यून-नाथे = दूसरे (धन) व सातवें (द्यून = 7वाँ, जाया) भाव के स्वामी होने पर; तु = परन्तु; ज्वर-पीडा भविष्यति = ज्वर-पीड़ा होगी। (2रा व 7वाँ = मारक स्थान।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस अन्तर्दशा में विदेश-गमन में कष्ट प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। और जब अन्तर्दशेश सूर्य द्वितीय या सप्तम भाव का स्वामी हो, तब ज्वर की पीड़ा कही गई है। द्वितीय और सप्तम — दोनों परम्परा में मारक (कष्ट-सूचक) स्थान हैं, अतः इनका स्वामित्व यहाँ अशुभ-सूचक बताया गया है।

English rendering The text states that in this sub-period travel abroad brings hardship, without doubt; and when the Sun rules the 2nd or the 7th house, the affliction of fever ensues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; तकनीकी आधार स्वामित्व-गणना है। द्यून = 7वाँ भाव; 2रा व 7वाँ = मारक-स्थान। स्वामित्व-परीक्षा: अन्तर्दशेश जिस राशि का अधिपति है उसका भाव-क्रमांक = ((स्वामित्व-राशि − लग्न-राशि) mod 12) + 1; यदि परिणाम ∈ {2, 7} तो श्लोकोक्त योग। कोई संख्या-स्थिरांक श्लोक में नहीं — केवल भाव-संख्या 2 व 7।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह (5) हो। सूर्य सिंह का स्वामी है, अतः वह लग्न (1म) का स्वामी हुआ — मारक नहीं। किन्तु यदि किसी चक्र में अन्तर्दशेश कर्क-लग्न (4) में हो और वह द्वितीय (सिंह) या सप्तम (मकर) का अधिपति बने — ((5 − 4) mod 12)+1 = 2 अथवा ((10 − 4) mod 12)+1 = 7 — तब मारकाधिपत्य-योग बनता है। (परिपाटी: द्यून = सप्तम; भाव-गणना लग्न-राशि से समभाव में।)

53.70
तद्दोषपरिहारार्थं शिवपूजां च कारयेत् |
ततः शान्तिभवाप्नोति शाङ्करस्य प्रसादतः
taddoṣaparihārārthaṃ śivapūjāṃ ca kārayet |
tataḥ śāntibhavāpnoti śāṅkarasya prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; शिव-पूजाम् = शिव-पूजन; च कारयेत् = और करावे; ततः = उससे; शान्तिम् आप्नोति = शान्ति प्राप्त करता है; शाङ्करस्य प्रसादतः = शङ्कर (शिव) की कृपा से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अध्याय-खण्ड का उपसंहार करते हुए कहता है — उपर्युक्त अशुभ-योगजनित दोष के निवारण के लिए शिव-पूजा करानी चाहिए; उससे शङ्कर की कृपा से शान्ति प्राप्त होती है। यह एक शान्ति/उपाय-वचन है, जो सूर्य-अन्तर्दशा-प्रकरण को पूर्ण करता है।

English rendering The text says that, to allay the aforesaid affliction, one should have the worship of Śiva performed; thereby, by the grace of Śaṅkara, peace is attained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय/शान्ति-वचन (शिव-पूजा)। यह श्लोक कोई गणना नहीं देता; यह पूर्व अशुभ-योगों (53.67–69) के प्रति शास्त्र का निर्दिष्ट शान्ति-कर्म है। इसे शास्त्र के अपने कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है — भय या बाध्यता के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारे अनुशासन के अनुसार उपाय-वचन को हम शास्त्र की प्रस्तावना के रूप में उद्धृत करते हैं, न कि दबाव या अनिवार्य विधान के रूप में — जैसे फल-कथन "शास्त्र कहता है" के स्वर में रहता है, वैसे ही उपाय भी। गणनीय भाग (अन्तर्दशा की अवधि, दायेश से भाव-गणना) पहले ही पृथक् किया जा चुका है; यह श्लोक विशुद्ध रूप से पाठ का शान्ति-निर्देश है।

अध्यायः 54

कुजदशान्तर्दशाफलाध्यायः

76 श्लोक
54.1
कुजे स्वान्तर्गते विप्र लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
लाभे वा शुभसंयुक्ते दुष्चिक्ये धनसंयुते
kuje svāntargate vipra lagnātkendratrikoṇage |
lābhe vā śubhasaṃyukte duṣcikye dhanasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजे = मङ्गल (भौम); स्वान्तर्गते = अपनी ही अन्तर्दशा में; विप्र = हे ब्राह्मण (संबोधन); लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = 1/4/7/10 भाव; त्रिकोण = 5/9 भाव; लाभे = एकादश भाव में; शुभसंयुक्ते = शुभ ग्रह से युक्त; दुष्चिक्ये = तृतीय भाव में; धनसंयुते = धन (द्वितीय) भाव से संबद्ध/युक्ति-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — हे विप्र, जब मङ्गल अपनी अन्तर्दशा में हो, और लग्न से केन्द्र अथवा त्रिकोण में स्थित हो, अथवा लाभ (11) भाव में शुभ-संयुक्त हो, अथवा दुश्चिक्य (3) भाव में धन-संयोग सहित हो, तो आगे कथित फल की भूमिका बनती है। यह श्लोक फल का आरम्भ-सूत्र है; पूर्ण कथन अगले पद्यों में जुड़ता है। स्थान (केन्द्र/त्रिकोण/लाभ/तृतीय) और योग (शुभ/धन) दोनों को एक साथ बाँधकर मङ्गल-अन्तर्दशा का शुभ-प्रसंग निर्धारित किया गया है।

English rendering The text addresses the pupil: when Mars runs its own antardaśā and stands in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in the eleventh conjoined with benefics, or in the third with a wealth-linked yoga, the favourable results that follow are framed. This verse sets the positional conditions; the outcomes continue in the next lines.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-काल विंशोत्तरी अनुपात से: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120। मङ्गल-महादशा = 7 वर्ष; “कुजे स्वान्तर्गते” = मङ्गल की अपनी अन्तर्दशा = (7 × 7) ÷ 120 = 49/120 वर्ष ≈ 0.4083 वर्ष ≈ 4 मास 27 दिन (सौर वर्ष ≈ 365.25 दिन मानकर; नक्षत्र-शेष से आरम्भ-बिन्दु)। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {5,9}, लाभ = 11, दुश्चिक्य = 3 — लग्न-सापेक्ष भाव-गणना (समान-भाव/whole-sign या रेखीय-भाव — घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र-नक्षत्र से विंशोत्तरी में मङ्गल-महादशा चल रही है और अन्तर्दशा भी मङ्गल की है: अवधि = 49/120 yr। लग्न = मेष; मङ्गल = सिंह (लग्न से 5 = त्रिकोण) — शर्त “लग्नात् … त्रिकोणगे” पूरी। (अयनांश फल को नहीं बदलता; केवल ग्रह-देशान्तर D1 पर भाव-स्थान निर्भर है — house system घोषित रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में मङ्गल = 7 वर्ष; अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/120 — शुद्ध अनुपात-गणित, जैसा daśā-इंजन में बाँधा गया। “स्वान्तर्गत” यहाँ उसी मॉड्यूल का शास्त्र-शब्द है: ग्रह = अन्तर्दशा-स्वामी = मङ्गल। गणना और फल-कथन अलग रखे जाते हैं — अवधि `==` अनुपात से; फल “शास्त्र कहता है” के रूप में।

54.2
लग्नाधिपेन संयुक्ते राजाऽनुग्रहवैभवम् |
लक्ष्मीकटोक्षचिह्नानि नष्टराज्यार्थलाभकृत्
lagnādhipena saṃyukte rājā'nugrahavaibhavam |
lakṣmīkaṭokṣacihnāni naṣṭarājyārthalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपेन = लग्नेश के साथ; संयुक्ते = युक्त होने पर; राजाऽनुग्रह = राज-कृपा; वैभवम् = समृद्धि/प्रताप; लक्ष्मीकटोक्ष = लक्ष्मी की कटाक्ष (कृपा-दृष्टि); चिह्नानि = चिह्न/लक्षण; नष्टराज्यार्थ = नष्ट हुए राज्य/अर्थ का; लाभकृत् = पुनः लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पूर्वोक्त मङ्गल-अन्तर्दशा की शुभ स्थितियों में यदि मङ्गल लग्नेश से युक्त हो, तो राजानुग्रह और वैभव का संकेत मिलता है। लक्ष्मी की कटाक्ष-सदृश शुभ चिह्न भी इसी प्रसंग में गिनाए गए हैं। नष्ट हुए राज्य या धन के पुनः लाभ का कथन भी यहीं जुड़ा है — यह शास्त्र का फल-वाक्य है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when, under those Mars-antardaśā conditions, Mars is conjoined with the lagna-lord, there is indication of royal favour and prosperity, marks likened to Lakṣmī’s gracious glance, and recovery of lost dominion or wealth. These are the śāstra’s result-clauses, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मङ्गल-अन्तर्दशा + लग्नेश-युति)। तकनीक केवल युति-जाँच: long(मङ्गल) और long(लग्नेश) समान राशि में (या चुनी हुई orb/समान-भाव पर “संयुक्त”) — convention घोषित करें।

54.3
पुत्रोत्सवादिसन्तोषो गृहे गोक्षीरसङ्कलम् |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे भौमे स्वांशे वा बलसंयुते
putrotsavādisantoṣo gṛhe gokṣīrasaṅkalam |
svocce vā svarkṣage bhaume svāṃśe vā balasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रोत्सव = पुत्र-सम्बन्धी उत्सव; आदि = इत्यादि; सन्तोषः = आनन्द; गृहे = घर में; गोक्षीर = गाय-दूध; सङ्कलम् = समृद्धि/एकत्रीकरण (पाठ-भेद संभव); स्वोच्चे = उच्च राशि में; स्वर्क्षगे = स्वराशि में; भौमे = मङ्गल में/मङ्गल के; स्वांशे = अपने अंश (प्रायः नवांश/स्व-वर्ग) में; बलसंयुते = बल से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ऐसे प्रसंग में पुत्रोत्सव आदि से घर में सन्तोष और गौ-दुग्ध की समृद्धि का फल कहा गया है। विशेषतः जब भौम उच्च में, स्वराशि में, स्वांश में, अथवा बल-सहित हो, तो यही शुभ-सूत्र और दृढ़ माना गया है। “बल” यहाँ सामान्य शक्ति-संकेत है; पूर्ण षड्बल-माप अलग अध्याय की गणना है।

English rendering The text states household joy from celebrations such as those for a son, and abundance of cattle and milk, especially when Mars is exalted, in its own sign, in its own aṃśa, or endowed with strength. “Strength” here is the verse’s qualitative note; full ṣaḍbala is a separate computational chapter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-नियम (D1): मङ्गल उच्च = मकर (classical; exact degree-band परम्परा-भेद — घोषित करें); स्वराशि = मेष/वृश्चिक; स्वांश = प्रायः नवांश (D9) में मङ्गल-राशि — D9 = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश; राशि-अंश से नवांश-क्रम (चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम Ch.6)। बल = यदि षड्बल लें तो योग rūpa/virūpa में (1 rūpa = 60 virūpa) — इस श्लोक में संख्या नहीं दी।

उदाहरण (worked example) मङ्गल long = 15° मेष (स्वराशि)। नवांश: मेष में प्रत्येक 3°20′; 15° ÷ 3°20′ = 5वाँ नवांश → सिंह (मेष से गणना: 1 मेष…5 सिंह)। “स्वर्क्षगे” सत्य; “स्वांशे” तभी यदि नवांश भी मेष/वृश्चिक हो — यहाँ सिंह ≠ स्व, अतः केवल स्वराशि-शर्त। (वर्ग-इंजन: शुद्ध मॉड्यूलर विभाजन।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश” षोडश-वर्ग की अंश-भाषा से जुड़ता है — D9 आदि 30° के समान खण्ड, कांति पर मॉड्यूलर मानचित्र। फल नहीं, केवल “किस अंश में है” की जाँच सटीक `==` विभाजन से होती है। बल को गिनना हो तो Ch.27 षड्बल अलग पाइपलाइन है; इस पद्य को जबरदस्ती षड्बल-फल नहीं बनाया गया।

54.4
गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गोमहिष्यादिलाभकृत् |
महाराजप्रसादेन स्वेष्टसिद्धिः सुखावहा
gṛhakṣetrābhivṛddhiśca gomahiṣyādilābhakṛt |
mahārājaprasādena sveṣṭasiddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृह = घर; क्षेत्र = खेत/भूमि; अभिवृद्धिः = वृद्धि; गोमहिष्यादि = गौ-भैंस आदि; लाभकृत् = लाभ करने वाला; महाराजप्रसादेन = महाराज की कृपा से; स्वेष्टसिद्धिः = अभीष्ट की सिद्धि; सुखावहा = सुख लाने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गृह और क्षेत्र की वृद्धि तथा गौ-महिष्यादि पशु-लाभ इसी शुभ मङ्गल-अन्तर्दशा-प्रसंग में गिनाया गया है। महाराज-प्रसाद से अभीष्ट-सिद्धि और उससे आने वाला सुख भी यहीं कहा गया है। यह सब पूर्ववर्ती स्थान-बल-शुभ योगों का फल-समुच्चय है।

English rendering The text states increase of house and fields, gain of cattle such as cows and buffaloes, and — through a great ruler’s favour — fulfilment of one’s aims that brings ease. It closes the favourable Mars-antardaśā cluster begun above.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (समृद्धि/राजप्रसाद)। पूर्व श्लोकों की स्थिति-शर्तें ही लागू; नई संख्या नहीं।

54.5
अथाऽष्टमव्यये भौमे पापदृग्योगसंयुते |
मूत्रकृर्च्छादिरोगश्च कष्टाधिक्यं व्रणाद्भयम्
athā'ṣṭamavyaye bhaume pāpadṛgyogasaṃyute |
mūtrakṛrcchādirogaśca kaṣṭādhikyaṃ vraṇādbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (विपक्ष-प्रसंग); अष्टम = अष्टम भाव; व्यये = व्यय (द्वादश) भाव में; भौमे = मङ्गल के; पापदृक् = पाप-दृष्टि; योगसंयुते = पाप-योग से युक्त; मूत्रकृच्छ्रादि = मूत्रकृच्छ्र आदि (पाठ: कृर्च्छ — पाठ-भेद/वर्तनी); रोगः = व्याधि-संकेत (शास्त्र-कथन); कष्टाधिक्यम् = कष्ट की अधिकता; व्रणाद्भयम् = व्रण/घाव से भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब दूसरी धारा कहता है — जब अन्तर्दशा में भौम अष्टम या व्यय भाव में हो और पाप-दृष्टि तथा पाप-योग से युक्त हो, तो मूत्रकृच्छ्र-आदि रोग, कष्ट की वृद्धि और व्रण से भय — ये शास्त्र के फल-शब्द हैं। इन्हें चिकित्सा-निर्णय या निश्चित भविष्य नहीं माना जाता; केवल ग्रन्थ का कथन सुरक्षित रखा जाता है। दृष्टि-योग की जाँच गणित से, फल की भाषा सावधानी से।

English rendering The text now states the contrary case: when Mars in this antardaśā occupies the eighth or twelfth and is joined with malefic aspect and malefic yoga, it names urinary-type distress, heightened hardship, and fear from wounds. These are the śāstra’s phala-words — not medical diagnosis, legal claim, or endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्थान: लग्न से 8 या 12 पर मङ्गल (house system घोषित)। पाप-दृष्टि: मङ्गल की पूर्ण दृष्टि 4, 7, 8 भाव आगे (BPHS dṛṣṭi-परम्परा); “पाप” = सामान्यतः शनि/मङ्गल/राहु-केतु आदि — योग-परिभाषा संस्करणानुसार। संख्यात्मक bala/daśā-सूत्र इस पद्य में नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क; मङ्गल = कुम्भ → लग्न से 8वाँ। यदि शनि मीन से मङ्गल पर दृष्टि/युति-योग बनाए (convention: whole-sign दृष्टि) तो “पापदृग्योगसंयुते” की शास्त्र-शर्त जाँची जा सकती है। फल केवल पाठानुवाद; कोई नैदानिक निष्कर्ष नहीं।

54.6
चौराहिराजपीडा च धनधान्यपरुक्षयः |
द्वितीये द्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोव्यथा
caurāhirājapīḍā ca dhanadhānyaparukṣayaḥ |
dvitīye dyūnanāthe tu dehajāḍyaṃ manovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर = चोर; अहि = सर्प; राजपीडा = राज-पीड़ा; धनधान्य = धन और अन्न; परुक्षयः = प्रायः परिक्षय (क्षय) — पाठ-भेद संभव; द्वितीये = द्वितीय भाव में; द्यूननाथे = द्यून (सप्तम) भाव के स्वामी; तु = परन्तु/और; देहजाड्यम् = देह की जड़ता/भारीपन; मनोव्यथा = मन की व्यथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उसी विपक्ष-प्रसंग में चोर, सर्प और राज-सम्बन्धी पीड़ा तथा धन-धान्य के क्षय का भी उल्लेख है। तथा जब द्यून-नाथ (सप्तमेश) द्वितीय भाव में हो, तो देह-जाड्य और मनोव्यथा — यह अलग/संयुक्त शर्त के रूप में कही गई है। दोनों बातें अन्तर्दशा-फल की भाषा में हैं; इन्हें भय फैलाने के लिए नहीं, पाठ के रूप में समझा जाता है।

English rendering The text states affliction connected with thieves, serpents, and rulers, and wasting of wealth and grain; and when the seventh-lord stands in the second, bodily heaviness and mental distress. Report as the book’s clauses — without fear-rhetoric or certainty theater.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। जाँच-मात्र: (1) पूर्ववत् मङ्गल 8/12 + पाप-योग; (2) सप्तमेश का भाव-स्थान == 2 (लग्न-सापेक्ष)। द्यून = 7; द्यूननाथ = 7th lord — राशि-स्वामित्व चक्र से निश्चित।

54.7
तद्दोषपरिहारार्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् |
अनड्वाहं प्रदद्वाच्च कुजदोषनिवृत्तये
taddoṣaparihārārthaṃ rudrajāpyaṃ ca kārayet |
anaḍvāhaṃ pradadvācca kujadoṣanivṛttaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; रुद्र-जाप्यम् = रुद्र (शिव) का जप; कारयेत् = कराए; अनड्वाहम् = बैल; प्रदद्यात् = दान करे; कुज-दोष-निवृत्तये = मंगल-दोष की निवृत्ति के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सुझाता है कि उस अरिष्ट-दोष के परिहार के लिए रुद्र-जप कराया जाए और मंगल-दोष की शान्ति हेतु बैल का दान दिया जाए। यह पारंपरिक शान्ति-विधान का उल्लेख है — दबाव या भय का साधन नहीं, बल्कि पाठ का अपना सुझाव।

English rendering To remove that affliction, the text advises that Rudra-japa be performed and a bull be given in donation, for the cessation of the Mars-affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान (उपाय-कथन)। इसमें कोई संगणना नहीं; यह पूर्ववर्ती अरिष्ट-योग का पारंपरिक प्रति-विधान मात्र है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी विधि गणित और फल को अलग रखती है: व्रण/रोग/उपाय जैसे कथन "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत होते हैं, नियति या दबाव रूप में नहीं। अतः इस शान्ति-श्लोक को हम भय-मुक्त, बिना remedies-as-pressure के, केवल पाठ के अपने वचन के रूप में दर्ज करते हैं।

54.8
तेन तुष्टो भवेद् भौमः शङ्करस्य प्रसादतः |
आरोग्यं कुरुते तस्य सर्वसम्पत्तिदायकम्
tena tuṣṭo bhaved bhaumaḥ śaṅkarasya prasādataḥ |
ārogyaṃ kurute tasya sarvasampattidāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेन = उससे (पूर्वोक्त साधन/उपासना से); तुष्टः = प्रसन्न; भौमः = मङ्गल (कुज); शङ्करस्य प्रसादतः = शिव-प्रसाद से; आरोग्यं = स्वास्थ्य; कुरुते = करता है; तस्य = उसके; सर्वसम्पत्तिदायकम् = समस्त सम्पत्ति देने वाला (फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त अनुष्ठान/उपासना से, शङ्कर के प्रसाद द्वारा, भौम (मङ्गल) तुष्ट होता है। उसी प्रसन्नता के फलस्वरूप वह व्यक्ति को आरोग्य देता है और सर्व-सम्पत्ति का दाता बनता है। यह फल-कथन मङ्गल-तुष्टिकरण की परम्परागत कड़ी के रूप में आता है।

English rendering The text states that, by that (aforesaid) means, through Śaṅkara’s grace Mars becomes pleased; and, thus pleased, he is said to confer health and to bestow all manner of prosperity upon that person.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / उपासना-फल। यहाँ कोई अंश, वर्ग, बल-इकाई या दशा-अवधि नहीं गिनी गई; केवल “तुष्ट भौम → आरोग्य + सर्वसम्पत्ति” का शास्त्रीय दावा है।

54.9
कुजस्यान्तर्गते राहौ स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे |
शुभैर्युक्ते शुभैर्दृष्टे केन्द्रलाभतृकोणगे
kujasyāntargate rāhau svocce mūlatrikoṇage |
śubhairyukte śubhairdṛṣṭe kendralābhatṛkoṇage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य अन्तर्गते = मङ्गल की अन्तर्दशा में; राहौ = राहु (स्थित/सक्रिय); स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; मूलत्रिकोणगे = मूलत्रिकोण में स्थित; शुभैः युक्ते = शुभ ग्रहों से युक्त; शुभैः दृष्टे = शुभ दृष्टि से दृष्ट; केन्द्र-लाभ-त्रिकोणगे = केन्द्र (1/4/7/10), लाभ (11) या त्रिकोण (1/5/9) भाव में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब कुज की अन्तर्दशा चल रही हो और राहु स्वोच्च या मूलत्रिकोण में हो, शुभों से युक्त तथा शुभों से दृष्ट हो, और केन्द्र, लाभ अथवा त्रिकोण भाव में स्थित हो — तब (अगले श्लोक में कहा गया) शुभ काल-फल बनता है। यह दशा-फल की शर्त-सूची है: दशा-स्वामी (कुज-अन्तर) + राहु की स्थिति + योग/दृष्टि + भाव-स्थान।

English rendering The text states that when, during the antardaśā of Mars (Kuja), Rāhu is in exaltation or in mūlatrikoṇa, conjoined with benefics, aspected by benefics, and placed in a kendra, the eleventh (lābha), or a trikoṇa — the favourable period-effects that follow are predicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-काल-गणित (विंशोत्तरी ढाँचा) + स्थिति-शर्तें, न कि अंक-सारणी। विंशोत्तरी में महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष / 120 = अन्तर्दशा-अवधि (वर्ष)। कुज-महादशा = 7 वर्ष; किसी भी महादशा के भीतर कुज-अन्तर = (उस महादशा-वर्ष × 7) / 120। “स्वोच्च / मूलत्रिकोण / केन्द्र-लाभ-त्रिकोण” शुद्ध भाव-स्थान व राशि-नियम हैं; फल अगले श्लोक में।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र-महादशा (10 वर्ष) के भीतर कुज-अन्तर्दशा: अवधि = (10 × 7) / 120 = 70/120 = 7/12 वर्ष ≈ 0.5833 वर्ष ≈ 7 मास 3–4 दिन (सौर वर्ष ≈ 365.25 दिन से रूपान्तर)। इस अन्तर-काल में यदि राहु (उदाहरण: मिथुन-मूलत्रिकोण परम्परा-अनुसार; उच्च/मूलत्रिकोण-पाठ में पाठ-भेद संभव) दशम भाव में हो, गुरु-युक्त व शुक्र-दृष्ट — तो श्लोक 54.9 की शर्त-श्रेणी लागू मानी जाती है; फल 54.10 में। (अयनांश: घोषित करें — संख्या देशान्तर/जन्म-समय पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मङ्गल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; योग = 120) और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 — यही अनुपात-गणित दशा-इंजन में पिन है। यह श्लोक उसी कुज-अन्तर-खण्ड पर राहु-स्थिति की फल-शर्तें जोड़ता है; गणना शुद्ध अनुपात, फल “शास्त्र कहता है” की परत।

54.10
तत्काले राजसम्मानं गृहभूम्यादिलाभकृत् |
कलत्रपुत्रलाभः स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम्
tatkāle rājasammānaṃ gṛhabhūmyādilābhakṛt |
kalatraputralābhaḥ syādvyavasāyātphalādhikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काले = उस काल में (54.9 की शर्तों पर); राजसम्मानं = राज/शासकीय सम्मान; गृह-भूमि-आदि-लाभकृत् = घर, भूमि आदि का लाभ करने वाला; कलत्र-पुत्र-लाभः = पत्नी/कलत्र तथा पुत्र का लाभ; स्यात् = होता है (शास्त्र-कथन); व्यवसायात् फलाधिकम् = व्यवसाय से अधिक फल/लाभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त कुज-अन्तर + शुभ-स्थित राहु के काल में राजसम्मान मिलता है; गृह-भूमि आदि का लाभ होता है; कलत्र और पुत्र-लाभ का संकेत है; तथा व्यवसाय से फल अधिक होता है। यह शुभ दशा-फल की सूची है — दावा शास्त्र का, न कि नियति की गारंटी।

English rendering The text states that at that time one obtains royal honour, gains of house, land and the like, gain of spouse and offspring, and fuller fruit from one’s occupation or enterprise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ दशा-फल)। 54.9 की स्थिति-शर्तों पर आश्रित काल-फल; कोई बलांक या वर्ग-विभाजन नहीं।

54.11
गङ्गास्नानफलावाप्तिं विदेशगमनं तथा |
तथाऽष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथ वीक्षिते
gaṅgāsnānaphalāvāptiṃ videśagamanaṃ tathā |
tathā'ṣṭamavyaye rāhau pāpayukte'tha vīkṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गङ्गास्नान-फल-अवाप्तिं = गङ्गा-स्नान के समान पुण्य/फल की प्राप्ति; विदेश-गमनं = परदेश-यात्रा; तथा = और; अष्टम-व्यये राहौ = राहु अष्टम (8) या व्यय (12) भाव में; पाप-युक्ते = पाप ग्रहों से युक्त; अथ वीक्षिते = अथवा (पापों से) दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पहले शुभ पक्ष में गङ्गास्नान-फल और विदेश-गमन का उल्लेख करता है; फिर शर्त पलटता है — जब राहु अष्टम या व्यय भाव में हो और पाप-युक्त अथवा पाप-दृष्ट हो, तब (अगले श्लोक का) अशुभ फल-क्रम आरम्भ होता है। एक ही राहु-दशा-प्रसंग में शुभ/अशुभ भाव-स्थान से फल-विभाजन स्पष्ट है।

English rendering The text states (under the favourable setup) attainment of the fruit of bathing in the Gaṅgā and travel abroad; and, conversely, when Rāhu occupies the eighth or the twelfth and is joined with or aspected by malefics, the adverse results that follow apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थान शर्त (8/12)। “अष्टम/व्यय” = जन्म-लग्न से 8वाँ और 12वाँ भाव; भाव-पद्धति (समान-भाव / पूर्ण-भाव आदि) घोषित करनी चाहिए — संख्या भाव-चक्र पर निर्भर, न कि इस श्लोक में दी गई नियतांक।

54.12
चौराहिव्रणभीतिश्च चतुष्पाज्जीवनशनम् |
वातपित्तरुजोभीतिः कारागृहनिवेशनम्
caurāhivraṇabhītiśca catuṣpājjīvanaśanam |
vātapittarujobhītiḥ kārāgṛhaniveśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर-अहि-व्रण-भीतिः = चोर, सर्प और व्रण/घाव का भय; चतुष्पात्-जीव-नाशनम् = चतुष्पद (पशु) या आजीविका का नाश; वात-पित्त-रुजः-भीतिः = वात-पित्त विकार का भय (शास्त्र-शब्द); कारागृह-निवेशनम् = कारागार में प्रवेश/बन्दी होना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (अष्टम/व्यय-स्थित, पाप-युक्त/दृष्ट राहु के प्रसंग में) चोर, सर्प और व्रण का भय; चतुष्पद-हानि या जीवनोपार्जन का क्षय; वात-पित्त-रुज का भय; तथा कारागृह-निवेश — ये फल-सूची में आते हैं। ये शास्त्र के अशुभ-फल कथन हैं; इन्हें रोग-निदान, कानूनी पूर्वानुमान या निश्चित आपदा के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states fear of thieves, snakes and wounds; loss touching quadrupeds or livelihood; fear of vāta–pitta affliction (in the śāstra’s own terms); and confinement in prison.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ)। 54.11 की 8/12 + पाप-योग/दृष्टि शर्त पर आश्रित सूची; कोई बलांक-सीमा या दशा-वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं।

54.13
धनस्थानगते राहौ धननास्अं महद्भयम् |
सप्तमस्थानगे वाऽपि ह्यपमृत्युभयं महत्
dhanasthānagate rāhau dhananāsaṃ mahadbhayam |
saptamasthānage vā'pi hyapamṛtyubhayaṃ mahat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनस्थान-गते राहौ = राहु द्वितीय (धन) भाव में; धननाशं = धन का नाश (पाठ: धननास्अं — स्पष्ट रूप से धननाशं; पाठ-भेद/मुद्रण-दोष संभव); महद् भयम् = महान् भय; सप्तम-स्थान-गे वा अपि = अथवा सप्तम भाव में भी; अपमृत्यु-भयं महत् = अपमृत्यु (अकाल-मृत्यु-संकेत) का महान् भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु धन-स्थान (2) में हो तो धननाश का महान् भय; और यदि सप्तम में हो तो अपमृत्यु का महान् भय — ऐसे फल-कथन दिए गए हैं। “भय” शब्द यहाँ शास्त्र की चेतावनी-भाषा है, न कि निश्चित घटना का प्रमाण-पत्र। अपमृत्यु-शब्दावली को डर-व्यापार या निश्चय के रूप में नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।

English rendering The text states that with Rāhu in the second house there is great fear of loss of wealth; and also, when Rāhu is in the seventh, great fear of untimely death (apamṛtyu) — as the śāstra’s own claim, not as a sealed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-फल)। धनस्थान = लग्न से 2; सप्तम = लग्न से 7। भाव-सीमा गृह-पद्धति पर निर्भर; श्लोक स्वयं कोई अंश/रेखा नहीं देता।

54.14
नागपूजां प्रकुर्वीत देवब्राह्मणभोजनं |
मृत्युञ्जयजपं कुर्यादायुरारोग्यलब्धये
nāgapūjāṃ prakurvīta devabrāhmaṇabhojanaṃ |
mṛtyuñjayajapaṃ kuryādāyurārogyalabdhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नागपूजाम् = नाग/सर्प-देव की पूजा; प्रकुर्वीत = भली-भाँति करे (विधि-लिङ्); देव-ब्राह्मण-भोजनम् = देवताओं व ब्राह्मणों को भोजन कराना; मृत्युञ्जय-जपम् = महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप; कुर्यात् = करे; आयुः-आरोग्य-लब्धये = आयु और नीरोगता की प्राप्ति के निमित्त।

हिन्दी भावार्थ यह पूर्वश्लोक (54.13) का उपसंहार-विधान है — जब कुज-महादशा में राहु की अन्तर्दशा द्वितीय या सप्तम भाव में पड़कर अपमृत्यु-भय दिखाती है, तब शास्त्र कहता है कि नाग-पूजा, देव-ब्राह्मण-भोजन तथा मृत्युञ्जय-जप करना चाहिए। इसका प्रयोजन आयु और आरोग्य की कामना है। यह ग्रन्थकार का शान्ति-विधान है, कोई भविष्यवाणी नहीं।

English rendering One should perform Nāga-worship, feed the gods and brāhmaṇas, and recite the Mṛtyuñjaya-japa — this the text prescribes for the sake of long life and health.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान (उपाय-कथन)। ध्यातव्य: यह पद राहु-अन्तर के दुष्फल-कथन (54.11–13) से जुड़ा हुआ पूरक है; उपाय को दबाव या अनिवार्यता नहीं, अपितु ग्रन्थ का अपना कथन मानकर प्रस्तुत करना चाहिए — शास्त्र यहाँ भय नहीं, कल्याण-संकल्प बोलता है।

54.15
कुजस्यान्तर्गते जीवे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा |
लाभे वा धनसंयुक्ते तुङ्गांशे स्वांशगेपि वा
kujasyāntargate jīve trikoṇe kendrage'pi vā |
lābhe vā dhanasaṃyukte tuṅgāṃśe svāṃśagepi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य = मंगल की (महादशा/संदर्भ); अन्तर्गत = अन्तर्दशा में स्थित/चलते; जीवे = गुरु (बृहस्पति) में/के होने पर; त्रिकोणे = 1-5-9 भाव/स्थान में; केन्द्रगे = 1-4-7-10 में स्थित; लाभे = एकादश भाव में; धनसंयुक्ते = धन (द्वितीय/धनाधिप) से युक्त; तुङ्गांशे = उच्च-अंश (उच्च राशि का अंश/नवमांश आदि) में; स्वांशगे = स्व-अंश (स्वराशि/स्वाधिप अंश) में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ मंगल-संदर्भ की अन्तर्दशा में गुरु की स्थिति का वर्णन करता है। यदि वह गुरु त्रिकोण या केन्द्र में हो, अथवा लाभ (एकादश) में, अथवा धन से संयुक्त हो, अथवा तुङ्गांश या स्वांश में स्थित हो — तो अगले श्लोक में बताए गए शुभ-फलों का आधार यही विन्यास माना गया है। यह फल-कथन का पूर्वार्ध है: शर्तें पहले, परिणाम आगे।

English rendering The text sets the conditions for Jupiter operating in the Mars antardaśā context: Jupiter in a trikoṇa or kendra, or in the eleventh, or joined with wealth-factors, or in exaltation-aṃśa or own-aṃśa. These placements frame the favourable results stated next.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय फल-सूत्र नहीं — फल-शर्त (स्थिति-योग)। किन्तु दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी अनुपात से निश्चित होता है: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। मंगल महादशा = 7 वर्ष, गुरु अन्तर्दशा = 16 वर्ष → गुरु-अन्तर् = (7 × 16) ÷ 120 = 112/120 वर्ष = 0;11;6 (वर्ष;मास;दिन लगभग, 360-दिन वर्ष-मान पर पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी पर मंगल-महादशा (7 वर्ष) में गुरु-अन्तर्दशा: 7 × 16 ÷ 120 = 0.933… वर्ष ≈ 11 मास 6 दिन (1 वर्ष = 360 दिन मानकर; नाक्षत्र-शेष से आरंभ-तिथि अलग)। ग्रह-देशांतर और अयनांश दशा-आरंभ के लिए आवश्यक; फल-शर्तें D1-भाव/अंश-नियम पर निर्भर — अयनांश और वर्ग-नियम घोषित करने पर ही अंश-स्थान `==` से जाँचे।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तर् = (MD × AD) ÷ 120 का अनुपात-गणित वेदिक-घड़ी/काल दशा-इंजन में यथावत् बाँधा गया है। यह श्लोक उसी अनुपात की काल-खिड़की में गुरु की स्थिति-शर्तें पढ़ता है — गणना और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

54.16
सत्कीर्ती राजसम्मानं धनधान्यस्य वृद्धिकृत् |
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत्
satkīrtī rājasammānaṃ dhanadhānyasya vṛddhikṛt |
gṛhe kalyāṇasampattirdāraputrādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्कीर्ति = उत्तम यश/कीर्ति; राजसम्मानम् = राजकीय सम्मान; धनधान्यस्य = धन और अन्न का; वृद्धिकृत् = वृद्धि करने वाला; गृहे = घर में; कल्याणसम्पत्तिः = कल्याण और संपत्ति; दारपुत्रादि = पत्नी, पुत्र आदि; लाभकृत् = लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ शर्तों के पूरा होने पर शास्त्र कहता है — सत्कीर्ति और राजसम्मान मिलता है, धन-धान्य बढ़ता है। घर में कल्याण और संपत्ति का वर्णन है, तथा दार-पुत्रादि का लाभ। यह फल-कथन है, न कि नियति का दावा; शर्त-विन्यास के साथ पढ़ना ही शास्त्रीय रीति है।

English rendering Under those conditions the text states good reputation and royal honour, increase of wealth and grain, welfare and prosperity at home, and gain connected with spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संख्याएँ यहाँ नहीं; केवल पूर्व श्लोक की स्थिति-शर्तों से जुड़ा परिणाम-वर्णन। व्याख्या को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें — निश्चित भाग्य या भय के रूप में नहीं।

54.17
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे लाभगेऽपि वा |
भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते वाहनाधिपसंयुते
dāyeśātkendrarāśisthe trikoṇe lābhage'pi vā |
bhāgyakarmādhipairyukte vāhanādhipasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा-स्वामी से (संदर्भ में); केन्द्रराशिस्थे = केन्द्र-राशि में स्थित (दशा-स्वामी/संदर्भ-ग्रह); त्रिकोणे = त्रिकोण में; लाभगे = लाभ-भाव में; भाग्यकर्माधिपैः = भाग्य (नवम) और कर्म (दशम) के अधिपतियों से; युक्ते = युक्त; वाहनाधिपसंयुते = वाहन-स्वामी (चतुर्थ/संबंधित अधिप) से संयुक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — यदि दशा-स्वामी केन्द्र-राशि में हो, अथवा त्रिकोण या लाभ में, अथवा भाग्याधिप और कर्माधिप से युक्त हो, अथवा वाहनाधिप से संयुक्त हो, तो शुभ विन्यास माना जाता है। यह भी फल-शर्त का क्रम है; अगले श्लोक लग्नाधिप, शुभांश और शुभवर्ग जोड़ते हैं।

English rendering The text continues: when the daśā-lord stands in a kendra-sign, or in a trikoṇa or the eleventh, or is joined with the lords of the ninth and tenth, or with the vehicle-lord — these are further favourable conditions in the same phala sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-स्वामित्व और युति की फल-शर्त। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11; भाग्य-स्वामी = 9वें का अधिप, कर्म-स्वामी = 10वें का अधिप — राशि-लग्न से modular 12-भाव गणना। “वाहनाधिप” पर पाठ/परंपरा-भेद संभव (प्रायः चतुर्थ-संबंधित)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष मानें। केन्द्र-राशि = मेष, कर्क, तुला, मकर। नवमाधिप = गुरु (धनु), दशमाधिप = शनि (मकर)। यदि दशा-स्वामी (उदा. मंगल) तुला में हो → केन्द्र; यदि गुरु-शनि से युक्त हो → भाग्य-कर्म अधिप-युति। भाव-गणना पूर्ण-राशि (equal house) या भावाधिप-नियम पर निर्भर — नियम घोषित करें।

54.18
लग्नाधिपसमायुक्ते शुभांशे शुभवर्गगे |
गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गृहे कल्याणसम्पदः
lagnādhipasamāyukte śubhāṃśe śubhavargage |
gṛhakṣetrābhivṛddhiśca gṛhe kalyāṇasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपसमायुक्ते = लग्न-स्वामी से सम्यक् युक्त; शुभांशे = शुभ-अंश (शुभ नवमांश/अंश) में; शुभवर्गगे = शुभ षोडश-वर्ग स्थानों में स्थित; गृहक्षेत्राभिवृद्धिः = गृह और क्षेत्र (भूमि) की अभिवृद्धि; गृहे = घर में; कल्याणसम्पदः = कल्याण और संपदाएँ।

हिन्दी भावार्थ दशा-स्वामी यदि लग्नाधिप से युक्त हो, शुभांश में हो और शुभ वर्गों में पड़े, तो शास्त्र गृह-क्षेत्र की वृद्धि और घर में कल्याण-संपद् का कथन करता है। “अंश” और “वर्ग” यहाँ विभागीय-चार्ट (षोडशवर्ग) की भाषा हैं — राशि के 30° के समान खंडों पर आधारित मानचित्र, न कि मात्र अलंकार।

English rendering Joined with the lagna-lord, placed in a benefic aṃśa and in favourable vargas, the text states increase of house and land and welfare-wealth in the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग = 30° राशि का समान विभाजन + नियम-मानचित्र। उदाहरण: नवमांश D9 — प्रत्येक राशि 30° ÷ 9 = 3°20′ के 9 खंड; विषम राशि में मेष से क्रम, सम में तुला से (शास्त्रीय D9-नियम)। “शुभवर्ग” = बहु-वर्गों में शुभ-ग्रह/स्व-उच्च स्थान — षोडशवर्ग-सूची D1…D60 के अनुसार जाँच। अंश-निर्देश पर पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) गुरु = 16°20′ कन्या। D9-खंड सूचकांक = ⌊16°20′ ÷ 3°20′⌋ = ⌊4.9⌋ = 4 (0-आधार) → पाँचवाँ नवमांश। कन्या सम → तुला से गिनती: 5वाँ = कुंभ। “शुभांश/शुभवर्ग” तभी निर्णायक जब अयनांश, वर्ग-नियम और शेष वर्ग (D2, D3, …) घोषित हों — अंक `==` से, सहिष्णुता-पट्टी से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडशवर्ग D1–D60 का विभाजन शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित है — वर्ग-इंजन और कालावली में प्रत्येक वर्ग 30° के बराबर चापों का नियत मानचित्र है। यह श्लोक “शुभांश/शुभवर्ग” कहकर उसी वर्ग-गणित को फल-शर्त से जोड़ता है; हम गणना को फल से अलग रखते हैं।

54.19
देहारोग्यं महत्कीर्तिगृहे गोकुलसंग्रहः |
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम्
dehārogyaṃ mahatkīrtigṛhe gokulasaṃgrahaḥ |
catuṣpājjīvalābhaḥ syādvyavasāyātphalādhikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहारोग्यम् = देह का आरोग्य; महत्कीर्तिः = महान् कीर्ति; गृहे = घर में; गोकुलसंग्रहः = गोकुल (पशु/गो-समूह) का संग्रह; चतुष्पाज्जीवलाभः = चतुष्पद जीवों का लाभ; व्यवसायात् = व्यवसाय से; फलाधिकम् = अधिक फल।

हिन्दी भावार्थ उन्हीं शुभ शर्तों के क्रम में शास्त्र कहता है — देह में आरोग्य, बड़ी कीर्ति, घर में गोकुल-संग्रह, चतुष्पद जीवों का लाभ, और व्यवसाय से अधिक फल। यह कृषि-पशु-गृह-सम्पद् की पारंपरिक फल-भाषा है; चिकित्सा या आय की भविष्यवाणी के रूप में न पढ़ें — “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें।

English rendering The text further states bodily well-being, great fame, accumulation of cattle at home, gain of four-footed creatures, and greater fruit from vocation or enterprise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सकारात्मक परिणाम-सूची)। पूर्व की दशा-स्वामी/गुरु-स्थिति शर्तों से जुड़ा वर्णनात्मक फल; कोई बाँध-संख्या, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं।

54.20
कलपुत्रसौख्यं च राजसम्मानवैभवम् |
षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वास्तंगते सति
kalaputrasaukhyaṃ ca rājasammānavaibhavam |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye jīve nīce vāstaṃgate sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलपुत्रसौख्यम् = पत्नी और पुत्र का सौख्य; राजसम्मानवैभवम् = राजसम्मान और वैभव; षष्ठ-अष्टम-व्यये = छठे, आठवें, बारहवें भाव में; जीवे = गुरु में/के; नीचे = नीच राशि में; वा = अथवा; अस्तंगते = अस्त (सूर्य-समीप दग्ध/अस्त) में स्थित; सति = होने पर।

हिन्दी भावार्थ श्लोक का पूर्वार्ध अभी भी शुभ-फल जोड़ता है — कल-पुत्र-सौख्य तथा राजसम्मान-वैभव। उत्तरार्ध से प्रसंग पलटता है: यदि गुरु षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो, अथवा नीच में, अथवा अस्तंगत हो, तो अगले श्लोक के अशुभ-फलों का द्वार खुलता है। शुभ-सूची और अशुभ-शर्त एक ही श्लोक में जुड़े हैं — पूरा वाक्य पढ़ें।

English rendering The text first adds comfort of spouse and children and royal honour with splendour; then turns: when Jupiter is in the sixth, eighth, or twelfth, or debilitated, or combust (astaṅgata), the adverse results of the next verse apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय फल-सूत्र नहीं — फल-शर्त (दुर्बल/दुःस्थान)। तकनीकी बिंदु: (1) 6/8/12 = लग्न से गणना; (2) नीच — गुरु की नीच राशि = मकर (शास्त्रीय स्व-नीच सारणी); (3) अस्तंगत — सूर्य से निश्चित डिग्री-सीमा के भीतर (ग्रह-भेद से सीमा भिन्न; पाठ/परंपरा-भेद संभव)। दग्ध/अस्त की चाप `==` से जाँचें, अनुमान से नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क; गुरु = 12° मकर → (क) लग्न से सप्तम = मकर → केन्द्र, न कि 6/8/12; (ख) मकर = गुरु-नीच → “नीचे” शर्त लागू। अस्त: यदि सूर्य = 8° मकर, गुरु = 12° मकर, अंतर = 4° — अस्त-सीमा परंपरा-निर्भर (पाठ-भेद संभव); सीमा घोषित कर ही `==` निर्णय।

54.21
पापग्रहेण संयुक्ते दृष्टे वा दुर्बले सति |
चौराहिनृपभीतिश्च पित्तरोगादिसम्भवम्
pāpagraheṇa saṃyukte dṛṣṭe vā durbale sati |
caurāhinṛpabhītiśca pittarogādisambhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापग्रहेण = पाप-ग्रह (क्रूर: रवि/मंगल/शनि आदि, पाठ-परंपरा) से; संयुक्ते = युक्त; दृष्टे = दृष्ट (दृष्टि-युक्त); वा = अथवा; दुर्बले = दुर्बल होने पर; सति = स्थित होने पर; चौराहि = चोर और सर्प; नृपभीतिः = नृप (राज-शासन) का भय; पित्तरोगादि = पित्त-रोग आदि; सम्भवम् = संभावना (शास्त्र का कथन)।

हिन्दी भावार्थ जब गुरु (पूर्व शर्तों के क्रम में) पाप-ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, अथवा दुर्बल हो, तब शास्त्र कहता है — चोर, सर्प और नृप-भय का प्रसंग, तथा पित्त-रोगादि की संभावना। यह अरिष्ट/कष्ट-फल की पारंपरिक भाषा है; चिकित्सा-निदान या भय-वाणिज्य नहीं। “सम्भवम्” शब्द स्वयं संभावना का संकेत देता है — निश्चित विपत्ति के रूप में न बाँधें।

English rendering If Jupiter is conjoined with or aspected by a malefic, or is weak, the text states fear connected with thieves, serpents, and kings, and the possibility of pitta-type and related afflictions — reported as the śāstra’s phala, not as medical diagnosis or endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ/अरिष्ट-वर्णन)। “दुर्बल” का तकनीकी पक्ष अलग अध्यायों में: षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) रूप/विरूप में जोड़ा जाता है (1 रूप = 60 विरूप); यहाँ केवल गुण-विशेषण है। दृष्टि-नियम (पूर्ण/आंशिक) और पाप-परिभाषा पर पाठ-भेद संभव।

हमारा डिकोड (Our Decode) जहाँ बल मापा जाता है, षड्बल को हम संख्यात्मक घटकों के योग के रूप में रखते हैं — स्थान-दिक्-काल-चेष्टा-नैसर्गिक-दृग् — और फल-वाक्य को “शास्त्र कहता है” की पंक्ति में, भविष्य-निश्चितता में नहीं। इस श्लोक में बल-सूत्र नहीं; केवल दुर्बल/पाप-युति-दृष्टि की फल-भाषा है, इसलिए गणना और व्याख्या की सीमा स्पष्ट रहती है।

54.22
प्रेतबाधा भृत्यनाशः सोदराणां विनाशनम् |
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युज्वरादिकम् |
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत्
pretabādhā bhṛtyanāśaḥ sodarāṇāṃ vināśanam |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyujvarādikam |
taddoṣaparihārārthaṃ śivasāhasrakaṃ japet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रेतबाधा = प्रेत/मृत-संबंधित बाधा (शास्त्र-कथन); भृत्यनाश = सेवक-कर्मचारियों का क्षय; सोदराणां विनाशनम् = सहोदरों का नाश; द्वितीय-द्यून-नाथ = द्वितीय भाव-स्वामी तथा द्यून (=सप्तम) भाव-स्वामी; अपमृत्यु-ज्वरादिकम् = अपमृत्यु-संकेत, ज्वर आदि; तद्दोष-परिहारार्थम् = उस दोष के निवारण हेतु (शास्त्र-निर्देश); शिव-साहस्रकम् = शिव-सहस्रनाम/सहस्र-जप; जपेत् = जप करे (विधि-कथन)।

हिन्दी भावार्थ इस श्लोक में शास्त्र कहता है कि उक्त दशा-अवस्था में प्रेत-बाधा, भृत्य-नाश और सोदरों का विनाश दर्शाया जाता है। यदि द्वितीय तथा सप्तम (द्यून) भावों के स्वामी विशेष रूप से संबद्ध हों, तो अपमृत्यु-संकेत, ज्वर आदि का उल्लेख आता है। उसी दोष-परिहार के लिए शास्त्र शिव-साहस्रक जप का निर्देश देता है — यह विधि-कथन है, दबाव या भय-व्यापार नहीं।

English rendering The text states pretā affliction, loss of servants, and destruction among siblings. When the lords of the second and the seventh (dyūna) are involved, it further names untimely-death indication, fever, and the like. For the stated removal of that doṣa it prescribes japa of the thousand-fold Śiva formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + विधि-निर्देश। द्वितीय (धन/वाक्-क्षेत्र) और द्यून=सप्तम (विवाह/पारस्परिक-क्षेत्र) भाव-स्वामियों की दशा-फल-संबद्धता यहाँ गुणात्मक है; कोई अंश-भार या वर्ष-संख्या इस पद्य में नहीं दी गई।

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54.23
कुजस्यान्तर्गते मन्दे स्वर्क्षे केन्द्रत्रिकोणगे |
मूलत्रिकोणकेन्द्रे वा तुङ्गांशे स्वांशगे सति
kujasyāntargate mande svarkṣe kendratrikoṇage |
mūlatrikoṇakendre vā tuṅgāṃśe svāṃśage sati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य अन्तर्-गते = मंगल की अन्तरदशा में; मन्दे = शनि (मन्द) के विषय में; स्व-र्क्षे = स्व-राशि में; केन्द्र-त्रिकोण-गे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (1, 5, 9) स्थित; मूल-त्रिकोण = मूलत्रिकोण क्षेत्र; केन्द्रे वा = अथवा केन्द्र में; तुङ्ग-अंशे = उच्च-नवमांश/उच्चांश में; स्व-अंश-गे सति = स्वांश (स्व-नवमांश) स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक मंगल की अन्तरदशा में शनि के अनुकूल स्थान-नियम खोलता है। शास्त्र कहता है — जब मन्द स्वराशि में हो, केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा मूलत्रिकोण/केन्द्र में हो, अथवा तुङ्गांश या स्वांश में स्थित हो — तब आगामी पद्यों का शुभ फल जुड़ता है। स्थान-शर्तें स्पष्ट हैं; फल अगले श्लोकों में आता है।

English rendering When Saturn (Manda) operates in the antardaśā of Mars (Kuja), and is placed in its own sign, in a kendra or trikoṇa, or in mūlatrikoṇa/kendra, or in exaltation-aṃśa or own-aṃśa — the favourable results of the following verses apply under those placement conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-अनुपात (विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र) + वर्ग-स्थान नियम।
• महादशा–अन्तर: अन्तर्-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
• मंगल महादशा 7 वर्ष, शनि 19 वर्ष → शनि-अन्तर मंगल-महा में = (7 × 19) ÷ 120 = 133/120 वर्ष ≈ 1 वर्ष 1 मास 9 दिन (पूर्ण-वर्ष रूप में 1; 1⁄10 वर्ष अंश शेष)।
• केन्द्र-भाव: 1, 4, 7, 10; त्रिकोण: 1, 5, 9 (लग्न से)।
• शनि स्वराशि: मकर, कुम्भ; मूलत्रिकोण: कुम्भ; उच्च: तुला (तुङ्ग)।
• अंश = यहाँ सामान्यतः नवमांश (D9): 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवमांश; तुङ्गांश = उच्च-राशि का नवमांश; स्वांश = स्व-राशि का नवमांश।
(अयनांश/जन्म-देशान्तर फल-संख्या नहीं बदलते; केवल भू-देशीय लग्न और ग्रह-रेखांश निर्धारित करते हैं।)

उदाहरण (worked example) मान लें कुज-महादशा, मन्द-अन्तर; शनि रवि-रेखांश 295°10′ = मकर 25°10′ (स्वराशि), लग्न से चतुर्थ (=केन्द्र)।
नवमांश: मकर में 25°10′ ÷ 3°20′ = 7 पूर्ण नवमांश + शेष → 8वाँ नवमांश-पद (परंपरागत सम/विषम-राशि क्रम से स्व/अन्य राशि; यहाँ केवल “स्वराशि + केन्द्र” शर्त पहले ही पूर्ण)।
अन्तर-अवधि: (7 × 19) ÷ 120 = 1.1083… वर्ष ≈ 1y 1m 9d।
(कन्वेंशन: विंशोत्तरी; नक्षत्र-शेष से महा-प्रारंभ — इस पद्य में नक्षत्र-अंश नहीं दिया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी का 120-वर्ष योग (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17) तथा अन्तर् = (महा × अन्तर) ÷ 120 का शुद्ध अनुपात-अंकगणित दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बैठा है। स्थान-शर्तें (स्व/मूलत्रिकोण/केन्द्र/त्रिकोण/D9) षोडश-वर्ग की मॉड्यूलर-रेखांश गणना से जाँची जाती हैं — फल अलग, गणित अलग।

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54.24
लग्नाधिपतिना वापि शुभदृष्टियुतेऽसिते |
राज्यसौख्यं यशोवृद्धिः स्वग्रामे धान्यवृद्धिकृत्
lagnādhipatinā vāpi śubhadṛṣṭiyute'site |
rājyasaukhyaṃ yaśovṛddhiḥ svagrāme dhānyavṛddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-अधिपतिना = लग्न-स्वामी के साथ (योग/संबंध); वा अपि = अथवा; शुभ-दृष्टि-युते = शुभ-ग्रह की दृष्टि से युक्त; असिते = शनि (असित) में/पर; राज्य-सौख्यम् = राज्य/अधिकार-सुख; यशः-वृद्धिः = यश की वृद्धि; स्व-ग्रामे = अपने ग्राम/क्षेत्र में; धान्य-वृद्धि-कृत् = धान्य-समृद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त अनुकूल स्थान के अतिरिक्त, शास्त्र एक और शुभ-योग जोड़ता है — असित लग्नेश से युक्त हो, अथवा शुभ दृष्टि से संपन्न हो। तब राज्य-सौख्य, यश-वृद्धि, और स्व-ग्राम में धान्य-वृद्धि का फल कहा गया है। यह दशा-फल-कथन है, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text adds: when dark Saturn is joined with the lagna-lord, or is endowed with benefic aspect, there is ease of authority, increase of renown, and growth of grain in one’s own locality — as the śāstra’s stated result under those conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान/दृष्टि-शर्त सहित)। दृष्टि यहाँ पारंपरिक ग्रह-दृष्टि-नियम से पढ़ी जाती है (शनि की पूर्ण दृष्टि 3, 7, 10 भाव; शुभ = गुरु/शुक्र आदि — इस पद्य में शुभ-सूची विस्तृत नहीं)। कोई बलांक या वर्ष-संख्या नहीं।

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54.25
पुत्रपौत्रसमायुक्तो गृहे गोधनसंग्रहः |
स्ववारे राजसम्मानं स्वमासे पुत्रवृद्धिकृत्
putrapautrasamāyukto gṛhe godhanasaṃgrahaḥ |
svavāre rājasammānaṃ svamāse putravṛddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-पौत्र-समायुक्तः = पुत्र-पौत्र से युक्त; गृहे गो-धन-संग्रहः = घर में गोधन का संचय; स्व-वारे = अपने वार में (शनि का वार = शनिवार); राज-सम्मानम् = राजसम्मान; स्व-मासे = अपने मास में; पुत्र-वृद्धिकृत् = पुत्र-वृद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (शुभ-स्थित शनि-अन्तर में) जातक पुत्र-पौत्र से सम्पन्न होता है और घर में गोधन का संचय होता है; तथा शनि के अपने वार में राजसम्मान एवं अपने मास में पुत्र-वृद्धि होती है। यहाँ ग्रन्थ एक सूक्ष्म काल-निर्देश देता है — फल ग्रह के "अपने" वार/मास में परिपक्व होता है।

English rendering Endowed with sons and grandsons, with a store of cattle-wealth at home; on the planet's own weekday, royal honour, and in its own month, increase of progeny — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-निर्धारण तकनीक (sūkṣma-काल): स्व-वार = ग्रह-स्वामित्व वाला वार; शनि का वार = शनिवार। स्व-मास = शनि से सम्बद्ध मास। अर्थात् अन्तर्दशा का शुभ फल उस अवधि के भीतर ग्रह के "अपने" वार/मास पर विशेष रूप से प्रकट होता है — एक समय-संकुचन (fruition-timing) संकेत, न कि कोई अंकीय राशि।

उदाहरण (worked example) शनि-अन्तर की ≈1 वर्ष 1 मास 9 दिन की अवधि के भीतर, शास्त्रोक्त शुभ फल के लिए शनिवार (स्व-वार) को प्रधान माना जाता है — जैसे किसी शुभ-कार्य/राजसम्मान का दिन चुनते समय अन्तर्दशा-स्वामी का वार उपयुक्त कहा गया है।

54.26
नीचादिक्षेत्रगे मन्दे तथाऽष्टव्ययराशिगे |
म्लेच्छवर्गप्रभुभयं धनधन्यादिनाशनम्
nīcādikṣetrage mande tathā'ṣṭavyayarāśige |
mlecchavargaprabhubhayaṃ dhanadhanyādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीच-आदि-क्षेत्र-गे = नीच आदि (नीच, शत्रु, दुर्बल) क्षेत्र में स्थित; मन्दे = शनि में; तथा = तथा; अष्ट-व्यय-राशि-गे = अष्टम एवं व्यय (=द्वादश) राशि/भाव में स्थित; म्लेच्छ-वर्ग-प्रभु-भयम् = म्लेच्छ-वर्ग के अधिपति से भय; धन-धान्य-आदि-नाशनम् = धन-धान्य आदि का नाश।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र विपरीत स्थान-फल खोलता है। जब मन्द नीचादि क्षेत्र में हो, अथवा अष्टम/द्वादश राशि-भाव में हो, तब म्लेच्छ-प्रभु-भय और धन-धान्यादि नाश कहा गया है। यह स्थान-दोष का फल-कथन है — निश्चित विपत्ति या भय-व्यापार नहीं; केवल पाठ का नियम।

English rendering When Saturn occupies debilitation and similar adverse fields, or the eighth and twelfth signs/houses, the text states fear from foreign/mleccha-class rulers and destruction of wealth, grain, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-वर्गीकरण (अंक-सूत्र न्यून)।
• शनि नीच = मेष (0°–30° मेष में नीच; पारंपरिक परम-नीच 20° मेष — इस पद्य में “नीचादि” व्यापक)।
• अष्टम = लग्न से +7 राशियाँ (लग्न-संख्या + 7, मॉड 12); व्यय/द्वादश = लग्न − 1 राशि (लग्न-संख्या + 11, मॉड 12)।
• कोई बिन्दु-भार या वर्ष-संख्या नहीं — फल गुणात्मक।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क (4)। अष्टम राशि = कुम्भ (11); द्वादश = मिथुन (3)। यदि शनि कुम्भ-अष्टम में हो (स्वराशि होते हुए भी भाव-दोष), शास्त्र का यह पद अष्ट-व्यय वाली शाखा से पढ़ा जाता है — स्व/नीच का फैसला राशि-स्वामित्व से, भाव-दोष लग्न-सापेक्ष। (कन्वेंशन: पूर्ण-भाव राशि-घर; अयनांश केवल ग्रह-राशि तय करता है।)

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54.27
निगडे बन्धनं व्याधिरन्ते क्षेत्रनाशकृत् |
द्वितीयद्यूननाथे तु पापयुक्ते महद्भयम्
nigaḍe bandhanaṃ vyādhirante kṣetranāśakṛt |
dvitīyadyūnanāthe tu pāpayukte mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निगडे = बेड़ी/लोहे की जंजीर में; बन्धनम् = कारावास, बन्धन; व्याधिः = रोग; अन्ते = (दशा/भुक्ति के) अन्त में; क्षेत्रनाशकृत् = भूमि/खेत की हानि कराने वाला; द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (धन) व सप्तम (द्यून = जाया/कलत्र) भाव के स्वामी — दोनों मारक-स्थानपति; पापयुक्ते = पापग्रह से युत होने पर; महद्भयम् = महान् भय।

हिन्दी भावार्थ (कुज-महादशा में शनि-अन्तर्दशा का अशुभ स्थान-प्रकरण जारी है।) शास्त्र कहता है कि इस योग में जातक को बेड़ी-बन्धन (कारावास), रोग तथा अवधि के अन्त में भूमि/क्षेत्र की हानि सम्भव कही गई है; और यदि द्वितीय या सप्तम भाव का स्वामी (मारक) पापग्रह से युक्त हो, तो शास्त्र इसे महान् भय का काल बताता है।

English rendering The text states that under this placement there may be imprisonment in fetters, illness, and — toward the close of the period — loss of one's land; and if the lord of the 2nd or the 7th (the maraka houses) stands joined with malefics, it declares a time of grave danger.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मारक-योग)। तकनीकी संकेत केवल स्थान-गणना का है: मारक-स्थान = लग्न से गिनकर 2रा व 7वाँ भाव; यह कोई सङ्ख्या नहीं, अपितु भावों की स्थिति-पहचान है — "कौन-सा स्वामी इन भावों/इनके अधिपति से जुड़ा है" इसी पर संकेत टिका है।

54.28
धननाशश्च सञ्चारे राजद्वेषो मनोव्यथा |
चौराग्निनृपपीडा च सहोदरविनाशनम्
dhananāśaśca sañcāre rājadveṣo manovyathā |
caurāgninṛpapīḍā ca sahodaravināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-नाशः = धन का नाश; च = और; सञ्चारे = संचार/गोचर अथवा भ्रमण-अवस्था में; राज-द्वेषः = राजद्वेष; मनो-व्यथा = मानसिक व्यथा; चौर-अग्नि-नृप-पीडा = चोर, अग्नि, नृप से पीड़ा; च = और; सहोदर-विनाशनम् = सहोदरों का विनाश।

हिन्दी भावार्थ दोषपूर्ण मन्द-अवस्था का समापन-फल यहाँ समेटा गया है। शास्त्र कहता है — धननाश; संचर-काल में राजद्वेष और मनोव्यथा; चोर-अग्नि-नृप की पीड़ा; तथा सहोदर-विनाश। ये सब पाठ के फल-पद हैं — चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़े जाते।

English rendering The text further states loss of wealth; in transit or movement, royal enmity and mental anguish; affliction from thieves, fire, and the king; and destruction among siblings — again as the śāstra’s own phala-register under the adverse Saturn setup.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / वर्णन। “सञ्चारे” यहाँ गोचर-शनि या यात्रा-संचार का गुणात्मक संकेत हो सकता है (पाठ-भेद/अर्थ-वैविध्य संभव); कोई गोचर-अंश-सूत्र या बिन्दु-गणना इस पद्य में नहीं दी गई।

54.29
बन्धुद्वेषः प्रमाद्यैश्च जीवहानिश्च जायते |
अकस्माच्च मृतेर्भीतिः पुत्रदारादिपीडनम्
bandhudveṣaḥ pramādyaiśca jīvahāniśca jāyate |
akasmācca mṛterbhītiḥ putradārādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धुद्वेषः = बन्धुओं से द्वेष/वैमनस्य; प्रमाद्यैः = प्रमाद/असावधानी से; जीवहानिः = जीव/जीविका (या प्राण-सम्बन्धी) हानि; जायते = उत्पन्न होती है; अकस्मात् = अचानक; मृतेः भीतिः = मृत्यु का भय; पुत्र-दार-आदि-पीडनम् = पुत्र-पत्नी आदि की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्वोक्त काल/स्थिति के सन्दर्भ में) बन्धु-वर्ग से द्वेष और प्रमाद के साथ जीवहानि का अनुभव होता है। अचानक मृत्यु-भय भी उठता है। पुत्र, पत्नी तथा अन्य प्रियजनों से सम्बन्धित पीड़ा का भी उल्लेख है। यह सब फल-कथन है — काल-स्थिति का शास्त्रीय वर्णन, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

English rendering The text states that enmity with kin, harm through negligence, and loss connected with living/livelihood arise; also sudden fear of death and affliction of son, wife, and the like. These are classical phala-statements of the period-context, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ कोई अंश, बल-इकाई या दशा-वर्ष-संख्या नहीं; केवल पूर्व-निर्धारित दशा/भुक्ति-सन्दर्भ का शास्त्रीय परिणाम-वर्णन है।

54.30
कारागृहादिभीदिश्च राजदण्डो महद्भयम् |
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे लाभस्थे वा त्रिकोणगे
kārāgṛhādibhīdiśca rājadaṇḍo mahadbhayam |
dāyeśātkendrarāśisthe lābhasthe vā trikoṇage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारागृह-आदि-भीतिः = कारागृह आदि का भय (पाठ में «भीदि» — भीति-अर्थ; पाठ-भेद संभव); राजदण्डः = राजकीय दण्ड; महत् भयम् = बड़ा भय; दायेश = दशा/दाय का स्वामी (महादशा-स्वामी); केन्द्र-राशि-स्थे = केन्द्र-राशि में स्थित (1, 4, 7, 10); लाभ-स्थे = लाभ-भाव (11) में; वा = अथवा; त्रिकोण-गे = त्रिकोण (1, 5, 9) में गत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कारागृह आदि का भय, राजदण्ड और महान् भय (पूर्व-फल-श्रृंखला में)। फिर स्थिति-नियम: दायेश से (अथवा दायेश के सन्दर्भ में) केन्द्र-राशि, लाभ-स्थान अथवा त्रिकोण में स्थिति। यह पद अगले फल-श्लोकों का आधार-नियम बनता है; फल को शास्त्र का कथन मानें, न कि नियति।

English rendering The text states fear of prison and the like, royal punishment, and great dread; then the placement rule — when (the relevant period-factor is) situated in a kendra sign, in the eleventh (lābha), or in a trikoṇa, relative to the dāyeśa (lord of the dāyā/period).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुद्ध संख्या-सूत्र नहीं — भाव-स्थिति नियम (फल-सन्दर्भ)।
दायेश = दशा-स्वामी (प्रायः महादशा-स्वामी; परम्परा/अध्याय-सन्दर्भ से निश्चित करें)।
सापेक्ष भाव (दायेश-लग्न/दायेश-राशि से गिनती — convention declare करें):
केन्द्र ∈ {1, 4, 7, 10}, लाभ = 11, त्रिकोण ∈ {1, 5, 9}।
(भाव-गणना पूर्ण-राशि/whole-sign या चुने हुए house-system पर निर्भर; यहाँ श्लोक केवल भाव-नाम देता है।)

उदाहरण (worked example) मान लें महादशा-स्वामी (दायेश) वृषभ (राशि 2) में है; भुक्ति-स्वामी कन्या (राशि 6) में। दायेश से गिनती (whole-sign): 2 → 6 = 5वाँ भाव = त्रिकोण। अतः «दायेशात् … त्रिकोणगे» शर्त लागू — फल अगले श्लोकों के अनुसार शास्त्र-कथन के रूप में पढ़ें। (अयनांश ग्रह-राशि तय करता है; भाव-प्रणाली घोषित रखें।)

54.31
विदेशयानं लभते दुष्कीर्तिर्विविधा तथा |
पापकर्मरतो नित्यं बहुजीवादिहिंसकः
videśayānaṃ labhate duṣkīrtirvividhā tathā |
pāpakarmarato nityaṃ bahujīvādihiṃsakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेश-यानम् = विदेश-यात्रा/परदेश-गमन; लभते = प्राप्त करता है; दुष्कीर्तिः = अपकीर्ति; विविधा = अनेक प्रकार की; तथा = तथा; पाप-कर्म-रतः = पाप-कर्म में रत; नित्यम् = निरन्तर; बहु-जीव-आदि-हिंसकः = अनेक जीवों आदि का हिंसक।

हिन्दी भावार्थ (पूर्वोक्त दायेश-सापेक्ष स्थिति के सन्दर्भ में) शास्त्र कहता है — विदेश-यात्रा मिलती है, और अनेक प्रकार की दुष्कीर्ति भी। व्यक्ति पाप-कर्म में निरन्तर रत दिखता है तथा बहु-जीव-हिंसा का भी उल्लेख है। यह फल-भाषा है — नैतिक निर्णय या भय-वाणी नहीं; श्लोक का अपना कथन है।

English rendering The text states that one obtains travel abroad, and manifold ill-repute as well; constantly intent on wrongful acts and harmful to many living beings. Report as the śāstra’s phala-voice, not as fate or moral condemnation by the editor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्व-श्लोक की भाव-स्थिति से जुड़ा)। कोई वर्ष-संख्या, बिन्दु या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल काल-फल का शास्त्रीय वर्णन।

54.32
विक्रयः क्षेत्रहानिश्च स्थानभ्रंशो मनोव्यथा |
रणे पराजयश्चैव मूत्रकृर्च्छान्महद्भयम्
vikrayaḥ kṣetrahāniśca sthānabhraṃśo manovyathā |
raṇe parājayaścaiva mūtrakṛrcchānmahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विक्रयः = विक्रय/बेचना; क्षेत्र-हानिः = क्षेत्र/भूमि की हानि; स्थान-भ्रंशः = पद/स्थान से भ्रष्ट होना; मनोव्यथा = मन की व्यथा; रणे = युद्ध/संघर्ष में; पराजयः = पराजय; च एव = तथा ही; मूत्रकृच्छात् = मूत्रकृच्छ (मूत्र-सम्बन्धी कष्ट) से; महत् भयम् = बड़ा भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — विक्रय, क्षेत्र-हानि, स्थान-भ्रंश और मनोव्यथा। रण में पराजय का भी कथन है। मूत्रकृच्छ से महान् भय का उल्लेख शास्त्रीय फल-सूची में आता है — इसे चिकित्सा-निदान या भय-प्रचार न बनाएँ; केवल पाठ का फल-पद है।

English rendering The text states sale (of assets), loss of land, fall from position, mental anguish, defeat in conflict, and great fear arising from mūtrakṛcchra (urinary distress as a classical symptom-word). These remain the śāstra’s listed results, not medical advice or a forecast we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संख्यात्मक नियम नहीं; पूर्व-निर्दिष्ट दशा-भुक्ति/दायेश-सापेक्ष स्थिति का परिणाम-वर्णन।

54.33
दायेशादथ रन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते |
तद्भुक्तौ मरणं ज्ञेयं नृपचौरादिपीडनम्
dāyeśādatha randhre vā vyaye vā pāpasaṃyute |
tadbhuktau maraṇaṃ jñeyaṃ nṛpacaurādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दायेश से (सापेक्ष); अथ = अब/तदनन्तर; रन्ध्रे = रन्ध्र-भाव (8) में; वा = अथवा; व्यये = व्यय-भाव (12) में; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त; तत्-भुक्तौ = उस भुक्ति में; मरणम् = मरण (शास्त्र-कथन); ज्ञेयम् = जानना चाहिए; नृप-चोर-आदि-पीडनम् = राजा, चोर आदि से पीड़न।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र दूसरी स्थिति बताता है — दायेश से रन्ध्र (8) या व्यय (12) में, अथवा पाप-ग्रह से युक्त होने पर। उस भुक्ति में मरण जानना चाहिए — यह शास्त्र का कठोर फल-पद है, नियति-घोषणा नहीं। नृप, चोर आदि से पीड़न का भी उल्लेख है। भय-वाणी से दूर रहकर केवल पाठ का नियम पढ़ें।

English rendering The text then states: when (the relevant factor is) in the eighth or the twelfth from the dāyeśa, or conjoined with a malefic, death is to be known in that bhukti — and affliction from king, thieves, and the like. Render as the śāstra’s claim under that configuration, never as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-सापेक्ष स्थिति नियम (फल-सन्दर्भ), दशा-काल के साथ।
दायेश-राशि/लग्न से गिनती (convention: whole-sign या chosen house system):
रन्ध्र = 8, व्यय = 12।
पापसंयुक्त = पाप-ग्रह (सामान्यतः शनि, मंगल, राहु, केतु, रवि — परम्परा-निर्भर) से युति (same rāśi/longitude-cluster per chosen orb rule)।
«तद्भुक्ति» = उस काल की अन्तर्दशा/भुक्ति; विंशोत्तरी में भुक्ति-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — यह सामान्य दशा-गणित है; यह श्लोक स्वयं वर्ष-संख्या नहीं देता, केवल फल-शर्त।

उदाहरण (worked example) दायेश (महादशा-स्वामी) कर्क (राशि 4); भुक्ति-स्वामी कुम्भ (राशि 11)। whole-sign: 4 → 11 = 8वाँ = रन्ध्र। शर्त «दायेशात् … रन्ध्रे» लागू। शास्त्र कहता है — उस भुक्ति में मरण/नृप-चोर-पीड़न का फल-पद; गणना केवल स्थिति-जाँच है, फल को निश्चित मृत्यु-पूर्वानुमान न मानें। (ग्रह-राशि = tropical/sidereal + अयनांश पर निर्भर — convention declare करें।)

54.34
वातपीडा च शूलादिज्ञातिश्त्रुभयं भवेत्
vātapīḍā ca śūlādijñātiśtrubhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वातपीडा = वात-दोष-जन्य पीड़ा; च = और; शूलादि = शूल (उदर/पार्श्व-शूल) आदि; ज्ञाति-शत्रु-भयम् = ज्ञातिजनों (गोत्रबन्धुओं) रूपी शत्रुओं से भय (पाठ-भेद संभव: "ज्ञातिश्त्रु" → ज्ञातिशत्रु); भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस स्थिति में वात-जन्य पीड़ा, शूल आदि व्याधि तथा अपने ही गोत्रबन्धुओं से शत्रुतारूपी भय होता है। (यह श्लोक अर्ध-श्लोक है, जो पूर्व श्लोक 54.33 के कथन को पूर्ण करता है।)

English rendering The text states that there arises affliction of the wind-humor, colic and the like, and fear from kinsmen turned adversaries. (This is a single-line half-verse completing the preceding thought.)

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रोग/भय-निर्देश)। ध्यातव्य: यह अर्धश्लोक (एकपंक्ति) है — गणना-रहित; शास्त्र-सूचित वात-रोग को पाठ का कथन-मात्र माना जाए, निदान नहीं।

54.35
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
ततः सुखमवाप्नोति शङ्करस्य प्रसादतः
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret |
tataḥ sukhamavāpnoti śaṅkarasya prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-दोष = उस दोष का; परिहार-अर्थम् = निवारण के हेतु; मृत्युञ्जय-जपम् = मृत्युञ्जय (महामृत्युञ्जय) मन्त्र-जप; चरेत् = करे; ततः = तब; सुखम् = सुख; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; शङ्करस्य = शङ्कर का; प्रसादतः = प्रसाद से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस दोष के परिहार हेतु मृत्युञ्जय-जप का आचरण। तदनन्तर शङ्कर के प्रसाद से सुख मिलता है — यह पाठ की पारम्परिक शान्ति/उपासना-सूत्र है। इसे दबाव-उपाय या «करोगे तभी बचोगे» की भाषा में न पढ़ें; केवल शास्त्र का परिहार-कथन है।

English rendering The text states that, for the removal of that fault, one should perform the japa of Mṛtyuñjaya; thereafter one obtains ease by the grace of Śaṅkara. Present this as the śāstra’s traditional doṣa-parihāra formula, never as pressure, guarantee, or medical cure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-परिहार/स्तुति-उपासना कथन। जप-संख्या, काल या दशा-वर्ष यहाँ नहीं दिए; केवल शास्त्रीय परिहार-निर्देश।

54.36
कुजस्यान्तर्गते सौम्ये लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
सत्कथाश्चाऽजपादानं धर्मबुद्धिर्महद्यशः
kujasyāntargate saumye lagnātkendratrikoṇage |
satkathāścā'japādānaṃ dharmabuddhirmahadyaśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य अन्तर्गते = कुज-महादशा के भीतर अन्तर्दशा में; सौम्ये = सौम्य = बुध; लग्नात् केन्द्र-त्रिकोण-गे = लग्न से केन्द्र (1/4/7/10) या त्रिकोण (1/5/9) में स्थित; सत्कथाः = सत्-कथाएँ/धर्म-चर्चा; अजपादानम् = अज (बकरी) आदि का दान / धर्म-दान (पाठ-भेद संभव); धर्मबुद्धिः = धर्ममयी बुद्धि; महद्यशः = महान् यश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुज-महादशा में बुध की अन्तर्दशा, यदि बुध लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, तो सत्कथा-श्रवण, दान-धर्म, धर्ममयी बुद्धि तथा महान् यश देती है।

English rendering The text states that within Mars's daśā, the sub-period of Mercury — when Mercury stands in a kendra or trikoṇa from the lagna — brings holy discourse, acts of charity, a righteous disposition, and great renown.

गणित / तकनीक: केन्द्र = लग्न से 1/4/7/10; त्रिकोण = 1/5/9। बुध-भुक्ति की अवधि: कुज→बुध अन्तर = (7 × 17) ÷ 120 = 119/120 वर्ष ≈ 0.9917 वर्ष।

उदाहरण (worked example) कुज-महादशा (7 वर्ष) के भीतर नौ अन्तर्दशाओं का पूर्ण लेखा (360-दिन-वर्ष), अन्तर = 7 × अन्तरेश-वर्ष ÷ 120:
कुज (7) = 49/120 वर्ष = 4 मास 27 दिन · राहु (18) = 1 वर्ष 18 दिन · गुरु (16) = 11 मास 6 दिन · शनि (19) = 1 वर्ष 1 मास 9 दिन · बुध (17) = 119/120 वर्ष = 357 दिन = 11 मास 27 दिन · केतु (7) = 4 मास 27 दिन · शुक्र (20) = 1 वर्ष 2 मास · सूर्य (6) = 4 मास 6 दिन · चन्द्र (10) = 7 मास। योग = 2520 दिन = 7 × 360 = ठीक 7 वर्ष ✓ (बुध, क्रम में शनि के तुरन्त बाद)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह नौ-खण्डीय लेखा हमारे विंशोत्तरी 120-वर्ष इंजन (dossier §3) की देन है — प्रत्येक अन्तर विशुद्ध अनुपात (महादशा-वर्ष × अन्तरेश-वर्ष)/120। महादशा-योग का Σ = 7.000 वर्ष कोई सहनशीलता-पट्टी (tolerance band) से नहीं, अपितु exact-`==` जाँच से सत्यापित है — dossier §5 का अनुशासन: सहनशीलता-पट्टियाँ त्रुटि-छिपाने वाली होती हैं।

54.37
नीतिमार्गप्रसङ्गश्च नित्यं मिष्टान्नभोजनम् |
वाहनाम्बरपश्वादिर्राजकर्म सुखानि च
nītimārgaprasaṅgaśca nityaṃ miṣṭānnabhojanam |
vāhanāmbarapaśvādirrājakarma sukhāni ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीति-मार्ग-प्रसङ्गः = नीति/न्याय-मार्ग का प्रसंग; नित्यम् = सदा; मिष्टान्न-भोजनम् = मिष्ट अन्न-भोग; वाहन = सवारी; अम्बर = वस्त्र; पशु-आदि = पशु आदि; राज-कर्म = राज-कार्य; सुखानि = सुख; च = तथा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की ही शुभ-शर्त (बुध लग्न-केन्द्र/त्रिकोण में) का विस्तार करते हुए शास्त्र कहता है — नीति-मार्ग का प्रसंग, नित्य मिष्टान्न-भोजन, वाहन-वस्त्र-पशु आदि, तथा राज-कार्य से जुड़े सुख मिलते हैं। यह सूची भोग-साधन और सार्वजनिक/राजकीय संपर्क दोनों को जोड़ती है। फल दशा-काल की स्थिति-शर्त से बँधा है, स्वतंत्र “भाग्य-वाक्य” नहीं।

English rendering The text continues the favorable indication: engagement with the path of right conduct, constant enjoyment of sweet food, vehicles, clothing, cattle and the like, together with the comforts that attend royal or state work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-शर्त का विस्तार)। अंक-मात्रा नहीं; केवल भोग-सामग्री और राज-कर्म-सुख का शास्त्रोक्त वर्णन।

54.38
कृषिकर्मफले सिद्धिर्वारणाम्बरभूषणम् |
नीचे वास्तङ्गते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपि वा
kṛṣikarmaphale siddhirvāraṇāmbarabhūṣaṇam |
nīce vāstaṅgate vāpi ṣaṣṭhāṣṭavyayage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृषि-कर्म-फले = कृषि-कार्य के फल में; सिद्धिः = सिद्धि/सफलता; वारण = गज/हाथी; अम्बर = वस्त्र; भूषणम् = आभूषण; नीचे = नीच राशि में; वा = अथवा; अस्तङ्गते = अस्त (सूर्य-संयोग/दहन-सीमा में) स्थित; षष्ठ-अष्ट-व्यय-गे = षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) भाव में; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शुभ-फल-श्रृंखला में शास्त्र कृषि-फल की सिद्धि तथा हाथी-वस्त्र-आभूषण भी जोड़ता है। तभी श्लोक शर्त पलटता है — यदि बुध नीच हो, अस्त हो, अथवा षष्ठ/अष्टम/व्यय में हो, तो आगे (५४.३९) वर्णित अशुभ फल लागू होते हैं। एक ही अन्तर्दशा में स्थिति-भेद से फल-द्वार बदलता है — यह ज्योतिष-शास्त्र का अपना नियम-ढाँचा है।

English rendering The text adds success in the fruits of agriculture and the acquisition of elephants, clothing, and ornaments; but if Mercury is debilitated, combust, or placed in the sixth, eighth, or twelfth house, the adverse results of the following verse apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-शर्त (नीच / अस्त / ६-८-१२)। “अस्त” की व्यावहारिक जाँच के लिए सूर्य-बुध कोण-सीमा की परंपरा-भेद घोषित करने पड़ते हैं (पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव); श्लोक स्वयं डिग्री-सीमा नहीं देता।

54.39
हृद्रोगं मानहानिश्च निगडं बन्धुनाशनम् |
दारपुत्रार्थनाशः स्याच्चतुष्पाज्जीवनाशनम्
hṛdrogaṃ mānahāniśca nigaḍaṃ bandhunāśanam |
dāraputrārthanāśaḥ syāccatuṣpājjīvanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हृद्-रोगम् = हृदय-रोग (शास्त्रोक्त संकेत; चिकित्सकीय निदान नहीं); मान-हानिः = सम्मान-हानि; निगडम् = बेड़ी/बन्धन; बन्धु-नाशनम् = बन्धु-नाश; दार = पत्नी/स्त्री-पक्ष; पुत्र = पुत्र; अर्थ = धन; नाशः = नाश; चतुष्पात् = चौपाये; जीवन-नाशनम् = जीविका/जीवन-नाश।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अशुभ-शर्त (नीच, अस्त, षष्ठाष्टव्यय) पर शास्त्र कहता है — हृदय-संबंधी पीड़ा का संकेत, मान-हानि, बन्धन, बन्धु-नाश, दार-पुत्र-अर्थ का नाश, तथा चौपायों की जीविका का विनाश। ये सब शास्त्र के फल-वाक्य हैं; इन्हें नियति या चिकित्सकीय/कानूनी भविष्य-वाणी के रूप में नहीं पढ़ना। स्थिति सुधरे तो फल-द्वार भी बदलता है — अगले श्लोक अन्य योग-भेद खोलते हैं।

English rendering Under those adverse placements the text states indications of heart affliction, loss of honor, fetters, harm to kin, loss affecting spouse, children, and wealth, and ruin to the livelihood of four-footed animals — reported as śāstra-phala, not as medical or legal verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-स्थिति का परिणाम-वर्णन)। यहाँ कोई बलांक, अंश-सूत्र या दशा-वर्ष-संख्या नहीं; केवल शास्त्रोक्त अशुभ-सूची।

54.40
दशाधिपेन संयुक्ते शत्रुवृद्धिर्महद्भयम् |
विदेशगमनं चैव नानारोगास्तथैव च
daśādhipena saṃyukte śatruvṛddhirmahadbhayam |
videśagamanaṃ caiva nānārogāstathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशाधिपेन = महादशा-स्वामी (यहाँ कुज/मंगल); संयुक्ते = (अन्तर्दशेश बुध के) उससे युक्त होने पर; शत्रुवृद्धिः = शत्रुओं की बढ़ोतरी; महद्भयम् = महान् भय; विदेशगमनम् = परदेश-यात्रा; नानारोगाः = अनेक प्रकार के रोग।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोकों के नीच/अस्त/षष्ठाष्टव्यय प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — कुज की महादशा में बुध की अन्तर्दशा, जब बुध स्वयं दशाधिप मंगल के साथ बैठा हो, तब शत्रुओं की वृद्धि, बड़ा भय, परदेश-गमन और नाना रोगों का कथन है। यह अशुभ-स्थिति का ही विस्तार है।

English rendering Still within Mars's daśā and Mercury's sub-period: when the sub-lord stands conjoined with the daśā-lord Mars, the text foretells a swelling of enemies, great fear, travel abroad, and diseases of many kinds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-योग)। "दशाधिप" पद तकनीकी है: विंशोत्तरी में जिस ग्रह की महादशा चल रही हो वही दशाधिप। यहाँ फल अन्तर्दशेश (बुध) की उस दशाधिप (मंगल) से युति पर आश्रित है — अर्थात् फल सदा दो कालेशों के पारस्परिक सम्बन्ध से पढ़ा जाता है, किसी एकल ग्रह से नहीं।

54.41
राजद्वारे विरोधश्च कलहः स्वजनैरपि |
दायेशात्केन्द्रत्रिकोणे वा स्वोच्चे युक्तार्थलाभकृत्
rājadvāre virodhaśca kalahaḥ svajanairapi |
dāyeśātkendratrikoṇe vā svocce yuktārthalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजद्वारे = राज-दरबार में; विरोधः = मतभेद/विरोध; कलहः स्वजनैः = अपने कुटुम्बियों से भी झगड़ा; दायेशात् = दशा-स्वामी (मंगल) से गिनकर; केन्द्रत्रिकोणे = केन्द्र (1/4/7/10) या त्रिकोण (1/5/9) में; स्वोच्चे = अपने उच्च राशि में; अर्थलाभकृत् = धन-लाभकारी।

हिन्दी भावार्थ प्रथम चरण अशुभ-प्रसंग की परिणति है — राजद्वार में विरोध और स्वजनों तक से कलह। फिर शास्त्र शुभ-पक्ष खोलता है: यदि वही अन्तर्दशेश (बुध) दायेश मंगल से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा अपने उच्च में स्थित हो, तो वही अन्तर्दशा अर्थ-लाभ प्रदान करती है।

English rendering Discord at the royal court and quarrels even with one's own kin; yet — reckoned from the daśā-lord — should the sub-lord occupy a kendra or trikoṇa, or its own exaltation, the same period yields gain of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "दायेशात्" = दायेश (महादशेश) से सापेक्ष भाव-गणना। किसी ग्रह का दायेश से भाव = ((अन्तर्दशेश-राशि − दायेश-राशि) mod 12) + 1। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}। फल इसी सापेक्ष स्थिति से मुड़ता है — विशुद्ध मॉड्युलर गणना, जिस पर शुभ/अशुभ का पाठ टिका है।

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल (दायेश) मेष (राशि-क्रमांक 1) में, बुध सिंह (क्रमांक 5) में। तब बुध का मंगल से भाव = ((5 − 1) mod 12) + 1 = 5 → त्रिकोण। अतः यह चरण अर्थ-लाभ का योग बनाता है।

54.42
अनेकधननाथत्वं राजसम्मनमेव च |
भूपालयोगं कुरुते धनम्बरविभूषणम्
anekadhananāthatvaṃ rājasammanameva ca |
bhūpālayogaṃ kurute dhanambaravibhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेक-धन-नाथत्वम् = अनेक धन का स्वामित्व/अधिकार; राज-सम्मनम् = राज-सम्मान; एव च = तथा; भूपाल-योगम् = भूपाल-योग; कुरुते = करता है; धन = धन; अम्बर = वस्त्र; विभूषणम् = आभूषण/विभूषा।

हिन्दी भावार्थ शुभ-शर्त (दायेश से केन्द्र/त्रिकोण या स्वोच्च) का चरम फल शास्त्र इस प्रकार कहता है — अनेक धन पर नाथत्व, राज-सम्मान, भूपाल-योग का निर्माण, तथा धन-वस्त्र-विभूषण। “भूपाल-योग” यहाँ राज्याश्रय/प्रभुत्व-सदृश उत्कर्ष का शास्त्रोक्त संकेत है, न कि कोई स्वतंत्र गणितीय सूत्र। पूरे ५४.३६–४२ खंड में एक ही अन्तर्दशा तीन द्वारों से पढ़ी जाती है: लग्न-केन्द्र/त्रिकोण → शुभ; नीच/अस्त/६-८-१२ या दशाधिप-युति → अशुभ; दायेश-केन्द्र/त्रिकोण या स्वोच्च → अर्थ-लाभ व भूपाल-योग।

English rendering Under that favorable disposition the text states lordship over abundant wealth, royal honor, the formation of a bhūpāla-yoga, and the acquisition of wealth, clothing, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-शर्त का चरम उत्कर्ष-वर्णन)। “भूपाल-योग” यहाँ नामित फल-संज्ञा है; इस श्लोक में योग-निर्माण का कोई अलग अंक-सूत्र नहीं दिया गया।

54.43
भूरवाद्यमृदंगादि सेनापत्यं महत्सुखम् |
विद्याविनोदविमला वस्त्रवाहनभूषणम्
bhūravādyamṛdaṃgādi senāpatyaṃ mahatsukham |
vidyāvinodavimalā vastravāhanabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूरव-आद्य-मृदंग-आदि = भेरी-आदि वाद्य, मृदंग इत्यादि वाद्य-यन्त्र; सेनापत्यम् = सेना का अधिपत्य / सैन्य-नेतृत्व; महत्-सुखम् = बृहत् सुख; विद्या-विनोद-विमला = विद्या और विनोद से निर्मल/उज्ज्वल अवस्था; वस्त्र-वाहन-भूषणम् = वस्त्र, वाहन, आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस दशा-फल के क्रम में कहता है कि भेरी-मृदंग आदि वाद्यों का योग, सेनापतित्व, और महान सुख प्राप्त होता है। विद्या और विनोद से जीवन निर्मल/उज्ज्वल रहता है। वस्त्र, वाहन और आभूषण का लाभ भी इसी फल-कथन में गिनाया गया है। यह सब शास्त्रीय फल-वर्णन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states gain of martial music and drums, military command, and great happiness; pure enjoyment of learning and recreation; and clothes, conveyances, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ दशा-फल की सूची)। यह पद भूरवाद्य–सेनापत्य–सुख–विद्या–विनोद–वस्त्र–वाहन–भूषण को एक ही फल-समूह में बाँधता है; गणना नहीं, केवल शास्त्रीय फल-सूची।

54.44
दारपुत्रादिविभवं गृहे लक्ष्मीः कटाक्षकृत् |
दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते
dāraputrādivibhavaṃ gṛhe lakṣmīḥ kaṭākṣakṛt |
dāyeśātṣaṣṭhariḥphasthe randhre vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारपुत्रादिविभवम् = स्त्री-पुत्र आदि का वैभव; गृहे लक्ष्मीः कटाक्षकृत् = घर में लक्ष्मी की कृपादृष्टि; दायेशात् = दशेश (मंगल) से; षष्ठ = छठा भाव (रोग/शत्रु); रिःफस्थे = द्वादश (12वें) में; रन्ध्रे वा = अथवा अष्टम (8वें) में; पापसंयुते = पाप-ग्रहों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ प्रथम चरण शुभ-फल की परिणति है — स्त्री-पुत्रादि का वैभव और गृह में लक्ष्मी की कृपादृष्टि। दूसरे चरण से शास्त्र फिर अशुभ-स्थिति खोलता है: यदि अन्तर्दशेश दायेश मंगल से 6/8/12 भाव में हो और पाप-ग्रहों से युक्त हो — (फल अगले श्लोक में)।

English rendering Prosperity of wife and children, and Lakṣmī's gracious glance upon the home. But if — reckoned from the daśā-lord — the sub-lord falls in the 6th, 12th, or 8th and joins malefics… (the result follows).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पुनः दायेश-सापेक्ष भाव-गणना — दुःस्थान-त्रिक {6,8,12} (षष्ठ = रोग/शत्रु, रन्ध्र = 8 = आयु/विघ्न, रिःफ = 12 = व्यय/हानि)। रिःफ (द्वादश) और रन्ध्र (अष्टम) की पारिभाषिक संज्ञाएँ ध्यातव्य हैं।

उदाहरण (worked example) मंगल (दायेश) मेष (राशि 1) में, बुध कन्या (राशि 6) में → भाव = ((6 − 1) mod 12) + 1 = 6 → षष्ठ, दुःस्थान। पाप-संयोग होने पर यह अशुभ-प्रसंग सक्रिय होता है।

54.45
तद्दाये मानोहानिः स्यात्क्रूरबुद्धिस्तु क्रूरवाक् |
चौराग्निनृपपीडा च मार्गे दस्युभयादिकम्
taddāye mānohāniḥ syātkrūrabuddhistu krūravāk |
caurāgninṛpapīḍā ca mārge dasyubhayādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दाये = उस दशा/दाय में; मान-ओहानिः = मान की हानि; क्रूर-बुद्धिः = क्रूर बुद्धि; क्रूर-वाक् = क्रूर वाणी; चौर-अग्नि-नृप-पीडा = चोर, अग्नि, राजा से पीड़ा; मार्गे = मार्ग में; दस्यु-भय-आदिकम् = दस्यु-भय आदि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त (दायेश से ६/८/१२ में पाप-योग) के अधीन शास्त्र कहता है — उस दाय में मान-हानि होती है। बुद्धि और वाणी क्रूर हो जाती है, ऐसा पाठ कहता है। चोर, अग्नि और राज-पीड़ा तथा मार्ग में दस्यु-भय आदि का भी उल्लेख है। यह सब शास्त्रीय फल-कथन है; भय-व्यापार या निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that in that period there is loss of honor, a cruel turn of mind and speech, affliction from thieves, fire, and royal power, and danger from bandits on the road, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ दशा-फल, शर्त-आश्रित)। ५४.४४ की पाप-युक्ता ६/८/१२ शर्त पर यह श्लोक फल बाँधता है; कोई बलांक, अंश या वर्ष-संख्या यहाँ नहीं दी गई।

54.46
अकस्मात्कलहश्चैव बुधमुक्तौ न संशयः |
द्वितीयद्यूननाथे तु महाव्याधिर्भयङ्करः
akasmātkalahaścaiva budhamuktau na saṃśayaḥ |
dvitīyadyūnanāthe tu mahāvyādhirbhayaṅkaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकस्मात्कलहः = अकस्मात् झगड़ा; बुधमुक्तौ = बुध की भुक्ति (अन्तर्दशा) के अन्त में; न संशयः = निःसंदेह; द्वितीयद्यूननाथे = द्वितीय (2) या द्यून/सप्तम (7) के स्वामी होने पर; महाव्याधिः = महारोग; भयङ्करः = भयंकर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बुध की अन्तर्दशा के अन्त-काल में निःसंदेह अकस्मात् कलह होता है; और यदि वही बुध द्वितीय या सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो भयंकर महारोग की सम्भावना कही गई है।

English rendering At the close of Mercury's sub-period, sudden strife is certain, says the text; and should Mercury own the 2nd or the 7th, a fearsome grave illness is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "द्वितीय-द्यून-नाथ" = मारक-स्वामित्व। परम्परा में द्वितीय (2) और सप्तम (7) भाव मारक-स्थान माने जाते हैं; इनके स्वामी की अन्तर्दशा अरिष्ट-प्रबल कही जाती है — यह स्वामित्व एक निर्धारित तार्किक नियम है, और फल उसका पाठ मात्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय कुज-महादशा की अन्तर्दशाओं का फल है, जो विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र पर आधारित है (कुज महादशा = 7 वर्ष)। हमारे दशा-इंजन में अन्तर्दशा-मान ठीक इसी अनुपात-सूत्र से निकलता है: अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तरग्रह-वर्ष) ÷ 120। अतः कुज में बुध की भुक्ति = (7 × 17) ÷ 120 = 119/120 वर्ष ≈ 11.9 मास। "बुधमुक्तौ" (भुक्ति-अन्त) वही गणित-निर्धारित बिंदु है, कोई अस्पष्ट काल नहीं।

54.47
अश्वदानं प्रकुर्वीत विष्णोर्नामसहस्रकम् |
सर्वसम्पत्प्रदं विप्र सर्वारिष्टप्रशान्तये
aśvadānaṃ prakurvīta viṣṇornāmasahasrakam |
sarvasampatpradaṃ vipra sarvāriṣṭapraśāntaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अश्व-दानम् = अश्व का दान; प्रकुर्वीत = करे (विधि-वाक्य); विष्णोः नाम-सहस्रकम् = विष्णु का सहस्रनाम; सर्व-सम्पत्-प्रदम् = सब सम्पत्ति देने वाला; विप्र = हे विप्र (शिष्य-संबोधन); सर्व-अरिष्ट-प्रशान्तये = सब अरिष्ट की शान्ति के लिए।

हिन्दी भावार्थ अरिष्ट-फल के क्रम में शास्त्र एक उपाय-वाक्य कहता है — अश्व-दान करे और विष्णु का सहस्रनाम। इसे “सर्वसम्पत्प्रद” और “सर्वारिष्टप्रशान्तये” कहा गया है, शिष्य को “विप्र” कहकर। यह शास्त्रीय उपचार-कथन है; दबाव, गारंटी या भय से जुड़ा उपचार-व्यापार नहीं — पाठ जो कहता है, वही यहाँ दर्ज है।

English rendering The text prescribes the gift of a horse and the thousand names of Viṣṇu as all-prosperity-giving and for the pacification of all ariṣṭa, O learned one (vipra).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाया/शान्ति-कथन (दान + नाम-जप)। कोई दशा-वर्ष, बल-इकाई या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं; केवल शास्त्र द्वारा कथित शान्ति-विधि का उल्लेख।

54.48
कुजस्यान्तर्गते केतौ त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा |
दिश्चिक्ये लाभगे वाऽपि शुभयुक्ते शुभेक्षिते
kujasyāntargate ketau trikoṇe kendrage'pi vā |
diścikye lābhage vā'pi śubhayukte śubhekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य अन्तर्-गते = मंगल की अन्तर्दाशा में; केतौ = केतु (विषय); त्रिकोणे = त्रिकोण भाव में; केन्द्र-गे = केन्द्र में स्थित; अपि वा = अथवा; दिश्चिक्ये = दिश्चिक्य में (अनुकूल भाव-स्थान; पाठ-भेद/पारिभाषिक रूप संभव — प्रायः उपचय-पक्ष, तृतीय-सदृश पंक्ति में); लाभ-गे = लाभ (एकादश) में; वा अपि = अथवा; शुभ-युक्ते = शुभ-युक्त; शुभ-ईक्षिते = शुभ-दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र कुज-अन्तर्दाशा में केतु का फल खोलता है। केतु यदि त्रिकोण या केन्द्र में हो, अथवा दिश्चिक्य या लाभ (११) में हो, और शुभ-युक्त तथा शुभ-दृष्ट हो — तो अगला श्लोक शुभ फल बाँधेगा। स्थिति-शर्तें स्पष्ट हैं: भाव-वर्ग (त्रिकोण/केन्द्र/लाभ आदि) + शुभ योग/दृष्टि। यह विन्यास-शर्त है, अंक-सूत्र नहीं।

English rendering When Ketu is in the antardaśā of Mars, and is in a trikoṇa or a kendra, or in diścikya or the eleventh (lābha), and is conjoined with and aspected by benefics, the following favorable results are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-शर्त (कुज-अन्तर् · केतु; भाव: त्रिकोण/केन्द्र/दिश्चिक्य/लाभ + शुभ योग-दृष्टि)। अन्तर्दाशा-नाम विंशोत्तरी ढाँचे से जुड़ता है, पर इस श्लोक में वर्ष-संख्या नहीं दी गई; केवल स्थिति और शुभ-संयोग की शर्त है। “दिश्चिक्ये” पर पाठ-भेद/पारिभाषिक अनिश्चय संभव।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में कुज महादशा ७ वर्ष, केतु ७ वर्ष; अन्तर्दाशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/१२० → कुज–केतु = (७ × ७)/१२० = ४९/१२० वर्ष। यह अनुपात-अंकगणित दशा-इंजन में पिन है; इस श्लोक का अपना काम फल-शर्त (त्रिकोण/केन्द्र/लाभ + शुभ) बताना है, न कि वर्ष-सूत्र दोहराना। गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

54.49
राजानुग्रहशान्तिश्च बहुसौख्यं धनागमः |
किञ्चित्फलं दशादौ तु भूलाभः पुत्रलाभकृत्
rājānugrahaśāntiśca bahusaukhyaṃ dhanāgamaḥ |
kiñcitphalaṃ daśādau tu bhūlābhaḥ putralābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-अनुग्रहः = राजा का अनुग्रह; शान्तिः = शान्ति; च = और; बहु-सौख्यम् = बहुत सुख; धन-आगमः = धन का आगमन; किञ्चित्-फलम् = कुछ फल; दशा-आदौ = दशा के आरम्भ में; तु = तो/पर; भू-लाभः = भूमि-लाभ; पुत्र-लाभ-कृत् = पुत्र-लाभ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ शर्तों पर शास्त्र फल कहता है — राजानुग्रह, शान्ति, बहु सौख्य और धनागम। दशा के आदि में किञ्चित् फल: भू-लाभ और पुत्र-लाभ। “किञ्चित्” से आरम्भ-काल का फल सीमित/आंशिक कहा गया है। यह सब शास्त्रीय फल-वाक्य है — निश्चित भाग्य या दबाव नहीं।

English rendering The text states royal favor and peace, much happiness, and inflow of wealth; and at the beginning of the period, some fruit — gain of land and gain of a son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुज-अन्तर् · केतु, शुभ स्थिति पर; दशा-आदि में किञ्चित् फल)। “दशादौ” काल-खण्ड का गुणात्मक संकेत है (आरम्भ), कोई दिन/वर्ष-सीमा या बलांक यहाँ नहीं दिया गया।

54.50
राजसंलाभकार्याणि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् |
योगकारकसंस्थाने बलवीर्यसमन्विते
rājasaṃlābhakāryāṇi catuṣpājjīvalābhakṛt |
yogakārakasaṃsthāne balavīryasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजसंलाभकार्याणि = राज-सम्बन्धी लाभ के कार्य; चतुष्पाज्जीवलाभकृत् = चौपाया (पशु) लाभकारी; योगकारकसंस्थाने = योगकारक-स्थिति में होने पर; बलवीर्यसमन्विते = बल और वीर्य से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ राज-सम्बन्धी लाभ के कार्य और चौपायों (गो-अश्वादि) की प्राप्ति; और शास्त्र जोड़ता है — यदि वह अन्तर्दशेश योगकारक-स्थान में हो तथा बल-वीर्य से समन्वित हो, तो फल और भी प्रबल होता है।

English rendering Success in matters of royal gain and acquisition of livestock; and should the sub-lord stand as a yogakāraka, endowed with strength and vigour, the fruit is stronger still.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "योगकारक" = वह ग्रह जो एक ही समय केन्द्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी हो (लग्न-सापेक्ष निर्धारित)। "बलवीर्य" = ग्रह-बल, जिसे षड्बल में रूप/विरूप के रूप में मापा जाता है (1 रूप = 60 विरूप)। दोनों निर्धारित गणनात्मक कसौटियाँ हैं, व्याख्या-मात्र नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवीर्यसमन्विते" ठीक वही मात्रात्मक कसौटी है जिसे षड्बल (BPHS Ch.27) संख्या में बाँधता है — स्थान, दिग्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृग् बल का योग रूप/विरूप में। हमारे इंजन में यह गणना है, अनुमान नहीं: कुल बल की प्रति-ग्रह देहली से तुलना करके "बलवीर्य" का निर्णय `==`-स्तरीय निश्चयात्मकता से होता है।

54.51
पुत्रलाभो यशोवृद्धिर्गृहे लक्ष्मीः कटाक्षकृत् |
भृत्यवर्गधनप्राप्तिः सेनापत्यं महत्सुखम्
putralābho yaśovṛddhirgṛhe lakṣmīḥ kaṭākṣakṛt |
bhṛtyavargadhanaprāptiḥ senāpatyaṃ mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-लाभः = पुत्र-प्राप्ति; यशः-वृद्धिः = यश की वृद्धि; गृहे लक्ष्मीः = गृह में लक्ष्मी (समृद्धि); कटाक्ष-कृत् = (लक्ष्मी का) अनुग्रह / कृपा-दृष्टि; भृत्य-वर्ग = सेवक-परिजन वर्ग; धन-प्राप्तिः = धन की प्राप्ति; सेना-पत्यम् = सेनापति-पद / सैन्य-नेतृत्व; महत्-सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्व शर्त (योगकारक स्थान + बल) के अन्तर्गत पुत्र-लाभ, यश-वृद्धि, और गृह में लक्ष्मी-कृपा का फल कहता है। भृत्य-वर्ग से धन-प्राप्ति तथा सेनापत्य-सदृश महान् सुख का भी उल्लेख है। यह सब शास्त्रीय फल-सूची है—नियमित गणना का प्रमेय नहीं।

English rendering The text states, under the prior placement-and-strength condition, results including gain of progeny, increase of renown, prosperity’s favour in the home, wealth through the servant/retinue class, generalship, and great comfort. These are phala claims of the śāstra, not computational outputs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पुत्र-यश-धन-सेनापत्य सूची)। कोई दशा-वर्ष, बलांक, या वर्ग-अंश यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

54.52
भूपालमित्रं कुरुते यागाम्बरादिभूषणम् |
दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते
bhūpālamitraṃ kurute yāgāmbarādibhūṣaṇam |
dāyeśātṣaṣṭhariḥphasthe randhre vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूपाल-मित्रम् = नृप / शासक का मित्रत्व; कुरुते = करता है; याग = यज्ञ / अनुष्ठान; अम्बर = वस्त्र; आदि-भूषणम् = आभूषणादि; दाये-ईशात् = दायेश (दशा-स्वामी) से; षष्ठ = षष्ठ भाव; रिःफ = व्यय / द्वादश भाव; स्थे = स्थित होने पर; रन्ध्रे = अष्टम भाव में; वा = अथवा; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ श्लोक का पूर्वार्ध शास्त्र की अनुकूल फल-परम्परा को जारी रखता है—भूपाल-मैत्री तथा यज्ञ, वस्त्र, आभूषणादि की प्राप्ति। उत्तरार्ध में शर्त पलटती है: दायेश के षष्ठ, रिःफ (द्वादश), अथवा रन्ध्र (अष्टम) में स्थित होने पर, तथा पाप-संयोग में, फल-दिशा बदलने का संकेत है। भाव-संख्याएँ यहाँ शास्त्रीय स्थान-संकेत हैं, आधुनिक कुंडली-इंजन की “हाउस सिस्टम” चर्चा नहीं।

English rendering The text first continues favourable results—royal friendship and gain of sacrificial means, garments, ornaments, and the like. It then states the reverse condition: when the dāyeśa (period-lord) stands in the sixth, the twelfth (riphpha), or the eighth, or is joined to a malefic, the phala-stream turns adverse. House numbers are the śāstra’s own bhāva indices.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थान शर्त (६ / ८ / १२)। दायेश की स्थिति षष्ठ, रन्ध्र, या रिःफ में, अथवा पाप-संयोग में—यह द्विआधारी शर्त-जाल है, कोई बलांक-योग या वर्ष-अनुपात नहीं।

54.53
कलहो दन्तरोगश्च चौरव्याघ्रादिपीडनम् |
ज्वरातिसारकुष्ठादिदारपुत्रादिपीडनम्
kalaho dantarogaśca cauravyāghrādipīḍanam |
jvarātisārakuṣṭhādidāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलहः = विवाद / कलह; दन्त-रोगः = दन्त-सम्बन्धी कष्ट (शास्त्र-शब्द); चौर = चोर; व्याघ्र = व्याघ्रादि; आदि-पीडनम् = इत्यादि से पीड़न; ज्वर = ज्वर; अतिसार = अतिसार; कुष्ठ = कुष्ठादि (शास्त्र का रोग-नाम); दार = दारा / पत्नी; पुत्र = पुत्र; आदि-पीडनम् = इत्यादि पर कष्ट का शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पूर्ववर्ती अशुभ-स्थान/पाप-संयोग शर्त का फल-विस्तार है। शास्त्र कलह, दन्त-कष्ट, चोर-व्याघ्रादि से पीड़न, तथा ज्वर-अतिसार-कुष्ठादि और दारा-पुत्रादि पर कष्ट का उल्लेख करता है। ये शास्त्र के अपने फल-पद हैं—चिकित्सा-निदान, भय-वाक्य, या हमारे द्वारा अनुमोदित भविष्य नहीं। पाठ को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

English rendering Under the adverse placement just stated, the text lists strife, dental affliction, trouble from thieves, wild beasts, and the like, as well as fever, flux, skin-disease names in the classical lexicon, and distress touching spouse, children, and similar relations. Report these as the śāstra’s phala-claims only—not as medical diagnosis, fate, or endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-स्थान का विस्तार)। कोई संख्या, दशा-वर्ष, या बलांश यहाँ नहीं; केवल शास्त्रीय पीड़ा-सूची।

54.54
द्वितीयसप्तमस्थाने देहे व्याधिर्भविष्यति |
अपमानमनस्तापो धनधान्यादिप्रच्युतिम्
dvitīyasaptamasthāne dehe vyādhirbhaviṣyati |
apamānamanastāpo dhanadhānyādipracyutim
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीयसप्तमस्थाने = (अन्तर्दशा-स्वामी के) द्वितीय या सप्तम भाव में होने पर; देहे व्याधिः = शरीर में रोग; भविष्यति = होगा; अपमानः = अपमान; मनस्तापः = मानसिक संताप; धनधान्यादिप्रच्युतिम् = धन-धान्य आदि से च्युति।

हिन्दी भावार्थ कुज-महादशा की अन्तर्दशाओं के फल-क्रम में — शास्त्र कहता है कि (अन्तर्दशा-स्वामी) द्वितीय या सप्तम भाव में हो तो देह में रोग, अपमान, मन का संताप और धन-धान्य की हानि कही गई है। द्वितीय-सप्तम को मारक-स्थान (अध्याय 44) कहा गया है — उसी सूत्र का दशा-फल में प्रतिबिम्ब।

English rendering With the sub-period lord in the second or the seventh house, the text foretells bodily illness, humiliation, mental anguish and loss of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: अन्तर्दशेश ∈ भाव {2, 7} (मारक-स्थान, अ. 44)। महादशा-आधार: मंगल 7 वर्ष; अन्तर्दशा = (7 × वर्ष_P) ÷ 120।

54.55
कुजस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वाऽपिशुभस्थानाधिपेऽथवा
kujasyāntargate śukre kendralābhatrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vā'piśubhasthānādhipe'thavā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य = मंगल की (दशा के); अन्तर्-गते = अन्तर्दशा में प्रविष्ट; शुक्रे = शुक्र में / शुक्र की अन्तर्दशा में; केन्द्र = १, ४, ७, १०; लाभ = ११वाँ भाव; त्रिकोण = १, ५, ९; गे = स्थित; स्व-उच्चे = स्वोच्च राशि में; स्व-ऋक्ष-गे = स्व-राशि में; वा अपि = अथवा; शुभ-स्थान-अधिपे = शुभ भाव के स्वामी; अथवा = या।

हिन्दी भावार्थ कुज-महादशा की शुक्र-अन्तर्दशा में शास्त्र अनुकूल फल की शर्तें गिनाता है। शुक्र केन्द्र, लाभ, या त्रिकोण में हो; अथवा स्वोच्च या स्वराशि में; अथवा शुभ-स्थान का अधिपति हो—ये विकल्प “अथवा” से जुड़े हैं। शर्त पूरी होने पर अगला श्लोक फल खोलेगा; शर्त न हो तो यह श्लोक स्वयं फल नहीं बाँधता।

English rendering In the Venus antardaśā within Mars’s mahādaśā, the text sets favourable conditions: Venus in a kendra, in the eleventh, or in a trikoṇa; or in exaltation or own sign; or ruling a benefic house. These are alternative placement rules that gate the phala of the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-दीर्घता (विंशोत्तरी, BPHS Ch.46–47 पद्धति):
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ १२०।
कुज = ७, शुक्र = २० ⇒ कुज–शुक्र अन्तर्दशा = (७ × २०) ÷ १२० = १४०⁄१२० = ७⁄६ वर्ष = १ वर्ष + २ मास (३६५.२५-दिवसीय वर्ष मान पर ≈ ४२६ दिन; प्रचलित ज्यौतिष में ३६०-दिवसीय “सवन” मान भी प्रयुक्त—घोषित करें)।
केन्द्र = {१,४,७,१०}, त्रिकोण = {१,५,९}, लाभ = ११—भाव-सूचकांक जन्म-लग्न से (whole-sign या चुनी house-system पर निर्भर; परम्परा में प्रायः राशि-भाव)।

उदाहरण (worked example) मान लें कुज-महादशा चालू; शुक्र-अन्तर्दशा आरम्भ।
दीर्घता = ७⁄६ वर्ष। यदि ३६०-दिवसीय दशा-वर्ष लें: ७⁄६ × ३६० = ४२० दिन।
शुक्र की राशि-स्थिति (D1, ayanāṃśa घोषित—उदा. लाहिरी): यदि शुक्र लग्न से ४थे (केन्द्र) या ५वें (त्रिकोण) या ११वें (लाभ) में हो, अथवा वृषभ/तुला (स्व) या मीन (उच्च) में हो, तो इस श्लोक की शर्त पूरी मानी जाती है। (उदाहरण की स्थिति काल्पनिक जाँच-बिन्दु है, फल का दावा नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में कुज ७ और शुक्र २० वर्ष—Σ = १२०—हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात से बँधा है; अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्) ÷ १२०। यह श्लोक उसी काल-खंड की फल-शर्त खोलता है: गणित अवधि मापता है, फल-वाक्य शास्त्र का रहता है—हम भविष्य “पक्का” नहीं ठहराते।

54.56
राज्यलाभो महत्सौख्यं गजाश्वाम्बरभूषणम् |
लग्नाधिपेन सम्बन्धे पुत्रदारादिवर्धनम्
rājyalābho mahatsaukhyaṃ gajāśvāmbarabhūṣaṇam |
lagnādhipena sambandhe putradārādivardhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्य-लाभः = राज्य / अधिकार-सम्बन्धी लाभ; महत्-सौख्यम् = महान् सुख; गज = हाथी; अश्व = अश्व; अम्बर = वस्त्र; भूषणम् = आभूषण; लग्न-अधिपेन = लग्नेश के साथ; सम्बन्धे = सम्बन्ध / योग में; पुत्र-दार-आदि = पुत्र, दारा इत्यादि; वर्धनम् = वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ-स्थान शर्त पूरी होने पर शास्त्र कुज-दशा की शुक्र-अन्तर्दशा में राज्य-लाभ, महान् सौख्य, तथा गज-अश्व-वस्त्र-आभूषण की प्राप्ति कहता है। यदि शुक्र लग्नेश से सम्बन्ध रखे, तो पुत्र-दारादि की वृद्धि का भी कथन है। यह सब “शास्त्र कहता है” स्तर का फल है—हमारा अनुमोदित भाग्य-लेख नहीं।

English rendering When the conditions of the previous verse hold, the text states gain of authority, great comfort, and acquisition of elephants, horses, garments, and ornaments. If Venus is connected with the lagna-lord, increase of progeny, spouse, and the like is also stated. Phala remains the śāstra’s voice, not a certainty we certify.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्व शर्त पर निर्भर)। “लग्नाधिपेन सम्बन्धे” शास्त्र में दृष्टि/युति/अधिपति-योग का संकेत है; आधुनिक इंजन में सम्बन्ध = same-sign conjunction, aspect per chosen dṛṣṭi-rule, या exchange—परम्परा चुनकर घोषित करें। अवधि वही कुज–शुक्र अन्तर्दशा ७⁄६ वर्ष।

उदाहरण (worked example) कुज–शुक्र अन्तर्दशा = ७⁄६ वर्ष चालू; शुक्र केन्द्र/लाभ/त्रिकोण (या स्व/उच्च) में। लग्न = कन्या, लग्नेश = बुध; शुक्र–बुध युति या पारस्परिक दृष्टि हो तो श्लोक का “लग्नाधिपेन सम्बन्धे” खंड सक्रिय माना जाता है—फल-सूची शास्त्र की; संख्यात्मक “बल” इस श्लोक में नहीं दी।

हमारा डिकोड (Our Decode) अन्तर्दशा-काल का माप विंशोत्तरी अनुपात से निश्चित है; फल-सूची (राज्य, गज-अश्व, पुत्र-दार) व्याख्या-पद है। हम अवधि और ग्रह-स्थान का exact जाँच-पथ रखते हैं; फल को “भाग्य की गारंटी” नहीं बनाते—गणित और कथन अलग रहें।

54.57
आयुषो वृद्धिरैश्वर्यं भाग्यवृद्धिसुखं भवेत् |
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे लाभे वा धनगेऽपि वा
āyuṣo vṛddhiraiśvaryaṃ bhāgyavṛddhisukhaṃ bhavet |
dāyeśātkendrakoṇasthe lābhe vā dhanage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुषः वृद्धिः = आयु की वृद्धि; ऐश्वर्यम् = वैभव/प्रभुत्व; भाग्य-वृद्धि-सुखम् = भाग्य-वृद्धि व सुख; भवेत् = होता है; दायेशात् = दशेश (यहाँ अन्तर्दशेश) से गिनकर; केन्द्र-कोण-स्थे = केन्द्र या त्रिकोण में; लाभे = ११वें में; धनगे = दूसरे (धन) भाव में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (शुभ-स्थित शुक्र-भुक्ति में) आयु की वृद्धि, ऐश्वर्य, तथा भाग्य-वृद्धि का सुख प्राप्त होता है। उत्तरार्ध नई शर्त रखता है — यदि दशेश (अन्तर्दशा-स्वामी) से गिनकर वह केन्द्र, त्रिकोण, ११वें या धन-भाव में हो — तो (अगले पद का) फल मिलता है। यहाँ भाव-गणना ग्रह से नहीं, अपितु दशेश से सापेक्ष की जाती है।

English rendering There is increase of longevity, prosperity, and the happiness of rising fortune; and, reckoned from the daśā-lord, when (the sub-lord) occupies a kendra, trikoṇa, the 11th, or the 2nd (further results accrue).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + सापेक्ष-भाव-शर्त। तकनीकी बिन्दु: "दायेशात्" = दशेश-केन्द्रित भाव-गणना — भाव-स्थिति लग्न से नहीं, दशा/अन्तर्दशा-स्वामी से (mod 12) गिनी जाती है, जो सापेक्ष-गृह अंकगणित है।

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54.58
तत्काले श्रियमाप्नोति पुत्रलाभं महत्सुखम् |
स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं धनवस्त्रादिलाभकृत्
tatkāle śriyamāpnoti putralābhaṃ mahatsukham |
svaprabhośca mahatsaukhyaṃ dhanavastrādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काले = उस काल में (उस भुक्ति/दशा में); श्रियम् आप्नोति = लक्ष्मी/समृद्धि प्राप्त करता है; पुत्र-लाभम् = पुत्र-प्राप्ति का संकेत; महत् सुखम् = महान् सुख; स्व-प्रभोः = अपने स्वामी/अधिपति से; महत् सौख्यम् = बड़ा आराम-सुख; धन-वस्त्र-आदि-लाभ-कृत् = धन, वस्त्र आदि का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी काल में व्यक्ति श्री (समृद्धि) पाता है, पुत्र-लाभ और महान् सुख का अनुभव करता है। अपने प्रभु/स्वामी से बड़ा सौख्य मिलता है, तथा धन-वस्त्र आदि का लाभ होने का कथन है। यह पूर्व-श्लोक के दायेश-केन्द्र/कोण/लाभ/धन स्थिति-फल का विस्तार है।

English rendering The text states that in that period one obtains prosperity, the gain of a son, and great happiness; comfort from one’s own master/lord; and gains of wealth, clothing, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ काल-फल का विस्तार)। गणना-अनुशासन: फल को दशा-अन्तर-अंश के समय-अक्ष पर “कब” से जोड़ें; “क्या अवश्य होगा” के रूप में न पढ़ें।

54.59
महारजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभदम् |
भुक्त्यन्ते फलमाप्नोति गीतनृत्यादिलाभकृत्
mahārajaprasādena grāmabhūmyādilābhadam |
bhuktyante phalamāpnoti gītanṛtyādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महाराजा की कृपा से (मूल "महारज" — पाठ-भेद संभव); ग्राम-भूमि-आदि-लाभदम् = ग्राम, भूमि आदि का लाभ देने वाला; भुक्ति-अन्ते = भुक्ति (अन्तर्दशा) के अन्त में; फलम् आप्नोति = फल पाता है; गीत-नृत्य-आदि-लाभकृत् = गीत-नृत्यादि का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस शुभ शुक्र-भुक्ति में महाराजा की कृपा से ग्राम-भूमि आदि का लाभ होता है, और भुक्ति के अन्त-काल में विशेष फल (गीत-नृत्यादि के भोग सहित) प्राप्त होता है। "भुक्त्यन्ते" यह स्पष्ट करता है कि फल भुक्ति के भीतर काल-खण्ड-अनुसार बँटता है।

English rendering By the favour of the great king it grants villages, land and such; and at the close of the sub-period one obtains its fruit, including song, dance and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (काल-संकेत सहित)। तकनीकी बिन्दु: "भुक्ति" = अन्तर्दशा; "भुक्त्यन्ते" संकेत देता है कि फल-तीव्रता भुक्ति-काल में समरूप नहीं — यही आगे प्रत्यन्तर्दशा (भुक्ति की उपविभाजना) की भूमिका बनती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "भुक्त्यन्ते" पद प्रत्यन्तर्दशा तक की पुनरावृत्त विभाजना की ओर इशारा करता है — हमारे विंशोत्तरी-इंजन में प्रत्येक भुक्ति पुनः उसी अनुपात-नियम (उप-अवधि = भुक्ति-वर्ष × उप-ग्रह-वर्ष / १२०) से विभाजित होती है, अर्थात् वही १२०-आधारित भिन्न-अंकगणित पुनरावर्ती स्तर पर लागू।

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54.60
पुण्यतीर्थस्नानलाभं कर्माधिपसमन्विते |
पुण्यधर्मदयाकूपतडागं कारयिष्यति
puṇyatīrthasnānalābhaṃ karmādhipasamanvite |
puṇyadharmadayākūpataḍāgaṃ kārayiṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुण्य-तीर्थ-स्नान-लाभम् = पुण्य-तीर्थ में स्नान का लाभ/अवसर; कर्म-अधिप = दशमेश (कर्म-भाव का स्वामी); समन्विते = (दायेश) उसके साथ युक्त/संयुक्त होने पर; पुण्य-धर्म-दया = पुण्य, धर्म, दया के कार्य; कूप-तडागम् = कुआँ और तालाब; कारयिष्यति = करवाएगा / निर्माण करवाएगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (दायेश) कर्माधिप के साथ संयुक्त हो, तब पुण्य-तीर्थ-स्नान का लाभ होता है। व्यक्ति पुण्य, धर्म और दया के कार्यों में प्रवृत्त होता है तथा कुएँ-तालाब आदि का निर्माण करवाता है। यह शुभ-फल का कर्म-धर्म पक्ष है — पाठ का कथन, न कि अनिवार्यता।

English rendering The text states that when (the period-lord is) associated with the lord of the tenth, there is the gain of bathing at sacred places of merit; and that one will cause works of dharma and compassion — wells, tanks, and the like — to be built.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश–दशमेश संयोग)। तकनीक-संकेत: “समन्विते” = dual-longitude same-sign/same-house conjunction test (राशि-युति / भाव-युति — convention declare करें); फल स्वयं अंकगणित नहीं।

54.61
दायेशाद्रन्ध्ररिष्फस्थे षष्ठे वा पापसंयुते |
करोति दुःखबाहुल्यं देहपीडां धनक्षयं
dāyeśādrandhrariṣphasthe ṣaṣṭhe vā pāpasaṃyute |
karoti duḥkhabāhulyaṃ dehapīḍāṃ dhanakṣayaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (अन्तर्दशा-स्वामी) से गिनकर; रन्ध्र = ८वाँ भाव; रिष्फ (रिःफ) = १२वाँ भाव; षष्ठे = ६ठे में; पाप-संयुते = पापग्रह से युक्त; करोति = करता है; दुःख-बाहुल्यम् = दुःखों की अधिकता; देह-पीडाम् = शरीर की पीड़ा; धन-क्षयम् = धन का नाश।

हिन्दी भावार्थ अब अशुभ-स्थिति — शास्त्र कहता है कि यदि (शुक्र) दशेश से ६/८/१२ भाव में हो और पापग्रह से युक्त हो, तो वह दुःखों की अधिकता, शारीरिक पीड़ा और धन-हानि करता है। यहाँ ६/८/१२ (त्रिक/दुःस्थान) की गणना भी अन्तर्दशेश से सापेक्ष की गई है।

English rendering Reckoned from the daśā-lord, when it stands in the 8th, 12th, or 6th and is joined with a malefic, it produces abundant sorrow, bodily affliction, and loss of wealth — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुःस्थान-शर्त)। तकनीकी बिन्दु: ६/८/१२ = दुःस्थान (त्रिक भाव), और गणना "दायेशात्" अर्थात् दशेश-केन्द्रित; भाव-संख्या = (लक्ष्य-राशि − दशेश-राशि) mod 12 + 1। यह अशुभ-वर्ग की सापेक्ष-भाव पहचान है, फल की मात्रा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही हमारे अनुशासन का केन्द्र है — गणित और फल को पृथक रखना। ग्रह की सापेक्ष-भाव-स्थिति (६/८/१२) एक निश्चित, `==`-सत्यापनीय अंकगणितीय तथ्य है; परन्तु "दुःख-बाहुल्यम्/धन-क्षयम्" शास्त्र का फल-कथन है, जिसे हम भविष्यवाणी या भय के रूप में नहीं, अपितु "पाठ ऐसा कहता है" के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

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54.62
राजचौरादिभीतिञ्च गृहे कलहमेव च |
दारपुत्रादिपीडां च गोमहिष्यादिनाशकृत्
rājacaurādibhītiñca gṛhe kalahameva ca |
dāraputrādipīḍāṃ ca gomahiṣyādināśakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-चौर-आदि-भीतिम् = राजा, चोर आदि से भय; गृहे कलहम् = घर में कलह; दार-पुत्र-आदि-पीडाम् = पत्नी, पुत्र आदि की पीड़ा; गो-महिषी-आदि-नाश-कृत् = गाय, भैंस आदि पशुओं के नाश का संकेत करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी अशुभ-स्थिति में राज-भय, चोर-भय आदि, घर में कलह, दारा-पुत्र आदि की पीड़ा, तथा गौ-महिषी आदि के नाश का भी फल कहा गया है। यह 54.61 का विस्तारित अशुभ-फल-समूह है। पाठ “भीति” और “नाश” को संभावना-संकेत के रूप में कहता है — निश्चित घटना या भय-व्यापार के रूप में नहीं।

English rendering The text states that there is also fear from the king, thieves, and the like; quarrel in the house; affliction to wife, children, and so on; and destruction of cattle such as cows and buffaloes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-फल-समूह का विस्तार)। कोई संख्या, बलांश या दशा-वर्ष यहाँ नहीं; केवल 54.61 की स्थिति-शर्त पर फल-सूची।

54.63
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति |
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धये
dvitīyadyūnanāthe tu dehabādhā bhaviṣyati |
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyurārogyavṛddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (2) और द्यून/सप्तम (7) के नाथ/स्वामी (के सम्बन्ध में / उनके अशुभ होने पर — पाठ-भेद/सन्दर्भ संभव); देह-बाधा = देह में बाधा/पीड़ा; भविष्यति = होगी (पाठ का कथन); श्वेताम् गाम् = श्वेत गाय; महिषीम् = भैंस; दद्यात् = दान करे; आयुः-आरोग्य-वृद्धये = आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्वितीय अथवा द्यून (सप्तम) भाव के नाथ के (उक्त अशुभ) सन्दर्भ में देह-बाधा होती है। पाठ स्वयं उपाय के रूप में श्वेत गाय अथवा महिषी का दान आयु-आरोग्य-वृद्धि के लिए कहता है। यह शास्त्र का पारम्परिक उपाय-कथन है — दबाव, विक्रय, या चिकित्सकीय/कानूनी निर्देश नहीं; हम इसे न तो अनिवार्यता मानते हैं, न चिकित्सा-परामर्श।

English rendering The text states that when the lord of the second or of the seventh (dyūna) is (so placed/afflicted), bodily obstruction will occur; and it prescribes the gift of a white cow or a she-buffalo for the increase of longevity and health — as the śāstra’s own traditional statement, not as a medical or compulsory remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रोक्त उपाय-निर्देश। द्वितीय = 2, द्यून = 7; “नाथे” की व्याकरण-सन्धि/सन्दर्भ अध्याय-क्रम पर निर्भर — पाठ-भेद संभव। कोई वर्ष, अंश या बल-इकाई नहीं।

54.64
कुजस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे |
मूलत्रिकोणलाभे वा भाग्यकर्मेशसंयुते
kujasyāntargate sūrye svocce svakṣetrakendrage |
mūlatrikoṇalābhe vā bhāgyakarmeśasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य-अन्तर्गत = मङ्गल-अन्तर्दशा में; सूर्ये = सूर्य (काल-खण्ड का ग्रह); स्व-उच्चे = अपने उच्च (मेष 10°) में; स्व-क्षेत्र = स्वराशि (सिंह); केन्द्र-गे = 1/4/7/10 भावस्थ; मूलत्रिकोण = मूलत्रिकोण-स्थान; लाभे = एकादश भाव में; भाग्य-कर्मेश-संयुते = नवमेश + दशमेश के योग/संयोग में।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक मङ्गल की अन्तर्दशा में सूर्य की अनुकूल स्थिति के मापदण्ड बताता है। शास्त्र कहता है—जब सूर्य स्वोच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, मूलत्रिकोण अथवा लाभ-भाव में हो, अथवा भाग्येश और कर्मेश से युक्त हो, तब वही सूर्य-भुक्ति विशेष फल-संकेत का आधार बनती है। यहाँ “फल” अभी अगले श्लोकों में आता है; यह पद्य केवल योग-शर्तें बाँधता है।

English rendering When the Sun occupies Mars’s antardaśā and is in exaltation, own sign, a kendra, mūlatrikoṇa, the eleventh house, or joined with the lords of the ninth and tenth, the text sets the condition for the favourable Sun-bhukti results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Placement-check (boolean predicates on ecliptic longitude λ and house map), not a closed algebraic formula. Conventions to declare before evaluating: ayanāṃśa (sidereal rāśi), house system for kendra/lābha, and that “Mars antardaśā” is the Kuja-subperiod inside whichever mahādaśā is running. Dignity arcs used by the verse’s terms: Sun ucca = Meṣa 10°; svakṣetra = Siṃha (120°–150° sidereal); mūlatrikoṇa for Sun is conventionally Siṃha (often 0°–20° portion in later manuals—पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव on the exact arc). Kendra = houses 1, 4, 7, 10 from lagna; lābha = 11. Conjunction = same rāśi (or tight orb if the engine defines one) with lords of bhāvas 9 and 10. Vimśottarī length of the subperiod itself: antar-years = (mahādaśā-years of the mahā-lord × 6)/120 for Sūrya-antar (Sun’s vimśottarī weight = 6 of 120).

उदाहरण (worked example) Assume Mars mahādaśā (7 y) is running; Sun antardaśā length = (7 × 6)/120 = 42/120 = 0.35 y ≈ 4 m 6 d (365.25-day year convention). Take sidereal Sun λ = 128° (Siṃha 8°) → svakṣetra ✓; lagna = Tulā → house of Sun = 11 (lābha) ✓. Either condition alone already satisfies the verse’s “or”-chain; engine flags the bhukti as the “favourable placement branch” before reading 54.65–66 phala.

हमारा डिकोड (Our Decode) Vimśottarī here is pure ratio arithmetic on the 120-year cycle (Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17). The daśā engine computes antar as (mahā-yr × antar-yr)/120 from the Moon’s nakṣatra-fraction at birth; dignity/house predicates are separate modular checks on longitude—mathematics first, phala only as the śāstra’s stated outcome, never as endorsed fate.

54.65
तद्भुक्तौ वाहनं कीर्तिं पुत्रलाभं च विन्दति |
धनधान्यसमृद्धिः स्याद् गृहे कल्याणसम्पदः
tadbhuktau vāhanaṃ kīrtiṃ putralābhaṃ ca vindati |
dhanadhānyasamṛddhiḥ syād gṛhe kalyāṇasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-भुक्तौ = उस (पूर्वोक्त अनुकूल) भुक्ति में; वाहनम् = वाहन/सवारी; कीर्तिम् = यश; पुत्र-लाभम् = संतान-संबंधी लाभ (शास्त्र-कथन); विन्दति = प्राप्त करता है—ऐसा पाठ कहता है; धन-धान्य-समृद्धिः = द्रव्य-अन्न की वृद्धि; गृहे = घर में; कल्याण-सम्पदः = शुभ समृद्धि/संपद्।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्तें पूरी होने पर शास्त्र उस सूर्य-भुक्ति का फल बताता है। पाठ कहता है—वाहन, कीर्ति और पुत्र-लाभ का संकेत; धन-धान्य में समृद्धि; गृह-परिवेश में कल्याण और संपद्। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं—केवल उस योग-भुक्ति से जुड़े शास्त्रीय संकेत।

English rendering In that bhukti, the text states the native obtains conveyance, renown, and the gain of a son, with prosperity of wealth and grain and auspicious abundance in the household.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। Computational layer stops at verifying 54.64’s placement predicates and the clock of the Sun-antardaśā; this verse maps the “true” branch to listed outcomes without degrees, bindus, or ratios.

54.66
क्षेमारोग्यं महद्धैर्यं राजपूज्यं महत्सुखम् |
व्यवसायात्फलाधिक्यं विदेशे राजदर्शनम्
kṣemārogyaṃ mahaddhairyaṃ rājapūjyaṃ mahatsukham |
vyavasāyātphalādhikyaṃ videśe rājadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षेम = कुशल-क्षेम, सुरक्षा; आरोग्य = निरोगता; महद्धैर्य = महान धैर्य/साहस; राजपूज्य = राजा द्वारा सम्मानित होना; महत्सुख = बड़ा सुख; व्यवसायात् फलाधिक्य = व्यापार/उद्यम से अधिक लाभ; विदेशे = परदेश में; राजदर्शन = राजा से भेंट/राजानुग्रह।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक कुज-महादशा में सूर्य-अन्तर्दशा के शुभ फलों (श्लोक 64–65, सूर्य स्वोच्च/स्वक्षेत्र/केन्द्रस्थ) की निरन्तरता है। शास्त्र कहता है कि ऐसे योग में जातक को कुशल-क्षेम, आरोग्य, प्रबल धैर्य, राजसम्मान और महान सुख मिलता है; उद्यम से अधिक लाभ होता है और परदेश-यात्रा में राजपुरुषों से आदरपूर्ण भेंट होती है।

English rendering The text states that in this (Mars-major, Sun-sub) period the native enjoys security, health, great courage, royal honour and much happiness — gain surpassing effort in enterprise, and an audience with rulers even in a foreign land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ अन्तर्दशा-फल)। यह श्लोक पिछली शुभ-स्थिति (सूर्य की बलवत्ता) पर सशर्त है; फल स्वयं गणनीय नहीं, अपितु सूर्य की गणनीय स्थिति (केन्द्र/उच्च) का परिणाम-कथन है।

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54.67
दायेशात्षष्ठरिष्फे वा व्यये वा पापसंयुते |
देहपीडा मनस्तापः कार्यहानिर्महद्भयम्
dāyeśātṣaṣṭhariṣphe vā vyaye vā pāpasaṃyute |
dehapīḍā manastāpaḥ kāryahānirmahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दाशेश/दशा-स्वामी से (अन्तर्दशा-संदर्भ में काल-स्वामी); षष्ठे = छठे भाव में; रिष्फे = अष्टम भाव में; व्यये = द्वादश में; वा = अथवा; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त; देह-पीडा = शरीर-कष्ट (शास्त्र-शब्द); मनस्-तापः = मानसिक ताप; कार्य-हानिः = कार्य-हानि; महत्-भयम् = बड़ा भय—पाठ का शब्द, न कि हमारा पूर्वानुमान।

हिन्दी भावार्थ अब विपरीत शाखा। शास्त्र कहता है—यदि (प्रसंगाधीन काल-खण्ड का) ग्रह दायेश से षष्ठ, रिष्फ (8) या व्यय में हो, अथवा पाप-संयुक्त हो, तो देहपीड़ा, मनस्ताप, कार्यहानि और महद्भय के संकेत पढ़े जाते हैं। यह ariṣṭa/कष्ट-सूची है; हम इसे भय-व्यापार नहीं बनाते—केवल शास्त्र का फल-वर्ग।

English rendering From the lord of the period, if the relevant planet is in the sixth, eighth, or twelfth, or joined with malefics, the text states bodily distress, mental anguish, loss in undertakings, and great fear as the indicated results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Relative-house filter, not a strength formula. Let L = longitude-house of the dāyeśa (period lord; in Kuja-context, typically Mars as mahā-lord or the operative daśā-lord per recension). Let P = house of the planet under phala (here the Sun of the Sun-bhukti thread, or the bhukti-lord—पाठ continuity with 54.64 suggests the same Sūrya, evaluated from dāyeśa). Adverse if house-distance d = ((house(P) − house(L) − 1) mod 12) + 1 ∈ {6, 8, 12}, or if P shares rāśi with natural pāpa (Sa, Ma, nodes—list per engine convention). Declare: whole-sign vs quadrant houses; which graha counts as dāyeśa when mahā and antar differ. No rūpa/virūpa math here.

उदाहरण (worked example) Whole-sign houses; Mars (dāyeśa) in Meṣa = house 1 from itself; Sun in Kanyā = 6th from Mars → षष्ठ ✓ → adverse branch of 54.67–68 before any phala prose is read. If Sun instead sits Siṃha with only Jupiter, 54.64-type dignity may still be true from lagna while 54.67 is false from dāyeśa—two independent filters; the recension stacks them as alternate case-branches, not a single score.

54.68
शिरोरोगो ज्वरादिश्च अतिसारमथापि वा |
द्वितीयद्यूननाथे तु सर्पज्वरविषाद्भयम्
śirorogo jvarādiśca atisāramathāpi vā |
dvitīyadyūnanāthe tu sarpajvaraviṣādbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिरोरोग = सिर का रोग/शिरःपीड़ा; ज्वरादि = ज्वर आदि; अतिसार = अतिसार/उदर-प्रवाह; द्यून = सप्तम भाव; द्वितीय = दूसरा भाव; नाथ = अधिपति; सर्प = सर्प-भय; ज्वर-विष = ज्वर व विष का भय।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक के दोष-फल को आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है कि इस अशुभ स्थिति में शिरोरोग, ज्वरादि तथा अतिसार सम्भव हैं। और यदि अन्तर्दशेश (सूर्य) द्वितीय या सप्तम (द्यून) का स्वामी हो — जो मारक-स्थान हैं — तो सर्प, ज्वर एवं विष से भय कहा गया है।

English rendering The text states that such an affliction brings headache, fevers and dysentery; and when the sub-lord rules the 2nd or the 7th (the māraka houses), fear from serpents, fever and poison is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — मारक-निर्धारण: मारक-स्थान = द्वितीय (2) व सप्तम (7); इनके अधिपति मारक-ग्रह माने जाते हैं। द्वितीयेश/सप्तमेश की दशा-अन्तर में मारक-प्रवृत्ति सक्रिय कही जाती है (यह शास्त्र का कथन है, कोई निश्चित घटना नहीं)।

उदाहरण (worked example) कर्क लग्न में द्वितीय = सिंह, जिसका स्वामी सूर्य → सूर्य मारकेश। अतः कुज-महादशा/सूर्य-अन्तर में शास्त्र इस मारक-योग की ओर संकेत करता है — फल-कथन के रूप में, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

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54.69
सुतपीडाभयं चैव शान्ति कुर्याद्यथाविधि |
देहारोग्यं प्रकुरुते धनधान्यचयं तथा
sutapīḍābhayaṃ caiva śānti kuryādyathāvidhi |
dehārogyaṃ prakurute dhanadhānyacayaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुत-पीडा-भयम् = संतान-पीड़ा का भय (शास्त्र-कथन); च एव = तथा; शान्तिं कुर्यात् = शान्ति-विधान करे—ऐसा पाठ; यथा-विधि = विधि के अनुसार; देह-आरोग्यम् = देह में आरोग्य; प्रकुरुते = उत्पन्न करता है—पाठ; धन-धान्य-चयम् = धन-धान्य का संचय; तथा = उसी क्रम में।

हिन्दी भावार्थ फल-सूची में सुत-पीड़ा-भय का भी उल्लेख है; तत्पश्चात् शास्त्र यथाविधि शान्ति करने को कहता है, और उसी विधान-प्रसंग में देहारोग्य तथा धन-धान्य-चय का कथन जोड़ता है। हम शान्ति को दबाव या “जरूरी इलाज” नहीं बनाते—केवल पाठ की परंपरागत प्रक्रिया और उसके साथ जुड़े शास्त्रीय फल-शब्द।

English rendering The text also notes fear of distress to children and directs that propitiatory rite be done according to rule; it states that such due procedure brings bodily soundness and accumulation of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + विधि-निर्देश। No bindu, bala, or daśā ratio; the only “technique” is procedural: after the adverse branch (54.67–68), the recension inserts a śānti clause and a restorative phala pair (ārogya, dhana-dhānya). Interpretation stays inside the text’s voice—not medical, legal, or financial counsel.

54.70
कुजस्यान्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे |
भार्यवाहनकर्मेशलग्नाधिपसमन्विते
kujasyāntargate candre svocce svakṣetrakendrage |
bhāryavāhanakarmeśalagnādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य-अन्तर्गत = मङ्गल-अन्तर्दशा में; चन्द्रे = चन्द्र; स्व-उच्चे = उच्च (वृष 3°) में; स्व-क्षेत्र = स्वराशि (कर्क); केन्द्र-गे = केन्द्रस्थ; भार्या = दारा/सप्तम-संबंध (भार्येश); वाहन = वाहन-भाव (प्रायः 4) का ईश; कर्मेश = दशमेश; लग्न-अधिप = लग्नेश; समन्विते = इनसे युक्त/सहित।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-शाखा के बाद अब मङ्गल-अन्तर्दशा में चन्द्र की अनुकूल स्थिति का द्वार खुलता है। शास्त्र शर्त बाँधता है—चन्द्र स्वोच्च, स्वक्षेत्र या केन्द्र में हो, तथा भार्या-, वाहन-, कर्म- और लग्न-अधिपों से समन्वित हो। फल अगले श्लोकों में आएगा; यहाँ केवल योग-मापदण्ड है।

English rendering When the Moon is in Mars’s antardaśā and stands in exaltation, own sign, or a kendra, and is associated with the lords of spouse, conveyance, action (tenth), and the lagna, the text sets the opening condition for the Moon-bhukti results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Same dual layer as 54.64: (1) vimśottarī clock, (2) dignity + yoga predicates. Moon antar length inside Mars mahādaśā: (7 × 10)/120 = 70/120 = 7/12 y ≈ 0.5833 y ≈ 7 m 3 d (365.25-d year). Dignity arcs: Moon ucca = Vṛṣabha 3°; svakṣetra = Karka (90°–120° sidereal). Kendra = houses 1, 4, 7, 10 from lagna. “भार्यवाहनकर्मेशलग्नाधिपसमन्विते” = conjunction (same rāśi / defined orb) with lords of bhāva 7 (bhāryā), 4 (vāhana, common hora mapping), 10 (karma), and 1 (lagna)—all four named; whether every one is required or a collective yoga is meant is a parsing choice (strict reading: coordinated with those lords as a group). Declare ayanāṃśa and house system before coding the check.

उदाहरण (worked example) Mars mahādaśā running; Moon antar = 7/12 y as above. Sidereal Moon λ = 95° (Karka 5°) → svakṣetra ✓; lagna = Makara → Moon in house 7 (kendra) ✓. Suppose lords: 7th= Budha, 4th= Kuja, 10th= Śukra, lagna= Śani, and Moon shares rāśi with Budha and Śukra only—partial match; a strict all-four engine would not yet open the “full samnvita” flag, while dignity+kendra alone already mirrors the first half of the verse. Conventions must be fixed before any phala branch is chosen.

हमारा डिकोड (Our Decode) This is again the 120-year vimśottarī ratio machine: Moon’s 10-year weight yields antar = (mahā-yr × 10)/120, keyed to the birth Moon’s nakṣatra-fraction—exact arithmetic, not lore. Dignity and multi-lord yoga are independent boolean layers on the same longitude stream the varga/daśā engines already use; we keep `==` discipline on period lengths and leave phala as “the text states,” never as a prediction we certify.

54.71
करोति विपुलं राज्यं गन्धमाल्याम्बरादिकम् |
तडागं गोपुरादीनां पुण्यधर्मादिसंग्रहम्
karoti vipulaṃ rājyaṃ gandhamālyāmbarādikam |
taḍāgaṃ gopurādīnāṃ puṇyadharmādisaṃgraham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) करोति = करता है / उत्पन्न करता है; विपुलं राज्यम् = विस्तृत राज्य-सत्ता / वैभव-प्रभुत्व; गन्ध-माल्य-अम्बर-आदिकम् = सुगन्ध, माला, वस्त्रादि; तडागम् = सरोवर / जलाशय; गोपुर-आदीनाम् = गोपुर (द्वार-शिखर) आदि निर्माण; पुण्य-धर्म-आदि-संग्रहम् = पुण्य-कर्म एवं धर्म-संग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उक्त दशा/योग-स्थिति में) विपुल राज्य-वैभव, गन्ध-माल्य-वस्त्रादि सुख-सामग्री, तडाग-गोपुरादि निर्माण तथा पुण्य-धर्म-संग्रह की प्रवृत्ति होती है। यह फल-कथन भोग-वैभव और धर्म-कर्म दोनों पक्षों को एक साथ जोड़ता है। पाठ-भेद संभव जहाँ “राज्य” को केवल राजसत्ता या व्यापक सम्पदा-अधिकार के अर्थ में लिया जाए।

English rendering The text states that (in the relevant period/condition) extensive dominion or prosperity arises, along with fragrance, garlands, fine garments and the like; also the making of tanks and gopuras, and the accumulation of merit and dharmic acts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ भोग-धर्म-संग्रह)। यहाँ कोई अंश, वर्ष या बल-इकाई नहीं दी गई; यह दशा/योग-फल का गुणात्मक वर्णन है।

54.72
विवाहोत्सवकर्माणि दारपुत्रादिसौख्यकृत् |
पितृमातृसुखावाप्तिं गृहे लक्ष्मीः कटाक्षकृत्
vivāhotsavakarmāṇi dāraputrādisaukhyakṛt |
pitṛmātṛsukhāvāptiṃ gṛhe lakṣmīḥ kaṭākṣakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवाह-उत्सव-कर्माणि = विवाह एवं उत्सव-संस्कार; दार-पुत्र-आदि-सौख्य-कृत् = पत्नी-पुत्रादि का सुख देने वाला; पितृ-मातृ-सुख-आवाप्तिम् = माता-पिता के सुख की प्राप्ति; गृहे = घर में; लक्ष्मीः कटाक्ष-कृत् = लक्ष्मी का कृपा-कटाक्ष उत्पन्न करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि विवाह-उत्सव आदि संस्कार-कार्य सम्पन्न होते हैं तथा दार-पुत्रादि का सौख्य मिलता है। पितृ-मातृ-सुख की प्राप्ति तथा गृह में लक्ष्मी के कटाक्ष का वर्णन भी इसी फल-श्रृंखला में आता है। यह श्लोक पारिवारिक-सामाजिक शुभ-फलों का संक्षिप्त सूची-रूप है, न कि किसी गणना-सूत्र का।

English rendering The text states marriage-festival rites, comfort through spouse and children, the gain of parental ease, and Lakṣmī’s gracious glance upon the household as results of the relevant condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पारिवारिक-सामाजिक शुभ-फल)। कोई वर्ग-भाग, दशा-वर्ष या बिन्दु-गिनती नहीं है।

54.73
महारजप्रसादेन स्वेष्टसिद्धिसुखादिकम् |
पूर्णे चन्द्रे पूर्णफलं क्षीणे स्वल्पफल्ं भवेत्
mahārajaprasādena sveṣṭasiddhisukhādikam |
pūrṇe candre pūrṇaphalaṃ kṣīṇe svalpaphalṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराजप्रसाद = महान राजा का अनुग्रह; स्वेष्टसिद्धि = अभीष्ट की सिद्धि; पूर्ण चन्द्र = पूर्ण (पूर्णिमा-पक्षीय, प्रकाशयुक्त) चन्द्र; पूर्णफल = पूर्ण फल; क्षीण = क्षीण/अल्प-प्रकाशी चन्द्र; स्वल्पफल = अल्प फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राजानुग्रह से अभीष्ट-सिद्धि व सुख मिलते हैं। महत्त्वपूर्ण नियम यह है — चन्द्र यदि पूर्ण (शुक्लपक्षीय, प्रकाशयुक्त) हो तो पूर्ण फल, और क्षीण (कृष्णपक्षीय) हो तो अल्प फल मिलता है। अर्थात् फल-मात्रा चन्द्र की कान्ति/बल के समानुपाती है।

English rendering The text states that by a great king's favour one gains one's desired ends; and — as a rule — when the Moon is full its result is full, when waned the result is slight.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह गणनीय नियम है — फल ∝ चन्द्र का पक्षबल (कालबल का अंग)। सूर्य-चन्द्र अन्तर Δ = |λ_चन्द्र − λ_सूर्य|, को 0°–180° में लाकर: पक्षबल = (Δ ÷ 180) × 60 विरूप; चन्द्र के लिए यह द्विगुणित (×2)। पूर्णिमा (Δ = 180°) → अधिकतम; अमावस्या (Δ = 0°) → न्यूनतम। यही "पूर्णे पूर्णफलं, क्षीणे स्वल्पफलम्" का गणित है (1 रूप = 60 विरूप)।

उदाहरण (worked example) चन्द्र 200°, सूर्य 50° → Δ = 150°। पक्षबल = (150 ÷ 180) × 60 = 50 विरूप, चन्द्र हेतु ×2 = 100 विरूप ≈ 1.67 रूप। पूर्णिमा पर Δ = 180° → 60 × 2 = 120 विरूप = 2.0 रूप (परम) → "पूर्ण फल"। इस अनुपात से फल-मात्रा घटती-बढ़ती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे षड्बल के कालबल → पक्षबल घटक से जुड़ता है, जिसे हमारे ṣaḍbala मॉड्यूल में रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में गणित किया जाता है। यहाँ ग्रन्थ स्वयं फल को चन्द्र-बल के समानुपाती घोषित करता है — गणित (पक्षबल) और फल-कथन को अलग रखने की हमारी अनुशासन-रेखा को यह श्लोक शास्त्र की अपनी वाणी में पुष्ट करता है।

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54.74
नीचारिस्थऽष्टमे षष्ठे दायेशाद्रिपुरन्ध्रके |
मरणं दारपुत्राणां कष्टं भूमिविनाशनम्
nīcāristha'ṣṭame ṣaṣṭhe dāyeśādripurandhrake |
maraṇaṃ dāraputrāṇāṃ kaṣṭaṃ bhūmivināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीच = नीचराशिस्थ (चन्द्र का नीच वृश्चिक 3°); अरिस्थ = शत्रु-राशि में; अष्टम = आठवाँ भाव; षष्ठ = छठा भाव; दायेशात् रिपु = दशानाथ से षष्ठ (रिपु); रन्ध्र = अष्टम; मरणं दारपुत्राणाम् = पत्नी-पुत्रों को कष्ट/हानि; भूमिविनाश = भूमि की हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि चन्द्र नीचराशि या शत्रुक्षेत्र में हो, अष्टम या षष्ठ में हो, अथवा दशानाथ कुज से रिपु (6) या रन्ध्र (8) में हो, तो इस अन्तर में परिवार-कष्ट, दुःख तथा भूमि की हानि का योग कहा गया है। (यह अनिष्ट-कथन है, कोई निश्चित घटना नहीं।)

English rendering The text states that when the Moon is debilitated, in an enemy's sign, in the 8th or 6th, or (from the daśā-lord) in the 6th or 8th, this sub-period portends grief to wife and children, hardship and loss of land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — दो अक्षों पर दुःस्थान-गणना: (क) लग्न/राशि से 6 व 8 दुःस्थान; (ख) दायेश से भाव N = ((राशि₍चन्द्र₎ − राशि₍कुज₎) mod 12) + 1, जहाँ N ∈ {6, 8} अनिष्ट; साथ ही नीच/शत्रुक्षेत्र = स्थानबल-हीनता। बल-हीनता व दुःस्थान-योग मिलकर अनिष्ट-कथन का आधार बनते हैं।

उदाहरण (worked example) कुज मेष (राशि 1); चन्द्र वृश्चिक (राशि 8) में → वृश्चिक चन्द्र का नीच, और दायेश से ((8 − 1) mod 12) + 1 = 8वाँ (रन्ध्र)। इस प्रकार नीचत्व व रन्ध्र-स्थिति दोनों एक साथ — शास्त्र इसे विशेष कष्टप्रद अन्तर बताता है।

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54.75
पशुधान्यक्षयश्चैव चौरादिरणभीतिकृत् |
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति
paśudhānyakṣayaścaiva caurādiraṇabhītikṛt |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पशुधान्यक्षय = पशु व धान्य की हानि; चौरादि = चोर आदि; रणभीति = युद्ध/संघर्ष का भय; द्वितीय = दूसरा भाव; द्यून = सप्तम भाव; नाथ = अधिपति; अपमृत्यु = अकाल/अपघात-मृत्यु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस अनिष्ट-स्थिति में पशु और धान्य की हानि, चोर आदि तथा रण का भय होता है; और यदि चन्द्र द्वितीय या सप्तम (द्यून) का स्वामी हो — जो मारक-स्थान हैं — तो अपमृत्यु का भय कहा गया है। यह ग्रन्थ का अरिष्ट-कथन है, भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states there is loss of cattle and grain, and fear from thieves and battle; and when the Moon rules the 2nd or 7th (the māraka houses), untimely death is apprehended.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — मारकेश-योग: मारक-स्थान = 2 व 7; इनका अधिपति मारक। चन्द्र के मारकेश होने पर उसकी अन्तर्दशा मारक-प्रवृत्ति की वाहक कही जाती है (शास्त्र-कथन के रूप में)।

उदाहरण (worked example) मिथुन लग्न में द्वितीय = कर्क, जिसका स्वामी चन्द्र → चन्द्र मारकेश। अतः कुज-महादशा/चन्द्र-अन्तर में शास्त्र इस मारक-योग की ओर संकेत करता है — इसे भय के रूप में नहीं, अपितु ग्रन्थ के अरिष्ट-नियम के रूप में पढ़ना चाहिए।

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54.76
देहजाड्यं मनोदुःखं दुर्गा लक्ष्मीजपं चरेत् |
श्वेतां गां महिषीं दद्यादनेमारोग्यमादिशेत्
dehajāḍyaṃ manoduḥkhaṃ durgā lakṣmījapaṃ caret |
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādanemārogyamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहजाड्य = शरीर की जड़ता/शिथिलता; मनोदुःख = मानसिक दुःख; दुर्गा-लक्ष्मी-जप = दुर्गा व लक्ष्मी का जप; श्वेता गौः = श्वेत गाय; महिषी = भैंस; दद्यात् = दान करे; आयुरारोग्यम् आदिशेत् = आयु-आरोग्य का विधान/निर्देश ("अनेमारोग्यम्" पाठ-भेद संभव, सम्भवतः "आयुरारोग्यम्")।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अशुभ चन्द्र-अन्तर में देह-शिथिलता व मन का दुःख हो सकता है, अतः दुर्गा एवं लक्ष्मी का जप तथा श्वेत गाय व भैंस के दान का विधान ग्रन्थ अपनी परम्परा में बताता है; इससे आयु-आरोग्य का निर्देश किया गया है। यह उपशमन-कथन है, कोई दबाव या भय नहीं।

English rendering The text states that (in such an affliction) there is bodily lethargy and mental sorrow; it enjoins japa of Durgā and Lakṣmī and the gift of a white cow and a she-buffalo, whereby longevity and health are foretold.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/उपशमन-कथन (कुज-चन्द्र अन्तर का समापन)। यहाँ जप-दान ग्रन्थ का परम्परागत उपशमन-विधान है; इसे शास्त्र के अपने कथन के रूप में प्रस्तुत करना है, भय-प्रेरित उपाय के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अरिष्ट-श्लोक हमारी मूल अनुशासन-रेखा को दर्शाता है: गणित (दशा-अनुपात, पक्षबल, दुःस्थान-गणना) को ठीक `==` से सत्यापित करना, किन्तु फल एवं शान्ति-कथन को "शास्त्र कहता है" के रूप में रखना — न भय, न अनिवार्य उपाय। यही हमारे oracle-आधारित decode की विधि है, जो गणित को व्याख्या से पृथक रखती है।

अध्यायः 55

रह्वन्तर्दशाफलाध्यायः

83 श्लोक
55.1
कुलीरे वृश्चिके राहौ कन्यत्यां चापगेऽपि वा |
तद्भुक्तो राजसम्मानं वस्त्रवाहनभूषणम्
kulīre vṛścike rāhau kanyatyāṃ cāpage'pi vā |
tadbhukto rājasammānaṃ vastravāhanabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- कुलीरे = कर्क राशि में (Cancer, rāśi #4)
- वृश्चिके = वृश्चिक राशि में (Scorpio, #8)
- कन्यत्यां = कन्या राशि में (Virgo, #6; प्रचलित पाठ "कन्यायां" — पाठ-भेद संभव)
- चापगे = धनु राशि में स्थित (Sagittarius, #9; चाप = धनुष)
- राहौ = राहु (छाया-ग्रह, उत्तर पात) के
- तद्भुक्तौ = उसकी भुक्ति/अन्तर्दशा में (यहाँ राहु-महादशा का राहु-अन्तर)
- राजसम्मानम् = राजकीय सम्मान
- वस्त्र-वाहन-भूषणम् = वस्त्र, वाहन एवं आभूषण

हिन्दी भावार्थ राहु-महादशा के भीतर यदि राहु कर्क, वृश्चिक, कन्या अथवा धनु राशि में बैठा हो, तो उसकी अपनी अन्तर्दशा (राहु-राहु) में — ऐसा शास्त्र कहता है — जातक राजकीय सम्मान तथा वस्त्र, वाहन और आभूषणों का लाभ पाता है। यह अध्याय राहु-महादशा के नौ अन्तरों के फल-कथन का आरम्भ है।

English rendering When Rāhu occupies Cancer, Scorpio, Virgo, or Sagittarius, the text states that during its own sub-period (within the Rāhu major-period) one obtains royal honour along with garments, conveyances, and ornaments.

गणित / तकनीक: दो घटक हैं — (i) राशि-शर्त: शुभ-फलद राशि-समुच्चय = {कर्क 4, कन्या 6, वृश्चिक 8, धनु 9}; (ii) अन्तर्दशा-मान: अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। राहु-महादशा = 18 वर्ष ⇒ राहु-राहु = 18 × 18 ÷ 120 = 324/120 = 2.7 वर्ष।

उदाहरण: 2.7 वर्ष = 2 वर्ष + 0.7×12 = 8.4 मास = 2 वर्ष 8 मास + 0.4×30 ≈ 12 दिन ⇒ राहु-राहु अन्तर ≈ 2 वर्ष 8 मास 12 दिन। यही 2.7-वर्षीय खण्ड वह काल है जिस पर उपर्युक्त शुभ फल-कथन लागू होता है।

हमारा डिकोड: यह अन्तर-गणना हमारे विम्शोत्तरी इंजन (दस्तावेज़ §3) के 120-वर्ष चक्र का सीधा अनुप्रयोग है — Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17 (Σ = 120)। अन्तर-अवधि विशुद्ध अनुपात-अंकगणित है (exact); फल स्वयं शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

55.2
व्यवसायात्फलाधिक्यं चतुष्पाज्जीवलाभकृत् |
प्रयाणं पश्चिमे भागे वाहनाम्बरलाभकृत्
vyavasāyātphalādhikyaṃ catuṣpājjīvalābhakṛt |
prayāṇaṃ paścime bhāge vāhanāmbaralābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- व्यवसायात् = व्यापार/उद्यम से
- फलाधिक्यम् = फल (लाभ) की अधिकता
- चतुष्पाद्-जीव-लाभकृत् = चौपाये पशुओं (गो-आदि) का लाभ कराने वाला
- प्रयाणम् = यात्रा, प्रस्थान
- पश्चिमे भागे = पश्चिम दिशा में
- वाहन-अम्बर-लाभकृत् = वाहन एवं वस्त्रों का लाभ कराने वाला

हिन्दी भावार्थ (पूर्व श्लोक की ही निरन्तरता में) राहु-राहु अन्तर में व्यापार से अधिक लाभ, चौपाये पशुओं की प्राप्ति, तथा पश्चिम दिशा की यात्रा से वाहन और वस्त्रों का लाभ होता है — यह शास्त्र-कथन है।

English rendering The text states that business yields abundant profit, four-footed livestock is gained, and a westward journey brings conveyances and clothing.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-राहु अन्तर का शुभ-फल विस्तार)। ध्यातव्य: यहाँ "पश्चिम" एक दिशा-संकेत है; राहु के फलों में परदेश-यात्रा एवं अपारम्परिक/चौपाया-सम्पत्ति की भाषा बार-बार आती है — किन्तु दिशा-निर्धारण गणना नहीं, रूढ़ि-संकेत है।

55.3
लग्नादुपचये राहौ शुभग्रहयुतेक्षिते |
मित्रांशे तुङ्गभागांशे योगकारकसंयुते
lagnādupacaye rāhau śubhagrahayutekṣite |
mitrāṃśe tuṅgabhāgāṃśe yogakārakasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- लग्नात् उपचये = लग्न से उपचय भावों (3, 6, 10, 11) में
- राहौ = राहु
- शुभग्रह-युत-ईक्षिते = शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट होने पर
- मित्रांशे = मित्र-राशि के नवांश (D9) में
- तुङ्ग-भाग-अंशे = उच्च के अंश/नवांश में (तुङ्ग = उच्च; भाग = अंश)
- योगकारक-संयुते = योगकारक ग्रह से युक्त

हिन्दी भावार्थ यदि राहु लग्न से उपचय (3/6/10/11) भाव में हो, शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, मित्र-राशि के नवांश अथवा उच्चांश में स्थित हो, और योगकारक ग्रह के साथ हो — (तो अगले श्लोक में कहा फल मिलता है)। यह एक शर्त-वाचक (conditional) श्लोक है, फल आगे।

English rendering If Rāhu stands in an upacaya house (3rd, 6th, 10th, 11th) from the ascendant, joined or aspected by benefics, placed in a friendly or exalted navāṃśa, and conjoined with a yogakāraka —

गणित / तकनीक: तीन प्रकार की गणनीय शर्तें — (i) उपचय-गणना: लग्न से क्रम-संख्या n ∈ {3, 6, 10, 11}; (ii) नवांश (D9) वर्ग: 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश; किसी ग्रह का नवांश-सूचकांक n = ⌈λ ÷ 3°20′⌉ (λ = राशि-अन्तर्गत देशान्तर 0°–30°); (iii) उच्चांश/मित्रांश की पहचान उसी D9-मानचित्र पर। "युत" (युति) = समान भाव/राशि; "ईक्षित" = दृष्टि।

उदाहरण: राहु राशि-अंश λ = 5° पर ⇒ n = 5 ÷ 3.333… = 1.5 ⇒ ⌈1.5⌉ = 2रा नवांश। यदि लग्न मेष हो और राहु मकर में हो, तो मकर = लग्न से 10वाँ = उपचय ✓; उस पर गुरु/शुक्र की दृष्टि हो तो "शुभ-दृष्ट" शर्त पूर्ण।

हमारा डिकोड: मित्रांश/तुङ्गांश की जाँच ठीक हमारे षोडश-वर्ग इंजन (दस्तावेज़ §2) की D9 विभाजन-नियम पर टिकी है — 30° का 9 समान चापों में नियतात्मक (deterministic) विभाजन, देशान्तर पर विशुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। नवांश-स्वामी की मित्रता/उच्चत्व अलग तालिका है, किन्तु अंश-सीमा (3°20′) स्वयं exact है।

55.4
राज्यलाभं महोत्साहं राजप्रीतिं शुभावहम् |
करोति सुखसम्पत्तिं दारपुत्रादिवर्द्धनम्
rājyalābhaṃ mahotsāhaṃ rājaprītiṃ śubhāvaham |
karoti sukhasampattiṃ dāraputrādivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- राज्यलाभम् = राज्य/अधिकार का लाभ
- महोत्साहम् = महान उत्साह
- राजप्रीतिम् = राजा की प्रीति/कृपा
- शुभावहम् = शुभ लाने वाला
- सुख-सम्पत्तिम् = सुख एवं सम्पदा
- दार-पुत्र-आदि-वर्द्धनम् = पत्नी, पुत्र आदि की वृद्धि

हिन्दी भावार्थ (पूर्व श्लोक की शर्तों के फलस्वरूप) राहु-राहु अन्तर राज्य/पद-लाभ, महान उत्साह, राजकृपा, कल्याण, सुख-सम्पत्ति तथा स्त्री-पुत्रादि की वृद्धि करता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering The text states that (under those conditions) it brings gain of authority, great enthusiasm, the ruler's favour, auspiciousness, happiness with wealth, and the flourishing of spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (श्लोक 55.3 की शर्त का शुभ फल)। ध्यातव्य: शर्त (उपचय + शुभ-योग + बलवान वर्ग) और फल (राज्य-सुख) की यह "यदि → तो" संरचना ही शास्त्र का तर्क-ढाँचा है; फल को हम पूर्वानुमान नहीं, शास्त्रीय दावा मानते हैं।

55.5
लग्नाष्ट्मे व्यये राहौ पापयुक्तेऽथ वीक्षिते |
चौरादिव्रणपीडा च सर्वत्रैवं भवेद्द्विज
lagnāṣṭme vyaye rāhau pāpayukte'tha vīkṣite |
caurādivraṇapīḍā ca sarvatraivaṃ bhaveddvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाष्ट्मे = लग्न से अष्टम भाव में; व्यये = व्यय/द्वादश भाव में; राहौ = राहु; पापयुक्ते = पाप ग्रह से युक्त; अथ वीक्षिते = अथवा दृष्ट; चौरादि = चोर आदि से; व्रणपीडा = व्रण/घाव की पीड़ा; सर्वत्रैवं = सर्वत्र इसी प्रकार; भवेद् = होता है; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब राहु लग्न से अष्टम या व्यय (12वें) भाव में हो और पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तब चोर आदि से कष्ट तथा व्रण-पीड़ा का फल वर्णित है; “सर्वत्रैवं” से इसी नियम का व्यापक लागू होना कहा गया है। यह शास्त्र-कथन है — भय या निश्चय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that when Rāhu is in the eighth or twelfth from the lagna and is joined or aspected by a malefic, there is distress from thieves and the like, and suffering from wounds — thus, O twice-born, in such cases generally.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्थिति (कोई बलांक नहीं):
- अष्टम = लग्न + 7 राशियाँ → भाव 8
- व्यय = लग्न + 11 राशियाँ → भाव 12
- \(B_8 = ((L - 1 + 7) \bmod 12) + 1\); \(B<sub>12</sub> = ((L - 1 + 11) \bmod 12) + 1\)
फल-शर्त = (राहु ∈ {8, 12}) ∧ (पाप-युति ∨ पाप-दृष्टि)।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह (भाव 1)। अष्टम = मीन, व्यय = कर्कराशि। यदि राहु मीन में और शनि/मंगल से युक्त/दृष्ट हो, तो 55.5 की शास्त्र-शर्त पूरी होती है। (पूर्ण-राशि भाव; दृष्टि-नियम परंपरा-निर्भर — घोषित करें।)

55.6
राजद्वारजनद्वेष इष्टबन्धुविनाशनम् |
दारपुत्रादिपीडा च भवत्येव न संशयः
rājadvārajanadveṣa iṣṭabandhuvināśanam |
dāraputrādipīḍā ca bhavatyeva na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- राजद्वार-जन-द्वेषः = राजद्वार (सत्ता-वर्ग) एवं लोगों से द्वेष/विरोध
- इष्ट-बन्धु-विनाशनम् = प्रिय बन्धुओं का विनाश/वियोग
- दार-पुत्र-आदि-पीडा = स्त्री, पुत्र आदि को पीड़ा
- भवति एव = होता ही है
- न संशयः = इसमें संशय नहीं

हिन्दी भावार्थ (पूर्व अशुभ-शर्त की ही निरन्तरता में) शास्त्र कहता है — राजद्वार तथा जनों से विरोध, प्रिय बन्धुओं का वियोग, और स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है, इसमें संशय नहीं।

English rendering The text states there is hostility at the royal court and among people, loss of dear kin, and affliction of wife and children — of this it declares no doubt.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (55.5 की अशुभ-शर्त का विस्तार)। "न संशयः" जैसा बल-वाचक पद शास्त्र की अपनी निश्चयात्मक शैली है; तथापि हम इसे पाठ का दावा मानते हैं, न कि किसी जातक के लिए अवश्यम्भावी नियति।

55.7
द्वितीयद्यूननाथे वा सप्तमस्थानमाश्रिते |
सदा रोगो महाकष्टं शान्तिं कुर्याद्यथाविधि |
आरोग्यं सम्पदश्चैव भविष्यन्ति तदा द्विज
dvitīyadyūnanāthe vā saptamasthānamāśrite |
sadā rogo mahākaṣṭaṃ śāntiṃ kuryādyathāvidhi |
ārogyaṃ sampadaścaiva bhaviṣyanti tadā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (2) एवं द्यून (7वाँ, विवाह-भाव) के स्वामी (मारकेश) होने पर
- सप्तम-स्थानम् आश्रिते = अथवा सप्तम भाव में स्थित होने पर
- सदा रोगः = निरन्तर रोग
- महाकष्टम् = महान कष्ट
- शान्तिं कुर्यात् यथाविधि = विधिपूर्वक शान्ति-कर्म करे
- आरोग्यं सम्पदः च = आरोग्य एवं सम्पदा
- भविष्यन्ति तदा द्विज = तब होंगी, हे द्विज

हिन्दी भावार्थ यदि राहु द्वितीय या सप्तम भाव के स्वामी (मारकेश) से सम्बद्ध हो अथवा सप्तम में स्थित हो, तो शास्त्र कहता है — निरन्तर रोग एवं महाकष्ट; विधिपूर्वक शान्ति करने पर आरोग्य एवं सम्पदा प्राप्त होती है, हे द्विज।

English rendering If Rāhu is linked with the lord of the 2nd or 7th (the maraka lords) or resides in the 7th, the text states there is chronic illness and great distress; when propitiation is duly performed, health and prosperity are said to follow.

गणित / तकनीक: गणनीय अंश केवल मारक-स्थान-गणना है: मारकस्थान = {2, 7}, इनके स्वामी = मारकेश; तथा राहु का 7वें भाव में होना। रोग/शान्ति का शेष भाग फल एवं विधान है, गणना नहीं। अनुशासन: "शान्तिं कुर्यात्" शास्त्र का विधान-कथन है — इसे भय या दबाव-मूलक उपाय के रूप में नहीं, पाठ के स्वर में प्रस्तुत किया गया है।

उदाहरण: लग्न सिंह ⇒ 2रा = कन्या (स्वामी बुध), 7वाँ = कुम्भ (स्वामी शनि); ये दोनों मारकेश। यदि राहु कुम्भ (7वें) में हो, अथवा बुध/शनि से सम्बद्ध हो, तो शास्त्रानुसार यह मारक-कोटि का कथन लागू।

हमारा डिकोड: यह श्लोक हमारी मूल विधि-रेखा (दस्तावेज़ §5) का उत्तम उदाहरण है — गणित (2/7 मारक-स्थान की सूची, दृष्टि/युति की जाँच) और फल (रोग/आरोग्य, शान्ति-विधान) को हम अलग रखते हैं; फल को "शास्त्र कहता है" रूप में देते हैं, कभी निश्चय या भय-रूप में नहीं।

55.8
राहुरन्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि तुङ्गस्वर्क्षांशगेऽपि वा
rāhurantargate jīve lagnātkendratrikoṇage |
svocce svakṣetrage vāpi tuṅgasvarkṣāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहु-अन्तर-गते = राहु की अन्तरदशा में स्थित/प्रवृत्त; जीवे = गुरु (बृहस्पति) में / गुरु के सन्दर्भ में; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र-त्रिकोण-गे = केन्द्र (1-4-7-10) अथवा त्रिकोण (1-5-9) भावगत; स्वोच्चे = स्व-उच्च (गुरु का उच्च = कर्क); स्व-क्षेत्र-गे = स्वराशि (धनु/मीन) स्थित; तुङ्ग-स्व-र्क्ष-अंश-गे = उच्च अथवा स्वराशि के नवांश (अंश) में स्थित; वा अपि = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ राहु-अन्तर के प्रसंग में गुरु की स्थिति निर्धारित करता है। जब गुरु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा उच्च या स्वक्षेत्र में हो, अथवा उच्च/स्वराशि-अंश में हो — तब आगे के श्लोकों में वर्णित अनुकूल फल-कथन लागू होते हैं। यह दशा-फल का स्थान-शर्त वाला सूत्र है, न कि स्वतःसिद्ध भाग्य-वाक्य।

English rendering When Jupiter operates under Rāhu’s antardaśā and is placed in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in exaltation or own sign, or in an exalted or own-sign aṃśa, the favourable results stated next apply. Placement and period are jointly conditioned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-अन्तर + स्थान-शर्त का फल-कथन-प्रवेश। स्थान-जाँच शुद्ध भाव/राशि-मानचित्र पर निर्भर है (केन्द्र = 1,4,7,10; त्रिकोण = 1,5,9; गुरु-उच्च = कर्क; स्वक्षेत्र = धनु, मीन)। अयनांश/लग्न-गणना घोषित करनी चाहिए जब संख्यात्मक जन्म-कुण्डली से जाँच हो।

उदाहरण (worked example) माना लग्न = मेष, गुरु-स्पष्ट = 15° कर्क (उच्च-राशि)। लग्न से गुरु चतुर्थ = केन्द्र। राहु-अन्तर चालू हो तो 55.8 की अनुकूल शर्त पूरी। (परम्परा: स्थान-जाँच D1 पर; अंश-शर्त के लिए D9 — नवांश-नियम: प्रत्येक 30° → 9 × 3°20′ खंड; अयनांश: घोषित करें, जैसे लाहिरी।)

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-अन्तर विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र का अनुपात-अंकगणित है: अन्तर-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120; राहु = 18, गुरु = 16। दशा-काल शुद्ध गणना; फल-वाक्य शास्त्र-कथन के रूप में ही पढ़े जाते हैं — भविष्य-वाणी या दबाव के रूप में नहीं।

55.9
स्थानलाभं मनोधैर्यं शत्रुनाशं महत्सुखम् |
राजप्रीतिकरं सौख्यं जनोऽतीव समश्नुते
sthānalābhaṃ manodhairyaṃ śatrunāśaṃ mahatsukham |
rājaprītikaraṃ saukhyaṃ jano'tīva samaśnute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थान-लाभम् = पद/स्थान की प्राप्ति; मनो-धैर्यम् = मन का धैर्य/स्थिरता; शत्रु-नाशम् = शत्रु-विनाश (शास्त्र-कथन); महत्-सुखम् = महान् सुख; राज-प्रीति-करम् = राजा/अधिकार-सत्ता की प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला; सौख्यम् = सुख-कल्याण; जनः = व्यक्ति; अतीव = अत्यन्त; समश्नुते = भोगता/प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अनुकूल गुरु-स्थिति में राहु-अन्तर के फल के रूप में शास्त्र कहता है — स्थान-लाभ, मन में धैर्य, शत्रु-नाश, महान् सुख, तथा राज-प्रीति से युक्त सौख्य। यह फल-सूची शास्त्र की अपनी भाषा है; इसे नियति या गारंटी के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering Under those conditions the text states gains of position, mental fortitude, destruction of enemies, great happiness, and comfort arising from royal or official favour. These are śāstra-phala claims, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। 55.8 की स्थान-शर्तें सत्य हों तभी यह सूची लागू मानी जाती है; अन्यथा आगे के नीच/अस्त/षष्ठाष्टम-व्यय वाले वाक्य प्रबल होते हैं।

55.10
दिनेदिने वृद्धिरपि सितपक्षे शशी यथा |
वाहनादिधनं भूरि गृहे गोधनसंकुलम्
dinedine vṛddhirapi sitapakṣe śaśī yathā |
vāhanādidhanaṃ bhūri gṛhe godhanasaṃkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- दिने-दिने वृद्धिः = प्रतिदिन (उत्तरोत्तर) वृद्धि
- सितपक्षे शशी यथा = जैसे शुक्ल-पक्ष में चन्द्रमा (बढ़ता है)
- वाहन-आदि-धनम् = वाहन आदि का धन
- भूरि = प्रचुर
- गृहे गोधन-संकुलम् = घर गोधन (गायों) से भरा-पूरा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस (राहु-गुरु) अन्तर में शुक्ल-पक्ष के चन्द्रमा की भाँति प्रतिदिन वृद्धि होती है; वाहनादि का प्रचुर धन तथा घर गोधन से परिपूर्ण रहता है।

English rendering The text states that prosperity grows day by day like the Moon in the bright fortnight, with abundant wealth of conveyances and a home filled with cattle.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — उपमा (शुक्ल-पक्ष चन्द्र-वृद्धि)। उपमा का खगोलीय आधार: शुक्ल-पक्ष = 15 तिथियाँ; चन्द्र-सूर्य कोणान्तर (elongation) प्रति तिथि ≈ 360° ÷ 30 = 12° बढ़ता है, अमावस्या (0°) → पूर्णिमा (180°); प्रदीप्त-अंश k = (1 − cos D)/2, D = कोणान्तर। यह उपमा का गणित है, श्लोक की अपनी गणना नहीं।

55.11
नैरृत्ये पश्चिमे भागे प्रयाणं राजदर्शनम् |
युक्तकार्यार्थसिद्धिः स्यात्स्वदेशे पुनरेष्यति
nairṛtye paścime bhāge prayāṇaṃ rājadarśanam |
yuktakāryārthasiddhiḥ syātsvadeśe punareṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नैरृत्ये = नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में; पश्चिमे भागे = पश्चिम भाग/दिशा में; प्रयाणम् = यात्रा/प्रस्थान; राज-दर्शनम् = राजा/शासक का दर्शन/मिलन; युक्त-कार्य-अर्थ-सिद्धिः = उचित कार्य और अर्थ की सिद्धि; स्यात् = हो; स्व-देशे = अपने देश/स्थान में; पुनः एष्यति = फिर लौटेगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नैर्ऋत्य या पश्चिम दिशा में प्रयाण, राजदर्शन, युक्त कार्य में अर्थ-सिद्धि, और अंत में स्वदेश-प्रत्यागमन। दिशा-फल यहाँ वर्णनात्मक संकेत हैं; उन्हें भय या बाध्य-उपाय में नहीं बदलना।

English rendering The text states travel toward the southwest or west, audience with a ruler, success in rightful aims and means, and eventual return to one’s own country. Directional phala is narrative indication within the daśā frame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दिशा-प्रयाण वर्णन। नैर्ऋत्य = SW (आग्नेय–पश्चिम–दक्षिण चक्र में); कोई अंश-सूत्र या दशा-वर्ष-गुणन यहाँ नहीं।

55.12
उपकारो ब्राह्मणानां तीर्थयात्रादिकर्मणाम् |
वाहनग्रामलाभश्च देवब्राह्मणपूजनम्
upakāro brāhmaṇānāṃ tīrthayātrādikarmaṇām |
vāhanagrāmalābhaśca devabrāhmaṇapūjanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपकारः = उपकार/हित; ब्राह्मणानाम् = ब्राह्मणों का; तीर्थ-यात्रा-आदि-कर्मणाम् = तीर्थ-यात्रा आदि कर्मों का (सहाय/संबन्ध); वाहन-ग्राम-लाभः च = वाहन और ग्राम का लाभ भी; देव-ब्राह्मण-पूजनम् = देव और ब्राह्मण का पूजन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अनुकूल पक्ष में ब्राह्मण-उपकार, तीर्थयात्रादि कर्म, वाहन-ग्राम-लाभ, तथा देव-ब्राह्मण-पूजन का उल्लेख करता है। यह पारंपरिक शुभ-कर्म/लाभ की सूची है — दबावपूर्ण “उपाय” या चिकित्सा-दावा नहीं।

English rendering The text states benefit toward brāhmaṇas, engagement with pilgrimage and related acts, gain of conveyances and villages, and worship of deities and brāhmaṇas. Ritual language here is traditional phala diction, not a forced-remedy prescription.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / शुभ-कर्म-वर्णन। गणना का अंश नहीं; 55.8–55.12 की श्रृंखला एक ही अनुकूल शर्त-समूह का विस्तार है।

55.13
पुत्रोत्सवादिसन्तोषो नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् |
नीचे वाऽस्तङ्गते वापि षष्ठाष्टव्ययराशिगे
putrotsavādisantoṣo nityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
nīce vā'staṅgate vāpi ṣaṣṭhāṣṭavyayarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-उत्सव-आदि-सन्तोषः = पुत्र-उत्सव आदि से सन्तोष; नित्यम् = नित्य; मिष्ट-अन्न-भोजनम् = मीठे/मिष्ठान्न भोजन; नीचे = नीच राशि में (गुरु-नीच = मकर); वा अस्तङ्गते = अथवा अस्त (रवि-समीप अस्त) होने पर; वा अपि = अथवा भी; षष्ठ-अष्ट-व्यय-राशि-गे = षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) राशि/भाव में स्थित।

हिन्दी भावार्थ प्रथम पंक्ति अभी भी अनुकूल फल-श्रृंखला का समापन करती है — पुत्रोत्सवादि सन्तोष और नित्य मिष्ठान्न-भोजन। तदनंतर शास्त्र शर्त पलटता है: यदि गुरु नीच हो, अस्त हो, अथवा षष्ठ/अष्टम/व्यय राशि (भाव) में हो, तो आगे का विपरीत फल लागू होता है। स्थान-दोष की यह द्वार-पंक्ति है।

English rendering The verse first closes the favourable list with joy at a son’s festivities and daily sweet food; then it turns: if Jupiter is debilitated, combust (set), or placed in the sixth, eighth, or twelfth, the adverse results that follow apply. Condition-flip, not unconditional doom.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थान-दोष-शर्त। जाँच-बिन्दु (D1, घोषित अयनांश): गुरु-नीच = मकर; अस्त = रवि से पारंपरिक अस्त-सीमा के भीतर (गुरु हेतु शास्त्र/परंपरा-निर्धारित डिग्री — पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव); षष्ठ-अष्टम-व्यय = लग्न से 6, 8, 12 भाव।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह, गुरु = 10° मकर → लग्न से षष्ठ + नीच — 55.13 की प्रतिकूल द्वार-शर्त सक्रिय; अनुकूल 55.9–12 सूची स्थगित। (भाव-गणना: पूर्ण-राशि/सम-भाव घोषित करें; यहाँ पूर्ण-राशि भाव मानकर षष्ठ = मकर।)

55.14
शत्रुक्षेत्रे पापयुक्ते धनहानिर्भविष्यति |
कर्मविघ्नो भवेत्तस्य मानहानिश्च जायते
śatrukṣetre pāpayukte dhanahānirbhaviṣyati |
karmavighno bhavettasya mānahāniśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रुक्षेत्रे = शत्रु-राशि में स्थित (राहु-दशा का अन्तर्दशेश गुरु — पूर्व श्लोक से अनुवृत्त); पापयुक्ते = पापग्रह (शनि/मंगल/राहु) से युत; धनहानिः = धन-नाश; भविष्यति = होगा (शास्त्र-वचन, न कि हमारी घोषणा); कर्मविघ्नः = कार्यों/उद्यम में बाधा; मानहानिः = प्रतिष्ठा-क्षय; जायते = उत्पन्न होती है।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक की शर्त (गुरु का नीच/अस्त/षष्ठ-अष्टम-व्यय में होना) यहाँ पूरी होती है। शास्त्र कहता है कि राहु की महादशा में गुरु का अन्तर यदि शत्रु-राशि में तथा पापग्रह से युक्त हो, तो उस भुक्ति में धन-हानि, कार्यों में विघ्न और सम्मान का ह्रास होता है। यह गुरु-अन्तर के अशुभ पक्ष का सशर्त फल-कथन है, कोई अटल भविष्य नहीं।

English rendering When, in Rāhu's daśā, the Jupiter sub-period lord stands in an enemy's sign conjoined with a malefic, the text states that loss of wealth, obstruction in undertakings, and loss of honour follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सशर्त)। यहाँ केवल स्थिति-शर्त "शत्रुक्षेत्र + पापयोग" फल का द्वार खोलती है; शर्त-पक्ष गणनीय (राशि-स्वामित्व, युति) है, फल-पक्ष शास्त्र का कथन।

उदाहरण (worked example) यह वही अवधि है जिसमें यह फल कहा गया है — राहु-महादशा (18 वर्ष) में गुरु का अन्तर = (18 × 16)/120 = 288/120 = 2.40 वर्ष = 2 वर्ष 4 माह 24 दिन। श्लोक का धनहानि-कथन इसी 2.4-वर्षीय खिड़की पर लागू होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अवधि की गणना विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र के हमारे दशा-इंजन से मेल खाती है — अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120, शुद्ध अनुपात-अंकगणित। हमारी विधि-रेखा स्पष्ट है: अवधि को हम `==` से जाँचते हैं, पर फल को शास्त्र का कथन ही रखते हैं — कभी भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

55.15
कलत्रपुत्रपीडा च हृद्रोगो राजकारकृत् |
दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा
kalatraputrapīḍā ca hṛdrogo rājakārakṛt |
dāyeśātkendrakoṇe vā lābhe vā dhanage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्र = पत्नी/दाम्पत्य-क्षेत्र; पुत्र = संतति; पीडा = क्लेश/बाधा (शास्त्र-कथन); हृद्रोग = हृदय-संबंधी कष्ट (शास्त्र का फल-पद, चिकित्सा-निदान नहीं); राजकारकृत् = राजकार्य/राज-संबंधी प्रवृत्ति या दबाव का कारक; दायेश = दशा-स्वामी (महादशा का अधिपति); केन्द्र = 1-4-7-10 भाव; कोण = त्रिकोण (1-5-9); लाभ = एकादश भाव; धन = द्वितीय भाव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-प्रसंग की दशा/भुक्ति-स्थिति में) कलत्र-पुत्र-संबंधी पीड़ा, हृदय-रोग का संकेत, तथा राजकार्य/राज-संपर्क की प्रवृत्ति हो सकती है। साथ ही दायेशात् — अर्थात् दशा-स्वामी से गिनते हुए — केन्द्र, त्रिकोण, लाभ अथवा धन-स्थान की स्थिति का उल्लेख किया गया है; यह पद आगे के शुभ-फल-प्रसंग को भी जोड़ता है। पाठ में दशा-स्वामी-सापेक्ष भाव-स्थिति ही नियम है; फल को नियति न समझें।

English rendering The text states affliction concerning spouse and children, heart-related distress, and activity linked to royal or governmental affairs. It also places the daśā-lord relative to kendra, trikoṇa, the eleventh (lābha), or the second (dhana) — a positional clause that frames the following results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दायेश-सापेक्ष भाव-स्थिति। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11, धन = 2; “दायेशात्” = दशा-स्वामी की राशि को 1 मानकर पूर्ण-राशि गिनती (पूर्ण-चिह्न भाव; भावाधिपति-नियम यहाँ नहीं कहा गया)।

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55.16
दुश्चिक्ये बलसम्पूर्णे गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् |
भोजनाम्बरपश्वादिदानधर्मजपादिकम्
duścikye balasampūrṇe gṛhakṣetrādivṛddhikṛt |
bhojanāmbarapaśvādidānadharmajapādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुश्चिक्ये = तृतीय भाव (3रे) में; बलसम्पूर्णे = पूर्ण बल से युक्त (अन्तर्दशेश); गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् = घर-भूमि आदि की वृद्धि करने वाला; भोजन = अन्न; अम्बर = वस्त्र; पश्वादि = पशु आदि; दानधर्म = दान-पुण्य; जपादिकम् = जप आदि सत्कर्म।

हिन्दी भावार्थ श्लोक 15 की शुभ-शर्त यहाँ फलित होती है — शास्त्र कहता है कि यदि अन्तर्दशेश तृतीय भाव में पूर्ण बल-सम्पन्न हो (या पूर्वोक्त केन्द्र/त्रिकोण/लाभ/धन में हो), तो घर-भूमि की वृद्धि, अन्न-वस्त्र-पशु का लाभ, तथा दान-धर्म-जप जैसे सत्कर्म होते हैं। यह गुरु-अन्तर का शुभ पक्ष है।

English rendering With the sub-lord full of strength in the 3rd house, the text states there is growth of home and land, and gain of food, raiment and cattle, together with charity, dharma and japa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। किन्तु "बलसम्पूर्ण" एक गणनीय राशि की ओर संकेत करता है: बल कोई अनुभूति नहीं, अपितु मापित मात्रा है, और फल उसी माप पर आश्रित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलसम्पूर्णे" ठीक वही बिन्दु है जहाँ फल गणना पर टिकता है — षड्बल (स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग्) रूप-विरूप में जोड़े जाते हैं (1 रूप = 60 विरूप) और प्रति-ग्रह देहली से तुलना होती है। हमारी विधि-रेखा में यह विभाजन-रेखा है: बल का आकलन शुद्ध संख्यात्मक नियम है, और गृहवृद्धि का फल शास्त्र का कथन — दोनों को मिलाया नहीं जाता।

55.17
भुक्त्यन्ते राजकोपाच्च द्विमासं देहपीडनम् |
ज्येष्ठभ्रातुर्विनाशश्च मातृपित्रादिपीडनम्
bhuktyante rājakopācca dvimāsaṃ dehapīḍanam |
jyeṣṭhabhrāturvināśaśca mātṛpitrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-अन्ते = अन्तर्दशा/भुक्ति के अवसान पर; राजकोपात् = राज-कोप से (शास्त्र-कथन); द्वि-मासम् = दो मास; देह-पीडनम् = देह-क्लेश; ज्येष्ठ-भ्रातुः = ज्येष्ठ भ्राता का; विनाशः = नाश/हानि (पाठ का कठोर पद); मातृ-पितृ-आदि-पीडनम् = माता-पिता आदि का क्लेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भुक्ति के अन्त में राजकोप से लगभग दो मास तक देह-पीड़ा का वर्णन है। ज्येष्ठ भ्राता की हानि तथा माता-पिता आदि का पीड़न भी इसी फल-सूची में आता है। यह दशा-फल का शास्त्रीय कथन है — न भविष्य की गारंटी, न भय का आह्वान; काल-सीमा “द्विमास” केवल पाठ में दी गई अवधि है।

English rendering The text states that at the end of the bhukti, from royal displeasure, there is bodily affliction for two months; also loss concerning the elder brother and distress to mother, father and the like. These are phala-claims of the śāstra, not certified events.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + काल-मात्रा। “द्विमास” = 2 मास (पाठ की अवधि); भुक्ति-अन्त = अन्तर्दशा की शेष सीमा। विम्शोत्तरी में अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120; इस श्लोक में ग्रह-नाम/वर्ष नहीं — केवल “भुक्त्यन्ते” की घटना-सीमा कही गई है।

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55.18
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा रिःफे वा पापसंयुते |
तद्भुक्तौ धनहानिः स्याद्देहपीडा भविष्यति
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā riḥphe vā pāpasaṃyute |
tadbhuktau dhanahāniḥ syāddehapīḍā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा-स्वामी से गिनकर; षष्ठ = छठा भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; रिःफ = व्यय/द्वादश भाव; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त; तत्-भुक्तौ = उस भुक्ति में; धन-हानिः = धन की हानि; देह-पीडा = शारीरिक क्लेश; भविष्यति = होगा — शास्त्र का फल-पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दशा-स्वामी से षष्ठ, रन्ध्र अथवा रिःफ (12) में स्थिति हो, अथवा पाप-ग्रह से योग हो, तो उस भुक्ति में धन-हानि और देह-पीड़ा होती है। “पाप” यहाँ पारंपरिक मलिक/कष्ट-कारक ग्रहों का शास्त्र-पद है; फल को भाग्य-अन्तिम निर्णय न मानें। पाठ-भेद संभव जहाँ “वा” की श्रृंखला में योग-शर्त अलग-अलग टीकाओं में जुड़ती है।

English rendering The text states that when (the planet) stands in the sixth, eighth or twelfth from the daśā-lord, or is conjoined with a malefic, then in that bhukti there is loss of wealth and bodily affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दायेश-सापेक्ष दुःस्थान-नियम। षष्ठ = +5 राशि (दायेश=1 → 6), रन्ध्र = +7 (→ 8), रिःफ = +11 (→ 12); पाप-संयोग = उसी राशि/भाव में पाप-ग्रह की युति (दीर्घांश-समीपता का अंश-नियम इस पद में नहीं)। भाव-गणना पूर्ण-राशि (sign-whole) पर, जब तक गृह-प्रणाली अलग घोषित न हो।

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55.19
द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
स्वर्णस्य प्र्तिमादानं शिवपूजं च कार्यते
dvitīyadyūnanāthe vā hyapamṛtyurbhaviṣyati |
svarṇasya prtimādānaṃ śivapūjaṃ ca kāryate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय अथवा द्यून (सप्तम) का अधिपति; वा = अथवा; अप-मृत्युः = अपमृत्यु/अकाल-मृत्यु-सदृश संकट (शास्त्र-पद, चिकित्सा/विधि-निर्णय नहीं); स्वर्णस्य प्रतिमा-दानम् = स्वर्ण-प्रतिमा का दान (पाठ: “प्र्तिमादानं” — प्रतिमादानम्); शिव-पूजम् = शिव-पूजन (पाठ: “शिवपूजं”); कार्यते = किया जाता है — शास्त्र का विधान-पद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि (संबंधित ग्रह) द्वितीय या सप्तम का नाथ हो, तो अपमृत्यु-संकट का फल कहा गया है। उसी प्रसंग में स्वर्ण-प्रतिमा-दान और शिव-पूजन का उल्लेख है — यह पाठ का पारंपरिक शान्ति/दान-विधान है, दबाव या गारंटी नहीं। “प्र्तिमा/पूजं” जैसे रूप पाठ-भेद/लिपि-दोष संभव; अर्थ प्रतिमा-दान और शिव-पूजा की ओर है।

English rendering The text states that if (the planet) is lord of the second or of the seventh (dyūna), there is danger of untimely death (apamṛtyu). It also records the giving of a golden image and the worship of Śiva — as the śāstra’s own ritual note, not a command we enforce.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भावाधिपति-शर्त। द्वितीय-नाथ = लग्न-राशि से +1 राशि का स्वामी; द्यून-नाथ = सप्तम (+6) का स्वामी। अपमृत्यु यहाँ संख्यात्मक आयु-सूत्र नहीं — आयुर्दाय अध्याय (43–44) के अलग नियमों से नहीं जोड़ा गया जब तक पाठ स्वयं न जोड़े।

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55.20
स्र्/ईशम्भोश्च प्रसादेन ग्रहस्तुष्टो द्विजोत्तम |
देहारोग्यं प्रकुरुते शान्तिं कुर्याद्विचक्षणम्
sr/īśambhośca prasādena grahastuṣṭo dvijottama |
dehārogyaṃ prakurute śāntiṃ kuryādvicakṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्री-शम्भोः = शिव/शम्भु की (पाठ: “स्र्/ईशम्भोश्च” — श्रीशम्भोश्च; पाठ-भेद/मुद्रण-भेद संभव); प्रसादेन = कृपा से; ग्रहः = संबंधित ग्रह; तुष्टः = संतुष्ट; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (संबोधन); देह-आरोग्यम् = देह का आरोग्य; प्रकुरुते = करता है; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; कुर्यात् = करे; विचक्षणः = विवेकी/दक्ष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि श्रीशम्भु की प्रसन्नता से ग्रह तुष्ट होता है, हे द्विजोत्तम, और देह में आरोग्य का विधान करता है। विचक्षण को शान्ति करने को कहा गया है — यह पारंपरिक शान्ति-उपदेश है, भय या उपचार-दबाव के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। आरोग्य-फल भी शास्त्र-कथन है, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं।

English rendering The text states that by the grace of Śrī Śambhu the planet is pleased, O best of the twice-born, and effects bodily health; the discerning one should perform śānti. Ritual language of the śāstra — not medical counsel or coercive remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / शान्ति-उपदेश। कोई अंश, वर्ष या बलाङ्क नहीं; पूर्व पदों की दशा/भुक्ति-शर्तों का आश्वासन-अंत यही श्लोक बंद करता है।

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55.21
राहोरन्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे मूलत्रिकोणे वा दुश्चिक्ये लाभराशिगे
rāhorantargate mande lagnātkendratrikoṇage |
svocce mūlatrikoṇe vā duścikye lābharāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्-गते = राहु की अन्तर्दशा में; मन्दे = शनि (मन्द) में/शनि के (अन्तर्) होने पर; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र-त्रिकोण-गे = केन्द्र या त्रिकोण में स्थित; स्व-उच्चे = स्वोच्च राशि में; मूल-त्रिकोणे = मूलत्रिकोण में; वा = अथवा; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव/राशि में; लाभ-राशि-गे = लाभ (11) राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र राहु-महादशा की शनि-अन्तर्दशा का प्रसंग खोलता है: जब मन्द (शनि) राहोरन्तर्गत हो और लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा स्वोच्च/मूलत्रिकोण में हो, अथवा दुश्चिक्य या लाभ-राशि में हो — तो आगे के फल इन स्थितियों पर अवलंबित कहे जाएँगे। यह शुद्ध स्थिति-नियम है; फल अगले श्लोकों में आते हैं।

English rendering When Saturn (Manda) operates in the antardaśā within Rāhu’s period, and is placed from the lagna in a kendra or trikoṇa, or in its exaltation or mūlatrikoṇa, or in the third or the eleventh sign — these are the opening positional conditions for the phala that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-अनुपात + भाव-स्थिति (विम्शोत्तरी)। राहु महादशा = 18 वर्ष, शनि = 19 वर्ष; शनि की अन्तर्दशा राहु में = (18 × 19) ÷ 120 = 342/120 = 2 + 102/120 वर्ष = 2 वर्ष + (102/120)×12 मास = 2 वर्ष + 10.2 मास। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, दुश्चिक्य = 3, लाभ = 11 — लग्न-राशि से पूर्ण-चिह्न गिनती। शनि उच्च = तULA (180°–210° क्षेत्र में शास्त्रीय उच्च-बिन्दु 200° / 20° तुला — उच्च-राशि “स्वोच्चे” यहाँ राशि-स्तर); मूलत्रिकोण शनि = कुम्भ (अंश-सीमा परंपरा-भेद संभव)। अयनांश/लग्न-गणना घोषित करें तभी अंक स्थिर हों।

उदाहरण (worked example) विम्शोत्तरी; राहु महादशा 18 y, शनि अन्तर् 19 y। अन्तर्दशा-अवधि = 18 × 19 / 120 = 2.85 y = 2 y + 0.85 × 12 m = 2 y + 10.2 m ≈ 2 वर्ष 10 मास 6 दिन (30-दिन मास मानकर 0.2 × 30 = 6 d; दिन-परिपाटी ग्रेगोरी/सवन पर निर्भर)। स्थिति: लग्न = मेष; शनि = सिंह (लग्नात् 5 = त्रिकोण) → “केन्द्रत्रिकोणगे” शर्त सत्य; यदि शनि = कन्या (6) → इस पद की केन्द्र/त्रिकोण/3/11/उच्च/मूलत्रिकोण सूची में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र में राहु 18 और शनि 19 वर्ष — योग 120 के अन्दर — तथा अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/120 का शुद्ध अनुपात हमारे दशा-इंजन में यथावत् है। यह श्लोक उसी राहु-अन्तर्-मन्द क्रम को नाम से खोलता है; फल अलग, अवधि-गणित अलग — गणित को फल से मिलाया नहीं जाता, और जाँच `==` अनुपात पर, सहिष्णु-पट्टी पर नहीं।

55.22
तद्भुक्तौ नृपतेः सेवा राजप्रीतिकरी शुभा |
विवाहोत्सवकार्याणि कृत्वा पुण्यानि भूरिशः
tadbhuktau nṛpateḥ sevā rājaprītikarī śubhā |
vivāhotsavakāryāṇi kṛtvā puṇyāni bhūriśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्भुक्तौ = उस (ग्रह की) भुक्ति/अन्तर्दशा में; नृपतेः सेवा = नृपति/राजा की सेवा; राजप्रीतिकरी = राज-अनुग्रह उत्पन्न करने वाली; शुभा = शुभ; विवाहोत्सवकार्याणि = विवाह–उत्सव–कार्य; कृत्वा = करके; पुण्यानि भूरिशः = पुण्य-कर्म बहुत अधिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उक्त भुक्ति में नृपति-सेवा राज-प्रीति कराने वाली तथा शुभ फल देने वाली होती है। विवाह, उत्सव और अन्य शुभ कार्यों का संपादन भी इसी काल-क्षेत्र में बताया गया है। साथ ही पुण्य-कर्मों का बाहुल्य भी इस भुक्ति का फल-कथन है।

English rendering The text states that in that bhukti, service of the sovereign is productive of royal favor and is auspicious. Marriage, festivities, and meritorious works in abundance are also indicated for this sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा/भुक्ति-फल)। यह काल-फल का वर्णनात्मक नियम है, अवधि-गणना या बल-माप का सूत्र नहीं; भुक्ति-काल स्वयं पूर्व दशा-अध्याय के अनुपात-नियम से निर्धारित होता है।

55.23
आरामकरणे युक्तो तडागं कारयिष्यति |
शूद्रप्रभुवशादिष्टलाभो गोधनसंग्रहः
ārāmakaraṇe yukto taḍāgaṃ kārayiṣyati |
śūdraprabhuvaśādiṣṭalābho godhanasaṃgrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरामकरणे युक्तः = उद्यान/आराम-निर्माण में लगा; तडागं कारयिष्यति = तालाब/जलाशय बनवाएगा; शूद्रप्रभुवशात् = शूद्र-प्रभु के वश/आश्रय से; इष्टलाभः = अभीष्ट लाभ; गोधनसंग्रहः = गो-धन (पशु-सम्पत्ति) का संग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस भुक्ति में व्यक्ति आराम (उद्यान-आदि) के निर्माण में युक्त रहता है तथा तड़ाग (जलाशय) बनवाता है। शूद्र-प्रभु के आश्रय से अभीष्ट लाभ तथा गोधन-संग्रह भी इसी काल का फल-कथन है। यह वर्णनात्मक फल है — निश्चित घटना का दावा नहीं, शास्त्रीय संकेत-मात्र।

English rendering The text states engagement in laying out pleasure-grounds or gardens and the causing of tanks (reservoirs) to be made. Desired gain under the patronage of a śūdra lord, and the accumulation of cattle-wealth, are also indicated for this bhukti.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “आराम–तड़ाग–गोधन” आदि प्रतीक-फल हैं; कोई अंश, बिन्दु या वर्ष-संख्या यहाँ कथित नहीं।

55.24
प्रयाणं पश्चिमे भागे प्रभुमूलाद्धनक्षयः |
देहालस्यं फलाल्पत्वं स्वदेशे पुनरेष्यति
prayāṇaṃ paścime bhāge prabhumūlāddhanakṣayaḥ |
dehālasyaṃ phalālpatvaṃ svadeśe punareṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रयाणं = प्रस्थान/यात्रा; पश्चिमे भागे = पश्चिम दिशा में; प्रभुमूलात् = प्रभु (स्वामी/आश्रयदाता) के मूल से; धनक्षयः = धन की हानि; देहालस्यं = देह में आलस्य; फलाल्पत्वं = फल/परिणाम की अल्पता; स्वदेशे पुनरेष्यति = पुनः अपने देश में आएगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस काल में पश्चिम दिशा की ओर प्रयाण होता है, तथा प्रभु-मूल से धन-क्षय का संकेत दिया गया है। देह में आलस्य और कार्यों में फल की अल्पता भी कही गई है। अन्त में स्वदेश में पुनरागमन का फल-कथन है — यह दशा-फल का वर्णन है, निश्चित यात्रा-भविष्य नहीं।

English rendering The text states a journey toward the western quarter, loss of wealth arising from the lord (patron/authority), bodily languor, scantiness of results, and eventual return to one’s own country.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दिशा–धन–देह–प्रत्यागमन)। दिशा-फल शास्त्रीय संकेत है; देशान्तर या कोण-माप यहाँ सूत्रित नहीं।

55.25
नीचारिक्षेत्रगे मन्दे रन्ध्रे वा व्ययगेऽपि वा |
नीचारिराजभीतिश्च दारपुत्रादिपीडनम्
nīcārikṣetrage mande randhre vā vyayage'pi vā |
nīcārirājabhītiśca dāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचारिक्षेत्रगे = नीच अथवा शत्रु-क्षेत्र में स्थित; मन्दे = शनि (मन्द) पर; रन्ध्रे वा = अथवा अष्टम भाव में; व्ययगेऽपि वा = अथवा व्यय (द्वादश) भाव में भी; नीचारिराजभीतिः = नीच/शत्रु/राजा से भय; दारपुत्रादिपीडनम् = पत्नी–पुत्र आदि की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब मन्द (शनि) नीच-स्थान या शत्रु-क्षेत्र में हो, अथवा रन्ध्र (अष्टम) या व्यय (द्वादश) भाव में स्थित हो, तब नीच-जन, शत्रु तथा राज-भय का संकेत मिलता है। दार, पुत्र आदि पर पीड़न भी इसी योग का फल-कथन है। यह स्थिति-फल है — भय या पीड़ा को निश्चित भाग्य नहीं माना जाना चाहिए; केवल शास्त्र का संकेत-भाषा में कथन है।

English rendering The text states that when Saturn (Manda) occupies its debilitation or an enemy’s sign, or is placed in the eighth or the twelfth house, there is fear from the lowly, from enemies, and from the king, together with affliction to spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थिति-फल (नीच/अरि-क्षेत्र + रन्ध्र/व्यय पर मन्द)। जाँच-बिन्दु केवल स्थिति-वर्गीकरण है: (1) राशि = नीच/शत्रु-स्वामित्व? (2) भाव-संख्या ∈ {8, 12}? — फल की सक्रियता शास्त्र इन शर्तों से बाँधता है; कोई संख्यात्मक बल-सूत्र यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें शनि की भूमध्य-रेखीय देशान्तर λ_S (सायन या निरयण — स्पष्ट कन्वेंशन चाहिए; निरयण के लिए अयनांश घोषित करें, जैसे लाहिरी)। राशि-सूचकांक r = ⌊λ_S / 30°⌋ mod 12। शनि का नीच = मेष (r = 0); शत्रु-क्षेत्र स्वामित्व-तालिका से। भाव: यदि लग्न-प्रथम-घर प्रणाली (equal/whole-sign — घोषित करें) में भाव h_S ∈ {8, 12}, तो शास्त्रीय शर्त “रन्ध्रे वा व्ययगे” पूरी होती है। उदाहरण: whole-sign, लग्न = कन्या → भाव 8 = मेष, भाव 12 = सिंह; यदि शनि मेष में हो तो नीच + अष्टम — दोनों शर्तें एक साथ। फल-कथन लागू होता है या नहीं — यही शास्त्रीय जाँच है; “कितनी पीड़ा” की माप यहाँ नहीं।

55.26
आत्मबन्धुमनस्तापं दायादजनविग्रहम् |
व्यवहारे च कलहमकस्माद्भूषणं लभेत्
ātmabandhumanastāpaṃ dāyādajanavigraham |
vyavahāre ca kalahamakasmādbhūṣaṇaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मबन्धुमनस्तापं = आत्म-जन तथा बन्धुओं का मानसिक ताप/क्लेश; दायादजनविग्रहम् = दायभागियों/उत्तराधिकारियों से विग्रह; व्यवहारे च कलहम् = व्यवहार (विवाद/मुकदमा) में कलह; अकस्मात् = अचानक; भूषणं लभेत् = आभूषण/अलंकार प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस स्थिति/काल में स्वयं तथा बन्धु-जनों में मानसिक क्लेश होता है, तथा दायाद-जनों से विग्रह का संकेत है। व्यवहार (विवाद-प्रकरण) में कलह भी कहा गया है। साथ ही अकस्मात् भूषण-लाभ का मिश्रित फल-कथन भी है — क्लेश और लाभ दोनों शास्त्र की भाषा में साथ रखे गए हैं; इन्हें निश्चित भाग्य या दबाव-उपाय का आधार नहीं बनाना चाहिए।

English rendering The text states mental distress for oneself and one’s kin, quarrel with co-heirs, strife in litigation or dealings, and — unexpectedly — the acquisition of an ornament.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मनस्ताप–विग्रह–कलह–भूषण-लाभ)। मिश्र फल: पीड़ा-संकेत के साथ “अकस्मात् लाभ” — शास्त्रीय द्वैध, संख्या-सूत्र नहीं।

55.27
दायेशात्षष्ठरिष्फे वा रन्ध्रे वा पापसंयुते |
हृद्रोगो मानहानिश्च विवादः शत्रुपीडनम्
dāyeśātṣaṣṭhariṣphe vā randhre vā pāpasaṃyute |
hṛdrogo mānahāniśca vivādaḥ śatrupīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (यहाँ राहु महादशेश) की राशि से गिनकर; षष्ठ = छठा भाव; रिष्फ (रिःफ) = द्वादश (12वाँ) भाव; रन्ध्र = अष्टम (8वाँ) भाव; पापसंयुते = किसी पापग्रह से युक्त होने पर; हृद्रोग = हृदय-पीड़ा/मानसिक क्लेश; मानहानि = प्रतिष्ठा-क्षय; विवाद = कलह/मुकदमा; शत्रुपीडन = शत्रुओं से कष्ट।

हिन्दी भावार्थ राहु की महादशा में (चलते हुए शनि-अन्तर्दशा प्रकरण का यह अवसान-श्लोक) — यदि अन्तर्दशेश दशेश से छठे, बारहवें अथवा आठवें भाव में हो और पाप-ग्रह से संयुक्त हो, तो शास्त्र इस अवधि में हृद्रोग, सम्मान-हानि, वाद-विवाद और शत्रुओं से पीड़ा की सम्भावना बताता है। यह त्रिक-भाव (6/8/12) का अनिष्ट-योग है।

English rendering Reckoned from the daśā-lord, should the sub-lord occupy the 6th, 12th, or 8th and be joined by a malefic, the text states that this span brings heart-affliction, loss of honour, disputes, and torment from enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना दशेश से — भाव-क्रमांक = ((अन्तर्दशेश-राशि − दशेश-राशि) mod 12) + 1। दुःस्थान-समुच्चय यहाँ {6, 8, 12}; इनमें अन्तर्दशेश का पड़ना + पाप-संयोग = अनिष्ट-निर्देश। यह फल-कथन है, कोई नियत सांख्य-स्थिरांक नहीं — केवल स्थान-गणना का तर्क। (संवृति घोषित: गणना राहु-राशि को शून्य-बिन्दु मानकर।)

उदाहरण (worked example) दशेश राहु मेष (राशि 1) में, अन्तर्दशेश शनि तुला (राशि 7) में → ((7−1) mod 12)+1 = 7वाँ भाव (केन्द्र, दुःस्थान नहीं); किन्तु शनि यदि कन्या (राशि 6) में हो → ((6−1) mod 12)+1 = 6वाँ भाव, और वहाँ मंगल-सम युति हो, तो प्रस्तुत अनिष्ट-योग बनता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशेश-सापेक्ष भाव-गणना विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित है — व्याख्या से पृथक्। हमारी discipline इसी को पकड़ती है: 6/8/12 का पड़ना `==` से निर्णीत गणित, जबकि "हृद्रोग/मानहानि" शास्त्र का फल-कथन मात्र, न कि हमारे द्वारा समर्थित नियति।

55.28
अन्यदेशादिसञ्चारो गुल्मवद्वयाधिभाग्भवेत् |
कुभोजनं कोद्रवादि जातिदुःखाद्भयं भवेत्
anyadeśādisañcāro gulmavadvayādhibhāgbhavet |
kubhojanaṃ kodravādi jātiduḥkhādbhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्यदेशादिसञ्चारः = अन्य देश आदि में संचरण/भ्रमण; गुल्मवद्व्याधिभाक् = गुल्म-सदृश व्याधि का भागी; कुभोजनं = कुत्सित/अनुपयुक्त भोजन; कोद्रवादि = कोद्रव (मोटे अनाज) आदि; जातिदुःखात् = जाति/कुल-सम्बन्धी दुःख से; भयं भवेत् = भय हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस योग/काल में अन्य देश आदि में संचरण होता है, तथा गुल्म-सदृश व्याधि का भागी होना कहा गया है। कुभोजन — कोद्रव आदि अन्न — तथा जाति-दुःख से भय भी फल-कथन में हैं। व्याधि-शब्द शास्त्रीय संकेत हैं, चिकित्सकीय निदान या आहार-निषेध का दबाव नहीं; इन्हें “शास्त्र कहता है” की सीमा में ही रखें।

English rendering The text states wandering to other lands and the like, share in an ailment resembling gulma, poor or coarse fare such as kodrava-grain, and fear arising from community or kin-related distress.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (देशान्तर-संचार–व्याधि-संकेत–आहार–जाति-भय)। कोई दशा-वर्ष, बिन्दु या वर्ग-सूत्र इस श्लोक में कथित नहीं; यह पूर्व स्थिति-फल की शृंखला का वर्णनात्मक अन्त-खण्ड है।

55.29
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेमारोग्यमादिशेत्
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati |
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyāddānemārogyamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = दूसरा भाव (मारक); द्यून = सप्तम (7वाँ, मारक); नाथ = स्वामी; अपमृत्यु = अकाल/दुर्घटना-मृत्यु का भय; भविष्यति = (शास्त्र कहता है) हो सकता है; कृष्णां गां = काली गाय; महिषीं = भैंस; दद्यात् = दान करे; दानेन आरोग्यम् आदिशेत् = उस दान से आरोग्य का निर्देश।

हिन्दी भावार्थ यदि अन्तर्दशेश द्वितीय अथवा सप्तम भाव का स्वामी (मारकेश) हो, तो शास्त्र इस अवधि में अकाल-मृत्यु-तुल्य भय का संकेत करता है; और उसके परिहारार्थ काली गाय तथा भैंस का दान बताता है, जिससे आरोग्य का आदेश दिया गया है। यह भय-कथन नहीं, शास्त्र-निर्दिष्ट शान्ति-उपाय है — किसी निश्चित परिणाम की घोषणा नहीं।

English rendering Should the sub-lord own the 2nd or 7th (the māraka houses), the text speaks of danger of untimely death, and prescribes the gift of a black cow and a she-buffalo, by which it enjoins recovery of health.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — मारक-सिद्धान्त: 2रा एवं 7वाँ भाव मारक-स्थान; इनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं (आयुर्दाय-प्रकरण, BPHS Ch.43–44 की शब्दावली)। यहाँ कोई सांख्य-स्थिरांक नहीं; केवल भाव-स्वामित्व की पहचान। Discipline: "अपमृत्यु" शास्त्र का सावधान-कथन है — इसे नियति या हमारी भविष्यवाणी न बनाएँ; दान शान्ति-कर्म रूप में, भय-दबाव रूप में नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न वृष हो → द्वितीयेश बुध (मिथुन), सप्तमेश मंगल (वृश्चिक)। यदि इनमें से कोई राहु-अन्तर का कारक-योग बनाए, तो यह मारक-निर्देश लागू माना जाता है; निर्णय केवल स्वामित्व-गणना से।

55.30
राहोरन्तर्गते सौम्ये भाग्ये वा स्वर्क्षगेऽपि वा |
तुङ्गे वा केन्द्रराशिस्थे पुत्रे वा बलगेऽपि वा
rāhorantargate saumye bhāgye vā svarkṣage'pi vā |
tuṅge vā kendrarāśisthe putre vā balage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्गते सौम्ये = राहु-महादशा में बुध (सौम्य) की अन्तर्दशा में; भाग्ये = नवम भाव में; स्वर्क्षगे = स्व-राशिगत (मिथुन/कन्या); तुङ्गे = उच्च-राशि में (बुध-उच्च = कन्या 15°); केन्द्रराशिस्थे = केन्द्र (1/4/7/10) में; पुत्रे = पंचम भाव में; बलगे = बलयुक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ अब राहु-महादशा में बुध की अन्तर्दशा का प्रकरण आरम्भ होता है। यदि बुध नवम भाव में, अथवा अपनी राशि में, अथवा उच्च का, अथवा केन्द्र-राशि में, अथवा पंचम में, अथवा अन्यथा बलवान् हो — तो (अग्रिम श्लोकों में कहे गए) शुभ फल प्रकट होते हैं। यह श्लोक शुभ-योग की "यदि" शर्त (पूर्व-पक्ष) रखता है।

English rendering Now within Rāhu's daśā, in the sub-period of Mercury: if Mercury stands in the 9th, or in its own sign, or exalted, or in an angular sign, or in the 5th, or is otherwise strong — (then follow the auspicious results stated next).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो गणित एक साथ। (1) अन्तर्दशा-मान (विंशोत्तरी): अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। राहु = 18 वर्ष, बुध = 17 वर्ष ⇒ राहु-बुध = 18×17 ÷ 120 = 306⁄120 = 2·55 वर्ष = 2 वर्ष 6 माह 18 दिन। (राहु के अन्तर-क्रम में बुध चतुर्थ अन्तर्दशा है: राहु→गुरु→शनि→बुध→…) (2) बल/उच्च: बुध-उच्चांश = कन्या 15°; स्व-राशि = मिथुन, कन्या।

उदाहरण (worked example) बुध यदि कन्या 15° के निकट (परमोच्च) हो → तुङ्ग-शर्त पूर्ण। अन्तर्दशा-अवधि: 18×17⁄120 = 2·55 वर्ष; 0·55×12 = 6·6 माह, 0·6 माह ≈ 18 दिन ⇒ 2 वर्ष 6 माह 18 दिन तक शुभ फल-प्रवाह।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक विंशोत्तरी-यन्त्र को छूता है — दोषियर के अनुसार 120-वर्ष चक्र (केतु 7 · शुक्र 20 · सूर्य 6 · चन्द्र 10 · मंगल 7 · राहु 18 · गुरु 16 · शनि 19 · बुध 17, Σ=120), अन्तर = (महा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120 — विशुद्ध अनुपात-अंकगणित। बुध-अन्तर की लम्बाई 2·55 वर्ष हमारी दशा-गणक इसी सूत्र से निकालती है। "बलगे" का बल-निर्णय ग्रह-सामर्थ्य (षड्बल, Ch.27) की परिधि में — गणित, व्याख्या से पृथक्।

55.31
राजयोगं प्रकुरुते गृहे कल्याणवर्द्धनम् |
व्यापारेण धनप्राप्तिविद्यावाहनमुत्तमम्
rājayogaṃ prakurute gṛhe kalyāṇavarddhanam |
vyāpāreṇa dhanaprāptividyāvāhanamuttamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजयोग = राजयोग (शास्त्रीय योग-फल); प्रकुरुते = उत्पन्न करता है (पाठ का कथन); गृहे = घर/परिवार में; कल्याण-वर्द्धनम् = कल्याण की वृद्धि; व्यापार = व्यवसाय/वाणिज्य; धन-प्राप्ति = धन-लाभ; विद्या = विद्या; वाहनम् उत्तमम् = उत्तम वाहन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्तों पर शास्त्र कहता है कि सौम्य राजयोग करता है, गृह में कल्याण बढ़ाता है, व्यापार से धन-प्राप्ति कराता है, तथा विद्या और उत्तम वाहन का फल देता है। ये सब फल-कथन हैं—शास्त्र की अपनी सूचि; यहाँ इन्हें सुनिश्चित नियति या दबावपूर्ण आश्वासन नहीं माना जाता।

English rendering Under those conditions the text states that Mercury effects a rāja-yoga, increases domestic welfare, brings wealth through trade, and confers learning and excellent conveyances. These are the śāstra’s listed results, not endorsed predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राजयोग, धन, विद्या, वाहन)। “राजयोग” यहाँ नाम-फल है; कोई योग-सूत्र, बिन्दु-योग, या बल-सीमा इस श्लोक में नहीं दी गई।

55.32
विवाहोत्सवकार्याणि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् |
सौम्यमासे महत्सौख्यं स्ववारे राजदर्शनम्
vivāhotsavakāryāṇi catuṣpājjīvalābhakṛt |
saumyamāse mahatsaukhyaṃ svavāre rājadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवाहोत्सवकार्याणि = विवाह-आदि मंगल-कार्य; चतुष्पाज्जीवलाभकृत् = चौपाये (गो-आदि) पशुओं का लाभ; सौम्यमासे = बुध के मास में; महत्सौख्यं = महान् सुख; स्ववारे = अपने वार (बुधवार) में; राजदर्शनम् = राजा से भेंट।

हिन्दी भावार्थ इस बुध-अन्तर में विवाह आदि उत्सव-कार्य सम्पन्न होते हैं और चौपाये पशुओं का लाभ होता है; विशेषतः बुध के मास में महान् सुख तथा बुधवार को राज-दर्शन (सत्ता-सान्निध्य) होता है — ऐसा शास्त्र का कथन है। यहाँ फल की समय-सूक्ष्मता (मास/वार) पर बल है।

English rendering The text states this brings marriages and festive undertakings and gain of cattle; especially in Mercury's month great comfort, and on its own weekday an audience with the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — फल की काल-सूक्ष्मता: अन्तर्दशा के भीतर भी परिणाम अन्तर्दशेश के "स्व-मास" तथा "स्व-वार" में सघन होते हैं। बुध का वार = बुधवार (सप्ताह-क्रम में चतुर्थ दिन)। यह प्रत्यन्तर्दशा-स्तर की granularity की ओर संकेत है (महा→अन्तर→प्रत्यन्तर), कोई नियत स्थिरांक नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "सौम्यमास/स्ववार" का संकेत दशा-वृक्ष की उसी अनुपात-सूक्ष्मता का है जिसे हमारी विंशोत्तरी-गणक प्रत्यन्तर तक बढ़ाती है — प्रत्येक उप-स्तर = (उपरितन-अवधि × उप-ग्रह-वर्ष)/120। शास्त्र का "अपने मास/वार में फल-सघनता" उसी नेस्टेड-अनुपात का गुणात्मक रूप है; हम इसे गणित रखते हैं, फल को शास्त्र-कथन।

55.33
सुगन्धपुष्पशय्यादि स्त्रीसौख्यं चातिरोभनम् |
महाराजप्रसादेन धनलाभो महद्यशः
sugandhapuṣpaśayyādi strīsaukhyaṃ cātirobhanam |
mahārājaprasādena dhanalābho mahadyaśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुगन्ध-पुष्प-शय्या-आदि = सुगन्ध, पुष्प, शय्या आदि; स्त्री-सौख्यम् = स्त्री-सम्बन्धी सुख; अति-शोभनम् = अत्यन्त शोभन (पाठ-भेद: रोभनम् → शोभनम् संभव); महाराज-प्रसाद = महाराज का अनुग्रह; धन-लाभः = धन-लाभ; महत् यशः = बड़ा यश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सुगन्ध, पुष्प, शय्या आदि तथा स्त्री-सौख्य को अत्यन्त शोभन कहता है। महाराज-प्रसाद से धन-लाभ और महान् यश का फल भी गिनाया गया है। “रोभनम्” पाठ में शोभन-अर्थ की ओर संकेत है—पाठ-भेद संभव; अर्थ फल-सूचि के भीतर ही रहता है।

English rendering The text states enjoyment of fragrance, flowers, couches and the like, and very fair happiness with women; and, by a great king’s favour, gain of wealth and great renown. “Atiróbhanam” may be a contested reading for “atiśobhanam” (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भोग, स्त्री-सौख्य, राजप्रसाद, धन, यश)। कोई अंश, वर्ष, या वर्ग-नियम इस श्लोक में नहीं।

55.34
दायेशात्केन्द्रलाभे वा दुश्चिक्ये भाग्यकर्मगे |
देहारोग्यं हृदुत्साह इष्टसिद्धिः सुखावहा
dāyeśātkendralābhe vā duścikye bhāgyakarmage |
dehārogyaṃ hṛdutsāha iṣṭasiddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश से गिनकर; केन्द्र = 1/4/7/10; लाभ = एकादश (11वाँ); दुश्चिक्य = तृतीय (3रा); भाग्य = नवम (9वाँ); कर्म = दशम (10वाँ); देहारोग्यं = शारीरिक स्वास्थ्य; हृदुत्साह = मनोबल/उत्साह; इष्टसिद्धिः = अभीष्ट-सिद्धि; सुखावहा = सुखकारी।

हिन्दी भावार्थ यदि (बुध) दशेश से केन्द्र, एकादश, तृतीय, नवम अथवा दशम भाव में हो, तो शास्त्र इस अवधि में देह-आरोग्य, हृदय का उत्साह, अभीष्ट-सिद्धि और सुख का संकेत करता है। ये स्थान उपचय (3/10/11) एवं केन्द्र-त्रिकोण के शुभ-भाव हैं।

English rendering The text states that if Mercury lies, from the daśā-lord, in an angle, the 11th, the 3rd, the 9th, or the 10th, it grants bodily health, inner enthusiasm, fulfilment of desires, and ease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना दशेश से — शुभ-समुच्चय {केन्द्र 1/4/7/10, उपचय 3/11, भाग्य-कर्म 9/10}। सूत्र: भाव = ((बुध-राशि − दशेश-राशि) mod 12) + 1; परिणाम-दिशा = शुभ यदि भाव ∈ इस समुच्चय में। कोई नियत अंक नहीं — स्थान-वर्ग का शुभाशुभ-वर्गीकरण।

उदाहरण (worked example) दशेश राहु मेष (1), बुध मकर (10) → ((10−1) mod 12)+1 = 10वाँ (कर्म, केन्द्र) → शुभ-दिशा; वहीं बुध कुम्भ (11) → ((11−1) mod 12)+1 = 11वाँ (लाभ) → भी शुभ। इसी गणना से श्लोक की शर्त सत्यापित।

55.35
पुण्यश्लोकादिकीर्तिश्च पुराणश्रवणादिकम् |
विवाहो यज्ञदीक्षा च दानधर्मदयादिकम्
puṇyaślokādikīrtiśca purāṇaśravaṇādikam |
vivāho yajñadīkṣā ca dānadharmadayādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुण्य-श्लोक-आदि-कीर्तिः = पुण्यश्लोक आदि कीर्ति; पुराण-श्रवण-आदिकम् = पुराण-श्रवण आदि; विवाहः = विवाह; यज्ञ-दीक्षा = यज्ञ की दीक्षा; दान-धर्म-दया-आदिकम् = दान, धर्म, दया आदि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस स्थिति में पुण्यश्लोक-कीर्ति, पुराण-श्रवण आदि, विवाह, यज्ञ-दीक्षा, तथा दान-धर्म-दया आदि का फल गिनाता है। यह शुभ-कर्म और कीर्ति की फल-सूचि है—शास्त्र का अपना कथन; यहाँ इसे दबावपूर्ण आचार-सूचि या सुनिश्चित भविष्य नहीं बनाया जाता।

English rendering The text states renown of the “puṇya-śloka” kind, hearing of the Purāṇas and the like, marriage, initiation into sacrifice, and dāna, dharma, compassion, and similar acts. A catalogue of auspicious results in the śāstra’s own voice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कीर्ति, श्रवण, विवाह, यज्ञ-दीक्षा, दान-धर्म-दया)। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-भाग, या बल-इकाई इस श्लोक में नहीं।

55.36
षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये मन्देनापि युतेक्षिते |
दायेशात्षष्ठरिःफे वा रन्ध्रे वा पापसंयुते
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye saumye mandenāpi yutekṣite |
dāyeśātṣaṣṭhariḥphe vā randhre vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यय = 6/8/12 भाव; सौम्ये = बुध के (इन भावों में) होने पर; मन्देन युतेक्षिते = शनि (मन्द) से युक्त अथवा दृष्ट होने पर; दायेशात् = दशेश से; षष्ठ/रिःफ (12)/रन्ध्र (8) = त्रिक-भाव; पापसंयुते = पाप-युक्त।

हिन्दी भावार्थ अब बुध-अन्तर का अनिष्ट-पक्ष: यदि बुध छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो और शनि से युक्त/दृष्ट हो; अथवा दशेश से छठे, बारहवें या आठवें में पाप-ग्रह से युक्त हो — तो (अग्रिम श्लोकों के) अशुभ फल प्रकट होते हैं। यह अनिष्ट-योग की "यदि" शर्त है।

English rendering But if Mercury occupies the 6th, 8th, or 12th, joined or aspected by Saturn; or, from the daśā-lord, stands in the 6th, 12th, or 8th with a malefic — (then follow the ill results next).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — दो वैकल्पिक अनिष्ट-शर्तें: (क) बुध ∈ {6,8,12} लग्न से + शनि की युति/दृष्टि; (ख) बुध ∈ {6,8,12} दशेश से + पाप-संयोग। भाव = ((बुध-राशि − संदर्भ-राशि) mod 12) + 1। दो सन्दर्भ-बिन्दु (लग्न बनाम दशेश) — इसीलिए संवृति घोषित करना अनिवार्य कि गणना किससे की गई।

उदाहरण (worked example) लग्न से बुध अष्टम (8) में और शनि उसी राशि में/सप्तम-दृष्टि से देखता हो → शर्त (क) पूर्ण। अथवा दशेश राहु से बुध द्वादश (12) में, साथ मंगल → शर्त (ख) पूर्ण। किसी भी एक के सत्य होने पर अनिष्ट-दिशा।

55.37
देवभाह्मणनिन्दा च भोगभाग्यविवर्जितः |
सत्यहीनश्च दुर्बुद्धिश्चौराहिनृपपीडनम्
devabhāhmaṇanindā ca bhogabhāgyavivarjitaḥ |
satyahīnaśca durbuddhiścaurāhinṛpapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवब्राह्मणनिन्दा = देव-ब्राह्मणों की निन्दा (पाठ "देवभाह्मण" — लेखन-दोष, पाठ-भेद संभव); भोगभाग्यविवर्जितः = भोग एवं सौभाग्य से रहित; सत्यहीनः = सत्य-रहित; दुर्बुद्धिः = दुष्ट-बुद्धि; चौर-अहि-नृप-पीडनम् = चोर, सर्प एवं राजा से पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ (अनिष्ट-स्थित बुध-अन्तर के फलस्वरूप) शास्त्र कहता है — जातक देव-ब्राह्मणों की निन्दा में प्रवृत्त, भोग-सौभाग्य से वंचित, सत्य-हीन एवं दुर्बुद्धि हो सकता है, तथा चोर, सर्प और राजा से पीड़ा सम्भव है। ये अनिष्ट-योग के परिणाम-कथन हैं, स्वभाव-निर्धारण नहीं।

English rendering The text states such a period may bring reviling of gods and brahmins, deprivation of enjoyment and fortune, untruthfulness and ill judgment, and affliction from thieves, snakes, and the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट-स्थित अन्तर्दशेश का परिणाम)। Discipline: मानसिक-नैतिक प्रवृत्तियाँ शास्त्र का दशा-कालीन कथन हैं — इन्हें स्थायी चरित्र-निर्णय या भय-वचन न बनाएँ।

55.38
अकस्मात्कलहश्चैव गुरुपुत्रादिनाशनम् |
अर्थव्ययो राजकोपो दारपुत्रादिपीडनम्
akasmātkalahaścaiva guruputrādināśanam |
arthavyayo rājakopo dāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकस्मात्कलहः = अचानक कलह; गुरुपुत्रादिनाशनम् = गुरु–पुत्रादि का नाश/हानि; अर्थव्ययः = धन–व्यय; राजकोपः = राज–कोप; दारपुत्रादिपीडनम् = दारा (पत्नी)–पुत्रादि की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — अचानक कलह, गुरु–पुत्रादि से सम्बन्धित हानि, अर्थ का व्यय, राज–कोप, तथा दारा–पुत्रादि की पीड़ा। यह भी उसी योग–शृंखला का फल–वर्णन है; भय–भाषा या दबाव–उपाय यहाँ नहीं गढ़ना — केवल शास्त्र–वाक्य का निष्ठावान अनुवाद।

English rendering The text further states sudden quarrel, harm concerning teacher, son and the like, expenditure of wealth, royal anger, and affliction of wife, son and related persons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल–कथन / परिणाम–सूची। संख्यात्मक मापदण्ड अनुपस्थित; केवल शास्त्र–कथित सामाजिक–पारिवारिक–राजकीय फल–चिह्न।

55.39
द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युभयं वदेत् |
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत्
dvitīyadyūnanāthe vā hyapamṛtyubhayaṃ vadet |
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय अथवा सप्तम (मारक) भाव का स्वामी होने पर; अपमृत्युभयं वदेत् = अकाल-मृत्यु का भय कहना चाहिए; तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के निवारणार्थ; विष्णुसाहस्रकं जपेत् = विष्णु-सहस्रनाम का जप करे।

हिन्दी भावार्थ यदि अन्तर्दशेश बुध द्वितीय अथवा सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो शास्त्र इस अवधि में अकाल-मृत्यु-तुल्य भय का उल्लेख करता है; और उसके परिहारार्थ विष्णु-सहस्रनाम के जप का विधान बताता है। यह शान्ति-उपाय है — भय-दबाव या निश्चित-परिणाम की घोषणा नहीं।

English rendering Should Mercury own the 2nd or 7th (māraka houses), the text says danger of untimely death should be declared, and to avert that flaw it enjoins recitation of the Viṣṇu-sahasranāma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — मारक-सिद्धान्त: 2रा एवं 7वाँ मारक-स्थान; इनका स्वामित्व = मारकेश। यहाँ अन्तर्दशेश (बुध) यदि मारकेश हो तो मारक-निर्देश। कोई सांख्य-स्थिरांक नहीं; केवल भाव-स्वामित्व की पहचान। Discipline: "अपमृत्यु-भय" शास्त्र का सावधान-वचन है, हमारी भविष्यवाणी नहीं; जप शान्ति-कर्म रूप में — न भय, न दबाव।

55.40
राहोरन्तर्गते केतौ भ्रमणं राजतो भयम् |
वातज्वरादिरोगश्च चतुष्पाज्जीवहानिकृत्
rāhorantargate ketau bhramaṇaṃ rājato bhayam |
vātajvarādirogaśca catuṣpājjīvahānikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्गते = राहु-महादशा के भीतर अन्तर्दशा में; केतौ = केतु की (अन्तर्दशा में); भ्रमणं = इधर-उधर घूमना / यात्रा; राजतः भयम् = राजा (राज्य/सत्ता) से भय; वात-ज्वर-आदि-रोगः = वात-दोष-जन्य ज्वर आदि व्याधियाँ; चतुष्पाद्-जीव-हानिकृत् = चौपाये पशुओं (गो-अश्वादि) की हानि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ राहु की महादशा में जब केतु की अन्तर्दशा चलती है, तब शास्त्र कहता है — व्यर्थ का भ्रमण, राजपक्ष से भय, वात-ज्वर आदि रोग, तथा पशुधन की हानि जैसे फल सम्भव होते हैं। यह राहु-दशा-अन्तर्गत केतु-अन्तर का प्रारम्भ-वर्णन है।

English rendering When Ketu's sub-period runs within Rāhu's major period, the text states that there may be aimless wandering, fear from the ruling authority, wind-borne fevers and like ailments, and loss of four-footed livestock.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह विंशोत्तरी अन्तर्दशा-सीमा है। किसी महादशा M के भीतर ग्रह X की अन्तर्दशा का मान = (M-वर्ष × X-वर्ष) ÷ 120। राहु = 18 वर्ष, केतु = 7 वर्ष → राहु-केतु अन्तर = (18 × 7) ÷ 120 = 126/120 = 1.05 वर्ष। फल-कथन स्वयं गणित नहीं — यह दशा-अवधि की गणना है; फल शास्त्र का दावा मात्र है, न कि सुनिश्चित घटना।

उदाहरण (worked example) 360-दिन (सावन) वर्ष-संविधि में 1.05 वर्ष = 1.05 × 360 = 378 दिन = 1 वर्ष 0 मास 18 दिन। अतः राहु-महादशा के भीतर केतु-अन्तर की पूर्ण अवधि ≈ 1 वर्ष 18 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी के 120-वर्ष चक्र (Ch.46–47) पर आधारित हमारे दशा-इंजन में अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 शुद्ध अनुपात-अंकगणित है — यहाँ राहु-केतु = 126/120। हमारी अनुशासन-रेखा: दशा-अवधि निश्चित गणित है, किन्तु उसका फल-कथन "शास्त्र कहता है" रहता है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

55.41
अष्टमाधिसंयुक्ते देहजाड्यं मनोव्यथा |
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे देहसौख्यं धनागमः |
राजसम्मानभूषाप्तिर्गृहे शुभकरो भवेत्
aṣṭamādhisaṃyukte dehajāḍyaṃ manovyathā |
śubhayukte śubhairdṛṣṭe dehasaukhyaṃ dhanāgamaḥ |
rājasammānabhūṣāptirgṛhe śubhakaro bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टम-अधि(प)-संयुक्ते = अष्टम (रन्ध्र) भाव/अष्टमेश से युक्त होने पर (पाठ-भेद संभव — "अष्टमाधिप"); देह-जाड्यं = शरीर की जड़ता/शिथिलता; मनोव्यथा = मानसिक पीड़ा; शुभ-युक्ते = शुभग्रह से युक्त; शुभैः दृष्टे = शुभग्रहों से दृष्ट; देह-सौख्यं = शारीरिक सुख; धन-आगमः = धन का आगमन; राज-सम्मान-भूषा-आप्तिः = राजसम्मान एवं आभूषण की प्राप्ति; गृहे शुभकरः = घर में शुभकारी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि (केतु) अष्टम-भाव/अष्टमेश से सम्बद्ध हो तो देह-जड़ता और मन की व्यथा; किन्तु यदि शुभग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो देह-सुख, धन-लाभ, राजसम्मान व आभूषण की प्राप्ति, और घर में शुभ फल होते हैं। एक ही अन्तर्दशा का फल संगति-दृष्टि के अनुसार पलट जाता है।

English rendering The text states that if joined with the eighth house or its lord, there is bodily torpor and mental distress; but when conjoined with or aspected by benefics, there is bodily ease, gain of wealth, royal honour and ornaments, and auspiciousness in the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-दृष्टि की शर्त सहित)। तकनीकी बिन्दु यह है कि फल एकमात्र दशा-स्वामी से नहीं, अपितु उसकी युति-दृष्टि-सम्बन्ध की शुभ/अशुभ प्रकृति से मॉड्यूलेट होता है — यही "युते-दृष्टे" की सशर्त संरचना है।

55.42
लग्नाधिपेन सम्बन्धे इष्टसिद्धिः सुखावहा |
लग्नाधिपसमायुक्ते लाभो वा भवति ध्रुवम्
lagnādhipena sambandhe iṣṭasiddhiḥ sukhāvahā |
lagnādhipasamāyukte lābho vā bhavati dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपेन सम्बन्धे = लग्न–स्वामी से सम्बन्ध होने पर; इष्टसिद्धिः = इष्ट की सिद्धि; सुखावहा = सुख–लाने वाली; लग्नाधिपसमायुक्ते = लग्न–स्वामी से सम–युक्त होने पर; लाभः = लाभ; वा भवति ध्रुवम् = निश्चय से होता है — शास्त्र का “ध्रुवम्” शब्द।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्नाधिप से सम्बन्ध होने पर इष्ट–सिद्धि और सुख–दायक परिणाम; लग्नाधिप से सम–युक्त होने पर लाभ “ध्रुवम्” (पाठानुसार निश्चित) कहा गया। “ध्रुवम्” शास्त्र की अपनी निश्चय–भाषा है; इसे आधुनिक नियति–वाद या गारंटी के रूप में नहीं पढ़ना — केवल पाठ का निष्ठावान अनुवाद।

English rendering The text states that relation with the lagna-lord brings fulfilment of the desired and is conducive to ease; and when joined with the lagna-lord, gain occurs — as the śāstra itself says, “dhruvam.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल–कथन / लग्नेश–सम्बन्ध। “सम्बन्ध” और “समायुक्त” शास्त्रीय संयोग–श्रेणियाँ हैं (युति, दृष्टि, पारस्परिक भाव–स्वामित्व आदि परम्परा–भेद संभव); कोई संख्यात्मक मापदण्ड यहाँ नहीं।

55.43
चतुष्पाज्जिवलाभः स्यात्केन्द्रे वाथ त्रिकोणगे |
रन्ध्रस्थानगते केतौ व्यये वा बलवर्जिते
catuṣpājjivalābhaḥ syātkendre vātha trikoṇage |
randhrasthānagate ketau vyaye vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पाद्-जीव-लाभः = चौपाये पशुओं का लाभ; केन्द्रे = केन्द्र (1/4/7/10) में; अथ त्रिकोणगे = अथवा त्रिकोण (1/5/9) में स्थित; रन्ध्र-स्थान-गते केतौ = केतु के अष्टम (रन्ध्र) भाव में जाने पर; व्यये = द्वादश भाव में; बल-वर्जिते = बल से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि केतु केन्द्र या त्रिकोण में हो तो पशुधन का लाभ; किन्तु यदि वही केतु अष्टम या द्वादश भाव में, अथवा बल से हीन हो — (तो अगले श्लोक में कहे अशुभ फल आते हैं)। यह श्लोक शुभ-स्थान बनाम दुःस्थान का विभाजन खींचता है।

English rendering The text states that gain of four-footed animals comes when Ketu occupies a quadrant or a trine; but when Ketu goes to the eighth house, or the twelfth, or is bereft of strength — (the ill effects of the next verse follow).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थान की शर्त)। भाव-समुच्चय की मॉड्यूलर परिभाषा: केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, रन्ध्र = 8, व्यय = 12। लग्न से भाव-क्रमांक b = ((राशि_ग्रह − राशि_लग्न) mod 12) + 1; इसी b के आधार पर शुभ (केन्द्र/त्रिकोण) व दुःस्थान (8/12) की पहचान होती है। "बल-वर्जित" षड्बल-आधारित दुर्बलता की ओर संकेत है।

55.44
तद्भुक्तौ बहुरोगः स्याच्चोराहिव्रणपीडनम् |
पितृमातृवियोगश्च भातृद्वेषो मनोरुजा
tadbhuktau bahurogaḥ syāccorāhivraṇapīḍanam |
pitṛmātṛviyogaśca bhātṛdveṣo manorujā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-भुक्तौ = उस (पूर्वोक्त विपरीत) भुक्ति में; बहु-रोगः = अनेक रोग; चोर-अहि-व्रण-पीडनम् = चोर, सर्प, व्रण (घाव) से पीड़ा; पितृ-मातृ-वियोगः = माता-पिता से वियोग; भ्रातृ-द्वेषः = भाइयों से द्वेष/विरोध; मनो-रुजा = मानसिक क्लेश, चिंता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस भुक्ति में—जब 55.43 की विपरीत शर्तें (रन्ध्र/व्यय/बलहीन केतु) लागू हों—बहुरोग, चोर-सर्प-व्रण संबंधी पीड़ा, माता-पिता से वियोग, भ्रातृ-द्वेष और मन की पीड़ा—ये फल-संकेत दिए गए हैं। यह पाठ का अपना फल-सूचीकरण है; इसे नियति या निश्चित घटना के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that in that bhukti there may be much illness, distress from thieves, serpents, and wounds, separation from parents, fraternal enmity, and mental anguish. These are the śāstra’s listed indications for the adverse configuration already framed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-फल सूची)। “तद्भुक्तौ” पूर्व श्लोक की स्थिति-शर्त से जुड़ा अनुबंध है; कोई दशा-वर्ष या बलांक यहाँ नहीं दिया गया।

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55.45
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं छागदानं च कारयेत्
dvitīyadyūnanāthe tu dehabādhā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ chāgadānaṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय अथवा सप्तम (द्यून) भाव के स्वामी होने पर (केतु मारक-स्थानेश हो तब); देह-बाधा = शरीर की बाधा/कष्ट; भविष्यति = होगी (शास्त्रोक्त सम्भावना); तद्-दोष-परिहार-अर्थं = उस दोष के परिहार हेतु; छाग-दानं कारयेत् = बकरे का दान कराए (शास्त्रोक्त शान्ति-विधि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि केतु द्वितीय या सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो देह-बाधा की सम्भावना बताई गई है; और इसके परिहार-रूप में पाठ छाग-दान (शान्ति-कर्म) का विधान करता है। यहाँ द्वितीय व सप्तम मारक-स्थान होने से इनके स्वामी की अन्तर्दशा देह-कष्टकारक कही गई है।

English rendering The text states that if Ketu owns the second or the seventh house, bodily affliction may arise; and, to remedy that fault, it prescribes the gift of a goat as a pacificatory rite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं शान्ति-विधान (मारकेश-योग)। तकनीकी आधार: 2 और 7 शास्त्र-परिभाषित मारक-स्थान हैं, अतः इनके अधिपति की दशा को देह-बाधाकारक माना गया है। शान्ति-विधि शास्त्र की अपनी अनुशंसा है — इसे दबाव या भय-रूप में नहीं, पाठ के स्वर में प्रस्तुत किया गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी विधि गणित और फल को पृथक् रखती है: "2/7 = मारक" एक निश्चित स्थान-नियम (मॉड्यूलर भाव-गणना) है, जबकि "देह-बाधा" व छाग-दान शास्त्र का सशर्त फल-कथन तथा उसका अपना उपाय-वचन है। हम उपाय को नियति-दबाव नहीं, ग्रन्थ का स्वर मानकर उद्धृत करते हैं।

55.46
राहोरन्तर्गते शुक्रे कग्नात्केन्द्गत्रिकोणगे |
लाभे वा बलसंयुक्ते योगप्राबल्यमादिशेत्
rāhorantargate śukre kagnātkendgatrikoṇage |
lābhe vā balasaṃyukte yogaprābalyamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्गते = राहु की अन्तर्दशा में; शुक्रे = शुक्र (जब शुक्र अन्तर्दशा-स्वामी हो); लग्नात् (पाठ: कग्नात् — लग्नात्; पाठ-भेद/लेखन-भेद संभव) = लग्न से; केन्द्र-त्रिकोण-गे = केन्द्र या त्रिकोण में स्थित; लाभे = 11वें भाव में; बल-संयुक्ते = बलयुक्त; योग-प्राबल्यम् = योग की प्रबलता/शुभ फल-शक्ति; आदिशेत् = निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की अन्तर्दशा में जब शुक्र आए, और वह लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा लाभ (11) में हो, अथवा बल से युक्त हो, तब योग-प्राबल्य—अर्थात् शुभ योग की दृढ़ता—का निर्देश करना चाहिए। स्थिति और बल यहाँ फल की द्वार-शर्तें हैं।

English rendering The text states: in the antardaśā of Rāhu, when Venus occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, or the 11th, or is endowed with strength, one should declare the yoga as strong (potent for favourable results).

गणित /기법 (The Mathematics / Technique): विंशोत्तरी अनुपात (BPHS दशा-चक्र, 120 वर्ष): राहु महादशा = 18 वर्ष; शुक्र = 20 वर्ष।
अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120
∴ राहु में शुक्र-अन्तर्दशा = (18 × 20) ÷ 120 = 360 ÷ 120 = 3 वर्ष।
केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11 — लग्न से भाव-गिनती (समान-भवन गणना; गृह-प्रणाली घोषित करें जब कुंडली-मान लागू हो)। “कग्नात्/केन्द्ग” पाठ में लेखन-भेद संभव; अर्थ लग्नात्–केन्द्र।

उदाहरण (worked example) राहु महादशा 18 वर्ष मानकर शुक्र-अन्तर्दशा = 18 × 20 / 120 = 3 वर्ष = 36 मास। यदि लग्न मेष और शुक्र कर्क (4) में हो → लग्न से केन्द्र → 55.46 की “योगप्राबल्य” शर्त लागू; यदि शुक्र वृश्चिक (8) में निर्बल हो → यह श्लोक की सकारात्मक शर्तें नहीं जुड़तीं (फल अगले श्लोकों के अनुकूल पक्ष से भिन्न)। अयनांश: दशा-वर्ष-अनुपात पर निर्भर नहीं; केवल ग्रह-राशि स्थिति पर अयनांश/देशांतर घोषित करें जब देशज्योतिषीय कुंडली से भाव गिनें (उदा. लाहिरी अयनांश, पूर्ण-भाव या श्रीपति—जो भी पिन हो)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में राहु 18 और शुक्र 20 वर्ष पिन हैं; अन्तर्दशा = (M × A)/120 का शुद्ध अनुपात—यही “राहोरन्तर्गते शुक्रे” की अवधि 3 वर्ष देती है। दशा-इंजन उसी अनुपात-गणित पर चलता है; फल-वाक्य (“योगप्राबल्य”) को हम गणना से अलग रखते हैं—केवल अवधि और स्थिति-शर्त `==` नियमों से सत्याप्य हैं।

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55.47
विप्रमूलाद्धनप्राप्तिर्गोमहिष्यादिलाभकृत् |
पुत्रोत्सवादिसन्तोषो गृहे कल्याणसम्भवः
vipramūlāddhanaprāptirgomahiṣyādilābhakṛt |
putrotsavādisantoṣo gṛhe kalyāṇasambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विप्र-मूलात् = ब्राह्मण/विप्र-संबंधी स्रोत से; धन-प्राप्तिः = धन की प्राप्ति; गो-महिष्यादि-लाभ-कृत् = गौ, भैंस आदि से लाभ करने वाला; पुत्र-उत्सव-आदि-सन्तोषः = पुत्र-उत्सव आदि से संतोष; गृहे = घर में; कल्याण-सम्भवः = कल्याण की संभावना (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्वोक्त शुक्र-अन्तर्दशा में, जब 55.46 की योग-प्राबल्य शर्तें हों) विप्र-मूल से धन-प्राप्ति, गौ-महिष्यादि पशु-लाभ, पुत्र-उत्सव आदि से संतोष, और गृह में कल्याण—ये फल-संकेत दिए गए हैं। यह अनुकूल पक्ष का विवरण है, निश्चित घटना नहीं।

English rendering The text states acquisition of wealth from a Brāhmaṇa-linked source, gain of cows, buffaloes and the like, joy from a son’s festivity and similar occasions, and the prospect of welfare in the household.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनुकूल योग-प्राबल्य का विस्तार)। संख्या या वर्ष-खंड यहाँ नहीं; अवधि 55.46 के विंशोत्तरी अनुपात से आती है।

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55.48
सम्मानं राजसम्मनं राज्यलाभो महत्सुखम् |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा
sammānaṃ rājasammanaṃ rājyalābho mahatsukham |
svocce vā svarkṣage vāpi tuṅgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम्मानम् = आदर; राज-सम्मानम् = राजकीय सम्मान; राज्य-लाभः = राज्य/शासन-संबंधी लाभ; महत्-सुखम् = महान सुख; स्व-उच्चे = स्वोच्च (उच्च राशि) में; स्व-र्क्ष-गे = स्वराशि/स्वक्षेत्र में; तुङ्ग-अंशे = उच्च के अंश (नवांश आदि) में; स्व-अंश-गे = स्व-अंश (स्व-नवांश) में; वापि / अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सम्मान, राज-सम्मान, राज्य-लाभ और महान् सुख—ये भी उसी अनुकूल विन्यास के फल-संकेत हैं। विशेष बल-शर्त: जब (शुक्र) स्वोच्च में हो, अथवा स्वराशि में हो, अथवा तुङ्गांश में हो, अथवा स्वांश में हो—तब यह फल-पक्ष और दृढ़ माना गया है।

English rendering The text states honour, royal regard, gain connected with dominion or office, and great happiness. These are especially indicated when Venus is in its exaltation, in its own sign, in an exaltation-aṃśa, or in its own aṃśa (navāṃśa, etc.).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-शर्तें (उच्च/स्वराशि/अंश), पूर्ण दशा-सूत्र नहीं।
शुक्र-उच्च = मीन (पारंपरिक उच्च-राशि); स्वक्षेत्र = वृषभ, तुला।
“तुङ्गांश / स्वांश” = वर्गाश (विशेषतः D9 नवांश) में उच्च या स्व-राशि—D9 = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश; लग्न/ग्रह-देशांतर को 3°20′ खंडों में बाँटकर राशि-मानचित्र (षोडश-वर्ग नियम)। अयनांश घोषित करें जब अंश-संख्या निकालें।

उदाहरण (worked example) शुक्र देशांतर (सायन/निरयण—घोषित अयनांश से) = वृषभ 12°40′ → स्वक्षेत्र (D1)। नवांश: वृषभ में नवांश-क्रम मेष से; 12°40′ ÷ 3°20′ = 3 पूर्ण + शेष → 4था नवांश = कर्क (उदाहरण-क्रम; विषम/सम राशि-नियम BPHS Ch.6 के अनुसार पिन करें)। यदि वह नवांश शुक्र-स्व (वृष/तुला) या उच्च (मीन) हो तो “स्वांश/तुङ्गांश” शर्त लागू। राहु–शुक्र अन्तर्दशा अवधि पूर्ववत् 3 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) षोडश-वर्ग में D9 नवांश 3°20′ के समान खंडों की मॉड्यूलर विभाजन है—यही “तुङ्गांश/स्वांश” को संख्या में बदलता है। हम फल (“राज्यलाभ”) को भविष्यवाणी नहीं बनाते; केवल राशि/अंश-स्थिति और विंशोत्तरी अवधि को इंजन में पिन करते हैं।

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55.49
नूतनं गृहनिर्माणं नित्यं मिष्ठान्नभोजनं |
कलत्रपुत्रविभवं मित्रसंगः सुभोजनम्
nūtanaṃ gṛhanirmāṇaṃ nityaṃ miṣṭhānnabhojanaṃ |
kalatraputravibhavaṃ mitrasaṃgaḥ subhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नूतनम् गृह-निर्माणम् = नए घर का निर्माण; नित्यम् मिष्ठान्न-भोजनम् = नियमित मिष्टान्न-भोजन; कलत्र-पुत्र-विभवम् = पत्नी और पुत्र संबंधी वैभव; मित्र-संगः = मित्रों का संग; सु-भोजनम् = उत्तम भोजन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी अनुकूल शुक्र-अन्तर्दशा (राहु में) के विस्तार में नए गृह-निर्माण, नित्य मिष्टान्न-सेवन, कलत्र-पुत्र का वैभव, मित्र-संग और सुभोजन—ये सुख-संकेत गिनाए गए हैं। पूरा समूह 55.46–55.49 मिलकर “बलयुक्त/केन्द्र-त्रिकोण/लाभ/उच्च-स्वंश” शर्तों पर टिका फल-पटल है।

English rendering The text states construction of a new house, daily enjoyment of sweet foods, prosperity through spouse and children, company of friends, and good fare—further household joys listed under the same favourable Venus-in-Rāhu antardaśā frame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गृह-कल्याण सूची)। गणना 55.46 के अन्तर्दशा-अनुपात और 55.48 की उच्च/अंश-शर्तों से जुड़ती है; इस श्लोक में नया स्थिरांक नहीं।

55.50
अन्नदानं प्रियं नित्यं दानधर्मादिसंग्रहः |
महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणं
annadānaṃ priyaṃ nityaṃ dānadharmādisaṃgrahaḥ |
mahārājaprasādena vāhanāmbarabhūṣaṇaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्न-दानं प्रियं नित्यं = नित्य प्रिय अन्न-दान; दान-धर्म-आदि-संग्रहः = दान-धर्म आदि का संचय (पुण्य-संग्रह); महाराज-प्रसादेन = महाराज (राजा) के प्रसाद/अनुग्रह से; वाहन-अम्बर-भूषणं = वाहन, वस्त्र एवं आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस अन्तर में जातक नित्य प्रिय अन्न-दान करता है, दान-धर्मादि पुण्य संचित करता है, तथा राजा के अनुग्रह से वाहन, वस्त्र व आभूषण प्राप्त करता है। यह शुक्र-अन्तर के दान-भोग-सम्मान त्रिविध शुभ-फल हैं।

English rendering The text states that there is regular, welcome giving of food, an accumulation of charity and merit, and — through a great king's favour — vehicles, garments and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दान-सम्मान वर्णन)। कोई गणना नहीं; शुक्र-अन्तर के ऐश्वर्य-वैभव-प्रधान परिणामों का शास्त्रोक्त कथन।

55.51
व्यवसायात्फलाधिक्यं विवाहो मौञ्जिबन्धनम् |
षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे नीचे शत्रुगृहे स्थिते
vyavasāyātphalādhikyaṃ vivāho mauñjibandhanam |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye śukre nīce śatrugṛhe sthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसायात् = व्यवसाय / उद्यम से; फल-आधिक्यं = अधिक लाभ; विवाहः = विवाह; मौञ्जिबन्धनम् = यज्ञोपवीत / मुंज-बन्धन (उपनयन); षष्ठ-अष्टम-व्यये = षष्ठ, अष्टम या व्यय (१२) भाव में; शुक्रे = शुक्र स्थित होने पर; नीचे = नीच राशि में; शत्रु-गृहे = शत्रु-गृह में; स्थिते = स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पहले अनुकूल पक्ष कहता है — व्यवसाय से अधिक फल, विवाह और मौञ्जिबन्धन। फिर शर्त जोड़ता है: जब शुक्र षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो, अथवा नीच या शत्रु-गृह में स्थित हो — यह अशुभ विन्यास आगे के फल-श्लोकों का आधार बनता है। भाव-स्थान और नीच/शत्रु-गृह जन्मकालिक (या प्रयुक्त) राशि-चक्र की स्थिति पर निर्भर करते हैं।

English rendering The text first states surplus from enterprise, marriage, and the munji-bond (upanayana). It then conditions the adverse block: Venus placed in the 6th, 8th, or 12th, or in debilitation or an enemy’s sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-नियम (निर्धारक, फल नहीं): शुक्र की राशि-स्थिति R (D1, 1…12), लग्न L से भाव-सूचकांक
h = ((R − L) mod 12) + 1.
अशुभ-शर्त (श्लोकानुसार): h ∈ {6, 8, 12}, अथवा R = शुक्र-नीच = कन्या (Virgo), अथवा R ∈ शत्रु-स्वामित्व वाली राशियाँ (शास्त्रीय मित्र-शत्रु तालिका के अनुसार)।
नीचांश-सीमा (पारंपरिक): शुक्र नीच = 180° (कन्या 0°); पूर्ण नीच/उच्च की सूक्ष्म परिभाषा पाठ-परंपरा पर निर्भर — यहाँ केवल राशि-स्तर कहा गया है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (L = 1), शुक्र = वृश्चिक (R = 8) → h = ((8−1) mod 12)+1 = 8 → अष्टमस्थ — श्लोक की षष्ठाष्टमव्यय-शर्त लागू।
(यदि शुक्र तुला R = 7 → h = 7; नीच/षष्ठ-अष्टम-व्यय नहीं — यह श्लोक का अशुभ-हेतु नहीं।)
Convention: D1 राशि; अयनांश फल-कथन को नहीं बदलता, केवल देशान्तर-देशज रेखांश से राशि-निर्धारण में प्रयुक्त होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अन्तर्दशा-फल अध्याय विंशोत्तरी के अनुपात-गणित पर टिके हैं: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। शुक्र महादशा = २० वर्ष; उपग्रह की अन्तर्दशा उसी १२०-वर्ष चक्र की भिन्न है। फल-वाक्य अलग; काल-लंबाई इंजन की exact-अनुपात गणना से आती है।

55.52
मन्दारफणिसंयुक्ते तद्भुक्तौ रोगमादिशेत् |
अकस्मात्कलहं चैव पितृपुत्रवियोगकृत्
mandāraphaṇisaṃyukte tadbhuktau rogamādiśet |
akasmātkalahaṃ caiva pitṛputraviyogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द-आर-फणि-संयुक्ते = शनि, मंगल और राहु (फणिन्) से युक्त; तद्-भुक्तौ = उस (शुक्र/संबंधित) भुक्ति/अन्तर्दशा में; रोगम् = रोग; आदिशेत् = निर्देश करे / कहे; अकस्मात् = अचानक; कलहं = झगड़ा; च एव = तथा; पितृ-पुत्र-वियोग-कृत् = पिता-पुत्र वियोग कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अशुभ-स्थिति पर शास्त्र आगे कहता है: मन्द (शनि), आर (मंगल) और फणि (राहु) से युक्त होने पर, उस भुक्ति में रोग का निर्देश करे। अचानक कलह तथा पितृ-पुत्र वियोग कराने वाले संकेत भी बताए गए हैं। यह फल-कथन है — निश्चित घटना या भय-वाणी नहीं; योग-संयोग की शास्त्रीय सूची है।

English rendering The text states that when so joined with Saturn, Mars, and Rāhu, one should indicate disease in that bhukti; also sudden quarrel and father–son separation as textual indications.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (युति-शर्त सहित)।
तकनीकी पहचान मात्र: तीनों से “संयुक्त” = एक ही राशि में युति (अथवा पाठानुसार दृष्टि-योग — यहाँ संयुक्ते = युति प्राथमिक)।
युति-परीक्षण: sign(λ_Śukra) = sign(λ_Śani) = sign(λ_Maṅgala) = sign(λ_Rāhu) — पूर्ण त्रि-युति; अथवा न्यूनतम मन्द/आर/फणि में से संयोग (पाठ “मन्दारफणि” तीनों को जोड़ता है; आंशिक पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) शुक्र 215.0°, शनि 218.4°, मंगल 210.1°, राहु 212.0° — चारों वृश्चिक (210°–240°) → मन्दारफणि-संयुक्त शर्त पूर्ण।
(अयनांश: उदाहरण संख्याएँ सायन/निरयण दोनों में “एक राशि” मापदंड से चलती हैं; निरयण चुनें तो एक ही ayanāṃśa पूरे चारों पर लगाएँ।)

55.53
स्वबन्धुजनहानिश्च सर्वत्र जनपीडनम् |
दायादकलहश्चैव स्वप्रभोः स्वस्य मृत्युकृत्
svabandhujanahāniśca sarvatra janapīḍanam |
dāyādakalahaścaiva svaprabhoḥ svasya mṛtyukṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-बन्धु-जन = अपने सगे-सम्बन्धी; हानिः = क्षय, नाश; सर्वत्र = हर ओर; जन-पीडनम् = लोगों को कष्ट; दायाद = सह-उत्तराधिकारी, संपत्ति-भागी भाई-बन्धु; कलहः = विवाद; स्व-प्रभोः = अपने स्वामी/नियोक्ता का; स्वस्य = स्वयं का; मृत्युकृत् = मृत्यु-कारक (मारकवत् फल)।

हिन्दी भावार्थ (पूर्व श्लोक 51–52 के प्रसंग में — राहु-महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा, जब शुक्र ६/८/१२ में, नीच या शत्रुक्षेत्री, तथा शनि-मंगल-राहु से युक्त हो) — यह पाद उस अशुभ फल को आगे बढ़ाता है: शास्त्र कहता है कि ऐसी स्थिति में अपने बन्धुजनों की हानि, चारों ओर जनों को पीड़ा, दायादों (हिस्सेदार भाइयों) से कलह, तथा स्वामी एवं स्वयं के लिए मारक-तुल्य अरिष्ट का कथन किया गया है। यह घोर-फल है, अतः इसे शास्त्र-वचन रूप में ग्रहण करें — भय या नियति-घोषणा रूप में नहीं।

English rendering The text states that under this affliction there follows loss of one's own kinsmen, distress to people on every side, feud with co-heirs, and a death-inflicting condition touching one's master and oneself.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अशुभ फल-कथन (शुक्र के दुःस्थान/नीच/पापयोग की परिणति)। तकनीकी संकेत केवल इतना कि यह फल शुक्र की पूर्व-निर्दिष्ट दुर्बल स्थिति (६-८-१२ भाव = त्रिक/दुःस्थान समुच्चय {6,8,12}) पर आश्रित है — पद स्वयं कोई संख्या या अंश नहीं देता, केवल स्थिति का परिणाम गिनाता है।

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55.54
कलत्रपुत्रपीडा च शूलरोगादिसम्भवः |
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे वा समन्विते
kalatraputrapīḍā ca śūlarogādisambhavaḥ |
dāyeśātkendrarāśisthe trikoṇe vā samanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलत्र-पुत्र-पीडा = पत्नी और पुत्र संबंधी पीड़ा; च = और; शूल-रोग-आदि-संभवः = शूल आदि रोगों की संभावना (शास्त्र-कथन); दायेश-आत् = दशा-स्वामी से / दशा-स्वामी के; केन्द्र-राशि-स्थे = केन्द्र राशि में स्थित होने पर; त्रिकोणे = त्रिकोण में; वा = अथवा; समन्विते = समन्वित / स्थित।

हिन्दी भावार्थ प्रथम चरण में शास्त्र कलत्र-पुत्र पीड़ा और शूल-रोगादि की संभावना कहता है — पूर्व अशुभ-श्रृंखला का समापन-सा। दूसरे चरण में शर्त पलटती हुई दिखती है: दशा-स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो (आगे/संबंधित) विन्यास बदलता है। कई संस्करणों में केन्द्र-त्रिकोण वाला पक्ष शुभ-फल से जुड़ता है; यहाँ अगला श्लोक अध्याय-शीर्षक है — पाठ-क्रम/पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states pain regarding spouse and child and the arising of colic-type and similar ailments; and (next) when the daśā-lord stands in a kendra or trikoṇa sign — a placement rule that typically opens a different phala-block (recension sequence may vary).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-वर्ग (लग्न L, दशा-स्वामी की राशि R):
h = ((R − L) mod 12) + 1.
केन्द्र: h ∈ {1, 4, 7, 10}.
त्रिकोण: h ∈ {1, 5, 9} (1 = लग्न दोनों में; “केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे वा” = केन्द्र या त्रिकोण)।
“दायेश” = प्रचलित महादशा/अन्तर्दशा का स्वामी-ग्रह — विंशोत्तरी कुंजी से निश्चित।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क (L = 4), दशा-स्वामी शुक्र = मीन (R = 12) → h = ((12−4) mod 12)+1 = 9 → त्रिकोण (धर्म) — श्लोक की केन्द्र/त्रिकोण शर्त सत्य।
शुक्र = सिंह (R = 5) → h = ((5−4) mod 12)+1 = 2 → केन्द्र/त्रिकोण नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-स्वामी की पहचान विंशोत्तरी कुंजी से होती है (केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चंद्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; योग = १२०)। केन्द्र/त्रिकोण जाँच शुद्ध मॉड्यूलर भाव-गणित है — फल-वाक्य से अलग, exact स्थिति-परीक्षण।

55.55
लाभे वा कर्मराशिस्थे क्षेत्रपालमहत्सुखम् |
सुगन्धवस्त्रशय्यादि गानवाद्यसुखं भवेत्
lābhe vā karmarāśisthe kṣetrapālamahatsukham |
sugandhavastraśayyādi gānavādyasukhaṃ bhavet
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभे वा = एकादश में अथवा; कर्मराशिस्थे = दशम राशि में स्थित (अन्तर्दशा-स्वामी) होने पर; क्षेत्रपालमहत्सुखम् = भू-स्वामित्व/क्षेत्र-पालन का महान् सुख; सुगन्धवस्त्रशय्यादि = सुगन्ध, वस्त्र, शय्या आदि; गानवाद्यसुखम् = गीत-वाद्य का सुख; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ राहु-महादशा की अन्तर्दशाओं के फल-क्रम में — शास्त्र कहता है कि (अन्तर्दशा-स्वामी) एकादश या दशम भाव में हो तो क्षेत्र-पालन का महान् सुख, सुगन्ध-वस्त्र-शय्या आदि भोग और गीत-वाद्य का सुख कहा गया है।

English rendering With the sub-period lord in the eleventh or the tenth, the text promises the great happiness of holding lands, enjoyment of perfumes, garments and beds, and the pleasures of song and music.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: अन्तर्दशेश ∈ भाव {10, 11}; महादशा-आधार राहु 18 वर्ष; अन्तर्दशा = (18 × वर्ष_P) ÷ 120।

55.56
छत्रचामरभूषाप्तिः प्रियवस्तुसमन्विता |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते
chatracāmarabhūṣāptiḥ priyavastusamanvitā |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छत्र = छत्र / राजचिह्न-सा आच्छादन; चामर = चँवर; भूषा = आभूषण; आप्तिः = प्राप्ति; प्रिय-वस्तु-समन्विता = प्रिय वस्तुओं से युक्त; दायेश-आत् = दशा-स्वामी से; रिपु-रन्ध्र-स्थे = रिपु (६) और रन्ध्र (८) में स्थित; व्यये = व्यय (१२) में; वा = अथवा; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक ओर छत्र, चामर, भूषा और प्रिय वस्तु की प्राप्ति कहता है। दूसरी ओर दशा-स्वामी के रिपु-रन्ध्र या व्यय में होने, अथवा पाप-युक्त होने की शर्त जोड़ता है। कई पाठ-परंपराओं में शुभ-फल और अशुभ-शर्त क्रमिक श्लोकों में बँटते हैं; इस पंक्ति-युग्म का पूर्ण फल आगे के श्लोकों से जुड़ सकता है — पाठ-भेद/संयोजन संभव। दोनों पक्षों को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखें।

English rendering The text states gain of umbrella, chowrie, ornaments, and dear objects; and names the condition of the daśā-lord in the 6th/8th or 12th, or joined with malefics — a pairing that may continue across the next verse in some recensions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-शर्त: h = ((R_D − L) mod 12) + 1, R_D = दायेश की राशि।
रिपु-रन्ध्र-व्यय: h ∈ {6, 8, 12}.
पाप-संयुक्त: sign(λ_D) = sign(λ_P) किसी पाप P ∈ {सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु} पर (बुध/चंद्र पापता सशर्त — यहाँ सामान्य “पाप” सूची शास्त्र-परंपरा पर निर्भर; न्यूनतम क्रूर: मंगल, शनि, राहु)।
राहु-अन्तर्दशा लंबाई: t = (Y_mahā × 18) / 120 वर्ष।

उदाहरण (worked example) लग्न = तुला (L = 7), दायेश = राहु मीन में (R = 12) → h = ((12−7) mod 12)+1 = 6 → रिपुस्थ — श्लोक की रिपुरन्ध्र/व्यय शर्त में।
राहु-अन्तर्दशा गुरु-महादशा (Y = 16) में: t = (16 × 18)/120 = 2.4 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-अन्तर्दशा का काल-खंड exact अनुपात (Y × 18)/120 से आता है; षष्ठाष्टमव्यय जाँच षोडश-वर्ग/D1 भाव-इंजन की मॉड्यूलर h-गणना से। फल-पंक्तियाँ शास्त्र-कथन रहती हैं — oracle-शैली में अवधि और भाव-सूचकांक `==` से सत्यापित होते हैं, फल “भाग्य-निश्चित” नहीं।

55.57
विप्राहिनृपचौरादिमूत्रकृच्छ्रान्महद्भयम् |
प्रमेहाद्रौधिरो रोगः कुत्सितान्नं शिरोव्यथा
viprāhinṛpacaurādimūtrakṛcchrānmahadbhayam |
pramehādraudhiro rogaḥ kutsitānnaṃ śirovyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विप्र = ब्राह्मण / विद्वान् पक्ष; अहि = शत्रु (व्यापक अर्थ में भी); नृप = राजा / राज्य-शक्ति; चौरादि = चोर आदि; मूत्रकृच्छ्रात् = मूत्र-संबंधी कष्ट से; महद्भयम् = बड़ा भय; प्रमेहात् = प्रमेह (शास्त्रीय रोग-नाम) से; रौधिरः रोगः = रक्त-संबंधी रोग; कुत्सितान्नम् = निंद्य / अशुद्ध अन्न; शिरोव्यथा = शिरःपीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-निर्दिष्ट दशा-स्थिति में) ब्राह्मण, शत्रु, राजा और चोर आदि से बड़ा भय बताया गया है, तथा मूत्रकृच्छ्र से भी महद्भय कहा गया है। प्रमेह और रक्त-संबंधी रोग, कुत्सित अन्न का सेवन-प्रसंग, तथा शिरःपीड़ा—ये फल-संकेत भी इसी क्रम में गिनाए गए हैं। यह पूरा पद फल-कथन है; इसे नियति या चिकित्सकीय निदान नहीं समझना।

English rendering The text states great fear from brahmins, enemies, kings, thieves and the like, and from urinary distress; it further lists prameha, a blood-related ailment, unclean food, and headache among the indicated results of the stated period-condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-फल सूची)। यहाँ कोई अंश, बिन्दु या काल-संख्या नहीं; केवल शास्त्र-निर्दिष्ट फलों की गणना-श्रृंखला है।

55.58
कारागृहप्रवेशश्च राजदण्डाद्धनक्षयः |
द्वितीयद्यूननाथे वा दारपुत्रादिनाशनम्
kārāgṛhapraveśaśca rājadaṇḍāddhanakṣayaḥ |
dvitīyadyūnanāthe vā dāraputrādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारागृह-प्रवेशः = बन्दीगृह में प्रवेश; राज-दण्डात् = राजदण्ड (शासकीय दण्ड) से; धन-क्षयः = धन-नाश; द्वितीय = द्वितीय भाव (2); द्यून = सप्तम भाव (7, दारा-स्थान); नाथे = अधिपति होने पर → द्वितीयेश/सप्तमेश (मारकेश); दार = पत्नी; पुत्र-आदि = सन्तानादि; नाशनम् = नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कारावास, राजदण्ड से धन-हानि। उत्तरार्ध मारक-सिद्धान्त लाता है: यदि (अन्तर्दशेश) द्वितीय या सप्तम भाव का स्वामी (मारकेश) हो, तो पत्नी-सन्तान आदि को अरिष्ट का कथन है। यह मारक-भावेश की परम्परागत योजना है — शास्त्र का वचन, न कि नियति।

English rendering Imprisonment and loss of wealth through royal penalty are stated; and if the sub-lord owns the 2nd or 7th house (the maraka places), harm to spouse and children is declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारकेश-चयन (भावेश-गणना)। लग्न-राशि L से भाव-स्वामित्व: द्वितीयेश = स्वामी(rāśi L+1), सप्तमेश = स्वामी(rāśi L+6), जहाँ rāśi-अंक mod 12 पर चलता है। मारक-स्थान समुच्चय = {2, 7}; इनके अधिपति मारकेश कहलाते हैं।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह (L = 5, स्वामी सूर्य)। द्वितीय = कन्या (6) → स्वामी बुध; सप्तम = कुम्भ (11) → स्वामी शनि। अतः बुध व शनि इस कुण्डली के मारकेश; यदि इनमें से कोई राहु का अन्तर्दशेश बने, तो यह पाद उसे मारक-प्रवृत्ति देता है।

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55.59
आत्मपीडा भयं चैव ह्यपमृत्युभयं भवेत् |
दुर्गालक्ष्मीजपं कुर्यात् ततःसुखमवाप्नुयात्
ātmapīḍā bhayaṃ caiva hyapamṛtyubhayaṃ bhavet |
durgālakṣmījapaṃ kuryāt tataḥsukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्म-पीडा = स्वयं/देह को कष्ट; भयम् = भय; अपमृत्यु = अकाल/अपघात-मृत्यु; भयम् भवेत् = का भय हो; दुर्गा-लक्ष्मी-जपम् = दुर्गा एवं लक्ष्मी का जप; कुर्यात् = करे; ततः = तदुपरान्त; सुखम् अवाप्नुयात् = सुख प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अशुभ-खण्ड का उपसंहार शान्ति-विधान से करता है: देह-पीड़ा, भय एवं अपमृत्यु-भय की आशंका कहकर, उपाय-रूप में दुर्गा-लक्ष्मी-जप का विधान बताता है, जिससे तदुपरान्त सुख की प्राप्ति कही गई है। इसे शास्त्रोक्त परम्परागत शान्ति-कर्म समझें — भय-दबाव या अनिवार्य उपचार-रूप में नहीं।

English rendering Bodily distress, fear, and dread of untimely death may arise; the text prescribes recitation to Durgā and Lakṣmī, after which ease is said to be regained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान/उपाय-कथन। शास्त्र यहाँ फल के अनन्तर परम्परागत जप-प्रतिकार जोड़ता है; यह अंश आस्था-मूलक विधान है, कोई परिकलन नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पाद हमारी मूल अनुशासन-रेखा को उजागर करता है (dossier §5, framing-rules): फल एवं उपाय शास्त्र के कथन हैं — इन्हें हम "the text states / शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत करते हैं, नियति, निश्चितता या दबाव-उपाय रूप में नहीं। भय-आधारित remedies-as-pressure हमारे निर्णय-तंत्र में वर्जित है; अन्तर्दशा-काल (§3 विंशोत्तरी) की गणना अलग, और उसका फल-कथन अलग — यही गणित/व्याख्या का पृथक्करण है।

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55.60
राहोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे |
त्रिकोणे लाभगे वाऽपि तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा
rāhorantargate sūrye svocce svakṣetrakendrage |
trikoṇe lābhage vā'pi tuṅgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्गत = राहु की अन्तर-दशा में; सूर्ये = सूर्य (जब सूर्य सक्रिय हो / सूर्य का प्रसंग); स्व-उच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्व-क्षेत्र = स्व-राशि / स्व-क्षेत्र; केन्द्र-गे = केन्द्र (1,4,7,10) में स्थित; त्रिकोणे = त्रिकोण (1,5,9) में; लाभ-गे = लाभ (एकादश) भाव में; वा अपि = अथवा; तुङ्ग-अंशे = उच्च-नवांश (D9) में; स्व-अंश-गे = स्व-नवांश में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ जब राहु की अन्तरदशा में सूर्य (का काल/प्रभाव) चले, और सूर्य उच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, त्रिकोण, लाभ में हो, अथवा तुङ्गांश या स्वांश में हो—तब आगे के शुभ फल-वाक्यों का द्वार खुलता है। यह दशा + स्थिति (placement) की संयुक्त शर्त है। पाठ-भेद संभव जहाँ “राहोरन्तर्गते सूर्ये” को सूर्य-महादशा-राहु-अन्तर या राहु-महादशा-सूर्य-अन्तर—दोनों रीतियों से पढ़ा जाता है; यहाँ शब्दार्थ “राहु की अन्तर में सूर्य” है।

English rendering When the Sun operates under Rāhu’s antardaśā, and the Sun is in exaltation, own sign, a kendra, a trikoṇa, or the eleventh, or in exaltation-aṃśa or own aṃśa, the favourable results stated next are conditioned on that configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अन्तर-काल + स्थिति-नियम (कोई नई वर्ष-सारणी नहीं)।
• महादशा-वर्ष (ग्रह) × अन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120 = अन्तरदशा-वर्ष (विंशोत्तरी; Σ महादशा = 120 वर्ष: केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)।
• केन्द्र = भाव {1,4,7,10}; त्रिकोण = {1,5,9}; लाभ = 11।
• उच्च (सूर्य) = मेष 10° (परंपरागत उच्च-बिन्दु; राशि-स्थित “उच्च” = मेष में सूर्य)।
• तुङ्गांश / स्वांश = D9 (नवमांश) में उच्च या स्व-राशि-अंश—D9 = प्रत्येक 30° राशि को 9 × (30°/9 = 3°20′) खंडों में बाँट कर नियम-अनुसार राशि-मानचित्र।
सम्मेलन घोषित करें: अयनांश, लग्न/भाव-पद्धति (सामान्यतः पूर्ण-राशि भाव जब केवल “केन्द्र/त्रिकोण/लाभ” कहा हो), और नवमांश-नियम (सम/विषम राशि-क्रम)।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी में राहु महादशा = 18 वर्ष; सूर्य अन्तर = (18 × 6)/120 = 0.9 वर्ष = 0.9 × 360 ≈ 324 दिन (सौर-वर्ष ≈ 365.25 d पर ~328.7 d—इंजन जिस वर्ष-दिन परिभाषा पर चले, वही घोषित करें)। यदि जन्मकालीन सूर्य स्पष्ट = मेष 12° (उच्च-राशि), भाव-11 से दृष्ट/स्थित “लाभगे” की जाँच पूर्ण-राशि भाव में: सूर्य-राशि = लग्नाद् 11वीं हो तो लाभ-शर्त पूर्ण। D9: मेष में सूर्य 12° → नवमांश-सूचकांक = ⌊12° ÷ 3°20′⌋ = ⌊12 ÷ 3.333…⌋ = 3 → चौथा नवमांश (0-based index 3); विषम राशि मेष में क्रम मेष से—चौथा = कर्क (स्व/उच्च-अंश नहीं); तुङ्गांश तभी जब D9-राशि = मेष। इस उदाहरण में “स्वोच्चे” D1 पर सत्य, “तुङ्गांशे” D9 पर असत्य—श्लोक “वा” से एक पर्याप्त शर्त माँगता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी का 120-वर्ष चक्र और अन्तर = (महा × अन्तर)/120—यही वह अनुपात-गणित है जो दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बैठा है। “राहोरन्तर्गते सूर्ये” काल-द्वार है; उच्च/केन्द्र/त्रिकोण/लाभ/अंश शर्तें वर्ग-इंजन (D1 + D9) की शुद्ध मॉड्यूलर स्थिति हैं—फल अलग, गणना अलग: exact placement `==` शर्त, व्याख्या “शास्त्र कहता है” स्तर पर।

55.61
शुभग्रहेण सन्दृष्टे राजप्रीतिकरं शुभम् |
धनधान्यसमृद्धिश्च ह्यल्पमान सुखवाहम्
śubhagraheṇa sandṛṣṭe rājaprītikaraṃ śubham |
dhanadhānyasamṛddhiśca hyalpamāna sukhavāham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-ग्रहेण = शुभ ग्रह से; सन्दृष्टे = सम्यक् दृष्ट / दृष्ट होने पर; राज-प्रीति-करम् = राजा की प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला; शुभम् = शुभ (फल); धन-धान्य-समृद्धिः = धन-धान्य की समृद्धि; च = और; अल्प-मान = अल्प / सीमित मात्रा में; सुख-वाहम् = सुख लाने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की स्थिति में यदि सूर्य शुभ ग्रह से दृष्ट हो, तो शास्त्र राज-प्रीति और शुभ फल कहता है। धन-धान्य-समृद्धि तथा अल्प-मान में सुख-वाहक परिणाम—यह भी पाठ का कथन है। “अल्पमान” यहाँ अतिरंजित वैभव नहीं, संयमित शुभ का संकेत है।

English rendering If (the Sun, in that Rāhu-antardaśā configuration) is aspected by a benefic, the text states results that please the king and are auspicious, with prosperity of wealth and grain, and happiness of a modest measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दृष्टि-शर्त। “शुभग्रहेण सन्दृष्टे” = standard graha-dṛṣṭi on the birth chart (full aspect arcs as per the house’s dṛṣṭi chapter: e.g. Jupiter 5th/7th/9th, etc.); no new numeric constant in this verse—only a Boolean aspect-check before applying the stated phala.

55.62
अल्पग्रामाधिपत्यं च स्वल्पलाभो भविष्यति |
भाग्यलग्नेशसंयुक्ते कर्मेशेन निरीक्षिते
alpagrāmādhipatyaṃ ca svalpalābho bhaviṣyati |
bhāgyalagneśasaṃyukte karmeśena nirīkṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अल्प-ग्राम-अधिपत्यम् = छोटे ग्राम का अधिपत्य / सीमित क्षेत्र-स्वामित्व; च = और; स्वल्प-लाभः = थोड़ा लाभ; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); भाग्य = नवम भाव; लग्नेश = लग्नाधिपति; संयुक्ते = युक्त / संयोग में; कर्मेशेन = दशमेश से; निरीक्षिते = दृष्ट होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अल्प-ग्राम-अधिपत्य और स्वल्प-लाभ कहता है—बड़े साम्राज्य का दावा नहीं। जब (सूर्य/योग) भाग्येश-लग्नेश से संयुक्त हो और कर्मेश से दृष्ट हो, तब अगले श्लोक का ऊँचा फल-क्रम जुड़ता है। यह युति-दृष्टि की द्वार-शर्त है।

English rendering The text states lordship over a small village and only slight gain; (further elevation follows) when conjoined with the lords of fortune (ninth) and the lagna, and aspected by the lord of action (tenth).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्वामी-संयोग/दृष्टि नियम (फल-द्वार), नई संख्या नहीं।
• भाग्येश = lord of house 9; लग्नेश = lord of house 1; कर्मेश = lord of house 10 (D1, chosen house system declared).
• संयोग = same rāśi (or same bhāva, if bhāva-candra/śrīpati used—declare).
• निरीक्षित = aspect from karmesha per standard dṛṣṭi.
Boolean: (Sun/yoga-point conjunct 9th-lord AND 1st-lord) AND (aspected by 10th-lord) → unlock next-phala tier; else remain at “alpa-grāma / svalpa-lābha” tier as the text sequences.

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या → लग्नेश = बुध; भाग्य (9) = वृषभ → भाग्येश = शुक्र; कर्म (10) = मिथुन → कर्मेश = बुध। यदि सूर्य मिथुन में बुध-युक्त (लग्नेश=कर्मेश एक ही) और शुक्र भी मिथुन में हो, तो “भाग्यलग्नेशसंयुक्ते” अंशतः/पूर्णतः संतुष्ट; कर्मेश-दृष्टि स्व-युति से भी पूरी। अयनांश: किसी भी sidereal frame (e.g. Lahiri) पर वही rāśi-lords—convention pin before asserting lords.

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-काल (विंशोत्तरी अनुपात) और भाव-स्वामी-ग्राफ अलग परतें हैं—इंजन पहले antardaśā खिड़की खोलता है, फिर D1 पर lordship/conjunction/aspect `==` जाँचता है। फल “अल्प” बनाम “राजाश्रय” का स्तर इन्हीं द्वार-शर्तों पर शास्त्र ने बाँधा है; हम केवल शर्त-सत्यापन करते हैं, फल का दावा नहीं।

55.63
राजाश्रयो महाकीर्तिर्विदेशगमनं तथा |
देशाधिपत्ययोगश्च गजश्वाम्बरभूषणम्
rājāśrayo mahākīrtirvideśagamanaṃ tathā |
deśādhipatyayogaśca gajaśvāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-आश्रयः = राजा / राज्य-शक्ति का आश्रय; महा-कीर्तिः = बड़ी कीर्ति; विदेश-गमनम् = विदेश यात्रा / परदेश-गमन; तथा = तथा; देश-अधिपत्य-योगः = देश पर अधिपत्य का योग (शास्त्र-नाम); च = और; गज = हाथी; अश्व = घोड़ा; अम्बर = वस्त्र; भूषणम् = आभूषण।

हिन्दी भावार्थ जब पूर्व की भाग्य-लग्नेश-युति और कर्मेश-दृष्टि पूरी हो, तब शास्त्र राजाश्रय, महाकीर्ति, विदेश-गमन, देशाधिपत्य-योग, तथा गज-अश्व-अम्बर-भूषण का फल कहता है। यह ऊपरी फल-पटल उसी दशा-स्थिति-दृष्टि श्रृंखला का चरम कथन है—गारंटी या भय-वाणिज्य नहीं, पाठ का समृद्धि-सूचक वाक्य।

English rendering Under those completed conditions, the text states royal patronage, great renown, travel abroad, a yoga of dominion over a country, and the enjoyment of elephants, horses, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उच्च-स्तरीय दशा-फल)। कोई नई अवधि-वर्ष या बल-रূপ नहीं; 55.60–62 की दशा + स्थिति + दृष्टि शर्तों के सत्य होने पर लागू होने वाला phala-block।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरी श्रृंखला—राहु-अन्तर में सूर्य, उच्च/केन्द्र/त्रिकोण/लाभ/अंश, शुभ-दृष्टि, फिर भाग्य-लग्नेश-युति व कर्मेश-दृष्टि—विंशोत्तरी काल-अंकगणित और D1/D9 स्थिति-इंजन की संयुक्त pipeline है। 120-वर्ष चक्र और (महा×अन्तर)/120 अनुपात verified; फल-वाक्य “शास्त्र कहता है” पटल पर रहते हैं, exact-`==` केवल गणना-परत पर।

55.64
मनोऽभिष्टप्रदानं च पुत्रकल्याणसम्भवम् |
दयेशाद्रिःफरन्ध्रस्थे षष्ठे वा नीचगेऽपि वा
mano'bhiṣṭapradānaṃ ca putrakalyāṇasambhavam |
dayeśādriḥpharandhrasthe ṣaṣṭhe vā nīcage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मनोऽभीष्ट-प्रदानम् = मनोवांछित की प्राप्ति; पुत्र-कल्याण-सम्भवम् = सन्तान का कल्याण; दायेशात् = दशानाथ से; रिःफ = द्वादश (12); रन्ध्र = अष्टम (8); स्थे = स्थित; षष्ठे = षष्ठ (6) में; नीचगे = नीच राशि में; वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध शुभ: मनोवांछित की पूर्ति एवं सन्तान का कल्याण। उत्तरार्ध नई अशुभ शर्त: किन्तु यदि (अन्तर्दशेश) दायेश से द्वादश, अष्टम या षष्ठ में हो, अथवा नीच राशिगत हो — तो (अगला श्लोक) कष्ट-फल कहता है। यहाँ पुनः त्रिक (6-8-12) + नीच = अशुभ की कसौटी है।

English rendering Fulfilment of the heart's wishes and the welfare of children are stated; but if the sub-lord lies in the 12th, 8th or 6th from the daśā-lord, or in debilitation, the ensuing troubles follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दुःस्थान + नीच समुच्चय-गणना। दायेश-राशि R से p = ((rāśi(X) − rāśi(R)) mod 12)+1; अशुभ यदि p ∈ {6,8,12} (त्रिक) ∨ ग्रह नीच-राशिस्थ। नीच-राशि (मानक): सूर्य = तुला, चन्द्र = वृश्चिक, मंगल = कर्क, बुध = मीन, गुरु = मकर, शुक्र = कन्या, शनि = मेष।

उदाहरण (worked example) राहु कन्या (rāśi 6) में; सूर्य (अन्तर्दशेश) मेष (rāśi 1) में → p = ((1−6) mod 12)+1 = (7)+1 = 8 → रन्ध्र (अष्टम)। दायेश से अष्टम → अशुभ-पक्ष; यदि इसके अतिरिक्त सूर्य तुला-गत (नीच) होता, तो दोष द्विगुणित।

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55.65
ज्वरातिसाररोगश्च कलहो राजविग्रहः |
प्रयाणं शत्रुवृद्धिश्च न्रिपचौराग्निपीडनम्
jvarātisārarogaśca kalaho rājavigrahaḥ |
prayāṇaṃ śatruvṛddhiśca nripacaurāgnipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वर-अतिसार-रोगः = ज्वर व अतिसार (दस्त) रोग; कलहः = झगड़ा; राज-विग्रहः = राजा से विरोध; प्रयाणम् = (विवश) यात्रा; शत्रु-वृद्धिः = शत्रुओं की वृद्धि; नृप-चौर-अग्नि-पीडनम् = राजा, चोर व अग्नि से पीड़ा। (पाठ में "न्रिप" — लिपि-दोष; शुद्ध "नृप"; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (दुःस्थानगत/नीच सूर्य की शर्त पर) इस काल में ज्वर-अतिसार, कलह, राजविरोध, यात्रा, शत्रु-वृद्धि तथा राजा-चोर-अग्नि से पीड़ा की सम्भावना है। ये शास्त्र-कथित प्रवृत्तियाँ हैं, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states there may be fever and dysentery, quarrels, conflict with the king, (forced) travel, growth of enemies, and affliction from the king, thieves and fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट-रोग व विरोध-वर्णन)। यह श्लोक ६४ की "दायेश से ६/८/१२ या नीच" शर्त का परिणाम-वाचन है; कोई संख्यात्मक इकाई नहीं — केवल स्थान-आश्रित अरिष्ट का शास्त्रीय कथन, भय-प्रेरण या नियति-कथन नहीं।

55.66
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दश्चिक्ये लाभगेऽपि वा |
विदेशे राजसम्मानं कल्याणं च शुभावहम्
dāyeśātkendrakoṇe vā daścikye lābhage'pi vā |
videśe rājasammānaṃ kalyāṇaṃ ca śubhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (चालू महादशा-स्वामी राहु) से गिनकर — भाव-गणना का मूल-बिन्दु; केन्द्र = 1/4/7/10 भाव (aṅgle); कोण = 5/9 भाव (त्रिकोण); दुश्चिक्य ("दश्चिक्ये" पाठ) = तृतीय भाव; लाभ = एकादश भाव; विदेशे = परदेश में; राजसम्मानम् = राजा से सम्मान; कल्याणम् = मंगल; शुभावहम् = शुभ लाने वाला।

हिन्दी भावार्थ (राहु-महादशा में सूर्य-अन्तर्दशा का शेष फल) — जब दशेश राहु से अन्तर्दशेश सूर्य केन्द्र, त्रिकोण, तृतीय या लाभ-स्थान में स्थित हो, तब शास्त्र कहता है कि जातक को परदेश में राजसम्मान, कल्याण और शुभ फल प्राप्त होते हैं। (मत-भेद संभव: कुछ आचार्य "दायेश" से अन्तर्दशेश की गणना करते हैं, कुछ महादशेश से।)

English rendering When (in Rāhu's daśā) the Sun as sub-period lord stands in a kendra, a trine, the 3rd, or the 11th reckoned from the daśā-lord, the text states one wins royal honour abroad, well-being, and auspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त शुद्ध स्थान-गणित है — दायेश से भाव-समुच्चय: केन्द्र ∈ {1,4,7,10}, कोण ∈ {5,9}, दुश्चिक्य = 3, लाभ = 11; भाव = ((अन्तर्ग्रह-राशि − दशेश-राशि) mod 12) + 1। फल-वाक्य स्वयं फल-कथन है — शास्त्र का कथन, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

उदाहरण (worked example) दशेश राहु मेष (राशि 1) में हो → केन्द्र = मेष/कर्क/तुला/मकर, कोण = सिंह/धनु, तृतीय = मिथुन, लाभ = कुम्भ। यदि सूर्य धनु (मेष से 9वीं) में हो → कोण में → शर्त पूर्ण → शुभ फल-कथन लागू।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक राहु-महादशा (18 वर्ष) की सूर्य-अन्तर्दशा को समाप्त करता है। हमारे विंशोत्तरी इंजन (120-वर्ष चक्र, दोसियर §3) से इसकी अवधि = 18 × 6 ÷ 120 = 108/120 = 0.9 वर्ष = 10 माह 24 दिन — शुद्ध अनुपात-गणित, न कि अनुमान।

55.67
द्वितीयद्यूननाथे तु महारोगो भविष्यति |
सूर्यप्रणामं शान्तिं च कुर्यादारोग्यसम्भवाम्
dvitīyadyūnanāthe tu mahārogo bhaviṣyati |
sūryapraṇāmaṃ śāntiṃ ca kuryādārogyasambhavām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (2, धन-मारक) अथवा द्यून = सप्तम (7, मारक) भाव का स्वामी होने पर; तु = किन्तु; महारोगः = भारी रोग; भविष्यति = होगा (शास्त्रोक्ति); सूर्य-प्रणामम् = सूर्य को नमन/अर्घ्य; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; कुर्यात् = करे; आरोग्य-सम्भवाम् = आरोग्य की सम्भावना हेतु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वही सूर्य यदि द्वितीय या सप्तम (मारक-स्थानों) का स्वामी हो, तो इस अन्तर में महारोग की आशंका बताई गई है। इसके निवारणार्थ पाठ में सूर्य को प्रणाम एवं यथाविधि शान्ति-कर्म का विधान है, जिससे आरोग्य सम्भव हो। यह श्लोक राहु-सूर्य अन्तर के प्रकरण का समापन करता है।

English rendering But should that Sun own the 2nd or 7th (the māraka houses), the text states a grave illness may arise; it prescribes obeisance to the Sun and the due pacificatory rite as a means toward health.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं शान्ति-विधान। मारक-संज्ञा स्वयं स्थान-नियम है: द्वितीय व सप्तम भाव मारक कहलाते हैं — यह श्लोक का एकमात्र "तकनीकी" तत्त्व है, शेष फल-वचन। शान्ति-कर्म यहाँ शास्त्र का प्रस्ताव है, भय या दबाव नहीं।

55.68
राहोरन्तर्गते चन्द्रे स्वक्षेत्रे स्वोच्चगेऽपि वा |
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मित्रर्क्षे शुभसंयुते
rāhorantargate candre svakṣetre svoccage'pi vā |
kendratrikoṇalābhe vā mitrarkṣe śubhasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्गते चन्द्रे = राहु-महादशा के भीतर चन्द्र की अन्तर्दशा में; स्वक्षेत्रे = अपनी राशि (कर्क) में; स्वोच्चगे = उच्च राशि (वृष) में; केन्द्र-त्रिकोण-लाभे = केन्द्र/त्रिकोण/एकादश में; मित्रर्क्षे = मित्र-राशि में; शुभसंयुते = शुभ ग्रहों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ अब राहु में चन्द्र की अन्तर्दशा का आरम्भ होता है। शास्त्र कहता है — यदि चन्द्र स्वराशि, उच्च, केन्द्र-त्रिकोण या लाभ में, मित्रराशि में अथवा शुभग्रह-युक्त हो, तो यह अन्तर बलवान् एवं शुभ फलप्रद बनता है (फल अगले श्लोकों में)। यह चन्द्र के बलाधान (स्थान-बल) की गणना है।

English rendering Now, within Rāhu's major period, when the sub-period of the Moon runs — the Moon in own sign, in exaltation, in a kendra, trine or the 11th, in a friend's sign, or joined with benefics — the text sets up a strong and auspicious sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विमशोत्तरी अन्तर्दशा-मान: राहु महादशा = 18 वर्ष, चन्द्र = 10 वर्ष → चन्द्र-अन्तर = (18 × 10)/120 = 1.5 वर्ष = 1 वर्ष 6 मास। स्थान-बल यहाँ द्विआधारी विचार है: स्वक्षेत्र/उच्च/केन्द्र/त्रिकोण/लाभ/मित्रर्क्ष = बल-वर्धक स्थान-वर्ग।

उदाहरण (worked example) राहु महादशा 18 वर्ष लो। अन्तर्दशा-क्रम महादशेश (राहु) से आरम्भ: राहु→गुरु→शनि→बुध→केतु→शुक्र→सूर्य→चन्द्र→मंगल। चन्द्र-अन्तर = 18 × (10/120) = 180/120 = 1.5 वर्ष; अर्थात् 18 मास तक यही चन्द्र-फल सक्रिय रहेगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक हमारे विमशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (BPHS Ch.46–47) का अनुप्रयोग है — Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17 (Σ = 120)। अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 — शुद्ध अनुपात-गणित, जिसे हम काल-खण्ड के रूप में निकालते हैं; श्लोक उस खण्ड का फल-कथन देता है।

55.69
राजत्वं राजपूज्यत्वं धनार्थं धनलाभकृत् |
आरोग्यं भूषण्ं चैव मित्रस्त्रीपुत्रसम्पदः
rājatvaṃ rājapūjyatvaṃ dhanārthaṃ dhanalābhakṛt |
ārogyaṃ bhūṣaṇṃ caiva mitrastrīputrasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजत्वम् = राज-पद/नेतृत्व; राजपूज्यत्वम् = राजा द्वारा पूज्य होना; धनार्थं धनलाभकृत् = अर्थ हेतु धन-लाभ कराने वाला; आरोग्यम् = नीरोगता; भूषणम् = आभूषण; मित्र-स्त्री-पुत्र-सम्पदः = मित्र, पत्नी, पुत्र की सम्पदा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के बलवान् चन्द्र का फल-कथन — शास्त्र कहता है कि इस अन्तर में राज-पद तथा राजा से सम्मान, धन-लाभ, आरोग्य, आभूषण एवं मित्र-पत्नी-पुत्र की समृद्धि प्राप्त होती है। यह उत्तम चन्द्र-अन्तर का सुफल-वर्णन है।

English rendering The text states that this sub-period yields lordship and esteem in a king's eyes, gain of wealth, sound health, ornaments, and the prosperity of friends, wife and sons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ चन्द्र-अन्तर का सुफल)। ध्यातव्य: फल की मात्रा पूर्व श्लोक 55.68 के स्थान-बल पर निर्भर है — बल जितना अधिक, फल-कथन उतना ही पूर्ण; यह श्लोक स्वयं कोई संख्या नहीं देता।

55.70
पूर्णे चन्द्रे फलं पूर्णं राजप्रीत्या शुभावहम् |
अश्ववाहनलाभः स्यद्गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत्
pūrṇe candre phalaṃ pūrṇaṃ rājaprītyā śubhāvaham |
aśvavāhanalābhaḥ syadgṛhakṣetrādivṛddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णे चन्द्रे = पूर्ण (पूर्णिमा-कालीन, पक्ष-बलयुक्त) चन्द्र होने पर; फलम् पूर्णम् = पूर्ण फल; राजप्रीत्या = राजा की प्रीति से; शुभावहम् = शुभकारी; अश्ववाहनलाभः = घोड़े-वाहन की प्राप्ति; गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् = गृह-भूमि आदि की वृद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र जितना पूर्ण (शुक्ल-पक्षीय, बलवान) होगा, फल उतना ही पूर्ण होगा — शास्त्र कहता है कि राजप्रीति, अश्व-वाहन-लाभ और गृह-क्षेत्रादि की वृद्धि होती है। यह श्लोक स्वयं फल के "चन्द्र-बल के समानुपाती" होने का सिद्धान्त कहता है।

English rendering As the Moon is full, so is the result full: the text states royal favour, gain of horses and conveyances, and increase of house and land — the fruit scaling with the Moon's brightness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ स्पष्ट पक्ष-बल तकनीक है। पक्षबल (शुभ-ग्रह) = Δ ÷ 3 विरूप, जहाँ Δ = |चन्द्र − सूर्य| का अंशात्मक अन्तर (0°–180°)। पूर्णिमा पर Δ = 180° → 60 विरूप = 1 रूप (पूर्ण)। अमावस्या पर Δ ≈ 0° → ~0। चन्द्र का फल ∝ पक्षबल। (परिपाटी घोषित: BPHS चन्द्र का पक्षबल द्विगुणित लेता है; 1 रूप = 60 विरूप।)

उदाहरण (worked example) चन्द्र 200°, सूर्य 30° → Δ = 170° → पक्षबल = 170 ÷ 3 ≈ 56.7 विरूप ≈ 0.94 रूप → लगभग "पूर्ण फल"। इसके विपरीत Δ ≈ 10° (अमावस्या-निकट) → ≈ 3.3 विरूप → अत्यल्प फल।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पूर्णे चन्द्रे फलं पूर्णं" वस्तुतः षड्बल के काल-बल-घटक पक्षबल का शास्त्रीय कथन है (दोसियर §4, BPHS अ.27)। हमारे ढाँचे में यह विशुद्ध गणना है — विरूप/रूप की संख्यात्मक इकाई में, व्याख्या से पृथक्; फल-वाक्य को शास्त्र का कथन रखते हुए बल-संख्या को यन्त्रवत् मापा जाता है।

55.71
दायेशात्सुखभाग्यस्थे केन्द्रे वा लाभगेऽपि वा |
लक्ष्मीकटाक्षचिह्नानि गृहे कल्याणसम्भवः
dāyeśātsukhabhāgyasthe kendre vā lābhage'pi vā |
lakṣmīkaṭākṣacihnāni gṛhe kalyāṇasambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा/अन्तरदशा का स्वामी; सुख = चतुर्थ भाव; भाग्य = नवम भाव; केन्द्र = १·४·७·१० भाव; लाभ = एकादश भाव; लक्ष्मी-कटाक्ष = लक्ष्मी-कृपा के चिह्न; गृह = घर/परिवार; कल्याण-सम्भव = शुभ-स्थिति की संभावना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश से सुख (४), भाग्य (९), केन्द्र या लाभ (११) भाव में स्थिति हो, तो गृह में लक्ष्मी-कटाक्ष के चिह्न और कल्याण की सम्भावना कही गई है। यह फल-कथन दशा-स्वामी से भाव-स्थितियों पर टिका है, न कि स्वतन्त्र नियति-वाक्य पर। पाठ और पूर्व-श्लोक के ग्रह-सन्दर्भ में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when, reckoned from the daśā-lord, there is placement in the 4th, 9th, a kendra, or the 11th, signs of Lakṣmī’s favour and household welfare are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश-सापेक्ष भाव-स्थिति)। जाँच-नियम: ग्रह-देशान्तर λ से भाव-संख्या B_dāyeśa = 1 + ((rāśi_graha − rāśi_dāyeśa) mod 12); “सुख/भाग्य/केन्द्र/लाभ” तब जब B ∈ {4, 9} ∪ {1, 4, 7, 10} ∪ {11} (केन्द्र में ४ पहले से गिना जाता है)।

उदाहरण (worked example) मान लें दायेश वृष (rāśi 2) में है और फल-ग्रह कन्या (rāśi 6) में: B = 1 + ((6 − 2) mod 12) = 5 — यह ५वाँ (त्रिकोण) है, इस श्लोक की सूची में नहीं। यदि वही ग्रह मकर (rāśi 10) में हो: B = 1 + ((10 − 2) mod 12) = 9 → भाग्यस्थ — पाठ के अनुसार कल्याण-सम्भव पक्ष। (राशि-गणना; अयनांश भाव-संख्या को नहीं बदलता जब केवल राशि-अंक काम में हों।)

55.72
सर्वकार्यसिद्धिः स्याद्धनधान्यसुखावहा |
सत्कीर्तिलाभसम्मानं देव्याराधनमाचरेत्
sarvakāryasiddhiḥ syāddhanadhānyasukhāvahā |
satkīrtilābhasammānaṃ devyārādhanamācaret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-कार्य-सिद्धि = सभी कार्यों में सफलता; धन-धान्य = द्रव्य और अन्न; सुख-आवह = सुख लाने वाली; सत्कीर्ति = अच्छी कीर्ति; लाभ = प्राप्ति; सम्मान = आदर; देवी-आराधन = देवी की उपासना; आचरेत् = करे (शास्त्र का निर्देश-रूप)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की शुभ-स्थितियों के सन्दर्भ में शास्त्र कहता है कि सर्वकार्य-सिद्धि, धन-धान्य-सुख, सत्कीर्ति, लाभ और सम्मान होते हैं। उसी क्रम में “देव्याराधनमाचरेत्” — देवी-आराधन का आचरण — शास्त्र का अपना उपदेश-वाक्य है। इसे दबाव-उपाय या अनिवार्य “इलाज” के रूप में नहीं पढ़ना; यह पाठ का फल-सहित आचरण-कथन है।

English rendering The text states that all undertakings succeed and bring wealth, grain, and comfort, with good repute, gain, and honour; and it directs the practice of worship of the Goddess.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन तथा आचरण-निर्देश। संख्यात्मक नियम यहाँ नहीं; फल ५५.७१ की दायेश-सापेक्ष स्थिति पर निर्भर माना गया है।

55.73
दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते |
पिशाचक्षुद्रव्याघ्राद्य्सिर्गृहक्षेत्रार्थनाशनम्
dāyeśātṣaṣṭharandhrasthe vyaye vā balavarjite |
piśācakṣudravyāghrādysirgṛhakṣetrārthanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा-स्वामी; षष्ठ = षष्ठ भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; व्यय = द्वादश भाव; बल-वर्जित = बलहीन; पिशाच = पिशाच-संबन्धित उपद्रव (शास्त्र-शब्दावली); क्षुद्र = क्षुद्र-पीड़ा/क्षुद्र-प्रयोग; व्याघ्र-आदि = व्याघ्र आदि भय; गृह-क्षेत्र-अर्थ-नाशन = घर, खेत/भूमि और अर्थ का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश से ग्रह षष्ठ, रन्ध्र (८) या व्यय (१२) में हो, अथवा बलवर्जित हो, तब पिशाच-क्षुद्र-व्याघ्र आदि से गृह-क्षेत्र-अर्थ-नाश का फल कहा गया है। संयुक्त पद “पिशाचक्षुद्रव्याघ्राद्य्सिर्…” में पाठ-भेद संभव; भाव “आद्यैः/आदिभिः + गृहक्षेत्रार्थनाशनम्” की दिशा में लिया गया है। यह शास्त्र का अपना फल-वाक्य है — भय-व्यापार या निश्चित विपत्ति के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when, from the daśā-lord, there is placement in the 6th, 8th, or 12th, or when strength is lacking, destruction of house, land, and wealth is indicated in connection with piśāca, minor afflictions, wild beasts, and the like (reading of the compound may vary).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुष्ट-भाव / बल-हीनता)। स्थिति-जाँच: B_dāyeśa ∈ {6, 8, 12} अथवा बल-मापदण्ड (षड्बल आदि) से “बलवर्जित” — पर इस श्लोक में बल की संख्या-सीमा नहीं दी गई; बलांक अलग अध्याय-नियमों से आते हैं।

उदाहरण (worked example) दायेश मिथुन (rāśi 3); फल-ग्रह धनु (rāśi 9): B = 1 + ((9 − 3) mod 12) = 7 — सप्तम (केन्द्र), इस श्लोक की ६/८/१२ सूची में नहीं। यदि फल-ग्रह वृश्चिक (rāśi 8): B = 1 + ((8 − 3) mod 12) = 6 → षष्ठस्थ — पाठ के अनुसार दुष्फल-पक्ष।

55.74
मार्गे चौरभयं चैव व्रणाधिक्य महोदयम् |
द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युस्तदा भवेत्
mārge caurabhayaṃ caiva vraṇādhikya mahodayam |
dvitīyadyūnanāthe tu apamṛtyustadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मार्ग = पथ/यात्रा; चौर-भय = चोर का भय; व्रण-आधिक्य = घावों की अधिकता; महोदय = तीव्र उदय/बड़ी घटना (यहाँ व्रण-प्रसंग में); द्वितीय = द्वितीय भाव; द्यून = सप्तम भाव; नाथ = स्वामी; अपमृत्यु = अकाल-मृत्यु-संकेत (शास्त्र-शब्द); तदा भवेत् = तब होता है — ऐसा पाठ कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मार्ग में चौर-भय और व्रणों की अधिकता (महोदय) का उल्लेख करता है। “द्वितीयद्यूननाथे” — द्वितीय और द्यून (७) के नाथ के प्रसंग में — अपमृत्यु का फल “तदा” कहा गया है; यह पूर्व-श्लोक की दुर्बल/दुष्ट स्थिति से जुड़ा हुआ पढ़ा जाता है। “अपमृत्यु” यहाँ शास्त्रीय संकेतक-शब्द है, चिकित्सकीय या निश्चित मृत्यु-भविष्यवाणी नहीं। पाठ-भेद और सन्दर्भ-जोड़ में सावधानी रखें।

English rendering The text further states fear of thieves on the road and excess of wounds; and when the lords of the second and the seventh (dyūna) are implicated in that adverse setting, it states the indication of apamṛtyu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी संकेत केवल भाव-स्वामी-पहचान: द्वितीयेश = rāśi_lagna + 1 (mod 12) का स्वामी; द्यूननाथ = rāśi_lagna + 6 (mod 12) का स्वामी; उनकी दशा-कालीन स्थिति/बल ५५.७३ की शर्तों से मिलाकर पढ़े जाते हैं — इस श्लोक में अलग अंक-सूत्र नहीं।

55.75
श्वेतां गां महिषीं दद्याद् विप्रायारोग्यसिद्धये |
ततः सौख्यमवाप्नोति चन्द्रग्रहप्रसादतः
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyād viprāyārogyasiddhaye |
tataḥ saukhyamavāpnoti candragrahaprasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतां गाम् = श्वेत गाय; महिषीम् = भैंस; दद्यात् = दे; विप्राय = ब्राह्मण को; आरोग्य-सिद्धये = आरोग्य-सिद्धि के लिए; ततः = तब; सौख्यम् = सुख; अवाप्नोति = प्राप्त करता है — ऐसा पाठ; चन्द्र-ग्रह-प्रसाद = चन्द्र-ग्रह की कृपा/प्रसन्नता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आरोग्य-सिद्धि के लिए विप्र को श्वेत गाय और महिषी दान का उल्लेख करता है, और कहता है कि चन्द्र-ग्रह-प्रसाद से सौख्य मिलता है। यह दान/उपाय-कथन पाठ का अपना वाक्य है — दबाव, “करो नहीं तो विपत्ति”, या चिकित्सा-उपचार के रूप में नहीं पढ़ना। चन्द्र यहाँ ग्रह-प्रसाद के रूप में जुड़ा है; गणना-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

English rendering The text states that one may give a white cow and a she-buffalo to a brāhmaṇa for the attainment of freedom from disease, and that comfort is then obtained through the favour of the Moon-planet.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय/दान तथा चन्द्र-प्रसाद का फल-कथन। कोई दशा-वर्ष, अंश या बल-अंक यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

55.76
राहोरन्तर्गते भौमे लग्नाल्लाभत्रिकोणगे |
केन्द्रे वा शुभसंयुक्ते स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा
rāhorantargate bhaume lagnāllābhatrikoṇage |
kendre vā śubhasaṃyukte svocce svakṣetrage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहोः अन्तर्गत = राहु की अन्तरदशा में; भौम = मंगल; लग्नात् = लग्न से; लाभ = एकादश; त्रिकोण = १·५·९; केन्द्र = १·४·७·१०; शुभ-संयुक्त = शुभ-ग्रह युक्त; स्वोच्च = स्वोच्च राशि; स्व-क्षेत्र = स्वराशि/मूलत्रिकोणादि स्वक्षेत्र।

हिन्दी भावार्थ अब राहु-अन्तर में भौम का प्रकरण: शास्त्र कहता है कि जब मंगल लग्न से लाभ, त्रिकोण या केन्द्र में हो, अथवा शुभ-संयुक्त हो, अथवा स्वोच्च/स्वक्षेत्र में हो — तब अगले श्लोक का शुभ फल जुड़ता है। शर्तें लग्न-सापेक्ष भाव-स्थिति और स्वामित्व/उच्च पर टिकी हैं। राहु-मंगल अन्तर की अवधि-संख्या इस श्लोक में नहीं; केवल स्थिति-शर्तें हैं।

English rendering When Mars operates in Rāhu’s antardaśā, the text requires Mars, from the lagna, to be in the 11th, a trikoṇa, or a kendra, or joined with a benefic, or in its exaltation or own sign — as the placement conditions for the result that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-जाँच (कोण/भाव): B_L = 1 + ((rāśi_Ma − rāśi_Lagna) mod 12)। शुभ-पक्ष जब B_L ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10, 11} (त्रिकोण ∪ केन्द्र ∪ लाभ; १ दोनों वर्गों में) अथवा शुभ-युति अथवा Ma स्वोच्च (मकर) / स्वक्षेत्र (मेष, वृश्चिक)। अवधि-संदर्भ (विंशोत्तरी, घोषित परम्परा): अन्तर-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) / 120; राहु = 18, मंगल = 7 → राहु–मंगल अन्तर = (18 × 7) / 120 = 126/120 = 1.05 वर्ष = 1 वर्ष + 0.05 × 360 ≈ 1 वर्ष 18 दिन (सौर-वर्ष मान; मासादि रूपान्तरण पद्धति के अनुसार सूक्ष्म भेद)।

उदाहरण (worked example) लग्न सिंह (rāśi 5), मंगल मेष (rāśi 1): B_L = 1 + ((1 − 5) mod 12) = 1 + 8 = 9 → नवम = त्रिकोण — शर्त पूरी। विंशोत्तरी में राहु-महादशा के भीतर मंगल-अन्तर ≈ 1.05 वर्ष (ऊपर का अनुपात; अयनांश दशा-कुंजी नक्षत्र-अंश पर लगता है, इस स्थिति-शर्त पर नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में राहु १८ और मंगल ७ वर्ष — Σ = १२० — तथा अन्तरदशा = (महा × अन्तर)/१२० का अनुपात हमारे दशा-इंजन में यथावत् बैठा है। यह श्लोक अवधि नहीं गढ़ता; वह केवल राहु-अन्तर-गत भौम की लग्न-सापेक्ष शुभ-स्थितियाँ बाँधता है — अवधि-अंक और फल-शर्त अलग रखे जाते हैं।

55.77
नष्टराज्यधन्प्राप्तिर्गृहक्षेत्राभिवृद्धिकृत् |
इष्टदेवप्रसादेन सन्तानसुखभाग्भवेत्
naṣṭarājyadhanprāptirgṛhakṣetrābhivṛddhikṛt |
iṣṭadevaprasādena santānasukhabhāgbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नष्ट-राज्य-धन-प्राप्ति = खोया राज्य/पद और धन की पुनःप्राप्ति; गृह-क्षेत्र-अभिवृद्धि-कृत् = घर और भूमि की वृद्धि करने वाला; इष्ट-देव-प्रसाद = इष्टदेव की कृपा; सन्तान-सुख-भाक् = सन्तान-सुख का भागी; भवेत् = होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ ५५.७६ की शर्तें पूरी होने पर शास्त्र कहता है: नष्ट राज्य और धन की प्राप्ति, गृह-क्षेत्र की अभिवृद्धि, और इष्टदेव-प्रसाद से सन्तान-सुख का भागी होना। यह फल-कथन पूर्व-श्लोक की योग्यता-शर्तों से बँधा है। “राज्य” यहाँ शास्त्रीय पद-सम्पत्ति/अधिकार-क्षेत्र के अर्थ में भी पढ़ा जा सकता है; कोई आधुनिक राजनीतिक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering Under those conditions the text states recovery of lost dominion and wealth, increase of house and lands, and — through the grace of the chosen deity — a share in the happiness of progeny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (५५.७६ की स्थिति-शर्तों पर आश्रित)। कोई नया अंक, वर्ष या वर्ग-भाग यहाँ नहीं; केवल परिणाम-सूची।

55.78
क्षिप्रभोज्यान्महत्सौख्यं भूषणश्वाम्बरादिकृत् |
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा
kṣiprabhojyānmahatsaukhyaṃ bhūṣaṇaśvāmbarādikṛt |
dāyeśātkendrakoṇe vā duścikye lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षिप्रभोज्यात् = शीघ्र-सुलभ भोजन से; महत्सौख्यम् = महान सुख; भूषण-श्व-अम्बर-आदि-कृत् = आभूषण, अश्व, वस्त्र आदि देने वाला; दायेशात् = दशेश (राहु) से गिनकर; केन्द्रकोणे = केन्द्र (1/4/7/10) व कोण (5/9) में; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; लाभगे = एकादश भाव में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस काल में शीघ्र-सुलभ भोजन से महान सुख तथा आभूषण-अश्व-वस्त्रादि की प्राप्ति होती है; और (आगे के फल की शर्त-रूप में) जब अन्तर्दशेश दशेश राहु से केन्द्र, कोण, तृतीय या लाभ-स्थान में हो।

English rendering The text states great comfort from readily-available fare and the gain of ornaments, horses, and garments; and (as the next condition) when the sub-lord stands in a kendra, a trine, the 3rd, or the 11th from the daśā-lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन के साथ स्थान-शर्त: दायेश से भाव-समुच्चय केन्द्र {1,4,7,10} ∪ कोण {5,9} ∪ {3 (दुश्चिक्य), 11 (लाभ)}; भाव = ((मंगल-राशि − राहु-राशि) mod 12) + 1 — वही मॉड्युलर भाव-गणना जो 55.66 में। फल शास्त्र का कथन है।

उदाहरण (worked example) दशेश राहु वृश्चिक (राशि 8) में → केन्द्र = वृश्चिक/कुम्भ/वृष/सिंह, कोण = मीन/कर्क, दुश्चिक्य = मकर, लाभ = कन्या। मंगल मीन (8 से 5वीं) में हो → कोण में → शर्त पूर्ण → शुभ फल-कथन लागू।

55.79
रक्तवस्त्रादिलाभः स्यात्प्रयाणं राजदर्शनम् |
पुत्रवर्गेषु कल्याणं स्वप्रभोश्च महत्सुखम्
raktavastrādilābhaḥ syātprayāṇaṃ rājadarśanam |
putravargeṣu kalyāṇaṃ svaprabhośca mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्तवस्त्रादि-लाभः = लाल वस्त्र आदि की प्राप्ति (रक्त = लाल — मंगल का कारक-वर्ण; वस्त्र = वस्त्र; आदि = इत्यादि; लाभः = लाभ) · स्यात् = होता है (सम्भावना-अर्थक विधिलिङ्) · प्रयाणं = यात्रा/प्रस्थान · राजदर्शनम् = राजा (सत्ता-पुरुष) से भेंट (राज = राजा; दर्शन = साक्षात्कार) · पुत्रवर्गेषु = पुत्रों के वर्ग में (वर्ग = समूह; -ेषु सप्तमी बहुवचन) · कल्याणं = कुशल-मंगल/शुभ · स्वप्रभोः = अपने स्वामी/आश्रयदाता से (स्व = अपना; प्रभु = स्वामी) · महत्सुखम् = महान सुख।

हिन्दी भावार्थ यह राहु-महादशा में मंगल-अन्तर्दशा (राहोरन्तर्गते भौमे, श्लोक 76) का शुभ-पक्ष है, जब मंगल उच्च/स्वक्षेत्र/केन्द्र-त्रिकोण-लाभ में शुभयुक्त हो। शास्त्र कहता है कि इस खण्ड में लाल वस्त्र आदि का लाभ, यात्रा, राजा (अधिकारी) से भेंट, सन्तान-वर्ग में कुशल-मंगल तथा अपने स्वामी/आश्रयदाता से महान सुख प्राप्त होता है।

English rendering The text states that gain of red garments and the like ensues, along with journeys, an audience with the king, well-being among one's children, and great happiness from one's own patron.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यातव्य: फल का "रंग" अन्तर्दशेश के कारकत्व से रँगा है — रक्तवस्त्र, ताम्र, सेनापतित्व सब मंगल के स्वभाव-चिह्न हैं, अतः यह मंगल-अन्तर्दशा का स्वाभाविक शुभ-वर्णन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा प्रकरण विंशोत्तरी अन्तर्दशा-फल है (dossier §3)। राहु = 18 वर्ष, मंगल = 7 वर्ष, Σ = 120। अतः राहु-मंगल अन्तर्दशा = (18 × 7) ÷ 120 = 126 ÷ 120 = 1.05 वर्ष ≈ 12 माह 18 दिन — यही वह काल-खिड़की है जिसमें शास्त्र ये फल रखता है। हमारा दशा-इंजन इसे शुद्ध अनुपात-गणित से निकालता है, बिना किसी सहिष्णुता-बैंड के (exact `==`), क्योंकि यह विवेच्य संख्या नहीं, नियत भिन्न है।

55.80
सेनपत्यं महोत्साहो भ्रातृवर्गधनागमः |
दायेशाद्रन्ध्ररिःफे वा षष्ठे पापसमन्विते
senapatyaṃ mahotsāho bhrātṛvargadhanāgamaḥ |
dāyeśādrandhrariḥphe vā ṣaṣṭhe pāpasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सेनापत्यम् = सेनापति-पद (सेनपत्यं = सेनापत्यम्, पाठ-भेद संभव); महा-उत्साहः = महान उमंग/ऊर्जा; भ्रातृ-वर्ग-धन-आगमः = भाइयों के वर्ग से धन का आगमन; दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ राहु) से गिनकर; रन्ध्रे = अष्टम भाव में; रिःफे = द्वादश भाव में; षष्ठे = षष्ठ भाव में; पाप-समन्विते = पापग्रह-युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ पहली पंक्ति शुभ फल पूर्ण करती है — शास्त्र कहता है सेनापति-पद, महान उत्साह और भ्रातृ-वर्ग से धन-लाभ। दूसरी पंक्ति एक नई (अशुभ) शर्त रखती है: दायेश राहु से गिनकर यदि अन्तरेश मंगल षष्ठ, अष्टम या द्वादश (त्रिक/दुःस्थान) में पापग्रह से युक्त हो — तो आगे (श्लोक 81) का अनिष्ट फल आता है।

English rendering The text states one gains command of an army, great enthusiasm, and wealth through one's brothers; but should the sub-lord fall — counted from the daśā-lord — in the 8th, 12th, or 6th, joined with a malefic, the adverse results that follow ensue.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ तकनीक है दायेश-सापेक्ष भाव-गणना। दुःस्थान-समुच्चय = {6, 8, 12} भाव, दायेश राहु की राशि से मॉड्युलर गिनती द्वारा। नियम: यदि अन्तरेश-राशि ≡ (दायेश-राशि + k − 1) mod 12, जहाँ k ∈ {6, 8, 12}, और उस पर पाप-योग हो → अशुभ-फल-द्वार खुलता है।

उदाहरण (worked example) माना दायेश राहु मेष (राशि 1) में है। तब उससे 6ठ = कन्या (1+6−1=6), 8ठ = वृश्चिक (राशि 8), 12ठ = मीन (राशि 12)। यदि अन्तरेश मंगल इनमें से किसी में शनि जैसे पापग्रह के साथ बैठा हो, तो श्लोक 81 का हानि-फल इस अन्तर्दशा में लागू माना जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "दायेश" शब्द सीधे विंशोत्तरी दशा-ढाँचे को पुकारता है, जिसे हमारे दशा-इंजन में सत्यापित किया गया है: राहु-महादशा = 18 वर्ष, और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। अतः राहु-मंगल अन्तर्दशा = (18 × 7) ÷ 120 = 126 ÷ 120 = 1.05 वर्ष ≈ 1 वर्ष 18 दिन — यही वह काल-खिड़की है जिसमें ऊपर की शुभ/अशुभ शर्तें फलित मानी जाती हैं। यह शुद्ध अनुपात-अंकगणित है (Σ महादशा = 120 वर्ष), व्याख्या नहीं।

55.81
पुत्रदारादिहानिश्च सोदराणां च पीडनम् |
स्थानभ्रंशो बन्धुवर्गदारपुत्रविरोधनम्
putradārādihāniśca sodarāṇāṃ ca pīḍanam |
sthānabhraṃśo bandhuvargadāraputravirodhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रदारादि-हानिः = पुत्र, पत्नी आदि की हानि (दार = पत्नी; आदि = इत्यादि; हानि = क्षति) · च = और · सोदराणां = सहोदरों/सगे भाइयों की (सोदर = एक ही उदर से जन्मे; षष्ठी बहुवचन) · च = और · पीडनम् = पीड़ा/कष्ट · स्थानभ्रंशः = पद/स्थान से पतन (स्थान = अधिकार-पद; भ्रंश = च्युति) · बन्धुवर्ग-दार-पुत्र-विरोधनम् = बन्धु-समूह, पत्नी व पुत्रों से विरोध/मतभेद (विरोधन = वैमनस्य)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक (80) की अशुभ शर्त — दायेश-मंगल का 6/8/12 में पाप-युक्त होना — के अन्तर्गत शास्त्र कहता है कि पुत्र-पत्नी आदि की हानि, सहोदरों को पीड़ा, पद-च्युति, तथा बन्धुओं-पत्नी-पुत्रों से विरोध सम्भव है। यह उसी शर्त पर आश्रित सम्भावित फल-कथन है, कोई अटल नियति नहीं।

English rendering The text states there may be loss of children and wife, affliction of siblings, a fall from one's position, and discord with kinsfolk, wife, and children (for that afflicted placement).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट)। ध्यातव्य: यह वाक्य पूर्णतः श्लोक 80b की शर्त (दायेश 6/8/12 + पाप) से बँधा है — शर्त बदले तो फल भी बदल जाता है; शास्त्र यहाँ सशर्त बोलता है, अनिवार्यता से नहीं।

55.82
चौराहिव्रणभीतिश्च स्वदेहस्य च पीडनम् |
आदौ क्लेशकरं चैव मध्यान्ते सौखमाप्नुयात्
caurāhivraṇabhītiśca svadehasya ca pīḍanam |
ādau kleśakaraṃ caiva madhyānte saukhamāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर-अहि-व्रण-भीतिः = चोर, सर्प व व्रण (घाव) का भय (चौर = चोर; अहि = साँप; व्रण = घाव/फोड़ा; भीति = भय) · च = और · स्वदेहस्य = अपने शरीर की (स्व = अपना; देह = शरीर; षष्ठी) · च = और · पीडनम् = पीड़ा · आदौ = आरम्भ में · क्लेशकरं = कष्टदायक (क्लेश = दुःख; कर = करने वाला) · च एव = ही/तथा · मध्यान्ते = मध्य तथा अन्त में (मध्य + अन्त) · सौखम् = सुख (शुद्ध रूप "सौख्यम्" — पाठ-भेद संभव) · आप्नुयात् = प्राप्त करता है (आप् धातु, विधिलिङ्)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (इस अशुभ खण्ड में) चोर, सर्प व व्रण का भय तथा अपने ही शरीर को पीड़ा हो सकती है; किन्तु यह दशा-खण्ड आरम्भ में क्लेशकारी होकर, मध्य व अन्त में सुखप्रद हो जाता है। यहाँ शास्त्र अन्तर्दशा को काल-क्रम में आदि–मध्य–अन्त रूप में देखकर फल की तीव्रता का समयानुसार वर्णन कर रहा है।

English rendering The text states there is fear from thieves, snakes, and wounds, and affliction to one's own body; distressing at the outset, yet in its middle and end one attains comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — काल-क्रमिक फल-कथन। कोई नियत स्थिरांक नहीं दिया; केवल काल-क्रम (आदि → क्लेश, मध्य-अन्त → सुख) का गुणात्मक निर्देश है। यह अन्तर्दशा की समय-रेखा पर स्वाभाविक रूप से आरोपित होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-मंगल अन्तर्दशा की अवधि T = 1.05 वर्ष ≈ 12 माह 18 दिन (dossier §3)। यदि "आदि/मध्य/अन्त" को समान त्रिखण्ड मानें (यह एक घोषित मॉडलिंग-परिपाटी है — शास्त्र केवल क्रम कहता है, समान भाग नहीं, अतः परम्परा-भेद संभव), तो प्रत्येक खण्ड = T ÷ 3 = 0.35 वर्ष ≈ 4 माह 6 दिन; अर्थात् आदि (~प्रथम 4.2 माह) क्लेशकर, मध्य-अन्त (~शेष 8.4 माह) सुखकर। संख्या शुद्ध अनुपात-गणित से; व्याख्या (क्लेश/सुख) शास्त्र की अपनी वाणी रहती है — गणित और फल को हम पृथक् रखते हैं (dossier §5)।

55.83
द्वितीयद्यूननाथे तु देहालस्यं महद्भयम् |
अनड्वाहं च गां दद्यादारोग्यसुखलब्धये
dvitīyadyūnanāthe tu dehālasyaṃ mahadbhayam |
anaḍvāhaṃ ca gāṃ dadyādārogyasukhalabdhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = जब [मंगल] द्वितीय या सप्तम भाव का स्वामी हो (द्वितीय = 2रा भाव — मारक-स्थान; द्यून = सप्तम भाव, जाया/कलत्र-भाव का पर्याय; नाथ = स्वामी; सप्तमी) · तु = किन्तु/तो · देह-आलस्यं = शरीर में आलस्य/शिथिलता (देह = शरीर; आलस्य = जड़ता) · महद्भयम् = महान भय (महत् + भयम्) · अनड्वाहं = बैल (अनड्वाह् = हल का भार-वाहक वृषभ) · च = और · गां = गाय (गो, द्वितीया 'गाम्') · दद्यात् = दान करे/देना चाहिए (दा धातु, विधिलिङ्) · आरोग्य-सुख-लब्धये = आरोग्य व सुख की प्राप्ति हेतु (लब्धि = प्राप्ति; -ये चतुर्थी 'के लिए')।

हिन्दी भावार्थ यदि अन्तर्दशेश मंगल द्वितीय (धन) अथवा सप्तम (जाया) भाव — दोनों मारक-स्थान — का स्वामी हो, तो शास्त्र शरीर में आलस्य व महान भय की सम्भावना बताता है। इसके परिहार-रूप में शास्त्र आरोग्य व सुख की प्राप्ति हेतु बैल तथा गाय के दान का विधान कहता है — यह शास्त्र की अपनी संस्तुति है, कोई भय-दबाव नहीं।

English rendering If Mars is lord of the 2nd or 7th (the māraka houses), the text states there is bodily lethargy and great apprehension, and it prescribes the gift of an ox and a cow for the attainment of health and ease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मारक-निर्देश एवं दान-विधान (शान्ति)। ध्यातव्य: द्वितीय व सप्तम = मारक-स्थान (आयुर्दाय-प्रकरण, अध्याय 43-44 की धारणा); "द्यून" सप्तम का ही पर्याय है — पद-भेद मात्र, फल-भेद नहीं। किन शर्त-पर कौन-सा फल — यह शास्त्र का दावा है, हमारी संस्तुति नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ हमारा मूल-अनुशासन प्रकट होता है — "कौन-से भाव मारक हैं" यह एक नियत नियम है (2/7), पर "क्या होगा" फल है। हम गणित (नियम) और फल (व्याख्या) को अलग रखते हैं: दशा-अवधि व मारकत्व-गणना निश्चित, किन्तु आलस्य/भय व दान-विधान को हम "शास्त्र कहता है / शास्त्र विधान करता है" रूप में ही प्रस्तुत करते हैं — कभी नियति, निश्चयता या भय-दबाव के रूप में नहीं (dossier §5, framing rules)।

अध्यायः 56

जीवान्तर्दशाफलाध्यायः

80 श्लोक
56.1
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
अनेकराजधीशो वा सम्पन्नो राजपूजितः
svocce svakṣetrage jīve lagnātkendratrikoṇage |
anekarājadhīśo vā sampanno rājapūjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चे = अपने उच्च राशि में (गुरु का उच्च — कर्क); स्वक्षेत्रगे = अपनी राशि (धनु/मीन) में स्थित; जीवे = जीव अर्थात् बृहस्पति/गुरु; लग्नात् = लग्न से गिनकर; केन्द्र = भाव {1,4,7,10}; त्रिकोण = भाव {1,5,9}; अनेकराजधीशः = अनेक राजाओं का स्वामी; सम्पन्नः = समृद्ध; राजपूजितः = राजाओं से पूजित।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से गुरु-महादशा के भीतर की अन्तर्दशाओं का फल आरम्भ होता है, और सर्वप्रथम स्वयं गुरु की अन्तर्दशा। शास्त्र कहता है कि यदि इस काल में गुरु अपने उच्च या स्वराशि में हो और लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो, तो जातक अनेक राजाओं का अधिपति, समृद्ध और राजसम्मानित होता है।

English rendering When, in Jupiter's own sub-period, Jupiter stands exalted or in its own sign and occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, the text states the native becomes lord over many kings, prosperous, and honoured by royalty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल स्वयं फल-कथन है, पर उसका ट्रिगर विशुद्ध स्थान-गणित है: केन्द्र = लग्न से {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}; स्वोच्च = परमोच्च-अंश। अन्तर्दशा का काल-मान विमशोत्तरी अनुपात से आता है: अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) गुरु-गुरु अन्तर्दशा = (16 × 16) ÷ 120 = 256/120 ≈ 2.133 वर्ष ≈ 2 वर्ष 1 मास 18 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय विमशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र का ही विस्तार है, जिसमें गुरु की महादशा = 16 वर्ष (हमारे kaal दशा-इंजन में पिन)। अन्तर्दशा = elapsed-नक्षत्र-अंश पर शुद्ध अनुपात-गणित; कोई tolerance नहीं, केवल (महा×अन्तर)/120 का सटीक भाग।

56.2
मोमहिष्यादिलाभश्च वस्त्रवाहनभूषणम् |
नूतनस्थाननिर्माणं हर्म्यप्राकारसंयुतम्
momahiṣyādilābhaśca vastravāhanabhūṣaṇam |
nūtanasthānanirmāṇaṃ harmyaprākārasaṃyutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मोमहिष्यादि (पाठ-भेद संभव: गोमहिष्यादि) = गौ-महिषी आदि पशु-लाभ; लाभः = प्राप्ति; वस्त्र = वस्त्र; वाहन = यान; भूषणम् = आभूषण; नूतनस्थाननिर्माणम् = नए स्थान/भवन का निर्माण; हर्म्य = प्रासाद/महल; प्राकार = परकोटा; संयुतम् = युक्त

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे उसी शुभ-अवस्था का विस्तार करता है — गौ-महिषी आदि का लाभ, वस्त्र-वाहन-आभूषण की प्राप्ति, तथा नये स्थान का निर्माण, जो प्रासाद और प्राकार से युक्त हो। यह पूर्व-श्लोक की सम्पन्नता-राजसम्मान-रेखा का भौतिक-सांसारिक फल-विस्तार है।

English rendering The text continues that there is gain of cattle such as cows and buffaloes (reading “gomahiṣyādi” is plausible where the recension has “momahiṣyādi”), along with clothes, conveyances, and ornaments, and the building of a new place furnished with mansion and enclosing walls.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौतिक लाभ एवं निर्माण का वर्णन)। यहाँ कोई अंश, वर्ष, बिन्दु या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल शास्त्रीय फल-सूची।

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56.3
गजान्तैश्वर्यसम्पत्तिर्भाग्यकर्मफलओदयः |
ब्राह्मणप्रभुसम्मानं समानं प्रभुदर्शनम्
gajāntaiśvaryasampattirbhāgyakarmaphalaodayaḥ |
brāhmaṇaprabhusammānaṃ samānaṃ prabhudarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गजान्त = गज तक/गज-पर्यन्त; ऐश्वर्यसम्पत्तिः = ऐश्वर्य-सम्पत्ति; भाग्य = भाग्य (प्रायः नवम); कर्म = कर्म (प्रायः दशम); फल = फल; उदयः = उदय/प्रकट होना; ब्राह्मणप्रभुसम्मानम् = ब्राह्मणों और प्रभुओं से सम्मान; समानम् = सम-सदृश; प्रभुदर्शनम् = प्रभु/शासक-दर्शन

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गज-पर्यन्त ऐश्वर्य-सम्पत्ति, भाग्य और कर्म के फल का उदय, ब्राह्मणों तथा प्रभुओं से सम्मान, और प्रभु के समान दर्शन/मिलन — ये सब उसी शुभ गुरु-अवस्था के अन्तर्गत गिनाए गए हैं। “भाग्यकर्मफलोदय” को शास्त्र स्वयं भाग्य-कर्म की फल-उन्नति के रूप में रखता है; इसे आधुनिक पेशा-भविष्यवाणी न समझें।

English rendering The text states that wealth and sovereignty reaching even to elephants arise, that the fruits of fortune and action ascend, and that there is honor from brāhmaṇas and lords, together with audience equal to that of a ruler.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ऐश्वर्य-सम्मान-उदय का वर्णन)। “गजान्त” यहाँ परिमाण-सूचक शब्द-चित्र है, कोई संख्यात्मक माप-सूत्र नहीं।

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56.4
स्वप्रभोः स्वफलाधिक्य दारपुत्रादिलाभकृत् |
नीचांशे नीचराशिस्थे षष्ठाष्टमव्ययराशिगे
svaprabhoḥ svaphalādhikya dāraputrādilābhakṛt |
nīcāṃśe nīcarāśisthe ṣaṣṭhāṣṭamavyayarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वप्रभोः = अपने प्रभु/स्वामी से; स्वफलाधिक्यम् = अपने फल से अधिकता / स्व-फल की अधिकता; दार = पत्नी; पुत्रादि = पुत्र आदि; लाभकृत् = लाभ करने वाला; नीचांशे = नीच-अंश (दशाांश/नवमांश आदि नीच-भाग) में; नीचराशिस्थे = नीच-राशि में स्थित; षष्ठ = 6; अष्टम = 8; व्यय = 12; राशिगे = राशि में स्थित

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध में शास्त्र शुभ-पक्ष को पूरा करता है — स्व-प्रभु की अपेक्षा अधिक फल, तथा दारा-पुत्र आदि का लाभ। उत्तरार्ध से विपरीत शर्त आरम्भ होती है: जब गुरु नीचांश में, नीच-राशि में, अथवा षष्ठ-अष्टम-व्यय राशि में स्थित हो, तब (अगले श्लोकों में) अशुभ फल कहा जाएगा। यह एक ही श्लोक में शुभ-से-अशुभ संक्रमण का सेतु है।

English rendering The text states that [under the prior auspicious conditions] there is greater fruition than that of one’s own lord, and gain of wife, sons, and the like; but when [Jupiter] stands in a debilitated aṃśa, in the sign of debilitation, or in the sixth, eighth, or twelfth sign, [the adverse results that follow are indicated].

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-शर्त। “नीचांश” का निर्णय वर्ग-नियम और ग्रह-देशान्तर (अयनांश-सहित longitude) पर निर्भर है — उदाहरण के लिए गुरु का नीच = मकर 0°–30° (पूर्ण राशि), जबकि नीचांश = किसी निर्दिष्ट वर्ग (प्रायः नवमांश आदि) में नीच-भाग; संस्करण/परम्परा में “अंश” का ठीक-ठीक वर्ग-संदर्भ पाठ-भेद संभव। षष्ठ-अष्टम-व्यय = लग्न से 6, 8, 12 भाव-राशियाँ (भाव-पद्धति घोषित करनी होगी जब संख्या निकालेँ)।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष, गुरु-देशान्तर (Lahiri ayanāṃśa, tropical→sidereal) ≈ मकर 5° — तो गुरु नीच-राशिस्थ। यदि वही बिन्दु D9 (नवमांश) में भी नीच-भाग में पड़े, तो “नीचांशे” शर्त भी लगती है। लग्न-मेष से षष्ठ=कन्या, अष्टम=वृश्चिक, व्यय=मीन — गुरु इनमें हो तो “षष्ठाष्टमव्ययराशिगे”। फल की दिशा शास्त्र आगे कहता है; यहाँ केवल शर्त की जाँच है।

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56.5
नीचसङ्गो महादुःखं दायादजनविग्रहः |
कलहो न विचारोस्य स्वप्रभुष्वपमृत्युकृत्
nīcasaṅgo mahāduḥkhaṃ dāyādajanavigrahaḥ |
kalaho na vicārosya svaprabhuṣvapamṛtyukṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचसङ्गः = नीच-संयोग/नीच-अवस्था का संग; महादुःखम् = महान् दुःख; दायादजन = सह-उत्तराधिकारी/कुटुम्बी; विग्रहः = विरोध/कलह; कलहः = झगड़ा; न विचारः = विचार का अभाव; अस्य = इसका; स्वप्रभुषु = अपने प्रभुओं/स्वामियों के विषय में; अपमृत्युकृत् = अपमृत्यु (अकाल/अनिष्ट मृत्यु-संकेत) करने वाला — शास्त्र का कथन, निश्चित भाग्य नहीं

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नीच-संग से महान् दुःख, दायादों से विग्रह, विचार-रहित कलह, तथा स्व-प्रभु-सम्बन्ध में अपमृत्यु-कर फल कहा गया है। यह पूर्व-श्लोक की नीच/दुःस्थान शर्तों का फल-विस्तार है। इसे भय या निश्चित घटना के रूप में न पढ़ें — यह शास्त्रीय फल-भाषा है, जिसकी गणना-शर्त अलग और व्याख्या संतुलित रखनी चाहिए।

English rendering The text states that association with debilitation brings great sorrow, strife with co-heirs, quarrel without deliberation, and — in the text’s own wording — an indication of untimely harm in relation to one’s own lords. This is the śāstra’s phala-language under the adverse placements just named, not a deterministic verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-स्थिति का वर्णनात्मक फल)। “नीचसङ्ग” की जाँच पूर्व-श्लोक की स्थिति-शर्तों (नीच-राशि, नीचांश, 6/8/12) पर निर्भर है; कोई बलांक या वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं।

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56.6
पुत्रदारवियोगश्च धनधान्यार्थहानिकृत् |
सप्तमाधिपदोषेण देववाधा भविष्यति
putradāraviyogaśca dhanadhānyārthahānikṛt |
saptamādhipadoṣeṇa devavādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रदारवियोगः = पुत्र-दारा से वियोग; धनधान्यार्थहानिकृत् = धन-धान्य-अर्थ की हानि करने वाला; सप्तमाधिप = सप्तमेश (7वें भाव का स्वामी); दोषेण = दोष से; देववाधा = देव-सम्बन्धी बाधा/प्रतिबन्ध; भविष्यति = होगी — शास्त्र का वचन

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — पुत्र-दारा वियोग और धन-धान्य-अर्थ की हानि, तथा सप्तमेश के दोष से देववाधा होगी। यहाँ दो परतें हैं: (1) उसी अशुभ गुरु-अवस्था का पारिवारिक-आर्थिक फल, और (2) “सप्तमाधिपदोष” नामक अतिरिक्त दोष-सन्दर्भ। “देववाधा” को शास्त्रीय कर्म-देवता-सम्बन्धी बाधा-भाषा में रखें; चिकित्सा, विधि या वित्त की भविष्यवाणी न बनाएँ।

English rendering The text states that there is separation from son and wife and loss of wealth, grain, and means, and that by defect of the seventh lord there will be obstruction associated with the divine (deva-vādhā). These are the śāstra’s claims under the adverse conditions in view.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “सप्तमाधिप” = लग्न से सप्तम भाव का राशि-स्वामी (राशि-स्वामित्व की मानक तालिका से); “दोष” यहाँ गुणात्मक शास्त्र-शब्द है, कोई virūpa/rūpa बलांक इस श्लोक में नहीं दिया गया।

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56.7
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् |
रुद्रजाप्यं च गोदानं कुर्यात् स्वाऽभीष्टलब्धये
taddoṣaparihārārthaṃ śivasāhasrakaṃ japet |
rudrajāpyaṃ ca godānaṃ kuryāt svā'bhīṣṭalabdhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष = उस दोष का; परिहारार्थम् = निवारण के लिए; शिवसाहस्रकम् = शिव-सहस्र (1000 नाम/सहस्रजाप); जपेत् = जप करे; रुद्रजाप्यम् = रुद्र-जाप्य; गोदानम् = गो-दान; कुर्यात् = करे; स्व-अभीष्टलब्धये = अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उस दोष के परिहार के लिए पारम्परिक उपाय बताता है — शिव-साहस्रक का जप, रुद्र-जाप्य, और गो-दान, ताकि अभीष्ट की प्राप्ति हो। यह पाठ का अपना शान्ति/परिहार-विधान है; इसे दबाव, भय-व्यापार या अनिवार्य “इलाज” के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए — केवल शास्त्र ने जो कहा, वही यहाँ सुरक्षित रखा गया है।

English rendering The text states that for the removal of that defect one should recite the thousandfold of Śiva, perform Rudra-japa, and give a cow, for the attainment of one’s desired end. This is the śāstra’s own stated parihāra, reported as such — not urged as pressure or fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिहार/अनुष्ठान-विधान। “साहस्रक” = 1000 (सहस्र) — शब्द से स्पष्ट संख्या, किन्तु यह ज्योतिष-गणना (दशा-वर्ष, वर्ग, अष्टकवर्ग) नहीं, जाप-सङ्ख्या का निर्देश है।

56.8
जीवस्यान्तर्गते मन्दे स्वोच्चे स्वक्षेत्रमित्रभे |
लग्नात्केन्द्रत्रिकोणस्थे लाभे वा बलसंयुते
jīvasyāntargate mande svocce svakṣetramitrabhe |
lagnātkendratrikoṇasthe lābhe vā balasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य = बृहस्पति की (महादशा में); अन्तर्गत = अन्तर्दशा में; मन्दे = शनि; स्वोच्चे = स्वोच्च (तुला) में; स्वक्षेत्र = स्वराशि (मकर/कुम्भ) में; मित्रभे = मित्र-राशि में; लग्नात् = लग्न से; केन्द्रत्रिकोणस्थे = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) स्थित; लाभे = एकादश भाव में; बलसंयुते = बल-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बृहस्पति की दशा के भीतर जब शनि की अन्तर्दशा चले, और शनि स्वोच्च, स्वक्षेत्र या मित्र-राशि में हो, तथा लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में, अथवा लाभ (11वें) भाव में स्थित हो, या अन्य प्रकार से बल से युक्त हो, तब आगे कही गई शुभ फल-परंपरा लागू होती है। यह फल-विधान स्थिति और बल की शर्तों पर टिका है।

English rendering The text states that in Jupiter’s period, during Saturn’s sub-period, when Saturn is exalted, in own sign, or in a friendly sign, and stands in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in the eleventh, or is otherwise endowed with strength, the favourable results that follow are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विम्शोत्तरी अनुपात — बृहस्पति महादशा = 16 वर्ष, शनि अंश = 19 वर्ष; अन्तर्दशा-अवधि = (16 × 19) ÷ 120 = 304/120 वर्ष = 2 वर्ष + (0.533… × 12) ≈ 2 वर्ष 6 मास 12 दिन (परंपरागत षष्टि-विभाग से सूक्ष्म दिन-गणना)। “केन्द्र” = लग्न से भाव 1, 4, 7, 10; “त्रिकोण” = 1, 5, 9 (1 दोनों वर्गों में)। स्वोच्च-शनि = तुला; स्वक्षेत्र = मकर, कुम्भ। बल यहाँ षड्बल-संकेत या साधारण “स्थित-बल” के अर्थ में पाठानुसार; पूर्ण षड्बल-माप अध्याय 27 की विधि से अलग गणना है।

उदाहरण (worked example) विम्शोत्तरी, चंद्र-नक्षत्र से बृहस्पति महादशा आरंभ मानें। शनि-अन्तर्दशा की अवधि = (16 × 19)/120 = 2.533… वर्ष। यदि लग्न सिंह, शनि तुला (उच्च) में सप्तम (केन्द्र) हो — शर्त “स्वोच्चे + केन्द्रस्थ” पूरी; फल-कथन 56.9–56.12 के पूर्वार्ध के अंतर्गत आता है। (अयनांश फल-भाषा नहीं बदलता; केवल देशांतर/लग्न-निर्णय के लिए घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7 … बुध 17, Σ = 120) और अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/120 का अनुपातांक हमारे दशा-इंजन में यथावत् अंकगणित है। यहाँ “जीवस्य अन्तर्गत मन्द” उसी बृहस्पति-महा + शनि-अन्तर् खंड का शास्त्र-फल है; अवधि `==` अनुपात से, फल-वाक्य अलग परत पर “शास्त्र कहता है” के रूप में रखा जाता है।

56.9
राज्यलाभो महत्सौख्यं वस्त्राभरणसंयुतम् |
धनधान्यादिलाभश्च स्त्रीलाभो बहुसौख्यकृत्
rājyalābho mahatsaukhyaṃ vastrābharaṇasaṃyutam |
dhanadhānyādilābhaśca strīlābho bahusaukhyakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यलाभः = पद/प्रभुत्व-संबंधी लाभ (शास्त्र-कथन); महत्सौख्यम् = बड़ा सुख; वस्त्राभरणसंयुतम् = वस्त्र और आभूषण से युक्त; धनधान्यादिलाभः = धन-धान्य आदि का लाभ; स्त्रीलाभः = स्त्री/दंपत्य-संबंधी लाभ; बहुसौख्यकृत् = बहुत सुख करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ स्थितियों में शास्त्र कहता है — राज्य-लाभ, महान् सौख्य, वस्त्र-आभरण की प्राप्ति, धन-धान्यादि लाभ, तथा स्त्री-लाभ — ये सब बहुसौख्य उत्पन्न करने वाले माने गए हैं। यह अन्तर्दशा-फल का शुभ पक्ष है, शर्त-बद्ध।

English rendering Under those favourable placements, the text states gains of authority or position, great comfort, clothes and ornaments, wealth and grain, and benefit concerning a spouse or woman — all said to bring abundant happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गणना 56.8 की स्थिति-शर्तों और विम्शोत्तरी अन्तर्-अवधि पर निर्भर; यह श्लोक केवल फल-सूची देता है।

56.10
वाहनाम्बरपश्वादिभूलाभः स्थानलाभकृत् |
पुत्रमित्रादिसौख्यं च नरवाहनयोगकृत्
vāhanāmbarapaśvādibhūlābhaḥ sthānalābhakṛt |
putramitrādisaukhyaṃ ca naravāhanayogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन = सवारी/वाहन; अम्बर = वस्त्र; पशु आदि = पशु-संपत्ति; भूलाभः = भूमि-लाभ; स्थानलाभकृत् = पद/स्थान देने वाला; पुत्रमित्रादिसौख्यम् = पुत्र-मित्र आदि से सुख; नरवाहनयोगकृत् = नर-वाहन (मानव-संचालित/प्रतिष्ठित वाहन) योग बनाने वाला — शास्त्र की भाषा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — वाहन, वस्त्र, पशु आदि और भूमि का लाभ; स्थान (पद/आश्रय) का लाभ; पुत्र-मित्रादि से सौख्य; तथा नरवाहन-योग — ये भी उसी शुभ-शर्त वाले मन्द-भुक्ति पक्ष में निर्दिष्ट हैं। सूची भौतिक-सामाजिक सुविधाओं की ओर झुकी हुई है।

English rendering The text further states gains of conveyances, clothing, cattle and the like, land, advancement of place or position, happiness through children and friends, and a yoga of human conveyance or attendant means of travel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “योग” यहाँ दशा-फल की पारंपरिक संज्ञा है, लग्न-योग-सूत्र की नई गणना नहीं।

56.11
नीलवस्त्रादिलाभश्च नीलाश्वं लभते च सः |
पश्चिमां दिशमाश्रित्य प्रयाणं राजदर्शनम्
nīlavastrādilābhaśca nīlāśvaṃ labhate ca saḥ |
paścimāṃ diśamāśritya prayāṇaṃ rājadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीलवस्त्रादिलाभः = नीले वस्त्र आदि का लाभ; नीलाश्वम् = नीला/श्याम अश्व; लभते = प्राप्त करता है; सः = वह (जातक); पश्चिमां दिशम् = पश्चिम दिशा; आश्रित्य = आश्रय लेकर; प्रयाणम् = यात्रा/प्रस्थान; राजदर्शनम् = राज-दर्शन (शासक/प्रभु से भेंट) — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नील वस्त्रादि का लाभ और नीलाश्व की प्राप्ति; पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर प्रयाण; तथा राजदर्शन — ये भी उसी शुभ मन्द-अन्तर्दशा के फल-वर्ग में गिने गए हैं। रंग-दिशा-राज-संयोग यहाँ पाठ की अपनी फल-भाषा है।

English rendering The text states gain of blue garments and the like, acquisition of a dark or blue horse, travel oriented to the west, and an audience with a king or authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दिशा-संकेत (पश्चिम) दशा-फल की पारंपरिक निर्देश-सूची का अंग है; खगोलीय अज़ीमुथ-गणना इस श्लोक में निहित नहीं।

56.12
अनेकयानलाभं च निर्दिशेन्मन्दभुक्तिषु |
लग्नात्षष्ठाष्टमे मन्दे व्यये नीचेऽस्तगेऽप्यरौ
anekayānalābhaṃ ca nirdiśenmandabhuktiṣu |
lagnātṣaṣṭhāṣṭame mande vyaye nīce'stage'pyarau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेकयानलाभम् = अनेक यान/वाहनों का लाभ; निर्दिशेत् = निर्देश करे; मन्दभुक्तिषु = शनि की भुक्ति (अन्तर्दशा) में; लग्नात् = लग्न से; षष्ठ-अष्टमे = छठे या आठवें में; मन्दे = शनि; व्यये = व्यय (12वें) में; नीचे = नीच (मेष) में; अस्तगे = अस्त (सूर्य-सामीप्य/दहन) में; अपि अरौ = अथवा शत्रु-राशि में।

हिन्दी भावार्थ शुभ पक्ष का समापन करते हुए शास्त्र कहता है — मन्द-भुक्ति में अनेक यान-लाभ भी निर्दिष्ट हो। तुरंत विपरीत शर्त: यदि शनि लग्न से षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो, अथवा नीच, अस्त, या शत्रु-ग्रह/शत्रु-राशि-संबंध में हो, तो आगे का अशुभ फल-क्रम लागू होता है। एक ही अन्तर्दशा में स्थिति-द्वार से फल-द्विधा है।

English rendering One should indicate manifold gains of conveyances in Saturn’s bhukti when the prior conditions hold; but if Saturn is in the sixth, eighth, or twelfth from the lagna, or debilitated, combust, or in an inimical condition, the adverse results that follow are stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) अन्तर्-अवधि वही: (16 × 19)/120 वर्ष। (2) भाव-स्थान: लग्न-रेखा से पूर्ण-राशि भाव (समान-भाव/whole-sign) या भावाधिय पद्धति — संख्या 6, 8, 12 पद्धति-निर्भर; घोषित करें। (3) नीच-शनि = मेष 0°–30° (समीप-नीच बिंदु = 20° मेष, परंपरा अनुसार)। (4) अस्त: सूर्य–शनि कोण शास्त्र/परंपरा की दहन-सीमा पर (सामान्य व्यवहार में ~15° के internally consistent नियम से जाँच; पाठ यहाँ सीमा-अंक नहीं देता)। शुभ/अशुभ द्वार = स्थिति-बूलियन, फल अलग परत।

उदाहरण (worked example) लग्न कन्या, समान-भाव। शनि मीन (7वाँ, केन्द्र) मित्र/उच्च-नहीं पर मित्र-वर्ग-विचार से शुभ-द्वार संभव। विपरीत: शनि कुम्भ लग्न से — यदि लग्न कर्क तो शनि 8वें; “षष्ठाष्टमे/व्यये” द्वार खुला → 56.13–56.14 का फल-पक्ष। अन्तर्-लंबाई दोनों दशाओं में समान (304/120 वर्ष); बदलता केवल भाव/अवस्था द्वार।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-इंजन अवधि को अनुपात से काटता है; भाव-द्वार और अस्त/नीच अलग मॉड्यूल हैं। हम फल को कभी अवधि-संख्या में “मिला” कर नहीं देते — ठीक 56.12 की संरचना: पहले यान-लाभ का निर्देश, फिर षष्ठ-अष्टम-व्यय-नीच-अस्त-अरि की शर्त पर फल-पलट, दोनों परतें अलग रखी जाती हैं।

56.13
धनधान्यादिनाशश्च ज्वरपीडा मनोरुजः |
स्त्रीपुत्रादिषु पीडा वाव्रणार्त्यादिकमुद्भवेत्
dhanadhānyādināśaśca jvarapīḍā manorujaḥ |
strīputrādiṣu pīḍā vāvraṇārtyādikamudbhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनधान्यादिनाशः = धन-धान्य आदि का नाश; ज्वरपीडा = ज्वर-संबंधी पीड़ा (शास्त्र-कथन, चिकित्सा नहीं); मनोरुजः = मानसिक क्लेश/चित्त-व्यथा; स्त्रीपुत्रादिषु पीडा = स्त्री-पुत्र आदि में कष्ट; वा = अथवा; व्रणार्त्यादिकम् = व्रण (घाव) और आर्ति आदि; उद्भवेत् = उत्पन्न हो — ऐसा शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ अशुभ स्थिति-शर्तों में शास्त्र कहता है — धन-धान्यादि का क्षय, ज्वर-पीड़ा, मन की रुजा, स्त्री-पुत्रादि के विषय में पीड़ा, अथवा व्रण-आर्ति आदि का उदय। यह दशा-फल का निषेध-पक्ष है; हम इसे रोग-निदान या नियति नहीं मानते — केवल पाठ का कथन।

English rendering The text states that under the adverse conditions, there may be loss of wealth and grain, affliction by fever, mental distress, trouble concerning spouse and children, or the arising of wounds, pain, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ पक्ष)। लागू होने का द्वार 56.12 के भाव/अवस्था नियमों से; यहाँ केवल फल-सूची है। भय या उपचार- दबाव का कोई सूत्र पाठ में संख्यात्मक नहीं।

56.14
गृहे त्वशुभकार्याणि भ्र्त्यवर्गादिपीडनम् |
गोमहिष्यादिहानिश्च बन्धुद्वेषी भविष्यति
gṛhe tvaśubhakāryāṇi bhrtyavargādipīḍanam |
gomahiṣyādihāniśca bandhudveṣī bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = घर में; तु = और; अशुभ-कार्याणि = अमंगल घटनाएँ/कुकार्य; भृत्य-वर्ग-आदि-पीडनम् = सेवक-आश्रित वर्ग आदि को कष्ट; गो-महिषी-आदि-हानिः = गाय-भैंस आदि पशुधन की हानि; बन्धु-द्वेषी = बन्धुजनों से वैरभाव रखने/पाने वाला; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ यह गुरु-महादशा के भीतर शनि-अन्तर्दशा का वही अनिष्ट-पक्ष है, जिसकी शर्त पिछली ऋचाओं में रखी गई — शनि का ६ठे/८वें/१२वें, नीच, अस्त या पापयुत होना। ऐसी स्थिति में शास्त्र कहता है कि घर में अशुभ कार्य होते हैं, सेवक-आश्रित वर्ग को पीड़ा पहुँचती है, गाय-भैंस आदि पशुधन की हानि होती है, और जातक का अपने बन्धुओं से वैमनस्य हो जाता है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that (with Saturn thus ill-placed) inauspicious affairs beset the home, servants and dependents suffer, cattle such as cows and buffaloes are lost, and the native falls into enmity with kinsmen.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुःस्थ शनि-अन्तर का अनिष्ट-फल)। ध्यान दें: यह फल किसी अटल दैव से नहीं, बल्कि पूर्व-श्लोकों में कही स्थिति-रचना (शनि ∈ {6,8,12} भाव / नीच / अस्त / पापयुति) से बँधा है — अर्थात् ज्यामिति पर सशर्त, न कि निरपेक्ष।

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56.15
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे लाभे वा धनगेऽपि वा |
भूराभश्चार्थलाभश्च पुत्रलाभसुखं भवेत्
dāyeśātkendrakoṇasthe lābhe vā dhanage'pi vā |
bhūrābhaścārthalābhaśca putralābhasukhaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशानाथ (यहाँ गुरु) से गिनकर; केन्द्र = १/४/७/१० भाव; कोण = त्रिकोण १/५/९; लाभे = ११वें भाव में; धन-गे = द्वितीय (धन) भाव में; भू-लाभः (भूराभः = भू-लाभः, पाठ-भेद संभव) = भूमि-प्राप्ति; अर्थ-लाभः = धन-प्राप्ति; पुत्र-लाभ-सुखम् = सन्तान-लाभ का सुख।

हिन्दी भावार्थ अब नई शर्त: यदि वही शनि-अन्तर्दशेश दशानाथ (गुरु) से केन्द्र, त्रिकोण, ११वें या धन-भाव में स्थित हो — तो शास्त्र कहता है कि इस अवधि में भूमि-लाभ, अर्थ-लाभ तथा पुत्र-लाभ का सुख प्राप्त होता है। स्थिति-गणना लग्न से नहीं, दशेश से की जा रही है — यही इस अध्याय की मूल विधि है।

English rendering When that Saturn sub-lord stands in a kendra, a trikoṇa, the eleventh, or the second reckoned from the daśā-lord, the text states there is gain of land, gain of wealth, and the happiness of obtaining a son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो स्वतन्त्र गणनाएँ यहाँ संयुक्त हैं। (क) स्थिति-द्वार — दशेश से भाव-सूचकांक = ((अन्तरेश-राशि − दशेश-राशि) mod 12) + 1; शुभ-समुच्चय = केन्द्र {1,4,7,10} ∪ त्रिकोण {1,5,9} ∪ {11} ∪ {2}. (ख) अन्तर्दशा-मान (विंशोत्तरी) = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) मान लें गुरु (दशेश) मेष (राशि 1) में, शनि कर्क (राशि 4) में → भाव = ((4−1) mod 12)+1 = 4 → केन्द्र → शुभ-द्वार सत्य। इसी शनि-अन्तर की लम्बाई = (16 × 19) ÷ 120 = 304⁄120 = 2.5333 वर्ष = 2 वर्ष 6 मास 12 दिन (30-दिन मास-संकेत)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वही विंशोत्तरी-अन्तर्दशा गणित है जिसे हमने अपने दशा-इंजन में Σ = 120 वर्ष (केतु 7 … बुध 17) पर आबद्ध किया — अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120, विशुद्ध अनुपात-अंकगणित। श्लोक की स्थिति-शर्त (दशेश से भाव) और यह कालमान दोनों निश्चयात्मक गणना हैं; फल-कथन शास्त्र का दावा है, हमारा पूर्वानुमान नहीं।

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56.16
गोमहिष्यादिलाभश्च शूद्रमूलाद्धनं तथा |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते
gomahiṣyādilābhaśca śūdramūlāddhanaṃ tathā |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गो-महिषी-आदि-लाभः = गाय-भैंस आदि की प्राप्ति; शूद्र-मूलात् = शूद्र-वर्ग स्रोत से; धनम् = धन; दायेशात् = दशानाथ से; रिपु-रन्ध्र-स्थे = ६ठे (शत्रु) व ८वें (रन्ध्र) भाव में स्थित होने पर; व्यये = १२वें भाव में; पाप-संयुते = पापग्रह-युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ पहला अर्ध पिछली शुभ-शर्त (५६.१५) का फल पूरा करता है — पशुधन-लाभ तथा शूद्र-मूलक स्रोत से धन। दूसरा अर्ध नई अशुभ-शर्त रखता है: यदि शनि-अन्तरेश दशेश से ६/८/१२ में या पापग्रह से युक्त हो। शास्त्र यहाँ स्रोत-भेद में जाति-मूलक भाषा प्रयोग करता है; हम इसे तत्कालीन सामाजिक शब्दावली मानकर तटस्थ रूप से "एक विशिष्ट वर्ग-स्रोत से आय" पढ़ते हैं।

English rendering (Continuing the benefic case) gain of cattle and buffalo, and wealth from a labouring-class source; and then — when that sub-lord is placed in the sixth, eighth, or twelfth from the daśā-lord, or conjunct a malefic —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं स्थिति-द्वार-निर्धारण। दूसरे अर्ध का तकनीकी सार: दशेश से अशुभ-समुच्चय = दुःस्थान {6,8,12}, अथवा पाप-संयोग (मंगल/शनि/राहु/केतु/क्षीण-चन्द्र के साथ युति) — यह अगले श्लोक (५६.१७) के अनिष्ट-फल का द्वार है; भाव-सूचकांक की गणना पूर्ववत् दशेश-राशि से की जाती है।

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56.17
धनधान्यादिनाशश्च बन्धुमित्रविरोधकृत् |
उद्योगभङ्गो देहार्तिः स्वजनानां महद्भयम्
dhanadhānyādināśaśca bandhumitravirodhakṛt |
udyogabhaṅgo dehārtiḥ svajanānāṃ mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनधान्यादिनाश = धन-अन्न आदि का नाश; बन्धु = स्वजन; मित्र = मित्र; विरोधकृत् = विरोध उत्पन्न करने वाला; उद्योगभङ्ग = उद्यम/प्रयास का भंग; देहार्ति = शारीरिक पीड़ा; स्वजनानां महद्भय = अपनों के लिए बड़ा भय/संकट-संकेत।

हिन्दी भावार्थ जब दायेश षष्ठाष्टमव्ययस्थ या पाप-युक्त हो (56.16), तब शास्त्र कहता है—धन-धान्य आदि का नाश, बन्धु-मित्र से विरोध, उद्योग का भंग, देह में आर्ति, तथा स्वजनों के लिए महद् भय। यह दशा-फल का अशुभ-पक्ष है; इसे निश्चित भाग्य या चिकित्सा-निदान न पढ़ें—यह शास्त्र का फल-कथन है।

English rendering The text states, under that adverse placement, loss of wealth and grain, strife with kin and friends, rupture of effort, bodily distress, and great fear concerning one’s own people—reported as śāstric result-language, not as certified fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ दायेश-स्थिति का परिणाम-सूची)। तकनीक: केवल भाव/युति-शर्त की जाँच; फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें, भविष्य-निश्चितता के रूप में नहीं।

56.18
द्विसप्तमाधिपे मन्दे ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत्
dvisaptamādhipe mande hyapamṛtyurbhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विसप्तम-अधिपे = द्वितीय व सप्तम (मारक) भावों के स्वामी होने पर; मन्दे = शनि (के); हि = निश्चय ही; अपमृत्युः = अकाल/अपमृत्यु-भय; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के शमन हेतु; विष्णु-साहस्रकम् = विष्णुसहस्रनाम; जपेत् = जपे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि इस अन्तर्दशा का शनि द्वितीय और सप्तम (मारक) भावों का स्वामी हो, तो अपमृत्यु का भय बनता है; उस दोष की शान्ति के लिए पाठ विष्णुसहस्रनाम-जप का विधान बताता है। यहाँ मारकत्व एक स्थान-आधारित लक्षण है, और उपाय पाठ का अपना निर्देश — इसे दबाव या भय-प्रचार के रूप में नहीं, ग्रन्थ के कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

English rendering When Saturn owns the 2nd and 7th (the māraka houses), the text states a risk of untimely death; to allay that flaw it prescribes recitation of the Viṣṇu-sahasranāma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारक-भाव-समुच्चय: मारक = {2, 7}। लक्षण-शर्त: शनि का भावेशत्व ∩ {2,7} ≠ ∅ → पाठ अपमृत्यु-दोष कहता है। यह स्वामित्व-गणना (भाव-स्वामी) है, कोई फलित-निश्चय नहीं; उपाय-वाक्य विधि-कथन मात्र।

उदाहरण (worked example) शनि-अन्तर की अवधि (विम्शोत्तरी) — गुरु-महादशा = 16 वर्ष, शनि-वर्ष = 19:
अन्तर्दशा(शनि) = 16 × 19 ÷ 120 = 304⁄120 = 2.5333… वर्ष।
360-दिन-वर्ष-परिपाटी से: 0.5333 × 360 = 192 दिन = 6 मास 12 दिन → गुरु-शनि = 2 वर्ष 6 मास 12 दिन। इसी सम्पूर्ण खण्ड पर उपर्युक्त मारक-दोष का कथन लागू होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक जिस अन्तर्दशा-ढाँचे में बैठा है, वही हमारा विम्शोत्तरी 120-वर्ष इंजन है (dossier §3): अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — शुद्ध अनुपात-गणित। गुरु-शनि = 16×19/120 = 2.5333 वर्ष हमारे engine से बाइट-सम मिलता है। शास्त्र की मारक-शर्त और उपाय-वाक्य "पाठ कहता है" के रूप में रखे गए — गणित (अवधि) और फलादेश (अपमृत्यु-भय) को अलग रखना ही हमारी विधि है (dossier §5)।

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56.19
कृष्णां गां महिषीं दद्यादनेनारोग्यमादिशेत् |
मन्दग्रहप्रसादेन सत्यं सत्यं द्विजोत्तम
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādanenārogyamādiśet |
mandagrahaprasādena satyaṃ satyaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृष्णां गाम् = काली गाय; महिषीम् = भैंस; दद्यात् = दान करे; अनेन = इससे; आरोग्यम् = नीरोगता; आदिशेत् = (ज्योतिषी) कहे/निर्देश करे; मन्द-ग्रह-प्रसादेन = शनि-ग्रह की कृपा से; सत्यं सत्यम् = सत्य ही, सत्य ही; द्विज-उत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय को सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के दोष-शमन का विस्तार: पाठ कहता है कि काली गाय और भैंस का दान करने से, शनि की कृपा से, आरोग्य की सम्भावना कही जा सकती है। "सत्यं सत्यं द्विजोत्तम" — यह पराशर का मैत्रेय से किया संवाद-सम्बोधन है, जो इस उपदेश की परम्परागत गुरु-शिष्य वाणी को दर्शाता है।

English rendering Let him give a black cow and a buffalo; by this, through Saturn's grace, the astrologer may declare recovery of health — "truly, truly, O best of the twice-born."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वाक्य एवं संवाद (उपाय-निर्देश + पराशर-मैत्रेय सम्बोधन)। दान-विधान को पाठ का अपना कथन मानना चाहिए, आरोग्य की गारंटी नहीं; "आदिशेत्" शब्द स्वयं इसे भविष्य-कथन की सीमा में रखता है, न कि अटल परिणाम में।

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56.20
जीवस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि दशाधिपसमन्विते
jīvasyāntargate saumye kendralābhatrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vāpi daśādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = बृहस्पति; अन्तर्गत = अन्तर्दशा में; सौम्य = बुध; केन्द्र = 1-4-7-10; लाभ = 11; त्रिकोण = 1-5-9; स्वोच्च = स्व-उच्च राशि; स्वर्क्ष = स्व-राशि; दशाधिपसमन्वित = दशा-स्वामी से युक्त।

हिन्दी भावार्थ जीव (गुरु) की अन्तर्दशा में, जब सौम्य (बुध) केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो—अथवा स्वोच्च/स्वर्क्ष में, अथवा दशाधिप से युक्त हो—तब अगले श्लोक का शुभ फल लागू होता है। यह अन्तर्दशा-फल की स्थिति-शर्त है; गणना दशा-चक्र और ग्रह-स्थिति दोनों पर निर्भर है।

English rendering In Jupiter’s antardaśā, when Mercury occupies a kendra, the eleventh, or a trikoṇa—or stands in exaltation or its own sign, or is conjoined with the daśā-lord—the favourable results of the next verse are conditioned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-ढाँचा (विंशोत्तरी-परंपरा, BPHS Ch.46–47): अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120। जीव-महादशा = 16 वर्ष; सौम्य-अन्तर् = 17 वर्ष ⇒ गुरु–बुध अन्तर् ≈ (16 × 17) ÷ 120 = 272/120 = 2 वर्ष 3 मा 6 दिन (मानक 360-दिन वर्ष-रूपांतर परंपरा के अनुसार विस्तार)। फल-लागू होने की शर्त: बुध ∈ {केन्द्र, 11, त्रिकोण} ∨ उच्च/स्व-राशि ∨ दशाधिप-युति। अयनांश/लग्न-गणना घोषित करें—भाव-स्थिति उन पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, गुरु-महादशा 16 y, बुध-अन्तर्: अवधि = 16 × 17 / 120 = 2.266… y ≈ 2y 3m 6d (वर्ष = 360 दिन मानकर: 2y + 0.2667×360 ≈ 2y 96d ≈ 2y 3m 6d)। यदि बुध, उदाहरणतः, लग्न से 10वें (केन्द्र) में स्व-राशि कन्या में हो, तो 56.20 की स्थिति-शर्त पूर्ण; फल 56.21 का।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तर्दशा-अनुपात (MD × AD)/120 हमारे दशा-इंजन में यथावत् गणित है। यह श्लोक उसी जीव–सौम्य अन्तर्-खंड की फल-शर्त बाँधता है; अवधि exact ratio से, फल शास्त्र-वाक्य से—दोनों अलग रखे जाते हैं।

56.21
अर्थलाभो देहसौख्यं राज्यलाभो महत्सुखम् |
महाराजप्रसादेन स्वेष्टसिद्धिः सुखावहा
arthalābho dehasaukhyaṃ rājyalābho mahatsukham |
mahārājaprasādena sveṣṭasiddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्थलाभ = धन-लाभ; देहसौख्य = शारीरिक सुख; राज्यलाभ = पद/राज-अनुग्रह/प्राधिकार-लाभ; महत्सुख = बड़ा सुख; महाराजप्रसाद = महाराज/शासक की कृपा; स्वेष्टसिद्धि = अभीष्ट की सिद्धि; सुखावहा = सुख लाने वाली।

हिन्दी भावार्थ जब 56.20 की शर्तें पूरी हों, शास्त्र कहता है—अर्थ-लाभ, देह-सौख्य, राज्य-लाभ और महत् सुख। महाराज के प्रसाद से अभीष्ट-सिद्धि होती है, और वह सिद्धि सुखावहा कही गई है। यह अनुकूल अन्तर्दशा-फल का शास्त्र-कथन है, न कि निश्चित राज-योग या आर्थिक गारंटी।

English rendering Under those conditions the text states gain of wealth, bodily ease, gain of rank or royal favour, and great happiness; through a great king’s grace one’s desired ends are fulfilled, and that fulfillment is said to bring happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (56.20 की स्थिति पर आश्रित शुभ-परिणाम-सूची)। लागू करने की जाँच-श्रृंखला: (1) जीव-अन्तर् सक्रिय? (2) बुध की भाव/राशि/युति 56.20 के अनुसार? → हाँ तो यह फल-पैकेज; नहीं तो यह श्लोक लागू नहीं।

56.22
वाहनाम्बरपश्वादिगोधनैस्संकुलं गृहम् |
महीसुतेन संदृष्टे शत्रुवृद्धिः सुखक्षयः
vāhanāmbarapaśvādigodhanaissaṃkulaṃ gṛham |
mahīsutena saṃdṛṣṭe śatruvṛddhiḥ sukhakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन-अम्बर-पशु-आदि = वाहन, वस्त्र, पशु आदि; गो-धनैः = गो-धन से; संकुलम् = भरा-पूरा; गृहम् = घर; मही-सुतेन = मंगल से (मही-सुत = पृथ्वी-पुत्र = मंगल); संदृष्टे = दृष्ट होने पर; शत्रु-वृद्धिः = शत्रुओं की वृद्धि; सुख-क्षयः = सुख का क्षय।

हिन्दी भावार्थ पहला अर्ध शुभ-फल पूरा करता है — घर वाहन, वस्त्र, पशु व गो-धन से भरा-पूरा रहता है। दूसरा अर्ध चेतावनी-शर्त देता है: यदि वही बुध मंगल (मही-सुत) से दृष्ट हो, तो शास्त्र शत्रु-वृद्धि और सुख के क्षय की बात कहता है — शुभ-योग पर पापदृष्टि का ह्रासकारी प्रभाव।

English rendering the house is filled with vehicles, garments, animals and cattle-wealth; but when Mercury is aspected by Mars, the text states enemies increase and comfort wanes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं दृष्टि-निर्धारण। तकनीकी बिन्दु: "मही-सुत = मंगल" भूतसंकेत नहीं, परिचय-नाम है। मंगल की विशेष दृष्टि पराशर-मत से ४थे, ७वें, ८वें भाव पर पूर्ण होती है — अतः "संदृष्ट" का द्वार बुध की मंगल से कोणीय दूरी (4/7/8 भाव) पर निर्भर है।

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56.23
व्यवसायात्फलं निष्टं ज्वरातीमारपीडनम् |
दायेशाद्भाग्यकोणे वा केन्द्रे वा तुङ्गराशिगे
vyavasāyātphalaṃ niṣṭaṃ jvarātīmārapīḍanam |
dāyeśādbhāgyakoṇe vā kendre vā tuṅgarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसायात् = व्यवसाय/उद्यम से; फलं (अ)निष्टं/नष्टं = अनिष्ट या नष्ट फल (पाठ "निष्टं" → अनिष्टं/नष्टं, पाठ-भेद संभव); ज्वर-अतिसार-पीडनम् = ज्वर व अतिसार की पीड़ा (पाठ "अतीमार" → अतिसार, पाठ-भेद संभव); दायेशात् = दशेश (गुरु) से; भाग्य-कोणे = ९वें (भाग्य/त्रिकोण) भाव में; केन्द्रे = केन्द्र में; तुङ्ग-राशि-गे = उच्च राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध अनिष्ट-पक्ष कहता है — व्यवसाय से हानि/अनिष्ट फल, तथा ज्वर-अतिसार आदि की पीड़ा (शास्त्र-कथन)। उत्तरार्ध पुनः इष्ट-शर्त रखता है: यदि दशेश से बुध ९वें, केन्द्र में या उच्च राशि में हो, तो (श्लोक २४ का) शुभ फल मिलता है। पाठ-भेद के दो स्थल यहाँ स्पष्ट कर दिए गए हैं।

English rendering Undesirable results from business and affliction by fever and dysentery (are indicated); but if, from the daśā-lord, Mercury is in the 9th, in a kendra, or exalted, (favourable results follow).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-समुच्चय से फल-पलटाव — दायेश से गणना:
इष्ट-शर्त: बुध-भाव ∈ {9 (भाग्य/कोण)} ∪ केन्द्र {1,4,7,10}, अथवा बुध = उच्च (तुङ्ग)। इस स्थान/गरिमा-पूर्ति पर अनिष्ट-शाखा से इष्ट-शाखा में संक्रमण। दो शब्द पाठ-भेद-सापेक्ष हैं, अतः अर्थ को "पाठ-भेद संभव" चिह्नित रखा गया।

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56.24
स्वदेशे धनलाभश्च पितृमातृसुखावहा |
गजवाजिसमायुक्तो राजमित्रप्रसादतः
svadeśe dhanalābhaśca pitṛmātṛsukhāvahā |
gajavājisamāyukto rājamitraprasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वदेशे = अपने देश/स्थान में; धनलाभ = धन की प्राप्ति; पितृ-मातृ-सुखावहा = माता-पिता का सुख देने वाली; गज = हाथी; वाजि = अश्व; समायुक्त = उनसे युक्त; राजमित्र = राज-मित्र/राजा और मित्र; प्रसादतः = अनुग्रह से।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की स्थिति — दायेश भाग्य-कोण, केन्द्र या तुङ्ग राशि में — के फल के रूप में शास्त्र कहता है: स्वदेश में धन-लाभ होता है और वह स्थिति पिता-माता का सुख लाने वाली बताई गई है। गज-अश्व से युक्त वैभव तथा राज-मित्र के प्रसाद से लाभ का भी उल्लेख है। यह शास्त्र का फल-वाक्य है, न कि हमारी ओर से की गई भविष्यवाणी।

English rendering Under that placement of the daśā-lord, the text states wealth gained in one’s own land and comfort for parents, with elephants and horses, through the favour of king and friends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “स्वदेश / राजमित्र-प्रसाद” व्याख्यात्मक फल हैं; कोई संख्यात्मक काल-विभाजन नहीं।

56.25
दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते |
शुभदृष्टिविहीने च धन्धान्यपरिच्युतिः
dāyeśātṣaṣṭharandhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute |
śubhadṛṣṭivihīne ca dhandhānyaparicyutiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश से; षष्ठ-रन्ध्र-स्थे = ६ठे व ८वें भाव में स्थित; व्यये = १२वें में; पाप-संयुते = पापग्रह-युक्त; शुभ-दृष्टि-विहीने = शुभ-ग्रह की दृष्टि से रहित; धन-धान्य-परिच्युतिः = धन-अन्न से च्युति/पतन।

हिन्दी भावार्थ अन्तिम अशुभ-शर्त: यदि बुध दशेश से ६/८/१२ में हो, पापग्रह से युक्त हो, और साथ ही किसी शुभ-ग्रह की दृष्टि से रहित हो — तो शास्त्र कहता है कि धन-धान्य से पतन होता है। तीन प्रतिकूल कारकों (दुःस्थान + पाप-युति + शुभ-दृष्टि का अभाव) के संयोग से ही यह पूर्ण अनिष्ट-द्वार खुलता है।

English rendering When, from the daśā-lord, Mercury is placed in the sixth or eighth or twelfth, conjunct a malefic, and bereft of any benefic aspect, the text states there is a falling-away of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — अनिष्ट-द्वार का तार्किक संयोजन (AND): दुःस्थान {6,8,12 दशेश से} ∧ पाप-युति ∧ ¬(शुभ-दृष्टि)। तीनों शर्तों का एक साथ सत्य होना आवश्यक है; कोई एक शुभ-दृष्टि भी द्वार को निरस्त कर देती है — अर्थात् फल केवल स्थिति नहीं, दृष्टि-संशोधन का भी फलन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "बहु-शर्त AND-द्वार, फिर संशोधन" वाली रचना हमारी विधि-रेखा से मेल खाती है — पहले सटीक स्थिति/युति/दृष्टि की गणना, तब फल; तथा शुभ-दृष्टि जैसे संशोधक को मौन रूप से छोड़ना नहीं, स्पष्ट शर्त के रूप में जोड़ना (जैसे अष्टकवर्ग में त्रिकोण-/एकाधिपत्य-शोधन फल से पूर्व SAV को घटाते हैं)।

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56.26
विदेशगमनं चैव मार्गे चौरभयं तथा |
व्रणदाहाक्षिरोगश्च नानादेशपरिभ्रमः
videśagamanaṃ caiva mārge caurabhayaṃ tathā |
vraṇadāhākṣirogaśca nānādeśaparibhramaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेश-गमनम् = परदेश-यात्रा; मार्गे = मार्ग में; चौर-भयम् = चोरों का भय; व्रण-दाह-अक्षि-रोगः = घाव, जलन/दाह तथा नेत्र-रोग; नाना-देश-परिभ्रमः = अनेक देशों में भटकना।

हिन्दी भावार्थ यह ५६.२५ की अशुभ-शर्त का फल-विस्तार है। शास्त्र कहता है कि ऐसी बुध-अन्तर्दशा में परदेश-गमन, मार्ग में चोर-भय, घाव-दाह व नेत्र-रोग की पीड़ा तथा अनेक देशों में अस्थिर भ्रमण होता है — षष्ठ/अष्टम/व्यय-गत, पाप-युत, शुभ-दृष्टि-हीन बुध का पूर्ण अनिष्ट-परिणाम।

English rendering the text states there is travel to foreign lands, danger from thieves upon the road, wounds, burns and eye-disease, and restless wandering through many countries.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (५६.२५ के अनिष्ट-द्वार का परिणाम-वाक्य)। अन्तर्दृष्टि: यह श्लोक बुध-अन्तर्दशा प्रकरण के अशुभ-पक्ष का समापन-फल है; कोई नई राशि-गणना नहीं जुड़ती — पूरा फल पूर्व-श्लोक की त्रि-शर्त पर आश्रित रहता है, और इसे शास्त्र की सशर्त उक्ति रूप में पढ़ें, भय रूप में नहीं।

56.27
लग्नात्षष्ठाष्टमभावे वा व्यये वा पापसंयुते |
अक्समात्कलहश्चैव गृहे मिष्ठुरभावणम्
lagnātṣaṣṭhāṣṭamabhāve vā vyaye vā pāpasaṃyute |
aksamātkalahaścaiva gṛhe miṣṭhurabhāvaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न (उदित राशि) से गणना का आधार; षष्ठ-अष्टम-भावे = छठे/आठवें भाव में; व्यये = बारहवें (व्यय) भाव में; पाप-संयुते = पापग्रह से युक्त; अकस्मात् (पाठ: "अक्समात्") = सहसा; कलहः = विवाद; गृहे = घर में; निष्ठुर-भाषणम् (पाठ: "मिष्ठुरभावणम्" — पाठ-भेद संभव, संभवतः निष्ठुर-भाषणम् = कठोर वचन)।

हिन्दी भावार्थ यह गुरु (जीव) की महादशा में बुध (सौम्य) की अन्तर्दशा का अशुभ पक्ष है (क्रम व॰ 20 "जीवस्यान्तर्गते सौम्ये" से जुड़ा)। शास्त्र कहता है कि यदि उस अन्तरेश बुध की स्थिति लग्न से छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, अथवा वह पापग्रह से युक्त हो, तो अकस्मात् कलह उठते हैं और घर में कठोर वचनों का प्रसंग बनता है।

English rendering The text states that when Mercury (the sub-period lord in Jupiter's daśā) stands in the 6th, 8th or 12th from the ascendant, or is conjoined with malefics, sudden quarrels break out and harsh speech is heard within the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह फल-गेट एक स्थान-गणना (भाव-सूचकांक) पर टिका है, कोई राशि नहीं देता, केवल शर्त देता है:
भाव n = ((राशिₚ − राशि_लग्न) mod 12) + 1, और अशुभ-गण = {6, 8, 12} (दुःस्थान)। इसके साथ पाप-युति एक बूलियन शर्त है। फल तभी कथित है जब n ∈ {6, 8, 12} अथवा पाप-युति सत्य हो।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (राशि 1), बुध = तुला (राशि 7) → n = ((7 − 1) mod 12) + 1 = 7 → 7 ∉ {6,8,12}, गेट निष्क्रिय। बुध = कन्या (राशि 6) → n = ((6 − 1) mod 12) + 1 = 6 → 6 ∈ {6,8,12}, गेट सक्रिय, अतः इस पद का अशुभ फल-कथन लागू होता है।

56.28
चतुष्पाज्जीवहानिश्च व्यवहारे तथैव च |
अपमृत्युभयं चैव शत्रूणां कलहो भवेत्
catuṣpājjīvahāniśca vyavahāre tathaiva ca |
apamṛtyubhayaṃ caiva śatrūṇāṃ kalaho bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात् = चौपाया (गौ-महिष्यादि पशु); जीव-हानिः = (पशु-रूप) जीवों की हानि; व्यवहारे = लेन-देन/व्यापार में; तथैव च = वैसे ही (हानि); अपमृत्यु-भयम् = अकाल-मृत्यु का भय; शत्रूणाम् = शत्रुओं का/से; कलहः = विवाद; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ उसी गुरु-बुध अन्तर्दशा के अशुभ योग का विस्तार — शास्त्र कहता है कि चौपाये पशुओं की हानि होती है, व्यापार-व्यवहार में भी क्षति होती है, अकाल-मृत्यु का भय बनता है, और शत्रुओं के साथ कलह उठ खड़ा होता है। यह भय-कथन शास्त्र का अपना अभिमत है, कोई अवश्यंभावी विधि नहीं।

English rendering The text states that during this affliction there is loss of cattle, loss in trade and dealings, a threat of untimely death, and strife with enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुष्फल-गणना)। ध्यातव्य: "अपमृत्यु-भय" यहाँ शास्त्र की आशङ्का-उक्ति है, कोई भविष्य-निश्चय नहीं; इसे मारकेश-विचार (व॰ 30) के साथ पढ़ने पर ही इसकी स्थान-आधारित शर्त पूर्ण होती है।

56.29
शुभदृष्टे शुभैर्युक्ते दारसौख्यं धनागमः |
आदौ शुभं देहसौख्यं वाहनाम्बरलाभकृत्
śubhadṛṣṭe śubhairyukte dārasaukhyaṃ dhanāgamaḥ |
ādau śubhaṃ dehasaukhyaṃ vāhanāmbaralābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-दृष्टे = शुभग्रह से दृष्ट होने पर; शुभैः-युक्ते = शुभग्रहों से युक्त होने पर; दार-सौख्यम् = पत्नी-सुख; धन-आगमः = धन का आना; आदौ = आरम्भ में (अन्तर्दशा का पूर्वार्ध); शुभम् = मंगल, कल्याण; देह-सौख्यम् = शरीर-सुख, आरोग्य; वाहन-अम्बर-लाभकृत् = वाहन व वस्त्र का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ अब शुभ पक्ष — शास्त्र कहता है कि यदि बुध-अन्तर्दशेश शुभग्रहों से दृष्ट व युक्त हो, तो दाम्पत्य-सुख और धनागम होता है; अन्तर्दशा के आरम्भ में शुभ फल, देह का आरोग्य, तथा वाहन एवं वस्त्र का लाभ मिलता है। "आदौ" शब्द अन्तर्दशा-काल के पूर्वार्ध की ओर संकेत करता है।

English rendering If aspected and conjoined by benefics, the text states there is marital happiness and inflow of wealth; in the early part of the period, auspiciousness, bodily ease, and gains of conveyance and garments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। किन्तु "आदौ / अन्ते" (आरम्भ बनाम अन्त) अन्तर्दशा को काल-खण्डों में विभाजित करने की तकनीक है — यही आगे प्रत्यन्तर्दशा का बीज है। अन्तर्दशा-मान की गणना: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी अभिसमय; गुरु-महादशा = 16 वर्ष, बुध-वर्ष = 17। बुध-अन्तर्दशा = 16 × 17 ÷ 120 = 272⁄120 = 2.2667 वर्ष ≈ 2 वर्ष 3 मास 6 दिन। "आदौ" (पूर्वार्ध) ≈ प्रथम 1 वर्ष 1½ मास; "अन्ते" (उत्तरार्ध) = शेष अवधि।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित है (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120)। अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120 को हम व्यतीत-नक्षत्र-अंश से `==` पर पिन करते हैं — "आदौ/अन्ते" का विभाजन गणित है, फल उसकी शास्त्रीय व्याख्या।

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56.30
अन्ते तु धनहानिश्चेत्स्वात्मसौख्यं न जायते |
द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति
ante tu dhanahāniścetsvātmasaukhyaṃ na jāyate |
dvitīyadyūnanāthe vā hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = (अन्तर्दशा के) अन्त-भाग में; तु = किन्तु; धन-हानिः = धन-क्षय; चेत् = यदि; स्व-आत्म-सौख्यम् = अपना निजी सुख; न जायते = नहीं होता; द्वितीय-द्यून-नाथे = दूसरे (धन) व सातवें (द्यून = जाया/मारक) भाव के स्वामी होने पर; अपमृत्युः = अकाल-मृत्यु; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसी बुध-अन्तर्दशा के उत्तरार्ध में धन-हानि होती है और आत्मसुख नहीं मिलता; और यदि वह अन्तरेश द्वितीय या सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो देह-बाधा/अपमृत्यु की आशङ्का का कथन है। यह शास्त्र का मारक-सिद्धान्त-आधारित अभिमत है, भय या नियति नहीं; अगला पद इसकी शान्ति बताता है।

English rendering The text states that toward the end wealth is lost and personal comfort fails; and if that sub-lord owns the 2nd or the 7th (the māraka houses), it declares a risk of untimely death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारक-स्थान = {2, 7} — यह कोई संख्या-मान नहीं, अपितु राशि-चक्र की स्वामित्व-सारणी से निर्धारित एक सुनिश्चित (deterministic) तथ्य है:
मारकेश ⇔ भावेश(2) ∨ भावेश(7), जहाँ भावेश(k) = उस राशि का स्वामी जो लग्न से k-वीं है। "अपमृत्यु" इस गणित पर आरोपित शास्त्र-कथन है, गणित का निष्कर्ष नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृश्चिक। द्वितीय = धनु (स्वामी गुरु), सप्तम = वृषभ (स्वामी शुक्र)। यदि इस कुण्डली में अन्तरेश बुध किसी प्रकार 2/7 का स्वामी नहीं (बुध यहाँ 8वें व 11वें का स्वामी) → मारक-गेट निष्क्रिय; अतः यह अपमृत्यु-कथन उस जातक पर लागू नहीं होता। स्वामित्व = गणित; फल = शास्त्र-वचन — दोनों पृथक्।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही "गणना बनाम व्याख्या" का पृथक्करण हमारी मूल अनुशासन-रेखा है (dossier §5): भावेश-स्वामित्व और द्वितीय/सप्तम की मारक-गणना `==` से सुनिश्चित सिद्ध होती है, जबकि "अपमृत्यु" को हम शास्त्र का कथन मानकर उद्धृत करते हैं, स्वयं की भविष्यवाणी बनाकर नहीं — न भय, न दबाव।

56.31
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् |
आयुर्वृद्धिकरं चैव सर्वसौभाग्यदायकम्
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet |
āyurvṛddhikaraṃ caiva sarvasaubhāgyadāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के परिहार (निवारण) हेतु; विष्णुसाहस्रकम् = विष्णु-सहस्रनाम; जपेत् = जप करे (शास्त्र का विधि-कथन); आयुर्वृद्धिकरम् = आयु-वृद्धि करने वाला (पाठ का फल); सर्वसौभाग्यदायकम् = समस्त सौभाग्य देने वाला (पाठ का फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त दोष-परिहार के लिए विष्णु-सहस्रनाम का जप विहित है। पाठ स्वयं इसे आयु-वृद्धि और सर्व-सौभाग्य का साधन बताता है। यह शास्त्रीय विधि-कथन है — दबाव या भय से जोड़ा हुआ “उपाय-व्यापार” नहीं; पाठक इसे स्रोत-वाणी के रूप में ही ग्रहण करे।

English rendering The text states that for removal of that defect one should recite the Viṣṇu-sahasranāma. It further calls this practice life-lengthening and bestower of all good fortune — as the śāstra’s own claim, not a pressure-remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/फल-कथन। जप-संख्या, काल, या बल-रूप में कोई संख्यात्मक सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

56.32
जीवस्यान्तर्गते केतौ शुभग्रहसमन्विते |
अल्पसौख्यधनव्याप्तिः कुत्सितान्नस्य भोजनम्
jīvasyāntargate ketau śubhagrahasamanvite |
alpasaukhyadhanavyāptiḥ kutsitānnasya bhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य-अन्तर्गते केतौ = गुरु (जीव) की दशा में केतु की अन्तर्दशा आने पर; शुभ-ग्रह-समन्विते = शुभग्रह से युक्त होने पर; अल्प-सौख्य-धन-व्याप्तिः = थोड़ा सुख व धन की प्राप्ति; कुत्सित-अन्नस्य भोजनम् = निन्दित/हीन अन्न का भोजन।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से गुरु-महादशा में केतु-अन्तर्दशा का फल आरम्भ होता है। शास्त्र कहता है कि यदि केतु शुभग्रह से युक्त हो, तब भी अल्प सुख और थोड़ा-सा धन-लाभ ही होता है, तथा हीन/निन्दित अन्न का भोजन करना पड़ता है।

English rendering The text states that when Ketu's sub-period arrives within Jupiter's daśā, even if Ketu is joined by a benefic, only slight comfort and small gain of wealth accrue, along with the eating of poor or disreputable food.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह पद विंशोत्तरी अन्तर्दशा-खण्ड का शीर्षक है — इसका गणित अन्तर्दशा-अवधि में है। गुरु महादशा = 16 वर्ष, केतु = 7 वर्ष; अन्तर्दशा-अवधि सूत्र:
अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) गुरु-केतु अन्तर = (16 × 7) ÷ 120 = 112 ÷ 120 = 0.9333… वर्ष = 11 माह 6 दिन (0.9333 × 12 = 11.2 माह; 0.2 माह ≈ 6 दिन)। सम्पूर्ण गुरु-दशा (16 वर्ष) में यह केतु-खण्ड की लम्बाई है, जिस पर उपर्युक्त फल आरोपित होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक हमारी विंशोत्तरी 120-वर्ष इंजन की शुद्ध अनुपात-गणना है (dossier §3): Ketu 7, … Σ = 120 वर्ष; अन्तर = (महा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120 केवल नक्षत्र-भिन्न पर आधारित सुनिश्चित अंकगणित है। शीर्ष-ग्रह-क्रम व अवधि गणना का विषय है; "अल्प-सौख्य/कुत्सितान्न" शास्त्र का फल-वचन है।

56.33
परान्नं चैव श्राद्धान्नं पापमूलाद्धनानि च |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते
parānnaṃ caiva śrāddhānnaṃ pāpamūlāddhanāni ca |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पर-अन्नम् = दूसरों का अन्न; श्राद्ध-अन्नम् = श्राद्ध का अन्न; पाप-मूलात् धनानि = पाप-मूलक (अशुभ स्रोत से) धन; दायेशात् = दशा-स्वामी (दायेश) से गणना का आधार; रिपु-रन्ध्र-स्थे = छठे (रिपु)/आठवें (रन्ध्र) में स्थित; व्यये = बारहवें में; पाप-संयुते = पापग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस केतु-अन्तर्दशा में परान्न और श्राद्ध का अन्न खाना पड़ता है तथा अशुभ स्रोतों से धन आता है। और यदि केतु दशेश (दायेश) से छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, या पापग्रह से युक्त हो — (आगे व॰ 34 में फल)।

English rendering The text states that during this period one eats others' food and śrāddha food and gathers wealth from tainted sources; and if Ketu lies in the 6th, 8th or 12th from the daśā-lord, or is joined with malefics — (result follows).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ गणना-आधार लग्न नहीं, अपितु दायेश (दशा-स्वामी) है — यह एक सापेक्ष स्थान-गणना है:
भाव n = ((राशिₚ − राशि_दायेश) mod 12) + 1, अशुभ-गण = {6, 8, 12}। शर्त: n ∈ {6, 8, 12} ∨ पाप-युति। कोई संख्या-मान नहीं, केवल पद-गणना (bhāva count) पर आधारित गेट।

उदाहरण (worked example) दायेश गुरु = धनु (राशि 9); केतु = कर्क (राशि 4) → n = ((4 − 9) mod 12) + 1 = (−5 mod 12) + 1 = 7 + 1 = 8 → 8 ∈ {6,8,12} → गेट सक्रिय, अगले पद का अशुभ फल-कथन लागू।

56.34
राजकोपो धनच्छेदो बन्धनं रोगपीडनम् |
बलाहानिः पितृद्वेषो भ्रातृद्वेषो मनोरुजम्
rājakopo dhanacchedo bandhanaṃ rogapīḍanam |
balāhāniḥ pitṛdveṣo bhrātṛdveṣo manorujam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजकोपः = राजा/शासन का कोप; धनच्छेदः = धन का छेदन/कटौती; बन्धनम् = बन्धन; रोगपीडनम् = रोग से पीड़न; बलाहानिः = बल-हानि; पितृद्वेषः = पितृ-जन से द्वेष/वैमनस्य; भ्रातृद्वेषः = भ्रातृ-जन से द्वेष; मनोरुजम् = मन की रुजा/मानस-पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त दोष-योग में राजकोप, धनच्छेद, बन्धन, रोग-पीड़ा, बल-हानि, पितृ-द्वेष, भ्रातृ-द्वेष, और मनोरुजा — ये फल-सूची आती है। ये सब पाठ के दशा-फल हैं; इन्हें निश्चित घटना या भय-वाणी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। “रोग” और “बन्धन” यहाँ ज्योतिष-फल के पद हैं — चिकित्सा या कानूनी निदान नहीं।

English rendering The text lists royal displeasure, cutting of wealth, bondage, affliction by disease, loss of strength, friction with father and with brothers, and mental distress. These are the śāstra’s daśā-results, reported as such — not certainties, medical diagnoses, or legal forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सात फल-पद गुणात्मक सूची हैं; कोई संख्या, अनुपात, या बल-सीमा नहीं दी गई।

56.35
दायेशात्सुतभाग्यस्थे वाहने कर्मगेऽपि वा |
नरवाहनयोगश्च गजाश्वाम्बरसङ्कुलम्
dāyeśātsutabhāgyasthe vāhane karmage'pi vā |
naravāhanayogaśca gajāśvāmbarasaṅkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश से; सुत-भाग्य-स्थे = पंचम (सुत = 5) या नवम (भाग्य = 9) में स्थित; वाहने = चतुर्थ (वाहन = 4) में; कर्मगे = दशम (कर्म = 10) में; नर-वाहन-योगः = पालकी आदि मनुष्य-वाहित सवारी का योग (उच्च-पद-सूचक); गज-अश्व-अम्बर-सङ्कुलम् = हाथी, घोड़े व वस्त्रों की बहुलता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि वही केतु दशेश से पंचम, नवम, चतुर्थ या दशम भाव में हो, तो नर-वाहन-योग बनता है और हाथी, घोड़े तथा वस्त्रों की समृद्धि होती है। यहाँ स्थान-शर्त केन्द्र (4,10) एवं त्रिकोण (5,9) की शुभ स्थितियाँ हैं।

English rendering The text states that if Ketu occupies the 5th, 9th, 4th or 10th from the daśā-lord, a naravāhana-yoga arises, with abundance of elephants, horses and garments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ स्थान-गण यहाँ केन्द्र ∪ त्रिकोण = {4, 10} ∪ {5, 9} है (दायेश-सापेक्ष):
भाव n = ((राशिₚ − राशि_दायेश) mod 12) + 1, शुभ-गण = {4, 5, 9, 10}। शर्त: n ∈ {4, 5, 9, 10}। (पद-गणना; कोई राशि-मान नहीं।)

उदाहरण (worked example) दायेश गुरु = मीन (राशि 12); केतु = कर्क (राशि 4) → n = ((4 − 12) mod 12) + 1 = (−8 mod 12) + 1 = 4 + 1 = 5 → 5 ∈ {4,5,9,10} (त्रिकोण) → शुभ-गेट सक्रिय, अतः यह समृद्धि-फल-कथन लागू।

56.36
महाराजप्रसादेन स्वेष्टकार्यार्थलाभकृत् |
व्यवसायात्फलाधिक्यं गोमहिष्यादिलाभकृत्
mahārājaprasādena sveṣṭakāryārthalābhakṛt |
vyavasāyātphalādhikyaṃ gomahiṣyādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महाशासक/राजा के अनुग्रह से; स्वेष्ट-कार्यार्थ-लाभ-कृत् = अभीष्ट कार्य व अर्थ-लाभ कराने वाला; व्यवसायात् = उद्यम/व्यापार से; फल-आधिक्यम् = फल की अधिकता; गो-महिष्यादि-लाभ-कृत् = गौ, महिषी आदि पशु-लाभ का कारक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्ववर्ती योग-स्थिति में) महाराज-प्रसाद से अभीष्ट कार्य और अर्थ-लाभ होता है। व्यवसाय से फल-वृद्धि बताई गई है। गौ, महिषी आदि पशुओं का लाभ भी इसी फल-कथन का अंग है। यह फल-वर्णन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that, under the stated conditions, royal favor brings success in desired aims and material gain; enterprise yields enhanced fruit, and there is gain of cattle such as cows and buffaloes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक पूर्व-निर्दिष्ट दशा/अन्तर्दशा-योग का परिणाम बताता है; गणना स्वयं यहाँ नहीं है, केवल शास्त्र-कथित फल-सूची है।

56.37
यवनप्रभुमूलाद्वा धनवस्त्रादिलाभकृत् |
द्वितीयद्यूननाथे तु देहवाधा भविष्यति
yavanaprabhumūlādvā dhanavastrādilābhakṛt |
dvitīyadyūnanāthe tu dehavādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यवन-प्रभु-मूलात् = यवन (म्लेच्छ/विदेशी) शासक के स्रोत से; धन-वस्त्रादि-लाभकृत् = धन-वस्त्र आदि का लाभ; द्वितीय-द्यून-नाथे = दूसरे (धन) व सप्तम (द्यून/मारक) भाव के स्वामी होने पर; देह-वाधा (बाधा) = शारीरिक पीड़ा; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यवन-शासक (विदेशी/अन्य-धर्मी अधिपति) के माध्यम से धन-वस्त्र आदि का लाभ होता है; किन्तु यदि वही केतु द्वितीय या सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो देह-बाधा की आशङ्का का कथन है। यह मारक-आधारित उक्ति शास्त्र का अभिमत है, नियति नहीं; अगला पद इसकी शान्ति देता है।

English rendering The text states that gains of wealth and clothing may come through a foreign ruler; but if Ketu owns the 2nd or 7th (māraka houses), bodily affliction is declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पुनः मारक-गणित: मारकेश ⇔ भावेश(2) ∨ भावेश(7), जहाँ भावेश(k) लग्न से k-वीं राशि का स्वामी है। यह स्वामित्व-सारणी से सुनिश्चित (deterministic) है; "देह-बाधा" उस पर आरोपित शास्त्र-कथन है, गणित का निष्कर्ष नहीं। (छाया-ग्रह केतु के स्वामित्व-निर्धारण में परम्परा-भेद संभव — पाठ-भेद/मत-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन। द्वितीय = कर्क (स्वामी चन्द्र), सप्तम = धनु (स्वामी गुरु)। इनमें केतु किसी राशि का "स्वामी" पारम्परिक अर्थ में नहीं (केतु अस्वामी माना जाता है, यद्यपि कुछ मत उसे स्थित-राशि-स्वामी का प्रतिनिधि मानते हैं) → मारक-गेट प्रायः निष्क्रिय; अतः देह-बाधा-कथन लागू नहीं। स्वामित्व = गणना, फल = शास्त्र-वचन — पृथक् रखे गए।

56.38
छागदानं प्रकुर्वीत मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
सर्वदोषोपशमनीं शान्तिं कुर्याद्विधानतः
chāgadānaṃ prakurvīta mṛtyuñjayajapaṃ caret |
sarvadoṣopaśamanīṃ śāntiṃ kuryādvidhānataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छाग-दानम् = बकरे का दान; प्रकुर्वीत = करे (शास्त्र-निर्देश); मृत्युञ्जय-जपम् = मृत्युञ्जय-मन्त्र का जप; चरेत् = आचरण करे; सर्व-दोष-उपशमनीम् = सब दोषों को शांत करने वाली; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; कुर्यात् = करे; विधानतः = विधि/शास्त्र-विधान के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस प्रसंग में छाग-दान और मृत्युञ्जय-जप का उल्लेख करता है, तथा विधिपूर्वक सर्वदोष-उपशमनी शान्ति करने को कहता है। यह शास्त्र-कथित शान्ति-उपाय का वर्णन है, दबाव या “करोगे तो बचोगे” का आग्रह नहीं। पाठक इसे पारंपरिक कर्म-सूची के रूप में समझें, चिकित्सा या कानूनी आदेश के रूप में नहीं।

English rendering The text prescribes goat-gift and Mṛtyuñjaya japa, and a formally conducted śānti said to allay all faults—recorded as the śāstra’s own ritual counsel, not as enforced remedy or medical cure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/उपाय-निर्देश। यहाँ कोई अंश, वर्ष, बिन्दु या बल-माप नहीं; केवल शास्त्र-कथित कर्म-सूची है।

56.39
जीवस्यान्तर्गते शुक्रे भाग्यकेन्द्रेशसंयुते |
लाभे वा सुतराशिस्थे स्वक्षेत्रे शुभसंयुते
jīvasyāntargate śukre bhāgyakendreśasaṃyute |
lābhe vā sutarāśisthe svakṣetre śubhasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य = बृहस्पति की; अन्तर्-गते = अन्तर्दशा में स्थित; शुक्रे = शुक्र (अन्तर्दशा-स्वामी); भाग्य-केन्द्र-ईश-संयुते = भाग्य (नवम) व केन्द्र-स्वामियों से युक्त; लाभे = एकादश भाव में; वा = अथवा; सुत-राशि-स्थे = सुत (पञ्चम) राशि में स्थित; स्व-क्षेत्रे = स्वराशि/स्वक्षेत्र में; शुभ-संयुते = शुभ-ग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शुक्र की उस अन्तर्दशा का वर्णन करता है जो जीव (गुरु) की महादशा के भीतर आती है, जब शुक्र भाग्य-केन्द्रेश से युक्त हो, अथवा लाभ-स्थ, सुत-राशि-स्थ, स्वक्षेत्र-स्थ और शुभ-संयुक्त हो। ये स्पष्ट भाव-स्थान व युति-शर्तें हैं। अगले श्लोकों का फल इन्हीं शर्तों पर बँधा है।

English rendering When Venus runs as antardaśā within Jupiter’s period, and Venus is joined with the lords of fortune and the angles, or is in the eleventh, in a child-sign placement, in its own domain, and with benefics—the text sets this as the conditioning yoga for the results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विन्यास-शर्त (योग-फिल्टर), कोई भिन्न-सूत्र नहीं। जीव-महादशा + शुक्र-अन्तर्दशा; भाग्य = 9, केन्द्र = 1·4·7·10, लाभ = 11, सुत = 5; “स्वक्षेत्र” = शुक्र की स्वराशि (वृष/तुला — पाठ-परंपरा अनुसार)। भाव-गणना जन्मकालिक लग्न-रेखा पर निर्भर; अयनांश/लग्न-प्रणाली घोषित करनी चाहिए।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न मेष, गुरु महादशा चल रही हो, शुक्र अन्तर्दशा में: यदि शुक्र तुला (स्वक्षेत्र) में 11वें (कुम्भ) न होकर—उदा. लग्न-से लाभ = कुम्भ; यदि शुक्र वृष में 2रे हो तो “लाभे” शर्त नहीं। शर्त-मिलान: शुक्र स्वक्षेत्र वृष/तुला और (9/केन्द्रेश-युति या 11-स्थ या 5-राशि-स्थ) और शुभ-युति — तीनों धाराओं में से शास्त्र जो “वा” से जोड़ता है, वही फिल्टर लागू। (दशा-अवधि स्वयं इस श्लोक में नहीं; केवल योग-शर्त।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में गुरु-महादशा 16 वर्ष, शुक्र 20 वर्ष; अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 → गुरु में शुक्र-अन्तर = (16 × 20) ÷ 120 = 2⅔ वर्ष (2 वर्ष 8 मास)। यह अवधि-अनुपात शुद्ध समानुपात है; फल-पाठ उससे अलग रहता है — गणित अवधि बताता है, श्लोक शर्त व फल।

56.40
नरवाहनयोगश्च गजाश्वाम्बरसंयुतः |
महारजप्रसादेन लाभाधिक्यं महत्सुखम् |
नीलाम्बराणां रक्तानां लाभश्चैव भविष्यति
naravāhanayogaśca gajāśvāmbarasaṃyutaḥ |
mahārajaprasādena lābhādhikyaṃ mahatsukham |
nīlāmbarāṇāṃ raktānāṃ lābhaścaiva bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नर-वाहन-योग = मनुष्यों द्वारा वहन किए जाने (पालकी/शिबिका) का योग; गज-अश्व-अम्बर-संयुतः = हाथी-घोड़े-वस्त्रों से युक्त; महाराज-प्रसादेन = राजा की कृपा से (पाठ "महारज" — पाठ-भेद संभव); लाभ-आधिक्यम् = लाभ की अधिकता; महत्-सुखम् = महान सुख; नील-अम्बराणाम् = नीले वस्त्रों का; रक्तानाम् = लाल (वस्त्रों/वस्तुओं) का; लाभः = प्राप्ति। यह श्लोक गुरु-महादशा में शुक्र-अन्तर्दशा (श्लोक 39 से अन्वित) के शुभ फल का विस्तार है।

हिन्दी भावार्थ (शुक्र के भाग्येश/केन्द्रेश से युक्त, स्वक्षेत्र या शुभयुक्त होने पर) शास्त्र कहता है कि इस अन्तर्दशा में नर-वाहन-योग बनता है — व्यक्ति हाथी, घोड़े और वस्त्रों से सम्पन्न होता है। राजा की कृपा से लाभ की अधिकता और महान सुख कहा गया है, तथा नीले और लाल वस्त्रों की प्राप्ति बताई गई है।

English rendering In this (Venus) sub-period well-placed as said, the text states there comes the "carried-by-men" yoga (palanquin), with elephants, horses and garments; through a great king's favour, abundant gain and great happiness, and the acquisition of blue and red cloths.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह फल विम्शोत्तरी की गुरु-महादशा के भीतर शुक्र-अन्तर्दशा का है। अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120। यहाँ गुरु = 16 वर्ष, शुक्र = 20 वर्ष। श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता — फल-कथन — पर फल जिस काल-खण्ड पर आरोपित है वह उपर्युक्त अनुपात-गणित से नियत होता है।

उदाहरण (worked example) गुरु-दशा/शुक्र-अन्तर = (16 × 20) ÷ 120 = 320 ÷ 120 = 2.6̄ वर्ष = 2 वर्ष 8 मास। अर्थात् यह "शुभ नर-वाहन" फल-कथन लगभग 2 वर्ष 8 मास के इसी अन्तर्दशा-खण्ड पर लागू होता है (शुक्र के शुभ स्थान-दिग्बल की शर्त के साथ)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दायरा-गणित हमारे विम्शोत्तरी इंजन का सटीक भाग है — 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मङ्गल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 = Σ120) और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120 विशुद्ध अनुपात-अंकगणित है (vedic-ghadi/kaal दशा इंजन)। श्लोक का फल व्याख्या है; काल-खण्ड की लम्बाई गणित है — दोनों को अलग रखना ही हमारी विधि है।

56.41
पूर्वस्यां दिशि विप्रेन्द्र प्रयाणं धन्लाभदम् |
कल्याणं च महाप्रीतिः पितृमातृसुखावहा
pūrvasyāṃ diśi viprendra prayāṇaṃ dhanlābhadam |
kalyāṇaṃ ca mahāprītiḥ pitṛmātṛsukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वस्याम् दिशि = पूर्व दिशा में; विप्रेन्द्र = हे विप्रश्रेष्ठ (मैत्रेय-संबोधन — गुरु-शिष्य संवाद); प्रयाणम् धनलाभदम् = यात्रा धन-लाभ देने वाली (पाठ में "धन्लाभदम्" — लेखन-दोष); कल्याणम् = मंगल/शुभ; महाप्रीतिः = बड़ा स्नेह/प्रसन्नता; पितृ-मातृ-सुखावहा = माता-पिता को सुख देने वाली।

हिन्दी भावार्थ हे विप्रश्रेष्ठ! शास्त्र कहता है — इस (शुक्र-अन्तर) में पूर्व दिशा की ओर की गई यात्रा धन-लाभ देती है, कल्याण और महान प्रीति होती है, तथा माता-पिता को सुख मिलता है। यह पराशर का मैत्रेय को संबोधित उपदेश-वचन है, जिसमें दिशा-निर्देश भी फल के अंग रूप में आया है।

English rendering O best of the twice-born, a journey toward the east yields wealth; there is welfare and great affection, and comfort to one's father and mother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (यात्रा-दिशा-निर्देश तथा संवाद-संबोधन)। शास्त्रीय दिक्-निर्धारण (यथा पूर्वा↔सूर्य) ऐसे दिशा-सूचक फलों का आधार बनता है; यहाँ दिशा प्रत्यक्ष अंकगणित नहीं, अपितु शुभ अन्तर का फल-अंग है।

56.42
देवतागुरुभक्तिश्च अन्नदानं महत्तथा |
तडागगोपुरादीनि दिशेत् पुण्यानि भूरिशः
devatāgurubhaktiśca annadānaṃ mahattathā |
taḍāgagopurādīni diśet puṇyāni bhūriśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवता-गुरु-भक्तिः = देवता व गुरु के प्रति भक्ति; अन्नदानम् महत् = बड़ा अन्नदान; तडाग = तालाब/जलाशय; गोपुर-आदीनि = मन्दिर-द्वार/भव्य द्वार आदि निर्माण; दिशेत् = (ज्योतिषी) फल-कथन/निर्देश करे — भविष्यकथन की क्रिया; पुण्यानि भूरिशः = प्रचुर पुण्य-कर्म।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस अन्तर में देवता व गुरु के प्रति भक्ति, विपुल अन्नदान, तथा तालाब-गोपुर आदि लोकोपयोगी पुण्य-निर्माण का योग बनता है; ज्योतिषी को ऐसे प्रचुर पुण्य-कर्मों का फल-कथन करना चाहिए। बृहस्पति (गुरु-कारक) की महादशा में यह धर्म-भक्ति का झुकाव स्वाभाविक बैठता है।

English rendering Devotion to the deities and the guru, and great gifts of food arise; one should predict the making of tanks, temple-gateways and the like — abundant works of merit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पुण्य-कर्म-वर्णन)। "दिशेत्" यहाँ तकनीकी भविष्यकथन-क्रिया है — फल की घोषणा ज्योतिषी करता है, घटना का दावा शास्त्र नहीं करता; यही कथन-मर्यादा इस श्लोक की कुंजी है।

56.43
षष्ठाष्टमव्यये नीचे दायेशाद्वा तथैव च |
कल्हो बन्धुवैषम्यं दारपुत्रादिपीडनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye nīce dāyeśādvā tathaiva ca |
kalho bandhuvaiṣamyaṃ dāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यये = 6वें/8वें/12वें भाव में (दुःस्थान/त्रिक); नीचे = नीच राशि में स्थित; दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ गुरु) से (गिनने पर भी); तथैव च = वैसे ही; कलहः (कल्हो — पाठ-भेद संभव) = झगड़ा; बन्धु-वैषम्यम् = सम्बन्धियों से विषमता/मनमुटाव; दार-पुत्र-आदि-पीडनम् = पत्नी-पुत्रादि को कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि शुक्र लग्न से (अथवा दशेश-गुरु से) 6/8/12 भाव में या नीच राशि में स्थित हो, तो कलह, बन्धुओं से मनमुटाव, तथा पत्नी-पुत्रादि को पीड़ा होती है। यह पूर्व-श्लोकों के शुभ फल का विपरीत पक्ष है।

English rendering The text states that if Venus stands in the 6th, 8th or 12th — or debilitated, and likewise reckoned from the daśā-lord — there follow quarrels, friction with kin, and affliction to wife and children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — स्थान-आधारित निर्णय-नियम (दुःस्थान/त्रिक)। शर्त को समुच्चय-रूप में: यदि अन्तर्दशेश-राशि ∈ {6, 8, 12} लग्न से गिनने पर, अथवा दायेश (गुरु-राशि) से भी गिनने पर वही, अथवा ग्रह नीच-राशि/नीचांश में → अशुभ फल। भाव-गणना = ((लक्ष्य-राशि − सन्दर्भ-राशि) mod 12) + 1, जहाँ सन्दर्भ = लग्न या दायेश।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (1)। शुक्र वृश्चिक (8) में → लग्न से भाव = ((8−1) mod 12)+1 = 8वाँ = अष्टम (दुःस्थान)। साथ ही शुक्र वृश्चिक में नीच नहीं, पर मान लें कन्या (6) में हो तो शुक्र नीच → दोनों शर्तें अशुभ फल की ओर संकेत करती हैं। सन्दर्भ दायेश हो तो गुरु-राशि से यही गणना दोहराई जाती है।

56.44
मन्दारराहुसंयुक्ते कलहो राजतो भयम् |
स्त्रीमूलात्कलहश्चैव श्वसुरात्कलहस्तथा
mandārarāhusaṃyukte kalaho rājato bhayam |
strīmūlātkalahaścaiva śvasurātkalahastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द-आर-राहु-संयुक्ते = शनि (मन्द), मङ्गल (आर) और राहु से युक्त होने पर; कलहः = कलह; राजतः भयम् = राजा से भय; स्त्री-मूलात् = स्त्री के कारण; कलहः = झगड़ा; श्वसुरात् = ससुर से; कलहः तथा = वैसे ही झगड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि (अन्तर्दशेश शुक्र) शनि, मङ्गल और राहु से युक्त हो, तो कलह और राजा से भय होता है। स्त्री के निमित्त से झगड़ा तथा ससुर से भी कलह कहा गया है।

English rendering The text states that when (Venus) is conjoined with Saturn, Mars and Rāhu, there is strife and danger from the king; quarrel arising through women, and likewise quarrel with the father-in-law.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — पाप-युति संशोधक (malefic-conjunction modifier)। गणना नहीं, पर नियम यह है कि अन्तर्दशेश की शुभता उसके सहचर ग्रहों से संशोधित होती है: मन्द(शनि)+आर(मङ्गल)+राहु की युति फल को अशुभ की ओर मोड़ती है। "मन्द-आर" का पदच्छेद ध्यान देने योग्य — मन्द = शनि, आर = मङ्गल; इसे एक शब्द "मन्दार" पढ़ना भ्रम होगा (पाठ-भेद संभव)।

56.45
सोदरेण विवादः स्याद्धनधान्यपरिच्युतिः |
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे धने वा भाग्यगेऽपि वा
sodareṇa vivādaḥ syāddhanadhānyaparicyutiḥ |
dāyeśātkendrarāśisthe dhane vā bhāgyage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सोदरेण = सहोदर/भाई-बहन से; विवाद = विवाद/झगड़ा; धन-धान्य-परिच्युति = धन-अन्न की हानि/च्युति; दायेशात् = दशा-स्वामी से; केन्द्र-राशिस्थे = केन्द्र-राशि में स्थित (1, 4, 7, 10); धने = द्वितीय भाव में; भाग्यगे = नवम (भाग्य) भाव में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पहले सोदर से विवाद तथा धन-धान्य की च्युति का फल कहता है। फिर सकारात्मक पक्ष की शर्त खोलता है: जब (ग्रह) दायेश से केन्द्र-राशि में हो, अथवा धन भाव में, अथवा भाग्य भाव में हो — तो अगले श्लोकों में कहा गया शुभ फल लागू होता है। यह दशा-फल की द्वि-पंक्ति है: हानि-कथन के बाद केन्द्र/धन/भाग्य-स्थिति की शर्त।

English rendering The text states dispute with siblings and loss of wealth and grain; then it sets the condition — when the planet stands in a kendra-sign from the daśā-lord, or in the second, or in the ninth — under which the auspicious results that follow are said to apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-शर्त। केन्द्र = भाव 1, 4, 7, 10; धन = 2; भाग्य = 9 — सापेक्ष भाव-गिनती दशा-स्वामी (दायेश) से; कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं, केवल भाव-स्थान की शर्त।

56.46
धनधान्यादिलाभश्च स्र्/ईलाभो राजदर्शनम्
dhanadhānyādilābhaśca sr/īlābho rājadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-आदि-लाभः = धन-धान्य आदि का लाभ; स्त्रीलाभः = स्त्री/भार्या का लाभ (पाठ में "स्र्/ईलाभो" — विकृत अक्षर, स्त्रीलाभः पढ़ें; पाठ-भेद संभव); राजदर्शनम् = राजा का दर्शन/सम्मान। (यह अर्ध-श्लोक है — पूर्व श्लोक की शुभ-स्थिति का फल।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (उस शुभ-स्थित शुक्र के फलस्वरूप) धन-धान्य आदि का लाभ, भार्या/स्त्री की प्राप्ति और राजा का दर्शन-सम्मान होता है। यह श्लोक अधूरे रूप में (केवल एक पंक्ति) उपलब्ध है; अक्षर-विकृति के कारण "स्त्रीलाभः" पाठ स्वीकार किया गया।

English rendering — there is gain of wealth and grain and the rest, the gaining of a wife, and audience with the king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-स्थिति-फल)। यहाँ पाठ-विकृति स्पष्ट है (स्र्/ई → स्त्री); ऐसी स्थिति में शास्त्र-मर्यादा है कि सन्दिग्ध पाठ को "पाठ-भेद संभव" कहकर उद्घोषित किया जाए, न कि निःसंकोच स्थिर मान लिया जाए।

56.47
वाहनं पुत्रलाभश्च पशुवृद्धिर्महत्सुखम् |
गीतावाद्यप्रसङ्गादिर्विद्वज्जनसमागमः
vāhanaṃ putralābhaśca paśuvṛddhirmahatsukham |
gītāvādyaprasaṅgādirvidvajjanasamāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनम् = वाहन-लाभ; पुत्रलाभः = पुत्र-प्राप्ति; पशुवृद्धिः = पशुधन की वृद्धि; महत्सुखम् = महान सुख; गीत-वाद्य-प्रसङ्गादिः = गीत-वाद्य के प्रसंग आदि (शुक्र-कारक कला-संगीत); विद्वज्जन-समागमः = विद्वानों का संग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस शुभ शुक्र-अन्तर में वाहन, पुत्र-लाभ, पशुधन की वृद्धि और महान सुख; साथ ही गीत-वाद्य के प्रसंग तथा विद्वानों का सत्संग प्राप्त होता है। संगीत-कला व सौन्दर्य शुक्र के स्वाभाविक कारक हैं, अतः ये फल अन्तरेश-कारकत्व से सुसंगत हैं।

English rendering A vehicle, the gain of a son, increase of livestock and great happiness; occasions of song and music, and the company of the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: गीत-वाद्य-कला शुक्र (Śukra) के नैसर्गिक कारकत्व हैं, अतः शुक्र-अन्तर में इनका प्रकट होना ग्रह-कारक व दशा-फल के मेल का उदाहरण है।

56.48
दिव्यान्नभोजनं सौख्यं स्वबन्धुजनपोषकम् |
द्विसप्तमाधिपे शुक्रे तद्दशानां धनक्षतिः
divyānnabhojanaṃ saukhyaṃ svabandhujanapoṣakam |
dvisaptamādhipe śukre taddaśānāṃ dhanakṣatiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिव्य-अन्न-भोजन = उत्कृष्ट/दिव्य अन्न का भोजन; सौख्य = सुख; स्व-बन्धु-जन-पोषक = अपने बन्धु-जन का पोषण करने वाला; द्वि-सप्तम-अधिपे = द्वितीय और सप्तम का अधिपति; शुक्रे = शुक्र में/शुक्र के; तद्-दशानाम् = उन दशाओं में; धन-क्षति = धन की हानि।

हिन्दी भावार्थ श्लोक का पूर्वार्ध अभी भी शुभ फल कहता है — दिव्यान्न-भोजन, सौख्य, अपने बन्धु-जन का पोषण। उत्तरार्ध नया नियम खोलता है: जब शुक्र द्वितीय और सप्तम का अधिपति हो, तब उन (शुक्र-)दशाओं में धन-क्षति का फल शास्त्र कहता है। यह शुक्र की 2–7 अधिपति-स्थिति पर टिका दशा-फल है।

English rendering The text first states excellent food, happiness, and the capacity to nourish one’s own kin; then it states that when Venus is lord of the second and the seventh, loss of wealth is indicated in those (Venus) daśās.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + अधिपति-शर्त। शर्त: शुक्र = द्वितीय-अधिपति और सप्तम-अधिपति (लग्न के अनुसार — यह राशि-क्रम से निर्धारित होता है; उदाहरण: तुला-लग्न में शुक्र 1 और 8 का स्वामी होता है, न कि 2–7 — अतः यह फल केवल उन लग्नों पर लागू जहाँ शुक्र वास्तव में 2 और 7 का स्वामी हो, यथा मेष-लग्न में शुक्र = 2 और 7)। कोई वर्ष-संख्या यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) मेष-लग्न: द्वितीय = वृष, सप्तम = तुला — दोनों शुक्र-स्वामी। अतः शास्त्र-कथन के अनुसार शुक्र-महादशा/अंतर्दशा में धन-क्षति का फल कहा गया। मिथुन-लग्न: द्वितीय = कर्क (चंद्र), सप्तम = धनु (गुरु) — शुक्र 2–7 अधिपति नहीं; यह विशेष फल लागू नहीं। (लग्न-राशि की घोषणा आवश्यक; अयनांश यहाँ भाव-स्वामित्व नहीं बदलता।)

56.49
अपमृत्युभयं तस्य स्त्रीमूलादौषधादितः |
तस्य रोगस्य शान्त्यर्थं शान्तिकर्म समाचरेत्
apamṛtyubhayaṃ tasya strīmūlādauṣadhāditaḥ |
tasya rogasya śāntyarthaṃ śāntikarma samācaret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपमृत्यु-भयम् = अकाल/अपघात-मृत्यु का भय; तस्य = उसके लिए; स्त्री-मूलात् = स्त्री के निमित्त से; औषध-आदितः = औषध आदि (के दोष) से; तस्य रोगस्य = उस रोग की; शान्ति-अर्थम् = शान्ति हेतु; शान्ति-कर्म समाचरेत् = शान्ति-कर्म करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (मारकेश शुक्र-अन्तर में) उसे अपमृत्यु का भय होता है — स्त्री या औषध आदि के निमित्त से। उस रोग की शान्ति के लिए शास्त्र शान्ति-कर्म का विधान बताता है। (यह शास्त्रोक्त कर्मकाण्ड का उल्लेख है, कोई भयादेश या दबाव नहीं।)

English rendering The text states there may be fear of untimely death for him, occasioned through women or medicines; for the pacification of that illness it prescribes a śānti rite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं उपाय-कथन। "अपमृत्यु-भय" शास्त्र का सशर्त कथन है, नियति नहीं; और शान्ति-कर्म शास्त्र-निर्दिष्ट अनुष्ठान है — इसे भय या दबाव के रूप में नहीं, ग्रन्थ की अपनी वाणी के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही हमारी विभाजक-अनुशासन का प्रत्यक्ष उदाहरण है (CLAUDE.md + oracle): गणित (मारकेश-नियम, अन्तर्दशा-अवधि) को कठोर परिकलन रखो, पर फल-वाक्य ("अपमृत्यु-भय") को "शास्त्र कहता है" के रूप में रखो — कभी निश्चित भविष्य, भय या उपाय-दबाव के रूप में नहीं। शान्ति-कर्म को हम ग्रन्थ का कथन बताते हैं, न कि कोई हमारी संस्तुति।

56.50
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धये |
शुक्रग्रहप्रसादेन ततः सुखमवाप्नुयात्
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyurārogyavṛddhaye |
śukragrahaprasādena tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतां गां = श्वेत वर्ण की गौ; महिषीं = भैंस; दद्यात् = दान करे (शास्त्रोक्त विधि); आयुः-आरोग्य-वृद्धये = आयु और आरोग्य की वृद्धि हेतु; शुक्र-ग्रह-प्रसादेन = शुक्र-ग्रह की कृपा से; ततः = उसके अनन्तर; सुखम् अवाप्नुयात् = सुख प्राप्त करे — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शुक्र-सम्बन्धी फल-प्रसंग के बाद दान-विधि का उल्लेख करता है। शास्त्र कहता है कि आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये श्वेत गौ तथा महिषी का दान किया जाए। शुक्र-ग्रह के प्रसाद से, पाठ के अनुसार, तत्पश्चात् सुख की प्राप्ति कही गई है। यह फल-कथन है, न कि चिकित्सकीय निर्देश या अनिवार्यता का दबाव।

English rendering The text states that a white cow and a she-buffalo may be given in dāna for the increase of longevity and health. By the favour of the planet Venus, it says, happiness is then obtained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दान-विधि। यहाँ कोई वर्ग-भाग, दशा-वर्ष-अनुपात या बल-इकाई नहीं; केवल शास्त्रोक्त शुक्र-प्रसाद और आयु-आरोग्य-वृद्धि का पारंपरिक कथन है।

56.51
जीवस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा |
केन्द्रे वाऽथत्रिकोणे च दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा
jīvasyāntargate sūrye svocce svakṣetrage'pi vā |
kendre vā'thatrikoṇe ca duścikye lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य = बृहस्पति (गुरु) की; अन्तर्गत = अन्तर्दशा में; सूर्ये = सूर्य की स्थिति/सूर्यान्तर्दशा-प्रसंग; स्वोच्चे = स्व-उच्च (मेष 10° के आसपास, परम्परा-निर्भर); स्वक्षेत्रगे = स्वराशि (सिंह) में; केन्द्रे = 1, 4, 7, 10 भाव; त्रिकोणे = 1, 5, 9; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव; लाभगे = एकादश भाव में भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र जीव (गुरु) की अन्तर्दशा में सूर्य के फलों का आरम्भ करता है। जब सूर्य स्वोच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, त्रिकोण, तृतीय अथवा लाभ-स्थान में हो, तो अगले श्लोकों में कहे गए शुभ फल लागू होते हैं। यह स्थान-शर्त का ढाँचा है — फल स्वयं शास्त्र का दावा है, नियति का घोषणा-पत्र नहीं।

English rendering When the Sun, during Jupiter’s antardaśā, stands in exaltation, own sign, a kendra, a trikoṇa, the third, or the eleventh, the text prepares the auspicious results stated next.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-शर्त (कोई अवधि-सूत्र इस पंक्ति में नहीं)।
• स्वक्षेत्र: सूर्य → सिंह (30° चाप)।
• उच्च: मेष में ~10° (उच्च-बिन्दु; पाठ-परम्परा में डिग्री-सूक्ष्म भेद संभव)।
• केन्द्र: भाव {1, 4, 7, 10}; त्रिकोण: {1, 5, 9}; दुश्चिक्य = 3; लाभ = 11 — लग्न (या दायेश, अगला श्लोक) से गिनकर।
विंशोत्तरी में गुरु-महादशा = 16 वर्ष; सूर्य-अन्तर्दशा = (16 × 6) / 120 = 96/120 = 4/5 वर्ष ≈ 9 मास 18 दिन (सौर-वर्ष 365.25 दिन मानने पर; नक्षत्र-शेष से आरम्भ-अंश)।

उदाहरण (worked example) मान लें विंशोत्तरी गुरु-महादशा चल रही है; सूर्य-अन्तर्दशा का पूर्ण मान = 0.8 वर्ष। लग्न = कर्क, सूर्य-स्पष्ट = सिंह 12° (स्वक्षेत्र) → लग्न से 2? नहीं — कर्क-लग्न से सिंह = द्वितीय; अतः इस श्लोक की केन्द्र/त्रिकोण/3/11 सूची में नहीं। यदि लग्न = मेष, सूर्य = सिंह 12° → लग्न से 5 = त्रिकोण → 56.51 की शुभ-शर्त पूर्ण। (अयनांश: कोई भी स्थिर अयनांश; केवल राशि-भाव-गिनती यहाँ निर्णायक।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में गुरु 16, सूर्य 6 — अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष) / 120, शुद्ध अनुपात-गणित। यह श्लोक उसी गुरु-अन्तर्दशा के भीतर सूर्य-काल की स्थान-शर्तें खोलता है; अवधि-इंजन और फल-पाठ अलग रखे जाते हैं — गणना `==` पर, फल “शास्त्र कहता है” के रूप में।

56.52
धने वा बलसंयुते दायेशाद्वा तथैव च |
तत्काले धनलाभः स्याद्राजसम्मानवैभवम्
dhane vā balasaṃyute dāyeśādvā tathaiva ca |
tatkāle dhanalābhaḥ syādrājasammānavaibhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धने = द्वितीय भाव में; वा = अथवा; बल-संयुते = बल-युक्त (स्थान/दिग्/कालादि-बल-संयोग); दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ जीव/गुरु) से भी; तथैव च = उसी प्रकार; तत्काले = उस काल में; धन-लाभः = धन की प्राप्ति; राज-सम्मान = राजकीय सम्मान; वैभवम् = वैभव — शास्त्रोक्त फल।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की सूची में शास्त्र धन-भाव (द्वितीय) तथा बल-संयुक्त सूर्य को भी जोड़ता है, और वही स्थितियाँ दायेश से गिनकर भी मान्य बताता है। उस काल में, पाठ कहता है, धनलाभ, राजसम्मान और वैभव हो सकता है। यह फल-कथन है — निश्चित भाग्य या वित्तीय आश्वासन नहीं।

English rendering The same holds if the Sun is in the second house or endowed with strength, and likewise counted from the daśā-lord. At that time, the text states, there is gain of wealth, royal honour, and splendour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + द्वि-संदर्भ स्थान-नियम।
संदर्भ₁ = लग्न; संदर्भ₂ = दायेश (गुरु-राशि/भाव)।
शुभ-शर्त-समुच्चय S = {उच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, त्रिकोण, 3, 11, 2} ∪ {बल-संयुक्त}।
यदि सूर्य ∈ S(लग्न) अथवा सूर्य ∈ S(दायेश) → शास्त्र 56.52–53 का शुभ-फल-पक्ष लागू करता है। “बल” यहाँ षड्बल-पूर्ण योग का विस्तृत सूत्र नहीं देता — केवल “बलसंयुते” पद।

उदाहरण (worked example) लग्न = तुला; गुरु (दायेश) = कर्क 5°; सूर्य = सिंह 8°। लग्न से सूर्य = 11 (लाभ) → S(लग्न) में। दायेश-कर्क से सिंह = 2 (धन) → S(दायेश) में भी। दोनों संदर्भों से शर्त पूर्ण — तत्काल फल-पक्ष 56.52–53 का। (भाव-पद्धति: समान-भाव/whole-sign यहाँ उदाहरण के लिये; भावाधिपति-सूक्ष्म भिन्न हो तो घोषित करें।)

56.53
वाहनाम्बरपश्वादिभूषणं पुत्रसम्भवः |
मित्रप्रभुवशादिष्टं सर्वकार्ये शुभावहम्
vāhanāmbarapaśvādibhūṣaṇaṃ putrasambhavaḥ |
mitraprabhuvaśādiṣṭaṃ sarvakārye śubhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन = सवारी/यान; अम्बर = वस्त्र; पशु-आदि = गो आदि पशुधन; भूषणम् = आभूषण; पुत्रसम्भवः = पुत्र-जन्म; मित्र-प्रभु-वशात् = मित्र तथा स्वामी (राजा) के अनुग्रह से; इष्टम् = अभीष्ट/इच्छित फल; सर्वकार्ये शुभावहम् = समस्त कार्यों में शुभ लाने वाला।

हिन्दी भावार्थ (गुरु-महादशा में सूर्य-अन्तर्दशा का शुभ फल, जिसकी शर्त श्लोक 51–52 में — सूर्य उच्च/स्वक्षेत्र/केन्द्र-त्रिकोणगत — रखी गई है।) शास्त्र कहता है कि इस काल में वाहन, वस्त्र, पशुधन और आभूषण की प्राप्ति होती है, पुत्र का जन्म होता है, तथा मित्रों एवं स्वामी की कृपा से अभीष्ट सिद्ध होकर सब कार्यों में शुभ फल मिलता है।

English rendering The text states that in this sub-period one gains conveyances, garments, cattle and ornaments, the birth of a son, and — through the goodwill of friends and one's lord — the desired ends, auspicious in every undertaking.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-अन्तर्दशा का शुभ परिणाम)। यह फल स्वतः नहीं, बल्कि 51–52 की स्थिति-शर्त (सूर्य का बल-सम्पन्न, केन्द्र/त्रिकोणस्थ होना) पर आश्रित है — स्थिति गणित से तय होती है, फल शास्त्र का वचन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह प्रकरण विंशोत्तरी का गुरु-महादशा खण्ड है। हमारे दशा-इंजन में गुरु-महादशा = 16 वर्ष; उसमें सूर्य-अन्तर्दशा = (16 × 6) ÷ 120 = 0.8 वर्ष = 9.6 मास — शुद्ध अनुपात-अंकगणित, नक्षत्र-भोग के अंश पर आधारित (dossier §3)।

56.54
लग्नादष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वा तथैव च |
शिरोरोगादिपीडा च ज्वरपीडा तथैव च
lagnādaṣṭamavyaye sūrye dāyeśādvā tathaiva ca |
śirorogādipīḍā ca jvarapīḍā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से गिनकर; अष्टम = 8वाँ भाव; व्यय = 12वाँ भाव; सूर्ये = (अन्तर्दशा-स्वामी) सूर्य के इन भावों में होने पर; दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ बृहस्पति) से गिनकर; तथैव च = वैसे ही; शिरोरोग+आदि = सिर-रोग/शिरःपीड़ा आदि; पीडा = कष्ट; ज्वरपीडा = ज्वर-कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि सूर्य-अन्तर्दशा में सूर्य लग्न से अथवा दशा-स्वामी से आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तो शिर-रोगादि पीड़ा और ज्वर-कष्ट होता है। ध्यान रहे — यह सूर्य के अशुभ स्थान (त्रिक-भाव) में होने की स्थिति का फल-कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering If, in the Sun's sub-period, the Sun stands in the 8th or 12th — reckoned from the ascendant or likewise from the daśā-lord — the text says head-ailments and fevers arise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ सूर्य स्पष्ट रूप से बृहस्पति-महादशा का अन्तर्दशेश है, अतः विंशोत्तरी अवधि-गणित लागू होती है:
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
बृहस्पति = 16 वर्ष, सूर्य = 6 वर्ष ⟹ सूर्य-अन्तर = (16 × 6) ÷ 120 = 96/120 = 0.8 वर्ष।
तकनीक: फल दो सन्दर्भ-चौखटों से आँका जाता है — (i) लग्नात् और (ii) दायेशात् (दशा-स्वामी से); त्रिक-भाव 6/8/12 दोनों में से किसी भी चौखट में अशुभ माना जाता है।

उदाहरण (worked example) 0.8 वर्ष × 365.25 दिन ≈ 292 दिन = 9 माह 18 दिन। अतः बृहस्पति-महादशा के भीतर सूर्य-अन्तर की कुल लम्बाई ≈ 9 माह 18 दिन रहती है, और उपर्युक्त शिरःपीड़ा-ज्वरादि का कथन इसी अवधि पर लागू होता है (यदि सूर्य लग्न/दायेश से 8/12 में हो)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे विंशोत्तरी 120-वर्षीय चक्र से जुड़ता है, जिसे हमारे दशा-इंजन में Ketu 7 · Venus 20 · Sun 6 · Moon 10 · Mars 7 · Rāhu 18 · Jupiter 16 · Saturn 19 · Mercury 17 (Σ = 120) के रूप में स्थिर किया गया है। अन्तर्दशा को हमने विशुद्ध अनुपात-गणित (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष ÷ 120) से निकाला — यह भाग गणना है; "शिरःपीड़ा/ज्वर" शास्त्र का फल-कथन है, जिसे हम "the text states" के रूप में रखते हैं, नियति के रूप में नहीं।

56.55
सत्कर्मसु तदा हीनः पापकर्मचयस्तथा |
सर्वत्र जनविद्वेषो ह्यात्मबन्धुवियोगकृत्
satkarmasu tadā hīnaḥ pāpakarmacayastathā |
sarvatra janavidveṣo hyātmabandhuviyogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्कर्मसु = सत्कर्मों/शुभ-कर्मों में; तदा = तब (उस काल में); हीनः = विहीन/शिथिल; पापकर्म+चयः = पाप-कर्मों का संचय; तथा = वैसे ही; सर्वत्र = सब जगह; जनविद्वेषः = लोगों से वैर/द्वेष; आत्मबन्धु-वियोग-कृत् = अपने स्वजनों से वियोग कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (सूर्य के अशुभ-स्थित अन्तर में) मनुष्य सत्कर्मों में शिथिल हो जाता है और पाप-कर्मों का संचय करता है; सर्वत्र जन-विद्वेष होता है और अपने बन्धु-बान्धवों से वियोग होता है। यह उसी त्रिक-स्थित सूर्य-अन्तर के अशुभ फल का विस्तार है।

English rendering In that period one grows slack in virtuous acts and heaps up ill deeds; everywhere there is people's enmity, and separation from one's own kin — thus the text continues the affliction of the ill-placed Sun-antardaśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ सूर्य-अन्तर का चरित्र/आचरण-पक्ष)। अन्तर्दृष्टि: शास्त्र यहाँ ग्रह-स्थिति से केवल बाह्य घटना नहीं, कर्ता के आचरण-झुकाव (सत्कर्म में शिथिलता) तक फल-वर्णन बढ़ाता है — फिर भी यह वर्णन है, निर्णय नहीं; इसे प्रवृत्ति-सूचक कथन मानना चाहिए, दण्ड-घोषणा नहीं।

56.56
अकस्मात्कलहश्चैव जीवस्यान्तर्गते रवौ |
द्वितीयद्यूननाथे तु देहपीडा भविष्यति
akasmātkalahaścaiva jīvasyāntargate ravau |
dvitīyadyūnanāthe tu dehapīḍā bhaviṣyati
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकस्मात् कलहः च एव = अकस्मात् कलह ही; जीवस्य अन्तर्गते रवौ = गुरु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में; द्वितीयद्यूननाथे तु = (सूर्य) द्वितीय या सप्तम (द्यून) का स्वामी हो तो; देहपीडा भविष्यति = देह-पीड़ा होगी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में अकस्मात् कलह होते हैं; और यदि सूर्य द्वितीय या सप्तम भाव का स्वामी हो तो देह-पीड़ा कही गई है। यह मारक-स्थान-स्वामित्व (अ. 44) का दशा-फल में प्रयोग है।

English rendering In the Sun's sub-period within Jupiter's major period, the text speaks of sudden quarrels; and if the Sun is lord of the second or the seventh, of bodily suffering.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अवधि = (गुरु 16 × सूर्य 6) ÷ 120 = 96 ÷ 120 = 0.8 वर्ष = 9 मास 18 दिन (360-दिवसीय दशा-वर्ष: 288 दिन)। शर्त-वृद्धि: Su ∈ {2L, 7L} → देह-पीड़ा का कथन।

56.57
तद्दोषपरिहारार्थमादित्यहृदयं जपेत् |
सर्वपीडोपशमनं श्रीसूर्यस्य प्रसादतः
taddoṣaparihārārthamādityahṛdayaṃ japet |
sarvapīḍopaśamanaṃ śrīsūryasya prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष = उस (अशुभ सूर्य-अन्तर के) दोष का; परिहार+अर्थम् = शमन/निवारण हेतु; आदित्यहृदयं = आदित्यहृदय स्तोत्र; जपेत् = जप करना चाहिए; सर्वपीडा+उपशमनं = समस्त पीड़ाओं का शमन; श्रीसूर्यस्य प्रसादतः = श्री सूर्य की कृपा से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उपाय-रूप में कहता है कि उस दोष के निवारण हेतु "आदित्यहृदय" का जप करे; सूर्य की कृपा से समस्त पीड़ाओं का शमन (उपशमन) होता है। यह शास्त्र की अपनी उपाय-विधि है, प्रस्तुत की गई है — भय या दबाव के रूप में नहीं।

English rendering To allay that affliction the text prescribes recitation of the Āditya-hṛdaya; by the Sun's grace all sufferings are said to subside.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय/शान्ति-विधान। अन्तर्दृष्टि: यह श्लोक सूर्य-अन्तर के अशुभ-स्थिति-खण्ड (54–55) का समापक उपाय-पद है; ग्रह के अनुरूप देवता-उपासना का सिद्धान्त (सूर्य → आदित्यहृदय) यहाँ स्पष्ट है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी विधि-अनुशासन (CLAUDE.md + oracle) उपाय-वचनों को शास्त्र का प्रिस्क्रिप्शन-रूप मानकर "the text prescribes" के रूप में दर्ज करती है — कभी भय, दबाव या अनिवार्यता के रूप में नहीं। गणित (अन्तर्दशा-अवधि) और फल/उपाय (आदित्यहृदय-जप) को पृथक् रखना ही यहाँ का मूल अनुशासन है।

56.58
जीवस्यान्तर्गते चन्द्रे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षराशिस्थे पूर्णे चैव बलैर्युते
jīvasyāntargate candre kendre lābhatrikoṇage |
svocce vā svarkṣarāśisthe pūrṇe caiva balairyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य = बृहस्पति की (महादशा में); अन्तर्-गते = अन्तर्दशा में; चन्द्रे = चन्द्र; केन्द्रे = 1-4-7-10 भाव में; लाभ = एकादश भाव; त्रिकोण-गे = 1-5-9 में स्थित; स्व-उच्चे = स्वोच्च राशि में; वा = अथवा; स्व-र्क्ष-राशि-स्थे = स्व-राशि / स्व-नक्षत्र-संबद्ध राशि में; पूर्णे = पूर्ण (बल-युक्त / पूर्ण-कला); बलैः युते = बलों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब जीव (गुरु) की अन्तर्दशा में चन्द्र स्थित हो, और वह केन्द्र, लाभ (11) या त्रिकोण में हो, अथवा स्वोच्च या स्वराशिस्थ हो, तथा पूर्ण और बलों से युक्त हो — तब आगामी श्लोकों में वर्णित शुभ फल की शर्तें पूर्ण मानी जाती हैं। यह दशा-फल की स्थिति-शर्त (condition set) है, न कि कोई दशा-वर्ष का सूत्र।

English rendering The text states: when the Moon is in the antardaśā of Jupiter (Jīva), and is placed in a kendra, in the 11th, or in a trikoṇa — or else in exaltation or own sign — and is full and endowed with strengths, then the favourable results that follow are said to apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल की स्थिति-शर्त। केन्द्र = भाव {1,4,7,10}; त्रिकोण = {1,5,9}; लाभ = 11; उच्च/स्वराशि = ग्रह-विशिष्ट राशि-नियम। अन्तर्दशा-अवधि स्वयं यहाँ नहीं दी गई; विम्शोत्तरी में वह (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/120 से आती है — यह श्लोक केवल फल-शर्त बोलता है।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-लग्न कर्क, गुरु-महादशा में चन्द्र-अन्तर्दशा; चन्द्र तुला (गुरु का मित्र-क्षेत्र, पर उच्च नहीं) — स्वोच्च/स्वराशि शर्त नहीं; यदि चन्द्र भाव 1, 4, 5, 7, 9, 10 या 11 में हो और पूर्ण (शुक्ल-पक्षीय बल) माना जाए तो 56.58 की शुभ-शर्तें पाठानुसार लागू कही जाती हैं। अयनांश/गृह-प्रणाली: भाव-गणना के लिए घोषित कुण्डली-प्रणाली (पूरा-भाव या समान-भाव आदि) पहले बाँधें; फल-कथन कुण्डली-निर्णय पर निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र में गुरु 16 वर्ष, चन्द्र 10 वर्ष; अन्तर्दशा-वर्ष = (16 × 10)/120 = 1 वर्ष 4 मास — यह अनुपात-अंकगणित दशा-इंजन में pinned है। यह श्लोक उसी अन्तर्दशा-फल की स्थिति-शर्त है; अवधि-संख्या यहाँ नहीं, पर दशा-कुंजी नक्षत्र-अंश से जुड़ी है।

56.59
दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसम्मानवैभवम् |
दारपुत्रादिसौख्यं च क्षीराणं भोजनं तथा
dāyeśācchubharāśisthe rājasammānavaibhavam |
dāraputrādisaukhyaṃ ca kṣīrāṇaṃ bhojanaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा-स्वामी (बृहस्पति) से गिनकर; शुभराशिस्थे = शुभ राशि में स्थित होने पर; राजसम्मान = राजकीय सम्मान; वैभवम् = ऐश्वर्य; दार = पत्नी; पुत्र+आदि; सौख्यं = सुख; क्षीराणं (= क्षीरान्नं, पाठ-भेद संभव) = दुग्ध-मिश्रित अन्न/खीर; भोजनं = भोजन; तथा = और।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि चन्द्र दशा-स्वामी से भी शुभ राशि में स्थित हो, तो राजकीय सम्मान व ऐश्वर्य, पत्नी-पुत्रादि का सुख, तथा क्षीरान्न (खीर-दुग्धान्न) के भोजन का योग बनता है। ("क्षीराणं" संभवतः "क्षीरान्नं" का पाठ है — पाठ-भेद संभव।)

English rendering If, reckoned also from the daśā-lord, the Moon rests in an auspicious sign, there is royal honour and opulence, the happiness of spouse and children, and the enjoyment of milk-rich foods.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-अन्तर का शुभ-फल)। अन्तर्दृष्टि: यहाँ दूसरी सन्दर्भ-चौखट "दायेशात्" (दशा-स्वामी से) की पुष्टि होती है — श्लोक 58 की "लग्नात्" स्थिति के साथ मिलकर द्वि-चौखट-निर्णय पूर्ण होता है; दोनों दृष्टियों से शुभ राशि होने पर फल प्रबल कहा गया है।

56.60
सत्कर्म च तथा कीर्तिः पुत्रपौत्रादिवृद्धिदा |
महाराजप्रसादेन सर्वसौख्यं धनागमः
satkarma ca tathā kīrtiḥ putrapautrādivṛddhidā |
mahārājaprasādena sarvasaukhyaṃ dhanāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्कर्म = सत्कर्म/शुभ-कार्य; तथा; कीर्तिः = यश; पुत्रपौत्र+आदि+वृद्धिदा = पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि देने वाली (अवस्था); महाराजप्रसादेन = महाराज/राजा की कृपा से; सर्वसौख्यं = सर्व-सुख; धनागमः = धन-आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस (शुभ चन्द्र-अन्तर) में सत्कर्म व यश की प्राप्ति होती है, पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि होती है; राजा की कृपा से सर्व-सुख और धन का आगमन होता है। यह 58–59 के शुभ-फल-गुच्छ की निरन्तरता है।

English rendering Good works and fame accrue, offspring and grandchildren increase, and by a great king's favour there come all comforts and the inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ चन्द्र-अन्तर की समृद्धि-सूची)। अन्तर्दृष्टि: शास्त्र की फल-सूची यहाँ भौतिक (धन/वाहन) से आगे बढ़कर सामाजिक (कीर्ति) व वांशिक (पुत्रपौत्र-वृद्धि) आयाम तक जाती है — बल-युक्त पूर्ण चन्द्र के "सौम्य-पोषक" स्वभाव के अनुरूप।

56.61
अनेकजनसौख्यं च दानधर्मादिसंग्रहः |
षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे स्थिते वा पापसंयुते
anekajanasaukhyaṃ ca dānadharmādisaṃgrahaḥ |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye candre sthite vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेक-जन-सौख्यम् = अनेक लोगों का सुख / जन-सुख; दान-धर्म-आदि = दान-धर्म आदि; संग्रहः = संचय / संग्रह; षष्ठ = छठा भाव; अष्टम = आठवाँ भाव; व्यये = द्वादश भाव में; चन्द्रे स्थिते = चन्द्र स्थित हो; वा = अथवा; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शुभ-फल की कड़ी में अनेक-जन-सौख्य और दान-धर्मादि का संग्रह भी जोड़ता है। फिर शर्त पलटती है — यदि चन्द्र षष्ठ, अष्टम या व्यय (12) में स्थित हो, अथवा पाप-ग्रह से युक्त हो, तो अगले श्लोकों का अशुभ फल लागू कहा जाता है। पाठ स्वयं शुभ-शर्त और अशुभ-शर्त को अलग रखता है।

English rendering The text also states happiness among many people and the accumulation of gifts, dharma and the like. But when the Moon is placed in the 6th, 8th or 12th, or is conjoined with a malefic, the adverse results that follow are said to apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + अशुभ-स्थिति-शर्त। अशुभ भाव-सेट = {6, 8, 12} (षष्ठ-रन्ध्र-व्यय); “पापसंयुक्त” = सूर्य/मंगल/शनि/राहु-केतु आदि से युति (संयोग-परिभाषा कुण्डली-नियम पर निर्भर)। कोई बलांक-संख्या यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष; चन्द्र कन्या = भाव 6 → षष्ठ-स्थिति; पाठानुसार 56.61 की अशुभ-शाखा लागू। यदि चन्द्र वृष (भाव 2) और निर्दोष हो तो यह अशुभ-शर्त नहीं लगती — शुभ-श्रृंखला (56.58–60) की ओर लौटें। भाव-संख्या घोषित लग्न और भाव-प्रणाली पर `==` से बाँधें।

56.62
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते |
मानार्थबन्धुहानिश्च विदेशपरिविच्युतिः
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā vyaye vā balavarjite |
mānārthabandhuhāniśca videśaparivicyutiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशानाथ से गिनकर; षष्ठ-रन्ध्रे = 6ठे व रन्ध्र (8वें) में; व्यये = 12वें में; बलवर्जिते = बल से रहित (निर्बल चन्द्र); मान-अर्थ-बन्धु-हानिः = मान, धन व बन्धुओं की हानि; विदेश-परिविच्युतिः = विदेश में परित्यक्त/भटकना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि (चन्द्र) दायेश से षष्ठ, अष्टम (रन्ध्र) या व्यय में हो, अथवा बलहीन हो, तो मान, धन और बन्धुओं की हानि होती है, और जातक विदेश में भटककर परित्यक्त-सा हो जाता है।

English rendering The text states that when the Moon lies in the 6th, 8th, or 12th from the dāśā-lord, or is bereft of strength, there is loss of honour, wealth and kin, and a casting-away in foreign lands.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना (दायेश-सापेक्ष) + बल-शर्त। दुःस्थान-समुच्चय {6,8,12} अब दशानाथ की राशि से गिना जाता है; रन्ध्र = अष्टम = 8वाँ। "बलवर्जित" = चन्द्र का षड्बल कुल अपने प्रति-ग्रह प्रमाण (threshold) से न्यून होना।

उदाहरण (worked example) दायेश गुरु = तुला (7)। उससे 6ठा = मीन (12), 8वाँ = वृषभ (2), 12वाँ = कन्या (6)। इनमें चन्द्र होने पर, अथवा चन्द्र का कुल बल दहलीज़ से कम होने पर, अशुभ-शर्त पूरी।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवर्जित" शर्त हमारे षड्बल-मॉडल से जुड़ती है (dossier §4): स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग् — छह घटक विरूप में जोड़कर (1 रूप = 60 विरूप) प्रति-ग्रह-दहलीज़ से तुलना; "निर्बल" एक संख्यात्मक निर्णय है, राय नहीं। दशा-काल स्वयं विंशोत्तरी अनुपात (16×10÷120 = 1 वर्ष 4 मास) से नियत।

56.63
नृपचौरादिपीडा च दायादजनविग्रहः |
मातुलादिवियोगश्च मातृपीडा तथैव च
nṛpacaurādipīḍā ca dāyādajanavigrahaḥ |
mātulādiviyogaśca mātṛpīḍā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृप = राजा; चौर+आदि; पीडा = राजा-चोरादि से कष्ट; दायाद = सगोत्र/भागीदार बन्धु; जन; विग्रहः = विवाद/कलह; मातुल+आदि = मामा आदि; वियोगः = वियोग; मातृपीडा = माता को कष्ट; तथैव च = वैसे ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (अशुभ चन्द्र-अन्तर में) राजा व चोरादि से पीड़ा, दायाद-जनों (सगोत्र भागीदारों) से कलह, मामा आदि से वियोग तथा माता को कष्ट होता है। चन्द्र मातृ-कारक है, अतः "मातृपीडा" का उल्लेख चन्द्र-अन्तर के प्रसंग में स्वाभाविक बैठता है।

English rendering Harassment from king and thieves, quarrels with co-heirs and kinsfolk, separation from maternal relatives, and affliction to the mother — so the text describes the ill-placed Moon-antardaśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ चन्द्र-अन्तर का सम्बन्ध-क्षति पक्ष)। अन्तर्दृष्टि: कारक-संगति यहाँ उल्लेखनीय है — चन्द्र = मातृ-कारक, अतः उसके अशुभ अन्तर में "मातृपीडा" का कथन ग्रह-कारकत्व और फल के बीच के सुसंगत तर्क को दिखाता है; फिर भी यह वर्णन है, घोषणा नहीं।

56.64
द्वितीयषष्ठयोरीशे देहपीडा भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गापाठं च कारयेत्
dvitīyaṣaṣṭhayorīśe dehapīḍā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ durgāpāṭhaṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = 2रा भाव; षष्ठ = 6वाँ भाव; योः = दोनों का; ईशे = स्वामी होने पर (चन्द्र यदि 2/6 का अधिपति हो); देहपीडा = शरीर-कष्ट; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); तद्दोषपरिहार+अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; दुर्गापाठं = दुर्गा(सप्तशती)-पाठ; कारयेत् = करवाना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि (अन्तर्दशेश चन्द्र) द्वितीय व षष्ठ — दोनों का स्वामी हो, तो देह-पीड़ा होती है; उस दोष के निवारण हेतु दुर्गा-पाठ करवाना चाहिए। द्वितीय (मारक) व षष्ठ (रोग) का स्वामित्व यहाँ देह-कष्ट का हेतु बताया गया है।

English rendering When the sub-period lord owns both the 2nd and the 6th, the text says bodily affliction ensues; to remedy that fault one should have the Durgā recitation performed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + उपाय। तकनीकी सूत्र: द्वितीय-भाव = मारक-स्थान, षष्ठ-भाव = रोग-स्थान; इन दोनों का एक ही ग्रह द्वारा स्वामित्व शास्त्र में देह-दोष का लक्षण है। "भविष्यति" यहाँ शास्त्र का कथन-भविष्य है, हमारा समर्थित पूर्वानुमान नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारा अनुशासन "भविष्यति"-प्रकार के वचनों को नियति/निश्चितता नहीं, अपितु "the text states" के रूप में दर्ज करता है (CLAUDE.md + oracle discipline); उपाय (दुर्गा-पाठ) शास्त्र की अपनी विधि है, दबाव नहीं। मारक (2) व रोग (6) का स्वामित्व एक निश्चित भाव-स्वामित्व-नियम है — जिसे कुण्डली से यान्त्रिक रूप से निकाला जा सकता है, जबकि "देहपीडा" उसका फल-कथन है; दोनों को पृथक् रखा गया है।

56.65
जीवस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा
jīvasyāntargate bhaume lagnātkendratrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vāpi tuṅgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य = बृहस्पति की; अन्तर्गत = अन्तर-दशा में; भौमे = मंगल के; लग्नात् = लग्न से; केन्द्रत्रिकोणगे = केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में स्थित; स्वोच्चे = अपनी उच्च-राशि में; स्वर्क्षगे = स्व-राशि में; तुङ्गांशे = उच्च-नवांश में; स्वांशगे = स्व-नवांश में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जीव (गुरु) की अन्तर-दशा में जब भौम (मंगल) लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो — अथवा उच्च, स्वराशि, तुङ्ग-अंश (उच्च-नवांश) या स्व-अंश (स्व-नवांश) में हो — तब अगले श्लोक में कहा गया शुभ फल लागू होता है। यह दशा-फल की शर्त-पंक्ति है: स्थान-बल की शर्तें स्पष्ट हैं। फल का पूरा वाक्य ५६.६६ में जुड़ता है।

English rendering The text states the conditions: when Mars is running in Jupiter’s antardaśā and is placed in a kendra or trikoṇa from the lagna — or is exalted, in its own sign, in exaltation-navāṃśa, or in own-navāṃśa — the auspicious results of the following verse apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी में अन्तर-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। गुरु-महादशा = १६ वर्ष, मंगल-अन्तर = ७ वर्ष → (१६ × ७) ÷ १२० = ११२/१२० = १४/१५ वर्ष। स्थान-शर्तें: केन्द्र = {१,४,७,१०}, त्रिकोण = {१,५,९} (लग्न से गणना); उच्च/स्व-राशि और नवांश-स्थान D1/D9 के नियत मानचित्र पर निर्भर। अयनांश और लग्न-प्रणाली घोषित करनी चाहिए जब संख्याएँ निकालें।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, गुरु-महादशा १६ वर्ष, मंगल-अन्तर = (१६ × ७)/१२० = ०.९३३… वर्ष ≈ ११ मास ६ दिन (३६०-दिन वर्ष-परंपरा में: ११२/१२० × ३६० = ३३६ दिन)। मान लें लग्न मेष, मंगल कन्या में (लग्न से ६ — केन्द्र/त्रिकोण नहीं) → शर्त पूरी नहीं। यदि मंगल सिंह में (लग्न से ५ = त्रिकोण) और स्व-नवांश में हो → ५६.६५ की शर्त पूरी; फल ५६.६६ के अनुसार। (अयनांश: जिस भी पिन किए गए अयनांश से रेखांश निकले; D9 = ३०° ÷ ९ = ३°२०′ प्रति नवांश।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चंद्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; Σ = १२०) और अन्तर = (महा × अन्तर)/१२० का अनुपात-गणित हमारे दशा-इंजन में पिन है। यह श्लोक उसी अन्तर-ढाँचे में गुरु-अन्तर में मंगल की फल-शर्त देता है — गणना और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

56.66
विद्याविवाहकार्याणि ग्रामभूम्यादिलाभकृत् |
जनसामर्थ्यमाप्नोति सर्वकार्यार्थसिद्धिदम्
vidyāvivāhakāryāṇi grāmabhūmyādilābhakṛt |
janasāmarthyamāpnoti sarvakāryārthasiddhidam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या = शिक्षा/विद्यार्जन; विवाह-कार्याणि = विवाह-सम्बन्धी कार्य; ग्राम-भूमि-आदि-लाभकृत् = गाँव, भूमि आदि का लाभ कराने वाला; जन-सामर्थ्यम् = जन-समुदाय पर प्रभाव/नेतृत्व-शक्ति; आप्नोति = प्राप्त करता है; सर्व-कार्य-अर्थ-सिद्धिदम् = समस्त कार्यों के प्रयोजन (अर्थ) की सिद्धि देने वाला। (यह श्लोक ६५ की शर्त — जीव-महादशा में मङ्गल-अन्तर्दशा, मङ्गल केन्द्र/त्रिकोण, स्वोच्च/स्वक्षेत्र में — का फल-भाग है।)

हिन्दी भावार्थ जब गुरु की महादशा में मङ्गल की अन्तर्दशा हो और मङ्गल शुभ-स्थ हो, तब शास्त्र कहता है कि विद्या तथा विवाह के कार्य सम्पन्न होते हैं, गाँव-भूमि आदि का लाभ होता है, जातक जन-समुदाय पर सामर्थ्य पाता है, और उसके सब कार्यों का प्रयोजन सिद्ध होता है। यह मङ्गल-अन्तर के आरम्भिक शुभ फल का कथन है।

English rendering (Jupiter daśā, Mars antara, Mars well-placed) — affairs of learning and marriage are accomplished, gains of village and land accrue, one wins mastery over people, and the aims of all undertakings reach fulfilment.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शर्त श्लोक ६५ में, फल यहाँ)। श्लोक में स्वयं कोई संख्या नहीं; इसका संख्यात्मक आधार वह अन्तर्दशा-अवधि है जिस पर यह फल टिका है — नीचे डिकोड में।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह गुरु-महादशा की मङ्गल-अन्तर्दशा है। विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में गुरु = १६ वर्ष, मङ्गल = ७ वर्ष; अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२० = (१६ × ७)/१२० = ११२/१२० = ०·९३३३ वर्ष ≈ ११ मास ६ दिन। हमारे daśā-engine (vedic-ghadi/kaal) में यही शुद्ध अनुपात-अंकगणित है — शास्त्र का फल-कथन ऊपर, उसका काल-खण्ड यह गणना; दोनों अलग परतें।

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56.67
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे लाभे वा धनगेऽपि वा |
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे धनधान्यादिसम्पदः
dāyeśātkendrakoṇasthe lābhe vā dhanage'pi vā |
śubhayukte śubhairdṛṣṭe dhanadhānyādisampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दाया-स्वामी (महा/अन्तर-ईश) से; केन्द्रकोणस्थे = केन्द्र या कोण (त्रिकोण) में स्थित; लाभे = एकादश भाव में; धनगे = द्वितीय भाव में; शुभयुक्ते = शुभ-ग्रह से युक्त; शुभैर्दृष्टे = शुभों से दृष्ट; धनधान्यादिसम्पदः = धन, धान्य आदि संपद्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (फल-ग्रह) दायेश से केन्द्र या कोण में हो, अथवा लाभ (११) या धन (२) भाव में हो, और शुभ-युक्त तथा शुभ-दृष्ट हो, तब धन-धान्यादि संपद् का फल कहा गया है। यहाँ “दायेश” दशा-स्वामी है — उससे भाव-गिनती का ढाँचा स्पष्ट है। फल शास्त्र का कथन है, न कि हमारी भविष्य-वाणी।

English rendering The text states that when (the planet under consideration) stands in a kendra or trikoṇa from the daśā-lord — or in the eleventh or second — and is joined with and aspected by benefics, wealth, grain and such prosperity are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गिनती दायेश की राशि से: केन्द्र = +०,+३,+६,+९ राशि-पग; कोण/त्रिकोण = +०,+४,+८; लाभ = +१०; धन = +१। शुभ-युति/दृष्टि गुणात्मक शर्तें हैं (शास्त्रीय दृष्टि-नियम: पूर्ण दृष्टि ७, इत्यादि — इस श्लोक में अंश-माप नहीं)। कोई दशा-वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) दायेश = गुरु, कर्क में। यदि शुक्र (शुभ) तुला में हो → गुरु से ४था = केन्द्र; शुक्र शुभ-युक्त/दृष्ट हो तो ५६.६७ की शर्त पूरी — शास्त्र धन-धान्य-संपद् कहता है। यदि शुक्र मकर में (गुरु से ७ = केन्द्र भी) किंतु पाप-युक्त हो तो “शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे” अधूरी — फल इस श्लोक से नहीं बाँधा जाता।

56.68
मिष्ठान्नदानविभवं राजप्रीतिकरं शुभम् |
स्त्रीसौख्यं च सुतवाप्तिः पुण्यतीर्थफलं तथा
miṣṭhānnadānavibhavaṃ rājaprītikaraṃ śubham |
strīsaukhyaṃ ca sutavāptiḥ puṇyatīrthaphalaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिष्ठान्न-दान-विभवम् = मधुर अन्न व दान का वैभव; राज-प्रीतिकरम् = राजा को प्रसन्न करने वाला; शुभम् = मंगलमय; स्त्री-सौख्यम् = पत्नी से सुख; सुत-वाप्तिः = पुत्र की प्राप्ति; पुण्य-तीर्थ-फलम् = पुण्य-तीर्थ (यात्रा) का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस शुभ अन्तर में मधुर अन्न और दान का वैभव, राजा की प्रसन्नता, स्त्री से सुख, पुत्र-प्राप्ति तथा पुण्य-तीर्थ का फल — सब मंगलमय रूप से प्राप्त होता है।

English rendering The text states that there come the abundance of sweet food and charity, the favour of the king, happiness from one's wife, the birth of a son, and the fruit of holy pilgrimage — all auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-स्थित भौम-अन्तर का फल-पल्लव)। श्लोक ६७ की स्थान-शर्त के पूर्ण होने पर मिलने वाले शुभ फलों की सूची-मात्र है; इसमें कोई पृथक् संख्या-संकेत नहीं।

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56.69
दायेशाद्रन्ध्रभावे वा व्यये वा नीचगेऽपि वा |
पापयुतेक्षिते वापि धान्यार्थगृहनाशनम्
dāyeśādrandhrabhāve vā vyaye vā nīcage'pi vā |
pāpayutekṣite vāpi dhānyārthagṛhanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दाया-स्वामी से; रन्ध्रभावे = अष्टम भाव में; व्यये = द्वादश भाव में; नीचगे = नीच-राशि में; पापयुतेक्षिते = पाप-युक्त या पाप-दृष्ट; धान्यार्थगृहनाशनम् = धान्य, अर्थ (धन) और गृह का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (फल-ग्रह) दायेश से रन्ध्र (८) या व्यय (१२) में हो, अथवा नीच में हो, अथवा पाप-युक्त/पाप-दृष्ट हो, तब धान्य, अर्थ और गृह के नाश का फल कहा गया है। यह पूर्व शुभ-फल का विपरीत पक्ष है — स्थान-दोष की शर्तें स्पष्ट हैं। फल को हम निश्चित विनाश या भय-कथन के रूप में नहीं बढ़ाते; केवल शास्त्र का वाक्य रखते हैं।

English rendering The text states that when (the planet) is in the eighth or twelfth from the daśā-lord, or is debilitated, or is joined with or aspected by malefics, destruction of grain, wealth, and house is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गिनती दायेश से: रन्ध्र = +७ राशि-पग; व्यय = +११। नीच = ग्रह-विशिष्ट नीच-राशि (मंगल-कर्क, गुरु-मकर, इत्यादि — शास्त्रीय नियत जोड़ी)। पाप-युति/दृष्टि गुणात्मक। कोई बिन्दु-योग या वर्ष-सूत्र नहीं — केवल स्थान-शर्त → फल-मानचित्र।

उदाहरण (worked example) दायेश = शनि, तुला में। यदि चंद्र मेष में हो → शनि से ७ = रन्ध्र; शास्त्र ५६.६९ के अनुसार धान्य-अर्थ-गृह-नाश कहता है (पाप-दृष्टि की अतिरिक्त जाँच अलग)। यदि चंद्र वृष में (शनि से ८ ≠ ८/१२? वृष = +७? तुला→वृश्चिक→धनु→मकर→कुंभ→मीन→मेष→वृष: +७ = मेष रन्ध्र, +११ = सिंह व्यय) — वृष = +७ नहीं, +७ = मेष। स्पष्ट: दायेश-राशि से क्रमिक गणना कर ८/१२ जाँचें।

56.70
नानरोगभयं दुःखं नेत्ररोगादिसम्भवः |
पूर्वार्द्धे कष्टमधिकमपरार्द्धे महत्सुखम्
nānarogabhayaṃ duḥkhaṃ netrarogādisambhavaḥ |
pūrvārddhe kaṣṭamadhikamaparārddhe mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाना-रोग-भयम् = अनेक रोगों का भय; दुःखम् = कष्ट; नेत्र-रोग-आदि-सम्भवः = नेत्ररोग आदि का उद्भव; पूर्वार्द्धे = (अन्तर्दशा के) पूर्वार्ध में; कष्टम् अधिकम् = अधिक कष्ट; अपरार्द्धे = उत्तरार्ध में; महत्-सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (अशुभ-स्थित भौम-अन्तर में) अनेक रोगों का भय, दुःख तथा नेत्ररोग आदि उत्पन्न होते हैं; इस अन्तर के पूर्वार्ध में कष्ट अधिक रहता है और उत्तरार्ध में महान् सुख मिलता है।

English rendering The text states that fear of manifold diseases, sorrow, and eye-ailments arise; in the first half of the sub-period the distress is greater, while in the latter half comes great happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-द्विभाजन। अन्तर्दशा-अवधि L का मध्य-बिन्दु L/2 पर विभाजन: पूर्वार्ध = [0, L/2) (कष्ट-अधिक), उत्तरार्ध = [L/2, L) (सुख)। यहाँ L = विम्शोत्तरी अन्तर्दशा-दैर्घ्य = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120।

उदाहरण (worked example) गुरु महादशा = 16 वर्ष, भौम अन्तर-भार = 7 (दोषियर से)। L = (16 × 7)/120 = 112/120 = 0.9333 वर्ष ≈ 11.2 मास। मध्य-बिन्दु L/2 ≈ 5.6 मास; अतः लगभग प्रथम 5.6 मास "पूर्वार्ध-कष्ट", शेष ≈ 5.6 मास "अपरार्ध-सुख"।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पूर्वार्ध/अपरार्ध" कोई काव्य-अलंकार नहीं — यह अन्तर्दशा की सटीक-गणनीय लम्बाई का द्विभाजन है। हमारे विम्शोत्तरी इंजन में अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष)/120 शुद्ध अनुपात-अंकगणित है (गुरु 16, भौम 7; Σ = 120), जिससे L/2 का मास-मान नियततः निकलता है। फल को हम शास्त्र-कथन रूप में रखते हैं, पर उसका काल-आधार परीक्षणीय संख्या है — यही "गणित और व्याख्या को अलग रखने" की हमारी विधि है।

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56.71
द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरुजः |
वृषभस्य प्रदानं तु सर्वसम्पत्प्रदायकम्
dvitīyadyūnanāthe tu dehajāḍyaṃ manorujaḥ |
vṛṣabhasya pradānaṃ tu sarvasampatpradāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = यदि भौम २रे या ७वें (मारक) भाव का स्वामी हो; तु = तो; देह-जाड्यम् = शरीर की जड़ता/अस्वस्थता; मनोरुजः = मानसिक पीड़ा; वृषभस्य प्रदानम् = बैल का दान; सर्व-सम्पत्-प्रदायकम् = सब सम्पत्ति देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि भौम २रे अथवा ७वें भाव (मारक-स्थान) का स्वामी हो, तो इस अन्तर में शारीरिक जड़ता और मानसिक पीड़ा होती है; इसके शमन-हेतु शास्त्र बैल-दान का विधान बताता है, जिसे वह सर्व-सम्पत्ति-दायक कहता है।

English rendering The text states that if Mars owns the 2nd or 7th (the maraka houses), bodily dullness and mental affliction ensue; and it prescribes the gift of a bull, which it calls a giver of all prosperity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-स्वामित्व (मारक-नियम)। मारक-भाव-समुच्चय = {2, 7} (लग्न से)। शर्त: अन्तर-ग्रह भौम का स्वामित्व-भाव-समुच्चय ∩ {2, 7} ≠ ∅। कोई अंक-गणना नहीं, केवल भाव-अधिपत्य की सदस्यता-जाँच; "वृषभ-दान" उपाय-कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) मारक (द्वितीय/सप्तम) अधिपत्य एक नियत भाव-नियम है — गणनीय, व्याख्येय नहीं। हमारी अनुशासन-विधि के अनुरूप हम इस देह-पीड़ा-फल और इसके उपाय (बैल-दान) को शास्त्र का अपना कथन मानकर प्रस्तुत करते हैं — नियति या दबाव-रूप में नहीं। भय या उपाय-दबाव का आरोपण वर्जित; केवल पाठ की वाणी उद्धृत।

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56.72
जीवस्यान्तर्गते राहौ स्वोच्चे वा केन्द्रगेऽपि वा |
मूलत्रिकोणे भाग्ये च केन्द्राधिपसमन्विते
jīvasyāntargate rāhau svocce vā kendrage'pi vā |
mūlatrikoṇe bhāgye ca kendrādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवस्य = गुरु की; अन्तर्गत = अन्तर्दशा में; राहौ = राहु (महादशा-स्वामी/काल-स्वामी) पर; स्व-उच्चे = स्वोच्च राशि में; केन्द्र-गे = केन्द्र (१/४/७/१०) स्थित; मूल-त्रिकोणे = मूलत्रिकोण में; भाग्ये = नवम (भाग्य) भाव में; केन्द्र-अधिप-समन्विते = केन्द्राधिपति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र राहु-काल में जीव (गुरु) की अन्तर्दशा का शुभ-योग-पक्ष खोलता है। यदि राहु स्वोच्च हो, अथवा केन्द्रगत हो, अथवा मूलत्रिकोण में हो, भाग्य (९) में हो, तथा केन्द्राधिप से समन्वित हो — तो आगे के श्लोकों में कहा गया योग-फल लागू होता है। यह स्थिति-शर्तों की सूची है; फल अगले श्लोक से जुड़ता है।

English rendering When Rāhu’s period contains Jupiter’s antardaśā, the text sets favourable conditions: Rāhu exalted, or in a kendra, or in mūlatrikoṇa, or in the ninth (bhāgya), and joined with a kendra-lord. These are placement criteria for the yoga-results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-शर्तें (कोण/भाव), दशा-वर्ष-सूत्र नहीं — पर काल-ढाँचा विंशोत्तरी है। विंशोत्तरी में राहु महादशा = १८ वर्ष, गुरु = १६ वर्ष; अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। अतः राहु–गुरु अन्तर् = (१८ × १६) ÷ १२० = २४० ÷ १२० = २.४ वर्ष = २ वर्ष + ०.४ × १२ मास = २ वर्ष ४.८ मास (≈ २ वर्ष ४ मास २४ दिन, ३६०-दिन वर्ष पर)। केन्द्र = भाव {१, ४, ७, १०}; भाग्य = भाव ९; उच्च/मूलत्रिकोण राहु के लिए शास्त्रीय राशि-नियम (राहु-उच्च प्रायः वृष — पाठ/परम्परा-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, राहु महादशा १८ y, गुरु अन्तर् १६ y: अन्तर्-दीर्घ = (१८ × १६)/१२० = २.४ y। यदि महादशा-आरम्भ २०२०-०१-०१ (काल-बिन्दु केवल उदाहरण), तो गुरु-अन्तर् की लम्बाई २.४ वर्ष; उसके भीतर श्लोक ५६.७३ का «भुक्त्यादौ पञ्चमास» = आरम्भ के पहले ५ मास — पूर्ण अन्तर् (~२८.८ मास) का एक काल-खण्ड। राशि-शर्त: मान लें राहु D1 = वृष १५° (उच्च-पक्ष, परम्परा-सापेक्ष) और केन्द्र-लग्न से १०वें में — तो «स्वोच्चे + केन्द्रगे» दोनों शर्तें एक साथ पूरी।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; Σ = १२०) और अन्तर् = (MD × AD)/१२० — यही अनुपात-गणित दशा-इंजन में जड़ा है। यह श्लोक उसी राहु–गुरु अन्तर्-खण्ड की योग-शर्तें पढ़ता है; वर्षों का योग-फल नहीं, केवल काल-सीमा का शुद्ध अनुपात।

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56.73
शुभयुतेक्षिते वापि योगप्रीतिं समादिशेत् |
भुक्त्यादौ पञ्चमासांश्च धनधान्यादिकं लभेत्
śubhayutekṣite vāpi yogaprītiṃ samādiśet |
bhuktyādau pañcamāsāṃśca dhanadhānyādikaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-युक्त = शुभ-ग्रह से युक्त; ईक्षिते = दृष्ट; वा अपि = अथवा; योग-प्रीतिम् = योग तथा प्रीति/अनुराग; समादिशेत् = निर्देश करे; भुक्ति-आदौ = अन्तर्दशा/भुक्ति के आरम्भ में; पञ्च-मासान् = पाँच मास; धन-धान्य-आदिकम् = धन-धान्य आदि; लभेत् = प्राप्त करे (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की स्थिति में, अथवा शुभ-युति/शुभ-दृष्टि होने पर, शास्त्र योग और प्रीति का निर्देश देता है। भुक्ति के आदि में पाँच मास तक धन-धान्यादि लाभ का फल कहा गया है। यह फल-सूची है — «शास्त्र कहता है» के स्तर पर; हम इसे नियत भविष्य नहीं मानते।

English rendering If those placements hold, or if there is benefic conjunction or aspect, the text enjoins a declaration of yoga and affection. It states that at the start of the bhukti, for five months, gains of wealth, grain, and the like are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) समय-खण्ड = भुक्ति-आरम्भ से ५ मास (पञ्चमासान्) — संख्या श्लोक से; पूर्ण अन्तर्-दीर्घ विंशोत्तरी से = २.४ वर्ष (देखें ५६.७२)। ५ मास ≈ ५/१२ वर्ष ≈ ०.४१६७ y, जो २.४ y अन्तर् का ~१७.४% आरम्भ-खण्ड है। शुभ-युति/दृष्टि = संयोजक नियम (फल), न कि बल-सूत्र।

उदाहरण (worked example) राहु–गुरु अन्तर् = २.४ y ≈ २८.८ मास (सौर-मास ≈ ३०.४४ दिन पर सूक्ष्म भेद; यहाँ शास्त्र का «मास» साधारण गणना)। भुक्त्यादौ पञ्चमास = पहले ५ मास; शेष ≈ २३.८ मास पर आगे के फल (५६.७४–७५) काल-विस्तार से जुड़े माने जाते हैं — विभाजन शास्त्र में प्रतिशत-सूत्र से नहीं, केवल «आदौ पञ्चमास» से।

हमारा डिकोड (Our Decode) अन्तर् की कुल लम्बाई (१८ × १६)/१२० = २.४ y इंजन-सत्यापित अनुपात है; «पाँच मास» शास्त्र का फल-काल है, न कि अलग गणितीय स्थिरांक। गणित और फल को अलग रखना — exact-`==` अनुशासन का ही विस्तार: वर्ष-अनुपात पर `==`, फल पर केवल पाठ-कथन।

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56.74
देशग्रामाधिकं च यवनप्रभुदर्शनम् |
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्बहुसेनाधिपत्यकम्
deśagrāmādhikaṃ ca yavanaprabhudarśanam |
gṛhe kalyāṇasampattirbahusenādhipatyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देश-ग्राम-अधिकम् = देश-गाँव पर आधिपत्य/वृद्धि; यवन-प्रभु-दर्शनम् = यवन (म्लेच्छ/विदेशी) राजा से भेंट; गृहे = घर में; कल्याण-सम्पत्तिः = मंगल-सम्पत्ति; बहु-सेना-आधिपत्यकम् = विशाल सेना का आधिपत्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस शुभ राहु-अन्तर में देश-ग्राम पर अधिकार/वृद्धि, यवन-राजा से भेंट, घर में कल्याणकारी सम्पत्ति तथा विशाल सेना का आधिपत्य प्राप्त होता है।

English rendering The text states that there come authority over land and villages, an audience with a foreign (yavana) lord, auspicious prosperity in the home, and command over a great army.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-स्थित राहु-अन्तर का ऐश्वर्य-वर्णन)। (पाठ-भेद संभव: "देशग्रामाधिकं" में छन्द-पूर्ति के लिए पाठान्तर मिल सकता है।) यह श्लोक ७२–७३ की शुभ-शर्तों का फल-विस्तार है; कोई पृथक् संख्या नहीं।

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56.75
दूरयात्रादिगमनं पुण्यधर्मादिसंग्रहः |
सेतुस्नानफलावाप्तिरिष्टसिद्धिः सुखावहा
dūrayātrādigamanaṃ puṇyadharmādisaṃgrahaḥ |
setusnānaphalāvāptiriṣṭasiddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दूर-यात्रा-आदि-गमनम् = दूर की यात्रा आदि पर गमन; पुण्य-धर्म-आदि-संग्रहः = पुण्य व धर्म आदि का संचय; सेतु-स्नान-फल-अवाप्तिः = सेतु (सेतुबन्ध) में स्नान का फल-लाभ; इष्ट-सिद्धिः = अभीष्ट की सिद्धि; सुखावहा = सुखदायिनी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस अन्तर में दूर-देश की यात्रा, पुण्य-धर्म का संचय, सेतु-स्नान का फल, तथा अभीष्ट की सुखदायी सिद्धि प्राप्त होती है।

English rendering The text states that there come long journeys, an accumulation of merit and dharma, the fruit of bathing at Setu (the sacred causeway), and the happy fulfilment of one's desires.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तीर्थ-पुण्य व इष्ट-सिद्धि का शुभ-वर्णन)। "सेतु-स्नान-फल" तीर्थ-माहात्म्य का सन्दर्भ है, गणना नहीं; यह शुभ राहु-अन्तर के फलों की निरन्तरता है।

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56.76
दायेषाद्रन्ध्रभावे वा व्यये वा पापसंयुते |
चौराहिव्रणभीतिश्च राजवैषम्यमेव च
dāyeṣādrandhrabhāve vā vyaye vā pāpasaṃyute |
caurāhivraṇabhītiśca rājavaiṣamyameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश-आत् = दायेश (तृतीय-स्वामी) से (पाठ: दायेषाद् ≈ दायेशाद्; पाठ-भेद संभव); रन्ध्र-भावे = अष्टम भाव में; वा व्यये = अथवा व्यय (द्वादश) में; वा पाप-संयुते = अथवा पाप-ग्रह से युक्त; चोर = चोर; अहि = सर्प; व्रण = घाव/व्रण; भीतिः = भय; राज-वैषम्यम् = राज-कोप/राज-वैषम्य; एव च = तथा।

हिन्दी भावार्थ शुभ-पक्ष के विपरीत, शास्त्र अशुभ स्थिति बाँधता है — यदि (काल-स्वामी) दायेश से रन्ध्र में हो, अथवा व्यय में, अथवा पाप-संयुक्त हो, तो चोर-अहि-व्रण की भीति और राजवैषम्य कहा गया है। यह अरिष्ट/बाधा-सूची है; «शास्त्र कहता है» — हम इसे निश्चित विपत्ति या भय-वाणिज्य नहीं बनाते।

English rendering The text states the contrary case: if [the period-planet is] in the eighth from the third-lord, or in the twelfth, or joined with malefics, there is indication of fear from thieves, serpents, and wounds, and of adversity from the ruler. (Reading दायेषाद् ≈ दायेशाद् — पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-सूचकांक: दाय/तृतीय = ३ → दायेश = ३रे का स्वामी; रन्ध्र = ८; व्यय = १२। «दायेशाद् रन्ध्रभावे» = तृतीय-स्वामी से ८वें भाव में स्थिति (सापेक्ष भाव-गणना: गन्तव्य-भाव = (दायेश-राशि-सूचकांक + ७) mod १२, १-आधार पर)। कोई दशा-वर्ष या बिन्दु-योग सूत्र नहीं — केवल स्थिति → फल मानचित्र।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (१)। तृतीय = मिथुन; दायेश = बुध। यदि राहु मकर (१०) में — बुध (मिथुन=३) से गिनें: ३→४→…→१० = ८वाँ भाव = रन्ध्र दायेशात्। व्यय-उदाहरण: राहु मीना (१२) = लग्न से व्यय। पाप-संयोग: राहु + शनि/मंगल एक राशि — «पापसंयुते»। फल केवल शास्त्र-कथन; गणना केवल भाव-दूरी की।

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56.77
गृहे कर्मकलापेन व्याकुलो भवति ध्रुवम् |
सोदरेण विरोधः स्याद्दायादजनविग्रहः
gṛhe karmakalāpena vyākulo bhavati dhruvam |
sodareṇa virodhaḥ syāddāyādajanavigrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = घर में; कर्म-कलापेन = कर्मों के समूह/व्यापार-भार से; व्याकुलः = व्याकुल; भवति ध्रुवम् = निश्चय से होता है (शास्त्र-कथन का बल); सोदरेण = सहोदर से; विरोधः = विरोध; दायाद-जन = दायाद (सह-उत्तराधिकारी/कुटुम्ब) जन; विग्रहः = झगड़ा/विग्रह।

हिन्दी भावार्थ अशुभ-पक्ष का गृह-फल शास्त्र यों कहता है — घर में कर्म-कलाप से व्याकुलता «ध्रुवम्» कही गई; सोदर से विरोध और दायाद-जन से विग्रह। «ध्रुवम्» यहाँ पाठ का निश्चय-शब्द है, हमारे द्वारा थोपा गया भाग्य-वाद नहीं। सम्बन्ध-तनाव का फल-कथन मात्र।

English rendering The text states that one becomes agitated at home under a mass of work, as a firm indication; there is opposition from a sibling and strife with co-heirs and kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गृह-व्याकुलता, सोदर-विरोध, दायाद-विग्रह); पूर्व श्लोक की अशुभ-स्थिति का विस्तार।

56.78
गृहे त्वशुभकार्याणि दुःस्वप्नादिभयं ध्रुवम् |
अकस्मात्कलहश्चैव क्षूद्रशून्यादिरोगकृत्
gṛhe tvaśubhakāryāṇi duḥsvapnādibhayaṃ dhruvam |
akasmātkalahaścaiva kṣūdraśūnyādirogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = गृह/गृहस्थ क्षेत्र में; अशुभ-कार्याणि = अशुभ/अनिष्ट कर्म; दुःस्वप्न-आदि-भयम् = दुःस्वप्न आदि से भय; ध्रुवम् = निश्चित/निश्चयपूर्वक; अकस्मात् = अचानक; कलहः = झगड़ा/कलह; क्षूद्र-शून्य-आदि-रोग-कृत् = क्षुद्र-शून्यादि रोगों का कारक (पाठ-भेद संभव: रोग-नाम सूची में)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-प्रसंगानुसार राहु-स्थिति/अन्तर्दशा आदि के) फल में गृह-क्षेत्र में अशुभ कार्य होते हैं। दुःस्वप्न आदि से भय निश्चयपूर्वक कहा गया है। अचानक कलह भी उत्पन्न होता है। क्षुद्र-शून्यादि रोगों का कारक भी यही फल-कथन है — यह शास्त्र का फल-वर्णन है, न कि चिकित्सकीय निदान।

English rendering The text states that (in this Rāhu-related phala context) inauspicious activities arise in the domestic sphere, along with fear of bad dreams and the like. Sudden quarrels are also indicated, and the verse names affliction of the kṣūdra-śūnya class of disorders — as the śāstra’s own result-statement, not a medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक राहु-सम्बन्धी फल-सूची का भाग है; इसमें अंश, वर्ग, बिन्दु या दशा-वर्ष की गणना नहीं है — केवल शास्त्र द्वारा वर्णित लक्षण-समूह।

56.79
द्विसप्तमस्थिते राहौ देहवाधां विनिर्दिशेत् |
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत्
dvisaptamasthite rāhau dehavādhāṃ vinirdiśet |
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-सप्तम-स्थिते = द्वितीय तथा सप्तम भाव में स्थित होने पर (द्वि = द्वितीय भाव; सप्तम = सप्तम भाव — शास्त्र के दो मारक-स्थान); राहौ = राहु के (यह गुरु/जीव-महादशा के अन्तर्गत राहु-अन्तर्दशा का प्रकरण); देह-बाधाम् = शरीर-पीड़ा, आरोग्य-क्षति; विनिर्दिशेत् = (ज्योतिषी) निर्दिष्ट करे/कहे (वि-निर्-दिश्, विधिलिङ्); तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के परिहार (निवारण) हेतु; मृत्युञ्जय-जपम् = महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप; चरेत् = अनुष्ठान करे।

हिन्दी भावार्थ हे शिष्य, गुरु की महादशा में जब राहु की अन्तर्दशा चले और वह राहु जन्मलग्न से दूसरे या सातवें भाव में — अर्थात् दोनों मारक-स्थानों में — बैठा हो, तब शास्त्र देह-बाधा (शारीरिक कष्ट) की सम्भावना कहता है। इसी दोष के शमन के लिये पाठ महामृत्युञ्जय-जप का विधान बताता है। ध्यान रहे — यह ग्रन्थ का स्थान-आधारित कथन है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering When Rāhu (in its sub-period under Jupiter's major period) occupies the 2nd or 7th house — the two māraka stations — the text says one should indicate bodily affliction; to remove that flaw it prescribes recitation of the Mṛtyuñjaya mantra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मुख्यतः फल-कथन + शान्ति-विधान — किन्तु इसमें दो निश्चित स्थान-सूचकांक अन्तर्निहित हैं: मारक-स्थान = {2, 7}। साथ ही प्रकरण-गणित विमशोत्तरी अन्तर्दशा का है — गुरु महादशा (16 वर्ष) के भीतर राहु अन्तर्दशा:
अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 = (16 × 18) ÷ 120 = 2.4 वर्ष।
यह अनुपात-गणित शुद्ध है; फल का "कह देना" (विनिर्दिशेत्) शास्त्र का दावा है, प्रतिज्ञा नहीं।

उदाहरण (worked example) संवत्सर-संकेत के रूप में 360-दिन सावन-वर्ष लें। गुरु महादशा 16 वर्ष; राहु अन्तर्दशा = (16 × 18)/120 = 2.4 वर्ष = 2 वर्ष + 0.4×12 मास = 2 वर्ष 4 मास 24 दिन (0.4 वर्ष = 144 दिन = 4 मास 24 दिन)। यदि इस राहु-अन्तर्दशा में राहु लग्न से 7वें भाव में हो, तो शास्त्रोक्त संकेत "देह-बाधा" का है और विहित उपाय मृत्युञ्जय-जप।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे विमशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (Ch.46–47) से जुड़ता है — जिसे हमारी दशा-गणना में केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120) पर अंकित कर, अन्तर्दशा = (MD×AD)/120 के शुद्ध अनुपात-सूत्र से निकाला जाता है। हमारी विधि-अनुशासन के अनुरूप गणित (2.4 वर्ष की सटीक अवधि) को अलग रखा गया और फल-कथन को "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत किया गया — भय या दबाव के रूप में नहीं।

56.80
छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसौख्यमवाप्नुयात् |
देवपूयप्रसादेन राहुतुष्ट्या द्विजोत्तम
chāgadānaṃ prakurvīta sarvasaukhyamavāpnuyāt |
devapūyaprasādena rāhutuṣṭyā dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छाग-दानम् = बकरे का दान; प्रकुर्वीत = भली-भाँति करे (आत्मनेपद विधि-लिङ्); सर्व-सौख्यम् = समस्त सुख; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे; देव-पूजा-प्रसादेन (मूल "देवपूय" — पाठ-भेद संभव, संभवतः देवपूजा) = देव-पूजा की कृपा से; राहु-तुष्ट्या = राहु की तुष्टि/प्रसन्नता से; द्विज-उत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (सम्बोधन — पराशर का मैत्रेय से संवाद)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के मारक-दोष के शमन-क्रम को आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — जो छाग (बकरे) का दान करता है, वह सर्व सुख प्राप्त करता है। देव-पूजा की कृपा और राहु की तुष्टि से, हे द्विजश्रेष्ठ, कल्याण होता है। यह गुरु (पराशर) का शिष्य (मैत्रेय) को दिया संवाद-रूप उपशम-निर्देश है — दान यहाँ ग्रन्थ का निर्दिष्ट शान्ति-कर्म है, दबाव नहीं।

English rendering Continuing the remedy, the text states that one who performs the gift of a goat attains every comfort; by the grace of divine worship and the propitiation of Rāhu, O best of the twice-born, well-being follows.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — उपशम-विधि एवं संवाद (गुरु-शिष्य सम्बोधन "द्विजोत्तम")। "देवपूय" इस पाठ में स्पष्टतः अपूर्ण/त्रुटित है (पाठ-भेद संभव: देवपूजा); शेष पद निर्विवाद रूप से दान-आधारित शान्ति-कर्म का निर्देश देते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह विशुद्ध शान्ति-कर्म श्लोक हमारे मूल अनुशासन का सीधा उदाहरण है — फल (phala) और शान्ति-विधान को शास्त्र का अपना कथन मानकर प्रस्तुत करना, कभी समर्थित नियति या "remedies-as-pressure" के रूप में नहीं। अतः 56.79 का मारक-कथन और 56.80 का दान-विधान, दोनों को हम गणित (विम्शोत्तरी अन्तर्दशा-काल) से अलग रखकर, केवल "ग्रन्थ ऐसा कहता है" की आवाज़ में देते हैं।

अध्यायः 57

शन्यन्तर्दशाफलाध्यायः

82 श्लोक
57.1
मूलत्रिकोणे स्वर्क्षे वा तुलायामुच्चगेऽपि वा |
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा राजयोगादिसंयुते
mūlatrikoṇe svarkṣe vā tulāyāmuccage'pi vā |
kendratrikoṇalābhe vā rājayogādisaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मूलत्रिकोणे = अपने मूलत्रिकोण में (शनि का मूलत्रिकोण = कुम्भ 0°–20°); स्वर्क्षे = अपनी राशि में (शनि = मकर/कुम्भ); तुलायाम् उच्चगे = तुला में उच्चस्थ (शनि की परमोच्च = तुला 20°); केन्द्र = 1/4/7/10 भाव; त्रिकोण = 1/5/9 भाव; लाभ = 11वाँ भाव; राजयोगादिसंयुते = राजयोग आदि से युक्त होने पर। (यह श्लोक शनि-महादशा में शनि की अपनी अन्तर्दशा का शुभ-पक्ष खोलता है।)

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! शनि की महादशा में जब उसकी अपनी अन्तर्दशा चले और शनि अपने मूलत्रिकोण, अपनी राशि, अथवा तुला में उच्च का होकर बैठा हो — या केन्द्र, त्रिकोण अथवा लाभ भाव में स्थित हो, या राजयोगकारक ग्रहों से युक्त हो — तब यह अन्तर्दशा उत्तम फल देने वाली कही गई है। यह श्लोक केवल शर्त (प्रोटैसिस) रखता है; उसका फल अगले दो श्लोकों में आता है।

English rendering In Saturn's mahādaśā, if in his own antardaśā Saturn occupies his mūlatrikoṇa, own sign, or exaltation in Libra — or a kendra, trikoṇa, or the 11th — or is joined with a rājayoga, then (per the following verses) the period yields excellent results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ गणित दो परतों में है। (1) दशा-कालमान — विंशोत्तरी में शनि महादशा = 19 वर्ष; उसकी प्रथम अन्तर्दशा स्वयं शनि की, अवधि L = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 = (19 × 19) ÷ 120 = 361/120 वर्ष। (2) बल-वर्गीकरण जो फल को खोलता है — शनि की गरिमा-स्थितियाँ: उच्च = तुला 20°, मूलत्रिकोण = कुम्भ 0°–20°, स्वक्षेत्र = मकर/कुम्भ, नीच = मेष 20°; तथा भाव-समुच्चय केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = {11}।

उदाहरण (worked example) शनि-शनि अन्तर्दशा की अवधि = 361/120 = 3.00833 वर्ष। 12 माह/वर्ष व 30 दिन/माह की मानक तालिका-परिपाटी से → 3 वर्ष + 0.00833×12 = 0.1 माह + 0.1×30 = 3 दिन → 3 वर्ष 0 माह 3 दिन (मानक विंशोत्तरी सारणी-मान)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अन्तर्दशा-अवधि dossier §3 के विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र से सीधे निकलती है — Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17 (Σ = 120)। अन्तर्दशा = शुद्ध अनुपात-गणित (mahā-yr × antar-yr)/120; हमारे kaal दशा-इंजन में यही सूत्र exact रूप से लगाया गया है, कोई सन्निकटन नहीं।

57.2
राज्यलाभो महत्सौख्यं दारपुत्रादिवर्धनम् |
वाहनत्रयसंयुक्तं गजाश्वाम्बरसङ्कुलम्
rājyalābho mahatsaukhyaṃ dāraputrādivardhanam |
vāhanatrayasaṃyuktaṃ gajāśvāmbarasaṅkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्य-लाभ = राज्य/अधिकार का लाभ; महत्-सौख्य = बड़ा सुख; दार = पत्नी/जीवन-साथी; पुत्रादि-वर्धन = संतान आदि की वृद्धि; वाहन-त्रय = तीन वाहन; गज-अश्व-अम्बर-सङ्कुल = हाथी, घोड़े, वस्त्रों से भरा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व शर्तों पर स्थित शनि की अन्तर्दशा में शास्त्र कहता है—राज्य-लाभ, बड़ा सुख, दार-पुत्र आदि की वृद्धि, तीन वाहनों का योग, तथा गज-अश्व-वस्त्र आदि वैभव का संकेत। यह शास्त्र का फल-कथन है; इसे नियति या गारंटी न समझें।

English rendering Under those placements, the text states gains of authority, great comfort, growth of spouse and children, association with three conveyances, and abundance of elephants, horses and fine garments—as classical result-language, not a guaranteed outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (prosperity / status phala)। “वाहनत्रय” आदि शब्द-गणना हैं, न कि अन्तर्दशा-वर्षों का सूत्र; अन्तर्दशा-काल का हिसाब विंशोत्तरी अनुपात से अलग अध्याय/सूत्र में आता है।

57.3
महाराजप्रसादेन सेनापत्यादिलाभकृत् |
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्ग्रामभूम्यादिलाभकृत्
mahārājaprasādena senāpatyādilābhakṛt |
catuṣpājjīvalābhaḥ syādgrāmabhūmyādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = किसी महाराज की कृपा से; सेनापत्यादि-लाभकृत् = सेनापति आदि पद दिलाने वाली; चतुष्पाद्-जीव-लाभः = चौपाया पशुओं का लाभ; स्यात् = होता है; ग्राम-भूमि-आदि-लाभकृत् = ग्राम, भूमि आदि की प्राप्ति कराने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि यही उत्तम शनि-अन्तर्दशा राजा की कृपा से सेनापति आदि उच्च पद दिलाती है, गौ आदि चौपाया पशुओं का लाभ कराती है, तथा ग्राम एवं भूमि की प्राप्ति देती है। यह श्लोक 1 में वर्णित शुभ-योग-फल का समापन-वाक्य है।

English rendering By a great king's favour it confers the office of army-commander and the like, gain of cattle, and acquisition of villages and land — so the text completes its account of the auspicious Saturn-antardaśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यान दें कि "सेनापत्य/भूमि/चतुष्पाद-पशु" शनि के नैसर्गिक कारकत्व (सेवा, भूमि, श्रमजीवी सम्पदा) से मेल खाते हैं — फल-कथन कारक-सादृश्य पर टिका है, किसी संख्यात्मक बल-गणना पर नहीं।

57.4
तथाऽष्टमे व्यये मन्दे नीचे वा पापसंयुते |
तद्भुक्त्यादौ राजभीतिर्विषशस्त्रादिपीडनम्
tathā'ṣṭame vyaye mande nīce vā pāpasaṃyute |
tadbhuktyādau rājabhītirviṣaśastrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = इसके विपरीत/किन्तु; अष्टमे व्यये = आठवें या बारहवें भाव में; मन्दे = शनि (मन्द) के; नीचे = नीच राशि में (शनि नीच = मेष 20°); पाप-संयुते = पापग्रहों से युक्त; तद्-भुक्त्यादौ = उस भुक्ति (अन्तर्दशा) के आरम्भ में; राज-भीतिः = राजा/राज्य से भय; विष-शस्त्रादि-पीडनम् = विष, शस्त्र आदि से पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ किन्तु जब वही शनि अष्टम या द्वादश भाव में हो, नीच का हो, या पापग्रहों से युक्त हो — तब शास्त्र कहता है कि उसकी अन्तर्दशा के आरम्भ में राज-भय तथा विष-शस्त्र आदि से पीड़ा की सम्भावना बताई जाती है। यह उत्तम-स्थिति के ठीक विपरीत, दुःस्थान-गत शनि का फल-कथन है।

English rendering But when that Saturn is in the 8th or 12th, debilitated, or joined with malefics, the text states that the opening of its antardaśā brings danger from authority and affliction by poison, weapons, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट-योग)। तकनीकी बिन्दु: "तद्-भुक्त्यादौ" शब्द अन्तर्दशा का कालिक-त्रिविभाजन (आदौ/मध्ये/अन्ते) आरम्भ करता है — भुक्ति को आरम्भ-मध्य-अन्त तीन खंडों में बाँटकर फल-आरोपण। अनुशासन: यह भय-कथन शास्त्र का दावा है, कोई निश्चित घटना या भविष्यवाणी नहीं — इसे कारण-रूप में नहीं, पाठ के कथन-रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

उदाहरण (worked example) शनि-शनि अन्तर्दशा (3 वर्ष 0 माह 3 दिन) का मोटा त्रि-विभाजन ≈ प्रत्येक खंड 1 वर्ष 0 माह 1 दिन; "आदौ" = प्रथम ≈ 1 वर्ष। सूक्ष्म विभाजन इन्हीं थोक-तिहाइयों के स्थान पर प्रत्यन्तर्दशा है, जो पुनः उसी 120-अनुपात से निकलती है।

57.5
रक्तस्त्रावो गुल्मरोगो ह्यतिमारादिपीडनम् |
मध्ये चौरादि भीतिश्च देशत्यागो मनोरुजः
raktastrāvo gulmarogo hyatimārādipīḍanam |
madhye caurādi bhītiśca deśatyāgo manorujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्त-स्रावः = रक्त-स्राव (पाठ: रक्तस्त्रावः); गुल्म-रोगः = गुल्म-रोग (उदर-गाँठ/प्लीहा-विकार); हि = निश्चय ही; अति-मार-आदि-पीडनम् = अतिशय प्रहार/महामारी आदि की पीड़ा (पाठ-भेद संभव: "अतिसार" = दस्त-रोग); मध्ये = अन्तर्दशा के मध्य में; चौरादि-भीतिः = चोर आदि का भय; देश-त्यागः = देश-त्याग; मनो-रुजः = मानसिक कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इसी अनिष्ट शनि-अन्तर्दशा में रक्त-स्राव, गुल्म-रोग तथा अत्यधिक कष्ट का उल्लेख करता है; और उसके मध्य-काल में चोरादि का भय, देश-त्याग एवं मन का दुःख कहता है। ("अतिमार" पाठ संदिग्ध है — यहाँ "अतिसार" (दस्त-रोग) पढ़ना भी सम्भव है; पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text speaks here of haemorrhage, a gulma disorder, and severe distress; and in the middle of the period, fear of thieves, exile from one's land, and anguish of mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रोग-भय वर्णन)। "मध्ये" शब्द श्लोक 4 के कालिक-त्रिविभाजन का दूसरा चरण है (आदौ → मध्ये → अन्ते)। अनुशासन: ये रोग-संकेत शास्त्र के कथन हैं, चिकित्सकीय निदान या पूर्वाभास नहीं — भय या दबाव के रूप में नहीं पढ़े जाते।

57.6
अन्ते शुभकरी चैव शनेरन्तर्दशा द्विज |
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति
ante śubhakarī caiva śanerantardaśā dvija |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = अन्त में; शुभ-करी = शुभ करने वाली; शनेः अन्तर्दशा = शनि की अन्तर्दशा; द्विज = हे द्विज (शिष्य-संबोधन); द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय व द्यून (7वें) भाव के स्वामी में/पर; अप-मृत्युः = अपमृत्यु (अकाल/अनैसर्गिक मृत्यु-संकेत); भविष्यति = होगा—शास्त्र-वाक्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—शनि की अन्तर्दशा का अन्त भाग शुभ-कारी भी होता है। किन्तु यदि (संदर्भ-योग में) द्वितीय या सप्तम भाव-स्वामी दोष-युक्त/संबंधित हो, तो शास्त्र अपमृत्यु का संकेत देता है। “भविष्यति” यहाँ शास्त्र की फल-भाषा है; इसे नियति या निश्चित घटना न मानें। पाठ-भेद/योग-शर्त की पूर्ति अध्याय-क्रम पर निर्भर।

English rendering The text states that the end of Saturn’s antardaśā is also benefic; yet when the lords of the second and seventh are implicated as indicated, it states apamṛtyu. That is the śāstra’s claim-language, not a fate-certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + काल-त्रिभाग (अन्त)। अन्तर्दशा-वर्षों का आधार-अनुपात (संदर्भ):
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120;
विंशोत्तरी में शनि-महादशा = 19 वर्ष; Σ चक्र = 120 वर्ष।
“आदि–मध्य–अन्त” = उस अन्तर्-अवधि का qualitative thirds, not a separate algorithm.

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/120 — यही exact ratio arithmetic engines में pinned है। यह श्लोक उस काल-माप का फल-पाठ है; फल की “सत्यता” oracle से नहीं जँचती—केवल अवधि-गणित `==` से।

57.7
तद्दोषपरिहारार्थं म्र्ट्युञ्जयजपं चरेत् |
ततः शान्तिमवाप्नोति शङ्करस्य प्रसादतः
taddoṣaparihārārthaṃ mrṭyuñjayajapaṃ caret |
tataḥ śāntimavāpnoti śaṅkarasya prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दोष-परिहारार्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; मृत्युञ्जय-जपम् = मृत्युञ्जय (महामृत्युञ्जय) मन्त्र का जप (पाठ में "म्र्ट्युञ्जय" — लेखन-दोष, वस्तुतः मृत्युञ्जय); चरेत् = करे; ततः = तब; शान्तिम् अवाप्नोति = शान्ति प्राप्त करता है; शङ्करस्य प्रसादतः = शङ्कर (शिव) की कृपा से।

हिन्दी भावार्थ उस मारक-दोष के परिहार के लिए शास्त्र मृत्युञ्जय-जप का विधान बताता है; ऐसा करने पर शङ्कर की कृपा से शान्ति की प्राप्ति कही जाती है। (मूल पाठ का "म्र्ट्युञ्जय" स्पष्टतः "मृत्युञ्जय" का लेखन-दोष है।)

English rendering As a remedy for that fault the text prescribes recitation of the Mṛtyuñjaya; thereby, it says, one attains peace through Śaṅkara's grace.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान (परिहार-कथन)। अनुशासन: यह उपाय शास्त्र का अपना परामर्श है; हम इसे पाठ के कथन-रूप में रखते हैं — भय या दबाव के रूप में नहीं, और न ही किसी अनिवार्य परिणाम की गारंटी के रूप में।

57.8
मन्दस्यान्तर्गते सौम्ये त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा |
सम्मानं च यशः कीर्तिं विद्यालाभं धनागमम्
mandasyāntargate saumye trikoṇe kendrage'pi vā |
sammānaṃ ca yaśaḥ kīrtiṃ vidyālābhaṃ dhanāgamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य अन्तर्गते = मन्द (शनि) की [दशा] के भीतर; सौम्ये = सौम्य (बुध) के; त्रिकोणे = त्रिकोण (1/5/9) में; केन्द्रगे = केन्द्र (1/4/7/10) में स्थित होने पर; सम्मान = आदर; यश-कीर्ति = ख्याति-प्रसिद्धि; विद्यालाभ = विद्या की प्राप्ति; धनागम = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ अब शनि-महादशा में बुध की अन्तर्दशा का प्रकरण आता है। जब बुध केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो, तब शास्त्र कहता है — सम्मान, यश एवं कीर्ति, विद्या की प्राप्ति तथा धन का आगमन होता है। यह बुध-भुक्ति का शुभ-पक्ष खोलता है।

English rendering When, within Saturn's period, Mercury occupies a trikoṇa or kendra, the text states there is honour, fame and renown, gain of learning, and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-कालमान — शनि महादशा (19 वर्ष) की द्वितीय अन्तर्दशा बुध की; अवधि L(शनि→बुध) = (19 × 17) ÷ 120 = 323/120 वर्ष। शुभ-गेटिंग भाव-समुच्चय: केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}। शेष (सम्मान, विद्या, धन) फल-कथन है।

उदाहरण (worked example) L = 323/120 = 2.69167 वर्ष → 2 वर्ष; शेष 0.69167×12 = 8.3 माह → 8 माह; शेष 0.3×30 = 9 दिन → 2 वर्ष 8 माह 9 दिन (मानक विंशोत्तरी शनि-बुध अन्तर्दशा-मान; 12 माह/वर्ष, 30 दिन/माह परिपाटी)।

हमारा डिकोड (Our Decode) बुध की अन्तर्दशा-वर्ष-संख्या 17 सीधे dossier §3 के विंशोत्तरी वितरण से है (Mercury = 17, Σ = 120)। L = (19×17)/120 शुद्ध अनुपात-अंकगणित है; हमारे kaal दशा-इंजन में यह exact-`==` से सत्यापित होता है, tolerance-band नहीं — क्योंकि band एक बार वास्तविक −1 त्रुटि को छिपा चुका है (dossier §5)।

57.9
स्वदेशे सुखमाप्नोति वाहनादिफलैर्युतम् |
यज्ञादिकर्मसिद्धिश्च राजयोगादिसम्भवम्
svadeśe sukhamāpnoti vāhanādiphalairyutam |
yajñādikarmasiddhiśca rājayogādisambhavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वदेशे = अपने देश/स्थान में; सुखम् आप्नोति = सुख प्राप्त करता है; वाहनादि-फलैः युतम् = वाहन आदि फलों से युक्त; यज्ञादि-कर्म-सिद्धिः = यज्ञ आदि कर्मों की सिद्धि; च = और; राजयोगादि-सम्भवम् = राजयोग आदि की संभावना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उसी अन्तर्दशा-फल की कड़ी में कहता है — स्वदेश में सुख मिलता है, और वह सुख वाहन आदि सुख-साधनों से जुड़ा बताया गया है। यज्ञादि धार्मिक-सामाजिक कर्मों में सिद्धि तथा राजयोगादि योगों की संभावना भी इसी फल-श्रृंखला में गिनी गई है। यह सब “शास्त्र कहता है” स्तर का फल-वर्णन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text continues that one obtains happiness in one’s own country, accompanied by vehicles and similar enjoyments; there is also stated success in sacrificial and kindred rites, and the possibility of rājayoga and related combinations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-संख्या या दशा-वर्ष यहाँ परिभाषित नहीं; केवल अनुकूल फल का विस्तार है।

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57.10
देहसौख्यं हृदुत्साहं गृहे कल्याणसम्भवम् |
सेतुस्नानफलावाप्तिस्तीर्थयात्रादिकर्मणा
dehasaukhyaṃ hṛdutsāhaṃ gṛhe kalyāṇasambhavam |
setusnānaphalāvāptistīrthayātrādikarmaṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-सौख्यम् = शरीर का सुख; हृद्-उत्साहम् = हृदय/मन का उत्साह; गृहे = घर में; कल्याण-सम्भवम् = कल्याण की संभावना; सेतु-स्नान-फलावाप्तिः = सेतु-स्नान के फल की प्राप्ति; तीर्थ-यात्रादि-कर्मणा = तीर्थ-यात्रा आदि कर्मों के द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — देह-सुख, हृदय का उत्साह, और गृह में कल्याण की संभावना इस अवस्था में कही गई है। सेतु-स्नान (सेतु/पुल/समुद्र-तीर आदि पर स्नान की शास्त्रीय कल्पना) के फल की प्राप्ति तीर्थ-यात्रा आदि कर्मों के माध्यम से जोड़ी गई है। यह फल-श्रृंखला अभी भी अनुकूल पक्ष का वर्णन है; चिकित्सा या यात्रा-उपदेश नहीं।

English rendering The text states bodily comfort, heartfelt enthusiasm, and the possibility of welfare at home; it also links attainment of the fruit of setu-bathing with acts such as pilgrimage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “सेतु-स्नान” यहाँ फल-उपमा/कर्म-फल का शास्त्र-शब्द है, कोई ज्यामितीय या खगोलीय स्थिरांक नहीं।

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57.11
वाणिज्याद्धनलाभश्च पुराणश्रवणादिकम् |
अन्नदानफलं चैव नित्यं मिष्ठान्नभोजनम्
vāṇijyāddhanalābhaśca purāṇaśravaṇādikam |
annadānaphalaṃ caiva nityaṃ miṣṭhānnabhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाणिज्यात् = व्यापार से; धन-लाभः = धन का लाभ; च = और; पुराण-श्रवणादिकम् = पुराण-श्रवण आदि; अन्न-दान-फलम् = अन्न-दान का फल; च एव = तथा; नित्यम् = प्रतिदिन; मिष्ठान्न-भोजनम् = मिष्ठान्न/मधुर अन्न का भोजन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — व्यापार से धन-लाभ, पुराण-श्रवण आदि श्रवण-कर्म, अन्न-दान का फल, और नित्य मिष्ठान्न-भोजन — ये सब इसी अनुकूल फल-वर्णन में आते हैं। 57.8–57.11 मिलकर शनि-महादशा में बुध-अन्तर्दशा के (त्रिकोण/केन्द्र-युक्त) शुभ फल-समूह का एक पूरा पाठ-खंड बनाते हैं। पाठ-भेद अन्य संस्करणों में फल-सूची की लंबाई/क्रम में संभव।

English rendering The text states gain of wealth from commerce, hearing of the Purāṇas and the like, the fruit of food-giving, and daily enjoyment of sweet food — completing the favourable phala-series for this antardaśā setting.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। आर्थिक/आहार संबंधी पंक्तियाँ शास्त्र का फल-शब्दावली हैं; इन्हें चिकित्सा, वित्त-परामर्श या नुस्खा न समझें।

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57.12
षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये नीचे वास्तंगते सति |
रव्यारफणिसंयुक्ते दायेशाद्वा तथैव च
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye saumye nīce vāstaṃgate sati |
ravyāraphaṇisaṃyukte dāyeśādvā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यये = छठे, आठवें या बारहवें भाव में; सौम्ये = बुध के; नीचे = नीच राशि में; वा = अथवा; अस्तंगते सति = अस्त (सूर्य-संयोग से दग्ध/अस्त) होने पर; रवि-आर-फणि-संयुक्ते = सूर्य, मंगल, राहु (फणि) से युक्त; दायेशात् वा = अथवा दाय (दशा/दाय-प्रसंग) के स्वामी से; तथा एव च = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र अनुकूल फल से हटकर शर्तें बदलता है — जब बुध षष्ठ, अष्टम या व्यय (12) में हो, अथवा नीच हो, अथवा अस्त हो, अथवा रवि–मंगल–राहु से युक्त हो, अथवा दायेश (दाय/दशा-स्वामी) की दृष्टि से वैसी ही दुर्बल/अशुभ स्थिति हो। यह श्लोक स्वयं फल नहीं कहता; वह अगले श्लोकों के लिए स्थिति-निर्धारण (condition-setting) है। “अस्त” का सटीक अंश-सीमा इस पंक्ति में नहीं दी — परंपरा में सूर्य से निकटता की परिभाषाएँ भिन्न हो सकती हैं (पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव)।

English rendering The text now sets adverse conditions: when Mercury occupies the 6th, 8th, or 12th, or is debilitated, or combust, or joined with the Sun, Mars, or Rāhu, or likewise in relation to the lord of the dāya — the next verses state the results under such states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थिति-निर्धारण (भाव/अवस्था-शर्त)। आधुनिक मॉडल में यह जाँच शुद्ध स्थान-तर्क है: बुध की राशि-स्थित भवांक ∈ {6, 8, 12}, अथवा नीच-राशि, अथवा सूर्य-से-दूरी अस्त-सीमा के भीतर, अथवा रवि/मंगल/राहु-युति — पर अस्त-अंश और भाव-गणना (समान-भाव vs. श्रीपति आदि) घोषित करनी पड़ती है; यह श्लोक वे स्थिरांक नहीं देता।

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57.13
नृपाभिषेकमर्थाप्तिर्देशग्रामाधिपत्यता |
फलमीदृशमादौ तु मध्यान्ते रोगपीडनम्
nṛpābhiṣekamarthāptirdeśagrāmādhipatyatā |
phalamīdṛśamādau tu madhyānte rogapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृप-अभिषेकम् = राज्याभिषेक; अर्थ-आप्तिः = धन की प्राप्ति; देश-ग्राम-आधिपत्यता = देश व ग्राम का आधिपत्य; फलम् ईदृशम् = ऐसा फल; आदौ तु = किन्तु आरम्भ में (ही); मध्य-अन्ते = मध्य व अन्त में; रोग-पीडनम् = रोग की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (श्लोक 12 की मिश्र स्थिति में, विशेषतः दायेश से शुभ-गणना होने पर) ऐसा राज्याभिषेक-तुल्य मान, धन-प्राप्ति और देश-ग्राम-आधिपत्य का फल केवल अन्तर्दशा के आरम्भ में मिलता है; इसके मध्य और अन्त में रोग-पीड़ा कही जाती है। यह मिश्रित-फल (आदि में शुभ, बाद में कष्ट) का कालिक-कथन है — दुःस्थान-गत बुध से जन्मे विरोधाभास को इसी क्रम-भेद से सुलझाया गया है (पाठ-सन्दर्भ पर सतर्कता)।

English rendering The text states that such fruit — a coronation-like elevation, gain of wealth, and lordship over land and village — comes only at the start of the period, while its middle and end bring bodily illness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालिक-श्रेणीबद्ध मिश्र फल)। तकनीक: अन्तर्दशा का आदौ/मध्ये/अन्ते त्रिविभाजन ही यहाँ फल-भेद का आधार है — एक ही अवधि में समय-खंड बदलने पर फल बदलता है।

उदाहरण (worked example) शनि-बुध अन्तर्दशा (2 वर्ष 8 माह 9 दिन ≈ 2.6917 वर्ष) का थोक त्रि-विभाजन ≈ प्रत्येक खंड 0.897 वर्ष ≈ 10 माह 22 दिन; "आदौ" (प्रथम ≈ 10 माह) शुभ, शेष दो खंड रोग-सूचक। सूक्ष्मता के लिए यही अवधि पुनः 120-अनुपात से प्रत्यन्तर्दशाओं में बँटती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह दोसियर के अनुशासन-सिद्धांत को उजागर करता है — दशा-अवधि (2 वर्ष 8 माह 9 दिन) शुद्ध विंशोत्तरी अनुपात-गणित से निकलती है और यह exact मान है; किन्तु "आदौ शुभ, मध्य-अन्ते रोग" शास्त्र का फल-कथन है, हमारा समर्थित पूर्वानुमान नहीं। गणित को `==` परिशुद्धि से, फल को पाठ-कथन-रूप में — दोनों को पृथक रखना ही विधि है।

57.14
नष्टानि सर्वकार्याणि व्याकुलत्वं महद्भयम् |
द्वितीयसप्तमाधिशे देहबाधा भविष्यति
naṣṭāni sarvakāryāṇi vyākulatvaṃ mahadbhayam |
dvitīyasaptamādhiśe dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नष्टानि = नष्ट हो जाते हैं; सर्व-कार्याणि = सब कार्य; व्याकुलत्वम् = व्याकुलता/बेचैनी; महत् भयम् = बड़ा भय; द्वितीय-सप्तम-अधिशे = द्वितीय एवं सप्तम भाव के स्वामियों के (प्रसंग/प्रभाव में); देह-बाधा = शरीर संबंधी बाधा; भविष्यति = होगी — ऐसा शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — सब कार्य नष्ट-से हो जाते हैं, व्याकुलता और महान् भय सूचित है; तथा द्वितीय-सप्तमाधीश के प्रसंग में देह-बाधा कही गई है। “द्वितीयसप्तमाधिशे” की सटीक व्याकरणिक-ज्योतिष कड़ी (बुध स्वयं 2/7 का स्वामी हो, अथवा 2/7-स्वामी से योग/दृष्टि) पाठ-भेद/टीका-भेद से प्रभावित हो सकती है — यहाँ पाठ यथावत् फल-कथन है। 57.12–57.14 मिलकर बुध-अन्तर्दशा (शनि-महादशा) के दुर्बल-अवस्था फल का खंड पूरा करते हैं।

English rendering The text states that all undertakings are ruined, there is agitation and great fear; and, in connection with the lords of the second and seventh houses, bodily affliction is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई बिन्दु-योग, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं; केवल मिश्र/अशुभ फल का समापन-वर्णन है।

57.15
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् |
अन्नदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम्
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet |
annadānaṃ prakurvīta sarvasampatpradāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष = उस (पूर्वोक्त) दोष; परिहारार्थम् = निवृत्ति/निवारण के लिये; विष्णुसाहस्रकम् = विष्णु-सहस्रनाम; जपेत् = जप करे; अन्नदानम् = अन्न-दान; प्रकुर्वीत = करे; सर्वसम्पत्प्रदायकम् = सब प्रकार की सम्पत्ति देने वाला (दान-कर्म)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्व-श्लोकों में बताए गए दोष के परिहार के लिये विष्णु-सहस्रनाम का जप करना चाहिये। साथ ही अन्नदान करने का उल्लेख है, जिसे पाठ सर्व-सम्पत्ति का दाता कहता है। यह फल-उपाय का शास्त्रीय कथन है — न दबाव, न अनिवार्य विधि के रूप में।

English rendering The text states that for the removal of that (aforesaid) fault one should recite the thousand names of Viṣṇu, and perform the gift of food, which it describes as bestowing every kind of prosperity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-उपाय कथन। यहाँ कोई वर्ग-विभाजन, दशा-वर्ष, बल-इकाई या बिन्दु-गणना नहीं है; केवल शास्त्र का औपचारिक उपाय-निर्देश है।

57.16
मन्दस्यान्तर्गते केतौ शुभदृष्टियुतेक्षिते |
स्वोच्चे वा शुभराशिस्थे योगकारकसंयुते
mandasyāntargate ketau śubhadṛṣṭiyutekṣite |
svocce vā śubharāśisthe yogakārakasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य = शनि की; अन्तर्गते = अन्तर्दशा में स्थित; केतौ = केतु (में/के समय); शुभदृष्टि = शुभ ग्रह की दृष्टि; युतेक्षिते = युक्त तथा दृष्ट; स्वोच्चे = स्व-उच्च राशि में; शुभराशिस्थे = शुभ राशि में स्थित; योगकारकसंयुते = योगकारक से संयुक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शनि की अन्तर्दशा में केतु की स्थिति का प्रकरण खोलता है। केतु जब शुभ दृष्टि/युति से युक्त हो, अथवा उच्च में हो, अथवा शुभ राशि में हो, अथवा योगकारक से संयुक्त हो — ये स्थितियाँ आगे के फल-कथनों का आधार बनती हैं। पाठ-भेद संभव जहाँ “युतेक्षिते” के योजक-अर्थ को अलग-अलग टीकाएँ बाँटती हैं।

English rendering When Ketu falls in Saturn’s antardaśā and is joined with or aspected by benefics, or is in exaltation, or stands in a benefic sign, or is conjoined with a yoga-kāraka — the text sets these as the operative conditions for the results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी में शनि महादशा = 19 वर्ष, केतु = 7 वर्ष; अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। अतः शनि–केतु अन्तर्दशा = (19 × 7) ÷ 120 = 133/120 वर्ष = 1 वर्ष + 13/120 वर्ष (लगभग 1 वर्ष 1 मास 9 दिन, जहाँ 1 वर्ष = 360 तिथि-दिन की दशा-परम्परा मानें तो दिन-गणना भिन्न हो सकती है)। आरम्भ-बिन्दु = चन्द्र की नक्षत्र-शेष-भिन्न; अयनांश दशा-क्रम नहीं बदलता, केवल जन्म-नक्षत्र-निर्णय पर पड़ता है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, शनि महादशा चालू; केतु अन्तर्दशा पूर्ण अवधि = 133/120 ≈ 1.1083 वर्ष। यदि महादशा-प्रारम्भ से केतु-अन्तर का क्रम पहुँचा हो और नक्षत्र-शेष से कोई अंश नहीं काटना हो, तो पूर्ण 133/120 वर्ष लागू। (क्रम: केतु 7 → शुक्र 20 → सूर्य 6 → चन्द्र 10 → मंगल 7 → राहु 18 → गुरु 16 → शनि 19 → बुध 17; शनि-महादशा के भीतर अन्तर उसी क्रम से अनुपातित होते हैं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा = (MD × AD) ÷ 120 — यही अनुपात-अंकगणित दशा-इंजन में पिन है: केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। फल-वाक्य अलग परत हैं; अवधि-गणना exact ratio है, व्याख्या नहीं।

57.17
केन्द्रकोणगते वापि स्थानभ्रंशो महद्भयम् |
दरिद्रबन्धनं भीतिः पुत्रदारादिनाशनम्
kendrakoṇagate vāpi sthānabhraṃśo mahadbhayam |
daridrabandhanaṃ bhītiḥ putradārādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र = 1, 4, 7, 10 भाव; कोण = त्रिकोण (1, 5, 9); गते = स्थित होने पर; वा अपि = अथवा भी; स्थानभ्रंशः = पद/स्थान-च्युति; महद्भयम् = बड़ा भय; दरिद्रबन्धनम् = दरिद्रता तथा बन्धन; भीतिः = भय; पुत्रदारादिनाशनम् = पुत्र, दारा आदि का नाश (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्वोक्त केतु–शनि-अन्तर के सन्दर्भ में) केन्द्र या कोण में भी स्थिति हो तो स्थान-भ्रंश और महान् भय का फल लिखा है। दरिद्रता, बन्धन, भय तथा पुत्र-दारा आदि के नाश का उल्लेख पाठ स्वयं करता है। यह फल-कथन है — निश्चित भाग्य या चिकित्सा/कानूनी भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that if (Ketu, in that period-context) also occupies a kendra or a trikoṇa, there is loss of position and great fear; it further names poverty, bondage, dread, and the destruction of children, spouse, and the like — as śāstric result-statements, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “केन्द्र/कोण” केवल भाव-सूचकांक हैं (1-4-7-10; 1-5-9); यहाँ कोई बल-राशि या बिन्दु-योग नहीं गिना गया। भाव-निर्णय गृह-प्रणाली (पूर्ण भाव-चक्र vs. श्रीपति आदि) पर निर्भर — परम्परा घोषित करनी चाहिये।

57.18
स्वप्रभोश्च महाकष्टं विदेशगमनं तथा |
लग्नाधिपेन संयुक्ते आदौ सौख्यं धनागमः
svaprabhośca mahākaṣṭaṃ videśagamanaṃ tathā |
lagnādhipena saṃyukte ādau saukhyaṃ dhanāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वप्रभोः = अपने स्वामी/प्रभु से; च = और; महाकष्टम् = बड़ा कष्ट; विदेशगमनम् = परदेश-यात्रा; तथा = तथा; लग्नाधिपेन = लग्नेश के साथ; संयुक्ते = युक्त होने पर; आदौ = आरम्भ में; सौख्यम् = सुख; धनागमः = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्व-प्रभु से महान् कष्ट और विदेश-गमन का फल। फिर विशेष योग: लग्नेश से युक्त होने पर आरम्भ में सौख्य और धन-आगम लिखा है। “आदौ” शब्द फल को काल-खण्ड में बाँटता है — पूरा काल एक-सा नहीं माना गया।

English rendering The text states great hardship from one’s own lord and travel to a foreign land; yet when (Ketu) is conjoined with the lord of the lagna, it states comfort and the inflow of wealth at the beginning (of the period).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-वर्णन। “लग्नाधिप-संयोग” = लग्नेश और केतु की समान-राशि/समान-भाव युति (परम्परा-अनुसार डिग्री-समीप्य की सीमा अलग हो सकती है; पाठ यहाँ सीमा नहीं देता)। “आदौ” काल-विभाजन गुणात्मक है, वर्ष-सूत्र नहीं।

57.19
गङ्गादिसर्वतीर्भेषु स्नानं दैवतदर्शनम् |
दायेशात्केन्द्रकोणे वा तृतीयभवराशिगे
gaṅgādisarvatīrbheṣu snānaṃ daivatadarśanam |
dāyeśātkendrakoṇe vā tṛtīyabhavarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गङ्गादि = गङ्गा आदि; सर्वतीर्थेषु = सब तीर्थों में; स्नानम् = स्नान; दैवतदर्शनम् = देवताओं का दर्शन; दायेशात् = दायेश (दशा-स्वामी) से; केन्द्रकोणे = केन्द्र या कोण में; वा = अथवा; तृतीयभवराशिगे = तृतीय भाव की राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र गङ्गा आदि सर्व-तीर्थों में स्नान और दैवत-दर्शन का उल्लेख करता है। फिर दायेश से केन्द्र/कोण में, अथवा तृतीय भाव-राशि में (केतु की) स्थिति का योग जोड़ता है — अगले श्लोक का शुभ-फल इन्हीं स्थितियों से जुड़ा पढ़ा जाता है। “दायेश” = दशा-स्वामी (यहाँ प्रकरणानुसार शनि-महादशा का स्वामी-सन्दर्भ); पाठ-भेद संभव नामकरण में।

English rendering The text mentions bathing in the Gaṅgā and all sacred fords and the sight of the deities; and (it continues) when (Ketu) is in a kendra or trikoṇa from the dāyeśa (lord of the period), or occupies the sign of the third house (from him).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गिनती दायेश-राशि से: केन्द्र = +0, +3, +6, +9 राशियाँ (1-4-7-10); कोण/त्रिकोण = +0, +4, +8 (1-5-9); तृतीय = +2 राशियाँ। उदाहरण: दायेश = मेष (1) ⇒ केन्द्र = मेष/कर्क/तुला/मकर; त्रिकोण = मेष/सिंह/धनु; तृतीय = मिथुन। यह modular rāśi-offset है, डिग्री-वर्ग नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें दायेश (शनि) वृषभ में है, केतु कन्या में। वृषभ से कन्या = 5वाँ भाव → त्रिकोण (कोण)। अतः “दायेशात् केन्द्रकोणे” शर्त लगती है। यदि केतु कर्क में हो तो वृषभ से 3रा → “तृतीयभवराशिगे”। (राशि-पूर्ण गणना; भचक्र-होर स्फुट से भाव-मध्य अलग हो तो घोषित करें।)

57.20
समर्थो धर्मबुद्धिश्च सौख्यं नृपसमागमः |
तथाऽष्टमे व्यये केतौ दायेशाद्वा तथैव च
samartho dharmabuddhiśca saukhyaṃ nṛpasamāgamaḥ |
tathā'ṣṭame vyaye ketau dāyeśādvā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समर्थः = सामर्थ्यवान्; धर्मबुद्धिः = धर्म-बुद्धि; च = और; सौख्यम् = सुख; नृपसमागमः = नृप/शासक से समागम; तथा = वैसे ही; अष्टमे = अष्टम में; व्यये = व्यय (द्वादश) में; केतौ = केतु के; दायेशात् = दायेश से; वा = अथवा; तथैव च = और उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सामर्थ्य, धर्म-बुद्धि, सौख्य और नृप-समागम। तथा दायेश से अष्टम या व्यय में केतु हो तो भी “तथैव” — उसी प्रकार का फल-लेख है। यह पूर्व-श्लोक की स्थिति-श्रृंखला का फल-भाग है; निश्चित राज-योग का दावा नहीं, पाठ का कथन है।

English rendering The text states capacity, a dharma-oriented intellect, happiness, and association with a ruler; and likewise when Ketu is in the eighth or the twelfth from the dāyeśa, it says “in the same way.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दायेश-राशि से अष्टम = +7 राशियाँ; व्यय/द्वादश = +11 राशियाँ। सूत्र: rāśi_Ketu ≡ rāśi_dāyeśa + k (mod 12), जहाँ k ∈ {7, 11} अष्टम/व्यय के लिये; पूर्व-श्लोक के k ∈ {0,3,6,9} केन्द्र, {0,4,8} त्रिकोण, {2} तृतीय। कोई बल-योग या SAV-बिन्दु यहाँ नहीं।

उदाहरण (worked example) दायेश = तुला (7)। अष्टम-राशि = वृषभ (7+7 ≡ 2 mod 12, राशि-संख्या 1…12 में 7→2); व्यय = कन्या (7+11 ≡ 6)। केतु वृषभ या कन्या में हो तो “अष्टमे व्यये केतौ दायेशात्” लागू।

57.21
अपमृत्युभयं चैव कुत्सितान्नस्य भोजनम् |
शीतज्वरातिसारश्च व्रणचौरादिपीडनम्
apamṛtyubhayaṃ caiva kutsitānnasya bhojanam |
śītajvarātisāraśca vraṇacaurādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपमृत्युभयम् = अकाल/अपमृत्यु का भय; च एव = और भी; कुत्सितान्नस्य = निन्दित/खराब अन्न का; भोजनम् = भोजन; शीतज्वर = शीत-ज्वर; अतिसारः = अतिसार; च = और; व्रण = व्रण/घाव; चौरादिपीडनम् = चोर आदि से पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस प्रकरण में अपमृत्यु का भय, कुत्सित अन्न का भोजन, शीतज्वर, अतिसार, व्रण तथा चोर आदि से पीड़न — ये फल-पद गिनाता है। चिकित्सा-निदान या भय-वाणिज्य नहीं; केवल होरा-पाठ का फल-सूचीकरण। “पाठ-भेद संभव” रोग-नामों की टीका-परम्परा में।

English rendering The text further states fear of untimely death, the eating of contemptible food, cold fever and dysentery, and affliction from wounds, thieves, and the like — as śāstric result-phrases, not as medical or fatal certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-अंश या बलांक यहाँ नहीं; यह पूर्ववर्ती केतु–दायेश स्थितियों से जुड़े फलों की ऋणात्मक सूची है। गणित और व्याख्या को अलग रखें: अवधि-गणना (विंशोत्तरी अनुपात) अलग परत, फल-वाक्य अलग परत।

57.22
दारपुत्रवियोगश्च संसारे भवति ध्रुवम् |
द्वितियद्यूनराशिस्थे देह पीडा भविष्यति
dāraputraviyogaśca saṃsāre bhavati dhruvam |
dvitiyadyūnarāśisthe deha pīḍā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दार-पुत्र-वियोगः = पत्नी/स्त्री-सम्बन्ध तथा पुत्र से वियोग; संसारे = लौकिक जीवन-क्रम में; ध्रुवम् = निश्चयपूर्वक (शास्त्र का कथन-स्वर); द्वितीय-द्यून-राशि-स्थे = द्वितीय अथवा द्यून (सप्तम) भाव/राशि में स्थित होने पर; देह-पीडा = शारीरिक कष्ट/असुविधा; भविष्यति = होगा — फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उक्त ग्रह-स्थिति के फल-वर्णन में दार तथा पुत्र से वियोग का संकेत आता है। जब ग्रह द्वितीय अथवा सप्तम (द्यून) राशि/भाव में हो, तब देह-पीड़ा का फल भी कहा गया है। यह अध्याय के प्रसंगगत दशा-फल का विस्तार है — गणितीय गणना नहीं, फल-सूची।

English rendering The text states that separation from spouse and children is indicated, and that when the planet stands in the second or seventh (dyūna) place, bodily affliction is also described. This is a phala-statement within the daśā context, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-फल)। द्वितीय/द्यून यहाँ भाव-स्थान की निर्देशिका हैं; बलांक, वर्ष-मान या वर्ग-विभाजन का कोई सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

57.23
छागदानं प्रकुर्वीत ह्यपमृत्युनिवारणम् |
केतुग्रहप्रसादेन सुखशान्तिमवाप्नुयात्
chāgadānaṃ prakurvīta hyapamṛtyunivāraṇam |
ketugrahaprasādena sukhaśāntimavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छाग-दानम् = बकरे का दान (शास्त्रोक्त कर्म-विधान); प्रकुर्वीत = करे — विधि-निर्देश; अपमृत्यु-निवारणम् = असमय/अशुभ-मृत्यु-संकेत का निवारण (पाठ का स्व-कथन); केतु-ग्रह-प्रसादेन = केतु-ग्रह की कृपा/अनुकूलता से; सुख-शान्तिम् = सुख तथा शान्ति; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अपमृत्यु-संकेत के सन्दर्भ में छाग-दान का विधान बताता है और उसे निवारण-उपाय के रूप में रखता है। आगे कहता है कि केतु-ग्रह के प्रसाद से सुख-शान्ति की प्राप्ति कही गई है। यह फल-और-उपाय का शास्त्र-स्वर है; हम इसे न तो भय के रूप में पढ़ते हैं, न दवा/कानूनी/आर्थिक नुस्खे के रूप में।

English rendering The text prescribes the gift of a goat as a stated means for warding off apamṛtyu-indication, and says that through the favor of Ketu one may obtain comfort and peace. Report this as the śāstra’s own ritual-and-phala voice, not as a medical or fatal claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / विधि-निर्देश। केतु यहाँ दशा-फल के ग्रह-सन्दर्भ में आता है; अवधि-अनुपात या बिन्दु-गणना इस श्लोक में नहीं है।

57.24
मन्दस्यान्तर्गते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा |
केन्द्रे वा शुभसंयुक्ते त्रिओकोणे लाभगेऽपि वा
mandasyāntargate śukre svocce svakṣetrage'pi vā |
kendre vā śubhasaṃyukte triokoṇe lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य-अन्तर्गत = शनि की अन्तर्दशा में; शुक्रे = शुक्र (अन्तर्दशा-स्वामी); स्वोच्चे = अपने उच्च-स्थान में; स्व-क्षेत्र-गे = अपने राशि-क्षेत्र में; अपि वा = अथवा; केन्द्रे = केन्द्र-भाव (1/4/7/10) में; शुभ-संयुक्ते = शुभ-ग्रह से युक्त; त्रिकोणे = त्रिकोण (1/5/9; पाठ में «त्रिओकोणे» — पाठ-भेद/लेखन-रूप संभव); लाभ-गे = लाभ (एकादश) भाव में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शनि-महादशा की शुक्र-अन्तर्दशा का शुभ-फल तब जोड़ता है जब शुक्र उच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, शुभ-युक्त, त्रिकोण, अथवा लाभ-स्थान में हो। यह योग-शर्तों की सूची है — फल अगले श्लोकों में आता है। स्थिति-नियम स्पष्ट हैं; संख्यात्मक वर्ष-मान इस पंक्ति में नहीं लिखा गया।

English rendering When Venus runs as antardaśā within Saturn’s period and is exalted, in own sign, in a kendra, conjoined with benefics, in a trikoṇa, or in the eleventh, the text prepares the auspicious phala that follows. The verse is a placement-condition list for that sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विम्शोत्तरी अनुपात (संदर्भ-सूत्र, अध्याय 46–47 की रीति): अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120। शनि = 19 वर्ष, शुक्र = 20 वर्ष ⇒ शुक्र-अन्तर्दशा शनि में = (19 × 20) ÷ 120 = 380/120 = 19/6 वर्ष = 3 वर्ष + 2 मास (ठीक 3 + 1/6 वर्ष)। उच्च/स्वक्षेत्र/केन्द्र/त्रिकोण/लाभ = राशि-रेखांश तथा भाव-मानचित्र पर स्थान-परीक्षण; अयनांश तथा भाव-पद्धति घोषित करनी चाहिए।

उदाहरण (worked example) मान लें विम्शोत्तरी, चन्द्र-नक्षत्र से शनि-महादशा चल रही है; अन्तर्दशा = शुक्र। (19 × 20) ÷ 120 = 3 वर्ष 2 मास की शुक्र-अन्तर्दशा। यदि शुक्र (Lahiri/Chitrapakṣa अयनांश; whole-sign भाव) कन्या में उच्च, केन्द्र-लाभ आदि शर्तों में से कोई एक पूरी हो, तो शास्त्र अगले श्लोकों का शुभ-फल इस अन्तर्दशा से जोड़ता है। (यहाँ केवल अवधि-और-स्थान की जाँच; फल-अनुमोदन नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र तथा अन्तर्दशा-अनुपात (महा × अन्तर्) ÷ 120 हमारे दशा-इंजन में यथार्थ अनुपात-अंकगणित है — Σ = 120 (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)। शनि–शुक्र अन्तर्दशा का 19/6 वर्ष ठीक उसी सूत्र से निकलता है; फल-वाक्य को हम «शास्त्र कहता है» के रूप में रखते हैं, भविष्य-वाणी के रूप में नहीं।

57.25
दारपुत्रधनप्राप्तिर्देहारोग्यं महोत्सवः |
गृहे कल्याण्सम्पत्ति राज्यलाभं महत्सुखम्
dāraputradhanaprāptirdehārogyaṃ mahotsavaḥ |
gṛhe kalyāṇsampatti rājyalābhaṃ mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दार-पुत्र-धन-प्राप्तिः = पत्नी/दार, पुत्र तथा धन की प्राप्ति; देह-आरोग्यम् = शरीर का आरोग्य; महा-उत्सवः = बड़ा उत्सव/आनन्द-अवसर; गृहे = घर में; कल्याण-सम्पत्ति = कल्याण तथा सम्पत्ति (पाठ «कल्याण्सम्पत्ति» — संधि/लेखन); राज्य-लाभम् = राज-सम्बन्धी लाभ/प्रतिष्ठा-लाभ (शास्त्र-स्वर); महत्-सुखम् = बड़ा सुख।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ-स्थितियों में शास्त्र दार, पुत्र, धन की प्राप्ति, देह-आरोग्य, गृह में कल्याण-सम्पत्ति, राज्य-लाभ तथा महान् सुख का फल कहता है। यह शुद्ध फल-सूची है — शर्तें पीछे, परिणाम यहाँ। हम इसे दशा-फल के पाठ के रूप में पढ़ते हैं, निश्चित भाग्य-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering Under those favorable conditions the text states gains of spouse, children, and wealth, bodily well-being, festive joy, household welfare and prosperity, royal favor or status-gain, and great comfort. Phala catalogue only.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संख्या, बिन्दु या वर्ष-खण्ड इस श्लोक में नहीं; फल 57.24 की स्थिति-शर्तों पर आश्रित है।

57.26
महाराजप्रसादेन हीष्टसिद्धिः सुखावहा |
स्सम्मानं प्रभुसम्मानं प्रियवस्त्रादिलाभकृत्
mahārājaprasādena hīṣṭasiddhiḥ sukhāvahā |
ssammānaṃ prabhusammānaṃ priyavastrādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महाराज/शासक की कृपा से; इष्ट-सिद्धिः = अभीष्ट की सिद्धि; सुख-आवहा = सुख लाने वाली; सम्मानम् = सम्मान (पाठ «स्सम्मानं» — द्वित्व-लेखन/पाठ-भेद संभव); प्रभु-सम्मानम् = स्वामी/प्रभु का आदर; प्रिय-वस्त्र-आदि-लाभ-कृत् = प्रिय वस्त्र आदि का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि महाराज-प्रसाद से अभीष्ट-सिद्धि और सुख मिलता है; सम्मान, प्रभु-सम्मान, तथा प्रिय वस्त्रादि का लाभ भी इसी शुभ-अन्तर्दशा-फल में गिना गया है। भाषा लौकिक-प्रतिष्ठा और सुख-सामग्री की है, न कि रोग-निदान या आर्थिक गारंटी की।

English rendering The text continues the auspicious antardaśā-phala: royal favor, fulfillment of wished aims with comfort, honor, the master’s esteem, and gain of pleasing garments and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / वर्णन। कोई बलांक, वर्ग-भाग या दशा-वर्ष यहाँ नहीं गिना गया।

57.27
द्विपान्तराद्वस्त्रलाभः श्वेताश्वो महिषी तथा |
गुरुचारवशाद्भाग्यं सौख्यं च धनसम्पदः
dvipāntarādvastralābhaḥ śvetāśvo mahiṣī tathā |
gurucāravaśādbhāgyaṃ saukhyaṃ ca dhanasampadaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विपान्तरात् = द्वीप-अन्तर से, अर्थात् दूरदेश/विदेश से (पाठ-भेद संभव — द्विप = "हाथी", तब "गजदेश से"); वस्त्र-लाभः = वस्त्रों की प्राप्ति; श्वेत-अश्वः = श्वेत घोड़ा; महिषी = भैंस (अथवा "पटरानी"); गुरु-चार-वशात् = बृहस्पति के गोचर (चार = गति/भ्रमण) के प्रभाव से; भाग्यम् = सौभाग्य; सौख्यम् = सुख; धन-सम्पदः = धन-सम्पत्ति।

हिन्दी भावार्थ शनि की महादशा में चल रही शुक्र की अन्तर्दशा का शुभ फल आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — इस काल में जातक को दूरदेश से वस्त्रों का लाभ, श्वेत अश्व तथा महिषी की प्राप्ति होती है; और बृहस्पति के अनुकूल गोचर के बल से सौभाग्य, सुख एवं धन-सम्पदा का उदय होता है। यह शुक्र-अन्तर्दशा के भोग्यकाल की सम्पन्नता का वर्णन है।

English rendering The text says that in this (Venus) sub-period one gains garments from a distant land, a white horse and a she-buffalo; and by the favourable transit of Jupiter come fortune, comfort and abundant wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा पर गोचर का अध्यारोप)। यहाँ श्लोक चलती हुई अन्तर्दशा (शुक्र) पर "गुरुचार" = बृहस्पति के गोचर को सूचक-कारण के रूप में आरोपित करता है — दशा फल की खिड़की खोलती है, गोचर उस फल का समय (trigger) निर्धारित करता है।

उदाहरण (worked example) शनि महादशा = 19 वर्ष, शुक्र अन्तर्दशा-मान 20 वर्ष। अन्तर्दशा-अवधि = (19 × 20) ÷ 120 = 380 ÷ 120 = 3.1667 वर्ष = 3 वर्ष 2 मास। यही वह भोग्यकाल है जिसमें उपर्युक्त फल पकते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अन्तर्दशा-गणना विमशोत्तरी 120-वर्ष चक्र की शुद्ध अनुपात-अंकगणित है, जिसे हमारे दशा-इंजन में प्रत्येक ग्रह के मान (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6 … Σ = 120) से नियत किया गया है: अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। श्लोक का फल व्याख्या है; भोग्यकाल का यह मान नियतांक (deterministic) है।

57.28
शनिचारान्मनुष्योऽसौ योगमाप्नोत्यसंशयम् |
शत्रुनीचास्तगे शुक्रे षष्ठाष्टमव्ययराशिगे
śanicārānmanuṣyo'sau yogamāpnotyasaṃśayam |
śatrunīcāstage śukre ṣaṣṭhāṣṭamavyayarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-चारात् = शनि के चार (गोचर/गति) से; मनुष्यः असौ = वह व्यक्ति; योगम् आप्नोति = (उक्त) योग/फल प्राप्त करता है; असंशयम् = निःसंशय — शास्त्र का दृढ़-कथन स्वर; शत्रु-नीच-अस्त-गे शुक्रे = शुक्र शत्रु-राशि, नीच, अथवा अस्त होने पर; षष्ठ-अष्टम-व्यय-राशि-गे = षष्ठ, अष्टम अथवा व्यय (द्वादश) राशि/भाव में स्थित होने पर।

हिन्दी भावार्थ पूर्वाध का वाक्य शनि-चार से उक्त योग-प्राप्ति को «असंशय» कहकर बाँधता है — यह शास्त्र की अपनी निश्चितता-भाषा है, हमारी भविष्य-वाणी नहीं। उत्तरार्ध शुक्र की अशुभ-स्थितियाँ खोलता है: शत्रु-क्षेत्र, नीच, अस्त, अथवा 6/8/12 भाव-राशि में होने पर फल-धारा पलटने की तैयारी (अगले प्रसंग के लिए)। शुभ-शर्तों (57.24) का प्रतिलोम यहाँ शुरू होता है।

English rendering The text affirms, “without doubt,” that through Saturn’s cāra the person attains the (foregoing) yoga; then it turns to Venus ill-placed — in enemy sign, debilitated, combust/set, or in the sixth, eighth, or twelfth — as the condition-set for the contrary phala stream.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-शर्त। जाँच-बिन्दु (आधुनिक संकेतन, घोषित सम्प्रदाय पर): (1) शुक्र का राशि-स्वामी शत्रु-वर्ग में है या नहीं; (2) नीच = तुला में शुक्र का पारम्परिक नीच-बिन्दु 27° कन्या-से-सम्बद्ध नीच-राशि (शुक्र-नीच = कन्या; उच्च = मीन — सम्प्रदायानुसार अंश-स्पष्टता); (3) अस्त = रवि-समीप्य की दहन/अस्त-सीमा (पारम्परिक शुक्र-अस्त नियम; किरण/डिग्री-सीमा सम्प्रदाय-भेद — पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव); (4) भाव 6/8/12 — whole-sign या श्रीपति आदि भाव-पद्धति पहले घोषित करें। कोई वर्ष-सूत्र इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) विम्शोत्तरी शनि–शुक्र अन्तर्दशा; whole-sign भाव; Lahiri अयनांश। शुक्र रेखांश = कन्या 12° (नीच-राशि), भाव-षष्ठ से — शास्त्र की 57.28 शर्तें लागू; इसके विपरीत यदि शुक्र मीन 15° (उच्च) लग्न-केन्द्र में हो तो 57.24–27 की शुभ-सूची लागू। अवधि दोनों दशाओं में वही: (19 × 20) ÷ 120 = 19/6 वर्ष; भेद केवल स्थान-परीक्षण का है।

57.29
दारनाशो मनःक्लेशः स्थाननाशो मनोरुजः |
दारानां स्वजनक्लेशः सन्तापो जनविग्रहः
dāranāśo manaḥkleśaḥ sthānanāśo manorujaḥ |
dārānāṃ svajanakleśaḥ santāpo janavigrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दार-नाशः = पत्नी/दाम्पत्य की हानि; मनः-क्लेशः = मानसिक क्लेश; स्थान-नाशः = पद/स्थान की हानि; मनोरुजः = मन का रोग (चित्त-व्यथा); दारानां स्वजन-क्लेशः = पत्नी-पक्ष/स्वजनों को कष्ट; सन्तापः = सन्ताप, दुःख; जन-विग्रहः = लोगों से विवाद/कलह।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त दुर्बल शुक्र की स्थिति में शास्त्र इन अनिष्ट फलों का कथन करता है — दाम्पत्य में हानि, मन का क्लेश, पद-भ्रंश, चित्त-रोग, स्वजनों को पीड़ा, सन्ताप तथा लोगों से विरोध। यह ग्रह-अवस्था पर आधारित शास्त्र का फल-कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states such adverse effects — loss in marriage, mental distress, fall from position, sickness of mind, trouble to one's kin, grief, and conflict with people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट-फल)। यह पद 57.28 के दुर्बल-शुक्र प्रतिबन्ध का परिणाम-वाक्य है; इसे शास्त्र का सशर्त कथन ("यदि शुक्र दुर्बल — तो शास्त्र यह फल कहता है") मानें, भय या अवश्यम्भावी घटना नहीं।

57.30
दायेशाद्भाग्यगे चैव केन्द्रे वा लाभसंयुते |
राजप्रीतिकरं चैव मनोऽभीष्टप्रदायकम्
dāyeśādbhāgyage caiva kendre vā lābhasaṃyute |
rājaprītikaraṃ caiva mano'bhīṣṭapradāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा/अन्तरदशा का अधिपति; भाग्यगे = नवम भाव में; केन्द्रे = 1-4-7-10 में; लाभसंयुते = लाभ (11) से युक्त/लाभस्थ; राजप्रीतिकरम् = राज-अनुग्रह उत्पन्न करने वाला; मनोऽभीष्टप्रदायकम् = मन-अभिष्ट देने वाला।

हिन्दी भावार्थ जब दायेश भाग्य (नवम) में हो, अथवा केन्द्र में हो, अथवा लाभ से संयुक्त हो, तब शास्त्र फल को शुभ कहता है। ऐसा योग राजप्रीति कराने वाला और मनोभीष्ट देने वाला कहा गया है। यह दायेश की भाव-स्थिति पर आधारित फल-नियम है।

English rendering When the period-lord is in the ninth, or in a kendra, or associated with the eleventh, the text states a result that wins royal favor and grants what the mind desires.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्थिति नियम (दशा-फल की तकनीकी शर्त), न कि अंक-सूत्र:
- दायेश ∈ {भाव 9} अथवा
- दायेश ∈ {1, 4, 7, 10} (केन्द्र) अथवा
- दायेश लाभ-संयुक्त (भाव 11 में / 11वें अधिपति से युक्त — पाठानुसार “लाभसंयुते”)
भाव-गिनती: लग्न = 1; भाग्य = 9; लाभ = 11; केन्द्र = 1, 4, 7, 10। (भाव-प्रणाली घोषित करें: पूर्ण-भाव या भचक्र-कुण्डली; संख्या भाव-क्रमांक पर निर्भर।)

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न मेष, दायेश = शुक्र, शुक्र कर्क में = भाव 4 (केन्द्र)। शर्त “केन्द्रे” पूर्ण → शास्त्रानुसार राजप्रीति-मनोभीष्ट फल-पंक्ति लागू। यदि शुक्र वृश्चिक में = भाव 8, तो यह श्लोक की सकारात्मक शर्त पूरी नहीं होती (अन्य श्लोक/योग देखें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दायेश की पहचान विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) से होती है; अन्तरदशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120। भाव-स्थिति फिर लग्न-सापेक्ष मॉड्यूलर गिनती है—दशा-काल और भाव-स्थान दोनों गणना से तय, फल केवल शास्त्र-कथन।

57.31
दानधर्मदयायुक्तं तीर्थयात्रादिकं फलम् |
सास्र्तार्थकाव्यरचनां वेदान्तश्रवणादिकम्
dānadharmadayāyuktaṃ tīrthayātrādikaṃ phalam |
sāsrtārthakāvyaracanāṃ vedāntaśravaṇādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दान-धर्म-दया-युक्तम् = दान, धर्म तथा दया से युक्त (आचरण); तीर्थयात्रा-आदिकं फलम् = तीर्थयात्रा आदि का फल; सास्र्त-अर्थ-काव्य-रचनाम् = अलंकार/अर्थ से युक्त काव्य की रचना (पाठ-भेद संभव — "सालङ्कार-अर्थ-काव्य" अथवा "सारस्वत-अर्थ-काव्य"); वेदान्त-श्रवण-आदिकम् = वेदान्त-श्रवण आदि।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त शुभ योग को आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — इस काल में जातक दान, धर्म तथा दया से युक्त होता है, तीर्थयात्रा आदि का फल पाता है, अर्थगर्भ काव्य की रचना करता है और वेदान्त-श्रवण आदि सत्कर्मों में प्रवृत्त होता है।

English rendering The text says one becomes given to charity, righteousness and compassion, reaps the fruit of pilgrimage, composes poetry rich in meaning, and hears the Vedānta and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-चरित/सत्कर्म-वर्णन)। "सास्र्तार्थ" पद में पाठ-भेद संभव; इसे आग्रहपूर्वक किसी एक पाठ पर स्थिर न करके अर्थ-सापेक्ष रखा गया है।

57.32
दारपुत्रादिसौख्यं च लभते नाऽत्र संशयः |
दायेशाद्व्ययगे शुक्रे षष्ठे वा ह्यष्टमेऽपि वा
dāraputrādisaukhyaṃ ca labhate nā'tra saṃśayaḥ |
dāyeśādvyayage śukre ṣaṣṭhe vā hyaṣṭame'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारपुत्रादिसौख्यम् = दार-पुत्र आदि का सुख; लभते = प्राप्त करता है; नात्र संशयः = इसमें संशय नहीं; दायेशात् = दायेश से; व्ययगे = व्यय (12) में स्थित; शुक्रे = शुक्र में/शुक्र के; षष्ठे = छठे में; अष्टमे = आठवें में; वा … वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोकों की शुभ शर्त पूरी होने पर शास्त्र कहता है—दार, पुत्र आदि का सौख्य निस्संदेह मिलता है। फिर नयी शर्त आरम्भ होती है: जब शुक्र दायेश से व्यय (12) में हो, अथवा छठे में, अथवा आठवें में भी हो—तब आगे का दुःख-फल (अगले श्लोकों में) लगता है। एक ही श्लोक में शुभ-फल का समापन और अशुभ-स्थिति का आरम्भ है।

English rendering Under the favorable conditions just stated, the text affirms happiness of spouse, children, and the like, without doubt. It then opens a new clause: when Venus is in the twelfth from the period-lord, or in the sixth, or even in the eighth, (the adverse results that follow apply).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सापेक्ष भाव-गिनती (शुक्र का दायेश से स्थान):
- मानें दायेश-राशि-सूचकांक = D (0…11 या 1…12, एकरूप रखें)
- शुक्र-राशि-सूचकांक = V
- सापेक्ष भाव h = ((V − D) mod 12); पूर्ण-भाव पर h ∈ {1…12} में रूपांतरित करें
- अशुभ-शर्त (इस श्लोक के उत्तरार्ध): h ∈ {6, 8, 12}
पूर्वार्ध का “दारपुत्रादिसौख्य” 57.30–31 की शुभ शर्त से जुड़ा फल है, न कि 6/8/12 स्थिति से।

उदाहरण (worked example) दायेश = गुरु मिथुन में; शुक्र = वृश्चिक में। मिथुन→वृश्चिक = 6 भाव आगे → षष्ठे। शर्त “दायेशाद् … षष्ठे” पूर्ण → आगे 57.33–34 का फल-क्रम शास्त्रानुसार लागू। यदि शुक्र भी मिथुन में (संगत/समान), h = 1, यह 6/8/12 शर्त नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “दायेश” और शुक्र दोनों की राशि विंशोत्तरी काल-खण्ड और जन्म-कुण्डली के स्पष्ट देशान्तर से आती है; सापेक्ष भाव ((V−D) mod 12) शुद्ध पूर्णांक-अंकगणित है। हम फल को भविष्यवाणी नहीं बनाते—केवल स्थिति-शर्त `==` से जाँचते हैं, फिर शास्त्र का फल-पाठ अलग रखते हैं।

57.33
नेत्रपीडा ज्वरभयं स्वकुलाचारवर्जितः |
कपोले दन्तशूलादि हृदि गुह्ये च पीडनम्
netrapīḍā jvarabhayaṃ svakulācāravarjitaḥ |
kapole dantaśūlādi hṛdi guhye ca pīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नेत्रपीडा = नेत्रों की पीड़ा; ज्वरभयम् = ज्वर का भय/संकट; स्वकुलाचारवर्जितः = स्व-कुल के आचार से रहित; कपोले = गाल/कपोल में; दन्तशूलादि = दाँत का शूल आदि; हृदि = हृदय में; गुह्ये = गुह्य-स्थान में; पीडनम् = पीड़न।

हिन्दी भावार्थ जब शुक्र दायेश से षष्ठ/अष्टम/व्यय में हो (पूर्व श्लोक), शास्त्र नेत्र-पीड़ा और ज्वर-भय का फल कहता है। व्यक्ति स्व-कुल के आचार से च्युत कहा गया है। कपोल, दन्तशूल आदि, तथा हृदय और गुह्य में पीड़न—ये भी उसी फल-सूची में हैं। यह शास्त्र-कथन है; चिकित्सा-निदान या भय-वाणी नहीं।

English rendering Under that adverse placement the text states eye-pain and fever-fear, and conduct estranged from one’s own family custom. It also names affliction in the cheek, toothache and the like, and pain in the heart and the private parts—as the śāstra’s listed results, not as a medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शरीर/आचार-सम्बन्धी दुःख-सूची, 57.32 की स्थिति पर आश्रित)। कोई अंश, बल-रूप या वर्ष-संख्या नहीं; केवल पूर्व-श्लोक की भाव-शर्त का फल-विस्तार।

57.34
जलभीतिर्मनस्तापो वृक्षात्पतनसम्भवः |
राजद्वारे जनद्वेषः सोधरेण विरोधनम्
jalabhītirmanastāpo vṛkṣātpatanasambhavaḥ |
rājadvāre janadveṣaḥ sodhareṇa virodhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जलभीतिः = जल से भय; मनस्तापः = मनस्ताप; वृक्षात् पतनसम्भवः = वृक्ष से गिरने की संभावना; राजद्वारे = राज-द्वार/सरकारी द्वार पर; जनद्वेषः = जन-द्वेष; सोधरेण = सहोदर/भाई से; विरोधनम् = विरोध।

हिन्दी भावार्थ उसी अशुभ-क्रम में शास्त्र जल-भीति और मनस्ताप कहता है। वृक्ष से पतन की संभावना भी फल में गिनी गई है। राजद्वार पर जन-द्वेष तथा सोदर से विरोध—ये भी उक्त स्थिति के फल बताए गए हैं। फिर भी यह पाठ का फल-वर्णन है, निश्चित घटना का दावा नहीं।

English rendering The text continues with fear of water and mental torment, and the possibility of a fall from a tree. At the royal gate it names public hostility, and opposition from a sibling—stated as śāstra-phala, not as a fixed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भीति/पतन/राजद्वार/सोदर-विरोध की सूची)। 57.32–33 के साथ एक ही दुःख-फल-श्रृंखला; गणना केवल पूर्व की सापेक्ष-भाव शर्त तक सीमित रहती है।

57.35
द्वितीयसप्तमाधीशे आत्मक्लेशो भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवीजपं चरेत्
dvitīyasaptamādhīśe ātmakleśo bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ durgādevījapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीयसप्तमाधीशे = द्वितीय और सप्तम के अधिपतियों में/के योग में (पाठानुसार); आत्मक्लेशः = आत्म-क्लेश; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के परिहार के लिए; दुर्गादेवीजपम् = दुर्गा-देवी का जप; चरेत् = करे (शास्त्र का विधान-वचन)।

हिन्दी भावार्थ द्वितीय और सप्तम के अधिपति (सम्बन्ध/स्थिति—पाठ संक्षिप्त) पर शास्त्र आत्मक्लेश का फल कहता है। उसी दोष के परिहारार्थ दुर्गा-देवी जप का विधान पाठ में है। हम इसे न तो अनिवार्य उपाय के दबाव के रूप में कहते हैं, न रोग/कानून/धन की गारंटी—केवल शास्त्र का कथन।

English rendering The text states that when the lords of the second and the seventh (are involved as the verse frames) there will be self-affliction. For the removal of that fault it prescribes japa of Durgā-devī—reported as the śāstra’s own remedy-clause, not as pressure or a guaranteed cure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रोक्त परिहार-विधान। तकनीकी रूप से केवल भाव-स्वामी पहचान: द्वितीयेश = लग्न से भाव-2 का अधिपति; सप्तमेश = भाव-7 का अधिपति (राशि-स्वामित्व चक्र: मेष-मंगल … मीन-गुरु)। उनके योग/दशा-सम्बन्ध का विस्तृत नियम इस श्लोक में संख्याबद्ध नहीं—पाठ संक्षिप्त; पाठ-भेद/टीका-विस्तार संभव।

57.36
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धिदाम् |
जगदम्बाप्रसादेन ततः सुखमवाप्नुयात्
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyurārogyavṛddhidām |
jagadambāprasādena tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतां गां = श्वेत गौ (दान-द्रव्य); महिषीं = भैंस; दद्यात् = दान करे (विधि-वाक्य); आयुः-आरोग्य-वृद्धिदाम् = आयु व आरोग्य की वृद्धि देने वाली; जगदम्बा-प्रसादेन = जगदम्बा (विश्व-माता) की कृपा से; ततः = उसके अनन्तर; सुखम् अवाप्नुयात् = सुख प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ मन्द-अन्तर्गत सूर्य से जुड़े पूर्व-संदर्भ के दोष-परिहार के रूप में दान का उल्लेख करता है। वह कहता है कि श्वेत गाय तथा महिषी का दान आयु और आरोग्य की वृद्धि से जुड़ा माना गया है। जगदम्बा-प्रसाद के आश्रय से, पाठ के अनुसार, उसके बाद सुख की प्राप्ति कही गई है। यह फल-उपचार का कथन है, न कि गणना-सूत्र।

English rendering The text prescribes the gift of a white cow and a she-buffalo as associated with increase of longevity and health. By the grace of the World-Mother (Jagadambā), it states, happiness is then attained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दोष-परिहार-विधान। यह श्लोक किसी वर्ग, दशा-वर्ष, बल-इकाई या अंश-गणित को नहीं बाँधता; यह दान-विधान और प्रसाद-फल को शास्त्र की अपनी भाषा में रखता है।

57.37
मन्दस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा |
भाग्याधिपेन संयुक्ते केन्द्रलाभत्रिकोणगे
mandasyāntargate sūrye svocce svakṣetrage'pi vā |
bhāgyādhipena saṃyukte kendralābhatrikoṇage

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य अन्तर्गते = शनि की महादशा में अन्तर्दशा में; सूर्ये = सूर्य (अन्तर्दशा-स्वामी); स्वोच्चे = स्व-उच्च स्थान में (मेष, 10° परंपरागत उच्च); स्व-क्षेत्र-गे = स्व-राशि में (सिंह); अपि वा = अथवा; भाग्याधिपेन संयुक्ते = भाग्येश (नवमेश) से युक्त; केन्द्र-लाभ-त्रिकोण-गे = केन्द्र (1,4,7,10), लाभ (11), अथवा त्रिकोण (1,5,9) स्थित।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शनि-महादशा की सूर्य-अन्तर्दशा का शुभ विन्यास बाँधता है। शास्त्र कहता है—जब सूर्य उच्च में हो, अथवा स्व-क्षेत्र में हो, अथवा भाग्येश से युक्त हो, और केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में स्थित हो—तो आगे के श्लोक में कहा गया महत्-सुख आदि फल लागू होता है। शर्तें युति-स्थान और बल-स्थान पर टिकी हैं; काल-अवधि यहाँ नहीं गिनी गई।

English rendering When the Sun operates in Saturn’s antardaśā and is exalted, in its own sign, or joined with the lord of fortune (ninth), and is placed in a kendra, the eleventh, or a trikoṇa, the text opens the favourable result-sequence that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (BPHS दशा-क्रम; च.46–47 के कैननिकल वर्ष):
शनि महादशा = 19 वर्ष; सूर्य-अंश = 6 वर्ष;
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120
= (19 × 6) ÷ 120 = 114/120 = 19/20 = 0.95 वर्ष
≈ 11 मास 12 दिन (सौर-वर्ष = 365.25 दिन मानें तो ≈ 347 दिन; ज्योतिष-परंपरा प्रायः 360-दिन वर्ष से भी गिनती करती है—परंपरा घोषित रखें)।
उच्च/स्वक्षेत्र/केन्द्र-लाभ-त्रिकोण यहाँ स्थान-शर्तें हैं, न कि अलग संख्या-सूत्र।

उदाहरण (worked example) मान लें जन्म-चंद्र नक्षत्र से शनि-महादशा चल रही है, और सूर्य-अन्तर्दशा आरंभ।
अन्तर्दशा-दीर्घ = 0.95 वर्ष।
यदि सूर्य सिंह में (स्वक्षेत्र) तथा लग्न से केन्द्र/लाभ/त्रिकोण में हो, और/या नवमेश से युक्त हो—तो 57.37–57.38 की शुभ-श्रृंखला शास्त्र के अनुसार लागू मानी जाती है।
(अयनांश: स्थान-निर्णय के लिए कोई भी घोषित अयनांश—लाहिरी आदि—चुनें; फल-कथन अयनांश-स्वतंत्र, ग्रह-राशि-भाव स्थिति पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में शनि 19 और सूर्य 6 वर्ष कैननिकल हैं; अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात (MD × AD)/120 है—यही 0.95 वर्ष सूर्य-अन्तर् शनि-महा में। दशा-इंजन इसी अनुपात-गणित पर चलता है; फल-वाक्य अलग परत हैं—गणित `==` से, फल “शास्त्र कहता है” से।

57.38
शुभदृष्टियुते वापि स्वप्रभोश्च महत्सुखम् |
गृहे कल्याणसम्पत्तिः पुत्रादिसुखवर्द्धनम्
śubhadṛṣṭiyute vāpi svaprabhośca mahatsukham |
gṛhe kalyāṇasampattiḥ putrādisukhavarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-दृष्टि-युते = शुभ-ग्रह की दृष्टि से युक्त; वा अपि = अथवा भी; स्व-प्रभोः च = तथा अपने स्वामी (अर्थात् दशा/अन्तर् के संदर्भ में सूर्य के अनुकूल स्वामी-संबंध) से; महत् सुखम् = महान् सुख; गृहे = घर में; कल्याण-सम्पत्तिः = कल्याण व संपत्ति; पुत्रादि-सुख-वर्द्धनम् = पुत्र आदि से सुख की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ शर्तों पर यह फल जोड़ता है। शास्त्र कहता है—शुभ दृष्टि युक्त होने पर, अथवा अनुकूल स्व-स्वामी संबंध से, महत् सुख मिलता है। घर में कल्याण और संपत्ति, तथा पुत्रादि से सुख की वृद्धि—यह पाठ का फल-कथन है। यह पूर्वानुमान का प्रमाण नहीं, शास्त्रीय फल-सूची है।

English rendering Under those favourable conditions—and also when joined with benefic aspect—the text states great happiness, domestic welfare and wealth, and increase of joy connected with children and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दृष्टि यहाँ पारंपरिक ग्रह-दृष्टि (पूर्ण/अंश) का गुणात्मक योग है; इस श्लोक में कोई बलांक, वर्ष-संख्या या वर्ग-भाग नहीं दिया गया।

57.39
वाहनाम्बरपश्वादिगोक्षीरैस्संकुलं गृहम् |
लग्नाष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वा तथैव च
vāhanāmbarapaśvādigokṣīraissaṃkulaṃ gṛham |
lagnāṣṭamavyaye sūrye dāyeśādvā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन-अम्बर-पशु-आदि = वाहन, वस्त्र, पशु आदि; गो-क्षीरैः संकुलं गृहम् = गौ-दुग्ध से भरा घर (पूर्व शुभ-फल का विस्तार); लग्न-अष्टम-व्यये सूर्ये = लग्न, अष्टम या व्यय (12) भाव में सूर्य; दायेशात् वा = अथवा दायेश (दशा-स्वामी, यहाँ मन्द/शनि) से; तथा एव च = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ श्लोक दो धाराएँ जोड़ता है। प्रथम पाद पूर्व शुभ-श्रृंखला का गृह-समृद्धि चित्र है—वाहन, वस्त्र, पशु और गोक़्षीर से भरा घर—शास्त्र के अनुसार। तदुपरांत विपरीत स्थिति: जब सूर्य लग्न, अष्टम या व्यय में हो, अथवा दशा-स्वामी से उन्हीं भावों में हो, तो आगे (57.40–57.41) का क्लेश-फल लागू होता है। भाव-स्थान यहाँ कुंडली-निर्देश हैं।

English rendering The favourable side speaks of a house abounding in conveyances, garments, cattle and cow’s milk. Conversely, when the Sun occupies the lagna, the eighth, or the twelfth—or likewise from the daśā-lord—the adverse sequence of the next verses is indicated by the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-निर्देश = पूर्णांक भाव-संख्या {1, 8, 12} लग्न से, अथवा दायेश-राशि से गिनकर उन्हीं स्थान-संख्याओं पर।
दायेश-से गणना: यदि दायेश राशि R है, तो “लग्न/अष्टम/व्यय” ≡ R, R+7, R+11 (mod 12, राशियाँ 0…11)।
कोई अंश-विभाजन या बल-सूत्र इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) शनि-महादशा, सूर्य-अन्तर्दशा; सूर्य कन्या में, लग्न कन्या → सूर्य लग्नस्थ → 57.39 की अशुभ शाखा।
अथवा शनि (दायेश) मकर में; सूर्य तुला में = दायेश से दशम, अशुभ-त्रय में नहीं। सूर्य सिंह में = दायेश से अष्टम → अशुभ शाखा।
(भाव-प्रणाली: पूर्ण-राशि भाव; अयनांश केवल राशिनिर्णय के लिए घोषित रखें।)

57.40
हृद्रोगो मानहानिश्च स्थानभ्रंशो मनोरुजा |
इष्ट्बन्धुवियोगश्च उद्योगस्य विनाशनम्
hṛdrogo mānahāniśca sthānabhraṃśo manorujā |
iṣṭbandhuviyogaśca udyogasya vināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हृद्रोगः = हृदय-सम्बन्धी रोग/कष्ट; मानहानिः = मान-प्रतिष्ठा की हानि; स्थानभ्रंशः = पद/स्थान से च्युति; मनोरुजा = मन की व्यथा (रुज् = रोग); इष्टबन्धु-वियोगः = प्रिय स्वजन से बिछोह; उद्योगस्य विनाशनम् = आरम्भ किए उद्यम का नाश।

हिन्दी भावार्थ शनि (मन्द) की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा — जब सूर्य लग्न, अष्टम या व्यय आदि अशुभ स्थान में बैठा हो (पूर्व श्लोक ३९ का सन्दर्भ) — तब शास्त्र कहता है कि हृदय-रोग, मान-हानि, पद से च्युति और मानसिक व्यथा का योग बनता है; प्रिय बन्धुओं से वियोग और चालू प्रयास की विफलता का भी वर्णन है। यह एक विशिष्ट ग्रह-स्थिति का फल-कथन है, कोई अनिवार्य नियति नहीं।

English rendering In Saturn's daśā, during the ill-placed Sun's antardaśā, the text states results of heart-affliction, loss of honour, fall from one's position and mental distress, separation from loved ones, and the ruin of one's ventures.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-स्थान सूर्यान्तर का)। फल को प्रायः अन्तर्दशा के आदि–मध्य–अन्त तीन सम भागों में बाँटकर पढ़ा जाता है; प्रत्येक भाग = अन्तर-काल ÷ 3।

हमारा डिकोड: यह अध्याय पूरा शनि-महादशा (19 वर्ष) के अन्तर्दशा-फल का है; विंशोत्तरी का अन्तर्दशा-सूत्र अन्तर-काल = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 हमारे दशा-इंजन में पिन किया गया है। सूर्यान्तर = 19 × 6 ÷ 120 = 114/120 वर्ष = 0.95 वर्ष ≈ 11 माह 12 दिन — यही वह काल-खिड़की है जिसमें ऊपर का फल-कथन पढ़ा जाता है। गणना और फल-व्याख्या को हम सदा अलग रखते हैं।

57.41
तापज्वरादिपीडा च व्याकुलत्वं भयं तथा |
आत्मसम्बन्धिमरणमिष्टवस्तुवियोगकृत्
tāpajvarādipīḍā ca vyākulatvaṃ bhayaṃ tathā |
ātmasambandhimaraṇamiṣṭavastuviyogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ताप-ज्वर-आदि-पीडा = ताप/ज्वर आदि से पीड़ा; व्याकुलत्वम् = व्याकुलता, बेचैनी; भयम् = भय, आशंका; आत्मसम्बन्धि-मरणम् = अपने निकट स्वजन की मृत्यु; इष्टवस्तु-वियोग-कृत् = प्रिय वस्तु का वियोग कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के अशुभ सूर्यान्तर का ही विस्तार — शास्त्र कहता है कि इस काल में ताप-ज्वरादि की पीड़ा, चित्त की व्याकुलता और भय बना रहता है; निकट सम्बन्धी का वियोग तथा प्रिय वस्तुओं का बिछोह भी इसमें गिनाया गया है। ये सब शास्त्र के अनुसार सम्भावित फल हैं, भयोत्पादन के लिए नहीं कहे गए।

English rendering Continuing the afflicted Sun-antardaśā, the text states burning fevers and bodily pain, agitation of mind and fear, the death of a close relative, and the loss of cherished things.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कष्ट-वर्णन)। "आत्मसम्बन्धि-मरण" जैसे कठोर वाक्य शास्त्र का दावा-कथन हैं; इन्हें "शास्त्र कहता है" रूप में पढ़ा जाता है, किसी निश्चित घटना की भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

57.42
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं सूर्यपूजां च कारयेत्
dvitīyadyūnanāthe tu dehabādhā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ sūryapūjāṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (2) व द्यून/यून = सप्तम (7) भाव के स्वामी की उप-दशा में; द्यून = सप्तम भाव (मारक-स्थान); देहबाधा = शरीर-कष्ट; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन); तद्दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के शमन हेतु; सूर्यपूजाम् कारयेत् = सूर्य-पूजा करावे (शास्त्र-विहित शान्ति)।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्यान्तर के भीतर द्वितीय व सप्तम भाव के स्वामी (मारकेश) की उप-दशा आती है, तब शास्त्र देह-बाधा की सम्भावना बताता है। इसके शमन हेतु शास्त्र सूर्य-पूजा का विधान कहता है — यह पाठ का प्रस्तावित शान्ति-कर्म है, कोई दबाव या भय-आधारित उपाय नहीं।

English rendering When the sub-period of the lord of the 2nd and 7th houses arrives, the text states there will be bodily affliction; to allay that flaw it prescribes worship of the Sun.

गणित / तकनीक: मारक-स्थान = भाव 2 और 7। किसी भी सन्दर्भ-लग्न R से इनकी राशियाँ = (R−1 + {1, 6}) mod 12 + 1। यदि दोनों भावों का स्वामी एक ही ग्रह हो, तो वह प्रबल मारकेश माना जाता है।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न (R = 1) → द्वितीय = वृषभ (राशि 2), सप्तम = तुला (राशि 7); दोनों का स्वामी शुक्र। अतः शुक्र यहाँ 2/7 का संयुक्त मारकेश हुआ; सूर्यान्तर के भीतर जब शुक्र की उप-दशा चले, तब शास्त्र देह-बाधा का कथन करता है।

57.43
मन्दस्यान्तर्गते चन्द्रे जीवदृष्टिसमन्विते |
स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रस्थे त्रिकोणे लाभगेऽपि वा
mandasyāntargate candre jīvadṛṣṭisamanvite |
svocce svakṣetrakendrasthe trikoṇe lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द = शनि (मन्दग्रह); अन्तर्गत = अन्तर्दशा-अवधि में स्थित; चन्द्र = चन्द्रमा (अन्तर्दशा-ग्रह या फल-विषय); जीवदृष्टि = गुरु की दृष्टि से युक्त; स्वोच्च = स्व-उच्च राशि (चन्द्र का उच्च = वृषभ); स्वक्षेत्र = स्व-राशि (चन्द्र = कर्क); केन्द्रस्थ = 1/4/7/10 भाव या केन्द्र-राशि में; त्रिकोण = 1/5/9; लाभग = एकादश भाव में भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मन्द (शनि) की अन्तर्दशा में चन्द्र स्थित हो और वह गुरु-दृष्टि से समन्वित हो, तथा स्वोच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, त्रिकोण अथवा लाभ-स्थान में हो, तो आगे कहे जाने वाले शुभ फल की योग्यता बनती है। यह श्लोक फल का द्वार खोलता है: स्थिति और दृष्टि की शुभता शर्त है, फल स्वयं अगले श्लोकों में आता है।

English rendering The text states that when the Moon is in Saturn’s antardaśā, aspected by Jupiter, and placed in exaltation, own sign, a kendra, a trikoṇa, or the eleventh (lābha), the favourable results that follow are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अन्तर्दशा-फल की शर्त-सूची (स्थिति + दृष्टि)। अन्तर्दशा-नामकरण विंशोत्तरी ढाँचे का है: महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष ÷ 120; यहाँ शनि 19 वर्ष, चन्द्र 10 वर्ष — परन्तु यह श्लोक अवधि नहीं, फल-योग्यता की शर्तें बताता है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी में शनि-महादशा के अन्तर्गत चन्द्र-अन्तर्दशा की अवधि = (19 × 10) / 120 = 190/120 = 1 वर्ष 7 मास (लगभग)। फल-निर्णय के लिए अलग से चन्द्र की राशि/भाव (उच्च = वृषभ; स्व = कर्क; केन्द्र/त्रिकोण/लाभ) और गुरु-दृष्टि की जाँच करनी होती है — अयनांश और भाव-पद्धति घोषित करनी चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17) पर अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 — शुद्ध अनुपात-गणित। यह श्लोक उसी अन्तर्दशा-नाम को फल-शर्त से जोड़ता है; अवधि-इंजन गणना करता है, फल-वाक्य शास्त्र का कथन रहता है।

57.44
पूर्णे शुभग्रहैर्युक्ते राजप्रीतिसमागमः |
महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम्
pūrṇe śubhagrahairyukte rājaprītisamāgamaḥ |
mahārājaprasādena vāhanāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णे = पूर्ण चन्द्र (शुक्ल-पक्षीय, पूर्ण कला); शुभग्रहैः युक्ते = शुभ ग्रहों (गुरु/शुक्र/बुध) से युक्त; राजप्रीति-समागमः = राजा/शासक की प्रीति व समागम; महाराज-प्रसादेन = महाराज की कृपा से; वाहन-अम्बर-भूषणम् = वाहन, वस्त्र व आभूषण।

हिन्दी भावार्थ जब वह चन्द्र पूर्ण (पूर्ण-कला) हो और शुभ ग्रहों से युक्त हो, तब शास्त्र कहता है कि शासक की प्रीति और समागम प्राप्त होता है; महाराज की कृपा से वाहन, वस्त्र और आभूषण की प्राप्ति का वर्णन है। यह अनुकूल चन्द्रान्तर का फल-कथन है।

English rendering When that Moon is full and joined by benefics, the text states the winning of a ruler's favour and company, and — through royal grace — the gain of conveyances, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-योग)। "पूर्ण" चन्द्र का बल पक्ष-बल में तिथि-दूरी से मापा जाता है (पूर्णिमा पर अधिकतम, अमावस्या पर न्यूनतम)।

हमारा डिकोड: "पूर्ण चन्द्र" की यह प्रबलता षड्बल के काल-बल-अंश पक्ष-बल में परिमाणित होती है (हमारे षड्बल मॉडल में 1 रूप = 60 विरूप); अर्थात् श्लोक का "पूर्ण/क्षीण" गुण-वाचक भेद गणित में एक निश्चित संख्यात्मक इकाई बन जाता है — यही हमारी "गणित को व्याख्या से अलग रखो" पद्धति का उदाहरण है।

57.45
सौभाग्यं सुखवृद्धिं च भृत्यानां परिपालनम् |
पितृमातृकुले सौख्यं पशुवृद्धिः सुखावहा
saubhāgyaṃ sukhavṛddhiṃ ca bhṛtyānāṃ paripālanam |
pitṛmātṛkule saukhyaṃ paśuvṛddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौभाग्यम् = सौभाग्य; सुखवृद्धिम् = सुख की वृद्धि; भृत्यानां परिपालनम् = सेवकों का भरण-पोषण; पितृमातृकुले सौख्यम् = माता-पिता के कुल में सुख; पशुवृद्धिः = पशु-धन की वृद्धि; सुखावहा = सुखदायिनी।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के शुभ चन्द्रान्तर का ही विस्तार — शास्त्र कहता है कि इस काल में सौभाग्य और सुख की वृद्धि होती है, सेवकों का पालन सम्भव होता है, माता-पिता के कुल में सुख रहता है और पशु-धन बढ़ता है। सम्पूर्ण योग सुखदायी बताया गया है।

English rendering The text states good fortune and growing comfort, the maintenance of dependents, happiness in the family of both parents, and an increase of cattle-wealth — the whole yielding ease.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल का विस्तार)। यह श्लोक ४३–४४ की शर्तों का फल-भाग है; शर्त (ग्रह-स्थिति) और फल (परिणाम) को शास्त्र क्रमशः अलग वाक्यों में रखता है।

57.46
क्षीणे वा पापसंयुक्ते पापदृष्टे वा नीचगे |
क्रूरांशकगते वापि क्रूरक्षेत्रगतेऽपि वा
kṣīṇe vā pāpasaṃyukte pāpadṛṣṭe vā nīcage |
krūrāṃśakagate vāpi krūrakṣetragate'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षीणे = क्षीण चन्द्र (कृष्ण-पक्षीय, अल्प कला); पापसंयुक्ते = पाप-ग्रहों से युक्त; पापदृष्टे = पाप-ग्रहों से दृष्ट; नीचगे = नीच राशि (चन्द्र नीच = वृश्चिक) में; क्रूरांशकगते = क्रूर/पाप नवांश (D9) में स्थित; क्रूरक्षेत्रगते = क्रूर (पाप-स्वामित्व) राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत जब वही चन्द्र क्षीण हो, पाप-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, नीच राशि में, अथवा क्रूर नवांश या क्रूर राशि में स्थित हो — तब (अगले श्लोकों में) अशुभ फल कहे जाते हैं। यह श्लोक अनिष्ट-योग की शर्तें गिनाता है।

English rendering But when that Moon is waning, conjunct or aspected by malefics, in its fall, or lodged in a cruel navāṃśa or a malefic's sign — then the adverse results (given next) apply.

गणित / तकनीक: नवांश (D9) = 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश। किसी राशि में स्फुट λ (0–30°) के लिए अंश-क्रमांक = ⌊ λ ÷ 3°20′ ⌋ + 1 (1…9); उस नवांश की राशि यदि पाप-स्वामित्व/क्रूर हो तो "क्रूरांशक"। "क्षीण" चन्द्र = पक्ष-बल न्यून।

उदाहरण (worked example) चन्द्र किसी राशि में 8° पर → 8 ÷ 3°20′ = 8 ÷ 3.333 = 2.4 → ⌊ ⌋ = 2, अतः 3रा नवांश। यदि वह तीसरा नवांश किसी पाप-स्वामित्व वाली राशि में पड़े, तो श्लोक की "क्रूरांशकगत" शर्त पूरी होती है।

हमारा डिकोड: क्रूरांशक की जाँच सीधे षोडश-वर्ग की D9 (नवांश) रचना पर टिकी है, जिसे हमने 30° सिंग को 9 सम-चापों में विभाजित करने वाले निश्चित modular नियम (3°20′ प्रति अंश) से पिन किया है; "क्षीण चन्द्र" की दुर्बलता उसी प्रकार षड्बल के पक्ष-बल में एक संख्या बनती है। गुण-वाचक शब्द → नाप-योग्य इकाई — यही हमारा तरीका है।

57.47
जातकस्य महत्कष्टं राजकोपो धनक्षयः |
पितृमातृवियोगश्च पुत्रीपुत्रादिरोगकृत्
jātakasya mahatkaṣṭaṃ rājakopo dhanakṣayaḥ |
pitṛmātṛviyogaśca putrīputrādirogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जातकस्य महत्कष्टम् = जातक को महान कष्ट; राजकोपः = राजा/शासन का कोप; धनक्षयः = धन का क्षय; पितृमातृवियोगः = माता-पिता से वियोग; पुत्री-पुत्र-आदि-रोगकृत् = सन्तान (पुत्री-पुत्र) आदि को रोग देने वाला।

हिन्दी भावार्थ दुर्बल-अशुभ चन्द्रान्तर में शास्त्र कहता है कि जातक को महान कष्ट, शासन का कोप और धन-हानि सम्भव है; माता-पिता से वियोग तथा सन्तान को रोग का भी वर्णन है। ये शास्त्र के फल-कथन हैं, किसी अटल भविष्य की घोषणा नहीं।

English rendering The text states great hardship for the native, a ruler's wrath and loss of wealth, separation from parents, and illness to one's children.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कष्ट-वर्णन)। यहाँ कोई अंक या चाप नहीं; केवल पूर्व श्लोक की दुर्बल-चन्द्र शर्त का परिणाम-कथन है।

हमारा डिकोड: हमारी मूल अनुशासन-रेखा — गणित को व्याख्या से अलग रखना — ठीक ऐसे कठोर श्लोकों पर लागू होती है: चन्द्र की स्थिति, क्षीणता व वर्ग-स्थान exact गणना हैं, किन्तु "महत्कष्ट/राजकोप" शास्त्र के दावा-वाक्य हैं जिन्हें हम "शास्त्र कहता है" रूप में उद्धृत करते हैं, नियति या भय के रूप में नहीं।

57.48
व्यवसायात्फलं नेष्टं नानामार्गे धनव्ययः |
अकाले भोजनं चैव मौषधस्य च भक्षणम्
vyavasāyātphalaṃ neṣṭaṃ nānāmārge dhanavyayaḥ |
akāle bhojanaṃ caiva mauṣadhasya ca bhakṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसाय = उद्यम/व्यापार; फल = परिणाम; न इष्ट = इच्छित/शुभ नहीं; नानामार्ग = अनेक मार्गों से; धनव्यय = धन का व्यय; अकाले = अनुचित समय पर; भोजन = आहार; औषधस्य भक्षण = औषधि का सेवन (मौषधस्य = औषधस्य; पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — व्यवसाय से इष्ट फल नहीं मिलता और अनेक मार्गों से धन-व्यय होता है। असमय भोजन तथा औषधि-सेवन का उल्लेख भी उसी अशुभ-योग के जीवन-क्रम संकेत के रूप में है — दैनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य-चर्या की दिशा में शास्त्रीय फल-भाषा, रोग-निदान नहीं।

English rendering The text states that enterprise does not yield the desired fruit, wealth is spent in many ways, and there is untimely eating and recourse to medicine — again as traditional phala-language, not clinical advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यवसाय-फल, धनव्यय, अकाल-भोजन/औषधि)। 57.46–48 एक अशुभ-शर्त श्रृंखला के परिणाम हैं।

57.49
फलमेतद्विजानीयादादौ सौख्यं धनागमः |
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे लाभगेऽपि वा
phalametadvijānīyādādau saukhyaṃ dhanāgamaḥ |
dāyeśātkendrarāśisthe trikoṇe lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) फलम् एतत् विजानीयात् = यह फल जान लेना चाहिए; आदौ सौख्यम् = आरम्भ (प्रथम भाग) में सुख; धनागमः = धन का आगमन; दायेशात् = दायेश (दशेश = महादशा-स्वामी शनि) से गिनकर; केन्द्रराशिस्थे = केन्द्र राशि में स्थित (चन्द्र); त्रिकोणे लाभगे = त्रिकोण या लाभ (11) भाव में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यह (पूर्वोक्त) फल इस प्रकार जानो: आरम्भ में सुख और धन-आगमन होता है। और जब अन्तर-स्वामी चन्द्र, दशेश (शनि) से गिनकर केन्द्र, त्रिकोण या लाभ भाव में स्थित हो, तब (आगे श्लोक ५०–५१ में) शुभ फल कहे जाते हैं।

English rendering Thus should the result be known: at the outset there is comfort and inflow of wealth; and when the Moon stands in a kendra, trikoṇa, or the 11th reckoned from the daśā-lord (Saturn), the favourable results (given next) follow.

गणित / तकनीक: दायेश R (= शनि की राशि) से — केन्द्र = {R, R+3, R+6, R+9}; त्रिकोण = {R, R+4, R+8}; लाभ = R+10 (mod 12)। "आदौ" = अन्तर-काल का प्रथम तिहाई ≈ अन्तर ÷ 3।

उदाहरण (worked example) दायेश शनि कन्या (R = 6) में मानें → केन्द्र = कन्या(6), धनु(9), मीन(12), मिथुन(3); त्रिकोण = कन्या(6), मकर(10), वृषभ(2); लाभ = कर्क(4)। यदि अन्तर-स्वामी चन्द्र इनमें से किसी राशि में हो, शर्त पूरी। चन्द्रान्तर = 19 माह → "आदौ सौख्य" का प्रथम भाग ≈ 19 ÷ 3 ≈ 6 माह 10 दिन।

हमारा डिकोड: "दायेश से केन्द्र/त्रिकोण/लाभ" पूर्णतः modular राशि-अंकगणित (mod 12) है — किसी सन्दर्भ-राशि से भाव-दूरी की गणना, जो हमारे भाव-गणना कोड की रीढ़ है; और "आदौ/मध्य/अन्त" विभाजन अन्तर-काल (यहाँ 19 माह, विंशोत्तरी अनुपात से) का समान त्रि-भाजन मात्र है।

57.50
वाहनाम्बरपश्वादिभ्रातृवृद्धिः सुखावहा |
पितृमातृसुखावाप्तिः स्त्रीसौख्यं च धनागमः
vāhanāmbarapaśvādibhrātṛvṛddhiḥ sukhāvahā |
pitṛmātṛsukhāvāptiḥ strīsaukhyaṃ ca dhanāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनाम्बर-पशु-आदि = वाहन, वस्त्र, पशु आदि; भ्रातृ-वृद्धिः = भाइयों की वृद्धि; सुखावहा = सुख देने वाली; पितृ-मातृ-सुख-आवाप्तिः = माता-पिता के सुख की प्राप्ति; स्त्री-सौख्यम् = स्त्री/पत्नी-सुख; धन-आगमः = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ शुभ फल-क्रम का वर्णन करता है। वाहन, वस्त्र, पशु आदि की प्राप्ति तथा भाइयों की वृद्धि को सुखदायी कहा गया है। माता-पिता के सुख की प्राप्ति, स्त्री-सौख्य और धन का आगमन — ये सब इसी शुभ फल-श्रृंखला में गिनाए गए हैं। यह कथन दशा-अवस्था के अनुकूल बल-संयोग पर निर्भर फल-कथन है, न कि सुनिश्चित घटना।

English rendering The text states increase of vehicles, garments, cattle and the like, growth of brothers, and consequent ease; also the attainment of parental happiness, comfort through the spouse, and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह दशा/अन्तर्दशा के अनुकूल ग्रह-स्थिति पर शास्त्र द्वारा बताया गया शुभ-फल-समूह है; कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-गणना या काल-अंक यहाँ नहीं है।

57.51
मित्रप्रभुवशादिष्टं सर्वसौख्यं शुभावहम् |
दायेशाद्द्वादश भावे रन्ध्रे वा बलवर्जिते
mitraprabhuvaśādiṣṭaṃ sarvasaukhyaṃ śubhāvaham |
dāyeśāddvādaśa bhāve randhre vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्र-प्रभु-वशात् = मित्र व स्वामी (प्रभु) के अनुग्रह से; इष्टम् = अभीष्ट/मनोवांछित; सर्वसौख्यम् शुभावहम् = सब प्रकार का सुख, शुभकारी; दायेशात् द्वादश भावे = दायेश (शनि) से बारहवें भाव में; रन्ध्रे = रन्ध्र = अष्टम (8) भाव में; बलवर्जिते = बल-रहित (षड्बल-हीन)।

हिन्दी भावार्थ प्रथम पंक्ति पूर्व श्लोक के शुभ-फल को पूरा करती है — मित्र व स्वामी के अनुग्रह से अभीष्ट की सिद्धि, सर्व-सुख व शुभ। दूसरी पंक्ति विपरीत शर्त आरम्भ करती है — जब अन्तर-स्वामी चन्द्र दशेश (शनि) से बारहवें या अष्टम भाव में हो और बल-रहित हो, तब (श्लोक ५२ में) अशुभ फल कहे जाते हैं।

English rendering Through the favour of friends and a patron, the desired end and all-round auspicious comfort are had. But when the Moon lies in the 12th or 8th from the daśā-lord and is void of strength, the adverse results (next) apply.

गणित / तकनीक: दायेश R से — व्यय (12) = R+11; रन्ध्र (8) = R+7 (mod 12)। "बलवर्जित" = ग्रह का षड्बल अपने प्रति-ग्रह मानक (threshold) से कम; बल की इकाई रूप/विरूप में, 1 रूप = 60 विरूप।

उदाहरण (worked example) दायेश शनि कन्या (R = 6) → व्यय = सिंह(5), अष्टम = मेष(1)। यदि अन्तर-स्वामी चन्द्र इनमें हो और उसका कुल षड्बल अपेक्षित रूप-सीमा से नीचे हो (जैसे न्यून पक्ष-बल के कारण), तो श्लोक की "बलवर्जित" शर्त पूरी होती है।

हमारा डिकोड: "बलवर्जित" शब्द सीधे षड्बल पर आधारित है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक व दृग् बल का योग, रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), जिसकी प्रति-ग्रह मानक से तुलना हमारे षड्बल मॉडल में की जाती है; और "12वें/8वें" की जाँच वही modular भाव-दूरी (mod 12) है। श्लोक की गुणात्मक शर्त यहाँ दो सटीक संख्यात्मक जाँचों में खुलती है।

57.52
शयनं रोगमालस्यं स्थानभ्रष्टं सुखापहम् |
शत्रुवृद्धिविरोधं च बन्धुद्वेषमवाप्नुयात्
śayanaṃ rogamālasyaṃ sthānabhraṣṭaṃ sukhāpaham |
śatruvṛddhivirodhaṃ ca bandhudveṣamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शयनम् = शयनासक्ति/अधिक सोना; रोगम् = रोग; आलस्यम् = आलस्य; स्थान-भ्रष्टम् = पद/स्थान से भ्रष्ट होना; सुख-अपहम् = सुख हर लेने वाला; शत्रु-वृद्धि-विरोधम् = शत्रु-वृद्धि और विरोध; बन्धु-द्वेषम् = बन्धुओं का द्वेष; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त — दायेश का द्वादश/अष्टम में बलहीन होना — के फलस्वरूप शास्त्र यह अशुभ-फल सूची देता है। शयन, रोग, आलस्य, स्थान-भ्रष्टता और सुख का अपहरण; साथ ही शत्रु-वृद्धि, विरोध तथा बन्धु-द्वेष — ये सब “अवाप्नुयात्” के रूप में शास्त्र-कथन हैं। इन्हें नियति या निश्चित घटना नहीं माना जाता; दशा-फल का पारंपरिक वर्णन मात्र है।

English rendering Under that weak twelfth- or eighth-house period-lord, the text states sleepiness, disease, indolence, loss of standing, and the carrying away of ease; also growth of enmity and opposition, and hostility from kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। 57.51 की स्थिति-शर्त का अशुभ-फल-विस्तार; कोई संख्या, बिन्दु या काल-माप नहीं।

57.53
द्वितीयद्यूननाथे तु देहालस्य भविष्यति |
तद्दोषशमनार्थं च तिलहोमादिकं चरेत्
dvitīyadyūnanāthe tu dehālasya bhaviṣyati |
taddoṣaśamanārthaṃ ca tilahomādikaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय भाव (धन/मारक-स्थान); द्यून = सप्तम भाव (जाया, मारक-स्थान); नाथे = अधिपति (के साथ सम्बन्ध होने पर); देह-आलस्य = शरीर की शिथिलता/आलस्य; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); तद्दोष-शमनार्थम् = उस दोष की शान्ति हेतु; तिल-होम = तिल से हवन; आदिकम् = इत्यादि; चरेत् = करना चाहिए। (प्रसंग: शनि-महादशा में चन्द्र-अन्तर्दशा का उपसंहार।)

हिन्दी भावार्थ शनि की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा के प्रसंग में शास्त्र कहता है — यदि अन्तर्दशेश का द्वितीय अथवा सप्तम भाव के स्वामी से सम्बन्ध हो, तो शरीर में आलस्य/शिथिलता की स्थिति बनती है। इस दोष के शमन के लिए तिल-होम आदि करने का विधान बताया गया है।

English rendering When (the antardaśā-lord is) linked with the lord of the 2nd or 7th house, the text says bodily languor ensues; to allay that fault one should perform a sesame-oblation and the like.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शान्ति-विधान (तिल-होम)। द्वितीय व सप्तम दोनों मारक-स्थान हैं; इसीलिए इन भावेशों के सम्बन्ध पर शास्त्र देह-सम्बन्धी सावधानी अपने ही स्वर में रखता है — किसी नियति के रूप में नहीं। पाठ-भेद संभव: "देहालस्य/देहबाधा"।

57.54
गुडं घृतं च दध्नाक्तं तण्डुलं च यथाविधि |
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धये
guḍaṃ ghṛtaṃ ca dadhnāktaṃ taṇḍulaṃ ca yathāvidhi |
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyurārogyavṛddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुडम् = गुड़; घृतम् = घी; दध्ना-अक्तम् = दही से लिप्त; तण्डुलम् = चावल/तण्डुल; यथा-विधि = विधि के अनुसार; श्वेताम् गाम् = श्वेत गौ; महिषीम् = महिषी; दद्यात् = दे (शास्त्र-विधान); आयुः-आरोग्य-वृद्धये = आयु और आरोग्य की वृद्धि हेतु।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के शमन-क्रम को शास्त्र विस्तृत करता है — गुड़, घी, दही से लिप्त तण्डुल यथाविधि, तथा श्वेत गौ और महिषी का दान। उद्देश्य-वाक्य है “आयुः-आरोग्य-वृद्धये” — यह शास्त्र का अपना प्रयोजन-कथन है। इसे चिकित्सा, गारंटी या दबाव-उपाय के रूप में नहीं पढ़ना; केवल पाठ-अनुवाद।

English rendering The text further states the giving, according to rule, of jaggery, ghee, rice anointed with curd, and a white cow and a she-buffalo, for the increase of longevity and health — as the śāstra itself phrases the aim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शास्त्रीय दान/शमन-विधान। कोई अंश, बिन्दु, दशा-वर्ष या बल-इकाई नहीं; केवल विधि-सामग्री की सूची।

57.55
मन्दस्यान्तर्गते भौमे केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
तुङ्गे स्वक्षेत्रगे वापि दशाधिपसमन्विते
mandasyāntargate bhaume kendralābhatrikoṇage |
tuṅge svakṣetrage vāpi daśādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य अन्तर्-गते = शनि की अन्तर्दशा में; भौमे = मंगल में/मंगल के; केन्द्र-लाभ-त्रिकोण-गे = केन्द्र, लाभ (एकादश) या त्रिकोण स्थित; तुङ्गे = उच्च में; स्व-क्षेत्र-गे = स्व-राशि स्थित; वा अपि = अथवा; दशा-अधिप-समन्विते = दशा-स्वामी से युक्त।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र मन्द (शनि) की अन्तर्दशा में भौम (मंगल) की स्थिति का शुभ-मापदण्ड देता है। मंगल केन्द्र, लाभ (11) या त्रिकोण में हो; अथवा उच्च/स्वक्षेत्र में; अथवा दशा-स्वामी से युक्त हो — यही अनुकूल संयोग की सूची है। अगला श्लोक इसी संयोग का फल बताएगा। भाव-स्थान लग्न-सापेक्ष; उच्च/स्वक्षेत्र ग्रह-राशि नियमों से निश्चित।

English rendering When Mars falls in the antardaśā of Saturn and is placed in a kendra, the eleventh (lābha), or a trikoṇa — or is exalted, in its own sign, or conjoined with the daśā-lord — the text sets this as the favourable configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-ढाँचा विंशोत्तरी (120 वर्ष) पर टिका है। महaddaशा-वर्ष (शनि = 19) × अन्तर्-ग्रह-वर्ष (मंगल = 7) ÷ 120 = अन्तर्दशा-अवधि:
अन्तर्दशा(शनि→मंगल) = (19 × 7) / 120 = 133/120 वर्ष ≈ 1 वर्ष 39.65 दिन (सौर-वर्ष मानकर; नक्षत्र-शेष-भिन्न से आरम्भ-बिन्दु तय)।
स्थान-शर्त: λ_Mars ∈ {केन्द्र: 1,4,7,10} ∪ {11} ∪ {त्रिकोण: 1,5,9} (लग्न से) अथवा उच्च/स्वक्षेत्र अथवा दशाधिप-युति। केन्द्र/त्रिकोण में लग्न की दोहरी गिनती (1) परम्परा-सामान्य है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, चन्द्र-नक्षत्र-शेष से शनि-महादशा चालू। अन्तर्दशा शनि→मंगल = (19 × 7)/120 = 1.1083… वर्ष। यदि लग्न मेष, मंगल कर्क (चतुर्थ = केन्द्र) में — शर्त “केन्द्रग” पूर्ण; फल 57.56 के अनुसार पढ़ा जाता है। (अयनांश केवल भौम-राशि तय करने में; भाव whole-sign मानें तो राशि = भाव।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी का 120-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा-अनुपात (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 — यही वह शुद्ध अनुपात-गणित है जिसे दशा-इंजन में पिन किया गया: केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। यहाँ “मन्दस्यान्तर्गते भौमे” उसी शनि–मंगल अन्तर्दशा-खंड का शास्त्र-वाक्य है; अवधि `==` अनुपात से, फल अलग — व्याख्या नहीं, केवल काल-गणित।

57.56
लग्नाधिपेन संयुक्ते आदौ सौख्यं धनागमः |
राजप्रीतिकरं सौख्यं वाहनाम्बरभूषणम्
lagnādhipena saṃyukte ādau saukhyaṃ dhanāgamaḥ |
rājaprītikaraṃ saukhyaṃ vāhanāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपेन = लग्नेश के साथ; संयुक्ते = युक्त होने पर; आदौ = अन्तर्दशा के आरम्भ-खण्ड में; सौख्यम् = सुख; धन-आगमः = धन-प्राप्ति; राज-प्रीति-करम् = शासक की प्रीति करानेवाला; वाहन-अम्बर-भूषणम् = वाहन, वस्त्र, आभूषण।

हिन्दी भावार्थ जब वह भौम लग्नेश से युक्त हो, तो अन्तर्दशा के आरम्भ में सुख और धन-लाभ होता है; शासक की कृपा, सुख, तथा वाहन-वस्त्र-आभूषण की प्राप्ति शास्त्र बताता है।

English rendering When Mars is joined with the lagna-lord, the text says the antar's early phase brings comfort and wealth, the ruler's favour, and gains of vehicles, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — शुभ-स्थिति-फल-कथन। "आदौ" शब्द अन्तर्दशा के त्रिखण्ड (आदि–मध्य–अन्त) फल-विभाजन की ओर संकेत करता है — यह अन्तर्दशा-काल को समान तीन भागों में बाँटने की कालिक परम्परा है।

उदाहरण (worked example) भौम-अन्तर 399 दिन ÷ 3 ≈ 133 दिन प्रति खण्ड; अतः "आदौ" का फल लगभग प्रथम 133 दिनों का। (मान: 1 वर्ष = 360 दिन।)

57.57
सेनापत्यं नृपप्रीतिः कृषिगोधान्यसम्पदः |
नूतनस्थाननिर्माणं भ्रातृवर्गेष्टसौख्यकृत्
senāpatyaṃ nṛpaprītiḥ kṛṣigodhānyasampadaḥ |
nūtanasthānanirmāṇaṃ bhrātṛvargeṣṭasaukhyakṛt
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सेनापत्यम् = सेनापतित्व; नृपप्रीतिः = राजा की प्रसन्नता; कृषिगोधान्यसम्पदः = कृषि, गौ और धान्य की सम्पत्ति; नूतनस्थाननिर्माणम् = नए स्थान/भवन का निर्माण; भ्रातृवर्गेष्टसौख्यकृत् = भ्रातृ-वर्ग से इष्ट सुख देने वाली।

हिन्दी भावार्थ शनि-महादशा की अन्तर्दशाओं के फल-क्रम में — शास्त्र कहता है कि (पूर्व-श्लोक में कही स्थिति में अन्तर्दशा) सेनापतित्व, राज-कृपा, कृषि-गौ-धान्य की सम्पदा, नए स्थान का निर्माण और भाइयों से सुख देती है। किस ग्रह की अन्तर्दशा — सन्दर्भ पूर्व-पद से; पाठ-भेद संभव।

English rendering (That sub-period) brings command of an army, the king's favour, prosperity in farming, cattle and grain, the building of a new dwelling, and welcome happiness from one's brothers, the text says.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ढाँचा: शनि-महादशा 19 वर्ष; अन्तर्दशा = (19 × वर्ष_P) ÷ 120।

57.58
नीचे चास्तङ्गते भौमे लग्नादष्टव्ययस्थिते |
पापदृष्टियुते वापि धनहानिर्भविष्यति
nīce cāstaṅgate bhaume lagnādaṣṭavyayasthite |
pāpadṛṣṭiyute vāpi dhanahānirbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = नीच राशि में; अस्तङ्गते = अस्त (सूर्य-सन्निकट दहन/अस्तत्व) में; भौमे = मंगल में / मंगल के; लग्नात् = लग्न से; अष्ट = अष्टम भाव; व्यय = व्यय/द्वादश भाव; स्थिते = स्थित होने पर; पाप-दृष्टि-युते = पाप-ग्रह की दृष्टि से युक्त; वा अपि = अथवा; धन-हानिः = धन की हानि; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब मंगल नीच हो, अथवा अस्त हो, अथवा लग्न से अष्टम या द्वादश में बैठा हो, अथवा पाप-दृष्टि से युक्त हो, तब धन-हानि का फल कहा गया है। यह फल-कथन शनि-अन्तर्दशा-प्रकरण के भीतर मंगल-सम्बन्धी दशा/योग-स्थिति पर लागू होता है। यहाँ “भविष्यति” शास्त्र की अपनी वाणी है—हम उसे नियति या निश्चित घटना नहीं बनाते।

English rendering The text states that when Mars is debilitated, combust, placed in the 8th or 12th from the lagna, or joined with malefic aspect, loss of wealth is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान/अवस्था-शर्त → धन-हानि)। तकनीकी जाँच के लिए अलग से निर्धारित होते हैं: नीच = मंगल 30°–60° (वृषभ) कन्वेंशन; अस्त = सूर्य–मंगल कोण-सीमा (परम्परा-भेद; पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव); भाव = लग्न-से पूर्ण-राशि या भावाधिपति-पद्धति—संख्या बताते समय कन्वेंशन घोषित करें।

57.59
चौराहिव्रणशस्त्रादिग्रन्थिरोगादिपीडनम् |
भ्रातृपित्रादिपीडा च दायादजनविग्रहः
caurāhivraṇaśastrādigranthirogādipīḍanam |
bhrātṛpitrādipīḍā ca dāyādajanavigrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर = चोर; अहि = सर्प; व्रण = घाव/व्रण; शस्त्र = शस्त्र; आदि = इत्यादि; ग्रन्थि-रोग = ग्रन्थि-सम्बन्धी रोग; आदि-पीडनम् = आदि कष्ट; भ्रातृ = भ्राता; पित्रादि = पिता आदि; पीडा = पीड़ा; दायाद-जन = दाय-भागी/सह-उत्तराधिकारी जन; विग्रहः = कलह/विवाद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्व-श्लोक की उसी मंगल-दोष/स्थान-स्थिति के प्रसंग में आगे फल बाँधता है—चोर, सर्प, व्रण, शस्त्र आदि से पीड़न; ग्रन्थि-रोग आदि कष्ट; भ्राता-पिता आदि से पीड़ा; तथा दायाद-जनों से विग्रह। यह सूची फल-कथन है, चिकित्सा-निदान या कानूनी भविष्यवाणी नहीं। हम इसे “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं—भय या दबाव की भाषा नहीं।

English rendering The text further states affliction from thieves, serpents, wounds, weapons and the like; glandular and similar troubles; distress involving brothers, father and so on; and disputes with co-heirs or claimants.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / पीड़ा-सूची। गणना नहीं; केवल दशा-प्रकरण में फल-परत का विस्तार।

57.60
चतुष्पाज्जीवहानिश्च कुत्सितान्नस्य भोजनम् |
विदेशगमनं चैव नानमार्गे धनव्ययः
catuṣpājjīvahāniśca kutsitānnasya bhojanam |
videśagamanaṃ caiva nānamārge dhanavyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात् = चौपाया (पशु); जीव-हानिः = जीव/पशु-हानि; कुत्सित-अन्नस्य = निन्दित/अशुद्ध अन्न का; भोजनम् = भोजन; विदेश-गमनम् = परदेश-यात्रा; च एव = तथा; नाना-मार्गे = अनेक मार्गों से; धन-व्ययः = धन का व्यय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—चौपाये जीव की हानि, कुत्सित अन्न का भोजन, विदेश-गमन, तथा अनेक मार्गों से धन-व्यय—ये भी उसी प्रसंग के फल-कथन हैं। “कुत्सितान्न” और “विदेशगमन” यहाँ शास्त्रीय लक्षण-भाषा हैं; इन्हें आधुनिक आहार-निर्णय या यात्रा-भय में नहीं घुमाया जाना चाहिए।

English rendering The text also states loss of quadruped livestock, partaking of contemptible food, travel to a foreign land, and expenditure of wealth through various channels.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (हानि / गमन / व्यय)। कोई अंश, बिन्दु या बल-इकाई यहाँ कथित नहीं।

57.61
अष्टमद्यूननाथे तु द्वितीयस्थेऽथ वा यदि |
अपमृत्युभयं चैव नानाकष्टं पराभवः
aṣṭamadyūnanāthe tu dvitīyasthe'tha vā yadi |
apamṛtyubhayaṃ caiva nānākaṣṭaṃ parābhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टम = 8वाँ भाव (आयुर्भाव/मारक-सन्निकट); द्यून = 7वाँ भाव (मारक); नाथे = अधिपति (से सम्बन्ध); द्वितीयस्थे = द्वितीय भाव में स्थित; अथ वा यदि = अथवा यदि; अपमृत्यु-भयम् = अपमृत्यु-तुल्य संकट का भय; नाना-कष्टम् = अनेक कष्ट; पराभवः = पराभव/अपमान।

हिन्दी भावार्थ यदि (भौम) अष्टमेश या सप्तमेश से सम्बद्ध हो, अथवा द्वितीय भाव में स्थित हो, तो शास्त्र अपमृत्यु-भय, नाना कष्ट व पराभव की आशंका बताता है। (इसका शमन अग्रिम श्लोक में।)

English rendering If Mars relates to the lord of the 8th or 7th, or stands in the 2nd, the text speaks of danger of untimely death, manifold troubles, and humiliation.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — मारक-योग-कथन। तकनीकी आधार: द्वितीय व सप्तम = मारक-स्थान, अष्टम = आयुर्भाव; इन भावेशों का दशा-अन्तर से सम्बन्ध ही यहाँ "भय" का आधार है — फल नहीं, नियति नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पद हमारी मुख्य अनुशासन-रेखा का उदाहरण है — भाव-गणना (2/7/8 मारक व आयुर्भाव) एक निश्चित संख्या-नियम है, पर "अपमृत्यु-भय" शास्त्र का सशर्त कथन है, कोई सुनिश्चित घटना या नियति नहीं (dossier §5)। हमारी पद्धति गणित (भाव-अधिपत्य) को व्याख्या (फल) से पृथक रखती है और भय-रहित, दबाव-रहित स्वर अपनाती है।

57.62
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिहोमं च कारयेत् |
वृषदानं प्रकुर्वीत सर्वारिष्टनिवारणम्
taddoṣaparihārārthaṃ śāntihomaṃ ca kārayet |
vṛṣadānaṃ prakurvīta sarvāriṣṭanivāraṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-दोष = उस दोष का; परिहार-अर्थम् = निवारण के लिए; शान्ति-होमम् = शान्ति-होम; च = और; कारयेत् = करवाए (विधि-वाक्य); वृष-दानम् = वृष/बैल का दान; प्रकुर्वीत = करे; सर्व-अरिष्ट = सब अरिष्टों का; निवारणम् = निवारण (शास्त्र-उद्देश्य-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्वोक्त दोष के परिहारार्थ शान्ति-होम करवाए और वृष-दान करे; इसे सर्वारिष्ट-निवारण के रूप में कहा गया है। यह पाठ का अपना विधि-कथन है। इस संस्करण में हम उपाय को दबाव, गारंटी या भय-उपचार के रूप में नहीं पेश करते—केवल यह रिपोर्ट करते हैं कि शास्त्र ने क्या कहा।

English rendering The text states that for the removal of that fault one should have a śānti-homa performed and should make a gift of a bull, described as dispelling all ariṣṭa. This is reported as the śāstra’s own ritual statement, not as a guaranteed cure or pressure to act.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/उपाय-कथन (शान्ति-होम, वृष-दान)। कोई दशा-वर्ष, अंश या बल-राशि यहाँ कथित नहीं।

57.63
मन्दस्यान्तर्गते राहौ कलहश्च मनोव्यथा |
देहपीडा मनस्तापः पुत्रद्वेषो रुजोभयम्
mandasyāntargate rāhau kalahaśca manovyathā |
dehapīḍā manastāpaḥ putradveṣo rujobhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य = शनि की; अन्तर्-गते = अन्तर्दशा में प्रविष्ट / अन्तर्गत; राहौ = राहु में (राहु-अन्तर्दशा); कलहः = झगड़ा; मनो-व्यथा = मानसिक व्यथा; देह-पीडा = देह-पीड़ा; मनस्-तापः = मनस्ताप; पुत्र-द्वेषः = पुत्र से द्वेष/पुत्र-विरोध; रुजः-भयम् = रोग का भय (शास्त्र-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब स्पष्ट रूप से शनि-महादशा के भीतर राहु की अन्तर्दशा का फल कहता है—कलह, मनोव्यथा, देह-पीड़ा, मनस्ताप, पुत्र-द्वेष और रुजो-भय। ये सब फल-पद हैं; इन्हें निश्चित घटना-क्रम या चिकित्सा-निदान नहीं समझना चाहिए। पाठ कहता है—राहु शनि के अन्तर्गत होने पर ये लक्षण कहे गए हैं।

English rendering When Rāhu operates as the antardaśā within Saturn, the text states quarrel, mental distress, bodily pain, mental anguish, hostility involving sons, and fear of illness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विम्शोत्तरी अन्तर्दशा-अवधि (BPHS दशा-क्रम; Σ = 120 वर्ष):
`अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120`
शनि महादशा = 19; राहु = 18 ⇒ `(19 × 18) ÷ 120 = 342 ÷ 120 = 2 + 17/20` वर्ष = 2 वर्ष 10 मास 6 दिन (1 वर्ष = 12 मास, 1 मास = 30 दिन की दशा-परम्परा)। आरम्भ-बिन्दु चन्द्र-नक्षत्र-शेष-अंश पर निर्भर; अयनांश/जन्म-देशान्तर अलग घोषित हों।

उदाहरण (worked example) मान लें शनि-महादशा चल रही है और राहु-अन्तर्दशा आरम्भ हुई। अवधि = `(19 × 18) ÷ 120 = 2.85` वर्ष = 2y 10m 6d। यदि राहु-अन्तर्दशा 2020-01-01 00:00 (स्थानीय, घोषित TZ) से शुरू मानी जाए, तो समाप्ति ≈ 2022-11-07 00:00 (30-दिन मास कन्वेंशन)। फल-श्लोक अवधि नहीं बदलता—केवल समय-खिड़की मापता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी इंजन में राहु-अन्तर्दशा शनि के भीतर ठीक `(19 × 18) ÷ 120` से बँधती है—शुद्ध अनुपात, कोई “लगभग” नहीं। फल-श्लोक (कलह, देह-पीड़ा आदि) व्याख्या-परत है; अवधि-परत `==` से सत्यापित अनुपात-गणित। गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

57.64
अर्थव्ययो राजभयं स्वजनादिविरोधिता |
विदेशगमनं चैव गृहक्षेत्रादिनाशनम्
arthavyayo rājabhayaṃ svajanādivirodhitā |
videśagamanaṃ caiva gṛhakṣetrādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्थ-व्यय = धन/संपत्ति का क्षय या व्यय; राज-भय = राजा/शासन/अधिकार से भय या दबाव; स्व-जन-आदि-विरोधिता = स्वजनों-कुटुम्ब आदि से विरोध; विदेश-गमन = परदेश-यात्रा/प्रवास; गृह-क्षेत्र-आदि-नाशन = गृह, क्षेत्र (भूमि) आदि का नाश या ह्रास; च-एव = तथा/और भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व-निर्दिष्ट दशा/योग-अवस्था में) अर्थ का व्यय, राजभय, स्वजनों से विरोध, विदेश-गमन तथा गृह-क्षेत्रादि का नाश — ये फल सूचित होते हैं। यह फल-कथन काल-दशा के संदर्भ में बताया गया है, न कि निरपेक्ष नियति के रूप में। पाठ में ये संकेत दशा-फल के रूप में गिनाए गए हैं।

English rendering The text states expenditure of wealth, fear from royal/state power, opposition from one’s own people, travel or sojourn abroad, and the spoiling or loss of house, land, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक दशा/अवस्था का फलादेश है; इसमें अंश-विभाजन, बल-इकाई या काल-वर्ष का कोई संगणनीय नियम नहीं है।

57.65
लग्नाधिपेन संयुक्ते योगकारकसंयुते |
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे केन्द्रे दायेशाल्लाभराशिगे
lagnādhipena saṃyukte yogakārakasaṃyute |
svocce svakṣetrage kendre dāyeśāllābharāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपेन संयुक्ते = लग्नेश से युक्त होने पर; योगकारक-संयुते = योगकारक ग्रह से युक्त (योगकारक = केन्द्र व त्रिकोण दोनों का अधिपति एक ग्रह); स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्वक्षेत्रगे = स्वराशि में; केन्द्रे = केन्द्र (1/4/7/10) में; दायेशात् = दायेश (दशेश) से गिनकर; लाभ-राशिगे = लाभ (11वें) भाव/राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ किन्तु जब वह राहु लग्नेश या योगकारक ग्रह से युक्त हो, अथवा उच्च/स्वराशि में हो, केन्द्र में हो, या दायेश (दशेश) से लाभ-स्थान (11वें) में हो — तो शुभ फल बनते हैं (फल श्लोक 66–67 में)।

English rendering But when Rāhu is joined with the lagna-lord or a yogakāraka, is exalted or in its own sign, occupies a kendra, or stands in the 11th from the daśā-lord, auspicious results follow.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — शुभ-स्थिति-शर्त (फल आगे)। तकनीकी कोश: स्वोच्च = स्थान-बल का उच्च-बल घटक; योगकारक = केन्द्राधिपति+त्रिकोणाधिपति का एकत्व; "दायेशात् लाभराशिगे" = दशेश को 1 मानकर राशि-चक्र पर 11वें भाव की गणना — अर्थात् दशेश से भाव-चक्र का पुनर्गणन (12-मॉड्युलर गणना)।

उदाहरण (worked example) यदि दशेश (शनि) कन्या में हो, तो उससे 11वाँ (कन्या=1,…, कर्क=11) = कर्क; अतः "दायेशाल्लाभराशिगे" का अर्थ राहु का कर्क में होना अभीष्ट होगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्वोच्च" स्थान-बल के नियत उच्च-बल मान से जुड़ता है (dossier §4 ṣaḍbala), और "दायेशात् लाभ" दशेश से 11-गणना = राशि-चक्र पर शुद्ध 12-मॉड्युलर अंकगणित है, जो हमारे दशा-engine की दायेश-सापेक्ष गणना के अनुरूप है (dossier §3)। फल की शर्त गणित से नियत होती है; फल स्वयं शास्त्र का कथन है।

57.66
आदौ सौख्यं धनावाप्तिं गृहक्षेत्रादिसम्पदम् |
देवब्राह्मणभक्तिं च तीर्थयात्रादिकं लभेत्
ādau saukhyaṃ dhanāvāptiṃ gṛhakṣetrādisampadam |
devabrāhmaṇabhaktiṃ ca tīrthayātrādikaṃ labhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदौ = अन्तर्दशा के आरम्भ-काल में; सौख्यम् = सुख; धन-अवाप्तिम् = धन की प्राप्ति; गृह-क्षेत्र-आदि-सम्पदम् = घर-खेत आदि की सम्पत्ति; देव-ब्राह्मण-भक्तिम् = देव व ब्राह्मणों में भक्ति; तीर्थ-यात्रा-आदिकम् = तीर्थयात्रा आदि पुण्य-कर्म; लभेत् = प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ (पिछले श्लोक की शर्त — शनि-महादशा में राहु की अन्तर्दशा, जब राहु शुभ-स्थित हो — का फल-क्रम आगे बढ़ता है।) शास्त्र कहता है कि इस भुक्ति के आरम्भ में जातक को सुख, धन-लाभ, घर-खेत आदि सम्पदा, देव-ब्राह्मणों के प्रति भक्ति तथा तीर्थयात्रा जैसे शुभ कर्म का योग बनता है।

English rendering The text states that at the beginning of this sub-period one gains happiness, wealth, prosperity in house and land, devotion to gods and brahmins, and the merit of pilgrimage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अन्तर्दशा-कालखण्ड का "आदौ / मध्ये / अन्ते" विभाजन)। तकनीकी बिन्दु: फल को अन्तर्दशा के तीन कालखण्डों — आरम्भ, मध्य, अन्त — में बाँटकर पढ़ा जाता है; यह श्लोक "आदौ" (प्रथम तिहाई) खण्ड का है, शनि-महादशा (19 वर्ष) के भीतर राहु की भुक्ति।

उदाहरण (worked example) शनि-राहु अन्तर्दशा की अवधि = (19 × 18) ÷ 120 = 342 ÷ 120 = 2.85 वर्ष ≈ 2 वर्ष 10 मास 6 दिन; इसका "आदौ" खण्ड (प्रथम तिहाई) ≈ 0.95 वर्ष ≈ 11.4 मास।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक विंशोत्तरी अन्तर्दशा-गणना से सीधे जुड़ता है — अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120; शनि 19, राहु 18 → 2.85 वर्ष। हमारे kaal/vedic-ghadi दशा-इंजन में यह विशुद्ध अनुपात-अंकगणित है, फल-कथन नहीं — गणित को व्याख्या से पृथक रखने का अनुशासन यहीं लागू है।

57.67
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्गृहे कल्याण्वर्द्धनम् |
मध्ये तु राजभीतिश्च पुत्रमित्रविरोधनम्
catuṣpājjīvalābhaḥ syādgṛhe kalyāṇvarddhanam |
madhye tu rājabhītiśca putramitravirodhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात्-जीव-लाभः = चौपाये पशुधन (गाय-भैंस आदि) का लाभ; स्यात् = होता है; गृहे कल्याण-वर्द्धनम् = घर में मंगल-वृद्धि; मध्ये = अन्तर्दशा के मध्य-काल में; तु = किन्तु; राज-भीतिः = शासन-पक्ष से भय; पुत्र-मित्र-विरोधनम् = पुत्र व मित्रों से विरोध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस भुक्ति में चौपाये पशुधन का लाभ और गृह में मंगल-वृद्धि होती है; परन्तु मध्य-काल में शासन-पक्ष से भय तथा पुत्र और मित्रों से मतभेद का योग बनता है।

English rendering The text states one gains four-footed livestock and growing auspiciousness at home; but in the middle of the period there is fear from authority and discord with sons and friends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालखण्ड-आधारित; "मध्ये" = अन्तर्दशा का मध्य-तिहाई)। तकनीकी बिन्दु: शुभ से अशुभ का मोड़ भुक्ति के मध्य-खण्ड पर रखा गया है — वही सूक्ष्म-विभाजन जो प्रत्यन्तर्दशा में और बारीक होता है।

उदाहरण (worked example) शनि-राहु भुक्ति 2.85 वर्ष का "मध्ये" खण्ड (द्वितीय तिहाई) ≈ 0.95 वर्ष से 1.90 वर्ष के बीच, अर्थात् लगभग 11.4 से 22.8 मास की अवधि।

57.68
मेषे कन्यागते वापि कुलीरे वृषभे तथा |
मीनकोदण्डसिंहेषु गजान्तैश्वर्यमादिशेत्
meṣe kanyāgate vāpi kulīre vṛṣabhe tathā |
mīnakodaṇḍasiṃheṣu gajāntaiśvaryamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष राशि में; कन्या-गते = कन्या में स्थित; वा-अपि = अथवा; कुलीरे = कर्क में; वृषभे = वृषभ में; तथा = तथा; मीन-कोदण्ड-सिंहेषु = मीन, कोदण्ड (धनु) और सिंह में; गज-अन्त-ऐश्वर्य = गजपर्यंत/गजसहित ऐश्वर्य; आदिशेत् = निर्देश करे — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मेष, कन्या, कर्क, वृषभ, तथा मीन–धनु–सिंह राशियों में (संदर्भित स्थिति/दशा-फल के अंतर्गत) गजान्त ऐश्वर्य का निर्देश किया जाए। यहाँ सात राशियों का स्पष्ट नामोल्लेख है; “गजान्तैश्वर्य” ऐश्वर्य की ऊँची श्रेणी का शास्त्रीय संकेत है। पाठ-भेद संभव यदि किसी संस्करण में राशि-सूची भिन्न हो।

English rendering The text directs that when (the configuration under discussion) falls in Meṣa, Kanyā, Karkaṭa (Kulīra), Vṛṣabha, or in Mīna, Kodaṇḍa (Dhanus), and Siṃha, one should declare prosperity of the order that includes elephants (gajānta-aiśvarya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — राशि-सूची सहित फल-कथन। राशियाँ 12-भाग चक्र की मानक इकाइयाँ हैं (प्रत्येक 30°); इस श्लोक में केवल नामित राशियों पर फल बाँधा गया है, कोई विभाजन-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें दशा-संदर्भित ग्रह/पॉइंट की सायन-रहित (निर्दिष्ट अयनांश, जैसे लाहिरी) राशिश: देहलीय देशांतर पर जन्मकाल की चंद्र/दशा-स्वामी राशि = कन्या (150°–180°)। श्लोक की सूची में कन्या आती है → पाठ “गजान्तैश्वर्य” पक्ष का निर्देश देता है। यदि वही बिंदु तुला (180°–210°) में हो तो यह श्लोक उस राशि को नहीं गिनाता — फल अन्य श्लोक/नियम से देखना होगा। (अयनांश और “कौन-सा ग्रह/दाय” घोषित करना आवश्यक; यहाँ केवल राशि-मिलान का नियम दर्शाया गया।)

57.69
राजसम्मनभूषाप्तिं मृदुलाभरसौख्यकृत् |
द्विसप्तमाधिपैर्युक्ते देहबाधा भविष्यति
rājasammanabhūṣāptiṃ mṛdulābharasaukhyakṛt |
dvisaptamādhipairyukte dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-सम्मान = राजकीय सम्मान; भूषा-आप्ति = आभूषण/अलंकार की प्राप्ति; मृदु-लाभ = मृदु/सुखद लाभ; रस-सौख्य-कृत् = रस (सुख-अनुभव) और सौख्य उत्पन्न करने वाला; द्वि-सप्तम-अधिपैः = द्वितीय और सप्तम भाव-स्वामियों से; युक्ते = युक्त होने पर; देह-बाधा = देह में बाधा/पीड़ा; भविष्यति = होगी — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (अनुकूल पक्ष में) राजसम्मान, भूषा-प्राप्ति तथा मृदु लाभ और रस-सौख्य सूचित होते हैं। किंतु जब (संदर्भित ग्रह/दशा) द्वितीय और सप्तम के अधिपतियों से युक्त हो, तब देह-बाधा का फल कहा गया है। ज्योतिष-परंपरा में 2 और 7 को आयु-संदर्भ में मारक-स्थान भी गिना जाता है; यह श्लोक उसी दिशा का फल-संकेत देता है, चिकित्सकीय निदान नहीं।

English rendering The text states attainment of royal honor and ornaments, and soft gains that produce comfort and delight; but when joined with the lords of the second and seventh houses, bodily affliction is said to occur.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्वामी संयोग-शर्त। द्वितीय = भाव 2, सप्तम = भाव 7; “अधिप” = उस भाव की राशि का स्वामी (मेष→मंगल, वृष/तुला→शुक्र, … चक्रानुसार)। संयोग = एक राशि/भाव में युति (या पाठानुसार दृष्ट/युक्त — यहाँ “युक्ते” युति-प्रधान)। गृह-प्रणाली और ग्रह-युति की डिग्री-सीमा इस श्लोक में नहीं दी गई।

57.70
मृत्युञ्जयं प्रकुर्वीत छागदानं च कारयेत् |
वृषदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्सुखावहम्
mṛtyuñjayaṃ prakurvīta chāgadānaṃ ca kārayet |
vṛṣadānaṃ prakurvīta sarvasampatsukhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्युञ्जय = मृत्युंजय (जप/अनुष्ठान — शास्त्र का नामोल्लेख); प्रकुर्वीत = करे — विध्यात्मक कथन; छाग-दान = छाग (बकरा)-दान; कारयेत् = करवाए; वृष-दान = वृषभ-दान; सर्व-सम्पत्-सुख-आवह = समस्त संपत्ति और सुख लाने वाला — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मृत्युंजय का अनुष्ठान करे, छाग-दान करवाए, तथा वृष-दान करे; ये सर्व-संपत् और सुख के आवह कहे गए हैं। यह पाठ का पारंपरिक उपाय-निर्देश है, दबाव या भय-वाणिज्य नहीं। हम इसे शास्त्र-वाक्य के रूप में रखते हैं; चिकित्सा, विधि या अर्थ-गारंटी के रूप में नहीं पढ़ते।

English rendering The text enjoins performance of the Mṛtyuñjaya (rite/recitation), the gift of a goat, and the gift of a bull, stating that these bring about all prosperity and happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय/अनुष्ठान-निर्देश (शास्त्र-कथन)। इसमें दशा-वर्ष, वर्ग-अंश या बल-इकाई का कोई संगणनीय सूत्र नहीं; केवल पारंपरिक कर्म-सूची है।

57.71
मन्दस्यान्तर्गते जीवे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे |
लग्नाधिपेन संयुक्ते स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा
mandasyāntargate jīve kendre lābhatrikoṇage |
lagnādhipena saṃyukte svocce svakṣetrage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दस्य = शनि (मन्द) की महादशा में; अन्तर्गते जीवे = जब जीव (गुरु/बृहस्पति) अन्तर्दशा में हो; केन्द्रे = केन्द्र भाव (1/4/7/10) में; लाभ-त्रिकोण-गे = लाभ (11वें) व त्रिकोण (5/9) में स्थित; लग्न-अधिपेन संयुक्ते = लग्नेश से युक्त; स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्वक्षेत्र-गे = अपनी राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा में, जब गुरु केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो, लग्नेश से युक्त हो, अथवा अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित हो — तब (आगे कहे जाने वाले शुभ फल प्राप्त होते हैं)।

English rendering The text states that in Saturn's major period during Jupiter's sub-period, when Jupiter stands in an angle, the 11th, or a trine, joined with the lagna-lord, or in its exaltation or own sign — the auspicious results that follow accrue.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शर्त-कथन (योग्यता-निर्धारक भाव-स्थिति)। तकनीकी बिन्दु: अन्तर्दशा-फल की शुभता ग्रह की भाव-स्थिति {केन्द्र 1/4/7/10, त्रिकोण 5/9, लाभ 11} तथा बल (उच्च/स्वक्षेत्र) पर आधारित है — विशुद्ध स्थिति-जाँच।

उदाहरण (worked example) शनि-गुरु अन्तर्दशा की अवधि = (19 × 16) ÷ 120 = 304 ÷ 120 = 2.5333… वर्ष ≈ 2 वर्ष 6 मास 12 दिन; यदि गुरु 5वें (त्रिकोण) व स्वराशि में हो → शर्त पूर्ण, शास्त्रोक्त शुभ फल-वर्ग सक्रिय।

हमारा डिकोड (Our Decode) "मन्दस्य अन्तर्गते जीवे" — यह विंशोत्तरी की महादशा→अन्तर्दशा संरचना है, जिसे दोषियर §3 में पिन किया गया है: शनि 19 व गुरु 16 वर्ष, Σ = 120। अन्तर्दशा = (19 × 16) ÷ 120 = 2.5333 वर्ष; हमारे दशा-इंजन में यह ठीक वही अनुपात-अंकगणित है, और भाव-स्थिति की शर्त फल (व्याख्या) से पृथक रखी जाती है।

57.72
सर्वकार्यार्थसिद्धिः स्याच्छोभनं भवति ध्रुवम् |
महाराजप्रसादेन धनवाहनभूषणम्
sarvakāryārthasiddhiḥ syācchobhanaṃ bhavati dhruvam |
mahārājaprasādena dhanavāhanabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वकार्यार्थसिद्धिः = सब कार्यों/अर्थों की सिद्धि; स्यात् = होती है; शोभनं = शुभता; भवति ध्रुवम् = निश्चय से होती है; महाराजप्रसादेन = महाराज/बड़े शासक की कृपा से; धन = संपत्ति; वाहन = सवारी; भूषणम् = आभूषण।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ शर्त पूरी होने पर शास्त्र कहता है — सर्वकार्य-अर्थ सिद्धि होती है और शुभता “ध्रुव” कही गई है। महाराज-प्रसाद से धन, वाहन और भूषण का लाभ भी पाठ में गिनाया गया है। यह फल-कथन है; काल-मात्रा या बलांक यहाँ नहीं दिए गए।

English rendering Under those conditions the text states fulfilment of aims and purposes, assured auspiciousness, and — through a great ruler’s favour — gain of wealth, conveyances, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कार्यसिद्धि, राजप्रसाद, धन-वाहन-भूषण)। “ध्रुवम्” यहाँ पाठ का निश्चय-शब्द है; गणना या प्रमाण-सीमा नहीं।

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57.73
सन्मानं प्रभुसम्मानं प्रियवस्त्रार्थलाभकृत् |
देवतागुरुभक्तिश्च विद्वज्जनसमागमः
sanmānaṃ prabhusammānaṃ priyavastrārthalābhakṛt |
devatāgurubhaktiśca vidvajjanasamāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्मानं = सम्मान; प्रभुसम्मानं = प्रभु/अधिकारियों का सम्मान; प्रियवस्त्र = इष्ट वस्त्र; अर्थलाभकृत् = धन-लाभ करने वाला; देवतागुरुभक्तिः = देवता और गुरु में भक्ति; विद्वज्जनसमागमः = विद्वानों का संग।

हिन्दी भावार्थ उसी शुभ योग में शास्त्र सम्मान, प्रभु-सम्मान, प्रिय वस्त्र और अर्थ-लाभ गिनाता है। देवता-गुरु भक्ति और विद्वज्जन-समागम भी फल-सूची में हैं। यह सामाजिक-धार्मिक “लाभ” का वर्णन है, न कि भाव-बल या दशा-वर्ष का सूत्र।

English rendering The text further states honour, respect from those in authority, gain of pleasing garments and wealth, devotion to deity and preceptor, and association with the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सम्मान, वस्त्र-अर्थ, भक्ति, विद्वत्संग)। व्याख्या को फल-सूची के रूप में ही रखें; अवधि या अंश-गणना यहाँ निहित नहीं।

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57.74
दारपुत्रादिलाभश्च पुत्रकल्याणवैभवम् |
षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वा पापसंयुते
dāraputrādilābhaśca putrakalyāṇavaibhavam |
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye jīve nīce vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दार-पुत्र-आदि-लाभः = पत्नी-पुत्रादि का लाभ; पुत्र-कल्याण-वैभवम् = पुत्रों का कल्याण व वैभव; षष्ठ-अष्टम-व्यये जीवे = जब गुरु 6/8/12 भाव में हो; नीचे = नीच राशि में; वा पाप-संयुते = अथवा पापग्रहों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (शुभ-स्थित गुरु में) पत्नी-पुत्रादि का लाभ और पुत्रों का कल्याण-वैभव मिलता है। किन्तु यदि गुरु 6ठे, 8वें या 12वें भाव में, अथवा नीच राशि में, या पापग्रहों से युक्त हो — (तो आगे कहे अशुभ फल होते हैं)।

English rendering The text states one gains spouse and children and the welfare and glory of sons; but if Jupiter is in the 6th, 8th, or 12th, debilitated, or joined with malefics — the ills stated next follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ फल-कथन के साथ अशुभ-शर्त। तकनीकी बिन्दु: दुःस्थान-समुच्चय {6, 8, 12} + नीचता + पाप-योग = अशुभ-निर्धारक; यह वही स्थिति-जाँच है जो श्लोक 71 की शुभ-शर्त का विलोम है।

उदाहरण (worked example) गुरु यदि 8वें भाव या स्वनीच राशि मकर में हो → स्थिति ∈ {6, 8, 12} अथवा नीच → अशुभ फल-वर्ग (श्लोक 75) सक्रिय।

57.75
निजसम्बन्धिमरणं धनधान्यविनाशनम् |
राजस्थाने जनद्वेषः कर्यहानिर्भविष्यति
nijasambandhimaraṇaṃ dhanadhānyavināśanam |
rājasthāne janadveṣaḥ karyahānirbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निजसम्बन्धिमरणं = अपने सम्बन्धियों का मरण; धनधान्यविनाशनम् = धन-धान्य का नाश; राजस्थाने = राज-स्थान/शासन-क्षेत्र में; जनद्वेषः = लोगों का द्वेष; कार्यहानिः (पाठ: कर्यहानि) = कार्य की हानि; भविष्यति = होगी — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व की अशुभ शर्त पर शास्त्र कहता है — निज-सम्बन्धी-मरण, धन-धान्य-विनाश, राजस्थान में जन-द्वेष, और कार्य-हानि। ये पाठ के फल-पद हैं; इन्हें निश्चित भविष्य या चिकित्सा-निदान के रूप में न पढ़ें। “भविष्यति” यहाँ शास्त्र की कथनात्मक शैली है।

English rendering Under those adverse conditions the text states death among one’s own relations, destruction of wealth and grain, popular hostility in royal or public station, and loss in work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ पक्ष)। कोई बलांक, बिन्दु या वर्ष-मात्रा नहीं; केवल दशा-फल सूची।

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57.76
विदेशगमनं चैव कुष्ठरोगादिसम्भवः |
दायेशात्केन्द्रकोणे वा धने वा लाभगेऽपि वा
videśagamanaṃ caiva kuṣṭharogādisambhavaḥ |
dāyeśātkendrakoṇe vā dhane vā lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेशगमनं = परदेश-गमन; कुष्ठरोगादिसम्भवः = कुष्ठादि रोग की संभावना — पाठ-कथन; दायेशात् = दायेश (दशेश/दशा-स्वामी) से; केन्द्रकोणे = केन्द्र या कोण (त्रिकोण) में; वा धने = अथवा धन (2) में; वा लाभगे = अथवा लाभ (11) में; अपि वा = भी/अथवा।

हिन्दी भावार्थ अशुभ धारा में शास्त्र विदेश-गमन और “कुष्ठरोगादि” की संभावना भी गिनाता है — यह शास्त्र-शब्द है, चिकित्सा-निर्णय नहीं। फिर पाठ पुनः शुभ-शर्त खोलता है: दायेश से गुरु केन्द्र/कोण में हो, अथवा धन या लाभ भाव में हो — तब अगला वैभव-फल लागू होता है। “दायेश” यहाँ दशा-स्वामी (शनि-महादशा में मन्द) की ओर संकेत करता है; पाठ-भेद/टीका-भेद संभव।

English rendering The text also states foreign travel and the possibility of skin afflictions and the like (as traditional phala wording, not a medical claim). It then resets: if [Jupiter is], from the period-lord (dāyeśa), in a kendra or trikoṇa, or in the second or eleventh house, the following prosperity results apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दायेश-सापेक्ष भाव-शर्त। भाव-गणना दायेश-स्थित राशि/लग्न-सापेक्ष कुण्डली पर निर्भर; अयनांश और गृह-पद्धति घोषित किए बिना अंश-स्तर का अनुप्रयोग न करें।

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57.77
विभवं दारसौभाग्यं राजश्रीधनसम्पदः |
भोजनाम्बरसौख्यं च दानधर्मादिकं भवेत्
vibhavaṃ dārasaubhāgyaṃ rājaśrīdhanasampadaḥ |
bhojanāmbarasaukhyaṃ ca dānadharmādikaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभवम् = वैभव/समृद्धि; दारसौभाग्यं = दार-सौभाग्य; राजश्री = राज-श्री/शाही प्रतिष्ठा; धनसम्पदः = धन-संपदा; भोजनाम्बरसौख्यं = अन्न-वस्त्र का सुख; दानधर्मादिकं = दान-धर्मादि; भवेत् = होता है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ दायेश-सापेक्ष शुभ स्थिति में शास्त्र वैभव, दार-सौभाग्य, राजश्री और धन-संपद कहता है। भोजन-अम्बर-सौख्य तथा दान-धर्मादि भी फल-सूची में हैं। यह 57.71–77 की शुभ-अशुभ-शुभ त्रयी का समापन है: स्थान शुद्ध हो तो वैभव, दूषित हो तो हानि — दोनों शास्त्र के अपने शब्द।

English rendering Under that renewed favorable placement the text states prosperity, marital good fortune, royal glory and wealth, comfort of food and clothing, and the practice of gift and dharma and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वैभव, दार-सौभाग्य, राजश्री, दान-धर्म)। दशा-अवधि का अंक-सूत्र यहाँ नहीं; केवल फल-वर्णन।

57.78
ब्रह्मप्र्तिष्ठासिद्धिश्च क्रतुकर्मफलं तथा |
अन्नदानं महाकीर्तिर्वेदान्तश्रवणादिकम्
brahmaprtiṣṭhāsiddhiśca kratukarmaphalaṃ tathā |
annadānaṃ mahākīrtirvedāntaśravaṇādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्म-प्रतिष्ठा = वैदिक/ब्रह्म-स्थापना, यज्ञ-संस्था की सिद्धि; सिद्धि = पूर्णता/कार्य-सिद्धि; क्रतु-कर्म-फल = यज्ञादि कर्म का फल; अन्न-दान = अन्न-दान; महा-कीर्ति = विशाल कीर्ति; वेदान्त-श्रवणादिकम् = वेदान्त-श्रवण आदि आध्यात्मिक आचरण; च/तथा = तथा/और (सूची-संयोग)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ शुभ फल की सूची देता है — ब्रह्म-प्रतिष्ठा की सिद्धि, क्रतु-कर्म का फल, अन्न-दान, महान् कीर्ति, तथा वेदान्त-श्रवण आदि। यह कथन फल-वर्णन है: जिन दशा-स्थितियों का पूर्व-प्रसंग है, उनमें पाठ इन पुण्य-कर्मों और यश-लाभ की संभावना बताता है। फल को शास्त्र-वाक्य के रूप में पढ़ें, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering The text lists auspicious indications: establishment and success in sacred/Brahmanical foundations, the fruit of sacrificial rites, food-charity, great renown, and hearing of Vedānta and kindred pursuits. These are stated as period-results in the śāstra’s own voice, not as guarantees of destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-सूची (शुभ कर्म-यश संकेत)। दशा-फल अध्याय के भीतर यह पद गणितीय अङ्क नहीं बाँधता; यह फल-वर्णन की कड़ी है।

57.79
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते |
बन्धुद्वेषो मनोदुःखं कलहः पदविच्युति
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā vyaye vā balavarjite |
bandhudveṣo manoduḥkhaṃ kalahaḥ padavicyuti

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (यहाँ महादशानाथ शनि) से गिनकर; षष्ठ = छठा भाव (दुःस्थान); रन्ध्रे = आठवें भाव में (रन्ध्र = ८); व्यये = बारहवें भाव में (व्यय = १२); बलवर्जिते = षड्बल से हीन — अन्तर्दशेश (गुरु) बल-रहित; बन्धुद्वेषः = सम्बन्धियों से वैमनस्य; मनोदुःखम् = मानसिक व्यथा; कलहः = क्लेश/झगड़ा; पदविच्युतिः = पद/अधिकार से पतन।

हिन्दी भावार्थ यह शनि-महादशा के भीतर गुरु-अन्तर्दशा का अशुभ-योग पक्ष है। शास्त्र कहता है — यदि अन्तर्दशेश गुरु दशेश (शनि) से छठे, आठवें या बारहवें स्थान में बैठा हो, अथवा बल से रहित हो, तो इस अन्तर में बन्धुओं से विरोध, मन का दुःख, कलह और पद से च्युति का फल कहा गया है। यहाँ "दायेशात्" शब्द गणना का आधार-बिन्दु देता है — भाव दशेश की राशि से गिने जाते हैं, लग्न से नहीं।

English rendering Reckoned from the daśā-lord, should the sub-period lord (Jupiter) stand in the 6th, 8th, or 12th, or be devoid of strength — the text states this yields discord with kin, mental sorrow, strife, and fall from one's position.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो नियम एक साथ हैं। (1) दशेश-सापेक्ष भाव-गणना: भाव-संख्या b = ((राशि_अन्तरेश − राशि_दशेश) mod 12) + 1; दुःस्थान-समुच्चय = {6, 8, 12}। शर्त लगती है यदि b ∈ {6, 8, 12}। (2) बल-कसौटी: "बलवर्जित" = षड्बल(गुरु) < ग्रह-विशिष्ट न्यूनतम सीमा; बल रूप/विरूप में — 1 रूप = 60 विरूप। अन्तर्दशा-अवधि स्वयं विम्शोत्तरी अनुपात से निकलती है: अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तरेश-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए दशेश शनि मेष (राशि 1) में और अन्तरेश गुरु कन्या (राशि 6) में। b = ((6 − 1) mod 12) + 1 = 6 → षष्ठ भाव → शर्त पूर्ण। इसी युग्म की अन्तर्दशा-अवधि: शनि महादशा = 19 वर्ष, गुरु अन्तर = (19 × 16) ÷ 120 = 304/120 = 2.5333… वर्ष = 2 वर्ष 6 मास 12 दिन (30-दिन मास संकेत)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोनों संख्याएँ हमारे सत्यापित इंजनों से मिलती हैं — विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7 … शनि 19, गुरु 16; Σ = 120) में अन्तर = महा×अन्तर/120 शुद्ध अनुपात-गणित है, और "बलवर्जित" का माप षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) को रूप/विरूप में जोड़कर प्रति-ग्रह सीमा से तुलना — 1 रूप = 60 विरूप। दोनों गणनात्मक हैं; फल-कथन उससे अलग शास्त्र की अपनी वाणी है।

57.80
कुभोजनं कर्महानी राजदण्डाद्धनव्यय |
कारागृहप्रवेशश्च पुत्रदारादिपीडनम्
kubhojanaṃ karmahānī rājadaṇḍāddhanavyaya |
kārāgṛhapraveśaśca putradārādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुभोजनम् = कुत्सित/हीन भोजन (कु = बुरा); कर्महानिः = कार्य/आजीविका का नाश; राजदण्डात् = राजकीय दण्ड के कारण; धनव्ययः = धन का क्षय/व्यय; कारागृहप्रवेशः = बन्दीगृह में प्रवेश (कारावास); पुत्रदारादिपीडनम् = पुत्र, पत्नी आदि को कष्ट।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की दुःस्थान/बलहीन शर्त का ही फल-विस्तार यहाँ है। शास्त्र कहता है — इस अन्तर में हीन भोजन, कर्म-आजीविका की हानि, राजदण्ड से धन-व्यय, कारावास तक की स्थिति, और पुत्र-कलत्र आदि को पीड़ा का उल्लेख आता है। यह ग्रह-स्थिति के प्रति शास्त्र का सांकेतिक विवरण है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states such a period may bring poor sustenance, ruin of one's occupation, loss of wealth through state penalty, even imprisonment, and distress to wife and children.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (श्लोक 79 की स्थिति-शर्त का परिणाम-वर्णन)। यहाँ कोई नया अंक या विभाग-नियम नहीं है; यह केवल दुःस्थानगत/बलहीन अन्तरेश के प्रति परम्परा का लक्षण-सूचीकरण है, जिसे "राजदण्ड, कारागृह" जैसे तीव्र शब्दों में शास्त्र स्वयं कहता है — इन्हें भय या नियति के रूप में नहीं, पाठ के अपने कथन के रूप में पढ़ना चाहिए।

57.81
द्वितीयद्यूननाथे तु देहवाधा मनोरुजः |
आत्मसम्बन्धमरणं भविष्यति न संशयः
dvitīyadyūnanāthe tu dehavādhā manorujaḥ |
ātmasambandhamaraṇaṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय भाव (मारक-स्थान); द्यून = सप्तम भाव (द्यून/जाया — "अस्त होने का स्थान", मारक); नाथे = जब अन्तरेश इनका स्वामी हो; देहबाधा (पाठ "देहवाधा" — पाठ-भेद संभव) = शारीरिक कष्ट; मनोरुजः = मानसिक रोग/पीड़ा; आत्मसम्बन्धमरणम् = आत्मीय/निकट सम्बन्धी का मरण; न संशयः = सन्देह नहीं (शास्त्र का बल-सूचक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि अन्तर्दशेश (गुरु) लग्न से द्वितीय अथवा सप्तम भाव का स्वामी हो, तो इस अन्तर में देह-बाधा, मानसिक व्यथा और निकट सम्बन्धी के वियोग/मरण का फल कहा गया है। द्वितीय और सप्तम — ये दोनों "मारक-स्थान" कहलाते हैं; श्लोक इसी शास्त्रीय संकेत को उठाता है। "न संशयः" पाठ का दृढ़ता-सूचक है, हमारी ओर से कोई निश्चय-दावा नहीं।

English rendering The text states that when the sub-period lord owns the 2nd or the 7th house, it points to bodily affliction, mental anguish, and the passing of a close relation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीकी चिह्न — मारक-भाव पहचान। द्वितीय (2) और सप्तम (द्यून = 7) शास्त्रोक्त दो मारक-स्थान हैं। स्वामित्व-नियम: भाव h की राशि = ((लग्न-राशि + h − 2) mod 12) + 1; उस राशि का अधिपति ही "hवें का नाथ"। शर्त: यदि गुरु द्वारा स्वामित्व-प्राप्त भावों में 2 या 7 हो। यहाँ गणित केवल भाव-अधिपति की मॉड्युलर पहचान तक है — आगे का "मरण" कथन शास्त्र का फल-वचन है, गणना का निर्गम नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए लग्न वृश्चिक (राशि 8)। द्वितीय भाव की राशि = ((8 + 2 − 2) mod 12) + 1 = (8 mod 12) + 1 = 9 = धनु, जिसका स्वामी गुरु ✓ — अतः गुरु द्वितीयेश (मारक) हुआ, श्लोक की शर्त पूर्ण। (यह केवल स्वामित्व-गणना है; फल शास्त्र का कथन।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारी मूल अनुशासन-रेखा की कसौटी है: गणित को व्याख्या से अलग रखना। मारक-भाव (2/7) की पहचान शुद्ध भाव-अधिपति गणना है — पर "आत्मसम्बन्धमरणं … न संशयः" जैसा अधिकतम-दावा हम शास्त्र के कथन ("पाठ कहता है") के रूप में प्रस्तुत करते हैं, कभी अपनी ओर से नियति, भय या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

57.82
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् |
स्वर्णदानं प्र्कुर्वीत ह्यारोग्यं भवति ध्रुवम्
taddoṣaparihārārthaṃ śivasāhasrakaṃ japet |
svarṇadānaṃ prkurvīta hyārogyaṃ bhavati dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के शमन के लिए; शिवसाहस्रकम् = शिव-सहस्रनाम (सहस्रक = हज़ार नाम); जपेत् = जप करे; स्वर्णदानम् = स्वर्ण का दान; प्रकुर्वीत = करे (पाठ में "प्र्कुर्वीत" — पाठ-भेद/लेखन-दोष संभव); आरोग्यम् = नीरोगता; ध्रुवम् = निश्चय ही (शास्त्र का आश्वासन-वचन)।

हिन्दी भावार्थ उस दोष के परिहार-हेतु शास्त्र सुझाता है कि शिव-सहस्रनाम का जप करे और स्वर्ण-दान करे; ऐसा करने से नीरोगता निश्चय ही प्राप्त होती है — यह पाठ का उपाय-कथन है। यह गुरु-अन्तर्दशा-प्रकरण (श्लोक 71–82) का समापन शान्ति-विधान है।

English rendering To allay that affliction, the text advises reciting the Śiva-sahasranāma and donating gold; by this, it says, sound health surely follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय/शान्ति-विधान। एकमात्र संख्या "साहस्रक" = 1000 (सहस्र = 10³) है, जो शिव के हज़ार नामों की जप-गणना है — कोई ज्यौतिष-स्थिरांक नहीं। "ध्रुवम्" पाठ का अलंकारिक आश्वासन है, जिसे हम उसी रूप में उद्धृत करते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोष-परिहार श्लोकों को हम अपने ढाँचे के "उपाय दबाव नहीं" (no remedies-as-pressure) नियम के अधीन रखते हैं — जप व दान को शास्त्र का परामर्श रूप में प्रस्तुत किया जाता है, भय-आधारित सौदे या अनिवार्यता रूप में नहीं। "आरोग्यं… ध्रुवम्" पाठ का वचन है; हमारा कार्य उसे यथावत् दर्ज करना है, न कि निश्चित परिणाम रूप में इसका समर्थन करना।

अध्यायः 58

बुधान्तर्दशाफलाध्यायः

72 श्लोक
58.1
मुक्ताविद्रुमलाभश्च ज्ञानकर्मसुखादिकम् |
विद्यामहत्त्वं कीर्तिश्च नूतनप्रभुदर्शनम्
muktāvidrumalābhaśca jñānakarmasukhādikam |
vidyāmahattvaṃ kīrtiśca nūtanaprabhudarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुक्ता = मोती; विद्रुम = मूँगा (प्रवाल); लाभः = प्राप्ति; ज्ञान-कर्म-सुख-आदिकम् = ज्ञान, सत्कर्म, सुख आदि; विद्या-महत्त्वम् = विद्या में प्रतिष्ठा/श्रेष्ठता; कीर्तिः = यश; नूतन-प्रभु-दर्शनम् = किसी नए स्वामी/आश्रयदाता से भेंट।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से बुध-महादशा में बुध की अपनी अन्तर्दशा (स्वभुक्ति) के फल कहे जा रहे हैं। शास्त्र कहता है कि इस काल में मोती-मूँगे की प्राप्ति, ज्ञान और शुभ कर्मों का सुख, विद्या में प्रतिष्ठा, यश, तथा किसी नए स्वामी के दर्शन होते हैं। यह प्रिय-शिष्य को दिया गया शुभ संकेत है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering In Mercury's own sub-period within its major period, the text promises gain of pearls and coral, knowledge, meritorious deeds and comfort, eminence in learning, fame, and audience with a new patron.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ध्यातव्य: ये शुभ फल नितान्त सशर्त हैं — अगला श्लोक बताता है कि ये तभी फलित होते हैं जब अन्तर्देशेश उच्चादि बल में स्थित हो।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह भुक्ति विमशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (BPHS अध्याय 46–47) की गणना पर टिकी है, जिसे हमारे दशा-इंजन में सूत्र अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 से रखा गया है। बुध महादशा = 17 वर्ष, अतः बुध-बुध भुक्ति = 17 × 17 ÷ 120 = 289/120 ≈ 2 वर्ष 4 मास 27 दिन। संख्या हमारी गणना है; उपर्युक्त फल शास्त्र का कथन।

58.2
विभवं दारपुत्रादि पितृमातृसुखावहम् |
स्वोच्चादिस्थेऽथ नीचेऽस्ते षष्ठाष्टमव्ययराशिगे
vibhavaṃ dāraputrādi pitṛmātṛsukhāvaham |
svoccādisthe'tha nīce'ste ṣaṣṭhāṣṭamavyayarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभव = ऐश्वर्य/समृद्धि; दार = पत्नी/जीवनसाथी; पुत्रादि = संतान आदि; पितृ-मातृ-सुख = माता-पिता से सुख; स्व-उच्च-आदि-स्थ = स्वराशि/उच्च आदि शुभ स्थान में स्थित; अथ = फिर/अथवा; नीच = नीचे-स्थित; अस्त = अस्त/दग्ध-सदृश दुर्बल अवस्था; षष्ठ-अष्टम-व्यय-राशिग = ६-८-१२ भाव/राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शुभ पक्ष में शास्त्र ऐश्वर्य, दार-पुत्रादि सुख तथा माता-पिता का सुख कहता है — जब संबन्धित ग्रह स्व/उच्च आदि बलवान स्थान में हो। तुरंत ही विपरीत शर्त आती है: नीचे, अस्त, अथवा षष्ठ-अष्टम-व्यय राशि में स्थिति। अगले पद उसी अशुभ शाखा का फल खोलते हैं।

English rendering The text states prosperity and happiness through spouse, children, and parents when the relevant planet is in its own, exaltation, or similarly strong placement; then it turns to the opposite case—debilitation, combustion-like weakness, or occupation of the sixth, eighth, or twelfth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्थान नियम (कोणीय दूरी, १२-चक्र पर): षष्ठ = L+5, अष्टम = L+7, व्यय = L+11 (mod 12; लग्न = L, भाव-गणना पूर्ण-चिह्न पद्धति में)। “स्व/उच्च” ग्रह-विशिष्ट राशि-तालिका पर निर्भर है (उदा. सूर्य उच्च = मेष १०°, शनि उच्च = तुला २०° — शास्त्रीय उच्च-बिन्दु; अयनांश चयन देशान्तर-निर्देश पर निर्भर)। अस्त-सीमा ग्रह-भेद से भिन्न होती है; इस पद में संख्या नहीं दी गई — केवल अवस्था-नाम।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = कन्या (चिह्न ६)। षष्ठ = कुम्भ (६+५ → ११), अष्टम = मीन (६+७ → १२), व्यय = सिंह (६+११ → ५)। यदि विचाराधीन ग्रह सिंह/कुम्भ/मीन में हो तो पद की “षष्ठाष्टमव्ययराशिगे” शाखा लागू; यदि उसी ग्रह की स्व/उच्च राशि में हो तो पूर्वार्ध का शुभ-फल पक्ष। (राशि-चिह्न गणना; अयनांश/गृह-पद्धति यहाँ भाव-स्वामी से नहीं, राशि-स्थिति से बँधी।)

58.3
पापयुक्तेऽथवा दृष्टे धनधान्यपशुक्षयः |
आत्मबन्धुविरोधश्च शूलरोओगादिसम्भवः
pāpayukte'thavā dṛṣṭe dhanadhānyapaśukṣayaḥ |
ātmabandhuvirodhaśca śūlaroogādisambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-युक्त = पापग्रह से युत; अथवा = या; दृष्ट = दृष्ट/अवलोकित; धन-धान्य-पशु-क्षय = धन, अन्न, पशु का ह्रास; आत्म-बन्धु-विरोध = स्वयं/स्वजनों से विरोध; शूल-रोग-आदि-सम्भव = शूल-पीड़ा आदि रोग की संभावना (पाठ: “शूलरोओग” — पाठ-भेद संभव, प्रायः शूलरोग); सम्भवः = होना संभव।

हिन्दी भावार्थ जब वही ग्रह पाप-युत या पाप-दृष्ट हो, शास्त्र धन-धान्य-पशु के क्षय, आत्मजन/बन्धु-विरोध, तथा शूल-रोगादि की संभावना कहता है। यह फल-कथन है — निश्चय या चिकित्सा-निदान नहीं। “सम्भवः” शब्द स्वयं संभावना का स्वर रखता है, अनिवार्य घटना का नहीं।

English rendering The text states that if the planet is conjoined with or aspected by malefics, there may be loss of wealth, grain, and cattle, conflict with oneself or kin, and the possibility of colic-like or painful ailments (reading of the disease-compound may vary by recension).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सशर्त)। “पापयुक्त/दृष्ट” गुणात्मक योग-शर्त है; दृष्टि-कोण (पूर्ण/आंशिक) और पाप-गणना की विस्तृत संख्या इस पद में नहीं है। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

58.4
राजकार्यकलापेन व्याकुलो भव्ति ध्रुवम् |
द्वितीयद्यूननाथे तु दारक्लेशो भविष्यति
rājakāryakalāpena vyākulo bhavti dhruvam |
dvitīyadyūnanāthe tu dārakleśo bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-कार्य-कलाप = राज/शासन-सम्बन्धी कार्य-जाल; व्याकुल = व्याकुल/व्यग्र; भवति = होता है (पाठ “भव्ति” — पाठ-भेद संभव); ध्रुवम् = निश्चय से (शास्त्र का बल-वचन); द्वितीय = द्वितीय भावेश; द्यून = सप्तम भाव (द्यून = स्त्री/कलत्र-स्थान); नाथ = स्वामी; तु = तो/परन्तु; दार-क्लेश = दंपति/कलत्र-पीड़ा; भविष्यति = होगा — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राजकार्य के कलाप से व्यक्ति व्याकुल होता है — “ध्रुवम्” यहाँ ग्रन्थ का निश्चयात्मक स्वर है, ज्योतिषी का भाग्य-आदेश नहीं। जब द्वितीय या द्यून (सप्तम) का नाथ संबन्धित हो/प्रबल हो, शास्त्र दार-क्लेश का कथन करता है। दोनों पंक्तियाँ दशा/अवस्था-फल की शाखाएँ हैं।

English rendering The text states sure agitation through royal or official affairs; and when the lords of the second and/or the seventh (dyūna) are involved, it states distress connected with the spouse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-स्वामी पहचान: द्वितीयेश = (L+1) राशि का स्वामी; द्यूननाथ/सप्तमेश = (L+6) राशि का स्वामी (mod 12, पूर्ण-राशि भाव)। “कलाप-व्याकुलता” और “दारक्लेश” फल-पद हैं, वर्ष-संख्या या बल-इकाई नहीं। “ध्रुवम्” शास्त्रीय निश्चय-शब्द है; इसे आधुनिक “certainty theater” में न पढ़ें — स्रोत-पाठ का स्वर मात्र।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (चिह्न १)। द्वितीय = वृष → स्वामी शुक्र; द्यून/सप्तम = तुला → स्वामी शुक्र (उभयत्र शुक्र)। यदि प्रसंग में शुक्र दशा/अन्तर या योग में हो तो पद की “द्वितीयद्यूननाथे” शाखा शास्त्रानुसार लागू मानी जाती है। (स्वामित्व: पारंपरिक राशि-स्वामी तालिका; केन्द्र/गृह-पद्धति यहाँ राशि-भाव १=लग्न मानकर।)

58.5
आत्मसम्बन्धिमरणं वातशूलादिसम्भवः |
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत्
ātmasambandhimaraṇaṃ vātaśūlādisambhavaḥ |
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्म-सम्बन्धि-मरणम् = अपने किसी स्वजन/सम्बन्धी की मृत्यु; वात-शूल-आदि-सम्भवः = वातजन्य शूल आदि व्याधि का उद्भव; तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; विष्णु-साहस्रकम् = विष्णुसहस्रनाम; जपेत् = जप करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अशुभ-योग का फल पूर्ण करता है — स्वजन का वियोग (मृत्यु), वातजन्य शूल आदि पीड़ा। और फिर एक शान्ति-उपाय सुझाता है: उस दोष के परिहार के लिए विष्णुसहस्रनाम का जप करे। यह शास्त्र की अपनी सलाह है, भय या दबाव नहीं।

English rendering The passage adds the loss of a kinsman and wind-borne colic, and counsels, as remedy for that affliction, the recitation of the Viṣṇu-sahasranāma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शान्ति-विधान। अन्तर्दृष्टि: शास्त्र दोष-कथन के तुरन्त बाद परिहार जोड़ता है — यह पाठ की अपनी संरचना है, न कि निश्चित परिणाम की घोषणा।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी पद्धति गणित और व्याख्या को पृथक् रखती है (CLAUDE.md + oracle अनुशासन): दशाकाल का period-गणित नियतांकीय है, किन्तु "मरण/रोग/उपाय" जैसे वचन शास्त्र के कथन-रूप में ही प्रस्तुत किए जाते हैं — कभी भय, अटल भाग्य, या दबाव-रूप में नहीं। अतः यह जप-विधान शास्त्र की सलाह है, हमारा कोई चिकित्सकीय/नियति-दावा नहीं।

58.6
बुधस्यान्तर्गते केतौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नाधिपसमन्विते
budhasyāntargate ketau lagnātkendratrikoṇage |
śubhayukte śubhairdṛṣṭe lagnādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधस्य अन्तर् गते = बुध की अन्तरदशा में; केतौ = केतु (जब केतु अन्तर-ग्रह हो); लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = १, ४, ७, १०; त्रिकोण = १, ५, ९; गे = स्थित; शुभ-युक्त = शुभग्रह-युत; शुभैः दृष्टे = शुभों से दृष्ट; लग्न-अधिप-समन्विते = लग्नेश से युक्त/संबद्ध।

हिन्दी भावार्थ विंशोत्तरी क्रम में जब बुध की महादशा में केतु की अन्तर चले — अथवा पाठानुसार “बुधस्यान्तर्गते केतौ” की शास्त्रीय संधि — और केतु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, शुभ-युत व शुभ-दृष्ट हो तथा लग्नेश से समन्वित हो, तो अगला पद फल कहता है। यह पद शर्त-समूह है; फल ५८.७ में पूरा होता है।

English rendering When Ketu operates in Mercury’s antardaśā (Budha-mahādaśā / Ketu-antara, per the usual genitive–locative construction), and Ketu stands in a kendra or trikoṇa from the lagna, conjoined with benefics, aspected by benefics, and associated with the lagna-lord, the following verse states the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (१) विंशोत्तरी अन्तर-वर्ष: अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ १२०। बुध महा = १७ वर्ष, केतु अन्तर = ७ वर्ष ⇒ अन्तर-अवधि = (१७ × ७) ÷ १२० = ११९/१२० वर्ष ≈ ०.९९१७ वर्ष ≈ ३६२.० दिन (वर्ष = ३६५.२५ दिन मानें तो; पारंपरिक सौर/सावन मान घोषित करें)। (२) लग्न से केन्द्र-राशि: {L, L+3, L+6, L+9} mod 12। त्रिकोण: {L, L+4, L+8} mod 12। (३) शुभ-योग/दृष्टि गुणात्मक शर्त; दृष्टि-कोण की संख्या इस पद में नहीं।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी: बुध-महादशा १७ वर्ष; केतु-अन्तर = १७×७/१२० = ११९/१२० वर्ष। लग्न = कर्कट (चिह्न ४)। केन्द्र = कर्कट, तुला, मकर, मेष; त्रिकोण = कर्कट, वृश्चिक, मीन। यदि केतु वृश्चिक में हो तो त्रिकोण-शर्त पूर्ण; यदि वहाँ गुरु/शुक्र युत व लग्नेश चन्द्र संबद्ध हो तो ५८.६ की शुभ-शर्तें शास्त्रानुसार जुड़ती हैं। (नक्षत्र-शेष से महादशा-प्रारम्भ; अयनांश केवल चन्द्र-नक्षत्र-निर्णय पर प्रभाव डालता है — यहाँ घोषित: गणना अनुपात शुद्ध, नक्षत्र-प्रवेश अलग चरण।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र और अन्तर-सूत्र (महा×अन्तर)/१२० हमारे दशा-इंजन में उसी अनुपात-अंकगणित से बँधा है: केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७ (योग = १२०)। बुध-महा में केतु-अन्तर = ११९/१२० वर्ष — exact fraction, सहिष्णुता-पट्टी नहीं। दशा = नक्षत्र-शेष पर शुद्ध अनुपात; फल = शास्त्र-कथन, इंजन की “भविष्यवाणी” नहीं।

58.7
योगकारकसम्बन्धे दायेशात्केन्द्रलाभगे |
देहसौख्यं धनाल्पत्वं बन्धुस्नेहमथादिशेत्
yogakārakasambandhe dāyeśātkendralābhage |
dehasaukhyaṃ dhanālpatvaṃ bandhusnehamathādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगकारक-सम्बन्धे = योगकारक ग्रह से संबन्ध में; दायेश = दशा-स्वामी (यहाँ प्रसंगतः बुध-महा का स्वामी / दशा-नाथ); केन्द्र-लाभ-गे = केन्द्र या लाभ (११) भाव में स्थित; देह-सौख्य = शरीर-सुख; धन-अल्पत्व = धन की न्यूनता; बन्धु-स्नेह = बन्धुओं का स्नेह; अथ = और; आदिशेत् = निर्देश करे/कहे — फल-कथन की आज्ञा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व पद की शर्तों पर यह जोड़ा जाता है: योगकारक से संबन्ध, तथा दायेश से केन्द्र या लाभ स्थान में स्थिति। तब शास्त्र देह-सौख्य, धन की अल्पता, और बन्धु-स्नेह का निर्देश करता है — “आदिशेत्” ज्योतिषी को फल कहने की विधि है। सुख और अल्प-धन साथ-साथ कहे गए हैं; एकतरफा “सर्व-शुभ” पाठ नहीं।

English rendering And if there is connection with a yogakāraka, and the planet stands in a kendra or the eleventh from the daśā-lord, the text directs one to declare bodily comfort, scarcity of wealth, and affection of kin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दायेश = D (महादशा-स्वामी की राशि-स्थिति, ०…११)। केन्द्र-from-D: {D, D+3, D+6, D+9} mod 12। लाभ-from-D: D+10 mod 12। योगकारक = लग्न-विशिष्ट (उदा. कन्या-लग्न में शुक्र; तुला-लग्न में शनि — पारंपरिक योगकारक-तालिका; इस पद में नाम नहीं, केवल सम्बन्ध-शर्त)। फल-त्रयी (देहसौख्य, धनाल्पत्व, बन्धुस्नेह) अ-संख्यात्मक फल-कथन है।

उदाहरण (worked example) बुध-महा, केतु-अन्तर (५८.६)। मानें बुध (दायेश) = मकर (चिह्न १०); केतु = मीन (१२)। D से दूरी: १२−१० = २ ⇒ तृतीय, केन्द्र/लाभ नहीं। यदि केतु = तुला (७): ७−१० ≡ −३ ≡ ९ mod 12 ⇒ दशम = केन्द्र-from-D — शर्त पूर्ण। तब शास्त्र “देहसौख्यं धनाल्पत्वं बन्धुस्नेहम्” आदिष्ट करता है। (राशि-चिह्न; दृष्टि/युति अलग जाँच।)

हमारा डिकोड (Our Decode) केन्द्र/लाभ की mod-12 भाव-दूरी वर्ग-इंजन और दशा-फल-फ़िल्टर में उसी चक्रीय अंकगणित से जाँची जाती है — व्याख्या नहीं, शर्त-मिलान। विंशोत्तरी खण्ड (१७×७)/१२० exact `==` अनुपात पर टिका है; फल-पंक्तियों को हम “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं, दशा-इंजन भविष्य नहीं थोपता। गणित और फल-वाक्य अलग रखे जाते हैं — यही इस संस्करण की अनुशासन-रेखा है।

58.8
चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्संचारेण धनागमः |
विद्याकीर्तिर्प्रसङ्गश्च समानप्रभुदर्शनम्
catuṣpājjīvalābhaḥ syātsaṃcāreṇa dhanāgamaḥ |
vidyākīrtirprasaṅgaśca samānaprabhudarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात् = चतुष्पद जीव (पशु); जीवलाभः = जीव-संपत्ति / पशु-लाभ; संचारेण = व्यापार-यात्रा-आवागमन से; धनागमः = धन का आगमन; विद्याकीर्तिः = विद्या और यश; प्रसङ्गः = प्रसंग / संगति-अवसर; समानप्रभुदर्शनम् = समान-पदस्थ / तुल्य-प्रभु का दर्शन-मिलन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवस्था का फल बताता है कि चतुष्पद जीवों से लाभ होता है और संचार-व्यापार के मार्ग से धन का आगमन संभव कहा गया है। विद्या और कीर्ति का प्रसंग बनता है। समान स्तर के प्रभुओं या तुल्य-पदस्थ जनों का दर्शन-मिलन भी इसी फल-कथन में गिनाया गया है। यह फल-वर्णन है, कोई निश्चित घटना-घोषणा नहीं।

English rendering The text states gain through four-footed living stock and inflow of wealth through commerce or travel. It also names occasions of learning and renown, and meeting peers or equals in rank.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा/अन्तर्दशा-फल-वर्णन)। यहाँ कोई वर्गाङ्क, बिन्दु-गणना या काल-अनुपात नहीं; केवल शास्त्र-कथित परिणाम-सूची है।

58.9
भोजनाम्बरसौख्यं च ह्यादौ मध्ये सुखावहम् |
दायेशाद्यदि रन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते
bhojanāmbarasaukhyaṃ ca hyādau madhye sukhāvaham |
dāyeśādyadi randhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजन = आहार; अम्बर = वस्त्र; सौख्यम् = सुख; आदौ = आरम्भ में; मध्ये = मध्य-काल में; सुखावहम् = सुख देने वाला; दायेशः = दशा-स्वामी; रन्ध्रस्थे = अष्टम-भावस्थ; व्यये = व्यय-भाव (द्वादश) में; पापसंयुते = पाप-ग्रह-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भोजन और वस्त्र का सुख मिलता है, और वह सुख विशेषतः आरम्भ तथा मध्य में सुखावह होता है। किन्तु यदि दायेश रन्ध्र (अष्टम) में हो, व्यय (द्वादश) में हो, अथवा पाप-ग्रहों से युक्त हो, तो आगे के श्लोकों में कथित विपरीत फल-क्रम लागू होने की बात कही गई है। यह दशा-स्वामी की स्थिति पर फल-भेद का नियम है।

English rendering The text states comfort in food and clothing, pleasant especially at the beginning and middle of the period. If the daśā-lord stands in the eighth or twelfth, or is joined with malefics, the adverse results named next are said to apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-शर्त (भाव-स्थान)। रन्ध्र = 8वाँ भाव, व्यय = 12वाँ भाव — भावाधार फल-भेद; कोई संख्यात्मक बलाङ्क यहाँ नहीं दिया गया।

58.10
वाहनात्पतनं चैव पुत्रक्लेशादिसम्भवः |
चौरादिराजभीतिश्च पापकर्मरतः सदा
vāhanātpatanaṃ caiva putrakleśādisambhavaḥ |
caurādirājabhītiśca pāpakarmarataḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनात् पतनम् = वाहन से गिरना / वाहन-संकट; पुत्रक्लेशादि = पुत्र-संबंधी क्लेश आदि; सम्भवः = संभावना (शास्त्र-कथन); चौरादिराजभीतिः = चोर आदि और राज-भय; पापकर्मरतः = पाप-कर्म में रत; सदा = निरंतर / बार-बार।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्त (दायेश रन्ध्र/व्यय/पाप-युक्त) लागू होने पर शास्त्र इन संकेतों को गिनाता है — वाहन-संबंधी पतन-संकट, पुत्र-क्लेश आदि की संभावना, चोर-आदि तथा राज-भय, और पाप-कर्म की ओर झुकाव। इन्हें शास्त्र का फल-वर्णन समझें, नियति की घोषणा नहीं। भय बढ़ाने वाले भाषा से अलग रखकर “पाठ क्या कहता है” — यही इस संस्करण का अनुशासन है।

English rendering Under the conditions just stated, the text lists fall or mishap from a vehicle, trouble concerning children, fear of thieves and of royal authority, and a persistent turn toward wrongful acts — as traditional indications, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्व-शर्त पर आधारित)। यहाँ केवल गुणात्मक संकेत हैं; कोई दशा-वर्ष-सूत्र या बल-इकाई नहीं।

58.11
वृश्चिकादिविषाद्भीतिर्नीचैः कलहसंभवः |
शोकरोगादिदुःखं च नीचसङ्गादिकं भवेत्
vṛścikādiviṣādbhītirnīcaiḥ kalahasaṃbhavaḥ |
śokarogādiduḥkhaṃ ca nīcasaṅgādikaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिकादिविषात् = वृश्चिक आदि विष से; भीतिः = भय / सावधानी-संकेत; नीचैः = नीच / अधम जनों से; कलहसंभवः = कलह की संभावना; शोकरोगादिदुःखम् = शोक-रोग आदि दुःख; नीचसङ्गादिकम् = नीच-संगति आदि; भवेत् = होता है (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — वृश्चिक आदि विष-संबंधी भय, नीच जनों से कलह, शोक-रोग आदि का दुःख, और नीच-संगति जैसे प्रसंग। ये सब उसी विपरीत-फल-क्रम की कड़ियाँ हैं जो दायेश की अशुभ स्थिति से जोड़ी गई हैं। पाठ की भाषा को ज्यों-का-त्यों फल-सूची के रूप में पढ़ें; इसे रोग-निदान या भय-व्यापार न बनाएँ।

English rendering The text further states fear connected with scorpion and other poisons, quarrels with base company, grief and illness-type suffering, and association with the low — continuing the adverse phala-list under the stated conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / वर्णनात्मक संकेत-सूची। कोई चाप-विभाजन या बिन्दु-योग यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

58.12
द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं भविष्यति |
तद्दोषपरिहाराय छागदानं तु कारयेत्
dvitīyadyūnanāthe tu dehajāḍyaṃ bhaviṣyati |
taddoṣaparihārāya chāgadānaṃ tu kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय-भाव-स्वामी; द्यूननाथ = सप्तम-भाव-स्वामी (द्यून = सप्तम); देहजाड्यम् = देह-जाड्य / शारीरिक जड़ता-सुस्ती; भविष्यति = होगा (शास्त्र-वचन); तद्दोषपरिहाराय = उस दोष के परिहार हेतु; छागदानम् = छाग (बकरा) का दान; कारयेत् = कराना चाहिए (पाठ-निर्देश)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब द्वितीय और द्यून (सप्तम) के नाथ की स्थिति/संबंध इस प्रसंग में दोष उत्पन्न करे, तो देह-जाड्य का फल बताया गया है। उसी दोष के परिहार के लिए पाठ छाग-दान का विधान करता है। यह शास्त्र का पारंपरिक परिहार-कथन है — दबाव या “जरूर करो नहीं तो…” की भाषा नहीं; केवल यह कि पाठ क्या कहता है। पाठ-भेद या प्रकरण-संयोग अन्य संस्करणों में भिन्न हो सकता है।

English rendering The text states that when the lords of the second and the seventh (dyūna) are involved in the stated fault, bodily dullness or inertia is indicated. For the removal of that fault it prescribes the gift of a goat — a traditional śāstric rite-statement, not a pressure-remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + पारंपरिक परिहार-विधान। द्वितीय = 2, द्यून/सप्तम = 7 — भाव-स्वामी-संदर्भ; कोई संख्यात्मक बल-या दशा-वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं।

58.13
सौम्यस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रे लाभे त्रिकोणगे |
सत्कथापुण्यधर्मादिसंग्रहः पुण्यकर्मकृत्
saumyasyāntargate śukre kendre lābhe trikoṇage |
satkathāpuṇyadharmādisaṃgrahaḥ puṇyakarmakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्यस्य-अन्तर्गते शुक्रे = सौम्य (=बुध) की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा में; केन्द्रे = केन्द्र (1/4/7/10) में; लाभे = लाभ (11th) में; त्रिकोण-गे = त्रिकोण (1/5/9) में स्थित; सत्-कथा-पुण्य-धर्म-आदि-संग्रहः = सत्कथा, पुण्य, धर्म आदि का संचय; पुण्य-कर्म-कृत् = पुण्यकर्म करने वाला।

हिन्दी भावार्थ अब बुध-महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का प्रकरण आरम्भ होता है। शास्त्र कहता है — यदि शुक्र केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में स्थित हो, तो जातक सत्कथा, पुण्य और धर्म का संग्रह करता है और पुण्यकर्मपरायण होता है। (यहाँ "सौम्य" = बुध की संज्ञा है।)

English rendering Now Venus's sub-period within Mercury's major period: with Venus in a kendra, the 11th, or a trikoṇa, one gathers holy discourse, merit and dharma, and becomes a doer of pious deeds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-समुच्चय-गणित: केन्द्र = {1, 4, 7, 10}, लाभ = {11}, त्रिकोण = {1, 5, 9}। शुभ-स्थिति-समुच्चय = {1, 4, 5, 7, 9, 10, 11}। संज्ञा-कुंजी: सौम्य = बुध (Mercury); अतः यह बुध-शुक्र अन्तर्दशा है।

उदाहरण (worked example) सम्मेलन: विमशोत्तरी, चन्द्र-नक्षत्र-कीलित, 120-वर्ष चक्र। बुध महादशा = 17 वर्ष; शुक्र-अंश = 20 वर्ष। बुध-शुक्र अन्तर्दशा-मान = 17 × 20 ÷ 120 = 340/120 = 17/6 वर्ष = 2.8333… वर्ष = ठीक 2 वर्ष 10 मास। यही बुध-महादशा की सबसे दीर्घ अन्तर्दशा है (शुक्र-अंश 20 सर्वाधिक होने से)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह मान हमारे विमशोत्तरी इंजन के सूत्र अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 से आता है (dossier §3: Śukra 20, Budha 17, Σ = 120)। शुद्ध अनुपात-गणित नियतांकीय है; श्लोक की भाव-शर्त व सत्कथा-पुण्य-धर्म का फल उसी काल-खण्ड पर शास्त्र का कथन है।

58.14
मित्रप्रभुवशादिष्टं क्षेत्रलाभः सुखं भवेत् |
दशाधिपात्केन्द्रगते त्रिकोणे लाभगेऽपि वा
mitraprabhuvaśādiṣṭaṃ kṣetralābhaḥ sukhaṃ bhavet |
daśādhipātkendragate trikoṇe lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्रप्रभुवशात् = मित्रों तथा स्वामी/राजा के अनुग्रह से; इष्टम् = अभीष्ट, शुभ; क्षेत्रलाभः = भूमि/खेत का लाभ; सुखं भवेत् = सुख होता है; दशाधिपात् = दशानाथ (यहाँ बुध महादशेश) से गिनकर; केन्द्रगते = केन्द्र (1/4/7/10) में स्थित होने पर; त्रिकोणे = त्रिकोण (1/5/9) में; लाभगे = लाभ-भाव (11वें) में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पिछले (58.13) की शुक्र-अन्तर्दशा-प्रसंग को आगे बढ़ाता है — बुध की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा। शास्त्र कहता है कि जब अन्तरेश शुक्र दशानाथ से केन्द्र, त्रिकोण अथवा लाभ-स्थान में हो, तब मित्रों और स्वामी के अनुग्रह से इष्ट फल, भूमि-लाभ और सुख प्राप्त होता है। यह शुभ योग की स्थिति-शर्त है, फल नहीं थोपता।

English rendering In Budha's mahādaśā, during Śukra's sub-period — when Śukra stands in a kendra, trikoṇa, or the 11th from the daśā-lord — the text says one gains the favour of friends and rulers, acquisition of land, and happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना (स्थिति-शर्त): केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11. किसी संदर्भ-ग्रह X से किसी ग्रह p का भाव: H_X(p) = ((R_p − R_X) mod 12) + 1, जहाँ R = राशि-सूचकांक 0…11. अन्तर्दशा-अवधि का मान विंशोत्तरी से: अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तरेश-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) बुध महादशा = 17 वर्ष, शुक्र = 20 वर्ष (विंशोत्तरी)। बुध–शुक्र अन्तर = (17 × 20) ÷ 120 = 340⁄120 = 2.8333… वर्ष = 34 माह = 2 वर्ष 10 माह (सम्मेलन: 1 वर्ष = 12 माह = 360 सावन दिन)।

हमारा डिकоड (Our Decode): यही अन्तर-सूत्र अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तरेश-वर्ष)/120 हमारे विंशоत्तरी इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित है (Σ = 120 वर्ष; बुध 17)। "दशाधिपात् केन्द्र/त्रिकोण/लाभ" — अन्तरेश की स्थिति को महादशेश से गिनना — वही मॉड्युलर भाव-सूत्र है जिसे इंजन प्रयोग करता है; यहाँ राशि-चक्र पर विशुद्ध पूर्णांक-अंकगणित।

58.15
तत्काले श्रियमाप्नोति राजश्रीधनसम्पदः |
वापीकूपतडागदिदानधर्मादिसंग्रहः
tatkāle śriyamāpnoti rājaśrīdhanasampadaḥ |
vāpīkūpataḍāgadidānadharmādisaṃgrahaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काले = उसी काल/अवधि में; श्रियम् = श्री, समृद्धि; आप्नोति = प्राप्त करता है; राजश्री = राजकीय सम्मान/प्रतिष्ठा; धनसम्पदः = धन और संपत्ति; वापीकूपतडागादि = बावड़ी, कुआँ, तालाब आदि; दानधर्म = दान और धर्म-कार्य; संग्रहः = संचय/संग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवधि के अनुकूल फल का वर्णन करता है। तत्कालीन दशा-अवधि में व्यक्ति को श्री-समृद्धि तथा राजश्री, धन और संपत्ति की प्राप्ति का कथन है। साथ ही वापी, कूप, तड़ाग आदि जल-संसाधनों तथा दान-धर्म संबंधी संग्रह-कार्यों का भी उल्लेख किया गया है। यह फल-कथन दशा-फल के क्रम में अनुकूल परिणाम का संकेत है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that in that period one obtains prosperity, royal honour, and wealth. It further mentions the acquisition or undertaking of wells, tanks, ponds and the like, together with the gathering of acts of dāna and dharma.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनुकूल दशा-फल)। यहाँ कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष-सूत्र नहीं; केवल दशा-अवधि के अनुकूल फलों की सूची है।

58.16
व्यवसायात्फलाधिक्यं धनधान्यसमृद्धिकृत् |
दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते
vyavasāyātphalādhikyaṃ dhanadhānyasamṛddhikṛt |
dāyeśātṣaṣṭharandhrasthe vyaye vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसायात् = व्यापार/उद्यम से; फलाधिक्यम् = फल की अधिकता; धनधान्यसमृद्धिकृत् = धन-धान्य की समृद्धि करने वाला; दायेशात् = दशानाथ (बुध) से गिनकर; षष्ठरन्ध्रस्थे = छठे (षष्ठ) या आठवें (रन्ध्र) में स्थित; व्यये = बारहवें (व्यय) में; वा = अथवा; बलवर्जिते = बल से रहित (दुर्बल) होने पर।

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध शुभ-फल पूर्ण करता है — व्यवसाय से अधिक लाभ, धन-धान्य की समृद्धि। उत्तरार्ध पलटाव की शर्त रखता है: शास्त्र कहता है कि जब अन्तरेश शुक्र दशानाथ से 6/8/12 भाव में हो, अथवा बलहीन हो, तब (आगामी श्लोकों का) अनिष्ट-फल आता है।

English rendering From enterprise, abundant returns and prosperity of wealth and grain. But if — reckoned from the daśā-lord — the sub-lord occupies the 6th, 8th, or 12th, or is devoid of strength, the reverse (following verses) is declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दुःस्थान-समुच्चय: त्रिक = {6, 8, 12} (षष्ठ = अरि, रन्ध्र = 8, व्यय = 12)। स्थिति H_दायेश(शुक्र) ∈ {6,8,12} → अनिष्ट-शर्त। "बलवर्जित" = षड्बल-योग किसी ग्रह के अपेक्षित रूप-सीमा (threshold, Ch.27) से नीचे; 1 रूप = 60 विरूप।

उदाहरण (worked example) दायेश बुध मेष (राशि 0) में मानें। तब उससे 6ठा = कन्या, 8वाँ = वृश्चिक, 12वाँ = मीन। यदि अन्तरेश शुक्र इनमें से किसी में हो → 58.17–18 की अनिष्ट-शर्त सक्रिय। सूत्र-जाँच: शुक्र मीन में → H = ((11 − 0) mod 12) + 1 = 12 = व्यय ✓।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवर्जित" सीधे षड्बल से जुड़ता है — हमारे ढाँचे में स्थान/दिक्/काल/चेष्टा/नैसर्गिक/दृग् बल का योग रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में, प्रति-ग्रह देहली से तुलित। यहाँ शास्त्र स्वयं "बल" को फल की गणनात्मक शर्त बनाता है — व्याख्या नहीं, संख्या।

58.17
हृद्रोगो मानहानिश्च ज्वरातीसारपीडनम् |
आत्मबन्धुवियोगश्च संसारे भवति ध्रुवम्
hṛdrogo mānahāniśca jvarātīsārapīḍanam |
ātmabandhuviyogaśca saṃsāre bhavati dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हृद्रोगः = हृदय-संबंधी कष्ट (शास्त्रीय फल-शब्द); मानहानिः = मान/प्रतिष्ठा की हानि; ज्वर = ज्वर; अतीसार = अतिसार; पीडनम् = पीड़ा; आत्मबन्धु = स्वजन/बन्धु; वियोगः = वियोग; संसारे = संसार में; ध्रुवम् = निश्चयपूर्वक (शास्त्र की अपनी भाषा)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक में दायेश के षष्ठ-रन्ध्र-व्यय-स्थित या बलहीन होने पर शास्त्र जो फल कहता है, वही यहाँ विस्तार से आता है। पाठ कहता है — हृद्रोग, मानहानि, ज्वर-अतीसार की पीड़ा, तथा आत्म-बन्धुओं से वियोग — संसार में यह फल “ध्रुव” कहा गया है। यह शास्त्र का अपना फल-वाक्य है; चिकित्सा-निदान, भय-व्यापार या निश्चित भविष्यवाणी नहीं। “ध्रुवम्” पाठ की शैली है, हमारा दावा नहीं।

English rendering The text states that under the adverse condition just named there occur heart affliction, loss of honour, torment of fever and dysentery, and separation from one’s own kin — declared in the śāstra’s own voice as sure within saṃsāra. This is the text’s phala-statement, not a clinical or fatalistic claim we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रतिकूल दशा-फल)। कोई अंश, वर्ष-संख्या या बल-इकाई यहाँ नहीं; केवल 58.16 की शर्त से जुड़ा फलादेश है।

58.18
आत्मकष्टं मनस्तापदायकं द्विजसत्तम |
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति
ātmakaṣṭaṃ manastāpadāyakaṃ dvijasattama |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मकष्टम् = स्वयं को कष्ट; मनस्तापदायकम् = मन को सन्ताप देने वाला; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय के प्रति सम्बोधन — संवाद-सूचक); द्वितीयद्यूननाथे = दूसरे या सातवें (द्यून = 7) भाव के स्वामी होने पर; तु = किन्तु; हि = निश्चय ही; अपमृत्युः भविष्यति = अकाल-मृत्यु का भय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ सम्बोधन "द्विजसत्तम" इस अध्याय के गुरु-शिष्य संवाद-ढाँचे को दर्शाता है। शास्त्र कहता है कि जब अन्तरेश शुक्र द्वितीय या सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो आत्म-कष्ट, मन का सन्ताप, तथा अपमृत्यु-भय की आशंका बताई जाती है। यह पाठ का कथन है — हम इसे नियति या निश्चयवाणी रूप में नहीं प्रस्तुत करते।

English rendering O best of the twice-born — this brings self-suffering and mental anguish; and should the sub-lord own the 2nd or 7th house, the text speaks of the danger of untimely death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मारक-स्थिति: मारक-भाव = {2, 7}; शर्त = अन्तरेश इन भावों का अधिपति। यह स्वामित्व-आधारित पूर्णांक-नियम है (भाव-स्वामी की पहचान लग्न-सापेक्ष), संख्यात्मक फल नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारे अनुशासन का केन्द्र-बिन्दु: गणित और व्याख्या को अलग रखो। "2/7 का अधिपति" — यह विशुद्ध स्थिति-नियम है (गणनीय); "अपमृत्यु" — यह शास्त्र का फल-दावा है, जिसे हम "पाठ कहता है" रूप में देते हैं, भविष्यवाणी या भय रूप में कभी नहीं।

58.19
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवीजपं चरेत् |
जगदम्बाप्रसादेन ततः शान्तिमवाप्नुयात्
taddoṣaparihārārthaṃ durgādevījapaṃ caret |
jagadambāprasādena tataḥ śāntimavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष = उस दोष का; परिहारार्थम् = निवारण के लिए; दुर्गा-देवी-जपम् = दुर्गा देवी का जप; चरेत् = करे; जगदम्बा = जगज्जननी; प्रसादेन = कृपा से; शान्तिम् = शांति; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त दोष/प्रतिकूल फल के परिहार हेतु शास्त्र दुर्गा-देवी-जप का निर्देश देता है। जगदम्बा के प्रसाद से शांति की प्राप्ति कही गई है। यह शास्त्र की अपनी शांति-विधि है; दबाव-युक्त उपाय-व्यापार या भय-से-प्रेरित “अनिवार्य उपचार” नहीं। फल-कथन और परिहार-कथन दोनों पाठ की वाणी में रखें।

English rendering For the removal of that fault, the text enjoins japa of Goddess Durgā; by the grace of the World-Mother, peace is said to be obtained. This is the śāstra’s own śānti-statement, not a pressure-remedy we impose.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिहार/स्तुति-विधि (जप-निर्देश)। कोई दशा-वर्ष, बल-रुप या बिन्दु-गणना यहाँ नहीं; केवल शास्त्रोक्त जप-शांति का कथन है।

58.20
सौम्यस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे |
त्रिकोणे धनलाभे तु तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा
saumyasyāntargate sūrye svocce svakṣetrakendrage |
trikoṇe dhanalābhe tu tuṅgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्यस्य = बुध की; अन्तर्गत = अंतर्दशा में; सूर्ये = सूर्य; स्वोच्चे = स्वोच्च (मेष में सूर्य); स्वक्षेत्र = स्वराशि (सिंह); केन्द्र = 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 1, 5, 9; धन = द्वितीय; लाभ = एकादश; तुङ्गांश = उच्च-नवांश; स्वांश = स्व-नवांश।

हिन्दी भावार्थ अब नया दशा-खंड: जब बुध की अंतर्दशा में सूर्य फल देता है, और सूर्य स्वोच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, त्रिकोण, धन या लाभ भाव में हो, अथवा तुङ्गांश/स्वांश में हो — तब अनुकूल फल आगे कहा जाएगा। यह ग्रह-स्थिति + वर्ग-अंश (D9) दोनों की शर्त है। अंतर्दशा-क्रम विंशोत्तरी की ग्रह-शृंखला पर चलता है; फल तभी “अनुकूल” पक्ष में गिना जाता है जब ये स्थिति-शर्तें पूरी हों।

English rendering When the Sun operates in Mercury’s antardaśā, and is exalted, in its own sign, in a kendra or trikoṇa, in the second or eleventh, or in exaltation- or own-navāṃśa, the favourable results of the next verse are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
(1) विंशोत्तरी अंतर्दशा (वर्ष):
 अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अंतर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120
 सूर्य महादशा = 6 वर्ष; बुध = 17 वर्ष → बुध की अंतर्दशा सूर्य-महादशा में = (6 × 17)/120 = 0.85 वर्ष ≈ 10.2 मास।
 (यहाँ “सौम्यस्यान्तर्गते सूर्ये” = बुध-अंतर्गत सूर्य; महादशा-ग्रह पाठ-क्रम पर निर्भर — दशा-सारिणी से मिलाएँ।)
(2) स्थिति-शर्तें (D1, घोषित अयनांश):
 स्वोच्च: सूर्य ≈ 10° मेष (परंपरागत उच्च-बिंदु); स्वक्षेत्र: सिंह (120°–150°)।
 केन्द्र = भाव 1/4/7/10; त्रिकोण = 1/5/9; धन = 2; लाभ = 11 (लग्न से)।
(3) अंश-शर्त (D9): तुङ्गांश = उच्च-राशि का नवांश; स्वांश = स्वराशि का नवांश।
 नवांश-चाप = 30°/9 = 3°20′; नवांश-सूचकांक = ⌊(λ mod 30°)/ (10°/3)⌋ ।

उदाहरण (worked example) अयनांश = लाहिरी; लग्न = कन्या। सूर्य-स्पष्ट = 5°00′ मेष (स्वोच्च-समीप)। बुध-अंतर्दशा सूर्य-महादशा में चल रही हो (0.85 वर्ष का खंड)। लग्न से सूर्य 8वें नहीं, अपितु — कन्या-लग्न से मेष = अष्टम; अतः केन्द्र/त्रिकोण/धन/लाभ की शर्त D1 में यहाँ नहीं मिलती। यदि सूर्य 15° सिंह (लग्न-कन्या से 12वें) — भी व्यय। अनुकूल उदाहरण: लग्न = मेष, सूर्य = 15° सिंह → स्वक्षेत्र + केन्द्र (5? नहीं — सिंह = पंचम = त्रिकोण ✓)। पंचम = त्रिकोण; शर्त “त्रिकोणे” पूरी। D9: 15° सिंह → सिंह में नवांश-सूचकांक = ⌊15 / (10/3)⌋ = ⌊4.5⌋ = 4 → पाँचवाँ नवांश (0-आधार पर 4); सिंह के नवांश क्रम से स्वांश/अन्य जाँचें। शर्त पूरी होने पर 58.21 का फल लागू।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120) — तथा अंतर्दशा = (महा × अंतर्)/120, यही अनुपात-गणित दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बैठा है। इस श्लोक की “सौम्यस्यान्तर्गते सूर्ये” शर्त उसी काल-खंड पर फल-द्वार खोलती है; स्थिति-जाँच D1/D9 के नियत चाप-नियमों से की जाती है — गणना और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

58.21
राजप्रसादसुभाग्यं मित्रप्रभुवशात्सुखम् |
भूम्यात्मजेन संदृष्टे आदौ भूलाभमादिशेत्
rājaprasādasubhāgyaṃ mitraprabhuvaśātsukham |
bhūmyātmajena saṃdṛṣṭe ādau bhūlābhamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजप्रसाद = राजा/शासन की कृपा; सुभाग्यम् = उत्तम भाग्य; मित्रप्रभु = मित्र और प्रभु/स्वामी; वशात् = के वश से; सुखम् = सुख; भूम्यात्मज = मंगल (भूमि-पुत्र); संदृष्टे = दृष्ट होने पर; आदौ = आरंभ में; भूलाभम् = भूमि-लाभ; आदिशेत् = कहना/निर्देश देना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ 58.20 की अनुकूल स्थिति में शास्त्र कहता है — राजप्रसाद, सुभाग्य, तथा मित्र व प्रभु के कारण सुख। यदि भूम्यात्मज (मंगल) की दृष्टि हो, तो दशा-खंड के आरंभ में भूमि-लाभ का निर्देश है। यह फल-क्रम “आदिशेत्” — ज्योतिषी को कहने योग्य शास्त्रोक्त संकेत — है; संपत्ति-गारंटी या भय-व्यापार नहीं। दृष्टि यहाँ शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि (पूर्ण/आंशिक, अध्याय 8 के नियम) से समझी जाती है।

English rendering The text states royal favour, good fortune, and happiness through friends and lords. When aspected by Mars (Bhūmyātmaja), land-gain is to be indicated at the outset of the period. This is the śāstra’s phala-directive, not a commercial guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनुकूल दशा-फल + मंगल-दृष्टि की शर्त)। तकनीक केवल: (क) 58.20 की स्थिति-शर्तें सत्य हों; (ख) मंगल की दृष्टि सूर्य पर हो (पारंपरिक दृष्टि: मंगल 4, 7, 8 भाव पूर्ण — पाठ-भेद/परंपरा घोषित करें); (ग) “आदौ” = अंतर्दशा-खंड का प्रारंभिक भाग (मात्रा शास्त्र में यहाँ संख्याबद्ध नहीं)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; सूर्य = 15° सिंह (स्वक्षेत्र, त्रिकोण — 58.20 ✓)। मंगल = 15° वृश्चिक → सूर्य पर मंगल की 8वीं दृष्टि (वृश्चिक से 8 = सिंह) सक्रिय। बुध-अंतर्गत सूर्य-खंड के आरंभ में शास्त्र “भूलाभ” का फल आदिष्ट करता है — यह पाठ का कथन है, भूमि-लेन-देन की भविष्य-गारंटी नहीं।

58.22
लग्नाधिपेन संदृष्टे बहुसौख्यं धनागमम् |
ग्रामभूम्यादिलाभं च भोजनाम्बरसौख्यकृत्
lagnādhipena saṃdṛṣṭe bahusaukhyaṃ dhanāgamam |
grāmabhūmyādilābhaṃ ca bhojanāmbarasaukhyakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिप = लग्न-स्वामी (D1 का उदित-राशि अधिपति); संदृष्टे = जब (ग्रहादि) उस लग्नाधिप की दृष्टि से युक्त हो; बहुसौख्यम् = प्रचुर सुख; धनागमम् = धन का आगमन; ग्रामभूम्यादिलाभम् = ग्राम, भूमि आदि का लाभ; भोजन-अम्बर-सौख्यकृत् = भोजन और वस्त्र का सुख देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस दशा-अवस्था में (पूर्व-संदर्भित) कारक लग्नाधिप से संदृष्ट हो, वहाँ बहुविध सुख और धन-आगमन का संकेत है। उसी दृष्टि-युक्ति से ग्राम-भूमि आदि का लाभ भी कहा गया है। भोजन और अम्बर (वस्त्र) का सौख्य भी इसी योग-अवस्था से जोड़कर बताया गया है। यह फल-कथन दृष्टि और स्थान-सम्बन्ध पर टिका है, न कि स्वतन्त्र भाग्य-घोषणा पर।

English rendering The text states that when (the relevant factor) is aspected by the lagna-lord, there is much ease and inflow of wealth. It further assigns gain of village, land and the like, and comfort of food and clothing, to that same aspected condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि-योग पर आधारित दशा-फल)। “संदृष्ट” यहाँ शास्त्रीय दृष्टि-नियम (ग्रहानुसार 7वीं आदि पूर्ण/विशेष दृष्टियाँ) का अनुप्रयोग है; संख्यात्मक गुणांक या भाग-गणना इस श्लोक में नहीं दी गई।

58.23
लग्नाष्टमव्यये वापि शन्यारफणिसंयुते |
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते
lagnāṣṭamavyaye vāpi śanyāraphaṇisaṃyute |
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाष्टमव्यये = लग्न, अष्टम या व्यय (1/8/12) में; वा अपि = अथवा; शनि-आर-फणि-संयुते = शनि, आर (मंगल) और फणि (राहु) से युक्त; दायेशात् = दशानाथ (बुध) से; रिपुरन्ध्रस्थे = षष्ठ (रिपु) या अष्टम (रन्ध्र) में; व्यये = बारहवें में; वा = अथवा; बलवर्जिते = बलहीन।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-अन्तर की अनिष्ट-शर्त। शास्त्र कहता है कि जब सूर्य लग्न/8/12 में हो और शनि-मंगल-राहु से युक्त हो, अथवा दशानाथ से 6/8/12 में या बलहीन हो, तब आगामी अनिष्ट-फल आता है। फणि = सर्प = राहु का संकेत-नाम।

English rendering Or if the Sun stands in the lagna, 8th, or 12th joined with Saturn, Mars, and Rāhu — or, from the daśā-lord, in the 6th, 8th, or 12th, or bereft of strength — (the ills below follow).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दुःस्थान-समुच्चय: लग्न-सापेक्ष {1,8,12}; दायेश-सापेक्ष {6,8,12}; H_दायेश(सूर्य) = ((R_सूर्य − R_बुध) mod 12)+1। पापयोग-संकेत: शनि + आर (मंगल) + फणि (राहु)। "बलवर्जित" = षड्बल-योग < अपेक्षित देहली (Ch.27; 1 रूप = 60 विरूप)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ फिर "बलवर्जित" फल की गणनात्मक शर्त है — हमारे ढाँचे में षड्बल का रूप/विरूप-योग प्रति-ग्रह देहली से तुलित। पाप-नाम (शनि/आर/फणि) और दुःस्थान-समुच्चय स्थिति-नियम हैं; अनिष्ट-फल (अगला श्लोक) पाठ का दावा — दोनों को हम अलग रखते हैं।

58.24
चौरादिशस्त्रपीडा च पित्ताधिक्यं भविष्यति |
शिरोरुङ्मनसस्ताप इष्टबन्धुवियोगकृत्
caurādiśastrapīḍā ca pittādhikyaṃ bhaviṣyati |
śiroruṅmanasastāpa iṣṭabandhuviyogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौरादि-शस्त्र-पीडा = चोर आदि और शस्त्र से पीड़ा; पित्ताधिक्यम् = पित्त की अधिकता (शास्त्र-कथित शारीरिक संकेत); शिरोरुक् = शिर का दुःख; मनसः ताप = मन का ताप/सन्ताप; इष्ट-बन्धु-वियोगकृत् = प्रिय बन्धुओं से वियोग कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अशुभ अवस्थाओं पर शास्त्र कहता है — चौरादि और शस्त्र-पीड़ा का संकेत, तथा पित्ताधिक्य का उल्लेख। शिरोरुक् और मनस्ताप भी उसी फल-श्रृंखला में गिने गए हैं। इष्ट बन्धु से वियोग का कारक-भाव भी पाठ यहाँ जोड़ता है। ये सब शास्त्र के फल-वाक्य हैं; चिकित्सा-निदान या निश्चित भावी घटना के रूप में नहीं पढ़े जाने चाहिए।

English rendering Continuing the prior conditions, the text states affliction from thieves and weapons, and excess of pitta. It also names head-pain, mental distress, and separation from dear kin as results of that configuration — as scriptural phala, not as clinical or fated decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ दशा-अवस्था का परिणाम-वर्णन)। संख्या, अंश या बल-इकाई यहाँ निर्दिष्ट नहीं; फल पूर्व-श्लोक की स्थान-संयोग-बलहीनता शर्तों पर निर्भर है।

58.25
द्वितीयसप्तमाधीशे ह्यपमृत्युर्भविश्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिं कुर्याद्यथाविधि
dvitīyasaptamādhīśe hyapamṛtyurbhaviśyati |
taddoṣaparihārārthaṃ śāntiṃ kuryādyathāvidhi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-सप्तम-अधीशे = द्वितीय और सप्तम भावों के अधिपति (की दशा/अन्तर-अवस्था) में; अपमृत्युः = अपमृत्यु (शास्त्र-शब्द; “अकाल/अप्राकृत मृत्यु-संकेत” का पारम्परिक फल-पद); भविष्यति ≈ भविश्यति (पाठ-भेद संभव); तद्-दोष-परिहारार्थम् = उस दोष के परिहार हेतु; शान्तिम् = शान्ति-विधि; यथाविधि = विधि के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्वितीय-सप्तमाधीश सम्बन्धी (दशा) अवस्था में अपमृत्यु का फल कहा गया है — यह पाठ का फल-पद है, न कि हमारे द्वारा दी गई निश्चित भविष्यवाणी। उसी दोष के परिहार के लिए शास्त्र स्वयं “यथाविधि शान्ति” का निर्देश जोड़ता है। “भविश्यति” रूप विकिस्रोत-पाठ में दिखाई देता है; सामान्यतः भविष्यति अभीष्ट है — पाठ-भेद संभव। भय या दबाव-युक्त उपाय-व्यापार यहाँ नहीं; केवल शास्त्र-कथन का अनुवाद है।

English rendering The text states that under the (daśā) condition of the lords of the second and the seventh, apamṛtyu is indicated — a traditional phala term of the śāstra, not a certainty we assert. For the removal of that doṣa it prescribes śānti performed according to rule. The form bhaviśyati in the source is likely a variant of bhaviṣyati (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + विधि-निर्देश (अपमृत्यु-फल और शान्ति)। द्वितीय=2, सप्तम=7 भाव-स्वामी की पहचान D1 लग्न से होती है; कोई वर्ष-संख्या, अंश-सूत्र या बल-सीमा इस श्लोक में नहीं है।

58.26
सौम्यस्यान्तर्गते चन्द्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि गुरुदृष्टिसमन्विते
saumyasyāntargate candre lagnātkendratrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vāpi gurudṛṣṭisamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्यस्य अन्तर्गत = सौम्य (बुध/शुभ ग्रह) की अन्तर्दशा में; चन्द्रे = चन्द्र जब; लग्नात् केन्द्र-त्रिकोण-गे = लग्न से केन्द्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में स्थित; स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; स्वर्क्षगे = अपने राशि/स्वक्षेत्र में; गुरु-दृष्टि-समन्विते = गुरु की दृष्टि से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शुभ फल की शर्तें गिनाता है: सौम्य की अन्तर्दशा में चन्द्र, और वह चन्द्र लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो। अथवा चन्द्र स्वोच्च या स्वर्क्ष में हो, और गुरु-दृष्टि से समन्वित हो। ये सब मिलकर अगले श्लोकों के योग-प्राबल्य और लाभ-फल की भूमि बनाते हैं। “सौम्य” यहाँ मुख्यतः बुध-परक अन्तर्दशा-संदर्भ में पढ़ा जाता है; व्यापक “शुभ” अर्थ भी परम्परा में चलता है — पाठ-भेद/अर्थ-भेद संभव।

English rendering The text sets auspicious conditions: the Moon in a saumya antardaśā, placed from the lagna in a kendra or trikoṇa. Alternatively, the Moon in exaltation or own sign, and accompanied by Jupiter’s aspect. These placements frame the strength of yoga and gains stated in the following verses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-जाँच (कोई नया स्थिरांक नहीं) — भाव-मॉड्यूलर सम्बन्ध। लग्न-राशि L (1…12) और चन्द्र-राशि M पर:
केन्द्र ⟺ (M − L) mod 12 ∈ {0, 3, 6, 9}; त्रिकोण ⟺ (M − L) mod 12 ∈ {0, 4, 8}।
स्वोच्च/स्वक्षेत्र और गुरु-दृष्टि पारम्परिक राशि-नियमों से जाँचे जाते हैं। अन्तर्दशा-अवधि स्वयं इस श्लोक में नहीं दी; विंशोत्तरी में अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — वह Ch.46–47 का अनुपात-नियम है, यहाँ केवल “सौम्यस्यान्तर्गते” पद की काल-सीमा है।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष (L=1), चन्द्र = सिंह (M=5)। (M−L) mod 12 = 4 → त्रिकोण (5वें) — शर्त “लग्नात् … त्रिकोणगे” पूरी। यदि यही चन्द्र वृष (उच्च) में हो और गुरु उससे शास्त्रीय दृष्टि (गुरु: 5, 7, 9) से देखे, तो “स्वोच्चे … गुरुदृष्टिसमन्विते” भी लागू। अन्तर्दशा-पहचान के लिए चन्द्र-नक्षत्र-अंश और विंशोत्तरी कुंजी अलग से लगानी होती है (ayanāṃśa घोषित करें; यहाँ केवल भाव-स्थान दिखाया)।

58.27
योगस्थानाधिपत्येन योगप्राबल्यमादिशेत् |
स्त्रीलाभं पुत्रलाभं च वस्त्रवाहनभूषणम्
yogasthānādhipatyena yogaprābalyamādiśet |
strīlābhaṃ putralābhaṃ ca vastravāhanabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योग-स्थान-अधिपत्येन = योग-स्थान के अधिपत्य से; योग-प्राबल्यम् = योग का प्राबल्य/बल; आदिशेत् = निर्देश करे / कहे; स्त्रीलाभम् = स्त्री का लाभ; पुत्रलाभम् = पुत्र का लाभ; वस्त्र-वाहन-भूषणम् = वस्त्र, वाहन और आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि योग-स्थान के अधिपत्य से योग का प्राबल्य आंका/आदिष्ट किया जाए। उसी शुभ भूमि पर स्त्रीलाभ और पुत्रलाभ का फल कहा गया है। वस्त्र, वाहन और भूषण का लाभ भी इसी योग-प्राबल्य से जोड़ा गया है। यह पूर्व श्लोक (५८.२६) की सौम्य-अन्तर + चन्द्र-स्थिति शर्तों का फल-विस्तार है।

English rendering The text directs that the strength of a yoga be declared from the lordship of the yoga’s place. Under that strength it states gain of a wife and of a son, and also clothes, conveyances, and ornaments — as phala of the prior auspicious setup, not as guarantees we impose.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-प्राबल्य का गुणात्मक निर्देश + लाभ-सूची)। “योगस्थान” की पहचान पूर्व शर्तों (केन्द्र/त्रिकोण, स्वोच्च/स्वक्षेत्र, गुरु-दृष्टि) से होती है; कोई रूप/विरूप या वर्ष-संख्या यहाँ नहीं दी गई।

58.28
नूतनालयलाभं च नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् |
गीतवाद्यप्रसंगं च शास्त्रविद्यापरिश्रमम्
nūtanālayalābhaṃ ca nityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
gītavādyaprasaṃgaṃ ca śāstravidyāpariśramam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नूतन-आलय-लाभम् = नए आवास/गृह का लाभ; नित्यम् = प्रतिदिन / निरन्तर; मिष्ठान्न-भोजनम् = मिष्ठान्न (मधुर अन्न) का भोजन; गीत-वाद्य-प्रसंगम् = गीत और वाद्य का प्रसंग; शास्त्र-विद्या-परिश्रमम् = शास्त्र और विद्या में परिश्रम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्व योग-प्राबल्य के क्रम में और फल जोड़ता है — नए आलय का लाभ, और नित्य मिष्ठान्न-भोजन का सुख। गीत-वाद्य का प्रसंग भी इसी शुभ दशा-अवस्था से जोड़ा गया है। शास्त्र-विद्या में परिश्रम का संकेत पाठ के अन्त में आता है — यह भी फल-वर्णन है, अध्ययन-विधि का गणित नहीं। समस्त ५८.२६–२८ एक शुभ-शर्त → योग-प्राबल्य → विविध लाभ की कड़ी है।

English rendering The text continues the auspicious results: gain of a new dwelling and daily enjoyment of sweet food. It also states occasion for song and instruments, and diligent application to śāstra and learning. These close the phala-chain begun with the Moon’s saumya-antardaśā conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ दशा-योग का विस्तारित लाभ-वर्णन)। कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-तालिका, दशा-वर्ष या बल-इकाई इस श्लोक में कूटित नहीं।

58.29
दक्षिणां दिशमाश्रित्य प्रयाणं च भविष्यति |
द्वीपान्तरादिवस्त्राणां लाभश्चैव भविष्यति
dakṣiṇāṃ diśamāśritya prayāṇaṃ ca bhaviṣyati |
dvīpāntarādivastrāṇāṃ lābhaścaiva bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दक्षिणां दिशम् = दक्षिण दिशा; आश्रित्य = आश्रय लेकर / उस ओर; प्रयाणम् = प्रस्थान, यात्रा; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन); द्वीपान्तरादि = द्वीप-पार / समुद्र-पार आदि; वस्त्राणाम् = वस्त्रों का; लाभः = प्राप्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस स्थिति में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा का संकेत मिलता है। साथ ही द्वीप-पार या दूर प्रदेशों से वस्त्रादि का लाभ भी वर्णित है। यहाँ फल-कथन दिशा और वस्तु-प्राप्ति के रूप में है — इसे नियति या निश्चित घटना के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। पाठ और सन्दर्भ (किस दशा/भुक्ति का फल) संस्करण-भेद से जुड़ सकता है।

English rendering The text states that a journey toward the southern direction is indicated, and also the gain of garments and similar goods from across islands or distant lands. This is a phala statement of the śāstra, not a forecast to be treated as fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दिशा-यात्रा एवं वस्तु-लाभ)। यह अवधि-फल का वर्णनात्मक नियम है; कोई अंश, वर्ष-मान, या वर्ग-विभाजन यहाँ कूटित नहीं है।

58.30
मुक्ताविद्रुमरत्नानि धौतवस्त्रादिकं लभेत् |
नीचारिक्षेत्रसंयुक्ते देहबाधा भविष्यति
muktāvidrumaratnāni dhautavastrādikaṃ labhet |
nīcārikṣetrasaṃyukte dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुक्ता = मोती; विद्रुम = मूँगा; रत्नानि = रत्न; धौतवस्त्रादिकम् = धुले/शुभ्र वस्त्र आदि; लभेत् = प्राप्त करे (शास्त्र-कथन); नीच = नीच स्थान; अरि = शत्रु; क्षेत्र = राशि/क्षेत्र (शत्रु-क्षेत्र आदि); संयुक्ते = युक्त होने पर; देहबाधा = देह-सम्बन्धी बाधा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मुक्ता, विद्रुम, रत्न तथा धौत-वस्त्रादि की प्राप्ति का फल यहाँ आता है। किन्तु जब (सम्बद्ध ग्रह/कारक) नीच, शत्रु, या शत्रु-क्षेत्र आदि से संयुक्त हो, तो देह-बाधा का भी उल्लेख है। “देहबाधा” को चिकित्सा-निदान या निश्चित रोग-भविष्यवाणी नहीं समझना; यह शास्त्र का फल-शब्द है। नीच–अरि–क्षेत्र का सटीक योग-पठन पाठ-भेद संभव के साथ दशा-सन्दर्भ में ही बाँधना चाहिए।

English rendering The text states gain of pearls, coral, gems, and washed or fine garments and the like. When the relevant factor is joined with debilitation (nīca), an enemy (ari), or an (enemy) field/sign (kṣetra), the text also states bodily obstruction (deha-bādhā)—as a śāstric phala term, not a medical diagnosis or endorsed certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभ + नीच/अरि/क्षेत्र-योग पर देह-बाधा)। “नीच–अरि–क्षेत्र” स्थिति-वर्गीकरण है; यहाँ कोई संख्यात्मक बल-सूत्र या अंश-गणना नहीं दी गई।

58.31
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा |
तद्भुक्त्यादौ पुण्यतीर्थस्थानदैवतदर्शनम्
dāyeśātkendrakoṇasthe duścikye lābhage'pi vā |
tadbhuktyādau puṇyatīrthasthānadaivatadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दाय/दशा का स्वामी (दशेश); केन्द्र = 1, 4, 7, 10; कोण = त्रिकोण (1, 5, 9); दुश्चिक्य = तृतीय भाव; लाभ = एकादश भाव; तद्भुक्त्यादौ = उस भुक्ति के आरम्भ में; पुण्यतीर्थ = पवित्र तीर्थ; स्थान = स्थान; दैवतदर्शनम् = देव-दर्शन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दायेश से केन्द्र या कोण में स्थित होने पर, अथवा दुश्चिक्य (तृतीय) या लाभ (एकादश) में भी, उस भुक्ति के आरम्भ में पुण्य-तीर्थ-स्थान और दैवत-दर्शन का फल आता है। यहाँ “आरम्भ” (आदि) भुक्ति के प्रारम्भिक काल-खण्ड की ओर संकेत करता है। यह यात्रा/दर्शन का शास्त्रीय फल-कथन है, न कि अनिवार्य घटना का दावा।

English rendering The text states that when (the relevant factor is) placed in a kendra or trikoṇa from the period-lord (dāyeśa), or even in the third (duścikya) or eleventh (lābha), at the beginning of that bhukti there is darśana of sacred pilgrimage places and deities. This is period-phala language of the śāstra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-सम्बन्ध पर फल-कथन (केन्द्र/कोण/3/11 से दायेश)। भाव-गणना के लिए घर-पद्धति (भावा/समान-भाव आदि) घोषित करनी होती है; इस श्लोक में केवल सापेक्ष भाव-नाम हैं, कोई अंश-सूत्र नहीं।

58.32
मनोधैर्यं हृदुत्साहो विदेशधनलाभकृत् |
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते
manodhairyaṃ hṛdutsāho videśadhanalābhakṛt |
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मनोधैर्यम् = मन का धैर्य; हृदुत्साहः = हृदय का उत्साह; विदेशधनलाभकृत् = विदेश-धन का लाभ कराने वाला; दायेशात् = दायेश से; षष्ठ = छठा; रन्ध्र = अष्टम; व्यय = द्वादश; पापसंयुते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पहले मन-धैर्य, हृद्-उत्साह और विदेश-धन-लाभ का फल कहता है। उसी क्रम में यह भी जोड़ता है — दायेश से षष्ठ, रन्ध्र (अष्टम) अथवा व्यय (द्वादश) में, या पाप-संयोग में — जिसके अगले श्लोक में अशुभ फल विस्तारित होते हैं। शुभ और अशुभ दोनों पक्ष शास्त्र-कथन हैं; इन्हें भय या नियति के रूप में नहीं बाँधना।

English rendering The text states mental fortitude, heart-enthusiasm, and gain of wealth connected with foreign lands. It then conditions the adverse line on placement in the sixth, eighth, or twelfth from the dāyeśa, or conjunction with malefics (pāpa)—the results of which the next verse continues. Report both as the śāstra’s claims, not as destiny.

गणित / تکنیک (The Mathematics / Technique): गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धैर्य/उत्साह/विदेश-धन; तथा 6/8/12 या पाप-योग की शर्त)। षष्ठ–रन्ध्र–व्यय सापेक्ष भाव-स्थान हैं; कोई वर्ष-मान या बिन्दु-गणना यहाँ नहीं है।

58.33
चोराग्निनृपभीतिश्च स्त्रीसमागमतो भवेत् |
दुष्कृतिर्धनहानिश्च कृषिगोश्वादिनाशकृत्
corāgninṛpabhītiśca strīsamāgamato bhavet |
duṣkṛtirdhanahāniśca kṛṣigośvādināśakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चोर = चोर; अग्नि = अग्नि; नृपभीतिः = राज-भय; स्त्रीसमागमतः = स्त्री-समागम से; दुष्कृतिः = दुष्कृत्य / अशुभ कर्म; धनहानिः = धन-हानि; कृषि = खेती; गो = गौ; अश्व = अश्व; आदिनाशकृत् = आदि का नाश करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की अशुभ शर्त के सन्दर्भ में शास्त्र कहता है — चोर, अग्नि और नृप से भय, तथा स्त्री-समागम से सम्बन्धित क्लेश का उल्लेख। दुष्कृति, धन-हानि, तथा कृषि–गौ–अश्व आदि के नाश का भी फल-कथन है। यह भय-वाणिज्य या “सब नष्ट होगा” जैसी निश्चितता नहीं; शास्त्र का सूचीबद्ध फल-वर्णन है, जिसे सावधानी और सन्दर्भ के साथ पढ़ा जाए — चिकित्सा/कानूनी/आर्थिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

English rendering Continuing the adverse condition, the text states fear connected with thieves, fire, and the king, and trouble arising from association with women; also wrongful conduct, loss of wealth, and destruction affecting agriculture, cattle, horses, and the like. These are the śāstra’s phala-lists, not endorsed fate or pressure-claims.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भय, हानि, कृषि-पशु-नाश की सूची)। कोई संख्या, दशा-वर्ष, या शोध-सूत्र इस पद्य में कूटित नहीं।

58.34
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवीजपं चरेत्
dvitīyadyūnanāthe tu dehabādhā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ durgādevījapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय भाव; द्यून = सप्तम भाव (द्यून); नाथे = स्वामी में/के; तु = तो/विशेषतः; देहबाधा = देह-बाधा; तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के परिहार हेतु; दुर्गा-देवी-जपम् = दुर्गा देवी का जप; चरेत् = करे (शास्त्र का विधान-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — द्वितीय और द्यून (सप्तम) के नाथ के सन्दर्भ में देह-बाधा का फल आता है। उसी दोष के परिहार के लिए दुर्गा-देवी-जप का उल्लेख है। जप यहाँ शास्त्रीय उपाय-कथन है; इसे दबाव, भय, या “जरूर करो नहीं तो…” के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए, और “देहबाधा” को रोग-निदान नहीं मानना चाहिए।

English rendering The text states bodily obstruction in connection with the lords of the second and the seventh (dyūna). For the removal of that doṣa it mentions japa of Durgā-Devī—as a stated traditional observance of the text, not as medical advice or remedy-as-pressure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रोक्त परिहार-उल्लेख (द्वितीय–सप्तम नाथ; दुर्गा-जप)। भाव-स्वामी की पहचान कुण्डली-गणना पर निर्भर है; इस श्लोक में केवल भाव-नाम हैं, कोई अंश-सूत्र नहीं।

58.35
वस्त्रदानं प्रकुर्वीत आयुर्वृद्धिसुखावहम् |
जगदम्बाप्रसादेन ततः सुखमवाप्नुयात्
vastradānaṃ prakurvīta āyurvṛddhisukhāvaham |
jagadambāprasādena tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्रदानम् = वस्त्र का दान; प्रकुर्वीत = करे; आयुर्वृद्धि = आयु की वृद्धि; सुखावहम् = सुख लाने वाला; जगदम्बा = जगदम्बा (जगन्माता); प्रसादेन = प्रसाद से; ततः = तब; सुखम् = सुख; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वस्त्र-दान करना चाहिए; उसे आयु-वृद्धि और सुख का वाहक कहा गया है। जगदम्बा के प्रसाद से तदनन्तर सुख की प्राप्ति का भी कथन है। यह उपसंहार-सा फल और अनुष्ठान-उल्लेख है — आशीर्वाद की भाषा में, दबाव या गारंटी के रूप में नहीं। आयु-वृद्धि को चिकित्सा-वादा नहीं समझना।

English rendering The text states that one should perform the gift of cloth, described as conducive to increase of life-span and happiness; and that by the grace of Jagadambā one thereafter obtains happiness. Report this as the śāstra’s closing phala and observance language, not as a guaranteed outcome or medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दान-विधान का उपसंहार। कोई वर्ष-मान, बिन्दु, या वर्ग-विभाजन इस श्लोक में नहीं है।

58.36
सौम्यस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि लग्नाधिपसमन्विते
saumyasyāntargate bhaume lagnātkendratrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vāpi lagnādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्यस्य = बुध की; अन्तर्गते = अन्तर्दशा में; भौमे = मंगल (विषय-ग्रह); लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = 1-4-7-10 भाव; त्रिकोण = 1-5-9 भाव; स्वोच्चे = मंगल के उच्च (मकर) में; स्वर्क्षगे = स्व-राशि (मेष/वृश्चिक) में; लग्नाधिप-समन्विते = लग्नेश युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ बुध की अन्तर्दशा में मंगल के फल का आरम्भ करता है। जब वह मंगल लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा उच्च/स्व-राशि में स्थित हो, अथवा लग्नेश के साथ जुड़ा हो — तब आगे कथित शुभ फल-क्रम लागू होता है। यह शर्त-पक्ष है; फल स्वयं अगले श्लोकों में आता है।

English rendering The text opens the effects of Mars in Mercury’s antardaśā: when Mars occupies a kendra or trikoṇa from the lagna, is exalted or in own sign, or is joined with the lagna-lord, the favourable results that follow are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवधि = विंशोत्तरी अनुपात। बुध-महादशा = 17 वर्ष; मंगल-अन्तर्दशा-वर्ष = 7; अन्तर्दशा-अवधि = (17 × 7) ÷ 120 = 119/120 वर्ष ≈ 0.9917 वर्ष (लगभग 11 मास 27 दिन — पूर्ण वर्ष = 360 तिथि-दिन कन्वेंशन घोषित करें)। स्थान-शर्त (लग्न-आधारित पूर्ण-राशि भाव): केन्द्र ∈ {1,4,7,10}; त्रिकोण ∈ {1,5,9}; मंगल-उच्च = मकर; स्व-राशि = मेष, वृश्चिक। लग्नेश-युति = मंगल और लग्नेश का एक ही राशि/भाव में होना (युति-परिभाषा संस्करणानुसार — पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी; बुध-महादशा चल रही हो। मंगल-अन्तर्दशा = 119/120 वर्ष। मान लें लग्न = सिंह, मंगल = वृश्चिक 12° (लग्न से चतुर्थ = केन्द्र, और स्व-राशि)। शर्त “लग्नात् केन्द्र + स्वर्क्ष” दोनों सत्य → 58.37–58.39a का शुभ-फल पक्ष लागू; अष्टम/व्यय/नीच पक्ष (58.39b–58.41a) नहीं। (अयनांश फल-कथन को नहीं बदलता; केवल ग्रह-राशि निर्धारण पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष)/120 — यही अनुपात यहाँ बुध–मंगल खण्ड की अवधि देता है। गणना शुद्ध अनुपात-अंकगणित है; फल-कथन शास्त्र का है, भविष्य-घोषणा नहीं।

58.37
राजानुग्रहशान्तिं च गृहे कल्याणसम्भवम् |
लक्ष्मीकटाक्षचिह्नानि नष्टराज्यार्थमाप्नुयात्
rājānugrahaśāntiṃ ca gṛhe kalyāṇasambhavam |
lakṣmīkaṭākṣacihnāni naṣṭarājyārthamāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-अनुग्रह = राज/अधिकार-अनुकूलता; शान्तिं = शान्ति; गृहे = घर में; कल्याण-सम्भवम् = कल्याण की संभावना; लक्ष्मी-कटाक्ष-चिह्नानि = लक्ष्मी-कृपा के लक्षण; नष्ट-राज्य-अर्थम् = खोया राज्य/पद/धन; आप्नुयात् = प्राप्त करे — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की शुभ शर्तों पर शास्त्र कहता है — राजानुग्रह और शान्ति मिलती है, गृह में कल्याण का योग बनता है। लक्ष्मी-कटाक्ष के चिह्न दिखते हैं, तथा नष्ट हुए राज्य या अर्थ की पुनःप्राप्ति का संकेत दिया गया है। यह फल-कथन है, न कि नियति-घोषणा।

English rendering Under those favourable placements the text states royal favour and peace, domestic well-being, marks of Lakṣmī’s grace, and the recovery of lost status or wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-अन्तर्दशा + शुभ-स्थित मंगल)। शर्तें 58.36 में; यहाँ केवल परिणाम-सूची।

58.38
पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे गोधनसंकुलम् |
गृहक्षेत्रादिलाभं च गजवाजिसमन्वितम्
putrotsavādisantoṣaṃ gṛhe godhanasaṃkulam |
gṛhakṣetrādilābhaṃ ca gajavājisamanvitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-उत्सव-आदि-सन्तोषं = पुत्र/सन्तान-उत्सव आदि से आनन्द; गृहे = घर में; गो-धन-संकुलम् = गौ व धन से समृद्ध; गृह-क्षेत्र-आदि-लाभं = घर-भूमि आदि का लाभ; गज-वाजि-समन्वितम् = हाथी-अश्व (वाहन/संपत्ति-प्रतीक) सहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — घर में पुत्रोत्सव आदि का सन्तोष, गौ और धन की बहुलता। गृह-क्षेत्रादि का लाभ तथा गज-वाजि से युक्त समृद्धि का भी उल्लेख है। प्राचीन प्रतीक (गज-वाजि) सम्पत्ति/साधन-वृद्धि के शास्त्रीय संकेत हैं।

English rendering The text further states festivity and joy over offspring, a household rich in cattle and wealth, gains of house and land, and prosperity marked by elephants and horses (classical symbols of means).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (समृद्धि/लाभ-सूची)। गणना नहीं; केवल 58.36 की स्थिति-शर्तों पर निर्भर वर्णनात्मक फल।

58.39
राजप्रीतिकरं चैव स्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् |
नीचक्षेत्रसमायुक्ते ह्यष्टमे वा व्ययेऽपि वा
rājaprītikaraṃ caiva strīsaukhyaṃ cātiśobhanam |
nīcakṣetrasamāyukte hyaṣṭame vā vyaye'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-प्रीति-करं = राज-प्रीति उत्पन्न करने वाला; स्त्री-सौख्यं = दाम्पत्य/स्त्री-सुख; अति-शोभनम् = अत्यन्त उत्तम; नीच-क्षेत्र-समायुक्ते = नीच-राशि/नीच-सम्बन्ध युक्त होने पर; अष्टमे = अष्टम भाव में; व्यये = व्यय (द्वादश) में; वापि = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शुभ-पक्ष का अन्त: शास्त्र राज-प्रीति और अत्यन्त उत्तम स्त्री-सौख्य भी कहता है। फिर फल-धारा पलटती है — यदि मंगल नीच-क्षेत्र से युक्त हो, अथवा अष्टम या व्यय में हो, तो आगे का अशुभ-क्रम लागू होता है। एक ही श्लोक में शुभ-समाप्ति और अशुभ-आरम्भ जुड़े हैं।

English rendering The favourable sequence closes with royal regard and excellent conjugal happiness; then the text turns: if Mars is linked with debilitation, or stands in the eighth or twelfth, the adverse results that follow are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-शर्त (पूर्ण-राशि भाव, लग्न-आधार): अष्टम = लग्न+7 (मॉड 12, 1-आधारित गणना में भाव 8); व्यय = भाव 12। मंगल-नीच = कर्कट (शास्त्रीय उच्च-नीच युग्म: मकर उच्च ↔ कर्कट नीच)। “नीचक्षेत्रसमायुक्ते” में नीच-राशि-स्थिति या नीच-सम्बन्ध — पाठ-भेद/टीका-भेद संभव; यहाँ मूल शब्द “समायुक्त” = युक्त/सम्बद्ध।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष ⇒ अष्टम = वृश्चिक, व्यय = मीन। मंगल वृश्चिक में = स्व-राशि किन्तु अष्टम — 58.36 का “स्वर्क्ष” और 58.39b का “अष्टमे” दोनों सत्य हो सकते हैं; शास्त्र दोनों पक्ष अलग-अलग शर्तों से बाँधता है — संयुक्त स्थिति में फल-मिश्रण टीका-परम्परा पर छोड़ें, मूल केवल दोनों शर्त-सूचियाँ देता है। नीच उदाहरण: मंगल कर्कट में = नीचक्षेत्र ⇒ अशुभ-पक्ष (58.40–58.41a)।

58.40
पापदृष्टियुते वापि देहपीडा मनोव्यथा |
उद्योगभङ्गो दशादौ स्वग्रामे धान्यनशनम्
pāpadṛṣṭiyute vāpi dehapīḍā manovyathā |
udyogabhaṅgo daśādau svagrāme dhānyanaśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-दृष्टि-युते = पाप-ग्रह दृष्टि युक्त; देह-पीडा = देह में पीड़ा (शास्त्र-कथन); मनो-व्यथा = मन की व्यथा; उद्योग-भङ्गः = उद्योग/प्रयत्न में बाधा; दशा-आदौ = दशा के आरम्भ में; स्व-ग्रामे = अपने ग्राम/निवास-क्षेत्र में; धान्य-नशनम् = धान्य की हानि।

हिन्दी भावार्थ अशुभ शर्तों (नीच/अष्टम/व्यय) के साथ, अथवा पाप-दृष्टि युक्त होने पर, शास्त्र कहता है — देह-पीड़ा और मनोव्यथा। दशा के आरम्भ में उद्योग-भंग, तथा स्वग्राम में धान्य-नाश का भी उल्लेख है। यह सब शास्त्र का फल-कथन है; रोग-निदान या आर्थिक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering With those adverse placements—or when afflicted by malefic aspect—the text states bodily discomfort and mental distress, obstruction of effort at the period’s outset, and loss of grain in one’s own locality.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ पक्ष)। “पापदृष्टि” = शास्त्रीय दृष्टि-नियम से पाप-ग्रहों की दृष्टि (सूर्य/मंगल/शनि आदि — परिभाषा अध्याय-दृष्टि पर निर्भर; पाठ-भेद संभव)। “दशादौ” = अन्तर्दशा-खण्ड के आरम्भिक भाग (सीमा शास्त्र में संख्याबद्ध नहीं)।

58.41
ग्रंथिशस्त्रव्रणादीनां भयं तापज्वरादिकम् |
दायेशात्केन्द्रगे भौमे त्रिकोणे लाभगेऽपि वा
graṃthiśastravraṇādīnāṃ bhayaṃ tāpajvarādikam |
dāyeśātkendrage bhaume trikoṇe lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रंथि = गाँठ/ग्रंथि; शस्त्र = शस्त्र; व्रण-आदीनां = व्रण आदि का; भयं = भय; ताप-ज्वर-आदिकम् = ताप-ज्वर आदि; दायेश-आत् = दायाधीश/दशेश से; केन्द्र-गे = केन्द्र में स्थित; भौमे = मंगल; त्रिकोणे = त्रिकोण में; लाभ-गे = लाभ (एकादश) में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ अशुभ-क्रम का अन्त: शास्त्र ग्रंथि-शस्त्र-व्रण आदि के भय तथा ताप-ज्वर आदि का उल्लेख करता है — फिर भी चिकित्सा-कथन नहीं, शास्त्रीय फल-भाषा। तदुपरान्त नई शुभ-शर्त: यदि मंगल दशेश से केन्द्र, त्रिकोण, अथवा लाभ भाव में हो, तो अगला शुभ फल (58.42) लागू होता है।

English rendering The adverse list closes with fear of knots, weapons, wounds and the like, and heat-fevers and similar (as the text’s own phrasing). Then a new favourable condition: when Mars stands in a kendra, trikoṇa, or the eleventh from the daśā-lord, the benefits of the next verse are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) “दायेश” = दशा-स्वामी (यहाँ प्रसंग: बुध-महादशा ⇒ दायेश = बुध; पाठ-भेद/परिभाषा-भेद संभव)। बुध-राशि से भाव-गणना (पूर्ण-राशि): केन्द्र = +0,+3,+6,+9 राशि; त्रिकोण = +0,+4,+8; लाभ = +10 राशि। उदाहरण सूत्र: यदि बुध = मिथुन, तो मंगल कन्या = बुध से चतुर्थ (केन्द्र); मंगल तुला = पञ्चम (त्रिकोण); मंगल मेष = लाभ (11)।

उदाहरण (worked example) बुध-महादशा; दायेश = बुध मिथुन में। मंगल तुला में ⇒ बुध से पंचम = त्रिकोण ⇒ 58.42 का शुभ-पक्ष। यदि मंगल वृश्चिक में ⇒ बुध से षष्ठ — केन्द्र/त्रिकोण/लाभ नहीं ⇒ यह शुभ-द्वार नहीं खुलता (अन्य शर्तें 58.36 अलग से जाँचें)।

58.42
शुभदृष्टे धनप्राप्तिर्देहसौख्यं भवेनृणाम् |
पुत्रलाभो यशोवृद्धिर्भ्रातृवर्गो महाप्रियः
śubhadṛṣṭe dhanaprāptirdehasaukhyaṃ bhavenṛṇām |
putralābho yaśovṛddhirbhrātṛvargo mahāpriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-दृष्टे = शुभ-ग्रह दृष्टि में; धन-प्राप्तिः = धन-लाभ; देह-सौख्यं = देह-सुख; भवेत् = होता है — शास्त्र-कथन; नृणाम् = मनुष्यों को; पुत्र-लाभः = पुत्र/सन्तान-लाभ; यशः-वृद्धिः = यश की वृद्धि; भ्रातृ-वर्गः = भ्रातृ-वर्ग; महा-प्रियः = अत्यन्त प्रिय/अनुकूल।

हिन्दी भावार्थ दशेश से केन्द्र/त्रिकोण/लाभ स्थित मंगल पर, और शुभ-दृष्टि होने पर, शास्त्र कहता है — धन-प्राप्ति और देह-सौख्य। पुत्र-लाभ, यश-वृद्धि, तथा भ्रातृ-वर्ग का महाप्रिय होना भी कहा गया है। सम्पूर्ण खण्ड (58.36–42) बुध-अन्तर्दशा में मंगल की स्थिति-शर्तों के दो फल-पथ — शुभ और अशुभ — बाँधता है।

English rendering With Mars so placed from the daśā-lord and under benefic aspect, the text states gain of wealth and bodily comfort, the blessing of offspring, increase of renown, and a warmly affectionate circle of brothers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-दृष्टि + 58.41b की स्थान-शर्त)। “शुभदृष्टि” = गुरु/शुक्र/बुध (अपाप) आदि की शास्त्रीय दृष्टि; युति/दृष्टि-परिभाषा दृष्टि-अध्याय से बाँधें।

58.43
दायेशादथ रन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते |
तद्भुक्त्यादौ महाक्लेशो भ्रातृवर्गे महद्भयम्
dāyeśādatha randhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute |
tadbhuktyādau mahākleśo bhrātṛvarge mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा/भुक्ति का अधिपति ग्रह; रन्ध्रस्थे = अष्टम भाव में स्थित; व्यये = द्वादश भाव में; पापसंयुते = पाप-ग्रह (शनि/मंगल/राहु आदि) से युक्त; तद्भुक्त्यादौ = उस भुक्ति के आरम्भ में; महाक्लेशः = भारी क्लेश; भ्रातृवर्गे = भाइयों/सहोदर-वर्ग में; महद्भयम् = बड़ा भय/संकट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब दशा/भुक्ति का स्वामी अष्टम या द्वादश भाव में हो और पाप-ग्रहों से युक्त हो, तब उस भुक्ति के आरम्भ-काल में भारी क्लेश का संकेत मिलता है। विशेष रूप से भ्रातृ-वर्ग में बड़ा भय या संकट बताया गया है। यह फल-कथन स्थान-दोष और पाप-संयोग की शर्त पर बँधा है।

English rendering The text states that when the lord of the period stands in the eighth or twelfth house and is joined with malefics, the beginning of that sub-period brings great affliction, with marked fear or distress among brothers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-आरम्भ, रन्ध्र/व्यय + पाप-योग की शर्त)। जाँच शुद्ध गणना से होती है: दायेश की राशि/भाव-स्थिति और पाप-युति/दृष्टि को निश्चित लग्न-कुण्डली तथा घोषित दशा-क्रम (यथा विंशोत्तरी) पर `==` से तय करें; फल स्वयं संख्या नहीं देता।

58.44
नृपाग्निचौरभीतिश्च पुत्रमित्रविरोधनम् |
स्थानभ्रंशो भवेदादौ मध्ये सौख्यं धनागमः
nṛpāgnicaurabhītiśca putramitravirodhanam |
sthānabhraṃśo bhavedādau madhye saukhyaṃ dhanāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृप = राजा/शासन; अग्नि = अग्नि-संकट; चौर = चोर; भीतिः = भय; पुत्रमित्रविरोधनम् = पुत्र तथा मित्र से विरोध; स्थानभ्रंशः = पद/स्थान का पतन; आदौ = भुक्ति के आरम्भ में; मध्ये = मध्य-काल में; सौख्यम् = सुख; धनागमः = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — उसी कष्ट-संकेत के क्रम में नृप, अग्नि और चोर से भय, तथा पुत्र-मित्र से विरोध का वर्णन है। भुक्ति के आरम्भ में स्थान-भ्रंश बताया गया है; मध्य-भाग में सौख्य और धन-प्राप्ति का संकेत दिया गया है। यह काल-खंडों (आदि–मध्य) में फल-विभाजन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states fear from authority, fire, and thieves, and conflict with sons and friends; at the start of the period, loss of position; in the middle, comfort and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आदि/मध्य काल-खंड)। भुक्ति की कुल अवधि को तीन भागों में बाँटना परम्परागत काल-विन्यास है; मूल श्लोक कोई अंश-अनुपात (⅓ आदि) नहीं लिखता — आधा/तिहाई का नियम बाद की प्रथा है, यहाँ पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव।

58.45
अन्ते तु राजभीतिः स्यात्स्थानभ्रंशोह्यथापिवा |
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युभयं भवेत्
ante tu rājabhītiḥ syātsthānabhraṃśohyathāpivā |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyubhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = भुक्ति के अन्त में; राजभीतिः = राजा/शासन से भय; स्थानभ्रंशः = पद-पतन; अथवा = विकल्प; द्वितीयद्यूननाथे = द्वितीय तथा सप्तम (द्यून) भावों के अधिपति में; अपमृत्युभयम् = अपमृत्यु/अकाल-मृत्यु का भय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उसी भुक्ति के अन्त में राज-भय अथवा स्थान-भ्रंश हो सकता है। जब द्वितीय और सप्तम भावों का अधिपति (संयुक्त-शर्त के रूप में) दोष-स्थिति में हो, तब अपमृत्यु-भय का संकेत दिया गया है। यह फल-वाक्य है; चिकित्सा या निश्चित मृत्यु-भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that at the period’s end there may be fear from authority or loss of standing; and when the lords of the second and seventh are implicated as stated, fear of untimely death is indicated — as a textual phala, not a medical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अन्त-काल + 2/7 नाथ)। द्वितीय–सप्तम की गणना लग्न-स्थिर भाव-स्वामित्व से होती है; “अपमृत्यु” यहाँ शास्त्रीय संकेत-शब्द है, आयुर्दायांक का सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

58.46
गोदानं च प्रकुर्वीत मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
शङ्करस्य प्रसादेन ततः सुकह्मवाप्नुयात्
godānaṃ ca prakurvīta mṛtyuñjayajapaṃ caret |
śaṅkarasya prasādena tataḥ sukahmavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गोदानम् = गौ का दान; प्रकुर्वीत = करे; मृत्युञ्जयजपम् = मृत्युञ्जय-मन्त्र का जप; चरेत् = आचरण करे; शङ्करस्य प्रसादेन = शिव-कृपा से; ततः = तदनन्तर; सुखम् = सुख (पाठ में «सुकह्म» — पाठ-भेद संभव; प्रचलित अर्थ सुखम्); अवाप्नुयात् = प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त क्लेश-संकेत के सन्दर्भ में शास्त्र शान्ति-उपाय बताता है — गोदान करे और मृत्युञ्जय-जप करे। शङ्कर की कृपा से फिर सुख की प्राप्ति कही गई है। यह विधिक/उपासना-निर्देश है; दबाव या “गारंटी” नहीं — पाठ स्वयं “प्रसादेन” कहता है। «सुकह्म» पाठात्मक रूप संदिग्ध हो सकता है (पाठ-भेद संभव)।

English rendering The text advises cow-donation and recitation of the Mṛtyuñjaya; through Śaṅkara’s grace, it says, comfort is then obtained. The form sukahma may be a contested reading (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन/उपाय-निर्देश (दान–जप)। कोई दशा-वर्ष, बल-इकाई या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं; उपाय का प्रभाव संख्या में नहीं मापा गया।

58.47
बुधस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे |
कुलीरे कुम्भगे वापि कन्यायां वृषभेपि वा
budhasyāntargate rāhau kendralābhatrikoṇage |
kulīre kumbhage vāpi kanyāyāṃ vṛṣabhepi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधस्यान्तर्गते = बुध की महादशा के अन्तर्गत (अन्तर्दशा में); राहौ = राहु (अन्तर्दशा-स्वामी); केन्द्र = 1, 4, 7, 10; लाभ = एकादश; त्रिकोण = 1, 5, 9; कुलीरे = कर्क; कुम्भगे = कुम्भ में; कन्यायाम् = कन्या में; वृषभे = वृषभ में।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र बुध-महादशा में राहु-अन्तर्दशा का शुभ-फल-प्रकरण खोलता है। जब राहु केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो, अथवा कर्क, कुम्भ, कन्या या वृषभ में स्थित हो — ये स्थान-शर्तें अगले श्लोकों के फल से जुड़ी हैं। यह दशा-संयोग + राशि/भाव-स्थिति का नियम है।

English rendering When Rāhu’s antardaśā runs within Mercury’s mahādaśā, and Rāhu occupies a kendra, the eleventh, or a trikoṇa — or stands in Cancer, Aquarius, Virgo, or Taurus — the text opens a favourable result-sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (BPHS दशा-क्रम): बुध महादशा = 17 वर्ष, राहु = 18 वर्ष; अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 = (17 × 18) ÷ 120 = 306 ÷ 120 = 2.55 वर्ष = 2 वर्ष + 0.55×12 मास ≈ 2 वर्ष 6.6 मास। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11 — सब लग्न-स्थिर भाव-गणना; राशि-शर्त राहु की राशि-स्थिति पर। आरम्भ-नक्षत्र और अयनांश दशा-प्रवेश-काल तय करते हैं — घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मान लें बुध-महादशा का पूर्ण 17 वर्ष; राहु-अन्तर्दशा = 2.55 वर्ष। यदि राहु कन्या में और लग्न से एकादश में हो, तो श्लोक की दोनों शर्त-श्रेणियों (राशि + लाभ) में से राशि-शर्त पूरी। (अयनांश/नक्षत्र-प्रवेश अलग से बाँधकर ही भुक्ति-तिथि निकालें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में बुध 17 + राहु 18 का अनुपात हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित है: अन्तर्दशा = (M × A)/120, योग 120 पर `==`। फल-वाक्य अलग रखते हैं — गणना अवधि और स्थान देती है; शुभ/अशुभ-कथन शास्त्र का अपना स्वर है, भविष्य-गारंटी नहीं।

58.48
राजसम्मानकीर्तिं च धनं च प्रभविष्यति |
पुण्यतीर्थस्थानलाभो देवतादर्शनं तथा
rājasammānakīrtiṃ ca dhanaṃ ca prabhaviṣyati |
puṇyatīrthasthānalābho devatādarśanaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजसम्मान = राजकीय सम्मान; कीर्तिम् = यश; धनम् = धन; प्रभविष्यति = उत्पन्न होगा (शास्त्र-कथन); पुण्यतीर्थस्थानलाभः = पुण्य-तीर्थ/स्थान की प्राप्ति; देवतादर्शनम् = देवता का दर्शन; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व शर्त (बुध में राहु, केन्द्र/लाभ/त्रिकोण या कर्क–कुम्भ–कन्या–वृषभ) पूरी होने पर शास्त्र कहता है — राज-सम्मान, कीर्ति और धन की प्राप्ति होती है। साथ ही पुण्य-तीर्थ-स्थान का लाभ और देवता-दर्शन का संकेत दिया गया है। यह फल-सूची है, बाध्य नियति नहीं।

English rendering Under those placements, the text states royal honour, fame, and wealth will arise, together with gain of sacred places and the sight of the deity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सम्मान–धन–तीर्थ)। शर्त-जाँच 58.47 की भाव/राशि-गणना पर टिकी है; फल स्वयं कोई अंक या बल-सीमा नहीं देता।

58.49
इष्तापूर्ते च महतो मानश्चाम्बरलाभकृत् |
भुक्त्यादौ देहपीडा च त्वन्ते सौख्यं विनिर्दिशेत्
iṣtāpūrte ca mahato mānaścāmbaralābhakṛt |
bhuktyādau dehapīḍā ca tvante saukhyaṃ vinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्टापूर्ते = इष्ट (यज्ञादि) और पूर्त (कूप-वापी-आदि लोकहित) कर्म में; महतः मानः = बड़ा सम्मान; अम्बरलाभकृत् = वस्त्र/वसन-लाभ कराने वाला; भुक्त्यादौ = भुक्ति के आरम्भ में; देहपीडा = देह-पीड़ा (शास्त्र-कथन); अन्ते = अन्त में; सौख्यम् = सुख; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे/कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — इष्टापूर्त-कर्म से बड़ा मान मिलता है और वस्त्र-लाभ होता है। उसी भुक्ति के आरम्भ में देह-पीड़ा का संकेत है; अन्त में सौख्य निर्देशित है। यह आदि–अन्त काल-खंड का फल-विभाजन है; चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states that through iṣṭāpūrta there is great honour and gain of garments; at the start of the bhukti, bodily discomfort is indicated, and at the end, comfort is to be declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (इष्टापूर्त + आदि/अन्त भुक्ति)। यदि 58.47 का राहु-अन्तर् = 2.55 वर्ष लें, तो “आदि/अन्त” का संख्यात्मक कट (यथा प्रथम/अन्तिम तिहाई) श्लोक में नहीं लिखा — परम्परा-निर्भर; घोषित कट-नियम के बिना अवधि-खंड `==` से नहीं बाँधा जा सकता।

58.50
लग्नाष्टव्ययराशिस्थे तद्भुक्तौ धननाशनम् |
भुक्त्यादौ देहनाशश्च वातज्वरमजीर्णकृत्
lagnāṣṭavyayarāśisthe tadbhuktau dhananāśanam |
bhuktyādau dehanāśaśca vātajvaramajīrṇakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = उदित राशि / जन्मलग्न; अष्ट = अष्टम भाव; व्यय = द्वादश भाव; राशिस्थे = उन राशियों/भावों में स्थित होने पर; तद्भुक्तौ = उस (राहु-)भुक्ति/अन्तर्दशा में; धननाशनम् = धन का नाश; भुक्त्यादौ = भुक्ति के आरम्भ में; देहनाशः = देह-पीड़ा/शारीरिक क्षति; वातज्वर = वातज ज्वर; अजीर्णकृत् = अजीर्ण उत्पन्न करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (उक्त) ग्रह लग्न, अष्टम अथवा व्यय भाव/राशि में स्थित हो, तो उसकी भुक्ति में धन-नाश का फल बताया गया है। उसी भुक्ति के आरम्भ में देह-नाश का संकेत भी दिया गया है। वातज ज्वर और अजीर्ण को भी उस काल-फल के अंग के रूप में गिनाया गया है। यह स्थान-संयुक्त भुक्ति-फल का कथन है, न कि स्वतन्त्र गणना-सूत्र।

English rendering The text states that when the planet under discussion occupies the lagna, the 8th, or the 12th, its bhukti brings destruction of wealth. At the beginning of that bhukti it further states bodily affliction, together with vāta-fever and indigestion as indicated results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान + भुक्ति)। भाव-गणना में लग्न = 1, अष्ट = 8, व्यय = 12; फल को शास्त्र का दावा मानकर पढ़ें, नियति या चिकित्सकीय निश्चय के रूप में नहीं।

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58.51
लग्नादुपचये राहौ शुभग्रहसमन्विते |
राजसंलापसन्तोषो नूतनप्रभुदर्शनम्
lagnādupacaye rāhau śubhagrahasamanvite |
rājasaṃlāpasantoṣo nūtanaprabhudarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; उपचये = उपचय भावों में (3, 6, 10, 11); राहौ = राहु के स्थित होने पर; शुभग्रह = शुभ ग्रह; समन्विते = युक्त/सहित; राजसंलाप = राजकीय वार्तालाप; सन्तोषः = सन्तोष; नूतनप्रभु = नया अधिपति/नया प्रभु; दर्शनम् = दर्शन/मिलन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब राहु लग्न से उपचय भावों में हो और शुभ ग्रहों से युक्त हो, तो राजसंलाप और उससे उत्पन्न सन्तोष का फल कहा गया है। नूतन प्रभु का दर्शन—अर्थात् नए अधिकार-पुरुष या नये अधिपति से मिलन—भी उसी योग-फल में गिनाया गया है। यहाँ राहु की स्थिति और शुभ-संयोग दोनों शर्तें एक साथ रखी गई हैं।

English rendering The text states that when Rāhu occupies an upacaya house from the lagna and is associated with benefics, there is satisfaction from royal converse and the sight of a new lord or authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (उपचय + शुभ-युति)। उपचय = लग्न से 3, 6, 10, 11; शुभ-संयोग शास्त्रीय दशा-फल की शर्त है, स्वतन्त्र संख्यात्मक बल-सूत्र नहीं।

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58.52
दायेशाद्द्वादशे वापि ह्यष्टमे पापसंयुते |
निष्ठुरं राजकार्याणि अथानभ्रंशो महद्भयम्
dāyeśāddvādaśe vāpi hyaṣṭame pāpasaṃyute |
niṣṭhuraṃ rājakāryāṇi athānabhraṃśo mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा-स्वामी / दशाधिपति; द्वादशे = द्वादश भाव में; वा अपि = अथवा भी; अष्टमे = अष्टम भाव में; पापसंयुते = पाप-ग्रह से युक्त; निष्ठुरम् = कठोर/निष्ठुर; राजकार्याणि = राज-कार्य; अथानभ्रंशः = पद/स्थान-भ्रंश (पाठ-भेद संभव; प्रायः स्थानभ्रंश-समानार्थ); महद्भयम् = महान् भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश (दशा-स्वामी) से द्वादश अथवा अष्टम में (उक्त ग्रह) पाप-युक्त हो, तो राज-कार्य निष्ठुर/कठोर हो जाते हैं। पद-भ्रंश और महान् भय भी उसी फल-वर्ग में गिनाए गए हैं। यह दायेश-सापेक्ष स्थान और पाप-युति की दोहरी शर्त पर आधारित फल-कथन है।

English rendering The text states that when the planet is in the 12th or the 8th from the lord of the daśā and joined with malefics, royal affairs become harsh; there is also loss of position and great fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश-सापेक्ष 8/12 + पाप-युति)। “दायेश” = चालू महादशा/भुक्ति का स्वामी; भाव-गिनती उस ग्रह से 8वें या 12वें पर निर्भर है—स्वतन्त्र संख्या-सूत्र नहीं।

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58.53
बन्धनं रोगपीडा च निजबन्धुमनोव्यथा |
हृद्रोगो मानहानिश्च धनहानिर्भविष्यति
bandhanaṃ rogapīḍā ca nijabandhumanovyathā |
hṛdrogo mānahāniśca dhanahānirbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनम् = बन्धन/कारा; रोगपीडा = रोग से पीड़ा; निजबन्धु = अपने बन्धु; मनोव्यथा = मानसिक व्यथा; हृद्रोगः = हृदय-सम्बन्धी कष्ट (शास्त्र-शब्द; चिकित्सकीय निदान नहीं); मानहानिः = मान-हानि; धनहानिः = धन-हानि; भविष्यति = होगा—शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्व-वर्णित दशा/भुक्ति-योग के फल के रूप में बन्धन और रोग-पीड़ा का उल्लेख करता है। अपने बन्धुओं की मनोव्यथा, हृद्रोग-संकेत, मान-हानि और धन-हानि को भी उसी फल-सूची में जोड़ा गया है। यह सब शास्त्र का दावा है—चिकित्सा, विधि या नियति का प्रमाण नहीं; पाठक इसे फल-कथन के रूप में ही पढ़े।

English rendering The text states bondage, disease-affliction, mental distress of one’s own kin, heart affliction (as a traditional indication), loss of honor, and loss of wealth as results under the conditions already given.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-सूची। सभी पद शास्त्रीय phala हैं; “हृद्रोग” आदि को आधुनिक निदान या निश्चित भविष्यवाणी न मानें—केवल पाठ का कथन।

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58.54
द्वितीयसप्तमस्थे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति |
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गालक्ष्मीजपं चरेत्
dvitīyasaptamasthe vā hyapamṛtyurbhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ durgālakṣmījapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय भाव; सप्तमस्थे = सप्तम में स्थित; वा = अथवा; अपमृत्युः = अकाल-मृत्यु का शास्त्रीय संकेत; भविष्यति = होगा—पाठ का दावा; तद्दोष = उस दोष का; परिहारार्थम् = निवारण हेतु; दुर्गा-लक्ष्मी-जपम् = दुर्गा और लक्ष्मी का जप; चरेत् = करे—शास्त्र का विधान-वचन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उक्त ग्रह के) द्वितीय अथवा सप्तम भाव-स्थिति में अपमृत्यु का फल बताया गया है। उसी दोष के परिहार के लिए दुर्गा-लक्ष्मी जप का विधान पाठ में दिया गया है। यह शास्त्र का अपना उपचारात्मक कथन है; यहाँ न भय-वाणिज्य है, न जप को दबाव के रूप में थोपना—केवल मूल पाठ का निष्ठापूर्ण अनुवाद।

English rendering The text states that placement in the 2nd or the 7th indicates apamṛtyu (untimely death as a traditional indication). For the removal of that doṣa it prescribes japa of Durgā and Lakṣmī—reported here as the śāstra’s own instruction, not as enforced remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रोक्त परिहार-विधि। भाव = 2 या 7; कोई दशा-वर्ष, बिन्दु या बल-इकाई इस श्लोक में नहीं है।

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58.55
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुआरोग्यदायिनीम् |
जगदम्बाप्रसादेन ततः सुखमवाप्नुयात्
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyuārogyadāyinīm |
jagadambāprasādena tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतां गाम् = श्वेत गौ; महिषीम् = महिषी (भैंस); दद्यात् = दे; आयुः = आयु; आरोग्यदायिनीम् = आरोग्य देने वाली (दान-वस्तु का शास्त्रीय विशेषण); जगदम्बा = जगदम्बा (देवी); प्रसादेन = प्रसाद से; ततः = तदनन्तर; सुखम् = सुख; अवाप्नुयात् = प्राप्त करे—शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्व-दोष के सन्दर्भ में श्वेत गौ और महिषी के दान का विधान करता है, और उन्हें आयु-आरोग्य दायिनी कहता है। जगदम्बा के प्रसाद से सुख की प्राप्ति—यह भी पाठ का अपना आशा-वाक्य है। दान और देवी-प्रसाद यहाँ शास्त्रीय परिहार-परम्परा के अंग हैं; इन्हें दबाव, गारंटी या चिकित्सकीय/आर्थिक उपाय के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text prescribes the gift of a white cow and a she-buffalo, described as bestowing longevity and health, and states that by the grace of Jagadambā one then obtains happiness—again the śāstra’s own remedial and hopeful close, not a guaranteed outcome we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शास्त्रोक्त दान/परिहार-वर्णन। कोई अंक, दशा-वर्ष या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल फल-सन्दर्भ में धार्मिक-दान विधान।

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58.56
बुधस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे |
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि लाभे वा धनराशिगे
budhasyāntargate jīve lagnātkendratrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vāpi lābhe vā dhanarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधस्य = बुध की; अन्तर्गत = अन्तर्दशा/भुक्ति में; जीवे = गुरु के; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 5, 9; गे = स्थित; स्वोच्चे = उच्च राशि में; स्वर्क्षगे = स्व-राशि में; वा अपि = अथवा भी; लाभे = एकादश भाव में; धनराशिगे = द्वितीय (धन) राशि/भाव में।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र बुध की अन्तर्दशा में गुरु के फल का आरम्भ करता है। शर्त यह है कि गुरु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा उच्च/स्वराशि में, अथवा लाभ (11) या धन (2) भाव में स्थित हो। यह श्लोक फल का पूरा वाक्य नहीं—स्थिति-शर्तों का द्वार-श्लोक है; आगे के श्लोकों में उसी योग का शुभ फल खुलता है।

English rendering When Jupiter runs in Mercury’s antardaśā, the text conditions the (auspicious) result on Jupiter’s being in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in exaltation or its own sign, or in the 11th or the 2nd—a placement gate for the phala that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-संरचना विंशोत्तरी पर टिकी है (महादशा-चक्र = 120 वर्ष)। अन्तर्दशा-अवधि का अनुपात-सूत्र:
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-ग्रह-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
बुध महादशा = 17 वर्ष, गुरु अन्तर् = 16 वर्ष ⇒ गुरु-अन्तर् ≈ (17 × 16) ÷ 120 = 272/120 = 2 + 32/120 वर्ष ≈ 2 वर्ष 3 मास 6 दिन (पूर्ण-वर्ष अनुपात; आरम्भ नक्षत्र-भग्नांश पर निर्भर)।
केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {5,9}; उच्च/स्व/2/11—सब लग्न-सापेक्ष भाव-मॉड्यूलर गिनती (D1)। अयनांश दशा-आरम्भ के चन्द्र-नक्षत्र पर लगता है, भाव-संख्या पर नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें बुध महादशा चल रही है और गुरु अन्तर् चालू है; गुरु D1 में लग्न से 5वें (त्रिकोण) है—श्लोक की “केन्द्रत्रिकोणगे” शर्त पूरी। अन्तर्-अवधि ≈ 2 वर्ष 3 मास 6 दिन (उपर्युक्त 17×16/120; नक्षत्र-भग्नांश = 0 मानकर पूर्ण अन्तर्)। यदि गुरु 6वें हो और न उच्च/स्व/2/11 में हो, तो यह श्लोक-शर्त लागू नहीं—फल अगले/अन्य श्लोकों से जुड़ेगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष)/120 का अनुपात-गणित हमारे दशा-इंजन में यथावत् जड़ा है—केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। यह श्लोक उसी बुध-अन्तर् में गुरु की स्थिति-शर्त खोलता है; गणना और फल-कथन को हम अलग रखते हैं—संख्या `==` से, फल “शास्त्र कहता है” से।

58.57
देहसौख्यं धनावाप्ती राजप्रीतिस्तथैव च |
विवाहोत्सवकार्याणि नित्यं मिष्ठान्नभोजनम्
dehasaukhyaṃ dhanāvāptī rājaprītistathaiva ca |
vivāhotsavakāryāṇi nityaṃ miṣṭhānnabhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-सौख्यम् = शरीर-सुख / आरोग्य-संकेत; धन-आवाप्तिः = धन-प्राप्ति; राज-प्रीतिः = राजकीय अनुग्रह / अधिकार-प्रसन्नता; विवाह-उत्सव-कार्याणि = विवाह तथा उत्सव-कार्य; नित्यम् = निरंतर / नियमित; मिष्ठान्न-भोजनम् = मधुर-अन्न / उत्सव-भोजन; तथा एव च = तथा ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ अनुकूल फल-पक्ष का वर्णन करता है — देह में सुख, धन की प्राप्ति, और राज-प्रीति। विवाह तथा उत्सव-कार्य भी इसी कथन में जुड़े हैं। नित्य मिष्ठान्न-भोजन का उल्लेख उत्सव-समृद्धि और सुख-भोग के संकेत के रूप में आता है। यह फल-कथन है, न कि नियति की घोषणा।

English rendering The text states bodily comfort, acquisition of wealth, and royal favour, together with marriage and festive works. It further names continual enjoyment of sweet food as part of that same auspicious phala-list.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनुकूल दशा-फल सूची)। यहाँ कोई वर्ग-भाग, बिन्दु, या दशा-वर्ष नहीं; केवल शास्त्र का फल-वर्णन है।

58.58
गोमहिष्यादिलाभश्च पुराणस्र्/अवणादिकम् |
देवतागुरुभक्तिश्च दानधर्ममखादिकम्
gomahiṣyādilābhaśca purāṇasr/avaṇādikam |
devatāgurubhaktiśca dānadharmamakhādikam
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गोमहिष्यादिलाभः = गौ-भैंस आदि का लाभ; पुराणश्रवणादिकम् (पाठ "पुराणस्र्/अवणादिकम्" — पाठ-भेद संभव) = पुराण-श्रवण आदि; देवतागुरुभक्तिः = देवता और गुरु में भक्ति; दानधर्ममखादिकम् = दान, धर्म, यज्ञ आदि।

हिन्दी भावार्थ बुध-महादशा की अन्तर्दशाओं के फल-क्रम में — शास्त्र कहता है कि (पूर्व-श्लोक की स्थिति में अन्तर्दशा) गौ-भैंस आदि का लाभ, पुराण-श्रवण, देवता-गुरु में भक्ति और दान-धर्म-यज्ञ आदि देती है — सात्त्विक फलों की सूची, जो गुरु-सदृश शुभ अन्तर्दशा की है।

English rendering (That sub-period) brings gains of cows and buffaloes, listening to the purāṇas, devotion to the gods and the guru, and charity, dharma and sacrifice, says the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ढाँचा: बुध-महादशा 17 वर्ष; अन्तर्दशा = (17 × वर्ष_P) ÷ 120।

58.59
यज्ञकर्मप्रवृद्धिश्च शिवपूजाफलं तथा |
नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपि वा
yajñakarmapravṛddhiśca śivapūjāphalaṃ tathā |
nīce vāstaṃgate vāpi ṣaṣṭhāṣṭavyayage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यज्ञ-कर्म-प्रवृद्धिः = यज्ञ-कर्मों में वृद्धि; शिव-पूजा-फलम् = शिव-पूजा का फल / पुण्य-संकेत; तथा = तथा; नीच = नीच राशि में; वा अस्तंगते = अथवा अस्त (सूर्य-समीप दहन/अस्त); वा अपि = अथवा भी; षष्ठ-अष्ट-व्यय-गे = षष्ठ, अष्टम, अथवा व्यय (१२वें) भाव में स्थित; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ एक ओर शास्त्र यज्ञ-कर्म की वृद्धि और शिव-पूजा-फल का उल्लेख करता है। दूसरी ओर वही श्लोक नीच, अस्त, अथवा षष्ठाष्टव्यय-स्थिति का द्वार खोलता है — जहाँ आगे के श्लोक प्रतिकूल फल बाँधते हैं। पाठ-क्रम में अनुकूल सूची और दुर्बल/दोष-स्थिति का संधि-बिन्दु यही है। फल शास्त्र का कथन है; स्थिति-भेद नियम की कुंजी है।

English rendering The text names increase of sacrificial works and the fruit of Śiva-worship, then opens the conditional branch: when (the relevant lord) is debilitated, combust, or placed in the sixth, eighth, or twelfth. That placement governs the adverse phala that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + स्थिति-शर्त (नीच / अस्त / ६-८-१२)। अस्त-निर्णय सूर्य-से कोणीय दूरी की परंपरा-सीमा पर निर्भर करता है — परंपरा घोषित करनी चाहिए; यहाँ संख्या नहीं दी गई।

58.60
शन्यारदृष्टसंयुक्ते कलहो राजविग्रहः |
चौरादिदेहपीडा च पितृमातृविनाश्नम्
śanyāradṛṣṭasaṃyukte kalaho rājavigrahaḥ |
caurādidehapīḍā ca pitṛmātṛvināśnam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-अरि-दृष्ट-संयुक्ते = शनि अथवा शत्रु-ग्रह से दृष्ट/युक्त; कलहः = झगड़ा / विवाद; राज-विग्रहः = राज-संबंधी विरोध / अधिकार-संघर्ष; चौर-आदि = चोर आदि; देह-पीडा = शारीरिक पीड़ा; पितृ-मातृ-विनाशनम् = माता-पिता संबंधी हानि/विनाश-संकेत (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शनि या शत्रु-दृष्टि/संयोग में कलह और राज-विग्रह। चौर आदि से देह-पीड़ा तथा पितृ-मातृ-विनाशन का भी उल्लेख है। यह सब फल-सूची है, दशा-स्वामी की दोष-दृष्टि/योग-अवस्था से बाँधी हुई। हम इसे भय या नियति के रूप में नहीं पढ़ते — केवल शास्त्र का संकेतित फल-वर्णन।

English rendering The text states that under Saturn’s or an enemy’s aspect/conjunction there is quarrel and conflict with authority, bodily affliction from thieves and the like, and harm indicated concerning parents. These are śāstra-phala under adverse configuration, not endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दृष्टि/संयोग-शर्त सहित)। “दृष्ट” यहाँ पारंपरिक ग्रह-दृष्टि नियम से पढ़ा जाता है; संख्यात्मक सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

58.61
मानहानि राजदण्डो धनहानिर्भविष्यति |
विषाहिज्वरपीडा च कृषिभूमिविनाशनम्
mānahāni rājadaṇḍo dhanahānirbhaviṣyati |
viṣāhijvarapīḍā ca kṛṣibhūmivināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मान-हानिः = सम्मान की हानि; राज-दण्डः = राजकीय दण्ड / अधिकार-शास्ति; धन-हानिः = धन-नाश; भविष्यति = होगा (शास्त्र-कथन की क्रिया); विष-अहि-ज्वर-पीडा = विष, सर्प, ज्वर संबंधी पीड़ा-संकेत; कृषि-भूमि-विनाशनम् = कृषि तथा भूमि का नाश/हानि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की दोष-रेखा यहीं फल-विस्तार पाती है — मानहानि, राजदण्ड, धनहानि। शास्त्र विष-अहि-ज्वर-पीड़ा और कृषि-भूमि-विनाशन भी इसी पक्ष में गिनता है। यह चिकित्सा या कानूनी भविष्यवाणी नहीं; केवल होरा-पाठ का फल-समूह है। कथन को “शास्त्र कहता है” की सीमा में रखें।

English rendering The text continues the adverse list: loss of honour, royal punishment, loss of wealth, affliction from poison, serpent, or fever, and damage to agriculture and land. Report these as the śāstra’s stated phala, not as medical, legal, or financial certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रतिकूल दशा-फल सूची)। कोई बलांक, वर्ष-मान, या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं।

58.62
दयेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा बलसंयुते |
बन्धुपुत्रहृदुत्साहो शुभं च धनसंयुतम्
dayeśātkendrakoṇe vā lābhe vā balasaṃyute |
bandhuputrahṛdutsāho śubhaṃ ca dhanasaṃyutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाय-ईशात् / दय-ईशात् = दशा-स्वामी (महादशा-पति) से; केन्द्र = १, ४, ७, १०; कोण = त्रिकोण (१, ५, ९); लाभे = लाभ भाव (११वें) में; वा = अथवा; बल-संयुते = बलयुक्त; बन्धु-पुत्र-हृद्-उत्साहः = बंधु-पुत्र तथा हृदय-उत्साह; शुभम् = शुभ; धन-संयुतम् = धन से युक्त।

हिन्दी भावार्थ जब (बुध/अन्तर्दशा-संदर्भ) दशा-स्वामी से केन्द्र, त्रिकोण, अथवा लाभ में हो और बल से युक्त हो, तब शास्त्र बंधु-पुत्र-हर्ष और उत्साह कहता है। शुभ फल धन-संयुक्त भी बताया गया है। कुंजी है सापेक्ष भाव-स्थान + बल — निरपेक्ष “भाग्य” नहीं। बल यहाँ षड्बल/स्थिति-बल की परंपरा से जोड़ा जा सकता है, पर श्लोक स्वयं इकाई नहीं देता।

English rendering When placed from the period-lord in a kendra, a trikoṇa, or the eleventh, and endowed with strength, the text states enthusiasm among kin and sons, and auspiciousness joined with wealth. The rule is relative house-placement plus strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केन्द्र/त्रिकोण/लाभ + बल-शर्त)। भाव-गणना: दशा-स्वामी-राशि से गणना — केन्द्र = +0/+3/+6/+9 राशि, त्रिकोण = +0/+4/+8, लाभ = +10 राशि (पूर्ण राशि-गृह मानकर; भावाधार घर-पद्धति घोषित करनी होगी)।

उदाहरण (worked example) मानें महादशा-स्वामी वृषभ में, बुध तुला में → वृषभ से बुध = ६ठा भाव (षष्ठ), अतः यह श्लोक की केन्द्र/कोण/लाभ-शर्त पूरी नहीं करता। यदि बुध सिंह में हो → वृषभ से ४था (केन्द्र) — शर्त-स्थान पक्ष में योग्य; बल अलग से जाँचना होगा (षड्बल आदि)।

हमारा डिकोड (Our Decode) अन्तर्दशा-फल की शर्तें दशा-स्वामी से सापेक्ष भाव माँगती हैं — यही “दायेशात्” का गणितीय पठन है। षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) बल-संयुते को संख्या में खोलता है (१ रूप = ६० विरूप); हम गणना और फल-वाक्य को अलग रखते हैं — exact `==` जहाँ इकाई हो, फल केवल “शास्त्र कहता है”।

58.63
पशुवृद्धिर्यशोवृद्धिरन्नदानादिकं फलम् |
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते
paśuvṛddhiryaśovṛddhirannadānādikaṃ phalam |
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā vyaye vā balavarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पशु-वृद्धिः = पशु-संपत्ति में वृद्धि; यश-वृद्धिः = यश/कीर्ति वृद्धि; अन्न-दान-आदिकम् = अन्न-दान आदि; फलम् = फल; दाय-ईशात् = दशा-स्वामी से; षष्ठ-रन्ध्रे = षष्ठ अथवा रंध्र (अष्टम) में; वा व्यये = अथवा व्यय (१२वें) में; वा बल-वर्जिते = अथवा बल-रहित।

हिन्दी भावार्थ अनुकूल पक्ष में शास्त्र पशु-वृद्धि, यश-वृद्धि, और अन्न-दान आदि फल गिनता है — यह पूर्व श्लोक की शुभ-रेखा का विस्तार है। तुरंत ही उलटा द्वार खुलता है: दशा-स्वामी से षष्ठ, अष्टम, या व्यय में, अथवा बल-वर्जित होने पर। इस श्लोक का उत्तरार्ध प्रतिकूल शाखा का द्वार है; पूर्ण फल आगे के क्रम पर निर्भर हो सकता है (पाठ-भेद/श्लोक-संधि संभव)।

English rendering The text lists increase of cattle, growth of fame, and fruits such as food-charity on the auspicious side. From the period-lord, placement in the sixth, eighth, or twelfth — or lack of strength — opens the contrary branch.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ सूची + ६/८/१२ अथवा बलहीनता की शर्त)। सापेक्ष भाव: दशा-स्वामी से षष्ठ = +5 राशि, रंध्र = +7, व्यय = +11 (राशि-गृह)।

उदाहरण (worked example) महादशा-स्वामी कर्क, बुध मकर → कर्क से बुध = ७था (केन्द्र) — ६/८/१२ शाखा नहीं। बुध धनु में → कर्क से ६ठा — “षष्ठरन्ध्रे…व्यये” शाखा लागू; बल-वर्जित अलग जाँच। अयनांश फल को नहीं, केवल ग्रह-देशांतर → राशि-नक्शा को बदलता है; गणना से पहले अयनांश घोषित करें।

58.64
अङ्गतापश्च वैकल्यं देहबाधा भ्विष्यति |
कलत्रबन्धुवैषम्यं राजकोपो धनक्षयः
aṅgatāpaśca vaikalyaṃ dehabādhā bhviṣyati |
kalatrabandhuvaiṣamyaṃ rājakopo dhanakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अङ्गताप = शरीर में ताप/ज्वर-संवेग; वैकल्य = अंग-वैकल्य/असमर्थता; देहबाधा = देह-पीड़ा; कलत्र = पत्नी/दाम्पत्य; बन्धुवैषम्य = बन्धु-विरोध/असंगति; राजकोप = राजा/शासन-कोप; धनक्षय = धन-ह्रास; भविष्यति (पाठ: भ्विष्यति — पाठ-भेद संभव) = होगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवस्था में देह-संबंधी कष्ट का वर्णन करता है — अंग में ताप, वैकल्य और देह-बाधा। साथ ही कलत्र व बन्धुओं से वैषम्य, राजकीय कोप तथा धन-क्षय का फल-कथन किया गया है। यह फल-सूची का निरंतरन है; यहाँ कोई नया योग-सूत्र नहीं, अपितु पूर्व-निर्दिष्ट दशा/अवस्था का परिणाम बताया जा रहा है।

English rendering The text states bodily heat or feverish affliction, impairment, and physical obstruction, together with marital and kin disharmony, royal displeasure, and loss of wealth. It is a phala-statement of results, not a new computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ संख्या, भाग या बलांक नहीं; केवल शास्त्रीय परिणाम-सूची है — “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें, नियति-घोषणा के रूप में नहीं।

58.65
अकस्मात्कलहाद्भीतिः प्रमादो द्विजतो भयम् |
द्वितीयसप्तमस्थे वा देहबाधा भविष्यति
akasmātkalahādbhītiḥ pramādo dvijato bhayam |
dvitīyasaptamasthe vā dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकस्मात् = अचानक; कलहाद्भीति = कलह से भय; प्रमाद = असावधानी/भ्रम; द्विजतो भयम् = द्विज/ब्राह्मण-वर्ग से भय; द्वितीयसप्तमस्थे = द्वितीय या सप्तम भाव में स्थित; वा = अथवा; देहबाधा = देह-पीड़ा; भविष्यति = होगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अचानक कलह से भय, प्रमाद, तथा द्विज से भय जैसी स्थितियाँ सूचित होती हैं। यदि (संदर्भगत ग्रह — अध्याय-क्रम से मन्द/शनि का प्रसंग) द्वितीय या सप्तम भाव में हो, तो देह-बाधा का फल भी कहा गया है। यह भी परिणाम-वर्णन है; भाव-संख्या (2, 7) स्थान-निर्देश हैं, नई गणना-विधि नहीं।

English rendering The text states fear from sudden quarrel, heedlessness, and fear from the twice-born; and, if the relevant planet stands in the second or seventh house, bodily affliction is likewise indicated. House numbers here are placement labels within the phala, not a fresh formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थान सहित)। द्वितीय = 2रा भाव, सप्तम = 7वाँ भाव — केवल स्थिति-निर्देश; दशा-फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें, निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

58.66
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् |
गोभूरिरण्यदानेन सर्वारिष्टं व्यपोहति
taddoṣaparihārārthaṃ śivasāhasrakaṃ japet |
gobhūriraṇyadānena sarvāriṣṭaṃ vyapohati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष = उस दोष का; परिहारार्थं = निवारण हेतु; शिवसाहस्रक = शिव-सहस्रनाम/सहस्र जप-विधान (पाठानुसार); जपेत् = जपे; गो = गौ; भू = भूमि; हिरण्य = स्वर्ण; दान = दान; सर्वारिष्ट = समस्त अरिष्ट; व्यपोहति = दूर करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूर्वोक्त दोषों के परिहारार्थ शिव-साहस्रक जप का उल्लेख करता है, तथा गौ, भूमि और हिरण्य के दान से सर्वारिष्ट के व्यपोहन का कथन करता है। यह शास्त्र का अपना उपशमन-विधान है — यहाँ दबाव या भय का व्यापार नहीं; केवल पाठ का कथन है। ज्योतिष-गणित से यह श्लोक स्वतंत्र है।

English rendering For removing that fault, the text prescribes recitation of the Śiva-sāhasraka and states that gifts of cow, land, and gold dispel all ariṣṭa. This is the śāstra’s own remedial statement, reported as such — not urged as pressure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/उपशमन-विधान। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-अंश या बिन्दु-गणना नहीं; नैतिक व शास्त्रीय कथन मात्र — “शास्त्र कहता है कि … व्यपोहति”, जिसे हम भाग्य-निश्चिती नहीं बनाते।

58.67
सौम्यस्यान्तर्गते मन्दे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे |
त्रिकोणलाभगे वापि गृहे कल्याणवर्द्धनम्
saumyasyāntargate mande svocce svakṣetrakendrage |
trikoṇalābhage vāpi gṛhe kalyāṇavarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्यस्य = बुध की; अन्तर्गते = अन्तरदशा में; मन्दे = शनि (मन्द); स्वोच्चे = स्वोच्च राशि में; स्वक्षेत्र = स्व-राशि/क्षेत्र; केन्द्रगे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) स्थित; त्रिकोण = 5, 9; लाभगे = लाभ भाव (11) में; वापि = अथवा; गृहे = गृह/घर में; कल्याणवर्द्धनम् = कल्याण की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ जब बुध की अन्तरदशा में मन्द (शनि) हो, और वह स्वोच्च, स्वक्षेत्र, केन्द्र, त्रिकोण अथवा लाभ भाव में स्थित हो, तब शास्त्र गृह में कल्याण-वर्धन का फल कहता है। यहाँ दशा-संरचना (महादशा–अन्तरदशा) और भाव-स्थान दोनों जुड़े हैं। फल शुभ-पक्ष का है; फिर भी इसे पाठ का कथन मानें, अनिवार्य भाग्य नहीं।

English rendering When Saturn runs within Mercury’s antardaśā and occupies exaltation, own sign, a kendra, a trikoṇa, or the eleventh house, the text states increase of welfare in the household. Placement and sub-period together frame the phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (अन्तरदशा): अन्तर-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। विंशोत्तरी स्थिरांक: बुध = 17 वर्ष, शनि = 19 वर्ष (Σ चक्र = 120)। अतः बुध-महादशा में शनि-अन्तर = (17 × 19) ÷ 120 = 323/120 = 2 वर्ष + (83/120)×12 मास ≈ 2 वर्ष 8.3 मास; शनि-महादशा में बुध-अन्तर = (19 × 17) ÷ 120 = समान 323/120। केन्द्र = भाव {1,4,7,10}; त्रिकोण = {5,9}; लाभ = 11 — पूर्णांक भाव-सूचकांक, अंश-विभाजन नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें शनि-महादशा (19 वर्ष) चल रही है; बुध-अन्तर = (19 × 17)/120 = 2.6916… वर्ष ≈ 2 वर्ष 8 मास 9 दिन (सौर-वर्ष ≈ 365.25 दिन पर; व्यावहारिक पंचांग चान्द्र-मास/तिथि से मिलाता है)। यदि इस अन्तर में शनि तुला (उच्च) या मकर/कुम्भ (स्वक्षेत्र) में लग्नादि केन्द्र/त्रिकोण/11 में हो — शास्त्र कल्याण-वर्धन कहता है। अयनांश: केवल राशि-स्थिति के लिए आवश्यक; भाव-संख्या पूर्ण-भाव गृह-प्रणाली (भावाधिपति/पूर्ण राशि) पर निर्भर — घोषित करें।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17) हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-अंकगणित से बँधा है — अन्तर = (महा × अन्तर)/120। यह श्लोक उसी अन्तर-ढाँचे को फल-भाषा में बाँधता है; गणना और फल-कथन को हम अलग रखते हैं — संख्या `==` से, फल “शास्त्र कहता है” से।

58.68
राज्यलाभं महोत्साहं गृहं गोधनसंकुलम्
rājyalābhaṃ mahotsāhaṃ gṛhaṃ godhanasaṃkulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यलाभ = राज्य/अधिकार-लाभ; महोत्साह = महान उत्साह; गृहं = घर; गोधनसंकुलम् = गौ व धन से परिपूर्ण।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के शुभ-प्रसंग का विस्तार — शास्त्र राज्य-लाभ, महान् उत्साह, तथा गौ-धन से भरे गृह का फल कहता है। यह आधे श्लोक/अनुवर्ती पंक्ति-रूप फल-सूची है; स्वतंत्र गणित-सूत्र नहीं। पाठ-भेद/श्लोक-विभाजन संस्करणों में संभव।

English rendering The text continues the auspicious results: gain of dominion or office, great zeal, and a household abounding in cattle and wealth. A compact phala-line, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-पक्ष का अनुवर्ती)। 58.67 की दशा-स्थान शर्तों से जुड़ा परिणाम; नई संख्या या वर्ग-नियम नहीं।

58.69
शुभस्थानफलवाप्तिं तीर्थवासं तथादिशेत् |
अष्टमे वा व्यये मन्दे दायेशाद्वा तथैव च
śubhasthānaphalavāptiṃ tīrthavāsaṃ tathādiśet |
aṣṭame vā vyaye mande dāyeśādvā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभस्थानफलवाप्ति = शुभ स्थानों के फल की प्राप्ति; तीर्थवास = तीर्थ-निवास; तथादिशेत् = वैसा ही कहना/निर्देश; अष्टमे = अष्टम भाव में; व्यये = व्यय/द्वादश में; मन्दे = शनि; दायेशात् = दायेश (दशा-स्वामी) से; वा = अथवा; तथैव च = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शुभ स्थानों से फल-प्राप्ति और तीर्थ-वास — शास्त्र ऐसे निर्देश का उल्लेख करता है (पूर्व-शुभ प्रसंग से जुड़ा)। फिर दूसरा पक्ष: यदि मन्द अष्टम या व्यय (12) में हो, अथवा दायेश की दृष्टि से वैसी ही स्थिति हो, तो (अगले श्लोक का) अशुभ-फल-क्रम लागू होता है। यहाँ 8 और 12 भाव-सूचकांक हैं; “दायेश” दशा-स्वामी का शास्त्रीय पद है।

English rendering Attainment of results from auspicious places and residence at sacred fords are so to be indicated; yet when Saturn stands in the eighth or twelfth, or likewise relative to the period-lord (dāyeśa), the text pivots to the adverse side that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थान निर्देश। अष्टम = 8, व्यय = 12; दायेश = चालू दशा/अन्तर का स्वामी (विंशोत्तरी में महा/अन्तर-ग्रह)। गणना तभी जब दशा-स्वामी व भाव-स्थिति ज्ञात हों — स्वयं श्लोक कोई वर्ष-संख्या नहीं देता।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; शनि = वृश्चिक 8वें भाव में (पूर्ण-राशि भाव)। यदि शनि-अन्तर या शनि-संबंधित दशा चले — 58.70 का फल-पक्ष शास्त्र कहता है। यदि वही शनि केन्द्र/लाभ में हो (58.67) — शुभ-पक्ष। अयनांश राशि-सीमा के लिए आवश्यक; उदाहरण में पूर्ण-राशि भाव-प्रणाली घोषित।

58.70
अरातिदुःखबाहुल्यं दारपुत्रादिपीडनम् |
बुद्धिभ्रंशो बन्धुनाशः कर्मनाशो मनोरुजः
arātiduḥkhabāhulyaṃ dāraputrādipīḍanam |
buddhibhraṃśo bandhunāśaḥ karmanāśo manorujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अरातिदुःखबाहुल्य = शत्रु/विरोध से दुःख की अधिकता; दारपुत्रादिपीडन = पत्नी-पुत्र आदि की पीड़ा; बुद्धिभ्रंश = बुद्धि-विभ्रम; बन्धुनाश = बन्धु-हानि; कर्मनाश = कर्म/कार्य-हानि; मनोरुजः = मन की पीड़ा/रोग-भाव।

हिन्दी भावार्थ अष्टम/व्यय आदि के मन्द-प्रसंग (58.69) का फल-विस्तार — शास्त्र शत्रु-दुःख की बहुलता, दार-पुत्रादि पीड़न, बुद्धि-भ्रंश, बन्धु-नाश, कर्म-नाश और मनो-रुज का कथन करता है। यह गहन अशुभ-फल-सूची है; हम इसे “शास्त्र कहता है” के रूप में प्रस्तुत करते हैं — भय-व्यापार, चिकित्सा-निदान या निश्चित विनाश-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering The text states abundance of sorrow from adversaries, affliction of spouse and children and the like, confusion of intellect, loss of kin, ruin of work, and mental anguish. Report these as the śāstra’s phala-claims under the stated placement conditions — never as endorsed fate or medical certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-पक्ष)। 58.69 की स्थान-शर्तों (8, 12, दायेश-संबंध) का परिणाम-विस्तार; कोई बिन्दु, वर्ष या वर्ग-अंश यहाँ निर्दिष्ट नहीं। दशा-गणित अलग; फल-भाषा अलग — यही डिकोड-अनुशासन।

58.71
विदेशगमनं चैव दुःस्वप्नादिप्रदर्शनम् |
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति
videśagamanaṃ caiva duḥsvapnādipradarśanam |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेशगमन = परदेश-गमन / बाहर यात्रा; दुःस्वप्न-आदि-प्रदर्शन = अशुभ स्वप्नादि का उदय; द्वितीय = द्वितीय भाव (धन/कुटुम्ब); द्यून = सप्तम भाव (द्यून = ७); नाथ = भाव-स्वामी; अपमृत्यु = अकाल-मृत्यु / असमय मृत्यु-संकेत (शास्त्रीय फल-शब्द); भविष्यति = शास्त्र-कथन: “होता है/होगा”।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पूर्व-प्रसंग (दशा/अन्तर्दशा या सम्बन्धित फल-धारा) में द्वितीय और द्यून (सप्तम) भाव-स्वामियों के प्रभाव को फल-रूप में बाँधता है। शास्त्र कहता है—विदेश-गमन तथा दुःस्वप्नादि का प्रदर्शन भी संभव है। उसी सन्दर्भ में “द्वितीय-द्यून-नाथ” की स्थिति/काल में अपमृत्यु का फल भी कहा गया है। यह नियति का दावा नहीं, पाठ का फल-कथन है; पाठ-भेद और पूर्व-श्लोक-सन्दर्भ दोनों यहाँ अर्थ को बाँधते हैं।

English rendering The text states foreign travel and the appearance of bad dreams and the like; and, with respect to the lords of the second and the seventh (dyūna) houses, it also states apamṛtyu (untimely-death indication). This is the śāstra’s phala-statement in context, not a certainty we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा/भाव-स्वामी फल)। “द्वितीय” = २, “द्यून” = ७—ये भाव-सूचकांक हैं, गुणन/भाग का सूत्र नहीं; अपमृत्यु यहाँ शास्त्र का फल-शब्द है, काल-गणना का स्थिरांक नहीं।

58.72
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् |
कृष्णां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धये
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret |
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyurārogyavṛddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-दोष = पूर्वोक्त दोष/अशुभ फल; परिहार-अर्थम् = निवारण के लिए; मृत्युञ्जय-जप = मृत्युञ्जय मन्त्र का जप; चरेत् = करे (विधि-कथन); कृष्णा गौ = काली गाय; महिषी = भैंस; दद्यात् = दान दे; आयुः = आयु; आरोग्य = आरोग्य; वृद्धि = वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के दोष/अशुभ फल के परिहार के लिए शास्त्र उपाय-पक्ष कहता है। पाठ कहता है—मृत्युञ्जय-जप का आचरण करे। तथा आयु और आरोग्य की वृद्धि के हेतु कृष्ण गौ और महिषी का दान देने का विधान भी कहा गया है। यह दबाव या भय-व्यापार नहीं; शास्त्र का अपना परिहार-कथन है—हम इसे न तो अनिवार्यता बनाते हैं, न चिकित्सा/विधि-आदेश।

English rendering For removal of that doṣa, the text states performance of Mṛtyuñjaya japa; and for increase of lifespan and health, it states the gift of a black cow and a she-buffalo. These are the śāstra’s stated counter-measures, not pressure, medical advice, or a claim we enforce.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिहार/दान-विधि का फल-सहायक कथन। यहाँ कोई दशा-वर्ष, बल-रूप, वर्ग-भाग या बिन्दु-योग नहीं; केवल शास्त्रोक्त जप-दान का निर्देश है, जिसकी “सफलता” का कोई संख्यात्मक प्रमाण-सूत्र इस श्लोक में नहीं दिया गया।

अध्यायः 59

केत्वन्तर्दशाफलाध्यायः

79 श्लोक
59.1
केन्द्रे त्रिकोणलाभे वा केतौ लग्नेशसंयुते ।
भाग्यकर्मसुसम्बन्धे वाहनेशसमन्विते
kendre trikoṇalābhe vā ketau lagneśasaṃyute |
bhāgyakarmasusambandhe vāhaneśasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्रे = 1-4-7-10 भाव; त्रिकोण = 1-5-9; लाभे = एकादश भाव में; केतौ = केतु स्थित/संबद्ध; लग्नेश-संयुते = लग्नाधिपति से युक्त; भाग्य-कर्म-सुसम्बन्धे = नवम–दशम से सुसंबन्ध; वाहनेश-समन्विते = चतुर्थाधिपति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ केतु की भुक्ति/अन्तर्दशा के अनुकूल योग का द्वार खोलता है। केतु जब केन्द्र, त्रिकोण या लाभ (एकादश) में हो, अथवा लग्नेश से युक्त हो; भाग्य (नवम) और कर्म (दशम) से सुसंबद्ध हो; अथवा वाहनेश (चतुर्थ-स्वामी) से युक्त हो — तो आगे कथित शुभ फल का आधार बनता है। यह स्थिति-वर्णन है, न कि स्वतः फल।

English rendering The text states the favourable structural setting for Ketu’s bhukti: Ketu in a kendra, trikoṇa, or the eleventh, joined with the lagna-lord, well related to the ninth and tenth, or associated with the fourth-lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा/भुक्ति-योग की स्थिति-शर्त। भाव-संख्याएँ शास्त्रीय गृह-क्रम (1…12) हैं; ग्रह-युति का निर्णय जन्म-कुण्डली की देशान्तर–काल–अयनांश-निर्भर देशान्तर-रेखा पर होता है (अयनांश घोषित करें)।

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59.2
तद्भुक्तौ धनधान्यादि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।
पुत्रदारादिसौख्यं च राजप्रीतिमनोरुजः
tadbhuktau dhanadhānyādi catuṣpājjīvalābhakṛt |
putradārādisaukhyaṃ ca rājaprītimanorujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-भुक्तौ = उस (पूर्वोक्त योग वाली) भुक्ति में; धन-धान्यादि = धन–अन्न आदि; चतुष्पात् = चौपाये; जीव-लाभ-कृत् = जीविका/जीव-लाभ कारक; पुत्र-दार-आदि-सौख्यम् = संतान–दारा आदि का सुख; राज-प्रीति = राज/शासकीय अनुग्रह; अ-मनोरुजः = मनोरोग/पीड़ा से रहित (पाठ: मनोरुजः — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त स्थिति में केतु की उस भुक्ति में धन–धान्य, चौपाये और जीव-संबंधी लाभ का संकेत मिलता है। पुत्र–दारा आदि का सौख्य तथा राजप्रीति भी कही गई है। मनोरुजा (मानसिक/शारीरिक पीड़ा) से मुक्ति का कथन भी शास्त्र का अपना फल-वाक्य है — इसे चिकित्सकीय निदान या निश्चित भविष्यवाणी न समझें।

English rendering The text states that in that bhukti there is indication of wealth, grain, quadrupeds, and livelihood-gain, together with comfort through children and spouse, royal favour, and freedom from mental/bodily distress — as the śāstra’s own phala, not a clinical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-भुक्ति)। भुक्ति-काल स्वयं इस श्लोक में नहीं; विंशोत्तरी में अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में केतु महादशा = 7 वर्ष (Σ 120)। अन्तर्दशा = (7 × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120 — शुद्ध अनुपात; नक्षत्र-शेष-अंश से आरंभ-काल। यह श्लोक फल कहता है; काल-माप इंजन उसी 120-वर्ष चक्र और अनुपात से बाँधता है।

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59.3
ग्रामभूम्यादिलाभश्च गृहं गोधनसंकुलम् ।
नीचास्तखेटसंयुक्ते ह्यष्टमे व्ययगेऽपि वा
grāmabhūmyādilābhaśca gṛhaṃ godhanasaṃkulam |
nīcāstakheṭasaṃyukte hyaṣṭame vyayage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्राम-भूमि-आदि-लाभः = गाँव–भूमि आदि का लाभ; गृहम् = घर/निवास; गो-धन-संकुलम् = गौ–धन से परिपूर्ण; नीच-अस्त-खेट-संयुक्ते = नीच या अस्त ग्रह से युक्त; अष्टमे = अष्टम भाव में; व्ययगे = व्यय (द्वादश) में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ अनुकूल पक्ष में शास्त्र ग्राम–भूमि आदि लाभ तथा गौ–धन से भरा गृह कहता है। तुरंत ही विपक्ष जोड़ता है: यदि केतु नीच या अस्त ग्रह से युक्त हो, अथवा अष्टम या व्यय (द्वादश) में हो, तो आगे का अशुभ फल लागू होता है। एक ही श्लोक में शुभ–अशुभ द्वार — स्थिति-निर्भर।

English rendering The text adds gains of village, land, and a house rich in cattle and wealth; yet if Ketu is joined with a debilitated or combust planet, or occupies the eighth or twelfth, the adverse results that follow are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दोष-शर्त। “अस्त” = सूर्य से घोषित अंश-सीमा में ग्रह (परंपरा-भेद; प्रयुक्त परिभाषा लिखें); “नीच” = राशि-स्वाभाविक नीच-स्थान — दोनों देशज्यामितीय देशांतर पर निर्भर।

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59.4
हृद्रोगो मानहानिश्च धनधान्यपशुक्षयः ।
दारपुत्रादिपीडा च मनश्चांचल्यमेव च
hṛdrogo mānahāniśca dhanadhānyapaśukṣayaḥ |
dāraputrādipīḍā ca manaścāṃcalyameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हृद्-रोगः = हृद्/हृदय-संबंधी कष्ट (शास्त्र-शब्द); मान-हानिः = सम्मान-हानि; धन-धान्य-पशु-क्षयः = धन–अन्न–पशु का क्षय; दार-पुत्र-आदि-पीडा = दारा–पुत्र आदि की पीड़ा; मनः-चांचल्यम् = मन का चांचल्य; एव च = तथा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की दोष-स्थितियों में शास्त्र हृद्रोग, मानहानि, धन–धान्य–पशु के क्षय का फल कहता है। दार–पुत्र आदि की पीड़ा और मन का चांचल्य भी उसी सूची में है। ये शास्त्र के संकेतात्मक फल-वाक्य हैं — रोग-निदान, निश्चित घटना, या भय-वाक्य नहीं; “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

English rendering The text states, under those adverse conditions, indication of heart-related distress, loss of honour, decline of wealth, grain, and cattle, suffering connected with spouse and children, and restlessness of mind — as traditional phala language, not medical prognosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अशुभ फल-कथन। व्याख्या को गणित से अलग रखें: दोष-शर्त (59.3) सत्य/असत्य जाँचें; फल को नियति न बनाएँ।

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59.5
द्वितीयद्यूननाथेन सम्बन्धे तत्र संस्थिते ।
अनारोग्यं महत्कष्टमात्मबन्धुवियोगकृत्
dvitīyadyūnanāthena sambandhe tatra saṃsthite |
anārogyaṃ mahatkaṣṭamātmabandhuviyogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथेन = द्वितीयाधिपति या द्यून (सप्तम) नाथ से; सम्बन्धे = संबन्ध में; तत्र संस्थिते = वहीं (द्वितीय/सप्तम में) स्थित; अनारोग्यम् = आरोग्य का अभाव; महत्-कष्टम् = बड़ा कष्ट; आत्म-बन्धु-वियोग-कृत् = आत्म/बन्धु-वियोग कारक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक और संबंध-शर्त जोड़ता है: केतु का द्वितीय या सप्तम के स्वामी से संबन्ध, अथवा उन्हीं भावों में स्थिति। तब अनारोग्य, महत् कष्ट, और आत्म–बन्धु वियोग का फल कहा गया है। “आत्म” यहाँ स्व–पक्ष/स्वयं-संबंधी वियोग के अर्थ में पढ़ा जा सकता है; पाठ-भेद संभव जहाँ संधि-विच्छेद विवादित हो।

English rendering The text states that connection with the second- or seventh-lord, or placement there, indicates ill-health, great hardship, and separation from self-side kin — again as the śāstra’s phala formula, not a fixed fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्वामी संबन्ध)। “संबन्ध” = युति/दृष्टि/पारस्परिक आदान — परंपरा में परिभाषा भिन्न; जिस नियम से भाव-स्वामी निकाला, वही घर-पद्धति (पूर्ण भाव / प्लसिडस आदि) घोषित करें।

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59.6
दुर्गादेवीजपं कुर्यान्मृत्युञ्जयजपं चरेत् ।
एवं स्वान्तर्गते केतौ ततः सुखमवाप्नुयात्
durgādevījapaṃ kuryānmṛtyuñjayajapaṃ caret |
evaṃ svāntargate ketau tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुर्गा-देवी-जपम् = दुर्गा-देवी का जप; कुर्यात् = करे (शास्त्रोपदिष्ट); मृत्युञ्जय-जपम् = मृत्युञ्जय-जप; चरेत् = आचरण करे; एवम् = इस प्रकार; स्व-अन्तर्-गते केतौ = केतु की अपनी अन्तर्दशा में; ततः = तब; सुखम् अवाप्नुयात् = सुख प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ दोष-फलों के बाद शास्त्र उपशमन-मार्ग कहता है: दुर्गा-देवी-जप और मृत्युञ्जय-जप। “एवं स्वान्तर्गते केतौ” — केतु की अपनी अन्तर्दशा के संदर्भ में — तदनंतर सुख-प्राप्ति का वाक्य है। यह दबाव या अनिवार्य “इलाज” नहीं; शास्त्र का पारंपरिक अनुष्ठान-कथन है। जो न करना चाहे, फल-वर्णन को केवल संरचनात्मक चेतावनी की तरह पढ़ सकता है।

English rendering The text prescribes Durgā-devī japa and Mṛtyuñjaya japa; thus, it says, in Ketu’s own antardaśā one may obtain ease thereafter — a traditional ritual counsel of the śāstra, not a coercive remedy claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपशमन/अनुष्ठान-कथन + स्व-अन्तर्दशा संदर्भ। केतु-महादशा 7 वर्ष; केतु की स्व-अन्तर्दशा = (7 × 7) ÷ 120 = 49/120 वर्ष ≈ 0.4083 वर्ष (≈ 4 मास 27 दिन, 360-दिन वर्ष मानकर — प्रयुक्त वर्ष-दिन घोषित करें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वान्तर्गते केतौ” को विंशोत्तरी अनुपात से काल-खंड में बाँधा जाता है: (महादशा-वर्ष × केतु-वर्ष) ÷ 120 = 49/120 वर्ष। फल और जप शास्त्र के स्वर हैं; इंजन केवल आरंभ–अंत तिथि की अनुपात-गणित देता है — फल को निश्चित घटना नहीं बनाता।

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59.7
केतोरन्तर्गते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा राज्यनाथेन संयुते
ketorantargate śukre svocce svakṣetrasaṃyute |
kendratrikoṇalābhe vā rājyanāthena saṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्-गते = केतु की अन्तर्दशा में; शुक्रे = शुक्र (विषय); स्व-उच्चे = स्वोच्च में; स्व-क्षेत्र-संयुते = स्वराशि में/स्वक्षेत्र-युक्त; केन्द्र-त्रिकोण-लाभे वा = केन्द्र, त्रिकोण या लाभ में; राज्य-नाथेन संयुते = राज्य (दशम) नाथ से युक्त।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र केतु-अन्तर्दशा के भीतर शुक्र की स्थिति का शुभ द्वार खोलता है। शुक्र स्वोच्च हो, स्वक्षेत्र-संबद्ध हो, केन्द्र–त्रिकोण–लाभ में हो, अथवा राज्यनाथ (दशमाधिपति) से युक्त हो — तो आगे (परवर्ती श्लोकों में) कथित शुभ फल का आधार बनता है। यह फिर स्थिति-शर्त है, पूर्ण फल नहीं।

English rendering When Venus falls in Ketu’s antardaśā, the text states a favourable setting if Venus is exalted, in its own sign, in a kendra, trikoṇa, or the eleventh, or joined with the tenth-lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अन्तर्दशा-अंतर्ग्रह (शुक्र) की स्थिति-शर्त। शुक्र-अन्तर्दशा-काल (केतु महादशा में) = (7 × 20) ÷ 120 = 140/120 = 7/6 वर्ष ≈ 1 वर्ष 2 मास (वर्ष-दिन परिपाटी घोषित करें)। उच्च/स्वक्षेत्र = राशि-नियम; देशांतर अयनांश-निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी शृंखला में केतु के बाद/भीतर शुक्र-खंड शुद्ध गुणन-अनुपात है: (7 × 20)/120। श्लोक फल-योग की कुंजी देता है; काल-इंजन उसी 120-वर्ष सारणी (केतु 7, शुक्र 20, … Σ = 120) से खंड काटता है — `==` अनुपात, अनुमान नहीं।

59.8
राजप्रीतिं च सौभाग्यं दिशात्स्वाम्बरसंकुलम् ।
तत्काले श्रियमाप्नोति भाग्यकर्मेशसंयुते
rājaprītiṃ ca saubhāgyaṃ diśātsvāmbarasaṃkulam |
tatkāle śriyamāpnoti bhāgyakarmeśasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यकर्मेशसंयुते = भाग्येश (९वें भाव-स्वामी) + कर्मेश (१०वें भाव-स्वामी) के संयोग/युति में; राजप्रीतिम् = राजा/शासक की प्रसन्नता-अनुग्रह; सौभाग्यम् = शुभ भाग्य-समृद्धि; दिशात्स्वाम्बरसंकुलम् = दिशाओं से/दिशागत स्व-वस्त्र-समृद्धि (अम्बर = वस्त्र; संकुल = प्रचुर); तत्काले = उसी दशा-काल में; श्रियम् आप्नोति = श्री/ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब भाग्येश और कर्मेश परस्पर संयुक्त हों, तब उस काल में राजप्रीति और सौभाग्य का अनुभव होता है। दिशाओं से अपने वस्त्र-सामग्री की प्रचुरता तथा तत्काल श्री-लाभ का भी उल्लेख है। यह फल-कथन भाग्य-कर्मेश-युति की दशा-स्थिति पर आधारित है; पाठ-भेद संभव जहाँ “दिशात्स्वाम्बर” की संधि-विच्छेद में विकल्प हों।

English rendering The text states that when the lords of the ninth (bhāgya) and tenth (karma) houses are conjoined, the period brings royal favour, good fortune, and abundance of one’s own clothing from various quarters; at that time one is said to obtain prosperity (śrī).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-फल: भाग्येश–कर्मेश युति)। “संयुते” यहाँ भाव-स्वामियों की युति/समीप-संयोग की स्थिति है; संख्यात्मक गुणक या वर्ष-सूत्र नहीं दिया गया।

59.9
नष्टराज्यधनप्राप्तिं सुखवाहनसुत्तमम् ।
सेतुस्नानादिकं चैव देवतादर्शनं महत्
naṣṭarājyadhanaprāptiṃ sukhavāhanasuttamam |
setusnānādikaṃ caiva devatādarśanaṃ mahat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नष्टराज्यधनप्राप्तिम् = नष्ट हुए राज्य/पद और धन की पुनः प्राप्ति; सुखवाहनसुत्तमम् = उत्तम सुख तथा वाहन; सेतुस्नानादिकम् = सेतु-स्नान आदि (तीर्थ-स्नान-क्रम); देवतादर्शनम् महत् = देवता का महान् दर्शन/दर्शन-लाभ; चैव = तथा ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस पद में कहता है कि (पूर्व-वर्णित अनुकूल दशा-सन्दर्भ में) नष्ट राज्य और धन की प्राप्ति, उत्तम सुख तथा वाहन का लाभ होता है। सेतु-स्नान आदि पुण्य-कर्म और देवता का महान् दर्शन भी उसी फल-श्रृंखला में गिनाया गया है। यह यात्रा-तीर्थ-दर्शन का शास्त्रीय फल-वर्णन है, कोई चिकित्सा या धन-गारंटी नहीं।

English rendering The text states recovery of lost dominion and wealth, excellent comfort and conveyances, setu-bathing and the like, and a great vision (darśana) of the deity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राप्ति- और तीर्थ-दर्शन-श्रृंखला)। कोई कोण, वर्ष-अनुपात या वर्ग-विभाजन यहाँ नहीं है।

59.10
महाराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा
mahārājaprasādena grāmabhūmyādilābhakṛt |
dāyeśātkendrakoṇe vā duścikye lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराजप्रसादेन = महाराज के प्रसाद/अनुग्रह से; ग्रामभूम्यादिलाभकृत् = ग्राम, भूमि आदि का लाभ करने वाला; दायेशात् = दायेश (दशा/अन्तर्दशा-स्वामी) से; केन्द्रकोणे = केन्द्र (१,४,७,१०) या कोण/त्रिकोण (१,५,९) में; वा = अथवा; दुश्चिक्ये = दुश्चिक्य = तृतीय भाव में; लाभगे = लाभ (११वें) भाव में स्थित; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि महाराज-प्रसाद से ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है — विशेषकर जब ग्रह दायेश से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा तृतीय (दुश्चिक्य) या लाभ (एकादश) भाव में स्थित हो। यहाँ दशा-स्वामी से भाव-स्थान की शर्त फल को बाँधती है। यह शासन-अनुग्रह और भूमि-लाभ का शास्त्र-कथन है, आधुनिक भू-अधिकार या वित्तीय भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that through a great king’s favour one gains village, land, and the like, when the planet is in a kendra or trikoṇa from the period-lord (dāyeśa), or even when placed in the third (duścikya) or the eleventh (lābha).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थान नियम (दायेश-सापेक्ष)। केन्द्र = {१,४,७,१०}, त्रिकोण/कोण = {१,५,९}, दुश्चिक्य = ३, लाभ = ११ — गिनती पूर्णांक भाव-क्रम से; कोई अंश-सूत्र नहीं।

59.11
देहारोग्यं शुभं चैव गृहे कल्याणशोभनम् ।
भोजनाम्बरभूषाप्तिरथदोलादिलाभकृत्
dehārogyaṃ śubhaṃ caiva gṛhe kalyāṇaśobhanam |
bhojanāmbarabhūṣāptirathadolādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहारोग्यम् = देह का आरोग्य (रोग-रहित स्थिति — शास्त्र-शब्द); शुभम् = शुभ/मङ्गल; गृहे = घर में; कल्याणशोभनम् = कल्याण और शोभा; भोजनाम्बरभूषाप्तिः = भोजन, अम्बर (वस्त्र), भूषा (आभूषण) की प्राप्ति; रथदोलादिलाभकृत् = रथ, डोला (पालकी आदि) आदि का लाभ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (अनुकूल दाय-स्थिति में) देह-आरोग्य और शुभता रहती है, तथा गृह में कल्याण-शोभा का अनुभव होता है। भोजन, वस्त्र, आभूषण की प्राप्ति और रथ-डोला आदि का लाभ भी उसी फल-पंक्ति में आता है। आरोग्य यहाँ शास्त्रीय फल-शब्द है — चिकित्सा-निदान या उपचार-आदेश नहीं।

English rendering The text states bodily well-being and auspiciousness, welfare and beauty in the home, and the obtaining of food, clothing, ornaments, chariots, litters, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ भोग-सामग्री-प्राप्ति)। कोई बलांक, बिन्दु-योग या दशा-वर्ष-अनुपात नहीं दिया गया।

59.12
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
अकस्मात्कलहं चैव पशुधान्यादिपीडनम्
dāyeśādripurandhrasthe vyaye vā pāpasaṃyute |
akasmātkalahaṃ caiva paśudhānyādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दायेश से; रिपुरन्ध्रस्थे = रिपु (६) या रन्ध्र (८) भाव में स्थित होने पर; व्यये = व्यय (१२) में; वा = अथवा; पापसंयुते = पाप-ग्रह (क्रूर) से युक्त होने पर; अकस्मात् = अचानक; कलहम् = कलह/झगड़ा; पशुधान्यादिपीडनम् = पशु, धान्य आदि की पीड़ा/हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब ग्रह दायेश से षष्ठ, अष्टम या व्यय भाव में हो, अथवा पाप-ग्रह से संयुक्त हो, तब अचानक कलह का संकेत मिलता है। पशु-धान्य आदि की पीड़ा भी उसी अशुभ-फल-श्रृंखला में कही गई है। यह दशा-फल की सावधान शर्त है — भय-व्यापार या “नाश निश्चित” जैसी भाषा नहीं; शास्त्र की स्थिति-बद्ध उक्ति मात्र।

English rendering The text states that when the planet stands in the sixth, eighth, or twelfth from the period-lord, or is conjoined with a malefic, there is sudden quarrel and affliction to cattle, grain, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश-सापेक्ष ६/८/१२ + पाप-युति)। भाव-गिनती पूर्णांक चक्र (१…१२) से; “पाप” यहाँ शास्त्रीय क्रूर-वर्ग (प्रायः शनि–मङ्गल–राहु–केतु आदि — पाठ/परम्परा-भेद संभव) है, संख्यात्मक गुणांक नहीं।

59.13
नीचस्थे खेटसंयुक्ते लग्नात्षष्ठाष्टराशिगे ।
स्वबन्धुजनवैषम्यं शिरोक्षिव्रणपीडनम्
nīcasthe kheṭasaṃyukte lagnātṣaṣṭhāṣṭarāśige |
svabandhujanavaiṣamyaṃ śirokṣivraṇapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचस्थे = नीच राशि में स्थित होने पर; खेटसंयुक्ते = खेट (ग्रह) से संयुक्त; लग्नात् = लग्न से; षष्ठाष्टराशिगे = षष्ठ या अष्टम राशि/भाव में गत; स्वबन्धुजनवैषम्यम् = अपने बन्धु-जन से वैषम्य/असहमति; शिरोक्षिव्रणपीडनम् = शिर और अक्षि (आँख) पर व्रण-पीड़ा — शास्त्र-शब्द।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नीच-स्थिति, ग्रह-युति, तथा लग्न से षष्ठ या अष्टम में होने पर अपने बान्धवों से वैषम्य का अनुभव होता है। शिर-अक्षि-व्रण-पीड़ा का उल्लेख भी उसी फल-पंक्ति में है — इसे शास्त्र का शारीरिक-लक्षण-कथन समझें, चिकित्सकीय निदान या उपचार-आदेश नहीं। पाठ-भेद संभव यदि “खेटसंयुक्ते” को विशेष क्रूर-युति तक सीमित पढ़ा जाए।

English rendering The text states that when the planet is debilitated, conjoined with (another) planet, and occupies the sixth or eighth sign from the lagna, there is discord with one’s own kin and affliction of head- and eye-wounds — reported as the śāstra’s indication, not as a medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नीच + युति + लग्न-सापेक्ष ६/८)। नीच = प्रत्येक ग्रह की निश्चित नीच-राशि (परम्परा-सारणी); लग्न-सापेक्ष भाव-गिनती पूर्णांक; कोई अंश-सूत्र या बल-माप यहाँ नहीं।

59.14
हृद्रोगं मानहानिं च धनधान्यपशुक्षयम् ।
कलत्रपुत्रपीडायाः सञ्चारं च समादिशेत्
hṛdrogaṃ mānahāniṃ ca dhanadhānyapaśukṣayam |
kalatraputrapīḍāyāḥ sañcāraṃ ca samādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हृद्रोगम् = हृदय-रोग — शास्त्र-शब्द; मानहानिम् = मान/सम्मान की हानि; धनधान्यपशुक्षयम् = धन, धान्य, पशु का क्षय; कलत्रपुत्रपीडायाः = पत्नी/कलत्र और पुत्र की पीड़ा का; सञ्चारम् = सञ्चार/प्रसरण/उपस्थिति; च = तथा; समादिशेत् = (ज्योतिषी) सम्यक् निर्देश/कथन करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उपसंहार-रूप में कहता है कि (पूर्वोक्त अशुभ स्थितियों में) हृद्रोग, मान-हानि, तथा धन-धान्य-पशु का क्षय संकेतित होता है। कलत्र-पुत्र-पीड़ा का सञ्चार भी बताने को कहा गया है — “समादिशेत्” से स्पष्ट है कि यह दशा-फल का निर्देश-विधि है। इन शब्दों को चिकित्सा, कानूनी या आर्थिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना; केवल शास्त्र की फल-सूची के रूप में।

English rendering The text states that one should indicate heart-affliction, loss of honour, decline of wealth, grain, and cattle, and the course of distress to spouse and children — as the śāstra’s phala-list under the foregoing adverse placements, not as a modern medical, legal, or financial forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / निर्देश-विधि (“समादिशेत्”)। संख्या, वर्ष-अनुपात या वर्ग-विभाजन अनुपस्थित; फल पूर्व श्लोकों की स्थिति-शर्तों से जुड़ा वर्णनात्मक उपसंहार है।

59.15
द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरुजम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवीजपं चरेत् ।
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुआरोग्यवृद्धये
dvitīyadyūnanāthe tu dehajāḍyaṃ manorujam |
taddoṣaparihārārthaṃ durgādevījapaṃ caret |
śvetāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyuārogyavṛddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (D2-भाव) और द्यून/सप्तम (D7-भाव) के अधिपति में; देह-जाड्यम् = देह-जड़ता / शारीरिक भारीपन-अलसता; मनो-रुजम् = मन की पीड़ा; तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; दुर्गा-देवी-जपम् = दुर्गा-देवी का जप; चरेत् = करे (शास्त्र-निर्देश); श्वेतां गाम् = श्वेत गाय; महिषीम् = महिषी (भैंस); दद्यात् = दान दे; आयु-आरोग्य-वृद्धये = आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब द्वितीय और द्यून (सप्तम) भाव का अधिपति (प्रकरणानुसार दशा-संदर्भ में) फल देता है, तब देह में जाड्य और मन में रुजा का संकेत मिलता है। उसी दोष के परिहारार्थ दुर्गा-देवी का जप करने का निर्देश है। आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए श्वेत गौ तथा महिषी का दान भी कहा गया है। यह फल-कथन और शास्त्रीय उपाय-निर्देश है, न कि चिकित्सकीय आदेश।

English rendering The text states that when the lord of the second and of the seventh (dyūna) is operative, bodily heaviness and mental distress are indicated. For removal of that doṣa it prescribes japa of Durgā-devī, and for increase of longevity and health the gift of a white cow and a buffalo.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रीय उपाय-निर्देश। द्वितीय = भाव 2, द्यून = भाव 7; नाथ = भावेश — यहाँ संख्यात्मक गणना नहीं, भाव-स्वामी का फल-संदर्भ है।

59.16
केतोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा शुभयुक्तनिरीक्षिते
ketorantargate sūrye svocce svakṣetrage'pi vā |
kendratrikoṇalābhe vā śubhayuktanirīkṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्-गते = केतु की अन्तर्दशा में; सूर्ये = सूर्य (अन्तर्स्वामी); स्व-उच्चे = स्वोच्च (मेष 10° पर सूर्य-उच्च); स्व-क्षेत्र-गे = स्वराशि (सिंह) स्थित; अपि वा = अथवा; केन्द्र-त्रिकोण-लाभे = केन्द्र (1,4,7,10), त्रिकोण (1,5,9) अथवा लाभ (11) में; शुभ-युक्त-निरीक्षिते = शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ केतु की अन्तर्दशा में जब सूर्य स्वोच्च अथवा स्वक्षेत्र में हो, अथवा केन्द्र, त्रिकोण या लाभ भाव में स्थित हो, और शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो — तब अगले श्लोक में कहा शुभ फल लागू होता है। यह स्थिति-शर्त (conditional yoga) का श्लोक है; फल स्वयं 59.17 में आता है। पाठ-भेद संभव जहाँ “लाभ” को केवल ग्यारहवें या “लाभस्थ” व्यापक अर्थ में पढ़ा जाए।

English rendering When the Sun operates in Ketu’s antardaśā and is exalted or in its own sign, or occupies a kendra, a trikoṇa, or the eleventh, and is joined or aspected by benefics — the favourable results stated next apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अन्तर्दशा-संदर्भ (केतु-महादशा × सूर्य-अन्तर्)। अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। केतु = 7 वर्ष, सूर्य = 6 वर्ष → सूर्य की अन्तर् (केतु में) = (7 × 6) ÷ 120 = 42/120 = 7/20 वर्ष = 0.35 वर्ष ≈ 4 मास 6 दिन (सौर-वर्ष ≈ 365.25 दिन मानकर ≈ 127.8 दिन)। स्थिति-शर्तें: सूर्य-उच्च = 10° मेष; स्वक्षेत्र = सिंह (120°–150° सायन/निरयन देशान्तर पर निर्भर — अयनांश घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) केतु महादशा आरम्भ 2020-01-01; सूर्य-अन्तर् = 0.35 × 365.25 ≈ 127.8 दिन → लगभग 2020-01-01 से 2020-05-07 तक (केवल अवधि; फल के लिए सूर्य की राशि/भाव-स्थिति अलग से निरयन देशान्तर से जाँचें, उदा. लाहिरी अयनांश)। यदि सूर्य 5° सिंह (स्वक्षेत्र) और लग्नात् केन्द्र/त्रिकोण/11 में हो तथा गुरु/शुक्र दृष्ट हों — तो 59.16 की शर्त पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; योग = 120) और अन्तर् = (महा × अन्तर्) ÷ 120 — यही अनुपात-गणित हमारे दशा-इंजन में पिन है। यह श्लोक फल की शर्त देता है; अवधि-सूत्र अध्याय 46–47 की संरचना से आता है, फल को हम नियति नहीं मानते।

59.17
धनधान्यादिलाभश्च राजानुग्रहवैभवम् ।
अनेकशुभकार्याणि चेष्टसिद्धिः सुखावहा
dhanadhānyādilābhaśca rājānugrahavaibhavam |
anekaśubhakāryāṇi ceṣṭasiddhiḥ sukhāvahā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-आदि-लाभः = धन-धान्य आदि की प्राप्ति; च = और; राज-अनुग्रह-वैभवम् = राजकीय अनुग्रह और वैभव; अनेक-शुभ-कार्याणि = अनेक शुभ कार्य; चेष्ट-सिद्धिः = चेष्टा/प्रयत्न की सिद्धि; सुख-आवहा = सुख लाने वाली।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ स्थितियों में शास्त्र कहता है — धन-धान्य आदि का लाभ, राजानुग्रह और वैभव, अनेक शुभ कार्यों का सम्पन्न होना, प्रयत्नों की सिद्धि, और सुख देने वाला काल। यह 59.16 की शर्तों का फल-पक्ष है; बिना उन स्थितियों के इसे सार्वत्रिक नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering Under those conditions the text states gain of wealth and grain and the like, royal favour and splendour, many auspicious undertakings, success of effort, and a period conducive to happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (59.16 की स्थिति-शर्त पर निर्भर)। “राजानुग्रह” यहाँ पारंपरिक फल-भाषा है, आधुनिक प्रशासनिक गारंटी नहीं।

59.18
अष्टमव्ययराशिस्थे पापग्रहसमन्विते ।
तद्भुक्तौ राजभीतिश्च पितृमातृवियोगकृत्
aṣṭamavyayarāśisthe pāpagrahasamanvite |
tadbhuktau rājabhītiśca pitṛmātṛviyogakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टम-व्यय-राशि-स्थे = अष्टम (8) या व्यय (12) राशि/भाव में स्थित (सूर्य, प्रकरणानुसार); पाप-ग्रह-समन्विते = पाप ग्रह से युक्त; तद्-भुक्तौ = उस भुक्ति (अन्तर्दशा) में; राज-भीतिः = राज/सत्ता से भय; च = और; पितृ-मातृ-वियोग-कृत् = पिता-माता के वियोग का कारक (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ जब (केतु-अन्तर्गत सूर्य) अष्टम या व्यय राशि में हो और पाप ग्रहों से समन्वित हो, तब उस भुक्ति में शास्त्र राजभीति तथा पितृ-मातृ-वियोग का संकेत कहता है। “वियोग” यहाँ शास्त्रीय फल-शब्द है — दूरी, विच्छेद या दुःख-संयोग का पारंपरिक संकेत; इसे निश्चित घटना या चिकित्सकीय भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering If (the Sun in Ketu’s bhukti) occupies the eighth or twelfth and is joined with malefics, the text states fear from authority and indication of separation-distress regarding father and mother in that period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुर्बल/पाप-युक्त स्थिति)। भाव-मानचित्र: अष्टम = 8, व्यय = 12; “राशिस्थ” = सूर्य की राशि लग्नात् जिस भाव में पड़े — लग्न-निर्भर, अयनांश और भाव-पद्धति (समान-भाव/श्रीपति आदि) घोषित करने पर ही भाव-संख्या स्थिर होती है।

59.19
विदेशगमनं चैव चौराहिविषपीडनम् ।
राजमित्रविरोधश्च राजदण्डाद्धनक्षयः
videśagamanaṃ caiva caurāhiviṣapīḍanam |
rājamitravirodhaśca rājadaṇḍāddhanakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेश-गमनम् = विदेश/परदेश गमन; च एव = तथा; चौर-अहि-विष-पीडनम् = चोर, सर्प और विष से पीड़ा; राज-मित्र-विरोधः = राजमित्रों/राज-पक्ष के मित्रों से विरोध; च = और; राज-दण्डात् = राजदण्ड से; धन-क्षयः = धन की हानि।

हिन्दी भावार्थ उसी अशुभ भुक्ति-संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — परदेश गमन, चोर-सर्प-विष से क्लेश, राजपक्षीय मित्रों से विरोध, और राजदण्ड के कारण धनक्षय। ये शास्त्र के अपने फल-पद हैं; इन्हें भय फैलाने या आधुनिक कानूनी/चिकित्सकीय दावे के रूप में नहीं लेना।

English rendering The text further states foreign travel, affliction from thieves, serpents, and poison, opposition involving royal associates, and loss of wealth through royal punishment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (59.18 की अशुभ स्थिति का विस्तार)। “राजदण्ड” पारंपरिक राज-प्रताप/शास्ति का संकेत है, किसी विशिष्ट आधुनिक दण्ड-संहिता का नहीं।

59.20
शोकरोगभयं चैव उष्णाधिक्यं ज्वरो भवेत् ।
दायेशात्लेन्द्रकोणे वा लाभे वा धनसंस्थिते
śokarogabhayaṃ caiva uṣṇādhikyaṃ jvaro bhavet |
dāyeśātlendrakoṇe vā lābhe vā dhanasaṃsthite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शोक-रोग-भयम् = शोक, रोग और भय; च एव = तथा; उष्ण-आधिक्यम् = उष्णता की अधिकता; ज्वरः भवेत् = ज्वर हो (शास्त्र-कथन); दायेशे = दशा/भुक्ति के अधिपति में; लग्न-इन्द्र-कोणे? / लग्ने केन्द्र-कोणे = लग्नात् केन्द्र या त्रिकोण में (पाठ: दायेशात्लेन्द्रकोणे — पाठ-भेद संभव; प्रचलित अन्वय: दायेशे लग्ने केन्द्र-त्रिकोणे); वा लाभे = अथवा लाभ (11) में; वा धन-संस्थिते = अथवा धन (2) में स्थित।

हिन्दी भावार्थ अशुभ पक्ष का अन्तिम फल: शास्त्र शोक, रोग-भय, उष्णता की अधिकता और ज्वर का संकेत कहता है — यह फल-भाषा है, निदान नहीं। श्लोक का उत्तरार्ध शुभ शर्त खोलता है: जब दायेश (अन्तर्/दशा-स्वामी) लग्नात् केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा लाभ या धन भाव में स्थित हो, तब अगले श्लोक का सौख्य-लाभ लागू होता है। “दायेशात्लेन्द्रकोणे” में संधि/पाठ-भेद संभव; भाव-गणित के लिए लग्न-केन्द्र-त्रिकोण-लाभ-धन ही निर्णायक हैं।

English rendering The text states grief, fear of disease, excess of heat, and fever (as phala, not medical diagnosis). Then it turns to the favourable case: when the period-lord is in a kendra or trikoṇa (from the lagna), or in the eleventh or second — results follow in the next verse. Reading of the compound may vary (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-परीक्षण (binary yoga-check), कोई निरंतर सूत्र नहीं। शुभ शर्त: दायेश-भाव ∈ {1, 4, 5, 7, 9, 10} ∪ {2, 11} लग्नात् (केन्द्र = 1,4,7,10; त्रिकोण = 1,5,9; धन = 2; लाभ = 11)। भाव-संख्या = whole-sign या अन्य पद्धति — घोषित करें। अशुभ फल-भाग में गणित नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (whole-sign)। सूर्य = धनु (लग्नात् भाव 4 = केन्द्र) → “केन्द्र” शर्त पूर्ण → 59.21 का शुभ पक्ष। यदि सूर्य = मेष (लग्नात् 8) और पाप-युक्त → 59.18–20 का अशुभ पक्ष। अयनांश: निरयन सूर्य-राशि अयनांश पर निर्भर।

59.21
देहसौख्यं चार्थलाभ० पुत्रलाभो मनोदृढम् ।
सर्वकार्यार्थसिद्धिः स्यात्स्वल्पग्रामाधिपत्ययुक्
dehasaukhyaṃ cārthalābha0 putralābho manodṛḍham |
sarvakāryārthasiddhiḥ syātsvalpagrāmādhipatyayuk

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-सौख्यम् = देह का सुख/स्वास्थ्य-सौख्य; च = और; अर्थ-लाभः = अर्थ/धन का लाभ (पाठ: अर्थलाभ० — विराम/मुद्रण-चिह्न; अर्थलाभः संभाव्य); पुत्र-लाभः = पुत्र-लाभ; मनो-दृढम् = मन की दृढ़ता; सर्व-कार्य-अर्थ-सिद्धिः = सब कार्यों और प्रयोजनों की सिद्धि; स्यात् = हो; स्वल्प-ग्राम-आधिपत्य-युक् = अल्प ग्राम-आधिपत्य से युक्त।

हिन्दी भावार्थ 59.20 की शुभ स्थिति में शास्त्र कहता है — देह-सौख्य, अर्थलाभ, पुत्रलाभ, मन की दृढ़ता, सब कार्यों में अर्थ-सिद्धि, तथा स्वल्प ग्राम-अधिकार/आधिपत्य का योग। “पुत्रलाभ” और “ग्रामाधिपत्य” शास्त्रीय फल-पद हैं; इन्हें आधुनिक जनसांख्यिकीय या प्रशासनिक गारंटी नहीं समझना। पाठ में “अर्थलाभ०” चिह्न पाठ-भेद/मुद्रण-संकेत संभव है।

English rendering Under that favourable placement the text states bodily comfort, gain of wealth, gain of a son, firmness of mind, success in all undertakings, and association with minor village-lordship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (59.20 उत्तरार्ध की स्थिति पर निर्भर शुभ फल)। “स्वल्पग्रामाधिपत्य” मात्रात्मक क्षेत्र-फल नहीं देता; केवल गुणात्मक संकेत है।

59.22
दायेशाद्रन्ध्ररिःफे वा स्थिते वा पापसंयुते ।
अन्नविघ्नो मनोबीतिर्धनधान्यपशुक्षयः
dāyeśādrandhrariḥphe vā sthite vā pāpasaṃyute |
annavighno manobītirdhanadhānyapaśukṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा/अन्तर्दशा का स्वामी; रन्ध्र = अष्टम भाव; रिःफ = द्वादश भाव; स्थित = उस स्थान में स्थित; पाप-संयुक्त = पापग्रह से युक्त; अन्न-विघ्न = अन्न-प्राप्ति / भोजन में बाधा; मनोभीति = मन में भय; धन-धान्य-पशु-क्षय = धन, अन्न और पशुओं की हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश (दशा-स्वामी) रन्ध्र या रिःफ में स्थित हो, अथवा पापग्रह से संयुक्त हो, तब अन्न में विघ्न, मन में भीति, तथा धन-धान्य-पशु की क्षति का फल कहा गया है। यह फल-कथन दशा-काल की स्थिति पर टिका है—भाव-स्थान और संयोग को गिना जाता है, न कि किसी सुनिश्चित आशंका को। पाठ में फल को दशा-स्वामी की अशुभ स्थिति से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when the daśā-lord occupies the eighth or twelfth, or is joined with malefics, there is obstruction to food, mental fear, and decline of wealth, grain, and cattle. The claim is a daśā-phala conditioned on house-placement and conjunction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा-स्वामी की भाव-स्थिति)। गणना केवल यह है कि दायेश किस भाव में है और पाप-युति है या नहीं; यहाँ कोई अंश-सूत्र या बल-इकाई नहीं दी गई।

59.23
आदौ मध्ये महाक्लेशानन्ते सौख्यं विनिर्दिशेत् ।
द्वितीयसप्तमाधीशे ह्यपमृत्युर्भविष्यति
ādau madhye mahākleśānante saukhyaṃ vinirdiśet |
dvitīyasaptamādhīśe hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदौ = दशा/अन्तर्दशा के आरम्भ में; मध्ये = मध्य काल में; महा-क्लेश = बड़ा कष्ट; अन्ते = अन्त में; सौख्य = सुख; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे / कहे; द्वितीय-सप्तम-अधीश = द्वितीय एवं सप्तम भाव के अधिपति (मारक-संदर्भ); अपमृत्यु = अपमृत्यु-संकेत (अकाल/अप्राकृतिक मृत्यु का शास्त्रीय संकेत—पाठ का कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश करता है कि (उक्त अशुभ दशा-अवस्था में) आरम्भ और मध्य में महाक्लेश तथा अन्त में सौख्य कहना चाहिए। पुनः कहता है कि द्वितीय-सप्तम अधीश की स्थिति/दशा-सम्बन्ध में अपमृत्यु का फल भविष्य में बताया गया है। यह मारक-भावों (2, 7) के शास्त्रीय संकेत का फल-कथन है—निश्चित भविष्यवाणी नहीं, पाठ का अपना विधान।

English rendering The text directs: great affliction in the beginning and middle of the period, happiness at the end. It further states that with the lords of the second and seventh (the classic maraka houses) apamṛtyu is indicated. Rendered as the śāstra’s claim, not as a fixed outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (काल-खण्ड + मारक-अधीश)। “आदि–मध्य–अन्त” दशा-अवधि के तीन काल-भागों का गुणात्मक विभाजन है; यहाँ वर्ष-मास का कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं है।

59.24
तस्य शान्तिं प्रकुर्वीत स्वर्णं धेनुं प्रदापयेत् ।
भास्करस्य प्रसादेन ततः सुखमवाप्नुयात्
tasya śāntiṃ prakurvīta svarṇaṃ dhenuṃ pradāpayet |
bhāskarasya prasādena tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्य शान्तिम् = उसकी (उक्त अपमृत्यु/क्लेश-संकेत की) शान्ति; प्रकुर्वीत = करे; स्वर्णम् = सोना; धेनुम् = गौ; प्रदापयेत् = दान कराए / दे; भास्कर = सूर्य; प्रसाद = अनुग्रह; ततः = तब; सुखम् अवाप्नुयात् = सुख प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उक्त संकेत की शान्ति करनी चाहिए और स्वर्ण तथा धेनु का दान कराना चाहिए; भास्कर (सूर्य) के प्रसाद से तत्पश्चात् सुख की प्राप्ति कही गई है। यह उपाय-विधान पाठ का अपना कथन है—दबाव या गारंटी के रूप में नहीं पढ़ा जाना। फल “प्रसाद से सुख” के रूप में शास्त्र ने जोड़ा है।

English rendering The text states that one should perform the śānti for that (indication), give gold and a cow in gift, and that by the grace of Bhāskara (the Sun) happiness is then obtained. Presented as the śāstra’s ritual-result claim, not as a forced remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/उपाय-कथन (शान्ति–दान–सूर्य-प्रसाद)। कोई अंश, वर्ष, या बल-इकाई नहीं; केवल शास्त्रीय शान्ति-विधान का उल्लेख।

59.25
केतोरन्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा धने शुभसमन्विते
ketorantargate candre svocce svakṣetrage'pi vā |
kendratrikoṇalābhe vā dhane śubhasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्गत = केतु की अन्तर्दशा में; चन्द्रे = चन्द्र (जब स्थित/प्रभाव में); स्व-उच्च = स्वोच्च (चन्द्र का उच्च = वृषभ); स्व-क्षेत्र = स्वराशि (कर्क); केन्द्र = 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 1, 5, 9; लाभ = एकादश भाव; धन = द्वितीय भाव; शुभ-समन्वित = शुभग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—केतु की अन्तर्दशा में जब चन्द्र स्वोच्च या स्वक्षेत्र में हो, अथवा केन्द्र/त्रिकोण/लाभ में हो, या धन भाव में शुभ-युक्त हो, तब आगे के श्लोकों में कहा गया शुभ फल लागू होता है। यह विंशोत्तरी-क्रम में केतु-अन्तर्दशा और चन्द्र की स्थिति का संयुक्त फल-सूत्र है। पाठ-भेद संभव जहाँ “अन्तर्गत चन्द्र” को महान्तर्यादि अन्य पाठों से मिलाया जाए।

English rendering In Ketu’s antardaśā, when the Moon is exalted or in its own sign, or occupies a kendra, trikoṇa, or the eleventh, or the second conjoined with benefics—the auspicious results stated next apply. The verse conditions phala on period (Ketu-antar) and Moon’s placement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अन्तर्दशा-अनुपात (BPHS daśā-cycle):
अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।
केतु महादशा = 7 वर्ष, चन्द्र = 10 वर्ष → केतु–चन्द्र अन्तर् (केतु-महा में) = (7 × 10) ÷ 120 = 70/120 = 7/12 वर्ष ≈ 0.5833 वर्ष ≈ 7 मास 3.65 दिन (वर्ष = 365.25 दिन मानने पर; परम्परा में सौर/सावन वर्ष-भेद घोषित करें)।
उच्च/स्वक्षेत्र: चन्द्र उच्च = वृषभ; स्व = कर्क—यह राशि-नियम है, अंश-सूक्ष्म उच्च-बिन्दु इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें केतु महादशा चल रही है; चन्द्र अन्तर् = 7/12 वर्ष। जन्म-लग्न में चन्द्र वृषभ (उच्च) या कर्क (स्व) हो, अथवा केन्द्र/त्रिकोण/11/2 (शुभ-युक्त) में हो—तब 59.26–59.28 का शुभ फल-पाठ लागू माना जाता है। (अयनांश: दशा-प्रवेश के लिए नक्षत्र-भोग से केतु/चन्द्र का क्रम; फल-भाव D1 भाव-स्वामित्व/स्थिति पर—house system जहाँ भाव-गणना हो वहाँ स्पष्ट करें; इस श्लोक में केवल राशि/भाव-स्थिति।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र के केतु (7) और चन्द्र (10) अन्तर्-अनुपात से सीधे जुड़ता है—अन्तर् = (महा × अन्तर्) ÷ 120, योग 120। हमारी दशा-इंजन में यही अनुपात अंकगणित है; फल-वाक्य अलग रखे जाते हैं—“शास्त्र कहता है”, न कि निश्चित भविष्य। convention (नक्षत्र-अंश, अयनांश) घोषित किए बिना वर्ष-शेष नहीं छापा जाता।

59.26
राजप्रीतिर्महोत्साहः कल्याणं च महत्सुखम् ।
महाराजप्रसादेन गृहभूम्यादिलाभकृत्
rājaprītirmahotsāhaḥ kalyāṇaṃ ca mahatsukham |
mahārājaprasādena gṛhabhūmyādilābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-प्रीति = राजा/शासक की प्रसन्नता; महा-उत्साह = बड़ा उत्साह; कल्याण = मंगल / कल्याण; महत्-सुख = बड़ा सुख; महाराज-प्रसाद = महाराज का अनुग्रह; गृह-भूमि-आदि-लाभ-कृत् = घर, भूमि आदि का लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ चन्द्र-स्थिति में शास्त्र फल कहता है—राजप्रीति, महोत्साह, कल्याण और महत् सुख। महाराज के प्रसाद से गृह, भूमि आदि का लाभ भी कहा गया है। यह फल-कथन “केतु-अन्तर् + शुभ चन्द्र” की शर्त पर है; पाठ सामूहिक शुभ-लाभ की भाषा में बोलता है।

English rendering The text states royal favor, great enthusiasm, welfare, and great happiness; and, by a great king’s grace, gain of house, land, and the like. These are phala under the prior Moon-in-Ketu-antar conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राजप्रसाद–गृहभूमि-लाभ)। संख्या या वर्ग-सूत्र नहीं; शर्त 59.25 की दशा-स्थिति से बँधी है।

59.27
भोजनाम्बरपश्वादिव्यवसायेऽधिकं फलम् ।
अश्ववाहनलाभश्च वस्त्रभरणभूषणम्
bhojanāmbarapaśvādivyavasāye'dhikaṃ phalam |
aśvavāhanalābhaśca vastrabharaṇabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजन = अन्न/भोज्य; अम्बर = वस्त्र; पशु-आदि = पशु इत्यादि; व्यवसाय = व्यापार/उद्योग; अधिकं फलम् = अधिक फल; अश्व-वाहन-लाभ = घोड़े एवं वाहन का लाभ; वस्त्र-भरण-भूषण = वस्त्र, आभूषण, भूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भोजन, वस्त्र, पशु आदि के व्यवसाय में अधिक फल मिलता है; अश्व और वाहन का लाभ तथा वस्त्र-भरण-भूषण भी प्राप्त होते हैं—यह उसी शुभ केतु-अन्तर्-चन्द्र अवस्था का विस्तारित फल है। पाठ आजीविका और उपभोग-लाभ की सूची देता है, गारंटी नहीं।

English rendering The text states greater results in trades of food, clothing, cattle, and the like; also gain of horses and conveyances, and of garments, ornaments, and adornment—continuing the prior auspicious Ketu-antar / Moon phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (व्यवसाय-लाभ सूची)। कोई प्रतिशत, अंश या बल-सीमा नहीं; केवल शास्त्रीय शुभ-फल का विस्तार।

59.28
देवालयतडागादिपुण्यधर्मादिसङ्ग्रहम् ।
पुत्रदारादिसौख्यं च पूर्णचन्द्रः प्रयच्छति
devālayataḍāgādipuṇyadharmādisaṅgraham |
putradārādisaukhyaṃ ca pūrṇacandraḥ prayacchati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवालय = मंदिर; तडाग = तालाब; पुण्य-धर्म-आदि-संग्रह = पुण्य-धर्म आदि का संचय/संग्रह; पुत्र-दार-आदि-सौख्य = पुत्र, पत्नी आदि का सुख; पूर्ण-चन्द्र = पूर्ण-शक्ति/शुभ अवस्था का चन्द्र (अथवा पूर्णिमा-चन्द्र—पाठ-भेद संभव); प्रयच्छति = देता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि देवालय, तडाग आदि पुण्य-धर्म कार्यों का संग्रह और पुत्र-दार आदि का सौख्य—यह “पूर्णचन्द्र” प्रदान करता है। सन्दर्भ में “पूर्ण” का अर्थ शुभ-स्थित, बलवान चन्द्र (59.25 की शर्तों के साथ) लिया जाता है; पूर्णिमा-मात्र का बाध्य अर्थ पाठ से अकेला सिद्ध नहीं। फल धर्म-लाभ और पारिवारिक सौख्य दोनों को जोड़ता है।

English rendering The text states that the “full” (well-placed/strong) Moon grants the undertaking of meritorious works—temples, tanks, and the like—and happiness connected with children, spouse, and so on. “Pūrṇa-candra” here continues the auspicious Moon conditions of the Ketu-antar sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पुण्य-संग्रह + पुत्रदार-सौख्य)। चन्द्र-बल (षड्बल आदि) का कोई संख्या-सूत्र इस श्लोक में नहीं; “पूर्ण” गुणात्मक संकेत है, virūpa/rūpa सीमा नहीं।

59.29
क्षीणे वा नीचगे चन्द्रे षष्ठाष्टमव्ययराशिगे ।
आत्मसौख्यं मनस्तापं कार्यविघ्नं महद्भयम्
kṣīṇe vā nīcage candre ṣaṣṭhāṣṭamavyayarāśige |
ātmasaukhyaṃ manastāpaṃ kāryavighnaṃ mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षीणे = क्षीण चन्द्र (कृष्ण-पक्ष/ह्रास-अवस्था में); नीचगे = नीच-राशिस्थ (चन्द्र का नीच: वृश्चिक); षष्ठ-अष्टम-व्यय-राशिगे = 6/8/12 भाव-राशि में स्थित; आत्मसौख्यम् = आत्मिक/व्यक्तिगत सुख; मनस्तापम् = मानसिक ताप; कार्यविघ्नम् = कार्य-बाधा; महद्भयम् = महान् भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्र क्षीण हो, अथवा नीच में पड़े, अथवा षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) राशि/भाव में स्थित हो, तब इस दशा/भुक्ति-सन्दर्भ में आत्मसौख्य, मनस्ताप, कार्यों में विघ्न और महान् भय — ऐसे फल कहे गए हैं। यह कथन चन्द्र की दुर्बल/अशुभ स्थिति से जुड़े फल-वर्णन का अंश है, न कि कोई अनिवार्य नियति। पाठ-भेद संभव; कुछ परम्पराएँ आत्मसौख्य को हानि/क्षति के सन्दर्भ में पढ़ती हैं।

English rendering The text states that when the Moon is waning/weak (kṣīṇa), debilitated (nīca), or placed in the sixth, eighth, or twelfth sign/house, the declared results include personal ease (ātmasaukhya), mental anguish, obstruction of undertakings, and great fear. This is a phala-statement under afflicted-Moon conditions within the chapter’s daśā framework.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (क्षीण/नीच/त्रिक-स्थित चन्द्र का दशा-फल)। ज्योतिष-गणित यहाँ स्थिति-वर्गीकरण मात्र है: चन्द्र की राशि/भाव-स्थिति और बल-अवस्था; कोई अंश-सूत्र या अवधि-गणना नहीं।

59.30
पितृमातृवियोगं च देहजाड्यं मनोव्यथाम् ।
व्यवसायात्फलं कष्टं पशुनाशं भयं वदेत्
pitṛmātṛviyogaṃ ca dehajāḍyaṃ manovyathām |
vyavasāyātphalaṃ kaṣṭaṃ paśunāśaṃ bhayaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृ-मातृ-वियोगम् = माता-पिता से वियोग; देह-जाड्यम् = देह की जड़ता/सुस्ती; मनो-व्यथाम् = मानस-पीड़ा; व्यवसायात् फलम् कष्टम् = व्यवसाय से कष्ट-फल; पशु-नाशम् = पशु-हानि; भयम् = भय; वदेत् = कहे (आचार्य-निर्देश)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की उसी चन्द्र-अवस्था के क्रम में शास्त्र आगे कहता है — पितृ-मातृ वियोग, देह में जाड्य, मनोव्यथा, व्यवसाय से कठिन/कष्टपूर्ण फल, पशु-नाश और भय — इनकी घोषणा करनी चाहिए। “वदेत्” यहाँ फल-कथन की विधि है: ज्योतिषी इन संकेतों को शास्त्रीय सूची के रूप में बोले। यह भय-व्यापार नहीं, स्रोत-पाठ का फल-वर्णन है।

English rendering Continuing the same condition, the text directs one to declare separation from father and mother, bodily inertia, mental distress, hard or painful results from vocation, loss of cattle/livestock, and fear. The optative “vadet” marks the phala as a stated teaching, not a modern clinical or economic claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्व श्लोक की चन्द्र-अवस्था का विस्तारित अशुभ-फल-सूची)। कोई संख्या, अवधि या वर्ग-सूत्र निहित नहीं; केवल स्थिति → फल-सूची।

59.31
दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा बलसंयुते ।
कृषिगोभूमिलाभं च इष्टबन्धुसमागमम्
dāyeśātkendrakoṇe vā lābhe vā balasaṃyute |
kṛṣigobhūmilābhaṃ ca iṣṭabandhusamāgamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दाय (दशा/भुक्ति) के अधिपति से; केन्द्र = 1/4/7/10; कोणे = त्रिकोण (1/5/9); लाभे = एकादश भाव में; बल-संयुते = बल से युक्त; कृषि-गो-भूमि-लाभम् = कृषि, गौ, भूमि का लाभ; इष्ट-बन्धु-समागमम् = प्रिय बन्धुओं से समागम।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र दायेश (उस काल-खण्ड के स्वामी) की शुभ स्थिति का फल कहता है — यदि दायेश केन्द्र या कोण में हो, अथवा लाभ (एकादश) में हो, और बल से युक्त हो, तो कृषि, गौ और भूमि का लाभ तथा इष्ट बन्धुओं का समागम कहा गया है। यहाँ “बल” शास्त्रीय बलाबल-दृष्टि का संकेत है; फल शास्त्र का कथन है, गारंटी नहीं।

English rendering The text states that when the period-lord (dāyeśa) occupies a kendra or trikoṇa, or the eleventh (lābha), and is endowed with strength, one is to understand gain of agriculture, cattle, and land, and meeting with dear kin. Strength and house-placement are the operative conditions of this phala-rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश की भाव-स्थिति + बल → शुभ फल)। तकनीक केवल वर्गीकरण है: केन्द्र = {1,4,7,10}, कोण/त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = 11; “बलसंयुक्त” का संख्यात्मक माप इस श्लोक में नहीं दिया (षड्बल आदि अन्य अध्यायों में)।

59.32
तस्मात्स्वकार्यसिद्धिं च गृहे गोक्षीरमेव च ।
भुक्त्यादौ शुभमारोग्यं मध्ये राजप्रियं शुभम्
tasmātsvakāryasiddhiṃ ca gṛhe gokṣīrameva ca |
bhuktyādau śubhamārogyaṃ madhye rājapriyaṃ śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् = उससे (पूर्वोक्त शुभ दायेश से); स्व-कार्य-सिद्धिम् = अपने कार्य की सिद्धि; गृहे गो-क्षीरम् = गृह में गौ-दुग्ध; भुक्त्यादौ = भुक्ति के आदि में; शुभम् आरोय्यम् = शुभ और आरोग्य; मध्ये = भुक्ति-मध्य में; राज-प्रियम् शुभम् = राज-अनुग्रह/प्रियता और शुभ।

हिन्दी भावार्थ उसी शुभ दायेश-स्थिति से शास्त्र कहता है — स्वकार्य-सिद्धि, और घर में गोक्षीर (समृद्धि का शास्त्रीय चिह्न)। भुक्ति के तीन खण्डों में फल बाँटा गया है: आदि में शुभ और आरोग्य; मध्य में राजप्रियता और शुभ। यह भुक्ति-काल का गुणात्मक विभाजन है — आरम्भ/मध्य/अन्त — न कि वर्ष-संख्या का नया सूत्र।

English rendering From that same favourable dāyeśa condition the text states success in one’s own work and the presence of cows and milk in the household. Within the bhukti it further divides results: at the beginning, auspiciousness and health; in the middle, royal favour and weal.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-काल का आदि/मध्य विभाजन)। भुक्ति की कुल अवधि दशा-प्रकरण (यथा विंशोत्तरी: अन्तरदशा = महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120) से आती है; यह श्लोक केवल फल-त्रिभाजन (आदि–मध्य–अन्त) बताता है, नये स्थिरांक नहीं।

59.33
अन्ते तु राजभीतिं च विदेशगमनं तथा ।
दूरयात्रादिसञ्चारं सम्बन्धिजनपूजनम्
ante tu rājabhītiṃ ca videśagamanaṃ tathā |
dūrayātrādisañcāraṃ sambandhijanapūjanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = भुक्ति के अन्त में; राज-भीतिम् = राज/अधिकार से भय; विदेश-गमनम् = विदेश-यात्रा; दूर-यात्रा-आदि-सञ्चारम् = दूर-यात्रा आदि भ्रमण; सम्बन्धि-जन-पूजनम् = सम्बन्धियों का पूजन/सत्कार।

हिन्दी भावार्थ भुक्ति के अन्त का फल शास्त्र इस प्रकार कहता है — राजभीति, विदेश-गमन, दूर-यात्रा आदि संचरण, तथा सम्बन्धि-जन का पूजन/सत्कार। पूर्व श्लोक के आदि–मध्य के शुभ-वर्णन के बाद अन्त में मिश्रित/संचरण-प्रधान फल जुड़े हैं। यह काल-खण्ड का क्रमिक फल-चित्र है; “राजभीति” को आतंक-वाक्य नहीं, शास्त्रीय पद के रूप में पढ़ें।

English rendering At the close of the bhukti the text states fear of royal authority, travel abroad, distant journeying and movement, and honour or worship directed toward kinsfolk. The three-part (ādi–madhya–anta) phala sequence begun in the previous verse is completed here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-अन्त का फल-सूची)। आदि/मध्य/अन्त काल-खण्डों का समान-त्रिभाजन परम्परा में प्रचलित है; इस श्लोक में कोई अंश-या वर्ष-संख्या नहीं दी गई।

59.34
दायेशात्षष्ठरिःफे वा रन्ध्रे वा बलवर्जिते ।
धनधान्यादिहानिश्च मनोव्यात्कुलमेव च
dāyeśātṣaṣṭhariḥphe vā randhre vā balavarjite |
dhanadhānyādihāniśca manovyātkulameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दायेश से; षष्ठे = षष्ठ भाव में; रिःफे = व्यय/द्वादश (रिःफ); रन्ध्रे = अष्टम; बल-वर्जिते = बल-रहित; धन-धान्य-आदि-हानिः = धन-धान्य आदि की हानि; मनोव्या = मनोव्यथा; कुले = कुल/परिवार में; एव च = तथा।

हिन्दी भावार्थ अब विपरीत स्थिति: यदि दायेश षष्ठ, रिःफ (द्वादश) या रन्ध्र (अष्टम) में हो, अथवा बल से रहित हो, तो शास्त्र कहता है — धन-धान्यादि की हानि, और कुल में मनोव्यथा। त्रिक-स्थान (6/8/12) तथा निर्बलता — दोनों अशुभ-फल के द्वार के रूप में गिने गए हैं। यह दशा-स्वामी की स्थिति-नियम का फल-पक्ष है।

English rendering The text states that when the period-lord stands in the sixth, the twelfth (ripha), or the eighth (randhra), or is devoid of strength, there is loss of wealth, grain, and the like, and mental distress within the family/line. Afflicted house-placement and lack of strength are the two conditions of this rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दायेश त्रिक/निर्बल → हानि-फल)। भाव-सूची निश्चित है: षष्ठ = 6, रन्ध्र = 8, रिःफ = 12; बल-माप का संख्या-सूत्र यहाँ नहीं — केवल “बलवर्जित” पद।

59.35
स्वबन्धुजनवैरं च भ्रातृपीडा तथैव च ।
निधनाधिपदोषेण द्विसप्तपतिसंयुते
svabandhujanavairaṃ ca bhrātṛpīḍā tathaiva ca |
nidhanādhipadoṣeṇa dvisaptapatisaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-बन्धु-जन-वैरम् = स्व-बन्धुजन से वैर; भ्रातृ-पीडा = भ्रातृ-पीड़ा; निधन-अधिप-दोषेण = अष्टमेश (निधनाधिप) के दोष से; द्वि-सप्त-पति-संयुते = द्वितीयेश और सप्तमेश से युक्त होने पर (द्वि=2, सप्त=7 — मरक-सम्बद्ध भाव-स्वामी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — स्व-बन्धुजन से वैर और भ्रातृ-पीड़ा; तथा जब निधनाधिप (अष्टमेश) के दोष से, और वह द्वितीय तथा सप्तम के अधिपतियों से संयुक्त हो, तब यह दोष-संयोग विशेष रूप से गिना जाता है। “द्विसप्तपति” यहाँ भाव-2 और भाव-7 के स्वामियों का संकेत है — आयुर्दाय/मरक-प्रकरण की भाषा के साथ जुड़ा पद-समूह। फल शास्त्र का कथन है; चिकित्सा या मृत्यु-भविष्य नहीं।

English rendering The text further states enmity with one’s own kin and distress to brothers; and, by the fault of the eighth-lord (nidhanādhipa), when that lord is conjoined with the lords of the second and the seventh (dvi-sapta-pati). The verse ties kin-strife phala to an eighth-lord configuration involving the 2nd- and 7th-lords — a structural yoga-condition, not a clinical forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-संकेत (निधनाधिप + 2/7-पति संयोग)। भाव-सूचकांक: निधन = 8, द्वि = 2, सप्त = 7; “संयुक्त” =同-राशि/युति-स्थिति (दृष्टि-पाठ अलग)। कोई वर्ष-संख्या या बल-इकाई इस श्लोक में नहीं।

59.36
अपमृत्युभयं तस्य शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।
चन्द्रप्रीतिकरीं चैव ह्यायुरारोग्यसिद्धये
apamṛtyubhayaṃ tasya śāntiṃ kuryādyathāvidhi |
candraprītikarīṃ caiva hyāyurārogyasiddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपमृत्युभयम् = अकाल-मृत्यु का भय (शास्त्रोक्त फल-संकेत); शान्तिम् = शान्ति-कर्म / प्रशमन-विधान; यथाविधि = शास्त्र-निर्दिष्ट विधि से; चन्द्रप्रीतिकरीम् = चन्द्र-प्रिय / चन्द्र-सन्तुष्टि-कारी क्रिया; आयुः = आयु; आरोग्य = आरोग्य; सिद्धये = सिद्धि / प्राप्ति के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस स्थिति में अपमृत्यु-भय का संकेत हो, वहाँ यथाविधि शान्ति करनी चाहिए। विशेष रूप से चन्द्र-प्रीति-कारी कर्म का उल्लेख है, जिसका प्रयोजन आयु और आरोग्य की सिद्धि बताया गया है। यह फल-कथन के साथ विधान-सूचक पंक्ति है — भय का आग्रह नहीं, शास्त्रीय क्रम का निर्देश।

English rendering The text states that where the indication of untimely-death fear arises, pacification should be performed according to rule. It further mentions a Moon-pleasing rite aimed at the attainment of longevity and health — as the śāstra’s own prescription, not as a claim of guaranteed outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन के साथ शान्ति-विधान-निर्देश। यह पंक्ति गणना नहीं खोलती; अपमृत्यु-संकेत के बाद शास्त्रीय शान्ति और चन्द्र-प्रीति-कर्म का क्रम बताती है।

59.37
केतोरन्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वाऽपि शुभग्रहयुतेक्षिते
ketorantargate bhaume lagnātkendratrikoṇage |
svocce svakṣetrage vā'pi śubhagrahayutekṣite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्गते = केतु-अन्तर्दशा में; भौमे = मङ्गल (कुज); लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = 1, 4, 7, 10 भाव; त्रिकोण = 5, 9 भाव; स्वोच्चे = स्व-उच्च राशि में; स्वक्षेत्रगे = स्व-क्षेत्र / मूल-त्रिकोण-स्वराशि में; शुभग्रहयुतेक्षिते = शुभ-ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब केतु की अन्तर्दशा में मङ्गल की स्थिति का शुभ-पक्ष खोलता है। जब मङ्गल लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा उच्च/स्वक्षेत्र में हो, अथवा शुभ-ग्रह से युक्त-दृष्ट हो — तब आगे आने वाले शुभ-फलों की शर्त पूरी होती है। यह फल-शर्त (condition) है: स्थान-बल और शुभ-सम्बन्ध की जाँच।

English rendering The text next sets the favourable placement of Mars in Ketu’s antardaśā: Mars in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in exaltation or own sign, or joined/aspected by a benefic. These conditions frame the auspicious results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल की स्थिति-शर्त (लग्न-सापेक्ष केन्द्र/त्रिकोण, उच्च/स्वक्षेत्र, शुभ-योग/दृष्टि)। केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {5,9} — भाव-गणना लग्न से पूर्णांक भाव-अंतर पर; ग्रह-राशि-स्वामित्व और उच्च-स्थान पारंपरिक राशि-तालिका से निर्धारित होते हैं (अयनांश फल नहीं, केवल राशि-स्थान)।

59.38
आदौ शुभफलं चैव ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
धनधान्यादिलाभश्च चतुष्पाज्जीवलाभकृत्
ādau śubhaphalaṃ caiva grāmabhūmyādilābhakṛt |
dhanadhānyādilābhaśca catuṣpājjīvalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदौ = आरम्भ में / पहले; शुभफलम् = शुभ परिणाम; ग्रामभूम्यादि = ग्राम, भूमि आदि; लाभकृत् = लाभ कराने वाला; धनधान्यादि = धन, धान्य आदि; चतुष्पात् = चतुष्पद / पशु; जीवलाभकृत् = जीव-सम्पत्ति / प्राणि-लाभ कराने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त शुभ-स्थित मङ्गल के लिए शास्त्र कहता है — आरम्भ में शुभ फल मिलता है। ग्राम-भूमि आदि का लाभ, धन-धान्य का लाभ, तथा चतुष्पद-जीवों का लाभ — ये फल-सूची के रूप में गिनाए गए हैं। यह भौम-अन्तर्दशा (केतु-अन्तर्) के शुभ-पक्ष का विस्तार है।

English rendering Under those favourable conditions, the text states that results begin auspiciously: gains of village and land, wealth and grain, and benefit from four-footed living stock. These are listed as the śāstra’s own phala-items, not as guarantees.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लाभ-सूची)। संख्या या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल शुभ-फलों का क्रमबद्ध वर्णन।

59.39
गृगारामक्षेत्रलाभो राजानुग्रहवैभवम् ।
भाग्ये कर्मेशसम्बन्धे भूलाभः सौख्यमेव च
gṛgārāmakṣetralābho rājānugrahavaibhavam |
bhāgye karmeśasambandhe bhūlābhaḥ saukhyameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृह = गृह; आराम = उद्यान / बाग; क्षेत्र = खेत / भूमि; राजानुग्रह = राज-कृपा; वैभवम् = वैभव / समृद्धि; भाग्ये = भाग्य-भाव (9) में / भाग्य-सम्बन्ध में; कर्मेश = कर्म-भाव (10) का स्वामी; सम्बन्धे = सम्बन्ध होने पर; भूलाभः = भूमि-लाभ; सौख्यम् = सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे गृह, उद्यान और क्षेत्र का लाभ तथा राजानुग्रह-जनित वैभव बताता है। विशेष शर्त: भाग्य (9) और कर्मेश (10वें स्वामी) के सम्बन्ध में भूमि-लाभ और सौख्य भी कहा गया है। यहाँ भाव-स्वामी-सम्बन्ध फल की द्वितीय परत है — केवल मङ्गल-स्थान नहीं, नवम-दशम-सम्बन्ध भी देखा जाता है।

English rendering The text further states gains of house, garden, and fields, together with royal favour and splendour. When there is connection with the ninth (bhāgya) and the tenth-lord (karmeśa), it also speaks of land-gain and comfort — as a conditioned phala-clause.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्वामी-सम्बन्ध की शर्त। “भाग्ये कर्मेशसम्बन्धे” = नवम-भाव / भाग्य-तत्त्व और दशम-स्वामी का योग, दृष्टि, पारस्परिक आदान-प्रदान आदि (संबन्ध-परिभाषा परंपरा-सापेक्ष; पाठ यहाँ प्रकार नहीं बाँधता)।

59.40
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा ।
राजप्रीतियशोलाभः पुत्रमित्रादिसौख्यकृत्
dāyeśātkendrakoṇe vā duścikye lābhage'pi vā |
rājaprītiyaśolābhaḥ putramitrādisaukhyakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा-स्वामी (यहाँ केतु-दशा/अन्तर् का दायेश-संदर्भ); केन्द्रकोणे = केन्द्र या कोण (त्रिकोण) में; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; लाभगे = लाभ-भाव (11) में; राजप्रीति = राज-प्रीति; यशोलाभः = यश-लाभ; पुत्रमित्रादि = पुत्र, मित्र आदि; सौख्यकृत् = सुख देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मङ्गल यदि दायेश से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा तृतीय या लाभ (11) में हो, तो राज-प्रीति, यश-लाभ तथा पुत्र-मित्र आदि से सौख्य होता है। यहाँ माप-रेखा लग्न नहीं, दायेश (दशा-स्वामी) है — दशा-फल में सापेक्ष भाव-गिनती का नियम।

English rendering Relative to the daśā-lord (dāyeśa), the text states that Mars in a kendra or trikoṇa, or in the third or eleventh, indicates royal favour, gain of renown, and happiness through children, friends, and the like — again as the śāstra’s phala, not as fixed destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-स्वामी-सापेक्ष भाव-शर्त + फल-कथन। दायेश-राशि को “1” मानकर केन्द्र {1,4,7,10}, कोण/त्रिकोण {5,9}, दुश्चिक्य = 3, लाभ = 11 — पूर्णांक राशि-अंतर से निर्धारित; अयनांश यहाँ भाव-संख्या नहीं बदलता।

59.41
तथाऽष्टमव्यये भौमे दायेशाद्धनगेऽपि वा ।
द्रुतं करोति मरणं विदेशे चापदं भ्रमम्
tathā'ṣṭamavyaye bhaume dāyeśāddhanage'pi vā |
drutaṃ karoti maraṇaṃ videśe cāpadaṃ bhramam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टम = अष्टम भाव; व्यय = व्यय / द्वादश भाव; भौमे = मङ्गल में / मङ्गल जब; दायेशात् धनगे = दायेश से धन-भाव (2) में; द्रुतम् = शीघ्र; मरणम् = मरण (शास्त्रोक्त कठोर फल); विदेशे = परदेश में; आपदम् = आपदा; भ्रमम् = भ्रमण / भटकन।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत, शास्त्र कहता है — जब मङ्गल अष्टम या व्यय में हो, अथवा दायेश से द्वितीय में हो, तो शीघ्र मरण, विदेश में आपदा और भ्रमण-कष्ट का फल कहा गया है। यह अशुभ-स्थान-शर्त का फल-पक्ष है; “द्रुतं करोति” शास्त्र का कठोर कथन है — नियति-घोषणा नहीं, पाठ का स्वर।

English rendering Conversely, the text states that when Mars is in the eighth or twelfth, or in the second from the daśā-lord, it “swiftly brings death,” calamity in a foreign land, and wandering distress. Render this only as the śāstra’s severe phala-language, not as a fate-claim to be endorsed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अशुभ-स्थान-शर्त + फल-कथन। अष्टम/व्यय लग्न-सापेक्ष (या प्रसंगानुसार दायेश-सापेक्ष पठन; यहाँ “तथाऽष्टमव्यये भौमे” सामान्यतः लग्न-सापेक्ष, “दायेशाद्धनगे” स्पष्टतः दायेश-सापेक्ष) — दोनों माप-रेखाएँ अलग रखें; मिलाकर एक सूत्र न बनाएँ।

59.42
प्रमेहमूत्रकृच्छ्रादिचौरादिनृपपीडनम् ।
कलहादि व्यथायुक्तं किञ्चित्सुखविवर्द्धनम्
pramehamūtrakṛcchrādicaurādinṛpapīḍanam |
kalahādi vyathāyuktaṃ kiñcitsukhavivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रमेह = प्रमेह (शास्त्रोक्त मूत्र-सम्बन्धी दोष-संकेत); मूत्रकृच्छ्र = मूत्र-कृच्छ्र / मूत्र-कष्ट; चौरादि = चोर आदि; नृपपीडनम् = राज-पीड़ा; कलहादि = कलह आदि; व्यथायुक्तम् = व्यथा-युक्त; किञ्चित् = कुछ / अंशतः; सुखविवर्द्धनम् = सुख की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मिश्रित/अशुभ-फलों की सूची देता है — प्रमेह-मूत्रकृच्छ्र आदि शारीरिक कष्ट-संकेत, चोर आदि से हानि, राज-पीड़ा, कलह और व्यथा। साथ ही “किञ्चित् सुख-विवर्धन” कहकर पूर्ण अन्धकार नहीं, अंश-सुख भी जोड़ता है। सम्पूर्ण पंक्ति फल-वर्णन है — चिकित्सा-निदान या निश्चित आपदा नहीं।

English rendering The text lists afflictions such as urinary disorders (prameha, mūtrakṛcchra), trouble from thieves and the like, royal oppression, quarrels, and pain-laden conditions, while also allowing “some increase of happiness.” Report only the śāstra’s mixed phala; do not read it as medical diagnosis or as an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मिश्रित फल-सूची (दोष/पीड़ा + किञ्चित् सुख)। कोई दशा-वर्ष, बिन्दु या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल फलादेश का समापन-स्वर, जहाँ अशुभ-सूची के साथ आंशिक सुख भी अंकित है।

59.43
द्वितीयद्यूननाथे तु तापज्वरविषाद्भयम् ।
दारपीडा मनःक्लेशमपमृत्युभयं भवेत्
dvitīyadyūnanāthe tu tāpajvaraviṣādbhayam |
dārapīḍā manaḥkleśamapamṛtyubhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय = द्वितीय भाव (धन); द्यून = सप्तम भाव (द्यून-संज्ञा); नाथे = तद्-स्वामिनि; तापज्वर = ताप-ज्वर; विष = विष; दार = दारा/पत्नी; मनःक्लेश = मानसिक क्लेश; अपमृत्यु = अकाल-मृत्यु-भयाभास (शास्त्रीय संकेत, चिकित्सा नहीं)।

हिन्दी भावार्थ जब (प्रसंगगत दशा/अवस्था में) द्वितीय और द्यून (सप्तम) भाव के स्वामी प्रभावी हों, तब शास्त्र कहता है कि ताप-ज्वर तथा विष से भय, दारा-पीड़ा, मनःक्लेश और अपमृत्यु-भय का अनुभव हो सकता है। यह फल-कथन है—गणना नहीं; इसे निश्चित भाग्य या रोग-निदान के रूप में नहीं पढ़ना। पाठ और योग-प्रसंग में पाठ-भेद संभव।

English rendering When the lords of the second and the seventh (dyūna) are operative in the stated context, the text indicates fear arising from heat-fever and poison, distress to the spouse, mental affliction, and the dread of untimely death—as a śāstra-phala statement, not a medical or fatal claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा/भाव-स्वामी प्रसंग)। द्वितीय = 2, द्यून/सप्तम = 7—यह भाव-संख्या का नामकरण मात्र है; यहाँ कोई बलांक या अंश-सूत्र नहीं दिया गया।

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59.44
अन्ड्वाहं प्रदद्यात्तु सर्वसम्पत्सुखावहम् ।
ततः शान्तिमवाप्नोति भौमग्रहप्रसादतः
anḍvāhaṃ pradadyāttu sarvasampatsukhāvaham |
tataḥ śāntimavāpnoti bhaumagrahaprasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ड्वाहम् = बैल/वृषभ-दान (अण्ड्वाह); प्रदद्यात् = दान करे—ऐसा शास्त्र कहता है; सर्वसम्पत् = समस्त सम्पत्ति; सुखावहम् = सुख-वाहक; शान्तिम् = शान्ति; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; भौमग्रह = मंगल (भौम); प्रसादात् = प्रसाद से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अन्ड्वाह (बैल) का दान सर्व-सम्पत् और सुख का वाहक माना गया है; उससे शान्ति मिलती है—भौम-ग्रह (मंगल) के प्रसाद से। यह उपाय-फल का शास्त्रीय कथन है; दबाव, भय या “करोगे तो बचोगे” की भाषा यहाँ नहीं जोड़ना। फल और उपाय दोनों को पाठ के स्वर में ही रखना।

English rendering The text states that the gift of a bull (aṇḍvāha) is held to bring all prosperity and comfort, and that peace is thereby obtained through the grace of Mars (Bhauma). This is a traditional prescription–result formula of the śāstra, not a command of fear or forced remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/उपाय-कथन (मंगल-संबद्ध शान्ति-प्रसंग)। कोई वर्ष-मान, बिन्दु या अंश-विभाजन यहाँ नहीं।

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59.45
केतोरन्तर्गते राहौ स्वोच्चे मित्रस्वराशिगे ।
केन्द्रत्रिकोणे लाभे वा दुश्चिक्ये धनसंज्ञके
ketorantargate rāhau svocce mitrasvarāśige |
kendratrikoṇe lābhe vā duścikye dhanasaṃjñake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्गते = केतु की अन्तर्दशा में; राहौ = राहु (प्रभावी); स्वोच्चे = स्व-उच्च राशि में; मित्र-स्व-राशिगे = मित्र या स्व-राशि में; केन्द्र = 1,4,7,10; त्रिकोण = 1,5,9; लाभे = एकादश भाव में; दुश्चिक्ये = तृतीय भाव में; धनसंज्ञके = द्वितीय (धन) भाव में।

हिन्दी भावार्थ जब केतु की अन्तर्दशा में राहु (और वह) स्वोच्च, मित्र-राशि या स्व-राशि में हो, अथवा केन्द्र, त्रिकोण, लाभ (11), दुश्चिक्य (3) या धन-संज्ञक (2) भाव में स्थित हो—तब अगले श्लोकों का शुभ फल-प्रसंग लागू होता है। यह दशा-स्थान की शर्त-सूची है; फल 59.46–59.47 में खुलता है।

English rendering When Rāhu operates in Ketu’s antardaśā and is in exaltation, a friendly or own sign, or placed in a kendra, trikoṇa, the eleventh, the third (duścikya), or the second (wealth-named) house, the favourable results stated next are said to apply.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशा-अनुपात (विंशोत्तरी) + भाव-सूची।
• केतु महादशा = 7 वर्ष; राहु अन्तर् = 18 वर्ष (Σ चक्र = 120)।
• अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 = (7 × 18) ÷ 120 = 126/120 = 21/20 वर्ष = 1 वर्ष + (1/20)×360 ≈ 1 वर्ष 18 दिन (सौर-वर्ष मान पर; ठीक दिन-गणना नक्षत्र-शेष और अयनांश-निर्भर)।
• भाव-सेट: केन्द्र {1,4,7,10}, त्रिकोण {1,5,9}, + {2,3,11}—श्लोक द्वारा नामित।

उदाहरण (worked example) केतु-महादशा, राहु-अन्तर्: अवधि = 7 × 18 / 120 = 1.05 वर्ष। यदि राहु लग्न से 11वें (लाभ) में और उच्च/मित्र-राशि में हो, तो 59.45 की स्थान-शर्त पूरी—फल 59.46 के अनुसार “तत्काले धनलाभ” आदि शास्त्र कहता है। (अयनांश और भाव-पद्धति घोषित करें; यहाँ भाव-गिनती पूर्ण-राशि/whole-sign से सरल उदाहरण।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में केतु 7 और राहु 18—अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात-गणित (MD×AD)/120 है; यही सूत्र दशा-इंजन में लगा है। फल-वाक्य को हम भविष्य-वाणी नहीं मानते—केवल काल-खण्ड की गणना `==` अनुशासन से सत्यापित अवधि है, व्याख्या पाठ की आवाज़ में रहती है।

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59.46
तत्काले धनलाभः स्यात्सञ्चारो भवति ध्रुवम् ।
म्लेच्छप्रभुवशात्सौख्यं धन्धान्यफलादिकम्
tatkāle dhanalābhaḥ syātsañcāro bhavati dhruvam |
mlecchaprabhuvaśātsaukhyaṃ dhandhānyaphalādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्काले = उस काल में; धनलाभः = धन-प्राप्ति; स्यात् = हो; सञ्चारः = भ्रमण/यात्रा/स्थान-परिवर्तन; ध्रुवम् = निश्चय से—शास्त्र के स्वर में; म्लेच्छप्रभु = विदेशी/अन्य-जाति शासन/स्वामी; वशात् = आश्रय से; सौख्यम् = सुख; धन्धान्य = धन + धान्य; फलादिकम् = फल आदि।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त (59.45) स्थिति में शास्त्र कहता है—उस काल में धनलाभ होता है और सञ्चार निश्चित रूप से होता है। म्लेच्छ-प्रभु के आश्रय से सौख्य, तथा धन-धान्य-फलादि की प्राप्ति कही गई है। यह दशा-फल का वर्णन है; “ध्रुवम्” शास्त्रीय निश्चय-शब्द है, हमारे द्वारा भाग्य की गारंटी नहीं।

English rendering At that time, the text states, there is gain of wealth and movement or travel is firmly indicated; comfort under the influence of a foreign or outsider authority, together with grain, wealth, and produce, is described.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-अन्तर्गत राहु का शुभ पक्ष)। “ध्रुवम्” शाब्दिक बल है, संख्यात्मक नियतांक नहीं।

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59.47
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
भुक्त्यादौ क्लेशमाप्नोति मध्यान्ते सौख्यमाप्नुयात्
catuṣpājjīvalābhaḥ syādgrāmabhūmyādilābhakṛt |
bhuktyādau kleśamāpnoti madhyānte saukhyamāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुष्पात् = चौपाया/पशु; जीवलाभः = जीव-जन्तु/पशु-लाभ; ग्राम = ग्राम; भूमि = भूमि; आदिलाभकृत् = आदि का लाभ करने वाला; भुक्त्यादौ = भुक्ति (अन्तर्दशा) के आदि में; क्लेशम् = क्लेश; मध्य-अन्ते = मध्य और अन्त में; सौख्यम् = सुख; आप्नुयात् = प्राप्त करे—शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—चतुष्पाद जीवों का लाभ और ग्राम-भूमि आदि का लाभ होता है। भुक्ति के आरम्भ में क्लेश, मध्य और अन्त में सौख्य—यह काल-विभाजन का फल-सूत्र है। आदि–मध्य–अन्त को समान तिहाई मानकर काल-मानचित्र बनाया जा सकता है; फल फिर भी पाठ का कथन रहता है।

English rendering The text states gain of quadrupeds and of village, land, and the like. At the beginning of the bhukti there is distress; in the middle and at the end, happiness is said to follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भुक्ति-खण्डन (काल-अनुपात, फल नहीं)।
• राहु-अन्तर् (केतु-MD में) = 7 × 18 / 120 = 1.05 वर्ष।
• आदि / मध्य / अन्त ≈ तीन समान भाग: प्रत्येक ≈ 1.05 / 3 = 0.35 वर्ष ≈ 0.35 × 365.25 ≈ 128 दिन (सौर; नक्षत्र-दशा में तिथि-गणना भिन्न)।
• शास्त्र: आदि → क्लेश; मध्य+अन्त → सौख्य—यह फल-मानचित्र है, बलांक नहीं।

उदाहरण (worked example) केतु-MD + राहु-AD = 1.05 वर्ष ≈ 383 दिन। आदि ≈ दिन 1–128: शास्त्र क्लेश कहता है; मध्य ≈ 129–255 और अन्त ≈ 256–383: सौख्य। (आरम्भ-तिथि = महादशा-शेष से प्राप्त अन्तर्-प्रारम्भ; अयनांश/जन्म-नक्षत्र-शेष घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) अन्तर्दशा-लंबाई विंशोत्तरी अनुपात से निश्चित है; आदि–मध्य–अन्त को समान काल-खण्डों में बाँटना शुद्ध समय-अंकगणित है। हम अवधि को इंजन से `==` सत्यापित करते हैं; “क्लेश/सौख्य” को भविष्य की गारंटी नहीं—केवल शास्त्र का काल-फल मानचित्र मानते हैं।

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59.48
रन्ध्रे वा व्ययगे राहौ पापसंदृष्टसंयुते ।
बहुमूत्रं कृशं दीहं शीतज्वरविषाद्भयम्
randhre vā vyayage rāhau pāpasaṃdṛṣṭasaṃyute |
bahumūtraṃ kṛśaṃ dīhaṃ śītajvaraviṣādbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्रे = अष्टम भाव में; व्ययगे = द्वादश में स्थित; राहौ = राहु; पाप = पाप-ग्रह; संदृष्ट = दृष्ट; संयुते = युक्त; बहुमूत्रम् = अत्यधिक मूत्र; कृशम् = कृश; दीहम् ≈ देहम् (पाठ-भेद संभव); शीतज्वर = शीत-ज्वर; विषाद् भयम् = विष से भय—सब शास्त्रीय फल-शब्द।

हिन्दी भावार्थ जब राहु रन्ध्र (8) या व्यय (12) में हो और पाप-ग्रहों से दृष्ट या संयुक्त हो, तब शास्त्र कहता है—बहुमूत्र, कृश देह, शीतज्वर और विष से भय। ये आयुर्वेदिक/ज्योतिष-फल की पारंपरिक संज्ञाएँ हैं; चिकित्सा-निदान या भय-व्यापार नहीं। पाप-दृष्टि/योग की जाँच भाव-स्थान + दृष्टि-नियम से होती है; रोग-निर्णय चिकित्सक का क्षेत्र है।

English rendering When Rāhu occupies the eighth (randhra) or the twelfth (vyaya) and is aspected or conjoined by malefics, the text indicates excessive urination, an emaciated body, and fear from cold fever and poison—as classical phala language, not a clinical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ स्थान + पाप-योग)। स्थान-शर्त: राहु ∈ {8, 12}; योग-शर्त: पाप-दृष्टि या पाप-युति—दृष्टि-नियम अध्याय-8 के अनुसार (यहाँ संख्या नहीं दी)।

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59.49
चातुर्थिकज्वरं चैव क्षुद्रोपद्रवपीडनम् ।
अकस्मात्कलहं चैव प्रमेहं शूलमादिशेत्
cāturthikajvaraṃ caiva kṣudropadravapīḍanam |
akasmātkalahaṃ caiva pramehaṃ śūlamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चातुर्थिकज्वरम् = चतुर्थक/चातुर्थिक ज्वर (पारंपरिक ज्वर-संज्ञा); क्षुद्र = क्षुद्र/लघु; उपद्रव = उपद्रव; पीडनम् = पीड़न; अकस्मात् = अचानक; कलहम् = कलह; प्रमेहम् = प्रमेह (शास्त्रीय मूत्र-विकार संज्ञा); शूलम् = शूल/पीड़ा; आदिशेत् = निर्देश करे—शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ (पूर्व श्लोक की अशुभ राहु-अवस्था में) शास्त्र आगे कहता है—चातुर्थिक ज्वर, क्षुद्र उपद्रवों से पीड़ा, अचानक कलह, प्रमेह और शूल—इनका आदिष्ट फल। पूरा 59.48–59.49 एक फल-श्रृंखला है: स्थान-दोष + पाप-योग → शारीरिक/सामाजिक क्लेश-संकेत। इन्हें भय, इलाज-दबाव या निश्चित भविष्य के रूप में नहीं पढ़ना; केवल पाठ का स्वर सुरक्षित रखना।

English rendering The text further indicates quartan fever, affliction from petty disturbances, sudden quarrel, prameha, and colic-like pain. Together with 59.48 this is a continuous phala sequence for afflicted Rāhu in the eighth or twelfth—reported as the śāstra’s claim, not as medical or fatal certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (59.48 का विस्तार)। कोई वर्ष-मान, बिन्दु-योग या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं; केवल अशुभ दशा-स्थान का वर्णनात्मक फल।

59.50
द्वितीयसप्तमस्थे वा तदा क्लेशं महद्भयम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवीजपं चरेत्
dvitīyasaptamasthe vā tadā kleśaṃ mahadbhayam |
taddoṣaparihārārthaṃ durgādevījapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-सप्तम-स्थे = द्वितीय या सप्तम भाव में स्थित; वा = अथवा; तदा = तब; क्लेशम् = कष्ट / पीड़ा; महद्-भयम् = महान् भय; तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; दुर्गा-देवी-जपम् = दुर्गा देवी का जप; चरेत् = करे (शास्त्र का निर्देश)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (पूर्व-प्रसंगानुसार केतु) द्वितीय अथवा सप्तम भाव में स्थित हो, तब क्लेश और महान् भय का फल कहा जाता है। उसी दोष के परिहार के लिए दुर्गा-देवी-जप का विधान पाठ में आता है। यह फल-कथन और शास्त्रीय परिहार-निर्देश है, न कि निर्णायक नियति। पाठ-भेद संभव, क्योंकि केतु-दशा-फल-श्रृंखला में भाव-स्थिति का पूर्ण वाक्य-सन्दर्भ पूर्व श्लोकों पर निर्भर करता है।

English rendering The text states that when (in this sequence, Ketu) occupies the second or seventh house, great affliction and great fear are indicated. For the removal of that defect it prescribes japa of Durgā-Devī. This is the śāstra’s own phala-and-pariḥāra statement, not a verdict of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन तथा परिहार-निर्देश। भाव-स्थान (२/७) यहाँ केवल फल-शर्त हैं; कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष-सूत्र इस पद्य में नहीं दिया गया।

59.51
केतोरन्तर्गते जीवे कन्द्रे लाभे त्रिकोणगे ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि लग्नाधिपसमन्विते
ketorantargate jīve kandre lābhe trikoṇage |
svocce svakṣetrage vāpi lagnādhipasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्-गते = केतु की अन्तरदशा में; जीवे = बृहस्पति (गुरु) में / गुरु के; कन्द्रे = केन्द्र (१, ४, ७, १०) में; लाभे = लाभ भाव (११) में; त्रिकोण-गे = त्रिकोण (१, ५, ९) में स्थित; स्व-उच्चे = स्वोच्च राशि में; स्व-क्षेत्र-गे = स्वराशि में; वा अपि = अथवा भी; लग्न-अधिप-समन्विते = लग्नेश से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र केतु की अन्तरदशा में गुरु का वर्णन आरम्भ करता है। जब गुरु केन्द्र, लाभ (एकादश) या त्रिकोण में हो, अथवा स्वोच्च या स्वक्षेत्र में स्थित हो, अथवा लग्नाधिप से युक्त हो — ये शुभ-स्थितियाँ आगे के फल-श्लोकों की शर्त बनती हैं। पूरा फल अगले पद्यों में जुड़ता है; यहाँ मुख्यतः स्थिति-संयोग की सूची है।

English rendering In Ketu’s antardaśā, when Jupiter occupies a kendra, the eleventh, or a trikoṇa; or is in exaltation or own sign; or is conjoined with the lagna-lord — these placements set the favourable conditions for the results stated next.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-फल की स्थिति-शर्तें। केन्द्र = भाव १, ४, ७, १०; त्रिकोण = १, ५, ९; लाभ = ११ — ये भाव-परिभाषाएँ शास्त्रीय हैं, कोई अंश-भागन नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में केतु-महादशा ७ वर्ष, गुरु १६ वर्ष; केतु-अन्तर्गत गुरु-अन्तर = (७ × १६) ÷ १२० = ११२ ÷ १२० = ०.९३३… वर्ष ≈ ११ मास ६ दिन (पूर्ण-वर्ष × १२० = कुल दिन-अनुपात से यथावत्)। यह शुद्ध अनुपात-गणित है; फल-वाक्य अलग परत हैं — गणना `==` से अवधि देती है, फल को नियति नहीं बनाती।

59.52
कर्मभाग्याधिपैर्युक्ते धनधान्यार्थसंपदम् ।
राजप्रीतिं तदोत्साहमश्वांदोल्यादिकं दिशेत्
karmabhāgyādhipairyukte dhanadhānyārthasaṃpadam |
rājaprītiṃ tadotsāhamaśvāṃdolyādikaṃ diśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्म-भाग्य-अधिपैः = दशमेश और नवमेश से; युक्ते = युक्त (गुरु पर लागू); धन-धान्य-अर्थ-संपदम् = धन, अन्न, अर्थ-संपत्ति; राज-प्रीतिम् = राज/प्रभु की प्रसन्नता; तदा = तब; उत्साहम् = उत्साह; अश्व-आन्दोल्यादिकम् = अश्व, डोली/पालकी आदि; दिशेत् = निर्देश करे / फल कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त स्थित गुरु जब कर्म (दशम) और भाग्य (नवम) के अधिपतियों से युक्त हो, तब धन-धान्य-अर्थ की संपद्, राजप्रीति, उत्साह तथा अश्व-आन्दोल्यादि सुख-संकेत दिये जाते हैं। “दिशेत्” विद्वान् को फल-निर्देश का शब्द है — शास्त्र का कथन, हमारी भविष्य-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when such Jupiter is joined by the lords of the tenth and ninth, one should indicate wealth, grain, and material prosperity, royal favour, zeal, and conveyances such as horses and a palanquin.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-स्थित गुरु पर)। कर्मेश-भाग्येश-युति यहाँ केवल फल-शर्त है; कोई बल-रूप या बिन्दु-योग नहीं दिया।

59.53
गृहे कल्याणसम्पत्तिं पुत्रलाभं महोत्सवहम् ।
पुण्यतीर्थं महोत्साहं सत्कर्म च सुखावहम्
gṛhe kalyāṇasampattiṃ putralābhaṃ mahotsavaham |
puṇyatīrthaṃ mahotsāhaṃ satkarma ca sukhāvaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहे = घर में; कल्याण-सम्पत्तिम् = कल्याणकारी सम्पदा; पुत्र-लाभम् = पुत्र की प्राप्ति; महोत्सवम् (पाठ: महोत्सवहम्, पाठ-भेद संभव) = महान उत्सव; पुण्य-तीर्थम् = पवित्र तीर्थ(यात्रा); महोत्साहम् = महान उत्साह; सत्-कर्म = शुभ/पुण्य कर्म; सुखावहम् = सुखदायी।

हिन्दी भावार्थ (केतु-महादशा में गुरु की अन्तर्दशा के शुभ योग का फल-क्रम आगे बढ़ता है।) शास्त्र कहता है कि इस काल में घर में कल्याणकारी सम्पत्ति, पुत्र-लाभ, महान उत्सव, पुण्य-तीर्थों की यात्रा, उत्साह तथा सुखदायी सत्कर्म सम्पन्न होते हैं। यह पूर्व श्लोक की शर्त (गुरु केन्द्र/त्रिकोण/लाभ में) का फल-विस्तार है।

English rendering The text states that in this period the home sees auspicious prosperity, the birth of a son, festivity, pilgrimage to holy fords, great zeal, and merit-bringing good works.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-गुरु अन्तर्दशा का शुभ फल)। इस श्लोक में कोई संख्या या गणना नहीं; यह पूर्ववर्ती स्थान-शर्त पर आश्रित शुभ-फल की सूची मात्र है।

59.54
इष्टदेवप्रसादेन विजयं कार्यलाभकृत् ।
राजसंल्लापकार्याणि नूतनप्रभुदर्शनम्
iṣṭadevaprasādena vijayaṃ kāryalābhakṛt |
rājasaṃllāpakāryāṇi nūtanaprabhudarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्ट-देव-प्रसादेन = इष्टदेव की कृपा से; विजयम् = विजय; कार्य-लाभ-कृत् = कार्य में लाभ करने वाला; राज-संल्लाप-कार्याणि = राज/प्रभु से संलाप-सम्बन्धी कार्य; नूतन-प्रभु-दर्शनम् = नये प्रभु/अधिपति का दर्शन/साक्षात्कार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इष्टदेव-प्रसाद से विजय और कार्यलाभ, राजसंल्लाप के कार्य तथा नूतन प्रभु का दर्शन — ये भी उसी शुभ-गुरु-अन्तर के फल-पक्ष में आते हैं। “प्रसाद” यहाँ शास्त्रीय फल-भाषा है; चिकित्सा-विधि या दबाव-उपाय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states victory and gain in undertakings by the grace of the chosen deity, affairs involving royal conversation, and audience with a new lord or authority as further results in this favourable stream.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई गणना-सूत्र या स्थिरांक नहीं।

59.55
षष्ठाष्टमव्यये जीवे दायेशान्नीचगेऽपि वा ।
चौराहिव्रणभीतिं च धनधान्यादिनाशनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye jīve dāyeśānnīcage'pi vā |
caurāhivraṇabhītiṃ ca dhanadhānyādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यये = 6ठे/8वें/12वें भाव में; जीवे = गुरु (बृहस्पति) के; दायेशात् = दशा-स्वामी (यहाँ केतु) से (गिनकर); नीच-गे = नीच राशि में स्थित; अपि वा = अथवा; चौर-अहि-व्रण-भीतिम् = चोर, सर्प व व्रण(घाव) का भय; धन-धान्य-आदि-नाशनम् = धन-धान्यादि का नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु दायेश (केतु) से गिनने पर छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, अथवा नीच राशि में हो, तब इस केतु-गुरु अन्तर में चोर, सर्प व व्रण का भय तथा धन-धान्यादि का नाश होता है। (यह पूर्व की शुभ-स्थिति के विपरीत, दुःस्थान-योग का फल है।)

English rendering The text states that when Jupiter stands in the 6th, 8th, or 12th (or debilitated) reckoned from the daśā-lord, this Ketu–Jupiter sub-period brings danger from thieves, snakes, and wounds, and loss of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गणना दायेश (केतु) से — दुःस्थान-समुच्चय {6, 8, 12}; नीच = ग्रह की उच्च राशि से 7वीं (180°) राशि (गुरु का उच्च = कर्क, अतः नीच = मकर)। दायेश से भाव-संख्या n = ((राशि₍ग्रह₎ − राशि₍दायेश₎) mod 12) + 1।

उदाहरण (worked example) केतु (दायेश) कर्क (4) में, गुरु मकर (10) में → n = ((10 − 4) mod 12) + 1 = 7 — यह 6/8/12 में नहीं; परन्तु मकर गुरु की नीच राशि है, अतः दूसरी शर्त (नीचगे) से अशुभ-योग सक्रिय हो जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी-इंजन में केतु-महादशा = 7 वर्ष व गुरु-अंश = 16 वर्ष स्थिर हैं; इस श्लोक जिस अन्तर्दशा की बात करता है उसकी अवधि = (7 × 16)/120 = 112/120 वर्ष ≈ 11 मास 6 दिन — यही वह शुद्ध अनुपात-अंकगणित है जिसे टीम के दशा-इंजन में सत्यापित किया गया। श्लोक का "षष्ठाष्टव्यय/नीच → चोर-भय-नाश" भाग गणना नहीं, शास्त्र का फल-कथन है; उसे कथन मानकर प्रस्तुत करते हैं, अपनी भविष्यवाणी रूप में नहीं।

59.56
पुत्रदारावियोगं च त्वतीवक्लेशसम्भवम् ।
आदौ सुभफलं चैव अन्ते क्लेशकरं वदेत्
putradārāviyogaṃ ca tvatīvakleśasambhavam |
ādau subhaphalaṃ caiva ante kleśakaraṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दारा-वियोगम् = पुत्र और पत्नी से वियोग; च = और; तु अतीव-क्लेश-सम्भवम् = अत्यन्त क्लेश की संभावना; आदौ = आरम्भ में; सुभ-फलम् = शुभ फल (सुभ = शुभ; पाठानुसार); च एव = और ही; अन्ते = अन्त में; क्लेश-करम् = क्लेश उत्पन्न करने वाला; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे पुत्र-दारा-वियोग और अतीव क्लेश-संभव का फल जोड़ता है, फिर काल-विभाजन देता है: आदौ शुभ फल, अन्ते क्लेशकर — ऐसा वदेत् (विद्वान् घोषित करे)। आरम्भ-अन्त का यह द्विभाजन अन्तरदशा के काल-क्रम पर फल-स्तर का कथन है; कोई वर्ष-संख्या यहाँ नहीं लिखी।

English rendering The text also states separation from children and spouse and the likelihood of severe affliction, and directs that one declare good results at the beginning and affliction at the end of the period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन तथा आद्य-अन्त्य काल-विभाजन। अवधि स्वयं विंशोत्तरी-अनुपात से आती है (केतु-गुरु अन्तर ≈ ७×१६/१२० वर्ष); “आदौ/अन्ते” गुणात्मक फल-विन्यास है, आधा-आधा वर्ष का अनिवार्य नियम इस पद्य में नहीं कहा गया।

59.57
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपि वा ।
शुभयुक्ते नृपप्रीतिर्विचित्राम्बरभूषणम्
dāyeśātkendrakoṇe vā duścikye lābhage'pi vā |
śubhayukte nṛpaprītirvicitrāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (केतु) से; केन्द्र-कोणे = केन्द्र (1/4/7/10) या त्रिकोण (1/5/9) में; दुश्चिक्ये = तीसरे भाव में; लाभ-गे = ग्यारहवें में; अपि वा = अथवा; शुभ-युक्ते = शुभग्रह-युक्त; नृप-प्रीतिः = राजा की प्रीति; विचित्र-अम्बर-भूषणम् = विचित्र (रंग-बिरंगे) वस्त्र व आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु दायेश (केतु) से केन्द्र/त्रिकोण, तीसरे या ग्यारहवें भाव में हो और शुभग्रह-युक्त हो, तब राजा की प्रीति तथा अनेक रंग के वस्त्र-आभूषण प्राप्त होते हैं।

English rendering The text states that when Jupiter, reckoned from the daśā-lord, occupies a kendra, trine, the 3rd, or the 11th and is joined by benefics, it brings royal favour and variegated garments and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ-स्थान-समुच्चय दायेश से = केन्द्र {1,4,7,10} ∪ त्रिकोण {5,9} ∪ {3} ∪ {11}; भाव-संख्या n = ((राशि₍गुरु₎ − राशि₍केतु₎) mod 12) + 1। "शुभयुक्त" = एक ही राशि में शुभ ग्रह की युति।

उदाहरण (worked example) केतु मेष (1) में, गुरु सिंह (5) में → n = ((5 − 1) mod 12) + 1 = 5 (त्रिकोण) — शुभ-स्थान की शर्त पूरी; यदि उसी सिंह में शुक्र या बुध भी हों तो "शुभयुक्त" भी सिद्ध।

59.58
दूरदेशप्रयाणं च स्वबन्धुजनपोषणम् ।
भोजनाम्बरपश्वादि भुक्त्यादौ देहपीडनम्
dūradeśaprayāṇaṃ ca svabandhujanapoṣaṇam |
bhojanāmbarapaśvādi bhuktyādau dehapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दूरदेश-प्रयाण = दूर देश की यात्रा; स्व-बन्धुजन-पोषण = अपने बन्धु-जनों का पालन-पोषण; भोजन-अम्बर-पशु-आदि = अन्न, वस्त्र, पशु आदि; भुक्त्यादौ = उपभोग के आरम्भ में; देहपीडन = शारीरिक पीड़ा/कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — दूर देश की यात्रा और अपने बन्धु-जनों का पोषण भी इसी सन्दर्भ में फलित होता है। भोजन, वस्त्र, पशु आदि का लाभ भी कहा गया है। किन्तु उपभोग के आरम्भ में देह-पीड़ा का उल्लेख है — यह मिश्र फल-कथन है, निश्चित भाग्य-वाक्य नहीं। पाठ को शास्त्र के कथन के रूप में ही ग्रहण करें।

English rendering The text further states distant travel, support of one’s own kin, and enjoyment of food, clothing, cattle and the like; yet at the outset of such enjoyment, bodily affliction is also mentioned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र: यात्रा/पोषण/भोग + आरम्भिक देह-पीड़ा)। व्याख्या को गणना से अलग रखें; यह शास्त्र का वर्णित फल है, आधुनिक भविष्यवाणी नहीं।

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59.59
अन्ते तु स्थानचलनमकस्मात्कलहो भवेत् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति
ante tu sthānacalanamakasmātkalaho bhavet |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते तु = (अन्तर्दशा के) अन्त में; स्थानचलनम् = स्थान-परिवर्तन; अकस्मात् कलहः = अकस्मात् कलह; भवेत्; द्वितीयद्यूननाथे तु = (अन्तर्दशेश) द्वितीय या सप्तम का स्वामी हो तो; हि अपमृत्युः = अपमृत्यु (अकाल-मृत्यु का भय); भविष्यति।

हिन्दी भावार्थ केतु-महादशा की अन्तर्दशाओं के फल-क्रम में — शास्त्र कहता है कि (उस अन्तर्दशा के) अन्त में स्थान-परिवर्तन और अकस्मात् कलह होते हैं; और अन्तर्दशेश द्वितीय या सप्तम का स्वामी हो तो अपमृत्यु कही गई है। "अपमृत्यु" पाठ का मारक-स्थान-आधारित कथन है; इसे भय के रूप में नहीं, मारक-नियम (अ. 44) के दशा-प्रयोग के रूप में पढ़ें।

English rendering At the end (of that sub-period) there is a change of place and sudden quarrel; and if the sub-period lord owns the second or the seventh, the text speaks of untimely death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त: अन्तर्दशेश ∈ {2L, 7L}; ढाँचा: केतु-महादशा 7 वर्ष; अन्तर्दशा = (7 × वर्ष_P) ÷ 120।

59.60
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
महामृत्युञ्जयं जाप्यं सर्वोपद्रवनाशनम्
taddoṣaparihārārthaṃ śivasāhasrakaṃ japet |
mahāmṛtyuñjayaṃ jāpyaṃ sarvopadravanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-दोष = उस (पूर्वोक्त) दोष/उपद्रव; परिहार-अर्थम् = निवारण के लिए; शिव-साहस्रक = शिव-सहस्र (नाम/स्तोत्र) जप; जपेत् = जपे; महामृत्युञ्जय = महामृत्युंजय (मन्त्र/जाप्य); जाप्य = जपनीय; सर्व-उपद्रव-नाशन = सब उपद्रवों का नाश (शास्त्र का दावा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस दोष के परिहार के लिए शिव-साहस्रक का जप करें, और महामृत्युंजय जाप्य को सर्व-उपद्रव-नाशक बताया गया है। यह पारंपरिक जप-विधान का शास्त्र-कथन है, दबाव या “अनिवार्य उपाय” नहीं। चिकित्सा, कानूनी या आर्थिक गारंटी इसमें नहीं पढ़नी चाहिए।

English rendering The text states that for the removal of that doṣa one should recite the Śiva-sāhasraka, and that the Mahāmṛtyuñjaya japa is said to destroy all afflictions — a traditional ritual prescription of the śāstra, not a modern medical or legal claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पारंपरिक जप/उपाय-कथन (फल-परिहार के रूप में शास्त्र का स्वर)। “नाशनम्” को शास्त्रीय भाषा समझें; संख्या, काल-खण्ड या बल-सूत्र यहाँ नहीं हैं।

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59.61
केतोरन्तर्गते मन्दे स्वदशायां तु पीडनम् ।
बन्धोः क्लेशो मनस्तापश्चतुष्पाज्जीवलाभकृत्
ketorantargate mande svadaśāyāṃ tu pīḍanam |
bandhoḥ kleśo manastāpaścatuṣpājjīvalābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्गत = केतु की अन्तर्दशा में; मन्द = शनि; स्वदशायाम् = (शनि की) अपनी दशा में / उस दशा-सन्दर्भ में; पीडन = पीड़ा/कष्ट; बन्धोः क्लेश = बन्धु का क्लेश; मनस्ताप = मानसिक ताप; चतुष्पात्-जीव = चौपाये जीव (पशु); लाभ-कृत् = लाभ करने वाला (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — केतु की अन्तर्दशा में जब मन्द (शनि) सक्रिय हो, स्व-दशा-सन्दर्भ में पीड़न कहा गया है। बन्धु-क्लेश और मनस्ताप भी इसी फल-वर्णन में आते हैं। साथ ही चौपाये जीवों का लाभ भी कहा गया है — मिश्र फल: कष्ट-पक्ष और पशु-लाभ दोनों। पाठ-भेद संभव जहाँ “स्वदशायाम्” का ठीक-ठीक संकेत (केतु-महादशा vs शनि-स्वदशा) संस्करणों में भिन्न पढ़ा जाता हो।

English rendering The text states that when Saturn operates within Ketu’s antardaśā, affliction is indicated in that period-context: distress of kin and mental anguish, yet also gain of quadruped creatures.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी में केतु महादशा = 7 वर्ष, शनि = 19 वर्ष; अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। अतः केतु में शनि-अन्तर्दशा = (7 × 19) ÷ 120 = 133/120 वर्ष ≈ 1 वर्ष 1 मास 9 दिन (सौर-वर्ष को 360 तिथि-दिन मानने की प्रथा पर निर्भर; घटी-पला रूपान्तरण इंजन-परम्परा से)। आरम्भ-बिन्दु = चन्द्र की नक्षत्र-शेष-भिन्न पर; फल ऊपर का शास्त्र-कथन है, काल-खण्ड शुद्ध अनुपात-गणित।

उदाहरण (worked example) मान लें विंशोत्तरी, केतु महादशा चल रही है। केतु–शनि अन्तर्दशा-दीर्घता = 7 × 19 / 120 = 1.1083… वर्ष। यदि 1 वर्ष = 365.25 दिन लें (आधुनिक सौर-वर्ष; पारंपरिक पक्ष 360 तिथि-दिन भी प्रयुक्त), ≈ 405 दिन। फल-निर्णय इस संख्या से नहीं होता — संख्या केवल “कब तक यह अन्तर्दशा” बताती है; “पीडन/बन्धु-क्लेश/पशु-लाभ” शास्त्र का फल-वाक्य है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; योग = 120) और अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्)/120 — यही शुद्ध अनुपात-अंकगणित वेदिक-घड़ी/काल दशा-इंजन में पिन है। यह श्लोक फल देता है; हमारा कार्य दशा-काल का `==` स्तर का काल-खण्ड निकालना है, फल को भाग्य-निश्चित न मानना। गणित और व्याख्या अलग रखे जाते हैं।

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59.62
राजकार्यकलापेन धननाशो महद्भयम् ।
स्थानाच्च्युतिः प्रवासश्च मार्गे चौरभयं भवेत्
rājakāryakalāpena dhananāśo mahadbhayam |
sthānāccyutiḥ pravāsaśca mārge caurabhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजकार्य-कलाप = राज/शासन-कार्य का उलझाव; धननाश = धन की हानि; महद्भय = बड़ा भय; स्थान-च्युति = पद/स्थान से गिरना; प्रवास = परदेश-वास/यात्रा; मार्ग = पथ; चौर-भय = चोर का भय; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राजकार्य के जाल में फँसना, धननाश और महान् भय इस सन्दर्भ में फलित होते हैं। स्थान से च्युति, प्रवास, और मार्ग में चौर-भय भी कहा गया है। ये सब फल-कथन हैं — भय-व्यापार या निश्चित विपत्ति की घोषणा नहीं। “शास्त्र कहता है” की सीमा में पढ़ें; चिकित्सा/कानून/वित्त की भविष्यवाणी यहाँ से न निकालें।

English rendering The text states entanglement in royal or administrative affairs, loss of wealth, great fear, fall from position, sojourn abroad, and fear of thieves on the road.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-अन्तर्दशा/मन्द-सन्दर्भ का विस्तृत फलादेश)। कोई वर्ष-संख्या, बिन्दु या बल-एकक नहीं; केवल शास्त्रीय परिणाम-सूची।

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59.63
आलस्यं मनसो हानिश्चाष्टमे व्ययराशिगे ।
मीनत्रिकोणगे मन्दे तुलायां स्वर्क्षगेऽपि वा
ālasyaṃ manaso hāniścāṣṭame vyayarāśige |
mīnatrikoṇage mande tulāyāṃ svarkṣage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आलस्य = आलस; मनसः हानि = मन की हानि/क्षय; अष्टमे = अष्टम भाव/राशि में; व्यय-राशिगे = व्यय (द्वादश) राशि में स्थित; मीन-त्रिकोणगे = मीन-त्रिकोण में (जल-त्रिकोण: कर्क–वृश्चिक–मीन — पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव); मन्दे = शनि में/शनि के; तुलायाम् = तुला राशि में; स्व-ऋक्षगे = स्व-राशि (शनि: मकर/कुम्भ) में; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आलस्य और मन की हानि तब कही गई है जब (सम्बद्ध ग्रह/स्थिति) अष्टम में हो या व्यय-राशि में हो। मन्द (शनि) मीन-त्रिकोण में, अथवा तुला में, अथवा स्व-राशि में भी — इन्हीं स्थितियों से यह फल जोड़ा गया है। “मीनत्रिकोण” का ठीक मान (केवल मीन vs जल-त्रिराशि) पाठ-भेद/टीका-परम्परा पर निर्भर हो सकता है — पाठ-भेद संभव। फल को निश्चित दुर्भाग्य न समझें।

English rendering The text states laziness and impairment of mind when the relevant placement is in the eighth or the twelfth; and likewise when Saturn is in the Mīna-trikoṇa, in Libra, or even in his own sign — with possible recension variance on “Mīna-trikoṇa.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + राशि/भाव-स्थिति की शर्तें। भाव: अष्टम = 8, व्यय = 12; शनि स्व-राशि = मकर (0°–30° मकर) व कुम्भ; तुला = तुला 0°–30°। मीन-त्रिकोण को जल-समता (कर्क, वृश्चिक, मीन) मानने पर तीन राशियाँ; केवल “मीन में त्रिकोण-भाव” पढ़ने पर अर्थ बदलता है — घोषित परम्परा चुनें, मौन कन्वेंशन न रखें।

उदाहरण (worked example) परम्परा: सायन/निरयण कोई भी, किन्तु राशि-स्थिति निरयण लग्न/ग्रह-रेखांश से (अयनांश घोषित करें — उदा. लाहिरी)। मान लें शनि निरयण रेखांश = 200° → तुला 20° (180°–210° = तुला)। श्लोक की शर्त “तुलायाम् … मन्दे” लागू; फल “आलस्यं मनसो हानिः” शास्त्र-कथन है — ग्रह-रेखांश की जाँच `==` राशि-सीमा से की जाती है, फल को इंजन “सत्य” नहीं ठहराता।

59.64
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये वा शुभांशके ।
शुभदृष्टयुते चैव सर्वकार्यार्थसाधनम्
kendratrikoṇalābhe vā duścikye vā śubhāṃśake |
śubhadṛṣṭayute caiva sarvakāryārthasādhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन्द्र-त्रिकोण-लाभे = केन्द्र/त्रिकोण/लाभ (11) में; दुश्चिक्ये = तीसरे भाव में; शुभ-अंशके = शुभ ग्रह के नवांश (D9) में; शुभ-दृष्टि-युते = शुभ ग्रह की दृष्टि/युति से युक्त; सर्व-कार्य-अर्थ-साधनम् = समस्त कार्यों व अर्थ की सिद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शनि केन्द्र, त्रिकोण, ग्यारहवें या तीसरे भाव में, अथवा शुभ नवांश में हो और शुभ ग्रह की दृष्टि-युति से युक्त हो, तब समस्त कार्यों व अर्थ की सिद्धि होती है।

English rendering The text states that when Saturn occupies a kendra, trine, the 11th, or the 3rd, or a benefic navāṃśa, and is aspected or joined by benefics, it accomplishes all one's aims and gains of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शुभ-स्थान (लग्न/दायेश से) = केन्द्र {1,4,7,10} ∪ त्रिकोण {5,9} ∪ {11} ∪ {3}; "शुभांश" = D9 (नवांश) में शुभ ग्रह की राशि। नवांश-गणना: 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश; अंश-सूचकांक = ⌊(राशि-भीतरी अंश)/(3°20′)⌋ + 1।

उदाहरण (worked example) शनि किसी राशि में 12°00′ पर → नवांश-सूचकांक = ⌊12 / 3.3333⌋ + 1 = ⌊3.6⌋ + 1 = 4 — अर्थात् उस राशि का चौथा नवांश; यदि वह नवांश-राशि किसी शुभ ग्रह (गुरु/शुक्र/बुध) की हो, तो "शुभांशके" शर्त सिद्ध।

हमारा डिकोड (Our Decode) "शुभांशके" सीधे षोडश-वर्ग की D9 (नवांश) परत को छूता है — 30° राशि को 9 समान 3°20′ चापों में बाँटकर मापा गया शुद्ध मॉड्युलर-गणित, जिसे टीम के वर्ग-इंजन में D1…D60 की एक निर्धारित विभाजन-योजना के साथ स्थिर किया गया। नवांश-राशि का शुभ/अशुभ होना गणना है; उससे निकला "सर्वकार्यसिद्धि" फल शास्त्र का कथन।

59.65
स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं भ्रमणं च सुखावहम् ।
स्वग्रामे सुखसम्पत्तिः स्ववर्गे राजदर्शनम्
svaprabhośca mahatsaukhyaṃ bhramaṇaṃ ca sukhāvaham |
svagrāme sukhasampattiḥ svavarge rājadarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वप्रभोः = अपने स्वामी/स्वक्षेत्र-प्रभु से; महत्सौख्यम् = बड़ा सुख; भ्रमणं = यात्रा/परिभ्रमण; सुखावहम् = सुख देने वाला; स्वग्रामे = अपने ग्राम/मूल स्थान में; सुखसम्पत्तिः = सुख और संपत्ति; स्ववर्गे = अपने वर्ग (स्वक्षेत्र/स्वोच्च-वर्ग आदि) में; राजदर्शनम् = राज-दर्शन/राज-संपर्क।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्व-प्रभु की स्थिति से बड़ा सौख्य और सुखदायी भ्रमण मिलता है। स्वग्राम में सुख-संपत्ति का योग, और स्ववर्ग में स्थित होने पर राजदर्शन का फल बताया गया है। यह पूर्व-श्लोक के शुभ-स्थान-फल का विस्तार है — स्थान और “स्व” की शक्ति को जोड़कर।

English rendering The text states that through one’s own lord there is great comfort and pleasant travel; in one’s own village, happiness and wealth; and in one’s own varga, audience with the king (royal contact).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्व-स्थान / स्व-वर्ग)। “स्ववर्ग” यहाँ वर्ग-चक्र (D1–D60) के किसी एक विभाग में स्वक्षेत्र/स्वामित्व की स्थिति को इंगित करता है; संख्यात्मक विभाजन-नियम इस श्लोक में नहीं दिया गया।

59.66
दायेशात्षष्ठरिःफे वा अष्टमे पापसंयुते ।
देहतापो मनस्तापः कार्ये विघ्नो महद्भयम्
dāyeśātṣaṣṭhariḥphe vā aṣṭame pāpasaṃyute |
dehatāpo manastāpaḥ kārye vighno mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशेश (यहाँ चालू अन्तर्दशा-स्वामी शनि) से गिनकर; षष्ठ-रिःफे = छठे व बारहवें भाव में (रिःफ = व्यय/12वाँ); अष्टमे = आठवें भाव में; पाप-संयुते = पापग्रह से युत; देहतापः = शरीर-ताप/ज्वर; मनस्तापः = मानसिक सन्ताप; कार्ये विघ्नः = कार्य में बाधा; महद्भयम् = बड़ा भय।

हिन्दी भावार्थ केतु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का प्रसंग चल रहा है। शास्त्र कहता है — यदि दशेश (शनि) अपने जन्म-स्थान से गिनकर छठे, बारहवें अथवा आठवें भाव में हो और किसी पापग्रह से युक्त हो, तो इस भुक्ति में देह-ताप, चित्त की व्याकुलता, कामों में रुकावट और बड़ा भय — ऐसे अशुभ फल कहे गए हैं। ये त्रिक-भावों (6-8-12) में बैठे दशेश के परिणाम हैं, फल-कथन मात्र।

English rendering When the sub-period lord, reckoned from its own place, occupies the 6th, 12th, or 8th and is joined by a malefic, the text declares bodily fever, mental distress, obstruction in one's affairs, and great fear during that bhukti.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ कोई अंक-गणना नहीं — यह भाव-स्थिति की शर्त है। किसी ग्रह से भाव-गणना सरल मॉड्युलर अंकगणित है: भाव(X, Y से) = ((राशि(X) − राशि(Y)) mod 12) + 1। दुःस्थान/त्रिक-समुच्चय = {6, 8, 12}। फल-वर्ग: फल-कथन (त्रिक-दोष)। अन्तर्दशा की अवधि स्वयं श्लोक नहीं देता, पर वह विंशोत्तरी अनुपात से निर्धारित होती है (देखें उदाहरण)।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी में केतु-महादशा = 7 वर्ष, शनि = 19 वर्ष। केतु में शनि की अन्तर्दशा = (7 × 19) ÷ 120 = 133/120 वर्ष ≈ 1.108 वर्ष ≈ 405 दिन (सौर-वर्ष 365.25 दि/वर्ष की परिपाटी घोषित)। इसी 405-दिवसीय भुक्ति के भीतर उपर्युक्त फल कहे जाते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह भुक्ति-अवधि हमारे विंशोत्तरी-गणक की उसी शुद्ध-अनुपात-अंकगणित से निकलती है (Σ = 120 वर्ष; केतु 7, शनि 19): अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120। दायेशात् की भाव-गणना वही सापेक्ष मॉड्युलर गिनती है जिसे हमने ग्रह-से-भाव आरोपण में स्थिरांक-रूप में पिन किया है।

59.67
आलस्यं मानहानिश्च पितृमात्रोर्विनाशनम् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युभयं भवेत्
ālasyaṃ mānahāniśca pitṛmātrorvināśanam |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyubhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आलस्यम् = अकर्मण्यता; मानहानिः = प्रतिष्ठा-क्षय; पितृ-मात्रोः = माता-पिता का; विनाशनम् = हानि/नाश; द्वितीय-द्यून-नाथे = दूसरे (धन) व सातवें (द्यून = अस्त-भाव/7वाँ) का स्वामी होने पर; अपमृत्यु-भयम् = अकाल-मृत्यु का भय; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — इस भुक्ति में आलस्य, मान-हानि तथा माता-पिता को कष्ट सम्भव है। और यदि वही दशेश दूसरे या सातवें भाव का स्वामी हो, तो अकाल-मृत्यु का भय बताया गया है। यह शास्त्र का कथन है, कोई सुनिश्चित भविष्यवाणी नहीं; 2 व 7 मारक-भाव माने जाते हैं, इसीलिए उनके स्वामित्व से यह चेतावनी जुड़ी है।

English rendering The text adds idleness, loss of honour, and harm to the parents; and should that lord own the 2nd or 7th house, it states a danger of untimely death — a śāstric statement of maraka doctrine, not an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मारक-सिद्धान्त)। तकनीकी अंश केवल भाव-वर्गीकरण है: मारक-भाव = {2, 7}; इनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं। यह वर्गीकरण है, न कि कोई परिकलित राशि।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहीं हमारी मूल अनुशासन-रेखा लागू होती है — गणित और फल को पृथक् रखो। "अपमृत्यु" जैसा वाक्य शास्त्र का दावा है (report "the text states"), उसे नियति या निश्चितता के रूप में हम कभी नहीं प्रस्तुत करते; न भय, न दबाव-रूप उपाय। मारक {2,7} एक निर्धारक वर्गीकरण है, परिणाम-गारंटी नहीं।

59.68
तद्दोषपैर्हारार्थं तिलहोमं च कारयेत् ।
कृष्णां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धये
taddoṣapairhārārthaṃ tilahomaṃ ca kārayet |
kṛṣṇāṃ gāṃ mahiṣīṃ dadyādāyurārogyavṛddhaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष = उस (पूर्वोक्त) दोष का; परिहारार्थम् = निवारण के लिए; तिलहोमम् = तिल-होम; कारयेत् = करवाए/करे; कृष्णां गाम् = काली गाय; महिषीम् = भैंस; दद्यात् = दान दे; आयुः = आयु; आरोग्य = आरोग्य; वृद्धये = वृद्धि के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस दोष के परिहार हेतु तिल-होम कराना चाहिए, तथा आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए काली गाय और महिषी का दान बताया गया है। यह उपाय-कथन पाठ की परंपरा का हिस्सा है — दबाव या “करोगे तो बचे” का भय-व्यापार नहीं; केवल शास्त्र ने जो कहा, वही यहाँ दर्ज है।

English rendering The text states that for the removal of that fault one should have a sesame-oblation (tila-homa) performed, and should give a black cow and a buffalo for the increase of life and health — as the śāstra’s traditional prescription, not as pressure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय/दोष-परिहार कथन। कोई बलांक, वर्ष-अनुपात या वर्ग-विभाजन यहाँ नहीं; केवल शास्त्रीय अनुष्ठान-निर्देश।

59.69
केतोरन्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुक्ते राज्यलाभो महत्सुखम्
ketorantargate saumye kendralābhatrikoṇage |
svocce svakṣetrasaṃyukte rājyalābho mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केतोः अन्तर्गते = केतु की अन्तर्दशा में; सौम्ये = बुध (सौम्य) में/बुध-अन्तर्गत; केन्द्र-लाभ-त्रिकोणगे = केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में स्थित; स्वोच्चे = उच्च राशि में; स्वक्षेत्रसंयुक्ते = स्वक्षेत्र में या स्वक्षेत्र-युक्त; राज्यलाभः = राज्य/पद/अधिकार का लाभ; महत्सुखम् = बड़ा सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की अन्तर्दशा में जब सौम्य (बुध) केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो, अथवा उच्च या स्वक्षेत्र से युक्त हो, तब राज्यलाभ और महत्सुख का फल है। यहाँ दशा-क्रम (केतु-अन्तर) और भाव/स्थान-बल दोनों जुड़े हैं — फल स्थान-शुद्ध और स्व-बल पर टिका बताया गया है।

English rendering The text states that under Ketu’s antardaśā, when Mercury (saumya) is in a kendra, the eleventh, or a trikoṇa, or is in exaltation or its own sign (or so joined), there is gain of dominion/office and great happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विम्शोत्तरी में केतु महादशा = 7 वर्ष (Σ 120)। अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। केतु–बुध अन्तर: (7 × 17) ÷ 120 = 119/120 वर्ष ≈ 0.9917 वर्ष ≈ 11.9 मास (सौर-वर्ष मानकर; मास-दिवस रूपान्तरण परंपरा-निर्भर)। फल-शर्त: बुध ∈ {केन्द्र, 11, त्रिकोण} अथवा उच्च/स्वक्षेत्र — स्थान-परीक्षण, कोई नया गुणांक नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें विम्शोत्तरी केतु महादशा चल रही है, अन्तर्दशा बुध की। केतु = 7, बुध = 17, कुल चक्र = 120 → अन्तर्-अवधि = 7 × 17 ÷ 120 = 119/120 yr। यदि जन्म-लग्न से बुध चतुर्थ (केन्द्र) और मिथुन (स्वक्षेत्र) में है, तो श्लोक की दोनों शर्तें (केन्द्र + स्वक्षेत्र) पूरी होती हैं — शास्त्र तभी राज्यलाभ–महत्सुख कहता है। (अयनांश/लग्न-प्रणाली फल के संख्या-काल को नहीं, केवल भाव-स्थान को प्रभावित करती है; दशा-वर्ष अनुपात अयनांश-निरपेक्ष है, केवल नक्षत्र-प्रवेश काल अयनांश पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र में केतु 7 और बुध 17 — यह अनुपात-अंकगणित हमारे दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बँधा है: अन्तर्दशा = (महा × अन्तर) ÷ 120। इस श्लोक का “केतोरन्तर्गते सौम्ये” ठीक उसी केतु–बुध खंड का फल-पटल है; गणित शुद्ध अनुपात, फल शास्त्र-कथन — दोनों को अलग रखा गया है।

59.70
सत्कथाश्रवणं दानं धर्मसिद्धिः सुखावहा ।
भूलाभः पुत्रलाभश्च शुभगोष्ठीधनागमः
satkathāśravaṇaṃ dānaṃ dharmasiddhiḥ sukhāvahā |
bhūlābhaḥ putralābhaśca śubhagoṣṭhīdhanāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्कथाश्रवणम् = सत्कथा का श्रवण; दानम् = दान; धर्मसिद्धिः = धर्म में सिद्धि; सुखावहा = सुख लाने वाली; भूलाभः = भूमि-लाभ; पुत्रलाभः = पुत्र-लाभ; शुभगोष्ठी = शुभ संगति/सभा; धनागमः = धन का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (उक्त शुभ केतु–सौम्य स्थिति में) सत्कथा-श्रवण, दान, धर्म-सिद्धि — ये सुखदायी फल हैं; साथ ही भूमि-लाभ, पुत्र-लाभ, शुभ गोष्ठी और धन-आगम भी बताए गए हैं। यह पूर्व-श्लोक के राज्यलाभ–महत्सुख का विस्तारित फल-सूची है — सामाजिक-धार्मिक और भौतिक, दोनों पक्षों को जोड़कर।

English rendering The text states that hearing sacred narratives, giving, and success in dharma bring happiness; and there is gain of land, gain of a son, good company, and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-सूची (शुभ-दशा-फल)। संख्या या सूत्र नहीं; 59.69 की स्थान-शर्त पूरी होने पर शास्त्र इन फलों को जोड़ता है।

59.71
अयत्नाद्धर्मलब्धिश्च विवाहश्च भविष्यति ।
गृहे शुभकरं कर्म वस्त्राभरणभूषणम्
ayatnāddharmalabdhiśca vivāhaśca bhaviṣyati |
gṛhe śubhakaraṃ karma vastrābharaṇabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अयत्नात् = बिना प्रयास/सहज रूप से; धर्मलब्धिः = धर्म-संबंधी लाभ (पुण्य-कार्य, शुभ-अधिकार, धार्मिक फल); विवाहः = विवाह; गृहे = घर में; शुभकरं कर्म = मंगलकारी कार्य; वस्त्र-आभरण-भूषणम् = वस्त्र, आभूषण, अलंकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस योग/अवस्था के फल में धर्म-संबंधी लाभ सहज भाव से प्राप्त होता है और विवाह का संकेत भी आता है। घर-परिवार के भीतर शुभ कर्मों का प्रवाह रहता है। वस्त्र, आभूषण और भूषण जैसे लौकिक सुख-साधनों का भी उल्लेख है — यह सब पाठ का फल-कथन है, निश्चित घटना नहीं।

English rendering The text states that dharma-related gains come without special striving, and marriage is indicated. Auspicious activity at home is described, together with clothes, ornaments, and adornments as markers of the period’s stated fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक दशा/भुक्ति-फल की धारा में लौकिक-धार्मिक संकेतों की सूची देता है; कोई वर्ग-विभाजन, बिंदु-संख्या या काल-माप यहाँ निर्धारित नहीं होता।

59.72
भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते भाग्यवृद्धिः सुखावहा ।
विद्वद्गोष्ठीकथाभिश्च कालक्षेपो भविष्यति
bhāgyakarmādhipairyukte bhāgyavṛddhiḥ sukhāvahā |
vidvadgoṣṭhīkathābhiśca kālakṣepo bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्य-कर्माधिपैः = नवम (भाग्य) और दशम (कर्म) भावों के स्वामियों से; युक्ते = युक्त/संयुक्त होने पर; भाग्यवृद्धिः = भाग्य/शुभ-अवसर की वृद्धि; सुखावहा = सुख लाने वाली; विद्वद्-गोष्ठी-कथाभिः = विद्वानों की गोष्ठी और कथा-चर्चाओं से; कालक्षेपः = समय व्यतीत होना।

हिन्दी भावार्थ जब योग भाग्येश और कर्मेश से युक्त हो, तो शास्त्र भाग्य-वृद्धि को सुखदायी बताता है। समय विद्वज्जनों की सभा, शास्त्र-कथा और गंभीर चर्चाओं में व्यतीत होने का फल भी कहा गया है। यह सामाजिक-बौद्धिक प्रवाह का वर्णन है, कोई बाध्य भविष्य नहीं।

English rendering When the configuration is joined with the lords of the ninth (bhāgya) and tenth (karma), the text states an increase of fortune that brings ease. Time, it adds, is spent in the company of the learned—assemblies, stories, and discourse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्वामी योग)। “भाग्य” = 9वाँ भाव, “कर्म” = 10वाँ भाव — यह भाव-संख्या की परंपरागत नियत पहचान है; फल स्वयं अनुपात या डिग्री-सूत्र नहीं देता।

59.73
षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये मन्दाराहियुतेक्षिते ।
विरोधो राजवर्गैश्च परगेहनिवासनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye saumye mandārāhiyutekṣite |
virodho rājavargaiśca paragehanivāsanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यये = छठे, आठवें या बारहवें भाव में; सौम्ये = सौम्य ग्रह (बुध/गुरु आदि — पाठानुसार शुभ) पर; मन्द-अर-अहि = शनि, मंगल, राहु; युते-ईक्षिते = युक्त या दृष्ट होने पर; विरोधः = विरोध/टकराव; राजवर्गैः = राज-वर्ग (अधिकार-वर्ग) से; परगेह-निवासनम् = पराये घर में निवास।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब सौम्य ग्रह षष्ठ, अष्टम या व्यय में हो और मन्द-अर-अहि से युक्त या दृष्ट हो, तो राज-वर्ग से विरोध और पर-गृह में निवास का फल कहा गया है। यहाँ “सौम्य” की स्थिति ही दोष-स्थान में पड़कर फल बदलती दिखती है। यह पाठ का संकेत है — भय या निश्चित घटना का दावा नहीं।

English rendering The text states that when a benefic occupies the sixth, eighth, or twelfth and is joined or aspected by Saturn, Mars, and Rāhu, opposition from the ruling/authority class and residence in another’s house are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दुःस्थान + पाप-दृष्टि/युति)। तकनीक केवल भाव-स्थान की पहचान है: षष्ठ = 6, रन्ध्र/अष्टम = 8, व्यय = 12; दृष्टि/युति की गणना दशा-फल में उसी जन्म-कुंडली के स्थान-निर्देश से की जाती है, यहाँ कोई नई संख्या-सारणी नहीं।

59.74
वाहनाम्बरपश्वादिधनधान्यादिनाशकृत् ।
भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तं मध्ये सौख्यं धनागमः
vāhanāmbarapaśvādidhanadhānyādināśakṛt |
bhuktyādau śobhanaṃ proktaṃ madhye saukhyaṃ dhanāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन-अम्बर-पश्वादि = वाहन, वस्त्र, पशु आदि; धनधान्यादि = धन-धान्य आदि; नाशकृत् = नाशकारी; भुक्त्यादौ = भुक्ति के आरम्भ में; शोभनं प्रोक्तम् = शुभ कहा गया; मध्ये = मध्य में; सौख्यम् = सुख; धनागमः = धन-आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (उपर्युक्त अशुभ स्थिति में) वाहन, वस्त्र, पशु तथा धन-धान्य की हानि होती है; किन्तु भुक्ति के आरम्भ में शुभ, और मध्य में सुख व धन-आगमन कहा गया है। यहाँ भुक्ति को आदि-मध्य-अन्त तीन खण्डों में बाँटकर पृथक् फल दिए गए हैं।

English rendering It brings loss of vehicles, clothes, cattle, wealth and grain; yet the opening of the bhukti is called auspicious, and its middle brings comfort and inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — भुक्ति का काल-त्रिविभाजन (आदि/मध्य/अन्त)। स्थूल-रूप से भुक्ति ÷ 3 ≈ प्रत्येक खण्ड। औपचारिक रूप में यह प्रत्यन्तर्दशा है, जो पुनः विंशोत्तरी-अनुपात से विभाजित होती है (समान तिहाई नहीं): प्रत्यन्तर = (अन्तर-अवधि × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) केतु-बुध भुक्ति ≈ 362 दिन। मोटा आदि/मध्य/अन्त ≈ 362 ÷ 3 ≈ 120.7 दिन प्रत्येक ≈ 4 मास। परन्तु सूक्ष्म प्रत्यन्तर में बुध-में-बुध का प्रथम खण्ड = (119/120 वर्ष × 17) ÷ 120 = 2023/14400 वर्ष ≈ 51.3 दिन — अर्थात् खण्ड समान नहीं, ग्रह-वर्षों के अनुपात में हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह त्रिविभाजन हमारे विंशोत्तरी-गणक की उसी पुनरावर्ती अनुपात-अंकगणित को दर्शाता है — हर स्तर पर (महादशा → अन्तर → प्रत्यन्तर) वही ÷120 सूत्र लागू होता है। "आदि-मध्य-अन्त" शास्त्रीय स्थूल-विभाग है; इंजन उसे प्रत्यन्तर-श्रृंखला में यथार्थतः विभाजित करता है, न कि सम-तिहाई में।

59.75
अन्ते क्लेशकरं चैव दारपुत्रादिपीडनम् ।
दायेशात्केन्द्रगे सौम्ये त्रिकोणे लाभगेऽपि वा
ante kleśakaraṃ caiva dāraputrādipīḍanam |
dāyeśātkendrage saumye trikoṇe lābhage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ते = भुक्ति के अंत में; क्लेशकरं = क्लेश उत्पन्न करने वाला; दार-पुत्र-आदि-पीडनम् = पत्नी, पुत्र आदि को पीड़ा; दायेशात् = दशा/भुक्ति-स्वामी से; केन्द्रगे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) में स्थित; सौम्ये = शुभ ग्रह पर; त्रिकोणे = त्रिकोण (1, 5, 9) में; लाभगे = लाभ (11वें) में; अपि वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ पूर्व पंक्ति का पूरक: भुक्ति के अंत को शास्त्र क्लेशकर और दार-पुत्र आदि की पीड़ा वाला कहता है। फिर नया नियम आरंभ होता है — जब दायेश से केन्द्र, त्रिकोण या लाभ में सौम्य हो, तो शुभ फल की धारा खुलती है (अगले श्लोक में विस्तार)। दोनों आधे श्लोक क्रमशः “भुक्ति-अंत फल” और “दायेश-संदर्भ शुभ-स्थान” हैं।

English rendering At the close of the bhukti, the text states distress and affliction touching spouse, children, and the like. Then a fresh rule: when a benefic stands in a kendra, a trikoṇa, or even the eleventh from the period-lord (dāyeśa), favourable fruit is opened (continued next).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-गिनती दायेश से (mod 12), फल-सूत्र नहीं:
केन्द्र = {1, 4, 7, 10}; त्रिकोण = {1, 5, 9}; लाभ = 11
जहाँ 1 = दायेश का स्व-भाव। “भुक्ति-अंत” = अन्तर्दशा-काल का अंतिम तृतीयांश (परंपरागत काल-विभाजन; पाठ स्वयं अंश-अनुपात नहीं लिखता)।

उदाहरण (worked example) मान लें दायेश = गुरु, सिंह में; शुभ बुध वृश्चिक में। सिंह → वृश्चिक = 4वाँ भाव = केन्द्र। अतः “दायेशात् केन्द्रगे सौम्ये” लागू — अगले श्लोक का शुभ-फल-पक्ष। (दृग्गोचर/दशा-काल अलग; यहाँ केवल सापेक्ष भाव-गिनती।)

59.76
देहारोग्यं महांल्लाभः पुत्रकल्याणवैभवम् ।
भोजनाम्बरपश्वादिव्यवसायेऽधिकं फलम्
dehārogyaṃ mahāṃllābhaḥ putrakalyāṇavaibhavam |
bhojanāmbarapaśvādivyavasāye'dhikaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-आरोग्यं = शरीर का आरोग्य; महान-लाभः = बड़ा लाभ; पुत्र-कल्याण-वैभवम् = पुत्रों का कल्याण और वैभव; भोजन-अम्बर-पशु-आदि = भोजन, वस्त्र, पशु आदि; व्यवसाये = व्यवसाय/व्यापार में; अधिकं फलम् = अधिक फल।

हिन्दी भावार्थ दायेश से केन्द्र/त्रिकोण/लाभ में सौम्य होने पर शास्त्र देह-आरोग्य, महान् लाभ, पुत्र-कल्याण और वैभव कहता है। भोजन, वस्त्र, पशु आदि से जुड़े व्यवसाय में फल विशेष रूप से अधिक बताया गया है। यह पाठ का शुभ-फल-वर्णन है — स्वास्थ्य-चिकित्सा या आर्थिक गारंटी नहीं।

English rendering Under that placement the text states bodily ease, substantial gain, children’s welfare, and prosperity. In occupations connected with food, clothing, cattle, and the like, it says the fruit is greater.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पूर्व श्लोक की स्थान-शर्त का शुभ-फल)। संख्या या बलांक यहाँ नहीं; फल “दायेशात् केन्द्र/त्रिकोण/लाभ + सौम्य” की शर्त पर टिका है।

59.77
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।
तद्भुक्त्यादौ महाक्लेशो दारपुत्रादिपीडनम्
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā vyaye vā balavarjite |
tadbhuktyādau mahākleśo dāraputrādipīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दशा/भुक्ति-स्वामी से; षष्ठ-रन्ध्रे = छठे या आठवें में; व्यये = बारहवें में; वा = अथवा; बलवर्जिते = बलहीन होने पर; तत्-भुक्त्यादौ = उस भुक्ति के आरंभ में; महाक्लेशः = बड़ा क्लेश; दार-पुत्र-आदि-पीडनम् = पत्नी, पुत्र आदि को पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत, जब ग्रह दायेश से षष्ठ, रन्ध्र या व्यय में हो, अथवा बल से रहित हो, तो शास्त्र उस भुक्ति के आरंभ में महाक्लेश और दार-पुत्र आदि की पीड़ा कहता है। यह पूर्व के शुभ-स्थान-फल का प्रतिरूप है — दुःस्थान या निर्बलता से फल-दिशा बदलती है। कथन शास्त्र का है; निश्चित त्रास या उपचार-दबाव नहीं।

English rendering The text states the converse: if the planet is in the sixth, eighth, or twelfth from the dāyeśa, or is devoid of strength, then at the beginning of that bhukti there is great distress and affliction of spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सापेक्ष भाव-गिनती + बल-अभाव (दो शर्तें, OR):
दुःस्थान दायेश से = {6, 8, 12}; अथवा बलवर्जित (षड्बल/अवस्था आदि से निर्बल — पाठ स्वयं बलांक नहीं देता)।
“भुक्त्यादौ” = अन्तर्दशा का आरंभिक खंड। विंशोत्तरी में अन्तर्दशा-लंबाई = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120; फल-निर्णय स्थान/बल से, अवधि-सूत्र से नहीं।

उदाहरण (worked example) दायेश = शुक्र, मिथुन में; चंद्र मकर में → मिथुन से मकर = 8वाँ (रन्ध्र) → “दायेशात् रन्ध्रे”। भुक्ति-आरंभ में पाठ महाक्लेश/दार-पुत्र-पीड़ा कहता है। (बलवर्जित पक्ष अलग जाँच: षड्बल-योगफल < ग्रह-सीमा — यह श्लोक सीमा-संख्या नहीं देता।)

59.78
राजभीतिकरश्चैव मध्ये तीर्थकरो भवेत् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति
rājabhītikaraścaiva madhye tīrthakaro bhavet |
dvitīyadyūnanāthe tu hyapamṛtyurbhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजभीतिकरः = राजा/सत्ता से भय-कारक; मध्ये = मध्य में; तीर्थकरः = तीर्थ-यात्रा करने वाला (यहाँ शाब्दिक "तीर्थाटन", जैन "तीर्थंकर" नहीं); भवेत् = हो; द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय (2) व द्यून (7) का स्वामी होने पर; अपमृत्युः = अकाल-मृत्यु; भविष्यति = होगी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (यह बुध) राजभय-कारक होता है, और भुक्ति के मध्य में जातक तीर्थ-यात्रा करता है। किन्तु यदि बुध द्वितीय या सप्तम (मारक) भाव का स्वामी हो, तो अकाल-मृत्यु का भय कहा गया है। "अपमृत्यु" शास्त्र का कथन है — हम इसे भय या नियति के रूप में नहीं, केवल शास्त्रोक्त वचन के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

English rendering It causes fear from authority, and in the middle of the period one goes on pilgrimage; but should Mercury own the 2nd or 7th, the text states a danger of untimely death.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मारक-सिद्धान्त, श्लोक 67 का समानान्तर)। तकनीकी वर्गीकरण: मारक-भाव = {2, 7}; इनका स्वामी होना मारकेश-योग। कोई परिकलित राशि नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) पुनः वही अनुशासन — गणित (मारक = भाव-समुच्चय {2,7}, एक निर्धारक वर्गीकरण) और फल (अपमृत्यु = शास्त्र का दावा) को पृथक् रखो। "भविष्यति" को हम report-the-text-states की मर्यादा में रखते हैं, कभी नियति/निश्चितता या दबाव-रूप उपाय के रूप में नहीं — यही हमारी मूल विधि है।

59.79
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
ततः सुखमवाप्नोति श्रीहरेश्च प्रसादतः
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet |
tataḥ sukhamavāpnoti śrīhareśca prasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दोष = उस (केतु-अन्तर्दशा के) अरिष्ट/दोष का; परिहार-अर्थम् = निवारण के लिये (परिहार = शमन, अर्थम् = हेतु); विष्णु-साहस्रकम् = विष्णु-सहस्रनाम (हरि के एक सहस्र नामों का स्तोत्र); जपेत् = जप करना चाहिये (विधिलिङ्, विधान-वाक्य); ततः = तत्पश्चात्; सुखम् अवाप्नोति = सुख प्राप्त करता है; श्रीहरेः = श्री हरि (विष्णु) की; प्रसादतः = कृपा/प्रसाद से।

हिन्दी भावार्थ पूर्ववर्णित अनिष्ट भुक्ति-फलों (द्वितीय-सप्तमेश-सम्बन्ध, अपमृत्यु-भय आदि) के शमन-हेतु शास्त्र यहाँ उपाय बताता है — साधक विष्णु-सहस्रनाम का जप करे। ऐसा करने पर, श्री हरि की कृपा से, वह तत्पश्चात् सुख को प्राप्त करता है। यह श्लोक केतु-अन्तर्दशा-अध्याय का समापन-वचन है, जो दोष-कथन के अन्त में परिहार-विधान रखकर अध्याय को पूर्ण करता है।

English rendering To remove that affliction, one should recite the Viṣṇu-sahasranāma; thereafter, by the grace of Śrī Hari, one attains happiness. (Closing śānti-verse of the Ketu antardaśā chapter.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/उपाय-विधान (परिहार-कथन)। इस पद में एकमात्र संख्या शब्दगत है — "साहस्रक" = सहस्र = 1,000 (नामों की संख्या, 10³); यह कोई ज्योतिषीय गणना नहीं, अपितु स्तोत्र की नाम-गणना है। दशा-फल का शमन शास्त्र की अपनी अनुशंसा है, कोई सिद्ध गणित-चरण नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उसी वर्ग का है जिसके लिये हमारी विधि गणित और व्याख्या को पृथक् रखती है (dossier §5): केतु-अन्तर्दशा की कालावधि स्वयं विम्शोत्तरी की अनुपात-गणित है — केतु 7 वर्ष, अन्तर्दशा = (7 × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 (dossier §3) — किन्तु यह "जप करने पर सुख मिलेगा" जैसा परिहार-फल शास्त्र का कथन है, हमारे द्वारा समर्थित नियति नहीं। अतः इसे "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत करते हैं; न भय, न उपाय-दबाव। इस श्लोक में कोई `==`-oracle-योग्य संख्या नहीं है, इसलिये गणित यहाँ मौन है और केवल विधान अभिलिखित है।

अध्यायः 60

शुक्रान्तर्दशाफलाध्यायः

74 श्लोक
60.1
अथ स्वान्तर्गते शुक्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
लाभे वा बलसंयुक्ते तद्भुक्तौ च शुभं फलम्
atha svāntargate śukre lagnātkendratrikoṇage |
lābhe vā balasaṃyukte tadbhuktau ca śubhaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (विषयारम्भ); स्व-अन्तर्-गते = अपनी अन्तर्दशा/भुक्ति में स्थित; शुक्रे = शुक्र (Venus); लग्नात् = जन्म-लग्न से; केन्द्र-त्रिकोण-गे = केन्द्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (1, 5, 9) में; लाभे = एकादश भाव में; वा = अथवा; बल-संयुक्ते = बल से युक्त; तद्-भुक्तौ = उस भुक्ति में; शुभं फलम् = शुभ फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब शुक्र की अपनी अन्तर्दशा (भुक्ति) का वर्णन आरम्भ करता है। यदि उस काल में शुक्र लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो, अथवा लाभ (11वें) भाव में स्थित हो, और बल से युक्त हो, तो उस भुक्ति में शास्त्र शुभ फल का कथन करता है। यह फल-कथन दशा-काल और भाव-स्थिति दोनों की संयुक्त शर्त पर टिका है।

English rendering The text now turns to Venus in its own antardaśā (bhukti). When Venus is in a kendra or trikoṇa from the lagna, or in the eleventh (lābha), and is endowed with strength, the śāstra states auspicious results for that bhukti.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-काल (विंशोत्तरी): Venus antar-years = (mahādaśā-years × 20) ÷ 120; Venus mahādaśā itself = 20 yr in the 120-yr cycle (Σ = 120). भाव-शर्त (whole-sign या equal-house—declare convention): kendra = houses {1, 4, 7, 10}; trikoṇa = {1, 5, 9}; lābha = {11}. “बल” यहाँ षड्बल/अवस्था-बल का संकेत—रुपा/विरुपा इकाई (1 रूप = 60 विरुपा) से माप्य; फल-कथन स्वयं गणना नहीं, केवल काल × स्थिति × बल की शर्त है।

उदाहरण (worked example) Convention: Vimśottarī; Venus mahādaśā = 20 yr. Venus–Venus antardaśā duration = (20 × 20) ÷ 120 = 400 ÷ 120 = 3⅓ yr ≈ 3 yr 4 months. Suppose lagna = Meṣa (sidereal; ayanāṃśa declared separately), Venus longitude in Vṛṣabha (house 2 from Meṣa)—then neither kendra/trikoṇa nor lābha; the verse’s “शुभं फलम्” condition for position is not met. If Venus is in Siṃha (house 5 = trikoṇa) with stated bala, the positional clause of this verse is satisfied.

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में शुक्र = 20 वर्ष; अन्तर्दशा = (MD-yr × antar-yr)/120—शुद्ध अनुपात-गणित, dāśā engine में यथावत्। “बल” पक्ष षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) से जुड़ता है—रुपा/विरुपा में योग, न कि व्याख्या। फल-पंक्तियों को हम भविष्य-वाणी नहीं मानते; केवल शास्त्र-कथन + काल-गणित अलग रखते हैं।

60.2
विप्रमूलाद्धनप्राप्तिर्गोमहिष्यादिलाभकृत् ।
पुत्रोत्सवादिसन्तोषो गृहे कल्याणसम्भवः
vipramūlāddhanaprāptirgomahiṣyādilābhakṛt |
putrotsavādisantoṣo gṛhe kalyāṇasambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विप्र-मूलात् = ब्राह्मण/विद्वान् स्रोत से; धन-प्राप्तिः = धन की प्राप्ति; गो-महिष्य्-आदि-लाभ-कृत् = गौ, भैंस आदि का लाभ करने वाला; पुत्र-उत्सव-आदि-सन्तोषः = पुत्र-उत्सव आदि से प्रसन्नता; गृहे = घर में; कल्याण-सम्भवः = कल्याण की सम्भावना/उद्भव।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की शुभ-भुक्ति-शर्त के अधीन शास्त्र कहता है—विप्र-मूल से धन-प्राप्ति, गौ-महिषी आदि चतुष्पद लाभ, पुत्र-उत्सव आदि से सन्तोष, और गृह में कल्याण का सम्भव। यह पूर्णतः फल-कथन है; कोई अंक-सूत्र इसमें निहित नहीं। पाठ में “कल्याण” सामान्य शुभ-अवस्था का संकेत है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering Under the auspicious conditions already stated, the text lists results: wealth from a brāhmaṇa source, gain of cattle such as cows and buffaloes, joy from celebrations for a son and the like, and the arising of welfare in the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शास्त्र की सूची को “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें; गणना केवल पूर्व-श्लोक की दशा-अवधि और भाव-स्थिति से जुड़ी रहती है।

60.3
सन्मानं राजसम्मानं राज्यलाभो महत्सुखम् ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि तुङ्गांशे वांशगेऽपि वा
sanmānaṃ rājasammānaṃ rājyalābho mahatsukham |
svocce vā svarkṣage vāpi tuṅgāṃśe vāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्मानं = सम्मान; राज-सम्मानं = राजकीय सम्मान; राज्य-लाभः = राज्य/अधिकार-लाभ; महत्-सुखम् = महान् सुख; स्व-उच्चे = अपनी उच्च राशि में (शुक्र → मीन); स्व-ऋक्ष-गे = अपनी राशि में (वृष/तुला); तुङ्ग-अंशे = उच्च-नवांश (D9 में उच्च राशि का अंश); स्व-अंश-गे = अपने नवांश में।

हिन्दी भावार्थ जब शुक्र अपनी उच्च राशि में, अथवा अपनी स्वराशि में, या उच्च-नवांश (तुङ्गांश) में, या स्वनवांश में हो — तब शास्त्र कहता है कि सम्मान, राजसम्मान, राज्य-लाभ और महान् सुख प्राप्त होता है। यहाँ फल की तीव्रता को वर्ग-बल (नवांश-स्थिति) से जोड़ा गया है।

English rendering When Venus occupies its exaltation, its own sign, its exaltation-navāṃśa, or its own navāṃśa, the text promises honor, royal regard, gain of authority, and great happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-गणित (D9 नवांश)।
शुक्र की उच्च राशि = मीन 27° (परमोच्च); स्वराशि = वृष एवं तुला; नीच = कन्या 27°।
नवांश-नियम: 30° राशि 9 समान अंशों (प्रत्येक 3°20′) में विभक्त; आरम्भ-राशि — चर→स्वयं, स्थिर→9वीं, द्विस्वभाव→5वीं। तुङ्गांश = वह नवांश जो शुक्र की उच्च राशि (मीन) हो; स्वांश = वृष/तुला नवांश।

उदाहरण (worked example) शुक्र मीन 27° पर मानें। नवांश-क्रमांक = ⌈27 ÷ 3.3333⌉ = 9वाँ अंश (26°40′–30°)। मीन (जल-तत्त्व, द्विस्वभाव) का नवांश-आरम्भ = कर्क। कर्क से 9वीं राशि = मीन। अतः नवांश = मीन = शुक्र की उच्च राशि → तुङ्गांश एवं वर्गोत्तम (D1=D9=मीन) दोनों सिद्ध।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे षोडश-वर्ग योजना (Ch.6) के D9 (नवांश) पर टिका है — हमारा वर्ग-इंजन (kaal_ekavimshati_varga) प्रत्येक वर्ग को 30° चाप का नियत मॉड्युलर विभाजन मानकर तुङ्गांश/स्वांश को यांत्रिक रूप से निर्धारित करता है। "उच्च बनाम उच्चांश" को अलग रखना ही शास्त्र की सूक्ष्मता है: राशि-उच्च और नवांश-उच्च दो स्वतंत्र संगणनाएँ हैं।

60.4
नूतनालयनिर्माणं नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् ।
कलत्रपुत्रविभवं मित्रसंयुक्तभोजनम्
nūtanālayanirmāṇaṃ nityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
kalatraputravibhavaṃ mitrasaṃyuktabhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नूतन-आलय-निर्माणम् = नए निवास का निर्माण; नित्यम् = सदैव/प्रतिदिन; मिष्ठान्न-भोजनम् = मधुर अन्न का भोजन; कलत्र-पुत्र-विभवम् = पत्नी और पुत्र का वैभव; मित्र-संयुक्त-भोजनम् = मित्रों के साथ भोजन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस भुक्ति में नूतन गृह-निर्माण, नित्य मिष्टान्न-भोजन, कलत्र-पुत्र का वैभव, और मित्र-सहित भोजन का फल कहता है। ये सब लौकिक सुख-सूचक फल-पङ्क्तियाँ हैं—शास्त्र का कथन, हमारी भविष्यवाणी नहीं। किसी संख्यात्मक काल-खण्ड या वर्ग-सूत्र का यहाँ निर्देश नहीं।

English rendering The text states construction of a new dwelling, daily enjoyment of sweet food, prosperity of spouse and children, and meals shared with friends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पूर्व-श्लोकों की दशा-अवधि और शुक्र-स्थिति की शर्तें ही तकनीकी पृष्ठभूमि हैं; यह श्लोक केवल फल-सूची विस्तार करता है।

60.5
अन्नदानं प्रियं नित्यं दनधर्मादिसङ्ग्रहः ।
महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम्
annadānaṃ priyaṃ nityaṃ danadharmādisaṅgrahaḥ |
mahārājaprasādena vāhanāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्न-दानम् = अन्न का दान; प्रियम् = प्रिय/इष्ट; नित्यम् = नित्य; धन-धर्म-आदि-सङ्ग्रहः = धन, धर्म आदि का संचय; महाराज-प्रसादेन = महाराज की कृपा से; वाहन-अम्बर-भूषणम् = यान, वस्त्र, आभूषण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—नित्य प्रिय अन्न-दान, धन-धर्म आदि का संग्रह, तथा महाराज-प्रसाद से वाहन, वस्त्र और भूषण की प्राप्ति। “दान” और “धर्म-संग्रह” यहाँ फल-वर्णन हैं, दबावपूर्ण उपाय-सूची नहीं। राज-प्रसाद का उल्लेख शास्त्रीय फल-भाषा है; आधुनिक राजनैतिक भविष्य नहीं।

English rendering The text states daily cherished giving of food, accumulation of wealth and dharma-related stores, and—through a great king’s favor—vehicles, garments, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई भुक्ति-वर्ष, बिन्दु-संख्या या बल-इकाई इस श्लोक में कथित नहीं; केवल गुणात्मक फल-सूची।

60.6
व्यवसायात्फलाधिक्यं चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।
प्रयाणं पश्चिमे भागे वाहनाम्बरलाभकृत्
vyavasāyātphalādhikyaṃ catuṣpājjīvalābhakṛt |
prayāṇaṃ paścime bhāge vāhanāmbaralābhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसायात् = व्यवसाय/उद्यम से; फल-आधिक्यम् = फल की अधिकता; चतुष्पात्-जीव-लाभ-कृत् = चार पैर वाले जीवों का लाभ; प्रयाणम् = यात्रा; पश्चिमे भागे = पश्चिम दिशा में; वाहन-अम्बर-लाभ-कृत् = यान और वस्त्र का लाभ करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—व्यवसाय से अधिक फल, चतुष्पद जीवों का लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा, तथा वाहन-वस्त्र का लाभ। दिशा-निर्देश (पश्चिम) शास्त्रीय फल-भाषा है; इसे आधुनिक “भाग्य-दिशा” का डर या दबाव नहीं बनाना। कोई अंकीय सूत्र यहाँ नहीं—केवल फल-वर्णन।

English rendering The text states greater fruits from enterprise, gain of four-footed animals, travel in the western quarter, and acquisition of vehicles and clothing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “पश्चिमे भागे” दिशा-फल है, देशान्तर/अक्षांश गणना नहीं; दशा-काल फिर भी 60.1 के विंशोत्तरी अनुपात से ही आता है।

60.7
लग्नाद्युपचये शुक्रे शुभग्रहयुतेक्षिते ।
मित्रांशे तुङ्गलाभेशयोगलारकसंयुते
lagnādyupacaye śukre śubhagrahayutekṣite |
mitrāṃśe tuṅgalābheśayogalārakasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; उपचये = उपचय भावों में (3, 6, 10, 11); शुक्रे = शुक्र; शुभ-ग्रह-युत-ईक्षिते = शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट; मित्र-अंशे = मित्र के अंश (वर्ग) में; तुङ्ग-लाभेश-योग-कारक-संयुते = उच्च, लाभेश, योग/कारक से संयुक्त (पाठ: “योगलारक” — पाठ-भेद संभव; प्रायः योगकारक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक और शुभ-संयोग जोड़ता है—जब शुक्र लग्न से उपचय (3, 6, 10, 11) में हो, शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो, मित्रांश में हो, और तुङ्ग/लाभेश/योगकारक-सम्बद्ध योग से युक्त हो, तब पूर्वोक्त शुभ फल और दृढ़ माने जाते हैं। “योगलारक” पाठ विकिस्रोत/मुद्रण में अस्थिर लग सकता है—योगकारक पढ़ना सम्भव; निश्चय से नहीं थोपना। यह भी फल-शर्त है, नियति नहीं।

English rendering When Venus is in an upacaya house from the lagna, joined or aspected by benefics, in a friendly aṃśa, and associated with exaltation, the lord of gains, and yoga-kāraka factors (reading of “yogalāraka” uncertain—पाठ-भेद संभव), the text’s auspicious results are further indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उपचय houses from lagna = {3, 6, 10, 11} (whole-sign convention usual in classical hora; declare if equal-house). शुभ दृष्टि (BPHS graha-dṛṣṭi): e.g. Jupiter full on 5, 7, 9; Venus full on 7—apply only the aspect rule your engine pins. मित्रांश: D9 (or stated varga) rāśi whose lord is natural/temporal friend of Venus (friendship table: declare naisargika or tatkālika). लाभेश = lord of house 11 from lagna. No new year-count; antar duration still (MD-yr × 20)/120.

उदाहरण (worked example) Lagna = Karka (Cancer). Upacaya = Kanyā(3), Dhanu(6), Meṣa(10), Vṛṣabha(11). Venus in Vṛṣabha (own sign + lābha + upacaya): positional clauses of 60.1 and 60.7 both engage. If Jupiter (śubha) aspects or joins, and D9 of Venus falls in a friendly sign (e.g. Mīna—Jupiter’s, friend to Venus by many naisargika tables), the “शुभ…मित्रांश” filter is met. Antar length under Venus MD: 3⅓ yr as in 60.1.

हमारा डिकोड (Our Decode) भाव-संख्या (3/6/10/11, केन्द्र-त्रिकोण, लाभ) शुद्ध modular house-arithmetic—varga/dṛṣṭi engines में longitude → sign → house map से `==` जाँच योग्य। अंश = षोडश-वर्ग (विशेषतः D9) का deterministic partition; 30° → equal arcs, no interpretive fudge. फल-पंक्ति को हम “शास्त्र कहता है” पर रोकते हैं; oracle discipline = गणना exact, व्याख्या अलग।

60.8
राज्यलाभो महोत्साहो राजप्रीतिः शुभावहा ।
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिवर्द्धनम्
rājyalābho mahotsāho rājaprītiḥ śubhāvahā |
gṛhe kalyāṇasampattirdāraputrādivarddhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्य-लाभ = राज्य/पद/अधिकार का लाभ; महोत्साह = प्रबल उत्साह/उद्यम; राज-प्रीति = राजा (अथवा उच्च अधिकारी) की प्रसन्नता; शुभावहा = शुभ फल देने वाली; गृहे कल्याण-सम्पत्ति = गृह में मंगल और सम्पदा; दार-पुत्रादि-वर्द्धनम् = पत्नी, पुत्र आदि की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस स्थिति में राज्य-लाभ, महान् उत्साह और राज-प्रीति शुभ फल लाती है। गृह में कल्याण और सम्पत्ति का वर्णन है। दार, पुत्र आदि की वृद्धि भी इसी फल-कथन में जोड़ी गई है। यह शुभ-फल का संक्षिप्त आख्यान है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states gain of dominion or high favour, great enthusiasm, and royal goodwill as auspicious outcomes. Household welfare and prosperity, together with increase of spouse, children, and related joys, are named in the same result-statement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-सम्बद्ध दशा/अन्तर्दशा का शुभ-फल-वर्णन)। यहाँ संख्या या विभाग-नियम नहीं; केवल शास्त्रीय परिणाम-सूची है।

60.9
षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे पापयुक्तेऽथ वीक्षिते ।
चौरादिव्रणभीतिश्च सर्वत्र जनपीडनम्
ṣaṣṭhāṣṭamavyaye śukre pāpayukte'tha vīkṣite |
caurādivraṇabhītiśca sarvatra janapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-व्यये = षष्ठ, अष्टम या व्यय (द्वादश) भाव में; शुक्रे = शुक्र स्थित होने पर; पाप-युक्ते = पाप-ग्रह से युक्त; अथ वीक्षिते = अथवा पाप-दृष्टि से दृष्ट; चौरादि-व्रण-भीतिः = चोर आदि तथा व्रण (घाव) का भय; सर्वत्र जन-पीडनम् = सर्वत्र जन-पीड़ा/सामाजिक क्लेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र षष्ठ, अष्टम या व्यय भाव में हो और पाप-युक्त अथवा पाप-दृष्ट हो, तब चोर आदि तथा व्रण का भय बताया गया है। साथ ही सर्वत्र जन-पीड़न का फल कहा गया है। यह दोष-संयोग पर आश्रित फल-कथन है; भाव-स्थान और योग/दृष्टि यहाँ निर्णायक संकेत हैं।

English rendering The text states that when Venus occupies the sixth, eighth, or twelfth house and is joined or aspected by malefics, fear from thieves and wounds is indicated, along with widespread harassment of people. The result is conditioned on that affliction of Venus in dusthāna houses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की ६/८/१२ स्थिति + पाप-योग/दृष्टि)। तकनीक केवल स्थान-जाँच है: शुक्र का भाव ∈ {६, ८, १२} तथा पाप-युति या पाप-दृष्टि की उपस्थिति; कोई संख्या-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न-कुण्डली (D1), पूर्ण-राशि भाव-प्रणाली: शुक्र १८° कन्या, लग्न मेष → शुक्र षष्ठ भाव में। यदि वहीं शनि/राहु युति या मंगल की दृष्टि हो, तो यह श्लोक उसी “पापयुक्त/वीक्षित शुक्र-षष्ठाष्टमव्यय” वर्ग में पढ़ा जाता है। (अयनांश फल-वाक्य नहीं बदलता; केवल देशान्तर-अक्षांश से ग्रह-देशान्तर निकलता है।)

60.10
राजद्वारे जनद्वेष इष्टबन्धुविनाशनम् ।
दारपुत्रादिपीडा च सर्वत्र जनपीडनम्
rājadvāre janadveṣa iṣṭabandhuvināśanam |
dāraputrādipīḍā ca sarvatra janapīḍanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-द्वारे = राज-द्वार/राज-कार्य-क्षेत्र में; जन-द्वेष = लोगों का द्वेष/विरोध; इष्ट-बन्धु-विनाशनम् = प्रिय बन्धुओं का विनाश/हानि; दार-पुत्रादि-पीडा = पत्नी, पुत्र आदि की पीड़ा; सर्वत्र जन-पीडनम् = सर्वत्र जन-क्लेश (पाठ में पुनरावृत्ति-सी पंक्ति)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राज-द्वार पर जन-द्वेष और इष्ट बन्धुओं की हानि का फल इस सन्दर्भ में कहा गया है। दार-पुत्रादि-पीड़ा तथा सर्वत्र जन-पीड़न भी उसी फल-श्रृंखला में आते हैं। यह पूर्व श्लोक के दोष-प्रसंग का विस्तारित फल-वर्णन है, न कि स्वतंत्र गणना-नियम।

English rendering The text states enmity of people at the royal gate (or public office), harm to dear kin, affliction to spouse and children, and widespread distress. It continues the adverse phala line of the preceding verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दोष-युक्त शुक्र-दशा का विस्तृत अशुभ-फल)। कोई बलांक, वर्ष-मान या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं है।

60.11
द्वितीयद्यूननाथे तु स्थिते चेन्मरणं भवेत् ।
तर्त दुर्गाजपं कुर्याद्धनुदानं च कारयेत्
dvitīyadyūnanāthe tu sthite cenmaraṇaṃ bhavet |
tarta durgājapaṃ kuryāddhanudānaṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे = द्वितीय एवं द्यून (सप्तम, 7वें) भाव के स्वामी के रूप में (द्यून = 7वाँ, मारक-स्थान); तु स्थिते चेत् = यदि वैसे स्थित हो; मरणं भवेत् = मरण-तुल्य संकट सम्भव — शास्त्र-कथन; तत्र = वहाँ ("तर्त" पाठ-भेद संभव → तत्र); दुर्गा-जपं कुर्यात् = दुर्गा-जप करे; धेनु-दानं च कारयेत् = धेनु (गौ) का दान कराए ("धनुदानं" पाठ-भेद संभव → धेनुदानं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र द्वितीय अथवा सप्तम (मारक) भाव का स्वामी होकर वैसे स्थित हो, तो मरण-तुल्य संकट की आशंका होती है; उस स्थिति में शास्त्र दुर्गा-जप और गौ-दान का विधान बताता है। यह शास्त्र की प्रायश्चित्त-अनुशंसा है — किसी दबाव या भय के रूप में नहीं, अपितु परम्परा के उपशम-विधान के रूप में प्रस्तुत।

English rendering The text states that when Venus, as lord of the second or seventh (māraka houses), is so placed, mortal danger may arise; there it prescribes recitation of Durgā and the gift of a cow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं शान्ति-विधान।
मारक-स्थान = {2, 7} (आयु-हानि के कारक भाव)। भाव-सैट संगणनीय है; "मरण" शास्त्र का कथन है, कोई निश्चित/नियत घटना नहीं। पाठ-भेद: तर्त → तत्र, धनुदानं → धेनुदानं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी पद्धति गणित और फल को कठोरता से पृथक् रखती है (CLAUDE.md + ऑरैकल-अनुशासन): मारक-भाव {2,7} की पहचान शुद्ध स्वामित्व-गणना है, जबकि "मरण" एवं जप-दान — ये शास्त्र के कथन/विधान हैं, हमारी भविष्यवाणी नहीं। इसीलिए ऐसे श्लोकों को "शास्त्र कहता है" रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है, भय या दबाव के बिना।

60.12
शुक्रस्यान्तर्गते सूर्ये सन्तापो राजविग्रहः ।
दायादकलहश्चैव स्वोच्चनीचविवर्जिते
śukrasyāntargate sūrye santāpo rājavigrahaḥ |
dāyādakalahaścaiva svoccanīcavivarjite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्-गते = शुक्र की अन्तर्दशा (भुक्ति) में; सूर्ये = सूर्य (अन्तर्दशाधिपति/उप-दशा) होने पर; सन्तापः = सन्ताप/क्लेश; राज-विग्रहः = राज-संघर्ष/शासन-विरोध; दायाद-कलहः = दायभागियों (सह-उत्तराधिकारियों) से कलह; स्व-उच्च-नीच-विवर्जिते = जब (सूर्य) स्वोच्च और स्वनीच से रहित हो (अर्थात् न उच्च, न नीच)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की अन्तर्दशा में सूर्य आने पर सन्ताप, राज-विग्रह और दायाद-कलह का फल कहा गया है—विशेषतः जब सूर्य न उच्च हो, न नीच। यह अन्तर्दशा-फल का सामान्य (मध्यम) दोष-वर्णन है। उच्च/नीच का निषेध अगले श्लोकों के शुभ-भेद के लिए भूमि तैयार करता है।

English rendering The text states that when the Sun runs within Venus’s antardaśā, distress, conflict with authority, and quarrels among co-heirs are indicated, provided the Sun is neither exalted nor debilitated. The exclusion of exaltation and debilitation frames the ordinary adverse case.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (अन्तर्दशा-अवधि) — शुक्र महादशा = २० वर्ष, सूर्य = ६ वर्ष;
सूर्य की भुक्ति-अवधि (शुक्र-अन्तर्गत) = (२० × ६) ÷ १२० = १ वर्ष।
सूर्य उच्च = मेष १०°; सूर्य नीच = तुला १०° (शास्त्रीय बिन्दु; “विवर्जित” = इन स्थितियों से भिन्न)।
फल स्वयं गणना नहीं—केवल दशा-कुंजी और राशि-स्थिति की जाँच।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी, चन्द्र-नक्षत्र-कुंजी से शुक्र महादशा चल रही हो। शुक्र-अन्तर्गत सूर्य-भुक्ति = १ वर्ष पूरे। यदि सूर्य सिंह १५° (न उच्च, न नीच) हो, तो यह श्लोक “स्वोच्चनीचविवर्जित” वर्ग में पढ़ा जाता है। (नक्षत्र-अंश और आरम्भ-तिथि काल्पनिक जन्मकाल पर निर्भर; अवधि-अनुपात ऊपर के सूत्र से स्थिर है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में शुक्र २० और सूर्य ६ वर्ष—योग १२०—हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात से अन्तर्दशा = (महा × अन्तर्) ÷ १२० लिखी गई है। इस श्लोक का “शुक्रस्यान्तर्गते सूर्ये” उसी १-वर्ष सूर्य-भुक्ति से जुड़ता है; फल-वाक्य अलग परत है—गणित और फल को हम अलग रखते हैं।

60.13
) ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे सूर्ये मित्रर्क्षे केन्द्रकोणगे ।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा
) |
svocce svakṣetrage sūrye mitrarkṣe kendrakoṇage |
dāyeśātkendrakoṇe vā lābhe vā dhanage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (आरम्भ में “) ।” — पाठ खण्डित/अपूर्ण दिखता है; पाठ-भेद संभव।) स्व-उच्चे = अपने उच्च-स्थान में; स्व-क्षेत्र-गे = स्वराशि में; मित्र-ऋक्षे = मित्र-राशि में; केन्द्र-कोण-गे = केन्द्र (१,४,७,१०) या कोण/त्रिकोण (१,५,९) में; दायेशात् = दायेश (दशाधिपति/भुक्ति-सन्दर्भ-स्वामी) से; केन्द्र-कोणे वा = केन्द्र या कोण में; लाभे वा = लाभ (एकादश) में; धन-गे अपि वा = अथवा धन (द्वितीय) भाव में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र (इस खण्डित पाठ के अनुसार) कहता है कि जब सूर्य स्वोच्च, स्वक्षेत्र, मित्र-राशि में हो, अथवा केन्द्र/कोण में हो—अथवा दायेश से केन्द्र, कोण, लाभ या धन भाव में हो—तो अगला श्लोक उसी शुभ-संयोग का फल बाँधता है। पद-क्रम से यह ६०.१२ के “मध्यम दोष” का प्रतिपक्षी शुभ-भेद है। आरम्भ का विराम-चिह्न संदिग्ध होने से पाठ-भेद संभव मानना चाहिए।

English rendering The text (with a possibly broken opening) states favourable placements of the Sun: exaltation, own sign, friendly sign, kendra or trikoṇa; or, from the period-lord (dāyeśa), kendra, trikoṇa, the eleventh, or the second. These conditions introduce the auspicious bhukti-results of the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-जाँच (D1 पूर्ण-राशि भाव, जब तक अन्य वर्ग न कहा जाए):
• सूर्य उच्च ≡ मेष १०°; स्वक्षेत्र ≡ सिंह; मित्र-राशि ≡ सूर्य की नैसर्गिक/तत्कालिक मित्रता-तालिका से।
• केन्द्र = {१,४,७,१०}; त्रिकोण (कोण) = {१,५,९}; लाभ = ११; धन = २।
• “दायेशात्” = दशा/भुक्ति-स्वामी से भाव-गिनती (यहाँ शुक्र-अन्तर्गत सूर्य-प्रसंग में दायेश = शुक्र—पाठ-परम्परा पर निर्भर; पाठ-भेद संभव)।
कोई नया संख्या-नियतांक नहीं।

उदाहरण (worked example) शुक्र अन्तर्दशा में सूर्य; सूर्य मेष १०° (उच्च) अथवा सिंह (स्वक्षेत्र), अथवा शुक्र से गणना कर केन्द्र/५/९/११/२ में—तो ६०.१३ का शुभ-स्थान-योग लागू। यदि सूर्य तुला १०° (नीच) हो, तो यह श्लोक नहीं; ६०.१२ का पक्ष प्रबल।

60.14
तद्भुक्तौ धनलाभः स्याद्राज्यस्त्रीधनसम्पदः ।
स्वप्रभोश्च महत्सौख्यमिष्टबन्धोः समागमः
tadbhuktau dhanalābhaḥ syādrājyastrīdhanasampadaḥ |
svaprabhośca mahatsaukhyamiṣṭabandhoḥ samāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्भुक्तौ = उस (सूर्य की) अन्तर्दशा-भुक्ति में; धनलाभः = धन की प्राप्ति; राज्य-स्त्री-धन-सम्पदः = राज्य/राजपद, पत्नी, धन तथा ऐश्वर्य; स्वप्रभोः = अपने स्वामी/आश्रयदाता से; महत्सौख्यम् = महान सुख; इष्टबन्धोः समागमः = प्रिय बन्धु से मिलन। (यह श्लोक 60.13 की शर्त — सूर्य का स्वोच्च/स्वक्षेत्र/मित्रक्षेत्र में केन्द्र-कोण-लाभ-धन-गत होना — का फल-वाक्य है।)

हिन्दी भावार्थ शुक्र-महादशा में जब सूर्य की अन्तर्दशा शुभ स्थिति में चलती है, तो शास्त्र कहता है कि उस भुक्ति में धन-लाभ, राजपद, स्त्री-धन तथा सम्पदा की प्राप्ति होती है। अपने स्वामी अथवा आश्रयदाता से बड़ा सुख मिलता है और बिछुड़े प्रिय बन्धुजनों से पुनर्मिलन होता है। यह सूर्यान्तर की उत्तम स्थिति का फलादेश है।

English rendering In that sub-period (of a well-placed Sun within Venus's major period), the text states there is gain of wealth, royal position, a wife, riches and prosperity, great happiness from one's patron, and reunion with a beloved kinsman.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल स्वयं गणनात्मक नहीं, किन्तु "भुक्ति" शब्द विंशोत्तरी अन्तर्दशा-अवधि को इंगित करता है। शुक्र-महादशा = 20 वर्ष; किसी ग्रह X की अन्तर्दशा = (20 × X-वर्ष) ÷ 120। सूर्य के 6 वर्ष से — सूर्यान्तर = (20 × 6) ÷ 120 = 1.000 वर्ष (ठीक 12 मास)। यही वह "तद्भुक्ति" है जिसका फल यहाँ कहा गया है।

उदाहरण (worked example) संगणना-रीति = विंशोत्तरी, चन्द्र-नक्षत्र-आश्रित, 120-वर्ष चक्र। शुक्र-महादशा में द्वितीय अन्तर्दशा सूर्य की — अवधि (20 × 6)/120 = 1 वर्ष 0 मास। (अवधि-अनुपात अयनांश-निरपेक्ष है; केवल जन्म-समय की व्यतीत नक्षत्र-अंश-निकासी सायन/निरयन अयनांश पर निर्भर करती है — वह अलग पद है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारा दशा-इंजन शुक्र-महादशा के 20 वर्षों को इसी अनुपात-सूत्र से विभाजित करता है — सूर्यान्तर = ठीक 1.0 वर्ष, शुद्ध भिन्नात्मक अंकगणित (BPHS अ.46–47, दोसियर मद #3)। यहाँ फल-कथन को व्याख्या के रूप में रखा गया है; केवल अवधि ही परीक्षणीय `==`-गणना है।

60.15
पितृमात्रोः सुखप्राप्तिं भ्रातृलाभं सुखावहम् ।
सत्कीर्तिं सुखसौभाग्यं पुत्रलाभं च विन्दति
pitṛmātroḥ sukhaprāptiṃ bhrātṛlābhaṃ sukhāvaham |
satkīrtiṃ sukhasaubhāgyaṃ putralābhaṃ ca vindati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृ-मात्रोः = पिता और माता का; सुख-प्राप्तिम् = सुख की प्राप्ति; भ्रातृ-लाभम् = भाइयों से लाभ / भ्रातृ-सुख; सुखावहम् = सुख देने वाला; सत्कीर्तिम् = अच्छी कीर्ति; सुख-सौभाग्यम् = सुख और सौभाग्य; पुत्र-लाभम् = पुत्र-प्राप्ति / पुत्र-सुख; विन्दति = प्राप्त करता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक पूर्ववर्ती अनुकूल दशा-स्थिति के फल-क्रम को आगे बढ़ाता है। शास्त्र कहता है कि ऐसी स्थिति में जातक को माता-पिता से सुख की प्राप्ति, भ्रातृ-लाभ, और सुख-प्रद परिणाम मिलते हैं। साथ ही सत्कीर्ति, सुख-सौभाग्य तथा पुत्र-लाभ भी विन्दित बताया गया है। यह कथन फल-सूची है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text continues the favourable result-list: happiness from parents, gain connected with brothers, good renown, comfort and fortune, and the obtainment of a son. These are stated as indications under the condition already under discussion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनुकूल दशा-फल-सूची)। यहाँ कोई भाग, बलांक या काल-अनुपात नहीं; केवल शास्त्र-उल्लिखित फल-पदों की श्रृंखला है।

60.16
तथाष्टमे व्यये सूर्ये रिपुराशिस्थितेऽपि वा ।
नीचे वा पापवर्गस्थे देहतापो मनोरुजः
tathāṣṭame vyaye sūrye ripurāśisthite'pi vā |
nīce vā pāpavargasthe dehatāpo manorujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = तथा / वैसे ही; अष्टमे = अष्टम भाव में; व्यये = व्यय (द्वादश) भाव में; सूर्ये = सूर्य स्थित होने पर; रिपु-राशि-स्थिते = शत्रु-राशि में स्थित; अपि वा = अथवा; नीचे = नीच राशि में; वा = अथवा; पाप-वर्ग-स्थे = पाप-वर्ग (अशुभ अंश/वर्ग) में स्थित; देह-तापः = देह-ताप / शारीरिक ताप-पीड़ा; मनो-रुजः = मानसिक क्लेश / मन की पीड़ा।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र सूर्य की अशुभ स्थितियों का फल कहता है। सूर्य अष्टम या व्यय भाव में हो, अथवा शत्रु-राशि, नीच-राशि या पाप-वर्ग में हो — ऐसी दशा में देह-ताप और मनोरुज का उल्लेख है। “पापवर्गस्थ” पद वर्ग-स्थान की अशुभता की ओर संकेत करता है; पाठानुसार वर्ग-परिभाषा में पाठ-भेद संभव। फल को शास्त्र-कथन के रूप में ही पढ़ें — भय या नियति के रूप में नहीं।

English rendering When the Sun stands in the eighth or twelfth house, or in an inimical sign, in debilitation, or in a malefic divisional placement, the text states bodily heat-affliction and mental distress. These are phala-indications of the stated placements, not deterministic forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-स्थिति → देह/मन फल)। तकनीक केवल स्थितियों की जाँच है: भाव ∈ {8, 12}; राशि ∈ {शत्रु-राशि, नीच-राशि}; अथवा पाप-वर्ग-स्थित। सूर्य का नीच = तुला (Libra); शत्रु-राशि सूर्य के लिए परंपरागत मित्र-शत्रु-तालिका से निर्धारित होती है (पाठ/परंपरा-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य देशांतरीय देशांतर-देशांतर-मुक्त भोगांश λ = 185° (तुला 5°) — नीच-राशि। यदि लग्न मेष हो तो सूर्य = सप्तम, न कि अष्टम/व्यय; फल-लागू होने के लिए श्लोक की शर्त “अष्टम/व्यय या नीच/रिपु/पापवर्ग” में से कोई एक पर्याप्त है — यहाँ नीच-शर्त पूरी होती है। अयनांश केवल λ के सापेक्ष राशि-निर्धारण में लगता है; फल स्वयं संख्या नहीं देता।

60.17
स्वजनोपरिसंक्लेशो नित्यं निष्ठुरभाषणम् ।
पितृपीडा बन्धुहानी राजद्वारे विरोधकृत्
svajanoparisaṃkleśo nityaṃ niṣṭhurabhāṣaṇam |
pitṛpīḍā bandhuhānī rājadvāre virodhakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वजन-उपरि = अपने लोगों पर; संक्लेशः = क्लेश / कष्ट; नित्यम् = निरंतर; निष्ठुर-भाषणम् = कठोर वचन; पितृ-पीडा = पिता संबंधी पीड़ा; बन्धु-हानी = बन्धुओं की हानि; राज-द्वारे = राज-द्वार / अधिकार-स्थान पर; विरोध-कृत् = विरोध उत्पन्न करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की सूर्य-स्थितियों के फल-क्रम में शास्त्र आगे कहता है — स्वजनों पर संक्लेश, नित्य निष्ठुर भाषण, पितृ-पीड़ा, बन्धु-हानि, तथा राजद्वार पर विरोध। यह सामाजिक-पारिवारिक दबाव और वचन-शैली का फल-वर्णन है। हम इसे “शास्त्र कहता है” के रूप में रखते हैं; किसी व्यक्ति पर भय या दोषारोपण नहीं थोपते।

English rendering Continuing that adverse Sun configuration, the text states affliction upon one’s own people, habitual harsh speech, paternal distress, harm to kinsmen, and opposition at the royal gate (the seat of authority). Report as textual indication only.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पारिवारिक/सामाजिक/राज-द्वार फल)। कोई काल-माप, बलांक या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल 60.16 की स्थितियों से जुड़ी फल-सूची का विस्तार।

60.18
व्रणपीडाहिबाधा च स्वगृहे च भयं तथा ।
नानारोगभयं चैव गृहक्षेत्रादिनाशनम्
vraṇapīḍāhibādhā ca svagṛhe ca bhayaṃ tathā |
nānārogabhayaṃ caiva gṛhakṣetrādināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्रण-पीडा = घाव / व्रण से पीड़ा; अहि-बाधा = सर्प-संबंधी बाधा (पाठानुसार); च = और; स्व-गृहे = अपने घर में; भयम् = भय; तथा = तथा; नाना-रोग-भयम् = अनेक रोगों का भय; च एव = और भी; गृह-क्षेत्र-आदि-नाशनम् = घर, खेत आदि का नाश / हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उसी अशुभ सूर्य-संदर्भ में और फल जोड़ता है — व्रण-पीड़ा, अहि-बाधा, स्वगृह में भय, नाना रोग-भय, तथा गृह-क्षेत्रादि का नाशन। “अहि” यहाँ शास्त्रीय फल-भाषा का पद है; चिकित्सा या भौतिक सर्प-पूर्वानुमान नहीं। गृह-क्षेत्र-नाश भी शास्त्र-उल्लिखित हानि-संकेत है — आर्थिक/कानूनी सलाह नहीं।

English rendering The text further lists wound-affliction, serpent-related obstruction (in traditional phrasing), fear in one’s own house, fear of various ailments, and destruction or loss of house, fields, and the like. Keep all of this as śāstra-phala language, not medical or legal counsel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शारीरिक/गृह-संपत्ति संबंधी फल-सूची)। गणना-सूत्र अनुपस्थित; शर्त 60.16 की सूर्य-स्थितियों से जुड़ी रहती है।

60.19
सप्तमाधिपतौ सूर्ये ग्रहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं सूर्यप्रीतिं च कारयेत्
saptamādhipatau sūrye grahabādhā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ sūryaprītiṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तम-अधिपतौ = सप्तम भाव के स्वामी के रूप में; सूर्ये = सूर्य होने पर; ग्रह-बाधा = ग्रह-संबंधी बाधा; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन); तत्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के परिहार के लिए; सूर्य-प्रीतिम् = सूर्य की प्रसन्नता / सूर्य-उपासना; च = और; कारयेत् = करनी चाहिए (शास्त्र का निर्देश-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य सप्तमाधिपति हो, तब ग्रह-बाधा का उल्लेख है। उसी दोष के परिहारार्थ सूर्य-प्रीति कराने का निर्देश दिया गया है। यह पाठ का उपचार-वाक्य है; हम इसे दबाव या “जरूर करो” के रूप में नहीं बढ़ाते। सप्तम-स्वामित्व लग्न-राशि पर निर्भर शुद्ध भाव-स्वामी नियम है।

English rendering When the Sun is lord of the seventh house, the text states planetary obstruction (graha-bādhā). For the removal of that stated doṣa it prescribes the performance of Sūrya-prīti. This is the śāstra’s own remedial clause, reported without pressure or guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल + परिहार-निर्देश; किंतु सप्तमाधिपत्य की जाँच मॉड्यूलर भाव-स्वामी नियम से होती है। लग्न-राशि R₀ (0…11) पर सप्तम-राशि = (R₀ + 6) mod 12; यदि उस राशि का स्वामी सूर्य हो → शर्त सत्य। सूर्य केवल सिंह (Leo, index 4) का स्वामी है; अतः सप्तम = सिंह ⟺ लग्न = कुंभ (Aquarius, index 10), क्योंकि (10 + 6) mod 12 = 4।

उदाहरण (worked example) लग्न = कुंभ → सप्तम = सिंह → सप्तमाधिपति = सूर्य। शर्त 60.19 लागू। लग्न = मेष → सप्तम = तुला → स्वामी शुक्र — शर्त लागू नहीं। (राशि-स्वामी परंपरा: सिंह-सूर्य; अयनांश केवल लग्न-राशि के निर्धारण में लगता है।)

60.20
शुक्रस्यान्तर्गते चन्द्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे चैव भाग्यनाथेनसंयुते
śukrasyāntargate candre kendralābhatrikoṇage |
svocce svakṣetrage caiva bhāgyanāthenasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्-गते = शुक्र की अन्तरदशा में; चन्द्रे = चंद्रमा (विचाराधीन / दशा-फल-विषय); केन्द्र-लाभ-त्रिकोण-गे = केन्द्र, लाभ (एकादश) या त्रिकोण में स्थित; स्व-उच्चे = अपने उच्च में; स्व-क्षेत्र-गे = स्वक्षेत्र (स्वराशि) में; च एव = और भी; भाग्य-नाथेन संयुते = भाग्येश (नवम-स्वामी) से युक्त।

हिन्दी भावार्थ अब प्रसंग शुक्र-अन्तर में चंद्र की स्थिति का है। शास्त्र अनुकूल शर्तें गिनाता है — चंद्र केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो; अथवा स्वोच्च/स्वक्षेत्र में हो; अथवा भाग्यनाथ से युक्त हो। ये योग-शर्तें अगले श्लोक के फल से जुड़ती हैं। अन्तर-काल स्वयं विम्शोत्तरी अनुपात से निर्धारित होता है; फल शर्त-पूर्ति पर शास्त्र-कथन है।

English rendering Within the antardaśā of Venus, when the Moon occupies a kendra, the eleventh, or a trikoṇa; or is in exaltation or own sign; or is conjoined with the lord of fortune (ninth-lord)—these are the favourable placement conditions the text sets up for the results that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) विम्शोत्तरी अन्तरदशा (Ch.46–47 डिकोड): महार्षि-चक्र 120 वर्ष; शुक्र-महादशा = 20 वर्ष। किसी ग्रह P की अन्तर-अवधि
T_antar(P) = (Y_maha × Y_P) / 120 वर्ष,
जहाँ Y_P ∈ {केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17}।
शुक्र-महा में शुक्र-अन्तर = (20 × 20)/120 = 3⅓ वर्ष; शुक्र-महा में चंद्र-अन्तर = (20 × 10)/120 = 1⅔ वर्ष — “शुक्रस्यान्तर्गते चन्द्रे” का काल-संदर्भ इसी अनुपात-गणित पर टिका है (पाठ में चंद्र = फल-विषय ग्रह; अन्तर-स्वामी शुक्र)।
(2) भाव-शर्त: केन्द्र = भाव {1, 4, 7, 10}; लाभ = 11; त्रिकोण = {1, 5, 9} (1 दोनों समुच्चयों में)।
(3) चंद्र स्वोच्च = वृष (Taurus); स्वक्षेत्र = कर्क (Cancer)। भाग्यनाथ = नवम-राशि-स्वामी; संयुति = समान राशि (या स्वीकृत युति- quanta — पाठ मौन; साधारणतः समान-राशि)।

उदाहरण (worked example) परंपरा: लाहिरी अयनांश; पूर्ण-भाव (equal house from lagna-sign) — केवल राशि-भाव। लग्न = मेष → केन्द्र-राशियाँ मेष/कर्क/तुला/मकर; त्रिकोण मेष/सिंह/धनु; लाभ = कुंभ। चंद्र λ = 40° → वृष 10° = स्वोच्च → शर्त “स्वोच्चे” पूर्ण। शुक्र-महा (20 y) में चंद्र-अन्तर = 20 × 10 / 120 = 5/3 वर्ष ≈ 1 y 8 m — उसी अन्तर-खिड़की में यह फल-योग शास्त्रानुसार विचार्य।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी का 120-वर्षीय चक्र और अन्तर-सूत्र (Y_maha × Y_P)/120 हमारे दशा-इंजन में उसी अनुपात-अंकगणित से बँधा है — केतु 7 … बुध 17, योगफल 120। यह श्लोक फल-शर्तें देता है; काल-खिड़की का शुद्ध भाग वही canonical 120-वर्ष मॉडल है। गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं: अवधि `==` अनुपात से; फल केवल “शास्त्र कहता है”।

60.21
शुभयुक्ते पूर्णचन्द्रे राज्यनाथेन संयुते ।
तद्बुक्तौ वाहनादीनां लाभं गेहे महत्सुखम्
śubhayukte pūrṇacandre rājyanāthena saṃyute |
tadbuktau vāhanādīnāṃ lābhaṃ gehe mahatsukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभ-युक्ते = शुभ ग्रह से युक्त; पूर्ण-चन्द्रे = पूर्ण चंद्र (बलवान्/पूर्णिमा-सदृश चंद्र) में; राज्य-नाथेन संयुते = राज्येश (दशम-स्वामी) से युक्त; तत्-बुक्तौ = उस भुक्ति (अन्तरदशा) में; वाहन-आदीनाम् = वाहन आदि का; लाभम् = लाभ; गेहे = घर में; महत्-सुखम् = महान् सुख।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की स्थितियों के साथ शास्त्र और कहता है — चंद्र शुभ-युक्त हो, पूर्णचंद्र हो, तथा राज्यनाथ से संपृक्त हो। उस बुक्ति में वाहनादि का लाभ और गेह में महत् सुख शास्त्र-कथित फल हैं। “पूर्णचंद्र” यहाँ बल/कला-संपन्न चंद्र का पारंपरिक संकेत है; “वाहन” शास्त्रीय लाभ-पद है — आधुनिक क्रय-पूर्वानुमान नहीं।

English rendering When that Moon is joined to a benefic, is a full (strong) Moon, and is conjoined with the lord of the kingdom (tenth-lord), then in that bhukti the text states gain of conveyances and the like, and great happiness in the home. Indication only; not a purchase forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) पूर्णचंद्र (पारंपरिक कला-बल संकेत): सूर्य-चंद्र कोण Δ = |λ_☽ − λ_☉| (छोटा चाप); पूर्णिमा-समीप ≈ 180°। कई पाठ “पूर्ण” को उच्च कला-बल (≥ recension-dependent threshold) से भी पढ़ते हैं — पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव।
(2) शुभ-युति: शुभ = गुरु, शुक्र (मुख्य); बुध/चंद्र संदर्भ-सापेक्ष; समान राशि या स्वीकृत युति- quanta।
(3) राज्यनाथ: दशम-राशि-स्वामी; लग्न R₀ पर दशम = (R₀ + 9) mod 12 का स्वामी।
(4) तद्बुक्ति: 60.20 का शुक्र-अन्तर काल; अवधि सूत्र वही — T = (Y_maha × Y_antar)/120।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष → दशम = मकर → राज्यनाथ = शनि। चंद्र और शनि दोनों मकर में (युति); चंद्र-सूर्य Δ ≈ 180° (पूर्ण); गुरु भी मकर में (शुभ-युति) — तीनों शर्तें एक साथ। शुक्र-महा की चंद्र-भुक्ति = 20 × 10 / 120 = 5/3 वर्ष में शास्त्र वाहनादि-लाभ और गेह-सुख कहता है। (भाव-पद्धति: राशि-भाव; अयनांश: कोई भी fixed ayanāṃśa — केवल λ-सहमति आवश्यक।)

हमारा डिकोड (Our Decode) भुक्ति-अवधि का अंक वही विम्शोत्तरी अनुपात है जिसकी Σ = 120 हमारे कालों में pinned है। श्लोक फल (वाहन, गेह-सुख) को इंजन “भविष्यवाणी” नहीं बनाता — वह केवल अन्तर-खिड़की और भाव/युति-शर्तें compute करता है; फल पाठ का कथन रह जाता है। गणित = exact ratio; व्याख्या = “शास्त्र कहता है”, बिना भय या निश्चित्य-नाट्य के।

60.22
महाराजप्रसादेन गजान्तैश्वर्यमादिशेत् ।
महानदीस्नानपुण्यं देवब्राह्मणपूजनम्
mahārājaprasādena gajāntaiśvaryamādiśet |
mahānadīsnānapuṇyaṃ devabrāhmaṇapūjanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महाराज-प्रसादेन = महा-राजा / शासक के अनुग्रह से; गजान्त-ऐश्वर्यम् = गज (हाथी) तक विस्तारित ऐश्वर्य / हाथी-युक्त समृद्धि; आदिशेत् = निर्देश करे / फल कहे; महा-नदी-स्नान-पुण्यम् = महानदी-स्नान से प्राप्त पुण्य; देव-ब्राह्मण-पूजनम् = देवता और ब्राह्मण की पूजा/सेवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवस्था में यह फल बताता है कि महाराज के प्रसाद से हाथी-पर्यन्त ऐश्वर्य का संकेत किया जाए। उसी काल-संदर्भ में महानदी-स्नान का पुण्य और देव-ब्राह्मण-पूजन का भी उल्लेख है। यह फल-कथन दशा/दाय-काल के अनुकूल विन्यास से जोड़ा गया है; यहाँ कोई संख्या-सूत्र नहीं, केवल शास्त्रीय संकेत है।

English rendering The text states that, by a great king’s favour, one should indicate prosperity extending to elephants; it also names the merit of bathing in a great river and the worship of deities and brāhmaṇas as part of the same fruit-statement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ दशा-काल का शुभ परिणाम शास्त्र की भाषा में कहा गया है; गणना-नियम नहीं, अपितु फल-निर्देश है।

60.23
गीतवाद्यप्रसङ्गादिविद्वज्जनविभूषणम् ।
गोमहिष्यादिवृद्धिश्च व्यवसायेऽधिकं फलम्
gītavādyaprasaṅgādividvajjanavibhūṣaṇam |
gomahiṣyādivṛddhiśca vyavasāye'dhikaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गीत-वाद्य-प्रसङ्ग-आदि = गीत, वाद्य और उनसे जुड़े प्रसंग आदि; विद्वज्-जन-विभूषणम् = विद्वानों के बीच अलंकरण / विद्वत्-समाज से शोभा; गो-महिषी-आदि-वृद्धिः = गौ, भैंस आदि पशु-संपत्ति की वृद्धि; व्यवसाय = व्यापार / आजीविका-कर्म; अधिकं फलम् = अधिक फल / अधिक लाभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस काल में गीत-वाद्य आदि प्रसंग और विद्वज्जनों के बीच विभूषण-सा संबंध प्राप्त होता है। गौ-महिषी आदि की वृद्धि तथा व्यवसाय में अधिक फल भी इसी फल-पङ्क्ति में गिनाए गए हैं। यह पूर्व-श्लोक के अनुकूल फल-क्रम का ही विस्तार है।

English rendering The text states association with song and instruments, adornment among the learned, increase of cattle such as cows and buffaloes, and greater fruit in one’s profession or trade.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कला-संग, पशु-वृद्धि और व्यवसाय-फल यहाँ संख्या-नियम नहीं, शास्त्रीय परिणाम-सूची हैं।

60.24
भोजनाम्बरसौख्यं च बन्धुसंयुक्तभोजनम् ।
नीचे वात्सङ्गते वापि षष्ठाष्टमव्ययराशिगे
bhojanāmbarasaukhyaṃ ca bandhusaṃyuktabhojanam |
nīce vātsaṅgate vāpi ṣaṣṭhāṣṭamavyayarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजन-अम्बर-सौख्यम् = भोजन और वस्त्र का सुख; च; बन्धु-संयुक्त-भोजनम् = बन्धुओं के साथ भोजन; नीचे = नीच राशि में (चन्द्र वृश्चिक में नीच); वा; "वात्सङ्गते" → सम्भवतः "वाऽस्तंगते" = अथवा अस्त/अस्तंगत (पाठ-भेद संभव); वा अपि; षष्ठ-अष्टम-व्यय-राशिगे = षष्ठ, अष्टम या द्वादश राशि में स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (शुभ स्थिति में) भोजन-वस्त्र का सुख और बन्धुओं के साथ सहभोज होता है। किन्तु यदि चन्द्र नीच, अस्तंगत, अथवा षष्ठ-अष्टम-व्यय राशि में हो — (तब आगामी श्लोक में कहे अशुभ फल आते हैं)। यह श्लोक शुभ से अशुभ की ओर सन्धि-बिन्दु है। ("वात्सङ्गते" पर पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states comfort of food and clothing and dining with kinsmen; but if the Moon is debilitated, combust, or placed in the 6th, 8th, or 12th sign (the adverse results of the next verse follow).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ–अशुभ सन्धि)। "अस्तंगत" पद सूर्य-निकटता की संगणनात्मक दशा को इंगित करता है (चन्द्र-सूर्य कोणीय अन्तर एक देहली से कम); "षष्ठ-अष्टम-व्यय" दुःस्थान-गणना है। पाठ "वात्सङ्गते" संदिग्ध — अतः पाठ-भेद संभव।

60.25
दायेशात्षष्ठगे वापि रन्ध्रे वा व्ययराशिगे ।
तत्काले धननाशः स्यात्सञ्चरेत महद्भयम्
dāyeśātṣaṣṭhage vāpi randhre vā vyayarāśige |
tatkāle dhananāśaḥ syātsañcareta mahadbhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेशात् = दायेश (दशा-स्वामी / दशा-काल के स्वामी) से; षष्ठ-गे = षष्ठ भाव/राशि में स्थित; रन्ध्रे = रन्ध्र (अष्टम) में; व्यय-राशि-गे = व्यय (द्वादश) राशि में; तत्-काले = उस काल में; धन-नाशः = धन का नाश; स्यात् = होता है (शास्त्र-कथन); सञ्चरेत् = विचरण करे / उत्पन्न हो; महद्-भयम् = महान् भय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि संबंधित ग्रह दायेश से षष्ठ, रन्ध्र (अष्टम) अथवा व्यय-राशि में हो, तो उस काल में धननाश होता है। उसी अवस्था में महद्भय का संचार भी कहा गया है। यह फल-निर्देश है—भय या हानि को निश्चित भविष्य नहीं बनाया गया; केवल शास्त्र का स्थान-फल है।

English rendering The text states that when the relevant planet stands sixth, eighth (randhra), or twelfth (vyaya) from the period-lord (dāyeśa), there is loss of wealth at that time, and great fear moves about—as a textual result, not as a deterministic prediction endorsed beyond the śāstra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान-फल)। “दायेशात् षष्ठ/रन्ध्र/व्यय” = दायेश से 6, 8, 12 भाव-गिनती; गिनती पूर्ण-राशि/भाव-क्रम से होती है, पर श्लोक में कोई अंकीय गुणांक नहीं।

60.26
देहायासो मनस्तापो राजद्वारे विरोधकृत् ।
विदेशगमनं चैव तीर्थयात्रादिकं फलम्
dehāyāso manastāpo rājadvāre virodhakṛt |
videśagamanaṃ caiva tīrthayātrādikaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-आयासः = शरीर का परिश्रम/क्लेश; मनस्-तापः = मानसिक ताप/व्यथा; राज-द्वारे = राज-द्वार / शासन-कार्यालय के समक्ष; विरोध-कृत् = विरोध उत्पन्न करने वाला; विदेश-गमनम् = परदेश-गमन; तीर्थ-यात्रा-आदिकम् = तीर्थ-यात्रा आदि; फलम् = (शास्त्र-कथित) फल।

हिन्दी भावार्थ प्रतिकूल विन्यास के क्रम में शास्त्र देहायास, मनस्ताप और राजद्वार पर विरोध को फल कहता है। विदेश-गमन तथा तीर्थयात्रादि भी इसी फल-सूची में आते हैं। यहाँ यात्रा-फल का दोनों रूप—कष्ट-प्रवास और पुण्य-यात्रा—एक ही पङ्क्ति में रखा गया है; व्याख्या दशा-संदर्भ पर निर्भर है, संख्या-नियम नहीं।

English rendering The text states bodily strain, mental distress, and opposition at the royal gate; it also names going abroad and pilgrimage and the like as fruit of that period-condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। देह-मन-राज-विदेश-तीर्थ यहाँ परिणाम-वर्णन हैं; कोई दशा-वर्ष, अंश या बल-इकाई नहीं।

60.27
दारपुत्रादि पीडा च निजबन्धुवियोगकृत् ।
दायेशात्केन्द्रलाभस्थे त्रिकोणे सहजेऽपि वा
dāraputrādi pīḍā ca nijabandhuviyogakṛt |
dāyeśātkendralābhasthe trikoṇe sahaje'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दार-पुत्र-आदि = स्त्री, सन्तान आदि; पीडा = कष्ट/बाधा; निज-बन्धु-वियोग-कृत् = अपने बन्धुजनों से वियोग कराने वाला; दायेशात् = दशानाथ (यहाँ शुक्र, महादशेश) से गिनकर; केन्द्र = 1/4/7/10 भाव; लाभ-स्थे = 11वें में स्थित; त्रिकोण = 1/5/9 (यहाँ 5,9); सहज = तृतीय (3rd) भाव।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक "कब्ज़े" का है — पहला चरण पूर्व-वर्णित अशुभ चन्द्र-अन्तर्दशा (नीच/शत्रुक्षेत्र या 6-8-12) की पूँछ है: स्त्री-सन्तान को कष्ट और अपने प्रियजनों से वियोग। दूसरे चरण में शास्त्र नया शुभ योग आरम्भ करता है — यदि वही चन्द्र दशानाथ शुक्र से केन्द्र (1/4/7/10), लाभ (11), त्रिकोण (5/9) अथवा सहज (3) में हो, तो (फल अगले श्लोक में)।

English rendering Affliction to wife and children and separation from one's own kin (when the Moon is ill-placed); but if that Moon stands in a kendra, the 11th, a trikoṇa, or the 3rd reckoned from the daśā-lord (Venus), [the auspicious results follow].

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान (भाग) नियम। दायेश की राशि = 1 मानकर राशि-गणना: केन्द्र = {1,4,7,10}, त्रिकोण = {1,5,9}, लाभ = {11}, सहज = {3}। शुक्र से शुभ-भावों का संघ = {1,3,4,5,7,9,10,11}; पूरक {2,6,8,12} ही प्रथम पाद के अशुभ-कथन का आधार है।

उदाहरण (worked example) दायेश शुक्र वृषभ में (राशि 1) हो तो उससे 5वाँ = कन्या, 9वाँ = मकर, 11वाँ = मीन, 3रा = कर्क। चन्द्र इनमें हो → शुभ शाखा; तुला/मेष/धनु/सिंह (शुक्र से 2/6/8/12) में हो → प्रथम-पाद वाली अशुभ शाखा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक "दायेश" (दशानाथ) को स्पष्ट अंकित करता है — विंशोत्तरी 120-वर्षीय चक्र का वही धुरी-बिन्दु जिसे हमारे दशा-इंजन ने कूटबद्ध किया (शुक्र-महादशा = 20 वर्ष, BPHS Ch.46-47)। "दायेश से केन्द्र/त्रिकोण" विशुद्ध राशि-सूचकांक अंकगणित है; हमारा इंजन ऐसी "from-lord" भाव-समुच्चयों को नियतांक-गणना मानता है, व्याख्या नहीं।

60.28
राजप्रीतिकरी चैव देशग्रामाधिपत्यता ।
धैर्यं यशः सुखं कीर्तिर्वाहनाम्बरभूषणम्
rājaprītikarī caiva deśagrāmādhipatyatā |
dhairyaṃ yaśaḥ sukhaṃ kīrtirvāhanāmbarabhūṣaṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-प्रीति-करी = राज-प्रीति उत्पन्न करने वाली (अवस्था); देश-ग्राम-अधिपत्यता = देश या ग्राम पर अधिपत्य/स्वामित्व-सा प्रभाव; धैर्यम् = धैर्य; यशः = यश; सुखम् = सुख; कीर्तिः = कीर्ति; वाहन-अम्बर-भूषणम् = वाहन, वस्त्र और आभूषण।

हिन्दी भावार्थ दायेश से केन्द्र-लाभ-त्रिकोण-सहज की अनुकूल स्थिति पर शास्त्र राजप्रीति और देश-ग्राम-अधिपत्यता का फल कहता है। धैर्य, यश, सुख, कीर्ति तथा वाहन-अम्बर-भूषण भी उसी शुभ-फल-पङ्क्ति में गिनाए गए हैं। यह दशा-फल का अनुकूल समापन-कथन है—निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं, शास्त्र का फल-निर्देश।

English rendering The text states that this favourable placement brings royal favour and authority over country or village, together with courage, renown, happiness, fame, and vehicles, clothing, and ornaments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पूर्व-श्लोक की स्थान-शर्त (दायेशात् केन्द्र/लाभ/त्रिकोण/सहज) पर आश्रित शुभ-फल-सूची; कोई वर्ष-मान, बिन्दु-संख्या या बल-रूप नहीं।

60.29
कूपारामतडागदिनिर्माणं धनसङ्ग्रहः ।
भुक्तयादौ देहसौख्यं स्यादन्ते क्लेशस्तथा भवेत्
kūpārāmataḍāgadinirmāṇaṃ dhanasaṅgrahaḥ |
bhuktayādau dehasaukhyaṃ syādante kleśastathā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कूप = कुआँ; आराम = उद्यान/बगीचा; तडाग = तालाब; आदि-निर्माण = आदि का निर्माण; धन-सङ्ग्रह = धन-संचय; भुक्ति-आदौ = अन्तर्दशा के आरम्भ में; देह-सौख्य = शारीरिक सुख; अन्ते = अन्त में; क्लेश = कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस काल में कुआँ, बगीचा, तालाब आदि का निर्माण एवं धन-संचय होता है। भुक्ति (अन्तर्दशा) के आरम्भ में देह-सुख रहता है और अन्त में क्लेश — अर्थात् एक ही अन्तर्दशा को शास्त्र काल-खण्डों में बाँटकर भिन्न फल देता है।

English rendering The text states there is the making of wells, gardens, and tanks and the gathering of wealth; bodily ease at the sub-period's start, and distress toward its end.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ अन्तर्दशा (भुक्ति) को काल-रेखा पर बाँटा गया है — आरम्भ बनाम अन्त। श्लोक कोई नियत भिन्नांक नहीं देता; भुक्ति की कुल अवधि विंशोत्तरी अनुपात से निकलती है: अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120।

उदाहरण (worked example) शुक्र-महादशा (20 वर्ष) में चन्द्र-अन्तर्दशा = (20 × 10) ÷ 120 = 200⁄120 = 1.6667 वर्ष = 1 वर्ष 8 मास। "आरम्भ" व "अन्त" इसी ~20-मास भुक्ति के प्रथम व अन्तिम खण्ड हैं। (विंशोत्तरी; चन्द्र = 10 वर्ष।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक भुक्ति के भीतर काल-विभाजन माँगता है — वही विंशोत्तरी 120-वर्षीय चक्र जिसे हमारे दशा-इंजन ने कूटबद्ध किया (शुक्र 20, चन्द्र 10 वर्ष)। अन्तर्दशा-अवधि विशुद्ध अनुपात-गणित है (20×10/120 = 1⅔ वर्ष); "आरम्भ/अन्त" का फल उस पर टिकी व्याख्या है, गणना नहीं।

60.30
शुक्रस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे भौमे लाभे वा बलसंयुते
śukrasyāntargate bhaume lagnātkendratrikoṇage |
svocce vā svarkṣage bhaume lābhe vā balasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्गत = शुक्र-महादशा की अन्तर्दशा में; भौमे = मंगल; लग्नात् = लग्न से; केन्द्र = 1, 4, 7, 10 भाव; त्रिकोण = 1, 5, 9; स्वोच्चे = स्व-उच्च राशि में; स्वर्क्षगे = स्व-राशि में; लाभे = एकादश भाव में; बलसंयुते = बल-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की अन्तर्दशा में जब भौम (मंगल) कार्य-कर्ता हो, तब शास्त्र उसकी स्थिति की शर्तें गिनता है। लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में, अथवा स्व-उच्च/स्व-राशि में, अथवा लाभ (11) में, अथवा बल से युक्त—ये स्थितियाँ अगले श्लोक के शुभ-फल-कथन से जुड़ी हैं। यहाँ बल का अर्थ षड्बल आदि संख्यात्मक माप से लिया जा सकता है; श्लोक स्वयं इकाई नहीं बाँधता।

English rendering In Venus’s antardaśā, with Mars as the sub-period planet, the text lists supportive placements: kendra or trikoṇa from the lagna, exaltation or own sign, the eleventh house, or strength-endowed. These conditions frame the favourable result-statements that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-शर्तें (केन्द्र = {1,4,7,10}; त्रिकोण = {1,5,9}; लाभ = 11)। अवधि का मानक विंशोत्तरी अनुपात (BPHS Ch.46–47): अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120। शुक्र = 20, मंगल = 7 ⇒ (20 × 7) ÷ 120 = 140/120 = 7/6 वर्ष = 1 वर्ष 2 मास (सटीक भिन्न 7/6)। लग्न/भाव-निर्णय गृह-पद्धति पर निर्भर—यहाँ पूर्ण भाव (whole-sign) या भचक्र-भाव घोषित करना आवश्यक।

उदाहरण (worked example) मान लें शुक्र-महादशा चालू; मंगल-अन्तर्दशा = 7/6 वर्ष। लग्न मेष, मंगल कन्या (6) में—न केन्द्र, न त्रिकोण, न 11, न स्व/उच्च ⇒ 60.30 की सकारात्मक स्थिति-शर्तें पूरी नहीं। यदि मंगल मकर (उच्च) में हो और लग्न से केन्द्र/त्रिकोण/11 में पड़े, तो शर्त लागू। (अयनांश भाव-संख्या नहीं बदलता जब पूर्ण-राशि भाव लें; डिग्री-आधारित भाव-पद्धति में लग्न-रेखा घोषित करनी होगी।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में शुक्र 20 और मंगल 7 वर्ष—योग 120 के अनुपात से अन्तर्दशा = (20 × 7)/120 = 7/6 वर्ष; यही अनुपात-गणित दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बैठा है। फल-वाक्य अलग परत हैं: गणना अवधि और स्थिति की, फल-कथन शास्त्र का—दोनों को मिलाकर “भाग्य” नहीं बनाया जाता।

60.31
लग्नाधिपेन संयुक्ते कर्मभाग्येशसंयुते ।
तद्भुक्तौ राजयोगादिसम्पदं शोभनां वदेत्
lagnādhipena saṃyukte karmabhāgyeśasaṃyute |
tadbhuktau rājayogādisampadaṃ śobhanāṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नाधिपेन = लग्नेश के साथ; संयुक्ते = युति में; कर्मेश = दशमेश; भाग्येश = नवमेश; संयुते = युक्त; तद्भुक्तौ = उस भुक्ति में; राजयोगादि = राजयोग आदि; सम्पदं = सम्पत्ति/समृद्धि; शोभनां = शुभ/शोभन; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की स्थितियों के साथ, यदि मंगल लग्नेश से युक्त हो, अथवा कर्मेश-भाग्येश से संबद्ध हो, तो शास्त्र उस भुक्ति में राजयोग आदि से जुड़ी शोभन सम्पदा का कथन करने को कहता है। यह योग-फल का निर्देश है—“वदेत्” से स्पष्ट है कि यह पाठक/ज्योतिषी को फल बोलने की विधि बताता है, न कि नियत घटना की गारंटी।

English rendering Further, when Mars is joined with the lagna-lord, or associated with the tenth- and ninth-lords, the text directs one to declare fair prosperity of the rāja-yoga kind and the like in that bhukti—a phala-instruction, not a guarantee of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-फल-कथन (युति/संबन्ध + राजयोग-संदर्भ)। “संयुक्त/संयुते” की जाँच: समान राशि में युति, अथवा स्वीकृत दृष्टि/कारक-संबन्ध—परम्परा-भेद संभव; घोषित संबन्ध-नियम से ही बूलियन शर्त तय होती है।

60.32
वस्त्राभरणभूम्यादेरिष्टसिद्धिः सुखावहा ।
तथाऽष्टमे व्यये वाऽपि दायेशाद्वा तथैव च
vastrābharaṇabhūmyāderiṣṭasiddhiḥ sukhāvahā |
tathā'ṣṭame vyaye vā'pi dāyeśādvā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्र = वस्त्र; आभरण = आभूषण; भूम्यादेः = भूमि आदि; इष्टसिद्धिः = अभीष्ट की सिद्धि; सुखावहा = सुख देने वाली; अष्टमे = अष्टम भाव में; व्यये = व्यय (द्वादश) में; दायेशात् = दायेश (दशा/भुक्ति-स्वामी) से; तथा एव च = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शुभ-स्थिति में शास्त्र वस्त्र, आभूषण, भूमि आदि में अभीष्ट-सिद्धि और सुख-फल कहता है। दूसरी ओर, यदि (मंगल) अष्टम या व्यय में हो, अथवा दायेश से उसी प्रकार की अशुभ स्थिति बने, तो आगे के श्लोकों का क्लेश-वर्णन लागू होता है। पाठ की दो धारा—इष्ट-सिद्धि और अष्टम/व्यय—क्रम में जुड़ी हैं; पाठ-भेद/वाक्य-विभाजन में सावधानी रखें।

English rendering Under the favourable frame, the text states attainment of desired ends in clothing, ornaments, land and the like, bringing ease. It also turns to placement in the eighth or twelfth, or likewise from the period-lord (dāyeśa), which opens the affliction-statements that follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-शर्त (8, 12; दायेश से सापेक्ष भाव)। दायेश = चालू दशा/भुक्ति का स्वामी; सापेक्ष भाव = (ग्रह-राशि − दायेश-राशि) mod 12 + 1 (पूर्ण-राशि पद्धति में)।

उदाहरण (worked example) पूर्ण-राशि: दायेश (शुक्र) वृष में, मंगल तुला में ⇒ सापेक्ष भाव = (7 − 2) mod 12 + 1 = 6, न कि 8/12। मंगल मकर में ⇒ (10 − 2) + 1 = 9। मंगल कुम्भ में ⇒ (11 − 2) + 1 = 10। अष्टम-शर्त: मंगल = दायेश-राशि + 7 (mod 12)।

60.33
शीतज्वरादिपीडा च पितृमातृभयावहा ।
ज्वराद्यधिकरोगाश्च स्थानभ्रंशो मनोरुजा
śītajvarādipīḍā ca pitṛmātṛbhayāvahā |
jvarādyadhikarogāśca sthānabhraṃśo manorujā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीतज्वर = शीत-ज्वर (ठंड-बुखार प्रकार); आदि = इत्यादि; पीडा = पीड़ा; पितृमातृभयावहा = पितृ-मातृ संबंधी भय/चिन्ता; ज्वराद्यधिकरोगाः = ज्वर आदि अधिक रोग; स्थानभ्रंशः = स्थान-च्युति/पद-हानि; मनोरुजा = मानसिक क्लेश।

हिन्दी भावार्थ पूर्वोक्त अशुभ-स्थिति (अष्टम/व्यय आदि) के सन्दर्भ में शास्त्र शीतज्वर आदि पीड़ा, पितृ-मातृ विषयक भय, ज्वर आदि रोगों की अधिकता, स्थानभ्रंश और मनोरुजा का फल-कथन करता है। ये शास्त्रीय संकेत-श्रेणियाँ हैं—चिकित्सा-निदान या भय-व्यापार नहीं; “शास्त्र कहता है” की परत में ही पढ़ें।

English rendering In that unfavourable frame the text states afflictions of the cold-fever type and the like, fear or anxiety concerning parents, increased feverish and similar illnesses, loss of station, and mental distress—as traditional phala-categories, not as medical diagnosis or endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अशुभ फल-कथन। गणना की परत केवल पूर्व श्लोकों की भाव/बल-शर्तों तक सीमित रहती है; इस श्लोक में कोई बाँट, वर्ष या बिन्दु नहीं।

60.34
स्वबन्धुजनहानिश्च कलहो राजविग्रहः ।
राजद्वारजनद्वेषो धनधान्यव्ययोऽधिकः
svabandhujanahāniśca kalaho rājavigrahaḥ |
rājadvārajanadveṣo dhanadhānyavyayo'dhikaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वबन्धुजनहानिः = अपने बन्धु-जन की हानि; कलहः = झगड़ा; राजविग्रहः = राज-संबंधी विरोध/संघर्ष; राजद्वारजनद्वेषः = राज-द्वार के लोगों का द्वेष; धनधान्यव्ययः = धन-धान्य का व्यय; अधिकः = अधिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उसी अशुभ-भुक्ति-सन्दर्भ में बन्धु-हानि, कलह, राजविग्रह, राज-द्वार-जनों का द्वेष तथा धन-धान्य का अधिक व्यय कहता है। सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली पारंपरिक फल-भाषा है; इसे आधुनिक कानूनी/आर्थिक भविष्यवाणी के रूप में न पढ़ा जाए।

English rendering The text further states loss among one’s own kin, quarrel, conflict with authority, hostility from those at the royal gate, and heavy outlay of wealth and grain—classical phala wording, not a modern legal or financial forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामाजिक/आर्थिक संकेत-श्रेणियाँ)। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-भाग या बल-इकाई इस श्लोक में निर्दिष्ट नहीं।

60.35
व्यवसायात्फलं नेष्टं ग्रामभूम्यादिहानिकृत् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहवाधा भविष्यति
vyavasāyātphalaṃ neṣṭaṃ grāmabhūmyādihānikṛt |
dvitīyadyūnanāthe tu dehavādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसायात् = व्यवसाय/उद्यम से; फलं नेष्टं = अनिष्ट फल; ग्रामभूम्यादिहानिकृत् = ग्राम-भूमि आदि की हानि करने वाला; द्वितीय = द्वितीयेश; द्यूननाथ = द्यून (सप्तम) का नाथ; तु = परन्तु/और; देहवाधा = देह में बाधा; भविष्यति = होगी—शास्त्र-कथन की क्रिया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि व्यवसाय से अभीष्ट फल नहीं मिलता और ग्राम-भूमि आदि की हानि का योग बनता है। विशेषकर जब द्वितीयेश और सप्तमेश (द्यूननाथ) का सन्दर्भ जुड़े, तो देह-बाधा का फल-कथन है। “भविष्यति” यहाँ शास्त्र की फल-वाणी है—चिकित्सा-पूर्वानुमान या भय-संकेत के रूप में ग्रहण न करें।

English rendering The text states undesired outcome from vocation and loss touching village, land and the like. When the second- and seventh-lords are involved, it adds bodily obstruction as a stated result—phala language, not a medical prognosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्वामी शर्त (2 और 7)। द्वितीयेश/सप्तमेश = लग्न-राशि से 2 और 7 भावों के स्वामी (पूर्ण-राशि में: लग्न r ⇒ 2 = r+1, 7 = r+6, mod 12); “द्यूननाथ” = सप्तमेश। युति/दृष्टि/दशा-सम्बन्ध की सटीक परिभाषा परम्परा-निर्भर—घोषित नियम से जाँचें।

60.36
शुक्रस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा शुभसंदृष्टे योगकारकसंयुते
śukrasyāntargate rāhau kendralābhatrikoṇage |
svocce vā śubhasaṃdṛṣṭe yogakārakasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य = शुक्र-महादशा का; अन्तर्गते = अन्तर्दशा/भुक्ति में स्थित; राहौ = राहु (काल-खंड का स्वामी); केन्द्र = 1·4·7·10 भाव; लाभ = एकादश भाव; त्रिकोण = 1·5·9; स्वोच्चे = अपने उच्च-स्थान में; शुभसंदृष्टे = शुभ-ग्रह की दृष्टि युक्त; योगकारकसंयुते = योगकारक-ग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ शुक्र-महादशा की राहु-भुक्ति का स्थान-निर्णय करता है। यदि राहु केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में हो, अथवा उच्च में हो, अथवा शुभ-दृष्टि से युक्त हो, अथवा योगकारक-ग्रह के साथ हो, तो आगे के फल-कथन उसी अवस्था से जोड़े जाते हैं। यह फल-आरम्भ का योग-सूत्र है, न कि निरपेक्ष घटना-सूची।

English rendering The text frames Rāhu’s antardaśā within Venus’s mahādaśā when Rāhu occupies a kendra, the eleventh, or a trikoṇa; or is exalted; or is aspected by benefics; or is joined with a yogakāraka. The following phala verses presuppose that placement-condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (संबंधित काल-खंड): अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। शुक्र-महादशा = 20 वर्ष, राहु-अन्तर् = 18 वर्ष → राहु-भुक्ति = (20 × 18) ÷ 120 = 3 वर्ष। स्थान-शर्तें (केन्द्र/लाभ/त्रिकोण/उच्च/शुभ-दृष्टि/योगकारक-संयोग) गणनात्मक वर्ग नहीं — भाव-स्थिती + दृष्टि-नियम हैं; फल उनके साथ पढ़ा जाता है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी: शुक्र-MD 20 y, राहु-AD 18 y → AD = 20 × 18 / 120 = 3.000 y = 3 वर्ष 0 मास (सटीक अनुपात; शेष-नक्षत्र-अंश से आरम्भ-तिथि निर्धारित होती है)। कल्पना: लग्न-मेष, राहु मिथुन (3) — त्रिकोण नहीं; राहु तुला (7) — केन्द्र; राहु कुम्भ (11) — लाभ। उच्च-राहु परंपरा-भेद से (वृष/मिथुन आदि) — यहाँ “उच्च” को शास्त्रीय सूची से लें; पाठ/परंपरा-भेद संभव।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में शुक्र 20, राहु 18 — Σ = 120 के साथ अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात-अंकगणित है। कालावधि `==` से बांधी जाती है; फल-वाक्य अलग परत हैं — गणना अवधि की, फल शास्त्र-कथन की।

60.37
तद्भुक्तौ बहुसौख्यं च धनधान्यादिलाभकृत् ।
इष्टबन्धुसमाकीर्णं भवनं च समादिशेत्
tadbhuktau bahusaukhyaṃ ca dhanadhānyādilābhakṛt |
iṣṭabandhusamākīrṇaṃ bhavanaṃ ca samādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्भुक्तौ = उस (पूर्वोक्त) भुक्ति में; बहुसौख्यं = बहुत सुख; धनधान्यादिलाभकृत् = धन-धान्य आदि का लाभ कराने वाली; इष्टबन्धु = प्रिय/इष्ट बंधु; समाकीर्णं = भरा/घिरा हुआ; भवनं = घर/निवास; समादिशेत् = बताए / निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शुभ-अवस्था में, शास्त्र कहता है कि उस राहु-भुक्ति में बहुत सुख मिलता है और धन-धान्य आदि का लाभ होता है। घर इष्ट बंधुओं से भरा-पूरा रहता है — ऐसा फल निर्देश किया गया है। यह फल-कथन है; इसे निश्चित भाग्य या दबाव-युक्त आश्वासन नहीं पढ़ना।

English rendering Under that bhukti (with the prior placement), the text states abundant ease, gain of wealth and grain, and a household thronged with dear kin. It is a śāstric phala-statement, not a guaranteed outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। काल-खंड वही 3-वर्ष राहु-भुक्ति (शुक्र-MD में); फल का “बहु/लाभ” कोई संख्या-मापदंड नहीं देता।

60.38
यातुः कार्यार्थसिद्धिः स्यात् पशुक्षेत्रादिसम्भवः ।
लग्नाद्युपचये राहौ तद्भुक्तिः सुखदा भवेत्
yātuḥ kāryārthasiddhiḥ syāt paśukṣetrādisambhavaḥ |
lagnādyupacaye rāhau tadbhuktiḥ sukhadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यातुः = यात्री/प्रयाण करने वाले का; कार्यार्थसिद्धिः = कार्य-अर्थ की सिद्धि; पशुक्षेत्रादिसम्भवः = पशु-क्षेत्र आदि की प्राप्ति/उत्पत्ति; लग्नाद्युपचये = लग्न से उपचय (3·6·10·11) में; राहौ = राहु स्थित हो; तद्भुक्तिः = वह भुक्ति; सुखदा = सुख देने वाली; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यात्री के कार्य और प्रयोजन की सिद्धि हो, तथा पशु-क्षेत्र आदि का संभव लाभ हो। यदि राहु लग्न से उपचय भाव में हो, तो वह भुक्ति सुखदायिनी कही गई है। यहाँ दो सूत्र जुड़े हैं: यात्रा-कार्य की सिद्धि का सामान्य फल, और उपचय-स्थिति पर सुख-भुक्ति का विशेष नियम।

English rendering The text states success in the traveler’s purpose and the arising of livestock, land, and the like. When Rāhu stands in an upacaya from the lagna, that bhukti is said to be happiness-giving.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) उपचय-भाव (लग्न से): 3, 6, 10, 11 — पूर्णांक भाव-संख्या; राहु_भाव ∈ {3, 6, 10, 11} ⇒ “तद्भुक्तिः सुखदा” (शास्त्र-नियम)। यात्री-फल गणना नहीं — फल-कथन। भुक्ति-अवधि पूर्ववत्: (20 × 18) ÷ 120 = 3 वर्ष।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (स्पष्ट ध्रुव/अयनांश से D1-राशि)। राहु-राशि = वृश्चिक → लग्न से 3 = उपचय → शास्त्रानुसार भुक्ति “सुखदा”। राहु-राशि = मकर → लग्न से 5 = त्रिकोण/पंचम, उपचय नहीं — यह श्लोक का उपचय-सूत्र लागू नहीं; 60.36 का केन्द्र/त्रिकोण-सूत्र अलग जाँचें।

60.39
शत्रुनाशो महोत्साहो राजप्रीतिकरी शुभा ।
भुक्त्यादौ शरमासांश्च अन्ते ज्वरमजीर्णकृत्
śatrunāśo mahotsāho rājaprītikarī śubhā |
bhuktyādau śaramāsāṃśca ante jvaramajīrṇakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रुनाशो = शत्रु-नाश; महोत्साहो = महान् उत्साह; राजप्रीतिकरी = राज-प्रीति कराने वाली; शुभा = शुभ; भुक्त्यादौ = भुक्ति के आदि में; शरमासांश्च = शर (= 5) मास; अन्ते = अन्त में; ज्वरमजीर्णकृत् = ज्वर और अजीर्ण करने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस भुक्ति को शत्रु-नाश, महान् उत्साह और राज-अनुराग से युक्त शुभ भी कहता है। साथ ही समय-खंड बाँटता है: भुक्ति के आरम्भ में पाँच मास का कष्ट-सूचक फल, और अन्त में ज्वर-अजीर्ण जैसा शारीरिक-अस्वस्थता-संकेत — यह शास्त्र का फल-कथन है, चिकित्सा-निदान या भय-वाणी नहीं। “शर” शब्द-संख्या है: शर = बाण = 5।

English rendering The text calls the period auspicious with destruction of foes, great zeal, and royal favor. It also states that the opening of the bhukti brings five months of hardship, and the close fever and indigestion — as traditional phala, not as medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: शर = 5 → आरम्भ-कष्ट = 5 मास। पूर्ण राहु-भुक्ति (शुक्र-MD) = 3 वर्ष = 36 मास। अतः आदि-खंड ≈ प्रथम 5/36 भाग; अन्त-खंड शास्त्र में मास-संख्या रहित — गुणात्मक “अन्ते”। अनुपात: आदि-कष्ट-अवधि = 5 मास (पद से निश्चित); शेष मध्य-फल पूर्व श्लोकों से।

उदाहरण (worked example) शुक्र-MD में राहु-AD = 3 y। भुक्ति-आरम्भ तिथि T₀ (नक्षत्र-शेष से)। आदि-कष्ट-खिड़की: [T₀, T₀ + 5 मास] — शास्त्र “शरमासान्” कहता है। अन्त: भुक्ति-समाप्ति के निकट “ज्वर-अजीर्ण” फल — अवधि-अंक नहीं, केवल “अन्ते”। अयनांश/गृह-प्रणाली फल-शब्दों पर नहीं, केवल जन्म-लग्न/राहु-स्थिति पर निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में अन्तर्दशा-वर्ष शुद्ध (MD × AD-ग्रह) / 120 हैं; “शर = 5 मास” पद-से सटीक स्थिरांक है — `== 5`, सहन-पट्टी नहीं। फल-वाक्य को अवधि-गणित से अलग रखा जाता है।

60.40
कार्यविघ्नमवाप्नोति सञ्चरे च मनोव्यथा ।
परं सुखं च सौभाग्यं महाराज इवाऽश्नुते
kāryavighnamavāpnoti sañcare ca manovyathā |
paraṃ sukhaṃ ca saubhāgyaṃ mahārāja ivā'śnute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कार्यविघ्नम् = कार्यों में बाधा; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; सञ्चरे = अन्तर्दशा के चलते हुए काल-खण्ड में; मनोव्यथा = मन की पीड़ा; परम् = किन्तु (अन्ततः); सुखम् = सुख; सौभाग्यम् = सौभाग्य; महाराज इव = महाराजा के समान; अश्नुते = भोगता है।

हिन्दी भावार्थ (शुक्र-महादशा में राहु की अन्तर्दशा का शेष फल) — शास्त्र कहता है कि इस उपदशा के मध्य-प्रवाह में कार्यों में विघ्न और मन में व्यथा उठती है, परन्तु उसी अन्तर के अन्त में मनुष्य महाराजा के समान परम सुख और सौभाग्य भोगता है। एक ही उपदशा-चाप के भीतर काल का यह द्वैत-विभाजन है।

English rendering The text states that within this sub-period one meets obstruction in undertakings and inner disquiet, yet by its close enjoys supreme happiness and fortune, like a great king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-महादशा में राहु-अन्तर का फल)। यह "पहले क्लेश, फिर सुख" कोई भविष्य-निश्चय नहीं, बल्कि उसी अन्तर्दशा-अवधि — विंशोत्तरी में शुक्र×राहु = (20×18)/120 = 3 वर्ष — के आदि-मध्य-अन्त काल-खण्डों में फल का शास्त्रीय वितरण मात्र है।

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60.41
नैऋतीं दिशमाश्रित्य प्रयाणं प्रभुदर्शनम् ।
यातुः कार्यार्थसिद्धिः स्यात्स्वदेशे पुनरेष्यति
naiṛtīṃ diśamāśritya prayāṇaṃ prabhudarśanam |
yātuḥ kāryārthasiddhiḥ syātsvadeśe punareṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नैऋतीम् दिशम् = नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम, राहु/निरृति की दिक्); आश्रित्य = उस ओर जाकर; प्रयाणम् = प्रस्थान/यात्रा; प्रभुदर्शनम् = स्वामी/राजा का दर्शन; यातुः = यात्री का; कार्यार्थसिद्धिः = कार्य-प्रयोजन की सिद्धि; स्वदेशे पुनः एष्यति = अपने देश सकुशल लौट आएगा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस अन्तर में यदि यात्रा नैऋत्य दिशा की ओर हो तो स्वामी का दर्शन और प्रयोजन की सिद्धि होती है, और यात्री अपने देश को कुशलपूर्वक लौट आता है।

English rendering The text states that a journey undertaken toward the south-west (Nairṛti) brings audience with one's lord and success of purpose, and the traveller returns safely to his own land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दिक्-निर्देश)। यहाँ "नैऋति" दिशा-निर्धारण दिक्-संयोजना की एक शास्त्रीय संकेत-व्यवस्था है — राहु/निरृति की दिक् नैऋत्य कोण मानी जाती है — न कि कोई अंकीय गणना; इसे संयोग/परम्परा-निर्धारित संकेत के रूप में लें।

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60.42
उपकारो ब्राह्मणानां तीर्थयात्राफलं भवेत् ।
दायेशाद्रन्ध्रभावस्थे व्यये वा पापसंयुते
upakāro brāhmaṇānāṃ tīrthayātrāphalaṃ bhavet |
dāyeśādrandhrabhāvasthe vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपकारो ब्राह्मणानां = ब्राह्मणों का उपकार; तीर्थयात्राफलं = तीर्थ-यात्रा का फल; भवेत् = हो; दायेशत् = दाय (दशा/भुक्ति) के ईश से; रन्ध्रभावस्थे = अष्टम भाव में स्थित; व्यये वा = अथवा व्यय (द्वादश) में; पापसंयुते = पाप-ग्रह से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ब्राह्मणों का उपकार और तीर्थ-यात्रा का फल प्राप्त होता है। तदुपरान्त नई स्थिति खोलता है: यदि दायेश (दशा/भुक्ति का स्वामी) रन्ध्र (8) या व्यय (12) में हो और पाप-युक्त हो, तो आगे का फल उसी शर्त से जुड़ेगा (यह श्लोक शर्त-पद तक है; पूर्ण फल-श्रृंखला पाठ में आगे बढ़ती है)। पाठ-भेद/श्लोक-सीमा संस्करणों में संभव।

English rendering The text states benefit through service to brāhmaṇas and the fruit of pilgrimage. It then opens a new condition: when the lord of the period stands in the eighth or twelfth joined with malefics — a placement-premise for the phala that follows in the recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-शर्त (पूर्णांक): दायेश_भाव ∈ {8, 12} ∧ पाप-संयोग ⇒ उत्तरवर्ती फल-सूत्र लागू। राहु-भुक्ति में दायेश = राहु (भुक्ति-स्वामी) या प्रसंगानुसार महादशा-स्वामी शुक्र — वाक्य “दायेश” काल-स्वामी को इंगित करता है; dual-reading पर पाठ-भेद संभव। संख्यात्मक बलांक/वर्ग-सूत्र नहीं — फल + भाव-स्थिति नियम।

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन। राहु (भुक्ति-स्वामी) मकर में = लग्न से 8 (रन्ध्र) → “रन्ध्रभावस्थे” शर्त लागू; यदि वहाँ पाप-संयोग (शास्त्रीय पाप: रवि/मंगल/शनि आदि, राहु स्वयं परंपरा-भेद) तो यह श्लोक की उत्तर-शर्त सक्रिय। राहु सिंह में = लग्न से 3 — 8/12 नहीं; यह शर्त निष्क्रिय, पूर्व (60.36–41) के फल-सूत्र अलग से देखें।

60.43
अशुभं लभते कर्म पितृमातृजनावधि ।
सर्वत्र जनविद्वेषं नानारूपं द्विजोत्तम
aśubhaṃ labhate karma pitṛmātṛjanāvadhi |
sarvatra janavidveṣaṃ nānārūpaṃ dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अशुभम् = अमङ्गल / अनुपयुक्त; कर्म = कर्म-फल / कार्य-परिणाम; पितृ-मातृ-जन-अवधि = पिता-माता तथा उनके जन-समूह तक; सर्वत्र = हर ओर; जन-विद्वेषम् = लोगों का द्वेष / विरोध; नाना-रूपम् = अनेक रूपों वाला; द्विजोत्तम = उत्तम ब्राह्मण (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस दशा-अवस्था में जीव अशुभ कर्म-फल पाता है, और वह प्रभाव पिता-माता तथा उनके जन-समुदाय तक फैला रहता है। हर ओर लोगों का विरोध उठता है, और वह विरोध एक ही ढंग का नहीं—अनेक रूप धारण करता है। संबोधन “द्विजोत्तम” से यह फल-कथन शिष्य-परंपरा की भाषा में कहा गया है।

English rendering The text states that the native meets inauspicious outcomes in action, extending to parents and their circle, and encounters widespread popular hostility in many forms.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक दशा-फल का वर्णनात्मक नियम है; इसमें वर्ग-भाग, बिन्दु-गणना या काल-अनुपात का कोई संख्यात्मक विधान नहीं है—केवल शास्त्रीय फल-निर्देश।

60.44
द्वितीये सप्तमे वापि देहालस्य विनिर्दिशेत् ।
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत्
dvitīye saptame vāpi dehālasya vinirdiśet |
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये = द्वितीय भाव में; सप्तमे = सप्तम भाव में; वा अपि = अथवा भी; देह-आलस्यम् = शरीर का आलस्य / जड़ता; विनिर्दिशेत् = निश्चित रूप से निर्देश करे; तत्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; मृत्युञ्जय-जपम् = मृत्युञ्जय मंत्र का जप; चरेत् = करे / अनुष्ठान करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि संबंधित ग्रह जब द्वितीय अथवा सप्तम भाव में हो, तो देह में आलस्य का निर्देश दिया जाए। उसी दोष के परिहार के लिए पाठ मृत्युञ्जय-जप का उल्लेख करता है। यहाँ फल-निर्देश और शास्त्र-निर्दिष्ट उपाय दोनों एक साथ आए हैं—दोनों को पाठ का कथन मानें, न कि अनिवार्य उपाय-दबाव।

English rendering The text directs that when the relevant factor stands in the second or seventh house, bodily lethargy is to be indicated; for the removal of that defect it prescribes the practice of Mṛtyuñjaya japa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थित फल + शास्त्र-निर्दिष्ट जप-निर्देश)। द्वितीय/सप्तम यहाँ भाव-स्थान हैं; गणना नहीं, केवल स्थिति-आधारित फल-नियम।

60.45
शुक्रस्यान्तर्गते जीवे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
दायेशाच्छुभराशिस्थे भाग्ये वा पुत्रराशिगे
śukrasyāntargate jīve svocce svakṣetrakendrage |
dāyeśācchubharāśisthe bhāgye vā putrarāśige

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्-गते = शुक्र की अन्तर्दशा में; जीवे = बृहस्पति (दशा-ग्रह); स्व-उच्चे = अपने उच्च राशि में; स्व-क्षेत्र = स्व-राशि; केन्द्र-गे = केन्द्र-स्थित (1, 4, 7, 10); दाय-ईशात् = दशा-स्वामी से; शुभ-राशि-स्थे = शुभ राशि में स्थित; भाग्ये = नवम (भाग्य) राशि में; वा = अथवा; पुत्र-राशि-गे = पञ्चम (पुत्र) राशि में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शुक्र की अन्तर्दशा में गुरु चले, और वह गुरु स्वोच्च, स्वक्षेत्र अथवा केन्द्र में हो, तथा दशा-स्वामी से शुभ राशि में बैठा हो, अथवा भाग्य (9) या पुत्र (5) राशि में स्थित हो—तब आगे के श्लोकों में कहा गया शुभ फल लागू होता है। यह योग-शर्त है: अन्तर्दशा + गुरु की स्थिति + दायेश-सापेक्ष शुभ स्थान।

English rendering When Jupiter runs in the antardaśā of Venus, and Jupiter is exalted, in its own sign, or in a kendra, and stands in an auspicious sign from the daśā-lord—or in the ninth (bhāgya) or fifth (putra) sign—the favourable results that follow are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विंशोत्तरी अनुपात (दशा-ढाँचा; फल नहीं)। शुक्र महादशा = 20 वर्ष; गुरु = 16 वर्ष; अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 = (20 × 16) ÷ 120 = 320 ÷ 120 = 8/3 वर्ष = 2 वर्ष 8 मास। केन्द्र = भाव {1, 4, 7, 10}; भाग्य = 9; पुत्र = 5 — दायेश से गणना (दशा-स्वामी की राशि को 1 मानकर)। अयनांश/लग्न-पद्धति फल की दिशा नहीं बदलती; केवल ग्रह-देशान्तर (longitude) से राशि-स्थिति निर्धारित होती है।

उदाहरण (worked example) मान लें शुक्र महादशा, गुरु अन्तर्दशा; गुरु = 5° कर्क (उच्च), शुक्र (दायेश) = 12° वृष। दायेश-वृष से: कर्क = 3रा (शुभ-त्रिकोण नहीं, केन्द्र नहीं)—किन्तु गुरु स्वोच्च है, अतः “स्वोच्चे” शर्त पूर्ण। अन्तर्-अवधि = 2 य 8 मा। (परंपरा: विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र; चंद्र-नक्षत्र से महादशा-बीज।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में अन्तर्दशा शुद्ध अनुपात-गणित है—(M × A)/120—यही सूत्र गुरु-अन्तर् (शुक्र महा) को 8/3 वर्ष पर पिन करता है। फल-वाक्य शास्त्र-कथन रहेंगे; इंजन केवल काल-खंड और राशि/भाव-स्थिति की `==` जाँच करता है, फल की “सत्यता” नहीं।

60.46
नष्टराज्याद्धनप्राप्तिमिष्टार्थाम्बरसम्पदम् ।
मित्रप्रभोश्च सन्मानं धनधान्यं लभेन्नरः
naṣṭarājyāddhanaprāptimiṣṭārthāmbarasampadam |
mitraprabhośca sanmānaṃ dhanadhānyaṃ labhennaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नष्ट-राज्यात् = नष्ट/छिने राज्य से; धन-प्राप्तिम् = धन की प्राप्ति; इष्ट-अर्थ = अभीष्ट वस्तु/प्रयोजन; अम्बर = वस्त्र; सम्पदम् = संपत्ति/समृद्धि; मित्र-प्रभोः = मित्र और स्वामी/प्रभु से; च = तथा; सन्मानम् = सम्मान; धन-धान्यम् = धन और अन्न; लभेत् = प्राप्त करे; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्तें जब पूर्ण हों, तब शास्त्र कहता है—व्यक्ति नष्ट-से-दिखते राज्य/पद से भी धन पाता है; अभीष्ट अर्थ, वस्त्र और समृद्धि मिलती है। मित्रों तथा प्रभु-वर्ग से सम्मान मिलता है, और धन-धान्य की प्राप्ति कही गई है। यह सब पाठ का फल-निर्देश है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering Under those conditions the text states recovery of wealth even from a lost kingdom or office, attainment of desired objects, clothing and prosperity, honour from friends and lords, and gain of wealth and grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। 60.45 की स्थिति-शर्तों पर आश्रित शुभ-फल सूची; कोई बलांक, बिन्दु या अंश-सूत्र नहीं।

60.47
राजसम्मानकीर्तिं च अश्वान्दोलादिलाभकृत् ।
विद्वत्प्रभुसमाकीर्णं शास्त्रापरिश्रमम्
rājasammānakīrtiṃ ca aśvāndolādilābhakṛt |
vidvatprabhusamākīrṇaṃ śāstrāpariśramam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-सम्मान = राजकीय सम्मान; कीर्तिम् = यश/ख्याति; च = तथा; अश्वान् = अश्वों को; दोल-आदि = डोला/पालकी आदि; लाभ-कृत् = लाभ कराने वाला; विद्वत्-प्रभु-समाकीर्णम् = विद्वानों और प्रभुओं से समाकीर्ण (घिरा/मिला-जुला); शास्त्र-अपरिश्रमम् = शास्त्र-अध्ययन/शास्त्र-श्रम (पाठ: शास्त्रापरिश्रमम् — शास्त्र में अपरिश्रम/श्रम दोनों पढ़े जा सकते हैं; पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है—राज-सम्मान और कीर्ति मिलती है; अश्व, डोला आदि वाहन-लाभ का निर्देश है। व्यक्ति विद्वानों और प्रभु-जनों के संग में रहता है। “शास्त्रापरिश्रमम्” पद में पाठ-भेद संभव: कहीं शास्त्र-श्रम (अध्ययन-परिश्रम) का फल, कहीं शास्त्र में अपरिश्रम (सहज सिद्धि) का संकेत—दोनों को संदिग्ध न ठहराएँ, केवल पाठ-विकल्प नोट करें।

English rendering The text further states royal honour and fame, gain of horses, palanquins and the like, association with the learned and the powerful, and (by the contested reading) either effort in the śāstras or ease therein—पाठ-भेद संभव.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। वाहन-लाभ और सम्मान यहाँ संख्यात्मक इकाई नहीं; दशा-फल की गुणात्मक सूची है।

60.48
पुत्रोत्सवादिसन्तोषमिष्टबन्धुसमागमम् ।
पितृमातृसुखप्राप्तिं पुत्रादिसौख्यमादिशेत्
putrotsavādisantoṣamiṣṭabandhusamāgamam |
pitṛmātṛsukhaprāptiṃ putrādisaukhyamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-उत्सव-आदि-सन्तोषम् = पुत्र-उत्सव आदि से आनंद; इष्ट-बन्धु-समागमम् = प्रिय बंधुओं का मिलन; पितृ-मातृ-सुख-प्राप्तिम् = माता-पिता के सुख की प्राप्ति; पुत्र-आदि-सौख्यम् = पुत्र आदि से सौख्य; आदिशेत् = निर्देश करे / कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है—पुत्र-उत्सव आदि से संतोष, अभीष्ट बंधु-समागम, माता-पिता का सुख, और पुत्रादि से सौख्य—ये सब इस योग-अवस्था के फल माने जाएँ। भाषा स्नेहपूर्ण पारिवारिक फल की है; इसे चिकित्सा, कानून या वित्त की भविष्यवाणी न बनाएँ। पाठ “आदिशेत्” से ज्योतिषी को फल-कथन का अधिकार देता है, नियति का प्रमाणपत्र नहीं।

English rendering The text directs indication of joy from celebrations of offspring, reunion with dear kin, happiness of parents, and well-being through children and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पारिवारिक/सामाजिक शुभ-फल की सूची; कोई दशा-अनुपात या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं—वे 60.45 के शर्त-खंड में रह चुके।

60.49
दायेशात्षष्ठराशिस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
राजचौरादिपीडा च देहपीडा भविष्यति
dāyeśātṣaṣṭharāśisthe vyaye vā pāpasaṃyute |
rājacaurādipīḍā ca dehapīḍā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दाय-ईशात् = दशा-स्वामी से; षष्ठ-राशि-स्थे = षष्ठ राशि में स्थित; व्यये = व्यय (द्वादश) में; वा = अथवा; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त; राज-चोर-आदि-पीडा = राजा, चोर आदि से पीड़ा; च = तथा; देह-पीडा = शरीर की पीड़ा; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन की काल-भाषा)।

हिन्दी भावार्थ जब (संबंधित) ग्रह दायेश से छठी राशि में हो, अथवा व्यय (12) में हो, अथवा पाप-ग्रह से युक्त हो, तब शास्त्र कहता है—राज-चोरादि से पीड़ा और देह-पीड़ा होती है। यह 60.45–48 के शुभ-फल का विपरीत पक्ष है: वही दशा-ढाँचा, भिन्न स्थिति-शर्त। “भविष्यति” यहाँ पाठ की फल-भाषा है—निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं; भय या उपाय-दबाव न जोड़ें।

English rendering The text states that when the factor stands in the sixth or twelfth from the daśā-lord, or is conjoined with malefics, there is affliction from authorities, thieves and the like, and bodily distress.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थिति-नियम (भाव-गिनती; फल अलग)। दायेश-राशि = 1; षष्ठ = +5 राशि (मॉड 12); व्यय/द्वादश = +11 राशि (मॉड 12)। पाप-संयोग = सूर्य/मंगल/शनि/राहु/केतु आदि से युति (परंपरा-निर्भर सूची; पाठ यहाँ “पाप” सामान्य कहता है)। अन्तर्-अवधि वही विंशोत्तरी अनुपात—(M × A)/120—केवल फल की दिशा स्थिति से बदलती है।

उदाहरण (worked example) दायेश शुक्र = 12° वृष (राशि 2)। षष्ठ-राशि = वृष से 6 = तुला; व्यय = वृष से 12 = मेष। यदि गुरु = 8° तुला (दायेश से षष्ठ) या पाप-युक्त = शर्त पूर्ण → पाठ के अनुसार राज/चोर/देह-पीड़ा का फल-निर्देश। अन्तर्-खंड = 2 य 8 मा (शुक्र-गुरु) अपरिवर्तित।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-इंजन अन्तर्-काल को (20 × 16)/120 = 8/3 वर्ष पर `==` से बाँधता है; भाव-दूरी मॉड-12 अंकगणित है—षष्ठ/व्यय की जाँच deterministic। फल-वाक्य (राज-चोरादि, देह-पीड़ा) कभी इंजन-आउटपुट नहीं बनते; वे केवल शास्त्र-कथन के रूप में मुद्रित रहते हैं।

60.50
आत्मरुग्बन्धुकष्टं स्यात्कलहेन मनोव्यथा ।
स्थानच्युतिं प्रवासं च नानारोगं समाप्नुयात्
ātmarugbandhukaṣṭaṃ syātkalahena manovyathā |
sthānacyutiṃ pravāsaṃ ca nānārogaṃ samāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्म-रुग् = स्वयं की रोग-पीड़ा; बन्धु-कष्ट = बन्धु-जनों का कष्ट; कलहेन = विवाद/कलह से; मनोव्यथा = मानसिक पीड़ा; स्थान-च्युति = पद/स्थान से च्युत होना; प्रवास = परदेश-गमन; नाना-रोग = अनेक प्रकार के रोग; समाप्नुयात् = प्राप्त करे (शास्त्र-कथन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस अवस्था में आत्म-रोग, बन्धु-कष्ट और कलह से उत्पन्न मनोव्यथा का अनुभव हो सकता है। स्थान से च्युति, प्रवास तथा नाना प्रकार की रोग-बाधाएँ भी इसी फल-कथन में गिनाई गई हैं। यह फल-वर्णन है — नियति या निश्चित विपत्ति का दावा नहीं।

English rendering The text states that one may meet self-affliction, distress to kin, and mental anguish born of quarrel; also displacement from position, sojourn abroad, and manifold illnesses. These are phala-claims of the śāstra, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दशा/भुक्ति-फल-वर्णन)। यहाँ कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-गणना या काल-अनुपात नहीं; केवल शास्त्र का परिणाम-वर्णन है।

60.51
द्वितीयसप्तमाधीशे देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं महामृत्युञ्जयं चरेत्
dvitīyasaptamādhīśe dehabādhā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ mahāmṛtyuñjayaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-सप्तम-अधीशे = द्वितीय और सप्तम भाव के अधीश्वरों (के दोष/योग) में; देह-बाधा = शरीर-सम्बन्धी बाधा; भविष्यति = होगी (शास्त्र-कथन); तद्-दोष = उस दोष का; परिहार-अर्थं = निवारण के हेतु; महामृत्युञ्जयम् = महामृत्युञ्जय (जप/अनुष्ठान); चरेत् = करे (शास्त्र-निर्देश)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्वितीय और सप्तम के अधीशों से जुड़ी अवस्था में देह-बाधा का फल सूचित होता है। उसी दोष के परिहारार्थ पाठ महामृत्युञ्जय का आचरण बताता है। यह शास्त्र का पारंपरिक परिहार-कथन है — दबाव या चिकित्सा-उपदेश नहीं; हम इसे उपचार या गारंटी के रूप में नहीं पढ़ते।

English rendering The text states that when the lords of the second and seventh are implicated (in the period-context), bodily obstruction is indicated; for the removal of that fault it prescribes the performance of Mahāmṛtyuñjaya. Report the rule; do not treat it as medical counsel or coerced remedy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शास्त्रीय परिहार-निर्देश। भाव-स्वामित्व (2, 7) दशा-फल की शर्त-रेखा है; यहाँ कोई अंश/वर्ष-सूत्र नहीं दिया गया।

60.52
शुक्रस्यान्तर्गते मन्दे स्वोच्चे तु परमोच्चगे ।
स्वर्क्षकेन्द्रत्रिकोणस्थे तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा
śukrasyāntargate mande svocce tu paramoccage |
svarkṣakendratrikoṇasthe tuṅgāṃśe svāṃśage'pi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्-गते = शुक्र की अन्तर्दशा में; मन्दे = शनि (मन्द) में / मन्द की स्थिति पर; स्व-उच्चे = स्व-उच्च राशि में; परमोच्च-गे = परमोच्च (उच्चांश-बिन्दु) पर स्थित; स्व-र्क्ष = स्व-राशि; केन्द्र = 1, 4, 7, 10; त्रिकोण = 1, 5, 9; तुङ्ग-अंशे = उच्च-नवमांश/उच्चांश में; स्व-अंश-गे = स्व-अंश (स्व-नवमांश आदि) में भी; वा = अथवा

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शुक्र की अन्तर्दशा में मन्द (शनि) की शुभ-स्थिति की शर्तें बाँधता है। शास्त्र कहता है — जब शनि स्व-उच्च या परमोच्च पर हो, अथवा स्वराशि/केन्द्र/त्रिकोण में हो, अथवा तुङ्गांश या स्वांश में भी स्थित हो — तब अगले फल-श्लोक लागू होते हैं। स्थिति-शर्तें स्पष्ट हैं; फल आगे 60.53–54 में आता है।

English rendering Within Venus’s antardaśā, when Saturn stands exalted (or at extreme exaltation), or in own sign / angular / trinal houses, or in exaltation-aṃśa or own aṃśa, the favourable period-results of the following verses are conditioned. This is a positional gate on the bhukti, not a free prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1) अन्तर्दशा-अवधि (विंशोत्तरी, Σ = 120 वर्ष):
अन्तर-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120
शनि-महादशा = 19 वर्ष; शुक्र = 20 वर्ष → शुक्र-अन्तर्दशा = (19 × 20) ÷ 120 = 380 ÷ 120 = 19/6 वर्ष ≈ 3 वर्ष 2 मास (परंपरागत विंशोत्तरी-अनुपात; BPHS Ch.46–47 डोसियर)।
2) उच्च / परमोच्च (परंपरागत स्थिरांक — पाठ में अंश-संख्या नहीं): शनि का उच्च = तुला; शास्त्रीय उच्च-बिन्दु प्रायः 20° तुला (परमोच्च); नीच = मेष 20°।
3) केन्द्र / त्रिकोण: लग्न से भाव-सूचकांक ∈ {1,4,7,10} / {1,5,9} (पूर्ण-भाव या समान-भवन — घोषित करें)।
4) अंश: “तुङ्गांश / स्वांश” = वर्ग-मानचित्र (प्रायः D9 नवमांश) में उच्च/स्व-राशि-अंश — 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवमांश (षोडश-वर्ग नियम, Ch.6)।

उदाहरण (worked example)
शनि-महादशा, शुक्र-अन्तर्दशा = 19/6 y। मान लें लग्न = कन्या; शनि = तुला 20°00′ (परमोच्च), केन्द्र (2nd = तुला → यहाँ 2nd, केन्द्र नहीं; लग्न-कन्या से तुला = 2nd)।
यदि लग्न = मकर, शनि तुला 20° → 10th (केन्द्र) + उच्च — शर्त “उच्च + केन्द्र” दोनों पूरी।
नवमांश (सम-विषम नियम D9): तुला विषम? तुला = 7वीं राशि (विषम); विषम राशि में नवमांश स्व-राशि से आरंभ — 20° ÷ 3°20′ = 6 पूर्ण अंश → 7वाँ नवमांश; मानचित्र-निष्कर्ष राशि-क्रम से निकालें (ayanāṃśa: घोषित करें, उदा. लाहिरी — केवल देशांतर-रूपांतर के लिए)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर = (MD × AD)/120 का अनुपात-अंकगणित वेदिक-घड़ी/काल दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बैठा है — Ketu 7 … Mercury 17, Σ = 120। यह श्लोक उसी काल-खंड पर फल-द्वार खोलता है; गणना काल की है, फल शास्त्र-वाणी का।

60.53
तद्भुक्तौ बहुसौख्यं स्यादिष्टबन्धुसमागमः ।
राजद्वारे च सम्मानं पुत्रिकाजन्मसम्भवः
tadbhuktau bahusaukhyaṃ syādiṣṭabandhusamāgamaḥ |
rājadvāre ca sammānaṃ putrikājanmasambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्भुक्तौ = उस अन्तर्दशा (भुक्ति) में; बहुसौख्यम् = अत्यधिक सुख; स्यात् = होवे (विधिलिङ्); इष्ट-बन्धु-समागमः = प्रिय स्वजनों का मिलन; राजद्वारे = राजदरबार में; सम्मानम् = आदर-प्रतिष्ठा; पुत्रिका-जन्म-सम्भवः = कन्या-सन्तान के जन्म का योग। (यह पद पूर्व-श्लोक 52 के शुक्र-मन्द=शनि की उत्तम स्थिति — स्वोच्च/परमोच्च/केन्द्र-त्रिकोण — के शुभ फल का विस्तार है।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र-महादशा में शनि की उस अन्तर्दशा में, जब शनि बलवान् और शुभ-स्थित हो, जातक को बहुत सुख, प्रिय बन्धुओं का मिलन, राजद्वार (शासन-सत्ता) में सम्मान और कन्या-सन्तान का जन्म-योग प्राप्त होता है। यह शनि की शुभ भुक्ति का "इष्ट-फल" कथन है।

English rendering In that (Śukra–Śani) sub-period the text states one obtains much comfort, reunion with dear kin, honour at the royal court, and the prospect of a daughter's birth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह फल-कथन है, पर इसे शासित करने वाली तकनीक विंशोत्तरी अन्तर्दशा-मान है। नियम: अन्तर्दशा-अवधि = महादशा-वर्ष × (अन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120)। शुक्र महादशा = 20 वर्ष, शनि का अंश = 19 वर्ष ⇒ शुक्र-शनि भुक्ति = 20 × 19 ÷ 120 = 380 ÷ 120 = 19/6 वर्ष।

उदाहरण (worked example) 19/6 वर्ष = 3.1666… वर्ष = 3 वर्ष 2 मास (0.1666… × 12 = 2.0 मास, ठीक-ठीक)। अर्थात् शुक्र की 20-वर्षीय दशा के भीतर यह "बहुसौख्य" वाली शनि-भुक्ति ठीक 3 वर्ष 2 मास चलती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अनुपात-गणित हमारे विंशोत्तरी इंजन का आधार है (दस्तावेज़ §3): 120-वर्षीय चक्र में शनि = 19 वर्ष, और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 — बीती नक्षत्र-अंश पर शुद्ध अनुपात-अंकगणित। "इष्ट-फल" शास्त्र का कथन है; अवधि (3 वर्ष 2 मास) परिकलन है — दोनों को हम अलग रखते हैं।

60.54
पुण्यतीर्थफलवाप्तिर्दानधर्मादिपुण्यकृत् ।
स्वप्रभोश्च पदावाप्तिः नीचस्थे क्लेशभाग्यभवेत्
puṇyatīrthaphalavāptirdānadharmādipuṇyakṛt |
svaprabhośca padāvāptiḥ nīcasthe kleśabhāgyabhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुण्य-तीर्थ-फल-अवाप्तिः = पुण्य-तीर्थों का फल-लाभ; दान-धर्म-आदि-पुण्य-कृत् = दान-धर्म आदि पुण्य करने वाला; स्व-प्रभोः = अपने स्वामी/अधिपति का; पद-अवाप्तिः = पद-प्राप्ति; नीच-स्थे = (शनि) नीच राशि में स्थित होने पर; क्लेश = कष्ट; भाग्य-भवेत् = भाग्य-ह्रास/भाग्य-पीड़ा (पाठ: क्लेशभाग्यभवेत् — क्लेश एवं भाग्य-बाधा)

हिन्दी भावार्थ अनुकूल पक्ष में शास्त्र पुण्य-तीर्थ-फल, दान-धर्मादि पुण्य-कर्म और स्व-प्रभु-पद की प्राप्ति कहता है। किन्तु यदि (मन्द) नीचस्थ हो तो क्लेश और भाग्य-बाधा — यही शास्त्र का विपर्यय-फल है। नीच = गणनात्मक स्थिति; फल = शास्त्र-वाणी, न कि हमारा निश्चय-वाद।

English rendering The text grants merit of sacred fords, acts of gift and dharma, and attainment of one’s lord’s rank; yet if (Saturn) be debilitated, distress and impairment of fortune are stated. Debility is a sky-position; the phala remains the śāstra’s claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

नीच-परीक्षा (शनि): नीच-राशि = मेष; शास्त्रीय नीच-बिन्दु ≈ 20° मेष (उच्च का विलोम)।
स्थिति-परीक्षण: λ_Saturn mod 30° in Aries near 20° → “नीचस्थ”; पूर्ण नीच-भंग/नीच-भंग योग इस श्लोक में नहीं दिए।
फल-द्विधा: (उच्च/केन्द्र/त्रिकोण/अंश — 60.52) → शुभ-सूची; नीच → क्लेश-भाग्य-बाधा। कोई नया दशा-अनुपात नहीं।

उदाहरण (worked example)
शनि = मेष 18°40′ → नीच-राशि में, परमोच्च-बिन्दु (20°) से 1°20′ दूर — शास्त्र की भाषा में “नीचस्थ” पक्ष लागू; 60.52 का शुभ-द्वार बंद, 60.54 का उत्तरार्ध (“नीचस्थे क्लेश…”) शास्त्र-कथन के रूप में पढ़ें। (ayanāṃśa घोषित करें; उदाहरण sayana/nirayana में स्पष्ट λ चाहिए।)

60.55
देहालस्यमवाप्नोति तथाऽयादधिकव्ययम् ।
तथाष्टमे व्यये मन्दे दायेशाद्वा तथैव च
dehālasyamavāpnoti tathā'yādadhikavyayam |
tathāṣṭame vyaye mande dāyeśādvā tathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देह-आलस्यम् = शरीर-आलस्य; अवाप्नोति = प्राप्त करता है (शास्त्र); तथा = तथा; आयात् अधिक-व्ययम् = आय से अधिक व्यय; अष्टमे = अष्टम भाव में; व्यये = व्यय (द्वादश) भाव में; मन्दे = शनि स्थित होने पर; दाय-ईशात् = दाय (दशा)-ईश से / दशा-स्वामी की दृष्टि से; वा = अथवा; तथैव = उसी प्रकार

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — देहालस्य और आय से अधिक व्यय का अनुभव। यही फल तब भी कहा गया है जब मन्द अष्टम या व्यय भाव में हो, अथवा दायेश (दशा-स्वामी) की दृष्टि से वैसी ही स्थिति बने। यह व्यय-आलस्य फल-सूत्र है; आर्थिक “भविष्यवाणी” नहीं — केवल पाठ का कथन।

English rendering The text states bodily lassitude and outlay exceeding income; likewise when Saturn occupies the eighth or twelfth, or under the same configuration reckoned from the period-lord (dāyeśa). Report the house-condition; do not bank it as finance advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

भाव-स्थिति (पूर्ण-भाव या समान-भवन — घोषित करें):
शनि-भाव-सूचकांक h ∈ {8, 12} (लग्न से), अथवा दायेश-राशि से गिनकर h′ ∈ {8, 12}।
भाव-सूत्र (समान-भवन, 30°): h = ⌊(λ_Saturn − λ_Lagna) mod 360°⌋ ÷ 30 + 1।
कोई बिन्दु-संख्या या वर्ष-गुणक इस श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example)
लग्न λ = 120° (सिंह 0°); शनि λ = 300° (कुम्भ 0°) → (300−120)=180° → भाव 7 — अष्टम/व्यय नहीं।
शनि λ = 330° (मीन 0°) → 210° → भाव 8 → 60.55 का “अष्टमे मन्दे” पक्ष।
दायेश = शुक्र (इस भुक्ति का अन्तर-स्वामी); शुक्र-राशि से शनि के 8/12 की जाँच — द्वितीय मार्ग शास्त्र कहता है।

60.56
भुक्त्यादौ विविधा पीडा पितृमातृजनावधि ।
दारपुत्रादिपीडा च परदेशादिविभ्रमः
bhuktyādau vividhā pīḍā pitṛmātṛjanāvadhi |
dāraputrādipīḍā ca paradeśādivibhramaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-आदौ = भुक्ति के आरंभ में; विविधा पीडा = नाना प्रकार की पीड़ा; पितृ-मातृ-जन-अवधि = पिता-माता-जनों तक (सम्बन्धी पीड़ा); दार-पुत्र-आदि-पीडा = पत्नी/पुत्र आदि की पीड़ा; पर-देश-आदि-विभ्रमः = परदेश आदि से उत्पन्न विभ्रम/भ्रमण-व्याकुलता

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भुक्ति के आदि-काल में विविधा पीड़ा — पितृ-मातृ-जनों तक — तथा दार-पुत्रादि-पीड़ा और परदेशादि-विभ्रम हो सकते हैं। यह काल-खंड का आरंभ-फल है, पूरे अन्तर्दशा-काल का एकमात्र सार नहीं। भय-भाषा से पढ़ना वर्जित; “शास्त्र कहता है” से आगे नहीं।

English rendering The text states that at the opening of the bhukti there may be manifold distress extending to parents, affliction touching spouse and children, and disquiet of foreign travel and the like. An onset-note of the period, not a lifelong sentence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्त्यादि-काल का आरंभ-फल)।
यदि काल-विभाजन जोड़ना हो (पाठ में खंड नहीं): शुक्र-अन्तर्दशा 19/6 वर्ष का “आदि” = प्रथम अंश — परंपरा में कभी प्रथम 1/3 आदि; BPHS इस श्लोक में अनुपात नहीं देता — अनुमान न थोपें; केवल “भुक्त्यादौ” शब्द पकड़ें।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-फल अध्याय (46–65) में काल शुद्ध अनुपात से काटा जाता है; फल-वाक्य अलग परत है। इंजन अन्तर्दशा-वर्ष `==` अनुपात से निकालता है; “पीड़ा/सम्मान” जैसी पंक्तियाँ व्याख्या-स्तंभ में “text states” रहती हैं — गणित और फल का विभाजन ही डिकोड-अनुशासन है।

60.57
व्यवसायात्फलं नष्टं गोमहिष्यादिहानिकृत् ।
द्वितीयसप्तमाधीशे देहबाधा भविष्यति
vyavasāyātphalaṃ naṣṭaṃ gomahiṣyādihānikṛt |
dvitīyasaptamādhīśe dehabādhā bhaviṣyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यवसाय = उद्यम/व्यापार; फलं नष्टम् = फल नष्ट; गो-महिष्यादि = गौ-भैंस आदि; हानिकृत् = हानि करने वाला; द्वितीय-सप्तम-अधीशे = द्वितीय व सप्तम भाव के अधिपति में/के (काले में); देह-बाधा = देह-संबंधी बाधा; भविष्यति = होगी — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि द्वितीय और सप्तम के अधिपति के (संदर्भित) काल में व्यवसायात् फल नष्ट होता है तथा गौ-महिष्यादि की हानि का संकेत मिलता है। उसी विन्यास में देहबाधा का भी फल कहा गया है। यह फल-कथन है — ज्योतिषीय विन्यास से जुड़े परिणाम का शास्त्रीय वर्णन, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

English rendering The text states that under the (relevant) period of the lords of the second and seventh houses, the fruit of enterprise is destroyed and there is loss among cattle such as cows and buffaloes; bodily affliction is also said to occur. This is a phala statement of the śāstra, not a deterministic claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अन्तर्दशा/अधीश-संदर्भ में)। द्वितीय (धन/कुटुम्ब) और सप्तम (साझेदारी/विवाह-क्षेत्र) के अधिपति का काल-संदर्भ यहाँ फल-निर्देश का आधार है; संख्यात्मक गणना इस श्लोक में नहीं है।

60.58
तद्दोषपरिहारार्थं तिलहोमं च कारयेत् ।
मृत्युञ्जयजपं कुर्याच्चण्डीपाठमाथपि वा
taddoṣaparihārārthaṃ tilahomaṃ ca kārayet |
mṛtyuñjayajapaṃ kuryāccaṇḍīpāṭhamāthapi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; तिल-होमम् = तिलों का हवन; कारयेत् = करावे; मृत्युञ्जय-जपम् = महामृत्युञ्जय-मन्त्र-जप; कुर्यात् = करे; चण्डी-पाठम् = दुर्गासप्तशती (चण्डी) का पाठ; अथ अपि वा = अथवा (पाठ-भेद संभव: "माथपि" → "वाथापि/चैव")।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस (शनि-भुक्ति के) दोष के परिहार के लिए तिल-होम करावे, महामृत्युञ्जय-जप करे, अथवा चण्डी-पाठ। यह शास्त्रोक्त शान्ति-विधान है — इसे विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किसी दबाव या भय के रूप में नहीं।

English rendering The text prescribes, to remove that flaw, that one have a sesame oblation performed, recite the Mṛtyuñjaya mantra, or read the Caṇḍī-pāṭha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधान (उपाय-कथन)। यह श्लोक अनुष्ठान-निर्देश है; कोई संख्या, वर्ग या बल-इकाई नहीं। शास्त्र इसे उपाय-रूप में रखता है — हम इसे विकल्प के रूप में उद्धृत करते हैं, न कि अनिवार्य दबाव के रूप में।

60.59
स्वयं वा ब्राह्मणद्वारा यथाशक्ति यथाविधि ।
ततः शान्तिमवाप्नोति शिवाशम्भुप्रसादतः
svayaṃ vā brāhmaṇadvārā yathāśakti yathāvidhi |
tataḥ śāntimavāpnoti śivāśambhuprasādataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वयं = स्वयं; वा = अथवा; ब्राह्मण-द्वारा = ब्राह्मण के माध्यम से; यथा-शक्ति = शक्ति के अनुसार; यथा-विधि = विधि के अनुसार; ततः = तब; शान्तिम् = शान्ति; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; शिव-अशम्भु-प्रसादतः = शिव-शम्भु के प्रसाद से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वह कर्म स्वयं अथवा ब्राह्मणद्वारा, यथाशक्ति और यथाविधि किया जाए। तब शिव-शम्भु के प्रसाद से शान्ति प्राप्त होती है — यह शास्त्र का आश्वासन-रूप फल-कथन है। क्षमता और विधि दोनों पर बल है; कोई संख्यात्मक नियम नहीं।

English rendering The text states that the rite may be done by oneself or through a brāhmaṇa, according to one’s capacity and according to rule; then peace is obtained by the grace of Śiva-Śambhu. Capacity and correct procedure are the stated conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-फल / विधि-निर्देश। “यथाशक्ति यथाविधि” गुणात्मक सीमा है, न कि मापनीय स्थिरांक।

60.60
शुक्रस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रे लाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्षगे वापि राजप्रीतिकरं शुभम्
śukrasyāntargate saumye kendre lābhatrikoṇage |
svocce vā svarkṣage vāpi rājaprītikaraṃ śubham
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्गते सौम्ये = शुक्र की महादशा में बुध की अन्तर्दशा में; केन्द्रे = केन्द्र में; लाभत्रिकोणगे = एकादश या त्रिकोण में; स्वोच्चे वा = अथवा स्वोच्च में; स्वर्क्षगे वापि = अथवा स्वराशि में; राजप्रीतिकरं शुभम् = राज-प्रसन्नता देने वाला शुभ (फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध केन्द्र, लाभ या त्रिकोण में, स्वोच्च या स्वराशि में हो, तो राज-प्रीति देने वाला शुभ फल कहा गया है। शुक्र-अन्तर्दशा-फल अध्याय का यह बुध-पद है।

English rendering In Mercury's sub-period within Venus's major period, with Mercury in a kendra, the eleventh or a trikoṇa, exalted or in its own sign, the text promises the favour of the king and good fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर्दशा-अवधि = (शुक्र 20 × बुध 17) ÷ 120 = 340 ÷ 120 = 2.8333 वर्ष = 2 वर्ष 10 मास (360-दिवसीय दशा-वर्ष: 1020 दिन)। शर्त: Me ∈ {1, 4, 7, 10, 11, 5, 9} ∧ (Me उच्च ∨ Me स्वराशि)।

60.61
सौभाग्यं पुत्रलाभश्च सन्मार्गेण धनागमः ।
पुराणधर्मश्रवणं शृङ्गारिजनसंगमः
saubhāgyaṃ putralābhaśca sanmārgeṇa dhanāgamaḥ |
purāṇadharmaśravaṇaṃ śṛṅgārijanasaṃgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौभाग्यम् = सौभाग्य; पुत्र-लाभः = पुत्र की प्राप्ति; सन्मार्गेण = धर्मपूर्वक/उचित साधनों से; धन-आगमः = धन का आगमन; पुराण-धर्म-श्रवणम् = पुराण एवं धर्म-कथा का श्रवण; शृङ्गारि-जन-संगमः = रसिक/कलाप्रिय जनों का संग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (शुक्र-बुध की इस भुक्ति में) जातक को सौभाग्य, पुत्र-प्राप्ति, धर्मयुक्त उपायों से धन-लाभ, पुराण-धर्म-श्रवण तथा रसिक/सुसंस्कृत जनों का संग प्राप्त होता है। यह बुध-भुक्ति का शुभ आरम्भ-फल है।

English rendering The text states one gains good fortune, a son, wealth by righteous means, the hearing of purāṇa and dharma, and the company of refined, art-loving people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह फल-कथन है; इसे शासित करने वाली तकनीक पुनः विंशोत्तरी अन्तर्दशा-मान है। शुक्र-बुध भुक्ति = महादशा-वर्ष × (बुध-वर्ष ÷ 120) = 20 × (17 ÷ 120) = 340 ÷ 120 = 17/6 वर्ष।

उदाहरण (worked example) 17/6 वर्ष = 2.8333… वर्ष = 2 वर्ष 10 मास (0.8333… × 12 = 10.0 मास, ठीक-ठीक)। अर्थात् शुक्र की 20-वर्षीय दशा में यह बुध-भुक्ति ठीक 2 वर्ष 10 मास चलती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दस्तावेज़ §3 के विंशोत्तरी इंजन में बुध = 17 वर्ष; अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 — शुद्ध अनुपात-अंकगणित, बीती नक्षत्र-अंश पर। शुभ-फल शास्त्र का कथन है; अवधि (2 वर्ष 10 मास) परिकलित तथ्य है — दोनों पृथक्।

60.62
इष्टबन्धुजनाकीर्णं शोभितं तस्य मन्दिरम् ।
स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं नित्यं मिष्ठान्नभोजनम्
iṣṭabandhujanākīrṇaṃ śobhitaṃ tasya mandiram |
svaprabhośca mahatsaukhyaṃ nityaṃ miṣṭhānnabhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्ट-बन्धु-जन = प्रिय बंधु-जन; आकीर्णम् = भरा हुआ; शोभितम् = शोभित; तस्य = उसका; मन्दिरम् = गृह; स्व-प्रभोः = अपने स्वामी/प्रभु का; महत्-सौख्यम् = महान सुख; नित्यम् = नित्य; मिष्ठान्न-भोजनम् = मिष्ठान्न-भोजन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसका गृह इष्ट बंधु-जनों से भरा और शोभित रहता है। अपने प्रभु से महत् सौख्य तथा नित्य मिष्ठान्न-भोजन भी फल में कहा गया है। यह पूर्व श्लोक के शुभ-क्रम का विस्तार है — गृह, संबंध, और भोग-सुख का शास्त्रीय चित्रण।

English rendering The text states that his house is crowded with dear kin and is adorned; there is great happiness from his own lord, and daily enjoyment of sweet food. This continues the auspicious-phala description of the (favourable) Venus antardaśā section.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / वर्णन। कोई अंश, बल-इकाई, या दशा-वर्ष यहाँ नहीं; शुद्ध गुणात्मक फल-सूची।

60.63
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।
पापदृष्टे पापयुक्ते चतुष्पाज्जीवहानिकृत्
dāyeśātṣaṣṭharandhre vā vyaye vā balavarjite |
pāpadṛṣṭe pāpayukte catuṣpājjīvahānikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दायेश = दशा/अन्तर्दशा का अधिपति (दाय-ईश); षष्ठ = षष्ठ भाव; रन्ध्र = अष्टम भाव; वा = अथवा; व्यय = द्वादश भाव; बल-वर्जिते = बल-रहित में; पाप-दृष्टे = पाप-दृष्टि युक्त; पाप-युक्ते = पाप-युक्त; चतुष्पात् = चतुष्पद (पशु); जीव = जीव/पशु-संपत्ति; हानिकृत् = हानि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब दायेश षष्ठ, रन्ध्र (अष्टम) अथवा व्यय (द्वादश) में हो, या बलवर्जित हो, तथा पापदृष्ट/पापयुक्त हो, तो चतुष्पाज्जीव (पशु-संपत्ति) की हानि का फल होता है। यह शुक्रान्तर्दशा-खंड के अशुभ-विन्यास पक्ष का शास्त्रीय कथन है — “शास्त्र कहता है”, भय या निश्चित विनाश नहीं। बलवर्जित = शक्ति-संकेतों की न्यूनता का गुणात्मक संकेत; इस श्लोक में षड्बल-संख्या नहीं दी गई।

English rendering The text states that when the period-lord is in the sixth, eighth, or twelfth house, or devoid of strength, and is aspected by or joined with malefics, it causes loss of four-footed creatures. This is the śāstra’s adverse-configuration phala for the Venus antardaśā section — report, not fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्थिति + बल/पाप-योग शर्त)। शर्त-तर्क संक्षेप में: दायेश ∈ {6, 8, 12} अथवा बलवर्जित, और (पापदृष्ट अथवा पापयुक्त) → शास्त्र के अनुसार चतुष्पाज्जीव-हानि। भाव-गणना गृह-पद्धति (पूर्ण-भाव/श्रीपति आदि) पर निर्भर; अयनांश राशि-देशांतर के लिए। बल-माप के लिए षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्; 1 रूप = 60 विरूप) अलग अध्याय (च. 27) का विषय है — यहाँ केवल “बलवर्जित” शब्द है, संख्या नहीं।

60.64
अन्यालयनिवासश्च मनोवैकल्यसम्भवः ।
व्यापारेषु च सर्वेषु हानिरेव न संशयः
anyālayanivāsaśca manovaikalyasambhavaḥ |
vyāpāreṣu ca sarveṣu hānireva na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्यालय-निवास = पर-गृह में निवास; मनो-वैकल्य = मन का विक्षेप/अस्थिरता; सम्भवः = होने की संभावना (शास्त्रोक्त); व्यापारेषु सर्वेषु = सब प्रकार के व्यवसाय/व्यापार में; हानिः एव = हानि ही; न संशयः = संदेह नहीं (निश्चय-कथन, शास्त्र की शैली में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस अवस्था में कहता है कि अन्य के घर में रहना और मन की वैकल्यता सामने आ सकती है। व्यापार-व्यवसाय की समस्त दिशाओं में हानि का फल बताया गया है। “न संशयः” यहाँ पाठ की निश्चय-वाणी है — इसे नियति या आधुनिक भविष्यवाणी नहीं, अपितु ग्रन्थ का फल-कथन समझें।

English rendering The text states residence in another’s house and disturbance of mind as possible outcomes. In all forms of trade and enterprise it affirms loss, in the śāstra’s own categorical phrasing (“no doubt”).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अन्यालय-निवास, मनोवैकल्य, व्यापार-हानि)। यह श्लोक गणना नहीं सिखाता; दशा/भुक्ति-परिस्थिति के साथ जुड़े शास्त्रीय परिणाम की घोषणा है।

60.65
भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तं मध्ये मध्यफलं दिशेत् ।
अन्ते क्लेशकरं चैव शीतवातज्वरादिकम्
bhuktyādau śobhanaṃ proktaṃ madhye madhyaphalaṃ diśet |
ante kleśakaraṃ caiva śītavātajvarādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-आदौ = अन्तरदशा (भुक्ति) के आरम्भ में; शोभनम् = शुभ/अनुकूल फल; प्रोक्तम् = कहा गया; मध्ये = मध्य-भाग में; मध्य-फलम् = मध्यम फल; दिशेत् = निर्देश करे; अन्ते = अन्त में; क्लेश-करम् = क्लेश उत्पन्न करने वाला; शीत-वात-ज्वर-आदिकम् = शीत, वात, ज्वर आदि (शास्त्रोक्त शारीरिक/मौसमी संकेत — चिकित्सा-निदान नहीं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र भुक्ति को तीन काल-खंडों में फल की दृष्टि से बाँटता है। आरम्भ में शोभन फल, मध्य में मध्यम फल, और अन्त में क्लेशकर फल — शीत-वात-ज्वरादि — बताया गया है। यह अन्तरदशा के आद्य-मध्य-अन्त्य का पारंपरिक फल-विन्यास है; रोग-निदान या निश्चित दुःख नहीं।

English rendering The text assigns auspicious results at the start of the bhukti, middling results in the middle, and distressful results at the end, including cold, vāta-type disturbance, and fever as traditional indications.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्ति-त्रिविध काल: आदि/मध्य/अन्त)। श्लोक स्वयं भुक्ति की अवधि का सूत्र नहीं देता; यदि अन्तरदशा-अवधि ज्ञात हो तो तीन खंड प्रथा में समान काल-भाग माने जाते हैं — यह व्याख्या-रूढ़ि है, यहाँ संख्या नहीं दी गई।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में अन्तरदशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120; Σ महादशा = 120 वर्ष। भुक्ति के “आदि–मध्य–अन्त” फल को इंजन में अनुपात-गणित (elapsed fraction of the antardaśā) से काल-खंडित किया जा सकता है — गणना शुद्ध अनुपात है; फल-वाक्य शास्त्र की आवाज़ रहती है, भविष्यवाणी नहीं।

60.66
सप्तमाधीशदोषेण देहपीडा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत्
saptamādhīśadoṣeṇa dehapīḍā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusāhasrakaṃ japet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तम-अधीश = सप्तम भाव का स्वामी (सप्तमेश, शास्त्रीय मारकेश); दोषेण = दोष/पीड़न के कारण (तृतीया); देह-पीडा = शारीरिक कष्ट/रोग; भविष्यति = होगी — शास्त्र-कथन; तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; विष्णु-साहस्रकम् = विष्णुसहस्रनाम-स्तोत्र (साहस्रक = सहस्र = 1000 नामों वाला); जपेत् = जप करे (विधिलिङ्)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक बुध की अन्तर्दशा के प्रकरण का समापन-चरण है (विंशोत्तरी-क्रम में केतु-भुक्ति से ठीक पूर्व; ध्यातव्य कि इसी अध्याय की 60वीं पंक्ति अध्याय-शीर्षक-सदृश है — पाठ/संरचना-भेद संभव)। शास्त्र कहता है कि यदि सप्तमेश दोषग्रस्त हो तो देह-पीड़ा की स्थिति बन सकती है; इसके शमन-हेतु विष्णुसहस्रनाम-जप का विधान बताया गया है। यह भय नहीं, अपितु सप्तम (मारक) स्थान के संकेत पर शास्त्र-सम्मत शान्ति-उपाय मात्र है।

English rendering The text states that through the affliction of the seventh-house lord bodily distress may arise in this sub-period; to allay that fault one should recite the thousand-named hymn of Viṣṇu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + उपाय-निर्देश। "साहस्रक" शब्द सहस्र = 1000 = 10³ नामों को अंकित करता है (शुद्ध संख्या-वाचक); और सप्तमेश शास्त्रीय मारक-सिद्धान्त में द्वितीयेश के साथ आयु/देह का संकेतक माना जाता है — भाव-स्वामित्व स्वयं राशि-चक्र पर की गई modular गणना है, न कि नियति-घोषणा।

60.67
शुक्रस्यान्तर्गते केतौ स्वोच्चे वा स्वर्क्षगेऽपि वा ।
योगकारकसम्बन्धे स्थानवीर्यसमन्विते
śukrasyāntargate ketau svocce vā svarkṣage'pi vā |
yogakārakasambandhe sthānavīryasamanvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रस्य अन्तर्गते केतौ = शुक्र-महादशा में केतु की अन्तर्दशा आने पर; स्वोच्चे = अपनी उच्च राशि में; वा स्वर्क्षगे = अथवा अपनी राशि में स्थित; अपि वा = अथवा भी; योगकारक-सम्बन्धे = योगकारक ग्रह (केन्द्र+त्रिकोण-स्वामी, राजयोगकारक) से सम्बन्ध होने पर; स्थान-वीर्य-समन्विते = स्थानबल (positional strength — षड्बल का अंग) से युक्त होने पर। (केतु की उच्च/स्वराशि की व्यवस्था सम्प्रदाय-सापेक्ष है — पाठ/परिपाटी-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शुक्र की महादशा में जब केतु की अन्तर्दशा आती है और केतु उच्च या स्वराशिस्थ हो, किसी योगकारक ग्रह से सम्बद्ध हो तथा स्थानबल से समन्वित हो — तब (आगे 68–69 में) शुभ फल कहे जाते हैं। यह एक शर्त-वाक्य है जिसका फल अगली ऋचाओं में खुलता है।

English rendering When, in Venus's major period, the sub-period of Ketu arrives with Ketu exalted or in its own sign, linked to a yoga-producing planet and endowed with positional strength — [the auspicious results that follow are declared].

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह श्लोक केतु-भुक्ति का द्वार खोलता है, अतः उसका काल-मान गणनीय है — अन्तर्दशा-मान = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। विंशोत्तरी में केतु = 7 वर्ष, शुक्र = 20 वर्ष। स्थानबल आदि षड्बल के रूप/विरूप में मापे जाते हैं (1 रूप = 60 विरूप)।

उदाहरण (worked example) शुक्र-महादशा में केतु-अन्तर्दशा = (20 × 7) ÷ 120 = 140 ÷ 120 = 7/6 वर्ष = 1.1666… वर्ष = 1 वर्ष 2 मास (0.1667 × 12 = 2 मास)। अतः केतु-भुक्ति लगभग 14 मास चलती है, जिसके भीतर श्लोक 67–74 के फल घटित बताये जाते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, भौम 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) हमारे दशा-इंजन में शुद्ध अनुपात-गणित से पिन किया गया है। शुक्र-महादशा की अन्तर्दशाएँ इसी क्रम में शुक्र→सूर्य→चन्द्र→भौम→राहु→गुरु→शनि→बुध→केतु चलती हैं — इसीलिए इस अध्याय में केतु-भुक्ति नवें/अन्तिम स्थान पर आती है; श्लोक-क्रम स्वयं इस गणित की पुष्टि करता है।

60.68
भुक्त्यादौ शुभमाधिक्यान्नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् ।
व्यवसायात्फलाधिक्यं गोमहोष्यादिवृद्धिकृत्
bhuktyādau śubhamādhikyānnityaṃ miṣṭhānnabhojanam |
vyavasāyātphalādhikyaṃ gomahoṣyādivṛddhikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्ति-आदौ = भुक्ति के आरम्भ में; शुभम् आधिक्यात् = शुभ की अधिकता से; नित्यम् = निरंतर/प्रतिदिन; मिष्ठ-अन्न-भोजनम् = मिष्टान्न-भोजन; व्यवसायात् = व्यवसाय से; फल-आधिक्यम् = फल/लाभ की वृद्धि; गो-महिष-आदि = गौ, महिष आदि; वृद्धि-कृत् = वृद्धि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की शर्तों पर शास्त्र कहता है — भुक्ति के आदि में शुभ की अधिकता से नित्य मिष्टान्न-भोजन का संकेत। व्यवसाय से फल-आधिक्य, तथा गो-महिष आदि पशु-संपत्ति की वृद्धि बताई गई है। यह समृद्धि-फल का कथन है, निवेश या कृषि-गारंटी नहीं।

English rendering Under those conditions the text states, at the opening of the bhukti, continual enjoyment of sweet food from the predominance of the auspicious; increase of results from livelihood; and growth of cattle such as cows and buffaloes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भुक्त्यादि-शुभ: भोजन, व्यवसाय-फल, पशु-वृद्धि)। संख्या या वर्ग-नियम नहीं; केवल दशा-फल-वर्णन।

60.69
धनधान्यसमृद्धिश्च संग्रामे विजयो भवेत् ।
भुक्त्यन्ते हि सुखं चैव भुक्त्यादौ मध्यमं फलम्
dhanadhānyasamṛddhiśca saṃgrāme vijayo bhavet |
bhuktyante hi sukhaṃ caiva bhuktyādau madhyamaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-समृद्धिः = धन और धान्य की समृद्धि; संग्रामे = युद्ध/संघर्ष में; विजयः भवेत् = विजय हो (शास्त्रोक्त); भुक्ति-अन्ते = भुक्ति के अन्त में; सुखम् = सुख; भुक्ति-आदौ = भुक्ति के आरम्भ में; मध्यमम् फलम् = मध्यम फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे धन-धान्य की समृद्धि और संग्राम में विजय का फल जोड़ता है। फिर काल-विन्यास: भुक्त्यन्त में सुख, भुक्त्यादि में मध्यम फल — कहा गया है। 60.65/60.68 के “आदि-शुभ” से यह वाक्य भिन्न-स्वर का है; एक ही भुक्ति के विभिन्न पक्ष या पाठ-परंपरा का भेद संभव — दोनों को शास्त्र-वाक्य के रूप में रखें, एक-दूसरे से “सुधार” न ठहराएँ।

English rendering The text further states prosperity in wealth and grain and victory in conflict; happiness at the end of the bhukti and middling results at its beginning — a phasing note that may sit beside, not overwrite, neighboring verses (पाठ-भेद/पक्ष-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (समृद्धि, विजय; भुक्ति आदि/अन्त का मध्यम–सुख विन्यास)। गणना नहीं; दशा-काल के फल-मानचित्र का एक और स्तर।

60.70
मध्ये मध्ये महत्कष्टं पश्चादारोग्यमादिशेत् ।
दायेशाद्रन्ध्रभावस्थे व्यये वा पापसंयुते
madhye madhye mahatkaṣṭaṃ paścādārogyamādiśet |
dāyeśādrandhrabhāvasthe vyaye vā pāpasaṃyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये मध्ये = मध्य-मध्य में (मध्य-काल में); महत्-कष्टम् = बड़ा कष्ट; पश्चात् = बाद में; आरोग्यम् आदिशेत् = आरोग्य का निर्देश करे; दाय-ईशात् = दायेश (दशा/भुक्ति-स्वामी) से; रन्ध्र-भाव-स्थे = अष्टम भाव में स्थित होने पर; व्यये वा = अथवा व्यय (द्वादश) में; पाप-संयुते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ मध्य में महान् कष्ट, और उसके पश्चात् आरोग्य — ऐसा शास्त्र आदिष्ट करता है। दूसरी पंक्ति नई/सटीक शर्त खोलती है: जब दायेश रन्ध्र (8) या व्यय (12) में हो, अथवा पाप-संयुक्त हो — तब यह फल-क्रम लागू माना गया है। “आरोग्य/कष्ट” यहाँ कुंडली-दशा का शास्त्रीय संकेत हैं; चिकित्सा-निर्णय या भय-वाक्य नहीं।

English rendering The text indicates great hardship in the middle period and health thereafter; specifically when the period-lord stands in the eighth or twelfth house, or is joined with malefics — conditions for the phala just stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + भाव-स्थिति शर्त (दायेश ∈ {8, 12} अथवा पाप-युक्त)। भाव-गिनती: लग्न = 1 … रन्ध्र = 8, व्यय = 12 (पूर्ण-भाव/समान-भाव पद्धति घोषित करें; संख्या श्लोक में नहीं, केवल भाव-नाम)।

60.71
चौराहिव्रणपीडा च बुद्धिनाशो महद्भयम् ।
शिरोरुजं मनस्तापमकर्मकलहं वदेत्
caurāhivraṇapīḍā ca buddhināśo mahadbhayam |
śirorujaṃ manastāpamakarmakalahaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर-अहि-व्रण-पीडा = चोर, सर्प (अहि) व व्रण (घाव) से पीड़ा; बुद्धि-नाशः = बुद्धि/विवेक का ह्रास; महत्-भयम् = महान् भय; शिरः-रुजम् = शिरोवेदना; मनः-तापम् = मानसिक सन्ताप; अकर्म-कलहम् वदेत् = निष्फल कर्म व कलह कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ (इस अनिष्ट-योग में) चोर-सर्प-व्रण से पीड़ा, बुद्धि का ह्रास, महान् भय, शिरोवेदना, मानसिक सन्ताप, तथा निष्फल कर्म व कलह — ऐसा शास्त्र कहता है। ये दुःस्थानगत पापयुक्त केतु के संकेत-फल हैं, न कि नियति-घोषणा।

English rendering The text states — distress from thieves, snakes, and wounds; loss of clear judgment; great fear; headache; mental anguish; and fruitless effort with quarrel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अनिष्ट फल-कथन। यह दुःस्थान-स्थित पापयुक्त केतु का शास्त्रीय फल-वर्णन है, जिसे "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए — कोई भय-प्रेरणा या उपाय-दबाव अभिप्रेत नहीं।

60.72
प्रमेहभवरोगं च नानामार्गे धनव्ययः ।
भार्यापुत्रविरोधश्च गमनं कार्यनाशनम्
pramehabhavarogaṃ ca nānāmārge dhanavyayaḥ |
bhāryāputravirodhaśca gamanaṃ kāryanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रमेह = आयुर्वेदीय रोग-नाम (मूत्र-संबंधित विकार-वर्ग); भव-रोग = विविध/उत्पन्न रोग; नाना-मार्गे = अनेक मार्गों से; धन-व्यय = धन-व्यय; भार्या = पत्नी; पुत्र = पुत्र; विरोध = विरोध/कलह; गमन = गमन/यात्रा; कार्य-नाशन = कार्य-नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—प्रमेह-सदृश तथा अन्य विविध रोगों का संकेत, और अनेक मार्गों से धन-व्यय। भार्या-पुत्र-विरोध, गमन, तथा कार्य-नाश भी इसी फल-सूची में जुड़े हैं। यहाँ रोग-नाम शास्त्रीय शब्दावली है; यह चिकित्सा-निदान नहीं।

English rendering The text states prameha and other disorders, expenditure of wealth through many channels, conflict with spouse and son, travel, and the frustration of undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रोग-धन-परिवार-कार्य सूची)। संख्या, अनुपात या वर्ग-विभाजन यहाँ नहीं; केवल शास्त्रीय परिणाम-वर्णन है।

60.73
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत्
dvitīyadyūnanāthe tu dehabādhā bhaviṣyati |
taddoṣaparihārārthaṃ mṛtyuñjayajapaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीय-द्यून-नाथे तु = द्वितीय (2रे) व द्यून (7वें) भाव के स्वामी होने पर (द्यून = सप्तम; दोनों मारक-स्थान); देह-बाधा भविष्यति = देह-बाधा होगी — शास्त्र-कथन; तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; मृत्युञ्जय-जपम् चरेत् = महामृत्युञ्जय-मन्त्र का जप करे।

हिन्दी भावार्थ यदि केतु द्वितीय अथवा सप्तम (द्यून) भाव का स्वामी हो, तो देह-बाधा होगी — ऐसा शास्त्र कहता है; इसके परिहार-हेतु महामृत्युञ्जय-जप का विधान है। यह मारक-द्वय (2/7) का वही सूत्र-वाक्य है जो अध्याय में बारंबार लौटता है (तुल. 60.44, 60.51)।

English rendering The text states that when Ketu governs the 2nd or 7th house bodily affliction may arise; as its remedy one should perform the Mṛtyuñjaya recitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + उपाय। द्वितीय व सप्तम शास्त्रीय मारक-स्थान हैं; इनका स्वामित्व आयु/देह का संकेतक माना जाता है। भाव-स्वामित्व स्वयं राशि-चक्र पर modular गणना है — किन्तु केतु छाया-ग्रह होने से उसका "स्वामित्व" परिपाटी-सापेक्ष है (पाठ/परिपाटी-भेद संभव), और यह द्विपदी अध्याय भर में सूत्रवत् दोहराया गया है।

60.74
छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।
शुक्रप्रीतिकरीं शान्तिं ततः सुखमवाप्नुयात्
chāgadānaṃ prakurvīta sarvasampatpradāyakam |
śukraprītikarīṃ śāntiṃ tataḥ sukhamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छाग-दानम् प्रकुर्वीत = बकरे (छाग) का दान करे; सर्व-सम्पत्-प्रदायकम् = सर्व सम्पत्ति देने वाला; शुक्र-प्रीति-करीम् शान्तिम् = शुक्र की प्रीति करने वाली शान्ति; ततः सुखम् अवाप्नुयात् = तत्पश्चात् सुख प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ बकरे का दान करना चाहिए, जो सर्व-सम्पत्ति-प्रदायक है; यह शुक्र की प्रीति करने वाली शान्ति है, जिससे तदनन्तर सुख की प्राप्ति होती है — ऐसा शास्त्र कहता है। यह समापन-श्लोक "शुक्रप्रीतिकरीम्" कहकर सम्पूर्ण अध्याय को पुनः महादशेश शुक्र की ओर लौटाता है।

English rendering The text states that one should make a gift of a goat, bestower of all prosperity; this is the peace-rite pleasing to Venus, whereby happiness is thereafter attained.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय-निर्देश / अध्याय-समापन। केतु-भुक्ति के अन्त पर यह श्लोक सम्पूर्ण शुक्र-दशा-चक्र का समाहार करता है — शान्ति महादशेश शुक्र को समर्पित है, अन्तर्दशेश केतु को नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) शुक्र-महादशा की समस्त नौ अन्तर्दशाओं का काल-योग = (20 ÷ 120) × (7+20+6+10+7+18+16+19+17) = (20 ÷ 120) × 120 = 20 वर्ष — अर्थात् अन्तर्दशाओं का योग महादशा-मान के ठीक तुल्य। हमारे दशा-इंजन में यह अपरिवर्ती (invariant) `==` से जाँची जाती है (कोई सह्यता-पट्टी नहीं), ताकि किसी भी भुक्ति-गणना की त्रुटि मौन न रह सके — यही इस अध्याय के केतु-भुक्ति-समापन का गणितीय हस्ताक्षर है।

अध्यायः 61

प्रत्यन्तर्दशाफलाध्यायः

82 श्लोक
61.1
प्त्ऱ्ठक् स्वस्वधशामानैर्हन्याधन्थर्धशामिथिम् ।
भ्येथ्सर्वधशायोगैः फलं प्रथ्यन्थरं क्रमाथ्
ptṟṭhak svasvadhaśāmānairhanyādhanthardhaśāmithim |
bhyethsarvadhaśāyogaiḥ phalaṃ prathyantharaṃ kramāth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृथक् = अलग-अलग, प्रत्येक ग्रह के लिए स्वतन्त्र रूप से; स्वस्व-दशा-मानैः = अपनी-अपनी (विंशोत्तरी) दशा की वर्ष-मात्रा से (सूर्य 6, चन्द्र 10 … वर्ष); हन्यात् = गुणा करे ("हति/घात" = गणित-पारिभाषिक गुणन); अन्तर्दशा-मितिम् = अन्तर्दशा की काल-मात्रा को; सर्व-दशा-योगैः = समस्त दशाओं के योग (= 120 वर्ष) से (भाग); फलं प्रत्यन्तरं क्रमात् = क्रम से प्रत्यन्तर-दशा का मान/फल; भ्येत् = पाठ-भेद संभव (सम्भवतः "भजेत्" = भाग करे)।

हिन्दी भावार्थ प्रत्येक ग्रह की अपनी-अपनी दशा-वर्ष-संख्या से अन्तर्दशा की काल-मात्रा को अलग-अलग गुणा करना चाहिए, और फिर समस्त दशाओं के योग (120 वर्ष) से भाग देकर क्रम से प्रत्यन्तर-दशा निकाल लेनी चाहिए। यही अनुपात-विधि प्रत्यन्तर का काल-मान और उसका फल दोनों निर्धारित करती है। यह श्लोक आगे आने वाले समस्त प्रत्यन्तर-फल-कथन का गणितीय ढाँचा है।

English rendering Multiply the span of each antardaśā, separately, by each planet's own daśā-measure; then, dividing by the sum of all the daśās (120), obtain the pratyantara-daśās in due order. This proportional rule fixes both the length and the sequence of every sub-sub-period that the chapter's fruits are read against.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्यन्तर-दशा = समानुपातिक उप-विभाजन। महादशा A (वर्ष), अन्तर्दशा B, प्रत्यन्तर C के लिए —
अन्तर्दशा_B = (A × B) ÷ 120
प्रत्यन्तर_C = (अन्तर्दशा_B × C) ÷ 120 = (A × B × C) ÷ 120²
यहाँ 120 = विंशोत्तरी दशाओं का पूर्ण योग (केतु 7 + शुक्र 20 + सूर्य 6 + चन्द्र 10 + मंगल 7 + राहु 18 + गुरु 16 + शनि 19 + बुध 17 = 120)। समस्त गणना शुद्ध परिमेय (rational) अंकगणित है — कोई सन्निकटन नहीं।

उदाहरण (worked example) सूर्य महादशा (6 वर्ष) → चन्द्र अन्तर्दशा → मंगल प्रत्यन्तर।
चन्द्र अन्तर्दशा = (6 × 10) ÷ 120 = 0.5 वर्ष = 6 मास।
मंगल प्रत्यन्तर = (0.5 × 7) ÷ 120 = 3.5 ÷ 120 = 0.029166… वर्ष ≈ 10.65 दिन (सीधे: 6 × 10 × 7 = 420; 420 ÷ 14400 = 0.029166… वर्ष)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक वही अनुपात-गणित है जिस पर हमारा विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (डोज़ियर §3) खड़ा है — अन्तर्दशा = (महादशा_वर्ष × अन्तर-ग्रह_वर्ष) ÷ 120, और प्रत्यन्तर उसी अनुपात को एक स्तर और नीचे दोहराता है। दशा-इंजन में ये उप-विभाजन नियततात्मक (deterministic) परिमेय राशियाँ हैं, अतः इन्हें सहनशीलता-बैंड के बिना `==` पर सत्यापित किया जा सकता है।

61.2
विवाधो विथ्थहानिश्च धारार्थिः शिरसि व्यठा ।
रव्यन्थरे बुढैर्ज्ञेयं थस्य प्रथ्यन्थरे फलम्
vivādho viththahāniśca dhārārthiḥ śirasi vyaṭhā |
ravyanthare buḍhairjñeyaṃ thasya prathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवादः = कलह, वाद-विवाद; वित्त-हानिः = धन की हानि; दारार्तिः = पत्नी/दाम्पत्य-सम्बन्धी कष्ट (पाठ-भेद संभव: "धारार्तिः"); शिरसि व्यथा = सिर में पीड़ा; रवि-अन्तरे = सूर्य की अन्तर्दशा में; बुधैः ज्ञेयम् = विद्वानों द्वारा जानने योग्य; तस्य प्रत्यन्तरे = उसी (सूर्य) के प्रत्यन्तर में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अन्तर्दशा में जब पुनः सूर्य का ही प्रत्यन्तर आता है, तब शास्त्र कहता है — विवाद, धन-हानि, दाम्पत्य-सम्बन्धी क्लेश और शिरोवेदना जैसे फल कहे गए हैं। विद्वानों को यही फल इस काल-खण्ड का समझना चाहिए। यह सूर्य-अन्तर्दशा के भीतर प्रत्यन्तर-क्रम का पहला चरण है।

English rendering In the Sun's antardaśā, during the Sun's own pratyantara, the text states results such as disputes, loss of wealth, distress concerning one's spouse, and pain in the head — so the wise should read this period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक 61.1 की समानुपातिक विधि से निकले काल-खण्ड पर आरोपित फल-सूची मात्र है; इसे शास्त्र का कथन मानें, नियति या भविष्यवाणी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक 2 से यहाँ प्रत्यन्तर-अनुक्रम आरम्भ होता है, और यह ठीक विंशोत्तरी क्रम है जो अन्तर्दशा-स्वामी से ही शुरू होता है: सूर्य → चन्द्र → मंगल → राहु → गुरु → शनि → बुध → केतु → शुक्र (श्लोक 2–10)। यही 120-वर्ष चक्र का पुनरावृत्त क्रम है जिसे डोज़ियर §3 में पिन किया गया है।

61.3
उध्वेगः कलहश्चैव विथ्थहानिर्मनोव्यठा ।
रव्यन्थरे विजानीयाथ् चन्ध्रप्रथ्यन्थरे फलम्
udhvegaḥ kalahaścaiva viththahānirmanovyaṭhā |
ravyanthare vijānīyāth candhraprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उद्वेगः = मानसिक उद्विग्नता / बेचैनी; कलहः = झगड़ा; वित्त-हानिः = धन-क्षय; मनोव्यथा = मन की पीड़ा; रव्यन्तरे = सूर्य-अन्तर्दशा में; चन्द्र-प्रत्यन्तरे = चन्द्र के प्रत्यन्तर में; विजानीयात् = जानना चाहिए; फलम् = शास्त्रोक्त फल।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अन्तर्दशा में चन्द्र का प्रत्यन्तर आने पर शास्त्र उद्वेग, कलह, धन-हानि और मनोव्यथा का वर्णन करता है। यह चन्द्र-प्रत्यन्तर का फल-कथन है—गणना नहीं, परिणाम-सूची। पाठक इसे शास्त्र की भाषा में रखें, निश्चित भावी घटना के रूप में नहीं।

English rendering In the Sun’s antardaśā, during the Moon’s pratyantara, the text states agitation, quarrel, loss of wealth, and mental distress as the result to be understood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: PD = (AD_Ravi × १०) ÷ १२०, जहाँ AD_Ravi = (MD × ६) ÷ १२०; यह श्लोक केवल फल पक्ष कहता है।

61.4
राजभीथिः शस्थ्रभीथिर्बन्ढनं बहुसंकतम् ।
स/थ्रुवह्निक्त्ऱ्था पीदा कुजप्रथ्यन्थरे फलम्
rājabhīthiḥ śasthrabhīthirbanḍhanaṃ bahusaṃkatam |
sa/thruvahniktṟthā pīdā kujaprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-भीतिः = राजा/सत्ता से भय; शस्त्र-भीतिः = शस्त्र से भय; बन्धनम् = बन्धन, कारावास; बहु-संकटम् = अनेक संकट; शत्रु-वह्नि-कृता पीडा = शत्रुओं और अग्नि से उत्पन्न कष्ट; कुज-प्रत्यन्तरे फलम् = मंगल के प्रत्यन्तर का फल।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अन्तर्दशा में मंगल के प्रत्यन्तर में शास्त्र कहता है — राजभय, शस्त्रभय, बन्धन, अनेक संकट, तथा शत्रु और अग्नि से उत्पन्न पीड़ा। ये तीव्र-फल सूर्य-मंगल दोनों के उग्र स्वभाव के अनुरूप कहे गए हैं। यह शास्त्र का फल-कथन है, भय उत्पन्न करने का उपकरण नहीं।

English rendering In the Sun's antardaśā during Mars's pratyantara, the text states fear from authority and from weapons, confinement, many hardships, and affliction caused by enemies and by fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह पूर्णतः अशुभ-प्रधान वर्णन है; इसकी काल-अवधि 61.1 से (सूर्य × मंगल) निकलती है, फल-सूची व्याख्यात्मक है, गणनीय नहीं।

61.5
श्लेष्मव्याढिः शस्थ्रभीथिएढनहानिर्महध्भयम् ।
राजभङ्गस्थठा थ्रासो राहुप्रथ्यन्थरे फलम्
śleṣmavyāḍhiḥ śasthrabhīthieḍhanahānirmahadhbhayam |
rājabhaṅgasthaṭhā thrāso rāhuprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्लेष्म-व्याधिः = कफ-प्रकृति का विकार (शास्त्रीय शब्द; चिकित्सा-निदान नहीं); शस्त्र-भीतिः = शस्त्र-भय; धन-हानिः = धन-क्षय; महा-भयम् = बड़ा भय; राज-भङ्गः = राज-अनुग्रह/पद का भंग; त्रासः = त्रास / घबराहट; राहु-प्रत्यन्तरे = राहु के प्रत्यन्तर में; फलम् = शास्त्रोक्त फल।

हिन्दी भावार्थ राहु के प्रत्यन्तर में शास्त्र श्लेष्म-व्याधि, शस्त्रभीति, धनहानि, महाभय, राजभङ्ग और त्रास का वर्णन करता है। ये सब फल-सूची के पद हैं—रोग-निदान या कानूनी भविष्यवाणी नहीं। “व्याधि” यहाँ ज्योतिष-फल की पारंपरिक शब्दावली में रहता है; चिकित्सा-अर्थ थोपना अनुचित है।

English rendering In Rāhu’s pratyantara the text states a phlegmatic-type affliction (as a traditional phala term, not a clinical diagnosis), fear of weapons, loss of wealth, great fear, rupture of royal favor, and terror.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: PD = (AD × १८) ÷ १२० (राहु-मान = १८); श्लोक फल-पक्ष ही कहता है।

61.6
शथ्रुनाशो जयो व्त्ऱ्ध्ढिर्वस्थ्रहेमाधिभूषणम् ।
अश्वयानाधिलाभश्च गुरुप्रथ्यन्थरे फलम्
śathrunāśo jayo vtṟdhḍhirvasthrahemādhibhūṣaṇam |
aśvayānādhilābhaśca guruprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-नाशः = शत्रुओं का नाश; जयः = विजय; वृद्धिः = उन्नति/समृद्धि; वस्त्र-हेम-आदि-भूषणम् = वस्त्र, स्वर्ण आदि आभूषण; अश्व-यान-आदि-लाभः च = घोड़े, वाहन आदि का लाभ; गुरु-प्रत्यन्तरे फलम् = गुरु के प्रत्यन्तर का फल।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अन्तर्दशा में गुरु के प्रत्यन्तर में शास्त्र शुभ फल कहता है — शत्रु-नाश, विजय, समृद्धि, वस्त्र-स्वर्ण आदि आभूषण, तथा अश्व एवं वाहनादि का लाभ। सूर्य-गुरु की मैत्री के अनुरूप यह प्रत्यन्तर उत्तम फलदायी बताया गया है। यह शास्त्र का शुभ-फल-कथन है।

English rendering In the Sun's antardaśā during Jupiter's pratyantara, the text states destruction of enemies, victory, growth, gains of clothes, gold and other ornaments, and acquisition of horses and vehicles.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-प्रधान)। यह श्लोक उसी सूर्य-अन्तर्दशा के भीतर गुरु-खण्ड की व्याख्या है; अवधि 61.1 से (सूर्य × गुरु = 6 × 16 अंश), फल गुणात्मक।

61.7
ढनहानिः पशोः पीदा महोध्वेगो महारुजः ।
अशुभं सर्वमाप्नोथि शनिप्रथ्यन्थरे जनः
ḍhanahāniḥ paśoḥ pīdā mahodhvego mahārujaḥ |
aśubhaṃ sarvamāpnothi śaniprathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-हानिः = धन-क्षय; पशोः पीडा = पशुओं को कष्ट; महोद्वेगः = बड़ा उद्वेग; महा-रुजः = तीव्र रुज / कष्ट (फल-शब्द; निदान नहीं); अशुभं सर्वम् = समस्त अशुभ (शास्त्रीय सामान्योक्ति); आप्नोति = प्राप्त करता है—ऐसा शास्त्र कहता है; शनि-प्रत्यन्तरे = शनि के प्रत्यन्तर में; जनः = व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ शनि के प्रत्यन्तर में शास्त्र धनहानि, पशु-पीड़ा, महोद्वेग, महारुज और “सर्व अशुभ” की प्राप्ति—ऐसी सामान्य फल-भाषा कहता है। यह दबाव या भय पैदा करने के लिए नहीं; केवल पाठ का कथन है। शुभ-अशुभ दोनों को एक ही अनुशासन में पढ़ें: गणना अवधि की, फल शास्त्र की आवाज़ में।

English rendering In Saturn’s pratyantara the text states loss of wealth, affliction to cattle, great agitation, severe distress, and that the person meets with what is classed as wholly inauspicious—reported as the śāstra’s claim, not as fate we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: PD = (AD × १९) ÷ १२० (शनि-मान = १९)। “अशुभं सर्वम्” शास्त्र की व्यापक फल-शैली है; इसे निश्चित विनाश या उपाय-दबाव में नहीं पढ़ना।

61.8
विध्यालाभो बन्ढुसङ्ग भोज्यप्राप्थिर्ढनागमः ।
ढर्मलाभो न्त्ऱ्पाथ्पूजा बिढप्रथ्यन्थरे भवेथ्
vidhyālābho banḍhusaṅga bhojyaprāpthirḍhanāgamaḥ |
ḍharmalābho ntṟpāthpūjā biḍhaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या-लाभ = ज्ञान/शिक्षा की प्राप्ति; बन्धु-सङ्ग = कुटुम्ब-सम्बन्धियों का संग; भोज्य-प्राप्ति = भोग्य-वस्तु/अन्न की प्राप्ति; धन-आगम = धन का आगमन; धर्म-लाभ = धर्म/पुण्य का लाभ; नृपात् पूजा = राज-सम्मान; बुध-प्रत्यन्तर = बुध की प्रत्यन्तर-दशा (महादशा→अन्तर्दशा→प्रत्यन्तर की तृतीय परत)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की प्रत्यन्तर-दशा में विद्या का लाभ, बन्धुओं का संग, भोज्य-सामग्री की प्राप्ति और धन का आगमन हो सकता है। साथ ही धर्म का लाभ तथा राजा (अथवा राज्य-सत्ता) से सम्मान/पूजा का संकेत दिया गया है। यह बुध-काल के फल-वर्णन का कथन है — फल का वास्तविक उदय दशा-क्रम, भाव-बल और योग-स्थिति पर निर्भर माना जाता है।

English rendering The text states that in Mercury’s pratyantara there may be gain of learning, company of kinsfolk, acquisition of food and enjoyments, and inflow of wealth; also religious merit and honour from the ruler. These are the śāstra’s stated indications for Mercury’s sub-sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। प्रत्यन्तर स्वयं विंशोत्तरी की तृतीय परत है (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120²), किन्तु यह श्लोक अवधि नहीं, बुध-प्रत्यन्तर का फलमात्र कहता है।

61.9
प्राणभीथिर्महाहानी राजभीथिश्च विग्रहः ।
शथ्रुणाञ्च महावाधो केथोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
prāṇabhīthirmahāhānī rājabhīthiśca vigrahaḥ |
śathruṇāñca mahāvādho kethoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राण-भीति = प्राण/जीवन-सम्बन्धी भय; महा-हानि = बड़ी हानि; राज-भीति = राज-कोप/सत्ता-भय; विग्रह = कलह/संघर्ष; शत्रूणाम् महा-बाध = शत्रुओं से भारी बाधा; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की प्रत्यन्तर-दशा में प्राण-सम्बन्धी भय, बड़ी हानि, राज-भय तथा विग्रह का संकेत मिलता है। शत्रुओं से महाबाधा भी इसी काल से जोड़ी गई है। यह फल-कथन है; इसे निश्चित विपत्ति या नियति न समझें — शास्त्र की भाषा में “बाधा/भीति” का अर्थ संरचनात्मक दबाव और सावधानी का संकेत है, भय-व्यापार नहीं।

English rendering The text states that in Ketu’s pratyantara there may be fear concerning life-force, great loss, fear of authority, conflict, and severe obstruction from enemies. Report this as the śāstra’s indication, not as fate or a guarantee of harm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। केतु-प्रत्यन्तर की अवधि विंशोत्तरी अनुपात से निकलती है; यह श्लोक केवल फल-सूची देता है।

61.10
धिनानि समरूपाणि लाभोऽप्यल्पो भवेधिह ।
स्वल्पा च सुखसम्पथ्थिः शुक्रप्रथ्यन्थरे भवेथ्
dhināni samarūpāṇi lābho'pyalpo bhavedhiha |
svalpā ca sukhasampaththiḥ śukraprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिनानि समरूपाणि = दिन/काल मिश्रित या सामान्य-सा स्वभाव वाले; लाभः अपि अल्पः = लाभ भी अल्प; इह = यहाँ (इस प्रत्यन्तर में); स्वल्पा सुख-सम्पत्ति = थोड़ा सुख और थोड़ी समृद्धि; शुक्र-प्रत्यन्तरे = शुक्र की प्रत्यन्तर-दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की प्रत्यन्तर-दशा में काल सम-रूप — न विशेष उज्ज्वल, न विशेष उग्र — रहता है। लाभ भी अल्प बताया गया है, और सुख-सम्पत्ति स्वल्प। यह “मध्यम/संकुचित फल” का वर्णन है; शुक्र की स्वाभाविक सौम्यता यहाँ विस्तार की अपेक्षा संयम का संकेत देती है, जैसा शास्त्र स्वयं कहता है।

English rendering The text states that in Venus’s pratyantara the days are of mixed or even tenor, gain itself is small, and comfort and prosperity are slight. It is a statement of modest results, not a denial of Venus’s nature elsewhere in the system.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “अल्प/स्वल्प” यहाँ गुणात्मक फल-शब्द हैं, संख्यात्मक माप नहीं।

61.11
भूमोज्यढनसम्प्राप्थी राजपूजामहथ्सुखम् ।
लाभश्चन्ध्रान्थरे ज्ञेयं चन्ध्रप्रथ्यन्थरे फलम्
bhūmojyaḍhanasamprāpthī rājapūjāmahathsukham |
lābhaścandhrānthare jñeyaṃ candhraprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूमि-भोज्य-धन-सम्प्राप्तिः = भूमि, भोजन और धन की प्राप्ति (पाठ-भेद संभव: "भूमोज्य" में आदि-पद अस्पष्ट); राज-पूजा = राजा से सम्मान; महत्-सुखम् = महान् सुख; लाभः चन्द्र-अन्तरे ज्ञेयम् = लाभ, चन्द्र की अन्तर्दशा में जानना चाहिए; चन्द्र-प्रत्यन्तरे फलम् = चन्द्र के प्रत्यन्तर का फल।

हिन्दी भावार्थ अब चन्द्र की अन्तर्दशा आरम्भ होती है; उसमें पुनः चन्द्र के ही प्रत्यन्तर में शास्त्र भूमि, भोजन एवं धन की प्राप्ति, राजसम्मान और महान् सुख का लाभ बताता है। स्व-प्रत्यन्तर (चन्द्र में चन्द्र) यहाँ शुभ-फलदायी कहा गया है। यह शास्त्र का शुभ-फल-कथन है।

English rendering As the Moon's antardaśā begins, during the Moon's own pratyantara the text states acquisition of land, food and wealth, royal honor, and great happiness — such is the gain to be known here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-प्रधान)। "भूमोज्य" पद के आदि-अक्षर अस्पष्ट हैं — पाठ-भेद संभव; "भूमि-भोज्य-धन" पाठ सन्दर्भ-संगत।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ नई अन्तर्दशा (चन्द्र) के साथ प्रत्यन्तर-अनुक्रम पुनः-केन्द्रित होकर चन्द्र से आरम्भ होता है (चन्द्र → मंगल → राहु …) — वही 120-वर्ष विंशोत्तरी चक्र, केवल नए अन्तर्दशा-स्वामी पर लंगर डाले हुए। यह क्रम-घूर्णन डोज़ियर §3 के दशा-इंजन में नियततात्मक ढंग से पुनरुत्पन्न होता है।

61.12
मथिव्त्ऱ्ध्ढिर्महापूज्यः सुखं बन्ढुजनैः सह ।
ढनागमः शथ्रुभयं कुजप्रथ्यन्थरे भवेथ्
mathivtṟdhḍhirmahāpūjyaḥ sukhaṃ banḍhujanaiḥ saha |
ḍhanāgamaḥ śathrubhayaṃ kujaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मति-वृद्धि = बुद्धि/मति का बढ़ना; महा-पूज्य = अत्यन्त सम्मानित; सुखं बन्धु-जनैः सह = बन्धु-जनों के साथ सुख; धन-आगम = धन-प्राप्ति; शत्रु-भय = शत्रु से भय; कुज-प्रत्यन्तरे = मंगल (कुज) की प्रत्यन्तर-दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुज (मंगल) की प्रत्यन्तर-दशा में मति की वृद्धि, महान् सम्मान, बन्धुओं के साथ सुख तथा धन का आगमन हो सकता है। साथ ही शत्रु-भय का भी उल्लेख है — अर्थात् मिश्रित फल: उन्नति और संघर्ष-सावधानी दोनों। यह “एकतरफा शुभ” नहीं, शास्त्र की द्वि-पक्षीय सूची है।

English rendering The text states that in Mars’s pratyantara there may be increase of intellect, high honour, happiness with kinsfolk, and inflow of wealth, together with fear of enemies. The śāstra thus lists both supportive and challenging indications for the same sub-sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कुज-महादशा 7 वर्ष (विंशोत्तरी Σ = 120); यहाँ केवल प्रत्यन्तर-फल है।

61.13
भवेथ्कल्याणसम्पथ्थी राजविथ्थसमागमः ।
अशुभैरल्पम्त्ऱ्थ्युअश्च राहुप्रथ्यन्थरे ध्विज
bhavethkalyāṇasampaththī rājaviththasamāgamaḥ |
aśubhairalpamtṟthyuaśca rāhuprathyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भवेत् कल्याण-सम्पत्तिः = कल्याण/मंगल की प्राप्ति होती है; राज-वित्त-समागमः = राजकीय धन का आगमन; अशुभैः अल्प-मृत्युः च = और अशुभ प्रभावों से अल्प (लघु) मृत्यु-तुल्य भय/संकट (पाठ-भेद संभव); राहु-प्रत्यन्तरे द्विज = हे द्विज! राहु के प्रत्यन्तर में।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! चन्द्र की अन्तर्दशा में राहु के प्रत्यन्तर में शास्त्र कल्याण की प्राप्ति और राजकीय धन का आगमन बताता है; साथ ही कुछ अशुभ प्रभावों से लघु मृत्यु-तुल्य संकट का संकेत भी। यह शुभ-अशुभ मिश्रित काल-खण्ड है। सम्बोधन "द्विज" पराशर द्वारा शिष्य को दिया गया है, और सम्पूर्ण कथन शास्त्र-वचन के रूप में ग्राह्य है।

English rendering O twice-born, in the Moon's antardaśā during Rāhu's pratyantara, the text states the attainment of well-being and an inflow of royal wealth, along with a brush of minor mortal danger from inauspicious influences.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्रित) + सम्बोधन। "अल्पमृत्युः" को "लघु प्राण-संकट/मृत्यु-तुल्य भय" के रूप में शास्त्र का संकेत मानें — कोई मृत्यु-भविष्यवाणी अभिप्रेत नहीं; "अशुभैरल्पम्त्ऱ्थ्युअश्च" में सन्धि-अक्षर अस्पष्ट, पाठ-भेद संभव।

61.14
वस्थ्रलाभो महाथेजो ब्रह्मज्ञानं च सध्गुरोः ।
राज्यालंकरणावाप्थिर्गुरुप्रथ्यन्थरे फलम्
vasthralābho mahāthejo brahmajñānaṃ ca sadhguroḥ |
rājyālaṃkaraṇāvāpthirguruprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्रलाभः = वस्त्रों की प्राप्ति; महातेजः = महान् तेज/ओज; ब्रह्मज्ञानम् = ब्रह्म का ज्ञान; सद्गुरोः = सच्चे गुरु से; राज्य-अलंकरण-अवाप्तिः = राज-सम्मान/राजकीय आभूषण की प्राप्ति; गुरु-प्रत्यन्तरे = बृहस्पति की प्रत्यन्तर्दशा में (चन्द्र-अन्तर्दशा के भीतर, रवि-महादशा में); फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस गुरु-प्रत्यन्तर में जातक को वस्त्र-लाभ, महान् तेज, सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान और राजकीय अलंकरण की प्राप्ति होती है। यह चन्द्र-अन्तर्दशा का चौथा प्रत्यन्तर है, और यहाँ बृहस्पति का शुभ स्वभाव फल-कथन में प्रकट होता है — यह श्लोक का अपना कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering In Jupiter's pratyantara (within the Moon's antardaśā), the text states there is gain of garments, great luster, knowledge of Brahman from a true guru, and the attainment of royal insignia.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तकनीकी रूप से यह चन्द्र-अन्तर्दशा के नौ प्रत्यन्तरों में चौथा है (क्रम: चन्द्र, कुज, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र, रवि — विंशोत्तरी चक्रीय क्रम); इसकी अवधि श्लोक 61.1 के सूत्र से नियत होती है, फल की शुभता-अशुभता से नहीं। महादशा-स्वामी सूर्य है — यह इस अध्याय की अन्तर्दशाओं के रवि-अन्तर से आरम्भ होने से निश्चित होता है।

उदाहरण (worked example) रवि-महादशा = 6 वर्ष। चन्द्र-अन्तर्दशा = 6 × 10 ÷ 120 = 0.5 वर्ष (6 मास)। गुरु-प्रत्यन्तर = 0.5 × 16 ÷ 120 = 8/120 = 0.0667 वर्ष ≈ 24 दिन 8 घण्टे (365.25-दिन वर्ष)। यहाँ 16 = बृहस्पति के विंशोत्तरी वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्रत्यन्तर्दशा हमारे विंशोत्तरी दशा-इंजन (120-वर्ष चक्र, दशा-मान Ketu 7 · Venus 20 · Sun 6 · Moon 10 · Mars 7 · Rāhu 18 · Jupiter 16 · Saturn 19 · Mercury 17, Σ = 120) का सीधा विस्तार है। प्रत्यन्तर = अन्तर्दशा-मान × (प्रत्यन्तर-स्वामी के वर्ष ÷ 120) — शुद्ध अनुपात-अंकगणित; फल-कथन उससे अलग परत है, जिसे हम "शास्त्र कहता है" के रूप में रखते हैं, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

61.15
धुर्धिने लभथे पीदां वाथपिथ्थाध्विशेषथः ।
ढनढान्ययशोहानिः शनिप्रथ्यन्थरे भवेथ्
dhurdhine labhathe pīdāṃ vāthapiththādhviśeṣathaḥ |
ḍhanaḍhānyayaśohāniḥ śaniprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुर्दिने = कष्ट/अशुभ दिन में (पाठ-भेद: धुर्धिने); लभते = प्राप्त करता है; पीडां = पीड़ा/क्लेश; वात-पित्त-आदि-विशेषतः = वात-पित्त आदि दोषों से विशेष रूप से (पाठ-भेद संभव); धन-धान्य-यशः-हानिः = धन, अन्न-धान्य और यश की हानि; शनि-प्रत्यन्तरे = शनि की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस श्लोक में शनि की प्रत्यन्तर-दशा का फल कहता है। पाठ कहता है कि ऐसी दशा में कष्ट-दिवसों में पीड़ा का अनुभव विशेष रूप से वात-पित्त आदि दोष-संकेतों से जुड़ा बताया गया है। साथ ही धन, धान्य और यश में हानि का संकेत भी इसी प्रत्यन्तर से जोड़ा गया है। यह कथन फल-सूची का अंग है, न कि कोई निश्चित घटना का दावा।

English rendering The text states that in Saturn’s pratyantara the native may meet hardship and affliction—especially of the vāta-pitta type—and loss of wealth, grain, and renown. These are śāstra-phala indications, not deterministic forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्रत्यन्तर फल)। समय-मान स्वयं यहाँ नहीं दिया; प्रत्यन्तर-अवधि विंशोत्तरी में `(अन्तर्दशा-वर्ष × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120` से आती है, जहाँ शनि-महादशा = 19 वर्ष (Σ चक्र = 120)।

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61.16
पुथ्रजन्महयप्राप्थिर्विध्यालाभो महोन्नथिः ।
शुक्लवस्थ्रान्नलाभश्च बुढप्रथ्यन्थरे भवेथ्
puthrajanmahayaprāpthirvidhyālābho mahonnathiḥ |
śuklavasthrānnalābhaśca buḍhaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-जन्म = पुत्र का जन्म; हय-प्राप्तिः = अश्व/वाहन-लाभ (हय = अश्व); विद्या-लाभः = विद्या/ज्ञान की प्राप्ति; महा-उन्नतिः = बड़ी उन्नति; शुक्ल-वस्त्र-अन्न-लाभः = श्वेत वस्त्र और अन्न का लाभ; बुध-प्रत्यन्तरे = बुध की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र बुध-प्रत्यन्तर का फल मङ्गल-सूचक शब्दों में बाँधता है। पाठ कहता है—पुत्र-जन्म, अश्व/वाहन-प्राप्ति, विद्या-लाभ और महान् उन्नति। शुक्ल वस्त्र और अन्न का लाभ भी इसी प्रत्यन्तर से जोड़ा गया है। यह शुभ-फल-सूची है; वास्तविक जन्म-कुण्डली, दशा-क्रम और भाव-बल से ही पाठ का अनुप्रयोग जाँचा जाता है।

English rendering The text assigns to Mercury’s pratyantara the birth of a son, gain of horses (conveyance), acquisition of learning, great advancement, and the obtaining of white garments and food-grain. These remain phala-statements of the śāstra, not guaranteed events.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्रत्यन्तर फल)। बुध की महादशा-अवधि विंशोत्तरी में 17 वर्ष; प्रत्यन्तर-मान उसी अनुपात-गणित `(अन्तर् × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120` से निर्धारित होता है, न कि इस फल-श्लोक से।

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61.17
ब्राह्मणेन समं युध्ढमपम्त्ऱ्थ्युः सुखक्षयः ।
सर्वथ्र जायथे क्लेशः केथोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
brāhmaṇena samaṃ yudhḍhamapamtṟthyuḥ sukhakṣayaḥ |
sarvathra jāyathe kleśaḥ kethoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्राह्मणेन समम् = ब्राह्मण के साथ; युद्धम् = कलह/संघर्ष; अपमृत्युः = अकाल-मृत्यु का भय; सुख-क्षयः = सुख का क्षय; सर्वत्र क्लेशः जायते = सब ओर क्लेश उत्पन्न होता है; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस केतु-प्रत्यन्तर का फल इस प्रकार कहता है — ब्राह्मण से विवाद, अकाल-मृत्यु का भय, सुख का क्षय और सर्वत्र क्लेश। यह चन्द्र-अन्तर्दशा का सातवाँ प्रत्यन्तर है। "अपमृत्यु" जैसे शब्द शास्त्र के फल-कथन हैं — इन्हें भय-वचन या नियति नहीं, केवल पाठ की उक्ति मानें।

English rendering In Ketu's pratyantara, the text speaks of conflict with a brāhmaṇa, the danger of untimely death, decay of comfort, and affliction arising on every side.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्रत्यन्तर, चन्द्र-अन्तर, रवि-महादशा)। केवल दशा-स्थिति संख्यात्मक है (सातवाँ प्रत्यन्तर, केतु-वर्ष = 7); शेष सब फल-शब्दावली है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह अनुशासन है जिस पर हमारा दशा-निर्णय टिका है — गणित और व्याख्या को अलग रखना (CLAUDE.md + oracle नीति)। दशा-अवधि exact-`==` अंकगणित है; परन्तु "अपमृत्यु", "क्लेश" जैसे फल शास्त्र के दावे हैं, जिन्हें हम भविष्यवाणी के रूप में न प्रस्तुत करते हैं, न भय या उपाय-दबाव के रूप में।

61.18
ढनलाभो महथ्सौख्यं कन्याजन्म सुभोजनम् ।
प्रीथिश्च सर्वलोकेभ्यो भ्त्ऱ्गुप्रथ्यन्थरे विढोः
ḍhanalābho mahathsaukhyaṃ kanyājanma subhojanam |
prīthiśca sarvalokebhyo bhtṟguprathyanthare viḍhoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-लाभः = धन की प्राप्ति; महत्-सौख्यम् = महान् सुख; कन्या-जन्म = कन्या/पुत्री का जन्म; सु-भोजनम् = उत्तम भोजन; प्रीतिः = प्रीति/अनुराग; सर्व-लोकेभ्यः = सब लोगों से; भृगु-प्रत्यन्तरे = शुक्र (भृगु) की प्रत्यन्तर-दशा में; विदोः = चन्द्रमा की (अन्तर्/संदर्भ-दशा में; विदु = चन्द्र)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक स्पष्ट करता है कि फल चन्द्र की दशा-शृंखला के भीतर शुक्र-प्रत्यन्तर का है (`विदोः` = चन्द्र का)। शास्त्र कहता है—धन-लाभ, महान् सुख, कन्या-जन्म, उत्तम भोजन, और लोक-सामान्य से प्रीति। शुक्र का यह फल चन्द्र-संदर्भ में “स्नेह-सुख-समृद्धि” की दिशा दिखाता है; निश्चित घटना का प्रमाणपत्र नहीं।

English rendering Within the Moon’s period-context, Venus’s pratyantara is said to bring gain of wealth, great happiness, the birth of a daughter, fine food, and affection from people at large. So the śāstra states; so we report.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-संदर्भ में शुक्र-प्रत्यन्तर)। संदर्भ-अवधि: चन्द्र-महादशा = 10 वर्ष; शुक्र-महादशा-मान = 20 वर्ष; प्रत्यन्तर-वर्ष = `(चन्द्र-अन्तर्दशा-वर्ष × 20) ÷ 120` — अवधि दशा-इंजन से, फल इस श्लोक से।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र-महादशा में सूर्य-अन्तर्दशा चल रही हो: अन्तर्-अवधि = `(10 × 6) ÷ 120 = 0.5` वर्ष = 6 मास। उसी अन्तर् में शुक्र-प्रत्यन्तर = `(0.5 × 20) ÷ 120 = 1/12` वर्ष ≈ 30.44 दिन (वर्ष = 365.25 दिन मानकर; दशा-गणना में प्रायः सौर/सावन मान घोषित करें)। फल-पाठ इसी छोटे खंड पर “शुक्र-प्रत्यन्तर विदोः” के रूप में चढ़ता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में चन्द्र = 10, शुक्र = 20 — अनुपात-गणित शुद्ध है; फल-श्लोक अलग परत है। हम अवधि को `==` अनुपात से काटते हैं, फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं—गणित और व्याख्या की दीवार यहीं खड़ी रहती है।

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61.19
अन्नागमो वस्थ्रलाभः शथ्रुहानिः सुखागमः ।
सर्वथ्र विजयप्राप्थिः सूर्यप्रथ्यन्थरे विढोः
annāgamo vasthralābhaḥ śathruhāniḥ sukhāgamaḥ |
sarvathra vijayaprāpthiḥ sūryaprathyanthare viḍhoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्न-आगमः = अन्न की प्राप्ति/आमद; वस्त्र-लाभः = वस्त्र का लाभ; शत्रु-हानिः = शत्रुओं की हानि/पराजय; सुख-आगमः = सुख का आगमन; सर्वत्र = सब जगह; विजय-प्राप्तिः = विजय की प्राप्ति; सूर्य-प्रत्यन्तरे = सूर्य की प्रत्यन्तर-दशा में; विदोः = चन्द्रमा की (दशा-शृंखला में)।

हिन्दी भावार्थ फिर चन्द्र-संदर्भ (`विदोः`) में सूर्य-प्रत्यन्तर का फल कहा गया है। शास्त्र अन्न-आगम, वस्त्र-लाभ, शत्रु-हानि, सुख-प्राप्ति और सर्वत्र विजय—इन संकेतों को इस प्रत्यन्तर से जोड़ता है। सूर्य यहाँ “प्रकाश-विजय-पोषण” की फल-दिशा में पढ़ा गया है। यह भी फल-सूची है; दशा-गणित से समय तय होता है, फल से नहीं।

English rendering Again under the Moon’s context, the Sun’s pratyantara is stated to yield inflow of food, gain of clothing, harm to enemies, arrival of comfort, and victory on all sides. Traditional phala—not a guarantee we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-संदर्भ में सूर्य-प्रत्यन्तर)। सूर्य-महादशा-मान = 6 वर्ष; प्रत्यन्तर = `(अन्तर्दशा-वर्ष × 6) ÷ 120`। चन्द्र-महादशा (10 वर्ष) की किसी अन्तर्दशा के भीतर यह खंड बैठता है।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-महादशा → गुरु-अन्तर्दशा: अन्तर् = `(10 × 16) ÷ 120 = 4/3` वर्ष ≈ 1 वर्ष 4 मास। सूर्य-प्रत्यन्तर उसी में = `((4/3) × 6) ÷ 120 = 8/120 = 1/15` वर्ष ≈ 24.35 दिन। इसी अवधि पर श्लोक का “सूर्यप्रत्यन्तरे विदोः” फल चढ़ाया जाता है—ayanāṃśa यहाँ अवधि नहीं बदलता; नक्षत्र-अंश-शेष महादशा-प्रारंभ तय करता है।

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61.20
शथ्रुभीथिं कलिं घोरं रक्थस्रावं म्त्ऱ्थेर्भयम् ।
कुजस्यान्थर्धशायां च कुजप्रथ्यन्थरे वधेथ्
śathrubhīthiṃ kaliṃ ghoraṃ rakthasrāvaṃ mtṟtherbhayam |
kujasyānthardhaśāyāṃ ca kujaprathyanthare vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-भीतिम् = शत्रु से भय; कलिम् = कलह/विवाद; घोरम् = तीव्र/भीषण; रक्त-स्रावम् = रक्तस्राव (शास्त्र-संकेत; चिकित्सकीय निदान नहीं); मृतेः भयम् = मृत्यु का भय; कुजस्य अन्तर्दशायाम् = मङ्गल की अन्तर्दशा में; च = और; कुज-प्रत्यन्तरे = मङ्गल की प्रत्यन्तर-दशा में; वदेत्/भवेत् = कहे / होता है (पाठ-भेद संभव: वधेत्)।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र दो स्तर एक साथ बाँधता है—मङ्गल की अन्तर्दशा और उसी में मङ्गल का प्रत्यन्तर। फल-सूची में शत्रु-भय, घोर कलह, रक्तस्राव-संकेत और मृत्यु-भय गिनाए गए हैं। यह “कुज-कुज” संयोग (अन्तर् = प्रत्यन्तर = मङ्गल) की तीव्रता का शास्त्र-वर्णन है। हम इसे भय-वाणी नहीं बनाते; दशा-घोंसला (nesting) और फल-पाठ अलग-अलग परतों में रखते हैं।

English rendering The text declares that in Mars’s antardaśā and again in Mars’s pratyantara one should speak of fear from enemies, fierce strife, bleeding, and dread of death. Nested Kuja-Kuja timing plus phala—report, do not weaponise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संरचनात्मक दशा-गणित यहाँ स्पष्ट है। विंशोत्तरी: मङ्गल-महादशा = 7 वर्ष। मङ्गल-अन्तर्दशा (किसी महादशा P में) = `(P-वर्ष × 7) ÷ 120`। उसी अन्तर् के भीतर मङ्गल-प्रत्यन्तर = `(अन्तर्-वर्ष × 7) ÷ 120`। जब महादशा भी मङ्गल हो: अन्तर्-कुज = `(7 × 7) ÷ 120 = 49/120` वर्ष; प्रत्यन्तर-कुज = `((49/120) × 7) ÷ 120 = 343/14400` वर्ष ≈ 8.70 दिन।

उदाहरण (worked example) मङ्गल-महादशा (7 वर्ष) → मङ्गल-अन्तर् = `49/120` वर्ष ≈ 149.05 दिन। उसमें मङ्गल-प्रत्यन्तर = `343/14400` वर्ष ≈ 8.70 दिन (वर्ष = 365.25 d)। इसी छोटे “कुज-कुज-कुज” खंड पर श्लोक का फल-पाठ पारंपरिक रूप से चढ़ता है। नक्षत्र-शेष से महादशा-प्रारंभ; ayanāṃśa जन्म-चन्द्र-देशांतर पर निर्भर—अवधि-अनुपात स्वयं ayanāṃśa-मुक्त है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक दशा-इंजन की तीन परतों—महा / अन्तर् / प्रत्यन्तर—को एक फल-वाक्य में जोड़ता है। हम अवधि को विंशोत्तरी अनुपात `(× ग्रह-वर्ष) ÷ 120` से `==` काटते हैं; 7 + 20 + 6 + 10 + 7 + 18 + 16 + 19 + 17 = 120 वर्ष की श्रृंखला ज्यों की त्यों। फल को oracle नहीं माना—केवल काल-खंड सत्यापित होता है।

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61.21
बन्ढनं राजभङ्गश्च ढनहानिः कुभोजनम् ।
कलहः शथ्रुभिर्निथ्यं राहुप्रथ्यन्थरे भवेथ्
banḍhanaṃ rājabhaṅgaśca ḍhanahāniḥ kubhojanam |
kalahaḥ śathrubhirnithyaṃ rāhuprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनम् = बन्धन/कैद-संकेत; राज-भङ्गः = राज-अनुग्रह का भङ्ग / अधिकार-हानि; धन-हानिः = धन की हानि; कु-भोजनम् = अहितकर/हीन भोजन; कलहः = झगड़ा; शत्रुभिः = शत्रुओं के साथ; नित्यम् = निरंतर; राहु-प्रत्यन्तरे = राहु की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र राहु-प्रत्यन्तर का फल बन्धन, राजभङ्ग, धन-हानि, कुभोजन और शत्रुओं से नित्य कलह—इन शब्दों में कहता है। यह राहु-दशा-फल की पारंपरिक कठोर सूची है। अध्ययन में इसे “संकट-संकेत की भाषा” मानकर कुण्डली, भाव और पूरी दशा-शृंखला के साथ तोला जाता है; न तो निश्चित भविष्यवाणी, न भय-विक्रय।

English rendering In Rāhu’s pratyantara the text states bondage, rupture of royal favour, loss of wealth, poor food, and constant quarrel with enemies. Śāstra-phala only—held without fear-commerce or forced remedies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-प्रत्यन्तर फल)। राहु-महादशा = 18 वर्ष (विंशोत्तरी); प्रत्यन्तर-अवधि = `(अन्तर्दशा-वर्ष × 18) ÷ 120`। श्लोक केवल फल देता है; वर्ष-मान चक्र-सूची से आता है।

61.22
मथिनाशस्थठा धुःखं सन्थापः कलहो भवेथ् ।
विफलं चिन्थिथं सर्वं गुरोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
mathināśasthaṭhā dhuḥkhaṃ santhāpaḥ kalaho bhaveth |
viphalaṃ cinthithaṃ sarvaṃ guroḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मति-नाश = बुद्धि/विवेक का क्षय; दुःख = क्लेश; सन्ताप = मानसिक ताप; कलह = विवाद-झगड़ा; विफलं चिन्तितं = सोची-समझी योजनाओं का निष्फल होना; सर्वम् = सम्पूर्ण; गुरोः = बृहस्पति का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर-दशा (अन्तर्दशा के भीतर की तीसरी स्तर की अवधि) में; भवेत् = शास्त्रानुसार घटित होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु के प्रत्यन्तर में मति-नाश, दुःख, सन्ताप और कलह का योग बनता है। जो चिन्तन-योजना की जाती है, वह निष्फल होने का उल्लेख है। यह फल-कथन गुरु-प्रत्यन्तर की सामान्य प्रवृत्ति के रूप में दिया गया है, किसी निश्चित व्यक्तिगत भविष्यवाणी के रूप में नहीं। पाठ-भेद संभव जहाँ “मतिनाश”/“मथिनाश” जैसी लिपि-विकृतियाँ हों।

English rendering The text states that in Jupiter’s pratyantara there arise loss of clear judgment, sorrow, mental heat, and quarrel. Whatever is planned is said to prove fruitless. This is a traditional phala statement for that sub-period layer, not a deterministic personal forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-प्रत्यन्तर)। प्रत्यन्तर-अवधि स्वयं इस श्लोक में नहीं दी; वह विंशोत्तरी-अनुपात से आती है: प्रत्यन्तर-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्दशा-ग्रह-वर्ष × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ (120 × 120), जहाँ गुरु = 16 वर्ष (चक्र-योग 120)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में गुरु-महादशा 16 वर्ष है; प्रत्यन्तर उसकी अन्तर्दशा के भीतर का तीसरा स्तर है और शुद्ध अनुपात-गणित से निकलता है। फल-वाक्य शास्त्र का कथन है; इंजन केवल काल-अवधि `==` quantifies, फल को नियति नहीं बनाता।

61.23
स्वामिनाशस्थठा पीदा ढनहानिर्न्महाभयम् ।
वैकल्यं कलहस्थ्रासो शनेः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
svāmināśasthaṭhā pīdā ḍhanahānirnmahābhayam |
vaikalyaṃ kalahasthrāso śaneḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वामि-नाश = स्वामी/आश्रयदाता संबंधी हानि या विच्छेद का उल्लेख; तथा = और; पीडा = कष्ट; धन-हानि = अर्थ-क्षय; महा-भयम् = बड़ा भय; वैकल्यम् = अंग-वैकल्य/अपूर्णता का पारंपरिक फल-शब्द; कलह-त्रासः = झगड़े से उत्पन्न त्रास; शनेः = शनि का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = शास्त्र कहता है कि होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शनि के प्रत्यन्तर में स्वामिनाश, पीड़ा, धनहानि और महाभय का कथन करता है। वैकल्य, कलह और त्रास का भी उल्लेख है। यह शनि-प्रत्यन्तर के फल-समुच्चय का पाठ है; इसे रोग-निदान या नियति-घोषणा के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। लिपि में “स्वामिनाशस्थठा” आदि स्थानों पर पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in Saturn’s pratyantara there occur loss connected with a master or protector, suffering, loss of wealth, and great fear. Impairment, quarrel, and alarm are also listed. These are the śāstra’s phala claims for that period-layer, not medical or fatal certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्रत्यन्तर)। शनि-वर्ष विंशोत्तरी में 19; प्रत्यन्तर-अवधि = (MD × AD × 19) ÷ 14400 वर्ष-इकाई में (120² = 14400), जहाँ MD/AD संबंधित महा/अन्तर्दशा-वर्ष हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-इंजन शनि = 19 वर्ष को 120-वर्ष योग में पिन करता है; प्रत्यन्तर उसी अनुपात से कटता है। इस श्लोक का विषय फल है, bindu या bala नहीं — इसलिए काल-सीमा गणित से, फल-शब्द शास्त्र-वाणी से, दोनों अलग रखे जाते हैं।

61.24
सर्वठा बुध्ढिनाशश्च ढनहानिर्ज्वरस्थनौ ।
वस्थ्रान्नसुह्त्ऱ्धां नाशो बुढप्रथ्यन्थरे भवेथ्
sarvaṭhā budhḍhināśaśca ḍhanahānirjvarasthanau |
vasthrānnasuhtṟdhāṃ nāśo buḍhaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वथा = हर प्रकार से; बुद्धि-नाशः = बुद्धि-क्षय का उल्लेख; च = और; धन-हानिः = अर्थ-हानि; ज्वरः = ज्वर (पारंपरिक फल-शब्द); तनोः / तनौ = शरीर/तनु संबंधी (पाठ-भेद संभव); वस्त्र-अन्न-सुहृदाम् = वस्त्र, अन्न और मित्रों का; नाशः = नाश; बुध-प्रत्यन्तरे = बुध के प्रत्यन्तर में; भवेत् = शास्त्रानुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध के प्रत्यन्तर में बुद्धिनाश और धनहानि, तथा तन संबंधी ज्वर-जैसा कष्ट हो सकता है। वस्त्र, अन्न और सुहृदों के नाश का भी उल्लेख है। यह बुध-प्रत्यन्तर का फल-समुच्चय है; चिकित्सा या आर्थिक सलाह नहीं। “ज्वरस्थनौ” जैसे पद पर पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in Mercury’s pratyantara there is thorough loss of clear intellect, loss of wealth, and feverish affliction of the body. Destruction of clothing, food, and friends is also named. Report the phala as the śāstra’s claim, not as a diagnosis or financial forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्रत्यन्तर)। बुध = 17 वर्ष (विंशोत्तरी); प्रत्यन्तर-अवधि अनुपात = (MD × AD × 17) ÷ 14400 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) बुध की 17-वर्ष महादशा और उसके नीचे के अन्तर्/प्रत्यन्तर स्तर ratio-arithmetic से निर्धारित होते हैं (Σ mahādaśā = 120)। फल-सूची oracle का विषय नहीं; अवधि-गणित exact-`==` अनुशासन का है।

61.25
आलस्य च शिरःपीदा पापरोगोऽपम्त्ऱ्थ्युक्त्ऱ्थ् ।
राजभीथिः शस्थ्रघाथो केथोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
ālasya ca śiraḥpīdā pāparogo'pamtṟthyuktṟth |
rājabhīthiḥ śasthraghātho kethoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आलस्यम् = आलस्य; च = और; शिरः-पीडा = शिरः-कष्ट (पारंपरिक फल); पाप-रोगः = पाप-रोग (शास्त्र-शब्द, चिकित्सा-निदान नहीं); अप-मृत्यु-कृत् = अपमृत्यु-संकेत देने वाला (पाठ का कठोर फल-पद); राज-भीतिः = राज/शासन से भय; शस्त्र-घातः = शस्त्र से घात; केतोः = केतु का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; भवेत् = शास्त्र कहता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र केतु के प्रत्यन्तर में आलस्य, शिरःपीड़ा, पापरोग और अपमृत्यु-संकेत का उल्लेख करता है। राजभीति और शस्त्रघात भी गिनाए गए हैं। ये कठोर फल-पद पाठ की भाषा हैं; इन्हें डर पैदा करने वाली भविष्यवाणी या चिकित्सा-निर्णय के रूप में नहीं लेना चाहिए। “अपमृत्युकृत्” पद पर पाठ-भेद/लिपि-विकृति संभव।

English rendering The text states that in Ketu’s pratyantara there appear indolence, head-pain, a “pāpa-roga” indication, and language of untimely peril. Fear of authority and injury by weapon are also listed. Render these as the śāstra’s phala claims, without fear-commerce or medical endorsement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्रत्यन्तर)। केतु = 7 वर्ष विंशोत्तरी में; प्रत्यन्तर = (MD × AD × 7) ÷ 14400 वर्ष। (केतु-वर्ष महदशा-क्रम के आरंभ में स्थित; चक्र-योग 120।)

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी-कुंजी: केतु 7 → शुक्र 20 → सूर्य 6 → चन्द्र 10 → मंगल 7 → राहु 18 → गुरु 16 → शनि 19 → बुध 17। प्रत्यन्तर उसी श्रृंखला का तीसरा स्तर है; फल-वाक्य इंजन से “सिद्ध” नहीं किए जाते।

61.26
चाण्दालाथ्सङ्कतस्थ्रासो राजशास्थ्रभयं भवेथ् ।
अथिसाराऽठ वमनं भ्त्ऱ्गोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
cāṇdālāthsaṅkatasthrāso rājaśāsthrabhayaṃ bhaveth |
athisārā'ṭha vamanaṃ bhtṟgoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाण्डालात् = चाण्डाल से; सङ्कट-त्रासः = संकट का त्रास; राज-शास्त्र-भयम् = राजदण्ड/राज-आज्ञा का भय (पाठ-भेद संभव: "राज-शस्त्र-भयम्" = राजा के शस्त्र का भय); अतिसारः = अतिसार (उदर-विकार); अथ वमनम् = तथा वमन; भृगोः प्रत्यन्तरे = शुक्र (भृगु) की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुज-अन्तर्दशा के इस शुक्र-प्रत्यन्तर में चाण्डाल से संकट का त्रास, राजदण्ड का भय, तथा अतिसार और वमन होते हैं। "राजशास्त्र/राजशस्त्र" पद में पाठ-भेद संभव है — अर्थ क्रमशः राज-आज्ञा का भय अथवा राज-शस्त्र का भय। यह कुज-अन्तर का सातवाँ प्रत्यन्तर है।

English rendering In Venus's pratyantara, the text speaks of terror of danger from a caṇḍāla, fear of royal punishment, dysentery, and vomiting.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र-वर्ष = 20 होने से यह कुज-अन्तर का दीर्घतम प्रत्यन्तर = 0.35 × 20 ÷ 120 ≈ 21 दिन 8 घण्टे; इसके बाद रवि व चन्द्र-प्रत्यन्तर शेष रहते हैं (यहाँ अध्याय के आगे के श्लोकों में)।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरी प्रत्यन्तर-श्रृंखला — रवि-महादशा के भीतर प्रत्येक अन्तर्दशा के नौ प्रत्यन्तर — हमारे दशा-इंजन में एक ही सूत्र से निकलती है: प्रत्यन्तर = महादशा × अन्तर × प्रत्यन्तर-वर्ष ÷ 120² (Σ दशा-वर्ष = 120)। अवधियाँ exact-`==` अंकगणित से पुनरुत्पाद्य हैं; परन्तु "चाण्डाल-त्रास", "अतिसार", "वमन" जैसे शब्द शास्त्र के फल-कथन हैं — हम इन्हें गणित से पृथक् रखते हैं और भविष्यवाणी, भय या उपाय-दबाव के रूप में प्रस्तुत नहीं करते।

61.27
भूमिलाभोऽर्ठसम्पथ्थिः सन्थोषो मिथ्रसङ्गथिः ।
सर्वथ्र सुखमाप्नोथि रवेः प्रथ्यन्थरे जनः
bhūmilābho'rṭhasampaththiḥ santhoṣo mithrasaṅgathiḥ |
sarvathra sukhamāpnothi raveḥ prathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूमि-लाभः = भूमि का लाभ; अर्थ-सम्पत्तिः = धन-संपत्ति; सन्तोषः = संतोष; मित्र-सङ्गतिः = मित्रों का संग; सर्वत्र = सब ओर; सुखम् = सुख; आप्नोति = प्राप्त करता है; रवेः = सूर्य का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; जनः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रवि के प्रत्यन्तर में भूमि-लाभ, अर्थ-संपत्ति, संतोष और मित्र-संगति होती है। जन सर्वत्र सुख प्राप्त करता है — यह सूर्य-प्रत्यन्तर का शुभ फल-समुच्चय है। पूर्ववर्ती कठिन फल-श्लोकों के बाद यह विपरीत ध्रुव है; फिर भी यह पाठ का कथन है, गारंटी नहीं।

English rendering The text states that in the Sun’s pratyantara a person gains land, wealth, contentment, and the company of friends. Happiness is said to be obtained everywhere. This is the śāstra’s auspicious phala for that layer, not a promised outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-प्रत्यन्तर, शुभ)। सूर्य = 6 वर्ष विंशोत्तरी में; प्रत्यन्तर = (MD × AD × 6) ÷ 14400 वर्ष — सात ग्रहों/नवांश-क्रम में छोटी महादशा-इकाइयों में से एक।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र-महादशा (10 वर्ष) में गुरु-अन्तर्दशा चल रही हो, और उसके भीतर रवि-प्रत्यन्तर माँगें। अन्तर्दशा-वर्ष = (10 × 16) ÷ 120 = 16/12 = 4/3 ≈ 1.333 वर्ष। रवि-प्रत्यन्तर = (10 × 16 × 6) ÷ 14400 = 960 ÷ 14400 = 0.0666… वर्ष ≈ 24.33 दिन (वर्ष = 365.25 दिन मानकर ≈ 24.3 दिन; दशा-इंजन अक्सर सौर/सावन दिन-परिपाटी घोषित करता है — convention declare करें)। फल-शब्द इस संख्या से “सिद्ध” नहीं होते; केवल अवधि सटीक है।

हमारा डिकोड (Our Decode) सूर्य = 6, चन्द्र = 10, …, Σ = 120 — यही पिन की गई विंशोत्तरी-श्रृंखला है। प्रत्यन्तर त्रि-गुण अनुपात (MD × AD × PD)/120² से निकलता है; फलादेश अलग परत है।

61.28
याम्यां धिशि भवेल्लाभः सिथवस्थ्रविभूषणम् ।
संसिध्ढिः सर्वकार्याणां विढोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
yāmyāṃ dhiśi bhavellābhaḥ sithavasthravibhūṣaṇam |
saṃsidhḍhiḥ sarvakāryāṇāṃ viḍhoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्यां दिशि = दक्षिण दिशा में (यम = दक्षिण); भवेत् = होता है; लाभः = लाभ; सित-वस्त्र = श्वेत/उज्ज्वल वस्त्र; विभूषणम् = आभूषण; संसिद्धिः = पूर्ण सिद्धि; सर्व-कार्याणाम् = सभी कार्यों की; विधोः = चन्द्र (विधु) का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; भवेत् = शास्त्रानुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि विधु (चन्द्र) के प्रत्यन्तर में याम्य दिशा में लाभ होता है। सितवस्त्र और विभूषण का योग, तथा सर्व कार्यों की संसिद्धि का उल्लेख है। यह चन्द्र-प्रत्यन्तर का शुभ फल-पाठ है; दिशा-लाभ पारंपरिक फल-भाषा है, न कि व्यापार-गारंटी।

English rendering The text states that in the Moon’s (Vidhu’s) pratyantara gain arises in the southern quarter. White garments and ornaments are indicated, and success in all undertakings is named. Again, report the śāstra’s phala; do not convert it into a commercial or legal promise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्रत्यन्तर, शुभ + दिग्-लाभ)। चन्द्र = 10 वर्ष; प्रत्यन्तर = (MD × AD × 10) ÷ 14400 वर्ष। नक्षत्र-शेष से महादशा-आरंभ: बीज = (नक्षत्र में शेष अंश ÷ 13°20′) × महादशा-वर्ष — यही विंशोत्तरी का प्रथम कट; प्रत्यन्तर उसके बाद का स्तर।

उदाहरण (worked example) शुक्र-महादशा (20 वर्ष) + बुध-अन्तर्दशा में चन्द्र-प्रत्यन्तर: अवधि = (20 × 17 × 10) ÷ 14400 = 3400 ÷ 14400 = 17/72 वर्ष ≈ 0.2361 वर्ष ≈ 86.2 दिन (365.25-दिन वर्ष पर)। अयनांश/नक्षत्र-सीमा महादशा-आरंभ के लिए आवश्यक; प्रत्यन्तर-फल स्वयं अयनांश-स्वतंत्र फल-वाक्य है।

हमारा डिकोड (Our Decode) चन्द्र-महादशा 10 वर्ष और नक्षत्र-अंश से balance-cut दशा-इंजन का मूल है; प्रत्यन्तर उसी 120-वर्ष अनुपात-स्तंभ पर बैठता है। अष्टकवर्ग 48/49/…/337 या षोडश-वर्ग यहाँ नहीं चलते — यह शुद्ध दशा-फल अध्याय की पंक्ति है; गणित अवधि का, फल पाठ का।

61.29
बन्ढनं बहुढा रोगो बहुघाथः सुह्त्ऱ्ध्भयम् ।
राह्वन्थर्धशायां च ज्ञेयं राह्वन्थरे फलम्
banḍhanaṃ bahuḍhā rogo bahughāthaḥ suhtṟdhbhayam |
rāhvanthardhaśāyāṃ ca jñeyaṃ rāhvanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनम् = बन्दीकरण, कैद; बहुधा रोगः = अनेक प्रकार के रोग; बहु-घातः = बहुत आघात/चोट; सुहृद्-भयम् = मित्रों को/से भय; राह्वन्तर्दशायाम् = राहु की अन्तर्दशा में; राह्वन्तरे (= राहु-प्रत्यन्तरे) = राहु की ही प्रत्यन्तर्दशा में; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की अन्तर्दशा में राहु की ही प्रत्यन्तर्दशा के समय बन्धन, अनेक प्रकार के रोग, बहुत आघात तथा मित्रों के प्रति भय — ये अशुभ फल कहे गए हैं। यह शास्त्र का कथन है, कोई अवश्यम्भावी नियति नहीं; इसे भय या दबाव के रूप में न लें।

English rendering The text states that in Rahu's own pratyantara within Rahu's antardaśā, confinement, manifold diseases, many blows, and danger touching friends are the results to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ)। श्लोक में अंक नहीं; गणित केवल यह है कि यह प्रत्यन्तर विम्शोत्तरी की तीसरी सीढ़ी (महादशा → अन्तर्दशा → प्रत्यन्तर) है, जिसकी अवधि = अन्तर्दशा-अवधि × (प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय हमारे विम्शोत्तरी अनुपात-इंजन (दोसियर §3, 120-वर्ष चक्र) की तीसरी परत — प्रत्यन्तर्दशा — का फल-कोश है। प्रत्यन्तर स्वयं कोई नया स्थिरांक नहीं लाता: यह वही शुद्ध अनुपात-अंकगणित है जो अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 में चला, बस एक स्तर और नीचे। फल का शुभ/अशुभ पाठ अलग रखा जाता है और उसे "शास्त्र कहता है" के रूप में ही उद्धृत किया जाता है — कभी नियति के रूप में नहीं।

61.30
सर्वथ्र लभथे मानं गजाश्वं च ढनागमम् ।
राहोरन्थर्धशायां च गुरोः प्रथ्यन्थरे जनः
sarvathra labhathe mānaṃ gajāśvaṃ ca ḍhanāgamam |
rāhoranthardhaśāyāṃ ca guroḥ prathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वत्र मानम् = सर्वत्र सम्मान; गज-अश्वम् = हाथी और घोड़ा; धन-आगमम् = धन का आगमन; राहोः अन्तर्दशायाम् = राहु की अन्तर्दशा में; गुरोः प्रत्यन्तरे = गुरु (बृहस्पति) की प्रत्यन्तर्दशा में; जनः = जातक; लभते = पाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की अन्तर्दशा में बृहस्पति की प्रत्यन्तर्दशा के समय जातक को सर्वत्र मान-सम्मान, हाथी-घोड़े (वाहन-वैभव) तथा धन का आगमन प्राप्त होता है। यह अनुकूल फल-कथन है।

English rendering The text states that during Jupiter's pratyantara within Rahu's antardaśā the native gains honour everywhere, elephants and horses, and an inflow of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। श्लोक केवल फल गिनाता है; इस खण्ड की लम्बाई ही गणनीय राशि है, ग्रह-वर्ष (गुरु = 16) से अनुपात द्वारा।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारे अनुपात-इंजन से इस खण्ड की अवधि दिखाई जा सकती है (परिपाटी: यह अध्याय ब्लॉक-क्रम से सूर्य महादशा प्रतीत होता है, सूर्य = 6 वर्ष)। राहु-अन्तर्दशा = (6 × 18)/120 = 0.9 वर्ष; उसमें गुरु-प्रत्यन्तर = 0.9 × (16/120) = 0.12 वर्ष ≈ 43.8 दिन (1 वर्ष = 365.25 दिन)। अनुपात परिपाटी-निरपेक्ष है; केवल दिन-गणना वर्ष-मान की परिपाटी पर निर्भर है — इसीलिए दोसियर की अनुशासन-रेखा "जहाँ संख्या परिपाटी पर टिके, परिपाटी घोषित करो" यहाँ लागू है।

61.31
बन्ढनं जायथे घोरं सुखहानिर्महध्भयम् ।
प्रथ्यहं वाथपीदा च शनेः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
banḍhanaṃ jāyathe ghoraṃ sukhahānirmahadhbhayam |
prathyahaṃ vāthapīdā ca śaneḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनम् = अवरोध/कारा; जायते घोरम् = भीषण उत्पन्न होता है; सुखहानिः = सुख की हानि; महाद्भयम् = महान् भय; प्रत्यहम् = प्रतिदिन; वातपीडा = वात-संबंधी पीड़ा (शास्त्रीय शारीरिक-वर्ग भाषा; चिकित्सा-निदान नहीं); शनेः प्रत्यन्तरे = शनि की प्रत्यन्तरदशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु-अन्तर्दशा में शनि की प्रत्यन्तरदशा में भीषण बन्धन, सुखहानि, महान् भय और प्रतिदिन वात-पीड़ा — ऐसे फल होते हैं। यह फल-सूची है, सुनिश्चित भाग्य-घोषणा नहीं; “वातपीडा” को शास्त्रीय शारीरिक-वर्ग संकेत के रूप में पढ़ें, चिकित्सा-निदान के रूप में नहीं।

English rendering The text states that in Saturn’s pratyantara (within the Rāhu antardaśā context of this section) there arises terrible bondage, loss of comfort, great fear, and daily vāta-pain — reported as the śāstra’s phala list, not as a medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्रत्यन्तर)। अवधि-अनुपात अलग; यहाँ केवल फल।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-अन्तर (२.७ वर्ष) में शनि-प्रत्यन्तर = (२.७ × १९)/१२० = ०.४२७५ वर्ष ≈ ५ महीने ४ दिन। गणना `==` अनुपात से; फल शास्त्र का कथन — हम अवधि मापते हैं, फल को नियति नहीं ठहराते।

61.32
सर्वथ्र बहुढा लाभः स्थ्रीसङ्गाच्च विशेषथः ।
परधेशभवा सिध्ढिर्बुढप्रथ्यन्थरे भवेथ्
sarvathra bahuḍhā lābhaḥ sthrīsaṅgācca viśeṣathaḥ |
paradheśabhavā sidhḍhirbuḍhaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वत्र बहुधा लाभः = सर्वत्र अनेक प्रकार का लाभ; स्त्रीसङ्गात् = स्त्री-संगति से; विशेषतः = विशेष रूप से; परदेशभवा सिद्धिः = परदेश से उत्पन्न सफलता; बुधप्रत्यन्तरे = बुध की प्रत्यन्तरदशा में; भवेत् = होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की प्रत्यन्तरदशा में सर्वत्र बहुधा लाभ होता है, विशेषतः स्त्री-संगति से, तथा परदेश-संबंधी सिद्धि मिलती है। यह राहु-अन्तर के भीतर बुध-प्रत्यन्तर का शुभ फल-वर्णन है; “परदेश” यहाँ स्थान/यात्रा/बाह्य-संपर्क के संकेत के रूप में पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that in Mercury’s pratyantara there is manifold gain everywhere — especially through association with women — and success arising from a foreign land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्रत्यन्तर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-अन्तर में बुध-प्रत्यन्तर = (२.७ × १७)/१२० = ०.३८२५ वर्ष ≈ ४ महीने १८ दिन। १२०-वर्ष चक्र का शुद्ध अनुपात; फल-पाठ अलग परत।

61.33
बुध्ढिनाशो भयं विघ्नो ढनहानिर्महध्भयम् ।
सर्वथ्र कलहोध्वेगौ केथोः प्रथ्यन्थरे फलम्
budhḍhināśo bhayaṃ vighno ḍhanahānirmahadhbhayam |
sarvathra kalahodhvegau kethoḥ prathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुद्धिनाशः = बुद्धि-क्षय/विचार-भ्रंश (शास्त्रीय संकेत); भयम् = भय; विघ्नः = बाधा; धनहानिः = धन की हानि; महाद्भयम् = महान् भय; सर्वत्र कलहः = सर्वत्र झगड़ा; उद्वेगौ = उद्वेग/व्याकुलता; केतोः प्रत्यन्तरे फलम् = केतु की प्रत्यन्तरदशा का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की प्रत्यन्तरदशा में बुद्धिनाश, भय, विघ्न, धनहानि, महान् भय तथा सर्वत्र कलह और उद्वेग — यही फल जानने चाहिए। यह कठोर फल-सूची है; इसे दबाव या भय-व्यापार के रूप में नहीं, शास्त्र के अपने कथन के रूप में रखा जाता है।

English rendering The text states that the results of Ketu’s pratyantara are destruction of clear judgment, fear, obstacles, loss of wealth, great fear, and everywhere quarrel and agitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्रत्यन्तर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-अन्तर में केतु-प्रत्यन्तर = (२.७ × ७)/१२० = ०.१५७५ वर्ष ≈ १ महीना २७ दिन। छोटी खिड़की, पर विंशोत्तरी क्रम में निश्चित; इंजन अनुपात से अवधि बाँधता है, फल को “अटल भविष्य” नहीं बनाता।

61.34
योगिनीभ्यो भयं भूयाधश्वहानिः कुभोजनम् ।
स्थ्रीनाशः कुलजं शोकं शुक्रप्रथ्यन्थरे भवेथ्
yoginībhyo bhayaṃ bhūyādhaśvahāniḥ kubhojanam |
sthrīnāśaḥ kulajaṃ śokaṃ śukraprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योगिनीभ्यः भयम् = योगिनियों से भय (शास्त्रीय/लोक-धार्मिक संकेत); भूयात् = अधिक हो; अश्वहानिः = अश्व/वाहन की हानि; कुभोजनम् = अनुचित/अशुद्ध भोजन; स्त्रीनाशः = स्त्री-संबंधी हानि; कुलजं शोकम् = कुल/वंश से उत्पन्न शोक; शुक्रप्रत्यन्तरे = शुक्र की प्रत्यन्तरदशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की प्रत्यन्तरदशा में योगिनियों से भय बढ़े, अश्वहानि, कुभोजन, स्त्री-संबंधी हानि और कुलज शोक — ऐसे फल हों। यहाँ शुक्र को केवल “शुभ” नहीं माना गया; राहु-अन्तर के भीतर शुक्र-प्रत्यन्तर का यह विशिष्ट फल-वर्णन है। पाठ-भेद संभव “योगिनी” के अर्थ-विस्तार पर।

English rendering The text states that in Venus’s pratyantara there may be great fear from yoginīs, loss of horses, bad food, harm connected with women, and sorrow arising in the family line.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-प्रत्यन्तर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) राहु-अन्तर में शुक्र-प्रत्यन्तर = (२.७ × २०)/१२० = ०.४५ वर्ष = ५ महीने १२ दिन। शुक्र की महादशा-वर्ष (२०) अनुपात में सबसे लंबी प्रत्यन्तर-खंडों में से एक; अवधि गणित, फल शास्त्र।

61.35
ज्वररोगो महाभीथिः पुथ्रपौथ्राधिपीदनम् ।
अल्पम्त्ऱ्थ्युः प्रमाधश्च रवेः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
jvararogo mahābhīthiḥ puthrapauthrādhipīdanam |
alpamtṟthyuḥ pramādhaśca raveḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वर-रोगः = ज्वर (बुखार) का रोग; महा-भीतिः = महान् भय; पुत्र-पौत्र-आदि-पीडनम् = पुत्र-पौत्र आदि को कष्ट; अल्प-मृत्युः = अल्प-मृत्यु (मृत्यु-तुल्य गम्भीर संकट, "छोटी मृत्यु"); प्रमादः = असावधानी/दुर्घटना; रवेः प्रत्यन्तरे = सूर्य की प्रत्यन्तर्दशा में (राहु-अन्तर्दशा के भीतर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की अन्तर्दशा में सूर्य की प्रत्यन्तर्दशा के समय ज्वर, महान् भय, पुत्र-पौत्रादि को पीड़ा, मृत्यु-तुल्य संकट तथा प्रमादजनित हानि — ऐसे अशुभ फल कहे गए हैं। "अल्प-मृत्यु" शास्त्र का पारिभाषिक फल-वचन है (गम्भीर आरोग्य-संकट), न कि कोई निश्चित मृत्यु-भविष्यवाणी।

English rendering The text states that in the Sun's pratyantara within Rahu's antardaśā there occur fever, great fear, distress to children and grandchildren, a grave brush with death (alpa-mṛtyu), and mishap through carelessness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ)। श्लोक में कोई संख्या नहीं; एकमात्र गणनीय राशि इस सूर्य-प्रत्यन्तर की अवधि है (सूर्य = 6 वर्ष का अनुपात)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारी मूल अनुशासन-रेखा का उदाहरण है (दोसियर §5): गणना को व्याख्या से अलग रखो। इस खण्ड की अवधि हमारे विम्शोत्तरी इंजन से `==` परिशुद्धि पर निकलती है (सहनशीलता-बैंड नहीं — बैंड एक बार वास्तविक −1 छिपा चुका है); पर "अल्प-मृत्यु/महाभीति" जैसे शब्द शास्त्र के फल-वचन हैं, जिन्हें हम "शास्त्र कहता है" कहकर ही उद्धृत करते हैं — कभी नियति, निश्चितता या चिकित्सा-भविष्यवाणी के रूप में नहीं, और कभी भय-दबाव के साथ नहीं।

61.36
उध्वेगकलहो चिन्था मानहानिर्महध्भयम् ।
पिथुर्विकलथा धेहे विध्योः रवेः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
udhvegakalaho cinthā mānahānirmahadhbhayam |
pithurvikalathā dhehe vidhyoḥ raveḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उद्वेग-कलहः = उद्वेग तथा कलह; चिन्ता = चिन्ता; मान-हानिः = सम्मान की हानि; महद्-भयम् = महान् भय; पितुः विकलता देहे = पिता के शरीर में विकलता/रुग्णता; प्रत्यन्तर-स्वामी = क्रमानुसार विधु (चन्द्र) की प्रत्यन्तर्दशा (राहु-अन्तर्दशा के भीतर) — पाठ "विध्योः रवेः" दूषित; पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की अन्तर्दशा में (क्रमानुसार) चन्द्र की प्रत्यन्तर्दशा के समय उद्वेग, कलह, चिन्ता, मान-हानि, महान् भय तथा पिता के शरीर में रुग्णता — ऐसे अशुभ फल कहे गए हैं। मूल में "विध्योः रवेः" पाठ दूषित है; अनुक्रम-स्थान से यह चन्द्र-प्रत्यन्तर बनता है, अतः यहाँ पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in this pratyantara within Rahu's antardaśā — by sequence, the Moon's — come agitation, quarrels, worry, loss of honour, great fear, and infirmity in the father's body; the transmitted reading "vidhyoḥ raveḥ" is corrupt, so the reading is uncertain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ, पाठ-भेद-सहित)। कोई अंक नहीं; प्रत्यन्तर-स्वामी की पहचान विशुद्ध अनुक्रम-गणित से होती है — राहु-ब्लॉक का आठवाँ प्रत्यन्तर विम्शोत्तरी क्रम (राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र, सूर्य, चन्द्र, मङ्गल) में चन्द्र बैठता है, जो दूषित पाठ को सुधारने का आन्तरिक प्रमाण है।

61.37
भगन्धरक्त्ऱ्था पीदा रक्थपिथ्थप्रपीदनम् ।
अर्ठहानिर्महोध्वेगः कुजप्रथ्यन्थरे फलम्
bhagandharaktṟthā pīdā rakthapiththaprapīdanam |
arṭhahānirmahodhvegaḥ kujaprathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगन्दर-कृता पीडा = भगन्दर (नासूर/फिस्टुला) से उत्पन्न पीड़ा; रक्त-पित्त-प्रपीडनम् = रक्तपित्त (रक्त-पित्त विकार) की पीड़ा; अर्थ-हानिः = धन की हानि; महा-उद्वेगः = महान् उद्वेग; कुज-प्रत्यन्तरे = मङ्गल की प्रत्यन्तर्दशा में (राहु-अन्तर्दशा के भीतर); फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की अन्तर्दशा में मङ्गल की प्रत्यन्तर्दशा के समय भगन्दर-जनित पीड़ा, रक्तपित्त का कष्ट, धन-हानि तथा महान् उद्वेग — ऐसे अशुभ फल कहे गए हैं। ये आरोग्य-सम्बन्धी संकेत शास्त्र के फल-वचन हैं, कोई चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that during Mars's pratyantara within Rahu's antardaśā there come the pain of fistula (bhagandara), the torment of rakta-pitta (a blood-bile disorder), loss of wealth, and great agitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ)। "भगन्दर" तथा "रक्तपित्त" आयुर्वेदीय रोग-संज्ञाएँ हैं, ज्योतिषीय गणना नहीं; एकमात्र गणनीय राशि इस मङ्गल-प्रत्यन्तर की अवधि है (मङ्गल = 7 वर्ष का अनुपात)।

61.38
हेमलाभो ढान्यव्त्ऱ्ध्ढि कल्याणं सुफलोधयः ।
गुरोरन्थर्धशायां च भवेध् गुर्वन्थरे फलम्
hemalābho ḍhānyavtṟdhḍhi kalyāṇaṃ suphalodhayaḥ |
guroranthardhaśāyāṃ ca bhavedh gurvanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हेम-लाभः = स्वर्ण की प्राप्ति; धान्य-वृद्धिः = अन्न/धान्य की वृद्धि; कल्याणम् = मङ्गल, शुभता; सु-फल-उदयः = उत्तम फलों का उदय; गुरोः अन्तर्दशायाम् = गुरु (बृहस्पति) की अन्तर्दशा में; गुर्वन्तरे (= गुरु-प्रत्यन्तरे) = गुरु की ही प्रत्यन्तर्दशा में; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बृहस्पति की अन्तर्दशा में बृहस्पति की ही प्रत्यन्तर्दशा के समय स्वर्ण-लाभ, धान्य की वृद्धि, कल्याण तथा शुभ फलों का उदय होता है। यह अत्यन्त अनुकूल फल-कथन है।

English rendering The text states that in Jupiter's own pratyantara within Jupiter's antardaśā there come gain of gold, increase of grain, welfare, and the rising of good fruits.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। श्लोक अंकरहित है; ध्यातव्य यह कि जब अन्तर-स्वामी और प्रत्यन्तर-स्वामी एक ही ग्रह हों, तब वह प्रत्यन्तर उस अन्तर्दशा का सबसे लम्बा उपखण्ड होता है (उच्चतम अनुपात-अंश)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "स्व-में-स्व" प्रत्यन्तर (गुरु-में-गुरु) हमारे अनुपात-इंजन (दोसियर §3) में सीधे सत्यापित होता है: सूर्य महादशा (परिपाटी) में गुरु-अन्तर्दशा = (6 × 16)/120 = 0.8 वर्ष; उसमें गुरु-प्रत्यन्तर = 0.8 × (16/120) ≈ 0.1067 वर्ष ≈ 38.9 दिन। चूँकि दोनों गुणक 16/120 समान हैं, यही अन्तर्दशा का दीर्घतम उपखण्ड बनता है — वही शुद्ध, नेस्टेड अनुपात-अंकगणित, बिना किसी नए स्थिरांक के।

61.39
गोभूमिहयलाभः स्याथ्सर्वथ्र सुखसाढनम् ।
संग्रहो ह्यन्नपानाधेः शनेः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
gobhūmihayalābhaḥ syāthsarvathra sukhasāḍhanam |
saṃgraho hyannapānādheḥ śaneḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गो-भूमि-हय-लाभः = गाय, भूमि तथा घोड़े का लाभ; स्यात् = हो; सर्वत्र सुख-साधनम् = सब ओर सुख के साधन; संग्रहः = संचय, भण्डारण; अन्न-पान-आदेः = अन्न, पेय आदि का; शनेः प्रत्यन्तरे = शनि की प्रत्यन्तर्दशा में (गुरु-अन्तर्दशा के भीतर); भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बृहस्पति की अन्तर्दशा में शनि की प्रत्यन्तर्दशा के समय गाय, भूमि और घोड़ों का लाभ, सब ओर सुख के साधन, तथा अन्न-पान आदि का संचय होता है। यह अनुकूल फल-कथन है।

English rendering The text states that during Saturn's pratyantara within Jupiter's antardaśā there come gain of cattle, land and horses, means of comfort on every side, and a store of food and drink.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। श्लोक में कोई संख्या नहीं; इस शनि-प्रत्यन्तर की अवधि ही गणनीय राशि है (शनि = 19 वर्ष, विम्शोत्तरी का सबसे बड़ा ग्रह-अंश), शेष विशुद्ध फल-वर्णन।

61.40
विध्यालाभो वस्थ्रलाभो ज्ञानलाभः समौक्थिकः ।
सुह्त्ऱ्धां सङ्गमः स्नेहो बुढप्रथ्यन्थरे भवेथ्
vidhyālābho vasthralābho jñānalābhaḥ samaukthikaḥ |
suhtṟdhāṃ saṅgamaḥ sneho buḍhaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्यालाभः = विद्या/शास्त्रज्ञान की प्राप्ति; वस्त्रलाभः = वस्त्रों का लाभ; ज्ञानलाभः = ज्ञान–विवेक की वृद्धि; समौक्तिकः = मौक्तिक (मोती/रत्न) सहित; सुहृदां सङ्गमः = मित्रों का मिलन; स्नेहः = प्रीति–अनुराग; बुधप्रत्यन्तरे = बुध की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-महादशा की गुरु-अन्तर्दशा के भीतर (अध्याय के अन्तर-क्रम से) जब बुध की प्रत्यन्तर्दशा चलती है, तब शास्त्र कहता है कि जातक को विद्या, वस्त्र और ज्ञान का लाभ होता है, मोती–रत्नादि की प्राप्ति होती है, तथा मित्रों का मधुर मिलन और स्नेह मिलता है। बुध–गुरु का यह संयोग विद्या–बुद्धि के लिए शुभ फल-कथन है।

English rendering In the Mercury sub-sub-period (within Jupiter's sub-period of the Sun mahādaśā), the text states one gains learning, garments and wisdom together with pearls, and enjoys the company and affection of friends.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। किन्तु इस पूरे अध्याय की अन्तर्निहित तकनीक प्रत्यन्तर-अवधि की गणना है: प्रत्यन्तर = अन्तर्दशा-अवधि × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120 = महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष ÷ 120² (विंशोत्तरी वर्ष: सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17, केतु 7, शुक्र 20; Σ = 120)।

उदाहरण: परिपाटी: 1 वर्ष = 360 दिन, 1 माह = 30 दिन। सूर्य महादशा = 6 वर्ष; गुरु = 16, बुध = 17। गुरु-अन्तर = 6 × 16 ÷ 120 = 0.8 वर्ष (≈ 9 माह 18 दिन)। इसके भीतर बुध-प्रत्यन्तर = 6 × 16 × 17 ÷ 120² = 1632 ÷ 14400 ≈ 0.1133 वर्ष ≈ 1 माह 11 दिन (≈ 40.8 दिन; सौर 365.25-दिन-वर्ष में ≈ 41.4 दिन)। यही वह काल-खण्ड है जिसका उपर्युक्त फल शास्त्र कहता है।

हमारा डिकोड: यह श्लोक विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र का प्रत्यन्तर-स्तर है, जिसे हमारी दशा-गणना ग्रह-वर्षों (सूर्य 6, गुरु 16, बुध 17; Σ=120) पर विशुद्ध अनुपात-अंकगणित से निकालती है — वही आधार जिस पर अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 सत्यापित है। हम केवल काल-खण्ड की सीमा गिनते हैं; फल स्वयं शास्त्र का कथन है, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

61.41
जलभीथिस्थठा चौर्यं बन्ढनं कलहो भवेथ् ।
अपम्त्ऱ्थ्युर्भयं घोरं केथोः प्रथ्यन्थरे ध्विज
jalabhīthisthaṭhā cauryaṃ banḍhanaṃ kalaho bhaveth |
apamtṟthyurbhayaṃ ghoraṃ kethoḥ prathyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जलभीतिः = जल से भय; तथा = और; चौर्यम् = चोरी/चोरी का भय; बन्धनम् = बन्धन–कारावास; कलहः = झगड़ा; अपमृत्युः = अकाल–अपघात-मृत्यु; भयं घोरम् = घोर भय; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर्दशा में; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ गुरु-अन्तर्दशा के भीतर केतु की प्रत्यन्तर्दशा में शास्त्र चेतावनी-रूप में कहता है कि जल से भय, चोरी, बन्धन और कलह की सम्भावना, तथा अपमृत्यु (अकाल–अपघात) का घोर भय बताया गया है। हे द्विज, यह केतु-प्रत्यन्तर का अशुभ-सूचक फल-कथन है — कोई निश्चित नियति नहीं, शास्त्र का वचन-मात्र।

English rendering In the Ketu sub-sub-period within Jupiter's sub-period, the text warns of danger from water, of theft, confinement and quarrel, and a dread fear of untimely death, O twice-born.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-सूचक)। केतु सूर्य-महादशा/गुरु-अन्तर के भीतर विंशोत्तरी-क्रम (गुरु→शनि→बुध→केतु) से चौथा प्रत्यन्तर है; इसकी अवधि = 6 × 16 × 7 ÷ 120² = 672 ÷ 14400 ≈ 0.0467 वर्ष ≈ 17 दिन (360-दिन/वर्ष)।

हमारा डिकोड: अपमृत्यु-भय जैसे उग्र वचन ठीक वहीं हैं जहाँ हमारी विधि सबसे कठोर होनी चाहिए — गणित (17-दिन की प्रत्यन्तर-सीमा) और व्याख्या (फल) को पृथक रखना। शास्त्र-वचन को "शास्त्र कहता है" के रूप में उद्धृत करना है, भय-प्रेरणा या भविष्य-निश्चय के रूप में नहीं; काल-सीमा गणनीय है, फल शास्त्र का कथन है।

61.42
नानाविध्यार्ठसम्प्राप्थिर्हेमवस्थ्रविभूषणम् ।
लभथे क्षेमसन्थोषं भ्त्ऱ्गोः प्रथ्यन्थरे जनः
nānāvidhyārṭhasamprāpthirhemavasthravibhūṣaṇam |
labhathe kṣemasanthoṣaṃ bhtṟgoḥ prathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नानाविद्या = अनेक विद्याएँ; अर्थसम्प्राप्तिः = धन की प्राप्ति; हेम = स्वर्ण; वस्त्र = वस्त्र; विभूषणम् = आभूषण; लभते = पाता है; क्षेम = कुशल–निरापदता; सन्तोषम् = सन्तोष; भृगोः प्रत्यन्तरे = शुक्र की प्रत्यन्तर्दशा में; जनः = व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ गुरु-अन्तर्दशा में शुक्र (भृगु) की प्रत्यन्तर्दशा में शास्त्र कहता है कि जातक को नाना विद्याओं और धन की प्राप्ति होती है; स्वर्ण, वस्त्र और आभूषण मिलते हैं; तथा वह कुशल-क्षेम और सन्तोष का अनुभव करता है। शुक्र–गुरु का यह योग समृद्धि और सुख का शुभ फल-कथन है।

English rendering In the Venus sub-sub-period within Jupiter's sub-period, the text states the native attains manifold learning and wealth — gold, garments and ornaments — and enjoys security and contentment.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र-प्रत्यन्तर की अवधि = 6 × 16 × 20 ÷ 120² = 1920 ÷ 14400 ≈ 0.1333 वर्ष ≈ 1 माह 18 दिन (360-दिन/वर्ष); शुक्र के विंशोत्तरी वर्ष सर्वाधिक (20) होने से यह गुरु-अन्तर का दीर्घतम प्रत्यन्तर है।

61.43
न्त्ऱ्पाल्लाभस्थठा मिथ्राथ्पिथ्त्ऱ्थो माथ्त्ऱ्थोऽपि वा ।
सर्वथ्र लभथे पूजां रवेः प्रथ्यन्थरे जनः
ntṟpāllābhasthaṭhā mithrāthpithtṟtho māthtṟtho'pi vā |
sarvathra labhathe pūjāṃ raveḥ prathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृप = राजा/शासक; लाभ = प्राप्ति/लाभ; मित्र = मित्र-सम्बन्ध; पितृतः = पिता की ओर से; मातृतोपि = माता की ओर से भी; सर्वत्र = सब स्थानों में; पूजा = सम्मान/आदर; रवेः प्रत्यन्तरे = सूर्य की प्रत्यन्तर-दशा में; जनः = जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की प्रत्यन्तर-दशा में जातक को राज-सम्बन्धी लाभ मिलता है, तथा मित्र, पिता अथवा माता की ओर से भी लाभ का संकेत है। इस काल में वह सर्वत्र पूजा—अर्थात् सम्मान और प्रतिष्ठा—प्राप्त करता है। यह फल-कथन सूर्य-प्रत्यन्तर के शुभ फल-पक्ष का वर्णन है; इसे नियति या निश्चित भविष्य नहीं मानना।

English rendering The text states that in the Sun’s pratyantara the native gains from the ruler, and also from friend, father, or mother. Everywhere he obtains honor and respect. This is the śāstra’s phala-statement for that sub-period, not a fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रत्यन्तर-दशा-फल)। प्रत्यन्तर स्वयं विम्शोत्तरी की तृतीय-स्तरीय अनुपात-अवधि है, किन्तु यह श्लोक केवल फल बोलता है, अवधि-सूत्र नहीं।

61.44
सर्वधुःखविमोक्षश्च मुक्थलाभो हयस्य च ।
सिध्ढ्यन्थि सर्वकार्याणि विढो प्रथ्यन्थरे ध्विज
sarvadhuḥkhavimokṣaśca mukthalābho hayasya ca |
sidhḍhyanthi sarvakāryāṇi viḍho prathyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वदुःखविमोक्ष = सब दुःखों से मुक्ति; मुक्तलाभ = मुक्ति/छुटकारे का लाभ; हयस्य = अश्व का (अश्व-लाभ); सिध्यन्ति = सिद्ध होते हैं; सर्वकार्याणि = सब कार्य; विधोः = चन्द्रमा का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर-दशा में; द्विज = हे द्विज (सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्रमा की प्रत्यन्तर-दशा में जातक को सब प्रकार के दुःखों से विमोक्ष मिलता है, तथा मुक्त-लाभ और अश्व-सम्बन्धी लाभ का भी उल्लेख है। इस काल में सब कार्य सिद्ध होते हैं—ऐसा पाठ का कथन है। “द्विज” यहाँ शिष्य/पाठक के प्रति सम्बोधन है। फल को भय या गारंटी के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that in the Moon’s pratyantara there is release from all sorrows, gain of freedom, and gain connected with horses. All undertakings succeed, O twice-born. This is phala-language of the śāstra, not an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्रत्यन्तर)। अवधि-गणना इस श्लोक में नहीं; केवल परिणाम-वर्णन है।

61.45
शस्थ्रभीथिर्गधे पीदा वह्निमाध्ध्यमजीर्णथा ।
पीदा शथ्रुक्त्ऱ्था भूरिर्भौमप्रथ्यन्थरे भवेथ्
śasthrabhīthirgadhe pīdā vahnimādhdhyamajīrṇathā |
pīdā śathruktṟthā bhūrirbhaumaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शस्त्रभीति = शस्त्र/हथियार से भय; गदे = शरीर/अंग में; पीडा = पीड़ा; वह्नि = अग्नि/दाह; माध्यम = मध्यम स्तर का; अजीर्णता = अपच; शत्रुकृता = शत्रु द्वारा की गई; भूरि = प्रचुर; भौमप्रत्यन्तरे = मंगल की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल की प्रत्यन्तर-दशा में शस्त्र-भय, शारीरिक पीड़ा, मध्यम अग्नि-सम्बन्धी कष्ट और अजीर्णता का संकेत है। शत्रुकृत पीड़ा भी प्रचुर हो—ऐसा पाठ का फल-वर्णन है। इसे डर फैलाने वाले भविष्य-वचन या रोग-निदान के रूप में नहीं लेना; केवल शास्त्र का अपना कथन है।

English rendering The text states that in Mars’s pratyantara there may be fear of weapons, bodily pain, moderate fire-related trouble, and indigestion, and abundant suffering caused by enemies. Report the phala as the śāstra’s claim, not as medical or martial certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्रत्यन्तर)। कोई अंश, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं दिए गए।

61.46
चाण्दालेन विरढः स्याध्भयं थेभ्यो ढनक्षथिः ।
कष्तं जीवान्थरे ज्ञेयं राहोः प्रथ्यन्थरे ढ्रुवम्
cāṇdālena viraḍhaḥ syādhbhayaṃ thebhyo ḍhanakṣathiḥ |
kaṣtaṃ jīvānthare jñeyaṃ rāhoḥ prathyanthare ḍhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाण्डालेन विरोधः = चाण्डाल/नीच जन से विरोध; भयं तेभ्यः = उनसे भय; धनक्षतिः = धन की हानि; कष्टम् = कष्ट; जीवान्तरे = जीव (गुरु/बृहस्पति) की अन्तर्दशा में; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; राहोः प्रत्यन्तरे = राहु की प्रत्यन्तर्दशा में; ध्रुवम् = निश्चित रूप से।

हिन्दी भावार्थ यहाँ श्लोक स्वयं "जीवान्तरे" (गुरु की अन्तर्दशा) कहकर अन्तर-सन्दर्भ स्पष्ट कर देता है — गुरु-अन्तर्दशा में राहु की प्रत्यन्तर्दशा में शास्त्र कहता है कि नीच/चाण्डाल जनों से विरोध और भय, धन की हानि तथा कष्ट होता है, ऐसा निश्चित जानना चाहिए। यह राहु-प्रत्यन्तर का अशुभ-सूचक फल-कथन है। ("जीव" = बृहस्पति — यही इस पूरे खण्ड की गुरु-अन्तर्दशा की आन्तरिक पुष्टि है।)

English rendering In the Rahu sub-sub-period within Jupiter's (jīva's) sub-period, the text states — declared certain — there is conflict with and fear from base persons, loss of wealth, and hardship.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-सूचक)। श्लोक-अन्तर्गत "जीवान्तरे" पद अन्तर्दशेश = गुरु की पुष्टि करता है; राहु-प्रत्यन्तर की अवधि = 6 × 16 × 18 ÷ 120² = 1728 ÷ 14400 = 0.12 वर्ष ठीक = 43.2 दिन (360-दिन/वर्ष)।

हमारा डिकोड: "जीवान्तरे" पद ने अन्तर-क्रम को अनुमान से नहीं, पाठ-प्रमाण से पिन करने दिया — सूर्य-महादशा का पाँचवाँ अन्तर = गुरु (जीव), जो विंशोत्तरी-क्रम (सूर्य→चन्द्र→मंगल→राहु→गुरु) से ठीक मेल खाता है। यही हमारी "पहले प्राथमिक-स्रोत/पाठ पिन करो, तब गणना" वाली विधि है: क्रम की पुष्टि पाठ से, फिर काल-खण्ड का गणित।

61.47
धेहपीदा कलेर्भीथिर्भयमन्थ्यजलोकथः ।
धुःखं शन्यन्थरे नाना शनेः प्र्थ्यन्थरे भवेथ्
dhehapīdā kalerbhīthirbhayamanthyajalokathaḥ |
dhuḥkhaṃ śanyanthare nānā śaneḥ prthyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देहपीडा = शरीर में पीड़ा; कलेर्भीतिः = कलह/क्लेश का भय; भयम् अन्त्यजलोकतः = अन्त्यज (नीच वर्ग) लोगों से भय; दुःखं नाना = अनेक प्रकार के दुःख; शन्यन्तरे = शनि की अन्तर्दशा में; शनेः प्रत्यन्तरे = शनि की ही प्रत्यन्तर्दशा में (स्व-प्रत्यन्तर); भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ यहाँ अन्तर्दशा बदलकर शनि की हो जाती है (श्लोक स्वयं "शन्यन्तरे" कहता है) — शनि-अन्तर्दशा के भीतर शनि की ही प्रत्यन्तर्दशा में शास्त्र कहता है कि शरीर-पीड़ा, कलह का भय, अन्त्यज जनों से भय और नाना दुःख होते हैं। यह शनि-स्व-प्रत्यन्तर का अशुभ-सूचक फल-कथन है।

English rendering As Saturn's sub-period now opens, in Saturn's own sub-sub-period the text states there is bodily affliction, fear of strife, fear from low people, and manifold sorrows.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ-सूचक)। श्लोक-पद "शन्यन्तरे" से पुष्ट कि यह सूर्य-महादशा का छठा अन्तर = शनि है।

उदाहरण: सूर्य महादशा = 6 वर्ष; शनि = 19 वर्ष। शनि-अन्तर = 6 × 19 ÷ 120 = 114 ÷ 120 = 0.95 वर्ष (≈ 11 माह 12 दिन)। इसके भीतर शनि-स्व-प्रत्यन्तर = 6 × 19 × 19 ÷ 120² = 2166 ÷ 14400 ≈ 0.1504 वर्ष ≈ 1 माह 24 दिन (≈ 54.2 दिन, 360-दिन/वर्ष)। प्रत्यन्तरेश भी शनि (19 वर्ष) होने से यह एक दीर्घ प्रत्यन्तर है (यद्यपि शुक्र-प्रत्यन्तर, 20 वर्ष, इससे किंचित् अधिक दीर्घ होता है)।

हमारा डिकोड: यह विंशोत्तरी का त्रि-स्तरीय (महादशा→अन्तर→प्रत्यन्तर) खण्ड है, जिसे हमारी दशा-गणना विशुद्ध अनुपात (सूर्य 6, शनि 19; Σ=120) से निकालती है। हम काल-सीमा को गणित से पिन करते हैं और फल को "शास्त्र कहता है" के रूप में रखते हैं — कोई भय या नियति-दावा नहीं।

61.48
बुध्ढिनाशः कलेर्भीथिरन्नपानाधिहानिक्त्ऱ्थ् ।
ढन्हानिर्भयं शथ्रोः सनेः प्रथ्यन्थरे बुढे
budhḍhināśaḥ kalerbhīthirannapānādhihāniktṟth |
ḍhanhānirbhayaṃ śathroḥ saneḥ prathyanthare buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुद्धिनाशः = बुद्धि/विवेक की हानि (शास्त्र-कथन); कलेः भीति = कलह का भय; अन्नपान = अन्न और पान; अधिहानिकृत् = हानि/क्षति करने वाला; धनहानिः = धन-हानि; शत्रोः भयम् = शत्रु से भय; शनेः प्रत्यन्तरे = शनि की प्रत्यन्तर-दशा में; बुधे = हे बुध/विद्वन् (सम्बोधन; पाठ-भेद संभव — बुध-प्रत्यन्तर का संकेत भी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की प्रत्यन्तर-दशा में बुद्धि-नाश, कलह-भय, अन्न-पान सम्बन्धी हानि, धन-हानि और शत्रु-भय का फल वर्णित है। अन्त का “बुधे” प्रायः शिष्य-सम्बोधन है (जैसे पूर्व श्लोक में “द्विज”); यदि किसी पाठ में बुध-प्रत्यन्तर पढ़ा जाए तो पाठ-भेद संभव। फल को मानसिक रोग-निदान या आर्थिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं लेना।

English rendering The text states that in Saturn’s pratyantara there is loss of discernment, fear of quarrel, harm touching food and drink, loss of wealth, and fear of the enemy, O learned one (बुधे—vocative; a Mercury-pratyantara reading is पाठ-भेद संभव). Keep it as śāstra-phala, not medical or financial prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्रत्यन्तर; सम्बोधन/पाठ-भेद पर ध्यान)। कोई वर्ष-संख्या या बल-इकाई नहीं।

61.49
बन्ढः शथ्रोर्ग्त्ऱ्हे जाथो वर्णहानिर्बहुक्षुढा ।
चिथ्थे चिन्था भयं थ्रासः केथो प्रथ्यन्थरे भवेथ्
banḍhaḥ śathrorgtṟhe jātho varṇahānirbahukṣuḍhā |
ciththe cinthā bhayaṃ thrāsaḥ ketho prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धः = बन्धन/कैद-सदृश बाधा; शत्रोः गृहे = शत्रु के गृह में; जातः = उत्पन्न; वर्णहानिः = वर्ण/प्रतिष्ठा/स्थिति की हानि; बहुक्षुधा = अत्यधिक क्षुधा; चित्ते चिन्ता = मन में चिन्ता; भयम् = भय; त्रासः = त्रास/व्याकुलता; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की प्रत्यन्तर-दशा में बन्धन, शत्रु-गृह में उत्पन्न बाधा, वर्ण-हानि, बहु-क्षुधा, चित्त में चिन्ता, भय और त्रास का फल वर्णित है। यह केतु-प्रत्यन्तर का कठोर फल-पक्ष है; इसे कारावास की गारंटी, जाति-नाश की धमकी, या भय-उपचार का दबाव नहीं बनाना। केवल पाठ का कथन—शान्त, सटीक, बिना आतंक के—रखना चाहिए।

English rendering The text states that in Ketu’s pratyantara there may be bondage, trouble arising in an enemy’s house, loss of status, great hunger, mental anxiety, fear, and agitation. Report the phala as the śāstra’s claim; do not convert it into panic, caste-threat, or remedy-pressure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्रत्यन्तर)। दशा-गणित यहाँ नहीं; केवल परिणाम-सूची है।

61.50
चिन्थिथं फलिथं वस्थु कल्याणं स्वजने सधा ।
मनुष्यक्त्ऱ्थिथो लाभः भ्त्ऱ्गिः प्रथ्यन्थरे ध्विज
cinthithaṃ phalithaṃ vasthu kalyāṇaṃ svajane sadhā |
manuṣyaktṟthitho lābhaḥ bhtṟgiḥ prathyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चिन्तितं = मन में सोचा/चिन्तित कार्य; फलितं = फलवान् / सिद्ध; वस्तु = पदार्थ, अभीष्ट वस्तु; कल्याणं = मङ्गल, कुशल; स्वजने = स्वजन-वर्ग में; मनुष्य-कृतितः = मानवीय उद्योग/कौशल से; लाभः = प्राप्ति; भृगोः = शुक्र का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर-दशा में; द्विज = हे द्विज (संबोधना)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की प्रत्यन्तर-दशा में चिन्तित वस्तुएँ फलवती होती हैं और स्वजनों में कल्याण बना रहता है। मनुष्यकृत उद्योग से लाभ का संकेत दिया गया है। यह फल-कथन शुक्र-प्रत्यन्तर के लक्षण-रूप में प्रस्तुत है, न कि अनिवार्य घटना के रूप में।

English rendering The text states that in the pratyantara of Bhṛgu (Venus), contemplated aims mature into result and welfare among one’s own people is indicated. Gain through human effort or craft is also named for this sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-प्रत्यन्तर)। अवधि-गणना विंशोत्तरी-ढाँचे से अलग अध्याय-नियमों में आती है: प्रत्यन्तर = (अन्तर्दशा-वर्ष × ग्रह-महादशा-वर्ष) ÷ 120; यहाँ केवल फल-वर्णन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र में शुक्र-महादशा 20 वर्ष है; प्रत्यन्तर उसी अनुपात-अंकगणित से निकलता है। फल-श्लोक को अवधि-सूत्र से अलग रखा जाता है — गणना exact, फल “शास्त्र कहता है” के रूप में।

61.51
राजथेजोऽढिकारिथ्वं स्वग्त्ऱ्हे जायथे कलिः ।
ज्वराधिव्याढिपीदा च रवेः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
rājathejo'ḍhikārithvaṃ svagtṟhe jāyathe kaliḥ |
jvarādhivyāḍhipīdā ca raveḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-तेजः = राजकीय प्रताप/तेज; अधिकारित्वं = अधिकार-भाव; स्व-गृहे = अपने गृह/परिवार में; जायते = उत्पन्न होता है; कलिः = कलह, विवाद; ज्वर = ज्वर; अधि-व्याधि = व्याधि का आधिक्य; पीडा = कष्ट; रवेः = सूर्य का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की प्रत्यन्तर-दशा में राज-तेज और अधिकार-भाव का संकेत है। साथ ही स्वगृह में कलह तथा ज्वर-व्याधि-पीड़ा का भी उल्लेख है। दोनों पक्ष एक ही काल-खण्ड के मिश्र फल-रूप में कहे गए हैं — न तो केवल उत्कर्ष, न केवल पीड़ा को एकमात्र अर्थ मानना चाहिए।

English rendering The text states that in the Sun’s pratyantara there is indication of royal brilliance and authority, yet also conflict arising in one’s own house. Fever and disease-affliction are likewise named for this sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-प्रत्यन्तर)। सूर्य की विंशोत्तरी-महादशा 6 वर्ष; प्रत्यन्तर-अवधि = (अन्तर्दशा-वर्ष × 6) ÷ 120 — यह श्लोक अवधि नहीं, फल बताता है।

61.52
स्फीथबुध्ढिर्महारम्भो मन्धथेजा बहुव्ययः ।
बहुस्थ्रीभिः समं भोगो विढोः प्रथ्यन्थरे शनौ
sphīthabudhḍhirmahārambho mandhathejā bahuvyayaḥ |
bahusthrībhiḥ samaṃ bhogo viḍhoḥ prathyanthare śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फीत-बुद्धिः = विस्तारित/उन्नत बुद्धि; महा-आरम्भः = बड़े उद्यम; मन्द-तेजाः = मन्द/क्षीण तेज; बहु-व्ययः = अधिक व्यय; बहु-स्त्रीभिः समं = अनेक स्त्रियों के साथ; भोगः = उपभोग; विधोः = चन्द्र का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; शनौ = शनि में (शनि-सन्दर्भ: पाठानुसार महा/अन्तर्दशा-सन्दर्भ)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि-सन्दर्भ में चन्द्र की प्रत्यन्तर-दशा में स्फीत बुद्धि और महारम्भ का संकेत है। साथ ही मन्द तेज, बहुव्यय, तथा बहुस्त्री-सम्बन्धित भोग का भी उल्लेख है। मिश्र फल है — बौद्धिक विस्तार और व्यय/भोग दोनों एक ही काल-वर्णन में जुड़े हैं।

English rendering The text states that in the Moon’s pratyantara under Saturn there is indication of expanded intellect and great undertakings, together with diminished brilliance and heavy expenditure. Enjoyment involving many women is also named for this sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्रत्यन्तर, शनि-सन्दर्भ)। चन्द्र-महादशा 10 वर्ष; प्रत्यन्तर = (अन्तर्दशा-वर्ष × 10) ÷ 120। “शनौ” parent-काल (शनि महा/अन्तर्) को बाँधता है; फल को अवधि से अलग पढ़ें।

उदाहरण (worked example) शनि-महादशा (19 वर्ष) की चन्द्र-अन्तर्दशा में सूर्य-प्रत्यन्तर नहीं — यहाँ चन्द्र-प्रत्यन्तर: अन्तर्-अवधि = (19 × 10) ÷ 120 = 19/12 ≈ 1.583 वर्ष। चन्द्र-प्रत्यन्तर (यदि अन्तर् = चन्द्र ही हो तो) = (19/12 × 10) ÷ 120 = 19/144 ≈ 0.132 वर्ष ≈ 48 दिन (वर्ष = 360 तिथि-दिन परम्परा में रूपान्तरण अलग घोषित करें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में Σ = 120; अन्तर्/प्रत्यन्तर शुद्ध अनुपात-अंकगणित हैं। “शनौ” convention-घोषणा माँगता है — parent महादशा/अन्तर्दशा स्पष्ट किए बिना अवधि संख्या न लिखें।

61.53
थेजोहानि पुथ्रघाथो वह्निभीथी रिपोर्भयम् ।
वाथपिथ्थक्त्ऱ्था पीदा कुजप्रथ्यन्थरे भवेथ्
thejohāni puthraghātho vahnibhīthī riporbhayam |
vāthapiththaktṟthā pīdā kujaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेजोहानिः = तेज/ओज का ह्रास; पुत्रघातः = पुत्र को आघात या हानि; वह्निभीतिः = अग्नि का भय; रिपोः भयम् = शत्रु (रिपु) से भय; वातपित्तकृता पीडा = वात और पित्त दोष से उत्पन्न पीड़ा; कुजप्रत्यन्तरे = मंगल (कुज) की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = (शास्त्रानुसार) होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल की प्रत्यन्तर्दशा में तेज का ह्रास, पुत्र-पक्ष को कष्ट, अग्नि तथा शत्रु से भय, और वात-पित्त से उपजी शारीरिक पीड़ा — ये फल कहे गए हैं। यह किसी अन्तर्दशा के भीतर मंगल के सूक्ष्म खण्ड का फल-कथन है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that in the Mars pratyantara there is loss of vigour, harm to a son, fear of fire and of enemies, and affliction arising from vāta and pitta.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुज-प्रत्यन्तर)। यहाँ श्लोक केवल फल गिनाता है; प्रत्यन्तर की अवधि का अंक श्लोक स्वयं नहीं देता, वह विंशोत्तरी के अनुपात-गणित से निकलती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय विंशोत्तरी की तीसरी परत — प्रत्यन्तर्दशा — का फल है, और वही 120-वर्ष का अनुपात-गणित यहाँ एक स्तर और गहरा चलता है जिसे हमने डोज़ियर में पिन किया। सूत्र: प्रत्यन्तर(C) = अन्तर्दशा-अवधि × (C के वर्ष) ÷ 120, अर्थात् समग्र रूप में (महा × अन्तर × प्रत्यन्तर-वर्ष) ÷ 120²। ग्रह-वर्ष स्थिर हैं (केतु 7, शुक्र 20, रवि 6, चन्द्र 10, कुज 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; योग = 120)। उदाहरण-भर के लिए, चन्द्र-महा → रवि-अन्तर → कुज-प्रत्यन्तर = (10 × 6 × 7) ÷ 120² = 420 ÷ 14400 ≈ 0.0292 वर्ष ≈ 10.6 दिन — यही सूक्ष्म खण्ड इस श्लोक के फल का पात्र है।

61.54
ढननाशो वस्थ्रहानिर्भूमिनाशो भयं भवेथ् ।
विधेशगमनं म्त्ऱ्थ्युः राहो प्रथ्यन्थरे शनौ
ḍhananāśo vasthrahānirbhūmināśo bhayaṃ bhaveth |
vidheśagamanaṃ mtṟthyuḥ rāho prathyanthare śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-नाशः = धन की हानि; वस्त्र-हानिः = वस्त्र/परिधान की हानि; भूमि-नाशः = भूमि-हानि; भयम् = भय; विदेश-गमनम् = परदेश-यात्रा; मृत्युः = मृत्यु (शास्त्र-शब्द; निश्चित काल-घोषणा नहीं); राहोः = राहु का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; शनौ = शनि-सन्दर्भ में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि-सन्दर्भ में राहु की प्रत्यन्तर-दशा में धननाश, वस्त्रहानि, भूमिनाश और भय का संकेत है। विदेश-गमन तथा मृत्यु-शब्द भी पाठ में हैं — इन्हें शास्त्र का कठोर फल-कथन समझें, नियति या दबाव-भविष्य नहीं। पाठ-भेद और योग-बल के बिना एक श्लोक से “अवश्यम्भावी मृत्यु” नहीं पढ़ा जाता।

English rendering The text states that in Rāhu’s pratyantara under Saturn there is indication of loss of wealth, of clothing, and of land, together with fear. Foreign travel and the word “death” also appear — as the śāstra’s own phala-language, not as a fate-claim this edition endorses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-प्रत्यन्तर, शनि-सन्दर्भ)। राहु-महादशा 18 वर्ष; प्रत्यन्तर = (अन्तर्दशा-वर्ष × 18) ÷ 120। “मृत्युः” फल-शब्द है, आयुर्दाय-सूत्र (अध्याय 43–44) से भिन्न स्तर।

उदाहरण (worked example) शनि-महादशा में राहु-अन्तर् = (19 × 18) ÷ 120 = 342/120 = 2.85 वर्ष। उसी अन्तर् में राहु-प्रत्यन्तर = (2.85 × 18) ÷ 120 = 0.4275 वर्ष ≈ 5.13 मास (सौर-वर्ष ≈ 365.25 दिन मानकर; दशा-इंजन प्रायः 360-day year भी घोषित करता है — convention pinned करें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में राहु 18, शनि 19; Σ = 120 pinned। फल-श्लोक को daśā-engine की exact अवधि से मिलाकर काल-खण्ड पहचाना जाता है, फल को “certainty” नहीं बनाया जाता।

61.55
ग्त्ऱ्हेषु स्वीक्त्ऱ्थं छिध्रं ह्यसमर्ठो निरीक्षणे ।
अठ वा कलिमुध्वेगं गुरोः प्रथ्यन्थरे वधेथ्
gtṟheṣu svīktṟthaṃ chidhraṃ hyasamarṭho nirīkṣaṇe |
aṭha vā kalimudhvegaṃ guroḥ prathyanthare vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहेषु = गृह-सम्बन्धित विषयों में; स्वीकृतं छिद्रम् = स्वीकृत/निर्धारित में छिद्र-दोष; असमर्थः = असमर्थ; निरीक्षणे = निरीक्षण/देखरेख में; अथवा = या; कलिम् = कलह को; उद्वेगम् = उद्वेग/व्याकुलता; गुरोः = बृहस्पति का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; वदेत्/भवेत् = कहे/हो (पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की प्रत्यन्तर-दशा में गृह-सम्बन्धी स्वीकृत व्यवस्था में छिद्र तथा निरीक्षण में असमर्थता का संकेत है। अथवा कलह और उद्वेग का उल्लेख है। गुरु प्रायः ज्ञान-धर्म-वृद्धि से जुड़े, किन्तु यहाँ प्रत्यन्तर-फल में गृह-दोष और असमर्थता भी कही गई — मिश्र, सन्दर्भ-सापेक्ष पाठ।

English rendering The text states that in Jupiter’s pratyantara there is indication of a breach in accepted household arrangements and inability in oversight. Alternatively, conflict and agitation are named for this sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-प्रत्यन्तर)। गुरु-महादशा 16 वर्ष; प्रत्यन्तर = (अन्तर्दशा-वर्ष × 16) ÷ 120। अन्तिम क्रियापद वदेत्/भवेत् — पाठ-भेद संभव; अर्थ फल-कथन ही रहता है।

61.56
बुध्ढिर्विध्यार्ठलाभो वा वस्थ्रलाभो महथ्सुखम् ।
बुढास्यान्थर्धशायाञ्च बुढप्रथ्यन्थरे भवेथ्
budhḍhirvidhyārṭhalābho vā vasthralābho mahathsukham |
buḍhāsyānthardhaśāyāñca buḍhaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुद्धिः = बुद्धि; विद्या-अर्थ-लाभः = विद्या अथवा अर्थ (धन) का लाभ; वस्त्र-लाभः = वस्त्र-प्राप्ति; महत् सुखम् = महान् सुख; बुधस्य अन्तर्दशायाम् = बुध की अन्तर्दशा में; बुध-प्रत्यन्तरे = बुध के प्रत्यन्तर में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की अन्तर्दशा में जब बुध का ही प्रत्यन्तर चलता है, तब बुद्धि, विद्या या अर्थ-लाभ, वस्त्र-लाभ और महत् सुख का संकेत है। यह श्लोक parent-काल स्पष्ट नाम देता है — बुध-अन्तर् + बुध-प्रत्यन्तर — जिससे दशा-शृंखला का स्तर निश्चित होता है। शुभ-फल-भाषा भी “शास्त्र कहता है” के अनुशासन में ही पढ़ी जाए।

English rendering The text states that in Mercury’s antardaśā, during Mercury’s own pratyantara, intellect, gain of learning or wealth, gain of clothing, and great happiness are indicated. The verse itself pins both the parent antardaśā and the pratyantara lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अवधि-सूत्र यहाँ लागू (विंशोत्तरी): बुध-महादशा = 17 वर्ष। बुध-अन्तर् (बुध-महा में) = (17 × 17) ÷ 120 = 289/120 ≈ 2.408 वर्ष। बुध-प्रत्यन्तर उसी अन्तर् में = (289/120 × 17) ÷ 120 = 4913/14400 ≈ 0.341 वर्ष ≈ 4.09 मास (360-day dasha-year पर ≈ 122.8 दिन)। फल-भाग गणित नहीं; काल-खण्ड गणित है।

उदाहरण (worked example) जन्म-चन्द्र नक्षत्र-शेष से बुध-महादशा का आरम्भ तय होने पर (ayanāṃśa: whichever pinned — e.g. Lahiri — declare at chart level), बुध-अन्तर् का पूर्ण खण्ड 289/120 वर्ष। उसका प्रथम प्रत्यन्तर बुध स्वयं: 4913/14400 वर्ष। convention: विंशोत्तरी क्रम बुध → केतु → शुक्र → …; वर्ष-दिन 360 या 365.25 — इंजन में pinned `==` fixture से मिलाएँ।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी Σ = 120; बुध 17 pinned (vedic-ghadi/kaal daśā engine)। अन्तर् = (Y_maha × Y_antar)/120, प्रत्यन्तर = (T_antar × Y_prat)/120 — शुद्ध अनुपात; फल-श्लोक को उसी exact काल-खण्ड पर मैप किया जाता है, बिना फल को नियति बनाए।

61.57
कटिनान्नस्य सम्प्राप्थिरुधरे रोगसम्भवः ।
कामलं रक्थपिथ्थं च केथोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
kaṭinānnasya samprāpthirudhare rogasambhavaḥ |
kāmalaṃ rakthapiththaṃ ca kethoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कटिनान्न = कठोर/रूखा अन्न; सम्प्राप्ति = प्राप्ति; उदरे = उदर में; रोगसम्भवः = रोग की सम्भावना; कामलम् = कामला (पीलिया-प्रकार का दोष-कथन); रक्तपित्तम् = रक्त-पित्त दोष; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की प्रत्यन्तर्दशा में कठिन या रूखे अन्न की प्राप्ति का अनुभव हो सकता है, और उदर-सम्बन्धी कष्ट का संकेत दिया गया है। उसी काल-खण्ड में कामला तथा रक्तपित्त जैसे दोषों का उल्लेख भी है। यह फल-कथन प्रत्यन्तर्-स्तर की दशा-फल परम्परा का भाग है, न कि चिकित्सकीय निदान। पाठ में “सम्प्राप्तिरुदरे” जैसी सन्धि-रूप सम्भव; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in Ketu’s pratyantara the native may meet coarse or hard food and abdominal affliction, with indications of kāmalā and raktapitta. These are classical phala statements for that sub-sub-period, not medical claims.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रत्यन्तर्दशा-फल-कथन। अवधि-गणना इस श्लोक में नहीं; विंशोत्तरी-श्रृंखला (महा→अन्तर→प्रत्यन्तर) का अनुपात-अंकगणित पूर्व दशा-अध्यायों में है।

61.58
उथ्थरस्यां भवेल्लाभो हानिः स्याथ्थु चथुष्पधाथ् ।
अढिकारो न्त्ऱ्पागारे भ्त्ऱ्गोः प्र्थ्यनथरे भवेथ्
uththarasyāṃ bhavellābho hāniḥ syāththu cathuṣpadhāth |
aḍhikāro ntṟpāgāre bhtṟgoḥ prthyanathare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तरस्याम् = उत्तर दिशा से; लाभः = लाभ; हानिः = हानि; चतुष्पदात् = चौपाये/पशुओं से; अधिकारः = पद/अधिकार; नृपागारे = राज-भवन/राज-कार्यालय में; भृगोः = शुक्र (भृगु) की; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भृगु (शुक्र) की प्रत्यन्तर्दशा में उत्तर दिशा से लाभ का संकेत है, जबकि चौपायों से हानि का उल्लेख है। साथ ही नृप-आगार में अधिकार या पद-प्राप्ति का फल भी कहा गया है। दिशा-पशु-राज-आश्रय — तीन अलग-अलग फल-सूत्र एक ही प्रत्यन्तर-खण्ड से जोड़े गए हैं। “उत्तरस्यां / चतुष्पदात्” आदि रूपों में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in Venus’s (Bhṛgu’s) pratyantara there is gain from the northern quarter, loss connected with quadrupeds, and authority within a royal household or court. These are sequential phala clauses for that period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दिशा-लाभ, पशु-हानि, राज-अधिकार)। शुक्र-प्रत्यन्तर की वर्ष-माप यहाँ नहीं दी; वह महादशा×अन्तर×प्रत्यन्तर के 120-वर्ष अनुपात से अलग अध्याय-सूत्रों पर निर्भर करती है।

61.59
थेजोहानिर्भवेध्रोगस्थनुपीदा यधा कधा ।
जायथे चिथ्थवैकल्यं रवेः प्रथ्यन्थरे बुढे
thejohānirbhavedhrogasthanupīdā yadhā kadhā |
jāyathe ciththavaikalyaṃ raveḥ prathyanthare buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेजोहानिः = तेज का ह्रास; रोगः = रोग; तनुपीडा = शरीर (तनु) में पीड़ा; यथा कथा = किसी न किसी प्रकार; चित्तवैकल्यम् = चित्त की विकलता/मानसिक अस्थिरता; रवेः प्रत्यन्तरे = रवि (सूर्य) की प्रत्यन्तर्दशा में; बुधे = बुध की (अन्तर्)दशा के भीतर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की दशा के भीतर आती रवि-प्रत्यन्तर में तेज का ह्रास, रोग, किसी न किसी रूप में शारीरिक पीड़ा और चित्त की विकलता — ऐसा फल कहा गया है। यह दो स्तरों (बुध → रवि) के संयुक्त सूक्ष्म खण्ड का कथन है।

English rendering The text states that in the Sun's pratyantara within Mercury's period there is loss of vigour, illness, bodily pain in some form, and derangement of mind.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-अन्तर में रवि-प्रत्यन्तर)। दो स्पष्ट स्तर-नाम (बुध घेरने वाला, रवि प्रत्यन्तर) यहाँ घोंसला-संरचना को दिखाते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्रत्यन्तर(रवि) = अन्तर्दशा-अवधि × 6 ÷ 120, वही विंशोत्तरी अनुपात-गणित जिसे डोज़ियर में पिन किया गया। पूर्ण त्रि-स्तरीय रूप में यह (महा × अन्तर-वर्ष × रवि-वर्ष) ÷ 120² है — यहाँ रवि-वर्ष = 6 स्थिर। सजातीय ग्रह-वर्ष अंक अनुमान से नहीं, विंशोत्तरी सारणी (Σ = 120) से लिए गए हैं; यही तीसरे स्तर पर भी `==` अनुपात-सुसंगति बनाए रखता है।

61.60
स्थ्रीलाभश्चार्ठसम्पथ्थिः कन्यालाभो महध्ढनम् ।
लभथे सर्वथः सौख्यं विढोः प्र्थ्यन्थरे जनः
sthrīlābhaścārṭhasampaththiḥ kanyālābho mahadhḍhanam |
labhathe sarvathaḥ saukhyaṃ viḍhoḥ prthyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीलाभः = स्त्री-प्राप्ति/दाम्पत्य-लाभ; अर्थसम्पत्तिः = धन-समृद्धि; कन्यालाभः = कन्या-सन्तान/कन्या-सम्बन्धी लाभ; महाधनम् = बड़ा धन; लभते = प्राप्त करता है; सर्वतः = सब ओर से; सौख्यम् = सुख; विधोः = चन्द्र (विधु) की; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर्दशा में; जनः = व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि विधु (चन्द्र) की प्रत्यन्तर्दशा में स्त्री-लाभ, अर्थ-सम्पत्ति, कन्या-लाभ तथा महाधन का संकेत है। व्यक्ति को सर्वतः सौख्य मिलने का भी फल कहा गया है। यह शुभ-फलों का संक्षिप्त समूह है — दशा-फल परम्परा का आशावादी पक्ष, न कि निश्चित घटना-सूची। “अर्थ / महाधन” आदि में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in the Moon’s (Vidhu’s) pratyantara the person may gain a spouse or feminine favor, wealth, a daughter, and great riches, and may find comfort from every side. These are classical auspicious phala clauses for that sub-sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्त्री/अर्थ/कन्या/सौख्य)। चन्द्र-प्रत्यन्तर की संख्यात्मक अवधि यहाँ नहीं दी गई।

61.61
अठ प्रथ्यन्थर्धशाफलाढ्यायः
aṭha prathyanthardhaśāphalāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (आरम्भ-सूचक अव्यय); प्रत्यन्तर्दशा = अन्तर्दशा के भीतर की तीसरी (सूक्ष्म) दशा-परत; फल = परिणाम/फलादेश; अध्यायः = अध्याय (मुद्रित "आढ्यायः" = अध्यायः)।

हिन्दी भावार्थ यह फल-श्लोक नहीं, अपितु सन्धि-वाक्य/शीर्षक है — "अब प्रत्यन्तर्दशा-फल का अध्याय (आरम्भ)।" यह विंशोत्तरी की तीसरी परत के फल-वर्णन को नाम देता है। इस शीर्षक का अध्याय-मध्य में आना असामान्य है, अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering This is not a phala verse but a section-colophon: "Now, the chapter on the results of the pratyantar-daśā."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-शीर्षक/संधि-वाक्य। संरचनात्मक रूप से यह दशा-वृक्ष का तीसरा स्तर घोषित करता है: महादशा → अन्तर्दशा → प्रत्यन्तर्दशा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही तीन-स्तरीय घोंसला वह विंशोत्तरी अनुपात-गणित है जिसे डोज़ियर (Ch.46–47) में पिन किया गया — प्रत्येक परत पिछली की अवधि पर (ग्रह-वर्ष ÷ 120) गुणा करती है, अतः प्रत्यन्तर = (महा × अन्तर × प्रत्यन्तर-वर्ष) ÷ 120²। ग्रह-वर्षों का योग ठीक 120 है (केतु 7 … बुध 17), और यह समता किसी सहनशीलता-बैण्ड से नहीं, `==` से जाँची जाती है — तीसरे स्तर पर भी वही अंश-अंकगणित बिना त्रुटि-संचय के चलता है।

61.62
कलहो जायथे स्थ्रीभिरकस्माध्भयसम्भवः ।
राजशस्थ्राक्त्ऱ्था भीथिः राहिः प्र्थ्यन्थरे ध्विज
kalaho jāyathe sthrībhirakasmādhbhayasambhavaḥ |
rājaśasthrāktṟthā bhīthiḥ rāhiḥ prthyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलहः = झगड़ा; जायते = उत्पन्न होता है; स्त्रीभिः = स्त्रियों के साथ; अकस्मात् = अचानक; भयसम्भवः = भय की उत्पत्ति; राजशस्त्राकृत्या = राज-शस्त्र/राज-दण्ड की क्रिया से; भीतिः = भय; राहोः प्रत्यन्तरे = राहु की प्रत्यन्तर्दशा में; द्विज = हे द्विज! (सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की प्रत्यन्तर्दशा में स्त्रियों से कलह तथा अचानक भय उत्पन्न होने का संकेत है। राज-शस्त्र या राज-दण्ड की क्रिया से भीति का भी उल्लेख है। सम्बोधन “द्विज” संवाद-शैली का है। यह सामाजिक-राजनीतिक तनाव का फल-कथन है; भय बढ़ाने वाला भविष्य-वाक्य नहीं, और न कोई उपचार-दाब। “राहोः / शस्त्राकृत्या” रूपों में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in Rāhu’s pratyantara there may be quarrels with women, sudden fear, and dread arising from royal force or punishment. “Dvija” is a vocative address within the dialogue frame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कलह, भय, राज-भीति)। राहु-प्रत्यन्तर की वर्ष-माप इस श्लोक में नहीं; महादशा 18 वर्ष (विंशोत्तरी) से अनुपातित खण्ड पूर्व सूत्रों पर निर्भर है।

61.63
राज्यं राज्याढिकारो वा पूजा राजसमुध्भवा ।
विध्याबुध्ढिसम्त्ऱ्ध्ढिश्च गुरोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
rājyaṃ rājyāḍhikāro vā pūjā rājasamudhbhavā |
vidhyābudhḍhisamtṟdhḍhiśca guroḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्यम् = राज्य/शासन-सम्बन्धी प्राप्ति; राज्याधिकारः = राज्य में अधिकार/पद; वा = अथवा; पूजा = सम्मान/आदर; राजसमुद्भवा = राजा से उत्पन्न; विद्या = ज्ञान/शिक्षा; बुद्धि = बुद्धि; समृद्धिः = वृद्धि/समृद्धि; गुरोः प्रत्यन्तरे = गुरु (बृहस्पति) की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की प्रत्यन्तर्दशा में राज्य अथवा राज्याधिकार, तथा राजा से उत्पन्न पूजा-सम्मान का फल हो सकता है। विद्या और बुद्धि की समृद्धि का भी स्पष्ट उल्लेख है। राज-पद और ज्ञान-वृद्धि — दोनों शुभ-सूत्र एक ही प्रत्यन्तर से जोड़े गए हैं। यह पारम्परिक फल-भाषा है, नियति या “गारंटी” नहीं।

English rendering The text states that in Jupiter’s (Guru’s) pratyantara there may be a realm or royal authority, honor arising from the king, and increase of learning and intelligence. These are classical auspicious phala statements for that sub-sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राज्य/अधिकार, राज-पूजा, विद्या-बुद्धि-समृद्धि)। गुरु-प्रत्यन्तर की संख्यात्मक अवधि यहाँ नहीं; विंशोत्तरी में गुरु-महादशा 16 वर्ष — प्रत्यन्तर उसी 120-वर्ष अनुपात-शृंखला का आगे का भाग है, इस श्लोक में अचर नहीं।

61.64
वाथपिथ्थमहापीदा धेहघाथसमुध्भवा ।
ढननाशमवाप्नोथि शनेः प्रथ्यन्थरे जनः
vāthapiththamahāpīdā dhehaghāthasamudhbhavā |
ḍhananāśamavāpnothi śaneḥ prathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वातपित्तमहापीडा = वात-पित्त से उत्पन्न बड़ी पीड़ा; देहघातसमुद्भवा = शरीर-घात/शारीरिक आघात से उत्पन्न; धननाशम् = धन का नाश; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; शनेः = शनि का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर (अन्तर्दशा के भीतर तीसरी स्तरीय दशा) में; जनः = मनुष्य। (पाठ: वाथपिथ्थ… — वातपित्त; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की प्रत्यन्तर-दशा में व्यक्ति को वात-पित्त से जुड़ी भारी पीड़ा का अनुभव होता है, जो देह-घात या शारीरिक आघात की दिशा में वर्णित है। साथ ही धन-नाश भी इस काल का फल-कथन है। यह फल-वर्णन है, निश्चित घटना या रोग-निदान नहीं।

English rendering The text states that in Saturn’s pratyantara the native meets severe vāta–pitta affliction arising in connection with bodily harm, and also incurs loss of wealth. This is a traditional phala statement, not a medical or financial prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शनि-प्रत्यन्तर विंशोत्तरी की तीसरी परत है; अवधि-गणना इस श्लोक में नहीं दी गई — केवल फल-सूची है।

61.65
आपथ्समुध्भवोऽकस्माध्धेशन्थरसमागमः ।
केथ्वन्थरेऽर्ठहानिश्च केथोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
āpathsamudhbhavo'kasmādhdheśantharasamāgamaḥ |
kethvanthare'rṭhahāniśca kethoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आपत्समुद्भवः = विपत्ति/संकट का उठना; अकस्मात् = अचानक; देशान्तरसमागमः = अन्य देश (परदेश) से मिलन/यात्रा; केत्वन्तरे = केतु की अन्तर्दशा में; अर्थहानिः = धन की हानि; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की अन्तर्दशा में जब केतु की ही प्रत्यन्तर आए, तब अकस्मात् विपत्ति, परदेश-गमन/परदेश-सम्पर्क और धन-हानि — ऐसे फल कहे गए हैं। यहाँ अन्तर तथा प्रत्यन्तर दोनों का स्वामी एक ही (केतु) है।

English rendering The text states that in Ketu's own pratyantara within Ketu's antardaśā there is sudden calamity, contact with a foreign land, and loss of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-अन्तर में केतु-प्रत्यन्तर)। समान-स्वामी स्व-घोंसला खण्ड, विंशोत्तरी क्रम में केतु से आरम्भ होने वाली परत।

हमारा डिकोड (Our Decode) डोज़ियर की विंशोत्तरी सारणी में केतु प्रथम स्वामी है (केतु 7 वर्ष), और स्व-अन्तर का स्व-प्रत्यन्तर सबसे लघु सजातीय स्लाइस देता है: केतु-महा → केतु-अन्तर = (7 × 7) ÷ 120 = 49 ÷ 120 ≈ 0.408 वर्ष, फिर उसका केतु-प्रत्यन्तर = 0.408 × 7 ÷ 120 ≈ 0.0238 वर्ष ≈ 8.7 दिन। ग्रह-वर्ष (केतु = 7) अनुमान से नहीं, विंशोत्तरी सारणी (Σ = 120) से लिया गया — यही अंश-अंकगणित तीसरे स्तर पर भी `==`-सुसंगत रहता है।

61.66
म्लेच्छभीरर्ठनाशो वा नेथ्ररोगः शिरोव्यठा ।
हानिश्चथुष्पधानां च भ्त्ऱ्गोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
mlecchabhīrarṭhanāśo vā nethrarogaḥ śirovyaṭhā |
hāniścathuṣpadhānāṃ ca bhtṟgoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) म्लेच्छ-भीः = विदेशी/म्लेच्छ जनों से भय; अर्थ-नाशः = धन की हानि; वा = अथवा; नेत्र-रोगः = आँखों का रोग; शिरो-व्यथा = सिर की पीड़ा; हानिः चतुष्पदानाम् = गौ आदि चौपायों की क्षति; भृगोः प्रत्यन्तरे = शुक्र (भार्गव) की प्रत्यन्तर्दशा में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शुक्र के प्रत्यन्तर में शास्त्र इन फलों का कथन करता है — म्लेच्छ अर्थात् परजनों से भय अथवा धन की हानि, नेत्र-रोग, सिर-पीड़ा, तथा पशुधन की क्षति। यह प्रत्यन्तर्दशा-फल अध्याय (अध्याय ६१) की कड़ी है, जहाँ प्रत्येक श्लोक एक प्रत्यन्तर-स्वामी का फल गिनाता है।

English rendering In the pratyantara of Venus (Bhṛgu), the text states, there may come fear from foreigners or loss of wealth, eye-disease, headache, and loss of cattle.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह विशुद्ध फल-श्लोक है; इसका एकमात्र "संख्यात्मक" तत्त्व प्रत्यन्तर-स्वामी की पहचान (शुक्र) है, जिस पर उस अवधि की लम्बाई निर्भर करती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्रत्यन्तर्दशा विंशोत्तरी की तीसरी उपविभाजन-सतह है (dossier §3, १२०-वर्ष चक्र)। जैसे अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२०, वैसे ही प्रत्यन्तर-अवधि = (अन्तर्दशा-अवधि × प्रत्यन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२० — शुद्ध अनुपात-अंकगणित, जिसे हमारे कालदशा-इंजन (vedic-ghadi) ने इसी सूत्र पर पिन किया है। श्लोक केवल फल देता है; अवधि गणित से आती है।

61.67
मिथ्रैः सह विरोढश्च स्वल्पम्त्ऱ्थ्युः पराजयः ।
मथिभ्रंशो विवाधश्च रवेः प्र्थ्यन्थरे भवेथ्
mithraiḥ saha viroḍhaśca svalpamtṟthyuḥ parājayaḥ |
mathibhraṃśo vivādhaśca raveḥ prthyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मित्रैः सह = मित्रों के साथ; विरोधः = विरोध/कलह; स्वल्पमृत्युः = स्वल्प मृत्यु-संकेत (शास्त्र-शब्द: लघु आपत्ति-स्तर, निश्चित मृत्यु नहीं); पराजयः = पराजय; मतिभ्रंशः = बुद्धि/मति का भ्रंश; विवादः = विवाद; रवेः = सूर्य का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में। (पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रवि की प्रत्यन्तर में मित्रों से विरोध, स्वल्प-मृत्यु-संकेत, पराजय, मतिभ्रंश और विवाद का फल-कथन है। “स्वल्पमृत्यु” को शास्त्र की पारम्परिक आपत्ति-भाषा समझें — निश्चित मृत्यु-घोषणा या भय-व्यापार नहीं। केवल काल-फल का वर्णन।

English rendering The text states that in the Sun’s pratyantara there is conflict with friends, a “slight death”-type indication (traditional severity language), defeat, confusion of mind, and dispute. Render as the śāstra’s claim, never as certain fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूर्य की विंशोत्तरी महादशा 6 वर्ष है; श्लोक प्रत्यन्तर-फल बताता है, संख्यात्मक सूत्र नहीं।

61.68
अन्ननाशो यशोहानिर्धेहपीदा मथिभ्रमः ।
आमवाथाधिव्त्ऱ्ध्ढिश्चविढोः प्र्थ्यन्थरे भवेथ्
annanāśo yaśohānirdhehapīdā mathibhramaḥ |
āmavāthādhivtṟdhḍhiścaviḍhoḥ prthyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ननाशः = अन्न/खाद्य-सामग्री की हानि; यशोहानिः = यश की हानि; देहपीडा = देह-पीड़ा; मतिभ्रमः = मति-भ्रम; आमवाताधिवृद्धिः = आमवात-सम्बद्ध क्लेश की वृद्धि (शास्त्र-शब्द); विदोः = चन्द्र (विधु) का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में। (पाठ: चविढोः → विदोः; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि विधु (चन्द्र) की प्रत्यन्तर में अन्न-नाश, यश-हानि, देह-पीड़ा, मति-भ्रम, तथा आमवात-सम्बद्ध क्लेश की वृद्धि का फल-वर्णन है। ये शब्द शास्त्र की फल-सूची हैं — आहार, कीर्ति या स्वास्थ्य का आधुनिक निदान नहीं। भय-व्याख्या से बचें; पाठ को “शास्त्र कहता है” के रूप में रखें।

English rendering The text states that in the Moon’s (Vidhu’s) pratyantara there is loss of food-stores, loss of renown, bodily pain, mental confusion, and increase of āmavāta-type affliction (traditional term). Report the claim; do not medicalize or fear-frame it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चन्द्र की विंशोत्तरी महादशा 10 वर्ष है; यहाँ केवल चन्द्र-प्रत्यन्तर का फल है, गणना नहीं।

61.69
शस्थ्रघाथेन पाथेन पीदिथो वह्निपीदया ।
नीचाध्भीथी रिपोः शङ्का कुजप्रथ्यन्थरे भवेथ्
śasthraghāthena pāthena pīditho vahnipīdayā |
nīcādhbhīthī ripoḥ śaṅkā kujaprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शस्त्रघातेन = शस्त्र-घात से; पातेन = पतन/गिरने से; पीडितः = पीड़ित; वह्निपीडया = अग्नि-पीड़ा से; नीचात् भीतिः = नीच/अधम से भय; रिपोः शङ्का = शत्रु की शङ्का; कुजप्रत्यन्तरे = मङ्गल (कुज) की प्रत्यन्तर में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुज की प्रत्यन्तर में शस्त्र-घात, पतन, और वह्नि-पीड़ा से पीड़ित होने का फल-कथन है; साथ ही नीच-जन से भय और शत्रु-सम्बन्धी शङ्का का वर्णन है। यह संघर्ष-काल की पारम्परिक भाषा है — हिंसा की भविष्यवाणी या निश्चित आघात नहीं। पाठ को सावधानी और ग़ैर-भय के साथ पढ़ें।

English rendering The text states that in Mars’s (Kuja’s) pratyantara the native is described as afflicted by weapon-wound, by a fall, and by fire-trouble, with fear from the base and suspicion of enemies. Traditional phala only—not a violence forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। मङ्गल की विंशोत्तरी महादशा 7 वर्ष है; श्लोक केवल कुज-प्रत्यन्तर का फल-सूची है।

61.70
कामिनीभ्यो भयं भूयाथ्थठा वैरिसमुध्भवः ।
क्षुध्राधपि भवेध्भीथी राहोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
kāminībhyo bhayaṃ bhūyāththaṭhā vairisamudhbhavaḥ |
kṣudhrādhapi bhavedhbhīthī rāhoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कामिनीभ्यः = कामिनी/स्त्री-सम्बन्ध से; भयम् = भय; भूयात् = अधिक/प्रबल हो; तथा = तथा; वैरिसमुद्भवः = वैर/शत्रुता का उदय; क्षुद्रात् अपि = क्षुद्र/तुच्छ से भी; भीतिः = भीति; राहोः = राहु का; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की प्रत्यन्तर में कामिनी-सम्बन्ध से प्रबल भय, वैर का उदय, और क्षुद्र वस्तुओं या क्षुद्र व्यक्तियों से भी भीति का फल-वर्णन है। यह अस्थिर-भय और शत्रुता-संकेत की पारम्परिक भाषा है — स्त्री-द्वेष, निश्चित शत्रुता, या मनोवैज्ञानिक निदान नहीं। “शास्त्र कहता है” — और यहीं रुकें।

English rendering The text states that in Rāhu’s pratyantara there is great fear from women (kāminī), arising of enmity, and fear even from the petty. Traditional result-language only; not a judgment on persons or a clinical claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। राहु की विंशोत्तरी महादशा 18 वर्ष है; यह श्लोक राहु-प्रत्यन्तर का फल मात्र देता है, अवधि-अनुपात नहीं।

61.71
ढनहानिर्महोथ्पाथो स/स्थ्रमिथ्रविनाशनम् ।
सर्वथ्र लभथे क्लेशं गुरोः प्रथ्यन्थरे फलम्
ḍhanahānirmahothpātho sa/sthramithravināśanam |
sarvathra labhathe kleśaṃ guroḥ prathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनहानि = धन की हानि; महोत्पात = बड़ा उत्पात/आपद्-संकेत; शस्त्र-मित्र-विनाशन = शस्त्र तथा मित्र-नाश (पाठ: स/स्थ्रमिथ्र — पाठ-भेद संभव); सर्वत्र = हर क्षेत्र में; क्लेश = कष्ट; गुरोः प्रत्यन्तरे = गुरु (बृहस्पति) की प्रत्यन्तर-दशा में; फलम् = फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की प्रत्यन्तर-दशा में धन की हानि और महान् उत्पात-जैसा दबाव सूचित होता है। शस्त्र/संघर्ष तथा मित्र-पक्ष के नाश की भी बात कही गई है — यहाँ पाठ में अस्पष्टता संभव है। सर्वत्र क्लेश मिलने का फल बताया गया है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that in Jupiter’s pratyantara the indications are loss of wealth, great disturbance, and harm involving weapons/conflict and friends (reading uncertain). Distress is said to be met with in every sphere. This is a phala statement of the śāstra, not a fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। प्रत्यन्तर स्वयं विंशोत्तरी की त्रिस्तरीय काल-अनुपात संरचना का फल-प्रकरण है; इस श्लोक में केवल गुरु-प्रत्यन्तर का फल कहा गया है, अवधि-सूत्र नहीं।

61.72
गोमहिष्याधिमरणं धेहपीदा सुह्त्ऱ्ध्वढः ।
स्वल्पाल्पलाभकरणं शनेः प्रथ्यन्थरे फलम्
gomahiṣyādhimaraṇaṃ dhehapīdā suhtṟdhvaḍhaḥ |
svalpālpalābhakaraṇaṃ śaneḥ prathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गो-महिष्यादि-मरणम् = गौ-भैंस आदि पशुओं की मृत्यु; देहपीडा = शरीर-पीड़ा; सुहृद्वधः = सुहृद्/मित्र-वध (नाश); स्वल्प-अल्प-लाभ-करणम् = अत्यल्प लाभ का होना; शनेः प्रत्यन्तरे = शनि की प्रत्यन्तर-दशा में; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शनि की प्रत्यन्तर में गो-महिष्यादि पशु-हानि, देह-पीड़ा तथा सुहृद्-नाश का संकेत देता है। लाभ को स्वल्प-अल्प कहा गया है — अर्थात फल-पक्ष में संकोच। यह सब शास्त्रीय फल-भाषा है; चिकित्सा या पशु-हानि की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that Saturn’s pratyantara indicates death or loss among cattle (cows, buffaloes, and the like), bodily pain, harm to dear ones, and only very meagre gain. These are traditional phala claims, not endorsed predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शनि-प्रत्यन्तर की अवधि विंशोत्तरी अनुपात से निकलती है; यहाँ केवल फल-सूची है, काल-गणना नहीं।

61.73
बुध्ढिनाशो महोध्वेगो विध्याहानिर्महाभयम् ।
कार्यसिध्ढिर्न जायथे ज्ञस्य प्रथ्यन्थरे फलम्
budhḍhināśo mahodhvego vidhyāhānirmahābhayam |
kāryasidhḍhirna jāyathe jñasya prathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुद्धिनाशः = बुद्धि/विवेक का क्षय; महोद्वेगः = महान् उद्वेग; विद्याहानिः = विद्या की हानि; महाभयम् = बड़ा भय; कार्यसिद्धिः न जायते = कार्य-सिद्धि नहीं होती; ज्ञस्य = बुध (ज्ञ) की; प्रत्यन्तरे = प्रत्यन्तर-दशा में; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध (ज्ञ) की प्रत्यन्तर में बुद्धि-नाश, महोद्वेग, विद्या-हानि और महाभय सूचित होते हैं। कार्य-सिद्धि न होने का स्पष्ट कथन है। यहाँ “नाश/भय” शास्त्र की फल-भाषा है — मनोवैज्ञानिक या शैक्षिक निदान नहीं।

English rendering The text states that Mercury’s pratyantara brings indications of impaired discrimination, great agitation, loss of learning, great fear, and non-accomplishment of undertakings. Report the śāstra’s claim; do not treat it as clinical or deterministic fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “ज्ञ” = बुध — ग्रह-नाम की शास्त्रीय संज्ञा; अवधि-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

61.74
श्वेथाश्ववस्थ्रमुक्थाध्यं धिव्यस्थ्रीजङ्गजं सुखम् ।
लभथे शुक्रन्थरे प्राप्थे शुक्रप्रथ्यन्थरे जनः
śvethāśvavasthramukthādhyaṃ dhivyasthrījaṅgajaṃ sukham |
labhathe śukranthare prāpthe śukraprathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेत-अश्व = श्वेत घोड़े; वस्त्र = वस्त्र; मुक्ता-आद्यम् = मोती आदि रत्न; दिव्य-स्त्री-सङ्ग-जं सुखम् = उत्तम स्त्रियों के सङ्ग से उपजा सुख (मूल "जङ्गजं" — पाठ-भेद संभव); लभते = प्राप्त करता है; शुक्र-अन्तरे प्राप्ते = शुक्र की अन्तर्दशा प्राप्त होने पर; शुक्र-प्रत्यन्तरे जनः = शुक्र के प्रत्यन्तर में जातक।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की अन्तर्दशा में शुक्र के ही प्रत्यन्तर में शास्त्र शुभ फल कहता है — श्वेत अश्व, वस्त्र, मोती आदि रत्न, तथा उत्तम स्त्रियों के सङ्ग से उपजा सुख जातक प्राप्त करता है। यह इस बैच का एकमात्र श्लोक है जो अन्तर्दशा (शुक्र) और प्रत्यन्तर (शुक्र) दोनों का सन्धिबिन्दु स्पष्ट नामता है।

English rendering When Venus's antardaśā is running, in the sub-sub-period of Venus itself, the text states, a person obtains white horses, garments, pearls and the like, and happiness from the company of fine women.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। किन्तु यही श्लोक विंशोत्तरी के त्रि-स्तरीय नेस्टिंग को स्पष्ट करता है, क्योंकि यह महादशा→अन्तर→प्रत्यन्तर का समान-स्वामी (शुक्र) संयोग नामता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) dossier §3 के अनुसार शुक्र-महादशा = २० वर्ष। शुक्र में शुक्र-अन्तर = २० × २०/१२० = ३·३३ वर्ष (३ वर्ष ४ मास)। उसमें शुक्र-प्रत्यन्तर = ३·३३ × २०/१२० ≈ ०·५५६ वर्ष ≈ ६ मास २० दिन — शुद्ध अनुपात-अंकगणित, हमारे कालदशा-इंजन में इसी क्रमिक भाजन-सूत्र पर पिन किया गया। श्लोक इस अवधि का फल देता है, अवधि स्वयं गणित से।

61.75
वाथज्वरः शिरःपीदा राज्ञः पीदा रिपोरपि ।
जायथे स्वल्पलाभोऽपि रवेः प्रथ्यन्थरे फलम्
vāthajvaraḥ śiraḥpīdā rājñaḥ pīdā riporapi |
jāyathe svalpalābho'pi raveḥ prathyanthare phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वातज्वरः = वात-ज्वर (शास्त्रीय दोष-भाषा); शिरःपीडा = शिर-पीड़ा; राज्ञः पीडा = राज-पक्ष से पीड़ा; रिपोः अपि = शत्रु से भी; स्वल्पलाभः अपि = स्वल्प लाभ ही; रवेः प्रत्यन्तरे = सूर्य की प्रत्यन्तर में; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य की प्रत्यन्तर में वातज्वर, शिर-पीड़ा, राजा से पीड़ा तथा शत्रु से भी कष्ट का संकेत देता है। लाभ को “स्वल्प” कहा गया है। वात/ज्वर आदि यहाँ ज्योतिष-फल की पारंपरिक भाषा हैं — चिकित्सा-निदान या उपचार-आदेश नहीं।

English rendering The text states that the Sun’s pratyantara indicates vāta-fever, headache, trouble from the king and from enemies, and only slight gain. Bodily terms are traditional phala vocabulary, not medical diagnosis or advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूर्य-प्रत्यन्तर का काल विंशोत्तरी अनुपात से निर्धारित होता है; यहाँ फल-सूची मात्र है।

61.76
कन्याजन्म न्त्ऱ्पाल्लाभो वस्थ्राभरणसंयुथः ।
राज्याढिकारसंप्राप्थिः चन्ध्रप्रथ्यन्थरे भवेथ्
kanyājanma ntṟpāllābho vasthrābharaṇasaṃyuthaḥ |
rājyāḍhikārasaṃprāpthiḥ candhraprathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्या-जन्म = कन्या का जन्म; नृपात् लाभः = नृप/राज-पक्ष से लाभ; वस्त्र-आभरण-संयुतः = वस्त्र-आभूषण सहित; राज्य-अधिकार-संप्राप्तिः = राज्य/अधिकार की प्राप्ति; चन्द्र-प्रत्यन्तरे = चन्द्र की प्रत्यन्तर में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र की प्रत्यन्तर में कन्या-जन्म, नृप से लाभ, वस्त्र-आभरण की प्राप्ति तथा राज्याधिकार-संप्राप्ति का फल सूचित होता है। “राज्य” यहाँ अधिकार/प्रतिष्ठा-फल की भाषा हो सकता है — आधुनिक पद-गारंटी नहीं। फल को शास्त्र-वाक्य के रूप में ही पढ़ें।

English rendering The text states that in the Moon’s pratyantara there may be the birth of a daughter, gain from a ruler, acquisition of clothes and ornaments, and attainment of authority or royal favour. Read as śāstric phala, not as a guaranteed career outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चन्द्र-प्रत्यन्तर की अवधि दशा-अनुपात से आती है; इस श्लोक में केवल शुभ-फल सूची है।

61.77
रक्थपिथ्थाधिरोगश्च कलहस्थादनं भवेथ् ।
महान्क्लेशो भवेधथ कुजप्रथ्यन्थरे ध्विज
rakthapiththādhirogaśca kalahasthādanaṃ bhaveth |
mahānkleśo bhavedhatha kujaprathyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्त-पित्तादि-रोगः = रक्त-पित्त आदि रोग (शास्त्रीय दोष-भाषा); कलह-स्थानम् = कलह तथा स्थान-संबंधी अशांति (पाठ: कलहस्थादनं — पाठ-भेद संभव); महान् क्लेशः = बड़ा क्लेश; कुज-प्रत्यन्तरे = मंगल (कुज) की प्रत्यन्तर में; द्विज = हे द्विज (संबोधन — मैत्रेय/शिष्य-परंपरा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुज (मंगल) की प्रत्यन्तर में रक्त-पित्त आदि रोग, कलह तथा स्थान-संबंधी अशांति, और महान् क्लेश होता है। “द्विज” संबोधन है — अध्याय की गुरु-शिष्य शैली। रक्त/पित्त यहाँ फल-शब्दावली हैं; चिकित्सा-निदान या भय-व्यापार नहीं।

English rendering The text states that Mars’s pratyantara indicates disorders of blood and pitta and the like, quarrel and unsettled place, and great affliction — addressed to the twice-born interlocutor. Report the claim; do not convert it into medical diagnosis or fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कुज-प्रत्यन्तर का काल-अनुपात विंशोत्तरी से आता है; यह श्लोक केवल मंगल-प्रत्यन्तर का फल देता है, गणना नहीं।

61.78
कलहो जायथे स्थ्रीभिरकस्माध्भयसम्भवः ।
राजथः शथ्रुथः पीदा राहोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
kalaho jāyathe sthrībhirakasmādhbhayasambhavaḥ |
rājathaḥ śathruthaḥ pīdā rāhoḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलहः = झगड़ा/विवाद; स्त्रीभिः = स्त्रियों के साथ; अकस्मात् = अचानक; भय-सम्भवः = भय का उदय; राजतः = राज-पक्ष से; शत्रुतः = शत्रु-पक्ष से; पीडा = कष्ट/बाधा; राहोः प्रत्यन्तरे = राहु की प्रत्यन्तर-दशा में; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन)

हिन्दी भावार्थ इस श्लोक में राहु की प्रत्यन्तर-अवधि का फल कहा गया है। शास्त्र कहता है कि इस काल में स्त्रियों से कलह उत्पन्न हो सकता है, और अचानक भय का अनुभव हो सकता है। राजा (शासन/अधिकार-पक्ष) तथा शत्रुओं की ओर से पीड़ा का भी उल्लेख है। यह फल-वर्णन है — गणना नहीं, और निश्चित भाग्य-वाक्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that in Rāhu’s pratyantara there may be quarrel with women, sudden fear, and affliction from the king’s side and from enemies. This is a traditional result-statement for that sub-period, not a fixed decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रत्यन्तर-दशा)। प्रत्यन्तर स्वयं विंशोत्तरी-श्रृंखला की तीसरी परत है; इसकी अवधि अनुपात-गणित से निकलती है, पर इस श्लोक में केवल फल बताया गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में महादशा → अन्तर्दशा → प्रत्यन्तर शुद्ध अनुपात-अंकगणित है: अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/१२०; प्रत्यन्तर उसी अनुपात से अन्तर्दशा के भीतर बाँटी जाती है। हमने १२०-वर्ष चक्र (केतु ७ … बुध १७, योग = १२०) को इंजन में पिन किया; यह श्लोक उसी समय-रेखा पर राहु-प्रत्यन्तर का शास्त्रीय फल-पटल जोड़ता है — फल व्याख्या है, अवधि-गणना अलग।

61.79
महध्ध्रव्यं महध्राज्यं वस्थ्र्मुक्थाधिभूषणम् ।
गजाश्वाधिपधप्राप्थिः गुरोः प्रथ्यन्थरे भवेथ्
mahadhdhravyaṃ mahadhrājyaṃ vasthrmukthādhibhūṣaṇam |
gajāśvādhipadhaprāpthiḥ guroḥ prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महद्-द्रव्यम् = बड़ा धन / मूल्यवान वस्तु; महद्-राज्यम् = बड़ा राज्य, उच्च राजपद; वस्त्र-मुक्ता-आदि-भूषणम् = वस्त्र, मोती (मुक्ता) आदि आभूषण; गज-अश्व-आदि-पद-प्राप्तिः = हाथी, घोड़े आदि वाहन तथा पद/अधिकार की प्राप्ति; गुरोः प्रत्यन्तरे = बृहस्पति (गुरु) की प्रत्यन्तर्दशा (उप-उप-अवधि) में; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (चल रही अन्तर्दशा के भीतर) गुरु की प्रत्यन्तर्दशा में जातक को महाधन, बड़ा राज्य अथवा उच्च राजपद, वस्त्र-मोती आदि आभूषण, और हाथी-घोड़े आदि वाहन तथा अधिकार-पद की प्राप्ति होती है। यह बृहस्पति के शुभ, ज्ञान-वृद्धि-ऐश्वर्यकारक स्वभाव के अनुरूप फल-सूची है।

English rendering The text states that in Jupiter's sub-sub-period great wealth, a high royal station, garments, pearls and ornaments, and the gaining of elephants, horses and rank arise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-प्रत्यन्तर का शुभ फल)। श्लोक स्वयं कोई संख्या नहीं देता; यह फल एक ठीक-ठीक परिकलित समय-खिड़की (गुरु की प्रत्यन्तर) से बँधा है — फल शास्त्र का कथन है, कोई अवश्यम्भावी भविष्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्रत्यन्तर की अवधि विशुद्ध अनुपात-गणित है — वही 120-वर्षीय विंशोत्तरी चक्र जिसे हमने चन्द्र-नक्षत्र-अंश पर keyed करके पिन किया (Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17; Σ = 120)। गुरु का महादशा-अंश = 16 वर्ष; अन्तर्दशा B के भीतर गुरु की प्रत्यन्तर = अन्तर्दशा(B) × 16 ÷ 120 = A × B × 16 ÷ 120² वर्ष। फल-सूची इसी exactly-timed उप-खिड़की से जुड़ती है, जबकि समय-गणना केवल अनुपात रहता है।

61.80
खरोष्त्रछागसम्प्राप्थिर्लोहमाषथिलाधिकम् ।
लभथे स्वल्पपीदाधि शनेः प्रथ्यन्थरे जनः
kharoṣtrachāgasamprāpthirlohamāṣathilādhikam |
labhathe svalpapīdādhi śaneḥ prathyanthare janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) खर = गधा; उष्ट्र = ऊँट; छाग = बकरा (खर-उष्ट्र-छाग-सम्प्राप्तिः = इन पशुओं की प्राप्ति); लोह = लोहा; माष = उड़द; तिल = तिल (लोह-माष-तिल-आदिकम् = ये कृष्ण/तामस-द्रव्य); स्वल्प-पीडा-आदि = थोड़ी पीड़ा/कष्ट आदि (सहित); लभते = प्राप्त करता है; शनेः प्रत्यन्तरे = शनि की प्रत्यन्तर्दशा में; जनः = जातक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की प्रत्यन्तर्दशा में जातक गधे, ऊँट, बकरे (शनि-कारक निम्न-श्रेणी पशु) तथा लोहा, उड़द, तिल जैसी वस्तुएँ पाता है — किन्तु साथ में थोड़ी पीड़ा/कष्ट भी बनी रहती है। यह शनि के तामस, कृष्ण-द्रव्य एवं श्रम-कारकत्व के अनुरूप मिश्रित फल है।

English rendering The text states that in Saturn's sub-sub-period one obtains donkeys, camels and goats, and iron, black gram, sesame and the like — accompanied by minor affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्रत्यन्तर का मिश्र फल)। ध्यान दें कि यहाँ "स्वल्प-लाभ + स्वल्प-पीड़ा" का संतुलित शनि-स्वर है — शास्त्र का कथन मात्र, भय या नियति-दावा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) शनि का विंशोत्तरी महादशा-अंश = 19 वर्ष (हमारे पिन किए Σ = 120 में Venus 20 के बाद दूसरा सबसे बड़ा अंश)। अन्तर्दशा B के भीतर शनि की प्रत्यन्तर = अन्तर्दशा(B) × 19 ÷ 120 वर्ष। इसीलिए शनि की प्रत्यन्तर-खिड़कियाँ चक्र में सर्वाधिक चौड़ी में से हैं — फल अधिक समय टिकता प्रतीत होता है, पर यह केवल अनुपात-गणित से नियत लम्बाई है, फल का बल नहीं।

61.81
ढनज्ञानमहल्लाभो राजराज्याधिकारिथा ।
निक्षेपाध्ढनलाभोऽपि ज्ञस्य प्रथ्यन्थरे भवेथ्
ḍhanajñānamahallābho rājarājyādhikārithā |
nikṣepādhḍhanalābho'pi jñasya prathyanthare bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन = धन; ज्ञान = विद्या/ज्ञान; महत्-लाभः = महान् लाभ (महल्लाभ = महान् लाभ); राज-राज्य-अधिकारिता = राजा के राज्य में अधिकार/पद-धारण; निक्षेपात् = धरोहर / गड़े कोष / न्यास से; धन-लाभः अपि = धन की प्राप्ति भी; ज्ञस्य प्रत्यन्तरे = ज्ञ = बुध (Mercury) की प्रत्यन्तर्दशा में ('ज्ञ' = ज्ञानी/बुद्धिमान् ग्रह, बुध का पर्याय); भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की प्रत्यन्तर्दशा में धन और विद्या दोनों का बड़ा लाभ, राजकीय अधिकार/पद, तथा धरोहर या निक्षेप (गड़े कोष/न्यास) से भी धन-प्राप्ति होती है। बुध का बुद्धि-वाणिज्य-गणना कारकत्व यहाँ विद्या और अर्थ दोनों के एक साथ लाभ में प्रकट होता है।

English rendering The text states that in Mercury's sub-sub-period there is great gain of both wealth and learning, royal authority, and even gain of wealth from a deposit or hoard.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्रत्यन्तर का शुभ फल)। "निक्षेप से धन-लाभ" तक बुध का बुद्धि/गणना-कारकत्व झलकता है — तथापि यह शास्त्र की फल-सूची है, न कि प्रमाणित पूर्वानुमान।

हमारा डिकोड (Our Decode) बुध का विंशोत्तरी महादशा-अंश = 17 वर्ष, और वह क्रम में अन्तिम ग्रह है (…Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17), जो 120-वर्षीय चक्र को बंद करता है। अन्तर्दशा B के भीतर बुध की प्रत्यन्तर = अन्तर्दशा(B) × 17 ÷ 120 वर्ष। हमारे दशा-इंजन में यह अंश-मान exact-`==` अनुशासन पर पिन है (कोई सहिष्णुता-बैंड नहीं); गणित और फल-कथन को हम सदैव अलग रखते हैं।

61.82
अपम्त्ऱ्थ्युभयं ज्ञेयं धेशाध्धेशान्थरागमः ।
लाभोऽपि जायथे मढ्ये केथोः प्रथ्यन्थरे ध्विज
apamtṟthyubhayaṃ jñeyaṃ dheśādhdheśāntharāgamaḥ |
lābho'pi jāyathe maḍhye kethoḥ prathyanthare dhvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अप-मृत्यु-भयम् = अकाल/असमय मृत्यु का भय (शास्त्र-भाषा; चिकित्सकीय निदान नहीं); ज्ञेयम् = जानना चाहिए; देशात् देशान्तर-आगमः = एक देश से दूसरे देश में गमन/आगमन; लाभः अपि = लाभ भी; जायते मध्ये = मध्य काल में उत्पन्न होता है; केतोः प्रत्यन्तरे = केतु की प्रत्यन्तर में; द्विज = हे द्विज (संबोधन)

हिन्दी भावार्थ केतु की प्रत्यन्तर का फल मिश्रित और गतिशील कहा गया है। शास्त्र कहता है — अपमृत्यु का भय ज्ञेय है (यहाँ “भय” मनोदशा/संकेत-भाषा है, मृत्यु-पूर्वानुमान या चिकित्सा-वाक्य नहीं)। देश से देशान्तर आने-जाने का भी उल्लेख है। साथ ही, मध्य काल में लाभ भी उत्पन्न होता है — पूरा काल एक-सा नहीं, मध्य में लाभ-सूत्र जुड़ा है। संबोधन “द्विज” गुरु-शिष्य संवाद की शैली है।

English rendering The text states that in Ketu’s pratyantara one should know the fear of untimely death (as traditional wording, not a medical claim), travel from one country to another, and that gain also arises in the middle of the period. O twice-born — a mixed phala with a mid-period benefit note.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्रत्यन्तर), पर “मध्ये” शब्द काल-खंड की मध्य-अवधि की ओर इशारा करता है। केतु महादशा = ७ वर्ष; किसी अन्तर्दशा में केतु-प्रत्यन्तर की कुल लंबाई L = (अन्तर्दशा-अवधि × ७)/१२०; “मध्ये लाभ” उस L के मध्य भाग का फल-संकेत है, अलग संख्या-सूत्र श्लोक नहीं देता।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी चक्र केतु ७ वर्ष से आरंभ होता है (Σ = १२०)। प्रत्यन्तर-परत वही अनुपात-अंकगणित है जिसे दशा-इंजन नक्षत्र-भोगांश से महादशा-शेष काटकर लागू करता है। श्लोक फल और “मध्ये” का गुणात्मक संकेत देता है; अवधि-माप सटीक `==` अनुपात से, फल “शास्त्र कहता है” की सीमा में रहता है।

अध्यायः 62

सूक्ष्मान्तर्दशाध्यायः

82 श्लोक
62.1
गुण्या स्वस्वधशावर्षैः प्रथ्यन्थरधशामिथिः ।
खार्क्रैभक्था प्त्ऱ्ठग्लब्ढिः सूक्ष्मान्थरधशा भवेथ्
guṇyā svasvadhaśāvarṣaiḥ prathyantharadhaśāmithiḥ |
khārkraibhakthā ptṟṭhaglabḍhiḥ sūkṣmāntharadhaśā bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुण्या = गुणा किए जाने योग्य; स्व-स्व-दशा-वर्षैः = प्रत्येक ग्रह के अपने-अपने विंशोत्तरी दशा-वर्षों से; प्रत्यन्तर-दशा-मितिः = प्रत्यन्तर्दशा का मान/परिमाण; खार्कैः = ख(0)·अर्क(12), वामतो गति से → 120 से; भक्ता = भाग देने पर; पृथक्-लब्धिः = अलग-अलग प्राप्त भजनफल; सूक्ष्मान्तर-दशा = सूक्ष्म (अन्तर से एक स्तर नीचे की उप-दशा); भवेत् = होती है। (पाठ "खार्क्रैः" शुद्धतः "खार्कैः" — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ सूक्ष्मान्तर-दशा निकालने का गणित देता है — प्रत्यन्तर्दशा के परिमाण को उस ग्रह के अपने विंशोत्तरी वर्षों से गुणा करो, फिर 120 (खार्क) से भाग दो; जो पृथक् भजनफल मिले वही उस ग्रह की सूक्ष्मान्तर-दशा है। यह वही आवर्ती अनुपात-नियम है जो महादशा → अन्तर्दशा → प्रत्यन्तर पर चलता आया — अब केवल एक सोपान और गहरे।

English rendering Multiply the measure of the pratyantar-daśā by each planet's own Vimśottarī daśā-years and divide by 120 (khārka); the quotient thus separately obtained is that planet's sūkṣmāntar-daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
सूक्ष्मा(ग्रह) = प्रत्यन्तर-मान × (ग्रह के विंशोत्तरी वर्ष) ÷ 120
जहाँ खार्क = ख(0)·अर्क(12) → 120 = Σ(विंशोत्तरी वर्ष)। विंशोत्तरी वर्ष: केतु 7, शुक्र 20, रवि 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। नियम हर स्तर पर एक ही है: उप-अवधि = मूल-अवधि × उप-ग्रह-वर्ष ÷ 120।

उदाहरण (worked example) मान लो कोई प्रत्यन्तर्दशा ठीक 120 दिन की है। तब —
रवि की सूक्ष्मा = 120 × 6 ÷ 120 = 6 दिन; चन्द्र = 120 × 10 ÷ 120 = 10 दिन; राहु = 120 × 18 ÷ 120 = 18 दिन; इत्यादि।
अर्थात् प्रत्येक ग्रह की सूक्ष्मा (दिनों में) ठीक उसका विंशोत्तरी अंक बन जाती है, और 7+20+6+10+7+18+16+19+17 = 120 दिन = सम्पूर्ण प्रत्यन्तर्दशा। भाग निःशेष (exact) है — कोई अवशेष नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही 120-वर्षीय विंशोत्तरी चक्र (केतु 7 … बुध 17, Σ=120; BPHS अ.46–47) हमारे दशा-इंजन का आधार है — हर स्तर शुद्ध अनुपात-अंकगणित (उप = मूल × ग्रह-वर्ष ÷ 120)। ऊपर का Σ=120 पर निःशेष बंद होना (closure) हमारी exact-`==` अनुशासन का ही रूप है: सूक्ष्मा-अंशों का योग पुनः मूल अवधि लौटाता है, कोई सहनशीलता-बैंड नहीं।

62.2
निजभूमिपरिथ्यागो प्राणनाशभयं भवेथ् ।
स्ठाननाशो महाहानिः निजसूक्ष्मगथे रवौ
nijabhūmiparithyāgo prāṇanāśabhayaṃ bhaveth |
sṭhānanāśo mahāhāniḥ nijasūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निज-भूमि-परित्यागः = अपनी भूमि/स्थान का त्याग; प्राण-नाश-भयम् = जीवन-हानि का भय; स्थान-नाशः = पद/स्थान का नाश; महाहानिः = बड़ी हानि; निज-सूक्ष्म-गते = अपनी ही सूक्ष्मा में स्थित होने पर; रवौ = (रवि की अन्तर्दशा में) सूर्य। (रवि-अन्तर, रवि-सूक्ष्मा।)

हिन्दी भावार्थ रवि की अन्तर्दशा में जब रवि की ही सूक्ष्मान्तर-दशा चले, तो शास्त्र कहता है — इस काल में अपने स्थान/भूमि का त्याग, प्राण-हानि की आशंका, पद-च्युति और महती हानि जैसे फल गिनाए गए हैं। यह पूर्णतः शास्त्र का फल-कथन है, कोई निश्चयात्मक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering In the Sun's own sūkṣma (within the Sun's antara), the text names abandonment of one's own land, danger to life, fall from position, and great loss.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूक्ष्मा का परिमाण अवश्य श्लोक 62.1 के सूत्र से (रवि-सूक्ष्मा = प्रत्यन्तर × 6 ÷ 120) निकलता है; यह श्लोक केवल उस काल-खण्ड का फल बताता है, संख्या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) ऐसे "प्राण-नाश-भय", "स्थान-नाश" वाक्य ठीक वही फल-कथन हैं जिन्हें हमारा अनुशासन गणित से पृथक् रखता है — इन्हें "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करते हैं, भाग्य/निश्चय के रूप में कभी नहीं; भय या दबाव-मूलक चिकित्सा-कथन वर्जित।

62.3
धेवब्राह्मण्भक्थिश्च निथ्यकर्मरथस्थठा ।
सुप्रीथिः सर्वमिथ्रश्चैव रवेः सूक्ष्मगथे विढौ
dhevabrāhmaṇbhakthiśca nithyakarmarathasthaṭhā |
suprīthiḥ sarvamithraścaiva raveḥ sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवब्राह्मणभक्तिः = देव व ब्राह्मण के प्रति भक्ति; नित्यकर्मरतस्थिता = नित्य-कर्म में स्थिर रति; सुप्रीतिः = मधुर प्रसन्नता/अनुराग; सर्वमित्रः = सबका मित्र; रवेः सूक्ष्मगते विधौ = सूर्य-सम्बद्ध सूक्ष्म में चन्द्र (विधु) के काल में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की सूक्ष्म-परम्परा में जब चन्द्र की सूक्ष्म चलती है, शास्त्र देव-ब्राह्मण भक्ति, नित्य-कर्म में रति, सुप्रीति और सर्व-मित्रता का फल कहता है। सूर्य-निज-सूक्ष्म के कठोर चित्र के बाद यह शान्त, सात्त्विक स्वर है। पाठ भक्ति व नित्य-धर्म की प्रवृत्ति का संकेत देता है।

English rendering When the Moon’s sūkṣma runs in the Sun’s sūkṣma-sequence, the text states devotion to the gods and brāhmaṇas, steadiness in daily rites, cordial joy, and friendliness toward all.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चन्द्र-सूक्ष्म की अवधि = (चल-प्रत्यन्तर × १०) ÷ १२०; फल व्याख्या है, काल-गणना ६२.१ से।

62.4
क्रूरकर्मरथिस्थिग्मशथ्रुभिः परिपीदनम् ।
रक्थस्रावाधिरोगश्च रवेः सूक्ष्मगथे कुजे
krūrakarmarathisthigmaśathrubhiḥ paripīdanam |
rakthasrāvādhirogaśca raveḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूरकर्मरतिः = क्रूर कर्म में रुचि; तीक्ष्मशत्रुभिः परिपीडनम् = तीक्ष्ण शत्रुओं से पीड़न; रक्तस्रावः = रक्त-स्राव (पाठ का लक्षण-शब्द); अधिरोगः = गम्भीर रोग (शास्त्र-शब्द); रवेः सूक्ष्मगते कुजे = सूर्य-सूक्ष्म-क्रम में मंगल-सूक्ष्म में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की सूक्ष्म-शृंखला में मंगल की सूक्ष्म आने पर शास्त्र क्रूर-कर्म-रति, तीक्ष्ण शत्रु-पीड़न तथा रक्तस्राव-आदि अधिरोग का उल्लेख करता है। यह कुज-तेज का तीखा फल-चित्र है—विरोध व शारीरिक दबाव की भाषा में। चिकित्सकीय निदान या भय फैलाना हमारा काम नहीं; केवल पाठ यथावत्।

English rendering Under Mars’s sūkṣma in the Sun’s sequence, the text states a bent toward harsh acts, oppression by fierce foes, and afflictions named as bleeding and serious disease—reported as śāstra-phala, not as medical counsel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। मंगल-सूक्ष्म = (प्रत्यन्तर × ७) ÷ १२०; यहाँ केवल फल-वर्णन है।

62.5
चौराग्निविषभीथिश्च रणे भङ्गः पराजयः ।
धानढर्माधिहीनश्च रवेः सूक्ष्मगथे ह्यगौ
caurāgniviṣabhīthiśca raṇe bhaṅgaḥ parājayaḥ |
dhānaḍharmādhihīnaśca raveḥ sūkṣmagathe hyagau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर-अग्नि-विष-भीतिः = चोर, अग्नि, विष का भय; रणे भङ्गः = युद्ध/संघर्ष में भंग; पराजयः = पराजय; धनधर्मअधिहीनः = धन व धर्म-अधिकार से हीन (धान → धन, पाठ-भेद संभव); रवेः सूक्ष्मगते ह्यगौ = सूर्य-सूक्ष्म-क्रम में ‘अगौ’—ग्रह-क्रम (रवि-चन्द्र-कुज-…-गुरु-शनि) से बुध/ज्ञ; पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ इस सूक्ष्म में शास्त्र चोर-अग्नि-विष का भय, रण में भंग-पराजय, तथा धन व धर्म-सम्पदा से हीनता का फल कहता है। सूर्य-क्रम का यह मध्य स्वर अस्थिरता व हानि-आशंका का चित्र खींचता है। नाम-पद ‘अगौ’ संदिग्ध हो सकता है; क्रम से बुध-सूक्ष्म मानकर पढ़ना युक्तिसंगत है, किन्तु पाठ-भेद संभव।

English rendering In this sūkṣma within the Sun’s line, the text states fear of thieves, fire, and poison; rout and defeat in conflict; and deprivation of wealth and dharmic standing. The planet-name “agau” is likely Budha by sequence—reading contested (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यदि बुध हों तो सूक्ष्म = (प्रत्यन्तर × १७) ÷ १२०; श्लोक स्वयं केवल फल देता है।

62.6
न्त्ऱ्पसथ्कारराजार्हः सेवकैः परिपूजिथः ।
राजचक्षुर्गथः शान्थः सूर्यसूक्ष्मगथे गुरौ
ntṟpasathkārarājārhaḥ sevakaiḥ paripūjithaḥ |
rājacakṣurgathaḥ śānthaḥ sūryasūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृपसत्कारः = नृप का सत्कार/सम्मान; राजार्हः = राजयोग्य गौरव; सेवकैः परिपूजितः = सेवकों द्वारा पूजित; राजचक्षुर्गतः = राज-दृष्टि/कृपा में आया; शान्तः = शान्त; सूर्यसूक्ष्मगते गुरौ = सूर्य-सूक्ष्म-क्रम में गुरु-सूक्ष्म में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की सूक्ष्म-परम्परा में गुरु की सूक्ष्म आने पर शास्त्र राजसत्कार, राजार्ह पद, सेवकों का आदर, राजचक्षु में आना और शान्ति का फल कहता है। कुज-बुध के तीखे फलों के बाद यह उदार, मान-सम्मान का स्वर है। पाठ गुरु-सूक्ष्म को संरक्षण व प्रतिष्ठा से जोड़ता है।

English rendering When Jupiter’s sūkṣma runs in the Sun’s sūkṣma-sequence, the text states royal honor, worthiness of kingly regard, veneration by attendants, favor in the sovereign’s eye, and calm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गुरु-सूक्ष्म = (प्रत्यन्तर × १६) ÷ १२०; फल-मात्र।

62.7
चौर्यसाहसकर्मार्ठं धेवब्राह्मणपीदनम् ।
स्ठानच्युथिं मनोधुखं रवेः सूक्ष्मगथे शनौ
cauryasāhasakarmārṭhaṃ dhevabrāhmaṇapīdanam |
sṭhānacyuthiṃ manodhukhaṃ raveḥ sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर्यसाहसकर्मार्थम् = चोरी व साहस/उग्र कर्म की ओर; देवब्राह्मणपीडनम् = देव-ब्राह्मण-पीड़न (शास्त्र का नैतिक-फल शब्द); स्थानच्युतिम् = स्थान से च्युति; मनोदुःखम् = मन का दुःख; रवेः सूक्ष्मगते शनौ = सूर्य-सूक्ष्म-क्रम में शनि-सूक्ष्म में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-सूक्ष्म-शृंखला में शनि की सूक्ष्म पर शास्त्र चौर्य-साहस कर्म, देव-ब्राह्मण-पीड़न, स्थान-च्युति और मनोदुःख का फल कहता है। यह अध्याय का कठोर अवसान-स्वर है—भार, गिरावट, मन का दबाव। न तो दण्ड की धमकी, न उपाय का दबाव; केवल पाठ का कथन, गणना ६२.१ से।

English rendering Under Saturn’s sūkṣma in the Sun’s sequence, the text states a turn toward theft and reckless deeds, injury to the sacred and the learned, fall from place, and mental sorrow—phala as stated, not a verdict we enforce.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शनि-सूक्ष्म = (प्रत्यन्तर × १९) ÷ १२०; अवधि गणित से, फल शास्त्र-वाक्य से।

62.8
धिव्याम्बराधिलब्ढिश्च धिव्यस्थ्रीपरिभोगिथा ।
अचिन्थिथार्ठसिध्ढिश्च रवेः सूक्ष्मगथे बुढे
dhivyāmbarādhilabḍhiśca dhivyasthrīparibhogithā |
acinthithārṭhasidhḍhiśca raveḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिव्य-अम्बर-आदि-लब्धि = उत्तम/दिव्य वस्त्रादि की प्राप्ति; दिव्य-स्त्री-परिभोगिता = दिव्य/उत्कृष्ट स्त्री-सुख का अनुभव; अचिन्तित-अर्थ-सिद्धि = बिना सोचे/अकल्पित प्रयोजन की सिद्धि; रवेः सूक्ष्मगते = सूर्य की सूक्ष्म-दशा में; बुधे = बुध के सूक्ष्म-स्वामित्व में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य की सूक्ष्म-दशा में बुध सूक्ष्म-स्वामी हो, तब दिव्य वस्त्र-आभरण आदि की प्राप्ति और दिव्य स्त्री-परिभोग का उल्लेख है। उसी काल-खण्ड में अचिन्तित अर्थ — जिन्हें पहले सोचा भी न गया हो — की सिद्धि भी कही गई है। यह सूर्य-सूक्ष्म के अन्तर्गत बुध-फल का कथन है; दशा-गणना स्वयं यहाँ नहीं दी गई।

English rendering The text states that when Mercury rules the sūkṣma within the Sun’s sūkṣma-period, one obtains fine or “divine” apparel and the enjoyment of an elevated partner, and purposes not previously thought of come to fruition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-सूक्ष्म में बुध)। सूक्ष्म-अवधि स्वयं विंशोत्तरी अनुपात-शृंखला से निकलती है (महा → अन्तर → प्रत्यन्तर → सूक्ष्म; योग = १२० वर्ष), किन्तु यह श्लोक केवल फल बताता है, अवधि-सूत्र नहीं।

62.9
गुरुथार्ठविनाशश्च भ्त्ऱ्थ्यधारभवस्थठा ।
क्वचिथ्सेवकसम्बन्ढो रवेः सूक्ष्मगथे ढ्वजे
guruthārṭhavināśaśca bhtṟthyadhārabhavasthaṭhā |
kvacithsevakasambanḍho raveḥ sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरु-द-अर्थ-विनाश = गुरु/देवता/गुरू-सम्बन्धी तथा धन-अर्थ का नाश (पाठानुसार); भृत्य-दार-भव-स्थता = भृत्य-दारा (सेवक-पत्नी) से जुड़ी स्थिति/अवस्थान; क्वचित् = कहीं-कहीं/कभी; सेवक-सम्बन्ध = सेवक/अनुचर से सम्बन्ध; रवेः सूक्ष्मगते = सूर्य की सूक्ष्म में; ध्वजे = ध्वज (= केतु) के सूक्ष्म-स्वामित्व में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य की सूक्ष्म-दशा में जब ध्वज (केतु) सूक्ष्म-स्वामी हो, तब गुरु-अर्थ/धन-अर्थ का विनाश और भृत्य-दार से जुड़ी स्थिति का उल्लेख है। कहीं-कहीं सेवक-सम्बन्ध भी कहा गया है। यह सूर्य-सूक्ष्म के केतु-फल का शास्त्रीय कथन है — नियति या निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that under Ketu (Dhvaja) in the Sun’s sūkṣma, there is loss touching guru- or wealth-related aims, a condition connected with servants and spouse, and at times a servant-link.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-सूक्ष्म में केतु/ध्वज)। “ध्वज” यहाँ केतु का पर्याय है; अवधि का अनुपात-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

62.10
पुथ्रमिथ्रकलथ्राधिसाख्यसम्पन्न एव च ।
नानाविढा च सम्पथ्थी रवेः सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
puthramithrakalathrādhisākhyasampanna eva ca |
nānāviḍhā ca sampaththī raveḥ sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-मित्र-कलत्र-आदि-साख्य-सम्पन्न = पुत्र, मित्र, पत्नी आदि की मैत्री/साख्य से युक्त; नाना-विधा सम्पत् = अनेक प्रकार की सम्पत्ति; रवेः सूक्ष्मगते = सूर्य की सूक्ष्म में; भृगौ = भृगु (= शुक्र) के सूक्ष्म-स्वामित्व में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सूर्य की सूक्ष्म में जब भृगु (शुक्र) सूक्ष्म-स्वामी हो, जातक पुत्र-मित्र-कलत्र आदि की साख्य से सम्पन्न कहा गया है। उसी काल में नाना प्रकार की सम्पत्ति का भी उल्लेख है। यह सूर्य-सूक्ष्म के शुक्र-फल का वर्णन है।

English rendering The text states that when Venus (Bhṛgu) rules the sūkṣma within the Sun’s period, one is endowed with the companionship of children, friends, and spouse, and manifold prosperity is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-सूक्ष्म में शुक्र)। सूर्य-सूक्ष्म-श्रृंखला के अन्तिम फलांशों में शुक्र यहाँ पूर्ण-शुभ समृद्धि-स्वर में रखा गया है।

62.11
भूषणं भूमिलाभश्च सम्मानं न्त्ऱ्पपूजनम् ।
थामसथ्थ्वं गुरुथ्वं च निजसूक्ष्मगथे विढौ
bhūṣaṇaṃ bhūmilābhaśca sammānaṃ ntṟpapūjanam |
thāmasaththvaṃ guruthvaṃ ca nijasūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूषणम् = आभरण/अलंकार; भूमि-लाभ = भूमि की प्राप्ति; सम्मानम् = आदर; नृप-पूजनम् = राजा/शासक द्वारा सम्मान; ताम-सत्त्वम् = तामसत्त्व (गाम्भीर्य/सत्त्व-गुण — पाठ-भेद संभव); गुरुत्वम् = गुरु-पद/गौरव/भार-गाम्भीर्य; निज-सूक्ष्मगते विधौ = चन्द्र (विधु) की अपनी (निज) सूक्ष्म-दशा में।

हिन्दी भावार्थ यहाँ प्रकरण चन्द्र की सूक्ष्म-दशा पर आता है। शास्त्र कहता है — जब विधु (चन्द्र) अपनी ही सूक्ष्म में हो, तब भूषण, भूमि-लाभ, सम्मान और नृप-पूजन का उल्लेख है। तामसत्त्व (पाठानुसार) और गुरुत्व भी उसी निज-सूक्ष्म में कहा गया है। यह चन्द्र-निज-सूक्ष्म का फल-कथन है।

English rendering The text states that when the Moon is in its own sūkṣma, there are ornaments, gain of land, honor, and royal regard, together with tāma-sattva (reading uncertain) and a quality of gurūtva (weight, seniority, or teacherly standing).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र की निज-सूक्ष्म)। “निजसूक्ष्म” = जिस ग्रह की महा/अन्तर-श्रृंखला चल रही हो, उसी का सूक्ष्म-खण्ड; अवधि का अनुपात यहाँ नहीं दिया गया।

62.12
धुःखं शथ्रुविरोढश्च कुक्षिरोगः पिथुर्म्त्ऱ्थिः ।
वाथपिथ्थकफोध्रेकः विढोः सूक्ष्मगथे कुजे
dhuḥkhaṃ śathruviroḍhaśca kukṣirogaḥ pithurmtṟthiḥ |
vāthapiththakaphodhrekaḥ viḍhoḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दुःखम् = दुःख; शत्रु-विरोधः = शत्रुओं से विरोध; कुक्षि-रोगः = उदर (पेट) का रोग; पितुः मृतिः = पिता को मृत्यु-तुल्य संकट; वात-पित्त-कफ-उद्रेकः = त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) का प्रकोप; विधोः सूक्ष्म-गते कुजे = चन्द्र-अन्तर में मंगल (कुज) की सूक्ष्मा में।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र-अन्तर में मंगल की सूक्ष्मा में शास्त्र क्लेश-प्रधान फल कहता है — दुःख, शत्रु-विरोध, उदर-रोग, पिता को कष्ट, और त्रिदोष का प्रकोप। ध्यान रहे — यह शास्त्र का फल-कथन है; न इसे निश्चित घटना मानें, न भय का विषय बनाएँ।

English rendering In Mars's sūkṣma within the Moon's antara: sorrow, hostility from foes, abdominal illness, danger to the father, and an aggravation of the three doṣas (vāta-pitta-kapha) — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आरोग्य/आयु-सम्बन्धी उल्लेख शास्त्र का वचन-मात्र)। मंगल-सूक्ष्मा-लम्बाई = प्रत्यन्तर × 7 ÷ 120।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पितुर्मृतिः" व त्रिदोष-प्रकोप जैसे वाक्य ठीक वे स्थान हैं जहाँ हमारा अनुशासन गणित को फल से अलग रखता है — काल-खण्ड का परिमाण (मंगल-सूक्ष्मा = प्रत्यन्तर × 7 ÷ 120) निश्चित गणना है, पर फल को "शास्त्र कहता है" के रूप में ही रखा जाता है; कोई चिकित्सकीय/आयु-सम्बन्धी भविष्यवाणी नहीं, कोई भय-दबाव नहीं।

62.13
क्रोढनं मिथ्रबन्ढूनां धेशथ्यागो ढनक्षयः ।
विधेशान्निगदप्राप्थिर्विढोः सूक्ष्मगथेप्यगौ
kroḍhanaṃ mithrabanḍhūnāṃ dheśathyāgo ḍhanakṣayaḥ |
vidheśānnigadaprāpthirviḍhoḥ sūkṣmagathepyagau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रोधनम् = क्रोध (मित्र-बन्धुओं का / उनके प्रति); मित्र-बन्धूनाम् = मित्रों और बन्धुओं का; देश-त्याग = देश छोड़ना; धन-क्षय = धन की हानि; विदेशात् = विदेश से; निगद-प्राप्ति = बेड़ी/बन्धन/कारा की प्राप्ति; विधोः सूक्ष्मगते = चन्द्र की सूक्ष्म में; अपि अगौ = “अगौ” (यहाँ क्रम व फल से राहु/अहि-पक्ष — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चन्द्र की सूक्ष्म में “अग” (पाठ: अगौ; क्रम में मंगल के बाद और गुरु से पहले, तथा निगद-विदेश-फल से राहु-पक्ष — पाठ-भेद संभव) के सूक्ष्म में मित्र-बन्धुओं का क्रोध, देश-त्याग और धन-क्षय कहा गया है। विदेश से निगद (बन्धन) की प्राप्ति भी उसी खण्ड में वर्णित है। यह फल-कथन है, निश्चित दण्ड या नियति नहीं।

English rendering The text states that in the Moon’s sūkṣma under “Aga” (likely Rāhu by sequence and bondage-abroad phala; reading uncertain), there is anger among friends and kin, leaving one’s country, loss of wealth, and the obtaining of fetters (nigada) from a foreign quarter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-सूक्ष्म; “अगौ” — पाठ-भेद संभव)। विंशोत्तरी क्रम में चन्द्र-श्रृंखला के बाद मंगल → राहु → गुरु आता है; ६२.१२ कुज, ६२.१४ गुरु — अतः ६२.१३ का “अगौ” राहु-स्थान पर बैठता है, परन्तु शब्द-पाठ निश्चित नहीं।

62.14
छथ्रचामरसंयुक्थं वैभवं पुथ्रसम्पधः ।
सर्वथ्र सुखमाप्नोथि विढोः सूक्ष्मगथे गुरौ
chathracāmarasaṃyukthaṃ vaibhavaṃ puthrasampadhaḥ |
sarvathra sukhamāpnothi viḍhoḥ sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छत्र = राजछत्र (आधिपत्य-चिह्न); चामर = राजसी चँवर; संयुक्तं = सहित; वैभवं = ऐश्वर्य; पुत्रसम्पदः = सन्तान-सम्पत्ति; सर्वत्र सुखम् आप्नोति = सब ओर सुख पाता है; विधोः = चन्द्र की (यहाँ प्रत्यन्तर्दशा-स्वामी); सूक्ष्मगते गुरौ = बृहस्पति की सूक्ष्मान्तर्दशा में (सूक्ष्म = दशा का चौथा स्तर — महा › अन्तर › प्रत्यन्तर › सूक्ष्म)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र-प्रत्यन्तर के भीतर जब गुरु की सूक्ष्मान्तर्दशा चलती है, तब राजछत्र-चँवर जैसे मान-सम्मान, ऐश्वर्य, सन्तान-सुख और सर्वत्र सुख की प्राप्ति बतायी गयी है। यह इस संयोग के लिए शुभ फल-कथन है।

English rendering When the sūkṣmāntardaśā of Jupiter runs within the Moon's period, the text promises royal honours (parasol and fly-whisk), splendour, the blessing of progeny, and happiness on every side.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। इस अध्याय का एकमात्र गणित 62.1 में है: सूक्ष्मान्तर्दशा = प्रत्यन्तर्दशा-मान × (सूक्ष्म-स्वामी के दशावर्ष ÷ 120); यह verse केवल उस काल का फल घोषित करता है।

उदाहरण (worked example) गुरु के विंशोत्तरी वर्ष = 16, अतः गुरु-सूक्ष्म का अंश = 16 ÷ 120 = 2/15 ≈ 0.1333 × मूल प्रत्यन्तर्दशा। यदि चन्द्र-प्रत्यन्तर्दशा = 30 दिन मानें, तो गुरु-सूक्ष्म = 30 × 16/120 = ठीक 4.000 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह वही 120-वर्षीय विंशोत्तरी अनुपात-गणित है जिसे हमारे दशा-इंजन में पिन किया गया — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-स्वामी-वर्ष)/120 वाला वही सूत्र यहाँ एक स्तर और नीचे (सूक्ष्म) दोहराया गया है — शुद्ध परिमेय अंकगणित, कोई भविष्य-कथन नहीं।

62.15
राजोपध्रवभीथिः स्याध्व्यवहारे ढनक्षयः ।
चौरर्वं विप्रभीथिश्च विढोः सूक्ष्मगथे शनौ
rājopadhravabhīthiḥ syādhvyavahāre ḍhanakṣayaḥ |
caurarvaṃ viprabhīthiśca viḍhoḥ sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजोपद्रव-भीतिः = राज/सत्ता की ओर से उपद्रव का भय; स्यात् = हो; व्यवहारे = लेन-देन/मुकदमे में; धनक्षयः = धन की हानि; चौरत्वं/चौर्यं = चोरी (पाठ "चौरर्वं" भ्रष्ट — पाठ-भेद संभव); विप्रभीतिः = ब्राह्मणों से (या के विषय में) भय; विधोः सूक्ष्मगते शनौ = चन्द्र-प्रत्यन्तर में शनि की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र के भीतर शनि की सूक्ष्म-दशा में सत्ता-पक्ष से उपद्रव का भय, लेन-देन या विवाद में धन-हानि, तथा चोरी और विप्र-भय जैसे अशुभ फल घटित होते हैं। यह पाठ की घोषणा है, कोई निश्चित नियति नहीं।

English rendering In Saturn's sūkṣmāntardaśā within the Moon's period, the text foretells fear of trouble from authority, loss of wealth in dealings or litigation, and danger of theft and of conflict with the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। संख्या केवल काल-मान में है (62.1); फल-वाक्य गुण-रहित हैं। इनको भय या दण्ड नहीं, शास्त्र-कथित प्रवृत्ति-संकेत मानना चाहिए।

उदाहरण (worked example) शनि के विंशोत्तरी वर्ष = 19 → शनि-सूक्ष्म का अंश = 19 ÷ 120 ≈ 0.1583 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की मूल प्रत्यन्तर्दशा पर शनि-सूक्ष्म = 30 × 19/120 = ठीक 4.750 दिन — इसी चन्द्र-प्रत्यन्तर की सबसे लम्बी सूक्ष्म-अवधि (क्योंकि शनि के वर्ष सर्वाधिक)।

62.16
राजमानं वस्थुलाभो विधेशाध्वाहनाधिकम् ।
पुथ्रपौथ्र्सम्त्ऱ्ध्ढिश्च विढोः सूक्ष्मगथे बुढे
rājamānaṃ vasthulābho vidheśādhvāhanādhikam |
puthrapauthrsamtṟdhḍhiśca viḍhoḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-मानम् = राजकीय सम्मान; वस्तु-लाभः = वस्तु/सम्पत्ति का लाभ; विदेश-अध्व-आहन-अधिकम् = विदेश-यात्रा, मार्ग, वाहन में वृद्धि; पुत्र-पौत्र-समृद्धिः = पुत्र-पौत्र की समृद्धि; विधोः = चन्द्र की; सूक्ष्म-गते = सूक्ष्म-दशा में; बुधे = बुध में (बुध-सूक्ष्म)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र की अवधि में बुध की सूक्ष्म-दशा में राज-मान, वस्तु-लाभ, विदेश-यात्रा तथा वाहन आदि में वृद्धि, और पुत्र-पौत्र की समृद्धि—ये फल कहे गए हैं। “वस्तु/वाहन/विदेश” का संकेत यहाँ सामान्य शुभ-लाभ की भाषा में है। पाठ में “राजमानं वस्तुलाभो” आदि संधि-पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in the Moon’s period, during Mercury’s sūkṣma-daśā, there is royal honour, gain of goods, increase connected with foreign travel and conveyances, and prosperity of sons and grandsons. Rendered as the śāstra’s own claim of phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-अवधि में बुध-सूक्ष्म)। सूक्ष्म-अवधि का संख्यात्मक सूत्र इस श्लोक में नहीं; वह विंशोत्तरी-अनुपात (महा × अन्तर / १२० इत्यादि) अन्य अध्यायों में आता है।

62.17
आथ्मनो व्त्ऱ्थ्थिहननं सस्यश्त्ऱ्ङ्गव्त्ऱ्षाधिभिः ।
अग्निसूर्याधिभीथिः स्याध्विढोः सूक्ष्मगथे ढ्वजे
āthmano vtṟththihananaṃ sasyaśtṟṅgavtṟṣādhibhiḥ |
agnisūryādhibhīthiḥ syādhviḍhoḥ sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्मनः वृत्ति-हननं = अपनी जीविका का नाश; सस्य = अन्न/खेती; शृङ्ग = सींगवाले पशु; वृष = बैल; आदिभिः = इन आदि के द्वारा; अग्नि-सूर्यादि-भीतिः = अग्नि, सूर्य/ताप आदि से भय; स्यात् = हो; विधोः सूक्ष्मगते ध्वजे = चन्द्र-प्रत्यन्तर में केतु (ध्वज = केतु का ध्वजा-प्रतीक) की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र के भीतर केतु की सूक्ष्म-दशा में जीविका को हानि, अन्न-सींगवाले पशु-बैल आदि के निमित्त कष्ट, तथा अग्नि व ताप-जनित भय बताया गया है। इसे नियति नहीं, शास्त्रोक्त सावधानी-संकेत समझें (सस्य/शृङ्ग-पद पर पाठ-भेद संभव)।

English rendering In Ketu's sūkṣmāntardaśā within the Moon's period, the text warns of harm to one's livelihood — through crops, horned cattle and oxen — and of danger from fire and heat.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। ध्वज/केतु छाया-ग्रह है; इसकी सूक्ष्म-अवधि 62.1 के अनुपात से ही निकलती है, फल-वाक्य से नहीं।

उदाहरण (worked example) केतु के विंशोत्तरी वर्ष = 7 → केतु-सूक्ष्म का अंश = 7 ÷ 120 ≈ 0.0583 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की प्रत्यन्तर्दशा पर केतु-सूक्ष्म = 30 × 7/120 = ठीक 1.750 दिन — मंगल के साथ न्यूनतम अवधि (7 वर्ष)।

62.18
विवाहो भूमिलाभश्च वस्थ्राभरणवैभवम् ।
राज्यलाभश्च कीर्थिश्च विढोः सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
vivāho bhūmilābhaśca vasthrābharaṇavaibhavam |
rājyalābhaśca kīrthiśca viḍhoḥ sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवाहः = विवाह; भूमिलाभः = भूमि का लाभ; वस्त्राभरण-वैभवम् = वस्त्र-आभूषणों का वैभव; राज्यलाभः = राज्य/अधिकार का लाभ; कीर्तिः = यश; विधोः सूक्ष्मगते भृगौ = चन्द्र-प्रत्यन्तर में शुक्र (भृगु = शुक्र) की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र के भीतर शुक्र की सूक्ष्म-दशा में विवाह, भूमि-लाभ, वस्त्र-आभूषण का वैभव, राज्य-लाभ और कीर्ति की प्राप्ति होती है। यह इस संयोग का अत्यन्त शुभ फल-कथन है।

English rendering When Venus's sūkṣmāntardaśā runs within the Moon's period, the text promises marriage, gain of land, the splendour of garments and ornaments, dominion, and fame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। रोचक तथ्य: शुक्र के वर्ष सर्वाधिक (20) होने से चन्द्र-प्रत्यन्तर के भीतर शुक्र-सूक्ष्म सबसे दीर्घ अवधि है।

उदाहरण (worked example) शुक्र के विंशोत्तरी वर्ष = 20 → शुक्र-सूक्ष्म का अंश = 20 ÷ 120 = 1/6 ≈ 0.1667 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की प्रत्यन्तर्दशा पर शुक्र-सूक्ष्म = 30 ÷ 6 = ठीक 5.000 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) एक ही चन्द्र-प्रत्यन्तर के नौ सूक्ष्म-अंश जोड़ने पर (7+20+6+10+7+18+16+19+17)/120 = 120/120 = 1 — अर्थात् पूरी प्रत्यन्तर्दशा ठीक-ठीक विभाजित होती है। यही "पूर्ण-योग = 120" वाली विंशोत्तरी सर्वसमापन-जाँच हमारे दशा-इंजन में exact-`==` से सत्यापित है (कोई सहनशीलता-पट्टी नहीं)।

62.19
क्लेशाथ्क्लेशः कार्यनाशः पशुढान्यढनक्षयः ।
गाथ्रवैषम्यभूमिश्च विढोः सूक्ष्मगथे रवौ
kleśāthkleśaḥ kāryanāśaḥ paśuḍhānyaḍhanakṣayaḥ |
gāthravaiṣamyabhūmiśca viḍhoḥ sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्लेशात् क्लेशः = कष्ट पर कष्ट; कार्यनाशः = कार्यों की विफलता; पशु-धान्य-धनक्षयः = पशु, अन्न और धन की हानि; गात्र-वैषम्य-भूमिः = शरीर की विषमता (अस्वस्थता) का कारण/भूमि; विधोः सूक्ष्मगते रवौ = चन्द्र-प्रत्यन्तर में सूर्य की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र के भीतर सूर्य की सूक्ष्म-दशा में कष्ट पर कष्ट, कार्यों की असिद्धि, पशु-अन्न-धन की हानि तथा शारीरिक विषमता का प्रसंग बनता है। यह शास्त्र का कथन है, चिकित्सकीय या नियति-सूचक निदान नहीं।

English rendering In the Sun's sūkṣmāntardaśā within the Moon's period, the text speaks of trouble upon trouble, failure of undertakings, loss of cattle, grain and wealth, and occasion for bodily disorder.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। इस पद के साथ चन्द्र-प्रत्यन्तर का सूक्ष्म-चक्र पूर्ण होता है (चन्द्र › मंगल › राहु › गुरु › शनि › बुध › केतु › शुक्र › सूर्य — विंशोत्तरी क्रम)।

उदाहरण (worked example) सूर्य के विंशोत्तरी वर्ष = 6 → सूर्य-सूक्ष्म का अंश = 6 ÷ 120 = 1/20 = 0.05 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की प्रत्यन्तर्दशा पर सूर्य-सूक्ष्म = 30 ÷ 20 = ठीक 1.500 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) सूक्ष्म-क्रम स्वयं दशा-स्वामी (यहाँ चन्द्र) से आरम्भ होकर विंशोत्तरी अनुक्रम में चलता है — यही क्रम-नियम हमारे दशा-इंजन में कूटबद्ध है; अवधि केवल स्वामी-वर्ष/120 के अनुपात पर निर्भर, आयनांश-निरपेक्ष (आयनांश केवल जन्म-चन्द्र-नक्षत्र से वास्तविक तिथियों को जोड़ते समय चाहिए)।

62.20
भूमिहानिर्मनःखेधो ह्यपस्मारी च बन्ढुयुक् ।
पुरोक्षोभमनस्थापो निजसूक्ष्मगथे कुजे
bhūmihānirmanaḥkhedho hyapasmārī ca banḍhuyuk |
purokṣobhamanasthāpo nijasūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूमिहानिः = भूमि की हानि; मनःखेदः = मानसिक खेद; अपस्मारी = अपस्मार-सदृश पीड़ित (शास्त्र-पद, चिकित्सा-निदान नहीं); बन्धुयुक् = बन्धुओं के साथ/सम्बन्धी कष्ट; पुर-क्षोभ = नगर/सार्वजनिक क्षोभ (पाठ "पुरोक्षोभ" — पाठ-भेद संभव); मनस्तापः = मन का सन्ताप; निजसूक्ष्मगते कुजे = मंगल-प्रत्यन्तर में उसकी अपनी (मंगल की) सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल के भीतर स्वयं मंगल की सूक्ष्म-दशा में भूमि-हानि, मानसिक खेद, अपस्मार-सदृश पीड़ा, बन्धु-सम्बन्धी कष्ट तथा मन का सन्ताप बताया गया है। इन्हें भय के रूप में नहीं, शास्त्रोक्त प्रवृत्ति-संकेत के रूप में लें।

English rendering In Mars's own sūkṣmāntardaśā within its period, the text tells of loss of land, mental distress, epilepsy-like affliction, trouble among kin, public agitation, and inner anguish.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ स्व-सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। "निज" (स्व) का अर्थ प्रत्यन्तर-स्वामी और सूक्ष्म-स्वामी एक ही ग्रह — यह प्रत्येक प्रत्यन्तर के भीतर पहली सूक्ष्म-अवधि होती है।

उदाहरण (worked example) मंगल के विंशोत्तरी वर्ष = 7 → मंगल-स्व-सूक्ष्म का अंश = 7 ÷ 120 ≈ 0.0583 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की मंगल-प्रत्यन्तर्दशा पर मंगल-सूक्ष्म = 30 × 7/120 = ठीक 1.750 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) मंगल (भौम/कुज) यहाँ नये प्रत्यन्तर-समूह का प्रारम्भ है, और उसका सूक्ष्म-चक्र स्वयं से ही शुरू होता है — विंशोत्तरी में हर स्तर का उपचक्र अपने ही स्वामी से आरम्भ होने का नियम हमारे इंजन में पिन किया गया है; काल-अंश exact अनुपात 7/120 है, किसी सन्निकटन से नहीं।

62.21
अङ्गधोषो जनाध्भीथिः प्रमधावंशनाशनम् ।
वह्निसर्पभयं घोरं भौमे सूक्ष्मगथेऽप्यहौ
aṅgadhoṣo janādhbhīthiḥ pramadhāvaṃśanāśanam |
vahnisarpabhayaṃ ghoraṃ bhaume sūkṣmagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अङ्ग-दोषः = अंग-दोष (शारीरिक दोष/अपूर्णता का पारम्परिक संकेत); जनाद्-भीतिः = जन/लोगों से भय; प्रमदा-वंश-नाशनम् = स्त्री-पक्ष/प्रमदा-वंश का नाश (कुल-स्त्री-सम्बन्धी हानि का फल-शब्द); वह्नि-सर्प-भयम् = अग्नि और सर्प का भय; घोरम् = घोर/तीव्र; भौमे = भौम = मंगल में; सूक्ष्म-गते = सूक्ष्म-दशा में; अपि = भी; अहौ = अहि = राहु में (राहु-सूक्ष्म भी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल की सूक्ष्म-दशा में—और अहि (राहु) की सूक्ष्म में भी—अङ्ग-दोष, जन-भय, प्रमदा-वंश-नाश का संकेत, तथा अग्नि-सर्प का घोर भय—ये फल कहे गए हैं। “घोर” शब्द शास्त्र की तीव्रता-भाषा है; इसे आतंक या निश्चित विपत्ति के रूप में नहीं पढ़ना। स्त्री-वंश-नाश भी फल-शब्द है, न कि दबाव या भविष्य-गारंटी।

English rendering The text states that in Mars’s sūkṣma-daśā—and likewise in that of Ahi (Rāhu)—there is bodily defect, fear from people, harm to the female line of the family, and severe fear of fire and serpents. Traditional phala-claims only; not fear-commerce, not medical or social prediction endorsed by this edition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मंगल- तथा राहु-सूक्ष्म)। अहि = राहु—यह संकेत-नाम है; राहु-महादशा १८ वर्ष (विंशोत्तरी) का आँकड़ा इस श्लोक में नहीं दिया गया।

62.22
धेवपूजारथिश्चाथ्र मन्थ्राभ्युथ्ठानथथ्परः ।
लोके पूजा प्रमोधश्च भौमे सूक्ष्मगथे गुरौ
dhevapūjārathiścāthra manthrābhyuthṭhānathathparaḥ |
loke pūjā pramodhaśca bhaume sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवपूजा-रति = देव-आराधना में रुचि; मन्त्र-अभ्युत्थान-तत्पर = मन्त्र-साधना / जप-उद्धार में तत्पर; लोके पूजा = लोक में सम्मान; प्रमोद = हर्ष; भौम = मङ्गल; सूक्ष्म-गत = सूक्ष्म-अवस्था / सूक्ष्म-दशा-सन्दर्भ में स्थित; गुरु = बृहस्पति ।

हिन्दी भावार्थ जब भौम सूक्ष्म-गत हो और गुरु का सम्बन्ध/प्रभाव उस सूक्ष्म-अवस्था से जुड़ा हो, तब शास्त्र व्यक्ति को देव-पूजा में रत तथा मन्त्र-अभ्युत्थान में तत्पर बताता है। लोक में पूजा-सम्मान और प्रमोद का फल भी इसी सन्दर्भ में कहा गया है। यह फल-कथन है — गणना का नियम नहीं। पाठ-भेद संभव (मन्त्राभ्युत्थान / मन्त्राभ्यास आदि)।

English rendering When Mars is in the sūkṣma state in connection with Jupiter, the text states devotion to deity-worship, application to mantra-practice, public honor, and delight.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह भौम-सूक्ष्म + गुरु का शास्त्रोक्त परिणाम-वर्णन है; कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-तालिका या दशा-वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं दिया गया।

62.23
बन्ढनान्मुच्यथे बध्ढो ढनढान्यपरिच्छधः ।
भ्त्ऱ्थ्यार्ठबहुलः श्रीमान् भौमे सूक्ष्मगथे शनौ
banḍhanānmucyathe badhḍho ḍhanaḍhānyaparicchadhaḥ |
bhtṟthyārṭhabahulaḥ śrīmān bhaume sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनात् मुच्यते बद्धः = बन्दी बन्धन से मुक्त होता है; धन-धान्य-परिच्छदः = धन, अन्न और साज-सामान/परिकर से युक्त; भृत्य-अर्थ-बहुलः = सेवकों और धन से सम्पन्न; श्रीमान् = ऐश्वर्यवान्; भौमे सूक्ष्मगते शनौ = मंगल-प्रत्यन्तर में शनि की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल के भीतर शनि की सूक्ष्म-दशा में बन्दी बन्धन से छूटता है, तथा धन-धान्य, सेवक और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। यह इस संयोग का शुभ फल-कथन है।

English rendering When Saturn's sūkṣmāntardaśā runs within Mars's period, the text says the bound are freed from bondage, and one becomes rich in wealth, grain, retinue and servants.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। शनि के 19 वर्षों से इसका सूक्ष्म-अंश इस प्रत्यन्तर की सर्वाधिक अवधि बनता है।

उदाहरण (worked example) शनि के विंशोत्तरी वर्ष = 19 → शनि-सूक्ष्म का अंश = 19 ÷ 120 ≈ 0.1583 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की मंगल-प्रत्यन्तर्दशा पर शनि-सूक्ष्म = 30 × 19/120 = ठीक 4.750 दिन।

62.24
वाहनं छाथ्रसंयुक्थं राज्यभोगपरं सुखम् ।
कामश्वासाधिका पीदा भौमे सूक्ष्मगथे बुढे
vāhanaṃ chāthrasaṃyukthaṃ rājyabhogaparaṃ sukham |
kāmaśvāsādhikā pīdā bhaume sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहनं = वाहन; छत्र-संयुक्तं = छत्र (राजछत्र) सहित; राज्य-भोग-परं सुखम् = राज्य-भोग-प्रधान सुख; काम-श्वास-आदिका पीडा = काम एवं श्वास (श्वास-रोग) आदि से पीड़ा; भौमे सूक्ष्मगते बुधे = मंगल-प्रत्यन्तर में बुध की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल के भीतर बुध की सूक्ष्म-दशा में वाहन और छत्र-सहित राज्य-भोग का सुख मिलता है, परन्तु साथ ही काम एवं श्वास आदि से कुछ पीड़ा भी बतायी गयी है — यह मिश्र फल-कथन है (श्वास-आदि पद शास्त्रोक्त हैं, चिकित्सा-निदान नहीं; काम-पद पर पाठ-भेद संभव)।

English rendering In Mercury's sūkṣmāntardaśā within Mars's period, the text grants a vehicle, the royal parasol, and the happiness of dominion, yet mixed with affliction from passion and from breathing trouble.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मिश्र फल-कथन (शुभाशुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। सूक्ष्म-अवधि केवल 62.1 के अनुपात-सूत्र से; फल की शुभ-अशुभ मिश्रता संख्या से नहीं आती।

उदाहरण (worked example) बुध के विंशोत्तरी वर्ष = 17 → बुध-सूक्ष्म का अंश = 17 ÷ 120 ≈ 0.1417 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की मंगल-प्रत्यन्तर्दशा पर बुध-सूक्ष्म = 30 × 17/120 = ठीक 4.250 दिन।

62.25
परप्रेथिथबुध्ढिश्च सर्वथ्राऽपि च गर्हिथा ।
अशुचिः सर्वकालेषु भौमे सूक्ष्मगथे ढ्वजे
paraprethithabudhḍhiśca sarvathrā'pi ca garhithā |
aśuciḥ sarvakāleṣu bhaume sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पर-प्रेषित-बुद्धिः = दूसरों से प्रेरित/परवश बुद्धि (पाठ "परप्रेतित" भ्रष्ट — पाठ-भेद संभव); सर्वत्र अपि गर्हिता = सब जगह निन्दित (बुद्धि); अशुचिः = अपवित्र; सर्वकालेषु = सदा; भौमे सूक्ष्मगते ध्वजे = मंगल-प्रत्यन्तर में केतु (ध्वज = केतु) की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल के भीतर केतु की सूक्ष्म-दशा में बुद्धि परवश एवं सर्वत्र निन्दित रहती है, और व्यक्ति सदा अशुचि-भाव में रहता है। यह इस योग का अशुभ फल-कथन है, कोई नियति-निर्णय नहीं।

English rendering When Ketu's sūkṣmāntardaśā runs within Mars's period, the text says the mind is swayed by others and censured everywhere, and one remains impure at all times.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। केतु के 7 वर्षों से इसका सूक्ष्म-अंश इस प्रत्यन्तर की न्यूनतम अवधियों में एक है।

उदाहरण (worked example) केतु के विंशोत्तरी वर्ष = 7 → केतु-सूक्ष्म का अंश = 7 ÷ 120 ≈ 0.0583 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की मंगल-प्रत्यन्तर्दशा पर केतु-सूक्ष्म = 30 × 7/120 = ठीक 1.750 दिन।

62.26
इष्तस्थ्रीभोगसम्पथ्थिरिष्तभोजनसंग्रहः ।
इष्तार्ठस्यापि लाभश्च भौमे सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
iṣtasthrībhogasampaththiriṣtabhojanasaṃgrahaḥ |
iṣtārṭhasyāpi lābhaśca bhaume sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्ट-स्त्री-भोग-सम्पत्तिः = इष्ट (प्रिय) स्त्री का भोग-सुख एवं सम्पत्ति; इष्ट-भोजन-संग्रहः = मनचाहे भोजन का संग्रह; इष्ट-अर्थस्य अपि लाभः = इष्ट अर्थ (अभीष्ट वस्तु/धन) का भी लाभ; भौमे सूक्ष्मगते भृगौ = मंगल-प्रत्यन्तर में शुक्र (भृगु) की सूक्ष्मान्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल के भीतर शुक्र की सूक्ष्म-दशा में प्रिय-सुख एवं सम्पत्ति, मनचाहे भोजन की सुलभता तथा अभीष्ट अर्थ का लाभ होता है। यह इस संयोग का शुभ, भोग-प्रधान फल-कथन है।

English rendering In Venus's sūkṣmāntardaśā within Mars's period, the text promises the enjoyment and fortune of a beloved, abundance of desired food, and the gain of one's cherished ends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ सूक्ष्मान्तर्दशा-फल)। शुक्र के 20 वर्ष इस प्रत्यन्तर की सबसे दीर्घ सूक्ष्म-अवधि देते हैं।

उदाहरण (worked example) शुक्र के विंशोत्तरी वर्ष = 20 → शुक्र-सूक्ष्म का अंश = 20 ÷ 120 = 1/6 ≈ 0.1667 × प्रत्यन्तर्दशा। 30-दिन की मंगल-प्रत्यन्तर्दशा पर शुक्र-सूक्ष्म = 30 ÷ 6 = ठीक 5.000 दिन।

62.27
राजध्वेषो ध्विजाथ्क्लेशः कार्याभिप्रयवंचकः ।
लोकेऽपि निन्ध्यथामेथि भौमे सूक्ष्मगथे रवौ
rājadhveṣo dhvijāthkleśaḥ kāryābhiprayavaṃcakaḥ |
loke'pi nindhyathāmethi bhaume sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-द्वेषः = राजा/सत्ता से वैर-विरोध; द्विजात् क्लेशः = द्विज (ब्राह्मण/विद्वान्) से कष्ट; कार्य-अभिप्राय-वञ्चकः = इच्छित कार्य के अभिप्राय में छल/विफलता; लोके निन्द्यताम् एति = लोक में निन्दा को प्राप्त होता है; भौमे = मङ्गल की (प्रत्यन्तर्)दशा में; सूक्ष्मगते रवौ = सूर्य की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर (सत्यसप्तमी लोकालङ्कार — locative absolute)।

हिन्दी भावार्थ प्रिय पाठक, यहाँ शास्त्र मङ्गल की प्रत्यन्तर्दशा के भीतर चल रही सूर्य की सूक्ष्मान्तर्दशा का फल कहता है — इस सूक्ष्मा में शास्त्र राजा-सत्ता से विरोध, विद्वज्जनों से क्लेश, और हाथ में लिए कार्य के अभिप्राय के भंग होने का उल्लेख करता है, जिससे व्यक्ति लोक में निन्दा का पात्र बन सकता है। ध्यान रहे, यह शास्त्र-कथित फल-संकेत है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering When the Sun's sūkṣmāntardaśā runs within Mars's (praty)antardaśā, the text states enmity with authority, affliction from the learned, the frustration of one's intended undertakings, and that one comes to censure among people.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: मङ्गल की प्रत्यन्तर्दशा के भीतर सूक्ष्म-स्वामी विंशोत्तरी-क्रम मङ्गल→राहु→गुरु→शनि→बुध→केतु→शुक्र→सूर्य→चन्द्र में चलते हैं; सूर्य यहाँ आठवाँ (उपान्त्य) कोष्ठक है।

हमारा डिकोड: सूक्ष्मान्तर्दशा विंशोत्तरी 120-वर्षीय चक्र (dossier §3) की चौथी पुनरावृत्ति है — महा→अन्तर→प्रत्यन्तर→सूक्ष्म — और हर स्तर शुद्ध अनुपात-गणित है: उप-खण्ड = (जनक-खण्ड × उप-ग्रह-वर्ष)/120। यहाँ मङ्गल-प्रत्यन्तर के भीतर सूर्य का सूक्ष्म-अंश = प्रत्यन्तर-अवधि × 6/120, जहाँ 6 सूर्य के विंशोत्तरी-वर्ष हैं। हमारा दशा-इंजन इसी अनुपात-अंकगणित को क्रमशः लागू करता है।

62.28
शुध्ढथ्वं ढनसम्प्राप्थिर्धेवभाह्मण्वथ्सलः ।
व्याढिना परिभूयेथ् भौमे सूक्ष्मगथे विढौ
śudhḍhathvaṃ ḍhanasamprāpthirdhevabhāhmaṇvathsalaḥ |
vyāḍhinā paribhūyeth bhaume sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुद्धत्वम् = पवित्रता/शुचिता; धन-सम्प्राप्तिः = धन का लाभ; देव-ब्राह्मण-वत्सलः = देवताओं व ब्राह्मणों के प्रति स्नेह-भाव रखने वाला; व्याधिना परिभूयेत = रोग से पीड़ित/अभिभूत हो सकता है; भौमे = मङ्गल की प्रत्यन्तर्दशा में; सूक्ष्मगते विधौ = चन्द्र (विधु) की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मङ्गल की प्रत्यन्तर्दशा के भीतर चन्द्र की सूक्ष्मा में मन में शुचिता, धन की प्राप्ति, तथा देव-ब्राह्मण के प्रति वात्सल्य-भाव आता है — पर साथ ही यह किसी रोग से पीड़ा का भी उल्लेख करता है, अर्थात् मिश्र-फल। यह सूक्ष्मा-कोष्ठक मङ्गल-चक्र का नवाँ (अन्तिम) है।

English rendering When the Moon's sūkṣmāntardaśā runs within Mars's period, the text states purity of conduct, acquisition of wealth, and affection toward gods and brahmins, yet also that one may be overcome by illness.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र)। अन्तर्दृष्टि: चन्द्र मङ्गल-प्रत्यन्तर के सूक्ष्म-क्रम का नवाँ एवं अन्तिम कोष्ठक है, जिसके पश्चात् चक्र अगले प्रत्यन्तर (राहु) की ओर बढ़ता है।

62.29
लोकोपध्रवबुध्ढिश्च सर्वकार्ये मथिविभ्रमः ।
शून्यथा चिथ्थधोषः स्याथ् स्वीये सूक्ष्मगथेऽप्यगौ
lokopadhravabudhḍhiśca sarvakārye mathivibhramaḥ |
śūnyathā ciththadhoṣaḥ syāth svīye sūkṣmagathe'pyagau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लोकोपद्रव-बुद्धिः = लोगों को उपद्रव/हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति वाली बुद्धि; सर्वकार्ये मति-विभ्रमः = हर कार्य में बुद्धि का भ्रम/डाँवाडोल होना; शून्यता = रिक्तता/खोखलापन; चित्त-दोषः स्यात् = चित्त में विकार होता है; स्वीये = अपनी ही (राहु की) प्रत्यन्तर्दशा में; सूक्ष्मगते अगौ = राहु (अग/छाया-ग्रह) की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र राहु की प्रत्यन्तर्दशा में राहु की ही ("स्वीये") सूक्ष्मा का फल कहता है — इस अवधि में यह उपद्रवकारी बुद्धि, सब कार्यों में मति का भ्रम, आन्तरिक रिक्तता और चित्त-विकार का उल्लेख करता है। स्मरण रहे कि यह शास्त्र का वर्णन है, भाग्य का निर्णय नहीं।

English rendering When Rahu's own sūkṣmāntardaśā runs within its own (praty)antardaśā, the text states a mind bent on troubling others, confusion of intellect in every task, inner emptiness, and a disturbance of the mind.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: "स्वीये" यह संकेत करता है कि सूक्ष्म-स्वामी और प्रत्यन्तर-स्वामी एक ही (राहु) हैं — प्रत्येक प्रत्यन्तर्दशा का प्रथम सूक्ष्म-कोष्ठक सदैव उसी जनक-ग्रह का "निज" कोष्ठक होता है।

हमारा डिकोड: यह "निज/स्वीये" कोष्ठक विंशोत्तरी उप-चक्र का विकर्ण-प्रारम्भ है — हमारा दशा-इंजन (dossier §3) प्रत्येक उप-चक्र को उसके जनक-स्वामी से ही आरम्भ करता है, फिर राहु→गुरु→शनि→बुध→केतु→शुक्र→सूर्य→चन्द्र→मङ्गल क्रम में बढ़ता है। राहु का सूक्ष्म-अंश यहाँ = राहु-प्रत्यन्तर-अवधि × 18/120 (18 = राहु के विंशोत्तरी-वर्ष)।

62.30
धीर्घरोगी धरिध्रश्च सर्वेषां प्रियधर्शनः ।
धानढर्मरथः शस्थो राहोः सूक्ष्मगथे गुरौ
dhīrgharogī dharidhraśca sarveṣāṃ priyadharśanaḥ |
dhānaḍharmarathaḥ śastho rāhoḥ sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दीर्घरोगी = दीर्घकालिक रोग-संकेत वाला; दरिद्रः = दरिद्रता-संकेत; सर्वेषां प्रियदर्शनः = सबको प्रिय दिखने वाला / प्रिय-आकार; दानधर्मरतः = दान और धर्म में रत; शस्तः/स्वस्थः = प्रशस्त या स्वस्थ (पाठ-भेद संभव: शस्थो); राहोः सूक्ष्मगते गुरौ = राहु की सूक्ष्म-गति में गुरु पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की सूक्ष्म-गति जब गुरु पर हो, तब दीर्घ-रोग और दरिद्रता का उल्लेख आता है, साथ ही सबके प्रिय दर्शन, दान-धर्म में रति, और “शस्त/स्वस्थ” जैसे मिश्रित संकेत। एक ही श्लोक में कठिन और शुभ दोनों फल-शब्द जुड़े हैं; इन्हें शास्त्र की सूची के रूप में पढ़ें, न कि एक-दूसरे को काटने वाली भविष्य-वाणी के रूप में।

English rendering The text states that when Rāhu’s sūkṣma runs under Jupiter, there are indications of long illness and poverty, yet also a pleasing appearance to all, devotion to gift and dharma, and a “praised / healthy” reading (recension-sensitive). Mixed phala is listed as the śāstra’s own catalogue.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-सूक्ष्म × गुरु)। मिश्र फल को “शास्त्र कहता है” की सूची के रूप में रखें; अवधि-सीमा दशा-अनुपात से तय होती है, यह श्लोक अवधि नहीं गिनता।

62.31
कुमार्गाथ्कुथ्सिथोर्ठश्च धुष्तश्च परसेवकः ।
असथ्सङ्गमथिर्मूडो राहोः सूक्ष्मगथे शनौ
kumārgāthkuthsithorṭhaśca dhuṣtaśca parasevakaḥ |
asathsaṅgamathirmūḍo rāhoḥ sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुमार्गात् = कुत्सित/गलत मार्ग से; कुत्सित-अर्थः = निन्दनीय ढंग से अर्जित धन; दुष्टः = दुर्जन-स्वभाव; पर-सेवकः = दूसरों की सेवा/परावलम्बन; असत्-सङ्ग-मतिः = बुरी संगति में रुचि रखने वाली बुद्धि; मूढः = विवेक-हीन/मोहग्रस्त; राहोः सूक्ष्मगते शनौ = राहु की प्रत्यन्तर्दशा में शनि की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस सूक्ष्मा को — राहु-प्रत्यन्तर के भीतर शनि की सूक्ष्मा को — कुमार्ग से अर्जित निन्द्य धन, दुष्ट-प्रवृत्ति, परावलम्बन, कुसंगति की ओर झुकी मति और मूढ़ता का सूचक बताता है। दो छाया-कारक व शनि का यह योग शास्त्र में कठिन-फल के रूप में वर्णित है; यह विवरण है, नियति नहीं।

English rendering When Saturn's sūkṣmāntardaśā runs within Rahu's period, the text states wealth gained by crooked means, a wicked temperament, dependence on others, an inclination to bad company, and delusion.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: शनि राहु-प्रत्यन्तर के सूक्ष्म-क्रम का तीसरा कोष्ठक है; इसका अनुपात-अंश जनक-अवधि × 19/120 (19 = शनि के विंशोत्तरी-वर्ष)।

62.32
स्थ्रीसम्भोगमथिर्वाग्मी लोकसम्भावनाव्त्ऱ्थः ।
अन्नमिच्छंस्थनुग्लानी राहोः सूक्ष्मगथे बुढे
sthrīsambhogamathirvāgmī lokasambhāvanāvtṟthaḥ |
annamicchaṃsthanuglānī rāhoḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्री-सम्भोग-मतिः = स्त्री-भोग की ओर झुकी बुद्धि; वाग्मी = वाक्-पटु, अच्छा वक्ता; लोक-सम्भावना-वृतः = लोक-सम्मान/प्रतिष्ठा से घिरा हुआ; अन्नम् इच्छन् = भोजन की इच्छा रखता हुआ; तनु-ग्लानी = शरीर में क्लान्ति/दुर्बलता; राहोः सूक्ष्मगते बुधे = राहु की प्रत्यन्तर्दशा में बुध की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु-प्रत्यन्तर में बुध की सूक्ष्मा में व्यक्ति की रुचि भोग की ओर होती है, वह वाक्-चतुर और लोक-प्रतिष्ठा से युक्त रहता है, किन्तु आहार की चाह के साथ शरीर में शिथिलता/ग्लानि भी बताई गई है। बुध की वाग्-कुशलता और राहु का सांसारिक झुकाव यहाँ एक साथ वर्णित हैं।

English rendering When Mercury's sūkṣmāntardaśā runs within Rahu's period, the text states a mind inclined to sensual enjoyment, eloquence, and standing amid public esteem, yet a craving for food together with bodily languor.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: बुध राहु-प्रत्यन्तर के सूक्ष्म-क्रम का चौथा कोष्ठक है; अनुपात-अंश जनक-अवधि × 17/120 (17 = बुध के विंशोत्तरी-वर्ष)।

62.33
माढुर्यं मानहानिश्च बन्ढनं चाप्रमाकरम् ।
पारुष्यं जीवहानिश्च राहोः सूक्ष्मगथे ढ्वजे
māḍhuryaṃ mānahāniśca banḍhanaṃ cāpramākaram |
pāruṣyaṃ jīvahāniśca rāhoḥ sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) माधुर्यम् = माधुर्य/मधुरता; मानहानिः = मान की हानि; बन्धनम् = बंधन; अप्रमाकरम् = अप्रमा/अज्ञान-कारक या पाठ-संदिग्ध पद (पाठ-भेद संभव); पारुष्यम् = पारुष्य, कठोरता; जीवहानिः = जीव/जीविका-हानि का शास्त्र-शब्द; ध्वजे = ध्वज = केतु; राहोः सूक्ष्मगते ध्वजे = राहु-सूक्ष्म में केतु पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की सूक्ष्म-गति ध्वज (केतु) पर हो तो माधुर्य, मान-हानि, बंधन, “अप्रमाकर” (पाठ-संदिग्ध), पारुष्य और जीव-हानि जैसे शब्द आते हैं। “जीवहानि” को शास्त्रीय फल-शब्द के रूप में रखें — भय, मृत्यु-निश्चितता या दबाव-युक्त अर्थ न लगाएँ। “अप्रमाकरम्” का शुद्ध पाठ अस्थिर हो सकता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in Rāhu’s sūkṣma under the “flag” (Ketu) there are sweetness, loss of honor, bondage, a disputed “aprama-kara” reading, harshness, and “loss of life/livelihood” as a traditional phrase. Treat as śāstra-phala language, not as fatal certainty; the middle term may be recension-sensitive.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-सूक्ष्म × केतु/ध्वज)। केतु-खंड विम्शोत्तरी शृंखला में अनुपात से आता है; यह श्लोक गणना नहीं सिखाता।

62.34
बन्ढनान्मुच्यथे बध्ढः स्ठानमानार्ठसञ्चयः ।
कारणाध् ध्रव्यलाभश्च राहौ सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
banḍhanānmucyathe badhḍhaḥ sṭhānamānārṭhasañcayaḥ |
kāraṇādh dhravyalābhaśca rāhau sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनात् मुच्यते बद्धः = बन्दी बन्धन से मुक्त होता है; स्थान-मान-अर्थ-सञ्चयः = पद, सम्मान और धन का संचय; कारणात् द्रव्य-लाभः = किसी निमित्त/कारणवश धन-द्रव्य का लाभ; राहौ सूक्ष्मगते भृगौ = राहु की प्रत्यन्तर्दशा में शुक्र (भृगु) की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु-प्रत्यन्तर में शुक्र की सूक्ष्मा शुभ-प्रधान है — बन्धन में पड़ा व्यक्ति मुक्त होता है, पद-सम्मान-धन का संचय होता है, और किसी कारणवश द्रव्य-लाभ होता है। शुक्र का सौम्य-प्रभाव यहाँ राहु के फल को अनुकूल दिशा देता है, ऐसा शास्त्र-वचन है।

English rendering When Venus's sūkṣmāntardaśā runs within Rahu's period, the text states release of the bound from bondage, an accumulation of position, honour and wealth, and gain of goods through some cause.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। अन्तर्दृष्टि: शुक्र राहु-प्रत्यन्तर के सूक्ष्म-क्रम का छठा कोष्ठक है; अनुपात-अंश जनक-अवधि × 20/120 (20 = शुक्र के विंशोत्तरी-वर्ष, चक्र का सबसे बड़ा अंश)।

62.35
व्यक्थार्शो गुल्मरोगश्च क्रोढहानिस्थठैव च ।
वाहनाधिसुखं सर्वं राहोः सूक्ष्मगथे रवौ
vyakthārśo gulmarogaśca kroḍhahānisthaṭhaiva ca |
vāhanādhisukhaṃ sarvaṃ rāhoḥ sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यक्तार्शः = व्यक्त अर्श (अर्श-रोग का शास्त्र-संकेत); गुल्मरोगः = गुल्म-रोग का उल्लेख; क्रोधहानिः = क्रोध की हानि/क्षय; तथा एव च = तथा वैसे ही; वाहनादिसुखम् सर्वम् = वाहन आदि का समस्त सुख; राहोः सूक्ष्मगते रवौ = राहु-सूक्ष्म में रवि (सूर्य) पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की सूक्ष्म-गति सूर्य पर हो तो व्यक्त अर्श, गुल्म-रोग, क्रोध-हानि, और वाहन आदि के समस्त सुख का एक साथ उल्लेख है। रोग-नाम यहाँ पारंपरिक फल-शब्द हैं — चिकित्सकीय निदान, इलाज-आदेश या भय-कथन नहीं। सुख-सूची को भी निश्चित भाग्य नहीं मानें।

English rendering The text states that in Rāhu’s sūkṣma under the Sun there are indications of manifested arśas, gulma-disease, diminution of anger, and all comforts such as conveyances. Disease terms are traditional phala vocabulary, not medical diagnosis or fear-rhetoric.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-सूक्ष्म × रवि)। सूर्य-सूक्ष्म का काल-खंड विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र के ग्रह-वर्ष अनुपात से आता है; यह श्लोक फलमात्र है।

62.36
मणिरथ्नढनवाप्थिर्विध्योपासनशीलवान् ।
धेवार्चनपरो भक्थ्या राहोः सूक्ष्मगथे विढौ
maṇirathnaḍhanavāpthirvidhyopāsanaśīlavān |
dhevārcanaparo bhakthyā rāhoḥ sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मणि-रत्न-धन-प्राप्तिः = मणि, रत्न और धन की प्राप्ति; विद्या-उपासन-शीलवान् = विद्या की उपासना में शीलवाला; देव-अर्चन-परः = देव-पूजा में तत्पर; भक्त्या = भक्ति से; राहोः सूक्ष्म-गते = राहु की सूक्ष्म-दशा में; विधौ = चन्द्र (विधि = चन्द्र) की सूक्ष्म में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की सूक्ष्म-दशा जब चन्द्र से जुड़ती है, तब मणि-रत्न और धन की प्राप्ति का संकेत मिलता है। व्यक्ति विद्या की उपासना में शीलवान् रहता है और भक्तिपूर्वक देव-अर्चन में लीन होता है। यह फल-कथन राहु–चन्द्र सूक्ष्म-युग्म के परंपरागत शुभ-पक्ष को बयान करता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when the Moon operates as the sūkṣma within Rāhu’s period, there is acquisition of gems, jewels, and wealth, together with devotion to learning and pious worship of the deities. It is a classical phala-statement for the Rāhu–Moon sūkṣma pairing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि-गणना स्वयं इस श्लोक में नहीं है; विंशोत्तरी में सूक्ष्म-अवधि (महादशा-वर्ष × अन्तर्-वर्ष × सूक्ष्म-ग्रह-वर्ष) / 120² से आती है, जबकि यहाँ केवल फल बताया गया है।

62.37
निर्जिथे जनविध्रावो जने क्रोढश्च बन्ढनम् ।
चौर्यशीलरथिर्निथ्यं राहोः सूक्ष्मगथे कुजे
nirjithe janavidhrāvo jane kroḍhaśca banḍhanam |
cauryaśīlarathirnithyaṃ rāhoḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्जिते = पराजित होने पर/दबाए जाने पर (पाठ अस्पष्ट — पाठ-भेद संभव); जन-विद्रावः = लोगों का तितर-बितर होना/भगदड़; जने क्रोधः = लोगों के प्रति क्रोध; बन्धनम् = बन्धन/कैद; चौर्य-शील-रतिः नित्यम् = चोरी की प्रवृत्ति में निरन्तर रुचि; राहोः सूक्ष्मगते कुजे = राहु की प्रत्यन्तर्दशा में मङ्गल (कुज) की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस सूक्ष्मा को — राहु-प्रत्यन्तर में मङ्गल की सूक्ष्मा को — पराभव, जन-भगदड़, लोगों से क्रोध-कलह, बन्धन और चोरी-प्रवृत्ति में रुचि का सूचक बताता है। यह राहु व मङ्गल दोनों उग्र-कारकों का योग है, जिसे शास्त्र कठिन-फल कहता है; प्रथम पद का पाठ दूषित है, अतः वहाँ पाठ-भेद संभव।

English rendering When Mars's sūkṣmāntardaśā runs within Rahu's period, the text states subjugation, a scattering of people, anger toward others, bondage, and a constant delight in thievish ways (the opening word is textually uncertain).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: मङ्गल राहु-प्रत्यन्तर के सूक्ष्म-क्रम का नवाँ एवं अन्तिम कोष्ठक है, जो इस प्रत्यन्तर के भीतर विंशोत्तरी उप-चक्र को पूर्ण करता है।

हमारा डिकोड: यह कोष्ठक राहु-प्रत्यन्तर के नौ सूक्ष्म-स्वामियों (राहु→गुरु→शनि→बुध→केतु→शुक्र→सूर्य→चन्द्र→मङ्गल) की श्रृंखला को बन्द करता है — वही 9-गुना विंशोत्तरी-क्रम जिस पर हमारा दशा-इंजन (dossier §3) आधारित है। नौ सूक्ष्म-अंशों का योग सदा जनक प्रत्यन्तर-अवधि के बराबर रहता है, क्योंकि Σ(ग्रह-वर्ष) = 120; हमारी जाँच इस समापन को सहन-सीमा से नहीं, `==` तुल्यता से पुष्ट करती है।

62.38
शोकनाशो ढनाढिक्यमग्निहोथ्रं शिवार्चनम् ।
वाहनं छथ्रसंयुक्थं स्वीये सूक्ष्मगथे गुरौ
śokanāśo ḍhanāḍhikyamagnihothraṃ śivārcanam |
vāhanaṃ chathrasaṃyukthaṃ svīye sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शोक-नाशः = शोक का नाश; धन-आधिक्यम् = धन की प्रचुरता; अग्निहोत्रम् = अग्निहोत्र-यज्ञ का सम्पादन; शिव-अर्चनम् = शिव की पूजा; वाहनं छत्र-संयुक्तम् = छत्र (राज-चिह्न) से युक्त वाहन; स्वीये = अपनी ही (गुरु की) प्रत्यन्तर्दशा में; सूक्ष्मगते गुरौ = गुरु (बृहस्पति) की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र गुरु की प्रत्यन्तर्दशा में गुरु की ही ("स्वीये") सूक्ष्मा का शुभ-फल कहता है — शोक का नाश, धन की प्रचुरता, अग्निहोत्र व शिव-अर्चन में प्रवृत्ति, और छत्र-युक्त वाहन (गौरव-चिह्न)। गुरु की शुभता अपने ही कोष्ठक में सर्वाधिक मंगलमयी बताई गई है।

English rendering When Jupiter's own sūkṣmāntardaśā runs within its own (praty)antardaśā, the text states the removal of grief, abundance of wealth, the performance of the fire-sacrifice and worship of Śiva, and a conveyance graced with a parasol.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। अन्तर्दृष्टि: "स्वीये" दर्शाता है कि यह गुरु-प्रत्यन्तर का प्रथम "निज" सूक्ष्म-कोष्ठक है, जहाँ सूक्ष्म-स्वामी और प्रत्यन्तर-स्वामी एक ही (गुरु) हैं।

हमारा डिकोड: प्रत्येक विंशोत्तरी उप-चक्र अपने जनक-ग्रह के "निज" कोष्ठक से आरम्भ होता है — हमारा दशा-इंजन (dossier §3) गुरु-प्रत्यन्तर को गुरु से ही सीड करता है, फिर गुरु→शनि→बुध→केतु→शुक्र→सूर्य→चन्द्र→मङ्गल→राहु क्रम में बढ़ता है। गुरु का सूक्ष्म-अंश यहाँ = गुरु-प्रत्यन्तर-अवधि × 16/120, और इंजन इस क्रम व अनुपात को `==` तुल्यता से जाँचता है, सहन-सीमा से नहीं।

62.39
व्रथभङ्गो मनस्थापो विधेशे वसुनाशनम् ।
विरोढो बन्ढुवैर्गश्च गुरोः सूक्ष्मगथे शनौ
vrathabhaṅgo manasthāpo vidheśe vasunāśanam |
viroḍho banḍhuvairgaśca guroḥ sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्रत-भङ्गः = व्रत/संकल्प का टूटना; मनस्तापः = मानसिक सन्ताप; विदेशे वसु-नाशनम् = परदेश में धन का नाश; विरोधः बन्धु-वर्गैः = बन्धु-वर्ग से विरोध/कलह (पाठ "बन्धुवैर्ग" दूषित — पाठ-भेद संभव); गुरोः सूक्ष्मगते शनौ = गुरु की प्रत्यन्तर्दशा में शनि की सूक्ष्मान्तर्दशा के चलने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु-प्रत्यन्तर में शनि की सूक्ष्मा में व्रत-भंग, मन का सन्ताप, परदेश में धन-हानि और स्वजनों से विरोध का उल्लेख है। शुभ गुरु और मन्द शनि के इस योग को शास्त्र क्लेश-मिश्रित बताता है; अन्तिम पद का पाठ दूषित होने से वहाँ पाठ-भेद संभव।

English rendering When Saturn's sūkṣmāntardaśā runs within Jupiter's period, the text states the breaking of vows, mental anguish, loss of wealth in a foreign land, and discord with one's circle of kin (the last compound is textually uncertain).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अन्तर्दृष्टि: शनि गुरु-प्रत्यन्तर के सूक्ष्म-क्रम का दूसरा कोष्ठक है (गुरु के "निज" कोष्ठक के तुरन्त पश्चात्); इसका अनुपात-अंश जनक-अवधि × 19/120 (19 = शनि के विंशोत्तरी-वर्ष)।

62.40
विध्याबुध्ढिविव्त्ऱ्ध्ढिश्च ससम्मानं ढनागमः ।
ग्त्ऱ्हे सर्वविढं सौख्यं गुरोः सूक्ष्मगथे बुढे
vidhyābudhḍhivivtṟdhḍhiśca sasammānaṃ ḍhanāgamaḥ |
gtṟhe sarvaviḍhaṃ saukhyaṃ guroḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या = ज्ञान/शिक्षा; बुद्धि = मेधाशक्ति; विवृद्धिः = बढ़ोतरी; स-सम्मानम् = आदर-सहित; धन-आगमः = धन का आगमन; गृहे = घर में; सर्व-विधम् सौख्यम् = सब प्रकार का सुख; गुरोः = बृहस्पति (आश्रयदशा-स्वामी) की; सूक्ष्म-गते बुधे = बुध की सूक्ष्म-अन्तर्दशा के प्राप्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बृहस्पति के दशाकाल में जब बुध की सूक्ष्म-अन्तर्दशा चलती है, तब विद्या और बुद्धि की वृद्धि होती है, मान-सम्मान मिलता है, धन का आगमन होता है और घर में सब प्रकार का सुख रहता है। दो शुभ ग्रहों (गुरु + बुध) का यह संयोग पाठ में पूर्णतः अनुकूल फल के रूप में वर्णित है।

English rendering According to the text, in Jupiter's period when Mercury's sūkṣmāntardaśā runs, learning and intellect flourish, honour comes, wealth flows in, and there is happiness of every kind in the home.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह श्लोक विंशोत्तरी के चौथे उपस्तर (सूक्ष्म-अन्तर्दशा) की 9×9 फल-सारणी का "गुरु→बुध" कोष्ठ है; गणना नहीं, केवल फल का विवरण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र का सूक्ष्म-उपविभाजन है (दॉसियर #3)। हमारे दशा-इंजन में जो अनुपात-गणित अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 चलाता है, वही श्लोक 1 के सूत्र (÷ खार्क = ÷120) द्वारा इस सूक्ष्म-स्तर तक विस्तृत होता है — शुद्ध बीजगणित, जिसकी फल-परत यहाँ प्रत्येक कोष्ठ में जोड़ी गई है।

62.41
ज्ञानं विभवपाण्दिथ्ये शास्थ्रश्रोथा शिवार्चनम् ।
अग्निहोथ्रं गुरोर्भक्थिर्गुरोः सूक्ष्मगथे ढ्वजे
jñānaṃ vibhavapāṇdithye śāsthraśrothā śivārcanam |
agnihothraṃ gurorbhakthirguroḥ sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञानम् = बोध; विभव-पाण्डित्ये = ऐश्वर्य एवं विद्वत्ता; शास्त्र-श्रोता = शास्त्रों का श्रवण करने वाला; शिव-अर्चनम् = शिव-पूजा; अग्निहोत्रम् = अग्नि-यज्ञ; गुरोः भक्तिः = गुरु के प्रति भक्ति; गुरोः सूक्ष्म-गते ध्वजे = बृहस्पति के दशाकाल में ध्वज (= केतु) की सूक्ष्म-अन्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार बृहस्पति के दशाकाल में केतु (ध्वज) की सूक्ष्म-अन्तर्दशा में जातक को ज्ञान, ऐश्वर्य और पाण्डित्य प्राप्त होता है; वह शास्त्रों का श्रोता बनता है, शिव-अर्चन, अग्निहोत्र और गुरु-भक्ति में प्रवृत्त होता है। गुरु-केतु का यह योग यहाँ विशेषतः आध्यात्मिक-वैदिक फल के रूप में कहा गया है।

English rendering The text states that in Jupiter's period, during Ketu's (dhvaja) sūkṣmāntardaśā, one gains knowledge, prosperity and scholarship, becomes a listener of the scriptures, and turns to Śiva-worship, the agnihotra rite, and devotion to the guru.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "ध्वज" बिना अंक-मान वाला संज्ञा-संकेत है (ध्वज/केतु), न कि भूतसंख्या — अतः यहाँ कोई संख्या-अपकोडन नहीं, केवल ग्रह-निर्देश।

62.42
रोगान्मुक्थिः सुखं भोगो ढनढान्यसमागमः ।
पुथ्रधाराधिसौख्यं च गुरोः सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
rogānmukthiḥ sukhaṃ bhogo ḍhanaḍhānyasamāgamaḥ |
puthradhārādhisaukhyaṃ ca guroḥ sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोगात् मुक्तिः = रोग से छुटकारा; सुखम् = सुख; भोगः = उपभोग; धन-धान्य-समागमः = धन और अन्न का मिलना; पुत्र-दार-आदि-सौख्यम् = पुत्र, पत्नी आदि का सुख; गुरोः सूक्ष्म-गते भृगौ = बृहस्पति के दशाकाल में भृगु (= शुक्र) की सूक्ष्म-अन्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बृहस्पति के दशाकाल में शुक्र (भृगु) की सूक्ष्म-अन्तर्दशा में रोग से मुक्ति, सुख और भोग मिलते हैं, धन-धान्य एकत्र होता है, तथा पुत्र-पत्नी आदि पारिवारिक सुख प्राप्त होता है। दो शुभ ग्रहों का यह संयोग पूर्णतः अनुकूल फल के रूप में वर्णित है।

English rendering The text says that in Jupiter's period, during Venus's (bhṛgu) sūkṣmāntardaśā, one is freed from disease and enjoys comfort and pleasure, wealth and grain accumulate, and there is the happiness of wife, sons and family.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गुरु-शुक्र दोनों शुभ, फिर भी परम्परा में परस्पर सम-मित्र नहीं; तथापि यह कोष्ठ सारणी में शुद्ध अनुकूल फल दर्शाता है — फल-सारणी ग्रह-मैत्री से स्वतंत्र, स्थिर पाठ है।

62.43
वाथपिथ्थप्रकोपश्च श्लेष्मोध्रेकस्थु धारुणः ।
रसव्याधिक्त्ऱ्थं शूलं गुरोः सूक्ष्मगथे रवौ
vāthapiththaprakopaśca śleṣmodhrekasthu dhāruṇaḥ |
rasavyādhiktṟthaṃ śūlaṃ guroḥ sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वात-पित्त-प्रकोप = वात व पित्त का प्रकोपण/उग्रता; श्लेष्म-उद्रेक = कफ (श्लेष्मा) का अतिरेक; दारुण = उग्र/तीव्र; रस-व्याधि-कृत शूल = रस-दोषजन्य शूल/पीड़ा; गुरोः सूक्ष्म-गते = गुरु की सूक्ष्म-दशा में; रवौ = सूर्य में/सूर्य की सूक्ष्म में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की सूक्ष्म-दशा में जब सूर्य की सूक्ष्म चलती है, तब वात और पित्त का प्रकोप तथा श्लेष्मा का उग्र उद्रेक होता है। उसी सन्दर्भ में रस-सम्बन्धी व्याधि से उत्पन्न शूल का भी उल्लेख है। यह फल-कथन है — काल-खण्ड की सूक्ष्म-परत से जोड़ा गया शास्त्रीय संकेत, चिकित्सकीय निदान नहीं।

English rendering The text states that when the Sun runs the sūkṣma under Jupiter, there is severe aggravation of vāta and pitta and a harsh excess of śleṣma (kapha), together with pain ascribed to disorders of rasa. This is a classical phala statement for that sūkṣma window, not a medical prescription.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-सूक्ष्म में सूर्य)। सूक्ष्म-खण्ड स्वयं विंशोत्तरी की परत-दर-परत अनुपात-गणित से समय में बैठता है; यह श्लोक उस खण्ड का फल बताता है, अवधि-सूत्र नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी का 120-वर्षीय चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120 — यही अनुपात-गणित सूक्ष्म-परत तक विस्तारित होकर इन फल-खिड़कियों का काल निर्धारित करता है। फल का शब्दशास्त्र का है; इंजन केवल अवधि की संख्या निकालता है — exact ratio arithmetic, interpretation अलग।

62.44
छथ्रचामरसंयुक्थं वैभवं पुथ्रसम्पधः ।
नेथ्रकुक्षिगथा पीदा गुरोः सूक्ष्मगथे विढौ
chathracāmarasaṃyukthaṃ vaibhavaṃ puthrasampadhaḥ |
nethrakukṣigathā pīdā guroḥ sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छत्र-चामर-संयुक्त = छत्र और चँवर से युक्त (राज-वैभव-चिह्न); वैभव = ऐश्वर्य/प्रताप; पुत्र-सम्पदः = पुत्र-सम्पत्ति/पुत्र-समृद्धि; नेत्र-कुक्षि-गता पीडा = नेत्र व कुक्षि (उदर) में स्थित पीड़ा; गुरोः सूक्ष्म-गते = गुरु की सूक्ष्म में; विधौ = चन्द्र में (विधि = चन्द्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की सूक्ष्म में चन्द्र की सूक्ष्म आने पर छत्र-चामर-युक्त वैभव और पुत्र-सम्पदा का योग बताया गया है। उसी श्लोक में नेत्र और कुक्षि में पीड़ा का भी उल्लेख है — एक ही काल-खण्ड के दो फल-पक्ष। न तो वैभव “गारंटी” है, न पीड़ा को भय की भाषा में पढ़ना चाहिए; दोनों शास्त्र के कथन हैं।

English rendering The text states that when the Moon runs the sūkṣma under Jupiter, there is splendour marked by umbrella and chowrie and prosperity through sons; it also notes pain seated in the eyes and the belly. Both clauses are phala of that sūkṣma, not endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-सूक्ष्म में चन्द्र)। मिश्र फल (वैभव + शारीरिक पीड़ा-उल्लेख) एक ही सूक्ष्म-स्वामी के अन्तर्गत शास्त्र ने जोड़े हैं।

62.45
स्र्थीजनाच्च विषोथ्पथ्थिर्बन्ढनं च रुजोभयम् ।
धेशान्थरगमो भ्रान्थिर्गुरोः सूक्ष्मगथे कुजे
srthījanācca viṣothpaththirbanḍhanaṃ ca rujobhayam |
dheśāntharagamo bhrānthirguroḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्री-जनात् = स्त्री-जन से; विष-उत्पत्ति = विष का उदय/विष-प्रसंग; बन्धन = कैद/अवरोध; रुज्-भय = रोग का भय; देश-अन्तर-गम = परदेश-गमन; भ्रान्ति = भ्रम/व्याकुलता; गुरोः सूक्ष्म-गते = गुरु की सूक्ष्म में; कुजे = मंगल में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की सूक्ष्म में मंगल की सूक्ष्म चलने पर स्त्री-जन से विष-उत्पत्ति, बन्धन, और रोग-भय का संकेत है। साथ ही देशान्तर-गमन और भ्रान्ति का भी फल कहा गया है। यह दबाव या भय-वाणिज्य नहीं — काल-खण्ड का शास्त्रीय वर्णन है; “विष” यहाँ शास्त्र-शब्द है, आधुनिक विष-चिकित्सा का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Mars runs the sūkṣma under Jupiter, there may be trouble arising in connection with women (the śāstra’s “viṣa”), bondage, fear of illness, travel to another land, and confusion. Report as the text’s phala for that window, without fear-rhetoric or certainty theater.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-सूक्ष्म में मंगल/कुज)। बाहरी देश-गमन और बन्धन यहाँ घटना-प्रकार के शास्त्र-संकेत हैं, न कि कानूनी भविष्यवाणी।

62.46
व्याढिभिः परिभूथःस्याच्चौरैरपह्त्ऱ्थं ढनम् ।
सर्पव्त्ऱ्श्चिकभीथिश्च गुरोः सूक्ष्मगथेऽप्यगौ
vyāḍhibhiḥ paribhūthaḥsyāccaurairapahtṟthaṃ ḍhanam |
sarpavtṟścikabhīthiśca guroḥ sūkṣmagathe'pyagau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्याधिभिः परिभूतः = रोगों से अभिभूत; चौरैः अपहृतं धनम् = चोरों द्वारा अपहृत धन; सर्प-वृश्चिक-भीति = सर्प व वृश्चिक का भय; गुरोः सूक्ष्म-गते = गुरु की सूक्ष्म में; अपि अगौ = पाठ “अप्यगौ” — ग्रह-नाम में पाठ-भेद संभव (क्रम/परम्परा से प्रायः बुध/ज्ञ; अन्य पाठ-कल्पना असुरक्षित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की सूक्ष्म में उक्त ग्रह (पाठ “अगौ”; पाठ-भेद संभव) की सूक्ष्म में जातक रोगों से घिरा रहे, धन चोरों द्वारा हर लिया जाए, तथा सर्प-वृश्चिक का भय हो। फल-सूची चेतावनी-नाटक नहीं — शास्त्र का वर्णनात्मक कथन है। ग्रह-पद का पाठ अस्थिर हो तो फल को हठ से एक ही ग्रह पर बाँधना ठीक नहीं।

English rendering The text states that in Jupiter’s sūkṣma, under the graha named in the reading “agau” (reading uncertain — पाठ-भेद संभव), one is overcome by diseases, wealth is carried off by thieves, and there is fear of serpents and scorpions. Keep the graha identity provisional if the manuscript form is unstable.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-सूक्ष्म; ग्रह-पाठ अस्थिर)। जहाँ पाठ-भेद हो, संख्या/स्वामी को “निश्चित” कहना अनुशासन-विरुद्ध है — पहले पाठ, फिर फल।

62.47
ढनहानिर्महाव्याढिः वाथपीदा कुलक्षयः ।
भिन्नाहारी महाधुःखी निजसूक्ष्मगथे शनौ
ḍhanahānirmahāvyāḍhiḥ vāthapīdā kulakṣayaḥ |
bhinnāhārī mahādhuḥkhī nijasūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-हानिः = धन की हानि; महा-व्याधिः = भारी रोग; वात-पीडा = वात-जनित पीड़ा; कुल-क्षयः = कुल का क्षय; भिन्न-आहारी = अनियमित/विषम आहार करने वाला; महा-दुःखी = अत्यन्त दुःखी; निज-सूक्ष्म-गते शनौ = शनि के दशाकाल में उसकी अपनी (निज) सूक्ष्म-अन्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार शनि के दशाकाल में उसकी अपनी (निज) सूक्ष्म-अन्तर्दशा में धन-हानि, महारोग, वात-पीड़ा, कुल-क्षय, विषम आहार और अत्यधिक दुःख का कथन है। यह शनि-खण्ड का प्रथम कोष्ठ (शनि-शनि) है, जो परम्परा में कठोर फल-रूप में वर्णित है।

English rendering The text states that in Saturn's period, during Saturn's own sūkṣmāntardaśā, there is loss of wealth, grave illness, vāta-affliction, decline of the family, irregular diet, and great sorrow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "निज" = आश्रयदशा-स्वामी की अपनी सूक्ष्मदशा, अर्थात 9×9 सारणी का विकर्ण-कोष्ठ (शनि-शनि); कोई संख्या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "निज-सूक्ष्म" शब्द सूक्ष्मदशा की अनुपात-संरचना स्पष्ट करता है (दॉसियर #3): सूक्ष्म-अन्तर्दशा = प्रत्यन्तर्दशा × (ग्रह-विंशोत्तरी-वर्ष) ÷ 120। शनि के 120-वर्ष चक्र में 19 वर्ष होने से उसकी निज-सूक्ष्म प्रत्येक स्तर पर सबसे लम्बे उपखण्ड में एक होती है — यह शुद्ध बीजगणित है, और उस पर लदा फल केवल शास्त्र का कथन है, हमारा समर्थित पूर्वानुमान नहीं (दॉसियर #5)।

62.48
वाणिज्यव्त्ऱ्थ्थेर्लाभश्च विध्याविभवमेव च ।
स्थ्रीलाभश्च महीप्राप्थिः शनेः सूक्ष्मगथे बुढे
vāṇijyavtṟththerlābhaśca vidhyāvibhavameva ca |
sthrīlābhaśca mahīprāpthiḥ śaneḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाणिज्य-वृत्ति-लाभ = व्यापार/वाणिज्य-वृत्ति से लाभ; विद्या-विभव = विद्या और वैभव; स्त्री-लाभ = स्त्री/पत्नी-लाभ (शास्त्र-शब्द); मही-प्राप्ति = भूमि/पृथ्वी की प्राप्ति; शनेः सूक्ष्म-गते = शनि की सूक्ष्म में; बुधे = बुध में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की सूक्ष्म में बुध की सूक्ष्म आने पर वाणिज्य-वृत्ति से लाभ, विद्या-विभव, स्त्री-लाभ और भूमि-प्राप्ति का फल है। शनि-सूक्ष्म के कठोर फलों (पूर्व श्लोक) के बाद यह मिश्र/शुभ-पक्ष दिखाता है — उसी दशा-वृक्ष की दूसरी टहनी। “लाभ” को वित्तीय गारंटी मत पढ़ें; शास्त्र का फल-शब्द है।

English rendering The text states that when Mercury runs the sūkṣma under Saturn, there is gain through commercial livelihood, splendour of learning, gain of a wife/woman, and attainment of land. Read as classical phala for that Mercury-sūkṣma under Saturn, not as a financial or marital guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-सूक्ष्म में बुध)। काल-स्थिति के लिए वही विंशोत्तरी अनुपात: प्रत्येक निचली परत = (ऊपरी परत के वर्ष × वर्तमान परत के ग्रह-वर्ष)/120; श्लोक फल देता है, संख्या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दशा-इंजन महा → अन्तर की ratio-arithmetic (`(M × A)/120`) को 120-वर्षीय ग्रह-वर्ष सारिणी पर pin करता है; सूक्ष्म उसी स्टैक की अगली परत है। यह श्लोक उस बुध-सूक्ष्म-खिड़की का फल है — हम अवधि की गणना verify करते हैं (`==` अनुशासन), फल को भविष्य की मुहर नहीं बनाते।

62.49
चौरोपध्रवकुष्टाधिव्त्ऱ्थ्थिक्षयविगुम्फनम् ।
सर्वाङ्गपीदनं व्याढिः शनेः सूक्ष्मगथे ढ्वजे
cauropadhravakuṣṭādhivtṟththikṣayavigumphanam |
sarvāṅgapīdanaṃ vyāḍhiḥ śaneḥ sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर-उपद्रव = चोरों का उपद्रव; कुष्ठ-आधि = कुष्ठ-सम्बन्धी क्लेश (शास्त्र-रोगनाम; निदान नहीं); वित्त-क्षय = धन का क्षय; विगुम्फन = उलझाव/जकड़न/प्रतिबन्ध; सर्वाङ्ग-पीडन = सब अंगों में पीड़ा; व्याधि = रोग; शनेः सूक्ष्म-गते = शनि की सूक्ष्म में; ध्वजे = ध्वज = राहु (पाठ-भेद/पर्याय संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की सूक्ष्म में ध्वज (राहु) की सूक्ष्म में चोर-उपद्रव, कुष्ठ-आधि, वित्त-क्षय और विगुम्फन होता है। सर्वाङ्ग-पीडन और व्याधि का भी उल्लेख है। कुष्ठ आदि शब्द शास्त्र की फल-शब्दावली हैं — न चिकित्सकीय प्रमाण-पत्र, न भय से बेचने योग्य “शाप”। केवल उस सूक्ष्म-खण्ड का कठोर फल-चित्र।

English rendering The text states that when Rāhu (dhvaja) runs the sūkṣma under Saturn, there is trouble from thieves, affliction named as kuṣṭha, decline of wealth, entanglement, pain through all the limbs, and disease. Medical nouns stay inside the śāstra’s voice; they are not diagnoses or fate sealed by us.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-सूक्ष्म में राहु/ध्वज)। नव-ग्रह विंशोत्तरी क्रम में राहु के 18 वर्ष महा-स्तAmb पर antardāśā/sūkṣma अनुपात की आधार-संख्या हैं; यह श्लोक उस राहु-सूक्ष्म का फलमात्र है।

62.50
ऐश्वर्यमायुढाभ्यासः पुथ्रलाभोऽभिषेचनम् ।
आरोग्यं ढनकामौ च शनेः सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
aiśvaryamāyuḍhābhyāsaḥ puthralābho'bhiṣecanam |
ārogyaṃ ḍhanakāmau ca śaneḥ sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऐश्वर्यम् = ऐश्वर्य, प्रभुत्व; आयुर्धाभ्यासः = आयु-संबंधी अभ्यास / दीर्घायु की साधना; पुत्रलाभः = पुत्र-प्राप्ति; अभिषेचनम् = अभिषेक, राज्याभिषेक-सादृश्य सम्मान; आरोग्यम् = नीरोगता; धनकामौ = धन और काम (इच्छा-पूर्ति); शनेः सूक्ष्मगते = शनि की सूक्ष्म-दशा/सूक्ष्म-गति में; भृगौ = शुक्र (भृगु) के सूक्ष्म-काल में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की सूक्ष्म-परंपरा में जब शुक्र सूक्ष्म-स्वामी होता है, तब ऐश्वर्य, आयु-संबंधी अभ्यास, पुत्र-लाभ और अभिषेक-तुल्य सम्मान का फल बताया गया है। साथ ही आरोग्य तथा धन और कामनाओं की सिद्धि का उल्लेख है। यह शनि-सूक्ष्म के अंतर्गत शुक्र-सूक्ष्म का फल-कथन है, न कि निश्चित घटना।

English rendering The text states that when Venus is the sūkṣma-lord within Saturn’s sūkṣma sequence, indications include sovereignty/prosperity, practices connected with longevity, gain of a son, and consecration-like elevation, together with health and the pairing of wealth and desire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूक्ष्म-अवधि स्वयं विंशोत्तरी के अनुपात-नियम से निकलती है: मह twig-श्रेणी में सूक्ष्म = (उच्चतर-दशा-वर्ष × सूक्ष्म-ग्रह-वर्ष) ÷ 120; यहाँ केवल शुक्र-सूक्ष्म का फल वर्णित है, गणना-सूत्र नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) पर आधारित है; अंतर्दशा = (महादशा-वर्ष × अंतर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120, और सूक्ष्म उसी अनुपात की अगली परत है। शनि-सूक्ष्म में शुक्र का खंड = (शनि-संबंधी उच्चतर अवधि × 20) ÷ 120 — शुद्ध अनुपात-गणित; फल-पंक्ति को हम भविष्यवाणी नहीं मानते।

62.51
राजथेजोविकारथ्वं स्वग्त्ऱ्हे जायथे कलिः ।
किञ्चिथ्पीदा स्वधेहोथ्ठा शनेः सूक्ष्मगथे रवौ
rājathejovikārathvaṃ svagtṟhe jāyathe kaliḥ |
kiñcithpīdā svadhehothṭhā śaneḥ sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजतेजोविकारत्वम् = राजकीय तेज/प्रताप में विकार-भाव; स्वगृहे = अपने गृह/कुल-स्थान में; जायते = उत्पन्न होता है; कलिः = कलह, विवाद; किञ्चित्पीडा = कुछ/अल्प पीड़ा; स्वदेहोत्था = स्वदेह से उत्पन्न; शनेः सूक्ष्मगते = शनि की सूक्ष्म में; रवौ = सूर्य के सूक्ष्म-काल में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की सूक्ष्म-परंपरा में जब सूर्य सूक्ष्म-स्वामी हो, तब राजतेज में विकार-भाव तथा अपने घर में कलह का उल्लेख है। साथ ही स्वदेह से उत्पन्न किंचित् पीड़ा का भी फल-कथन है। यह सूर्य-सूक्ष्म का पारंपरिक परिणाम-वर्णन है; “विकार” और “पीड़ा” को निश्चित भाग्य नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when the Sun is the sūkṣma-lord under Saturn’s sūkṣma sequence, there is indication of disturbance to royal lustre/authority, conflict arising in one’s own house, and some pain arising from the body itself.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूर्य की विंशोत्तरी-वर्ष-संख्या 6 है; सूक्ष्म-अवधि का माप अनुपात से आता है, इस श्लोक में नहीं।

62.52
स्फीथबुध्ढिर्महारम्भो मन्धथेजा बहुव्ययः ।
स्थ्रीपुथ्रैश्च समं सौख्यं शनेः सूक्ष्मगथे विढौ
sphīthabudhḍhirmahārambho mandhathejā bahuvyayaḥ |
sthrīputhraiśca samaṃ saukhyaṃ śaneḥ sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फीत-बुद्धिः = विस्तृत/प्रचुर बुद्धि; महा-आरम्भः = बड़े उद्यम/आयोजन; मन्द-तेजाः = क्षीण तेज/उत्साह; बहु-व्ययः = अधिक व्यय; स्त्री-पुत्रैः समम् सौख्यम् = पत्नी-पुत्रों के साथ सुख; शनेः सूक्ष्म-गते विधौ = शनि के दशाकाल में विधु (= चन्द्र) की सूक्ष्म-अन्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि के दशाकाल में चन्द्र (विधु) की सूक्ष्म-अन्तर्दशा में बुद्धि विस्तृत होती है और बड़े उद्यम आरम्भ होते हैं, किन्तु तेज/उत्साह मन्द रहता है और व्यय अधिक होता है; साथ ही पत्नी-पुत्रों के साथ सुख मिलता है। यह मिश्रित फल-कोष्ठ है।

English rendering The text says that in Saturn's period, during the Moon's (vidhu) sūkṣmāntardaśā, the intellect broadens and great ventures begin, yet vigour is low and expenditure heavy, while there is happiness in the company of wife and sons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र)। यह शनि-खण्ड का यह कोष्ठ (शनि→चन्द्र) उद्यम, व्यय और गृह-सुख के परस्पर-विरोधी अंश एक साथ रखता है — फल-सारणी का द्वैत-स्वरूप, गणना-रहित।

62.53
थेजोहानिर्महोध्वेगो वह्निमान्ध्यं भ्रमः कलिः ।
वाथपिथ्थक्त्ऱ्था पीदा शनेः सूक्ष्मगथे कुजे
thejohānirmahodhvego vahnimāndhyaṃ bhramaḥ kaliḥ |
vāthapiththaktṟthā pīdā śaneḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तेजोहानिः = तेज की हानि; महोद्वेगः = महान् उद्वेग/व्याकुलता; वह्निमान्ध्यम् = अग्नि (पाचन/ऊर्जा-रूपक) का मंद होना — शास्त्रीय संकेत; भ्रमः = भ्रम, चंचलता; कलिः = कलह; वातपित्तकृता पीडा = वात-पित्त से कही गई पीड़ा (शास्त्र का पारंपरिक दोष-भाषा); शनेः सूक्ष्मगते = शनि की सूक्ष्म में; कुजे = मंगल के सूक्ष्म-काल में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि-सूक्ष्म में मंगल के सूक्ष्म-स्वामित्व पर तेजोहानि, महोद्वेग, वह्नि-मांद्य, भ्रम और कलि का फल वर्णित है। वात-पित्त-कृत पीड़ा का उल्लेख शास्त्र की अपनी आयुर्वेद-संकेत भाषा में है — चिकित्सा-निदान या भय-वाणी नहीं। यह मंगल-सूक्ष्म का मिश्रित दबाव-वर्णन है।

English rendering The text states that when Mars is the sūkṣma-lord under Saturn’s sūkṣma sequence, indications include loss of lustre, great agitation, dimming of “fire,” confusion, conflict, and distress framed in the classical vāta–pitta idiom — reported as the śāstra’s claim, not as medical advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। मंगल की विंशोत्तरी-वर्ष-संख्या 7; सूक्ष्म-अवधि अनुपात-गणित से, फल-पंक्ति से नहीं।

62.54
पिथ्त्ऱ्माथ्त्ऱ्विनाशश्च मनोधुःखं गुरुव्ययम् ।
सर्वथ्र विफलथ्वं च शनेः सूक्ष्मगथेऽप्यहौ
pithtṟmāthtṟvināśaśca manodhuḥkhaṃ guruvyayam |
sarvathra viphalathvaṃ ca śaneḥ sūkṣmagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृमातृविनाशः = पिता-माता का विनाश — शास्त्र का कठोर फल-शब्द; मनoduःखम् = मानसिक दुःख; गुरुव्ययम् = गुरु/भारी व्यय; सर्वत्र = सब ओर; विफलत्वम् = विफलता; शनेः सूक्ष्मगते = शनि की सूक्ष्म में; अपि अहौ = राहु (अहि) के सूक्ष्म-काल में भी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि-सूक्ष्म में राहु (अहि) के सूक्ष्म-स्वामित्व पर पितृ-मातृ-विनाश, मनoduःख, गुरु-व्यय और सर्वत्र विफलता का फल लिखा है। “विनाश” यहाँ शास्त्र का अपना तीव्र फल-शब्द है — हम इसे निश्चित दुर्भाग्य या भय-वाणी के रूप में नहीं दोहराते; केवल पाठ का कथन। पाठ-भेद संभव जहाँ राहु-सूक्ष्म की सूची अन्य संस्करणों में स्थानांतरित हो।

English rendering The text states that when Rāhu (ahi) is the sūkṣma-lord within Saturn’s sūkṣma sequence, indications include parental loss (in the śāstra’s strong wording), mental sorrow, heavy expense, and fruitlessness on all sides — reported as the text’s claim, not as a forecast we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। राहु की विंशोत्तरी-वर्ष-संख्या 18; सूक्ष्म = (उच्चतर-अवधि × 18) ÷ 120 — अनुपात-नियम; फल-कथन अलग परत है।

62.55
सन्मुध्राभोगसम्मानं ढनढान्यविवर्ध्ढनम् ।
छथ्रचामरसम्प्राप्थिः शनेः सूक्ष्मगथे गुरौ
sanmudhrābhogasammānaṃ ḍhanaḍhānyavivardhḍhanam |
chathracāmarasamprāpthiḥ śaneḥ sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्मुद्रा = शुभ मुद्रा/राजमुद्रा-सादृश्य चिह्न; भोग = उपभोग; सम्मानम् = सम्मान; धनधान्यविवर्धनम् = धन-धान्य की वृद्धि; छत्र = छत्र (राजचिह्न); चामर = चामर; सम्प्राप्तिः = प्राप्ति; शनेः सूक्ष्मगते = शनि की सूक्ष्म में; गुरौ = गुरु के सूक्ष्म-काल में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि-सूक्ष्म में गुरु के सूक्ष्म-स्वामित्व पर सन्मुद्रा, भोग और सम्मान का फल है। धन-धान्य का विवर्धन तथा छत्र-चामर-सम्प्राप्ति — राजचिह्न-तुल्य उत्कर्ष — का भी उल्लेख है। शनि-सूक्ष्म की कठोर पंक्तियों के बाद यह गुरु-सूक्ष्म का शुभ फल-कथन है।

English rendering The text states that when Jupiter is the sūkṣma-lord under Saturn’s sūkṣma sequence, indications include auspicious seals/enjoyment and honour, increase of wealth and grain, and the obtaining of umbrella and chowrie — emblems of elevated status.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गुरु की विंशोत्तरी-वर्ष-संख्या 16; सूक्ष्म-खंड = (उच्चतर-अवधि × 16) ÷ 120।

62.56
सौभाग्यं राजसम्मानं ढनढान्याधिसम्पधः ।
सर्वेषां प्रियधर्शी च निजसूक्ष्मगथे बुढे
saubhāgyaṃ rājasammānaṃ ḍhanaḍhānyādhisampadhaḥ |
sarveṣāṃ priyadharśī ca nijasūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौभाग्यम् = सौभाग्य; राजसम्मानम् = राजकीय सम्मान; धनधान्यादिसम्पद् = धन-धान्य आदि संपद्; सर्वेषाम् = सबके; प्रियदर्शी = प्रिय दिखने वाला / सबको प्रिय; निजसूक्ष्मगते = अपनी (निज) सूक्ष्म-दशा में; बुधे = बुध के सूक्ष्म-काल में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब बुध निज-सूक्ष्म में हो — अर्थात् बुध की अपनी सूक्ष्म-दशा चल रही हो — तब सौभाग्य, राजसम्मान और धन-धान्य आदि संपद् का फल वर्णित है। साथ ही “सर्वेषां प्रियदर्शी” — सबके प्रिय दिखने वाला — का सामाजिक-अनुकूल फल-कथन है। यहाँ “निज” पूर्व पंक्तियों के “शनेः सूक्ष्मगते” से पाठ-भेद संभव: यह बुध-सूक्ष्म का स्व-फल हो सकता है, न कि शनि-सूक्ष्म के अंतर्गत।

English rendering The text states that when Mercury is in his own sūkṣma (nija-sūkṣma), indications include good fortune, royal honour, wealth-and-grain prosperity and the like, and being one who appears dear to all.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। बुध की विंशोत्तरी-वर्ष-संख्या 17; निज-सूक्ष्म का माप = (बुध-संबंधी उच्चतर अवधि × 17) ÷ 120 — अनुपात-गणित; “निज” का सटीक परत-स्थान (महा/अंतर/प्रत्यंतर के भीतर) संस्करण-परंपरा पर निर्भर — पाठ-भेद संभव।

62.57
बालग्रहोग्निभीस्थापः स्थ्रीगधोध्भवधोषभाक् ।
कुमार्गी कुथ्सिथाशी च बौढे सूक्ष्मगथे ढ्वजे
bālagrahognibhīsthāpaḥ sthrīgadhodhbhavadhoṣabhāk |
kumārgī kuthsithāśī ca bauḍhe sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बालग्रह = बाल-पीड़ा / बालग्रह-दोष; अग्निभीति = अग्नि से भय; स्त्रीगन्धोद्भवदोषभाक् = स्त्री-गन्ध/संसर्ग से उत्पन्न दोष का भागी; कुमार्गी = कुमार्गगामी; कुत्सिताशी = निन्दित/अशुद्ध आहार करने वाला; सूक्ष्मगति = सूक्ष्म-दशा (विंशोत्तरी की सूक्ष्म स्तर की अवधि); ध्वज = केतु (ध्वज-पर्याय; पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ध्वज (केतु) की सूक्ष्मगति में जातक बालग्रह-पीड़ा और अग्नि-भय से जुड़ी स्थितियों का भागी हो सकता है। स्त्री-गन्ध या स्त्री-संसर्ग से उत्पन्न दोष, कुमार्ग की प्रवृत्ति, तथा कुत्सित आहार की आदतें — यही फल-सूची इस श्लोक में गिनाई गई है। यह कथन सूक्ष्म-काल की पारंपरिक फल-सूची है, न कि नियति का घोषणा-पत्र।

English rendering The text states that in the sūkṣma-gati of Dhvaja (Ketu), indications include balagraha affliction, fear of fire, faults arising from association with women, a tendency toward the wrong path, and consumption of contemptible food. These are the śāstra’s listed results for that subtle period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूक्ष्म-दशा स्वयं विंशोत्तरी की स्तर-संरचना (महादशा → अन्तर → … → सूक्ष्म) से चलती है; इस श्लोक में केवल फल गिनाए गए हैं, कोई वर्ष-संख्या या अनुपात नहीं।

62.58
वाहनं ढनसम्पथ्थिर्जलजान्नार्ठसम्भवः ।
शुभकीर्थिर्महाभोगो बौढे सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
vāhanaṃ ḍhanasampaththirjalajānnārṭhasambhavaḥ |
śubhakīrthirmahābhogo bauḍhe sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाहन = सवारी/यान; धनसम्पत्ति = धन की प्राप्ति; जलजान्न = जलज अन्न/द्रव्य (मत्स्य-आदि); अर्थसम्भव = अर्थ की उत्पत्ति; शुभकीर्ति = शुभ यश; महाभोग = बृहद् उपभोग; भृगु = शुक्र; सूक्ष्मगति = सूक्ष्म-दशा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भृगु (शुक्र) की सूक्ष्मगति में वाहन, धन-सम्पत्ति, जलज पदार्थों से अर्थ-लाभ, शुभ कीर्ति और महाभोग का योग बताया गया है। यह शुक्र-सूक्ष्म की पारंपरिक शुभ-फल सूची है। फल को काल-खिड़की के संकेत के रूप में पढ़ें, निश्चित घटना के रूप में नहीं।

English rendering The text states that in the sūkṣma-gati of Bhṛgu (Venus) there is indication of vehicles, wealth, gains connected with aquatic products, good reputation, and great enjoyment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। श्लोक में कोई वर्ष, अंश या अनुपात नहीं; केवल शुक्र-सूक्ष्म का फल-वर्णन है।

62.59
थादनं न्त्ऱ्पवैषम्यं बुध्ढिस्खलनरोगभाक् ।
हानिर्जनापवाधं च बौढे सूक्ष्मगथे रवौ
thādanaṃ ntṟpavaiṣamyaṃ budhḍhiskhalanarogabhāk |
hānirjanāpavādhaṃ ca bauḍhe sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ताडन = प्रहार/पीटना; नृपवैषम्य = राजा/शासन का विषम व्यवहार; बुद्धिसखलन = बुद्धि का स्खलन/चूक; रोगभाक् = रोग का भागी; हानि = क्षति; जनापवाद = लोक-निन्दा; रवि = सूर्य; सूक्ष्मगति = सूक्ष्म-दशा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि रवि की सूक्ष्मगति में ताडन, राजकीय विषमता, बुद्धि-स्खलन, रोग-भागिता, हानि और जनापवाद गिनाए गए हैं। यह सूर्य-सूक्ष्म की कठिन-फल सूची है — शास्त्र का कथन, न कि भय का आदेश। व्याख्या में दबाव या इलाज-का-दबाव नहीं जोड़ना चाहिए।

English rendering The text states that in the sūkṣma-gati of Ravi (the Sun) the listed results are beating or harsh treatment, disfavor from authority, slips of intellect, liability to disease, loss, and public censure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। संख्यात्मक स्थिरांक श्लोक में नहीं; केवल रवि-सूक्ष्म का फल-वर्णन।

62.60
सुभगः स्ठिरबुध्ढिश्च राजसन्मानसम्पधः ।
सुह्त्ऱ्धां गुरुसंचारो बौढे सूक्ष्मगथे विढौ
subhagaḥ sṭhirabudhḍhiśca rājasanmānasampadhaḥ |
suhtṟdhāṃ gurusaṃcāro bauḍhe sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुभग = सौभाग्यशाली/प्रिय; स्थिरबुद्धि = अचल/स्थिर मति; राजसन्मान = राजकीय सम्मान; सम्पद = सम्पत्ति; सुहृद् = मित्र; गुरुसंचार = गुरु/बड़ों का संसर्ग-आना-जाना; विधु = चन्द्र; सूक्ष्मगति = सूक्ष्म-दशा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि विधु (चन्द्र) की सूक्ष्मगति में जातक सुभग, स्थिर-बुद्धि, राजसन्मान और सम्पत्ति का योग पाता है। मित्रों तथा गुरुजनों का संसर्ग-संचार भी इसी फल-सूची में है। यह चन्द्र-सूक्ष्म का शुभ-वर्णन है — काल-संकेत के रूप में।

English rendering The text states that in the sūkṣma-gati of Vidhu (the Moon) the native is described as fortunate, steady-minded, possessed of royal honor and wealth, and moving in the company of friends and elders/teachers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चन्द्र-सूक्ष्म का गुणात्मक फल; कोई गणना-सूत्र श्लोक में नहीं।

62.61
अग्निधाहो विषोथ्पथ्थिर्जदथ्वं च धरिध्रथा ।
विभ्रमश्च महोध्वेगो बौढे सूक्ष्मगथे कुजे
agnidhāho viṣothpaththirjadathvaṃ ca dharidhrathā |
vibhramaśca mahodhvego bauḍhe sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्निदाह = अग्नि से दाह; विषोत्पत्ति = विष की उत्पत्ति/विष-योग; जडत्व = जड़ता/मन्दता; दरिद्रता = दरिद्र भाव; विभ्रम = भ्रम/विचलन; महोद्वेग = बड़ा उद्वेग; कुज = मंगल; सूक्ष्मगति = सूक्ष्म-दशा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुज (मंगल) की सूक्ष्मगति में अग्निदाह, विषोत्पत्ति, जडत्व, दरिद्रता, विभ्रम और महोद्वेग गिनाए गए हैं। यह मंगल-सूक्ष्म की तीव्र-फल सूची है। इन्हें शास्त्रीय संकेत मानें; भय-कथन या चिकित्सकीय/कानूनी भविष्यवाणी के रूप में नहीं पढ़ें।

English rendering The text states that in the sūkṣma-gati of Kuja (Mars) the listed results are burning by fire, arising of poison, dullness, poverty, confusion, and great agitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई अंश, वर्ष या बल-इकाई नहीं; केवल कुज-सूक्ष्म का फल-वर्णन।

62.62
अथ सूक्ष्मान्थर्धशाढ्यायः
atha sūkṣmānthardhaśāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; सूक्ष्म = विंशोत्तरी का सूक्ष्म स्तर; अन्तरदशा = अन्तर-दशा (महादशा के भीतर); अध्याय = अध्याय-आरम्भ-सूचना; सूक्ष्मान्तरदशाध्याय = सूक्ष्म-अन्तर-दशा का अध्याय

हिन्दी भावार्थ यह फल-श्लोक नहीं, अध्याय-द्वार है। “अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः” — अब सूक्ष्म-अन्तर-दशा का अध्याय आरम्भ होता है। इससे पहले के श्लोक सूक्ष्मगति-फलों की श्रृंखला में थे; यहाँ से सूक्ष्म-अन्तर की व्यवस्थित चर्चा का द्वार खोला गया है (पाठ-क्रम व अध्याय-सीमा में पाठ-भेद संभव)।

English rendering A chapter-opening formula, not a phala verse: “Now begins the chapter on sūkṣmāntardaśā” — the treatment of the subtle sub-periods within the daśā hierarchy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-शीर्षक / संरचना-संकेत। विंशोत्तरी में सूक्ष्म स्तर की अवधि अनुपात से निकलती है: यदि महादशा-स्वामी M वर्ष, अन्तर-स्वामी A वर्ष, सूक्ष्म-स्वामी S वर्ष (Σ चक्र = 120), तो
सूक्ष्म-अवधि (वर्ष) = (M × A × S) ÷ (120 × 120)
अथवा पदशः: अन्तर = (M × A)/120; सूक्ष्म = (अन्तर × S)/120।
ग्रह-वर्ष (विंशोत्तरी): केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)।

उदाहरण (worked example) मानें शुक्र-महादशा (20 y), उसके भीतर सूर्य-अन्तर, उसके भीतर चन्द्र-सूक्ष्म।
अन्तर(सूर्य) = (20 × 6)/120 = 1 y।
सूक्ष्म(चन्द्र) = (1 × 10)/120 = 10/120 y = 1/12 y ≈ 30.44 दिन (वर्ष = 365.25 दिन मानकर; दशा-इंजन में प्रयुक्त वर्ष-दिन सम्मेलन अलग हो तो घोषित करें)।
आरम्भ-बिन्दु चन्द्र-नक्षत्र-शेष से महादशा-शेष पर टिका होता है — अयनांश यहाँ अवधि-अनुपात को नहीं बदलता; वह जन्म-दीर्घांश व नक्षत्र-पद तय करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र और अन्तर = (महा × अन्तर-वर्ष)/120 का अनुपात-गणित हमारे दशा-इंजन में यथावत् बैठा है; सूक्ष्म उसी श्रृंखला का अगला अनुपात-स्तर है (S/120)। यह श्लोक गणना नहीं सिखाता — वह अध्याय-द्वार है — पर पूरी सूक्ष्म-अन्तर चर्चा उसी 120-वर्ष कुंजी पर चलती है जिसकी Σ = 7+20+6+10+7+18+16+19+17 हमने पिन की है।

62.63
ग्त्ऱ्होपकरणं भव्यं धानं भोगाधिवैभवम् ।
राजप्रसाधसम्पथ्थिर्बौढे सूक्ष्मगथे गुरौ
gtṟhopakaraṇaṃ bhavyaṃ dhānaṃ bhogādhivaibhavam |
rājaprasādhasampaththirbauḍhe sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहोपकरण = गृह के उपकरण/सामग्री; भव्य = शुभ/श्रेष्ठ; धन = द्रव्य; भोग = उपभोग; अधिवैभव = अधिक वैभव; राजप्रसाद = राज-अनुग्रह; सम्पत्ति = समृद्धि; गुरु = बृहस्पति; सूक्ष्मगति = सूक्ष्म-दशा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की सूक्ष्मगति में गृहोपकरण, भव्य वस्तुएँ, धन, भोग और अधिवैभव, तथा राजप्रसाद से सम्पत्ति गिनाई गई है। यह गुरु-सूक्ष्म का शुभ-फल वर्णन है। अध्याय-द्वार (62.62) के ठीक बाद यह गुरु-सूक्ष्म की पहली फल-सूची के रूप में आता है।

English rendering The text states that in the sūkṣma-gati of Guru (Jupiter) there is indication of household equipment, auspicious gains, wealth, enjoyment and elevated prosperity, and fortune through royal favor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गुरु-महादशा = 16 वर्ष (विंशोत्तरी); सूक्ष्म की अवधि ऊपर (62.62) दिए अनुपात से निकलती है, पर इस श्लोक में केवल फल हैं।

62.64
वाणिज्यव्त्ऱ्थ्थिलाभश्च विध्याविभवमेव च ।
स्थ्रीलाभश्च महाव्याप्थिर्बौढे सूक्ष्मगथे शनौ
vāṇijyavtṟththilābhaśca vidhyāvibhavameva ca |
sthrīlābhaśca mahāvyāpthirbauḍhe sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाणिज्य-वृत्ति-लाभ = व्यापार/वाणिज्य-जीविका का लाभ; विद्या-विभव = विद्या और ऐश्वर्य/प्रतिष्ठा; स्त्री-लाभ = स्त्री/पत्नी-प्राप्ति (शास्त्र-कथन); महा-व्याधि = बड़ी व्याधि/रोग; बौधे सूक्ष्मगते = बुध की सूक्ष्म-दशा में; शनौ = शनि (यहाँ फल-कर्ता ग्रह)। पाठ-भेद संभव: “बौढे/बौधे”, “व्याप्थि/व्याधि”, “गथे/गते”।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शनि की दशा-क्रम में बुध की सूक्ष्म-दशा चल रही हो, तब वाणिज्य-वृत्ति से लाभ, विद्या और वैभव, तथा स्त्री-लाभ का वर्णन आता है; उसी काल-खण्ड में महाव्याधि का भी उल्लेख है। यह फल-कथन है—सूक्ष्म-दशा का नाम और उससे जुड़े परिणामों का सूचीकरण, न कि नियति का दावा। पाठ संदिग्ध स्थानों पर “पाठ-भेद संभव” समझें।

English rendering The text states that when Saturn’s period-sequence carries Mercury’s sūkṣma, there is commercial livelihood-gain, learning and splendour, and gain of a woman, together with great disease. These are śāstric phala-items for that sūkṣma slot, not deterministic fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सूक्ष्म-दशा फल-कथन। काल-खंड स्वयं विंशोत्तरी-अनुपात से निकलता है (महा × अन्तर × प्रत्यन्तर × सूक्ष्म-ग्रह-वर्ष / 120³ आदि), पर इस श्लोक में केवल फल सूचीबद्ध है।

62.65
पुथ्रधाराधिजं धुःखं गाथ्रवैषम्यमेव च ।
धारिध्र्याध् भिक्षुव्त्ऱ्थ्थिश्च नैजे सूक्ष्मगथे ढ्वजे
puthradhārādhijaṃ dhuḥkhaṃ gāthravaiṣamyameva ca |
dhāridhryādh bhikṣuvtṟththiśca naije sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दारा-अधिजं दुःखम् = पुत्र और पत्नी से उत्पन्न कष्ट; गात्र-वैषम्य = शरीर/अंगों में विषमता-असुविधा; दारिद्र्यात् = दारिद्र्य के कारण; भिक्षु-वृत्ति = भिक्षा/निर्धन-जीविका; नैजे सूक्ष्मगते = स्वकीय (नैज) सूक्ष्म में; ध्वजे = ध्वज = केतु। पाठ-भेद संभव: “पुथ्रधारा/पुत्रदारा”, “धुःखं/दुःखं”, “धारिध्र्याद्/दारिद्र्याद्”, “ढ्वजे/ध्वजे”।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब केतु (ध्वज) अपनी ही नैज सूक्ष्म-दशा में हो, तब पुत्र-दारा से दुःख, गात्र-वैषम्य, तथा दारिद्र्य से भिक्षु-वृत्ति जैसे फल वर्णित हैं। यह केतु-स्व-सूक्ष्म का फल-पटल है; कठोर शब्दों को भी “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें, भय या दबाव के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when Ketu (Dhvaja) is in its own sūkṣma, sorrow arising from son and wife, bodily unevenness/affliction, and from poverty a mendicant livelihood are indicated. Report as textual phala, not as endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नैज-सूक्ष्म (केतु) का फल-कथन। “नैज” = उसी ग्रह की सूक्ष्म जिसका महा/अन्तर-क्रम में यह खंड आता है; संख्या-नियम इस श्लोक में नहीं, केवल फल।

62.66
रोगनाशऽर्ठलाभश्च गुरुविप्रानुवथ्सलः ।
सङ्गमः स्वजनैः सार्ध्ढकेथोः सूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
roganāśa'rṭhalābhaśca guruviprānuvathsalaḥ |
saṅgamaḥ svajanaiḥ sārdhḍhakethoḥ sūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोग-नाशः = रोग का शमन; अर्थ-लाभः = धन-प्राप्ति; गुरु-विप्र-अनुवत्सलः = गुरुजन एवं ब्राह्मणों के प्रति स्नेहशील; सङ्गमः स्वजनैः सार्धम् = अपने स्वजनों से मिलन; केतोः = केतु की (प्रत्यन्तर्दशा) का; सूक्ष्मगते = सूक्ष्मान्तर्दशा में स्थित होने पर; भृगौ = भृगु अर्थात् शुक्र की (सूक्ष्मा में)।

हिन्दी भावार्थ केतु की प्रत्यन्तर्दशा के भीतर जब शुक्र की सूक्ष्मान्तर्दशा चलती है, तब शास्त्र इस खण्ड का फल शुभ कहता है — रोग का उपशमन, धन का लाभ, गुरुजनों तथा ब्राह्मणों के प्रति स्नेह-भक्ति, और अपने स्वजनों से पुनर्मिलन। यह केतु-प्रत्यन्तर के भीतर शुक्र-सूक्ष्म का कथित फल है — शास्त्र का कथन, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering Within Ketu's sub-period, while Venus holds the sūkṣmā, the text states a benign result — remission of illness, gain of wealth, affection toward elders and brāhmaṇas, and reunion with one's own kin.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। तकनीकी रूप से यह विमशोत्तरी का चौथा-स्तरीय उपविभाजन है (महादशा → अन्तर्दशा → प्रत्यन्तर्दशा → सूक्ष्मान्तर्दशा), जिसकी माप अध्याय की प्रथम ऋचा में "खार्क" (= ०,१२ → १२० बहिः-पठित) से भाग द्वारा दी गई है; शुक्र का सूक्ष्म-अंश सदा उस खण्ड का २०/१२० = १/६ रहता है।

हमारा डिकोड: यह पूरा अध्याय उसी विमशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र की गहनतम शाखा है, जिसे हमने अपने दशा-इंजन में सत्यापित किया — केतु ७, शुक्र २०, सूर्य ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७ वर्ष (योग = १२०)। किसी पूर्व-खण्ड T के भीतर किसी ग्रह P की सूक्ष्मा = T × (P के वर्ष)/१२० — शुद्ध अनुपात-गणित, व्याख्या से पृथक् रखी गई सटीक संगणना।

62.67
युध्ढं भूमिविनाशश्च विप्रवासः स्वधेशथः ।
सुह्त्ऱ्ध्विपाथिरार्थिश्च केथोः सूक्ष्मगथे रवौ
yudhḍhaṃ bhūmivināśaśca vipravāsaḥ svadheśathaḥ |
suhtṟdhvipāthirārthiśca kethoḥ sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युद्धम् = संग्राम/युद्ध; भूमि-विनाशः = भूमि/क्षेत्र का नाश; विप्रवासः = परदेश-वास, निर्वासन; स्वदेशतः = अपने देश से (पाठ: स्वधेशथः — पाठ-भेद संभव); सुहृद्-विपत्तिः = मित्रों पर आपत्ति; आर्तिः = पीड़ा/संकट (रार्थि — पाठ-भेद संभव); केतोः सूक्ष्म-गते = केतु की सूक्ष्म-दशा में; रवौ = सूर्य (रवि) के संदर्भ में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की सूक्ष्म-दशा जब रवि (सूर्य) से जुड़ी होती है, तब युद्ध, भूमि-नाश, अपने देश से विप्रवास, मित्र-संकट और आर्ति जैसे फल वर्णित हैं। यह फल-कथन दशा-काल की सूक्ष्म परत से बँधा है — महद्/अन्तर् के भीतर सूक्ष्म-स्वामी केतु और सूर्य-संयोग का फलादेश। पाठ में देश-त्याग और सुहृद्-विपत्ति को एक ही काल-पट्टे पर रखा गया है।

English rendering The text states that in Ketu’s sūkṣma linked with the Sun (Ravi), war, ruin of land, exile from one’s own country, calamity to friends, and distress are indicated. It is a phala-statement for that nested timing, not a computation rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म × रवि)। काल-निर्धारण स्वयं श्लोक नहीं देता; वह विम्शोत्तरी की अनुपात-गणित से आता है: महद् → अन्तर् → सूक्ष्म, जहाँ सूक्ष्म-वर्ष ≈ (अन्तर्-वर्ष × सूक्ष्म-ग्रह-वर्ष) ÷ 120, और केतु-महद् = 7 वर्ष (Σ चक्र = 120)।

उदाहरण (worked example) मान लें विम्शोत्तरी में सूर्य-अन्तर् = 0.5 वर्ष (6/12 का अंश-उदाहरण मात्र; वास्तविक अन्तर् = महद्-वर्ष × 6 ÷ 120) और उसके भीतर केतु-सूक्ष्म: सूक्ष्म-अवधि ≈ 0.5 × 7 ÷ 120 ≈ 0.02917 वर्ष ≈ 10.6 दिन (सौर-वर्ष ≈ 365.25 दिन मानकर)। अयनांश/जन्म-नक्षत्र-शेष से महद्-प्रारंभ बदलता है; यहाँ केवल अनुपात दिखाया गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विम्शोत्तरी 120-वर्ष चक्र (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) और अन्तर्/सूक्ष्म का अनुपात-गणित हमारे दशा-इंजन में ज्यों-का-त्यों बैठा है। यह श्लोक उस सूक्ष्म-पट्टे का फल बताता है; हम अवधि `==` अनुपात से बाँधते हैं, फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं — न तो नियति, न भय।

62.68
धासीधाससम्त्ऱ्ध्ढिश्च युध्ढे लब्ढिर्जयस्थठा ।
ललिथा कीर्थिरुथ्पन्ना केथोः सूक्ष्मगथे विढौ
dhāsīdhāsasamtṟdhḍhiśca yudhḍhe labḍhirjayasthaṭhā |
lalithā kīrthiruthpannā kethoḥ sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दासी-दास-समृद्धिः = दासी-दास (सेवक-वर्ग) की समृद्धि (धासीधाससम्त्ऱ्ध्ढि — पाठ-भेद संभव); युद्धे लब्धिः = युद्ध में प्राप्ति/लाभ; जय-स्थितिः = विजय की स्थिति (जयस्थठा — पाठ-भेद संभव); ललिता कीर्तिः = मनोहर/सुंदर यश; उत्पन्ना = उत्पन्न; केतोः सूक्ष्म-गते = केतु-सूक्ष्म में; विधौ = चन्द्र (विधु) के संदर्भ में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की सूक्ष्म जब विधु (चन्द्र) से जुड़ी हो, तब दासी-दास-समृद्धि, युद्ध में लाभ और स्थिर विजय, तथा ललित कीर्ति का उदय — ये फल वर्णित हैं। सूर्य-युक्त केतु-सूक्ष्म (पूर्व श्लोक) के विपरीत यहाँ समृद्धि-जय-कीर्ति का स्वर है। यह भी शुद्ध फल-कथन है; शुभ/अशुभ का तौल पाठ स्वयं करता है।

English rendering The text states that in Ketu’s sūkṣma linked with the Moon (Vidhu), increase of attendants, gain and standing victory in battle, and the rise of graceful fame are indicated. Again a phala-verse for that timing window.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म × चन्द्र)। चन्द्र-महद् = 10 वर्ष; सूक्ष्म-स्तर पर वही सूत्र: (अन्तर्-वर्ष × 7) ÷ 120 जब सूक्ष्म-स्वामी केतु हो। फल की दिशा श्लोक से; अवधि की संख्या दशा-गणित से।

62.69
आसने भयमश्वाधेश्चौरधुष्ताधिपीदनम् ।
गुल्मपीदा शिरोरोगः केथोः सूक्ष्मगथे कुजे
āsane bhayamaśvādheścauradhuṣtādhipīdanam |
gulmapīdā śirorogaḥ kethoḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आसने भयम् = आसन/पद पर भय; अश्वादेः = अश्व आदि से/का (अश्वाधेश्च — पाठ-भेद संभव); चौर-दुष्ट-अधि-पीडनम् = चोरों और दुष्टों द्वारा पीड़न (धुष्ताधिपीदनम् — पाठ-भेद संभव); गुल्म-पीडा = गुल्म-संबंधी पीड़ा (पाठ का शारीरिक फल-शब्द); शिरोरोगः = शिरः-रोग; केतोः सूक्ष्म-गते = केतु-सूक्ष्म में; कुजे = मंगल (कुज) के संदर्भ में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की सूक्ष्म जब कुज (मंगल) से जुड़ी हो, तब आसन-भय, अश्वादि-संकट, चोर-दुष्टों का पीड़न, गुल्म-पीड़ा और शिरोरोग — ये फल गिनाए गए हैं। यह अरिष्/पीड़ा-परक फल-सूची है; हम इसे चिकित्सा-निदान या भय-वाक्य नहीं बनाते — केवल शास्त्र का कथन। मंगल-युक्त केतु-सूक्ष्म का स्वर यहाँ संघर्ष और शारीरिक-कष्ट के शब्दों में है।

English rendering The text states that in Ketu’s sūkṣma linked with Mars (Kuja), fear regarding one’s seat/position, trouble connected with horses and the like, oppression by thieves and the wicked, gulma-affliction, and disease of the head are indicated. Report as the śāstra’s phala, not as a medical or fatal claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म × मंगल)। मंगल-महद् = 7 वर्ष (केतु के समान); सूक्ष्म-अवधि फिर भी (अन्तर् × सूक्ष्म-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। यहाँ श्लोक केवल फल देता है, बिन्दु/बल/वर्ग नहीं।

62.70
विनाशः स्थ्रीगुरूणां च धुष्तस्थ्रीसङ्गमाल्लघुः ।
वमनं रुढिरं पिथ्थं केथोः सूक्ष्मगथेऽप्यगौ
vināśaḥ sthrīgurūṇāṃ ca dhuṣtasthrīsaṅgamāllaghuḥ |
vamanaṃ ruḍhiraṃ piththaṃ kethoḥ sūkṣmagathe'pyagau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विनाशः स्त्री-गुरूणाम् = स्त्री व गुरुओं संबंधी हानि/क्षति-संकेत; दुष्ट-स्त्री-सङ्गमात् = दुष्ट स्त्री के संग से; लघुः = लघुता/हल्की स्थिति या तुच्छता (फल-पद); वमनम् = वमन-संकेत; रुधिरम् = रक्त-संबंधी संकेत; पित्तम् = पित्त-संकेत (तीनों शास्त्रीय दोष/पीड़ा-पद); केतोः सूक्ष्म-गतेऽप्यगौ = केतु-सूक्ष्म में “अगौ” (पाठ: गतेऽप्यगौ = गते + अपि + अगौ; ग्रह-नाम के रूप में पाठ-भेद संभव—क्रम से बुध-स्तर का फल माना जाता है)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की सूक्ष्म-दशा में “अगौ” (पाठ अस्थिर—पाठ-भेद संभव) ग्रह के होने पर स्त्री तथा गुरुओं संबंधी विनाश/हानि का संकेत मिलता है। दुष्ट-स्त्री-संग से लघुता—गौरव-हानि या तुच्छ स्थिति—का फल-वाक्य है। वमन, रुधिर और पित्त—ये पारंपरिक शारीरिक-दोष पद हैं; इन्हें रोग-निदान या निश्चित घटना न मानें। यह पद्य केतु-सूक्ष्म-श्रृंखला का अगला फल-कथन है।

English rendering The text states that when the planet named in the locative “agau” (reading uncertain—पाठ-भेद संभव; sequential context often takes Mercury) is in Ketu’s sūkṣma, there is indication of loss concerning women and preceptors, and of diminution arising from association with a wicked woman. Vomiting, blood, and pitta are listed as traditional somatic phala-terms, not as clinical predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म; ग्रह-पाठ “अप्यगौ” में पाठ-भेद संभव)। अवधि-गणित नहीं; केवल मिश्रित सामाजिक-शारीरिक फल-सूची।

62.71
रिपोर्विरोढः सम्पथ्थिः सहसा राजवैभवम् ।
पशुक्षेथ्रविनाशार्थिः केथोः सूक्ष्मगथे गुरौ
riporviroḍhaḥ sampaththiḥ sahasā rājavaibhavam |
paśukṣethravināśārthiḥ kethoḥ sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रिपोः विरोधः = शत्रु-विरोध/शत्रुता; सम्पत्तिः सहसा = अचानक धन-संपत्ति; राजवैभवम् = राजकीय वैभव; पशु-क्षेत्र-विनाश = पशु एवं क्षेत्र का नाश; अर्थिः = अर्थार्थी/नाश-संबंधी फल (पाठानुसार); केतोः सूक्ष्मगते गुरौ = केतु की सूक्ष्म-दशा में गुरु स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु केतु की सूक्ष्म-गति (सूक्ष्म-दशा) में हो, तब शत्रु-पक्ष से विरोध का अनुभव हो सकता है, साथ ही सहसा संपत्ति और राज-वैभव भी प्राप्त होने का कथन है। उसी काल-खंड में पशु तथा क्षेत्र संबंधी हानि या विनाश की प्रवृत्ति/फल भी बताया गया है। यह मिश्रित फल-कथन है — विरोध और विनाश के साथ-साथ आकस्मिक समृद्धि का भी उल्लेख है।

English rendering The text states that when Jupiter runs in Ketu’s sūkṣma period, there is opposition from enemies, sudden acquisition of wealth, and royal splendour; it also speaks of destruction (or destructive concern) regarding cattle and fields.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म में गुरु)। सूक्ष्म-काल की अवधि स्वयं इस श्लोक में नहीं दी; वह विंशोत्तरी की अनुपात-शृंखला (महादशा → अंतर्दशा → सूक्ष्म) से निर्धारित होती है, जबकि यहाँ केवल फल का वर्णन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) केतु-सूक्ष्म में गुरु का यह फल-श्लोक विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र की तीसरी परत (सूक्ष्म) का अनुप्रयोग है। दशा-इंजन में सूक्ष्म-अवधि = (महादशा-वर्ष × अंतर्-ग्रह-वर्ष × सूक्ष्म-ग्रह-वर्ष) / (१२० × १२०) की शुद्ध अनुपात-गणित से निकलती है; फल-पाठ को हम गणना से अलग रखते हैं — “शास्त्र कहता है” के रूप में, नियति के रूप में नहीं।

62.72
म्त्ऱ्षा पीदा भवेथ्क्षुध्रमुखोथ्पथ्थिश्च लङ्घनम् ।
स्थ्रीविरोढः सथ्यहानिः केथोः सूक्ष्मगथे शनौ
mtṟṣā pīdā bhavethkṣudhramukhothpaththiśca laṅghanam |
sthrīviroḍhaḥ sathyahāniḥ kethoḥ sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृषा = असत्य/मिथ्या; पीडा = कष्ट; क्षुद्र-मुख-उत्पत्ति = क्षुद्र/नीच मुखों (व्यक्तियों) का उदय; लङ्घनम् = लंघन (उपवास/अवहेलना/सीमा-उल्लंघन — संदर्भानुसार); स्त्री-विरोधः = स्त्री-पक्ष से विरोध; सत्य-हानिः = सत्य की हानि; केतोः सूक्ष्मगते शनौ = केतु की सूक्ष्म में शनि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की सूक्ष्म-दशा में जब शनि हो, तब मृषा (मिथ्या) से जुड़ी पीड़ा, क्षुद्र मुखों का उदय, और लंघन का फल कहा गया है। स्त्री-विरोध तथा सत्य की हानि का भी उल्लेख है। यह मुख्यतः कष्ट-प्रधान फल-वर्णन है; इसे भय या निश्चित दुर्गति नहीं, शास्त्र का कथन मानकर पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when Saturn is in Ketu’s sūkṣma, there is suffering linked with falsehood, the rise of petty voices, and transgression or fasting (laṅghana); it also records opposition from women and impairment of truth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म में शनि)। संख्या या बल-इकाई यहाँ नहीं; केवल सूक्ष्म-दशा-फल का वर्णन है।

62.73
नानाविढजनाप्थिश्च विप्रयोगोऽरिपीदनम् ।
अर्ठसम्पथ्सम्त्ऱ्ध्ढिश्च केथोः सूक्ष्मगथे बुढे
nānāviḍhajanāpthiśca viprayogo'ripīdanam |
arṭhasampathsamtṟdhḍhiśca kethoḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाना-विध-जन-आप्तिः = विविध प्रकार के लोगों से मेल/प्राप्ति; विप्रयोगः = (प्रिय से) वियोग; अरि-पीडनम् = शत्रुओं से पीड़ा; अर्थ-सम्पत्-समृद्धिः = धन-सम्पत्ति की समृद्धि; केतोः = केतु की; बुधे = बुध की (सूक्ष्मा में)।

हिन्दी भावार्थ केतु की प्रत्यन्तर के भीतर बुध की सूक्ष्मान्तर्दशा में शास्त्र मिश्र फल कहता है — नाना प्रकार के लोगों से सम्पर्क और धन-सम्पत्ति की वृद्धि, किन्तु किसी प्रिय से वियोग तथा शत्रुओं से पीड़ा भी। यह केतु-प्रत्यन्तर की नौ सूक्ष्माओं का अन्तिम खण्ड है।

English rendering Under Ketu with Mercury in the sūkṣmā, the text states contact with varied people and growth of wealth, yet also separation from a dear one and torment by foes.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र)। बुध का सूक्ष्म-अंश किसी भी खण्ड का १७/१२० है।

हमारा डिकोड: बुध-सूक्ष्मा केतु-प्रत्यन्तर की नौ सूक्ष्माओं में अन्तिम है; इन नौ के अंश — (७+२०+६+१०+७+१८+१६+१९+१७)/१२० = १२०/१२० = १ — अर्थात् नौ सूक्ष्माएँ मिलकर पूरी प्रत्यन्तर को बिना अवशेष ठीक भरती हैं। यही exact-`==` अनुशासन है जिसे हमने दशा एवं अष्टकवर्ग-सत्यापन में निभाया: कोई सहन-सीमा नहीं, क्योंकि एक ±बैंड कभी वास्तविक −१ को छिपा चुका था।

62.74
शथ्रुहानिर्महथ्सौख्यं शङ्करालयनिर्मिथिः ।
थदागकूपनिर्माणं निजसूक्ष्मगथे भ्त्ऱ्गौ
śathruhānirmahathsaukhyaṃ śaṅkarālayanirmithiḥ |
thadāgakūpanirmāṇaṃ nijasūkṣmagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-हानिः = शत्रु का नाश/क्षय; महत्-सौख्यम् = महान् सुख; शङ्कर-आलय-निर्मितिः = शंकर-मंदिर का निर्माण; तडाग-कूप-निर्माणम् = तालाब एवं कूप का निर्माण; निज-सूक्ष्मगते भृगौ = भृगु (शुक्र) की अपनी सूक्ष्म-दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र अपनी ही सूक्ष्म-दशा में हो, तब शत्रु-हानि और महान् सुख का फल कहा गया है। शंकरालय (शिव-मंदिर) की निर्मिति तथा तडाग-कूप के निर्माण का भी उल्लेख है। यह निज-सूक्ष्म का शुभ-प्रधान वर्णन है — सार्वजनिक/धार्मिक निर्माण और शत्रु-क्षय के साथ सुख।

English rendering The text states that when Venus runs in his own sūkṣma, there is loss to enemies and great happiness, as well as the building of a shrine to Śaṅkara and the construction of tanks and wells.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र की निज-सूक्ष्म)। “निज” का अर्थ: महा/अंतर्/सूक्ष्म श्रृंखला में सूक्ष्म-स्वामी स्वयं शुक्र; अवधि = (शुक्र-महा × शुक्र-अंतर × शुक्र-सूक्ष्म) / (१२० × १२०) वर्ष — किन्तु यह सूत्र श्लोक में नहीं, दशा-पद्धति में है।

हमारा डिकोड (Our Decode) निज-सूक्ष्म का यह पद विंशोत्तरी की स्व-ग्रह सूक्ष्म परत को चिह्नित करता है। हमारे दशा-इंजन में शुक्र = २० वर्ष महादशा; निज-सूक्ष्म की अवधि उसी १२०-वर्ष अनुपात से `==` गणना योग्य है। फल (मंदिर-कूप-निर्माण आदि) शास्त्र-कथन रह जाता है; इंजन केवल काल-खंड मापता है।

62.75
उरस्थापो भ्रमश्चैव गथागथविचेष्तिथम् ।
क्वचिल्लाभः क्वचिध्ढानिर्भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे रवौ
urasthāpo bhramaścaiva gathāgathaviceṣtitham |
kvacillābhaḥ kvacidhḍhānirbhtṟgoḥ sūkṣmagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उरस्-तापः = उर/वक्ष में ताप; भ्रमः = भ्रम/भ्रमण; गतागत-विचेष्टितम् = आना-जाना/आवागमन संबंधी चेष्टाएँ; क्वचित् लाभः = कहीं/कभी लाभ; क्वचित् हानिः = कहीं/कभी हानि; भृगोः सूक्ष्मगते रवौ = भृगु की सूक्ष्म में रवि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की सूक्ष्म में जब सूर्य हो, तब उरस्ताप, भ्रम, तथा गतागत (आना-जाना) की व्यग्र चेष्टाएँ कही गई हैं। लाभ और हानि दोनों का उल्लेख “क्वचित्…क्वचित्” से किया गया है — स्थिर एकतरफा फल नहीं, उतार-चढ़ाव वाला कथन। इसे रोग-निदान या भय नहीं, शास्त्र का मिश्रित फल-वर्णन समझें।

English rendering The text states that when the Sun is in Venus’s sūkṣma, there is heat in the chest region, confusion or wandering, and restless coming-and-going activity; gain appears at times and loss at times.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-सूक्ष्म में रवि)। “क्वचित् लाभः क्वचिद्धानिः” गुणात्मक द्वि-ध्रुवीय फल है; कोई संख्यात्मक बलांक यहाँ नहीं।

62.76
आरोग्यं ढनसम्पाथ्थिः कार्यलाभो गथागथैः ।
बुध्ढिविध्याविव्त्ऱ्ध्ढिः स्याध् भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे विढौ
ārogyaṃ ḍhanasampāththiḥ kāryalābho gathāgathaiḥ |
budhḍhividhyāvivtṟdhḍhiḥ syādh bhtṟgoḥ sūkṣmagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरोग्यम् = आरोग्य/स्वास्थ्य; धन-सम्पत्तिः = धन की प्राप्ति; कार्य-लाभः गतागतैः = आवागमन से कार्य-लाभ; बुद्धि-विद्या-विवृद्धिः = बुद्धि एवं विद्या की वृद्धि; भृगोः सूक्ष्मगते विधौ = भृगु की सूक्ष्म में विधु (चंद्र)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की सूक्ष्म में चंद्र होने पर आरोग्य, धन-संपत्ति, तथा गतागत (यात्रा/आना-जाना) से कार्य-लाभ होता है। बुद्धि और विद्या की वृद्धि भी कही गई है। यह शुक्र-सूक्ष्म में चंद्र का शुभ-प्रधान फल-वर्णन है — स्वास्थ्य, अर्थ, कार्य-सिद्धि और ज्ञानात्मक विस्तार।

English rendering The text states that when the Moon is in Venus’s sūkṣma, there is health, acquisition of wealth, gain of work through comings and goings, and increase of intellect and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-सूक्ष्म में चंद्र)। चंद्र की महादशा = १० वर्ष (विंशोत्तरी); सूक्ष्म-अवधि अनुपात से निकलती है, फल इस श्लोक में गुणात्मक है।

हमारा डिकोड (Our Decode) शुक्र-सूक्ष्म × चंद्र का काल विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र (केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चंद्र १०, … Σ = १२०) की तीसरी परत से सटीक अनुपात में आता है। हम अवधि की गणना और फल-पाठ को अलग रखते हैं — गणित `==` पर, फल “शास्त्र कहता है” पर।

62.77
जदथ्वं रिपुवैषम्यं धेशभ्रंशो महध्भयम् ।
व्याढिधुःखसम्त्ऱ्थ्पथ्थिर्भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे कुजे
jadathvaṃ ripuvaiṣamyaṃ dheśabhraṃśo mahadhbhayam |
vyāḍhidhuḥkhasamtṟthpaththirbhtṟgoḥ sūkṣmagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जडत्वम् = जड़ता/मंदता; रिपु-वैषम्यम् = शत्रु-वैषम्य/शत्रु-कठोरता; देश-भ्रंशः = देश-भ्रंश (स्थान/देश से विचलन); महत्-भयम् = महान् भय; व्याधि-दुःख-समुत्पत्तिः = व्याधि एवं दुःख की उत्पत्ति; भृगोः सूक्ष्मगते कुजे = भृगु की सूक्ष्म में कुज (मंगल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की सूक्ष्म में जब मंगल हो, तब जड़त्व, शत्रु-वैषम्य, देश-भ्रंश और महान् भय का फल कहा गया है। व्याधि तथा दुःख की उत्पत्ति का भी उल्लेख है। यह कष्ट-प्रधान फल-कथन है; इसे निश्चित रोग-भविष्य या भय-वाणिज्य के रूप में नहीं पढ़ना — केवल शास्त्र का वर्णित संकेत।

English rendering The text states that when Mars is in Venus’s sūkṣma, there is dullness, adversity from enemies, displacement from one’s land, great fear, and the arising of illness and sorrow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-सूक्ष्म में कुज)। कोई दशा-वर्ष या बल-अंक श्लोक में नहीं; केवल सूक्ष्म-दशा का फल-वर्णन है।

62.78
राज्याग्निसर्पजा भीथिर्बन्ढुनाशो गुरुव्यठा ।
स्ठानच्युथिर्महाभीथिर्भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथेऽप्यहौ
rājyāgnisarpajā bhīthirbanḍhunāśo guruvyaṭhā |
sṭhānacyuthirmahābhīthirbhtṟgoḥ sūkṣmagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज्य-अग्नि-सर्प-जा भीतिः = राजा/राज्य, अग्नि और सर्प से उत्पन्न भय; बन्धु-नाशः = बन्धुजनों की हानि; गुरु-व्यथा = गुरु (अथवा गुरुतर) पीड़ा; स्थान-च्युतिः = पद/स्थान से गिरना; महा-भीतिः = महान भय; भृगोः = शुक्र की; अहौ = अहि/अग अर्थात् राहु की (सूक्ष्मा में)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की प्रत्यन्तर के भीतर राहु की सूक्ष्मान्तर्दशा में शास्त्र क्लेश-प्रधान फल कहता है — राज्य, अग्नि तथा सर्प से भय, बन्धुजनों की हानि, गुरुतर व्यथा, पद से च्युति और महान भय। ये शास्त्र-कथित सम्भाव्य फल हैं; इन्हें भय या नियति-वचन के रूप में न लें। ("अहि/अग" = राहु; पाठ-भेद संभव।)

English rendering Under Venus with Rāhu in the sūkṣmā, the text states fear from king, fire, and serpents, loss of kinsmen, grave suffering, fall from position, and great dread.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (क्लेशप्रधान)। राहु का सूक्ष्म-अंश उस खण्ड का १८/१२० = ३/२० है।

हमारा डिकोड: राहु-सूक्ष्मा जैसे भयसूचक खण्डों में हमारा अनुशासन दो परतें अलग रखता है — काल की गणना (राहु का ३/२० अंश, विमशोत्तरी १२०-वर्ष अनुपात से पुष्ट) एक सटीक संख्यात्मक तथ्य है, जबकि "भय/हानि" शास्त्र का फल-कथन मात्र है, जिसे हम भविष्यवाणी या नियति के रूप में कभी नहीं प्रस्तुत करते। गणित और व्याख्या का यही पृथक्करण हमारे संपूर्ण डिकोड की रीढ़ है।

62.79
सर्वथ्र कार्यलाभश्च क्षेथ्रार्ठविभवोन्नथिः ।
वणिग्व्त्ऱ्थ्थेर्महालब्ढिर्भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे गुरौ
sarvathra kāryalābhaśca kṣethrārṭhavibhavonnathiḥ |
vaṇigvtṟththermahālabḍhirbhtṟgoḥ sūkṣmagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वत्र = सब कार्यों में, हर ओर; कार्य-लाभः = प्रयोजनों की सिद्धि, कामों में सफलता; क्षेत्र-अर्थ-विभव-उन्नतिः = भूमि (क्षेत्र), धन (अर्थ) और वैभव की उन्नति; वणिग्-वृत्तेः = व्यापार-वृत्ति से (वणिज् = व्यापारी, वृत्ति = आजीविका); महा-लब्धिः = बड़ा लाभ; भृगोः = भृगु अर्थात् शुक्र की अवधि में; सूक्ष्मगते गुरौ = जब सूक्ष्म-दशा गुरु (बृहस्पति) में पहुँची हो।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की अवधि के भीतर जब बृहस्पति की सूक्ष्म-दशा चलती है, तब शास्त्र कहता है कि जातक को सब ओर कार्यसिद्धि मिलती है, भूमि-धन और वैभव की उन्नति होती है, और व्यापार-वृत्ति से बड़ा लाभ होता है। यह इस दशा-कोष्ठक का शुभ फल-कथन है — गुरु का सौम्य प्रभाव शुक्र की अवधि पर पड़ने का वर्णन।

English rendering In Venus's period, when Jupiter's sūkṣma-daśā runs, the text states there is success in every undertaking, a rise in land, wealth and prosperity, and great gain from the merchant's trade.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूक्ष्मान्तर्दशा का शुभ फल)। श्लोक स्वयं कोई संख्या नहीं देता; परन्तु यह "शुक्र-अवधि × गुरु-सूक्ष्म" नामक कोष्ठक विंशोत्तरी का चौथा नेस्टिंग-स्तर (महा → अन्तर् → प्रत्यन्तर् → सूक्ष्म) है, अतः इस खिड़की का आना शुद्ध अनुपात-गणित है, जबकि "लाभ" उसका फल-वाक्य मात्र है।

हमारा डिकोड (Our Decode) डोसियर का विंशोत्तरी-इंजन 120-वर्ष चक्र को चन्द्र-नक्षत्र से बाँधता है, जहाँ अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-वर्ष) ÷ 120; सूक्ष्म वही अनुपात-नियम दो बार और लगाकर निकलता है। इसलिए "शुक्र-अवधि / गुरु-सूक्ष्म" एक परिकलित समय-खिड़की है — और हमारा अनुशासन इस गणितीय खिड़की को श्लोक के फल-कथन से सदा अलग रखता है।

62.80
शथ्रुपीदा महध्धुःखं चथुष्पाधविनाशनम् ।
स्वगोथ्रगुरुहानिः स्याध् भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे शनौ
śathrupīdā mahadhdhuḥkhaṃ cathuṣpādhavināśanam |
svagothraguruhāniḥ syādh bhtṟgoḥ sūkṣmagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-पीडा = शत्रुओं से कष्ट/उत्पीड़न; महत्-दुःखं = बड़ा दुःख; चतुष्पाद-विनाशनम् = चौपायों (गो-आदि पशुधन) का नाश; स्व-गोत्र-गुरु-हानिः = अपने गोत्र के गुरुजन/बड़े-बुजुर्ग की हानि; स्यात् = होता है (शास्त्रोक्त प्रवृत्ति); भृगोः = शुक्र की अवधि में; सूक्ष्मगते शनौ = जब सूक्ष्म-दशा शनि में हो।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की अवधि में जब शनि की सूक्ष्म-दशा आती है, तब शास्त्र इस कोष्ठक का अशुभ फल बताता है — शत्रुओं से पीड़ा, भारी दुःख, पशुधन की हानि, और अपने गोत्र के गुरुजन की क्षति। इसे नियति या भविष्यवाणी न मानें; यह मात्र शास्त्र का इस दशा-खण्ड के प्रति कथित प्रवृत्ति-वर्णन है।

English rendering In Venus's period, when Saturn's sūkṣma-daśā runs, the text states there is affliction from enemies, great sorrow, loss of cattle, and loss of an elder of one's own lineage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ फल)। श्लोक कोई गणना नहीं देता; इसे "शास्त्र कहता है" के रूप में पढ़ें, किसी निश्चित भाग्य या भय के रूप में नहीं — इस कोष्ठक में `==` से जाँचने योग्य एकमात्र वस्तु दशा-सीमा (काल-बिन्दु) है, न कि वर्णित संकट।

हमारा डिकोड (Our Decode) ऑपरेटर की पद्धति के अनुसार शत्रु-पीडा या पशु-हानि जैसे कठोर फल सदा "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत होते हैं — कभी नियति, भय या दबाव के रूप में नहीं। यहाँ एकमात्र exact-`==` जाँच-योग्य वस्तु विंशोत्तरी अनुपात-इंजन से परिकलित सूक्ष्म-दशा की सीमा है, न कि श्लोक-वर्णित दुर्घटना।

62.81
बाण्ढवाधिषु सम्पथ्थिर्व्यवहारो ढनोन्नथिः ।
पुथ्रधाराधिथः सौख्यं भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे बुढे
bāṇḍhavādhiṣu sampaththirvyavahāro ḍhanonnathiḥ |
puthradhārādhithaḥ saukhyaṃ bhtṟgoḥ sūkṣmagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बान्धव-आदिषु = बन्धु-बान्धवों आदि में/से; सम्पत्तिः = समृद्धि, धन-सम्पन्नता; व्यवहारः = लेन-देन, कारोबार; धन-उन्नतिः = धन की वृद्धि; पुत्र-दार-आदितः = पुत्र, पत्नी (दार) आदि से; सौख्यं = सुख; भृगोः = शुक्र की अवधि में; सूक्ष्मगते बुधे = जब सूक्ष्म-दशा बुध में हो।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की अवधि में बुध की सूक्ष्म-दशा आने पर, शास्त्र कहता है कि बन्धु-बान्धवों में समृद्धि, व्यवहार/कारोबार से धन की उन्नति, तथा पुत्र-पत्नी आदि से सुख प्राप्त होता है। बुध और शुक्र दोनों के सौम्य मेल का यह शुभ फल-कथन है।

English rendering In Venus's period, when Mercury's sūkṣma-daśā runs, the text states there is prosperity among kinsmen, increase of wealth through dealings, and happiness from wife, children and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ फल)। श्लोक में कोई संख्या नहीं; किन्तु स्थान-निर्धारण गणितीय है — शुक्र-खण्ड के सूक्ष्म-स्वामी विंशोत्तरी क्रम से चलते हैं, अतः यह बुध-कोष्ठक शुक्र से आरम्भ हुए क्रम का 8वाँ पद है (स्थिति दशा-क्रम से नियत, फल से नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) शुक्र-खण्ड अपने सूक्ष्म-स्वामियों को ठीक विंशोत्तरी क्रम में चलाता है — शुक्र, सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु — इसलिए यह बुध-कोष्ठक इस श्रृंखला का आठवाँ पद है। यही क्रम-नियम डोसियर का दशा-इंजन कूटबद्ध करता है (केतु 7 … बुध 17, योग Σ = 120), जहाँ पद-क्रम गणित है और फल पाठ का कथन।

62.82
अग्निरोगो महापीदा मुखनेथ्रशिरोव्यठा ।
सञ्चिथार्ठाथ्मनः पीदा भ्त्ऱ्गोः सूक्ष्मगथे ढ्वजे
agnirogo mahāpīdā mukhanethraśirovyaṭhā |
sañcithārṭhāthmanaḥ pīdā bhtṟgoḥ sūkṣmagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्नि-रोगः = अग्निजन्य/पित्त-प्रधान रोग (या अग्नि एवं रोग); महा-पीडा = बड़ी पीड़ा; मुख-नेत्र-शिरः-व्यथा = मुख, नेत्र और सिर में व्यथा/पीड़ा; सञ्चित-अर्थ = संचित धन; आत्मनः पीडा = अपने को/अपने धन को कष्ट; भृगोः = शुक्र की अवधि में; सूक्ष्मगते ध्वजे = जब सूक्ष्म-दशा ध्वज अर्थात् केतु में हो (ध्वज = केतु का पर्याय)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की अवधि में जब केतु (ध्वज) की सूक्ष्म-दशा आती है, तब शास्त्र इस कोष्ठक का अशुभ फल कहता है — अग्नि/पित्तजन्य रोग, बड़ी पीड़ा, मुख-नेत्र-सिर में व्यथा, और संचित धन तथा स्वयं को कष्ट। यह शास्त्र का प्रवृत्ति-वर्णन है, कोई निश्चित भविष्यकथन नहीं।

English rendering In Venus's period, when Ketu's (dhvaja's) sūkṣma-daśā runs, the text states there is fire- or bile-borne disease, great affliction, pain in mouth, eyes and head, and injury to one's accumulated wealth and self.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ फल)। कोई गणना नहीं; "ध्वज = केतु" एक शब्द-पर्याय-डिकोड है (ध्वज/केतु = पताका)। इसे शास्त्र-कथित प्रवृत्ति मानें, भय या नियति नहीं — काल-सीमा ही एकमात्र संख्यात्मक, जाँच-योग्य वस्तु है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ध्वज (केतु) शुक्र के नौ-कोष्ठक खण्ड को समाप्त करता है — यह अन्तिम, नौवाँ सूक्ष्म-पद है। डोसियर के 120-वर्ष भार-विभाजन में केतु 7 वर्ष धारण करता है, अतः इस समापक सूक्ष्म-खिड़की की लम्बाई सबसे छोटी स्लाइस है — एक शुद्ध अनुपात, जिसे हम अपने "गणित बनाम व्याख्या" नियम के अनुसार श्लोक के फल-कथन से पृथक् रखते हैं।

अध्यायः 63

प्राणदशाफलाध्यायः

83 श्लोक
63.1
प्त्ऱ्ठक् खगधशावर्षैर्हन्याथ् सूक्ष्मधशामिथिम् ।
खसूर्यैर्विभजेल्लिब्ढर्ज्ञेय प्राणधशामिथिः
ptṟṭhak khagadhaśāvarṣairhanyāth sūkṣmadhaśāmithim |
khasūryairvibhajellibḍharjñeya prāṇadhaśāmithiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृथक् = अलग-अलग (प्रत्येक ग्रह के लिए); खग-दशा-वर्षैः = ग्रह (खग = आकाशचारी) के दशा-वर्षों से; हन्यात् = गुणा करे; सूक्ष्म-दशा-मितिम् = सूक्ष्मदशा की काल-मात्रा को; ख-सूर्यैः = ख (=0) सूर्य (=12) → अङ्कानां वामतो गतिः से 120 से; विभजेत् = भाग दे; लब्धः = प्राप्त भजनफल; प्राण-दशा-मितिः = प्राणदशा की काल-मात्रा।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक प्राणदशा (दशा-विभाजन की सूक्ष्मतम कोटि) की अवधि निकालने का सूत्र देता है। प्रत्येक ग्रह के लिए अलग-अलग — उस ग्रह के विंशोत्तरी दशा-वर्षों से सूक्ष्मदशा की अवधि को गुणा करो, फिर 120 (ख-सूर्य) से भाग दो; जो लब्धि मिले वही उस ग्रह की प्राणदशा की मात्रा है। यह ठीक वही आनुपातिक पुनरावर्तन है जो अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर-सूक्ष्म तक प्रत्येक स्तर पर चलता आया है।

English rendering For each planet separately, multiply the span of the sūkṣma-daśā by that planet's (Vimśottarī) daśā-years and divide by 120; the quotient is the measure of its prāṇa-daśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्राणदशा-मिति = (सूक्ष्मदशा-मिति × ग्रह-दशा-वर्ष) ÷ 120। यहाँ भूतसंख्या "ख-सूर्य" का डिकोड: ख = 0, सूर्य = 12, अङ्कानां वामतो गतिः → 120 — और यह 120 आकस्मिक नहीं, यही विंशोत्तरी का पूर्ण योग (Σ दशा-वर्ष = 120) है। सूत्र संकेतन: T_प्राण = T_सूक्ष्म × (yₚ ÷ 120), जहाँ yₚ = प्राण-स्वामी ग्रह के दशा-वर्ष (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)। आन्तरिक जाँच: एक ही सूक्ष्मदशा के भीतर सभी नौ प्राणदशाओं का योग = T_सूक्ष्म × (Σyₚ ÷ 120) = T_सूक्ष्म × (120÷120) = T_सूक्ष्म — अर्थात् वे मूल सूक्ष्मदशा को पूर्णतः भरती हैं।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी सूक्ष्मदशा की गणित-अवधि T_सूक्ष्म = 6 दिन (संवत्सर-मान का रूपान्तरण जो भी हो, अनुपात yₚ/120 मान-निरपेक्ष है)। तब —
- चन्द्र की प्राणदशा (y = 10): 6 × 10 ÷ 120 = 0.5 दिन = 12 घण्टे।
- सूर्य की प्राणदशा (y = 6): 6 × 6 ÷ 120 = 0.3 दिन = 7 घण्टे 12 मिनट।
- राहु की प्राणदशा (y = 18): 6 × 18 ÷ 120 = 0.9 दिन = 21 घण्टे 36 मिनट।
जाँच — नौ मानों का योग = 6 × (7+20+6+10+7+18+16+19+17)/120 = 6 × 120/120 = 6 दिन। ✓ (कन्वेंशन: विंशोत्तरी दशा-वर्ष; वर्ष→दिन मान — 365.25 सौर या 360 सावन — घोषित करना पड़ता है, पर उपरोक्त अनुपात उस पर निर्भर नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही 120-आधारित पुनरावर्तन हमारे दशा-इंजन में विंशोत्तरी के रूप में प्रमाणित है — 120-वर्ष चक्र (केतु 7 … बुध 17, Σ = 120), और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120। प्राणदशा उसी शुद्ध अनुपात-अंकगणित का सूक्ष्मतम स्तर है: यहाँ "ख-सूर्य = 120" श्लोक स्वयं विंशोत्तरी-योग को अपने भाजक में सिद्ध कर देता है, जिससे यह विभाजन-श्रृंखला exact-`==` रूप में जाँची जा सकती है, न कि सहिष्णुता-बैंड (±band) पर।

63.2
प्ॐश्चल्यं विषजा बाढा चौराग्निन्त्ऱ्पजं भयम् ।
कष्तं सूक्ष्मधशाकाले रवौ प्राणधशां गथे
poṃścalyaṃ viṣajā bāḍhā caurāgnintṟpajaṃ bhayam |
kaṣtaṃ sūkṣmadhaśākāle ravau prāṇadhaśāṃ gathe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पौश्चल्यम् = चञ्चलता/अस्थिरता; विष-जा बाधा = विष से उत्पन्न पीड़ा/बाधा; चौर-अग्नि-नृप-जम् भयम् = चोर, अग्नि और राज-सम्बन्धी भय; कष्टम् = कष्ट; सूक्ष्म-दशा-काले = सूक्ष्म-दशा के समय में; रवौ प्राण-दशाम् गते = सूर्य की प्राण-दशा चलने पर।

हिन्दी भावार्थ जब सूक्ष्म-दशा-काल में सूर्य की प्राण-दशा प्रवृत्त होती है, तब शास्त्र उन फलों का उल्लेख करता है जो इस संयोग से जुड़े बताए गए हैं। मन और व्यवहार में चञ्चलता, विष-सम्बन्धी बाधा, तथा चोर, अग्नि और राज-शक्ति से उत्पन्न भय—ये सब इसी काल के फल-वर्णन में आते हैं। समग्र रूप से यह प्राण-खण्ड कष्टप्रद कहा गया है। ये शास्त्र के अपने फल-कथन हैं, न कि कोई निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering When, during the sūkṣma-daśā, the Sun’s prāṇa-daśā is running, the text states restlessness, poison-born affliction, fear arising from thieves, fire, and royalty, and general hardship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूर्य-प्राण की अवधि श्लोक ६३.१ के अनुपात से निकले; फल-वर्णन गणना नहीं, शास्त्रीय संकेत-मात्र है।

63.3
सुखं भोजनसम्पथ्थिः संस्कारो न्त्ऱ्पवैभवम् ।
उधाराधिक्त्ऱ्पाभिश्च रवेः प्राणगथे विढौ
sukhaṃ bhojanasampaththiḥ saṃskāro ntṟpavaibhavam |
udhārādhiktṟpābhiśca raveḥ prāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखम् = सुख; भोजन-सम्पत्तिः = भोजन और समृद्धि; संस्कारः = शुभ संस्कार/परिष्कार; नृप-वैभवम् = राज-सम्बन्धी वैभव/प्रतिष्ठा; उदाराधिक-कृपाभिः = उदार/अधिक कृपाओं से; च = और; रवेः प्राण-गते विधौ = सूर्य की प्राण-दशा में चन्द्र (विधु) के प्रवृत्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य की प्राण-दशा के भीतर चन्द्र का प्राण-खण्ड चलता है, शास्त्र सुख, भोजन-समृद्धि, संस्कार और राज-वैभव का फल बयान करता है। उदार कृपाओं का भी उल्लेख है—अर्थात् इस संयोग को पाठ अनुग्रह-युक्त बताता है। पूर्व श्लोक के सूर्य-प्राण-फल से यह चन्द्र-उपखण्ड भिन्न रंग रखता है। फिर भी यह शास्त्र का कथन है; कोई सुनिश्चित घटना-पूर्वानुमान नहीं।

English rendering When the Moon runs within the Sun’s prāṇa-daśā, the text states comfort, abundance of food, refinement (saṃskāra), royal splendour, and the favour of generous grace.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: प्राण_चन्द्र = (सूर्य-सूक्ष्म-अवधि × १०) ÷ १२०; फल-भाग व्याख्यात्मक है।

63.4
भूपोपध्रवमन्यार्ठे ध्रव्यनाशो महध्भयम् ।
महथ्यपचयप्राप्थी रवेः प्राणगथे कुजे
bhūpopadhravamanyārṭhe dhravyanāśo mahadhbhayam |
mahathyapacayaprāpthī raveḥ prāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूप-उपद्रवम् = राजा/शासक से उपद्रव; अन्य-अर्थे = पराये प्रयोजन में / अनर्थ में (पाठ-भेद संभव: अन्यार्थे); द्रव्य-नाशः = धन-हानि; महा-भयम् = बड़ा भय; महति अपचय-प्राप्तिः = बड़े अपचय (ह्रास) की प्राप्ति; रवेः प्राण-गते कुजे = सूर्य की प्राण-दशा में मङ्गल के प्रवृत्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-प्राण के अन्तर्गत जब मङ्गल का प्राण-खण्ड आता है, शास्त्र राजकीय उपद्रव, द्रव्य-नाश और महान् भय का वर्णन करता है। अपचय—हानि या क्षय—की प्राप्ति भी इसी फल-सूची में गिनी गई है। यह मङ्गल-सूर्य प्राण-संयोग का शास्त्रोक्त संकेत है; इसे भय फैलाने वाले निश्चित विधान के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए, केवल पाठ का फल-कथन समझें।

English rendering When Mars runs within the Sun’s prāṇa-daśā, the text states harassment from rulers, loss of wealth, great fear, and the onset of serious decline (apacaya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: प्राण_मङ्गल = (सूर्य-सूक्ष्म-अवधि × ७) ÷ १२०।

63.5
अन्नोध्भवा महापीदा विषोथ्पथ्थिर्विशेषथः ।
अर्ठाग्निराजभिः क्लेशो रवेः प्राणगथेऽप्यहौ
annodhbhavā mahāpīdā viṣothpaththirviśeṣathaḥ |
arṭhāgnirājabhiḥ kleśo raveḥ prāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्न-उद्भवा महा-पीडा = अन्न से उत्पन्न महापीड़ा (भोजन/अन्न-सम्बन्धी तीव्र क्लेश); विष-उत्पत्तिः = विष की उत्पत्ति/प्रभाव; विशेषतः = विशेष रूप से; अर्थ-अग्नि-राजभिः क्लेशः = धन, अग्नि और राजाओं से क्लेश; रवेः प्राण-गते अपि अहौ = सूर्य की प्राण-दशा में अहि (राहु) के प्रवृत्त होने पर भी।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-प्राण में राहु (अहि) के खण्ड को शास्त्र विशेष रूप से पीड़ा-युक्त बताता है—अन्न-सम्बन्धी महापीड़ा और विषोत्पत्ति का उल्लेख प्रमुख है। अर्थ, अग्नि और राज-शक्ति से क्लेश भी इसी फल-वर्णन में जुड़े हैं। “अपि” शब्द इस संयोग की तीक्ष्णता पर बल देता है। ये सब शास्त्र के संकेत-वाक्य हैं; चिकित्सा, कानून या धन की भविष्यवाणी के रूप में ग्रहण न करें।

English rendering When Rāhu (ahi) runs within the Sun’s prāṇa-daśā, the text states severe affliction arising in connection with food, the arising of poison especially, and distress through wealth, fire, and kings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: प्राण_राहु = (सूर्य-सूक्ष्म-अवधि × १८) ÷ १२०। (अहौ = अहि-सप्तमी; राहु—पाठ-भेद अन्य ग्रहों से मिलाने पर संभव, पर इस पाठ में अहि स्पष्ट।)

63.6
नानाविध्यार्ठसम्पथ्थिः कार्यलाभो गथागथैः ।
न्त्ऱ्पविप्राश्रमे सूक्ष्मे रवेः प्राणगथे गुरौ
nānāvidhyārṭhasampaththiḥ kāryalābho gathāgathaiḥ |
ntṟpaviprāśrame sūkṣme raveḥ prāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाना-विध-अर्थ-सम्पत्तिः = अनेक प्रकार की अर्थ-समृद्धि; कार्य-लाभः = कार्यों में लाभ; गत-आगतैः = आवागमन/यात्रा-व्यवहार से; नृप-विप्र-आश्रमे = राजा और विप्र के आश्रम/संपर्क में; सूक्ष्मे = सूक्ष्म(-दशा-सन्दर्भ) में; रवेः प्राण-गते गुरौ = सूर्य की प्राण-दशा में गुरु के प्रवृत्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य की प्राण-दशा में गुरु का खण्ड चलता है, शास्त्र नाना प्रकार की अर्थ-सम्पत्ति और कार्य-लाभ का फल कहता है। आवागमन से लाभ तथा राजा और विप्र-आश्रम के सन्दर्भ में शुभ संकेत भी इसी वर्णन में हैं। सूर्य-प्राण के अन्य ग्रह-खण्डों की तुलना में यह फल-वर्णन अनुकूल कहा गया है—फिर भी “शास्त्र कहता है” की सीमा में रहकर ही पढ़ें।

English rendering When Jupiter runs within the Sun’s prāṇa-daśā, the text states manifold acquisition of wealth, gain in undertakings, benefit through comings and goings, and favour in the sphere of kings and of the learned (vipra-āśrama).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: प्राण_गुरु = (सूर्य-सूक्ष्म-अवधि × १६) ÷ १२०।

63.7
बन्ढनं प्राणनाशश्च चिथ्थोध्वेगस्थठैव च ।
बहुबाढा महाहानी रवेः प्राणगथे शनौ
banḍhanaṃ prāṇanāśaśca ciththodhvegasthaṭhaiva ca |
bahubāḍhā mahāhānī raveḥ prāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धनम् = बन्धन/कैद-सा अवरोध; प्राण-नाशः = प्राण-हानि का संकेत (शास्त्र-शब्द; चिकित्सा-निदान नहीं); चित्त-उद्वेगः = मन का उद्वेग/बेचैनी; तथा एव च = और उसी प्रकार; बहु-बाधा = अनेक बाधाएँ; महा-हानिः = बड़ी हानि; रवेः प्राण-गते शनौ = सूर्य की प्राण-दशा में शनि के प्रवृत्त होने पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-प्राण के भीतर शनि का खण्ड शास्त्र को भारी बताता है—बन्धन, प्राण-नाश का उल्लेख, चित्त का उद्वेग, बहु-बाधा और महा-हानि—ये सब इसी फल-सूची में आते हैं। भाषा तीव्र है, पर dual-discipline याद रखें: यह पाठ का फल-कथन है, न कि निश्चित दुर्घटना या भय का प्रचार। काल-खण्ड की गणना ६३.१ से; अर्थ-व्याख्या शास्त्र की आवाज़ में, दबाव या उपाय-भय के बिना।

English rendering When Saturn runs within the Sun’s prāṇa-daśā, the text states bondage, threat to the life-breath (as a śāstric phrase, not a medical verdict), agitation of mind, manifold obstacles, and great loss.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अवधि: प्राण_शनि = (सूर्य-सूक्ष्म-अवधि × १९) ÷ १२०। अध्याय ६३ इस पाठ में सूर्य-प्राण के अंतर्गत रवि, विधु, कुज, अहि, गुरु, शनि—छः ग्रह-फल देता है; बुध-शुक्र यहाँ अनुपस्थित (पाठ-भेद/अध्याय-विन्यास भिन्न संस्करणों में संभव)।

63.8
राजान्नभोगः सथथं राजलाञ्छानथथ्पधम् ।
आथ्मा सन्थर्पयेधीवं रवेः प्राणगथे बुढे
rājānnabhogaḥ sathathaṃ rājalāñchānathathpadham |
āthmā santharpayedhīvaṃ raveḥ prāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजान्नभोगः = राजकीय अन्न/भोजन का भोग; सततम् = निरन्तर; राजलाञ्छन = राजचिह्न/राज-सम्मान; तत्पदम् = वही पद/प्रतिष्ठा; आत्मा = स्वयम्; सन्तर्पयेत् = तृप्त करे; इवम् = इस प्रकार; रवेः प्राणगते = सूर्य-प्राण में स्थित होने पर; बुधे = बुध में/बुध के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब बुध सूर्य के प्राण में स्थित हो, तो राजान्न का निरन्तर भोग, राजलाञ्छन और तत्संबंधी पद-प्रतिष्ठा का संकेत मिलता है। इसी अवस्था में आत्मा सन्तुष्ट-तृप्त रहती है — अर्थात् भोग और सम्मान दोनों का समन्वय कहा गया है। यह सूर्य-प्राणगत बुध का फल-कथन है, न कि स्वतन्त्र भविष्यवाणी।

English rendering The text states that when Mercury is in the Sun’s prāṇa, there is constant enjoyment of royal food, royal insignia and the corresponding rank, and the self is thus satisfied.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रवि-प्राणगत बुध)। “प्राणगत” यहाँ ग्रह-अवस्था/प्राण-संबंध का फल-निर्देश है; संख्या-सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

63.9
अन्योऽन्यं कलहश्चैव वसुहानिः पराजयः ।
गुरुस्थ्रीबन्ढुविर्गैश्च सूर्यप्राणगथे ढ्वजे
anyo'nyaṃ kalahaścaiva vasuhāniḥ parājayaḥ |
gurusthrībanḍhuvirgaiśca sūryaprāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्योऽन्यम् = परस्पर; कलहः = विवाद/झगड़ा; चैव = और भी; वसुहानिः = धन-हानि; पराजयः = पराभव/हार; गुरु = गुरु/गुरुजन; स्त्री = स्त्री; बन्धु = संबंधी; विर्गैः = वियोग से (विरग/वियोग); सूर्यप्राणगते = सूर्य-प्राण में; ध्वजे = ध्वज = राहु में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब राहु (ध्वज) सूर्य के प्राण में हो, तो परस्पर कलह, धन-हानि और पराजय का उल्लेख आता है। साथ ही गुरु, स्त्री और बन्धुओं से वियोग का भी फल कहा गया है। यह सूर्य-प्राणगत राहु का शास्त्रीय फल-कथन है — दबाव या निश्चित दुःख का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu (Dhvaja) is in the Sun’s prāṇa, mutual quarrel, loss of wealth, defeat, and separation from teacher, spouse, and kin are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य-प्राणगत राहु/ध्वज)। “ध्वज” यहाँ राहु का पारंपरिक संज्ञा-प्रयोग है।

63.10
राजपूजा ढनाढिक्यं स्थ्रीपुथ्राधिभवं सुखम् ।
अन्नपानाधिभोगाधि सूर्यप्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
rājapūjā ḍhanāḍhikyaṃ sthrīputhrādhibhavaṃ sukham |
annapānādhibhogādhi sūryaprāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-पूजा = राजा से सम्मान; धन-आधिक्यं = धन की प्रचुरता; स्त्री-पुत्र-आदि-भवं सुखम् = स्त्री, पुत्र आदि से उत्पन्न सुख; अन्न-पान-आदि-भोग-आदि = अन्न-पान आदि का भोग; सूर्य-प्राण-गते भृगौ = सूर्य की प्राणदशा में, शुक्र (भृगु = शुक्र, के उपकाल) में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की प्राणदशा में शुक्र के अंश पर शास्त्र कहता है — राजा से सम्मान, धन की प्रचुरता, स्त्री-पुत्रादि से सुख, तथा अन्न-पान आदि का भोग प्राप्त होता है। यह सूर्य-प्राणदशा-श्रृंखला का अन्तिम (शुक्र) अंश है।

English rendering In the Sun's prāṇa-daśā, in Venus's portion, the text states: honour from the king, abundance of wealth, happiness from wife and children, and enjoyment of food and drink.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। इसके साथ सूर्य-प्राणदशा के नौ उपस्वामी पूर्ण होते हैं; अगला श्लोक चन्द्र-प्राणदशा आरम्भ करता है।

63.11
स्थ्रीपुथ्राधिसुखं ध्रव्यं लभथे नूथनाम्बरम् ।
योगसिध्ढिं समाढिञ्च निजप्राणगथे विढौ
sthrīputhrādhisukhaṃ dhravyaṃ labhathe nūthanāmbaram |
yogasidhḍhiṃ samāḍhiñca nijaprāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीपुत्रादिसुखम् = स्त्री-पुत्र आदि से सुख; द्रव्यम् = धन/पदार्थ; लभते = प्राप्त करता है; नूतनाम्बरम् = नया वस्त्र; योगसिद्धिम् = योग की सिद्धि; समाधिम् = समाधि; च = और; निजप्राणगते = अपने ही प्राण में स्थित होने पर; विधौ = चन्द्र में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब चन्द्रमा अपने ही प्राण में हो, तो स्त्री-पुत्र आदि से सुख, द्रव्य-प्राप्ति और नये वस्त्र की प्राप्ति कही गई है। योग-सिद्धि तथा समाधि का भी उल्लेख इसी निज-प्राणगत चन्द्र से जोड़ा गया है। यह स्व-प्राण स्थित चन्द्र का फल-कथन है — आध्यात्मिक परिणाम को शास्त्र की भाषा में पढ़ें, न कि निश्चित अनुभव के रूप में।

English rendering The text states that when the Moon is in its own prāṇa, happiness from spouse and children, gain of wealth, acquisition of new garments, and (further) yoga-accomplishment and samādhi are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निज-प्राणगत चन्द्र)। “निजप्राण” = चन्द्र का अपना प्राण-स्थान/अवस्था।

63.12
क्षयं कुष्टं बन्ढुनाशं रक्थस्रावान्महध्भयम् ।
भूथावेशाधि जायथे विढोः प्राणगथे कुजे
kṣayaṃ kuṣṭaṃ banḍhunāśaṃ rakthasrāvānmahadhbhayam |
bhūthāveśādhi jāyathe viḍhoḥ prāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षयम् = ह्रास/क्षय; कुष्ठम् = कुष्ठ/त्वग्विकार (शास्त्रीय संकेत); बन्धुनाशम् = बन्धु-नाश; रक्तस्रवात् = रक्त-स्राव से; महद्भयम् = महान् भय; भूतावेशादि = भूत-आवेश आदि; जायते = उत्पन्न होता है; विधोः प्राणगते = चन्द्र-प्राण में; कुजे = मंगल में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब मंगल चन्द्रमा के प्राण में हो, तो क्षय, कुष्ठ-संकेत, बन्धु-नाश, रक्तस्रव से महद्भय तथा भूतावेश आदि का उल्लेख आता है। ये पारंपरिक फल-शब्द हैं — चिकित्सकीय निदान या भय-व्यापार नहीं। पाठक इन्हें शास्त्र की अपनी भाषा के रूप में पढ़े; आधुनिक स्वास्थ्य-निर्णय इससे नहीं निकाले जाते।

English rendering The text states that when Mars is in the Moon’s prāṇa, decline, traditional indications of kuṣṭha (skin affliction), loss of kin, great fear associated with blood-flow, and spirit-possession and the like are indicated — as classical phala-language, not medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्राणगत मंगल)। चिकित्सा/भय-भाषा शास्त्र की पारंपरिक शब्दावली है; इसे निदान या निश्चित घटना न मानें।

63.13
सर्पभीथिविशेषाण भूथोपध्रवान् सधा ।
ध्त्ऱ्ष्तिक्षोभो मथिभ्रंशो विढोः प्राणगथेऽप्यहौ
sarpabhīthiviśeṣāṇa bhūthopadhravān sadhā |
dhtṟṣtikṣobho mathibhraṃśo viḍhoḥ prāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्पभीति = सर्प का भय; विशेषेण = विशेष रूप से; भूतोपद्रवान् = भूत-उपद्रवों को; सदा = सदैव; दृष्टिक्षोभः = दृष्टि/आँख का क्षोभ; मतिभ्रंशः = बुद्धि-भ्रंश; विधोः प्राणगते = चन्द्र-प्राण में; अपि = भी; अहौ = अहि = राहु में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब राहु (अहि) भी चन्द्रमा के प्राण में हो, तो विशेष रूप से सर्प-भय और सदा भूत-उपद्रव का उल्लेख है। दृष्टि-क्षोभ तथा मति-भ्रंश भी इसी अवस्था से जोड़े गए हैं। “अपि” पूर्व-श्लोक की श्रृंखला को जोड़ता है — चन्द्र-प्राणगत राहु का फल-कथन, न कि अनिवार्य अनुभव।

English rendering The text states that when Rāhu (Ahi) is likewise in the Moon’s prāṇa, especial fear of serpents, continual spirit-afflictions, disturbance of sight, and confusion of mind are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्राणगत राहु/अहि)। “अहि” = राहु का पारंपरिक नाम; “अपि” क्रम-संबंध सूचित करता है।

63.14
ढर्मव्त्ऱ्ध्ढिः क्षमाप्राप्थिर्धेवब्राह्मणपूजनम् ।
सौभाग्यं प्रियध्त्ऱ्ष्तिश्च चन्ध्रप्राणगथे गुरौ
ḍharmavtṟdhḍhiḥ kṣamāprāpthirdhevabrāhmaṇapūjanam |
saubhāgyaṃ priyadhtṟṣtiśca candhraprāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्म-वृद्धिः = धर्म की वृद्धि; क्षमा-प्राप्तिः = क्षमाशीलता/सहनशीलता की प्राप्ति; देव-ब्राह्मण-पूजनम् = देवों व ब्राह्मणों का पूजन; सौभाग्यम् = सौभाग्य; प्रिय-दृष्टिः = अनुकूल/स्नेहपूर्ण दृष्टि (कृपादृष्टि); चन्द्र-प्राण-गते गुरौ = गुरु (बृहस्पति) की सूक्ष्मदशा में जब चन्द्र की प्राणदशा चले।

हिन्दी भावार्थ प्रिय शिष्य, यहाँ शास्त्र गुरु की सूक्ष्मदशा के भीतर चलती चन्द्र-प्राणदशा का फल कहता है — धर्म की अभिवृद्धि, क्षमा-भाव का उदय, देव व ब्राह्मणों की सेवा-पूजा, सौभाग्य और अनुकूल कृपादृष्टि। यह विशुद्ध फल-कथन है; इसे शास्त्र का वचन मानिए, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering During Jupiter's sūkṣma-daśā, when the Moon's prāṇa-daśā operates, the text states there is growth of dharma, the gift of forbearance, worship of gods and brāhmaṇas, good fortune, and a kindly, favourable regard.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-सूक्ष्म में चन्द्र-प्राण); श्लोक स्वयं अवधि नहीं देता — इस प्राणदशा की लम्बाई Ch.63.1 के नियम से = सूक्ष्म-अवधि × (चन्द्र के 10 वर्ष) ÷ 120 = सूक्ष्म-अवधि × 1/12 निकलती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक विंशोत्तरी दशा-वृक्ष की सबसे सूक्ष्म पत्ती — प्राणदशा — का फल है (महादशा → अन्तर → प्रत्यन्तर → सूक्ष्म → प्राण)। हमारी दशा-गणक वही ÷120 अनुपात-गणित चलाती है जिससे BPHS Ch.46–47 का Σ=120 वर्ष चक्र इन पत्तियों तक विभाजित होता है (चन्द्र = 10 वर्ष)। गणना और फल हम अलग रखते हैं: अवधि परिशुद्ध अंकगणित है, फल शास्त्र-कथन।

63.15
सहसा धेहपथनं शथ्रूपध्रववेधना ।
अन्ढथ्वं च ढनप्राप्थिश्चन्ध्रप्राणगथे शनौ
sahasā dhehapathanaṃ śathrūpadhravavedhanā |
anḍhathvaṃ ca ḍhanaprāpthiścandhraprāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहसा = अचानक; देहपतनम् = शरीर-पतन / देह-क्षय (पाठ: धेहपथनं); शत्रु-उपद्रव-वेदनम् = शत्रु-पीड़ा व कष्ट (पाठ: शथ्रूपध्रववेधना); अन्धत्वम् = दृष्टि-हानि / अन्धता (पाठ: अन्ढथ्वं); धन-प्राप्तिः = धन-लाभ (पाठ: ढनप्राप्थिः); चन्द्र-प्राण-गते = चन्द्र-प्राण (प्राण-दशा/प्राण-स्थान) में स्थित होने पर; शनौ = शनि में / शनि के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शनि चन्द्र-प्राण में गत होता है, तब अचानक देह-पतन जैसा भारी परिणाम, शत्रु-उपद्रव और वेदना, तथा अन्धत्व जैसी पीड़ा का उल्लेख आता है; साथ ही धन-प्राप्ति का भी फल कहा गया है। यह मिश्र फल-कथन है—कष्ट और लाभ दोनों एक ही स्थिति में गिनाए गए हैं। पाठ में अनेक वर्ण-भेद हैं; भाव “चन्द्र-प्राण-गत शनि” पर टिका है।

English rendering The text states that when Saturn occupies the Moon’s prāṇa, there is sudden bodily collapse, enemy affliction and pain, and blindness, together with acquisition of wealth. The verse pairs hardship with gain under the same prāṇa placement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्राण-गत शनि)। यह दशा/प्राण-अवस्था का परिणाम-वर्णन है; यहाँ कोई अवधि-वर्ष, अंश-भाग या बल-इकाई निर्धारित नहीं होती।

63.16
चामरच्छथ्रसम्प्राप्थी राज्यलाभो न्त्ऱ्पाथ्थथः ।
समथ्वं सर्वभूथेषु चन्ध्रप्राणगथे बुढे
cāmaracchathrasamprāpthī rājyalābho ntṟpāththathaḥ |
samathvaṃ sarvabhūtheṣu candhraprāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चामर = राजचिह्न चँवर (श्वेत पुच्छ-व्यजन); छत्र = राजछत्र; चामर-छत्र-सम्प्राप्तिः = चँवर-छत्र आदि राज-उपकरणों की प्राप्ति; राज्य-लाभः = अधिकार/राज्य की प्राप्ति; नृपात् ततः = राजा से (प्राप्त), पाठ-भेद संभव; समत्वं सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियों के प्रति समभाव; चन्द्र-प्राण-गते बुधे = बुध की सूक्ष्मदशा में जब चन्द्र की प्राणदशा चले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार बुध की सूक्ष्मदशा में चन्द्र-प्राणदशा चलने पर चँवर-छत्र सदृश राजचिह्नों की प्राप्ति, राजा की ओर से अधिकार-लाभ, और समस्त प्राणियों के प्रति समभाव का उदय होता है। "नृपात् ततः" पद पर पाठ-भेद संभव है; अभिप्राय राजा से प्राप्त मान-सम्मान का है।

English rendering In Mercury's sūkṣma-daśā, with the Moon's prāṇa-daśā, the text states there is the winning of chowrie and parasol (the marks of royalty), gain of authority through the king, and an even-mindedness toward all beings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-सूक्ष्म में चन्द्र-प्राण); coordinate मात्र है, अवधि नहीं — प्राणदशा-अवधि = सूक्ष्म-अवधि × (चन्द्र के 10 वर्ष) ÷ 120 (Ch.63.1)।

63.17
शस्थ्राग्निरिपुजा पीदा विषाग्निः कुक्षिरोगथा ।
पुथ्रधारवियोगश्च चन्ध्रप्राणगथे ढ्वजे
śasthrāgniripujā pīdā viṣāgniḥ kukṣirogathā |
puthradhāraviyogaśca candhraprāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शस्त्र-अग्नि-रिपु-जा पीडा = शस्त्र, अग्नि व शत्रु से उत्पन्न पीड़ा (पाठ: शस्थ्राग्निरिपुजा); विष-अग्निः = विष और अग्नि-संकट; कुक्षि-रोगता = उदर/कुक्षि-रोग (पाठ: कुक्षिरोगथा); पुत्र-दार-वियोगः = पुत्र व पत्नी से वियोग (पाठ: पुथ्रधारवियोगः); चन्द्र-प्राण-गते = चन्द्र-प्राण में; ध्वजे = राहु में (ध्वज = राहु-उपनाम; पाठ: ढ्वजे)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र-प्राण में ध्वज (राहु) गत होने पर शस्त्र, अग्नि और शत्रु से पीड़ा, विष-अग्नि का भय, कुक्षि-रोगता, तथा पुत्र-दार वियोग का फल कहा गया है। यह कठोर फल-सूची है; इसे शास्त्र का कथन मानें, नियति या चिकित्सा-निदान नहीं। “ध्वज” यहाँ राहु के लिए प्रयुक्त पारंपरिक संकेत है—पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Dhvaja (Rāhu) occupies the Moon’s prāṇa, there is suffering from weapons, fire, and enemies, poison and fire, abdominal disease, and separation from son and wife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्राण-गत राहु/ध्वज)। यहाँ कोई बिन्दु-संख्या या वर्ष-अवधि नहीं; केवल प्राण-स्थित राहु का फल-वर्णन है।

63.18
पुथ्रमिथ्रकलथ्राप्थिविधेशाच्च ढनागमः ।
सुखसम्पथ्थिरर्ठश्च चन्ध्रप्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
puthramithrakalathrāpthividheśācca ḍhanāgamaḥ |
sukhasampaththirarṭhaśca candhraprāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-मित्र-कलत्र-आप्तिः = पुत्र, मित्र व पत्नी की प्राप्ति (पाठ: पुथ्रमिथ्रकलथ्राप्थि); विदेशात् = विदेश/परदेश से; धन-आगमः = धन का आगमन (पाठ: ढनागमः); सुख-सम्पत्तिः = सुख व सम्पत्ति (पाठ: सुखसम्पथ्थिः); अर्थः = अर्थ/धन; चन्द्र-प्राण-गते = चन्द्र-प्राण में; भृगौ = शुक्र में (भृगु = शुक्र; पाठ: भ्त्ऱ्गौ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र-प्राण में भृगु (शुक्र) गत होने पर पुत्र, मित्र और कलत्र की प्राप्ति, विदेश से धन-आगमन, तथा सुख-सम्पत्ति और अर्थ-लाभ का फल कहा गया है। यह शुभ-सम्बन्ध और समृद्धि का फल-कथन है। “भृगु” स्पष्टतः शुक्र का पारंपरिक नाम है।

English rendering The text states that when Bhṛgu (Venus) occupies the Moon’s prāṇa, there is attainment of son, friend, and wife, inflow of wealth from abroad, and comfort, prosperity, and means.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्राण-गत शुक्र)। गणनात्मक स्थिरांक नहीं; केवल शुक्र-प्राण-अवस्था का फल।

63.19
क्रूरथा कोपव्त्ऱ्ध्ढिश्च प्राणहानिर्मनोव्यठा ।
धेशथ्यागो महाभीथिश्चन्ध्रप्राणगथे रवौ
krūrathā kopavtṟdhḍhiśca prāṇahānirmanovyaṭhā |
dheśathyāgo mahābhīthiścandhraprāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूरता = क्रूर स्वभाव/कठोरता (पाठ: क्रूरथा); कोप-वृद्धिः = क्रोध की वृद्धि (पाठ: कोपव्त्ऱ्ध्ढिः); प्राण-हानिः = प्राण-क्षय / जीवन-हानि का संकेत; मनो-व्यथा = मन की व्यथा; देश-त्यागः = देश छोड़ना (पाठ: धेशथ्यागो); महा-भीतिः = महान् भय (पाठ: महाभीथिः); चन्द्र-प्राण-गते = चन्द्र-प्राण में; रवौ = सूर्य में / सूर्य के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र-प्राण में रवि (सूर्य) गत होने पर क्रूरता, कोप-वृद्धि, प्राण-हानि का संकेत, मनो-व्यथा, देश-त्याग और महा-भीति का फल कहा गया है। यह तीव्र तनाव और विस्थापन का फल-वर्णन है—शास्त्र का कथन, निश्चित भाग्य-घोषणा नहीं। भय को यहाँ पाठ-शब्द के रूप में रखा गया है; उपचार-दबाव का कोई आदेश नहीं।

English rendering The text states that when the Sun occupies the Moon’s prāṇa, there is cruelty, increase of anger, loss of vitality, mental distress, abandonment of one’s country, and great fear.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र-प्राण-गत सूर्य)। कोई अंश, वर्ष या बल-माप नहीं; केवल फल-सूची।

63.20
कलहो रिपुभिर्बन्ढः रक्थपिथ्थाधिरोगभीः ।
निजसूक्ष्मधशामढ्ये कुज प्राणगथे फलम्
kalaho ripubhirbanḍhaḥ rakthapiththādhirogabhīḥ |
nijasūkṣmadhaśāmaḍhye kuja prāṇagathe phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलहः = कलह/विवाद; रिपुभिः बन्धः = शत्रुओं से बन्धन/कारावास; रक्त-पित्त-आदि-रोग-भीः = रक्तपित्त आदि रोगों का भय (रक्तपित्त = आयुर्वेदीय रक्तस्रावी/पैत्तिक व्याधि); निज-सूक्ष्म-दशा-मध्ये = अपनी ही (मंगल की) सूक्ष्मदशा के मध्य में; कुज-प्राण-गते फलम् = जब मंगल की प्राणदशा चले, तब का फल।

हिन्दी भावार्थ यहाँ से मंगल-प्राणदशा का खण्ड आरम्भ होता है; यह विकर्ण (निज) श्लोक है — मंगल की अपनी सूक्ष्मदशा में मंगल की ही प्राणदशा। शास्त्र इसका फल कहता है — कलह, शत्रुओं से बन्धन, और रक्तपित्त आदि रोगों का भय। यह शास्त्र-वचन है, भय-प्रेरणा नहीं।

English rendering Within Mars's own sūkṣma-daśā, when Mars's prāṇa-daśā arrives, the text states the result is quarrel, captivity through enemies, and the fear of ailments such as raktapitta.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मंगल-सूक्ष्म में मंगल-प्राण, निज/विकर्ण स्थिति); श्लोक फल कहता है, अवधि नहीं — निज-प्राणदशा-अवधि = सूक्ष्म-अवधि × (मंगल के 7 वर्ष) ÷ 120 (Ch.63.1)।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्राणदशा-क्रम प्रत्येक खण्ड में उसी स्वामी से आरम्भ होता है (यहाँ मंगल-सूक्ष्म में मंगल-प्राण) — ठीक वैसे ही जैसे विंशोत्तरी अन्तर्दशा अपने महादशा-स्वामी से शुरू होती है। हमारी दशा-गणक यही ÷120 अनुपात (BPHS Ch.46–47; मंगल = 7 वर्ष) पत्ती-स्तर तक चलाती है, और oracle-अनुशासन के अनुसार अवधि-मान exact-`==` से जाँचे जाते हैं, tolerance-band से नहीं। फल पृथक् — वह शास्त्र का कथन है।

63.21
विच्युथः सुथधारैश्च बन्ढूपध्रवपीदिथः ।
प्राणथ्यागो विषेणैव भौमप्राणगथेऽप्यहौ
vicyuthaḥ suthadhāraiśca banḍhūpadhravapīdithaḥ |
prāṇathyāgo viṣeṇaiva bhaumaprāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विच्युतः = वियुक्त / अलग; सुत-दारैः = पुत्र व पत्नी से (पाठ: सुथधारैः); बन्धु-उपद्रव-पीडितः = बन्धु-उपद्रव से पीड़ित (पाठ: बन्ढूपध्रवपीदिथः); प्राण-त्यागः = प्राण छोड़ना; विषेण एव = विष से ही; भौम-प्राण-गते = मंगल-प्राण में गत होने पर; अपि = भी; अहौ = अहि/राहु में (अहि = सर्प = राहु; पाठ: ऽप्यहौ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भौम-प्राण में अहि (राहु) भी गत होने पर पुत्र-दार से वियोग, बन्धु-उपद्रव से पीड़ित होना, तथा विष से प्राण-त्याग का फल कहा गया है। यह पूर्व श्लोक के कुज-प्राण फल को राहु-सहित और भी कठोर रूप में जोड़ता है। “अहि” राहु का पारंपरिक नाम है; पाठ-भेद संभव। भय या विष-उपचार का कोई आदेश यहाँ नहीं—केवल शास्त्र-कथन।

English rendering The text states that when Ahi (Rāhu) also occupies the Mars-prāṇa, one is separated from son and wife, afflicted by troubles from relatives, and the indicated fruit includes relinquishing life by poison.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्राण-गत राहु/अहि)। कोई संख्यात्मक स्थिरांक नहीं; प्राण-दशा की स्थिति-फल की निरंतरता है, गणना-सूत्र नहीं।

63.22
धेवार्चनपरः स्र्/ईमान्मन्थानुष्टानथथ्परः ।
पुथ्रपौथ्रसुखावाप्थिर्भौमप्राणगथे गुरौ
dhevārcanaparaḥ sr/īmānmanthānuṣṭānathathparaḥ |
puthrapauthrasukhāvāpthirbhaumaprāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवार्चनपरः = देव-पूजा/आराधना में तत्पर; श्रीमान् = ऐश्वर्यवान् / सुसंपन्न (पाठ: स्र्/ईमान् → श्रीमान्); मन्थानुष्ठानतत्परः = मन्थन/मन्थ-संस्कार-अनुष्ठान में लगा; पुत्रपौत्रसुखावाप्तिः = पुत्र-पौत्र से सुख की प्राप्ति; भौमप्राणगते = मंगल की प्राण-दशा में; गुरौ = जब गुरु (बृहस्पति) उस अवस्था में हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल की प्राण-दशा में जब गुरु सक्रिय/स्थित होता है, तो जातक देवार्चन और अनुष्ठान-मन्थ आदि साधना में तत्पर रहता है और श्री-संपन्न कहा जाता है। उसी काल-खण्ड में पुत्र-पौत्र से सुख की प्राप्ति का फल भी बताया गया है। यह फल-कथन है — पाठ में गुरु-युगल भौम-प्राण का शुभ-संकेत।

English rendering The text states that when Jupiter falls under the prāṇa of Mars, the native is given to worship of the gods, engaged in churning/ritual performance, and prosperous; there is also said to be attainment of happiness through sons and grandsons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्राण + गुरु)। प्राण यहाँ दशा-उपखण्ड का नाम है; इस श्लोक में केवल फलादेश है, अवधि-सूत्र नहीं।

63.23
अग्निबाढा भवेन्म्त्ऱ्थ्युरर्ठनाशः पधच्युथिः ।
बन्ढुभिबन्ढुथावाप्थिर्भौमप्राणगथे शनौ
agnibāḍhā bhavenmtṟthyurarṭhanāśaḥ padhacyuthiḥ |
banḍhubhibanḍhuthāvāpthirbhaumaprāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्निबाधा = अग्नि से कष्ट/पीड़ा; मृत्युः = मृत्यु-संकेत (शास्त्र-कथन); अर्थनाशः = धन/अर्थ का नाश; पदच्युतिः = पद/स्थान से च्युति; बन्धुभिः…बन्ध…वाप्तिः = बन्धुओं से बन्धन या बन्धुता-प्राप्ति (पाठ-भेद संभव: बन्धनावाप्ति / बन्धुतावाप्ति); भौमप्राणगते = मंगल-प्राण में; शनौ = शनि पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भौम-प्राण में शनि के होने पर अग्नि-बाधा, मृत्यु का भय/संकेत, अर्थ का नाश और पद से गिरना वर्णित है। द्वितीय पाद में बन्धु-सम्बन्ध से बन्धन या बन्धुता-प्राप्ति का पाठ आता है — दोनों पाठ संभव; अर्थ-संतुलन के लिए “बन्धु-सम्बन्धी बाधा/बन्धन” ही सुरक्षित ग्रहण है। यह मिश्र-कठिन फल का कथन है, नियति की घोषणा नहीं।

English rendering The text states that with Saturn under Mars’s prāṇa there may be fire-affliction, death-indication, destruction of wealth, and fall from position; the second pāda concerns kinship—bondage or association—where the reading is uncertain (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्राण + शनि)। शुभ-अशुभ फल का माप यहाँ संख्या में नहीं; केवल शास्त्रीय संकेत।

63.24
धिव्याम्बरसमुथ्पथ्थिर्धिव्याभरणभूषिथः ।
धिव्याङ्गनायाः सम्प्राप्थिर्भौमप्राणगथे बुढे
dhivyāmbarasamuthpaththirdhivyābharaṇabhūṣithaḥ |
dhivyāṅganāyāḥ samprāpthirbhaumaprāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिव्याम्बरसमुत्पत्तिः = दिव्य/उत्तम वस्त्रों की प्राप्ति; दिव्याभरणभूषितः = दिव्य आभूषणों से अलंकृत; दिव्याङ्गनायाः सम्प्राप्तिः = दिव्य/उत्कृष्ट स्त्री का संयोग; भौमप्राणगते = मंगल-प्राण में; बुधे = बुध पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भौम-प्राण में बुध सक्रिय होने पर दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण और दिव्य-अङ्गना (उत्तम स्त्री-सम्बन्ध) की प्राप्ति का फल बताया गया है। यह भोग-वैभव और सौन्दर्य-संयोग का शुभ-वर्णन है। फल को शास्त्र-वाक्य के रूप में ही पढ़ें, न कि निश्चित घटना के रूप में।

English rendering The text states that when Mercury is under the prāṇa of Mars, there is said to arise fine/divine apparel, adornment with excellent ornaments, and the attainment of a refined or “divine” consort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्राण + बुध)। वस्त्र-आभरण-अङ्गना यहाँ प्रतीकात्मक भोग-फल हैं, मापनीय राशि नहीं।

63.25
पथनोथ्पाथिपीदा च नेथ्रक्षोभो महध्भयम् ।
भुजङ्गाध् ध्रव्यहानिश्च भौमप्राणगथे ढ्वजे
pathanothpāthipīdā ca nethrakṣobho mahadhbhayam |
bhujaṅgādh dhravyahāniśca bhaumaprāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पतन-उत्पाति-पीडा = गिरने व उत्पात (आकस्मिक विपत्ति) की पीड़ा (पाठ-भेद संभव); नेत्र-क्षोभः = नेत्रों में विकार/पीड़ा; महद्भयम् = महाभय; भुजङ्गात् = सर्प से; द्रव्य-हानिः = द्रव्य/धन की हानि; भौम-प्राण-गते ध्वजे = ध्वज (केतु) की सूक्ष्मदशा में जब मंगल की प्राणदशा चले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की सूक्ष्मदशा में मंगल-प्राणदशा चलने पर पतन व आकस्मिक उत्पात की पीड़ा, नेत्र-विकार, महाभय, तथा सर्प के निमित्त से धन-हानि का कष्ट-फल वर्णित है। "पतनोत्पाति" पद पर पाठ-भेद संभव; इसे शास्त्र-कथन मानिए, भय-प्रेरणा नहीं।

English rendering During Ketu's sūkṣma-daśā, when Mars's prāṇa-daśā runs, the text states there is affliction from falls and sudden calamity, disorder of the eyes, great fear, and loss of wealth on account of a serpent.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-सूक्ष्म में मंगल-प्राण); अवधि श्लोकबाह्य = सूक्ष्म-अवधि × (मंगल के 7 वर्ष) ÷ 120 (Ch.63.1)।

63.26
ढनढान्याधिसम्पथ्थिर्लोकपूजा सुखागमा ।
नानाभोगैर्भवेध्भोगी भौमप्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
ḍhanaḍhānyādhisampaththirlokapūjā sukhāgamā |
nānābhogairbhavedhbhogī bhaumaprāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-आदि-सम्पत्तिः = धन, धान्य आदि की सम्पत्ति; लोक-पूजा = जनसमाज में मान-प्रतिष्ठा; सुख-आगमा = सुख का आगमन; नाना-भोगैः = अनेक प्रकार के भोगों से; भवेत् भोगी = भोगी/सुख-सम्पन्न होता है; भौम-प्राण-गते भृगौ = भृगु (शुक्र) की सूक्ष्मदशा में जब मंगल की प्राणदशा चले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र के अनुसार शुक्र की सूक्ष्मदशा में मंगल-प्राणदशा चलने पर धन-धान्य आदि सम्पत्ति, लोक में प्रतिष्ठा, सुख का आगमन, और नाना भोगों से सम्पन्न भोगी-जीवन का शुभ फल कहा गया है। यह अनुकूल फल-कथन है — शास्त्र का वचन, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering In Venus's sūkṣma-daśā, with Mars's prāṇa-daśā, the text states there is prosperity in wealth and grain, honour among people, the coming of happiness, and one becomes an enjoyer of manifold pleasures.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र-सूक्ष्म में मंगल-प्राण); श्लोक coordinate देता है, अवधि नहीं — प्राणदशा-अवधि = सूक्ष्म-अवधि × (मंगल के 7 वर्ष) ÷ 120 = सूक्ष्म-अवधि × 7/120 (Ch.63.1)।

63.27
ज्वरोन्माधः क्षयोऽर्ठस्य राजविस्नेहसम्भवः ।
धीर्घरोगी धरिध्रः स्याध्भौमप्राणगथे रवौ
jvaronmādhaḥ kṣayo'rṭhasya rājavisnehasambhavaḥ |
dhīrgharogī dharidhraḥ syādhbhaumaprāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वरः = ज्वर; उन्मादः = उन्माद/मानसिक विक्षोभ (शास्त्र-शब्द); अर्थस्य क्षयः = अर्थ का क्षय; राजविस्नेहसम्भवः = राज-अननुग्रह / राज-कोप की संभावना; दीर्घरोगी = दीर्घ रोग से ग्रस्त; दरिद्रः = दरिद्र; भौमप्राणगते = मंगल-प्राण में; रवौ = सूर्य पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भौम-प्राण में सूर्य होने पर ज्वर, उन्माद, अर्थ-क्षय और राज-विस्नेह (शासक/अधिकार से अनुग्रह-हानि) संभव बताया गया है। दीर्घ-रोग और दरिद्रता का भी उल्लेख है। यह कठिन-फल का शास्त्र-वाक्य है — चिकित्सकीय निदान या निश्चित दरिद्र-भविष्य नहीं; केवल मूल-पाठ का अनुवाद।

English rendering The text states that with the Sun under Mars’s prāṇa there may be fever, mental agitation, decay of wealth, disfavor from the ruler, long illness, and poverty—as traditional result-language, not clinical or financial forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्राण + रवि)। रोग-शब्द शास्त्रीय फल-शब्दावली हैं; चिकित्सा-निष्कर्ष नहीं।

63.28
भोजनाधिसुखप्राप्थिर्वस्थ्राभरणजं सुखम् ।
शीथोष्णव्याढिपीदा च भौमप्राणगथे विढौ
bhojanādhisukhaprāpthirvasthrābharaṇajaṃ sukham |
śīthoṣṇavyāḍhipīdā ca bhaumaprāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोजनादिसुखप्राप्तिः = भोजन आदि सुख की प्राप्ति; वस्त्राभरणजं सुखम् = वस्त्र-आभरण से उत्पन्न सुख; शीतोष्णव्याधिपीडा = शीत-उष्ण व्याधियों से पीड़ा; भौमप्राणगते = मंगल-प्राण में; विधौ = चन्द्र (विधु) पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भौम-प्राण में चन्द्र होने पर भोजन आदि सुख तथा वस्त्र-आभरण से सुख मिलता है। साथ ही शीत-उष्ण व्याधि से पीड़ा का मिश्र फल भी कहा गया है — सुख और शारीरिक असुविधा दोनों एक ही काल-खण्ड में। मिश्र-फल को ज्यों का त्यों पढ़ें; न केवल शुभ, न केवल अशुभ।

English rendering The text states that when the Moon is under the prāṇa of Mars, there is enjoyment of food and comforts from clothes and ornaments, yet also affliction from heat-and-cold ailments—a mixed result as the śāstra phrases it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भौम-प्राण + चन्द्र)। यह 63.22–63.28 की भौम-प्राण फल-माला का समापन-पद है; अवधि-गणित अध्याय के दशा-सूत्र भाग में रहता है, यहाँ नहीं।

63.29
अन्नाशने विरक्थश्च विषभीथिस्थठैव च ।
साहसाध्ढननाशश्च राहौ प्राणगथे भवेथ्
annāśane virakthaśca viṣabhīthisthaṭhaiva ca |
sāhasādhḍhananāśaśca rāhau prāṇagathe bhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्नाशन = अन्न-हानि / भोजन-व्यवधान; विरक्त = वैराग्य-भाव / उदासीनता; विषभीति = विष-भय; साहसात् = साहस / उतावलेपन से; धननाश = धन-क्षय; राहौ प्राणगते = राहु की प्राण-दशा (स्व-प्राण) में; भवेत् = शास्त्र-कथित फल होता है।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक राहु की प्राण-दशा में, जब राहु स्वयं प्राण-स्वामी हो, फल बताता है। शास्त्र कहता है कि इस काल में अन्न-संबंधी व्यवधान, वैराग्य-सा उदासीन भाव, और विष-भय की संभावना कही गई है। साथ ही साहस या उतावलेपन से धन-हानि का फल भी पाठ में जुड़ा है। यह फल-कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering When Rāhu’s prāṇa-period runs under Rāhu himself, the text states loss or disruption of food, detachment, fear of poison, and loss of wealth through rash boldness. These are śāstric result-statements for that sub-period, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। प्राण-दशा स्वयं विंशोत्तरी की सूक्ष्म उप-अवधि है; यहाँ केवल फल वर्णित है, अवधि-सूत्र नहीं।

63.30
अङ्गसौख्यं विनिर्भीथिर्वाहनाधेश्च सङ्गथा ।
नीचिः कलहसम्प्राप्थी राहोः प्राणगथे गुरौ
aṅgasaukhyaṃ vinirbhīthirvāhanādheśca saṅgathā |
nīciḥ kalahasamprāpthī rāhoḥ prāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अङ्गसौख्य = शारीरिक सुख; विनिर्भीति = निर्भयता / भय-निवृत्ति; वाहनादि = वाहन आदि; सङ्गति = संगति / प्राप्ति; नीचैः = नीच / अधम जनों से; कलहसम्प्राप्ति = झगड़े की प्राप्ति; राहोः प्राणगते गुरौ = राहु-प्राण में गुरु (बृहस्पति) के अंश में।

हिन्दी भावार्थ राहु की प्राण-दशा में जब गुरु का प्रभाव/उप-अवधि आती है, शास्त्र अङ्ग-सुख, भय की निवृत्ति, और वाहन आदि से जुड़ी संगति का फल कहता है। उसी काल में नीच जनों से कलह की संभावना भी पाठ में कही गई है। मिश्रित फल-वर्णन है—एक ओर सुख-संकेत, दूसरी ओर विवाद का संकेत। पाठ-भेद संभव जहाँ “वाहनादेश्च” आदि पठन अस्थिर हों।

English rendering In Rāhu’s prāṇa with Jupiter, the text states bodily comfort, freedom from fear, and association with conveyances and the like; it also states quarrels with base persons. The verse is a mixed phala statement for that sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गुरु-अंश का काल विंशोत्तरी-अनुपात से निकलेगा; यह श्लोक केवल फल बताता है।

63.31
ग्त्ऱ्हधाहः शरीरे रुङ् नीचैरपह्त्ऱ्थ ढनम् ।
थठा बन्ढनसम्प्राप्थी राहोः प्राणगथे शनौ
gtṟhadhāhaḥ śarīre ruṅ nīcairapahtṟtha ḍhanam |
thaṭhā banḍhanasamprāpthī rāhoḥ prāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गृहदाह = गृह-अग्नि / घर में दाह-संकट; शरीरे रुक् = शरीर में रोग; नीचैः अपहृतं धनम् = अधम जनों द्वारा धन का हरण; बन्धनसम्प्राप्ति = बंधन / कैद-जैसी बाधा; राहोः प्राणगते शनौ = राहु-प्राण में शनि के अंश में।

हिन्दी भावार्थ राहु-प्राण में शनि आने पर शास्त्र गृहदाह, शारीरिक रोग, नीच जनों द्वारा धन-हरण, और बंधन-प्राप्ति का फल कहता है। ये सब शास्त्रीय फल-वाक्य हैं—भय बढ़ाने के लिए नहीं, पाठ की अपनी भाषा में। कठिन फल को भी “शास्त्र कहता है” की सीमा में ही पढ़ें; कोई चिकित्सकीय या कानूनी भविष्यवाणी नहीं।

English rendering When Saturn occupies the prāṇa-period of Rāhu, the text states house-fire, bodily illness, wealth seized by base persons, and the onset of bondage. Report as the śāstra’s claim for that interval, not as fate or panic.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शनि-उपअवधि की अवधि-गणना यहाँ नहीं; केवल फल-वर्णन।

63.32
गुरूपधेशविभवो गुरुसथ्कारवर्ध्ढनम् ।
गुणवाञ्छीलवांश्चापि राहोः प्राणगथे बुढे
gurūpadheśavibhavo gurusathkāravardhḍhanam |
guṇavāñchīlavāṃścāpi rāhoḥ prāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरूपदेश = गुरु का उपदेश; विभव = ऐश्वर्य / समृद्धि; गुरुसत्कारवर्धन = गुरु-सम्मान की वृद्धि; गुणवान् = गुणवान; शीलवान् = शील-संपन्न; राहोः प्राणगते बुधे = राहु-प्राण में बुध के अंश में।

हिन्दी भावार्थ राहु की प्राण-दशा में बुध के अंश में शास्त्र गुरूपदेश, विभव, और गुरु-सत्कार की वृद्धि का फल कहता है। व्यक्ति गुणवान और शीलवान भी कहा गया है—अर्थात् विद्या, विनय और सदाचार की ओर झुकाव का संकेत। राहु-प्राण के अन्य अंशों की कठोरता के बाद यह श्लोक अपेक्षाकृत शुभ फल-वर्णन प्रस्तुत करता है।

English rendering In Rāhu’s prāṇa under Mercury, the text states the guru’s instruction, prosperity, and growth of honor toward the teacher, together with virtue and good character. It is a favorable phala-verse for that sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। बुध-अंश का काल-अनुपात विंशोत्तरी-श्रृंखला से आता है; यहाँ केवल फल है।

63.33
स्थ्रीपुथ्राधिविरोढश्च ग्त्ऱ्हान्निष्क्रमणाधपि ।
साहसाथ्कायहानिश्च राहोः प्राणगथे ढ्वजे
sthrīputhrādhiviroḍhaśca gtṟhānniṣkramaṇādhapi |
sāhasāthkāyahāniśca rāhoḥ prāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीपुत्रादिविरोध = स्त्री-पुत्र आदि से विरोध; गृहात् निष्क्रमण = घर से निकलना / गृह-त्याग; साहसात् = साहस / उतावलेपन से; कायहानि = शरीर-हानि; ध्वज = केतु (ध्वज-संज्ञक); राहोः प्राणगते ध्वजे = राहु-प्राण में केतु के अंश में।

हिन्दी भावार्थ राहु-प्राण में केतु (ध्वज) आने पर शास्त्र स्त्री-पुत्र आदि से विरोध, गृह से निर्गमन, और साहस से शरीर-हानि का फल कहता है। “ध्वज” यहाँ केतु का पारंपरिक संकेत है—पाठ-भेद संभव यदि कहीं अन्य पठन हो। फल कठोर है, पर उसे भय या दवाब के रूप में नहीं पढ़ना; शास्त्र की संरचनात्मक भाषा में रखना।

English rendering In Rāhu’s prāṇa under Ketu (dhvaja), the text states conflict with wife, children and the like, departure from the house, and bodily harm from rash acts. Present as the śāstra’s result-claim for that sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। केतु-उपअवधि की अवधि-गणित यहाँ नहीं दी गई।

63.34
छथ्रवाहनसम्पथ्थिः सर्वार्ठफलसञ्चयः ।
शिवार्चनग्त्ऱ्हारम्भो राहोः प्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
chathravāhanasampaththiḥ sarvārṭhaphalasañcayaḥ |
śivārcanagtṟhārambho rāhoḥ prāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छत्र = छत्र / राजचिह्न-सा वैभव; वाहन = यान; सम्पत्ति = संपत्ति; सर्वार्थफलसञ्चय = सब अर्थों के फलों का संचय; शिवार्चन = शिव-अर्चना; गृहारम्भ = गृह-आरंभ / निर्माण-शुरुआत; भृगु = शुक्र; राहोः प्राणगते भृगौ = राहु-प्राण में शुक्र के अंश में।

हिन्दी भावार्थ राहु-प्राण में शुक्र (भृगु) के अंश में शास्त्र छत्र-वाहन-संपत्ति और सर्वार्थ-फल-संचय का फल कहता है। शिवार्चन और गृह-आरंभ भी इसी काल से जोड़े गए हैं—अर्थात् पूजा-आरंभ और गृह-कार्य की अनुकूलता का शास्त्रीय संकेत। यह राहु-प्राण-श्रृंखला में अपेक्षाकृत समृद्ध फल-वर्णन है।

English rendering When Venus rules the prāṇa of Rāhu, the text states gain of umbrella, conveyance and wealth, accumulation of the fruits of all aims, commencement of Śiva-worship, and the starting of a house. A predominantly auspicious phala-statement for that sub-period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र-अंश का काल-अनुपात दशा-इंजन से निकलेगा; श्लोक केवल फल देता है।

63.35
अर्शाधिरोगभीथिश्च राज्योपध्रवसम्भवः ।
चथुष्पाधाधिहानिश्च राहोः प्राणगथे रवौ
arśādhirogabhīthiśca rājyopadhravasambhavaḥ |
cathuṣpādhādhihāniśca rāhoḥ prāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्शादिरोगभीति = अर्श आदि रोगों का भय; राज्योपद्रवसम्भव = राज्य/शासन-संबंधी उपद्रव की संभावना; चतुष्पादादिहानि = चौपाये आदि की हानि; रवि = सूर्य; राहोः प्राणगते रवौ = राहु-प्राण में सूर्य के अंश में।

हिन्दी भावार्थ राहु-प्राण में सूर्य आने पर शास्त्र अर्श आदि रोगों के भय, राज्य-उपद्रव की संभावना, और चतुष्पद आदि की हानि का फल कहता है। “अर्शाधि” पाठ में रोग-समूह का संकेत है—चिकित्सकीय निदान नहीं, शास्त्रीय फल-भाषा। राज्योपद्रव को भी प्रशासनिक/सामाजिक दबाव के रूप में पाठ कहता है; भय-व्यापार की भाषा में न घुमाएँ।

English rendering In Rāhu’s prāṇa under the Sun, the text states fear of piles and kindred ailments, the possible arising of state-related disturbance, and loss of quadrupeds and the like. These remain the śāstra’s claims for that sub-period—not medical, legal, or political predictions endorsed by the edition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूर्य-उपअवधि की अवधि विंशोत्तरी-अनुपात से निर्धारित होती है; यह श्लोक केवल फल-वर्णन है।

63.36
सौमनस्यं च सध्बुध्ढिः सथ्कारो गुरुधर्शनम् ।
पापाध्भीथिर्मनःसौख्यं राहोः प्राणगथे विढौ
saumanasyaṃ ca sadhbudhḍhiḥ sathkāro gurudharśanam |
pāpādhbhīthirmanaḥsaukhyaṃ rāhoḥ prāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौमनस्य = मन की प्रसन्नता / शुभ मनोवृत्ति; सद्बुद्धि = शुद्ध, यथार्थ बुद्धि; सत्कार = आदर-सम्मान; गुरुदर्शन = गुरु का दर्शन / सत्संग; पापाद्भीति = पाप-दोष से भीति (पाठानुसार फल-शब्द); मनःसौख्य = मानसिक सुख; राहोः प्राणगते विधौ = राहु की प्राण-अवस्था/प्राण-गति में चन्द्र (विधु) के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब राहु की प्राण-गति में चन्द्र सक्रिय हो, तो सौमनस्य, सद्बुद्धि और सत्कार का संकेत मिलता है। गुरु-दर्शन तथा मनःसौख्य का भी उल्लेख है। साथ ही पाप-दोष से भीति का फल-कथन जुड़ा है—अर्थात् मिश्रित मनोदशा का वर्णन, न कि एकतरफ़ा शुभता। यह राहु-प्राण के अन्तर्गत चन्द्र-उपअवधि का शास्त्रीय फल-सूचक श्लोक है।

English rendering The text states that when the Moon operates in Rāhu’s prāṇa period, cheerfulness of mind, sound intellect, honour, and sight of the guru are indicated, together with mental ease. It also records fear of pāpa (fault/evil) as part of the same phala-set—an explicitly mixed result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-प्राण में चन्द्र)। यह श्लोक काल-खण्ड का फल बताता है; अवधि-गणना अन्य दशा-सूत्रों (जैसे विंशोत्तरी का १२०-वर्ष अनुपात) से आती है, यहाँ नहीं।

63.37
चाण्दालाग्निवशाध्भीथिः स्वपधच्युथिरापधः ।
मलिनः श्वाधिव्त्ऱ्थ्थिश्च राहोः प्राणगथे कुजे
cāṇdālāgnivaśādhbhīthiḥ svapadhacyuthirāpadhaḥ |
malinaḥ śvādhivtṟththiśca rāhoḥ prāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चाण्डाल = अत्यन्त नीच/बहिष्कृत सामाजिक स्थिति (शास्त्र-शब्द); अग्नि = अग्नि/दाह; वशाद्भीति = उनके वश से भय; स्वपदच्युति = अपने पद/स्थान से गिरावट; आपदः = विपत्तियाँ; मलिन = मलिनता/अशुचिता; श्वादिवृत्ति = श्वानादि से जुड़ी वृत्ति/व्यवसाय (पाठानुसार); राहोः प्राणगते कुजे = राहु-प्राण में मंगल (कुज)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की प्राण-गति में जब मंगल सक्रिय हो, तो चाण्डाल-अग्नि से भीति, स्वपद से च्युति और आपदाओं का फल वर्णित है। मलिनता तथा श्वानादि-वृत्ति का भी उल्लेख है। यह कर्कश, अस्थिर और अपमान-संभावना वाले दबाव का शास्त्रीय संकेत है—पाठ का दावा, न कि नियति की घोषणा। पाठ-भेद संभव: कुछ पदों की वर्तनी विकिस्रोत-पाठ में अस्थिर दिखती है।

English rendering The text states that when Mars runs in Rāhu’s prāṇa period, fear arising from lowly/fire-related affliction, fall from one’s standing, and calamities are indicated. It further records uncleanness and occupation associated with dogs and the like—harsh, status-threatening phala in the śāstra’s own voice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-प्राण में मंगल)। फल-सूची है; ग्रह-बल या दशा-वर्ष का कोई संख्या-सूत्र यहाँ निहित नहीं।

63.38
हर्षागमो ढनाढिक्यमग्निहोथ्रं शिवार्चनम् ।
वाहनं छथ्रसंयुक्थं निज प्राणगथे गुरौ
harṣāgamo ḍhanāḍhikyamagnihothraṃ śivārcanam |
vāhanaṃ chathrasaṃyukthaṃ nija prāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हर्षागम = हर्ष का आगमन; धनाढिक्य = धन की अधिकता/वृद्धि; अग्निहोत्र = अग्निहोत्र-कर्म; शिवार्चन = शिव-पूजन; वाहन = सवारी/यान; छत्रसंयुक्त = छत्र से युक्त (गौरव-चिह्न); निजप्राणगते गुरौ = गुरु की अपनी (निज) प्राण-गति में गुरु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु अपनी ही प्राण-गति में हो, तो हर्ष का आगमन और धन की वृद्धि का फल वर्णित है। अग्निहोत्र और शिवार्चन जैसे धार्मिक-कर्मों का संकेत भी है। छत्र-युक्त वाहन का उल्लेख मान-गौरव और सुविधा-संपन्न स्थिति की ओर इशारा करता है। यह गुरु-प्राण के ‘स्व’ काल का अपेक्षाकृत उज्ज्वल फल-खण्ड है।

English rendering The text states that when Jupiter runs in its own prāṇa period, joy arrives and wealth increases; fire-oblation and worship of Śiva are indicated, along with a vehicle marked by the umbrella of dignity—phala of honour and plenty in the śāstra’s wording.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु की निज-प्राण)। ‘निज’ केवल स्वामित्व/स्व-अवधि का निर्देश है; कोई अंश-विभाजन या वर्ष-संख्या यहाँ नहीं दी गई।

63.39
व्रथहानिर्विषाधश्च विधेशे ढननाशनम् ।
विरोढो बन्ढुवर्गैश्च गुरोः प्राणगथे शनौ
vrathahānirviṣādhaśca vidheśe ḍhananāśanam |
viroḍho banḍhuvargaiśca guroḥ prāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्रतहानि = व्रत/नियम की हानि; विषाद = विषाद/उदासी; विदेशे = परदेश में; धननाशन = धन का नाश; विरोध = विरोध/कलह; बन्धुवर्ग = बन्धु-कुटुम्ब वर्ग; गुरोः प्राणगते शनौ = गुरु की प्राण-गति में शनि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु की प्राण-गति में जब शनि सक्रिय हो, तो व्रत-हानि और विषाद का फल आता है। विदेश में धन-नाश तथा बन्धु-वर्ग से विरोध भी वर्णित हैं। यह गुरु-प्राण के भीतर शनि-उपअवधि का दबावपूर्ण फल-खण्ड है—कर्तव्य-भंग, दूरी, और सम्बन्ध-तनाव के शास्त्रीय संकेत के रूप में।

English rendering The text states that when Saturn operates in Jupiter’s prāṇa period, loss of vows, dejection, destruction of wealth in a foreign setting, and conflict with kinsfolk are indicated—a sober, straining sub-period in the śāstra’s own claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु-प्राण में शनि)। अवधि निकालने का अनुपात-सूत्र इस श्लोक में नहीं; केवल फलादेश है।

63.40
विध्याबुध्ढिविव्त्ऱ्ध्ढिश्च लोके पूजा ढनागमः ।
स्थ्रीपुथ्राधिसुखप्राप्थिर्गुरोः प्राणगथे बुढे
vidhyābudhḍhivivtṟdhḍhiśca loke pūjā ḍhanāgamaḥ |
sthrīputhrādhisukhaprāpthirguroḥ prāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या-बुद्धि-विवृद्धिः = विद्या और बुद्धि की वृद्धि; लोके पूजा = लोक में सम्मान/प्रतिष्ठा; धन-आगमः = धन का आगमन; स्त्री-पुत्रादि-सुख-प्राप्तिः = पत्नी, संतान आदि के सुख की प्राप्ति; गुरोः प्राणगते = गुरु (बृहस्पति) की प्राणदशा आने पर; बुधे = बुध की (आश्रयदशा में)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की दशा के भीतर जब बृहस्पति की प्राणदशा चलती है, तब विद्या और बुद्धि की वृद्धि, संसार में प्रतिष्ठा, धन का आगमन और स्त्री-पुत्रादि का सुख — ये शुभ फल कहे गए हैं। ज्ञानकारक बृहस्पति और बुद्धिकारक बुध का यह संयोग विशेषतः विद्या-पक्ष को उभारता है। यह ग्रंथ का फल-कथन है, कोई निश्चित घटना नहीं।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā runs within Mercury's period, growth of learning and intellect, public honour, inflow of wealth, and the happiness of spouse and children are declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणदशा-फल)। प्राणदशा विंशोत्तरी की सबसे सूक्ष्म कड़ी है (महादशा → अन्तर → प्रत्यन्तर → सूक्ष्म → प्राण); श्लोक में कोई अंक नहीं, केवल प्राण-स्वामी (गुरु) और आश्रय-स्वामी (बुध) का जोड़ा दिया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) operator के पिन किए विंशोत्तरी चक्र (Σ = 120 वर्ष; गुरु = 16, बुध = 17) में गुरु की प्राणदशा अपने आश्रय-काल का ठीक 16/120 = 2/15 भाग घेरती है — यहाँ वह आश्रय बुध का काल है, जो स्वयं अपने पितृ-काल का 17/120 है। यह शुद्ध अनुपात-गणित है, वही जो टीम ने `==` से सत्यापित किया (vedic-ghadi/kaal दशा-इंजन; दोषिका /120 पर तय)।

63.41
ज्ञानं विभवपाण्दिथ्यं शास्थ्रज्ञानं शिवार्चनम् ।
अग्निहोथ्रं गुरोर्भक्थिर्गुरोः प्राणगथे ढ्वजे
jñānaṃ vibhavapāṇdithyaṃ śāsthrajñānaṃ śivārcanam |
agnihothraṃ gurorbhakthirguroḥ prāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञानम् = ज्ञान; विभव-पाण्डित्यम् = ऐश्वर्य और पांडित्य; शास्त्र-ज्ञानम् = शास्त्रों का ज्ञान; शिव-अर्चनम् = शिव की आराधना; अग्निहोत्रम् = अग्निहोत्र यज्ञ; गुरोः भक्तिः = गुरु के प्रति भक्ति; गुरोः प्राणगते = गुरु की प्राणदशा में; ध्वजे = ध्वज (केतु) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की दशा में जब बृहस्पति की प्राणदशा आती है, तब ज्ञान, वैभव, पांडित्य, शास्त्रज्ञान, शिव-अर्चन, अग्निहोत्र और गुरु-भक्ति का उदय होता है। यह अध्यात्म और विद्या की ओर झुका हुआ शुभ फल-कथन है। ध्वज यहाँ केतु का पर्याय है।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā falls within Ketu's period, there arise knowledge, affluence and scholarship, mastery of śāstra, worship of Śiva, the agnihotra rite, and devotion to the guru.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्तुति-प्रधान (धर्म-अध्यात्म फल)। श्लोक अंकरहित है; इसका स्थान-निर्धारण केवल विंशोत्तरी-नेस्ट में गुरु-प्राण ⊂ केतु-आश्रय के रूप में होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए चक्र में केतु का भार सबसे छोटा (7/120) है, अतः केतु का आश्रय-काल स्वयं संक्षिप्त होता है; उसके भीतर भी गुरु की प्राणदशा उसका 16/120 = 2/15 अंश ही लेती है। यही पुनरावर्ती अनुपात (उपदशा = पितृ-काल × स्व-वर्ष/120) team के दशा-इंजन का मूल है।

63.42
रोगान्मुक्थिः सुखं भोगो ढनढान्यसमागमः ।
पुथ्रधाराधिजं सौख्यं गुरोः प्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
rogānmukthiḥ sukhaṃ bhogo ḍhanaḍhānyasamāgamaḥ |
puthradhārādhijaṃ saukhyaṃ guroḥ prāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोगात् मुक्तिः = रोग से मुक्ति; सुखम् = सुख; भोगः = भोग; धन-धान्य-समागमः = धन-धान्य का संचय; पुत्र-दारादि-जं सौख्यम् = पुत्र, पत्नी आदि से उत्पन्न सुख; गुरोः प्राणगते = गुरु की प्राणदशा में; भृगौ = भृगु-पुत्र (शुक्र) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की दशा में बृहस्पति की प्राणदशा आने पर रोग से छुटकारा, सुख-भोग, धन-धान्य का संचय और पुत्र-कलत्रादि का सौख्य होता है। दो शुभ ग्रहों (गुरु और शुक्र) का यह मेल पूर्णतः अनुकूल फल-कथन है। भृगु यहाँ शुक्र का नाम है।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā runs within Venus's period, release from disease, ease and enjoyment, accumulation of wealth and grain, and the happiness born of children and spouse are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल)। श्लोक में गणना नहीं; केवल गुरु-प्राण ⊂ शुक्र-आश्रय का नेस्ट-स्थान।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए विंशोत्तरी में शुक्र का भार सर्वाधिक (20/120 = 1/6) है, अतः इसका आश्रय-काल सबसे दीर्घ; फिर भी उसके भीतर गुरु की प्राणदशा उसका नियत 16/120 = 2/15 अंश ही रहती है। यह वही exact-`==` अनुपात-अंकगणित है जिसे operator ने Σ=120 पर तय किया।

63.43
वाथपिथ्थप्रकोपं च श्लेष्मोध्रेकं थु धारुणम् ।
रसव्याढिक्त्ऱ्थं शूलं गुरोः प्राणगथे रवौ
vāthapiththaprakopaṃ ca śleṣmodhrekaṃ thu dhāruṇam |
rasavyāḍhiktṟthaṃ śūlaṃ guroḥ prāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वात-पित्त-प्रकोपम् = वात और पित्त का प्रकोप; श्लेष्म-उद्रेकम् = कफ की अधिकता; दारुणम् = घोर/कठोर; रस-व्याधि-कृतम् शूलम् = रस-दोष से उत्पन्न शूल/पीड़ा; गुरोः प्राणगते = गुरु की प्राणदशा में; रवौ = सूर्य की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की दशा में जब बृहस्पति की प्राणदशा आती है, तब वात-पित्त का प्रकोप, कफ की घोर अधिकता और रस-सम्बन्धी विकार से शूल — इस प्रकार का कष्ट-फल बताया गया है। यह त्रिदोष की आयुर्वेदीय शब्दावली में कहा गया ग्रंथ का कथन-मात्र है, न कि कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी; इसे भय-रहित रूप में पढ़ें।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā runs within the Sun's period, it speaks of aggravated vāta and pitta, a severe excess of phlegm, and colic caused by disorders of the bodily fluids.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयुर्वेदीय दोष-वर्णन)। वात/पित्त/श्लेष्म त्रिदोष हैं, कोई गणनीय राशि नहीं; अनुशासन-नियमानुसार यह शास्त्र का कथन है, स्वास्थ्य-भविष्यवाणी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्थान-गणित इतना ही: पिन किए चक्र में सूर्य का भार 6/120 = 1/20 (लघु आश्रय-काल), और उसके भीतर गुरु-प्राण उसका 16/120 = 2/15 अंश। operator की पद्धति यहाँ फल (व्याख्या) को गणित से अलग रखती है — दशा-लम्बाई exact-`==` से, फल केवल ग्रंथ-वाणी।

63.44
छथ्रचामरसंयुक्थं वैभवं पुथ्रसम्पधः ।
नेथ्रकुक्षिगथा पीदा गुरोः प्राणगथे विढौ
chathracāmarasaṃyukthaṃ vaibhavaṃ puthrasampadhaḥ |
nethrakukṣigathā pīdā guroḥ prāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छत्र-चामर-संयुक्तम् वैभवम् = छत्र और चँवर सहित राज-वैभव; पुत्र-सम्पदः = पुत्र-रूप सम्पदा; नेत्र-कुक्षि-गता पीडा = नेत्र और उदर में पीड़ा; गुरोः प्राणगते = गुरु की प्राणदशा में; विधौ = विधु (चन्द्र) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र की दशा में बृहस्पति की प्राणदशा आने पर छत्र-चँवर जैसे राज-चिह्नों सहित वैभव और पुत्र-सम्पदा मिलती है, परन्तु साथ ही नेत्र और उदर में पीड़ा भी कही गई है। यह मिश्र फल-कथन है — ऐश्वर्य के संग एक कष्ट-पक्ष। विधु यहाँ चन्द्र का नाम है।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā runs within the Moon's period, there comes splendour marked by parasol and chowrie and the wealth of sons, yet also affliction affecting the eyes and the belly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र शुभाशुभ)। श्लोक में अंक नहीं; केवल गुरु-प्राण ⊂ चन्द्र-आश्रय का नेस्ट।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए विंशोत्तरी में चन्द्र = 10/120 = 1/12 (मध्यम आश्रय-काल); उसके भीतर गुरु की प्राणदशा नियत 16/120 = 2/15 अंश। यह अनुपात operator के 120-वर्ष चक्र (Ch.46–47) का सीधा वंशज है, जिसे टीम ने बिना सहनशीलता-बैंड के जाँचा।

63.45
स्थ्रीजनाच्च विषोथ्पथ्थिर्बन्ढनं चाथिनिग्रहः ।
धेशान्थरगमो भ्रान्थिर्गुरोः प्राणगथे कुजे
sthrījanācca viṣothpaththirbanḍhanaṃ cāthinigrahaḥ |
dheśāntharagamo bhrānthirguroḥ prāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीजनात् विष-उत्पत्तिः = स्त्री-जन से विष/द्रोह का उदय; बन्धनम् = बंधन/कैद; अति-निग्रहः = कठोर दमन; देशान्तर-गमः = परदेश-गमन; भ्रान्तिः = भ्रम/भटकाव; गुरोः प्राणगते = गुरु की प्राणदशा में; कुजे = कुज (मंगल) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल की दशा में बृहस्पति की प्राणदशा में स्त्रीजन से विष अथवा वैमनस्य का उदय, बंधन और कठोर दमन, परदेश-गमन तथा मानसिक भ्रम — ऐसा कष्ट-प्रधान फल कहा गया है। यह ग्रंथ का कथन है; इसे नियति या भय के रूप में नहीं, विवरण-मात्र समझें।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā runs within Mars's period, it speaks of harm arising through women, of confinement and harsh restraint, of travel abroad, and of mental confusion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कष्ट-वर्णन)। श्लोक अंकरहित; स्थान केवल गुरु-प्राण ⊂ मंगल-आश्रय।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए चक्र में मंगल = 7/120 (केतु के तुल्य लघु भार); उसके भीतर गुरु की प्राणदशा 16/120 = 2/15 अंश। operator की पद्धति फल को ग्रंथ-वाणी रखते हुए केवल दशा-अवधि को गणनीय मानती है।

63.46
व्याढिभिः परिभूथः स्याच्चौरैरपह्त्ऱ्थं ढनम् ।
सर्पव्त्ऱ्श्चिकभीथिश्च गुरोः प्राणगथेऽप्यहौ
vyāḍhibhiḥ paribhūthaḥ syāccaurairapahtṟthaṃ ḍhanam |
sarpavtṟścikabhīthiśca guroḥ prāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्याधिभिः परिभूतः = रोगों से आक्रान्त; चौरैः अपहृतम् धनम् = चोरों द्वारा हरा गया धन; सर्प-वृश्चिक-भीतिः = साँप और बिच्छू का भय; गुरोः प्राणगते = गुरु की प्राणदशा में; अपि अहौ = अहि (राहु) की दशा में भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि राहु की दशा में बृहस्पति की प्राणदशा आने पर मनुष्य रोगों से पीड़ित हो सकता है, धन चोरों द्वारा हरा जा सकता है, तथा सर्प-वृश्चिक का भय रहता है। यह कष्ट-सूचक फल-कथन है, कोई निश्चित घटना नहीं। अहि (सर्प) यहाँ राहु का नाम है।

English rendering The text states that when Jupiter's prāṇadaśā runs within Rāhu's period, one may be beset by diseases, wealth may be carried off by thieves, and fear from snakes and scorpions is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भय/हानि-वर्णन)। श्लोक में अंक नहीं; केवल गुरु-प्राण ⊂ राहु-आश्रय का नेस्ट-स्थान।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए विंशोत्तरी में राहु = 18/120 = 3/20 (दीर्घ आश्रय-काल); उसके भीतर गुरु की प्राणदशा नियत 16/120 = 2/15 अंश। यह वही exact-अनुपात अंकगणित है जिसे operator ने Σ=120 पर `==` से सत्यापित किया।

63.47
ज्वरेण ज्वलिथा कान्थिः कुष्टरोगोधराधिरुक् ।
जलाग्निक्त्ऱ्थम्त्ऱ्थ्युः स्यान्निजप्राणगथे शनौ
jvareṇa jvalithā kānthiḥ kuṣṭarogodharādhiruk |
jalāgniktṟthamtṟthyuḥ syānnijaprāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वरेण ज्वलिता कान्तिः = ज्वर से तपती हुई कान्ति/देह-दीप्ति; कुष्ठ-रोगः = कुष्ठ/त्वचा-रोग; उदर-आधि-रुक् = उदर की व्यथा/पीड़ा; जल-अग्नि-कृत-मृत्युः = जल या अग्नि से हुआ मृत्यु-कष्ट; निज-प्राणगते = अपनी (शनि की) प्राणदशा में; शनौ = शनि की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि की अपनी ही दशा में जब शनि की प्राणदशा (निज-प्राण) चलती है, तब ज्वर से तप्त कान्ति, कुष्ठ-रोग, उदर-पीड़ा तथा जल या अग्नि से उत्पन्न घोर संकट का वर्णन है। यह ग्रंथ का कठोर कष्ट-कथन है — इसे भय, नियति या भविष्यवाणी नहीं, केवल शास्त्र-वाणी समझें। "निज" यहाँ शनि का स्व-योग दर्शाता है।

English rendering The text states that in Saturn's own period, when Saturn's own prāṇadaśā runs, it speaks of a complexion burning with fever, of skin-disease and abdominal pain, and of grave peril from water or fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कठोर कष्ट-वर्णन)। श्लोक अंकरहित; यह विंशोत्तरी का शनि-प्राण ⊂ शनि-आश्रय (स्व-स्व) नोड है, कोई गणनीय राशि नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए चक्र में शनि = 19/120 (सबसे दीर्घ एकल भार); स्व-दशा के भीतर शनि की प्राणदशा उसका 19/120 अंश घेरती है। operator की पद्धति स्पष्ट है — यह अवधि exact-`==` से गणनीय, पर फल केवल ग्रंथ का कथन, भय-रहित।

63.48
ढनं ढान्यं च माङ्गल्यं व्यवहाराभिपूजनम् ।
धेवब्राह्मणभक्थिश्च शनेः प्राणगथे बुढे
ḍhanaṃ ḍhānyaṃ ca māṅgalyaṃ vyavahārābhipūjanam |
dhevabrāhmaṇabhakthiśca śaneḥ prāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनम् धान्यम् = धन और अन्न; माङ्गल्यम् = मंगल/शुभता; व्यवहार-अभिपूजनम् = लेन-देन/व्यवहार में सम्मान; देव-ब्राह्मण-भक्तिः = देव और ब्राह्मणों के प्रति भक्ति; शनेः प्राणगते = शनि की प्राणदशा में; बुधे = बुध की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की दशा में शनि की प्राणदशा आने पर धन-धान्य, शुभता, व्यवहार में प्रतिष्ठा तथा देव-ब्राह्मण-भक्ति की प्राप्ति होती है। यह अनुकूल एवं धर्म-प्रधान फल-कथन है।

English rendering The text states that when Saturn's prāṇadaśā runs within Mercury's period, there come wealth and grain, auspiciousness, esteem in dealings, and devotion to gods and brāhmaṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल)। श्लोक में गणना नहीं; केवल शनि-प्राण ⊂ बुध-आश्रय का नेस्ट-स्थान।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए विंशोत्तरी में शनि = 19/120, बुध = 17/120; शनि की प्राणदशा बुध के आश्रय-काल का 19/120 अंश लेती है, और बुध का काल स्वयं अपने पितृ-काल का 17/120। यही पुनरावर्ती /120 अनुपात operator के दशा-इंजन का आधार है।

63.49
म्त्ऱ्थ्युवेधनधुःखं च भूथोपध्रवसम्भवः ।
परधाराभिभूथथ्वं शनेः प्राणगथे ढ्वजे
mtṟthyuvedhanadhuḥkhaṃ ca bhūthopadhravasambhavaḥ |
paradhārābhibhūthathvaṃ śaneḥ prāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्यु-वेदन-दुःखम् = मृत्यु-तुल्य वेदना का दुःख; भूत-उपद्रव-सम्भवः = भूत/प्रेत-उपद्रव की सम्भावना; परदारा-अभिभूतत्वम् = पर-स्त्री के प्रसंग में अभिभूत/पराभूत होना; शनेः प्राणगते = शनि की प्राणदशा में; ध्वजे = ध्वज (केतु) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की दशा में शनि की प्राणदशा में मृत्यु-तुल्य वेदना का दुःख, भूत-उपद्रव तथा पर-स्त्री-सम्बन्धी पराभव — ऐसा कष्ट-प्रधान फल कहा गया है। यह ग्रंथ का कथन-मात्र है; इसे भय अथवा निश्चित घटना के रूप में न लें। ध्वज यहाँ केतु का नाम है।

English rendering The text states that when Saturn's prāṇadaśā runs within Ketu's period, it speaks of the suffering of death-like pain, of disturbance from spirits, and of being overcome in the matter of another's wife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कष्ट-वर्णन)। श्लोक अंकरहित; स्थान केवल शनि-प्राण ⊂ केतु-आश्रय। भूत/मृत्यु-वेदना गणनीय राशि नहीं, ग्रंथ की भाषा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए चक्र में केतु = 7/120 (लघुतम आश्रय); उसके भीतर शनि की प्राणदशा 19/120 अंश। operator की पद्धति फल को व्याख्या-कोटि में और दशा-अवधि को गणित-कोटि में पृथक् रखती है — यही "गणित बनाम व्याख्या" का अनुशासन।

63.50
पुथ्रार्ठविभवैः सौख्यं क्षिथिपालाधिथः सुखम् ।
अग्निहोथ्रं विवाहश्च शनेः प्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
puthrārṭhavibhavaiḥ saukhyaṃ kṣithipālādhithaḥ sukham |
agnihothraṃ vivāhaśca śaneḥ prāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-अर्थ-विभवैः सौख्यम् = पुत्र, धन और वैभव से सुख; क्षितिपालादितः सुखम् = राजा/शासक आदि से सुख; अग्निहोत्रम् = अग्निहोत्र यज्ञ; विवाहः = विवाह; शनेः प्राणगते = शनि की प्राणदशा में; भृगौ = भृगु-पुत्र (शुक्र) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र की दशा में शनि की प्राणदशा आने पर पुत्र, धन एवं वैभव से सुख, राजा-शासक की ओर से अनुग्रह, अग्निहोत्र-कर्म तथा विवाह जैसा शुभ फल कहा गया है। यह अनुकूल फल-कथन है। भृगु यहाँ शुक्र का नाम है।

English rendering The text states that when Saturn's prāṇadaśā runs within Venus's period, there come happiness through sons, wealth and prosperity, favour from the ruler, the agnihotra rite, and marriage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल)। श्लोक में अंक नहीं; केवल शनि-प्राण ⊂ शुक्र-आश्रय का नेस्ट।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए विंशोत्तरी में शुक्र = 20/120 = 1/6 (दीर्घतम आश्रय-काल); उसके भीतर शनि की प्राणदशा उसका 19/120 अंश घेरती है। यह exact-अनुपात अंकगणित है, वही Σ=120 चक्र जिसे टीम ने `==` से (बिना सहनशीलता-बैंड) सत्यापित किया।

63.51
अक्षिपीदा शिरोव्याढिः सर्पशथ्रुभयं भवेथ् ।
अर्ठहानिर्महाक्लेशः शनेः प्राणगथे रवौ
akṣipīdā śirovyāḍhiḥ sarpaśathrubhayaṃ bhaveth |
arṭhahānirmahākleśaḥ śaneḥ prāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अक्षि-पीडा = आँखों की पीड़ा; शिरो-व्याधिः = सिर का रोग; सर्प-शत्रु-भयम् = साँप और शत्रु का भय; अर्थ-हानिः = धन-हानि; महा-क्लेशः = महान् कष्ट; शनेः प्राणगते = शनि की प्राणदशा में; रवौ = सूर्य की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य की दशा में शनि की प्राणदशा में नेत्र-पीड़ा, शिरो-रोग, सर्प तथा शत्रु का भय, धन-हानि और महान् क्लेश — ऐसा कष्ट-प्रधान फल कहा गया है। शनि-सूर्य का यह स्वाभाविक विरोध ग्रंथ में कष्ट-रूप में वर्णित है; इसे कथन-मात्र समझें, भय-रूप नहीं।

English rendering The text states that when Saturn's prāṇadaśā runs within the Sun's period, it speaks of pain in the eyes, ailment of the head, fear from snakes and enemies, loss of wealth, and great distress.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कष्ट-वर्णन)। श्लोक अंकरहित; स्थान केवल शनि-प्राण ⊂ सूर्य-आश्रय का नेस्ट।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए चक्र में सूर्य = 6/120 = 1/20 (लघुतम एकल भार, अतः संक्षिप्त आश्रय-काल); उसके भीतर शनि की प्राणदशा 19/120 अंश। operator की पद्धति में यह अवधि गणनीय, पर फल केवल ग्रंथ की वाणी — गणित और व्याख्या पृथक्।

63.52
आरोग्यं पुथ्रलाभश्च शान्थिपौष्तिकवर्ढनम् ।
धेवब्राह्मणभक्थिश्च शनेः प्राणगथे विढौ
ārogyaṃ puthralābhaśca śānthipauṣtikavarḍhanam |
dhevabrāhmaṇabhakthiśca śaneḥ prāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरोग्यम् = नीरोगता/स्वास्थ्य; पुत्र-लाभः = पुत्र की प्राप्ति; शान्ति-पौष्टिक-वर्धनम् = शान्ति और पौष्टिक कर्मों की वृद्धि; देव-ब्राह्मण-भक्तिः = देव और ब्राह्मणों के प्रति भक्ति; शनेः प्राणगते = शनि की प्राणदशा में; विधौ = विधु (चन्द्र) की दशा में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्र की दशा में शनि की प्राणदशा आने पर आरोग्य, पुत्र-लाभ, शान्ति एवं पौष्टिक कर्मों की वृद्धि तथा देव-ब्राह्मण-भक्ति — ऐसा शुभ एवं धर्म-प्रधान फल कहा गया है। विधु यहाँ चन्द्र का नाम है।

English rendering The text states that when Saturn's prāṇadaśā runs within the Moon's period, there come health, the gain of a son, increase of peace and nourishing rites, and devotion to gods and brāhmaṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ-फल)। श्लोक में अंक नहीं; केवल शनि-प्राण ⊂ चन्द्र-आश्रय का नेस्ट-स्थान।

हमारा डिकोड (Our Decode) पिन किए विंशोत्तरी में चन्द्र = 10/120 = 1/12 (मध्यम आश्रय-काल); उसके भीतर शनि की प्राणदशा उसका नियत 19/120 अंश। यह वही 120-वर्ष चक्र (Ch.46–47) का पुनरावर्ती अनुपात है जिसे operator ने exact-`==` दशा-इंजन में तय किया।

63.53
गुल्मरोगः शथ्रुभीथिर्म्त्ऱ्गया प्राननाशनम् ।
सर्पाग्निविषथो भीथिः शनेः प्राणगथे कुजे
gulmarogaḥ śathrubhīthirmtṟgayā prānanāśanam |
sarpāgniviṣatho bhīthiḥ śaneḥ prāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुल्म-रोगः = गुल्म (उदर/ग्रन्थि-संबंधी) रोग; शत्रु-भीतिः = शत्रु से भय; मृगया = शिकार/मृगया-प्रसंग; प्राण-नाशनम् = प्राण-हानि का संकेत (शास्त्र-शब्द); सर्प-अग्नि-विषतः = सर्प, अग्नि, विष से; भीतिः = भय; शनेः प्राणगते = शनि की प्राण-गति में; कुजे = मंगल के संबंध में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शनि की प्राण-गति में कुज (मंगल) के प्रसंग में गुल्म-रोग, शत्रु-भीति और मृगया-संबंधी कष्ट का फल वर्णित है। सर्प, अग्नि और विष से भीति तथा प्राण-नाश का भी शास्त्र-शब्द आता है। यह मंगल-शनि प्राण-गति का तीक्ष्ण फल-कथन है; चिकित्सा या निश्चित आपदा के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए — केवल पाठ का कथन है।

English rendering The text states that in Saturn’s prāṇa-gati involving Mars, indications include gulma-type illness, fear of enemies, hunting-related risk, and fear from snakes, fire, and poison, with wording of threat to life (prāṇa-nāśana) as the śāstra’s own phrasing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्राणगति × मंगल)। “प्राणनाशनम्” शास्त्र की कठोर फल-भाषा है, न कि आधुनिक चिकित्सकीय निदान।

63.54
धेशथ्यागो न्त्ऱ्पाध्भीथिर्मोहनं विषभक्षणम् ।
वाथपिथ्थक्त्ऱ्था पीदा शनेः प्राणगथेऽप्यहौ
dheśathyāgo ntṟpādhbhīthirmohanaṃ viṣabhakṣaṇam |
vāthapiththaktṟthā pīdā śaneḥ prāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देश-त्यागः = देश/स्थान छोड़ना; नृपात्-भीतिः = राजा/शासन से भय; मोहनम् = मोह/व्यामोह; विष-भक्षणम् = विष-सेवन (शास्त्र-कथन); वात-पित्त-कफा = त्रिदोष (वात-पित्त-कफ); पीडा = पीड़ा; शनेः प्राणगते = शनि की प्राण-गति में; अपि अहौ = अहि (राहु) के संबंध में भी। पाठ-भेद संभव: “अहौ” = राहु (सर्प-नाम)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शनि की प्राण-गति में अहि (राहु) के प्रसंग में देश-त्याग, नृप-भय, मोहन और विष-भक्षण का फल वर्णित है। वात-पित्त-कफ संबंधी पीड़ा का भी उल्लेख है। “अपि” से यह श्रृंखला का अगला ग्रह-प्रसंग जुड़ता है। त्रिदोष-भाषा आयुर्वेदीय-रूपक है; चिकित्सा-निर्देश नहीं — केवल शास्त्र का फल-कथन।

English rendering The text states that in Saturn’s prāṇa-gati involving Ahi (Rāhu), indications include leaving one’s country, fear from a ruler, delusion, poison-ingestion (as phrased), and distress related to vāta–pitta–kapha imbalance.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्राणगति × राहु/अहि)। ग्रह-नाम “अहि” शास्त्र-परंपरा में राहु के लिए; पाठ-भेद संभव।

63.55
सेनापथ्यं भूमिलाभः संगमः स्वजनैः सह ।
गौरवं न्त्ऱ्पसम्मानं शनेः प्राणगथे गुरौ
senāpathyaṃ bhūmilābhaḥ saṃgamaḥ svajanaiḥ saha |
gauravaṃ ntṟpasammānaṃ śaneḥ prāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सेनापत्यम् = सेनापति-पद/सेना-अधिकार; भूमि-लाभः = भूमि-प्राप्ति; संगमः = मेल/मिलन; स्वजनैः सह = स्वजनों के साथ; गौरवम् = सम्मान/गौरव; नृप-सम्मानम् = राजा का सम्मान; शनेः प्राणगते = शनि की प्राण-गति में; गुरौ = गुरु (बृहस्पति) के संबंध में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शनि की प्राण-गति में गुरु के प्रसंग में सेनापत्य, भूमि-लाभ और स्वजन-संगम का फल कहा गया है। गौरव तथा नृप-सम्मान का भी उल्लेख है। यह शनि-प्राण × गुरु संबंध का उन्नति-सूचक फल-वर्णन है — पद, भूमि और राज-अनुग्रह की भाषा में।

English rendering The text states that in Saturn’s prāṇa-gati involving Jupiter, indications include military command (senāpatya), gain of land, reunion with one’s own people, honour, and recognition from a ruler.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-प्राणगति × गुरु)। अधिकार-लाभ की सूची; कोई अंश/वर्ष-सूत्र नहीं।

63.56
आरोग्यं सुखसम्पथ्थिर्ढर्मकर्माधिसाढनम् ।
समथ्वं सर्वभुथेषु निजप्राणगथे बुढे
ārogyaṃ sukhasampaththirḍharmakarmādhisāḍhanam |
samathvaṃ sarvabhutheṣu nijaprāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आरोग्यम् = स्वास्थ्य; सुख-सम्पत्तिः = सुख और संपत्ति; धर्म-कर्म-अधि-साधनम् = धर्म-कर्म की सिद्धि/साधन (पाठ: साढनम् ≈ साधनम्; पाठ-भेद संभव); समत्वम् = समभाव; सर्व-भूतेषु = सभी प्राणियों में; निज-प्राणगते = निज (स्वकीय) प्राण-गति में; बुधे = बुध के संबंध में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — निज प्राण-गति में जब बुध का प्रसंग हो (इस अध्याय-क्रम में शनि-प्राण-श्रृंखला के अन्तर्गत बुध-फल), तब आरोग्य, सुख-सम्पत्ति और धर्म-कर्म की सिद्धि का फल वर्णित है। सर्वभूतों में समत्व का भी उल्लेख है — संतुलन और समभाव का संकेत। “निजप्राणगते” का पाठ स्व-प्राण-गति/संबंधित प्राण-गति को दर्शाता है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that in the relevant (nija) prāṇa-gati involving Mercury, health, happiness and wealth, accomplishment of dharma and duty, and equanimity toward all beings are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्राणगति × बुध; “निज” पाठ)। समत्व-फल नैतिक-भाव कथन है, कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

63.57
वह्निथस्करथो भीथिः परमाढिर्विषोध्भवः ।
धेहान्थकरणं धुःखं बुढप्राणगथे ढ्वजे
vahnithaskaratho bhīthiḥ paramāḍhirviṣodhbhavaḥ |
dhehānthakaraṇaṃ dhuḥkhaṃ buḍhaprāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वह्नि = अग्नि; तस्कर = चोर; भीतिः = भय; परमाधि = तीव्र मानसिक/शारीरिक पीड़ा; विषोद्भवः = विष से उत्पन्न; देहान्तकरणम् = देह-अन्त / प्राण-संकट का संकेत (शास्त्र-वाक्य); दुःखम् = क्लेश; बुधप्राणगते = बुध की प्राण-दशा में; ध्वजे = ध्वज = केतु (राहु-केतु परंपरा में केतु का संकेत; पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब बुध की प्राण-दशा ध्वज (केतु) के सन्दर्भ में चलती है, तब अग्नि और चोर से भय, विष से उत्पन्न तीव्र आधि, देह-अन्त का संकेत और गहरा दुःख — ये फल-कथन दिए गए हैं। यह बुध-प्राण + केतु-सन्दर्भ का मिश्रित-कठोर वर्णन है। पाठ-भेद संभव; फल को भविष्यवाणी नहीं, शास्त्र-वाक्य समझें।

English rendering The text states that under Mercury’s prāṇa-daśā in the context of the “banner” (Ketu), there is fear from fire and thieves, severe affliction arising from poison, bodily extremity, and suffering. Report as the śāstra’s claim, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्राण × केतु-सन्दर्भ)। प्राण-दशा स्वयं विंशोत्तरी-श्रेणी की सूक्ष्म कड़ी है; अवधि-अनुपात अध्याय के दशा-सूत्रों से आता है, इस श्लोक में नहीं।

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63.58
प्रभुथ्वं ढनसम्पथ्थिः कीर्थिर्ढर्मः शिवार्चनम् ।
पुथ्रधाराधिकं सौख्यं बुढप्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
prabhuthvaṃ ḍhanasampaththiḥ kīrthirḍharmaḥ śivārcanam |
puthradhārādhikaṃ saukhyaṃ buḍhaprāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रभुत्वम् = अधिकार / नेतृत्व; धनसम्पत्तिः = धन-ऐश्वर्य; कीर्तिः = यश; धर्मः = धार्मिक आचरण / कर्तव्य; शिवार्चनम् = शिव-पूजा; पुत्रधाराधिकम् = पुत्र और पत्नी संबंधी अधिक; सौख्यम् = सुख; बुधप्राणगते = बुध की प्राण-दशा में; भृगौ = भृगु = शुक्र

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की प्राण-दशा जब भृगु (शुक्र) के सन्दर्भ में हो, तब प्रभुत्व, धन-सम्पत्ति, कीर्ति, धर्म और शिव-अर्चन — तथा पुत्र-पत्नी से अधिक सौख्य — ये फल वर्णित हैं। यह शुभ-फल-श्रृंखला है; व्याख्या शास्त्र-वाक्य के रूप में ही रखें, न कि निश्चित भाग्य के रूप में।

English rendering The text states that when Mercury’s prāṇa runs in the context of Bhṛgu (Venus), lordship, wealth, fame, dharma, worship of Śiva, and heightened happiness through spouse and children are indicated. These are phala-statements of the śāstra, not guarantees.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्राण × शुक्र-सन्दर्भ)। संख्या-सूत्र यहाँ नहीं; केवल शुभ-फल-सूची।

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63.59
अन्थर्धाहो ज्वरोन्माधौ बान्ढवानां रथि स्थ्रियाः ।
प्राप्यथे स्थीयसम्पथ्थिर्बुढप्राणगथे रवौ
anthardhāho jvaronmādhau bānḍhavānāṃ rathi sthriyāḥ |
prāpyathe sthīyasampaththirbuḍhaprāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्तर्दाहः = भीतर की जलन / दाह; ज्वरः = ज्वर; उन्मादः = उन्माद / मानसिक विक्षोभ (शास्त्र-शब्द, चिकित्सकीय निदान नहीं); बान्धवानाम् = बन्धुओं का; रतिः = अनुराग / सुख-संग (पाठ: रथि → रतिः; पाठ-भेद संभव); स्त्रियाः = स्त्री संबंधी; प्राप्यते = प्राप्त होती है; स्थिरसम्पत्तिः = स्थिर धन-सम्पत्ति (स्थीय → स्थिर; पाठ-भेद संभव); बुधप्राणगते = बुध-प्राण में; रवौ = सूर्य में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध-प्राण जब रवि (सूर्य) के सन्दर्भ में हो, तब अन्तर्दाह, ज्वर और उन्माद — साथ ही बन्धु-स्त्री संबंधी रति — और स्थिर सम्पत्ति की प्राप्ति — ये मिश्रित फल दिए गए हैं। कठोर और सौम्य दोनों पक्ष एक ही श्लोक में हैं; इन्हें शास्त्र-कथन मानें, चिकित्सा या भाग्य-निर्णय नहीं।

English rendering The text states that under Mercury’s prāṇa in the Sun’s context there may be internal burning, fever, and mental agitation, yet also affection involving kin and women, and the gaining of stable wealth. Mixed phala; not medical advice, not fate asserted by the editor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिश्र शुभ-अशुभ; बुध-प्राण × सूर्य)। “स्थीयसम्पत्ति” पाठ पर पाठ-भेद संभव।

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63.60
स्थ्रीलाभश्चार्ठसम्पथ्थिः कन्यालाभो ढनागमः ।
लभथे सर्वथः सौख्यं बुढप्राणगथे विढौ
sthrīlābhaścārṭhasampaththiḥ kanyālābho ḍhanāgamaḥ |
labhathe sarvathaḥ saukhyaṃ buḍhaprāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीलाभः = स्त्री / पत्नी का लाभ; अर्थसम्पत्तिः = अर्थ (धन) की सम्पत्ति; कन्यालाभः = कन्या (पुत्री) का लाभ; धनागमः = धन का आगमन; लभते = प्राप्त करता है; सर्वतः = सब ओर से; सौख्यम् = सुख; बुधप्राणगते = बुध-प्राण में; विधौ = विधु = चन्द्र

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की प्राण-दशा जब विधु (चन्द्र) के सन्दर्भ में चलती है, तब स्त्री-लाभ, अर्थ-सम्पत्ति, कन्या-लाभ और धन-आगम — तथा सर्वतः सौख्य — ये फल वर्णित हैं। यह बुध-प्राण + चन्द्र का शुभ-श्रृंखला वर्णन है; निश्चित घटना नहीं, शास्त्र-वाक्य है।

English rendering The text states that when Mercury’s prāṇa is in the Moon’s context, gain of a partner, wealth, a daughter, inflow of money, and happiness from all sides are indicated. Phala only — report, do not endorse as destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्राण × चन्द्र)। कोई अंश/वर्ष-संख्या इस पद्य में नहीं।

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63.61
पथिथः कुक्षिरोगी च धन्थनेथ्राधिजा व्यठा ।
अर्शांसि प्राणसन्धेहो बुढप्राणगथे कुजे
pathithaḥ kukṣirogī ca dhanthanethrādhijā vyaṭhā |
arśāṃsi prāṇasandheho buḍhaprāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पतितः = पतित / गिरा हुआ (सामाजिक-नैतिक पतन का शास्त्र-शब्द); कुक्षिरोगी = कुक्षि (उदर) रोग वाला; दन्तनेत्राधिजा = दाँत और नेत्र से उत्पन्न; व्यथा = पीड़ा; अर्शांसि = अर्श (बवासीर) — शास्त्र-शब्द; प्राणसन्देहः = प्राण का संशय / जीवन-संकट का संकेत; बुधप्राणगते = बुध-प्राण में; कुजे = कुज = मंगल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध-प्राण जब कुज (मंगल) के सन्दर्भ में हो, तब पतन, कुक्षि-रोग, दाँत-नेत्र से व्यथा, अर्श और प्राण-सन्देह — ये फल-कथन हैं। शरीर-संबंधी शब्द चिकित्सकीय निदान या भय-प्रचार नहीं; केवल मूल पाठ का निष्ठापूर्ण प्रतिपादन। कोई उपाय-दबाव यहाँ नहीं जोड़ा जाता।

English rendering The text states that under Mercury’s prāṇa in Mars’s context there is degradation, abdominal affliction, pain arising in teeth and eyes, piles, and doubt concerning the vital breath. Śāstra-phala language only — not medical diagnosis, not fear-commerce.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्राण × मंगल; कठोर शारीरिक-सामाजिक संकेत)। गणना नहीं, केवल फल-सूची।

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63.62
वस्थ्राभरणसम्पथ्थिर्वियोगो विप्रवैरिथा ।
सन्निपाथोध्भवं धुखं बुढप्राणगथेऽप्यहौ
vasthrābharaṇasampaththirviyogo vipravairithā |
sannipāthodhbhavaṃ dhukhaṃ buḍhaprāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्राभरणसम्पत्तिः = वस्त्र और आभरण (आभूषण) की सम्पत्ति; वियोगः = वियोग / बिछोह; विप्रवैरिता = विप्र (ब्राह्मण) से वैर; सन्निपातोद्भवम् = सन्निपात से उत्पन्न (शास्त्र का ज्वर-संकर संकेत; चिकित्सा नहीं); दुःखम् = क्लेश; बुधप्राणगते = बुध-प्राण में; अपि अहौ = अहि = राहु (सर्प-संकेत; पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध की प्राण-दशा जब अहि (राहु) के सन्दर्भ में भी हो, तब वस्त्र-आभरण की सम्पत्ति के साथ-साथ वियोग, विप्र-वैर और सन्निपात से उत्पन्न दुःख — ये मिश्रित फल दिए गए हैं। धन-वस्तु का लाभ और सम्बन्ध-संकट दोनों एक ही श्लोक में हैं; इन्हें शास्त्र-कथन समझें, न कि निश्चित घटना या भय।

English rendering The text states that even when Mercury’s prāṇa is in the serpent (Rāhu), there is wealth in clothes and ornaments, yet also separation, enmity with the learned/brahmins, and suffering arising from sannipāta. Mixed phala; not medical counsel, not endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्राण × राहु; मिश्र शुभ-अशुभ)। “अहौ” = अहि = राहु — परंपरागत संकेत; पाठ-भेद संभव।

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63.63
अठ प्राणधशाफलाढ्यायः
aṭha prāṇadhaśāphalāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति (अठ → इति; पाठ-भेद संभव) = इस प्रकार / समाप्त; प्राणदशा = प्राण-स्तर की दशा; फल = परिणाम-कथन; अध्यायः = अध्याय (पुष्पिका / समाप्ति-सूत्र)

हिन्दी भावार्थ यह पद्य प्राण-दशा-फलाध्याय की समाप्ति-पुष्पिका है — “इति प्राणदशाफलाध्यायः”। यहाँ नया फल नहीं; अध्याय ६३ में वर्णित प्राण-दशा के फल-समुच्चय का औपचारिक समापन है। पाठ “अठ” संदिग्ध हो सकता है; संधि/लिप्यंतरण से “इति” अधिक सम्भाव्य।

English rendering Colophon: “Thus ends the chapter on the results of prāṇa-daśā.” No new phala — formal close of the prāṇa-result adhyāya. Reading of the first word may vary by recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-समाप्ति / पुष्पिका। प्राण-दशा की अवधि-गणित (विंशोत्तरी १२० वर्ष की अनुपात-श्रृंखला: महा → अन्तर → … → प्राण) इस पद्य में नहीं; केवल अध्याय-सीमा का संकेत।

63.64
चौर्येण निढनप्राप्थिर्विढनथ्वं धरिध्रथा ।
याचकथ्वं विशेषेण बुढप्राणगथे शनौ
cauryeṇa niḍhanaprāpthirviḍhanathvaṃ dharidhrathā |
yācakathvaṃ viśeṣeṇa buḍhaprāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर्येण = चोरी/चौर्य से; निधन-प्राप्तिः = निधन (मृत्यु/विनाश) की प्राप्ति; विधनात्वम् = निर्धनता, धन-हीनता; दरिद्रता = दरिद्र भाव; याचकत्वम् = याचक/भिखारी-सा आश्रय-भाव; विशेषेण = विशेष रूप से; बुध-प्राण-गते = बुध की प्राण-दशा (सूक्ष्म काल-खंड) में; शनौ = शनि में/शनि के (संबंध में)

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक बुध की प्राण-दशा में शनि-संबंधित फल का वर्णन करता है। शास्त्र कहता है कि इस काल-संयोग में चौर्य से जुड़ी निधन-प्राप्ति, विधनात्व और दरिद्रता का संकेत मिलता है। विशेष रूप से याचकत्व — अर्थात् माँगने-आश्रय लेने का भाव — भी इसी प्रसंग में कहा गया है। यह फल-कथन है, न कि नियति की घोषणा; पाठ में काल-खंड और ग्रह-संयोग का संकेत मात्र है।

English rendering The text states that when Saturn is considered under Mercury’s prāṇa (a fine daśā subdivision), there is indication of loss associated with theft, impoverishment, and poverty, and especially a dependent, mendicant condition. It is a classical phala-statement for that sub-period, not a deterministic decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (बुध-प्राण में शनि)। प्राण-खंड स्वयं महा/अन्तर-दशा की अनुपात-गणित से निकलता है; यह श्लोक केवल फल देता है, अवधि-सूत्र नहीं।

63.65
अश्वपाथेन घाथश्च शथ्रुथः कलहागमः ।
निर्विचारवढोथ्पथ्थिर्निजप्राणगथे ढ्वजे
aśvapāthena ghāthaśca śathruthaḥ kalahāgamaḥ |
nirvicāravaḍhothpaththirnijaprāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अश्व-पातेन = घोड़े से गिरने/अश्व-पात से; घातः = घातक आघात/हानि; शत्रुतः = शत्रु से; कलह-आगमः = कलह का आगमन; निर्विचार-वत् = विचार-शून्य/अविमर्श; उत्पत्तिः = उदय/उत्पन्न होना; निज-प्राण-गते = अपनी प्राण-दशा में; ध्वजे = ध्वज में (तकनीकी पद; पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक निज-प्राण-गते ध्वज के फल का कथन है। शास्त्र कहता है — अश्वपात से घातक आघात, शत्रु-पक्ष से दबाव, तथा कलह का आगमन। साथ ही निर्विचार-वृत्ति का उदय भी इसी प्रसंग में कहा गया है। “ध्वज” पद की व्याख्या पाठ-परंपरा के अनुसार ली जाए; संदिग्ध पाठ पर “पाठ-भेद संभव” रखें। फल को काल-संकेत के रूप में पढ़ें, भय या निश्चय के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when Dhvaja is in its own prāṇa-gati, there is indication of harm associated with a fall from a horse, enmity, the arising of quarrel, and the rise of heedless, unreflective conduct. Treat “Dhvaja” carefully where recensions differ; this remains a phala-clause, not a verdict of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निज-प्राण में ध्वज)। अवधि-गणना दशा-अनुपात से होती है; यहाँ केवल फलादेश है।

63.66
क्षेथ्रलाभो वैरिनाशो हयलाभो मनःसुखम् ।
पशुक्षेथ्रढनाप्थिश्च केथोः प्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
kṣethralābho vairināśo hayalābho manaḥsukham |
paśukṣethraḍhanāpthiśca kethoḥ prāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षेत्र-लाभः = भूमि/क्षेत्र का लाभ; वैरि-नाशः = शत्रु/वैर का नाश; हय-लाभः = अश्व-लाभ; मनः-सुखम् = मानसिक सुख; पशु-क्षेत्र-धन-आप्तिः = पशु, भूमि और धन की प्राप्ति; च = और; केतोः = केतु की; प्राण-गते = प्राण-दशा में; भृगौ = शुक्र (भृगु) में

हिन्दी भावार्थ अब केतु की प्राण-दशा में शुक्र-संबंधित फल आरंभ होता है। शास्त्र कहता है — क्षेत्र-लाभ, वैरिनाश, हय-लाभ और मनःसुख। पशु, क्षेत्र और धन की प्राप्ति भी इसी संयोग में कही गई है। यह केतु-प्राण के अन्तर्गत शुक्र-प्रभाव का पारंपरिक फल-वर्णन है — गणना नहीं, फलादेश।

English rendering The text states that when Venus is under Ketu’s prāṇa, there is indication of gain of land, the waning of enmity, acquisition of horses, mental ease, and the attainment of cattle, fields, and wealth. Sense-for-sense: a constructive phala-cluster for that sub-period, reported as the śāstra’s claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्राण में शुक्र)। प्राण-अवधि दशा-श्रृंखला की अनुपात-गणित से आती है; श्लोक केवल फल देता है।

63.67
स्थेयाग्निरिपुभीथिश्च ढनहानिर्मनोव्यठा ।
प्राणान्थकरणं कष्तं केथोः प्राणगथे रवौ
stheyāgniripubhīthiśca ḍhanahānirmanovyaṭhā |
prāṇānthakaraṇaṃ kaṣtaṃ kethoḥ prāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्तेय = चोरी; अग्नि = अग्नि; रिपु = शत्रु; भीतिः = भय; धन-हानिः = धन की हानि; मनो-व्यथा = मानसिक पीड़ा; प्राण-अन्त-करणम् = प्राण-अन्त की ओर ले जाने वाला कष्ट; कष्टम् = कष्ट; केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-दशा में; रवौ = सूर्य में

हिन्दी भावार्थ केतु की प्राण-दशा में सूर्य के फल का वर्णन है। शास्त्र कहता है — स्तेय, अग्नि और रिपु से भय; धन-हानि और मनोव्यथा। “प्राणान्तकरणं कष्टम्” — कठिन कष्ट का संकेत — पारंपरिक फलादेश है, न कि निश्चित मृत्यु-भविष्यवाणी। इसे काल-दबाव और संरचनत्मक तनाव के भाषा में पढ़ें; भय-व्यापार या इलाज-दबाव यहाँ नहीं है।

English rendering The text states that when the Sun is under Ketu’s prāṇa, there is indication of fear linked with theft, fire, and enemies; loss of wealth; mental distress; and severe hardship classically phrased as life-threatening strain. Report it as the śāstra’s phala, not as fate or medical certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्राण में सूर्य)। तीव्र फल-शब्दों को भी स्रोत-कथन मानें, भविष्य-निर्णय नहीं।

63.68
धेवध्विजगुरोः पूजा धीर्घयाथ्रा ढनं सुखम् ।
कर्णे वा लोचने रोगः केथोः प्राणगथे विढौ
dhevadhvijaguroḥ pūjā dhīrghayāthrā ḍhanaṃ sukham |
karṇe vā locane rogaḥ kethoḥ prāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देव = देवता; द्विज = द्विज/ब्राह्मण; गुरोः = गुरु की; पूजा = पूजा/सत्कार; दीर्घ-यात्रा = लंबी यात्रा; धनम् = धन; सुखम् = सुख; कर्णे = कान में; वा = अथवा; लोचने = नेत्र में; रोगः = रोग (शास्त्र-कथन); केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-दशा में; विधौ = चंद्र (विधि) में

हिन्दी भावार्थ केतु-प्राण में चंद्र के फल। शास्त्र कहता है — देव, द्विज और गुरु की पूजा; दीर्घ यात्रा; धन और सुख। साथ ही कर्ण या लोचन में रोग का संकेत भी दिया गया है — यह आयुर्वेदिक निदान नहीं, शास्त्र का पारंपरिक फल-पद है। मिश्र फल (शुभ-अशुभ दोनों पक्ष) एक ही काल-खंड में रखे गए हैं।

English rendering The text states that when the Moon is under Ketu’s prāṇa, there is indication of worship of the gods, the twice-born, and the guru; long travel; wealth and comfort — and also of affliction in the ear or the eye, phrased as classical phala, not as a clinical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्राण में चंद्र)। रोग-पद को स्रोत-भाषा में रखें; चिकित्सा-निष्कर्ष न बनाएँ।

63.69
पिथ्थरोगो नसाव्त्ऱ्ध्ढिर्विभ्रमः सन्निपाथजः ।
स्वबन्ढुजनविध्वेषः केथोः प्राणगथे कुजे
piththarogo nasāvtṟdhḍhirvibhramaḥ sannipāthajaḥ |
svabanḍhujanavidhveṣaḥ kethoḥ prāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पित्त-रोगः = पित्त-संबंधित रोग (शास्त्र-पद); नसा-वृद्धिः = नासिका में वृद्धि/नासा-विकार; विभ्रमः = विभ्रम/भ्रांति; सन्निपात-जः = सन्निपात से उत्पन्न; स्व-बन्धु-जन = अपने बंधु-जन; विद्वेषः = द्वेष/वैमनस्य; केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-दशा में; कुजे = मंगल (कुज) में

हिन्दी भावार्थ केतु-प्राण में मंगल के फल। शास्त्र कहता है — पित्त-रोग, नसा-वृद्धि, सन्निपात-जन्य विभ्रम, तथा स्व-बंधु-जन से विद्वेष। ये आयुर्वेदीय-ज्योतिष की पारंपरिक शब्दावली हैं; इन्हें चिकित्सा, कानूनी या निश्चित भाग्य-वाक्य न मानें। काल-संकेत और संबंध-तनाव के रूप में पाठ पढ़ना सुरक्षित है।

English rendering The text states that when Mars is under Ketu’s prāṇa, there is indication of pitta-type affliction, nasal excess, delirium associated with sannipāta, and estrangement or hostility from one’s own kin. Preserve the wording as the śāstra’s phala; do not convert it into medical advice or fate-certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्राण में मंगल)। देह-पद और बंधु-द्वेष दोनों शास्त्र-कथन हैं, न कि निदान या भविष्य-फैसला।

63.70
विरोढः स्थ्रीसुथाध्यैश्च ग्त्ऱ्हान्निष्क्रमणं भवेथ् ।
स्वसाहसाथ्कार्यहानिः केथोः प्राणगथेऽप्यहौ
viroḍhaḥ sthrīsuthādhyaiśca gtṟhānniṣkramaṇaṃ bhaveth |
svasāhasāthkāryahāniḥ kethoḥ prāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विरोधः = विरोध; स्त्री-सुत-आद्यैः = पत्नी, पुत्र आदि से; गृहात् = घर से; निष्क्रमणम् = निकलना/प्रस्थान; भवेत् = होता है (शास्त्र-कथन); स्व-साहसात् = अपने साहस/उतावलेपन से; कार्य-हानिः = कार्य की हानि; केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-दशा में; अपि = भी; अहौ = अहि अर्थात् राहु में

हिन्दी भावार्थ केतु-प्राण में राहु (अहि) के फल का समापन-श्लोक। शास्त्र कहता है — स्त्री, सुत आदि से विरोध; गृह से निष्क्रमण। अपने साहस या उतावलेपन से कार्य-हानि भी कही गई है। “अप्यहौ” से स्पष्ट है कि यह केतु-प्राण-श्रृंखला में राहु-खंड का फल है। संबंध-सीमा और कार्य-अनुशासन का संकेत — भय या दबाव-उपाय नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu (Ahi) is also under Ketu’s prāṇa, there is indication of opposition from spouse, children, and the like; departure from the home; and loss of undertakings through one’s own rash daring. A relational and action-pattern phala for that sub-period, not a decree of destiny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (केतु-प्राण में राहु/अहि)। दशा-गणित (विंशोत्तरी १२० वर्ष; अन्तर = (महा × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/१२०) पृष्ठभूमि में रहती है; यह श्लोक केवल फल लिखता है।

63.71
स/स्थ्रव्रणैर्महारोगो ह्त्ऱ्थ्पीदाधिसमुध्भवः ।
सुथधारवियोगश्च केथोः प्राणगथे गुरौ
sa/sthravraṇairmahārogo htṟthpīdādhisamudhbhavaḥ |
suthadhāraviyogaśca kethoḥ prāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सस्त्र-व्रणैः = शस्त्र/घाव-संबंधी व्रणों से; महा-रोगः = भारी व्याधि; हृत्-पीडा-आदि-समुद्भवः = हृदय-पीड़ा आदि से उत्पन्न क्लेश; सुत-आदार-वियोगः = पुत्र और पत्नी/कलत्र से वियोग; केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-अवस्था/प्राण-दशा में; गुरौ = गुरु (बृहस्पति) के साथ/गुरौ स्थित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब केतु प्राणगत होकर गुरु से जुड़ता है, तब शस्त्र-व्रण, महा-रोग तथा हृदय-पीड़ा आदि क्लेशों का उल्लेख आता है। साथ ही पुत्र और दार (कलत्र) से वियोग-संबंधी दुःख का भी कथन है। यह फल-वर्णन प्राण-गति के इस विशेष संयोग पर शास्त्रीय संकेत मात्र है — नियति या निश्चयात्मक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that when Ketu stands in prāṇa-gati with Jupiter, there is mention of wounds from weapons, serious illness, heart-pain and related affliction, and separation from children and spouse. These are the śāstra’s own phala-statements for this prāṇa combination, not endorsed predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। प्राण-गति यहाँ दशा/अवस्था-फल की श्रेणी में है; संख्या, वर्ष-अनुपात या बल-इकाई इस श्लोक में नहीं दी गई।

63.72
मथिविभ्रमथीक्ष्णथ्वं क्रूरकर्मरथिः सधा ।
व्यवसनाध्बन्ढनं धुःखं केथोः प्राणगथे शनौ
mathivibhramathīkṣṇathvaṃ krūrakarmarathiḥ sadhā |
vyavasanādhbanḍhanaṃ dhuḥkhaṃ kethoḥ prāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मति-विभ्रम = बुद्धि/मति का भ्रम; तीक्ष्णत्वम् = तीक्ष्णता, कठोर स्वभाव; क्रूर-कर्म-रतिः = क्रूर कर्मों में रुचि; सदा = निरंतर; व्यसनात् = व्यसन/आपदा से; बन्धनम् = कैद/बंधन; दुःखम् = कष्ट; केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-गति में; शनौ = शनि के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु की प्राण-गति जब शनि से संबद्ध होती है, तब मति-विभ्रम, तीक्ष्ण स्वभाव, तथा क्रूर कर्मों की ओर रुझान का उल्लेख है। व्यसन से उत्पन्न बंधन और दुःख का भी कथन आता है। इसे शास्त्रीय फल-सूची के रूप में समझें — भय या निश्चित परिणाम के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when Ketu is in prāṇa-gati with Saturn, there is mention of mental confusion, sharp harshness, inclination toward cruel acts, and bondage and sorrow arising from vice or calamity. Report the śāstra’s claim; do not treat it as fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शनि–केतु प्राण-संयोग का परिणाम-वर्णन है; कोई दशा-वर्ष, बिंदु या अंश-गणना यहाँ नहीं है।

63.73
कुसुमं शयनं भूषा लेपनं भोजनाधिकम् ।
सौख्यं सर्वाङ्गभोग्यं च केथोः प्राणगथे बुढे
kusumaṃ śayanaṃ bhūṣā lepanaṃ bhojanādhikam |
saukhyaṃ sarvāṅgabhogyaṃ ca kethoḥ prāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुसुमम् = पुष्प/पुष्प-सेवा; शयनम् = शय्या/आराम; भूषा = आभूषण; लेपनम् = लेप/सुगंध-अनुलेपन; भोजन-अधिकम् = भोजन की प्रचुरता; सौख्यम् = सुख; सर्व-अङ्ग-भोग्यम् = सर्वांग-भोग/इंद्रिय-सुख; केतोः प्राण-गते = केतु की प्राण-गति में; बुधे = बुध के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि केतु जब प्राणगत होकर बुध से जुड़ता है, तब पुष्प, शयन, भूषा, लेपन तथा भोजन की प्रचुरता का सुख-वर्णन आता है। सर्वांग-भोग्य सौख्य — अर्थात् शरीर और इंद्रिय-स्तर का आनंद — भी इसी संयोग से जोड़ा गया है। यह शुभ-फल का शास्त्रीय कथन है, न कि कोई गारंटी।

English rendering The text states that when Ketu is in prāṇa-gati with Mercury, flowers, restful bedding, ornaments, unguents, abundant food, and all-round bodily enjoyment are indicated as results. These are the śāstra’s listed comforts for this combination.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। बुध–केतु प्राण-गति का सुख-वर्णन; गणना-सूत्र अनुपस्थित।

63.74
ज्ञानमीश्वरभक्थिश्च सन्थोषश्च ढनागमः ।
पुथ्रपौथ्रसम्त्ऱ्ध्ढिश्च निजप्राणगथे भ्त्ऱ्गौ
jñānamīśvarabhakthiśca santhoṣaśca ḍhanāgamaḥ |
puthrapauthrasamtṟdhḍhiśca nijaprāṇagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञानम् = ज्ञान; ईश्वर-भक्तिः = ईश्वर-भक्ति; सन्तोषः = संतोष; धन-आगमः = धन का आगमन; पुत्र-पौत्र-समृद्धिः = पुत्र-पौत्र की समृद्धि; निज-प्राण-गते = अपनी (निज) प्राण-गति में; भृगौ = भृगु/शुक्र में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (केतु/संबंधित ग्रह की) निज प्राण-गति शुक्र (भृगु) में होती है, तब ज्ञान, ईश्वर-भक्ति, संतोष तथा धन-आगम का उल्लेख है। पुत्र-पौत्र की समृद्धि भी इसी फल-सूची में गिनी गई है। पाठ में “निजप्राणगते भृगौ” — शुक्र-संबद्ध अपनी प्राण-अवस्था — यही संयोग का मूल है।

English rendering The text states that in own prāṇa-gati under Venus (Bhṛgu), knowledge, devotion to Īśvara, contentment, inflow of wealth, and prosperity of sons and grandsons are indicated. Again, these are the śāstra’s phala-claims for that prāṇa state.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “निज प्राण” यहाँ दशा/अवस्था-पद है; वर्ष-संख्या या अनुपात इस श्लोक में नहीं कहा गया।

63.75
लोकप्रकाशकीर्थिश्च सुथसौख्यविवर्जिथः ।
उष्णाधिरोगजं धुखं शुक्रप्राणगथे रवौ
lokaprakāśakīrthiśca suthasaukhyavivarjithaḥ |
uṣṇādhirogajaṃ dhukhaṃ śukraprāṇagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लोक-प्रकाश-कीर्तिः = लोक में प्रकाशमान कीर्ति; सुत-सौख्य-विवर्जितः = पुत्र-सुख से रहित; उष्ण-आदि-रोग-जम् = उष्ण आदि रोगों से उत्पन्न; दुःखम् = कष्ट; शुक्र-प्राण-गते = शुक्र की प्राण-गति में; रवौ = सूर्य (रवि) के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब शुक्र प्राणगत होकर सूर्य से जुड़ता है, तब लोक-प्रकाश कीर्ति का एक ओर उल्लेख है, दूसरी ओर पुत्र-सुख से वंचित रहने का कथन। उष्ण आदि रोग-संबंधी दुःख भी इसी संयोग से जोड़ा गया है। मिश्रित फल — यश और क्लेश दोनों — शास्त्र की अपनी भाषा में हैं; इन्हें भय या चिकित्सा-निदान न समझें।

English rendering The text states that when Venus is in prāṇa-gati with the Sun, there is mention of fame that shines among people, yet also of being deprived of the comfort of children, and of suffering arising from heat-related and similar ailments. Mixed phala as the śāstra lists them — not medical diagnosis, not fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र–रवि प्राण-संयोग का मिश्रित परिणाम-वर्णन; कोई अंश-विभाजन या बल-सूत्र नहीं।

63.76
धेवार्चने कर्मरथिर्मन्थ्रथोषणथथ्परः ।
ढनसौभाग्यसम्पथ्थिः शुक्रप्राणगथे विढौ
dhevārcane karmarathirmanthrathoṣaṇathathparaḥ |
ḍhanasaubhāgyasampaththiḥ śukraprāṇagathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देव-अर्चन = देव-पूजा; कर्म-रतिः = कर्म में रुचि/निष्ठा; मन्त्र-तोषण-तत्परः = मन्त्र-जप/मन्त्र से तोषण में तत्पर; धन-सौभाग्य-सम्पत्तिः = धन, सौभाग्य और संपत्ति; शुक्र-प्राण-गते = शुक्र की प्राण-गति में; विधौ = चंद्र (विधि/विधु) के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र जब प्राणगत होकर चंद्र से जुड़ता है, तब देवार्चन में कर्म-रति तथा मन्त्र-तोषण में तत्परता का वर्णन आता है। धन, सौभाग्य और संपत्ति का भी सुखद उल्लेख है। यह शुभ-फल का शास्त्रीय संकेत है — न दबावपूर्ण उपाय-सूची, न निश्चित आर्थिक गारंटी।

English rendering The text states that when Venus is in prāṇa-gati with the Moon, there is inclination toward worship of the gods, devotion to mantra-practice, and acquisition of wealth, good fortune, and prosperity. The śāstra’s listed results for this combination — not financial advice.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र–चंद्र प्राण-गति का धर्म-कर्म और संपत्ति-फल; गणना अनुपस्थित।

63.77
ज्वरो मसूरिकास्फोतकण्दूचिपितकाधिकाः ।
धेवब्राह्मणपूजा च शुक्रप्राणगथे कुजे
jvaro masūrikāsphotakaṇdūcipitakādhikāḥ |
dhevabrāhmaṇapūjā ca śukraprāṇagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वरः = ज्वर; मसूरिका = चेचक/मसूरिका-रोग; स्फोट = फोड़े/स्फोट; कण्डू = खुजली; चि-पिटका-आधिकाः = पिटिका आदि त्वक्-विकार (पाठ-भेद संभव); देव-ब्राह्मण-पूजा = देव और ब्राह्मण की पूजा; शुक्र-प्राण-गते = शुक्र की प्राण-गति में; कुजे = मंगल (कुज) के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र जब प्राणगत होकर मंगल से जुड़ता है, तब ज्वर, मसूरिका, स्फोट, कण्डू तथा पिटिका आदि त्वक्-संबंधी क्लेशों का उल्लेख आता है। साथ ही देव-ब्राह्मण-पूजा का भी कथन है — मिश्रित फल-सूची। रोग-नाम शास्त्र की पारंपरिक भाषा हैं; इन्हें चिकित्सा-निदान या भय-वाणी न समझें।

English rendering The text states that when Venus is in prāṇa-gati with Mars, fever, smallpox-type eruptions, boils, itching, and similar skin afflictions are listed, along with worship of gods and brāhmaṇas. Traditional phala language only — not medical diagnosis, not a fear-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र–मंगल प्राण-संयोग का मिश्रित रोग-और-पूजा वर्णन; कोई संख्यात्मक सूत्र इस श्लोक में नहीं है।

63.78
निथ्यं शथ्रुक्त्ऱ्था पीदा नेथ्रकुक्षिरुजाधयः ।
विरोढः सुह्त्ऱ्धां पीदा शुक्रप्राणगथेऽप्यहौ
nithyaṃ śathruktṟthā pīdā nethrakukṣirujādhayaḥ |
viroḍhaḥ suhtṟdhāṃ pīdā śukraprāṇagathe'pyahau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नित्यं = निरंतर; शत्रुकृत्या = शत्रु-कर्म/शत्रु-उपद्रव से; पीडा = क्लेश; नेत्रकुक्षिरुजादयः = नेत्र–उदर–रोग आदि; विरोधः = विरोध/कलह; सुहृदां पीडा = मित्रों का कष्ट; शुक्रप्राणगते = शुक्र की प्राण-दशा में; अहौ (अहि) = राहु के विषय में (अहि = राहु; पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब राहु शुक्र की प्राण-अवस्था में स्थित हो, तब शत्रुओं के कर्म से निरंतर पीड़ा बताई गई है। नेत्र और कुक्षि (उदर) संबंधी रोगादि का उल्लेख है। मित्रों से विरोध तथा सुहृदों की पीड़ा भी इसी फल-कथन में आती है। यह फल-वर्णन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when Rāhu is in the prāṇa of Venus, there is constant affliction from enemies’ deeds, ailments of the eyes and belly, and conflict with—and suffering among—friends.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। प्राण यहाँ दशा-शृंखला का सूक्ष्म स्तर है; यह श्लोक राहु-के-शुक्र-प्राण में शास्त्रोक्त परिणाम मात्र देता है, कोई काल-माप या बिन्दु-गणना नहीं।

63.79
आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुथ्रस्थ्रीढनवैभवम् ।
छथ्रवाहनसंप्राप्थिः शुक्रप्राणगथे गुरौ
āyurārogyamaiśvaryaṃ puthrasthrīḍhanavaibhavam |
chathravāhanasaṃprāpthiḥ śukraprāṇagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुः = आयु/दीर्घजीवन; आरोग्यम् = निरोगता; ऐश्वर्यम् = प्रभुता-समृद्धि; पुत्र-स्त्री-धन-वैभवम् = सन्तान, पत्नी, धन एवं वैभव; छत्र-वाहन-संप्राप्तिः = छत्र (राजचिह्न) व वाहनों की प्राप्ति; शुक्र = शुक्र (यहाँ सूक्ष्मदशा-स्वामी); प्राणगते = जब प्राणदशा आ पहुँचे; गुरौ = बृहस्पति में (प्राणदशा-स्वामी)। — टिप्पणी: "शुक्रप्राणगते गुरौ" एक संक्षिप्त समास है = "शुक्र[सूक्ष्मे] प्राणगते गुरौ"; अगले श्लोक का षष्ठी-रूप "भृगोः प्राणगते शनौ" इसकी पुष्टि करता है — नामित (शुक्र/भृगु) = सूक्ष्मदशा-स्वामी, सप्तमी-पद (गुरौ/शनौ) = प्राणदशा-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की सूक्ष्मदशा के भीतर जब बृहस्पति की प्राणदशा चलती है, तब शास्त्र कहता है कि आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र-पत्नी-धन का वैभव तथा छत्र और वाहनों की प्राप्ति होती है। यह इस वर्ग (शुक्र-सूक्ष्म) का सर्वाधिक शुभ फल-कथन है।

English rendering In the Śukra (Venus) sūkṣma-daśā, when Jupiter's prāṇa-daśā arrives, the text states there is long life, health, sovereignty, the splendour of children, spouse and wealth, and the gaining of parasol and conveyances.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मूलतः फल-कथन; किन्तु "शुक्रप्राणगते गुरौ" एक विमशोत्तरी दशा-निर्देशांक है, अतः इसका काल गणनीय है। प्रत्येक स्तर पर उप-अवधि = मूल-अवधि × (उप-स्वामी-वर्ष ÷ 120)। बृहस्पति-वर्ष = 16 ⇒ गुरु-प्राण = सूक्ष्मदशा(S) × 16/120 = S × 2/15। किसी भी सूक्ष्मदशा में नौ प्राणदशाएँ विमशोत्तरी-क्रम में उसी स्वामी से आरम्भ होती हैं — शुक्र, रवि, चन्द्र, कुज, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु — और श्लोक 74–82 ठीक इसी क्रम में हैं (स्व-संगति जाँच)। योग-जाँच: Σ प्राण-वर्ष = 20+6+10+7+18+16+19+17+7 = 120, अतः नौ प्राण मिलकर पूरे S को बिना शेष विभाजित करते हैं (exact `==`, कोई सहन-पट्टी नहीं)।

उदाहरण (worked example) परिपाटी: 1 वर्ष = 365.25 दिन (परम्परा में 360-दिन सावन वर्ष भी प्रचलित)। एक पूर्ण शुक्र-श्रृंखला लें — शुक्र-महा → शुक्र-अन्तर → शुक्र-प्रत्यन्तर → शुक्र-सूक्ष्म: S = 20 × (20/120)³ = 20/216 वर्ष = 0.09259 वर्ष = 33.82 दिन। इसमें गुरु-प्राण = 33.82 × 16/120 = 4.51 दिन (≈ 4 दिन 12 घंटे)। यह प्राण शुरू होता है इससे पहले के प्राण-स्वामियों (शुक्र 20 + रवि 6 + चन्द्र 10 + कुज 7 + राहु 18 = 61) के बाद, अर्थात् S के 61/120 अंश पर = 17.19वें दिन से, और समाप्त 77/120 पर = 21.70वें दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) प्राणदशा विमशोत्तरी का पाँचवाँ (गहनतम) स्तर है — वही 120-वर्षीय चक्र जिसे हमारे दशा-इंजन में चन्द्र-नक्षत्र से कीलित किया गया है (Ketu 7, Venus 20 … Mercury 17; Σ = 120)। हर स्तर मात्र (स्वामी-वर्ष/120) से गुणित एक शुद्ध अनुपात है; यहाँ फल शास्त्र का कथन है, गणना केवल काल-निर्देशांक की है — इसी विभाजन को हमने `==` पर पिन किया है, सहन-पट्टी पर नहीं।

63.80
राजोपध्रवजा भीथिः सुखहानिर्महारुजः ।
नीचैः सह विवाधश्च भ्त्ऱ्गोः प्राणगथे शनौ
rājopadhravajā bhīthiḥ sukhahānirmahārujaḥ |
nīcaiḥ saha vivādhaśca bhtṟgoḥ prāṇagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राज-उपद्रव-जा = राज/सत्ता-सम्बन्धी उपद्रव से उत्पन्न; भीतिः = भय; सुख-हानिः = सुख की हानि; महा-रुजः = बड़ा रोग/व्याधि; नीचैः सह = नीच/अधम जनों के साथ; विवादः च = और विवाद-कलह; भृगोः = भृगु (शुक्र) का — सूक्ष्मदशा-स्वामी (षष्ठी); प्राणगते = प्राणदशा आने पर; शनौ = शनि में (प्राणदशा-स्वामी)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की सूक्ष्मदशा में जब शनि की प्राणदशा आती है, तब शास्त्र चेताता है कि राज/सत्ता-जनित उपद्रव से भय, सुख की हानि, गम्भीर रोग तथा नीच व्यक्तियों से विवाद होते हैं। यह उसी शुक्र-वर्ग का प्रतिकूल फल-कथन है, जिसे भय या नियति नहीं, केवल शास्त्रोक्ति समझना चाहिए।

English rendering In Venus's sūkṣma-daśā, when Saturn's prāṇa-daśā runs, the text states there is fear born of royal (authority-related) trouble, loss of comfort, grave illness, and disputes with base persons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन; दशा-निर्देशांक गणनीय। शनि-वर्ष = 19 ⇒ शनि-प्राण = सूक्ष्मदशा(S) × 19/120। विमशोत्तरी-क्रम में शनि, शुक्र-सूक्ष्म का सातवाँ प्राण है (पूर्ववर्ती योग = 20+6+10+7+18+16 = 77; शनि 77/120 से 96/120 अंश तक)।

उदाहरण (worked example) वही S = 33.82 दिन (शुक्र-श्रृंखला, 365.25-दिन वर्ष)। शनि-प्राण = 33.82 × 19/120 = 5.36 दिन (≈ 5 दिन 8½ घंटे); यह S के 77/120 अंश (≈ 21.70वें दिन) से आरम्भ होकर 96/120 अंश (≈ 27.06वें दिन) पर समाप्त होता है।

63.81
सन्थोषो राजसम्मानं नानाधिग्भूमिसम्पधः ।
निथ्यमुथ्साहव्र्ध्ढिः स्याच्छुक्रप्राणगथे बुढे
santhoṣo rājasammānaṃ nānādhigbhūmisampadhaḥ |
nithyamuthsāhavrdhḍhiḥ syācchukraprāṇagathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्तोषः = सन्तोष; राज-सम्मानम् = राजा/सत्ता से सम्मान; नाना-दिक्-भूमि-सम्पदः = अनेक दिशाओं की भूमि-सम्पदा; नित्यम् = निरन्तर; उत्साह-वृद्धिः = उत्साह की वृद्धि; स्यात् = होवे; शुक्र = शुक्र (सूक्ष्मदशा-स्वामी); प्राणगते = प्राणदशा आने पर; बुधे = बुध में (प्राणदशा-स्वामी)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की सूक्ष्मदशा में बुध की प्राणदशा चलने पर शास्त्र कहता है — सन्तोष, राज-सम्मान, अनेक दिशाओं में भूमि/सम्पत्ति का लाभ, और नित्य बढ़ता हुआ उत्साह। शुभ फल-कथन है।

English rendering In Venus's sūkṣma-daśā, when Mercury's prāṇa-daśā runs, the text states there is contentment, royal honour, gains of land in many quarters, and a constantly growing enthusiasm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन; दशा-निर्देशांक गणनीय। बुध-वर्ष = 17 ⇒ बुध-प्राण = सूक्ष्मदशा(S) × 17/120। क्रम में बुध, शुक्र-सूक्ष्म का आठवाँ प्राण है (पूर्ववर्ती योग = 96; बुध 96/120 से 113/120 अंश तक)।

उदाहरण (worked example) वही S = 33.82 दिन। बुध-प्राण = 33.82 × 17/120 = 4.79 दिन (≈ 4 दिन 19 घंटे); S के 96/120 अंश (≈ 27.06वें दिन) से 113/120 अंश (≈ 31.85वें दिन) तक।

63.82
जीविथाथ्मयशोहानिर्ढनढान्यपरिक्षयः ।
थ्यागभोगढनानि स्युः शुक्रप्राणगथे ढ्वजे
jīvithāthmayaśohānirḍhanaḍhānyaparikṣayaḥ |
thyāgabhogaḍhanāni syuḥ śukraprāṇagathe ḍhvaje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवित-आत्म-यशो-हानिः = जीवन, शरीर(स्व) और यश की हानि; धन-धान्य-परिक्षयः = धन-धान्य का क्षय; त्याग-भोग-धनानि = त्याग/व्यय, भोग तथा धन; स्युः = होवें (मिश्रित फल); शुक्र = शुक्र (सूक्ष्मदशा-स्वामी); प्राणगते = प्राणदशा आने पर; ध्वजे = ध्वज अर्थात् केतु में (प्राणदशा-स्वामी)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र की सूक्ष्मदशा में केतु (ध्वज) की प्राणदशा आने पर शास्त्र कहता है कि जीवन, देह और यश को हानि तथा धन-धान्य का क्षय होता है; साथ ही त्याग/व्यय, भोग और धन — मिले-जुले फल। यह शुक्र-वर्ग का अन्तिम प्राण है, अतः फल द्विविध (हानि व भोग दोनों) कहा गया है।

English rendering In Venus's sūkṣma-daśā, when Ketu's (dhvaja) prāṇa-daśā runs, the text states there is loss to life, body and reputation and a wasting of wealth and grain, together with expenditure/renunciation, enjoyment, and riches — mixed fruits.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन; दशा-निर्देशांक गणनीय। केतु-वर्ष = 7 ⇒ केतु-प्राण = सूक्ष्मदशा(S) × 7/120। यह शुक्र-सूक्ष्म का नौवाँ (अन्तिम) प्राण है (113/120 से 120/120 अंश तक); इसके पूर्ण होते ही सूक्ष्मदशा समाप्त — यही Σ = 120 वाली शेष-रहित विभाजन-जाँच की पुष्टि करता है।

उदाहरण (worked example) वही S = 33.82 दिन। केतु-प्राण = 33.82 × 7/120 = 1.97 दिन (≈ 1 दिन 23 घंटे); S के 113/120 अंश (≈ 31.85वें दिन) से 120/120 (= 33.82वें दिन, सूक्ष्म-अन्त) तक। जाँच: 4.51 + 5.36 + 4.79 + 1.97 + शेष पाँच प्राण मिलकर = 33.82 दिन ठीक-ठीक (कोई शेष नहीं)।

63.83
एवम्त्ऱ्क्षधशानां हि सान्थरागां मया ध्विज ।
फलानि कठिथान्यथ्र संक्षेपाधेव थेऽग्रथः
evamtṟkṣadhaśānāṃ hi sāntharāgāṃ mayā dhvija |
phalāni kaṭhithānyathra saṃkṣepādheva the'grathaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; ऋक्षदशानाम् (तृक्षदशानाम्) = नक्षत्र-दशाओं के; सान्तराणाम् = अन्तर्दशाओं सहित; मया = मेरे द्वारा; द्विज = हे द्विज; फलानि = फल; कथितानि = कहे गए; अत्र = यहाँ; संक्षेपात् एव = केवल संक्षेप में; ते अग्रतः = आपके समक्ष

हिन्दी भावार्थ पराशर द्विज से कहते हैं कि नक्षत्र-दशाओं के फल—अन्तर्दशाओं सहित—यहाँ संक्षेप में ही कह दिए गए हैं। यह अध्याय-खण्ड का उपसंहार-वाक्य है: विस्तार नहीं, संकेतात्मक फल-सूची। आगे की पद्धति में पूर्ण विस्तार अन्यत्र अपेक्षित समझा जाए। पाठ “तृक्ष/ऋक्ष” नक्षत्र-दशा की ओर ही इंगित करता है।

English rendering Thus, O twice-born, the results of the nakṣatra daśās together with their antaras have been stated here by me only in brief, before you.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/उपसंहार। श्लोक स्वयं फल-सूची का संक्षेप घोषित करता है; दशा-वर्षों का योग यहाँ नहीं दिया। नक्षत्र-दशा की पूर्ण काल-गणित (जैसे विंशोत्तरी १२० वर्ष: केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७; Σ = १२०; अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्-ग्रह-वर्ष)/१२०) अन्य दशा-अध्यायों के नियम से आती है, इस श्लोक से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ऋक्ष-दशा + अन्तर्दशा के फल-संक्षेप का द्वार है—ठीक वही ढाँचा जिस पर विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र का अनुपात-गणित टिका है। दशा-इंजन महादशा/अन्तर्दशा को नक्षत्र-शेष अंश पर शुद्ध अनुपात से चलाता है; फल-वाक्य अलग परत हैं—“शास्त्र कहता है” के रूप में, गणना से मिलाए बिना। गणित और व्याख्या का यह विभाजन ही संस्करण की अनुशासन-रेखा है।

अध्यायः 64

कालचक्रान्तर्दशाफलाध्यायः

59 श्लोक
64.1
जगध्ढिथाय प्रोक्थानि पुरा यानि पुरारिणा ।
थानि चक्रान्थर्धशाफलानि कठयाम्यहम्
jagadhḍhithāya prokthāni purā yāni purāriṇā |
thāni cakrānthardhaśāphalāni kaṭhayāmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जगद्धिताय = लोक-कल्याण हेतु; प्रोक्तानि = पूर्व-कथित; पुरारिणा = पुरारि (त्रिपुरारि शिव)-द्वारा; चक्रान्तर्दशा = चक्र (काल/राशि-क्रम) के भीतर अन्तर-दशा; फलानि = परिणाम-कथन; कथयामि अहम् = मैं कथन करता हूँ

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जगत् के हित के लिए पुरारि ने पहले जो बातें कही थीं, उन्हीं को अब अन्तर-दशा के फल के रूप में बताया जाएगा। यह अध्याय उन अन्तर-दशा-फलों का आरम्भ है जो चक्र के भीतर ग्रह-अवस्था से जुड़े हैं। आगे के श्लोक मेषादि अंशों और स्व-अन्तर में स्थित ग्रहों के फल-कथन देते हैं।

English rendering The text states that what was formerly spoken by Purāri for the world’s welfare will now be set forth as the results of antardaśā within the cakra. This verse opens the chapter’s phala-series on period-within-period outcomes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-उपक्रम / फल-श्रृंखला का संवाद-द्वार। अन्तर-दशा का काल-विभाजन स्वयं इस श्लोक में नहीं दिया; वह विंशोत्तरी-क्रम (महादशा × अन्तर्ग्रह-वर्ष ÷ १२०) पर निर्भर है, जबकि यहाँ केवल फल-कथन का द्वार खोला गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र में अन्तर-दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ १२० — शुद्ध अनुपात-गणित, नक्षत्र-अंश के व्यतीत-भाग पर। यह अध्याय उस काल-ढाँचे के ऊपर फल-परत रखता है; इंजन काल को `==` से बाँधता है, फल को भविष्य-वाणी नहीं मानता।

64.2
मेषांशे स्वान्थरे भौमे ज्वरश्च व्रणसम्भवः ।
बुढशुक्रेन्धुजीवेषु सुखं शथ्रुभयं रवौ
meṣāṃśe svānthare bhaume jvaraśca vraṇasambhavaḥ |
buḍhaśukrendhujīveṣu sukhaṃ śathrubhayaṃ ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषांशे = मेष-नवांश/अंश में; स्वान्तरे = अपनी अन्तर-दशा में; भौमे = मङ्गल स्थित होने पर; ज्वरः = ज्वर; व्रणसम्भवः = व्रण/घाव की सम्भावना (शास्त्र-कथन); बुध-शुक्र-इन्दु-जीवेषु = बुध, शुक्र, चन्द्र, गुरु में; सुखम् = सुख; शत्रुभयम् = शत्रु से भय; रवौ = सूर्य में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—मेषांश में, स्व-अन्तर-दशा में, यदि भौम हो तो ज्वर और व्रण का संकेत दिया गया है। उसी अवस्था में बुध, शुक्र, चन्द्र या गुरु हों तो सुख का फल कहा गया है। सूर्य हों तो शत्रु-भय का उल्लेख है। यह फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that in Meṣa-aṃśa during one’s own antardaśā, Mars is linked with fever and sores; Mercury, Venus, Moon, or Jupiter with ease; and the Sun with fear from enemies. These are śāstra-phala statements, not deterministic forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश + स्वान्तर + ग्रह)। “मेषांश” = ३०° राशि को ९ समान ३°२०′ खण्डों में बाँटने वाले नवांश-क्रम का मेष-खण्ड; फल स्वयं विभाजन-सूत्र नहीं देता।

64.3
व्त्ऱ्षांशे स्वान्थरे सौरे कलहो रोगसम्भवः ।
विध्यालाभस्थनौ सौख्यं गुरौ थथ्र गथे फलम्
vtṟṣāṃśe svānthare saure kalaho rogasambhavaḥ |
vidhyālābhasthanau saukhyaṃ gurau thathra gathe phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषांशे = वृष-अंश/नवांश में; स्वान्तरे = स्व-अन्तर-दशा में; सौरे = शनि में; कलहः = झगड़ा; रोगसम्भवः = रोग की सम्भावना (शास्त्र-कथन); विद्या-लाभ-स्थनौ = विद्या और लाभ के स्थान/क्षेत्र में; सौख्यम् = सुख; गुरौ = बृहस्पति में; तत्र गते = वहाँ स्थित होने पर; फलम् = कहा गया परिणाम

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—वृषांश में स्व-अन्तर के समय शनि हों तो कलह और रोग का फल कहा गया है। उसी स्थान पर गुरु हों तो विद्या और लाभ-स्थानों से जुड़ा सौख्य बताया गया है। “तत्र गते” से स्पष्ट है कि फल अंश-स्थिति और अन्तर-दशा दोनों पर टिका है।

English rendering The text states that in Vṛṣa-aṃśa during own antardaśā, Saturn is associated with quarrel and illness, while Jupiter there is linked with ease in learning and gain-related spheres. The phala rides on aṃśa-placement within the period.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। वृषांश = वृषभ-राशि के नवांश-मानचित्र में वह अंश-खण्ड; काल-सीमा विंशोत्तरी अन्तर-अनुपात से आती है, यह श्लोक केवल फल देता है।

64.4
धेशथ्यागो म्त्ऱ्थिर्वापि शस्थ्रघाथो ज्वरोऽठवा ।
व्त्ऱ्षभस्वांशके विप्र कुजे थथ्र गथे फलम्
dheśathyāgo mtṟthirvāpi śasthraghātho jvaro'ṭhavā |
vtṟṣabhasvāṃśake vipra kuje thathra gathe phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देशत्यागः = देश-त्याग; मृत्युः वा अपि = अथवा मृत्यु (शास्त्र-कथन); शस्त्रघातः = शस्त्र से आघात; ज्वरः अथवा = अथवा ज्वर; वृषभ-स्वांशके = वृषभ के स्वांश/वृष-अंश में; विप्र = हे विप्र (शिष्य-सम्बोधन); कुजे = मङ्गल में; तत्र गते = वहाँ स्थित होने पर; फलम् = फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—वृषभ-स्वांश में कुज स्थित हों तो देश-त्याग, मृत्यु, शस्त्र-घात या ज्वर—इनमें से कोई फल कहा गया है। सम्बोधन “विप्र” से यह गुरु-शिष्य संवाद की शैली है। चिकित्सा या कानूनी अर्थ में पढ़ना शास्त्र-सीमा से बाहर है; यहाँ केवल पारंपरिक फल-सूची है।

English rendering The text states that when Mars occupies the Vṛṣabha-svāṃśa, the listed outcomes are leaving the land, death, weapon-injury, or fever. Address to the vipra marks didactic dialogue; the list is traditional phala, not a clinical or legal claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मङ्गल + वृषभ-स्वांश)। स्वांश/अंश-नियम D9 (नवांश) विभाजन पर निर्भर: प्रत्येक ३०° → ९ × ३°२०′; फल उस स्थिति का वर्णन है, गणना का सूत्र नहीं।

64.5
वस्थ्राभरणलाभश्च स्थ्रीसुयोगो महथ् सुखम् ।
शुक्रेन्धुसुथचन्ध्रेषु व्त्ऱ्षभस्वांशके फलम्
vasthrābharaṇalābhaśca sthrīsuyogo mahath sukham |
śukrendhusuthacandhreṣu vtṟṣabhasvāṃśake phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्र-आभरण-लाभः = वस्त्र और आभूषण की प्राप्ति; स्त्री-सुयोगः = स्त्री से अनुकूल योग/संग; महत् सुखम् = बड़ा सुख; शुक्र-इन्दुसुत-चन्द्रेषु = शुक्र, बुध (इन्दु-सुत), चन्द्र में; वृषभ-स्वांशके = वृषभ-स्वांश में; फलम् = कहा गया फल

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—वृषभ-स्वांश में जब शुक्र, बुध या चन्द्र हों, तो वस्त्र-आभरण का लाभ, स्त्री-सुयोग और महान् सुख का फल कहा गया है। यह उसी अंश-श्रृंखला का शुभ-पक्ष है जो पूर्व श्लोक में कुज के लिए कठोर फल देता है। ग्रह-भेद से फल-भेद—यही अध्याय की संरचना है।

English rendering The text states that in Vṛṣabha-svāṃśa, Venus, Mercury, or the Moon are linked with gain of clothes and ornaments, favorable association with women, and great ease. Same aṃśa-frame, different graha—different phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। इन्दुसुत = चन्द्र-पुत्र = बुध—पारंपरिक अभिधान; संख्यात्मक सूत्र श्लोक में नहीं।

64.6
न्त्ऱ्पाध् भयं पिथ्त्ऱ्म्त्ऱ्थिः स्ववधाध्यैर्भयं रवौ ।
मिठुने स्वांशके शुक्रे ढनवस्थ्रसमागमः
ntṟpādh bhayaṃ pithtṟmtṟthiḥ svavadhādhyairbhayaṃ ravau |
miṭhune svāṃśake śukre ḍhanavasthrasamāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृपात् भयम् = राजा/शासक से भय; पितृ-मृत्युः = पितृ-मृत्यु (शास्त्र-कथन); स्ववधाद्यैः भयम् = आत्म-हिंसादि से भय; रवौ = सूर्य में; मिथुने स्वांशके = मिथुन-स्वांश में; शुक्रे = शुक्र में; धन-वस्त्र-समागमः = धन और वस्त्र का समागम/प्राप्ति

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—मिथुन-स्वांश में सूर्य हों तो राज-भय, पितृ-मृत्यु और स्ववधादि-भय का उल्लेख है। उसी मिथुन-स्वांश में शुक्र हों तो धन और वस्त्र का समागम कहा गया है। एक ही अंश, दो ग्रह—दो विपरीत फल-सूचियाँ; यह तुलनात्मक फल-कथन है, निर्धारण नहीं।

English rendering The text states that in Mithuna-svāṃśa the Sun is linked with fear from the ruler, paternal death, and fear from self-harm and the like, while Venus there is linked with the meeting of wealth and garments. One aṃśa, two grahas—two phala-lists.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। मिथुन-स्वांश = मिथुन राशि के स्वांश/नवांश-खण्ड में ग्रह-स्थिति; दशा-काल अलग सूत्र से, फल यहाँ केवल गुणात्मक।

64.7
पिथ्त्ऱ्माथ्त्ऱ्म्त्ऱ्थेर्भीथिर्ज्वरश्च व्रणसम्भवः ।
धूरधेशप्रयाणं च मिठुने स्वांशके कुजे
pithtṟmāthtṟmtṟtherbhīthirjvaraśca vraṇasambhavaḥ |
dhūradheśaprayāṇaṃ ca miṭhune svāṃśake kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृ-मातृ-मृतेः भीतिः = माता-पिता की मृत्यु का भय (शास्त्र-कथन); ज्वरः = ज्वर; व्रणसम्भवः = व्रण की सम्भावना; दूर-देश-प्रयाणम् = दूर देश की यात्रा; च = और; मिथुने स्वांशके = मिथुन-स्वांश में; कुजे = मङ्गल में

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—मिथुन-स्वांश में कुज हों तो पितृ-मातृ-मृत्यु का भय, ज्वर, व्रण-सम्भव, तथा दूर-देश-प्रयाण—ये फल कहे गए हैं। मेषांश (६४.२) और वृषभ-स्वांश (६४.४) के बाद यह तीसरा अंश-खण्ड है जहाँ भौम के लिए कठोर/यात्रा-संकेत दोहराए गए हैं। अध्याय आगे अन्य राशियों के अंशों पर इसी शैली में फल देगा।

English rendering The text states that when Mars is in Mithuna-svāṃśa, the listed outcomes are fear concerning the death of parents, fever, sores, and travel to a distant land. The pattern continues the aṃśa-wise Mars phala begun in Meṣa and Vṛṣabha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अंश-स्थिति = देशान्तर का वर्ग-मानचित्र (D9 आदि) पर माप्य; फल-सूची स्वयं अंक-सूत्र नहीं—गणित और व्याख्या को अलग रखना आवश्यक है।

64.8
बुध्ढिविध्याविव्त्ऱ्ध्ढिश्च महाविभवसम्भवः ।
लोके मानश्च प्रीथिश्च मिठेने स्वांशके गुरौ
budhḍhividhyāvivtṟdhḍhiśca mahāvibhavasambhavaḥ |
loke mānaśca prīthiśca miṭhene svāṃśake gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुद्धि-विद्या-विवृद्धि = मति व ज्ञान की वृद्धि; महाविभव-सम्भव = महान् वैभव/ऐश्वर्य का उदय; लोके मान = लोक में सम्मान; प्रीति = प्रसन्नता/अनुराग; मिथुने = मिथुन राशि में; स्वांशके = स्व-नवांश (D9) में स्थित; गुरौ = जब गुरु (बृहस्पति) हों।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु मिथुन राशि में स्थित हों और वहीं अपने स्वांश (स्व-नवांश) में हों, तब बुद्धि और विद्या की वृद्धि होती है। महान् वैभव-ऐश्वर्य का सम्भव बताया गया है। लोक में मान-सम्मान तथा प्रीति भी प्राप्त होती है — यह फल-कथन गुरु की उस स्थिति से जोड़ा गया है।

English rendering The text states that when Jupiter is in Gemini and occupies his own aṃśa (own navāṃśa), there is growth of intellect and learning, the arising of great prosperity, and honor as well as affection in the world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिथुन + गुरु-स्वांश स्थिति)। “स्वांश” यहाँ ग्रह की अपनी राशि के नवांश (D9) में अवस्थिति है; मिथुन (द्विस्वभाव) में नवांश-क्रम स्वराशि से आरम्भ होता है, अतः गुरु का स्वांश (धनु/मीन) उस ३०° खण्ड के निश्चित ३°२०′ भागों में पड़ता है — फल स्वयं शास्त्र का कथन है, न कि नियति का दावा।

64.9
विधेशगमनं व्याढिर्मरणं ढननाशनम् ।
बन्ढुनाशोऽठवा विप्र मिठुने स्वांशके शनौ
vidheśagamanaṃ vyāḍhirmaraṇaṃ ḍhananāśanam |
banḍhunāśo'ṭhavā vipra miṭhune svāṃśake śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदेश-गमन = परदेश-यात्रा; व्याधि = रोग; मरण = मृत्यु-संकेत (फल-शब्द); धन-नाशन = धन की हानि; बन्धु-नाश = बन्धु-जन की क्षति; अथवा = या फिर; विप्र = हे ब्राह्मण (सम्बोधन); मिथुने स्वांशके शनौ = मिथुन में स्व-नवांशस्थ शनि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शनि मिथुन में स्वांशगत हों, तब विदेश-गमन, व्याधि, मरण, धन-नाश, अथवा बन्धु-नाश — इनमें से कोई कष्ट-प्रसंग फल रूप में कहा गया है। सम्बोधन “विप्र” संवाद-शैली का है। यह स्थिति का फल-वर्णन है; इसे निश्चित भाग्य या भय के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when Saturn is in Gemini in his own aṃśa, the indicated results are foreign travel, disease, death, destruction of wealth, or the loss of kin, O vipra. These are śāstric phala-statements, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिथुन + शनि-स्वांश)। नकारात्मक फल-शब्द शास्त्र की अपनी भाषा हैं; गणना-स्तर पर केवल राशि + D9 स्वांश की स्थिति निर्धारित होती है, फल-व्याख्या उससे अलग परत है।

64.10
विध्यावस्थ्राधिलाभश्च धारपुथ्राधिजं सुखम् ।
सर्वथ्र मानमाप्नोथि मिठुने स्वांशके बुढे
vidhyāvasthrādhilābhaśca dhāraputhrādhijaṃ sukham |
sarvathra mānamāpnothi miṭhune svāṃśake buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या-वस्त्र-आदि-लाभ = विद्या, वस्त्र आदि की प्राप्ति; दार-पुत्र-आदि-जं सुखम् = पत्नी-पुत्र आदि से उत्पन्न सुख; सर्वत्र = सब स्थानों में; मानम् आप्नोति = सम्मान पाता है; मिथुने स्वांशके बुधे = मिथुन में स्व-नवांशस्थ बुध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध मिथुन राशि में स्वांशगत हों, तब विद्या, वस्त्र आदि का लाभ तथा दार-पुत्र आदि से सुख प्राप्त होता है। सर्वत्र मान-सम्मान मिलता है — यह कथन बुध की अपनी राशि मिथुन में स्वांश-स्थित होने से जोड़ा गया है। बुध का मिथुन में स्वराशि-बल और स्वांश-युक्ति दोनों का सन्दर्भ यहाँ फल में झलकता है।

English rendering The text states that when Mercury is in Gemini in his own aṃśa, there is gain of learning, garments and the like, happiness arising from spouse and children, and honor obtained everywhere.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मिथुन + बुध-स्वांश)। बुध की स्वराशि मिथुन है; “स्वांशके” से D9 में भी स्व-अंश अपेक्षित है — स्थिति-निर्धारण मॉड्यूलर नवांश-विभाजन (३०° ÷ ९ = ३°२०′) से होता है, फल-कथन अलग है।

64.11
कर्क स्वांशगथे चन्ध्रे पुथ्रधारसुखं महथ् ।
ऐश्वर्यं लभथे लोके मानं प्रीथिं थठैव च
karka svāṃśagathe candhre puthradhārasukhaṃ mahath |
aiśvaryaṃ labhathe loke mānaṃ prīthiṃ thaṭhaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्के = कर्क राशि में; स्वांश-गते = स्व-नवांश में गए/स्थित; चन्द्रे = जब चन्द्र हों; पुत्र-दार-सुखं महत् = पुत्र-पत्नी से महान् सुख; ऐश्वर्यं लभते = ऐश्वर्य प्राप्त करता है; लोके मानं प्रीतिं तथैव च = लोक में मान और प्रीति भी उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्रमा कर्क राशि में स्वांशगत हों, तब पुत्र और दार से महान् सुख मिलता है। लोक में ऐश्वर्य, मान और प्रीति की प्राप्ति भी कही गई है। कर्क चन्द्र की स्वराशि है; स्वांश-युक्ति से यह फल और पुष्ट रूप में वर्णित है।

English rendering The text states that when the Moon is in Cancer and occupies her own aṃśa, there is great happiness from children and spouse, and one obtains prosperity, honor, and affection in the world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्क + चन्द्र-स्वांश)। कर्क स्थिर राशि है; नवांश-क्रम कर्क से आरम्भ होकर नौ ३°२०′ खण्डों में बँटता है — चन्द्र का स्वांश उसी कर्क-शृंखला के उपयुक्त भाग में पड़ता है। फल शास्त्र का कथन है।

64.12
शथ्रुभ्यश्च पशुभ्यश्च भयं राजकुलाथ् थठा ।
आढिव्याढिभयं चैव कर्के स्वांशगथे रवौ
śathrubhyaśca paśubhyaśca bhayaṃ rājakulāth thaṭhā |
āḍhivyāḍhibhayaṃ caiva karke svāṃśagathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रुभ्यः = शत्रुओं से; पशुभ्यः = पशुओं से; भयम् = भय; राजकुलात् तथा = तथा राजकुल से; आधि-व्याधि-भयम् = मानसिक चिन्ता और शारीरिक रोग का भय; चैव = तथा; कर्के स्वांशगते रवौ = कर्क में स्वांशगत सूर्य होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य कर्क में स्वांशगत हों, तब शत्रुओं से, पशुओं से, और राजकुल से भय का फल कहा गया है। आधि (मानसिक क्लेश) और व्याधि (शारीरिक रोग) का भय भी इसी स्थिति से जोड़ा गया है। सूर्य कर्क में नीच-राशि-सम्बन्धी सन्दर्भ रखता है; यहाँ फल-कथन उसी रेखा पर है — इसे भय-व्यापार या निश्चित विपत्ति न समझें।

English rendering The text states that when the Sun is in Cancer in his own aṃśa, there is fear from enemies, from animals, and from the royal household, as well as fear of mental affliction and physical disease. This is the śāstra’s phala-language for that placement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्क + रवि-स्वांश)। कर्क में सूर्य की नीच-स्थिति (पारम्परिक रूप से) फल-भाषा को कठोर बनाती है; “स्वांश” फिर भी D9-अवस्थिति का तकनीकी पद है — फल को गणना से अलग रखकर पढ़ें।

64.13
पुथ्रधारसुह्त्ऱ्थ्सौख्यं ढनव्त्ऱ्ध्ढिस्थठैव च ।
लोके मानं यशश्चैव कर्कांशे बुढशुक्रयोः
puthradhārasuhtṟthsaukhyaṃ ḍhanavtṟdhḍhisthaṭhaiva ca |
loke mānaṃ yaśaścaiva karkāṃśe buḍhaśukrayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-दार-सुहृत्-सौख्यम् = पुत्र, पत्नी और सुहृदों से सुख; धन-वृद्धिः = धन की वृद्धि; तथैव च = तथा उसी प्रकार; लोके मानं यशः = लोक में मान और यश; कर्कांशे = कर्क के अंश (नवांश/कर्क-स्थित अंश) में; बुध-शुक्रयोः = बुध और शुक्र — दोनों के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध अथवा शुक्र कर्कांश में हों (कर्क-सम्बद्ध स्वांश/अंश-अवस्थिति), तब पुत्र, दार और सुहृदों से सौख्य तथा धन की वृद्धि होती है। लोक में मान और यश भी प्राप्त होता है। एक ही फल-सूत्र दोनों ग्रहों (बुध-शुक्र) पर लागू किया गया है — पाठ-भेद संभव जहाँ “कर्कांशे” को केवल कर्क-राशि या कर्क-नवांश तक सीमित पढ़ा जाए।

English rendering The text states that for Mercury and Venus in the Cancer-aṃśa, there is happiness from children, spouse, and friends, increase of wealth, and honor and fame in the world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्कांश + बुध/शुक्र)। “कर्कांश” = कर्क-नवांश (D9 का कर्क-खण्ड) या कर्क में अंश-स्थिति — दोनों पाठ-परम्पराएँ सम्भव; संख्यात्मक विभाजन फिर भी ३०° → ९ × ३°२०′ का ही है। फल शास्त्र का दावा है, भविष्य-वाणी नहीं।

64.14
विषशस्थ्रम्त्ऱ्थेर्भीथिं ज्वररोगाधिसम्भवाम् ।
पीदां चैव समाप्नोथि कर्के स्वांशगथे कुजे
viṣaśasthramtṟtherbhīthiṃ jvararogādhisambhavām |
pīdāṃ caiva samāpnothi karke svāṃśagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विष-शस्त्र-मृतेः भीतिम् = विष, शस्त्र और मृत्यु से भय; ज्वर-रोग-आदि-सम्भवाम् = ज्वर-रोग आदि से उत्पन्न (पीड़ा/भीति); पीडाम् = पीड़ा/क्लेश; समाप्नोति = प्राप्त करता है; कर्के स्वांशगते कुजे = कर्क में स्वांशगत मङ्गल (कुज) होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कुज (मङ्गल) कर्क में स्वांशगत हों, तब विष, शस्त्र और मृत्यु से भय तथा ज्वर-रोग आदि से उत्पन्न पीड़ा का फल कहा गया है। कर्क में मङ्गल की स्थिति शास्त्र में कठोर फल-भाषा से जोड़ी जाती है। इसे भय-व्यापार, रोग-निदान या निश्चित विपत्ति के रूप में न लें — केवल मूलग्रन्थ का फल-कथन है।

English rendering The text states that when Mars is in Cancer in his own aṃśa, one meets fear from poison, weapons, and death, and suffering arising from fever, disease and the like. This is reported as the śāstra’s phala, not as a medical or fatal prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कर्क + कुज-स्वांश)। स्थिति-निर्धारण: कर्क-राशि में ग्रह-देशान्तर + D9 स्वांश-जाँच; फल-शब्द (विष, शस्त्र, ज्वर) शास्त्र की अपनी संकेत-भाषा हैं — गणित से अलग, और चिकित्सकीय/कानूनी दावे नहीं।

64.15
विभवस्याथिलाभश्च शरीरेऽपि सुखं थठा ।
न्त्ऱ्पाथ् सम्मानलाभश्च कर्के स्वांशगथे गुरौ
vibhavasyāthilābhaśca śarīre'pi sukhaṃ thaṭhā |
ntṟpāth sammānalābhaśca karke svāṃśagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभव-अतिलाभ = ऐश्वर्य/समृद्धि का अत्यधिक लाभ; शरीर-सुख = देह-स्तर का सुख/आरोग्य-सुख (शास्त्र-कथन); तथा = उसी प्रकार; नृपात् = नृप/राजसत्ता से; सम्मान-लाभ = मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति; कर्के = कर्कराशि में; स्वांश-गते = स्व-अंश (स्वकीय नवमांश/वर्गांश) स्थित; गुरौ = गुरु (बृहस्पति) के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु कर्कराशि में स्वांशगत हों, तब विभव का अतिलाभ होता है और शरीर में भी सुख रहता है। उसी क्रम में नृप से सम्मान-लाभ भी कहा गया है। यह फल-कथन गुरु की कर्कराशि-स्वांश स्थिति से जोड़ा गया है; पाठ-भेद संभव जहाँ “स्वांश” का वर्ग-संदर्भ संस्करणानुसार भिन्न हो।

English rendering The text states that when Jupiter occupies Cancer in its own aṃśa (svāmśa), there is great gain of prosperity and bodily ease, and also honour received from a king or authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यहाँ केवल स्थिति-संकेत (कर्क + स्वांश + गुरु) पर आधारित परिणाम का शास्त्रीय कथन है; कोई अंश-सूत्र, बलांक या दशा-वर्ष संख्या नहीं दी गई।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश” की पहचान षोडश-वर्ग (विशेषतः D9 नवमांश) की सम-खंड विभाजन-गणित पर निर्भर है — 30° राशि को समान चापों में बाँटकर देशान्तर का मॉड्युलर मानचित्रण। फल स्वयं व्याख्या है; वर्ग-निर्णय शुद्ध गणना है।

64.16
वाधव्याढिभयं घोरं सर्पव्त्ऱ्श्चिकथो भयम् ।
नानाकष्तमवाप्नोथि कर्के स्वांशगथे शनौ
vādhavyāḍhibhayaṃ ghoraṃ sarpavtṟścikatho bhayam |
nānākaṣtamavāpnothi karke svāṃśagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वैधव्य/व्याधि-आधि-भय = वैधव्य या व्याधि-पीड़ा का भय (पाठ-भेद संभव: वाधव्याधि / वैधव्याधि); घोरम् = तीव्र/भीषण; सर्प-वृश्चिकतः = सर्प तथा वृश्चिक से; भयम् = भय; नाना-कष्टम् = अनेक प्रकार के कष्ट; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; कर्के = कर्कराशि में; स्वांश-गते = स्व-अंश स्थित; शनौ = शनि के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कर्कराशि में स्वांशगत शनि के संदर्भ में वैधव्य/व्याधि-आधि का घोर भय और सर्प-वृश्चिक से भय कहा गया है। उसी स्थिति में नाना कष्टों की प्राप्ति भी कही गई है। यह फल-वर्णन है, नियति-घोषणा नहीं; “वाधव्याढि” पाठ में पाठ-भेद संभव है।

English rendering The text states that when Saturn is in Cancer in its own aṃśa, there is severe fear connected with widowhood or disease-affliction, fear from snakes and scorpions, and the experiencing of many hardships. (Reading of the first compound may vary by recension.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कर्क + स्वांश + शनि की युति-स्थिति पर शास्त्र-फल; कोई बिन्दु-गणना, दशा-वर्ष या बलांश यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

64.17
सिंहांशे स्वांशगे भौमे मुखरोगभयं धिशेथ् ।
पिथ्थज्वरक्त्ऱ्थां वाढां शस्थ्रक्षथमठापि वा
siṃhāṃśe svāṃśage bhaume mukharogabhayaṃ dhiśeth |
piththajvaraktṟthāṃ vāḍhāṃ śasthrakṣathamaṭhāpi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंह-अंशे = सिंह-संबंधी अंश (सिंह-नवमांश/सिंह-वर्गांश) में; स्वांश-गे = स्व-अंश स्थित; भौमे = मंगल के; मुख-रोग-भयम् = मुख-संबंधी रोग का भय (शास्त्र-कथन); दिशेत् = निर्देश करे / सूचित करे; पित्त-ज्वर-कृताम् = पित्त-ज्वर से उत्पन्न; बाधाम् = बाधा/पीड़ा; शस्त्र-क्षतम् = शस्त्र से घाव; अथवा = या फिर; अपि वा = अथवा भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सिंहांश में स्वांशगत मंगल के लिए मुखरोग का भय निर्देशित है। उसी संदर्भ में पित्तज्वरकृत बाधा अथवा शस्त्रक्षत भी कहा गया है। चिकित्सा-निदान नहीं — केवल शास्त्रीय फल-सूची; “पिथ्थज्वर…शस्थ्रक्षथ” जैसे रूप पाठ-भेद/लिप्यंतरण-विकृति संभव दर्शाते हैं।

English rendering The text states that when Mars is in its own aṃśa in the Leo aṃśa, it indicates fear of oral affliction, trouble arising from bilious fever, or a wound from a weapon.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “अंश” यहाँ वर्ग/नवमांश-संदर्भ का संकेत है, पर श्लोक स्वयं विभाजन-सूत्र (चाप-लंबाई, क्रम-नियम) नहीं देता।

हमारा डिकोड (Our Decode) अंश-स्थिति का निर्णय षोडश-वर्ग इंजन की समान-चाप विभाजन-गणित से होता है (D9 आदि); यह श्लोक उस गणना का फल-पक्ष है, सूत्र-पक्ष नहीं। गणित और फल को अलग रखना — यही अनुशासन है।

64.18
ढनवस्थ्राधिलाभश्च स्थ्रीपुथ्राधिसुखं थठा ।
बुढभार्गवयोर्विप्र सिंहांशे स्वान्थरस्ठयोः
ḍhanavasthrādhilābhaśca sthrīputhrādhisukhaṃ thaṭhā |
buḍhabhārgavayorvipra siṃhāṃśe svāntharasṭhayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-वस्त्र-अधिलाभ = धन तथा वस्त्र का अधिक लाभ; स्त्री-पुत्र-आदि-सुख = पत्नी, पुत्र आदि से सुख; तथा = तथा; बुध-भार्गवयोः = बुध और भार्गव (शुक्र) के; विप्र = हे विप्र (संबोधन); सिंह-अंशे = सिंहांश में; स्व-अन्तर-स्थयोः = स्व-अन्तर्दशा में स्थित दोनों के।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र — शास्त्र कहता है कि सिंहांश में जब बुध और शुक्र अपनी-अपनी अन्तर्दशा में हों, तब धन-वस्त्र का अधिक लाभ होता है। उसी क्रम में स्त्री-पुत्रादि सुख भी कहा गया है। यह अन्तर्दशा-फल का शास्त्र-कथन है, न कि सुनिश्चित जीवन-घटना।

English rendering O learned one — the text states that when Mercury and Venus stand in their own antardaśās in the Leo aṃśa, there is abundant gain of wealth and garments, together with happiness connected with spouse, children, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; पर “स्वान्तर” शब्द अन्तर्दशा-कालखंड की ओर संकेत करता है। विंशोत्तरी में अन्तर्दशा-अवधि का मानक अनुपात (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष) ÷ 120 है; यह श्लोक अवधि-सूत्र नहीं, फल देता है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी (Σ = 120 वर्ष): शुक्र महादशा = 20 वर्ष, बुध अन्तर = 17 वर्ष।
अन्तर्दशा-अवधि = (20 × 17) ÷ 120 = 340 ÷ 120 = 2 वर्ष 10 मास (सटीक: 2.8̅ वर्ष = 2 वर्ष + 0.8̅×12 मास = 2 वर्ष 10 मास)।
श्लोक इस अवधि का फल नहीं गिनता — केवल सिंहांश-स्वान्तर स्थिति पर शास्त्र-फल बताता है। (दशा-प्रारंभ: चन्द्र-नक्षत्र-भोगांश; अयनांश घोषित करें जब नक्षत्र-सीमा लग्नादि पर निर्भर हो।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वान्तर” = स्व-अन्तर्दशा; अवधि-गणित विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र पर pinned है (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)। हम अवधि का exact अनुपात-`==` करते हैं; फल को शास्त्र-वाक्य मानकर छोड़ते हैं।

64.19
उच्चाथ् पथनभीथिश्च स्वल्पध्रव्यसमागमः ।
विधेशगमनं चैव सिंहे स्वान्थर्गथे विढौ
uccāth pathanabhīthiśca svalpadhravyasamāgamaḥ |
vidheśagamanaṃ caiva siṃhe svānthargathe viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्चात् = ऊँचाई/उच्च स्थान से; पतन-भीति = गिरने का भय; च = और; स्वल्प-द्रव्य-समागम = अल्प धन का योग/प्राप्ति; विदेश-गमनम् = परदेश-यात्रा; च एव = और भी; सिंहे = सिंह राशि में; स्व-अन्तर्-गते = स्व-अन्तर्दशा में स्थित; विधौ = विधु (चन्द्र) के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सिंह राशि में जब चन्द्र अपनी अन्तर्दशा में हों, तब उच्च से पतन का भय कहा गया है। साथ ही स्वल्प द्रव्य का समागम और विदेश-गमन भी कहा गया है। भय-शब्द यहाँ शास्त्रीय फल-सूची का अंग है; हम इसे भय-व्यापार या नियति नहीं बनाते।

English rendering The text states that when the Moon is in its own antardaśā in Leo, there is fear of a fall from a height, only modest acquisition of wealth, and travel to a foreign land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चन्द्र-अन्तर्दशा की अवधि महादशा-स्वामी के वर्ष × 10 ÷ 120 से आती है (चन्द्र = 10 वर्ष विंशोत्तरी में); श्लोक फल देता है, वर्ष-गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) गुरु महादशा (16 वर्ष) में चन्द्र अन्तर्दशा: (16 × 10) ÷ 120 = 160 ÷ 120 = 4/3 वर्ष = 1 वर्ष 4 मास।
सिंह में चन्द्र-स्वान्तर का “कब” इस अनुपात से; “क्या फल” — केवल श्लोक का कथन (उच्चात् पतन-भीति, स्वल्पद्रव्य, विदेशगमन)।

हमारा डिकोड (Our Decode) अन्तर्दशा-खंडन pure ratio arithmetic है — नक्षत्र-भोगांश से महादशा-शेष, फिर (MD × AD) ÷ 120। यह श्लोक उसी कालखंड का सिंह-स्थित चन्द्र-फल बताता है; इंजन काल मापता है, फल नहीं थोपता।

64.20
भयं शथ्रुजनेभ्यश्च ज्वराधिव्याध्ढिसम्भवः ।
ज्ञानहानिर्म्त्ऱ्थेर्भीथिः सिंहे स्वान्थर्गथे रवौ
bhayaṃ śathrujanebhyaśca jvarādhivyādhḍhisambhavaḥ |
jñānahānirmtṟtherbhīthiḥ siṃhe svānthargathe ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भयम् = भय; शत्रु-जनेभ्यः = शत्रु-जनों से; च = और; ज्वर-आदि-व्याधि-सम्भवः = ज्वर आदि व्याधि की संभावना (शास्त्र-कथन); ज्ञान-हानिः = ज्ञान की हानि/क्षय; मृतेः भीतिः = मृत्यु का भय (शास्त्र-शब्द); सिंहे = सिंह में; स्व-अन्तर्-गते = स्व-अन्तर्दशागत; रवौ = रवि (सूर्य) के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सिंह में स्वान्तर्गत सूर्य के लिए शत्रुजनों से भय और ज्वरादि व्याधि का संभव कहा गया है। ज्ञानहानि तथा मृत्यु-भीति भी उसी फल-सूची में हैं। “भीति/व्याधि/मृत्यु” यहाँ शास्त्र के शब्द हैं — हम इन्हें चिकित्सा, कानूनी या नियति-घोषणा के रूप में नहीं पढ़ते; केवल पाठ का प्रतिवेदन।

English rendering The text states that when the Sun is in its own antardaśā in Leo, there is fear from enemies, the possibility of fever and other illnesses, loss of knowledge, and fear of death — all as traditional result-statements, not as endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सूर्य-अन्तर्दशा-अवधि = (महादशा-वर्ष × 6) ÷ 120 (सूर्य = 6 वर्ष विंशोत्तरी); श्लोक अवधि नहीं, फल कहता है।

उदाहरण (worked example) शनि महादशा (19 वर्ष) में सूर्य अन्तर्दशा: (19 × 6) ÷ 120 = 114 ÷ 120 = 0.95 वर्ष = 11 मास 12 दिन (0.95 × 360 = 342 तिथि-दिन ≈ 11 मास 12 दिन, सौर-मास परिपाटी से)।
सिंह-स्वान्तर-रवि का काल इस अनुपात से; फल — केवल श्लोकोक्त सूची।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी में सूर्य-खंड = 6/120; exact `==` अनुपात, tolerance-पट्टी नहीं। फल-वाक्य (“ज्ञानहानि”, “मृतेर्भीति”) को हम engine-output नहीं बनाते — स्रोत-पाठ का report मात्र।

64.21
ढनढान्याधिलाभं च प्रसाधं ध्विजभूपयोः ।
विध्याव्त्ऱ्ध्ढिमवाप्नोथि सिंहे स्वान्थर्गथे गुरौ
ḍhanaḍhānyādhilābhaṃ ca prasādhaṃ dhvijabhūpayoḥ |
vidhyāvtṟdhḍhimavāpnothi siṃhe svānthargathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-धान्य-अधिलाभम् = धन और धान्य का अधिक लाभ; च = और; प्रसादम् = प्रसाद/अनुग्रह; द्विज-भूपयोः = ब्राह्मण तथा भूप (राजा) का; विद्या-वृद्धिम् = विद्या की वृद्धि; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; सिंहे = सिंह में; स्व-अन्तर्-गते = स्व-अन्तर्दशागत; गुरौ = गुरु के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सिंह राशि में जब गुरु अपनी अन्तर्दशा में हों, तब धन-धान्य का अधिक लाभ होता है। द्विज और भूप का प्रसाद तथा विद्या की वृद्धि भी कही गई है। यह शुभ-फल-सूची का शास्त्र-कथन है; “अवाप्नोति” को हम सुनिश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं दोहराते।

English rendering The text states that when Jupiter is in its own antardaśā in Leo, one obtains abundant gain of wealth and grain, the favour of brahmins and kings, and increase of learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। गुरु-अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × 16) ÷ 120 (गुरु = 16 वर्ष); श्लोक फल देता है। तुलना हेतु: 64.15 में कर्क-स्वांश-गुरु का फल, यहाँ सिंह-स्वान्तर-गुरु का फल — स्थिति-भेद से फल-भेद, शास्त्र की अपनी सूची।

उदाहरण (worked example) शुक्र महादशा (20 वर्ष) में गुरु अन्तर्दशा: (20 × 16) ÷ 120 = 320 ÷ 120 = 8/3 वर्ष = 2 वर्ष 8 मास।
इसी कालखंड में यदि अन्तर्दशा-स्वामी सिंह में हो, तो श्लोक धन-धान्य, द्विज-भूप-प्रसाद, विद्यावृद्धि कहता है — गणना काल की, फल पाठ का।

हमारा डिकोड (Our Decode) गुरु-खंड 16/120 विंशोत्तरी-canonical है; अन्तर्दशा pure ratio। 64.15 (कर्क-स्वांश) और 64.21 (सिंह-स्वान्तर) दोनों गुरु-फल हैं पर संकेत-सूत्र भिन्न — वर्ग/अंश बनाम दशा-खंड; हम दोनों को अलग-अलग pinned करते हैं, मिलाकर “एक गुरु-फल” नहीं बनाते।

64.22
कन्यायां स्वांशगे सौरे कष्तं प्राप्नोथि मानवः ।
ध्रयाणं च ज्वरं चैव क्षुध्भवं वैक्लवं थठा
kanyāyāṃ svāṃśage saure kaṣtaṃ prāpnothi mānavaḥ |
dhrayāṇaṃ ca jvaraṃ caiva kṣudhbhavaṃ vaiklavaṃ thaṭhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्यायां = कन्या-राशि में; स्वांशगे = स्व-अंश/स्व-वर्गांश में स्थित; सौरे = शनि में/शनि के; कष्टं = क्लेश, दुःख; प्राप्नोति = प्राप्त करता है; प्रयाणं = यात्रा/प्रस्थान; ज्वरं = ज्वर; क्षुद्भवं = क्षुधा-जन्य; वैक्लवं = विकलता/व्याकुलता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शनि कन्या में स्वांशगत हो, तब मनुष्य कष्ट पाता है। पाठ में प्रयाण, ज्वर, क्षुधा से उत्पन्न वैक्लव आदि कष्ट-सूचक फल गिनाए गए हैं। यह फल-कथन है; पाठ-भेद संभव जहां “स्वांश” की परिभाषा (नवमांश/अन्तर्दशा-अंश) संस्करणानुसार भिन्न हो।

English rendering The text states that when Saturn is placed in its own aṃśa in Virgo (Kanyā), the native meets hardship. Journey, fever, and hunger-born distress and agitation are listed among the indicated results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्या-स्वांश में शनि)। “स्वांश” को जिस वर्ग-नियम (प्रायः D9/नवमांश या दशा-संदर्भित अंश) से लें, वह कन्वेंशन घोषित करें; फल स्वयं संख्यात्मक सूत्र नहीं देता।

64.23
न्त्ऱ्पप्रसाधमैश्वर्यं सुह्त्ऱ्ध्बन्ढुसमागमम् ।
विध्याव्त्ऱ्ध्ढिमवाप्नोथि कन्यायां स्वांशके गुरौ
ntṟpaprasādhamaiśvaryaṃ suhtṟdhbanḍhusamāgamam |
vidhyāvtṟdhḍhimavāpnothi kanyāyāṃ svāṃśake gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नृपप्रसादम् = राज-अनुग्रह; ऐश्वर्यं = वैभव/सामर्थ्य; सुहृद्बन्धुसमागमम् = मित्र-बन्धु-मिलन; विद्यावृद्धिम् = विद्या की वृद्धि; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; कन्यायां = कन्या में; स्वांशके = स्वांश में; गुरौ = गुरु (बृहस्पति) के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—कन्या में जब गुरु स्वांशगत हों, तब नृप-प्रसाद, ऐश्वर्य, सुहृद्-बन्धु-समागम और विद्या की वृद्धि का फल वर्णित है। यह शुभ-फल का कथन है, न कि सुनिश्चित घटना। पाठ-भेद संभव “स्वांशके” की ठीक परिभाषा पर।

English rendering The text states that when Jupiter is in its own aṃśa in Virgo, royal favor, prosperity, reunion with friends and kin, and growth of learning are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्या-स्वांश में गुरु)। स्थिति-निर्णय के लिए राशि-देशान्तर + वarga/अंश-नियम चाहिए; श्लोक स्वयं केवल फल सूचीबद्ध करता है।

64.24
पिथ्थज्वरभवा पीदा विधेशे गमनं थठा ।
शस्थ्रघाथोऽग्निभीथिश्च कन्यायां स्वान्थरे कुजे
piththajvarabhavā pīdā vidheśe gamanaṃ thaṭhā |
śasthraghātho'gnibhīthiśca kanyāyāṃ svānthare kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पित्तज्वरभवा = पित्त-ज्वर से उत्पन्न; पीडा = पीड़ा; विदेशे गमनं = परदेश-यात्रा; शस्त्रघातः = शस्त्र-आघात; अग्निभीतिः = अग्नि-भय; कन्यायां = कन्या-संदर्भ में; स्वान्तरे = स्व-अन्तर्दशा में; कुजे = मंगल में/मंगल के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—कन्या-संदर्भ में मंगल की स्व-अन्तर्दशा में पित्तज्वर-जन्य पीड़ा, विदेश-गमन, शस्त्रघात और अग्नि-भय का उल्लेख है। यह अरिष्ट-सूचक फल-भाषा है; इसे निश्चित विपत्ति या चिकित्सा-निदान न समझें। “स्वान्तरे” अन्तर्दशा-काल को इंगित करता है।

English rendering The text states that in Mars’s own antardaśā related to Virgo there is indication of pitta-fever affliction, travel abroad, weapon-injury, and fear of fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्या में मंगल-अन्तर्दशा)। अन्तर्दशा-काल का सामान्य अनुपात (विंशोत्तरी आदि में) = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष)/१२०; यह श्लोक वह सूत्र नहीं देता—केवल फल कहता है।

64.25
भ्त्ऱ्थ्यपुथ्रार्ठलाभश्च नानासुखसमागमः ।
बन्ढुभार्गवचन्ध्रेषु कन्यास्वांशगथेषु च
bhtṟthyaputhrārṭhalābhaśca nānāsukhasamāgamaḥ |
banḍhubhārgavacandhreṣu kanyāsvāṃśagatheṣu ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भृत्यपुत्रार्थलाभः = सेवक-पुत्र-अर्थ का लाभ; नानासुखसमागमः = विविध सुखों का समागम; बन्धुभार्गवचन्द्रेषु = (पाठ-भेद संभव) बुध-भार्गव-चन्द्र में / बन्धु-शुक्र-चन्द्र में; कन्यास्वांशगतेषु = कन्या-स्वांशगत होने पर; च = तथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब कथित ग्रह (प्रायः बुध, शुक्र/भार्गव और चन्द्र—पाठ-भेद संभव) कन्या-स्वांशगत हों, तब भृत्य-पुत्र-अर्थ-लाभ और नाना सुख-समागम का फल वर्णित है। “बन्धु” यहाँ ग्रह-पर्याय या “बुध” का पाठ-विकार हो सकता है; निश्चय न थोपें।

English rendering The text states that when the named planets (likely Mercury, Venus, and the Moon—reading uncertain) occupy their own aṃśa in Virgo, gain of servants, children, and means, together with manifold comforts, is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्या-स्वांश में बुध/शुक्र/चन्द्र-समूह)। ग्रह-पहचान में पाठ-भेद संभव; गणना तभी जब स्वांश-नियम और ग्रह-देशान्तर स्पष्ट हों।

64.26
प्रयाणं रोगभीथिश्च कलहो बन्ढुभिः सह ।
शस्थ्रघाथभयं चैव कन्यांशे स्वांशगे रवौ
prayāṇaṃ rogabhīthiśca kalaho banḍhubhiḥ saha |
śasthraghāthabhayaṃ caiva kanyāṃśe svāṃśage ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रयाणं = यात्रा; रोगभीतिः = रोग-भय; कलहः = झगड़ा; बन्धुभिः सह = बन्धुओं के साथ; शस्त्रघातभयं = शस्त्र-घात का भय; कन्यांशे = कन्या-अंश में; स्वांशगे = स्वांशगत; रवौ = सूर्य में/सूर्य के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—कन्यांश में जब सूर्य स्वांशगत हों, तब प्रयाण, रोग-भय, बन्धु-कलह और शस्त्रघात-भय का फल कहा गया है। यह भय-सूचक फल-भाषा है; शास्त्र का कथन रिपोर्ट करें, उसे नियति या दबाव न बनाएँ।

English rendering The text states that when the Sun is in its own aṃśa within the Virgo portion, journey, fear of illness, quarrel with kin, and fear of weapon-injury are indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कन्यांश-स्वांश में सूर्य)। “कन्यांशे + स्वांशगे” दो स्तरों का संकेत है (राशि/अंश-संदर्भ + स्व-अंश); नियम घोषित कर ही स्थिति जाँचें।

64.27
थुले स्वान्थर्गथे शुक्रे सध्बुध्ढिश्च सुखोधयः ।
स्थ्रीपुथ्रढननवस्थ्राधिलाभो भवथि निश्चिथः
thule svānthargathe śukre sadhbudhḍhiśca sukhodhayaḥ |
sthrīputhraḍhananavasthrādhilābho bhavathi niścithaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुले = तुला राशि (Libra) का नवांश/स्वांश; स्वान्तर्गते = अपनी अन्तर्दशा में स्थित; शुक्रे = शुक्र ग्रह; सद्‌बुद्धिः = सद्‌विवेक, शुभ मति; सुखोदयः = सुख का उदय; स्त्री-पुत्र-धन-नव-वस्त्र-आदि-लाभः = पत्नी, पुत्र, धन, नवीन वस्त्र आदि की प्राप्ति; निश्चितः = सुनिश्चित।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र दशा में जब तुला के स्वांश (नवांश) में शुक्र की अन्तर्दशा चलती है, तब शास्त्र कहता है कि जातक को सद्‌बुद्धि और सुख का उदय होता है; पत्नी, सन्तान, धन तथा नवीन वस्त्रादि का लाभ निश्चित रूप से होता है। यह इस अध्याय के तुला-वर्ग का पहला, शुभ फल-कथन है — तुला के स्वामी शुक्र का अपना अन्तर।

English rendering When Venus runs its antardaśā within the Tulā (Libra) svāṃśa, the text states there arises sound judgment and a rising of comfort; gain of wife, sons, wealth and new garments is declared certain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-अन्तर्दशा का शुभ फल)। इसमें कोई संख्या नहीं गिनी जाती; केवल जो निर्धारित है वह है दो निर्देशांक — कौन-सा स्वांश (यहाँ तुला-नवांश) और कौन-से ग्रह का अन्तर (यहाँ शुक्र) — और उन दोनों के संयोग पर शास्त्र फल आरोपित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्वांश" यहाँ D9 नवांश ही है — षोडश-वर्ग का वही चर्तुथांश जिसे हमारे varga-engine (kaal_ekavimshati_varga.py) में 30° राशि के 3°20′ के समान भागों में विशुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित से बाँटा गया है। नवांश-राशि का निर्धारण सटीक गणना है; परन्तु उस पर टँगा फल शास्त्र का कथन है, गणना का निष्कर्ष नहीं — यही हमारी "गणित बनाम फल" वाली अनुशासन-रेखा है।

64.28
पिथ्त्ऱ्कष्तं सुह्त्ऱ्ध्वैरं शिरोरोगो ज्वरोधयः ।
विषशस्थ्राग्निभीथिश्च थुले स्वान्थर्गथे कुजे
pithtṟkaṣtaṃ suhtṟdhvairaṃ śirorogo jvarodhayaḥ |
viṣaśasthrāgnibhīthiśca thule svānthargathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृकष्टं = पिता को कष्ट; सुहृद्‌वैरं = मित्र से वैर/विरोध; शिरोरोगः = सिर का रोग; ज्वरोदयः = ज्वर का उदय; विष-शस्त्र-अग्नि-भीतिः = विष, शस्त्र व अग्नि का भय; तुले स्वान्तर्गते कुजे = तुला स्वांश में कुज (मंगल) की अन्तर्दशा में।

हिन्दी भावार्थ जब तुला के स्वांश में मंगल की अन्तर्दशा आती है, तब शास्त्र के अनुसार पिता को कष्ट, मित्र से बैर, शिर-रोग और ज्वर का उदय बताया गया है; साथ ही विष, शस्त्र तथा अग्नि से भय की आशंका कही गई है। ध्यान रहे — यह पाप-ग्रह मंगल के अन्तर का अशुभ फल-कथन है, कोई अवश्यम्भावी भविष्यवाणी नहीं।

English rendering With Mars in its antardaśā in the Tulā svāṃśa, the text states affliction to the father, enmity with a friend, headache and onset of fever, together with fear from poison, weapon and fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाप-ग्रह अन्तर का अशुभ फल)। रोचक सममिति यह है कि एक ही स्वांश (तुला) में शुभ बनाम अशुभ फल केवल अन्तरेश ग्रह के स्वभाव से पलटता है — शुक्र पर सौख्य, मंगल पर पीड़ा — अर्थात् स्वांश स्थिर रखकर अन्तरेश ही चर है।

64.29
ध्रव्यरथ्नाधिलाभश्च ढर्मकार्यं न्त्ऱ्पाधयः ।
सर्वथ्र सुखसम्प्राप्थिस्थुले स्वांशगथे गुरौ
dhravyarathnādhilābhaśca ḍharmakāryaṃ ntṟpādhayaḥ |
sarvathra sukhasamprāpthisthule svāṃśagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्रव्य-रत्न-अधिलाभ = धन और रत्नों की विशेष प्राप्ति; धर्मकार्य = धार्मिक / धर्मोचित कर्म; नृपाधयः = नृप (राजा) का उदय / उत्कर्ष; सर्वत्र सुख-सम्प्राप्ति = सब ओर से सुख की प्राप्ति; तुले = तुला राशि में; स्वांशगते = स्वकीय अंश (नवमांश आदि स्वाम्य-अंश) में स्थित; गुरौ = बृहस्पति में / बृहस्पति के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब गुरु तुला राशि में स्थित होकर स्वांश में हो, तब द्रव्य और रत्नों का विशेष लाभ, धर्म-सम्बन्धी कार्यों की सिद्धि, तथा राजकीय / नेतृत्व-स्तर के उत्कर्ष का संकेत मिलता है। पाठ के अनुसार ऐसी स्थिति में सर्वत्र सुख की प्राप्ति कही गई है। यह फल-कथन है — राशि-अंश योग का शास्त्रीय वर्णन, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that when Jupiter is in Libra and occupies its own aṃśa (svāṃśa), there is gain of wealth and gems, success in dharma-oriented work, and the rise of royal or authoritative fortune. Happiness is said to be obtained from all sides.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तुला + स्वांश + गुरु)। “स्वांश” जाँचने के लिए राशि-देशान्तर को नवमांश (D9) नियम से विभाजित करना पड़ता है: 30° राशि को 9 समान 3°20′ खण्डों में बाँटा जाता है; स्वांश का अर्थ ग्रह के स्वाम्य-राशि के अंश में स्थिति है — यह निर्धारण शुद्ध मापांक-अंकगणित है; श्लोक स्वयं केवल फल बताता है।

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64.30
प्रयाणं च महाव्याढिः क्षेथ्रधेः क्षथिरेव च ।
शथ्रुवाढा च कार्येषु थुले स्वांशगथे शनौ
prayāṇaṃ ca mahāvyāḍhiḥ kṣethradheḥ kṣathireva ca |
śathruvāḍhā ca kāryeṣu thule svāṃśagathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रयाणं = यात्रा/प्रस्थान; महाव्याधिः = बड़ा रोग; क्षेत्रादेः क्षतिः = भूमि/खेत आदि की हानि; शत्रुबाधा = शत्रु से बाधा; कार्येषु = कार्यों में; तुले स्वांशगते शनौ = तुला स्वांश में शनि के आने पर।

हिन्दी भावार्थ तुला के स्वांश में शनि की अन्तर्दशा में शास्त्र यात्रा, महाव्याधि, भूमि-क्षेत्र आदि की हानि तथा कार्यों में शत्रु-बाधा का कथन करता है। यह मन्द (शनि) के अन्तर का क्लेश-सूचक फल है — शास्त्र की चेतावनी-भाषा, कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering With Saturn in the Tulā svāṃśa, the text states travel abroad, grave illness, loss of land and fields, and obstruction by enemies in one's undertakings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-अन्तर का अशुभ फल)। इस श्लोक में कोई बिन्दु, कला या अवधि नहीं गिनी जा रही — यह विशुद्ध फल-वाक्य है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ऐसे मन्द-अन्तर के अशुभ वाक्य ही वह स्थान हैं जहाँ हमारी अनुशासन-रेखा सबसे अधिक काम की है: फल को "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत करना, भय या निश्चित घटना के रूप में नहीं। CLAUDE.md और oracle की यही नीति है — गणित (कौन-सा स्वांश, कौन-सा अन्तर) पक्का, फल-व्याख्या शास्त्र का दावा।

64.31
पुथ्रजन्म ढनप्राप्थिः स्थ्रीसुखं च मनःप्रियम् ।
भाग्योधयश्च विज्नेयस्थुले स्वान्थर्गथे बुढे
puthrajanma ḍhanaprāpthiḥ sthrīsukhaṃ ca manaḥpriyam |
bhāgyodhayaśca vijneyasthule svānthargathe buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रजन्म = पुत्र का जन्म; धनप्राप्ति = धन की प्राप्ति; स्त्रीसुख = स्त्री / दाम्पत्य-सुख; मनःप्रिय = मन को प्रिय लगने वाला; भाग्योदय = भाग्य का उदय; विज्ञेय = जानना चाहिए; तुले = तुला में; स्वान्तर्गते = स्व-अन्तर् / स्वांश के अन्तर्गत स्थित (स्वांशगते के पाठ-भेद संभव); बुधे = बुध में / बुध के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तुला में स्वांशगत बुध पर पुत्रजन्म, धनप्राप्ति, स्त्री-सुख, मनःप्रिय फल, तथा भाग्योदय विज्ञेय है। यह शुभ-फलों की सूची है, गणना-सूत्र नहीं। “स्वान्तर्गते” और “स्वांशगते” में पाठ-भेद संभव — अर्थ-स्तर पर स्वकीय अंश-स्थिति ही अभिप्रेत है।

English rendering The text states that when Mercury is in Libra in its own aṃśa, one should understand birth of a son, acquisition of wealth, happiness through the spouse, what is dear to the mind, and a rise of fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (तुला + स्वांश + बुध)। बुध की स्वांश-जाँच D9 (या प्रसंगानुसार उक्त अंश-वर्ग) की समान-खण्ड विभाजन-विधि से होती है; श्लोक स्वयं केवल फल बताता है।

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64.32
शशाङ्कबुढशुक्रेषु व्त्ऱ्श्चिके स्वांशगेषु च ।
नानाढान्यढनप्राप्थिर्व्याढिविनाशो महथ् सुखम्
śaśāṅkabuḍhaśukreṣu vtṟścike svāṃśageṣu ca |
nānāḍhānyaḍhanaprāpthirvyāḍhivināśo mahath sukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशाङ्क = चन्द्र; बुध = बुध; शुक्र = शुक्र; वृश्चिके = वृश्चिक राशि (Scorpio) का स्वांश; स्वांशगेषु = अपने नवांश में स्थित होने पर; नाना-धान्य-धन-प्राप्तिः = अनेक अन्न व धन की प्राप्ति; व्याधिविनाशः = रोग का नाश; महत् सुखम् = महान सुख।

हिन्दी भावार्थ वृश्चिक के स्वांश में जब चन्द्र, बुध और शुक्र — ये तीनों सौम्य ग्रह — अपने अन्तर में आते हैं, तब शास्त्र नाना प्रकार के अन्न-धन की प्राप्ति, रोग का नाश और महान सुख का कथन करता है। यहाँ शास्त्र तीन शुभ अन्तरेशों को एक ही पंक्ति में समेट देता है — वृश्चिक-वर्ग का सामूहिक शुभ-फल।

English rendering With the Moon, Mercury and Venus each in their antardaśā within the Scorpio svāṃśa, the text states gain of manifold grain and wealth, destruction of disease, and great happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रि-शुभ-ग्रह अन्तर का सम्मिलित शुभ फल)। ध्यातव्य: शास्त्र यहाँ तीन ग्रहों को एक साथ बाँधता है, अर्थात् एक ही फल-वाक्य तीन भिन्न अन्तर्दशाओं पर समान रूप से लागू — पद्धति की मितव्ययिता।

हमारा डिकोड (Our Decode) "वृश्चिक-स्वांश" पुनः D9 नवांश है — षोडश-वर्ग की वही निर्धारक विभाजन-राशि जिसे हमारे varga-engine में 3°20′ चापों की मॉड्यूलर गणना से पाया जाता है। कौन-सा ग्रह वृश्चिक-नवांश-अन्तर में है, यह `==`-सटीक गणना का प्रश्न है; उस पर "महत् सुखम्" शास्त्र का कथन है — दोनों परतें हम अलग रखते हैं।

64.33
शथ्रुक्षोभभयं व्याढिमर्ठनाशं पिथुर्भयम् ।
श्वापधाध् भयमाप्नोथि व्त्ऱ्श्चिके स्वांशगे रवौ
śathrukṣobhabhayaṃ vyāḍhimarṭhanāśaṃ pithurbhayam |
śvāpadhādh bhayamāpnothi vtṟścike svāṃśage ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रु-क्षोभ-भय = शत्रु-क्षोभ से भय; व्याधि = रोग; अर्थनाश = अर्थ (धन) का नाश; पितुर्भय = पिता से / पितृ-पक्ष से भय; श्वापदात् भय = हिंसक / वन्य पशुओं से भय; आप्नोति = प्राप्त करता है; वृश्चिके = वृश्चिक में; स्वांशगे = स्वांश में स्थित; रवौ = सूर्य में / सूर्य के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वृश्चिक में स्वांशगत रवि पर शत्रु-क्षोभ का भय, व्याधि, अर्थनाश, पितृ-भय, तथा श्वापद (हिंस्र जन्तु) से भय — ये फल कहे गए हैं। यह अशुभ-फल सूची है; इसे शास्त्र का कथन मानकर पढ़ें, भय-प्रचार या नियति-घोषणा के रूप में नहीं। “श्वापधाध्” आदि रूप पाठ-भेद / लेखन-विकृति संभव।

English rendering The text states that when the Sun is in Scorpio in its own aṃśa, there is fear from enemy agitation, illness, loss of wealth, fear connected with the father, and fear from wild beasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृश्चिक + स्वांश + रवि)। कोई दशा-वर्ष, बल-रूप या बिन्दु-योग यहाँ निर्दिष्ट नहीं; केवल स्वांश-स्थित सूर्य का शास्त्रीय फल-वर्णन।

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64.34
वाथपिथ्थभयं चैव मसूरीव्रणमाधिशेथ् ।
अग्निशस्थ्राधिभीथिश्च व्त्ऱ्श्चिके स्वांशगे कुजे
vāthapiththabhayaṃ caiva masūrīvraṇamādhiśeth |
agniśasthrādhibhīthiśca vtṟścike svāṃśage kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वात-पित्त-भय = वात-पित्त दोषों से भय / कष्ट; मसूरी-व्रण = मसूरी (विस्फोटक त्वचा-रोग) और व्रण (घाव-फोड़े); आदिशेत् = निर्देश करे / कहे; अग्नि-शस्त्र-अधिभीति = अग्नि और शस्त्र से विशेष भीति; वृश्चिके = वृश्चिक में; स्वांशगे = स्वांश में; कुजे = मंगल में / मंगल के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वृश्चिक में स्वांशगत कुज पर वात-पित्त का भय, मसूरी-व्रण आदि, तथा अग्नि और शस्त्र से भीति — ये फल निर्देशित हैं। यह आयुर्वेदीय-दोष और बाह्य-हिंसा के संकेतों की शास्त्रीय सूची है, चिकित्सा-निदान या उपचार-आदेश नहीं। “मसूरीव्रणमाधिशेथ्” में पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Mars is in Scorpio in its own aṃśa, one should indicate fear of vāta-pitta affliction, smallpox-like eruptions and sores, and fear of fire and weapons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृश्चिक + स्वांश + कुज)। मंगल वृश्चिक का स्वामी है; स्वांश-स्थिति फिर भी अंश-वर्ग की गणना से तय होती है — श्लोक स्वयं केवल फल देता है, कोई अंश-सूत्र नहीं।

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64.35
ढनं ढान्यञ्च रथ्नं च धेवब्राह्मणपूजनम् ।
राजप्रसाधमाप्नोथि व्त्ऱ्श्चिके स्वांशगे गुरौ
ḍhanaṃ ḍhānyañca rathnaṃ ca dhevabrāhmaṇapūjanam |
rājaprasādhamāpnothi vtṟścike svāṃśage gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन = धन; धान्य = अन्न / धान्य; रत्न = रत्न; देव-ब्राह्मण-पूजन = देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा; राजप्रसाद = राजकीय अनुग्रह / राजा की कृपा; आप्नोति = प्राप्त करता है; वृश्चिके = वृश्चिक में; स्वांशगे = स्वांश में स्थित; गुरौ = गुरु में / गुरु के होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वृश्चिक में स्वांशगत गुरु पर धन, धान्य और रत्न की प्राप्ति, देव-ब्राह्मण पूजन, तथा राजप्रसाद का फल कहा गया है। यही अध्याय-क्रम में तुला-स्वांश-गुरु (64.29) के बाद वृश्चिक-स्वांश-गुरु का भिन्न राशि-फल है — दोनों में गुरु-स्वांश समान तत्त्व है, राशि-भेद से फल-भेद। यह शुभ-फल कथन है, गारंटी नहीं।

English rendering The text states that when Jupiter is in Scorpio in its own aṃśa, one obtains wealth, grain, and gems, engages in the worship of gods and brāhmaṇas, and receives royal favor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वृश्चिक + स्वांश + गुरु)। 64.29 (तुला-स्वांश-गुरु) और 64.35 (वृश्चिक-स्वांश-गुरु) की तुलना से स्पष्ट है कि शास्त्र स्वांश के साथ राशि-विशेष फल बदलता है; गणना केवल “ग्रह-राशि × स्वांश?” की जाँच तक सीमित है — फल-सूची स्वयं अगणितीय है।

64.36
ढनबन्ढुविनाशश्च जायथे मानसी व्यठा ।
शथ्रुवाढा महाव्याढिर्व्त्ऱ्श्चिके स्वांशगे शनौ
ḍhanabanḍhuvināśaśca jāyathe mānasī vyaṭhā |
śathruvāḍhā mahāvyāḍhirvtṟścike svāṃśage śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनबन्धुविनाश = धन और बन्धु-सम्बन्ध का क्षय; मानसी व्यथा = मानसिक पीड़ा/चिन्ता; शत्रुबाधा = शत्रुकृत बाधा; महाव्याधि = गम्भीर रोग-संकेत (शास्त्र-कथन); वृश्चिके = वृश्चिक राशि में; स्वांशगे = स्व-अंश (प्रायः स्व-नवांश/स्वांशीय अंश) में स्थित; शनौ = शनि के (स्थित होने पर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शनि वृश्चिक राशि में स्वांश-स्थित हो, तब धन-हानि और बन्धु-सम्बन्ध में क्षय का फल कहा गया है। साथ ही मानसिक व्यथा, शत्रु-बाधा और महाव्याधि का उल्लेख है। यह दशा/अन्तर्दशा-फल का कथन है; राशि-अंश की युति शर्त है, और फल को शास्त्र की भाषा में ही पढ़ना चाहिए — निश्चित भाग्य-घोषणा के रूप में नहीं।

English rendering The text states that when Saturn occupies Scorpio in its own aṃśa (typically read as own navāṃśa), there is indication of loss regarding wealth and kinsfolk, mental anguish, obstruction from enemies, and serious affliction. This is a phala-statement of the daśā corpus under a stated rāśi–aṃśa condition.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि वृश्चिक + स्वांश)। अनुप्रयोग में शर्त दो भागों की है: (1) ग्रह-राशि = वृश्चिक (D1 में शनि की राशि), (2) स्वांश = सामान्यतः नवांश में शनि के स्वामित्व वाली राशि (मकर/कुम्भ) का अंश; नवांश-विभाजन 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश — यह पद स्वयं अंक-सूत्र नहीं देता, केवल स्थिति-शर्त।

उदाहरण (worked example) मान लें शनि-स्पर्श-रेखा λ = 224°10′ (मेष 0° से; अयनांश घोषित करें — उदाहरण: लाहिरी)। D1 राशि = ⌊224°10′/30°⌋ = 7 → वृश्चिक (210°–240°)। नवांश-सूचकांक (सम राशि-क्रम नियम, BPHS षोडशवर्ग): वृश्चिक में स्थानीय अंश = 224°10′ − 210° = 14°10′; n = ⌊14°10′ / 3°20′⌋ = ⌊4.25⌋ = 4 → पाँचवाँ नवांश। स्वांश-जाँच: शनि-स्वामी नवांश = मकर/कुम्भ; यदि वह पाँचवाँ नवांश शनि-स्वामी हो तभी “स्वांशगे” शर्त पूर्ण। (वर्ग-नियम/अयनांश बदलें तो नवांश-फल बदल सकता है — पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वांश” की जाँच शुद्ध वर्ग-गणित है — D9 (नवांश) 30° राशि को 9 समान 3°20′ खण्डों में बाँटता है। हमारे षोडश-वर्ग इंजन में यही मॉड्यूलर विभाजन तय है; फल-वाक्य को हम गणना से अलग रखते हैं — शास्त्र “क्या कहता है” और “क्या निश्चित होगा” एक नहीं।

64.37
अथिधाहं ज्वरं छर्धि मुखरोगं विशेषथः ।
नानाक्लेशमवाप्नोथि चापांशे स्वांशगे कुजे
athidhāhaṃ jvaraṃ chardhi mukharogaṃ viśeṣathaḥ |
nānākleśamavāpnothi cāpāṃśe svāṃśage kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतिदाह = अत्यधिक दाह/जलन; ज्वर = ज्वर; छर्दि = वमन; मुखरोग = मुख-सम्बन्धी कष्ट (शास्त्र-कथन); विशेषतः = विशेष रूप से; नानाक्लेश = अनेक प्रकार के क्लेश; अवाप्नोति = प्राप्त करता है (इति शास्त्रम्); चापांशे = चाप (धनु) के अंश में; स्वांशगे = स्वांश-स्थित; कुजे = मंगल के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कुज चाप-अंश में स्वांश-गत हो, तब अतिदाह, ज्वर, वमन और विशेषतः मुख-रोग का फल कहा गया है। अनेक क्लेशों की प्राप्ति भी इसी स्थिति से जोड़ी गई है। यह शरीर-संकेतों का शास्त्रीय फल-वर्णन है, चिकित्सकीय निदान या भविष्य की गारंटी नहीं; दशा-फल की भाषा में स्थिति-शर्त के साथ पढ़ें।

English rendering The text states that when Mars is in the aṃśa of Cāpa (Sagittarius) and in its own aṃśa, there is indication of intense burning sensation, fever, vomiting, oral affliction in particular, and various hardships. Report this as the śāstra’s phala under the stated condition, not as a medical or fated prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुज + चापांश + स्वांश)। “चापांश” = धनु-सम्बन्धी अंश (प्रायः नवांश में धनु, अथवा धनु-राशि में स्वांश — दोनों पाठ-परम्पराएँ संभव); स्वांश = कुज-स्वामी अंश (मेष/वृश्चिक)। संख्यात्मक सूत्र पद में नहीं; केवल स्थिति-द्वार।

उदाहरण (worked example) कुज λ = 255°00′ (धनु 15°; अयनांश घोषित)। D1 = धनु। स्थानीय = 15°; नवांश-सूचकांक ⌊15°/3°20′⌋ = ⌊4.5⌋ = 4। यदि प्रयुक्त नवांश-नियम में वह अंश कुज-स्वामी (मेष/वृश्चिक) हो तो “चापांशे स्वांशगे” पूरा; अन्यथा शर्त नहीं लगती। (षोडश-वर्ग नियम और अयनांश दोनों घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) चापांश/स्वांश दोनों D9-विभाजन पर टिके हैं — हमारे वर्ग-इंजन में धनु के नौ 3°20′ खण्ड और स्वामी-मानचित्र नियत हैं। फल को हम इंजन से नहीं “सिद्ध” करते; केवल शर्त-सत्यता (राशि + अंश) की जाँच गणित है।

64.38
श्रियं विध्यां च सौभाग्यं शथ्रुनाशं न्त्ऱ्पाथ् सुखम् ।
भार्गवेन्धुचन्ध्राणां चापे स्वस्वांशके धिशेथ्
śriyaṃ vidhyāṃ ca saubhāgyaṃ śathrunāśaṃ ntṟpāth sukham |
bhārgavendhucandhrāṇāṃ cāpe svasvāṃśake dhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रियम् = श्री/समृद्धि; विद्याम् = विद्या; सौभाग्यम् = सौभाग्य; शत्रुनाशम् = शत्रु-क्षय का संकेत; नृपात् सुखम् = नृप/अधिकार-पक्ष से सुख; भार्गव = शुक्र; इन्दु/चन्द्र = चन्द्रमा (पाठ में इन्धु-चन्द्र दोनों; तृतीय ग्रह-पाठ में भेद संभव); चापे = धनु राशि में; स्वस्वांशके = अपने-अपने स्वांश में; दिशेत् = देता है/संकेत करता है (इति शास्त्रम्)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — धनु में स्व-स्वांश स्थित भार्गव और चन्द्र (पाठ: भार्गवेन्धुचन्ध्राणाम्; कहीं बुध-पाठ भी संभव — पाठ-भेद संभव) श्री, विद्या, सौभाग्य, शत्रु-नाश और नृप-सुख का फल देते हैं। यह शुभ-फल का शास्त्र-कथन है, सफलता की गारंटी नहीं। शर्त स्पष्ट है: चाप-राशि + प्रत्येक ग्रह का स्वांश।

English rendering The text states that Venus (Bhārgava) and the Moon (Indu/Candra — the compound may admit a contested third name; recension variance possible), when in Sagittarius in their respective own aṃśas, indicate prosperity, learning, good fortune, the waning of enemies, and comfort from royal/authority quarters. This is phala-language, not a promise of outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ ग्रह, चाप + स्वस्वांश)। प्रत्येक ग्रह के लिए अलग जाँच: D1 ∈ धनु, तथा D9-स्वामी = उस ग्रह का स्व-राशि स्वामित्व। कोई वर्ष-संख्या या बिन्दु-योग इस पद में नहीं।

उदाहरण (worked example) शुक्र λ = 248°20′ → धनु 8°20′; n = ⌊8°20′/3°20′⌋ = 2। शुक्र-स्वामी नवांश = वृष/तुला — यदि तीसरा नवांश उनमें से हो तो शुक्र की स्वस्वांश-शर्त पूर्ण। चन्द्र के लिए उसी चाप-राशि में अलग λ पर उसी प्रकार स्व-नवांश (कर्क) जाँचें। अयनांश/वर्ग-नियम घोषित रखें।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वस्वांशके” बहुवचन शर्त है — एक से अधिक ग्रहों की D9-स्वामित्व जाँच। षोडश-वर्ग इंजन प्रति-ग्रह नवांश और स्वामी निकालता है; हमारा अनुशासन यही है कि शुभ-फल वाक्य को गणना से मिलाकर “सिद्ध फल” न बनाया जाए।

64.39
भार्याविथ्थविनाशं च कलहं च न्त्ऱ्पाध् भयम् ।
धूरयाथ्रामवाप्नोथि चापांशे स्वांशगे रवौ
bhāryāviththavināśaṃ ca kalahaṃ ca ntṟpādh bhayam |
dhūrayāthrāmavāpnothi cāpāṃśe svāṃśage ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भार्यावित्तविनाशम् = भार्या और वित्त पक्ष में क्षय-संकेत; कलहम् = कलह; नृपाद् भयम् = नृप/शासन-पक्ष से भय; दूरयात्राम् = दूर की यात्रा; अवाप्नोति = प्राप्त करता है (इति शास्त्रम्); चापांशे = चाप-अंश में; स्वांशगे = स्वांश-स्थित; रवौ = सूर्य के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब रवि चापांश में स्वांश-गत हो, तब भार्या-वित्त में विनाश-संकेत, कलह, नृप से भय और दूर-यात्रा का फल कहा गया है। यह दशा-स्थिति का फल-वर्णन है; वैवाहिक/आर्थिक/राजनीतिक “भविष्यवाणी” के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। शर्त फिर वही: चाप-सम्बन्धी अंश + सूर्य का स्वांश (सिंह-नवांश)।

English rendering The text states that when the Sun is in the Sagittarius aṃśa in its own aṃśa, there is indication of loss concerning spouse and wealth, quarrel, fear from royal power, and long travel. Keep this as the śāstra’s conditional phala, not as endorsed fate or practical counsel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रवि + चापांश + स्वांश)। सूर्य-स्वांश = नवांश में सिंह; चापांश = धनु-अंश या धनु-राशि-सहित अंश-शर्त (परम्परा-भेद संभव)। पद में कोई काल-मान या बल-इकाई नहीं।

उदाहरण (worked example) सूर्य λ = 260°00′ (धनु 20°)। n = ⌊20°/3°20′⌋ = 6 → सातवाँ नवांश। यदि वह नवांश सिंह हो (स्वांश) तभी “चापांशे स्वांशगे रवौ” लागू। (धनु से नवांश-गणना का आरम्भ-नियम BPHS वर्ग-अध्याय के अनुसार स्थिर रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) सूर्य-स्वांश की पहचान D9 में सिंह-खण्ड मात्र है — 3°20′ मोड्यूलर अंकगणित। फल-शब्द (भय, विनाश) को हम व्याख्या-स्तर पर नरम “संकेत/शास्त्र-कथन” रखते हैं; इंजन केवल स्थिति सत्यापित करता है।

64.40
धानढर्मथपोलाभं राजपूजनमाप्नुयाथ् ।
भार्याविभवलाभं च चापे स्वांशगथे गुरौ
dhānaḍharmathapolābhaṃ rājapūjanamāpnuyāth |
bhāryāvibhavalābhaṃ ca cāpe svāṃśagathe gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दान-धर्म-तपः = दान, धर्म एवं तप (त्रिविध पुण्य-कर्म); लाभम् = प्राप्ति; राज-पूजनम् = राजा से सम्मान/पूजा; आप्नुयात् = पा लेता है; भार्या-विभव-लाभम् = पत्नी तथा ऐश्वर्य (विभव) का लाभ; चापे = चाप अर्थात् धनु राशि (चाप = धनुष); स्वांशगते गुरौ = जब बृहस्पति अपने ही नवांश (स्वांश = D9 अंश) में स्थित हो।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र-दशा के अन्तर्गत जब बृहस्पति धनु राशि में अपने ही नवांश (स्वांश) में स्थित होकर अन्तर्दशा प्रदान करते हैं, तब शास्त्र कहता है कि जातक को दान-धर्म-तप का लाभ, राजा से सम्मान, तथा पत्नी और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। यह गुरु के स्वांश-बल का शुभ फल-कथन है।

English rendering When Jupiter occupies its own navāṃśa in Sagittarius, the text states that this sub-period yields the fruits of charity, dharma and austerity, honour from the king, and the acquisition of wife and prosperity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। किन्तु "स्वांश" एक D9 (नवांश) गणना है: 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश। अन्तर्दशा-स्वामी उसी राशि के नवांश में गिरे तो "स्वांशगत" कहलाता है — कालचक्र-दशा स्वयं नवांश-आधारित है, अतः यह पूर्व-शर्त शुद्ध वर्ग-गणित पर टिकी है।

उदाहरण (worked example) धनु = 240°–270°। कोई ग्रह 268° पर हो → राशि-भीतर चाप = 268° − 240° = 28°; 28° ÷ 3°20′ = 8.4 → 9वाँ नवांश (266°40′–270°)। अग्नि-तत्त्व राशियों (मेष/सिंह/धनु) में नवांश-गणना मेष से आरम्भ; धनु का 9वाँ नवांश = धनु-नवांश। अतः इस अंश में बैठा बृहस्पति ही "धनु में स्वांशगत" — यही श्लोक की गणितीय शर्त।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह समूचा अध्याय कालचक्र-अन्तर्दशा का है और इसकी हर शर्त "स्वांश" = नवांश (D9) पर आधारित है — वही षोडश-वर्ग शृंखला (D1…D60) जिसे हमने deterministic modular-arithmetic partition के रूप में सत्यापित किया (kaal_ekavimshati_varga.py)। गणित (नवांश-स्थिति) और फल (व्याख्या) को हम पृथक् रखते हैं; बृहस्पति का यह शुभ फल शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

64.41
ध्विजधेवन्त्ऱ्पोध्भूथं कोपं बन्ढुविनाशनम् ।
धेशथ्यागमवाप्नोथि मकरस्वांशगे शनौ
dhvijadhevantṟpodhbhūthaṃ kopaṃ banḍhuvināśanam |
dheśathyāgamavāpnothi makarasvāṃśage śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्विजदेवनृपोद्भूतम् = ब्राह्मण, देव और नृप से उत्पन्न; कोपम् = कोप/रोष; बन्धुविनाशनम् = बन्धु-क्षय; देशत्यागम् = देश छोड़ना/प्रवास; अवाप्नोति = प्राप्त करता है (इति शास्त्रम्); मकरस्वांशगे = मकर में स्वांश-स्थित; शनौ = शनि के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शनि मकर-स्वांश में हो, तब द्विज-देव-नृप से उत्पन्न कोप, बन्धु-विनाश और देश-त्याग का फल कहा गया है। मकर शनि की स्वराशि है; स्वांश के साथ यह कठोर फल-संयोग के रूप में वर्णित है। भय फैलाने के लिए नहीं — दशा-शास्त्र की सशर्त भाषा के रूप में समझें; न निर्णय लें कि “अवश्य देश छोड़ना पड़ेगा”।

English rendering The text states that when Saturn is in Capricorn in its own aṃśa, there is indication of anger arising from brāhmaṇas, deities, and kings, harm regarding kinsfolk, and leaving one’s country. Capricorn is Saturn’s own sign; with svāṃśa the verse states a severe conditional phala — report it as such, without fear-rhetoric or fatal certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि + मकर + स्वांश)। D1 = मकर; स्वांश = नवांश में मकर/कुम्भ (शनि-स्वामी)। 64.36 (वृश्चिक-स्वांश शनि) से राशि-भेद स्पष्ट — फल भी भिन्न कहा गया।

उदाहरण (worked example) शनि λ = 285°00′ (मकर 15°)। n = ⌊15°/3°20′⌋ = 4। यदि पाँचवाँ नवांश शनि-स्वामी हो तो मकरस्वांशगे शनौ लागू। तुलना: वृश्चिक-स्थित शनि (64.36) अलग D1-शर्त — दोनों को एक न मानें।

हमारा डिकोड (Our Decode) एक ही ग्रह (शनि) के दो स्वांश-योग — वृश्चिक बनाम मकर — अलग D1 इनपुट, अलग फल-पंक्ति। वर्ग-इंजन राशि और नवांश अलग रखता है; exact स्थिति-मिलान (`==` शर्त) के बिना फल-पंक्ति न बाँधना — यही हमारी विधि-अनुशासन की छाया है।

64.42
धेवार्चनं थपोढ्यानं सम्मानं भूपथेः कुले ।
भार्गवज्ञेन्धुजीवानां म्त्ऱ्गांशेऽन्थर्धशाफलम्
dhevārcanaṃ thapoḍhyānaṃ sammānaṃ bhūpatheḥ kule |
bhārgavajñendhujīvānāṃ mtṟgāṃśe'nthardhaśāphalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवार्चनम् = देव-पूजन; तपोध्यानम् = तप और ध्यान; सम्मानम् = सम्मान; भूपतेः कुले = भूप/राज-कुल में; भार्गव = शुक्र; ज्ञ = बुध; इन्दु = चन्द्र; जीव = गुरु; मृगांशे = मृग (मकर) अंश में; अन्तर्दशाफलम् = अन्तर्दशा का फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मृगांश (मकर-अंश) में स्थित भार्गव, बुध, चन्द्र और गुरु की अन्तर्दशा का फल देवार्चन, तपो-ध्यान, तथा भूप-कुल में सम्मान है। यह पद स्पष्टतः “अन्तर्दशाफल” कहता है — अर्थात् महादशा के भीतर उप-काल का फल, राशि-अंश शर्त के साथ। शुभ-कर्म और सम्मान का संकेत है; पद कोई वर्ष-संख्या नहीं गिनता, केवल फल-दिशा बताता है।

English rendering The text states that the antardaśā results of Venus, Mercury, the Moon, and Jupiter, when in the aṃśa of Mṛga (Capricorn), are worship of the gods, austerity and meditation, and honor in a royal household. The verse names the phala of the sub-period under an aṃśa condition; it does not itself give the year-lengths of the daśā scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पद स्वयं फल-कथन है; अन्तर्दशा-काल का सूत्र यहाँ नहीं, किन्तु अनुप्रयोग-शृंखला दो स्तरीय है। (1) अंश-शर्त: ग्रह मृग/मकर-नवांश में — D9 खण्ड = मकर। (2) अन्तर्दशा-दीर्घ (विंशोत्तरी, जब वही पद्धति प्रयुक्त हो): अन्तर्दशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष) ÷ 120; महादशा-वर्ष: केतु 7, शुक्र 20, रवि 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120)। नक्षत्र-अंश से महादशा-शेष = (नक्षत्र में शेष अंश ÷ 13°20′) × महादशा-वर्ष। अयनांश और दशा-पद्धति घोषित करें; पाठ-भेद/अन्य दशा-क्रम संभव।

उदाहरण (worked example) मान लें विंशोत्तरी, चन्द्र-नक्षत्र से शुक्र महादशा (20 वर्ष), अन्तर्दशा गुरु (16)। गुरु-अन्तर्दशा = (20 × 16) ÷ 120 = 320 ÷ 120 = 2 वर्ष 8 मास। अब गुरु λ ऐसा हो कि D9 = मकर (मृगांश) — तभी इस पद का अन्तर्दशा-फल-कथन लागू। यदि गुरु मकर-नवांश में न हो, केवल अन्तर्दशा-काल गिनना पर्याप्त नहीं। (उदाहरण-अयनांश: लाहिरी; नक्षत्र-वृत 27 × 13°20′।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पद अन्तर्दशा-फल को मृगांश-शर्त से बाँधता है — हमारे पक्ष में दो इंजन मिलते हैं: (क) षोडश-वर्ग से मकर-नवांश-सत्यापन, (ख) विंशोत्तरी 120-वर्ष अनुपात से अन्तर्दशा-दीर्घ। हम फल-वाक्य (देवार्चन, सम्मान) को संख्या से “सिद्ध” नहीं करते; exact-`==` अनुशासन केवल कालावधि और वर्ग-स्थिति पर है, भविष्य-घटना पर नहीं।

64.43
शिरोरोगं ज्वरं चैव करपाधक्षथं धिशेथ् ।
रक्थपिथ्थाथिसारांश्च म्त्ऱ्गस्वांशगथे कुजे
śirorogaṃ jvaraṃ caiva karapādhakṣathaṃ dhiśeth |
rakthapiththāthisārāṃśca mtṟgasvāṃśagathe kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिरोरोग = शिरः-रोग (सिर-संबंधी विकार); ज्वर = ज्वर; कर-पाद-क्षत = हाथ-पाँव के घाव/क्षति; रक्त-पित्त = रक्त-पित्त विकार; अतिसार = अतिसार; मृग-स्व-अंश-गत = मकर (मृग) राशि में स्वांश-स्थित; कुज = मंगल; दिशेत् = शास्त्र फलादेश देता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब मंगल मृग (मकर) में स्वांशगत होता है, तब शिरोरोग और ज्वर का संकेत मिलता है। हाथ-पाँव में क्षत, रक्त-पित्त तथा अतिसार जैसे विकारों का भी उल्लेख है। यह फल-कथन अंश-अवस्था और ग्रह-स्थिति के योग पर टिका है; पाठ में “मृगस्वांश” पढ़ा गया है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Mars occupies its own aṃśa in Mṛga (Makara/Capricorn), indications of head affliction, fever, wounds of the hands and feet, and disorders of blood-bile and loose bowels are to be read. The wording follows the given recension; alternate readings may exist.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश-स्थित कुज-फल)। यह पद गणना नहीं सिखाता; यह दशा/अंशावस्था में मंगल के फल का शास्त्रीय कथन है — “शास्त्र कहता है”, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

64.44
विनाशं पिथ्त्ऱ्बन्ढूनां ज्वररोगाधिकं धिशेथ् ।
न्त्ऱ्पशथ्रुभयं चैव म्त्ऱ्गांशस्वांशगे शनौ
vināśaṃ pithtṟbanḍhūnāṃ jvararogādhikaṃ dhiśeth |
ntṟpaśathrubhayaṃ caiva mtṟgāṃśasvāṃśage śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विनाश = नाश/क्षय; पितृ-बन्धु = पितृ-पक्ष के बन्धु; ज्वर-रोग-अधिक = ज्वर-रोग की अधिकता; नृप-शत्रु-भय = राजा तथा शत्रु से भय; मृग-अंश-स्व-अंश-ग = मृगांश में स्वांशगत; शनि = शनि; दिशेत् = फलादेश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि जब मृगांश में स्वांशगत हो, तब पितृ-बन्धुओं के विनाश-संकेत तथा ज्वर-रोग की अधिकता कही गई है। नृप-भय और शत्रु-भय का भी उल्लेख है। यह फल-वर्णन है; अंश-नाम “मृगांश” इस पाठ में है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that when Saturn stands in its own aṃśa in the Mṛga-aṃśa, indications of loss among paternal kin, excess of feverish disease, and fear from king and enemies are assigned. The claim is the śāstra’s phala, not a verified event-rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मृगांश-स्वांश शनि-फल)। अंश-स्थान की पहचान वर्गीय/राशि-मानचित्र से होती है, किन्तु इस श्लोक में कोई संख्या-सूत्र या काल-माप नहीं दिया गया।

64.45
नानाविध्यार्ठलाभश्च पुथ्रस्थ्रीमिथ्रजं सुखम् ।
शरीरारोग्यमैश्वर्यं कुम्भे स्वांशगथे भ्त्ऱ्गौ
nānāvidhyārṭhalābhaśca puthrasthrīmithrajaṃ sukham |
śarīrārogyamaiśvaryaṃ kumbhe svāṃśagathe bhtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाना-विध-अर्थ-लाभ = अनेक प्रकार का अर्थ-लाभ; पुत्र-स्त्री-मित्र-जं सुखम् = पुत्र-स्त्री-मित्र से उत्पन्न सुख; शरीर-आरोग्य = देह-आरोग्य; ऐश्वर्य = समृद्धि/वैभव; कुम्भे = कुम्भ राशि में; स्व-अंश-गत = स्वांश-स्थित; भृगु = शुक्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शुक्र जब कुम्भ में स्वांशगत हो, तब नानाविध अर्थ-लाभ तथा पुत्र-स्त्री-मित्र से सुख का संकेत मिलता है। शरीरारोग्य और ऐश्वर्य का भी उल्लेख है। यह शुभ-फल-वर्णन है; कुम्भ + स्वांश की युति पाठ की शर्त है।

English rendering The text states that when Venus occupies its own aṃśa in Kumbha (Aquarius), gains of various kinds of wealth, happiness arising from children, spouse, and friends, bodily health, and prosperity are indicated. The verse is a phala statement of placement, not a numerical rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुम्भ-स्वांश भृगु-फल)। “स्वांश” का निर्धारण दशा/अंशावस्था-पद्धति की उस परिभाषा पर निर्भर करता है जिस पाठ-परंपरा में अध्याय पढ़ा जा रहा हो — यहाँ केवल फल दिया गया है।

64.46
ज्वराग्निचोरजा पीदा शथ्रुणां च महध् भयम् ।
मनोव्यठामवाप्नोथि घतांशस्वान्थरे कुजे
jvarāgnicorajā pīdā śathruṇāṃ ca mahadh bhayam |
manovyaṭhāmavāpnothi ghatāṃśasvānthare kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्वर-अग्नि-चोर-जा पीडा = ज्वर, अग्नि तथा चोर से उत्पन्न पीड़ा; शत्रुणाम् महद् भयम् = शत्रुओं से महान् भय; मनोव्यथाम् = मानसिक व्यथा; अवाप्नोति = पाता है; घटांश-स्वान्तरे कुजे = जब मंगल घट अर्थात् कुम्भ राशि के अपने नवांश (स्वान्तर) में हो (घट = कुम्भ)।

हिन्दी भावार्थ जब मंगल कुम्भ राशि में अपने नवांश में स्थित होकर अन्तर्दशा देते हैं, तब शास्त्र कहता है कि ज्वर, अग्नि और चोर से पीड़ा, शत्रुओं से बड़ा भय, तथा मानसिक व्यथा सूचित होती है। यह मंगल का अनिष्ट-सूचक फल-कथन है।

English rendering When Mars is in its own navāṃśa in Aquarius, the text states that the sub-period may bring suffering from fever, fire and thieves, great fear from enemies, and mental distress.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अनिष्ट-सूचक)। घट = कुम्भ का पर्याय; स्वान्तर = स्वांश (अपना नवांश), वही 64.40 वाली D9 शर्त। श्लोक में गणना नहीं, केवल फल-गणना।

हमारा डिकोड (Our Decode) "महद् भयम्" जैसे शब्दों को हम भय-वचन नहीं बनने देते — यही CLAUDE.md/oracle discipline है: फल = ग्रन्थ का कथन, न कि निश्चय या पूर्वानुमान। यहाँ केवल मंगल की नवांश-स्थिति (D9) गणनीय है; उसका पीड़ा-फल व्याख्या-मात्र।

64.47
नैरुज्यं च सुखं चैव सम्मानं भूपथेः ध्विजाथ् ।
मनःप्रसाधमाप्नोथि कुम्भांशस्वांशगे गुरौ
nairujyaṃ ca sukhaṃ caiva sammānaṃ bhūpatheḥ dhvijāth |
manaḥprasādhamāpnothi kumbhāṃśasvāṃśage gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नैरुज्य = आरोग्य/रोग-रहितता; सुख = सुख; सम्मान = आदर; भूपतेः = राजा से; द्विजात् = द्विज/ब्राह्मण से; मनः-प्रसाद = मन का प्रसाद/शांति; कुम्भ-अंश-स्व-अंश-ग = कुम्भांश में स्वांशगत; गुरु = बृहस्पति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु जब कुम्भांश में स्वांशगत हो, तब नैरुज्य, सुख तथा राजा और द्विज से सम्मान का संकेत मिलता है। मनःप्रसाद की प्राप्ति भी कही गई है। यह शुभ-फल-वर्णन है; कुम्भांश + स्वांश + गुरु की युति शर्त है।

English rendering The text states that when Jupiter occupies its own aṃśa in the Kumbha-aṃśa, freedom from disease, happiness, honor from the king and from the twice-born, and mental clarity/contentment are indicated. The verse reports traditional phala, not a computational step.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुम्भांश-स्वांश गुरु-फल)। अंश-स्थिति वर्गीय/राशि-मान से तय होती है; इस श्लोक में कोई बाँट-सूत्र, बाँधु-संख्या या बल-इकाई नहीं है।

64.48
ढाथुथ्रयप्रकोपं च कलहं धेशविभ्रमम् ।
क्षयव्याढिमवाप्नोथि कुंभांशस्वांशगे शनौ
ḍhāthuthrayaprakopaṃ ca kalahaṃ dheśavibhramam |
kṣayavyāḍhimavāpnothi kuṃbhāṃśasvāṃśage śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धातु-त्रय-प्रकोपम् = तीन धातुओं/दोषों (वात-पित्त-कफ) का प्रकोप — त्रय = 3; कलहम् = कलह; देश-विभ्रमम् = देश-भ्रमण/भटकाव; क्षय-व्याधिम् = क्षय-रोग (क्षीण करने वाली व्याधि); अवाप्नोति = पाता है; कुम्भांश-स्वांशगे शनौ = जब शनि कुम्भ राशि के अपने नवांश में हो।

हिन्दी भावार्थ जब शनि कुम्भ राशि के अपने नवांश में स्थित होकर अन्तर्दशा देते हैं, तब शास्त्र कहता है कि त्रिधातु (वात-पित्त-कफ) का प्रकोप, कलह, देश-भटकाव तथा क्षय-व्याधि सूचित होती है। यह शनि का अनिष्ट-सूचक फल-कथन है, कोई चिकित्सकीय पूर्वानुमान नहीं।

English rendering When Saturn is in its own navāṃśa in Aquarius, the text states that the sub-period may bring aggravation of the three humours, quarrels, restless wandering, and wasting illness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। एकमात्र संख्या शब्द-रूप में: धातु-त्रय = 3 (वात, पित्त, कफ)। स्वांश-द्वार 64.40 के समान (शनि, कुम्भ-नवांश)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "त्रय = 3" को हम अंक-निष्ठ रूप से डिकोड करते हैं (भूतसंख्या-अनुशासन: वचन को अंक में निष्ठापूर्वक बदलना), और "क्षय-व्याधि" को ग्रन्थ का फल-वचन मानते हैं, स्वास्थ्य-भविष्यवाणी नहीं। शनि की नवांश-स्थिति गणनीय; फल व्याख्या-मात्र।

64.49
पुथ्रमिथ्रढनस्थ्रीणां लाभं चैव मनःप्रियम् ।
सौभाग्यव्त्ऱ्ध्ढिमाप्नोथि कुम्भांशस्वांशगे बुढे
puthramithraḍhanasthrīṇāṃ lābhaṃ caiva manaḥpriyam |
saubhāgyavtṟdhḍhimāpnothi kumbhāṃśasvāṃśage buḍhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-मित्र-धन-स्त्रीणां लाभ = पुत्र, मित्र, धन, स्त्री का लाभ; मनः-प्रिय = मन को प्रिय; सौभाग्य-वृद्धि = सौभाग्य की वृद्धि; अवाप्नोति = प्राप्त करता है (शास्त्र-कथन); कुम्भ-अंश-स्व-अंश-ग = कुम्भांश में स्वांशगत; बुध = बुध।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध जब कुम्भांश में स्वांशगत हो, तब पुत्र-मित्र-धन-स्त्री का लाभ तथा मनःप्रिय फल का संकेत मिलता है। सौभाग्य-वृद्धि भी कही गई है। यह शुभ-फल-वर्णन है; शर्त कुम्भांश + स्वांश + बुध की स्थिति है।

English rendering The text states that when Mercury occupies its own aṃśa in the Kumbha-aṃśa, gain of children, friends, wealth, and spouse, what is pleasing to the mind, and increase of good fortune are indicated. The verse is pure phala language of the given recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुम्भांश-स्वांश बुध-फल)। गणना-सूत्र नहीं; दशा-अंशावस्था के फल-क्रम का अंतिम कड़ी-सा पद, जिसमें बुध का शुभ-पक्ष कहा गया है।

64.50
विध्याव्त्ऱ्ध्ढिमवाप्नोथि स्थ्रीसुखं व्याढिनाशनम् ।
सुह्त्ऱ्थ्सङ्गं मनःप्रीथिं मीनांशस्वांशगे विढौ
vidhyāvtṟdhḍhimavāpnothi sthrīsukhaṃ vyāḍhināśanam |
suhtṟthsaṅgaṃ manaḥprīthiṃ mīnāṃśasvāṃśage viḍhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विद्या-वृद्धि = ज्ञान/शिक्षा की वृद्धि; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; स्त्री-सुख = स्त्री/दाम्पत्य-सुख; व्याधि-नाशन = रोग का नाश; सुहृत्-सङ्ग = मित्र-संगति; मनः-प्रीति = मानसिक प्रसन्नता; मीनांश = मीन-राशि-अंश (D9/नवमांश-प्रसंग में मीन-अंश); स्वांशगे = स्व-अंश/स्व-नवमांश में स्थित; विधौ = चन्द्र में/चन्द्र के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब चन्द्र मीनांश में तथा स्वांश में स्थित हो, तो विद्या की वृद्धि, स्त्री-सुख और व्याधि का नाश प्राप्त होता है। सुहृदों की संगति तथा मन की प्रीति भी इसी स्थिति से जोड़ी गई है। यह कालचक्र-दशा-अंश-फल का चन्द्र-विषयक कथन है, न कि सार्वकालिक नियति।

English rendering The text states that when the Moon occupies the Mīna (Pisces) aṃśa and is also in its own aṃśa, one attains growth of learning, happiness with the spouse/women, and removal of disease, together with the company of good friends and mental delight.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-दशा, मीनांश-स्वांश-स्थित चन्द्र)। “अंश” यहाँ नवमांश-श्रेणी का अंश-पद है; फल-कथन को दशा/अंश-मानचित्र के ऊपर रखें, गणना-सूत्र के रूप में नहीं।

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64.51
बन्ढुभिः कलहं चैव चौरभीथिं मनोव्यठाम् ।
स्ठानभ्रंशमवाप्नोथि मीनांशस्वांशगे रवौ
banḍhubhiḥ kalahaṃ caiva caurabhīthiṃ manovyaṭhām |
sṭhānabhraṃśamavāpnothi mīnāṃśasvāṃśage ravau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बन्धुभिः = सम्बन्धियों से; कलह = विवाद/झगड़ा; चौर-भीति = चोर/चोरी का भय; मनो-व्यथा = मानसिक क्लेश; स्थान-भ्रंश = पद/स्थान-च्युति; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; मीनांश-स्वांशगे = मीन-अंश और स्वांश में स्थित; रवौ = सूर्य में/सूर्य के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब सूर्य मीनांश में तथा स्वांश में हो, तो बन्धुओं से कलह, चौर-भय और मनोव्यथा का फल कहा गया है। साथ ही स्थानभ्रंश (पद या स्थान से च्युति) भी इसी योग से जोड़ा गया है। यह फल-कथन कालचक्र-अंश-व्यवस्था के अन्तर्गत सूर्य-स्थिति का वर्णन है।

English rendering The text states that when the Sun is in the Mīna aṃśa and in its own aṃśa, there is quarrel with kinsfolk, fear of thieves, mental distress, and loss of position or standing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य, मीनांश-स्वांश)। “स्थानभ्रंश” को शास्त्रीय पद-अर्थ में रखें; आधुनिक “career prediction” का विस्तार यहाँ न जोड़ें।

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64.52
रणे विजयमाप्नोथि पशुभूमिसुथागमम् ।
ढनव्त्ऱ्ध्ढिश्च मीनांशे स्वांशयोर्बुढशुक्रयोः
raṇe vijayamāpnothi paśubhūmisuthāgamam |
ḍhanavtṟdhḍhiśca mīnāṃśe svāṃśayorbuḍhaśukrayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रणे विजयम् = युद्ध में विजय; पशु-भूमि-सुत-आगमम् = पशु, भूमि तथा पुत्र की प्राप्ति; धन-वृद्धिः = धन की वृद्धि; मीनांशे = मीन राशि के नवांश में; स्वांशयोः = (द्विवचन) दोनों के अपने-अपने नवांश में स्थित होने पर; बुध-शुक्रयोः = बुध तथा शुक्र का (युग्म)।

हिन्दी भावार्थ जब बुध और शुक्र — दोनों मीन राशि में अपने-अपने नवांश में स्थित होकर अन्तर्दशा देते हैं, तब शास्त्र कहता है कि युद्ध में विजय, पशु-भूमि-पुत्र की प्राप्ति तथा धन की वृद्धि होती है। यह दोनों ग्रहों का सम्मिलित शुभ फल-कथन है।

English rendering When both Mercury and Venus occupy their own navāṃśas in Pisces, the text states that the sub-period brings victory in battle, the acquisition of cattle, land and sons, and increase of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्विग्रह-युग्म)। "स्वांशयोः" द्विवचन है → शर्त दो ग्रहों (बुध व शुक्र) पर एक साथ, प्रत्येक की स्वांश-गणना वही 64.40 वाली (30° ÷ 9)।

हमारा डिकोड (Our Decode) द्विवचन "स्वांशयोः" यह कहता है कि दोनों ग्रह स्वतन्त्र रूप से मीन-नवांश में हों — और D9 विभाजन की determinism के कारण प्रत्येक की स्वांश-स्थिति एक ही नियम (30°÷9 = 3°20′) से सिद्ध होती है, जो हमारे वर्ग-इंजन में सत्यापित है। सम्मिलित शुभ फल ग्रन्थ का कथन है; गणनीय अंश केवल दोनों की नवांश-स्थिति।

64.53
पिथ्थरोगं विवाधञ्च स्वजनैरपि मानवः ।
शथ्रुणां भयमाप्नोथि मीनांशस्वांशगे कुजे
piththarogaṃ vivādhañca svajanairapi mānavaḥ |
śathruṇāṃ bhayamāpnothi mīnāṃśasvāṃśage kuje

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पित्त-रोगम् = पित्त-जन्य व्याधि (bilious illness); विवादम् = कलह/झगड़ा; स्वजनैः अपि = अपने ही लोगों से भी; मानवः = जातक; शत्रूणां भयम् = शत्रुओं से भय; आप्नोति = प्राप्त करता है; मीनांश-स्वांशगे = मीन के नवांश (D9) में स्थित, उसकी उप-दशा/अन्तर में; कुजे = मंगल (के अन्तर में)।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र-अन्तर्दशा में जब मंगल मीन के नवांश-खण्ड में स्थित होकर अपना अन्तर देता है, तब शास्त्र कहता है — जातक को पित्त-सम्बन्धी रोग, विवाद (और वह भी अपने स्वजनों से) तथा शत्रुओं से भय जैसे फल सामने आते हैं। यह मंगल के उग्र-पित्त स्वभाव का मीन-नवांश में प्रकट रूप है, फल-कथन मात्र।

English rendering When Mars, placed in the Pisces navāṃśa, gives its sub-period, the text states that the native meets bilious ailments, disputes even with his own kin, and fear from enemies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। तथापि इसका इनपुट पूर्णतः गणनीय है: फल जिस "मीन-अंश" पर टँगा है वह D9 (नवांश) का एक निश्चित 3°20′ चाप है — व्याख्या भले हो, स्थान-निर्धारण शुद्ध अंकगणित है।

उदाहरण (worked example) नवांश-चाप = 30° ÷ 9 = 3°20′। मीन द्विस्वभाव राशि है, अतः इसके नवांश कर्क से आरम्भ होते हैं (चर→स्वतः, स्थिर→नवम, द्विस्वभाव→पञ्चम)। क्रम: कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन। अतः "मीन-नवांश" स्वयं मीन राशि के अन्तिम खण्ड 26°40′–30°00′ में पड़ता है (राशिचक्र में नवांश-मीन कुल 9 बार आता है; यह एक स्पष्ट स्थान)। इस चाप में स्थित मंगल = उपर्युक्त फल-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय जिस "अंश/नवांश" पर आश्रित है, वही हमारे षोडश-वर्ग इंजन का D9 है — 30° राशि का 9 समान 3°20′ खण्डों में नियतात्मक विभाजन (kaal_ekavimshati_varga.py)। हमारी पद्धति गणित और व्याख्या को अलग रखती है: नवांश-स्थान `==` शुद्ध गणना है, जबकि पित्त-रोग/विवाद जैसा फल शास्त्र का कथन है — कोई नियति-दावा नहीं।

64.54
ढनवस्थ्रकलथ्राणां लाभो भूपसमाधरः ।
प्रथिष्टा बहुढा लोके मीनांशस्वांशगे गुरौ
ḍhanavasthrakalathrāṇāṃ lābho bhūpasamādharaḥ |
prathiṣṭā bahuḍhā loke mīnāṃśasvāṃśage gurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-वस्त्र-कलत्राणाम् = धन, वस्त्र और कलत्र (पत्नी/दाम्पत्य) का; लाभः = प्राप्ति; भूप-समादरः = राजा से सम्मान; प्रतिष्ठा बहुधा लोके = लोक में प्रचुर यश-प्रतिष्ठा; मीनांश-स्वांशगे = मीन-नवांश में स्थित, उसके अन्तर में; गुरौ = बृहस्पति (के अन्तर में)।

हिन्दी भावार्थ जब गुरु मीन के नवांश में स्थित होकर अपना अन्तर देता है, तब शास्त्र के अनुसार जातक को धन, वस्त्र और कलत्र-सुख का लाभ, राजा/शासन से आदर, और लोक में बहुविध प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मीन गुरु की अपनी राशि है, इसीलिए यह अन्तर विशेष शुभ बताया गया है।

English rendering When Jupiter, in the Pisces navāṃśa, gives its sub-period, the text states gains of wealth, garments and a spouse, honour from the king, and wide renown in the world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुभ)। सूक्ष्म बिन्दु: मीन गुरु का स्वक्षेत्र है, अतः "स्व-अंश" यहाँ द्विगुण अर्थ रखता है — ग्रह अपने ही स्वामित्व की राशि के नवांश में — और शास्त्र इसे उच्च-कोटि शुभ मानता है।

64.55
ढननाशो मनस्थापो वेश्याधीनां च सङ्गमाथ् ।
धेशथ्यागो भवेध्वापि मीनांशस्वांशगे शनौ
ḍhananāśo manasthāpo veśyādhīnāṃ ca saṅgamāth |
dheśathyāgo bhavedhvāpi mīnāṃśasvāṃśage śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धन-नाश = धन की हानि; मनः-ताप = मानसिक संताप; वेश्यादीनां सङ्गमात् = वेश्यादि के संग से (पाठ: वेश्याधीनां/वेश्यादीनां — पाठ-भेद संभव); देश-त्याग = देश छोड़ना; भवेत् वा अपि = अथवा हो भी सकता है; मीनांश-स्वांशगे = मीन-अंश और स्वांश में; शनौ = शनि में/शनि के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब शनि मीनांश में तथा स्वांश में हों, तो धननाश और मनस्ताप का फल कहा गया है—विशेषतः वेश्यादि-संग के प्रसंग में। अथवा देशत्याग भी हो सकता है—पाठ “भवेद्वापि” से विकल्प-सूचक है। यह कठोर फल-कथन है; भय-व्यापार या दबाव-उपाय के रूप में न पढ़ा जाए।

English rendering The text states that when Saturn is in the Mīna aṃśa and in its own aṃśa, there is loss of wealth and mental anguish—associated with company of courtesans and the like—or even abandonment of one’s country.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि, मीनांश-स्वांश; विकल्प “वा अपि”)। नैतिक/सामाजिक फल-भाषा को शास्त्र-कथन के रूप में रखें; दोषारोपण या उपचार-दबाव न जोड़ें।

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64.56
एवं प्राज्ञैश्च विज्ञेयं कालचक्रधशाफलम् ।
अन्थर्धशाफलं चैव वामर्क्षेऽप्येवमेव च
evaṃ prājñaiśca vijñeyaṃ kālacakradhaśāphalam |
anthardhaśāphalaṃ caiva vāmarkṣe'pyevameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; प्राज्ञैः = विद्वानों द्वारा; विज्ञेयम् = जान लेना चाहिए; कालचक्र-दशा-फलम् = कालचक्र दशा का फल; अन्तर्दशा-फलम् च एव = और अन्तर्दशा (उप-दशा) का फल भी; वाम-ऋक्षे अपि = "वाम" (उल्टे/अपसव्य) नक्षत्र-क्रम में भी; एवम् एव च = ठीक इसी प्रकार (लागू)।

हिन्दी भावार्थ ऋषि उपसंहार करते हैं — विद्वानों को कालचक्र-दशा तथा उसकी अन्तर्दशा का फल इसी विधि से समझ लेना चाहिए। और जो नियम सव्य (सीधे) नक्षत्र-क्रम पर लागू है, वही "वामर्क्ष" अर्थात् अपसव्य (उल्टे) नक्षत्र-समूह पर भी उसी रूप में लागू होता है।

English rendering Thus should the wise understand the fruits of the Kālacakra daśā and its sub-periods; and in the reverse (apasavya) nakṣatra-reckoning too, the rule holds in exactly the same way.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सारांश (सव्य / अपसव्य क्रम)। तकनीकी सार: कालचक्र दशा में नक्षत्र-पाद दो दिशाओं में गिने जाते हैं — सव्य (क्रम-अनुगामी) और अपसव्य/वाम (प्रति-क्रम)। श्लोक कहता है कि फल-निर्धारण की तालिका दोनों दिशाओं में सम-रूप है; केवल क्रम की दिशा उलटती है, फल-नियम नहीं। दिशा एक नियतात्मक (deterministic) संरचना है, फल उसकी व्याख्या।

हमारा डिकोड (Our Decode) कालचक्र दशा जिस नवांश-ढाँचे पर खड़ी है, वह हमारे D9 इंजन का ही परिणाम है (30° का 9×3°20′ में नियत विभाजन)। दिशा (सव्य/अपसव्य) और नवांश-चाप — दोनों `==` स्तर की संरचनात्मक गणना हैं; जबकि "फल" शास्त्र का कथन बना रहता है। यही हमारी मूल-अनुशासन रेखा है: संरचना को गणित की तरह, फल को पाठ के स्वर की तरह प्रस्तुत करना — नियति के रूप में नहीं।

64.57
इधं फलं मया प्रोक्थं ढर्माऽढर्मक्त्ऱ्थं पुरा ।
थथ्सर्वं पाणिभिर्निथ्यं प्राप्यथे नाऽथ्र संशयः
idhaṃ phalaṃ mayā prokthaṃ ḍharmā'ḍharmaktṟthaṃ purā |
thathsarvaṃ pāṇibhirnithyaṃ prāpyathe nā'thra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इदम् फलम् = यह (उपर्युक्त) फल; मया प्रोक्तम् = मैंने (पराशर ने) कहा; धर्म-अधर्म-कृतम् = धर्म और अधर्म (शुभाशुभ कर्मों) से उत्पन्न; पुरा = पूर्वकाल में (किए कर्मों से); तत् सर्वम् = वह सब; प्राणिभिः = प्राणियों द्वारा (पाठ-भेद संभव: पाणिभिः); नित्यम् प्राप्यते = निरन्तर प्राप्त होता है; न अत्र संशयः = इसमें कोई संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं — यह जो फल मैंने बताया, वह पूर्वकृत धर्म और अधर्म (शुभ-अशुभ कर्मों) का परिणाम है; प्राणी उसे नित्य प्राप्त करते ही हैं, इसमें संशय नहीं। अर्थात् शास्त्र दशा-फल को यादृच्छिक न कहकर कर्म-फल-सिद्धान्त से जोड़ता है — यह ग्रन्थ का अपना दार्शनिक कथन है।

English rendering "This fruit I have declared is wrought of dharma and adharma done aforetime; all of it is ever obtained by beings — herein is no doubt," says the sage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-सिद्धान्त (कर्म-फल)। यह श्लोक फल का कारण-दर्शन देता है (पूर्व-कर्म), गणना नहीं; इसे शास्त्र के अपने विश्वास-कथन के रूप में पढ़ें, किसी अटल भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारी विधि-रेखा का मूल है: फल को कभी "नियति/निश्चित भविष्य" की तरह नहीं, बल्कि "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करना (dossier §5 — phala = the text's statement, never endorsed fate)। कर्म-हेतु का यह दार्शनिक कथन ग्रन्थ का स्वर है; हमारा इंजन केवल दशा-संरचना की गणना करता है, फल का अनुमोदन नहीं।

64.58
सुह्त्ऱ्धोऽन्थर्धशा भव्या पापस्यापि ध्विजोथ्थम ।
शुभस्यापि रिपोश्चैवमशुभा च प्रकीर्थिथा
suhtṟdho'nthardhaśā bhavyā pāpasyāpi dhvijoththama |
śubhasyāpi ripoścaivamaśubhā ca prakīrthithā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुहृदः = मित्र-ग्रह की; अन्तर्दशा = उप-दशा; भव्या = शुभ/कल्याणकारी; पापस्य अपि = वह पाप-ग्रह (नैसर्गिक क्रूर) हो तब भी; द्विज-उत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय); शुभस्य अपि = शुभ (नैसर्गिक सौम्य) ग्रह हो तब भी; रिपोः = शत्रु-ग्रह की; च एवम् अशुभा = वैसे ही अशुभ; प्रकीर्तिता = कही गई है।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ! जो ग्रह मित्र है उसकी अन्तर्दशा शुभ होती है — चाहे वह स्वभाव से पाप (क्रूर) ग्रह ही क्यों न हो; और जो शत्रु है उसकी अन्तर्दशा अशुभ कही गई है — चाहे वह स्वभाव से शुभ (सौम्य) ग्रह ही क्यों न हो। अर्थात् अन्तर्दशा-फल में सम्बन्ध (मित्र/शत्रु) ग्रह के नैसर्गिक शुभ-अशुभत्व पर प्रभावी होता है।

English rendering O best of the twice-born, the sub-period of a friendly planet is auspicious even if that planet be a malefic; and the sub-period of an inimical planet is called inauspicious even if it be a benefic.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक (वर्गीकरण-नियम), संख्यात्मक सूत्र नहीं। श्लोक एक निर्णय-नियम देता है जो नैसर्गिक स्वभाव को अध्यारोपित (override) करता है:
· अन्तर-ग्रह = मित्र → फल शुभ (चाहे पाप हो)
· अन्तर-ग्रह = शत्रु → फल अशुभ (चाहे शुभ हो)
यहाँ सम्बन्ध (मैत्री) निर्णायक है, नैसर्गिक शुभ-अशुभत्व नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक उस भेद को छूता है जिसे हम अलग रखते हैं — ग्रह का नैसर्गिक बल (naisargika, ṣaḍbala का एक घटक) बनाम उसकी सम्बन्ध-स्थिति (मित्र/शत्रु)। श्लोक का नियम एक नियतात्मक वर्गीकरण है (मित्र→शुभ, शत्रु→अशुभ), जिसे हम गणना-योग्य तर्क की तरह देखते हैं; उससे निकलने वाला फल-कथन शास्त्र का ही रहता है, कोई अनुमोदित भविष्यवाणी नहीं।

64.64
अठ कालचक्रान्थर्धशाफलाढ्यायः
aṭha kālacakrānthardhaśāphalāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ/इति = अध्याय-चिह्न (आरम्भ/समाप्ति-सूत्र; पाठ-भेद संभव); कालचक्र = कालचक्र-दशा-पद्धति; अन्तर्दशा-फल = अन्तर्दशाओं का फल-वर्णन; अध्यायः = अध्याय (अध्याय-समाप्ति/नाम-सूत्र)।

हिन्दी भावार्थ यह पंक्ति अध्याय का नाम-अथवा समाप्ति-सूत्र है—कालचक्र अन्तर्दशा-फल का अध्याय। यहाँ कोई नया फल-वाक्य नहीं; पाठ-संग्रह यह चिह्नित करता है कि अन्तर्दशा-फल का प्रकरण यहीं बँधा है। “अठ” रूप विकृत लग सकता है—अथ/इति आदि पाठ-भेद संभव।

English rendering Colophon/title-line of the chapter on the results of Kālacakra antardaśās. It marks the close (or formal naming) of this adhyāya rather than adding a new computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-नाम/समाप्ति-सूत्र (कोलोफ़ोन)। यह श्लोक दशा-वर्ष, अन्तर्दशा-अनुपात, या बिन्दु-गणना नहीं सिखाता; यह केवल प्रकरण की सीमा बाँधता है—कालचक्र की अन्तर्दशा-फल चर्चा यहीं समाप्त/नामित होती है।

अध्यायः 65

कालचक्रनवांशदशाफलाध्यायः

33 श्लोक
65.1
मेषे थु रक्थजा पीदा व्त्ऱ्षभे ढान्यवर्ध्ढनम् ।
मिठुने ज्ञानव्त्ऱ्ध्ढिश्च कर्के ढनपथिर्भवेथ्
meṣe thu rakthajā pīdā vtṟṣabhe ḍhānyavardhḍhanam |
miṭhune jñānavtṟdhḍhiśca karke ḍhanapathirbhaveth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष-राशि की दशा में (D1 राशि #1); रक्तजा पीडा (रक्तजा पीडा) = रक्त से उत्पन्न कष्ट (रक्त-विकार/रक्तस्राव); वृषभे धान्य-वर्धनम् = वृष-दशा में अन्न-धन की वृद्धि; मिथुने ज्ञान-वृद्धिः = मिथुन-दशा में विद्या/ज्ञान का बढ़ना; कर्के धन-पतिः भवेत् = कर्क-दशा में जातक धन-स्वामी (धनी) होता है। — यहाँ से मेष-नवांश की कालचक्र-दशा का फल आरम्भ होता है।

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय कालचक्र-नवांश-दशा का फल-कथन है। शास्त्र कहता है — मेष-नवांश में जन्मे जातक की दशा जब मेष-राशि में चले तो रक्त-सम्बन्धी पीड़ा का कथन है, वृष में अन्न-धन की वृद्धि, मिथुन में विद्या-ज्ञान का उत्कर्ष, और कर्क की दशा में धन-सम्पन्नता। ये चारों दशा-चरणों के फल हैं, कोई गणना नहीं।

English rendering For one born in the Aries navāṃśa, the text states the fruits as the daśā moves through the signs: in Aries, blood-borne affliction; in Taurus, growth of grain and wealth; in Gemini, increase of learning; and in Cancer, one becomes a master of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-नवांश-दशा का दशा-फल)। दशा-रचना (कौन-सी राशि किस क्रम में आती है) पूर्व-अध्यायों की गणना है; यह श्लोक केवल उस क्रम के प्रत्येक चरण का फल-वचन देता है — फल शास्त्र का कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

65.2
सिंहभे शथ्रुबाढा स्याथ् कन्यायां स्थ्रीजनाथ् सुखम् ।
थुलभे राजमन्थ्रिथ्वं व्त्ऱ्श्चिके म्त्ऱ्थ्युथो भयम्
siṃhabhe śathrubāḍhā syāth kanyāyāṃ sthrījanāth sukham |
thulabhe rājamanthrithvaṃ vtṟścike mtṟthyutho bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंह-भे (सिंहभे) = सिंह-राशि की दशा में (भे = राशि में, भ का सप्तमी-एकवचन); शत्रु-बाधा = शत्रुओं से उपद्रव; कन्यायां स्त्रीजनात् सुखम् = कन्या-दशा में स्त्री-वर्ग से सुख; तुले (थुलभे) राज-मन्त्रित्वम् = तुला-दशा में राजा का मन्त्री-पद; वृश्चिके मृत्युतो भयम् = वृश्चिक-दशा में मृत्यु-भय (आयु-संकट का कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मेष-नवांश की दशा आगे बढ़ने पर सिंह में शत्रुओं से बाधा, कन्या में स्त्री-जन से सुख, तुला में राज-मन्त्री-तुल्य प्रतिष्ठा, और वृश्चिक-चरण में मृत्यु-भय का वर्णन है। यह अन्तिम वचन आयु-संकट का शास्त्रीय कथन-मात्र है, भय या निश्चय नहीं — इसे केवल पाठ की घोषणा के रूप में लें।

English rendering The text states: in the Leo phase, harassment from enemies; in Virgo, comfort through womenfolk; in Libra, the standing of a royal minister; and in the Scorpio phase, a declared fear touching life — reported as the śāstra's statement, not as a fated outcome.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अरिष्ट/शुभ मिश्र दशा-फल)। "मृत्युतो भयम्" जैसे वचन अरिष्ट-कथन हैं; अनुशासन यह है कि इन्हें आयुर्दाय-गणित (अध्याय 43–44) से अलग रखा जाए — यह पद्य फल-वाणी है, आयु-गणना नहीं।

65.3
अर्ठलाभो भवेच्चापे मेषस्य नवभागके ।
फलमेवं विजानीयं धशाकाले ध्विजोथ्थम
arṭhalābho bhaveccāpe meṣasya navabhāgake |
phalamevaṃ vijānīyaṃ dhaśākāle dhvijoththama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्थ-लाभः भवेत् चापे = धनु-दशा में धन-लाभ हो; मेषस्य नव-भागके (नवभागके) = मेष के नवांश (D9) में — अर्थात् जन्म-बिन्दु का नवांश मेष है; फलम् एवं = फल इस प्रकार; विजानीयात् (पाठ-भेद संभव: "विजानीयं") = जान लेना चाहिए; दशा-काले = दशा के चलन-काल में; द्विज-उत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज (पराशर का मैत्रेय को सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ यह वचन मेष-नवांश-खण्ड को समेटता है — शास्त्र कहता है कि धनु की दशा में धन-लाभ होता है, और "हे द्विज-श्रेष्ठ, मेष के नवांश का दशा-फल इस प्रकार जानना।" यहाँ स्पष्ट होता है कि पूरा खण्ड (1–3) एक ही जन्म-नवांश (मेष) के लिए है, और दशा की प्रत्येक राशि का पृथक् फल गिनाया गया है।

English rendering In the Sagittarius phase, gain of wealth; thus, O best of the twice-born, one should know the daśā-fruits for the navāṃśa of Aries — the closing marker that binds verses 1–3 into a single navāṃśa-block.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ श्लोक जिस राशि पर दशा टिकाता है वह नवांश (D9) है। नवांश-गणना: एक राशि = 30°, नौ बराबर अंश → 30° ÷ 9 = 3°20′ (= 3.3333…°) प्रति नवांश। किसी राशि में स्थित देशान्तर λ के लिए नवांश-क्रमांक = ⌊(λ mod 30°) ÷ 3°20′⌋ + 1, जहाँ क्रमांक 1…9। चर-राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) का नवांश उसी राशि से गिना जाता है; स्थिर से 9वीं, द्विस्वभाव से 5वीं (BPHS अध्याय 6 का षोडश-वर्ग नियम — संहिता-भेद संभव, अतः परिपाटी घोषित)।

उदाहरण (worked example) जन्म-बिन्दु (चन्द्र/लग्न, परिपाटी-अनुसार) मेष 1°00′ पर मान लें। मेष चर-राशि है, अतः गणना मेष से: नवांश-क्रमांक = ⌊1.000° ÷ 3.3333°⌋ + 1 = 0 + 1 = 1 → पहला नवांश = मेष-नवांश। अतः मेष के प्रथम 0°–3°20′ खण्ड में स्थित बिन्दु इसी 1–3 श्लोक-खण्ड के दशा-फल को धारण करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवांश (D9) हमारे षोडश-वर्ग-इंजन की सोलह विभागों में से एक है — 30° का 9 समान चापों में नियतात्मक विभाजन, देशान्तर पर विशुद्ध मॉड्युलर अंकगणित (varga engine; kaal_ekavimshati_varga.py, dossier §2)। ध्यातव्य: कालचक्र-नवांश-दशा D9 पर आधारित राशि-दशा है, जबकि हमारा पिन-किया दशा-इंजन नक्षत्र-आधारित विंशोत्तरी (dossier §3) है — दोनों भिन्न प्रणालियाँ; हम केवल D9-वर्ग की गणना को सत्यापित मानते हैं, फल-वचन को नहीं।

65.4
मकरे पापकर्माणि कुम्भे वाणिज्यथो ढनम् ।
मीने सर्वार्ठसिध्ढिश्च व्त्ऱ्श्चिके वह्निथो भयम्
makare pāpakarmāṇi kumbhe vāṇijyatho ḍhanam |
mīne sarvārṭhasidhḍhiśca vtṟścike vahnitho bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मकरे पाप-कर्माणि = मकर-दशा में पाप-कर्म (निन्दित कार्य); कुम्भे वाणिज्यतः धनम् = कुम्भ-दशा में व्यापार से धन; मीने सर्वार्थ-सिद्धिः = मीन-दशा में समस्त प्रयोजनों की सिद्धि; वृश्चिके वह्नितः भयम् = वृश्चिक-दशा में अग्नि से भय। — यहाँ से वृष-नवांश का दशा-फल आरम्भ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वृष-नवांश की दशा मकर में हो तो निन्दित/पाप-कर्मों की ओर प्रवृत्ति, कुम्भ में व्यापार से धन, मीन में सर्व-कार्य-सिद्धि, और वृश्चिक-चरण में अग्नि-सम्बन्धी भय का कथन है। ये फल-वचन हैं; अग्नि-भय आदि शास्त्र की चेतावनी-वाणी है, कोई निश्चित घटना-घोषणा नहीं।

English rendering For the Taurus navāṃśa the text states: in Capricorn, tendency to unwholesome deeds; in Aquarius, wealth through trade; in Pisces, fulfilment of every aim; and in Scorpio, a declared danger from fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-नवांश-दशा का दशा-फल)। "पाप-कर्माणि" प्रवृत्ति-कथन है और "सर्वार्थ-सिद्धि" शुभ-कथन — शास्त्र इन्हें एक ही दशा-श्रृंखला में मिश्र रूप से रखता है; निर्णय गणित नहीं, पाठ की वाणी है।

65.5
थुलभे राजपूजा च कन्यायां शथ्रुथो भयम् ।
कर्के पथ्नीजने कष्तं सिंहभे नेथ्रपीदनम्
thulabhe rājapūjā ca kanyāyāṃ śathrutho bhayam |
karke pathnījane kaṣtaṃ siṃhabhe nethrapīdanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुले राज-पूजा = तुला-दशा में राजा से सम्मान/पूजा; कन्यायां शत्रुतः भयम् = कन्या-दशा में शत्रु से भय; कर्के पत्नी-जने कष्टम् = कर्क-दशा में पत्नी-पक्ष को कष्ट; सिंह-भे नेत्र-पीडनम् = सिंह-दशा में नेत्र-पीड़ा (आँखों का कष्ट)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वृष-नवांश की दशा तुला में राज-सम्मान देती है, कन्या में शत्रु-भय, कर्क में पत्नी-सम्बन्धी कष्ट, और सिंह-चरण में नेत्र-पीड़ा का कथन है। ये फल-वचन मात्र हैं; शारीरिक कष्ट का उल्लेख शास्त्रीय कथन है, कोई चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states: in Libra, honour from the king; in Virgo, fear from enemies; in Cancer, distress touching the wife; and in the Leo phase, affliction of the eyes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-नवांश-दशा का दशा-फल)। "नेत्र-पीडनम्" जैसे देह-कष्ट-वचन को शास्त्र-कथन के रूप में ही प्रस्तुत करना अनुशासन है — इन्हें चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं बनाना।

65.6
मिठुने विषथो भीथिर्व्त्ऱ्षस्य नवमांशके ।
व्त्ऱ्षभे ढनलाभः स्ठान्मेषे थु ज्वरसंभवः
miṭhune viṣatho bhīthirvtṟṣasya navamāṃśake |
vtṟṣabhe ḍhanalābhaḥ sṭhānmeṣe thu jvarasaṃbhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथुने = मिथुन में; विषतः भीतिः = विष से भय; वृषस्य = वृष का; नव-मांशके = नवमांश (D9) में; वृषभे = वृष में; धन-लाभः स्यात् = धन-लाभ हो; मेषे तु = मेष में तो; ज्वर-संभवः = ज्वर की संभावना (पाठ-कथन)।

हिन्दी भावार्थ मिथुन में विष-भय — और यहाँ स्पष्ट मार्कर है: वृषस्य नवमांशके। फिर वृष में धनलाभ; मेष में ज्वर-संभव। यह खंड वृष-नवमांश की फल-पंक्ति को नाम से बाँधता है। ज्वर/विष को रोग-भविष्य न समझें; शास्त्र का शब्द-फल है, चिकित्सकीय दावा नहीं।

English rendering In Mithuna, fear from poison — framed under the Taurus navamāṃśa; in Vṛṣabha, gain of wealth; in Meṣa, the possibility of fever — as the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवमांश (D9) वही विभाजन: 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश।
वृष-नवमांश = वृष राशि (30°–60° राशि-चक्र पर, मेष=0° से) के भीतर या “वृष से गिने नवमांश-क्रम” — परम्परा-भेद पर निर्भर; इस श्लोक में केवल फल, नक्शा-नियम नहीं। ज्वर/विष/धन — अमाप्य फल-पद।

उदाहरण (worked example) देशान्तर λ = 42°10′ (वृष के भीतर: 42°10′ − 30° = 12°10′)।
वृष-आन्तरिक नवमांश-सूचकांक = ⌊12°10′ ÷ 3°20′⌋ = ⌊12.166… ÷ 3.333…⌋ = ⌊3.65⌋ = 3 → चौथा नवमांश।
(अयनांश, “उदयादि/पार्वती” आदि नवमांश-मानचित्र — यदि राशि-स्वामी-क्रम बदलता हो — अलग से घोषित करें; यहाँ केवल 3°20′ चाप दिखाया।) फल: शास्त्र वृष में धनलाभ कहता है — रिपोर्ट, न कि गारंटी।

हमारा डिकोड (Our Decode) “नवमांश” सीधे षोडश-वर्ग के D9 से जुड़ता है — शुद्ध चाप-भागाकार, न कि भाष्य। दशा-कालीन पठन के साथ यह श्लोक वृष-नवमांश-पट्टे का नामित खंड है। इंजन-अनुशासन वही: विभाजन `==` से सत्याप्य; फल “शास्त्र कहता है” की सीमा में — कोई ± सहन-पट्टी फल पर नहीं, क्योंकि फल संख्या ही नहीं।

65.7
मीने च माथुलप्रीथिः कुम्भे शथ्रुप्रवर्ढनम् ।
मकरे चोरथो भीथिश्चापे विध्याविवर्ढनम्
mīne ca māthulaprīthiḥ kumbhe śathrupravarḍhanam |
makare coratho bhīthiścāpe vidhyāvivarḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने = मीन में; मातुल-प्रीतिः = मामा/मातुल का स्नेह; कुम्भे = कुम्भ में; शत्रु-प्रवर्धनम् = शत्रुओं की वृद्धि; मकरे = मकर में; चोरतः भीतिः = चोर से भय; चापे = धनु में; विद्या-विवर्धनम् = विद्या की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ अंतिम पंक्ति में शास्त्र कहता है — मीन में मातुल-प्रीति; कुम्भ में शत्रु-प्रवर्धन; मकर में चोर-भय; धनु में विद्या-विवर्धन। मीन–कुम्भ–मकर का कुछ पद पहले भी आ चुके; पुनरावृत्ति या पाठ-भेद संभव — इस संस्करण (Wikisource) में यथावत् रखा। सारा अध्याय-खंड फल-सूची है: प्रेम, शत्रु, चौर्य-भय, विद्या — सब शास्त्र के शब्द, हमारे आग्रह नहीं।

English rendering The text states affection of the maternal uncle in Mīna; increase of enemies in Kumbha; fear from thieves in Makara; and growth of learning in Dhanus (Cāpa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अध्याय 65 का समापन-क्रम)। मातुल–शत्रु–चोर–विद्या: वर्णनात्मक दशा/नवमांश-फल; कोई बिन्दु, रूप, या वर्ष-अंक नहीं।

65.8
मेषे थु शस्थ्रसंघाथो व्त्ऱ्षे थु कलहो भवेथ् ।
मिठुने सुखमाप्नोथि मिठुनांशे फलं थ्विधम्
meṣe thu śasthrasaṃghātho vtṟṣe thu kalaho bhaveth |
miṭhune sukhamāpnothi miṭhunāṃśe phalaṃ thvidham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे तु शस्त्र-संघातः = मेष-दशा में शस्त्र-आघात/प्रहार; वृषे तु कलहः भवेत् = वृष-दशा में कलह हो; मिथुने सुखम् आप्नोति = मिथुन-दशा में सुख मिलता है; मिथुन-अंशे फलम् तु इदम् (पाठ-भेद संभव: "थ्विधम्"=त्विदम्/ईदृशम्) = मिथुन-नवांश का फल इस प्रकार — खण्ड-समापक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मेष में शस्त्र-आघात का भय, वृष में कलह, मिथुन में सुख; और "इस प्रकार मिथुन-नवांश का फल जानना" — यह वचन मिथुन-नवांश-खण्ड को समेटता है। इसके पश्चात् कर्क-नवांश-खण्ड आरम्भ होता है।

English rendering The text states: in Aries, a weapon-blow; in Taurus, quarrel; in Gemini, attainment of comfort — such is the fruit of the Gemini navāṃśa, the marker closing this block.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) समापक-चिह्न पुनः नवांश (D9) है। नवांश-चाप = 3°20′; मिथुन द्विस्वभाव-राशि है, अतः उसका नवांश-आरम्भ राशि से 5वीं (तुला) से गिना जाता है (BPHS अध्याय 6 परिपाटी; संहिता-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) मिथुन 25°00′ पर बिन्दु: ⌊25.000° ÷ 3.3333°⌋ + 1 = ⌊7.5⌋ + 1 = 8 → आठवाँ नवांश। द्विस्वभाव गणना तुला से: तुला(1)…आगे 8वाँ = वृषभ (तुला→वृश्चिक→धनु→मकर→कुम्भ→मीन→मेष→वृषभ)। इस प्रकार जन्म-नवांश-राशि निश्चित होकर लागू फल-खण्ड चुना जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) द्विस्वभाव-राशि के लिए "5वीं से गणना" जैसी परिपाटी-निर्भरता ही वह कारण है जिसे हम घोषित करते हैं — संख्या परिपाटी पर टिकी हो तो परिपाटी बताना अनिवार्य (dossier §5)। D9-विभाजन-मात्र का सत्यापन हमारे वर्ग-इंजन में `==` स्तर पर नियत है (dossier §2); फल-वचन शास्त्र का कथन बना रहता है।

65.9
कर्कते सुखमाप्नोथि सिंहे भूपालथो भयम् ।
कन्यायां बन्ढुथः सौख्यं थुलभे कीर्थिमाप्नुयाथ्
karkate sukhamāpnothi siṃhe bhūpālatho bhayam |
kanyāyāṃ banḍhuthaḥ saukhyaṃ thulabhe kīrthimāpnuyāth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कटे (कर्कते) = कर्क राशि में; सुखम् आप्नोति = सुख पाता है; सिंहे = सिंह राशि में; भूपालतः = राजा/शासक की ओर से; भयम् = भय; कन्यायाम् = कन्या राशि में; बन्धुतः = बन्धु-जन से; सौख्यम् = सुख/सुखद सम्बन्ध; तुलायाम् (तुलभे) = तुला राशि में; कीर्तिम् आप्नुयात् = यश/कीर्ति प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्क में सुख की प्राप्ति कही गई है, जबकि सिंह में भूपाल (राजा या शासन-सत्ता) से भय का संकेत है। कन्या में बन्धु-जन से सौख्य मिलता है, और तुला में कीर्ति की प्राप्ति कही गई है। ये सब शास्त्र के फल-वाक्य हैं — स्थिति का पारंपरिक वर्णन, नियति की घोषणा नहीं।

English rendering The text states that in Karka one obtains happiness, while in Siṃha there is fear from the ruler. In Kanyā there is comfort through kinsfolk, and in Tulā one may attain renown. These are traditional phala statements of the śāstra, not deterministic forecasts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राशि-क्रम में सुख/भय/बन्धु/कीर्ति)। कोई अंश-विभाजन या बल-इकाई यहाँ नहीं गिनी गई; केवल संकेत-सूची है।

65.10
व्त्ऱ्श्चिके च पिथुः कष्तं चापे ज्ञानढनागमः ।
मकरे थ्वयशो लोके कुम्भे वाणिज्यथः क्षथिः
vtṟścike ca pithuḥ kaṣtaṃ cāpe jñānaḍhanāgamaḥ |
makare thvayaśo loke kumbhe vāṇijyathaḥ kṣathiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिके = वृश्चिक राशि में; पितुः कष्टम् = पिता-सम्बन्धी कष्ट; चापे = धनु राशि में; ज्ञान-धन-आगमः = ज्ञान और धन का आगमन; मकरे = मकर राशि में; अयशः = अपयश/अकीर्ति; लोके = लोक में; कुम्भे = कुम्भ राशि में; वाणिज्यतः = व्यापार/वाणिज्य से; क्षतिः = हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि वृश्चिक में पिता की ओर से कष्ट का संकेत है, और धनु में ज्ञान तथा धन का आगमन कहा गया है। मकर में लोक में अयश का उल्लेख है; कुम्भ में वाणिज्य-मार्ग से क्षति कही गई है। यहाँ “कष्ट / आगमन / अयश / क्षति” शास्त्र की फल-भाषा है — इसे निश्चित घटना या दबाव के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that in Vṛścika there is hardship connected with the father, and in Dhanus (Cāpa) there is inflow of knowledge and wealth. In Makara, disrepute in the world is indicated; in Kumbha, loss through trade. These are the śāstra’s own phala claims, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृ-कष्ट, ज्ञान-धन, अयश, वाणिज्य-क्षति)। कोई भुज/भाग-गणना या दशा-अनुपात यहाँ नहीं दिया गया।

65.11
मीने सुखमाप्नोथि कर्कांशे फलमीध्त्ऱ्शम् ।
व्त्ऱ्श्चिके कलहः पीदा थुलभे सुखसम्पधः
mīne sukhamāpnothi karkāṃśe phalamīdhtṟśam |
vtṟścike kalahaḥ pīdā thulabhe sukhasampadhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने सुखम् आप्नोति = मीन-दशा में सुख; कर्क-अंशे फलम् ईदृशम् (फलमीदृशम्) = कर्क-नवांश का फल इस प्रकार — खण्ड-समापक; वृश्चिके कलहः पीडा = (नये खण्ड में) वृश्चिक-दशा में कलह व पीड़ा; तुले सुख-सम्पदः = तुला-दशा में सुख-सम्पदा।

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध कर्क-नवांश-खण्ड को समेटता है — मीन में सुख, "इस प्रकार कर्क-नवांश का फल।" उत्तरार्ध से सिंह-नवांश खण्ड आरम्भ — वृश्चिक में कलह-पीड़ा, तुला में सुख-सम्पदा। शास्त्र इन्हें दशा-फल-रूप में कहता है।

English rendering In Pisces, attainment of comfort — thus ends the Cancer-navāṃśa block; then, for the Leo navāṃśa, the text states strife and affliction in the Scorpio phase and prosperous ease in the Libra phase.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) खण्ड-सन्धि नवांश (D9) से चिह्नित। सिंह स्थिर-राशि है → नवांश-आरम्भ राशि से 9वीं (मेष) से; प्रति नवांश 3°20′, क्रमांक 1…9 (BPHS अध्याय 6 परिपाटी; संहिता-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) सिंह 12°00′ पर बिन्दु: ⌊12.000° ÷ 3.3333°⌋ + 1 = ⌊3.6⌋ + 1 = 4 → चौथा नवांश। स्थिर गणना मेष से: मेष(1)→वृष(2)→मिथुन(3)→कर्क(4) → नवांश-राशि कर्क।

हमारा डिकोड (Our Decode) ⌊·⌋ (फ़्लोर) और मॉड्युलर-गणना ही नवांश-क्रमांक को नियत करते हैं — यही नियतात्मक अंकगणित हमारे D9-वर्ग का आधार है (dossier §2)। हम खण्ड-सीमा को गणित से पिन करते हैं और फल-वचन को शास्त्र-कथन रूप में रखते हैं; तोलरेंस-बैंड नहीं, विभाजन-सीमा पर विशुद्ध `==` (dossier §5)।

65.12
कन्यायां ढनढान्यानि कर्के पशुगणाध् भयम् ।
सिंहे सुखं च धुःखं च मिठुने शथ्रुवर्ढनम्
kanyāyāṃ ḍhanaḍhānyāni karke paśugaṇādh bhayam |
siṃhe sukhaṃ ca dhuḥkhaṃ ca miṭhune śathruvarḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्यायाम् = कन्या राशि में; धन-धान्यानि = धन और धान्य (अन्न-सम्पदा); कर्के = कर्क में; पशु-गणात् = पशु-समूह/पशु-जन से; भयम् = भय; सिंहे = सिंह में; सुखं च दुःखं च = सुख भी और दुःख भी; मिथुने = मिथुन में; शत्रु-वर्धनम् = शत्रुओं की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कन्या में धन-धान्य का संकेत है, जबकि कर्क में पशु-गण की ओर से भय कहा गया है। सिंह में सुख और दुःख दोनों का मिश्रण बताया गया है; मिथुन में शत्रु-वर्धन का उल्लेख है। यह मिश्र-फल (सुखं च दुःखं च) याद दिलाता है कि शास्त्र कभी-कभी एक ही स्थान पर द्वैध संकेत देता है — उसे एकतरफा “भाग्य” बनाकर नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that in Kanyā there are wealth and grain, while in Karka there is fear from herds or groups of animals. In Siṃha both happiness and sorrow are indicated; in Mithuna, increase of enemies. The double note (sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca) is the śāstra’s own mixed claim, not a one-sided verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धन-धान्य, पशुभय, मिश्र-सुख-दुःख, शत्रु-वृद्धि)। कोई बलांक या बिन्दु-योग यहाँ नहीं है।

65.13
व्त्ऱ्षे च सुखसम्पथ्थिः मेषे कष्तमवाप्नुयाथ् ।
मीने थु धीर्घयाथ्रा स्याथ् सिंहांशे फलमीध्त्ऱ्शम्
vtṟṣe ca sukhasampaththiḥ meṣe kaṣtamavāpnuyāth |
mīne thu dhīrghayāthrā syāth siṃhāṃśe phalamīdhtṟśam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषे च सुख-सम्पत्तिः = वृष-दशा में सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति; मेषे कष्टम् अवाप्नुयात् = मेष-दशा में कष्ट पाए; मीने तु दीर्घ-यात्रा स्यात् = मीन-दशा में दीर्घ यात्रा हो; सिंह-अंशे फलम् ईदृशम् (फलमीदृशम्) = सिंह-नवांश का फल इस प्रकार — खण्ड-समापक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सिंह-नवांश की दशा वृष में सुख-सम्पत्ति, मेष में कष्ट, और मीन में दीर्घ-यात्रा देती है; "इस प्रकार सिंह-नवांश का फल जानना" — यह वचन सिंह-नवांश-खण्ड को समेटता है। इस प्रकार प्रत्येक जन्म-नवांश के लिए दशा-राशियों का पृथक् फल-क्रम शास्त्र गिनाता है।

English rendering The text states: in Taurus, gain of comfort and prosperity; in Aries, one meets with hardship; and in Pisces, a long journey — such is the fruit of the Leo navāṃśa, the marker that closes this block.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) समापक-चिह्न नवांश (D9): 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश, क्रमांक = ⌊(λ mod 30°) ÷ 3°20′⌋ + 1। यही सूत्र प्रत्येक "X-अंशे फलमीदृशम्" खण्ड-सीमा को नियत करता है — फल-वाणी बदलती है, अन्तर्निहित D9-गणित एक ही रहता है।

उदाहरण (worked example) सिंह 29°00′ पर बिन्दु: ⌊29.000° ÷ 3.3333°⌋ + 1 = ⌊8.7⌋ + 1 = 9 → नवाँ (अन्तिम) नवांश। स्थिर-राशि सिंह की गणना मेष से 9वीं: मेष(1)…धनु(9) → नवांश-राशि धनु। अर्थात् सिंह के अन्तिम 26°40′–30° चाप का बिन्दु धनु-नवांश में पड़ता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरे अध्याय की खण्ड-रचना एक ही नियतात्मक D9-विभाजन (dossier §2) पर टिकी है — नवांश-राशि की पहचान गणित है, प्रत्येक दशा-राशि का फल शास्त्र का कथन। हमारा अनुशासन इन्हें पृथक् रखता है: वर्ग-सीमा `==`-स्तर पर सत्यापित, फल-वचन नियति नहीं, बल्कि "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत (dossier §5)।

65.14
कुम्भभे ढनलाभः स्यान्मकरेऽपि ढनागमः ।
चापे भ्राथ्त्ऱ्जनाथ् सौख्यं मेषे माथ्त्ऱ्सुखं वधेथ्
kumbhabhe ḍhanalābhaḥ syānmakare'pi ḍhanāgamaḥ |
cāpe bhrāthtṟjanāth saukhyaṃ meṣe māthtṟsukhaṃ vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुम्भे = कुम्भ राशि में; धन-लाभः = धन का लाभ; स्यात् = हो; मकरे अपि = मकर में भी; धन-आगमः = धन का आगमन; चापे = धनु में; भ्रातृ-जनात् = भाइयों/सहोदर-जन से; सौख्यम् = सुख; मेषे = मेष में; मातृ-सुखम् = माता-सम्बन्धी सुख; वदेत् / वर्धेत् = कहा जाए / बढ़े — पाठ-भेद संभव (वदेत्↔वर्धेत्; हस्तलेख “वधेथ्”)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कुम्भ में धन-लाभ होता है, और मकर में भी धन का आगमन कहा गया है। धनु में भ्रातृ-जन से सौख्य मिलता है; मेष में मातृ-सुख का कथन (या वृद्धि — पाठानुसार) है। दोनों राशियों में धन-संकेत पास-पास आने से यह सूची “लाभ” को एक ही दिशा में नहीं ठहरती — प्रत्येक राशि का अपना फल-वाक्य है, और उसे शास्त्र की भाषा में ही रखना चाहिए।

English rendering The text states that in Kumbha there is monetary gain, and in Makara also an inflow of wealth. In Dhanus there is comfort from brothers or sibling-kin; in Meṣa, maternal happiness is declared (or increases — reading vadet/vardhet uncertain: पाठ-भेद संभव). These remain the śāstra’s phala claims, not personal predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (धनलाभ, धनागम, भ्रातृ-सौख्य, मातृ-सुख)। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-चाप या बलांक यहाँ नहीं दिया गया; केवल राशि-आधारित शास्त्रीय संकेत-सूची है।

65.15
व्त्ऱ्षभे पुथ्रसौख्यं च मिठुने शथ्रुथो भयम् ।
कर्के धारजनैः प्रीथिः सिंहे व्याढिविवर्ढनम्
vtṟṣabhe puthrasaukhyaṃ ca miṭhune śathrutho bhayam |
karke dhārajanaiḥ prīthiḥ siṃhe vyāḍhivivarḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषभे = वृष-राशि में; पुत्रसौख्यम् = सन्तान-सुख; मिथुने = मिथुन में; शत्रुतः भयम् = शत्रु से भय; कर्के = कर्क में; दारजनैः = पत्नी/गृह-जनों के साथ; प्रीतिः = स्नेह; सिंहे = सिंह में; व्याधि-विवर्धनम् = रोग की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ कन्या-नवांश-महादशा की ही धारा में शास्त्र कहता है — वृष की अन्तर्दशा में पुत्र-सुख, मिथुन में शत्रु-भय, कर्क में पत्नी एवं गृहजनों से प्रीति, और सिंह की अन्तर्दशा में व्याधि की वृद्धि होती है। ये चारों उसी नवांश-दशा के चार अन्तर-खण्ड हैं।

English rendering The text states: in Taurus, the joy of offspring; in Gemini, danger from enemies; in Cancer, affection with wife and household; and in Leo, an aggravation of illness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "व्याधि-विवर्धन" जैसा वाक्य शास्त्र का फल-कथन है, निदान या चिकित्सा-भविष्यवाणी नहीं; इसे राशि-अन्तर्दशा से जुड़ी शास्त्रीय टिप्पणी के रूप में ही पढ़ें।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी डिकोड-अनुशासन-रेखा (CLAUDE.md + oracle) यहीं लागू होती है — गणित (नवांश-विभाजन, दशा-काल) और फल (व्याधि/शत्रु-भय) को पृथक रखना। "सिंहे व्याधिविवर्धनम्" हमारे लिए शास्त्र का दावा है ("the text states"), न कि हमारे द्वारा अनुमोदित चिकित्सकीय पूर्वानुमान; भय या दबाव-रूप में इसे प्रस्तुत नहीं किया जाता।

65.16
कन्यायां च सुथोथ्पथ्थिः कन्यांशे फलमीध्त्ऱ्शम् ।
थुलभे ढनसम्पथ्थिर्व्त्ऱ्श्चिके भ्राथ्त्ऱ्थः सुखम्
kanyāyāṃ ca suthothpaththiḥ kanyāṃśe phalamīdhtṟśam |
thulabhe ḍhanasampaththirvtṟścike bhrāthtṟthaḥ sukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्यायाम् = कन्या में; सुतोत्पत्तिः = पुत्र-जन्म; कन्यांशे = कन्या-नवांश (दशा) में; फलम् ईदृशम् = ऐसा (इसी प्रकार का) फल; तुले = तुला में; धनसम्पत्तिः = धन-सम्पदा; वृश्चिके = वृश्चिक में; भ्रातृतः = भाई से; सुखम् = सुख।

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध कन्या-नवांश-महादशा को समेटता है — कन्या की अन्तर्दशा में पुत्र-जन्म; और "कन्यांशे फलमीदृशम्" पद उस समस्त नवांश-दशा-खण्ड की समाप्ति-मुद्रा है। इसके बाद तुला-नवांश-दशा आरम्भ होती है, जिसमें शास्त्र तुला की अन्तर्दशा में धन-सम्पदा और वृश्चिक में भाई से सुख कहता है।

English rendering In Virgo, the birth of a son — "such is the result in the Virgo navāṃśa." Then (in the Libra navāṃśa daśā) the text states: in Libra, abundance of wealth; in Scorpio, happiness through a brother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "कन्यांशे फलमीदृशम्" संरचनात्मक चिह्न है: यह कन्या-नवांश (D9 का एक अंश) की महादशा-खण्ड को बंद करता है और अगला दशेश-नवांश खोलता है — पूरे अध्याय की रीढ़ यही नवांश-वार खण्ड-विभाजन है।

उदाहरण (worked example) नवांश (D9) = एक राशि (30°) का 9 समान अंशों में विभाजन, प्रत्येक 30° ÷ 9 = 3°20′। मान लें कोई बिन्दु अपनी राशि में 15° पर है → वह ⌈15° ÷ 3°20′⌉ = ⌈4.5⌉ = 5वें नवांश-अर्क (13°20′–16°40′) में पड़ता है। अध्याय-65 की कालचक्र-दशा इस नवांश को सव्य/अपसव्य क्रम से उसकी दशा-राशि पर आरोपित करती है — यही "कन्यांशे" जैसा पद पूरे फल-खण्ड को उस नवांश-दशा से बाँधता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवांश = हमारी षोडश-वर्ग सूची (D1…D60) का D9 अंग है — 30° का शुद्ध मॉड्युलर विभाजन, 3°20′ के समान चापों में (varga engine; kaal_ekavimshati_varga.py)। श्लोक जिस "अंश" पर दशा-खण्ड को टिकाता है, वह हमारे लिए ठीक वही नियतात्मक (deterministic) विभाजन है — व्याख्या नहीं, गणना।

65.17
पिथ्त्ऱ्वर्गसुखं चापे माथ्त्ऱ्कष्तं म्त्ऱ्गे वधेथ् ।
कुम्भे वाणिज्यथो लाभं मीने च सुखसम्पधम्
pithtṟvargasukhaṃ cāpe māthtṟkaṣtaṃ mtṟge vadheth |
kumbhe vāṇijyatho lābhaṃ mīne ca sukhasampadham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृवर्गसुखम् = पितृ-पक्ष / पितृ-वर्ग से सुख; चापे = धनु (चाप) राशि में; मातृकष्टम् = मातृ-सम्बन्धी कष्ट; मृगे = मकर (मृग) राशि में; वदेत् = कहना चाहिए; कुम्भे = कुम्भ राशि में; वाणिज्यतः लाभम् = वाणिज्य से लाभ; मीने = मीन राशि में; सुखसम्पदम् = सुख और सम्पद्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र धनु में पितृ-वर्ग से सुख, मकर में मातृ-कष्ट, कुम्भ में व्यापार से लाभ, और मीन में सुख-सम्पद् का फल बताता है। “वदेत्” विधान-वाचक है — ज्योतिषी को इस प्रकार कथन करना, न कि घटना को अवश्यंभावी ठहराना। मातृ-कष्ट आदि पद शास्त्रीय संकेत हैं; उन्हें भय या दबाव में नहीं बदलना।

English rendering The text states that in Sagittarius there is happiness from the father’s side or class; in Capricorn, maternal hardship; in Aquarius, gain from trade; and in Pisces, happiness with prosperity. The optative “vadet” frames this as the traditional statement to be reported, not as a guaranteed event.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चार राशियों के लिए चार शास्त्रीय परिणाम; कोई संख्या, दशा-वर्ष या बल-मान यहाँ नहीं है।

65.18
व्त्ऱ्श्चिके च स्थ्रीयाः पीदा थुले च जलथो भयम् ।
कन्यायां सुखसम्पथ्थिस्थुलांशे फलमीध्त्ऱ्शम्
vtṟścike ca sthrīyāḥ pīdā thule ca jalatho bhayam |
kanyāyāṃ sukhasampaththisthulāṃśe phalamīdhtṟśam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिके = वृश्चिक में; स्त्रियाः पीडा = स्त्री-सम्बन्धी पीड़ा; तुले = तुला में; जलतः भयम् = जल से भय; कन्यायाम् = कन्या में; सुखसम्पत्तिः = सुख-सम्पदा; तुलांशे = तुला-नवांश (दशा) में; फलम् ईदृशम् = ऐसा फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वृश्चिक की अन्तर्दशा में स्त्री-सम्बन्धी पीड़ा, तुला में जल से भय, और कन्या में सुख-सम्पत्ति। "तुलांशे फलमीदृशम्" पद तुला-नवांश-दशा-खण्ड को समेटकर बंद कर देता है, जिसके बाद अगला दशेश-नवांश आरम्भ होगा।

English rendering The text states: in Scorpio, distress connected with a woman; in Libra, danger from water; in Virgo, ease and prosperity — "such is the result in the Libra navāṃśa."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + खण्ड-समापन-चिह्न। "जलतो भयम्" शास्त्र का फल-कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं; कालचक्र-दशा में ऐसे वाक्य दशेश-नवांश एवं अन्तर्दशा-राशि के संयोग पर आरोपित शास्त्रीय-परिणाम मात्र हैं।

उदाहरण (worked example) तुला-नवांश-खण्ड की पहचान: किसी बिन्दु का राशि-भीतर अंश यदि 25° हो → नवांश-संख्या = ⌈25° ÷ 3°20′⌉ = ⌈7.5⌉ = 8वाँ नवांश (23°20′–26°40′)। यह अंक कालचक्र-क्रम में जिस दशा-राशि पर मानचित्रित होता है, वही "तुलांशे" खण्ड का स्वामी बनकर उपर्युक्त फल-सूची को अपने साथ बाँधता है (नवांश-चाप = 3°20′ स्थिर; राशि-आरोपण = घोषित कालचक्र-पद्धति)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दो सूत्र यहाँ हमारी विधि से मिलते हैं — (1) नवांश-चाप 3°20′ हमारी D9 वर्ग-गणना का नियत मान है (kaal_ekavimshati_varga.py); (2) "जलतो भयम्", "स्त्रियाः पीडा" जैसे वाक्य हमारे अनुशासन में शास्त्र के दावे हैं, हमारे अनुमोदित पूर्वानुमान नहीं — गणित और फल पृथक, कोई भय-दबाव नहीं।

65.19
कर्कभे ढनहानिः स्याथ् सिंहे भूपालथो भयम् ।
मिठुने भूमिलाभश्च व्त्ऱ्शभे ढनसम्पधः
karkabhe ḍhanahāniḥ syāth siṃhe bhūpālatho bhayam |
miṭhune bhūmilābhaśca vtṟśabhe ḍhanasampadhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कभे = कर्क राशि में; धनहानिः = धन की हानि; स्यात् = हो (शास्त्र-विधान); सिंहे = सिंह राशि में; भूपालतः भयम् = भूपाल / राजा से भय; मिथुने = मिथुन राशि में; भूमिलाभः = भूमि-लाभ; वृषभे = वृषभ राशि में; धनसम्पदः = धन की सम्पद्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कर्क में धन-हानि, सिंह में राज-सत्ता से भय, मिथुन में भूमि-लाभ, और वृषभ में धन-सम्पद् का फल कहता है। ध्यान रहे — ६५.१५ में वृषभ/मिथुन/कर्क/सिंह का फल-क्रम भिन्न था; यहाँ उसी चक्र का उलटा/भिन्न विन्यास है, जो संभवतः भिन्न ग्रह, दशा-स्वामी या गोचर-संदर्भ का फल है (पाठ-भेद / प्रकरण-संदर्भ संभव)। फल-सूची को एक-दूसरे से “सुधार” मानकर मिलाना नहीं; प्रत्येक श्लोक अपने प्रकरण का कथन है।

English rendering The text states that in Cancer there is loss of wealth; in Leo, fear from a ruler; in Gemini, gain of land; and in Taurus, wealth-prosperity. The sign-order and results differ from 65.15, so the two lists belong to their own contextual phala-series rather than a single merged table.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। कोई संख्यात्मक हानि/लाभ-सूत्र नहीं; केवल गुणात्मक शास्त्र-फल।

65.20
मेषे थु रक्थजा पीदा मीने च सुखमाधिशेथ् ।
कुम्भे वाणिज्यथो लाभो मकरे च ढनक्षिथः
meṣe thu rakthajā pīdā mīne ca sukhamādhiśeth |
kumbhe vāṇijyatho lābho makare ca ḍhanakṣithaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष राशि में; रक्तजा पीडा = रक्त से उत्पन्न / रक्त-सम्बन्धी पीड़ा; मीने = मीन राशि में; सुखम् आदिशेत् = सुख का निर्देश करे; कुम्भे = कुम्भ राशि में; वाणिज्यतः लाभः = व्यापार से लाभ; मकरे = मकर राशि में; धनक्षितिः = धन और भूमि (धन + क्षिति), अथवा धन-नाश का संकेत (पाठ-संदर्भ से द्व्यर्थ संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मेष में रक्तजा पीड़ा, मीन में सुख, कुम्भ में वाणिज्य-लाभ, और मकर में धन-क्षिति (धन-भूमि / धन-सम्बन्धी स्थिति) का फल बताता है। “रक्तजा पीडा” शास्त्र का पारंपरिक फल-पद है — इसे चिकित्सा-निदान या निश्चित रोग-भविष्य के रूप में नहीं पढ़ना। “आदिशेत्” फिर विधान-वाचक है: ज्योतिष-कथन की रीति, न कि अनिवार्यता का दावा।

English rendering The text states that in Aries there is affliction described as blood-born; in Pisces, happiness is to be indicated; in Aquarius, gain from commerce; and in Capricorn, the result termed dhana-kṣiti (wealth-and-land, or, by context, a wealth-earth outcome). Report the wording; do not convert it into a medical prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। चार राशियों के शास्त्रीय परिणाम; कोई अंश-भाग या बल-गणना नहीं।

65.21
चापे च सुखसम्पथ्थिर्व्त्ऱ्श्चिकांशे फलं थ्विधम् ।
मेषे च ढनलाभः स्याथ् व्त्ऱ्षे भूमिविवर्ध्ढनम्
cāpe ca sukhasampaththirvtṟścikāṃśe phalaṃ thvidham |
meṣe ca ḍhanalābhaḥ syāth vtṟṣe bhūmivivardhḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चापे = धनु में; सुखसम्पत्तिः = सुख-सम्पदा; वृश्चिकांशे = वृश्चिक-नवांश (दशा) में; फलं द्विधम् = द्विविध/संयुक्त फल (पाठ-भेद संभव — "थ्विधम्" अनियमित रूप); मेषे = मेष में; धनलाभः = धन-लाभ; वृषे = वृष में; भूमि-विवर्धनम् = भूमि की वृद्धि।

हिन्दी भावार्थ धनु की अन्तर्दशा में सुख-सम्पदा — इसके साथ "वृश्चिकांशे फलं द्विधम्" पद वृश्चिक-नवांश-दशा-खण्ड को समेटता है (द्विविध = दशा-अन्तर्दशा का संयुक्त फल; रूप अनियमित होने से पाठ-भेद संभव)। तत्पश्चात् धनु-नवांश-दशा आरम्भ होकर शास्त्र मेष में धन-लाभ और वृष में भूमि-वृद्धि कहता है।

English rendering In Sagittarius, ease and prosperity — "the result in the Scorpio navāṃśa is twofold" (reading uncertain). Then (in the Sagittarius navāṃśa daśā) the text states: in Aries, gain of wealth; in Taurus, an increase of land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + खण्ड-समापन। "फलं द्विधम्" का सम्भावित अर्थ "द्विविध फल" = दशा-राशि और अन्तर्दशा-राशि के संयुक्त परिणाम — अर्थात् फल एकल-कारक नहीं, अपितु दो स्तरों (महादशेश-नवांश × अन्तर्दशा) के संयोग से; पद-रूप अनियमित होने से पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) वृश्चिक-नवांश-खण्ड का चाप-निर्धारण: राशि-भीतर 8° का बिन्दु → नवांश = ⌈8° ÷ 3°20′⌉ = ⌈2.4⌉ = 3रा नवांश (6°40′–10°00′)। "द्विधम्" संकेत करता है कि इस खण्ड का प्रभावी फल = दशेश-नवांश-राशि ⊕ अन्तर्दशा-राशि — एक द्वि-स्तरीय संयोग, न कि अकेली राशि का फल।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवांश-चाप (3°20′) की नियत गणना और "अंश" पर खण्ड-आरोपण दोनों हमारी D9 वर्ग-प्रणाली के अनुरूप हैं (षोडश-वर्ग; kaal_ekavimshati_varga.py)। "द्विधम्" जैसी संयुक्त-फल-संकल्पना हमारे लिए दशा × अन्तर्दशा का क्रमिक-गुणन-ढाँचा है — व्याख्या नहीं, संरचना।

65.22
मिठुने सर्वसिध्ढिः स्याथ् कर्कभे सुखसम्पधः ।
सिंहे सर्वसुखोथ्पथ्थिः कन्यायां कलहागमः
miṭhune sarvasidhḍhiḥ syāth karkabhe sukhasampadhaḥ |
siṃhe sarvasukhothpaththiḥ kanyāyāṃ kalahāgamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथुने = मिथुन राशि में; सर्वसिद्धिः = समस्त कार्य-सिद्धि; कर्कभे = कर्कट (कर्क) राशि में; सुखसम्पदः = सुख और समृद्धि; सिंहे = सिंह राशि में; सर्वसुखोत्पत्तिः = सब प्रकार के सुख की उत्पत्ति; कन्यायां = कन्या राशि में; कलहागमः = कलह/झगड़े का आगमन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ मिथुन से कन्या तक की राशियों का फल-क्रम कहता है। मिथुन में सर्वसिद्धि बताई गई है; कर्कट में सुख और सम्पत्ति का योग। सिंह में सर्वसुख की उत्पत्ति कही गई है, और कन्या में कलह आने का संकेत दिया गया है। यह फल-कथन है — राशियों के क्रम में पाठ की अपनी भाषा।

English rendering The text states results for the signs from Gemini through Virgo: all accomplishment in Mithuna; happiness and prosperity in Karka; the arising of every comfort in Siṃha; and the coming of quarrels in Kanyā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राशि-क्रम का फलादेश)। यहाँ कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष नहीं; केवल शास्त्रीय फल-सूची है।

65.23
थुले वाण्ज्यथो लाभो व्त्ऱ्श्चिके रोगजं भयम् ।
चापे पुथ्रसुखं वाच्यं ढनुरंशे फलं थ्विधम्
thule vāṇjyatho lābho vtṟścike rogajaṃ bhayam |
cāpe puthrasukhaṃ vācyaṃ ḍhanuraṃśe phalaṃ thvidham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुले = तुला में; वाणिज्यतः लाभः = व्यापार से लाभ; वृश्चिके = वृश्चिक में; रोगजं भयम् = रोग-जनित भय; चापे = धनु में; पुत्रसुखं वाच्यम् = पुत्र-सुख कहना चाहिए; धनुरंशे = धनु-नवांश (दशा) में; फलं द्विधम् = द्विविध/संयुक्त फल (पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तुला की अन्तर्दशा में व्यापार से लाभ, वृश्चिक में रोग-जनित भय, धनु में पुत्र-सुख। "धनुरंशे फलं द्विधम्" पद धनु-नवांश-दशा-खण्ड को समेटता है (द्विविध = दशा-अन्तर्दशा का संयुक्त फल; रूप अनियमित, पाठ-भेद संभव)।

English rendering The text states: in Libra, profit through trade; in Scorpio, fear born of disease; in Sagittarius, the joy of a son is to be declared — "the result in the Sagittarius navāṃśa is twofold" (reading uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + खण्ड-समापन। "रोगजं भयम्" शास्त्र का फल-वाक्य है, चिकित्सा-पूर्वानुमान नहीं; "वाच्यम्" (कहना चाहिए) स्वयं संकेत देता है कि यह कथन-विधि है — फल का उच्चारण, न कि नियति की घोषणा।

उदाहरण (worked example) धनु-नवांश-खण्ड का चाप: राशि-भीतर 20° का बिन्दु → नवांश = ⌈20° ÷ 3°20′⌉ = ⌈6.0⌉ = 6ठा नवांश (16°40′–20°00′)। "द्विधम्" पुनः द्वि-स्तरीय फल (दशेश-नवांश × अन्तर्दशा-राशि) की ओर संकेत करता है; नवांश-चाप 3°20′ स्थिर, राशि-आरोपण घोषित कालचक्र-क्रम से।

हमारा डिकोड (Our Decode) धनु-नवांश जैसा "अंश"-चिह्न हमारी D9 वर्ग-गणना के 3°20′ नियत-चाप से सीधे जुड़ता है (kaal_ekavimshati_varga.py)। साथ ही "रोगजं भयम्" को हम शास्त्र का कथन मानते हैं — गणित (नवांश/दशा-काल) और फल को पृथक रखने का वही अनुशासन (CLAUDE.md + oracle), बिना किसी भय या चिकित्सकीय दावे के।

65.24
मकरे पुथ्रलाभः स्याथ् कुम्भे ढनविवर्ढनम् ।
मीने कल्याणमाप्नोथि व्त्ऱ्श्चिके पशुथो भयम्
makare puthralābhaḥ syāth kumbhe ḍhanavivarḍhanam |
mīne kalyāṇamāpnothi vtṟścike paśutho bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मकरे = मकर में; पुत्रलाभः = पुत्र-प्राप्ति; कुम्भे = कुम्भ में; धन-विवर्धनम् = धन की वृद्धि; मीने = मीन में; कल्याणम् आप्नोति = कल्याण प्राप्त होता है; वृश्चिके = वृश्चिक में; पशुतः भयम् = पशुओं से भय।

हिन्दी भावार्थ मकर (मृग)-नवांश-दशा की धारा में शास्त्र कहता है — मकर की अन्तर्दशा में पुत्र-प्राप्ति, कुम्भ में धन की वृद्धि, मीन में कल्याण, और वृश्चिक की अन्तर्दशा में पशुओं से भय। ये एक ही नवांश-दशा के चार क्रमिक अन्तर-खण्ड हैं।

English rendering The text states: in Capricorn, the gain of a son; in Aquarius, an increase of wealth; in Pisces, one attains well-being; and in Scorpio, danger from cattle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। "पशुतो भयम्" शास्त्र का फल-कथन है, कोई नियति-सूचना नहीं; इसे उसी दशेश-नवांश × अन्तर्दशा-राशि के संयोग पर आरोपित शास्त्रीय-परिणाम के रूप में पढ़ना चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी विधि के अनुरूप, "पशुतो भयम्" जैसे वाक्य हमारे लिए शास्त्र के दावे हैं ("the text states"), हमारे अनुमोदित पूर्वानुमान नहीं। गणित (नवांश-विभाजन, कालचक्र-दशा-क्रम) निश्चित एवं पुनरुत्पाद्य है; फल-वाक्य शास्त्र की अपनी वाणी में रखे जाते हैं — बिना भय, बिना दबाव।

65.25
थुलभे थ्वर्ठलाभः स्याथ् कन्यायां शथ्रुथो भयम् ।
कर्कते श्रियमाप्नोथि सिंहे शथ्रु जनाध् भयम्
thulabhe thvarṭhalābhaḥ syāth kanyāyāṃ śathrutho bhayam |
karkate śriyamāpnothi siṃhe śathru janādh bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुले = तुला में; तु अर्थलाभः = और धन-लाभ; कन्यायाम् = कन्या में; शत्रुतः भयम् = शत्रु से भय; कर्के = कर्क में; श्रियम् आप्नोति = श्री/सम्पत्ति प्राप्त करता है; सिंहे = सिंह में; शत्रुजनात् भयम् = शत्रु-जनों से भय।

हिन्दी भावार्थ मकर-नवांश-दशा में ही शास्त्र कहता है — तुला की अन्तर्दशा में धन-लाभ, कन्या में शत्रु-भय, कर्क में श्री (लक्ष्मी) की प्राप्ति, और सिंह की अन्तर्दशा में शत्रु-जनों से भय। एक ही नवांश-दशा में लाभ और शत्रु-भय भिन्न अन्तर्दशाओं में क्रमशः प्रकट होते हैं।

English rendering The text states: in Libra, gain of wealth; in Virgo, danger from enemies; in Cancer, one obtains prosperity (Śrī); and in Leo, danger from hostile people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। एक ही महादशेश-नवांश के भीतर "अर्थलाभ" और "शत्रुतो भयम्" का सह-अस्तित्व दर्शाता है कि फल-निर्धारक इकाई अकेली महादशा नहीं, अपितु महादशा × अन्तर्दशा का युग्म है।

65.26
मिठुने विषथो भीथिर्म्त्ऱ्गांशे फलमीध्त्ऱ्शम् ।
व्त्ऱ्शभे ढनसम्पथ्थिर्मेषे नेथ्ररुजो भयम्
miṭhune viṣatho bhīthirmtṟgāṃśe phalamīdhtṟśam |
vtṟśabhe ḍhanasampaththirmeṣe nethrarujo bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथुने = मिथुन में; विषतः भीतिः = विष से भय; मृगांशे = मृग (मकर)-नवांश (दशा) में; फलम् ईदृशम् = ऐसा फल; वृषभे = वृष में; धनसम्पत्तिः = धन-सम्पदा; मेषे = मेष में; नेत्ररुजः भयम् = नेत्र-रोग से भय।

हिन्दी भावार्थ मिथुन की अन्तर्दशा में विष से भय — और "मृगांशे फलमीदृशम्" पद मकर (मृग)-नवांश-दशा-खण्ड को समेटता है। इसके पश्चात् अगला दशेश-नवांश आरम्भ होकर शास्त्र वृष में धन-सम्पदा और मेष में नेत्र-रोग से भय कहता है।

English rendering In Gemini, fear from poison — "such is the result in the Capricorn (Mṛga) navāṃśa." Then (in the next navāṃśa daśā) the text states: in Taurus, abundance of wealth; in Aries, danger of eye-disease.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + खण्ड-समापन-चिह्न। "मृग" = मकर का पर्याय; "मृगांशे फलमीदृशम्" मकर-नवांश-दशा-खण्ड की समाप्ति-मुद्रा है, जो अगला दशेश-नवांश खोलती है — अध्याय का समग्र ढाँचा इन्हीं द्वादश नवांश-खण्डों की शृंखला है।

उदाहरण (worked example) मकर (मृग)-नवांश-खण्ड का चाप: राशि-भीतर 5° का बिन्दु → नवांश = ⌈5° ÷ 3°20′⌉ = ⌈1.5⌉ = 2रा नवांश (3°20′–6°40′)। यह नवांश-अंक कालचक्र-सव्य/अपसव्य क्रम से अपनी दशा-राशि पर मानचित्रित होकर "मृगांशे" खण्ड का फल-समुच्चय धारण करता है (चाप 3°20′ स्थिर; राशि-आरोपण = घोषित कालचक्र-पद्धति)।

हमारा डिकोड (Our Decode) "मृगांशे" जैसा नवांश-चिह्न हमारी D9 वर्ग-गणना (30° ÷ 9 = 3°20′ के समान चाप) से सीधे मेल खाता है (षोडश-वर्ग; kaal_ekavimshati_varga.py)। अध्याय-65 के बारह नवांश-खण्ड हमारे लिए एक नियत, पुनरुत्पाद्य विभाजन-अनुक्रम हैं, जिन पर फल-वाक्य शास्त्र की अपनी वाणी में आरोपित हैं — गणना और व्याख्या पृथक।

65.27
मीनभे धीर्घयाथ्रा स्याथ् कुम्भे ढनविवर्ढनम् ।
मकरे सर्वसिध्ढिः स्याच्चापे ज्ञानविवर्ढनम्
mīnabhe dhīrghayāthrā syāth kumbhe ḍhanavivarḍhanam |
makare sarvasidhḍhiḥ syāccāpe jñānavivarḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने = मीन राशि/नवांश में (Pisces); भे = भ (राशि) में — फल-श्लोकों का पूरक स्थानवाचक; दीर्घ-यात्रा = लम्बी यात्रा; स्यात् = हो/होती है; कुम्भे = कुम्भ में (Aquarius); धन-विवर्धनम् = धन की वृद्धि; मकरे = मकर में (Capricorn); सर्व-सिद्धिः = समस्त कार्य-सिद्धि; चापे = चाप/धनु में (Sagittarius, "धनुष"); ज्ञान-विवर्धनम् = ज्ञान की वृद्धि। (मूल पाठ की वर्तनी अशुद्ध-प्राय — ढ=ध, थ=त; अतः यहाँ शुद्ध रूप दिया गया, "पाठ-भेद संभव"।)

हिन्दी भावार्थ कालचक्र-नवांश-दशा के राशि-क्रम में जब दशा-राशि मीन हो तो शास्त्र दीर्घ यात्रा का, कुम्भ में धन-वृद्धि का, मकर में सर्व-सिद्धि का और चाप (धनु) में ज्ञान-वृद्धि का फल कहता है। ये चारों केवल उस-उस राशि-कालखण्ड के फल-वाक्य हैं।

English rendering The text states that in the Mīna period a long journey ensues, in Kumbha an increase of wealth, in Makara complete success, and in Cāpa (Sagittarius) a growth of knowledge.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कालचक्र-नवांश-दशा के राशि-क्रम का फल)। यहाँ राशि-नाम केवल अनुक्रम-सूचक है; फल किसी संख्या-सूत्र से नहीं, राशि-प्रतीक से जुड़ा है — अतः यह गणना नहीं, दशा-फल की सूची है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ नामित राशियाँ नवांश (D9) कोष्ठ हैं। हमारे वर्ग-डिकोड के अनुसार D9 प्रत्येक 30° राशि को 9 समान चापों में — 30° ÷ 9 = 3°20′ — बाँटता है, और कालचक्र-दशा इन्हीं नवांश-कोष्ठों पर निर्धारित (deterministic) रूप से चलती है। हम D9-विभाजन को शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित मानते हैं (kaal_ekavimshati_varga.py) तथा उपर्युक्त फल को केवल शास्त्र-कथन रूप में रखते हैं, गणित-मान रूप में नहीं।

65.28
मेषे सौख्यविनाशः स्याथ् व्त्ऱ्षभे मरणं भवेथ् ।
मिठुने सुखसम्पथ्थिः कुम्भांशे फलमीध्त्ऱ्शम्
meṣe saukhyavināśaḥ syāth vtṟṣabhe maraṇaṃ bhaveth |
miṭhune sukhasampaththiḥ kumbhāṃśe phalamīdhtṟśam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषे = मेष में; सौख्य-विनाशः = सुख का नाश; स्यात् = हो; वृषभे = वृष में; मरणं = मरण/प्राण-संकट; भवेत् = हो; मिथुने = मिथुन में; सुख-सम्पत्तिः = सुख एवं सम्पदा; कुम्भांशे = कुम्भ-नवांश में (Aquarius navāṃśa); फलम् ईदृशम् = ऐसा (उपरिलिखित) फल।

हिन्दी भावार्थ मेष की दशा-राशि में सुख का नाश, वृष में मरण-तुल्य संकट, और मिथुन में सुख-सम्पत्ति — इस प्रकार का फल शास्त्र कहता है। अन्तिम पद "कुम्भांशे फलमीदृशम्" यह संकेत देता है कि पूर्व-कथित फल-सूची कुम्भ-नवांश वाले जातक के खण्ड की समाप्ति है।

English rendering In Meṣa, ruin of comfort; in Vṛṣabha, mortal danger; in Mithuna, happiness and prosperity — such, the text states, is the fruit for one of the Kumbha navāṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नवांश-खण्ड का समापन-सूचक "अंशे फलमीदृशम्")। "मरणं भवेत्" जैसे कठोर पद को भी शास्त्र-कथन के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है — यह भय या नियति-घोषणा नहीं, ग्रन्थ का पारम्परिक फल-वाक्य है।

हमारा डिकोड (Our Decode) समापन-पद "कुम्भांशे फलमीदृशम्" इस खण्ड को कुम्भ-नवांश — एक D9 कोष्ठ — से बाँधता है। हमारा डिकोड नवांश को राशि का निर्धारित 3°20′ विभाजन मानता है, अतः इस खण्ड की कुंजी बना जन्म-नवांश एक शुद्ध मॉड्युलर परिणाम है, जबकि कठोर फल (जैसे "मरणं") को हम शास्त्र का दावा-मात्र मानकर रखते हैं — गणना और व्याख्या को पृथक् रखने के अनुशासन के अनुरूप।

65.29
कर्कते ढनव्त्ऱ्ध्ढिः स्याथ् सिंहे राजाश्रयं वधेथ् ।
कन्यायां ढनढान्यानि थुले वाणिज्यथो ढनम्
karkate ḍhanavtṟdhḍhiḥ syāth siṃhe rājāśrayaṃ vadheth |
kanyāyāṃ ḍhanaḍhānyāni thule vāṇijyatho ḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्कते = कर्कट राशि (कैंसर) में; धन-वृद्धिः = धन की वृद्धि; स्यात् = होती है; सिंहे = सिंह राशि में; राजाश्रयम् = राज-आश्रय / राजकीय संरक्षण; वदेत् = कहना चाहिए; कन्यायाम् = कन्या राशि में; धन-धान्यानि = धन और धान्य; तुले = तुला राशि में; वाणिज्यतः = व्यापार से; धनम् = धन।

हिन्दी भावार्थ कालचक्र-नवांश दशा-फल की इस कड़ी में शास्त्र कर्क से तुला तक के राश्यांशों का फल बताता है। कर्कट में धन-वृद्धि कही गई है; सिंह में राजाश्रय का संकेत है। कन्या में धन-धान्य की प्राप्ति, और तुला में वाणिज्य-मार्ग से धन — यही क्रम यहाँ कहा गया है। यह फल-कथन दशा-अंश की स्थिति के अनुसार शास्त्र की भाषा में है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states results for the Cancer-to-Libra span of the Kālacakra-navāṃśa daśā sequence: increase of wealth in Cancer; royal patronage in Leo; wealth and grain in Virgo; and wealth through trade in Libra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राश्यांश-फल)। यहाँ गणना नहीं, केवल दशा/अंश की राशि-स्थिति पर शास्त्र द्वारा कहा गया फल-क्रम है; राशि-क्रम कर्क → सिंह → कन्या → तुला है।

65.30
व्त्ऱ्श्चिके ज्वरजा पीदा चापे ज्ञानसुखोधयः ।
मकरे स्थ्रीविरोढः स्याथ् कुम्भे च जलथो भयम्
vtṟścike jvarajā pīdā cāpe jñānasukhodhayaḥ |
makare sthrīviroḍhaḥ syāth kumbhe ca jalatho bhayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृश्चिके = वृश्चिक राशि में; ज्वरजा = ज्वर से उत्पन्न; पीडा = पीड़ा / क्लेश; चापे = धनु राशि में; ज्ञान-सुख-उदयः = ज्ञान और सुख का उदय; मकरे = मकर राशि में; स्त्री-विरोधः = स्त्री / पत्नी से विरोध; स्यात् = होता है; कुम्भे = कुम्भ राशि में; जलतः = जल से; भयम् = भय।

हिन्दी भावार्थ आगे वृश्चिक से कुम्भ तक का फल कहा गया है। वृश्चिक में ज्वर-जन्य पीड़ा का उल्लेख है; धनु में ज्ञान और सुख का उदय बताया गया है। मकर में स्त्री-विरोध, और कुम्भ में जल से भय — शास्त्र इन्हीं शब्दों में फल कहता है। इन्हें सावधान-वर्णन की तरह पढ़ें, न कि निश्चित आपदा की घोषणा की तरह।

English rendering The text continues the sequence: affliction arising from fever in Scorpio; the rise of knowledge and happiness in Sagittarius; opposition involving a woman (or spouse) in Capricorn; and fear connected with water in Aquarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राश्यांश-फल)। कोई अंश-विभाजन या दशा-वर्ष सूत्र यहाँ नहीं; केवल वृश्चिक → धनु → मकर → कुम्भ क्रम पर शास्त्र-कथित फल है।

65.31
मीने थु सर्वसौभाग्यं मीनांशे फलमीध्त्ऱ्शम् ।
धशाध्यंशक्रमेणैव ज्ञाथ्वा सर्वफलं वधेथ्
mīne thu sarvasaubhāgyaṃ mīnāṃśe phalamīdhtṟśam |
dhaśādhyaṃśakrameṇaiva jñāthvā sarvaphalaṃ vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीने = मीन में; सर्व-सौभाग्यं = समस्त सौभाग्य; मीनांशे = मीन-नवांश में (Pisces navāṃśa); फलम् ईदृशम् = ऐसा फल; दशा = दशा (कालखण्ड); अध्यंश = अधि-अंश/उप-अंश (नवांश का सूक्ष्म उप-क्रम; पाठ-भेद संभव: दशा-अंश); क्रमेण एव = क्रम से ही; ज्ञात्वा = जानकर; सर्व-फलं = समस्त फल; वदेत् = कहे/घोषित करे।

हिन्दी भावार्थ मीन की दशा-राशि में सर्व-सौभाग्य होता है; और "मीनांशे फलमीदृशम्" — अर्थात् मीन-नवांश-खण्ड का फल ऐसा है। शास्त्र स्पष्ट विधि-निर्देश देता है: दशा और अध्यंश (उप-नवांश) के क्रम को ठीक-ठीक जानकर ही समस्त फल कहना चाहिए।

English rendering In Mīna, complete good fortune — such is the fruit for the Mīna navāṃśa. Only after knowing the results strictly through the sequence of daśā and its sub-division should one declare the whole result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह विधि-श्लोक है (संख्या-सूत्र नहीं, अपितु प्रक्रिया)। फल-कथन का क्रम = जन्म-नवांश → चालू दशा-राशि → अध्यंश (उप-नवांश), फिर संगत फल। तात्पर्य: पहले यह गणना कि कौन-सा नवांश/उप-अंश चल रहा है, तत्पश्चात् ही फल-कथन (ज्ञात्वा … वदेत्)।

उदाहरण (worked example) कल्पित इनपुट — चन्द्र-स्फुट 21° तुला (परम्परा: नवांश D9, चाप 3°20′; चर-राशि से नवांश-गणना उसी राशि से आरम्भ)। राशि-भीतर स्थिति = 21°। नवांश-सूचक = ⌊21° ÷ 3°20′⌋ = ⌊21 ÷ 3.3333⌋ = ⌊6.3⌋ = 6 → तुला का 7वाँ नवांश। तुला (चर) से गणना: तुला(1), वृश्चिक(2), धनु(3), मकर(4), कुम्भ(5), मीन(6), मेष(7) → जन्म-नवांश = मेष। अब कालचक्र-दशा इसी मेष-नवांश से आरम्भ होकर राशि-क्रम में चलती है, और प्रत्येक चालू राशि पर उपर्युक्त फल-सूची लागू होती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे इंजन की मूल क्रिया-विधि — दशा-अंश-क्रम — को ही नामांकित करता है। मीनांश (D9 कोष्ठ, 30° ÷ 9 = 3°20′) तथा उससे सूक्ष्म "अध्यंश" — दोनों को हम शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित से निकालते हैं कि कौन-सा अंश चल रहा है, और तभी शास्त्र-फल जोड़ते हैं। यह ठीक "ज्ञात्वा … वदेत्" (जानकर तब कहो) के इसी निर्देश के अनुरूप है।

65.32
क्रूरग्रहधशाकाले शान्थिं कुर्याध् विढानथः ।
थथः शुभमवाप्नोथि थध्धशायां न संशयः
krūragrahadhaśākāle śānthiṃ kuryādh viḍhānathaḥ |
thathaḥ śubhamavāpnothi thadhdhaśāyāṃ na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूर-ग्रह = क्रूर/पाप ग्रह; दशा-काले = उसकी दशा-अवधि में; शान्तिं = शान्ति-कर्म/प्रशमन-विधि; कुर्यात् = करे; विधानतः = शास्त्र-विधि के अनुसार; ततः = तब/उससे; शुभम् = शुभ-फल; अवाप्नोति = प्राप्त करता है; तद्-दशायां = उस दशा में; न संशयः = संशय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — क्रूर (पाप) ग्रह की दशा-अवधि में विधिपूर्वक शान्ति-कर्म करना चाहिए; ग्रन्थ का कथन है कि इससे उस दशा में शुभ-फल प्राप्त होता है, इसमें (ग्रन्थ के अनुसार) संशय नहीं। यह ग्रन्थ का पारम्परिक विधान-वाक्य है; इसे किसी दबाव या अनिवार्य उपाय के रूप में नहीं, केवल शास्त्र-कथन के रूप में लेना चाहिए।

English rendering The text prescribes that during a malefic planet's daśā one should perform the śānti rite according to the ordinance; it states that one thereby attains auspiciousness in that period, without doubt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधान/उपाय-कथन (शान्ति-विधि)। यह उपाय-वाक्य है; डिकोड-नीति के अनुसार इसे शास्त्र का कथन-मात्र प्रस्तुत किया गया है — भय या बाध्यकारी उपाय के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी फ्रेमिंग-नीति फल- और उपाय-वाक्यों को सदा ग्रन्थ की अपनी वाणी मानती है, कभी नियति या दबाव नहीं (CLAUDE.md अनुशासन)। यह श्लोक इसका आदर्श उदाहरण है: "शान्तिं कुर्यात् … शुभम् अवाप्नोति" को हम केवल शास्त्र-विधान रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो निर्धारित दशा-अवधि की गणना (जहाँ हमारा exact-`==` इंजन-कार्य है) से पृथक् है।

65.65
अठ कालचक्रनवांशधशाफलाढ्यायः
aṭha kālacakranavāṃśadhaśāphalāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब/यहाँ (मूल "अठ" → अथ; पाठ-भेद संभव); कालचक्र = कालचक्र (काल-चक्र आधारित दशा-पद्धति); नवांश = D9 नवांश; दशा = दशा; फल = फल/परिणाम; अध्यायः = अध्याय।

हिन्दी भावार्थ यह "कालचक्र-नवांश-दशा-फल" नामक अध्याय का शीर्षक/पुष्पिका-वाक्य है — अर्थात् कालचक्र-आधारित नवांश-दशा के फलों का अध्याय। इसी से स्पष्ट होता है कि पूर्व-श्लोक इसी दशा-पद्धति के फल-विशेष थे।

English rendering This is the colophon: "the chapter on the results (phala) of the Kālachakra-navāṃśa daśā."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-शीर्षक/पुष्पिका (वर्णन)। यह पद अध्याय को नामांकित करता है और इसी से ज्ञात होता है कि पूर्ववर्ती समस्त श्लोक कालचक्र-नवांश-दशा के फल थे, कोई स्वतन्त्र गणना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) जिस recension पर यह पुस्तक पिन है (Sanskrit Wikisource, 97 अध्याय / 3,943 श्लोक), उसमें दशा-खण्ड अध्याय 46–65 तक फैला है; यह पुष्पिका उसी खण्ड की समाप्ति चिह्नित करती है, जिसके पश्चात् अष्टकवर्ग (Ch.66 — हमारा exact-`==` कैनॉनिकल: सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV 337) आरम्भ होता है। शीर्षक में नामित "नवांश" वही D9 वर्ग है जिसे हमारा इंजन निर्धारित रूप से विभाजित करता है।

अध्यायः 66

अथाष्टकवर्गाध्यायः

72 श्लोक
66.1
भगवन् भवथाऽख्याथं ग्रहभावाधिजं फलम् ।
बहुनाम्त्ऱ्षिवर्याणामाचार्याणां च सम्मथम्
bhagavan bhavathā'khyāthaṃ grahabhāvādhijaṃ phalam |
bahunāmtṟṣivaryāṇāmācāryāṇāṃ ca sammatham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगवन् = हे भगवन् (शिष्य-सम्बोधन); भवता = आपके द्वारा; आख्यातम् = कहा/व्याख्यात; ग्रहभावाधिजम् = ग्रह + भाव से उत्पन्न; फलम् = फल-कथन; बहूनाम् = अनेक; ऋषिवर्याणाम् = श्रेष्ठ ऋषियों का; आचार्याणाम् = आचार्यों का; सम्मतम् = सम्मत / स्वीकृत।

हिन्दी भावार्थ शिष्य कहता है — हे भगवन्, ग्रह और भावों से उत्पन्न जो फल आपने पहले कहा है, वह अनेक श्रेष्ठ ऋषियों और आचार्यों के मत से भी मेल खाता है। यह कथन परम्परा की सहमति का द्वार खोलता है: जो फल-विधान यहाँ आगे चलेगा, वह एक व्यक्ति-मात्र की कल्पना नहीं, शास्त्र-समुदाय का सम्मत-पथ है। पाठ में “भवथाऽख्याथं / सम्मथम्” जैसे रूप पाठ-भेद संभव का संकेत देते हैं; भाव “भवता आख्यातम् … सम्मतम्” ही स्थिर है।

English rendering “O Lord, the results arising from the planets and the houses that you have expounded are also agreed upon by many eminent ṛṣis and teachers.” The verse frames the coming doctrine as tradition-endorsed, not idiosyncratic.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / प्रस्तावना। यह श्लोक गणना नहीं देता; यह फल-विधान की प्रामाणिकता (ऋषि-आचार्य-सम्मति) स्थापित करता है, जिसके बाद अध्याय अष्टकवर्ग की स्पष्ट विधि की ओर बढ़ेगा।

66.2
संकराथ् थथ्फलानां च ग्रहाणां गथिसङ्कराथ् ।
इथ्ठमेवेथि नो सर्वे ज्ञाथ्वा वक्थुमलं नराः
saṃkarāth thathphalānāṃ ca grahāṇāṃ gathisaṅkarāth |
ithṭhamevethi no sarve jñāthvā vakthumalaṃ narāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संकरात् = मिश्रण / परस्पर-संकर से; तत्फलानाम् = उन फलों का; ग्रहाणाम् = ग्रहों का; गतिसङ्करात् = गतियों के संकर से; इत्थम् एव = ठीक इसी प्रकार; इति = ऐसा; नो सर्वे = सभी नहीं; ज्ञात्वा = जानकर; वक्तुम् अलम् = कहने में समर्थ; नराः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उन फलों में संकर होने से, और ग्रहों की गतियों के परस्पर-मिश्रण से, सभी मनुष्य यह समझकर निश्चयपूर्वक “इसी प्रकार है” नहीं कह पाते। सरल भाषा में: ग्रह-भाव-फल की साधारण सूची पर्याप्त स्पष्ट नहीं रहती, क्योंकि एक साथ कई ग्रह, कई भाव, कई गति-अवस्थाएँ फल को संकरित कर देती हैं। इसी कठिनाई से आगे की विधि — अष्टकवर्ग — का औचित्य जन्म लेता है।

English rendering “Owing to the intermixture of those results and to the mixed motions of the planets, not all people, even after understanding, are competent to declare, ‘It is exactly so.’” The verse names the problem aṣṭakavarga is about to solve: confounded phala under concurrent planetary conditions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — समस्या-कथन / संवाद। “संकर” और “गतिसङ्कर” यहाँ गुणात्मक चुनौती हैं, कोई सूत्र नहीं; अगले श्लोकों में उसी चुनौती का उत्तर “स्पष्ट” (परिस्फुट) विधि के रूप में माँगा जाएगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अध्याय ६६ आगे अष्टकवर्ग की सारणियाँ देता है — सूर्य-रेखायोग ४८, चन्द्र ४९, मंगल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९, सर्वअष्टकवर्ग (SAV) = ३३७ — जिन्हें हमने exact-`==` फिक्स्चर से पिन किया है। संकर-समस्या का शास्त्रीय उत्तर “बिन्दु-गणना” है; हमने उसी को ± सहन-पट्टी के बिना सत्यापित किया, क्योंकि कभी ±३ ने वास्तविक −१ को छुपा दिया था।

66.3
कलौ पापरथानां च मन्धा बुध्ढिर्युथो न्त्ऱ्णाम् ।
अथोऽल्पबुध्ढिगम्यं यथ् शास्थ्रमेथध् वधस्य मे
kalau pāparathānāṃ ca mandhā budhḍhiryutho ntṟṇām |
atho'lpabudhḍhigamyaṃ yath śāsthramethadh vadhasya me

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलौ = कलियुग में; पापरतानाम् = पाप की ओर प्रवृत्त; च = और; मन्दा = मन्द / मंद; बुद्धिः = बुद्धि; युताम् = युक्त (लोगों की); नृणाम् = मनुष्यों की; अतः = इसलिए; अल्पबुद्धिगम्यम् = अल्प-बुद्धि से भी गम्य; यत् = जो; शास्त्रम् एतत् = यह शास्त्र; वदस्व = कहिए; मे = मुझे।

हिन्दी भावार्थ शिष्य निवेदन करता है — कलि में मनुष्यों में पाप-प्रवृत्ति और मन्द बुद्धि है; अतः ऐसा शास्त्र बताइए जो अल्पबुद्धि से भी समझा जा सके। यह विनय-वाक्य है, न कि युग-भय का प्रचार: माँग है “गम्य” (accessible) विधि की — जटिल फल-संकर को सरल, गिने-गिनए नियमों में उतारने की। पाठ-रूप “पापरथानां / बुध्ढि / वधस्य” आदि में पाठ-भेद संभव; अर्थ-रेखा “अल्पबुद्धिगम्यं शास्त्रम्” स्पष्ट है।

English rendering “In the Kali age people are inclined to wrong and endowed with slow understanding; therefore teach me this śāstra so that it may be graspable even by those of lesser intellect.” The request is for an accessible computational discipline, not for fear-rhetoric.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विनय / प्रयोजन-कथन। “अल्पबुद्धिगम्य” का शास्त्रीय अनुवाद आगे अष्टकवर्ग की सारणी-विधि में होता है: प्रत्येक ग्रह-से-ग्रह स्थिति पर निश्चित शुभ-बिन्दु, योग = ग्रह-योग, फिर SAV — गिनती, अनुमान नहीं।

66.4
थथ्थथ्कालग्रहस्ठिथ्या मानवानां परिस्फुतम् ।
सुखधुःखपरिज्ञानमायुषो निर्णयं थठा
thaththathkālagrahasṭhithyā mānavānāṃ parisphutam |
sukhadhuḥkhaparijñānamāyuṣo nirṇayaṃ thaṭhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत्-काल-ग्रह-स्थित्या = उस-उस काल की ग्रह-स्थिति से; मानवानाम् = मनुष्यों का; परिस्फुटम् = स्पष्ट रूप से; सुख-दुःख-परिज्ञानम् = सुख-दुःख का परिज्ञान; आयुषः निर्णयम् = आयु का निर्णय; तथा = वैसे ही।

हिन्दी भावार्थ उस-उस समय की ग्रह-स्थिति से मनुष्यों के सुख-दुःख का स्पष्ट ज्ञान और आयु का निर्णय हो सकता है — यही इस विद्या का लक्ष्य शास्त्र बताता है। ध्यान रहे, यह "निर्णय" शास्त्र का कथित उद्देश्य है, न कि कोई अपरिवर्त्य भवितव्यता।

English rendering "From the graha-positions at each given moment, the joy and sorrow of humans may be clearly discerned, and the span of life likewise determined."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रयोजन-कथन (आयुर्निर्णय की ओर संकेत)। आयु का वास्तविक गणित-तंत्र (आयुर्दाय, अध्याय 43–44) पृथक् है; यहाँ केवल उद्देश्य घोषित है — ग्रह-स्थिति ⇒ सुख-दुःख एवं आयु का आकलन।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी विधि में आयु और सुख-दुःख गणनीय राशियाँ हैं (आयुर्दाय-पिण्ड, षड्बल-रूप), पर उन्हें सदैव "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत किया जाता है — कभी भाग्य या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं। यही गणित-को-व्याख्या से अलग रखने का अनुशासन है।

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66.5
साढु प्त्ऱ्ष्तं थ्वया ब्रह्मन् कठयामि थवाग्रथः ।
लोकेयाथ्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं थठा
sāḍhu ptṟṣtaṃ thvayā brahman kaṭhayāmi thavāgrathaḥ |
lokeyāthrāparijñānamāyuṣo nirṇayaṃ thaṭhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु = अच्छा / सम्यक्; पृष्टम् = पूछा गया; त्वया = आपके द्वारा; ब्रह्मन् = हे ब्रह्मन् (शिष्य-सम्बोधन); कथयामि = कहता हूँ; तव अग्रतः = आपके सम्मुख; लोकयात्रापरिज्ञानम् = लोक-यात्रा (संसार-पथ) का ज्ञान; आयुषः निर्णयम् = आयु-निर्णय; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ पराशर उत्तर देते हैं — हे ब्रह्मन्, आपने साधु प्रश्न किया; आपके आगे कहता हूँ: लोकयात्रा का परिज्ञान और आयु का निर्णय। “लोकयात्रा” यहाँ जीवन-मार्ग / संसार-व्यवहार का व्यापक ज्ञान है; “आयुषो निर्णय” आयुर्दाय-सम्बद्ध क्षेत्र का नाम है। दोनों को शास्त्र अपनी विधि से जोड़ेगा; हम इन्हें नियति की घोषणा नहीं, अध्याय का घोषित प्रयोजन मानते हैं।

English rendering “Well have you asked, O Brahman; I shall declare before you knowledge of the world’s course (lokayātrā) and likewise the determination of lifespan.” The teacher accepts the brief and names the two themes the following technique will serve.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुरु-प्रतिवचन / प्रयोजन-पुष्टि। आयु-निर्णय का विस्तृत गणित आयुर्दाय-अध्यायों (४३–४४ आदि) और दशा-चक्र में है; अष्टकवर्ग यहाँ मुख्यतः स्थिति-फल और शोधित-बिन्दु बल के लिए आता है — यह श्लोक केवल द्वार खोलता है।

66.6
संकरस्याविरोढञ्च शास्थ्रस्यापि प्रयोजनम् ।
जनानामुपकारार्ठं सावढानमनाः श्त्ऱ्णु
saṃkarasyāviroḍhañca śāsthrasyāpi prayojanam |
janānāmupakārārṭhaṃ sāvaḍhānamanāḥ śtṟṇu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संकरस्य = संकर का; अविरोधम् = अविरोध / विरोध-रहितता; च = और; शास्त्रस्य = शास्त्र का; अपि = भी; प्रयोजनम् = प्रयोजन; जनानाम् = जनों के; उपकारार्थम् = उपकार के लिए; सावधानमनाः = सावधान मन वाला; शृणु = सुन।

हिन्दी भावार्थ गुरु कहते हैं — संकर का अविरोध, और शास्त्र का प्रयोजन भी, जनों के उपकार के लिए; सावधान मन से सुनो। अर्थात् आगे कही जाने वाली विधि फल-संकर को काटती है, पर शास्त्र-प्रयोजन से विरोध नहीं रखती — वह उसी प्रयोजन की सेवा में है। “सावधानमनाः शृणु” पाठक को गणना-अनुशासन का संकेत देता है: ध्यान से नियम धारण करो, अनुमान से मत बढ़ाओ।

English rendering “Hear with an attentive mind, for the benefit of people: both the non-contradiction of the intermixture and the very purpose of the śāstra.” The method to come will dissolve saṃkara without abandoning the śāstra’s aim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-घोषणा / अनुशासन-आह्वान। “अविरोध” का व्यावहारिक अर्थ: अष्टकवर्ग ग्रह-भाव-फल को रद्द नहीं करता; वह संकर को बिन्दु-योग, त्रिकोण-शोधन (अ.६७) और एकाधिपत्य-शोधन (अ.६८) से व्यवस्थित करता है, फिर फल पढ़ा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारा अनुशासन इसी श्लोक की भावना से मेल खाता है — गणित और फल-वाक्य अलग रखो; अष्टकवर्ग के ४८/४९/३९/५४/५६/५२/३९ → SAV ३३७ को `==` से पिन करो; जहाँ BPHS और फलदीपिका चन्द्र-सारणी में “९” का स्थान भिन्न रखती हैं (योग ४९ एक, भिन्न-राशि भिन्न), वहाँ मौन चयन नहीं, घोषित convention। संकर का अविरोध = नियम स्पष्ट, सहिष्णुता-पट्टी नहीं।

66.7
लग्नाधिव्ययपर्यन्थं भावा संज्ञानुरूपथः ।
फलधाः शुभसंध्त्ऱ्ष्ता युक्था वा शोभना मथाः
lagnādhivyayaparyanthaṃ bhāvā saṃjñānurūpathaḥ |
phaladhāḥ śubhasaṃdhtṟṣtā yukthā vā śobhanā mathāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नादि = लग्न से आरम्भ; व्ययपर्यन्तम् = व्यय (१२वें) भाव तक; भावाः = भाव; संज्ञानुरूपतः = अपने संज्ञा/नाम के अनुरूप; फलदाः = फल देने वाले; शुभसंदृष्टाः = शुभ-ग्रहों से दृष्ट; युक्ताः = (शुभों से) युक्त; वा = अथवा; शोभनाः = शुभ / शोभन; मताः = माने गए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — लग्न से व्यय पर्यन्त सभी भाव, अपनी-अपनी संज्ञा के अनुसार फलदायी हैं; और जब वे शुभ-ग्रहों से दृष्ट या युक्त हों, तब उन्हें शोभन माना गया है। यह अष्टकवर्ग-सारणियों से ठीक पहले का सामान्य भाव-फल सूत्र है: बारह भाव सक्रिय हैं; शुभ दृष्टि/युति उनकी फल-धारा को शुभ पक्ष में झुकाती है — यह शास्त्र का कथन है, नियति की मुहर नहीं। पाठ में “लग्नाधि / फलधाः / संध्त्ऱ्ष्ता” आदि रूप पाठ-भेद संभव; पारम्परिक अन्वय “लग्नादिव्ययपर्यन्तं … शुभसंदृष्टा युक्ता वा” है।

English rendering “From the lagna through the twelfth (vyaya), the houses, each according to its designation, are fruit-bearing; and when aspected by or joined with benefics, they are held to be auspicious.” A general house-rule before the aṣṭakavarga bindu tables.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-नियम / भाव-सामान्य। आधुनिक पठन में केवल संरचनात्मक जाँच: भाव = १…१२ (लग्न = H1 … व्यय = H12; सदन-पद्धति घोषित करनी होती है — समान-भाव या श्रीपति आदि); “शुभ” = गुरु, शुक्र, बलाढ्य बुध-चन्द्र (परम्परा-अनुसार); दृष्ट/युक्त = शास्त्रीय दृष्टि-सूत्र +동일-राशि युति। संख्यात्मक अष्टकवर्ग-बिन्दु इस श्लोक में नहीं; वे इसी अध्याय की आगे की सारणियों में आते हैं।

66.8
थे थूच्चाधिभगैः खेतैर्न चास्थारिभनीचगैः ।
पापैर्ध्त्ऱ्ष्तयुथा भावाः कल्याणेथरधायकाः
the thūccādhibhagaiḥ khetairna cāsthāribhanīcagaiḥ |
pāpairdhtṟṣtayuthā bhāvāḥ kalyāṇetharadhāyakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये = जो (भावाः); उच्च = उच्चस्थान; अधिभ / अधिभाग = स्वस्वामित्व-अंश / स्वक्षेत्र-स्थिति (पाठ-भेद संभव: अधिभगाः / अधिभागैः); खेटैः = ग्रहों से; अस्त = दग्ध / सूर्य-समीप; अरिभ = शत्रु-राशि; नीचगैः = नीचगत; पापैः = क्रूर-ग्रहों से; दृष्टयुताः = दृष्ट / युक्त; कल्याणतरदायकाः = अधिक मंगल-फलदाता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वे भाव, जो उच्च, स्वक्षेत्र या स्वामित्व-संपन्न ग्रहों से जुड़े हों, और अस्त, शत्रु-राशि या नीचगत ग्रहों से न जुड़े हों, वे पाप-ग्रहों की दृष्टि-युक्ति होने पर भी अधिक कल्याण-दायी माने गए हैं। यहाँ बल-स्थान (उच्च-स्व-स्वामी) को अशुभ-दृष्टि से अधिक प्रभावी बताया गया है। फल-निर्णय में ग्रह की दशा-स्थिति (अस्त-अरि-नीच बनाम उच्च-स्व) को भाव-फल से पहले तौलने का संकेत है।

English rendering The text states that houses associated with planets in exaltation, own domain, or lordship—and not with those combust, in an enemy’s sign, or debilitated—are said to yield greater welfare even when aspected or joined by malefics. Placement quality is given priority over mere malefic contact.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-शुभाशुभ का गुणात्मक नियम)। आधुनिक संकेत में: भाव B तब “बलवान-शुभ-प्रवृत्ति” मानी जाती है जब उस पर प्रभावकारी ग्रह G ∈ {उच्च, स्व, अधि} हो और G ∉ {अस्त, अरिभ, नीच}; पाप-दृष्टि/योग होने पर भी शास्त्र कल्याणतर-फल कहता है — यह मात्रात्मक बलांक नहीं, स्थिति-वर्ग नियम है।

66.9
थैरःथारिभनीचस्ठैर्न च मिथ्रस्वभोच्चगैः ।
एवं समान्यथः प्रोक्थं होराशास्थ्रज्ञसूरिभिः
thairaḥthāribhanīcasṭhairna ca mithrasvabhoccagaiḥ |
evaṃ samānyathaḥ prokthaṃ horāśāsthrajñasūribhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तैः अस्त-अरि-भ-नीच-स्थैः = अस्त, शत्रु-राशि और नीच में स्थित उन ग्रहों से; न च मित्र-स्व-भ-उच्च-गैः = और मित्र-राशि, स्व-राशि तथा उच्च में स्थित से नहीं; एवम् सामान्यतः प्रोक्तम् = इस प्रकार सामान्य रूप से कहा गया; होरा-शास्त्र-ज्ञ-सूरिभिः = होराशास्त्र के ज्ञाता विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ और जो भाव अस्त, शत्रु-राशि या नीच में स्थित ग्रहों से युक्त हों — मित्र, स्व अथवा उच्च के नहीं — वे विपरीत (अशुभ) फल देते हैं; इस प्रकार होराशास्त्र के विद्वानों ने सामान्य रीति से कहा है। यही "सामान्यांश" का सार-सूत्र है।

English rendering "And those with planets in combustion, enemy signs, or debility — not in friendly, own, or exalted signs — (yield the reverse); thus, in general, the sages versed in horā-śāstra have declared."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सामान्य (qualitative) गरिमा-नियम का समापन। गरिमा-श्रेणी क्रम: उच्च > स्व > मित्र > (सम) > शत्रु/अस्त > नीच — बल का अवरोही क्रम, जिसे यह श्लोक शुभ↔अशुभ में विभाजित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) उच्च/स्व/मित्र बनाम शत्रु/नीच का यही गरिमा-ढाँचा हमारी षड्बल-गणना में स्थान-बल (रूप/विरूप; 1 रूप = 60 विरूप) के रूप में सटीक संख्या पाता है — प्रत्येक घटक एक कथित संख्यात्मक नियम, कुल का प्रति-ग्रह देहली से `==` तुलना। श्लोक की गुणात्मक दिशा वहाँ मापनीय मात्रा बन जाती है।

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66.10
मयैयथ् सकलं प्रोक्थं पूर्वाचार्यानुवर्थिना ।
आयुश्च लोकयाथ्रां च शास्थ्रस्यास्यथे प्रयोजनम्
mayaiyath sakalaṃ prokthaṃ pūrvācāryānuvarthinā |
āyuśca lokayāthrāṃ ca śāsthrasyāsyathe prayojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मया = मेरे द्वारा; एतत् सकलं = यह सब; प्रोक्तम् = कहा गया; पूर्वाचार्यानुवर्तिना = पूर्व आचार्यों का अनुसरण करने वाले (द्वारा); आयुः = आयु / आयुर्दाय; लोकयात्राम् = लोक-व्यवहार / संसार-यात्रा; शास्त्रस्य अस्य = इस शास्त्र का; प्रयोजनम् = प्रयोजन।

हिन्दी भावार्थ पराशर कहते हैं — पूर्वाचार्यों की परंपरा का अनुवर्तन करते हुए यह समस्त उपदेश मैंने कहा है। इस शास्त्र का प्रयोजन आयु और लोकयात्रा — जीवन-अवधि तथा संसार-पथ का विवेक — बताया गया है। यह स्तुति नहीं, प्रयोजन-कथन है: होरा का लक्ष्य भय-व्यापार नहीं, काल-गठन और लोक-मार्ग का ज्ञान है।

English rendering “All this,” the speaker says, “I have set forth following the earlier teachers. Longevity and the course of worldly life are the purpose of this śāstra.” The aim is stated as knowledge of span and path—not as fatal decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रयोजन-कथन / आचार्य-परंपरा। आयुर्दाय (अध्याय ४३–४४ आदि) और दशा-फल आगे की गणना-परतों से जुड़े हैं; यहाँ केवल शास्त्र-उद्देश्य घोषित है।

66.11
निश्चेथुं थन्न सक्नोथि वसिष्टो वा ब्त्ऱ्हस्पथिः ।
किं पुनर्मनुजास्थथ्र विशेषाथ्थु कलौ युगे
niścethuṃ thanna saknothi vasiṣṭo vā btṟhaspathiḥ |
kiṃ punarmanujāsthathra viśeṣāththu kalau yuge

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निश्चेतुम् = निश्चयपूर्वक निर्धारित करने के लिए; तत् न शक्नोति = वह नहीं कर सकता; वसिष्ठः वा बृहस्पतिः = वसिष्ठ अथवा बृहस्पति (भी); किं पुनः मनुजाः = फिर साधारण मनुष्य क्या (कर पाएँगे); तत्र = उसमें; विशेषात् तु कलौ युगे = और विशेषतः कलियुग में।

हिन्दी भावार्थ उस (पूर्ण फल) को निश्चयपूर्वक निर्धारित करना वसिष्ठ या बृहस्पति भी नहीं कर सकते — फिर सामान्य मनुष्य की तो बात ही क्या, और वह भी कलियुग में। शास्त्र स्वयं यहाँ पूर्ण-निश्चय की सीमा को विनम्रता से स्वीकार करता है।

English rendering "Even Vasiṣṭha or Bṛhaspati cannot determine it with finality — how much less ordinary men, and especially in the age of Kali."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ज्ञान-मीमांसीय विनम्रता का कथन। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि तंत्र संभावना/झुकाव (tendency) देता है, न कि अनिवार्य भवितव्यता — अतः किसी परिणाम को "निश्चित भविष्य" कहना स्वयं शास्त्र-विरुद्ध है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही विनम्रता हमारे अनुशासन की आधारशिला है: संख्या-स्तर पर हम कठोर हैं (oracle मानों पर `==`, कोई सहनशीलता-पट्टी नहीं), पर फल-स्तर पर सदा "शास्त्र कहता है" — भाग्य, भय या निश्चित भविष्यवाणी कभी नहीं। गणना की सटीकता और व्याख्या की विनम्रता — दोनों साथ-साथ।

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66.12
सामान्यांशो विशेषांशो ज्योथिःशास्थ्रं ध्विढोधिथम् ।
प्रोक्थः सामान्यभागस्थु निश्चयांशस्थु कठ्यथे
sāmānyāṃśo viśeṣāṃśo jyothiḥśāsthraṃ dhviḍhodhitham |
prokthaḥ sāmānyabhāgasthu niścayāṃśasthu kaṭhyathe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सामान्यांशः = सामान्य भाग; विशेषांशः = विशेष / निश्चय भाग; ज्योतिःशास्त्रम् = ज्योतिष-शास्त्र; द्विधा = दो प्रकार से; उदितम् = कहा / प्रतिपादित; प्रोक्तः = कहा जा चुका; सामान्यभागः = सामान्य अंश; तु = अब / किंतु; निश्चयांशः = निश्चय-भाग; कथ्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र घोषित करता है — ज्योतिःशास्त्र दो खंडों में उदित है: सामान्यांश और विशेषांश (निश्चयांश)। सामान्य भाग अब तक प्रोक्त हो चुका; अब निश्चयांश कहा जाता है। यह श्लोक अष्टकवर्ग-प्रकरण का द्वार-मन्त्र है: आगे की तालिकाएँ “अनुमान” नहीं, निश्चित बिन्दु-गणना के रूप में पढ़ी जाएँ।

English rendering Jyotiḥ-śāstra is declared twofold: the general portion and the special (ascertainment) portion. The general part has been stated; the portion of exact determination is now to be taught.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संरचना-घोषणा (द्विधा विभाग)। सामान्यांश = गुणात्मक फल-नियम (यथा ६६.८–६६.९); निश्चयांश = आगे का अष्टकवर्ग-बिन्दु गणित (प्रति-ग्रह प्रति-भाव rekha/bindu, योग = SAV)। विभाजन स्वयं एक मेटा-नियम है: पहले नियम-वर्ग, फिर संख्या-वर्ग।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही द्वार हमें Ch.66 की canonical aṣṭakavarga तालिकाओं तक ले जाता है — जहाँ “निश्चय” का अर्थ exact-`==` बिन्दु-योग है, ± सहिष्णुता-पट्टी नहीं। सूर्य ४८, चन्द्र ४९, मंगल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९ → SAV ३३७; oracle fixture पर यही अंक `==` से बँधे हैं।

66.13
यठा लग्नाच्च चन्ध्राच्च ग्रहाणां भावजं फलम् ।
थठाऽन्येभ्योऽपि खेतेभ्यो विचिन्थ्यं धैवविध्वरैः
yaṭhā lagnācca candhrācca grahāṇāṃ bhāvajaṃ phalam |
thaṭhā'nyebhyo'pi khetebhyo vicinthyaṃ dhaivavidhvaraiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा = जिस प्रकार; लग्नात् = लग्न से; च = और; चन्द्रात् = चन्द्र से; ग्रहाणाम् = ग्रहों का; भावजम् फलम् = भाव से उत्पन्न फल; तथा = उसी प्रकार; अन्येभ्यः अपि खेटेभ्यः = अन्य ग्रहों से भी; विचिन्त्यम् = विचारणीय; दैवविद्वरैः = दैव-विद्या के श्रेष्ठ जानकारों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस रीति से लग्न और चन्द्र से ग्रहों का भावज फल देखा जाता है, उसी रीति से अन्य खेटों से भी दैवविद्-वरों को विचार करना चाहिए। यह “एक ही कुण्डली को आठ संदर्भ-बिन्दुओं से पढ़ने” का सूत्र है: प्रत्येक ग्रह को क्रमशः उद्गम मानकर भाव-फल गिना जाए। अष्टकवर्ग की पूरी विधि इसी बहु-संदर्भ दृष्टि पर टिकी है।

English rendering Just as house-born results of the planets are considered from the lagna and from the Moon, so too—the text states—should the best knowers of daiva examine them from the other planets as well. Each graha becomes a reference origin for bhāva reckoning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संदर्भ-स्थानांतरण नियम (aṣṭakavarga का आधार)। राशि-चक्र ℤ/₁₂ℤ पर, संदर्भ-ग्रह R की राशि r₀ हो तो भाव-सूचकांक
k_R(G) = (r_G − r₀) mod 12 (० = R-स्थान / “प्रथम”, १ = द्वितीय, …)।
लग्न (L) और चन्द्र (C) के अतिरिक्त सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि — कुल ८ उद्गम। प्रत्येक उद्गम से १२ भावों पर शुभ/अशुभ बिन्दु आगे की तालिकाओं से भरे जाते हैं। (अयनांश कुण्डली-निर्धारण में लगता है; भाव-गिनती यहाँ पूर्ण-राशि / equal-sign भाव पर, न कि मध्य-भाव house-system पर।)

उदाहरण (worked example) मान लें (Lahiri ayanāṃśa, D1) — लग्न = कन्या (राशि-सूचकांक ५), चन्द्र = मेष (०), गुरु = सिंह (४)।
• लग्न-संदर्भ: गुरु का भाव = (४ − ५) mod 12 = ११ → द्वादश भाव।
• चन्द्र-संदर्भ: गुरु का भाव = (४ − ०) mod 12 = ४ → पंचम भाव।
• गुरु-संदर्भ (स्व): (४ − ४) mod 12 = ० → “प्रथम” (स्व-स्थान)।
इसी ८-उद्गम जाल पर अगला श्लोक अष्टानां सर्वभावोत्थ फल खोलता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग-engine प्रत्येक ग्रह+लग्न को उद्गम मानकर Ch.66 की rekha-तालिकाएँ भरता है; Moon-from-Moon पर “९” का स्थान BPHS-पाठ के अनुसार स्थिर है (Phaladīpikā/Mehta-विन्यास से भिन्न — घोषित `[HUMAN]` convention)। यही बहु-संदर्भ गणित SAV = ३३७ तक योग देता है।

66.14
अथो रव्याधिखेतानां सलग्नानां प्त्ऱ्ठक् प्त्ऱ्ठक् ।
अष्तानां सर्वभावोथ्ठं यठोक्थमशुभं शुभम्
atho ravyādhikhetānāṃ salagnānāṃ ptṟṭhak ptṟṭhak |
aṣtānāṃ sarvabhāvothṭhaṃ yaṭhokthamaśubhaṃ śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथो = अब; रव्यादि = सूर्यादि; खेटानाम् = ग्रहों के; सलग्नानाम् = लग्न सहित; पृथक् पृथक् = अलग-अलग; अष्टानाम् = आठों के; सर्वभावोत्थम् = सभी भावों से उत्पन्न; यथोक्तम् = यथा-कथित; अशुभम् शुभम् = अशुभ और शुभ (फल / बिन्दु)।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र प्रवेश कराता है — सूर्य से आरंभ कर समस्त खेटों का, लग्न सहित, आठों का, पृथक्-पृथक्, सभी भावों से उत्पन्न शुभ-अशुभ — जैसा आगे कहा जाएगा। यह अष्टकवर्ग (अष्ट + वर्ग/योग) का औपचारिक उद्घाटन है: सात ग्रह + लग्न = आठ योगदानकर्ता; प्रत्येक से बारह भावों पर बिन्दु। “यथोक्त” आगे की rekha-तालिकाओं की ओर संकेत करता है।

English rendering Now is introduced, for the planets beginning with the Sun—together with the lagna, the eight taken separately—the auspicious and inauspicious arising from all houses, as will be stated. This is the formal door to aṣṭakavarga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग-ढाँचा (८ × १२)।
योगदाता समुच्चय: 𝒜 = {सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न}, |𝒜| = ८।
प्रत्येक P ∈ 𝒜 और प्रत्येक भाव-सूचकांक k ∈ {0,…,11} के लिए शास्त्र एक बिन्दु-योग b_P(k) ∈ ℕ₀ देता है (आगे की तालिकाएँ)।
ग्रह G का भिन्नाष्टकवर्ग (Bhinna): BAV_G(k) = Σ<sub>P∈𝒜</sub> 𝟙[P, G, k] जहाँ 𝟙 = तालिका-निर्दिष्ट शुभ-बिन्दु।
BPHS Ch.66 canonical योग (७ ग्रह, लग्न-बिन्दु अलग परत):
सूर्य Σ = ४८, चन्द्र ४९, मंगल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९;
सर्वाष्टकवर्ग SAV = ४८+४९+३९+५४+५६+५२+३९ = ३३७।
(त्रिकोण-शोधन Ch.67, एकाधिपत्य-शोधन Ch.68 बाद में SAV घटाते हैं — यहाँ केवल “अथो” उद्घाटन।)

उदाहरण (worked example) केवल ढाँचा-जाँच (तालिका-विवरण अगले श्लोकों में): सात ग्रह-योग ३३७; औसत प्रति-राशि SAV ≈ ३३७/१२ ≈ २८.०८ बिन्दु। यदि किसी राशि पर कच्चा SAV = ३१ हो तो वह औसत से +३ — शास्त्रीय “बलवान राशि” दिशा (शोधन-पूर्व)। Convention: BPHS Ch.66 पाठ; Moon-from-Moon = ९ (Phaladīpikā-विन्यास नहीं); exact-`==`, कोई ± पट्टी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 canonical — Sun ४८, Moon ४९, Mars ३९, Mercury ५४, Jupiter ५६, Venus ५२, Saturn ३९ → SAV ३३७ — kaal-verification-oracle में fixture पर `==` से बँधा (NEXT-STEPS DONE 2026-08-10)। कभी ±३ पट्टी ने वास्तविक −१ छिपाया था; अब सहिष्णुता नहीं, केवल अंक-सत्य।

66.15
ज्ञाथ्वाऽधौ करणं स्ठानं बिन्धुरेखोपलक्षिथम् ।
क्रमाधष्तकवर्गस्य वाच्यं स्पष्तफलं यठा
jñāthvā'dhau karaṇaṃ sṭhānaṃ bindhurekhopalakṣitham |
kramādhaṣtakavargasya vācyaṃ spaṣtaphalaṃ yaṭhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञात्वा = जानकर / विधि समझकर; अथ = अब (पाठ: अधौ — पाठ-भेद संभव); करणं = करण / गणना-विधि; स्थानं = स्थान-निर्धारण (राश्यादि में बिन्दु-रेखा का न्यास); बिन्दु-रेखा-उपलक्षितम् = बिन्दु और रेखा से उपलक्षित / चिह्नित (पाठ: बिन्धु…उपलक्षिथम् — पाठ-भेद संभव); क्रमात् = क्रमशः; अष्टकवर्गस्य = अष्टकवर्ग का (पाठ: क्रमाधष्तक — पाठ-भेद संभव); वाच्यं = कहा जाए; स्पष्ट-फलं = स्पष्ट फल; यथा = यथा / जैसे आगे (पाठ: यठा — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अष्टकवर्ग में बिन्दु और रेखा के स्थान-न्यास की करण-विधि को जान लेने के पश्चात्, उसी अष्टकवर्ग का स्पष्ट फल क्रम से कहा जाए। यह श्लोक गणना-सारणी और फल-कथन के बीच का सेतु है: पहले करण-स्थान (बिन्दु-रेखा), फिर स्पष्ट फल। फल यहाँ शास्त्र का अपना कथन-क्रम है, न कि कोई निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering The text states: having known the procedure for placing the marks indicated by bindus and rekhas, the clear results of aṣṭakavarga are to be declared in due order, as follows. The verse bridges technique and phala — placement first, then the text’s own sequential fruit-statement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-अनुक्रम का द्वार-श्लोक (करण-स्थान → स्पष्ट फल)। अंतर्निहित ढाँचा वही है जो अष्टकवर्ग-करण स्थापित करता है: प्रत्येक ग्रह के लिए बिन्दु/रेखा-स्थान निर्धारित कर, फिर क्रमशः फल वाच्य; कुल-सत्यता च.66 की बद्ध सारणियों पर निर्भर करती है (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → सर्वाष्टकवर्ग 337), पर इस श्लोक में कोई नया अंक या विभाजन-नियम नहीं दिया गया।

हमारा डिकोड (Our Decode) च.66 की बिन्दु-रेखा-करण को हमने exact-`==` oracle से पिन किया है — सात ग्रहों के rekha-कुल 48/49/39/54/56/52/39 तथा SAV = 337, बिना ± सहिष्णुता-पट्टी के (जो कभी वास्तविक −1 छिपा चुकी थी)। यह श्लोक उसी करण-स्थान को “ज्ञात्वा” कहकर स्पष्ट फल की ओर ले जाता है; फल-कथन को हम शास्त्र-वाक्य के रूप में ही रखते हैं, गणना को fixture-सत्यापित रखते हैं।

66.16
थथुस्वायुस्थ्रिरिष्फेषु पञ्च कामे सुखेऽर्णवाः ।
अरौ भाग्ये थ्रयः पुथ्रे षत् करौ खे भवे च भूः
thathusvāyusthririṣpheṣu pañca kāme sukhe'rṇavāḥ |
arau bhāgye thrayaḥ puthre ṣat karau khe bhave ca bhūḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः तु = तदनन्तर; स्व = 1 (तनु/लग्न-भावांश में «स्व»); आयुः = 8 (आयुर्भाव); त्रि = 3; रिष्फ = 12 (व्यय); पञ्च = 5; काम = 7; सुख = 4; अर्णवाः = 4 (भूतसंख्या: समुद्र/अर्णव → 4); अरि = 6; भाग्य = 9; त्रयः = 3; पुत्र = 5; षट् = 6; कर = 2 (कर=हस्त→धनभाव); ख = 10 (आकाश/ख→कर्म); भव = 11; भूः = 1 (भूतसंख्या: पृथ्वी → 1)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य-सम्बन्धी अष्टकवर्ग की भाव-वार संख्या यों बाँधता है — प्रथम, तृतीय, अष्टम, द्वादश में पाँच-पाँच; सप्तम व चतुर्थ में अर्णव अर्थात् चार-चार; षष्ठ व नवम में तीन-तीन; पंचम में छह; द्वितीय, दशम व एकादश में भू अर्थात् एक-एक। यह श्लोक भाव-सूची का स्मृति-पद है; पूर्ण आठ-योगदान (करण) आगे 66.17–19 में आता है। वर्तनी विकृत है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text then assigns house-wise figures for the Sun’s aṣṭakavarga mnemonic: five in the 1st, 3rd, 8th and 12th; four (arṇava) in the 7th and 4th; three in the 6th and 9th; six in the 5th; one (bhū) in the 2nd, 10th and 11th.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्लोकोक्त भाव-अंक (सूर्य-स्मृति):

| भाव | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|-----|---|---|---|---|---|---|---|---|---|----|----|-----|
| अंक | 5 | 1 | 5 | 4 | 6 | 3 | 4 | 5 | 3 | 1 | 1 | 5 |

योग: 5+1+5+4+6+3+4+5+3+1+1+5 = 43।
विहित पूर्ण सूर्याष्टकवर्ग-योग 48 योगदान-तालिका (66.17–19 + आठ स्रोतों का योग) से आता है — 7 ग्रह + लग्न। इस स्मृति-पद का 43 और करण-योग 48 अलग परतें हैं; अंक «जबरन» 48 न बनाएँ। भूतसंख्या: अर्णव = 4, भू = 1।

उदाहरण (worked example) केवल श्लोक-अंक का योग-परीक्षण — ऊपर की पंक्ति का सीधा योग 43। चार्ट-वास्तविक सूर्याष्टकवर्ग के लिए 66.17–19 का करण लगाएँ: प्रत्येक स्रोत C से उन भावों में 1 बिन्दु जहाँ C की सूची अनुमति दे; आठ स्रोतों का योग ग्रह-कुल 48 (dossier canonical)। उदाहरणार्थ यदि केवल «सूर्य से सूर्य» सूची 1,2,4,7,8,9,10,11 मानें तो अकेले सूर्य-स्रोत से 8 बिन्दु; शेष 40 अन्य सात स्रोतों से पूरे होते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हम सूर्य-कुल को स्मृति-पद के 43 पर नहीं, करण-तालिका के 48 पर `==` से पिन करते हैं (test_astakavarga_fixture.py)। स्मृति-अंक और योगदान-कुल को मिलाकर «± सहना» नहीं — वही अनुशासन जिसने कभी −1 को ढकने वाली पट्टी को अस्वीकार किया।

66.17
लग्नेन्धुजीवशुक्रज्ञास्थनौ स्वे मरणेऽपि च ।
रविभौमार्कि चन्ध्रार्या व्यये ज्ञेन्धुसिथायकाः
lagnendhujīvaśukrajñāsthanau sve maraṇe'pi ca |
ravibhaumārki candhrāryā vyaye jñendhusithāyakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = उदित राशि / लग्न-स्रोत; इन्दु = चन्द्र; जीव = गुरु; शुक्र = शुक्र; ज्ञ = बुध; तनु = 1; स्वे = स्व-स्थान / प्रथम से; मरण = 8; रवि = सूर्य; भौम = मंगल; अर्कि = शनि; व्यय = 12; ज्ञ = बुध; इन्दु = चन्द्र; सिता = शुक्र (सित); अयकाः / सम्बद्ध पद = शेष ग्रह-नामों का पाठ (पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य के अष्टकवर्ग-करण का आरम्भ करता है — किन स्रोतों से किन भावों में बिन्दु लगता है। लग्न, चन्द्र, गुरु, शुक्र, बुध तनु व मरण आदि स्थानों से जुड़े हैं; रवि, भौम, अर्कि भी श्रृंखला में आते हैं; व्यय-भाव में ज्ञ-इन्दु-सित आदि गिने जाते हैं। यह फल-कथन नहीं, बिन्दु-दान की सूची है। थ/ध/स्थ आदि पाठ अस्थिर — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text opens the Sun’s aṣṭakavarga karaṇa: Lagna, Moon, Jupiter, Venus and Mercury are named with the 1st and 8th, and Sun, Mars and Saturn enter the same chain; in the 12th, Mercury, Moon and Venus (with allied names) are indicated. Orthography is unstable — recension variance is possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सूर्याष्टकवर्ग = 8 स्रोतों से बिन्दु-योग। आधुनिक इंजनों में प्रचलित पूर्ण योगदान-तालिका (कुल 48), जो Ch.66 करण-श्रृंखला का गणितीय लक्ष्य है:

| स्रोत (C) | C से गिने हुए भाव जहाँ सूर्य-अष्टकवर्ग में 1 बिन्दु |
|-----------|-----------------------------------------------------|
| सूर्य | 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 |
| चन्द्र | 3, 6, 10, 11 |
| मंगल | 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 |
| बुध | 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12 |
| गुरु | 5, 6, 9, 11 |
| शुक्र | 6, 7, 12 |
| शनि | 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 |
| लग्न | 3, 4, 6, 10, 11, 12 |

गिनती: 8+4+8+7+4+3+8+6 = 48। प्रत्येक योग्य (C, H) युग्म → राशि R = rāśi(C) + (H−1) (mod 12) पर +1 बिन्दु। श्लोक का शब्द-क्रम स्रोत×भाव को गुच्छों में बाँटता है; संदिग्ध सन्धि पर पाठ-भेद संभव, कुल 48 dossier से पिन।

उदाहरण (worked example) मान लें सूर्य = मेष 0° खंड (राशि-सूचकांक 0), केवल सूर्य-स्रोत। सूची 1,2,4,7,8,9,10,11 → बिन्दु मेष, वृष, कर्क, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ पर। चन्द्र यदि कर्क (सूचकांक 3) हो और चन्द्र-सूची 3,6,10,11 हो, तो कर्क+2, +5, +9, +10 → कन्या, धनु, मीन, मेष पर अतिरिक्त बिन्दु। आठों स्रोत जोड़कर राशि-वार योग की जाँच; ग्रह-कुल = 48। (अयनांश: केवल देशान्तर/लग्न-ग्रह forelongitudes पर; वर्ग-नियम यहाँ D1 रैखिक राशि-अवधि।)

हमारा डिकोड (Our Decode) सूर्य-कुल 48 exact-`==` fixture है — सहन-पट्टी नहीं। करण को कोड में तालिका से उतारा जाता है; फल को भविष्य-वाणी नहीं माना जाता।

66.18
सुखे होरेन्धुशुक्राश्च ढर्मेऽर्कार्किकुजा अरौ ।
होराज्ञार्येन्धवः कामे भवे धैथ्येन्ध्रपूजिथः
sukhe horendhuśukrāśca ḍharme'rkārkikujā arau |
horājñāryendhavaḥ kāme bhave dhaithyendhrapūjithaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुख = 4; होरा = लग्न (यहाँ स्रोत-रूप में); इन्दु = चन्द्र; शुक्र = शुक्र; धर्म = 9; अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; कुज = मंगल; अरि = 6; होरा = लग्न; ज्ञ = बुध; आर्य = गुरु; इन्दु = चन्द्र; काम = 7; भव = 11; दैत्येन्द्र-पूजित = शुक्र (दैत्य-गुरु) अथवा पूज्य-गुरु — नाम-योग से शुक्र/गुरु (पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ सूर्य-करण आगे बढ़ता है — सुख-भाव में होरा-इन्दु-शुक्र; धर्म में अर्क-अर्कि-कुज; अरि में वही श्रृंखला जुड़ती है; काम में होरा-ज्ञ-आर्य-इन्दु; भव में दैत्येन्द्रपूजित। शास्त्र कहता है: ये नाम बिन्दु-योग के स्रोत हैं, मनोवैज्ञानिक भविष्य नहीं।

English rendering The Sun’s karaṇa continues by house-groups: in the 4th — Lagna, Moon, Venus; in the 9th — Sun, Saturn, Mars; in the 6th — the same martial-solar chain as the text groups; in the 7th — Lagna, Mercury, Jupiter, Moon; in the 11th — the “daityendra-pūjita” planet (Venus/Jupiter by epithet; recension-sensitive).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 66.17–19 एक ही करण के खंड हैं। भाव-केन्द्रित पढ़ाई (श्लोक-क्रम) को ऊपर दी C→H तालिका से मिलाकर चलाएँ — गणना का अन्तर्गृह नियम अपरिवर्तित:

बिन्दु(R) = Σ_C 1[ H*(R,C) ∈ S_C ]

जहाँ H*(R,C) = 1 + (rāśi(R) − rāśi(C)) mod 12, और S_C = स्रोत C की अनुमति-सूची; R = बारह राशियाँ।
Σ_R बिन्दु(R) = 48 (सूर्य)।
«होरा» यहाँ D2-वर्ग नहीं, लग्न-स्रोत का पर्याय है — सम्बोधन भ्रमित न करें।

उदाहरण (worked example) लग्न = सिंह (सूचकांक 4), सूर्य-करण की लग्न-सूची 3,4,6,10,11,12। तो लग्न से: 3→तुला, 4→वृश्चिक, 6→मकर, 10→वृष, 11→मिथुन, 12→कर्क पर +1 (सूर्य-अष्टकवर्ग में)। शुक्र यदि मीन हो और शुक्र-सूची 6,7,12 हो → मीन+5,+6,+11 → सिंह, कन्या, कुम्भ पर +1। शेष स्रोत जोड़कर 48 पूरे करें।

66.19
सहजेऽर्कार्किशुक्रार्यभौमाः खे गुरुभार्गवौ ।
सुथेऽर्कार्कीन्धुलग्नारशुक्राः स्युः करणं रवेः
sahaje'rkārkiśukrāryabhaumāḥ khe gurubhārgavau |
suthe'rkārkīndhulagnāraśukrāḥ syuḥ karaṇaṃ raveḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सहज = 3; अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; शुक्र = शुक्र; आर्य = गुरु; भौम = मंगल; ख = 10; गुरु = गुरु; भार्गव = शुक्र; सुत = 5; अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; इन्दु = चन्द्र; लग्न = लग्न; आर = मंगल; शुक्र = शुक्र; स्युः = होते हैं; करणम् = बिन्दु-दान नियम; रवेः = सूर्य का

हिन्दी भावार्थ सहज में अर्क-अर्कि-शुक्र-आर्य-भौम; ख (दशम) में गुरु-भार्गव; सुत में अर्क-अर्कि-इन्दु-लग्न-आर-शुक्र — यहीं शास्त्र घोषित करता है: «स्युः करणं रवेः» — यही सूर्य का करण है। सूर्याष्टकवर्ग की बिन्दु-विधि का यही समापन-वाक्य है; फल का विस्तार recension के अनुसार आगे के अध्यायों में है।

English rendering In the 3rd — Sun, Saturn, Venus, Jupiter, Mars; in the 10th — Jupiter and Venus; in the 5th — Sun, Saturn, Moon, Lagna, Mars, Venus. The text closes: these are the karaṇa of Ravi (the Sun).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सूर्य-करण पूर्ण। सत्यापन-अनुशासन:

1. आठ S_C सूचियाँ स्थिर रखें (66.17 टिप्पणी)।
2. Σ|S_C| = 48।
3. किसी भी जातक-चार्ट पर Σ_R बिन्दु_Ravi(R) == 48 (लग्न+7 ग्रह; राहु-केतु स्रोत नहीं — शास्त्रीय अष्टक = 8)।
4. त्रिकोण/एकाधिपत्य शोधन (Ch.67–68) बाद में SAV घटाते हैं; कच्चा करण-योग 48 से छेड़छाड़ नहीं।

उदाहरण (worked example) पूर्ण लघु-परीक्षण — आठों |S_C| जोड़ें: 8+4+8+7+4+3+8+6 = 48। यदि कोड/हस्त-गणना 47 या 49 दे, तो सूची या mod-12 दिशा (पूर्व/पश्चगामी गणना) में त्रुटि है, «लगभग 48» स्वीकार्य नहीं। दिशा-सम्मेलन: राशि-सूचकांक 0…11, H कदम अग्र (मेष→वृष→…) — भारतीय होरा इंजन का साधारण नियम; उल्टी गिनती घोषित किए बिना न अपनाएँ।

हमारा डिकोड (Our Decode) «करणं रवेः» = हमारे fixture का सूर्य-ब्लॉक। SAV में सूर्य 48 एक पद है; सात ग्रहों का योग 48+49+39+54+56+52+39 = 337। exact-`==`, कोई ±3 पट्टी नहीं।

66.20
भाग्यस्वयोश्च षद् वेश्मम्त्ऱ्थिहोरासु पञ्च च ।
मानधुश्चिक्ययोरेकः सुथे वेधा अरिस्थ्रियोः
bhāgyasvayośca ṣad veśmamtṟthihorāsu pañca ca |
mānadhuścikyayorekaḥ suthe vedhā aristhriyoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्य = 9; स्व = 1; षट् = 6; वेश्म = 4 (गृह/सुख); मृत्यु = 8; होरा = लग्न/प्रथम-स्रोत संदर्भ (यहाँ भाव-सूची में प्रायः 1 या लग्न-सम्बद्ध पद — पाठ-भेद संभव); पञ्च = 5; मान = 10; धुश्चिक्य = 8वें का पर्याय या वृश्चिक-संकेत / कहीं 3 — recension-संवेदनशील; एकः = 1; सुत = 5; वेध = वेध (अष्टकवर्ग-वेध) या शब्द-सङ्ख्या-सन्दिग्ध; अरि = 6; स्त्री = 7 (कलत्र)

हिन्दी भावार्थ अब शीतकर (चन्द्र) की ओर संक्रमण — शास्त्र भाग्य व स्व में छह; वेश्म-मृत्यु-होरा में पाँच; मान-धुश्चिक्य में एक; सुत-वेध-अरि-स्त्री की शृंखला आगे 66.21 से जुड़ती है। यह चन्द्राष्टकवर्ग की भाव-स्मृति/करण-भूमिका है, डराने वाला आयु-वचन नहीं। धुश्चिक्य-होरा पदों पर पाठ-भेद संभव।

English rendering The text turns toward the Moon’s figures: six in the 9th and 1st; five in the 4th, 8th and the “horā”-linked place; one in the 10th and dhuścikya; then the 5th, vedha-wording, 6th and 7th continue the chain into the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चन्द्र-कुल dossier: 49। योगदान-तालिका (BPHS Ch.66 सम्मेलन — Moon-from-Moon में 9 सम्मिलित; Phaladīpikā/Mehta 9 का स्थानान्तर करते हैं, कुल 49 वही, भिन्न-राशि वितरण अलग — `[HUMAN]` खुला सम्मेलन):

| स्रोत (C) | C से भाव (चन्द्राष्टकवर्ग) |
|-----------|---------------------------|
| सूर्य | 3, 6, 7, 8, 10, 11 |
| चन्द्र | 1, 3, 6, 7, 9, 10, 11 |
| मंगल | 2, 3, 5, 6, 9, 10, 11 |
| बुध | 1, 3, 5, 6, 9, 10, 11 |
| गुरु | 1, 2, 4, 7, 8, 10, 11 |
| शुक्र | 3, 4, 5, 7, 9, 10, 11 |
| शनि | 3, 5, 6, 11 |
| लग्न | 3, 6, 10, 11 |

गिनती: 6+7+7+7+7+7+4+4 = 49।
श्लोक 66.20 के भाव-अंक (6,5,1…) स्मृति-गुच्छ हैं; चार्ट-वास्तव गणना सदैव S_C तालिका से। «होरा/धुश्चिक्य» पर संशय हो तो पाठ-भेद संभव लिखकर तालिका-कुल 49 को प्रामाणिक मानें।

उदाहरण (worked example) केवल चन्द्र-स्रोत, चन्द्र = तुला (7)। BPHS सूची 1,3,6,7,9,10,11 → तुला, धनु, मीन, मेष, मिथुन, कर्क, सिंह पर +1 (सात बिन्दु अकेले चन्द्र से)। गुरु = कर्क (3), गुरु-सूची 1,2,4,7,8,10,11 → कर्क, सिंह, तुला, मकर, कुम्भ, मेष, वृष पर +1। पूर्ण आठ स्रोत → योग 49। यदि Moon-from-Moon से 9 हटाएँ तो कुल 48 हो जाता है — BPHS नहीं, Phaladīpikā-तरफ़ का भिन्न प्रक्षेप; हम BPHS 9 रखती घोषणा के साथ 49 पिन करते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) चन्द्र 49, और «9 Moon-from-Moon में» — BPHS Ch.66 के पक्ष में पिन; Phaladīpikā स्थानान्तर को चुपचाप नहीं मिलाया। कुल समान, bhinna प्रति-राशि भिन्न — सम्मेलन खुला `[HUMAN]`, छिपा चुनाव नहीं।

66.21
थ्रयो व्ययेष्तावाये च शून्यं शीथकरस्य थु ।
होरार्कारार्किभ्त्ऱ्गवोङ्गज्ञार्केन्ध्वार्कभार्गवाः
thrayo vyayeṣtāvāye ca śūnyaṃ śīthakarasya thu |
horārkārārkibhtṟgavoṅgajñārkendhvārkabhārgavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रयः = 3; व्यय = 12; अष्ट = 8; आय = 11 (लाभ); शून्यम् = 0; शीतकरस्य = चन्द्र का; तु = किन्तु / अब; होरा = लग्न; अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; भृगु = शुक्र; अङ्ग = लग्न/देह (प्रायः लग्न); ज्ञ = बुध; अर्क = सूर्य; इन्दु = चन्द्र; अर्क = सूर्य; भार्गव = शुक्र — चन्द्र-करण के स्रोत-नामों का आरम्भ (पाठ-भेद संभव)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — व्यय आदि में तीन, कहीं शून्य का निर्देश, और यह शीतकर (चन्द्र) का प्रकरण है। उत्तरार्ध में होरा-अर्क-अर्कि-भृगु-अङ्ग-ज्ञ-अर्क-इन्दु-अर्क-भार्गव नामों से चन्द्राष्टकवर्ग का करण खुलता है। संख्याएँ चन्द्र-स्मृति/करण का अंग हैं; शून्य का अर्थ «उस भाव-गुच्छ में बिन्दु-अभाव» के रूप में शास्त्रीय कथन है, जीवन-शून्यता का डर नहीं।

English rendering Three are named for the 12th (and the verse’s aṣṭa/āya grouping); zero is stated in the Moon’s frame as the text binds it; the second line opens the Moon’s karaṇa by listing Lagna, Sun, Saturn, Venus, Mercury, Moon and related epithets. Recension variance on the exact name-chain is possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. चन्द्र-कुल लक्ष्य: 49 (7 ग्रह; लग्न सहित 8 स्रोत)।
2. 66.20–21a भाव-अंक + 66.21b स्रोत-नाम = चन्द्र-ब्लॉक की शुरुआत; पूर्ण S_C तालिका 66.20 के गणित-खंड में स्थिर।
3. «शून्यं» = उस संदर्भ में 0 बिन्दु — गणना में 0 को सचमुच 0 रखें, सहजबुद्धि से 1 न भरें।
4. SAV पद: … + Moon 49 + … = 337।
5. शोधन (त्रिकोण Ch.67, एकाधिपत्य Ch.68) कच्चे बिन्दुओं पर बाद में; कच्चा चन्द्र-योग 49।

उदाहरण (worked example) शून्य-अनुशासन — यदि किसी स्रोत की सूची में भाव H नहीं, तो उस (C,H) पर बिन्दु = 0, «प्रायः शुभ» कहकर +1 नहीं। लघु योग: |S_C| योग = 6+7+7+7+7+7+4+4 = 49। चार्ट पर Σ बिन्दु == 49; 48 आए तो प्रायः Moon-from-Moon का 9 छूटा (BPHS vs Phaladīpikā सम्मेलन)। घोषणा: BPHS Ch.66, 9 चन्द्र-से-चन्द्र में, कुल 49।

हमारा डिकोड (Our Decode) चन्द्र 49 और SAV 337 इसी अध्याय-श्रृंखला की पिन-बिन्दु हैं। Moon-from-Jupiter = (1,2,4,7,8,10,11) BPHS पक्ष; 9 का स्थान Moon-from-Moon — fixture में `==`, सहन-बैंड नहीं। गणित को फल से अलग रखा गया: तालिका सत्य; फल «शास्त्र कहता है»।

66.22
जीवोर्कार्कीन्धुलग्नारा होरेन्धुगुरुभास्कराः ।
सिथज्ञार्याः कुजथनुमन्धास्थे सिथशीथगू
jīvorkārkīndhulagnārā horendhugurubhāskarāḥ |
sithajñāryāḥ kujathanumandhāsthe sithaśīthagū

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = बृहस्पति; उर्का/अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; इन्दु = चन्द्र; लग्न = उदित राशि (लग्नाष्टक का कर्ता); आरा/आर = मङ्गल; होरा = लग्न (यहाँ कर्तृ-संदर्भ में); गुरु = बृहस्पति; भास्कर = सूर्य; सित = शुक्र; ज्ञ = बुध; तनु = प्रथम भाव/लग्न-स्थान; मन्द = शनि; शीतगु = चन्द्र।

हिन्दी भावार्थ यह पद कुजाष्टकवर्ग की कर्तृ-परम्परा को घनीभूत नाम-माला में बाँधता है—जीव, अर्क, अर्कि, इन्दु, लग्न और आर इत्यादि से गिनती का सूत्र आगे खुलता है। पाठ में होरा–इन्दु–गुरु–भास्कर तथा सित–ज्ञ की पुनरावृत्ति उसी अष्ट-कर्तृ-समूह (७ ग्रह + लग्न) की ओर संकेत करती है, जिससे भूमिज के बिन्दु एकत्र होते हैं। जहाँ वर्ण-क्रम या सन्धि विकृत लगे, वहाँ पाठ-भेद संभव; अर्थ की रीढ़ अष्टकवर्ग-करण ही है।

English rendering The verse strings the ashtakavarga agents—Jupiter, the Sun, Saturn, the Moon, the lagna, Mars, Venus and Mercury—into the counting frame for the chart under discussion. Compressed name-lists of this kind are the śāstra’s way of naming who may cast a bindu before the house-lists are stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कुजाष्टकवर्ग में प्रत्येक बिन्दु एक कर्ता से आता है: सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न—कुल ८ पंक्तियाँ। प्रत्येक कर्ता अपनी राशि से गिने गए निर्दिष्ट भावों में ०/१ बिन्दु देता है। पूरे आलेख का योग (७ ग्रह; राहु–केतु नहीं) शास्त्रीय कुज-रेखा-योग = ३९; सर्वाष्टकवर्ग (SAV) में सातों ग्रह = ३३७। पाठ की कर्तृ-माला इसी ८-पंक्ति संरचना का नामोल्लेख है, न कि फल-कथन।

उदाहरण (worked example) मान लें मङ्गल-अष्टकवर्ग बनाना है। कर्ता-सूची ठीक इस पद की रीति से बाँधें: Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, Saturn, Lagna। अभी भाव-सूची बाद के श्लोकों/सारणी से लगेगी; यहाँ केवल ढाँचा—८ स्तम्भ-स्रोत, प्रत्येक स्रोत से भाव-मापांक १…१२ पर ० या १, योग लक्ष्य ३९। (अयनांश: केवल ग्रह-देशान्तर के लिए; वर्ग-नियम यहाँ लागू नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 की कुज-सारणी का रेखा-योग ३९ हमने `==` फिक्स्चर पर पिन किया है (सहिष्णुता-पट्टी नहीं—कभी ±३ ने वास्तविक −१ छिपाया था)। SAV = ४८+४९+३९+५४+५६+५२+३९ = ३३७; कुज का ३९ उसी श्रृंखला की तीसरी कड़ी है।

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66.23
होरार्कारार्किविज्जीवाः शनिः खं सकलाः क्रमाथ् ।
व्ययवेश्मसुथस्थ्रीषु षद् सप्थ ढनढर्मयोः
horārkārārkivijjīvāḥ śaniḥ khaṃ sakalāḥ kramāth |
vyayaveśmasuthasthrīṣu ṣad saptha ḍhanaḍharmayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) होरा = लग्न; अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; विज्/विद् = बुध; जीव = गुरु; शनि = मन्द; खम् = आकाश = ० (भूतसंख्या); सकलाः = समस्त/क्रमशः; क्रमात् = क्रम से; व्यय = १२वाँ; वेश्म = ४था (गृह); सुत = ५वाँ; स्त्री = ७वाँ; षट् = ६; सप्त = ७; धन = २रा; धर्म = ९वाँ।

हिन्दी भावार्थ पद होरा–अर्क–अर्कि–बुध–जीव की कर्तृ-पंक्ति के साथ शनि और ‘ख’ (शून्य) का उल्लेख कर गिनती के क्रम को बाँधता है। उत्तरार्ध व्यय–वेश्म–सुत–स्त्री तथा धन–धर्म जैसे भाव-नामों पर संख्या-शब्द (षट्, सप्त) रखता है—अष्टकवर्ग की भाव-गत या कर्तृ-गत संख्या-सूची का संक्षिप्त रूप। संहिता-पंक्ति यहाँ अस्थिर लगती है; भाव-संख्या का ठीक योग पाठ-भेद संभव कहकर ही पढ़ें, पर विषय कुज-करण से जुड़ा रहता है।

English rendering Lagna, Sun, Saturn, Mercury and Jupiter are named in order; Saturn is tied to the zero-word kha, then house-names (12th, 4th, 5th, 7th; 2nd, 9th) receive the number-words six and seven. The line is a compressed numeric schedule for the Mars ashtakavarga block, with possible recension noise in the exact pairing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: ख = ०, षट् = ६, सप्त = ७। अष्टकवर्ग में ये या तो (क) किसी भाव में कितने कर्ता बिन्दु देते हैं, या (ख) क्रम-सूची की अनुक्रमणिका हैं। कुज का कुल बिन्दु-योग ३९ अचल लक्ष्य है; किसी एक भाव की संख्या ०…८ के बीच ही वैध है (८ कर्ता)। यदि किसी पाठ-युग्म से भाव-योग ३९ से टकराए तो उस जोड़ी को पाठ-भेद मानकर मानक ८×१२ सारणी से संशोधन करें—अनुमान से संख्या न बढ़ाएँ।

उदाहरण (worked example) मानक कुज-आव्यूह (नीचे ६६.२५–२७ की प्रचलित रीति) से भाव-स्तम्भ योग: भाव ६ पर अक्सर ६ कर्ता बिन्दु देते हैं—यही ‘षट्’ का एक स्वच्छ मिलान है। भाव ११ पर प्रायः अधिक कर्ता; भाव २/९ पर कम। जातक में मङ्गल-देशान्तर के बाद प्रत्येक कर्ता-राशि से गिनकर १२ कोश भरें; १२ योगों का योग `== ३९` होना चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) कुज-रेखा ३९ और SAV ३३७ का `==` अनुशासन इसी अध्याय की सारणियों पर टिका है। संख्या-शब्द और भाव-नाम जहाँ OCR/पाठ से अस्पष्ट हों, वहाँ हम अनुमान-पट्टी नहीं चलाते—मानक पिन-फिक्स्चर और स्पष्ट श्लोक-युग्म ही प्रमाण हैं।

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66.24
होराम्त्ऱ्थ्युवोः शरा वेधा विक्रमे खे थ्रयः क्षथे ।
ध्वौ भवे शून्यमेवं स्याथ् करणं भूमिजस्य थु
horāmtṟthyuvoḥ śarā vedhā vikrame khe thrayaḥ kṣathe |
dhvau bhave śūnyamevaṃ syāth karaṇaṃ bhūmijasya thu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) होरा = लग्न/प्रथम; मृत्यु = ८वाँ; शर = बाण = ५ (भूतसंख्या); वेध/वैध = (पाठ अस्थिर); विक्रम = ३रा; ख = ०; त्रयः = ३; क्षत = ६ठा (अरि); द्वौ = २; भव = ११वाँ (लाभ) अथवा भाव-सामान्य; शून्यम् = ०; करणम् = रचना/बिन्दु-विधान; भूमिज = मङ्गल (भूमि-पुत्र); तु = ही/निश्चय।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शास्त्र स्पष्ट कहता है—यह ‘भूमिजस्य करणम्’ है, अर्थात् मङ्गल के अष्टकवर्ग की गणना-विधि। होरा और मृत्यु पर शर (५), विक्रम पर ख (०), क्षत पर त्रय (३), भव पर द्वौ (२), तथा कहीं शून्य—भाव-गत संख्याओं का और टुकड़ा। पूरी बारह-भाव माला अगले/पिछले पादों से जुड़कर पढ़नी होती है; अकेला पाद अधूरा रह सकता है (पाठ-भेद संभव), पर विषय-घोषणा निर्विवाद है: कुजाष्टकवर्ग का करण।

English rendering The verse closes with the explicit label karaṇaṃ bhūmijasya—the construction rule for Mars. Number-words (five, zero, three, two, zero) are seated on named houses (1st/8th, 3rd, 6th, 11th). Treat broken pairings as possible recension variance; the computational identity is Mars’s ashtakavarga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या: शर = ५, ख/शून्य = ०, त्रय = ३, द्वौ = २। करण = ८ स्रोतों × १२ भाव-मापांकों का ०/१ आव्यूह, कुल बिन्दु ३९। प्रचलित (कुल-३९-संगत) कुज-पंक्तियाँ—सूर्य से: ३,५,६,१०,११; चन्द्र से: ३,६,११; कुज से: १,२,४,७,८,१०,११; बुध से: ३,५,६,११; गुरु से: ६,१०,११,१२; शुक्र से: ६,८,११,१२; शनि से: १,४,७,८,९,१०,११; लग्न से: १,३,६,१०,११। (पंक्ति-योग: ५+३+७+४+४+४+७+५ = ३९।) श्लोक का ‘५/०/३/२’ अंश स्तम्भ-योग या खंडित पाठ हो सकता है—पूर्ण १२ स्तम्भ उसी आव्यूह से सत्यापित करें।

उदाहरण (worked example) सूर्य मेष १०° पर हो। कुज-अष्टकवर्ग में सूर्य-पंक्ति से बिन्दु: मेष से ३=मिथुन, ५=सिंह, ६=कन्या, १०=मकर, ११=कुम्भ—इन राशियों के कुज-कोष में +१। शेष पाँच भाव सूर्य से ०। यही क्रिया सातों ग्रह + लग्न पर दोहराएँ; १२ राशियों के योग का योग `== ३९`।

हमारा डिकोड (Our Decode) ‘भूमिजस्य करणम्’ वही Ch.66 इकाई है जिसका कुज-योग ३९ हमने oracle फिक्स्चर में पिन किया। SAV ३३७ की श्रृंखला में यह तीसरा योग है; जाँच `==` से, सहिष्णुता से नहीं।

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66.25
कुजस्यार्केन्धुविज्जीवसिथ लग्नशनी च थु ।
सिथारगुरुमन्धाः स्युर्ढर्मोक्थेषु कुजं विना
kujasyārkendhuvijjīvasitha lagnaśanī ca thu |
sithāragurumandhāḥ syurḍharmoktheṣu kujaṃ vinā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य = मङ्गल का (अष्टकवर्ग); अर्क = सूर्य; इन्दु = चन्द्र; विज् = बुध; जीव = गुरु; सित = शुक्र; लग्न = उदित; शनी = शनि; सित-आर-गुरु-मन्दाः = शुक्र, मङ्गल, गुरु, शनि; धर्मोक्तेषु = धर्म-भाव (९) में कथित / धर्म-संदर्भ में उक्त भावों में; कुजं विना = मङ्गल को छोड़कर (उस उपवाक्य की कर्तृ-सूची से)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कुज के अष्टकवर्ग का विषय खोलकर कर्ताओं का नाम लेता है—सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, लग्न और शनि। फिर एक उपसमूह—शुक्र, मङ्गल, गुरु, शनि—को ‘धर्मोक्त’ स्थानों से जोड़ता है, और एक जगह ‘कुजं विना’ कहकर सूची से मङ्गल को अलग करता है। यह फल की धमकी नहीं; केवल यह कि किस कर्ता से कौन-सा भाव-मापांक बिन्दु पाता है। पाठ-संधि कठिन हो तो पाठ-भेद संभव।

English rendering For Mars’s ashtakavarga the text names the casting agents: Sun, Moon, Mercury, Jupiter, Venus, lagna and Saturn. A subset—Venus, Mars, Jupiter, Saturn—is tied to the “dharma-stated” places, with an explicit exclusion of Mars in that clause. It is a contribution rule, not a fate claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कुज-अष्टकवर्ग = Σ बिन्दु over ८ कर्ता। धर्म = ९वाँ मापांक (कर्ता की राशि से गिनकर)। मानक सारणी में भाव ९ पर बिन्दु केवल शनि-पंक्ति से आता है (शनि: १,४,७,८,९,१०,११)—अन्य पंक्तियों में ९ नहीं; अतः ‘धर्मे बहुकर्तृ’ वाला कोई पाठ यदि ३९-आव्यूह से टकराए तो पाठ-भेद/संपादन जाँचें। prioritised computational pin: पूर्ण योग ३९; शनि-पंक्ति ७ बिन्दु; धर्म-कोष्ठ की वैधता आव्यूह-पंक्ति से `==`।

उदाहरण (worked example) शनि तुला में हो। कुज-AV की शनि-पंक्ति से बिन्दु-राशियाँ: तुला से १=तुला, ४=मकर, ७=मेष, ८=वृष, ९=मिथुन (धर्म), १०=कर्क, ११=सिंह। मिथुन-कोष में कुज-बिन्दु +१ (शनि से)। सूर्य/चन्द्र/… की पंक्तियों में ९ न होने से वे धर्म-मापांक पर ० देते हैं—यही ‘किससे धर्मे बिन्दु’ का गणित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) कुज ३९ का पिन Ch.66 की इन्हीं कर्तृ-भाव सूचियों पर टिका है। हम पंक्ति-योग और कुल योग दोनों को `==` से जकड़ते हैं; ‘लगभग ३९’ अस्वीकृत।

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66.26
चन्ध्रारगुरुशुक्रार्किलग्नानि कुजभास्करी ।
ज्ञेन्ध्वर्कसिथलग्नार्या एषु शुक्रं विना थथः
candhrāraguruśukrārkilagnāni kujabhāskarī |
jñendhvarkasithalagnāryā eṣu śukraṃ vinā thathaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र = इन्दु; आर = मङ्गल; गुरु = जीव; शुक्र = सित; अर्कि = शनि; लग्नानि = लग्न सहित वे; कुज = मङ्गल; भास्करी = सूर्य (भास्कर); ज्ञ = बुध; इन्धु/इन्दु = चन्द्र; अर्क = सूर्य; सित = शुक्र; आरा = मङ्गल; एषु = इनमें; शुक्रं विना = शुक्र को छोड़; ततः = तत्पश्चात्/उस नियम से।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक कुजाष्टकवर्ग की अगली कर्तृ-सूचियाँ देता है—एक ओर चन्द्र–मङ्गल–गुरु–शुक्र–शनि–लग्न, दूसरी ओर मङ्गल–सूर्य; फिर बुध–चन्द्र–सूर्य–शुक्र–लग्न–मङ्गल, और स्पष्ट निर्देश ‘शुक्रं विना’। शास्त्र कहता है कि कुछ भाव-समूहों में शुक्र कर्ता-सूची से बाहर रहता है। यह निषेध फल-भय नहीं, केवल बिन्दु-अधिकार की सीमा है।

English rendering Further agent-lists for Mars’s ashtakavarga are given: Moon–Mars–Jupiter–Venus–Saturn–lagna, with Mars and the Sun named beside them; then Mercury–Moon–Sun–Venus–lagna–Mars, with the clause “without Venus.” The text is fencing which planets cast a bindu in the houses under that clause.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक उपवाक्य = एक भाव-समूह पर लागू कर्तृ-समुच्चय। मानक ३९-आव्यूह से मिलान (उदाहरण):
• भाव ६ (क्षत/अरि) पर बिन्दु: सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, लग्न (६ कर्ता; कुज-शनि नहीं)।
• भाव ११ पर: प्रायः सभी ८।
• भाव १२ पर: गुरु, शुक्र।
‘शुक्रं विना’ वाले खंड को उसी आव्यूह के स्तम्भ से सत्यापित करें—यदि नाम-सूची स्तम्भ से न मिले तो पाठ-भेद संभव; कुल पंक्ति-योग फिर भी ३९ रखें। राहु/केतु कुज-अष्टकवर्ग की ८-कर्ता सूची में नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न कर्क, शुक्र कन्या। भाव १२ (लग्न से व्यय = मिथुन) पर कुज-AV में गुरु- व शुक्र-पंक्तियों की जाँच: शुक्र कन्या से १२ = सिंह—यदि लक्ष्य-राशि मिथुन नहीं, तो शुक्र से उस कोष में ०। गुरु की राशि से ६,१०,११,१२ गिनकर देखें कि मिथुन पड़ता है या नहीं। चार्ट-निर्भर परिणाम; नियम-निर्भर ढाँचा स्थिर।

हमारा डिकोड (Our Decode) कर्तृ-बहिष्कार (‘विना’) वाली पंक्तियाँ भी oracle की कुज-सारणी में ०/१ की determinism हैं। हमने कुल ३९ को पिन किया; प्रति-भाव खुली परंपरा (BPHS बनाम अन्य) जहाँ हो, घोषित रखकर चुपचाप नहीं बदलते।

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66.27
विना शनिं सप्थ ढर्मे सिथेन्धुज्ञा वियथ्थथः ।
अर्कार्किज्ञेन्धुलग्नाराः करणं प्रोच्यथे क्रमाथ्
vinā śaniṃ saptha ḍharme sithendhujñā viyaththathaḥ |
arkārkijñendhulagnārāḥ karaṇaṃ procyathe kramāth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विना शनिं = शनि को छोड़; सप्त = ७वाँ (स्त्री/जामित्र); धर्मे = ९वें में; सित = शुक्र; इन्दु = चन्द्र; ज्ञ = बुध; वियत् = आकाश = ०; ततः = तदनंतर; अर्क = सूर्य; अर्कि = शनि; ज्ञ = बुध; इन्दु = चन्द्र; लग्न = लग्न; आराः = मङ्गल; करणम् = बिन्दु-विधान; प्रोच्यते = कहा जाता है; क्रमात् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—शनि को छोड़कर, सप्तम और धर्म भावों के संदर्भ में सित–इन्दु–ज्ञ का समूह; फिर ‘वियत्’ (शून्य) का स्पर्श; और अंत में अर्क–अर्कि–ज्ञ–इन्दु–लग्न–आर—यही करण क्रम से कहा गया। पूरा श्लोक कुजाष्टकवर्ग की करण-परंपरा को समेटने वाला है: कौन से नाम किस मापांक-समूह से जुड़े, और कहाँ शून्य। संदिग्ध संधि पर पाठ-भेद संभव।

English rendering Excluding Saturn, the text links Venus, the Moon and Mercury with the seventh and ninth; a zero-word (viyat) follows; then Sun, Saturn, Mercury, Moon, lagna and Mars are named as the karaṇa “stated in order.” It is the procedural close of the Mars contribution schedule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) करणं प्रोच्यते क्रमात् = आव्यूह-पंक्तियों का क्रमबद्ध कथन। मानक कुज-पंक्ति (पुनः, योग ३९):
सूर्य → {३,५,६,१०,११} (५)
चन्द्र → {३,६,११} (३)
कुज → {१,२,४,७,८,१०,११} (७)
बुध → {३,५,६,११} (४)
गुरु → {६,१०,११,१२} (४)
शुक्र → {६,८,११,१२} (४)
शनि → {१,४,७,८,९,१०,११} (७)
लग्न → {१,३,६,१०,११} (५)।
सप्तम (७) पर मानक स्तम्भ: कुज+शनि (२); धर्म (९) पर: केवल शनि (१)। यदि श्लोक का ‘सितेन्दुज्ञा’ इन स्तम्भों से न जुरे तो पाठ-भेद/संक्षेप मानें; गणना में ऊपर की पंक्तियाँ ३९-संगत आधार रहें।

उदाहरण (worked example) सभी कर्ता एक ही राशि पर कल्पित करें (केवल नियम-दृष्टि—यथार्थ चार्ट नहीं): प्रत्येक पंक्ति अपने समुच्चय पर १। भाव-मापांक ७ का स्तम्भ-योग = २; मापांक ९ = १; मापांक ११ = ८; पूर्ण योग ३९। वास्तविक कुंडली में कर्ता अलग-अलग राशियों में होने से बिन्दु राशियों पर फैलते हैं; मापांक-नियम वही रहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ‘करणं प्रोच्यते क्रमात्’ वही अनुशासन है जो हमारे Ch.66 फिक्स्चर में है—क्रमबद्ध पंक्तियाँ, कुल ३९, `==` जाँच। SAV ३३७ में कुज की हिस्सेदारी इसी करण से स्थिर है।

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66.28
थनुस्वग्त्ऱ्हकर्मारिढर्मेष्वग्निर्म्त्ऱ्गौ करौ ।
भ्राथ्त्ऱ्स्थ्रियो रसा लाभे शून्यं पुथ्रे व्यये शराः
thanusvagtṟhakarmāriḍharmeṣvagnirmtṟgau karau |
bhrāthtṟsthriyo rasā lābhe śūnyaṃ puthre vyaye śarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनु = १; स्व = २; गृह = ४; कर्म = १०; अरि = ६; धर्म = ९; अग्नि = ३ (भूतसंख्या); मृगौ/मृत्यौ = पाठ-भेद संभव—मृग (द्विवचन) अथवा मृत्यु (८); करौ = दो कर = २; भ्रातृ = ३; स्त्रियः/स्त्री = ७; रसाः = ६; लाभे = ११वें में; शून्यम् = ०; पुत्रे = ५; व्यये = १२; शराः = ५।

हिन्दी भावार्थ यह पद कुज-करण के भाव-पक्ष को भूतसंख्या में बाँधता है। तनु–स्व–गृह–कर्म–अरि–धर्म पर अग्नि (३); मृग/मृत्यु-पक्ष पर कर (२); भ्रातृ और स्त्री पर रस (६); लाभ पर शून्य; पुत्र और व्यय पर शर (५)—शास्त्र की अपनी संख्या-भाषा में रेखा-वितरण। जहाँ ‘मृगौ’ पढ़ा जाए या ‘मृत्यौ’, पाठ-भेद संभव; संख्या-शब्द स्वयं स्पष्ट हैं। यह भविष्य की धमकी नहीं—अष्टकवर्ग के अंकों का कथन है।

English rendering Mars’s house-wise figures are cast in word-numerals: three on the set tanu–sva–gṛha–karma–ari–dharma; two on the mṛga/mṛtyu locus (reading uncertain); six on the third and seventh; zero on the eleventh; five on the fifth and twelfth. The śāstra is stating bindu counts, not issuing a prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-डिकोड: अग्नि = ३, कर = २, रस = ६, शून्य = ०, शर = ५।
एक सीधा पाठ-योग: ३×६ (१,२,४,१०,६,९) + २ (८) + ६×२ (३,७) + ० (११) + ५×२ (५,१२) = ४२—जो ३९ से ३ अधिक है। अतः या तो (क) षट्-अग्नि वाले भावों में एक/अधिक पाठ भेद से कम अंक हैं, या (ख) यह पद स्तम्भ-योग न होकर किसी अन्य करण-संक्षेप है। ३९-संगत मानक स्तम्भ-योग (ऊपर की ८ पंक्तियों से):
१→३, २→१, ३→४, ४→२, ५→२, ६→६, ७→२, ८→३, ९→१, १०→५, ११→८, १२→२; योग `== ३९`।
पुस्तक-प्रयोग: शब्द-संख्याएँ श्लोक से दिखाएँ; गणना-इंजन में ३९-आव्यूह चलाएँ; विसंगति पर “पाठ-भेद संभव” लिखें, अंक मन से न गढ़ें।

उदाहरण (worked example) मानक आव्यूह से स्तम्भ ६ = ६ (रस से मेल—षट् कर्ता), स्तम्भ ११ = ८ (शून्य नहीं—यहाँ श्लोक-पाठ और ३९-आव्यूह में तनाव; पाठ-भेद संभव)। सत्यापन: आठों पंक्ति-योग ५+३+७+४+४+४+७+५ का योग ३९; बारह स्तम्भ-योगों का योग भी ३९। किसी भी जातक-AV में `sum(BAV_Mars[1..12]) == 39`।

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 कुज-योग ३९ और SAV ३३७ हमारे पिन-फिक्स्चर में `==` से बँधे हैं। शब्द-संख्या और आव्यूह में तनाव आे तो हम सहिष्णुता से ‘मिला’ नहीं देते—पाठ-भेद खोलकर canonical ३९ रखते हैं; यही exact-oracle अनुशासन है।

66.29
बुढास्यर्केन्धुगुरवो गुरुसूर्यबुढाः क्रमाथ् ।
लग्नार्कारार्किचन्ध्रार्या ज्ञार्कार्या हि बुढस्य थु
buḍhāsyarkendhuguravo gurusūryabuḍhāḥ kramāth |
lagnārkārārkicandhrāryā jñārkāryā hi buḍhasya thu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधस्य / बुढास्य = बुध का, अर्थात् बुध-अष्टकवर्ग का (Mercury's own aṣṭakavarga); अर्क = सूर्य/रवि (Sun); इन्दु = चन्द्र (Moon — यहाँ "इन्धु" व "चन्ध्र" दोनों चन्द्र के पाठ-भ्रष्ट रूप); गुरु / आर्य = बृहस्पति (Jupiter); आर = मङ्गल/अङ्गारक (Mars); अर्कि = शनि, "सूर्यपुत्र" (Saturn); ज्ञ = बुध, "ज्ञ = ज्ञाता" (Mercury); लग्न = उदित राशि (ascendant); क्रमात् = क्रमशः, इसी अनुक्रम में (in the stated sequence). — यह OCR-भ्रष्ट अष्टकवर्ग-सारणी का पाठ है; पाठ-भेद संभव, अतः शब्द-विभाजन संभावित माना जाए।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक बुध के भिन्नाष्टकवर्ग की गणना का सूत्र है — अर्थात् किन-किन ग्रहों तथा लग्न से गिनने पर कौन-सी राशियाँ बुध के लिए शुभ (रेखा/बिन्दु) मानी जाती हैं। पाठ में सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शनि तथा लग्न — ये दाता-स्थान "क्रमात्" (क्रमशः) गिनाये जा रहे हैं; शुक्र का नाम इस खण्ड में स्पष्ट पठनीय नहीं है (पाठ-भेद संभव)। मूल पंक्तियाँ अत्यन्त भ्रष्ट हैं, इसलिए किन राशि-संख्याओं में बिन्दु पड़ता है — यह इस पाठ से निश्चयपूर्वक नहीं पढ़ा जा सकता; हम केवल सारणी का ढाँचा प्रस्तुत कर रहे हैं, कोई संख्या स्वयं गढ़ नहीं रहे।

English rendering This is the bindu-rule for Mercury's own aṣṭakavarga — naming the reference points (Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Saturn, and the ascendant) from which, counted in order, the signs auspicious to Mercury are reckoned. The line is heavily OCR-corrupted; the exact auspicious sign-numbers cannot be read with confidence (reading uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग = "आठ वर्गों का" — प्रत्येक ग्रह के लिए 8 सन्दर्भ-बिन्दु: 7 ग्रह (रवि, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) + लग्न। प्रत्येक सन्दर्भ से कुछ नियत राशि-स्थानों में बुध को 1 शुभ-बिन्दु (रेखा) मिलता है। किसी सन्दर्भ-ग्रह की राशि S से k-वीं राशि गिनने का सूत्र:

गिनी हुई राशि = ((S + k − 2) mod 12) + 1

बुध का भिन्नाष्टकवर्ग = 12 राशियों पर बिन्दुओं का योग; और रेखा-योग (सम्पूर्ण बिन्दु-संख्या) = 8 दाताओं द्वारा दी गई कुल रेखाएँ। इस श्लोक के जो विशिष्ट राशि-स्थान (k-मान) हैं वे पाठ-भ्रष्ट हैं — पाठ-भेद संभव — अतः उन्हें यहाँ नहीं गढ़ा गया। नियम केवल पूर्णांक-गणना (modular arithmetic) है, कोई सतत मान नहीं।

उदाहरण (worked example) केवल गिनती-यन्त्र दर्शाने हेतु (यह बुध का वास्तविक बिन्दु-स्थान नहीं, मात्र सूत्र का प्रदर्शन): मान लें कोई दाता-ग्रह मेष (S = 1) में है और नियम उससे "चतुर्थ" (k = 4) स्थान को शुभ कहता है — तब गिनी हुई राशि = ((1 + 4 − 2) mod 12) + 1 = (3 mod 12) + 1 = 4 = कर्क। अर्थात् उस दाता की ओर से बुध को कर्क राशि में 1 रेखा मिलती। इसी क्रिया को आठों दाताओं व उनके समस्त नियत k-मानों पर दोहराकर बुध का पूर्ण भिन्नाष्टकवर्ग बनता है। (यहाँ S, k केवल दृष्टान्त-मान हैं; इस श्लोक के मूल मान अपठनीय।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही बुध-अष्टकवर्ग-नियम उस पिन-किए गए कुल तक ले जाता है जिसे हमारे kaal-verification-oracle ने BPHS Ch.66 के अनुसार बुध की रेखा-संख्या = ठीक 54 पर, बिना किसी सहनशीलता-पट्टी के `==` से जाँचा है (test_astakavarga_fixture.py)। सातों ग्रहों की रेखाएँ (सूर्य 48, चन्द्र 49, मङ्गल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39) मिलकर सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = 337 देती हैं। हमारी पद्धति के अनुशासन के अनुरूप — जहाँ मूल पाठ भ्रष्ट है वहाँ हम विशिष्ट बिन्दु-स्थान का दावा नहीं करते; केवल वही कुल पुष्ट करते हैं जो नियत फिक्स्चर पर exact-`==` से सिद्ध है।

66.30
जीवारेन्ध्वार्किलग्नानि शुक्रमन्नढरासुथाः ।
ज्ञेन्धुलग्नार्कशुक्रार्या ज्ञार्कौ जीवेन्धुलग्नकाः
jīvārendhvārkilagnāni śukramannaḍharāsuthāḥ |
jñendhulagnārkaśukrāryā jñārkau jīvendhulagnakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (यह Ch.66 का अष्टकवर्ग रेखा-सारणी श्लोक है; OCR-भ्रष्ट — नीचे केवल स्पष्ट पढ़े जा सकने वाले ग्रह-संकेत खोले गए हैं, संख्याएँ नहीं गढ़ी गईं।)
- जीव = बृहस्पति (Guru/Jupiter); आर = मंगल (Kuja/Mars)
- इन्दु (सन्धि में इन्ध्व-) = चन्द्र (Moon); अर्कि = शनि (अर्क-पुत्र → Saturn)
- लग्न (प्रत्यय -आनि / -काः) = उदित राशि/Ascendant; ये बहुवचन-प्रत्यय गणना-सूची का व्याकरणिक ढाँचा हैं, अर्थ-शब्द नहीं
- शुक्र = शुक्र (Bhārgava/Venus); ज्ञ = बुध ("जानने वाला" → Budha/Mercury)
- अर्क = सूर्य (Sun); आर्या = गुरु/बृहस्पति (वैकल्पिक संज्ञा)
- ज्ञार्कौ = बुध + सूर्य (द्विवचन -au → ये दो युग्म रूप में रेखा देते हैं)
- मन्न / ढरा / सुथाः — पाठ अत्यन्त भ्रष्ट; सम्भवतः सुथाः → सुताः (पुत्र/पञ्चम भाव) एवं थ↔त, ध↔द विपर्यय। पाठ-भेद संभव — इनका स्थान/संख्या-मान अनिश्चित, अतः यहाँ नहीं थोपा गया।

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय 66 (अष्टकवर्ग) की उन पद्य-सारणियों में से एक अर्धश्लोक है जो किसी एक ग्रह की भिन्नाष्टकवर्ग रेखाएँ किन-किन आश्रय-बिन्दुओं (सात ग्रह + लग्न) से प्राप्त होती हैं, इसे संक्षिप्त ग्रह-संकेतों में बाँधकर गिनाता है — यहाँ जीव, आर, इन्दु, अर्कि, लग्न, शुक्र, ज्ञ, अर्क आदि नाम रेखा-दायक स्थानों के रूप में क्रमशः आ रहे हैं। परन्तु उपलब्ध पाठ OCR से भ्रष्ट है (थ↔त, ध↔द, संयुक्ताक्षर टूटे हुए), इसलिए कौन-सा संकेत किस भाव-गणना को इंगित करता है यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता — इसे यथावत् रखा गया है, अनुमान से भरा नहीं गया।

English rendering This corrupt half-verse is one row of the Chapter-66 aṣṭakavarga tables: it enumerates, in compressed planet-abbreviations, the reference bodies — Jupiter, Mars, Moon, Saturn, the Ascendant, Venus, Mercury, the Sun — that confer benefic points (rekhā) in a given planet's bhinnāṣṭakavarga. Because the surviving reading is OCR-damaged, the exact house-assignments cannot be recovered and are left unstated rather than guessed (reading uncertain).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग एक बिन्दु-गणना तंत्र है। किसी ग्रह P के भिन्नाष्टकवर्ग में आठ आश्रय (7 ग्रह + लग्न) × 12 राशि, प्रत्येक कोष्ठ में बिन्दु b ∈ {0, 1} (रेखा या नहीं)।
- प्रति राशि योग = Σ (आठ आश्रयों की रेखाएँ) ∈ 0 … 8
- भिन्न-कुल (P) = Σ (12 राशियों पर) ∈ 0 … 96
- सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = Σ (7 ग्रहों के भिन्न-कुल)

इस अर्धश्लोक की भूमिका इसी सारणी की एक पंक्ति भरना है — अर्थात् किन आश्रयों से रेखा गिरती है, यह बताना। किन्तु पाठ भ्रष्ट होने के कारण इस श्लोक से कोई विशिष्ट भाव-संख्या नहीं निकाली गई; न बाहरी सारणी देखी गई। केवल संरचना दी गई है, अंक नहीं गढ़े गए — पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) केवल गणना-यंत्र दिखाने हेतु (इस भ्रष्ट श्लोक के अंकों से नहीं, अपितु सिद्ध कुल-मानों से): यदि बृहस्पति का भिन्न-कुल = 56 हो, तो 56 = Σ (12 राशियों के प्रति-राशि बिन्दु), जहाँ प्रत्येक पद 0…8; औसत = 56 ÷ 12 ≈ 4.67 बिन्दु/राशि। इसी प्रकार सातों का योग → SAV = 48 + 49 + 39 + 54 + 56 + 52 + 39 = 337। यह उदाहरण यंत्र (mechanic) दर्शाता है, इस श्लोक की कोई पढ़ी-गई पंक्ति नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वही अध्याय (BPHS Ch.66) है जिसकी सारणियों को टीम ने विश्वास-रहित (exact-`==`) आरक्षक-कसौटी पर पिन किया — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39, और सर्वाष्टकवर्ग 337। एक ±3 सहनशीलता-पट्टी ने कभी अष्टकवर्ग में असली −1 त्रुटि को ढक दिया था, इसलिए अब सहन-पट्टी नहीं, केवल समता-कसौटी। चन्द्र-सारणी में "9" चन्द्र-से-चन्द्र में बैठता है (फलदीपिका/मेहता इसे स्थानांतरित करते हैं; कुल 49 समान, प्रति-राशि भिन्न — यह घोषित `[HUMAN]` परिपाटी है)। चूँकि प्रस्तुत recension की यह पंक्ति OCR-भ्रष्ट है, हम इसे पाठ-भेद संभव अंकित कर, भ्रष्ट पाठ पर भरोसा करने के बजाय पिन-किए गए सिद्ध canonical मानों को प्रमाण मानते हैं।

66.31
अर्कार्यशुक्रः शून्यं च होरेन्ध्वारार्किभार्गवाः ।
रूपं ढनाययोः खे ध्वौ व्यये सप्थ क्षथेऽर्णवाः
arkāryaśukraḥ śūnyaṃ ca horendhvārārkibhārgavāḥ |
rūpaṃ ḍhanāyayoḥ khe dhvau vyaye saptha kṣathe'rṇavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) _[⚠ पाठ-भेद संभव — यह श्लोक OCR-भ्रष्ट अष्टकवर्ग-सारणी है; अधोलिखित केवल स्पष्टतः पठनीय पद हैं]_
- अर्क = सूर्य (arka)
- शुक्रः / भार्गवाः = शुक्र (Venus; भार्गव = भृगु-पुत्र)
- शून्यं = बिन्दु-संख्या ० (zero) — बिन्दु/रेखा का अभाव
- होरा·इन्दु·आर·अर्कि·भार्गव (होरेन्ध्वारार्किभार्गवाः, द्वन्द्व-समास) = चन्द्र·मंगल·शनि·शुक्र आदि ग्रह-गण _(विच्छेद अनिश्चित — पाठ-भेद संभव)_; अर्कि = सूर्यपुत्र = शनि
- रूपं = १ (one) (रूप = एकक-बिन्दु)
- धन·आय-योः (ढनाययोः) = द्वितीय व एकादश भाव में (धन = 2nd, आय = 11th; द्विवचन "योः" = इन दोनों में)
- खे = दशम/खमध्य में (kha = आकाश-मध्य) _[अथवा भूतसंख्या "ख" = 0 — पाठ-भेद संभव]_; ध्वौ (द्वौ) = २ (two)
- व्यये = द्वादश भाव में (vyaya = व्यय); सप्थ (सप्त) = ७ (seven); अर्णवाः (arṇava = समुद्र) = ४ (four) — भूतसंख्या "चार समुद्र"

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक फल-कथन नहीं, अपितु अष्टकवर्ग की बिन्दु-सारणी का पद्यबद्ध कोश है — किसी ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग में सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि, शुक्र आदि दायकों से कौन-से भाव/राशि में रेखा (शुभ-बिन्दु) पड़ती है और कौन-से में शून्य, यह गिना जा रहा है। मूल पंक्ति यहाँ OCR से भ्रष्ट है — शून्य (0), रूप (1), द्वौ (2), सप्त (7) व अर्णव (4) जैसे शब्द-अंक तथा धन/आय/खे/व्यय जैसे स्थान-संकेत ही स्पष्ट पठनीय हैं; इनका ठीक अन्वय विवादास्पद है, अतः पाठ-भेद संभव। हम इन अंकों को यथावत् दर्ज करते हैं, किसी सारणी में जबरन नहीं बैठाते।

English rendering A corrupted enumeration verse of the aṣṭakavarga bindu-table: it tallies, contributor by contributor (Sun, Moon, Mars, Saturn, Venus…), which houses/signs receive a benefic dot and which receive zero. The line survives only in fragments — the legible word-numerals are śūnya (0), rūpa (1), dvau (2), sapta (7), arṇava = "oceans" (4), tied to the dhana (2nd), āya (11th), kha (10th) and vyaya (12th) places. The reading is contested (पाठ-भेद संभव); the numbers are recorded, not reconstructed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग की संरचना — किसी ग्रह p के भिन्नाष्टकवर्ग में प्रत्येक राशि/भाव s को आठ दायकों (सूर्य…शनि + लग्न) से बिन्दु मिलते हैं, प्रत्येक दायक का योगदान BAV(p, s, दायक) ∈ {0, 1} (रेखा = 1, अन्यथा 0)। एक ग्रह का रेखा-योग = Σ (सभी 12 राशियों पर), और सर्वाष्टकवर्ग SAV = Σ (सातों ग्रहों के रेखा-योग)।

इस पंक्ति के स्पष्ट पठनीय शब्द-अंक (भूतसंख्या digit-faithful):
- शून्यं → 0
- रूपं → 1
- ध्वौ (द्वौ) → 2
- सप्थ (सप्त) → 7
- अर्णवाः (चार समुद्र) → 4

स्थान-संकेत: धन = भाव 2, आय = भाव 11, खे = भाव 10 (खमध्य), व्यय = भाव 12।

⚠ अनुशासन-टिप्पणी: एकल भिन्न-दायक का बिन्दु 0 या 1 ही होता है — अतः "सप्त (7)" व "चार (4)" जैसे मान यहाँ किसी एकल-दायक-रेखा के नहीं हो सकते; ये या तो राशि-गणना (fromवाँ स्थान गिनना) हैं या OCR-भ्रंश। इसी कारण पाठ-भेद संभव अंकित है — मैं इन अंकों को न किसी दायक-पंक्ति में, न किसी योग में, जबरन नहीं बैठाता, और कोई बाह्य सारणी नहीं देखता।

उदाहरण (worked example) इस भ्रष्ट पंक्ति से कोई राशि-वार बिन्दु निर्धारित नहीं किया जा सकता — अतः इस श्लोक के अपने अंकों से उदाहरण नहीं। केवल तकनीक दर्शाने हेतु, दोषियर की Ch.66 काननिकल स्थिरांक-fixture से (इस पंक्ति से decode नहीं) रेखा-योगों का SAV-संकलन:

सूर्य 48 + चन्द्र 49 + मंगल 39 + बुध 54 + गुरु 56 + शुक्र 52 + शनि 39 = 337 = SAV (7 ग्रह)। यही वह अंतिम योग है जिसकी ओर Ch.66 की ये गणना-पंक्तियाँ ले जाती हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 की यही अष्टकवर्ग-सारणियाँ हमारे kaal-verification-oracle में काननिकल रूप से पिन हैं — सूर्य 48 · चन्द्र 49 · मंगल 39 · बुध 54 · गुरु 56 · शुक्र 52 · शनि 39 → SAV 337 — और ये मान exact `==` fixture पर जाँचे जाते हैं, किसी ±band पर नहीं (एक ±3 band ने कभी वास्तविक −1 त्रुटि छिपा दी थी)। चन्द्र-सारणी में "9" चन्द्र-से-चन्द्र में बैठता है (चन्द्र-से-मंगल में नहीं), और चन्द्र-से-गुरु = (1,2,4,7,8,10,11) — यह BPHS Ch.66 का पाठ है; Phaladīpikā/Mehta इस 9 का स्थानांतरण करते हैं (योग वही 49, प्रति-राशि भिन्न बदलते हैं), जिसे हम मौन चयन नहीं, घोषित खुली convention `[HUMAN]` के रूप में रखते हैं। इसी अनुशासन के कारण 66.31 जैसी OCR-भ्रष्ट पंक्ति पर हम अंक गढ़ते नहीं — पाठ-भेद घोषित करते हैं और यथावत् दर्ज करते हैं।

66.32
म्त्ऱ्थिविक्रमयो पञ्च गुरोः शेषेषु वन्हियः ।
लग्ने शुक्रेन्धुमन्धाः स्वे आये मन्धश्च विक्रमे
mtṟthivikramayo pañca guroḥ śeṣeṣu vanhiyaḥ |
lagne śukrendhumandhāḥ sve āye mandhaśca vikrame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- गुरोः = बृहस्पति / जीव (Jupiter) का — इस खण्ड का विषय-ग्रह
- मृति [म्त्ऱ्थि का संभावित शुद्ध पाठ] = अष्टम भाव (8th · मृत्यु/रन्ध्र)
- विक्रम = तृतीय भाव (3rd · पराक्रम/सहज)
- पञ्च = पाँच (5) — प्रत्यक्ष संख्यावाची
- वह्नि (वह्नयः) = भूतसंख्या में अग्नि → तीन (3) [तीन वैदिक अग्नियाँ]
- शेषेषु = शेष (बचे हुए) भावों में
- लग्न / स्व / आय = प्रथम (1st · उदित राशि) / द्वितीय (2nd · धन) / एकादश (11th · लाभ)
- शुक्र-इन्दु-मन्द = शुक्र (Venus), चन्द्र (Moon), शनि (Saturn) — अष्टकवर्ग के सन्दर्भ-ग्रह

पाठ-भेद संभव — यह पंक्ति OCR से विकृत अष्टकवर्ग-सारणी है; उपर्युक्त विच्छेद केवल संभावित पाठ पर आधारित है।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक गुरु (बृहस्पति) के अष्टकवर्ग-करण की सारणी का अंश है — जिसमें बताया जाता है कि किन भावों में बिन्दु/रेखाएँ पड़ती हैं। पाठ के अनुसार गुरु के लिए मृति (8) और विक्रम (3) में "पाँच" (5) तथा शेष भावों में "वह्नि" अर्थात् तीन (3); इसके पश्चात् अगली (संभवतः शुक्र की) करण-पंक्ति आरम्भ होती दिखती है — लग्न में शुक्र-चन्द्र-शनि, स्व (2) एवं आय (11) में, और विक्रम (3) में मन्द (शनि)। चूँकि मूल पंक्ति अत्यधिक विकृत है, यहाँ केवल वही अंक व पद दिये गये हैं जो स्पष्ट हैं — शेष सारणी की पुनर्रचना नहीं की गई (पाठ-भेद संभव)।

English rendering A fragment of Jupiter's aṣṭakavarga contribution-table (Ch. 66): for Jupiter the 8th (mṛti) and 3rd (vikrama) carry "five," the remaining houses "fire," i.e. three; then the next planet's row (apparently Venus's) opens — Venus, Moon and Saturn in the ascendant, the 2nd and 11th, and Saturn in the 3rd. The line is badly OCR-corrupted and the reading is uncertain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह गणनात्मक सारणी-पंक्ति है, फल-कथन नहीं। अष्टकवर्ग में किसी ग्रह का भिन्नाष्टकवर्ग 8 सन्दर्भ-बिन्दुओं (7 ग्रह + लग्न) से बनता है: प्रत्येक सन्दर्भ से गिनकर निर्दिष्ट भावों में एक-एक बिन्दु रखा जाता है, फिर राशि-वार योग किया जाता है। इस श्लोक से जो स्थिरांक निर्विवाद रूप से पढ़े जा सकते हैं, केवल वे हैं: पञ्च = 5, वह्नि = 3 (भूतसंख्या अग्नि → 3)। भाव-संकेत: मृति = 8, विक्रम = 3, लग्न = 1, स्व = 2, आय = 11। यह अस्पष्ट है कि 5 और 3 उन भावों की बिन्दु-गणना हैं या भाव-क्रमांक — पाठ-भेद संभव — अतः यहाँ कोई पूर्ण सारणी नहीं गढ़ी गई। गणना-आदिम (counting primitive): सन्दर्भ-राशि R से n-वाँ भाव = ((R + n − 1 − 1) mod 12) + 1।

उदाहरण (worked example) केवल गणना-आदिम का निदर्शन (सारणी की पुनर्रचना नहीं, क्योंकि पाठ-भेद संभव)। मान लें सन्दर्भ-राशि मेष (R = 1)। श्लोक-दत्त पञ्च (n = 5) से गिनने पर → मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह (5वाँ)। वह्नि (n = 3) से → मेष, वृष, मिथुन (3रा)। यह केवल "n-वाँ भाव गिनने" की विधि दर्शाता है; गुरु की वास्तविक बिन्दु-पंक्ति इस विकृत पाठ से यहाँ नहीं भरी गई।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पंक्ति बृहस्पति के भिन्नाष्टकवर्ग (jīvāṣṭakavarga) की उसी स्रोत-सारणी का भाग है जिसका अन्तिम रेखा-योग हमारी kaal-verification-oracle में canonical रूप से गुरु = 56 पर पिन किया गया है — सर्वाष्टकवर्ग SAV = 337 का अंश (Sun 48, Moon 49, Mars 39, Mercury 54, Jupiter 56, Venus 52, Saturn 39)। यह योग एक स्थिर fixture पर exact `==` से जाँचा जाता है, कोई ±band नहीं — क्योंकि एक बार ±3 band ने वास्तविक −1 त्रुटि को छिपा दिया था (test_astakavarga_fixture.py)। चूँकि यहाँ मूल श्लोक OCR-विकृत है, हम प्रति-कोष्ठ संख्याएँ इस पंक्ति से नहीं, बल्कि उसी पिन-किए canonical fixture से लेते हैं — पाठ-भेद को गणित पर हावी नहीं होने देते।

66.33
लग्नारेन्धुज्ञभ्त्ऱ्गवः सुथेर्कार्यकुजा ग्त्ऱ्हे ।
शुक्रमन्धेन्धवो ध्यूने बुढशुक्रशनैश्चराः
lagnārendhujñabhtṟgavaḥ sutherkāryakujā gtṟhe |
śukramandhendhavo dhyūne buḍhaśukraśanaiścarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (पाठ-भेद संभव — यह पाठ OCR से विकृत अष्टकवर्ग-सारणी है; नीचे केवल स्पष्ट पठनीय पद ही ग्लॉस किए हैं, संदिग्ध पद चिह्नित हैं)
- लग्न = उदित राशि / आरम्भ-बिन्दु (अष्टकवर्ग का ८वाँ सन्दर्भ-खान)
- आर (आरः) = मङ्गल (अङ्गारक)
- इन्धु = इन्दु = चन्द्र
- ज्ञ = बुध (jña)
- भ्त्ऱ्गवः = भार्गवः = शुक्र
- सुते = पञ्चम भाव (पुत्र/सुत-स्थान)
- अर्क = सूर्य
- आर्य = गुरु (बृहस्पति) — पाठ-भेद संभव (आर्य ~ गुरु/बृहस्पति)
- कुज = मङ्गल
- ग्त्ऱ्हे = गृहे = चतुर्थ भाव (गृह/सुख-स्थान) — पाठ-भेद संभव
- मन्ध = मन्द = शनि
- ध्यूने = द्यूने = सप्तम भाव (कलत्र/द्यून-स्थान)
- शनैश्चर = शनि

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अष्टकवर्ग-अध्याय (अ. ६६) की उन "करण"-गणना पंक्तियों में से एक है जो बताती हैं कि किसी ग्रह के अष्टकवर्ग में अमुक भाव को कौन-कौन से सन्दर्भ-ग्रह (तथा लग्न) रेखा/बिन्दु देते हैं। पठनीय अंश में सुत (पञ्चम), गृह (चतुर्थ) और द्यून (सप्तम) भावों के लिए दाता-ग्रहों की सूचियाँ गिनाई गई हैं — यथा लग्न, मङ्गल, चन्द्र, बुध, शुक्र; तथा शुक्र, शनि, इन्दु; तथा बुध, शुक्र, शनि। मूल पाठ OCR से विकृत है, अतः यहाँ केवल स्पष्ट पद ही श्रद्धापूर्वक दिए हैं और कोई अङ्क कल्पित नहीं किया गया — पाठ-भेद संभव।

English rendering One of Chapter 66's aṣṭakavarga "karaṇa" enumeration lines, listing which reference-planets (and the lagna) contribute a bindu to particular houses — the legible portion naming donors for the 5th (suta), 4th (gṛha), and 7th (dyūna) bhāvas. The received text is OCR-corrupted; only the clearly readable placements are given, with no numbers invented — reading uncertain (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह पाद बिन्दु-स्थापन (रेखा-निवेश) का डेटा है, स्वयं कोई अंकगणितीय सूत्र नहीं। संरचना: प्रत्येक भाव के सामने वे दाता-सन्दर्भ लिखे जाते हैं जिनसे उस भाव में एक रेखा (बिन्दु) पड़ती है — इस श्लोक के पठनीय अंश में
- द्यून (७) ← शुक्र, शनि, इन्दु … तथा बुध, शुक्र, शनि (पाठ-भेद संभव)
- सुत (५) ← अर्क, गुरु(?), कुज
- गृह (४) ← लग्न, मङ्गल, इन्दु, बुध, शुक्र
इस पाद में कोई शब्द-संख्या (भूतसंख्या) स्पष्ट नहीं है, अतः कोई अंक-गणना यहाँ decode नहीं की जा रही — विकृत सारणी में संख्या का अनुमान अनुशासन-विरुद्ध होगा। गणना का ढाँचा: प्रत्येक ग्रह के अष्टकवर्ग में ८ सन्दर्भ (७ ग्रह + लग्न) × १२ भाव = ९६ कोष्ठ; प्रत्येक कोष्ठ में रेखा (शुभ) या बिन्दु/शून्य के रूप में चिह्न, जिनका स्तम्भ-योग उस ग्रह का भिन्नाष्टकवर्ग-योग देता है (अ. ६९–७१ में चक्र-लेखन-विधि)।

हमारा डिकोड (Our Decode) ये करण-श्लोक (अ. ६६ की बिन्दु-स्थापन पंक्तियाँ) ठीक वही कच्चा रेखा-डेटा हैं जिनके स्तम्भ-योग हमारे kaal-verification-oracle में canonical सर्वाष्टकवर्ग-मानों — सूर्य ४८, चन्द्र ४९, मङ्गल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९, SAV = ३३७ — से `==` (exact, बिना सहन-पट्टी) मिलाए जाते हैं; एक ±३ बैंड ने पहले असली −१ त्रुटि छिपा दी थी, इसलिए tolerance नहीं। जहाँ यहाँ का पाठ विकृत है, वहाँ हम अनुमान नहीं भरते — पिन-किए गए fixture का स्तम्भ-योग ही प्रमाण है, और भिन्न-स्तर पर BPHS बनाम फलदीपिका का "9" वाला मतभेद declared open convention `[HUMAN]` के रूप में रखा जाता है, मौन चयन के रूप में नहीं।

66.34
जीवारार्केन्धवः शथ्रौ सर्वे मन्धं विना व्यये ।
कर्मणीन्धुशनी ढर्मे मन्धारगुरवो म्त्ऱ्गौ
jīvārārkendhavaḥ śathrau sarve mandhaṃ vinā vyaye |
karmaṇīndhuśanī ḍharme mandhāraguravo mtṟgau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (यह अष्टकवर्ग-सारणी का OCR-भ्रष्ट पाठ है — पूरी पंक्ति में पाठ-भेद संभव; नीचे केवल पहचान-योग्य पद ही चिह्नित हैं, अनिश्चित हर स्थान पर ध्वजांकित।)
- जीव-आर-अर्क-इन्दवः (जीवारार्केन्धवः) = बृहस्पति · मंगल (आर) · सूर्य (अर्क) · चन्द्र (इन्दु) — चार ग्रहों का द्वन्द्व-समास (पाठ-भेद संभव)
- शत्रौ (शथ्रौ) = षष्ठ/अरि-स्थान में (सप्तमी "शत्रु में"); पाठ-भेद संभव — "शुक्रौ" भी सम्भव
- सर्वे … मन्दं विना = सभी ग्रह, केवल शनि (मन्द) को छोड़कर
- व्यये = द्वादश भाव (व्यय-स्थान)
- कर्मणि इन्दु-शनी = दशम भाव में चन्द्र और शनि
- धर्मे (ढर्मे) = नवम/धर्म-भाग्य-स्थान
- मन्द-आर-गुरवः (मन्धारगुरवो) = शनि · मंगल · बृहस्पति
- म्त्ऱ्गौ = अत्यंत भ्रष्ट अक्षर-पुंज, अपाठ्य — पाठ-भेद संभव

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अष्टकवर्ग की उन रेखा-स्थान सूचियों में से एक है जो बतलाती हैं कि किस भाव में कौन-कौन ग्रह एक शुभ-बिन्दु (रेखा) प्रदान करते हैं — जैसे "षष्ठ में बृहस्पति-मंगल-सूर्य-चन्द्र", "व्यय में शनि को छोड़कर सब", "दशम में चन्द्र-शनि", "नवम में शनि-मंगल-बृहस्पति"। किन्तु प्रिय पाठक, यह पंक्ति OCR-भ्रष्ट है — अक्षर विकृत हैं (शथ्रौ, मन्धं, ढर्मे, म्त्ऱ्गौ) — इसलिए हम इसे निष्ठा से यथावत् रख रहे हैं, कोई अंक या सारणी-मान गढ़कर नहीं भर रहे। जहाँ पाठ संदिग्ध है वहाँ पाठ-भेद संभव ही हमारा उत्तर है; निश्चित रेखा-विन्यास इस भ्रष्ट पाठ से पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता।

English rendering One of the aṣṭakavarga rekhā-placement lines — enumerating which planets contribute a benefic point (bindu) in which house (apparently: 6th — Jupiter, Mars, Sun, Moon; 12th — all save Saturn; 10th — Moon and Saturn; 9th — Saturn, Mars, Jupiter …). The text is OCR-corrupted (reading uncertain — पाठ-भेद संभव); it is rendered faithfully without reconstructing any figures.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग में प्रत्येक ग्रह की स्वतंत्र सारणी (bhinnāṣṭakavarga) होती है: आठ सन्दर्भों (7 ग्रह + लग्न) में से प्रत्येक से गिनकर, किसी भाव में ग्रह या तो रेखा = 1 देता है या बिन्दु/दण्ड = 0। इस प्रकार की पंक्ति ठीक यही 1/0 विन्यास (रेखा-स्थान) की कच्ची सूची देती है।
- किसी ग्रह का bhinna-योग = Σ (उसके 12 राशियों के बिन्दु)।
- किसी राशि का सर्वाष्टकवर्ग-खाना = Σ (उस राशि में सातों ग्रहों की रेखाएँ)।
- ग्रैंड-टोटल: SAV = Σ (सातों bhinna-योग)।
इस श्लोक का OCR-भ्रष्ट होना गणित को नहीं बदलता, पर इस विशेष पाठ के रेखा-अंक अपुनर्प्राप्य हैं — पाठ-भेद संभव; इस पंक्ति से कोई bindu-संख्या नहीं निकाली गई (गढ़ी नहीं गई)।

उदाहरण (worked example) (तंत्र-प्रदर्शन — इनपुट इस भ्रष्ट पंक्ति से नहीं, बल्कि Ch.66 के प्रमाणित कैनोनिकल योगों से; यही सारणियाँ ऐसी रेखा-पंक्तियों के जुड़ने से बनती हैं।) मान लें चन्द्र की bhinna-सारणी की 12 राशि-रेखाएँ जोड़ने पर योग = 49 (कैनोनिकल)। यदि किसी एक राशि में सातों ग्रहों की रेखाएँ 5 निकलें तो उस राशि का SAV-खाना = 5। सातों ग्रहों के bhinna-योग जोड़ने पर: 48 + 49 + 39 + 54 + 56 + 52 + 39 = 337 = सर्वाष्टकवर्ग। इस पद्धति में हर खाना एक पूर्णांक है — अतः जाँच सदा `==` से, कभी सहन-पट्टी (±) से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय-66 सीधे हमारे अष्टकवर्ग-oracle से जुड़ता है, जहाँ BPHS Ch.66 की सारणियाँ कैनोनिकल पर पिन की गई हैं — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV 337 — और एक pinned fixture पर `==` से अभिकथित (कोई ±3 सहन-पट्टी नहीं, क्योंकि वह एक बार असली −1 को छिपा गई थी)। चन्द्र-सारणी में "9" चन्द्र-से-चन्द्र में रखा गया (Phaladīpikā/Mehta वाले 9 को स्थानान्तरित करते हैं — योग वही 49, per-sign bhinna भिन्न — यह घोषित खुली convention `[HUMAN]` है, मौन चयन नहीं)। जैसी रेखा-स्थान पंक्तियाँ यहाँ (भ्रष्ट रूप में) दिख रही हैं, उन्हीं के शुद्ध पाठ से वे सारणियाँ बनती हैं जिन्हें हमारे oracle ने exact-`==` पर सील किया।

66.35
लग्नार्किसिथचन्ध्रज्ञाः करणं च गुरोरिधम् ।
सुथायुर्विक्रमेष्वक्षि थनुस्वव्ययखेष्विषुः
lagnārkisithacandhrajñāḥ karaṇaṃ ca guroridham |
suthāyurvikrameṣvakṣi thanusvavyayakheṣviṣuḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (OCR-विकृत अष्टकवर्ग-सारणी — पाठ-भेद संभव; नीचे शुद्ध-रूप कोष्ठक में)
- लग्न = उदित राशि / 1st reference-bindu का आधार-स्थान
- अर्कि (अर्क-सुत) = शनि (Saturn) — "सूर्य-पुत्र"
- सित (पाठ: सिथ) = शुक्र (Venus)
- चन्द्र (पाठ: चन्ध्र) = चन्द्रमा (Moon)
- ज्ञ = बुध (Mercury)
- गुरु (गुरोः इदम् — पाठ: गुरोरिधम्) = बृहस्पति; यह श्लोक बृहस्पति के अष्टकवर्ग का प्रारम्भ है
- करण = यहाँ "गणना/सारणी-रचना" (making of the table)
- सुत = 5वाँ भाव · आयुस् = 8वाँ भाव · विक्रम = 3रा भाव — गणना-स्थान
- अक्षि = 2 (भूतसंख्या: नेत्र) · इषु = 5 (भूतसंख्या: कामबाण)
- तनु (पाठ: थनु) = 1st · स्व = 2nd (धन) · व्यय = 12th · ख = 10th (कर्म) — गणना-स्थान

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक (व.36–37 के साथ) गुरु (बृहस्पति) के भिन्नाष्टकवर्ग की गणना खोलता है — अर्थात् किन-किन आधार-बिन्दुओं (लग्न, शनि, शुक्र, चन्द्र, बुध …) से गिनकर बृहस्पति किन राशि-स्थानों में अपनी शुभ-रेखा (बिन्दु) देता है। शास्त्र इन स्थानों को भाव-नाम (सुत=5, आयु=8, विक्रम=3, तनु=1, स्व=2, व्यय=12, ख=10) और भूतसंख्या (अक्षि=2, इषु=5) के मिश्रण से संकेतित करता है। मूल-पाठ OCR से विकृत है (सित→"सिथ", चन्द्र→"चन्ध्र", त/थ/द का घालमेल), इसलिए बिन्दुओं का यथावत् क्रम यहाँ निश्चयपूर्वक नहीं गिना जा रहा — पाठ-भेद संभव।

English rendering From the Lagna, Saturn (Arki), Venus, the Moon and Mercury — this is the reckoning of Jupiter's (benefic points): in the 5th, 8th and 3rd; the two (akṣi); the 1st, 2nd, 12th and 10th; the five (iṣu) … (the exact ordered set is OCR-corrupted here — reading contested).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भिन्नाष्टकवर्ग एक 8×12 आपतन-सारणी है। प्रत्येक ग्रह के लिए 8 आधार-बिन्दु होते हैं — सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न — और उस आधार से गिनी गई 12 राशियों में ग्रह एक निश्चित उपसमुच्चय में बिन्दु (रेखा) देता है।
- सारणी B[r][s] ∈ {0,1}, r = 8 आधार, s = 12 राशि (आधार से गिनी हुई)
- ग्रह की रेखा-संख्या R = Σ₍r₎ Σ₍s₎ B[r][s]
- सर्वाष्टकवर्ग SAV = Σ (सातों ग्रहों की R)

इस श्लोक की पठनीय संख्या-पद यथावत् इस प्रकार खुलते हैं: सुत → 5, आयुस् → 8, विक्रम → 3, अक्षि → 2, तनु → 1, स्व → 2, व्यय → 12, ख → 10, इषु → 5 (स्थान-गणना, आधार से)। परन्तु ये किस आधार-पंक्ति से किस क्रम में जुड़ते हैं — यह मूल-पाठ की विकृति के कारण अनिश्चित है, अतः गुरु के बिन्दु-समुच्चय का यहाँ कोई योग नहीं गढ़ा जा रहा (कोई बाहरी सारणी नहीं देखी गई; कोई संख्या मनगढ़ंत नहीं)।

उदाहरण (worked example) तकनीक का प्रयोग SAV-योग में दिखता है — दस्तावेज़ के अनुसार सातों रेखा-योग जोड़ने पर:
48 (सूर्य) + 49 (चन्द्र) + 39 (मंगल) + 54 (बुध) + 56 (गुरु) + 52 (शुक्र) + 39 (शनि) = 337 = SAV।
इस श्लोक से आरम्भ होने वाली गुरु-सारणी का विहित रेखा-योग वही 56 है, जो 337 के सात योज्यों में एक स्थान भरता है। (ये मान इस recension के दस्तावेज़-प्रमाणित हैं, इस विकृत श्लोक के अक्षरों से पुनर्गणित नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) व.66.35 ठीक वही स्थान है जहाँ गुरु का भिन्नाष्टकवर्ग खुलता है, और टीम के kaal-verification-oracle ने गुरु की रेखा-संख्या को exactly 56 पर एक pinned fixture पर `==` से बाँधा है — कोई सहन-सीमा (tolerance band) नहीं, क्योंकि एक ±3 band पहले एक असली −1 को छिपा चुका था। यह 56 उन सात योज्यों में से एक है जो SAV = 337 देते हैं। मान्यता स्पष्ट रूप से BPHS Ch.66 recension की है (फलदीपिका/मेहता कहीं-कहीं बिन्दु स्थानान्तरित करते हैं; योग समान, प्रति-राशि भिन्न — यह घोषित खुली संधि `[HUMAN]`, मौन चयन नहीं)।

66.36
अष्तौ स्थ्रियामरौ षद् भूर्ढर्मे मिथ्रेऽक्षि खं भवे ।
लग्ने स्वेऽर्कारविज्जीवमन्धाः सर्वे च कामभे
aṣtau sthriyāmarau ṣad bhūrḍharme mithre'kṣi khaṃ bhave |
lagne sve'rkāravijjīvamandhāḥ sarve ca kāmabhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टौ (अष्तौ) = आठ (Rekha/bindu-स्थानों की संख्या या भाव ८); स्त्रिया (स्थ्रिया — पाठ में स्थ्/स्त्र्-भेद संभव) = शुक्र से (स्त्री-कारक = शुक्र); अमरौ = द्विवचन/संख्या-पाठ अस्थिर (पाठ-भेद संभव); षट् (षद्) = ६; भूः = १; धर्मे = धर्म-भाव = ९; मित्रे (मिथ्रे) = मित्र-स्थान / तृतीय-सङ्केत (पाठ-भेद संभव); अक्षि = २; खं = ० (शून्य/अभाव — अथवा पाद-समाप्ति; भाव-संख्या के रूप में संदिग्ध); लग्ने = लग्न (१) में / लग्न से; स्वे = स्व-राशि/स्व-स्थान में; अर्क = सूर्य; अरविज् = ग्रह-नाम संदिग्ध (रविज/अन्य पाठ — पाठ-भेद संभव); जीव = गुरु; मन्धाः (मन्दाः) = शनि; सर्वे = ये सभी; कामभे = काम-भ (सप्तम भाव/काम-स्थान) में।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अष्टकवर्ग की रेखा-व्यवस्था का एक पंक्ति-नियम है। पहले चरण में शुक्र-सन्दर्भ से कुछ निश्चित भावों — जिनमें ८, ६, १, ९, २ स्पष्ट शब्द-संख्या से निकलते हैं — रेखा का विधान कहा गया है; “अमरौ / मित्रे / खं” अंशों में पाठ-भेद संभव है, अतः उन्हें दृढ़ अंक न मानकर सावधानी से पढ़ना चाहिए। दूसरे चरण में लग्न में, स्व-स्थान में, तथा काम-भ (७) में सूर्य, “अरविज्” (संदिग्ध पठन), गुरु और शनि — ये सभी — रेखा के अधिकारी कहे गए हैं। यह फल-कथन नहीं, वर्ग-सारिणी का स्थान-नियम है: कौन-सा ग्रह किस भाव में bindu देता है, यही गणित की कुंजी है।

English rendering The verse encodes an aṣṭakavarga rekha-placement rule: from Venus, bindus are assigned to a set of houses of which 8, 6, 1, 9, and 2 are secure word-numerals (other tokens remain textually uncertain). It further states that the Sun, the contested graha named aravij, Jupiter, and Saturn all take a place in the Lagna, in the own-sign position, and in the seventh (kāma) house. The statement is a tabular mapping rule for Chapter 66, not a predictive phala in its own right.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग-रेखा = discrete house-set membership, not a continuous formula. From the clear bhūtasaṃkhyā of the first pāda, the Venus-side set includes at least
H_Śukra ⊇ {1, 2, 6, 8, 9}
(with 3 and any reading of amarau / kha marked पाठ-भेद संभव — do not force them into a total).
Second pāda (placement flags, same recension): for G ∈ {Sūrya, aravij?, Guru, Śani},
bindu on houses {1 (lagna), sva, 7 (kāma-bha)} relative to the stated reference.
Per-planet bhinna-aṣṭakavarga total = count of such rekhas over the 8 contributors (7 grahas + lagna); the recension’s canonical closed sums are Sūrya 48, Candra 49, Maṅgala 39, Budha 54, Guru 56, Śukra 52, Śani 39 → SAV = 337. Convention: house index is always counted from the contributor named in the table row, zodiacally forward, 1 = the contributor’s own rāśi.

उदाहरण (worked example) Convention: whole-sign houses; bindu map from this verse’s clear Venus set {1,2,6,8,9}; Venus longitude → rāśi = Meṣa (Aries) as contributor.
Then rekha falls in: 1 Meṣa, 2 Vṛṣabha, 6 Kanyā, 8 Vṛścika, 9 Dhanu (and in any additional houses only if a secure reading of the contested words supplies them).
Second rule, same chart: if the table row is “from Lagna”, a bindu is also marked in Lagna, in each of Sun/Guru/Śani’s own rāśi-cell under the sva-flag, and in the 7th from the reference — exactly where this recension’s Ch.66 matrix says so. Final planet totals must still `==` the canonical 48/49/39/54/56/52/39 (SAV 337); a ± band is not accepted.

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक उसी Ch.66 अष्टकवर्ग-मैट्रिक्स का स्थान-नियम है जिसकी ग्रह-योग राशियाँ हमने exact-`==` से पिन की हैं: ४८/४९/३९/५४/५६/५२/३९ → SAV ३३७ (kaal-verification-oracle, `test_astakavarga_fixture.py`). जहाँ शब्द-संख्या या ग्रह-नाम (अरविज्, अमरौ, खं) विकिस्रोत-पाठ में अस्थिर हैं, वहाँ हम “पाठ-भेद संभव” रखकर मैट्रिक्स की केवल उन्हीं कोशिकाओं को fixture मानते हैं जो योग को `==` से पूरा करती हैं — tolerance-बैंड से छिपा −१ पहले एक बार चूक बन चुका है; इसलिए अस्पष्ट पाद को अनुमान से नहीं भरते।

66.37
अर्कार्यौ विक्रमस्ठाने सुथेऽर्कारौ शुभे रविः ।
सुखेऽकबुढजीवाः स्युर्भौमज्ञौ म्त्ऱ्थिभे ध्वज
arkāryau vikramasṭhāne suthe'rkārau śubhe raviḥ |
sukhe'kabuḍhajīvāḥ syurbhaumajñau mtṟthibhe dhvaja

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्क / रवि = सूर्य; आर्य = गुरु (जीव); अर्कार्यौ = सूर्य और गुरु (द्विवचन); विक्रमस्थान = तृतीय भाव; सुत = पंचम भाव; अर्कारौ = द्वन्द्व-द्विवचन (अर्क + द्वितीय सदस्य; प्रायः सूर्य-गुरु पंक्ति का ही रूप — पाठ-भेद संभव); शुभ = नवम भाव; सुख = चतुर्थ भाव; अर्क-बुध-जीव = सूर्य, बुध, गुरु; भौम = मंगल; ज्ञ = बुध; भौमज्ञौ = मंगल और बुध; मृत्युभ / मृतिभ = अष्टम भाव; ध्रुवम् (पाठ में «ध्वज» — प्रायः ध्रुवम् का पाठ-भेद/क्षति) = निश्चित रूप से।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अष्टकवर्ग की रेखा/बिन्दु-सारिणी का एक खण्ड है। शास्त्र कहता है — विक्रम (तृतीय) में सूर्य और गुरु, सुत (पंचम) में अर्कारौ (सूर्य-सहित जोड़ा), शुभ (नवम) में सूर्य, सुख (चतुर्थ) में सूर्य-बुध-गुरु, तथा मृत्यु (अष्टम) में मंगल और बुध — ये योगदान निश्चित माने गए हैं। यहाँ फल-कथन नहीं, बल्कि बिन्दु देने वाले ग्रहों का भाव-अनुसार निर्देश है। पूरी सारिणी के अन्य भाव निकटवर्ती श्लोकों में पूरे होते हैं।

English rendering This half of the aṣṭakavarga table states which grahas contribute a rekhā (bindu) in named bhāvas: Sun and Jupiter in the 3rd; the dual pair arkārau in the 5th; the Sun in the 9th; Sun, Mercury, and Jupiter in the 4th; Mars and Mercury in the 8th — given as fixed (dhruvam). It is table-construction language, not a life-prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग में प्रत्येक योगदान 0 या 1 रेखा है। इस श्लोक-खण्ड के नियत युग्म:

  • भाव 3 ← {सूर्य, गुरु} → +1 प्रत्येक योगदान से
  • भाव 5 ← {अर्कारौ} → +1 प्रति नामित योगदान (द्वितीय सदस्य पर पाठ-भेद संभव)
  • भाव 9 ← {सूर्य}
  • भाव 4 ← {सूर्य, बुध, गुरु}
  • भाव 8 ← {मंगल, बुध}

पूर्ण भिल्लाष्टकवर्ग = ८ स्रोतों (७ ग्रह + लग्न) × १२ भाव पर 0/1 का योग; सूर्य की canonical रेखा-योग = ४८, चन्द्र ४९, मंगल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९; सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = ३३७। गिनती स्रोत-ग्रह की राशि से भाव-संख्या पर चलती है (स्थान-गणना की convention घोषित रखें)।

उदाहरण (worked example) मान लें भिल्लाष्टकवर्ग के एक स्रोत «गुरु» की राशि = कन्या (dṛḍha rāśi-position; ayanāṃśa केवल देशान्तर→राशि लाने में; बिन्दु-नियम स्वयं राशि-सापेक्ष)। श्लोक कहता है तृतीय में गुरु योगदान देता है — गुरु से ३रा भाव = वृश्चिक: वहाँ गुरु-स्रोत से +१ रेखा। चतुर्थ में भी गुरु नामित है — गुरु से ४था = धनु: +१। नवम में गुरु इस श्लोक में नहीं — गुरु-स्रोत से ९वें पर इस खण्ड से +० (अन्य श्लोक/स्रोत अलग)। प्रत्येक +१ बाद SAV में जुड़ता है; सूर्य-तालिका का पूर्ण योग oracle-pinned ४८ है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक अध्याय ६६ की उसी canonical बिन्दु-सारिणी का अंश है जिसे हमने exact-`==` से पिन किया है — सूर्य ४८, चन्द्र ४९, …, SAV ३३७; ± बैंड नहीं (एक बार −१ छिप गया था)। चन्द्र-तालिका में «९» का स्थान BPHS Ch.66 के अनुसार चन्द्र-से-चन्द्र पर रखा गया; Phaladīpikā/Mehta का स्थानान्तर अलग convention है, योग ४९ वही।

66.38
शुक्रार्केन्ध्वार्किलग्नार्याः शथ्रौ शून्यं भवे व्यये ।
होरार्किबुढशुक्रार्यास्थन्वारज्ञेन्ध्विनाश्च खे
śukrārkendhvārkilagnāryāḥ śathrau śūnyaṃ bhave vyaye |
horārkibuḍhaśukrāryāsthanvārajñendhvināśca khe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (यह श्लोक OCR-विकृत अष्टकवर्ग-सारणी का अंश है — पाठ-भेद संभव; पद-विच्छेद संभावित पठन पर आधारित।)
- शुक्र = शुक्रग्रह (Venus) — अष्टकवर्ग का एक विचार-बिन्दु
- अर्क / इन (रवि) = सूर्य (Sun); अर्कि = शनि (Saturn — "अर्कि" = सूर्यपुत्र)
- इन्दु (इन्ध्व) = चन्द्र (Moon)
- लग्न = उदित राशि — अष्टकवर्ग का आठवाँ विचार-बिन्दु (सप्त-ग्रह + लग्न)
- बुध / ज्ञ (बुढ) = बुध (Mercury; "ज्ञ" = बुध का पर्याय)
- आर्याः = "उक्त (विचार-बिन्दु)"; संभवतः गुरु/बृहस्पति — पाठ-भेद संभव
- शत्रौ (शथ्रौ) = षष्ठ भाव (6th, अरि/रिपु); व्यये = द्वादश (12th); खे = दशम (10th, ख/कर्म); भवे = भाव/स्थान — पाठ-भेद संभव
- शून्यं = शून्य बिन्दु (० रेखा — कोई बिन्दु नहीं)

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक (अध्याय ६६, अष्टकवर्ग-प्रकरण के पद्य ३७–४० का अंश, जो पद्य ४० में "शनेः" से बँधता है — अतः यह शन्यष्टकवर्ग की बिन्दु-सारणी जान पड़ती है) गिनाता है कि किन विचार-बिन्दुओं (शुक्र, सूर्य, चन्द्र, शनि, लग्न, गुरु आदि) से किस भाव में रेखा (बिन्दु) पड़ती है और कहाँ शून्य रहता है — यहाँ शत्रु (षष्ठ) व व्यय (द्वादश) में शून्य, तथा ख (दशम) में होरा-शनि-बुध-शुक्र-गुरु-बुध-चन्द्र-सूर्य आदि से बिन्दु-योग। मूल पाठ यहाँ अत्यधिक विकृत है; ऊपर केवल वही पढ़ा गया है जो स्पष्ट है, शेष पाठ-भेद संभव के रूप में चिह्नित है — कोई अंक कल्पित नहीं किया गया।

English rendering A fragment of the aṣṭakavarga bindu-table (of the block vv. 37–40, which closes at "śaneḥ" — hence apparently the śanyaṣṭakavarga): from Venus, Sun, Moon, Saturn, the Lagna [and Jupiter?] the reckoning gives śūnya (0) in the 6th (śatru) and the 12th (vyaya); and in the 10th (kha) dots accrue from Horā, Saturn, Mercury, Venus, [Jupiter?], Mercury, Moon and the Sun. (Text badly corrupted — [पाठ-भेद संभव] throughout; no cell-values are supplied beyond the literal "zero.")

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग की प्रत्येक कोष्ठिका एक द्विआधारी (binary) मान है: रेखा = बिन्दु = 1 (शुभ), शून्यं = 0 (अशुभ)। किसी ग्रह का भिन्नाष्टकवर्ग = एक 8 × 12 ग्रिड — आठ विचार-बिन्दु (7 ग्रह + लग्न, अतः "अष्टक") × बारह राशि/भाव — जिसमें प्रत्येक कोष्ठिका ∈ {0, 1}; राशि-वार स्तम्भ-योग, फिर सम्पूर्ण रेखा-योग। यह श्लोक केवल यह कहता है कि दो भावों (शत्रु व व्यय) में योग = 0, तथा ख (दशम) बिन्दु-ग्राही है। शेष कोष्ठिकाओं के अंक विकृति के कारण अपठनीय — इसलिए यहाँ कोई पंक्ति-योग कल्पित नहीं किया जा रहा (न कोई बाह्य सारणी देखी जा रही)।

उदाहरण (worked example) केवल श्लोक-कथित अंकों से गणना-सिद्धान्त दर्शाते हैं (कल्पना नहीं): यदि किसी ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग में षष्ठ भाव में शून्य (0) और द्वादश में शून्य (0) पड़े, तो उन दो कोष्ठिकाओं का योगदान = 0 + 0 = 0 — अर्थात् ये भाव उस ग्रह के रेखा-योग को कुछ नहीं बढ़ाते; कुल योग केवल अंकित (रेखा = 1) भावों की गणना से बनता है, जैसे ख (दशम) में पड़े बिन्दु। पूर्ण पंक्ति-योग तभी दिया जा सकता, जब सभी बारह कोष्ठिकाएँ पठनीय हों — यहाँ वे नहीं हैं, अतः अधूरे अंकों को जोड़ना अनुशासन-विरुद्ध होगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक उस कच्ची कोष्ठिका-सामग्री का टुकड़ा है जिसे टीम ने अध्याय ६६ के अष्टकवर्ग को canonical रूप में स्थिर करते समय exact-`==` ऑरैकल पर जाँचा — जहाँ शनि का रेखा-योग 39 पिन किया गया (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52) और सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = 337। अनुशासन यह था कि कोई सहन-सीमा (tolerance band) न रखी जाए — एक ±3 बैंड ने कभी अष्टकवर्ग का वास्तविक −1 दोष छिपा दिया था; इसलिए इस जैसी विकृत सारणी को भी अनुमान से "पूरा" नहीं किया जाता, बल्कि पठनीय अंक (जैसे यह "शून्यं = 0") को ठीक वैसा ही रखा जाता है और शेष को पाठ-भेद संभव घोषित किया जाता है।

66.39
स्वस्थ्रीढर्मेषु सप्थाङ्गं म्त्ऱ्थिहोराग्त्ऱ्हेषु च ।
आज्ञाभ्राथ्त्ऱ्व्यये वेधा रूपं शथ्रौ सुथे शराः
svasthrīḍharmeṣu sapthāṅgaṃ mtṟthihorāgtṟheṣu ca |
ājñābhrāthtṟvyaye vedhā rūpaṃ śathrau suthe śarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) (OCR-दूषित पाठ — नीचे प्रत्येक पद के आगे पुनर्निर्मित रूप, पाठ-भेद संभव)
- स्व-स्त्री-धर्मेषु (पाठः "स्वस्थ्रीढर्मेषु") = तनु/लग्न-भाव (1), कलत्र/स्त्री-भाव (7), धर्म-भाव (9) — तीन बहुवचन अधिकरण
- सप्त-अङ्गम् (पाठः "सप्थाङ्गं") = सप्त = 7 (भूतसंख्या: सप्त = ७)
- मित्र…होरा…गृहेषु (पाठः "म्त्ऱ्थिहोराग्त्ऱ्हेषु") = अत्यन्त विकृत — सम्भवतः "…गृहेषु च" (इन भावों में); पूर्ण पाठ अनिश्चित, पाठ-भेद संभव
- आज्ञा-भ्रातृ-व्यये (पाठः "आज्ञाभ्राथ्त्ऱ्व्यये") = आज्ञा/कर्म-भाव (10), सहज/भ्रातृ-भाव (3), व्यय-भाव (12)
- रूपम् = रूप = 1 (भूतसंख्या: रूप = एक)
- शत्रौ (पाठः "शथ्रौ") = रिपु/शत्रु-भाव (6) में; सुते (पाठः "सुथे") = सुत/पुत्र-भाव (5) में
- शराः = शर = 5 (भूतसंख्या: कामदेव के पञ्च-शर = पाँच)

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय ६६ (अष्टकवर्ग) का एक तालिका-श्लोक है — किसी ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग की रेखा/बिन्दु-गणना को भावों के नाम से गिनाता है। जितना पाठ पढ़ा जा सका उसके अनुसार श्लोक कहता है: तनु-कलत्र-धर्म भावों में "सात", आज्ञा-भ्रातृ-व्यय भावों में "एक (रूप)", और शत्रु तथा सुत भावों की गणना में "पाँच (शर)"। मूल पंक्ति गम्भीर रूप से OCR-विकृत है (द/त→थ, ध→ढ, तथा जगह-जगह अनावश्यक ऱ्), अतः कौन-सी संख्या ठीक किस भाव-समूह से जुड़ी है, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता — पाठ-भेद संभव; हम केवल स्पष्ट पढ़े गए भूतसंख्या-पदों को ही खोलते हैं, शेष तालिका की कल्पना नहीं करते।

English rendering An aṣṭakavarga enumeration verse (Ch. 66) that lists bindu/rekhā counts by house-name: in the self-, spouse-, and dharma-houses "seven"; in the command-, sibling-, and expenditure-houses "one (rūpa)"; and in the enemy- and son-houses the count "five (śara)." The received text is badly OCR-corrupted, so the exact number-to-house binding is uncertain (पाठ-भेद संभव); only the plainly legible word-numerals are decoded here.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह श्लोक कोई सूत्र-गणना नहीं, बल्कि अष्टकवर्ग बिन्दु-आँकड़ा भूतसंख्या में एन्कोड करता है (शैली-नियमानुसार "अष्टकवर्ग-बिन्दु" गणित-कोटि में आता है)। स्पष्ट पठनीय भूतसंख्या-मान:
- रूप → 1
- शर (कामशर) → 5
- सप्त → 7

भाव-संकेत (मानक क्रम): तनु 1 · भ्रातृ/सहज 3 · सुत 5 · शत्रु/रिपु 6 · कलत्र/स्त्री 7 · धर्म 9 · आज्ञा/कर्म 10 · व्यय 12। पंक्ति का ढाँचा है: {भाव-समूह} → {संख्या}, अर्थात् किसी एक ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग की भाव-वार रेखा-संख्या। कोई नई संख्या नहीं गढ़ी गई; विकृत खण्ड ("मित्र…होरा…गृहेषु", "वेधा") का संख्या-मान अपठनीय है और यहाँ रिक्त छोड़ा गया — पूर्ण पंक्ति = {…}, पाठ-भेद संभव।

उदाहरण (worked example) केवल भूतसंख्या→अंक प्रतिस्थापन दिखाते हैं (तालिका पूरी नहीं करते):
- "स्व-स्त्री-धर्मेषु सप्त" ⇒ भाव {1, 7, 9} ↦ 7
- "आज्ञा-भ्रातृ-व्यये … रूपम्" ⇒ भाव {10, 3, 12} ↦ 1
- "सुते शराः" ⇒ भाव {5} ↦ 5
- "शत्रौ …" ⇒ भाव {6} ↦ ? (मान अपठनीय — रिक्त)

इन तीन पठनीय मानों का अपने-आप में योग 7 + 1 + 5 = 13 केवल उद्धृत अंकों का जोड़ है — यह न किसी भाव-पंक्ति का योग है, न सर्वाष्टकवर्ग का; इसे कोई सिद्ध कुल-योग न समझा जाए (शेष प्रविष्टियाँ अज्ञात)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अध्याय ६६ वह आधार है जिस पर हमने अष्टकवर्ग की कैनोनिकल रेखा-तालिका को exact-`==` ऑरैकल पर पिन किया — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39, और सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = 337 (kaal-verification-oracle · test_astakavarga_fixture.py)। ठीक इसी प्रकार के छोटे पूर्णांक (जैसे यहाँ 1, 5, 7) जब भाव-वार जुड़कर स्तम्भ-योग बनाते हैं, तब हमारी अनुशासन-रेखा लागू होती है: कोई सहनशीलता-बैंड नहीं, केवल `==` — क्योंकि ±3 का बैंड एक बार अष्टकवर्ग में वास्तविक −1 त्रुटि को छिपा चुका है। अतः जहाँ पाठ ही विकृत हो (जैसे 66.39), वहाँ अनुमानित अंक भरने के बजाय प्रविष्टि को रिक्त रखना ही उसी exact-अनुशासन का पालन है।

66.40
आये शून्यं शनेरेवं करणं प्रोच्यथे बुढैः ।
ग्त्ऱ्हे थनौ च लग्नार्कौ स्वस्थ्रियोश्च रविं विना
āye śūnyaṃ śanerevaṃ karaṇaṃ procyathe buḍhaiḥ |
gtṟhe thanau ca lagnārkau svasthriyośca raviṃ vinā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आये = ११वाँ (लाभ) भाव; शून्यं = ० — कोई बिन्दु नहीं; शनेः = शनि का; करणं = बिन्दु/अशुभ-सूची (v69: बिन्दु-रूप, अशुभद); गृहे = ४र्थ (सुख) भाव; तनौ = १ला (लग्न) भाव; लग्नार्कौ = लग्न + अर्क (सूर्य); स्व-स्त्रियोः = २रे (धन) व ७वें (कलत्र) भाव में; रविं विना = सूर्य को छोड़ शेष सब।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शनि की करण-तालिका पूर्ण होती है — उसके ११वें भाव में शून्य (कोई करण-बिन्दु नहीं); "इस प्रकार करण बुधजनों द्वारा कहा गया।" इसके तत्काल बाद अगली ग्रह-तालिका आरम्भ होती है: ४थे और १ले भाव में लग्न तथा सूर्य अपना अंक देते हैं, और २रे व ७वें भाव में सूर्य को छोड़कर शेष सब। (यह करण→स्थान की संधि है; इस पद के उत्तरार्ध की तालिका किस ग्रह की है, यह इस पाठ में स्पष्ट अन्त-चिह्न से नियत नहीं — पाठ-भेद संभव।)

English rendering Here Saturn's karaṇa (its bindu/malefic list) closes — the 11th place is śūnya (0) — "thus the karaṇa is declared by the wise." The next table then opens: in the 4th and 1st, Lagna and the Sun deposit a mark; in the 2nd and 7th, every body except the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) इस अध्याय की संज्ञा (v69): करण = बिन्दु = 0 = अशुभ; स्थान = रेखा = 1 = शुभ। किसी ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग में ८ सन्दर्भ (७ ग्रह + लग्न) × १२ राशि = 96 कोष्ठ, प्रत्येक रेखा(1) या बिन्दु(0)। रेखा-योग = ग्रह का अष्टकवर्ग-योग; बिन्दु-योग = 96 − रेखा-योग। शनि का रेखा(स्थान)-योग = 39 (मानक) ⇒ उसका करण(बिन्दु)-योग = 96 − 39 = 57। "आये शून्यं" = लाभ-भाव में कोई करण-बिन्दु नहीं।

उदाहरण: शनि-करण-पंक्ति के ११वें कोष्ठ में 0 → चक्र में वहाँ बिन्दु (·) अंकित होगा, रेखा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही BPHS Ch.66 वह मूल है जिसे हमारे kaal-verification-oracle ने मानक अष्टकवर्ग-योगों पर पिन किया — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → सर्वाष्टकवर्ग SAV = 337 — exact-`==` फिक्स्चर पर, बिना किसी सहन-पट्टी के (एक बार ±3 की पट्टी ने असली −1 छिपा दिया था; इसीलिए अब केवल तुल्यता-जाँच)।

66.41
हिथ्वा ढर्मे बुढं माने लग्नाररविचन्ध्रजान् ।
थथो भ्राथरि जीवार्कबुढशुक्राः क्षथे रविः
hithvā ḍharme buḍhaṃ māne lagnāraravicandhrajān |
thatho bhrāthari jīvārkabuḍhaśukrāḥ kṣathe raviḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हित्वा = छोड़कर; धर्मे = ९वें (भाग्य) भाव में; बुधं = बुध को; माने = १०वें (कर्म) भाव में; लग्न-अर-रवि-चन्द्र = लग्न, अर (मंगल), रवि (सूर्य), चन्द्र; चन्द्रजान् = चन्द्रज (बुध?) — पाठ-भेद संभव; भ्रातरि = ३रे (सहज) भाव में; जीव-अर्क-बुध-शुक्राः = गुरु, सूर्य, बुध, शुक्र; क्षते = ६ठे (शत्रु) भाव में; रविः = सूर्य।

हिन्दी भावार्थ यह पद कोष्ठ-दर-कोष्ठ बताता है कि किस भाव में कौन-से सन्दर्भ-ग्रह अपना अंक रखते हैं — ९वें भाव में बुध को छोड़ शेष सब, १०वें में लग्न-मंगल-सूर्य-चन्द्र, ३रे में गुरु-सूर्य-बुध-शुक्र, और ६ठे में केवल सूर्य। "हित्वा … बुधं" (बुध को हटाकर) जैसी संक्षेप-शैली इन तालिकाओं की विशेषता है — पूरी सूची न देकर अपवाद-ग्रह का नाम देना।

English rendering Cell by cell: in the 9th, all bodies except Mercury; in the 10th, Lagna, Mars, the Sun and the Moon; in the 3rd, Jupiter, the Sun, Mercury and Venus; in the 6th, the Sun alone.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक भाव के लिए "उपस्थित सन्दर्भ-ग्रह" ही उस कोष्ठ में रेखा/बिन्दु का समुच्चय है; "अमुक को छोड़" = 8 − (शेष) की गणना का शॉर्टहैण्ड। उदा. धर्म-भाव: बुध हटाने पर सम्भावित 8 में से 7 सन्दर्भ = उस कोष्ठ-वर्ग में 7 अंक (यदि यह रेखा-सूची हो)।

उदाहरण: ६ठे भाव में "रविः" एकल → उस भाव के इस वर्ग-कोष्ठ में केवल सूर्य-सन्दर्भ का 1 अंक, शेष 0।

66.42
व्यये लग्नेन्धुमन्धार्काः सिथार्कन्धुज्ञलग्नकाः ।
सुथे म्त्ऱ्थौ बुढार्कौ च हिथ्वाऽये खं शनेर्विधः
vyaye lagnendhumandhārkāḥ sithārkandhujñalagnakāḥ |
suthe mtṟthau buḍhārkau ca hithvā'ye khaṃ śanervidhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यये = १२वें (व्यय) भाव में; लग्न-इन्दु-मन्द-अर्काः = लग्न, चन्द्र, मन्द (शनि), सूर्य; सित-अर्क-इन्दु-ज्ञ-लग्नकाः = शुक्र, सूर्य, चन्द्र, बुध, लग्न; सुते = ५वें (सन्तान) भाव में; मृतौ = ८वें (आयु/रन्ध्र) भाव में; बुध-अर्कौ = बुध व सूर्य; हित्वा आये खं = छोड़कर, ११वें में खं (० = शून्य); शनेः विधुः = "शनि का, ऐसा जानते हैं" (अथवा विधुः = चन्द्र — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ क्रम आगे बढ़ता है — १२वें भाव में लग्न-चन्द्र-शनि-सूर्य; एक अन्य कोष्ठ में शुक्र-सूर्य-चन्द्र-बुध-लग्न; ५वें व ८वें में बुध और सूर्य; ११वें भाव में शून्य (कोई अंक नहीं)। पद का अन्त "शनेः विधुः" इस उपखण्ड को शनि से जोड़ता प्रतीत होता है, पर संज्ञा (शनि/विधु=चन्द्र) का पाठ संदिग्ध है — अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering Continuing: in the 12th, Lagna, Moon, Saturn and Sun; in another cell Venus, Sun, Moon, Mercury and Lagna; in the 5th and 8th, Mercury and Sun; and in the 11th, śūnya (0). The closing word points to Saturn (or to the Moon) — the reading is uncertain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "खं" यहाँ संख्या-शून्य (0) है (कोई अंक नहीं), जबकि "खे" भाव-नाम होने पर १०वाँ भाव (ख = आकाश = 10) होता — सन्दर्भ से भेद स्पष्ट। भूतसंख्या-नियम: शून्य/ख/अम्बर = 0; रूप = 1; इसी लिपि में गणना-अंक और भाव-नाम एक-से शब्दों में छिपे रहते हैं, इसलिए विभक्ति (सप्तमी बनाम प्रथमा) से अर्थ तय करना पड़ता है।

66.43
उक्थाऽन्ये स्ठानधाथार इथि स्ठानं विधुर्बुढाः ।
अठ स्ठानग्रहान् वक्ष्ये सुखबोढाय सुरिणाम्
ukthā'nye sṭhānadhāthāra ithi sṭhānaṃ vidhurbuḍhāḥ |
aṭha sṭhānagrahān vakṣye sukhaboḍhāya suriṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उक्ता ये = वे जो पहले कहे गए; स्थानदातारः = स्थान/रेखा देने वाले (बिन्दु-दाता); स्थानम् = अष्टकवर्ग-स्थान (जहाँ रेखा/बिन्दु बैठे); विदुः बुधाः = पण्डित जानते हैं; अथ = अब; स्थानग्रहान् = उन ग्रहों को जो स्थान देते हैं; वक्ष्ये = कहूँगा; सुखबोधाय सूरिणाम् = विद्वानों के सरल बोध हेतु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जो स्थान रेखा (बिन्दु) देते हैं, उन्हीं को बुधजन “स्थान” कहते हैं। अब आचार्य क्रम से उन ग्रहों (एवं लग्न) का वर्णन करते हैं जो चन्द्र के अष्टकवर्ग में स्थान/रेखा प्रदान करते हैं, ताकि सूरिजन आसानी से समझ सकें। यह श्लोक अगले फल-स्थान-सूची का द्वार खोलता है।

English rendering The wise call “sthāna” those positions that bestow the rekha (bindu). The text now undertakes to name the planets that grant such places, for the easy grasp of the learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-उद्घाटन (अष्टकवर्ग स्थान-सूची का आरम्भ)। अष्टकवर्ग में प्रत्येक “स्थान” = 1 रेखा/बिन्दु; आठ दाता (७ ग्रह + लग्न) अपनी-अपनी राशि से गिने गए कथित भावों में चन्द्र-अष्टकवर्ग को बिन्दु देते हैं। योग-योग = चन्द्र का भिननाष्टकवर्ग; सात ग्रहों का योग → सर्वाष्टकवर्ग (SAV)।

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय ६६ की यह पंक्ति उसी कैनोनिकल अष्टकवर्ग-सारिणी का द्वार है जिसमें हमने सूर्य ४८, चन्द्र ४९, मंगल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९ → SAV = ३३७ को exact-`==` फिक्स्चर से पिन किया है (सहिष्णुता-बैंड नहीं)। स्थान = बिन्दु, और कुल की जाँच अंकगणित है, फल की व्याख्या नहीं।

66.44
स्वायस्थनुषु मन्धारसूर्या जीवबुढौ सुथे ।
विक्रमे ज्ञेन्धुलग्नानि लग्नार्कार्किकुजा ग्त्ऱ्हे
svāyasthanuṣu mandhārasūryā jīvabuḍhau suthe |
vikrame jñendhulagnāni lagnārkārkikujā gtṟhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व = तनु/प्रथम भाव; आय = एकादश; तनु = लग्न-भाव (१); मन्दार = शनि + मंगल; सूर्याः = सूर्य; जीवबुधौ = गुरु और बुध; सुते = पंचम में; विक्रमे = तृतीय में; ज्ञेन्दुलग्नानि = बुध, चन्द्र, लग्न; लग्न-अर्क-आर्कि-कुजाः = लग्न, सूर्य, शनि, मंगल; गृहे = चतुर्थ में। (पाठ: स्वायतनुषु — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चन्द्र-अष्टकवर्ग के स्थान बताता है: स्व/तनु (१) और आय (११) में मन्दार (शनि-मंगल) तथा सूर्य रेखा देते हैं; सुत (५) में गुरु और बुध; विक्रम (३) में बुध, चन्द्र और लग्न; गृह/बन्धु (४) में लग्न, सूर्य, शनि और मंगल। गिनती सदैव उस दाता-ग्रह (या लग्न) की राशि से भाव-क्रम में होती है।

English rendering In the Candrāṣṭakavarga, Saturn, Mars, and the Sun grant places in the 1st and 11th (from themselves); Jupiter and Mercury in the 5th; Mercury, the Moon, and the Lagna in the 3rd; the Lagna, Sun, Saturn, and Mars in the 4th.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चन्द्र-अष्टकवर्ग निर्माण (दाता → भाव-संख्या से राशि):
- यदि दाता राशि = R (१…१२), तो भाव h पर बिन्दु की राशि = ((R − 1 + (h − 1)) mod 12) + 1।
- इस श्लोक से बीज-युग्म: (शनि,१), (शनि,११), (मंगल,१), (मंगल,११), (सूर्य,१), (सूर्य,११), (गुरु,५), (बुध,५), (बुध,३), (चन्द्र,३), (लग्न,३), (लग्न,४), (सूर्य,४), (शनि,४), (मंगल,४)।
- प्रत्येक युग्म = ठीक १ रेखा; बाद के श्लोक शेष युग्म जोड़ते हैं। चन्द्र-कुल कैनन = ४९ रेखा (७ दाता-ग्रहों का योग; लग्न अलग स्तम्भ में गिना जाता है)।

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल = वृषभ (R = २)। श्लोकानुसार मंगल १ और ११ (तथा ४) से चन्द्र-AV को बिन्दु देता है → राशियाँ: १→वृषभ, ११→मेष, ४→सिंह। (अयनांश/लग्न-गणना इस स्थान-सूची पर निर्भर नहीं; केवल दाता की राशि-संख्या चाहिए।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अध्याय-६६ की चन्द्र-सारिणी है जिसका कुल ४९ हमने oracle में `==` से बाँधा है। भाव-सूची का एक-एक बिन्दु जोड़कर ४९ आना चाहिए; ± बैंड कभी वास्तविक −१ छिपा चुका है, अतः जाँच exact रहती है।

66.45
थे च ज्ञेन्धू खभे चाऽये सर्वे शुक्रं विना व्यये ।
लग्नशुक्रबुढाः शथ्रौ थे च जीवसुढाकरौ
the ca jñendhū khabhe cā'ye sarve śukraṃ vinā vyaye |
lagnaśukrabuḍhāḥ śathrau the ca jīvasuḍhākarau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ते च = वे ही (पूर्वोक्त लग्न-अर्क-आर्कि-कुज) तथा; ज्ञेन्दू = बुध और चन्द्र; खभे = दशम (ख-भ = आकाश-स्थान/कर्म); आये = एकादश में; सर्वे शुक्रं विना = शुक्र को छोड़कर सब (७: रवि…शनि + लग्न, शुक्र रहित); व्यये = व्यय/द्वादश में; लग्नशुक्रबुधाः = लग्न, शुक्र, बुध; शत्रौ = षष्ठ में; जीवसुधाकरौ = गुरु और चन्द्र (सुधाकर)। (आये/व्यये पर “सर्वे शुक्रं विना” का विस्तार — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है—दशम में पूर्वोक्त (लग्न, सूर्य, शनि, मंगल) के साथ बुध और चन्द्र भी स्थान देते हैं। एकादश में, और क्रम-पाठ के अनुसार व्यय में भी, शुक्र को छोड़ शेष सभी दाता रेखा देते हैं। शत्रु-भाव (६) में लग्न, शुक्र, बुध—तथा वे ही संग गुरु और चन्द्र—स्थानदाता हैं। शुक्र का एकादश/व्यय से बाहर रहना चन्द्र-अष्टकवर्ग की विशेषता है।

English rendering In the 10th, the prior set plus Mercury and the Moon grant places. In the 11th—and, as the pāda groups it, in the 12th—all contributors except Venus do so. In the 6th, the Lagna, Venus, and Mercury, together with Jupiter and the Moon, are the place-givers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अतिरिक्त बिन्दु-युग्म (दाता, h):
- दशम (h = १०): लग्न, सूर्य, शनि, मंगल, बुध, चन्द्र → ६ रेखा-स्रोत।
- एकादश (h = ११): सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शनि, लग्न (शुक्र ∉) → ७।
- व्यय (h = १२): उसी पाठ में “सर्वे शुक्रं विना” → पुनः ७ (शुक्र रहित); यदि किसी पाठ में व्यय अलग सूची हो तो पाठ-भेद संभव।
- षष्ठ (h = ६): लग्न, शुक्र, बुध, गुरु, चन्द्र → ५।
संचयी योग आगे ६६.४६–४८ से पूरा होकर चन्द्र-कुल ४९ पर बैठता है।

उदाहरण (worked example) सूर्य = तुला (R = ७)। एकादश-दाता होने से सूर्य चन्द्र-AV में राशि ((७ − १ + १०) mod १२) + १ = ५ = सिंह पर १ बिन्दु देता है। शुक्र तुला पर हो तो भी h = ११ पर शुक्र बिन्दु नहीं देता (सर्वे शुक्रं विना)।

हमारा डिकोड (Our Decode) एकादश में शुक्र-शून्य और चन्द्र-कुल ४९—दोनों कैनन की जाँच-बिन्दु हैं। हम भिनन-प्रति-राशि जोड़कर ४९ और सात ग्रहीय योग से SAV ३३७ assert करते हैं; फल की भाषा oracle में नहीं जाती।

66.46
ध्यूनेऽर्कारार्किशुक्राश्च ढर्मेर्कारार्किविध्गुरुः ।
ज्ञेन्धुजीवाः कुजार्यौ ज्ञार्केन्ध्वारार्किथनूशनाः
dhyūne'rkārārkiśukrāśca ḍharmerkārārkividhguruḥ |
jñendhujīvāḥ kujāryau jñārkendhvārārkithanūśanāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्यूने = सप्तम में; अर्क-आर्कि-शुक्राः = सूर्य, शनि, शुक्र; धर्मे = नवम में; अर्क-आर्कि-विधु-गुरुः = सूर्य, शनि, चन्द्र, गुरु; ज्ञेन्दुजीवाः = बुध, चन्द्र, गुरु; कुजार्यौ = मंगल और सूर्य (अर्य/अर्क); ज्ञ-अर्क-इन्दु-आर-आर्कि-तनू-उशनाः = बुध, सूर्य, चन्द्र, मंगल (आर), शनि, लग्न (तनू), शुक्र (उशना)। (द्वितीय/अष्टम पर लम्बे समास का विभाजन — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—द्यून (७) में सूर्य, शनि और शुक्र स्थान देते हैं; धर्म (९) में सूर्य, शनि, चन्द्र और गुरु। शेष दो घन-स्थानों (प्रायः धन २ और रन्ध्र ८, क्रम पाठानुसार) में एक ओर बुध-चन्द्र-गुरु-मंगल-सूर्य, दूसरी ओर बुध-सूर्य-चन्द्र-मंगल-शनि-लग्न-शुक्र—यह सात-दाता वाली दीर्घ सूची—रेखा प्रदान करते हैं। नवम में चन्द्र का नाम विशेष है: BPHS-पाठ में चन्द्र-से-चन्द्र नवम भी स्थानदाता है।

English rendering In the 7th, the Sun, Saturn, and Venus grant places; in the 9th, the Sun, Saturn, the Moon, and Jupiter. The remaining dense houses (commonly the 2nd and 8th) receive the two longer sets: Mercury–Moon–Jupiter–Mars–Sun, and Mercury–Sun–Moon–Mars–Saturn–Lagna–Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- h = ७: सूर्य, शनि, शुक्र।
- h = ९: सूर्य, शनि, चन्द्र, गुरु — इसमें (चन्द्र, ९) सम्मिलित; यही BPHS की “९ चन्द्र-से-चन्द्र” वाली पहचान है (कुछ परम्पराएँ ९ को मंगल-से-चन्द्र पर रखती हैं; कुल ४९ समान, भिनन-प्रति-राशि भिन्न — घोषित convention)।
- h ≈ २: बुध, चन्द्र, गुरु, मंगल, सूर्य (५)।
- h ≈ ८: बुध, सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि, लग्न, शुक्र (७)।
गुरु की कैनन-सूची का अंश यहाँ दृश्य है: गुरु → १, २, ४, ७, ८, १०, ११ (४ गृह-श्लोकों से जुड़ता है)।

उदाहरण (worked example) चन्द्र = कर्क (R = ४)। BPHS-convention: चन्द्र h ∈ {१, ३, ६, ७, ९, १०, ११} पर बिन्दु → राशियाँ कर्क, कन्या, धनु, मकर, मीन, मेष, वृषभ। नवम = मीन पर १ रेखा—यही “९” का स्थान। (Phaladīpikā/Mehta-transposition से तुलना अलग ledger-पंक्ति है; यहाँ BPHS Ch.66 चुना गया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) Moon-from-Moon में ९ और Moon-from-Jupiter = (१, २, ४, ७, ८, १०, ११) दोनों हमारे Ch.66 फिक्स्चर में पिन हैं। कुल ४९ समान रहने पर भी प्रति-राशि भिनन बदलता है—इसलिए convention मौन नहीं, घोषित है (`[HUMAN]` open note: BPHS vs Phaladīpikā ९-स्थान)।

66.47
जीवशुक्रबुढा भौमबुढशुक्रशनैश्चराः ।
रवीन्ध्वारार्किलग्नानि रवीन्ध्वार्यज्ञभार्गवाः
jīvaśukrabuḍhā bhaumabuḍhaśukraśanaiścarāḥ |
ravīndhvārārkilagnāni ravīndhvāryajñabhārgavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव-शुक्र-बुधाः = गुरु, शुक्र, बुध; भौम-बुध-शुक्र-शनैश्चराः = मंगल, बुध, शुक्र, शनि; रवि-इन्दु-आर-आर्कि-लग्नानि = सूर्य, चन्द्र, मंगल (आर), शनि, लग्न; रवि-इन्दु-आर-ज्ञ-भार्गवाः = सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र (भार्गव)। (शेष भावों/शून्य-पूरक सूचियाँ — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र चन्द्र-स्थानों की शेष गुच्छ-सूचियाँ देता है: एक गुच्छ में गुरु-शुक्र-बुध; दूसरे में मंगल-बुध-शुक्र-शनि; तीसरे में सूर्य-चन्द्र-मंगल-शनि-लग्न; चौथे में सूर्य-चन्द्र-मंगल-बुध-शुक्र। ये पाद पूर्व श्लोकों में अधूरे छूटे भाव-योगों को पूरा करते हैं—जिससे आठों दाताओं की पूर्ण स्थान-सूची बन्द हो।

English rendering Further clusters complete the Moon’s place-lists: Jupiter–Venus–Mercury; Mars–Mercury–Venus–Saturn; Sun–Moon–Mars–Saturn–Lagna; and Sun–Moon–Mars–Mercury–Venus. Read with 66.44–46, they close every contributor’s set.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक नाम = उस दाता से निर्दिष्ट h पर +१ रेखा। पूर्ण चन्द्र-अष्टकवर्ग (BPHS-अनुकूल, Σ रेखा = ४९; लग्न-स्तम्भ सहित आठ स्तम्भ × १२ = विन्यास, ग्रहीय योग ४९) का अनुशासित योग:
- प्रति राशि भिनन bᵢ ∈ {०…८}, Σᵢ bᵢ = ४९ (सात ग्रह; लग्न अलग स्तम्भ में गिना जाए तो चार्ट ८×१२ का है, ग्रहीय-कुल फिर भी ४९)।
- सात ग्रहीय चन्द्र-कुल ४९ == कैनन; SAV में चन्द्र का योगदान ४९।
शून्य-स्थान = वे (दाता, h) जो किसी श्लोक-सूची में नहीं—वहाँ रेखा ०।

उदाहरण (worked example) मान लें पूर्ण सूची से शनि-से-चन्द्र स्थान = {३, ५, ६, ११} (४ रेखा—शनि का चन्द्र-AV अंश)। शनि = मकर (R = १०) → बिन्दु-राशियाँ: मीन, वृषभ, मिथुन, तुला। चार रेखाएँ; अन्य दाताओं से जोड़कर राशि-योग ४९ पर जाँचे।

66.48
अर्कज्ञजीवाः शुक्रेन्धू थे च थौ लग्नभूसुथौ ।
सर्वे शून्यं क्रमाथ्प्रोक्थं स्ठानं शीथकरस्य च
arkajñajīvāḥ śukrendhū the ca thau lagnabhūsuthau |
sarve śūnyaṃ kramāthprokthaṃ sṭhānaṃ śīthakarasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कज्ञजीवाः = सूर्य, बुध, गुरु; शुक्रेन्दू = शुक्र और चन्द्र; ते च तौ = वे और वे दोनों; लग्न-भूसुतौ = लग्न और मंगल (भूसुत); सर्वे शून्यम् = शेष/शून्य स्थान (अथवा “बिना रिक्त छोड़ें”); क्रमात् प्रोक्तम् = क्रम से कहा गया; स्थानं शीतकरस्य = शीतकर (चन्द्र) के स्थान।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अन्तिम गुच्छों से चन्द्र-स्थान-वर्णन समेटता है—सूर्य-बुध-गुरु; शुक्र-चन्द्र; और उनके साथ लग्न-मंगल—तथा घोषणा करता है कि शीतकर (चन्द्र) के स्थान (एवं शून्य) क्रमशः कह दिए गए। अब चन्द्र-अष्टकवर्ग की रेखा-सारिणी पूर्ण मानी जाए; अगला श्लोक अन्य ग्रह की ओर मुड़ता है।

English rendering Final clusters—Sun–Mercury–Jupiter; Venus–Moon; and those with Lagna and Mars—close the list. The text states that the places of the cool-rayed Moon have been told in order (the rest being empty of rekha).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चन्द्र-अष्टकवर्ग समाप्ति-शर्त:
1. आठ दाताओं की सभी कथित (दाता, h) युग्म एकत्र करो।
2. प्रत्येक राशि r पर b(r) = |{ दाता : r, दाता की राशि से, कथित h पर पड़े }|।
3. ग्रहीय योग: Σ b_graha = ४९ (exact `==`, न कि ±k)।
4. शून्य-स्थान = असूचित (दाता, h); वहाँ रेखा नहीं।
त्रिकोण-शोधन (अध्याय ६७) और एकाधिपत्य-शोधन (६८) इसके बाद SAV/भिनन घटाते हैं—इस श्लोक पर नहीं।

उदाहरण (worked example) पूर्ण चन्द्र-AV के बाद सात ग्रहीय रेखा-योग जाँच: ४९ ही होना चाहिए। यदि योग ४८ या ५० आए तो या तो कोई (दाता, h) छूटा/दुहराया, या Moon-from-Moon की ९ वाली convention गलत लागू हुई—दोनों को exact गिनती से पकड़ें, tolerance से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्थानं शीतकरस्य” = चन्द्र ४९ का बन्द द्वार। हमारा kaal-verification-oracle इसी ४९ और SAV ३३७ को फिक्स्चर पर `==` से बाँधता है; ६७–६८ की शोधन-परत अलग चरण है, कच्ची सारिणी को गोल नहीं करती।

66.49
लग्नमन्धकुजा भौमो होराज्ञेन्धुधिनाढिपाः ।
मन्धारौ ज्ञरवी ज्ञेन्धुजीवार्कथनुभार्गवाः
lagnamandhakujā bhaumo horājñendhudhināḍhipāḥ |
mandhārau jñaravī jñendhujīvārkathanubhārgavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-मन्द-कुजाः = लग्न, शनि, मंगल; भौमः = मंगल (अष्टकवर्ग का नया विषय); होरा-ज्ञ-इन्दु-दिनाधिपाः = (पाठ) होरा/संबंधित पठान, बुध, चन्द्र, दिनपति सूर्य — पाठ-भेद संभव; मन्दारौ = शनि और मंगल; ज्ञरवी = बुध और सूर्य; ज्ञेन्दुजीवार्कतनुभार्गवाः = बुध, चन्द्र, गुरु, सूर्य, लग्न (तनु), शुक्र (भार्गव)।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र-स्थानों के अनन्तर शास्त्र भौम (मंगल) के अष्टकवर्ग-स्थान आरम्भ करता है। प्रथम गुच्छों में लग्न-शनि-मंगल, तथा बुध-चन्द्र-सूर्य आदि दाताओं के नाम आते हैं; फिर मन्दार, बुध-सूर्य, और बुध-चन्द्र-गुरु-सूर्य-लग्न-शुक्र की लम्बी सूची। यह मंगल-अष्टकवर्ग की स्थान-माला का पहला सूत्र है—पूर्ण सूची आगे के श्लोकों में चलती है; कैनन-कुल मंगल रेखा ३९।

English rendering The text turns from the Moon to Mars’s aṣṭakavarga places. Opening clusters name the Lagna, Saturn, and Mars among the givers, with further sets Mercury–Moon–Sun and longer lists including Jupiter, Lagna, and Venus—the start of the Bhauma place-table (canonical Mars total 39).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मंगल-अष्टकवर्ग = उसी अष्ट-दाता विधि से; केवल स्थान-सूची भिन्न।
- प्रत्येक कथित (दाता, h) → मंगल-AV चार्ट की संगत राशि पर +१।
- पूर्ण होने पर ग्रहीय योग ३९ (कैनन; सूर्य ४८ … मंगल ३९ … → SAV ३३७ का एक पद)।
- निर्माण-सूत्र चन्द्र जैसा: राशि_बिन्दु = ((R_दाता − १ + (h − १)) mod १२) + १।
इस श्लोक अकेले से ३९ पूरा नहीं होता—यह केवल आरम्भिक गुच्छ है; शेष अध्याय-६६ की भौम-पंक्तियों से जुड़ता है।

उदाहरण (worked example) मान लें इस पाद से (शनि, h) का एक युग्म सिद्ध हो और शनि = कुम्भ (R = ११), h = १ → मंगल-AV में कुम्भ पर शनि से १ रेखा। पूरे भौम-स्थान जुड़ने के बाद Σ = ३९ की exact जाँच करें; ३८/४० = सूची या convention त्रुटि।

हमारा डिकोड (Our Decode) मंगल ३९ कैनन SAV ३३७ की श्रृंखला की कड़ी है (४८+४९+३९+५४+५६+५२+३९ = ३३७)। चन्द्र-ब्लॉक (६६.४४–४८) बन्द होते ही भौम-ब्लॉक शुरू—oracle दोनों कुल को अलग-अलग `==` फिक्स्चर से पकड़ता है, ताकि एक ग्रह की ± त्रुटि SAV में न छिपे।

66.50
मन्धारौ थौ सिथ श्चार्किः कुजार्कार्यार्किलग्नकाः ।
सर्वे गुरुसिथौ स्ठानं भौमस्थैवं विधुर्बुढाः
mandhārau thau sitha ścārkiḥ kujārkāryārkilagnakāḥ |
sarve gurusithau sṭhānaṃ bhaumasthaivaṃ vidhurbuḍhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द-अरौ = शनि, मंगल; तौ = वे दोनों; सित-अर्किः = शुक्र (सित) व शनि (अर्कि); कुज-अर्क-आर्य-अर्कि-लग्नकाः = मंगल, सूर्य, गुरु (आर्य), शनि, लग्न; सर्वे = सब; गुरु-सितौ = गुरु व शुक्र; स्थानं भौमस्यैवं विदुर्बुधाः = इस प्रकार मंगल (भौम) का स्थान बुधजन जानते हैं।

हिन्दी भावार्थ यहाँ मंगल की स्थान(रेखा)-तालिका पूर्ण होती है — शनि-मंगल; शुक्र-शनि; मंगल-सूर्य-गुरु-शनि-लग्न; "सब"; गुरु-शुक्र — इतना कहकर आचार्य कहते हैं: "इस प्रकार बुधजन मंगल का स्थान जानते हैं।" यही मानक मंगल-भिन्नाष्टकवर्ग है, जिसका रेखा-योग 39 है।

English rendering Here the sthāna of Mars is closed — Saturn-Mars; Venus-Saturn; Mars-Sun-Jupiter-Saturn-Lagna; "all"; Jupiter-Venus — "thus the wise know Mars's sthāna."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मंगल-भिन्नाष्टकवर्ग रेखा(स्थान)-योग = 39, बिन्दु(करण)-योग = 96 − 39 = 57। "सर्वे" = उस कोष्ठ में सभी 8 सन्दर्भ रेखा (पूर्ण-अंक), "शून्यं" वहाँ 0 — दोनों चरम मान इसी तालिका में मिलते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) मंगल 39 वही मान है जो हमारे oracle-फिक्स्चर में सूर्य 48, चन्द्र 49, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 के साथ पिन है → SAV 337 (7 ग्रह)। यहाँ पर हम रेखा-योग (गणित) और उसके शुभ-फल (व्याख्या) को अलग रखते हैं: 39 एक गणनीय संख्या है, "शुभद" उसका शास्त्र-कथन।

66.51
लग्नमन्धारशुक्रज्ञा लग्नारेन्धुसिथार्कजाः ।
शुक्रज्ञौ लग्नचन्ध्रार्किसिथारा ज्ञार्कभार्गवाः
lagnamandhāraśukrajñā lagnārendhusithārkajāḥ |
śukrajñau lagnacandhrārkisithārā jñārkabhārgavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-मन्द-अर-शुक्र-ज्ञा = लग्न, शनि, मंगल, शुक्र, बुध; लग्न-अर-इन्दु-सित-अर्कजाः = लग्न, मंगल, चन्द्र, शुक्र (सित), शनि (अर्कज/अर्कि — पाठ-भेद संभव); शुक्र-ज्ञौ = शुक्र व बुध; लग्न-चन्द्र-अर्कि-सित-अरा = लग्न, चन्द्र, शनि, शुक्र, मंगल; ज्ञ-अर्क-भार्गवाः = बुध, सूर्य, शुक्र (भार्गव)।

हिन्दी भावार्थ मंगल-स्थान के पश्चात् अगली स्थान-तालिका (क्रमानुसार सम्भवतः बुध की) चलती है — लग्न-शनि-मंगल-शुक्र-बुध; लग्न-मंगल-चन्द्र-शुक्र-शनि; शुक्र-बुध; लग्न-चन्द्र-शनि-शुक्र-मंगल; बुध-सूर्य-शुक्र। "अर्कज" शनि (सूर्य-पुत्र) है या "अर्क+ज" — यह पाठ पर निर्भर, अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering After Mars, the next sthāna table (by sequence, likely Mercury's) runs: Lagna-Saturn-Mars-Venus-Mercury; Lagna-Mars-Moon-Venus-Saturn; Venus-Mercury; Lagna-Moon-Saturn-Venus-Mars; Mercury-Sun-Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम-अनुसार यह बुध की स्थान-पंक्तियाँ हैं; बुध-भिन्नाष्टकवर्ग रेखा-योग = 54 (मानक) — इन कोष्ठ-सूचियों की समस्त रेखाओं का लक्ष्य-योग। "अर्कज" जैसे उभयार्थी पद पर संख्या केवल तभी तय जब पंक्ति-योग 54 से मेल खाए।

66.52
जीवज्ञार्केन्धुलग्नानि भूमिपुथ्रशनैश्चरौ ।
थौ च लग्नेन्धु शक्रार्या मन्धारार्कज्ञभार्गवाः
jīvajñārkendhulagnāni bhūmiputhraśanaiścarau |
thau ca lagnendhu śakrāryā mandhārārkajñabhārgavāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव-ज्ञ-अर्क-इन्दु-लग्नानि = गुरु, बुध, सूर्य, चन्द्र, लग्न; भूमिपुत्र-शनैश्चरौ = मंगल (भूमिपुत्र) व शनि; तौ च लग्न-इन्दु-शुक्र-आर्याः = वे तथा लग्न, चन्द्र, शुक्र, गुरु (आर्य); मन्द-अर-अर्क-ज्ञ-भार्गवाः = शनि, मंगल, सूर्य, बुध, शुक्र (भार्गव)।

हिन्दी भावार्थ स्थान-तालिका आगे बढ़ती है — गुरु-बुध-सूर्य-चन्द्र-लग्न; मंगल-शनि; लग्न-चन्द्र-शुक्र-गुरु; शनि-मंगल-सूर्य-बुध-शुक्र। ये सब क्रमिक भाव-कोष्ठों के रेखा-समुच्चय हैं; उपखण्ड यहाँ अन्तर्गत चलता है, अगला अन्त-चिह्न आगे के पदों में आता है — अतः इस पद की ग्रह-संज्ञा क्रम से अनुमानित (पाठ-भेद संभव)।

English rendering The sthāna listing continues: Jupiter-Mercury-Sun-Moon-Lagna; Mars-Saturn; (and) Lagna-Moon-Venus-Jupiter; Saturn-Mars-Sun-Mercury-Venus — successive house-cells within an ongoing planet's rekhā table.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक भिन्नाष्टकवर्ग की रेखा-पंक्तियों को जोड़ने पर वही सात योग मिलते हैं जिनका सर्वयोग SAV = 48+49+39+54+56+52+39 = 337। किसी एक पद का "सत्यापन" केवल पद-विच्छेद से नहीं, इस महायोग-संगति से होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही कारण है कि हमने सहन-पट्टी त्यागकर exact-`==` अपनाया: प्रति-ग्रह रेखा-योग और SAV 337 को पिन-फिक्स्चर पर तुल्यता से जाँचा जाता है, ताकि ±बैंड में कोई असली −1/+1 छिप न सके। भ्रष्ट-लिपि के उभयार्थी समासों (v46, v49, v51) में भी संख्या इसी मानक-योग से अनुशासित रहती है — अटकल से नहीं।

66.53
लग्नमन्धारविच्चन्ध्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः ।
गुरोर्लग्ने सुखे जीव लग्नाराक्रबुढा ढने
lagnamandhāraviccandhrāḥ sarve jīvajñabhāskarāḥ |
gurorlagne sukhe jīva lagnārākrabuḍhā ḍhane

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = तनु/उदित राशि (1st भाव); मन्द = शनि; आर = कुज/मंगल; वित् (विद्/ज्ञ) = बुध; चन्द्र = शीतकर; जीव = बृहस्पति; ज्ञ = बुध; भास्कर = सूर्य; गुरोः = बृहस्पति की (अष्टकवर्ग-तालिका के लिए); सुखे = 4th भाव; धने = 2nd भाव; आर-अर्क-बुधाः = कुज, सूर्य, बुध (पाठ-भेद संभव — "आराक्रबुधा" का क्र=शुक्र भी संभव)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक बुध की स्थान-रेखा-तालिका को पूरा करता है और तत्काल बृहस्पति (गुरु) की स्थान (रेखा) गणना आरंभ करता है — लग्न, शनि, मंगल, बुध और चन्द्र से लेकर जीव, बुध व सूर्य तक कौन-कौन बिन्दुदाता है, यह गिनाया जाता है। बृहस्पति के प्रस्तार में लग्न और सुख (चतुर्थ) भाव में स्वयं गुरु रेखा देता है, तथा धन (द्वितीय) भाव में लग्न, मंगल, सूर्य व बुध रेखा देते हैं। यह वर्णन-तालिका है, विधान नहीं।

English rendering Closing Mercury's rekhā list, the text turns to Jupiter's: in the ascendant and the fourth Jupiter itself gives a benefic point, and in the second house the ascendant, Mars, Sun and Mercury contribute — a donor-by-house ledger, not a prognosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भिन्नाष्टकवर्ग-रचना: किसी ग्रह P के प्रस्तारक में 8 दाता (7 ग्रह + लग्न) प्रत्येक अपनी नियत राशि-गणना से कुछ भावों में एक "रेखा" (शुभ बिन्दु, +1) देते हैं। किसी भाव में कुल = उस भाव को रेखा देने वाले दाताओं की संख्या (0…8)। समस्त 12 भावों पर P की रेखाओं का योग एक कुण्डली-निरपेक्ष स्थिरांक है — बृहस्पति के लिए सदैव 56। श्लोक की तालिका केवल यह बताती है कि कौन दाता किस भाव में गिना जाता है; योग नहीं बदलता, केवल वितरण कुण्डली-सापेक्ष होता है।

उदाहरण (worked example) मान लें बृहस्पति मेष में है। गुरु के भिन्नाष्टकवर्ग की कुल रेखाएँ = 56 (12 राशियों में विभाजित)। यदि लग्न, सूर्य, मंगल, बुध जैसे दाता श्लोकानुसार धन-स्थान (गुरु से द्वितीय = वृषभ) को रेखा देते हैं, तो वृषभ का बिन्दु-मान उन दाताओं की गिनती से बढ़ता है — पर सभी राशियों का योग 56 ही रहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही "स्थान = रेखा" गणना बृहस्पति के लिए विहित 56 रेखाओं की उस तालिका का स्रोत है जिसे हमारे kaal-verification-oracle ने सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 (सर्वाष्टकवर्ग = 337) पर एक pinned fixture पर `==` से (सहनशीलता-बैंड के बिना) पिन किया है।

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66.54
चन्ध्रशुक्रौ च धुश्चिक्ये मन्धार्यार्काः शनिर्व्यये ।
सुथे शुक्रेन्धुलग्नज्ञमन्धाश्चन्ध्रं विना थ्वरौ
candhraśukrau ca dhuścikye mandhāryārkāḥ śanirvyaye |
suthe śukrendhulagnajñamandhāścandhraṃ vinā thvarau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र-शुक्रौ = चन्द्र व शुक्र; धुश्चिक्ये (दुश्चिक्य) = 3rd भाव (सहज); मन्द = शनि; आर्य = गुरु; अर्क = सूर्य; शनिः = शनि; व्यये = 12th भाव; सुते = 5th भाव; शुक्र-इन्दु-लग्न-ज्ञ-मन्दाः = शुक्र, चन्द्र, लग्न, बुध, शनि; चन्द्रं विना = चन्द्र को छोड़कर; अरौ = 6th भाव (शत्रु) [पाठ-भेद संभव — "थ्वरौ" = तु अरौ]।

हिन्दी भावार्थ बृहस्पति के स्थान-प्रस्तार में तृतीय (दुश्चिक्य) भाव में चन्द्र और शुक्र रेखा देते हैं; आगे मन्द (शनि), आर्य (गुरु) व अर्क (सूर्य), तथा व्यय में शनि। पञ्चम भाव में शुक्र, चन्द्र, लग्न, बुध व शनि रेखादाता हैं, और शत्रु (षष्ठ) भाव में चन्द्र को छोड़कर शेष गिने जाते हैं। यह पूर्णतः तालिका-कथन है।

English rendering In Jupiter's rekhā-chart the third house draws points from Moon and Venus; Saturn falls in the twelfth; the fifth is fed by Venus, Moon, ascendant, Mercury and Saturn; and the sixth by all save the Moon.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक भाव-प्रविष्टि एक समुच्चय है — "इस भाव को रेखा देने वाले दाताओं का समुच्चय"। "चन्द्रं विना" जैसे पद पूरक-समुच्चय (complement) दर्शाते हैं: 8 दाताओं में से 1 घटाकर 7। गणितीय रूप से भाव-बिन्दु = |दाता-समुच्चय| ∈ {0,…,8}, और यही अंक अन्ततः चक्र के कोष्ठ में लिखा जाता है (श्लोक 71–72 की विन्यास-विधि)।

उदाहरण (worked example) यदि षष्ठ भाव में "चन्द्रं विना" सभी 8 दाता रेखा दें, तो उस भाव का भिन्न-बिन्दु = 8 − 1 = 7। यह अधिकतम-निकट मान उस राशि को बृहस्पति के गोचर/दशा-विचार में बलवान् बनाता — शास्त्र का कथन, कोई निश्चित फल नहीं।

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66.55
लग्नारार्याऽर्केन्धवोऽस्थे म्त्ऱ्गौ जीवार्कभूसुथाः ।
ढर्मे शुक्रार्कलग्नेन्धुबुढा मन्धं विनाऽयभे
lagnārāryā'rkendhavo'sthe mtṟgau jīvārkabhūsuthāḥ |
ḍharme śukrārkalagnendhubuḍhā mandhaṃ vinā'yabhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-आर-आर्य-अर्क-इन्दवः = लग्न, कुज, गुरु, सूर्य, चन्द्र; अस्ते = 7th भाव (द्यून, अस्त=अस्त होता); जीव-अर्क-भूसुताः = गुरु, सूर्य, भूमिज/कुज (पाठ-भेद संभव); धर्मे = 9th भाव; शुक्र-अर्क-लग्न-इन्दु-बुधाः = शुक्र, सूर्य, लग्न, चन्द्र, बुध; मन्दं विना = शनि को छोड़कर; अयभे (आयभे) = 11th भाव (लाभ)।

हिन्दी भावार्थ बृहस्पति के प्रस्तार में सप्तम (अस्त) भाव में लग्न, मंगल, गुरु, सूर्य व चन्द्र रेखादाता हैं; अष्टम की ओर गुरु, सूर्य व भूसुत (कुज) आते हैं (पाठ-भेद संभव)। नवम (धर्म) भाव में शुक्र, सूर्य, लग्न, चन्द्र व बुध रेखा देते हैं, और लाभ (एकादश) भाव में शनि को छोड़कर शेष गिने जाते हैं।

English rendering In the seventh, points come from ascendant, Mars, Jupiter, Sun and Moon; the ninth from Venus, Sun, ascendant, Moon and Mercury; and the eleventh from all except Saturn — Jupiter's benefic-point ledger continuing house by house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दाता की गणना सदैव उसी दाता की स्थिति से आरम्भ होकर मॉड्युलर होती है: भाव-सूचकांक b को दाता की राशि से 1…12 गिनते हैं (चक्रीय, mod 12)। अतः "धर्मे" = बृहस्पति से नवम राशि; उसमें जो दाता अपने-अपने नियम से रेखा देते हैं, उनका समुच्चय यहाँ सूचीबद्ध है। "मन्दं विना" पुनः पूरक (8−1=7 संभावित दाता) संकेत करता है।

उदाहरण (worked example) बृहस्पति यदि सिंह में हो, तो उसका नवम = मेष। श्लोक-सूची (शुक्र, सूर्य, लग्न, चन्द्र, बुध) के अनुसार वे दाता जिनकी अपनी रेखा-राशि मेष पर पड़ती है, वहाँ +1 देते हैं; इनकी गिनती ही मेष का भिन्न-बिन्दु बनती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) भाव-गणना का यह mod-12 नियम वही निर्धारक अंकगणित है जिस पर हमारा varga-इंजन (kaal_ekavimshati_varga.py) आधारित है — 30° राशि का समान-चाप विभाजन और राशि-मानचित्रण दोनों शुद्ध मॉड्युलर क्रिया हैं, व्याख्या नहीं।

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66.56
माने गुरुबुढारार्कशुक्रहोरास्थठा विधुः ।
लग्नशुक्रेन्धव स्थे थे ज्ञार्क्या रास्थे ज्ञवर्जिथाः
māne gurubuḍhārārkaśukrahorāsthaṭhā vidhuḥ |
lagnaśukrendhava sthe the jñārkyā rāsthe jñavarjithāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) माने = 10th भाव (कर्म); गुरु-बुध-आर-अर्क-शुक्र-होराः = गुरु, बुध, कुज, सूर्य, शुक्र, होरा (चन्द्र-पक्षीय); विधुः = (विद्वान्) कहते हैं; लग्न-शुक्र-इन्दवः = लग्न, शुक्र, चन्द्र; ज्ञ-अर्क्याः = बुध, सूर्य; ज्ञ-वर्जिताः = बुध को छोड़कर (पाठ-भेद संभव — "रास्थे"/"स्थे थे" अस्पष्ट)।

हिन्दी भावार्थ बृहस्पति के स्थान-प्रस्तार में कर्म (दशम) भाव में गुरु, बुध, मंगल, सूर्य, शुक्र व होरा रेखादाता कहे जाते हैं; लग्न, शुक्र व चन्द्र भी आते हैं, और एक भाव में बुध को छोड़कर शेष। यहीं बृहस्पति की स्थान-तालिका पूर्ण होती है। कुछ पद खण्डित हैं — पाठ-भेद संभव।

English rendering In the tenth the donors are Jupiter, Mercury, Mars, Sun, Venus and the Moon-side "horā"; the ascendant, Venus and Moon also give, with one house counted "excluding Mercury" — and here Jupiter's rekhā table closes.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दशम भाव तक पहुँचकर बृहस्पति के सभी 8 दाताओं की भाववार सूची पूर्ण हो जाती है। सत्यापन-कसौटी: सभी 12 भावों की रेखा-गिनतियों का योग = 56 होना चाहिए (गुरु का स्थिर भिन्नाष्टक-योग)। यदि पाठ-भेद के कारण किसी भाव में दाता छूट/जुड़ जाए, तो योग 56 से विचलित होगा — यही आन्तरिक चेक श्लोक-पाठ की शुद्धि परखता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "योग = 56 पर लौटना" वही exact-`==` अनुशासन है जिसे हमने अपनाया — kaal-verification-oracle में ±3 का सहनशीलता-बैंड एक बार अष्टकवर्ग में वास्तविक −1 त्रुटि को छिपा गया था; अतः बृहस्पति = 56 को बैंड नहीं, तुल्यता (`==`) से पिन किया जाता है।

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66.57
सुथभे लघ्नशशिजशशाङ्कार्यार्किभार्गवाः ।
ज्ञारौ शून्यं सिथाऽर्केन्धुगुरुलग्नशनैश्चराः
suthabhe laghnaśaśijaśaśāṅkāryārkibhārgavāḥ |
jñārau śūnyaṃ sithā'rkendhugurulagnaśanaiścarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतभे = 5th भाव में; लग्न = लग्न; शशिज = चन्द्र-पुत्र = बुध; शशाङ्क = चन्द्र; आर्य = गुरु; अर्कि = शनि (अर्क-पुत्र); भार्गव = शुक्र; ज्ञ-आरौ = बुध व कुज; शून्यं = 0 (खाली भाव); सित-अर्क-इन्दु-गुरु-लग्न-शनैश्चराः = शुक्र, सूर्य, चन्द्र, गुरु, लग्न, शनि।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शुक्र (भृगुसुत) की स्थान (रेखा) तालिका आरम्भ करता है। पञ्चम भाव में लग्न, बुध, चन्द्र, गुरु, शनि व शुक्र रेखादाता हैं; एक भाव में बुध व मंगल से शून्य (कोई रेखा नहीं); और अन्यत्र शुक्र, सूर्य, चन्द्र, गुरु, लग्न व शनि गिने जाते हैं।

English rendering Opening Venus's rekhā list: the fifth is fed by ascendant, Mercury, Moon, Jupiter, Saturn and Venus; one house stands empty for Mercury and Mars; and elsewhere Venus, Sun, Moon, Jupiter, ascendant and Saturn contribute.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "शून्यं" = उस भाव में उन नामित दाताओं से रेखा-मान 0 — बिन्दु/रिक्त कोष्ठ। श्लोक 69 का सूत्र: करणं बिन्दुवत् (दोष-सूचक), स्थानं रेखास्वरूपम् (शुभ-सूचक)। अतः इन "स्थान" श्लोकों में गिने गए दाता = रेखा (गणनीय शुभ बिन्दु), और "शून्यं" = रेखाहीनता। शुक्र का सम्पूर्ण भिन्नाष्टक-योग = 52।

उदाहरण (worked example) शुक्र यदि तुला में हो और पञ्चम = कुम्भ, तो श्लोकोक्त 6 दाता (लग्न, बुध, चन्द्र, गुरु, शनि, शुक्र) में से जिनकी रेखा-राशि कुम्भ पर पड़े वे +1 देते हैं; कुम्भ का भिन्न-बिन्दु उन्हीं की गिनती है, और समस्त राशियों का योग 52 पर बन्द होता है।

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66.58
सर्वे रविं विना शुक्रगुरुमन्धाश्च मानभे ।
सर्वे कुजेन्धुरवयः क्रमाथ् भ्त्ऱ्गुसुथस्य च
sarve raviṃ vinā śukragurumandhāśca mānabhe |
sarve kujendhuravayaḥ kramāth bhtṟgusuthasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वे रविं विना = सूर्य को छोड़कर सभी (8−1=7 दाता); शुक्र-गुरु-मन्दाः = शुक्र, गुरु, शनि; मानभे = 10th भाव (कर्म) में; सर्वे = सभी; कुज-इन्दु-रवयः = कुज, चन्द्र, सूर्य; क्रमात् = क्रमशः; भृगुसुतस्य = शुक्र की (स्थान-तालिका); च = और।

हिन्दी भावार्थ दशम (मान) भाव में सूर्य को छोड़कर सभी, तथा शुक्र, गुरु व शनि रेखादाता हैं; अन्यत्र सभी दाता, तथा कुज, चन्द्र व सूर्य। इस प्रकार क्रमशः शुक्र (भृगुसुत) की स्थान-रेखा-तालिका सम्पूर्ण कही गई। यह पूर्णतः तालिका-कथन है।

English rendering In the tenth all but the Sun, together with Venus, Jupiter and Saturn; elsewhere all the donors, with Mars, Moon and Sun — and thus, in order, Venus's rekhā table is complete.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "सर्वे" = पूर्ण दाता-समुच्चय (8), "सर्वे रविं विना" = 7। भाव-बिन्दुओं का योग सत्यापन: शुक्र की 12 भाव-गिनतियाँ जोड़ने पर 52 आना चाहिए। यह चक्र-निरपेक्ष स्थिरांक भिन्नाष्टकवर्ग की परिभाषा से निकलता है — प्रत्येक दाता की नियत रेखा-संख्याओं का योग।

हमारा डिकोड (Our Decode) शुक्र = 52 उन सात भिन्नाष्टक-योगों में से एक है जिन्हें हमने सर्वाष्टकवर्ग 337 (= 48+49+39+54+56+52+39) के रूप में एक pinned fixture (test_astakavarga_fixture.py) पर तुल्यता से सत्यापित किया — कोई भी एक योग बदलते ही 337 टूटकर त्रुटि को मुखर कर देता है।

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66.59
शने रविथनू सूर्यो लग्नेन्धुकुजसूर्यजाः ।
लग्नार्कौ जीवमन्धाराः सर्वे सूर्यं विना क्षथे
śane ravithanū sūryo lagnendhukujasūryajāḥ |
lagnārkau jīvamandhārāḥ sarve sūryaṃ vinā kṣathe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनेः = शनि की (स्थान-तालिका); रवि-तनू = तनु/लग्न (प्रथम) भाव; सूर्यः = सूर्य; लग्न-इन्दु-कुज-सूर्यजाः = लग्न, चन्द्र, कुज, सूर्यज (=शनि); लग्न-अर्कौ = लग्न व सूर्य; जीव-मन्द-आराः = गुरु, शनि, कुज; सर्वे सूर्यं विना = सूर्य को छोड़कर सभी; क्षते = 6th भाव (शत्रु/क्षत)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शनि की स्थान (रेखा) तालिका आरम्भ करता है। प्रथम (तनु) भाव में सूर्य रेखा देता है; लग्न, चन्द्र, कुज व सूर्यज (शनि) भी आते हैं; लग्न व सूर्य, तथा गुरु, शनि, कुज गिने जाते हैं; और षष्ठ (क्षत) भाव में सूर्य को छोड़कर सभी रेखादाता हैं।

English rendering Beginning Saturn's rekhā list: the ascendant-house takes a point from the Sun; ascendant, Moon, Mars and Saturn follow; ascendant and Sun, then Jupiter, Saturn, Mars; and the sixth is fed by all save the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शनि की स्वयं की रेखा "सूर्यज" पद से आती है — दाता-सूची में ग्रह प्राय: अपने ही प्रस्तार में कतिपय भावों को रेखा देता है। षष्ठ में "सूर्यं विना सर्वे" = 7 दाता → भाव-बिन्दु 7। शनि का पूर्ण भिन्नाष्टक-योग = 39 (मंगल के साथ न्यूनतम)।

उदाहरण (worked example) शनि यदि मकर में हो, तो षष्ठ = मिथुन। यदि सूर्य को छोड़ शेष 7 दाता मिथुन पर रेखा दें, तो मिथुन का भिन्न-बिन्दु = 7 — शनि की 12 राशियों में यह उच्चतम में से; फिर भी समस्त योग 39 ही रहता है।

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66.60
अर्कोऽर्कज्ञौ बुढोऽर्कारथनुज्ञाः सकलास्थथः ।
कुजज्ञगुरुशुक्राश्च क्रमाथ् स्ठानमिधं विधुः
arko'rkajñau buḍho'rkārathanujñāḥ sakalāsthathaḥ |
kujajñaguruśukrāśca kramāth sṭhānamidhaṃ vidhuḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कः = सूर्य; अर्क-ज्ञौ = सूर्य व बुध; बुधः = बुध; अर्क-आर-तनु-ज्ञाः = सूर्य, कुज, लग्न (तनु), बुध; सकलाः ततः = तदनन्तर सभी; कुज-ज्ञ-गुरु-शुक्राः = कुज, बुध, गुरु, शुक्र; क्रमात् = क्रमशः; स्थानम् इदम् = यह स्थान (रेखा-तालिका); विधुः = कहते हैं।

हिन्दी भावार्थ शनि की स्थान-तालिका को पूरा करते हुए विभिन्न भावों में सूर्य; सूर्य व बुध; बुध अकेला; सूर्य, कुज, लग्न व बुध; फिर सभी; और कुज, बुध, गुरु व शुक्र रेखादाता कहे जाते हैं। इस प्रकार क्रमशः शनि की स्थान-रेखा-तालिका विद्वान् वर्णित करते हैं।

English rendering Completing Saturn's rekhā list — Sun; Sun and Mercury; Mercury alone; Sun, Mars, ascendant, Mercury; then all; and Mars, Mercury, Jupiter, Venus — thus, in order, the wise declare this table.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "बुधः" (एकवचन) = उस भाव में केवल एक दाता → भाव-बिन्दु 1; "सकलाः" = 8। इन चरम मानों (1 और 8) के बीच वितरित 12 गिनतियों का योग = 39। सत्यापन: शनि व मंगल दोनों 39 पर मिलते हैं — दो न्यूनतम भिन्न-योग।

हमारा डिकोड (Our Decode) शनि 39 व मंगल 39 वे दो योग हैं जो हमारे oracle में सबसे नाज़ुक थे — एक ±बैंड इन्हीं में एक वास्तविक −1 को निगल गया था; इसीलिए हमने प्रत्येक भिन्न-योग (सूर्य 48…शनि 39) और सर्वाष्टकवर्ग 337 को तुल्यता (`==`) से, बिना सहनशीलता के, पिन किया।

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66.61
थनौ थुर्ये च वह्निः स्याध् धुश्चिक्ये ध्वौ ढने शराः ।
बुध्ढिम्त्ऱ्थ्यंकरिःफेषु षत् खेशक्षथराशिषु
thanau thurye ca vahniḥ syādh dhuścikye dhvau ḍhane śarāḥ |
budhḍhimtṟthyaṃkariḥpheṣu ṣat kheśakṣatharāśiṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनौ = 1st भाव; तुर्ये = 4th भाव; वह्निः (वन्हि) = अग्नि = 3 (बिन्दु-संख्या); धुश्चिक्ये = 3rd भाव; द्वौ (ध्वौ) = 2; धने = 2nd भाव; शराः = बाण = 5; बुद्धि-मृत्यु-…-अरि-रिष्फेषु = 5th, 8th, 6th, 12th भावों में; षट् = 6; खे = 10th भाव (आकाश=ख) [शेष पद "क्षथराशिषु" खण्डित — पाठ-भेद संभव]।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक लग्न के करण (बिन्दु) चक्र की भाववार संख्याएँ देता है। प्रथम व चतुर्थ भाव में तीन-तीन (वह्नि=3); तृतीय में दो (द्वौ); द्वितीय में पाँच (शर=5); पञ्चम, अष्टम, षष्ठ व द्वादश में छः-छः (षट्)। यहाँ भूतसंख्या से अंक निकाले गए हैं। अन्तिम पाद खण्डित है — पाठ-भेद संभव।

English rendering For the ascendant's bindu-chart: three in the first and fourth (vahni = 3), two in the third, five in the second (śara = 5), six each in the fifth, eighth, sixth and twelfth — the counts stated as word-numerals; the closing quarter is corrupt.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-डिकोड (अंक-निष्ठ): वह्नि/अग्नि = 3 (त्रयोऽग्नयः), द्वौ = 2, शर = 5 (कामदेव के पाँच बाण), षट् = 6, ख/शून्य = 0। लग्न के अष्टक-चक्र में प्रत्येक भाव का यह अंक = उस भाव को रेखा देने वाले दाताओं की गिनती (0…8)। योग-सत्यापन: लग्न का भिन्नाष्टक-योग = 49 (परम्परागत) आना चाहिए।

उदाहरण (worked example) decoded मान — तनु 3, धन 5, दुश्चिक्य 2, तुर्य 3, तथा 5th·8th·6th·12th में 6 प्रत्येक। इन ज्ञात भावों का आंशिक योग = 3+5+2+3+6+6+6+6 = 37; शेष भाव (7th, 9th, 10th, 11th) की गिनतियाँ जोड़ने पर पूर्ण योग परखा जाता है (खण्डित पाद के कारण यहाँ अपूर्ण — पाठ-भेद संभव)।

हमारा डिकोड (Our Decode) भूतसंख्या को "अंक-निष्ठ" (digit-faithful) डिकोड करने का यही अनुशासन हमारी विधि का केन्द्र है — वह्नि=3, शर=5 को दृढ़ता से निर्धारित करना, और संदिग्ध पाठ को "पाठ-भेद संभव" कहना, न कि प्रशंसनीय अनुमान से रिक्ति भरना।

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66.62
रूपंस्थ्रियां गुरुं थ्यक्थ्वा लग्नस्य करणं थ्विधम् ।
होरासूर्येन्धवो लग्ने लग्नारेन्ध्विनसूर्यजाः
rūpaṃsthriyāṃ guruṃ thyakthvā lagnasya karaṇaṃ thvidham |
horāsūryendhavo lagne lagnārendhvinasūryajāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रूपं = 1 (एक रूप); स्त्रियाम् = 7th भाव (जाया/स्त्री); गुरुं त्यक्त्वा = बृहस्पति को छोड़कर; लग्नस्य करणम् = लग्न की करण-तालिका; (इदम्) = यह; होरा-सूर्य-इन्दवः = होरा (चन्द्र-पक्ष), सूर्य, चन्द्र; लग्ने = 1st भाव; लग्न-आर-इन्दु-इन-सूर्यजाः = लग्न, कुज, चन्द्र, इन (सूर्य), सूर्यज (शनि) [पाठ-भेद संभव]।

हिन्दी भावार्थ सप्तम (स्त्री) भाव में एक (रूप=1), बृहस्पति को छोड़कर — इस प्रकार लग्न की करण (बिन्दु) तालिका कही जाती है। प्रथम (लग्न) भाव में होरा, सूर्य व चन्द्र; तथा लग्न, कुज, चन्द्र, सूर्य व सूर्यज (शनि) रेखादाता/बिन्दुदाता गिने जाते हैं। यहाँ गणना दाता-सूची व अंक-दोनों रूपों में मिश्रित है — पाठ-भेद संभव।

English rendering One (rūpa = 1) in the seventh, excluding Jupiter — thus the ascendant's bindu-table is stated; in the first house the Moon-side horā, Sun and Moon, with ascendant, Mars, Moon, Sun and Saturn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रूप = 1 → उस भाव में केवल एक दाता। "गुरुं त्यक्त्वा" पूरक-संकेत (8−1=7 संभावित)। ध्यातव्य: यह श्लोक अंक-रूप (रूप=1) और दाता-सूची (होरा, सूर्य, इन्दु…) दोनों को मिलाता है — दो अंकनविधियाँ एक ही चक्र के लिए। दोनों का लक्ष्य समान: प्रत्येक भाव का बिन्दु-मान 0…8 निर्धारित करना।

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66.63
गुरुज्ञौ लग्नचन्ध्रारा लसूचंमंबुसौरयः ।
क्षथे शुक्रस्थठा चैकः कामे सर्वे गुरुं विना
gurujñau lagnacandhrārā lasūcaṃmaṃbusaurayaḥ |
kṣathe śukrasthaṭhā caikaḥ kāme sarve guruṃ vinā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरु-ज्ञौ = गुरु व बुध; लग्न-चन्द्र-आराः = लग्न, चन्द्र, कुज; "लसूचंमंबुसौरयः" = अत्यन्त खण्डित (सम्भवतः लग्न, सूर्य … सौरि/शनि) — पाठ-भेद संभव; क्षते = 6th भाव; शुक्रः = शुक्र; एकः = 1; कामे = काम-भाव; सर्वे गुरुं विना = बृहस्पति को छोड़कर सभी (7)।

हिन्दी भावार्थ लग्न के करण-चक्र में गुरु व बुध; लग्न, चन्द्र व मंगल; तथा एक खण्डित दाता-श्रेणी (पाठ-भेद संभव)। षष्ठ (क्षत) भाव में शुक्र, और वहाँ एक (एकः=1); काम-भाव में बृहस्पति को छोड़कर सभी गिने जाते हैं। एक पाद पूर्णतः दूषित है, अतः पुनर्निर्माण नहीं किया जा रहा।

English rendering Jupiter and Mercury; ascendant, Moon and Mars; then a badly corrupt donor-run (reading uncertain); Venus in the sixth, counted as one; and in the "kāma" house all except Jupiter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एकः = 1, "सर्वे गुरुं विना" = 7 — पुनः चरम मान 1 व 7 के बीच का वितरण। लग्न के करण-चक्र का प्रत्येक भाव-अंक = दाता-गिनती; सत्यापन-नियम वही: 12 भावों का योग स्थिर (लग्न 49)। दूषित पाद के कारण इस श्लोक का योग-अंश असत्यापनीय — पाठ-भेद संभव।

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66.64
म्त्ऱ्गौ भ्त्ऱ्गुबुढौ थ्यक्थ्वा ढर्मे गुरुसिथौ विना ।
कर्मण्याये थठा शुक्रोव्यये सूर्येन्धुवर्जिथाः
mtṟgau bhtṟgubuḍhau thyakthvā ḍharme gurusithau vinā |
karmaṇyāye thaṭhā śukrovyaye sūryendhuvarjithāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मङ्गौ = मङ्गल (मंगल; पाठ-भेद संभव); भृगु-बुधौ = शुक्र और बुध (द्विवचन); त्यक्त्वा = छोड़कर / अपवर्जित करके; धर्मे = नवम भाव (धर्म-स्थान); गुरु-स्थितौ विना = गुरु की स्थिति को छोड़कर / गुरु-स्थित को अपवाद मानकर; कर्मणि = दशम भाव; आये = एकादश भाव (आय-स्थान); तथा = उसी प्रकार; शुक्रः = शुक्र; व्यये = द्वादश भाव (व्यय); सूर्य-इन्दु-वर्जिताः = सूर्य और चन्द्र को छोड़कर शेष (वर्जित = excluded)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ अष्टकवर्ग-करण के क्रम में भाव-विशेष पर ग्रह-अपवाद बतलाता है। धर्म-स्थान (९) में मङ्गल, शुक्र और बुध को छोड़कर गिनती की जाती है, और गुरु-स्थिति को अलग नियम से अपवाद माना गया है। कर्म (१०) तथा आय (११) में शुक्र का उल्लेख है; व्यय (१२) में सूर्य और चन्द्र वर्जित रहकर शेष ग्रह गिने जाते हैं। यह फल-कल्पना नहीं, अपितु बिन्दु/रेखा-योग के लिए ग्रह-भाव चयन का शास्त्रीय नियम है; पाठ-भेद संभव।

English rendering The verse states, in the aṣṭakavarga procedure, house-wise planetary exclusions: in the 9th, Mars, Venus and Mercury are set aside (with a stated exception touching Jupiter’s placement); Venus is named for the 10th and 11th; in the 12th the count excludes the Sun and the Moon. It is a selection rule for bindu contribution, not a fate-claim. Readings may be contested (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टकवर्ग में प्रत्येक संदर्भ (लग्न/ग्रह) से १२ भावों में बिन्दु 0 या 1 का बाइनरी योगदान होता है। इस श्लोक का नियम भाव-समुच्चय S पर ग्रह-समुच्चय P का अपवाद-सेट देता है:

  • भाव ९ (धर्म): P₉ = {सभी प्रासंगिक ग्रह} \ {मङ्गल, शुक्र, बुध}, गुरु-स्थिति के लिए पृथक् अपवाद (पाठानुसार)
  • भाव १०, ११ (कर्म, आय): शुक्र का योगदान निर्दिष्ट
  • भाव १२ (व्यय): P₁₂ = {सभी} \ {सूर्य, चन्द्र}

कुल रेखा = Σ बिन्दु; ग्रह-वार canonical योग (BPHS Ch.66) — सूर्य ४८, चन्द्र ४९, मङ्गल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९; SAV = ३३७ (७ ग्रह)। कन्वेंशन: BPHS Ch.66 तालिका; पाठ-भेद पर बिन्दु-प्रति-भाव बदल सकता है, योग अचल नहीं मानें बिना fixture-जाँच के।

उदाहरण (worked example) मानें लग्न-संदर्भ से द्वादश भाव की गिनती: योगदान-योग्य ग्रह = {मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि} (सूर्य-चन्द्र वर्जित, श्लोकानुसार)। यदि इनमें से ३ ग्रह द्वादश में बिन्दु देते हों, तो Lagna→12 रेखा = ३। (पूर्ण तालिका Ch.66 के ग्रह-वार पदों से जुड़ती है; ayanāṃśa यहाँ नहीं लगता — यह राशि-स्थान-गिनती है, न कि देशान्तर-देशांतर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 की canonical rekha-totals (४८/४९/३९/५४/५६/५२/३९ → SAV ३३७) exact-`==` fixture पर pinned हैं; ±tolerance कभी −१ छिपा चुकी है, अतः भाव-वार अपवाद-नियम भी बिना band के ही verify होते हैं। BPHS बनाम Phaladīpikā/Mehta की प्रति-राशि भिन्नता (कुल समान) खुला `[HUMAN]` convention है — चुपचाप नहीं बदला जाता।

66.65
लग्नस्येधं थु संप्रोक्थं करणं ध्विजपुङ्गव ।
अठ स्ठानं प्रवक्ष्यामि लग्नस्य ध्विजपुङ्गव
lagnasyedhaṃ thu saṃprokthaṃ karaṇaṃ dhvijapuṅgava |
aṭha sṭhānaṃ pravakṣyāmi lagnasya dhvijapuṅgava

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नस्य = लग्न का; इदं = यह; तु = ही / निश्चय; संप्रोक्तं = पूर्णतः कहा गया; करणं = विधि / प्रक्रिया (अष्टकवर्ग-करण); द्विज-पुङ्गव = हे द्विजश्रेष्ठ (शिष्य-संबोधन); अथ = अब; स्थानं = स्थान / बिन्दु-स्थान (कहाँ रेखा पड़ती है); प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; लग्नस्य = लग्न के।

हिन्दी भावार्थ पराशर शिष्य से कहते हैं — हे द्विजश्रेष्ठ, लग्न का यह करण (अष्टकवर्ग की विधि) अब तक संपूर्ण कह दिया गया। इसके बाद क्रम आता है स्थान-वर्णन का: लग्न की दृष्टि से किन भावों में बिन्दु/रेखा गिनी जाएँगी, वह अब कहा जाएगा। करण = गणना-विधि; स्थान = फल-पटल के लिए स्थान-सूची — दोनों अलग परतें हैं।

English rendering “O best of the twice-born, this procedure (karaṇa) of the Lagna has been fully declared; now I shall set forth the places (sthāna) of the Lagna.” The verse is a hinge: method closed, locus-list to follow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अध्याय-क्रम-सूचना। करण और स्थान को अलग रखना ही तकनीक है: पहले योगदान-नियम, फिर (लग्न से) १२ भावों की बिन्दु-सूची; दोनों मिलकर लग्न-अष्टकवर्ग का पूरा मॉड्यूल बनते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) डिकोड-विधि वही orthodoxy रखती है जो यह श्लोक बाँटता है — mathematics (बिन्दु-तालिका, SAV ३३७, trikoṇa/ekādhipatya शोधन Ch.67–68) को phala से अलग; स्थान-सूची fixture पर `==` से जुड़ती है, “लग्न शुभ/अशुभ” जैसी व्याख्या गिनती का स्थानापन्न नहीं।

66.66
अठाष्तकवर्गाढ्यायः
aṭhāṣtakavargāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (मंगल-सूचक आरम्भ-शब्द); अष्टक = आठ का समूह (अष्टन् = 8); वर्ग = वर्ग/समूह/श्रेणी; अष्टकवर्ग = "आठ आश्रय-बिन्दुओं से की गई बिन्दु-गणना" (सात ग्रह + लग्न = आठ सन्दर्भ-कुण्डलियाँ); अध्यायः = अध्याय/प्रकरण।

हिन्दी भावार्थ यह पंक्ति अष्टकवर्ग-अध्याय का शीर्षक-वाक्य है — "अब अष्टकवर्ग-अध्याय (आरम्भ होता है)।" इस Wikisource पाठ में यह शीर्षक श्लोक-क्रम 66 पर आता है, यद्यपि भूमिका 1–15 तथा बिन्दु-सारणियाँ 16 से ही चल रही हैं; अतः यहाँ स्थान-भेद/पाठ-भेद संभव — इसे प्रकरण-संज्ञा मानना ही निरापद है। "अष्टक" शब्द ही विधि का मर्म खोल देता है: प्रत्येक ग्रह के शुभ-बिन्दु सात ग्रहों तथा लग्न — इन आठ आश्रयों से गिने जाते हैं।

English rendering "Now begins the chapter on the Aṣṭakavarga." A section-title line naming the eight-fold benefic-point reckoning that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-शीर्षक/संज्ञा-कथन। किन्तु संज्ञा स्वयं संरचना घोषित करती है: अष्ट (8) आश्रय = {सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न}। प्रत्येक राशि में किसी एक ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग-बिन्दु 0 से 8 तक; एक ग्रह की भिन्न-कुण्डली में अधिकतम 8 × 12 = 96 बिन्दु।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह अध्याय है जिसे हमारे kaal-verification-oracle में canonical रूप में स्थिर किया गया: सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 — सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = 337 (सात ग्रह)। यह fixture पर exact-`==` से सिद्ध है, किसी tolerance-band से नहीं (एक बार ±3 band ने असली −1 को छिपा दिया था)।

66.67
थठा जीवभ्त्ऱ्गू बुध्ढौ सर्वे शुक्रं विना क्षथे ।
जीव एकस्थठा ध्यूने म्त्ऱ्गौ सौम्यभ्त्ऱ्गू थठा
thaṭhā jīvabhtṟgū budhḍhau sarve śukraṃ vinā kṣathe |
jīva ekasthaṭhā dhyūne mtṟgau saumyabhtṟgū thaṭhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = उसी क्रम में / और; जीव = गुरु; भृगू = शुक्र (भृगु); बुधौ = बुध (तत्सहित उल्लेख); सर्वे शुक्रं विना = शुक्र को छोड़कर सभी (योगदाता); क्षथे = षष्ठे, छठे भाव में; जीव एकस्था = केवल गुरु अकेला स्थित; ध्यूने = द्यूने, सप्तम भाव में; सौम्यभृगू = बुध और शुक्र; म्त्ऱ्गौ = पाठ अस्पष्ट (भृगौ / अन्य) — पाठ-भेद संभव।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अष्टकवर्ग-क्रम में भाव-वार योगदान (स्थान/रेखा) का उल्लेख है। शास्त्र कहता है कि षष्ठ भाव में शुक्र को छोड़कर शेष योगदानदाताओं का योग आता है; सप्तम में केवल गुरु एकस्थ कहा गया है; और बुध-शुक्र का उल्लेख उसी श्रृंखला में जुड़ता है। संज्ञाएँ भाव-संकेत हैं (क्षत ≈ ६, द्यून ≈ ७)। विकृत पाठ के कारण पद-क्रम में पाठ-भेद संभव; अर्थ शास्त्रीय सूची-वाक्य के रूप में ही ग्रहण करें, फल का विस्तार यहाँ नहीं है।

English rendering The verse continues the house-wise contribution list: in the sixth, all contributors except Venus; in the seventh, Jupiter alone; Mercury and Venus are named in the same chain. The wording is damaged in places (पाठ-भेद संभव); it is a placement catalogue, not a phala narrative.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अष्टकवर्ग का भाव-वार योगदान-सूचीकरण (लग्न/अष्टकवर्ग श्रृंखला का अंश)। आधुनिक संकेत में: प्रत्येक भाव b ∈ {1…12} के लिए योगदान-समुच्चय G_b ⊆ {सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न} निर्धारित होता है; यहाँ b = ६ पर G_6 = (सभी) \ {शुक्र}, b = ७ पर G_7 = {गुरु} — श्लोक-पाठ के अनुसार। कुल रेखा = |G_b| उस भाव/राशि कोष्ठ में। यह सेट-सदस्यता है, न कि निरंतर फलन।

उदाहरण (worked example) केवल इस श्लोक की षष्ठ-सप्तम पंक्ति से: षष्ठ कोष्ठ में शुक्र को छोड़कर ७ में से ६ योगदानदाता → ६ रेखा-अंक (यदि “सर्वे” = सात ग्रह + लग्न में से शुक्र-वर्जन हो तो गणना तदनुसार — “सर्वे” का ठीक परिमाण पूर्व-श्लोकों की पूर्ण सूची पर निर्भर; पाठ-भेद संभव)। सप्तम कोष्ठ: केवल गुरु → १ रेखा। सम्पूर्ण लग्नाष्टकवर्ग-योग बाद की पंक्तियों के बिना अधूरा रहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग Ch.66 की पूरे चक्र-तालिकाएँ (सूर्य ४८, चन्द्र ४९, …, SAV ३३७) उसी अध्याय की bindu/rekha-अनुशासन पर टिकी हैं; भाव-वार G_b सूचियाँ ही bhinna-aṣṭakavarga की कोष्ठ-भराई हैं। हमारा oracle कुल रेखाएँ exact-`==` से पिन करता है; अधूरी/विवादित पद-पंक्ति को मौन “सुधार” नहीं — पाठ-भेद घोषित रहता है।

66.68
ढर्मे गुरुसिथावेव खे भवे शुक्रमन्थरा ।
सूर्यचन्ध्रौ थठा रिष्फे स्ठानं लग्नस्य कीर्थिथम्
ḍharme gurusithāveva khe bhave śukramantharā |
sūryacandhrau thaṭhā riṣphe sṭhānaṃ lagnasya kīrthitham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मे = नवम में; गुरु-सितौ एव = केवल गुरु और शुक्र; खे = दशम (आकाश/कर्म) में; भवे = सभी भाव-योग्य / समस्त; शुक्र-मन्तरा = शुक्र के बिना; सूर्य-चन्द्रौ = रवि और चन्द्र; तथा = तथा; रिष्फे = द्वादश में; स्थानं = स्थान; लग्नस्य = लग्न का; कीर्तितम् = कहा / प्रशंसित रूप से निर्दिष्ट।

हिन्दी भावार्थ स्थान-सूची पूरी होती है — नवम में केवल गुरु-शुक्र; दशम में शुक्र छोड़कर शेष; द्वादश में सूर्य-चन्द्र। इतने से “लग्न का स्थान” शास्त्र में कीर्तित माना गया। करण (पूर्व) अशुभ-लेखन था; स्थान शुभ-लेखन है — दोनों मिलकर लग्न-अष्टकवर्ग की चिह्न-सारिणी बनाते हैं। पाठ-भेद संभव।

English rendering In the 9th, only Jupiter and Venus; in the 10th, all except Venus; in the 12th, the Sun and Moon — thus the sthāna of the Lagna is declared. With 66.67–66.68 the auspicious placement list for Lagna is closed, as the text states it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-सारिणी पूर्ण (६६.६७–६६.६८): भाव ९ → {गुरु, शुक्र}; भाव १० → (योगदान-समूह) ∖ {शुक्र}; भाव १२ → {सूर्य, चन्द्र}; साथ ६६.६७: भाव ६ → समूह में शुक्र वर्जित; भाव ७ → {गुरु}; कुज-संदर्भ में {बुध, शुक्र}। लग्न-अष्टकवर्ग सेल (i, j) ∈ {०,१} — स्थान-सेल = १ (रेखा), करण-सेल अलग बिन्दु-लेखन (६६.६९)। सर्वाष्टकवर्ग बाद में भाव-योग: SAV_b = Σ_graha BAV_graha(b); शास्त्रीय पिन-कुल (७ ग्रह) Σ = ३३७।

उदाहरण (worked example) लग्न = तुला। धर्म (९) = मिथुन — स्थान केवल गुरु/शुक्र को; ख (१०) = कर्क — शुक्र वर्जित शेष योगदान; रिष्फ (१२) = कन्या — सूर्य-चन्द्र। यदि उदाहरण-कुण्डली में गुरु मिथुन में है तो धर्म-स्थान में गुरु-रेखा लगती है; शुक्र कर्क में हो तो दशम-स्थान में शुक्र नहीं गिना जाता। सम्मेलन: भाव-गिनती लग्न से पूर्ण-भाव (whole-sign) — यही वर्ग-सारिणी का साधारण पाठ-अनुकूल मॉडल है।

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 की भिंन-तालिकाएँ और SAV = ३३७ exact-`==` से सत्यापित हैं; त्रिकोण-शोधन (Ch.67) और एकाधिपत्य-शोधन (Ch.68) SAV को फल से पहले घटाते हैं। लग्न-स्थान की यह भाव-मानचित्र उसी अष्टकवर्ग-तन्त्र का हिस्सा है — हम गणित को फलादेश से अलग रखते हैं।

66.69
करणं बिन्धुवथ् लेख्यं स्ठानं रेखास्वरूपकम् ।
करणं थ्वशुभधं प्रोक्थं स्ठानं शुभफलप्रधम्
karaṇaṃ bindhuvath lekhyaṃ sṭhānaṃ rekhāsvarūpakam |
karaṇaṃ thvaśubhadhaṃ prokthaṃ sṭhānaṃ śubhaphalapradham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) करणं = रिक्त/अयोग स्थान (जहाँ योगदान नहीं); बिन्धुवत् / बिन्दुवत् = बिन्दु के रूप में; लेख्यं = लिखना चाहिए; स्थानं = योगदान-स्थान (जहाँ रेखा/अंक लगता है); रेखास्वरूपकम् = रेखा के स्वरूप में; तु = किन्तु / ही; अशुभदं = अशुभ-फलदायी (शास्त्र-कथन); प्रोक्तं = कहा गया; शुभफलप्रदम् = शुभ फल देने वाला (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र लेखन-विधि और संकेत-अर्थ दोनों देता है: जहाँ करण है उसे बिन्दुवत् लिखें; जहाँ स्थान है उसे रेखा-स्वरूप में लिखें। करण को अशुभद, स्थान को शुभफलप्रद कहा गया है — यह अष्टकवर्ग-चिह्न की शास्त्रीय व्याख्या है, न कि व्यक्ति-विशेष का निश्चित भविष्य। बिन्दु = शून्य-योग का चिह्न; रेखा = योगदान का चिह्न। (आधुनिक बोलचाल में “बिन्दु” कभी योगदान-अंक को भी कहते हैं — यहाँ श्लोक का अपना शब्द-प्रयोग पालन करें।)

English rendering Mark a karaṇa as a dot (bindu) and a sthāna as a stroke (rekhā). The text states that karaṇa is inauspicious-giving and sthāna auspicious-giving — a notational and phala-rule of the śāstra, not a personal prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चिह्न-नियम + द्विमान अंक। कोष्ठ (g, r) (कर्ता g, राशि r) पर: यदि योगदान है तो a<sub>g,r</sub> = १ (स्थान → रेखा); अन्यथा a<sub>g,r</sub> = ० (करण → बिन्दु)। राशि r का bhinna-योग B_r = Σ_g a<sub>g,r</sub>। SAV-योग = Σ_r B_r। “शुभ/अशुभ” यहाँ चिह्न-अर्थ का शास्त्र-कथन है; संख्यात्मक बलाबल त्रिकोण/एकाधिपत्य शोधन (Ch.67–68) के बाद फल-विवेचन में आता है।

उदाहरण (worked example) मान लें एक राशि-कोष्ठ में ८ कर्ताओं में से ५ स्थान (रेखा) और ३ करण (बिन्दु) हैं → B_r = ५। लिखते समय पाँच रेखा-चिह्न, तीन बिन्दु। शोधन से पहले यही कच्चा अंक; Ch.67–68 के बाद घटा हुआ योग फल-पाठ के लिए प्रयुक्त — यह श्लोक केवल लेखन/चिह्न तय करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) oracle की canonical रेखा-कुल (सूर्य ४८ … SAV ३३७) ठीक इन्हीं स्थान-रेखाओं का योग है — करण (०) गिने नहीं जाते। exact-`==` fixture “रेखा = १, करण = ०” को बिना tolerance band के जाँचता है; ±३ जैसी पट्टी कभी −१ छिपा चुकी है, इसलिए चिह्न-अनुशासन ही संख्या-अनुशासन है।

66.70
धशारेखा लिखेधूर्ढ्वास्थिर्यग् रेखाश्चथुर्धश ।
नगेशकोष्टसंयुक्थं चक्रमेवं प्रजायथे
dhaśārekhā likhedhūrḍhvāsthiryag rekhāścathurdhaśa |
nageśakoṣṭasaṃyukthaṃ cakramevaṃ prajāyathe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दश = दस; रेखाः = रेखाएँ; लिखेत् = लिखे; ऊर्ध्वाः = ऊर्ध्व / खड़ी; तिर्यक् = तिरछी / आड़ी; रेखाः = रेखाएँ; चतुर्दश = चौदह; नगेश-कोष्ठ-संयुक्तं = नगेश-संख्या के कोष्ठकों से युक्त; चक्रम् = चक्र / पट्ट; एवम् = इस प्रकार; प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ अष्टकवर्ग-चक्र का रेखा-निर्माण: दस ऊर्ध्व रेखाएँ और चौदह तिर्यक् रेखाएँ खींचें; उससे नगेश-कोष्ठ वाला चक्र बनता है। यह सारिणी का ज्यामितीय ढाँचा है — जिसमें राशि, योगदानकर्ता और बिन्दु/रेखा भरे जाते हैं। “नगेश” शब्द-संख्या/पाठ पर टीका-भेद संभव; कोष्ठ-गिनती पारंपरिक रूप से ९×१४ = १२६ मानी जाती है।

English rendering One should draw ten vertical lines and fourteen transverse lines; thus the cakra endowed with nageśa-cells is produced. The verse is the construction rule for the aṣṭakavarga writing-grid. The exact cell-count reading of nageśa may vary by recension; the classical working grid is taken as 9×14 = 126 apartments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) जाल-निर्माण: ऊर्ध्व रेखाएँ n_v = १० → स्तम्भ-अन्तराल = ९; तिर्यक् रेखाएँ n_h = १४। पारंपरिक कोष्ठ-गिनती: ९ × १४ = १२६ (नगेश-कोष्ठ — भूतसंख्यानुवाद/टीका में पाठ-भेद संभव; अंक १२६ शास्त्र-व्याख्या परंपरा से, शब्द-संख्य का एकमात्र निर्विवाद पठन नहीं)। उपयोग: पंक्तियों/स्तम्भों में १२ राशि + शीर्षक/योग पंक्तियाँ और ८ योगदानकर्ता (७ ग्रह + लग्न) व्यवस्थित कर बिन्दु-रेखा भरना। SAV भाव-योग बाद में: प्रत्येक राशि b पर Σ₈ (या भिंन ७ + लग्न) चिह्न।

उदाहरण (worked example) कागज पर १० खड़ी रेखाएँ समान्तर खींचें — बीच में ९ पट्टी। आड़ी १४ रेखाएँ काटें। प्राप्त ग्रिड के आंतरिक ९×१४ = १२६ कोष्ठों में से उपयोगी ब्लॉक चुनकर लिखें: उदाहरण शीर्ष पंक्ति = राशि नाम (मेष…मीन), बायाँ स्तम्भ = रवि, चन्द्र, कुज, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न; सेल में ६६.६९ के अनुसार • या रेखा। सात ग्रहों के भिंन-कुल यदि Ch.66 के पिन हों तो Σ = ४८+४९+३९+५४+५६+५२+३९ = ३३७ (लग्न-स्तम्भ अलग)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही चक्र-ढाँचा Ch.66 तालिकाओं का दृश्य रूप है। हमने भिंन-योग — सूर्य ४८, चन्द्र ४९, कुज ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९ → SAV ३३७ — को फिक्स्चर पर exact-`==` से बाँधा है; चन्द्र-तालिका में “९” चन्द्र-से-चन्द्र पर है (BPHS), फलादीपिका/मेहता transpositions अलग घोषित convention हैं। रेखा-गिनती और योग में सहन-बैंड नहीं — केवल यथार्थ समानता।

66.71
थिर्यगष्तसु कोष्टेषु विलग्नसहिथान् खगान् ।
आध्येषूर्ढ्वाढरेष्वेवं भावसंख्या लिखेध् बुढः
thiryagaṣtasu koṣṭeṣu vilagnasahithān khagān |
ādhyeṣūrḍhvāḍhareṣvevaṃ bhāvasaṃkhyā likhedh buḍhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिर्यक्/तिर्यग् = क्षैतिज/आड़ी पंक्ति; अष्टसु कोष्ठेषु = आठ कोष्ठों/खानों में; विलग्न-सहितान् = लग्न सहित (लग्न + ग्रह); खगान् = ग्रहों को; आद्येषु = आरम्भ/प्रथम (पंक्तियों/कोष्ठों) में; ऊर्ध्व-अधरेषु = ऊपरी और नीचे की पंक्तियों/कोष्ठों में; भाव-संख्याम् = भाव-अंक (1…12); लिखेद् बुधः = विद्वान् लिखे — पाठ-भेद संभव (थिर्यगष्तसु / आध्येषूर्ढ्वाढरेषु / लिखेध् बुढः आदि विकृति)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अष्टकवर्ग-तालिका रचते समय आठ कोष्ठों की क्षैतिज व्यवस्था में लग्न सहित ग्रहों को स्थापित करना चाहिए। उसी क्रम में आदि, ऊर्ध्व और अधः कोष्ठों में भाव-संख्याएँ लिखी जाएँ, जिससे प्रत्येक स्थान का अंक-विन्यास स्पष्ट रहे। यह पद फल नहीं, बल्कि चार्ट-निर्माण की लेखन-विधि बताता है।

English rendering The wise should set the planets together with the lagna in the eight horizontal cells, and likewise write the house-numbers in the initial, upper, and lower cells. The verse fixes the layout of the aṣṭakavarga grid, not a phala claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टक = 8 योगदान-स्रोत: लग्न + 7 ग्रह (सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) — यही aṣṭaka जिस पर bhinna-aṣṭakavarga (BAV) की rekha/bindu गिनती चलती है। प्रत्येक ग्रह के लिए 12 राशि-कोष्ठ; बिंदु 0 या 1 (या तालिका-योग) प्रति राशि। Sarvāṣṭakavarga (SAV) = Σ (7 ग्रहों के BAV योग) — canonical Ch.66: 48+49+39+54+56+52+39 = 337 (लग्न-स्तम्भ अलग; SAV 7-ग्रह योग)। भाव-संख्या लेखन = 1…12 का क्रमबद्ध कोष्ठ-मानचित्र (modular house-index, लग्न = 1 से गणना की परंपरा घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष। आठ तिर्यक् शीर्ष: Lg | Su | Mo | Ma | Me | Ju | Ve | Sa। प्रत्येक स्तम्भ के नीचे 12 राशि-पंक्तियाँ (मेष→मीन); BAV में सूर्य-तालिका का राशि-योग 48 (Ch.66 canonical, exact-`==`)। भाव-संख्या स्तम्भ/पंक्ति में लग्न=1, वृष=2, … मीन=12 लिखें — यही “भावसंख्यां लिखेद्” का संख्यात्मक अर्थ। (Convention: BPHS Ch.66 table order; ayanāṃśa BAV-तालिका-निर्माण में नहीं, केवल जन्म-देशांतर→राशि-स्थान पर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही आठ कोष्ठ (लग्न+7) Ch.66 के canonical BAV totals — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV 337 — के stub हैं; kaal-verification-oracle इन्हें fixture पर exact-`==` से पिन करता है (tolerance-band निषिद्ध)। चन्द्र-तालिका में “9” Moon-from-Moon पर (Moon-from-Mars नहीं) — BPHS बनाम Phaladīpikā/Mehta का घोषित convention-भेद, silent flip नहीं।

66.72
यठोक्थं विन्यसेथ् थथ्र करणं स्ठानमेव वा ।
थथः शुभाऽशुभं ज्ञाथ्वा जाथकस्य फलं वधेथ्
yaṭhokthaṃ vinyaseth thathra karaṇaṃ sṭhānameva vā |
thathaḥ śubhā'śubhaṃ jñāthvā jāthakasya phalaṃ vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथोक्तम् = जैसा पहले कहा; विन्यासेत् = स्थापित/रचे; तत्र = उस (तालिका/विधि) में; करणम् = प्रक्रिया/करण (रचना-विधि); स्थानम् एव वा = अथवा स्थान (कोष्ठ/भाव-स्थान) ही; ततः = तब; शुभ-अशुभम् = शुभ तथा अशुभ (बिंदु/योग से); ज्ञात्वा = जानकर; जातकस्य फलम् = जातक का फल; वदेत् = कहे — पाठ-भेद संभव (यठोक्थं / विन्यसेथ् / वधेथ् आदि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि पूर्वोक्त विधि से अष्टकवर्ग का करण — अथवा उसके स्थान-विन्यास — को यथास्थान रचा जाए। तदनन्तर उन स्थानों के शुभ-अशुभ संकेत जानकर जातक का फल कहा जाए। यह अध्याय का समापन-सूत्र है: पहले गणना-तालिका, फिर शास्त्रीय फल-कथन — दोनों क्रमबद्ध।

English rendering Arrange there the procedure — or the places themselves — exactly as taught; then, having discerned the auspicious and inauspicious, declare the result for the native. Layout and assessment precede any phala statement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-समापन + फल-कथन का क्रम। संख्यात्मक पाइपलाइन जो पद संकेतित करता है: (1) BAV rekha-तालिकाएँ (Ch.66) → (2) त्रिकोण-शोधन (Ch.67) + एकाधिपत्य-शोधन (Ch.68) से SAV घटाव → (3) शेष बिंदुओं से शुभ/अशुभ का शास्त्रीय आकलन → (4) “फलं वदेत्”। “शुभ/अशुभ” यहाँ bindu-घनत्व और शोधित योग का पाठ-संकेत है, न कि सुनिश्चित भाग्य-घोषणा।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारे इंजन गणित (BAV totals, SAV 337, शोधन-चरण) को exact-`==` से सत्यापित करते हैं; फल-वाक्य को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रखते हैं — fate, भय, या remedy-pressure नहीं। Mathematics और interpretation अलग: बिंदु गणना pin; “जातकस्य फलं वदेत्” पाठ की आवाज़, हमारी endorsement नहीं।

अष्टकवर्ग — प्रति-ग्रह रेखा-योग (BPHS ६६)48रवि49चन्द्र39मंगल54बुध56गुरु52शुक्र39शनियोग = 48+49+39+54+56+52+39 = सर्वाष्टकवर्ग 337oracle: exact == पिन · कोई tolerance band नहीं
अष्टकवर्ग — the eightfold bindu system (BPHS Ch.66). Each planet earns rekhā-bindus in the twelve signs reckoned from eight reference points; the per-planet totals are canonical: रवि 48 · चन्द्र 49 · मंगल 39 · बुध 54 · गुरु 56 · शुक्र 52 · शनि 39 → their sum, the सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = 337. Our oracle pins these with exact == (no tolerance band — a ±3 once hid a real −1).
अध्यायः 67

त्रिकोणशोधनाध्यायः

6 श्लोक
67.1
एवं सलग्नखेतानां विढायाष्तकवर्गकम् ।
थ्रिकोणशोढनं कुर्याधाधौ सर्वंषु राशिषु
evaṃ salagnakhetānāṃ viḍhāyāṣtakavargakam |
thrikoṇaśoḍhanaṃ kuryādhādhau sarvaṃṣu rāśiṣu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; सलग्नखेतानाम् = लग्नसहित ग्रहों के; विधाय = करके / रचकर; अष्टकवर्गकम् = अष्टकवर्ग (प्रत्येक ग्रह + लग्न से बिन्दु-सारणी); त्रिकोणशोधनम् = त्रिकोण-शोधन (त्रिकोण-राशि-त्रयी पर समान घटाव); कुर्यात् = करना चाहिए; आदौ = पहले / आरम्भ में; सर्वेषु राशिषु = सभी बारह राशियों में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्नसहित ग्रहों का अष्टकवर्ग तैयार करने के पश्चात् सबसे पहले त्रिकोण-शोधन करना चाहिए। यह शोधन प्रत्येक राशि-समूह पर लागू होता है, न कि केवल किसी एक भाव पर। क्रम स्पष्ट है — पहले अष्टकवर्ग का निर्माण, फिर त्रिकोण-शोधन, तत्पश्चात् आगे के शोधन। पाठ में “विढायाष्तकवर्गकम् / थ्रिकोणशोढनम्” आदि रूप विकृत प्रतीत होते हैं; भाव अष्टकवर्ग-विधायन और त्रिकोण-शोधन का है (पाठ-भेद संभव)।

English rendering Having thus constructed the aṣṭakavarga of the planets together with the lagna, one should first perform the triangular purification (trikoṇa-śodhana) across all the signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रक्रिया-क्रम (computation pipeline): (1) bhinna-aṣṭakavarga bindu-tables for Sun…Saturn (+ lagna contribution as the text’s aṣṭaka frame) → (2) trikoṇa-śodhana (this chapter) on each elemental triad → (3) later ekādhipati-śodhana (next chapter). No numeric constant in this verse; it fixes order: अष्टकवर्ग-निर्माण → त्रिकोण-शोधन first among śodhanas.

उदाहरण (worked example) Convention: BPHS Ch.66 bindu-tables as source input; Ch.67 acts on the twelve-sign row of one planet (or on SAV after planetary rows are ready — implement as per your pipeline). Suppose after placing bindus a planet’s row is ready for all 12 rāśis. Do not apply ekādhipati reduction yet; first reduce each fire/earth/air/water triad by the rule of 67.4–67.5. Only after all four triads are processed does the text send the wise on to ekādhipati-śodhana (67.5).

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.67 is the second stage of the aṣṭakavarga reduction chain after the Ch.66 canonical tables (Sun 48, Moon 49, Mars 39, Mercury 54, Jupiter 56, Venus 52, Saturn 39 → SAV 337). The oracle pins those raw totals with exact `==`; trikoṇa-śodhana then reduces the placed bindus before phala, exactly as this opening verse orders.

67.2
थ्रिकोणं कठ्यथे विप्र मेषसिंहढनूंष्यठ ।
व्त्ऱ्षकन्याम्त्ऱ्गस्याश्च युग्मथौलिघतास्थठा
thrikoṇaṃ kaṭhyathe vipra meṣasiṃhaḍhanūṃṣyaṭha |
vtṟṣakanyāmtṟgasyāśca yugmathaulighatāsthaṭhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोणम् = त्रिकोण (एक-दूसरे से 5वें/9वें स्थान पर स्थित राशि-त्रयी); कथ्यते = कहा जाता है; विप्र = हे ब्राह्मण / शिष्य-संबोधन; मेष-सिंह-धनुः = अग्नि-त्रिकोण (राशि 1–5–9); वृष-कन्या-मृग = पृथ्वी-त्रिकोण (2–6–10; मृग = मकर); युग्म-तुला-घट = वायु-त्रिकोण (3–7–11; युग्म = मिथुन, घट = कुम्भ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र त्रिकोणों की परिभाषा देता है। पहला त्रिकोण मेष–सिंह–धनु है। दूसरा वृष–कन्या–मकर है। तीसरा मिथुन–तुला–कुम्भ है। ये तीन अग्नि-पृथ्वी-वायु के स्थायी राशि-त्रिकोण हैं; जल-त्रिकोण अगले श्लोक में पूरा होता है। विकृत पाठ “ढनूंष्यठ / युग्मथौलिघतास्थठा” आदि में धनुः, तुला, घट का ही आशय है (पाठ-भेद संभव)।

English rendering The triads are stated, O Vipra: Aries–Leo–Sagittarius; Taurus–Virgo–Capricorn; and Gemini–Libra–Aquarius.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Trikoṇa partition of the 12 rāśis (1-based index):
T_fire = {1, 5, 9}, T_earth = {2, 6, 10}, T_air = {3, 7, 11}.
(Water triad completed in 67.3.) Each set is closed under +4 mod 12 on the sign circle (trine steps). Śodhana is performed inside each set independently.

उदाहरण (worked example) Signs numbered Meṣa=1 … Mīna=12. Fire triad longitudes (sign indices only): 1, 5, 9. Earth: 2, 6, 10. Air: 3, 7, 11. Any bindu-vector B[1…12] is later reduced by operating only on the three coordinates of each triad — never mixing fire bindus with earth bindus in one subtraction step.

67.3
कर्कव्त्ऱ्श्चिकमीनाश्च थ्रिकोणाः स्युः परस्परम् ।
अढोऽढः सर्वराशीनामष्तवर्गफलं न्यसेथ्
karkavtṟścikamīnāśca thrikoṇāḥ syuḥ parasparam |
aḍho'ḍhaḥ sarvarāśīnāmaṣtavargaphalaṃ nyaseth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्क-वृश्चिक-मीनाः = कर्क, वृश्चिक, मीन; च = और; त्रिकोणाः = त्रिकोण-समूह; स्युः = होते हैं; परस्परम् = परस्पर / एक-दूसरे के; अधोऽधः = क्रमशः नीचे / अधोभाग में; सर्वराशीनाम् = सभी राशियों का; अष्टवर्गफलम् = अष्टकवर्ग-फल (प्रति-राशि बिन्दु-योग); न्यसेत् = रखना / स्थापित करना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र जल-त्रिकोण पूरा करता है — कर्क, वृश्चिक और मीन परस्पर त्रिकोण हैं। इस प्रकार चार त्रिकोण पूर्ण हुए: अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल। फिर निर्देश है कि सभी राशियों का अष्टवर्ग-फल क्रम से (अधोऽधः) रखा जाए — अर्थात् बारह राशियों के बिन्दु स्पष्ट पंक्ति/सारणी में स्थापित कर शोधन के लिए तैयार किए जाएँ।

English rendering Cancer, Scorpio and Pisces likewise form a mutual trikoṇa. One should set down, in due order, the aṣṭavarga results of all the signs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Completes the partition:
T_water = {4, 8, 12}.
Full cover of ℤ/12ℤ:
T_fire ∪ T_earth ∪ T_air ∪ T_water = {1,…,12}, pairwise disjoint.
Placement rule: write the twelve bindu counts B(r), r = 1…12, in sign order as the working vector for reduction. No subtraction formula here — only taxonomy + layout.

उदाहरण (worked example) Working row for one planet (illustrative bindus only, not a natal claim):
B = [5, 4, 3, 6, 2, 5, 4, 1, 7, 3, 2, 4] on rāśis 1…12.
Triads ready for 67.4: fire (5,2,7), earth (4,5,3), air (3,4,2), water (6,1,4). Each triple will be reduced by the min-rule of the next verse.

हमारा डिकोड (Our Decode) The four elemental triads are the exact index sets the reduction engine walks when applying Ch.67 before Ch.68 ekādhipati-śodhana. Raw Ch.66 totals (… → SAV 337) are the pre-śodhana layer; this verse’s “न्यसेत्” is the placement step that makes those per-sign bindus addressable as B[1…12].

67.4
थ्रिकोणेषु च यन्न्यूनं थथ्थुल्यं थ्रिषु शोढयेथ् ।
एकस्मिन् भवने शून्यं थथ् थ्रिकोणं न शोढयेथ्
thrikoṇeṣu ca yannyūnaṃ thaththulyaṃ thriṣu śoḍhayeth |
ekasmin bhavane śūnyaṃ thath thrikoṇaṃ na śoḍhayeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोणेषु = त्रिकोण-राशियों में; यत् न्यूनम् = जो न्यूनतम हो; तत् तुल्यम् = उसके बराबर; त्रिषु = तीनों में; शोधयेत् = शोधन करे / घटाए; एकस्मिन् भवने = एक भी भाव/राशि में; शून्यम् = शून्य (बिन्दु = 0); तत् त्रिकोणम् = उस (सम्पूर्ण) त्रिकोण को; न शोधयेत् = शोधन न करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की केन्द्रीय गणितीय नियम यही है। किसी त्रिकोण की तीन राशियों में जो सबसे छोटा बिन्दु-मान है, उतना ही तीनों से समान रूप से घटाओ। यदि तीनों में से किसी एक राशि का मान पहले से शून्य है, तो उस सम्पूर्ण त्रिकोण पर शोधन मत करो — त्रिकोण अछूता रहता है। यह घटाव फल का “निश्चय” नहीं, अपितु अष्टकवर्ग-शोधन की शास्त्रोक्त प्रक्रिया है।

English rendering In each trikoṇa, subtract from all three houses a quantity equal to the least among them. If any one house in the triad is zero, that trikoṇa is not to be purified.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) For a triad with bindus (a, b, c) ∈ ℕ₀³:
• if min(a,b,c) = 0 → leave (a,b,c) unchanged;
• else m = min(a,b,c), set (a′,b′,c′) = (a−m, b−m, c−m).
Invariant: a′+b′+c′ = a+b+c − 3m, and at least one of a′,b′,c′ is 0 when m>0.
Applies independently to each of T_fire, T_earth, T_air, T_water.
(When a=b=c>0 the same formula zeros all three; verse 67.5 states that case explicitly.)

उदाहरण (worked example) Fire triad before śodhana: (5, 2, 7).
m = min(5,2,7) = 2 ≠ 0 → after: (3, 0, 5).
Water triad: (6, 0, 4). min = 0 → no reduction; remains (6, 0, 4).
Earth: (4, 5, 3) → m=3 → (1, 2, 0).
Air: (3, 4, 2) → m=2 → (1, 2, 0).
Net bindus removed from this planet’s row: 3×2 + 0 + 3×3 + 3×2 = 6+0+9+6 = 21 (each reduced triad loses 3m).

हमारा डिकोड (Our Decode) This is the exact arithmetic of Ch.67 trikoṇa-śodhana in the aṣṭakavarga pipeline: min-subtraction per elemental triad, with the zero-guard that freezes a whole triad. It sits between the pinned Ch.66 tables (exact `==` totals) and Ch.68 ekādhipati-śodhana; no tolerance band — each triad either reduces by m or is left identical.

67.5
समथ्वे सर्वगेहेषु सर्वं संशोढयेध् बुढः ।
पश्चाथ् विपश्चिथा कार्यमेकाढिपथिशोढनम्
samathve sarvageheṣu sarvaṃ saṃśoḍhayedh buḍhaḥ |
paścāth vipaścithā kāryamekāḍhipathiśoḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समत्वे = समान होने पर; सर्वगेहेषु = तीनों भावों/राशियों में; सर्वम् = सब (सम्पूर्ण बिन्दु); संशोधयेत् = पूर्णतः शोधित करे; बुधः = बुद्धिमान् ज्योतिषी; पश्चात् = उसके बाद; विपश्चिता = विद्वान् द्वारा; कार्यम् = करना चाहिए; एकाधिपतिशोधनम् = एकाधिपति-शोधन (एक स्वामी की दो राशियों का शोधन — अगला अध्याय)।

हिन्दी भावार्थ यदि त्रिकोण की तीनों राशियों के बिन्दु बराबर हों, तो शास्त्र कहता है कि बुद्धिमान् उस समान राशि को तीनों से हटा दे — अर्थात् तीनों शून्य हो जाएँ (67.4 के m = a = b = c से यही सिद्ध होता है)। त्रिकोण-शोधन पूरा होने के पश्चात् ही एकाधिपति-शोधन करना है। क्रम बाँध दिया गया: पहले त्रिकोण, फिर एकाधिपति।

English rendering When the three houses of a trikoṇa are equal, the wise should reduce them all (to zero). Thereafter the learned should perform the ekādhipati purification.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Special case of 67.4: if a = b = c = k ≥ 0, then m = k and (a′,b′,c′) = (0,0,0).
(If k = 0 already, the zero-guard of 67.4 also leaves them unchanged — same end state.)
Pipeline order (mandatory):

trikoṇa-śodhana (Ch.67) → ekādhipati-śodhana (Ch.68).
Do not reverse. Ekādhipati acts on dual-lordship pairs after triads are cleaned.

उदाहरण (worked example) Air triad equal: (4, 4, 4).
m = 4 → after trikoṇa-śodhana: (0, 0, 0).
Fire unequal already reduced e.g. to (3, 0, 5) — left as is for this step.
Only when all four triads have been processed does one begin Ch.68 ekādhipati-śodhana on the dual-owned sign pairs (Meṣa–Vṛścika for Mars, etc.), which is outside this verse’s formula but fixed as the next operation.

हमारा डिकोड (Our Decode) Dossier order matches the śāstra: Ch.66 tables → Ch.67 trikoṇa-śodhana → Ch.68 ekādhipati-śodhana, each reducing the working bindus before phala. Equal-triad wipe-to-zero is not a separate algorithm; it is the min-rule with m = common value, then hand-off to ekādhipati exactly as “पश्चात् … एकाधिपतिशोधनम्” states.

67.67
अठ थ्रिकोणशोढनाढ्यायः
aṭha thrikoṇaśoḍhanāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब / (अध्याय-संकेत); त्रिकोणशोधन = त्रिकोण-शोधन; अध्यायः = अध्याय। (पाठ “अठ … अध्यायः” — अथ त्रिकोणशोधनाध्यायः; पाठ-भेद / लिप्यंतरण-विकृति संभव।)

हिन्दी भावार्थ यह पंक्ति त्रिकोण-शोधन अध्याय का शीर्षक/उपसंहार-संकेत है। विषय-सीमा स्पष्ट होती है — अष्टकवर्ग में त्रिकोण-शुद्धि का यह अध्याय यहीं बँधता है; अगला चरण एकाधिपति-शोधन का है।

English rendering Thus (is marked) the chapter on trikoṇa-śodhana.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-शीर्षक / समाप्ति-संकेत। यह गणना नहीं सिखाता; Ch.67 की विषय-सीमा नामित करता है, जिसके भीतर 67.1–67.5 की त्रिकोण-परिभाषा और min-शोधन लागू होते हैं।

अध्यायः 68

अथैकाधिपत्यशोधनाध्यायः

7 श्लोक
68.1
पूर्वं थ्रिकोणं संशोढ्य राशीनां स्ठापयेथ् फलम् ।
प्त्ऱ्ठक् प्त्ऱ्ठक् थथः कुर्याधेकाढिपथिशोढनम्
pūrvaṃ thrikoṇaṃ saṃśoḍhya rāśīnāṃ sṭhāpayeth phalam |
ptṟṭhak ptṟṭhak thathaḥ kuryādhekāḍhipathiśoḍhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वम् = पहले (सर्वप्रथम); त्रिकोणम् = त्रिकोण-राशि-समूह (कोई राशि तथा उससे 5वीं व 9वीं), अर्थात् त्रिकोण-शोधन (अध्याय 67); संशोध्य = शोधन करके; राशीनाम् = बारह राशियों का; स्थापयेत् फलम् = शेष बिन्दु-फल (रेखा) स्थापित करे; पृथक् पृथक् = अलग-अलग, हर स्वामी-युग्म के लिए स्वतन्त्र रूप से; ततः = तदनन्तर; कुर्यात् एकाधिपति-शोधनम् = एकाधिपत्य-शोधन करे — एक ही ग्रह के अधिपत्य वाली दो राशियों (द्विस्वामी-युग्म) का शोधन।

हिन्दी भावार्थ सर्वाष्टकवर्ग में पहले राशियों का त्रिकोण-शोधन (अध्याय 67) पूरा करके जो बिन्दु-फल शेष रहें, उन्हें स्थापित करो। इसके बाद प्रत्येक द्विस्वामी-युग्म को अलग-अलग लेकर एकाधिपत्य-शोधन करना चाहिए। यह अध्याय सर्वाष्टकवर्ग को फल-कथन से पूर्व दूसरी बार परिष्कृत करने की विधि बताता है — क्रम निश्चित है: पहले त्रिकोण, फिर एकाधिपत्य।

English rendering First complete the trikoṇa-reduction of the signs and set down the remaining bindu-figures; thereafter, taking each pair separately, one should perform the ekādhipatya (common-lordship) reduction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह शोधन-क्रम का पहला चरण घोषित करता है। संस्कार-क्रम (pipeline):
सर्वाष्टकवर्ग (SAV) → त्रिकोण-शोधन (Ch.67) → एकाधिपत्य-शोधन (Ch.68) → पिण्ड।
एकाधिपत्य केवल उन्हीं राशियों पर लागू है जिनके दो-दो स्वामी एक ही ग्रह हैं (द्विस्वामी-युग्म):
मेष–वृश्चिक (मंगल), वृष–तुला (शुक्र), मिथुन–कन्या (बुध), धनु–मीन (गुरु), मकर–कुम्भ (शनि) — कुल 5 युग्म।
कर्क (चन्द्र) व सिंह (सूर्य) एकस्वामी हैं, अतः इस शोधन से मुक्त (देखें 68.6)। प्रत्येक युग्म को "पृथक् पृथक्" — स्वतन्त्र रूप से — निपटाया जाता है; किसी एक युग्म का शोधन दूसरे को प्रभावित नहीं करता।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वही परिष्करण है जिसे हमारे kaal-verification-oracle में Ch.67 (त्रिकोण) व Ch.68 (एकाधिपत्य) के रूप में SAV = 337 पर, फल-कथन से पहले, लागू किया गया है। हमने बिन्दु-योग को exact `==` पर पिन किया — कोई सहनशीलता-पट्टी (tolerance band) नहीं, क्योंकि ±3 की पट्टी एक बार अष्टकवर्ग में असली −1 को छिपा गई थी। शोधन गणित है, फल व्याख्या — दोनों को अलग रखना ही अनुशासन है।

68.2
क्षेथ्रध्वये फलनि स्युस्थधा संशोढयेध् यठा ।
क्षीणेन सह चान्यस्मिन् शुढयेध् ग्रहवर्जिथे
kṣethradhvaye phalani syusthadhā saṃśoḍhayedh yaṭhā |
kṣīṇena saha cānyasmin śuḍhayedh grahavarjithe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षेत्र-द्वये = एक ग्रह के दोनों राशियों में; फलानि स्युः = फलांक/बिन्दु हों; तथा … यथा = इस प्रकार; संशोधयेत् = शोधन करे; क्षीणेन सह = न्यूनतर (क्षीण) फलांक के साथ; अन्यस्मिन् = दूसरी राशि में; ग्रह-वर्जिते = जो ग्रह-रहित हो; शोधयेत् = शुद्ध/सम करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब एक स्वामी की दोनों राशियों में फलांक हों, तो शोधन इस नियम से हो: न्यूनतर पक्ष को मापदण्ड मानकर, ग्रह-रहित दूसरी राशि को उसके साथ सम या उसी मापदण्ड से शुद्ध किया जाए। अगले श्लोक इसी नियम के उप-प्रकरण खोलते हैं।

English rendering The text states that when both fields (signs) of a lord carry phala, reduction is done thus: using the lesser figure as the measure, purify the other — the one free of graha — in step with that lesser amount.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एकाधिपत्य-युग्म \( (R_1, R_2) \), फलांक \( f_1, f_2 \) (त्रिकोण-शोधन के बाद)।
सामान्य “क्षीण-मापदण्ड” (ग्रह-रहित पक्ष पर, 68.3–68.4 के साथ पढ़ें):
\( f<sub>\min</sub> = \min(f_1, f_2) \)।
ग्रह-वर्जित राशि \( R_e \) पर: \( f_e \leftarrow f<sub>\min</sub> \) (अर्थात् \( f_e \) को ऊन के बराबर लाएँ — “ऊनेन समम्”, 68.4), जब शर्तें 68.3–68.4 पूरी हों।
यदि दोनों में ग्रह हों → 68.3: शोधन नहीं।
सङ्ख्याएँ श्लोक से नहीं; केवल समीकरण-रूप।

उदाहरण (worked example) मङ्गल-युग्म: मेष \( f=4 \), वृश्चिक \( f=7 \); मेष में ग्रह है, वृश्चिक ग्रह-वर्जित (परम्परागत ग्रह-स्थिति; ayanāṃśa केवल ग्रह-निर्देश के लिए — फलांक स्वयं aṣṭakavarga rekha से)। 68.3–68.4 के अनुसार ग्रह-युक्त ऊन (4), ग्रह-वर्जित अधिक (7) → \( f_{\text{वृश्चिक}} \leftarrow 4 \)। दोनों में से 3 बिन्दु घटते हैं।

68.3
उभयोर्ग्रहसंयोगे न संशोढ्यः कधाचन् ।
ग्रहयुक्थे फलैर्हीने ग्रहाभावे फलाढिके
ubhayorgrahasaṃyoge na saṃśoḍhyaḥ kadhācan |
grahayukthe phalairhīne grahābhāve phalāḍhike

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उभयोः = दोनों राशियों में; ग्रह-संयोगे = ग्रह स्थित हों; न संशोध्यः कदाचन = कभी शोधन न करे; ग्रह-युक्ते = ग्रह सहित राशि में; फलैः हीने = फलांक कम हों; ग्रह-अभावे = ग्रह-रहित में; फल-अधिके = फलांक अधिक हों (अगला श्लोक क्रिया पूरा करता है)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो स्पष्ट स्थितियाँ बाँटता है। पहली: यदि एकाधिपति-युग्म की दोनों राशियों में ग्रह हों, तो एकाधिपति-शोधन कभी नहीं होता — फलांक ज्यों के त्यों रहते हैं। दूसरी स्थिति का आरम्भ: जब ग्रह-युक्त राशि फलांक में हीन हो और ग्रह-रहित अधिक हो — उसका कर्म 68.4 में पूरा होता है।

English rendering The text states that when both signs of a pair are occupied by grahas, ekādhipatya reduction is never applied. It then opens the case in which the occupied sign is poorer in phala and the unoccupied richer — completed in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नियम (boolean gate):
यदि \( \mathrm{occ}(R_1)=\mathrm{true} \) और \( \mathrm{occ}(R_2)=\mathrm{true} \) → \( f_1, f_2 \) अपरिवर्तित (शोधन = 0)।
अगला प्रकरण: \( \mathrm{occ}(R_g)=\mathrm{true},\; \mathrm{occ}(R_e)=\mathrm{false},\; f_g < f_e \) → 68.4 का “ऊनेन समम्”।
“occ” = जन्म-लग्न कुण्डली में उस राशि में कोई ग्रह (परम्परा में प्रायः 7 ग्रह; राहु/केतु पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) शुक्र-युग्म: वृषभ में शुक्र+बुध (\( f=5 \)), तुला में मङ्गल (\( f=3 \)) — दोनों occupied → शोधन नहीं; \( (5,3) \) ज्यों के त्यों।
दूसरा: मिथुन \( f=2 \) (बुध स्थित), कन्या \( f=6 \) (रिक्त) → \( f_g < f_e \) → 68.4 लागू।

68.4
ऊनेन सममन्यस्मिन् शोढयेध् ग्रहवर्जिथे ।
फलाढिके ग्रहैर्युक्थे चान्यस्मिन् सर्वमुथ्स्त्ऱ्जेथ्
ūnena samamanyasmin śoḍhayedh grahavarjithe |
phalāḍhike grahairyukthe cānyasmin sarvamuthstṟjeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊनेन समम् = न्यूनतर के बराबर; अन्यस्मिन् = दूसरी (ग्रह-वर्जित) राशि में; शोधयेत् = शोधन करे; ग्रह-वर्जिते = ग्रह-रहित पक्ष; फल-अधिके ग्रहैः युक्ते = जब ग्रह-युक्त पक्ष फलांक में अधिक हो; च अन्यस्मिन् = और दूसरी में; सर्वम् उत्सृजेत् = सारा फलांक छोड़ दे / शून्य करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (68.3 के क्रम में) ग्रह-युक्त ऊन हो और ग्रह-रहित अधिक, तो ग्रह-रहित को ऊन के बराबर लाकर शुद्ध करें। इसके विपरीत, यदि ग्रह-युक्त राशि ही फलांक में अधिक हो, तो ग्रह-रहित राशि का सारा फल त्याग दिया जाए।

English rendering The text states: equalize the planet-free sign to the lesser (occupied) figure and purify; but when the occupied sign holds the greater phala, discard the entire phala of the other (empty) sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) \( R_g \) = ग्रह-युक्त, \( R_e \) = ग्रह-वर्जित, दोनों में \( f>0 \) (क्षेत्रद्वये फलानि):
- यदि \( f_g < f_e \): \( f_e \leftarrow f_g \) (ऊनेन समम्)
- यदि \( f_g > f_e \): \( f_e \leftarrow 0 \) (सर्वमुत्सृजेत्)
- यदि \( f_g = f_e \): → 68.5 (सग्रहाग्रहयोस्तुल्ये)
घटौती केवल \( R_e \) पर; \( f_g \) अछूता।

उदाहरण (worked example) (क) गुरु-युग्म: धनु \( f_g=3 \) (गुरु स्थित), मीन \( f_e=8 \) (रिक्त) → \( f_e \leftarrow 3 \)।
(ख) शनि-युग्म: मकर \( f_g=6 \) (शनि स्थित), कुम्भ \( f_e=2 \) (रिक्त) → \( f_e \leftarrow 0 \)।
फलांक Ch.67 के बाद के rekha माने; ग्रह-स्थिति D1 (राशि-कुण्डली) से।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक एकाधिपत्य की मुख्य द्वि-शाखा recude rule है — “सम-करो” बनाम “सर्व-त्याग”। Ch.66 की 337 SAV exact-`==` पिन शोधन-पूर्व totals की है; फल-प्रयोग से पहले Ch.67–68 की ऐसी घटौतियाँ लगती हैं। Convention अलग होने पर (ग्रह-परिभाषा, पाठ) silent ±band नहीं — exact state की घोषणा।

68.5
उभयथ्र ग्रहभावे समथ्वे सकलं थ्यजेथ् ।
सग्रहाग्रहयोस्थुल्ये सर्वं संशोढ्यमग्रहे
ubhayathra grahabhāve samathve sakalaṃ thyajeth |
sagrahāgrahayosthulye sarvaṃ saṃśoḍhyamagrahe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उभयत्र ग्रह-अभावे = दोनों राशियों में ग्रह न होने पर; समत्वे = बिन्दु समान होने पर; सकलम् त्यजेत् = सम्पूर्ण (दोनों का) त्याग कर दे; सग्रह-अग्रहयोः = ग्रह-सहित और ग्रह-रहित (राशियों) के; तुल्ये = फल तुल्य (समान) होने पर; सर्वम् संशोध्यम् = सब घटा दिया जाए; अग्रहे = ग्रह-रहित राशि में।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों राशियाँ ग्रह-रहित हों और उनके बिन्दु समान हों, तो दोनों के सारे फल त्याग दो (दोनों शून्य)। और जब एक ग्रह-सहित तथा दूसरी ग्रह-रहित राशि के फल समान हों, तो ग्रह-रहित राशि में सारे बिन्दु घटा दो (उसे शून्य कर दो), जबकि ग्रह-सहित राशि अक्षत रहती है।

English rendering When both signs are planet-devoid and equal, discard all in both; when an occupied and a devoid sign hold equal figures, reduce all away in the planet-devoid one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रकरण-नियम, भाग 3 (समता की दशाएँ):
• दोनों रिक्त तथा a = b → दोनों := 0 (सकलम् त्यजेत्)।
• एक अधिष्ठित p, एक रिक्त q, तथा p = q → रिक्त q := 0; अधिष्ठित p अपरिवर्तित।
इससे पूर्ण प्रकरण-सारणी बनती है (p = अधिष्ठित, q = रिक्त, दोनों त्रिकोण-शोधित मान):

| स्थिति | दशा | परिणाम |
|---|---|---|
| दोनों अधिष्ठित | कोई भी | अपरिवर्तित |
| एक अधिष्ठित p, एक रिक्त q | p < q | q := p |
| — | p > q | q := 0 |
| — | p = q | q := 0 |
| दोनों रिक्त | a ≠ b | दोनों := min(a,b) |
| दोनों रिक्त | a = b | दोनों := 0 |

उदाहरण (worked example) मकर–कुम्भ युग्म (स्वामी शनि)।
(i) दोनों रिक्त, मकर = 4, कुम्भ = 4 → समान → दोनों = 0।
(ii) मकर ग्रह-सहित = 4, कुम्भ रिक्त = 4 → तुल्य → कुम्भ = 0, मकर = 4 यथावत्।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ "शून्य कर देना" ठीक वही सटीक-शून्यन है जिसे हमने exact `==` पर सत्यापित किया — कोई सहनशीलता-पट्टी नहीं। जब शास्त्र "सर्वं त्यजेत्" कहता है तो मान बिलकुल 0 होता है, ≈0 नहीं; यही अनुशासन अष्टकवर्ग के छिपे −1 को उजागर करने में निर्णायक रहा।

68.6
कुलीरसिंहयो राश्योः प्त्ऱ्ठक् क्षेथ्रं प्त्ऱ्ठक् फलम् ।
संशोढ्यैकाढिपथ्यं हि थथः पिण्दं प्रसाढयेथ्
kulīrasiṃhayo rāśyoḥ ptṟṭhak kṣethraṃ ptṟṭhak phalam |
saṃśoḍhyaikāḍhipathyaṃ hi thathaḥ piṇdaṃ prasāḍhayeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुलीर = कर्क राशि (Cancer); सिंह = सिंह राशि (Leo); कुलीर-सिंहयोः राश्योः = कर्क व सिंह — इन दो राशियों का; पृथक् क्षेत्रम् = क्षेत्र (राशि) अलग; पृथक् फलम् = बिन्दु-फल भी अलग (स्वतन्त्र, कोई युग्म नहीं); संशोध्य एकाधिपत्यम् हि = इस प्रकार एकाधिपत्य-शोधन पूरा करके; ततः पिण्डम् प्रसाधयेत् = तदनन्तर पिण्ड (कुल योग) सिद्ध करे।

हिन्दी भावार्थ कर्क और सिंह — इन दोनों राशियों का क्षेत्र और फल स्वतन्त्र (पृथक्) रखो, क्योंकि इनके एक-एक ही स्वामी (चन्द्र, सूर्य) हैं, कोई द्विस्वामी-युग्म नहीं बनता; अतः इन पर एकाधिपत्य-शोधन लागू नहीं होता। इस तरह सारा एकाधिपत्य-शोधन पूर्ण करके फिर सम्पूर्ण पिण्ड (कुल बिन्दु-योग) निकालो।

English rendering For Cancer and Leo keep the sign and its figure separate (they have single lords and form no pair); having thus completed the ekādhipatya-reduction, then work out the piṇḍa (the total).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एकस्वामी राशियाँ कर्क (चन्द्र) व सिंह (सूर्य) युग्म-रहित हैं → इन पर 68.2–68.5 का कोई नियम नहीं; इनके शोधित मान = त्रिकोण-शोधित मान (अपरिवर्तित)। सारे 5 द्विस्वामी-युग्म + ये 2 एकस्वामी राशियाँ = 12 राशियाँ। अन्तिम पिण्ड:
पिण्ड = Σᵢ₌₁¹² (एकाधिपत्य-शोधित बिन्दुᵢ)
यही परिष्कृत सर्वाष्टकवर्ग-योग है, जिस पर आगे फल-कथन आधारित होता है।

उदाहरण (worked example) मान लो शोधन के बाद 5 युग्मों के मान क्रमशः (2,2), (3,3), (2,0), (0,0), (4,0) रहे, और एकस्वामी कर्क = 5, सिंह = 6 यथावत्। तब पिण्ड = (2+2)+(3+3)+(2+0)+(0+0)+(4+0)+5+6 = 4+6+2+0+4+11 = 27 (यह केवल विधि-दर्शक संख्या है; वास्तविक कुण्डली-सापेक्ष नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पिण्ड" ही वह अन्तिम राशि-योग है जिसे हमने सर्वाष्टकवर्ग की मानक निर्दिष्ट संख्या — 7 ग्रहों का SAV = 337 (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39) — के विरुद्ध exact `==` पर पिन किया। कर्क व सिंह को युग्म-मुक्त रखने की यह शास्त्रीय शर्त हमारे oracle में भी घोषित convention है, ताकि शोधन-गणना बिना मौन-चयन के पुनरुत्पाद्य रहे। शोधन गणित है; इसका फल शास्त्र की अपनी उक्ति — भविष्य-कथन नहीं।

68.68
अठैकाढिपथ्यशोढनाढ्यायः
aṭhaikāḍhipathyaśoḍhanāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (इति, समाप्ति-सूचक); एकाधिपत्य-शोधन = एक ही अधिपति की दो राशियों का बिन्दु-शोधन; अध्यायः = अध्याय (समाप्त)। — यह पुष्पिका (colophon) है।

हिन्दी भावार्थ "इस प्रकार एकाधिपत्य-शोधन नामक अध्याय (समाप्त)।" यह अध्याय का समापन-वाक्य (पुष्पिका) है, कोई विधि-वचन नहीं — यह केवल घोषित करता है कि सर्वाष्टकवर्ग के दूसरे परिष्कार, एकाधिपत्य-शोधन, का प्रकरण यहाँ पूर्ण हुआ।

English rendering Thus [ends] the chapter on the ekādhipatya (common-lordship) reduction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-समाप्ति (पुष्पिका / colophon)। पूरे अध्याय का सार यही कि त्रिकोण-शोधन के पश्चात् द्विस्वामी-युग्मों पर प्रकरण-सारणी लगाकर, कर्क–सिंह को मुक्त रखकर, परिष्कृत पिण्ड सिद्ध किया जाता है — तत्पश्चात् ही फल-विचार आरम्भ होता है।

अध्यायः 69

पिण्डसाधनाध्यायः

5 श्लोक
69.1
एवं शोढ्यावशेषाङ्कं राशिमानेन वर्ध्ढयेथ् ।
ग्रहयुक्थे च थध्राशौ ग्रहमानेन वर्ध्ढयेथ्
evaṃ śoḍhyāvaśeṣāṅkaṃ rāśimānena vardhḍhayeth |
grahayukthe ca thadhrāśau grahamānena vardhḍhayeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार (शोधन के बाद); शोध्य-अवशेष-अङ्कम् = शोधन-क्रिया (त्रिकोण Ch.67 + एकाधिपत्य Ch.68) के पश्चात् प्रत्येक राशि में शेष बचे बिन्दु-अंक (śodhita bindu); राशिमानेन = राशि-गुणकाङ्क से (उस राशि का अपना गुणक); वर्धयेत् = गुणा करे / बढ़ाए; ग्रहयुक्ते तद्राशौ = जिस राशि में ग्रह स्थित हो, उस राशि में; ग्रहमानेन = ग्रह-गुणकाङ्क से (उस ग्रह का अपना गुणक)।

हिन्दी भावार्थ शोधन पूर्ण होने पर जो बिन्दु-अंक प्रत्येक राशि में शेष रहते हैं, उन्हें उस राशि के अपने 'राशिमान' (गुणक) से गुणा करना चाहिए — यही राशि-पिण्ड की रचना का पहला चरण है। और जिस राशि में कोई ग्रह बैठा हो, वहाँ उन्हीं शेष बिन्दुओं को उस ग्रह के 'ग्रहमान' (गुणक) से भी गुणा करना चाहिए — यही ग्रह-पिण्ड की रचना है। इस प्रकार पिण्ड-साधन की दो समानांतर धाराएँ — राशि-पिण्ड और ग्रह-पिण्ड — यहाँ आरम्भ होती हैं।

English rendering After the reductions are complete, multiply the bindus remaining in each sign by that sign's own multiplier (the rāśi-guṇaka); and in whichever sign a planet stands, multiply those same remaining bindus also by that planet's multiplier (the graha-guṇaka).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मान लें bᵢ = राशि i में शोधित बिन्दु (i = 1…12), Rᵢ = राशि-गुणक, Gₚ = ग्रह-गुणक।
- राशि-पिण्ड-अंश (प्रति राशि) = bᵢ × Rᵢ
- ग्रह-पिण्ड-अंश (ग्रह-युक्त राशि में) = bₚ × Gₚ, जहाँ bₚ = ग्रह P की राशि में शोधित बिन्दु
कुल: राशि-पिण्ड = Σᵢ (bᵢ × Rᵢ); ग्रह-पिण्ड = Σₚ (bₚ × Gₚ)।
अभिसमय: बिन्दु किसी एक ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग (BPHS Ch.66) से लिए जाते हैं, त्रिकोण-शोधन (Ch.67) व एकाधिपत्य-शोधन (Ch.68) के बाद।

उदाहरण (worked example) मान लें शोधन के बाद वृषभ राशि (R = 10) में 4 बिन्दु शेष हैं → राशि-पिण्ड-अंश = 4 × 10 = 40। यदि उसी वृषभ में गुरु (G = 10) स्थित हो → ग्रह-पिण्ड-अंश = 4 × 10 = 40।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह 'शोध्यावशेष' वही घटा हुआ पूर्णांक-समुच्चय है जिसकी मूल-सारणियों को हमारी kaal-verification-oracle Ch.66 पर == से पिन करती है (सूर्य 48, चन्द्र 49, … SAV 337), जिसके बाद Ch.67-68 का शोधन उन्हें घटाता है। पिण्ड-साधन उसी घटे हुए समुच्चय पर विशुद्ध पूर्णांक-गुणन है — यहाँ कोई सहनशीलता-बैंड नहीं, केवल == (एक बार ±3 बैंड ने असली −1 छिपा दिया था)।

69.2
सर्वेषां च पुनर्योगः पिण्दाख्यः कठ्यथे ध्विज ।
गोसिंहौ धशभिर्गुण्यौ वसुभिर्युग्मव्त्ऱ्श्चिकौ
sarveṣāṃ ca punaryogaḥ piṇdākhyaḥ kaṭhyathe dhvija |
gosiṃhau dhaśabhirguṇyau vasubhiryugmavtṟścikau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वेषां योगः = सब गुणन-फलों का योग; पिण्डाख्यः = “पिण्ड” नाम से कहा गया; द्विज = हे द्विज (शिष्य-संबोधन); गो = वृषभ; सिंह = सिंह; दशभिः = 10 से; गुण्यौ = दोनों गुणित हों; वसुभिः = 8 से (वसु = 8); युग्म = मिथुन; वृश्चिक = वृश्चिक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सभी राशि-गुणन और ग्रह-गुणन का पुनः योग ही “पिण्ड” कहलाता है। राशिमानों में से वृषभ और सिंह को दस से गुणित करें; मिथुन और वृश्चिक को आठ (वसु) से। यह भूतसंख्या-निबद्ध राशि-गुणक-सूची का आरम्भ है।

English rendering The sum of all those products is called the piṇḍa, O twice-born. Multiply Taurus and Leo by ten; Gemini and Scorpio by eight (vasu).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Piṇḍa = Σ Pᵣ(i) + Σ P𝑔 (over signs and conjunct planets). Rāśi multipliers begun here (bhūtasaṃkhyā-faithful):
- Vṛṣabha (2), Siṃha (5): Mᵣ = 10
- Mithuna (3), Vṛścika (8): Mᵣ = 8 (vasu = 8)
Remaining Mᵣ values continue in 69.3.

उदाहरण (worked example) Residual in Taurus b = 3 → Pᵣ = 3 × 10 = 30. Residual in Gemini b = 2 → Pᵣ = 2 × 8 = 16. These enter the total piṇḍa sum with the other ten signs and any graha-products.

हमारा डिकोड (Our Decode) पिण्ड aṣṭakavarga-फल-श्रृंखला का संख्यात्मक संक्षेपण है; Ch.66 के 48/49/39/54/56/52/39 totals और SAV 337 के बाद शोधन-शेष पर यही गुणक लगते हैं। Oracle-discipline: गुणक शास्त्रोक्त स्थिरांक हैं — `==` 10 और `==` 8, कोई ± बैंड नहीं।

69.3
सप्थभिस्थुलमेषौ च म्त्ऱ्गकन्ये च पञ्चभिः ।
शेषाः स्वसंख्यया गुण्या ग्रहमानमठोच्यथे
sapthabhisthulameṣau ca mtṟgakanye ca pañcabhiḥ |
śeṣāḥ svasaṃkhyayā guṇyā grahamānamaṭhocyathe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तभिः = 7 से; तुला = तुला; मेष = मेष; मृग = मकर (मृग = मकर); कन्या = कन्या; पञ्चभिः = 5 से; शेषाः = शेष राशियाँ; स्वसंख्यया = अपनी क्रम-संख्या से (मेष=1 … मीन=12 की स्वाभाविक संख्या); गुण्या = गुणित हों; ग्रहमान = ग्रह-माप/गुणक; अथ उच्यते = अब कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तुला और मेष को सात से गुणित करें; मकर और कन्या को पाँच से। शेष राशियाँ (कर्क, धनु, कुम्भ, मीन) अपनी स्वाभाविक संख्या से गुणित हों — अर्थात् कर्क 4, धनु 9, कुम्भ 11, मीन 12। अब ग्रहमान कहा जाता है।

English rendering Multiply Libra and Aries by seven; Capricorn and Virgo by five. The remaining signs are multiplied by their own ordinal numbers. The planetary measures are now stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Complete Mᵣ table (BPHS Ch.69, this recension):
| राशि | Mᵣ | हेतु |
|---|---|---|
| मेष (1) | 7 | तुला-मेषौ सप्तभिः |
| वृषभ (2) | 10 | गो-सिंहौ दशभिः |
| मिथुन (3) | 8 | वसुभिः |
| कर्क (4) | 4 | स्वसंख्या |
| सिंह (5) | 10 | गो-सिंहौ |
| कन्या (6) | 5 | मृग-कन्ये पञ्चभिः |
| तुला (7) | 7 | तुला-मेषौ |
| वृश्चिक (8) | 8 | वसुभिः |
| धनु (9) | 9 | स्वसंख्या |
| मकर (10) | 5 | मृग-कन्ये |
| कुम्भ (11) | 11 | स्वसंख्या |
| मीन (12) | 12 | स्वसंख्या |

“स्वसंख्या” = rāśi serial index 1…12 (मेष=1 … मीन=12), not the residual bindu count.

उदाहरण (worked example) Karka residual b = 6 → Pᵣ = 6 × 4 = 24. Mīna residual b = 1 → Pᵣ = 1 × 12 = 12. Meṣa residual b = 5 → Pᵣ = 5 × 7 = 35. Sum with the other signs’ products for the rāśi-piṇḍa portion.

69.4
जीवारशुक्रसौम्यानां धशाष्तनगसायकाः ।
पञ्च शेषग्रहाणां च मानं प्रोक्थमिधं क्रमाथ्
jīvāraśukrasaumyānāṃ dhaśāṣtanagasāyakāḥ |
pañca śeṣagrahāṇāṃ ca mānaṃ prokthamidhaṃ kramāth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीव = गुरु; आर = मंगल; शुक्र = शुक्र; सौम्य = बुध; दश = 10; अष्ट = 8; नग = 7 (नग/पर्वत = 7); सायक = 5 (काम के बाण = 5); पञ्च = 5; शेषग्रहाणाम् = शेष ग्रहों का (सूर्य, चन्द्र, शनि); मानम् = गुणक/माप; प्रोक्तम् इदम् क्रमात् = यह क्रम से कहा गया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु, मंगल, शुक्र और बुध के ग्रहमान क्रमशः दस, आठ, सात और पाँच हैं (दश-अष्ट-नग-सायक)। शेष ग्रहों — सूर्य, चन्द्रमा और शनि — का मान पाँच है। यही ग्रहमान क्रमानुसार प्रोक्त है; शोध्य-शेष अङ्क को ग्रहयुक्त राशि में इसी मान से गुणित किया जाता है।

English rendering For Jupiter, Mars, Venus, and Mercury the measures are ten, eight, seven, and five in that order (daśa–aṣṭa–naga–sāyaka). For the remaining planets the measure is five. This is the planetary measure stated in sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Graha-māna M𝑔 (bhūtasaṃkhyā-decoded, exact):
- Guru (जीव) = 10 (daśa)
- Maṅgala (आर) = 8 (aṣṭa)
- Śukra = 7 (naga = 7)
- Budha (सौम्य) = 5 (sāyaka = 5)
- Śeṣa — Sūrya, Candra, Śani = 5 each

Thus: M𝑔 ∈ {Sūrya:5, Candra:5, Maṅgala:8, Budha:5, Guru:10, Śukra:7, Śani:5}.
For planet g in rāśi i with residual bᵢ: P𝑔 = bᵢ × M𝑔.
Full piṇḍa = Σᵢ bᵢ × Mᵣ(i) + Σ𝑔 bᵢ(g) × M𝑔. (Rāhu/Ketu are not in this seven-graha māna list in the verse.)

उदाहरण (worked example) After śodhana, Jupiter’s sign has residual b = 3 → graha-product = 3 × 10 = 30. Mars in a sign with b = 4 → 4 × 8 = 32. Sun in a sign with b = 2 → 2 × 5 = 10. Add these to the twelve rāśi-products for the total piṇḍa used in later aṣṭakavarga phala/āyur-context rules of the recension.

हमारा डिकोड (Our Decode) ग्रहमान और राशिमान दोनों शुद्ध संख्या-नियम हैं — Ch.66 rekha-tables (48, 49, 39, 54, 56, 52, 39 → SAV 337) और Ch.67–68 शोधन के बाद का integer residual ही इनपुट है। Exact-`==` discipline यहाँ भी लागू: M𝑔(Guru) `==` 10, M𝑔(Maṅgala) `==` 8; नग=7 और सायक=5 भूतसंख्या का digit-faithful पाठ है, अनुमान नहीं।

69.69
अठ पिण्दसाढनाढ्यायः
aṭha piṇdasāḍhanāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (आरम्भ-सूचक मंगल-शब्द); पिण्ड-साधन = पिण्ड की सिद्धि / गणना; अध्यायः = अध्याय। → "अथ पिण्ड-साधन-अध्यायः"।

हिन्दी भावार्थ यह अध्याय-शीर्षक है — "अब पिण्ड-साधन अध्याय (आरम्भ)।" यह पंक्ति कोई गणना नहीं, बल्कि अष्टकवर्ग-प्रकरण के भीतर पिण्ड-गणना वाले अध्याय की उद्घोषणा-मात्र है। (पाठ-भेद संभव: यह पंक्ति शीर्षक/colophon के रूप में विभिन्न संस्करणों में स्थान बदलती है।)

English rendering "Now, the chapter on Piṇḍa-sādhana (the reckoning of the piṇḍa)." — a section-heading, not a verse of content.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-शीर्षक / colophon। शीर्षक स्वयं संकेत करता है कि पूरा प्रकरण एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित है — शोधित बिन्दुओं से राशि-पिण्ड व ग्रह-पिण्ड की विशुद्ध पूर्णांक-गणना।

अध्यायः 70

अथाऽष्टकवर्गफलाध्यायः

45 श्लोक
70.1
आथ्मस्वभावशक्थिश्च पिथ्त्ऱ्चिन्था रवेः फलम् ।
मनोबुध्ढिप्रसाधश्च माथ्त्ऱ्चिन्था म्त्ऱ्गाङ्कथः
āthmasvabhāvaśakthiśca pithtṟcinthā raveḥ phalam |
manobudhḍhiprasādhaśca māthtṟcinthā mtṟgāṅkathaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आत्म-स्वभाव-शक्तिः = स्वयं जातक, उसकी प्रकृति एवं बल; पितृ-चिन्ता = पिता-सम्बन्धी विचार; रवेः फलम् = सूर्य से पढ़े जाने वाले फल; मनः-बुद्धि-प्रसादः = मन, बुद्धि तथा उनकी निर्मलता/प्रसन्नता; मातृ-चिन्ता = माता-सम्बन्धी विचार; मृगाङ्कतः = चन्द्र से (मृगाङ्क = हरिण-चिह्न वाला = चन्द्र)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य से जातक का अपना स्वभाव, आत्मबल एवं पिता का विचार करना चाहिए; और चन्द्र (मृगाङ्क) से मन, बुद्धि की स्वच्छता तथा माता का। यह श्लोक अध्याय की आधारशिला रखता है — कौन-सा ग्रह किस जीवन-विषय का साक्षी बनेगा, यह यहीं से नियत होता है।

English rendering From the Sun consider the self, one's nature and strength, and the father; from the Moon (the deer-marked one) consider the mind, the clarity of intellect, and the mother.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — कारक-विन्यास (प्रत्येक ग्रह को एक जीवन-विषय सौंपने वाला वर्णन)। यह विन्यास ही आगे प्रत्येक ग्रह के अष्टकवर्ग-फल को पढ़ने की कुंजी है — सूर्याष्टकवर्ग पितृ के लिए, चन्द्राष्टकवर्ग मातृ के लिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही सूर्य और चन्द्र की तालिकाएँ हैं जिन्हें हमारे oracle ने BPHS अ.66 के अनुसार पिन किया — सूर्य की रेखा-योग 48, चन्द्र की 49, exact-`==` फिक्स्चर पर (कोई ±3 सहनशीलता नहीं, क्योंकि वह एक बार असली −1 को छिपा गई थी)। अध्याय 70 उन्हीं तालिकाओं से पितृ-मातृ का फल पढ़ता है, अतः तालिका का शुद्ध होना अनिवार्य है।

70.2
भ्राथ्त्ऱ्सथ्थ्वं गुणं भूमिं भौमेनैव विचिन्थयेथ् ।
वाणिज्यकर्म व्त्ऱ्थ्थिश्च सुह्त्ऱ्धं च बुढेन थु
bhrāthtṟsaththvaṃ guṇaṃ bhūmiṃ bhaumenaiva vicinthayeth |
vāṇijyakarma vtṟththiśca suhtṟdhaṃ ca buḍhena thu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृ-सत्त्वम् = भाइयों का बल/अस्तित्व (सत्त्व = साहस-सामर्थ्य भी); गुणम् = गुण-स्वभाव; भूमिम् = भूमि / भू-सम्पत्ति; भौमेन = मंगल से; विचिन्तयेत् = विचार करे; वाणिज्य-कर्म = व्यापार-कर्म; वृत्तिः = जीविका / आजीविका; सुहृद् = मित्र / हितैषी; बुधेन तु = बुध से ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भ्रातृ-सत्त्व, गुण और भूमि — इनका विचार मंगल से ही करना चाहिए। वाणिज्य-कर्म, वृत्ति तथा सुहृद्-सम्बन्ध बुध से विचारने चाहिए। यह पूर्व श्लोक की ही श्रृंखला है: प्रत्येक ग्रह अपने निश्चित फल-क्षेत्र का द्वार है।

English rendering The text states that siblings’ strength, qualities, and land are to be considered from Mars; trade, livelihood, and friends from Mercury.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / कारक-विभाग। मंगल–बुध के विचार-विषय का कथन; कोई अंक-सूत्र या अष्टकवर्ग-रेखा-गणना यहाँ नहीं है।

70.3
गुरुणा धेहपुष्तिञ्च विध्या पुथ्रार्ठसम्पधः ।
भ्त्ऱ्गोर्विवाहकर्माणि भोगस्ठान च वाहनम्
guruṇā dhehapuṣtiñca vidhyā puthrārṭhasampadhaḥ |
bhtṟgorvivāhakarmāṇi bhogasṭhāna ca vāhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुणा = बृहस्पति से; देह-पुष्टिम् = शरीर की पुष्टि / पोषण; विद्या = ज्ञान-शिक्षा; पुत्र-अर्थ-सम्पदः = पुत्र, अर्थ (धन) और सम्पत्ति; भृगोः = शुक्र से (भृगु = शुक्र); विवाह-कर्माणि = विवाह-सम्बन्धी कर्म; भोग-स्थानम् = भोग का स्थान / सुख-आश्रय; वाहनम् = यान / वाहन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि देह-पुष्टि, विद्या तथा पुत्र–अर्थ–सम्पद का विचार गुरु से करना चाहिए। विवाह-कर्म, भोग-स्थान और वाहन — इनका विचार शुक्र से करना चाहिए। यह कारक-श्रृंखला का अगला पद है; इस श्लोक में केवल गुरु और शुक्र के क्षेत्र दिए गए हैं (पाठ-भेद / अध्याय-क्रम में आगे अन्य ग्रह आ सकते हैं)।

English rendering The text states that bodily nourishment, learning, and the wealth of children and means are examined from Jupiter; marriage-acts, places of enjoyment, and vehicles from Venus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / कारक-विभाग। गुरु–शुक्र के फल-क्षेत्र का निरूपण; यहाँ कोई अंश-भाग, दशा-वर्ष या बल-इकाई कूटित नहीं है।

70.4
वेश्यास्थ्रीजनसंयोगं शुक्रेण च निरीक्षयेथ् ।
आयुश्च जीवनोपायं धुःखशोक भयानि च
veśyāsthrījanasaṃyogaṃ śukreṇa ca nirīkṣayeth |
āyuśca jīvanopāyaṃ dhuḥkhaśoka bhayāni ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वेश्यास्त्रीजनसंयोग = वेश्या/वेश्या-जन और स्त्री-जन से संयोग-संपर्क (पाठ: «वेश्यास्थ्री…» — स्थ्री ≈ स्त्री); शुक्रेण = शुक्र (Venus) के द्वारा/द्वारा; निरीक्षयेत् = परीक्षा/निरीक्षण करना चाहिए (पाठ: «निरीक्षयेथ्»); आयुः = आयु-अवधि/जीवन-दीर्घता; जीवनोपाय = जीवन-निर्वाह का उपाय (वृत्ति, कमाई-मार्ग); दुःख-शोक-भयानि = दुःख, शोक और भय (पाठ: «धुःख…» ≈ दुःख); च = तथा/और।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस श्लोक में शुक्र को उन विषयों का निरीक्षण-क्षेत्र बताता है जिनमें स्त्री-संपर्क, विशेषतः वेश्या-जन से संयोग, जीवन की आयु-सीमा, आजीविका का उपाय, तथा दुःख–शोक–भय की धाराएँ आती हैं। कहने का भाव यह है कि इन फल-विषयों को शुक्र की स्थिति, दृष्टि, योग और (इस प्रकरण में) शुक्राष्टकवर्ग आदि के संकेत से देखा जाए। यह फल-निर्देश का सूची-वचन है, न कि कोई स्वतंत्र गणना-सूत्र।

English rendering The text states that association with courtesans and other women, longevity, means of livelihood, and the experiences of sorrow, grief, and fear are to be examined through Venus (Śukra). It assigns these themes to Venus’s domain of scrutiny rather than stating a numeric rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-विषय-निर्देश (शुक्र-क्षेत्र के परीक्षा-पद)। यह श्लोक शुक्र से देखने योग्य विषयों की सूची देता है; कोई वार्ग-विभाजन, बिन्दु-तालिका, दशा-वर्ष या बल-इकाई यहाँ नहीं कही गई। (सन्दर्भ-परम्परा: अष्टकवर्ग-प्रकरण Adhyāya 66–72 में शुक्र-बिन्दु-योग शास्त्रानुसार 52 — वह Ch.66 की तालिका का परिणाम है, इस श्लोक का प्रत्यक्ष सूत्र नहीं।)

70.5
सर्वक्षयं च मरणं मन्धेनैव निरीक्षयेथ् ।
थथ्थध्भावफलाङ्केन गुणयेध् योगपिण्दकम्
sarvakṣayaṃ ca maraṇaṃ mandhenaiva nirīkṣayeth |
thaththadhbhāvaphalāṅkena guṇayedh yogapiṇdakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-क्षय = सर्वनाश / पूर्ण हानि; मरण = मृत्यु (शास्त्र-कथन); मन्द = शनि; निरीक्षयेत् = विचारे; तत्-तद्-भाव-फलाङ्क = उस-उस भाव का फल-अंक (बिन्दु-संख्या); गुणयेत् = गुणा करे; योग-पिण्डक = योगपिण्ड (अष्टकवर्ग-संस्कार से प्राप्त अंक)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सर्व-क्षय और मरण का विचार शनि से ही करें। फिर तकनीक: योगपिण्ड को उस भाव के फल-अंक (बिन्दु-संख्या) से गुणा करें। यह अष्टकवर्ग-फल की गणना-पद्धति का सूत्र-पद है — फल-शब्द शास्त्र के हैं, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that total loss and death are to be examined through Saturn alone; then: multiply the yoga-piṇḍa by the phala-aṅka (bindu count) of the relevant bhāva.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
योगपिण्ड × भाव-फलाङ्क (बिन्दु)
यहाँ गुणनफल P = Y × B, जहाँ
- Y = योगपिण्ड (त्रिकोण-शोधन / एकाधिपत्य-शोधन के बाद प्राप्त, परंपरा-निर्भर),
- B = संबंधित भाव में ग्रह/सर्वाष्टकवर्ग के बिन्दु।
अगला श्लोक P ÷ 27 का शेष देता है। सम्मेलन घोषित करें: किस अष्टकवर्ग-सारणी (BPHS Ch.66 आदि) से B लिया गया।

उदाहरण (worked example) मान लें योगपिण्ड Y = 112, चतुर्थ भाव में बिन्दु B = 5।
P = 112 × 5 = 560।
(अगले श्लोकानुसार 560 ÷ 27: 27 × 20 = 540, शेष = 20 — नक्षत्र/ऋक्ष-निर्देश के लिए।)
सम्मेलन: बिन्दु BPHS Ch.66-परंपरा से; योगपिण्ड शोधन-विधि पर निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग Ch.66 में ग्रह-रेखा योग (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV 337) exact-`==` फिक्स्चर पर पिन हैं। भाव-फलाङ्क B उसी सारणी-परंपरा से आता है; ±टॉलरेंस से छिपा −1 पहले सिद्ध हो चुका — अतः B और Y दोनों पर `==` अनुशासन।

70.6
सप्थविंशओढ्त्ऱ्थं शेषथुल्यर्क्षे याथि भानुजः ।
यधा थधा थस्य थस्य भावस्यार्थि विनिर्धिशेथ्
sapthaviṃśaoḍhtṟthaṃ śeṣathulyarkṣe yāthi bhānujaḥ |
yadhā thadhā thasya thasya bhāvasyārthi vinirdhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तविंश = 27; उद्धृत = भाग देने पर; शेष = शेषफल; तुल्य-ऋक्ष = शेष-समान ऋक्ष (नक्षत्र; कहीं राशि-पाठ भी); याति = जाता है; भानुज = सूर्य-पुत्र = शनि; यथा तथा = जैसे-तैसे / तदनुसार; तस्य तस्य भावस्य अर्थम् = उस-उस भाव का फलार्थ; विनिर्दिशेत् = निर्दिष्ट करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (पूर्व श्लोक का गुणनफल) सत्ताईस से भाग देने पर जो शेष रहे, उसके तुल्य ऋक्ष में शनि “जाता” है — अर्थात् फल-निर्देश उस ऋक्ष से जोड़ें। उसी रीति से प्रत्येक भाव का अर्थ निर्दिष्ट करें। “भानुज” यहाँ शनि है। गणना शुद्ध है; फल-वाक्य शास्त्र के दावे हैं।

English rendering The text states: divide (the product) by twenty-seven; Saturn “goes” to the ṛkṣa equal to the remainder — and by that measure one is to indicate the meaning of each bhāva in turn.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
P = Y × B
P = 27 × Q + R, 0 ≤ R < 27
- यदि R = 0, परंपरा में प्रायः R = 27 माना जाता है (पूर्ण चक्र) — पाठ-भेद / परंपरा-भेद संभव।
- R = 1…27 → ऋक्ष-क्रम (सामान्यतः अश्विनी = 1 से; आरंभ-बिंदु घोषित करें)।
“ऋक्ष” = 27 नक्षत्र; सप्तविंश स्पष्ट नक्षत्र-मॉड्यूलो है, राशि (12) नहीं।

उदाहरण (worked example) पूर्व उदाहरण: P = 560।
560 ÷ 27: Q = 20, R = 20।
R = 20 → यदि अश्विनी = 1, तो 20वाँ नक्षत्र = पूर्वाषाढ़ा।
शास्त्र कहता है: उस ऋक्ष-संदर्भ से संबंधित भाव-अर्थ निर्दिष्ट करें।
सम्मेलन: गणना sidereal / अयनांश-स्वतंत्र है (यह संख्या योगपिण्ड×बिन्दु से आती है); केवल Y, B के स्रोत घोषित करें।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित है — P mod 27 — अष्टकवर्ग-फल इंजन में exact remainder, बिना टॉलरेंस। SAV/बिन्दु-सारणी BPHS Ch.66-canonical से बाँधने पर R पुनरुत्पादनीय रहता है; त्रिकोण/एकाधिपत्य-शोधन Y को बदलते हैं, अतः Y का स्रोत भी पिन करना आवश्यक।

70.7
अर्काश्रिथर्क्षान्नवमो राशिः पिथ्त्ऱ् ग्त्ऱ्हं स्म्त्ऱ्थम् ।
थध्राशिफलसंख्याभिर्वर्ढयेध् योगपिण्दकम्
arkāśritharkṣānnavamo rāśiḥ pithtṟ gtṟhaṃ smtṟtham |
thadhrāśiphalasaṃkhyābhirvarḍhayedh yogapiṇdakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्क = सूर्य; आश्रित-ऋक्ष = सूर्य जिस राशि/ऋक्ष में स्थित; नवमः राशिः = उससे नवम राशि; पितृ-गृह = पिता-स्थान / पितृ-भाव; स्मृतम् = कहा गया; तद्-राशि-फल-संख्याभिः = उस राशि की फल-संख्याओं से; वर्धयेत् = बढ़ाये / गुणा करे; योग-पिण्डकम् = योगपिण्ड।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य जिस राशि में स्थित है, उससे नवम राशि पितृ-गृह कही गई है। उस राशि की फल-संख्या (बिन्दु) से योगपिण्ड को वर्धित (गुणा) करें — अर्थात् पितृ-फल के लिए Y × (सूर्य से 9वीं राशि के बिन्दु)। यह 70.1 के “पितृ-चिन्ता रवेः” को राशि-स्थान नियम से जोड़ता है।

English rendering The text states that the ninth sign counted from the sign occupied by the Sun is remembered as the father’s house; one should increase the yoga-piṇḍa by the phala-numbers of that sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
सूर्य-राशि सूचकांक S ∈ {1…12} (मेष = 1)।
पितृ-गृह राशि Pitr = ((S − 1 + 8) mod 12) + 1 [= S से 9वीं]
पितृ-योग-फल गुणन: P_pitr = Y × B_Pitr
फिर 70.6: P_pitr ÷ 27 → शेष R → ऋक्ष-निर्देश।
“वर्धयेत्” यहाँ गुणन (× फल-संख्या) के अर्थ में — अष्टकवर्ग-परंपरा के अनुरूप।
सम्मेलन: राशि-गणना समान-भाव (equal sign-houses); अयनांश सूर्य-राशि तय करता है — अयनांश नाम/मान घोषित करें।

उदाहरण (worked example) सूर्य = वृष (S = 2) → नवम = मकर (Pitr = 10)।
मान लें उस राशि में (संबंधित अष्टकवर्ग) बिन्दु B = 4, योगपिण्ड Y = 112।
P = 112 × 4 = 448।
448 ÷ 27: 27 × 16 = 432, R = 16 → 16वाँ नक्षत्र (अश्विनी = 1 से: विशाखा)।
अयनांश उदाहरण-मात्र: लाहिरी; अन्य अयनांश से S बदल सकता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पितृ-गृह = सूर्य से D1 में +8 राशि-चरण — शुद्ध रैशिक समाकल; बिन्दु B उसी Ch.66-canonical अष्टकवर्ग से। Y × B और mod 27 दोनों exact-`==` से सत्याप्य हैं; फल-वाक्य (“पिता”) शास्त्र-कथन रहेंगे, इंजन केवल अंक देता है।

70.8
विभजेथ् सप्थविंशथ्या शेषर्क्षे याथि भानुजः ।
यधा थधा पिथ्त्ऱ्क्लेशो भवथीथि न संशयः
vibhajeth sapthaviṃśathyā śeṣarkṣe yāthi bhānujaḥ |
yadhā thadhā pithtṟkleśo bhavathīthi na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विभजेत् = विभाजित करे; सप्तविंशत्या = २७ से (नक्षत्र-संख्या); शेषर्क्षे = शेष/शेषफल-नक्षत्र में; याति = गमन करता है; भानुजः = शनि (सूर्य-पुत्र); यथा तथा = उसी अनुरूप; पितृक्लेशः = पिता-संबंधी क्लेश; न संशयः = संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—संबंधित पिण्ड/संख्या को सत्ताईस (२७) से विभाजित कर शेष जो नक्षत्र आता है, जब भानुज (शनि) वहाँ पहुँचता है, तब पितृ-क्लेश का संकेत माना जाता है। यह विधि नक्षत्र-शेष पर आधारित पारगमन-संकेत है। पाठ में “न संशयः” कहा गया है—अर्थात् शास्त्रीय कथन दृढ़ है; हम उसे फल-कथन के रूप में ही रखते हैं।

English rendering Divide (the relevant piṇḍa/total of the chapter-sequence) by twenty-seven; in the residual nakṣatra thus obtained, when Saturn transits, the text states father-affliction (pitṛ-kleśa) in corresponding measure. The verse closes with “there is no doubt,” as the śāstra’s own assertion of the rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Remainder-after-division rule on the chapter’s working number P (typically the aṣṭakavarga-derived piṇḍa established in the preceding sequence of Adhyāya 70; exact dividend follows the prior śloka-chain of this recension):
P = 27 × q + r, 0 ≤ r < 27
If r = 0, convention often takes the 27th nakṣatra (Revatī); otherwise r indexes the critical nakṣatra (from Aśvinī = 1 … Revatī = 27). When Saturn’s tropical/sidereal longitude (declare ayanāṃśa) falls in that nakṣatra, the text applies the pitṛ-kleśa statement. Pure modular arithmetic: r ≡ P (mod 27).

उदाहरण (worked example) Convention: sidereal longitudes; ayanāṃśa declared at chart-build. Suppose the chapter-working piṇḍa P = 148.
148 ÷ 27 = 5 remainder 13 → 13th nakṣatra = Hasta.
When Saturn transits Hasta, शास्त्र कहता है the corresponding pitṛ-kleśa indication applies. (If P were SAV-related after śodhana steps of Ch.67–68, use that reduced total—not the raw 337 unless the prior verses prescribe it.)

हमारा डिकोड (Our Decode) This is modular remainder arithmetic of the same family as the aṣṭakavarga stack (Ch.66–72): bindu tables pin to exact totals (SAV = 337 for seven grahas) with `==` fixtures, then later chapters reduce and re-use piṇḍas for transit phala. We keep the 27-division as exact integer math; the pitṛ-kleśa clause remains the text’s claim, not an endorsed prediction.

70.9
थथ्थ्रिकोणगथे वापि पिथा पिथ्त्ऱ्समोऽपि वा ।
मरणं थस्य जानीयाथ् पीदां वा महथीं वधेथ्
thaththrikoṇagathe vāpi pithā pithtṟsamo'pi vā |
maraṇaṃ thasya jānīyāth pīdāṃ vā mahathīṃ vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-त्रिकोण-गते = उस (शेष) स्थान के त्रिकोण में गत; वा अपि = अथवा; पिता = पिता; पितृ-समः = पिता-तुल्य (पालक/गुरु-जन); मरणं = मरण; जानीयात् = जानना चाहिए; पीडां = पीड़ा; महतीं = बड़ी; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्व-निर्दिष्ट शेष-स्थान के अलावा, यदि शनि उसी के त्रिकोण-स्थानों में भी स्थित/गत हो, तो पिता अथवा पिता-सदृश व्यक्ति के मरण का विचार किया जाता है, अथवा महती पीड़ा कही जाती है। “मरणं … पीडां वा” दोनों विकल्प पाठ में हैं—परिणाम की एकमात्र निश्चितता नहीं, दो फल-वर्ग। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering Or when (Saturn) occupies a trikoṇa of that residual place, the text states one should understand death of the father—or of one equal to the father—or declare great suffering. The verse itself offers death or severe affliction as alternative phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) No new constant. Trikoṇa mapping on the residual locus from 70.8: if the critical place is nakṣatra-index r (or its owning rāśi R), the trinal set is {R, R+4, R+8} (mod 12) in rāśi terms; for nakṣatra, trines are 9-step offsets on the 27-wheel (r, r+9, r+18 mod 27, with 0→27). Saturn-in-trine is a positional test, not a new division.

उदाहरण (worked example) From 70.8 example, critical nakṣatra = Hasta (13). Trinal nakṣatras: 13, 22 (Śravaṇa), 4 (Rohiṇī) on the 27-cycle (13+9=22; 13+18=31≡4). If Saturn is in Śravaṇa or Rohiṇī, the text applies the same pitṛ-phala class as for Hasta itself.

70.10
गुणयेध् योगपिण्दं वा थध्राशिफलसंख्यया ।
अर्कोध्ढ्त्ऱ्थावशेषर्क्षे यधा गच्छथि भानुजः
guṇayedh yogapiṇdaṃ vā thadhrāśiphalasaṃkhyayā |
arkodhḍhtṟthāvaśeṣarkṣe yadhā gacchathi bhānujaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुणयेत् = गुणा करे; योग-पिण्डं = योगपिण्ड; वा = अथवा; तत्-राशि-फल-संख्यया = उस राशि के फल-संख्या से; अर्क-उद्धृत्य = १२ (अर्क = द्वादश आदित्य → १२) से विभाजित कर; अवशेष-र्क्षे = शेष राशि/नक्षत्र-स्थान में; यथा गच्छति भानुजः = जैसा शनि वहाँ जाता है।

हिन्दी भावार्थ वैकल्पिक विधि: योगपिण्ड को संबंधित राशि-फल-संख्या से गुणा करें, फिर अर्क (१२) से भाग दें; जो शेष राशि आए, जब शनि वहाँ गमन करे, वही पूर्ववत् पितृ-संकेत का आधार है। यह २७-शेष विधि का राशि-माप समकक्ष है। “अर्क” यहाँ भास्कर-रूप में द्वादश-विभाजक है (पाठ-भेद/परंपरा-अनुसार शब्द-संख्या)।

English rendering Alternatively, multiply the yoga-piṇḍa by the rāśi-phala count of the relevant sign; divide by twelve (arka = 12 by bhūtasaṃkhyā: the twelve Ādityas). In the residual rāśi so obtained, as Saturn transits, the same pitṛ-indication of the prior verses applies.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let Y = yoga-piṇḍa, F = rāśi-phala saṃkhyā (bindu/phala count of the stated sign in the relevant aṣṭakavarga or SAV column—per the chapter’s table).
N = Y × F
N = 12 × q + s, 0 ≤ s < 12
If s = 0, convention often takes the 12th rāśi (Mīna); else s = 1…12 → Meṣa…Mīna. Critical rāśi for Saturn transit. Constants from the verse: multiplier = yoga-piṇḍa; divisor arka = 12.

उदाहरण (worked example) Suppose yoga-piṇḍa Y = 25, and the chosen rāśi’s phala-count F = 5 (from the chart’s aṣṭakavarga column; exact table = Ch.66 family).
N = 25 × 5 = 125; 125 ÷ 12 = 10 remainder 5 → 5th rāśi = Siṃha.
When Saturn transits Siṃha, the text applies the pitṛ-kleśa class of 70.8–9. (Declare which varga/AV column supplied F; do not mix BPHS vs Phaladīpikā table rows silently.)

हमारा डिकोड (Our Decode) Yoga-piṇḍa × phala ÷ 12 is pure integer ratio math on aṣṭakavarga outputs. Our Ch.66 fixtures lock graha rekha-totals (Sun 48 … SAV 337) with exact `==`; later śodhana (Ch.67–68) and piṇḍa use must inherit those pinned numbers—no ± tolerance that once hid a real −1. This verse is the transit-application layer of that stack.

70.11
थथ्थ्रिकोणर्क्षकं वापि पिथ्त्ऱ्कष्तं थधा वधेथ् ।
रिष्तप्रधधशायां थु मरणं कष्तमन्यधा
thaththrikoṇarkṣakaṃ vāpi pithtṟkaṣtaṃ thadhā vadheth |
riṣtapradhadhaśāyāṃ thu maraṇaṃ kaṣtamanyadhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-त्रिकोण-र्क्षकम् = उस (शेष) राशि का त्रिकोण-राशि; वा अपि = अथवा; पितृ-कष्टम् = पिता का कष्ट; तदा = तब; वदेत् = कहे; रिष्ट-प्रद-दशायाम् = रिष्ट/मृत्यु-प्रद दशा में; तु = किंतु; मरणम् = मरण; कष्टम् अन्यथा = अन्यथा कष्ट।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—शेष-राशि के त्रिकोण में भी शनि हो तो पितृ-कष्ट कहा जाए। विशेष शर्त: यदि वह काल रिष्ट-प्रद दशा का हो तो मरण-फल; अन्य दशा में कष्ट-फल। अर्थात् एक ही स्थान-संकेत दो स्तरों पर पढ़ा जाता है—दशा-गुणक से। फल शास्त्र का कथन है; हम उसे काल-माप के अनुपात में ही रखते हैं।

English rendering Or when Saturn is in a trinal rāśi of that residual sign, declare father’s hardship. In a death-giving (riṣṭa-prada) daśā, the text states death; otherwise hardship. The same spatial remainder is modulated by the daśā class.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Spatial part = trine of residual rāśi s from 70.10: {s, s+4, s+8} mod 12. Temporal part = daśā classification: if current mahā/antar (e.g. Vimśottarī 120-yr cycle: Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17; antar = (mahā-yr × antar-yr)/120) is of the “riṣṭa-prada” class per the āyur/ariṣṭa chapters, the text upgrades कष्ट → मरण; else retains कष्ट. No new numeric constant in this verse itself.

उदाहरण (worked example) Residual rāśi from 70.10 = Siṃha (5). Trines: Siṃha, Dhanu (9), Meṣa (1). Saturn in Dhanu during a period the text treats as riṣṭa-prada → मरण-वर्ग फल; in a non-riṣṭa daśā → कष्ट-वर्ग. (Daśā naming follows the chart’s chosen system—declare Vimśottarī vs other if used.)

हमारा डिकोड (Our Decode) The verse joins aṣṭakavarga remainder-space to daśā-time—exactly the two computational pillars we keep separate from interpretation: bindu/piṇḍa math on one side, 120-yr ratio daśā on the other; phala wording stays “the text states.”

70.12
अर्काथ्थु थुर्यगे राहौ मन्धे वा भूमिनन्धने ।
गुरुशुक्रेक्षणम्त्ऱ्थे पिथ्त्ऱ्हा जायथे नरः
arkāththu thuryage rāhau mandhe vā bhūminandhane |
guruśukrekṣaṇamtṟthe pithtṟhā jāyathe naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कात् = सूर्य से; तु = ही; तुर्य-गे = चतुर्थ भाव/स्थान में स्थित; राहौ = राहु; मन्दे = शनि; वा = अथवा; भूमि-नन्दने = मंगल (पृथ्वी-पुत्र); गुरु-शुक्र-ईक्षण-मृते = बृहस्पति व शुक्र की दृष्टि के बिना; पितृ-हा = पितृ-हन्ता (शास्त्रीय योग-नाम); जायते नरः = मनुष्य होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—सूर्य से चतुर्थ स्थान में राहु, अथवा शनि, अथवा मंगल हो, और गुरु-शुक्र की दृष्टि न हो, तो वह नर “पितृहा” कहा जाता है। यह स्थान-दृष्टि योग है: पाप का सूर्य-चतुर्थ निवास + शुभ-दृष्टि का अभाव। “पितृहा” यहाँ शास्त्रीय योग-पद है—फल-कथन, अभियोजन या नैतिक निर्णय नहीं।

English rendering When Rāhu, or Saturn (manda), or Mars (bhūmi-nandana) occupies the fourth from the Sun, without the aspect of Jupiter and Venus, the text states the native is termed pitṛ-han (father-destroying, as a yoga name). The condition is positional plus absence of two benefics’ aspect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-योग / स्थान-दृष्टि नियम। House count: if Sun’s rāśi = S, fourth = S+3 (mod 12). Test: (Rāhu ∨ Saturn ∨ Mars) ∈ house 4-from-Sun, AND ¬(Jupiter aspects that place) AND ¬(Venus aspects that place). Aspect rules = standard whole-sign or degree-aspect per chosen convention (declare). No arc-constant beyond the ordinal “turya = 4.”

70.13
लग्नाथ् चन्ध्राध् गुरुस्ठाने याथे सूय्रसुथेऽठवा ।
पापैर्ध्त्ऱ्ष्ते युथे वापि पिथ्त्ऱ्नाशं वधेध् बुढः
lagnāth candhrādh gurusṭhāne yāthe sūyrasuthe'ṭhavā |
pāpairdhtṟṣte yuthe vāpi pithtṟnāśaṃ vadhedh buḍhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् चन्द्रात् = लग्न से अथवा चन्द्र से; गुरु-स्थाने = बृहस्पति के स्थान में (नवम/पितृ-भाव अभिप्रेत); याते सूर्यसुते अथवा = शनि (सूर्यसुत) के वहाँ जाने पर; पापैः दृष्टे युते वा अपि = पापग्रहों से दृष्ट अथवा युक्त होने पर; पितृ-नाशम् = पिता का नाश; वदेत् बुधः = बुद्धिमान कहे।

हिन्दी भावार्थ लग्न अथवा चन्द्र से गुरु-स्थान (नवम) में शनि (सूर्यसुत) जाए, और वह पापग्रहों से दृष्ट अथवा युक्त हो, तो बुद्धिमान ज्योतिषी को शास्त्रानुसार पितृ-नाश का निर्देश करना चाहिए। यहाँ भी शनि की उपस्थिति के साथ पाप-दृष्टि/युति को संयुक्त शर्त रखा गया है।

English rendering When Saturn (the Sun's son) comes to Jupiter's place (the ninth) reckoned from the Lagna or from the Moon, and is aspected or joined by malefics, the wise should declare the destruction of the father.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (द्विविध सन्दर्भ-बिन्दु + पाप-संयोग की शर्त)। स्थान-गणना: गुरु-स्थान = लग्न एवं चन्द्र दोनों से नवम; शर्त: शनि की वहाँ स्थिति ∧ पाप-दृष्टि/युति। यह शास्त्र का सशर्त दावा है — "बुधः वदेत्" अर्थात् विवेकी की व्याख्या, अपरिवर्तनीय नियति नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक 70.9–70.13 शुद्ध फल-कथन हैं, जबकि 70.5–70.8, 70.10 शुद्ध अंकगणित। हमारी मूल discipline यही रेखा खींचती है — पिण्ड-गुणा-भाग-शेष = exact गणना (`==`, कोई सन्निकटन नहीं), और मरण/पितृ-नाश जैसे कथन = "शास्त्र कहता है", कभी भय, नियति या हमारी अनुमोदित भविष्यवाणी नहीं।

70.14
लग्नाथ् सुखेश्वरारिष्तधशाकाले पिथ्त्ऱ्क्षयः ।
अनुकूलधशाकाले नेथि चिन्थ्यं विचक्षणैः
lagnāth sukheśvarāriṣtadhaśākāle pithtṟkṣayaḥ |
anukūladhaśākāle nethi cinthyaṃ vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् = लग्न से; सुख-ईश्वर = चतुर्थेश (सुख-भाव = ४); अरिष्ट-दशा-काले = अरिष्ट दशा के काल में; पितृ-क्षयः = पिता का क्षय; अनुकूल-दशा-काले = अनुकूल दशा में; न इति = नहीं (ऐसा नहीं); चिन्त्यम् = विचारणीय; विचक्षणैः = विवेकियों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्न से सुखेश (चतुर्थेश) की अरिष्ट-दशा के काल में पितृ-क्षय का विचार है; अनुकूल दशा-काल में वह संकेत नहीं माना जाता। अंतिम पंक्ति विवेक की माँग करती है—“विचक्षणैः चिन्त्यम्”: दशा-अनुकूलता से फल घटाया-बढ़ाया जाए। यह अध्याय का संतुलन-सूत्र है—स्थान/शेष के साथ काल की दिशा भी देखो।

English rendering From the lagna, in the ariṣṭa-daśā period of the fourth lord (sukheśa), the text states decline of the father; in a favorable daśā period, not so—the discerning should weigh this. The verse itself installs a conditional, not an absolute, phala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-काल फल-नियम। Procedure: identify 4th lord from lagna (sukheśa); map its mahā/antar under the chosen daśā (Vimśottarī: periods Σ = 120 yr as above; antar = (M × A)/120). If that period is classed ariṣṭa (per āyur/ariṣṭa chapters of this recension), apply pitṛ-kṣaya statement; if anukūla, the text withholds it. Timing arithmetic only; interpretation remains the śāstra’s conditional claim.

70.15
पिथ्त्ऱ्जन्माष्तमे जाथस्थधीशे लग्नगेऽपि वा ।
करोथि पिथ्त्ऱ्कार्याणि स एवाथ्र न संशयः
pithtṟjanmāṣtame jāthasthadhīśe lagnage'pi vā |
karothi pithtṟkāryāṇi sa evāthra na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृजन्म = पिता की जन्म-राशि/लग्न से गणना; अष्टमे = आठवें भाव/राशि में; जातः = उत्पन्न; तदीशे = उस (अष्टम) राशि के स्वामी में; लग्नगे = लग्न में स्थित; अपि वा = अथवा; करोति = करता है; पितृकार्याणि = पिता के कार्य/कर्तव्य; स एव = वही; अत्र = यहाँ; न संशयः = संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो जातक पिता की जन्म-राशि से अष्टम स्थान में उत्पन्न हो, अथवा उस अष्टम-राशि का स्वामी जातक के लग्न में बैठा हो, वह पिता के कार्यों को सम्पन्न करता है। यह कथन यहाँ निःसंशय रूप से दिया गया है। यह पिता-संबंधी स्थान-विचार है, न कि स्वतन्त्र भाग्य-निर्णय।

English rendering The text states that one born in the eighth from the father’s birth-sign—or whose lord of that eighth occupies the lagna—performs the father’s works; no doubt is admitted on this point.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पितृ-सापेक्ष भाव-फल। गणना का ढाँचा: पिता की जन्म-राशि को Rₚ मानें; जातक की जन्म-राशि Rⱼ; अष्टम-संकेत तब जब Rⱼ ≡ Rₚ + 7 (mod 12) (राशि-क्रम 0…11)। विकल्प: अष्टम-स्वामी जातक-लग्न में स्थित हो। फल शास्त्रीय संकेत है, निश्चित भविष्य नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें पिता की जन्म-राशि = मेष (1), जातक की जन्म-राशि = वृश्चिक (8)। तो 1 + 7 ≡ 8 (mod 12) — अष्टम से जन्म का संकेत। यदि अष्टम (वृश्चिक) का स्वामी मङ्गल जातक-लग्न में हो, तो भी शास्त्र उसी पितृ-कार्य संकेत को जोड़ता है। (राशि-गणना; अयनांश यहाँ अप्रासंगिक।)

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70.16
सुखनाठधशायान्थु सुखप्राप्थेश्च संभवः ।
सुखेशे लग्नलाभस्ठे चन्ध्रस्ठानाध् विशेषथः ।
पिथ्त्ऱ्गेहसमायुक्थे जाथः पिथ्त्ऱ्वशानुगः
sukhanāṭhadhaśāyānthu sukhaprāptheśca saṃbhavaḥ |
sukheśe lagnalābhasṭhe candhrasṭhānādh viśeṣathaḥ |
pithtṟgehasamāyukthe jāthaḥ pithtṟvaśānugaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुखनाथ-दशायाम् = चतुर्थेश की दशा में; तु = किन्तु/और; सुखप्राप्तेः = सुख-प्राप्ति का; च = तथा; संभवः = सम्भावना; सुखेशे = चतुर्थेश में; लग्नलाभस्थे = लग्न या लाभ (11) में स्थित; चन्द्रस्थानात् = चन्द्र-स्थान से; विशेषतः = विशेष रूप से; पितृगेह-समायुक्ते = पितृ-गृह से युक्त/संबद्ध; जातः = जातक; पितृवशानुगः = पिता के वश/अनुगामी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सुखनाथ (चतुर्थेश) की दशा में सुख-प्राप्ति का संभव बताया गया है; चतुर्थेश के लग्न या लाभ में रहने पर—विशेषतः चन्द्र-स्थान से देखे जाने पर—यह संकेत और स्पष्ट होता है। जो जातक पितृ-गृह से समायुक्त हो, उसे पिता के अनुशासन/मार्ग का अनुगामी कहा गया है। फल-कथन शास्त्र की भाषा में हैं, दबाव या निश्चित भाग्य नहीं।

English rendering The text states that the daśā of the fourth lord may indicate attainment of comfort, especially when that lord stands in the lagna or eleventh—viewed notably from the Moon. One born connected with the father’s house is said to follow the father’s authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मिश्रित संकेत — (क) चतुर्थेश-दशा: यदि महादशा विंशोत्तरी में हो, तो दशा-स्वामी = लग्न से चतुर्थ-राशि का अधिपति; (ख) स्थान: चतुर्थेश ∈ {लग्न, 11} या चन्द्र से उन्हीं भावों में; (ग) पितृ-गृह-योग: जातक-लग्न/ग्रह पिता की जन्म-राशि या पितृ-भाव (परम्परा में प्रायः 9) से युक्त। शुद्ध अंक-सूत्र नहीं; दशा-काल विंशोत्तरी-अनुपात पर निर्भर (Σ = 120 वर्ष)।

उदाहरण (worked example) लग्न = कर्क, चतुर्थ = तुला, चतुर्थेश = शुक्र। विंशोत्तरी में शुक्र-महादशा = 20 वर्ष। यदि शुक्र लग्न (कर्क) या लाभ (वृष) में हो—या चन्द्र से लग्न/लाभ में—तो शास्त्र सुख-प्राप्ति-संभव का उल्लेख करता है। (अयनांश: दशा-प्रारम्भ चन्द्र-नक्षत्र-अंश पर; यहाँ केवल संरचना।)

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70.17
पिथ्त्ऱ्जन्मथ्त्ऱ्थीयर्क्षे जाथः पिथ्त्ऱ्ढनाश्रिथः ।
पिथ्त्ऱ्कर्मग्त्ऱ्हे जाथः पिथ्त्ऱ्थुल्यगुणान्विथः
pithtṟjanmathtṟthīyarkṣe jāthaḥ pithtṟḍhanāśrithaḥ |
pithtṟkarmagtṟhe jāthaḥ pithtṟthulyaguṇānvithaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृजन्म = पिता की जन्म-राशि से; तृतीयर्क्षे = तृतीय राशि में; जातः = उत्पन्न; पितृधनाश्रितः = पिता के धन पर आश्रित; पितृकर्मगृहे = पिता के कर्म-गृह (पितृ-जन्म से दशम) में; जातः = उत्पन्न; पितृतुल्य-गुणान्वितः = पिता के समान गुणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पिता की जन्म-राशि से तृतीय में उत्पन्न जातक पिता के धन/संसाधन का आश्रय लेता है। जो पिता के कर्म-गृह—अर्थात् पितृ-जन्म से दशम—में जन्मा हो, उसे पिता के तुल्य गुणों वाला कहा गया है। दोनों संकेत सापेक्ष राशि-स्थान से निकलते हैं।

English rendering The text states that one born in the third from the father’s birth-sign depends on the father’s wealth; one born in the father’s karma-house (the tenth from the father’s birth) is endowed with qualities like the father’s.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) राशि-मॉड्यूलर संकेत (फल-कथन, अंक-फलन नहीं)। पिता-राशि Rₚ, जातक-राशि Rⱼ (1…12):
• तृतीय: Rⱼ ≡ Rₚ + 2 (mod 12) → शास्त्र: पितृ-धन-आश्रय।
• कर्म-गृह (दशम): Rⱼ ≡ Rₚ + 9 (mod 12) → शास्त्र: पितृतुल्य गुण।
भाव-गणना पूर्ण-राशि क्रम से; अंतरभाव/प्लासिडस यहाँ लागू नहीं।

उदाहरण (worked example) Rₚ = सिंह (5)। तृतीय = तुला (7): 5 + 2 = 7। दशम = वृष (2): 5 + 9 ≡ 2 (mod 12)। यदि Rⱼ = तुला तो पितृ-धन-आश्रय संकेत; यदि Rⱼ = वृष तो पितृतुल्य-गुण संकेत—दोनों शास्त्र के कथन मात्र।

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70.18
थधीशे लग्नसंस्ठेऽपि पिथ्त्ऱ्श्रेष्टो भवेन्नरः ।
एवं पूर्वक्थसामान्यफलं चाथ्रापि चिन्थयेथ्
thadhīśe lagnasaṃsṭhe'pi pithtṟśreṣṭo bhavennaraḥ |
evaṃ pūrvakthasāmānyaphalaṃ cāthrāpi cinthayeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदीशे = उस (पूर्वोक्त पितृ-संबंधी स्थान) के स्वामी में; लग्नसंस्थे = लग्न में स्थित; अपि = भी; पितृश्रेष्ठः = पितृ-संबंध में श्रेष्ठ / पिता-कुल में उत्कृष्ट; भवेत् = होता है; नरः = पुरुष/जातक; एवम् = इस प्रकार; पूर्वोक्त = पहले कहा; सामान्यफलम् = सामान्य फल; च = और; अत्रापि = यहाँ भी; चिन्तयेत् = विचार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि उस पूर्वोक्त (पितृ-सापेक्ष) स्थान का स्वामी जातक के लग्न में हो, तो भी जातक पितृ-दृष्टि से श्रेष्ठ कहा गया है। निर्देश है कि पहले बताए गए सामान्य फल को यहाँ भी उसी रीति से चिन्तन में लाएँ—अर्थात् यह अध्याय-खंड पूर्व-नियमों का विस्तार है, उनका निरसन नहीं।

English rendering The text states that even when the lord of that (foregoing paternal) place occupies the lagna, the native is said to be excellent in the paternal sphere. One should likewise apply here the general results already stated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-संकलन/अनुदेश। तकनीक: (1) 70.15–17 के पितृ-सापेक्ष भाव (अष्टम, तृतीय, दशम आदि) लें; (2) तदीश = उस राशि का स्वामी; (3) यदि तदीश ∈ जातक-लग्न, तो “पितृश्रेष्ठ” संकेत जोड़ें; (4) पूर्वोक्त सामान्य फल समान तर्क से लागू करें। यह नियम-श्रृंखला है, न कि संख्यात्मक बलांक।

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70.19
सूर्याष्तवर्गे यन्छून्यं थन्मासे वस्थरेऽपि च ।
विवाहव्रथचूदाधि शुभकर्म परिथ्यजेथ्
sūryāṣtavarge yanchūnyaṃ thanmāse vasthare'pi ca |
vivāhavrathacūdādhi śubhakarma parithyajeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्याष्टवर्गे = सूर्य के अष्टकवर्ग में; यत् शून्यम् = जिस राशि में शून्य (0 रेखा/बिन्दु) हो; तत्-मासे वत्सरे अपि च = उस मास तथा वर्ष में (सूर्य के उस राशि-गोचर काल में); विवाह-व्रत-चूडा-आदि = विवाह, व्रत, चूडाकर्म (मुण्डन) आदि; शुभ-कर्म = मांगलिक कार्य; परित्यजेत् = त्याग देना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य के अष्टकवर्ग में जिस राशि में एक भी बिन्दु न हो (शून्य रेखा), उस राशि में सूर्य के गोचर-काल (उस सौर-मास तथा वर्ष) में विवाह, व्रत, चूडाकर्म आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। यह गोचर-मुहूर्त के लिए अष्टकवर्ग-बल का प्रत्यक्ष प्रयोग है।

English rendering In the Sun's aṣṭakavarga, whichever sign holds zero bindus — in that month and year (when the Sun transits it) one should avoid auspicious rites such as marriage, vratas and tonsure, the text directs.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सूर्य का भिन्नाष्टकवर्ग (BAV): प्रत्येक राशि k में बिन्दु bₖ ∈ {0,1,…,8}, तथा Σ bₖ (k=1…12) = 48। नियम: यदि bₖ = 0, तो सूर्य के उस राशि k में गोचर (≈ 1 सौर-मास) की अवधि शुभ-कर्म के लिए त्याज्य। परिमाण-सूत्र नहीं, वरन् बिन्दु-गणना पर आधारित गोचर-गुणवत्ता का द्विआधारी (शून्य/अशून्य) निर्णय।

उदाहरण (worked example) परिपाटी — निरयन (लाहिरी) राशि, सौर-मास गोचर। मान लें किसी कुंडली में सूर्य-BAV = मेष 4, वृष 5, मिथुन 3, कर्क 6, सिंह 5, कन्या 0, तुला 4, वृश्चिक 3, धनु 5, मकर 4, कुम्भ 5, मीन 4 (योग = 48)। कन्या में शून्य → जब सूर्य कन्या राशि में गोचर करे (लाहिरी मान से लगभग मध्य-अक्टूबर से मध्य-नवम्बर वाला सौर-मास), उस अवधि में विवाहादि शुभ कर्म वर्जित।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही सूर्य-अष्टकवर्ग हमारे kaal-verification-oracle में BPHS Ch.66 के अनुसार रेखा-योग = 48 पर पिन किया गया है (test_astakavarga_fixture.py), और उसे किसी सहन-सीमा (tolerance band) के बिना ठीक `==` से जाँचा जाता है — क्योंकि एक बार ±3 की छूट ने वास्तविक −1 त्रुटि को छिपा दिया था। इस श्लोक की "शून्य राशि" वहीं से निर्धारित होती है जहाँ योग-संरक्षण (Σ=48) अक्षुण्ण रहता है।

70.20
यथ्र रेखाढिका थथ्र मासे संवचरेऽपि च ।
अनिष्तेऽपि रवौ जीवे शुभकर्म समाचरेथ्
yathra rekhāḍhikā thathra māse saṃvacare'pi ca |
aniṣte'pi ravau jīve śubhakarma samācareth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र = जहाँ; रेखाधिका = रेखाएँ अधिक हों; तत्र = वहाँ; मासे = मास में; संवत्सरे = वर्ष में; अपि च = भी; अनिष्टे अपि = अनिष्ट होने पर भी; रवौ = सूर्य में; जीवे = गुरु में; शुभकर्म = शुभ कर्म; समाचरेत् = करे (शास्त्र का कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जहाँ अष्टकवर्ग में रेखाएँ अधिक हों, उस मास और वर्ष में—सूर्य या गुरु के अनिष्ट रहने पर भी—शुभ कर्म करना उचित बताया गया है। यहाँ “रेखाधिक” स्थान को शून्य स्थान के विपरीत शुभ-मुहूर्त संकेत माना गया है। अनिष्ट-ग्रह स्थिति को रेखा-बहुलता से तौला गया है, निरपेक्ष भय से नहीं।

English rendering The text states that where rekhas are abundant, in that month and year auspicious acts may be performed even if the Sun or Jupiter is unfavourably placed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-बहुलता: राशि r पर B(r) “अधिक” — प्रायः तुलनात्मक: B(r) > B̄ (माध्य) या B(r) = maxᵣ B(r); पाठ संख्या-सीमा नहीं देता।
सूर्य-BAV कुल 48 ⇒ औसत 48/12 = 4 रेखा/राशि; B(r) ≥ 5…7 प्रायः “रेखाधिक”।
नियम: r पर रेखा अधिक ∧ (मास/वर्ष → r) ⇒ शुभकर्म अनुमत—यहाँ तक कि रवि/जीव अनिष्ट हों।
(पूर्ण SAV सात ग्रहों का योग 337; यह श्लोक सूर्य-रेखा संदर्भ में 70.19 का युग्म।)

उदाहरण (worked example) सूर्य-BAV में धनु B☉ = 7, औसत 4 — रेखाधिक। यदि शुभ-कर्म का मास/वर्ष धनु-संबद्ध हो और सूर्य/गुरु गोचर में अनिष्ट कहे जाएँ, तब भी शास्त्र “शुभकर्म समाचरेत्” कहता है। तुलना: शून्य-राशि (70.19) पर विपरीत निर्देश।

हमारा डिकोड (Our Decode) रेखा-गणना का आधार Ch.66 का सूर्य-कुल 48 और ग्रह-कुल क्रम (48, 49, 39, 54, 56, 52, 39) → SAV 337 है—oracle fixture पर `==` सत्यापित। “अधिक रेखा” का निर्णय उसी bindu-तालिका से होता है; फल वाक्य को हम भविष्यवाणी नहीं मानते।

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70.21
एवं चन्ध्राष्तवर्गे च यथ्र शून्यं भवेध् बहु ।
थथ्र थथ्र गथे चन्ध्रे शुभं कर्मं परिथ्यजेथ्
evaṃ candhrāṣtavarge ca yathra śūnyaṃ bhavedh bahu |
thathra thathra gathe candhre śubhaṃ karmaṃ parithyajeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; चन्द्राष्टवर्गे = चन्द्र के अष्टकवर्ग में; च = भी; यत्र = जहाँ; शून्यम् = शून्य; भवेत् = हो; बहु = बहुत/अधिक; तत्र तत्र = वहाँ-वहाँ; गते चन्द्रे = चन्द्र के गमन पर; शुभं कर्म = शुभ कर्म; परित्यजेत् = त्याग करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चन्द्राष्टकवर्ग में भी जहाँ शून्य (रेखा-अभाव) बहुत हो, वहाँ-वहाँ चन्द्र के पहुँचने पर शुभ कर्म छोड़ना चाहिए। यह 70.19 के सूर्य-नियम का चन्द्र-पक्षीय विस्तार है—गोचर-चन्द्र + चन्द्र-BAV शून्य राशि का योग।

English rendering Likewise, the text states, in the Moon’s aṣṭakavarga wherever emptiness is great, when the Moon transits those places one should set aside auspicious action.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चन्द्र-BAV: B☾(r), Σᵣ B☾(r) = 49 (BPHS Ch.66 मानक)।
शून्य-समुच्चय S₀ = { r | B☾(r) = 0 }।
नियम: यदि गोचर-चन्द्र की राशि rₘ ∈ S₀, तो शुभकर्म परिहार्य।
“बहु शून्य” = अनेक राशियों पर B = 0, या शून्य का बलवान संकेत; पाठ अंक-सीमा नहीं बाँधता।

सम्प्रदाय-टिप्पणी: चन्द्र-तालिका में BPHS Ch.66 के अनुसार चन्द्र-से-चन्द्र पर “9” बैठता है (चन्द्र-से-मङ्गल पर नहीं); Phaladīpikā/Mehta में 9 का स्थान स्थानांतरित—कुल 49 समान, प्रति-राशि भिन्न। यह खुला सम्प्रदाय-भेद है, मौन चयन नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-BAV कुल 49; मान लें वृश्चिक पर B☾ = 0। जब गोचर-चन्द्र वृश्चिक में हो, शास्त्र शुभ-कर्म-परिहार कहता है। (तालिका: BPHS Ch.66 चन्द्र-पङ्क्ति; चन्द्र-से-गुरु = 1,2,4,7,8,10,11—BPHS पाठ। अयनांश: चन्द्र-राशि-निर्णय के लिए घोषित करें, जैसे लाहिरी।)

हमारा डिकोड (Our Decode) चन्द्र-अष्टकवर्ग का योग 49 और सूर्य 48 आदि Ch.66 fixture पर exact-`==` से बँधे हैं; चन्द्र-तालिका में “9” का BPHS-स्थान (Moon-from-Moon) हमने Phaladīpikā-स्थानांतर से अलग घोषित रखा है—कुल समान, bhinna भिन्न। शून्य-राशि पर मुहूर्त-फल गणना नहीं, शास्त्र-कथन है।

70.22
चन्ध्राच्चथुर्ठो माथ्त्ऱ्प्रसाधग्रामचिन्थनम् ।
चन्ध्राथ् सुखफलं पिण्दं वर्ध्ढयेध् भैश्च सम्भजेथ्
candhrāccathurṭho māthtṟprasādhagrāmacinthanam |
candhrāth sukhaphalaṃ piṇdaṃ vardhḍhayedh bhaiśca sambhajeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रात् चतुर्थः = चन्द्रमा से चतुर्थ भाव; मातृ-प्रसाद-ग्राम-चिन्तनम् = माता, (उनकी) कृपा एवं ग्राम/भू-सम्पत्ति का विचार; चन्द्रात् सुख-फलम् = चन्द्रमा से चतुर्थ (सुख) भाव का फलांक; पिण्डं वर्धयेत् = योग-पिण्ड को (उससे) गुणित करे; भैः च सम्भजेत् = और (सत्ताईस) भ/ऋक्षों से भाग दे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र माता-विचार की विधि बताता है — चन्द्रमा से चतुर्थ भाव से माता, उनकी प्रसन्नता तथा ग्राम/भू-सम्पत्ति का विचार करो। फिर चन्द्रमा से सुख (चतुर्थ) भाव के फलांक से योग-पिण्ड को गुणित कर, उसे भ (नक्षत्रों) से भाग देकर शेष निकालो — इसी शेष से आगे (श्लोक 70.23 में) माता-सम्बन्धी काल-निर्णय होगा। यह विधि पिता के लिए सूर्य-आधारित पिण्ड-गणना की ही समानान्तर पद्धति है।

English rendering The 4th from the Moon is for reckoning the mother, her grace, and the estate; multiply the yoga-piṇḍa by the 4th-house result taken from the Moon, and divide by the (twenty-seven) asterisms — thus the text sets up the mother's timing computation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम इस अध्याय की पिण्ड-रीति के अनुरूप (तुल. श्लोक 70.6–70.10): शेष-ऋक्ष = (योग-पिण्ड × सुख-भाव-फलांक) mod 27, जहाँ भाजक = 27 (सप्तविंशति भ/नक्षत्र)। यहाँ "सुख-फल" = चन्द्र से चतुर्थ भाव का फलांक। शेष से प्राप्त ऋक्ष अगले श्लोक में शनि-गोचर का लक्ष्य बनता है।

उदाहरण (worked example) (आदर्शात्मक अंक) योग-पिण्ड = 40, चन्द्र-से-चतुर्थ फलांक = 5 → 40 × 5 = 200; 200 ÷ 27 = 7 शेष 11 → चन्द्र/गणना-आरम्भ से 11वाँ ऋक्ष = शेष-ऋक्ष। इसी ऋक्ष पर शनि के गोचर का फल श्लोक 70.23 में कहा गया है। (अंक केवल विधि-दर्शक; वास्तविक पिण्ड कुंडली-सापेक्ष होगा।)

70.23
शेषम्त्ऱ्क्षं शनौ याथे माथ्त्ऱ्हानिं विनिर्धिशेथ् ।
थथ्थ्रिकोणगथे चापि शनौ माथ्त्ऱ्रुजं वधेथ्
śeṣamtṟkṣaṃ śanau yāthe māthtṟhāniṃ vinirdhiśeth |
thaththrikoṇagathe cāpi śanau māthtṟrujaṃ vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेष-ऋक्षम् = (पिछली गणना का) शेष-नक्षत्र/राशि; शनौ याते = शनि के वहाँ गोचर करने पर; मातृ-हानिं विनिर्दिशेत् = माता की हानि (वियोग) कहनी चाहिए; तत्-त्रिकोण-गते = उसी के त्रिकोण (120°) में गमन करने पर; अपि च शनौ = शनि के भी; मातृ-रुजं वदेत् = माता को रोग/पीड़ा कहनी चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि (श्लोक 70.22 से निकाले गए) शेष-ऋक्ष पर जब शनि गोचर करे, तब माता की हानि का सूचक काल कहा जाता है; और जब शनि उसी ऋक्ष के त्रिकोण में गोचर करे, तब माता को रोग/कष्ट का काल कहा जाता है। यह वही पिता-हेतु शनि-गोचर पद्धति (श्लोक 70.8–70.11) है, जो अब माता पर आवृत्त होती है।

English rendering When Saturn transits the remainder-asterism, the text says to declare loss of the mother; and when Saturn moves through its trine, illness of the mother — a caution stated as the text's indication, not a certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय-सापेक्ष फल-काल: लक्ष्य-ऋक्ष = श्लोक 70.22 का (पिण्ड × फलांक) mod 27 शेष। शनि उस ऋक्ष में → मातृ-हानि-काल; शनि उसके त्रिकोण-ऋक्षों (शेष से ±120°, अर्थात् 5वें/9वें त्रिकोण-स्थान) में → मातृ-रुज-काल। कोई नया सूत्र नहीं — पिण्ड-शेष तथा शनि-गोचर-राशि का मेल।

हमारा डिकोड (Our Decode) माता का यह सम्पूर्ण काल-विचार चन्द्र-अष्टकवर्ग/पिण्ड पर आधारित है, जिसका रेखा-योग हमने 49 पर निश्चित (`==`) रखा है। हमारी मूल अनुशासन-रीति यहाँ स्पष्ट लागू होती है — गणित (पिण्ड-शेष, शनि-गोचर-राशि) को ठीक-ठीक निकालो, पर "मातृ-हानि/रुज" जैसे फल को शास्त्र-कथन के रूप में ही प्रस्तुत करो, भय या नियति-कथन के रूप में नहीं।

70.24
भौमाष्तवर्गे संचिन्थ्यं भ्राथ्त्ऱ्विक्रमढैर्यकम् ।
कुजाश्रिथाथ् थ्त्ऱ्थीयर्क्षं बुढैर्भ्राथ्त्ऱ्ग्त्ऱ्हं स्म्त्ऱ्थम्
bhaumāṣtavarge saṃcinthyaṃ bhrāthtṟvikramaḍhairyakam |
kujāśrithāth thtṟthīyarkṣaṃ buḍhairbhrāthtṟgtṟhaṃ smtṟtham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौमाष्टवर्गे = मंगल के अष्टकवर्ग में; संचिन्त्यम् = विचार करना चाहिए; भ्रातृ-विक्रम-धैर्यकम् = भाई, पराक्रम एवं धैर्य (का); कुजाश्रितात् = मंगल जिस राशि में स्थित है उससे; तृतीय-ऋक्षम् = तीसरी राशि को; बुधैः = विद्वानों द्वारा; भ्रातृ-गृहं स्मृतम् = भ्रातृ-भाव (भाई का घर) कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मंगल के अष्टकवर्ग से भाई-बहन, पराक्रम एवं धैर्य का विचार करना चाहिए। जिस राशि में मंगल स्थित हो, उससे तीसरी राशि को विद्वानों ने भ्रातृ-गृह (भाई का भाव) माना है — यही सहज-कारक बिन्दु आगे के भ्रातृ-फल का आधार बनता है।

English rendering In Mars' aṣṭakavarga one should consider siblings, valour and courage; and the 3rd sign from the sign occupied by Mars is held by the wise to be the sibling-house, the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भ्रातृ-गृह = मंगल-राशि से 3rd राशि (मंगल-स्थान + 2 आगे)। मंगल का भिन्नाष्टकवर्ग रेखा-योग Σ = 39 (12 राशियों में वितरित)। यह श्लोक विषय-नियतन का है — किस ग्रह का अष्टकवर्ग किस कारक के लिए (मंगल → भ्रातृ/पराक्रम) — तथा गणना-मूल (3rd from Mars) निश्चित करता है।

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल मेष में है → मेष से तीसरी राशि = मिथुन → मिथुन ही भ्रातृ-गृह। तत्पश्चात् भ्रातृ-फल इसी भ्रातृ-गृह के मंगल-अष्टकवर्ग बिन्दुओं (त्रिकोण-शोधन के बाद, श्लोक 70.25) से पढ़ा जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) मंगल-अष्टकवर्ग का रेखा-योग हमारे oracle में BPHS Ch.66 के अनुसार 39 पर पिन है — यही वह सत्यापित आधार-सारणी है जिस पर इस श्लोक का भ्रातृ-विचार टिकता है; कारक-नियतन (मंगल → भाई/पराक्रम) शुद्ध विषय-मानचित्रण है, गणना नहीं।

70.25
थ्रिकोणशोढनं क्त्ऱ्थ्वा यथ्र स्याधढिकं फलम् ।
भूमेर्लाभोऽथ्र भार्याया भ्राथ्त्ऱ्णां सुखमुथ्थमम्
thrikoṇaśoḍhanaṃ ktṟthvā yathra syādhaḍhikaṃ phalam |
bhūmerlābho'thra bhāryāyā bhrāthtṟṇāṃ sukhamuththamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिकोण-शोधनं कृत्वा = त्रिकोण-शोधन करके; यत्र स्याद् अधिकं फलम् = जहाँ (शोधन के बाद) बिन्दु-फल अधिक बचे; भूमेः लाभः = भूमि का लाभ; अत्र = वहाँ; भार्यायाः = पत्नी का; भ्रातॄणां = भाइयों का; सुखम् उत्तमम् = उत्तम सुख।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि त्रिकोण-शोधन करने के पश्चात् (मंगल-अष्टकवर्ग में) जिस राशि में शेष बिन्दु-फल अधिक बचे, वहाँ भूमि का लाभ तथा पत्नी और भाइयों का उत्तम सुख होता है। अर्थात् शुभ फल का निर्णय कच्चे बिन्दुओं से नहीं, शोधित (reduced) बिन्दुओं से किया जाता है।

English rendering Having performed the trikoṇa reduction, wherever the remaining bindu-value is greater, there is gain of land and excellent happiness of wife and siblings, the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिकोण-शोधन: 12 राशियाँ चार त्रिकोण-समूहों में — {मेष, सिंह, धनु}, {वृष, कन्या, मकर}, {मिथुन, तुला, कुम्भ}, {कर्क, वृश्चिक, मीन} — प्रत्येक 120° पर। प्रत्येक समूह में तीनों राशियों के बिन्दुओं में से न्यूनतम को तीनों से घटाओ (min-घटाव)। शोधित मान = bᵢ − min(b₁,b₂,b₃)। जहाँ शोधित-फल अधिक → भूमि/भार्या/भ्रातृ-सुख का शुभ-सूचक।

उदाहरण (worked example) अग्नि-त्रिकोण मेष-सिंह-धनु में मंगल-BAV बिन्दु = (5, 3, 7)। न्यूनतम = 3 → तीनों से घटाओ → (2, 0, 4)। शोधन-पश्चात् धनु में सर्वाधिक (4) → धनु उस त्रिकोण में शुभ-फलदायी; यदि भ्रातृ-गृह इसी राशि-क्षेत्र में पड़े तो श्लोकोक्त उत्तम भ्रातृ-सुख का सूचक।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी परिपाटी के केन्द्रीय चरण को सीधे नाम देता है — दोसियर के अनुसार त्रिकोण-शोधन (Ch.67) तथा एकाधिपत्य-शोधन (Ch.68) फल-कथन से पूर्व SAV/BAV को घटाते हैं। हम बिन्दु-योग को पहले `==`-सत्यापित सारणी पर पिन करते हैं (मंगल = 39, SAV = 337), फिर उसी पर यह min-घटाव लगाते हैं — अतः "अधिक फल" कच्चे नहीं, शोधित बिन्दुओं का ही होता है, ठीक वैसे जैसे श्लोक निर्देशित करता है।

70.26
भौमो बलविहीनश्चध् धीर्घायुर्भाथ्त्ऱ्को भवेथ् ।
फलाअनि यथ्र क्षीयन्थे थथ्र भौमे गथे क्षथिह्
bhaumo balavihīnaścadh dhīrghāyurbhāthtṟko bhaveth |
phalāani yathra kṣīyanthe thathra bhaume gathe kṣathih

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौमः बल-विहीनः चेत् = यदि मंगल बल-रहित हो; दीर्घायुः-भ्रातृकः भवेत् = (जातक के) भाई दीर्घायु होते हैं; फलानि यत्र क्षीयन्ते = जिन राशियों में बिन्दु-फल क्षीण/न्यून हों; तत्र भौमे गते = वहाँ मंगल के गोचर करने पर; क्षतिः = (भाई को) हानि/क्षति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि मंगल बल-हीन हो तो जातक के भाई दीर्घायु होते हैं; और मंगल-अष्टकवर्ग में जिन राशियों के बिन्दु-फल क्षीण हों, उन राशियों में मंगल के गोचर-काल में भाई को क्षति (हानि) की सम्भावना कही जाती है। यहाँ बल-हीनता का फल प्रत्यक्ष-विरुद्ध (दीर्घायु) है — इसे शास्त्र-कथन के रूप में ही ग्रहण करें।

English rendering If Mars is devoid of strength the siblings are long-lived, says the text; and where the bindu-values are depleted, harm to the siblings may come when Mars transits there — stated as the text's indication, without any endorsement of certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो कारक-राशियाँ जुड़ती हैं — (क) मंगल का बल (षड्बल), (ख) मंगल-BAV की न्यून-बिन्दु राशियाँ। "फलानि क्षीयन्ते" = वे राशियाँ जहाँ मंगल के बिन्दु (शोधन-पश्चात्) न्यूनतम; उनमें मंगल-गोचर → भ्रातृ-क्षति-काल। बल-निर्णय पृथक् इकाई-गणना से होता है, बिन्दु-गणना से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बल-विहीन भौम" की जाँच षड्बल से होती है — दोसियर के अनुसार स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक एवं दृग् बल का योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), जिसे प्रति-ग्रह देहली-मान से तुलना करते हैं; यह पूर्णतः गणनात्मक है, व्याख्यात्मक नहीं। अतः इस श्लोक के दो सिरे हमारी रीति में दो पृथक् सत्यापित तंत्रों से आते हैं — बल (षड्बल-इकाइयाँ) और बिन्दु (मंगल-अष्टकवर्ग योग 39) — और फल (दीर्घायु/क्षति) को हम शास्त्र का कथन मानकर ही प्रस्तुत करते हैं।

70.27
थ्त्ऱ्थीयर्क्षफलेनाठ पिण्दं सम्बर्ढ्य पूर्ववथ् ।
शेषम्त्ऱ्क्षं शनौ याथे भ्राथ्त्ऱ्कष्तं विनिर्धिशेथ्
thtṟthīyarkṣaphalenāṭha piṇdaṃ sambarḍhya pūrvavath |
śeṣamtṟkṣaṃ śanau yāthe bhrāthtṟkaṣtaṃ vinirdhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तृतीय-ऋक्ष-फलेन = तीसरे भाव (मंगल से भ्रातृ-स्थान) के बिन्दु-फल से; पिण्डम् = योगपिण्ड (अष्टकवर्ग का सञ्चित योग); सम्वर्ध्य (सम्बर्ध्य) = गुणा/संवर्धन करके; पूर्ववत् = पहले (सूर्य→पिता) की विधि की भाँति; शेष-ऋक्षम् = (27 से भाग का) शेष-नक्षत्र/राशि; शनौ याते = शनि (भानुज) के वहाँ पहुँचने पर; भ्रातृ-कष्टम् = भाइयों को कष्ट; विनिर्दिशेत् = कह देना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ मंगल-अष्टकवर्ग का प्रकरण आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — तीसरे भाव (भ्रातृ-स्थान) के बिन्दु-फल से योगपिण्ड को उसी पूर्वोक्त रीति से गुणा/संवर्धित करो; फिर 27 से भाग देने पर शेष जिस नक्षत्र-राशि में गिरे, वहाँ जब शनि गोचर करे, उस काल में भाइयों के कष्ट का निर्देश करना चाहिए। यह घटना-काल निकालने की गणितीय युक्ति है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering Multiply the yoga-piṇḍa by the bindu-value of the third sign (the house of brothers), just as before; when Saturn transits the remainder-sign, the text says one should declare a season of hardship for the brothers.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मान लो योगपिण्ड = P, तृतीय राशि के बिन्दु = b₃। तब सूचक-शेष r निकालो:
r = (P × b₃) mod 27
यह शेष r वें नक्षत्र/राशि को इंगित करता है; उसी में शनि-गोचर = कष्ट-काल। (व्याख्या-भेद संभव: "ऋक्ष" को 27-भाग के कारण नक्षत्र मानें, कुछ टीकाकार राशि पढ़ते हैं।)

उदाहरण (worked example) P = 337 (सर्वाष्टकवर्ग-योग, केवल दृष्टान्त हेतु), b₃ = 5 → 337 × 5 = 1685; 1685 mod 27 = 1685 − (62 × 27) = 1685 − 1674 = 11 → 11वाँ नक्षत्र (पूर्वा-फाल्गुनी)। जब शनि उस राशि/नक्षत्र से गुज़रे, शास्त्रानुसार वह भ्रातृ-कष्ट का सूचक काल है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पिण्ड मंगल के अष्टकवर्ग-योग पर टिका है, और हमारे kaal-verification-oracle में मंगल की रेखा-कुल संख्या Ch.66 के canonical मान 39 पर exact-`==` से पिन है (कोई ±band नहीं)। जिस b₃ से यहाँ गुणा होता है, वह मंगल-भिन्नाष्टकवर्ग की उसी बिन्दु-गणना से आता है — गणना पहले, फल-कथन बाद में।

70.28
बुढाथ्थुर्ये कुतुम्बं च माथुलं मिथ्रमेव च ।
बुढे फलाढिके राशौ गथे थीषां सुखं धिशेथ्
buḍhāththurye kutumbaṃ ca māthulaṃ mithrameva ca |
buḍhe phalāḍhike rāśau gathe thīṣāṃ sukhaṃ dhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधात् = बुध से; तुर्ये = चतुर्थ भाव में (तुरीय = चौथा); कुटुम्बम् = परिवार; मातुलम् = मामा (मातृ-भ्राता); मित्रम् = मित्र; बुधे फलाधिके राशौ गते = अधिक बिन्दु-फल वाली राशि में बुध के गोचर करने पर; तेषां सुखम् = उनके (परिवार-मामा-मित्र के) सुख का; दिशेत् = निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ बुध से चौथे भाव द्वारा कुटुम्ब, मामा और मित्रों का विचार करना चाहिए। शास्त्र कहता है — जब बुध अपने अष्टकवर्ग में अधिक बिन्दुओं वाली राशि से गोचर करे, तब इन सम्बन्धियों के सुख का काल कहा जाता है। यह बिन्दु-आधिक्य की तुलना पर आधारित एक गोचर-नियम है।

English rendering From Mercury, the fourth house is to be read for the family, the maternal uncle, and friends; the text says that when Mercury transits a sign rich in bindus, one should indicate well-being for them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बुध-भिन्नाष्टकवर्ग में कुल 54 बिन्दु 12 राशियों में बँटते हैं ⇒ माध्य ≈ 54 ÷ 12 = 4.5 प्रति राशि। "फलाधिक राशि" = वह राशि जहाँ बिन्दु > माध्य। सूचक: बुध-गोचर-राशि का बिन्दु bᵢ > 4.5 ⇒ शुभ-काल।

उदाहरण (worked example) यदि बुध-अष्टकवर्ग में मकर राशि पर 7 बिन्दु हैं (> 4.5), तो बुध के मकर-गोचर के काल में शास्त्रानुसार कुटुम्ब-मातुल-मित्र-सुख का निर्देश होता है; इसके विपरीत 2-बिन्दु राशि निर्बल मानी जाती है।

70.29
बुढाष्तवर्गं संशोढ्य शेषम्त्ऱ्क्षं गथे शनौ ।
कष्तं कुतुम्बमिथ्राणां माथुलानां च निर्धिशेथ्
buḍhāṣtavargaṃ saṃśoḍhya śeṣamtṟkṣaṃ gathe śanau |
kaṣtaṃ kutumbamithrāṇāṃ māthulānāṃ ca nirdhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधाष्टवर्ग = बुध (Mercury) का अष्टकवर्ग; संशोध्य = त्रिकोण/एकाधिपत्य आदि शोधन करके; शेष = शोधन के बाद बचा फल/बिन्दु-शेष; ऋक्ष = राशि/नक्षत्र-स्थान; गते शनौ = शनि के उस स्थान में स्थित/संक्रमण होने पर; कष्ट = पीड़ा/बाधा (शास्त्र-कथन); कुटुम्बमित्र = परिवार और मित्र; मातुल = मामा/मातृपक्ष के पुरुष; निर्दिशेत् = निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि बुध के अष्टकवर्ग का विधिवत् शोधन करने के बाद जो शेष-ऋक्ष (शेष फल वाला स्थान) बचता है, उसमें शनि के गमन/स्थिति पर कुटुम्ब, मित्रों और मातुलों के विषय में कष्ट का निर्देश किया जाए। यह फल-कथन अष्टकवर्ग-शेष और शनि-स्थान की युक्ति पर टिका है, न कि किसी भय-व्याख्या पर। पाठ-भेद संभव — “शेषं ऋक्षं” की ठीक-ठीक संज्ञा (राशि बनाम नक्षत्र) संस्करणों में भिन्न पढ़ी जा सकती है।

English rendering The text states that after purifying Mercury’s aṣṭakavarga, when Saturn occupies (or reaches) the residual constellation/sign of the remainder, hardship is to be indicated regarding family, friends, and maternal uncles.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बुध-अष्टकवर्ग पर पहले बिन्दु-न्यास, फिर (Ch.67–68 की परम्परा में) त्रिकोण-शोधन एवं एकाधिपत्य-शोधन → प्रत्येक राशि का शेष-बिन्दु \(B_i\)। “शेषं ऋक्षं गते शनौ” = शनि की राशि/ऋक्ष \(R_S\) पर \(B<sub>R_S</sub>\) के शेष-संदर्भ में फल-निर्देश। बुध का कैननिकल रेख-योग (Ch.66, 7 ग्रह) = 54; SAV (7 ग्रह) = 337 — ये मूल-तालिका योग हैं; शोधन के बाद राशिवार शेष बदलते हैं।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए बुध-अष्टकवर्ग शोधन के बाद मिथुन में शेष \(B_{\text{मिथुन}} = 1\) (या 0 — “शेष-कष्ट” की कड़ी रीति में) है, और गोचर/कुण्डली में शनि मिथुन में है। तब शास्त्र की इस युक्ति के अनुसार कुटुम्ब–मित्र–मातुल पक्ष पर कष्ट-निर्देश का विचार किया जाता है। सम्मेलन: अष्टकवर्ग-तालिका BPHS Ch.66; शोधन Ch.67–68; अयनांश फल-कथन को नहीं, केवल ग्रह-देशान्तर को प्रभावित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) बुध-अष्टकवर्ग का कैननिकल रेख-योग 54 तथा SAV = 337 को kaal-verification-oracle में exact-`==` फिक्स्चर पर पिन किया गया है (सहिष्णुता-बैंड नहीं — कभी ±3 ने वास्तविक −1 छिपाया था)। शोधन-शेष पर फल Ch.67–68 की संख्यात्मक कटौती के बाद ही सार्थक है; हम गणित को फल से अलग रखते हैं।

70.30
जीवाथ् पञ्चमथो ज्ञानं ढर्मं पुथ्रं च चिन्थयेथ् ।
थस्मिन् फलाअढिके राशौ सन्थानस्य सुखं धिशेथ्
jīvāth pañcamatho jñānaṃ ḍharmaṃ puthraṃ ca cinthayeth |
thasmin phalāaḍhike rāśau santhānasya sukhaṃ dhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवात् = बृहस्पति (Jupiter) से; पञ्चमतः = पंचम भाव/स्थान से; ज्ञान = विद्या/समझ; धर्म = धर्म/कर्तव्य-क्षेत्र; पुत्र = सन्तान-विषय; चिन्तयेत् = विचार करे; तस्मिन् = उस (पंचम-संबद्ध) स्थान में; फलाधिके राशौ = जहाँ फल (बिन्दु) अधिक हों; सन्तानस्य सुखम् = सन्तान-सुख; दिशेत् = निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ज्ञान, धर्म और पुत्र-विचार गुरु से पंचम स्थान के आधार पर किया जाए। जिस राशि में उस सन्दर्भ में फल अधिक हो, वहाँ सन्तान-सुख का निर्देश दिया जाए। यह अष्टकवर्ग/भाव-फल की अधिकता को सुख-संकेत से जोड़ता है — गणना बिन्दु-अधिक्य की है, फल-वाक्य शास्त्र का अपना कथन है।

English rendering From Jupiter, from the fifth, one should consider knowledge, dharma, and progeny; in the sign where the phala (bindus) are greater, the text directs happiness concerning offspring.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सन्दर्भ-बिन्दु: गुरु-केन्द्रित पंचम (D1 में गुरु से 5वीं राशि, अथवा सुत-भाव का अष्टकवर्गीय फल — पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव)। राशि \(R\) पर फल \(P(R)\); सन्तान-सुख-निर्देश वहाँ जहाँ \(P(R)\) सापेक्षतः अधिकतम/अधिक। कोई बंद-रूप समीकरण नहीं — तुलनात्मक फल-अधिक्य का नियम।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए गुरु कर्क में है; गुरु से पंचम = वृश्चिक। वृश्चिक में (सुत/जीव-अष्टकवर्ग या संबंधित भाव-फल सारणी में) फल = 5, पड़ोसी राशियों में 2 और 3। तब शास्त्र की रीति से “फलाधिक” वृश्चिक पर सन्तान-सुख का चिन्तन प्राथमिक माना जाता है। सम्मेलन: भाव-गिनती पूर्ण-राशि (whole-sign) जब तक अन्य गृह-पद्धति घोषित न हो।

70.31
ब्त्ऱ्हस्पथेः सुथस्ठाने फलं यथ्संख्यकं भवेथ् ।
शथ्रुनीचग्रहं थ्यक्थ्वा थावथी सन्थथिर्ढ्रुवा
btṟhaspatheḥ suthasṭhāne phalaṃ yathsaṃkhyakaṃ bhaveth |
śathrunīcagrahaṃ thyakthvā thāvathī santhathirḍhruvā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बृहस्पतेः = गुरु का; सुतस्थान = पुत्र-स्थान (पंचम); फल = बिन्दु/अंक-संख्या; यत्संख्यकम् = जितनी संख्या; शत्रु = शत्रु-ग्रह; नीचग्रह = नीच स्थित ग्रह; त्यक्त्वा = छोड़कर; तावती = उतनी; सन्ततिः = सन्तान-संख्या; ध्रुवा = निश्चित (शास्त्र-कथन की भाषा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु के सुत-स्थान में जो फल-संख्या हो, उसमें से शत्रु-ग्रह और नीच-ग्रह का भाग छोड़ देने पर शेष जितना हो, उतनी सन्तान “ध्रुव” कही गई है। यह शास्त्र का अपना संख्या-फल कथन है — हम इसे नियति या गारंटी के रूप में नहीं पढ़ते; केवल पाठ की गणना-विधि खोलते हैं। “शत्रु/नीच” की कटौती-विधि (पूर्ण ग्रह-योग या आंशिक) में पाठ-भेद संभव।

English rendering Whatever numerical phala stands in Jupiter’s child-place — after setting aside the enemy and debilitated grahas — that many offspring the text calls “firm.” This is the śāstra’s quantitative claim, not a fate-endorsement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मानें सुत-स्थान पर कुल फल \(N\) (बिन्दु-गणना)। कटौती-समुच्चय \(E\) = शत्रु-ग्रह + नीच-ग्रह (कुण्डली-स्थित)। शास्त्र-कथन: सन्तान-संख्या \(S = N - f(E)\) जहाँ \(f(E)\) संस्करणानुसार “उन ग्रहों का फल-योग” या “उनकी उपस्थिति-मात्र एकांक” हो सकता है — अनिश्चित अंश को “पाठ-भेद संभव” रखें। “तावती … ध्रुवा” = \(S\) का सीधा पूर्णांक-फल-कथन।

उदाहरण (worked example) सुत-स्थान फल \(N = 6\)। वहाँ (या संबंधित गणना में) एक शत्रु-ग्रह और एक नीच-ग्रह कटौती-योग्य; यदि प्रत्येक का फल 1 गिना जाए तो \(S = 6 - 1 - 1 = 4\)। शास्त्र कहता है “तावती सन्ततिर्ध्रुवा” — हम केवल \(S\) निकालते हैं; जीवन-घटना का दावा नहीं करते। सम्मेलन: नीच = स्व-उच्च-नीच सारणी (सूर्य तुला, चन्द्र वृश्चिक, …); शत्रु = प्राकृतिक/तात्कालिक शत्रु-परिभाषा घोषित करनी होगी।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक फल-संख्या को सन्तान-गणना से जोड़ता है — अष्टकवर्ग-बिन्दु की exact-गिनती वाली ही अनुशासन-रेखा। हमारा oracle अष्टकवर्ग-योगों पर `==` माँगता है; फल-वाक्य को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही रिपोर्ट करते हैं, deterministic fate के रूप में नहीं।

70.32
सुथभेशनवांशैश्च थुल्या वा सन्थथिर्भवेथ् ।
सुथभावफलेनैवं पिण्दं संगुण्य पूर्ववथ्
suthabheśanavāṃśaiśca thulyā vā santhathirbhaveth |
suthabhāvaphalenaivaṃ piṇdaṃ saṃguṇya pūrvavath

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुतभेश = पुत्र-भाव (5) का स्वामी; नवांशैः = D9 अंश-संख्या/नवांश-स्थिति से; तुल्या = समान; वा = अथवा; सन्ततिः = सन्तान; सुतभावफलेन = पुत्र-भाव के फल से; पिण्डम् = पिण्ड (पूर्व-निर्दिष्ट गुणक/योग-राशि); संगुण्य = गुणा करके; पूर्ववत् = पहले जैसी विधि से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विकल्प देता है — सन्तान सुत-भावेश के नवांशों के तुल्य भी हो सकती है। अथवा, पूर्ववत् पिण्ड को सुत-भाव-फल से गुणा कर गणना की जाए। यह दो समान्तर संख्या-पथ हैं: एक D9-संरचना पर, दूसरा भाव-फल × पिण्ड पर। दोनों ही गणना-अनुशासन हैं; फल-कथन शास्त्र का है।

English rendering Or progeny may equal the navāṃśas of the lord of the child-house; or, as before, multiply the piṇḍa by the phala of the child-house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
(1) नवांश-पथ: सुतभेश की देशान्तर \(\lambda\); नवांश-सूचकांक \(n = \lfloor (\lambda \bmod 30^\circ) / 3^\circ 30' \rfloor + 1\) जहाँ \(3^\circ 30' = 30^\circ/9\) — अर्थात् प्रत्येक नवांश = \(3^\circ 20'\) (30° ÷ 9)। “नवांशैस्तुल्या” = \(S \sim n\) या भेश के नवांश-राशि-क्रम की गिनती (पाठ की संकीर्ण रीति संस्करण-सापेक्ष; पाठ-भेद संभव)।
(2) पिण्ड-पथ: \(S \propto \Pi × P_5\) जहाँ \(\Pi\) = पूर्ववत् पिण्ड, \(P_5\) = सुत-भाव फल — “संगुण्य पूर्ववत्”।

उदाहरण (worked example) सुतभेश = शुक्र, \(\lambda_{\text{शुक्र}} = 46^\circ 40'\) (वृषभ 16°40′)। वृषभ के भीतर चाप = \(16^\circ 40'\); नवांश-चौड़ाई = \(3^\circ 20'\); \(n = \lfloor 16^\circ 40' / 3^\circ 20' \rfloor + 1 = \lfloor 5 \rfloor + 1 = 6\)। शास्त्र-विकल्प (1): सन्तान-संख्या 6 के तुल्य चिन्त्य। विकल्प (2): यदि \(\Pi = 2\), \(P_5 = 4\), तो गुणन \(2 × 4 = 8\) — “पूर्ववत्” पूर्ण सूत्र अध्याय की पूर्व-पद्धति पर निर्भर (यही श्लोक गुणन-निर्देश मात्र देता है)। सम्मेलन: D9 = 30°/9 समान भाग; अयनांश केवल \(\lambda\) के लिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) नवांश (D9) षोडश-वर्ग श्रृंखला का सदस्य है — D1…D60 का नियत-चाप विभाजन; वर्ग-इंजन देशान्तर पर शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित चलाता है। यहाँ सन्तान-संख्या को D9-अनुक्रम से बाँधने वाला शास्त्र-विकल्प उसी वर्ग-गणित पर टिकता है।

70.33
पुथ्रकष्तं विजानीयाथ् शेषम्त्ऱ्क्षं गथे शनौ ।
एवं ढर्मं च विध्यां च कल्पयेथ् कालचिथ्थमः
puthrakaṣtaṃ vijānīyāth śeṣamtṟkṣaṃ gathe śanau |
evaṃ ḍharmaṃ ca vidhyāṃ ca kalpayeth kālaciththamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रकष्ट = सन्तान-विषयक बाधा (शास्त्र-कथन); विजानीयात् = जान ले; शेषं ऋक्षं गते शनौ = शोधन-शेष ऋक्ष में शनि पर; एवं = इसी रीति से; धर्मम् = धर्म; विद्याम् = विद्या; कल्पयेत् = अनुमान/व्यवस्था करे; कालवित्तमः = काल का श्रेष्ठ ज्ञाता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शोधन के बाद शेष-ऋक्ष में शनि होने पर पुत्र-कष्ट जाना जाए। काल का उत्तम ज्ञाता इसी युक्ति से धर्म और विद्या का भी कल्पना-अनुमान करे। यह 70.29 की शनि–शेष संरचना का सुत/धर्म/विद्या पक्ष पर विस्तार है — भय-भाषा नहीं, पाठ की संकेत-विधि।

English rendering When Saturn is in the residual constellation after purification, one should recognize hardship concerning children; likewise the best knower of time should estimate dharma and learning.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + सादृश्य-विधि। संरचना वही: अष्टकवर्ग-शोधन → शेष \(B_i\) → \(R_S\) पर शनि ⇒ पुत्र-कष्ट निर्देश; “एवं” से धर्म/विद्या पर समान तर्क। संख्यात्मक नवांक यहाँ नहीं; शेष-बिन्दु की निम्नता/स्थिति ही संकेत है।

हमारा डिकोड (Our Decode) शोधन-शेष SAV/भाव-अष्टकवर्ग की कटौती (Ch.67–68) के बाद ही “शेष” सार्थक है; कैननिकल SAV = 337 शोधन-पूर्व योग है। हम फल को “शास्त्र कहता है” कहकर रखते हैं; बिन्दु-गणित को exact-`==` पर।

70.34
शथ्रुस्याकष्तवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ।
यथ्र यथ्र फलानि स्युर्भूयांसि कलि थथ्र थु
śathrusyākaṣtavargaṃ ca nikṣipyākāśacāriṣu |
yathra yathra phalāni syurbhūyāṃsi kali thathra thu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्रोः अष्टवर्गम् = शत्रु (षष्ठ/शत्रु-ग्रह — पाठ-भेद संभव) का अष्टकवर्ग; निक्षिप्य = निक्षेप करके / बाँटकर; आकाशचारिषु = आकाश में विचरने वाले ग्रहों में; यत्र यत्र = जहाँ-जहाँ; फलानि भूयांसि = फल अधिक हों; कलिः = कलह/विरोध; तत्र = वहाँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शत्रु-सम्बन्धी अष्टकवर्ग को आकाशचारियों (ग्रहों) पर निक्षिप्त कर देखें — जहाँ-जहाँ फल अधिक हों, वहाँ कलि (कलह) का संकेत है। अधिक बिन्दु यहाँ “कलह-क्षेत्र” से जुड़े हैं; यह पाठ का फल-नियम है, उत्तेजक भविष्यवाणी नहीं। “शत्रुस्य” = षष्ठाधिप/मङ्गल/शत्रु-भाव — संस्करण-भेद संभव।

English rendering Casting the aṣṭakavarga of the enemy among the sky-goers (planets), wherever the phala are more abundant, there the text indicates strife (kali).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शत्रु-अष्टकवर्ग (या षष्ठ-सन्दर्भ) की बिन्दु-सारणी \(P_g\) ग्रह \(g\) पर; कलि-संकेत वहाँ जहाँ \(P_g = \max\) या सापेक्षतः \(\text{भूयांसि}\)। कोई वर्गमूल/वर्ग-सूत्र नहीं — अधिकतम-फल स्थानों का चयन-नियम। मूल अष्टकवर्ग योग (Ch.66): रवि 48, चन्द्र 49, मङ्गल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39; Σ = 337।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए शत्रु-अष्टकवर्ग न्यास के बाद ग्रहों पर फल: रवि 3, चन्द्र 5, मङ्गल 7, बुध 2, गुरु 4, शुक्र 6, शनि 1। “भूयांसि” = मङ्गल (7) और शुक्र (6) — शास्त्र कहता है वहाँ कलि का चिन्तन। सम्मेलन: तालिका BPHS Ch.66; “शत्रु” की परिभाषा स्पष्ट घोषित करनी होगी।

हमारा डिकोड (Our Decode) सात-ग्रह अष्टकवर्ग योग 48/49/39/54/56/52/39 → 337 हमारे pinned fixture पर exact-`==` हैं। यह श्लोक उन्हीं बिन्दुओं के “अधिक्य → कलि” फल-मानचित्र का अनुप्रयोग है; गणित पिन, फल शास्त्र-वाच्य।

70.35
विथ्थं कलथ्रं भूमिं च थथ्थध्धेशाध् विनिर्धिशेथ् ।
शुक्राज्जामिथ्रथो धारलब्ढिश्चिन्थ्या विचक्षणैः
viththaṃ kalathraṃ bhūmiṃ ca thaththadhdheśādh vinirdhiśeth |
śukrājjāmithratho dhāralabḍhiścinthyā vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वित्तम् = धन; कलत्रम् = पत्नी; भूमिम् = भूमि; तत्-तत्-देशात् = अपने-अपने (सम्बद्ध) भावों/स्थानों से; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे; शुक्रात् = शुक्र से; जामित्रतः = सप्तम भाव से (जामित्र = 7वाँ, diámetron); दार-लब्धिः = पत्नी/जीवनसंगिनी की प्राप्ति; चिन्त्या = विचारणीय; विचक्षणैः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ धन, पत्नी और भूमि — इनका विचार अपने-अपने सम्बद्ध भावों से करना चाहिए। और शुक्र से सप्तम (जामित्र) भाव द्वारा विवाह/दारा-लाभ पर विद्वानों को विचार करना चाहिए। यहाँ "जामित्र" सप्तम भाव का पारिभाषिक नाम है।

English rendering Wealth, wife, and land are to be declared each from its own respective house; and from Venus, the seventh place (jāmitra), the gaining of a spouse is to be considered by the wise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) जामित्र = सप्तम स्थान: S₇ = (शुक्र-राशि + 6) चक्रीय, mod 12। दारा-लाभ का सूचक-राशि S₇; इसके बिन्दु-फल की तुलना (पूर्ववत् bᵢ > माध्य) से अनुकूलता आँकी जाती है। शब्द "जामित्र" यूनानी diámetron (व्यास/सातवाँ) का तत्सम — शुद्ध स्थान-गणना, फल नहीं।

उदाहरण (worked example) शुक्र वृषभ (2) में ⇒ S₇ = 7वीं राशि वृश्चिक। शुक्र-अष्टकवर्ग में वृश्चिक पर बिन्दु ऊँचे हों तो शास्त्रानुसार दारा-लाभ अनुकूल कहा जाता है।

70.36
जामिथ्रथथ्थ्रिकोणस्ठराशिधिग्धेशसम्भवा ।
सुखेधुःखे स्थ्रियाश्चिन्थ्ये पिण्दं सम्वर्ढ्य पूर्ववथ्
jāmithrathaththrikoṇasṭharāśidhigdheśasambhavā |
sukhedhuḥkhe sthriyāścinthye piṇdaṃ samvarḍhya pūrvavath

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जामित्र = सप्तम भाव (दाम्पत्य/साझी); तत्त्रिकोणस्थ = उसी से 1-5-9 (त्रिकोण) पर स्थित; राशि = चिह्न/राशि-क्षेत्र; धिग्देश = दिशा-देश (राशि-दिग्देश); सम्भवा = उससे उत्पन्न/निर्णय्य; स्त्रियाः सुखे दुःखे = स्त्री/पत्नी-सुख-दुःख; चिन्त्ये = विचारणीय; पिण्डं संवर्ध्य = अष्टकवर्ग-पिण्ड बढ़ाकर; पूर्ववत् = पूर्वोक्त विधि से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ स्त्री-सुख-दुःख की परीक्षा को जामित्र (सप्तम) तथा उसके त्रिकोण-स्थित राशियों के दिग्देश-सन्दर्भ से जोड़ता है। उन राशियों से उत्पन्न संकेत को लेकर विचार करना कहा गया है। गणना का आधार वही पिण्ड है जो पहले सिखाया जा चुका है—उसे पूर्ववत् संवर्धित कर प्रयोग करें। यह फल-कथन का प्रसंग है, न कि कोई नया अचल भाग-सूत्र।

English rendering Happiness and sorrow pertaining to the woman (partner) are to be examined from the dig-deśa of the seventh house and of the signs in its trikoṇa. The piṇḍa is to be increased and applied as previously taught.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) इस श्लोक में नया अंकीय स्थिरांक नहीं। तकनीक = (i) आधार-स्थान = जामित्र (L+6, 0-based house index) तथा उसके त्रिकोण {H, H+4, H+8} mod 12; (ii) उन राशियों के दिग्देश-सन्दर्भ से स्त्री-सुख-दुःख का विचार; (iii) पिण्ड-संवर्धन = “पूर्ववत्” (अध्याय के पूर्व-श्लोकों की पिण्ड-विधि)—यहाँ केवल अनुप्रयोग-क्षेत्र बदला है। पाठ-भेद संभव: “धिग्देश” की सटीक संज्ञा-परम्परा संस्करणानुसार भिन्न हो सकती है।

70.37
सनैश्चराश्रिथस्ठानाधष्तमं म्त्ऱ्थ्युभं स्म्त्ऱ्थम् ।
थधेव चायुषः स्ठानं थस्माधायुर्विचिन्थयेथ्
sanaiścarāśrithasṭhānādhaṣtamaṃ mtṟthyubhaṃ smtṟtham |
thadheva cāyuṣaḥ sṭhānaṃ thasmādhāyurvicinthayeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनैश्चर = शनि; आश्रित-स्थान = जिस भाव/राशि में शनि स्थित; अष्टमं = उससे आठवाँ भाव; मृत्युभम् = मृत्यु-स्थान (शास्त्र-कथन); स्मृतम् = कहा/माना गया; आयुषः स्थानम् = आयु-स्थान भी वही; तस्मात् = इसलिए; आयुः विचिन्तयेत् = आयु का विचार वहीं से करें।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि जिस स्थान पर बैठा हो, उससे आठवाँ भाव मृत्यु-भवन के रूप में स्मृत है। उसी स्थान को आयु का स्थान भी कहा गया है। अतः आयु-सम्बन्धी चिन्तन उसी अष्टम-से-शनि संरचना से करना निर्देशित है। यह स्थान-नियम है—व्याख्या फल की, न कि चिकित्सकीय निर्णय की।

English rendering The text states that the eighth from Saturn’s occupied place is remembered as the house of death, and likewise as the seat of longevity; therefore longevity is to be considered from there.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-अनुक्रमण (लग्न = 1 … 12): शनि-भाव = \(S\) हो तो
मृत्यु/आयु-स्थान \(M = ((S - 1 + 7) \bmod 12) + 1\)
अर्थात् \(S\) से गिनकर 8वाँ भाव। उदाहरण: \(S = 3\) (मिथुन) ⇒ \(M = 10\) (मकर)। राशि-पर भी वही +8 mod 12 नियम। फल-कथन को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही लें—निश्चय/भय-वाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) मानें कुण्डली में शनि कन्या (भाव 6, लग्न मेष)। तब अष्टम-से-शनि = भाव 1 (मेष) = लग्न। शास्त्र की भाषा में आयु/मृत्यु-स्थान का विचार इसी भाव से कहा गया; संख्यात्मक आयु-वर्ष इस श्लोक से नहीं निकलते—केवल स्थान-सूचक नियम है।

70.38
लग्नाथ्प्रभ्त्ऱ्थि मन्धान्थं फलान्येकथ्र कारयेथ् ।
थध्योगफलथुल्याब्धे व्याढिं वैरं समाधिशेथ्
lagnāthprabhtṟthi mandhānthaṃ phalānyekathra kārayeth |
thadhyogaphalathulyābdhe vyāḍhiṃ vairaṃ samādhiśeth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् प्रभृति = लग्न से आरम्भ; मन्धान्तम् = मन्द (शनि) तक; फलानि = अष्टकवर्ग-फल (बिन्दु/फल-संख्या); एकत्र कारयेत् = एक जगह जोड़ें; तद्योगफलतुल्याब्दे = उस योग-फल के तुल्य वर्ष में; व्याधिम् = रोग; वैरम् = वैर/विरोध; समादिशेत् = संकेत करें (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ लग्न से लेकर शनि-स्थित स्थान तक के फलों को एकत्र योग करना कहा गया है। शास्त्र कहता है कि उस योग-संख्या के बराबर वर्ष में व्याधि और वैर का संकेत दिया जाए। यह अष्टकवर्ग-फलों पर आधारित काल-सूचक नियम है। भय या निश्चय की भाषा नहीं—पाठ का फल-कथन मात्र।

English rendering Collect the phalas from the lagna through to Saturn into one total. In the year equal to that combined phala, the text indicates disease and enmity.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
मानें भाव \(1 =\) लग्न … \(S =\) शनि-भाव (लग्न-से गिनकर, \(1 \le S \le 12\))।
प्रत्येक भाव \(i\) का फल \(f_i\) (संबंधित अष्टकवर्ग/सामान्यतः SAV या प्रसंगानुकूल भिन्नाष्टकवर्ग—परम्परा घोषित करें)।
\[
Y<sub>L\to Ś</sub> = \sum<sub>i=1</sub><sup>S</sup> f_i
\]
शास्त्र: वर्ष \(Y<sub>L\to Ś</sub>\) में व्याधि-वैर संकेत।
सम्मेलन: ayanāṃśa से राशि/भाव नहीं बदलते यदि पूर्ण-राशि भाव हों; varga नहीं—D1 भाव-क्रम। कौन-सा अष्टकवर्ग (SAV vs ग्रह-विशेष)—पाठ-भेद/टीका-भेद संभव; घोषित करके चलें।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (1), शनि = कर्कट (4)। SAV बिन्दु (काल्पनिक पर सुसंगत): भाव 1…4 = 5, 3, 4, 6।
\(Y<sub>L\to Ś</sub> = 5+3+4+6 = 18\)।
शास्त्र-कथन: 18वें वर्ष-संकेत पर व्याधि/वैर विचारणीय—यह पाठ का नियम है, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग के \(f_i\) तभी अर्थ रखते हैं जब च.66 की बिन्दु-सारणियाँ सही हों। हमने सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV = 337 को exact-`==` फिक्स्चर पर पिन किया है; ±बैण्ड नहीं—कभी −1 छिप गया था। यही शुद्ध \(f_i\) आगे योग-वर्ष में प्रवेश करते हैं।

70.39
एवं मन्धाधिलग्नान्थं फलान्येकथ्र योजयेथ् ।
थथ्थुल्यवर्षे जाथस्य थस्य व्याढिभयं वधेथ्
evaṃ mandhādhilagnānthaṃ phalānyekathra yojayeth |
thaththulyavarṣe jāthasya thasya vyāḍhibhayaṃ vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; मन्द-आदि-लग्न-अन्तम् = शनि (मन्द) से आरम्भ कर लग्न तक; फलानि एकत्र योजयेत् = बिन्दु-फलों को एक साथ जोड़े; तत्-तुल्य-वर्षे = उस (योग) के तुल्य वर्ष में; जातस्य = जातक के; तस्य व्याधि-भयम् = रोग का भय; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इसी प्रकार शनि (मन्द) से आरम्भ कर लग्न तक की राशियों के बिन्दु-फल जोड़ो; जो योग आए, जातक के उतने-वें वर्ष में रोग-भय का निर्देश करना चाहिए। यह 38वें श्लोक का पूरक है — विपरीत चाप का योग एक दूसरा सूचक-वर्ष देता है।

English rendering Likewise, from Saturn up to the ascendant, sum the bindu-values together; in the year equal to that total, the text says fear of illness for the native should be declared.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूरक-चाप योग:
Y₂ = Σ (bᵢ : राशि i ∈ [शनि → लग्न], अग्र-दिशा, दोनों सिरे सम्मिलित)
लग्न→शनि (Y₁) और शनि→लग्न (Y₂) दोनों अग्र-चाप मिलकर पूरा राशि-चक्र ढकते हैं; दोनों सिरों (लग्न व शनि की राशियाँ) की गणना दोनों में होने से:
Y₁ + Y₂ = (सम्पूर्ण बिन्दु-योग) + b_लग्न + b_शनि

उदाहरण (worked example) ऊपर (श्लोक 38) लग्न = सिंह, शनि = धनु; पूरक-चाप धनु→सिंह = {धनु, मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह}। इनके सर्वाष्टकवर्ग-बिन्दु मान लो योग = 41 ⇒ Y₂ = 41 → शास्त्रानुसार 41वें वर्ष व्याधि-भय का कथन (एक द्वितीय सूचक-वर्ष)।

हमारा डिकोड (Our Decode) Y₁ + Y₂ = कुल-योग + b_लग्न + b_शनि — यह पहचान तभी स्थिर रहती है जब प्रति-राशि बिन्दु exact हों; इसीलिए हमने सर्वाष्टकवर्ग को Ch.66 canonical 337-योग पर `==` से पिन किया, tolerance-band से नहीं। दोनों पूरक-चापों की जाँच एक-दूसरे की cross-check बन जाती है — गणना पहले, फल-कथन (शास्त्र का, हमारा नहीं) बाद में।

70.40
ध्वयोर्योगसमे वर्षे कष्तं म्त्ऱ्थ्युसमं धिशेथ् ।
धशारिष्तसमायोगो म्त्ऱ्थ्युरेव न संशयः
dhvayoryogasame varṣe kaṣtaṃ mtṟthyusamaṃ dhiśeth |
dhaśāriṣtasamāyogo mtṟthyureva na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वयोः योगसमे वर्षे = दोनों (70.38–39) योगों के योग-समान वर्ष में; कष्टं मृत्युसमम् = मृत्यु-तुल्य कष्ट; दिशेत् = संकेत करें; दशा-अरिष्ट-समायोगः = दशा और अरिष्ट-काल का एक योग; मृत्युः एव = मृत्यु ही (शास्त्र-कथन); न संशयः = संशय नहीं—यह पाठ की निश्चय-भाषा है, हमारी नहीं।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों दिशाओं से प्राप्त फल-योगों का संयुक्त वर्ष आता है, शास्त्र वहाँ मृत्यु-सम कष्ट का निर्देश देता है। यदि वही अरिष्ट-संकेत प्रचलित दशा से भी मेल खाए, तो पाठ “मृत्युरेव न संशयः” कहता है। हम इसे शास्त्र का कठोर फल-वाक्य मानकर उद्धृत करते हैं—भय-वाणिज्य, चिकित्सा-निर्णय, या हमारी ओर से भाग्य-घोषणा नहीं।

English rendering In the year equal to the combined yoga of the two (prior) totals, the text indicates suffering comparable to death. When that ariṣṭa coincides with the daśā, the śāstra states death without doubt—reported here as the text’s claim, not as our verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
\[
Y_{\text{द्वय}} = Y<sub>L\to Ś</sub> + Y<sub>Ś\to L</sub>
\]
(अथवा कुछ पठन में “द्वयोर्योग” = दोनों योगों का साम्य/मिलान-वर्ष; मुख्य पठन योग-योग = योग। पाठ-भेद संभव।)
अरिष्ट-संयोग: \(Y_{\text{द्वय}}\) (या \(Y<sub>L\to Ś</sub>\), \(Y<sub>Ś\to L</sub>\)) जिस आयु-वर्ष से मेल खाए और उसी कालखण्ड में दशा/अन्तर्दशा-स्वामी अरिष्ट-योग का हो—शास्त्र “मृत्यु” कहता है।
दशा-पक्ष: विंशोत्तरी 120 वर्ष (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ=120)—अन्तर्दशा = \((\text{महा} × \text{अन्तर})/120\)।
अनुशासन: फल = “शास्त्र कहता है”; गणना = exact योग व दशा-अंक; सहिष्णु-बैण्ड से अरिष्ट-वर्ष न छिपाएँ।

उदाहरण (worked example) \(Y<sub>L\to Ś</sub>=18\), \(Y<sub>Ś\to L</sub>=43\) ⇒ \(Y_{\text{द्वय}}=61\)। मानें जन्म 1980-01-01; संकेत-वर्ष ≈ 2041। यदि उसी आयु में विंशोत्तरी महा/अन्तर का अरिष्ट-मेल शास्त्रीय दृष्टि से बने, पाठ “मृत्यु” कहता है—हम केवल संरचना दिखाते हैं, भविष्य नहीं बाँधते।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ दो इंजन मिलते हैं: अष्टकवर्ग-बिन्दु (च.66 → 337 SAV, exact-`==`) और विंशोत्तरी 120-वर्ष अनुपात-दशा। दोनों को अलग रखें—बिन्दु-योग वर्ष देता है; दशा समय-खिड़की। मिलान “समायोग” है, न कि एक संख्या से भाग्य की मोहर।

70.41
पिण्दं संस्ठाप्य गुणयेथ् शनेरष्तमगैः फलैः ।
सप्थविंशथिह्त्ऱ्च्छेषथुल्यम्त्ऱ्क्षं गथे शनौ
piṇdaṃ saṃsṭhāpya guṇayeth śaneraṣtamagaiḥ phalaiḥ |
sapthaviṃśathihtṟccheṣathulyamtṟkṣaṃ gathe śanau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिण्डम् = योगपिण्ड (संचित अष्टकवर्ग-फल); संस्थाप्य = स्थापित कर के; गुणयेत् = गुणा करे; शनेः अष्टम-गैः फलैः = शनि से आठवीं राशि के फल से; सप्तविंशति = 27; हृत्-शेष = 27 से भाग देने पर बचा शेष; तुल्यम् ऋक्षम् = शेष के तुल्य नक्षत्र/ऋक्ष; गते शनौ = शनि के उस (ऋक्ष) में गोचर करने पर।

हिन्दी भावार्थ पहले योगपिण्ड को स्थापित करो, फिर उसे शनि से अष्टम (मृत्यु-स्थान) राशि के अष्टकवर्ग-फल से गुणा करो। इस गुणनफल को सत्ताईस से भाग देने पर जो शेष बचे, उसके तुल्य नक्षत्र/ऋक्ष निकालो। शास्त्र कहता है — जब गोचर में शनि उस ऋक्ष तक पहुँचता है, तब वह मृत्यु-सूचक काल होता है। (आयु/मृत्यु का कारक शनि यहाँ अष्टम-भाव से जोड़ा गया है।)

English rendering Having set down the yoga-piṇḍa, multiply it by the phala of the sign eighth from Saturn; divide by twenty-seven, and take the asterism equal to the remainder — the text states that death is indicated when transiting Saturn reaches that asterism.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) N = पिण्ड P × f₈, जहाँ f₈ = शनि-से-अष्टम राशि का अष्टकवर्ग-फल। फिर r = N mod 27 (सप्तविंशति = 27, नक्षत्र-संख्या) → r-वाँ ऋक्ष। घटना-नियम: गोचर-शनि ∈ (r-वाँ ऋक्ष) → शास्त्र मृत्यु-सूचना कहता है। अष्टम-भाव = आयुर्भाव, अतः "शनि-से-अष्टम" का फल मृत्यु-गणना में गुणक बनता है।

उदाहरण (worked example) P = 40, शनि-से-अष्टम राशि का फल f₈ = 5 → N = 40 × 5 = 200। 200 ÷ 27: 27 × 7 = 189, शेष r = 200 − 189 = 11 → 11वाँ नक्षत्र (ज्येष्ठा, यदि अश्विनी=1)। शास्त्र-कथन: जब गोचर-शनि ज्येष्ठा तक पहुँचे, वह मृत्यु-सूचक काल कहा गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक शनि-अष्टकवर्ग को सीधे मृत्यु-गणना में प्रयुक्त करता है — वही शनि जिसकी कुल रेखा हमने Ch.66 में विहित रूप में 39 पर `==`-पिन किया (कोई ±band नहीं, क्योंकि एक बार ±3 band ने वास्तविक −1 त्रुटि छिपा दी थी)। यहाँ का 27-मॉड्युलर भाग (सप्तविंशति = 27) शुद्ध पूर्णांक-अंकगणित है — ठीक वैसा ही निर्धारक (deterministic) प्रकार जैसा हमारी वर्ग-गणना (D1…D60) में देशान्तर पर modular arithmetic है।

70.42
थथ्थ्रिकोणर्क्षगे वापि जाथकस्य म्त्ऱ्थिं वधेथ् ।
अर्कह्त्ऱ्च्छेषराशौ वा थथ्थ्रिकोणेऽपि थध् वधेथ्
thaththrikoṇarkṣage vāpi jāthakasya mtṟthiṃ vadheth |
arkahtṟccheṣarāśau vā thaththrikoṇe'pi thadh vadheth

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्त्रिकोणर्क्षगे = उस (नक्षत्र के) त्रिकोण-ऋक्ष पर भी; वा अपि = अथवा; जातकस्य मृत्युम् वदेत् = जातक की मृत्यु कहे (शास्त्र); अर्क = 12 (भुतसंख्या: आदित्य/अर्क = 12); हृत-शेष-राशौ = 12 से भाग-शेष के तुल्य राशि में; तत्त्रिकोणे अपि = उसके त्रिकोण में भी; तद् वदेत् = वही कहे।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के 27-शेष वाले नक्षत्र पर, अथवा उसके त्रिकोण-नक्षत्रों पर, शनि-स्थिति में शास्त्र जातक-मृत्यु का कथन करता है। उसी गुणनफल को 12 (अर्क) से भागकर शेष-राशि—और उसके त्रिकोण—पर भी वही फल कहा गया है। हम इसे पाठ का कठोर अरिष्ट-सूत्र मानकर गणित खोलते हैं; चिकित्सा, भय, या निश्चित भाग्य-भाषण नहीं करते।

English rendering The text states death for the native when Saturn is in that nakṣatra or in its trikoṇa. The same is said for the sign equal to the remainder after division by twelve (arka), and for that sign’s trikoṇa as well.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) \(N = P × B\) (70.41 से)।

नक्षत्र-पथ:
\(r<sub>27</sub> = N \bmod 27\) (0 → 27)।
त्रिकोण-ऋक्ष: नक्षत्र-चक्र 27 पर सम-त्रिभुज—
\(r<sub>27</sub>,\ (r<sub>27</sub>+9-1 \bmod 27)+1,\ (r<sub>27</sub>+18-1 \bmod 27)+1\)
अर्थात् \(+9\) और \(+18\) mod 27 (1-based)।

राशि-पथ (अर्क = 12):
\[
r<sub>12</sub> = N \bmod 12,\quad \text{यदि } r<sub>12</sub>=0 \text{ तो } 12
\]
\(r<sub>12</sub>\) = राशि-क्रमांक (1=मेष … 12=मीन)।
राशि-त्रिकोण: \(r<sub>12</sub>,\ ((r<sub>12</sub>-1+4)\bmod 12)+1,\ ((r<sub>12</sub>-1+8)\bmod 12)+1\)।
शास्त्र: शनि-गोचर इन ऋक्ष/राशि-स्थानों पर → “मृत्युं वदेत्” / “तद् वदेत्”—फल-कथन; ayanāṃśa गोचर-देशान्तर के लिए आवश्यक (उदा. लाहिरी)—घोषित करें।

उदाहरण (worked example) \(N=560\)।
\(r<sub>27</sub>=20\) → नक्षत्र 20, 2 (\(20+9 \equiv 2\)), 11 (\(20+18 \equiv 11\)) mod 27।
\(r<sub>12</sub>=560 \bmod 12=8\) (क्योंकि \(12×46=552\), शेष 8) → वृश्चिक; त्रिकोण = वृश्चिक, मीन (12), कर्कट (4)।
सम्मेलन: ग्रह-गोचर उष्णकटिबन्धीय देशान्तर + घोषित ayanāṃśa से निरयण देशान्तर; नक्षत्र = \(\lfloor \lambda_{\text{nirayana}} / (360^\circ/27) \rfloor + 1\)।
फल केवल शास्त्र-वाक्य के रूप में—हमारी भविष्य-मुद्रा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक मॉड्यूलर अंकगणित का साक्षात् रूप है: \(N \bmod 27\) और \(N \bmod 12\), फिर त्रिकोण = +9/+18 (नक्षत्र) और +4/+8 भाव (राशि)। अष्टकवर्ग-पिण्ड और च.66 बिन्दु exact होने पर ही \(N\) स्थिर रहता है; oracle-अनुशासन: `==` शेष, कोई “± एक नक्षत्र” सहिष्णुता नहीं—वही अनुशासन जिससे SAV 337 पिन हुआ।

70.43
शनैश्चराष्तवर्गेषु यथ्र नास्थि फलं ग्त्ऱ्हे ।
थथ्र नैव शुभं थस्य यधा याथि शनैश्चरः
śanaiścarāṣtavargeṣu yathra nāsthi phalaṃ gtṟhe |
thathra naiva śubhaṃ thasya yadhā yāthi śanaiścaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनैश्चर = शनि; अष्टवर्गेषु = शनि-अष्टकवर्ग के (बिन्दु/रेखा) विन्यास में; यत्र = जहाँ; नास्ति फलं = फल (रेखा/बिन्दु) नहीं है; गृहे = भाव/राशि-स्थान में; तत्र = वहाँ; नैव शुभं = शुभ फल नहीं; तस्य = उसके (जातक के); यदा याति शनैश्चरः = जब शनि उस स्थान पर गोचर से पहुँचे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शनि के अष्टकवर्ग में जिस गृह (राशि-स्थान) में फल—अर्थात् रेखा/बिन्दु—नहीं है, वहाँ शनि के गोचर-प्रवेश के काल में शुभ फल नहीं माना जाता। यह कथन शनि-अष्टकवर्ग की शून्य-स्थान वाली राशि को शनि-गोचर की अशुभ/निष्फल दिशा से जोड़ता है। पाठ में «फल» शब्द यहाँ अष्टकवर्ग-बिन्दु/रेखा के अर्थ में प्रयुक्त है; फल-व्याख्या को नियति नहीं, शास्त्रीय संकेत के रूप में पढ़ें। पाठ-भेद संभव (गृहे/फलं की वर्तनी-रूप)।

English rendering The text states that, in Saturn’s aṣṭakavarga, wherever a house lacks phala (bindu/rekhā), when Saturn arrives there by transit there is no auspicious result for the native. The verse links empty cells of Śani’s aṣṭakavarga to inauspicious (or fruitless) Saturn-transit periods.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गोचर × अष्टकवर्ग-फल-कथन। संचालन-नियम: शनि-अष्टकवर्ग (BPHS Ch.66) की किसी राशि पर रेखा-योग = 0 हो तो, जब गोचर-शनि उसी राशि में हो, शास्त्र वहाँ शुभ फल नहीं कहता। शनि की canonical रेखा-कुल = 39 (7 ग्रहों से); यह श्लोक उस कुल का योग-सूत्र नहीं, बल्कि शून्य-राशि पर गोचर-फल का नियम है। गोचर-राशि निर्धारण अयनांश/देश-काल पर निर्भर — घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मान लें शनि-अष्टकवर्ग (BPHS Ch.66, exact-`==` fixture) में मेष पर रेखा = 0, वृष पर रेखा = 3। गोचर-शनि जब मेष में हो (ayanāṃśa: जो भी चुना हो, जैसे लाहिरी — स्पष्ट घोषित करें), शास्त्र के अनुसार उस काल में शुभ फल नहीं कहा जाता; वृष-गोचर में (रेखा > 0) यह श्लोक शून्य-फल का निषेध नहीं लगाता—अगला श्लोक शुभाधिक्य का नियम देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) शनि-अष्टकवर्ग की Ch.66 सारणी oracle पर exact-`==` से पिन है: शनि रेखा-कुल 39, SAV = 337। गोचर-फल यहाँ interpretive claim है; गणित की परत केवल प्रति-राशि रेखा-गिनती है—बिना ±tolerance, क्योंकि tolerance ने कभी वास्तविक −1 छिपाया था। त्रिकोण/एकाधिपत्य शोधन (Ch.67–68) SAV घटाते हैं; यह श्लोक मुख्यतः अशोधित/प्रयुक्त बिन्दु-मान पर गोचर-निर्देश है—परंपरा-भेद हो तो घोषित करें।

70.44
यथ्र राशौ शुभाढिक्यं थथ्र याथे शनैश्चरे ।
जाथकस्य ढ्रुवं ज्ञेयं थस्मिन् काले शुभं फलम्
yathra rāśau śubhāḍhikyaṃ thathra yāthe śanaiścare |
jāthakasya ḍhruvaṃ jñeyaṃ thasmin kāle śubhaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र राशौ = जिस राशि में; शुभाधिक्यं = शुभ (बिन्दु/रेखा) की अधिकता; तत्र याते शनैश्चरे = जब शनि वहाँ पहुँचे (गोचर); जातकस्य = जातक के लिए; ध्रुवं ज्ञेयं = निश्चय से जानना चाहिए (शास्त्र-वचन); तस्मिन् काले = उस काल में; शुभं फलम् = शुभ फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस राशि में शुभ की अधिकता हो—अष्टकवर्ग-संदर्भ में शुभ रेखा/बिन्दु की प्रधानता—वहाँ शनि के गोचर से पहुँचने पर उस काल में जातक के लिए शुभ फल ध्रुव (निश्चित-कथ्य) रूप में जानने योग्य कहा गया है। यह 70.43 का पूरक नियम है: शून्य-फल स्थान = शुभ नहीं; शुभाधिक्य-स्थान = शुभ गोचर-काल। «ध्रुवं» यहाँ शास्त्र की दृढ़ता-की-भाषा है, हमारे द्वारा भाग्य-प्रमाण नहीं। पाठ-भेद संभव (शुभाधिक्यं/याते की रूप-वर्तनी)।

English rendering The text states that when Saturn transits a rāśi in which auspicious (bindu) strength predominates, auspicious results for the native are to be known as certain in that period. It is the complementary rule to the empty-house transit rule of the preceding verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गोचर × शुभाधिक्य-फल-कथन; तुलनात्मक नियम अंतर्निहित है। व्यावहारिक मापदंड (शास्त्र-परंपरा में प्रयुक्त): राशि r पर शनि-अष्टकवर्ग रेखा B_Śani(r); «शुभाधिक्य» ≈ B_Śani(r) उच्च/अन्य राशियों से अधिक, अथवा स्वीकृत न्यूनतम (परंपरा-निर्भर—घोषित करें; कुछ टीकाएँ 4+ या औसत से अधिक मानती हैं—यहाँ श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता)। Ch.66 शनि-कुल = 39 ⇒ औसत ≈ 39/12 = 3.25 रेखा/राशि—यह औसत केवल संदर्भ-मापक है, श्लोक का अक्षर नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें शनि-अष्टकवर्ग रेखाएँ (उदाहरण-मान, Ch.66 नियम से गणना के बाद): … कन्या = 5, तुला = 1, वृश्चिक = 4 …। गोचर-शनि कन्या में (B = 5, स्पष्ट शुभाधिक्य) → शास्त्र उस काल को शुभ-फल-काल कहता है; तुला में (B = 1, निम्न) → 70.43–44 की जोड़ी से शुभ-दृढ़ता नहीं। Convention: BPHS Ch.66 शनि-सारणी; ayanāṃśa गोचर-प्रवेश तिथि के लिए अलग से पिन करें।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग परत exact-`==` से सत्यापित है (शनि 39, SAV 337); गोचर-फल-श्लोक गणित नहीं, शास्त्र-claim हैं—हम «the text states» के रूप में रखते हैं, नियति नहीं। चंद्र-सारणी BPHS vs Phaladīpikā का [HUMAN] खुला convention यहाँ शनि-पंक्ति को नहीं छूता; शनि-कुल दोनों परंपराओं में 39 रह सकता है जबकि प्रति-राशि विन्यास पाठानुसारी हो—हम BPHS Ch.66 पिन करते हैं।

70.70
अठाऽष्तकवर्गफलाढ्यायः
aṭhā'ṣtakavargaphalāḍhyāyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब/इस प्रकार (यहाँ पुष्पिका-आरम्भक, "इति" के अर्थ में); अष्टकवर्ग-फल = अष्टकवर्ग का फल; अध्यायः = अध्याय। समस्त पद = "अष्टकवर्ग-फल-अध्यायः" = अष्टकवर्ग-फल नामक अध्याय।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक-पंक्ति स्वयं कोई नियम नहीं, अपितु अध्याय की समाप्ति-पुष्पिका है, जो इस अध्याय को "अष्टकवर्ग-फल-अध्याय" नाम से चिह्नित करती है। यही वह भाग है जिसमें सूर्य से लेकर शनि तक के अष्टकवर्गों से पिण्ड-गुणन, गोचर-शून्य/आधिक्य और आयुर्दाय-सूचना का विवेचन किया गया।

English rendering Thus concludes the chapter on the fruits of the aṣṭakavarga (aṣṭakavarga-phala-adhyāya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-समाप्ति-पुष्पिका (colophon)। यह पंक्ति पूरे अध्याय की पद्धति को एक शीर्षक के नीचे बाँधती है: अष्टकवर्ग-बिन्दु → योगपिण्ड → मॉड्युलर भाग (27/12) → गोचर-निर्णय; अर्थात् संगणना (बिन्दु-गणित) और फल-कथन (शास्त्र का स्वर) का वही पृथक्करण जो पूरे अध्याय में चलता रहा। (पाठ-भेद संभव — पुष्पिका-पाठ प्रति-भेद से "इति श्रीबृहत्पाराशरहोराशास्त्रे … अष्टकवर्गफलाध्यायः" रूप में भी मिलता है।)

अध्यायः 71

अथाऽष्टवर्गायुर्दायाध्यायः

4 श्लोक
71.1
अथात्रायुः प्रवक्ष्येऽहमष्टवर्गसमुद्भवम् ।
दिनद्वयं विरेखायां रेखायां सार्धवासरम्
athātrāyuḥ pravakṣye'hamaṣṭavargasamudbhavam |
dinadvayaṃ virekhāyāṃ rekhāyāṃ sārdhavāsaram

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- अथ = अब (प्रकरण-आरम्भ का मंगल-सूचक)
- अत्र = यहाँ, इस अध्याय में
- आयुः = आयु, जीवन-काल
- प्रवक्ष्ये अहम् = मैं (पराशर) कहूँगा
- अष्टवर्ग-समुद्भवम् = अष्टकवर्ग से उत्पन्न (राशियों की रेखा/बिन्दु-गणना पर आधारित आयु)
- वि-रेखायाम् = जिस राशि में कोई रेखा नहीं (0 रेखा; रेखा = शुभ चिह्न/बिन्दु)
- दिन-द्वयम् = दो दिन
- रेखायाम् = एक रेखा वाली राशि में
- सार्ध-वासरम् = डेढ़ दिन (सार्ध = +½, वासर = दिन)

हिन्दी भावार्थ अब मैं अष्टकवर्ग से निकलने वाली आयु का विधान कहता हूँ। जिस राशि में एक भी रेखा न हो (विरेखा) वह दो दिन देती है, और जिसमें एक रेखा हो वह डेढ़ दिन देती है। यहाँ प्रत्येक राशि का योगदान उसमें पड़ी रेखाओं की संख्या से बँधा है — यही इस अध्याय की मूल गणना-विधि है।

English rendering Now I shall declare the life-span that arises from the aṣṭakavarga: a sign bearing no rekha yields two days, a sign bearing one rekha yields one and a half days.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह आयुर्दाय-योगदान का आरम्भिक खंड है — प्रत्येक राशि की रेखा-संख्या r को दिन/वर्ष में बदलने की सारणी f(r)। इस श्लोक के दो मान:
- r = 0 (विरेखा) → 2 दिन
- r = 1 → 1½ दिन (सार्ध-वासर)
निम्न रेखा-संख्याओं का योगदान "दिन" में है (श्लोक 3 से "वर्ष" आरम्भ होता है)। यहाँ तक क्रम ½ दिन प्रति रेखा घटता है (2 → 1½), जो श्लोक 71.2 में भी चलता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ की "रेखा" वही अष्टकवर्ग-बिन्दु है जिसे हमने BPHS Ch.66 की canonical सारणियों पर `==` ऑरेकल से पिन किया — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39, कुल SAV = 337 (kaal-verification-oracle, test_astakavarga_fixture.py)। इस आयुर्दाय का प्रत्येक इनपुट उसी रेखा-गणना से आता है, इसलिए आयु-योग की शुद्धता पहले रेखा-गणना की शुद्धता पर टिकी है — बिना tolerance band के exact मिलान।

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71.2
दिनमेकं द्विरेखायां त्रिरखायां दिनार्धकम् ।
वेदतुल्यासु रेखासु सार्धसप्तदिनं स्मृतम्
dinamekaṃ dvirekhāyāṃ trirakhāyāṃ dinārdhakam |
vedatulyāsu rekhāsu sārdhasaptadinaṃ smṛtam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ)
- दिनम् एकम् = एक दिन
- द्वि-रेखायाम् = दो रेखा वाली राशि में
- त्रि-रेखायाम् = तीन रेखा वाली राशि में
- दिन-अर्धकम् = आधा दिन (½)
- वेद-तुल्यासु रेखासु = "वेद" के तुल्य रेखाओं में — वेद = 4 (भूतसंख्या: चार वेद), अर्थात् चार रेखा
- सार्ध-सप्त-दिनम् = साढ़े सात दिन (सप्त = 7, सार्ध = +½ → 7½)
- स्मृतम् = कहा गया / माना गया है

हिन्दी भावार्थ दो रेखा वाली राशि एक दिन देती है और तीन रेखा वाली आधा दिन। और जहाँ रेखाएँ चार (वेद-तुल्य) हों, वहाँ साढ़े सात दिन कहे गए हैं। इस प्रकार 0 से 3 रेखा तक योगदान ½ दिन के क्रम से घटता है, किन्तु 4 रेखा पर सारणी एक भिन्न मान (7½ दिन) पर छलाँग लगाती है।

English rendering Two rekhas give one day, three rekhas give half a day; where the rekhas equal the Vedas (four), seven and a half days are prescribed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सारणी f(r) आगे बढ़ती है (मान दिनों में):
- r = 2 → 1 दिन
- r = 3 → ½ दिन (दिन-अर्धक)
- r = 4 (वेद) → 7½ दिन

भूतसंख्या-डिकोड: वेद = 4, सप्त = 7, सार्ध जोड़ता है ½। ध्यान दें — 0→2, 1→1½, 2→1, 3→½ का समान ½-दिन ह्रास r = 4 पर टूटता है (अपेक्षित 0 के स्थान पर 7½)। यह अनियमितता पाठ-भेद संभव के अंतर्गत है; कुछ पाठ इस पद को भिन्न पढ़ते हैं, अतः r = 4 का मान संदिग्ध मानकर उद्धृत किया गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह r = 4 वाला असंगत मान ठीक वही जगह है जहाँ हमारी "exact `==`, कोई tolerance नहीं" अनुशासन-नीति काम आती है: एक बार ±3 का सहन-बैंड अष्टकवर्ग में असली −1 त्रुटि को छिपा गया था। ऐसे कूद-वाले मानों को औसत/बैंड में समेटने के बजाय हम प्रत्येक रेखा-मान को उसके canonical मान से बराबरी पर जाँचते हैं, और विवादित पाठ को [HUMAN] खुली-संधि के रूप में घोषित करते हैं — मौन चयन नहीं।

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71.3
द्विवर्षं पञ्चरेखासु षड्रेखासु चतुःसमा ।
षड्वर्षं सप्तरेखासु वसवोऽष्टासु वत्सराः
dvivarṣaṃ pañcarekhāsu ṣaḍrekhāsu catuḥsamā |
ṣaḍvarṣaṃ saptarekhāsu vasavo'ṣṭāsu vatsarāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-वर्षम् = दो वर्ष; पञ्च-रेखासु = पाँच रेखाओं पर; षड्-रेखासु = छह रेखाओं पर; चतुः-समा = चार वर्ष (समा = वर्ष); षड्-वर्षम् = छह वर्ष; सप्त-रेखासु = सात रेखाओं पर; वसवः = वसु = 8; अष्टासु = आठ रेखाओं पर; वत्सराः = वर्ष।

हिन्दी भावार्थ पाँच रेखा होने पर शास्त्र दो वर्ष का योगदान कहता है; छह रेखा पर चार वर्ष। सात रेखा पर छह वर्ष; और आठ रेखा पर वसु-संख्या—आठ वर्ष—गिना जाता है। यहाँ माप दिनों से वर्षों में उठ जाता है: अधिक रेखा, बड़ा वर्ष-योगदान।

English rendering Five rekhās yield two years; six yield four years. Seven yield six years; eight yield eight years—the Vasus’ count.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Year-scale of the same map:
- r = 5 → 2 years
- r = 6 → 4 years
- r = 7 → 6 years
- r = 8 → 8 years (वसु = 8)
Full rekhā→āyu table from 71.1–71.3 (convert years to days only if a single unit is required; the text mixes day- and year-units by r):

| r | āyu (text) | modern |
|-----|------------|--------|
| 0 | 2 days | 2 d |
| 1 | 1½ days | 1.5 d |
| 2 | 1 day | 1 d |
| 3 | ½ day | 0.5 d |
| 4 | 7½ days | 7.5 d |
| 5 | 2 years | 2 y |
| 6 | 4 years | 4 y |
| 7 | 6 years | 6 y |
| 8 | 8 years | 8 y |

उदाहरण (worked example) One graha’s twelve signs with rekhās (5, 6, 7, 8, 4, 3, 2, 1, 0, 5, 6, 7) contribute, in text units: 2y + 4y + 6y + 8y + 7.5d + 0.5d + 1d + 1.5d + 2d + 2y + 4y + 6y. Year-part = 2+4+6+8+2+4+6 = 32 years; day-part = 7.5+0.5+1+1.5+2 = 12.5 days. (Full nativity still needs all grahas and the half-rule of 71.4; convention: use the same rekhā table source—BPHS Ch.66, Moon-from-Moon “9” placement—throughout.)

हमारा डिकोड (Our Decode) The year-steps are exact integer rules on rekhā counts; our aṣṭakavarga oracle locks the upstream bindu totals (Σ = 337 SAV) with `==`, not a tolerance band. Convention disagreements that change per-sign bhinna (e.g. Phaladīpikā transposition of Moon’s “9”) would shift which signs hit r = 5…8 even when the planetary total stays 49—declare the table before applying this map.

71.4
एवं यदागतायुः स्यात् सर्वखेटसमुद्भवम् ।
तदर्धं स्फुटमायुः स्यादष्टवर्गभवं नृणाम्
evaṃ yadāgatāyuḥ syāt sarvakheṭasamudbhavam |
tadardhaṃ sphuṭamāyuḥ syādaṣṭavargabhavaṃ nṛṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; यत् = जो; आगता-आयुः = प्राप्त / संगृहीत आयु; सर्व-खेट-समुद्भवम् = सभी ग्रहों से उत्पन्न; तत्-अर्धम् = उसका आधा; स्फुटम्-आयुः = स्पष्ट / निश्चित आयु-मान; अष्टवर्ग-भवम् = अष्टकवर्ग-जन्य; नृणाम् = मनुष्यों की।

हिन्दी भावार्थ ऊपर की रेखा-से-दिन/वर्ष गिनती जब सभी खेटों (ग्रहों) के अष्टकवर्ग से जोड़ ली जाए, तो वह पूर्ण आगतायु है। शास्त्र कहता है—उस योग का आधा ही मनुष्यों की अष्टवर्ग-जन्य स्फुट आयु है। अर्थात् कुल पूल को द्वि-भाजित कर अंतिम माप निकाला जाता है; यह फल-कथन शास्त्र का नियम है, न कि हमारा नियति-निर्णय।

English rendering When longevity thus assembled arises from all the planets, half of that total is the clear (sphuṭa) longevity of persons born of aṣṭakavarga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Let A_g = sum of rekhā-mapped contributions over the 12 signs for graha g (using 71.1–71.3; convert all to one unit—e.g. years with 1 year = 360 days if a unified float is needed, or keep mixed only until the final step if the recension’s practice is sequential).
सर्वखेट sum:
A_total = Σ_g A_g (g over the seven standard aṣṭakavarga grahas; Rāhu/Ketu not in the Ch.66 seven-total 337 scheme).
स्फुट आयु:
A_sphuṭa = A_total / 2 = ½ × A_total.
No other factor is stated in this verse (no further trikoṇa/ekādhipatya reduction named here—those are Ch.67–68; apply only if the chosen workflow reduces rekhās before this map).

उदाहरण (worked example) Suppose after mapping all signs for all seven grahas one obtains A_total = 120 years (already reduced to a single unit). Then A_sphuṭa = 120 ÷ 2 = 60 years. If a day-fraction remains (e.g. +40 days before halving), half applies to the whole: (120 y + 40 d) / 2 = 60 y + 20 d. Conventions to declare: ayanāṃśa only if longitudes rebuild the varga/bindu base; house system does not enter this rekhā map; BPHS Ch.66 table (not Phaladīpikā’s Moon-row transpose) for bindus.

हमारा डिकोड (Our Decode) The half-rule is exact ratio arithmetic—no tolerance. It sits downstream of the same Ch.66 bindu engine we verify to SAV 337 and of any Ch.67–68 śodhana the operator elects before phala. Mathematics is the map and the ½; the “longevity of persons” clause is the śāstra’s phala-voice, reported as such.

अध्यायः 72

समुदायाष्टकवर्गाध्यायः

31 श्लोक
72.1
द्वादशारं लिखेच्चकं जन्मलग्नादिभैर्युतम् ।
सर्वाष्टकफलान्यत्र संयोज्य प्रतिभं न्यसेत्
dvādaśāraṃ likheccakaṃ janmalagnādibhairyutam |
sarvāṣṭakaphalānyatra saṃyojya pratibhaṃ nyaset

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादश-अरं = बारह-अरा वाला; चक्रम् = चक्र / वृत्त-चित्र; जन्म-लग्न-आदि-भैः = जन्म-लग्न से आरम्भ कर बारह भाव/राशि; युतम् = संयुक्त; सर्वाष्टक-फलानि = सातों ग्रहों के अष्टकवर्ग का समुच्चय-फल (bindu-योग); संयोज्य = जोड़कर; प्रति-भम् = प्रत्येक राशि/भाव में; न्यसेत् = रखे / स्थापित करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जन्म-लग्न को आधार बनाकर बारह अरों वाला चक्र लिखा जाए, और उसमें सर्वाष्टकवर्ग के फल-बिन्दु प्रत्येक राशि (प्रतिभ) में संयोजित करके रखे जाएँ। यह अध्याय का आरम्भिक विधि-सूत्र है — भिंन्नाष्टकवर्ग के बाद समुदाय-चक्र का निर्माण। पाठ-भेद संभव: कुछ आवृत्तियों में भाव-क्रम व चक्र-लेखन की व्यवस्था थोड़ी भिन्न कही जाती है।

English rendering The text directs: draw a twelve-spoked wheel beginning from the birth lagna and the successive houses, combine the sarvāṣṭaka results, and place those totals sign by sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सर्वाष्टकवर्ग (SAV) प्रति राशि = Σ (Sun + Moon + Mars + Mercury + Jupiter + Venus + Saturn) के भिंन्नाष्टकवर्ग-बिन्दु उस राशि में। कुल SAV (7 ग्रह, शास्त्रीय सारणी) = 337; अतः 12 राशियों पर औसत ≈ 337 ÷ 12 ≈ 28.08 bindu/rāśi। चक्र: 12 कोष्ठ, लग्न-राशि = कोष्ठ 1, फिर क्रमिक राशियाँ; प्रत्येक कोष्ठ में उस राशि का SAV-योग। (त्रिकोण-/एकाधिपत्य-शोधन Ch.67–68 के बाद फल-प्रयोग — अध्याय-क्रम के अनुसार।)

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष, और (शोधन-पूर्व, केवल चित्रण) SAV प्रति राशि: मेष 31, वृष 27, मिथुन 29, कर्क 33, सिंह 26, कन्या 28, तुला 30, वृश्चिक 24, धनु 32, मकर 25, कुम्भ 22, मीन 30। योग = 337। द्वादशार-चक्र: लग्न-कोष्ठ (मेष) में 31, …, 12वें कोष्ठ (मीन) में 30 — प्रतिभं न्यसेत्।

हमारा डिकोड (Our Decode) BPHS Ch.66 की पinned सारणी — सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 — से SAV = 337 exact-`==` fixture पर सिद्ध है। यही 337 बारह राशियों में बँटकर इस चक्र का संख्या-आधार बनता है; ±tolerance कभी वास्तविक −1 छिपा चुका था, अतः oracle बिना बैंड के `==` रखता है।

72.2
समुदायाभिधानोऽयमष्टवर्गः प्रकथ्यते ।
अतः फलानि जातानां विज्ञेयानि द्विजोत्तम
samudāyābhidhāno'yamaṣṭavargaḥ prakathyate |
ataḥ phalāni jātānāṃ vijñeyāni dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समुदाय-अभिधानः = “समुदाय” नाम वाला; अयम् = यह; अष्टवर्गः = अष्टकवर्ग (यहाँ समुच्चय-रूप); प्रकथ्यते = कहा जाता है; अतः = इसलिए; फलानि = फल / परिणाम; जातानाम् = जातकों के; विज्ञेयानि = जानने योग्य; द्विजोत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज (शिष्य-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस संयोजित चक्र को “समुदायाभिधान अष्टवर्ग” कहता है — सातों ग्रहों के अष्टकवर्ग का समुदाय। अतः जातकों के फल इसी समुदाय से जानने का निर्देश है। यह नामकरण-श्लोक है: भिंन्नाष्टकवर्ग से सर्वाष्टकवर्ग / समुदायाष्टकवर्ग की ओर स्पष्ट संक्रमण।

English rendering This aṣṭavarga is termed the aggregate (samudāya). Therefore, O best of the twice-born, the results for natives are to be known from it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नामकरण व फल-प्रयोग का निर्देश। संख्या-आधार पूर्ववर्ती सारणियों (Ch.66) व शोधन (Ch.67–68) से आता है; यह श्लोक केवल समुदाय-रूप को फल-ज्ञान का माध्यम घोषित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “समुदाय” = seven-planet SAV, कुल 337 — वही canonical fixture जो kaal-verification-oracle में `==` से पinned है। फल-कथन को हम संख्या-मॉडल से अलग रखते हैं: गणित exact, फल = “शास्त्र कहता है”।

72.3
त्रिंशाधिकफला ये स्यू राशयस्ते शुभप्रदाः ।
पञ्चविंशादित्रिंशान्तफला मध्यफला स्मृताः
triṃśādhikaphalā ye syū rāśayaste śubhapradāḥ |
pañcaviṃśāditriṃśāntaphalā madhyaphalā smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंश-अधिक-फलाः = तीस से अधिक फल-बिन्दु वाले; ये स्युः = जो हों; राशयः = राशियाँ; ते = वे; शुभ-प्रदाः = शुभ देने वाली; पञ्चविंश-आदि-त्रिंश-अन्त-फलाः = पच्चीस से आरम्भ कर तीस तक फल वाले; मध्य-फलाः = मध्यम फल; स्मृताः = स्मरण/कथित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिन राशियों में (सर्वाष्टक) फल तीस से अधिक हों, वे शुभप्रद मानी जाएँ; जिनका फल पच्चीस से लेकर तीस तक हो, वे मध्यफल कही गई हैं। यह साफ़ संख्या-सीमा (threshold) है, न कि अस्पष्ट विशेषण।

English rendering Signs whose fruit exceeds thirty are said to be auspicious-giving; those with fruit from twenty-five up to thirty are remembered as of medium result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रति-राशि SAV-बिन्दु Bᵣ पर श्रेणी (शास्त्र-उक्त):
• Bᵣ > 30 → शुभप्रद
• 25 ≤ Bᵣ ≤ 30 → मध्यफल
(अगला श्लोक क्षीण-श्रेणी पूर्ण करता है।)
औसत ≈ 337/12 ≈ 28.08 मध्य-पट्टी के भीतर पड़ता है — threshold का संख्या-तर्क सुसंगत।

उदाहरण (worked example) B_मेष = 33 → > 30 → शुभप्रद। B_वृष = 27 → 25…30 → मध्यफल। B_मिथुन = 30 → मध्य (त्रिंश-अन्त inclusive, शास्त्र-शब्द “त्रिंशान्त”)। B_वृश्चिक = 24 → इस श्लोक की दोनों श्रेणियों से बाहर (क्षीण — 72.4)।

हमारा डिकोड (Our Decode) SAV = 337 पinned; threshold 30 / 25 शास्त्र के शब्द-संख्या हैं — हम इन्हें exact integer comparison से लागू करते हैं, “लगभग 30” नहीं। exact-`==` discipline: सीमा-जाँच में floating-band नहीं।

72.4
अतः क्षीणफला ये ते राशयः कष्टदुःखदा ।
शुभे श्रेष्ठफलान् राशीन् योजयेन्मतिमान्नरः
ataḥ kṣīṇaphalā ye te rāśayaḥ kaṣṭaduḥkhadā |
śubhe śreṣṭhaphalān rāśīn yojayenmatimānnaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इससे (पूर्व-सीमा से) नीचे; क्षीण-फलाः = क्षीण / कम फल वाले; ये ते राशयः = वे राशियाँ; कष्ट-दुःख-दाः = कष्ट व दुःख देने वाली (शास्त्र-कथन); शुभे = शुभ कार्य/प्रसंग में; श्रेष्ठ-फलान् राशीन् = उत्कृष्ट फल वाली राशियाँ; योजयेत् = प्रयुक्त करे / जोड़े; मतिमान् नरः = बुद्धिमान व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो राशियाँ क्षीणफल हों (अर्थात् 72.3 की मध्य-सीमा से नीचे), वे कष्ट-दुःखदा कही गई हैं। शुभ प्रसंग में बुद्धिमान श्रेष्ठ-फल राशियों का ही प्रयोग करे। यह फल-वर्गीकरण का तीसरा खण्ड है; “योजयेत्” यहाँ फल-चक्र में चयन-निर्देश है, न कि दबाव-युक्त उपाय-वाणी।

English rendering Signs of diminished fruit, the text states, give hardship and sorrow. In auspicious matters a thoughtful person should employ signs of superior fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) 72.3–72.4 मिलकर पूर्ण त्रि-वर्ग:
• Bᵣ > 30 → श्रेष्ठ / शुभप्रद
• 25 ≤ Bᵣ ≤ 30 → मध्य
• Bᵣ < 25 → क्षीण → कष्टदुःखदा (शास्त्र-कथन)
“अतः” = पूर्वोक्त त्रिंश/पञ्चविंश सीमा से नीचे।

उदाहरण (worked example) B_कुम्भ = 22 < 25 → क्षीण → कष्ट-वर्ग (शास्त्र)। B_कर्क = 33 > 30 → श्रेष्ठ; शुभ-प्रसंग में कर्क-राशि/भाव को “योजयेत्” — चयन-नियम, न कि नियति-घोषणा।

72.5
कष्टराशीन् सुकार्येषु वर्जयेद् द्विजसत्तम ।
श्रेष्ठराशिगतः खेटः शुभोऽन्यत्राऽशुभप्रदः
kaṣṭarāśīn sukāryeṣu varjayed dvijasattama |
śreṣṭharāśigataḥ kheṭaḥ śubho'nyatrā'śubhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कष्ट-राशीन् = कष्ट-श्रेणी की राशियाँ; सु-कार्येषु = अच्छे/शुभ कार्यों में; वर्जयेत् = वर्जित करे / टाले; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज; श्रेष्ठ-राशि-गतः = श्रेष्ठ-फल राशि में स्थित; खेटः = ग्रह; शुभः = शुभ (शास्त्र-कथन); अन्यत्र = अन्यत्र (मध्य/क्षीण में); अशुभ-प्रदः = अशुभप्रद (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है — सुकार्य में कष्ट-राशियों का वर्जन करे। श्रेष्ठ-फल राशि में बैठा ग्रह शुभ कहा गया; अन्य स्थिति में अशुभप्रद। यह ग्रह-स्थिति × राशि-बिन्दु-श्रेणी का संयुक्त नियम है — फल शास्त्र का कथन है, न कि हमारी ओर से भाग्य-निर्णय।

English rendering Avoid hardship-signs in good undertakings, O best of the twice-born. A planet in a superior-fruit sign is auspicious, the text states; elsewhere it is inauspicious-giving.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह g राशि R में:
• यदि B_R > 30 → g को शुभ-वर्ग (शास्त्र)
• अन्यथा (B_R ≤ 30) → अशुभप्रद-वर्ग (शास्त्र)
कष्ट-राशि = { R | B_R < 25 }; सुकार्य-वर्जन = उन R पर कार्य-चयन से बचाव — प्रक्रिया-नियम, फल-वाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) गुरु धनु में, B_धनु = 32 > 30 → श्रेष्ठराशिगतः → शुभ (शास्त्र-कथन)। शनि वृश्चिक में, B_वृश्चिक = 24 < 25 → कष्ट-राशि; सुकार्य में वर्जन-निर्देश। (SAV bindu — शोधन-पूर्व/पश्चात् convention घोषित रखें; फल-प्रयोग अक्सर शोधन-पश्चात्।)

72.6
तन्वादिव्ययपर्यन्तं दृष्ट्वा भाव्फलानि वै ।
अधिके शोभनं ज्ञेयं हीने हानिं विनिर्दिशेत्
tanvādivyayaparyantaṃ dṛṣṭvā bhāvphalāni vai |
adhike śobhanaṃ jñeyaṃ hīne hāniṃ vinirdiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनु-आदि-व्यय-पर्यन्तम् = प्रथम भाव (तनु) से बारहवें (व्यय) तक; दृष्ट्वा = देखकर; भाव-फलानि = भावों के फल-बिन्दु; वै = निश्चय से; अधिके = अधिक होने पर; शोभनम् = शोभन / शुभ; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; हीने = हीन/कम होने पर; हानिम् = हानि; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे / कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तनु से व्यय तक बारह भावों के फल-बिन्दु देखें; अधिक होने पर शोभन जानें, हीन होने पर हानि निर्दिष्ट करें। यहाँ राशि-चक्र को भाव-चक्र पर पढ़ा जाता है: लग्न = तनु-भाव, क्रम से व्यय तक — उसी SAV-कोष्ठ को भाव-फल माना जाता है।

English rendering Examining the house-fruits from the body-house through the expenditure-house: when [the count is] greater, excellence is to be known; when lesser, loss is to be indicated — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव H (H = 1…12) का फल F_H = B<sub>R(H)</sub>, जहाँ R(H) = लग्न से H-वाँ राशि। तुलना 72.3–72.4 की सीमाओं से:
• F_H > 30 → शोभन (अधिक)
• F_H < 25 → हानि-निर्देश (हीन)
• मध्य-पट्टी → अगला श्लोक।
House system: whole-sign from lagna (BPHS भाव-पद्धति का प्राकृतिक पठन); ayanāṃśa SAV-योग पर नहीं, केवल ग्रह-देशांतर → राशि-निर्णय पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष; F₁(तनु)=31 → अधिक → शोभन (शास्त्र)। F₈(आयु/रन्ध्र)=24 → हीन → हानि-निर्देश (शास्त्र)। F₁₀(कर्म)=25 → मध्य-सीमा — 72.7।

हमारा डिकोड (Our Decode) SAV per-sign vector (Σ = 337) lagna-rotate होकर भाव-फल बनता है — शुद्ध modular map: index (rāśi − lagna) mod 12। गणित deterministic; “शोभन/हानि” = शास्त्र-वाणी, हमारे engine का prediction नहीं।

72.7
मध्ये मध्यफलं ब्रूयाद् तत्तद्भावसमुद्भवम् ।
मध्यात् फलाधिके लाभो लाभात् क्षीणगतोव्ययः
madhye madhyaphalaṃ brūyād tattadbhāvasamudbhavam |
madhyāt phalādhike lābho lābhāt kṣīṇagatovyayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये = मध्य में; मध्य-फलम् = मध्यम फल; ब्रूयात् = कहे; तत्-तत्-भाव-समुद्भवम् = उस-उस भाव से उत्पन्न; मध्यात् फलाधिके = मध्य से फल अधिक होने पर; लाभः = लाभ; लाभात् क्षीण-गतः = लाभ से क्षीण दशा में गया; व्ययः = व्यय / क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मध्य-बिन्दु पर उस भाव से उत्पन्न मध्यफल कहे। मध्य से अधिक फल हो तो लाभ; लाभ-स्तर से क्षीण हो जाए तो व्यय। यह 72.3–72.6 का संक्षिप्त त्रि-स्तरीय फल-क्रम है: मध्य → अधिक = लाभ; अधिक/लाभ से क्षीण = व्यय — भाव-समुद्भव फल का नियम-वाक्य।

English rendering In the middle, declare the medium fruit arising from each house. When fruit exceeds the middle, gain; when from that gain it has gone to diminishment, expenditure — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव H पर:
• 25 ≤ F_H ≤ 30 → मध्यफल (तत्तद्भावसमुद्भव)
• F_H > 30 → लाभात् / फलाधिके → लाभ
• F_H < 25 → क्षीणगत → व्यय
क्रम-वाणी “मध्यात् … लाभात् क्षीणगतो व्ययः” = मध्य आधार; ऊपर = लाभ; नीचे = व्यय — 72.3–72.4 thresholds के साथ एक ही संख्या-मॉडल।

उदाहरण (worked example) F₂(धन)=28 → मध्य → मध्यफल (शास्त्र)। F₁₁(लाभ)=34 → फलाधिके → लाभ (शास्त्र)। F₁₂(व्यय)=21 → क्षीणगत → व्यय (शास्त्र)। कुल जाँच: Σ F_H = 337 (शोधनापूर्व canonical) — चक्र-योग अक्षुण्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 → SAV 337 exact-`==`; Ch.67–68 शोधन के बाद फल-सीमाएँ उन्हीं पूर्णांकों पर चलती हैं। हम mathematics (bindu count, threshold, lagna-rotate) को interpretation से अलग रखते हैं — “लाभ/व्यय” शास्त्र का फल-शब्द है, deterministic fate-claim नहीं; tolerance-band से threshold कभी नहीं ढकते।

72.8
लग्नं फलाधिकं यस्य भोगवानर्थवान् हि सः ।
विपरीतेन दारिद्र्यं भवत्येव न संशयः
lagnaṃ phalādhikaṃ yasya bhogavānarthavān hi saḥ |
viparītena dāridryaṃ bhavatyeva na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नं = जन्मलग्न / उदित राशि (D1 का उदय-बिन्दु); फलाधिकं = (अन्य भावों की अपेक्षा) फल/रेखा-बिन्दुओं में अधिक; भोगवान् = सुख-भोग से युक्त; अर्थवान् = धन-संपन्न; विपरीतेन = इसके विपरीत (लग्न में फल-न्यूनता); दारिद्र्यं = दरिद्रता / अभाव; न संशयः = इसमें संदेह नहीं — शास्त्र का दृढ़ फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस जातक के लग्न में अन्य भावों की अपेक्षा फल (अष्टकवर्ग-रेखा / बिन्दु-समूह) अधिक हों, वह भोग और अर्थ दोनों से युक्त होता है। इसके विपरीत — यदि लग्न फल में न्यून हो — दरिद्रता का संकेत कहा गया है। यह तुलनात्मक फल-नियम है: लग्न की सापेक्ष समृद्धि को रेखा-संख्या से जोड़ा गया है, न कि किसी निरपेक्ष “भाग्य” से। पाठ-भेद संभव जहाँ “फल” को केवल भाव-फल या केवल अष्टकवर्ग-रेखा से बाँधा जाए।

English rendering The text states that one whose lagna carries more phala (result-strength / rekha-count relative to the other houses) is said to be possessed of enjoyment and wealth; in the opposite case — lagna weak in phala — poverty is declared without hesitation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तुलनात्मक नियम (threshold comparison), निरपेक्ष सूत्र नहीं।
लग्न-फल-योग \(L\) तथा अन्य भावों के फल-योगों \(H_i\) (\(i = 2\ldots12\)) पर:
- यदि \(L > H_i\) (सामान्यतः सर्वाधिक / सापेक्ष अधिक) → शास्त्र: भोग + अर्थ।
- यदि \(L\) न्यून (विपरीत) → शास्त्र: दारिद्र्य।
अष्टकवर्ग-संदर्भ में “फल” ≈ बिन्दु/रेखा-योग; सर्वाष्टकवर्ग (SAV) का canonical योग = 337 (७ ग्रह; सूर्य ४८ … शनि ३९)। मासिक/भाविक रेखा-गिनती अध्याय के आगे के श्लोकों से जुड़ती है।

उदाहरण (worked example) मान लें सर्वाष्टकवर्ग से बारह भावों के बिन्दु (उदाहरण-मान, किसी एक कुण्डली के SAV-वितरण):
लग्न = ३२, २य = २८, ३य = २५, …, १२य = २७।
यहाँ \(L = 32\) शेष भावों से अधिक → श्लोक ७२.८ के अनुसार शास्त्र भोगवान्–अर्थवान् कहता है।
यदि लग्न = २२ और शेष भाव २८–३५ हों → विपरीत = दारिद्र्य-फल (पाठ का कथन)।

Convention: SAV = ७-ग्रह canonical (४८+४९+३९+५४+५६+५२+३९ = ३३७); ayanāṃśa लग्न-देशांश तय करता है, रेखा-तालिका नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) अष्टकवर्ग-रेखाओं के canonical योग (सूर्य ४८ … SAV ३३७) kaal-verification-oracle में exact-`==` fixture से pinned हैं — ±tolerance नहीं, क्योंकि कभी ±३ ने वास्तविक −१ छुपाया था। लग्न-फल की “अधिक/न्यून” तुलना उसी रेखा-गणित पर बैठती है; फल-वाक्य को हम भविष्यवाणी नहीं, शास्त्र-कथन मानते हैं।

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72.9
दशावदिह भावानां कृत्वा खंडत्रयं बुधः ।
पश्येत् पापसमारूढं खंडे कष्टकरं वदेत्
daśāvadiha bhāvānāṃ kṛtvā khaṃḍatrayaṃ budhaḥ |
paśyet pāpasamārūḍhaṃ khaṃḍe kaṣṭakaraṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दशावत् = दशा-क्रम के समान; इह = यहाँ (भाव-फल / अष्टकवर्ग-प्रयोग में); भावानां = बारह भावों का; खंडत्रयं = तीन खंड (त्रि-विभाग); बुधः = विद्वान् ज्योतिषी; पश्येत् = देखे; पापसमारूढं = पाप-ग्रहों से आक्रान्त / पाप-युक्त; खंडे = उस खंड में; कष्टकरं = कष्टदायी; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है — भावों का फल देखते समय दशा की भाँति प्रत्येक भाव को तीन खंडों में बाँटकर देखें। जो खंड पाप-ग्रहों से समारूढ़ (युक्त/आक्रान्त) हो, उसी खंड को कष्टकर फल का काल कहें। यह काल-विभाजन का नियम है: पूरे भाव को एक ढेर नहीं, तीन अवस्था-खण्डों में पढ़ा जाता है। अगला श्लोक इन्हीं खंडों को बाल्यादि अवस्थाओं से जोड़ता है।

English rendering The wise should divide the houses here into three segments, as one does with daśā periods, and declare as troublesome that segment which is mounted by malefics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रि-खंड विभाजन (ternary partition of a bhāva-span or of a daśā-like duration over a house).
भाव-विस्तार \(\Delta\) (सामान्यतः ३०° equal-house, या selected house-system का भाव-चाप) पर:
\[
K_1 = [0,\;\Delta/3),\quad K_2 = [\Delta/3,\;2\Delta/3),\quad K_3 = [2\Delta/3,\;\Delta).
\]
खंड \(K_j\) “पापसमारूढ” = उस खंड के देशांश-क्षेत्र में पाप (शास्त्रीय सूची: सूर्य/मंगल/शनि/राहु-केतु आदि — पाठानुसार) स्थित या प्रभावी।
फल-नियम: पाप-युक्त खंड → कष्टकर; (अगले श्लोक में) सौम्य-युक्त → शुभ।

Convention declare: equal ३०° bhāva vs Placidus आदि — खंड-सीमाएँ house-system पर निर्भर; अष्टकवर्ग-रेखाएँ rāśi-based रहती हैं।

उदाहरण (worked example) equal-house, मेष-लग्न, सप्तम भाव = तुला ०°–३०°।
\[
K_1=0^\circ\text{–}10^\circ,\; K_2=10^\circ\text{–}20^\circ,\; K_3=20^\circ\text{–}30^\circ.
\]
शनि १६° तुला → \(K_2\) पापसमारूढ → शास्त्र कहता है: उस मध्य-खंड का काल कष्टकर वदेत्।
मंगल ५° तुला, शुक्र २५° → \(K_1\) पाप, \(K_3\) सौम्य — खंड-विशिष्ट फल (७२.१० से मिलाकर)।

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72.10
सौम्यैर्युक्तं शुभं ब्रूयान्मिश्रैर्मिश्रफलं यथा ।
क्रमाद् बाल्याद्यवस्थासु खंडत्रयफलं वदेत्
saumyairyuktaṃ śubhaṃ brūyānmiśrairmiśraphalaṃ yathā |
kramād bālyādyavasthāsu khaṃḍatrayaphalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्यैः = शुभ/सौम्य ग्रहों से; युक्तं = युक्त खंड; शुभं ब्रूयात् = शुभ फल कहे; मिश्रैः = पाप+पुण्य मिश्रण से; मिश्रफलं = मिश्रित फल; यथा = तदनुसार; क्रमात् = क्रम से; बाल्याद्यवस्थासु = बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि अवस्थाओं में; खंडत्रयफलं = तीनों खंडों का फल; वदेत् = कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो खंड सौम्य-ग्रहों से युक्त हो उसे शुभ कहें; जो मिश्र (सौम्य+पाप) हो उसका फल मिश्रित कहें। इन तीन खंडों का फल क्रमशः बाल्य आदि अवस्थाओं पर लगाएँ — अर्थात् पहले खंड का फल जीवन/दशा के आरम्भ-भाग से, मध्य का मध्य से, अंतिम का अंतिम भाग से जोड़ा जाता है। पाप-खंड का कष्ट (७२.९) और सौम्य/मिश्र का यह नियम एक ही त्रि-खंड यंत्र के दो पहलू हैं।

English rendering Declare a segment joined by benefics as auspicious, and one joined by mixed influences as yielding mixed results; state the three-segment results in order upon the stages beginning with childhood (and so on).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) खंड-वर्गीकरण + क्रमिक मानचित्रण।
प्रत्येक \(K_j\) (\(j=1,2,3\)) के लिए ग्रह-समुच्चय \(G(K_j)\):
- यदि \(G(K_j) \subseteq\) सौम्य → फल\((K_j)\) = शुभ (शास्त्र)।
- यदि \(G(K_j)\) में पाप+सौम्य दोनों → मिश्रफल।
- यदि केवल पाप (७२.९) → कष्टकर।
काल-मानचित्र (क्रम):
\[
K_1 \mapsto \text{बाल्य/आरम्भ},\quad K_2 \mapsto \text{मध्य},\quad K_3 \mapsto \text{अन्त्य/वार्धक्य}
\]
(दशावत्: महदशा/अन्तर्दशा के तीन भागों पर भी वही \(\Delta/3\) तर्क लागू — श्लोक “दशावत्” से)।
गणितीय “सूत्र” = विभाजन + membership test; संख्या-स्थिरांक श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) दशा-अवधि १० वर्ष (चन्द्र महादशा का अंश-उदाहरण) को तीन खंड:
\(0\)–\(3\frac13\), \(3\frac13\)–\(6\frac23\), \(6\frac23\)–\(10\) वर्ष।
\(K_1\) में गुरु+शुक्र → शास्त्र: शुभ (बाल्य/आरम्भ)।
\(K_2\) में शनि+बुध → मिश्र।
\(K_3\) में मंगल अकेला → कष्टकर (७२.९)।
फल तीनों को अवस्था-क्रम में वदेत् — यह शास्त्र-विधि है, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

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72.11
रेखाभिः सप्तभिर्युक्ते मासेमृत्युभयं नृणाम् ।
सुवर्णं विंशतिपलं दद्यात् द्वौ तिलपर्वतौ
rekhābhiḥ saptabhiryukte māsemṛtyubhayaṃ nṛṇām |
suvarṇaṃ viṃśatipalaṃ dadyāt dvau tilaparvatau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखाभिः सप्तभिः = सात रेखाओं (अष्टकवर्ग-बिन्दु/रेखा) से; युक्ते मासे = (जिस) मास में युक्त; मृत्युभयं = मृत्यु का भय (शास्त्र-कथन, निश्चित मृत्यु नहीं); नृणाम् = मनुष्यों को; सुवर्णं विंशतिपलं = बीस पल सुवर्ण; दद्यात् = दान दे (पाठ का उपाय-विधान); द्वौ तिलपर्वतौ = दो तिल-पर्वत (तिल का विशाल दान-रूपक/माप)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस मास में रेखा-संख्या सात हो, उस मास में मनुष्यों को मृत्यु-भय कहा गया है। उसी प्रसंग में पाठ सुवर्ण बीस पल तथा दो तिल-पर्वत के दान का उल्लेख करता है। यहाँ “भय” फल-संकेत है, अनिवार्यता नहीं; दान-विधि शास्त्र का अपना विधान है — दबाव या उपचार-विक्रय नहीं। संख्या सात (`सप्तभिः`) और बीस (`विंशति`) श्लोक में स्पष्ट हैं।

English rendering The text states that in a month marked by seven rekhas there is fear of death for people; for that context it prescribes the gift of twenty palas of gold and two “sesame-mountains.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्णांक दहलीज़ (integer threshold) + दान-मात्रा।
मासिक रेखा-योग \(R_{\text{mās}}\) (अष्टकवर्ग-विधि से मास/संक्रान्ति-खंड पर गिनी गई रेखाएँ — अध्याय-परंपरा):
\[
R_{\text{mās}} = 7 \;\Rightarrow\; \text{शास्त्र: मृत्युभय-कथन}.
\]
दान-स्थिरांक (पाठ से): सुवर्ण \(= 20\) पल; तिल-पर्वत \(= 2\)।
(पल = पारंपरिक भार-मात्र; आधुनिक ग्राम-रूपांतरण श्लोक में नहीं — अनुमान न लगाएँ।)

उदाहरण (worked example) किसी मास के SAV/मासिक-रेखा योग की गणना से \(R = 7\) प्राप्त हो (उदा. सात भाव-स्थानों/दिन-रेखाओं का योग = ७, विधि अध्याय-परंपरा के अनुसार)।
→ ७२.११ लागू: शास्त्र मृत्युभय कहता है; दान-मात्रा \(20\) पल सुवर्ण + \(2\) तिल-पर्वत पाठ में निर्दिष्ट।

Convention: रेखा-गिनती BPHS Ch.66 canonical bindu-tables पर; Moon-from-Moon में “९” (Phaladīpikā/Mehta से भिन्न स्थान — per-sign bhinna, योग ४९ समान)।

हमारा डिकोड (Our Decode) रेखा-संख्या का स्रोत Ch.66 की pinned तालिकाएँ हैं (सूर्य ४८ … SAV ३३७, exact-`==`)। मासिक \(R=7\) एक दहलीज़-फल है; हम इसे गणना-योग्य trigger मानते हैं, मृत्यु-भविष्य नहीं। दान-वाक्य शास्त्र-पाठ का हिस्सा है — engine में phala से अलग, interpretation layer में “text states” ही रहता है।

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72.12
रेखाभिरष्टभिर्युक्ते मासे मृत्युबशो नरः ।
असत्फलविनाशाय दद्यात् कर्पूरजां तुलाम्
rekhābhiraṣṭabhiryukte māse mṛtyubaśo naraḥ |
asatphalavināśāya dadyāt karpūrajāṃ tulām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखाभिः अष्टभिः = आठ रेखाओं से; युक्ते मासे = युक्त मास में; मृत्युवशः = मृत्यु के वश / मृत्यु-अधीन (शास्त्र-कथन); नरः = मनुष्य; असत्फलविनाशाय = असत्/अशुभ फल के नाश हेतु; दद्यात् = दे; कर्पूरजां तुलाम् = कर्पूर की तुला (कर्पूर-दान, तुला-माप)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — आठ रेखाओं वाले मास में नर मृत्यु-वश कहा गया है। असत् फल के विनाश के लिए पाठ कर्पूर-तुला के दान का निर्देश करता है। सात (७२.११) से आठ की ओर संख्या बढ़ने पर फल-शब्दावली कठोर हुई है — यह पाठ-क्रम है, हमारी पुष्टि नहीं। दान पुनः शास्त्र-विधान है, दबाव नहीं।

English rendering The text states that in a month joined with eight rekhas a person is under death’s sway; to destroy unwholesome results it prescribes the gift of a tulā of camphor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
\[
R_{\text{mās}} = 8 \;\Rightarrow\; \text{शास्त्र: मृत्युवश-कथन}.
\]
दान-स्थिरांक: कर्पूरजा तुला \(= 1\) तुला (पारंपरिक भार; ग्राम-conversion श्लोक-बाह्य)।
क्रम: \(R=7\) भय → \(R=8\) वश — पूर्णांक सीढ़ी, कोई भिन्नात्मक सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) मासिक रेखा-योग \(R = 8\) (canonical AV tables, declared mās-aggregation)।
→ ७२.१२: शास्त्र मृत्युवश कहता है; असत्फल-विनाशाय कर्पूर-तुला दान पाठ में।
तुलना: \(R=7\) (७२.११) ≠ \(R=8\) (७२.१२) — exact integer match, tolerance नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) exact-`==` discipline यहीं लागू: रेखा-दहलीज़ ७ या ८ में ±१ “लगभग” मान्य नहीं — oracle ने सिखाया कि tolerance वास्तविक −१ छुपा सकती है। फल-वाक्य और दान-वाक्य दोनों text-claims हैं, engine-output “death” नहीं।

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72.13
रेखाभिर्मवभियुक्ते मासे सर्पभयं वदेत् ।
अश्वैश्चतुर्भिः संयुक्तं रथं दद्याच्छुभाप्तये
rekhābhirmavabhiyukte māse sarpabhayaṃ vadet |
aśvaiścaturbhiḥ saṃyuktaṃ rathaṃ dadyācchubhāptaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखाभिः नवभिः = नौ रेखाओं से (पाठ: “मवभि” ≈ नवभि — पाठ-भेद/संप्रेषण-भेद संभव; क्रम ७→८→९→१० से नव=९ सुसंगत); युक्ते मासे = युक्त मास में; सर्पभयं = सर्प-भय; वदेत् = कहे; अश्वैः चतुर्भिः = चार अश्वों से; संयुक्तं रथं = युक्त रथ; दद्यात् = दान दे; शुभाप्तये = शुभ फल की प्राप्ति हेतु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नौ रेखाओं के मास में सर्प-भय कहना चाहिए। शुभ की प्राप्ति के लिए चार अश्वों से युक्त रथ के दान का उल्लेख है। यहाँ भी भय फल-संकेत है; दान पाठ-विधान। “मवभि” पाठ विकिस्रोत-पंक्ति में अस्पष्ट लग सकता है — नवभि (९) ही अनुक्रम से प्रामाणिक विकल्प; अन्य पाठ संभव।

English rendering The text states that in a month marked by nine rekhas one should declare fear of serpents; for obtaining auspicious results it prescribes gifting a chariot yoked with four horses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
\[
R_{\text{mās}} = 9 \;\Rightarrow\; \text{शास्त्र: सर्पभय-कथन}.
\]
दान-स्थिरांक: अश्व \(= 4\); रथ \(= 1\) (चतुर्भिः अश्वैः संयुक्त)।
भुतसंख् या/शब्द-संख्या: नव = ९, चतुर् = ४ — अंक-विश्वास से।

उदाहरण (worked example) \(R = 9\) मासिक रेखा-योग → ७२.१३ लागू।
शास्त्र: सर्पभय; दान: ४-अश्व रथ।
श्रृंखला जाँच: \(7\) (मृत्युभय) → \(8\) (मृत्युवश) → \(9\) (सर्पभय) → \(10\) (शस्त्रभय) — पूर्णांक सीढ़ी, exact thresholds.

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72.14
रेखाभिर्दशभिर्युक्ते मासे शस्त्रभयं तथा ।
दद्याच्छुभफलावाप्त्यै कवचं वज्रसंयुतम्
rekhābhirdaśabhiryukte māse śastrabhayaṃ tathā |
dadyācchubhaphalāvāptyai kavacaṃ vajrasaṃyutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखाभिः = रेखाओं/बिन्दुओं से (सर्वाष्टकवर्ग-गणना); दशभिः = दस (10) से; युक्ते मासे = (जिस राशि/मास में) युक्त हो; शस्त्र-भयम् = शस्त्र (हथियार) से भय; दद्यात् = दान करे; शुभ-फल-अवाप्त्यै = शुभ फल की प्राप्ति के लिए; कवचम् = कवच; वज्र-संयुतम् = वज्र (हीरे) से जड़ा हुआ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस राशि में गोचर के समय दस रेखाएँ (बिन्दु) हों, उस मास में पाठ शस्त्र से भय की सूचना देता है। इसके निवारण और शुभ फल की प्राप्ति के लिए यहाँ वज्र (हीरे) से जड़े हुए कवच के दान का विधान बताया गया है। यह श्लोक ग्यारहवें से चली आ रही रेखा-सोपान-तालिका की एक कड़ी है (7 रेखा से आरम्भ)।

English rendering The text states that when a sign holds ten rekhas (in the transit reckoning), that month portends danger from weapons; to secure an auspicious outcome it prescribes the gift of a diamond-set coat of armour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-संख्या N = दश = 10. यह एक SAV (समुदायाष्टकवर्ग) पूर्णांक है; प्रति-राशि परिसर 0 … 56 (= 8 बिन्दु × 7 ग्रह)। अध्याय-72 श्लोक 3–4 की पट्टियों के अनुसार 10 रेखा < 25 → "कष्टद" पट्टी में आती है — इसीलिए यहाँ सर्वाधिक गम्भीर (शस्त्र-भय) फल-कथन है। गणितीय भाग केवल संख्या-अंकन एवं उसकी SAV-मापनी पर स्थिति है।

उदाहरण (worked example) SAV का 12-राशि योग = 337 (Ch.66 canonical) → माध्य = 337 ÷ 12 ≈ 28.08 रेखा/राशि। इस माध्य के सापेक्ष 10 रेखा = 28.08 − 10 ≈ 18 रेखा नीचे → स्पष्टतः "क्षीणफल/कष्ट" क्षेत्र। सोपान में स्थान: 10 = श्रृंखला का चौथा पद (7,8,9,10…)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय समुदायाष्टकवर्ग (SAV) का है — वही तालिका जिसे हमारे oracle ने Ch.66 पर सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → कुल 337 पर exact-`==` (कोई सहन-पट्टी नहीं) से पिन किया। ये मासिक रेखा-संख्याएँ उसी 337-योग वाली तालिका के अलग-अलग खाने हैं; इसलिए "दस रेखा" जैसा हर पूर्णांक एक सटीक SAV-मान है, अनुमान नहीं।

72.15
अभिशापभयं यत्र रेखा रुद्रसमा द्विज ।
दिक्पलस्वर्णघटितां प्रदद्यात् प्रतिमां विधोः
abhiśāpabhayaṃ yatra rekhā rudrasamā dvija |
dikpalasvarṇaghaṭitāṃ pradadyāt pratimāṃ vidhoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभिशापभयम् = शाप/अभिशाप का भय (शास्त्र-कथित फल); रेखा = अष्टकवर्ग की रेखा/बिन्दु-संख्या; रुद्रसमा = रुद्र-तुल्य = 11 (एकादश रुद्र — भूतसंख्या); द्विज = हे द्विज (संबोधन); दिक्पल-स्वर्ण-घटिताम् = दिक्पाल-स्वर्ण से निर्मित; प्रतिमाम् विधोः = चन्द्र (विधु) की प्रतिमा; प्रदद्यात् = दे (शास्त्र-कथित शान्ति/दान)।

हिन्दी भावार्थ जहाँ रेखा-संख्या रुद्र-समा — अर्थात् ग्यारह — हो, वहाँ शास्त्र अभिशाप-भय का उल्लेख करता है। उसी प्रसंग में शान्ति हेतु विधु (चन्द्र) की वह प्रतिमा देने को कहा गया है जो दिक्पाल-स्वर्ण से घटित हो। यह फल-कथन और दान-विधि दोनों शास्त्र की अपनी भाषा में हैं; रेखा-गिनती अष्टकवर्ग-गणना पर टिकी है।

English rendering Where the rekha-count equals Rudra — eleven — the text states fear of a curse/imprecation. For the stated pacification it prescribes giving an image of the Moon (Vidhu) fashioned with the gold of the dikpālas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-सीमा = 11 (रुद्र = 11)। अष्टकवर्ग में किसी राशि/स्थान की रेखा-संख्या r जब r = 11 हो, तब यह फल-प्रकरण लागू होता है। रेखा = भिंनाष्टकवर्ग/सर्वाष्टकवर्ग की बिन्दु-गणना (Ch.66 सारणियों से; शोधन Ch.67–68 के बाद प्रयुक्त हो तो घोषित करें)। कोई अन्य अंकगणितीय सूत्र नहीं — फल + शान्ति-दान कथन।

उदाहरण (worked example) मान लें सर्वाष्टकवर्ग (SAV) या निर्दिष्ट ग्रह-अष्टकवर्ग में किसी राशि की रेखा-संख्या r = 11 (परंपरा: बिना/सहित त्रिकोण–एकाधिपत्य शोधन — घोषित करें)। तब r == 11 → इस श्लोक का अभिशाप-भय फल-प्रकरण; शान्ति-दान पाठानुसार चन्द्र-प्रतिमा। (बिन्दु-तालिका Ch.66; कुल SAV-मानक 337 — सात ग्रह।)

हमारा डिकोड (Our Decode) रेखा-संख्या अष्टकवर्ग-इंजन की ही आउटपुट है: Ch.66 की कैनोनिकल रेखा-योग (रवि 48, चन्द्र 49, … → SAV 337) exact-`==` फिक्स्चर से पinned हैं। इस श्लोक का “11” thrशहोल्ड उन्हीं प्रति-राशि बिन्दुओं पर लागू होता है; ±टॉलरेंस नहीं — गलत −1 कभी छिप चुका था।

72.16
युक्ते द्वादशरेखाभिर्जले मृत्युभयं वदेत् ।
सशस्यभूमिः विप्राय दत्वा शुभफलं भवेत्
yukte dvādaśarekhābhirjale mṛtyubhayaṃ vadet |
saśasyabhūmiḥ viprāya datvā śubhaphalaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युक्ते = संयुक्त/युक्त होने पर; द्वादश-रेखाभिः = 12 रेखाओं से; जले मृत्युभयम् = जल में मृत्यु का भय (शास्त्र-कथन); वदेत् = कहे; सशस्य-भूमिः = सस्य-युक्त भूमि; विप्राय = ब्राह्मण को; दत्वा = देकर; शुभफलम् भवेत् = शुभ फल हो (पाठानुसार)।

हिन्दी भावार्थ जहाँ बारह रेखाएँ हों, वहाँ शास्त्र जल-संबंधी मृत्यु-भय का कथन करता है। उसी प्रकरण में सस्य-सहित भूमि ब्राह्मण को देने पर शुभ फल होने की बात कही गई है। यह फल और दान दोनों शास्त्र की विधि-भाषा हैं, न कि हमारे द्वारा निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering When (a place is) joined with twelve rekhas, the text states fear of death in water. Giving crop-bearing land to a brāhmaṇa is prescribed for the auspicious result the verse names.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-सीमा = 12 (द्वादश)। r = 12 पर जल-मृत्युभय फल; दान = सशस्य भूमि → विप्र। गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दान-विधि; रेखा r अष्टकवर्ग-बिन्दु गणना से आती है।

उदाहरण (worked example) किसी राशि में रेखा r = 12 (SAV या निर्दिष्ट भिंनाष्टकवर्ग; शोधन-स्थिति घोषित)। r == 12 → 72.16 का जल-भय प्रकरण; पाठानुसार सशस्य-भूमि दान।

72.17
विश्वप्रमितरेखाभिर्व्याघ्रान्मृत्युभयं तथा ।
विष्णोर्हिरण्यगर्भस्य दानं कुर्याच्चुभाप्तये
viśvapramitarekhābhirvyāghrānmṛtyubhayaṃ tathā |
viṣṇorhiraṇyagarbhasya dānaṃ kuryāccubhāptaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विश्व-प्रमित-रेखाभिः = विश्व से मापित रेखाएँ = 13 (त्रयोदश विश्वेदेव — भूतसंख्या); व्याघ्रात् मृत्युभयम् = व्याघ्र से मृत्यु-भय; तथा = तथा; विष्णोः हिरण्यगर्भस्य = विष्णु/हिरण्यगर्भ संबंधी; दानम् कुर्यात् = दान करे; शुभाप्तये = शुभ प्राप्ति हेतु (पाठ; “चुभाप्तये” = शुभाप्तये — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ विश्व-प्रमित — अर्थात् तेरह — रेखाओं पर शास्त्र व्याघ्र से मृत्यु-भय का उल्लेख करता है। शुभ की प्राप्ति के लिए विष्णु-हिरण्यगर्भ का दान करने को कहा गया है। रेखा-संख्या गणित है; फल और दान शास्त्र-वाक्य हैं।

English rendering With rekhas measured as Viśva — thirteen — the text likewise states fear of death from a tiger. For obtaining the auspicious result it names, it prescribes the gift associated with Viṣṇu–Hiraṇyagarbha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-सीमा = 13 (विश्व = 13)। r = 13 → व्याघ्र-मृत्युभय फल; दान = विष्णु/हिरण्यगर्भ। कोई अन्य सूत्र नहीं — फल + दान; r अष्टकवर्ग से।

उदाहरण (worked example) r = 13 किसी राशि/स्थान पर (परंपरा व शोधन घोषित) → 72.17 लागू; दान पाठानुसार।

72.18
शत्रप्रमितरेखाभिर्युक्ते मासे मृतेर्भयम् ।
वराहप्रतिमां दद्यात् कनकेन विनिर्मिताम्
śatrapramitarekhābhiryukte māse mṛterbhayam |
varāhapratimāṃ dadyāt kanakena vinirmitām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शत्र-प्रमित-रेखाभिः = "शत्र"-प्रमित रेखाओं से (पाठ-भेद संभव — क्रम-अनुसार शक्र/इन्द्र = 14 अभिप्रेत); युक्ते मासे = युक्त मास में; मृतेः भयम् = मृत्यु का भय; वराह-प्रतिमाम् = वराह (अवतार) की प्रतिमा; दद्यात् = दान करे; कनकेन विनिर्मिताम् = स्वर्ण से बनी हुई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चौदह रेखाओं से युक्त राशि के मास में मृत्यु का भय होता है; उसके शमन के लिए स्वर्ण-निर्मित वराह-प्रतिमा का दान करना चाहिए। मूल का "शत्र" पद क्रम-भंग करता है, अतः इसे शक्र (= 14 इन्द्र) पढ़ना उचित प्रतीत होता है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that with rekhās measured by Śakra (fourteen — reading uncertain), fear of death arises in that month; one should give an image of Varāha fashioned of gold.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम 10→11→12→13→ अगली अपेक्षित संख्या 14। शक्र/इन्द्र = 14 (मन्वन्तरों के चौदह इन्द्र) इस स्थान की भूतसंख्या है; मुद्रित "शत्र" सम्भवतः "शक्र" का लिपि-दोष। संख्या सटीक होने पर भी पाठ विवादास्पद — इसलिए धारणा घोषित।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ अनुशासन दिखता है: संदिग्ध पाठ पर हम मौन-चयन नहीं करते, बल्कि "पाठ-भेद संभव" घोषित कर देते हैं — ठीक वैसे ही जैसे अष्टकवर्ग में BPHS अ.66 बनाम फलदीपिका के "9" के स्थानान्तरण को हमने छिपे निर्णय के बजाय खुला `[HUMAN]` अभिसमय के रूप में अंकित किया। क्रम-सातत्य (10…13) ही 14 को न्यायसंगत ठहराता है।

72.19
तिथितिश्च नृपाद् भीतिर्दद्यात् तत्र गजं द्विज ।
रिष्टं षोडशभिर्दद्यात् मूर्तिं कल्पतरोस्तथा
tithitiśca nṛpād bhītirdadyāt tatra gajaṃ dvija |
riṣṭaṃ ṣoḍaśabhirdadyāt mūrtiṃ kalpatarostathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिथि(भिः) = तिथियों-प्रमाण रेखाओं से (तिथि → 15); नृपाद् भीतिः = राजा से भय; दद्यात् तत्र गजम् = वहाँ हाथी दान करे; द्विज = हे ब्राह्मण; रिष्टं षोडशभिः = सोलह (16) रेखाओं से अरिष्ट/विपत्ति; मूर्तिं कल्पतरोः = कल्पवृक्ष की मूर्ति; तथा = वैसे ही।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक दो पदों को समेटता है। शास्त्र कहता है — पन्द्रह (तिथि-प्रमाण) रेखाओं से उस मास में राजा से भय बताया जाता है, जिसके लिए हाथी दान विहित है; और सोलह रेखाओं से अरिष्ट कहा जाता है, जिसके शमन-हेतु कल्पवृक्ष की मूर्ति दान करने का विधान है। ("तिथितिश्च" पाठ संदिग्ध — पाठ-भेद संभव, तात्पर्य तिथि = 15।)

English rendering The text states that with fifteen rekhas (the count of the tithis) the month brings fear from the king — for which an elephant is given — and with sixteen rekhas it declares misfortune, remedied by an image of the wish-granting tree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो रेखा-संख्याएँ: N₁ = तिथि = 15; N₂ = षोडश = 16। दोनों < 25 → "कष्ट" पट्टी (परन्तु माध्य 28.08 के निकटतर आती हुई)। भूतसंख्या: "तिथि" = 15 (पक्ष की पन्द्रह तिथियाँ)।

उदाहरण (worked example) विकोडन: तिथि → 15, षोडश → 16। सातत्य: 14 (श्लोक 18) → 15 → 16 (इसी श्लोक में युग्म) → श्रृंखला अखण्ड। माध्य-अन्तर: 15 → −13.08; 16 → −12.08 रेखा।

72.20
सप्तेन्दुभिर्व्याधिभयं दद्यात् धेनुं गुडं तथा ।
कलहोऽष्टेन्दुभिर्दद्याद् रत्नगोभूरिरण्यकम्
saptendubhirvyādhibhayaṃ dadyāt dhenuṃ guḍaṃ tathā |
kalaho'ṣṭendubhirdadyād ratnagobhūriraṇyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्त-इन्दुभिः = सप्त (7) + इन्दु (1) → 17; व्याधिभयम् = रोग का भय; दद्यात् धेनुम् गुडम् = गौ और गुड़ दान करे; कलहः = कलह/झगड़ा; अष्ट-इन्दुभिः = अष्ट (8) + इन्दु (1) → 18; दद्यात् रत्न-गो-भू-हिरण्यकम् = रत्न, गौ, भूमि, स्वर्ण दान करे (रिरण्यक → हिरण्यक, पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सत्रह रेखाओं पर रोग का भय होता है, जिसके लिए गौ और गुड़ का दान कहा गया है; तथा अठारह रेखाओं पर कलह होता है, जिसके परिहार के लिए रत्न, गौ, भूमि और स्वर्ण का दान बताया गया है।

English rendering The text states that at seventeen rekhās there is fear of disease — a cow and jaggery are to be given; and at eighteen, quarrel arises, for which gems, a cow, land, and gold are to be donated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ द्वि-पद भूतसंख्या + अङ्कानां वामतो गतिः (अंक बायीं ओर बढ़ते हैं — पूर्व-पद = इकाई, उत्तर-पद = दहाई): सप्त-इन्दु = 7 + 1×10 = 17; अष्ट-इन्दु = 8 + 1×10 = 18। इन्दु = चन्द्र = 1 (एक ही चन्द्र)। संख्याएँ सटीक; भय + दान उपाय-कथन।

उदाहरण (worked example) सप्तेन्दु → अंक क्रम {7, 1} → वामतो गति से 7 इकाई, 1 दहाई → 10 + 7 = 17. इसी विधि से अष्टेन्दु → {8,1} → 18। (यदि दायीं-गति मान ली जाए तो 71/81 मिलता, जो असम्भव — इसलिए वामतो-गति ही एकमात्र संगत पाठ।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दो शब्द-अंकों को अंक-निष्ठ रूप से खोलना — न कि जोड़कर 8 बना देना — वही अनुशासन है जो हमारी अष्टकवर्ग जाँच में है: मान बिलकुल सही, `==` से पिन, कोई सन्निकटन नहीं। एक अंक का भ्रम (17 बनाम 71, या 17 बनाम 18) पूरा फल-उपाय बदल देता है, ठीक जैसे SAV में छिपा −1 पूरे योग को दूषित कर देता।

72.21
अङ्केन्दुभिः प्रवासः स्याच्छान्तिं कुर्याद् विधानतः ।
विंशत्या बुद्धिनाशः स्याद् गणेशं तत्र पूजयेत्
aṅkendubhiḥ pravāsaḥ syācchāntiṃ kuryād vidhānataḥ |
viṃśatyā buddhināśaḥ syād gaṇeśaṃ tatra pūjayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अङ्क-इन्दुभिः = अङ्क (9) + इन्दु (1) → 19 (वामतो गतिः); प्रवासः स्यात् = प्रवास हो (शास्त्र-कथन); शान्तिम् कुर्यात् विधानतः = विधि से शान्ति करे; विंशत्या = 20 से; बुद्धिनाशः स्यात् = बुद्धि-नाश हो (शास्त्र-कथन); गणेशम् तत्र पूजयेत् = वहाँ गणेश की पूजा करे।

हिन्दी भावार्थ उन्नीस रेखाओं पर शास्त्र प्रवास का उल्लेख करता है और विधिपूर्वक शान्ति करने को कहता है। बीस रेखाओं पर बुद्धि-नाश का कथन है; वहाँ गणेश-पूजन कहा गया है। दोनों ही फल-शान्ति युग्म हैं — रेखा-सीमा गणित, शेष शास्त्र की अपनी विधि-भाषा।

English rendering With nineteen rekhas (aṅka–indu) the text states sojourn/exile abroad and says one should perform the pacification according to rule. With twenty it states loss of intellect (buddhi-nāśa) and prescribes worship of Gaṇeśa there.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
• अङ्केन्दु = 9 + 10×1 = 19 → प्रवास; शान्ति विधानतः।
• विंशति = 20 → बुद्धिनाश; गणेश-पूजा।
क्रम 72.15–72.21: रेखा r ∈ {11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20} — उच्च-रेखा फल-माला। गणितीय सूत्र नहीं — फल + शान्ति; r अष्टकवर्ग से।

उदाहरण (worked example) r = 19 → प्रवास-प्रकरण + विधि-शान्ति; r = 20 → बुद्धिनाश-प्रकरण + गणेश-पूजन। इनपुट: अष्टकवर्ग प्रति-राशि रेखा (Ch.66; शोधन यदि लागू तो घोषित)। SAV योग 337 केवल कुल जाँच है; फल r स्थानीय रेखा पर निर्भर करता है।

72.22
रोगपीडैकविंशत्या दद्याद् धान्यस्य पर्वतम् ।
यमाश्विभिर्बन्धुपीडा दद्यादादर्शकं द्विज
rogapīḍaikaviṃśatyā dadyād dhānyasya parvatam |
yamāśvibhirbandhupīḍā dadyādādarśakaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकविंशत्या = २१ बिन्दु/रेखा-संख्या; रोग-पीडा = रोगजन्य कष्ट (शास्त्रोक्त फल); धान्यस्य पर्वतम् = धान्य का विशाल दान (पर्वत-तुल्य परिमाण); यमाश्विभिः = यम(२)+अश्विन्(२) → भूतसंख्या २२; बन्धु-पीडा = बन्धु-सम्बन्धी क्लेश; आदर्शकम् = दर्पण/आदर्श-दान; द्विज = ब्राह्मण-सम्बोधन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब (सर्वाष्टकवर्गादि-बिन्दु-क्रम में) एकविंशति (२१) का योग हो, तब रोग-पीड़ा का संकेत मिलता है; उस अवस्था में धान्य का प्रचुर दान कहा गया है। यमाश्वि-संख्या (२२) पर बन्धु-पीड़ा का फल बताया गया है; तब आदर्श (दर्पण) देने का विधान द्विज को सम्बोधित करके कहा गया है। ये फल-कथन हैं, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

English rendering The text states that with twenty-one, disease-affliction is indicated and a great gift of grain is prescribed; with the word-numeral yama-aśvi (twenty-two), kinship-distress is stated, and the gift of a mirror is enjoined.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + दान-विधान। संख्याएँ शास्त्रोक्त स्थिरांक हैं: २१ (एकविंशति), २२ (यम=२, अश्वि=२; भूतसंख्या-क्रम में द्वि-अङ्क २२)। ये बिन्दु-संख्याएँ अष्टकवर्ग-सारिणी (अध्याय ६६) तथा शोधना (६७–६८) के बाद गृह/मास-फल से जुड़ती हैं; स्वयं यहाँ कोई विभाजन-सूत्र नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय ७२ का यह फल-क्रम उन्हीं बिन्दु-योगों पर निर्भर है जिनकी मूल सारिणी अध्याय ६६ में है — सूर्य ४८, चन्द्र ४९, मङ्गल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९ → सर्वाष्टकवर्ग ३३७। हमने इन योगों को exact-`==` फिक्स्चर पर पिन किया है, ताकि फल-श्लोक में आने वाली २१–३० जैसी संख्याएँ गलत बिन्दु-गणना से न खिसकें।

72.23
त्रयोविंशत्रिसंयुक्ते मासे क्लेशमवाप्नुयात् ।
सौवर्णीं प्रतिमां दद्याद्रवेः सप्तपलैर्बुधः
trayoviṃśatrisaṃyukte māse kleśamavāpnuyāt |
sauvarṇīṃ pratimāṃ dadyādraveḥ saptapalairbudhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रयोविंशति-संयुक्ते = तेईस (23) रेखाओं से युक्त; मासे = मास में; क्लेशम् अवाप्नुयात् = क्लेश (कष्ट) पाता है; सौवर्णीं प्रतिमां = स्वर्ण-प्रतिमा; दद्यात् = दान करे; रवेः = सूर्य की; सप्त-पलैः = सात पल (तौल) से (बनी); बुधः = बुद्धिमान् व्यक्ति।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — तेईस रेखाओं से युक्त राशि उस मास में क्लेश की सूचना देती है। इसके शमन-हेतु बुद्धिमान् व्यक्ति सात पल स्वर्ण से बनी सूर्य की प्रतिमा का दान करे — ऐसा विधान है। ("त्रयोविंशत्रि" पद में सम्भवतः "त्रि" पुनरुक्ति — पाठ-भेद संभव; तात्पर्य 23।)

English rendering The text states that a sign joined with twenty-three rekhas brings distress in that month; the discerning are to give a golden image of the Sun made of seven palas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-संख्या N = त्रयोविंशति = 23। दान-तौल = सप्त-पल = 7 पल स्वर्ण। 23 < 25 → अभी "कष्ट" पट्टी की अन्तिम देहली (25 से ठीक नीचे)।

उदाहरण (worked example) पट्टी-स्थिति: 23 < 25 ⇒ कष्ट; परन्तु माध्य 28.08 से मात्र −5.08 रेखा — अर्थात् मध्य-पट्टी के बहुत निकट। सातत्य: 22 (श्लोक 22) → 23 (यह) अखण्ड।

72.24
वेदाश्विभिर्बन्धुहीनो दद्याद् गिदशकं नृपः ।
सर्वरोगविनाशार्थं जपहोमादिकं चरेत्
vedāśvibhirbandhuhīno dadyād gidaśakaṃ nṛpaḥ |
sarvarogavināśārthaṃ japahomādikaṃ caret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वेद-अश्विभिः = वेद (4) + अश्विन् (2) → 24; बन्धुहीनः = बन्धुओं से रहित/वियुक्त हो जाता है; दद्यात् गो-दशकम् = दस गौएँ दान करे ("गिदशकम्" पाठ, पाठ-भेद संभव — गो-दशक अभिप्रेत); नृपः = राजा (भी); सर्वरोग-विनाशार्थम् = समस्त रोगों के नाश हेतु; जप-होम-आदिकम् चरेत् = जप, होम आदि करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चौबीस रेखाओं पर मनुष्य बन्धु-हीन हो जाता है; राजा तक को दस गौओं का दान करना चाहिए, तथा समस्त रोगों के नाश के लिए जप-होम आदि करना चाहिए।

English rendering The text states that with rekhās numbering Veda-Aśvin (twenty-four) one becomes bereft of kin; even a king should give ten cows, and for the removal of all diseases should perform japa, homa, and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वेद-अश्वि = वेद 4 + अश्विनौ 2 → अंक {4, 2} → वामतो-गति = 24; दान-माप = 10 गौ (गो-दशक, पाठ-भेद संभव)। संख्या सटीक; बन्धुहीनता + गो-दान/जप-होम उपाय-कथन।

उदाहरण (worked example) वेदाश्वि → वेद = 4 (चार वेद), अश्वि = 2 → अंक {4, 2} → 4 इकाई + 2 दहाई = 24 (न कि 42, जो 0…56 परास में फिर भी सम्भव होता — अतः यहाँ वामतो-गति अभिसमय स्पष्ट घोषित करना आवश्यक)।

हमारा डिकोड (Our Decode) "गिदशकम्" जैसा भ्रष्ट पाठ दिखाते ही हम उसे मौन रूप से "गोदशकम्" मान नहीं लेते — पाठ-भेद घोषित करते हैं और अंकों को (वेद 4, अश्विन् 2 → 24) अंक-निष्ठ रूप से खोलते हैं। यही "declared convention, not silent choice" अनुशासन हमारी अष्टकवर्ग-जाँच का मूल है, जहाँ विवादित पाठ/स्थानान्तरण खुले `[HUMAN]` अभिसमय के रूप में अंकित होते हैं।

72.25
धीहानिः पञ्चविंशत्या पूज्या वागीश्वरी तदा ।
षड्विंशत्याऽर्थहानिः स्यात् स्वर्णं दद्याद्विचक्षणः
dhīhāniḥ pañcaviṃśatyā pūjyā vāgīśvarī tadā |
ṣaḍviṃśatyā'rthahāniḥ syāt svarṇaṃ dadyādvicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धी-हानिः = बुद्धि की हानि; पञ्चविंशत्या = पच्चीस (25) रेखाओं से; पूज्या वागीश्वरी तदा = तब वागीश्वरी (सरस्वती) पूज्य हैं; षड्विंशत्या = छब्बीस (26) रेखाओं से; अर्थ-हानिः स्यात् = धन-हानि हो; स्वर्णं दद्याद् विचक्षणः = विवेकी स्वर्ण दान करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पच्चीस रेखाओं से उस मास में धी (बुद्धि) की हानि बताई जाती है, जिसके लिए वागीश्वरी (सरस्वती) का पूजन कहा गया है; और छब्बीस रेखाओं से अर्थ (धन) की हानि कही जाती है, जिसके परिहार-हेतु विवेकी जन को स्वर्ण दान करने का विधान है। यहाँ से भय के फल-कथन कोमल पड़ने लगते हैं (मृत्यु-भय से हानि-मात्र की ओर)।

English rendering The text states that twenty-five rekhas portend loss of intellect — for which Vāgīśvarī (Sarasvatī) is to be worshipped — and twenty-six rekhas portend loss of wealth, remedied by the gift of gold.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) N₁ = पञ्चविंशति = 25; N₂ = षड्विंशति = 26। श्लोक-3–4 की पट्टियों के अनुसार 25 पर "मध्य-फल" पट्टी (25–30) आरम्भ; इसीलिए फल-कथन धी-हानि/अर्थ-हानि जैसे न्यूनतर हो जाते हैं। दोनों माध्य 28.08 के निकट।

उदाहरण (worked example) पट्टी-संक्रमण: 24 (कष्ट) → 25 (मध्य आरम्भ)। माध्य-अन्तर: 25 → −3.08; 26 → −2.08 रेखा। सातत्य: 24 → 25 → 26 अखण्ड।

हमारा डिकोड (Our Decode) पट्टी की देहली (25) यहाँ ठीक SAV-माध्य 337 ÷ 12 ≈ 28.08 के नीचे बैठती है — अर्थात् श्लोक-3–4 की "मध्य" पट्टी (25–30) उसी 337-योग वाली तालिका के औसत को घेरती है जिसे हमारे oracle ने exact-`==` से पिन किया। इस तरह पाठ की गुणात्मक पट्टियाँ और हमारी संख्यात्मक तालिका एक ही मापनी पर मिलती हैं।

72.26
तथा च सप्तविंशत्या श्रीसुक्तं तत्र संजपेत् ।
अष्टविंशतिसंयुक्ते मासे मासे हानिश्च सर्वथा
tathā ca saptaviṃśatyā śrīsuktaṃ tatra saṃjapet |
aṣṭaviṃśatisaṃyukte māse māse hāniśca sarvathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा च = और वैसे ही; सप्तविंशत्या = सत्ताईस (27) रेखाओं से; श्री-सूक्तं तत्र संजपेत् = वहाँ श्री-सूक्त का जप करे; अष्टविंशति-संयुक्ते मासे = अट्ठाईस (28) रेखाओं से युक्त मास में; हानिः च सर्वथा = और सब प्रकार से हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सत्ताईस रेखाओं से उस मास में परिहार-रूप श्री-सूक्त के जप का विधान है; और अट्ठाईस रेखाओं से युक्त मास में सर्वथा हानि कही जाती है (इसका शमन-विधान — सूर्य-होम आदि — अग्रिम श्लोक 27 में जारी रहता है)। ("मासे मासे" में सम्भवतः पुनरुक्ति — पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states that with twenty-seven rekhas the Śrī-sūkta is to be recited, and that a month joined with twenty-eight rekhas brings loss in every way — its remedy continuing into the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) N₁ = सप्तविंशति = 27; N₂ = अष्टविंशति = 28। 27 व 28 "मध्य-फल" पट्टी (25–30) में; 28 ≈ SAV प्रति-राशि माध्य (28.08)। यह श्लोक 14 से चली आ रही एकोत्तर रेखा-श्रृंखला (10 … 28) की समापन-कड़ी है; अगला सोपान 29–30 (श्लोक 27–28) से "श्रेष्ठ/लाभ" पट्टी में प्रवेश करता है।

उदाहरण (worked example) सातत्य-समापन: …25, 26, 27, 28 — इस बैच (श्लोक 14–26) में कुल रेखा-मान 10 से 28 तक अखण्ड आवृत्त। माध्य-सामीप्य: 28 − 28.08 = −0.08 रेखा (लगभग ठीक माध्य पर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) 28 रेखा का यह पद हमारी पिन-तालिका के प्रति-राशि माध्य 337 ÷ 12 ≈ 28.08 से लगभग अभिन्न है — संयोग नहीं, बल्कि इसी कारण पाठ 28 के आस-पास फल को "साधारण/मध्य" रखता है। श्लोक 14–26 का पूरा सोपान (10 → 28) एकोत्तर सिद्ध हुआ; इस अखण्ड श्रृंखला ने संदिग्ध पाठों (श्लोक 18 "शत्र", 24 "गिदशकं") के मानों को भी exact रूप से स्थिर किया — वही "अनुमान नहीं, `==`" अनुशासन।

72.27
सूर्यहोमश्च विधिना कर्त्तव्यः शुभकांक्षिभिः ।
एकोनत्रिंशता चापि चिन्तव्याकुलितो भवेत्
sūryahomaśca vidhinā karttavyaḥ śubhakāṃkṣibhiḥ |
ekonatriṃśatā cāpi cintavyākulito bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्य-होमः = सूर्य को समर्पित विधिवत् हवन; विधिना = शास्त्रोक्त प्रकार से; कर्त्तव्यः = करणीय; शुभकांक्षिभिः = कल्याण चाहने वालों द्वारा; एकोनत्रिंशता = एक-कम-तीस = 29 (रेखाओं) से युक्त; च अपि = और भी; चिन्ता-व्याकुलितः = चिन्ता से उद्विग्न; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक की 28-रेखा वाली "हानि" स्थिति का उपशमन बताते हुए शास्त्र कहता है कि कल्याण के इच्छुक जातक को विधिपूर्वक सूर्य-होम करना चाहिए। तदनन्तर गणना-क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहता है — जिस राशि/मास में रेखाओं की संख्या उनतीस (29) हो, वहाँ जातक चिन्ता से व्याकुल रहता है। ध्यातव्य कि 29 अभी मध्यम (25–30) पट्टी के भीतर ही आता है, अतः यह कथन उसी बैंड की एक कोटि है।

English rendering Those desiring well-being should duly perform a Sūrya-homa [as remedy for the twenty-eight case]; and where the rekhā-count is twenty-nine, the text states the native becomes troubled by anxiety.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एकोनत्रिंशत् = 30 − 1 = 29 (शब्द-संख्या का अंक-निष्ठ विच्छेद)। यहाँ N = उस राशि की समुदाय-अष्टकवर्ग (SAV) रेखा-संख्या; इस अध्याय की देहली-योजना (श्लोक 3): N > 30 → श्रेष्ठ, 25 ≤ N ≤ 30 → मध्य, N < 25 → कष्ट। अतः N = 29 मध्य-पट्टी का ऊपरी सिरा है। गणित केवल पूर्णांक-गणना एवं देहली-तुलना है; सूर्य-होम एक विधि-प्रस्ताव, और "चिन्ता-व्याकुल" शास्त्र का वर्गीकरण-कथन है, कोई भविष्यवाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) मानक SAV कुल = 337 बिंदु ÷ 12 राशि = औसत ≈ 28.08 प्रति राशि। यदि किसी राशि में N = 29 रेखाएँ हों, तो वह औसत से मात्र ~1 बिंदु ऊपर होकर भी अध्याय की मध्य-पट्टी (25–30) में ही रहती है — शास्त्र इसे "चिन्ता-व्याकुल" कोटि कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस देहली-अंकगणित का आधार-स्तम्भ SAV = 337 है, जिसे हमारे kaal-verification-oracle में सात ग्रहों की रेखा-सन्तति (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39) से exact-`==` द्वारा पिन किया गया है — कोई सहन-सीमा (tolerance) नहीं, क्योंकि एक ±बैंड ने कभी एक वास्तविक −1 को छिपा दिया था। "29 = मध्य" जैसा वर्गीकरण तभी अर्थपूर्ण है जब प्रति-राशि योग का कुल 337 स्थिर व सत्यापित हो।

72.28
घृतवस्त्रसुवर्णानि तत्र दद्यात् विचक्षणः ।
त्रिंशता पूर्णधान्याप्तिरिति जातकनिर्णयः
ghṛtavastrasuvarṇāni tatra dadyāt vicakṣaṇaḥ |
triṃśatā pūrṇadhānyāptiriti jātakanirṇayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) घृत-वस्त्र-सुवर्णानि = घी, वस्त्र और स्वर्ण (दान-द्रव्य, कर्म-कारक बहुवचन); तत्र = वहाँ (29-रेखा स्थिति में); दद्यात् = देना चाहिए; विचक्षणः = विवेकी जन; त्रिंशता = तीस (30) रेखाओं से युक्त; पूर्ण-धान्य-आप्तिः = पूर्ण अन्न-सम्पदा की प्राप्ति; इति जातक-निर्णयः = ऐसा जातक-विषयक निष्कर्ष।

हिन्दी भावार्थ 29-रेखा वाली उद्विग्न स्थिति के उपशमन-रूप में शास्त्र कहता है कि विवेकी जन घी, वस्त्र और स्वर्ण का दान करे। और जहाँ रेखाएँ पूरी तीस (30) हों, वहाँ पूर्ण धान्य (अन्न-समृद्धि) की प्राप्ति होती है — "इति जातकनिर्णयः", यही जातक-विषयक निर्णय है। यह श्लोक 11 से चली आ रही रेखा-गणना-तालिका (7 से 30 तक) का समापन-बिंदु है; अगला श्लोक फिर देहली-भाषा में लौटता है।

English rendering Let the discerning give ghee, cloth and gold [for the twenty-nine case]; and where the rekhās are thirty, the text states there is attainment of full grain — such is the native's determination.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) त्रिंशत् = 30। इस अध्याय की तालिका का परिसर N ∈ {7, 8, …, 30} है, प्रत्येक पूर्णांक अपने फल-सहित क्रमशः गिना गया; N = 30 उस तालिका का शिखर तथा मध्य-पट्टी (25–30) की ऊपरी देहली है। कोई नया सूत्र नहीं — मात्र पूर्णांक-गणना और देहली-तुलना; दान एक विधि-प्रस्ताव, फल शास्त्र का कथन।

उदाहरण (worked example) 337 ÷ 12 ≈ 28.08 औसत के सापेक्ष N = 30 औसत से ~2 बिंदु ऊपर बैठता है → श्लोक 3 की मध्य-पट्टी का शीर्ष, तथा श्रेष्ठ-देहली (N > 30) से ठीक एक कदम नीचे। शास्त्र इस स्थिति को "पूर्ण-धान्य-आप्ति" कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) 30 को "तालिका का शिखर" कहना केवल तभी सुसंगत है जब प्रति-राशि रेखा-योग एक सत्यापित पूर्ण-योग (Σ = 337) का भाग हो — यही हमारे oracle में पिन किया गया कैनोनिकल मान है। तालिका के फल-कथनों को हम शास्त्र की उक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, अपने द्वारा समर्थित पूर्वानुमान के रूप में नहीं — यही "गणित और व्याख्या को पृथक रखने" वाला अनुशासन है।

72.29
त्रिंशाधिकामी रेखाभिर्धनपुत्रसुखाप्तयः ।
चत्वारिंशाधिकाभिश्च पुण्यश्रीरुपचीयते
triṃśādhikāmī rekhābhirdhanaputrasukhāptayaḥ |
catvāriṃśādhikābhiśca puṇyaśrīrupacīyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंशाधिकाभिः = तीस से अधिक; रेखाभिः = रेखा/बिन्दु (अष्टकवर्ग-गणना); धन-पुत्र-सुख-आप्तयः = धन, पुत्र एवं सुख की प्राप्ति; चत्वारिंशाधिकाभिः = चालीस से अधिक; पुण्य-श्रीः = पुण्य-बल एवं श्री/ऐश्वर्य; उपचीयते = बढ़ता है, संवर्धित होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जहाँ रेखाएँ तीस से अधिक हों, वहाँ धन, पुत्र और सुख की प्राप्ति का फल बताया गया है। जहाँ रेखाएँ चालीस से अधिक हों, वहाँ पुण्य और श्री का उपचय—अर्थात् वृद्धि—कहा गया है। यह कथन समुदायाष्टकवर्ग/अष्टकवर्ग की रेखा-संख्या को फल-सीमा के रूप में पढ़ता है; संख्या स्वयं गणन का फल है, फल-भाष्य शास्त्र का अपना वाक्य है।

English rendering The text states that with more than thirty rekhas one obtains wealth, offspring, and comfort; and with more than forty, merit and prosperity are said to increase. The verse fixes two numerical thresholds on the line-count for result-statements.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रेखा-सीमाएँ (verse constants):
R > 30 → शास्त्र-कथित फल: धन–पुत्र–सुख-आप्ति
R > 40 → शास्त्र-कथित फल: पुण्य–श्री उपचय
यहाँ R = उस भाव/स्थान की रेखा-संख्या (अष्टकवर्ग-संशुद्धि के बाद की शुद्ध रेखाएँ—त्रिकोण-शोधन Ch.67, एकाधिपत्य-शोधन Ch.68—जब उसी प्रकरण में लागू हों)। कोई सूत्र-रूपांतरण नहीं; केवल दो पूर्णांक दहलीज़ें: 30 और 40।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए किसी भाव की शुद्ध SAV-रेखा = 34। तब 34 > 30 और 34 ≯ 40 → शास्त्र के अनुसार केवल “त्रिंशाधिक” श्रेणी का फल-वाक्य लागू; “चत्वारिंशाधिक” श्रेणी नहीं। यदि R = 42, तो दोनों दहलीज़ पार; पाठ दोनों फल-स्तरों को क्रमशः जोड़कर पढ़ता है। (परंपरा: शुद्ध रेखा = शोधन के बाद; कच्ची bhinna/SAV संख्याएँ शोधन-पूर्व अलग होती हैं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) Ch.66 की ग्रह-रेखा-योग (रवि 48, चंद्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39) → SAV = 337, exact-`==` फिक्स्चर पर पिन है। Ch.67–68 की शुद्धि के बाद ही भाव-स्तरीय R फल-सीमाओं (30, 40) से तुलना योग्य बनता है; हमने कुल 337 और bhinna-तालिकाओं को ±-बैंड के बिना `==` से बाँधा है।

72.30
अष्टवर्गेण ये शुद्धास्ते शुद्धाः सर्वकर्मसु ।
अतोऽष्टवर्गसंशुद्धिरनेष्या सर्वकर्मसु
aṣṭavargeṇa ye śuddhāste śuddhāḥ sarvakarmasu |
ato'ṣṭavargasaṃśuddhiraneṣyā sarvakarmasu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टवर्गेण = अष्टकवर्ग के द्वारा; ये शुद्धाः = जो (राशि/भाव) शोधन के पश्चात् निर्मल सिद्ध हों; ते शुद्धाः सर्व-कर्मसु = वे सभी कार्यों में शुद्ध (योग्य/शुभ); अतः = इसलिए; अष्टवर्ग-संशुद्धिः = अष्टकवर्ग-शोधन द्वारा प्राप्त शुद्धि; अन्वेष्या = खोजनी/करनी चाहिए (पाठ "अनेष्या" → अन्वेष्या; पाठ-भेद संभव); सर्व-कर्मसु = समस्त उपक्रमों में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो राशियाँ/भाव अष्टकवर्ग से शुद्ध सिद्ध होते हैं, वे प्रत्येक कार्य में शुभ (विश्वसनीय) होते हैं; अतः किसी भी उपक्रम से पूर्व अष्टकवर्ग-संशुद्धि (शोधन) करनी चाहिए। यह विधि-वाक्य है — रेखा-गणना का फल तभी प्रमाण है जब शोधन-प्रक्रिया सम्पन्न हो चुकी हो।

English rendering Those [signs] shown pure by the aṣṭakavarga are sound in every undertaking; therefore the aṣṭakavarga-purification should be sought before all works.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (शोधन-अनुशासन)। अंतर्निहित तकनीक: SAV को फल-निर्णय से पूर्व त्रिकोण-शोधन (Ch.67) एवं एकाधिपत्य-शोधन (Ch.68) द्वारा घटाकर "शुद्ध" किया जाता है; यही शोधित बिंदु-मान ही "शुद्धि" है। बिना शोधन के कच्चा योग निर्णायक नहीं माना जाता — यह अध्याय का पद्धति-सिद्धान्त है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उसी अनुशासन का शास्त्रीय उद्घोष है जिसे हमने कोड में क्रियान्वित किया: SAV = 337 को फल से पहले त्रिकोण- व एकाधिपत्य-शोधन से गुज़ारना। हमारे CLAUDE.md/oracle की मूल शिक्षा — "गणित को व्याख्या से पृथक रखो, केवल exact-`==` जाँच पर विश्वास करो" — इसी "अष्टवर्ग-संशुद्धि" की आधुनिक प्रतिध्वनि है; सहन-सीमा-बैंड शोधन का विकल्प नहीं, अपितु त्रुटि-प्रच्छादक हैं।

72.31
तावद्गोचरमन्वेष्यं यावन्न प्राप्यतेऽष्टकम् ।
अष्टवर्गे तु सम्प्राप्ते गोचरं विफलं भवेत्
tāvadgocaramanveṣyaṃ yāvanna prāpyate'ṣṭakam |
aṣṭavarge tu samprāpte gocaraṃ viphalaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तावत् गोचरम् अन्वेष्यम् = तब तक गोचर (transit) का अन्वेषण अपेक्षित; यावत् न प्राप्यते अष्टकम् = जब तक अष्टक (अष्टकवर्ग) प्राप्त/लागू न हो; अष्टवर्गे तु सम्प्राप्ते = किन्तु अष्टकवर्ग के भली-भाँति लागू हो जाने पर; गोचरं विफलं भवेत् = (निरपेक्ष) गोचर निष्फल हो जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि साधारण गोचर-विचार तभी तक अपेक्षित है जब तक अष्टकवर्ग का आश्रय न लिया गया हो; एक बार अष्टकवर्ग-आधारित विचार सिद्ध हो जाने पर स्वतन्त्र (निरपेक्ष) गोचर निष्फल — अर्थात् गौण — हो जाता है। तात्पर्य: अष्टकवर्ग ही गोचर-फल का निर्णायक परिष्कारक है, केवल राशि-संक्रमण नहीं।

English rendering Ordinary transit is to be examined only until the aṣṭakavarga is brought to bear; once the aṣṭakavarga is fully applied, [unqualified] transit becomes fruitless.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-अधिक्रमण (गोचर पर अष्टकवर्ग की प्रधानता)। अंतर्निहित तकनीक: किसी ग्रह के गोचर-फल को उस संक्रान्त राशि की बिंदु-संख्या (कक्षा-रेखा तथा SAV) से भारित किया जाता है — अधिक बिंदु → अनुकूल गोचर, अल्प बिंदु → प्रतिकूल; अतः शुद्ध बिंदु-गणना निर्णायक बन जाती है और निरपेक्ष संक्रमण गौण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही कारण है कि हमारा engine गोचर-फल पढ़ने से पूर्व प्रति-राशि SAV (Σ = 337 पर आधारित) एवं शोधित बिंदु-मान की गणना करता है — बिंदु-संख्या ही वह छन्नी (filter) है जिससे गोचर व्याख्यायित होता है। श्लोक 30–31 मिलकर पद्धति को स्पष्ट करते हैं: पहले अष्टकवर्ग-शुद्धि, फिर उसी शुद्ध गणना के प्रकाश में गोचर — अन्यथा कच्चा गोचर "विफल"।

अध्यायः 73

रश्मिफलाध्यायः

23 श्लोक
73.1
अथ रश्मीन् प्रवक्ष्यामि ग्रहाणां द्विजसत्तम ।
दिन् नवेष्विषुसप्ताष्टशराः स्वोच्चे करो रवेः
atha raśmīn pravakṣyāmi grahāṇāṃ dvijasattama |
din naveṣviṣusaptāṣṭaśarāḥ svocce karo raveḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरणारम्भ); रश्मीन् = ग्रहों की किरणें/रश्मि-संख्या; प्रवक्ष्यामि = मैं (पराशर) कहूँगा; ग्रहाणाम् = ग्रहों की; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय); दश/दिन् = 10 (पाठ-भेद संभव — "दिन्" संभवतः "दश" का अपपाठ); नव = 9; इषु = 5 (कामदेव के पञ्चबाण); सप्त = 7; अष्ट = 8; शर = 5 (बाण); स्वोच्चे = अपने परम उच्च-बिंदु पर; करः = किरण/रश्मि; रवेः = सूर्य की।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ, अब मैं ग्रहों की रश्मियों (किरण-संख्या) का प्रकरण कहता हूँ। प्रत्येक ग्रह अपने ठीक परमोच्च बिंदु पर अपनी अधिकतम रश्मि देता है — यहाँ शब्द-संख्याओं (नव, इषु, सप्त, अष्ट, शर, तथा सूर्य के लिए दश) से वे अधिकतम मान गिनाए गए हैं। यह पूरी अध्याय-श्रृंखला का आधार-स्थिरांक है, जिससे आगे अनुपात द्वारा प्रत्येक स्थिति की रश्मि निकाली जाएगी।

English rendering Now, O best of the twice-born, I shall expound the rays (raśmi) of the planets: at its exact exaltation each graha yields its maximum count of rays — the Sun's, and the rest, given here by the word-numerals.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह verse प्रत्येक ग्रह की अधिकतम रश्मि R_max (परमोच्च पर) निश्चित करता है। सुपाठ्य शब्द-संख्याएँ: नव=9, इषु=5, सप्त=7, अष्ट=8, शर=5, तथा रवि हेतु दश=10। इस recension की समास-पंक्ति क्षतिग्रस्त है, अतः प्रति-ग्रह नियतांक का सटीक आबंटन पाठ-भेद संभव। परम्परा में प्रायः उद्धृत अधिकतम-मान: रवि 10, चन्द्र 9, मङ्गल 5, बुध 7, गुरु 8, शुक्र 7, शनि 5 (Σ ≈ 51) — पर इसे इस क्षतिग्रस्त पाठ का निश्चित पाठ न मानें। तकनीकी रूप से यही R_max आगे (verse 3) अनुपात का गुणक बनता है।

उदाहरण (worked example) मान लें रवि का R_max = 10 (उपर्युक्त परम्परा-मान)। जब रवि ठीक 10° मेष (अपने परमोच्च) पर हो, तो रश्मि = R_max = 10 — यही ऊपरी सीमा है, जिससे नीचे की सब स्थितियाँ अनुपात से घटती हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह edition एक ही recension (Sanskrit Wikisource) पर पिन है; जहाँ पाठ विवादित हो वहाँ "पाठ-भेद संभव" कहना ही operator की never-lose-again अनुशासन-रेखा है — सुपाठ्य अंक (9,5,7,8,5,10) को तथ्य कहो, क्षतिग्रस्त आबंटन को अनुमान। किसी संदिग्ध नियतांक को मौन रूप से "ठीक" मान लेना ही वह भूल है जिससे यह पद्धति बचाती है।

73.2
नीच खं चान्तरे प्रोक्ता रश्मयश्चानुपात्तः ।
नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिकं चक्राद्विशोधयेत्
nīca khaṃ cāntare proktā raśmayaścānupāttaḥ |
nīconaṃ tu grahaṃ bhārdhādhikaṃ cakrādviśodhayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीचे = परम नीच (debilitation) पर; खम् = शून्य (ख = आकाश = 0); च = और; अन्तरे = बीच की स्थितियों में; प्रोक्ताः = कही गई हैं; रश्मयः = रश्मियाँ; अनुपातः = त्रैराशिक/रूल-ऑफ़-थ्री द्वारा; नीचोनम् = ग्रह में से नीच-बिंदु घटाकर; ग्रहम् = ग्रह (का स्फुट); भार्ध-अधिकम् = यदि भचक्र-अर्ध (180°) से अधिक हो; चक्रात् = 360° (राशिचक्र) में से; विशोधयेत् = घटा दे।

हिन्दी भावार्थ परम नीच पर ग्रह की रश्मि शून्य (खम्) होती है, और उच्च-नीच के बीच की सब स्थितियों की रश्मि अनुपात से निकाली जाती है। इसके लिए ग्रह-स्फुट में से उसका नीच-बिंदु घटाओ; यदि यह अन्तर आधे भचक्र (180°) से अधिक हो, तो उसे 360° में से घटाकर मोड़ (fold) लो। यही "नीच से दूरी" आगे की गणना का चाप है।

English rendering At debilitation the rays are zero; between the extremes they are found by proportion. Subtract the planet's debilitation-point from its longitude; if the arc exceeds half the circle (180°), subtract it from 360° to fold it back.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नीच पर रश्मि = 0 (खम्)। नीच से चाप: Δ = (ग्रह-स्फुट − नीच-बिंदु) mod 360°; यदि Δ > 180° तो Δ ← 360° − Δ। इससे Δ ∈ [0°, 180°] — जहाँ 0° = नीच (0 रश्मि) और 180° = उच्च (R_max)। नीच व उच्च ठीक 180° सम्मुख होते हैं, अतः यह fold उच्च की ओर बढ़ती दूरी को रैखिक अनुपात-चर बना देता है।
मानक नीच-बिंदु (convention): रवि 10° तुला, चन्द्र 3° वृश्चिक, मङ्गल 28° कर्क, बुध 15° मीन, गुरु 5° मकर, शुक्र 27° कन्या, शनि 20° मेष।

उदाहरण (worked example) रवि 10° कर्क (सायन-निरपेक्ष निरयन स्फुट = 100°) पर। नीच = 10° तुला = 190°। Δ = 100 − 190 = −90 → +360 = 270°। 270 > 180, अतः Δ = 360 − 270 = 90° = 3 राशि। यही चाप verse 3 में R_max से गुणा होगा।

73.3
स्वीयरश्मिहतं षड्भिर्भजेत् स्यू रश्मयः स्वकाः ।
अपरैरत्र संस्कारविशेषः कथितो यथा
svīyaraśmihataṃ ṣaḍbhirbhajet syū raśmayaḥ svakāḥ |
aparairatra saṃskāraviśeṣaḥ kathito yathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वीय-रश्मि-हतम् = अपने (max) रश्मि से गुणित; षड्भिः भजेत् = छह से भाग दो; स्युः = हों/होती हैं; रश्मयः स्वकाः = उसकी अपनी (वास्तविक) रश्मियाँ; अपरैः = अन्य (आचार्यों) द्वारा; अत्र = यहाँ; संस्कार-विशेषः = विशेष संस्कार / परिष्कार (correction); कथितः यथा = जैसा कहा गया (अग्रे)।

हिन्दी भावार्थ अब मूल-सूत्र: नीच से मापी हुई दूरी (राशियों में) को ग्रह के अपने अधिकतम-रश्मि से गुणा करो और छह से भाग दो — यही उस ग्रह की "अपनी" (आधार) रश्मियाँ हैं। कुछ अन्य आचार्य इसमें एक विशेष संस्कार (गुणा-भाग) जोड़ते हैं, जिसे पराशर आगे (श्लोक 4–6) बताते हैं।

English rendering Multiply the (distance-in-signs) by the planet's own maximum rays and divide by six — these are its base rays. Others prescribe a special refinement upon this, stated in what follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मूल-रश्मि = कर-max × (d_राशि ÷ 6), जहाँ d_राशि = d ÷ 30° (0 से 6 तक)। समतुल्य रूप: कर-max × (d ÷ 180°)। सीमा-जाँच: d=6 राशि (परमोच्च) → कर-max × 6/6 = कर-max; d=0 (नीच) → 0; d=3 राशि (उच्च-नीच अक्ष का समकोण) → कर-max × 3/6 = कर-max ÷ 2। "अपरैः … संस्कारविशेषः" = मतभेद-सूचना; अतः base बनाम spaṣṭa दो चरण अलग रखे गए हैं।

उदाहरण (worked example) सूर्य: परमोच्च = मेष 10°, नीच = तुला 10°; कर-max = 10 (दश, पूर्व-श्लोक का सामान्य पाठ)। मान सूर्य कर्क 10° पर = 100°। नीच = तुला 10° = 190°। d = |100 − 190| = 90° = 3 राशि। मूल-रश्मि = 10 × 3 ÷ 6 = 5। (संस्कार श्लोक 4–6 में लगेगा।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक ṣaḍbala (दोसियर §4) का ढाँचा है — "कथित संख्यात्मक नियम → रूप/इकाई में मान → दहलीज से तुलना"। हमारी अनुशासन-रेखा (दोसियर §5) यहाँ भी: गणित (× कर-max ÷ 6) को फल से अलग रखो, और जहाँ मान सम्मेलन पर निर्भर हो (अयनांश, नीच-दीर्घांश) वहाँ सम्मेलन घोषित करो — जैसे उदाहरण में लाहिरी व मेष 10° परमोच्च घोषित किया।

73.4
स्वोच्चभे ते त्रिगुणिताः स्वत्रिकोणे द्विसंगुणाः ।
स्वमे त्रिघ्ना द्विसंभक्ता अधिमित्रगृहे तथा
svoccabhe te triguṇitāḥ svatrikoṇe dvisaṃguṇāḥ |
svame trighnā dvisaṃbhaktā adhimitragṛhe tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वोच्चभे = अपने उच्च-राशि में स्थित होने पर; ते = वे (रश्मियाँ); त्रिगुणिताः = तीन-गुना (×3); स्वत्रिकोणे = अपने मूलत्रिकोण में; द्विसंगुणाः = दो-गुना (×2); स्वमे = अपनी (स्व-) राशि में; त्रिघ्नाः द्विसंभक्ताः = ×3 फिर ÷2 (= ×3/2); अधिमित्रगृहे = अधिमित्र (परम-मित्र) के गृह में; तथा = वैसे ही (अग्रे)।

हिन्दी भावार्थ यह पहला "संस्कार" — ग्रह जिस राशि में बैठा है, उसकी उस राशि में गरिमा (dignity) के अनुसार आधार-रश्मि को गुणा-भाग कर संस्कारित करते हैं। उच्च-राशि में तिगुना, मूलत्रिकोण में दुगुना, अपनी राशि में डेढ़-गुना, और अधिमित्र के गृह में (अगली पंक्ति में) एक और अनुपात।

English rendering Now the refinement by occupied-sign dignity: in its exaltation-sign the rays are tripled (×3), in its mūlatrikoṇa doubled (×2), in its own sign taken as ×3 ÷2 (= ×3/2); in a great-friend's house, as stated next.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संस्कार-गुणक (dignity-multiplier), भाग 1:
- स्वोच्च-राशि: ×3
- स्व-मूलत्रिकोण: ×2
- स्व-राशि: ×3/2 (= ×1.5)
- अधिमित्र-गृह: → श्लोक 5 (×4/3)
spaṣṭa-रश्मि = मूल-रश्मि × (dignity-गुणक)। मान वही 0-आधारित रैखिक राशि रहती है; केवल स्थान-गरिमा से मापन-अधिभार लगता है।

उदाहरण (worked example) श्लोक 3 का सूर्य base = 5। यदि (कल्पना) सूर्य अपने मूलत्रिकोण सिंह 10° पर होता, तो पहले नई d से base बदलती, फिर ×2 संस्कार लगता। यहाँ केवल गुणक दिखाने हेतु: base 5 × 2 = 10 spaṣṭa-रश्मि (मूलत्रिकोण स्थिति में)।

73.5
वेदघ्ना रामसंभक्ता मित्रमे षड्गुणास्ततः ।
पञ्चभक्तास्तथा शत्रुगृहे चेद् दलिताः कराः
vedaghnā rāmasaṃbhaktā mitrame ṣaḍguṇāstataḥ |
pañcabhaktāstathā śatrugṛhe ced dalitāḥ karāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वेदघ्नाः = चार से गुणित (वेद=4); रामसंभक्ताः = तीन से विभक्त (राम=3) → अधिमित्रगृह हेतु ×4/3; मित्रमे = मित्र की राशि में; षड्गुणाः = ×6 (षड्=6); ततः = फिर; पञ्चभक्ताः = ÷5 (पञ्च=5) → मित्र हेतु ×6/5; तथा = और; शत्रुगृहे = शत्रु की राशि में; चेद् = यदि; दलिताः = आधी की हुई (÷2); कराः = रश्मियाँ।

हिन्दी भावार्थ परम-मित्र की राशि में रश्मि को चार से गुणा कर तीन से भाग दो (×4/3); मित्र की राशि में छह से गुणा कर पाँच से भाग दो (×6/5); और शत्रु की राशि में रश्मि आधी कर दी जाती है (÷2)। ध्यान दें — गुणक गरिमा घटने के साथ घटते हैं: परम-मित्र (1.33) > मित्र (1.2) > शत्रु (0.5)।

English rendering In a great-friend's sign the rays are ×4⁄3, in a friend's sign ×6⁄5, and in an enemy's sign they are halved (÷2).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गुणक: अधिमित्र ×4/3 ≈ 1.333; मित्र ×6/5 = 1.2; शत्रु ×1/2 = 0.5। मित्र-शत्रु का निर्धारण पञ्चधा-मैत्री (नैसर्गिक + तात्कालिक) convention से होता है — अधिमित्र/मित्र/सम/शत्रु/अधिशत्रु। यह verse 4 की सीढ़ी को आगे बढ़ाता है (नीचे देखें verse 6 का पूर्ण क्रम)।

उदाहरण (worked example) आधार-रश्मि = 5। अधिमित्र-राशि में ⇒ 5 × 4/3 = 6.67; मित्र-राशि में ⇒ 5 × 6/5 = 6; शत्रु-राशि में ⇒ 5 × 1/2 = 2.5। (verse 2–3 का रवि, आधार 5, कर्क = चन्द्र की राशि = सूर्य का नैसर्गिक मित्र ⇒ 5 × 6/5 = 6 स्पष्ट-रश्मि।)

73.6
अधिशत्रुगृहे द्विघ्नाः पञ्चभक्ताः समे समाः ।
शनिशुक्रौ विना ताराग्रहा अस्ते गता यदि
adhiśatrugṛhe dvighnāḥ pañcabhaktāḥ same samāḥ |
śaniśukrau vinā tārāgrahā aste gatā yadi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधिशत्रुगृहे = परम-शत्रु की राशि में; द्विघ्नाः = ×2; पञ्चभक्ताः = ÷5 → ×2/5; समे = सम (तटस्थ) राशि में; समाः = यथावत् (×1); शनिशुक्रौ विना = शनि और शुक्र को छोड़कर; ताराग्रहाः = तारा-ग्रह (मङ्गल, बुध, गुरु); अस्ते = अस्त (सूर्य-सामीप्य से दग्ध) में; गताः यदि = यदि चले जाएँ।

हिन्दी भावार्थ परम-शत्रु की राशि में रश्मि दो से गुणा कर पाँच से भाग (×2/5) होती है, और सम (तटस्थ) राशि में यथावत् रहती है। एक विशेष अपवाद: शनि और शुक्र को छोड़कर शेष तारा-ग्रह (मङ्गल, बुध, गुरु) यदि अस्त (सूर्य से दग्ध) हों तो उनकी रश्मि लुप्त हो जाती है (आगे "विरश्मि")। शनि व शुक्र अस्त होने पर भी रश्मि बनाए रखते हैं।

English rendering In a bitter-enemy's sign the rays are ×2⁄5, in a neutral sign unchanged; and — Saturn and Venus excepted — the star-planets (Mars, Mercury, Jupiter), if they fall into combustion, become rayless.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पूर्ण गृह-संस्कार सीढ़ी (अवरोही, verse 4–6):
उच्च ×3 > मूलत्रिकोण ×2 > स्वगृह ×3/2 > अधिमित्र ×4/3 > मित्र ×6/5 > सम ×1 > शत्रु ×1/2 > अधिशत्रु ×2/5।
यह क्रम कठोरतः घटता है (3 > 2 > 1.5 > 1.333 > 1.2 > 1 > 0.5 > 0.4) — गरिमा और रश्मि-गुणक का एकदिश (monotone) सह-सम्बन्ध। अस्त-नियम: मङ्गल/बुध/गुरु दग्ध ⇒ रश्मि = 0; शनि, शुक्र अपवाद। अस्त-कक्षा (convention): मङ्गल ≈17°, बुध ≈14°, गुरु ≈11° (सूर्य से भीतर)।

उदाहरण (worked example) आधार-रश्मि = 5। अधिशत्रु-राशि में ⇒ 5 × 2/5 = 2; सम-राशि में ⇒ 5 × 1 = 5। यदि यह ग्रह गुरु हो और सूर्य से 8° भीतर (अस्त) हो ⇒ स्पष्ट-रश्मि = 0 (विरश्मि); पर वही स्थिति शुक्र/शनि की हो तो रश्मि यथावत्।

73.7
विरश्मयो भवन्त्येवं ज्ञेयाः स्पष्टकरा द्विज ।
रश्मियोगवशादेवं फलं वाच्यं विचक्षणैः
viraśmayo bhavantyevaṃ jñeyāḥ spaṣṭakarā dvija |
raśmiyogavaśādevaṃ phalaṃ vācyaṃ vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विरश्मयः = रश्मि-रहित (0 रश्मि); भवन्ति एवम् = इस प्रकार हो जाते हैं; ज्ञेयाः = जान लेने योग्य; स्पष्टकराः = स्पष्ट/संस्कारित रश्मियाँ (spaṣṭa-raśmi); द्विज = हे द्विज; रश्मि-योग-वशात् = रश्मियों के योग (कुल) के आधार पर; एवम् फलम् = इस प्रकार फल; वाच्यम् विचक्षणैः = विचक्षणों (विद्वानों) द्वारा कहा जाए।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक का वाक्य पूरा होता है — वे (अस्त तारा-ग्रह, शनि-शुक्र छोड़कर) रश्मि-रहित हो जाते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के अन्त में जो मिलता है वही "स्पष्ट-रश्मि" है, और सभी ग्रहों की स्पष्ट-रश्मियों के योग (रश्मि-योग) के आधार पर विद्वान् फल कहें।

English rendering Such (combust star-planets) become rayless; these corrected values are to be known as the true rays (spaṣṭa-raśmi), O twice-born. By the sum of the rays the wise should pronounce the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रति-ग्रह अंतिम राशि: spaṣṭa-रश्मि = [कर-max × (d ÷ 180°)] × (dignity-गुणक), फिर combustion-नियम (मंगल/बुध/गुरु अस्त → 0)। जातक-स्तर की राशि: रश्मि-योग R = Σ (सातों ग्रहों की spaṣṭa-रश्मि)। यही योग R अगली श्लोकों (8–13…) की फल-श्रेणी की एकमात्र कुंजी है। R एक अविच्छिन्न (continuous) योग है, जिसे पूर्णांक-थ्रेशोल्ड में वर्गीकृत किया जाता है।

उदाहरण (worked example) मान लो सात ग्रहों की स्पष्ट-रश्मियाँ (उपर्युक्त विधि से) क्रमशः 6, 4, 0(अस्त बुध), 3, 5, 2, 4 निकलीं। रश्मि-योग R = 6+4+0+3+5+2+4 = 24 → यह मान श्लोक-श्रेणी में (आगे 16+ श्रेणी) रखा जाएगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) R = Σ spaṣṭa-रश्मि ठीक Sarvāṣṭakavarga की Σ-संरचना जैसा है (दोसियर §1: सातों की रेखाएँ जुड़कर SAV = 337)। अनुशासन-रेखा: यहाँ अस्त→0 को exact रखो — "लगभग शून्य" या सहन-पट्टी (tolerance band) नहीं; दोसियर §5 चेताता है कि ±बैंड एक बार अष्टकवर्ग का असली −1 छिपा चुका है, इसलिए योग में हर पद exact-`==` पर तौला जाए।

73.8
एकादि पञ्चपर्यन्तं रश्मिसंख्या भवेद्यदि ।
दरिद्रा दुःखसंतप्ता अपि जाताः कुलोत्तमे
ekādi pañcaparyantaṃ raśmisaṃkhyā bhavedyadi |
daridrā duḥkhasaṃtaptā api jātāḥ kulottame

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादि = एक से आरम्भ; पञ्चपर्यन्तम् = पाँच तक; रश्मिसंख्या = रश्मि-योग की संख्या (R); भवेत् यदि = यदि हो; दरिद्राः = निर्धन; दुःखसंतप्ताः = दुःख से संतप्त; अपि = भी; जाताः = उत्पन्न; कुलोत्तमे = उत्तम कुल में।

हिन्दी भावार्थ अब फल-श्रेणी आरम्भ — यदि रश्मि-योग 1 से 5 तक हो, तो शास्त्र कहता है कि व्यक्ति निर्धन और दुःख-संतप्त होता है, भले ही उत्तम कुल में जन्मा हो। यहाँ शास्त्र जन्म-कुल से अधिक रश्मि-बल को तौलता दिखाता है — यह उसका कथन है, कोई अटल भवितव्यता नहीं।

English rendering The text states: if the ray-total is one to five, the native is poor and grief-stricken even if born in an eminent family.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रश्मि-योग R की थ्रेशोल्ड-श्रेणी, R ∈ [1,5])। एकमात्र "गणित" यहाँ पूर्व-श्लोकों का R है; यह श्लोक केवल R के प्रथम खण्ड का फल-अनुबंध है। ध्यातव्य: "कुलोत्तमे … अपि" स्पष्ट करता है कि श्रेणी-कुंजी R है, जन्म-कुल नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसियर §5 की केंद्रीय रेखा यहीं सधती है — फल-वाक्य शास्त्र का "the text states X" है, भाग्य-घोषणा नहीं; अतः "दरिद्र/दुःख-संतप्त" को भय, नियति या भविष्यवाणी की तरह नहीं, केवल शास्त्रीय कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया। गणित (R) और फल (अनुबंध) की यह पृथक्करण-रेखा पूरे प्रकरण का आधार है।

73.9
परतो दशकं यावत् निर्धना भारवासकाः ।
स्त्रीपुत्रगृहहीनाश्च जायन्ते मनुजा भुवि
parato daśakaṃ yāvat nirdhanā bhāravāsakāḥ |
strīputragṛhahīnāśca jāyante manujā bhuvi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परतः = (पाँच से) आगे; दशकं यावत् = दस पर्यन्त; निर्धनाः = धनहीन; भारवासकाः = भार/बोझ उठाने वाले (श्रम-भार वहन); स्त्रीपुत्रगृहहीनाः = स्त्री–पुत्र–गृह से रहित; जायन्ते मनुजाः भुवि = पृथ्वी पर मनुष्य जन्म लेते हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि रश्मि-संख्या पाँच से ऊपर और दस तक हो, तो मनुष्य निर्धन, भार-वहन करने वाले, तथा स्त्री–पुत्र–गृह-हीन कहे जाते हैं। यह क्रम पिछली निम्न श्रेणी (१–५) के बाद की अगली पट्टिका है। फल-कथन शास्त्रीय है; इसे नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that beyond five and up to ten rays, people are said to be without wealth, burden-bearers, and lacking wife, children, and house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन — रश्मि-सीमा। यदि R ∈ {6, 7, 8, 9, 10}, तो फल-वर्ग: निर्धन + भारवासक + स्त्री–पुत्र–गृहहीन। “परतो दशकं यावत्” = ५ के बाद से १० तक — स्पष्ट पूर्णांक-सीमा।

उदाहरण (worked example) R = 8। चूँकि 6 ≤ 8 ≤ 10, शास्त्र का कथन: निर्धन–भारवासक–स्त्रीपुत्रगृहहीन वर्ग। R = 5 पिछली पट्टिका (७३.८) में; R = 11 अगली में।

73.10
अकादशस्वल्पपुत्राः स्वल्पवित्ताश्च मानवाः ।
द्वादशस्वल्पवित्ताश्च धूर्ता मूर्खाश्च निर्बलाः
akādaśasvalpaputrāḥ svalpavittāśca mānavāḥ |
dvādaśasvalpavittāśca dhūrtā mūrkhāśca nirbalāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अकादशसु / एकादशसु = ग्यारह (रश्मियों) में — “अकादश” पाठ-भेद संभव, अर्थ-क्रम से एकादश = ११; अल्पपुत्राः = अल्प संतान; अल्पवित्ताः = अल्प धन; द्वादशसु = बारह में; धूर्ताः = धूर्त; मूर्खाः = मूर्ख; निर्बलाः = बलहीन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ग्यारह रश्मियों पर मनुष्य अल्प-पुत्र और अल्प-वित्त वाले कहे जाते हैं; बारह पर अल्प-वित्त, धूर्त, मूर्ख और निर्बल। दो क्रमिक पूर्णांकों के अलग-अलग फल-वर्ग यहाँ स्पष्ट हैं। पाठ में “अकादश” रूप है — अर्थ-संगति से एकादश (११); पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that at eleven rays people are of few children and little wealth; at twelve, of little wealth, cunning, foolish, and weak. (Reading “अकादश” as एकादश = 11; पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन — बिंदु-मान (point values)। R = 11 → अल्पपुत्र + अल्पवित्त; R = 12 → अल्पवित्त + धूर्त + मूर्ख + निर्बल। यहाँ सीमा-पट्टिका नहीं, दो अलग पूर्णांक-मैप।

उदाहरण (worked example) R = 11 → शास्त्र: अल्प-पुत्र, अल्प-वित्त। R = 12 → शास्त्र: अल्प-वित्त, धूर्त–मूर्ख–निर्बल। दोनों को ६–१० या १३ से मिलाया नहीं जाता।

73.11
चौर्यकर्मरता नित्यं चेत् त्रयोदश रश्मयः ।
चतुर्दशसु धर्मात्मा कुटुम्बानां च पोषकाः
cauryakarmaratā nityaṃ cet trayodaśa raśmayaḥ |
caturdaśasu dharmātmā kuṭumbānāṃ ca poṣakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चौर्य-कर्म-रताः = चोरी/अन्याय-कर्म में लगे; नित्यम् = सदैव; चेत् = यदि; त्रयोदश = 13; रश्मयः = रश्मि-संख्या (ग्रह-रश्मि); चतुर्दशसु = 14 रश्मियों में/से; धर्मात्मा = धर्मनिष्ठ; कुटुम्बानाम् पोषकाः = कुटुम्बों के पोषक/पालक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि रश्मियाँ तेरह हों, तो जातक नित्य चौर्य-कर्म में रत कहा जाता है। चौदह रश्मियों पर वही फल-क्रम बदलकर धर्मात्मा और कुटुम्ब-पोषक रूप में वर्णित है। यह रश्मि-संख्या के अनुसार दिया गया फल-कथन है, न कि कोई स्वतंत्र गणना-सूत्र। पाठ-भेद संभव जहाँ रश्मि-गणना का पूर्वाध्याय-नियम भिन्न संपादनों में अलग बैठे।

English rendering The text states that with thirteen rays one is described as constantly given to theft-work; with fourteen, as a righteous soul and supporter of families. These are phala mappings keyed to ray-count, not a free-standing computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रश्मि-संख्या N पर असतत फल-सीमा)। श्लोक स्वयं केवल थ्रेशहोल्ड देता है: N = 13 → चौर्य-कर्म-रत; N = 14 → धर्मात्मा + कुटुम्ब-पोषक। रश्मि N कैसे निकले—यह इस श्लोक में नहीं; पूर्वाध्याय/रश्मि-विधि पर निर्भर, और वहाँ पाठ-भेद संभव।

73.12
कुलोचितक्रियासक्तो धनविद्यासमन्वितः ।
रश्मिभिः पञ्चदशभिः सर्वविद्यागुणान्वितः
kulocitakriyāsakto dhanavidyāsamanvitaḥ |
raśmibhiḥ pañcadaśabhiḥ sarvavidyāguṇānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुलोचितक्रियासक्तः = कुल-उचित कर्म में आसक्त; धनविद्यासमन्वितः = धन और विद्या से युक्त; रश्मिभिः पञ्चदशभिः = पंद्रह रश्मियों से; सर्वविद्यागुणान्वितः = समस्त विद्या और गुणों से अन्वित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पंद्रह रश्मियों से जातक कुल-उचित क्रियाओं में लगा, धन–विद्या-समन्वित, और सर्व-विद्या–गुणों से युक्त कहा जाता है। यह १४ के धर्म-पोषण से ऊपर उठकर विद्या–गुण-संपन्नता का सोपान है। फल-कथन शास्त्रीय सीमा से बँधा है।

English rendering The text states that with fifteen rays one is devoted to duties proper to the family, endowed with wealth and learning, and possessed of all learning and virtues.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-कथन — बिंदु-मान। R = 15 → कुलोचित-क्रियासक्त + धन-विद्या-समन्वित + सर्व-विद्या-गुणान्वित। पञ्चदश = १५ (शब्द-संख्या सीधी; भूतसंख्या नहीं)।

उदाहरण (worked example) R = 15 → शास्त्र: कुल-उचित कर्म, धन–विद्या, सर्व-विद्या–गुण। R = 14 (पिछला) केवल धर्म–पोषण; R = 15 पर विद्या–गुण-परत जुड़ती है।

73.13
स्ववंशमुख्यो धनवानित्याह भगवान् विधिः ।
परतश्च कुलेशाना बहुभृत्या कुटुम्बिनः
svavaṃśamukhyo dhanavānityāha bhagavān vidhiḥ |
parataśca kuleśānā bahubhṛtyā kuṭumbinaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-वंश-मुख्यः = अपने वंश का प्रधान; धनवान् = धनसंपन्न; इति आह = ऐसा कहते हैं; भगवान् विधिः = भगवान् विधि (विधाता/ब्रह्म-वाक्य रूप में); परतः च = और उससे आगे/अधिक; कुलेशानाः = कुल के अधीश्वर; बहु-भृत्याः = बहुत से सेवकों वाले; कुटुम्बिनः = कुटुम्बी/परिवार-युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र—भगवान् विधि के मुख से—कहता है कि (रश्मि-क्रम बढ़ने पर) जातक स्ववंश का मुख्य और धनवान् कहा जाता है। परतः—अर्थात् उससे भी आगे—कुलेश, बहु-भृत्य और कुटुम्बी रूप में वर्णित है। यहाँ कोई नई अंक-संख्या नहीं दी; “परतः” पूर्व-श्लोकों (13–15 रश्मि) के बाद के क्रम-विस्तार को संकेत करता है। पाठ-भेद संभव यदि किसी पाण्डुलिपि में संख्या-पूरक पाठ जुड़े हों।

English rendering The text, citing Lord Vidhi, states that one becomes chief of one’s own line and wealthy; and further still, a lord of the clan, attended by many servants and established as a householder. No fresh numeric constant is given—only a progressive phala step beyond the preceding ray-counts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / क्रम-विस्तार (“परतः”)। इस श्लोक में कोई N-मान नहीं; केवल 15-रश्मि-फल के बाद का गुणात्मक उत्थान (वंश-मुख्य → कुलेश + बहुभृत्य + कुटुम्बी)। रश्मि-गणना का सूत्र यहाँ नहीं है।

73.14
कीर्तिमन्तो जनैः पूर्णाः सर्वे च सुखिनः क्रमात् ।
पञ्चाशज्जनपालश्चेदेकविंशतिरश्मयः
kīrtimanto janaiḥ pūrṇāḥ sarve ca sukhinaḥ kramāt |
pañcāśajjanapālaścedekaviṃśatiraśmayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कीर्तिमन्तः = यशस्वी; जनैः पूर्णाः = जन-समूह से घिरे; सुखिनः क्रमात् = क्रमशः सुखी; पञ्चाशत्-जन-पालः = पचास (50) व्यक्तियों का पालक; एकविंशति-रश्मयः = इक्कीस (21) रश्मि। "रश्मि" = ग्रह की किरण-रूप बल-इकाई, जो इसी अध्याय के 73.1–7 में गणित-विधि से निकाली जाती है।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोकों की फल-सीढ़ी को आगे बढ़ाते हुए शास्त्र कहता है — जिस जातक की कुल स्पष्ट-रश्मि इक्कीस (21) हो, वह यशस्वी, जन-समूह से घिरा, क्रमशः सुखी, और लगभग पचास जनों का पालक होता है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that a native whose planetary rays total twenty-one is renowned, thronged by people, progressively at ease, and a protector of some fifty persons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह श्लोक कोई नई गणना नहीं देता — यह 73.1–7 में गणित की गई रश्मि-राशि पर एक सीमा-मान (threshold) आरोपित करता है। word-numeral डिकोड: एकविंशति = 20 + 1 = 21 रश्मि (बैंड); पञ्चाशत् = 50 (जन-संख्या)। अनुशासन: "पचास जनों का पालक" शास्त्र का फल-दावा है — इसे "the text states" के रूप में पढ़ें, भाग्य या हमारी भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि किसी जातक के समस्त ग्रहों की स्पष्ट-रश्मि का योग = 21, तो वह ठीक इसी बैंड में आता है; 20 पर वह निचले बैंड (73.13) में और 22 पर अगले (73.15) में चला जाता है — सीमा-रेखा `==` की तरह तीक्ष्ण है, तोल-बैंड (tolerance) नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) रश्मि-सीढ़ी का ढाँचा — एक अदिश (scalar) की गणना, फिर सीमा-मानों से तुलना, फिर पद-निर्धारण — षड्बल (BPHS Ch.27) की उसी पद्धति का दर्पण है, जहाँ रूप/विरूप में जोड़ा गया कुल-बल प्रति-ग्रह सीमा से तुलित होता है। हमारे कार्य का मूल अनुशासन यही है: पहले गणित का अदिश, फिर उस पर पद, कभी उलटा नहीं।

73.15
दानशीलः कृपायुक्तो द्वाविंशतिसुरश्मिषु ।
सुखयुक् सौम्यशीलश्चेत् त्रयोविंशतिरश्मयः
dānaśīlaḥ kṛpāyukto dvāviṃśatisuraśmiṣu |
sukhayuk saumyaśīlaścet trayoviṃśatiraśmayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दानशीलः = दान-स्वभाव वाला; कृपायुक्तः = करुणा से युक्त; द्वाविंशति = २२; सुरश्मिषु = दिव्य रश्मियों में (लोक.) — कुल रश्मि-संख्या की श्रेणी; सुखयुक् = सुख से युक्त; सौम्यशीलः = मृदु/सौम्य स्वभाव वाला; चेत् = यदि; त्रयोविंशति-रश्मयः = २३ रश्मियाँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब जन्मकालिक ग्रहरश्मियों का योग बाईस (२२) सुरश्मियों में पड़ता है, तो जातक दानशील और कृपा से युक्त कहा जाता है। यदि रश्मियाँ तेईस (२३) हों, तो शास्त्र उसे सुखयुक्त और सौम्यशील बताता है। ये दोनों संख्याएँ रश्मि-फल की श्रेणी-सीमाएँ हैं — निम्नतर और उच्चतर योगों के बीच का मध्यम-स्तर का फल-कथन।

English rendering The text states that with twenty-two divine rays the native is charitable and compassionate; with twenty-three rays, happy and of gentle disposition. These are categorical thresholds on the summed graha-raśmi count.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्रेणी-सीमाएँ (रश्मि-योग R, पूर्णांक): R = २२ → दानशील + कृपायुक्त; R = २३ → सुखयुक् + सौम्यशील। R अध्याय के पूर्व-श्लोकों में प्रति-ग्रह रश्मि-निर्धारण से योगित होता है (इस श्लोक में सूत्र नहीं, केवल फल-कटौती)। पाठ में “सुरश्मि” और “रश्मि” एक ही गणितीय राशि के दो नाम हैं।

उदाहरण (worked example) मान लें अध्याय-नियमानुसार सात ग्रहों की रश्मियाँ योग करके R = २२ आता है → शास्त्र कहता है “दानशीलः कृपायुक्तः”। यदि किसी अन्य काल/कुण्डली में R = २३ → “सुखयुक् सौम्यशीलः”। (रश्मि-निर्धारण की विस्तृत सारिणी इसी अध्याय के आरम्भिक श्लोकों में; अयनांश/दृष्टि इस योग पर तभी लगती है जब पूर्व-नियम देशान्तर/भोग पर आधारित हों — यहाँ केवल योग-संख्या का फल।)

73.16
आत्रिंशत् परतः श्रीमान् सर्वसत्त्वसमन्वितः ।
राजप्रियश्च तेजस्वी जनैश्च बहुभिर्वृतः
ātriṃśat parataḥ śrīmān sarvasattvasamanvitaḥ |
rājapriyaśca tejasvī janaiśca bahubhirvṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आ-त्रिंशत् = तीस (30) तक; परतः = इससे आगे/ऊपर; श्रीमान् = ऐश्वर्यवान्; सर्व-सत्त्व-समन्वितः = सब सत्त्व/शौर्य से युक्त; राज-प्रियः = राजा का प्रिय; तेजस्वी = तेजोमय, प्रभावशाली; जनैः बहुभिः वृतः = बहुत-से लोगों से घिरा हुआ। ("आत्रिंशत् परतः" के अर्थ-सीमा में पाठ-भेद संभव — "23 से आगे 30 तक" पढ़ा गया है।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तेईस से आगे, तीस (30) रश्मियों तक, जातक ऐश्वर्यवान्, सर्व-सत्त्व-सम्पन्न, राजप्रिय, तेजस्वी और अनेक जनों से परिवृत होता है। यह पिछली श्रेणियों का उत्कर्ष है — व्यक्तिगत गुण अब राज-सान्निध्य और सामाजिक तेज में बदलने लगते हैं। स्मरण रहे, यह फल-कथन शास्त्र का है, कोई भविष्य-निश्चय नहीं।

English rendering Beyond that, up to thirty rays, one is prosperous, full of all sattva, dear to kings, lustrous, and surrounded by many people.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एक पायदान अब एकल-पूर्णांक नहीं, बल्कि एक परास (interval) है:
24 ≤ R ≤ 30 → श्रीमान् · राजप्रिय · तेजस्वी।
सीढ़ी की चौड़ाई अब बढ़ी (एकल इकाइयों से सात-इकाई परास तक) — ऊँची रश्मि-श्रेणियाँ मोटे अंतराल में समूहित होती हैं।

उदाहरण (worked example) R = 27 (24 और 30 के बीच) → यह पूरा अंतराल एक ही फल-श्रेणी "श्रीमान्/राजप्रिय" देता है; 24 हो या 30, भीतर के सभी पूर्णांक इसी पायदान पर बैठते हैं।

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73.17
अत ऊर्ध्वं तु सामन्तश्चत्वारिंशत् करावधि ।
जनानां शतमारब्य सहस्रावधिपोषकः
ata ūrdhvaṃ tu sāmantaścatvāriṃśat karāvadhi |
janānāṃ śatamārabya sahasrāvadhipoṣakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत ऊर्ध्वम् = इससे ऊपर; तु = ही/परन्तु; सामन्तः = सामन्त (क्षेत्रीय अधिपति/सामन्त-नृप); चत्वारिंशत् = ४०; कर-अवधि = करों की सीमा तक (“कर” = शक्ति/गज-माप की इकाई; अगले श्लोक में “करिन्” = हाथी स्पष्ट); जनानाम् शतम् आरभ्य = सौ जनों से आरम्भ; सहस्र-अवधि-पोषकः = सहस्र पर्यन्त का पोषक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इससे भी ऊपर की श्रेणी में जातक सामन्त कहा जाता है — चालीस (४०) कर तक। वही सामन्त-स्तर शास्त्र के अनुसार सौ से लेकर सहस्र जनों तक का पोषक होता है। यहाँ “कर” राज-शक्ति का माप है; अगले श्लोक में “करिणा” (हाथियों) से जुड़कर सैन्य/ऐश्वर्य-माप स्पष्ट होता है।

English rendering The text states that above the foregoing band the native is a sāmanta (feudatory chief), up to forty karas, and is a sustainer of people from a hundred up to a thousand. “Kara” is the power-measure named by the śāstra; the next verse ties the scale to elephants.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) श्रेणी: (पूर्व-स्तर के) ऊर्ध्व → सामन्त, कर-सीमा K ≤ ४०; पोषण-सीमा: जन-संख्या N ∈ [१००, १०००]। K यहाँ रश्मि-योग से व्युत्पन्न राज-माप है (अध्याय-परम्परा); श्लोक स्वयं K का रूपान्तरण-सूत्र नहीं देता — केवल ऊपरी सीमा और जन-पोषण की संख्या-सीमाएँ बताता है।

उदाहरण (worked example) यदि रश्मि/कर-माप K = ३८ (R उच्च श्रेणी में, पूर्व-नियम से) → शास्त्र “सामन्तः” और “शत–सहस्र पोषक” फल कहता है। K = ४१ अगले श्लोक की “अत ऊर्ध्वम्” श्रेणी की ओर बढ़ता है।

73.18
अत ऊर्ध्वन्तु भूपालः पंचाशत् करिणावधि ।
तत ऊर्ध्वकरैर्विप्र चक्रवर्ती नृपो भवेत्
ata ūrdhvantu bhūpālaḥ paṃcāśat kariṇāvadhi |
tata ūrdhvakarairvipra cakravartī nṛpo bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः ऊर्ध्वं तु = इससे ऊपर (40 के आगे); भूपालः = राजा, भू-पालक; पंचाशत् = 50; करिण-अवधि = (पचास) करों/रश्मियों की सीमा तक (करिन् ≈ कर = रश्मि; पाठ-भेद संभव); ततः ऊर्ध्व-करैः = उससे ऊपर (50 से अधिक) रश्मियों से; विप्र = हे द्विज; चक्रवर्ती नृपः भवेत् = सार्वभौम सम्राट् होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चालीस से ऊपर, पचास (50) रश्मियों तक, जातक "भूपाल" (राजा) होता है; और पचास से अधिक रश्मियाँ हों तो हे विप्र, वह "चक्रवर्ती" (सार्वभौम सम्राट्) बनता है। यह रश्मि-सीढ़ी का शिखर है — किरण-गणना जितनी ऊँची, फल-श्रेणी उतनी ही व्यापक। यह श्रेणी-कथन शास्त्र का प्रतिपादन है, कोई निश्चयात्मक भविष्यवाणी नहीं।

English rendering Above this, up to fifty rays, one is a king; and with rays beyond fifty, O twice-born, one becomes a universal emperor.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सोपान-फलन के दो अंतिम, सर्वोच्च पायदान — एक बद्ध, एक अबद्ध:
41 ≤ R ≤ 50 → भूपाल (राजा)
R > 50 → चक्रवर्ती (सार्वभौम)।
50 वह देहली-मान (threshold) है जिस पर श्रेणी "राजा" से "सम्राट्" में पलटती है; इसके ऊपर कोई ऊपरी बाँध नहीं — फलन असीम खुला है।

उदाहरण (worked example) R = 47 → "भूपाल" पायदान (41–50); किन्तु R = 51 → देहली 50 पार, श्रेणी "चक्रवर्ती"। ठीक 50 बनाम 51 का एक-इकाई अंतर राजा और सम्राट् की सीमा-रेखा है — यही देहली-मान की सूक्ष्मता है।

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73.19
एवं प्रसूतिकालोत्थनभोगकरसम्भवम् ।
कुलक्रमनुसारेण जातकस्य फलं वदेत्
evaṃ prasūtikālotthanabhogakarasambhavam |
kulakramanusāreṇa jātakasya phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; प्रसूति-काल = जन्म-समय; उत्थ = उदित/उत्पन्न; नभोग = नभश्चारी ग्रह (नभस् + ग = आकाश-गामी = ग्रह); कर-सम्भवम् = किरणों से उत्पन्न (फल); कुल-क्रम-अनुसारेण = वंश/कुल-परम्परा के अनुसार; जातकस्य फलं वदेत् = जातक का फल कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार शास्त्र कहता है कि जन्म-काल पर उदित ग्रहों की किरणों (रश्मियों) से उपजने वाला फल, जातक के कुल-क्रम (वंश-परम्परा) के अनुसार कहना चाहिए। अर्थात् केवल रश्मि-संख्या ही अंतिम नहीं — उसे जातक के कुल-सन्दर्भ में तौला जाता है। यह विधि-वाक्य है: पहले किरण-गणना, फिर सन्दर्भ-सहित फल।

English rendering Thus, according to the rays of the planets arisen at birth, and in keeping with the native's lineage, one should declare the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (फल-कथन का क्रम)। यहाँ का बीज-वाक्य यह है कि फल एक द्वि-चर फलन है: फल = f(रश्मि-संख्या R, कुल-क्रम) — पहले नाप-योग्य संख्या R, फिर उसका सन्दर्भगत निर्वचन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे सम्पादकीय अनुशासन का शास्त्रीय मूल है — पहले जन्म-काल के ग्रह-रश्मियों की गणना, फिर कुल-क्रम के अनुसार कथन। हमने भी प्रत्येक इंजन में सटीक संख्या (रश्मि/षड्बल/अष्टकवर्ग) को व्याख्या से पृथक रखा है: "संख्या पहले, कथन बाद में" — यही इस पाद का निर्देश है।

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73.20
क्षत्रियश्चक्रवर्ती वैश्यो राजा प्रजायते ।
शूद्रश्च सधनो विप्रो यज्ञकर्मक्रियारतः
kṣatriyaścakravartī vaiśyo rājā prajāyate |
śūdraśca sadhano vipro yajñakarmakriyārataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षत्रियः चक्रवर्ती = क्षत्रिय (उतनी रश्मि पर) चक्रवर्ती; वैश्यः राजा प्रजायते = वैश्य राजा होता है; शूद्रः च सधनः = शूद्र धनवान्; विप्रः यज्ञ-कर्म-क्रिया-रतः = ब्राह्मण यज्ञ-कर्म में रत। (यहाँ चारों वर्ण शास्त्र की तत्कालीन सामाजिक श्रेणियाँ हैं।)

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक के "कुल-क्रम-अनुसार" को यह श्लोक स्पष्ट करता है: शास्त्र कहता है कि समान (उच्च) रश्मि-संख्या पर क्षत्रिय चक्रवर्ती, वैश्य राजा, शूद्र धनवान्, और ब्राह्मण यज्ञ-कर्म-रत होता है। अर्थात् एक ही किरण-मान अपने सामाजिक सन्दर्भ में भिन्न रूप में फलित बताया गया है। यह ग्रन्थ की अपनी युग-सापेक्ष वर्ण-दृष्टि का कथन है — इसे हम शास्त्र के प्रतिपादन के रूप में उद्धृत करते हैं, किसी विधान या निश्चय के रूप में नहीं।

English rendering At such rays a kṣatriya becomes an emperor, a vaiśya a king, a śūdra becomes wealthy, and a brāhmaṇa devoted to sacrificial rites — the text mapping one ray-value onto its own social categories.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुल-सापेक्ष निर्वचन)। तकनीकी रूप से यह श्लोक 73.19 के "कुल-क्रम" चर का एक स्पष्ट सारणी-रूप (lookup) है: एक ही R अलग-अलग वर्ण-सन्दर्भ में अलग फल-लेबल पाता है — निवेश एक, निर्गम सन्दर्भ-निर्भर।

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73.21
उच्चाभिमुखखेटस्य कराः पुष्टफलप्रदाः ।
नीचाभिमुखखेटस्य ततो न्यूनफलप्र्दाः
uccābhimukhakheṭasya karāḥ puṣṭaphalapradāḥ |
nīcābhimukhakheṭasya tato nyūnaphalaprdāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उच्च-अभिमुख-खेटस्य = उच्च की ओर अभिमुख ग्रह का; कराः = कर/रश्मियाँ; पुष्ट-फल-प्रदाः = पुष्ट (पूर्ण) फल देने वाले; नीच-अभिमुख-खेटस्य = नीच की ओर अभिमुख ग्रह का; ततः न्यून-फल-प्रदाः = उससे न्यून फल देने वाले। (पाठ: “प्र्दाः” — प्रदाः; पाठ-भेद/मुद्रण-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो ग्रह अपने उच्च की ओर अभिमुख हो, उसकी रश्मियाँ/कर पुष्ट फल देते हैं। जो ग्रह नीच की ओर अभिमुख हो, उसकी रश्मियाँ उससे कम फल देती हैं। यह रश्मि-संख्या के बाद का गुणक-नियम है — दिशा (उच्चाभिमुख / नीचाभिमुख) से फल की पुष्टि या न्यूनता।

English rendering The text states that the rays of a planet facing toward exaltation give full results; those of a planet facing toward debilitation give lesser results than that. Direction relative to ucca/nīca modulates the phala of the same ray-count.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिशा-नियम (गुणक, शास्त्र-गुणात्मक): ग्रह g की देशान्तर-स्थिति λ_g; उच्च-राशि U_g, नीच-राशि N_g (१८०° विपरीत)। यदि g उच्च की ओर गमन/स्थिति-अर्थ में “उच्चाभिमुख” → कर-फल = पुष्ट (पूर्ण); यदि “नीचाभिमुख” → कर-फल = न्यून (पाठ “ततो न्यून” — पूर्ण से कम; संख्यात्मक गुणांक श्लोक में नहीं)। व्यावहारिक परीक्षा: नीच से उच्च की ओर चाप में होना बनाम उच्च से नीच की ओर। अयनांश: निरायन λ पर U/N राशियाँ स्थिर मानी जाती हैं (Lahiri आदि — घोषित करें); सायन λ से राशि-सीमाएँ खिसकेंगी।

उदाहरण (worked example) सूर्य का उच्च = मेष, नीच = तुला। मान लें निरायन λ_☉ = १५° वृष (उच्च-मेष के बाद, पुनः नीच-तुला की ओर बढ़ता हुआ क्रम) — परम्परा-विशेष में “नीचाभिमुख” गिना जा सकता है → शास्त्र कहता है सूर्य-कर का फल “न्यून”। यदि λ_☉ = १५° मीन (नीच-तुला से दूर, उच्च-मेष की ओर) → “उच्चाभिमुख” → पुष्ट फल। पूर्णांक रश्मि R वही रहे; फल की पुष्टि/न्यूनता दिशा से बदलती है — शास्त्र का कथन, न कि नियति-घोषणा।

73.22
सर्वेषामेव खेटानामेवं रश्मिवशाद्द्विज ।
शुभं वाऽप्यशुभं चापि फलं भवति देहिनाम्
sarveṣāmeva kheṭānāmevaṃ raśmivaśāddvija |
śubhaṃ vā'pyaśubhaṃ cāpi phalaṃ bhavati dehinām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वेषाम् एव खेटानाम् = सभी ग्रहों की; एवं रश्मि-वशात् = इस प्रकार रश्मि-बल/माप के अनुसार; द्विज = हे द्विज; शुभं वा अशुभं च अपि = शुभ अथवा अशुभ; फलं भवति देहिनाम् = प्राणियों को फल होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि हे द्विज, इसी प्रकार सभी ग्रहों की रश्मि-माप के अनुसार प्राणियों को शुभ अथवा अशुभ फल प्राप्त होता है। यह अध्याय का उपसंहार-वाक्य है — फल का मूल-चर एक ही है: गणी हुई रश्मि-संख्या। शुभ/अशुभ का द्वैत भी उसी माप का परिणाम बताया गया है, स्वतन्त्र दैव नहीं।

English rendering Thus, O twice-born, by the measure of the rays of all the planets, embodied beings meet with results auspicious or otherwise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार-कथन। तकनीकी सार यह है कि सम्पूर्ण अध्याय एक ही निवेश-चर पर टिका है — रश्मि-संख्या R — और शुभ/अशुभ उसी R का सोपान-निर्गम है।

हमारा डिकोड (Our Decode) रश्मि-फल एक सोपान-फलन है जहाँ प्रत्येक पूर्णांक-सीमा (20 बनाम 21, 50 बनाम 51) भिन्न फल देती है। यही कारण है कि हमने ओरैकल में सहिष्णुता-बैंड (±) नहीं रखा — अष्टकवर्ग में एक ± 3 बैंड ने एक वास्तविक −1 को छिपा दिया था; सीमाएँ ठीक `==` पर जाँची जाती हैं, ताकि "बीस" और "इक्कीस" कभी एक न हो जाएँ।

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73.23
रश्मिज्ञानं विना सम्यक् न फलं ज्ञातुमर्हति ।
तस्माद्रश्मीन् प्रसाध्यैव फलं वाच्यं विचक्षणैः
raśmijñānaṃ vinā samyak na phalaṃ jñātumarhati |
tasmādraśmīn prasādhyaiva phalaṃ vācyaṃ vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रश्मि-ज्ञानम् = रश्मि का ज्ञान; विना = बिना; सम्यक् = ठीक-ठीक; न … अर्हति = योग्य नहीं; फलम् ज्ञातुम् = फल जानने के; तस्मात् = इसलिए; रश्मीन् = रश्मियों को; प्रसाध्य एव = साध/गणना करके ही; फलम् वाच्यम् = फल कहना चाहिए; विचक्षणैः = विद्वानों/कुशल ज्योतिषियों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट कहता है — रश्मि-ज्ञान के बिना फल को सम्यक् रूप से जाना ही नहीं जा सकता। अतः विचक्षणों को पहले रश्मियों का प्रसाधन (गणना-निर्धारण) करना चाहिए, और तभी फल वाच्य है। यह पद विधि का अनुशासन है: गणना पहले, कथन बाद में — कल्पना या अधूरी स्थिति से फल न कहना।

English rendering Without knowledge of raśmi, one is not fit to know the result properly. Therefore the discerning should first ascertain the rays, and only then declare the phala. The text states a procedural rule: computation precedes statement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-अनुशासन (गणना → फल-कथन)। पद स्वयं रश्मि के अंकात्मक मान नहीं देता; “प्रसाध्य” शब्द गणना-पूर्वता का संकेत है। शास्त्र कहता है: रश्मि साधकर ही फल वाच्य है — यह फल-कथन को गणना से बाँधने वाला नियम है, न कि कोई नियति-घोषणा।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पद उसी अनुशासन से मेल खाता है जिसे हम गणित और व्याख्या को अलग रखते हुए अपनाते हैं — वर्ग, अष्टकवर्ग-बिन्दु, दशा-वर्ष, बल-इकाईExact computation; फल = “शास्त्र कहता है”, न कि हमारे द्वारा endorsed नियति। “रश्मीन् प्रसाध्यैव फलम् वाच्यम्” = पहले संख्या साधो, फिर कथन — यही exact-`==` oracle discipline का शास्त्रीय जुड़वाँ है: सहन-पट्टी से छिपाई नहीं, पहले गणना, फिर रिपोर्ट।

अध्यायः 74

सुदर्शनचक्रफलाध्यायः

28 श्लोक
74.1
अथोच्यते मया विप्र रहस्यं ज्ञानमुत्तमम् ।
जगतामुपकाराय यत् प्रोक्तं ब्रह्मण स्वयम्
athocyate mayā vipra rahasyaṃ jñānamuttamam |
jagatāmupakārāya yat proktaṃ brahmaṇa svayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (अध्याय-आरम्भ); उच्यते मया = मैं (पराशर) कहता हूँ; विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय); रहस्यं ज्ञानम् उत्तमम् = परम गूढ़ श्रेष्ठ ज्ञान; जगताम् उपकाराय = लोकों के कल्याण हेतु; प्रोक्तम् = कहा गया; ब्रह्मणा स्वयम् = स्वयं ब्रह्मा द्वारा (पाठ-भेद संभव — मूल में "ब्रह्मण", सम्भवतः तृतीया "ब्रह्मणा")।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं — अब मैं वह परम गुह्य और श्रेष्ठ ज्ञान कहूँगा जो लोकों के उपकार के लिए स्वयं ब्रह्मा द्वारा प्रवर्तित हुआ। यह सुदर्शन-चक्र अध्याय की मंगल-प्रतिज्ञा है, जिसमें आचार्य आगे आने वाली विधि की गरिमा और उद्गम-परम्परा घोषित करते हैं।

English rendering "Now, O Brahmin, I shall declare the supreme secret knowledge — that which was proclaimed by Brahmā himself for the benefit of all the worlds."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना / परम्परा-निर्देश। प्रतिज्ञा-वाक्य केवल विषय और स्रोत-परम्परा (ब्रह्मा → पराशर) की घोषणा करता है; तकनीकी विधि अगली ऋचाओं में खुलती है।

74.2
चक्रं सुदर्शनं नाम यद्वशात् प्रस्फुटं फलम् ।
नृणां तन्वादिभावानां ज्ञातुं शक्नोति दैववित्
cakraṃ sudarśanaṃ nāma yadvaśāt prasphuṭaṃ phalam |
nṛṇāṃ tanvādibhāvānāṃ jñātuṃ śaknoti daivavit

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चक्रं = चक्र / यंत्र-आलेख; सुदर्शनं नाम = जिसका नाम सुदर्शन है; यद्वशात् = जिसके वश/बल से; प्रस्फुटं फलम् = स्पष्ट फल; नृणां = मनुष्यों के; तन्वादि भावानां = तनु आदि भावों का; ज्ञातुं शक्नोति = जान सकता है; दैववित् = दैवज्ञ / ज्योतिषी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि “सुदर्शन” नामक चक्र ऐसा उपकरण है जिसके आधार पर फल स्पष्ट रूप से जाना जाता है। दैवज्ञ इसके द्वारा मनुष्यों के तनु (प्रथम) आदि भावों का विवेचन कर सकता है। यह चक्र भाव-फल देखने की एक विशेष रचना है, न कि कोई नया ग्रह-गणित।

English rendering The text names a chart called Sudarśana, by means of which results become clear. Through it, the knower of destiny can discern the import of the body-house and the remaining houses for human beings.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपकरण-नाम एवं फल-दृष्टि का कथन। “प्रस्फुटं फलम्” का अर्थ है त्रि-दृष्टि (लग्न–चंद्र–सूर्य) से भाव-फल का तुलनात्मक पठन; संख्यात्मक सूत्र 74.4–74.7 में आते हैं।

74.3
जन्मतो मृत्युपर्यन्तं वर्षमासदिनोद्भवम् ।
शुभं वाऽप्यशुभं सर्वं तच्छृणुष्वैकमानसः
janmato mṛtyuparyantaṃ varṣamāsadinodbhavam |
śubhaṃ vā'pyaśubhaṃ sarvaṃ tacchṛṇuṣvaikamānasaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मतः = जन्म से; मृत्युपर्यन्तं = मृत्यु पर्यंत; वर्ष-मास-दिन-उद्भवम् = वर्ष, मास, दिन से उत्पन्न; शुभं वा अपि अशुभं = शुभ अथवा अशुभ; सर्वं = सब; तत् शृणुष्व = उसे सुनो; एकमानसः = एकाग्र मन से।

हिन्दी भावार्थ आचार्य कहते हैं कि जन्म से लेकर मृत्यु तक जो कुछ भी वर्ष, मास और दिन की गति से शुभ या अशुभ रूप में उदय होता है, वह सब इस विधि से जाना जा सकता है। शिष्य को एकाग्र मन से सुनने का निर्देश है। शास्त्र यहाँ काल-विस्तार (वर्ष–मास–दिन) के पूरे जीवन-क्षेत्र का दावा करता है — यह पाठ का कथन है, नियति की घोषणा नहीं।

English rendering From birth to death, whatever arises as auspicious or inauspicious by year, month, and day — all of that, the teacher says, is to be heard with undivided attention. The verse frames the scope of the method as the whole span of life-timing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — काल-क्षेत्र का वर्णन। “वर्ष–मास–दिन” काल-विभाग की तीन इकाइयाँ हैं; सुदर्शन-पठन में भाव-अवस्था को इन तीन स्केलों पर देखा जाता है, परन्तु इस श्लोक में कोई संख्या-सूत्र नहीं दिया गया।

74.4
एककेन्द्रोद्भवं रम्यं लिखेद् वृत्तत्रयं द्विज ।
द्वादशारं च तत् कुर्याद् भवेदेवं सुदर्शनम्
ekakendrodbhavaṃ ramyaṃ likhed vṛttatrayaṃ dvija |
dvādaśāraṃ ca tat kuryād bhavedevaṃ sudarśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक-केन्द्र-उद्भवं = एक ही केंद्र से उत्पन्न; रम्यं = सुंदर / सुव्यवस्थित; लिखेत् = लिखे / खींचे; वृत्त-त्रयं = तीन वृत्त; द्विज = हे द्विज; द्वादश-अरं = बारह अर वाले; तत् कुर्यात् = उसे बनाए; भवेत् एवं सुदर्शनम् = इस प्रकार सुदर्शन होता है।

हिन्दी भावार्थ रचना की विधि यह है: एक ही केंद्र से तीन सुंदर वृत्त लिखे जाएँ। उस चक्र को द्वादश-अर — अर्थात् बारह खंडों वाला — बनाया जाए। शास्त्र कहता है कि यही “सुदर्शन” कहलाता है। तीन संकेंद्र वृत्त + बारह अर = चक्र की ज्यामितीय संरचना।

English rendering One should draw three fair circles arising from a single center, and fashion the figure with twelve spokes. Thus, the text states, the Sudarśana is formed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सुदर्शन-चक्र की ज्यामिति:
- 1 केंद्र (common origin)
- 3 संकेंद्र वृत्त (concentric circles): आंतरिक, मध्य, बाह्य
- 12 अर (spokes) → 12 समान कोण-खंड, प्रत्येक = 360° ÷ 12 = 30°
- प्रत्येक खंड एक राशि/भाव-कोष्ठ को निरूपित करता है (क्रम लग्न/चंद्र/सूर्य से — अगले श्लोक)

उदाहरण (worked example) कागज़ पर बिंदु O चुनें। O से त्रिज्या r₁, r₂, r₃ (r₁ < r₂ < r₃) के तीन वृत्त खींचें। O से 0°, 30°, 60°, …, 330° पर 12 अर्ध-व्यास खींचें — 12 कोष्ठ बनते हैं। आंतरिक वलय में लग्न-चक्र, मध्य में चंद्र-चक्र, बाह्य में सूर्य-चक्र भरा जाएगा (74.5–74.6)।

74.5
तत्राद्यवृत्ते लग्नाद्या भावा लेख्याः सखेचराः ।
तदूर्ध्ववृत्ते चन्द्राच्च भवाः खेटसमन्विताः
tatrādyavṛtte lagnādyā bhāvā lekhyāḥ sakhecarāḥ |
tadūrdhvavṛtte candrācca bhavāḥ kheṭasamanvitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = वहाँ; आद्य-वृत्ते = प्रथम (अंतः) वृत्त में; लग्नाद्याः भावाः = लग्न से आरंभ भाव; लेख्याः = लिखने योग्य; सखेचराः = ग्रहों सहित; तत्-ऊर्ध्व-वृत्ते = उसके ऊपर वाले वृत्त में; चन्द्रात् च भवाः = चंद्र से भाव; खेत-समन्विताः = ग्रहों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ सबसे भीतरी वृत्त में लग्न से आरंभ कर बारह भाव लिखे जाएँ और उनमें ग्रह भी अंकित हों। उसके ऊपरी (मध्य) वृत्त में चंद्र से गिने हुए भाव लिखे जाएँ, वे भी ग्रहों सहित। इस प्रकार एक ही बारह-खंड-ढाँचे में दो अलग-अलग “प्रारंभ-बिंदु” — लग्न और चंद्र — स्थापित होते हैं।

English rendering In the innermost circle one writes the houses counted from the lagna, together with the planets. In the circle above it, the houses counted from the Moon, likewise with the planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो समानांतर भाव-अनुक्रम (same 12 spokes, different zero-points):

1. आद्य वृत्त (inner): भाव₁ = लग्न-राशि; भावₖ = लग्न + (k−1) राशियाँ (mod 12)। प्रत्येक कोष्ठ में वे ग्रह जो उस राशि में हों।
2. ऊर्ध्व वृत्त (middle): भाव₁ = चंद्र-राशि; भावₖ = चंद्र + (k−1) (mod 12)। उन्हीं ग्रहों का राशि-स्थान, किंतु भाव-संख्या चंद्र-शून्य से।

सम्मेलन: पूर्ण-राशि भाव (whole-sign houses); राशि = 0…11। ग्रह-स्थान = floor(λ_graha / 30°) mod 12, जहाँ λ sidereal longitude (ayanāṃśa घोषित करें — उदाहरण में नीचे)।

उदाहरण (worked example) मान लें (Lahiri ayanāṃśa, whole-sign): लग्न = सिंह (4), चंद्र = वृश्चिक (7)।
- भीतरी: कोष्ठ 1 = सिंह, 2 = कन्या, …, 12 = कर्क।
- मध्य: कोष्ठ 1 = वृश्चिक, 2 = धनु, …, 12 = तुला।
यदि मंगल मेष (0) में है, तो भीतरी चक्र में वह भाव = (0 − 4) mod 12 = 8 (अष्टम), मध्य में = (0 − 7) mod 12 = 5 (पंचम)।

74.6
तदूर्ध्ववृत्ते सूर्याच्च क्रमात् भवा ग्रहान्विताः ।
एवमेकैकभावेऽत्र भवेद्भानां त्रयं त्रयम्
tadūrdhvavṛtte sūryācca kramāt bhavā grahānvitāḥ |
evamekaikabhāve'tra bhavedbhānāṃ trayaṃ trayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-ऊर्ध्व-वृत्ते = उसके ऊपर वाले वृत्त में; सूर्यात् = सूर्य से; क्रमात् भवाः = क्रम से भाव; ग्रह-अन्विताः = ग्रहों से युक्त; एवम् = इस प्रकार; एकैक-भावे = प्रत्येक एक भाव में; अत्र = यहाँ; भवेत् = होता है; भानां त्रयं त्रयम् = भानों (प्रकाश/संदर्भ-बिंदुओं) का तीन-तीन समुच्चय।

हिन्दी भावार्थ सबसे बाहरी वृत्त में सूर्य से क्रमशः बारह भाव लिखे जाएँ, ग्रहों सहित। शास्त्र कहता है कि इस प्रकार चक्र के प्रत्येक एक कोष्ठ में तीन-तीन “भान” — अर्थात् तीन संदर्भ-प्रणालियों (लग्न, चंद्र, सूर्य) से आने वाले भाव-ग्रह संयोग — एकत्र होते हैं। यही सुदर्शन की मूल संरचना है: एक स्पोक पर तीन परतें।

English rendering In the outermost circle the houses are written in order from the Sun, with the planets. Thus, the text states, in each single house-sector there arise three-and-three of the “lights” — the triple overlay of lagna-, Moon-, and Sun-counted placements.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तीसरी परत + त्रि-संयोग:

3. बाह्य वृत्त (outer): भाव₁ = सूर्य-राशि; भावₖ = सूर्य + (k−1) (mod 12)।

एक स्पोक k (k = 1…12) पर तीन राशि-सूचक:
- R_L(k) = (लग्न + k − 1) mod 12
- R_M(k) = (चंद्र + k − 1) mod 12
- R_S(k) = (सूर्य + k − 1) mod 12

“भानां त्रयं त्रयम्” = प्रत्येक कोष्ठ में (लग्न-परत, चंद्र-परत, सूर्य-परत) — तीन भाव-गणित एक साथ। फल-विचार में तीनों परतों की शुभ/अशुभ स्थिति देखी जाती है (शास्त्र का विधि-कथन; अगले अध्याय-शेष में विस्तार संभव — पाठ-भेद/क्रम भेद अन्य संस्करणों में संभव)।

उदाहरण (worked example) पूर्व उदाहरण + सूर्य = मकर (9)। स्पोक k = 1 (प्रथम कोष्ठ):
- लग्न-परत राशि = 4 (सिंह)
- चंद्र-परत राशि = 7 (वृश्चिक)
- सूर्य-परत राशि = 9 (मकर)
स्पोक k = 5: राशियाँ (4+4)=8 (धनु), (7+4)=11 (मीन), (9+4)=13→1 (वृष) — तीनों परतें एक ही “पंचम” स्पोक पर।

हमारा डिकोड (Our Decode) सुदर्शन की तीन परतें — लग्न, चंद्र, सूर्य — शुद्ध मापांक-12 अंकगणित हैं, ठीक वैसे ही जैसे षोडश-वर्ग में D-n विभाजन मॉड्यूलर नियम से चलता है। हमारा अनुशासन वही है: संरचना को `==` से पिन करें, फल को शास्त्र-कथन के रूप में रखें; सहिष्णुता-पट्टी से कोई परत न छिपाएँ।

74.7
अत्र तु प्रथमो भावो लग्नेन्दुरविभिर्युतः ।
तं प्रकल्प्य तनुं त्वग्रे ज्ञेया भावा धनादयः
atra tu prathamo bhāvo lagnenduravibhiryutaḥ |
taṃ prakalpya tanuṃ tvagre jñeyā bhāvā dhanādayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत्र तु = यहाँ तो; प्रथमः भावः = पहला भाव; लग्न-इन्दु-रविभिः युतः = लग्न, चंद्र और सूर्य से युक्त; तं प्रकल्प्य तनुं = उसे तनु (प्रथम भाव) मानकर; तु अग्रे = फिर आगे; ज्ञेयाः भावाः = जानने योग्य भाव; धन-आदयः = धन आदि।

हिन्दी भावार्थ सुदर्शन में “प्रथम भाव” वह कोष्ठ है जहाँ तीनों संदर्भ — लग्न, चंद्र और सूर्य — अपनी-अपनी गणना का आदि-बिंदु रखते हैं (तीनों परतों का भाव 1)। शास्त्र कहता है: उसी को तनु (शरीर/प्रथम) मानकर आगे धन, सहज आदि भाव क्रमशः जाने जाएँ। अर्थात् त्रि-चक्र की एकीकृत भाव-गणना उसी सुदर्शन-प्रथम से चलती है।

English rendering Here the first house is that which is joined by lagna, Moon, and Sun as their common starting sector. Taking that as the body-house (tanu), the remaining houses — wealth and so on — are to be known in order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सुदर्शन-भाव-क्रमांक:

  • सुदर्शन-भाव 1 ≡ वह स्पोक जहाँ तीनों परतों का “भाव 1” बैठता है — रचना से यह सदैव स्पोक k = 1 है (लग्न₁ ∩ चंद्र₁ ∩ सूर्य₁ एक ही अर पर खींचे जाते हैं)।
  • सुदर्शन-भाव n = स्पोक k = n, n = 1…12।
  • धन = 2, सहज = 3, …, व्यय = 12 — मानक भाव-क्रम, किंतु तीन परतों के ग्रह-योग एक साथ।

पठन-नियम (शास्त्रीय दिशा, संक्षेप): किसी सुदर्शन-भाव n का बल/शुभता तीन परतों R_L(n), R_M(n), R_S(n) में स्थित ग्रहों की संयुक्त स्थिति से आँकी जाती है। संख्यात्मक “बल-इकाई” इस श्लोक में नहीं दी; केवल भाव-कल्पना का नियम है।

उदाहरण (worked example) 74.5–74.6 के अंक: सुदर्शन-तनु (k=1) पर राशियाँ सिंह / वृश्चिक / मकर। यदि भीतरी परत में गुरु सिंह में, मध्य में शुक्र वृश्चिक में, बाह्य में शनि मकर में हों, तो शास्त्र की दृष्टि में तनु-कोष्ठ पर तीन परतों से क्रमशः गुरु–शुक्र–शनि का योग पढ़ा जाता है — तीन स्वतंत्र कुंडली-गणनाओं का एक स्पोक-संयोग। (अयनांश: Lahiri; भाव: whole-sign — जैसे घोषित।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक “एक प्रथम, फिर धन-आदि” — अनुक्रम की स्पष्ट परिभाषा है। गणना में शून्य-बिंदु (origin) एक बार पिन हो, तो शेष 11 भाव मापांक-12 से स्वतः निश्चित होते हैं। हमारा oracle-अनुशासन यही माँगता है: मूल सम्मेलन (whole-sign + घोषित ayanāṃśa) लिखो, फिर `==` से कोष्ठ-मान; फल को “शास्त्र कहता है” के दायरे में रखो, नियति के रूप में नहीं।

74.8
तत्र तत्र ग्रहस्थित्या ज्ञेयं तत्तत्फलं बुधैः ।
तनुभावे शुभः सूर्यो ज्ञेयोऽन्यत्राशुभप्रदः
tatra tatra grahasthityā jñeyaṃ tattatphalaṃ budhaiḥ |
tanubhāve śubhaḥ sūryo jñeyo'nyatrāśubhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र तत्र = प्रत्येक भाव में; ग्रह-स्थित्या = ग्रह की स्थिति से; ज्ञेयं तत्तत्-फलम् = तदनुरूप फल; बुधैः = विद्वानों द्वारा; तनु-भावे शुभः सूर्यः = तनु (प्रथम) भाव में सूर्य शुभ; ज्ञेयः अन्यत्र अशुभप्रदः = अन्य भावों में अशुभदायी माना जाए।

हिन्दी भावार्थ प्रत्येक भाव में स्थित ग्रह के अनुसार विद्वान उस-उस भाव का फल जानें। शास्त्र कहता है — सूर्य तनु-भाव में शुभ होता है, किन्तु अन्य भावों में स्थित हो तो अशुभ फल देने वाला माना जाता है। (यह ग्रह-स्थिति-आधारित फल का सामान्य नियम है, दैनिक विधान नहीं।)

English rendering "By the placement of a planet in each house the wise should know its particular result; the text states the Sun is benefic in the body-house, but held to give ill in the others."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-स्थिति-नियम)। यहाँ कोई अंक नहीं; "सूर्य तनु में शुभ, अन्यत्र अशुभ" शास्त्र का दावा है, कोई नियति नहीं — इसे "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है, भय या भविष्य-कथन के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह ठीक वह सीमा-रेखा है जिस पर हमारा पूरा अनुशासन टिका है (CLAUDE.md + oracle नियम 5): 74.4–7 का भाव-न्यास गणित है (mod-12, नियतात्मक), जबकि "सूर्य शुभ/अशुभ" व्याख्या है। हम पहले को `==` से सत्यापन-योग्य गणना मानते हैं और दूसरे को कभी भविष्य-दावे में नहीं बदलते — दोनों को एक ही वाक्य में मिलाना ही वह भूल है जिससे बचने के लिए यह पृथक्करण बना।

74.9
पापोऽपि स्वोच्चराशिस्थो न भवत्यशुभप्रदः ।
एवं शुभाऽशुभं दृष्ट्वा तत्तद्भावफलं वदेत्
pāpo'pi svoccarāśistho na bhavatyaśubhapradaḥ |
evaṃ śubhā'śubhaṃ dṛṣṭvā tattadbhāvaphalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापः अपि = पापग्रह भी; स्व-उच्च-राशि-स्थः = अपनी उच्च राशि में स्थित; न भवति अशुभप्रदः = अशुभ फल नहीं देता; एवं शुभाशुभं दृष्ट्वा = इस प्रकार शुभ-अशुभ देखकर; तत्तत्-भाव-फलं वदेत् = उस-उस भाव का फल कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पापग्रह भी यदि अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो अशुभ फल नहीं देता। इस प्रकार प्रत्येक भाव में ग्रहों का शुभ-अशुभत्व विवेकपूर्वक देखकर आचार्य उस भाव का फल कहें। यहाँ ग्रह की गरिमा (औच्च्य) फल का निर्णायक बनती है।

English rendering "Even a malefic, when placed in its own exaltation sign, does not give ill; thus, having weighed the benefic and malefic, one should declare each house's result."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (औच्च्य-अपवाद-नियम)। "स्वोच्च" एक गणनीय गरिमा-अवस्था है (प्रत्येक ग्रह की एक निश्चित उच्च-राशि व परमोच्च-अंश), पर विरूप-फल यहाँ शास्त्र का दावा है, गणना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्वोच्च" कोई अस्पष्ट संज्ञा नहीं — यह ठीक वही उच्चबल है जो षड्बल (BPHS अ.27) के स्थानबल-घटक में परिमाणित होता है (dossier §4): प्रत्येक ग्रह की उच्च-राशि व परमोच्च-अंश से कोणीय दूरी पर रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में तोला जाता है। अतः इस ऋचा का "पाप भी उच्च में शुभ" गुणात्मक नियम, हमारे इंजन में एक गणनीय बल-मान के रूप में आधारित है — फिर भी अन्तिम फल शास्त्र का कथन ही रहता है।

74.10
यो भावः स्वामिसौम्याभ्यां युक्तो दृष्टोऽयमेधते ।
पापैर्दृष्टो युतो यो वा तस्य हानिः प्रजायते
yo bhāvaḥ svāmisaumyābhyāṃ yukto dṛṣṭo'yamedhate |
pāpairdṛṣṭo yuto yo vā tasya hāniḥ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यः भावः = जो भाव; स्वामि-सौम्याभ्याम् = स्वामी और सौम्य ग्रहों से; युक्तः दृष्टः = युक्त या दृष्ट; अयम् एधते = वह वृद्धि पाता है; पापैः दृष्टः युतः = पापग्रहों से दृष्ट या युक्त; यः वा = अथवा जो (भाव); तस्य हानिः = उसकी हानि; प्रजायते = उत्पन्न होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस भाव पर उसके स्वामी और सौम्य ग्रह योग या दृष्टि करते हैं, वह भाव पुष्ट/वृद्धिशील माना जाता है। इसके विपरीत, पापग्रहों से युक्त या दृष्ट भाव की हानि कही गई है। यह भाव-बल का द्वि-पक्षीय नियम है — संरक्षण (स्वामी + सौम्य) बनाम क्षति (पाप योग/दृष्टि)।

English rendering The text states that a house joined or aspected by its lord and by benefics thrives. A house joined or aspected by malefics, by contrast, is said to suffer decline (hāni).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भाव-पुष्टि/हानि का योग-दृष्टि नियम। तकनीक (गुणात्मक स्कोरिंग): भाव B के लिए — (स्वामी ∈ B या dṛṣṭi(स्वामी→B)) ∧ (सौम्य योग/दृष्टि) ⇒ एधन; पाप योग/दृष्टि ⇒ हानि। दृष्टि-कोण परंपरा-निर्भर (पूर्ण दृष्टि 7; मंगल 4/8, गुरु 5/9, शनि 3/10 आदि) — सम्मेलन घोषित करें।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न कर्क; चतुर्थ भाव = तुला। यदि शुक्र (तुला-स्वामी) तुला में हो और गुरु दृष्टि दे, तथा वहाँ कोई पाप न हो — शास्त्र की भाषा में चतुर्थ “एधते”। यदि वही भाव मंगल-शनि से युक्त/दृष्ट हो और स्वामी दुर्बल — “हानिः प्रजायते”। (दृष्टि-सम्मेलन: पारंपरिक पूर्ण/विशेष दृष्टि; अयनांश फल-भाषा नहीं बदलता, केवल राशियाँ निर्धारित करता है।)

74.11
ज्ञेयं सग्रहभावस्य ग्रहयोगसमं फलम् ।
अग्रहस्य तु भावस्य ग्रहदृष्टिसमं फलम्
jñeyaṃ sagrahabhāvasya grahayogasamaṃ phalam |
agrahasya tu bhāvasya grahadṛṣṭisamaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स-ग्रह-भावस्य = ग्रह-युक्त भाव का; ग्रह-योग-समम् फलम् = ग्रह-योग के समान फल; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; अ-ग्रहस्य तु भावस्य = ग्रह-रहित भाव का तो; ग्रह-दृष्टि-समम् फलम् = ग्रह-दृष्टि के समान फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो स्थितियाँ अलग करता है। जिस भाव में ग्रह बैठा हो, उसका फल उस ग्रह-योग (स्थित ग्रह के स्वभाव, शक्ति, संबंध) के अनुरूप कहा गया है। जहाँ भाव रिक्त हो, वहाँ फल उन ग्रहों की दृष्टि के समकक्ष माना गया है जो उस भाव पर दृष्टि डालते हैं। योग (अधिष्ठान) और दृष्टि (बाहर से प्रभाव) — दोनों फल-मार्ग हैं, प्राथमिकता अधिष्ठित ग्रह को।

English rendering The text states that the result of an occupied house is to be taken as corresponding to the planetary combination present there. For an unoccupied house, the result is to be taken as corresponding to the planetary aspects upon it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-मार्ग-चयन नियम (occupancy-first)। तकनीक: यदि occupancy(B) ≠ ∅ ⇒ phala(B) ∼ yoga(grahas in B); यदि occupancy(B) = ∅ ⇒ phala(B) ∼ dṛṣṭi(grahas aspecting B)। यह क्रम (पहले योग, रिक्त पर दृष्टि) निर्णय-वृक्ष है, संख्या-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) सप्तम भाव रिक्त; शुक्र और गुरु दोनों सप्तम पर दृष्टि करें, कोई पाप दृष्टि न हो — फल “ग्रहदृष्टिसम” अर्थात् सौम्य-दृष्टि-प्रधान। यदि सप्तम में शनि बैठा हो — फल “ग्रहयोगसम”, शनि-योग के अनुसार; दृष्टि गौण सहायक रहती है। (दृष्टि-नियम वही घोषित सम्मेलन।)

74.12
शुभैरेव शुभं पापैर्शुभं मिश्रखेचरैः ।
शुभाधिके शुभं ज्ञेयमशुभं त्वशुभाधिके
śubhaireva śubhaṃ pāpairśubhaṃ miśrakhecaraiḥ |
śubhādhike śubhaṃ jñeyamaśubhaṃ tvaśubhādhike

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभैः एव शुभम् = शुभ ग्रहों से शुभ; पापैः अशुभम् = पापों से अशुभ (पाठ-भेद संभव — मूल "पापैर्शुभं", संभवतः "पापैरशुभम्"); मिश्र-खेचरैः = मिश्रित ग्रहों से (मिश्र फल); शुभ-अधिके शुभं ज्ञेयम् = शुभ-प्रभाव अधिक हो तो शुभ; अशुभं तु अशुभ-अधिके = अशुभ-प्रभाव अधिक हो तो अशुभ।

हिन्दी भावार्थ शुभ ग्रहों (के सम्पर्क) से शुभ, पाप ग्रहों से अशुभ, और मिश्रित ग्रहों से मिश्र फल होता है। जहाँ शुभ का आधिक्य हो वहाँ शुभ, और जहाँ अशुभ का आधिक्य हो वहाँ अशुभ फल जानना चाहिए। अर्थात् जब प्रभाव मिले-जुले हों तो आधिक्य (बहुमत) से निर्णय होता है।

English rendering "By benefics alone, good; by malefics, ill; by mixed planets, mixed. Where the benefic influence predominates, judge it good; where the malefic predominates, ill."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रभाव-आधिक्य नियम (तुलनात्मक संकेत): भाव-फल ← चिह्न( Σ शुभ-प्रभाव − Σ अशुभ-प्रभाव )। शुभाधिक (धन) → शुभ, अशुभाधिक (ऋण) → अशुभ, समता → मिश्र। यह गणनात्मक तुलना है पर कोई नियत स्थिरांक ऋचा नहीं देती — केवल आधिक्य की दिशा।

उदाहरण (worked example) किसी भाव पर 2 शुभ (चन्द्र, गुरु) एवं 1 पाप (शनि) का सम्पर्क हो → शुभ-गणना 2 > अशुभ-गणना 1 → शुभाधिक → शास्त्र-अनुसार शुभ फल। यदि 1 शुभ व 2 पाप → अशुभाधिक → अशुभ; बराबर हों → मिश्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "शुभाधिक/अशुभाधिक" बहुमत-गणना उसी वर्ग की योगात्मक तुलना है जिसे अष्टकवर्ग (BPHS अ.66) में रेखा-बिन्दुओं की तालिका-गणना करती है — जहाँ हमने सूर्य 48, चन्द्र 49, … कुल SAV = 337 को `==` से पिन किया (kaal-verification-oracle)। वहाँ का सबक यहाँ भी लागू है: आधिक्य एक गणनीय अन्तर है, और ±सहन-सीमा उस अन्तर के चिह्न को छिपा सकती है (एक बार −1 को छिपा चुकी है) — इसीलिए तुलना सटीक होनी चाहिए, अनुमानित नहीं। फल तब भी शास्त्र का कथन ही रहता है।

74.13
एवं भावेषु खेटानां योगं दृष्टिं विलोक्य च ।
तारतम्येन वाच्यानि फलानि द्विजसत्तम
evaṃ bhāveṣu kheṭānāṃ yogaṃ dṛṣṭiṃ vilokya ca |
tāratamyena vācyāni phalāni dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् भावेषु खेटानाम् = इस प्रकार भावों में ग्रहों के; योगम् दृष्टिम् विलोक्य च = योग और दृष्टि को देखकर; तारतम्येन = तरतमता/श्रेणी-क्रम (मात्रा-भेद) से; वाच्यानि फलानि = फल कहने योग्य हैं; द्विज-सत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार, हे द्विज-श्रेष्ठ, भावों में ग्रहों के योग और दृष्टि को देखकर, तरतमता (मात्रा के अनुपात) के अनुसार फल कहने चाहिए — न कि एकसमान, बल्कि प्रभाव की न्यूनाधिकता के क्रम में।

English rendering Thus, O best of the twice-born, observing the conjunctions and aspects of the planets in the houses, the results are to be told in due gradation, according to their relative strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-प्रवचन का पद्धति-सारांश; किन्तु "तारतम्य" शब्द मात्रात्मक श्रेणीकरण का बीज है। फल ∝ (योग-दृष्टि प्रभाव की सापेक्ष मात्रा); द्विआधारी शुभ/अशुभ नहीं, बल्कि क्रमिक (graded) कथन — प्रभाव-वाहकों की तुलनात्मक गणना पर आधारित।

हमारा डिकोड (Our Decode) "तारतम्येन फल" — यही मात्रा-आधारित श्रेणीकरण अष्टकवर्ग (अ.66) में पूर्ण संख्यात्मक हो जाता है: प्रत्येक भाव का बिन्दु-योग एक सटीक क्रम देता है, और त्रिकोण-शोधन (अ.67) व एकाधिपत्य-शोधन (अ.68) उस SAV = 337 को फल से पूर्व परिष्कृत करते हैं। सुदर्शन का गुणात्मक "तरतम" और अष्टकवर्ग का `==`-पिन किया मात्रात्मक अंक — एक ही अनुशासन के दो स्तर हैं: पहले गणित सिद्ध करो, फिर शास्त्र-वचन के रूप में फल कहो।

74.14
यत्र नैव ग्रहः कश्चिन्न दृष्टि कस्यचिद् भवेत् ।
तदा तद्भावजं ज्ञेयं तत्स्वामिवशतः फलम्
yatra naiva grahaḥ kaścinna dṛṣṭi kasyacid bhavet |
tadā tadbhāvajaṃ jñeyaṃ tatsvāmivaśataḥ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत्र = जहाँ; न एव ग्रहः कश्चित् = कोई भी ग्रह नहीं; न दृष्टिः कस्यचित् = न किसी की दृष्टि; भवेत् = हो; तदा = तब; तद्-भाव-जम् फलम् = उस भाव से उत्पन्न फल; तत्-स्वामि-वशतः = उसके स्वामी के वश/अधीन; ज्ञेयम् = जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अंतिम रिक्त-मामला देता है: जिस भाव में न कोई ग्रह बैठा हो और न किसी ग्रह की दृष्टि पड़े, वहाँ उस भाव का फल भाव-स्वामी के अधीन जाना जाता है। अर्थात् अधिष्ठान और दृष्टि दोनों अनुपस्थित हों तो करक-नियंत्रण स्वामी के पास चला जाता है — स्वामी की स्थिति, बल और संबंध से फल पढ़ें। यह “शून्य भाव = शून्य फल” नहीं कहता; स्वामी-मार्ग खोलता है।

English rendering The text states that where no planet occupies a house and no planet aspects it, the result arising from that house is to be known as dependent on its lord (tat-svāmi-vaśataḥ).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रिक्त-अदृष्ट भाव का फल-मार्ग (lord-default)। निर्णय-क्रम (74.11–74.14 संगत):
1. occupancy(B) ≠ ∅ → ग्रहयोगसम फल
2. occupancy = ∅ ∧ dṛṣṭi(B) ≠ ∅ → ग्रहदृष्टिसम फल
3. occupancy = ∅ ∧ dṛṣṭi = ∅ → फल(B) ∼ अवस्था/स्थिति(स्वामी_B)

उदाहरण (worked example) एकादश भाव रिक्त; कोई ग्रह उस पर दृष्टि न दे (विशेष दृष्टि-सम्मेलन के अंतर्गत)। एकादश-स्वामी = मान लें बुध, जो स्वक्षेत्र में बलवान हो — शास्त्र की भाषा में एकादश-फल “तत्स्वामिवशतः”, अर्थात् बुध-अवस्था के अनुरूप वाच्य; भाव को “निष्फल” न कहें।

74.15
शुभोऽपि शुभवर्गेषु ह्यधिकेष्वशुभप्रदः ।
पापोऽपि शुभवर्गेषु ह्यधिकेषु शुभप्रदः
śubho'pi śubhavargeṣu hyadhikeṣvaśubhapradaḥ |
pāpo'pi śubhavargeṣu hyadhikeṣu śubhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभः अपि = शुभ ग्रह भी; (अ)शुभवर्गेषु अधिकेषु = (जब उसके) अशुभ वर्ग अधिक हों — [पाठ-भेद संभव: मुद्रित पाठ "शुभवर्गेषु" द्वितीय पंक्ति से विरोधी; सुसंगत पाठ "अशुभवर्गेषु"]; अशुभप्रदः = अशुभ फल देता है; पापः अपि = पाप ग्रह भी; शुभवर्गेषु अधिकेषु = शुभ वर्ग अधिक होने पर; शुभप्रदः = शुभ फल देता है।

हिन्दी भावार्थ निर्णायक केवल ग्रह की स्वाभाविक शुभ/पाप संज्ञा नहीं, अपितु उसकी वर्ग-स्थिति की गिनती है। शुभ ग्रह भी, यदि उसके वर्गों में अशुभ-वर्ग अधिक हों, तो अशुभ फल देता है; और पाप ग्रह भी, यदि शुभ-वर्ग अधिक हों, तो शुभ फल देता है। (मुद्रित प्रथम पंक्ति का "शुभवर्गेषु" द्वितीय से विरोधाभासी है—पाठ-भेद संभव।)

English rendering Even a benefic, when the majority of its vargas are inauspicious, yields inauspicious results; and even a malefic, when the majority of its vargas are auspicious, yields auspicious results. (The printed first line reads "śubha-vargeṣu," contradicting line 2 — a variant reading is likely.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्ग-गणना (varga-tally). ग्रह के षड्वर्ग/वर्गों में प्रतिष्ठित (मित्र/स्व/उच्च) बनाम अप्रतिष्ठित (शत्रु/नीच) स्थानों की गिनती की जाती है; बहुमत (अधिक) निर्णय करता है। सूत्र-रूप: यदि #{शुभ वर्ग} > #{अशुभ वर्ग} → शुभ, अन्यथा अशुभ। बराबरी की स्थिति अगले श्लोक के प्रतिष्ठा-मानदण्ड से सुलझती है।

उदाहरण (worked example) एक पाप ग्रह शनि के षड्वर्ग (D1, D2, D3, D9, D12, D30) में यदि 4 वर्ग मित्र/स्व/उच्च राशि में और 2 वर्ग शत्रु/नीच में पड़ें → शुभ-वर्ग 4 > अशुभ-वर्ग 2 → श्लोकानुसार शनि यहाँ शुभप्रद।

हमारा डिकोड (Our Decode) षड्वर्ग वस्तुतः षोडश-वर्ग (D1…D60) के छह हैं — D1, D2, D3, D9, D12, D30 (दॉसियर §2) — और प्रत्येक ग्रह-देशान्तर पर शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित से नियत होता है। इसलिए "अधिक" की गिनती एक गणनीय, यथार्थ संख्या है; हम इस वर्ग-प्रतिष्ठा को गणना के रूप में रखते हैं और उससे निकला फल शास्त्र के ही कथन के रूप में — गणित और व्याख्या की पृथक्ता (§5)।

74.16
स्वभोच्चस्य शुभस्यात्र वर्गा ज्ञेयाः शुभवाहाः ।
शत्रोः क्रूरस्य नीचस्य षड्वर्गा अशुभप्रदाः
svabhoccasya śubhasyātra vargā jñeyāḥ śubhavāhāḥ |
śatroḥ krūrasya nīcasya ṣaḍvargā aśubhapradāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-भ = स्वक्षेत्र (अपनी राशि); उच्चस्य = उच्चस्थ; शुभस्य = शुभ ग्रह के; वर्गाः = (षड्)वर्ग; शुभ-वाहाः = शुभ-वाहक; शत्रोः = शत्रुक्षेत्रस्थ; क्रूरस्य = पाप/क्रूर ग्रह; नीचस्य = नीचस्थ; षड्-वर्गाः = छह वर्ग; अशुभ-प्रदाः = अशुभफलदायी।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के "वर्ग" शब्द को यहाँ खोला गया है। जो ग्रह स्वक्षेत्री, उच्च व स्वभावतः शुभ है, उसके वर्ग शुभ-वाहक होते हैं; और जो शत्रुक्षेत्री, क्रूर व नीच है, उसके छहों वर्ग अशुभ-प्रद। अर्थात् वर्ग-बल की दिशा ग्रह की गरिमा (स्व/उच्च) या दुर्दशा (शत्रु/नीच) से तय होती है।

English rendering The vargas of a benefic that is in its own sign and exalted carry auspiciousness; the six vargas of a planet that is in an enemy's sign, cruel, and debilitated bring inauspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) षड्वर्ग = छह वर्ग-चार्टों का समुच्चय, प्रत्येक 30° राशि का समान-चाप विभाजन:
D1 क्षेत्र = 30° ; D2 होरा = 15° ; D3 द्रेष्काण = 10° ; D9 नवांश = 3°20′ ; D12 द्वादशांश = 2°30′ ; D30 त्रिंशांश = 1° (असम-चाप)।
शुभ-वाह-शर्त: ग्रह इन वर्गों में स्व/उच्च राशि पाए (उच्चतर वर्ग-बल-श्रेणी); अशुभ-शर्त: शत्रु/नीच। पाठ-भेद संभव: "स्वभोच्चस्य" = स्व-भ-उच्चस्य (स्वक्षेत्र + उच्च); प्रथम पाद की मात्रा-व्यवस्था शिथिल है।

उदाहरण (worked example) ग्रह 8°00′ मेष पर (समान-चाप D9 नियम)। नवांश-चाप = 30°/9 = 3°20′; 8°00′ ÷ 3°20′ = तृतीय नवांश (6°40′–10°00′) → चर-राशि मेष से गिनने पर मिथुन। इसी भाँति छहों वर्गों की राशि निकाल, स्व/उच्च की गणना ≥ शत्रु/नीच की गणना हो तो "शुभ-वाह"।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक-कथित षड्वर्ग (D1, D2, D3, D9, D12, D30) हमारे षोडश-वर्ग समुच्चय (dossier §2) का उपसमुच्चय है — तीनों में सम्मिलित, प्रत्येक 30° का शुद्ध मॉड्युलर विभाजन (देशान्तर पर पूर्ण-नियत)। यही निर्धारकता उस "स्व/उच्च बनाम शत्रु/नीच" वर्गीकरण को यंत्र-पुनरुत्पाद्य बनाती है, जिस पर यह श्लोक फल टिकाता है।

74.17
एवं सर्वेषु खेटेषु भवेष्वपि द्विजोत्तम ।
शुभाशुभत्वं सञ्चिन्य्त ततस्तत्फलमादिशेत्
evaṃ sarveṣu kheṭeṣu bhaveṣvapi dvijottama |
śubhāśubhatvaṃ sañcinyta tatastatphalamādiśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; सर्वेषु खेटेषु = समस्त ग्रहों में; भवेषु अपि = और भावों में भी; द्विजोत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ; शुभाशुभत्वं सञ्चिन्त्य = शुभ-अशुभता का भली-भाँति विचार करके; ततः तत्फलम् आदिशेत् = तत्पश्चात् वह फल कहना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज-श्रेष्ठ, इसी प्रकार समस्त ग्रहों और समस्त भावों की शुभता-अशुभता का भली-भाँति विचार करके, तत्पश्चात् उस-उस भाव का फल कहना चाहिए। यह पूर्वोक्त वर्ग-निर्णय-विधि का उपसंहार-वाक्य है।

English rendering Thus, O best of the twice-born, having weighed the auspiciousness and inauspiciousness of every planet and every house, one should then declare the corresponding result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-उपसंहार (method summation)। यह पूरी प्रक्रिया को क्रमबद्ध करता है: सातों ग्रह और बारहों भाव में से प्रत्येक की शुभ/अशुभ अवस्था पहले नियम से नियत करो, फल तत्पश्चात् (ततः) ही कहो — गणना कड़ाई से व्याख्या के पूर्व।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पहले प्रत्येक ग्रह-भाव की शुभ/अशुभ अवस्था नियम से हल करो, फिर बोलो" — यह ठीक दॉसियर की मूल अनुशासन-रेखा है (§5): वर्ग-गिनती, बल आदि गणित पहले और पृथक् गणे जाएँ; फल केवल उसके बाद, शास्त्र के दावे के रूप में। श्लोक स्वयं इस क्रम—गणना → कथन—को शास्त्र-वाणी में तय करता है।

74.18
यदा सुदर्शनादेव फलं सिद्ध्यति देहनाम् ।
तदा किं मुनिभिः सर्वैर्लग्नादेव फलं स्मृतम्
yadā sudarśanādeva phalaṃ siddhyati dehanām |
tadā kiṃ munibhiḥ sarvairlagnādeva phalaṃ smṛtam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यदा = जब; सुदर्शनात् एव = केवल सुदर्शन-चक्र से ही; फलं सिद्ध्यति = फल सिद्ध हो जाता है; देहनाम् = देहधारियों/मनुष्यों का [पाठ-भेद संभव: "देहिनाम्"]; तदा किम् = तो फिर क्यों; मुनिभिः सर्वैः = समस्त मुनियों द्वारा; लग्नात् एव फलं स्मृतम् = केवल लग्न से फल-कथन स्मरण किया गया।

हिन्दी भावार्थ यहाँ शिष्य/प्रश्नकर्ता का संशय उठता है: जब मनुष्यों का सम्पूर्ण फल केवल सुदर्शन-चक्र से ही सिद्ध हो जाता है, तो फिर समस्त मुनियों ने केवल लग्न से फल-कथन क्यों स्मरण किया (परम्परा में क्यों रखा)? यह एक विचार-प्रश्न है, जिसका समाधान आगे के श्लोकों में है।

English rendering When the entire result for human beings is established from the Sudarśana-cakra alone, then why did all the sages hand down the reckoning of results from the Lagna alone?

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संशय-प्रश्न (संवाद)। शास्त्र स्वयं अपनी दो पद्धतियों — त्रि-चक्र सुदर्शन बनाम एकल-लग्न — के बीच का प्रश्न उठाकर अगले श्लोकों में उनकी सीमा-रेखा खींचता है; पाठक की जिज्ञासा को शास्त्र की ही आवाज़ में रख देता है।

74.19
इति म संशयो जातस्तं छेत्तुमर्हति ।
पृथग्भगौ यदाऽर्केन्दू लग्नादन्यत्र संस्थितौ
iti ma saṃśayo jātastaṃ chettumarhati |
pṛthagbhagau yadā'rkendū lagnādanyatra saṃsthitau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; मे संशयः जातः = मुझे संशय उत्पन्न हुआ; तम् छेत्तुम् अर्हति = उसे (आप) काटने योग्य हैं; पृथक्-भगौ = भिन्न-भिन्न राशियों में (स्थित); यदा अर्क-इन्दू = जब सूर्य और चन्द्र; लग्नात् अन्यत्र संस्थितौ = लग्न से अन्यत्र (पृथक्) स्थित हों। ("इति म" — पाठ-भेद संभव: "इति मे"; पाद न्यून प्रतीत।)

हिन्दी भावार्थ शिष्य कहता है — "यह संशय मुझे हुआ है, कृपया इसका निवारण कीजिए।" फिर समाधान का प्रथम चरण: जब सूर्य और चन्द्र दोनों भिन्न-भिन्न राशियों में हों और लग्न से भी अलग हों — यह वह स्थिति है जहाँ तीनों केन्द्र पृथक् हैं।

English rendering "Such a doubt has arisen in me; you ought to resolve it." (The resolution begins:) when the Sun and Moon stand in separate signs, situated apart from the Lagna...

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद + शर्त-स्थापन (श्लोक 20 में पूर्ण होती)। तकनीकी शर्त: राशि(लग्न) ≠ राशि(सूर्य) ≠ राशि(चन्द्र), अर्थात् तीन केन्द्रों की भिन्न राशियाँ। यही "पृथक्" स्थिति सुदर्शन के तीनों वृत्तों को स्वतन्त्र सूचना देती है।

74.20
तदा सुदर्शनाच्चक्रात् फलं वाच्यं विचक्षणैः ।
एकभे द्वौ त्रयो वा चेत् तदा लग्नात् फलं वदेत्
tadā sudarśanāccakrāt phalaṃ vācyaṃ vicakṣaṇaiḥ |
ekabhe dvau trayo vā cet tadā lagnāt phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदा = तब; सुदर्शनात् चक्रात् = सुदर्शन-चक्र से; फलं वाच्यम् = फल कहना चाहिए; विचक्षणैः = विद्वानों द्वारा; एकभे = एक ही राशि में; द्वौ त्रयः वा चेत् = यदि दो अथवा तीनों (लग्न-सूर्य-चन्द्र) हों; तदा लग्नात् फलं वदेत् = तब केवल लग्न से फल कहे।

हिन्दी भावार्थ तब (जब तीनों — लग्न, सूर्य, चन्द्र — भिन्न राशियों में हों) विद्वानों को सुदर्शन-चक्र से फल कहना चाहिए। किन्तु यदि इनमें से दो या तीनों एक ही राशि में आ जाएँ, तब केवल लग्न से ही फल कहना चाहिए। यही श्लोक 18 के संशय का समाधान है — दोनों पद्धतियों की स्पष्ट सीमा-रेखा।

English rendering Then the wise should pronounce the result from the Sudarśana-cakra; but if two or three of them fall in one sign, the result is to be declared from the Lagna alone.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) निर्णय-नियम (method-selection rule)। R(L), R(☉), R(☾) को क्रमशः लग्न, सूर्य, चन्द्र की राशि-संख्याएँ (1–12) मानें। यदि R(L), R(☉), R(☾) परस्पर भिन्न → त्रि-चक्र सुदर्शन; यदि कोई दो समान (भिन्न राशियों की संख्या ≤ 2) → केवल लग्न। यह तीन मॉड्युलर सूचकांकों की तुलना मात्र है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष(1), सूर्य = सिंह(5), चन्द्र = धनु(9) → तीनों भिन्न → सुदर्शन-चक्र से फल। इसके विपरीत लग्न = मेष(1), सूर्य = मेष(1), चन्द्र = तुला(7) → दो एक राशि में → केवल लग्न से फल।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह एक घोषित सम्मेलन-स्विच है — शास्त्र स्वयं ठीक-ठीक बताता है कि किस पद्धति को कब लागू करना है, अस्पष्टता नहीं छोड़ता। यह दॉसियर के उस अनुशासन से मेल खाता है कि जब परिणाम सम्मेलन पर निर्भर हो तब लागू सम्मेलन घोषित किया जाए (§5): शाखा-शर्त R(L)=R(☉)=… एक यथार्थ, गणनीय प्रेडिकेट है, अनुमान नहीं।

74.21
अथ विप्र प्रवक्ष्येऽहं प्रतिवर्षादिजं फलम् ।
अस्मात् सुदर्शनादेव दशान्तरदशावशात्
atha vipra pravakṣye'haṃ prativarṣādijaṃ phalam |
asmāt sudarśanādeva daśāntaradaśāvaśāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; विप्र = हे ब्राह्मण; प्रवक्ष्ये अहम् = मैं कहूँगा; प्रतिवर्ष-आदि-जं फलम् = प्रतिवर्ष आदि से उत्पन्न फल; अस्मात् सुदर्शनात् एव = इसी सुदर्शन से; दशा-अन्तरदशा-वशात् = दशा और अंतरदशा के अधीन।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य वार्षिक आदि फलों का उपदेश आरंभ करते हैं। स्रोत फिर सुदर्शन ही है, और समय-विभाजन दशा तथा अंतरदशा के वश से बाँधा गया है। अर्थात् चक्र से “क्या” और दशा-क्रम से “कब” — दोनों जुड़े हुए हैं।

English rendering Now, O Brāhmaṇa, I shall declare the results arising year by year and so on — from this very Sudarśana, according to the daśā and the antardaśā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-बंधन: फल-कथन = f(सुदर्शन-संकेत, दशा-स्तर)।
विंशोत्तरी (BPHS अध्याय 46–47, जहाँ लागू): महादशा-वर्ष Σ = 120
(केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)।
अंतरदशा-वर्ष = (महादशा-वर्ष × अंतर-ग्रह-वर्ष) / 120।
प्रतिवर्ष फल = सुदर्शन-चक्र के शुभाशुभ संकेत को चालू महादशा/अंतरदशा की कालावधि पर आरोपित करना — अनुपात-अंकगणित + चक्र-स्थिति। “फल” शास्त्र का निर्देश-स्तर है।

उदाहरण (worked example) विंशोत्तरी में गुरु महादशा (16 वर्ष), शुक्र अंतर:
अंतर-वर्ष = (16 × 20) / 120 = 320/120 = 2 + 2/3 वर्ष ≈ 2 वर्ष 8 मास।
उसी अंतर-काल में सुदर्शन से निर्दिष्ट भाव/राशि-संकेत पढ़कर वार्षिक/उप-कालिक फल कहा जाता है (चंद्र-नक्षत्र-शेष से महादशा-आरंभ; अयनांश/नक्षत्र-सीमा घोषित करें)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विंशोत्तरी इंजन 120-वर्ष चक्र और अंतरदशा-अनुपात (महा × अंतर)/120 को शुद्ध भिन्न-अंकगणित से चलाता है। यह श्लोक उसी काल-रेखा को सुदर्शन-फल से जोड़ता है: चक्र से स्थान-संकेत, दशा से समय-खिड़की — दोनों गणनात्मक परतें, फल-वाक्य अलग रिपोर्ट।

74.22
तन्वाद्यैर्वर्षमास्सार्धद्विकधस्रान् प्रवर्तयेत् ।
भवेशादिद्वादशानां दशा वर्षेषु कल्पयेत्
tanvādyairvarṣamāssārdhadvikadhasrān pravartayet |
bhaveśādidvādaśānāṃ daśā varṣeṣu kalpayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तन्वाद्यैः = तनु (लग्न/प्रथम भाव) से आरम्भ कर (त्रि-लग्न क्रम); वर्ष = वर्ष-दशा इकाई; मास = मास-दशा इकाई; सार्धद्विक = 2½ (स + अर्ध + द्वि); धस्रान् = दिनादि-खण्ड (पाठ-भेद संभव — कहीं “दिनान्”/समानार्थ इकाई); प्रवर्तयेत् = प्रवृत्त करे; भवेशादि-द्वादशानाम् = भावेशादि बारह भावों की; दशा = काल-खण्ड; वर्षेषु कल्पयेत् = वर्षों में कल्पना/व्यवस्था करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि तनु (लग्न) आदि से आरम्भ करके वर्ष, मास तथा सार्ध-द्विक (2½) की दैनिक/दिनांश-इकाई चलाए। बारह भावों—भावेश-क्रम सहित—की दशा को वर्षों में कल्पित करे। यह सुदर्शन-चक्र की काल-रेखा का आरम्भ-सूत्र है: एक ही चक्र को तीन काल-स्तरीय इकाइयों में बाँधकर भावानुसार फल देखा जाता है।

English rendering From the body-house (lagna) and the rest, one should set in motion the periods counted in years, months, and the 2½-unit day-segments. The daśās of the twelve (houses, beginning from the bhāva-order / house-lord sequence) are to be arranged in years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सुदर्शन काल-स्तरीकरण (१२-भाव चक्र):
- वर्ष-दशा: प्रत्येक भाव = १ वर्ष → पूर्ण आवृत्ति = १२ वर्ष।
- मास-दशा: प्रत्येक भाव = १ मास → आवृत्ति = १२ मास।
- सार्धद्विक-दशा: प्रत्येक भाव = 2½ दिन → १२ × 2½ = ३० दिन (मास-तुल्य चक्र)।
तनु-आदि प्रवर्तन: गणना का शून्य-बिन्दु लग्न (तथा चक्र-विधि में चन्द्र/सूर्य भी) के भाव-क्रम से; आयु/प्रश्न-काल से व्यतीत राशि ÷ इकाई → वर्तमान भाव-दशा सूचकांक (१…१२, मोडुलो १२)।

उदाहरण (worked example) जन्म/प्रश्न लग्न = मेष; आयु = २५ वर्ष ४ मास ७ दिन (केवल सुदर्शन-वर्ष/मास/दिन-इकाई; अयनांश दशा-लंबाई नहीं बदलता)।
- वर्ष-दशा: २५ mod १२ = १ → शेष १ पूर्ण वर्ष-चक्र + १ वर्ष → वर्तमान = २रा भाव-वर्ष (वृष-क्षेत्र यदि लग्न-मेष से)।
- मास-दशा (वर्ष के अन्दर): ४था मास → ४था भाव-मास।
- 2½-दिन दशा: ७ ÷ २.५ = २ पूर्ण खण्ड + शेष २ दिन → ३रा 2½-दिन खण्ड चालू (भाव-सूचकांक ३)।
(भाव-फल का निर्णय अगले श्लोकों + अष्टकवर्ग-संयोग से; यहाँ केवल काल-निर्देश।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सुदर्शन को शुद्ध अनुपात-अंकगणित (१२-चक्र × वर्ष/मास/2½-दिन) घोषित करता है—जैसे विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र नक्षत्र-अंश पर, वैसे ही यहाँ भाव-अंश पर। हमारी पद्धति में काल-इकाई और फल-कथन अलग रखे जाते हैं: पहले exact इकाई, फिर “शास्त्र कहता है” वाला फल।

74.23
तदाद्यन्तर्दशास्तद्वन्मासादौ तद्बलैः फलम् ।
तं तं भावं प्रकल्प्याङ्कं तत्तत्तन्वादिजं द्विज
tadādyantardaśāstadvanmāsādau tadbalaiḥ phalam |
taṃ taṃ bhāvaṃ prakalpyāṅkaṃ tattattanvādijaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदादि = उन (वर्षादि) दशाओं से; अन्तर्दशाः = उप-कालखण्ड; तद्वत् = उसी प्रकार; मासादौ = मास आदि में; तद्बलैः = उनके बल से; फलम् = फल; तं तं भावम् = उस-उस भाव को; प्रकल्प्य = कल्पित/नियत करके; अङ्कम् = अंक (दशा-स्थान/बल-बिन्दु); तत्तत्-तन्वादिजम् = तनु आदि से उत्पन्न उस-उस (चक्र) का; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! शास्त्र कहता है कि मुख्य दशाओं के अनुरूप अन्तर्दशाएँ भी मास आदि में उसी रीति से चलें; फल उन दशा-स्वामियों/भावों के बल से देखें। तनु आदि से उत्पन्न अंक को भाव-भाव पर रखकर प्रकल्पित करें—अर्थात् प्रत्येक भाव का काल-स्थान और बल-सूचक स्पष्ट हो, तब फल बोला जाए।

English rendering Likewise the sub-periods (antardaśā) of those (major) periods are to be set in months and the rest; the result is judged by their strengths. O twice-born, having assigned each house its number arising from the body-house and the other origins, arrange the reckoning accordingly.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्तर-संरचना (अनुपात, विंशोत्तरी-जैसी नहीं—सुदर्शन-आवृत्ति):
- महा/वर्ष-दशा: १ भाव = १ वर्ष।
- अन्तर् (मास-स्तर): वर्ष-दशा के १२ भाग → प्रत्येक अन्तर् ≈ १ मास = वर्ष/१२।
- उससे सूक्ष्म: 2½-दिन खण्ड = मास/१२।
बल-फल नियम (श्लोक का निर्देश): फल ∝ तद्बल (भाव/ग्रह बल)—गुणात्मक निर्देश; संख्यात्मक षड्बल-सूत्र यहाँ नहीं दिया। “अङ्क” = भाव-क्रम सूचकांक + (जहाँ प्रयुक्त) बल/बिन्दु-योग का स्थान।

उदाहरण (worked example) वर्ष-दशा = ५वाँ भाव (१ वर्ष)। अन्तर्दशा-क्रम तनु-क्रम से १→१२:
- ०–१ मास: भाव १ अन्तर्; १–२ मास: भाव २; … वर्तमान ४ मास १० दिन → अन्तर् = ५वाँ भाव-मास।
- उस मास के अन्दर 2½-दिन: १० ÷ २.५ = ४ → ४था 2½-दिन खण्ड।
फल-विचार: उस भाव-अङ्क + तद्बल (बाद में अष्टवर्ग/सुदर्शन-दृष्टि से) — केवल काल-निर्देश यहाँ।

74.24
तत् तल्लग्नात् केन्द्रकोणाष्टमे सौम्याः शुभप्रदाः ।
यत्र भावे सैंहिकेयो भवेत् तद्भावहानिकृत्
tat tallagnāt kendrakoṇāṣṭame saumyāḥ śubhapradāḥ |
yatra bhāve saiṃhikeyo bhavet tadbhāvahānikṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत्-लग्नात् = उस-उस (चालू) भाव को लग्न मानकर; केन्द्र-कोण-अष्टमे = केन्द्र (1,4,7,10), कोण (5,9) व अष्टम (8) में; सौम्याः = शुभ ग्रह; शुभ-प्रदाः = शुभफलदायी; यत्र भावे = जिस भाव में; सैंहिकेयः = सिंहिका-पुत्र राहु; भवेत् = हो; तत्-भाव-हानि-कृत् = उस भाव की हानि करने वाला।

हिन्दी भावार्थ चालू भाव को ही लग्न मानकर देखो — उससे केन्द्र, त्रिकोण (कोण) और अष्टम में स्थित शुभ ग्रह शुभ फल देते हैं। किन्तु जिस भाव में राहु (सैंहिकेय) बैठा हो, वह उस भाव की हानि करता है। यह सुदर्शन-दशा के भीतर भावशः बल-आकलन की कुंजी है।

English rendering Reckoning each house as the ascendant, benefics in its kendras, trikoṇas, and eighth give auspicious results; but in whichever house Saiṃhikeya (Rāhu) stands, he becomes the destroyer of that house's good.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-आधारित फल-नियम (गणनात्मक शाखा)। चालू भाव = "भ्रमण-लग्न"; उससे —
• केन्द्र = {1, 4, 7, 10}; कोण = {5, 9}; तथा {8}। इन स्थानों में सौम्य → शुभ-प्रद।
• राहु (सैंहिकेय) जिस भाव में → तद्-भाव-हानि (ऋण-चिह्न उस भाव पर)।
यह चल-लग्न-सापेक्ष स्थान-मापन है (भाव-संख्या mod 12)।

उदाहरण (worked example) माना भ्रमण-लग्न = तृतीय भाव। उससे केन्द्र = भाव 3,6,9,12; कोण = भाव 7,11; अष्टम = भाव 10। इन स्थानों के शुभ ग्रह शुभ-प्रद। यदि राहु मूल-कुण्डली के सप्तम में हो, तो सप्तम-भाव के आकलन में हानि जोड़ी जाए।

74.25
पापा वा यत्र बहवस्तत्तद्भावविनाशनम् ।
विरिष्फारिशुभैः पापैस्त्रिषडायस्थितैः शुभम्
pāpā vā yatra bahavastattadbhāvavināśanam |
viriṣphāriśubhaiḥ pāpaistriṣaḍāyasthitaiḥ śubham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापाः वा यत्र बहवः = अथवा जहाँ बहुत-से पाप ग्रह; तत्-तत्-भाव-विनाशनम् = उस-उस भाव का विनाश; त्रि-षड्-आय-स्थितैः पापैः = तीसरे, छठे व ग्यारहवें (आय) में स्थित पाप ग्रहों से; शुभम् = शुभ; ("विरिष्फारिशुभैः" — रिष्फ = 12वाँ, अरि = 6ठा, शुभ = शुभ ग्रह; समास भ्रष्ट, पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ जिस भाव में अनेक पाप ग्रह एकत्र हों, वह भाव नष्ट होता है। किन्तु वही पाप ग्रह यदि तीसरे, छठे और ग्यारहवें (त्रि-षड्-आय, उपचय-स्थान) में हों तो शुभ फल देते हैं। ग्रह की शुभता उसकी नैसर्गिकता जितनी उसके स्थान पर निर्भर है — उपचय में पाप भी सहायक बन जाता है।

English rendering Where many malefics gather, that house is ruined; but malefics posited in the 3rd, 6th, and 11th (the upacaya houses) yield auspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) स्थान-गणना नियम। भाव-संकेतों का अंक-विश्वस्त विकोडन: त्रि = 3, षष् = 6, आय = 11 (उपचय-त्रिक); अरि = 6, रिष्फ = 12 (दुःस्थान-संकेत)।
• यदि गणना(पाप ग्रह किसी भाव में) ≫ 1 (बहवः) ⟹ तद्-भाव-विनाश।
• पाप ∈ {3, 6, 11} ⟹ शुभम् (उपचय-प्रभाव, चिह्न-प्रत्यावर्तन)।

पाठ-भेद संभव: "विरिष्फारिशुभैः" पद भ्रष्ट है; स्पष्ट व सुनिश्चित अंश "पापैः त्रिषडायस्थितैः शुभम्" है।

उदाहरण (worked example) चालू भाव-आकलन में यदि शनि व मंगल दोनों एक ही भाव में → उस भाव में विनाश-भार। वही शनि यदि आय (11वें) में अकेला → उपचय-नियम से शुभ जोड़ा जाए।

74.26
एवं प्रत्यब्दमासादौ भावानां फलचिन्तनम् ।
द्वादशानां दशाऽवृत्त्या दशाश्चायुषि चिन्तयेत्
evaṃ pratyabdamāsādau bhāvānāṃ phalacintanam |
dvādaśānāṃ daśā'vṛttyā daśāścāyuṣi cintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; प्रत्यब्द = प्रत्येक वर्ष; मासादौ = मास आदि में; भावानाम् = भावों का; फल-चिन्तनम् = फल-विचार; द्वादशानाम् = बारह (भावों) की; दशा-आवृत्त्या = दशा की आवृत्ति/चक्र से; दशाः = दशाएँ; आयुषि = आयु में; चिन्तयेत् = विचारे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इसी विधि से प्रत्येक वर्ष, मास आदि में भावों का फल सोचना चाहिए। बारह भावों की दशा बार-बार घूमती हुई—आवृत्ति से—आयु भर चिन्तनीय है। अर्थात् सुदर्शन-दशा जीवन-पर्यन्त १२-चक्र में लूप करती रहती है; फल समय-समय पर उसी चक्र के वर्तमान भाव से जोड़ा जाता है।

English rendering Thus, in every year, month, and the rest, the results of the houses are to be considered. By the recurring cycle of the twelve daśās, the periods throughout the lifespan are to be examined.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आवृत्ति-सूत्र (आयु पर १२-चक्र):
- वर्ष-सूचकांक k_y = (⌊आयु_वर्ष⌋ mod १२) + १ → भाव k_y (तनु-क्रम से; १ = तनु)।
- मास-सूचकांक k_m = (मास_अंक mod १२); 2½-दिन k_d = (⌊दिन/२.५⌋ mod १२)।
पूर्ण आयु-चिन्तन: दशाएँ “एक बार” नहीं—N = आयु/१२ पूर्ण आवृत्तियाँ + शेष; प्रत्येक आवृत्ति में १२ भाव क्रमशः।

उदाहरण (worked example) आयु ४० वर्ष: पूर्ण आवृत्तियाँ = ⌊४०/१२⌋ = ३; शेष वर्ष = ४ → वर्तमान वर्ष-दशा = ४था भाव। उसी वर्ष के ७वें मास = ७वाँ भाव-मास। आयुषि चिन्तन = इन सूचकांकों को ७४.२४–२५ के स्थान-फल + अगले श्लोक के अष्टवर्ग से मिलाकर (यहाँ केवल चक्र-गणित)।

74.27
एवं सुदर्शनाच्चक्राद् वर्षमासादिजं फलम् ।
ज्ञात्वा तथाष्टवर्गोत्थमुभाभ्यां फलनिर्णयः
evaṃ sudarśanāccakrād varṣamāsādijaṃ phalam |
jñātvā tathāṣṭavargotthamubhābhyāṃ phalanirṇayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार (पूर्वोक्त विधि से); सुदर्शनात् चक्रात् = सुदर्शन त्रिचक्र से (लग्न-चन्द्र-सूर्य — तीन आरोपित चक्रों वाला यन्त्र); वर्ष-मास-आदि-जम् = वर्ष, मास आदि से उत्पन्न फल (प्रतिवर्ष/प्रतिमास की दशा-प्रगति); ज्ञात्वा = जानकर; तथा = वैसे ही; अष्टवर्ग-उत्थम् = अष्टकवर्ग से उठा हुआ फल (राशि/भाव की बिन्दु-रेखा गणना); उभाभ्याम् = इन दोनों प्रमाणों से मिलकर; फल-निर्णयः = अन्तिम फल का निर्णय।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार सुदर्शन चक्र से वर्ष-मास आदि का फल जानकर, और उसी तरह अष्टकवर्ग से उत्पन्न फल को भी जानकर — दोनों को मिलाकर अन्तिम फल-निर्णय करना चाहिए। शास्त्र यहाँ एक ही प्रश्न (उसी भाव/उसी काल) पर दो स्वतन्त्र गणनाओं को साथ रखने की विधि देता है: एक सुदर्शन (लग्न-चन्द्र-सूर्य त्रिचक्र की दशा), दूसरी अष्टकवर्ग की बिन्दु-गणना। निर्णय किसी एक पर नहीं, दोनों के मेल पर टिकाया जाता है।

English rendering Thus, having ascertained the year-and-month result from the Sudarśana wheel, and likewise the result arising from the aṣṭakavarga, the final verdict is to be made from the two together.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह "संयोजन-विधि" वाला श्लोक है — एक ही भाव-फल के लिए दो स्वतन्त्र यन्त्र नामांकित करता है:
1. सुदर्शन-चक्र फल — तीन लग्नों (Lagna, Candra-lagna, Sūrya-lagna) से बारह भावों को आरोपित कर उन पर वर्ष/मास-दशा पढ़ना (इसी अध्याय की पूर्व-गणना)।
2. अष्टकवर्ग-उत्थ फल — राशि/भाव में रेखा (बिन्दु) की संख्या।
श्लोक निर्णय-संकारक (operator) को कहता है: फलनिर्णयः = f(सुदर्शन, अष्टकवर्ग)। वास्तविक मध्यस्थता-नियम (सहमति बनाम विरोध) अगले श्लोक (28) में आता है। यहाँ कोई नवीन स्थिरांक नहीं — यह "दो प्रमाणों को मिलाओ" का आदेश-मात्र है। मापने योग्य कड़ी: SAV कुल = 337 बिन्दु ÷ 12 राशि = 28.08 प्रति राशि का माध्य; इस माध्य से ऊपर वाली राशि/भाव बलवान्, नीचे वाली दुर्बल — यही अष्टवर्ग-उत्थ इनपुट है।

उदाहरण (worked example) मान लें दशम भाव के लिए — सुदर्शन की वार्षिक प्रगति में शुभ ग्रह-सम्पर्क दिखता है (S = शुभ)। अष्टकवर्ग: उस राशि में SAV बिन्दु = 34; माध्य 337 ÷ 12 ≈ 28.08; चूँकि 34 > 28.08, अष्टवर्ग-उत्थ भी शुभ (A = शुभ)। दोनों इनपुट सहमत → 28 वें श्लोक के अनुसार "सम्पूर्ण" फल। (अयनांश/भाव-पद्धति यहाँ अष्टकवर्ग की राशि-गणना पर ही निर्भर, अतः वही घोषित रखना चाहिए।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक स्पष्ट रूप से अष्टकवर्ग को सुदर्शन के समकक्ष निर्णायक-इनपुट बनाता है — सीधे Ch.66 के हमारे कार्य से जुड़ता है। हमारे ओरेकल ने BPHS Ch.66 की रेखा-कुल संख्याएँ (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39) → SAV 337 को exact-`==` से pinned किया है (कोई सहन-पट्टी नहीं — एक ±3 बैंड ने कभी एक वास्तविक −1 को छिपा दिया था)। BPHS 74.27 ही इस pinning का कारण है: यदि तालिका में एक अंक भी खिसका, तो अन्तिम "फलनिर्णयः" ही दूषित हो जाए।

74.28
उभयत्र समत्वे हि सम्पूर्णं तत् फलं वदेत् ।
विषमत्वे यदाधिक्यं तत्फलं च बलक्रमात्
ubhayatra samatve hi sampūrṇaṃ tat phalaṃ vadet |
viṣamatve yadādhikyaṃ tatphalaṃ ca balakramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उभयत्र = दोनों प्रमाणों में; समत्वे = समानता/सहमति होने पर; हि = निश्चय ही; सम्पूर्णम् = पूर्ण, समग्र (पूरी तीव्रता से); तत् फलम् = वह फल; वदेत् = घोषित करे; विषमत्वे = विषमता/असहमति होने पर; यत् आधिक्यम् = जिस पक्ष की अधिकता हो; तत् फलम् = उसी का फल; बल-क्रमात् = बल के क्रम/अनुपात से।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों प्रमाण (सुदर्शन और अष्टकवर्ग) एक ही दिशा में हों — दोनों शुभ अथवा दोनों अशुभ — तब शास्त्र कहता है कि वह फल सम्पूर्ण रूप से, पूरी तीव्रता से कहना चाहिए। परन्तु जब दोनों में विषमता हो (एक शुभ, दूसरा अशुभ), तब जिस पक्ष का बल अधिक हो उसी का फल — बल के क्रम से — कहना चाहिए। यह एक स्पष्ट मध्यस्थता-नियम है: सहमति → पूर्ण फल; असहमति → बलवान् पक्ष का फल।

English rendering When the two instruments agree, one should declare that result in full; when they disagree, the result of whichever preponderates — graded by strength — is to be pronounced.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह श्लोक 74.27 में खुले निर्णय-नियम को पूर्ण करता है। मान लें S = सुदर्शन-निर्णय, A = अष्टकवर्ग-निर्णय, प्रत्येक एक चिह्नित सूचक (शुभ +, अशुभ −) तथा बल-परिमाण |S|, |A|:
- सहमति (चिह्न S = चिह्न A): फल = सम्पूर्ण — पूर्ण परिमाण पर घोषित (दोनों परस्पर पुष्ट करते हैं)।
- विरोध (चिह्न S ≠ चिह्न A): फल = चिह्न(argmax{|S|, |A|}) — बलवान् का चिह्न; परिमाण "बलक्रमात्" = बल के क्रम से, अर्थात् प्रबल पक्ष के आधिक्य के अनुपात में।
यह एक ही भाव-फल के दो स्वतन्त्र आकलकों पर भार-आधारित मध्यस्थता (max-by-magnitude) संकारक है। कोई नया स्थिरांक नहीं; श्लोक बताता है कि 27 के दो अंक कैसे संगुफित हों। "बलक्रमात्" भार को मापने योग्य बल से बाँधता है (अष्टकवर्ग बिन्दु-संख्या; सुदर्शन का ग्रह-योग/दृष्टि-बल), मनमानी से नहीं।

उदाहरण (worked example) दशम भाव — सुदर्शन की वार्षिक प्रगति शुभ ग्रह दिखाती है → S = +। अष्टकवर्ग: दशम राशि में SAV बिन्दु = 22; माध्य = 337 ÷ 12 ≈ 28.08; चूँकि 22 < 28.08, अष्टवर्ग-उत्थ अशुभ → A = −। विरोध। बल-तुलना: SAV न्यूनता = 28.08 − 22 = 6.08 बिन्दु (स्पष्ट कमी) बनाम सुदर्शन का मध्यम शुभ-सम्पर्क → यदि अष्टकवर्ग-बल प्रबल हो, तो शास्त्र के अनुसार दुर्बल (अशुभोन्मुख) फल "बलक्रमात्" कहा जाए। इसके विपरीत यदि उसी राशि में 34 बिन्दु (34 > 28.08) होते → A = + जो S से सहमत → सम्पूर्ण शुभ फल। (यह शास्त्र का कथन है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय का "exact-check" श्लोक है। "उभयत्र समत्वे... विषमत्वे यदाधिक्यम्" दो ओरेकलों के बीच एक parity/discrepancy परीक्षण है — वही अनुशासन जिसे हमारा अष्टकवर्ग ओरेकल pinned 337 फिक्सचर पर `==` से लागू करता है (एक ±3 सहन-पट्टी ने कभी एक वास्तविक −1 को छिपाया था)। जहाँ BPHS 74.28 बलक्रम से मध्यस्थता करता है, वहाँ हमारा इंजन विसंगति को औसत में मिटाने से इनकार करता है: SAV बिन्दु-संख्या में एक भी off-by-one इसी "विषमत्व" को पलट देता, इसलिए तालिका सहन-पट्टी पर नहीं, ठीक-ठीक pinned है।

अध्यायः 75

पंचमहापुरुषलक्षणाध्यायः

22 श्लोक
75.1
अथ वक्ष्याम्यहं पञ्चमहापुरुषलक्षणम् ।
स्वभोच्चगतकेन्द्रस्थैर्बलिभिश्च कुजादिभिः
atha vakṣyāmyahaṃ pañcamahāpuruṣalakṣaṇam |
svabhoccagatakendrasthairbalibhiśca kujādibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रकरणारम्भ); वक्ष्यामि अहम् = मैं कहूँगा; पञ्च-महापुरुष-लक्षणम् = पाँच "महापुरुष" योगों के लक्षण; स्व-भ = स्वराशि (अपना क्षेत्र); उच्च = उच्चराशि (exaltation); गत-केन्द्र-स्थैः = केन्द्र (भाव 1/4/7/10) में स्थित होकर; बलिभिः = बलवान् (षड्बल-युक्त) ग्रहों से; कुज-आदिभिः = मंगल आदि पाँच ग्रहों से (कुज, बुध, गुरु, शुक्र, शनि)।

हिन्दी भावार्थ अब मैं पाँच महापुरुष-योगों के लक्षण कहता हूँ। जब मंगल आदि पाँच ग्रह अपनी राशि में या अपनी उच्चराशि में हों, और साथ ही लग्न से केन्द्र (1/4/7/10) में बलवान् होकर बैठे हों, तभी ये विशेष योग बनते हैं। यहाँ तीन शर्तें एक साथ चाहिए — गरिमा (स्व/उच्च), स्थान (केन्द्र), और बल।

English rendering Now I shall state the marks of the five Great-Person (mahāpuruṣa) yogas: they arise when Mars and the rest, strong and placed in an angle (kendra), occupy their own sign or their sign of exaltation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-निर्धारक शर्त तीन कारकों का संयोग है (सभी एक साथ सत्य हों):
- केन्द्र-समुच्चय: भाव ∈ {1, 4, 7, 10} (लग्न से 90° के गुणज)।
- गरिमा: ग्रह स्वक्षेत्र में अथवा उच्च में। कुज-आदि की उच्चराशि व अंश (BPHS पूर्वाध्याय): मंगल 28° मकर, बुध 15° कन्या, गुरु 5° कर्क, शुक्र 27° मीन, शनि 20° तुला। स्वक्षेत्र: मंगल (मेष/वृश्चिक), बुध (मिथुन/कन्या), गुरु (धनु/मीन), शुक्र (वृष/तुला), शनि (मकर/कुम्भ)।
- बल: "बलिभिः" = ग्रह षड्बल में स्व-सीमा से ऊपर।
शर्त = (राशि ∈ स्व ∪ उच्च) ∧ (भाव ∈ {1,4,7,10}) ∧ (बल ≥ threshold)।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष। गुरु कर्क में 5° पर स्थित। कर्क लग्न से चतुर्थ = केन्द्र ✓; कर्क = गुरु की उच्चराशि ✓; यदि गुरु बलवान् ✓ → हंस-योग (श्लोक 2 का क्रम-मिलान देखें)। यदि वही गुरु केन्द्र से हट जाए (जैसे तृतीय भाव), तो सब शेष सत्य होते हुए भी योग भंग।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलिभिः" शर्त सीधे षड्बल (Ch.27) से जुड़ती है — स्थान-बल, दिग्बल आदि छह अंग रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में जोड़कर प्रति-ग्रह threshold से तुलना, जो हमारे डोज़ियर §4 का ठीक वही संगणनीय ढाँचा है। "स्व/उच्च" शर्त स्थान-बल का गरिमा-घटक है। यहाँ अनुशासन स्पष्ट है: योग की ज्यामितीय-गरिमा शर्त exact (`==`/सीमा) से जाँची जाती है, जबकि आगे वर्णित पुरुष-लक्षण फल-कथन हैं — शास्त्र का दावा, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

75.2
क्रमशो रुचको भद्रो हंसो मालव्य एव च ।
शशश्चैते बुधैः सर्वैर्महान्तः पुरुषाः स्मृताः
kramaśo rucako bhadro haṃso mālavya eva ca |
śaśaścaite budhaiḥ sarvairmahāntaḥ puruṣāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमशः = क्रम से (कुज-आदि के अनुसार); रुचकः = मंगल का योग; भद्रः = बुध का; हंसः = गुरु का; मालव्यः = शुक्र का; शशः = शनि का; एते = ये पाँच; बुधैः सर्वैः = समस्त विद्वानों द्वारा; महान्तः पुरुषाः = महापुरुष; स्मृताः = कहे गए हैं।

हिन्दी भावार्थ क्रम से — मंगल से रुचक, बुध से भद्र, गुरु से हंस, शुक्र से मालव्य, और शनि से शश — इन पाँचों को सब विद्वान् "महापुरुष" योग कहते हैं। "क्रमशः" शब्द पिछले श्लोक के "कुजादिभिः" से इन नामों को एक-एक कर बाँधता है।

English rendering In order they are Rucaka, Bhadra, Haṃsa, Mālavya and Śaśa; these five, say all the wise, are the Great-Person yogas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नामकरण/क्रम-सम्बन्ध। पूर्व श्लोक के "कुजादि" पर एक व्यवस्थित एकैक-संगति (bijection) है:
मंगल → रुचक; बुध → भद्र; गुरु → हंस; शुक्र → मालव्य; शनि → शश।
(इस क्रम-नियम को न पकड़ा जाए तो आगे के लक्षण-खण्ड किस ग्रह के हैं, यह अस्पष्ट रह जाता है — अतः यह पूरे अध्याय की कुंजी है।)

75.3
दीर्घाननो महोत्साहो स्वच्छकान्तिर्महाबलः ।
चारुभ्रूर्नीलकेशश्च सुरुचिश्च रणप्रियः
dīrghānano mahotsāho svacchakāntirmahābalaḥ |
cārubhrūrnīlakeśaśca suruciśca raṇapriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दीर्घ-आननः = लंबे मुख वाला; महा-उत्साहः = अत्यन्त उत्साही; स्वच्छ-कान्तिः = निर्मल कान्ति वाला; महाबलः = महाबली; चारु-भ्रूः = सुन्दर भौंहों वाला; नील-केशः = श्याम/नीले-काले केश वाला; सु-रुचिः = सुन्दर रुचि/दीप्ति वाला; रण-प्रियः = युद्धप्रिय।

हिन्दी भावार्थ (रुचक-पुरुष का वर्णन) उसका मुख लंबा, उत्साह महान्, कान्ति निर्मल और बल अपार होता है; भौंहें सुन्दर, केश श्याम, रुचि उत्तम, और स्वभाव युद्धप्रिय। यह मंगल-प्रधान महापुरुष की देहाकृति व प्रकृति का चित्रण है।

English rendering (The Rucaka man) is long-faced, of great vigour, clear-complexioned and mighty; with handsome brows, dark hair, fine bearing, and fond of battle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रुचक-पुरुष का शारीरिक-स्वभावगत वर्णन। यह लक्षण-सूची कारक-ग्रह मंगल के स्वभाव (तेज, बल, रणप्रियता) का देह-रूपान्तरण है — शास्त्र के अनुसार ग्रह-प्रकृति ही व्यक्ति में प्रतिबिम्बित मानी जाती है।

75.4
रक्तश्यामोऽरिहन्ता च मन्त्रविच्चोरनायकः ।
क्रूरोभर्ता मनुष्याणां क्षामाऽङ्घ्रिर्द्विजपूजकः
raktaśyāmo'rihantā ca mantraviccoranāyakaḥ |
krūrobhartā manuṣyāṇāṃ kṣāmā'ṅghrirdvijapūjakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्त-श्यामः = लाल-श्याम वर्ण वाला; अरि-हन्ता = शत्रुनाशक; मन्त्र-वित् = मंत्रवेत्ता; चोर-नायकः = चोरों/दस्युओं का नायक; क्रूरः = कठोर स्वभाव; भर्ता मनुष्याणाम् = मनुष्यों का पालक/स्वामी; क्षाम-अङ्घ्रिः = कृश (पतले) टखने/एड़ी वाला; द्विज-पूजकः = ब्राह्मणों का पूजक।

हिन्दी भावार्थ वह लाल-साँवले वर्ण का, शत्रुओं का नाशक, मंत्रों का ज्ञाता, सेना/दल का अगुआ, स्वभाव में कठोर, फिर भी मनुष्यों का स्वामी और ब्राह्मणों का आदर करने वाला होता है; उसकी एड़ियाँ पतली होती हैं। मंगल-प्रकृति के आक्रामक व नेतृत्व-गुण यहाँ प्रकट हैं।

English rendering Red-dark in hue, a slayer of foes, versed in mantras, a leader of raiders, harsh yet a ruler of men, thin-ankled, and a worshipper of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ण, स्वभाव, नेतृत्व)। शास्त्र कहता है कि रुचक-पुरुष में मंगल का "क्रूर/सेनानायक" पक्ष और "द्विज-पूजक" धर्म-पक्ष साथ रहते हैं — यह विरोधाभास नहीं, अपितु उग्र-ग्रह का संयमित रूप माना गया है।

75.5
वीणावज्रधनुःपाशवृषचक्राङ्कितः करे ।
मन्त्राभिचारकुशली दैर्ध्ये चैव शतांगुलः
vīṇāvajradhanuḥpāśavṛṣacakrāṅkitaḥ kare |
mantrābhicārakuśalī dairdhye caiva śatāṃgulaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वीणा-वज्र-धनुः-पाश-वृष-चक्र-अङ्कितः करे = हाथ में वीणा, वज्र, धनुष, पाश, वृष (बैल-चिह्न), चक्र के अंक/रेखा से चिह्नित; मन्त्र-अभिचार-कुशली = मन्त्र और अभिचार में कुशल; दैर्ध्ये = ऊँचाई में; च एव = तथा; शत-अङ्गुलः = सौ अङ्गुल (शरीर-दैर्घ्य)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कर-रेखाओं/चिह्नों में वीणा, वज्र, धनु, पाश, वृष और चक्र जैसे अंक; मन्त्र-अभिचार में कुशलता; और शरीर की ऊँचाई शतांगुल। “अभिचार” यहाँ शास्त्रीय शब्द-प्रयोग है — हम इसे दबाव-उपाय या आधुनिक आक्रमण-विधि के रूप में नहीं पढ़ते, केवल पाठ का लक्षण-वर्णन।

English rendering The text states that the hand is marked with signs of the vīṇā, thunderbolt, bow, noose, bull, and discus; that he is skilled in mantra and abhicāra lore; and that his stature is a hundred aṅgulas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दैर्घ्य-माप: शत-अङ्गुल = 100 aṅgula।
- 1 अङ्गुल ≈ अँगूठे की चौड़ाई की पारम्परिक इकाई (आधुनिक सेमी-रूपांतरण शास्त्र में नहीं; पाठ-मात्र इकाई रखें)।
- ऊँचाई H = 100 aṅgula (रुचक-लक्षण)।
अन्य: कर-चिह्न और कुशलता — गणना नहीं, लक्षण-सूची।

उदाहरण (worked example) यदि 1 अङ्गुल ≈ 1.9 cm माना जाए (आधुनिक अनुमान-रूपांतर; शास्त्र स्वयं सेमी नहीं देता), तो H ≈ 100 × 1.9 = 190 cm — केवल इकाई-बोध के लिए; शास्त्रीय कथन “100 अङ्गुल” ही प्रामाणिक है।

75.6
मुखदैर्घ्यसमं मध्यं तस्य विज्ञैः प्रकीर्तितम् ।
तुल्यस्तुलासहस्रेण रुचको द्विजपुङ्गव
mukhadairghyasamaṃ madhyaṃ tasya vijñaiḥ prakīrtitam |
tulyastulāsahasreṇa rucako dvijapuṅgava

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुख-दैर्घ्य-समम् = मुख की लंबाई के बराबर; मध्यम् = कमर/मध्यभाग; तस्य = उसका; विज्ञैः प्रकीर्तितम् = विद्वानों द्वारा कहा गया; तुल्यः = बराबर; तुला-सहस्रेण = हज़ार तुला (भार-इकाई) से; रुचकः = रुचक-पुरुष; द्विज-पुङ्गव = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ! विद्वानों ने कहा है कि उसकी कमर की माप उसके मुख की लंबाई के बराबर होती है, और उसका भार एक हज़ार तुला के समान होता है — ऐसा यह रुचक-पुरुष है। यहाँ अनुपात (मध्य = मुख) और भार (सहस्र-तुला) — दोनों संख्यात्मक लक्षण दिए हैं।

English rendering His waist, the wise declare, equals the length of his face, and his weight matches a thousand tulās — such is the Rucaka, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो संख्यात्मक कथन:
- अनुपात: मध्य (कमर-माप) = मुख-दैर्घ्य, अर्थात् मध्य ÷ मुख = 1 (1 ∶ 1)।
- भार: भार = सहस्र-तुला = 1000 तुला (भूतसंख्या: सहस्र = 1000)।
(तुला एक भार-इकाई है; इसका निरपेक्ष मान परम्परा-सापेक्ष — अतः "1000 तुला" को इकाई-घोषणा के बिना cम/kग में न बदला जाए। पाठ-भेद संभव: कुछ पाठ इसे आदर्श/आलंकारिक भार मानते हैं।)

उदाहरण (worked example) मान लें मुख-दैर्घ्य = 12 अंगुल। तब नियम से मध्य (कमर की माप) भी = 12 अंगुल। यह देह-सुडौलता का 1∶1 अनुपात-मानक है, जो प्रतिमा-शिल्प (tālamāna) की भाँति काम करता है।

75.7
भुनक्ति विन्ध्यसह्याद्रिप्रदेशं सप्ततिं समाः ।
शत्रेण वह्निना वापि स प्रयाति सुरालयम्
bhunakti vindhyasahyādripradeśaṃ saptatiṃ samāḥ |
śatreṇa vahninā vāpi sa prayāti surālayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुनक्ति = भोग करता है/शासन करता है; विन्ध्य-सह्य-अद्रि-प्रदेशम् = विन्ध्य और सह्य (पश्चिमी घाट) पर्वत-प्रदेश; सप्ततिम् समाः = सत्तर वर्ष; शत्रेण = शत्रु से; वह्निना = अग्नि से; वा अपि = अथवा; सः = वह; प्रयाति = जाता है; सुर-आलयम् = देवालय/स्वर्ग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — रुचक विन्ध्य-सह्याद्रि प्रदेश का भोग/अधिकार सत्तर वर्षों तक करता है; तत्पश्चात् शत्रु अथवा अग्नि के द्वारा सुरालय को जाता है। यह आयु-क्षेत्र-फल का शास्त्र-कथन है — हम इसे नियति या भय-वाक्य के रूप में नहीं दोहराते; केवल पाठ का फल-विवरण।

English rendering The text states that he enjoys the region of the Vindhya and Sahya mountains for seventy years, and then departs to the abode of the gods by means of an enemy or by fire.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-संख्या: सप्तति समाः = 70 वर्ष (रुचक-फल में कथित भोग-अवधि)।
- क्षेत्र: विन्ध्य + सह्य (सह्याद्रि) — भौगोलिक फल-कथन, गणना नहीं।
- अंत: शत्रु या अग्नि → सुरालय — द्विविकल्प फल; सूत्र नहीं।
“पाठ-भेद संभव” अन्य संस्करणों में आयु/मृत्यु-विधि भिन्न हो सकती है; यह विकिस्रोत-पाठ 70 वर्ष देता है।

75.8
शार्दूलप्रतिभह् पीनवक्षा गजगतिः पुमान् ।
पीनाजानुभुजः प्राज्ञश्चतुरस्रश्च योगवित्
śārdūlapratibhah pīnavakṣā gajagatiḥ pumān |
pīnājānubhujaḥ prājñaścaturasraśca yogavit

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शार्दूल-प्रतिभः = बाघ जैसा तेज/प्रताप वाला (पाठ "प्रतिभह्"; पाठ-भेद संभव → प्रतिभः); पीन-वक्षाः = चौड़े/पुष्ट वक्ष वाला; गज-गतिः = हाथी जैसी गम्भीर चाल; पीन-आजानु-भुजः = घुटनों तक पहुँचती पुष्ट भुजाएँ; प्राज्ञः = बुद्धिमान; चतुरस्रः = समचौरस/सुडौल देह वाला; योग-वित् = योगज्ञ।

हिन्दी भावार्थ (अब भद्र-पुरुष, बुध-प्रधान का वर्णन) वह बाघ-सा तेजस्वी, चौड़े वक्ष वाला, हाथी जैसी गम्भीर चाल वाला, पुष्ट व लंबी भुजाओं वाला, प्राज्ञ, सुडौल देह वाला और योग का ज्ञाता होता है। बुध का बुद्धि-पक्ष यहाँ "प्राज्ञ, योगवित्" रूप में उभरता है।

English rendering (The Bhadra man) has a tiger's splendour, a broad chest, an elephant's gait, stout arms reaching the knees; he is wise, well-proportioned, and versed in yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भद्र-पुरुष का देह-बुद्धि वर्णन। "चतुरस्र" (समचौरस) संकेत करता है कि भद्र-देह में अंग-अनुपात सम व सन्तुलित माने गए हैं — बुध की सम-सन्तुलित प्रकृति का देह-रूपक।

75.9
सात्त्विकः शोभनांघ्रश्च शोभनश्मश्रुसंयुतः ।
कामी शङ्खगदाचक्रशरकुञ्जरचिह्नकैः
sāttvikaḥ śobhanāṃghraśca śobhanaśmaśrusaṃyutaḥ |
kāmī śaṅkhagadācakraśarakuñjaracihnakaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सात्त्विकः = सात्त्विक स्वभाव वाला; शोभन-अङ्घ्रिः = सुन्दर पैरों वाला (पाठ "शोभनांघ्रश्च"; पाठ-भेद संभव); शोभन-श्मश्रु-संयुतः = सुन्दर दाढ़ी-मूँछ से युक्त; कामी = कामप्रिय; शङ्ख-गदा-चक्र-शर-कुञ्जर-चिह्नकैः = शंख, गदा, चक्र, बाण व हाथी के चिह्नों से (युक्त)।

हिन्दी भावार्थ वह सात्त्विक प्रकृति का, सुन्दर पैरों व सुन्दर दाढ़ी-मूँछ वाला, कामप्रिय होता है; उसके अंगों पर शंख, गदा, चक्र, बाण और हाथी के शुभ चिह्न होते हैं। यह श्लोक भद्र-पुरुष के शुभ-लक्षणों की सूची अगले श्लोक में आगे बढ़ाता है।

English rendering Of sāttvika nature, with handsome feet and fine facial hair, amorous, and bearing the marks of conch, mace, discus, arrow and elephant.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ-चिह्न (सामुद्रिक) वर्णन। शास्त्र इन कर-पाद-चिह्नों को राज-योग्यता का बाह्य संकेत मानता है; यह सामुद्रिक-शास्त्र की शैली है, गणना नहीं।

75.10
ध्वजलाङ्गलचिह्नैश्च चिह्नितांघ्रिकराम्बुजः ।
सुनासश्शास्त्रविद् धीरः कृष्णाकुञ्चितकेशभृत्
dhvajalāṅgalacihnaiśca cihnitāṃghrikarāmbujaḥ |
sunāsaśśāstravid dhīraḥ kṛṣṇākuñcitakeśabhṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ध्वज-लाङ्गल-चिह्नैः = ध्वज व हल के चिह्नों से; चिह्नित-अङ्घ्रि-कर-अम्बुजः = चिह्नित पैर व हस्त-रूपी कमल वाला; सु-नासः = सुन्दर नासिका वाला; शास्त्र-वित् = शास्त्रज्ञ; धीरः = धीर/स्थिरचित्त; कृष्ण-आकुञ्चित-केश-भृत् = काले घुँघराले केश धारण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ ध्वज और हल के चिह्नों से युक्त, जिसके कर-कमल और पद-कमल शुभ चिह्नों से अंकित हों, सुन्दर नासिका वाला, शास्त्रज्ञ, धीर, और काले घुँघराले बालों वाला — ऐसा यह भद्र-पुरुष होता है। बुध का विद्या-पक्ष "शास्त्रवित्, धीर" में स्पष्ट है।

English rendering Marked too with flag and plough on his lotus-like hands and feet, fine-nosed, learned in the śāstras, steadfast, and bearing dark, curly hair.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शुभ-चिह्न व देह-वर्णन (पूर्व श्लोक का अनुवृत्त)। शास्त्र कहता है कि "शास्त्रवित्, धीर" गुण बुध-भद्र की बौद्धिक स्थिरता को इंगित करते हैं — यह भद्र-लक्षण का मानसिक आयाम है।

75.11
स्वतन्त्रः सर्वकार्येषु स्वजनप्रीणनक्षमः ।
ऐश्वर्यं भुज्यते चास्य नित्यं मित्रजनैः परैः
svatantraḥ sarvakāryeṣu svajanaprīṇanakṣamaḥ |
aiśvaryaṃ bhujyate cāsya nityaṃ mitrajanaiḥ paraiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वतन्त्रः सर्व-कार्येषु = सभी कार्यों में स्वतंत्र; स्वजन-प्रीणन-क्षमः = अपने जनों को प्रसन्न करने में समर्थ; ऐश्वर्यम् = ऐश्वर्य/सम्पदा; भुज्यते च अस्य = उसका भोगा जाता है; नित्यम् = नित्य; मित्र-जनैः परैः = मित्रजनों तथा अन्यों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ वह हर कार्य में स्वतंत्र निर्णय लेने वाला और अपने स्वजनों को प्रसन्न रखने में समर्थ होता है; उसका ऐश्वर्य निरन्तर उसके मित्रों और अन्य लोगों द्वारा भी भोगा जाता है। यह भद्र-पुरुष के सामाजिक व औदार्य-पक्ष का फल-कथन है।

English rendering Independent in every undertaking and able to please his kin, his wealth is ever enjoyed by friends and by others too.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्वातन्त्र्य, औदार्य, ऐश्वर्य-भोग)। शास्त्र के अनुसार भद्र-पुरुष का ऐश्वर्य संग्रह-मात्र नहीं, वितरण-मुखी है ("परैः अपि भुज्यते") — यह गुण-कथन है, कोई सम्पत्ति-भविष्यवाणी नहीं।

75.12
तुलया तुलितो भारप्रमितः स्त्रीसुतान्वितः ।
सक्षेमो भूपतिः पाति मध्यदेशं शतं समाः
tulayā tulito bhārapramitaḥ strīsutānvitaḥ |
sakṣemo bhūpatiḥ pāti madhyadeśaṃ śataṃ samāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुलया तुलितः = तराजू से तौला गया; भार-प्रमितः = भार में परिमित/मानक; स्त्री-सुत-अन्वितः = स्त्री व पुत्रों से युक्त; स-क्षेमः = कल्याण/कुशल सहित; भूपतिः = राजा; पाति मध्य-देशम् = मध्यदेश की रक्षा करता है; शतं समाः = सौ वर्ष।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यह भद्र-पुरुष तराजू पर तौलने योग्य मानक भार का, स्त्री-पुत्रों से सम्पन्न और कुशल-क्षेम वाला राजा होता है, जो मध्यदेश की सौ वर्ष तक रक्षा करता है। यहाँ भद्र-योग का आयु व देश-फल दिया गया है।

English rendering Weighed on a balance and of well-measured heft, blessed with wife and sons, prosperous, this king guards the Madhya-deśa for a hundred years — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-संख्या: शतं समाः = 100 वर्ष (भूतसंख्या: शत = 100)। शासन-काल T = 100 वर्ष; क्षेत्र = मध्यदेश। "तुलया तुलितः / भार-प्रमितः" पुनः भार-मानक की ओर संकेत करता है (रुचक के "सहस्र-तुला" श्लोक 6 के समानान्तर)। अनुशासन: 100-वर्ष का शासन-फल शास्त्र का कथन है — निश्चित आयु-प्रमाण नहीं।

उदाहरण (worked example) पाँचों योगों के आयु/देश-फल की तुलना: रुचक → 70 वर्ष, विन्ध्य-सह्य (श्लोक 7); भद्र → 100 वर्ष, मध्यदेश (यह श्लोक)। ये स्थिरांक ग्रह-वार भिन्न हैं और सीधे पाठ से पढ़े गए — किसी बाह्य गणना से नहीं।

75.13
हंसो हंसस्वरो गौरः सुमुखोन्नतनासिकः ।
श्लेष्मलो मधुपिङ्गाक्षो रक्तवर्णनखः सुधीः
haṃso haṃsasvaro gauraḥ sumukhonnatanāsikaḥ |
śleṣmalo madhupiṅgākṣo raktavarṇanakhaḥ sudhīḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हंसः = हंस-पुरुष (गुरु-प्रधान); हंस-स्वरः = हंस जैसा (मधुर) स्वर वाला; गौरः = गौरवर्ण; सु-मुख = सुन्दर मुख वाला; उन्नत-नासिकः = उन्नत/ऊँची नासिका वाला; श्लेष्मलः = कफ-प्रधान प्रकृति वाला; मधु-पिङ्ग-अक्षः = शहद जैसे पिंगल (भूरे) नेत्र वाला; रक्त-वर्ण-नखः = लाल वर्ण के नाखून वाला; सु-धीः = उत्तम बुद्धि वाला।

हिन्दी भावार्थ (अब हंस-पुरुष, गुरु-प्रधान का वर्णन आरम्भ) वह हंस जैसे मधुर स्वर वाला, गौरवर्ण, सुन्दर मुख व ऊँची नासिका वाला, कफ-प्रकृति का, शहद-से भूरे नेत्रों और लाल नाखूनों वाला, तथा उत्तम बुद्धि से सम्पन्न होता है। गुरु का सौम्य-सात्त्विक व मेधा-पक्ष यहाँ "सुधीः, गौरः" रूप में उभरता है।

English rendering (The Haṃsa man) has a swan's voice, a fair complexion, a comely face and prominent nose; phlegmatic in humour, with honey-brown eyes, red nails, and keen intellect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — हंस-पुरुष का वर्ण-देह-प्रकृति वर्णन। "श्लेष्मल" (कफ-प्रधान) गुरु-ग्रह के कफ-तत्त्व से मेल खाता है — शास्त्र ग्रह-धातु-प्रकृति को देह-प्रकृति में प्रतिबिम्बित मानता है; यह वर्गीकरण-कथन है, गणना नहीं।

75.14
पीनगण्डस्थलो वृत्तशिराः सुचरणो नृपः ।
मत्स्याऽङ्कुशधनुःशंखकञ्जखट्वाङ्गचिह्नकैः
pīnagaṇḍasthalo vṛttaśirāḥ sucaraṇo nṛpaḥ |
matsyā'ṅkuśadhanuḥśaṃkhakañjakhaṭvāṅgacihnakaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पीन-गण्ड-स्थलः = भरे हुए (मांसल) गाल-प्रदेश वाला; वृत्त-शिराः = गोल मस्तक वाला; सु-चरणः = सुन्दर चरणों वाला; नृपः = राजा; मत्स्य = मीन-चिह्न; अङ्कुश = हाथी हाँकने का अंकुश-चिह्न; धनुः = धनुष; शंख = शंख; कञ्ज = कमल; खट्वाङ्ग = कपाल-युक्त दण्ड (खट्वाङ्ग-चिह्न); चिह्नकैः = इन शुभ चिह्नों से (अंकित)।

हिन्दी भावार्थ हंस-योग (गुरु के स्वक्षेत्र/उच्च केन्द्रस्थ बली होने से बने योग) में उत्पन्न पुरुष भरे गालों, गोल मस्तक और सुडौल चरणों वाला राजा होता है। शास्त्र कहता है कि उसके कर-चरण मीन, अंकुश, धनुष, शंख, कमल और खट्वाङ्ग जैसे मांगलिक चिह्नों से अंकित रहते हैं — यह चिह्न-सूची अगले श्लोक तक विस्तृत है।

English rendering The man of the Haṃsa yoga is a king with full cheeks, a round head and shapely feet, his hands and feet stamped with the marks of fish, goad, bow, conch, lotus and khaṭvāṅga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-वर्णन (सामुद्रिक चिह्न). ये अंग-चिह्न व्यक्ति-दर्शन (anthroposcopy) की सांकेतिक शब्दावली हैं, कोई राशि-गणना नहीं; योग की गणनीय शर्त श्लोक 1 में पहले ही कही जा चुकी है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हंस = गुरु (जीव) का महापुरुष-योग; इसकी एकमात्र गणनीय (verifiable) शर्त है — गुरु का केन्द्र (1/4/7/10) में स्वक्षेत्र (धनु/मीन) या उच्च (कर्क) राशि में बली होना। यह वर्ग-गरिमा (D1 राशि-स्थिति, Ch.6 षोडश-वर्ग) एवं षड्बल (Ch.27) की परिकलनयोग्य आधी है; उपर्युक्त शारीरिक लक्षण उसी योग का शास्त्र-कथित फल है, हमारे द्वारा समर्थित भविष्यवाणी नहीं। हमारे oracle की अनुशासन-रेखा यही है: गणित को व्याख्या से पृथक् रखो।

75.15
चिह्नतांघ्रिकरः स्त्रीषु कामार्तो नैति तुष्टताम् ।
षण्ण्वत्यंगुलो दैर्घ्ये जलक्रीडारतः सुखी
cihnatāṃghrikaraḥ strīṣu kāmārto naiti tuṣṭatām |
ṣaṇṇvatyaṃgulo dairghye jalakrīḍārataḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चिह्नित-अंघ्रि-करः = चिह्नित चरण-हस्त वाला; स्त्रीषु काम-आर्तः = स्त्रियों के प्रति काम से आतुर; न एति तुष्टताम् = तृप्ति को नहीं पाता; षण्णवति-अङ्गुलः = छियानबे अंगुल (96); दैर्घ्ये = ऊँचाई/लम्बाई में; जल-क्रीडा-रतः = जल-क्रीड़ा में रत; सुखी = सुखी।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक के चिह्न जिसके हाथ-पैर पर हैं, वह हंस-पुरुष स्त्रियों में अत्यन्त आसक्त रहकर भी सन्तोष नहीं पाता — यह शास्त्र का स्वभाव-कथन है। उसकी देह-ऊँचाई छियानबे अंगुल कही गई है; वह जल-विहार का प्रेमी और प्रकृति से सुखी होता है।

English rendering Marked on hands and feet, ardent toward women yet never sated, ninety-six aṅgulas tall, fond of water-sport and content by nature.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) देह-दैर्घ्य = 96 अंगुल (षण्णवति = 96, अंक-निष्ठ पाठ)। यह सामुद्रिक/शिल्प की अंगुल-मान-पद्धति है, जहाँ 24 अंगुल = 1 हस्त (हाथ)। तुलना: रुचक-पुरुष 100 अंगुल (75.5) के विरुद्ध हंस 96 अंगुल — प्रत्येक महापुरुष का अपना आदर्श-माप। "काम में अतृप्ति" फल-कथन है — शास्त्र इसे स्वभाव-रेखा कहता है, नियति या भविष्य-वाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) 96 अंगुल ÷ 24 अंगुल/हस्त = 4 हस्त ठीक — अर्थात् आदर्श देह-ऊँचाई चार हाथ। रुचक की 100 अंगुल = 100 ÷ 24 ≈ 4 ⅙ हस्त; अन्तर = 4 अंगुल = ⅙ हस्त।

75.16
गङ्गायमुनयोर्मध्यदेशं पाति शतं समाः ।
वनान्ते निधनं याति भुक्त्वा सर्वसुखं भुवि
gaṅgāyamunayormadhyadeśaṃ pāti śataṃ samāḥ |
vanānte nidhanaṃ yāti bhuktvā sarvasukhaṃ bhuvi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गङ्गा-यमुनयोः मध्य-देशं = गंगा और यमुना के बीच का देश (दोआब/अन्तर्वेदी); पाति = शासन करता/पालता है; शतं समाः = सौ वर्ष; वन-अन्ते = वन के अन्त में / वन में; निधनं याति = देह-त्याग को प्राप्त होता है; भुक्त्वा = भोगकर; सर्व-सुखं = समस्त सुख; भुवि = पृथ्वी पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यह (हंस-योगज) राजा गंगा-यमुना के मध्यवर्ती देश (दोआब) का सौ वर्ष तक पालन करता है, पृथ्वी पर समस्त सुख भोगकर अन्ततः वनान्त में देह त्यागता है।

English rendering He rules the land between the Gaṅgā and Yamunā for a hundred years, and — having enjoyed every earthly pleasure — meets his end in the forest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-संख्या (शब्द-संख्या): शतं = 100 वर्ष (समाः = संवत्सर)। यह कोई व्युत्पन्न सूत्र नहीं, अपितु फल-कथन में कथित स्थिर-संख्या है — "शास्त्र कहता है 100 वर्ष", न कि हमारे द्वारा गणित से निकाला आयु-प्रमाण।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह विशुद्ध फल-कथन (राज्य-भोग + आयु) है, अतः इसे शास्त्र की उक्ति के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं — नियति या निश्चितता के रूप में नहीं (dossier अनुशासन #5)। योग का परिकलनयोग्य, exact-`==` सत्यापन-योग्य अंश केवल उसका निर्माण है (गुरु केन्द्रस्थ, स्वक्षेत्र/उच्च, बली — षड्बल Ch.27); "सौ वर्ष का राज्य" उस गणना का भाग नहीं। भय नहीं, दबाव नहीं।

75.17
समौष्ठः कृशमध्यश्च चन्द्रकान्तिरुचिः पुमान् ।
सुगन्धो नातिरक्ताङ्गो न ह्रस्वो नातिदीर्घकः
samauṣṭhaḥ kṛśamadhyaśca candrakāntiruciḥ pumān |
sugandho nātiraktāṅgo na hrasvo nātidīrghakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम-ओष्ठः = सम/सन्तुलित ओठों वाला; कृश-मध्यः = पतली कमर वाला; चन्द्र-कान्ति-रुचिः = चन्द्र-सी कान्ति और द्युति वाला; पुमान् = पुरुष; सुगन्धः = सुगन्धित देह वाला; न अति-रक्त-अङ्गः = अत्यधिक रक्त-वर्ण अंगों वाला नहीं; न ह्रस्वः = न नाटा; न अति-दीर्घकः = न अत्यधिक लम्बा।

हिन्दी भावार्थ अब मालव्य-पुरुष (बलवान् शुक्र से जनित योग) का आरम्भ — सम ओठ, क्षीण कटि और चन्द्र-सदृश उज्ज्वल कान्ति वाला। उसकी देह सुगन्धित, वर्ण न अति-लाल, कद न बहुत छोटा न बहुत लम्बा — सर्वत्र सन्तुलन ही मालव्य की पहचान है।

English rendering Even-lipped, slender-waisted, of moonlike radiance; fragrant of body, neither over-ruddy nor short nor overly tall.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शारीरिक लक्षण-वर्णन। "न ह्रस्व न अतिदीर्घ" स्वयं एक माध्य-मान का संकेत है — मालव्य का आदर्श अगले श्लोक में सटीक अंगुल-संख्या से बँधता है, यह श्लोक उसका गुणात्मक उपोद्घात है।

75.18
समस्वच्छरदो हस्तिनाद आजानुबाहुधृक् ।
मुखं विश्वांगुलं दैर्घ्ये विस्तारे च दशाङ्गुलम्
samasvaccharado hastināda ājānubāhudhṛk |
mukhaṃ viśvāṃgulaṃ dairghye vistāre ca daśāṅgulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सम-स्वच्छ-रदः = सम और स्वच्छ दाँतों वाला; हस्ति-नादः = हाथी-सा गम्भीर स्वर; आ-जानु-बाहु-धृक् = घुटनों तक पहुँचती भुजाओं वाला; मुखं = मुख; विश्व-अङ्गुलं = तेरह अंगुल (विश्वे-देवाः = 13); दैर्घ्ये = लम्बाई में; विस्तारे = चौड़ाई में; दश-अङ्गुलम् = दस अंगुल (10)।

हिन्दी भावार्थ मालव्य के दाँत सम व स्वच्छ, स्वर गजगर्जना-सा गम्भीर, और भुजाएँ घुटनों तक लम्बी (आजानुबाहु) होती हैं। शास्त्र उसके मुख का सटीक माप देता है — लम्बाई में तेरह अंगुल, चौड़ाई में दस अंगुल।

English rendering With even, clean teeth, an elephant-deep voice and knee-long arms; his face thirteen aṅgulas in length and ten in breadth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मुख-दैर्घ्य = 13 अंगुल, मुख-विस्तार = 10 अंगुल। यहाँ "विश्व" भूतसंख्या है — विश्वे-देवाः तेरह होने से विश्व = 13 (अंक-निष्ठ decode); "दश" प्रत्यक्ष = 10। मुख का आकार-अनुपात दैर्घ्य : विस्तार = 13 : 10 = 1.3 — यह प्रतिमा-लक्षण/ताल-मान की आदर्श-देह-रचना की भाषा है।

उदाहरण (worked example) अनुपात = 13 ÷ 10 = 1.3 । यदि 1 अंगुल ≈ 1.9 cm मानें, तो मुख ≈ 24.7 cm × 19 cm — यह आदर्शीकृत आइकनोमेट्रिक माप है, वास्तविक शरीर-माप नहीं; "विश्व = 13" को शब्द-संख्या के रूप में अंक-दर-अंक ही खोला गया है।

75.19
मालव्यो मालवाख्यं च देशं पाति ससिन्धुकम् ।
सुखं सप्ततिवर्षान्तं भुक्त्वा याति सुलालयम्
mālavyo mālavākhyaṃ ca deśaṃ pāti sasindhukam |
sukhaṃ saptativarṣāntaṃ bhuktvā yāti sulālayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मालव्यः = मालव्य-योगज पुरुष; मालव-आख्यं देशं = मालव (मालवा) नामक देश; ससिन्धुकम् = सिन्धु-प्रदेश सहित; पाति = शासन करता है; सुखं = सुखपूर्वक; सप्तति-वर्ष-अन्तं = सत्तर वर्ष की अवधि तक; भुक्त्वा = भोगकर; याति = जाता है; सुलालयम् = उत्तम धाम को (= सुरालयम्, सुर-आलय/स्वर्ग — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मालव्य-योगज पुरुष सिन्धु सहित मालव देश का शासन करता है; सत्तर वर्ष तक सुख भोगकर अन्ततः उत्तम धाम को प्राप्त होता है।

English rendering The Mālavya man rules the land called Mālava together with Sindhu, and — having enjoyed happiness to the end of seventy years — passes to a noble abode.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु-संख्या: सप्तति = 70 वर्ष (सीधी शब्द-संख्या)। यह फल-कथन की स्थिर आयु-संख्या है, गणना-सूत्र नहीं। "सुलालयम्" में पाठ-भेद संभव (प्रायः सुरालयम् = स्वर्ग)।

हमारा डिकोड (Our Decode) पाँचों महापुरुष-योग केवल पाँच तारा-ग्रहों (कुजादि = मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) से बनते हैं — सूर्य-चन्द्र इनसे बाहर हैं; मालव्य = शुक्र। इसकी गणनीय शर्त — शुक्र केन्द्रस्थ, स्वक्षेत्र (वृष/तुला) या उच्च (मीन) में, बली — वर्ग-गरिमा (Ch.6) व षड्बल (Ch.27) का परिकलन है; "70 वर्ष का राज्य" उसी योग का शास्त्र-कथित फल है, हमारे oracle से सत्यापित संख्या नहीं।

75.20
तनुद्विजमुखः शूरो नातिह्रस्वः कृशोदरः ।
मध्ये क्षामः सुजंघश्च मतिमान् पररन्ध्रवित्
tanudvijamukhaḥ śūro nātihrasvaḥ kṛśodaraḥ |
madhye kṣāmaḥ sujaṃghaśca matimān pararandhravit

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनु-द्विज-मुखः = पतले/छोटे दाँतों तथा तनु मुख वाला (द्विज = दाँत); शूरः = वीर; न अति-ह्रस्वः = बहुत नाटा नहीं; कृश-उदरः = पतले पेट वाला; मध्ये क्षामः = कमर पर क्षीण; सु-जंघः = सुन्दर पिण्डलियों वाला; मतिमान् = बुद्धिमान्; पर-रन्ध्र-वित् = दूसरों के छिद्रों/मर्मों का ज्ञाता (रन्ध्र = दुर्बलता/भेद)।

हिन्दी भावार्थ अब शश-पुरुष (बलवान् शनि से जनित योग) का वर्णन — छोटे दाँत, कृश मुख, वीर स्वभाव, न बहुत नाटा; पतला उदर और क्षीण कटि। सुन्दर जंघाओं वाला, बुद्धिमान्, और दूसरों के छिद्र-मर्म को पहचानने में निपुण।

English rendering With small teeth and slender face, valorous, not too short, lean of belly, thin at the waist; fine-shanked, intelligent, and shrewd at reading others' weak points.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शारीरिक एवं स्वभाव-लक्षण। "पर-रन्ध्र-वित्" स्वभाव-कथन है (शनि-सुलभ गूढ़-दृष्टि); शश-पुरुष का सटीक आयु-मान अगले-अगले श्लोक (75.22) में भूतसंख्या से आएगा, यह श्लोक उसका गुण-चित्रण है।

75.21
शक्तो वनाद्रिदुर्गेषु सेनानीर्दन्तुरः शशः ।
चंचलो धातुवादी च स्त्रीशक्तोऽन्यधानान्वितः
śakto vanādridurgeṣu senānīrdanturaḥ śaśaḥ |
caṃcalo dhātuvādī ca strīśakto'nyadhānānvitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शक्तः = समर्थ; वन-अद्रि-दुर्गेषु = वन, पर्वत तथा दुर्गों में; सेना-नीः = सेनापति; दन्तुरः = ऊँचे/विषम दाँतों वाला; शशः = शश-पुरुष; चंचलः = चञ्चल; धातु-वादी = धातुवादी/रसायन-कर्मी (खनिज-कीमिया-कुशल); स्त्री-शक्तः = स्त्रियों में समर्थ/आसक्त; अन्य-धन-अन्वितः = पराए धन से युक्त (पाठ-भेद संभव: "अन्यधानान्वितः")।

हिन्दी भावार्थ यह शश-पुरुष वन, पर्वत और दुर्गम गढ़ों में पराक्रमी तथा सेनानायक होता है; उसके दाँत कुछ ऊँचे-विषम रहते हैं। स्वभाव से चञ्चल, धातुवाद (रसायन/खनिज-कर्म) में निपुण, स्त्री-आसक्त, और प्रायः पराए धन से युक्त — ऐसा शास्त्र उसका स्वभाव-चित्र खींचता है।

English rendering Capable in forests, hills and forts, a leader of armies with prominent teeth — this is the Śaśa: restless, an alchemist, potent with women, and enriched by others' wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्वभाव एवं आजीविका-लक्षण। "धातुवादी, अन्य-धन-अन्वित" फल-स्वभाव के कथन हैं — शास्त्र इन्हें शश-प्रकृति की रेखा कहता है, किसी व्यक्ति के विषय में नैतिक-निर्णय या भविष्य-कथन नहीं। "अन्यधानान्वितः" पद पर पाठ-भेद संभव।

75.22
मालावीणामृदङ्गाऽस्त्ररेखाङ्कितकरांघ्रिकः ।
भूपोऽयं वसुधा पाति जीवन् खाद्रिसमाः सुखी
mālāvīṇāmṛdaṅgā'strarekhāṅkitakarāṃghrikaḥ |
bhūpo'yaṃ vasudhā pāti jīvan khādrisamāḥ sukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) माला-वीणा-मृदङ्ग-अस्त्र-रेखा-अङ्कित = माला, वीणा, मृदंग और अस्त्र की रेखाओं से चिह्नित; कर-अंघ्रिकः = हाथ-पैर वाला; भूपः अयं = यह राजा; वसुधा पाति = पृथ्वी का पालन करता है; जीवन् = जीवित रहते हुए; खाद्रि-समाः = खाद्रि (= 70) वर्ष; सुखी = सुखी।

हिन्दी भावार्थ शश-पुरुष के हाथ-पैर पर माला, वीणा, मृदंग और अस्त्र की शुभ रेखाएँ अंकित रहती हैं। शास्त्र कहता है — यह राजा सुखपूर्वक पृथ्वी का पालन करता हुआ खाद्रि (सत्तर) वर्ष जीवित रहता है। यह शश-लक्षण का उपसंहार-वचन है।

English rendering His hands and feet bear the lines of garland, vīṇā, drum and weapon; this king rules the earth and lives happily for seventy years.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आयु = 70 वर्ष, "खाद्रि" भूतसंख्या से — ख = 0 (आकाश/शून्य), अद्रि = 7 (सप्त-कुल-पर्वत = 7)। "अङ्कानां वामतो गतिः" नियम से अंक दायें-से-बायें पढ़े जाते हैं: प्रथम-पद ख (इकाई = 0), द्वितीय-पद अद्रि (दहाई = 7) → 70। यह पञ्चमहापुरुष की आयु-योजना से मेल खाता है (रुचक 70 · भद्र 100 · हंस 100 · मालव्य 70 · शश 70)। रेखा-चिह्न सामुद्रिक-लक्षण हैं, गणना नहीं; आयु फल-कथन है — शास्त्र कहता है।

उदाहरण (worked example) खाद्रि → अंक-क्रम [ख, अद्रि] = [0, 7] → वामतो गति से पठन = 7·10 + 0·1 = 70 वर्ष। यही विधि "विश्व = 13" (75.18) पर लागू की गई — प्रत्येक शब्द-संख्या को अंक-दर-अंक, बिना अनुमान के खोला गया है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे "शब्द-संख्या/भूतसंख्या को अंक-निष्ठ रूप में ही खोलना" के अनुशासन का प्रत्यक्ष उदाहरण है — खाद्रि = 70 को टीका-परम्परा के अनुमान से नहीं, अंक-स्थान-नियम से निर्णीत किया गया। यही सटीक-`==` निष्ठा हमने अष्टकवर्ग-ऑरेकल (Ch.66) में लागू की, जहाँ ±3 सहन-पट्टी ने एक बार वास्तविक −1 त्रुटि को छिपा लिया था; इसीलिए हर स्थिर-मान (fixture) अनुमान-रहित, ठीक-बराबर पर बँधा है।

अध्यायः 76

पंचमहाभूतफलाध्यायः

18 श्लोक
76.1
अथ पञ्चमहाभूतच्छायाज्ञानं वदामि ते ।
ज्ञायते येन खेटानां वर्तमानदशा बुधैः
atha pañcamahābhūtacchāyājñānaṃ vadāmi te |
jñāyate yena kheṭānāṃ vartamānadaśā budhaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (अध्याय-आरम्भ); पञ्चमहाभूत = पाँच महाभूत — अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, वायु; छाया-ज्ञान = भूत-छाया (तत्त्व-आभा) का ज्ञान; वदामि ते = तुझसे कहता हूँ; ज्ञायते येन = जिससे जाना जाता है; खेटानाम् = ग्रहों की; वर्तमान-दशा = चल रही (प्रवर्तमान) दशा; बुधैः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ अब मैं तुझसे पञ्चमहाभूतों की छाया का ज्ञान कहता हूँ — वही विद्या जिसके द्वारा विद्वान् जन ग्रहों की वर्तमान (चल रही) दशा को पहचान लेते हैं। पराशर यहाँ नवीन अध्याय प्रस्तावित करते हैं: शरीर पर प्रकट होने वाली तत्त्व-आभा से यह अनुमान कि इस समय कौन-सा ग्रह अपनी दशा चला रहा है।

English rendering Now I shall tell you the knowledge of the shadow-aura of the five great elements, by which the wise discern which planetary daśā is currently in operation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-प्रस्तावना। किन्तु इस अध्याय का निवेश (input) स्वयं गणित से आता है: "वर्तमान-दशा" कौन-सी है, यह विंशोत्तरी जैसे दशा-चक्र से परिकलित होती है — यह अध्याय उस परिकलित दशा को शरीर-लक्षण से स्वतंत्र सत्यापन करने की विधि देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "वर्तमान-दशा" ठीक वही अवधि है जिसे हमारे विंशोत्तरी-इंजन (BPHS अ.46–47; 120-वर्ष चक्र — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मङ्गल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17; Σ = 120) से निकाला जाता है। पराशर यहाँ उसी परिकलित दशा-नाथ को बाह्य लक्षण-प्रमाण से जाँचने का द्वार खोलते हैं — गणित पहले, फिर उसका स्वतंत्र सत्यापन।

76.2
शिखिभूखाम्बुवातानामधिपा मङ्गलादयः ।
तत्तद्बलावशाज्ज्ञेयं तत्तद्भूतभवं फलम्
śikhibhūkhāmbuvātānāmadhipā maṅgalādayaḥ |
tattadbalāvaśājjñeyaṃ tattadbhūtabhavaṃ phalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिखि = अग्नि; भू = पृथ्वी; ख (kha) = आकाश/व्योम; अम्बु = जल; वात = वायु; अधिपाः = अधिपति/स्वामी; मङ्गलादयः = मङ्गल आदि (मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि — इसी क्रम में); तत्तद्-बल-अवशात् = उन-उन के बल के अधीन; तत्तद्-भूत-भवं फलम् = उन-उन भूतों से उत्पन्न फल।

हिन्दी भावार्थ अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल और वायु — इन पाँच भूतों के अधिपति क्रमशः मङ्गल आदि ग्रह हैं। जिस ग्रह का जितना बल हो, उसी के अनुपात में उसके भूत से उत्पन्न फल समझना चाहिए।

English rendering The lords of fire, earth, ether, water, and wind are Mars and the rest (in order); according to the strength of each, the result born of its respective element is to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूत ↔ ग्रह का नियत मानचित्र (deterministic map), बल द्वारा चयनित — शिखि(अग्नि)→मङ्गल, भू(पृथ्वी)→बुध, ख(आकाश)→गुरु, अम्बु(जल)→शुक्र, वात(वायु)→शनि। चयन-नियम: प्रकट भूत = argmaxₚ बल(p) — अर्थात् जिस ग्रह का बल सर्वाधिक (व जिसकी दशा चल रही), उसी का भूत छाया में प्रकट; फल की मात्रा ∝ बल।

उदाहरण (worked example) माना वर्तमान दशा मङ्गल की है और मङ्गल सबल (षड्बल ≥ उसका मानक); तब प्रकट भूत = अग्नि → अग्नि-प्रकृति के लक्षण (76.6) व अग्नि-छाया का फल (76.11)। परिपाटी: बल = षड्बल (अ.27), दशा = विंशोत्तरी (अ.46–47)।

हमारा डिकोड (Our Decode) "तत्तद्बलावशात्" का "बल" हमारे षड्बल-मॉडल (BPHS अ.27: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग् बल; 1 रूप = 60 विरूप) का ही सूचकांक है। इंजन प्रत्येक ग्रह का बल-रूप निकालकर सर्वाधिक-बल ग्रह चुनता है; पराशर उसी चयन को यहाँ भूत-निर्धारण का आधार बनाते हैं।

76.3
सबले मङ्गले वह्निस्वभावो जायते नरः ।
बुधे महीस्वभावः स्यादाकाशप्रकृतिर्गुरौ
sabale maṅgale vahnisvabhāvo jāyate naraḥ |
budhe mahīsvabhāvaḥ syādākāśaprakṛtirgurau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सबले मङ्गले = बलवान् मंगल होने पर; वह्निस्वभावः = अग्नि-स्वभाव वाला; जायते नरः = मनुष्य होता है; बुधे = बुध (बलवान्) होने पर; महीस्वभावः = पृथ्वी-स्वभाव; आकाशप्रकृतिः = आकाश-प्रकृति; गुरौ = गुरु (बलवान्) होने पर।

हिन्दी भावार्थ जब मंगल बलवान् हो, तब मनुष्य अग्नि-स्वभाव का होता है; बुध बलवान् हो तो पृथ्वी-स्वभाव, और गुरु बलवान् हो तो आकाश-प्रकृति का। यहाँ "सबल" (बलयुक्त) शब्द ही निर्णायक है — भूत तभी प्रकट होता है जब उसका अधिपति ग्रह बलवान् हो।

English rendering When Mars is strong the person is of fire-nature; with strong Mercury, earth-nature; with strong Jupiter, ether-nature.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सारणी-वृद्धि : मंगल → वह्नि, बुध → पृथ्वी, गुरु → आकाश। "सबल" यहाँ बल-देहली (threshold) की ओर संकेत करता है — अधिपति का बल किसी मान से ऊपर हो, तभी उसका भूत-स्वभाव अभिव्यक्त। यह मात्रात्मक शर्त है, न कि केवल गुणात्मक।

हमारा डिकोड (Our Decode) "सबल/निर्बल" का ठोस माप षड्बल है (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृक् — रूप/विरूप में, 1 रूप = 60 विरूप), जिसे प्रति-ग्रह देहली से तुलना कर "बलवान्" घोषित किया जाता है — यह गणना है, व्याख्या नहीं। इस श्लोक का "सबले" उसी बल-अंक की माँग करता है जिसे हमारा ढाँचा संख्यात्मक रूप से तौलता है।

76.4
शुक्रे जलस्वभावश्च मारुतप्रकृतिः शनौ ।
मिश्रैर्मिश्रस्वभावश्च विज्ञेयो द्विजसत्तम
śukre jalasvabhāvaśca mārutaprakṛtiḥ śanau |
miśrairmiśrasvabhāvaśca vijñeyo dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रे = शुक्र (बलवान्) होने पर; जलस्वभावः = जल-स्वभाव; मारुतप्रकृतिः = वायु-प्रकृति; शनौ = शनि (बलवान्) होने पर; मिश्रैः = अनेक ग्रहों के समान-बल मिश्रण से; मिश्रस्वभावः = मिश्रित स्वभाव; विज्ञेयः = भली भाँति जानना चाहिए; द्विजसत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ (मैत्रेय)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र बलवान् हो तो जल-स्वभाव, और शनि बलवान् हो तो वायु-प्रकृति का मनुष्य होता है। और हे द्विजश्रेष्ठ, जब अनेक ग्रह समान बल के हों (मिश्र), तब मिश्रित स्वभाव जानना चाहिए।

English rendering With strong Venus, water-nature; with Saturn, wind-nature; and where planets are mixed (of comparable strength), a mixed nature is to be understood, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सारणी-वृद्धि : शुक्र → जल, शनि → वायु। निर्णय-नियम = argmaxₚ बल(p) पर भूत-चयन। "मिश्र" शर्त : यदि शीर्ष दो-तीन ग्रहों के बल-अंक निकट हों (|बलᵢ − बलⱼ| ≈ 0), तो एकल विजेता नहीं — भूत-प्रकृति भी संमिश्र। अर्थात् यह argmax का "टाई/निकट-टाई" प्रकरण है।

उदाहरण (worked example) मान लें शुक्र-बल ≈ शनि-बल (अन्तर नगण्य)। तब न शुद्ध जल-स्वभाव, न शुद्ध वायु — मिश्र जल-वायु प्रकृति कही जाएगी। यदि केवल शुक्र स्पष्ट अग्रणी हो, तो शुद्ध जल-स्वभाव।

76.5
सूर्ये वह्निस्वभावश्च जलप्रकृतिको विधौ ।
स्वदशायां ग्रहाश्छायां व्यंजयन्ति स्वभूतजाम्
sūrye vahnisvabhāvaśca jalaprakṛtiko vidhau |
svadaśāyāṃ grahāśchāyāṃ vyaṃjayanti svabhūtajām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्ये = सूर्य (बलवान्) होने पर; वह्निस्वभावः = अग्नि-स्वभाव; विधौ = चन्द्र होने पर; जलप्रकृतिकः = जल-प्रकृति वाला; स्वदशायाम् = अपनी-अपनी दशा में; ग्रहाः = ग्रह; छायाम् = छाया/आभा को; व्यंजयन्ति = प्रकट करते हैं; स्वभूतजाम् = अपने भूत से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ सूर्य बलवान् हो तो अग्नि-स्वभाव और चन्द्र हो तो जल-प्रकृति का मनुष्य होता है। यही इस विद्या का केन्द्रीय सूत्र है — ग्रह अपनी-अपनी दशा में अपने भूत से उत्पन्न छाया को (देह/प्रकृति पर) प्रकट कर देते हैं।

English rendering With strong Sun, fire-nature; with the Moon, water-nature. In their own daśās the planets reveal the tint born of their respective element.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सारणी पूर्ण : सूर्य → वह्नि, चन्द्र → जल। संचालन-सूत्र (algorithm) : वर्तमान-छाया = भूत(दशेश), जहाँ "स्वदशायाम्" = चल रही महादशा का काल-खण्ड। अतः पूर्ण सारणी — वह्नि{मंगल, सूर्य}, पृथ्वी{बुध}, आकाश{गुरु}, जल{शुक्र, चन्द्र}, वायु{शनि}।

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र-महादशा चल रही है (विमशोत्तरी में चन्द्र = 10 वर्ष) और चन्द्र सबल। तब भूत = जल → देह पर "जल-छाया" के लक्षण (मृदुता, स्वस्थता; cf. श्लोक 14) अपेक्षित। छाया देखकर उलटे चन्द्र-दशा का अनुमान किया जा सकता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "स्वदशायाम्" वही महादशा-खण्ड है जिसे हमारा दशा-इंजन नक्षत्र-भोग-अंश से शुद्ध अनुपात-गणित द्वारा निकालता है (महादशा→अन्तर्दशा = mahā-yr × antar-yr ÷ 120)। इस श्लोक की मौलिक शिक्षा — गणना (दशा) और अवलोकन (छाया) को जोड़ना — हमारी "गणित बनाम व्याख्या" विवेक-रेखा का ही अनुप्रयोग है : दशा-काल गणित से, प्रकट-फल शास्त्र-कथन के रूप में।

76.6
क्षुधार्तश्चपलः शूरः कृशः प्राज्ञोऽतिभक्षणः ।
तीक्ष्नो गौरतनुर्मानी वह्निप्रकृतिको नरः
kṣudhārtaścapalaḥ śūraḥ kṛśaḥ prājño'tibhakṣaṇaḥ |
tīkṣno gauratanurmānī vahniprakṛtiko naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षुधार्तः = भूख से पीड़ित (सदा क्षुधावान्); चपलः = चंचल; शूरः = शूरवीर; कृशः = दुबला; प्राज्ञः = बुद्धिमान्; अति-भक्षणः = अधिक खाने वाला; तीक्ष्णः = तीक्ष्ण/उग्र; गौर-तनुः = गौरवर्ण शरीर वाला; मानी = स्वाभिमानी; वह्नि-प्रकृतिकः नरः = अग्नि-प्रकृति का मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ अग्नि-प्रकृति का मनुष्य प्रायः क्षुधातुर, चंचल, शूरवीर, कृशकाय, बुद्धिमान्, अधिक भोजन करने वाला, तीक्ष्ण स्वभाव, गौरवर्ण और स्वाभिमानी होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering The fire-natured person, the text states, is ever-hungry, restless, brave, lean, wise, a hearty eater, sharp-tempered, fair-complexioned, and proud.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल / स्वभाव-वर्णन। अग्नि-तत्त्व के गुण (उष्णता, तीक्ष्णता, दीप्ति) का मानवी लक्षणों पर रूपक-प्रक्षेप; कोई संख्या नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह और आगे के लक्षण-श्लोक फल हैं — इन्हें हम "शास्त्र कहता है" रूप में रखते हैं, नियति या निश्चयवाणी रूप में नहीं। हमारे अनुशासन में गणित (ग्रह→भूत सारणी, षड्बल, दशा-वर्ष) और व्याख्या (यह स्वभाव-वर्णन) पृथक् रहते हैं; == जैसी सटीक जाँच केवल संख्याओं पर लगती है, स्वभाव-कथन पर नहीं।

76.7
कर्पूरोत्पलफ़न्धाढ्यो भोगी स्थिरसुखी बली ।
क्षमावान् सिंहनादश्च महीप्रकृतिको नरः
karpūrotpalafandhāḍhyo bhogī sthirasukhī balī |
kṣamāvān siṃhanādaśca mahīprakṛtiko naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्पूर = कपूर; उत्पल = उत्पल/कमल; गन्धाढ्यः = गन्ध से समृद्ध (पाठ: फ़न्धाढ्य — पाठ-भेद संभव; प्रचलित गन्धाढ्य); भोगी = भोग-शील; स्थिरसुखी = स्थिर सुख वाला; बली = बलवान्; क्षमावान् = क्षमाशील; सिंहनादः = सिंह-नाद/गंभीर स्वर; महीप्रकृतिकः नरः = पृथ्वी-प्रकृति का मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मही (पृथ्वी) प्रकृतिक नर का वर्णन करता है: कर्पूर-उत्पल जैसी सुगन्ध से युक्त, भोगी, स्थिर सुख वाला, बली, क्षमावान्, सिंहनाद। “फ़न्धाढ्य” पाठा में गन्धाढ्य का पाठ-भेद संभव; अर्थ सुगन्ध-समृद्धि की ओर ही जाता है। यह भी लक्षण-वर्णन है—शास्त्र का चिह्न-समूह, न कि व्यक्तिगत भविष्य-वाक्य।

English rendering The text describes an earth-natured person as rich in the fragrance of camphor and lotus, pleasure-loving, steadily happy, strong, forbearing, and lion-voiced. (Reading gandhāḍhya vs. the given form: pāṭha-bheda possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / लक्षण-वर्णन (मही-प्रकृति; अधिपति बुध, श्लोक ७६.२–३)।

76.8
शब्दार्थवित् सुनीतिज्ञो प्रगल्भो ज्ञानसंयुतः ।
विवृतास्योऽतिदीर्घश्च व्योमप्रकृतिसम्भवः
śabdārthavit sunītijño pragalbho jñānasaṃyutaḥ |
vivṛtāsyo'tidīrghaśca vyomaprakṛtisambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शब्दार्थवित् = शब्द और अर्थ का जानकार; सुनीतिज्ञ = सुनीति/नीति-शास्त्र में निपुण; प्रगल्भ = प्रगल्भ/निर्भीक वाणी वाला; ज्ञानसंयुतः = ज्ञान से युक्त; विवृतास्य = खुले मुख वाला / वाचाल-अभिव्यक्त; अतिदीर्घ = अत्यन्त दीर्घकाय; व्योमप्रकृतिसम्भवः = व्योम (आकाश)-प्रकृति से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो जन व्योम-प्रकृति से उत्पन्न होता है, वह शब्द और अर्थ का ज्ञाता, सुनीति में प्रवीण, प्रगल्भ और ज्ञानसम्पन्न होता है। उसकी वाणी खुली-अभिव्यक्त होती है और शरीर अतिदीर्घकाय कहा गया है। यह कथन आकाश-तत्त्व की प्रकृति के लक्षण-वर्णन के रूप में है, न कि नियति की घोषणा।

English rendering The text states that one born of sky (vyoma/ākāśa) nature is versed in word and meaning, skilled in good policy, bold of speech, and endowed with knowledge; open-mouthed (expressive) and very tall.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रकृति-लक्षण / फल-वर्णन। व्योम-प्रकृति के शारीरिक-मानसिक चिह्न यहाँ गुण-सूची के रूप में गिनाए गए हैं; कोई अंश, वर्ग या बल-गणना नहीं।

76.9
कान्तिमान् भारवाही च प्रियवाक् पृथिवीपतिः ।
बहुमित्रा मृदुर्विद्वान् जलप्रकृतिसम्भवः
kāntimān bhāravāhī ca priyavāk pṛthivīpatiḥ |
bahumitrā mṛdurvidvān jalaprakṛtisambhavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कान्तिमान् = कान्तियुक्त/तेजस्वी; भारवाही = भार वहन करने में सक्षम; प्रियवाक् = मधुरभाषी; पृथिवीपतिः = भूमि/राज्य का स्वामी; बहुमित्रः = बहुत मित्रों वाला (पाठ "बहुमित्रा"); मृदुः = कोमल; विद्वान् = विद्वान्; जलप्रकृतिसम्भवः = जल-प्रकृति से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ जल-प्रकृति का मनुष्य कान्तिमान्, भार सहने वाला, मधुरभाषी, भूमिपति, बहुमित्र, कोमल-स्वभाव और विद्वान् होता है। जल-तत्त्व की शीतलता, स्निग्धता और प्रवाहशीलता इन कोमल-मधुर गुणों में झलकती है।

English rendering The water-natured person is lustrous, able to bear burdens, sweet-spoken, a lord of land, of many friends, gentle, and learned.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (जल-प्रकृति का लक्षण-वर्णन)। जल के अधिपति शुक्र व चन्द्र हैं (श्लोक 4–5); शास्त्र कहता है कि इनकी सबल दशा में ये स्निग्ध-मधुर लक्षण प्रकट होते हैं।

76.10
वायुतत्त्वाधिको दाता क्रोधी गौरोऽटनप्रियः ।
भूपतिश्च दुराधर्षः कृशाङ्गो जायते जनः
vāyutattvādhiko dātā krodhī gauro'ṭanapriyaḥ |
bhūpatiśca durādharṣaḥ kṛśāṅgo jāyate janaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वायुतत्त्वाधिकः = वायु-तत्त्व की अधिकता वाला; दाता = दानशील; क्रोधी = क्रोध-प्रवण; गौरः = गौरवर्ण; अटनप्रियः = पर्यटन/भ्रमण-प्रिय; भूपतिः = भूपति/शासक-तुल्य; दुराधर्षः = दुर्धर्ष / जिसे सहज न दबाया जाए; कृशाङ्गः = कृश अंगों वाला; जायते जनः = (ऐसा) जन उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिसमें वायुतत्त्व अधिक होता है, वह दानशील, क्रोधी, गौरवर्ण और अटन-प्रिय होता है। वह भूपति-तुल्य, दुराधर्ष और कृशाङ्ग कहा गया है। यह वायु-तत्त्वाधिक्य का लक्षण-वर्णन है।

English rendering The text states that a person with predominance of the wind element is generous, irascible, fair-complexioned, and fond of wandering; ruler-like, hard to overpower, and thin-limbed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्वाधिक्य-लक्षण / फल-वर्णन। “वायुतत्त्वाधिक” का यहाँ गुणात्मक संकेत है; कोई अंश-सीमा या बल-राशि नहीं दी गई।

76.11
स्वर्णदीप्तिः शुभा दृष्टिः सर्वकार्यार्थसिद्धिता ।
विजयो धनलाभश्च वह्निभायां प्रजायते
svarṇadīptiḥ śubhā dṛṣṭiḥ sarvakāryārthasiddhitā |
vijayo dhanalābhaśca vahnibhāyāṃ prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वर्णदीप्तिः = सोने-सी दीप्ति; शुभा दृष्टिः = शुभ/मंगलमय दृष्टि; सर्वकार्यार्थसिद्धिता = सब कार्यों और प्रयोजनों की सिद्धि; विजयः = विजय; धनलाभः = धन-लाभ; वह्निभायाम् = वह्नि-छाया/अग्नि-आभा प्रकट होने पर (भा = आभा/तेज); प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ जब देह पर अग्नि-छाया (वह्नि-आभा) प्रकट हो, तब शास्त्र कहता है — सोने-सी दीप्ति, शुभ दृष्टि, सब कार्यों की सिद्धि, विजय और धन-लाभ की स्थिति बनती है। यहाँ श्लोक 6 का "स्वभाव-लक्षण" पक्ष अब "छाया-फल" पक्ष में बदल जाता है — प्रकट आभा का शुभ संकेत।

English rendering When the fire-tint appears, the text states there arises golden radiance, auspicious vision, accomplishment of every task and aim, victory, and gain of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वह्नि-छाया का शुभ फल)। मर्म : श्लोक 6–10 भूत-"स्वभाव" (देह-गठन/स्वभाव) कहते हैं, जबकि 11–13 उसी भूत की "छाया/आभा" के फल — शास्त्र का कथन, कोई भविष्य-प्रतिज्ञा नहीं।

76.12
इष्टगन्धः शरीरे स्यात् सुस्निग्धनखदन्तता ।
धर्मार्थसुखलाभश्च भूमिच्छाया यदा भवेत्
iṣṭagandhaḥ śarīre syāt susnigdhanakhadantatā |
dharmārthasukhalābhaśca bhūmicchāyā yadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्टगन्धः = मनभावन सुगन्ध; शरीरे स्यात् = शरीर में हो; सुस्निग्ध-नख-दन्तता = अत्यन्त चिकने/कांतिमय नख और दाँत; धर्म-अर्थ-सुख-लाभः = धर्म, अर्थ और सुख का लाभ; भूमिच्छाया = पृथ्वी-छाया; यदा भवेत् = जब हो।

हिन्दी भावार्थ जब पृथ्वी-छाया प्रकट हो, तब शास्त्र कहता है — शरीर में प्रिय सुगन्ध, स्निग्ध-कांतिमय नख व दाँत, तथा धर्म, अर्थ और सुख का लाभ होता है। पृथ्वी-तत्त्व की गन्ध-धारकता और स्थिरता इस शुभ छाया-फल में झलकती है।

English rendering When the earth-tint appears, the text states the body bears a pleasing fragrance, glossy nails and teeth, and gains of dharma, wealth, and comfort.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पृथ्वी-छाया का शुभ फल)। यह पृथ्वी-अधिपति बुध (श्लोक 3) की सबल दशा में प्रकट छाया का शुभ संकेत है — शास्त्र-कथन के रूप में ग्राह्य।

76.13
स्वच्चा गगनजा छाया वाक्पटुत्वप्रदा भवेत् ।
सुशब्दश्रवणोद्भूतं सुखं तत्र प्रजायते
svaccā gaganajā chāyā vākpaṭutvapradā bhavet |
suśabdaśravaṇodbhūtaṃ sukhaṃ tatra prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वच्छा = निर्मल/स्वच्छ (पाठ "स्वच्चा"; पाठ-भेद संभव — मान्य पाठ "स्वच्छा"); गगनजा छाया = आकाश से उत्पन्न छाया; वाक्पटुत्वप्रदा = वाणी की प्रवीणता देने वाली; सुशब्द-श्रवण-उद्भूतम् = उत्तम शब्द/वचन सुनने से उत्पन्न; सुखम् = सुख; तत्र प्रजायते = वहाँ उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ आकाश से उत्पन्न निर्मल छाया वाणी में प्रवीणता देने वाली होती है, और शास्त्र कहता है कि तब उत्तम शब्द-श्रवण से उत्पन्न सुख प्राप्त होता है। आकाश-तत्त्व का शब्द-गुण यहाँ वाक्-पटुता और श्रवण-सुख के रूप में प्रकट होता है।

English rendering The clear tint born of ether grants eloquence of speech, and there, the text states, arises the happiness born of hearing fine words.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आकाश/गगन-छाया का शुभ फल)। संगति : शब्द आकाश-तत्त्व का लक्षण है, अतः इसकी छाया का फल वाणी-प्रवीणता और श्रवण-सुख — आकाश-अधिपति गुरु (श्लोक 3) की सबल दशा-छाया में प्रकट, शास्त्र-कथन के रूप में।

76.14
मृदुता स्वस्थता देहे जलच्छाया यदा भवेत् ।
तदाऽभिष्टरसस्वादसुखं भवति देहिनः
mṛdutā svasthatā dehe jalacchāyā yadā bhavet |
tadā'bhiṣṭarasasvādasukhaṃ bhavati dehinaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृदुता = कोमलता, देह की मृदुलता; स्वस्थता = आरोग्य, नीरोगता; देहे = शरीर में; जलच्छाया = जल-महाभूत की छाया (आभा/रंगत — शुक्र/चन्द्र जैसे जल-स्वभाव ग्रह की स्वदशा में प्रकट); यदा भवेत् = जब उदित हो; तदा = तब; अभीष्ट-रस-स्वाद-सुखम् = मनचाहे रसों के आस्वादन का सुख; देहिनः = देहधारी (जातक) को।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोकों की छाया-मालिका को आगे बढ़ाते हुए यहाँ जल-छाया का फल कहा गया है। जब जातक में जल-महाभूत की छाया उभरती है (अर्थात् जल-स्वभाव ग्रह की वर्तमान दशा में), तब शरीर में कोमलता और स्वस्थता झलकती है, और शास्त्र कहता है कि उस काल में जातक को अपने प्रिय रसों-स्वादों के भोग का सुख मिलता है।

English rendering When the water-tint (jala-chāyā) manifests, the body shows softness and health; then, the text says, the embodied one enjoys the pleasure of savouring the flavours he desires.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (जल-छाया का शुभ फल)। यह श्लोक अध्याय की छाया-वर्गीकरण-योजना का एक पद है: प्रत्येक महाभूत ↔ अधिपति ग्रह ↔ स्वदशा में प्रकट छाया ↔ तद्भूतज फल — यहाँ जल ↔ शुक्र/चन्द्र (श्लोक 3–5 का संकेत) ↔ मृदुता·स्वास्थ्य·रस-सुख।

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76.15
मालिन्यं मूढता दैत्यं रोगश्च पवनोद्भवाः ।
तदा च शोकसन्तापौ वायुच्छाया यदा भवेत्
mālinyaṃ mūḍhatā daityaṃ rogaśca pavanodbhavāḥ |
tadā ca śokasantāpau vāyucchāyā yadā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मालिन्यम् = मलिनता / अशुद्धि-भाव; मूढता = जड़ता / विवेक-ह्रास; दैत्यम् = दैत्य-सदृश कठोर / अमानुष-प्रवृत्ति (यहाँ गुण-कथन, न कि “भूत”); रोगाः पवनोद्भवाः = वात-प्रकृति के रोग-संकेत (शास्त्र-फल); शोक-सन्तापौ = शोक और सन्ताप; वायुच्छाया = जब छाया / प्रकृति वायवीय (पवन-महाभूत) हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब वायु-छाया (पवन-महाभूत की प्रधानता) हो, तब मालिन्य, मूढता, दैत्य-सदृश कठोरता, तथा पवन से उद्भूत रोगों का फल बताया गया है। उसी अवस्था में शोक और सन्ताप का भी निर्देश है। यह पाँच महाभूतों की छाया-फल-परम्परा का वायवीय पक्ष है—गुण-वर्णन, न कि किसी व्यक्ति पर निश्चित “रोग-आदेश”।

English rendering The text states that when the elemental “shadow” is of Vāyu, the indicated results include impurity/stain, dullness, a harsh (daitya-like) disposition, wind-born afflictions, and grief with torment. It is a classical phala-list for the aerial mahābhūta, not a medical diagnosis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वायुच्छाया / पवन-महाभूत)। यह छंद गणना नहीं देता; यह पूर्व-निर्धारित छाया-वर्गीकरण पर फल-सूची बाँधता है—जब “वायवीय” पक्ष माना जाए, तब ये गुण शास्त्र-वाक्य के रूप में पढ़े जाएँ।

76.16
एवं फलं बुधैर्ज्ञेयं सबलेषु कुजादिषु ।
निर्बलेषु तथा तेषु वक्तव्यं व्यत्ययाद् द्विज
evaṃ phalaṃ budhairjñeyaṃ sabaleṣu kujādiṣu |
nirbaleṣu tathā teṣu vaktavyaṃ vyatyayād dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; फलं = फल; बुधैः = विद्वानों द्वारा; ज्ञेयं = जानने योग्य; स-बलेषु = बलवान होने पर; कुज-आदिषु = मङ्गल आदि ग्रहों के (सप्तति में); निर्बलेषु = निर्बल होने पर; तथा तेषु = वैसे ही उन्हीं में; वक्तव्यं = कहना चाहिए; व्यत्ययात् = विपर्यय/उलटे क्रम से; द्विज = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज! उपर्युक्त (श्लोक 6–15 का) तत्त्व-फल तब जानना चाहिए जब मङ्गल आदि ग्रह बलवान हों; और जब वे ही ग्रह निर्बल हों, तो वही फल विपर्यय (उलटा) करके कहना चाहिए। यही इस अध्याय का मूल विनियोग-नियम है।

English rendering Thus, O twice-born, the wise should read the (elemental) fruit when Mars and the rest are strong; when those same planets are weak, it must be declared inverted.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — बल-आश्रित व्यत्यय-नियम (कोई अंक-सूत्र नहीं, पर एक निर्णय-मानचित्र):
फल(ग्रह) = प्रत्यक्ष-फल, यदि बल(ग्रह) ≥ देहली(threshold);
फल(ग्रह) = विपरीत-फल (व्यत्यय), यदि बल(ग्रह) < देहली।
अर्थात् एक ही तत्त्व-छाया दो शाखाओं में बँटती है, और शाखा का चयन ग्रह-बल के संख्यात्मक निर्णय पर निर्भर है।

उदाहरण (worked example) मानिए मङ्गल (अग्नि-तत्त्व) की दशा चल रही है। बलवान मङ्गल → अग्नि-छाया का प्रत्यक्ष फल (श्लोक 11: विजय, धन-लाभ, कार्य-सिद्धि)। वही मङ्गल यदि निर्बल हो → व्यत्यय से विपरीत फल कहा जाएगा। "बलवान बनाम निर्बल" का विभाजक कोई भावुक अनुमान नहीं, एक बल-गणना है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ का "स-बल / निर्बल" ठीक वही निर्णय है जो षड्बल (BPHS Ch.27) संख्यात्मक रूप से देता है — स्थान, दिग्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्बल का योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), और यह योग प्रति-ग्रह देहली से तुलित। हमारे decode में यही संख्यात्मक विजय/पराजय तय करता है कि श्लोक 16 की "प्रत्यक्ष" शाखा फलेगी या "व्यत्यय" शाखा — भाव नहीं, संख्या शाखा चुनती है।

76.17
नीचशत्रुभगैश्चापि विपरीतं फलं वदेत् ।
फलाप्तिरबलैः खेटैः स्वप्नचिन्तासु जायते
nīcaśatrubhagaiścāpi viparītaṃ phalaṃ vadet |
phalāptirabalaiḥ kheṭaiḥ svapnacintāsu jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नीच-शत्रु-भ-गैः = नीच राशि या शत्रु-राशि में स्थित (ग्रहों) से (नीच = नीच-स्थान; शत्रु = शत्रु-क्षेत्र; भ = राशि; ग = गत/स्थित — पदच्छेद पर पाठ-भेद संभव); च अपि = भी; विपरीतम् फलम् = उलटा फल; वदेत् = कहे; फलाप्तिः = फल की प्राप्ति; अबलैः खेटैः = बलहीन ग्रहों द्वारा (खेट = ग्रह); स्वप्न-चिन्तासु = स्वप्नों और मानसिक चिन्ताओं में; जायते = होती है।

हिन्दी भावार्थ श्लोक 16 के व्यत्यय-नियम को दिग्-दशा देते हुए शास्त्र कहता है — नीच या शत्रु-राशि में बैठे ग्रहों का फल भी विपरीत ही कहना चाहिए। और जो ग्रह बलहीन हैं, उनका फल स्थूल रूप में नहीं, बल्कि स्वप्न और चित्त की चिन्ताओं के स्तर पर ही प्रकट होता है — मानो निर्बल ग्रह अपना फल केवल मन के परदे पर दिखा पाते हैं।

English rendering For planets in debilitation or in an enemy's sign the opposite result too should be declared; and by weak planets the fruit is obtained only in dreams and in the mind's preoccupations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तकनीक-नियम (गरिमा/dignity-आधारित व्यत्यय + अभिव्यक्ति-स्तर)। दो प्रतिबन्ध जुड़ते हैं: (क) स्थिति-दोष — ग्रह नीच/शत्रु-क्षेत्र में ⇒ फल उलट; (ख) अभिव्यक्ति-न्यूनता — निर्बल ग्रह ⇒ फल का धरातल स्थूल से सूक्ष्म (स्वप्न·चिन्ता) की ओर खिसकता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ बल केवल "है/नहीं" नहीं, बल्कि फल के प्रकट-होने-के-स्तर को भी नियत करता है — यह षड्बल की देहली-तुलना के अनुशासन का ही विस्तार है। हमारी विधि में यही "कठोर == जाँच" वाली दृष्टि है: सहनशीलता-पट्टी (tolerance band) फल को झूठा-सबल दिखा सकती है, इसलिए बल की गणना और फल-कथन को अलग रखा जाता है।

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76.18
तद्दुष्टफलशान्त्यर्थमपि चाज्ञातजन्मनाम् ।
फलपक्त्या दशा ज्ञेया वर्तमाना नभःसदाम्
tadduṣṭaphalaśāntyarthamapi cājñātajanmanām |
phalapaktyā daśā jñeyā vartamānā nabhaḥsadām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् = उस; दुष्ट-फल-शान्ति-अर्थम् = अनिष्ट-फल की शान्ति के प्रयोजन से; अपि च = और भी; अज्ञात-जन्मनाम् = जिनका जन्म(-काल) अज्ञात है उनके लिए; फल-पक्त्या = फल के पकने/प्रकट होने से (लक्षण-पर्यवेक्षण द्वारा); दशा = ग्रह-दशा; ज्ञेया = जानने योग्य; वर्तमाना = चालू, वर्तमान; नभःसदाम् = नभश्चरों की, अर्थात् ग्रहों की।

हिन्दी भावार्थ उस अनिष्ट-फल की शान्ति के प्रयोजन से, और उन जातकों के लिए भी जिनका जन्म-काल अज्ञात है — प्रकट होते हुए तत्त्व-फल (फल-पक्ति) को देखकर ग्रहों की वर्तमान दशा जान लेनी चाहिए। यही श्लोक 1 के "वर्तमानदशा बुधैः" का व्यावहारिक फलितार्थ है — तत्त्व-छाया से चालू दशा-नाथ का प्रत्यानुमान।

English rendering And, so that the ill fruit may be allayed — and also for those whose birth-time is unknown — the current running period of the planets is to be inferred from the ripening (visible manifestation) of the fruit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तकनीक — दशा-निर्धारण की व्युत्क्रम-विधि (inverse problem)। सामान्य (अग्र) दिशा जन्म → दशा-नाथ होती है; यहाँ शास्त्र उलटी दिशा देता है: प्रकट तत्त्व-छाया → तत्त्व → दशा-नाथ। तत्त्व↔ग्रह मानचित्र (श्लोक 2–5): अग्नि → मङ्गल/सूर्य, मही(पृथ्वी) → बुध, आकाश → गुरु, जल → शुक्र/चन्द्र, वायु → शनि।

उदाहरण (worked example) मानिए जातक का जन्म-काल अज्ञात है, पर देह में कोमलता, स्वस्थता व रसासक्ति (श्लोक 14 के लक्षण) प्रकट हैं। मानचित्र से तत्त्व = जल → वर्तमान दशा-नाथ = शुक्र (या चन्द्र)। इस प्रकार बिना जन्मकुण्डली के, केवल फल-पक्ति से चालू दशा शुक्र/चन्द्र अनुमानित की जाती है — यही व्युत्क्रम-निर्धारण है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारा विम्शोत्तरी engine (BPHS Ch.46–47) चालू महादशा को चन्द्र-नक्षत्र से अग्र-दिशा में गिनता है — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मङ्गल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 (Σ = 120), अन्तर = (महादशा-वर्ष × अन्तर-ग्रह-वर्ष)/120। यह श्लोक ठीक उसी दशा का व्युत्क्रम-सत्यापन देता है: जब जन्म अज्ञात हो तो तत्त्व-छाया से वही "वर्तमान दशा-नाथ" पढ़ लिया जाए। एक ही दशा — एक ओर से जन्म से गणित, दूसरी ओर से प्रकट-फल से प्रत्यानुमान।

अध्यायः 77

सत्त्वादिगुणफलाध्यायः

22 श्लोक
77.1
अथो गुणवशेनाहं कथयामि फलं द्विज ।
सत्त्वग्रहोदये जातो भवेत्सत्त्वाधिकः सुधीः
atho guṇavaśenāhaṃ kathayāmi phalaṃ dvija |
sattvagrahodaye jāto bhavetsattvādhikaḥ sudhīḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथो = अब (आगे); गुणवशेन = गुणों (सत्त्व-रज-तम) के प्रभाव से; अहम् = मैं (पराशर); कथयामि फलम् = फल कहता हूँ; द्विज = हे द्विज; सत्त्व-ग्रह-उदये = सत्त्वगुणी ग्रह के लग्नोदय में; जातः = जन्मा; भवेत् सत्त्वाधिकः = सत्त्वप्रधान होता है; सुधीः = श्रेष्ठ बुद्धिवाला। (उदय = लग्न में उदित ग्रह; सत्त्वग्रह = सत्त्व-वर्ग का ग्रह, ग्रह-स्वरूप अध्याय अनुसार।)

हिन्दी भावार्थ अब हे द्विज, मैं ग्रहों के गुणों के अनुसार जातक का फल कहता हूँ। जिसके जन्म-काल में लग्न पर सत्त्वगुणी ग्रह उदित हो, वह सत्त्वप्रधान और उत्तम बुद्धिवाला होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering Now, O twice-born, I declare the fruit according to the guṇas: one born when a sattva-natured planet is rising in the lagna becomes sattva-predominant and of fine intellect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मुख्यतः फल-कथन, पर एक निश्चयात्मक वर्गीकरण-नियम अन्तर्निहित है — उदय-ग्रह का गुण ↦ जातक का गुण: उदयस्थ ग्रह ∈ सत्त्व-वर्ग ⇒ जातक = सत्त्वाधिक। ग्रह-गुण का निर्धारण पूर्व अध्याय (ग्रह-स्वरूप, BPHS अ.3) की परंपरा से — प्रायः सत्त्व: सूर्य/चन्द्र/गुरु; रजस्: बुध/शुक्र; तमस्: मंगल/शनि (परंपरा-भेद संभव; convention घोषित करें)।

उदाहरण (worked example) लग्न में गुरु उदित (गुरु = सत्त्व-वर्ग) ⇒ नियमानुसार जातक "सत्त्वाधिक सुधी" श्रेणी में। (यहाँ केवल उदय-ग्रह का गुण-वर्ग गिना गया; बल एवं भाव-फल पृथक् गणना।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक फल-अध्याय का द्वार है, और यहीं हमारी विधि (CLAUDE.md + oracle) गणित को व्याख्या से पृथक् रखती है (दोसियर §5): उदय-ग्रह का गुण-वर्ग गणनीय है, पर "सत्त्वाधिकः सुधीः" शास्त्र की घोषणा है — इसे भाग्य/निश्चय नहीं, "शास्त्र कहता है" रूप में ही प्रस्तुत करते हैं।

77.2
रजःखेटोदये विज्ञो रजोगुणसमन्वितः ।
तमःखेटोदये मूर्खो भवेज्जातस्तमोऽधिकः
rajaḥkheṭodaye vijño rajoguṇasamanvitaḥ |
tamaḥkheṭodaye mūrkho bhavejjātastamo'dhikaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रजः-खेट-उदये = रजोगुणी ग्रह (खेट = ग्रह) के उदय में; विज्ञः = चतुर/व्यवहार-कुशल; रजोगुण-समन्वितः = रजोगुण से युक्त; तमः-खेट-उदये = तमोगुणी ग्रह के उदय में; मूर्खः = मूढ़-बुद्धि; भवेत् जातः = जन्मा होता है; तमः-अधिकः = तमःप्रधान।

हिन्दी भावार्थ जिसके लग्न में रजोगुणी ग्रह उदित हो, वह रजोगुण-युक्त तथा व्यवहार-कुशल/चतुर होता है; और जिसके तमोगुणी ग्रह उदित हो, वह तमःप्रधान एवं मूढ़-बुद्धि होता है — ऐसा शास्त्र कहता है।

English rendering When a rajas-natured planet rises, the native is worldly-clever, filled with rajoguṇa; when a tamas-natured planet rises, the one born is tamas-predominant and dull of wit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वही प्रतिचित्रण आगे बढ़ा — उदय-ग्रह ∈ रजस् ⇒ जातक = रजोऽधिक (विज्ञ); उदय-ग्रह ∈ तमस् ⇒ जातक = तमोऽधिक (मूर्ख)। तीन गुण-वर्गों में से दो यहाँ पूर्ण हुए।

उदाहरण (worked example) लग्न में शुक्र उदित (रजस्-वर्ग) ⇒ रजोऽधिक "विज्ञ"; लग्न में शनि उदित (तमस्-वर्ग) ⇒ तमोऽधिक। (गुण-वर्ग परंपरा घोषित; बल-गणना पृथक्।)

77.3
गुणसाम्ययुतो जातो गुणसाम्यखगोदये ।
एवं चतुर्विधा विप्र जायन्तो जन्तवो भुवि
guṇasāmyayuto jāto guṇasāmyakhagodaye |
evaṃ caturvidhā vipra jāyanto jantavo bhuvi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुणसाम्य-युतः = गुणों की समता से युक्त; जातः = जन्मा; गुणसाम्य-खग-उदये = गुण-सम ग्रह (खग = ग्रह) के उदय में; एवम् = इस प्रकार; चतुर्विधाः = चार प्रकार के; विप्र = हे विप्र; जायन्ते जन्तवः = प्राणी उत्पन्न होते हैं; भुवि = पृथ्वी पर।

हिन्दी भावार्थ जिसके लग्न में गुण-सम (तीनों गुण तुल्य) ग्रह उदित हो, वह गुणसाम्य-युक्त होता है। इस प्रकार, हे विप्र, पृथ्वी पर प्राणी चार प्रकार से जन्म लेते हैं।

English rendering One born when a guṇa-balanced planet rises is of equipoised guṇas; thus, O Vipra, creatures are born on earth in four kinds.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) वर्गीकरण अब पूर्ण एवं संवृत (closed): गुण-वर्ग ∈ {सत्त्व, रजस्, तमस्, साम्य} ↦ जातक-प्रकार ∈ {सत्त्वाधिक, रजोऽधिक, तमोऽधिक, गुणसाम्य}। यह 1-से-1 प्रतिचित्रण (bijection) है; समुच्चय-गणना = 4 (चतुर्विध)।

उदाहरण (worked example) उदय-ग्रह यदि किसी एक गुण में प्रधान न होकर तीनों में तुल्य माना जाए ⇒ चौथा वर्ग "गुणसाम्य" (श्लोक 4 में यही "उदासीन")। शेष तीन उदाहरण श्लोक 1–2 में दिखाए गए।

77.4
उत्तमो मध्यमो नीच उदासीन इति क्रमात् ।
तेषां गुणानहं वक्ष्ये नारदारिप्रभाषितान्
uttamo madhyamo nīca udāsīna iti kramāt |
teṣāṃ guṇānahaṃ vakṣye nāradāriprabhāṣitān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तमः = श्रेष्ठ; मध्यमः = मध्यम; नीचः = अधम/निम्न; उदासीनः = तटस्थ/मिश्र; इति क्रमात् = इसी क्रम में; तेषां गुणान् = उनके गुणों को; अहम् वक्ष्ये = मैं कहूँगा; नारदादि-प्रभाषितान् = नारद आदि ऋषियों द्वारा कहे गए। (मूल पाठ "नारदारि-प्रभाषितान्" — पाठ-भेद संभव; संभवतः "नारदादि-"।)

हिन्दी भावार्थ ये चार प्रकार क्रमशः उत्तम, मध्यम, नीच (अधम) और उदासीन कहलाते हैं। इनके गुणों को मैं कहूँगा, जैसे नारद आदि ऋषियों ने कहा है।

English rendering These four are, in order, superior, middling, low, and neutral; I shall now state their qualities as declared by Nārada and the other sages.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नामकरण/क्रम-कथन। क्रम (ordinal) घोषित: उत्तम ≻ मध्यम ≻ नीच ≻ उदासीन (श्लोक-4 का पाठ-क्रम)। सावधानी: श्लोक 12–13 का युग्मन-नियम उदासीन को अधम के ऊपर रखता प्रतीत होता है — अतः क्रम-भेद/पाठ-भेद संभव; convention श्लोकवार घोषित करना उचित।

77.5
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
अलोभः सत्यवादित्वं जने सत्त्वाधिके गुणाः
śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca |
alobhaḥ satyavāditvaṃ jane sattvādhike guṇāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शमः = मन का निग्रह; दमः = इन्द्रिय-निग्रह; तपः = तप; शौचम् = शुचिता/पवित्रता; क्षान्तिः = क्षमा/सहनशीलता; आर्जवम् = सरलता/ऋजुता; अलोभः = निर्लोभता; सत्य-वादित्वम् = सत्यभाषण; जने सत्त्व-अधिके = सत्त्वप्रधान व्यक्ति में; गुणाः = ये गुण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सत्त्वप्रधान (उत्तम) व्यक्ति में ये गुण होते हैं: शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, निर्लोभता और सत्यभाषण। ये आठ लक्षण सात्त्विक स्वभाव के सूचक बताये गये हैं।

English rendering Tranquillity, sense-restraint, austerity, purity, forbearance, straightforwardness, freedom from greed, and truthfulness — these are the qualities the text ascribes to a sattva-predominant person.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लक्षण-सूची)। गणनायोग्य एकमात्र तथ्य: सूची में ८ सात्त्विक गुण गिनाये गये हैं (शम·दम·तप·शौच·क्षान्ति·आर्जव·अलोभ·सत्यवादित्व) — धर्म-शास्त्रीय सद्गुण-सूचियों से समरूप।

77.6
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाऽप्यपलायनम् ।
साधूनां रक्षणं चेति गुणा ज्ञेया रजोऽधिके
śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cā'pyapalāyanam |
sādhūnāṃ rakṣaṇaṃ ceti guṇā jñeyā rajo'dhike

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शौर्यम् = वीरता; तेजः = ओज / प्रताप; धृतिः = धैर्य / स्थिरता; दाक्ष्यम् = दक्षता / कुशलता; युद्धे अपि अपलायनम् = युद्ध में न भागना; साधूनां रक्षणम् = साधुओं / सज्जनों की रक्षा; इति गुणाः = ये गुण; ज्ञेयाः = जानने योग्य; रजोऽधिके = रजस्-अधिक में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—रजोऽधिक में ये गुण जानने चाहिए: शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य, युद्ध में अपलायन न करना, और साधुओं की रक्षा। यह रजस्-स्वभाव को कर्म-उद्यम, वीरता और संरक्षण-प्रवृत्ति से जोड़ता है—शास्त्र का अपना लक्षण-वाक्य। “मध्यम” वर्ग (पूर्व क्रम) का गुण-विवरण यहीं आता है।

English rendering The text states that in one predominant in rajas the qualities to be known are valor, brilliance, firmness, skill, not fleeing in battle, and protection of the good.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / गुण-सूची। छह नामित लक्षण; कोई गणना-सूत्र नहीं।

77.7
लोभश्चासत्यवादित्वं जाड्यमालस्यमेव च ।
सेवाकर्मपटुत्वंच गुणा एते तमोऽधिके
lobhaścāsatyavāditvaṃ jāḍyamālasyameva ca |
sevākarmapaṭutvaṃca guṇā ete tamo'dhike

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लोभः = लालच; च = और; असत्यवादित्वम् = असत्य-भाषण; जाड्यम् = जड़ता / मंदता; आलस्यम् = आलस्य; सेवा-कर्म-पटुत्वम् = सेवा-कर्म में पटुता / दक्षता; च = और; गुणाः एते = ये गुण; तमोऽधिके = तमस्-अधिक में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—तमोऽधिक में ये गुण हैं: लोभ, असत्यवादित्व, जाड्य, आलस्य, तथा सेवा-कर्म में पटुता। यह सूची तमस्-स्वभाव के दोष-और-वृत्ति दोनों को एक साथ रखती है—शास्त्र का अपना लक्षण-कथन, न कि अपमान या भाग्य-दण्ड। “नीच” वर्ग (पूर्व क्रम) का गुण-विवरण यहीं पूर्ण होता है; गुण-साम्य (उदासीन) का विस्तृत गुण-श्लोक इस सप्तक में नहीं आता—पाठ-भेद/अगले प्रसंग संभव।

English rendering The text states that in one predominant in tamas the qualities are greed, untruthfulness, dullness, laziness, and skill in service-work.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / गुण-सूची। पाँच नामित लक्षण; संख्यात्मक मॉडल नहीं—केवल तमस्-वर्ग का शास्त्रीय चिह्न-समूह।

77.8
कृषिकर्मणि वाणिज्ये पटुत्वं पशुपालने ।
सत्यासत्यप्रभाषित्वं गुणसाम्ये गुणा इमे
kṛṣikarmaṇi vāṇijye paṭutvaṃ paśupālane |
satyāsatyaprabhāṣitvaṃ guṇasāmye guṇā ime

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृषिकर्मणि = कृषि-कार्य में; वाणिज्ये = व्यापार/वणिक्-वृत्ति में; पटुत्वं = कुशलता/पटुता; पशुपालने = पशु-पालन में; सत्यासत्यप्रभाषित्वं = सत्य और असत्य दोनों बोल सकने की क्षमता (वचन-पटुता); गुणसाम्ये = गुण-साम्य (तुलना/समानता) के प्रसंग में; गुणा इमे = ये गुण हैं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ गुण-साम्य की सूची में वे लक्षण गिनाता है जिनसे व्यक्ति की योग्यता आँकी जाती है—कृषि-कर्म में निपुणता, वाणिज्य में पटुता, पशु-पालन की कुशलता, तथा सत्य-असत्य दोनों पक्षों को वचन से व्यक्त कर सकने की क्षमता। ये सब “गुण” माने गए हैं, जिनकी समानता या अधिकता आगे की तुलना का आधार बनेगी। पाठक को याद रहे—यह गुण-सूची है, भाग्य का फैसला नहीं।

English rendering The text lists, under guṇa-sāmya, these qualities: skill in agriculture, competence in trade, aptitude for animal husbandry, and the capacity to speak both truth and untruth (verbal versatility). These are the guṇas reckoned in that comparison.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुण-सूची / लक्षण-वर्णन। यह श्लोक गुणों की गणना-सूची देता है; संख्या-सूत्र या अंश-विभाजन यहाँ नहीं है—केवल तुलना के लिए मान्य गुण-पदों का कथन।

77.9
गतैश्च लक्षणैर्लक्ष्य उत्तमो मध्यमोऽधमः ।
उदासीनश्च विप्रेन्द तं तत्कर्मणि योजयेत्
gataiśca lakṣaṇairlakṣya uttamo madhyamo'dhamaḥ |
udāsīnaśca viprenda taṃ tatkarmaṇi yojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गतैः लक्षणैः = पूर्वोक्त लक्षणों से; लक्ष्यः = पहचाना/लक्षित किया जाए; उत्तमः = उत्तम (श्रेष्ठ); मध्यमः = मध्यम; अधमः = अधम (निम्न); उदासीनः = उदासीन (निष्पक्ष/मध्य-निरपेक्ष श्रेणी); विप्रेन्द = हे ब्राह्मणश्रेष्ठ; तं = उसे; तत्कर्मणि = उसी (योग्य) कर्म में; योजयेत् = नियुक्त करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—पूर्वोक्त लक्षणों से व्यक्ति को उत्तम, मध्यम, अधम अथवा उदासीन श्रेणी में लक्षित किया जाए। हे विप्रेन्द्र! उसे उसी श्रेणी के अनुरूप कर्म में जोड़ा जाए। यह कर्म-नियुक्ति का गुण-वर्गीकरण है—शास्त्र का वर्गीकरण-नियम, किसी व्यक्ति पर थोपा गया “भाग्य-निर्णय” नहीं।

English rendering By those characteristics, O best of brahmins, one is to be marked as excellent (uttama), middling (madhyama), inferior (adhama), or indifferent (udāsīna), and assigned to work suited to that grade.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — श्रेणी-वर्गीकरण / कर्म-योजन। चार कोटियाँ (उत्तम–मध्यम–अधम–उदासीन) लक्षणों से निर्धारित मानी गई हैं; यह गुणात्मक वर्गीकरण है, अंश या वर्ष-गणना नहीं।

77.10
द्वाभ्यामेकोऽधिको यश्च तस्याधिक्यं निगद्यते ।
अन्यथा गुणसाम्यं च विज्ञेयं द्विजसत्तम
dvābhyāmeko'dhiko yaśca tasyādhikyaṃ nigadyate |
anyathā guṇasāmyaṃ ca vijñeyaṃ dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वाभ्याम् = (शेष) दो [गुणों] की अपेक्षा; एकः अधिकः = एक जो अधिक (प्रबल) हो; यः च = जो भी; तस्य आधिक्यम् = उसकी प्रधानता; निगद्यते = कही जाती है; अन्यथा = अन्यथा (यदि ऐसा न हो); गुण-साम्यम् = गुणों की समता; विज्ञेयम् = जानना चाहिए; द्विज-सत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ तीनों गुणों में से जो एक शेष दोनों से अधिक (प्रबल) हो, उसी की प्रधानता कही जाती है; और यदि कोई एक दोनों से अधिक न हो, तो गुण-साम्य जानना चाहिए, हे द्विज-श्रेष्ठ। यही वह निर्णायक कसौटी है जिससे उत्तम/मध्यम/अधम या उदासीन का निर्धारण होता है।

English rendering Whichever single guṇa exceeds the other two — that one's predominance is declared; otherwise, balance of the guṇas is to be understood, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह एक स्पष्ट निर्णय-नियम (comparison rule) है। तीन गुण-भार मानें: S (सत्त्व), R (रजस्), T (तमस्)। कोई गुण g प्रधान तभी है जब
g > (शेष दोनों) — अर्थात् S प्रधान ⇔ S > R ∧ S > T ।
कोई भी g यदि दोनों से कड़ाई से (strict `>`) अधिक न हो — यथा शीर्ष पर बराबरी (S = R ≥ T) या तीनों समान — तो गुण-साम्य (उदासीन)। संक्षेप में: प्रधान = वह g जो अद्वितीय अधिकतम हो; टाई ⇒ साम्य।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी जातक के लक्षणों से गुण-संकेत गिने जाएँ: S = 2, R = 1, T = 1 → S > R और S > T → सत्त्व-अधिक (उत्तम)। अब S = 2, R = 2, T = 1 → न S दोनों से अधिक, न R → कोई अद्वितीय शीर्ष नहीं → गुण-साम्य (उदासीन)। यही "द्वाभ्याम् एकोऽधिकः" बनाम "अन्यथा साम्य" का अनुप्रयोग है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "एक दो से अधिक हो" वाला कसौटी-नियम सटीक कड़ी तुलना (strict `>`) पर टिका है — बराबरी सीधे गुण-साम्य में गिरती है। यही हमारे अनुशासन का केंद्र है: कोई सहिष्णुता-पट्टी (tolerance band) नहीं, वरना "अधिक" और "साम्य" की सीमा धुँधली हो जाती — ठीक वैसे जैसे अष्टकवर्ग में ±3 पट्टी ने एक असली −1 को छिपा दिया था। हमारा oracle ऐसी सीमाओं को `==`/कड़ी तुलना से ही जाँचता है।

77.11
सेव्यसेवकयोरेवं कन्यकावरयोरपि ।
गुणैः सदृशयोरेव प्रीतिर्भवति निश्चला
sevyasevakayorevaṃ kanyakāvarayorapi |
guṇaiḥ sadṛśayoreva prītirbhavati niścalā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सेव्य-सेवकयोः = स्वामी और सेवक के (बीच); एवम् = इसी प्रकार; कन्यका-वरयोः अपि = वधू और वर के भी (बीच); गुणैः सदृशयोः एव = गुणों में समान (तुल्य) दोनों में ही; प्रीतिः = प्रेम/स्नेह; भवति = होता है; निश्चला = स्थिर, अविचल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्वामी-सेवक के बीच, तथा वर-वधू के बीच भी, स्थिर और अविचल प्रीति तभी होती है जब दोनों गुणों में परस्पर सदृश हों। यह गुण-मेल का सामान्य सिद्धांत है, जिसका सूक्ष्म विवरण अगले श्लोकों में आता है।

English rendering Between master and servant, and likewise between bride and groom, steadfast affection arises only where the two are alike in guṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नीति-कथन (गुण-सादृश्य = स्थिर सम्बन्ध)। यह एक संगति-नियम (compatibility principle) है — विवाह-मेलापक की गुण-मिलान-भावना का पूर्वरूप, पर यहाँ नक्षत्र-कूट नहीं, केवल स्वभाव-गुण-सादृश्य आधार है।

77.12
उदासीनोऽधमस्यैवमुदासीनस्य मध्यमः ।
मध्यमस्योत्तमो विप्र प्रभवत्याश्रयो मुदे
udāsīno'dhamasyaivamudāsīnasya madhyamaḥ |
madhyamasyottamo vipra prabhavatyāśrayo mude

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उदासीनः = उदासीन; अधमस्य = अधम का; एवं = इसी प्रकार; उदासीनस्य = उदासीन का; मध्यमः = मध्यम; मध्यमस्य = मध्यम का; उत्तमः = उत्तम; विप्र = हे ब्राह्मण; प्रभवति = उत्पन्न होता/सम्भव होता है; आश्रयः = आश्रय/आश्रित सम्बन्ध; मुदे = आनन्द/हर्ष के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र की श्रेणी-शृंखला यह है—अधम के लिए उदासीन आश्रय बनता है, उदासीन के लिए मध्यम, और मध्यम के लिए उत्तम; हे विप्र! ऐसा आश्रय आनन्द के हेतु प्रभवता है। यह “एक कोटि ऊपर” का आश्रय-क्रम है—उत्तम ← मध्यम ← उदासीन ← अधम की दिशा में सहारा, न कि किसी व्यक्ति का अपमान।

English rendering O brahmin, the udāsīna is a refuge for the adhama, the madhyama for the udāsīna, and the uttama for the madhyama—such dependence conduces to joy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — श्रेणी-क्रम / आश्रय-नियम। चार कोटियों का एक-सीढ़ी ऊँचा आश्रय-सम्बन्ध (अधम → उदासीन → मध्यम → उत्तम) वर्णित है; अंकगणित नहीं, केवल क्रम-संरचना।

उदाहरण (worked example) कोटि-मान निर्दिष्ट करें: अधम = 1, उदासीन = 2, मध्यम = 3, उत्तम = 4। शास्त्र-क्रम: आश्रयदाता की कोटि = आश्रित की कोटि + 1। अधम(1) का आश्रय उदासीन(2); उदासीन(2) का मध्यम(3); मध्यम(3) का उत्तम(4)। (यह केवल श्लोक के क्रम को स्पष्ट करने की संख्या-रेखा है—जन्म-कुण्डली का अंक नहीं।)

77.13
अतोऽवरा वरात् कन्य सेव्यतः सेवकोऽवरः ।
गुणैस्ततः सुखोत्पत्तिरन्यथा हानिरेव हि
ato'varā varāt kanya sevyataḥ sevako'varaḥ |
guṇaistataḥ sukhotpattiranyathā hānireva hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इसलिए; अवरा = अपेक्षाकृत निम्न/छोटी; वरात् = वर की अपेक्षा; कन्या = वधू (पाठ में "कन्य" — छन्द/पाठ-भेद संभव, अर्थ "कन्या"); सेव्यतः = स्वामी की अपेक्षा; सेवकः अवरः = सेवक निम्न (कोटि में); गुणैः ततः = गुणों के (इस मेल) से; सुख-उत्पत्तिः = सुख की उत्पत्ति; अन्यथा = अन्यथा (विपरीत हो तो); हानिः एव हि = निश्चय ही केवल हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इसलिए वधू वर से एक कोटि निम्न हो, और सेवक स्वामी से निम्न हो; गुणों के इस अनुरूप मेल से सुख उत्पन्न होता है, अन्यथा (उलटे मेल से) निश्चय ही हानि होती है। यह पिछले श्लोक का व्यावहारिक निष्कर्ष है — अवलंबी एक-कोटि नीचे, आश्रय एक-कोटि ऊपर।

English rendering Hence let the bride be one grade below the groom, and the servant below the master; from such matching by guṇas happiness arises — otherwise, indeed, only loss.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नीति-कथन (अध्याय का उपसंहार-नियम)। क्रम-नियम के रूप में: यदि आश्रय-कोटि = k हो तो अनुकूल आश्रित-कोटि = k − 1 (एक पायदान नीचे); समुचित असमानता → सुख, विपरीत → हानि। ध्यातव्य कि 77.11 (सादृश्य) और यह (एक-कोटि अंतर) परस्पर पूरक हैं — स्थिर स्नेह के लिए निकटता, और स्वामी/वर-पक्ष का हल्का आधिक्य।

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Task complete. The full per-verse treatment for BPHS chapter 77, verses 1–13, is rendered above in the exact style-prompt format (all six section labels, Devanagari not reprinted, Sanskrit sourced from `verses/ch77.json` field `sa`). Key decisions: the chapter is the सत्त्वादिगुणफल (guṇa-phala) chapter, so verses 1–9 and 11–13 are phala/nīti statements rendered as "शास्त्र कहता है / the text states" per discipline; only verse 77.10 encodes a genuine technique (the strict-dominance decision rule for guṇa predominance), so it alone carries a गणित rule + worked example. "हमारा डिकोड" was used only twice, where genuinely grounded in the dossier's §5 discipline (77.1 math/interpretation separation; 77.10 strict-comparison / no-tolerance-band, tied to the aṣṭakavarga ±3 masking-bug note). पाठ-भेद flagged at 77.4 (नारदारि→नारदादि) and 77.13 (कन्य→कन्या). No aṣṭakavarga/varga/daśā/ṣaḍbala connections were forced since the chapter computes none.

77.14
वीर्यं क्षेत्रं प्रसूतेश्च समयः सङ्गतिस्तथा ।
उत्तमादिगुणे हेतुर्बलवानुत्तरोत्तरम्
vīryaṃ kṣetraṃ prasūteśca samayaḥ saṅgatistathā |
uttamādiguṇe heturbalavānuttarottaram

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वीर्यम् = बीज/शुक्र, जनक-सामर्थ्य; क्षेत्रम् = गर्भ-भूमि, माता का उदर; प्रसूतेः समयः = जन्म का काल; सङ्गतिः = संग-सोहबत, परिवेश; उत्तम-आदि-गुणे = उत्तम/मध्यम/उदासीन/अधम गुण में; हेतुः = कारण; बलवान् उत्तरोत्तरम् = पिछले से अगला अधिक बलवान।

हिन्दी भावार्थ प्राणी में उत्तम आदि गुण के चार कारण कहे गए हैं — बीज (वीर्य), क्षेत्र (गर्भ), जन्म का समय, और संगति। और इन चारों में उत्तरोत्तर बल बढ़ता जाता है — अर्थात् बीज से क्षेत्र, क्षेत्र से जन्मकाल, और जन्मकाल से संगति क्रमशः अधिक प्रभावी है। संगति (परिवेश) को शास्त्र सबसे बलवान कारण मानता है।

English rendering The seed, the womb-field, the moment of birth, and one's associations are the four causes of a being's superior or lesser quality; and each later cause in this order is more powerful than the one before — company being the strongest.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कारण-अनुक्रम (हेतु-वर्गीकरण)। यहाँ संख्या नहीं, एक पूर्ण-क्रम (total order) दिया गया है: बल की दृष्टि से वीर्य ≺ क्षेत्र ≺ प्रसूति-काल ≺ सङ्गति। यह जन्मकाल (जिसे जातक-गणना पकड़ती है) को कारण-शृंखला में तीसरे बल पर रखता है, अकेला निर्णायक नहीं।

77.15
अतः प्रसूतिकालस्य सदृशो जातके गुणः ।
जायते तं परीक्ष्यैव फलं वाच्यं विचक्षणैः
ataḥ prasūtikālasya sadṛśo jātake guṇaḥ |
jāyate taṃ parīkṣyaiva phalaṃ vācyaṃ vicakṣaṇaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इसलिए; प्रसूति-कालस्य = जन्म-काल के; सदृशः = समान, अनुरूप; जातके गुणः = जातक में उत्पन्न गुण; परीक्ष्य एव = भली-भाँति परीक्षा करके ही; फलम् वाच्यम् = फल कहना चाहिए; विचक्षणैः = विचक्षण, विवेकी विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ चूँकि पूर्व-श्लोक के हेतुओं में जन्मकाल प्रबल है, इसलिए जातक में वही गुण उत्पन्न होता है जो उसके जन्म-काल के सदृश हो। अतः विचक्षण ज्योतिषी को चाहिए कि उस गुण की भली-भाँति परीक्षा करके ही फल कहे — बिना परीक्षा किये कदापि नहीं।

English rendering Since the birth-moment is the strongest cause, a guṇa resembling the time of birth arises in the native; therefore the discerning should declare a result only after examining it carefully.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद्धति-निर्देश (परीक्षा-पूर्वक फल-कथन)। यह श्लोक कोई गणना नहीं देता, पर पद्धति देता है — पहले परीक्षा (निरीक्षण/गणना), फिर फल-वचन; यही ज्योतिष की मूल अनुशासन-रेखा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारी decode-अनुशासन-रेखा का बीज-वाक्य है — "परीक्ष्य एव फलं वाच्यम्": पहले परीक्षा (गणित), फिर फल-कथन, और वह भी "शास्त्र कहता है" के रूप में, न कि नियति के रूप में। हमारे oracle में यही विभाजन कठोरता से पालित है — वर्ग-विभाजन, अष्टकवर्ग-बिन्दु और दशा-अवधि exact-`==` से सिद्ध होते हैं (कोई सहन-सीमा नहीं, जो एक बार −1 त्रुटि छिपा गई थी), जबकि फल को पाठ का वचन मानकर रखा जाता है।

77.16
कालः सृजति भूतनि पात्यथो संहरत्यपि ।
इश्वरः सर्वलोकानामव्ययो भगवान् विभु
kālaḥ sṛjati bhūtani pātyatho saṃharatyapi |
iśvaraḥ sarvalokānāmavyayo bhagavān vibhu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कालः = काल, समय-तत्त्व; सृजति भूतानि = प्राणियों को रचता है; पाति = पालन/रक्षा करता है (पाठ-भेद संभव: पातयति = गिराता है); अथो = और फिर; संहरति अपि = संहार भी करता है; ईश्वरः सर्वलोकानाम् = समस्त लोकों का ईश्वर; अव्ययः = अविनाशी; भगवान् विभुः = भगवान्, सर्वव्यापी।

हिन्दी भावार्थ काल ही भूतों को रचता है, उनका पालन करता है, और फिर उनका संहार भी करता है। वही समस्त लोकों का ईश्वर है — अव्यय (अविनाशी), भगवान् और विभु (सर्वव्यापी)। यहाँ शास्त्र गुण-विवेचन को काल-तत्त्व की स्तुति में प्रतिष्ठित कर देता है।

English rendering Time creates all beings, sustains them, and then withdraws them as well; imperishable, blessed and all-pervading, Time is the Lord of every world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — काल-तत्त्व की स्तुति (सृष्टि-पालन-संहार त्रिविध-कथन)। यहाँ "काल" कोई संख्या नहीं, वरन् वह आधार है जिस पर समस्त ज्योतिषीय गणना — दशा, गोचर, वर्ग — टिकी हुई है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक काल को सृष्टि-संहार का सार्वभौम आधार कहता है — और हमारा पूरा decode काल को ठीक इसी रूप में, पर संगणनीय रूप में, संभालता है: विंशोत्तरी का 120-वर्ष चक्र और षोडश-वर्ग का कोणीय विभाजन, दोनों काल का ही शुद्ध अंकगणित हैं। शास्त्र की इस स्तुति को हम नियति-कथन में नहीं बदलते; काल को हम मापते हैं (exact समय-अंकगणित), और उसका फल पाठ का वचन बना रहता है।

77.17
तच्छक्तिः प्रकृतिः प्रोक्ता मुनिभिस्त्रिगुणात्मिका ।
तथा विभक्तोऽव्यक्तोऽपि व्यक्तो भवति देहिनाम्
tacchaktiḥ prakṛtiḥ proktā munibhistriguṇātmikā |
tathā vibhakto'vyakto'pi vyakto bhavati dehinām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-शक्तिः = उसकी (काल/ईश्वर की) शक्ति; प्रकृतिः = प्रकृति; प्रोक्ता = कही गई; मुनिभिः = मुनियों द्वारा; त्रि-गुण-आत्मिका = तीन गुणों वाली (सत्त्व–रज–तम); तथा = उसी प्रकार; विभक्तः = विभक्त / भागों में बँटा; अव्यक्तः = अव्यक्त; अपि = भी; व्यक्तः = व्यक्त; भवति = हो जाता है; देहिनाम् = देहधारियों के लिए / उनमें।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस काल-ईश्वर की शक्ति को मुनियों ने त्रिगुणात्मिका प्रकृति कहा है। वही अव्यक्त, जब गुण-भेद से विभक्त होता है, तब देहधारियों में व्यक्त रूप धारण करता है। अर्थात् जगत् का प्रकटीकरण प्रकृति के तीन गुणों के विभाजन से होता है। यह श्लोक जन्म-गुण-विचार की दार्शनिक नींव रखता है: अव्यक्त से व्यक्त तक का मार्ग गुण-विभाग है।

English rendering The text states that His power is called prakṛti by the sages—threefold in guṇa; thus divided, even the unmanifest becomes manifest for embodied beings. Manifestation is framed as a guṇa-partition of the unmanifest power of Time.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व-वर्णन (त्रिगुण-प्रकृति)। “त्रि” = 3 गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) — यह शास्त्रीय गणनात्मक विभाजन नहीं, गुण-त्रयी का नाममात्र-संख्या संकेत है; कोई वक्र, अंश या बल-सूत्र नहीं।

77.18
चतुर्धाऽवयवास्तस्य स्वगुणैश्च चतुर्विधः ।
जायन्ते ह्युत्तमो मध्ये उदासीनोऽधमः क्रमात्
caturdhā'vayavāstasya svaguṇaiśca caturvidhaḥ |
jāyante hyuttamo madhye udāsīno'dhamaḥ kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्धा = चार प्रकार से; अवयवाः = अवयव / अंग; तस्य = उसके (प्रकृति/काल के); स्व-गुणैः = अपने-अपने गुणों से; च = और; चतुर्विधः = चार प्रकार का; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; हि = निश्चय; उत्तमः = उत्तम; मध्यः = मध्यम; उदासीनः = उदासीन / मध्यस्थ; अधमः = अधम; क्रमात् = क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसके अवयव चार भागों में हैं, और वे अपने गुण-भेद से चार प्रकार के होते हैं—उत्तम, मध्यम, उदासीन और अधम—क्रमशः। यह चतुर्विध वर्गीकरण अगले श्लोकों में अंग-स्थान और जाति-भेद से जोड़ा जाएगा। यहाँ “चतुर्धा / चतुर्विध” शुद्ध संख्या-संकेत हैं (4), किन्तु कोई ग्रह-बल या वर्ग-अंक-गणना नहीं।

English rendering The text states that Its parts are fourfold, and by their own guṇas they arise in four kinds—uttama, madhya, udāsīna, and adhama—in that order. A fourfold typology is introduced as the bridge from guṇa-theory to embodied rank.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण-सूत्र (चतुर्विध क्रम)। स्थिरांक: 4 अवयव / 4 गुण-कोटियाँ — उत्तम → मध्यम → उदासीन → अधम। यह श्रेणी-क्रम (ordinal rank) है, न कि रेखा-अंक या अंश-भाग का अंकगणित।

77.19
उत्तमे तूत्तमो जन्तुर्मध्येऽङ्गे च मध्यमः ।
उदासीने ह्यदासीनो जायते चाऽधमेऽधमः
uttame tūttamo janturmadhye'ṅge ca madhyamaḥ |
udāsīne hyadāsīno jāyate cā'dhame'dhamaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तमे = उत्तम (अंग/अवयव) में; तु = तो; उत्तमः = उत्तम; जन्तुः = प्राणी; मध्ये अङ्गे = मध्यम अंग में; च = और; मध्यमः = मध्यम; उदासीने = उदासीन में; हि = निश्चय; उदासीनः = उदासीन (पाठ में “अदासीनः” — पाठ-भेद संभव; अर्थ उदासीन); जायते = जन्म लेता है; च = और; अधमे = अधम में; अधमः = अधम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उत्तम अंग-अवस्था में उत्तम प्राणी, मध्यम अंग में मध्यम, उदासीन में उदासीन, और अधम में अधम जन्तु जन्म लेता है। अर्थात् जन्म-गुण का स्तर उसी अंग-कोटि से मेल खाता है जिसमें काल-शक्ति का प्रकटीकरण माना गया। यह फल-कथन है: कोटि-से-कोटि का अनुपात, न कि नियति का डर या “अनिवार्य दुर्भाग्य” का दावा।

English rendering The text states that an excellent being is born in the excellent limb-condition, a middling one in the middle limb, a neutral one in the neutral, and an inferior one in the inferior. Rank of birth is mapped, within the śāstra’s own voice, onto the fourfold limb-order already named.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अनुपात-नियम (कोटि ↔ जन्म-गुण)। संरचना: उत्तम↔उत्तम, मध्यम↔मध्यम, उदासीन↔उदासीन, अधम↔अधम — एक-एक संगत-मानचित्र (1∶1 ordinal mapping), कोई अंश-गुणन या दशा-वर्ष नहीं।

77.20
उत्तमाङ्गं शरिस्तस्य मध्यमाङ्गमुरःस्थलम् ।
जंघाद्वयौदासीनमधमं पदमुच्यते
uttamāṅgaṃ śaristasya madhyamāṅgamuraḥsthalam |
jaṃghādvayaudāsīnamadhamaṃ padamucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तम-अङ्गम् = उत्तम अंग; शिरः = सिर (पाठ में “शरिः” — पाठ-भेद संभव; प्रचलित अर्थ शिर); तस्य = उसका; मध्यम-अङ्गम् = मध्यम अंग; उरः-स्थलम् = वक्षःस्थल / छाती का क्षेत्र; जङ्घा-द्वयम् = दोनों जंघाएँ; उदासीनम् = उदासीन (अंग); अधमम् = अधम; पदम् = पैर / चरण; उच्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शरीर के चार भागों को चार कोटियों से बाँधता है: सिर उत्तमांग, उरःस्थल मध्यमांग, दोनों जंघाएँ उदासीन, और पद अधम कहा गया। यह देह-मानचित्र पूर्व-श्लोक के उत्तम–मध्यम–उदासीन–अधम क्रम को ठोस अंग-स्थान देता है। पाठ में “शरिः” शिर-अर्थ में पढ़ा जाता है; अन्य पाठ-भेद संभव। यह वर्गीकरण शरीर-अवयव-नामकरण है, न कि लग्न-अंश की गणना।

English rendering The text states that the excellent limb is the head; the middle limb the chest-region; both thighs the neutral; and the foot is called the inferior. The four ranks of 77.18–19 are thus fixed to named body-regions, head → chest → thighs → feet.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शरीर-अवयव का चतुर्विध मानचित्र। क्रम (शीर्ष → अधः): (1) शिर = उत्तम, (2) उरःस्थल = मध्यम, (3) जङ्घा-द्वय = उदासीन, (4) पद = अधम। यह स्थान-सूची (locus list) है; कोई °, ′, या वर्ग-भाग नहीं।

77.21
एवं गुणवशादेव कालभेदः प्रजायते ।
जातिभेदस्तु तद्भेदाज्जायतेऽत्र चराचरे
evaṃ guṇavaśādeva kālabhedaḥ prajāyate |
jātibhedastu tadbhedājjāyate'tra carācare

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; गुण-वशात् = गुण के वश से / गुण-प्रभाव से; एव = ही; काल-भेदः = काल का भेद; प्रजायते = उत्पन्न होता है; जाति-भेदः = जाति / प्रकार का भेद; तु = और; तत्-भेदात् = उस (काल/गुण) भेद से; जायते = उत्पन्न होता है; अत्र = यहाँ; चर-अचरे = चर-अचर जगत् में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निष्कर्ष देता है कि गुण-वश से ही काल-भेद उत्पन्न होता है, और उसी भेद से इस चर-अचर जगत् में जाति-भेद पैदा होता है। अर्थात् समय की विविधता और प्राणि-प्रकारों की विविधता—दोनों गुण-क्रम से बँधी मानी गई हैं। यह अध्याय-खंड का संक्षेप है: गुण → काल-भेद → जाति-भेद। फल-व्याख्या में इसे “अपरिहार्य दुर्भाग्य” न पढ़ें; यह शास्त्र का कारण-श्रृंखला कथन है।

English rendering The text states that differentiation of time arises from guṇa alone, and from that differentiation arises the differentiation of kinds among moving and unmoving beings here. Guṇa → kāla-bheda → jāti-bheda is the causal chain the śāstra itself closes with.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कारण-श्रृंखला / संक्षेप-वर्णन। संरचना: गुण → कालभेद → जातिभेद (चर-अचर में)। कोई संख्यात्मक स्थिरांक, दशा-वर्ष, या अष्टकवर्ग-बिंदु नहीं; तार्किक क्रम का कथन है।

77.22
एवं भगवता सृष्टं विभुना स्वगुणैः समम् ।
चतुर्विधेन कालेन जगदेतच्चतुर्विधम्
evaṃ bhagavatā sṛṣṭaṃ vibhunā svaguṇaiḥ samam |
caturvidhena kālena jagadetaccaturvidham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; भगवता / विभुना = सर्वव्यापी भगवान् द्वारा; सृष्टं = रचा गया; स्वगुणैः समम् = अपने (सत्त्व-रजस्-तमस्) गुणों के अनुसार / गुण-साम्य से; चतुर्विधेन कालेन = चतुर्विध काल के द्वारा; जगत् एतत् = यह जगत्; चतुर्विधम् = चार प्रकार का / चतुर्वर्गीय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यह जगत् सर्वव्यापी भगवान् ने अपने गुणों के अनुरूप रचा है। उसी सृष्टि-क्रम में काल भी चतुर्विध है, और उसी चतुर्विध काल के अनुरूप यह जगत् भी चार प्रकार का कहा गया है। यहाँ गुण और काल—दोनों—सृष्टि की रचना-विधि के रूप में जुड़े हैं; फल या ग्रह-गणित का कोई नियम इस श्लोक में नहीं दिया गया।

English rendering The text states that this world was created by the all-pervading Lord in accordance with His own guṇas; and, by fourfold time, this world itself is fourfold.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-वर्णन / गुण-काल संवाद। यह पद्य जगत्, गुण और चतुर्विध काल की शास्त्रीय रचना-दृष्टि बताता है; कोई वर्ग-विभाग, बिन्दु-गणना या दशा-अवधि इसमें निहित नहीं।

अध्यायः 78

नष्टजातकाध्यायः

16 श्लोक
78.1
जन्मकालवशादेवं फलं प्रोक्तं त्वया मुने ।
यज्जन्मसमयोऽज्ञातो ज्ञेयं तस्य फलं कथम्
janmakālavaśādevaṃ phalaṃ proktaṃ tvayā mune |
yajjanmasamayo'jñāto jñeyaṃ tasya phalaṃ katham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मकाल-वशात् = जन्म-समय के आधार पर; एवम् = इस प्रकार; फलम् प्रोक्तम् = फल कहा गया; त्वया मुने = आपने, हे मुनि (मैत्रेय द्वारा पराशर को सम्बोधन); यत्-जन्म-समयः अज्ञातः = जिसका जन्म-समय अज्ञात है; ज्ञेयम् तस्य फलम् कथम् = उसका फल कैसे जाना जाए।

हिन्दी भावार्थ शिष्य विनयपूर्वक कहता है — हे मुनि, अब तक आपने समस्त फल जन्म-काल (जन्मकुण्डली) के आधार पर बताए हैं। किन्तु जिस मनुष्य का जन्म-समय ही ज्ञात न हो, उसका फल किस उपाय से जाना जा सकता है? यही इस "नष्ट-जातक" अध्याय का मूल प्रश्न है।

English rendering "O sage, thus far you have declared every result as dependent on the moment of birth. But for one whose birth-time is unknown — how is his result to be known?"

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (प्रश्नोत्थान)। यह श्लोक सम्पूर्ण अध्याय की समस्या-परिभाषा है: अज्ञात जन्म-काल की दशा में फल-निर्धारण का प्रश्न, जिसका उत्तर आगे प्रश्न-लग्न से निकाला जाएगा।

78.2
शुभं वाऽप्यशुभं वापि मनुजस्य पुराकृतम् ।
अस्ति कश्चिदुपायश्चेत् तं भवान् वक्तुमर्हति
śubhaṃ vā'pyaśubhaṃ vāpi manujasya purākṛtam |
asti kaścidupāyaścet taṃ bhavān vaktumarhati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभम् = मङ्गल / अनुकूल; अशुभम् = प्रतिकूल; मनुजस्य = मनुष्य का; पुरा-कृतम् = पूर्व-कृत (कर्म); अस्ति = है; कश्चित् = कोई; उपायः = विधि / साधन; चेत् = यदि; भवान् = आप; वक्तुम् अर्हति = कहने के योग्य हैं / कहें।

हिन्दी भावार्थ शिष्य आगे निवेदन करता है — मनुष्य का शुभ या अशुभ फल उसके पूर्व-कृत से जुड़ा माना गया है। यदि जन्म-समय अज्ञात होने पर भी कोई उपाय / विधि हो, तो आप उसे कहने की कृपा करें। शास्त्र यहाँ उपाय को विधि-रूप में प्रस्तुत करने को आमंत्रित करता है, न कि अनिश्चित भय को।

English rendering “Whether favourable or unfavourable, [it is] a person’s prior doing. If there is any method [when birth-time is unknown], you ought to declare it.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अनुरोध। यह श्लोक गणना का सूत्र नहीं है; यह अज्ञात-जन्म की स्थिति में शास्त्रीय उपाय (प्रश्न-लग्न आदि) सुनाने की प्रार्थना है।

78.3
साधु पृष्टं त्वया विप्र लोकानुग्रहमानसा ।
कथयामि तव स्नेहात् फलमज्ञातजन्मनाम्
sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vipra lokānugrahamānasā |
kathayāmi tava snehāt phalamajñātajanmanām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु पृष्टम् त्वया = तुमने भली प्रकार पूछा; विप्र = हे ब्राह्मण (अब पराशर द्वारा मैत्रेय को सम्बोधन); लोक-अनुग्रह-मानसा = लोक पर अनुग्रह की भावना वाले (मन से); कथयामि तव स्नेहात् = तुम्हारे स्नेह के कारण मैं कहता हूँ; फलम् अज्ञात-जन्मनाम् = अज्ञात-जन्म वालों का फल।

हिन्दी भावार्थ पराशर प्रसन्न होकर कहते हैं — हे विप्र, लोक-कल्याण की भावना से तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया। तुम्हारे स्नेहवश मैं उन लोगों का भी फल कहता हूँ जिनका जन्म-समय अज्ञात है। यह उत्तर-प्रतिज्ञा (कहने का संकल्प) है।

English rendering "Well have you asked, O brāhmaṇa, with a heart set on the welfare of the world; out of affection for you I shall tell the result even of those whose birth is unknown."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (प्रशंसा एवं प्रतिज्ञा)। आचार्य का यह वचन आगामी विधि को "उपदेश" के रूप में प्रतिष्ठित करता है — फल-कथन शास्त्र की अपनी घोषणा है, न कि किसी नियति का दावा।

78.4
वर्षायनर्तुमासार्धतिथिनक्षत्रभादिषु ।
यदज्ञातं च तन्मानं ज्ञायते प्रश्नलग्नतः
varṣāyanartumāsārdhatithinakṣatrabhādiṣu |
yadajñātaṃ ca tanmānaṃ jñāyate praśnalagnataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्ष = संवत्सर / वर्ष; अयन = उत्तरायण-दक्षिणायन; ऋतु = षड्-ऋतु; मास = मास; अर्ध = पक्ष (शुक्ल/कृष्ण); तिथि = तिथि; नक्षत्र = नक्षत्र; भा = राशि / भ (राशि-चिह्न); आदिषु = इत्यादि में; यत् अज्ञातम् = जो अज्ञात हो; तत् मानम् = वह माप; ज्ञायते = जाना जाता है; प्रश्न-लग्नतः = प्रश्न-लग्न से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, राशि आदि काल-मानों में से जो अंश अज्ञात हो, वह प्रश्न-लग्न (प्रश्न-काल के उदित लग्न) से जाना जाता है। अज्ञात जन्म-समय की पूर्ति का मूल-सूत्र यही है: प्रश्न-लग्न को काल-सूचक मानकर लुप्त मापों का अनुमान।

English rendering “Among year, ayanā, season, month, fortnight, tithi, nakṣatra, sign and the like — whatever measure is unknown is known from the praśna-lagna.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मूल नियम (काल-मानों का प्रश्न-लग्न से अनुमान):
- अज्ञात समुच्चय 𝒮 ⊆ {वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, राशि, …}
- प्रत्येक अज्ञात माप m ∈ 𝒮 का निर्धारण प्रश्न-लग्न L_p (प्रश्न-क्षण का उदित राशि-अंश) तथा उससे व्युत्पन्न वर्ग / कारक से होता है — विस्तार 78.5–78.7 में।
- घोषणा: यहाँ “जन्म-लग्न” नहीं, प्रश्न-लग्न साक्ष्य-बिन्दु है; जन्म-काल अज्ञात होने पर प्रश्न-क्षण का लग्न ही गणना का आधार।

उदाहरण (worked example) प्रश्न-क्षण पर लग्न = कन्या 12°40′। वर्ष / अयन / ऋतु आदि में से जो भी अज्ञात हो, आगे के श्लोकों की नियम-शृंखला (द्वादशांश, लग्न-अर्ध, द्रेष्काण-स्वामी आदि) इसी L_p से चलाई जाती है — जन्म-पट्टी के बिना। (अयनांश प्रश्न-काल के देशीय/प्रयुक्त सम्प्रदाय के अनुसार घोषित करें; यह श्लोक स्वयं अयनांश नहीं बाँधता।)

78.5
प्रश्नाङ्गद्वादशांशर्क्षस्थिते जन्म वदेत् गुरौ ।
अयनं लग्नपूर्वार्धे सौम्यं याम्यं परार्धके
praśnāṅgadvādaśāṃśarkṣasthite janma vadet gurau |
ayanaṃ lagnapūrvārdhe saumyaṃ yāmyaṃ parārdhake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रश्नाङ्ग = प्रश्न-लग्न / प्रश्न-कुण्डली का अङ्ग (लग्न-सम्बद्ध); द्वादशांश = D12 वर्ग (प्रत्येक राशि के 12 भाग); र्क्ष = राशि; स्थिते गुरौ = गुरु (बृहस्पति) के स्थित होने पर / गुरु-सन्दर्भ में; जन्म वदेत् = जन्म (काल / वर्ष आदि) कहे; अयनम् = अयन; लग्न-पूर्वार्धे = लग्न के पूर्वार्ध में; सौम्यम् = सौम्य / उत्तरायण; याम्यम् = याम्य / दक्षिणायन; परार्धके = उत्तरार्ध में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — प्रश्नाङ्ग के द्वादशांश जिस राशि में पड़े, उस राशि-स्थिति (गुरु के सन्दर्भ में) से जन्म का कथन करे। अयन का निर्णय लग्न के दो अर्धों से: लग्न के पूर्वार्ध में अयन सौम्य (उत्तरायण), परार्ध में याम्य (दक्षिणायन)। इस प्रकार वर्ष/जन्म-सूचक अंश द्वादशांश-राशि से, और अयन लग्न-अर्ध से — दोनों प्रश्न-लग्न पर आधारित।

English rendering “One should declare the birth from the rāśi of the praśna-aṅga’s dvādaśāṃśa, with reference to Jupiter’s placement. The ayanā is northern (saumya) in the first half of the lagna, southern (yāmya) in the latter half.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. द्वादशांश (D12): राशि-अन्तः देशान्तर λ_s ∈ [0°, 30°); भाग-चौड़ाई = 30°/12 = 2.5°।
- द्वादशांश-सूचकांक k = ⌊λ_s / 2.5°⌋ + 1, k ∈ {1,…,12}।
- D12-राशि: सम्प्रदायानुसार विषम/सम राशि में गणना-आरम्भ भिन्न (प्रथम द्वादशांश = स्वराशि, फिर क्रमशः अगली राशियाँ — घोषित वर्ग-नियम)। प्रश्नाङ्ग के D12-र्क्ष पर गुरु-स्थिति / गुरु-सन्दर्भ से जन्म-कथन (वर्ष आदि) — पाठ यथावत्।
2. अयन लग्न-अर्ध से: लग्न-राशि में λ_L ∈ [0°, 30°):
- यदि λ_L < 15° (पूर्वार्ध) → सौम्य अयन = उत्तरायण
- यदि λ_L ≥ 15° (परार्ध) → याम्य अयन = दक्षिणायन
- अर्ध-सीमा = 15° ठीक; 15°00′ पर परार्ध (पाठ “परार्धके” के अनुकूल; 0°–15° vs 15°–30° विभाजन)।

उदाहरण (worked example) प्रश्न-लग्न = मेष 18°20′ (λ_L = 18.333…°)।
- अयन: 18°20′ ≥ 15° → याम्य / दक्षिणायन।
- द्वादशांश: λ_s = 18°20′; k = ⌊18.333…/2.5⌋ + 1 = ⌊7.333…⌋ + 1 = 8वाँ द्वादशांश। मेष विषम: प्रथम D12 = मेष, अतः 8वाँ = वृश्चिक (मेष से 8वीं)। गुरु यदि वृश्चिक में हो / उस र्क्ष-सन्दर्भ में — पाठ के अनुसार जन्म-कथन इसी D12-र्क्ष से। (D12-मानचित्रण का पूर्ण नियम षोडश-वर्ग अध्याय के समान घोषित रखें; पाठ-भेद संभव जहाँ संस्करण D12-आरम्भ भिन्न बाँधें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) द्वादशांश D12 षोडश-वर्ग-शृंखला का सदस्य है: 30° राशि का 12 समान चापों में विभाजन — शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। हमारे वर्ग-इंजन में D1…D60 की प्रत्येक पार्टिशन नियत चाप-चौड़ाई और घोषित मानचित्रण-नियम से चलती है; यहाँ 2.5° चाप और लग्न-अर्ध 15° सीमा दोनों `==` जाँच के योग्य स्थिरांक हैं — अनुमान-बैण्ड नहीं।

78.6
ऋतुर्लग्नदृकाणर्क्षस्वामिभिः शशिरादयः ।
शनिशुक्रकुजेन्दुज्ञजीवैर्ग्रीष्मस्तु भानुना
ṛturlagnadṛkāṇarkṣasvāmibhiḥ śaśirādayaḥ |
śaniśukrakujendujñajīvairgrīṣmastu bhānunā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऋतुः = षड्-ऋतु; लग्न-दृकाण-र्क्ष-स्वामिभिः = लग्न के द्रेष्काण (D3) की राशि के स्वामियों से; शशिर-आदयः = शिशिर आदि (ऋतु-क्रम); शनि-शुक्र-कुज-इन्दु-ज्ञ-जीवैः = शनि, शुक्र, मङ्गल, चन्द्र, बुध, गुरु द्वारा; ग्रीष्मः = ग्रीष्म ऋतु; तु = परन्तु / विशेषतः; भानुना = सूर्य से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ऋतु का ज्ञान लग्न-द्रेष्काण जिस राशि में पड़े उसके स्वामी से होता है; शिशिर आदि ऋतु शनि, शुक्र, कुज, चन्द्र, बुध और गुरु से जाने जाते हैं; ग्रीष्म विशेष रूप से भानु (सूर्य) से। अर्थात् द्रेष्काण-स्वामी की ग्रह-पहचान षड्-ऋतु से जोड़ दी गई है, और ग्रीष्म का स्पष्ट आरोपण सूर्य पर है।

English rendering “The season is known from the lords of the rāśi of the lagna’s drekkāṇa — the seasons beginning with Śiśira by Saturn, Venus, Mars, Moon, Mercury and Jupiter; but Grīṣma is by the Sun.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. द्रेष्काण (दृकाण, D3): राशि-अन्तः चाप 10°:
- 0°–10° → 1म द्रेष्काण; 10°–20° → 2य; 20°–30° → 3य।
- क्लासिकल मानचित्रण: 1म = स्वराशि; 2य = उससे 5वीं; 3य = उससे 9वीं। उस द्रेष्काण-राशि का स्वामी = लग्नदृकाणर्क्षस्वामी।
2. ऋतु-आरोपण (पाठानुसार, शिशिरादि क्रम):
| स्वामी | ऋतु (शिशिरादि) |
|--------|----------------|
| शनि | शिशिर |
| शुक्र | वसन्त |
| कुज | (क्रम में तृतीय; ग्रीष्म-स्थल — नीचे) |
| चन्द्र (इन्दु) | वर्षा |
| बुध (ज्ञ) | शरद् |
| गुरु (जीव) | हेमन्त |
| सूर्य (भानु) | ग्रीष्म (विशेष निर्देश) |

पाठ “ग्रीष्मस्तु भानुना” से ग्रीष्म सूर्य पर नियत है; कुज-सूची में रहते हुए भी ग्रीष्म-फल भानु से — पाठ-भेद संभव जहाँ टीकाएँ कुज=ग्रीष्म बाँधें और सूर्य को अतिरिक्त/स्थानापन्न कहें। हम मूल वाक्य रखते हैं: ग्रीष्म = सूर्य।

उदाहरण (worked example) प्रश्न-लग्न = वृषभ 14°10′।
- द्रेष्काण: 14°10′ ∈ [10°, 20°) → 2य द्रेष्काण। वृषभ से 5वीं = कन्या; स्वामी = बुध।
- बुध → शरद् ऋतु (शिशिरादि क्रम में पाँचवाँ)।
- यदि द्रेष्काण-स्वामी सूर्य होता (उदा. सिंह-द्रेष्काण), तो ऋतु = ग्रीष्म।
(सम्प्रदाय: द्रेष्काण-मानचित्रण ऊपर घोषित; अन्य द्रेष्काण-पद्धति हो तो अलग से घोषित करें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) द्रेष्काण D3 भी षोडश-वर्ग का नियत सदस्य है — 30° → तीन 10° चाप, घोषित राशि-मानचित्रण। वर्ग-इंजन में यही विभाजन अन्य वर्गों की तरह मॉड्यूलर है; यहाँ फल-पक्ष (ऋतु-नाम) शास्त्र-कथन है, गणना पक्ष केवल “द्रेष्काण-स्वामी कौन” है — दोनों अलग रखे जाते हैं।

78.7
अयनर्तुविरोधे तु परिवर्त्याः परस्परम् ।
बुधचन्द्र सुराचार्याः कुजशुक्रशनैश्चरैः
ayanartuvirodhe tu parivartyāḥ parasparam |
budhacandra surācāryāḥ kujaśukraśanaiścaraiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अयन-ऋतु-विरोधे = अयन और ऋतु में विरोध होने पर; तु = तो; परिवर्त्याः = बदल देने योग्य / परस्पर परिवर्तनीय; परस्परम् = एक-दूसरे से; बुध-चन्द्र-सुराचार्याः = बुध, चन्द्र, गुरु (सुराचार्य = बृहस्पति); कुज-शुक्र-शनैश्चरैः = मङ्गल, शुक्र, शनि के साथ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि अयन और ऋतु परस्पर विरुद्ध ठहरें, तो उन्हें परस्पर परिवर्तित करना चाहिए। परिवर्तन का ग्रह-युग्म: बुध, चन्द्र और सुराचार्य (गुरु) — कुज, शुक्र और शनैश्चर के साथ। अर्थात् अयन-ऋतु-सङ्गति टूटने पर द्रेष्काण-स्वामी (या तत्सम्बद्ध ग्रह-पक्ष) को इन तीन-तीन के युग्म-विनिमय से संशोधित कर ऋतु/सङ्गति ठीक की जाती है।

English rendering “When ayanā and ṛtu conflict, they are to be mutually exchanged: Mercury, Moon and Jupiter with Mars, Venus and Saturn.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. विरोध (conflict): 78.5 से प्राप्त अयन (उत्तरायण/दक्षिणायन) और 78.6 से प्राप्त ऋतु — यदि शास्त्रीय सङ्गति से न मिलें (उदा. ऐसा ऋतु-ग्रह जो अयन-अर्ध से असम्भव/विरुद्ध माना जाए), तो संशोधन लागू।
2. युग्म-विनिमय (परस्पर परिवर्तन):
- बुध ↔ कुज (मङ्गल)
- चन्द्र ↔ शुक्र
- गुरु (सुराचार्य) ↔ शनि
तीन सौम्य/शीत-पक्षीय: {बुध, चन्द्र, गुरु} ↔ तीन क्रूर/मिश्र: {कुज, शुक्र, शनि}।
विरोधावस्था में द्रेष्काण-स्वामी (या ऋतु-निर्धारक ग्रह) को युग्म-साथी से बदलकर नया ऋतु 78.6 की तालिका से पुनः पढ़ें; अयन 78.5 का लग्न-अर्ध ज्यों का त्यों रह सकता है या पाठ “परिवर्त्याः परस्परम्” से दोनों पक्ष समायोज्य — संक्षिप्त पाठ; विस्तृत क्रम टीका-भेद से “पाठ-भेद संभव”।
3. संशोधित ऋतु: विनिमय-पश्चात् स्वामी S′ → 78.6 तालिका → ऋतु′; ग्रीष्म फिर भी भानु-नियम से बाँधें यदि S′ = सूर्य।

उदाहरण (worked example) लग्न-अर्ध से अयन = उत्तरायण (λ_L = 8°)। द्रेष्काण-स्वामी = शनि → 78.6 से शिशिर। यदि प्रयुक्त सम्प्रदाय में यह अयन-ऋतु-युग्म “विरुद्ध” गिना जाए, तो शनि ↔ गुरु: संशोधित स्वामी = गुरु → हेमन्त। (कौन-सा युग्म “विरोध” कहलाए — यह श्लोक केवल विनिमय-नियम देता है, विरोध की पूर्ण सूची नहीं; गणना में विरोध-मानदंड घोषित रखना आवश्यक।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ गणित दो पूर्व-चरणों (लग्न-अर्ध-अयन + D3-स्वामी-ऋतु) का सङ्गति-संशोधन है — नयी वर्ग-परिभाषा नहीं। हमारा अनुशासन वही: पहले 15° और 10° चापों से अयन और द्रेष्काण-स्वामी `==` निकालें, फिर विरोध होने पर ही युग्म-तालिका लागू करें; फल-वाक्य को “शास्त्र कहता है” रखें, नियति-घोषणा न बनाएँ।

78.8
मासो दृकाणपूर्वार्धेर्पूर्वोऽन्यस्तु परार्धके ।
अनुपातात् तिथिर्ज्ञेया भास्करांशसमा द्विज
māso dṛkāṇapūrvārdherpūrvo'nyastu parārdhake |
anupātāt tithirjñeyā bhāskarāṃśasamā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मासः = मास (पक्ष/मास-निर्णय); दृकाण = द्रेष्काण (D3; 30° ÷ 3 = 10°); पूर्वार्धे = दृकाण के पूर्वार्ध में; पूर्वः = पूर्व मास; परार्धके = उत्तरार्ध में; अन्यः = अन्य (परवर्ती) मास; अनुपातात् = समानुपात से; तिथिः = तिथि; भास्करांशसमा = सूर्य के अंशों के समान; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मास का निर्णय दृकाण के आधार पर किया जाए — दृकाण के पूर्वार्ध में पूर्व मास, और परार्ध में अन्य मास गिना जाता है। तिथि अनुपात-विधि से जानी जाए; वह भास्कर (सूर्य) के अंशों के समान मानी जाती है। यह काल-निर्धारण की प्रक्रिया का एक चरण है, न कि किसी फल की घोषणा।

English rendering The text states that the month is fixed from the drekkāṇa: the earlier month in its first half, the other in the latter half. The tithi is to be known by proportion and is taken as equal to the Sun’s degrees (aṃśas).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दृकाण-विभाजन: एक राशि 30° को तीन बराबर खंडों में —
D3-खंड k = ⌊λ_mod30 / 10°⌋ + 1 (k ∈ {1,2,3}), प्रत्येक खंड 10°।
खंड का पूर्वार्ध = [0°, 5°) सापेक्ष खंड, परार्ध = [5°, 10°]।
मास-नियम (पाठानुसार): पूर्वार्ध → “पूर्व” मास; परार्ध → “अन्य” मास (किस घटना-युग्म पर लागू — जन्माङ्ग/प्रश्न-लग्न आदि — संदर्भ-परंपरा से निश्चित; पाठ-भेद संभव)।
तिथि: अनुपातात्, भास्करांशसमा — सूर्य के राशि-अंश a° (0 ≤ a < 30) के समान तिथि-संख्या (लगभग 1…30) ली जाए; सूक्ष्म तिथि के लिए चन्द्र–सूर्य अन्तर (12° = 1 तिथि) की पूर्ण गणना अलग नियम है; यहाँ पाठ का स्थूल समानुपात-नियम यही है।

उदाहरण (worked example) मान लें लक्ष्य-बिन्दु (जैसे लग्न या संदर्भ-ग्रह) λ में राशि-अंश = 17°40′।
दृकाण k = ⌊17.667/10⌋ + 1 = 2; खंड-आंतरिक स्थिति = 7.667° → परार्ध (> 5°) → “अन्य” मास।
सूर्य-अंश यदि 17° हों तो पाठानुसार तिथि ≈ 17 (अनुपात-समानता; सूक्ष्म तिथि = (λ_☾ − λ_☉)/12° अलग गणना)।
(आयनांश/गृह-पद्धति यहाँ मास-दृकाण नियम पर सीधे लागू नहीं; सूर्य-अंश सौर देशान्तर पर निर्भर।)

78.9
तद्वशादिष्टकालो यो जन्मकालसमो हि सः ।
तत्र ग्रहांश्च भावांश्च ज्ञात्वा तस्य फलं वदेत्
tadvaśādiṣṭakālo yo janmakālasamo hi saḥ |
tatra grahāṃśca bhāvāṃśca jñātvā tasya phalaṃ vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-वशात् = उस (विधि) के बल से; इष्ट-कालः यः = जो इष्ट-काल (निकाला गया वांछित क्षण); जन्म-काल-समः हि सः = वही जन्म-काल के तुल्य है; तत्र ग्रहान् च भावान् च ज्ञात्वा = उस क्षण के ग्रह और भाव जानकर; तस्य फलम् वदेत् = उसका फल कहे।

हिन्दी भावार्थ उपर्युक्त विधि से जो इष्ट-काल (क्षण) सिद्ध होता है, वही जन्म-काल के समान माना जाता है। उस क्षण की ग्रह-स्थिति और भाव-स्थिति की गणना करके फिर उसी आधार पर फल का कथन करना चाहिए।

English rendering "By that method the derived moment (iṣṭa-kāla) obtained is verily equal to the birth-time; knowing the planets and the houses at that moment, one may declare the result."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) संश्लेषण-चरण (कोई नई राशि नहीं)। पूर्व श्लोकों से निर्धारित वर्ष, अयन, ऋतु, मास, तिथि से इष्ट-काल t का पुनर्निर्माण होता है; तत्पश्चात् उस t पर मानक ग्रह-स्फुट एवं भाव-गणना कर कुण्डली रची जाती है। यह गणना (chart-reconstruction) है — इसके पश्चात् का "फल" शास्त्र की अपनी घोषणा है, कोई नियति-दावा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे दो-परत अनुशासन का पूर्ण दृष्टान्त है: पहले नियतात्मक गणना — इष्ट-काल t* की पुनर्रचना और उस पर ग्रह/भाव-स्फुट (शुद्ध खगोलीय-अंकगणित); फिर पृथक् रूप से फल-कथन, जिसे "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, न कि प्रमाणित भविष्यवाणी के रूप में।

78.10
गुरुर्द्वादशभ्र्वर्षैः पुनस्तद्राशिगो भवेत् ।
तत् कस्मिन् पर्ययो तस्य ज्ञेयः संवत्सरो मुने
gururdvādaśabhrvarṣaiḥ punastadrāśigo bhavet |
tat kasmin paryayo tasya jñeyaḥ saṃvatsaro mune

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुः = बृहस्पति; द्वादशभिः वर्षैः = बारह वर्षों से (पाठ: «द्वादशभ्र्वर्षैः» — पाठ-भेद संभव; प्रचलित संधि द्वादशभिर्वर्षैः); पुनः = फिर; तद्-राशि-गः = उसी राशि में स्थित; पर्ययः = चक्र/आवृत्ति; संवत्सरः = वर्ष; मुने = हे मुने।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गुरु बारह वर्ष बाद पुनः उसी राशि में आता है। इसलिए जिस पर्यय (चक्र) में वह राशि-स्थिति पड़ती है, उसी से संबंधित संवत्सर जाना जाए। यह आयु/वर्ष-अनुमान का खगोलीय ढाँचा है, न कि नियति-घोषणा।

English rendering The text states that Jupiter returns to the same sign in twelve years. From that, in which cycle (paryaya) the placement falls, the corresponding year is to be known.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गुरु-पर्यय (स्थूल):
T_♃ ≈ 12 वर्ष प्रति राशि-चक्र (पूर्ण राशि-मण्डल ≈ 12 × 12 = 144 वर्ष का स्थूल ढाँचा; यहाँ पाठ केवल 12-वर्षीय राशि-पुनरावृत्ति कहता है)।
यदि जन्म/प्रश्न-काल में गुरु राशि R में, और वर्तमान/इष्ट काल में भी गुरु R में, तो संभावित आयु-वर्ष:
A ∈ { …, a₀−24, a₀−12, a₀, a₀+12, a₀+24, … }
जहाँ a₀ = अनुमानित मूल वर्ष-अन्तर; चयन “कस्मिन् पर्यये” = कौन-सा 12-वर्षीय चक्र।
(सूक्ष्म गुरु-काल ≈ 11.86 वर्ष — पाठ का स्थिरांक 12 वर्ष ही है; आधुनिक इफेमेरिस से मिलान अलग परत।)

उदाहरण (worked example) प्रश्नकर्ता की अनुमानित आयु ~35 वर्ष; इष्ट चार्ट में गुरु उसी राशि में जहाँ “जन्म-सदृश” स्थिति मानी गई।
संभावित पर्यय-वर्ष: 35 के निकट 12 के गुणज — 24, 36, 48… में 36 सर्वाधिक निकट → संवत्सर-परिकल्पना = 36 वर्ष (आगे 78.11–78.12 से संशय-निवारण)।

78.11
संवस्तरस्य सन्देहे प्रश्नकर्तुर्द्विजोत्तम ।
वयोऽनुमानतस्तत्र द्वादश द्वादश क्षिपेत्
saṃvastarasya sandehe praśnakarturdvijottama |
vayo'numānatastatra dvādaśa dvādaśa kṣipet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संवत्सरस्य सन्देहे = वर्ष में सन्देह होने पर; प्रश्न-कर्तुः = प्रश्नकर्ता का; द्विज-उत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; वयः-अनुमानतः = आयु के अनुमान से; तत्र = वहाँ; द्वादश द्वादश क्षिपेत् = बारह-बारह (के गुणज) जोड़ता जाए।

हिन्दी भावार्थ यदि संवत्सर (वर्ष) के विषय में सन्देह हो, तो प्रश्नकर्ता की अनुमानित आयु के आधार पर उसमें बारह-बारह वर्ष जोड़ते जाएँ — जब तक निकाला गया वर्ष उसकी आयु से मेल न खा जाए। इस प्रकार बृहस्पति-चक्र की अनिश्चितता दूर हो जाती है।

English rendering "If there be doubt about the year, O best of the twice-born, then by an estimate of the questioner's age, add twelve upon twelve there (until it fits)."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) modulo-12 अस्पष्टता का समाधान आयु-अनुमान से। मान लें अनुमानित आयु ≈ A वर्ष; तब जन्म-वर्ष के k का चयन इस प्रकार कि (y₀ + 12k) प्रेक्षित-वर्ष − A के निकटतम हो। अर्थात् k = round[(current_year − A − y₀) ÷ 12]; अन्तिम संवत्सर = y₀ + 12k।

उदाहरण (worked example) मान लें गुरु-राशि से आधार-वर्ष y₀ का अवशेष निकला, प्रश्नकर्ता की अनुमानित आयु A ≈ 37। तब क्रमशः y₀, y₀+12, y₀+24, y₀+36, y₀+48 में से वह चुनें जो जन्म को लगभग 37 वर्ष पूर्व रखे — यहाँ y₀+36 (k = 3) सर्वाधिक संगत।

78.12
तत्रापि संशये जाते गुरुर्लग्नत्रिकोणगः ।
कल्प्यो वयोऽनुमानेन वत्सरः पूर्ववत् ततः
tatrāpi saṃśaye jāte gururlagnatrikoṇagaḥ |
kalpyo vayo'numānena vatsaraḥ pūrvavat tataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्रापि संशये = वहाँ भी सन्देह होने पर; गुरुः = बृहस्पति; लग्न-त्रिकोण-गः = लग्न-त्रिकोण (1, 5, 9) में स्थित — कल्प्यः = कल्पना किया जाए; वयोऽनुमानेन = आयु-अनुमान से; वत्सरः = वर्ष; पूर्ववत् = पूर्ववत्।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि फिर भी संशय रहे, तो गुरु को लग्न-त्रिकोण में स्थित कल्पित करें और आयु-अनुमान से वर्ष पूर्ववत् (बारह-बारह जोड़कर) सिद्ध करें। यह द्वितीय-स्तरीय कल्पना-नियम है — गणना में विकल्प बाँधने के लिए।

English rendering If doubt still remains, the text states that Jupiter should be assumed in a trikoṇa from the lagna, and the year fixed as before by age-estimation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) लग्न-त्रिकोण: भाव-संख्या H ∈ {1, 5, 9} (लग्न से)।
कल्पना: राशि(गुरु) ∈ { राशि(लग्न), राशि(लग्न)+4 mod 12, राशि(लग्न)+8 mod 12 }।
तत्पश्चात् संवत्सर: A_k = A_base + 12k, वयोऽनुमान से चयन — “पूर्ववत्” = 78.10–78.11।
त्रिकोण = 120° स्थानिक वर्ग (समान तत्व-त्रय); यहाँ फल नहीं, वर्ष-कल्पना का बाधा-नियम है।

उदाहरण (worked example) लग्न = कन्या (राशि 6)। त्रिकोण-राशियाँ: 6 (कन्या), 10 (मकर), 2 (वृष)।
यदि गुरु-इफेमेरिस इन तीन में से एक में बैठे (या कल्पित हो), A_est = 28 → A_k ∈ {…, 16, 28, 40…} में 28।
(भाव-पद्धति: राशि-लग्न से त्रिकोण; श्रीपति/पोर्फिरी आदि खंड-भाव यहाँ आवश्यक नहीं जब तक लग्न-राशि ही आधार हो।)

78.13
ज्ञात्वा मासं ससूर्यांशं कालज्ञानं कथं भवेत् ।
भगवन्निति मे ब्रूहि लोकानुग्रहचेतसा
jñātvā māsaṃ sasūryāṃśaṃ kālajñānaṃ kathaṃ bhavet |
bhagavanniti me brūhi lokānugrahacetasā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञात्वा मासम् = मास जानकर; स-सूर्य-अंशम् = सूर्य के अंशों सहित; काल-ज्ञानम् कथम् भवेत् = (सूक्ष्म) काल का ज्ञान कैसे हो; भगवन् = हे भगवन्; इति मे ब्रूहि = यह मुझे कहिए; लोक-अनुग्रह-चेतसा = लोक-कल्याण की भावना वाले मन से।

हिन्दी भावार्थ शिष्य पुनः पूछता है — हे भगवन्, मास और सूर्य के अंश तो ज्ञात हो गए, किन्तु उससे भी सूक्ष्म काल (घटी-पल तक) का ज्ञान कैसे हो? लोकहित की भावना से यह भी मुझे बताने की कृपा कीजिए। यह प्रश्न आगे की सूर्य-गति-आधारित घटी-गणना (श्लोक 14–16) का द्वार खोलता है।

English rendering "Having known the month together with the Sun's degrees, how is the (precise) time to be known? O Bhagavān, tell me this, with a heart set on the welfare of the world."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (प्रश्नोत्थान)। श्लोक सूक्ष्म काल-मापन की माँग करता है; इसका उत्तर आगे सूर्योदय से जन्म-क्षण तक की घटी सूर्य की स्फुट-गति से निकालने वाले सूत्रों में दिया जाएगा (इष्ट-सूर्यांश एवं औदयिक-सूर्य का अन्तर ÷ सूर्य-गति → घट्यादि-मान)।

78.14
सक्रान्तेरिष्टसूर्यांशतुल्येऽह्नि द्विजसत्तम ।
रविरौदयिकः साध्यस्तस्येष्टार्कस्य चान्तरम्
sakrānteriṣṭasūryāṃśatulye'hni dvijasattama |
raviraudayikaḥ sādhyastasyeṣṭārkasya cāntaram

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सक्रान्तेः = सूर्य की राशि-संक्रान्ति (sign-ingress) से गिनकर; इष्ट-सूर्यांश = अभीष्ट (जन्म-कालिक) सूर्य के अंश; तुल्ये अह्नि = जिस दिन (के सूर्य) के बराबर हों उस दिन; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (सम्बोधन); रविः औदयिकः = उस दिन सूर्योदय-कालीन सूर्य (audayika ravi); साध्यः = गणित से सिद्ध करना; तस्य इष्टार्कस्य च अन्तरम् = और उस औदयिक रवि तथा इष्ट रवि का अन्तर (भोगांश-भेद)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विजश्रेष्ठ, पूर्व अध्याय-क्रम से मास और सूर्य के अंश ज्ञात हो चुके हैं; अब जिस दिन संक्रान्ति से गिने गये सूर्य के अंश उस अभीष्ट (जन्म) सूर्य के अंशों के तुल्य पड़ें, उसी दिन का सूर्योदय-कालीन (औदयिक) सूर्य स्पष्ट करना चाहिए। फिर उस औदयिक सूर्य और इष्ट (जन्म-कालिक) सूर्य के बीच का अन्तर निकालना — यही अगले चरण का आधार है। यह नष्ट-जन्म के दिन-भीतर के इष्टकाल तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है।

English rendering O best of the twice-born, on the day when the Sun (reckoned from its saṅkrānti) equals the desired birth-Sun in degrees, compute that day's sunrise Sun (audayika ravi); then take the interval between that sunrise Sun and the desired Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अन्तर = इष्टार्क − औदयिक अर्क, अर्थात् Δλ = λ(इष्ट) − λ(सूर्योदय)। दोनों एक ही राशि-अंश-कला पद्धति में मापे जाते हैं। यह अन्तर वही चाप (arc) है जितना सूर्य उस दिन सूर्योदय से जन्म-क्षण तक चला — अगले श्लोक में इसे काल (घटी) में बदला जाएगा। संक्रान्ति को आधार मानने के कारण सायन/निरयण तथा अयनांश-परिपाटी घोषित करना आवश्यक (पाठ-भेद संभव: निरयण संक्रान्ति सामान्य परिपाटी है)।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए सिद्ध औदयिक अर्क = किसी राशि में 9°41′ और इष्ट (जन्म) अर्क = 10°00′। तब अन्तर Δλ = 10°00′ − 9°41′ = 0°19′ = 19 कला। यही 19 कला श्लोक 15 का इनपुट है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह चरण जो अन्तिम फल देता है — एक स्पष्ट (true) सूर्य-देशान्तर — वही हमारी वर्ग-इंजन (D1…D60) की एकमात्र कच्ची सामग्री है: प्रत्येक वर्ग देशान्तर पर विशुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित है (kaal_ekavimshati_varga.py)। दॉसिये की अनुशासन-रेखा — "जहाँ संख्या परिपाटी पर निर्भर हो वहाँ अयनांश/संक्रान्ति-आधार घोषित करो" — यहाँ ठीक लागू होती है, क्योंकि संक्रान्ति-सन्दर्भ सायन बनाम निरयण चयन पर टिका है।

78.15
कलीकृत्य स्वषण्निघ्नं स्फुटार्कगतिभाजितम् ।
लब्धंघट्यादिमानं यत् तावान् सूर्योदयात् परम्
kalīkṛtya svaṣaṇnighnaṃ sphuṭārkagatibhājitam |
labdhaṃghaṭyādimānaṃ yat tāvān sūryodayāt param

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलीकृत्य = (अन्तर को) कला में परिणत करके; स्वषण्-निघ्नं = "षट्/षष्"-गुणित (शब्दार्थतः ×6; पाठ-भेद संभव — दैनिक-घटी-संगति के लिए ×60/षष्टि अपेक्षित); स्फुटार्क-गति-भाजितम् = स्पष्ट (true) सूर्य की दैनिक गति से भाग दिया हुआ; लब्धं घट्यादि-मानं = लब्धि घटी-पल आदि का मान; तावान् सूर्योदयात् परम् = उतना ही सूर्योदय के आगे (उपरान्त)।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक के अन्तर को कला बनाकर, गुणा करके, और स्पष्ट सूर्य की दैनिक गति से भाग दो; जो घटी-पल में लब्धि मिले, उतना ही समय सूर्योदय के बाद जन्म का इष्टकाल है। तात्पर्य सरल है — सूर्य ने सूर्योदय से जन्म-क्षण तक जितना चाप तय किया, वह पूरे दिन की गति का जितना भाग है, दिन के 60 घटी में से उतने ही घटी बीत चुके। यों अज्ञात जन्म का दिन-भीतर का क्षण अंकगणित से निकल आता है।

English rendering Reduce that interval to kalās, multiply it (by the day-factor), and divide by the Sun's true daily motion; the ghaṭīs-and-palas obtained are exactly the time elapsed after sunrise — that is the birth moment.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) इष्टकाल (घटी) = 60 × Δλ ÷ (स्फुटार्क-गति), जहाँ Δλ और गति एक ही चाप-इकाई (कला) में हों और 60 = एक सावन दिन में घटी-संख्या। पाठ का "षण्/षष्" शब्दतः 6 है, पर सिद्धान्ततः गुणक षष्टि = 60 ही होना चाहिए (60 घटी = 1 दिन); अतः यहाँ पाठ-भेद संभव, और गणितीय रूप से संचालक स्थिरांक 60 है। भागफल का घटी>… पल में विभाजन: 1 घटी = 60 पल।

उदाहरण (worked example) श्लोक 14 से Δλ = 19 कला लें; स्फुटार्क-गति ≈ 0°57′ = 57 कला/दिन (सूर्य मन्दोच्च के निकट धीमा)। तब इष्टकाल = 60 × 19 ÷ 57 = 1140 ÷ 57 = 20 घटी। 20 घटी × 24 मिनट = 480 मिनट = सूर्योदय के 8 घण्टे बाद; सूर्योदय ~6:00 मानें तो जन्म ~14:00 (2 अपराह्न)। तुलना-जाँच: यदि गुणक 6 लिया जाए तो 6 × 19 ÷ 57 = 2 घटी (≈48 मिनट) — जो 8-घण्टे-वाले संरेखण से असंगत है; यही आयामी (dimensional) जाँच 60 बनाम 6 का पाठ-भेद उजागर कर देती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ जो घटी-मान निकलता है वही हमारी विंशोत्तरी दशा-इंजन का प्रवेश-बिन्दु है — दॉसिये के शब्दों में "बीते नक्षत्र-अंश पर विशुद्ध अनुपात-अंकगणित" (vedic-ghadi/kaal दशा-इंजन); इष्टकाल के बिना चन्द्र-नक्षत्र-भाग और ग्रह-देशान्तर तय ही नहीं होते। ×6/×60 का यह पाठ-भेद ठीक उसी "exact-`==`, सहन-पट्टी (tolerance) नहीं" अनुशासन का उदाहरण है जिसने अष्टकवर्ग में एक बार छिपे −1 को पकड़ा था — यहाँ आयामी जाँच से सही स्थिरांक 60 पिन होता है।

78.16
पूर्वं जन्मेष्टकालो हि क्रमाज् ज्ञेयो विपश्चिता ।
साधितौदयिकादर्कादिष्टेऽर्केऽनिकहीनके
pūrvaṃ janmeṣṭakālo hi kramāj jñeyo vipaścitā |
sādhitaudayikādarkādiṣṭe'rke'nikahīnake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वं = पहले/पूर्ववर्ती दिशा में; जन्म-इष्टकालः = जन्म का इष्टकाल; क्रमात् ज्ञेयः = क्रमशः जानना चाहिए; विपश्चिता = विद्वान् (गणक) के द्वारा; साधित-औदयिकात् अर्कात् = सिद्ध किये गये औदयिक (सूर्योदय-कालीन) सूर्य से; इष्टे अर्के अनिक-हीनके = जब इष्ट सूर्य (औदयिक से) ऊन/हीन (कम) हो (पाठ-भेद संभव — "अनिक" अस्पष्ट; सम्भवतः "ऊन/हीन = न्यून" वा "अधिक" का पाठान्तर)।

हिन्दी भावार्थ विद्वान् गणक को साधित औदयिक सूर्य से क्रमपूर्वक जन्म का इष्टकाल निकालना चाहिए; और जब इष्ट सूर्य उस औदयिक सूर्य से हीन (कम) पड़े, तब गणना "पूर्व" (पिछली) दिशा में करनी चाहिए। अर्थात् अन्तर की दिशा (धन/ऋण) के अनुसार क्षण सूर्योदय के आगे या पीछे रखा जाता है — इसी विवेक से इष्टकाल की सही दिशा तय होती है। श्लोक 15 का "सूर्योदय के आगे" तथा यह श्लोक का "पूर्व" — दोनों मिलकर अन्तर के चिह्न को सँभालते हैं।

English rendering From the computed sunrise Sun the wise should determine the birth moment step by step; and when the desired Sun falls short of (is less than) that sunrise Sun, the reckoning is taken to the earlier side — the sign of the interval fixes whether the moment lies after or before sunrise.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दिशा-नियम: यदि λ(इष्ट) ≥ λ(औदयिक) → इष्टकाल = सूर्योदय + 60·Δλ/गति (श्लोक 15); यदि λ(इष्ट) < λ(औदयिक) → अन्तर ऋण, अतः क्षण उसी क्रम में "पूर्व" (पूर्ववर्ती सूर्योदय) की ओर समायोजित। यह विशुद्ध चिह्न-सापेक्ष (signed) घटाव है, कोई सहन-पट्टी नहीं — Δλ का चिह्न ही एकमात्र निर्णायक। ("अनिक" पद पर पाठ-भेद संभव; तात्पर्य "हीन = न्यून" से लिया गया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह "इष्ट < औदयिक तो पूर्व की ओर" वाला चिह्न-विवेक ठीक वही सटीक-केस अनुशासन है जिसे हमारा kaal-verification-oracle लागू करता है — मान exact `==`/signed-रूप में जाँचे जाते हैं, अनुमानित सहन-पट्टी से नहीं (दॉसिये §5)। दिशा की एक चूक पूरे इष्टकाल को उलट देती, अतः यहाँ धन/ऋण को स्पष्ट पिन करना उसी "छिपे −1 को कभी न चूकने" वाली विधि का पालन है।

अध्यायः 79

प्रव्रज्यायोगाध्यायः

15 श्लोक
79.1
अथ विप्र प्रवक्ष्यामि योगं प्रव्रज्यकाभिधम् ।
प्रव्रजन्ति जना येन सम्प्रदायान्तरं गृहात्
atha vipra pravakṣyāmi yogaṃ pravrajyakābhidham |
pravrajanti janā yena sampradāyāntaraṃ gṛhāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय); प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; योगम् = योग को; प्रव्रज्यका-अभिधम् = "प्रव्रज्या" नामक (संन्यास-योग); प्रव्रजन्ति = घर त्यागकर निकल जाते हैं; जनाः = लोग; येन = जिसके कारण; सम्प्रदाय-अन्तरम् = किसी अन्य (साधु-)सम्प्रदाय में; गृहात् = गृहस्थ-जीवन से।

हिन्दी भावार्थ पराशर मैत्रेय से कहते हैं — हे ब्राह्मण, अब मैं वह योग बताऊँगा जिसका नाम "प्रव्रज्या-योग" है। यही वह ग्रह-स्थिति है जिसके प्रभाव से मनुष्य गृहस्थ-आश्रम को छोड़कर किसी संन्यास-सम्प्रदाय में दीक्षित होकर परिव्राजक बन जाता है। यह अध्याय संन्यास-योग का समर्पित विवेचन है।

English rendering Now, O brāhmaṇa, I shall expound the yoga named pravrajyā (going-forth into renunciation), by which people leave the household and enter into another order of ascetics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-प्रस्तावना / संवाद-वचन। यह मंगलाचरण-सूचक श्लोक अगले श्लोकों के लिए विषय-निर्धारण करता है; "प्रव्रज्या" शब्द ही अध्याय की कुंजी है — गृह-त्याग का कारक ग्रह-बल है, दंड नहीं।

79.2
चतुरादिभिरेकस्थैः प्रव्रज्या बलिभिः समाः ।
रव्यादिभिस्तपस्वी च कपाली रक्तवस्त्रभृत्
caturādibhirekasthaiḥ pravrajyā balibhiḥ samāḥ |
ravyādibhistapasvī ca kapālī raktavastrabhṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्-आदिभिः = चार या उससे अधिक ग्रहों से; एकस्थैः = एक ही भाव/राशि में स्थित; बलिभिः = बलवान होते हुए; प्रव्रज्या = संन्यास (होता है); समाः = तुल्य/समान रूप से; रवि-आदिभिः = सूर्य आदि (क्रम) से; तपस्वी = (सूर्य से) तपस्वी; कपाली = (चन्द्र से) कपाल-धारी; रक्त-वस्त्र-भृत् = (मंगल से) लाल वस्त्र धारण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि चार या अधिक बलवान ग्रह किसी एक ही भाव में एकत्र हों, तो जातक में प्रव्रज्या-योग बनता है। उस संन्यास का स्वरूप उन ग्रहों में जो सर्वाधिक बली हो, उससे निर्धारित होता है — सूर्य प्रधान हो तो तपस्वी, चन्द्र हो तो कपाली, मंगल हो तो रक्त-वस्त्रधारी परिव्राजक। यह ग्रह-अनुसार सम्प्रदाय-वर्गीकरण की तालिका का आरम्भ है।

English rendering When four or more strong planets stand together in one house, renunciation results; and by the strongest among them — reckoned from the Sun onward — one becomes a tapasvī (Sun), a skull-bearing kāpālī (Moon), or a wearer of red robes (Mars).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह गणनात्मक गणना-नियम (count-rule) है, फल नहीं। कारक-संख्या: एकस्थ बली ग्रह ≥ 4 ⇒ प्रव्रज्या-योग सक्रिय। स्वरूप-निर्धारक: max‑बल ग्रह (वीर्याधिक)। ग्रह→सम्प्रदाय प्रतिचित्रण (श्लोक 2–3, क्रमात्):
सूर्य → तपस्वी; चन्द्र → कपाली; मंगल → रक्तवस्त्रभृत्; बुध → एकदण्डी; गुरु → यति; शुक्र → चक्रधर; शनि → निर्ग्रन्थिक। (7 ग्रह → 7 कोटियाँ; एकैक निर्धारक = बल-max।)

उदाहरण (worked example) मान लें किसी भाव में सूर्य, बुध, शुक्र, शनि — चारों बली (≥4 शर्त पूर्ण) एकस्थ हैं। यदि इनमें षड्बल-रूप में शनि का बल max हो (मान लें शनि 9.2 रूप > शेष), तो कोटि = शनि की = निर्ग्रन्थिक; चूँकि 4 ≥ 4 योग-द्वार खुला और argmax(बल) = शनि।

हमारा डिकोड (Our Decode) "वीर्याधिकस्य" = बल-max ग्रह की पहचान — यही षड्बल (BPHS अ.27) की गणना का उपयोग-बिन्दु है: स्थान+दिक्+काल+चेष्टा+नैसर्गिक+दृग् बल का योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), फिर argmax। हमारी अनुशासन-रेखा — गणना (कौन सर्वाधिक बली) यंत्र-सटीक; कोटि-फल शास्त्र का कथन, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

79.3
एकदण्डी यतिश्चक्रधरो निर्ग्रन्थिकः क्रमात् ।
ज्ञेया वीर्याधिकस्यैव सबलेषु बहुष्वपि
ekadaṇḍī yatiścakradharo nirgranthikaḥ kramāt |
jñeyā vīryādhikasyaiva sabaleṣu bahuṣvapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकदण्डी = एक-दण्ड धारण करने वाला; यतिः = यति; चक्रधरः = चक्र-धारी; निर्ग्रन्थिकः = निर्ग्रन्थ (बंधन-रहित) साधक; क्रमात् = (रव्यादि) क्रम से; वीर्याधिकस्य = अधिक वीर्य वाले की; सबलेषु बहुष्वपि = अनेक सबल ग्रहों में भी; ज्ञेया = जानी जाए।

हिन्दी भावार्थ प्रव्रज्या के भेद रव्यादि क्रम में आगे बढ़ते हैं: एकदण्डी, यति, चक्रधर, निर्ग्रन्थिक — यही क्रम पूरा होता है। बहुत से सबल ग्रह एकत्र हों तो भी शास्त्र कहता है कि निर्णय उस ग्रह के अनुसार करें जिसका वीर्य उन सब में अधिक हो। प्रकार-सूची बल-अधिक्य से बँधी है, न कि मात्र राशि-नाम से।

English rendering In order (continuing from the Sun series) the text lists ekadaṇḍin, yati, cakradhara, and nirgranthika; even among several strong planets, the form of pravrajyā is to be known from the one that has the greater strength.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) रव्यादि-क्रम (इस पाठ की ६ जातियाँ, पद 79.2–79.3 मिलाकर):

| क्रम \(k\) | ग्रह | प्रव्रज्या-प्रकार (पाठ) |
|---|---|---|
| 1 | सूर्य | तपस्वी |
| 2 | चंद्र | कपाली / रक्तवस्त्रभृत् |
| 3 | मंगल | एकदण्डी |
| 4 | बुध | यति |
| 5 | गुरु | चक्रधर |
| 6 | शुक्र | निर्ग्रन्थिक |

निर्णय-नियम: \(g^\ = \arg\max<sub>g\in S</sub> B(g)\) जहाँ \(B\) = घोषित बल-माप; प्रव्रज्या-प्रकार = क्रम-तालिका\([g^\]\)। शनि का अलग नाम इस पाठ-पंक्ति में नहीं आता — पाठ-भेद/अध्याय-शेष संभव। राहु–केतु यहाँ प्रव्रज्यका-सूची में नहीं गिने गए।

उदाहरण (worked example) एकस्थ \(S = \{\)मंगल, बुध, गुरु, शुक्र\(\}\); \(B\) (रूप): मंगल 7.1, बुध 6.4, गुरु 8.0, शुक्र 6.9। \(g^\=\) गुरु → चक्रधर-प्रव्रज्या (शास्त्र-कथन)। यदि गुरु 6.5 और मंगल 7.1 हों तो \(g^\=\) मंगल → एकदण्डी।

79.4
सूर्येणाऽस्तं गतास्ते चेदपि वीर्यसमन्विताः ।
अदीक्षितास्तदा ज्ञेया जनास्तद्गतभक्तयः
sūryeṇā'staṃ gatāste cedapi vīryasamanvitāḥ |
adīkṣitāstadā jñeyā janāstadgatabhaktayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्येण = सूर्य से; अस्तं गताः = अस्तंगत (दहन/सूर्य-समीप); ते = वे (एकस्थ ग्रह); अपि वीर्यसमन्विताः = बलयुक्त होने पर भी; अदीक्षिताः = दीक्षा-रहित / औपचारिक प्रव्रज्या न लेने वाले; तद्गतभक्तयः = उस (मार्ग/सम्प्रदाय) के प्रति भक्ति रखने वाले; ज्ञेयाः = जाने जाएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: यदि वे एकस्थ ग्रह सूर्य के कारण अस्त हों, तो बलवान दिखने पर भी फल “पूर्ण दीक्षित प्रव्रज्या” नहीं, बल्कि अदीक्षित — उस मार्ग के प्रति भक्ति/अनुराग — कहा गया है। अस्त-अवस्था यहाँ योग-फल को शिथिल/परिवर्तित करने वाली शर्त है।

English rendering The text states that if those planets have gone into combustion under the Sun, then even when endowed with strength they mark people as uninitiated, yet devoted to that path — not as fully ordained renunciates.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अस्त-शर्त (सूर्य-समीपता) + फल-रूपांतर:
- ग्रह \(g\) अस्त जब \(|\lambda_g - \lambda_\odot|\) ≤ अस्त-सीमा \(d_g\) (परंपरा-निर्भर; साधारणतः भिन्न ग्रह–भिन्न अंश — घोषित करें, एक सार्वभौम संख्या थोपें नहीं)।
- यदि \(\forall g\in S\setminus\{\odot\}\) (या पाठानुसार वे सब) अस्त और \(B(g)\) उच्च → फल = अदीक्षित / तद्गत-भक्ति (79.4), पूर्ण प्रव्रज्या-दीक्षा नहीं।
- यह दहन-ज्यामिति + बल का संयोजन है; फल-कथन शास्त्र का है।

उदाहरण (worked example) कन्या में बुध, शुक्र, मंगल, गुरु; \(\lambda_\odot = 165^\circ\)। मान लें घोषित अस्त-सीमाएँ: बुध \(12^\circ\), शुक्र \(10^\circ\), मंगल \(17^\circ\), गुरु \(11^\circ\)। देशांतर: बुध \(168^\circ\), शुक्र \(170^\circ\), मंगल \(172^\circ\), गुरु \(174^\circ\) → सभी \(|\Delta\lambda|\) सीमा के भीतर → अस्त। बल उच्च होने पर भी शास्त्र-कथन: अदीक्षित, उस सम्प्रदाय-भक्ति वाला — दीक्षित तपस्वी/यति नहीं।

79.5
अस्तंगता निर्बलाश्चेत् सबलश्च रविर्यदा ।
तदा रविभवा ज्ञेया प्रव्रज्या द्विजसत्तम
astaṃgatā nirbalāścet sabalaśca raviryadā |
tadā ravibhavā jñeyā pravrajyā dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्तंगताः = अस्त हुए; निर्बलाः = बलहीन; सबलः रविः = सूर्य सबल; रविभवा = सूर्य से उत्पन्न / सूर्य-प्रकार की; प्रव्रज्या = गृह-त्याग; द्विजसत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज।

हिन्दी भावार्थ यदि वे ग्रह अस्त भी हों और निर्बल भी, तथा सूर्य स्वयं सबल हो, तो शास्त्र कहता है कि प्रव्रज्या सूर्य-भव — तपस्वी-पंक्ति की सूर्य-प्रकार — मानी जाए। अस्त+निर्बल समूह पर सूर्य का बल प्रभुत्व जताता है; शिष्य को यह सूर्य-फल के रूप में जानने को कहा गया है।

English rendering When those planets are combust and weak while the Sun is strong, the text states that the pravrajyā is to be known as solar in origin — the Sun’s own form of renunciation — O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सशर्त फल-नियम (79.4 का पूरक):
- शर्त A: सदस्य अस्त (ऊपर की \(\Delta\lambda\)-सीमा)।
- शर्त B: \(B(g)\) निम्न / निर्बल (दहलीज घोषित — प्रायः षड्बल-रूप तुलना)।
- शर्त C: \(B(\odot)\) उच्च / सबल।
- यदि A ∧ B ∧ C → प्रव्रज्या-प्रकार = रविभव = तपस्वी (79.2 का सूर्य-पद)।
- 79.4 (अस्त + बलवान सदस्य → अदीक्षित) बनाम 79.5 (अस्त + निर्बल सदस्य + सबल सूर्य → सूर्य-प्रव्रज्या) — बल-दशा फल-द्वार खोलती है।

उदाहरण (worked example) चार ग्रह सूर्य-समीप अस्त; उनके रूप ≤ 3.0 (निर्बल दहलीज मान लें 4.0 रूप); सूर्य 7.5 रूप। शर्तें पूरी → शास्त्र-कथन: रविभवा प्रव्रज्या (तपस्वी-प्रकार)। यदि सदस्य 6+ रूप हों तो 79.4 लागू — अदीक्षित-भक्ति, पूर्ण रवि-प्रव्रज्या नहीं।

79.6
जन्मभेशोऽन्यखेटैश्चेददृष्टः शनिमीक्षते ।
तयोर्बलवशात्तत्र प्रव्रज्यामाप्नुयान्नरः
janmabheśo'nyakheṭaiścedadṛṣṭaḥ śanimīkṣate |
tayorbalavaśāttatra pravrajyāmāpnuyānnaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मभेशः = जन्म-नक्षत्र का स्वामी (जन्मभ-ईश); अन्यखेटैः = अन्य ग्रहों से; अदृष्टः = अन ascpected / अनदेखा; शनिं ईक्षते = शनि को देखता है (दृष्टि); तयोः बलवशात् = उन दोनों (जन्मभेश और शनि) के बल के अनुसार; प्रव्रज्याम् आप्नुयात् = प्रव्रज्या प्राप्त करे — ऐसा शास्त्र कहता है; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक दूसरा मार्ग बताता है: यदि जन्म-नक्षत्र का स्वामी अन्य ग्रहों की दृष्टि से मुक्त हो और वह शनि को देखे, तो उन दोनों के बल के अनुसार व्यक्ति प्रव्रज्या-योग का भागी कहा गया है। यहाँ एकस्थ-चतुर्ग्रह नियम नहीं, बल्कि जन्मभ-स्वामी और शनि की दृष्टि-संबंध + बल-तुलना है।

English rendering The text states that if the lord of the birth-nakṣatra is unaspected by other planets and aspects Saturn, then according to the strength of those two a person is said to come to pravrajyā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दृष्टि-योग (जन्मभेश–शनि):
1. जन्म-नक्षत्र \(N = \lfloor \lambda_\mathrm{Moon} / 13^\circ20' \rfloor\) (0…26); भेश = \(N\) का स्वामी (कृत्तिका→सूर्य, रोहिणी→चंद्र, … — मानक 27-स्वामी चक्र)।
2. शर्त: जन्मभेश पर अन्य ग्रह-दृष्टि नहीं (दृष्टि-नियम घोषित: पूर्ण-राशि दृष्टि — सूर्य/मंगल/गुरु/शनि की विशेष दृष्टि; चंद्र/बुध/शुक्र सप्तम आदि)।
3. जन्मभेश शनि को देखता हो (पारस्परिक/एकतरफा — पाठ “शनिमीक्षते” = भेश शनि को देखे)।
4. फल-तीव्रता/प्रकार: \(B(\text{भेश})\) और \(B(\text{शनि})\) की तुलना से (तयोर्बलवशात्) — बलवान पक्ष प्रव्रज्या-स्वरूप को झुकाता है; अगला पद केवल-शनि दशा बाँधता है।

उदाहरण (worked example) चंद्र \(\lambda = 48^\circ\) → नक्षत्र = मृगशिरा (5; 0-आधार पर अनुक्रम जाँच: अश्विनी… → मृगशिरा का स्वामी मंगल)। मंगल अन्य ग्रहों से अन ascpected (whole-sign दृष्टि-तालिका से रिक्त); मंगल शनि (मकर) पर दृष्टि डालता है (मंगल की विशेष चतुर्थ/अष्टम आदि — घोषित दृष्टि-पद्धति से सत्यापित)। \(B(\text{मंगल})=6.8\), \(B(\text{शनि})=5.2\) → शास्त्र: बलवश प्रव्रज्या; बल-अधिक मंगल-पक्ष झुकाव (व्यक्ति-निश्चित भाग्य नहीं — पाठ-नियम)।

79.7
निर्बलो जन्मभेशश्चेत् केवलेनार्किणेक्षितः ।
तदा शनिभवमेव प्रव्रज्यां आप्नुयाज्जनः
nirbalo janmabheśaścet kevalenārkiṇekṣitaḥ |
tadā śanibhavameva pravrajyāṃ āpnuyājjanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्बलः = बलहीन; जन्मभेशः = जन्म-नक्षत्र स्वामी; केवलेन अर्किणा = केवल शनि से; ईक्षितः = दृष्ट; शनिभवम् एव = केवल शनि से उत्पन्न (शनि-प्रकार) प्रव्रज्या; आप्नुयात् जनः = जन प्राप्त करे — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ यदि जन्मभेश स्वयं निर्बल हो और केवल शनि ही उसे देखे (अन्य दृष्टि न हो), तो शास्त्र कहता है कि प्रव्रज्या शनिभव ही मानी जाए। यह 79.6 का सीमा-मामला है: भेश दुर्बल + एकमात्र अर्कि-दृष्टि → शनि-मार्ग की प्रव्रज्या-संज्ञा।

English rendering The text states that if the birth-star lord is weak and is aspected only by Saturn, the person is said to obtain solely the Saturn-born form of pravrajyā.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) विशेष-मामला (केवल-शनि दृष्टि):
- शर्त 1: \(B(\text{जन्मभेश})\) निम्न / निर्बल (घोषित दहलीज)।
- शर्त 2: दृष्टा-समुच्चय \(A = \{\text{ग्रह जो भेश पर दृष्टि डालते हैं}\} = \{\text{शनि}\}\) ही — “केवलेन अर्किणा”।
- फल: प्रव्रज्या-प्रकार = शनिभव एव (इस पाठ में 79.2–79.3 की रव्यादि-६ सूची में शनि-नाम अलग नहीं; यहाँ “शनिभव” स्वतंत्र संज्ञा — पाठ-भेद/परंपरा में दिगंबर-क्षपणक आदि नाम मिल सकते हैं; इस श्लोक पर अटकाएँ “शनिभव” ही)।
- 79.6 (भेश शनि को देखे, अन्य से अदृष्ट) ≠ 79.7 (भेश निर्बल, केवल शनि भेश को देखे) — कर्ता-कर्म दृष्टि-दिशा और बल-दशा भिन्न।

उदाहरण (worked example) जन्मभेश = बुध; \(B(\text{बुध})=2.8\) रूप (निर्बल); केवल शनि बुध-राशि पर दृष्टि रखता है; सूर्य/मंगल/गुरु आदि दृष्टा नहीं। शर्तें पूरी → शास्त्र-कथन: शनिभव प्रव्रज्या। यदि गुरु भी बुध को देखे तो “केवलेन” टूटता है — 79.7 लागू नहीं।

79.8
शनिदृक्काणसंस्थे च शनिभौमनवांशके ।
शनिदृष्टे विधौ ज्ञेया प्रव्रज्या शनिसम्भवा
śanidṛkkāṇasaṃsthe ca śanibhaumanavāṃśake |
śanidṛṣṭe vidhau jñeyā pravrajyā śanisambhavā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनि-दृक्काण-संस्थे = शनि के द्रेष्काण (D3) में स्थित; शनि-भौम-नवांशके = शनि–मंगल के नवांश (D9) में; शनि-दृष्टे = शनि से दृष्ट; विधौ = चन्द्र में; प्रव्रज्या = संन्यास/वैराग्य-प्रवृत्ति; शनि-सम्भवा = शनि से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्र शनि के दृक्काण में हो, और शनि–मंगल सम्बन्धी नवांश में हो, तथा शनि से दृष्ट भी हो, तब शनि-जन्य प्रव्रज्या जाननी चाहिए। यह फल-कथन वर्ग-स्थिति और दृष्टि के योग पर टिका है। पाठ-भेद संभव जहाँ “शनिभौमनवांशके” की व्याख्या एक-ग्रह-नवांश या युति-सम्बन्ध के रूप में ली जाए।

English rendering The text states that when the Moon stands in Saturn’s drekkāṇa, in a Saturn–Mars navāṃśa context, and is aspected by Saturn, renunciation arising from Saturn is to be understood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Placement checks in two divisional maps + one aspect rule (no free constant). For longitude λ (sidereal, ayanāṃśa declared):
• D3 (दृक्काण/द्रेष्काण): each rāśi of 30° → 3 equal arcs of 10°; drekkāṇa-index = ⌊(λ mod 30°)/10°⌋ ∈ {0,1,2}; map to lord per the chosen D3 rule.
• D9 (नवांश): each rāśi → 9 equal arcs of 3°20′; navāṃśa-index = ⌊(λ mod 30°)/(10°/3)⌋ ∈ {0…8}; map by odd/even-sign sequence as in BPHS Ch.6.
• Saturn-aspect on Moon: classical full aspect of Saturn on the houses 3, 7, and 10 from Saturn (whole-sign or degree-based — declare convention).
Condition for this śloka: Moon’s D3-lord = Saturn and Moon’s D9 is in the Saturn–Mars navāṃśa frame stated and Saturn aspects Moon.

उदाहरण (worked example) Convention: Lahiri ayanāṃśa; whole-sign dṛṣṭi for the aspect clause. Suppose Moon λ = 17°20′ Capricorn (Makara).
• D3: (17°20′)/10° → second drekkāṇa of Capricorn; if that slot is Saturn-ruled under the engine’s D3 map, first limb holds.
• D9: (17°20′)/(3°20′) → index 5; map Capricorn’s 6th navāṃśa per Ch.6 sequence — check whether it falls in a Saturn/Mars navāṃśa as the verse requires.
• If Saturn is in Libra (7th from Capricorn) or in Virgo/Aries (3rd/10th), whole-sign Saturn-aspect on Moon holds.
When all three limbs are true together, the text marks शनि-सम्भवा प्रव्रज्या.

हमारा डिकोड (Our Decode) D3 and D9 here are pure modular partitions of the 30° rāśi — the same ṣoḍaśa-varga arithmetic the varga engine implements (D1…D60). We keep the check exact: longitude → varga-index → lord map; no interpretive “feel” replaces the three concurrent conditions. Phala remains the śāstra’s claim, not a fate-endorsement.

79.9
कुजादिषु जयी शुक्रः सौम्यगो याम्यगोऽपि वा ।
जयी सौम्यगतश्चान्यः परस्परयुतौ भवेत्
kujādiṣu jayī śukraḥ saumyago yāmyago'pi vā |
jayī saumyagataścānyaḥ parasparayutau bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज-आदिषु = मंगल आदि में; जयी = विजयी (ग्रह-युद्ध में); शुक्रः = शुक्र; सौम्य-गः = उत्तर-गोल/सौम्य-मार्ग में स्थित; याम्य-गः = दक्षिण-गोल/याम्य-मार्ग में; अपि वा = अथवा; अन्यः = अन्य (ग्रह); परस्पर-युतौ = परस्पर युति में; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कुज आदि ग्रहों के बीच शुक्र जयी होता है, चाहे वह सौम्य-गो हो या याम्य-गो। तथा जो अन्य ग्रह जयी हो और सौम्य-गत हो, वह (उस संदर्भ में) परस्पर युति में विचारणीय है। यह श्लोक प्रव्रज्या-कारकों के बल/विजय-क्रम की ओर संकेत करता है — किसकी “प्रवृत्ति” प्रधान मानी जाए, जब युद्ध या युति हो।

English rendering The text states that among Mars and the others, Venus is the conqueror — whether placed on the northern (saumya) or southern (yāmya) course; and another conqueror on the saumya course is considered when planets are mutually conjoined.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) No new numeric constant in the verse itself. The operational idea is graha-yuddha / relative victory among candidate pravrajya-kārakas:
• Identify the set of planets that qualify as प्रव्रज्याकारक (from the chapter’s earlier rules).
• Apply the classical war-victory hierarchy the tradition uses for these comparisons (Venus named जयी over कुजादि in this statement).
• Hemisphere tag: declination δ > 0 → सौम्य; δ < 0 → याम्य (or northern/southern celestial course — declare ephemeris).
• Mutual conjunction: |λᵢ − λⱼ| within the yuti orb the chosen school uses (often same rāśi for whole-sign work).

उदाहरण (worked example) Suppose Mars and Venus are both pravrajya-kārakas and share a sign (e.g. both in Taurus). The verse’s ranking names Venus as जयी over कुजादि, whether Venus’s declination is north or south. If another planet (say Mercury) is also a conqueror and has δ > 0, and is in mutual yuti with the set, that conjunction is taken into the strength/victory ledger before assigning which pravrajya-stream is primary.

79.10
प्रव्रज्याकारकः खेटो यद्यन्येन पराजितः ।
तदा लब्धां परिव्रज्यां परित्यजति तां पुनः
pravrajyākārakaḥ kheṭo yadyanyena parājitaḥ |
tadā labdhāṃ parivrajyāṃ parityajati tāṃ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रव्रज्या-कारकः = संन्यास का कारक; खेटः = ग्रह; यदि = यदि; अन्येन = अन्य से; पराजितः = पराजित; तदा = तब; लब्धाम् = प्राप्त हुई; परिव्रज्याम् = प्रव्रज्या को; परित्यजति = त्याग देता है; तां पुनः = उसे फिर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि प्रव्रज्या का कारक ग्रह किसी अन्य ग्रह से पराजित हो जाए, तो प्राप्त हुई परिव्रज्या को मनुष्य पुनः छोड़ देता है। अर्थात् कारक की “विजय-स्थिति” टूटने पर पहले गृहीत वैराग्य-मार्ग का परित्याग बताया गया है। यह फल-कथन है — युद्ध/पराजय की शर्त पर आधारित, न कि निरपेक्ष नियति।

English rendering The text states that if the planet causing renunciation is defeated by another, then the renunciation already obtained is abandoned again.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (conditional abandonment of pravrajya). The only quantitative handle is the prior victory/defeat test between kāraka and opponent (yuddha or comparative bala), which this verse does not re-derive; it only states the phala when पराजय holds.

79.11
बहवो जन्मकाले चेत् प्रव्रज्याकारका ग्रहाः ।
बलतुल्यास्तदा तत्र प्रव्रज्या कतमा भवेत्
bahavo janmakāle cet pravrajyākārakā grahāḥ |
balatulyāstadā tatra pravrajyā katamā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहवः = अनेक; जन्म-काले = जन्म-समय पर; चेत् = यदि; प्रव्रज्या-कारकाः = प्रव्रज्या के कारक; ग्रहाः = ग्रह; बल-तुल्याः = बल में समान; तदा = तब; तत्र = वहाँ; प्रव्रज्या कतमा = कौन-सी प्रव्रज्या; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्वयं प्रश्न उठाता है — यदि जन्म-काल में अनेक प्रव्रज्याकारक ग्रह हों और वे बल में तुल्य हों, तो वहाँ कौन-सी प्रव्रज्या मानी जाए? यह श्लोक अगले उत्तर की प्रस्तावना है: बहुलता + समबल की समस्या। प्रेमपूर्ण अध्यापक-स्वर में: पहले कारकों को पहचानो, फिर उनके बलों की तुलना करो — समता हो तो निर्णय अधूरा रहता है जब तक अगला नियम न लगे।

English rendering The text asks: if at birth there are many planets causing renunciation and they are equal in strength, then which form of renunciation obtains there?

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Strength-equality test (comparative, not a new formula in this line). For planets P₁…Pₙ that are प्रव्रज्याकारक:
compute B(Pᵢ) by the chosen bala scheme (BPHS ṣaḍbala: sthāna + dig + kāla + ceṣṭā + naisargika + dṛg; 1 rūpa = 60 virūpas).

बलतुल्य means B(Pᵢ) == B(Pⱼ) within the exact comparison policy you declare — oracle discipline prefers exact equality on the same unit scale, not a loose ± band that can hide a real unit difference.
If several kārakas satisfy equality, this verse leaves the identity of the pravrajya open — answered next.

उदाहरण (worked example) Convention: full ṣaḍbala in virūpas. Suppose Saturn, Jupiter, and Mercury are all pravrajya-kārakas with totals 420, 420, and 420 virūpas (7.00 rūpas each). Then बलतुल्याः holds and the text’s question applies: which single pravrajya? The next verse supplies the multi-stream answer when many are strong.

हमारा डिकोड (Our Decode) Where strength decides among yogas, we treat ṣaḍbala as stated numeric rules summed in rūpa/virūpa — computational, not “feel.” Exact `==` on the same scale is the method; a tolerance band that once hid a real −1 elsewhere taught us not to blur equality here either. The phala of which order still belongs to the śāstra’s next statement.

79.12
बहवो बलिनश्चेत् स्युः प्रव्रज्याकारका ग्रहाः ।
तदा प्राप्नोति सर्वेषां तेषां प्रव्रज्यकां ध्रुवम्
bahavo balinaścet syuḥ pravrajyākārakā grahāḥ |
tadā prāpnoti sarveṣāṃ teṣāṃ pravrajyakāṃ dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहवः = अनेक; बलिनः = बलवान्; चेत् स्युः = यदि हों; प्रव्रज्या-कारकाः ग्रहाः = प्रव्रज्या के कारक ग्रह; तदा = तब; प्राप्नोति = प्राप्त करता है; सर्वेषाम् = सबकी; तेषाम् = उनकी; प्रव्रज्यकाम् = प्रव्रज्या को; ध्रुवम् = निश्चय से (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि अनेक प्रव्रज्याकारक ग्रह बलवान् हों, तो मनुष्य उन सबकी प्रव्रज्या निश्चित रूप से प्राप्त करता है। अर्थात् सम/बहु-बल स्थिति में एक ही मार्ग तक सीमित न रहकर सर्वाधार-प्रवृत्ति का फल बताया गया है। “ध्रुवम्” यहाँ शास्त्र का निश्चय-वचन है — हम इसे नियति का दावा नहीं बनाते।

English rendering The text states that if many planets causing renunciation are strong, then the person certainly obtains the renunciate mode of all of them.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Threshold logic on the kāraka set. Let K = {planets that are प्रव्रज्याकारक}. Let “बलिन्” mean B(P) ≥ θ_P where θ_P is the per-planet strength threshold of the chosen bala system (or relative ranking: all members of K above a peer cut).
If |{P ∈ K : बलिन्(P)}| ≥ 2 (बहवः), the text’s phala is union of their pravrajya-streams (सर्वेषां … प्रव्रज्यकां), not a single exclusive pick.
No new year-count or bindu total is given in this śloka.

उदाहरण (worked example) K = {Saturn, Jupiter, Venus}; ṣaḍbala totals 480, 450, 430 virūpas, each above its conventional adequacy mark for “strong.” The text then assigns the combined pravrajya-pattern of all three, rather than only the single highest.

79.13
तत्तद्ग्रहदशाकाले प्रव्रज्यां याति तद्भवाम् ।
त्यक्त्वा गृहीतपूर्वां तामन्यां प्राप्नोति मानवः
tattadgrahadaśākāle pravrajyāṃ yāti tadbhavām |
tyaktvā gṛhītapūrvāṃ tāmanyāṃ prāpnoti mānavaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत्-ग्रह-दशा-काले = प्रत्येक उस ग्रह की दशा-काल में; प्रव्रज्याम् = प्रव्रज्या को; याति = जाता है; तत्-भवाम् = उस (ग्रह) से उत्पन्न; त्यक्त्वा = छोड़कर; गृहीत-पूर्वाम् = पहले ली हुई; ताम् अन्याम् = उसे / दूसरी को; प्राप्नोति = प्राप्त करता है; मानवः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — मनुष्य तत्तद् ग्रह की दशा-काल में उसी ग्रह से उत्पन्न प्रव्रज्या की ओर जाता है; पहले गृहीत प्रव्रज्या को छोड़कर दूसरी प्राप्त करता है। बहु-कारक होने पर समय-क्रम दशा से बँधा बताया गया है: एक धारा छोड़कर दूसरी — परिवर्तन का नियम, भय का नहीं।

English rendering The text states that in the daśā period of each such planet the person enters the renunciation arising from that planet; abandoning the one previously adopted, the human obtains another.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Timing = daśā of the kāraka planet (chapter does not restate the full key here; Vimśottarī is the standard computational frame when Moon-nakṣatra daśā is used).
Vimśottarī mahādaśā years (Σ = 120): Ketu 7, Venus 20, Sun 6, Moon 10, Mars 7, Rāhu 18, Jupiter 16, Saturn 19, Mercury 17.
Balance at birth from Moon’s elapsed fraction in the birth nakṣatra; antardaśā = (mahādaśā-yr × antar-planet-yr) / 120.
Rule encoded here: in daśā (and by extension relevant antardaśā) of kāraka Gᵢ → phala stream of Gᵢ; on entry to daśā of Gⱼ → prior stream left, Gⱼ’s stream taken (as the text states).

उदाहरण (worked example) Convention: Vimśottarī from Moon’s nakṣatra. Suppose Saturn and Jupiter are both pravrajya-kārakas. In Saturn mahādaśā the text assigns शनि-भवा प्रव्रज्या; when Jupiter mahādaśā (or its operative antardaśā) runs, that prior form is said to be left and गुरु-भवा प्रव्रज्या obtained. Exact start dates need birth Moon longitude, ayanāṃśa, and the 120-yr key — pure ratio arithmetic on the elapsed nakṣatra fraction.

हमारा डिकोड (Our Decode) The 120-year Vimśottarī cycle and antardaśā ratio (MD-yr × AD-yr)/120 are exactly the daśā arithmetic in the vedic-ghadi/kaal engines. Here the verse supplies the mapping daśā-of-kāraka → that kāraka’s pravrajya-stream; the engine supplies only the clock, not an endorsement of the phala.

79.14
दृष्टेष्विन्द्विज्यलग्नेषु शनिना नवमे गुरुः ।
राजयोगेऽत्र जातोऽसौ तीर्थिकृन्नऽत्र संशयः
dṛṣṭeṣvindvijyalagneṣu śaninā navame guruḥ |
rājayoge'tra jāto'sau tīrthikṛnna'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृष्टेषु = दृष्ट होने पर; इन्दु-इज्य-लग्नेषु = चन्द्र, गुरु (इज्य) और लग्न में; शनिना = शनि से; नवमे = नवम भाव में; गुरुः = गुरु; राज-योगे = राजयोग में; अत्र जातः = यहाँ जन्मा; असौ = वह; तीर्थि-कृत् = तीर्थ-कर्ता / तीर्थ-संस्थापक (शास्त्र-कथन); न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र का निश्चय-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्र, गुरु और लग्न शनि से दृष्ट हों, और गुरु नवम में हो, तथा यहाँ राजयोग हो, तो वह जातक तीर्थिकृत् होता है — “न अत्र संशयः” शास्त्र का अपना बल-वचन है। लग्न–चन्द्र–गुरु पर शनि-दृष्टि और नवम-स्थित गुरु का योग; राजयोग की सह-स्थिति के साथ तीर्थ-सम्बन्धी फल कहा गया है। हम इसे भविष्य की गारंटी नहीं मानते — केवल पाठ का कथन।

English rendering The text states that when the Moon, Jupiter, and the lagna are aspected by Saturn, Jupiter stands in the ninth, and a rājayoga is present, the native becomes a maker/patron of tīrthas — “no doubt,” in the śāstra’s own phrasing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) Boolean yoga of placements + aspects (no new constant).
1. Lagna rāśi L from ascendant longitude (house system declared; whole-sign common in classical yoga work).
2. Moon and Jupiter longitudes → rāśi positions.
3. Saturn aspects those three: Saturn’s full aspects on houses +3, +7, +10 from Saturn’s rāśi (whole-sign) or the degree-based equivalent if using exact dṛṣṭi orbs — declare which.
4. Jupiter in the 9th from lagna: house(Jupiter) = 9, i.e. rāśi index (R_J − R_L) mod 12 = 8.
5. “राजयोगे” = separate rājayoga definition from the yoga chapters (not expanded in this line) must also hold.
All limbs true → the text’s तीर्थिकृत् phala.

उदाहरण (worked example) Whole-sign houses; Lahiri sidereal. Lagna = Aries; Jupiter in Sagittarius (9th); Saturn in Libra. Saturn from Libra aspects: Capricorn (3), Aries (7), Cancer (10). Thus lagna (Aries) is aspected; if Moon is in Capricorn or Cancer (or Aries), and Jupiter in Sagittarius is also under a valid Saturn aspect in the chosen scheme (here Jupiter is not on 3/7/10 from Libra — so for this toy chart the Jupiter-aspect limb fails unless Saturn’s position differs). Adjust Saturn e.g. to Gemini: aspects Leo (3), Sagittarius (7), Pisces (10) → Jupiter in Sagittarius is aspected; lagna Aries is not — so both limbs need a Saturn placement that covers Moon, Jupiter, and lagna simultaneously (possible with degree-based multi-aspect or when the three occupy houses Saturn fully aspects from one seat). The checklist is the method: three aspect targets + Jupiter-in-9 + rājayoga flag.

79.15
धर्मस्थानगते मन्दे ग्रहदृष्टिविवर्जिते ।
राजयोगेऽत्र यो जातः स राजा दीक्षितो भवेत्
dharmasthānagate mande grahadṛṣṭivivarjite |
rājayoge'tra yo jātaḥ sa rājā dīkṣito bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मस्थान = नवम भाव; गते = स्थित होने पर; धर्मस्थानगते = नवम भाव में गए हुए; मन्दे = शनि (मन्द = मन्दगति ग्रह); ग्रह-दृष्टि-विवर्जिते = किसी भी ग्रह की दृष्टि से रहित; राजयोगे = राजयोग में; यः जातः = जो उत्पन्न हो; सः राजा = वह राजा (उच्च राजयोग-जात); दीक्षितः = दीक्षा-प्राप्त, संन्यास में दीक्षित; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मात्र शनि नवम (धर्म) भाव में स्थित हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न पड़ रही हो, तथा इसी के साथ राजयोग भी विद्यमान हो, तो इस योग में जन्मा व्यक्ति राजा होकर भी दीक्षित (संन्यासी) बन जाता है। यहाँ शनि का निर्दृष्ट, एकाकी धर्म-स्थान-आधिपत्य वैराग्य की ओर मोड़ देता है — राज-वैभव के बीच भी त्याग की दीक्षा।

English rendering When Saturn alone stands in the ninth (the house of dharma), untouched by the aspect of any planet, one born here within a rāja-yoga becomes a king who takes initiation into renunciation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निर्दृष्ट नवमस्थ शनि + राजयोग → दीक्षित राजा)। ध्यातव्य: पिछले श्लोक की भाँति यहाँ भी शर्त दृष्टि-ज्यामिति है, पर उलटी दिशा में — शनि पर किसी ग्रह की दृष्टि का अभाव (ग्रह-दृष्टि-विवर्जित) अपेक्षित है; अर्थात् दृष्टि-सम्बन्धों की पूरी सूची निकालकर शनि के विरुद्ध रिक्त होना जाँचा जाता है, फल "दीक्षित राजा" उसी का कथन है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "ग्रह-दृष्टि-विवर्जित" जैसी शर्त हमारी दृष्टि-गणना के लिए आदर्श है: दृष्टि एक द्विआधारी (है/नहीं) ज्यामितीय सम्बन्ध है, जिसे इंजन प्रत्येक ग्रह-युग्म पर निश्चित रूप से हल करता है — शनि पर शून्य दृष्टि की पुष्टि `==` की कोटि की है, कोई सहिष्णुता-पट्टी नहीं। किन्तु "राजा दीक्षित होगा" — यह शास्त्र का फल-वचन है, जिसे हम भाग्य या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं, केवल पाठ के कथन के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

अध्यायः 80

स्त्रीजातकाध्यायः

55 श्लोक
80.1
बहुधा भवता प्रोक्तं यज्जातकफलं मुने ।
तन्नारीणां कथं ज्ञेयमिति मे कथयाऽधुना
bahudhā bhavatā proktaṃ yajjātakaphalaṃ mune |
tannārīṇāṃ kathaṃ jñeyamiti me kathayā'dhunā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुधा = अनेक प्रकार से; भवता = आपके द्वारा; प्रोक्तं = कहा गया; यज्जातकफलं = जो जातक-फल; मुने = हे मुने; नारीणां = स्त्रियों का; कथं ज्ञेयं = कैसे जाना जाए; कथयाऽधुना = अब कहिए।

हिन्दी भावार्थ शिष्य मुनि से निवेदन करता है कि आपने जातक-फल अनेक रीति से विस्तार से कहा है। अब वही फल-विधान स्त्रियों के लिए किस प्रकार जाना जाए — यह स्पष्ट करें। अध्याय का आरम्भ प्रश्न-रूप संवाद से होता है: सामान्य जातक-शास्त्र के बाद स्त्री-जातक की पृथक् जिज्ञासा।

English rendering “O sage, you have spoken at length of natal results. How is that same phala to be known for women? Please tell me now.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / प्रश्न-श्लोक। यह अध्याय स्त्री-जातक (strī-jātaka) की दिशा खोलता है; गणना अभी नहीं, केवल जिज्ञासा का ढाँचा।

80.2
साधु पृष्टं त्वया विप्र तदपि प्रवदाम्यहम् ।
स्त्रीणां पुंभिः समं ज्ञेयं फलमुक्तं विपश्चिता
sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vipra tadapi pravadāmyaham |
strīṇāṃ puṃbhiḥ samaṃ jñeyaṃ phalamuktaṃ vipaścitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु पृष्टं = भली भाँति पूछा; त्वया विप्र = हे विप्र, आपके द्वारा; तदपि = फिर भी / उस विषय को भी; प्रवदाम्यहम् = मैं कहता हूँ; स्त्रीणां = स्त्रियों का; पुंभिः समं = पुरुषों के समान; ज्ञेयं फलम् = फल जानना चाहिए; विपश्चिता = विद्वान् द्वारा (उक्त)।

हिन्दी भावार्थ आचार्य प्रशंसा के साथ उत्तर देते हैं: प्रश्न उचित है; अब वही विषय कहूँगा। शास्त्र कहता है कि विद्वानों द्वारा पुरुषों के लिए कहा गया फल स्त्रियों के लिए भी समरूप से जानना चाहिए — आधार-फल एक, आगे विशेष नियम।

English rendering “Well asked, O brāhmaṇa; I shall declare that too. The results stated by the wise for men are to be known in the same way for women.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सूत्र / समता-नियम। स्त्री-कुण्डली पर सामान्य जातक-फल का डिफ़ॉल्ट अनुप्रयोग: जब तक अगले श्लोक विशेष न दें, पुरुष-जातक के ही फल-नियम लागू।

80.3
विशेषस्तत्र यो दृष्टः संक्षेपात् कथयामि तत् ।
लग्ने देहफलं तस्याः पञ्चमे प्रसवस्तथा
viśeṣastatra yo dṛṣṭaḥ saṃkṣepāt kathayāmi tat |
lagne dehaphalaṃ tasyāḥ pañcame prasavastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विशेषः = विशेष बात; तत्र = उसमें (स्त्री-जातक में); दृष्टः = देखा / निर्धारित; संक्षेपात् = संक्षेप से; कथयामि = कहता हूँ; लग्ने = लग्न में; देहफलं = देह / शरीर-संबंधी फल; तस्याः = उसका (स्त्री का); पञ्चमे = पंचम भाव में; प्रसवः = प्रसव / संतान-जन्म; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ समता के बाद शास्त्र संक्षेप में विशेष बताता है। स्त्री के देह-संबंधी फल लग्न से देखे जाएँ; प्रसव-संबंधी फल पंचम भाव से। यह भाव-केंद्रण का नियम है — कौन-सा फल किस भाव से पढ़ा जाए।

English rendering “The special points observed therein I state briefly: her bodily results from the lagna, and childbirth from the fifth.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-मैप (स्त्री-जातक विशेष):
- देह-फल → भाव 1 (लग्न)
- प्रसव-फल → भाव 5
(गृह-प्रणाली: पारंपरिक पूर्ण-राशि भाव; संख्यात्मक गुणन नहीं — स्थान-नियुक्ति।)

उदाहरण (worked example) कुण्डली में लग्न = कन्या, पंचम = मकर। शास्त्र की रीति से देह-संबंधी संकेत लग्न-कन्या और उसके अधिपति/ग्रह-दृष्टि से पढ़े; प्रसव-संबंधी संकेत पंचम-मकर और उस भाव के योगों से। (अयनांश/दृष्टि-नियम फल की बारीकी बदलते हैं; यहाँ केवल भाव-स्थान।)

80.4
सप्तमे पतिसौभाग्यं वैधव्यं निधने द्विज ।
स्त्रीणामसम्भवं यद्यत् तत्फलं तत्पतौ वदेत्
saptame patisaubhāgyaṃ vaidhavyaṃ nidhane dvija |
strīṇāmasambhavaṃ yadyat tatphalaṃ tatpatau vadet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे = सप्तम भाव में; पतिसौभाग्यं = पति-संबंधी सौभाग्य; वैधव्यं = वैधव्य; निधने = अष्टम (निधन) भाव में; द्विज = हे द्विज; स्त्रीणामसम्भवम् = स्त्रियों के लिए जो असम्भव / अनुपयुक्त; यद्यत् तत्फलम् = जो-जो वह फल; तत्पतौ वदेत् = उसके पति के विषय में कहे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: सप्तम से पति-सौभाग्य पढ़ा जाए; निधन (अष्टम) से वैधव्य का संकेत। जो फल स्त्री-जातक में प्रत्यक्ष लागू नहीं हो सकते, उन्हें उसके पति के फल के रूप में कहा जाए — स्थानांतरण-नियम, न कि स्वतः भविष्यवाणी।

English rendering “From the seventh, the husband’s fortune; widowhood from the eighth, O twice-born. Whatever result is inapplicable to women should be stated with respect to her husband.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-मैप + फल-स्थानांतरण:
- पति-सौभाग्य → भाव 7
- वैधव्य (शास्त्र-कथन) → भाव 8 (निधन)
- पुरुष-विशिष्ट फल F (स्त्री पर असम्भव) → F को पति-संदर्भ में पढ़ें (transfer rule)
यह गणना नहीं, फल-विन्यास की संहिता-रीति है।

उदाहरण (worked example) सप्तम = मीन, अष्टम = मेष। पति-सौभाग्य-संकेत सप्तम-मीन से; वैधव्य-संबंधी शास्त्रीय संकेत अष्टम-मेष से (पाठ के अनुसार, फल-कथन के रूप में)। यदि कोई फल केवल पुरुष-भूमिका का हो, उसे स्त्री-लग्न पर न बाँधकर पति-संदर्भ (मुख्यतः सप्तम/सप्तमाधिपति) में कहा जाए।

80.5
लग्नेन्दू समभे यस्याः सा नारी प्रकृतिस्थिता ।
कन्योचितगुणोपेता सुशीला शुभलक्षणा
lagnendū samabhe yasyāḥ sā nārī prakṛtisthitā |
kanyocitaguṇopetā suśīlā śubhalakṣaṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेन्दू = लग्न और चंद्र; समभे = सम-राशि (युग्म: 2, 4, 6, 8, 10, 12) में; यस्याः = जिस (स्त्री) का; सा नारी = वह स्त्री; प्रकृतिस्थिता = प्रकृति-स्थित / स्वाभाविक स्थिति में; कन्योचितगुणोपेता = कन्या-उचित गुणों से युक्त; सुशीला = सुशील; शुभलक्षणा = शुभ लक्षण वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: जिस स्त्री के लग्न और चंद्र दोनों सम-राशि में हों, वह प्रकृति-स्थित मानी जाती है — कन्योचित गुण, सुशीलता और शुभ लक्षणों से युक्त। यह राशि-समता (even-sign) का द्वि-बिंदु नियम है: लग्न और चंद्र दोनों सम।

English rendering “She whose lagna and Moon stand in even signs is said to be established in her nature — endowed with maidenly virtues, of good character, and of auspicious marks.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) सम-राशि परीक्षण (पूर्ण-राशि निर्देशांक, r = 1…12, मेष = 1):
सम-भ = {2, 4, 6, 8, 10, 12} (वृष…मीन)
शर्त: r(Lagna) ∈ सम-भ और r(Moon) ∈ सम-भ
(राशि = ⌊λ / 30°⌋ + 1, जहाँ λ sidereal longitude; अयनांश घोषित करें — परिणाम राशि-सीमा पर निर्भर।)

उदाहरण (worked example) अयनांश: लाहिरी (उदाहरण-मात्र)। λ_L = 45° → राशि 2 (वृष, सम); λ_M = 195° → राशि 7 (तुला)… तुला = 7 विषम → शर्त पूर्ण नहीं।
दूसरा सेट: λ_L = 100° → राशि 4 (कर्क, सम); λ_M = 280° → राशि 10 (मकर, सम) → दोनों सम → श्लोक 80.5 का “समभे” मामला।

80.6
शुभेक्षितौ सुरूपा च सदा देहसुखान्विता ।
विषमे पुरुषाकारा दुःशीला पापवीक्षितौ
śubhekṣitau surūpā ca sadā dehasukhānvitā |
viṣame puruṣākārā duḥśīlā pāpavīkṣitau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभेक्षितौ = (लग्न-चंद्र) शुभ-ग्रहीक्षित; सुरूपा = सुंदर रूप वाली; सदा देहसुखान्विता = सदैव देह-सुख से युक्त; विषमे = विषम-राशि (1, 3, 5, 7, 9, 11) में; पुरुषाकारा = पुरुष-आकार / पुरुषवत् आकृति; दुःशीला = दुःशील; पापवीक्षितौ = पाप-ग्रहीक्षित होने पर।

हिन्दी भावार्थ सम-राशि स्थिति पर यदि लग्न-चंद्र शुभ दृष्टि से युक्त हों, तो शास्त्र सुरूपता और देह-सुख कहता है। विषम-राशि में पुरुषाकारता; पाप-दृष्टि में दुःशीलता — यह दृष्टि-गुण और सम/विषम का संयुक्त नियम है। फल शास्त्र का कथन है, नियति नहीं।

English rendering “If those two (lagna and Moon) are aspected by benefics, she is fair of form and always endowed with bodily ease. In odd signs she has a masculine cast; when aspected by malefics, of harsh character — so the text states.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
1. विषम-भ = {1, 3, 5, 7, 9, 11}; सम-भ = {2, 4, 6, 8, 10, 12}
2. दृष्टि-स्तरीकरण (पारंपरिक पूर्ण-दृष्टि मॉडल, जब तक अन्य पाठ न हो):
- शुभ = गुरु, शुक्र (बुध-संदिग्ध/मिश्र — पाठ-भेद संभव)
- पाप = शनि, मंगल, रवि (चंद्र-पापता स्थिति-सापेक्ष)
3. “ईक्षितौ” = लग्न और चंद्र दोनों पर उक्त दृष्टि-वर्ग लागू
सम + शुभ-दृष्टि → सुरूपा / देह-सुख (शास्त्र); विषम → पुरुषाकारा; पाप-दृष्टि → दुःशीला (शास्त्र)।

उदाहरण (worked example) Lagna राशि 4, Moon राशि 10 (दोनों सम)। गुरु लग्न पर पूर्ण दृष्टि, शुक्र चंद्र पर — “शुभेक्षितौ” पक्ष।
विपरीत: Lagna राशि 1, Moon राशि 5 (दोनों विषम) → “विषमे पुरुषाकारा”; यदि शनि/मंगल दोनों पर दृष्टि → “पापवीक्षितौ” पक्ष (पाठानुसार फल-कथन)।

80.7
पापाढ्यौ च गुणैर्हीना मिश्रे मिश्रफलं वदेत् ।
लग्नेन्द्वोर्यो बली तस्य फलं तस्य विशेषतः
pāpāḍhyau ca guṇairhīnā miśre miśraphalaṃ vadet |
lagnendvoryo balī tasya phalaṃ tasya viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापाढ्यौ = (लग्न-चंद्र) पाप-ग्रही से भरे / पाप-युक्त; गुणैर्हीना = गुणों से हीन; मिश्रे = मिश्र स्थिति में; मिश्रफलं = मिश्र फल; वदेत् = कहे; लग्नेन्द्वोः = लग्न और चंद्र में से; यो बली = जो बलवान्; तस्य फलं = उसका फल; तस्य विशेषतः = विशेष रूप से उसी का।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है: लग्न-चंद्र दोनों यदि पापाढ्य और गुणहीन हों तो उसी दिशा का फल; मिश्र योग में मिश्र फल। लग्न और चंद्र में जो अधिक बली हो, विशेषतः उसी का फल प्रधान माना जाए — निर्णायक कुंजी “बल” की तुलना है।

English rendering “When both are laden with malefics and devoid of virtues, speak that result; when mixed, mixed results. Of lagna and Moon, whichever is stronger — its phala is to be stated as primary.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तीन-स्तरीय वर्गीकरण + बल-तुलना:
1. पापाढ्य-दोनों → पाप-दिशा फल (शास्त्र)
2. मिश्र (एक शुभ / एक पाप, या मिश्र दृष्टि) → मिश्र फल
3. प्रधानता: argmax(B_Lagna, B_Moon) — जो बली, उसी का फल विशेष
बल-माप: अध्याय स्वयं इकाई नहीं देता; व्यावहारिक रूप से चंद्र के लिए षड्बल (स्थान+दिक्+काल+चेष्टा+नैसर्गिक+दृग्) और लग्न के लिए लग्न-बल / लग्नेश-बल की तुलना — सम्मेलन घोषित करें (षड्बल: 1 रूप = 60 विरूप; exact `==` तुलना, सहिष्णुता-पट्टी नहीं)।

उदाहरण (worked example) मान लें घोषित सम्मेलन — चंद्र-बल ṣaḍbala से, लग्न-बल लग्नेश के ṣaḍbala से।
B_Moon = 6.2 रूप, B_Lagneśa = 4.8 रूप → Moon बली → सम/विषम और दृष्टि-फल चंद्र-राशि व चंद्र-दृष्टि को विशेष भार दें।
यदि दोनों लगभग समान हों तो मिश्र-पाठ बनाए रखें; गोल संख्या पर मनमाना “±” न लगाएँ — दशमलव तक `==` या स्पष्ट “तुल्य” घोषणा।

हमारा डिकोड (Our Decode) “यो बली” को हम व्याख्या नहीं, मापनीय तुलना मानते हैं: षड्बल-इंजन (स्थान-दिक्-काल-चेष्टा-नैसर्गिक-दृग्; रूप/विरूप) से चंद्र-बल निकाला जाता है; लग्न-पक्ष लग्नेश-बल या घोषित लग्न-बल से। oracle-अनुशासन वही — exact `==`, सहिष्णुता से छिपा अंतर नहीं; फल फिर भी “शास्त्र कहता है”, गणना का समर्थन नहीं।

80.8
लग्नेन्द्वोर्यो बली विप्र त्रिंशांशैस्तदधिष्ठितैः ।
ग्रहराशिवशाद् वाच्यं फलं स्त्रीणां विशेषतः
lagnendvoryo balī vipra triṃśāṃśaistadadhiṣṭhitaiḥ |
graharāśivaśād vācyaṃ phalaṃ strīṇāṃ viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेन्द्वोः = लग्न और चन्द्र में से; यो बली = जो बलवान् हो; विप्र = हे विप्र (मैत्रेय-संबोधन); त्रिंशांशैः = D30 / त्रिंशांश (30° का 1/30 = 1° खंड) द्वारा; तदधिष्ठितैः = उन्हीं (बली लग्न/चन्द्र) से अधिष्ठित अंशों से; ग्रहराशिवशात् = ग्रह और राशि के वश/अनुसार; वाच्यं फलम् = फल कहा जाए; स्त्रीणां विशेषतः = स्त्रियों के विषय में विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्री-जातक में फल विशेषतः लग्न और चन्द्र में से जो बलवान् हो, उसी के आधार पर कहा जाए। उस बली स्थान के त्रिंशांश (D30) में जो ग्रह-अंश अधिष्ठित हों, उन्हीं के अनुसार—ग्रह और राशि दोनों के नियम से—फल वाच्य है। यह अध्याय आगे उन्हीं त्रिंशांश-स्थितियों के फल-भेद खोलता है। लग्न-चन्द्र की बराबरी पर पाठ स्पष्ट नहीं करता—ऐसी स्थिति में बल-निर्णय की पद्धति घोषित करनी होती है।

English rendering The text states that results—especially for women—are to be declared from whichever of the Lagna or the Moon is stronger, by means of the triṃśāṃśas (D30) occupied under that stronger factor, according to planet and sign.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) (1) बल-चयन: लग्न vs चन्द्र—जो बली हो, उसी की राशि-रेखांश पर आगे कार्य (षड्बल/स्थानाबल आदि से तुलना; इकाई: रूप = 60 विरूप)। (2) त्रिंशांश (D30) = 30° राशि को 5 खंडों में: 5° + 5° + 8° + 7° + 5° = 30°। विषम राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ): 0°–5° मंगल, 5°–10° शनि, 10°–18° गुरु, 18°–25° बुध, 25°–30° शुक्र। सम राशि (वृष…मीन): क्रम उलटा—0°–5° शुक्र, 5°–12° बुध, 12°–20° गुरु, 20°–25° शनि, 25°–30° मंगल। यह शुद्ध खंड-मानचित्र (modular partition of longitude) है—फल व्याख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें बली चन्द्र की राशि-रेखांश = कन्या 14°20′ (सम राशि)। सम-क्रम: 0°–5° शुक्र, 5°–12° बुध, 12°–20° गुरु → 14°20′ गुरु-त्रिंशांश में पड़ता है। अतः आगे का फल “जैव त्रिंशांश” श्रेणी से वाच्य (अगले श्लोकों का शास्त्रीय फल-कथन), अयनांश केवल D1 रेखांश तय करने के लिए—यहाँ उदाहरणार्थ Lahiri/Chitrapakṣa मानकर रेखांश स्थिर माना।

हमारा डिकोड (Our Decode) त्रिंशांश षोडश-वर्ग शृंखला का D30 है—D1…D60 का नियत चाप-विभाजन; वर्ग-इंजन में यही 5°/5°/8°/7°/5° नियम विषम–सम क्रम से लागू होता है। लग्न/चन्द्र “बली” पक्ष षड्बल (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) की संख्यात्मक तुलना से जुड़ता है—गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

80.9
कन्यैवारगृहे दुष्टा भौमत्रिंशांशके भवेत् ।
कुचरित्रा तथा शौक्रे समाया बोधने स्मृता
kanyaivāragṛhe duṣṭā bhaumatriṃśāṃśake bhavet |
kucaritrā tathā śaukre samāyā bodhane smṛtā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्या एव = कुमारी अवस्था में ही; अरगृहे = शत्रु-गृह/शत्रु-राशि में; दुष्टा = दुष्ट स्वभाव वाली (शास्त्र-कथन); भौम-त्रिंशांशके = मंगल के त्रिंशांश में; भवेत् = होती है; कुचरित्रा = कुमार्ग/दुराचार स्वभाव; तथा शौक्रे = तथा शुक्र-(त्रिंशांश) में; समाया = सम/मध्यम स्वभाव; बोधने = बुध-(त्रिंशांश) में; स्मृता = कही गई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भौम-त्रिंशांश में—विशेषतः शत्रु-गृह की स्थिति में—स्त्री को कुमारी अवस्था में भी दुष्ट-स्वभाव वाला कहा गया है। शुक्र-संबद्ध अंश में कुचरित्रा कही गई है। बुध-संबद्ध अंश में उसे समाया—मध्यम, संतुलित स्वभाव वाली—स्मरण किया गया है। ये सब फल-कथन हैं, नियति-घोषणा नहीं; पाठ-भेद और राशि-प्रसंग अगले श्लोकों में और खुलते हैं।

English rendering The text states that in a Mars triṃśāṃśa—especially in an enemy house—she is described as corrupt even while a maiden; in a Venus-linked portion, of bad conduct; in a Mercury-linked portion, of moderate nature.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रिंशांश-स्वामी × स्वभाव)। गणना केवल इतनी कि D1 रेखांश से D30-स्वामी ज्ञात हो (देखें 80.8 का खंड-नियम); “अरगृह” = उस ग्रह/राशि से शत्रु-संबंध की पारंपरिक ग्रह-मैत्री तालिका पर निर्भर—सौहार्द-तालिका घोषित करनी चाहिए।

80.10
जैवे साध्वी शनौ दासी ज्ञर्क्षे कौजे छलान्विता ।
शौक्रे प्रकीर्णकामा सा बौधेंऽशे च गुणान्विता
jaive sādhvī śanau dāsī jñarkṣe kauje chalānvitā |
śaukre prakīrṇakāmā sā baudheṃ'śe ca guṇānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जैवे = गुरु-(त्रिंशांश/अंश) में; साध्वी = पतिव्रता/साधु-चरित्रा; शनौ = शनि में; दासी = दासी/सेविका-भाव; ज्ञ-ऋक्षे = बुध की राशि में; कौजे = मंगल-(अंश) में; छलान्विता = छल से युक्त; शौक्रे = शुक्र में; प्रकीर्ण-कामा = बिखरी/अनियत काम-वृत्ति; सा = वह; बौधे अंशे = बुध के अंश में; च गुणान्विता = और गुणों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुरु-संबद्ध अंश में स्त्री साध्वी कही गई; शनि में दासी-भाव। बुध-राशि में मंगल-संयोग/मंगलांश पर छलान्विता कही गई। शुक्र में प्रकीर्णकामा, तथा बुध के अंश में गुणान्विता। 80.9 और 80.10 में शुक्र–बुध के लिए थोड़े भिन्न विशेषण हैं—संभवतः राशि-प्रसंग या पाठ-परंपरा का भेद; पाठ-भेद संभव। फल को शास्त्र-वाक्य मानकर पढ़ें, भय या दबाव में नहीं।

English rendering The text states: in a Jupiter-linked portion she is called a virtuous wife; in Saturn’s, a servant; in Mars’s under a Mercury sign, deceitful; in Venus’s, of scattered desire; and in a Mercury aṃśa, endowed with good qualities.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-अंश × स्वभाव-विशेषण)। “ज्ञर्क्षे कौजे” दो शर्तों का योग है: (i) राशि-स्वामी = बुध, (ii) त्रिंशांश-स्वामी = मंगल—दोनों D1 राशि-स्वामी और D30-स्वामी से `==` जाँचे जाते हैं।

80.11
क्लीबाऽर्क्यंशे सती जैवे कौजै दुष्टा सितर्क्षके ।
शौक्रे ख्यातगुणा बौधे कलासु निपुणा भवेत्
klībā'rkyaṃśe satī jaive kaujai duṣṭā sitarkṣake |
śaukre khyātaguṇā baudhe kalāsu nipuṇā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्लीबा = स्त्री-स्वभाव में न्यून/शीत/क्लीब-भाव (शास्त्र-शब्द; चिकित्सा नहीं); आर्क्य-अंशे = अर्क/आर्कि-अंश में (सूर्यज शनि का अंश—पाठ-भेद संभव: अर्क = सूर्य); सती जैवे = गुरु में सती/पतिव्रता; कौजै = मंगल में; दुष्टा = दुष्ट; सित-ऋक्षके = शुक्र की राशि में; शौक्रे = शुक्र-(अंश) में; ख्यात-गुणा = प्रसिद्ध गुणों वाली; बौधे = बुध में; कलासु निपुणा = कलाओं में निपुण; भवेत् = होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—आर्क्य/शनि-अंश में क्लीब-भाव वाला वर्णन है; गुरु में सती। मंगल-अंश, जब शुक्र-राशि में हो, तो दुष्टा कही गई। शुक्र-अंश में ख्यातगुणा, बुध में कला-निपुणा। “आर्क्य” पढ़ने में अर्क (सूर्य) और आर्कि (शनि) दोनों संभव—पाठ-भेद संभव; जिस पाठ को अपनाएँ, वही घोषित करें। कोई चिकित्सा या नैतिक दंड नहीं—केवल स्रोत-पाठ का स्वभाव-कथन।

English rendering The text states that in a Saturn-related (ārkya) aṃśa she is described as deficient in feminine vitality; in Jupiter’s, chaste; in Mars’s within a Venus sign, corrupt; in Venus’s, famed for virtues; in Mercury’s, skilled in the arts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश-स्वामी + राशि-स्वामी का युग्म)। “सितर्क्षके कौजै” = राशि-स्वामी शुक्र ∧ D30-स्वामी मंगल; दोनों स्वामी रेखांश से निश्चित।

80.12
जैवे गुणवती मान्दे पुनर्भूश्चन्द्रभे ततः ।
स्वतन्त्रा कुजात्रिंशांशे शौक्रे च कुलपांसना
jaive guṇavatī mānde punarbhūścandrabhe tataḥ |
svatantrā kujātriṃśāṃśe śaukre ca kulapāṃsanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जैवे = गुरु में; गुणवती = गुणों से युक्त; मान्दे = शनि (मन्द) में; पुनर्भूः = पुनर्विवाहिता/पुनर्भू; चन्द्र-भे = चन्द्र की राशि/भ में; ततः = तब/उससे; स्वतन्त्रा = स्वच्छंद/स्वतंत्र; कुज-त्रिंशांशे = मंगल-त्रिंशांश में; शौक्रे = शुक्र में; च कुल-पांसना = और कुल की कलंक/अपयश (शास्त्र-शब्द)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुरु-संबद्ध स्थिति में गुणवती; शनि में, विशेषतः चन्द्र-भ/चन्द्र-राशि प्रसंग में, पुनर्भू कही गई। मंगल-त्रिंशांश में स्वतन्त्रा; शुक्र में कुलपांसना। “चन्द्रभे” राशि या नक्षत्र—दोनों पाठ-संभव; गणना में जिस परंपरा का उपयोग हो, उसे स्पष्ट कहें। कठोर विशेषण भय-वाणिज्य के लिए नहीं—स्रोत का फल-वाक्य मात्र।

English rendering The text states: under Jupiter, virtuous; under Saturn—when linked with the Moon’s sign/asterism—a remarried woman; in a Mars triṃśāṃśa, independent; under Venus, a disgrace to the family (as the śāstra phrases it).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “चन्द्रभे” यदि राशि है तो चन्द्र की D1 राशि; यदि नक्षत्र है तो चन्द्र-रेखांश ÷ 13°20′ से नक्षत्र-सूचकांक (0…26)—परंपरा घोषित करें।

80.13
बौधे शिल्पकलाऽभिज्ञा जैवे बहुगुणा शनौ ।
पतिघ्नी चार्कभे कौजे वाचाला भार्गवे सती
baudhe śilpakalā'bhijñā jaive bahuguṇā śanau |
patighnī cārkabhe kauje vācālā bhārgave satī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बौधे = बुध में; शिल्प-कला-अभिज्ञा = शिल्प और कला की जानकार; जैवे = गुरु में; बहु-गुणा = अनेक गुणों वाली; शनौ = शनि में (अगले पद से जुड़ाव पाठानुसारी); पतिघ्नी = पति के लिए अशुभ/पति-हानि सूचक शब्द (शास्त्र-कथन—भय नहीं); च अर्क-भे = और सूर्य की राशि में; कौजे = मंगल में; वाचाला = वाचाल/अधिक बोलने वाली; भार्गवे = शुक्र (भृगु) में; सती = सती/पतिव्रता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—बुध में शिल्प-कलाभिज्ञा; गुरु में बहुगुणा। सूर्य-राशि प्रसंग में मंगल-संबद्ध स्थिति को पतिघ्नी कहा गया है—यह स्रोत का कठोर फल-शब्द है, न कि हमारी भविष्य-घोषणा, न चिकित्सा/कानूनी दावा। मंगल-पक्ष में वाचाला, शुक्र (भार्गव) में सती। शनि का स्वतंत्र विशेषण इस श्लोक में अधूरा-सा लगता है—पाठ-भेद या पूर्व-पर श्लोक से संधि संभव।

English rendering The text states: under Mercury, skilled in crafts and arts; under Jupiter, of many virtues; under Mars in a Sun sign, described with the harsh traditional label “pati-ghnī”; talkative in the Mars-linked reading; chaste under Venus (Bhārgava).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “अर्कभे कौजे” = राशि-स्वामी सूर्य ∧ (त्रिंशांश/अंश) मंगल; सिंह राशि + भौम-D30 जैसे युग्म पर लागू। फल को `report(text)` की तरह रखें—`predict(fate)` नहीं।

80.14
बौधे पुंश्चेष्टिता जैवे राज्ञी मान्दे कुलच्युता ।
कौजे बहुगुणाऽर्यर्क्षे शौक्रे चाप्यसती मता
baudhe puṃśceṣṭitā jaive rājñī mānde kulacyutā |
kauje bahuguṇā'ryarkṣe śaukre cāpyasatī matā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बौधे = बुध में; पुंस्-चेष्टिता = पुरुष-जैसी चेष्टा/आचरण वाली; जैवे = गुरु में; राज्ञी = रानी/राजसी पद; मान्दे = शनि में; कुल-च्युता = कुल से च्युत; कौजे = मंगल में; बहु-गुणा = अनेक गुण; आर्य-ऋक्षे = आर्य/श्रेष्ठ राशि-भ में (पाठ-भेद संभव); शौक्रे = शुक्र में; च अपि असती = और असती भी; मता = मानी गई।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—बुध में पुंश्चेष्टिता; गुरु में राज्ञी; शनि में कुलच्युता। मंगल में—आर्यर्क्ष प्रसंग में—बहुगुणा; शुक्र में असती मानी गई। “आर्यर्क्षे” का अर्थ (श्रेष्ठ राशि / विशिष्ट भ) और संधि-पाठ दोनों में पाठ-भेद संभव। इस श्रृंखला (80.9–80.14) का सार: बली लग्न/चन्द्र के D30-स्वामी और राशि-स्वामी के युग्म से स्त्री-स्वभाव के शास्त्रीय विशेषण—गणित अंश-निर्णय तक, व्याख्या पाठ की सीमा में।

English rendering The text states: under Mercury, of masculine conduct; under Jupiter, a queen; under Saturn, fallen from her family; under Mars in an “ārya” sign-context, of many virtues; under Venus, also held unchaste—as the śāstra’s own phrasing, not as fate we certify.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अध्याय 80 की त्रिंशांश-फल माला का समापन-खंड इस बैच में)। संपूर्ण विधि का कंकाल: (1) max(बल_लग्न, बल_चन्द्र) → चयनित बिन्दु; (2) उस बिन्दु का D30-स्वामी; (3) D1 राशि-स्वामी; (4) श्लोक-तालिका से विशेषण—`==` मैपिंग, सहिष्णुता-बैंड नहीं।

80.15
बौधे विज्ञानसंयुता जैवेऽनेकगुणान्विता ।
मान्दे चाल्परतिः प्रोक्ता दासी कौजे तथाऽर्किभे
baudhe vijñānasaṃyutā jaive'nekaguṇānvitā |
mānde cālparatiḥ proktā dāsī kauje tathā'rkibhe

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बौधे = बुध-राशि/बुध-स्थान में; विज्ञानसंयुता = ज्ञान-विज्ञान से युक्त; जैवे = गुरु-स्थान में; अनेकगुणान्विता = अनेक गुणों से समन्वित; मान्दे = शनि-स्थान में; अल्परतिः = अल्प-काम/अल्प-आसक्ति; दासी = दासी-स्वभाव; कौजे = मङ्गल-स्थान में; अर्किभे = सूर्य-राशि में (अर्कि = सूर्य)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री/पत्नी-लक्षण-क्रम में कहता है कि बुध-सम्बद्ध स्थान में वह विज्ञान-संयुक्त कही जाती है, और गुरु-सम्बद्ध स्थान में अनेक गुणों से युक्त। शनि-सम्बद्ध स्थान में अल्परति कही गई है; मङ्गल तथा सूर्य की राशि/स्थान में दासी-स्वभाव का उल्लेख है। यह फल-कथन है — स्थिति-विशेष पर शास्त्र का अपना वाक्य, न कि निश्चित भाग्य-घोषणा।

English rendering The text states that in a Mercurial placement she is endowed with knowledge; in a Jovian one, with many virtues. Under Saturn she is described as of scant passion; under Mars and the Sun, as of servant-like station.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-स्थानानुसार स्त्री-लक्षण)। यहाँ “स्थान” शास्त्रीय होरा-भाषा में राशि/भाव-सम्बद्ध ग्रह-क्षेत्र है; कोई संख्या-सूत्र नहीं गिनाया गया।

80.16
सुप्रज्ञा च भवेच्छौक्रे बौधे दुःस्था तथा खला ।
जैवे पतिव्रता प्रोक्ता मान्दे नीचजनानुगा
suprajñā ca bhavecchaukre baudhe duḥsthā tathā khalā |
jaive pativratā proktā mānde nīcajanānugā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुप्रज्ञा = उत्तम बुद्धि-युक्त; शौक्रे = शुक्र-स्थान में; बौधे = बुध-स्थान में; दुःस्था = दुःस्थित / अशान्त-स्थिति; खला = कठोर/दुष्ट-स्वभाव (शास्त्र-शब्द); जैवे = गुरु-स्थान में; पतिव्रता = पति-व्रत-परायणा; मान्दे = शनि-स्थान में; नीचजनानुगा = नीच-जनों का अनुसरण करने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — शुक्र-सम्बद्ध स्थान में सुप्रज्ञा कही जाती है; बुध-सम्बद्ध स्थान में दुःस्था तथा खला। गुरु-स्थान में पतिव्रता कही गई; शनि-स्थान में नीचजनानुगा। पूर्व-श्लोक के बुध/गुरु-फल से यह श्रृंखला भिन्न प्रकरण-सूत्र पर भी पढ़ी जा सकती है — पाठ-भेद/प्रकरण-भेद संभव; फल को शास्त्र-वाक्य के रूप में ही ग्रहण करें।

English rendering The text states: under Venus, of good intellect; under Mercury, ill-placed and harsh in temperament; under Jupiter, devoted to her husband; under Saturn, attendant upon the low.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शुक्र–बुध–गुरु–शनि स्थानानुसार लक्षण)। व्याख्या में “कठोर/दासी/नीच” आदि शास्त्र के पारिभाषिक फल-शब्द हैं; इन्हें नैतिक-दण्ड या निश्चित भविष्य नहीं बनाएँ।

80.17
मन्दे शून्ये शुभादृष्टे पतिः कापुरुषो भवेत् ।
चरभे च प्रवासी स्यात् क्लीवस्तत्र ज्ञमन्दयोः
mande śūnye śubhādṛṣṭe patiḥ kāpuruṣo bhavet |
carabhe ca pravāsī syāt klīvastatra jñamandayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दे = शनि-सम्बद्ध स्थिति में; शून्ये = (सम्बद्ध भाव) रिक्त/ग्रह-शून्य; शुभादृष्टे = शुभ-ग्रहों से दृष्ट; पतिः = पति; कापुरुषः = कायर/अधम-पुरुष (शास्त्र-शब्द); चरभे = चर-राशि में; प्रवासी = प्रवास-शील; क्लीवः = नपुंसक/क्लीव (शास्त्र-पारिभाषिक); ज्ञमन्दयोः = बुध और शनि — दोनों की उपस्थिति में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पति-स्वरूप कहता है: शनि-सम्बद्ध/शून्य किन्तु शुभ-दृष्ट स्थिति में पति कापुरुष कहा गया। चर-राशि में प्रवासी; और जहाँ बुध तथा शनि simultaneous हों, वहाँ क्लीव कहा गया। यह सब शास्त्र-फल है — चिकित्सा-निदान या निश्चित भाग्य नहीं; “कापुरुष/क्लीव” को शास्त्र-शब्दावली में ही रखें।

English rendering The text states that under a Saturn-linked, empty yet benefic-aspected condition the husband is described as base/cowardly; in a movable sign, a sojourner; and where Mercury and Saturn jointly stand, as klīva (the śāstra’s technical term).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शून्य-भाव + दृष्टि + चर-राशि + बुध-शनि युति/स्थिति)। “दृष्टि” यहाँ शास्त्रीय ग्रह-दृष्टि का नियम है (पूर्ण/आंशिक दृष्टि-अध्याय से), इस श्लोक में कोई नया संख्या-सूत्र नहीं।

80.18
सूर्येऽस्तभे पतित्यक्ता बाल्ये च विधवा कुजे ।
शनावशुभसन्दृष्टे याति कन्यैव वृद्धताम्
sūrye'stabhe patityaktā bālye ca vidhavā kuje |
śanāvaśubhasandṛṣṭe yāti kanyaiva vṛddhatām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्ये अस्तभे = सूर्य सप्तम-भाव (अस्त-भ = लग्न से सप्तम, “अस्त” गृह) में; पतित्यक्ता = पति द्वारा परित्यक्ता; बाल्ये = बाल्यावस्था में; विधवा = विधवा; कुजे = मङ्गल (सप्तम में) होने पर; शनौ = शनि पर; अशुभसन्दृष्टे = अशुभ-ग्रहों से सन्दृष्ट; कन्यैव वृद्धताम् याति = कन्या रहते ही वृद्धावस्था को प्राप्त — अविवाहिता रहना (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम में सूर्य हो तो पति-परित्यक्ता; मङ्गल हो तो बाल्य में विधवा — यह शास्त्र का अपना फल-वाक्य है। शनि अशुभ-दृष्ट हो तो “कन्यैव वृद्धताम्” कहा गया, अर्थात् अविवाह-स्थिति दीर्घ तक। भय या “नाश” की भाषा यहाँ नहीं जोड़नी; केवल स्रोत-कथन का स्पष्ट पाठ।

English rendering The text states: with the Sun in the seventh, forsaken by the husband; with Mars there, widowed in youth; with Saturn afflicted by malefic aspect, she remains unwed into old age — all as the śāstra’s stated indications, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम-स्थ ग्रह + अशुभ-दृष्टि)। अस्त-भ = लग्न + 6 राशियाँ (7वाँ भाव); भाव-गणना में गृह-पद्धति (समभाव/श्रीपति आदि) घोषित करनी चाहिए — इस श्लोक में पद्धति नहीं दी गई।

80.19
विधवास्तगतैः पापैः सौम्यैस्तु सधवा सती ।
मिश्रखेटैः पूनर्भूः सा ज्ञेया मिश्रफलान्विता
vidhavāstagataiḥ pāpaiḥ saumyaistu sadhavā satī |
miśrakheṭaiḥ pūnarbhūḥ sā jñeyā miśraphalānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विधवा = विधवा; अस्तगतैः पापैः = सप्तम-स्थित पाप-ग्रहों से; सौम्यैः = सौम्य/शुभ-ग्रहों से; सधवा = सधवा (पति-जीवित); सती = सती/पतिव्रता; मिश्रखेटैः = मिश्र-ग्रहों (शुभ+अशुभ) से; पुनर्भूः = पुनर्विवाहिता (शास्त्र-शब्द); मिश्रफलान्विता = मिश्र-फल वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सप्तम के ग्रह-वर्ग से तीन फल बाँधता है: पाप अस्त-गत हों तो विधवा; सौम्य हों तो सधवा सती; मिश्र-खेट हों तो पुनर्भू, मिश्र-फल-युक्त। यह त्रि-वर्गीय फल-तालिका है — “पाप/सौम्य/मिश्र” शास्त्रीय ग्रह-वर्गीकरण पर टिकी, न कि नैतिक निर्णय पर। पाठ में “पूनर्भूः” रूप — पाठ-भेद संभव (सामान्यतः पुनर्भूः)।

English rendering The text states: malefics in the seventh → widow; benefics → a living-husbanded, chaste wife; mixed planets → a remarried woman of mixed results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम में पाप / सौम्य / मिश्र खेट)। वर्गीकरण: शास्त्र-परम्परा में सूर्य-मङ्गल-शनि-राहु-केतु प्रायः पाप; गुरु-शुक्र-बुध (शुद्ध) सौम्य; मिश्र = दोनों वर्गों की संयुक्त उपस्थिति — विस्तृत सूची अध्याय-परम्परा पर निर्भर, यहाँ श्लोक स्वयं सूची नहीं देता।

80.20
मिथोंऽशस्थौ सितारौ चेदन्यासक्ता तदाऽङ्गना ।
सप्तमे च स्थिते चन्द्रे तदा भर्तुरनुज्ञ्या
mithoṃ'śasthau sitārau cedanyāsaktā tadā'ṅganā |
saptame ca sthite candre tadā bharturanujñyā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथः अंशस्थौ = एक-दूसरे के अंश (नवांश/D9) में स्थित; सितारौ = शुक्र और मङ्गल; अन्यआसक्ता = अन्य (पति-भिन्न) में आसक्त; अङ्गना = स्त्री; सप्तमे स्थिते चन्द्रे = सप्तम में चन्द्र; भर्तुः अनुज्ञ्या = पति की आज्ञा/अनुमति-अनुगामिनी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि शुक्र और मङ्गल परस्पर-अंशस्थ हों, तो स्त्री अन्य-आसक्ता कही गई। यदि सप्तम में चन्द्र हो, तो भर्तुरनुज्ञ्या — पति की अनुमति/इच्छा के अनुसार चलने वाली। “अंश” यहाँ वर्ग-गणित (नवांश) का संकेत है; फल स्वयं शास्त्र-वाक्य है, निश्चित चरित्र-निर्णय नहीं।

English rendering The text states that if Venus and Mars occupy each other’s aṃśa (divisional portion, classically the navāṃśa), the woman is described as attached elsewhere; if the Moon stands in the seventh, she is compliant with her husband’s will.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त-जाँच = नवांश (D9) गणना। 30° राशि ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश। राशि-प्रकारानुसार नवांश-आरम्भ (पराशर): चर → उसी राशि से; स्थिर → 9वीं से; द्विस्वभाव → 5वीं से। “मिथोंऽशस्थ” = शुक्र जिस नवांश-राशि में, मङ्गल उसी की स्व-राशि/क्षेत्र-नवांश में (और व्युत्क्रम) — परस्पर-अंश। सम्पूर्ण देशान्तर पर अयनांश घोषित करें (उदा. लाहिरी); बिना अयनांश-घोषणा के अंश-फल अस्थिर।

उदाहरण (worked example) मान लें (सायनांश-रहित उदा., केवल नियम-प्रदर्शन; अयनांश = कोई भी pin, यहाँ निरयण मान): शुक्र = वृषभ 10°00′; मङ्गल = मेष 16°40′। वृषभ स्थिर → नवांश 9वीं (मकर) से: 10° ÷ 3°20′ = 3 पूर्ण नवांश → 4था नवांश = मीन। मेष चर → नवांश मेष से: 16°40′ ÷ 3°20′ = 5 पूर्ण → 6ठा = कन्या। यह युग्म “मिथोंऽश” नहीं। मिथोंऽश का उदाहरण: शुक्र ऐसी देशान्तर पर कि उसका D9-राशि मङ्गल-राशि हो, और मङ्गल का D9-राशि शुक्र-राशि — दोनों शर्तें `==` से जाँचें, सहिष्णुता-बैंड नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “अंश” षोडश-वर्ग-क्रम का D9 (नवांश) है — Ch.6 का निश्चित 30°÷9 विभाजन, शुद्ध मॉड्यूलर अंकगणित। वर्ग-इंजन में प्रत्येक varga समान-चाप-विभाजन + कथित मैपिंग-नियम से चलता है; फल-वाक्य को गणित से अलग रखा जाता है — शर्त सत्य/असत्य, फल “शास्त्र कहता है”।

80.21
शुक्रभे शनिभे वापि सेन्दुशुक्रे च लग्नगे ।
मात्रा सह तदा नारी वन्धकी भवति ध्रुवम्
śukrabhe śanibhe vāpi senduśukre ca lagnage |
mātrā saha tadā nārī vandhakī bhavati dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रभे = शुक्र-राशि में; शनिभे = शनि-राशि में; वा अपि = अथवा; सेन्दुशुक्रे = चन्द्र-सहित शुक्र (इन्दु+शुक्र); लग्नगे = लग्न में स्थित; मात्रा सह = माता के साथ; नारी = स्त्री; वन्धकी = वन्धकी (शास्त्र-पारिभाषिक स्त्री-चरित्र शब्द); ध्रुवम् = निश्चय-पूर्वक (शास्त्र का अपना दृढ़-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र-राशि या शनि-राशि में, और लग्न में चन्द्र-युक्त शुक्र हो, तो नारी माता के साथ वन्धकी कही जाती है, “ध्रुवम्” शब्द से शास्त्र स्वयं दृढ़ता जताता है। यह फल-कथन है; इसे भय, लज्जा-दबाव, या नैतिक-दण्ड की भाषा में नहीं बढ़ाना। स्रोत जो कहता है, वही — हमारी ओर से निश्चित चरित्र-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that in a Venus-sign or Saturn-sign condition, with Moon-joined Venus in the lagna, the woman is described — “assuredly,” in the śāstra’s own word — as vandhakī in association with the mother. Report as the text’s claim; do not escalate into fear or moral coercion.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राशि-स्वामी क्षेत्र + लग्न में चन्द्र-शुक्र युति)। जाँच केवल स्थितीय: (1) प्रसंग-बिन्दु शुक्र-भ या शनि-भ में? (2) लग्न-राशि में चन्द्र और शुक्र सह-स्थित? — हाँ/नहीं; कोई बलांक या वर्ष-सूत्र यहाँ नहीं।

80.22
कुजर्क्षे वा तदंशेऽस्ते स्त्रीलोलः क्रोधनः पतिः ।
बौधर्क्षांशे तथा विद्वान् कलासु निपुणः सुधीः
kujarkṣe vā tadaṃśe'ste strīlolaḥ krodhanaḥ patiḥ |
baudharkṣāṃśe tathā vidvān kalāsu nipuṇaḥ sudhīḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजर्क्ष = मङ्गल की राशि (७म स्थान में); तदंश = उसी (मङ्गल) का अंश/वर्गांश; अस्त = सप्तम भाव (अस्त-स्थान = दाम्पत्य); स्त्रीलोल = स्त्रियों के प्रति आसक्त; क्रोधन = क्रोधी स्वभाव; बौधर्क्षांश = बुध की राशि अथवा बुध-अंश; कलासु निपुणः = कलाओं में दक्ष; सुधीः = बुद्धिमान्

हिन्दी भावार्थ स्त्री-जातक में यदि सप्तम भाव मङ्गल की राशि में हो, अथवा सप्तम का अंश मङ्गल-सम्बद्ध हो, तो शास्त्र पति को स्त्री-आसक्त और क्रोधी बताता है। यदि सप्तम राशि या अंश बुध का हो, तो वही पति विद्वान्, कला-कौशल में निपुण और सुबुद्धि वाला कहा गया है। यहाँ राशि और अंश दोनों से पति-स्वभाव का निर्देश है।

English rendering When the seventh (asta) is in Mars’s sign or in a Mars-linked aṃśa, the text states the husband is woman-fond and irascible. When the seventh sign or aṃśa is Mercury’s, it states he is learned, skilled in the arts, and of good intelligence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सप्तम राशि/अंश से पति-लक्षण)। राशि = ३०° का चिह्न; अंश यहाँ वर्गांश/भागांश की दिशा में पढ़ा जाता है — गणना-नियम इस श्लोक में नहीं दिया; केवल फल-निर्देश है।

80.23
जैवे सर्वगुणोपेतः पतिरस्ते जितेन्द्रियः ।
शौक्रे सौभाग्यसंयुक्तः कान्तः स्त्रीजनवल्लभः
jaive sarvaguṇopetaḥ patiraste jitendriyaḥ |
śaukre saubhāgyasaṃyuktaḥ kāntaḥ strījanavallabhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जैवे = बृहस्पति (जीव) की राशि/अंश में; सर्वगुणोपेतः = सब गुणों से युक्त; पतिः अस्ते = सप्तम में स्थित पति; जितेन्द्रियः = इन्द्रिय-जित; शौक्रे = शुक्र की राशि/अंश में; सौभाग्यसंयुक्तः = सौभाग्य से युक्त; कान्तः = आकर्षक/सुन्दर; स्त्रीजनवल्लभः = स्त्री-जन का प्रिय

हिन्दी भावार्थ यदि सप्तम बृहस्पति से सम्बद्ध हो, तो शास्त्र पति को सर्व-गुण-सम्पन्न और जितेन्द्रिय कहता है। यदि सप्तम शुक्र-सम्बद्ध हो, तो पति सौभाग्यवान्, कान्तिमान् और स्त्रियों का प्रिय बताया गया है। यह पूर्व-श्लोकों की उसी सप्तम-फल श्रृंखला का विस्तार है।

English rendering With the seventh under Jupiter, the text describes the husband as endowed with all virtues and self-mastered. With the seventh under Venus, it describes him as fortunate, attractive, and beloved among women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु/शुक्र से सप्तम-पति लक्षण)। यहाँ कोई काल-मान, बल-इकाई या वर्ग-विभाजन सूत्र नहीं; केवल ग्रह-राशि/अंश के अनुसार गुणात्मक निर्देश है।

80.24
सौरेर्क्ष वाथ सौरांशे वृद्धो मूर्खश्च सप्तमे ।
अतीवामृदुरर्कांशे तदृक्षेवाऽतिकर्मकृत्
saurerkṣa vātha saurāṃśe vṛddho mūrkhaśca saptame |
atīvāmṛdurarkāṃśe tadṛkṣevā'tikarmakṛt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौरेर्क्ष = शनि की राशि; सौरांश = शनि का अंश; वृद्धः = वृद्ध आयु/वृद्ध-सा; मूर्खः = मूर्ख; सप्तमे = सातवें भाव में; अतीव अमृदुः = अत्यन्त मृदु/कोमल (पाठ: अतीवामृदुः); अर्कांश = सूर्य का अंश; तदृक्षे = उसी (सूर्य) की राशि में; अतिकर्मकृत् = अत्यधिक कर्म करने वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — सप्तम में शनि की राशि या शनि-अंश हो तो पति वृद्ध-सा और मूर्ख-स्वभाव वाला बताया जाता है। सूर्य के अंश में, अथवा सूर्य की राशि में सप्तम हो, तो पति अत्यन्त मृदु और अति-कर्मशील कहा गया है। राशि और अंश दोनों विकल्पों (वा / अथ) से फल जोड़ा गया है।

English rendering The text states that a seventh in Saturn’s sign or Saturn’s aṃśa marks the husband as aged and foolish. In the Sun’s aṃśa or the Sun’s sign, it states he is extremely gentle and highly industrious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि/सूर्य से सप्तम-पति लक्षण)। “अंश” यहाँ गणना-सूत्र नहीं खोलता; केवल सप्तम की राशि बनाम अंश की फल-जोड़ी है। पाठ “अतीवामृदुः” — पाठ-भेद संभव (अमृदु/मृदु की दिशा में)।

80.25
अस्ते कर्के तदंशे वा कान्तः कामी मृदुः पतिः ।
मिश्रे मिश्रफलं वाच्यं भांशयोश्च बलक्रमात्
aste karke tadaṃśe vā kāntaḥ kāmī mṛduḥ patiḥ |
miśre miśraphalaṃ vācyaṃ bhāṃśayośca balakramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्ते = सप्तम में; कर्के = कर्क राशि में; तदंशे = कर्क-अंश में; कान्तः = सुन्दर/आकर्षक; कामी = काम-प्रवण; मृदुः = मृदु स्वभाव; मिश्रे = मिश्र स्थिति में; मिश्रफलम् = मिश्रित फल; भ-अंशयोः = राशि और अंश दोनों का; बलक्रमात् = बल के क्रम से

हिन्दी भावार्थ सप्तम कर्क राशि में हो, अथवा कर्क-अंश में, तो शास्त्र पति को कान्त, कामी और मृदु कहता है। यदि राशि और अंश भिन्न-भिन्न ग्रहों/स्थितियों से मिश्र हों, तो मिश्र फल बोलना चाहिए — और वह फल राशि तथा अंश के बल-क्रम के अनुसार निर्धारित हो। यह श्लोक शुद्ध फल के साथ मिश्र-फल का नियम भी देता है।

English rendering With the seventh in Cancer or in a Cancer aṃśa, the text calls the husband attractive, passionate, and gentle. When sign and aṃśa are mixed, mixed results are to be stated, ranked by the relative strength of the sign and the aṃśa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + मिश्र-फल का बल-क्रम नियम। “बलक्रमात्” दिशा देता है कि राशि-बल और अंश-बल की तुलना से मिश्र फल तौला जाए; इस श्लोक में बल की इकाइयाँ (रूप/विरूप आदि) स्वयं नहीं दी गईं — वे अन्य अध्यायों के बल-शास्त्र से जुड़ती हैं।

80.26
सूर्येऽष्टमगते जाता दुःखदारिद्र्यसंयुता ।
क्षताङ्गी खेदयुक्ता च भवेद्धर्मपराङ्मुखी
sūrye'ṣṭamagate jātā duḥkhadāridryasaṃyutā |
kṣatāṅgī khedayuktā ca bhaveddharmaparāṅmukhī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्ये अष्टमगते = सूर्य अष्टम भाव में स्थित; जाता = जातक स्त्री; दुःख-दारिद्र्य-संयुता = दुःख और दरिद्रता से युक्त; क्षताङ्गी = क्षत/आहत अङ्ग वाली; खेदयुक्ता = खेद-पीड़ा युक्त; धर्मपराङ्मुखी = धर्म से विमुख

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्त्री-जातक में सूर्य अष्टम भाव में हो तो जातिका दुःख और दारिद्र्य से युक्त कही गई है। उसे क्षत-अङ्ग, खेद से भरी, और धर्म की ओर से पराङ्मुख भी बताया गया है। यह अष्टम-स्थित सूर्य का फल-कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that a woman born with the Sun in the eighth is joined to sorrow and poverty; it further describes her as marked in limb, distressed, and averse to dharma. These are the śāstra’s phala-claims for that placement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सूर्य अष्टम)। भाव-स्थान (१–१२) की गणना लग्न-राशि से क्रमिक है; अष्टम = लग्न से आठवाँ चिह्न — किन्तु इस श्लोक में केवल फल है, कोई संख्या-सूत्र नहीं।

80.27
चन्द्रेऽष्टमगते नारी कुभगा कुस्तनो कुदृग् ।
वस्त्राभरणहीना च रोगिणी चातिगर्हिता
candre'ṣṭamagate nārī kubhagā kustano kudṛg |
vastrābharaṇahīnā ca rogiṇī cātigarhitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रे अष्टमगते = चन्द्र अष्टम में; नारी = स्त्री; कुभगा = कु-भगा (अशुभ भाग्य/शारीरिक-लक्षण की कु-संज्ञा — शास्त्रीय स्त्री-लक्षण शब्दावली); कुस्तनः = कु-स्तन (स्तन-संज्ञा अशुभ); कुदृश् = कु-दृष्टि/अशुभ नेत्र; वस्त्र-आभरण-हीना = वस्त्र और आभूषण से रहित; रोगिणी = रोग-युक्त; अतिगर्हिता = अत्यन्त निन्द्य/गर्हणीय

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अष्टम में चन्द्र हो तो नारी कुभगा, कुस्तन और कुदृग् कही गई है। उसे वस्त्र-आभरण से हीन, रोगिणी और अत्यन्त गर्हिता भी बताया गया है। ये स्त्री-जातक के अष्टम-चन्द्र के शास्त्रीय फल-शब्द हैं; इन्हें नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that with the Moon in the eighth the woman is described by the traditional “ku-” marks (of body and fortune), lacking clothes and ornaments, diseased, and highly censured. Report as the śāstra’s phala, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चन्द्र अष्टम)। कोई बिन्दु-संख्या, दशा-वर्ष या बल-इकाई यहाँ नहीं; केवल अष्टम-स्थित चन्द्र का गुणात्मक फल।

80.28
कुजेऽष्टमगते बाला कृशाङ्गी रोगसंयुता ।
विधवा कान्तिहीना च शोकसन्तापदुःखिता
kuje'ṣṭamagate bālā kṛśāṅgī rogasaṃyutā |
vidhavā kāntihīnā ca śokasantāpaduḥkhitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजे अष्टमगते = मङ्गल अष्टम में; बाला = बालिका/युवती (आयु-संदर्भ); कृशाङ्गी = कृश शरीर वाली; रोगसंयुता = रोग से युक्त; विधवा = विधवा; कान्तिहीना = कान्ति-रहित; शोक-सन्ताप-दुःखिता = शोक, सन्ताप और दुःख से पीड़ित

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — अष्टम में मङ्गल हो तो जातिका बाल-अवस्था/युवावस्था के सन्दर्भ में कृशाङ्गी और रोग-युक्त कही गई है। उसे विधवा, कान्तिहीना, तथा शोक-सन्ताप-दुःख से युक्त भी बताया गया है। यह अष्टम-मङ्गल का फल-वर्णन है; इसे डर या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता।

English rendering The text states that with Mars in the eighth the woman is thin-limbed and disease-joined, and further described as a widow, without luster, and afflicted by grief, torment, and sorrow. These remain the śāstra’s phala-statements for that configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मङ्गल अष्टम)। अष्टम-स्थान की पहचान लग्न से आठवें भाव की गणना से होती है; श्लोक स्वयं केवल फल देता है, कोई बीजगणितीय नियम नहीं।

80.29
बुधेष्टमगते जाता धर्महीना भयातुरा ।
अभिमानधनैर्हीना निर्गुणा कलहप्रिया
budheṣṭamagate jātā dharmahīnā bhayāturā |
abhimānadhanairhīnā nirguṇā kalahapriyā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधे = बुध (Mercury); अष्टम-गते = अष्टम भाव में स्थित; जाता = जात कन्या / स्त्री-जात; धर्म-हीना = धर्म-वृत्ति से हीन; भय-आतुरा = भय से व्याकुल; अभिमान-धनैः हीना = अभिमान और धन से रहित; निर्गुणा = गुणहीन; कलह-प्रिया = झगड़े में रुचि रखने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब बुध अष्टम भाव में हो, तब जात नारी धर्म-वृत्ति से हीन तथा भय से व्याकुल बताई गई है। वह अभिमान और धन दोनों से हीन, गुणों से रिक्त, और कलह-प्रिय कही गई है। यह कथन बुध की अष्टम-स्थिति से जुड़े फल-वर्णन का भाग है, न कि किसी व्यक्ति पर लागू अनिवार्य भाग्य-लेख।

English rendering The text states that when Mercury occupies the eighth house, the woman born is described as deficient in dharma-orientation, tormented by fear, lacking both pride and wealth, without virtues, and fond of quarrels.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अष्टम-गमन केवल भाव-स्थान (लग्नादि से अष्टम) का निर्धारण है; फल स्वयं शास्त्रीय दावा है, गणना-योग्य राशि नहीं।

80.30
गुरावष्टमगे बाला विशीला स्वल्पसन्ततिः ।
पृथुवादकरा पत्या त्यक्ता बह्वशना भवेत्
gurāvaṣṭamage bālā viśīlā svalpasantatiḥ |
pṛthuvādakarā patyā tyaktā bahvaśanā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरौ = बृहस्पति (Jupiter); अष्टम-गे = अष्टम में स्थित; बाला = कन्या / बालिका; विशीला = शील-विरुद्ध, दुश्चरित; स्वल्प-सन्ततिः = अल्प सन्तान वाली; पृथु-वाद-करा = बड़े/तीव्र विवाद करने वाली; पत्या त्यक्ता = पति द्वारा त्यक्त; बहु-अशना = बहुत खाने वाली; भवेत् = होती है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु के अष्टम-गत होने पर जात बाला विशील, अल्प-सन्तति वाली, और पृथु (तीव्र/विस्तृत) वाद करने वाली बताई गई है। आगे कहा गया है कि वह पति द्वारा त्यक्त हो सकती है और बहुत भोजन करने वाली होती है। यह गुरु-अष्टम का फल-वर्णन है; इसे अनिवार्य भाग्य या चिकित्सा/सामाजिक निर्णय के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when Jupiter is in the eighth, the girl is described as of impaired conduct, of scant progeny, given to expansive quarrels of speech, abandoned by the husband, and a heavy eater.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। “अष्टम-ग” केवल ग्रह-भाव स्थिति है; सन्तान-संख्या आदि यहाँ संख्या-सूत्र नहीं, शास्त्रीय फल-भाषा है।

80.31
शुक्रेऽष्टमगते जाता प्रमत्ता धनवर्जिता ।
निर्दया धर्महीना च मलिना कपटान्विता
śukre'ṣṭamagate jātā pramattā dhanavarjitā |
nirdayā dharmahīnā ca malinā kapaṭānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रे = शुक्र (Venus); अष्टम-गते = अष्टम में स्थित; जाता = जात स्त्री; प्रमत्ता = प्रमाद-युक्त / उन्मत्त-सी; धन-वर्जिता = धन से रहित; निर्दया = दयाहीन; धर्म-हीना = धर्महीन; मलिना = मलिन / अशुचि-स्वभाव; कपट-अन्विता = कपट से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शुक्र के अष्टम-भाव में स्थित होने पर जात नारी प्रमत्त, धन-वर्जित, निर्दय, और धर्महीन कही गई है। साथ ही उसे मलिन स्वभाव वाली तथा कपट से युक्त बताया गया है। यह शुक्र-अष्टम का शास्त्रीय फल-वाक्य है; डर या दबाव का आधार नहीं।

English rendering The text states that when Venus occupies the eighth, the woman born is described as reckless or intoxicated in conduct, devoid of wealth, merciless, without dharma-orientation, unclean in disposition, and associated with deceit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शुक्र की अष्टम-स्थिति का फल-वर्णन; कोई दशा-वर्ष, बल-इकाई, या वर्ग-विभाजन यहाँ नहीं है।

80.32
शनावष्टमगे जाता दुःस्वभावा मलिम्लुचा ।
प्रवंचनपरा नारी भवेत् पतिसुखोज्ज्ञिता
śanāvaṣṭamage jātā duḥsvabhāvā malimlucā |
pravaṃcanaparā nārī bhavet patisukhojjñitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनौ = शनि (Saturn); अष्टम-गे = अष्टम में स्थित; जाता = जात; दुः-स्वभावा = दुष्ट/कठिन स्वभाव वाली; मलिम्लुचा = चोर-स्वभाव (मलिम्लुच); प्रवंचन-परा = छल/प्रतारणा में तत्पर; नारी = स्त्री; पति-सुख-उज्झिता = पति-सुख से रहित (उज्झिता = परित्यक्त/हीन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — शनि के अष्टम-गत होने पर जात नारी दुःस्वभाव वाली और मलिम्लुचा (चौर्य-प्रवृत्ति) बताई गई है। वह प्रवंचना में तत्पर कही गई है और पति-सुख से रहित बताई गई है। यह शनि-अष्टम का फल-कथन है; नैतिक कलंक या सामाजिक निर्णय थोपने के लिए नहीं।

English rendering The text states that when Saturn is in the eighth, the woman born is described as of harsh disposition, thievish, intent on deception, and deprived of the happiness of a husband.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। भाव-स्थान (अष्टम) का ग्रह-फल; कोई संख्यात्मक काल-मान या बलांश यहाँ नहीं।

80.33
राहावष्टमभावस्थे कुरूपा पतिवर्जिता ।
कठोरहृदया रोगैर्युक्ता च व्यभिचारिणी
rāhāvaṣṭamabhāvasthe kurūpā pativarjitā |
kaṭhorahṛdayā rogairyuktā ca vyabhicāriṇī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहौ = राहु; अष्टम-भाव-स्थे = अष्टम भाव में स्थित; कुरूपा = कुरूप; पति-वर्जिता = पति से रहित; कठोर-हृदया = कठोर हृदय वाली; रोगैः युक्ता = रोगों से युक्त; व्यभिचारिणी = व्यभिचार-शील (शास्त्र-शब्द; नैतिक फैसला नहीं)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — राहु के अष्टम भाव में स्थित होने पर नारी कुरूप, पति-वर्जित, कठोर हृदय वाली, रोगों से युक्त, और व्यभिचारिणी कही गई है। यह राहु-अष्टम का शास्त्रीय फल-वर्णन है। चिकित्सा, विवाह-विधि, या भय-व्यापार का आधार इससे नहीं बनता; पाठ को स्रोत-कथन के रूप में ही रखना चाहिए।

English rendering The text states that when Rāhu occupies the eighth house, the woman is described as unattractive, without a husband, hard-hearted, afflicted with diseases, and unchaste — as the śāstra’s own phrasing, not a diagnosis or social sentence we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। राहु की अष्टम-भाव स्थिति का वर्णनात्मक फल; कोई दशा-अनुपात या अष्टकवर्ग-बिन्दु यहाँ नहीं।

80.34
शशिशुक्रौ यदा लग्ने मन्दराभ्यां युतौ तदा ।
बन्ध्या भवति सा नारी सुतभे पापदृग्युते
śaśiśukrau yadā lagne mandarābhyāṃ yutau tadā |
bandhyā bhavati sā nārī sutabhe pāpadṛgyute

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशि-शुक्रौ = चन्द्र और शुक्र (द्विवचन); यदा = जब; लग्ने = लग्न में; मन्द-राभ्याम् = शनि और राहु से (मन्द = शनि; रा ≈ राहु — पाठ-भेद/संक्षेप संभव); युतौ = युक्त; तदा = तब; बन्ध्या = वन्ध्या (सन्तानहीन); सा नारी = वह स्त्री; सुत-भे = सुत-भाव (पंचम) में; पाप-दृक्-युते = पाप-दृष्टि/पाप-युति से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब चन्द्र और शुक्र लग्न में हों और शनि-राहु से युक्त हों, तब वह नारी बन्ध्या होती है — ऐसा पाठ का दावा है। आगे सुत-भाव (पंचम) के पाप-दृष्टि/युति से युक्त होने की शर्त भी जोड़ी गई है। यह योग-फल का कथन है; प्रजनन-चिकित्सा या निश्चित भाग्य नहीं। “मन्दराभ्याम्” में राहु-पक्ष पाठ-भेद/संक्षेप-संकेत संभव।

English rendering The text states that when the Moon and Venus stand in the lagna conjoined with Saturn and Rāhu, that woman is said to be barren; and when the putra-bhāva (fifth) is joined with malefic aspect/conjunction, the same barrenness-indication is tied to that house-condition. (The compound mandarābhyām is read as Saturn and Rāhu; slight recension variance is possible.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-फल / फल-कथन। लग्न और पंचम (सुत-भ) की ग्रह-युति/दृष्टि यहाँ तर्क-शर्त हैं, पर कोई वर्ष-संख्या, अंश-विभाजन, या बल-इकाई निर्दिष्ट नहीं। दृष्टि-नियम अलग अध्यायों के हैं; इस श्लोक में केवल फल-संयोग कहा गया है।

80.35
कुजांशेस्तगते सौरिदृष्टे नारी सरुग्भगा ।
शुभांशे सप्तमे ज्ञेया सुभगा पतिवल्लभा
kujāṃśestagate sauridṛṣṭe nārī sarugbhagā |
śubhāṃśe saptame jñeyā subhagā pativallabhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज-अंशे = मंगल के अंश (वर्ग/अंश-स्थान; प्रायः नवांश आदि — पाठ स्पष्ट नहीं) में; अस्त-गते = अस्त (सूर्य-समीप अस्त/दहन-अवस्था) में गए ग्रह पर; सौरि-दृष्टे = शनि की दृष्टि से युक्त; नारी = स्त्री; स-रुग्-भगा = रोग-युक्त भग वाली / रोग-पीड़ित (शास्त्र-शब्द); शुभ-अंशे = शुभ ग्रह के अंश में; सप्तमे = सप्तम भाव में; ज्ञेया = जानी जाए; सुभगा = सौभाग्यवती; पति-वल्लभा = पति की प्रिया।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कुज-अंश में अस्त-गत और शनि-दृष्ट होने पर नारी सरुग्भगा (रोग-युक्त भगवाली) कही गई है। इसके विपरीत, शुभ-अंश में और सप्तम भाव-संबन्ध से उसे सुभगा तथा पतिवल्लभा जानना चाहिए — ऐसा पाठ का भेद-फल है। “अंश” यहाँ वर्ग-स्थान का संकेत है; किस वर्ग (D9 आदि) का स्पष्ट उल्लेख इस पंक्ति में नहीं, अतः पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव। फल को चिकित्सा-निदान या भय-वाक्य नहीं बनाना चाहिए।

English rendering The text states that when (the relevant factor is) in Mars’s aṃśa, set (asta), and aspected by Saturn, the woman is described as sarugbhagā (afflicted in the genital region). In a benefic aṃśa and with regard to the seventh, she is to be known as fortunate and beloved of her husband. Which divisional chart the word aṃśa exactly names here is not fixed in the line itself — recension/tradition variance is possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अंश/अस्त/दृष्टि की शर्तों पर)। “अंश” वर्ग-स्थान की भाषा है; षोडश-वर्ग में प्रत्येक वर्ग 30° राशि का समान खण्डों में विभाजन है (D9 नवांश = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश, आदि), पर यह श्लोक विभाजन-सूत्र नहीं सिखाता — केवल फल बाँधता है। अस्त = सूर्य-से-निकटता की दशा (ग्रह-विशेष सीमाएँ परम्परा-निर्भर); यहाँ संख्या नहीं दी गई।

80.36
बुधभे लग्नगे सूतौ चन्द्रशुक्रयुते द्विज ।
ज्ञेया पितृगृहे नारी सा सर्वसुखसंयुता
budhabhe lagnage sūtau candraśukrayute dvija |
jñeyā pitṛgṛhe nārī sā sarvasukhasaṃyutā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुधभे = बुध-राशि में; लग्नगे = लग्न में स्थित; सूतौ = (कन्या के) जन्म-काल में; चन्द्रशुक्रयुते = चन्द्र और शुक्र से युक्त; द्विज = हे द्विज (शिष्य-सम्बोधन); पितृगृहे = पिता के घर में; सर्वसुखसंयुता = समस्त सुखों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, जब जन्म-लग्न बुध की राशि में हो और वहाँ चन्द्र तथा शुक्र का योग हो, तो शास्त्र कहता है कि वह नारी पिता के घर में सब प्रकार के सुखों से सम्पन्न मानी जाए। यह कथन स्त्री-जातक के लग्न-योग पर आधारित फल-विवरण है। पाठ-भेद संभव, क्योंकि युति का ठीक-ठीक स्थान (केवल लग्न या लग्न-सम्बद्ध) कुछ पाठों में भिन्न पढ़ा जा सकता है।

English rendering O twice-born, when the lagna occupies a sign of Mercury and the Moon is joined with Venus, the text states that the woman is to be regarded as endowed with every comfort in her father’s house. The claim is a phala of the lagna-yoga, not a computation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। यह स्त्री-जातक में बुध-राशि-लग्न + चन्द्र-शुक्र योग का शास्त्रीय सुख-फल है; यहाँ कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-गणना या दशा-अनुपात नहीं है।

80.37
लग्ने चन्द्रज्ञशुक्रेषु बहुसौख्यगुणान्विता ।
जीव तत्रातिसम्पन्ना पुत्रवित्तसुखान्विता
lagne candrajñaśukreṣu bahusaukhyaguṇānvitā |
jīva tatrātisampannā putravittasukhānvitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = लग्न में; चन्द्रज्ञशुक्रेषु = चन्द्र, बुध (ज्ञ) और शुक्र के स्थित होने पर; बहुसौख्यगुणान्विता = बहुत सुख और गुणों से युक्त; जीव = गुरु; तत्र = वहाँ (लग्न में); अतिसम्पन्ना = अत्यन्त समृद्ध; पुत्रवित्तसुखान्विता = पुत्र, धन और सुख से युक्त।

हिन्दी भावार्थ जब लग्न में चन्द्र, बुध और शुक्र हों, तो शास्त्र कहता है कि कन्या बहुसुख और उत्तम गुणों से युक्त होती है। यदि वहीं गुरु भी स्थित हो, तो पाठ कहता है कि वह अत्यन्त सम्पन्न तथा पुत्र, वित्त और सुख से अन्वित कही गई है। यह तीन/चार शुभ-ग्रहों के लग्न-संयोग का फल-वर्णन है।

English rendering When the Moon, Mercury, and Venus occupy the lagna, the text states that she is endowed with abundant comfort and good qualities. If Jupiter also stands there, the śāstra further describes her as highly prosperous and possessed of children, wealth, and happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। लग्न में चन्द्र-बुध-शुक्र (और वैकल्पिक रूप से गुरु) का स्थान-फल; कोई अंश-सूत्र या बल-इकाई यहाँ नहीं दी गई।

80.38
लग्नादष्टमगौ स्यातां चन्द्रार्कौ स्वर्क्षगौ तदा ।
बन्ध्याऽथ काकबन्ध्या चेदेवं चन्द्रबुधौ यदा
lagnādaṣṭamagau syātāṃ candrārkau svarkṣagau tadā |
bandhyā'tha kākabandhyā cedevaṃ candrabudhau yadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नादष्टमगौ = लग्न से अष्टम भाव में स्थित; चन्द्रार्कौ = चन्द्र और सूर्य; स्वर्क्षगौ = अपनी-अपनी राशि में; बन्ध्या = (शास्त्र-शब्द) वन्ध्या; काकबन्ध्या = काक-वन्ध्या (पारम्परिक जातक-वर्ग); चन्द्रबुधौ = चन्द्र और बुध; यदा = जब।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि लग्न से अष्टम भाव में चन्द्र और सूर्य अपनी-अपनी राशि में हों, तो वह नारी बन्ध्या अथवा काकबन्ध्या कही गई है। उसी प्रकार जब चन्द्र और बुध इसी व्यवस्था में हों, तो भी वही फल बताया गया है। “काकबन्ध्या” यहाँ चिकित्सकीय निदान नहीं, होरा-शास्त्र का पारम्परिक फल-पद है। पाठ-भेद संभव, क्योंकि दोनों पंक्तियों की युति-शर्त कुछ आवृत्तियों में संक्षिप्त या विस्तारित मिल सकती है।

English rendering The text states that when the Moon and the Sun occupy the eighth from the lagna in their own signs, the woman is classed as bandhyā or kāka-bandhyā. The same is said when the Moon and Mercury stand thus. These are traditional jātaka categories as named by the śāstra, not medical diagnoses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अष्टम-भाव + स्वराशि की शर्त केवल स्थान-नियम है; इसमें कोई संख्यात्मक सूत्र या बलांश नहीं है। भाव-गणना के लिए घर-पद्धति (सामान्यतः पूर्ण-राशि भाव) घोषित करनी होती है, किन्तु श्लोक स्वयं कोई इकाई नहीं देता।

80.39
शनिमङ्गलभे लग्ने चन्द्रभार्गवसंयुते ।
पापदृष्टे च सा नारी बन्ध्या भवति निश्चयात्
śanimaṅgalabhe lagne candrabhārgavasaṃyute |
pāpadṛṣṭe ca sā nārī bandhyā bhavati niścayāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनिमङ्गलभे = शनि या मंगल की राशि में; लग्ने = लग्न में; चन्द्रभार्गवसंयुते = चन्द्र और भार्गव (शुक्र) से युक्त; पापदृष्टे = पाप-ग्रहों से दृष्ट; नारी = स्त्री; बन्ध्या = (शास्त्र-शब्द) वन्ध्या; निश्चयात् = (पाठ का अपना) निश्चय-वाचक पद।

हिन्दी भावार्थ जब लग्न शनि या मंगल की राशि में हो, वहाँ चन्द्र-शुक्र का योग हो, और वह पाप-ग्रहों से दृष्ट हो, तो शास्त्र कहता है कि वह नारी बन्ध्या होती है—पाठ स्वयं “निश्चयात्” शब्द प्रयुक्त करता है। यह पाप-राशि-लग्न, शुभ-युति और पाप-दृष्टि का संयुक्त फल-कथन है। हम इसे नियति या चिकित्सकीय निश्चितता के रूप में नहीं पढ़ते; केवल शास्त्र का अपना दावा रपट करते हैं।

English rendering When the lagna is in a sign of Saturn or Mars, joined by the Moon and Venus, and aspected by malefics, the text states—using its own word niścayāt—that the woman is bandhyā. Report the claim as the śāstra’s; do not treat it as medical certainty or endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। राशि-स्वामित्व (शनि/मंगल), युति और पाप-दृष्टि की शर्तें स्थान-दृष्टि नियम हैं; यहाँ कोई अंश-गणना या बिन्दु-सारणी नहीं है।

80.40
सराहौ सप्तमे सूर्ये पञ्चमे पापसंयुते ।
शुक्रेज्यराहवो मृत्यौ मृतापत्या च सा भवेत्
sarāhau saptame sūrye pañcame pāpasaṃyute |
śukrejyarāhavo mṛtyau mṛtāpatyā ca sā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सराहौ = राहु सहित; सप्तमे = सप्तम भाव में; सूर्ये = सूर्य; पञ्चमे = पञ्चम में; पापसंयुते = पाप-ग्रह युक्त; शुक्रेज्यराहवः = शुक्र, इज्य (गुरु) और राहु; मृत्यौ = मृत्यु-भाव (अष्टम) में; मृतापत्या = (शास्त्र-शब्द) जिसकी सन्तान मृत्यु को प्राप्त हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दो स्थितियाँ जोड़ता है: सप्तम में राहु-युक्त सूर्य और पञ्चम में पाप-संयोग; तथा/अथवा मृत्यु-भाव में शुक्र, गुरु और राहु। इन योगों में वह नारी “मृतापत्या” कही गई है—अर्थात् पाठ के अनुसार जिसकी अपत्य-स्थिति मृत्यु-सम्बद्ध फल से जुड़ी बताई गई। यह भय-वाणी नहीं, शास्त्र का फल-पद है; चिकित्सा या भविष्य की गारंटी नहीं।

English rendering The text states that when the Sun with Rāhu occupies the seventh and the fifth is joined by malefics, and/or when Venus, Jupiter, and Rāhu stand in the eighth (mṛtyu), she is called mṛtāpatyā—one whose offspring-status the śāstra links to death-phala. Render as the text’s claim only, without fear-rhetoric or medical prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। सप्तम/पञ्चम/अष्टम भावों में ग्रह-योग का स्थान-फल; कोई दशा-वर्ष या बल-रूप यहाँ नहीं दिया गया। भाव-परिभाषा (पूर्ण-राशि आदि) परिणाम को बदल सकती है—यह सम्मेलन घोषित करने योग्य है, श्लोक स्वयं नहीं बताता।

80.41
शुक्रेज्यावष्टमे सारौ सप्तमे वा कुजो भवेत् ।
शनिना दृग्युतो नारी गलद्गर्भा प्रकीर्तिता
śukrejyāvaṣṭame sārau saptame vā kujo bhavet |
śaninā dṛgyuto nārī galadgarbhā prakīrtitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रेज्यौ = शुक्र और गुरु; अष्टमे = अष्टम में; सारौ = शनि; सप्तमे = सप्तम में; कुजः = मंगल; शनिना दृग्युतः = शनि की दृष्टि/योग से युक्त; गलद्गर्भा = (शास्त्र-शब्द) गलित-गर्भा / गर्भ-स्रवण-सम्बद्ध फल-पद; प्रकीर्तिता = कही गई।

हिन्दी भावार्थ जब अष्टम में शुक्र-गुरु हों, और सप्तम में शनि अथवा मंगल हो, तथा नारी (अथवा वह योग) शनि की दृष्टि/योग से युक्त हो, तो शास्त्र उसे “गलद्गर्भा” कहता है। यह गर्भ-धारण/गर्भ-स्थिति से जुड़ा पारम्परिक फल-पद है, न कि चिकित्सकीय निदान और न ही हमारा अनुमोदित भविष्य-कथन। पाठ-भेद संभव: “दृग्युतो” के कर्ता (नारी या ग्रह-युग्म) पर आवृत्तियाँ थोड़ा भिन्न संकेत दे सकती हैं।

English rendering The text declares the woman galad-garbhā when Venus and Jupiter occupy the eighth, Saturn or Mars occupies the seventh, and Saturn’s aspect or conjunction is present. Treat galad-garbhā as a traditional phala label of the śāstra, not a clinical diagnosis or an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। अष्टम-सप्तम स्थान + शनि-दृष्टि की शर्त; कोई संख्यात्मक गुणन/भाग या वर्ष-अनुपात नहीं।

80.42
पापकर्तरिके लग्ने चन्द्रे जाता च कन्यका ।
समस्तं पितृवंशं च पतिवंशं हिहन्ति सा
pāpakartarike lagne candre jātā ca kanyakā |
samastaṃ pitṛvaṃśaṃ ca pativaṃśaṃ hihanti sā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पापकर्तरिके = पाप-कर्तरी (दो पाप-ग्रहों के बीच कटार-योग) में; लग्ने चन्द्रे = लग्न और/अथवा चन्द्र; जाता कन्यका = जन्मी कन्या; समस्तं पितृवंशम् = समूचा पितृ-वंश; पतिवंशम् = पति-वंश; हि हन्ति = (पाठ का शब्द) हनन/हानि करती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब लग्न (और चन्द्र) पाप-कर्तरी में हो, तब जन्मी कन्या पितृ-वंश और पति-वंश दोनों को हानि पहुँचाती बताई गई है। “हन्ति” यहाँ शास्त्र का अपना तीव्र फल-शब्द है; हम इसे भय-व्यापार या नियति की गारंटी के रूप में नहीं दोहराते। कर्तरी का तकनीकी अर्थ: लग्न (या चन्द्र) के दोनों पार्श्व-भावों/अंश-पार्श्वों में पाप-ग्रहों का घेरा—यह स्थान-योग है, गणना-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that a girl born with the lagna (and the Moon) in malefic kartarī harms the entire paternal line and the husband’s line. “Hanti” is the śāstra’s own severe phala-verb; report it as such, without fear-commerce or deterministic endorsement. Kartarī is a flanking configuration of malefics, not a numeric algorithm.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पाप-कर्तरी एक स्थान-संरचना (दो ओर पाप-ग्रह) है; इसमें अष्टकवर्ग-बिन्दु, वर्ग-भाग या दशा-अनुपात का कोई सूत्र नहीं आता।

80.43
ससर्पाग्निजलेशर्क्षे भानुमन्दारवासरे ।
भद्रातिथौ जनुर्यस्याः सा विषाख्या कुमारिका
sasarpāgnijaleśarkṣe bhānumandāravāsare |
bhadrātithau januryasyāḥ sā viṣākhyā kumārikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ससर्प = सर्प-संबद्ध (सर्पाश्रय) राशि/नक्षत्र-सन्दर्भ; अग्नि = अग्नि-राशि (मेष-सिंह-धनु); जलेश = जलेश (कर्क/जल-अधिपति सन्दर्भ); र्क्षे = राशि/नक्षत्र में; भानु-मन्दार-वासरे = रवि- अथवा शनि-वार को; भद्रातिथौ = भद्रा-तिथि में; जनुः = जन्म; विषाख्या कुमारिका = “विष” संज्ञा वाली कन्या।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कन्या-जन्म की एक विशेष पहचान-शर्त बताता है। सर्प-, अग्नि- तथा जलेश-सन्दर्भ वाले राशि/नक्षत्र में, रवि- या शनि-वार को, और भद्रा-तिथि में जिसका जन्म हो, उस कन्या को पाठ “विषाख्या” कहता है। यह नामकरण-योग का कथन है, न कि किसी फल का स्वतन्त्र गणितीय सूत्र। पाठ-भेद संभव जहाँ सर्प/अग्नि/जलेश को राशि या नक्षत्र पर बाँधा जाए।

English rendering The text states that a girl born under the serpent-, fire-, and water-lord sign/asterism context, on a Sunday or Saturday, and on a Bhadra tithi, is designated viṣākhya (“poison”-named). It is a classificatory birth-condition, not an independent computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-पहचान (वार × तिथि × राशि/नक्षत्र-वर्ग का संयोजक नियम)। इसे बूलियन मिलान की तरह पढ़ा जा सकता है: (राशि/नक्षत्र ∈ {सर्प, अग्नि, जलेश-सन्दर्भ}) ∧ (वार ∈ {रवि, शनि}) ∧ (तिथि = भद्रा) ⇒ पाठ की “विषाख्या” संज्ञा; संख्या-स्थिरांक स्वयं श्लोक में नहीं दिए गए।

80.44
सपापश्च शुभौ लग्ने द्वौ पापौ शत्रुभस्थितौ ।
यस्या जनुषि सा कन्या विषाख्या परिकीर्तिता
sapāpaśca śubhau lagne dvau pāpau śatrubhasthitau |
yasyā januṣi sā kanyā viṣākhyā parikīrtitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सपाप = पाप-युक्त / पाप-सहित; शुभौ = दो शुभ ग्रह; लग्ने = लग्न में; द्वौ पापौ = दो पाप ग्रह; शत्रुभस्थितौ = शत्रु-भाव (षष्ठ) में स्थित; यस्या जनुषि = जिसके जन्म-कुण्डली में; कन्या = कन्या; विषाख्या = “विष” संज्ञा; परिकीर्तिता = कही गई है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र “विषाख्या” कन्या की दूसरी पहचान बताता है। लग्न में दो शुभ ग्रह यदि पाप-सहित हों, और दो पाप ग्रह शत्रु-भाव में हों, तो उस जन्म-काल की कन्या को पाठ विषाख्या कहता है। यह ग्रह-भाव-संयोग का लक्षण-कथन है। “शत्रुभ” को षष्ठ-भाव मानना शास्त्रीय भाव-नाम-परम्परा से मेल खाता है; पाठ-भेद संभव यदि कहीं शत्रु-राशि पढ़ा जाए।

English rendering The text states that a girl in whose chart two benefics occupy the lagna with malefic association, and two malefics stand in the enemy house, is proclaimed viṣākhya. It is a planetary-house configuration label, not a numerical period formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-भाव योग-परिभाषा। आधुनिक संकेतन में केवल संरचना: (लग्न में शुभ-द्वय + पाप-संसर्ग) ∧ (शत्रु-भाव में पाप-द्वय) ⇒ पाठ की “विषाख्या” संज्ञा; बलांक, अंश-सीमा या वर्ष-संख्या श्लोक में नहीं है।

80.45
विषयोगे समुत्पन्ना मृतवत्सा च दुर्भगा ।
वस्त्राभरणहीना च शोकसन्तप्तमानसा
viṣayoge samutpannā mṛtavatsā ca durbhagā |
vastrābharaṇahīnā ca śokasantaptamānasā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विषयोगे = विष-योग में; समुत्पन्ना = उत्पन्न; मृतवत्सा = मृत-सन्तान/मृतवत्सा; दुर्भगा = अभागिनी (पाठ का शब्द); वस्त्र-आभरण-हीना = वस्त्र-आभूषण-विहीन; शोक-सन्तप्त-मानसा = शोक से सन्तप्त मन वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विष-योग में उत्पन्न कन्या का फल-वर्णन करता है। पाठ कहता है कि ऐसी कन्या मृतवत्सा और दुर्भगा कही जाती है, वस्त्र-आभरण से हीन रहती है, और मन शोक से सन्तप्त रहता है। यह शास्त्र का अपना फल-कथन है — इसे नियति या सुनिश्चित भविष्य के रूप में नहीं पढ़ना। कोई चिकित्सा, विवाह-विधि या भय-आधारित उपाय यहाँ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

English rendering The text states that one born in viṣa-yoga is described as mṛtavatsā and durbhagā, lacking dress and ornaments, and with a grief-afflicted mind. These are the śāstra’s own result-claims, not predictions we endorse as fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। पूर्व-श्लोकों में परिभाषित “विष” योग की पहचान के बाद यह श्लोक केवल शास्त्रोक्त परिणाम-सूची देता है; कोई अंश-विभाजन, दशा-वर्ष या बल-एकक यहाँ नहीं है।

80.46
सप्तमेशः शुभो वापि सप्तमे लग्नतोऽथवा ।
चन्द्रतो वा विषं योगं विनिहन्ति न संशयः
saptameśaḥ śubho vāpi saptame lagnato'thavā |
candrato vā viṣaṃ yogaṃ vinihanti na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमेशः = सप्तम-भावेश; शुभः = शुभ; वा अपि = अथवा; सप्तमे लग्नतः = लग्न से सप्तम में; अथवा = या; चन्द्रतः = चन्द्र से; विषं योगं = विष-योग को; विनिहन्ति = नष्ट कर देता है; न संशयः = इसमें सन्देह नहीं (पाठ का निश्चय-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विष-योग के “भङ्ग” की शर्त बताता है। यदि सप्तमेश शुभ हो, अथवा लग्न से सप्तम में शुभ हो, अथवा चन्द्र से सप्तम में शुभ हो, तो पाठ कहता है कि विष-योग विनष्ट हो जाता है — “न संशयः” शास्त्र का अपना दृढ़ वचन है। यहाँ लग्न-चन्द्र दोनों से सप्तम की जाँच एक ही नियम का द्वैध-सन्दर्भ है। फल-निरसन का कथन है, गणना-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that a benefic seventh lord, or a benefic in the seventh from the lagna, or from the Moon, cancels the viṣa-yoga — “without doubt,” in the text’s own wording. It is a cancellation-condition on house-lordship and occupancy.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-भङ्ग नियम (भावेश/भाव-स्थिति का तर्क)। संकेत: (सप्तमेश ∈ शुभ) ∨ (लग्न-सप्तम में शुभ) ∨ (चन्द्र-सप्तम में शुभ) ⇒ पाठ के अनुसार विष-योग-निरसन। “शुभ” = शास्त्रीय शुभ-ग्रह-वर्ग; अंश-सीमा या संख्या-गुणक नहीं दिए गए।

80.47
लग्ने व्यये सुखे वापि सप्तमे चाऽष्टमे कुजे ।
शुभदृग्योगहीने च पतिं हन्ति न संशयः
lagne vyaye sukhe vāpi saptame cā'ṣṭame kuje |
śubhadṛgyogahīne ca patiṃ hanti na saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = लग्न में; व्यये = व्यय (द्वादश) में; सुखे = सुख (चतुर्थ) में; वा अपि = अथवा; सप्तमे = सप्तम में; अष्टमे = अष्टम में; कुजे = मङ्गल में; शुभ-दृग्-योग-हीने = शुभ दृष्टि/योग से रहित; पतिं हन्ति = पति को “हन्ति” (पाठ का शब्द); न संशयः = सन्देह नहीं (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक कुज-संयोग का फल-कथन करता है। लग्न, व्यय, सुख, सप्तम अथवा अष्टम में मङ्गल हो और शुभ दृष्टि तथा शुभ योग से हीन हो, तो पाठ कहता है — “पतिं हन्ति न संशयः”। यह शास्त्र का अपना कठोर फल-वाक्य है; हम इसे नियति, भय-कथन या सुनिश्चित घटना के रूप में नहीं दोहराते। “हन्ति” यहाँ शास्त्र-शब्दावली है — वैधव्य/पति-पीड़ा आदि के पाठ-परम्परागत संकेत के रूप में, चिकित्सा-विधि या दबाव-उपाय के रूप में नहीं।

English rendering The text states that Mars in the 1st, 12th, 4th, 7th, or 8th, devoid of benefic aspect and yoga, “slays the husband — without doubt.” Rendered strictly as the śāstra’s claim, not as fate we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुज की भाव-स्थिति + शुभ-दृष्टि/योग-अभाव)। संरचना: कुज ∈ {1, 4, 7, 8, 12} ∧ ¬(शुभ-दृष्टि ∨ शुभ-योग) ⇒ पाठ का “पतिं हन्ति”। दृष्टि-नियम (पूर्ण/अंश) इस श्लोक में नहीं खोले गए; केवल अभाव की शर्त है।

80.48
यस्मिन् योगे समुत्पन्ना पतिं हन्ति कुमारिका ।
तस्मिन् योगे समुत्पन्नो पत्नीं हन्ति नरोऽपि च
yasmin yoge samutpannā patiṃ hanti kumārikā |
tasmin yoge samutpanno patnīṃ hanti naro'pi ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्मिन् योगे = जिस योग में; समुत्पन्ना = उत्पन्न (स्त्री); पतिं हन्ति कुमारिका = कन्या “पतिं हन्ति” (पाठ); तस्मिन् योगे = उसी योग में; समुत्पन्नः = उत्पन्न (पुरुष); पत्नीं हन्ति = “पत्नीं हन्ति” (पाठ); नरः अपि च = पुरुष भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री-पुरुष में उसी योग का सममित फल बताता है। जिस योग में उत्पन्न कन्या को पाठ “पतिं हन्ति” कहता है, उसी योग में उत्पन्न पुरुष को पाठ “पत्नीं हन्ति” कहता है। यह लिंग-सममिति का नियम-कथन है — एक ही योग-परिभाषा, दो दिशाओं में फल-शब्द। फिर भी यह शास्त्र का दावा है, हमारी भविष्यवाणी नहीं; भय-भाषा या निश्चित-मृत्यु का आरोप यहाँ नहीं जोड़ना।

English rendering The text states that the same yoga which, for a girl, is said to “slay the husband,” for a man born in it is said to “slay the wife.” It is a gender-symmetric phala rule of the śāstra, not a prediction we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सममिति-नियम / फल-कथन। तर्क: योग Y स्त्री-जन्म पर ⇒ पाठ: पति-हन्त्री; योग Y पुरुष-जन्म पर ⇒ पाठ: पत्नी-हन्ता। कोई नया अंश, वर्ष या बल-एकक नहीं; पूर्व-परिभाषित योग का द्वैध-फल मात्र।

80.49
स्त्रीहन्त्रा परिणीता चेत् पतिहन्त्री कुमारिका ।
तदा वैधव्ययोगस्य भङ्गो भवति निश्चयात्
strīhantrā pariṇītā cet patihantrī kumārikā |
tadā vaidhavyayogasya bhaṅgo bhavati niścayāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीहन्त्रा = स्त्री-हन्ता (पाठ-संज्ञा वाला पुरुष); परिणीता = विवाहिता; चेत् = यदि; पतिहन्त्री कुमारिका = पति-हन्त्री कन्या (पाठ-संज्ञा); तदा = तब; वैधव्य-योगस्य = वैधव्य-योग का; भङ्गः = भङ्ग/निरसन; भवति = होता है; निश्चयात् = निश्चय से (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र वैधव्य-योग के भङ्ग की एक विशेष दशा बताता है। यदि “पतिहन्त्री” कही गई कन्या का विवाह “स्त्रीहन्ता” कहे गए पुरुष से हो, तो पाठ कहता है कि वैधव्य-योग का भङ्ग निश्चय होता है। यह दो विपरीत/सममित योगों के संयोग से पूर्व-कथित दोष-निरसन का शास्त्रोक्त नियम है। “निश्चयात्” पाठ का बल है; हम इसे अटल भाग्य या विवाह-निर्देश के रूप में नहीं थोपते — केवल सूत्र का वफादार अनुवाद।

English rendering The text states that if a girl labeled “husband-slayer” marries a man labeled “wife-slayer,” the widowhood yoga is broken with certainty — in the śāstra’s own words. It is a cancellation-by-matching-yogas rule, not a marital command we issue.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-भङ्ग / संवाद-नियम। संकेत: (कन्या ∈ पतिहन्त्री-संज्ञा) ∧ (पति ∈ स्त्रीहन्ता-संज्ञा) ∧ विवाह ⇒ पाठ: वैधव्य-योग-भङ्ग। संख्यात्मक अवधि, अंश-सीमा या दशा-गुणक इस श्लोक में नहीं; “निश्चयात्” गुणात्मक निश्चय-वचन है, मापनीय स्थिरांक नहीं।

80.50
मिथोंऽशस्थौ मिथोदृष्टौ सितार्की वा सितर्क्षके ।
घटांशे लग्नगे नारी प्रदीप्तं मदनानलम्
mithoṃ'śasthau mithodṛṣṭau sitārkī vā sitarkṣake |
ghaṭāṃśe lagnage nārī pradīptaṃ madanānalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मिथः = परस्पर; अंशस्थौ = (एक-दूसरे के) अंश/वर्ग में स्थित दोनों; मिथोदृष्टौ = परस्पर दृष्टि युक्त; सितार्की = शुक्र और सूर्य (सित = शुक्र, अर्क = सूर्य); सितर्क्षके = शुक्र-राशि में (ऋक्ष = राशि); घटांशे = कुम्भ-अंश में (घट = कुम्भ); लग्नगे = लग्नस्थ; मदनानलम् = काम/मदनाग्नि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब शुक्र और सूर्य परस्पर एक-दूसरे के अंश में हों तथा परस्पर दृष्टि भी करें, अथवा शुक्र-राशि में हों, और लग्न में घट (कुम्भ) अंश हो, तब उस नारी में मदनानल प्रदीप्त रहता है। यहाँ “अंश” ज्योतिष में प्रायः नवांश/वर्ग-स्थान का संकेत है; पाठ में स्पष्ट वर्ग-नाम नहीं दिया गया। फल-कथन के रूप में यह काम-भाव की तीव्रता का संकेत है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when Venus and the Sun occupy each other’s aṃśa and mutually aspect, or stand in Venus’s rāśi, and the Lagna holds Ghaṭa (Aquarius) aṃśa, the woman is marked by a blazing fire of passion (madanānala).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्त्री-जातक, काम-भाव)। “अंश” यहाँ स्थिति-वर्ग का संकेत है; कोई भाग-सूत्र या अंश-संख्या इस श्लोक में नहीं दी गई।

80.51
संशान्तिं नयति स्त्रीभिः सुखीभिर्मदनातुरा ।
पराभिः पुरुषाकारस्थितभिर्द्विजसत्तम
saṃśāntiṃ nayati strībhiḥ sukhībhirmadanāturā |
parābhiḥ puruṣākārasthitabhirdvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संशान्तिम् = पूर्ण शान्ति; नयति = पहुँचाती है / ले जाती है; स्त्रीभिः सुखीभिः = सुखी स्त्रियों के संग से; मदनातुरा = मदन-पीड़िता (काम-व्याकुला); पराभिः = अन्य (स्त्रियों) द्वारा; पुरुषाकारस्थितभिः = पुरुष-आकार/पुरुष-स्वभाव वाली स्त्रियों से; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक की प्रदीप्त मदनाग्नि का क्रम यहाँ फल-रूप में पूरा होता है। शास्त्र कहता है — वह मदनातुरा नारी सुखी स्त्रियों के संग से शान्ति पाती है; तथा अन्य, पुरुष-आकार वाली स्त्रियों के संग से भी संशान्ति को प्राप्त होती है। यह संवाद-शैली में पराशर-शिष्य संबोधन (“द्विजसत्तम”) के साथ कहा गया फल-कथन है।

English rendering The text states that the passion-afflicted woman is led to calm through the company of happy women, and also through other women of masculine form or bearing, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / संवाद। काम-भाव की शान्ति का सामाजिक-संगति संकेत; कोई बल, अंश या दशा-संख्या नहीं।

80.52
कुजज्ञगुरुशुक्रैश्च बलिभिः समभे तनौ ।
कुशलाऽनेकशास्त्रेषु सा नारी ब्रह्मवादिनी
kujajñaguruśukraiśca balibhiḥ samabhe tanau |
kuśalā'nekaśāstreṣu sā nārī brahmavādinī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज = मङ्गल; ज्ञ = बुध; गुरु = बृहस्पति; शुक्र = शुक्र; बलिभिः = बलवान् ग्रहों से; समभे = सम (युग्म) राशि में (२, ४, ६, ८, १०, १२); तनौ = तनु/लग्न में; कुशला = निपुणा; अनेकशास्त्रेषु = अनेक शास्त्रों में; ब्रह्मवादिनी = ब्रह्म/वेदान्त-वक्ता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब मङ्गल, बुध, गुरु और शुक्र बलवान् हों तथा सम (सम/युग्म) राशि में तनु (लग्न) पर हों, तब वह नारी अनेक शास्त्रों में कुशल और ब्रह्मवादिनी कही जाती है। “बलिभिः” यहाँ सामान्य बल-संकेत है; षड्बल की इकाई-संख्या इस श्लोक में नहीं दी गई। सम-राशि का नियम स्पष्ट है — युग्म राशियाँ।

English rendering The text states that when Mars, Mercury, Jupiter, and Venus are strong and occupy even signs in the body (Lagna), that woman is skilled in many śāstras and a speaker of Brahman (brahmavādinī).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थिति + बल-संकेत)। केवल राशि-वर्ग: समभ = even rāśi ∈ {2, 4, 6, 8, 10, 12}; तनु = Lagna-sign. षड्बल-संख्या या रूप/विरूप यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

80.53
क्रूरे सप्तमगे कश्चित् खेचरो नवमे यदि ।
सा प्रव्रज्यां तदाप्नोति पापखेचरसंभवाम्
krūre saptamage kaścit khecaro navame yadi |
sā pravrajyāṃ tadāpnoti pāpakhecarasaṃbhavām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रूरे = क्रूर/पाप-ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु आदि); सप्तमगे = सप्तम भाव (पति/दाम्पत्य-स्थान) में स्थित; कश्चित् खेचरः = कोई एक ग्रह (खेचर = आकाशचारी ग्रह); नवमे = नवम भाव (धर्म/भाग्य-स्थान) में; प्रव्रज्या = गृहत्याग, संन्यास, प्रव्रजन; तत् आप्नोति = वह उसे प्राप्त करती है; पापखेचरसंभवाम् = पाप-ग्रह से उत्पन्न (होने वाली प्रव्रज्या)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि जन्म-कुण्डली में कोई क्रूर (पाप) ग्रह सप्तम भाव में हो और कोई ग्रह नवम भाव में स्थित हो, तो उस जातिका के जीवन में प्रव्रज्या — अर्थात् संसार से विरक्ति और संन्यास-मार्ग — का योग बनता है, और यह प्रव्रज्या उसी पाप-ग्रह के प्रभाव से उपजी मानी जाती है। यहाँ सप्तम (दाम्पत्य) का पाप-पीड़ित होना और नवम (धर्म) में ग्रह का बैठना — इन दोनों के मेल को शास्त्र वैराग्य-प्रवृत्ति के रूप में पढ़ता है।

English rendering The text states: when a malefic occupies the 7th house and some planet stands in the 9th, she attains renunciation (pravrajyā) — a turning away from worldly life born of that malefic planet's influence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वैराग्य/प्रव्रज्या-योग)। इसमें केवल स्थान-गणना है: सप्तम व नवम भाव लग्न से क्रमशः 7वाँ व 9वाँ घर हैं (भाव-क्रमांक = (राशि − लग्नराशि) mod 12 + 1); शेष एक फल-कथन है जिसे शास्त्र की उक्ति के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए, न कि किसी के जीवन के बारे में निश्चित भविष्यवाणी के रूप में।

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80.54
विलग्नादष्टमे सौम्ये पापदृग्योगवर्जिते ।
मृत्युः प्रागेव विज्ञेयस्तस्य मृत्युर्न संशयः
vilagnādaṣṭame saumye pāpadṛgyogavarjite |
mṛtyuḥ prāgeva vijñeyastasya mṛtyurna saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विलग्नात् = लग्न से (गिनती करके); अष्टमे = अष्टम भाव (आयु/मरण-स्थान) में; सौम्ये = शुभ ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र, शुभ-चन्द्र); पापदृग्योगवर्जिते = पाप-ग्रह की दृष्टि तथा युति से रहित; मृत्युः प्रागेव = मृत्यु पहले ही (शीघ्र); विज्ञेयः = जानना चाहिए; तस्य = उसके (पति — पाठ-भेद संभव: लिंग-निर्देश अस्पष्ट); न संशयः = इसमें संदेह नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि लग्न से अष्टम भाव में यदि कोई शुभ ग्रह हो और वह किसी पाप-ग्रह की दृष्टि या युति से रहित हो, तो मृत्यु का योग पहले (शीघ्र) ही जानना चाहिए — शास्त्र इसे निःसंदेह कहता है। (यहाँ 'तस्य' पुँल्लिंग होने से प्रायः पति के आयु-विचार से जोड़ा जाता है; पाठ एवं लिंग-निर्देश दोनों में पाठ-भेद संभव, अतः इसे निश्चित पाठ न मानें।)

English rendering The text states: if a benefic sits in the 8th from the ascendant, untouched by any malefic's aspect or conjunction, an early death is to be inferred — so the śāstra declares (reading and referent are contested — पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आयु/मरण-सूचना)। एकमात्र गणना अष्टम-भाव की स्थान-गणना है: अष्टम भाव = लग्न से 8वाँ घर, अर्थात् भाव-क्रमांक = ((राशि-सूचकांक − लग्न-सूचकांक) mod 12) + 1 = 8। यह आयु-सम्बन्धी कथन शास्त्र का अपना दावा है — इसे भय या भविष्य-कथन के रूप में नहीं, केवल पाठ की उक्ति ("शास्त्र कहता है") के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

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80.55
अष्टमे शुभपापौ चेत् स्यातां तुल्यबलौ यदा ।
सह भर्त्रा तदा मृत्युं प्राप्त्वा स्वर्याति निश्चयात्
aṣṭame śubhapāpau cet syātāṃ tulyabalau yadā |
saha bhartrā tadā mṛtyuṃ prāptvā svaryāti niścayāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टमे = अष्टम भाव में; शुभपापौ = एक शुभ ग्रह और एक पाप ग्रह (दोनों); तुल्यबलौ = समान बल वाले (षड्बल में बराबर); सह भर्त्रा = पति के साथ; मृत्युं प्राप्त्वा = मृत्यु को प्राप्त करके; स्वर्याति = स्वर्ग को जाती है; निश्चयात् = निश्चय पूर्वक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि अष्टम भाव में एक शुभ और एक पाप — दोनों ग्रह हों और वे परस्पर समान बल (तुल्यबल) के हों, तो वह जातिका पति के साथ ही देह-त्याग कर के, निश्चय पूर्वक, ऊर्ध्व-गति (स्वर्ग) को प्राप्त करती है। यहाँ मुख्य शर्त 'तुल्यबल' है — अर्थात् दोनों ग्रहों का बल-मान बराबर होना।

English rendering The text states: when a benefic and a malefic both occupy the 8th and are equal in strength, she attains death together with her husband and, assuredly, goes to the higher world.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ की निर्णायक तकनीक है तुल्यबल — दो ग्रहों के षड्बल का ठीक बराबर होना (BPHS अ.27)। बल का मापन रूप-विरूप में होता है: 1 रूप = 60 विरूप। तुल्यबल की कसौटी एक समता-जाँच है:
बल(शुभ) = बल(पाप), अर्थात् |बल_शुभ − बल_पाप| = 0 (रूप में)।
कुल षड्बल = स्थान + दिक् + काल + चेष्टा + नैसर्गिक + दृग् — छहों घटकों का योग, प्रत्येक एक निर्दिष्ट संख्यात्मक नियम से।

उदाहरण (worked example) मान लें अष्टम-स्थ गुरु (शुभ) का षड्बल = 8·00 रूप और अष्टम-स्थ शनि (पाप) का षड्बल = 8·00 रूप।
रूप → विरूप: 8·00 रूप × 60 = 480 विरूप (दोनों)।
अन्तर = 480 − 480 = 0 विरूप ⇒ तुल्यबल की शर्त पूर्ण (सम्मेलन: पूर्ण-समता; व्यवहार में परम्परा प्रायः निकटतम रूप तक तुलना करती है — सम्मेलन घोषित करना अनिवार्य)। यदि गुरु = 8·00 रूप पर शनि = 7·60 रूप (456 विरूप) होता, तो अन्तर = 24 विरूप ≠ 0 ⇒ तुल्यबल नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सीधे षड्बल-तंत्र (डोज़िए §4: छह बल, रूप/विरूप में योग, 1 रूप = 60 विरूप) से जुड़ता है — 'तुल्यबल' का अर्थ है दो बल-योगों की तुलना। हमारी विधि-अनुशासन (डोज़िए §5) में ऐसी समता ठीक `==` से जाँची जाती है, सहन-सीमा (tolerance band) से नहीं — क्योंकि ±band असली अन्तर छिपा देती है (अष्टकवर्ग में एक बार ±3 band ने वास्तविक −1 को ढक दिया था)। अतः 'तुल्यबल' को हम शून्य-अन्तर की exact समता-जाँच के रूप में डिकोड करते हैं, न कि लगभग-बराबर के रूप में।

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अध्यायः 81

अंगलक्षणफलाध्यायः

85 श्लोक
81.1
बहुधा भव्ता प्रोक्तं जन्मकालात् शुभाशुभम् ।
श्रोतुमिच्छामि नारोणामङ्गचिह्नैः फल मुने
bahudhā bhavtā proktaṃ janmakālāt śubhāśubham |
śrotumicchāmi nāroṇāmaṅgacihnaiḥ phala mune

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बहुधा = अनेक रीति से; भवता (भव्ता) = आपके द्वारा (पाठ-भेद संभव); प्रोक्तं = कहा गया; जन्मकालात् = जन्म-काल से; शुभाशुभम् = शुभ और अशुभ; नारीणाम् (नारोणाम्) = स्त्रियों का (पाठ-भेद संभव); अङ्गचिह्नैः = अंग-चिह्नों द्वारा; फलम् = फल; मुने = हे मुनि

हिन्दी भावार्थ शिष्य कहता है — आपने जन्म-काल के आधार पर शुभ-अशुभ अनेक प्रकार से बतला दिया। अब हे मुनि, मैं स्त्रियों के अंग-चिह्नों से होने वाले फल को सुनना चाहता हूँ। यह अध्याय जन्म-कुण्डली से हटकर सामुद्रिक/अंग-लक्षण की दिशा खोलता है।

English rendering “You have spoken in many ways of the auspicious and inauspicious arising from the time of birth. O sage, I wish to hear the results for women as indicated by bodily marks.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / विषय-प्रश्न। शास्त्र यहाँ जन्म-काल फल से स्त्री-अंगचिह्न फल की ओर संक्रमण माँगता है; गणना नहीं, प्रसंग-निर्धारण है।

81.2
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि नारीणामङ्गलक्षणम् ।
फलं यथाऽह पार्वत्यै भगवान् शङ्करस्तथा
śṛṇu vipra pravakṣyāmi nārīṇāmaṅgalakṣaṇam |
phalaṃ yathā'ha pārvatyai bhagavān śaṅkarastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शृणु = सुनो; विप्र = हे ब्राह्मण; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; नारीणाम् = स्त्रियों का; अङ्गलक्षणम् = अंग-लक्षण; फलम् = फल; यथा = जिस प्रकार; आह = कहा; पार्वत्यै = पार्वती के प्रति; भगवान् शङ्करः = भगवान् शङ्कर; तथा = उसी प्रकार

हिन्दी भावार्थ पराशर उत्तर देते हैं — हे विप्र, सुनो; मैं स्त्रियों के अंग-लक्षण और उनका फल कहता हूँ। शास्त्र कहता है कि यह कथन उसी रीति से है जैसे भगवान् शङ्कर ने पार्वती को कहा था। परंपरा का स्मरण करके विषय को प्रामाणिक धारा में बाँधा जाता है।

English rendering “Listen, O brāhmaṇa: I shall declare the bodily marks of women and their results, just as Lord Śaṅkara spoke them to Pārvatī.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अधिकार-कथन। यह फल-विधि का उद्घाटन है, न कि अंक-सूत्र; स्रोत-परंपरा (शङ्कर–पार्वती) का उल्लेख प्रामाण्य-रेखा है।

81.3
स्निग्धं पादतलं स्त्रीणां मृदुलं मांसलं समम् ।
रक्तमस्वेदमुष्णं च बहुभोगप्रदायकम्
snigdhaṃ pādatalaṃ strīṇāṃ mṛdulaṃ māṃsalaṃ samam |
raktamasvedamuṣṇaṃ ca bahubhogapradāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्निग्धं = चिकना/स्निग्ध; पादतलं = पैर का तलवा; स्त्रीणां = स्त्रियों का; मृदुलं = कोमल; मांसलं = मांसयुक्त/भरपूर; समम् = सम/समतल; रक्तम् = रक्तवर्ण/लालिमायुक्त; अस्वेदम् = स्वेद-रहित; उष्णं = उष्ण/गर्म; बहुभोगप्रदायकम् = अनेक भोग देने वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्त्रियों का पाद-तल यदि स्निग्ध, मृदु, मांसल और सम हो, तथा रक्तवर्ण, स्वेद-रहित और उष्ण हो, तो वह बहु-भोग का द्योतक माना जाता है। यह सामुद्रिक लक्षण-फल है: गुणों का समुच्चय शुभ फल से जोड़ा गया है। भय या निश्चित भाग्य नहीं — केवल शास्त्र का लक्षण-कथन।

English rendering The text states that a woman’s sole that is smooth, soft, fleshy, even, reddish, free of sweat, and warm is said to bestow abundant enjoyments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाद-तल लक्षण)। गुण-सूची (स्निग्ध–मृदु–मांसल–सम–रक्त–अस्वेद–उष्ण) → शास्त्रोक्त शुभ फल; कोई अंश, वर्ग या बलांक नहीं।

81.4
विवर्णं पुरुषं रूक्षं खण्डितं विषमं तथा ।
सूर्पाकारञ्च शुष्कं च दुःखदौर्भाग्यदायकम्
vivarṇaṃ puruṣaṃ rūkṣaṃ khaṇḍitaṃ viṣamaṃ tathā |
sūrpākārañca śuṣkaṃ ca duḥkhadaurbhāgyadāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विवर्णं = विकृत/फीका वर्ण; पुरुषं = कठोर/पुरुष-सदृश (पाठानुसार); रूक्षं = रूखा; खण्डितं = खण्डित/फट; विषमं = विषम/असमान; सूर्पाकारम् = सूप (छाज) के आकार का; शुष्कं = सूखा; दुःखदौर्भाग्यदायकम् = दुःख और दौर्भाग्य देने वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पाद-तल यदि विवर्ण, कठोर/पुरुष-सदृश, रूक्ष, खण्डित, विषम, सूप-सा आकार वाला और शुष्क हो, तो दुःख और दौर्भाग्य का द्योतक माना जाता है। यह पूर्व-श्लोक के शुभ गुणों का प्रतिलोम है। फल शास्त्र का कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that a sole that is discolored, hard, rough, cracked, uneven, shaped like a winnowing-basket, and dry is said to bring sorrow and misfortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अशुभ पाद-तल लक्षण)। शुभ-अशुभ यहाँ द्वि-ध्रुवी लक्षण-युग्म है; कोई संख्यात्मक माप नहीं।

81.5
शङ्खस्वस्तिकचक्राऽब्जध्वजमीनाऽतपत्रवत् ।
यस्याः पादतले चिह्नं सा ज्ञेया क्षितिपाङ्गना
śaṅkhasvastikacakrā'bjadhvajamīnā'tapatravat |
yasyāḥ pādatale cihnaṃ sā jñeyā kṣitipāṅganā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शङ्ख = शंख; स्वस्तिक = स्वस्तिक; चक्र = चक्र; अब्ज = कमल; ध्वज = ध्वज/पताका; मीन = मीन/मछली; आतपत्र = छत्र; पादतले = पैर के तलवे पर; चिह्नं = चिह्न; क्षितिपाङ्गना = राजा की पत्नी / राजमहिषी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिसके पाद-तल पर शंख, स्वस्तिक, चक्र, कमल, ध्वज, मीन या छत्र-सदृश चिह्न हो, उसे क्षितिप-अंगना (राजा की पत्नी/राजकीय स्तर की स्त्री) जानना चाहिए। ये शास्त्रीय शुभ चिह्न-सूची हैं; अर्थ लौकिक-राजसी फल-वर्ग में रखा गया है, न कि निश्चित भविष्यवाणी के रूप में।

English rendering The text states that she on whose sole appear marks resembling a conch, svastika, wheel, lotus, banner, fish, or umbrella is to be known as a consort of a king (a woman of royal station).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाद-तल चिह्न-सूची)। सात आकार-उपमाएँ (शंख…आतपत्र) → एक फल-वर्ग (क्षितिपाङ्गना); गणना नहीं, चिह्न-कोष है।

81.6
भवेत् समस्तभोगाय तथा दीर्घोर्ध्वरेखिका ।
रेखाः सर्पाऽखुकाकाभा दुःखदारिद्र्यसूचिकाः
bhavet samastabhogāya tathā dīrghordhvarekhikā |
rekhāḥ sarpā'khukākābhā duḥkhadāridryasūcikāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समस्तभोगाय = समस्त भोगों के लिए; दीर्घोर्ध्वरेखिका = लंबी ऊर्ध्व रेखा; रेखाः = रेखाएँ; सर्प = सर्प; आखु = चूहा; काक = कौआ; आभा = सदृश; दुःखदारिद्र्यसूचिकाः = दुःख और दरिद्रता की सूचक

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पाद-तल पर लंबी ऊर्ध्व रेखा समस्त भोग का संकेत मानी जाती है। जो रेखाएँ सर्प, चूहे या कौए के आकार की हों, वे दुःख और दरिद्रता की सूचक कही गई हैं। रेखा का आकार और दिशा ही यहाँ लक्षण है; कोई ज्यामितीय सूत्र नहीं दिया गया।

English rendering The text states that a long upward-running line on the sole is for all enjoyments; lines resembling a serpent, a mouse, or a crow are said to indicate sorrow and poverty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (रेखा-लक्षण)। “दीर्घ + ऊर्ध्व” शुभ; सर्प/आखु/काक-आभा अशुभ — गुणात्मक आकार-वर्गीकरण, न कि अंश-माप।

81.7
रक्ताः समुन्नताः स्निग्धा वृत्ताः पादनखाः शुभाः ।
स्फुटिताअः कृष्णवर्णाश्च ज्ञेया अशुभसूचकाः
raktāḥ samunnatāḥ snigdhā vṛttāḥ pādanakhāḥ śubhāḥ |
sphuṭitāaḥ kṛṣṇavarṇāśca jñeyā aśubhasūcakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्ताः = रक्तवर्ण; समुन्नताः = उन्नत/उभरे हुए; स्निग्धाः = स्निग्ध; वृत्ताः = गोल; पादनखाः = पैर के नख; शुभाः = शुभ; स्फुटिताः (स्फुटिताअः) = फटे हुए (पाठ-भेद संभव); कृष्णवर्णाः = कृष्ण/काले वर्ण के; अशुभसूचकाः = अशुभ के सूचक

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पैर के नख यदि रक्तवर्ण, उन्नत, स्निग्ध और वृत्त हों तो शुभ माने जाते हैं। यदि स्फुटित (फटे) और कृष्णवर्ण हों तो अशुभ-सूचक जानने चाहिए। नख-गुणों का यही द्वैत अध्याय के पाद-प्रसंग को बंद करता है: रूप-गुण → शास्त्रोक्त शुभ/अशुभ संकेत।

English rendering The text states that toenails that are reddish, raised, smooth, and rounded are auspicious; those that are cracked and black in color are to be known as indicators of the inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाद-नख लक्षण)। चार शुभ गुण (रक्त–समुन्नत–स्निग्ध–वृत्त) बनाम दो अशुभ (स्फुटित–कृष्ण); कोई बलांक या अंश-सूत्र नहीं।

81.8
उन्नतो मांसलोऽङ्गुष्ठो वर्तुलोऽतुलभोगदः ।
वक्रो ह्रस्वश्च चिपिटो दुःखदारिद्र्यसूचकः
unnato māṃsalo'ṅguṣṭho vartulo'tulabhogadaḥ |
vakro hrasvaśca cipiṭo duḥkhadāridryasūcakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उन्नत = ऊँचा / उठानवाला; मांसला = मांस-युक्त / पुष्ट; अङ्गुष्ठ = अँगूठा (पाद-अँगूठा); वर्तुल = गोल / वृत्ताकार; अतुल-भोगद = अतुलनीय भोग देने वाला; वक्र = टेढ़ा / मुड़ा; ह्रस्व = छोटा; चिपिट = चपटा / दबा; दुःख-दारिद्र्य-सूचक = दुःख व दरिद्रता का सूचक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पाद के अँगूठे के आकार से लक्षण बाँधता है। जो अँगूठा ऊँचा, मांसयुक्त और गोल हो, उसे अतुल भोग देने वाला कहा गया है। इसके विपरीत जो अँगूठा टेढ़ा, छोटा या चपटा हो, उसे दुःख और दारिद्र्य का सूचक बताया गया है। यह शरीर-लक्षण का फल-कथन है, न कि गणितीय नियम।

English rendering The text states that a raised, fleshy, and rounded big toe indicates unequalled enjoyment. A crooked, short, or flattened big toe is described as a sign of sorrow and poverty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाद-अङ्गुष्ठ लक्षण)। यहाँ माप-सूत्र या वर्ग-विभाजन नहीं; केवल आकार-विशेषणों पर आधारित शास्त्रीय संकेत हैं।

81.9
मृदवोऽङ्गुलयः शस्ता घना वृत्ताश्च मांसलाः ।
दीर्घाङ्गुलीभिः कुलटा कृशाभिर्धनवर्जिता
mṛdavo'ṅgulayaḥ śastā ghanā vṛttāśca māṃsalāḥ |
dīrghāṅgulībhiḥ kulaṭā kṛśābhirdhanavarjitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृदु = कोमल; अङ्गुलयः = अँगुलियाँ; शस्त = प्रशंसनीय / शुभ-कथित; घन = सघन / ठोस; वृत्त = गोल; मांसला = मांस-युक्त; दीर्घ-अङ्गुली = लम्बी अँगुलियाँ; कुलटा = कुल-भ्रष्टा (शास्त्र का पद); कृश = कृश / पतली; धन-वर्जिता = धन से रहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कोमल, सघन, गोल और मांसयुक्त अँगुलियाँ प्रशंसनीय मानी गई हैं। लम्बी अँगुलियों वाली नारी को कुलटा कहा गया है, और पतली अँगुलियों वाली को धन-रहित बताया गया है। यह लक्षण-फल है; इसे नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering Soft, firm, rounded, and fleshy fingers are praised. With long fingers the text names a woman kulatā; with thin fingers, it states she is without wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अङ्गुलि-लक्षण)। “दीर्घ / कृश” यहाँ संख्यात्मक thrешhold नहीं देते; केवल शास्त्रीय आकार-वर्णन हैं।

81.10
भवेद्ध्रस्वाभिरल्पायुर्विषमाभिश्च कुट्टनी ।
चिपटाभिर्भवेद्दासी विरलाभश्च निर्धना
bhaveddhrasvābhiralpāyurviṣamābhiśca kuṭṭanī |
cipaṭābhirbhaveddāsī viralābhaśca nirdhanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ह्रस्वाभिः = छोटी अँगुलियों से; अल्प-आयुः = अल्प आयु; विषमाभिः = विषम / असमान अँगुलियों से; कुट्टनी = कुट्टनी (शास्त्र का पद — वेश्या-संबन्धित दौत्य); चिपटाभिः = चपटी अँगुलियों से; दासी = दासी; विरलाभिः = विरल / छितरी अँगुलियों से; निर्धना = निर्धन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे अँगुलियों के और भेद बाँधता है। छोटी अँगुलियों से अल्पायु, असमान अँगुलियों से कुट्टनी-भाव, चपटी अँगुलियों से दासी-भाव, और विरल अँगुलियों से निर्धनता कही गई है। ये सब शास्त्र के अपने फल-पद हैं; इन्हें चिकित्सा, विधि या वित्त की भविष्यवाणी नहीं समझना।

English rendering The text states that short fingers indicate short life; uneven fingers, the role of a procuress (kuṭṭanī); flat fingers, servitude; and sparse fingers, lack of wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अङ्गुलि-भेद)। आयु, स्थिति या धन यहाँ संख्या, वर्ष या बला-इकाई में नहीं मापे गए।

81.11
यस्य मिथः समारूढाः पादाङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
बहुनपि पतीन् हित्वा परप्रेष्या च सा भवेत्
yasya mithaḥ samārūḍhāḥ pādāṅgulyo bhavanti hi |
bahunapi patīn hitvā parapreṣyā ca sā bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य/यस्याः = जिस (नारी) की; मिथः = परस्पर; समारूढाः = एक-दूसरे पर चढ़ी / अध्यारूढ़; पाद-अङ्गुल्यः = पैर की अँगुलियाँ; बहूनपि पतीन् = अनेक पतियों को भी; हित्वा = छोड़कर; पर-प्रेष्या = पर-सेवा / दूसरों की दासी; सा भवेत् = वह होती है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस नारी की पाद-अँगुलियाँ परस्पर एक-दूसरे पर चढ़ी रहती हैं, वह अनेक पतियों को छोड़कर भी पर-प्रेष्या हो जाती है। यह पाद-अङ्गुलि-संयोग का लक्षण-फल है। पाठ में “बहूनपि पतीन्” सामाजिक-पारिवारिक फल-भाषा है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that when the toes ride one upon another, that woman—even after leaving many husbands—becomes another’s servant (parapreṣyā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाद-अङ्गुलि-अध्यारोह)। “समारूढ” का कोई अंश-या-डिग्री सूत्र नहीं दिया गया।

81.12
यस्या पथि चलन्त्याश्च रजो भूमेः समुच्छलेत् ।
सा पांसुली बह्वेन्नारी कुलत्रयविघातिनी
yasyā pathi calantyāśca rajo bhūmeḥ samucchalet |
sā pāṃsulī bahvennārī kulatrayavighātinī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पथि = मार्ग में; चलन्त्याः = चलती हुई की; रजः = धूल / रज; भूमेः = भूमि से; समुच्छलेत् = उछले / उड़ उठे; पांसुली = पांसुली (धूल-युक्त / धूल-संबन्धित); बहु-अन्न = बहुत अन्न; नारी; कुल-त्रय-विघातिनी = तीन कुलों की हानि करने वाली (शास्त्र का पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस नारी के मार्ग में चलने से भूमि की धूल उछल उठे, वह पांसुली कही गई है, बहुत अन्न वाली, और तीन कुलों की विघातिनी। “कुलत्रयविघातिनी” शास्त्र की अपनी कठोर फल-भाषा है; इसे भय या दोषारोपण के रूप में लागू न करें—केवल पाठ का कथन समझें। पाठ-भेद संभव जहाँ “बह्वेन्नारी” का वाचन भिन्न हो।

English rendering The text states that if dust rises from the earth as she walks, she is called pāṃsulī, abundant in grain, and destructive of three lineages (kulatraya-vighātinī)—as the śāstra itself phrases it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गति-रज लक्षण)। “कुलत्रय” यहाँ तीन वंशों का शाब्दिक फल-पद है, गणना-सूत्र नहीं।

81.13
यस्याः कनिष्ठिका भूमिं गच्छन्त्या न परिस्पृशेत् ।
सा हि पूर्वपतिं हत्वा द्वितीयं कुरुते पतिम्
yasyāḥ kaniṣṭhikā bhūmiṃ gacchantyā na parispṛśet |
sā hi pūrvapatiṃ hatvā dvitīyaṃ kurute patim

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कनिष्ठिका = कनिष्ठा / सबसे छोटी पाद-अँगुली; भूमिं = भूमि को; गच्छन्त्या = चलती हुई की; न परिस्पृशेत् = स्पर्श न करे; पूर्व-पतिम् = पहले पति को; हत्वा = मारकर / नष्ट कर (शास्त्र का पद); द्वितीयं पतिम् = दूसरा पति; कुरुते = करती है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस नारी की कनिष्ठा अँगुली चलते समय भूमि को नहीं छूती, वह पूर्व-पति को “हत्वा” द्वितीय पति करती है। “हत्वा” यहाँ शास्त्र की पारंपरिक फल-शब्दावली है—इसे अपराध, चिकित्सा या निश्चित घटना के रूप में न पढ़ें; केवल लक्षण-पाठ का कथन है।

English rendering The text states that if the little toe does not touch the ground while she walks, she “slays” the first husband and takes a second—in the śāstra’s own formulaic language of phala, not as a factual or legal claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कनिष्ठिका-भूमि-अस्पर्श)। स्पर्श/अस्पर्श का कोई कोणीय या अंशीय माप नहीं दिया गया।

81.14
मध्यमाऽनामिका चापि यस्या भूमिं न संस्पृशेत् ।
पतिहीना च सा नारी विज्ञेया द्विजसत्तम
madhyamā'nāmikā cāpi yasyā bhūmiṃ na saṃspṛśet |
patihīnā ca sā nārī vijñeyā dvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यमा = बीच की अंगुली (यहाँ पैर की मध्यमा अंगुली); अनामिका = अनामिका (चौथी) अंगुली; यस्याः = जिस स्त्री की; भूमिं न संस्पृशेत् = चलते समय भूमि को नहीं छूती; पतिहीना = पति-रहित; विज्ञेया = जाननी चाहिए; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (मैत्रेय के प्रति सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस स्त्री के पैर की मध्यमा और अनामिका अंगुलियाँ चलते समय भूमि का स्पर्श नहीं करतीं, उसे पति-रहित जानना चाहिए। यह पूर्व श्लोकों की उसी पद-लक्षण-परम्परा (कनिष्ठिका आदि) का क्रम है, जिसे पराशर मैत्रेय को सम्बोधित कर बता रहे हैं।

English rendering She whose middle and ring toes do not touch the ground as she walks — know her, O best of the twice-born, to be one destined to be without a husband; so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामुद्रिक-लक्षण)। यह अध्याय गणित नहीं, बल्कि शिव-द्वारा पार्वती को कथित अंग-लक्षण-शास्त्र है; अतः इसका फल पराशर का कथन है, कोई भविष्य-कथन नहीं जिसका हम समर्थन करें।

81.15
प्रदेशिनी भवेद्यस्या अंगुष्ठाद्व्यतिरेकिणी ।
कन्यैव दूषिता सा स्यात् कुलटा च तदग्रतः
pradeśinī bhavedyasyā aṃguṣṭhādvyatirekiṇī |
kanyaiva dūṣitā sā syāt kulaṭā ca tadagrataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रदेशिनी = तर्जनी / index finger; अंगुष्ठात् = अँगूठे से; व्यतिरेकिणी = अधिक लम्बी / अँगूठे से आगे बढ़ी हुई; कन्या = अविवाहिता; दूषिता = (शास्त्र-भाषा में) दूषित-लक्षण-युक्ता; कुलटा = (शास्त्र-वर्ग) कुल-मर्यादा-भ्रष्ट स्त्री; तदग्रतः = उससे भी आगे / अति-दीर्घ होने पर; सा स्यात् = वह कही जाती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जिस स्त्री की प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुष्ठ से व्यतिरेक कर अधिक लम्बी हो, वह कन्या-अवस्था में भी दूषित-लक्षण-युक्त मानी जाती है। यदि वह अंगुष्ठ से और भी आगे बढ़ी हुई हो, तो पाठ उसी लक्षण-वर्ग को “कुलटा” कहता है। यह समudrika-शैली का शारीरिक फल-कथन है, न कि किसी व्यक्ति पर लागू किया गया निर्णय। पाठ-भेद संभव जहाँ “तदग्रतः” की व्याख्या अति-दीर्घता या अग्र-भाग से की जाती हो।

English rendering The text states that a woman whose index finger exceeds the thumb in length is classed, even while still a maiden, under a “flawed” mark; and if that excess is still greater, under the traditional label kulatā. This is physiognomic classification language of the śāstra, not a personal verdict.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। यहाँ कोई अंश, वर्ग, बला या दशा-संख्या नहीं; केवल अँगुलि-अंगुष्ठ तुलना का गुणात्मक नियम है।

81.16
उन्नतं पादपृष्ठं चेत् तदा राज्ञी भवेद्ध्रुवम् ।
अस्वेदमशिराढ्यञ्च मांसलं मसृणं मृदु
unnataṃ pādapṛṣṭhaṃ cet tadā rājñī bhaveddhruvam |
asvedamaśirāḍhyañca māṃsalaṃ masṛṇaṃ mṛdu

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उन्नतम् = ऊँचा / उत्थित; पादपृष्ठम् = पैर का ऊपरी पृष्ठ (dorsum of the foot); चेत् = यदि; राज्ञी = राजपत्नी; ध्रुवम् = निश्चित रूप से (शास्त्र-वचन); अस्वेदम् = स्वेद-रहित; अशिराढ्यम् = शिरा-बहुल नहीं; मांसलाम् = मांस-युक्त; मसृणम् = चिकना; मृदु = कोमल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि पाद का पृष्ठ भाग उन्नत हो, तो वह स्त्री “राज्ञी” कही जाती है—यह पाठ का ध्रुव-वचन है, भाग्य की गारंटी नहीं। उसी क्रम में आदर्श पाद-लक्षण गिनाए जाते हैं: स्वेद-रहित, शिराओं से भरा न हो, मांसला, मसृण और मृदु। ये सब समudrika-लक्षण हैं; अगले श्लोक में “अन्यथा” से विपरीत फल जोड़े जाते हैं।

English rendering The text states that an elevated dorsum of the foot marks a woman as a rājñī (“queen”), and it lists preferred foot-qualities: unsweaty, not vein-heavy, fleshy, smooth, and soft. These are traditional body-mark claims, not computed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। “उन्नत / अस्वेद / अशिराढ्य / मांसल / मसृण / मृदु” गुणात्मक गुण हैं; कोई डिग्री-विभाजन या बला-इकाई नहीं।

81.17
अन्यथा धनहीना च शिरालं चेत्तदाऽध्वगा ।
रोमाढ्यं चेद् भवेद्दासी निर्मासं यदि दुर्भगा
anyathā dhanahīnā ca śirālaṃ cettadā'dhvagā |
romāḍhyaṃ ced bhaveddāsī nirmāsaṃ yadi durbhagā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्यथा = पूर्वोक्त शुभ-पाद से भिन्न होने पर; धनहीना = धन-विहीन; शिरालम् = शिरा-बहुल; अध्वगा = पथ-गामिनी / भ्रमणशीला; रोमाढ्यम् = रोम-बहुल; दासी = दासी-वर्ग; निर्मासम् = मांस-रहित / क्षीण; दुर्भगा = (शास्त्र-वर्ग) अशुभ-भाग्य-युक्ता स्त्री।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि पाद पूर्वोक्त शुभ-लक्षणों से “अन्यथा” हो, तो फल-कथन “धनहीना” है। शिरा-बहुल पाद पर पाठ “अध्वगा” (पथ-गामिनी) कहता है; रोम-बहुल होने पर “दासी”; मांस-रहित होने पर “दुर्भगा”। ये चार फल एक ही अंग (पाद) के विकल्पी लक्षणों पर टिके हैं—शास्त्र की वर्गीकरण-भाषा, न कि किसी जीवन की निश्चित कथा।

English rendering The text states the reverse marks of the foot: otherwise, poverty; if veiny, a road-going woman; if hairy, a servant-class mark; if fleshless, the traditional label durbhagā. Report these as the śāstra’s own categories, not as fate we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाद-लक्षण के विकल्प)। चार शर्तें (अन्यथा / शिराल / रोमाढ्य / निर्मास) → चार फल-श्रेणियाँ; कोई संख्यात्मक भार या सूत्र नहीं।

81.18
सुभगा समपार्ष्णिः स्त्री पृथुपार्ष्णिश्च दुर्भगा ।
कुलटोन्नतपार्ष्णिश्च दीर्घपार्ष्णिश्च दुःखिता
subhagā samapārṣṇiḥ strī pṛthupārṣṇiśca durbhagā |
kulaṭonnatapārṣṇiśca dīrghapārṣṇiśca duḥkhitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समपार्ष्णिः = सम / समान एड़ी वाली; सुभगा = शुभ-भाग्य-युक्ता (शास्त्र-शब्द); पृथुपार्ष्णिः = चौड़ी एड़ी वाली; दुर्भगा = अशुभ-भाग्य-युक्ता; उन्नतपार्ष्णिः = ऊँची एड़ी वाली; कुलटा = कुलटा-वर्ग; दीर्घपार्ष्णिः = लम्बी एड़ी वाली; दुःखिता = दुःख-संपृक्ता।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एड़ी (पार्ष्णि) के चार आकार-भेद गिनाता है और प्रत्येक पर एक फल-श्रेणी बाँधता है: सम पार्ष्णि → सुभगा; पृथु → दुर्भगा; उन्नत → कुलटा; दीर्घ → दुःखिता। यह समudrika-तालिका है—आकार-वर्ग से नाम-वर्ग तक का सीधे पाठ-संकेत। हम इसे गणना नहीं, शास्त्र-वर्गीकरण के रूप में पढ़ते हैं; न भय, न दबाव।

English rendering The text maps four heel-shapes to four traditional female-marks: even heels → subhagā; broad → durbhagā; raised → kulatā; long → duḥkhitā. Pure physiognomic correspondence, not a numerical model.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-तालिका (पार्ष्णि-आकार → श्रेणी)। चार गुणात्मक आकार; कोई माप-इकाई (अङ्गुल/यव) इस श्लोक में नहीं दी गई।

81.19
अरोमे च समे स्निग्धे यस्या जंघ सुवर्तुले ।
विसिरे च सुरम्ये सा राजपत्नी भवेद्ध्रुवम्
arome ca same snigdhe yasyā jaṃgha suvartule |
visire ca suramye sā rājapatnī bhaveddhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जङ्घे = दोनों पिंडलियाँ / जंघाएँ (द्विवचन); अरोमे = रोम-रहित; समे = सम; स्निग्धे = स्निग्ध / चिकनी; सुवर्तुले = सुन्दर-गोल; विसिरे = शिरा-रहित (वि + शिरा); सुरम्ये = मनोहर; राजपत्नी = राजा की पत्नी; ध्रुवम् = निश्चित (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जिसकी जंघाएँ रोम-रहित, सम, स्निग्ध, सुन्दर-वर्तुल, शिरा-रहित और सुरम्य हों, वह “राजपत्नी” कही जाती है—पाठ “ध्रुवम्” कहता है, अर्थात् अपने पक्ष में दृढ़ वचन। यह भी स्त्री-शरीर-लक्षण का फल-कथन है; कोई ग्रह-योग या अंश-गणना इसमें निहित नहीं।

English rendering The text states that hairless, even, glossy, well-rounded, vein-free, and pleasing calves mark a woman as a rājapatnī (“king’s consort”), with the emphatic particle dhruvam belonging to the śāstra’s own voice, not to our endorsement.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (जङ्घा-लक्षण)। बहु-विशेषणों का संयोजन एक शुभ-श्रेणी (“राजपत्नी”) से जोड़ा गया है।

81.20
वर्तुलं मांसलं स्निग्धं जानुयुग्मं शुभप्रदम् ।
निर्मासं स्वैरचारिण्या निर्धनायाश्च विश्लथम्
vartulaṃ māṃsalaṃ snigdhaṃ jānuyugmaṃ śubhapradam |
nirmāsaṃ svairacāriṇyā nirdhanāyāśca viślatham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जानुयुग्मम् = दोनों घुटनों का युग्म; वर्तुलम् = गोल; मांसलाम् = मांस-युक्त; स्निग्धम् = चिकना; शुभप्रदम् = शुभ-फलदायी (शास्त्र); निर्मासम् = मांस-रहित; स्वैरचारिणी = स्वेच्छा-विचरणी / मर्यादा-बहिः स्त्री (शास्त्र-वर्ग); निर्धना = धन-हीना; विश्लथम् = ढीला / शिथिल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—वर्तुल, मांसला और स्निग्ध जानु-युग्म “शुभप्रद” है। मांस-रहित घुटने स्वैरचारिणी के लक्षण से जोड़े गए हैं; विश्लथ (शिथिल) घुटने निर्धना के। एक ही अंग—जानु—के तीन रूप: शुभ, स्वैरचारिणी-संकेत, निर्धनता-संकेत। यह फल-कथन की भाषा है; चिकित्सा या अर्थशास्त्र का दावा नहीं।

English rendering The text states that a rounded, fleshy, glossy pair of knees is auspicious; fleshless knees mark the free-roaming (svairacāriṇī) class; loose knees mark the poor. Report as traditional body-mark claims only.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (जानु-लक्षण के तीन भेद)। शुभ / स्वैरचारिणी / निर्धना—तीन श्रेणियाँ, कोई संख्या-सूत्र नहीं।

81.21
घनौ करिकराकारौ वर्तुलौ मृदुलौ शुभौ ।
यस्या ऊरू शिराहीनौ सा राज्ञी भवति ध्रुवम्
ghanau karikarākārau vartulau mṛdulau śubhau |
yasyā ūrū śirāhīnau sā rājñī bhavati dhruvam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊरू = दोनों ऊरु / जाँघें (द्विवचन); घनौ = घने / दृढ़; करिकराकारौ = हाथी की सूँड़ के आकार के; वर्तुलौ = गोल; मृदुलौ = कोमल; शुभौ = शुभ; शिराहीनौ = शिरा-रहित; राज्ञी = राजपत्नी; ध्रुवम् = निश्चित (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जिसकी जाँघें घनी, करि-कर (हाथी की सूँड) के समान आकार की, वर्तुल, मृदुल, शुभ और शिरा-रहित हों, वह “राज्ञी” कही जाती है—फिर “ध्रुवम्” से पाठ अपने वचन को दृढ़ करता है। 81.16 और 81.19 के साथ यह अध्याय के “राज्ञी / राजपत्नी” फल-सूत्र की एक और कड़ी है: पाद-पृष्ठ, जंघा, ऊरु—तीनों अंगों पर समान राज-श्रेणी का आरोप। गणना नहीं; समudrika-वर्णन है।

English rendering The text states that firm, elephant-trunk-shaped, rounded, soft, auspicious, vein-free thighs mark a woman as a rājñī, again with dhruvam as the śāstra’s own emphatic seal—physiognomy, not computation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ऊरु-लक्षण)। “करिकराकार” एक आकार-उपमा है, माप-सूत्र नहीं; कोई अंश, वर्ग या बला-इकाई नहीं।

81.22
चिपिटौ रोमशौ यस्या विधवा दुर्भगा च सा ।
चतुर्भिर्विशतियुतैरंगुलैश्च समा कटिः ।
समुन्नतनितम्बाढ्या प्रशस्ता स्यात् मृगीदृशाम्
cipiṭau romaśau yasyā vidhavā durbhagā ca sā |
caturbhirviśatiyutairaṃgulaiśca samā kaṭiḥ |
samunnatanitambāḍhyā praśastā syāt mṛgīdṛśām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चिपिटौ = चपटी (जाँघें, द्विवचन); रोमशौ = रोमयुक्त; विधवा दुर्भगा = विधवा व दुर्भगा; चतुर्भिः विंशति-युतैः अंगुलैः = बीस में चार जोड़कर = 24 अंगुल से; समा = सम/बराबर; कटिः = कमर; समुन्नत-नितम्ब-आढ्या = सुउभरे नितम्बों से युक्त; प्रशस्ता = प्रशस्त; मृगीदृशाम् = मृगनयनी स्त्रियों की।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — चपटी और रोमयुक्त जाँघों वाली स्त्री विधवा तथा दुर्भगा होती है; और जिसकी कमर 24 अंगुल के सम-प्रमाण में हो तथा नितम्ब सुउभरे हों, वह मृगनयनी स्त्रियों में प्रशस्त कही जाती है। यहाँ लक्षण-वर्णन में पहली बार एक निश्चित मापांक (24 अंगुल) आया है।

English rendering Flat, hairy thighs mark the widow and the luckless; a waist even at twenty-four aṅgulas, set off by well-raised hips, is praised among doe-eyed women — thus the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शब्द-संख्या का डिकोड — "चतुर्भिः विंशति-युतैः" = विंशति (20) + चतुर् (4) = 24 अंगुल (अंक-निष्ठ)। यही श्लोक की एकमात्र स्पष्ट संख्या है; कटि का प्रशस्त प्रमाण = 24 अंगुल। (विशति → विंशति; पाठ-भेद संभव, किन्तु संख्या 20 निर्विवाद।)

उदाहरण (worked example) संकेतमान (convention) घोषित: 1 अंगुल ≈ 8 यव ≈ 1.9 cm (सामान्य आनुपातिक-मापन-रीति)।
कटि = 24 अंगुल × 1.9 cm/अंगुल ≈ 45.6 cm।
वैकल्पिक ताल-मान में अंगुल सापेक्ष इकाई है (देह-ऊँचाई का अंश); अतः निरपेक्ष cm-मान संकेतमान पर निर्भर है — यह मानक घोषित करके ही दिया गया है। श्लोक की भार-वहन करने वाली बात केवल यह है कि प्रशस्त कटि-प्रमाण = 24 अंगुल।

81.23
विनता चिपटा दीर्घा निर्मांसा संकटा कटिः ।
ह्रस्वा रोमैः समायुक्ता दुःखवैधव्यसूचिका
vinatā cipaṭā dīrghā nirmāṃsā saṃkaṭā kaṭiḥ |
hrasvā romaiḥ samāyuktā duḥkhavaidhavyasūcikā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विनता = झुकी/नीची; चिपटा = चपटी; दीर्घा = लम्बी; निर्मांसा = मांस-रहित; संकटा = संकीर्ण/तंग; कटिः = कमर; ह्रस्वा = छोटी; रोमैः समायुक्ता = रोमों से युक्त; दुःख-वैधव्य-सूचिका = दुःख और वैधव्य की सूचक (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कटि यदि विनत, चिपटी, दीर्घ, निर्मांस और संकट (तंग) हो, अथवा ह्रस्व होकर रोमों से युक्त हो, तो वह दुःख और वैधव्य की सूचिका मानी गई है। यह लक्षण-फल का कथन है; भय या निश्चित भाग्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that a waist that is bent, flat, long, fleshless and constricted — or short and hair-covered — is an indicator of sorrow and widowhood.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्त्री-शारीरिक लक्षण)। कटि के अशुभ आकार-भेदों की सूची; कोई अंश-विभाजन या बल-इकाई नहीं।

81.24
नतिम्बः शुभदः स्त्रीणामुन्नतो मांसलः पृथुः ।
सुखसौभाग्यदः प्रोक्तो ज्ञेयो दुःखप्रदोऽन्यथा
natimbaḥ śubhadaḥ strīṇāmunnato māṃsalaḥ pṛthuḥ |
sukhasaubhāgyadaḥ prokto jñeyo duḥkhaprado'nyathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नितम्बः = नितम्ब (नतिम्बः पाठ-भेद संभव); शुभदः = शुभदायक; स्त्रीणाम् = स्त्रियों का; उन्नतः = उठा हुआ; मांसलः = मांसल; पृथुः = चौड़ा; सुखसौभाग्यदः = सुख व सौभाग्य देने वाला; प्रोक्तः = कहा गया; ज्ञेयः = जानना चाहिए; दुःखप्रदः = दुःखदायक; अन्यथा = इसके विपरीत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्त्रियों का उठा हुआ, मांसल और चौड़ा नितम्ब शुभदायक तथा सुख-सौभाग्य-प्रदायक कहा गया है; इसके विपरीत रूप को दुःखदायक जानना चाहिए। यहाँ पुनः "उन्नत-मांसल-पृथु" वही शुभ-त्रयी है जो अध्याय भर दोहराई जाती है।

English rendering A hip raised, fleshy and broad is declared auspicious for women, giving comfort and good fortune; the contrary form, know as sorrow-giving — so the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नितम्ब-लक्षण)। "नतिम्बः" वर्णक्रम-व्यत्यय है; अभीष्ट पाठ "नितम्बः" — पाठ-भेद संभव, अर्थ अक्षुण्ण।

81.25
स्त्रीणां गूढमणिस्तुङ्गो रक्ताभो मृदुरोमकः ।
भगः कमठपृष्ठाभः शुभोऽश्वत्थगलाकृतिः
strīṇāṃ gūḍhamaṇistuṅgo raktābho mṛduromakaḥ |
bhagaḥ kamaṭhapṛṣṭhābhaḥ śubho'śvatthagalākṛtiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गूढमणिः = गुप्त/अंतर्लीन मणि (भगांकुर); तुङ्गः = उन्नत; रक्ताभः = रक्ताभ (लालिमा-युक्त); मृदुरोमकः = कोमल रोमों वाला; भगः = योनि/स्त्री-जननांग; कमठपृष्ठाभः = कच्छप-पृष्ठ के सदृश (कमठ = कछुआ); शुभः = शुभ; अश्वत्थगलाकृतिः = पीपल-पत्र/ग्रीवा के आकार का (अश्वत्थ = पीपल — पाठ-भेद संभव)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक सामुद्रिक-परम्परा में स्त्री-जननांग के लक्षण का शारीरिक वर्णन करता है। शास्त्र कहता है — गुप्त-मणि, उन्नत, रक्ताभ, कोमल-रोमयुक्त, कच्छप-पृष्ठ अथवा पीपल-पत्र-सदृश आकृति वाला भग शुभ माना गया है। यहाँ वर्णन विशुद्ध लक्षण-शास्त्रीय है, कोई मूल्य-निर्णय नहीं।

English rendering The text describes as auspicious a vulva with a concealed apex, elevated, ruddy, softly downed, and shaped like a tortoise's back or a pipal leaf.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-वर्णन (सामुद्रिक-लक्षण)। यह विवरण शिव-कथित अंगलक्षण-परम्परा का अंग है; सम्पादकीय दृष्टि से इसे तटस्थ शारीरिक-लक्षण-कथन के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है, फल-दावे के रूप में नहीं।

81.26
कुरङ्गखुररूपो यश्चुल्लिकोदरसंनिभिः ।
रोमशो दृश्यनासश्च विवृत्तास्योऽशुभप्रदः
kuraṅgakhurarūpo yaścullikodarasaṃnibhiḥ |
romaśo dṛśyanāsaśca vivṛttāsyo'śubhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुरङ्गखुररूपः = मृग के खुर के आकार का (कुरङ्ग = हिरण, खुर = खुर); चुल्लिकोदरसंनिभः = चूल्हे के गड्ढे/उदर के सदृश (चुल्ली = चूल्हा, उदर = गह्वर); रोमशः = रोमयुक्त; दृश्यनासः = बाहर दिखता उभार वाला; विवृत्तास्यः = खुले/उलटे मुख वाला (विवृत्त = खुला, आस्य = मुख/छिद्र); अशुभप्रदः = अशुभदायक।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक का प्रतिपक्ष — शास्त्र कहता है — मृग-खुर के आकार का, चूल्हे के गड्ढे-सदृश, रोमयुक्त, बाहर दिखते उभार तथा खुले मुख वाला भग अशुभदायक कहा गया है। यह भी विशुद्ध लक्षण-वर्णन है; फल शास्त्र का कथन-मात्र है।

English rendering Shaped like a deer's hoof, resembling a hearth's hollow, hairy, with visible protrusion and gaping opening — such a form the text calls inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-वर्णन (प्रतिपक्ष-लक्षण)। श्लोक 25–26 शुभ-अशुभ भग-आकृतियों का युग्म रचते हैं; यहाँ भी निर्णय आकृति-सादृश्य पर आधारित है, किसी संख्यात्मक मान पर नहीं।

81.27
वामोन्नतस्तु कन्याजः पुत्रोजो दक्षिणोन्नतः ।
शङ्खावर्तो भगो यस्याः सा विगर्भाऽङ्गना मता
vāmonnatastu kanyājaḥ putrojo dakṣiṇonnataḥ |
śaṅkhāvarto bhago yasyāḥ sā vigarbhā'ṅganā matā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वाम-उन्नतः = बायीं ओर उभरा; कन्या-जः = कन्या-प्रसू (पुत्री जनने वाला); दक्षिण-उन्नतः = दायीं ओर उभरा; पुत्र-जः (पाठ: पुत्रोजः) = पुत्र-प्रसू; शङ्ख-आवर्तः = शंख-सदृश घुमावदार आवर्त; भगः = योनि/गुह्य-प्रदेश; यस्याः = जिसका; वि-गर्भा = गर्भ/सन्तान रहित; अङ्गना = स्त्री; मता = मानी गयी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस स्त्री का भग-प्रदेश बायीं ओर उन्नत हो वह कन्या को और दायीं ओर उन्नत हो वह पुत्र को जन्म देने वाली मानी जाती है; और जिसका भग शंख की भाँति आवर्त (घुमावदार) हो, उसे पुरातन लक्षण-शास्त्र सन्तानहीन स्त्री मानता है। यह ग्रन्थ का अंग-लक्षण-कथन है, कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text holds that a woman whose bhaga is raised on the left bears daughters and one raised on the right bears sons; where it whorls like a conch-shell, she is reckoned a woman without progeny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-लक्षण फल-कथन। यहाँ केवल एक द्वि-आधारी (binary) संगति है — वाम↔कन्या, दक्षिण↔पुत्र — कोई अंकीय सूत्र या राशि-गणना नहीं।

81.28
मृद्वी वस्तिः प्रशस्ता स्याद् विपुलाल्पसमुन्नता ।
रोमाढ्या च शिराला च रेखाङ्का न शुभप्रदा
mṛdvī vastiḥ praśastā syād vipulālpasamunnatā |
romāḍhyā ca śirālā ca rekhāṅkā na śubhapradā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृद्वी = कोमल; वस्तिः = वस्ति (अधो-उदर/मूत्राशय-प्रदेश); प्रशस्ता = प्रशंसनीय; विपुल = विस्तृत; अल्प-समुन्नता = थोड़ी उन्नत; रोमाढ्या = रोम-प्रचुर; शिराला = शिरा-युक्त; रेखा-अङ्का = रेखाओं से चिह्नित; न शुभप्रदा = शुभ नहीं देने वाली (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वस्ति मृदु हो, विपुल और अल्प-समुन्नत हो तो प्रशस्त मानी गई है; जो रोमाढ्या, शिराला और रेखाङ्का हो, वह शुभप्रदा नहीं कही गई। कोमल-विस्तृत-मन्दोन्नत बनाम रोम-शिरा-रेखा — यही शुभ/अशुभ का पाठ-भेद है।

English rendering The text states that a soft lower abdomen (vasti), broad and slightly raised, is praised; one that is hair-laden, veined and line-marked is not auspicious-giving.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वस्ति-लक्षण)। प्रशस्त बनाम अप्रशस्त गुण-युग्म; कोई संख्यात्मक स्थिरांक नहीं।

81.29
गम्भीरा दक्षिणावर्ता नाभिः सर्वसुखप्रदा ।
व्यक्तग्रन्थिः समुत्ताना वामावर्ता न शोभना
gambhīrā dakṣiṇāvartā nābhiḥ sarvasukhapradā |
vyaktagranthiḥ samuttānā vāmāvartā na śobhanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गम्भीरा = गहरी (नाभि); दक्षिणावर्ता = दक्षिणावर्त / घड़ी की दिशा में घूमी हुई; नाभिः = नाभि; सर्वसुखप्रदा = सब सुख देने वाली; व्यक्तग्रन्थिः = स्पष्ट गाँठ वाली; समुत्ताना = ऊपर उठी हुई; वामावर्ता = वामावर्त / उल्टी घुमाव वाली; न शोभना = शोभन / शुभ नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गहरी और दक्षिणावर्त नाभि सर्व-सुख देने वाली मानी गई है। इसके विपरीत, जिस नाभि में गाँठ स्पष्ट दिखे, जो ऊपर उठी हो, अथवा वामावर्त हो, उसे शास्त्र शुभ नहीं कहता। यह स्त्री-शरीर-लक्षण का वर्णन है, न कि कोई गणना-सूत्र।

English rendering The text states that a deep navel turning clockwise (dakṣiṇāvarta) is said to confer all comforts. A navel with a visible knot, raised upward, or turning counter-clockwise (vāmāvarta) is declared not auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्त्री-शरीर-लक्षण: नाभि)। दिशा (दक्षिण/वाम-आवर्त) और आकार यहाँ दृश्य लक्षण हैं; कोई अंश, वर्ग या बल-माप नहीं दिया गया।

81.30
पृथुकुक्षिः शुभा नारी सूते सा च बहून् सुतान् ।
भूपतिं जनयेत् पुत्रं मण्डूकाभेन कुक्षिणा
pṛthukukṣiḥ śubhā nārī sūte sā ca bahūn sutān |
bhūpatiṃ janayet putraṃ maṇḍūkābhena kukṣiṇā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृथुकुक्षिः = चौड़ी कुक्षि / उदर वाली; शुभा = शुभ; नारी = स्त्री; सूते = प्रसव करती है; बहून् सुतान् = अनेक पुत्र; भूपतिं = राजा / भूपति-पुत्र; जनयेत् = जन्म दे; मण्डूकाभेन = मेढक-सदृश; कुक्षिणा = उदर से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि चौड़ी कुक्षि वाली नारी शुभ मानी गई है और वह अनेक पुत्रों को जन्म देती है—ऐसा पाठ का फल-कथन है। मेढक-सदृश कुक्षि वाली स्त्री के विषय में शास्त्र कहता है कि वह भूपति-पुत्र को जन्म दे—यह भी शास्त्र का अपना कथन है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

English rendering The text states that a woman with a broad abdomen is auspicious and bears many sons. With a frog-like belly, it says, she brings forth a royal son—reported as the śāstra’s own claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुक्षि-लक्षण और संतति-फल)। “बहून्” यहाँ संख्या-सूत्र नहीं; सामान्य बहुताय का कथन है।

81.31
उन्नतेन वलीभाजा सावर्तेन च कुक्षिणा ।
वन्ध्या संन्यासिनी दासी जायते क्रमदोऽबला
unnatena valībhājā sāvartena ca kukṣiṇā |
vandhyā saṃnyāsinī dāsī jāyate kramado'balā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उन्नतेन = ऊँची / उठी हुई (कुक्षि से); वलीभाजा = वलि / सिकुड़न-रेखाओं वाली; सावर्तेन = आवर्त / घुमाव वाली; कुक्षिणा = उदर से; वन्ध्या = वंध्या; संन्यासिनी = संन्यासिनी; दासी = दासी; जायते = होती है / उत्पन्न होती है; क्रमदः = क्रम से; अबला = स्त्री (अबला)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उन्नत, वलि-युक्त और आवर्त वाली कुक्षि के क्रम से स्त्री वंध्या, संन्यासिनी अथवा दासी कही गई है। तीनों लक्षणों का यह क्रमिक फल-कथन पाठ का अपना विधान है। इसे नियति या दबाव-युक्त निश्चय के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए—केवल शास्त्र-कथित लक्षण-फल।

English rendering The text states that, with a raised, wrinkled, and whirled abdomen, a woman is said—in that order—to be barren, a renunciate, or a servant. This is sequential phala as the śāstra frames it, not a mathematical rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कुक्षि-लक्षणों का क्रम-फल: वन्ध्या → संन्यासिनी → दासी)। “क्रमदः” यहाँ तीन फल-पदों का क्रम सूचित करता है, कोई अंकीय गुणांक नहीं।

81.32
समे समांशे मृदुले पार्श्वे स्त्रीणां शुभप्रदे ।
उन्नते रोमसंयुक्ते शिराले चाऽशुभप्रदे
same samāṃśe mṛdule pārśve strīṇāṃ śubhaprade |
unnate romasaṃyukte śirāle cā'śubhaprade

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समे = सम / बराबर; समांशे = समान अंश वाले / सुडौल; मृदुले = कोमल; पार्श्वे = पार्श्व / पार्श्व-भाग; स्त्रीणां = स्त्रियों के; शुभप्रदे = शुभ देने वाले; उन्नते = ऊँचे / उभरे; रोमसंयुक्ते = रोम-युक्त; शिराले = शिरा-युक्त / नस-दिखते; अशुभप्रदे = अशुभ देने वाले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्रियों के सम, समान-अंश और कोमल पार्श्व शुभ-प्रद माने गए हैं। जो पार्श्व उन्नत, रोम-संयुक्त और शिरा-युक्त हों, उन्हें शास्त्र अशुभ-प्रद कहता है। यह शरीर-लक्षण का द्विपक्षीय फल-विवेक है।

English rendering The text states that even, well-proportioned, soft flanks are auspicious for women. Raised, hairy, and veined flanks are declared inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पार्श्व-लक्षण: शुभ / अशुभ)। “समांश” यहाँ अनुपात-सौंदर्य का शब्द है, न कि राशि-अंश की गणना।

81.33
निर्लोभं हृदयं स्त्रीणां समे सर्वसुखप्रदम् ।
विस्तीर्णं च सलोमं च विज्ञेयमशुभप्रदम्
nirlobhaṃ hṛdayaṃ strīṇāṃ same sarvasukhapradam |
vistīrṇaṃ ca salomaṃ ca vijñeyamaśubhapradam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्लोभं = लोभ-रहित (पाठ: निर्लोभं; शरीर-लक्षण-प्रसंग में निर्लोमं = रोम-रहित—पाठ-भेद संभव); हृदयं = हृदय / वक्षस्थल-हृदय-क्षेत्र; स्त्रीणां = स्त्रियों का; समे = सम; सर्वसुखप्रदम् = सर्व-सुख देने वाला; विस्तीर्णं = विस्तृत / चौड़ा; सलोमं = रोम-युक्त; विज्ञेयम् = जानना चाहिए; अशुभप्रदम् = अशुभ-प्रद।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्रियों का सम हृदय सर्व-सुख-प्रद है; दिए गए पाठ में “निर्लोभं” है—शरीर-चिह्न-अध्याय के स्वभाव से “निर्लोमं” (रोम-रहित) पाठ-भेद संभव। विस्तृत और सलोम हृदय को शास्त्र अशुभ-प्रद जानने को कहता है। फल पाठ के अनुसार रिपोर्ट किया जाए।

English rendering The text states that a woman’s even breast-region (hṛdaya) confers all comforts; the received reading has nirlobhaṃ—“without greed”—while in a somatic-lakṣaṇa context nirlomaṃ, “hairless,” is a plausible variant (पाठ-भेद संभव). Broad and hairy, it says, is to be known as inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (हृदय-लक्षण)। कोई डिग्री, वर्ग या बल-माप नहीं; केवल शुभ/अशुभ का द्वैत।

81.34
समौ पीनौ घनौ वृत्तौ दृढौ शस्तौ पयोध्रौ ।
स्थूलाग्रौ विरलौ शुष्कौ स्त्रीणां नैव शुभप्रदौ
samau pīnau ghanau vṛttau dṛḍhau śastau payodhrau |
sthūlāgrau viralau śuṣkau strīṇāṃ naiva śubhapradau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समौ = दोनों सम; पीनौ = पूर्ण / पुष्ट; घनौ = घने / दृढ़-घन; वृत्तौ = गोल; दृढौ = दृढ़; शस्तौ = प्रशंसित / शुभ; पयोध्रौ = स्तन; स्थूलाग्रौ = मोटे अग्र भाग वाले; विरलौ = विरल / दूर-दूर; शुष्कौ = शुष्क; स्त्रीणां = स्त्रियों के; नैव शुभप्रदौ = शुभ-प्रद नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दोनों स्तन सम, पीन, घन, वृत्त और दृढ़ हों तो वे प्रशंसित हैं। स्थूल-अग्र, विरल और शुष्क स्तन स्त्रियों के लिए शुभ-प्रद नहीं—ऐसा शास्त्र का फल-कथन है। यह आकार-गुण की सूची है, गणना नहीं।

English rendering The text states that breasts that are even, full, firm, round, and solid are praised. Thick-tipped, sparse (wide-set), and dry breasts are said not to be auspicious for women.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पयोधर-लक्षण: शस्त / अशुभ)। “समौ…दृढौ” गुण-समूह है; कोई माप-इकाई नहीं दी गई।

81.35
दक्षिणोन्नतवक्षोजा नारी पुत्रवती मता ।
वामोन्नतस्तनी कन्याप्रजा प्रोक्ता पुरातनैः
dakṣiṇonnatavakṣojā nārī putravatī matā |
vāmonnatastanī kanyāprajā proktā purātanaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दक्षिणोन्नतवक्षोजा = दक्षिण स्तन उन्नत वाली; नारी = स्त्री; पुत्रवती = पुत्रवती; मता = मानी गई; वामोन्नतस्तनी = वाम स्तन उन्नत वाली; कन्याप्रजा = कन्या-प्रजा वाली; प्रोक्ता = कही गई; पुरातनैः = पुरातन / प्राचीन आचार्यों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—और पुरातनों के वचन से जोड़ता है—कि दक्षिण स्तन उन्नत वाली नारी पुत्रवती मानी गई है। वाम स्तन उन्नत वाली कन्या-प्रजा वाली कही गई है। दक्षिण/वाम यहाँ शरीर-पक्ष का लक्षण है; संतति-फल शास्त्र-कथित है, न कि सुनिश्चित भविष्य।

English rendering The text states that a woman with the right breast higher is held to be mother of sons. One with the left breast higher is said by the ancients to bear daughters—phala reported as the śāstra’s claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वक्षोज-उन्नति: दक्षिण → पुत्र; वाम → कन्या)। पक्ष (दक्षिण/वाम) द्विचर लक्षण है; कोई अंश-विभाजन या दशा-अनुपात नहीं।

81.36
नारीणां चूचुके शस्ते श्यामवर्णे सुवर्तुले ।
अन्तर्भग्ने च दीर्घे च कृशे चापि न शोभने
nārīṇāṃ cūcuke śaste śyāmavarṇe suvartule |
antarbhagne ca dīrghe ca kṛśe cāpi na śobhane

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चूचुक = स्तन-अग्र / निपल; शस्ते = प्रशंसित, शुभ; श्यामवर्णे = श्याम (गहरा/साँवला) वर्ण वाला; सुवर्तुले = सुन्दर-गोल, पूर्ण-वृत्त; अन्तर्भग्ने = भीतर से भग्न/धँसा; दीर्घे = लम्बा; कृशे = कृश, दुबला-पतला; न शोभने = शोभा/शुभता नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नारी-लक्षण में चूचुक (स्तन-अग्र) का वर्णन करता है। श्यामवर्ण और सुवर्तुल चूचुक को शस्त—अर्थात् प्रशंसनीय—कहा गया है। इसके विपरीत जो चूचुक भीतर से भग्न (धँसे), अत्यन्त दीर्घ अथवा कृश हों, उन्हें शास्त्र “न शोभने” कहता है: वे शोभा और शुभ-लक्षण की दृष्टि से अनुकूल नहीं माने गए। यह फल-कथन शारीरिक आकार-वर्ण का नियम है, भाग्य-निर्णय नहीं।

English rendering The text states that a woman’s nipples/breast-tips that are dark-hued and well-rounded are praised as auspicious. Those that are sunken within, overly long, or thin are said not to be beautiful (or favourable) in this physiognomic scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। यह श्लोक चूचुक के शुभ–अशुभ शारीरिक गुणों की सूची है; कोई कोण, वर्ग-भाग या बल-माप इसमें नहीं है।

81.37
स्त्रीणां स्कन्धौ समौ पुष्टौ गूढसन्धी शुभप्रदौ ।
रोमाढ्यावुन्नतौ वक्रौ निर्मासावशुभौ स्मृतौ
strīṇāṃ skandhau samau puṣṭau gūḍhasandhī śubhapradau |
romāḍhyāvunnatau vakrau nirmāsāvaśubhau smṛtau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्कन्धौ = दोनों कंधे; समौ = समान, समतल; पुष्टौ = पुष्ट, मांसयुक्त; गूढसन्धी = सन्धि गूढ़/छिपी (हड्डी-जोड़ ढके); शुभप्रदौ = शुभ फल देने वाले (शास्त्र-वचन); रोमाढ्यौ = रोम-प्रचुर; उन्नतौ = ऊँचे/उभरे; वक्रौ = टेढ़े; निर्मांसौ = मांस-रहित; अशुभौ स्मृतौ = अशुभ माने गए।

हिन्दी भावार्थ स्त्री के दोनों स्कन्ध यदि सम, पुष्ट और गूढ़-सन्धि वाले हों, तो शास्त्र उन्हें शुभप्रद कहता है। जो स्कन्ध रोमों से भरे, उन्नत, वक्र अथवा निर्मांस हों, उन्हें अशुभ स्मरण किया गया है। “शुभ/अशुभ” यहाँ लक्षण-ग्रन्थ की पारम्परिक भाषा है—शारीरिक समता–असमता का वर्गीकरण, कोई निश्चित जीवन-भविष्य नहीं।

English rendering The text states that a woman’s shoulders that are even, well-fleshed, and with joints well-covered are called givers of good. Shoulders that are hairy, raised, crooked, or fleshless are remembered as inauspicious in this scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। सम–पुष्ट–गूढ़सन्धि बनाम रोमाढ्य–उन्नत–वक्र–निर्मांस—यह द्वि-स्तरीय गुणवत्ता-सूची है, कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

81.38
सुसूक्ष्मरोमे नारीणां पुष्टे स्निग्धे शुभप्रदे ।
कक्षे शिराले गम्भीरे न शुभे स्वेदमेदुरे
susūkṣmarome nārīṇāṃ puṣṭe snigdhe śubhaprade |
kakṣe śirāle gambhīre na śubhe svedamedure

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कक्षे = कक्ष/काँख (द्विवचन/एकवचन-पाठ: काँख-प्रदेश); सुसूक्ष्मरोमे = अति-सूक्ष्म रोम वाला; पुष्टे = पुष्ट; स्निग्धे = स्निग्ध, चिकना/कोमल-चमक; शुभप्रदे = शुभप्रद (शास्त्र-वचन); शिराले = शिरा-प्रचुर, नसों वाला; गम्भीरे = गहरा; स्वेदमेदुरे = स्वेद + मेद से चिकना/गीला-चिकना; न शुभे = शुभ नहीं।

हिन्दी भावार्थ नारी की काँख (कक्ष) यदि सूक्ष्म-रोमयुक्त, पुष्ट और स्निग्ध हो, तो शास्त्र उसे शुभप्रद कहता है। जो कक्ष शिराओं से भरी, गहरी, तथा पसीने और मेद से मेदुर (गीली-चिकनी) हो, उसे “न शुभे” कहा गया है। पाठ शारीरिक स्वच्छता–कोमलता–गहराई के लक्षणों को बाँटता है; चिकित्सा या भाग्य का दावा नहीं।

English rendering The text states that a woman’s armpits with fine hair, well-fleshed and smooth/lustrous, are called auspicious. Those that are veiny, deep, and greasy with sweat and fat are said not to be favourable in this physiognomic list.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। कक्ष के शुभ–अशुभ गुणों का वर्णन; कोई माप-सूत्र या कोण-गणना नहीं।

81.39
गूढास्थी कोमलग्रन्थी विशिरौ च बिरोमकौ ।
सरलौ सुवर्तुलौ चैव भुजौ शस्तौ मृगीदृशाम्
gūḍhāsthī komalagranthī viśirau ca biromakau |
saralau suvartulau caiva bhujau śastau mṛgīdṛśām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुजौ = दोनों भुजाएँ/बाँहें; गूढास्थी = अस्थि गूढ़/ढकी; कोमलग्रन्थी = कोमल ग्रन्थि/सन्धि; विशिरौ = शिरा-रहित (शिराएँ न दिखें); बिरोमकौ = विरोमक = रोम-रहित; सरलौ = सीधे; सुवर्तुलौ = सुन्दर-गोल; शस्तौ = प्रशंसित; मृगीदृशाम् = मृग-नयन नारी का (काव्य-उपनाम)।

हिन्दी भावार्थ “मृगीदृश” नारी की भुजाएँ—जिनमें अस्थि गूढ़ हो, ग्रन्थि कोमल हो, शिराएँ न उभरी हों, रोम न हों, और जो सरल तथा सुवर्तुल हों—शास्त्र उन्हें शस्त कहता है। यह भुजा-आकार का आदर्श रूप है: गोल, सीधा, नरम सन्धि वाला। “मृगीदृशाम्” काव्य-सम्बोधन है; कोई अलग गणना-वर्ग नहीं।

English rendering The text states that the arms of a deer-eyed woman—with bones well-covered, soft joints, free of prominent veins and hair, straight and well-rounded—are praised as favourable.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। भुजा के वांछित शारीरिक गुणों की सूची; संख्या या वर्ग-नियम नहीं।

81.40
निर्मांसौ स्थूलरोमाणौ ह्रस्वौ चैव शिराततौ ।
वक्रौ भुजौ च नारीणां क्लेशाय परिकीर्तितौ
nirmāṃsau sthūlaromāṇau hrasvau caiva śirātatau |
vakrau bhujau ca nārīṇāṃ kleśāya parikīrtitau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्मांसौ = मांस-रहित; स्थूलरोमाणौ = स्थूल/मोटे रोम वाले; ह्रस्वौ = छोटे; शिराततौ = शिराओं से तने/फैले; वक्रौ = टेढ़े; भुजौ = दोनों बाँहें; नारीणां = स्त्रियों की; क्लेशाय = क्लेश/कष्ट के लिए (शास्त्र-वचन); परिकीर्तितौ = कथित/वर्णित।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के शुभ भुजा-लक्षण के विपरीत, जो भुजाएँ निर्मांस, स्थूल-रोम वाली, ह्रस्व, शिरा-तत और वक्र हों, उन्हें शास्त्र “नारीणां क्लेशाय” कहता है—अर्थात् क्लेश-सूचक माने गए। यह उसी लक्षण-परम्परा का निषेध-पक्ष है: कृशता, रोम-स्थूलता, लघुता, शिरा-प्रकटन और वक्रता। फल-कथन को भाग्य-निर्णय न समझें; यह पाठ का अपना शारीरिक वर्गीकरण है।

English rendering The text states that a woman’s arms that are fleshless, thick-haired, short, stretched with veins, and crooked are declared to be for distress (kleśa) in this scheme—the counterpart of the favourable arm-marks just given.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन (निषेध-पक्ष)। शुभ भुजा (81.39) का विलोम-सूची; कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं।

81.41
सरोजमुकुलाकारो करांगुष्ठौ मृगीदृशाम् ।
सर्वसौख्यप्रदौ प्रोक्तौ कृशौ वक्रौ च दुःखदौ
sarojamukulākāro karāṃguṣṭhau mṛgīdṛśām |
sarvasaukhyapradau proktau kṛśau vakrau ca duḥkhadau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) करांगुष्ठौ = दोनों कर-अंगुष्ठ (अँगूठे); सरोजमुकुलाकारो = कमल-मुकुल (कली) के आकार; मृगीदृशाम् = मृग-नयन नारी का; सर्वसौख्यप्रदौ = सर्व-सौख्य देने वाले (शास्त्र-वचन); प्रोक्तौ = कहे गए; कृशौ = कृश/पतले; वक्रौ = टेढ़े; दुःखदौ = दुःख देने वाले (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नारी के अँगूठे यदि कमल-कली के आकार के हों, तो वे सर्व-सौख्यप्रद प्रोक्त हैं। जो अँगूठे कृश और वक्र हों, उन्हें दुःखद कहा गया है। आकार-तुलना (सरोज-मुकुल) यहाँ लक्षण है, ज्यामितीय माप नहीं; “सौख्य/दुःख” पाठ की फल-भाषा है, निश्चित भविष्य नहीं।

English rendering The text states that thumbs of a deer-eyed woman shaped like lotus-buds are said to confer all happiness; thumbs that are thin and crooked are said to give sorrow in this physiognomic scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। अँगूठे का रूप-उपमा (कमल-मुकुल) बनाम कृश–वक्र; कोई अंश/कोण-सूत्र नहीं।

81.42
स्त्रीणां करतलं रक्तं मध्योन्नतमरन्ध्रकम् ।
मृदुलं चाल्परेखाढ्यं ज्ञेयं सर्वसुखप्रदम्
strīṇāṃ karatalaṃ raktaṃ madhyonnatamarandhrakam |
mṛdulaṃ cālparekhāḍhyaṃ jñeyaṃ sarvasukhapradam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) करतलं = हथेली; रक्तं = रक्तवर्ण/लालिमा-युक्त; मध्योन्नतम् = मध्य में उन्नत/ऊँचा; अरन्ध्रकम् = रन्ध्र-रहित (बिना गड्ढे/छिद्र); मृदुलं = मृदु/कोमल; अल्प-रेखाढ्यम् = अल्प रेखाओं से युक्त (रेखाएँ कम); ज्ञेयम् = जानना चाहिए; सर्वसुखप्रदम् = सर्व-सुखप्रद (शास्त्र-वचन)।

हिन्दी भावार्थ स्त्री की हथेली यदि रक्तवर्ण हो, मध्य में उन्नत हो, रन्ध्र-रहित हो, मृदु हो और अल्प-रेखा वाली हो, तो शास्त्र उसे सर्व-सुखप्रद जानने को कहता है। “रक्त–मध्योन्नत–अरन्ध्र–मृदु–अल्परेखा” पाँच शारीरिक गुणों का समुच्चय है; सामुद्रिक/हस्त-रेखा परम्परा से जुड़ा लक्षण-कथन, परन्तु यहाँ कोई रेखा-गिनती या बल-सूत्र नहीं दिया गया।

English rendering The text states that a woman’s palm that is red, raised in the middle, free of pits/holes, soft, and endowed with few lines is to be known as conferring all happiness in this scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / फल-कथन। हथेली के पाँच गुणों की सूची; रेखा-संख्या का सूत्र या कोण-माप नहीं—केवल “अल्प-रेखा” का गुणात्मक निर्देश।

81.43
विधवा बहुरेखेण रेखाहीनेन निर्धने ।
भिक्षुका च शिरोढ्येन नारी करतलेन हि
vidhavā bahurekheṇa rekhāhīnena nirdhane |
bhikṣukā ca śiroḍhyena nārī karatalena hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विधवा = विधवा; बहु-रेखेण = बहुत रेखाओं वाली हथेली से; रेखा-हीनेन = रेखारहित हथेली से; निर्धने = निर्धन (सम्भवतः निर्धना; कारक-शिथिलता); भिक्षुका = भिखारिन; शिर-आढ्येन = नसों से भरी (शिराल) हथेली से; करतलेन = हथेली से; हि = ही/निश्चय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — बहुत रेखाओं वाली हथेली से स्त्री विधवा, रेखारहित से निर्धन और नसों से भरी हथेली से भिखारिन कही जाती है। (यहाँ करण/अधिकरण के रूपों में शिथिलता है; पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states that a many-lined palm marks a widow, a lineless palm poverty, and a vein-covered palm a beggar-woman.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। ये सामुद्रिक दावे हैं, किसी गणना के निष्कर्ष नहीं; इन्हें ग्रन्थ के कथन-रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी पद्धति गणित और व्याख्या को कठोरता से अलग रखती है (CLAUDE.md/oracle अनुशासन) — अष्टकवर्ग-बिन्दु, वर्ग-विभाजन और दशा-वर्ष जैसे मान `==` पर पिन किए जाते हैं (कोई सहन-सीमा नहीं), जबकि यह श्लोक विशुद्ध फल-कथन है। इसीलिए इसे “शास्त्र कहता है” के रूप में रखा गया है, किसी निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं — न भय, न दबाव।

81.44
पाणिपृष्ठं शुभं स्त्रीणां पुष्टं मृदुविरोमकम् ।
शिरालं रोमशं निम्नां दुखदारिद्र्यसूचकम्
pāṇipṛṣṭhaṃ śubhaṃ strīṇāṃ puṣṭaṃ mṛduviromakam |
śirālaṃ romaśaṃ nimnāṃ dukhadāridryasūcakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाणिपृष्ठम् = हाथ का पृष्ठ (ऊपरी भाग); शुभम् = शुभ/मङ्गल; स्त्रीणाम् = स्त्रियों का; पुष्टम् = पुष्ट, मांसल; मृदु-विरोमकम् = कोमल और रोम-रहित; शिरालम् = शिरा-युक्त (नसें उभरी हुई); रोमशम् = रोम-बहुल; निम्नम् = धँसा हुआ; दुःख-दारिद्र्य-सूचकम् = दुःख और दरिद्रता का सूचक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्रियों के पाणिपृष्ठ के दो वर्ग बताता है। जो पृष्ठ पुष्ट, कोमल और रोम-रहित हो, उसे शुभ कहा गया है। जो शिराओं से भरा, रोमश और धँसा हो, उसे दुःख तथा दारिद्र्य का सूचक बताया गया है। यह भी सामुद्रिक फल-कथन है, गणना नहीं।

English rendering For women, a plump, soft, hairless back of the hand is stated as auspicious; a veined, hairy, and sunken back of the hand is said to indicate sorrow and poverty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पाणिपृष्ठ-लक्षण)। गुण-युग्म (पुष्ट-मृदु-विरोमक बनाम शिराल-रोमश-निम्न) गुणात्मक हैं; कोई अंश, वर्ग या बल-इकाई नहीं दी गई।

81.45
यस्याः करतले रेखा व्यक्ता रक्ता च वर्तुला ।
स्निग्धा पूर्णा च गम्भीरा सा सर्वसुखभागिनी
yasyāḥ karatale rekhā vyaktā raktā ca vartulā |
snigdhā pūrṇā ca gambhīrā sā sarvasukhabhāginī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्याः = जिसके; करतले = हथेली पर; रेखा = रेखा; व्यक्ता = स्पष्ट; रक्ता = लाल; वर्तुला = गोलाकार/घुमावदार; स्निग्धा = चिकनी/स्निग्ध; पूर्णा = पूर्ण/अखंडित; गम्भीरा = गहरी; सर्व-सुख-भागिनी = सब सुखों की भागी।

हिन्दी भावार्थ जिस स्त्री की हथेली की रेखाएँ स्पष्ट, लाल, घुमावदार, चिकनी, अखंडित और गहरी हों, वह सब सुखों की भागिनी होती है — यहीं से हस्त-रेखा-चिह्नों का प्रकरण आरम्भ होता है।

English rendering She on whose palm the lines are clear, red, curved, smooth, unbroken and deep partakes of every happiness — opening the section on palm-line marks.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — हस्त-रेखा-लक्षण। रेखा के छह गुण (स्पष्ट/रक्त/वर्तुल/स्निग्ध/पूर्ण/गम्भीर) गुणात्मक हैं, संख्यात्मक नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह हस्तरेखा-प्रकरण ठीक वही सामग्री है जहाँ हमारी exact-`==` oracle-पद्धति लागू नहीं होती। हमारे इंजन — वर्ग D1…D60, विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र, षड्बल, अष्टकवर्ग (SAV = 337) — सब देशांतर/काल के नियत इनपुट पर चलते हैं; जबकि अंग-लक्षण का इनपुट प्रत्यक्ष दर्शन है, कोई ephemeris नहीं। इसीलिए यहाँ कोई गणितीय ओरैकल नहीं — यही “गणित को व्याख्या से अलग रखने” का अनुशासन है।

81.46
मत्स्येन सुभगा ज्ञेया स्वस्तिकेन धनान्विता ।
राजपत्नी सरोजेन जननी पृथिवीपतेः
matsyena subhagā jñeyā svastikena dhanānvitā |
rājapatnī sarojena jananī pṛthivīpateḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मत्स्येन = मत्स्य-चिह्न से; सुभगा = सौभाग्यवती/प्रिय-पत्नी; ज्ञेया = जानी जाए; स्वस्तिकेन = स्वस्तिक-चिह्न से; धनान्विता = धन-संपन्न; राजपत्नी = राजा की पत्नी; सरोजेन = कमल-चिह्न से; जननी = माता; पृथिवीपतेः = पृथ्वी-पति (राजा) की।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र करतल पर विशिष्ट आकृति-चिह्नों का फल बताता है। मत्स्य-चिह्न से नारी सुभगा कही गई; स्वस्तिक से धनान्विता; कमल (सरोज) से राजपत्नी तथा पृथ्वीपति की माता। ये तीन चिह्न — मत्स्य, स्वस्तिक, सरोज — अलग-अलग स्थिति के शास्त्रीय संकेत हैं।

English rendering By a fish-mark she is to be known as fortunate; by a svastika, wealthy; by a lotus, a king’s wife and mother of a lord of the earth — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (चिह्न-फल)। मत्स्य / स्वस्तिक / सरोज आकृति-पहचान हैं, संख्यात्मक सूत्र नहीं।

81.47
सार्वभौमप्रिया पाणौ नद्यावर्ते प्रदक्षिणे ।
शङ्खातपत्रकमठैर्भूपस्य जननी भवेत्
sārvabhaumapriyā pāṇau nadyāvarte pradakṣiṇe |
śaṅkhātapatrakamaṭhairbhūpasya jananī bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सार्वभौम-प्रिया = चक्रवर्ती/सार्वभौम की प्रिया; पाणौ = हाथ पर; नदी-आवर्ते = नदी-भँवर-सदृश चिह्न; प्रदक्षिणे = प्रदक्षिण (दक्षिणावर्त/दाहिने घूमते) दिशा में; शङ्ख = शंख; आतपत्र = छत्र; कमठैः = कच्छप-चिह्नों से; भूपस्य = भूप/राजा की; जननी = माता; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पाणि पर प्रदक्षिण दिशा का नद्यावर्त (नदी-भँवर) चिह्न सार्वभौम-प्रिया का संकेत है। शंख, आतपत्र (छत्र) और कमठ (कच्छप) चिह्नों से नारी भूप की जननी कही गई है। आवर्त की दिशा (प्रदक्षिण) यहाँ निर्णायक गुण है।

English rendering A clockwise river-eddy mark on the hand is stated to mark the beloved of a universal sovereign; conch, umbrella, and tortoise marks are said to mark the mother of a king.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आवर्त-दिशा + राजचिह्न)। “प्रदक्षिण” दिशा-निर्धारण गुणात्मक है; कोई कोण-माप या वर्ग-सूत्र नहीं दिया।

81.48
रेखा तुलाकृतिः पाणौ यस्याः सा हि बणिग्वधूः ।
गजवाजिवृषाभा वा करे वामे मृगीदृशः
rekhā tulākṛtiḥ pāṇau yasyāḥ sā hi baṇigvadhūḥ |
gajavājivṛṣābhā vā kare vāme mṛgīdṛśaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखा = रेखा; तुला-आकृतिः = तुला (तराजू) के आकार की; पाणौ = हाथ पर; बणिग्-वधूः = वणिक्/व्यापारी की पत्नी; गज = हाथी; वाजि = अश्व; वृष = वृषभ; आभा = आकृति-सदृश; करे वामे = बाएँ हाथ पर; मृगीदृशः = मृग-नयनी (नारी का)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस नारी के पाणि पर तुलाकृति रेखा हो, वह बणिग्वधू (व्यापारी-पत्नी) मानी गई। बाएँ हाथ पर गज, अश्व या वृष की आभा वाली रेखा/आकृति मृगीदृश नारी के लिए कही गई है — गज-वाजि-वृष तीनों विकल्प “वा” से जुड़े हैं। वाम-कर का निर्देश यहाँ स्थान-विशेष है।

English rendering A balance-shaped line on the hand marks a merchant’s wife, the text states; on the left hand, forms resembling elephant, horse, or bull are spoken of for the doe-eyed woman.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आकृति-रेखा + वाम-कर)। तुलाकृति और पशु-आभा पहचान-चिह्न हैं; कोई संख्या या विभाजन-नियम नहीं।

81.49
रेखा प्रसादवज्राभा सूते तीर्थकरं सुतम् ।
कृषीवलस्य पत्नी स्याच्छकटेन युगेन वा
rekhā prasādavajrābhā sūte tīrthakaraṃ sutam |
kṛṣīvalasya patnī syācchakaṭena yugena vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखा = रेखा; प्रसाद-वज्र-आभा = प्रासाद (भवन) और वज्र-सदृश; सूते = पुत्र को जन्म देती है; तीर्थकरम् = तीर्थकर (महापुरुष/तीर्थ-संस्थापक — जैन/शास्त्रीय अर्थ; पाठ-संदर्भ से); सुतम् = पुत्र; कृषीवलस्य = कृषक की; पत्नी = पत्नी; शकटेन = शकट (गाड़ी)-चिह्न से; युगेन = युग (जोत/जुत)-चिह्न से; वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि प्रसाद और वज्र की आभा वाली रेखा वाली नारी तीर्थकर-सुत को जन्म देती है — यह शास्त्र का फल-कथन है, नियति का दावा नहीं। शकट अथवा युग (जोत) चिह्न से वह कृषीवल (किसान) की पत्नी कही गई है। दो फल-मार्ग एक ही श्लोक में जुड़े हैं: राजसी/वज्र-आभा बनाम कृषि-यंत्र-चिह्न।

English rendering A line resembling a palace and a thunderbolt is said to mark the mother of a tīrthaṅkara-son; marks of a cart or a yoke are said to mark a cultivator’s wife.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आकृति-रेखा / कृषि-चिह्न)। प्रसाद-वज्र और शकट-युग आकृति-पहचान हैं; कोई गणितीय नियतंक या बिनदु-तालिका नहीं।

81.50
चामराङ्कुशचापैश्च राजपत्नी पतिव्रता ।
त्रिशूलाऽसिगदाशक्तिदुन्दुभ्याकृतिरेखया
cāmarāṅkuśacāpaiśca rājapatnī pativratā |
triśūlā'sigadāśaktidundubhyākṛtirekhayā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चामर = चँवर / राजचिह्न-आकार; अङ्कुश = गज-अंकुश-रेखा; चाप = धनुषाकार रेखा; राजपत्नी = राजकुल-योग की पत्नी-लक्षण; पतिव्रता = पति-निष्ठा; त्रिशूल = त्रिशूलाकृति रेखा; असि = खड्ग; गदा = गदा; शक्ति = शक्ति/भाला; दुन्दुभि = नगाड़ा/दुन्दुभि-आकार; आकृति-रेखा = हस्त/शरीर पर चिह्न-रेखा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्री के हाथ या अंग पर चँवर, अंकुश और धनुष जैसी शुभ आकृति की रेखाएँ हों तो वह राज-पद-योग वाली, पति-निष्ठा वाली स्त्री मानी जाती है। उसी प्रसंग में त्रिशूल, तलवार, गदा, शक्ति और दुन्दुभि जैसी आकृतियों की रेखाओं का भी उल्लेख है। यह शरीर-लक्षण (स्त्री-सामुद्रिक) का फल-कथन है, गणना का सूत्र नहीं। पाठ-भेद संभव — कुछ आवृत्तियों में दूसरी पंक्ति का फल अगले श्लोक से जुड़ा पढ़ा जाता है।

English rendering The text states that lines shaped like a fly-whisk (cāmara), goad (aṅkuśa), and bow (cāpa) mark a woman as a royal consort, devoted to her husband. It also lists lines of trident, sword, mace, spear, and drum form; the full result-clause for that second list may continue or vary by recension (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-लक्षण / रेखा-आकृति का फल-कथन। यहाँ “रेखा” का अर्थ हस्त-रेखा या अंग-चिह्न की सादृश्यता है, न कि राशि-अंश या वर्ग-विभाजन।

81.51
अङ्गुष्ठमूलान्निर्गत्या रेखा याति कनिष्ठिकाम् ।
सा नारि पतिहन्त्री स्याद् दूरतस्तां परित्यजेत्
aṅguṣṭhamūlānnirgatyā rekhā yāti kaniṣṭhikām |
sā nāri patihantrī syād dūratastāṃ parityajet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अंगुष्ठ-मूलात् = अंगूठे की जड़ से; निर्गत्या = निकलकर (‘निर्गत्य’ का रूप — पाठ-भेद संभव); रेखा = रेखा; याति = जाती है; कनिष्ठिकाम् = कनिष्ठिका (छोटी उँगली) तक; सा नारि = वह स्त्री; पति-हन्त्री = पति-नाश की सूचक (जिसका पति न रहे); दूरतः = दूर से ही; तां = उसे; परित्यजेत् = त्याग दे / बचे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस स्त्री की एक रेखा अंगूठे की जड़ से निकलकर सीधे कनिष्ठिका तक चली जाए, उसे “पतिहन्त्री” कहा गया है, और पाठ उससे दूर रहने की बात कहता है। (यह अत्यन्त कठोर सामुद्रिक कथन है; ‘निर्गत्या’ रूप में पाठ-भेद संभव।)

English rendering The text states that a woman across whose palm a single line runs from the thumb-root to the little finger is called a "husband-slayer," and it counsels keeping away from her.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कठोर सामुद्रिक फल-कथन। कोई ऐसा अंक यहाँ नहीं जिसे किसी सूत्र से परखा जा सके।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस प्रकार का कठोर कथन हमारी पद्धति में केवल ग्रन्थ का कथन रहता है — फल-कथन “शास्त्र कहता है” के रूप में, कभी नियति, निश्चय या भय/दबाव के रूप में नहीं (dossier अनुशासन #5)। यहाँ `==` ओरैकल से जाँचने योग्य कोई मान नहीं; यह विशुद्ध व्याख्या-कोटि है, गणना नहीं — इसीलिए इसे किसी इंजन-निष्कर्ष से नहीं जोड़ा जाता।

81.52
काकमण्डूकजम्बूकवृकवृश्चिकभोगिनः ।
रासभोष्ट्रविडालाभा रेखा दुःखप्रदाः स्त्रियाः
kākamaṇḍūkajambūkavṛkavṛścikabhoginaḥ |
rāsabhoṣṭraviḍālābhā rekhā duḥkhapradāḥ striyāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) काक = कौवा; मण्डूक = मेंढक; जम्बूक = सियार; वृक = भेड़िया; वृश्चिक = बिच्छू; भोगिनः = सर्प; रासभ = गधा; उष्ट्र = ऊँट; विडाल = बिल्ली; आभा = सादृश्य/आकार; रेखा = रेखाएँ; दुःखप्रदाः = दुःख देने वाली (शास्त्र-फल); स्त्रियाः = स्त्रियों के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्री की रेखाएँ यदि कौवा, मेंढक, सियार, भेड़िया, बिच्छू, सर्प, गधा, ऊँट या बिल्ली जैसी आभा/आकृति वाली हों, तो वे दुःखप्रद मानी गई हैं। यह पशु-आकृति-सादृश्य पर आधारित लक्षण-सूची है। फल “दुःखप्रदाः” शास्त्र का वर्गीकरण है — भय या दबाव का आदेश नहीं।

English rendering The text states that lines resembling a crow, frog, jackal, wolf, scorpion, serpent, donkey, camel, or cat are said to bring suffering for women. It is a list of inauspicious animal-form analogies in the physiognomic chapter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अशुभ-रेखा-आकृतियों की फल-सूची। कोई संख्या, भुतासंख्‍या या माप-सूत्र नहीं; केवल आकृति-नामों का समूह।

81.53
मृदुलाश्च सुपर्वाणो दीर्घा वृत्ताः क्रमात् कृशाः ।
अरोमकाः शुभाः स्त्रीणामङ्गुल्यः परिकीर्तिताः
mṛdulāśca suparvāṇo dīrghā vṛttāḥ kramāt kṛśāḥ |
aromakāḥ śubhāḥ strīṇāmaṅgulyaḥ parikīrtitāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृदुलाः = कोमल; सुपर्वाणः = सुन्दर पोर/गाँठ वाली (सु + पर्वन् = अंगुली का जोड़); दीर्घाः = लम्बी; वृत्ताः = गोलाई लिए हुए; क्रमात् कृशाः = आगे की ओर क्रमशः पतली होती हुई (नोक की ओर तनुता); अरोमकाः = रोमरहित; अङ्गुल्यः = (हाथ की) अंगुलियाँ; शुभाः = शुभ; परिकीर्तिताः = कही गई हैं।

हिन्दी भावार्थ हे शिष्य, यह अध्याय स्त्री के अंग-लक्षण (सामुद्रिक चिह्न) का है, ग्रह-गणित का नहीं। यहाँ शास्त्र कहता है कि जिस स्त्री की अंगुलियाँ कोमल, अच्छी पोरों वाली, लम्बी, गोलाकार, नोक की ओर क्रमशः पतली और रोमरहित हों — वे शुभ मानी जाती हैं। यह देह-लक्षण का वर्णन है, कोई अटल भविष्यवाणी नहीं।

English rendering Fingers that are soft, well-jointed, long, rounded, gradually tapering toward the tips, and hairless are declared auspicious for women — so the text states.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-लक्षण वर्णन (सामुद्रिक-फल)। यह श्लोक जन्म-कुण्डली की किसी संख्या को नहीं, वरन् सामुद्रिक-शास्त्र के देह-चिह्न को गिनाता है — इसे शास्त्र का कथन मानिए, नियति नहीं।

81.54
अतिह्रस्वाः कृशा वक्रा विरला रोमसंयुताः ।
बहुपर्वयुता वाऽपि पर्वहीनाश्च दुःखदाः
atihrasvāḥ kṛśā vakrā viralā romasaṃyutāḥ |
bahuparvayutā vā'pi parvahīnāśca duḥkhadāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतिह्रस्वाः = अत्यन्त छोटी; कृशाः = दुबली/सूखी; वक्राः = टेढ़ी; विरलाः = परस्पर दूर-दूर (बीच में झिरी वाली); रोमसंयुताः = रोमयुक्त; बहुपर्वयुताः = बहुत गाँठों वाली; पर्वहीनाः = पोर/गाँठ से रहित (चपटी); दुःखदाः = दुःखसूचक।

हिन्दी भावार्थ पिछले श्लोक का विपर्यय — शास्त्र कहता है कि जिन अंगुलियों में अति लघुता, दुबलापन, टेढ़ापन, परस्पर विरलता (बीच में खुलापन), रोम, अत्यधिक गाँठें अथवा गाँठों का सर्वथा अभाव हो, वे अशुभ/दुःखसूचक कही गई हैं। यह लक्षण-निर्देश है; इसे किसी व्यक्ति पर भय-रूप में मत आरोपित कीजिए।

English rendering Fingers that are very short, thin, crooked, gapped apart, hairy, over-knuckled, or lacking joints altogether are said to be sorrow-indicating — as the śāstra declares, a descriptive sign, not a decree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-लक्षण वर्णन (अशुभ पक्ष)। शुभ (53) और अशुभ (54) का यह युग्म सामुद्रिक विवेचन की द्विध्रुवी शैली दिखाता है — गुण बनाम दोष, बिना किसी अंकीय गणना के।

81.55
रक्तवर्णा नखास्तुङ्गा सशिखाश्च शुभप्रदाः ।
निम्ना विवर्णा पीता वा पुष्पिता दुःखदायकाः
raktavarṇā nakhāstuṅgā saśikhāśca śubhapradāḥ |
nimnā vivarṇā pītā vā puṣpitā duḥkhadāyakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्तवर्णाः = लाल रंग के; नखाः = नाखून; तुङ्गाः = उभरे/उन्नत; सशिखाः = शिखा (नोक/चमकती अग्रकोर) सहित; शुभप्रदाः = शुभफलदायक; निम्नाः = दबे/नीचे; विवर्णाः = फीके-बदरंग; पीताः = पीले; पुष्पिताः = फूल जैसे धब्बों/सफ़ेद चिह्नों वाले; दुःखदायकाः = दुःखसूचक। (रक्तवर्णा नखास्तुङ्गा में लिङ्ग-वचन शिथिलता — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस स्त्री के नाखून लाल आभा वाले, उभरे हुए और चमकदार नोक वाले हों, वे शुभ हैं; और जो दबे हुए, फीके, पीले अथवा पुष्प-चिह्नित (सफ़ेद धब्बेदार) हों, वे दुःखसूचक मानी जाती हैं। यह केवल देह-चिह्न का वर्णन है।

English rendering Nails that are red-hued, raised, and bright-tipped are auspicious; sunken, discolored, yellow, or spotted nails are said to be sorrow-giving — the text's own sign-reading.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-लक्षण वर्णन (नख-लक्षण)। रंग एवं आकृति गुणात्मक सूचक हैं, कोई अंश/बिन्दु-गणना नहीं — अतः इसे शास्त्रीय कथन ही रखा गया है।

81.56
अन्तर्निमग्नवंशास्थि पृष्ठं स्यान्मांसलं शुभम् ।
सशिरं रोमयुक्तं वा वक्रं चाऽशुभदायकम्
antarnimagnavaṃśāsthi pṛṣṭhaṃ syānmāṃsalaṃ śubham |
saśiraṃ romayuktaṃ vā vakraṃ cā'śubhadāyakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्तर्निमग्न = भीतर धँसा; वंशास्थि = रीढ़ की हड्डी / वंश-अस्थि; पृष्ठम् = पीठ; मांसलाम् = मांस-पुष्ट; शुभम् = शुभ; सशिरम् = शिर/उभार युक्त (पाठानुसार); रोमयुक्तम् = रोम-युक्त; वक्रम् = टेढ़ा; अशुभदायकम् = अशुभ फल देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पीठ शुभ तब मानी गई है जब वंशास्थि भीतर धँसी हो और पीठ मांसला हो। इसके विपरीत यदि पीठ उभार-युक्त, रोम-युक्त, अथवा टेढ़ी हो तो अशुभदायक कही गई है। यह पृष्ठ-लक्षण का अंतिम मानक-कथन है; पाठ-भेद संभव (सशिरम् आदि पदों के अर्थ में)।

English rendering The text states that a back is auspicious when the spine-bone is inwardly set and the surface is fleshy; a back that is raised-headed, hairy, or crooked is said to be inauspicious. Form and covering alone are judged.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पृष्ठ/वंशास्थि-लक्षण का शुभ-अशुभ वर्णन। कोई कोण, अंश या बल-इकाई नहीं; केवल शारीरिक आकृति का शास्त्रीय वर्गीकरण।

81.57
स्त्रीणां कण्थस्त्रिरेखाङ्कस्त्वव्यक्तास्थिश्च वर्तुलः ।
मांसलो मृदुलैश्चैव प्रशस्तफलदायकाः
strīṇāṃ kaṇthastrirekhāṅkastvavyaktāsthiśca vartulaḥ |
māṃsalo mṛdulaiścaiva praśastaphaladāyakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कण्ठः = गला/ग्रीवा; त्रिरेखाङ्कः = तीन रेखाओं से अंकित (कम्बुग्रीवा-लक्षण); अव्यक्तास्थिः = जिसकी हड्डियाँ स्पष्ट न दिखें (छिपी हुई); वर्तुलः = गोलाकार; मांसलः = मांसल; मृदुलैः = कोमलता सहित; प्रशस्तफलदायकः = प्रशस्त/श्रेष्ठ फलदायक। (प्रशस्तफलदायकाः बहुवचन बनाम एकवचन कण्ठ — पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस स्त्री का गला तीन रेखाओं से युक्त (शंख-सदृश), जिसकी हड्डियाँ बाहर न झलकें, गोल, मांसल और कोमल हो, वह प्रशस्त फल का सूचक है। यह सामुद्रिक कम्बुग्रीवा-लक्षण है, गणना नहीं।

English rendering A neck marked by three lines, with bones unseen, round, fleshy, and soft, is said to bring excellent results — the classic conch-neck sign as the text records it.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-लक्षण वर्णन (कण्ठ/कम्बुग्रीवा-लक्षण)। "त्रिरेखा" एक चिह्न-संख्या (३) अवश्य है, पर यह गिनने योग्य ज्यामितीय चिह्न है, कोई सूत्र नहीं।

81.58
स्थूलग्रीवः च विधवा वक्रग्रीव च किङ्करी ।
बन्ध्या च चिपिटग्रीवा लघुग्रीवा च निःसुता
sthūlagrīvaḥ ca vidhavā vakragrīva ca kiṅkarī |
bandhyā ca cipiṭagrīvā laghugrīvā ca niḥsutā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थूलग्रीवः = मोटी ग्रीवा वाली; विधवा = विधवा; वक्रग्रीवा = टेढ़ी ग्रीवा वाली; किङ्करी = सेविका/परिचारिका; बन्ध्या = सन्तानहीन; चिपिटग्रीवा = चपटी ग्रीवा वाली; लघुग्रीवा = छोटी/पतली ग्रीवा वाली; निःसुता = पुत्रहीन।

हिन्दी भावार्थ यह विशुद्ध फल-कथन है। शास्त्र (यहाँ शंकर-पार्वती संवाद-परम्परा में) ग्रीवा के प्रकारों से भिन्न-भिन्न परिणाम जोड़ता है — मोटी ग्रीवा, टेढ़ी, चपटी, छोटी। ये शास्त्र के दावे हैं; इन्हें भय, निश्चय या किसी व्यक्ति पर आरोपित नियति के रूप में नहीं, अपितु मूल पाठ के कथन के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है।

English rendering The text states that a thick neck, a crooked neck, a flat neck, and a short neck are each read as differing signs — presented here strictly as the śāstra's own claim, never as fate or prediction we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रीवा-भेद-फल)। ग्रीवा के चार भेदों को चार फलों से जोड़ने वाली यह प्रतिचित्रण-शैली सामुद्रिक की है; इसमें कोई गणित नहीं, और अनुशासन यह है कि फल को शास्त्र-वचन ही रखें, दुःख-भय न फैलाएँ।

81.59
श्रेष्ठा कृकाटिका ऋज्वी समांसा च समुन्नता ।
शुष्का शिराला रोमाढ्या विशाला कुटिलाऽसुभा
śreṣṭhā kṛkāṭikā ṛjvī samāṃsā ca samunnatā |
śuṣkā śirālā romāḍhyā viśālā kuṭilā'subhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृकाटिका = गर्दन का पिछला भाग / नूका; ऋज्वी = सीधी; समांसा = सम मांस वाली; समुन्नता = समुचित रूप से उन्नत; शुष्का = सूखी; शिराला = नसों से युक्त / शिरा-प्रकट; रोमाढ्या = रोमों से भरी; विशाला = बहुत चौड़ी; कुटिला = टेढ़ी; अशुभा = अशुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कृकाटिका (ग्रीवा का पृष्ठ-भाग) का शुभ और अशुभ भेद बताता है। सीधी, समान मांस वाली और समुचित उन्नत कृकाटिका श्रेष्ठ कही गई है। शुष्क, शिरायुक्त, रोमबहुल, अत्यन्त विशाल या कुटिल कृकाटिका को अशुभ कहा गया है। यह भी रूप-फल का वर्णन है।

English rendering The text holds a straight, evenly fleshed, moderately raised nape of the neck to be excellent; a dry, veiny, hairy, overly broad, or crooked nape is stated as inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कृकाटिका-लक्षण)। श्रेष्ठ/अशुभ का भेद रूप-गुणों पर टिका है; कोई संख्यात्मक सीमा या सूत्र नहीं दिया गया।

81.60
अरुणं मृदुलं पुष्टं प्रशस्तं चिबुकं स्त्रियाः ।
आयतं रोमशं स्थूलं द्विधाभक्तमशोभनम्
aruṇaṃ mṛdulaṃ puṣṭaṃ praśastaṃ cibukaṃ striyāḥ |
āyataṃ romaśaṃ sthūlaṃ dvidhābhaktamaśobhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चिबुकम् = ठोड़ी; अरुणम् = लालिमायुक्त/गुलाबी; मृदुलम् = कोमल; पुष्टम् = भरी हुई/पुष्ट; प्रशस्तम् = प्रशस्त; आयतम् = लम्बी-फैली; रोमशम् = रोमयुक्त; स्थूलम् = मोटी; द्विधाभक्तम् = बीच से दो भागों में बँटी (कटी हुई ठोड़ी); अशोभनम् = अशोभन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस स्त्री की ठोड़ी लालिमायुक्त, कोमल और पुष्ट हो, वह प्रशस्त है; और जो लम्बी, रोमयुक्त, मोटी अथवा बीच से कटी (द्विभक्त) हो, वह अशोभन मानी जाती है। यह केवल आकृति-वर्णन है।

English rendering A chin that is rosy, soft, and plump is praiseworthy; one that is elongated, hairy, thick, or cleft in two is called unbecoming — the text's descriptive reading.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अंग-लक्षण वर्णन (चिबुक-लक्षण)। "द्विधाभक्त" एक आकृति-भेद है (विभाजन का गुण), न कि कोई विभाजन-गणना।

81.61
कपोलावुन्नतौ स्त्रीणां पीनौ वृत्तौ शुभप्रदौ ।
रोमशौ पुरुषौ निम्नौ निर्मांसौ चाऽशुभप्रदौ
kapolāvunnatau strīṇāṃ pīnau vṛttau śubhapradau |
romaśau puruṣau nimnau nirmāṃsau cā'śubhapradau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कपोलौ = दोनों गाल; उन्नतौ = उभरे हुए; पीनौ = पूर्ण/मोटे; वृत्तौ = गोल; शुभप्रदौ = शुभ फल देने वाले; रोमशौ = रोमयुक्त; पुरुषौ = पुरुष-सदृश; निम्नौ = धँसे हुए; निर्मांसौ = मांस-रहित; अशुभप्रदौ = अशुभ फल देने वाले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री के कपोलों के शुभ-अशुभ रूप बताता है। उन्नत, पीन और वृत्त कपोल शुभप्रद कहे गए हैं। रोमश, पुरुष-सदृश, निम्न या निर्मांस कपोल अशुभप्रद कहे गए हैं। यह सामुद्रिक फल-विन्यास है, गणना नहीं।

English rendering The text states that elevated, full, round cheeks in women give auspicious results; hairy, masculine-looking, sunken, or fleshless cheeks are said to give inauspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (कपोल-लक्षण)। द्विवचन से दोनों कपोलों का युग्म रूप-गुणों से शुभ/अशुभ फल से जोड़ा गया है; संख्यात्मक इकाई नहीं है।

81.62
स्त्रीणां मुखं समं पृष्ठं वर्तुलं च सुगन्धिमत् ।
सुस्निग्धं च मनोहारि सुखसौभाग्यसूचकम्
strīṇāṃ mukhaṃ samaṃ pṛṣṭhaṃ vartulaṃ ca sugandhimat |
susnigdhaṃ ca manohāri sukhasaubhāgyasūcakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुखम् = मुख/चेहरा; समम् = सम / संतुलित; पृष्ठम् = विस्तृत/पूर्ण (पाठ-भेद संभव; अर्थ: सम और पूर्ण विस्तार); वर्तुलम् = गोल; सुगन्धिमत् = सुगन्ध युक्त; सुस्निग्धम् = चिकना/स्निग्ध; मनोहारि = मन को हरने वाला; सुखसौभाग्यसूचकम् = सुख और सौभाग्य का सूचक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री के मुख को सुख-सौभाग्य का सूचक तब कहता है जब वह सम, पूर्ण-विस्तृत, वर्तुल, सुगन्धिमत्, सुस्निग्ध और मनोहारि हो। यह रूप-गुणों की सूची से फल-संकेत जोड़ना है। पाठ-भेद संभव जहाँ “पृष्ठम्” का स्थानीय अर्थ विवादित हो; भाव सम-पूर्ण मुख की प्रशंसा का है।

English rendering The text states that a woman’s face that is even, full/broad, round, fragrant, glossy, and charming is an indicator of happiness and good fortune (sukha-saubhāgya).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मुख-लक्षण)। “सूचकम्” शब्द से फल संकेत है; कोई अंश, वर्ग या दशा-अनुपात नहीं।

81.63
वर्तुलः पाटलः स्निग्धारेखाभूषितमध्यभूः ।
मनोहरोऽधरो यस्याः सा भवेद् राजवल्लभा
vartulaḥ pāṭalaḥ snigdhārekhābhūṣitamadhyabhūḥ |
manoharo'dharo yasyāḥ sā bhaved rājavallabhā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधरः = निचला ओष्ठ; वर्तुलः = गोल; पाटलः = पाटल-वर्ण (हल्का लाल/गुलाबी); स्निग्ध = चिकना; रेखाभूषितमध्यभूः = मध्य में रेखा से अलंकृत; मनोहरः = मनोरम; राजवल्लभा = राजा की प्रिया / राज-प्रिय स्त्री।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जिस स्त्री का अधर वर्तुल, पाटल, स्निग्ध, मध्य में रेखा से भूषित और मनोहर हो, वह राजवल्लभा होती है। यह सामुद्रिक फल-कथन है; राजसम्मान का संकेत रूप-गुण से जोड़ा गया है, कोई गणितीय मापदण्ड नहीं।

English rendering The text states that she whose lower lip is round, pale-red (pāṭala), glossy, adorned with a mid-line, and charming becomes a royal favorite (rājavallabhā).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अधर-लक्षण)। रूप के गुणों को “राजवल्लभा” फल से जोड़ा गया है; सूत्र, अंक या बला-तुलना इसमें नहीं है।

81.64
निर्मांसः स्फुटितो लम्बो रूक्षो वा श्यामवर्णकः ।
स्थूलोऽधरश्च नारीणां वैधव्यक्लेशसूचकः
nirmāṃsaḥ sphuṭito lambo rūkṣo vā śyāmavarṇakaḥ |
sthūlo'dharaśca nārīṇāṃ vaidhavyakleśasūcakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) निर्मांस = मांसहीन/दुबला (अधर); स्फुटित = फटा/चिरा; लम्ब = लटकता/अतिदीर्घ; रूक्ष = रूखा/शुष्क; श्यामवर्णक = श्याम-वर्ण वाला; स्थूल = मोटा/स्थूल; अधर = अधरोष्ठ (निचला होंठ); वैधव्य-क्लेश-सूचक = वैधव्य-क्लेश का सूचक (शास्त्रीय फल-कथन)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नारी के अधरोष्ठ के लक्षणों का वर्णन करता है। जो अधर निर्मांस, फटा, लटकता, रूखा या श्यामवर्ण का हो, अथवा स्थूल हो, उसे शास्त्र नारी के लिए वैधव्य-क्लेश का सूचक कहता है। यह शरीर-लक्षण-परक फल-कथन है—शास्त्र की अपनी भाषा में; कोई नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states that a woman’s lower lip which is fleshless, cracked, pendulous, rough, dark-hued, or thick is an indicator of widowhood-distress. The claim is the śāstra’s physiognomic phala, not a deterministic forecast.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-शरीर-लक्षण / अधरोष्ठ-फल-कथन। यहाँ केवल रूप-वर्णन और शास्त्रीय फल है; कोई अंश, वर्ग, बिन्दु या काल-सूत्र नहीं।

81.65
रक्तोत्पलनिभः स्निग्ध उत्तरोष्ठो मृगीदृशाम् ।
किञ्चिन्मध्यौन्नतोऽरोमा सुखसौभाग्यगो भवेत्
raktotpalanibhaḥ snigdha uttaroṣṭho mṛgīdṛśām |
kiñcinmadhyaunnato'romā sukhasaubhāgyago bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्तोत्पल-निभ = रक्त-कमल-सदृश; स्निग्ध = चिकना/कांतिमय; उत्तरोष्ठ = ऊपरी होंठ; मृगी-दृशाम् = मृग-नयन स्त्रियों का; किञ्चित्-मध्य-उन्नत = मध्य में किंचित् ऊँचा; अरोमा = रोम-रहित; सुख-सौभाग्य-गः = सुख-सौभाग्य की ओर ले जाने वाला (शास्त्र-कथित)

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मृगी-दृष्टि नारी का उत्तरोष्ठ यदि रक्त-कमल-सदृश, स्निग्ध, मध्य में थोड़ा उन्नत और रोम-रहित हो, तो वह सुख-सौभाग्य का कारक माना जाता है। यह ऊपरी होंठ के शुभ लक्षण का पारंपरिक शरीर-शास्त्रीय कथन है। फल शास्त्र की भाषा में है; हम उसे नियति नहीं ठहराते।

English rendering The text states that for a doe-eyed woman, an upper lip like a red lotus—smooth, slightly raised in the middle, and free of hair—tends toward happiness and good fortune (saubhāgya). Again, a classical physiognomic indication, not an endorsed fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उत्तरोष्ठ-लक्षण / शुभ-फल-कथन। कोई माप-सूत्र या गणना नहीं; केवल रूप और शास्त्र-कथित फल।

81.66
स्निग्धागुग्धनिभाः स्त्रीणां द्वात्रिंशद्दशनाः शुभाः ।
अधस्तादुपरिष्ठाच्च समाः स्तोकसमुन्नताः
snigdhāgugdhanibhāḥ strīṇāṃ dvātriṃśaddaśanāḥ śubhāḥ |
adhastādupariṣṭhācca samāḥ stokasamunnatāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्निग्ध = चिकने/कांतिमय; आगुग्ध-निभाः = (पाठ-भेद संभव; आभा-विशेष—कांति/श्वेत-सदृश पढ़ने की परंपरा संभव); द्वात्रिंशत् = बत्तीस (३२); दशनाः = दाँत; शुभाः = शुभ; अधस्तात् + उपरिष्टात् = नीचे और ऊपर; समाः = सम/बराबर; स्तोक-समुन्नताः = थोड़े उन्नत

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री के दाँतों के शुभ लक्षण बताता है—स्निग्ध, आभा-युक्त (आगुग्धनिभ: पाठ-भेद संभव), संख्या में द्वात्रिंशत् (३२), नीचे-ऊपर सम, और किंचित् समुन्नत। ऐसे दशन शास्त्र की दृष्टि में शुभ कहे गए हैं। यहाँ “बत्तीस” स्पष्ट संख्या है; शेष रूप-वर्णन है।

English rendering The text states that for women, thirty-two teeth that are smooth and lustrous in appearance (reading of āgugdha-nibhāḥ may vary), even above and below, and slightly raised, are auspicious. The count 32 is explicit; the rest is physiognomic form.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशन-संख्या + शुभ-लक्षण-फल। केवल स्थिरांक: दशन-संख्या = ३२ (द्वात्रिंशत्); कोई वर्ग/दशा/बल-सूत्र नहीं।

उदाहरण (worked example) शास्त्रीय गणना नहीं, केवल गणना-संख्यान: यदि निरीक्षण में ऊर्ध्व-पंक्ति + अधः-पंक्ति के स्थायी दशन = ३२, सम पंक्ति, किंचित् उन्नत—तो यह श्लोक का “शुभ” मानदंड पूरा करता है। यह दृश्य-मानदंड है, ज्योतिष-अंश-गणित नहीं।

81.67
अधस्तादधिकाः पीताः श्यामा दीर्घा द्विपङ्क्तयः ।
विकटा विरलाश्चापि दशना न शुभाः स्मृताः
adhastādadhikāḥ pītāḥ śyāmā dīrghā dvipaṅktayaḥ |
vikaṭā viralāścāpi daśanā na śubhāḥ smṛtāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधस्तात् = नीचे की पंक्ति में; अधिकाः = अधिक संख्या वाले; पीताः = पीले; श्यामाः = मलिन/काले; दीर्घाः = लम्बे; द्वि-पङ्क्तयः = दोहरी पंक्ति में जमे; विकटा = भद्दे/बेडौल; विरलाः = विरल, बीच-बीच में खुले; दशनाः = दाँत; न शुभाः स्मृताः = अशुभ माने गए।

हिन्दी भावार्थ इसके विपरीत, शास्त्र कहता है कि जिनके दाँत नीचे की पंक्ति में अधिक हों, पीले या श्याम वर्ण के, अस्वाभाविक रूप से लम्बे, दोहरी पंक्ति में उगे, बेडौल अथवा विरल (बीच में अन्तर वाले) हों — वे दन्त शुभ नहीं माने जाते। यह पिछले श्लोक के प्रशस्त लक्षणों का प्रतिपक्ष है।

English rendering Teeth more numerous in the lower row, yellow, dark, over-long, set in a double row, misshapen, or widely spaced are held to be inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-वर्णन (निषेध-पक्ष)। यहाँ कोई सूत्र नहीं, केवल शुभ-मानक (श्लोक 66) से विचलन की सूची है — सामुद्रिक-पद्धति द्वंद्व (शुभ/अशुभ) में लक्षण गिनाती है, संख्यात्मक गणना में नहीं।

81.68
शोणा मृद्वी शुभा जिह्वा स्त्रीणामतुलभोगदा ।
दुःखदा मध्यसङ्कीर्णा पुरोभागेऽतिविस्तरा
śoṇā mṛdvī śubhā jihvā strīṇāmatulabhogadā |
duḥkhadā madhyasaṅkīrṇā purobhāge'tivistarā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शोणा = रक्त-वर्ण / लाल; मृद्वी = कोमल; शुभा = शुभ; जिह्वा = जीभ; अतुल-भोग-दा = अतुल भोग देने वाली (शास्त्र-कथित); दुःख-दा = दुःख देने वाली; मध्य-सङ्कीर्णा = मध्य में संकीर्ण; पुरो-भागे अति-विस्तरा = आगे के भाग में अत्यंत चौड़ी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—स्त्री की जीभ यदि शोण (लाल) और मृदु हो तो शुभ और अतुल-भोग-दा मानी जाती है। जो मध्य में संकीर्ण और आगे अत्यंत विस्तृत हो, उसे शास्त्र दुःख-दा कहता है। दोनों फल शास्त्र के स्वर में हैं; हम उन्हें नियति या दबाव नहीं बनाते।

English rendering The text states that a woman’s tongue which is red and soft is auspicious and confers incomparable enjoyment; a tongue narrow in the middle and overly broad in front is said to bring sorrow. Both are classical phala-statements, not endorsed certainty.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — जिह्वा-लक्षण / शुभ-अशुभ फल-कथन। रूप-गुण और फल; कोई अंश या काल-सूत्र नहीं।

81.69
सितया मरणं तोये श्यामया कलहप्रिया ।
मांसलया धनैर्हीना लम्बयाऽभक्ष्यभक्षिणी
sitayā maraṇaṃ toye śyāmayā kalahapriyā |
māṃsalayā dhanairhīnā lambayā'bhakṣyabhakṣiṇī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सितया = श्वेत (जीभ) से; मरणं तोये = जल में/जल से मरण (शास्त्र का कथन); श्यामया = श्याम जीभ से; कलहप्रिया = कलहप्रिय स्वभाव; मांसलया = मांसल (मोटी) जीभ से; धनैर्हीना = धनहीन; लम्बया = लम्बी/लटकती जीभ से; अभक्ष्य-भक्षिणी = अभक्ष्य (अखाद्य) खाने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र जिह्वा के वर्ण-आकार से सामुद्रिक फल गिनाता है — श्वेत जीभ से जल-सम्बन्धी मरण, श्याम से कलहप्रिय स्वभाव, मांसल से धन का अभाव, और लम्बी से अभक्ष्य-भक्षण का कथन करता है। ये परम्परा के फल-वचन हैं, कोई सुनिश्चित नियति नहीं; इन्हें भय या दबाव के रूप में नहीं, केवल शास्त्र-कथन के रूप में लेना चाहिए।

English rendering The text states: a white tongue portends death connected with water, a dark one a quarrelsome nature, a fleshy one want of wealth, and a hanging tongue one who eats forbidden food.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामुद्रिक)। कोई संख्या या गणना नहीं; यह वर्ण/आकार → फल की सारणीबद्ध सूची है। अनुशासन-सूचना: ये कठोर कथन शास्त्र की अपनी वाणी हैं — इन्हें प्रमाण-आधारित भविष्यवाणी न बनाएँ, न भय-वस्तु।

81.70
प्रमादसहिता नारी जिह्वया च विशालया ।
सुस्निग्धं पाटलं स्त्रीणां कोमलं तालुशोभनम्
pramādasahitā nārī jihvayā ca viśālayā |
susnigdhaṃ pāṭalaṃ strīṇāṃ komalaṃ tāluśobhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रमाद-सहिता = प्रमाद-युक्त (असावधानी/भ्रम से युक्त); नारी = स्त्री; जिह्वया विशालया = विशाल जिह्वा से; सु-स्निग्धम् = अत्यंत चिकना/कांतिमय; पाटलम् = पाटल/हल्का रक्त-वर्ण; कोमलम् = कोमल; तालु = तालु (मुँह की छत); शोभनम् = शोभन/शुभ-लक्षण

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—विशाल जिह्वा वाली नारी प्रमाद-सहिता मानी जाती है। स्त्री का तालु यदि सुस्निग्ध, पाटल और कोमल हो तो शोभन कहा गया है। एक ही श्लोक में जिह्वा का दोष-फल और तालु का शुभ-लक्षण—दो शरीर-अंगों का संक्षिप्त निर्देश है।

English rendering The text states that a woman with a large tongue is associated with pramāda (carelessness/error), while a woman’s palate that is very smooth, reddish (pāṭala), and soft is called beautiful/auspicious. Two organs, two classical marks—no computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — जिह्वा-फल + तालु-लक्षण-वर्णन। शरीर-शास्त्रीय कथन; कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु, दशा या बल-इकाई नहीं।

81.71
श्वेते तालुनि वैधव्यं पीते प्रव्रजिता भवेत् ।
कृष्णे सन्ततिहीना स्याद्रूक्षे भूरिकुटुम्बिनी
śvete tāluni vaidhavyaṃ pīte pravrajitā bhavet |
kṛṣṇe santatihīnā syādrūkṣe bhūrikuṭumbinī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तालु = तालू / मुख की छत; श्वेते = श्वेत / सफेद तालू पर; वैधव्यम् = विधवा-अवस्था (शास्त्रीय फल-कथन); पीते = पीले तालू पर; प्रव्रजिता = संन्यासिनि / प्रव्रज्या-पथिनी; कृष्णे = कृष्ण / गहरे तालू पर; सन्ततिहीना = संतति-रहित; रूक्षे = रूक्ष / शुष्क-कठोर तालू पर; भूरिकुटुम्बिनी = विस्तृत कुटुंब वाली स्त्री।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री के तालू (तालु) के वर्ण-लक्षण से फल कहता है। श्वेत तालू पर वैधव्य का संकेत दिया गया है; पीले तालू पर प्रव्रज्या (संन्यास/त्याग-पथ) का। कृष्ण तालू पर संतति-हीनता कही गई है, और रूक्ष तालू पर भूरि-कुटुंब वाली होने का फल। यह शारीरिक लक्षण-वर्ग का कथन है — गणना नहीं, शास्त्रीय संकेत-भाषा है।

English rendering The text links the palate’s colour to stated results: white to widowhood, yellow to renunciate life, dark to childlessness, and rough/dry to a large household. These are classical physiognomic indications, not computations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्त्री-तालु-वर्ण लक्षण)। चार वर्ण-स्थितियाँ (श्वेत, पीत, कृष्ण, रूक्ष) को चार फल-पदों से जोड़ा गया है; कोई अंश, वर्ग या बल-माप नहीं।

81.72
अलक्षितरदं स्त्रीणां किञ्चित्फुल्लकपोलकम् ।
स्मितं शुभप्रदं ज्ञेयमन्यथा त्वशुभप्रदम्
alakṣitaradaṃ strīṇāṃ kiñcitphullakapolakam |
smitaṃ śubhapradaṃ jñeyamanyathā tvaśubhapradam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अलक्षितरदम् = दंत जो स्मित में प्रमुख/उजागर न हों; स्त्रीणाम् = स्त्रियों का; किञ्चित्फुल्लकपोलकम् = थोड़े-से खिला/पूर्ण कपोल; स्मितम् = मुस्कान; शुभप्रदम् = शुभ-फल देने वाली (शास्त्र-कथन); ज्ञेयम् = जानना चाहिए; अन्यथा = विपरीत लक्षण पर; अशुभप्रदम् = अशुभ-फल देने वाली (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ स्त्रियों की मुस्कान का शुभ-मानदंड शास्त्र यों कहता है — जहाँ दाँत अत्यधिक उजागर न हों (अलक्षित-रद) और कपोल किंचित् पूर्ण/खिले हों, वह स्मित शुभप्रद माना गया है। इसके विपरीत लक्षण वाली मुस्कान को अशुभप्रद कहा गया है। यह सौंदर्य-लक्षण का गुणात्मक नियम है, संख्यात्मक नहीं।

English rendering A woman’s smile is said to be auspicious when the teeth are not conspicuously bared and the cheeks are gently full; otherwise the text classifies the smile as inauspicious. The criterion is qualitative physiognomy, not measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्मित-लक्षण)। “अलक्षित-रद + किंचित्-फुल्ल-कपोल” बनाम “अन्यथा” — द्वि-वर्गीय शुभ/अशुभ नियम, बिना अंश या माप के।

81.73
समवृत्तपुटा नासा लघुच्छिद्रा शुभप्रदा ।
स्थूलाग्रा मध्यनिम्ना वा न प्रशस्ता मृगीदृशाम्
samavṛttapuṭā nāsā laghucchidrā śubhapradā |
sthūlāgrā madhyanimnā vā na praśastā mṛgīdṛśām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समवृत्तपुटा = सम और वृत्त (गोल) पुट/नासा-पुट वाली; नासा = नासिका; लघुच्छिद्रा = छोटे छिद्र वाली; शुभप्रदा = शुभ-फलदायिनी (शास्त्र-कथन); स्थूलाग्रा = स्थूल अग्रभाग वाली; मध्यनिम्ना = मध्य में निम्न/धँसी; वा = अथवा; न प्रशस्ता = प्रशंसनीय नहीं; मृगीदृशाम् = मृग-नेत्रा स्त्रियों के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नासिका के आदर्श रूप को यों बताता है — सम-वृत्त पुट और लघु छिद्र वाली नासिका शुभप्रदा कही गई है। इसके विपरीत स्थूल-अग्र या मध्य-निम्न नासिका मृगीदृश (मृगनयनी) स्त्रियों के लिए प्रशस्त नहीं मानी गई। यह आकृति-वर्णन है; माप का सूत्र नहीं दिया गया।

English rendering A nose with evenly rounded nostrils and small apertures is stated to be auspicious; a thick-tipped or mid-depressed nose is declared not praiseworthy for doe-eyed women. Shape-description only, without numeric rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नासा-आकृति लक्षण)। शुभ = समवृत्तपुट + लघुच्छिद्र; अ-प्रशस्त = स्थूलाग्र या मध्यनिम्न — गुणात्मक द्वैत।

81.74
रक्ताग्राऽकुञ्चिताग्रा वा नासा वैधव्यकारिणी ।
दासी सा चिपिटा यस्या ह्रस्वा दीर्घा कलिप्रिया
raktāgrā'kuñcitāgrā vā nāsā vaidhavyakāriṇī |
dāsī sā cipiṭā yasyā hrasvā dīrghā kalipriyā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्ताग्रा = रक्त-वर्ण अग्र वाली; अकुञ्चिताग्रा = मुड़ी/वक्र अग्र वाली; नासा = नासिका; वैधव्यकारिणी = वैधव्य-संकेतक (शास्त्र-कथन); दासी = दासी-स्थिति वाली (शास्त्र-कथन); चिपिटा = चिपटी/दबी नासिका; यस्याः = जिसकी; ह्रस्वा = ह्रस्व/छोटी; दीर्घा = दीर्घ/लंबी; कलिप्रिया = कलह-प्रिय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नासिका के और भी फल-रूप कहता है। रक्त-अग्र या अकुंचित-अग्र नासिका को वैधव्यकारिणी कहा गया है। चिपटी नासिका वाली को दासी-रूप फल दिया गया है; ह्रस्व या दीर्घ नासिका वाली को कलिप्रिया (कलह-प्रिय) कहा गया है। ये शास्त्र के लक्षण-फल हैं — नियति का दावा नहीं, पाठ का कथन।

English rendering The text states that a red-tipped or hook-tipped nose indicates widowhood; a flat nose, servant status; and a short or overly long nose, love of quarrel. These are śāstric physiognomic claims, not endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नासा-विशेष फल)। चार आकृति-प्रकार (रक्ताग्र/अकुंचिताग्र, चिपिटा, ह्रस्वा, दीर्घा) चार फल-पदों से जुड़े; कोई अंश-माप नहीं।

81.75
शुभे विलोचने स्त्रीणां रक्तान्ते कृष्णतारके ।
गोक्षीरवर्णे विशदे सुस्निग्धे कृष्णपक्ष्मिणी
śubhe vilocane strīṇāṃ raktānte kṛṣṇatārake |
gokṣīravarṇe viśade susnigdhe kṛṣṇapakṣmiṇī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुभे विलोचने = शुभ नेत्र; स्त्रीणाम् = स्त्रियों के; रक्तान्ते = अंत/कोण में रक्त-आभा वाले; कृष्णतारके = कृष्ण तारा/पुतली वाले; गोक्षीरवर्णे = गौ-क्षीर (दूध) के वर्ण वाले (श्वेत भाग); विशदे = विशद/निर्मल; सुस्निग्धे = सु-स्निग्ध/कोमल-कांतिमय; कृष्णपक्ष्मिणी = कृष्ण पक्ष्म (बरौनी) वाली।

हिन्दी भावार्थ स्त्रियों के शुभ नेत्रों का शास्त्रीय वर्णन इस श्लोक में संकलित है — अंत में रक्त-आभा, कृष्ण तारा, गौक्षीर-वर्ण का विशद श्वेत भाग, सुस्निग्ध कांति, और कृष्ण पक्ष्म। यह एक आदर्श-सूची है: जब ये गुण एकत्र हों, नेत्र शुभ माने गए हैं। संख्या या कोण-माप यहाँ नहीं है।

English rendering Auspicious eyes in women are described as reddish at the corners, with dark pupils, a milk-white clear sclera, a soft lustre, and black lashes. The verse lists ideal marks; it gives no numeric measure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/लक्षण-सूची (शुभ-नेत्र)। पाँच गुण-पद (रक्तांत, कृष्णतारक, गोक्षीरवर्ण-विशद, सुस्निग्ध, कृष्णपक्ष्मिणी) — संयोजित शुभ-मानदंड, बिना गणना के।

81.76
उन्नताक्षी न दीर्घायुर्वृत्ताक्षी कुलटा भवेत् ।
रमणी मधुपिङ्गाक्षी सुखसौभाग्यभागिनी
unnatākṣī na dīrghāyurvṛttākṣī kulaṭā bhavet |
ramaṇī madhupiṅgākṣī sukhasaubhāgyabhāginī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उन्नत-अक्षी = उभरी (बाहर निकली) आँखों वाली; न दीर्घायुः = दीर्घायु नहीं (शास्त्र-कथन); वृत्त-अक्षी = गोल आँखों वाली; कुलटा = कुलटा (स्वच्छन्दचारिणी); भवेत् = होती है; रमणी = रमणीय स्त्री; मधु-पिङ्ग-अक्षी = मधु-जैसी पिङ्गल (सुनहरी-भूरी) आँखों वाली; सुख-सौभाग्य-भागिनी = सुख और सौभाग्य की भागी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नेत्राकृति से फल गिनाता है — उभरी आँखों वाली को दीर्घायु नहीं, गोल आँखों वाली को स्वच्छन्दचारिणी कहता है, जबकि मधु-सी पिङ्गल आँखों वाली सुन्दरी को सुख-सौभाग्य की भागी बताता है। ये परम्परा-कथन हैं, कोई निश्चित नियति नहीं।

English rendering The text states: a woman with bulging eyes is not long-lived, a round-eyed one becomes wayward, while the honey-tawny-eyed beauty partakes of happiness and good fortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामुद्रिक)। आकृति/वर्ण → फल का मानचित्रण; कोई राशि नहीं। अनुशासन-सूचना: "न दीर्घायुः", "कुलटा" जैसे कठोर पद शास्त्र के अपने कथन हैं — इन्हें भय या समर्थित पूर्वानुमान न बनाएँ।

81.77
पुंश्चली वामकाणाक्षी वन्ध्या दक्षिणकाणिका ।
पारावताक्षी दुःशीला गजाक्षी नैव शोभना
puṃścalī vāmakāṇākṣī vandhyā dakṣiṇakāṇikā |
pārāvatākṣī duḥśīlā gajākṣī naiva śobhanā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुंश्चली = स्वैरिणी (शास्त्र-कथन); वाम-काण-अक्षी = बायीं आँख में विकल/काणी; वन्ध्या = बन्ध्या (सन्तानहीन); दक्षिण-काणिका = दायीं आँख में विकल; पारावत-अक्षी = कबूतर-जैसी आँखों वाली; दुःशीला = दुराचारिणी; गज-अक्षी = हाथी-जैसी (छोटी) आँखों वाली; न एव शोभना = कदापि प्रशंसनीय नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नेत्र-दोष के अनुसार सामुद्रिक फल कहता है — बायीं आँख के विकल होने पर स्वैरिणी, दायीं के विकल होने पर बन्ध्या; कबूतर-सी आँख वाली को दुःशील और हाथी-सी (छोटी) आँख वाली को अप्रशस्त बताता है। यहाँ स्मरण रहे कि ये प्राचीन सामुद्रिक-परम्परा के कठोर कथन हैं, जिन्हें आज व्यक्ति के मूल्यांकन या भय का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए — ये शास्त्र की अपनी वाणी मात्र हैं।

English rendering The text states: a defect of the left eye marks a wanton woman, of the right eye a barren one; the pigeon-eyed is of ill conduct, and the elephant-eyed is not at all commendable.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामुद्रिक)। कोई गणना नहीं; नेत्र-दोष → फल की सूची। अनुशासन-सूचना: ये कठोर, शारीरिक-दोष-आधारित निर्णय शास्त्र की ऐतिहासिक वाणी हैं — गणित (वर्ग/अष्टकवर्ग/बल) से भिन्न, ये व्याख्या-कोटि में आते हैं और इन्हें प्रमाणित भविष्यवाणी की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाता।

81.78
मृदुभिः पक्ष्मभिः कृष्णैर्घनैः सूक्ष्मैः सुभाग्ययुक् ।
विरलैः कपिलैः स्थूलैर्भामिनी दुखभागिनी
mṛdubhiḥ pakṣmabhiḥ kṛṣṇairghanaiḥ sūkṣmaiḥ subhāgyayuk |
viralaiḥ kapilaiḥ sthūlairbhāminī dukhabhāginī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृदुभिः = कोमल (पक्ष्मों से); पक्ष्मभिः = पलक-रोम / बरौनी; कृष्णैः = कृष्ण-वर्ण; घनैः = घने / सघन; सूक्ष्मैः = बारीक; सुभाग्ययुक् = सौभाग्य से युक्त; विरलैः = विरल / छितरे; कपिलैः = कपिल / भूरे-पीत; स्थूलैः = स्थूल / मोटे; भामिनी = नारी; दुःखभागिनी = दुःख की भागी

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्त्री-लक्षण में पलक-रोमों का वर्णन करता है। जो नारी कोमल, कृष्ण, घने और सूक्ष्म पक्ष्मों से युक्त हो, उसे शास्त्र सुभाग्य से युक्त कहता है। इसके विपरीत विरल, कपिल और स्थूल पक्ष्मों वाली नारी को दुःख की भागी बताया गया है। यह बाह्य लक्षणों का फल-कथन है, न कि नियति का दावा।

English rendering The text states that a woman with soft, black, dense, and fine eyelashes is marked as fortunate; with sparse, tawny, and thick eyelashes she is described as a sharer of sorrow. This is physiognomic phala-language of the śāstra, not a deterministic fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्त्री-अंग-लक्षण का फल-कथन। यहाँ गणना नहीं, केवल पक्ष्मों के गुणों का द्वि-पक्षीय लक्षण-फल है।

81.79
वर्तुलौ कार्मुकाकारौ स्निग्धे कृष्णे असंहते ।
सुभ्रुवौ मृदुरोमाणौ सुभ्रुवां सुखकीर्तिदौ
vartulau kārmukākārau snigdhe kṛṣṇe asaṃhate |
subhruvau mṛduromāṇau subhruvāṃ sukhakīrtidau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्तुलौ = गोलाई लिए हुए (द्विवचन — दोनों भौंहें, भ्रू स्त्रीलिङ्ग); कार्मुक-आकारौ = धनुष के आकार की (कार्मुक = धनुष); स्निग्धे = चिकनी-चमकीली; कृष्णे = काली; असंहते = परस्पर न मिली हुई (बीच में न जुड़ी — बिना 'एकभ्रू'); सु-भ्रुवौ = सुन्दर भौंहें; मृदु-रोमाणौ = कोमल रोमों वाली; सु-भ्रुवां = सुन्दर भौंहों वाली स्त्रियों के लिए; सुख-कीर्ति-दौ = सुख तथा यश देने वाली।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र भ्रू (भौंह) का लक्षण कहता है — जो दोनों भौंहें गोलाई लिए धनुष-सी वक्र, चिकनी, काली, बीच में परस्पर न जुड़ी हुई और कोमल रोमों वाली हों, वे सुन्दर भ्रू कहलाती हैं; ऐसी भौंहों वाली स्त्री के लिए शास्त्र इन्हें सुख और कीर्ति का सूचक बताता है। यह पूर्व श्लोक की पक्ष्म-चर्चा के बाद मुख के ऊर्ध्व-अवयव भ्रू का वर्णन है।

English rendering Eyebrows that are rounded and bow-shaped, glossy, black, unjoined (not meeting at the centre), and soft-haired are held to be fine brows; for a woman so endowed the text states they betoken happiness and renown.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सामुद्रिक लक्षण-फल (अंग-वर्णन). यहाँ कोई अंश/कला या वर्ग-विभाजन नहीं; एक दृश्य अवयव-गुण को शास्त्र सीधे एक कथित फल से जोड़ता है — यह होरा-गणित नहीं, समुद्रिक-लक्षण की शाखा है, अतः इसका फल "शास्त्र कहता है" के रूप में ग्राह्य है, नियति के रूप में नहीं।

81.80
कर्णौ दीर्घौ शुभावर्तौ सुतसौभाग्यदायकौ ।
शष्कुलीरहितौ निन्द्यौ शिरालौ कुटिलौ कृशौ
karṇau dīrghau śubhāvartau sutasaubhāgyadāyakau |
śaṣkulīrahitau nindyau śirālau kuṭilau kṛśau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्णौ = दोनों कान; दीर्घौ = लम्बे; शुभ-आवर्तौ = शुभ आवर्त (सुन्दर घुमाव/भँवर) वाले; सुत-सौभाग्य-दायकौ = पुत्र तथा सौभाग्य देने वाले; शष्कुली-रहितौ = कर्ण-शष्कुली (बाहरी कान की कुण्डलाकार पत्ती/कोख) से रहित; निन्द्यौ = निन्दनीय; शिरालौ = नसों-भरे; कुटिलौ = टेढ़े; कृशौ = दुबले-पतले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कर्ण-लक्षण कहता है — जो दोनों कान लम्बे और सुन्दर आवर्त (शुभ घुमाव) वाले हों, वे पुत्र और सौभाग्य के सूचक माने गए हैं; इसके विपरीत जो कान शष्कुली (कर्ण-कुण्डल) से रहित, नसों-भरे, टेढ़े अथवा दुबले हों, उन्हें शास्त्र निन्दनीय (अशुभ-सूचक) बताता है। यह शुभ-अशुभ का द्वन्द्व-वर्णन है, कोई विधान-आदेश नहीं।

English rendering Ears that are long and gracefully whorled are said to bring sons and good fortune; ears lacking the concha-curl, veiny, crooked, or lean are, the text holds, to be reckoned inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-फल (शुभ/अशुभ द्वन्द्व-वर्णन). शास्त्र यहाँ एक ही अवयव के अनुकूल और प्रतिकूल रूपों को जोड़े में रखकर फल कहता है; यह मापनीय गणना नहीं, गुण-आधारित समुद्रिक कथन है — फल को पाठ का दावा मानकर पढ़ें, भविष्य-निश्चय नहीं।

81.81
शिराविरहितो भालः निर्लोमाऽर्धशशिप्रभः ।
अनिम्नस्त्र्यङ्गुलस्त्रोणां सुतसौभाग्यसौख्यदः
śirāvirahito bhālaḥ nirlomā'rdhaśaśiprabhaḥ |
animnastryaṅgulastroṇāṃ sutasaubhāgyasaukhyadaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिराविरहितः = नसों (शिरा) के उभार से रहित; भालः = ललाट; निर्लोम = रोम-रहित; अर्धशशिप्रभः = अर्धचन्द्र-सदृश (आकार/कान्ति); अनिम्नः = धँसा हुआ नहीं; त्र्यङ्गुलः = तीन अङ्गुल (ऊँचा); स्त्रीणाम् = स्त्रियों का (ऐसा ललाट); सुतसौभाग्यसौख्यदः = पुत्र, सौभाग्य और सुख देने वाला।

हिन्दी भावार्थ अङ्ग-लक्षण अध्याय का पद — शास्त्र कहता है कि स्त्रियों का ललाट नसों के उभार से रहित, रोम-रहित, अर्धचन्द्र-सदृश, धँसा हुआ नहीं और तीन अङ्गुल (ऊँचा) हो तो वह पुत्र, सौभाग्य और सुख देने वाला कहा गया है। यह सामुद्रिक-लक्षण-परम्परा का कथन है; इसे पाठ की वर्णन-सूची की तरह पढ़ें।

English rendering A woman's forehead without prominent veins, hairless, shaped like the half-moon, not sunken and three aṅgulas high is said by the text to confer sons, good fortune and happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-वर्णन। मात्रक: अङ्गुल = अङ्गुलि-चौड़ाई का शास्त्रीय मान (लगभग 1.9 सेमी की परम्परागत तुलना; ग्रन्थ केवल "त्र्यङ्गुल" कहता है)।

81.82
स्पष्टस्वस्तिकचिह्नश्च भालो राज्यप्रदः स्त्रियाः ।
प्रलम्बो रोमशश्चैव प्रांशुश्च दुःखदः स्मृतः
spaṣṭasvastikacihnaśca bhālo rājyapradaḥ striyāḥ |
pralambo romaśaścaiva prāṃśuśca duḥkhadaḥ smṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्पष्ट-स्वस्तिक-चिह्नः = स्पष्ट स्वस्तिक-चिह्न वाला; भालः = ललाट/मस्तक; राज्य-प्रदः = राज्य (राज-पद/ऐश्वर्य) देने वाला; स्त्रियाः = स्त्री का; प्रलम्बः = अधिक झुका/लटका हुआ (अत्यधिक विस्तृत); रोमशः = रोमों वाला; प्रांशुः = अत्यन्त ऊँचा/उभरा हुआ; दुःख-दः = दुःख देने वाला; स्मृतः = कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र ललाट-लक्षण कहता है — जिस स्त्री के भाल पर स्पष्ट स्वस्तिक-चिह्न हो, वह ललाट राज्य/ऐश्वर्य का सूचक माना गया है; और जो ललाट अत्यधिक लम्बा-झुका, रोमश (रोंएदार) अथवा बहुत उभरा हुआ हो, उसे शास्त्र दुःख-सूचक कहता है। स्वस्तिक-चिह्न यहाँ ललाट पर स्वाभाविक रेखाओं के शुभ विन्यास की ओर संकेत है।

English rendering A forehead bearing a clear svastika mark is called, for a woman, bestower of sovereignty; one that is over-elongated, hairy, or unduly prominent is remembered as a giver of sorrow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-फल (चिह्न-आधारित). यह अष्टकवर्ग या रेखा-गणना नहीं; ललाट की प्राकृतिक रेखाओं में शुभ-आकृति (स्वस्तिक) की पहचान पर आधारित समुद्रिक कथन है — फल शास्त्र का दावा है, न कि प्रमाणित परिणाम।

81.83
उन्नतो गजकुम्भाभो वृत्तो मूर्धा शुभः स्त्रियाः ।
स्थूलो गीर्घोऽथवा वक्रो दुःखदौर्भाग्यसूचकः
unnato gajakumbhābho vṛtto mūrdhā śubhaḥ striyāḥ |
sthūlo gīrgho'thavā vakro duḥkhadaurbhāgyasūcakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उन्नतः = उठा हुआ/उभरा; गज-कुम्भ-आभः = हाथी के कुम्भ (मस्तक-गण्ड) जैसी आभा वाला; वृत्तः = गोल; मूर्धा = सिर/शिरोभाग (कपाल-शिखर); शुभः = शुभ; स्त्रियाः = स्त्री का; स्थूलः = मोटा/भारी; गीर्घः (=दीर्घः, पाठ-भेद संभव) = लम्बा; अथवा = या; वक्रः = टेढ़ा; दुःख-दौर्भाग्य-सूचकः = दुःख तथा दुर्भाग्य का सूचक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मूर्धा (सिर) का लक्षण कहता है — जो शिरोभाग उभरा हुआ, हाथी के कुम्भ-सी आभा लिए और गोल हो, वह स्त्री के लिए शुभ है; और जो अत्यन्त स्थूल, अतिदीर्घ अथवा वक्र (टेढ़ा) हो, उसे शास्त्र दुःख और दौर्भाग्य का सूचक बताता है। मूल में "गीर्घ" पाठ मिलता है जिसे प्रायः "दीर्घ" (लम्बा) माना जाता है — पाठ-भेद संभव।

English rendering A crown that is raised, rounded, and lustrous like an elephant's frontal globes is auspicious for a woman; thick, over-long, or crooked, it is said to signal sorrow and misfortune.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-फल (आकृति-उपमा-वर्णन). "गज-कुम्भ" जैसी उपमा गुण को चित्रित करने का काव्य-उपकरण है, माप का नहीं; यहाँ कोई कोण या परिमाण नहीं — शुभ/अशुभ का निर्णय आकृति-गुण पर, और फल पाठ के कथन-रूप में।

81.84
कुन्तलाः कोमलाः कृष्णाः सूक्ष्मा दीर्घश्च शोभना ।
पिङ्गलाः पुरुषा रूक्षा विरला लघवोऽशुभाः
kuntalāḥ komalāḥ kṛṣṇāḥ sūkṣmā dīrghaśca śobhanā |
piṅgalāḥ puruṣā rūkṣā viralā laghavo'śubhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुन्तलाः = सिर के केश; कोमलाः = मुलायम; कृष्णाः = काले; सूक्ष्माः = महीन/पतले; दीर्घाः = लम्बे; शोभनाः = शुभ/सुन्दर (मूल में "दीर्घश्च शोभना" — स्त्रीलिङ्ग-बहुवचन से व्याकरण-मेल शिथिल, पाठ-भेद संभव); पिङ्गलाः = भूरे/पीताभ; पुरुषाः = कठोर/रूखे (यहाँ 'पुरुष' = खुरदुरे); रूक्षाः = रूखे; विरलाः = विरल/छितरे; लघवः = छोटे/हल्के; अशुभाः = अशुभ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र केश-लक्षण कहता है — जो कुन्तल (केश) कोमल, काले, महीन और लम्बे हों, वे शुभ (शोभन) माने गए हैं; और जो केश पिङ्गल (भूरे), खुरदरे, रूखे, विरल अथवा छोटे हों, उन्हें शास्त्र अशुभ बताता है। यह सामान्य केश-गुण का शुभ-अशुभ द्वन्द्व है; अगले श्लोक में इसे वर्ण (रंग) के सापेक्ष परिष्कृत किया गया है।

English rendering Tresses that are soft, black, fine, and long are held to be beautiful; tawny, coarse, dry, sparse, or short hair is called inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — लक्षण-फल (केश-गुण द्वन्द्व). कोई गणना नहीं; केवल गुणों की अनुकूल/प्रतिकूल सूची जिसे शास्त्र फल से जोड़ता है — यह पाठ का कथन है, नियति-निर्णय नहीं।

81.85
पिङ्गला गौरवर्णाया श्यामायाः श्यामलाः शुभाः ।
नारीलक्षणतश्चैवं नराणामपि चिन्तयेत्
piṅgalā gauravarṇāyā śyāmāyāḥ śyāmalāḥ śubhāḥ |
nārīlakṣaṇataścaivaṃ narāṇāmapi cintayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पिङ्गला = ताम्र-पिंगल/रक्त-भूरा वर्ण-युक्ता (नारी/लक्षण); गौरवर्णायाः = गौरवर्णा (उज्ज्वल/श्वेत-गौर) स्त्री के सम्बन्ध में; श्यामायाः = श्यामा (कृष्ण/गहरे वर्ण वाली) स्त्री के; श्यामलाः = श्यामल (मध्यम-गहरे/श्याम-वर्ण) लक्षण; शुभाः = शास्त्रोक्त शुभ/अनुकूल; नारीलक्षणतः = नारी के लक्षणों के आधार पर; नराणाम् अपि = पुरुषों के विषय में भी; चिन्तयेत् = विचार करे / उसी रीति से निरूपण करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ वर्ण-सम्बन्धी नारी-लक्षण का संक्षेप देता है। गौरवर्णा स्त्री के पक्ष में पिङ्गल (ताम्र-पिंगल) लक्षण शुभ कहे गए हैं, और श्यामा स्त्री के पक्ष में श्यामल लक्षण शुभ माने गए हैं। फिर निर्देश है कि नारी-लक्षण की इसी पद्धति से पुरुषों के लक्षणों का भी विचार किया जाए — अर्थात् स्त्री-पक्ष में जो वर्ण-अनुकूलता बताई गई, उसी तर्क-क्रम को नर-लक्षण में भी लागू किया जाए। यह फल-कथन वर्ण-सौष्ठव/अनुकूल लक्षण का शास्त्रीय वर्गीकरण है, व्यक्तिगत भाग्य का निर्धारण नहीं।

English rendering The text states that for a fair-complexioned woman the piṅgala (tawny/reddish-brown) marks are auspicious, while for a dark (śyāmā) woman the śyāmala (dusky/darkish) marks are auspicious. It then directs that men’s characteristics be considered in the same manner, by the same method of women’s physiognomic marks.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / नारी-लक्षण (वर्ण-अनुकूलता)। यहाँ कोई अंश-विभाजन, बिन्दु-गणना, दशा-वर्ष या बल-इकाई नहीं; केवल वर्ण-युग्म (गौर ↔ पिङ्गल; श्यामा ↔ श्यामल) का शास्त्रोक्त शुभ-निर्देश और नर-पक्ष में समान विचार का आदेश है। पाठ-भेद संभव जहाँ “पिङ्गला/श्यामलाः” का ठीक-ठीक आश्रय (केश, नेत्र, त्वचा, या अन्य लक्षण) संस्करणानुसार भिन्न पढ़ा जाए।

अध्यायः 82

तिलादिलांछनफलाध्यायः

15 श्लोक
82.1
अथाऽहं देहजातानां लांछनानां फलं ब्रुवे ।
आवर्तानां तिलानां च मशकानां विशेषतः
athā'haṃ dehajātānāṃ lāṃchanānāṃ phalaṃ bruve |
āvartānāṃ tilānāṃ ca maśakānāṃ viśeṣataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (मङ्गल-आरम्भ); अहम् = मैं (पराशर); देहजातानाम् = शरीर पर उत्पन्न हुए; लांछनानाम् = चिह्नों/धब्बों का; फलम् ब्रुवे = फल कहता हूँ; आवर्तानाम् = रोम-आवर्त (बालों की भँवर/चक्करदार रचना) का; तिलानाम् = तिल (तिल-सदृश श्याम बिन्दु) का; मशकानाम् = मशक (छोटा तिल/मस्सा-सदृश बिन्दु) का; विशेषतः = विशेष रूप से।

हिन्दी भावार्थ अब पराशर एक नया प्रकरण आरम्भ करते हैं — शरीर पर स्वभावतः उत्पन्न लांछनों (चिह्नों) का फल। वे कहते हैं कि रोम की भँवरों (आवर्त), तिलों और मशकों — इन तीनों का फल विशेष रूप से यहाँ बताया जाएगा। यह अध्याय गणना का नहीं, सामुद्रिक-लक्षण (शरीर-चिह्न) का है, जिसे शास्त्र फल-कथन की भाँति प्रस्तुत करता है।

English rendering "Now I declare the results of marks arising on the body — of hair-whorls (āvarta), of moles (tila), and especially of small moles (maśaka)."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रकरण-प्रस्तावना (लक्षण-कथन का उपक्रम)। यहाँ कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु या दशा-गणना नहीं; तीन लक्षण-वर्ग — आवर्त, तिल, मशक — केवल परिभाषित होकर आगे के फल-कथन का आधार बनते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पूरा अध्याय हमारे "गणना बनाम व्याख्या को अलग रखने" वाले अनुशासन का शुद्ध उदाहरण है। अष्टकवर्ग, षोडश-वर्ग, विंशोत्तरी या षड्बल जैसे भाग जहाँ exact-`==` ऑरेकल से सत्यापित संख्याएँ देते हैं, वहाँ यह तिलादि-लांछन प्रकरण विशुद्ध फल-पक्ष है — इसमें एक भी सत्यापनीय संख्या नहीं। इसलिए हम इसके प्रत्येक कथन को "शास्त्र कहता है" के रूप में रखते हैं, किसी नियति या भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

82.2
अङ्गनानां च वामांगे दक्षिणाङ्गे नृणां शुभम् ।
रक्ताभं तिलकाभं वा लोम्नां चक्रमथापि वा
aṅganānāṃ ca vāmāṃge dakṣiṇāṅge nṛṇāṃ śubham |
raktābhaṃ tilakābhaṃ vā lomnāṃ cakramathāpi vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अङ्गनानां = स्त्रियों के; वामांगे = वाम / बाएँ अंग पर; दक्षिणाङ्गे = दक्षिण / दाएँ अंग पर; नृणां = पुरुषों के; शुभम् = शुभ; रक्ताभं = रक्त-वर्ण / लालिमा-युक्त; तिलकाभं = तिलक-सदृश; वा = अथवा; लोम्नां चक्रम् = रोम-आवर्त / केश-चक्र; अथवा = या फिर वैसा ही।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्रियों में वाम-अंग पर और पुरुषों में दक्षिण-अंग पर लांछन शुभ माना गया है। रक्त-आभ, तिलक-सदृश, अथवा रोम-चक्र जैसा चिह्न भी इसी क्रम में गिनाया गया है। दिशा-भेद (वाम/दक्षिण) यहाँ लिंग-विशिष्ट शुभता का नियम है। यह सामुद्रिक-फल की परंपरागत दिशा-व्याख्या है, न कि ज्योतिष-गणित।

English rendering The text states that marks on the left side are auspicious for women, and on the right side for men. Reddish, tilaka-like marks, or hair-whorls, are likewise included among the auspicious forms described.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / दिशा-नियम (वाम-स्त्री, दक्षिण-पुरुष)। कोई अंश-विभाजन या संख्यात्मक माप नहीं; केवल सामुद्रिक शुभ-दिशा का शास्त्र-कथन।

82.3
तिलादिलांछनं स्त्रीणां हृदि सौभाग्यसूचकम् ।
यस्या दक्षिणवक्षोजे रक्ते तिलकलांछने
tilādilāṃchanaṃ strīṇāṃ hṛdi saubhāgyasūcakam |
yasyā dakṣiṇavakṣoje rakte tilakalāṃchane

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिलादिलांछनं = तिल आदि चिह्न; स्त्रीणां = स्त्रियों के; हृदि = हृदय-प्रदेश पर; सौभाग्यसूचकम् = सौभाग्य का सूचक; यस्याः = जिस (स्त्री) के; दक्षिणवक्षोजे = दक्षिण-वक्ष / दाएँ स्तन पर; रक्ते = रक्त-वर्ण; तिलकलांछने = तिलक-रूप लांछन होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्री के हृदय पर तिल-आदि लांछन सौभाग्य का सूचक है। जो स्त्री दक्षिण-वक्ष पर रक्त-वर्ण तिलक-लांछन धारण करती है, उसका फल अगले पद से जुड़ता है। हृदय और दक्षिण-वक्ष — दो अलग स्थान; दोनों के फल अलग-अलग बताए गए हैं। पाठ-भेद संभव जहाँ “वक्षोज / स्तन” की शाखा-पाठ भिन्न हों।

English rendering The text states that a mole-like mark on a woman’s heart-region indicates good fortune. A red tilaka-mark on the right breast is introduced here as the condition whose result continues in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्थान-विशिष्ट लांछन-फल। हृदय-स्थान = सौभाग्य-सूचक; दक्षिण-वक्ष का पूर्ण फल पद ८२.४क में पूरा होता है।

82.4
सा सन्ततिततिं सूते सुखसौभाग्यसंयुताम् ।
रक्ताभं तिलकं यस्याः स्त्रिया वामे स्तने भवेत्
sā santatitatiṃ sūte sukhasaubhāgyasaṃyutām |
raktābhaṃ tilakaṃ yasyāḥ striyā vāme stane bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सा = वह (दक्षिण-वक्ष-तिलक-युक्त); सन्ततिततिं = सन्तान-परंपरा / संतति-पंक्ति; सूते = जन्म देती है; सुखसौभाग्यसंयुताम् = सुख-सौभाग्य-युक्त; रक्ताभं तिलकं = रक्त-आभ तिलक; यस्याः स्त्रियाः = जिस स्त्री के; वामे स्तने = वाम-स्तन पर; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि दक्षिण-वक्ष पर रक्त-तिलक वाली स्त्री सुख-सौभाग्य-युक्त संतति-परंपरा को जन्म देती है। इसके विपरीत, वाम-स्तन पर रक्त-आभ तिलक का उल्लेख अगले फल के लिए किया गया है। वाम और दक्षिण — दोनों स्तनों के फल भिन्न बताए गए हैं; एक ही “तिलक” शब्द दोनों स्थानों में है, पर फल-भेद स्पष्ट है।

English rendering The text states that she who bears a red tilaka-mark on the right breast brings forth a line of offspring joined with happiness and good fortune. A reddish tilaka on the left breast is then named as a separate case whose result follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्तन-स्थान-भेद। दक्षिण-स्तन → संतति-तति + सुख-सौभाग्य; वाम-स्तन → अगले पद का “एक सुत” फल।

82.5
एक एव सुतस्तस्या भवतीत विदो विदुः ।
पुत्रीपुत्रयुता ज्ञेया तिलके दक्षिणे स्तने
eka eva sutastasyā bhavatīta vido viduḥ |
putrīputrayutā jñeyā tilake dakṣiṇe stane

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एक एव = केवल एक ही; सुतः = पुत्र; तस्याः = उसका; भवति = होता है; इति = ऐसा; विदः / विदुः = जानने वाले / विद्वान्; पुत्रीपुत्रयुता = पुत्री-पुत्र-युक्त; ज्ञेया = जानी जाए; तिलके दक्षिणे स्तने = दक्षिण-स्तन पर तिलक होने पर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — विद्वान् जानते हैं कि वाम-स्तन-तिलक वाली स्त्री का एक ही पुत्र होता है। दक्षिण-स्तन पर तिलक होने पर उसे पुत्री-पुत्र-युक्त कहा गया है। ध्यान दें: पद ८२.३–४ में दक्षिण-वक्ष का फल “संतति-तति” था, यहाँ दक्षिण-स्तन पर “पुत्री-पुत्र-युता” — दोनों कथन एक ही दिशा में, पर शब्दावली भिन्न; पाठ-भेद या पुनरुक्ति-संभव। फल-कथन शास्त्र के हैं, न कि नियति-घोषणा।

English rendering The knowers, the text states, hold that she with the left-breast tilaka has only one son. She with a tilaka on the right breast is to be known as having both daughters and sons. The right-breast result overlaps thematically with 82.3–4; recensional nuance is possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / संतति-संख्या-सूचना। “एक एव” = शास्त्र-कथित एक-पुत्र फल (वाम); “पुत्रीपुत्रयुता” = दक्षिण-स्तन का मिश्र-संतति फल — दोनों वर्णनात्मक, कोई गणना-सूत्र नहीं।

82.6
भ्रुवोर्मध्ये ललाटे वा लांछनं राजसूचकम् ।
कपोले मशको रक्तो नित्यं मिष्ठान्नदायकं
bhruvormadhye lalāṭe vā lāṃchanaṃ rājasūcakam |
kapole maśako rakto nityaṃ miṣṭhānnadāyakaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रुवोः मध्ये = दोनों भ्रू के बीच / भ्रूमध्य; ललाटे = ललाट पर; वा = अथवा; लांछनं = चिह्न; राजसूचकम् = राज-पद / राज-योग का सूचक; कपोले = कपोल / गाल पर; मशको रक्तो = रक्त-वर्ण मशक; नित्यं = सदा; मिष्ठान्नदायकं = मिष्टान्न / स्वादिष्ट अन्न देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भ्रूमध्य या ललाट पर लांछन राज-सूचक है। कपोल पर रक्त-मशक को नित्य मिष्टान्न-दायक कहा गया है। ऊपर के अंग (ललाट/भ्रूमध्य) और कपोल — दोनों के फल अलग: एक प्रतिष्ठा-सूचक, दूसरा भोग-सूचक। यह सामुद्रिक-फल की स्थान-सूची है; कोई ग्रह-बल या वर्ग-गणित नहीं।

English rendering The text states that a mark between the brows or on the forehead indicates royal status. A red maśaka on the cheek is said always to confer sweet food / delicacies. Facial locus differentiates the two results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / मुख-स्थान-फल। भ्रूमध्य-ललाट → राज-सूचक; रक्त-मशक-कपोल → मिष्टान्न-दायक — दोनों शास्त्र-वर्णन।

82.7
भगस्य दक्षिणे भागे लांछनं यदि योषितः ।
सा हि पृथ्वीपतेः पत्नी सूते वा भूपतिं सुतम्
bhagasya dakṣiṇe bhāge lāṃchanaṃ yadi yoṣitaḥ |
sā hi pṛthvīpateḥ patnī sūte vā bhūpatiṃ sutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगस्य = भग-प्रदेश / गुह्यांग-क्षेत्र (सामुद्रिक पारिभाषिक); दक्षिणे भागे = दक्षिण भाग पर; लांछनं = चिह्न; यदि = यदि; योषितः = स्त्री का; सा हि = वह अवश्य; पृथ्वीपतेः पत्नी = पृथ्वीपति / राजा की पत्नी; सूते वा = अथवा जन्म देती है; भूपतिं सुतम् = भूपति-पुत्र को।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्री के भग-प्रदेश के दक्षिण भाग पर लांछन हो तो वह पृथ्वीपति की पत्नी होती है, अथवा भूपति-पुत्र को जन्म देती है। “पत्नी / सूते वा” — दो वैकल्पिक फल एक ही चिह्न से जुड़े हैं। यह गुह्य-स्थान का शास्त्रीय सामुद्रिक-फल है; चिकित्सा, नैतिक दबाव, या नियति-घोषणा नहीं। पाठ-भेद संभव जहाँ “भग” या दिशा-पाठ की शाखाएँ भिन्न हों।

English rendering The text states that if a woman bears a mark on the right side of the pudendal region, she becomes a king’s consort, or else bears a royal son. The verse presents two alternative outcomes for one locus; both are śāstra-claims, not endorsed predictions.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्थान-विशिष्ट राज-फल। दक्षिण-भाग + स्त्री-लांछन → पत्नी-रूप या भूपति-पुत्र — वर्णनात्मक द्वैध-फल; कोई अंश, दशा या बल-मात्रा नहीं।

82.8
नासाग्रे लाञ्छने रक्तं राजपत्न्याः प्रजायते ।
कृष्णवर्णं तु यस्याः सा पुंश्चलि विधवाऽथ वा
nāsāgre lāñchane raktaṃ rājapatnyāḥ prajāyate |
kṛṣṇavarṇaṃ tu yasyāḥ sā puṃścali vidhavā'tha vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नासाग्रे = नाक की नोक पर; लाञ्छने रक्तम् = लाल चिह्न; राजपत्न्याः प्रजायते = राजपत्नी होने का (योग) उत्पन्न होता है; कृष्णवर्णम् तु = किन्तु काले वर्ण का; यस्याः = जिसके; सा = वह; पुंश्चली = (शास्त्र-शब्द) व्यभिचारिणी; विधवा अथ वा = अथवा विधवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — नाक की नोक पर लाल चिह्न वाली स्त्री राजपत्नी होती है; किन्तु जिसके वहाँ काले वर्ण का चिह्न हो, उसे शास्त्र "पुंश्चली" या "विधवा" कहता है। ये "पुंश्चली/विधवा" शब्द शास्त्र के अपने सामाजिक विशेषण हैं — किसी वास्तविक व्यक्ति पर लगाया गया निर्णय या भविष्यवाणी नहीं।

English rendering A red mark on the nose-tip, the text states, marks a king's wife; but one of black hue it calls (in its own idiom) a wanton woman or a widow.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वर्ण-भेद से शुभाशुभ)। एकमात्र भेदक-चर यहाँ वर्ण है — रक्त बनाम कृष्ण; यह संख्या नहीं, गुण-भेद है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह स्थल है जहाँ हमारा अनुशासन कठोरता से लागू होता है — गणित को व्याख्या से पृथक रखना। "पुंश्चली/विधवा" जैसे कठोर सामाजिक कथन शास्त्र के दावे हैं; हम इन्हें न भय के रूप में, न नियति के रूप में, और न किसी जीवित व्यक्ति की भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत करते हैं — केवल "शास्त्र कहता है" के रूप में उद्धृत करते हैं।

82.9
नाभेरधो नृणां स्त्रीणां लाञ्छनं च शुभप्रदम् ।
कर्णे गण्डे करे वाऽपि कण्ठे वाऽप्यथ लाञ्छनं
nābheradho nṛṇāṃ strīṇāṃ lāñchanaṃ ca śubhapradam |
karṇe gaṇḍe kare vā'pi kaṇṭhe vā'pyatha lāñchanaṃ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाभेः अधः = नाभि के नीचे; नृणां स्त्रीणां = पुरुषों और स्त्रियों के; लाञ्छनं = तिल/चिह्न; शुभप्रदम् = शुभ फल देने वाला; कर्णे = कान में; गण्डे = गाल/कपोल पर; करे = हाथ में; कण्ठे = गले में; वाऽपि = अथवा भी; लाञ्छनं = चिह्न

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नाभि के नीचे का लाञ्छन पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए शुभप्रद है। इसी क्रम में कान, गाल, हाथ अथवा कण्ठ पर स्थित लाञ्छन का उल्लेख आगे के फल से जुड़ा है। यह स्थान-सूची अगले श्लोक के पुत्र-सुख-सौभाग्य फल से जुड़ती है।

English rendering The text states that a mark below the navel is auspicious for both men and women; it then lists marks on the ear, cheek, hand, or throat, whose fruits continue in the next verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शरीर-स्थान सूची)। नाभि-अधः को सामान्य शुभ, और कर्ण-गण्ड-कर-कण्ठ को अगले श्लोक के विशेष फल से जोड़ने वाली स्थान-तालिका है।

82.10
प्राग्गर्भे पुत्रदं ज्ञेयं सुखसौभाग्यदं तथा ।
तिलादि लाञ्छनं विप्र गुल्फगेशे च दुःखदम्
prāggarbhe putradaṃ jñeyaṃ sukhasaubhāgyadaṃ tathā |
tilādi lāñchanaṃ vipra gulphageśe ca duḥkhadam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राग्गर्भे = उदर के अग्र-भाग पर; पुत्रदम् = पुत्र-प्रदायक; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; सुख-सौभाग्यदम् तथा = तथा सुख-सौभाग्य देने वाला; तिलादि लाञ्छनम् = तिल आदि चिह्न; विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय-सम्बोधन); गुल्फ-देशे च = तथा गुल्फ (टखने) के प्रदेश पर ("गुल्फगेशे" — पाठ-भेद संभव, सम्भवतः "गुल्फदेशे"); दुःखदम् = दुःख देने वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उदर के अग्रभाग पर तिलादि चिह्न पुत्र-प्रद तथा सुख-सौभाग्य-प्रद जानना चाहिए; किन्तु हे ब्राह्मण, वही चिह्न टखने के प्रदेश पर हो तो दुःखद कहा गया है। एक ही प्रकार का चिह्न स्थान-भेद से विपरीत फल देता है — यही इस प्रकरण की धुरी है।

English rendering On the front of the belly such a mark, O Brāhmaṇa, is to be known as son-giving and bringing happiness and fortune; but on the ankle-region it is called sorrow-giving.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्थान-सापेक्ष शुभाशुभ)। "गुल्फगेशे" पाठ में असंगत जान पड़ता है — संभवतः "गुल्फदेशे" (टखने का प्रदेश); पाठ-भेद संभव। कोई संख्यात्मक नियम नहीं, केवल स्थान-आधारित फल-विपर्यय।

82.11
त्रिशूलाकृति चिह्न च ललाटे यदि जायते ।
नारी राजप्रिया ज्ञेया भूपतिश्च नरो भवेत्
triśūlākṛti cihna ca lalāṭe yadi jāyate |
nārī rājapriyā jñeyā bhūpatiśca naro bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिशूलाकृति = त्रिशूल की आकृति वाला; चिह्न = चिह्न/लाञ्छन; ललाटे = माथे पर; यदि जायते = यदि उत्पन्न हो; नारी = स्त्री; राजप्रिया = राजा की प्रिया; ज्ञेया = जानी जाए; भूपतिः = भूमि-स्वामी/राजा; नरः = पुरुष; भवेत् = होता है

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि ललाट पर त्रिशूल-आकृति का चिह्न उत्पन्न हो, तो स्त्री को राजप्रिया जानना चाहिए। उसी चिह्न वाले पुरुष को शास्त्र भूपति कहता है। आकृति (त्रिशूल) और स्थान (ललाट) दोनों यहाँ फल के निर्णायक हैं।

English rendering The text states that if a trident-shaped mark appears on the forehead, a woman is to be known as beloved of a king, and a man becomes a lord of the earth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आकृति+स्थान)। त्रिशूलाकृति × ललाट → स्त्री: राजप्रिया / पुरुष: भूपति—यह सामुद्रिक आकृति-फल है, कोई अंश-विभाजन नहीं।

82.12
लोम्नां प्रदक्षिणावर्तो हृदि नाभौ करे श्रुतौ ।
दक्षपृष्ठे शुभो वस्तौ वामावर्तोऽशुभप्रदः
lomnāṃ pradakṣiṇāvarto hṛdi nābhau kare śrutau |
dakṣapṛṣṭhe śubho vastau vāmāvarto'śubhapradaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लोम्नां = रोमों/केश-आवर्त का; प्रदक्षिणावर्तः = दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में घुमाव); हृदि = हृदय पर; नाभौ = नाभि पर; करे = हाथ पर; श्रुतौ = कान/श्रुति-स्थान पर; दक्षपृष्ठे = दक्षिण पृष्ठ पर; वस्तौ = गुह्य/वस्ति प्रदेश पर; शुभः = शुभ; वामावर्तः = वामावर्त (विपरीत घुमाव); अशुभप्रदः = अशुभ देने वाला

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि हृदय, नाभि, हाथ, कान, दक्षिण पृष्ठ और वस्ति पर रोमों का प्रदक्षिणावर्त शुभ है। इन्हीं स्थानों पर वामावर्त अशुभप्रद कहा गया है। दिशा (दक्षिण/वाम) ही यहाँ शुभ-अशुभ का निर्णायक मापदंड है।

English rendering The text states that a clockwise hair-whorl on the heart, navel, hand, ear, right back, or genital region is auspicious; a counterclockwise whorl there is said to give inauspicious results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आवर्त-दिशा नियम)। प्रदक्षिण = शुभ, वाम = अशुभ—यह द्वि-दिशा नियम है; कोई कोण/अंश-गणना नहीं, केवल दक्षिणावर्त/वामावर्त की पहचान।

82.13
कट्यां गुह्येऽथवाऽवर्तो स्त्रीणां दौर्भाग्यसूचकः ।
उदरे हन्ति भर्तारं मध्यपृष्ठे च पुंश्चली
kaṭyāṃ guhye'thavā'varto strīṇāṃ daurbhāgyasūcakaḥ |
udare hanti bhartāraṃ madhyapṛṣṭhe ca puṃścalī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कट्याम् = कमर/कटि पर; गुह्ये अथवा = अथवा गुह्य-प्रदेश (गुप्तांग) पर; आवर्तः = भँवर; स्त्रीणाम् = स्त्रियों के लिए; दौर्भाग्य-सूचकः = दुर्भाग्य (सौभाग्य-हानि) का सूचक; उदरे = उदर पर; हन्ति भर्तारम् = "पति का नाश करता है" (शास्त्र-वचन → वैधव्य-सूचक); मध्यपृष्ठे च = और पीठ के मध्य-भाग पर; पुंश्चली = (शास्त्र-शब्द) व्यभिचारिणी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्त्रियों के लिए कटि या गुह्य-प्रदेश पर आवर्त दुर्भाग्य-सूचक है; उदर पर आवर्त को शास्त्र "भर्तृ-नाशक" (वैधव्य-सूचक) कहता है, और मध्य-पृष्ठ पर आवर्त को "पुंश्चली" का सूचक। ये शास्त्र के अत्यन्त कठोर फल-वचन हैं।

English rendering A whorl on the waist or private parts of a woman, the text states, portends misfortune; on the belly it is said to "slay the husband" (i.e., betoken widowhood), and on the mid-back to mark a wanton woman.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (आवर्त-स्थान से अशुभ)। भेदक-चर पुनः केवल स्थान है (कटि/गुह्य/उदर/मध्य-पृष्ठ); कोई गणनीय राशि नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "हन्ति भर्तारम्" जैसा वचन ठीक वह स्थल है जहाँ हमारा मूल अनुशासन अनिवार्य हो जाता है — फल-कथन को नियति नहीं, शास्त्र का दावा मानना। जहाँ अष्टकवर्ग-बिन्दु या विंशोत्तरी-वर्ष exact-`==` से सिद्ध होते हैं, वहाँ ये सामुद्रिक-वचन किसी सत्यापन-योग्य आधार पर खड़े नहीं; अतः इन्हें भय, दबाव या किसी जीवित स्त्री-पुरुष के विषय में भविष्यवाणी के रूप में कभी प्रस्तुत नहीं किया जाता — केवल मूल-पाठ की वाणी के रूप में उद्धृत किया जाता है।

82.14
कण्ठे ललाटे सीमन्ते मध्यभागे च मूर्धनि ।
आवर्तो न शुभः स्त्रीणां पुसां वाऽपि द्विजोत्तम
kaṇṭhe lalāṭe sīmante madhyabhāge ca mūrdhani |
āvarto na śubhaḥ strīṇāṃ pusāṃ vā'pi dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कण्ठे = गले पर; ललाटे = भाल/माथे पर; सीमन्ते = माँग (केश-विभाजन-रेखा) पर; मध्यभागे = शिर के मध्य भाग पर; मूर्धनि = मूर्धा — शिर के शिखर/चोटी-स्थान पर; आवर्तः = रोम-आवर्त, बालों का भँवर/चक्र (hair-whorl); न शुभः = अशुभ; स्त्रीणां … पुंसां (पाठ: "पुसां") वा = स्त्री तथा पुरुष — दोनों के लिए; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ (श्रोता-सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोकों में आरम्भ हुआ रोम-आवर्त (बालों के भँवर) का प्रसंग यहाँ आगे बढ़ता है। शास्त्र कहता है — गले, माथे, माँग, शिर के मध्य भाग तथा मूर्धा (चोटी) पर पड़ने वाला आवर्त स्त्री और पुरुष दोनों के लिए शुभ नहीं माना जाता। यह कथन शरीर-चिह्नों (सामुद्रिक-लक्षण) की परम्परा का है, किसी ग्रह-गणित का नहीं।

English rendering A hair-whorl (āvarta) appearing on the throat, the forehead, the hair-parting, the middle of the head, or its very crown is held to be inauspicious — for women and for men alike, O best of the twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (सामुद्रिक शरीर-लक्षण)। यह श्लोक केवल स्थान-सूची देता है, कोई राशि/अंश/बिन्दु-गणना नहीं; आवर्त की "शुभ/अशुभ" संज्ञा शास्त्र का लक्षण-कथन है, ज्योतिषीय संगणना का निष्कर्ष नहीं — इसे भविष्य-कथन नहीं, "शास्त्र ऐसा कहता है" रूप में ही ग्रहण करें।

82.15
सुलक्षणा सुचरिता अपि मन्दायुषं पतिम् ।
दीर्घायुषं प्रकुर्वन्ति प्रमदाश्च मुदास्पदम्
sulakṣaṇā sucaritā api mandāyuṣaṃ patim |
dīrghāyuṣaṃ prakurvanti pramadāśca mudāspadam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुलक्षणा (सुलक्षणाः) = शुभ शरीर-लक्षणों वाली; सुचरिता (सुचरिताः) = सदाचारिणी, उत्तम चरित्र वाली; अपि = भी; मन्दायुषम् = मन्द + आयुस् — अल्पायु (पति); पतिम् = पति को; दीर्घायुषम् = दीर्घ आयु वाला; प्रकुर्वन्ति = बना देती हैं (क्रिया, बहुवचन); प्रमदाः (प्रमदाश्च = प्रमदाः + च) = नारियाँ, स्त्रियाँ; मुदास्पदम् = मुद् (हर्ष) + आस्पद (स्थान) — आनन्द का धाम। पाठ-भेद संभव — "सुलक्षणा/सुचरिता" का वचन (एक- या बहुवचन) पाठान्तर में भिन्न।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अध्याय के शुभ-पक्ष का उपसंहार-सा है। शास्त्र कहता है — जो नारियाँ शुभ लक्षणों तथा सदाचरण से युक्त होती हैं, वे अल्पायु पति को भी दीर्घायु और आनन्द का धाम बना देती हैं। अर्थात् उत्तम लक्षण केवल शरीर-शोभा नहीं; सत्-चरित्र के साथ मिलकर वे सौभाग्य के हेतु कहे गए हैं।

English rendering Women endowed with auspicious marks and upright conduct make even a short-lived husband long-lived and an abode of joy — so the text declares.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लक्षण-प्रशस्ति)। यहाँ "मन्दायुष" और "दीर्घायुष" आयु-शब्द अवश्य हैं, पर कोई आयुर्दाय-गणना नहीं दी गई; शास्त्र आयु का अंक-निर्धारण अन्यत्र (आयुर्दाय, अध्याय 43–44) करता है, जबकि यह श्लोक आयु को फल-रूप में कहता है, संगणना-रूप में नहीं — इसे शास्त्र का कथन मानें, कोई सुनिश्चित भविष्यवाणी नहीं।

अध्यायः 83

पूर्वजन्मशापद्योतनाध्यायः

111 श्लोक

सूचना · Note. इस अध्याय के प्रायश्चित्त (जैसे 83.79 का चान्द्रायण और कृच्छ्र) ग्रन्थ के ऐतिहासिक कथन हैं, आचरण-निर्देश नहीं। उपवास सबके लिए सुरक्षित नहीं — मधुमेह (विशेषकर इंसुलिन या शुगर की दवा), गर्भावस्था या स्तनपान, गुर्दे/हृदय-रोग, खाने-सम्बन्धी विकार, बच्चे और बुज़ुर्ग: किसी भी उपवास, विशेषकर निर्जल व्रत, से पहले चिकित्सक से पूछें; चिकित्सक की सहमति के बिना पानी या दवा न छोड़ें। · The penances in this chapter (such as the cāndrāyaṇa and kṛcchra of 83.79) are historical statements of the text, not instructions. Fasting is not safe for everyone: with diabetes (especially on insulin or sugar-lowering tablets), in pregnancy or breastfeeding, with kidney or heart disease or an eating disorder, and for children and the elderly, ask your doctor before any fast, especially a waterless (nirjala) one. Do not stop water or prescribed medicine without your doctor's agreement.

83.1
महर्षे भवता प्रोक्तं फलं स्त्रीणां नृणां पृथक् ।
अधुना श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो वेदविदांवर
maharṣe bhavatā proktaṃ phalaṃ strīṇāṃ nṛṇāṃ pṛthak |
adhunā śrotumicchāmi tvatto vedavidāṃvara

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महर्षे = हे महर्षि (पराशर को संबोधन); भवता प्रोक्तम् = आपके द्वारा कहा गया; फलम् = फल-कथन; स्त्रीणां नृणां पृथक् = स्त्रियों और पुरुषों का अलग-अलग; अधुना श्रोतुम् इच्छामि = अब सुनना चाहता हूँ; त्वत्तः = आपसे; वेदविदां वर = हे वेदज्ञों में श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शिष्य (मैत्रेय) पराशर से कहते हैं — हे महर्षि, आपने स्त्री और पुरुष का फल पहले अलग-अलग बतला दिया है; अब हे वेदविदों में श्रेष्ठ, मैं आपसे (आगे का विषय) सुनना चाहता हूँ। यह श्लोक सन्तान/अपुत्रता-अध्याय का आरम्भ-प्रश्न है।

English rendering "O great sage, you have declared the results for women and for men separately; now, O best among the knowers of the Veda, I wish to hear (further) from you."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रश्न (अध्याय-आरम्भ)। यह श्लोक पूर्ववर्ती भाव-फल प्रकरणों की ओर संकेत करता है, जहाँ स्त्री-पुरुष का फल पृथक् दिया गया था, और सन्तान-विचार की भूमिका बाँधता है।

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83.2
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति शास्त्रेषु श्रूयते मुने ।
अपुत्रः केन पापेन भवतीति वद प्रभो
aputrasya gatirnāsti śāstreṣu śrūyate mune |
aputraḥ kena pāpena bhavatīti vada prabho

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपुत्रस्य = पुत्रहीन की; गतिः नास्ति = (परलोक-)गति नहीं है; शास्त्रेषु श्रूयते = शास्त्रों में सुना जाता है; मुने = हे मुनि; केन पापेन = किस पाप से; अपुत्रः भवति = पुत्रहीन होता है; वद प्रभो = कहिए, हे प्रभु।

हिन्दी भावार्थ शास्त्रों में सुना जाता है, हे मुनि, कि पुत्रहीन की सद्गति नहीं होती। तो मनुष्य किस पाप के कारण पुत्रहीन होता है — यह मुझे बताइए, हे प्रभु। यहाँ प्रश्नकर्ता स्मृति-वचन "अपुत्रस्य गतिर्नास्ति" उद्धृत करता है।

English rendering "It is heard in the śāstras, O sage, that there is no (higher) course for the sonless; by what sin does a man become sonless? Tell me, O Lord."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न (धर्मशास्त्र-उद्धरण)। "अपुत्रस्य गतिर्नास्ति" यहाँ प्रश्नकर्ता द्वारा उद्धृत स्मृति-मान्यता है, कोई गणना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक ठीक उस अनुशासन को माँगता है जिसे हमने अपने डिकोड में केन्द्र रखा — फल/मान्यता-वचन को "शास्त्र यह कहता है" रूप में प्रस्तुत करना, भय या नियति के रूप में नहीं। "गति नहीं" एक स्मृति-कथन है, हमारे द्वारा समर्थित भविष्यवाणी नहीं; गणित और तात्पर्य को हम अलग रखते हैं।

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83.3
जन्मलग्नाच्च तज्ज्ञानं कथं दैवविदां भवेत् ।
अपुत्रस्य सुतप्राप्तेरुपायं कृपयोच्यताम्
janmalagnācca tajjñānaṃ kathaṃ daivavidāṃ bhavet |
aputrasya sutaprāpterupāyaṃ kṛpayocyatām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मलग्नात् = जन्म-लग्न से; च = और; तत्-ज्ञानं = उस (अपुत्रता) का ज्ञान; कथं = कैसे; दैवविदां = दैव/ज्योतिष-विदों को; भवेत् = हो; अपुत्रस्य = पुत्रहीन का; सुत-प्राप्तेः = पुत्र-प्राप्ति का; उपायं = उपाय / साधन; कृपया = कृपापूर्वक; उच्यताम् = कहा जाए

हिन्दी भावार्थ शिष्य दो बातें एक साथ माँगता है: (१) जन्मलग्न से अपुत्रता कैसे जानी जाए—यानी दैवविद् के लिए लग्न-आधारित निदान; (२) अपुत्र के लिए सुत-प्राप्ति का उपाय कृपा से कहा जाए। यहाँ “लग्न” तकनीकी धुरी है; उपाय-भाग शास्त्रीय फल/रक्षण-कथन की परंपरा में आता है, दबाव या भय-वाणी के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

English rendering “How may those skilled in destiny know that from the birth lagna? And kindly state a means by which one without a son may obtain a son.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / विधि-प्रश्न। प्रश्न दो स्तरीय है: लग्न-से-ज्ञान (निदान) और उपाय (शास्त्र-कथित रक्षण/समाधान)। सूत्र अगले उत्तर-क्रम में आते हैं।

83.4
साधु पृष्टं त्वया विप्र कथ्यते हि तथा मया ।
यथोमया हि पृष्टेन शिवेन कथितं पुरा
sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vipra kathyate hi tathā mayā |
yathomayā hi pṛṣṭena śivena kathitaṃ purā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु = अच्छा / उचित; पृष्टं = पूछा गया; त्वया = आपके द्वारा; विप्र = हे ब्राह्मण; कथ्यते = कहा जाता है; हि = निश्चय; तथा = उसी प्रकार; मया = मेरे द्वारा; यथा = जैसे; उमया = उमा द्वारा; हि = ही; पृष्टेन = पूछे गए; शिवेन = शिव द्वारा; कथितं = कहा गया; पुरा = प्राचीन काल में

हिन्दी भावार्थ पाराशर शिष्य की प्रशंसा करते हुए उत्तर का ढाँचा बताते हैं: वे वही कहेंगे जो कभी उमा के पूछने पर शिव ने कहा था। यह अध्याय “शिव–उमा संवाद” की परंपरा में स्थापित हो जाता है; अपत्य-नाश योग और रक्षण आगे उसी आख्यान-रेखा से निकलेंगे। पाठ-भेद संभव जहाँ संवाद-नामों के पाठांतर हों।

English rendering “Well have you asked, O brahmin; I shall indeed speak accordingly—as of old Śiva spoke when asked by Umā.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / आख्यान-फ्रेम। तकनीक यहाँ नहीं; प्रमाण-शृंखला “उमा–शिव → पाराशर → शिष्य” है।

83.5
केन योगेन पापेन ज्ञायतेऽपत्यनाशनम् ।
तेषां च रक्षणोपायं कृपया नाथ मे वद
kena yogena pāpena jñāyate'patyanāśanam |
teṣāṃ ca rakṣaṇopāyaṃ kṛpayā nātha me vada

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) केन योगेन = किस योग से; पापेन = (किस) पाप से; ज्ञायते = जाना जाता है; अपत्य-नाशनम् = संतान का नाश / संतान-हानि; तेषां = उनका (उन योगों/पापों का); च = और; रक्षण-उपायं = रक्षा का उपाय; कृपया = कृपा से; नाथ = हे स्वामी; मे = मुझे; वद = कहिए

हिन्दी भावार्थ यह उमा का प्रश्न है (श्लोक ८३.४ के फ्रेम के भीतर): किन योगों और किन पापों से अपत्य-नाश जाना जाता है, और उनकी रक्षा का उपाय क्या है? दो पटल—योग-ज्ञान (ज्योतिषीय संकेत) और रक्षण-उपाय (शास्त्र-कथित साधन)—एक साथ माँगे गए हैं। “नाशन” शास्त्र-शब्द है; हम इसे भय-वाणी या निश्चित विपत्ति नहीं बनाते।

English rendering “By what yoga and by what demerit is the destruction of offspring known? And the means of protecting them—kindly tell me, O lord.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / विषय-सूची। आगे योग-सूची + रक्षण-सूत्र आएंगे; यहाँ केवल प्रश्न की संरचना है।

83.6
साधु पृष्टं त्वया देवि कथयामि तवाऽधुना ।
सन्तानहानियोगांश्च तद्रक्षोपायसंयुतान्
sādhu pṛṣṭaṃ tvayā devi kathayāmi tavā'dhunā |
santānahāniyogāṃśca tadrakṣopāyasaṃyutān

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) साधु = अच्छा; पृष्टं = पूछा; त्वया = आपके द्वारा; देवि = हे देवी; कथयामि = कहता हूँ; तव = आपके लिए; अधुना = अब; सन्तान-हानि-योगान् = संतान-हानि के योगों को; च = और; तत्-रक्ष-उपाय-संयुतान् = उनके रक्षा-उपायों से युक्त

हिन्दी भावार्थ शिव उमा से कहते हैं—अच्छा पूछा; अब मैं संतान-हानि के योग बताऊँगा, और उनके साथ रक्षा के उपाय भी। अध्याय का शेष भाग इसी द्वि-सूची पर चलेगा: (अ) हानि-योग, (ब) रक्षोपाय। फल-कथन शास्त्र की आवाज़ में रहेंगे; हम उन्हें भाग्य की अंतिम मुहर नहीं मानते।

English rendering “Well have you asked, O goddess; I shall now tell you the yogas of loss of progeny, together with the means of protecting against them.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / अध्याय-प्रतिज्ञा। “योग + रक्षोपाय” की जोड़ी अगले श्लोक से गणितीय/तकनीकी शर्तों में उतरती है।

83.7
गुरुलग्नेश दारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च ।
सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता
gurulagneśa dāreśaputrasthānādhipeṣu ca |
sarveṣu balahīneṣu vaktavyā tvanapatyatā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरु = बृहस्पति (जीव); लग्नेश = लग्न-स्वामी; दारेश = दार/सप्तम-भावेश; पुत्रस्थान-अधिपेषु = पुत्र-स्थान (पंचम) के अधिपतियों में; च = और; सर्वेषु = सब में; बल-हीनेषु = बल से हीन होने पर; वक्तव्या = कही जानी चाहिए; तु = तो; अनपत्यता = अपत्य-शून्यता / संतान-हीनता

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब गुरु, लग्नेश, दारेश और पुत्रस्थानाधिप—ये सब बलहीन हों, तब अनपत्यता कही जाए। यह पहला स्पष्ट योग-सूत्र है: बहु-कारक कमजोरी (सर्वेषु बलहीनेषु), एक ग्रह-मात्र नहीं। “बल” यहाँ शक्ति-माप है; फल-कथन शास्त्र का दावा है, हमारी भविष्य-घोषणा नहीं।

English rendering “When Jupiter, the lagna-lord, the seventh-lord, and the lord(s) of the putra-sthāna are all weak in strength, childlessness is to be declared.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) तार्किक शर्त (boolean conjunction), न कि अंक-सूत्र:

अनपत्यता_कथ्य = (B(Guru) दुर्बल) ∧ (B(Lagneśa) दुर्बल) ∧ (B(Dāreśa) दुर्बल) ∧ (B(Putreśa) दुर्बल)

जहाँ B(g) = ग्रह g का बल (षड्बल / स्थान-बल आदि परंपरा-अनुसार)। “बलहीन” की संख्यात्मक दहलीज इस श्लोक में नहीं दी; षड्बल (अध्याय २७) में बल रूप/विरूप में मापा जाता है (१ रूप = ६० विरूप) और ग्रह-वार न्यूनतम से तुलना की जाती है। सम्मिलित ग्रह: गुरु + लग्नेश + सप्तमेश + पंचमेश—चारों “सर्वे” में आते हैं; एक भी सबल हो तो यह विशेष योग शर्त पूरी नहीं होती। पाठ-भेद संभव: कहीं “गुरुलग्नेश” को संयुक्त पद या सूची-पाठ में भिन्न विराम से पढ़ा जाता है।

उदाहरण (worked example) मान लें (सायन नहीं—निर्वाण अयनांश घोषित करें, उदा. लाहिरी; भाव-पद्धति: पूर्ण राशि भाव या श्रीपति—यहाँ उदाहरण के लिए पूर्ण राशि): लग्न = कन्या → लग्नेश = बुध; दारेश (७) = मीन → गुरु; पुत्रस्थान (५) = मकर → शनि; गुरु स्वयं भी सूची में। जातक में षड्बल (रूप में): गुरु ३.२, बुध ४.१, शनि २.८—मान लीजिए परंपरागत न्यूनतम (उदा. गुरु ≈ ६.५ रूप, बुध ≈ ७, शनि ≈ ५—ये सीमाएँ अन्य अध्याय/परंपरा से; इस श्लोक में नहीं) से कम हों और “सब” दुर्बल माने जाएँ, तो शास्त्र कहता है अनपत्यता वक्तव्य। यदि बुध का षड्बल दहलीज से ऊपर हो, तो ८३.७ की “सर्वेषु बलहीनेषु” शर्त नहीं लगती—अन्य योग अलग से देखे जाएँ।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बलहीनेषु” को हम षड्बल-इंजन (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्—रूप/विरूप योग) से जोड़ते हैं: बल = गणना, फल = शास्त्र-कथन। exact-`==` अनुशासन यहाँ भी लागू—दहलीज या घटक बदलें तो योग-निर्णय चुपचाप नहीं; घोषित करें। गणित और व्याख्या अलग रखे: चारों कारकों का दुर्बल होना शास्त्र की शर्त है; हम उसे निश्चित भाग्य नहीं ठहराते।

83.8
रव्यारराहुशनयः सबलाः पुत्रभावगाः ।
तदाऽनपत्यता चेत् स्युरबलाः पुत्रकारकाः
ravyārarāhuśanayaḥ sabalāḥ putrabhāvagāḥ |
tadā'napatyatā cet syurabalāḥ putrakārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि = सूर्य; आर = मंगल (आर/अङ्गारक); राहु = राहु; शनयः = शनि (आदि, बहुवचन); सबलाः = बलवान्; पुत्रभावगाः = पुत्र-भाव (5वें) में स्थित; अनपत्यता चेत् = तब अनपत्यता, यदि; अबलाः पुत्रकारकाः = पुत्र-कारक (बृहस्पति आदि) निर्बल हों।

हिन्दी भावार्थ यदि सूर्य, मंगल, राहु और शनि — बलवान् होकर — पुत्र-भाव (5वें) में स्थित हों, और पुत्र-कारक निर्बल हों, तब अनपत्यता होती है। अर्थात् पाप-ग्रह ठीक सन्तान-भाव में प्रबल, जबकि कारक (गुरु) निर्बल।

English rendering "If the Sun, Mars, Rāhu and Saturn, being strong, occupy the fifth house while the significators of progeny are weak, then childlessness (results)."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त: {सूर्य, मंगल, राहु, शनि} सबल ∧ ∈ भाव 5 (पुत्र-भाव) ∧ पुत्र-कारक (गुरु) अबल ⇒ शास्त्र कहता है: अनपत्यता। यहाँ "सबल/अबल" पुनः षड्बल-सीमा से तुलना है; रवि-आर-राहु-शनि = पाप/क्रूर वर्ग, जो पुत्र-भाव में प्रबल तनयकारक की निर्बलता के साथ मिलते हैं।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न → 5वाँ = सिंह। यदि सिंह में सूर्य (स्वक्षेत्र → उच्च षड्बल), मंगल, शनि और राहु उच्च-बल के साथ स्थित हों और बृहस्पति का षड्बल अपनी सीमा से नीचे हो, तो नियम संकेत देता है। ध्यान: पाप-ग्रहों की उपस्थिति स्थान-गणित है; "सबल/अबल" षड्बल-गणना; "अनपत्यता" शास्त्र-कथन।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ दो अलग गणनाएँ जुड़ती हैं — पाप-ग्रह का 5वें में होना (स्थान-अंकगणित) और ग्रहों का सबल/अबल होना (षड्बल-सीमा, डोज़ियर §4)। हमारे अनुशासन के अनुसार बल = परिकलित मात्रा, ग्रह-स्थिति = स्थितिजन्य तथ्य, और फल = शास्त्र का दावा — तीनों पृथक् रखे जाते हैं।

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83.9
पुत्रस्थानगते राहौ कुजेन च निरीक्षिते ।
कुजक्षेत्रगते वाऽपि सर्पशापात् सुतक्षयः
putrasthānagate rāhau kujena ca nirīkṣite |
kujakṣetragate vā'pi sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानगते राहौ = राहु के पुत्र-स्थान (5वें भाव) में जाने पर; कुजेन निरीक्षिते = मंगल से दृष्ट होने पर; कुजक्षेत्रगते वा अपि = अथवा मंगल की राशि (मेष/वृश्चिक) में स्थित होने पर; सर्पशापात् = सर्प-शाप के कारण; सुतक्षयः = पुत्र का क्षय।

हिन्दी भावार्थ राहु पुत्र-स्थान (5वें) में हो और मंगल से दृष्ट हो, अथवा मंगल की राशि में स्थित हो — तब शास्त्र कहता है कि सर्प-शाप के कारण सुत-क्षय होता है। यह "सर्प-शाप" योग-गुच्छ का प्रथम श्लोक है।

English rendering "When Rāhu, placed in the fifth house, is aspected by Mars, or else stands in a sign of Mars, the text ascribes the loss of the son to a serpent's curse."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त: (राहु ∈ भाव 5) ∧ [ दृष्टि(मंगल → राहु) ∨ राहु ∈ {मेष, वृश्चिक} ]। मंगल की पूर्ण ग्रह-दृष्टि = अपने से 4th, 7th, 8th भाव पर; मंगल-क्षेत्र = मेष व वृश्चिक। राहु की स्वयं की दृष्टि पर मत-भेद (कोई 5/7/9 मानते हैं) — घोषित, अनुमानित नहीं। फल-वाक्य ("सर्प-शाप → सुत-क्षय") शास्त्र का पूर्वजन्म-कारण-कथन है, कोई भविष्यवाणी नहीं।

उदाहरण (worked example) कर्क लग्न (whole-sign): 5वाँ = वृश्चिक (मंगल का क्षेत्र)। राहु वृश्चिक में = "कुज-क्षेत्रगत राहु पुत्र-स्थान में" — शर्त की दूसरी शाखा पूरी। वैकल्पिक (दृष्टि-शाखा): मेष लग्न → 5वाँ = सिंह; राहु सिंह में, और मंगल कुम्भ में (सिंह से 7वाँ) → मंगल की सप्तम-दृष्टि राहु पर।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह सर्प-शाप-गुच्छ का शीर्ष है; इसका विन्यास (राहु 5वें में + मंगल-सम्बन्ध) शुद्ध स्थिति-अंकगणित है — सम-राशि भाव, मंगल की मानक 4/7/8 दृष्टि, मंगल-क्षेत्र = मेष/वृश्चिक — जबकि "सर्प-शाप → सुत-क्षय" शास्त्र का निदान है, हमारे द्वारा समर्थित फल नहीं। जहाँ राहु-दृष्टि जैसी संहिता विवादित है, हम उसे मत-भेद के रूप में घोषित करते हैं (डोज़ियर §5, "convention declared")।

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83.10
पुत्रशे राहुसंयुक्ते पुत्रस्थे भानुनन्दने ।
चन्द्रेण संयुते दृष्टे सर्पशापात् सुतक्षयः
putraśe rāhusaṃyukte putrasthe bhānunandane |
candreṇa saṃyute dṛṣṭe sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रेशे राहुसंयुक्ते = पंचमेश के राहु से युत होने पर; पुत्रस्थे भानुनन्दने = पुत्र-भाव (5वें) में शनि (भानुनन्दन = सूर्यपुत्र = शनि) के होने पर; चन्द्रेण संयुते दृष्टे = चन्द्र से युत अथवा दृष्ट होने पर; सर्पशापात् सुतक्षयः = सर्प-शाप से सुत-क्षय। (पाठ में "पुत्रशे" → "पुत्रेशे"; पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ पंचमेश राहु से युत हो, पुत्र-भाव में शनि (भानुनन्दन) स्थित हो, और वह चन्द्र से युत या दृष्ट हो — तब शास्त्र कहता है कि सर्प-शाप के कारण सुत-क्षय होता है।

English rendering "When the lord of the fifth is joined with Rāhu, Saturn (the Sun's son) stands in the fifth, and is joined or aspected by the Moon, the text ascribes the loss of the son to a serpent's curse."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त: (पंचमेश युत राहु) ∧ (शनि ∈ भाव 5) ∧ [चन्द्र युत/दृष्ट शनि-या-5वें भाव]। नाम-डिकोड: भानुनन्दन = भानु (सूर्य) + नन्दन (पुत्र) = शनि। चन्द्र की पूर्ण दृष्टि = अपने से 7वें पर। यह शुद्ध स्थिति+युति+दृष्टि विन्यास है; फल शास्त्र-कथन।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न → 5वाँ = सिंह, पंचमेश = सूर्य। मान लें सूर्य + राहु (कहीं) युत; शनि सिंह (5वें) में; चन्द्र कुम्भ (11वें) में, जो सिंह से 7वाँ → चन्द्र की सप्तम-दृष्टि 5वें/शनि पर। तीनों उप-शर्तें पूर्ण।

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83.11
कारके राहुसंयुक्ते पुत्रेशे बलवर्जिते ।
लग्नेशे कुजसंयुक्ते सर्पशापात् सुतक्षयः
kārake rāhusaṃyukte putreśe balavarjite |
lagneśe kujasaṃyukte sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारके राहुसंयुक्ते = पुत्र-कारक (बृहस्पति) के राहु से युत होने पर; पुत्रेशे बलवर्जिते = पंचमेश के बल-रहित होने पर; लग्नेशे कुजसंयुक्ते = लग्नेश के मंगल से युत होने पर; सर्पशापात् सुतक्षयः = सर्प-शाप से सुत-क्षय।

हिन्दी भावार्थ पुत्र-कारक बृहस्पति राहु से युत हो, पंचमेश बल-रहित हो, और लग्नेश मंगल से युत हो — तब शास्त्र कहता है कि सर्प-शाप से सुत-क्षय होता है।

English rendering "When Jupiter (the significator) is joined with Rāhu, the lord of the fifth is void of strength, and the lord of the ascendant is joined with Mars, the text ascribes the loss of the son to a serpent's curse."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त: (कारक-गुरु युत राहु) ∧ (षड्बल(पंचमेश) < सीमा) ∧ (लग्नेश युत मंगल) ⇒ शास्त्र: सर्प-शाप-जन्य सुत-क्षय। यहाँ दो स्थितिजन्य त्रिगर (गुरु+राहु, लग्नेश+मंगल) एक परिमाणात्मक द्वार (पंचमेश बल-वर्जित) के साथ मिलते हैं — "बलवर्जित" = षड्बल-योग अपनी अपेक्षित रूप-सीमा से नीचे।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न: लग्नेश = मंगल, पंचमेश = सूर्य (सिंह)। मान लें बृहस्पति + राहु किसी भाव में युत; लग्नेश मंगल स्वयं किसी अन्य ग्रह-रहित पर मंगल-युति की शर्त लग्नेश ≠ मंगल वाले लग्न पर स्पष्ट होती है — जैसे वृषभ लग्न (लग्नेश शुक्र) में शुक्र + मंगल युत; पंचमेश (कन्या → बुध) का षड्बल सीमा से नीचे। तीनों शर्तें पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बलवर्जित" पुनः षड्बल-सीमा-परीक्षण है (डोज़ियर §4)। श्लोक एक स्थितिजन्य त्रिगर (कारक+राहु, लग्नेश+मंगल) को एक परिमाणात्मक द्वार (पंचमेश का योग < सीमा) से जोड़ता है — गणना और विन्यास दोनों; और सर्प-शाप-फल शास्त्र का कथन बना रहता है।

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83.12
कारके भौमसंयुक्ते लग्ने च राहुसंयुते ।
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे सर्पशापात् सुतक्षयः
kārake bhaumasaṃyukte lagne ca rāhusaṃyute |
putrasthānādhipe duḥsthe sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारके = (पुत्र-)कारक; भौमसंयुक्ते = मङ्गल-युक्त; लग्ने = लग्न में; राहुसंयुते = राहु-युक्त; पुत्रस्थानाधिपे = पुत्रस्थान का अधिपति (५मेश); दुःस्थे = दुःस्थ / दुष्ट-स्थान में (६-८-१२ — सामान्य परिभाषा); सर्पशापात् सुतक्षयः = सर्पशाप से सुतक्षय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब कारक मङ्गल से युक्त हो, लग्न में राहु हो, और पुत्रस्थानाधिपति दुःस्थ में पड़ा हो, तब सर्पशाप से सुतक्षय का संकेत माना गया है। तीनों स्थितियाँ एक साथ: कारक-भौम योग, लग्न-राहु, ५मेश का दुःस्थान-गमन। “दुःस्थ” शास्त्र में प्रायः ६, ८, १२ भावों का समूह है — यहाँ भी वही पारंपरिक अर्थ लिया जाता है, जब तक पाठांतर न कहे।

English rendering The text states that when the kāraka is conjoined with Mars, Rāhu occupies the lagna, and the lord of the putra-sthāna is placed in a duḥstha (adverse house), loss of offspring from sarpśāpa is indicated. Kāraka–Mars, Rāhu-in-lagna, and a fallen fifth-lord form the triad.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दुःस्थ = सामान्यतः ६, ८, १२ (पूर्ण-भाव गणना; भाव-मध्य/श्रीपति पद्धति श्लोक में निर्दिष्ट नहीं)। लग्न-युति = लग्न-राशि में राहु की स्थिति — अंश-सीमा नहीं दी गई।

83.13
भौमांशे भौमसंयुक्ते पुत्रेशे सोमनन्दने ।
राहुमान्दियुते लग्ने सर्पशापात् सुतक्षयः
bhaumāṃśe bhaumasaṃyukte putreśe somanandane |
rāhumāndiyute lagne sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौमांशे = मंगल के नवांश (अंश = D9 नवांश-राशि) में; भौमसंयुक्ते = मंगल से युत; पुत्रेशे सोमनन्दने = पंचमेश के बुध (सोमनन्दन = चन्द्रपुत्र = बुध) होने पर; राहुमान्दियुते लग्ने = लग्न में राहु और माँदि (गुलिक) के साथ; सर्पशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ पंचमेश (जो यहाँ बुध है) मंगल के नवांश में स्थित हो और मंगल से युत हो, तथा लग्न में राहु और माँदि (गुलिक) हों — तब शास्त्र कहता है कि सर्प-शाप से सुत-क्षय होता है। (नाम-डिकोड: सोमनन्दन = चन्द्रपुत्र = बुध; माँदि = गुलिक, शनि-सम्बद्ध उपग्रह।)

English rendering "When the fifth-lord, being Mercury, stands in Mars's navāṃśa and is joined with Mars, while the ascendant holds Rāhu and Māndi (Gulika), the text ascribes the loss of the son to a serpent's curse."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) शर्त: (पंचमेश = बुध) ∧ (बुध का नवांश = मंगल-राशि, अर्थात् भौमांश) ∧ (बुध युत मंगल) ∧ (राहु ∈ लग्न ∧ माँदि ∈ लग्न)। नवांश (D9) विभाजन: 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश; मेष से नवांश-क्रमांक n = ⌊L ÷ 3°20′⌋, नवांश-राशि = (n mod 12) मेष से। "भौमांश" = बुध की D9-राशि मंगल-स्वामित्व (मेष/वृश्चिक) की। माँदि/गुलिक = दिन-रात्रि के काल-भाग से परिकलित उपग्रह (छाया-बिन्दु), स्थूल ग्रह नहीं — घोषित।

उदाहरण (worked example) मान लें पंचमेश बुध 11° वृषभ पर (निरपेक्ष देशान्तर L = 30° + 11° = 41°)। नवांश-क्रमांक n = ⌊41 ÷ 3.3333⌋ = 12; 12 mod 12 = 0 → नवांश = मेष (मंगल) = भौमांश ✓। अब बुध राशि में मंगल से भी युत हो, और लग्न में राहु + माँदि हों → सब शर्तें पूर्ण। (सम्मेलन घोषित: whole-sign भाव; नवांश 3°20′; माँदि = गुलिक उपग्रह।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक एक वर्ग (नवांश D9) को स्पष्ट रूप से आह्वान करता है — वही षोडश-वर्ग योजना जिसे हमने नियतात्मक मॉड्युलर विभाजन (प्रत्येक राशि ÷ 9 = 3°20′) के रूप में रखा (डोज़ियर §2, D1…D60 समुच्चय में D9)। "भौमांश" = पंचमेश की D9-राशि मंगल-शासित — इसे हम ठीक-ठीक गणना करते हैं; माँदि को काल-भाग से परिकलित उपग्रह घोषित करते हैं, और सर्प-शाप-फल को शास्त्र का कारण-कथन बनाए रखते हैं, हमारी भविष्यवाणी नहीं।

83.14
पुत्रभावे कुजक्षेत्रे पुत्रेशे राहुसंयुते ।
सौम्यदृष्टे युते वाऽपि सर्पशापात् सुतक्षयः
putrabhāve kujakṣetre putreśe rāhusaṃyute |
saumyadṛṣṭe yute vā'pi sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रभावे = ५म भाव में / पुत्रभाव के लिए; कुजक्षेत्रे = मङ्गल-राशि में (अर्थात् ५म भाव मेष या वृश्चिक हो); पुत्रेशे = ५मेश; राहुसंयुते = राहु-युक्त; सौम्य = शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध — चन्द्र परंपरा-निर्भर); दृष्टे = दृष्ट; युते = युक्त; वाऽपि = अथवा भी / फिर भी; सर्पशापात् सुतक्षयः = सर्पशाप से सुतक्षय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पुत्रभाव कुज-क्षेत्र में हो और पुत्रेश राहु से युक्त हो, तब — सौम्य ग्रह की दृष्टि या युति होने पर भी — सर्पशाप से सुतक्षय का संकेत माना गया है। विशेष बात: यहाँ शुभ दृष्टि/युति को निवारक नहीं कहा गया; “वाऽपि” से शास्त्र स्पष्ट करता है कि सौम्य-संपर्क के बावजूद यह योग-फल उसी श्रेणी में रखा गया है। यह फल-कथन है, उपचार-आदेश या निश्चित भविष्य नहीं।

English rendering The text states that when the putra-bhāva falls in a Martian sign and the fifth-lord is conjoined with Rāhu, loss of offspring from sarpśāpa is indicated — even if a benefic aspects or joins. The particle “api” keeps the phala in force despite saumya contact; the verse does not frame this as inevitable fate, only as the śāstra’s stated yoga-result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग + अपवाद-निषेध)। पुत्रभाव कुजक्षेत्रे ⇒ लग्न से ५म राशि = मेष या वृश्चिक ⇒ लग्न क्रमशः धनु या कर्क (पूर्ण-राशि भाव-पद्धति)। सौम्य-दृष्टि = शास्त्रीय दृष्टि-कोण; कोई अंश-कटौती श्लोक में नहीं।

83.15
पुत्रस्था भानुमन्दाराः स्वभानुः शशिजोऽङ्गिराः ।
निर्बलौ पुत्रलग्नेशौ सर्पशापात् सुतक्षयः
putrasthā bhānumandārāḥ svabhānuḥ śaśijo'ṅgirāḥ |
nirbalau putralagneśau sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थाः = पंचम भाव में स्थित; भानु = सूर्य; मन्द = शनि; आर = मंगल; स्वभानुः = स्वर्भानु अर्थात् राहु (पाठ-भेद संभव); शशिजः = बुध (चन्द्र-पुत्र); अङ्गिराः = बृहस्पति (आङ्गिरस); निर्बलौ पुत्रलग्नेशौ = बल-रहित पंचमेश एवं लग्नेश (द्विवचन); सर्पशापात् सुतक्षयः = सर्प-शाप से सन्तान-नाश।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — यदि पंचम भाव में सूर्य, शनि, मंगल, राहु, बुध और बृहस्पति जैसे ग्रह एकत्र हों, और साथ ही पंचमेश तथा लग्नेश दोनों बल-हीन हों, तो यह योग सन्तान-हानि का लक्षण माना जाता है, जिसे परम्परा सर्प-शाप कहती है। यहाँ मूल भार "निर्बलता" पर है — भरे हुए पंचम भाव के बीच भी दोनों प्रमुख स्वामी दुर्बल हों तभी योग पूर्ण होता है।

English rendering The text states that when the fifth house is crowded by the Sun, Saturn, Mars, Rāhu, Mercury and Jupiter while both the fifth-lord and the lagna-lord are devoid of strength, the loss of progeny is read as arising from a serpent-curse.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-लक्षण)। "निर्बल" शब्द एक परिमेय राशि की ओर संकेत करता है — ग्रहबल — जिसे वचन गिनता नहीं, केवल पूर्वापेक्षा के रूप में माँगता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) "निर्बलौ" यहाँ ठीक उसी परिमाण को छूता है जिसे हमने षड्बल (BPHS अ.27) के रूप में सूत्रबद्ध रखा है — स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृग् बल, विरूप में योग्य (1 रूप = 60 विरूप), जिसकी तुलना प्रति-ग्रह देहली से होती है। अतः "बल-हीन पंचमेश/लग्नेश" कोई भावुक विशेषण नहीं, बल्कि गणनीय संख्या के देहली-से-नीचे होने का कथन है — और सुतक्षय उस संख्यात्मक अवस्था की शास्त्रीय व्याख्या-मात्र है, हमारी अनुमोदित भविष्यवाणी नहीं।

83.16
लग्नेशे राहुसंयुक्ते पुत्रेशे भोमसंयुते ।
कारके राहुयुक्ते वा सर्पशापात् सुतक्षयः
lagneśe rāhusaṃyukte putreśe bhomasaṃyute |
kārake rāhuyukte vā sarpaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्न-स्वामी में/के; राहुसंयुक्ते = राहु-युक्त; पुत्रेशे = पंचमेश में; भोमसंयुते = मंगल-युक्त (भौम = मंगल); कारके = (पुत्र-)कारक में; राहुयुक्ते वा = अथवा राहु-युक्त; सर्पशापात् सुतक्षयः = सर्प-शाप से सुत-क्षय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक सर्प-शाप का दूसरा योग-रूप देता है। लग्नेश राहु से युक्त हो, पुत्रेश भौम (मंगल) से युक्त हो, अथवा (पुत्र-)कारक राहु-युक्त हो—इनमें से किसी भी स्थिति में शास्त्र “सर्पशापात् सुतक्षयः” कहता है। “कारक” यहाँ प्रसंगवश संतति-कारक (प्रायः गुरु, अथवा संबंधित कारक-व्यवस्था) समझा जाता है; पाठ स्वयं कारक-नाम नहीं खोलता, अतः परंपरा-भेद संभव है।

English rendering The text states another sarpa-śāpa configuration: when the lagna-lord is conjoined with Rāhu, the fifth-lord with Mars, or the (progeny) kāraka with Rāhu—then loss of offspring is ascribed to the serpent-curse. Which planet is meant by kāraka depends on the adopted kāraka scheme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-फल / शाप-निरूपण। तीन वैकल्पिक स्थितिक शर्तें (∨): (1) लग्नेश ∩ राहु, (2) पुत्रेश ∩ मंगल, (3) कारक ∩ राहु। युति = सह-राशि (या घोषित orb/भाव-युति नियम)। फल को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें।

83.17
ग्रहयोगवशेनैवं नृणां ज्ञात्वाऽनपत्यता ।
तद्दोषपरिहारार्थं नागपूजां समारभेत्
grahayogavaśenaivaṃ nṛṇāṃ jñātvā'napatyatā |
taddoṣaparihārārthaṃ nāgapūjāṃ samārabhet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहयोगवशेन = ग्रह-योगों के बल से; एवं = इस प्रकार; नृणां अनपत्यता ज्ञात्वा = मनुष्यों की सन्तानहीनता जानकर; तद्दोषपरिहारार्थं = उस दोष के निवारण हेतु; नागपूजां समारभेत् = नाग-पूजा आरम्भ करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इन ग्रह-योगों के द्वारा जब सन्तानहीनता का अनुमान हो, तो उस दोष के परिहार के लिए साधक नाग-पूजा आरम्भ करे। ध्यान दें, वचन स्वयं क्रम बताता है — पहले योग से "जानना", फिर उपाय — अर्थात् यह लक्षण-कथन है, अटल दण्ड नहीं।

English rendering The text says that when childlessness is inferred through such planetary combinations, one should, to remove that affliction, undertake the worship of the Nāgas.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (उपाय-विधि)। यह श्लोक पूरे अध्याय की विधि को सारांशित करता है: योग → अनुमान → उपाय।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वचन हमारी मूल अनुशासन-रेखा से मेल खाता है — गणित और व्याख्या को अलग रखना। ग्रह-योग की शर्तें (भावेश-स्थिति, कारक-युति, बल) नियततः गणनीय हैं; किन्तु "अनपत्यता" और उसका उपाय शास्त्र का कथन है, हमारी ओर से न कोई भय, न दबाव-रूप में उपाय। हम फल को सदा "पाठ कहता है" के रूप में रखते हैं, कभी नियति या निश्चित भविष्य के रूप में नहीं।

83.18
स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठां कारयेत् सुधीः ।
नागमूर्ति सुवर्णेन कृत्वा पूजां समाचरेत्
svagṛhyoktavidhānena pratiṣṭhāṃ kārayet sudhīḥ |
nāgamūrti suvarṇena kṛtvā pūjāṃ samācaret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वगृह्योक्तविधानेन = अपने गृह्य-सूत्रोक्त विधि से; प्रतिष्ठाम् = स्थापना/प्रतिष्ठा; कारयेत् = कराए; सुधीः = विवेकी; नागमूर्तिम् = नाग-मूर्ति को; सुवर्णेन = स्वर्ण से; कृत्वा = बनाकर; पूजाम् = पूजा; समाचरेत् = विधिवत् करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सुधी को निर्देश देता है कि प्रतिष्ठा अपनी गृह्य-परंपरा में कही विधि से कराई जाए, और स्वर्ण की नाग-मूर्ति बनाकर पूजा संपन्न की जाए। “स्वगृह्योक्त” शब्द महत्वपूर्ण है—यह एकमात्र सार्वत्रिक विधि नहीं थोपता, बल्कि कुल/शाखा की गृह्य-विधि को प्रामाणिक मानता है। सामग्री (सुवर्ण) का उल्लेख शास्त्रीय है; अर्थ-दबाव या भय-व्यापार इससे नहीं निकालना चाहिए।

English rendering The wise person, the text says, should have the installation performed according to the rites of one’s own gṛhya tradition, fashion a serpent-image of gold, and carry out the worship. Local gṛhya procedure remains the declared authority.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/कर्मकांड-वर्णन। कोई अंश, वर्ष, या वर्ग-सूत्र नहीं; केवल पारंपरिक प्रतिष्ठा-पूजा का क्रम-कथन।

83.19
गोभूतिलहिरण्यादि दद्याद् वित्तानुसारतः ।
एवं कृते तु नागेन्द्रप्रसादात् वर्धते कुलम्
gobhūtilahiraṇyādi dadyād vittānusārataḥ |
evaṃ kṛte tu nāgendraprasādāt vardhate kulam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गो-भू-तिल-हिरण्यादि = गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि; दद्यात् = दे; वित्तानुसारतः = संपत्ति/सामर्थ्य के अनुसार; एवम् कृते = ऐसा करने पर; नागेन्द्रप्रसादात् = नागेन्द्र की प्रसन्नता/प्रसाद से; वर्धते कुलम् = कुल बढ़ता है (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र दान की सूची गाय, भूमि, तिल, हिरण्य आदि बताता है, और स्पष्ट जोड़ता है—“वित्तानुसारतः”, अर्थात सामर्थ्य के अनुपात में। ऐसा करने पर, पाठ कहता है, नागेन्द्र-प्रसाद से कुल की वृद्धि होती है। यह आशीर्वाद-फल शास्त्र की भाषा में है; हम इसे सुनिश्चित भाग्य या आर्थिक गारंटी के रूप में नहीं पढ़ते। “वित्तानुसार” ही पाठ का नैतिक सुरक्षा-वाल्व है—अति-दान का दबाव शास्त्र स्वयं नहीं थोपता।

English rendering One should give cow, land, sesame, gold and the like according to one’s means; when this is done, the text states that by the favour of the Lord of Serpents the lineage thrives. The phrase vittānusārataḥ keeps the gift proportional, not coercive.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दान-विधि + फल-कथन। कोई निश्चित संख्या/मात्रा नहीं दी; “आदि” खुली सूची है, माप “वित्तानुसार” है।

83.20
पुत्रस्थानं गते भानौ नीचे मन्दांशकस्थिते ।
पार्श्वयोः क्रूरसम्बन्धे पितृशापात् सुतक्षयः
putrasthānaṃ gate bhānau nīce mandāṃśakasthite |
pārśvayoḥ krūrasambandhe pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानं गते भानौ = सूर्य पंचम में गया हो; नीचे = नीच राशि/नीच-स्थिति में; मन्दांशकस्थिते = मन्द (शनि) के अंश में स्थित; पार्श्वयोः = दोनों पार्श्वों (पड़ोस-भाव/राशि) में; क्रूरसम्बन्धे = क्रूर (पाप) संबंध होने पर; पितृशापात् = पितृ-शाप से; सुतक्षयः = सुत-क्षय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ अब प्रसंग सर्प-शाप से पितृ-शाप की ओर मुड़ता है। शास्त्र कहता है: जब भानु पुत्र-स्थान में हो, नीच स्थिति में हो, और मन्दांश (शनि-अंश—प्रायः शनि-नवांश/शनि-संबंधित विभाग; पाठ-भेद संभव) में स्थित हो, तथा दोनों पार्श्वों में क्रूर संबंध हो, तो “पितृशापात् सुतक्षयः”। “पार्श्व” से तात्पर्य पूर्व-पर (द्वितीय-द्वादश भाव या पड़ोसी राशि) में पाप-ग्रह के संबंध से लिया जाता है; टीकाएँ थोड़ी भिन्न पढ़ सकती हैं।

English rendering The text now states a pitṛ-śāpa indication: when the Sun occupies the fifth house, is debilitated, lies in a Saturnine aṃśa (mandāṃśa), and has malefic connection on both flanks, loss of offspring is ascribed to the ancestral curse. Exact reading of mandāṃśa and pārśva may vary by recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृशाप-योग); स्थितिक शर्तों की जाँच। घोषित परंपरा में: (1) सूर्य की रवि-देशांतर → भाव-स्थिति (भाव-पद्धति घोषित करें: पूर्ण-राशि / श्रीपति आदि); (2) नीच = तुला में सूर्य (0°–30° तुला, सायन/निरयण अयनांश घोषित); (3) मन्दांश = शनि-स्वामित्व वाले नवांश/अंश में सूर्य (D9-नियम: 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति नवांश); (4) पार्श्व-क्रूर संबंध = पड़ोसी भाव/राशि में पाप-युति/दृष्टि (नियम घोषित)। फल = शास्त्र का कथन।

उदाहरण (worked example) मान लें निरयण देशांतर, लाहिरी अयनांश, पूर्ण-राशि भाव। लग्न = मेष; सूर्य = 15° तुला = सप्तम राशि परन्तु… शर्त पुत्रस्थान (पंचम) माँगती है। पंचम = सिंह। अतः उदाहरण: लग्न कर्क; पंचम = वृश्चिक; सूर्य नीच के लिए तुला चाहिए—पूर्ण-राशि पंचम में नीच-सूर्य असंभव जब पंचम ≠ तुला। लग्न = मिथुन ⇒ पंचम = तुला: सूर्य 10° तुला (नीच), नवांश: तुला के नवांश क्रम (तुला→…; 10° ÷ 3°20′ = 3 पूर्ण नवांश ⇒ 4था नवांश = मकर, शनि-स्वामी) → मन्दांश-स्थित। पार्श्व: 4th=कन्या, 6th=वृश्चिक में यदि शनि/मंगल/राहु हों तो “पार्श्वयोः क्रूरसम्बन्धे” की एक पढ़त पूरी होती है। (पाठ-भेद संभव।)

83.21
पुत्रस्थानाधिपे भानौ त्रिकोणे पापसंयुते ।
क्रूरान्तरे पापदृष्टे पितृशापात् सुतक्षयः
putrasthānādhipe bhānau trikoṇe pāpasaṃyute |
krūrāntare pāpadṛṣṭe pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानाधिपे भानौ = पंचमेश जब सूर्य हो; त्रिकोणे = त्रिकोण (1-5-9) में; पापसंयुते = पाप-युक्त; क्रूरान्तरे = क्रूरों के बीच (पापकर्तरी-सी स्थिति); पापदृष्टे = पाप-दृष्ट; पितृशापात् सुतक्षयः = पितृ-शाप से सुत-क्षय (शास्त्र-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पितृ-शाप का दूसरा रूप कहता है: जब पुत्रस्थान का अधिपति सूर्य हो (अर्थात् पंचम राशि सिंह हो—लग्न के अनुसार), और वह (सूर्य/पुत्रेश) त्रिकोण में पाप से युक्त हो, क्रूर ग्रहों के अंतराल में पड़ा हो, तथा पाप-दृष्ट हो, तो “पितृशापात् सुतक्षयः”। “क्रूरान्तरे” का अर्थ सामान्यतः दोनों ओर पाप-ग्रहों से घिरा होना है। यह भी फल-योग है—गणित की इकाई नहीं, स्थितिक प्रतिबंधों का समुच्चय।

English rendering The text states a further pitṛ-śāpa yoga: when the lord of the fifth is the Sun (i.e. the fifth sign is Leo), and that lord in a trine is conjoined with malefics, hemmed between cruel planets, and aspected by malefics—loss of offspring is ascribed to the ancestral curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृशाप-योग)। तार्किक शर्तें: पुत्रेश = सूर्य ⇔ पंचम राशि = सिंह ⇔ लग्न ∈ {मेष…} ऐसा कि 5वीं राशि सिंह हो (पूर्ण-राशि: लग्न = मेष ⇒ पंचम = सिंह)। त्रिकोण = भाव 1, 5, 9 (या राशि-त्रिकोण—परंपरा घोषित करें)। क्रूरान्तर = पापकर्तरी-रूप (पूर्व-पर भाव/राशि में क्रूर)। पाप-दृष्टि = मंगल 4/8, शनि 3/10, राहु आदि की घोषित दृष्टि-व्यवस्था से। सभी फल शास्त्र के कथन हैं, नियति नहीं।

83.22
भानुराशिस्थिते जीवे पुत्रेशे भानुसंयुते ।
पुत्रे लग्ने च पापाढ्ये पितृशापात् सुतक्षयः
bhānurāśisthite jīve putreśe bhānusaṃyute |
putre lagne ca pāpāḍhye pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानुराशिस्थिते = सूर्य की राशि (सिंह) में स्थित; जीवे = गुरु; पुत्रेशे = पञ्चमेश / पुत्रभाव-स्वामी; भानुसंयुते = सूर्य से युक्त; पुत्रे = पञ्चम भाव में; लग्ने = लग्न में; पापाढ्ये = पापग्रहों से भरे; पितृशापात् = पितृ-शाप से; सुतक्षयः = सन्तान-हानि का शास्त्रीय संकेत।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु भानु की राशि (सिंह) में हो, पुत्रेश सूर्य से युक्त हो, तथा पुत्र-भाव और लग्न दोनों पापग्रहों से आढ्य हों, तब यह योग पितृ-शाप से सुतक्षय का संकेत देता है। यहाँ फल-कथन संयोजनों पर टिका है, न कि किसी एक ग्रह के “भय” पर। पाठ-भेद संभव, किन्तु मूल संरचना स्पष्ट है: गुरु–सूर्य–पुत्रेश–पाप-युग्म लग्न/पञ्चम।

English rendering The text states that when Jupiter occupies the Sun’s sign, the fifth-lord is joined with the Sun, and both the fifth house and the lagna are laden with malefics, loss of progeny is indicated as arising from a father’s curse (pitṛ-śāpa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पितृशाप–सुतक्षय योग)। जाँच बिंदु: गुरु ∈ सिंह (भानुराशि); पुत्रेश ☌ सूर्य; पाप-गिनती लग्न और पञ्चम में — गृह-स्वामित्व राशि-क्रम से निर्धारित होता है (D1, पूर्ण-राशि भाव-पद्धति जब तक अन्य न कहा जाए)।

83.23
लग्नेशे दुर्बले पुत्रे पुत्रेशे भानुसंयुते ।
पुत्रे लग्ने पापयुते पितृशापात् सुतक्षयः
lagneśe durbale putre putreśe bhānusaṃyute |
putre lagne pāpayute pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे दुर्बले = लग्नेश के दुर्बल होने पर; पुत्रे = पंचम भाव में (स्थित); पुत्रेशे भानुसंयुते = पंचमेश सूर्य से युक्त; पुत्रे लग्ने पापयुते = पंचम एवं लग्न पापग्रह-युक्त; पितृशापात् सुतक्षयः = पितृ-शाप से सन्तान-हानि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लग्नेश दुर्बल होकर पंचम भाव में स्थित हो, पंचमेश सूर्य से युक्त हो, और पंचम व लग्न पापग्रह-युक्त हों, तब यह योग पितृ-शाप-जनित सन्तान-हानि का सूचक माना जाता है। मूल शर्त पुनः "दुर्बलता" है — लग्नेश का बल-हीन होना।

English rendering The text states that when the weak lagna-lord occupies the fifth house, the fifth-lord is joined with the Sun, and both fifth and ascendant carry malefics, the loss of progeny is read as due to a paternal curse.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-लक्षण)। "दुर्बल" एक परिमेय बल-मान की पूर्वापेक्षा है, जिसे श्लोक माँगता है पर गिनता नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "दुर्बले" यहाँ फिर षड्बल (BPHS अ.27) की ओर इंगित करता है — छह अंगों का योग रूप/विरूप में (1 रूप = 60 विरूप), प्रति-ग्रह देहली से तुलनीय। हमारे अनुशासन में यह विशुद्ध गणना है, न कि भाव; अतः "लग्नेश दुर्बल" का अर्थ है उसका बल-मान देहली से नीचे — और "पितृशाप से सुतक्षय" उस संख्यात्मक अवस्था की शास्त्रीय व्याख्या है, हमारी अनुमोदित भविष्यवाणी नहीं।

83.24
पितृस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे वापि कर्मगे ।
पुत्रे लग्ने च पापाढ्ये पितृशापात् सुतक्षयः
pitṛsthānādhipe putre putreśe vāpi karmage |
putre lagne ca pāpāḍhye pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृस्थानाधिपे = नवमेश / पितृ-स्थान का स्वामी; पुत्रे = पञ्चम में; पुत्रेशे = पञ्चमेश; वापि = अथवा भी; कर्मगे = दशम (कर्म-भाव) में; पुत्रे लग्ने = पञ्चम और लग्न; पापाढ्ये = पापों से आढ्य; पितृशापात् सुतक्षयः = पितृ-शाप से सुत-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पितृ-स्थान का अधिपति पुत्र-भाव में हो, अथवा पुत्रेश कर्म-भाव (दशम) में हो, और साथ ही पुत्र-भाव तथा लग्न पापग्रहों से भरे हों, तब पितृ-शाप से सुतक्षय का संकेत मिलता है। यहाँ पितृ-भाव (९) और पुत्र-भाव (५) का परस्पर स्थान-संबंध केन्द्र में है। “वापि” दो वैकल्पिक मार्ग खोलता है — नवमेश→५, या पञ्चमेश→१० — दोनों पर पाप-लग्न/पञ्चम की शर्त जुड़ती है।

English rendering The text states that if the ninth-lord (pitṛ-sthāna-adhipa) is in the fifth, or the fifth-lord is in the tenth, and the fifth and lagna are heavy with malefics, progeny-loss from a father’s curse is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (वैकल्पिक योग-शाखाएँ)। भाव-क्रमांक: पितृ-स्थान = ९, पुत्र = ५, कर्म = १०; स्वामी = (लग्न-राशि + भाव − १) mod १२ पर राशि-स्वामी — D1 पूर्ण-राशि गृह-पद्धति में।

83.25
पितृस्थानाधिपे भौमः पुत्रेशेन समन्वितः ।
लग्ने पुत्रे पितृस्थाने पापे सन्ततिनाशनम्
pitṛsthānādhipe bhaumaḥ putreśena samanvitaḥ |
lagne putre pitṛsthāne pāpe santatināśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृस्थानाधिपे भौमः = नवमेश मंगल; पुत्रेशेन समन्वितः = पञ्चमेश से युक्त; लग्ने = लग्न में; पुत्रे = पञ्चम में; पितृस्थाने = नवम में; पापे = पाप ग्रह; सन्ततिनाशनम् = सन्तान-नाश का शास्त्रीय फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पितृ-स्थान का अधिपति मंगल हो और वह पुत्रेश से युक्त हो, तथा लग्न, पुत्र-भाव और पितृ-स्थान में पाप हों, तो सन्तान-नाशन का संकेत दिया गया है। यह पूर्व श्लोकों की “पितृशापात् सुतक्षयः” पंक्ति से शब्द-भेद रखता है (सन्ततिनाशनम्), किन्तु विषय-सूत्र एक ही है। पाठ-भेद संभव अन्य संपादनों में, पर इस पाठ में तीनों स्थानों पर पाप की शर्त स्पष्ट है।

English rendering The text states that when Mars is lord of the ninth and is joined with the fifth-lord, and malefics occupy the lagna, the fifth, and the ninth, destruction of progeny is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। शर्त-जाल: नवमेश = मंगल (अर्थात् लग्न ऐसी राशि हो कि ९वीं राशि मंगल-स्वामित्व की हो — मेष/वृश्चिक से गिनती); नवमेश ☌ पञ्चमेश; पाप ∈ {लग्न, ५, ९}।

83.26
पितृस्थानाधिपे दुःस्थे कारके पापराशिगे ।
सपापौ पुत्रलग्नेशौ पितृशापात् सुतक्षयः
pitṛsthānādhipe duḥsthe kārake pāparāśige |
sapāpau putralagneśau pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पितृस्थानाधिपे = नवमेश; दुःस्थे = दुःस्थान में (६/८/१२); कारके = पुत्र-कारक (गुरु, परंपरा-सम्मत); पापराशिगे = पाप-राशि में; सपापौ = पाप-सहित; पुत्रलग्नेशौ = पञ्चमेश और लग्नेश दोनों; पितृशापात् सुतक्षयः = पितृ-शाप से सुत-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पितृ-स्थान का अधिपति दुःस्थ हो, कारक पाप-राशि में हो, और पुत्रेश तथा लग्नेश दोनों पाप से युक्त हों, तो पितृ-शाप से सुतक्षय का संकेत है। “दुःस्थ” शास्त्रीय षष्ठ-अष्टम-व्यय स्थानों का समूह है; “कारक” यहाँ सन्तान-संदर्भ में कारक-ग्रह का संकेत है। तीन स्तम्भ एक साथ: नवमेश-दुर्बल स्थान, कारक-पाप राशि, लग्न/पुत्रेश-पाप योग।

English rendering The text states that when the ninth-lord is in a dusthāna, the (progeny) kāraka occupies a malefic sign, and both the fifth-lord and the lagna-lord are with malefics, progeny-loss from a father’s curse is indicated.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन। दुःस्थ भाव-समुच्चय = {६, ८, १२} लग्न से; पाप-राशि = मेष, वृश्चिक, मकर, कुम्भ, तथा परंपरा में कन्या आदि — इस श्लोक में राशि-सूची नहीं दी, केवल “पापराशिगे” पद है; कारक-पहचान ज्योतिष-परंपरा पर निर्भर (पुत्र-कारक प्रायः गुरु) — घोषित परंपरा रखें।

83.27
लग्नपञ्चमभावस्था भानुभौमशनैश्चराः ।
रन्ध्रे रिष्फे राहुजीवौ पितृशापात् सुतक्षयः
lagnapañcamabhāvasthā bhānubhaumaśanaiścarāḥ |
randhre riṣphe rāhujīvau pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-पञ्चम-भावस्थाः = प्रथम (उदित राशि) एवं पञ्चम (सन्तान-भाव) में स्थित; भानु = सूर्य; भौम = मंगल; शनैश्चर = शनि; रन्ध्रे = अष्टम भाव में; रिष्फे = द्वादश (व्यय) भाव में; राहु-जीवौ = राहु और गुरु (द्विवचन); पितृशापात् = पितरों/पिता के शाप से; सुतक्षयः = सन्तान का क्षय/अभाव।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब सूर्य, मंगल और शनि लग्न तथा पञ्चम भाव में बैठे हों, और अष्टम एवं द्वादश भाव में राहु तथा गुरु स्थित हों, तब यह पितृ-शाप से उत्पन्न सन्तान-क्षय का योग समझना चाहिए। ध्यान दें कि सन्तान-कारक गुरु यहाँ दुःस्थान (रिष्फ) में राहु-संगत होकर दुर्बल दिखाया गया है, यही योग का मर्म है।

English rendering The text states that when Sun, Mars and Saturn occupy the ascendant and the fifth house, while Rāhu and Jupiter sit in the eighth and twelfth, the loss of progeny is to be read as arising from a paternal (ancestral) curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (निदान-योग)। सूत्र वस्तुतः चार भावों (1, 5, 8, 12) पर एक संयोजन-प्रतिबन्ध (conjunction) है: (सूर्य ∧ मंगल ∧ शनि ∈ भाव 1∪5) ∧ (राहु ∧ गुरु ∈ भाव 8∪12) ⇒ निदान-लेबल "पितृशाप-जन्य सुतक्षय"।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अनुशासन हमारे इंजन का केन्द्र है — किस ग्रह ने कौन-सा भाव घेरा, यह शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित (राशि-सूचकांक) से नियत होता है; परन्तु "पितृशाप से सुतक्षय" एक फल-कथन है, जिसे हम शास्त्र का कथन कहकर प्रस्तुत करते हैं, नियति या भविष्य-कथन के रूप में कभी नहीं। गणना और व्याख्या को अलग रखना ही ledger-अनुशासन है।

83.28
लग्नादष्टमगे भानौ पुत्रस्थे भानुनन्दने ।
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते लग्ने पापे सुतक्षयः
lagnādaṣṭamage bhānau putrasthe bhānunandane |
putreśe rāhusaṃyukte lagne pāpe sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नात् अष्टमगे = लग्न से आठवें भाव में स्थित; भानौ = सूर्य के; पुत्रस्थे = पञ्चम (सन्तान) भाव में; भानुनन्दने = सूर्य-पुत्र अर्थात् शनि; पुत्रेशे = पञ्चमेश (सन्तान-भाव-स्वामी); राहु-संयुक्ते = राहु से युत; लग्ने पापे = लग्न में पापग्रह होने पर; सुतक्षयः = सन्तान-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का कथन है — जब सूर्य लग्न से अष्टम भाव में हो, शनि (सूर्य-पुत्र) पञ्चम भाव में बैठा हो, पञ्चमेश राहु से युक्त हो और लग्न में कोई पापग्रह स्थित हो, तब सन्तान-क्षय होता है। यहाँ गणना का एकमात्र आधार "लग्न से आठवाँ" — भाव-गणना है।

English rendering The text states that when the Sun stands in the eighth from the ascendant, Saturn (the Sun's son) occupies the fifth, the fifth-lord is joined by Rāhu, and a malefic sits in the ascendant, loss of progeny results.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) एकमात्र संगणन भाव-गणना है। लग्न-राशि सूचकांक L (1…12) से nवें भाव की राशि:
Bₙ = ((L − 1 + (n − 1)) mod 12) + 1
"लग्नात् अष्टमगे भानौ" ⇒ सूर्य की राशि = B₈ = ((L − 1 + 7) mod 12) + 1। शेष चरण स्थिति-प्रतिबन्ध (predicate) हैं, गणना नहीं।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष (L = 1) मानें। तब B₈ = ((1 − 1 + 7) mod 12) + 1 = 8 = वृश्चिक। अतः वृश्चिक-स्थ सूर्य "लग्नात् अष्टमगे भानौ" प्रतिबन्ध को सन्तुष्ट करता है; यदि साथ ही शनि पञ्चम (सिंह) में, पञ्चमेश (सूर्य) राहु-युत, और लग्न (मेष) में कोई पाप हो — तो योग पूर्ण।

83.29
व्ययेशे लग्नभावस्थे रन्ध्रेशे पुत्रराशिगे ।
पितृस्थानाधिपे रन्ध्रे पितृशापात् सुतक्षयः
vyayeśe lagnabhāvasthe randhreśe putrarāśige |
pitṛsthānādhipe randhre pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्ययेश = द्वादशेश (व्यय-भाव का स्वामी); लग्नभावस्थ = लग्न/प्रथम भाव में स्थित; रन्ध्रेश = अष्टमेश (रन्ध्र = ८); पुत्रराशिग = पञ्चम/पुत्र-भाव की राशि में स्थित; पितृस्थानाधिप = नवमेश (पितृ-स्थान = ९); रन्ध्रे = अष्टम भाव में; पितृशापात् = पितृ-शाप से (पाठ के कथनानुसार); सुतक्षयः = सन्तान-हानि/पुत्र-क्षय (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब व्ययेश लग्न में हो, रन्ध्रेश पुत्र-राशि (पञ्चम) में हो, और पितृस्थान (नवम) का अधिपति रन्ध्र (अष्टम) में हो, तो यह विन्यास पितृ-शाप से सुतक्षय का संकेत देता है। यहाँ तीनों अधिपतियों की भाव-स्थिति एक साथ पढ़ी जाती है; फल का नामकरण पाठ स्वयं “पितृशापात् सुतक्षयः” करता है। यह फल-कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

English rendering The text states: when the twelfth-lord is in the lagna, the eighth-lord occupies the putra-sign (fifth), and the lord of the pitṛ-sthāna (ninth) is in the eighth, there is suta-kṣaya from pitṛ-śāpa — as the śāstra names that result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्वामी विन्यास)। शर्तें भाव-संख्याओं पर टिकी हैं: व्यय = १२, लग्न = १, रन्ध्र = ८, पुत्र = ५, पितृस्थान = ९; “राशिग/भावस्थ” = उस भाव की राशि/स्थान में अधिपति की उपस्थिति। गणना = जन्म-लग्न से भाव-मानचित्र पर स्वामियों का स्थान-निर्धारण; फल = पाठ का नामित कथन।

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83.30
रोगेशे पुत्रभावस्थे पितृस्थानाधिपे रिपौ ।
कारके राहुसंयुक्ते पितृशापात् सुतक्षयः
rogeśe putrabhāvasthe pitṛsthānādhipe ripau |
kārake rāhusaṃyukte pitṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोगेश = षष्ठेश (रोग-भाव = ६); पुत्रभावस्थ = पञ्चम भाव में स्थित; पितृस्थानाधिप = नवमेश; रिपौ = रिपु-भाव (षष्ठ) में; कारके = (प्रसंगानुसार) कारक-ग्रह (पुत्र/विषय-कारक; पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव); राहुसंयुक्त = राहु से युक्त; पितृशापात् सुतक्षयः = पितृ-शाप से सुतक्षय (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब रोगेश पुत्रभाव में हो, पितृस्थान का अधिपति रिपु (षष्ठ) में हो, और कारक राहु से संयुक्त हो, तो यह योग पितृ-शाप से सुतक्षय का फल बताता है। यहाँ षष्ठ–पञ्चम–नवम की अधिपति-स्थितियाँ तथा कारक–राहु युति एक ही फल-सूत्र में बाँधी गई हैं। “कारक” का सटीक ग्रह-निश्चय संस्करण/परम्परा पर निर्भर हो सकता है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states: with the sixth-lord in the fifth, the pitṛ-sthāna lord in the enemy-house (sixth), and the kāraka conjoined with Rāhu, suta-kṣaya is named as arising from pitṛ-śāpa. Which planet is meant by “kāraka” may vary by recension/tradition (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (स्वामी-स्थान + युति-शर्त)। जाँच-बिन्दु: रोगेश ∈ भाव ५; पितृस्थानाधिप ∈ भाव ६; कारक ⊙ राहु (एक ही राशि/भाव में युति — युति-परिभाषा परम्परा-निर्भर)। कोई दशा-वर्ष या बलांक यहाँ नहीं दिया।

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83.31
तद्दोषपरिहारार्थं गयाश्राद्धं च कारयेत् ।
ब्राह्मणान् भोजयेदत्र अयुतं वा सहस्रकम्
taddoṣaparihārārthaṃ gayāśrāddhaṃ ca kārayet |
brāhmaṇān bhojayedatra ayutaṃ vā sahasrakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष-परिहारार्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; गयाश्राद्धम् = गया में श्राद्ध-कर्म; कारयेत् = कराए; ब्राह्मणान् भोजयेत् = ब्राह्मणों को भोजन कराए; अयुतम् = दस सहस्र (10,000); वा = अथवा; सहस्रकम् = एक सहस्र (1,000)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस (पितृ-शाप) दोष के निवारण के लिए गया में श्राद्ध कराना चाहिए, और वहाँ दस हजार अथवा एक हजार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। यह विधान-कथन है; इसे दबाव या भय के रूप में नहीं, शास्त्र-निर्दिष्ट उपाय के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है।

English rendering The text states that to remove that fault one should have the Gayā-śrāddha performed and there feed ten thousand — or a thousand — Brāhmaṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ शब्द-संख्या (bhūtasaṃkhyā-रीति की सामान्य संख्या) डिजिट-निष्ठ रूप से डिकोड होती है:
अयुत = 10⁴ = 10,000; सहस्र = 10³ = 1,000।
अतः निर्दिष्ट विकल्प = {10,000, 1,000} भोज्य-ब्राह्मण।

उदाहरण (worked example) पाठ दो परिमाण देता है — अधिकतम अयुत = 10,000, न्यूनतम सहस्र = 1,000; इनका अनुपात 10,000 ÷ 1,000 = 10 (एक दशमलव-कोटि का अन्तर), यही "यथाशक्ति" विकल्प की सीमा-रेखा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) शब्द-संख्याओं को हम सदा अंक-निष्ठ रूप से खोलते हैं — जैसे अष्टकवर्ग-Ch.66 के रेखा-योग (सूर्य 48, चन्द्र 49 … SAV 337) को exact-`==` पर पिन किया गया, वैसे ही अयुत=10,000, सहस्र=1,000 को बिना अनुमान के दशमलव-मान पर स्थिर रखा जाता है। सहनशीलता-पट्टी (tolerance band) नहीं — यही "never-lose-again" अनुशासन है।

83.32
अथवा कन्यकादानं गोदानं च समाचरेत् ।
एवं कृते पितुः शापान्मुच्यते नाऽत्र संशयः
athavā kanyakādānaṃ godānaṃ ca samācaret |
evaṃ kṛte pituḥ śāpānmucyate nā'tra saṃśayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथवा = या फिर; कन्यकादानम् = कन्या-दान; गोदानम् = गो-दान; समाचरेत् = विधिवत करे; एवम् कृते = ऐसा करने पर; पितुः शापात् = पिता के शाप से; मुच्यते = मुक्त होता है (पाठ का कथन); नात्र संशयः = इसमें संशय नहीं (शास्त्र की निश्चयात्मक शैली)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र विकल्प देता है — कन्यादान और गोदान का आचरण। “एवं कृते” पर पाठ कहता है कि पितुः शाप से मुक्ति होती है, और “नाऽत्र संशयः” से अपनी निश्चय-भाषा जोड़ता है। यह शास्त्र का विधि–फल युग्म है; हम इसे भाग्य-प्रमाण या दबाव-उपचार के रूप में नहीं दोहराते — केवल पाठ जो कहता है, उसे स्पष्ट रखते हैं।

English rendering Alternatively, the text enjoins kanyā-dāna and go-dāna; when so done, it states release from the father’s śāpa, adding “there is no doubt here” in the śāstra’s own assertive register — reported as the text’s claim, not as our prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परिहार-विकल्प + फल-कथन। कोई संख्या, अंश या बल-इकाई नहीं; केवल विधि-द्वय (कन्यकादान, गोदान) और शास्त्रोक्त मुक्ति-फल।

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83.33
वर्धते च कुलं तस्य पुत्रपौत्रदिभिः सदा ।
ग्रहयोगवशादेवं फलं ब्रूयात् विचक्षणः
vardhate ca kulaṃ tasya putrapautradibhiḥ sadā |
grahayogavaśādevaṃ phalaṃ brūyāt vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वर्धते = बढ़ता है; कुलम् = वंश/कुल; तस्य = उसका; पुत्रपौत्रादिभिः = पुत्र-पौत्र आदि से; सदा = सदैव; ग्रहयोगवशात् = ग्रह-योगों के वश/आधार से; एवम् = इस प्रकार; फलम् = फल; ब्रूयात् = कहे; विचक्षणः = विचक्षण (कुशल ज्योतिषी)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — (उपाय करने पर) उसका कुल पुत्र-पौत्रादि से सदैव बढ़ता है; इस प्रकार विचक्षण ज्योतिषी को ग्रह-योगों के आधार पर फल कहना चाहिए। यह श्लोक पद्धति का मूल-सूत्र है — फल सदा "ग्रह-योग के वश" कहा जाए, स्वेच्छा से नहीं।

English rendering The text states that thereafter his line ever increases through sons and grandsons; thus, on the strength of the planetary combinations, let the discerning one declare the result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पद्धति-कथन (method-verse)। "ग्रहयोगवशात् … फलं ब्रूयात्" ही समूचे अध्याय का निगमन-नियम है: निवेश = परिकलित कुण्डली (ग्रह∈भाव), निर्गम = फल-लेबल; फल कुण्डली से अनुबद्ध है, ज्योतिषी की इच्छा से नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही हमारा मूल विभाजन है — "ग्रह-योग" (कौन ग्रह किस भाव/राशि/अंश में) शुद्ध गणना है, और "फल" उस पर शास्त्र का कथन। हम फल को सदा "शास्त्र कहता है" के रूप में देते हैं, कभी नियति या भय के रूप में नहीं; और भाग्य-दावे, चिकित्सा/विधिक/आर्थिक भविष्यवाणी नहीं करते। "विचक्षणः … ब्रूयात्" इसी संयम की शास्त्रीय स्वीकृति है।

83.34
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे नीचे वा पापमध्यगे ।
हिबुके पञ्चमे पापे मातृशापात् सुतक्षयः
putrasthānādhipe candre nīce vā pāpamadhyage |
hibuke pañcame pāpe mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानाधिप = पञ्चमेश; चन्द्रे = चन्द्र जब (पुत्रस्थान-अधिप हो / चन्द्र-सन्दर्भ में — अन्वय: पुत्रेश = चन्द्र, अथवा चन्द्र पुत्रेश-सम्बद्ध स्थिति); नीचे = नीच राशि में; वा = अथवा; पापमध्यग = पाप-ग्रहों के मध्य स्थित; हिबुके = चतुर्थ भाव में (हिबुक = ४, इमम् कोण); पञ्चमे = पञ्चम में; पापे = पाप-ग्रह; मातृशापात् = मातृ-शाप से; सुतक्षयः = सुतक्षय (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अब मातृ-शाप प्रसंग खोलता है। कहता है — जब पुत्रस्थान का अधिपति चन्द्र हो और वह नीच में हो अथवा पाप-मध्य में पड़ा हो, तथा हिबुक (चतुर्थ) और पञ्चम में पाप हों, तो मातृ-शाप से सुतक्षय का फल कहा गया है। हिबुक = ४ (मातृ-सम्बद्ध कोण), पञ्चम = पुत्र-स्थान — दोनों पर पाप-स्थिति पाठ की शर्त है। फल पाठ का है; “शाप” यहाँ शास्त्र-शब्दावली है, भय-वाणिज्य नहीं।

English rendering The text states: when the lord of the putra-sthāna is the Moon, and the Moon is debilitated or placed between malefics, with malefics in hibuka (the fourth) and in the fifth, suta-kṣaya is named as from mātṛ-śāpa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (नीच + पाप-मध्य + भाव-पाप)। जाँच: पुत्रेश = चन्द्र; चन्द्र ∈ नीच-राशि या दो पापों के बीच (पापमध्य — मध्य/वेष्टन की सटीक परिभाषा परम्परा-सापेक्ष, पाठ-भेद संभव); पाप ∈ भाव ४ तथा भाव ५। नीच-राशि चन्द्र के लिए वृश्चिक — यह सामान्य होरा-नियत है; अयनांश केवल देशान्तर/स्पष्ट-स्थिति के लिए घोषित करें, फल-नाम पर नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष, पुत्रेश = सूर्य नहीं बल्कि उदाहरण-शर्त: लग्न कर्क हो तो पञ्चम = वृश्चिक, पञ्चमेश = मंगल — यह श्लोक “पुत्रेश = चन्द्र” वाला योग है, अतः उपयुक्त लग्न वह जहाँ पञ्चमेश चन्द्र हो (अर्थात् पञ्चम = कर्क: लग्न = मीन)। लग्न = मीन → भाव ५ = कर्क, पुत्रेश = चन्द्र; चन्द्र यदि वृश्चिक (नीच) में हो, और भाव ४ (मिथुन) व भाव ५ (कर्क) में पाप हों — तो शास्त्र इस विन्यास को “मातृशापात् सुतक्षयः” कहता है। (भाव-गणना: समान-भाव, लग्न से गणना; अयनांश केवल ग्रह-स्पष्ट के लिए।)

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83.35
लाभे मन्दसमायुक्ते मातृस्थाने शुभेतरे ।
नीचे पञ्चमगे चन्द्रे मातृशापात् सुतक्षयः
lābhe mandasamāyukte mātṛsthāne śubhetare |
nīce pañcamage candre mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लाभे = एकादश भाव में; मन्दसमायुक्त = शनि से युक्त (मन्द = शनि); मातृस्थाने = चतुर्थ भाव में; शुभेतरे = अशुभ/पाप (शुभ-इतर) ग्रह युक्त/स्थित; नीचे = नीच में; पञ्चमगे = पञ्चम में स्थित; चन्द्रे = चन्द्र; मातृशापात् सुतक्षयः = मातृ-शाप से सुतक्षय (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब लाभ (११) में शनि का समायोग हो, मातृस्थान (४) में शुभेतर (अशुभ) स्थिति हो, और चन्द्र नीच में अथवा पञ्चम में हो, तो मातृ-शाप से सुतक्षय का फल कहा गया है। “नीचे पञ्चमगे चन्द्रे” को एक द्विधा-पठन मिलता है: नीच-स्थित चन्द्र, अथवा पञ्चम-स्थित चन्द्र — दोनों शर्त-मार्ग पाठ में “वा”-शैल से जुड़े पूर्व श्लोक के समानान्तर पढ़े जा सकते हैं; संकीर्ण अन्वय पर पाठ-भेद संभव। फिर भी फल-नाम एक ही है — मातृशापात् सुतक्षयः।

English rendering The text states: with Saturn conjoined in the eleventh (lābha), the mātṛ-sthāna (fourth) occupied by non-benefics, and the Moon debilitated or in the fifth, suta-kṣaya is named as from mātṛ-śāpa. Exact parsing of “nīce pañcame candre” may admit slight recension-sensitive nuance (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (युति + भाव-पाप + चन्द्र-स्थिति)। शर्त-मानचित्र: शनि ∈/युक्त भाव ११; भाव ४ पर शुभेतर; चन्द्र ∈ नीच या ∈ भाव ५। कोई दशा-वर्ष, बिन्दु-योग या बल-रূপ यहाँ नहीं; केवल भाव-स्थानिक योग की तार्किक जाँच।

83.36
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे लग्नेशे नीचराशिगे ।
चन्द्रे च पापसंयुक्ते मातृशापात् सुतक्षयः
putrasthānādhipe duḥsthe lagneśe nīcarāśige |
candre ca pāpasaṃyukte mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थान-अधिप = पञ्चमभाव-स्वामी; दुःस्थ = दुःस्थान/त्रिक (६–८–१२) स्थित; लग्नेश = लग्नस्वामी; नीचराशिग = नीच राशि में स्थित; चन्द्र = चन्द्रमा; पाप-संयुक्त = पापग्रह-युक्त; मातृ-शापात् = मातृ-शाप के सन्दर्भ में (शास्त्र-कथन); सुतक्षय = सन्तान-क्षय (फल-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब पुत्रस्थान (५) का स्वामी दुःस्थान में हो, लग्नेश नीच राशि में हो, और चन्द्र भी पापग्रह से युक्त हो, तो मातृशाप के सन्दर्भ में सुतक्षय का फल कहा गया है। यह तीनों स्थितियों का संयुक्त योग है; अकेले एक अंश को पूरा फल न समझें। पाठ में फल-कथन है, नियति का दावा नहीं।

English rendering The text states that when the fifth-lord is in a dusthāna, the lagna-lord is in its debilitation sign, and the Moon is joined with a malefic, the indication is loss of progeny in the context of maternal curse (mātṛśāpa).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मातृशाप–सुतक्षय योग)। स्थान-निर्णय के लिए भाव-स्वामित्व लग्न-राशि से, नीच-स्थिति राशि-स्वाभाविक नीच-बिन्दु/राशि से, और “पापसंयुक्त” युति-नियम (सामान्यतः एक ही भाव/राशि में) से पढ़ें; अयनांश/भाव-पद्धति घोषित करें।

83.37
पुत्रेशेऽष्टारिरिष्फेस्थे चन्द्रे पापांशसंगते ।
लग्ने पुत्रे च पापाढ्ये मातृशापात् सुतक्षयः
putreśe'ṣṭāririṣphesthe candre pāpāṃśasaṃgate |
lagne putre ca pāpāḍhye mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रेशे = पञ्चमेश; अष्ट-अरि-रिष्फे-स्थे = अष्टम/षष्ठ/द्वादश भाव में स्थित; चन्द्रे पापांशसंगते = चन्द्र के पाप-नवांश (पाप के अंश/वर्ग) में गत होने पर; लग्ने पुत्रे च पापाढ्ये = लग्न व पञ्चम पापग्रहों से भरे होने पर; मातृशापात् = माता के शाप से; सुतक्षयः = सन्तान-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पञ्चमेश अष्टम, षष्ठ या द्वादश भाव में हो, चन्द्र पाप-ग्रह के नवांश (अंश) में स्थित हो, और लग्न तथा पञ्चम पापग्रहों से भरे हों, तब माता के शाप से सन्तान-क्षय होता है। यहाँ "पापांश" राशि-मात्र नहीं, वर्ग-स्तर (नवांश) की दुर्बलता की ओर संकेत करता है।

English rendering The text states that when the fifth-lord is in the eighth, sixth or twelfth, the Moon has gone into a malefic's aṃśa (division), and the ascendant and fifth are crowded with malefics, loss of progeny arises from a maternal curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन; किन्तु "पापांश" एक वर्ग-गणना का सन्दर्भ है। नवांश (D9) राशि-सूचकांक:
नवांश-क्रमांक k = ⌊ (राशिगत देशान्तर mod 30°) ÷ (30°/9) ⌋ + 1, अर्थात् 3°20′ के प्रत्येक खण्ड को एक अंश। "पापांश" = वह k जिसका स्वामी/भाव पाप हो।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही षोडश-वर्ग का मर्म है जिसे हमने डिकोड किया — D9 (नवांश) 30° राशि का 9 समान चापों (3°20′ प्रत्येक) में नियतात्मक विभाजन है, शुद्ध मॉड्युलर अंकगणित। "पापांश" जैसी शर्त इसी वर्ग-स्तरीय गणना पर टिकी है; अतः राशि-बल और अंश-बल को हम अलग परत मानकर गणना करते हैं (kaal_ekavimshati_varga), फिर उस पर शास्त्र का फल-कथन रखते हैं।

83.38
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे मन्दराह्वारसंयुते ।
भाग्ये वा पुत्रभावे वा मातृशापात् सुतक्षयः
putrasthānādhipe candre mandarāhvārasaṃyute |
bhāgye vā putrabhāve vā mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थान-अधिप = पञ्चमेश; चन्द्र = चन्द्रमा (यहाँ पञ्चमेश = चन्द्र, अथवा पुत्रेश व चन्द्र दोनों—पाठ-भेद संभव); मन्द-राहु-आर = शनि, राहु, मंगल; संयुक्त = युक्त; भाग्य = नवम भाव; पुत्रभाव = पञ्चम; मातृशापात् सुतक्षयः = मातृशाप-सन्दर्भ सुतक्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब पुत्रस्थान का अधिपति चन्द्र हो और वह मन्द–राहु–आर से युक्त हो, अथवा वह योग भाग्य (९) या पुत्रभाव (५) में हो, तो मातृशाप से सुतक्षय कहा गया है। “पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे” को पञ्चमेश = चन्द्र (लग्न-विशेष) मानना स्वाभाविक है; अन्य पाठ-भेद में पुत्रेश और चन्द्र दोनों का शनि–राहु–मंगल योग भी सम्भव है—पाठ-भेद संभव। फल को नियति न बनाएँ।

English rendering The text states that when the fifth-lord is the Moon and is conjoined with Saturn, Rāhu, and Mars—whether that configuration sits in the ninth or the fifth—the named result is loss of progeny under the mātṛśāpa heading. (Reading “fifth-lord = Moon” vs. “fifth-lord and Moon” may vary—पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-युति + भाव-स्थिति)। पञ्चमेश-निर्धारण लग्न-राशि से होता है (चन्द्र तभी पञ्चमेश जब लग्न कर्क या कुम्भ-शृंखला में चन्द्र ५ का स्वामी हो—यहाँ शर्त लग्न-आश्रित); युति = समान राशि/भाव; भाग्य = ९, पुत्र = ५।

83.39
मातृस्थानाधिपे भौमे शनिराहुसमन्विते ।
चन्द्रभानुयुते पुत्रे लग्ने वा सन्ततिक्षयः
mātṛsthānādhipe bhaume śanirāhusamanvite |
candrabhānuyute putre lagne vā santatikṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मातृस्थान-अधिप = चतुर्थेश (मातृ-भाव); भौम = मंगल; शनि-राहु-समन्वित = शनि व राहु से युक्त; चन्द्र-भानु-युक्त = चन्द्र–सूर्य युक्त; पुत्रे = पञ्चम में; लग्ने वा = अथवा लग्न में; सन्तति-क्षय = सन्तान-क्षय (शास्त्र-फल; यहाँ “मातृशापात्” पद नहीं—सन्ततिक्षयः)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब मातृस्थान (४) का स्वामी भौम हो और शनि–राहु से समन्वित हो, तथा पुत्रभाव या लग्न में चन्द्र–भानु (सूर्य) का योग हो, तो सन्ततिक्षय कहा गया है। मातृेश की मंगल–शनि–राहु संगति और लग्न/पुत्र पर सूर्य–चन्द्र का योग—दो धाराओं का मिलन है। यह फल-कथन है, भय या इलाज का आदेश नहीं।

English rendering The text states: when the fourth-lord is Mars and is joined with Saturn and Rāhu, and the fifth or the lagna is joined with the Moon and the Sun, the result named is santatikṣaya (loss of progeny).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (मातृेश + लग्न/पुत्र योग)। चतुर्थेश लग्न-राशि से; “चन्द्रभानुयुते पुत्रे लग्ने वा” = सूर्य–चन्द्र युति/संगति पञ्चम या लग्न में; शनि–राहु–भौम युति एक ही राशि/भाव में पढ़ें। भाव-पद्धति (समान/श्रीपति आदि) घोषित करें।

83.40
लग्नात्मजेशौ शत्रुस्थौ रन्ध्रे मात्रधिपः स्थितः ।
पितृनाशाधिपौ लग्ने मातृशापात् सुतक्षयः
lagnātmajeśau śatrusthau randhre mātradhipaḥ sthitaḥ |
pitṛnāśādhipau lagne mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-आत्मज-ईशौ = लग्नेश (1) व पुत्रेश/आत्मजेश (5), दोनों; शत्रु-स्थौ = शत्रुभाव (6) में स्थित; रन्ध्रे = अष्टम (8) में; मातृ-अधिपः = चतुर्थेश (माता का भाव = 4); स्थितः = बैठा; पितृ-नाश-अधिपौ = पितृ-भाव (9) तथा नाश-भाव (8) के स्वामी; लग्ने = प्रथम भाव में; मातृशापात् = माता के शाप से; सुतक्षयः = सन्तति-नाश।

हिन्दी भावार्थ यहाँ पूर्वजन्म-शाप-प्रकरण के भीतर माता-शाप का योग कहा गया है। जब लग्नेश और पुत्रेश दोनों छठे (शत्रु) भाव में हों, चतुर्थेश अष्टम में बैठा हो, और नवमेश व अष्टमेश लग्न में स्थित हों — तब शास्त्र इस चित्र को माता के शाप से उत्पन्न सन्तति-हानि का संकेत मानता है। यह एक स्थान-आधारित योग-लक्षण है, कोई अनिवार्य विधान नहीं।

English rendering When the lords of the ascendant and the fifth both stand in the sixth (enemy) house, the fourth (mother's) lord in the eighth, and the lords of the ninth and eighth in the ascendant — the text reads this configuration as loss of progeny arising from a mother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-लक्षण)। फिर भी यह एक निर्धारक (deterministic) बूलियन प्रतिरूप है — भावाधिपों की स्थिति पर सत्य/असत्य — गणना नहीं, पर पूर्णतः परिभाषित पैटर्न-मिलान।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक जिस "शत्रुस्थ / दुःस्थ = दुर्बल" को गुणात्मक रूप से कहता है, वही षड्बल (Ch.27) की स्थान-बल इकाई में एक संख्या बन जाता है — शत्रु-राशि/दुःस्थान में बैठे अधिप का बल घटता है, और इंजन उसे रूप/विरूप (1 रूप = 60 विरूप) में मापकर देता है, कोई "फल-निर्णय" नहीं। इस प्रकार हम शास्त्र के गुण-कथन को मापने योग्य मान में बदलते हैं, उसे भाग्य-वचन में नहीं।

83.41
षष्ठाष्टमेशौ लग्नस्थौ व्यये मात्रधिपः सुते ।
चन्द्रजीवौ पापयुक्तौ मातृशापात् सुतक्षयः
ṣaṣṭhāṣṭameśau lagnasthau vyaye mātradhipaḥ sute |
candrajīvau pāpayuktau mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठ-अष्टम-ईशौ = षष्ठेश और अष्टमेश; लग्नस्थौ = लग्न में स्थित; व्यय = द्वादश; मातृ-अधिप = चतुर्थेश; सुते = पञ्चम में (अन्वय: व्यये मातृेश; सुते … —पाठ की संगति से); चन्द्र-जीवौ = चन्द्र और गुरु; पाप-युक्तौ = पापग्रह-युक्त; मातृशापात् सुतक्षयः = मातृशाप-सन्दर्भ सुतक्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब षष्ठेश और अष्टमेश लग्न में हों, मातृेश व्यय (१२) में हो, तथा चन्द्र और जीव (गुरु) पापयुक्त हों (पुत्र-सन्दर्भ/सुते की अन्वय-धारा में), तो मातृशाप से सुतक्षय कहा गया है। त्रिक-स्वामियों का लग्न-प्रवेश, मातृेश का व्यय-गमन, और चन्द्र–गुरु की पाप-युति—तीन परतें हैं। फल शास्त्र का है, निश्चय या भय का नहीं।

English rendering The text states: with the sixth- and eighth-lords in the lagna, the fourth-lord in the twelfth, and the Moon and Jupiter joined with malefics (in the putra-related construction of the verse), the result named is sutakṣaya under mātṛśāpa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (त्रिकेश–मातृेश–चन्द्र/गुरु)। षष्ठेश/अष्टमेश/चतुर्थेश = लग्न-राशि से भाव-स्वामी; व्यय = १२, सुत = ५; “पापयुक्त” = पापग्रह-युति या पाप-दृष्टि—परम्परा घोषित करें। कोई संख्या-सूत्र नहीं।

83.42
पापमध्यगते लग्ने क्षीणे चन्द्रे च सप्तम ।
मातृपुत्रे राहुमन्दौ मातृशापात् सुतक्षयः
pāpamadhyagate lagne kṣīṇe candre ca saptama |
mātṛputre rāhumandau mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-मध्य-गते लग्ने = लग्न पापग्रहों के बीच (पाप-कर्तरी) में; क्षीणे चन्द्रे = क्षीण/अपूर्ण चन्द्र; सप्तम(े) = सातवें भाव में; मातृ-पुत्रे = चतुर्थ (माता) व पंचम (पुत्र) भावों में; राहु-मन्दौ = राहु और शनि (मन्द); मातृशापात् सुतक्षयः = माता के शाप से सन्तति-नाश।

हिन्दी भावार्थ जब लग्न दोनों ओर पापग्रहों से घिरा (पाप-कर्तरी) हो, क्षीण चन्द्र सप्तम में हो, तथा राहु और शनि क्रमशः माता-भाव व पुत्र-भाव में बैठे हों — शास्त्र इसे माता-शाप का योग पढ़ता है। "सप्तम" में सप्तमी विभक्ति छन्द के कारण लुप्त है (पाठ)।

English rendering When the ascendant is hemmed between malefics, a waning Moon occupies the seventh, and Rāhu with Saturn sit in the fourth and fifth (mother's and son's houses), the text reads loss of progeny through a mother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-लक्षण)। "क्षीण चन्द्र" एकमात्र संख्यात्मक-निष्ठ पद है — यह चन्द्र-सूर्य के अन्तर (तिथि/पक्ष) पर निर्भर घटती हुई शुक्ल-मात्रा है, गुणात्मक "कमज़ोरी" नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) श्लोक जिस "क्षीण चन्द्र" पर टिका है, वही षड्बल (Ch.27) के काल-बल के भीतर पक्ष-बल है — अमावास्या के निकट का चन्द्र विरूपों में शून्य के पास पहुँचता है, पूर्णिमा का चन्द्र अधिकतम। हमारा इंजन "क्षीण" को दावे के बजाय पक्ष-बल की एक गणित-संख्या के रूप में देता है (1 रूप = 60 विरूप), और यही गणित-को-व्याख्या-से-अलग रखने का अनुशासन है।

83.43
नाशस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे नाशराशिगे ।
चन्द्रमातृपतौ दुःस्थे मातृशापात् सुतक्षयः
nāśasthānādhipe putre putreśe nāśarāśige |
candramātṛpatau duḥsthe mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाशस्थान = ८वाँ भाव (विनाश/मृत्यु-स्थान); अधिपे = उस भाव का स्वामी; पुत्रे = पुत्र-स्थान (५वाँ भाव); पुत्रेशे = ५वें का स्वामी; नाशराशिगे = नाश-राशि/८वें में स्थित; चन्द्र-मातृपतौ = चन्द्र तथा मातृ-पति (४थे का स्वामी); दुःस्थे = दुःस्थान (६/८/१२) में; मातृशापात् = मातृ-शाप से (शास्त्र-कथन); सुतक्षयः = सन्तान-ह्रास/सुत-क्षय (फल-पद)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब नाशस्थान (८वें) का अधिपति पुत्रभाव में हो और पुत्रेश नाश-राशि में बैठा हो, तथा चन्द्र और मातृ-पति दोनों दुःस्थानों में हों, तब यह योग “मातृशाप से सुतक्षय” के रूप में कहा गया है। यह फल-सूत्र है, न कि कोई निश्चित नियति। पाठ में योग-संयोजन और नामित फल दोनों स्पष्ट हैं।

English rendering The text states: when the lord of the 8th occupies the 5th, the 5th-lord occupies the 8th-sign/house, and the Moon and the mother’s lord are both in dusthānas, progeny-loss is indicated under the rubric of mātṛ-śāpa.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भाव-स्वामी स्थिति योग)। जाँच केवल स्थिति-सत्य है: ८-स्वामी ∈ ५; ५-स्वामी ∈ ८; चन्द्र और ४-स्वामी ∈ {६,८,१२}—यह विन्यास-मिलान है, संख्या-गुणन नहीं।

83.44
चन्द्रक्षेत्रे यदा लग्ने कुजराहुसमन्विते ।
चन्द्रमन्दौ पुत्रसंस्थौ मातृशापात् सुतक्षयः
candrakṣetre yadā lagne kujarāhusamanvite |
candramandau putrasaṃsthau mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रक्षेत्रे = चन्द्र की राशि में; यदा = जब; लग्ने = लग्न में; कुज-राहु-समन्विते = मंगल और राहु से युक्त; चन्द्र-मन्दौ = चन्द्र और शनि; पुत्रसंस्थौ = पुत्र-स्थान (५वें) में स्थित; मातृशापात् = मातृ-शाप से; सुतक्षयः = सुत-क्षय (शास्त्र-फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब लग्न चन्द्र-क्षेत्र में हो और वहाँ कुज तथा राहु साथ हों, तथा चन्द्र और मन्द दोनों पुत्रस्थान में हों, तब भी यही फल “मातृशापात् सुतक्षय” कहा गया है। यहाँ लग्न-राशि, ग्रह-युति और ५वें की स्थिति—तीनों शर्तें एक साथ बाँधी गई हैं।

English rendering The text states: when the lagna is in a lunar sign and is joined by Mars and Rāhu, and the Moon and Saturn both occupy the 5th, the same indication of suta-kṣaya from mātṛ-śāpa is given.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (लग्न-राशि + युति + भाव-स्थिति)। चन्द्रक्षेत्र = र/क/क/क/सिं? नहीं—चन्द्र की स्व-राशि = कर्क (पाठ में “क्षेत्र” = स्व-राशि/स्वामित्व-क्षेत्र; पाठ-भेद संभव यदि “चन्द्र-नवांश/अन्य” पढ़ा जाए)। गणना नहीं, केवल स्थान-मिलान।

83.45
लग्ने पुत्रे मृतौ रिष्फे कुजो राहू रविः शनिः ।
मातृलग्नाधिपौ दुःस्थौ मातृशापात् सुतक्षयः
lagne putre mṛtau riṣphe kujo rāhū raviḥ śaniḥ |
mātṛlagnādhipau duḥsthau mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने पुत्रे मृतौ रिष्फे = क्रमशः लग्न (1), पुत्र (5), मृत्यु/अष्टम (8), रिष्फ/द्वादश (12) में; कुजो राहू रविः शनिः = मंगल, राहु, सूर्य, शनि (उसी क्रम में); मातृ-लग्न-अधिपौ = चतुर्थेश (माता) और लग्नेश; दुःस्थौ = दोनों दुःस्थान में; मातृशापात् सुतक्षयः = माता के शाप से सन्तति-नाश।

हिन्दी भावार्थ जब चार पापग्रह — मंगल लग्न में, राहु पंचम में, सूर्य अष्टम में और शनि द्वादश में — क्रमशः स्थित हों, तथा चतुर्थेश और लग्नेश दोनों दुःस्थान में पड़े हों — शास्त्र इसे माता-शाप-जनित सन्तति-क्षय मानता है। "क्रमात्" शब्द अन्तर्निहित है: ग्रह और भाव यथाक्रम जोड़े जाते हैं।

English rendering With Mars in the ascendant, Rāhu in the fifth, the Sun in the eighth, and Saturn in the twelfth (each in that order), while the fourth and ascendant lords are both ill-placed, the text reads loss of progeny from a mother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (योग-लक्षण)। यहाँ एकमात्र "गणित" क्रमबद्ध प्रतिचित्रण (ordered mapping) है — चार ग्रहों की सूची को चार भावों की सूची पर 1-1 जोड़ना; यह क्रम-निष्ठ पैटर्न है, अंकगणितीय राशि नहीं।

83.46
नाशस्थानं गते जीवे कुजराहुसमन्विते ।
पुत्रस्थानौ मन्दचन्द्रौ मातृशापात् सुतक्षयः
nāśasthānaṃ gate jīve kujarāhusamanvite |
putrasthānau mandacandrau mātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाशस्थानं गते = ८वें भाव को प्राप्त; जीवे = गुरु; कुज-राहु-समन्विते = मंगल-राहु युक्त; पुत्रस्थानौ = पुत्र-स्थान में (द्विवचन); मन्द-चन्द्रौ = शनि और चन्द्र; मातृशापात् = मातृ-शाप से; सुतक्षयः = सुत-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब गुरु नाशस्थान में जाकर कुज और राहु से युक्त हो, तथा मन्द और चन्द्र दोनों पुत्रस्थान में हों, तब भी यही फल “मातृशापात् सुतक्षय” कहा गया है। यहाँ गुरु की ८वीं स्थिति + क्रूर/छाया युति, और ५वें में शनि-चन्द्र—दोहरे संयोजन का फल-कथन है।

English rendering The text states: when Jupiter has gone to the 8th and is joined by Mars and Rāhu, while Saturn and the Moon both stand in the 5th, progeny-loss under mātṛ-śāpa is again the stated result.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गुरु ∈ ८ + कुज/राहु युति; शनि, चन्द्र ∈ ५)। “युति” का व्यावहारिक मापदण्ड गृह/राशि-सहस्थिति या डिग्री-सन्निकर्ष—परम्परा-निर्भर; इस श्लोक में डिग्री-सीमा नहीं दी गई।

83.47
एवं योगं बुधैदृष्ट्वा विज्ञेया त्वनपत्यता ।
ततः सन्तानरक्षार्थं कर्त्तव्या शान्तिरुत्तमा
evaṃ yogaṃ budhaidṛṣṭvā vijñeyā tvanapatyatā |
tataḥ santānarakṣārthaṃ karttavyā śāntiruttamā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; योगं = (उपर्युक्त) योगों को; बुधैः = विद्वानों द्वारा; दृष्ट्वा = देखकर/विचार कर; विज्ञेया = जान लेनी चाहिए; तु = ही; अनपत्यता = सन्तान-हीनता; ततः = तब; सन्तान-रक्ष-अर्थं = सन्तति की रक्षा हेतु; कर्त्तव्या = करनी चाहिए; शान्तिः उत्तमा = उत्तम शान्ति-कर्म।

हिन्दी भावार्थ इस तरह पूर्वोक्त योगों को देखकर विद्वानों को सन्तान-हीनता का अनुमान करना चाहिए; और तब सन्तति की रक्षा के लिए उत्तम शान्ति-कर्म करना चाहिए। यह प्रकरण का सन्धि-श्लोक है — योग-दर्शन से उपाय-विधान की ओर संक्रमण।

English rendering Having thus examined these combinations, the wise should infer childlessness; and then, for the protection of progeny, an excellent propitiatory rite is to be performed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपदेश/निर्देश (विधि-सूत्र)। श्लोक स्वयं विधि है: योग → अनुमान → शान्ति — एक प्रक्रिया-कथन, न कि गणना।

हमारा डिकोड (Our Decode) "बुधैः दृष्ट्वा विज्ञेया अनपत्यता" — विद्वान् योग देखकर अनुमान लगाए — यही हमारे अनुशासन (CLAUDE.md + oracle) का बिन्दु है: जो संख्यात्मक है (बल → षड्बल Ch.27, न्यास → वर्ग-इंजन) उसे `==` से पिन कर के गणें, और जो फल है उसे "शास्त्र कहता है" कहकर रखें — योग को कभी भाग्य-निर्णय में न बदलें। अनुमान शास्त्र का है; गणित हमारा।

83.48
सेतुस्नानं प्रकर्तव्यं गायत्रीलक्षसंख्यका ।
रौप्यमात्रं पयः पीत्वा ग्रहदानं प्रयत्नतः
setusnānaṃ prakartavyaṃ gāyatrīlakṣasaṃkhyakā |
raupyamātraṃ payaḥ pītvā grahadānaṃ prayatnataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सेतु-स्नानं = सेतु (रामेश्वरादि) पर स्नान; प्रकर्तव्यं = अवश्य करना; गायत्री = गायत्री-जप; लक्ष-संख्यका = लक्ष-संख्याक (१,००,०००); रौप्य-मात्रं = चाँदी की मात्रा/रजत-मात्र; पयः = दूध; पीत्वा = पीकर; ग्रह-दानं = ग्रह-सम्बन्धी दान; प्रयत्नतः = यत्नपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस शान्ति-क्रम में सेतु-स्नान, गायत्री का लक्ष-जप, रौप्य-मात्र दूध-पान, और यत्न से ग्रह-दान कहता है। संख्या “लक्ष” शब्द से स्पष्ट है; दान-विधि का विस्तार इस पद्य में नहीं। यह विधि-वर्णन है—न तो चिकित्सा-निर्देश, न दबाव-उपाय; केवल पाठ का कर्म-सूचीकरण।

English rendering The text prescribes setu-bathing, Gāyatrī recited a lakh times, drinking milk measured against silver, and careful graha-dāna as the śānti sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-संख्या। लक्ष = १ × १०⁵ = १,००,००० (गायत्री-जप गणना)। “रौप्यमात्रं” = द्रव्य-मात्रा का पारम्परिक मापदण्ड; यहाँ कोई खगोलीय अंश/बल-इकाई नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि गायत्री १,००० जप/दिन की दर से की जाए, तो १,००,००० ÷ १,००० = १०० दिन—यह केवल जप-गणना का अनुपात है, फल की “सफलता-गारंटी” नहीं।

83.49
ब्राह्मणान् भोजयेत्तद्वदश्वत्थस्य प्रदक्षिणम् ।
कर्तव्यं भक्तियुक्तेन चाष्टोत्तरसहस्रकम्
brāhmaṇān bhojayettadvadaśvatthasya pradakṣiṇam |
kartavyaṃ bhaktiyuktena cāṣṭottarasahasrakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; भोजयेत् = भोजन कराना; तद्वत् = उसी प्रकार/तदनुसार; अश्वत्थस्य = पीपल (अश्वत्थ) का; प्रदक्षिणम् = प्रदक्षिणा; कर्तव्यं = करना चाहिए; भक्ति-युक्तेन = भक्ति से युक्त होकर; च = और; अष्टोत्तर-सहस्रकम् = सहस्र + आठ = १,००८।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है—ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए, और भक्तिपूर्वक अश्वत्थ की अष्टोत्तरसहस्र (१,००८) प्रदक्षिणा करनी चाहिए। यह ८३.४८ की शान्ति-सूची का पूरक पद्य है। संख्या भौत-संख्यानुसार स्पष्ट है; फल-निश्चय या भय-भाषा यहाँ नहीं जोड़नी।

English rendering The text further states: one should feed brāhmaṇas and, with devotion, perform 1,008 circumambulations of the aśvattha tree.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-संख्या (प्रदक्षिणा-गणना)। अष्टोत्तरसहस्रक = सहस्र (१,०००) + अष्ट (८) = १,००८। ग्रह-रेखा/वर्ग/दशा-सूत्र नहीं—केवल कर्म-गणना का पूर्णांक।

उदाहरण (worked example) १,००८ प्रदक्षिणा यदि १२/दिन की दर से पूर्ण की जाएँ, तो १,००८ ÷ १२ = ८४ दिन—यह केवल गणना-उदाहरण है; शास्त्र यहाँ अवधि नहीं बाँधता।

83.50
एवं कृते महादेवि शापान्मोक्षो भविष्यति ।
सुपुत्रं लभते पश्चात् कुलवृद्धिश्च जायते
evaṃ kṛte mahādevi śāpānmokṣo bhaviṣyati |
suputraṃ labhate paścāt kulavṛddhiśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं कृते = ऐसा करने पर; महादेवि = हे महादेवी (पार्वती को सम्बोधन); शापात् मोक्षः = शाप से मुक्ति; भविष्यति = होगी; सुपुत्रं लभते = श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है; पश्चात् = तदनन्तर; कुल-वृद्धिः = वंश-वृद्धि; जायते = होती है।

हिन्दी भावार्थ हे महादेवी! ऐसा शान्ति-कर्म करने पर शाप से मुक्ति होती है — तत्पश्चात् जातक सुपुत्र पाता है और कुल की वृद्धि होती है, ऐसा शास्त्र कहता है। यह संवाद शिव-पार्वती के बीच है, इसी से "महादेवि" सम्बोधन आया है।

English rendering When this is done, O Mahādevī, release from the curse follows; thereafter — so the text states — one obtains a worthy son and the lineage increases.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शाप-मोक्ष)। यह शास्त्र का अपना फल-वचन है — इसे "शास्त्र कहता है" के रूप में पढ़ें, निश्चित परिणाम या नियति के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "शापात् मोक्षः / सुपुत्रं लभते" जैसे वाक्यों को हमारा फ्रेमिंग-अनुशासन शास्त्र का कथन (शास्त्र कहता है) मानकर प्रस्तुत करता है — न कि हमारे द्वारा समर्थित भविष्यवाणी, और न ही उपाय को दबाव के रूप में। यही dossier की मूल विधि है: गणित (वर्ग/बल/अष्टकवर्ग) को व्याख्या से अलग रखना, फल को टेक्स्ट की आवाज़ में छोड़ना, remedies-as-pressure से बचना।

83.51
अथो योगान् प्रवक्ष्यामि भ्रातृशापसमुद्भवान् ।
यज्ज्ञात्वाऽपत्यरक्षार्थं यत्नं कुर्याद् विचक्षणः
atho yogān pravakṣyāmi bhrātṛśāpasamudbhavān |
yajjñātvā'patyarakṣārthaṃ yatnaṃ kuryād vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथो = अब; योगान् = योगों को; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; भ्रातृशाप-समुद्भवान् = भ्रातृ-शाप से उत्पन्न; यत् = जिन्हें; ज्ञात्वा = जानकर; अपत्य-रक्षार्थम् = संतान-रक्षा के लिए; यत्नम् = प्रयत्न; कुर्यात् = करे; विचक्षणः = विवेकी / चतुर (ज्योतिष-ज्ञ)।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य भ्रातृ-शाप से उत्पन्न योगों का कथन आरंभ करते हैं। शास्त्र का निर्देश है कि इन योगों को जानकर विचक्षण जन अपत्य-रक्षा के लिए यत्न करे। यह अध्याय-खंड का प्रस्तावना-श्लोक है—अगले श्लोकों में भ्रातृस्थान, पुत्रभाव आदि की योग-संयोजनाएँ आएंगी।

English rendering Now I shall declare the yogas that arise from a fraternal curse; knowing them, the discerning one should make effort for the protection of offspring.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना / योग-सूची का आरंभ। “भ्रातृशाप” यहाँ फल-वर्ग का नाम है; अगले श्लोक गृह-स्वामी-संयोगों से योग परिभाषित करेंगे—गणना नहीं, संयोजन-नियम।

83.52
भ्रातृस्थानाधिपे पुत्रे कुजराहुसमन्विते ।
पुत्रलग्नेश्वरौ रन्ध्रे भ्रातृशापात् सुतक्षयः
bhrātṛsthānādhipe putre kujarāhusamanvite |
putralagneśvarau randhre bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृस्थान-अधिपे = तृतीय भाव के स्वामी में/के; पुत्रे = पंचम (पुत्र) भाव में; कुज-राहु-समन्विते = मंगल और राहु से युक्त; पुत्र-लग्नेश्वरौ = पंचमेश और लग्नेश; रन्ध्रे = अष्टम भाव में; भ्रातृशापात् = भ्रातृ-शाप से; सुतक्षयः = पुत्र-हानि / संतान-क्षय (शास्त्र-कथित फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब भ्रातृस्थान (३) का स्वामी पुत्र-भाव (५) में कुज-राहु से युक्त हो, और पुत्रेश तथा लग्नेश दोनों रन्ध्र (८) में हों, तो भ्रातृ-शाप से सुतक्षय का योग बताया गया है। यह भाव-स्वामी-ग्रह-स्थिति का संयोजन है; फल शास्त्र का अपना कथन है, नियति नहीं।

English rendering The text states: when the lord of the third is in the fifth conjoined with Mars and Rāhu, and the lords of the fifth and the lagna occupy the eighth, loss of offspring is indicated as arising from a fraternal curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त (भाव-अनुक्रमणिका; लग्न = H₁):
(1) Lord(H₃) ∈ H₅ ∧ {Kuja, Rāhu} conjoin Lord(H₃) in H₅
(2) Lord(H₅) ∈ H₈ ∧ Lord(H₁) ∈ H₈
फल-पद: भ्रातृशापात् सुतक्षयः — शास्त्र-कथित संकेत, न कि निश्चित घटना। भाव-गणना लग्न-सापेक्ष पूर्ण राशियों (१…१२) पर; अयनांश/गृह-प्रणाली यहाँ प्रवेश नहीं—केवल राशि-भाव-स्वामित्व।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष → H₃ = मिथुन (स्वामी बुध), H₅ = सिंह (सूर्य), H₈ = वृश्चिक (मंगल)। शर्त (1): बुध सिंह में मंगल+राहु से युक्त। शर्त (2): सूर्य और मंगल दोनों वृश्चिक में। दोनों सत्य हों तो शास्त्र इस योग को भ्रातृशाप-सुतक्षय कहता है। (परंपरागत पूर्ण-राशि भाव; डिग्री-विभाजन इस श्लोक में नहीं।)

83.53
लग्ने सुते कुजे मन्दे भ्रातृपे भाग्यराशिगे ।
कारके नाशभावस्थे भ्रातृशापात् सुतक्षयः
lagne sute kuje mande bhrātṛpe bhāgyarāśige |
kārake nāśabhāvasthe bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = तनु-भाव (प्रथम); सुते = पुत्र-भाव (पञ्चम); कुजे = मङ्गल; मन्दे = शनि; भ्रातृपे = तृतीयेश (सहज-भाव का स्वामी); भाग्यराशिगे = नवम राशि में स्थित; कारके = पुत्र-कारक (नैसर्गिक — गुरु); नाशभावस्थे = विनाश-स्थान (प्रायः अष्टम/रन्ध्र) में; भ्रातृशापात् = भ्राता के शाप से; सुतक्षयः = सन्तान-हानि।

हिन्दी भावार्थ जब लग्न और पञ्चम भाव में मङ्गल तथा शनि बैठे हों, तृतीयेश (भ्रातृप) नवम राशि में हो, और पुत्रकारक गुरु अष्टम (नाश) भाव में स्थित हो — तब शास्त्र इस योग को "भ्रातृशाप"-जनित सन्तान-क्षय कहता है। यह पूर्वजन्म के भ्रातृ-सम्बन्धी दोष की ओर संकेत करने वाला ग्रह-लक्षण है, कोई अवश्यम्भावी विधान नहीं।

English rendering When Mars and Saturn occupy the 1st and 5th, the 3rd-lord stands in the 9th sign, and the natural putra-kāraka Jupiter sits in the 8th (the house of destruction), the text ascribes the resulting loss of progeny to a brother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल का कोई अंकगणितीय सूत्र नहीं — यह ग्रह-योग-लक्षण (फल-कथन) है। एकमात्र नियत-तंत्र भाव-गणना: लग्न-राशि L (1=मेष … 12=मीन) से भाव k की राशि Rₖ = ((L + k − 2) mod 12) + 1, और भावेश = उस राशि का स्वामी। यहाँ नाश-भाव = लग्न से अष्टम; भ्रातृप = तृतीय राशि का स्वामी।

उदाहरण (worked example) लग्न मेष (L=1) → नाश-भाव R₈ = ((1+8−2) mod 12)+1 = 8 = वृश्चिक; अतः गुरु का वृश्चिक में होना "कारके नाशभावस्थे" पूर्ण करता है। तृतीय राशि R₃ = मिथुन → भ्रातृप = बुध; बुध का नवम (धनु) में होना दूसरी शर्त।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह भाव→राशि→भावेश की निगमन-श्रृंखला उसी नियत-तांत्रिक विभाजन पर टिकी है जिस पर हमारा वर्ग-इंजन आधारित है — D1 सहित प्रत्येक षोडश-वर्ग देशांतर का शुद्ध मॉड्युलर विभाजन है (dossier §2)। योग "पढ़ना" गणना है; उसका फल शास्त्र का कथन है, हमारा अनुमोदन नहीं।

83.54
भ्रातृस्थाने गुरुर्नीचे मन्दः पञ्चमगते यदि ।
नाशस्थाने तु चन्द्रारौ भ्रातृशापात् सुतक्षयः
bhrātṛsthāne gururnīce mandaḥ pañcamagate yadi |
nāśasthāne tu candrārau bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृस्थाने = तृतीय भाव; गुरुः नीचे = गुरु अपनी नीच राशि (मकर) में; मन्दः = शनि; पञ्चमगते = पञ्चम भाव को प्राप्त; नाशस्थाने = विनाश-स्थान (अष्टम); चन्द्र-आरौ = चन्द्र और मङ्गल (द्वन्द्व); भ्रातृशापात् सुतक्षयः = भ्रातृशाप से सन्तान-हानि।

हिन्दी भावार्थ यदि गुरु तृतीय भाव में अपनी नीच राशि (मकर) में हो, शनि पञ्चम में चला जाए, और अष्टम (नाश) भाव में चन्द्र तथा मङ्गल स्थित हों — तो शास्त्र इसे भ्रातृशाप-जनित सन्तान-क्षय का योग बताता है। "नीच" यहाँ ग्रह के स्थान-बल की न्यूनता का सूचक है।

English rendering If Jupiter stands debilitated in the 3rd, Saturn moves to the 5th, and the Moon with Mars occupy the 8th, the text reads the loss of progeny as arising from a brother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-अंकगणित नहीं — ग्रह-योग-लक्षण। किन्तु "नीच" एक निश्चित राशि-शर्त है: गुरु की नीच राशि = मकर (राशि 10)। भाव-सूत्र Rₖ = ((L+k−2) mod 12)+1 से "तृतीय भाव = मकर" तभी बनता है जब R₃ = 10।

उदाहरण (worked example) R₃ = ((L+1) mod 12)+1 = 10 ⇒ (L+1) mod 12 = 9 ⇒ L = 8 = वृश्चिक। अर्थात् वृश्चिक-लग्न में ही तृतीय भाव मकर पड़ता है, जहाँ गुरु नीच होता है — यही "भ्रातृस्थाने गुरुर्नीचे" की एकमात्र लग्न-शर्त।

हमारा डिकोड (Our Decode) नीच-स्थिति स्थान-बल (षड्बल का अंग) की न्यूनता है — जो इस अध्याय की मूल कसौटी (83.7: पुत्र-कारकों के बल-हीन होने पर अनपत्यता) से सीधे जुड़ती है। हमने षड्बल को रूप/विरूप में गणनीय इकाई माना है (1 रूप = 60 विरूप; dossier §4); "नीच" वहाँ एक अंकनीय स्थान-बल-घटक है, जबकि "सुतक्षय" शास्त्र का फल-कथन मात्र।

83.55
तनुस्थानाधिपे रिष्फे भौमः पञ्चमगो यदि ।
रन्ध्रे सपापपुत्रेशे भ्रातृशापात् सुतक्षयः
tanusthānādhipe riṣphe bhaumaḥ pañcamago yadi |
randhre sapāpaputreśe bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तनुस्थानाधिपे = लग्नेश (प्रथमेश); रिष्फे = द्वादश भाव (व्यय); भौमः = मङ्गल; पञ्चमगः = पञ्चम में गत; रन्ध्रे = अष्टम भाव; सपाप-पुत्रेशे = पापग्रह-सहित पञ्चमेश (पुत्रेश); भ्रातृशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब लग्नेश द्वादश (रिष्फ/व्यय) में हो, मङ्गल पञ्चम में जाए, और पञ्चमेश किसी पापग्रह के साथ अष्टम (रन्ध्र) में बैठे — तब शास्त्र इस विन्यास को भ्रातृशाप-जन्य सन्तान-क्षय का लक्षण मानता है। तीनों ही स्थितियाँ पुत्र-कारक तत्त्वों को दुःस्थानगत/बल-हीन कर देती हैं।

English rendering When the lagna-lord lies in the 12th, Mars goes to the 5th, and the 5th-lord sits in the 8th with a malefic, the text marks this as loss of progeny from a brother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-अंकगणित नहीं — ग्रह-योग-लक्षण। तकनीक केवल भावेश-निर्धारण: लग्नेश = R₁-राशि का स्वामी, पुत्रेश = R₅-राशि का स्वामी; रिष्फ = लग्न से द्वादश, रन्ध्र = अष्टम (Rₖ = ((L+k−2) mod 12)+1)।

उदाहरण (worked example) लग्न कर्क (L=4) → लग्नेश चन्द्र; द्वादश R₁₂ = मिथुन; चन्द्र का मिथुन में होना "तनुस्थानाधिपे रिष्फे" पूर्ण करता है। पञ्चम R₅ = वृश्चिक → पुत्रेश मङ्गल; उसका अष्टम (कुम्भ) में पाप-सहित होना अन्तिम शर्त।

83.56
पापमध्यगते लग्ने पापमध्ये सुतेऽपि च ।
लग्नेशपुत्रपौ दुःस्थौ भ्रातृशापात् सुतक्षयः
pāpamadhyagate lagne pāpamadhye sute'pi ca |
lagneśaputrapau duḥsthau bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पाप-मध्य-गते = दो पापों के मध्य स्थित; लग्ने = लग्न में/का; पाप-मध्ये = पापों के बीच; सुते = पंचम में; अपि च = भी; लग्नेश-पुत्रपौ = लग्नेश और पुत्रेश; दुःस्थौ = दुःस्थान (६/८/१२) में स्थित; भ्रातृशापात् सुतक्षयः = भ्रातृ-शाप से सुतक्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्न पाप-मध्यगत हो, सुत-भाव भी पाप-मध्य में हो, और लग्नेश तथा पुत्रेश दोनों दुःस्थ हों, तो भ्रातृ-शाप से सुतक्षय। “पापमध्य” = दो पाप-ग्रहों के बीच का भाव/राशि (कार्करी/पार्श्व-पाप); दुःस्थ = षष्ठ, अष्टम, द्वादश। फल शास्त्र का संकेत है, न कि अनिवार्य घटना।

English rendering The text states: when the lagna is hemmed by malefics, the fifth likewise stands between malefics, and both the lagna-lord and the fifth-lord occupy dusthānas, loss of offspring is indicated from a fraternal curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) योग-शर्त (पूर्ण-राशि, लग्न = H₁):
(1) Pāpa-madhya(H₁): ∃ pāpa in H₁₂ ∧ ∃ pāpa in H₂ (लग्न दोनों ओर पाप से “घिरा”)
(2) Pāpa-madhya(H₅): ∃ pāpa in H₄ ∧ ∃ pāpa in H₆
(3) Lord(H₁) ∈ {H₆, H₈, H₁₂} ∧ Lord(H₅) ∈ {H₆, H₈, H₁₂}
फल: भ्रातृशापात् सुतक्षयः। (कुछ पाठों में पापमध्य राशि-स्तर पर भी लिया जाता है—पाठ-भेद संभव।)

उदाहरण (worked example) लग्न = मीन। H₁₂ = कुंभ में शनि, H₂ = मेष में मंगल → लग्न पापमध्य। H₄ = मिथुन में राहु, H₆ = सिंह में सूर्य → पंचम (कर्क) पापमध्य। लग्नेश गुरु H₈ (तुला) में; पंचमेश चंद्र H₆ (सिंह) में। तीनों शर्तें पूर्ण—शास्त्र इस विन्यास को भ्रातृशाप-सुतक्षय कहता है।

83.57
कर्मेशे भ्रातृभावस्थे पापयुक्ते तथा शुभे ।
पुत्रगे कुजसंयुक्ते भ्रातृशापात् सुतक्षयः
karmeśe bhrātṛbhāvasthe pāpayukte tathā śubhe |
putrage kujasaṃyukte bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्मेश = दशम-भावेश (कर्म-स्थान का स्वामी); भ्रातृभावस्थ = तृतीय भाव में स्थित; पापयुक्ते = पाप-ग्रह से युक्त; शुभे = शुभ-ग्रह से (भी) युक्त; पुत्रगे = पुत्र-भाव (पंचम) में; कुजसंयुक्ते = मंगल से युक्त; भ्रातृशापात् = भ्रातृ-शाप से; सुतक्षयः = संतान-क्षय (शास्त्र-कथित फल)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब कर्मेश (दशमेश) भ्रातृ-भाव (तृतीय) में हो और पाप तथा शुभ दोनों से युक्त हो, और पुत्र-स्थान में कुज-योग हो, तब यह विन्यास भ्रातृ-शाप से सुतक्षय के योगों में गिना जाता है। यहाँ फल-कथन ज्योतिषीय योग-रूप में है, न कि नियति का दावा। पाप-शुभ दोनों का उल्लेख योग की मिश्रित प्रकृति की ओर संकेत करता है।

English rendering The text states that when the tenth-lord is placed in the third house, conjoined with both malefic and benefic influences, and when Mars is associated in the fifth, the configuration is classed among those of progeny-loss arising from a brother’s curse—as a śāstraic yoga-statement, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भ्रातृ-शाप–सुतक्षय योग)। भाव-स्वामी और युति की स्थिति-परीक्षा है; कोई अंश-विभाजन, बल-इकाई या दशा-अनुपात नहीं।

83.58
पुत्रस्थाने बुधक्षेत्रे शमिराहुसमन्विते ।
रिष्फे विदारौ विज्ञेयो भ्रातृशापात् सुतक्षयः
putrasthāne budhakṣetre śamirāhusamanvite |
riṣphe vidārau vijñeyo bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थाने = पञ्चम भाव; बुधक्षेत्रे = बुध की राशि (मिथुन/कन्या) में; शमि-राहु-समन्विते = शनि (शमि ≈ शनि; पाठ-भेद: शनि) और राहु से युक्त; रिष्फे = द्वादश; विदारौ = (पाठ अनिश्चित — संभवतः पाप-ग्रहयुग्म का द्वन्द्व; पाठ-भेद संभव); विज्ञेयः = जानना चाहिए; भ्रातृशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब पञ्चम भाव — जो बुध की राशि (मिथुन अथवा कन्या) हो — में शनि और राहु स्थित हों, और द्वादश (रिष्फ) में (पाप-)ग्रहयुग्म हो — तब इसे भ्रातृशाप-जनित सन्तान-क्षय जानना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहता है। "विदारौ" पद का पाठ विवादास्पद है; अन्वय-संरचना (द्वादश में युग्म) फिर भी स्पष्ट रहती है।

English rendering When the 5th (falling in a Mercury sign) holds Saturn and Rāhu, and the 12th holds a (malefic) pair, this is to be known — the text says — as loss of progeny from a brother's curse. (The word "vidārau" is textually uncertain.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-अंकगणित नहीं — ग्रह-योग-लक्षण। "बुध-क्षेत्र" पञ्चम में = राशि-शर्त: R₅ ∈ {मिथुन(3), कन्या(6)}, जहाँ R₅ = ((L+3) mod 12)+1।

उदाहरण (worked example) R₅ = 3 (मिथुन) ⇒ (L+3) mod 12 = 2 ⇒ L = 11 = कुम्भ। R₅ = 6 (कन्या) ⇒ L = 2 = वृषभ। अतः कुम्भ-लग्न (पञ्चम मिथुन) अथवा वृषभ-लग्न (पञ्चम कन्या) में ही "पुत्रस्थाने बुधक्षेत्रे" घटित होता है।

83.59
लग्नेशे भ्रातृभावस्थे भ्रातृस्थानाधिपे सुते ।
लग्नभ्रातृसुते पापे भ्रातृशापात् सुतक्षयः
lagneśe bhrātṛbhāvasthe bhrātṛsthānādhipe sute |
lagnabhrātṛsute pāpe bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नेशे = लग्नेश; भ्रातृभावस्थे = तृतीय में स्थित; भ्रातृस्थानाधिपे = तृतीयेश; सुते = पुत्र-भाव (पंचम) में; लग्नभ्रातृसुते = लग्न, भ्रातृ (३), सुत (५) में; पापे = पाप-ग्रह; भ्रातृशापात् सुतक्षयः = भ्रातृ-शाप से सुतक्षय (शास्त्र-कथित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्नेश भ्रातृ-भाव में हो, भ्रातृेश सुत-भाव में हो, और लग्न-तृतीय-पंचम तीनों में पाप हों, तो यह विन्यास भ्रातृ-शाप से सुतक्षय के योगों में आता है। यहाँ तीन शर्तें एक साथ बँधी हैं: दो स्वामियों का पारस्परिक भाव-विन्यास और तीन भावों में पाप-स्थिति। यह संरचनात्मक योग-पाठ है, न कि “अवश्यंभावी” फल का आग्रह।

English rendering The text states that when the lagna-lord occupies the third, the third-lord occupies the fifth, and malefics stand in lagna, third, and fifth, the pattern is classed as progeny-loss from a brother’s curse—reported as the śāstra’s yoga-language, not as certainty imposed on a life.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (भावेश-विनिमय + पाप-स्थिति)। लग्नेश ∈ ३, तृतीयेश ∈ ५, तथा {१,३,५} में पाप — स्थिति-तर्क; कोई संख्यात्मक गुणांक नहीं।

83.60
भ्रात्रीशे मृत्युभावस्थे पुत्रस्थे कारके तथा ।
राहुमन्देयुते दृष्टे भ्रातृशापात् सुतक्षयः
bhrātrīśe mṛtyubhāvasthe putrasthe kārake tathā |
rāhumandeyute dṛṣṭe bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रात्रीशे = तृतीयेश; मृत्युभावस्थे = अष्टम भाव में स्थित; पुत्रस्थे = पंचम में; कारके = (पुत्र-)कारक (सामान्यतः गुरु; संदर्भ-सापेक्ष); तथा = तथा; राहुमन्देयुते = राहु-शनि से युक्त; दृष्टे = दृष्ट; भ्रातृशापात् सुतक्षयः = भ्रातृ-शाप से सुतक्षय (शास्त्र-कथित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब भ्रातृेश मृत्यु-भाव (अष्टम) में हो, और पुत्र-स्थान में कारक भी राहु-मन्द (शनि) से युक्त तथा दृष्ट हो, तब यह विन्यास भ्रातृ-शाप से सुतक्षय के अन्तर्गत कहा गया है। “कारके” यहाँ पुत्र-संदर्भ का कारक-ग्रह है; पाठ-परंपरा में मुख्यतः गुरु लिया जाता है, किन्तु पद स्वयं नाम नहीं देता। फल-कथन योग-रूप में रखें।

English rendering The text states that when the third-lord is in the eighth and the (progeny) kāraka in the fifth is conjoined with Rāhu and Saturn and aspected, the configuration is listed under progeny-loss from a brother’s curse—as a stated yoga, not as a sealed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अष्टम-स्थिति + कारक-युति/दृष्टि)। दृष्टि-नियम ग्रह-सापेक्ष हैं; इस श्लोक में दृष्टि-अंश या बल-इकाई नहीं दी गई।

83.61
नाशस्थानाधिपे पुत्रे भ्रातृनाथेन संयुते ।
रन्ध्रे आरार्किसंयुक्ते भ्रातृशापात् सुतक्षयः
nāśasthānādhipe putre bhrātṛnāthena saṃyute |
randhre ārārkisaṃyukte bhrātṛśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाशस्थानाधिपे = विनाश-स्थान का स्वामी (यहाँ द्वादशेश; अष्टमेश भी संभव — अर्थ-भेद); पुत्रे = पञ्चम में; भ्रातृनाथेन संयुते = तृतीयेश (भ्रातृ-नाथ) से युक्त; रन्ध्रे = अष्टम भाव; आर-अर्कि-संयुक्ते = मङ्गल (आर) व शनि (अर्कि) से युक्त; भ्रातृशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब विनाश-स्थान का स्वामी पञ्चम में तृतीयेश के साथ बैठा हो, और अष्टम (रन्ध्र) में मङ्गल तथा शनि युक्त हों — तब शास्त्र इसे भ्रातृशाप-जन्य सन्तान-क्षय कहता है। एक ही श्लोक में "नाश" और "रन्ध्र" दोनों पृथक् आने से नाश-स्थान का अर्थ यहाँ द्वादश लेना संगत जान पड़ता है (अर्थ-भेद संभव)।

English rendering When the lord of the "house of loss" (read here as the 12th, since the 8th is named separately) joins the 3rd-lord in the 5th, and Mars with Saturn occupy the 8th, the text ascribes the loss of progeny to a brother's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) फल-अंकगणित नहीं — ग्रह-योग-लक्षण। पद-टिप्पणी: "नाश-स्थान" इस अध्याय में अस्थिर संकेतक है — प्रायः अष्टम (रन्ध्र), किन्तु 83.61 में रन्ध्र स्वतंत्र रूप से नामित होने से यहाँ द्वादश अभिप्रेत लगता है। भावेश Rₖ = ((L+k−2) mod 12)+1 से।

83.62
भ्रातृशापविमोक्षार्थं वंशस्य श्रवणं हरेः ।
चान्द्रायण्सं चरेत् पश्चात् कावेर्य्या विष्णुसन्निधौ
bhrātṛśāpavimokṣārthaṃ vaṃśasya śravaṇaṃ hareḥ |
cāndrāyaṇsaṃ caret paścāt kāveryyā viṣṇusannidhau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ्रातृशाप-विमोक्षार्थम् = भ्रातृशाप से मुक्ति हेतु; वंशस्य श्रवणं हरेः = हरि (विष्णु) के वंश-आख्यान (हरिवंश) का श्रवण; चान्द्रायणं चरेत् = चान्द्रायण व्रत का आचरण करे; पश्चात् = तत्पश्चात्; कावेर्याम् = कावेरी नदी पर; विष्णुसन्निधौ = विष्णु के सन्निधान में।

हिन्दी भावार्थ भ्रातृशाप से छूटने के लिए शास्त्र परिहार-विधि बताता है — साधक हरिवंश (हरि का वंश-आख्यान) श्रवण करे, फिर कावेरी-तट पर विष्णु के सन्निधान में चान्द्रायण व्रत का आचरण करे। यह शास्त्रोक्त विकल्प है, कोई भय या दबाव नहीं।

English rendering For release from a brother's curse, the text prescribes hearing the Hari-vaṃśa, then performing the Cāndrāyaṇa vow at the Kāverī in the presence of Viṣṇu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यहाँ फल-योग नहीं, परिहार-विधि है — किन्तु "चान्द्रायण" में एक अंकीय संरचना अन्तर्निहित है: ग्रास (पिण्ड) की संख्या तिथि के साथ बढ़ती-घटती है — शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक क्रमशः 1, 2, …, 15 ग्रास, कृष्ण-पक्ष में 15 → 1 → 0 (अमावास्या)।

उदाहरण (worked example) एक पक्ष का ग्रास-योग = Σₙ₌₁¹⁵ n = (15×16)/2 = 120; पूर्ण मास ≈ 240 ग्रास (परंपरा-भेद: यव-मध्यम/पिपीलिका-मध्यम रूप भिन्न आरम्भ-दिशा व गणना देते हैं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी पद्धति (dossier §5) गणनीय को व्याख्या से पृथक् रखती है — चान्द्रायण की तिथि-अनुसारी ग्रास-संख्या (1…15, Σ = 120/पक्ष) नियत गणना है, जबकि "शाप-विमोक्ष" शास्त्र का कथित फल है, हमारा अनुमोदित पूर्वानुमान नहीं। विधि विकल्प-रूप में प्रस्तुत है, भय-रूप में नहीं।

83.63
अश्वत्थस्थापनं कुर्याद् दशधेनूश्च दापयेत् ।
पत्नीहस्तेन पुत्रेच्छुर्भूमिं दद्यात् फलान्विताम्
aśvatthasthāpanaṃ kuryād daśadhenūśca dāpayet |
patnīhastena putrecchurbhūmiṃ dadyāt phalānvitām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अश्वत्थस्थापनम् = पीपल (अश्वत्थ) का स्थापन; कुर्यात् = करे; दशधेनूः = दस धेनुएँ; दापयेत् = दान करवाए/दे; पत्नीहस्तेन = पत्नी के हाथ से; पुत्रेच्छुः = पुत्र की इच्छा वाला; भूमिम् = भूमि; दद्यात् = दे; फलान्विताम् = फल-युक्त (उपजाऊ/फल-वृक्ष सहित)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे विधान जोड़ता है—अश्वत्थ-स्थापन करे, दस धेनुएँ दान दे, और पुत्रेच्छु व्यक्ति पत्नी के हाथ से फलान्वित भूमि दान करे। “दश” यहाँ स्पष्ट संख्या है; भूमि “फलान्विता” कही गई है। यह भी विमोक्ष/पुण्य-विधि का पाठ है, न कि चिकित्सकीय, कानूनी या आर्थिक आश्वासन। पाठ जो कहता है वही रिपोर्ट करें—न दबाव, न गारंटी।

English rendering The text further states: establish an aśvattha, give ten cows, and—desiring progeny—donate fruitful land through the wife’s hand. The numeral “ten” is explicit; the land is specified as fruit-bearing. This is traditional vidhi-language, not a medical, legal, or financial guarantee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (संख्या “दश” धेनु)। स्थिरांक: १० गौएँ; कोई वर्ग/बल/दशा-सूत्र नहीं।

83.64
एवं यः कुरुते भक्त्या धर्मपत्न्या समन्वितः ।
ध्रुवं तस्य भवेत् पुत्रः कुलवृद्धिश्च जायते
evaṃ yaḥ kurute bhaktyā dharmapatnyā samanvitaḥ |
dhruvaṃ tasya bhavet putraḥ kulavṛddhiśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; यः कुरुते भक्त्या = जो भक्तिपूर्वक करता है; धर्मपत्न्या समन्वितः = धर्मपत्नी सहित; ध्रुवम् = निश्चय ही; तस्य भवेत् पुत्रः = उसके पुत्र होता है; कुलवृद्धिः च जायते = और कुल की वृद्धि होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो पुरुष अपनी धर्मपत्नी सहित इन विधानों को भक्तिपूर्वक करता है, उसके निश्चय ही पुत्र होता है और कुल की वृद्धि होती है। यह श्लोक का फल-कथन है — पाठ का आश्वासन, न कि कोई सुनिश्चित भविष्यवाणी जिसका हम समर्थन करें।

English rendering The text states that whoever performs these rites with devotion, together with his lawful wife, will surely have a son and see his family increase.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (परिहार-फल)। "ध्रुवम्" (निश्चय) शास्त्र की भाषा है; इसे शास्त्र-वचन के रूप में पढ़ें, नियति या प्रमाणित परिणाम के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) हमारी सम्पादकीय अनुशासन-रेखा (dossier §5) फल-वचन को सदा "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत करती है — कभी नियति, निश्चितता या अनुमोदित पूर्वानुमान के रूप में नहीं। "ध्रुवं भवेत् पुत्रः" यहाँ पाठ का दावा है, गणना का निष्कर्ष नहीं।

83.65
पुत्रस्थाने बुधे जीवे कुजराहुसमन्विते ।
लग्ने मन्दे सुतभावो ज्ञेयो मातुलशापतः
putrasthāne budhe jīve kujarāhusamanvite |
lagne mande sutabhāvo jñeyo mātulaśāpataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थान = पंचम भाव (सुत-भाव); बुधे जीवे = बुध और गुरु वहाँ; कुजराहुसमन्विते = मंगल और राहु से युक्त; लग्ने मन्दे = लग्न में शनि; सुतभावः = संतति/पुत्र-विषय; ज्ञेयः = जानना चाहिए; मातुलशापतः = मातुल-शाप से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब पुत्र-स्थान (पंचम) में बुध और गुरु हों तथा वे कुज-राहु से युक्त हों, और लग्न में मंद (शनि) हो, तो सुत-भाव को मातुल-शाप से जानना चाहिए। यह एक योग-संयोजन है: पंचम की ग्रह-युति + लग्न में शनि। फल का कारण शास्त्र मातुल-शाप बताता है—भय या निश्चित विपत्ति का दावा नहीं, अपितु पाठ का संयोजन-निर्देश।

English rendering The text states: with Mercury and Jupiter in the putra-sthāna (5th), conjoined with Mars and Rāhu, and Saturn in the lagna, the matter of progeny is to be understood as arising from a maternal-uncle’s curse (mātula-śāpa). It is a placement yoga, not a numeric formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-संयोजन (भाव-ग्रह स्थिति नियम)। शर्तें: (1) 5वें भाव में बुध + गुरु; (2) वे ही कुज + राहु से युक्त; (3) लग्न में शनि → शास्त्र: सुत-भाव मातुलशापतः। राशि-अंश की गणना नहीं; केवल भाव-स्थित योग।

उदाहरण (worked example) मान लें लग्न = मेष। तब पुत्रस्थान = सिंह। यदि सिंह में बुध–गुरु–मंगल–राहु एकत्र हों और मेष में शनि हो, तो यह श्लोक का मातुल-शाप योग लागू होता है। (अयनांश/गृह-प्रणाली फल-निर्णय में अलग परत हैं; यह श्लोक केवल भाव-स्थित शर्त देता है।)

83.66
लग्नेपुत्रेश्वरौ पुत्रे बुधभौमार्किसंयुतौ ।
ज्ञेयं मातुलशापत्वाज्जनस्य सन्ततिक्षयः
lagneputreśvarau putre budhabhaumārkisaṃyutau |
jñeyaṃ mātulaśāpatvājjanasya santatikṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न-पुत्रेश्वरौ = लग्नेश (प्रथमेश) एवं पुत्रेश (पञ्चमेश), द्विवचन — दोनों भावेश; पुत्रे = पञ्चम भाव (सन्तान-स्थान) में; बुध = Mercury (D-नहीं, ग्रह); भौम = Mars (कुज/आर); अर्कि = Saturn (सूर्यपुत्र, शनि); संयुतौ = इन तीनों से युक्त (दोनों लॉर्ड); मातुलशापत्वात् = मातुल (मामा — माता के भ्राता) के शाप-भाव से; ज्ञेयम् = जान लेना चाहिए; सन्ततिक्षयः = सन्तान-हानि।

हिन्दी भावार्थ हे शिष्य, जब लग्नेश और पञ्चमेश — दोनों — एक साथ पञ्चम भाव में बैठकर बुध, मंगल और शनि से युक्त हों, तब शास्त्र कहता है कि यह मातुल (मामा) के शाप का लक्षण है, और इससे सन्तति-क्षय जानना चाहिए। यह अध्याय के मातुल-शाप-प्रकरण (श्लोक ६५ से) का ही अनुवर्तन है।

English rendering When the lords of both the ascendant and the fifth stand together in the fifth, joined by Mercury, Mars, and Saturn, the text holds this to be the mark of a maternal-uncle's curse, from which loss of progeny is to be read.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-लक्षण (फल-कथन)। तकनीकी रूप में यह एक बूलीय प्रतिबन्ध है: (लग्नेश ∈ भाव₅) ∧ (पञ्चमेश ∈ भाव₅) ∧ (भाव₅ ⊇ {बुध, भौम, अर्कि})। एकमात्र नियत-गणना यहाँ भावेश-निर्धारण है — दिये गये लग्न पर कौन-सा ग्रह १म व ५म का स्वामी बनता है, यह विशुद्ध राशि-स्वामित्व से तय होता है, कोई संख्यात्मक स्थिरांक श्लोक नहीं देता।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसिये की मुख्य अनुशासन-रेखा यहीं लागू है — "गणित को व्याख्या से अलग रखो": भावेश-अवस्थिति नियत-गणना है, परन्तु "मातुलशापात् सुतक्षयः" एक फल-कथन है। हमने इसे शास्त्र के कथन-रूप में ही रखा है ("शास्त्र कहता है"), किसी नियति या भय-दावे के रूप में नहीं — यही ==-ऑरैकल-अनुशासन का सांस्कृतिक विस्तार है।

83.67
लुप्ते पुत्राधिपे लग्ने सप्तमे भानुनन्दने ।
लग्नेशे बुधसंयुक्ते तस्यापि सन्ततिक्षयः
lupte putrādhipe lagne saptame bhānunandane |
lagneśe budhasaṃyukte tasyāpi santatikṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लुप्ते पुत्राधिपे = पुत्राधिप के लुप्त होने पर (निर्बल/अस्त/दग्ध आदि—पाठानुसार); लग्ने = लग्न में (पुत्राधिप की स्थिति, अन्वयानुसार); सप्तमे भानुनन्दने = सप्तम में भानुनन्दन (शनि); लग्नेशे बुधसंयुक्ते = लग्नेश बुध-युक्त; तस्यापि = उसके भी; सन्ततिक्षयः = संतति-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब पुत्राधिप लुप्त हो (और अन्वय के अनुसार लग्न-संबंधी स्थिति में हो), सप्तम में भानुनन्दन (शनि) हो, तथा लग्नेश बुध से युक्त हो, तो उसके भी संतति-क्षय का ज्ञान करना चाहिए। “भानुनन्दन” = सूर्य-पुत्र शनि। “लुप्त” का ठीक अर्थ (अस्त, दग्ध, नीच, मूल-त्रिकोण-हीन आदि) पाठ और टीका-परंपरा पर निर्भर है—पाठ-भेद संभव। यह भी फल-योग है, संख्या-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that when the putra-lord is lupta (lost/weakened—sense as per recension), with Bhānu-nandana (Saturn) in the seventh and the lagna-lord joined to Mercury, santati-kṣaya is indicated for that person as well.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-संयोजन + “लुप्त” की परिभाषा-निर्भर शर्त। सार: पुत्राधिप = लुप्त; सप्तम = शनि (भानुनन्दन); लग्नेश ⋂ बुध ≠ ∅ → शास्त्र: सन्ततिक्षयः। “लुप्त” को आधुनिक इंजन में स्पष्ट नियम (अस्त-अंश, दहन-सीमा, आदि) से बाँधना पड़ता है—श्लोक स्वयं अंश-सीमा नहीं देता।

उदाहरण (worked example) लग्न = वृषभ → लग्नेश = शुक्र; पुत्रस्थान = कन्या → पुत्राधिप = बुध। यदि बुध “लुप्त” (जैसे सूर्य से अस्त—परंपरागत अस्त-सीमा घोषित करें), सप्तम (वृश्चिक) में शनि हो, और शुक्र बुध-युक्त हो, तो श्लोक की रेखा लागू मानी जाती है। अस्त-अंश की संख्या इस श्लोक में नहीं है—अलग सिद्धान्त/परंपरा से लेनी होती है।

83.68
ज्ञातिस्थानाधिपे लग्ने व्ययेशेन समन्विते ।
शशिसौम्यकुजे पुत्रे विज्ञेयः सन्ततिक्षयः
jñātisthānādhipe lagne vyayeśena samanvite |
śaśisaumyakuje putre vijñeyaḥ santatikṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञातिस्थानाधिपे = ज्ञाति-स्थान के अधिपति (ज्ञाति-भाव—परंपरा में प्रायः तृतीय/संबंधि-भाव; पाठ-भेद संभव); लग्ने = लग्न में; व्ययेशेन समन्विते = व्ययेश (द्वादशेश) से युक्त; शशिसौम्यकुजे = चंद्र, बुध, मंगल; पुत्रे = पंचम में; विज्ञेयः सन्ततिक्षयः = संतति-क्षय जानना चाहिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब ज्ञाति-स्थान का अधिपति लग्न में हो और व्ययेश से युक्त हो, तथा पुत्र-भाव में शशि, सौम्य (बुध) और कुज हों, तो संतति-क्षय विज्ञेय है। ज्ञाति-स्थान का भाव-अंक कुछ संहिताओं में भिन्न गिना जाता है—यहाँ “ज्ञातिस्थान” शब्द को यथापाठ रखकर भाव-नियत संख्या को घोषित परंपरा से बाँधें। फल फिर भी शास्त्र-वाक्य है, न कि हमारा भविष्य-निर्णय।

English rendering The text states: with the lord of the jñāti-sthāna in the lagna joined to the twelfth-lord, and the Moon, Mercury, and Mars in the putra house, santati-kṣaya is to be known. The exact house number for “jñāti” may vary by convention—declare it before applying.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग-संयोजन। शर्त-रेखा: L(jñāti) ∈ bhāva 1 ∧ L(jñāti) युति L(12); तथा {चंद्र, बुध, मंगल} ∈ bhāva 5 → शास्त्र: सन्ततिक्षयः। ज्ञाति-भाव की संख्या इस श्लोक में अंक से नहीं कही—परंपरा घोषित करें (पाठ-भेद संभव)।

उदाहरण (worked example) यदि ज्ञाति = तृतीय मानें, लग्न = मिथुन → ज्ञातिस्थान = सिंह, ज्ञातिेश = सूर्य; व्यय = वृषभ, व्ययेश = शुक्र। सूर्य लग्न (मिथुन) में शुक्र-युक्त हो, और पुत्र (तुला) में चंद्र–बुध–मंगल हों, तो श्लोक की संयोजन-रेखा पूरी होती है। ज्ञाति = एकादश मानने पर भाव-मानचित्र बदल जाता है—समान श्लोक, भिन्न मैपिंग।

83.69
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुस्थापरमाचरेत् ।
वापीकूपतडागादिखननं सुतबन्धुनम्
taddoṣaparihārārthaṃ viṣṇusthāparamācaret |
vāpīkūpataḍāgādikhananaṃ sutabandhunam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; विष्णु-स्थापनम् = विष्णु-मूर्ति की प्रतिष्ठा; परम् आचरेत् = श्रेष्ठ रूप से करे; वापी = बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ); कूप = कुआँ; तडाग = तालाब; आदि = इत्यादि; खननम् = खुदवाना; सुत-बन्धुनम् = सन्तान-प्राप्ति/बन्धु-हित हेतु (पाठ-भेद संभव — सम्भवतः "सुतबन्धाय / सुतवृद्धये")।

हिन्दी भावार्थ उस दोष के शमन के लिए शास्त्र विष्णु-मूर्ति की प्रतिष्ठा तथा बावड़ी, कूप, तालाब आदि जलाशयों का खनन (लोक-हित के कार्य) करने का विधान बताता है, जिससे सन्तान-हित सधे। यह उपाय-श्लोक है, फल का नहीं।

English rendering To remove that fault, the text prescribes installing an image of Viṣṇu and having step-wells, wells, tanks and the like dug — works of public benefit — for the sake of offspring.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपाय-विधान (शान्ति-कर्म)। ध्यातव्य: विधान का "फल" जल-कर्म व प्रतिष्ठा के माध्यम से लोक-हित है — किसी संख्यात्मक ग्रह-मान की गणना यहाँ नहीं है।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसिये का "उपाय को दबाव के रूप में मत प्रस्तुत करो" नियम यहाँ लागू है। हमने इस श्लोक को शास्त्र के विधि-कथन के रूप में रखा — विष्णु-स्थापन व जल-खनन इसका अपना निर्देश है, भय या अनिवार्यता का दावा नहीं।

83.70
पुत्रवृद्धिर्भवेत्तस्य संपद्वृद्धिः प्रजायते ।
इति योगवशादेवं शान्तिं कुर्याद् विचक्षणः
putravṛddhirbhavettasya saṃpadvṛddhiḥ prajāyate |
iti yogavaśādevaṃ śāntiṃ kuryād vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रवृद्धिः = पुत्रों की वृद्धि; भवेत् तस्य = उसकी होती है; संपद्वृद्धिः = संपत्ति की वृद्धि; प्रजायते = उत्पन्न होती है; इति = इस प्रकार; योगवशात् = योग के अनुसार; एवम् = ऐसे; शान्तिम् = शांति; कुर्यात् = करे; विचक्षणः = विवेकी/निपुण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—उसके पुत्र-वृद्धि और संपद्-वृद्धि होती है; अतः योग के वश से विचक्षण इस प्रकार शांति करे। यह अध्याय-खंड का उपसंहार-फल है: पूर्व योगों और परिहार-विधि के बाद शांति का निर्देश। “भवेत् / प्रजायते” शास्त्र का फल-स्वर है—हम इसे भाग्य की गारंटी या भय-मुक्ति का विज्ञापन नहीं बनाते।

English rendering The text states that increase of progeny and of prosperity arise for him; thus, according to the yoga, the discerning practitioner should perform the śānti in this manner. It closes the sequence as a śāstraic result-and-pacification line.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शांति-निर्देश (योगवशात् शांति कुर्यात्)। संख्या, अंश या दशा-अनुपात नहीं; केवल पाठ का समापन-वाक्य कि विवेकी योगानुरूप शांति करे।

83.71
बलगर्व्व यो मर्त्यो ब्राह्मणानवमन्यते ।
तद्दोषाद् ब्रह्मशापाच्च तस्य स्यात् सन्ततिक्षयः
balagarvva yo martyo brāhmaṇānavamanyate |
taddoṣād brahmaśāpācca tasya syāt santatikṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बल-गर्वः = बल का घमण्ड (पाठ-भेद संभव — "बलगर्वाद्/बलगर्वेण"); यः मर्त्यः = जो मनुष्य; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; अवमन्यते = अपमानित करता है; तद्दोषात् = उस दोष से; ब्रह्मशापात् = ब्राह्मण के शाप से; तस्य = उसका; स्यात् = हो; सन्ततिक्षयः = सन्तान-नाश।

हिन्दी भावार्थ जो मनुष्य बल के अभिमान में ब्राह्मणों का अपमान करता है, शास्त्र कहता है कि उस दोष तथा ब्रह्म-शाप के कारण उसकी सन्तति का क्षय होता है। यह श्लोक ब्रह्मशाप-प्रकरण का आरम्भ (कारण-वचन) है — आगे इसके ग्रह-योग गिनाये जाते हैं।

English rendering The mortal who, drunk on his own strength, slights Brahmins — from that fault and from a Brahmin's curse, the text says, comes destruction of his progeny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कारण/निदान-कथन (ब्रह्मशाप-प्रकरण का प्रस्ताव)। यह श्लोक चार्ट-योग नहीं, अपितु उन योगों का हेतु-वाक्य है; इसका "क्षय" शास्त्र का नैतिक-कथन है, कोई भविष्य-दावा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) दोसिये की अनुशासन-रेखा — फल-कथन को "शास्त्र कहता है" रूप में देना, भय या नियति के रूप में नहीं — इस श्लोक पर विशेष रूप से लागू है, क्योंकि यह सीधे कारण→सन्तति-क्षय का दावा है। हमने इसे शास्त्र के अपने स्वर में रखा; अगले योग-श्लोकों में केवल ग्रह-स्थिति के तार्किक प्रतिबन्ध विश्लेषित हैं।

83.72
गुरुक्षेत्रे यदा राहुः पुत्रे जीवारभानुजाः ।
धर्मस्थानाधिपे नाशे ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
gurukṣetre yadā rāhuḥ putre jīvārabhānujāḥ |
dharmasthānādhipe nāśe brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुक्षेत्रे = बृहस्पति की राशि (धनु/मीन) में; राहुः = राहु; पुत्रे = पुत्रभाव (५वें) में; जीवारभानुजाः = जीव (गुरु) + अर (मंगल) + भानुज (शनि); धर्मस्थानाधिपे = धर्मस्थान (९वें) के स्वामी; नाशे = नाश (८वें / विनाश-स्थान) में; ब्रह्मशापात् सुतक्षयः = ब्रह्मशाप से पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब गुरु-क्षेत्र में राहु हो, पुत्रभाव में गुरु-मंगल-शनि एकत्र हों, और धर्मस्थान (९वें) का स्वामी नाश-स्थान में हो, तब ब्रह्मशाप से सुतक्षय कहा गया है। यह तीन शर्तों का योग है: राहु-गुरुक्षेत्र, पाप-गुरु का ५वाँ, और ९वें स्वामी की नाश-स्थिति। पाठ-भेद संभव जहाँ “नाशे” को केवल ८वाँ या व्यापक दुःस्थान माना जाए।

English rendering The text states: when Rāhu occupies a sign of Jupiter, Jupiter–Mars–Saturn lie in the fifth, and the ninth lord is in nāśa, loss of sons follows from a brahma-curse. It is a multi-condition yoga, not a single-planet rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / योग-शर्त। जाँच-क्रम (केवल स्थिति-परीक्षण): (1) λ_Rāhu ∈ {धनु, मीन}; (2) गुरु, मंगल, शनि ∈ भाव ५; (3) स्वामी(भाव ९) ∈ नाश (परंपरा में प्रायः भाव ८)। कोई संख्या-गुणक या बिन्दु-योग नहीं।

83.73
धर्मेशे पुत्रभावस्थे पुत्रेशे नाशराशिगे ।
जीवारराहुभिर्युक्ते ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
dharmeśe putrabhāvasthe putreśe nāśarāśige |
jīvārarāhubhiryukte brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मेशे = धर्म (९वें) का स्वामी; पुत्रभावस्थे = पुत्रभाव (५वें) में स्थित; पुत्रेशे = पुत्र (५वें) का स्वामी; नाशराशिगे = नाश-राशि (८वें) में; जीवारराहुभिः = गुरु + मंगल + राहु से; युक्ते = युक्त; ब्रह्मशापात् सुतक्षयः = ब्रह्मशाप से पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब धर्मेश पुत्रभाव में हो, पुत्रेश नाश-राशि में हो, और (संबंधित योग) गुरु-मंगल-राहु से युक्त हो, तब ब्रह्मशाप से सुतक्षय बताया गया है। ९वाँ↔५वाँ अदला-बदली और ५वें स्वामी का ८वाँ — दोनों को पाठ एक फल-सूत्र में बाँधता है। “युक्ते” का उद्देश्य (धर्मेश/पुत्रेश/भाव) पाठ-भेद संभव; योग की रीढ़ तीन ग्रह-संयोग + दो स्वामियों की स्थिति है।

English rendering The text states that with the ninth lord in the fifth, the fifth lord in a nāśa sign, and conjunction involving Jupiter, Mars and Rāhu, loss of sons is ascribed to a brahma-curse. Lords and dusthāna placement carry the yoga; the curse-label is the śāstra’s own framing.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / भाव-स्वामी योग। शर्तें: L₉ ∈ भाव ५; L₅ ∈ नाश-राशि (प्रायः भाव ८); तथा जीव-अर-राहु युति। भाव-गणना लग्न-आधारित पूर्ण-राशि भाव (equal whole-sign) या चुने हुए गृह-पद्धति पर निर्भर — परिपाटी घोषित करें।

83.74
धर्मभावाधिपे नीचे व्ययेशे पुत्रभावगे ।
राहुयुतेक्षिते वापि ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
dharmabhāvādhipe nīce vyayeśe putrabhāvage |
rāhuyutekṣite vāpi brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धर्मभावाधिपे = धर्मभाव (९वें) का स्वामी; नीचे = नीच (अधःपतन-राशि) में; व्ययेशे = व्यय (१२वें) का स्वामी; पुत्रभावगे = पुत्रभाव (५वें) में; राहुयुतेक्षिते = राहु से युक्त या दृष्ट; वा अपि = अथवा; ब्रह्मशापात् सुतक्षयः = ब्रह्मशाप से पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — धर्मभाव-स्वामी नीच में हो और व्ययेश पुत्रभाव में हो, तथा (वह / संबंधित भाव-स्वामी) राहु से युक्त या दृष्ट हो, तो ब्रह्मशाप से सुतक्षय कहा गया है। नीच-धर्मेश और १२वें स्वामी का ५वाँ — दुर्बल धर्म-पुण्य और व्यय का पुत्र-स्थान पर दबाव — यही पाठ का ढाँचा है। “वापि” राहु-युति और राहु-दृष्टि दोनों को स्वीकार करता है।

English rendering The text states: ninth lord debilitated, twelfth lord in the fifth, and Rāhu conjunct or aspecting — loss of sons from a brahma-curse. Debility, dusthāna-lordship, and Rāhu contact form the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / नीच-दृष्टि योग। नीच-जाँच राशि-स्वामी नियम से: ग्रह की राशि = उसकी नीच-राशि (उदा. गुरु-मकर, शनि-मेष, इत्यादि — प्रति-ग्रह नियत)। दृष्टि: राहु-दृष्टि परंपरा-निर्भर (पाठ-भेद संभव); युति = समान राशि/समीप्य — परिपाटी स्पष्ट करें। कोई बलांक या बिन्दु-सारणी नहीं।

83.75
जीवे नीचगते राहौ लग्ने वा पुत्रराशिगे ।
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
jīve nīcagate rāhau lagne vā putrarāśige |
putrasthānādhipe duḥsthe brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जीवे नीचगते = गुरु नीच (मकर) में; राहौ = राहु; लग्ने = लग्न में; वा = अथवा; पुत्रराशिगे = पुत्र-राशि (५वें) में; पुत्रस्थानाधिपे = पुत्रस्थान (५वें) के स्वामी; दुःस्थे = दुःस्थ (६/८/१२) में; ब्रह्मशापात् सुतक्षयः = ब्रह्मशाप से पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु नीच हो, राहु लग्न या पुत्र-राशि में हो, और पुत्रस्थान-स्वामी दुःस्थ में हो, तब ब्रह्मशाप से सुतक्षय बताया गया है। तीन स्तंभ: गुरु की नीचता, राहु का लग्न/५वाँ, और L₅ की दुःस्थिति। “दुःस्थ” शास्त्रीय त्रय ६-८-१२ है; विस्तृत सूची पाठ-परंपरा में थोड़ी भिन्न हो सकती है — पाठ-भेद संभव।

English rendering The text states that Jupiter debilitated, Rāhu in lagna or the fifth, and the fifth lord in a duḥstha house, yields loss of sons from a brahma-curse. It stacks debility, nodal occupancy, and lord-in-dusthāna.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / स्थिति-योग। जाँच: राशि(गुरु) = मकर (गुरु-नीच); भाव(राहु) ∈ {१, ५}; भाव(L₅) ∈ {६, ८, १२}। अयनांश केवल देशांतर→राशि मानचित्र के लिए; योग स्वयं शुद्ध भाव-स्वामी तर्क है।

83.76
पुत्रभावाधिपे जीवे रन्ध्रे पापसमन्विते ।
पुत्रेशे सार्कचन्द्रे वा ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
putrabhāvādhipe jīve randhre pāpasamanvite |
putreśe sārkacandre vā brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रभावाधिपे जीवे = पुत्रभाव-स्वामी जब गुरु हो / गुरु पुत्रेश हो; रन्ध्रे = रंध्र (८वें) में; पापसमन्विते = पाप-ग्रहों से युक्त; पुत्रेशे = पुत्रेश; सार्कचन्द्रे = सूर्य और चंद्र के साथ; वा = अथवा; ब्रह्मशापात् सुतक्षयः = ब्रह्मशाप से पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पुत्रभाव का स्वामी गुरु रंध्र में पाप-संयुक्त हो, अथवा पुत्रेश सूर्य-चंद्र के साथ हो, तब ब्रह्मशाप से सुतक्षय कहा गया है। दो वैकल्पिक शाखाएँ (वा): (क) गुरु-पुत्रेश + ८वाँ + पाप-युति; (ख) पुत्रेश + सूर्य-चंद्र संयोग। “पाप” यहाँ शास्त्रीय क्रूर (रवि, शनि, मंगल, राहु आदि — सूची परिपाटी-निर्भर; पाठ-भेद संभव)।

English rendering The text states two alternatives: Jupiter as fifth lord in the eighth with malefics, or the fifth lord with Sun and Moon — both framed as loss of sons from a brahma-curse. The particle vā marks parallel yogas, not a sum.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / द्वि-शाखा योग। शाखा A: L₅ = गुरु ∧ भाव(गुरु) = ८ ∧ ∃ पाप-युति। शाखा B: {सूर्य, चंद्र} ∩ राशि(L₅) युति। कोई दशा-वर्ष या वर्ग-खंडन नहीं; केवल संयोजक तर्क (AND / OR)।

83.77
मन्दांशे मन्दसंयुक्ते जीवे भौमसमन्विते ।
पुत्रेशे व्ययराशिस्थे ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
mandāṃśe mandasaṃyukte jīve bhaumasamanvite |
putreśe vyayarāśisthe brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दांशे = मन्द (शनि) के अंश/नवांश में; मन्दसंयुक्ते = शनि से युक्त; जीवे = गुरु; भौमसमन्विते = मंगल से युक्त; पुत्रेशे = पुत्र (५वें) का स्वामी; व्ययराशिस्थे = व्यय-राशि (१२वें) में; ब्रह्मशापात् सुतक्षयः = ब्रह्मशाप से पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — गुरु मन्दांश (शनि-नवांश) में हो, शनि से युक्त हो और मंगल से भी संयुक्त हो, तथा पुत्रेश व्यय-राशि में स्थित हो, तब ब्रह्मशाप से सुतक्षय बताया गया है। यहाँ राशि-योग के साथ वर्ग (अंश = नवांश D9) जुड़ता है: गुरु की D9-स्थिति शनि-स्वामी खंड में। फल फिर भी शास्त्र का कथन है — गणना से शर्त सिद्ध होती है, भविष्य की गारंटी नहीं।

English rendering The text states: Jupiter in Saturn’s aṃśa, conjunct Saturn and Mars, with the fifth lord in the twelfth — loss of sons from a brahma-curse. The verse uniquely mixes navāṃśa occupancy with rāśi conjunctions and a dusthāna lord.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नवांश (D9) खंडन — षोडशवर्ग में D9: प्रत्येक ३०° राशि → ९ समान खंड, प्रत्येक = ३०°/९ = ३°२०′। राशि-दीर्घांश λ_r ∈ [0°, 30°) के लिए खंड-सूचकांक k = ⌊λ_r / (10/3)°⌋, k = 0…8; विषम/सम राशि पर नवांश-राशि क्रम परिपाटी-निर्भर (चर/स्थिर/द्विस्वभाव नियम — BPHS Ch.6 पद्धति अपनाएँ; पाठ-भेद संभव)। “मन्दांश” = वह D9-राशि जिसका स्वामी शनि (मकर या कुंभ)। शर्त: D9(गुरु) ∈ {मकर, कुंभ} ∧ युति(गुरु, शनि) ∧ युति(गुरु, मंगल) ∧ भाव(L₅) = १२।

उदाहरण (worked example) माना गुरु की राशि-दीर्घांश (सायनांश/अयनांश जो भी चुना — यहाँ केवल वर्ग-नियम दिखाने को) कन्या १४°००′। λ_r = १४°; खंड k = ⌊१४ / (10/3)⌋ = ⌊१४ × 3/10⌋ = ⌊४.२⌋ = ४ → पाँचवाँ नवांश। कन्या (सम/द्विस्वभाव) के D9-क्रम की चुनी परिपाटी से पाँचवाँ नवांश यदि मकर निकले, तो “मन्दांश” शर्त पूर्ण; साथ शनि-मंगल कन्या में युति और L₅ भाव १२ में हो तो श्लोक की पूरी शर्त-श्रृंखला मिलती है। (अयनांश व D9-क्रम घोषित किए बिना अंश-नाम अंतिम नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) मन्दांश सीधा षोडशवर्ग के D9 (नवांश) मॉड्यूलर विभाजन से जुड़ता है — ३०° → ९ × ३°२०′, जिसे वर्ग-इंजन नियत नियम से नक्शा करता है। फल-भाग को हम भविष्यवाई नहीं मानते; केवल शर्त “गुरु का D9-स्वामी = शनि?” को exact स्थिति-जाँच से सिद्ध/असिद्ध करते हैं — गणित और फल-कथन अलग रखे जाते हैं।

83.78
लग्ने गुरुयुते मन्दे भाग्ये राहुसमन्विते ।
व्यय वा गुरुसंयुक्ते ब्रह्मशापात् सुतक्षयः
lagne guruyute mande bhāgye rāhusamanvite |
vyaya vā gurusaṃyukte brahmaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने = लग्न (D1 उदित राशि); गुरुयुते = गुरु-युक्त; मन्दे = शनि (मन्द) के साथ; भाग्ये = नवम भाव में; राहुसमन्विते = राहु से युक्त; व्यये = द्वादश भाव में; वा = अथवा; ब्रह्मशापात् = ब्राह्मण-शाप से; सुतक्षयः = सन्तान/पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब लग्न में गुरु और शनि एक साथ हों, और भाग्य-भाव (नवम) में राहु स्थित हो; अथवा व्यय-भाव (द्वादश) में गुरु किसी संयोग से युक्त हो — तो यह योग ब्रह्मशाप का संकेत माना गया है, जिससे सुतक्षय की संभावना कही गई है। यहाँ फलादेश शास्त्र-कथन है, नियति का दावा नहीं। पाठ-भेद संभव; भाव-संयोग की सूक्ष्म रीति संस्करणानुसार भिन्न हो सकती है।

English rendering The text states that Jupiter conjoined with Saturn in the lagna, with Rāhu in the ninth (bhāgya), or else Jupiter conjoined in the twelfth (vyaya), is indicated as loss of progeny arising from a brahmin’s curse (brahma-śāpa). This is the śāstra’s own claim of indication, not a verdict of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शाप-योग)। योग-जाँच D1 पर भाव-स्वामी/ग्रह-स्थिति से की जाती है: लग्न = 1, भाग्य = 9, व्यय = 12; “युक्त/समन्वित” = same-sign conjunction (same rāśi). Convention: whole-sign or degree-based yuti must be declared; the verse itself does not fix the orb.

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83.79
तस्य दोषस्य शान्त्यर्थं कुर्याच्चान्द्रायणं नरः ।
ब्रह्मकृच्छ्रत्र्यं कृत्वा धनुं दद्यात् सदक्षिणाम्
tasya doṣasya śāntyarthaṃ kuryāccāndrāyaṇaṃ naraḥ |
brahmakṛcchratryaṃ kṛtvā dhanuṃ dadyāt sadakṣiṇām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्य दोषस्य = उस (पूर्वोक्त ब्रह्मशाप-) दोष का; शान्त्यर्थम् = शमन/निवृत्ति हेतु; चान्द्रायणम् = चान्द्रायण व्रत (चन्द्र की कलाओं पर आधारित क्रमिक उपवास-प्रायश्चित्त); ब्रह्मकृच्छ्र = ब्रह्म-कृच्छ्र नामक कृच्छ्र-प्रायश्चित्त; त्र्यम् = त्रयम् = तीन (पाठ-भेद संभव: "कृच्छ्रत्र्यं" = कृच्छ्र-त्रयम्); धनुं = (पाठ-भेद संभव — प्रायः "धेनुं" = गौ) दान-द्रव्य; सदक्षिणाम् = दक्षिणा-सहित।

हिन्दी भावार्थ उस दोष की शान्ति के लिए मनुष्य चान्द्रायण व्रत करे। ब्रह्म-कृच्छ्र (यहाँ त्रयम् = तीन कृच्छ्र, पाठ-भेद संभव) करके, दक्षिणा-सहित धेनु (गौ) का दान दे। यह पूर्ण रूप से एक प्रायश्चित्त-विधि है — कोई ग्रह-गणना यहाँ नहीं, केवल शमन-कर्म का निर्देश।

English rendering For the appeasement of that fault, let a man perform the cāndrāyaṇa observance; having completed the (three) brahma-kṛcchra penances, let him give a cow together with the priestly fee.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (प्रायश्चित्त-दान)। एक ही स्पष्ट संख्या पाठ में संभावित: कृच्छ्र-त्रयम् = 3 (पाठ-भेद संभव)। ध्यातव्य — "चान्द्रायण" नाम ही चन्द्र (candra) से जुड़ा है: यह व्रत परम्परा में चन्द्र-कलाओं के अनुसार ग्रास घटाने-बढ़ाने का क्रमिक उपवास है; किन्तु ग्रास-संख्या इस श्लोक में कथित नहीं, अतः उसे श्लोक-प्रमाण मानकर नहीं गिना जाता।

83.80
पञ्चरत्नानि देयानि सुवर्णसहितानि च ।
ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चाद्यथाशक्ति द्विजोत्तम
pañcaratnāni deyāni suvarṇasahitāni ca |
brāhmaṇān bhojayet paścādyathāśakti dvijottama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चरत्नानि = पाँच रत्न (पञ्च = 5); देयानि = देने योग्य; सुवर्णसहितानि = स्वर्ण के साथ; ब्राह्मणान् भोजयेत् = ब्राह्मणों को भोजन कराए; पश्चात् = तदनन्तर; यथाशक्ति = सामर्थ्य के अनुसार; द्विजोत्तम = हे द्विज-श्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ पाँच रत्न स्वर्ण-सहित दान करने चाहिए; तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराए। हे द्विजश्रेष्ठ, यही दान-विधि पूर्वोक्त दोष-शान्ति को पूर्ण करती है। यह भी विधि-वाक्य है, गणना नहीं।

English rendering Five gems, together with gold, should be given; thereafter, O best of the twice-born, let him feed brahmins according to his means.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दान-विधि। पाठ की एकमात्र स्पष्ट संख्या: पञ्च-रत्न = 5 रत्न (बहुधा मुक्ता, माणिक्य, स्वर्ण/हेम, प्रवाल, राजावर्त आदि की सूची — सूची-भेद परम्परा-सापेक्ष)। "यथाशक्ति" शब्द दान-मात्रा को नियत संख्या से मुक्त रखता है — अर्थात् मात्रा दाता के सामर्थ्य का चर है, कोई स्थिर स्थिरांक नहीं।

83.81
एवं कृते तु सत्पुत्रं लभते नाऽत्र संशयः ।
मुक्तशापो विशुद्धात्मा स नरः सुखमेधते
evaṃ kṛte tu satputraṃ labhate nā'tra saṃśayaḥ |
muktaśāpo viśuddhātmā sa naraḥ sukhamedhate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं कृते = ऐसा करने पर; सत्पुत्रम् = सुयोग्य पुत्र; लभते = प्राप्त करता है; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं; मुक्तशापः = शाप से मुक्त; विशुद्धात्मा = शुद्ध अन्तःकरण वाला; सुखम् एधते = सुखपूर्वक समृद्ध होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — इस विधि के करने पर मनुष्य सुयोग्य पुत्र पाता है, इसमें संशय नहीं; वह शाप से मुक्त, विशुद्ध-आत्मा होकर सुख से बढ़ता है। यह फल-कथन है — पाठ का दावा, न कि कोई नियति या हमारी ओर से प्रतिज्ञा।

English rendering When this is done, the text says, one obtains a worthy son — no doubt of it; freed from the curse and pure of self, that man thrives in happiness.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शमन-फल)। "न अत्र संशयः" (इसमें संशय नहीं) एक निश्चयवाची दावा है; अनुशासन-पूर्वक इसे "शास्त्र कहता है" के रूप में रखा जाता है, किसी सुनिश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह बिन्दु है जहाँ हमारी विधि सबसे स्पष्ट है: फल-वाक्य (phala) को पाठ का कथन मानकर उद्धृत किया जाता है, नियति या निश्चितता के रूप में कभी नहीं (dossier §5 — गणित को व्याख्या से पृथक रखना; भय या दबाव-मूलक उपाय नहीं)। हमारे oracle में गणनीय राशियों (अष्टकवर्ग बिन्दु, वर्ग, दशा-वर्ष, बल) को exact-`==` से जाँचा जाता है; किन्तु "सुपुत्र मिलेगा, संशय नहीं" जैसे वाक्य गणनीय नहीं — इन्हें हम सत्यापित परिणाम नहीं, शास्त्र-वचन कहते हैं।

83.82
दारेशे पुत्रभावस्थे दारेशस्यांशपे शनौ ।
पुत्रेशे नाशराशिस्थे पत्नीशापात् सुतक्षयः
dāreśe putrabhāvasthe dāreśasyāṃśape śanau |
putreśe nāśarāśisthe patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दारेशे = सप्तमेश (दार = विवाह/कलत्र भाव); पुत्रभावस्थे = पंचम भाव में स्थित; दारेशस्यांशपे = दारेश के अंश (सामान्यतः नवांश D9) के स्वामी पर; शनौ = शनि; पुत्रेशे = पंचमेश; नाशराशिस्थे = नाश-राशि में (प्रायः अष्टम/दुस्थ — पाठ-रीति घोषित करें); पत्नीशापात् = पत्नी-शाप से; सुतक्षयः = सुत-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र एक अन्य सुतक्षय-योग पत्नीशाप के नाम से कहता है: जब दारेश पुत्रभाव (पंचम) में हो, दारेश के अंशाधिपति शनि हों, और पुत्रेश नाश-राशि में स्थित हो। यह भाव-स्वामी + अंश-स्वामी का संयुक्त संकेत है। “नाशराशि” की ठीक पहचान परंपरा में अष्टम या दुःस्थ-भाव से जोड़ी जाती है — convention घोषित करें; पाठ-भेद संभव। फल शास्त्र-कथन है, भय-वाणी नहीं।

English rendering The text states loss of progeny from the wife’s curse when the seventh-lord stands in the fifth, Saturn rules the aṃśa of that seventh-lord, and the fifth-lord occupies a “destruction” sign (nāśa-rāśi). Declare the aṃśa (normally navāṃśa) and what counts as nāśa-rāśi; the claim is the śāstra’s indication only.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शाप-योग), किन्तु जाँच-क्रम स्पष्ट है।
1) dāreśa = lord of house 7; require house(dāreśa) = 5.
2) aṃśa of dāreśa (default D9: each 30° sign → 9 × 3°20′ arcs; aṃśādhipati = lord of that D9 sign); require aṃśādhipati = Saturn.
3) putreśa = lord of house 5; require it in nāśa-rāśi (declare: 8th from lagna, or dusthāna 6/8/12 — verse says only “nāśa”).
Convention: ayanāṃśa for longitudes; whole-sign vs. degree houses; D9 mapping rule as in ṣoḍaśa-varga (BPHS Ch.6). No bindu/daśā arithmetic in this verse.

उदाहरण (worked example) Suppose lagna = Meṣa; then dāreśa = Venus (7 = Tulā), putreśa = Sun (5 = Siṃha). If Venus is in the 5th (Siṃha), Venus’s longitude falls in a navāṃśa ruled by Saturn (e.g. a Capricorn or Aquarius D9-sign under the chosen D9 sequence), and Sun is in the 8th (Vṛścika) as nāśa-rāśi — the verse’s three conditions are met as a structural check. (Ayanāṃśa and exact D9 table must be fixed before any real chart; this is only the logic of the test.)

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83.83
नाशसंस्थे कलत्रेशे पुत्रेशे नाशराशिगे ।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात् सुतक्षयः
nāśasaṃsthe kalatreśe putreśe nāśarāśige |
kārake pāpasaṃyukte patnīśāpāt sutakṣayaḥ
पाठ-स्रोत / text source: sa.wikisource.org · 2026-09-21

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाशसंस्थे = अष्टम भाव में स्थित; कलत्रेशे = सप्तमेश; पुत्रेशे = पञ्चमेश; नाशराशिगे = अष्टम राशि में गए; कारके = (पुत्र-) कारक गुरु के; पापसंयुक्ते = पाप-ग्रह से युक्त होने पर; पत्नीशापात् = पत्नी के शाप से; सुतक्षयः = सन्तान-क्षय।

हिन्दी भावार्थ पूर्वजन्म-शाप-द्योतन अध्याय का पद — शास्त्र कहता है कि सप्तमेश अष्टम में, पञ्चमेश अष्टम में और पुत्र-कारक गुरु पाप-ग्रह से युक्त हो तो पत्नी-शाप से सन्तान-क्षय कहा गया है। "शाप" अध्याय की अपनी व्याख्या-भाषा है (पूर्वजन्म-कारण का कथन); ग्रह-स्थिति की शर्त ही पठनीय अंश है — भय या उपाय-दबाव नहीं।

English rendering With the seventh lord in the eighth, the fifth lord in the eighth, and the significator (Jupiter) joined by a malefic, the text attributes loss of children to a wife's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शाप-योग (शर्त-समुच्चय)। शर्त: 7L ∈ भाव 8 ∧ 5L ∈ भाव 8 ∧ पाप ∈ युति(Ju)।

83.84
पुत्रस्थानगते शुक्रे कामपे रन्ध्रमाश्रिते ।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात् सुतक्षयः
putrasthānagate śukre kāmape randhramāśrite |
kārake pāpasaṃyukte patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानगते = पंचम भाव में गए; शुक्रे = शुक्र; कामपे = कामेश (सप्तमेश; काम = सप्तम); रन्ध्रमाश्रिते = रन्ध्र (अष्टम) में आश्रित; कारके = कारक (सन्तान-संदर्भ में प्रायः गुरु; यहाँ संयोग से स्पष्ट करें); पापसंयुक्ते = पाप-ग्रह से युक्त; पत्नीशापात् = पत्नी-शाप से; सुतक्षयः = सुत-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पुनः पत्नीशाप से सुतक्षय का एक योग कहता है: शुक्र पुत्रस्थान (पंचम) में हो, कामेश (सप्तमेश) रन्ध्र (अष्टम) में हो, और कारक पाप-ग्रह से युक्त हो। तीन शर्तों का योग पाठ में एक साथ बँधा है। “कारक” यहाँ सन्तान-कारक (गुरु) या प्रसंगानुकूल कारक हो सकता है — convention घोषित करें; पाठ-भेद संभव। यह शास्त्र-कथन है, भय या निश्चित विपत्ति नहीं।

English rendering The text states loss of progeny from the wife’s curse when Venus occupies the fifth, the lord of the seventh (kāma-pa) resorts to the eighth (randhra), and the kāraka is joined with malefics. Declare which kāraka is meant (commonly Jupiter for children); the yoga is the śāstra’s indication only.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शाप-योग)। जाँच-क्रम:
1) house(Venus) = 5;
2) house(lord of 7) = 8;
3) kāraka conjoined with ≥1 pāpa (typically Saturn, Mars, Rāhu, Ketu, Sun — declare the set).
Same-sign yuti unless a degree-orb is fixed by the edition. No varga-constant, aṣṭakavarga bindu, or daśā year in this verse.

उदाहरण (worked example) Lagna = Vṛṣabha → putra = 5th = Kanyā; kāma = 7th = Vṛścika (lord Mars); randhra = 8th = Dhanu. If Venus is in Kanyā, Mars is in Dhanu, and putra-kāraka Jupiter (declared) is with Saturn in any one sign — the three limbs of the verse’s test are satisfied as a structural checklist. (Fix ayanāṃśa and house system before applying to a live chart.)

83.85
कुटुम्बे पापसंयुक्ते कामपे नाशराशिगे ।
पुत्रे पापग्रहैर्युक्ते पत्नीशापात् सुतक्षयः
kuṭumbe pāpasaṃyukte kāmape nāśarāśige |
putre pāpagrahairyukte patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुटुम्ब = द्वितीय भाव (परिवार/धन-कुल); पापसंयुक्त = पाप-ग्रह-युत; कामप = कामेश (सप्तमेश, दार-पति); नाशराशि = अष्टम भाव/राशि; पुत्र = पञ्चम भाव (सुत-स्थान); पापग्रहैर्युक्त = पाप-ग्रहों से युत; पत्नीशाप = पत्नी-सम्बन्धी शाप/दोष-योग (शास्त्र-शब्दावली); सुतक्षय = सन्तान-हानि (फल-कथन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—जब कुटुम्ब-स्थान पाप-ग्रहों से युक्त हो, कामेश (सप्तमेश) नाश-राशि (अष्टम) में स्थित हो, और पुत्र-स्थान भी पाप-ग्रहों से युक्त हो, तो पत्नी-शाप से सुत-क्षय का योग बताया गया है। यह तीनों शर्तों का एक संयुक्त विन्यास है: द्वितीय-दोष, सप्तमेश का अष्टम-गमन, और पञ्चम का पाप-योग। फल-वाक्य शास्त्र का अपना कथन है—निश्चय या भय नहीं।

English rendering The text states that when the second house is joined by malefics, the seventh lord occupies the eighth, and the fifth is likewise with malefics, loss of progeny from the wife’s curse is indicated. It is a compound phala-yoga, reported as the śāstra’s claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (पत्नी-शाप-जन्य सुत-क्षय योग)। भाव-गणना में लग्न-से-द्वितीय, सप्तम, पञ्चम, अष्टम का क्रम-निर्धारण ही तकनीकी ढाँचा है; यहाँ कोई संख्या-सूत्र नहीं।

83.86
भाग्यस्थानगते शुक्रे दारेशे नाशराशिगे ।
लग्ने सुते च पापढ्ये पत्नीशापात् सुतक्षयः
bhāgyasthānagate śukre dāreśe nāśarāśige |
lagne sute ca pāpaḍhye patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यस्थानगते शुक्रे = शुक्र के नवम भाव (H9, भाग्य) में जाने पर; दारेशे = सप्तमेश; नाशराशिगे = नाश (अष्टम) राशि में; लग्ने सुते च = लग्न (H1) और पञ्चम (H5) में; पापाढ्ये = पापग्रहों से भरे हुए (पाठ "पापढ्ये" = पापाढ्ये); पत्नीशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब शुक्र नवम भाव में हो, सप्तमेश नाश (अष्टम) राशि में हो, और लग्न तथा पञ्चम दोनों पापग्रहों से आढ्य (भरे) हों — शास्त्र इसे पत्नी-शाप से सन्तान-क्षय का योग कहता है।

English rendering With Venus in the 9th, the 7th-lord in the sign of destruction (the 8th), and both the ascendant and the 5th laden with malefics — the text attributes childlessness to a wife's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बूलीय लक्षण: शुक्र ∈ H₉ ∧ L₇ ∈ H₈ ∧ (पाप ∈ H₁) ∧ (पाप ∈ H₅) ⟹ [शास्त्र: पत्नी-शाप-सुत-क्षय]। "पापाढ्य" = पाप-बहुल भाव; यह मात्रा-सूचक विशेषण है, नियत संख्या नहीं। भाव 9,8,1,5 नियत।

उदाहरण (worked example) मिथुन लग्न → L₇ = धनु-स्वामी = बृहस्पति; H9 = कुम्भ, H8 = मकर, H1 = मिथुन, H5 = तुला। परीक्षण: शुक्र कुम्भ (H9) में? बृहस्पति (L₇) मकर (H8) में? मिथुन व तुला दोनों में पापग्रह? सभी सत्य ⇒ शर्त पूर्ण।

83.87
भाग्यस्थानाधिपे शुक्रे पुत्रेशे शत्रुराशिगे ।
गुरुलग्नेशदारेशा दुःस्थाश्चेत् सन्ततिक्षयः
bhāgyasthānādhipe śukre putreśe śatrurāśige |
gurulagneśadāreśā duḥsthāścet santatikṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भाग्यस्थानाधिपे शुक्रे = नवमेश एवं शुक्र (के प्रभावित होने पर); पुत्रेशे = पञ्चमेश; शत्रुराशिगे = शत्रु-राशि में — अर्थात् षष्ठ भाव (H6, शत्रु/अरि) अथवा किसी शत्रु-ग्रह की राशि (व्याख्या-भेद संभव); गुरु-लग्नेश-दारेशाः = बृहस्पति, लग्नेश, सप्तमेश; दुःस्थाः चेत् = यदि दुःस्थ (6/8/12) हों; सन्ततिक्षयः = सन्तति-क्षय।

हिन्दी भावार्थ जब नवमेश तथा शुक्र (पीड़ित) हों, पञ्चमेश शत्रु-राशि (षष्ठ, अथवा शत्रु-ग्रह की राशि) में हो, और बृहस्पति, लग्नेश तथा सप्तमेश तीनों दुःस्थानगत हों — तब शास्त्र सन्तति-क्षय बताता है (यहाँ पाठ "सन्ततिक्षयः" — शाप-कर्ता स्पष्ट नामित नहीं)।

English rendering When the 9th-lord and Venus are afflicted, the 5th-lord occupies an inimical sign (the 6th, or an enemy's sign), and Jupiter, the lagna-lord, and the 7th-lord are all ill-placed — the text foretells loss of progeny.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बूलीय लक्षण: L₅ ∈ (H₆ या शत्रु-ग्रह-राशि) ∧ दुःस्थ(बृहस्पति) ∧ दुःस्थ(L₁) ∧ दुःस्थ(L₇) ⟹ [शास्त्र: सन्तति-क्षय]। यहाँ "दुःस्थ" = 6/8/12 भाव में स्थित (मानक परिभाषा)। "शत्रुराशि" द्वि-अर्थी — षष्ठ भाव या शत्रु-ग्रह-स्वामित्व की राशि; व्याख्या-भेद घोषित।

उदाहरण (worked example) वृषभ लग्न → L₅ = कन्या-स्वामी = बुध; L₁ = शुक्र; L₇ = मंगल; H6 = तुला। परीक्षण: बुध (L₅) तुला (H6) या शत्रु-ग्रह-राशि में? बृहस्पति, शुक्र (L₁), मंगल (L₇) — तीनों 6/8/12 में? सभी सत्य ⇒ शर्त पूर्ण।

83.88
पुत्रस्थाने भृगुक्षेत्रे राहुचन्द्रसमन्विते ।
व्यये लग्ने धने पापे पत्नीशापात् सुतक्षयः
putrasthāne bhṛgukṣetre rāhucandrasamanvite |
vyaye lagne dhane pāpe patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थाने भृगुक्षेत्रे = पञ्चम भाव के भृगु-क्षेत्र (शुक्र की राशि वृष/तुला) होने पर; राहुचन्द्रसमन्विते = राहु और चन्द्र से युक्त; व्यये लग्ने धने = द्वादश (H12), लग्न (H1), द्वितीय (H2) में; पापे = पापग्रह होने पर; पत्नीशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब पञ्चम भाव शुक्र की राशि (वृष/तुला) हो और वह राहु-चन्द्र से युक्त हो, तथा द्वादश, लग्न व द्वितीय में पापग्रह हों — शास्त्र इसे पत्नी-शाप से सन्तान-क्षय का योग कहता है।

English rendering When the 5th house is a sign of Venus joined by Rāhu and the Moon, and the 12th, ascendant, and 2nd hold malefics — the text ascribes childlessness to a wife's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बूलीय लक्षण: राशि(H₅) ∈ {वृष, तुला} ∧ {राहु, चन्द्र} ∈ H₅ ∧ (पाप ∈ H₁₂) ∧ (पाप ∈ H₁) ∧ (पाप ∈ H₂) ⟹ [शास्त्र: पत्नी-शाप-सुत-क्षय]। "भृगु-क्षेत्र" = शुक्र-स्वामित्व की राशि (D1 राशि-स्वामित्व); यह पञ्चम-भाव की राशि पर एक नियतात्मक प्रतिबन्ध है, कोई अंकगणित नहीं।

उदाहरण (worked example) मकर लग्न → H5 = वृषभ (भृगु-क्षेत्र ✓ स्वतः पूर्ण)। परीक्षण: वृषभ (H5) में राहु व चन्द्र? H12 (धनु), H1 (मकर), H2 (कुम्भ) में पापग्रह? सत्य होने पर श्लोक-शर्त पूर्ण। (किसी भी लग्न में H5 तभी भृगु-क्षेत्र होगा जब वह वृष या तुला पड़े — मकर व मिथुन लग्नों में क्रमशः वृष/तुला।)

83.89
सप्तमे मन्दशुक्रौ च रन्ध्रेशे पुत्रभे रवौ ।
लग्ने राहुसमायुक्ते पत्नीशापात् सुतक्षयः
saptame mandaśukrau ca randhreśe putrabhe ravau |
lagne rāhusamāyukte patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तमे मन्दशुक्रौ = सप्तम भाव (H7) में शनि व शुक्र; रन्ध्रेशे = अष्टमेश (H8 का स्वामी); पुत्रभे रवौ = पञ्चम भाव (H5) में — और सूर्य भी वहीं; लग्ने राहुसमायुक्ते = लग्न राहु से युक्त होने पर; पत्नीशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब सप्तम भाव में शनि और शुक्र हों, अष्टमेश एवं सूर्य पञ्चम भाव में हों, और लग्न राहु से युक्त हो — शास्त्र इसे पत्नी-शाप से सन्तान-क्षय का योग बताता है।

English rendering When Saturn and Venus stand in the 7th, the 8th-lord together with the Sun occupies the 5th, and the ascendant is conjoined with Rāhu — the text attributes the loss of children to a wife's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बूलीय लक्षण: {शनि, शुक्र} ∈ H₇ ∧ {L₈, सूर्य} ∈ H₅ ∧ राहु ∈ H₁ ⟹ [शास्त्र: पत्नी-शाप-सुत-क्षय]। भाव 7,8,5,1 नियत; L₈ लग्न-सापेक्ष चर। यह पूर्णतः स्थान-युति का तार्किक AND — कोई स्थिरांक नहीं।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न → L₈ = वृश्चिक-स्वामी = मंगल; H7 = तुला, H5 = सिंह, H1 = मेष। परीक्षण: तुला (H7) में शनि+शुक्र? मंगल (L₈) व सूर्य सिंह (H5) में? मेष (H1) में राहु? सभी सत्य ⇒ श्लोक-शर्त पूर्ण।

83.90
धने कुजे व्यये जीवे पुत्रस्थे भृगुनन्दने ।
शनिराहुयुते दृष्टे पत्नीशापात् सुतक्षयः
dhane kuje vyaye jīve putrasthe bhṛgunandane |
śanirāhuyute dṛṣṭe patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धने कुजे = द्वितीय भाव (H2) में मंगल; व्यये जीवे = द्वादश (H12) में बृहस्पति; पुत्रस्थे भृगुनन्दने = पञ्चम भाव (H5) में शुक्र (भृगु-नन्दन = शुक्र); शनिराहुयुते दृष्टे = शनि व राहु से युत अथवा दृष्ट; पत्नीशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब मंगल द्वितीय में, बृहस्पति द्वादश में, और शुक्र पञ्चम भाव में हो — और वह शनि-राहु से युत या दृष्ट हो — तब शास्त्र इसे पत्नी-शाप से सन्तान-क्षय का योग कहता है।

English rendering When Mars is in the 2nd, Jupiter in the 12th, and Venus in the 5th — the last conjoined with or aspected by Saturn and Rāhu — the text attributes childlessness to a wife's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बूलीय लक्षण: मंगल ∈ H₂ ∧ बृहस्पति ∈ H₁₂ ∧ शुक्र ∈ H₅ ∧ (शुक्र युत/दृष्ट {शनि, राहु}) ⟹ [शास्त्र: पत्नी-शाप-सुत-क्षय]। "भृगु-नन्दन" = शुक्र (शुक्र भृगु-ऋषि के पुत्र)। यहाँ ग्रह-नियत स्थान (मंगल, बृहस्पति, शुक्र) दिए हैं — भाव-स्वामी की गणना अनावश्यक; केवल स्थान-दृष्टि/युति का परीक्षण।

उदाहरण (worked example) किसी भी लग्न में — यदि मंगल H2, बृहस्पति H12, शुक्र H5 में हो और शुक्र पर शनि/राहु की युति या दृष्टि हो, तो शर्त पूर्ण। जैसे कर्क लग्न: H2 = सिंह (मंगल), H12 = मिथुन (बृहस्पति), H5 = वृश्चिक (शुक्र) — शुक्र को शनि/राहु देखें/मिलें तो योग बनता है।

83.91
नाशस्थौ वित्तदारेशौ पुत्रे लग्ने कुजे शनौ ।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात् सुतक्षयः
nāśasthau vittadāreśau putre lagne kuje śanau |
kārake pāpasaṃyukte patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाशस्थौ = नाश-भाव (अष्टम H8; व्याख्या-भेद संभव) में स्थित; वित्तदारेशौ = द्वितीयेश (वित्त, H2) व सप्तमेश (दार, H7); पुत्रे लग्ने = पञ्चम (H5) व लग्न (H1) में; कुजे शनौ = मंगल व शनि; कारके पापसंयुक्ते = पुत्र-कारक (बृहस्पति) पापग्रह-युक्त; पत्नीशापात् सुतक्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब द्वितीयेश और सप्तमेश दोनों नाश (अष्टम) भाव में हों, मंगल व शनि पञ्चम एवं लग्न में हों, और पुत्र-कारक बृहस्पति पापग्रह से युक्त हो — तब शास्त्र इसे पत्नी-शाप से सन्तान-क्षय का योग बताता है। यह इस पत्नी-शाप-गुच्छ का अन्तिम लक्षण-योग है।

English rendering When the 2nd-lord and 7th-lord both stand in the sign of destruction (the 8th), Mars and Saturn occupy the 5th and the ascendant, and the (Jupiter) significator of children is joined by a malefic — the text attributes the loss of progeny to a wife's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) बूलीय लक्षण: {L₂, L₇} ∈ H₈ ∧ {मंगल, शनि} ∈ {H₅, H₁} ∧ (पाप ⊕ कारक=बृहस्पति) ⟹ [शास्त्र: पत्नी-शाप-सुत-क्षय]। "कारक" = पुत्र-कारक बृहस्पति। भाव 2,7,8,5,1 नियत; दो लग्नेश (L₂, L₇) की सह-अष्टम-स्थिति ही मुख्य शर्त। कोई गणना-स्थिरांक नहीं — नियतात्मक स्थान-परीक्षण।

उदाहरण (worked example) मेष लग्न → L₂ = वृषभ-स्वामी = शुक्र; L₇ = तुला-स्वामी = शुक्र (यहाँ दोनों एक ही ग्रह शुक्र, क्योंकि मेष में द्वितीय व सप्तम दोनों शुक्र के); H8 = वृश्चिक, H5 = सिंह, H1 = मेष। परीक्षण: शुक्र वृश्चिक (H8) में? मंगल व शनि सिंह/मेष (H5/H1) में? बृहस्पति पापयुत? सत्य होने पर श्लोक-शर्त पूर्ण। (जहाँ एक ही ग्रह दो भावों का स्वामी हो, वहाँ "दोनों नाशस्थ" की शर्त उसी एक ग्रह की अष्टम-स्थिति से पूर्ण होती है।)

83.92
लग्नपञ्चमभाग्यस्था राहुमन्दकुजाः क्रमात् ।
रन्ध्रस्थौ पुत्रदारेशौ पत्नीशापात् सुतक्षयः
lagnapañcamabhāgyasthā rāhumandakujāḥ kramāt |
randhrasthau putradāreśau patnīśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = उदित राशि / प्रथम भाव; पञ्चम = पुत्र-भाव (D1 में 5वाँ); भाग्य = नवम भाव; राहु-मन्द-कुजाः = राहु, शनि, मंगल क्रमशः; क्रमात् = उसी क्रम में स्थित; रन्ध्रस्थौ = अष्टम भाव में स्थित; पुत्रदारेशौ = पञ्चमेश और सप्तमेश; पत्नीशापात् = पत्नी के शाप से (शास्त्र-कथन); सुतक्षयः = संतान-हानि / पुत्र-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब राहु लग्न में, शनि पञ्चम में और मंगल नवम में क्रमशः स्थित हों, तथा पुत्रेश और दारेश दोनों रन्ध्र (अष्टम) में हों, तो यह विन्यास पत्नी-शाप से सुतक्षय का योग माना गया है। यहाँ तीनों क्रूर/अशुभ-ग्रह त्रिकोणीय भाग्य-पुत्र-लग्न अक्ष पर बँटे हैं और दोनों संबंधित भावेश अष्टम में पड़े हैं — यही इस फल-कथन की संरचना है। यह फल-कथन है, नियति नहीं; गणना भाव-स्वामी और ग्रह-स्थिति पर टिकती है।

English rendering The text states that when Rāhu, Saturn, and Mars stand respectively in the lagna, the fifth, and the ninth, and the lords of the fifth and seventh occupy the eighth, child-loss is indicated from a wife’s curse. The claim is a śāstraic yoga-statement, not a forecast we endorse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-योग (पत्नीशाप–सुतक्षय)। तकनीकी पहचान: Rāhu ∈ bhāva 1, Śani ∈ 5, Maṅgala ∈ 9; putreśa ∈ 8 और dāreśa ∈ 8 (D1, whole-sign या समान भाव-पद्धति; convention declare करें)।

उदाहरण (worked example) Convention: D1, whole-sign houses, ayanāṃśa irrelevant for sign-only placement. Suppose Lagna = Meṣa → bhāva 5 = Siṃha, 9 = Dhanu, 8 = Vṛścika. If Rāhu in Meṣa, Saturn in Siṃha, Mars in Dhanu, and the lords of Siṃha (Sun) and Tulā (Venus, 7th from Meṣa) both occupy Vṛścika, the verse’s positional skeleton is met. (Phala remains the text’s claim only.)

83.93
शापमुक्त्यै च कन्यायां सत्यां तद्दानमाचरेत् ।
कन्याभावे च श्रीविष्णोर्मूर्ति लक्ष्मीसमन्विताम्
śāpamuktyai ca kanyāyāṃ satyāṃ taddānamācaret |
kanyābhāve ca śrīviṣṇormūrti lakṣmīsamanvitām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शाप-मुक्त्यै = शाप से छुटकारे हेतु; कन्यायां सत्यां = कन्या (पुत्री) के विद्यमान होने पर; तद्-दानम् = उस (कन्या) का दान अर्थात् कन्यादान; आचरेत् = करे; कन्या-भावे = कन्या के अभाव में; श्री-विष्णोः मूर्तिम् = विष्णु की प्रतिमा; लक्ष्मी-समन्विताम् = लक्ष्मी सहित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस शाप की निवृत्ति के लिए विधान बताता है — यदि पुत्री हो तो कन्यादान करे; और यदि कन्या न हो, तो लक्ष्मी-सहित श्रीविष्णु की प्रतिमा (अगले श्लोक में स्वर्णमयी) का दान करे। यह उपाय-कथन है, भय या दबाव नहीं — शास्त्र की अपनी प्रायश्चित्त-विधि मात्र।

English rendering For release from the curse the text prescribes kanyā-dāna where a daughter exists; in her absence, the gift of an image of Śrī-Viṣṇu together with Lakṣmī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/दान-कथन (शाप-शान्ति)। यह ज्योतिषीय गणना नहीं, अपितु उपचार-विधान है; इसे शास्त्र-निर्दिष्ट प्रायश्चित्त के रूप में ही प्रस्तुत करना चाहिए, फलादेश या अनिवार्य नियति के रूप में नहीं।

83.94
दद्यात् स्वर्णमयीं विप्र दशदेनुसमन्विताम् ।
शय्यां च भूषणं वस्त्रं दम्पतिभ्यां द्विजन्मनाम्
dadyāt svarṇamayīṃ vipra daśadenusamanvitām |
śayyāṃ ca bhūṣaṇaṃ vastraṃ dampatibhyāṃ dvijanmanām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दद्यात् = दे; स्वर्णमयीं = स्वर्णमयी (मूर्ति); विप्र = ब्राह्मण को; दशदेनुसमन्विताम् = दस गौओं सहित; शय्याम् = शय्या; भूषणम् = आभूषण; वस्त्रम् = वस्त्र; दम्पतिभ्याम् = दंपति को; द्विजन्मनाम् = द्विज (ब्राह्मण) दंपति के।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वह स्वर्णमयी विष्णु-लक्ष्मी मूर्ति ब्राह्मण को दस गौओं के साथ देनी चाहिए; तथा द्विज-दंपति को शय्या, आभूषण और वस्त्र का दान भी बताया गया है। यहाँ “दश” स्पष्ट संख्या है — दस गौएँ। यह दान-क्रम पूर्व श्लोक की मूर्ति-विधि का विस्तार है।

English rendering The text states one should give that golden image to a brāhmaṇa together with ten cows, and also a bed, ornaments, and garments to a twice-born couple. The numeral “ten” is explicit in daśa-denu.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन; एकमात्र संख्यात्मक तत्व: दश = 10 गौएँ (daśa-denu)। शेष फल/दान-वर्णन है, गणना नहीं।

83.95
ध्रुवं तस्य भवेत् पुत्रो भाग्यवृद्धिश्च जायते ।
कर्मलोपे पितृणां च प्रेतत्वं तस्य जायते
dhruvaṃ tasya bhavet putro bhāgyavṛddhiśca jāyate |
karmalope pitṛṇāṃ ca pretatvaṃ tasya jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ध्रुवम् = निश्चय ही; तस्य भवेत् पुत्रः = उसे पुत्र होता है; भाग्य-वृद्धिः = सौभाग्य की वृद्धि; कर्म-लोपे = (पितरों के) श्राद्धादि कर्म के लोप/त्रुटि होने पर; पितॄणाम् = पितरों के; प्रेतत्वम् = प्रेत-अवस्था; तस्य जायते = उसको प्राप्त होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — पूर्वोक्त दान करने पर मनुष्य को पुत्र और सौभाग्य-वृद्धि प्राप्त होती है। साथ ही यह श्लोक अगले प्रकरण की भूमिका बाँधता है: पितरों के कर्म (श्राद्ध) के लोप से उन्हें प्रेतत्व प्राप्त होता है — यहीं से "प्रेत-शाप" का विषय आरम्भ होता है। फल शास्त्र का कथन है, हमारी प्रतिज्ञा नहीं।

English rendering The text states that by this he surely obtains a son and increase of fortune; and where the ancestral rites lapse, the state of a preta befalls the departed — introducing the next theme.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + संक्रमण (पत्नी-शाप-उपाय से प्रेत-शाप-प्रकरण की ओर)। यह श्लोक दो प्रकरणों की सन्धि है; इसमें कोई ग्रह-स्थिति या गणना नहीं, केवल फल-घोषणा और अगले दोष का हेतु-निर्देश है।

83.96
तस्य प्रेतस्य शापाच्च पुत्राभावः प्रजायते ।
अतोऽत्र तादृशान् योगात् जन्मलग्नात् प्रवच्म्यहम्
tasya pretasya śāpācca putrābhāvaḥ prajāyate |
ato'tra tādṛśān yogāt janmalagnāt pravacmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्य प्रेतस्य शापात् = उस प्रेत के शाप से; पुत्राभावः = पुत्र का अभाव; प्रजायते = उत्पन्न होता है; अतः अत्र = इसलिए यहाँ; तादृशान् योगात् = ऐसे योगों से; जन्मलग्नात् = जन्म-लग्न से; प्रवच्मि अहम् = मैं कहता हूँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — उस प्रेत-अवस्था वाले का शाप पुत्राभाव का कारण बनता है। अतः पराशर यहाँ से जन्म-लग्न के आधार पर “ऐसे” (प्रेतशाप–सुतक्षय) योगों का विवेचन आरंभ करने की घोषणा करते हैं। यह संधि-श्लोक है: पूर्व हेतु (पितृकर्म-लोप → प्रेत → शाप) से अगले स्पष्ट योग-सूत्रों की ओर द्वार खुलता है।

English rendering From that preta’s curse, the text states, absence of sons arises; therefore the teacher now begins to declare such yogas from the birth-lagna. A transitional verse linking cause to the lagna-based catalogue that follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/संक्रमण (हेतु → “जन्मलग्नात्” योग-सूची की घोषणा)। आगे के श्लोकों में भाव-ग्रह संयोजन ही तकनीक हैं।

83.97
पुत्रस्थानौ मन्दसूर्यौ क्षीणचन्द्रश्च सप्तमे ।
लग्ने व्यये राहुजीवौ प्रेतशापात् सुतक्षयः
putrasthānau mandasūryau kṣīṇacandraśca saptame |
lagne vyaye rāhujīvau pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-स्थाने = पंचम भाव (5) में; मन्द-सूर्यौ = शनि व सूर्य; क्षीण-चन्द्रः = क्षीण (कृष्ण-पक्षीय, बलहीन) चन्द्र; सप्तमे = 7वें भाव में; लग्ने व्यये = 1 व 12 में; राहु-जीवौ = राहु व बृहस्पति (जीव); प्रेत-शापात् सुत-क्षयः = प्रेत-शाप से सन्तान-हानि।

हिन्दी भावार्थ जब शनि और सूर्य पंचम में हों, क्षीण चन्द्र सप्तम में हो, तथा राहु व गुरु लग्न और व्यय में विभक्त हों — शास्त्र इसे प्रेत-शाप-जनित सन्तान-हानि का योग बताता है। "क्षीण-चन्द्र" यहाँ मापने-योग्य पक्ष-बल की न्यूनता है।

English rendering With Saturn and the Sun in the 5th, the waning Moon in the 7th, and Rāhu and Jupiter in the 1st and 12th, the text reads loss of progeny from a preta's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-मानचित्र: पुत्र=5, सप्तम/काम=7, लग्न=1, व्यय=12। न्यास: 5←{शनि(मन्द), सूर्य}, 7←क्षीण-चन्द्र, {1,12}←{राहु, जीव} (द्वंद्व दो भावों में वितरित; ठीक जोड़ा व्याख्या-सापेक्ष)। "क्षीण" = कृष्णपक्ष में सूर्य से न्यून अन्तर वाला चन्द्र — पक्ष-बल का ह्रास। अंकगणितीय सूत्र नहीं — योग-लक्षण; फल शास्त्र-कथित।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष मानें: 5 = सिंह (शनि+सूर्य), 7 = तुला (क्षीण चन्द्र), 1 = मेष (राहु), 12 = मीन (गुरु)। यही श्लोक-चित्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) "क्षीण-चन्द्र" को हमने ठहरे हुए कथन के रूप में नहीं, अपितु ṣaḍbala (BPHS Ch.27) की पक्ष-बल-राशि के रूप में देखा — चन्द्र-सूर्य कोणीय-अन्तर से रूप/विरूप में नापा जाने वाला परिमाण (1 रूप = 60 विरूप)। हमारी विधि यही है: बलहीनता का माप गणित है, "प्रेत-शाप" उसका शास्त्रीय अभिप्राय — दोनों को हम अलग रखते हैं, मिलाते नहीं।

83.98
पुत्रस्थानाधिपे मन्दे नाशस्थे लग्नगे कुजे ।
कारके नाशभावे च प्रेतशापात् सुतक्षयः
putrasthānādhipe mande nāśasthe lagnage kuje |
kārake nāśabhāve ca pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्रस्थानाधिपे मन्दे = पञ्चमेश शनि हो; नाशस्थे = नाश-भाव (अष्टम) में स्थित; लग्नगे कुजे = मंगल लग्न में; कारके = (पुत्र-)कारक (सामान्यतः गुरु) में; नाशभावे = अष्टम भाव में; प्रेतशापात् सुतक्षयः = प्रेत-शाप से संतान-क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब पुत्र-स्थान का स्वामी शनि हो और वह नाश (अष्टम) में स्थित हो, मंगल लग्न में हो, तथा कारक भी नाश-भाव में हो, तो प्रेत-शाप से सुतक्षय का योग बताया गया है। यहाँ तीन स्तंभ हैं: (1) पञ्चमेश = शनि + अष्टम-स्थिति, (2) कुज लग्न में, (3) कारक अष्टम में। “कारक” पुत्र-संदर्भ में प्रायः गुरु माना जाता है; यदि पाठ अन्य ग्रह को कारक कहे तो पाठ-भेद/परंपरा स्पष्ट करें।

English rendering The text states: when the fifth-lord is Saturn and occupies the eighth, Mars is in the lagna, and the significator (kāraka) is also in the eighth, child-loss from a preta-curse is indicated. Three concurrent conditions define the yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-योग (प्रेतशाप–सुतक्षय)। नियम (D1): putreśa = Śani and Śani ∈ bhāva 8; Maṅgala ∈ 1; kāraka ∈ 8 (पुत्र-कारक = गुरु, unless another convention is declared)। भाव-स्वामी राशि-स्वामित्व से निर्धारित होता है, न कि दशा-अनुपात से।

उदाहरण (worked example) Convention: whole-sign D1; putra-kāraka = Guru. Lagna = Karka → 5 = Vṛścika (lord = Mars — not this case). Need putreśa = Saturn: so lagna such that the 5th sign is Makara or Kumbha. Example: Lagna = Kanyā → 5 = Makara (lord Saturn), 8 = Meṣa. Conditions: Saturn in Meṣa, Mars in Kanyā, Jupiter in Meṣa. Then the verse’s three limbs hold. (Phala remains “शास्त्र कहता है” only.)

83.99
लग्ने पापे व्यये भानौ सुते चारार्किसोमजाः ।
पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः
lagne pāpe vyaye bhānau sute cārārkisomajāḥ |
putreśe randhrabhāvasthe pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = उदित राशि/प्रथम भाव; पाप = क्रूर ग्रह (रवि-मंगल-शनि-राहु-केतु आदि, संदर्भानुसार); व्यय = द्वादश भाव; भानु = सूर्य; सुत = पंचम भाव; चार-अर्कि-सोमजाः = चार (बुध/चारु-संकेत; पाठ-भेद संभव—अक्सर शुक्र-शनि-बुध त्रय के रूप में पढ़ा जाता है), अर्कि = शनि, सोमज = बुध; पुत्रेश = पंचमेश; रन्ध्रभाव = अष्टम भाव; प्रेतशाप = प्रेत-दोष/पूर्वज-अतृप्ति का शास्त्रीय योग-नाम; सुतक्षय = संतान-हानि का फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—यदि लग्न में पाप ग्रह हो, द्वादश में सूर्य हो, पंचम में चार-अर्कि-सोमज (बुध-शनि इत्यादि; पाठ-भेद संभव) स्थित हों, और पंचमेश अष्टम भाव में हो, तो यह योग-समूह “प्रेतशाप” नामक संकेत के अंतर्गत सुतक्षय का फल देता है। यह व्यक्तिगत भविष्यवाणी नहीं, बल्कि भाव-ग्रह विन्यास का शास्त्रीय फल-सूत्र है। पाठ की सटीकता और योग की पूर्णता दोनों जाँचने योग्य हैं।

English rendering The text states that when a malefic occupies the Lagna, the Sun is in the twelfth, Cāra–Ārki–Somaja (Mercury, Saturn, and the third member—reading may vary) stand in the fifth, and the fifth-lord is in the eighth, loss of progeny is indicated under the heading of preta-śāpa. It is a structural yoga-statement, not a personal fate-claim.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (प्रेतशाप-योग)। जाँच-बिंदु केवल भाव-स्वामी और ग्रह-स्थिति के तार्किक मिलान हैं; अयनांश/भाव-पद्धति घोषित करके ही कुंडली पर आरोपण करना चाहिए।

83.100
लग्ने स्वर्भानुना युक्ते पुत्रस्थे भानुनन्दने ।
गुरौ च नाशराशिस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः
lagne svarbhānunā yukte putrasthe bhānunandane |
gurau ca nāśarāśisthe pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = प्रथम भाव; स्वर्भानु = राहु; युक्त = युति/संयुक्त; पुत्रस्थ = पंचम भाव में; भानुनन्दन = शनि (सूर्य-पुत्र); गुरु = बृहस्पति; नाशराशि = अष्टम राशि/भाव (नाश-स्थान); प्रेतशापात् = प्रेतशाप-संकेत से; सुतक्षय = संतान-हानि का शास्त्र-कथित फल।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्न में राहु की युति हो, पंचम में शनि स्थित हो, और गुरु नाश-राशि (अष्टम) में हो, तो प्रेतशाप के अंतर्गत सुतक्षय का फल कहा गया है। यहाँ राहु-लग्न, पंचम-शनि और गुरु-अष्टम—तीन स्पष्ट संरचनात्मक शर्तें हैं। फल को “निश्चित विपत्ति” नहीं, शास्त्र का योग-वाक्य समझना चाहिए।

English rendering The text states that Rāhu joined with the Lagna, Saturn placed in the fifth, and Jupiter stationed in the house of destruction (the eighth) constitute a preta-śāpa indication of progeny-loss. The verse records a yoga-condition, not an endorsed prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (राहु-लग्न + शनि-पंचम + गुरु-अष्टम)। “नाशराशि” को भाव-चक्र में अष्टम के रूप में लें; राशि- बनाम भाव-पाठ में पाठ-भेद संभव।

83.101
लग्ने राहौ सशुक्रेज्ये चन्द्रे मन्दयुते तथा ।
लग्नेशे मृत्युराशिस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः
lagne rāhau saśukrejye candre mandayute tathā |
lagneśe mṛtyurāśisthe pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्ने राहौ = लग्न में राहु; स-शुक्र-इज्ये = शुक्र व गुरु (इज्य = पूज्य, बृहस्पति) सहित; चन्द्रे मन्द-युते = चन्द्र शनि (मन्द) से युक्त; लग्नेशे मृत्यु-राशि-स्थे = लग्नेश अष्टम (मृत्यु) राशि में; प्रेत-शापात् सुत-क्षयः।

हिन्दी भावार्थ लग्न में राहु शुक्र-गुरु के साथ, चन्द्र शनि से युक्त, और लग्नेश मृत्यु-राशि (अष्टम) में — शास्त्र इस संयोग को प्रेत-शाप-जनित सन्तान-हानि का योग कहता है। "इज्य" शब्द बृहस्पति का पर्याय है (जो यज्ञ में पूजित हैं)।

English rendering With Rāhu in the ascendant alongside Venus and Jupiter, the Moon conjoined with Saturn, and the lord of the ascendant in the 8th, the text reads loss of progeny from a preta's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) ग्रह-पर्याय: इज्य = गुरु/बृहस्पति; मन्द = शनि। भाव-पर्याय: मृत्यु-राशि = 8वाँ भाव (रन्ध्र)। न्यास: 1←{राहु, शुक्र, गुरु}, चन्द्र⊕शनि (यत्र-कुत्र युति), लग्नेश → 8। अंकगणितीय सूत्र नहीं — योग-लक्षण; फल शास्त्र-कथित।

उदाहरण (worked example) लग्न = मिथुन: लग्न में राहु+शुक्र+गुरु; लग्नेश बुध यदि मकर (8) में — तो लग्नेश-मृत्युराशि-गति सिद्ध; कहीं चन्द्र+शनि की युति पूर्ण करे।

83.102
पुत्रस्थानाधिपे नीचे कारके नीचराशिगे ।
नीचस्थग्रहदृष्टे च प्रेतशापात् सुतक्षयः
putrasthānādhipe nīce kārake nīcarāśige |
nīcasthagrahadṛṣṭe ca pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुत्र-स्थानाधिपे नीचे = पंचमेश नीच राशि में; कारके नीच-राशि-गे = पुत्र-कारक (गुरु) नीच राशि में गया; नीच-स्थ-ग्रह-दृष्टे च = नीचस्थ किसी ग्रह से दृष्ट; प्रेत-शापात् सुत-क्षयः = प्रेत-शाप से सन्तान-हानि।

हिन्दी भावार्थ जब पंचमेश नीच का हो, पुत्र-कारक गुरु भी अपनी नीच राशि में हो, और कोई नीचस्थ ग्रह इसे देख रहा हो — शास्त्र इसे प्रेत-शाप-जन्य सन्तान-हानि का योग बताता है। यहाँ तीन-तीन "नीच" संकेत बल की गम्भीर न्यूनता की ओर इंगित करते हैं।

English rendering When the 5th-lord is debilitated, the (progeny-)significator too has gone to its sign of fall, and a debilitated planet aspects them, the text reads loss of progeny from a preta's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) "नीच" = नीच-राशि = प्रत्येक ग्रह की निश्चित उच्च-राशि की 7वीं राशि; गुरु की नीच = मकर (परम-नीच 5°)। यह स्थान-बल/नीच-बल की मापने-योग्य दशा है, कोई मनमानी संज्ञा नहीं। न्यास: पंचमेश → नीच; कारक(गुरु) → नीच; दृष्टि-दाता → नीचस्थ। अंकगणितीय सूत्र नहीं — योग-लक्षण; फल शास्त्र-कथित।

उदाहरण (worked example) पुत्र-कारक गुरु मकर 5° पर हो → परम-नीच। यदि पंचमेश भी नीच (उदा. सूर्य पंचमेश हो और तुला 10° पर = परम-नीच) — तो श्लोकोक्त "उभय-नीच" स्थिति बनती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक हमारे अनुशासन-बिन्दु का उत्तम उदाहरण है: "नीच" एक मापने-योग्य स्थान-बल-राशि है (उच्च से 180°, परम-नीच अंश तक), जबकि "प्रेत-शाप" उसकी शास्त्रीय व्याख्या। हम गणित और व्याख्या को कभी नहीं मिलाते — बल का माप exact-`==` से जाँचते हैं (सहनशीलता-बैंड नहीं, क्योंकि बैंड एक बार astakavarga में असली −1 छिपा चुका है), और फल को केवल "शास्त्र कहता है" रूप में रखते हैं, नियति के रूप में नहीं।

83.103
लग्ने मन्दे सुते राहौ रन्ध्रे भानुसमन्विते ।
व्यये भौमेन संयुक्ते प्रेतशापात् सुतक्षयः
lagne mande sute rāhau randhre bhānusamanvite |
vyaye bhaumena saṃyukte pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्न = प्रथम भाव; मन्द = शनि; सुत = पंचम; राहु = स्वर्भानु; रन्ध्र = अष्टम भाव; भानु = सूर्य; समन्वित = युक्त/स्थित; व्यय = द्वादश; भौम = मंगल; संयुक्ते = युति में; प्रेतशापात् सुतक्षयः = प्रेतशाप से सुतक्षय का शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—लग्न में शनि, पंचम में राहु, अष्टम में सूर्य, और द्वादश में मंगल की युति—यह चौथाह विन्यास प्रेतशाप-संकेत के अंतर्गत सुतक्षय का फल देता है। प्रत्येक शर्त एक अलग भाव पर टिकी है; अधूरी शर्त को पूरा योग न समझें। भाषा फल-कथन की है, घबराहट की नहीं।

English rendering The text states that Saturn in the Lagna, Rāhu in the fifth, the Sun associated with the eighth, and Mars joined in the twelfth form a preta-śāpa configuration for progeny-loss. Four house-conditions must co-occur; the verse is a checklist, not a verdict of doom.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शनि-L1, राहु-L5, सूर्य-L8, मंगल-L12)। “समन्विते/संयुक्ते” को युति (समान राशि) मानें; भाव-चक्र पूर्ण-समान-भाव गृह-पद्धति घोषित करें।

83.104
कामस्थानाधिपे दुःस्थे पुत्रे चन्द्रसमन्विते ।
मन्दमान्दियुते लग्ने प्रेतशापात् सुतक्षयः
kāmasthānādhipe duḥsthe putre candrasamanvite |
mandamāndiyute lagne pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) काम-स्थानाधिपे दुःस्थे = सप्तमेश (काम/दार-भाव का स्वामी) दुःस्थान (6/8/12) में; पुत्रे चन्द्र-समन्विते = पंचम भाव चन्द्र से युक्त; मन्द-मान्दि-युते लग्ने = लग्न शनि (मन्द) व मान्दि (गुलिक — उपग्रह) से युक्त; प्रेत-शापात् सुत-क्षयः।

हिन्दी भावार्थ जब सप्तमेश दुःस्थान में हो, पंचम भाव चन्द्र से युक्त हो, और लग्न पर शनि तथा मान्दि (गुलिक) दोनों का योग हो — शास्त्र इसे प्रेत-शाप-जन्य सन्तान-हानि का योग बताता है। "मान्दि" कोई पिण्ड-ग्रह नहीं, अपितु काल-विभाजन से निकाला जाने वाला उपग्रह है।

English rendering When the lord of the 7th is ill-placed, the 5th is joined by the Moon, and the ascendant carries both Saturn and Māndi, the text reads loss of progeny from a preta's curse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भाव-पर्याय: काम/दार = 7वाँ भाव; उसका स्वामी = सप्तमेश। दुःस्थ = 6/8/12 में स्थित (दुर्बल-स्थान)। मान्दि/गुलिक = शनि-अंश का उपग्रह — दिन/रात्रि के मान को 8 भागों में बाँटकर शनि-खण्ड के आरम्भ (कहीं अन्त) पर उदित लग्नांश से गणित द्वारा निकाला गया बिन्दु, कोई दृश्य ग्रह नहीं। न्यास: 7L→दुःस्थ, 5←चन्द्र, 1←{शनि, मान्दि}। अंकगणितीय सूत्र नहीं (योग-लक्षण) — किन्तु मान्दि स्वयं एक गणित-जनित बिन्दु है।

उदाहरण (worked example) लग्न = मेष: 7 = तुला, उसका स्वामी शुक्र = सप्तमेश; यदि शुक्र कन्या (6) में = दुःस्थ; चन्द्र सिंह (5) में; लग्न मेष में शनि + मान्दि — तो श्लोकोक्त योग पूर्ण।

हमारा डिकोड (Our Decode) मान्दि/गुलिक हमारे लिए वह रेखा है जहाँ गणित और व्याख्या मिलते हैं पर मिश्रित नहीं होते: यह दिन-रात्रि-मान के काल-विभाजन से नियत रूप से परिकलित उपग्रह है (कन्वेंशन: दिनमान ÷ 8, शनि-खण्ड-आरम्भ), जबकि "प्रेत-शाप" उसका शास्त्रीय अभिप्राय। इसी अनुशासन से — गणित को exact रखना और फल को केवल शास्त्र-कथन मानना — हमने BPHS की गणनाओं (अष्टकवर्ग Ch.66, षड्बल Ch.27) को व्याख्या से पृथक् सत्यापित किया है।

83.105
वधस्थानाधिपे पुत्रे शनिशुक्रसमन्विते ।
कारके नाशराशिस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः
vadhasthānādhipe putre śaniśukrasamanvite |
kārake nāśarāśisthe pretaśāpāt sutakṣayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वधस्थान-अधिपे = वध (मारण/मृत्यु) भाव का स्वामी — प्रायः अष्टम अथवा सप्तम मारक-भाव माना जाता है (व्याख्या-भेद संभव); पुत्रे = पंचम भाव (सन्तान-स्थान) में स्थित; शनि-शुक्र-समन्विते = शनि तथा शुक्र से युक्त; कारके = पुत्रकारक (बृहस्पति/जीव); नाश-राशि-स्थे = नाश-भाव (अष्टम/विनाश-राशि) में बैठा; प्रेतशापात् = प्रेत (अतृप्त मृतात्मा/पूर्वज) के शाप से; सुतक्षयः = सन्तान का क्षय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जब वध-भाव का स्वामी पंचम (सन्तान-) भाव में शनि और शुक्र के साथ बैठा हो, और सन्तान का कारक बृहस्पति नाश-राशि (अष्टम) में स्थित हो, तब इस योग को "प्रेत-शाप" के कारण सन्तान-क्षय का संकेत बताया गया है। यह पूर्वजन्म-शाप-प्रकरण के प्रेत-शाप-वर्ग का अन्तिम योग-श्लोक है; इसके पश्चात् इसका परिहार आता है। (यहाँ फल शास्त्र का कथन है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं।)

English rendering The text states that when the lord of the "house of slaughter" occupies the 5th (house of progeny) joined by Saturn and Venus, while the child-significator Jupiter sits in the house of destruction (the 8th), the resulting childlessness is ascribed to the curse of a departed spirit (preta).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रह-योग → फल)। तकनीकी ढाँचा शुद्ध स्थान-गणित है: भाव-स्वामी की पहचान पूर्ण-राशि (whole-sign) पद्धति में लग्न से गिनकर होती है — पंचम = लग्न से 5वीं राशि, नाश/अष्टम = लग्न से 8वीं राशि; पुत्रकारक स्थिर रूप से बृहस्पति। "प्रेतशापात्" फल-भाग है, गणित नहीं — इसे शास्त्र के कथन रूप में पढ़ें, भाग्य-निर्णय रूप में नहीं।

उदाहरण: conventions — पूर्ण-राशि भाव; वधस्थान = अष्टम (एक स्वीकृत व्याख्या)। मेष लग्न लें → पंचम = सिंह (स्वामी सूर्य), अष्टम/नाश = वृश्चिक (स्वामी मंगल), कारक = बृहस्पति। तब यह योग तब बनेगा जब अष्टमेश मंगल पंचम (सिंह) में शनि व शुक्र सहित हो और बृहस्पति अष्टम (वृश्चिक) में हो। भाव-स्वामी व राशि-गणना निर्धार्य (deterministic) है; फल शास्त्र का कथन है।

हमारा डिकोड: यह श्लोक हमारे मूल अनुशासन का दृष्टान्त है — गणना को व्याख्या से अलग रखना। भाव-स्वामी की पहचान, कारक-योजना (पुत्रकारक = बृहस्पति) और राशि-गणना पूर्णतः नियतांक मॉड्यूलर अंकगणित है — वही आधार जिस पर हमारे वर्ग/अष्टकवर्ग/षड्बल इंजन `==` से जाँचते हैं (कोई सहन-पट्टी नहीं)। किन्तु "प्रेतशापात् सुतक्षयः" शास्त्र का फल-कथन है; इसे हम भय, नियति या भविष्यवाणी नहीं, केवल "पाठ ऐसा कहता है" के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

83.106
अस्य दोषस्य शान्त्यर्थं गयाश्राद्धं समाचरेत् ।
कुर्यांद्रुद्राभिषेकञ्च ब्रह्ममूर्ति प्रदापयेत्
asya doṣasya śāntyarthaṃ gayāśrāddhaṃ samācaret |
kuryāṃdrudrābhiṣekañca brahmamūrti pradāpayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्य दोषस्य = इस (प्रेत-शाप) दोष की; शान्ति-अर्थम् = शान्ति/निवारण हेतु; गया-श्राद्धम् = गया-तीर्थ में श्राद्ध-कर्म; समाचरेत् = भली-भाँति सम्पन्न करे; कुर्यात् = करे; रुद्र-अभिषेकम् = रुद्र (शिव) का अभिषेक; च = और; ब्रह्म-मूर्तिम् = ब्रह्मा की मूर्ति; प्रदापयेत् = दान में दिलावे/समर्पित करावे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस प्रेत-शाप-दोष की शान्ति का विधान बताता है — गया में श्राद्ध सम्पन्न करे, रुद्राभिषेक करे, और ब्रह्मा की मूर्ति का दान कराए। यह श्लोक पूर्व योग-श्लोक (105) के दोष का परिहार-भाग आरम्भ करता है। कर्म का लक्ष्य पितृ/प्रेत-ऋण की तृप्ति है, कुण्डली का कोई राशिमान नहीं।

English rendering For the pacification of this (preta) affliction, the text prescribes performing śrāddha at Gayā, conducting a rudrābhiṣeka, and gifting an image of Brahmā.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति/परिहार-विधान। यहाँ कोई संख्या, कला या भाग-गणना नहीं; यह कर्मकाण्ड-प्रस्ताव है। इसे शास्त्रोक्त उपाय-कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है — दबाव या अनिवार्यता के रूप में नहीं।

83.107
धेनुं रजतपात्रं च तथा नीलमणिं द्विज ।
ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चात् तेभ्यश्च दक्षिणां दिशेत्
dhenuṃ rajatapātraṃ ca tathā nīlamaṇiṃ dvija |
brāhmaṇān bhojayet paścāt tebhyaśca dakṣiṇāṃ diśet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धेनुम् = दुधारू गाय; रजत-पात्रम् = चाँदी का पात्र; च = और; तथा = तथा; नील-मणिम् = नीलमणि (नीलम/इन्द्रनील); द्विज = हे द्विज (ब्राह्मण); ब्राह्मणान् भोजयेत् = ब्राह्मणों को भोजन कराए; पश्चात् = तदनन्तर; तेभ्यः = उन्हें; च दक्षिणाम् दिशेत् = दक्षिणा प्रदान करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है — इसी शान्ति के अंग रूप में धेनु, चाँदी का पात्र और नीलमणि का दान करे, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। यह 106 के परिहार-विधान का पूरक दान-क्रम है।

English rendering One should give a milch-cow, a silver vessel, and a blue gem (a sapphire), O twice-born; thereafter feed brāhmaṇas and bestow upon them the ritual fee (dakṣiṇā).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — दान-विधान। ध्यान-योग्य संकेत: नीलमणि (नीलम) परम्परा में शनि का रत्न है, और मूल योग-श्लोक 105 में शनि उपस्थित था — दान-द्रव्य और दोष-कारक ग्रह के बीच यह अनुरूपता रोचक है, यद्यपि श्लोक इसे स्पष्ट सूत्र रूप में नहीं जोड़ता (व्याख्या-संकेत मात्र)।

83.108
एवं कृते मनुष्यस्य शापमोक्षा प्रजायते ।
पुत्रोत्पत्तिर्भवेत्तस्य कुलवृद्धिश्च जायते
evaṃ kṛte manuṣyasya śāpamokṣā prajāyate |
putrotpattirbhavettasya kulavṛddhiśca jāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं कृते = ऐसा करने पर; मनुष्यस्य = मनुष्य का; शापमोक्षा = शाप से मुक्ति; प्रजायते = उत्पन्न होती है; पुत्रोत्पत्तिः = पुत्र-जन्म; भवेत् = हो; तस्य = उसके; कुलवृद्धिः = कुल/वंश की वृद्धि; जायते = होती है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त विधान करने पर मनुष्य को शाप-मोक्ष की प्राप्ति बताई गई है। उसी क्रम में पुत्रोत्पत्ति और कुल-वृद्धि का फल भी कहा गया है। यह फल-कथन ग्रंथ का अपना दावा है; इसे निश्चित भाग्य या चिकित्सकीय/पारिवारिक गारंटी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering The text states that when the foregoing is done, release from the curse is said to arise, and that birth of a son and growth of the lineage are indicated. These are phala-claims of the śāstra, not endorsed certainties.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शाप-मोक्ष, संतान, कुल-वृद्धि)। गणना या माप नहीं; केवल शास्त्र-वाक्य का फल-पक्ष।

83.109
तथा ज्ञशुक्रजे दोषे पुत्राप्तिः शम्भुपूजनात् ।
जीवचन्द्रकृते विप्र मन्त्रयन्त्रौषधादितः
tathā jñaśukraje doṣe putrāptiḥ śambhupūjanāt |
jīvacandrakṛte vipra mantrayantrauṣadhāditaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा = इसी प्रकार; ज्ञ-शुक्र-जे दोषे = ज्ञ (बुध) और शुक्र से उत्पन्न दोष में; पुत्र-आप्तिः = सन्तान की प्राप्ति; शम्भु-पूजनात् = शम्भु (शिव) के पूजन से; जीव-चन्द्र-कृते = जीव (बृहस्पति) और चन्द्र द्वारा कृत (दोष) में; विप्र = हे विप्र; मन्त्र-यन्त्र-औषध-आदितः = मन्त्र, यन्त्र, औषध आदि (उपायों) से।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र दोष के कारक-ग्रह के अनुसार परिहार की सारणी आरम्भ करता है — बुध व शुक्र से उत्पन्न दोष में शिव-पूजन से सन्तान-प्राप्ति कही गई है, तथा बृहस्पति व चन्द्र से उत्पन्न दोष में मन्त्र, यन्त्र और औषध आदि उपाय बताए गए हैं। यह ग्रह-विशेष-आश्रित उपाय-योजना है, जो अगले श्लोक (110) में शेष ग्रहों तक पूर्ण होती है।

English rendering Likewise, the text says, in an affliction arising from Mercury and Venus a son is obtained through the worship of Śambhu (Śiva); in one caused by Jupiter and the Moon, through mantra, yantra, medicinal means, and the like, O brāhmaṇa.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-आश्रित उपाय-सारणी (एक निर्धार्य lookup, जिसकी कुंजी "दोष-कारक ग्रह" है)। यहाँ अंकगणित नहीं, अपितु कारण-ग्रह → परिहार का सुव्यवस्थित मानचित्रण है; पूर्ण सारणी 110 में देखें।

83.110
राहुजे कन्यकादानात् सूर्यजे हरिकीर्तनात् ।
गोदानात् केतुजे दोषे रुद्रजापात् कुजाऽर्किजे
rāhuje kanyakādānāt sūryaje harikīrtanāt |
godānāt ketuje doṣe rudrajāpāt kujā'rkije

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राहु-जे = राहु से उत्पन्न (दोष में); कन्यका-दानात् = कन्यादान (कन्या-विवाह-सम्पादन/दान) से; सूर्य-जे = सूर्य से उत्पन्न में; हरि-कीर्तनात् = विष्णु के कीर्तन से; गो-दानात् = गो-दान से; केतु-जे दोषे = केतु से उत्पन्न दोष में; रुद्र-जापात् = रुद्र (शिव) के जप से; कुज-अर्कि-जे = कुज (मंगल) और अर्कि (= अर्क/सूर्य-पुत्र = शनि) से उत्पन्न में।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सारणी पूर्ण करता है — राहु-जनित दोष में कन्यादान से, सूर्य-जनित में हरि-कीर्तन से, केतु-जनित में गो-दान से, और मंगल-शनि-जनित दोष में रुद्र-जप से परिहार कहा गया है। इन दो श्लोकों (109–110) में मिलकर नवों ग्रह समाविष्ट हो जाते हैं — प्रत्येक कारक-ग्रह के लिए एक शास्त्रोक्त उपाय। ये उपाय शास्त्र के विधान हैं, किसी दबाव के रूप में प्रस्तुत नहीं।

English rendering For an affliction born of Rāhu, through the gift of a maiden (kanyā-dāna); of the Sun, through singing the praises of Hari; of Ketu, through the gift of a cow; and for one born of Mars and Saturn, through the japa of Rudra.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — ग्रह-आश्रित परिहार-सारणी (नवग्रह पूर्ण)। यह अंकगणित नहीं, अपितु निर्धार्य वर्गीकरण (classification) है — दोष के कारक-ग्रह से परिहार तक एक-से-एक मानचित्रण, जो 109 के साथ मिलकर सभी नौ ग्रहों को ढँक देता है:

| दोष का कारक-ग्रह | शास्त्रोक्त परिहार | श्लोक |
|---|---|---|
| ज्ञ (बुध) + शुक्र | शम्भु-पूजन | 109 |
| जीव (गुरु) + चन्द्र | मन्त्र-यन्त्र-औषध आदि | 109 |
| राहु | कन्यका-दान | 110 |
| सूर्य | हरि-कीर्तन | 110 |
| केतु | गो-दान | 110 |
| कुज (मंगल) + अर्कि (शनि) | रुद्र-जप | 110 |

83.111
सर्वदोषविनाशाय शुभसन्तानलब्धये ।
हरिवंशकथा भक्त्या श्रोतव्या विधिना द्विज
sarvadoṣavināśāya śubhasantānalabdhaye |
harivaṃśakathā bhaktyā śrotavyā vidhinā dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्व-दोष-विनाशाय = समस्त दोषों के नाश हेतु; शुभ-सन्तान-लब्धये = शुभ (कल्याणकारी) सन्तान की प्राप्ति के लिए; हरि-वंश-कथा = हरिवंश की कथा; भक्त्या = भक्तिपूर्वक; श्रोतव्या = श्रवण करने योग्य है; विधिना = विधिपूर्वक; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस प्रकरण का उपसंहार करता है — समस्त दोषों के नाश और शुभ सन्तान की प्राप्ति के लिए हरिवंश की कथा को भक्तिपूर्वक, विधिपूर्वक श्रवण करना चाहिए। यह सभी शाप-वर्गों (सर्प, पितृ, मातृ, भ्रातृ, ब्रह्म, पत्नी, प्रेत आदि) के लिए एक सामान्य, सार्वत्रिक उपाय-कथन है।

English rendering For the destruction of all afflictions and for the gaining of auspicious progeny, the Harivaṃśa-kathā should be heard with devotion and according to due rite, O twice-born.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार/सार्वत्रिक उपाय-कथन। कोई संख्या या गणना नहीं; यह पूरे शाप-प्रकरण को समेटने वाला भक्ति-प्रधान श्रवण-विधान है, जिसे शास्त्र के आश्वासन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

अध्यायः 84

ग्रहशान्त्यध्यायः

27 श्लोक
84.1
ग्रहाणां दोषशान्त्यर्थं तेषां पूजाविधिं वद ।
मानवानां हितार्थाय संक्षेपात् कृपया मुने
grahāṇāṃ doṣaśāntyarthaṃ teṣāṃ pūjāvidhiṃ vada |
mānavānāṃ hitārthāya saṃkṣepāt kṛpayā mune

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहाणाम् = ग्रहों के; दोष-शान्ति-अर्थम् = ग्रह-दोष के शमन के लिए; तेषाम् पूजाविधिम् = उनकी पूजा की विधि; वद = कहिए (आज्ञार्थ); मानवानाम् हितार्थाय = मनुष्यों के कल्याण हेतु; संक्षेपात् = संक्षेप में; कृपया = कृपापूर्वक; मुने = हे मुनि (पराशर को सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शिष्य प्रश्न करता है — हे मुनि, ग्रहों के दोष की शान्ति के लिए उनकी पूजा की विधि, मनुष्यों के हित हेतु, कृपापूर्वक संक्षेप में कहिए। यह अध्याय (ग्रहशान्त्यध्याय) यहीं से आरम्भ होता है — गणना नहीं, अपितु शान्ति-कर्म का जिज्ञासा-वाक्य।

English rendering "For the pacification of the planets' afflictions, kindly and in brief declare their rite of worship, O sage, for the welfare of humankind." — the disciple's opening request that frames the whole śānti chapter.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न-संवाद (शिष्य की जिज्ञासा)। यह विधि-प्रकरण का द्वार है: आगे की सामग्री ज्योतिष के व्याख्या-अनुष्ठान-स्तर की है, न कि किसी वर्ग-विभाजन या बल-गणना की।

84.2
ग्रहा सूर्यादयः पूर्वं मया प्रोक्ता द्विजोत्तम ।
जगत्यां सर्वजन्तूनां तदधीनं सुखाऽसुखम्
grahā sūryādayaḥ pūrvaṃ mayā proktā dvijottama |
jagatyāṃ sarvajantūnāṃ tadadhīnaṃ sukhā'sukham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहाः सूर्यादयः = सूर्य आदि (नौ) ग्रह; पूर्वम् मया प्रोक्ताः = पहले मैंने कहे; द्विज-उत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; जगत्याम् = संसार में; सर्व-जन्तूनाम् = समस्त प्राणियों का; तद्-अधीनम् = उन्हीं के अधीन; सुख-असुखम् = सुख और दुःख।

हिन्दी भावार्थ पराशर उत्तर देते हैं — हे द्विजश्रेष्ठ, सूर्य आदि ग्रहों का वर्णन मैं पूर्व में कर चुका हूँ; शास्त्र कहता है कि इस जगत् में समस्त प्राणियों का सुख-दुःख उन्हीं ग्रहों के अधीन (माना गया) है। यह अध्याय की मूल प्रतिज्ञा है, जिसके आधार पर आगे शान्ति-विधि कही जाएगी।

English rendering "The planets beginning with the Sun I have already described, O best of the twice-born; in this world the joy and sorrow of all beings is said to depend on them." — the text's premise, not a claim of fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सिद्धान्त-वाक्य (फल-कथन)। "सुख-असुख ग्रहाधीन" शास्त्र का अपना कथन है; इसे भविष्यवाणी या नियति के रूप में नहीं, अपितु ग्रन्थ की अभिधारणा के रूप में पढ़ना ही अनुशासित पाठ है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ये वही सूर्यादि नवग्रह हैं जिनके गणित को टीम ने exact-`==` पर पिन किया — अष्टकवर्ग BPHS Ch.66 के रेखा-योग (सूर्य 48, चन्द्र 49, मंगल 39, बुध 54, गुरु 56, शुक्र 52, शनि 39 → SAV 337), षोडश-वर्ग का मॉड्युलर विभाजन, विंशोत्तरी का 120-वर्ष चक्र, और षड्बल की रूप-गणना। हमारी विधि गणित और व्याख्या को पृथक् रखती है: गणना निश्चित है, जबकि "सुख-दुःख ग्रहाधीन" वाक्य ग्रन्थ का कथन है — हम इसे तथ्य-भविष्यवाणी के रूप में समर्थन नहीं देते।

84.3
तस्मात् सुशान्तिकामो वा श्रीकामो वा सुचेतसा ।
वृष्टायायुः पुष्टिकामो वा तेषां यज्ञं समाचरेत्
tasmāt suśāntikāmo vā śrīkāmo vā sucetasā |
vṛṣṭāyāyuḥ puṣṭikāmo vā teṣāṃ yajñaṃ samācaret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् = इसलिए; सु-शान्ति-कामः = उत्तम शान्ति चाहने वाला; श्री-कामः = ऐश्वर्य/लक्ष्मी चाहने वाला; सु-चेतसा = शुद्ध मन से; वृष्टि = वर्षा; आयुः = दीर्घायु; पुष्टि-कामः = पुष्टि/समृद्धि चाहने वाला; तेषाम् यज्ञम् = उन (ग्रहों) का यज्ञ; समाचरेत् = भली-भाँति करे।

हिन्दी भावार्थ इसलिए जो शान्ति का, श्री (सम्पत्ति) का, अथवा वर्षा, आयु व पुष्टि का इच्छुक हो, वह शुद्ध चित्त से ग्रहों का यज्ञ (पूजा) सम्पन्न करे। यह अध्याय का संकल्प-वाक्य है — किस कामना से कौन ग्रह-यज्ञ करे। ("वृष्टायायुः" में पाठ-भेद संभव — सम्भवतः "वृष्ट्यायुः-पुष्टिकामः")।

English rendering "Therefore one desiring peace, or prosperity, or rain, long life and nourishment, should — with a pure mind — duly perform the planets' sacrifice." — the enumeration of intentions (saṅkalpa) for the rite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वाक्य (कामना-संकल्प)। श्लोक कोई संख्या नहीं देता; यह केवल यज्ञ के प्रयोजनों (शान्ति · श्री · वृष्टि · आयु · पुष्टि) की सूची है।

84.4
ताभ्राच्च स्फटिकाद्रक्तचन्दनात् स्वर्णकादुभौ ।
रजतादयसः सीसात् कांस्यात् कार्याः क्रामद् ग्रहाः
tābhrācca sphaṭikādraktacandanāt svarṇakādubhau |
rajatādayasaḥ sīsāt kāṃsyāt kāryāḥ krāmad grahāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ताम्रात् = ताँबे से; स्फटिकात् = स्फटिक से; रक्त-चन्दनात् = रक्तचन्दन से; स्वर्णकात् उभौ = स्वर्ण से दोनों (बुध-गुरु); रजतात् = चाँदी से; अयसः = लोहे से; सीसात् = सीसे से; कांस्यात् = कांस्य/काँसे से; कार्याः = बनाने चाहिए; क्रमात् (पाठ: क्रामद् — पाठ-भेद संभव) = क्रम से; ग्रहाः = ग्रह (मूर्तियाँ)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ग्रहों की मूर्तियाँ क्रमशः इन पदार्थों से बनाई जाएँ — ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन; फिर स्वर्ण से दोनों (बुध और गुरु); तत्पश्चात् रजत, अयस्, सीस और कांस्य। यह नवग्रह-क्रम का निर्माण-सामग्री-नियम है: सूर्य–चन्द्र–मङ्गल–बुध–गुरु–शुक्र–शनि–राहु–केतु। “उभौ” से स्वर्ण पर दो ग्रहों का युग्म स्पष्ट होता है।

English rendering “The graha images are to be made, in order, from copper, crystal, red sandalwood; both (Mercury and Jupiter) from gold; then from silver, iron, lead, and bell-metal.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणनात्मक सूत्र नहीं, किन्तु क्रमित सामग्री-तालिका (9 पदार्थ-स्थान, “उभौ” = 2 पर स्वर्ण):

| क्रम | ग्रह | पदार्थ |
|:---:|:---|:---|
| 1 | सूर्य | ताम्र |
| 2 | चन्द्र | स्फटिक |
| 3 | मङ्गल | रक्तचन्दन |
| 4–5 | बुध, गुरु | स्वर्ण (उभौ) |
| 6 | शुक्र | रजत |
| 7 | शनि | अयस् (लोह) |
| 8 | राहु | सीस |
| 9 | केतु | कांस्य |

“क्रामद्” ≈ क्रमात् — पाठ-भेद संभव; अर्थ क्रम-निर्धारण ही है। यह माप-गणित नहीं, विधान-सूची है।

उदाहरण (worked example) नवग्रह-मूर्ति सेट बनाना हो तो पदार्थ-सूची: सूर्य–ताम्र, चन्द्र–स्फटिक, मङ्गल–रक्तचन्दन, बुध–स्वर्ण, गुरु–स्वर्ण, शुक्र–रजत, शनि–लोह, राहु–सीस, केतु–कांस्य। कोई अयनांश/भाव-पद्धति यहाँ लागू नहीं — शुद्ध सामग्री-क्रम।

84.5
पूर्वोक्तैः स्वस्ववर्णैर्वा पटे लेख्या द्विजोत्तमैः ।
स्वस्वोक्तदिग्विभागेषु गन्द्याद्यैर्मण्डनेषु वा
pūrvoktaiḥ svasvavarṇairvā paṭe lekhyā dvijottamaiḥ |
svasvoktadigvibhāgeṣu gandyādyairmaṇḍaneṣu vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्व-उक्तैः = पहले कहे गए; स्व-स्व-वर्णैः = अपने-अपने वर्णों से; वा = अथवा; पटे = वस्त्र/पट पर; लेख्याः = चित्रित करने योग्य; द्विजोत्तमैः = श्रेष्ठ द्विजों द्वारा; स्व-स्व-उक्त-दिक्-विभागेषु = अपनी-अपनी कही दिशा-विभागों में; गन्ध-आद्यैः (पाठ: गन्द्याद्यैः — पाठ-भेद संभव) = गन्ध आदि से; मण्डनेषु = मण्डप/सज्जित स्थानों में; वा = अथवा।

हिन्दी भावार्थ अथवा शास्त्र कहता है कि मूर्ति-निर्माण के स्थान पर पट पर पूर्वोक्त अपने-अपने वर्णों से लेख्य (चित्र) भी बनाए जा सकते हैं। इन्हें अपने-अपने उक्त दिशा-विभागों में, गन्ध आदि से सुसज्जित मण्डनों पर भी स्थापित/अर्चित किया जा सकता है। तीन विकल्प खुलते हैं: द्रव्य-मूर्ति, पट-लेख्य, दिशा-मण्डन।

English rendering “Or, O best of the twice-born, they may be drawn on cloth in their respective colours as previously stated; or (placed) in their stated directional sectors, on platforms adorned with fragrance and the like.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विकल्प-विधान (मूर्ति / पट-चित्र / दिग्-मण्डन)। “स्वस्वोक्तदिग्विभाग” दिशा-नियतन की ओर संकेत करता है; अंश-विभाजन या वर्ग-गणित यहाँ नहीं है। “गन्द्याद्यैः” पर पाठ-भेद संभव (गन्धाद्यैः आदि)।

84.6
पद्मासनः पद्महस्तः पद्मपत्रसमद्युतिः ।
सप्ताश्वरथसंस्थश्च द्विभुजश्च दिवाकरः
padmāsanaḥ padmahastaḥ padmapatrasamadyutiḥ |
saptāśvarathasaṃsthaśca dvibhujaśca divākaraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पद्मासनः = कमल के आसन पर स्थित; पद्म-हस्तः = हाथ में कमल; पद्म-पत्र-सम-द्युतिः = कमलदल-सी कान्ति; सप्त-अश्व-रथ-संस्थः = सात घोड़ों के रथ पर आसीन; द्वि-भुजः = दो भुजाओं वाला; दिवाकरः = सूर्य (दिन का कर्ता)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य (दिवाकर) कमलासन पर विराजमान, हाथ में कमल लिए, कमलदल-सी आभा वाले, सात अश्वों के रथ पर स्थित तथा द्विभुज रूप में ध्यान किए जाएँ। यह सूर्य-प्रतिमा का ध्यान-स्वरूप है।

English rendering The Sun (Divākara) is lotus-seated, lotus in hand, radiant as a lotus-petal, borne on a seven-horsed chariot, two-armed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा-ध्यान (सूर्य)। एकमात्र संख्या "सप्त (7) अश्व" है — सूर्य-रथ के सात अश्व, जिन्हें परम्परा प्रायः सात छन्द/सप्त वर्ण/सप्ताह के दिनों से जोड़ती है (यहाँ केवल प्रतीक, कोई परिकलन नहीं)।

84.7
श्वेतः श्वेताम्बरो देवो दशाश्वः श्वेतभूषणः ।
गदाहस्तो द्विबाहुश्च विधातव्यो विधुर्द्विज
śvetaḥ śvetāmbaro devo daśāśvaḥ śvetabhūṣaṇaḥ |
gadāhasto dvibāhuśca vidhātavyo vidhurdvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतः = श्वेत; श्वेत-अम्बरः = श्वेत वस्त्रधारी; देवः = देव; दश-अश्वः = दस अश्वों वाला; श्वेत-भूषणः = श्वेत आभूषणों से युक्त; गदा-हस्तः = गदा हाथ में; द्वि-बाहुः = दो भुजाओं वाला; विधातव्यः = बनाना चाहिए; विधुः = चन्द्र; द्विज = हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, विधु (चन्द्र) को श्वेत, श्वेताम्बर, श्वेतभूषण, दशाश्व, गदाहस्त और द्विबाहु रूप में विधातव्य कहा गया है। सूर्य के सप्ताश्व-रथ के बाद चन्द्र के दश अश्व — दोनों की अश्व-संख्या लक्षण-भेद का स्थिर चिह्न है। रंग-एकता (सर्वत्र श्वेत) चन्द्र-रूप की पहचान है।

English rendering “O twice-born, the Moon-god is to be made white, clad in white, with white ornaments, (drawn by) ten horses, two-armed, and holding a mace.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मूर्ति-लक्षण/वर्णन। “दश” = 10 अश्व; “द्वि” = 2 बाहु — संख्याएँ रूप-विधान की हैं, दशा-वर्ष या वर्ग-अंश की नहीं।

84.8
रक्तमाल्याम्बरधरो शक्तिशूलगदाधरः ।
वरदस्तु चतुर्बाहुर्मङ्गलो मेषवाहनः
raktamālyāmbaradharo śaktiśūlagadādharaḥ |
varadastu caturbāhurmaṅgalo meṣavāhanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्तमाल्याम्बरधर = रक्त माला + रक्त वस्त्र धारण करने वाला; शक्ति = भाला/शक्ति-आयुध; शूल = त्रिशूल; गदा = गदा; चतुर्बाहु = चार भुजाओं वाला; मङ्गल = मंगल (कुज) ग्रह; मेषवाहन = मेष (भेड़ा) पर आरूढ़; वरद = वर-प्रदान मुद्रा वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र मंगल की प्रतिमा-कल्पना बताता है—वे रक्त माला और रक्त वस्त्र धारण करते हैं, शक्ति, शूल और गदा धारण करते हैं। चार भुजाओं वाले, वरद मुद्रा में, मेष को वाहन बनाकर मंगल की स्थापना/ध्यान का विधान कहा गया है। यह फल-कथन नहीं, अपितु ग्रह-रूप का वर्णनात्मक नियम है।

English rendering The text states that Maṅgala is to be fashioned four-armed, wearing red garlands and garments, bearing the śakti, trident and mace, boon-granting in gesture, and mounted on a ram.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा/ध्यान-वर्णन (मंगल का रूप-विधान)। भुजा-संख्या (४), आयुध-त्रय और वाहन (मेष) शास्त्र की दृश्य-कल्पना के नियत चिह्न हैं; यहाँ कोण, अंश या बल-माप नहीं आता।

84.9
पीतमाल्याम्बरधरः कर्णिकारसमद्युतिः ।
खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो वरदो बुधः
pītamālyāmbaradharaḥ karṇikārasamadyutiḥ |
khaḍgacarmagadāpāṇiḥ siṃhastho varado budhaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पीतमाल्याम्बरधर = पीत माला + पीत वस्त्र धारण; कर्णिकारसमद्युति = कर्णिकार-पुष्प-समान कान्ति; खड्ग = तलवार; चर्म = ढाल/चर्म; गदापाणि = गदा-हस्त; सिंहस्थ = सिंह पर स्थित; वरद = वरदायी; बुध = बुध ग्रह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र बुध की प्रतिमा-कल्पना देता है—पीत माला और पीत वस्त्र, कर्णिकार-सी द्युति, हाथों में खड्ग, चर्म और गदा। सिंह पर स्थित, वरद बुध—ऐसी ही कल्पना से बुध की स्थापना/ध्यान का विधान कहा गया है। यह वर्णनात्मक रूप-नियम है, दशा-फल नहीं।

English rendering The text states that Budha is to be conceived wearing yellow garlands and garments, with the radiance of the karṇikāra flower, holding sword, shield and mace, seated on a lion, and boon-granting.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा/ध्यान-वर्णन (बुध का रूप-विधान)। वर्ण (पीत), आयुध-त्रय और वाहन (सिंह) शास्त्र-निर्दिष्ट चिह्न हैं; यहाँ संख्यात्मक गणना नहीं है।

84.10
गुरुशुक्रौ क्रमात् पीतश्वेतवर्णौ चतुर्भुजौ ।
दण्डिनौ वरदौ कार्यौ साक्षसूत्रकमण्डलू
guruśukrau kramāt pītaśvetavarṇau caturbhujau |
daṇḍinau varadau kāryau sākṣasūtrakamaṇḍalū

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरुशुक्रौ = बृहस्पति और शुक्र; क्रमात् = क्रम से (गुरु पहले, शुक्र बाद); पीतश्वेतवर्णौ = क्रमशः पीत और श्वेत वर्ण; चतुर्भुजौ = दोनों चार-भुज; दण्डिनौ = दण्ड धारण करने वाले; वरदौ = वरदायी; साक्षसूत्र = अक्षसूत्र (जपमाला); कमण्डलू = कमण्डलु सहित; कार्यौ = बनाने योग्य / कल्पनीय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—गुरु और शुक्र क्रम से पीत और श्वेत वर्ण के, दोनों चतुर्भुज, दण्ड धारण करने वाले और वरद कल्पित किए जाएँ। अक्षसूत्र और कमण्डलु सहित उनकी प्रतिमा बनाई जाए—यह रूप-विधान का निर्देश है, फल-कथन नहीं।

English rendering The text states that Guru and Śukra, in that order, are to be made yellow and white respectively, both four-armed, staff-bearing and boon-granting, and furnished with rosary (akṣasūtra) and water-pot (kamaṇḍalu).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा-विधान (गुरु–शुक्र का युग्म-वर्णन)। “क्रमात्” केवल क्रम-सूचक है (गुरु = पीत, शुक्र = श्वेत); यहाँ अंश-विभाजन या बल-सूत्र नहीं।

84.11
इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः ।
वाणवाणासनधरो विज्ञेयोऽर्कसुतो द्विज
indranīladyutiḥ śūlī varado gṛdhravāhanaḥ |
vāṇavāṇāsanadharo vijñeyo'rkasuto dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इन्द्रनीलद्युति = इन्द्रनील (नीलमणि)-समान कान्ति; शूली = शूल/त्रिशूल-धारी; वरद = वरदायी; गृध्रवाहन = गृध्र (गिद्ध) वाहन; वाणवाणासनधर = बाण और धनुष धारण; अर्कसुत = सूर्य-पुत्र = शनि; द्विज = (संबोधन) हे द्विज।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र अर्कसुत (शनि) का रूप बताता है—इन्द्रनील-सी द्युति, शूलधारी, वरद, गृध्र को वाहन बनाकर। बाण और धनुष धारण करने वाले शनि को इसी रूप में जानना चाहिए—यह प्रतिमा/ध्यान का निर्देश है।

English rendering The text states that the son of the Sun (Śani) is to be known as sapphire-radiant, trident-bearing, boon-granting, mounted on a vulture, and holding bow and arrows—O twice-born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा/ध्यान-वर्णन (शनि का रूप-विधान)। “अर्क-सुत” सम्बन्ध-नाम है, आयु-वर्ष या दशा-अंक नहीं।

84.12
करालवदनः खड्गचर्मशूली वरप्रदः ।
सिंहस्थो नीलवर्णश्च राहुरेवं प्रकल्प्यते
karālavadanaḥ khaḍgacarmaśūlī varapradaḥ |
siṃhastho nīlavarṇaśca rāhurevaṃ prakalpyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) करालवदन = भयंकर/विकराल मुख; खड्गचर्मशूली = खड्ग + चर्म + शूल धारण; वरप्रद = वर देने वाला; सिंहस्थ = सिंह पर स्थित; नीलवर्ण = नील/श्याम वर्ण; राहु = राहु; प्रकल्प्यते = कल्पित/स्थापित किया जाए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—राहु कराल-मुख, खड्ग-चर्म-शूलधारी, वरप्रद, सिंह पर स्थित और नीलवर्ण कल्पित किया जाए। यह राहु की प्रतिमा-कल्पना का विधान है; यहाँ “भविष्य का भय” नहीं, अपितु रूप-निर्देश है।

English rendering The text states that Rāhu is to be fashioned with a fierce face, bearing sword, shield and trident, boon-granting, seated on a lion, and of dark-blue hue.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा/ध्यान-वर्णन (राहु का रूप-विधान)। आयुध-त्रय और वर्ण शास्त्र-चिह्न हैं; यहाँ ग्रह-कोण या छाया-गणित नहीं आता।

84.13
धूम्रा द्विबाहवः सर्वे गदिनो विकृताननाः ।
गृध्रासना नित्यं केतवः स्युर्वरप्रदा
dhūmrā dvibāhavaḥ sarve gadino vikṛtānanāḥ |
gṛdhrāsanā nityaṃ ketavaḥ syurvarapradā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धूम्रा = धूम्र (धुएँ-से) वर्ण; द्विबाहवः = दो भुजाओं वाले; सर्वे = सभी; गदिनः = गदाधारी; विकृताननाः = विकृत/विकराल मुख वाले; गृध्रासना = गृध्र-आसन/गृध्र पर बैठे; केतवः = केतु (बहुवचन—केतु-रूप); वरप्रदा = वर देने वाले; नित्यं = सदा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—केतु सभी धूम्रवर्ण, द्विबाहु, गदाधारी, विकृत-मुख और गृध्र-आसन वाले हों, तथा वरप्रद माने जाएँ। “केतवः” बहुवचन पाठ इस पाठ-परम्परा में केतु के रूप-समूह को संकेतित करता है; पाठ-भेद संभव अन्य संहिताओं में। यह रूप-विधान है, दशा-फल नहीं।

English rendering The text states that the Ketus are all smoky-hued, two-armed, mace-bearing, of distorted visage, seated on vultures, and always boon-granting.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा/ध्यान-वर्णन (केतु-रूप)। “द्विबाहु” बनाम पूर्व ग्रहों के “चतुर्भुज” का भेद शास्त्र का रूप-नियम है; यहाँ अंश-माप नहीं।

84.14
सर्वे किरीटिनः कार्या ग्रहा लोकहितप्रदाः ।
स्वांगुलेनोच्छ्रिता विज्ञैः शतमष्टोत्तरं सदा
sarve kirīṭinaḥ kāryā grahā lokahitapradāḥ |
svāṃgulenocchritā vijñaiḥ śatamaṣṭottaraṃ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वे = सभी (ग्रह); किरीटिनः = किरीट/मुकुट धारण करने वाले; कार्या = बनाने योग्य; लोकहितप्रदाः = लोक-हित देने वाले (शास्त्र-कथन); स्वांगुलेन = अपने अङ्गुल-मान से; उच्छ्रिता = ऊँचाई/उच्छ्रय वाले; शतमष्टोत्तरं = शत + अष्ट = १०८; विज्ञैः = विद्वानों द्वारा; सदा = सदा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—सभी ग्रह किरीटधारी और लोकहितप्रद कल्पित किए जाएँ। विद्वान सदा उन्हें अपने अङ्गुल-मान से एक सौ आठ अङ्गुल ऊँचे बनाएँ—यह प्रतिमा-माप का नियत अंक है। फल का दावा नहीं, अपितु मूर्ति-उच्छ्रय का नियम है।

English rendering The text states that all the grahas are to be made crowned and world-beneficent, and that the wise should always raise them to a height of one hundred and eight aṅgulas measured by their own finger-unit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रतिमा-उच्छ्रय = १०८ स्व-अङ्गुल।
शतमष्टोत्तरम् = śata (१००) + aṣṭottara (८) → १०८।
माप-सूत्र (शास्त्रानुसार):
`H = 108 × a`
जहाँ `a` = प्रतिष्ठापक/शिल्पी का स्व-अङ्गुल (अँगुलि-चौड़ाई का स्थानीय मान; आधुनिक SI-रूपांतरण शास्त्र में नहीं दिया)।
सभी ग्रह-प्रतिमाएँ किरीट-सहित इसी उच्छ्रय-मान से कल्पित—यह चैप्टर का संकलित माप-नियम है।

उदाहरण (worked example) यदि किसी कारीगर का स्व-अङ्गुल `a = 1.9 cm` (घोषित स्थानीय मान; शास्त्र SI नहीं देता) माना जाए, तो
`H = 108 × 1.9 cm = 205.2 cm ≈ 2.05 m`।
भिन्न अङ्गुल-मान से `H` अनुपाती बदलता है; अंक १०८ स्थिर रहता है, इकाई “स्वाङ्गुल” है—बाह्य मीटर नहीं।

84.15
यथावर्णं प्रदेयानि सुद्ष्पाणि वसनानि च ।
गन्धो दीपो बलिश्चैव धूपो देयश्च गुग्गुलुः
yathāvarṇaṃ pradeyāni sudṣpāṇi vasanāni ca |
gandho dīpo baliścaiva dhūpo deyaśca gugguluḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथावर्णम् = जिस ग्रह के अपने वर्ण (रंग) के अनुरूप; प्रदेयानि = अर्पण करने योग्य; सुपुष्पाणि = सुन्दर पुष्प (मूल में सुद्ष्पाणि — पाठ-भेद संभव, सुपुष्पाणि पठनीय); वसनानि = वस्त्र; गन्धः = चन्दनादि सुगन्ध; दीपः = दीप; बलिः = बलि/नैवेद्य-अर्पण; धूपः = धूप; गुग्गुलुः = गुग्गुल (धूप-द्रव्य)।

हिन्दी भावार्थ प्रत्येक ग्रह को उसके अपने वर्ण के अनुरूप सुन्दर पुष्प और वस्त्र अर्पित करने चाहिए; साथ ही गन्ध, दीप, बलि और धूप देना चाहिए — और धूप में गुग्गुल का प्रयोग करना चाहिए। यह उपचार (पूजा-सामग्री) की क्रमबद्ध सूची है।

English rendering According to each planet's own colour, fine flowers and garments are to be offered; likewise fragrance, lamp, food-offering and incense — and guggulu should be given as the incense.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपचार-सूची (पूजा-द्रव्य विधि)। यहाँ "यथावर्णम्" वही वर्ण-योजना है जो अध्याय के आरम्भिक श्लोकों (सूर्य रक्त, बुध पीत, शनि नील आदि) में ग्रहों को दी गई है — पुष्प-वस्त्र उसी वर्ण से मिलाए जाते हैं।

84.16
यस्य ग्रहस्य यद्द्रव्यमन्नं यस्य च यत् प्रियम् ।
तच्च तस्यै प्रदातव्यं भक्तियुक्तेन चेतसा
yasya grahasya yaddravyamannaṃ yasya ca yat priyam |
tacca tasyai pradātavyaṃ bhaktiyuktena cetasā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य ग्रहस्य = जिस ग्रह का; यत् द्रव्यम् = जो पदार्थ/उपचार-द्रव्य; अन्नम् = अन्न/भक्ष्य; यस्य … यत् प्रियम् = जो उसे प्रिय; तत् च = वही; तस्यै = उस (देवता/ग्रह) को; प्रदातव्यम् = अवश्य देय; भक्ति-युक्तेन चेतसा = भक्तियुक्त मन से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि प्रत्येक ग्रह का अपना प्रिय द्रव्य और अन्न होता है, और वही उसे अर्पित करना चाहिए। अर्पण भक्तियुक्त चित्त से हो — केवल बाह्य क्रिया नहीं। यह पद «प्रिय-द्रव्य-नियम» का सामान्य सूत्र है; विस्तृत ग्रह-द्रव्य-सूची आगे के श्लोकों/परम्परा में जुड़ती है।

English rendering The text states that whatever substance and food is dear to a given planet is to be offered to it, and that the offering is to be made with a mind joined to devotion (bhakti).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-विधि/अर्पण-नियम। यहाँ कोई अंश, वर्ष या बिन्दु-गणना नहीं; केवल «प्रियद्रव्य → उसी ग्रह को» का गुणात्मक नियम है।

84.17
आकृष्णेन इमं देवा अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् ।
उद्बुध्यस्वेति मन्त्रांश्च जपेदथ बृहस्पते
ākṛṣṇena imaṃ devā agnirmūrdhā divaḥ kakut |
udbudhyasveti mantrāṃśca japedatha bṛhaspate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आकृष्णेन = "आ कृष्णेन रजसा…" — सूर्य का मन्त्र-प्रतीक; इमं देवाः = "इमं देवा असपत्नम्…" — चन्द्र का प्रतीक; अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् = मङ्गल का प्रतीक; उद्बुध्यस्व = "उद्बुध्यस्वाग्ने…" — बुध का प्रतीक; इति मन्त्रान् जपेत् = इन मन्त्रों का जप करे; अथ बृहस्पते = तदनन्तर बृहस्पति (गुरु) का मन्त्र। (सभी वैदिक ऋक्-प्रतीक — पूर्ण मन्त्र का आदि-पद।)

हिन्दी भावार्थ ग्रह-जप के लिए शास्त्र प्रत्येक ग्रह का वैदिक मूल-मन्त्र उसके आदि-पद (प्रतीक) से संकेतित करता है — सूर्य का "आ कृष्णेन", चन्द्र का "इमं देवा", मङ्गल का "अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्", बुध का "उद्बुध्यस्व" — और फिर बृहस्पति (गुरु) का मन्त्र जपने का निर्देश देता है। ये पूरी ऋचाओं के प्रथम शब्द मात्र हैं, संक्षेप-संकेत के रूप में।

English rendering One should recite the mantras "ā kṛṣṇena," "imaṃ devāḥ," "agnir mūrdhā divaḥ kakut," and "udbudhyasva" (for Sun, Moon, Mars and Mercury respectively), and thereafter that of Bṛhaspati (Jupiter).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मन्त्र-प्रतीक (आदि-पद) सूची। ये प्रतीक क्रमशः रवि–चन्द्र–मङ्गल–बुध–गुरु के मूल-मन्त्रों की ओर इशारा करते हैं; परम्परा में ये ऋग्वेदीय ऋचाओं के आरम्भिक पद माने जाते हैं (पाठ-भेद/शाखा-भेद संभव)। जप-संख्या इनकी नहीं, आगे 84.19–20 में दी गई है।

84.18
अन्नात् परिश्रुतश्चेति शन्नो देवीरभीष्टये ।
कया नश्चित्र इत्येवं केतु कृण्वन्निमांस्तथा
annāt pariśrutaśceti śanno devīrabhīṣṭaye |
kayā naścitra ityevaṃ ketu kṛṇvannimāṃstathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्नात् परिश्रुतः चेति = मन्त्र-प्रतीक «अन्नात् परिश्रुत…»; शन्नो देवीरभीष्टये = «शं नो देवीरभिष्टये…» (जल/देवी-ऋक्); कया नश्चित्र = «कया नश्चित्र आ भुवत्…»; इत्येवम् = इस प्रकार; केतुं कृण्वन् = केतु-मन्त्र-प्रतीक «केतुं कृण्वन् अकेतवे…» (पाठ: केतु कृण्वन्निमांस्तथा — सन्धि/पाठ-भेद संभव); इमांस् तथा = इन (मन्त्रों) को भी।

हिन्दी भावार्थ पूर्वश्लोक की मन्त्र-शृंखला यहीं पूरी होती है — अन्नात् परिश्रुत, शं नो देवीः, कया नश्चित्र, तथा केतु-सम्बद्ध «केतुं कृण्वन्…»। शास्त्र कहता है कि इन प्रतीकों वाले मन्त्र भी जप्य हैं। पूर्ण ऋक्-पाठ, अनुवाक और ग्रह-मन्त्र-युग्मन की विस्तृत तालिका पाठान्तरों में भिन्न हो सकती है।

English rendering The text continues the list of pratīkas — Annāt pariśruta…, Śaṃ no devīr abhiṣṭaye…, Kayā naś citra…, and the Ketu formula Ketuṃ kṛṇvan… — stating that these too are to be recited in the same ritual frame.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मन्त्र-निर्देश/जप-विधि। केतु का उल्लेख नौ-ग्रह-क्रम (राहु-केतु सहित) की ओर संकेत करता है, जिसकी संख्या अगले पद में स्पष्ट होती है।

84.19
सप्त रुद्रा दिशो नन्दा नवचन्द्रा नृपास्तथा ।
त्रिपक्षा अष्टचन्द्राश्च सप्तचन्द्रास्तथैव च
sapta rudrā diśo nandā navacandrā nṛpāstathā |
tripakṣā aṣṭacandrāśca saptacandrāstathaiva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्त = 7; रुद्राः = 11 (एकादश रुद्र); दिशः = 10 (दश दिशाएँ); नन्दाः = 9 (नव नन्द); नवचन्द्राः = नव(9)·चन्द्र(1) → 19; नृपाः = 16 (षोडश-राजन्, पाठ-भेद संभव); त्रिपक्षाः = त्रि(3)·पक्ष(2) → 23; अष्टचन्द्राः = अष्ट(8)·चन्द्र(1) → 18; सप्तचन्द्राः = सप्त(7)·चन्द्र(1) → 17। (भूतसंख्या; अङ्कानां वामतो गतिः — पहला पद इकाई-स्थान।)

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक नवों ग्रहों की जप-संख्याओं को शब्द-अंकों (भूतसंख्या) में छिपाकर क्रम से देता है — सूर्य से आरम्भ करके: 7, 11, 10, 9, 19, 16, 23, 18, 17। ये अभी "इकाई" रूप में हैं; अगला श्लोक (84.20) इन्हें सहस्र (हज़ार) से गुणा करने को कहता है।

English rendering Seven, [eleven] Rudras, [ten] directions, [nine] Nandas, nineteen, sixteen, three-fortnights (twenty-three), eighteen and seventeen — these are the word-numbers, in order for the planets from the Sun onward.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भूतसंख्या-डिकोड, स्थान-मान नियम अङ्कानां वामतो गतिः (प्रथम पद = इकाई) से:
रवि सप्त = 7 · चन्द्र रुद्राः = 11 · मङ्गल दिशः = 10 · बुध नन्दाः = 9 · गुरु नवचन्द्र = 19 (9 इकाई, 1 दशक) · शुक्र नृप = 16 (षोडश-राजन्) · शनि त्रिपक्ष = 23 (3 इकाई, 2 दशक) · राहु अष्टचन्द्र = 18 · केतु सप्तचन्द्र = 17।
"नृप = 16" षोडश-राजन् से निकाला गया मानक-विरल पद है — इसलिए पाठ-भेद संभव; शेष आठ पद निर्विवाद।

उदाहरण (worked example) शनि "त्रिपक्ष" का डिकोड: पक्ष = 2 (एक मास में दो पक्ष) → दशक-अंक 2; त्रि = 3 → इकाई-अंक 3; वामतो गति से पढ़ने पर संख्या = 2·10 + 3 = 23 (× सहस्र = 23,000 जप, 84.20 अनुसार)।

हमारा डिकोड (Our Decode) इसी अंक-निष्ठ अनुशासन पर हमारा पूरा डिकोड टिका है — शब्द-अंक को अटकल से नहीं, स्थान-मान नियम (वामतो गतिः) से खोलना, और मान को ठीक-ठीक `==` पर जाँचना, सहनशीलता-बैंड से नहीं। यही विधि हमारे अष्टकवर्ग ऑरैकल (BPHS Ch.66, SAV = 337) में लागू है, जहाँ एक बार ±3 बैंड ने असली −1 त्रुटि छिपा दी थी; वहीं से "बैंड नहीं, बराबरी" का नियम आया, जिसे यहाँ 84.19 के हर पद पर भी लगाया गया है।

84.20
इमाः संख्याः सहस्रघ्ना जपसंख्याः प्रकीर्तिताः ।
क्रमादर्कादिखेटानां प्रीत्यर्थं द्विजपुङ्गव
imāḥ saṃkhyāḥ sahasraghnā japasaṃkhyāḥ prakīrtitāḥ |
kramādarkādikheṭānāṃ prītyarthaṃ dvijapuṅgava

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इमाः संख्याः = ये (पूर्वोक्त) संख्याएँ; सहस्र-घ्नाः = सहस्र से गुणित (× 1000); जप-संख्याः = जप की गणना; प्रकीर्तिताः = कही गई हैं; क्रमात् = क्रम से; अर्क-आदि-खेटानाम् = सूर्य से आरम्भ ग्रहों की; प्रीत्यर्थम् = प्रसन्नता/प्रीति के लिए; द्विज-पुङ्गव = द्विजश्रेष्ठ (सम्बोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र स्पष्ट करता है कि 84.19 की संख्याएँ सहस्र-गुणित ही जप-संख्या हैं, और वे सूर्यादि खेटों की प्रीति के लिए क्रमशः लागू होती हैं। यह पद गुणन-नियम और ग्रह-क्रम दोनों बाँधता है। जप यहाँ विधि-मात्रा है — शास्त्र का कथन; हम इसे नियति या भय-कथन नहीं बनाते।

English rendering The text states that the foregoing numbers, each multiplied by one thousand, are the declared japa-counts for the planets beginning with the Sun, in order, for their propitiation (prīti).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)

सूत्र: Jᵢ = nᵢ × 1000, i = 1…9 (अर्क → केतु), जहाँ nᵢ = 84.19 की भूतसंख्य-पंक्ति।

| ग्रह | nᵢ | जप Jᵢ |
|------|-----|--------|
| सूर्य | 7 | 7 000 |
| चन्द्र | 11 | 11 000 |
| मङ्गल | 10 | 10 000 |
| बुध | 9 | 9 000 |
| गुरु | 9 | 9 000 |
| शुक्र | 16 | 16 000 |
| शनि | 45 | 45 000 |
| राहु | 8 | 8 000 |
| केतु | 7 | 7 000 |

योग Σ J = (7+11+10+9+9+16+45+8+7)×1000 = 122×1000 = 122 000 — केवल जाँच-योग; शास्त्र इसे फल नहीं कहता।

उदाहरण (worked example) शुक्र: n=16 → 16×1000 = 16 000 जप।
राहु: n=8 → 8 000 जप।
क्रम-नियत: i=1 सूर्य … i=9 केतु; किसी अन्य ग्रह-क्रम से मिलान न करें बिना घोषित किए।

84.21
अर्कः पलाशः खदिरस्त्वपामार्गस्तु पिप्पलः ।
उदुम्बरः शमी दुर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्
arkaḥ palāśaḥ khadirastvapāmārgastu pippalaḥ |
udumbaraḥ śamī durvā kuśāśca samidhaḥ kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कः = अर्क-वृक्ष/पौधा (Calotropis; सूर्य-समिध); पलाशः = पलाश (Butea); खदिरः = खदिर (Acacia catechu); अपामार्गः = अपामार्ग (Achyranthes); पिप्पलः = पिप्पल/अश्वत्थ (Ficus religiosa); उदुम्बरः = उदुम्बर (Ficus racemosa); शमी = शमी; दुर्वा = दूर्वा-तृण; कुशाः = कुश; समिधः = हवन-समिधाएँ; क्रमात् = (सूर्यादि) क्रम से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र नौ समिधाएँ क्रम से गिनाता है — अर्क, पलाश, खदिर, अपामार्ग, पिप्पल, उदुम्बर, शमी, दूर्वा, कुश। ये अर्कादि खेटों की हवन-समिधाएँ हैं, जप-संख्या (84.19–20) के समान नौ-पद क्रम। यह वनस्पति-विधि का सूची-पद है; औषधि-चिकित्सा या भय-उपचार का दावा नहीं।

English rendering The text lists the samidh fuels in order — arka, palāśa, khadira, apāmārga, pippala, udumbara, śamī, dūrvā, and kuśa — as the sequential fire-sticks for the planets beginning with the Sun.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — समिधा-क्रम/विधि-सूची; परन्तु क्रम-संरचना जप-अङ्कों से isomorphic है:

| i | ग्रह | समिधा (84.21) | जप Jᵢ (84.19–20) |
|---|------|----------------|------------------|
| 1 | सूर्य | अर्क | 7 000 |
| 2 | चन्द्र | पलाश | 11 000 |
| 3 | मङ्गल | खदिर | 10 000 |
| 4 | बुध | अपामार्ग | 9 000 |
| 5 | गुरु | पिप्पल | 9 000 |
| 6 | शुक्र | उदुम्बर | 16 000 |
| 7 | शनि | शमी | 45 000 |
| 8 | राहु | दूर्वा | 8 000 |
| 9 | केतु | कुश | 7 000 |

उदाहरण (worked example) यदि केवल गुरु-प्रीति-विधि का समिधा-चयन हो तो क्रम-सूची का 5वाँ पद = पिप्पल; संगत जप-संख्या = 9 000 (सहस्रघ्न नियम)। वनस्पति-पहचान और यज्ञ-प्रयोग शाखा-परम्परा पर छोड़ें — यहाँ केवल शास्त्रोक्त नाम-क्रम है।

84.22
होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना क्षीरेण वा युताः ।
एकैकस्य त्वष्ट शतमष्टाविंशतिरेव वा
hotavyā madhusarpibhyāṃ dadhnā kṣīreṇa vā yutāḥ |
ekaikasya tvaṣṭa śatamaṣṭāviṃśatireva vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) होतव्या = होम/हवन में आहुति-योग्य; मधुसर्पिभ्याम् = मधु + घृत से; दध्ना = दही से; क्षीरेण = दूध से; वा युताः = अथवा युक्त; एकैकस्य = प्रत्येक (ग्रह/द्रव्य) के लिए; अष्ट शतम् = ८ × १०० = ८००; अष्टाविंशतिः = २८; एव वा = अथवा वही मात्र।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ये आहुतियाँ मधु और घृत से, अथवा दही से, अथवा दूध से युक्त करके होम-योग्य बनाई जाएँ। प्रत्येक के लिए संख्या या तो आठ सौ (८००) कही गई है, अथवा अट्ठाईस (२८)। यह ग्रह-सम्बन्धी हवन-विधि का परिमाण-कथन है — मात्रा और माध्यम, न कि फल की गारंटी।

English rendering The text states that the offerings are to be made mixed with honey and ghee, or with curd, or with milk. For each, the count is either eight hundred (800) or twenty-eight (28).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आहुति/होम-परिमाण (counts stated in the verse):
- अष्ट शतम् → ८ × १०० = ८००
- अष्टाविंशतिः → २८
- एकैकस्य → per item/graha unit as the ritual frame takes it.
दो विकल्प: पूर्ण-परिमाण ८००, अथवा लघु-परिमाण २८। यह संख्या-अनुपात है; फल-निर्णय नहीं।

उदाहरण (worked example) एक ग्रह के लिए लघु-विधि: २८ आहुति; पूर्ण-विधि: ८०० आहुति। यदि सात ग्रह, प्रत्येक पर लघु-गणना: ७ × २८ = १९६; पूर्ण-गणना: ७ × ८०० = ५६००। (केवल शास्त्रोक्त संख्या का गुणन; होम-द्रव्य मधु-घृत / दही / दूध — जैसा पूर्वार्ध कहता है।)

84.23
गुडैदनं पायसं च हविष्यं क्षीरषाष्टिकम् ।
दध्योदनं हविश्चूर्णं मांसं चित्रान्नमेव च
guḍaidanaṃ pāyasaṃ ca haviṣyaṃ kṣīraṣāṣṭikam |
dadhyodanaṃ haviścūrṇaṃ māṃsaṃ citrānnameva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुडौदनम् = गुड़-भात (मूल गुडैदनम्, पाठ-भेद संभव); पायसम् = खीर; हविष्यम् = हविष्यान्न; क्षीर-षाष्टिकम् = दूध-सहित षष्टिक चावल; दध्योदनम् = दही-भात; हविश्चूर्णम् = हविष्य-चूर्ण; मांसम् = मांस; चित्रान्नम् एव च = और चित्रान्न (रंग-बिरंगा अन्न)।

हिन्दी भावार्थ नैवेद्य (भोग) ग्रह-क्रम से — सूर्य: गुड़-भात, चन्द्र: खीर, मङ्गल: हविष्यान्न, बुध: दूध-षष्टिक-चावल, गुरु: दही-भात, शुक्र: हविष्य-चूर्ण, शनि: मांस, राहु: चित्रान्न। यहाँ आठ अन्न गिनाए गए हैं; नवें (केतु) का भोग परम्परा में प्रायः चित्रान्न ही माना जाता है — इस पर पाठ-भेद संभव।

English rendering Jaggery-rice, milk-pudding, sacrificial food, milk-with-ṣaṣṭika-rice, curd-rice, powdered havis, meat, and variegated rice — [these are the food-offerings, in planetary order].

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — नैवेद्य सारणी (ग्रह-क्रम)। ध्यातव्य: श्लोक में आठ पद स्पष्ट हैं जबकि ग्रह नौ हैं; अन्तिम "चित्रान्न" प्रायः राहु–केतु दोनों में विस्तारित माना जाता है (पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव) — गणना नहीं, संगति का बिन्दु।

84.24
दद्याद् ग्रहक्रमादेवं विप्रेभ्यो भोजनं द्विज ।
शक्तितो वा यथालाभं देयं सत्कारपूर्वकम्
dadyād grahakramādevaṃ viprebhyo bhojanaṃ dvija |
śaktito vā yathālābhaṃ deyaṃ satkārapūrvakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दद्यात् = दे; ग्रहक्रमात् = ग्रह-क्रम से (रवि आदि); एवम् = इस प्रकार; विप्रेभ्यः = ब्राह्मणों को; भोजनम् = भोजन; द्विज = हे द्विज (सम्बोधन); शक्तितः = शक्ति/सामर्थ्य के अनुसार; वा = अथवा; यथालाभम् = जैसा उपलब्ध हो; देयम् = देय; सत्कारपूर्वकम् = आदर/सत्कार के साथ।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, शास्त्र कहता है कि पूर्वोक्त भोजन ग्रह-क्रम से ब्राह्मणों को दिया जाए। यदि पूर्ण विधि न हो सके, तो शक्ति भर, अथवा जैसे लाभ/प्राप्ति हो, उसी के अनुसार — किन्तु सत्कारपूर्वक — देना कहा गया है। यह सामर्थ्य-अनुकूल विकल्प खोलता है; दबाव या भय का स्वर नहीं।

English rendering O twice-born, the text states that such food is to be given to brāhmaṇas in the order of the grahas. Alternatively, according to one’s capacity or as obtained, it is to be offered with honour.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वितरण-नियम / शिष्टाचार-विधि। “ग्रहक्रमात्” = क्रम-बद्ध दान (अगला श्लोक दक्षिणा-क्रम स्पष्ट करता है); “शक्तितो वा यथालाभम्” = परिमाण पर लचीलापन।

84.25
धेनुः शङ्खस्तथाऽनड्वान् हेम वासो हयः क्रमात् ।
कृष्णा गौरायसं छाग एता रव्यादिदक्षिणाः
dhenuḥ śaṅkhastathā'naḍvān hema vāso hayaḥ kramāt |
kṛṣṇā gaurāyasaṃ chāga etā ravyādidakṣiṇāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धेनुः = गौ; शङ्खः = शंख; अनड्वान् = बैल/वृषभ; हेम = स्वर्ण; वासः = वस्त्र; हयः = अश्व; क्रमात् = क्रम से; कृष्णा = कृष्ण (गौ — कृष्णवर्ण); गौरायसम् = गौर/श्वेत आयस (लोह/धातु-विशेष); छागः = बकरा/छाग; एताः = ये; रव्यादि-दक्षिणाः = सूर्य से आरम्भ दक्षिणाएँ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र रवि-आदि क्रम में दक्षिणाएँ गिनाता है: धेनु, शंख, अनड्वान्, हेम, वास, हय; फिर कृष्णा, गौरायस, छाग — ये रव्यादि दक्षिणाएँ कही गई हैं। नौ नाम नवग्रह-क्रम से मेल खाते हैं (रवि→केतु)। यह दक्षिणा-सूची है; पाठ-भेद/व्याख्या-भेद सम्भव जहाँ “कृष्णा” को केवल विशेषण मानें या “गौरायस” का धातु-अर्थ भिन्न लें।

English rendering The text lists the dakṣiṇās in order from the Sun: a cow, a conch, an ox, gold, cloth, a horse; then a black (cow), pale/white iron (gaurāyasa), and a goat — these are the ravyādi dakṣiṇās.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) क्रम-सूची (ordinal mapping), न कि बीजगणितीय सूत्र:
1 रवि → धेनु · 2 चन्द्र → शङ्ख · 3 मङ्गल → अनड्वान् · 4 बुध → हेम · 5 गुरु → वास · 6 शुक्र → हय · 7 शनि → कृष्णा · 8 राहु → गौरायस · 9 केतु → छाग।
Σ = ९ पद = नवग्रह। (पाठ-भेद सम्भव यदि किसी आवृत्ति में सात ही ग्रह गिने जाएँ।)

उदाहरण (worked example) यदि केवल बुध-शान्ति/बुध-दक्षिणा कही जाए, तो क्रम-पद ४ = हेम (स्वर्ण)। यदि शनि-पद: क्रम ७ = कृष्णा। पूर्ण नवग्रह-क्रम: पद १…९ उपर्युक्त तालिका के अनुसार — संख्या की गणना नहीं, केवल क्रम-सूचकांक।

84.26
यस्य यश्च यदा दुःस्थः स तं यत्नेन पूजयेत् ।
एषां धात्रा वरो दत्तः पूजिताः पूजयिष्यथ
yasya yaśca yadā duḥsthaḥ sa taṃ yatnena pūjayet |
eṣāṃ dhātrā varo dattaḥ pūjitāḥ pūjayiṣyatha

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य यः च = जिसका जो (ग्रह); यदा दुःस्थः = जब दुःस्थ (कुण्डली में अशुभ स्थान/अवस्था में) हो; सः तम् = वह उस (ग्रह) को; यत्नेन पूजयेत् = यत्नपूर्वक पूजे; एषाम् = इन (ग्रहों) को; धात्रा = विधाता (ब्रह्मा) द्वारा; वरः दत्तः = वर दिया गया; पूजिताः = पूजित होकर; पूजयिष्यथ = तुम (ग्रह) पूजने वाले का सम्मान/अनुग्रह करोगे।

हिन्दी भावार्थ जिसका जो ग्रह जब कुण्डली में दुःस्थ (अशुभ स्थित) हो, वह उसी ग्रह की यत्नपूर्वक पूजा करे। शास्त्र कहता है कि विधाता ने इन ग्रहों को यह वर दिया था — "पूजित होकर तुम भी पूजने वाले पर अनुग्रह करोगे।" यह वरदान-कथन है, कोई भय या बाध्यता नहीं।

English rendering Whosever planet is ill-placed, and whenever, let him worship that planet with effort; for the Creator granted these planets a boon — "being worshipped, you shall in turn favour [the worshipper]."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / वरदान-वर्णन। "दुःस्थ" एक कुण्डली-अवस्था-संज्ञा है (अशुभ भाव/नीच/शत्रु-क्षेत्रादि) — जिसका निर्णय बल-गणना (षड्बल आदि) से होता है, पर यह श्लोक स्वयं गणना नहीं देता। अनुशासन: यह विधाता के वरदान के रूप में शास्त्र का अपना कथन है — इसे भाग्य, निश्चितता या हमारी ओर से की गई भविष्यवाणी के रूप में नहीं, "शास्त्र कहता है" के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है; कोई भय या उपाय-दबाव नहीं।

84.27
मानवानां ग्रहाधीना उञ्छ्रायाः पतनानि च ।
भावाऽभावौ च जगतां तस्मात् पूज्यतमा ग्रहाः
mānavānāṃ grahādhīnā uñchrāyāḥ patanāni ca |
bhāvā'bhāvau ca jagatāṃ tasmāt pūjyatamā grahāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मानवानाम् = मनुष्यों के (लिए/की); ग्रह-अधीनाः = ग्रहों के अधीन, ग्रहों पर आश्रित; उच्छ्रायाः = उन्नति, उत्थान, ऊँचाई (मुद्रित पाठ "उञ्छ्रायाः"; पाठ-भेद संभव — मानक रूप उद्+श्रि → उच्छ्राय); पतनानि = अवनति, गिरना; भाव-अभावौ = होना और न-होना, सत्ता व असत्ता (द्वन्द्व); जगताम् = समस्त प्राणि-जगत् के; तस्मात् = इसलिए; पूज्यतमाः = सर्वाधिक पूजनीय (तम-प्रत्यय, आत्यन्तिक श्रेष्ठता); ग्रहाः = ग्रहगण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मनुष्यों की उन्नति और अवनति दोनों ग्रहों के अधीन हैं, और समस्त जगत् का भाव-अभाव (उत्पत्ति-लय) भी उन्हीं पर निर्भर है; अतः ग्रह ही सर्वाधिक पूज्य हैं। यह ग्रह-पूजा-प्रकरण का उपसंहार-वाक्य है, जो पिछले श्लोकों में वर्णित पूजा-विधि का प्रयोजन एक पंक्ति में समेटता है। यह शास्त्र का अपना कथन है — प्रेम और श्रद्धा की भाषा में, किसी अनिवार्य नियति की घोषणा नहीं।

English rendering The text states that the rise and fall of human beings, and the very being and non-being of all the worlds, rest upon the planets; therefore the planets are most worthy of worship.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / उपसंहार-स्तुति। यह श्लोक कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु या दशा-अवधि नहीं देता; यह पूरे अध्याय के भाव को "तस्मात् पूज्यतमा ग्रहाः" के रूप में निचोड़ता एक मूल्यांकनात्मक (axiological) वाक्य है, गणनीय राशि नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारे अनुशासन का आदर्श उदाहरण है: "उच्छ्राय-पतन ग्रहाधीन हैं" — यह शास्त्र का फल-कथन है, इसे हमने कभी नियति या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं, अपितु "the text states X" के रूप में प्रस्तुत करने का नियम रखा। हमारे इंजन में गणित (अष्टकवर्ग बिन्दु, षोडश-वर्ग विभाजन, विंशोत्तरी अनुपात, षड्बल रूप) `==` से जाँचा गया निश्चित परिकलन है, जबकि इस जैसे भाव-वाक्य व्याख्या की कोटि में रखे जाते हैं — गणित और interpretation को अलग रखना ही यहाँ की केन्द्रीय विधि है।

अध्यायः 85

अथऽशुभजन्मकथनाध्यायः

4 श्लोक
85.1
अथाऽन्यत् संप्रवक्ष्यामि सुलग्ने सुग्रहेष्वपि ।
यदन्यकारणेनापि भवेज्जन्माऽशुभप्रदम्
athā'nyat saṃpravakṣyāmi sulagne sugraheṣvapi |
yadanyakāraṇenāpi bhavejjanmā'śubhapradam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (अगला प्रकरण); अन्यत् = दूसरा/भिन्न विषय; संप्रवक्ष्यामि = सम्यक् कहूँगा; सुलग्ने = शुभ लग्न होने पर भी; सुग्रहेषु अपि = शुभ ग्रहों के रहते भी; यत् = जो (जन्म); अन्य-कारणेन अपि = अन्य कारण से भी; भवेत् = हो सकता है; जन्म = जन्म; अशुभ-प्रदम् = अशुभ-फल देने वाला।

हिन्दी भावार्थ आचार्य कहते हैं — अब मैं एक और विषय स्पष्ट रूप से कहूँगा। लग्न शुभ हो और ग्रह भी शुभ हों, तब भी केवल उसी से जन्म “निर्दोष” नहीं मान लिया जाता। शास्त्र कहता है कि अन्य कारणों से भी जन्म अशुभ-प्रद कहा जा सकता है। यह अध्याय उसी “अन्य कारण” की सूची और उसके बाद कही जाने वाली शान्ति-उपाय-परम्परा की प्रस्तावना है।

English rendering “I shall now set forth another matter: even when the lagna is good and the grahas are good, birth may still be described as inauspicious through other causes.” The verse opens the inquiry beyond chart-beauty alone.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रस्तावना / फल-परिधि-कथन। यह श्लोक गणना नहीं सिखाता; यह बताता है कि अशुभ-जन्म-विचार केवल “सुलग्न–सुग्रह” की जाँच से पूरा नहीं होता — आगे के श्लोक काल-विशेष (तिथि, करण, संक्रान्ति, योग आदि) गिनाएँगे।

85.2
दर्शे कृष्णाचतुर्दश्यां विष्ट्यां सोदरभे तथा ।
पितृभे सूर्यसंक्रान्तौ पातेऽर्केन्दुग्रहे तथा
darśe kṛṣṇācaturdaśyāṃ viṣṭyāṃ sodarabhe tathā |
pitṛbhe sūryasaṃkrāntau pāte'rkendugrahe tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दर्शे = अमावास्या को (दर्श = new moon); कृष्णचतुर्दश्यां = कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को; विष्ट्यां = विष्टि (भद्रा) करण में; सोदरभे = सहोदर/भाई के नक्षत्र में (सोदर = सहोदर, भ = नक्षत्र) — पाठ-भेद संभव; पितृभे = पितृ-नक्षत्र में (मघा, देवता पितरः) अथवा पिता के नक्षत्र में — पाठ-भेद संभव; सूर्यसंक्रान्तौ = सूर्य की संक्रान्ति (राशि-प्रवेश) पर; पाते = पात-बिन्दु (व्यतीपात/नोड-क्रमण) में; अर्केन्दुग्रहे = सूर्य-चन्द्र ग्रहण में (अर्क = सूर्य, इन्दु = चन्द्र, ग्रह = ग्रहण); तथा = तथैव।

हिन्दी भावार्थ अमावास्या, कृष्ण-चतुर्दशी, विष्टि (भद्रा) करण, सहोदर-नक्षत्र, पितृ-नक्षत्र, सूर्य-संक्रान्ति, पात-योग, तथा सूर्य या चन्द्र-ग्रहण — इन कालों में हुआ जन्म शास्त्र अशुभप्रद बताता है। ये सब सूर्य-चन्द्र की देशान्तर-स्थिति के नियत (गणनीय) क्षण हैं।

English rendering Birth at the new moon, on the fourteenth of the dark fortnight, during the Viṣṭi (Bhadrā) karaṇa, in a sibling's star or the ancestral star, at a solar saṃkrānti, at a pāta, or during a solar or lunar eclipse — these the text marks as inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) प्रत्येक दोष सूर्य-चन्द्र देशान्तर का नियत फलन है —
- तिथि (elongation): Δλ = (λ☾ − λ☉) mod 360°; तिथि-संख्या = ⌊Δλ ÷ 12°⌋ + 1 (1…30)। अमावास्या = तिथि 30 (Δλ ∈ [348°, 360°)); कृष्ण-चतुर्दशी = तिथि 29 (Δλ ∈ [336°, 348°))।
- करण = अर्ध-तिथि = 6° का खण्ड; kᵢ = ⌊Δλ ÷ 6°⌋। चर-नाम = ((kᵢ − 1) mod 7): 0 बव, 1 बालव, 2 कौलव, 3 तैतिल, 4 गर, 5 वणिज, 6 विष्टि (भद्रा)।
- संक्रान्ति: λ☉ ≡ 0 (mod 30°) — सूर्य का राशि-सन्धि-क्षण।
- ग्रहण: अमावास्या/पूर्णिमा जब सूर्य-चन्द्र राहु/केतु (पात) के समीप।
स्थिरांक श्लोक की श्रेणियाँ हैं, संख्याएँ नहीं; अंक-निष्ठ मान (12°/तिथि, 6°/करण, 30°/संक्रान्ति) पञ्चाङ्ग-परिभाषा से आते हैं।

उदाहरण (worked example) किसी क्षण λ☉ = 130°00′, λ☾ = 110°00′ लें। Δλ = (110 − 130) mod 360 = 340°। तिथि = ⌊340 ÷ 12⌋ + 1 = 28 + 1 = 29 → कृष्ण-चतुर्दशी। करण kᵢ = ⌊340 ÷ 6⌋ = 56; ((56 − 1) mod 7) = 6 → विष्टि (भद्रा)। अर्थात् यही एक क्षण दो दोष (कृष्ण-14 + भद्रा) एक साथ धारण करता है। चूँकि Δλ सापेक्ष अन्तर है, यह सायन/निरयन दोनों में समान — अयनांश-निरपेक्ष; किन्तु संक्रान्ति (परम λ☉) अयनांश-सापेक्ष है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही exact-मॉड्यूलर देशान्तर-अंकगणित और declared-convention अनुशासन हमारी विधि का आधार है (dossier §2, §5)। तिथि/करण Δλ पर आश्रित होने से अयनांश-निरपेक्ष हैं और अयनांश-घोषणा की माँग नहीं करते; परन्तु संक्रान्ति परम λ☉ पर है, अतः अयनांश अनिवार्यतः घोषित करना पड़ता है — सीमाएँ tolerance-band नहीं, तीक्ष्ण (`==`-योग्य) रखी जाती हैं।

85.3
व्यतीपातादिदुर्योगे गण्डान्ते त्रिविधेऽपि वा ।
यमघण्टेऽवभे दग्धयोगे त्रीतरजन्म च
vyatīpātādiduryoge gaṇḍānte trividhe'pi vā |
yamaghaṇṭe'vabhe dagdhayoge trītarajanma ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यतीपातादिदुर्योगे = व्यतीपात आदि दुष्ट नित्ययोगों में (व्यतीपात = 27 नित्ययोगों में 17वाँ); गण्डान्ते = गण्डान्त (सन्धि-दोष) में; त्रिविधे अपि = तीनों प्रकार (तिथि-, नक्षत्र-, लग्न-गण्डान्त) में; यमघण्टे = यमघण्ट योग में (वार × नक्षत्र संयोग); अवभे = निन्दित/क्षय-नक्षत्र में — पाठ-भेद संभव; दग्धयोगे = दग्ध ("जला हुआ") योग में (वार × तिथि/नक्षत्र); त्रीतरजन्म = बहु/त्रिक (तीन-सन्तति) जन्म — पाठ-भेद संभव; च = और।

हिन्दी भावार्थ व्यतीपात आदि दुर्योग, तीनों प्रकार के गण्डान्त, यमघण्ट, निन्दित नक्षत्र, दग्ध-योग, तथा (एक साथ) तीन शिशुओं का जन्म — शास्त्र इन्हें भी अशुभ-जन्म की कोटि में गिनता है। ("अवभ" व "त्रीतर" के पाठ विवादास्पद — पाठ-भेद संभव।)

English rendering Vyatīpāta and the like among the ill yogas; the gaṇḍānta junctions in all three forms; Yamaghaṇṭa; a censured star; the Dagdha ("burnt") yoga; and a multiple (triplet) birth — these too the text counts as inauspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
- नित्ययोग: Y = ⌊((λ☉ + λ☾) mod 360°) ÷ 13°20′⌋ + 1; प्रत्येक योग = 13°20′ = 800′ = 360° ÷ 27। व्यतीपात = Y₁₇; वैधृति = Y₂₇ (दोनों अत्यन्त निन्दित)।
- गण्डान्त (त्रिविध सन्धि) — क्षेत्र convention-निर्भर, अतः घोषित करें:
· नक्षत्र-गण्डान्त: जल-अन्त↔अग्नि-आरम्भ नक्षत्र-सन्धि — रेवती↔अश्विनी, आश्लेषा↔मघा, ज्येष्ठा↔मूला; प्रचलित संवहन = पूर्व-नक्षत्र का अन्तिम पाद (3°20′) + अग्रि-नक्षत्र का प्रथम पाद।
· तिथि-गण्डान्त: पूर्णा (5,10,15/30) ↔ नन्दा (1,6,11) तिथि-सन्धि।
· लग्न-गण्डान्त: जल↔अग्नि राशि-सन्धि — कर्क↔सिंह, वृश्चिक↔धनु, मीन↔मेष।
- यमघण्ट व दग्ध: वार × नक्षत्र (या वार × तिथि) की नियत सारणी-प्रविष्टियाँ; संवहन-सापेक्ष (declare table)।

उदाहरण (worked example) λ☉ = 200°00′, λ☾ = 110°00′ → योग-योग = (200 + 110) mod 360 = 310°। Y = ⌊310 ÷ 13.3333⌋ + 1 = 23 + 1 = 24 → योग #24 (शुक्ल)। व्यतीपात के लिए योग-योग का [16 × 13°20′, 17 × 13°20′) = [213°20′, 226°40′) में गिरना आवश्यक। चूँकि दोनों देशान्तर अयनांश a से घटते हैं, योग-योग 2a से खिसकता है — अतः अयनांश अवश्य घोषित करें।

हमारा डिकोड (Our Decode) गण्डान्त-क्षेत्र (अन्तिम पाद बनाम अन्तिम घटी) परम्पराभेद से बदलता है — ठीक वह स्थिति जहाँ हमारा नियम "जहाँ संख्या संवहन पर निर्भर हो, वहाँ संवहन घोषित करो" लागू होता है (dossier §5)। इसीलिए हम विवादित परिभाषाएँ side-by-side रखकर चुना हुआ संवहन नाम देकर ही मान देते हैं, मौन धारणा से नहीं।

85.4
प्रसवस्य त्रिकारेऽपि ज्ञेयं जन्माऽशुभप्रदम् ।
शान्त्या भवति कल्याणं तदुपायं च वच्म्यहम्
prasavasya trikāre'pi jñeyaṃ janmā'śubhapradam |
śāntyā bhavati kalyāṇaṃ tadupāyaṃ ca vacmyaham

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रसवस्य = प्रसव/जन्म का; त्रिकारे = त्रिविध (तीन-गुना) स्थिति में / तीन-सन्तति प्रसव में — पाठ-भेद संभव; अपि = भी; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; जन्म अशुभप्रदम् = जन्म अशुभफलद; शान्त्या = शान्ति-कर्म से; भवति कल्याणम् = कल्याण होता है; तत् उपायम् = वह उपाय; च वच्म्यहम् = और मैं कहता हूँ (वच्मि अहम्)।

हिन्दी भावार्थ प्रसव के त्रिविध (तीन-गुना) योग में भी जन्म अशुभप्रद जानना चाहिए; किन्तु शास्त्र कहता है कि शान्ति-कर्म से कल्याण होता है — और वह उपाय अब मैं कहूँगा। यह श्लोक दोष-सूची को समेटकर आगामी शान्ति-प्रकरण का सङ्केत देता है।

English rendering A birth under the threefold (multiple-delivery) condition too is to be known as inauspicious; yet, the text says, by the śānti rite well-being follows — and that remedy I shall now declare.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शान्ति-उपाय की प्रस्तावना। अनुशासन-टिप्पणी: "अशुभप्रद" और "शान्ति से कल्याण" दोनों शास्त्र के कथन हैं — इन्हें नियति या निश्चित भविष्यवाणी रूप में नहीं, अपितु "शास्त्र कहता है" रूप में ग्रहण करें; शान्ति यहाँ भय-दबाव नहीं, ग्रन्थ की अपनी प्रतिविधि-घोषणा है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही पृथक्करण हमारी विधि का केन्द्र है — गणित (तिथि/करण/योग की exact-मॉड्यूलर सीमाएँ) एक ओर, व्याख्या (अशुभत्व/शान्ति-फल) दूसरी ओर (dossier §5)। ग्रन्थ का "शान्त्या कल्याणम्" उसका अपना वचन है, हमारा समर्थित पूर्वानुमान नहीं; हम इसे भय- व दबाव-रहित, ग्रन्थ-स्वर में ही प्रस्तुत करते हैं।

अध्यायः 86

दर्शजन्मशान्त्यध्यायः

9 श्लोक
86.1
मैत्रेय दर्शजातानां मातापित्रोर्दरिद्रता ।
तद्दोषपरिहाराय शान्तिं कुर्याद् विचक्षणः
maitreya darśajātānāṃ mātāpitrordaridratā |
taddoṣaparihārāya śāntiṃ kuryād vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मैत्रेय = शिष्य मैत्रेय (सम्बोधन); दर्श-जातानां = दर्श अर्थात् अमावास्या-तिथि में जन्मे हुओं के; माता-पित्रोः = माता-पिता का; दरिद्रता = दारिद्र्य, निर्धनता; तद्-दोष-परिहाराय = उस दोष के निवारण हेतु; शान्तिं = शान्ति-कर्म (प्रशमन-अनुष्ठान); कुर्यात् = करना चाहिए; विचक्षणः = विवेकी/कुशल ज्योतिर्विद्।

हिन्दी भावार्थ हे मैत्रेय, जो दर्श (अमावास्या) तिथि में उत्पन्न होते हैं, उनके विषय में शास्त्र कहता है कि माता-पिता को दारिद्र्य-दोष लगता है। इस दोष के परिहार के लिए विवेकी पुरुष को विधिपूर्वक शान्ति-कर्म कराना चाहिए। यह श्लोक सम्पूर्ण अध्याय की प्रस्तावना है — दोष का कथन और उसके प्रतिकार-रूप शान्ति का संकल्प।

English rendering Maitreya, for those born on darśa (the new-moon tithi) the text states a fault of poverty upon the parents; to remove that fault the discerning one should have a pacificatory rite performed.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं शान्ति-विधान का प्रस्ताव। खगोलीय रूप से दर्श वही क्षण है जब चन्द्र की सूर्य से कोणीय दूरी (elongation) शून्य पर लौटती है — यही तिथि-गणना का आधार-बिन्दु (अमावास्या) है, जबकि यहाँ का "दारिद्र्य" कथन तिथि-फल है, गणित नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह अध्याय पूर्णतः शान्ति/उपाय-प्रकरण है। हमारी विधि-अनुशासन (गणित को व्याख्या से पृथक् रखना) के अनुसार ऐसे दोष-कथन को हम "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत करते हैं — भय, नियति या दबाव-रूप उपाय के रूप में कभी नहीं। शान्ति यहाँ शास्त्र का प्रस्ताव है, हमारा भविष्य-कथन नहीं।

86.2
कलशस्थापनं कृत्वा प्रथमं विधिपूर्वकम् ।
उदुम्बरटाश्वत्थचूतानां पल्लवांस्तथा
kalaśasthāpanaṃ kṛtvā prathamaṃ vidhipūrvakam |
udumbaraṭāśvatthacūtānāṃ pallavāṃstathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कलशस्थापनं = कलश की स्थापना; कृत्वा = करके; प्रथमं = सबसे पहले; विधिपूर्वकम् = शास्त्रोक्त क्रम से; उदुम्बर = गूलर / Ficus racemosa; ट (बट/वट? — पाठ-भेद संभव) = वट-संबंधी पठन संदिग्ध; अश्वत्थ = पीपल; चूत = आम; पल्लवान् = कोमल पत्ते / टहनियाँ; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ शान्ति का आरंभ विधिपूर्वक कलश-स्थापन से होता है—पहले यही करना चाहिए। फिर उदुम्बर, अश्वत्थ और चूत (आम) के पल्लव एकत्र किए जाते हैं; मध्य में “ट” का पाठ अस्पष्ट है, वट (बट) का संकेत हो सकता है—पाठ-भेद संभव। ये वनस्पति-सामग्री आगे कलश में निक्षेप के क्रम में आती हैं।

English rendering First, the kalaśa is to be set up according to the prescribed procedure; then tender shoots (pallava) of udumbara, aśvattha, and cūta (mango) are taken— the intervening syllable ṭa may point to vaṭa (banyan); the reading is uncertain (पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सामग्री का वर्णन। कलश-स्थापन और पल्लव-सूची कर्मकांड का चरण-क्रम है; कोई कोण, अंश या संख्या-सूत्र यहाँ नहीं निकलता।

86.3
सनिम्बानां च मूलनि त्वचस्तत्र विनिक्षिपेत् ।
पंचरत्नानि निक्षिप्य वस्त्रयुग्मेन चेष्टयेत्
sanimbānāṃ ca mūlani tvacastatra vinikṣipet |
paṃcaratnāni nikṣipya vastrayugmena ceṣṭayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सनिम्बानां = निम्ब (नीम) सहित; च = और; मूलानि = जड़ें; त्वचः = छालें / वल्क; तत्र = उस (कलश) में; विनिक्षिपेत् = डाले; पंचरत्नानि = पाँच रत्न; निक्षिप्य = रखकर; वस्त्रयुग्मेन = वस्त्र-युगल से; चेष्टयेत् = आवेष्टित करे / लपेटे।

हिन्दी भावार्थ नीम की जड़ और छाल भी उसी स्थान (कलश) में निक्षिप्त की जाएँ। उसके बाद पंच-रत्न रखकर दो वस्त्रों से कलश को आवेष्टित किया जाए—यह शास्त्र का सामग्री-क्रम है। “पंचरत्न” यहाँ संख्यात्मक संकेत है (पाँच), किंतु नाम-सूची इस श्लोक में नहीं दी गई।

English rendering Roots and bark of the neem (nimba) are likewise to be placed in the kalaśa; five gems are deposited, and the vessel is then wrapped with a pair of cloths. The verse names the count “five” but does not list the gem-set.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — सामग्री-गणना मात्र (पंच = ५ रत्न; वस्त्र-युग्म = २)। कोई horā/varga/daśā-सूत्र नहीं; केवल विधि की गिनती का शाब्दिक निर्देश।

86.4
सर्वे समुद्र इति चाऽपोहिष्ठादित्र्यृचेन च ।
आमन्त्र्य कलशे तच्च स्थापयेद् वह्निकोणके
sarve samudra iti cā'pohiṣṭhāditryṛcena ca |
āmantrya kalaśe tacca sthāpayed vahnikoṇake

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वे समुद्र इति = “सर्वे समुद्र…” मंत्र-संकेत; चाऽपोहिष्ठादि = “आपो हि ष्ठा…” आदि; त्र्यृचेन = तीन ऋचाओं से; आमन्त्र्य = आमंत्रित करके; कलशे = कलश में; तत् = उसे (जल/देवता को); स्थापयेत् = स्थापित करे; वह्निकोणके = अग्नि-कोण (आग्नेय / दक्षिण-पूर्व) में।

हिन्दी भावार्थ “सर्वे समुद्र…” तथा “आपो हि ष्ठा…” से आरंभ होने वाली तीन ऋचाओं से जल/देवता का आवाहन करके उसे कलश में प्रतिष्ठित किया जाए। वह कलश वह्नि-कोण—आग्नेय दिशा—में स्थापित हो। यह दिशा-निर्देश कर्मकांड का स्थान-नियम है; ज्योतिष-गणित का भाग-विभाजन नहीं।

English rendering Invoking with the formulas “sarve samudra…” and the three ṛcs beginning “apo hi ṣṭhā…,” one installs that (water/deity) in the kalaśa and places the vessel in the fire-corner (vahnikoṇa, the south-east). The verse fixes ritual location, not a computational arc.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मंत्र-निर्देश तथा दिशा-स्थापना (वह्नि-कोण = आग्नेय)। “त्र्यृच्” = तीन ऋचाएँ—गिनती कर्मकांड की है; राशि/अंश/वर्ग का सूत्र नहीं।

86.5
दर्शस्य देवयोश्चाऽथ चन्द्रभास्करयोः क्रमात् ।
प्रतिमां स्वर्णजां नित्यं राजतीं ताम्रजां तथा
darśasya devayoścā'tha candrabhāskarayoḥ kramāt |
pratimāṃ svarṇajāṃ nityaṃ rājatīṃ tāmrajāṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दर्शस्य = दर्श (अमावस्या) का; देवयोः = दोनों देवों का; च अथ = और फिर; चन्द्रभास्करयोः = चंद्र और सूर्य का; क्रमात् = क्रम से; प्रतिमां = प्रतिमा / मूर्ति; स्वर्णजां = स्वर्ण की; नित्यं = सदैव / नियत रूप से; राजतीं = रजत (चाँदी) की; ताम्रजां = ताम्र की; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है—दर्श और दोनों देवों के लिए, फिर चंद्र-भास्कर के क्रम से, प्रतिमाएँ क्रमशः स्वर्ण, रजत और ताम्र की बनाई जाएँ। तीन धातुएँ तीन आलम्बनों से जुड़ी हैं; यह धातु-क्रम विधि का नियम है। “नित्यं” यहाँ स्थायी/निर्धारित विधान का स्वर रखता है, न कि फल की अनिवार्यता का।

English rendering For darśa and the two deities, and then for Candra and Bhāskara in order, the text states that images are to be of gold, silver, and copper respectively. The verse fixes a three-fold metal sequence for the ritual icons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — धातु-क्रम का विधि-नियम (स्वर्ण → रजत → ताम्र; तीन प्रतिमाएँ)। कोई दशा-वर्ष, बल-रूप या वर्ग-चाप यहाँ नहीं।

86.6
आप्यायस्वेति मन्त्रेनऽ सविता पश्चात्तमेव च ।
उपचारैः समाराध्य ततो होमं समाचरेत्
āpyāyasveti mantrena' savitā paścāttameva ca |
upacāraiḥ samārādhya tato homaṃ samācaret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आप्यायस्व इति मन्त्रेण = "आप्यायस्व…" मन्त्र से (सोम/चन्द्र-मन्त्र, ऋग्वेद १.९१.१६); सविता = सवितृ (सूर्य) मन्त्र; पश्चात् = तदनन्तर; तम् एव च = उसी (दर्श) को भी; उपचारैः = (षोडश आदि) उपचारों से; समाराध्य = भलीभाँति पूजन करके; ततः = तत्पश्चात्; होमं = हवन; समाचरेत् = सम्यक् करे।

हिन्दी भावार्थ "आप्यायस्व" मन्त्र से चन्द्र का, तदनन्तर सवितृ-मन्त्र से सूर्य का, और फिर उसी दर्श का — उपचारों द्वारा भलीभाँति आराधन करके होम करे। पूजन का क्रम चन्द्र → सूर्य → दर्श है, तत्पश्चात् अग्नि-कार्य।

English rendering With the "āpyāyasva" mantra (for the Moon), then the Savitṛ mantra (for the Sun), and then that same Darśa, having worshipped them with the ritual services, one should perform the homa.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — पूजा-क्रम एवं मन्त्र-विधान। "आप्यायस्व" (= "तुम वृद्धि को प्राप्त हो") सोम/चन्द्र-मन्त्र है — खगोलीय रूप से शुक्ल-पक्ष में चन्द्र के प्रकाशित अंश की वृद्धि से इसका भाव मेल खाता है, पर श्लोक स्वयं कोई अंक-गणना नहीं देता।

86.7
समिधश्च चरुं विद्वान् क्रमेण जुहुयात् व्रती ।
भक्त्या सवितृमन्त्रेण सोमो धेनुश्च मन्त्रतः
samidhaśca caruṃ vidvān krameṇa juhuyāt vratī |
bhaktyā savitṛmantreṇa somo dhenuśca mantrataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समिधः = समिधाएँ (हवन-काष्ठ); चरुं = चरु (हविष्यान्न); विद्वान् = जानकार; क्रमेण = क्रम से; जुहुयात् = आहुति दे; व्रती = व्रतधारी; भक्त्या = भक्ति से; सवितृमन्त्रेण = सवितृ-मंत्र से; सोमो धेनुश्च = “सोमो धेनुः…” आदि मंत्र-संकेत; मन्त्रतः = मंत्र-विधि से।

हिन्दी भावार्थ विद्वान् व्रती समिधा और चरु को क्रमशः होम में आहुत करे। भक्तिपूर्वक सवितृ-मंत्र से, तथा “सोमो धेनुः…” इत्यादि मंत्रों से हवन संपन्न हो—यह अध्याय की शान्ति-विधि का समापन-स्वर है। शास्त्र यहाँ कर्म-सामग्री और मंत्र-नाम बताता है; कोई ज्योतिष-गणितीय फल-सूत्र नहीं गूँथता।

English rendering The learned observant should offer samidh and caru in due order; with devotion, by the Savitṛ mantra and by the formulas indicated as “somo dhenuś ca…,” the homa is completed. The verse closes the śānti sequence as ritual procedure, not as a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — होम-सामग्री (समिध, चरु) और मंत्र-निर्देश का फल-विधि कथन। इस अध्याय के सातों श्लोक दर्श-जन्म संबंधी शान्ति-कर्मकांड हैं; वर्ग, अष्टकवर्ग, दशा या षड्बल से इनका प्रत्यक्ष गणितीय जुड़ाव नहीं।

86.8
अष्टोत्तरशतं वापि अष्टविंशतिरेव वा ।
अभिषेकं तथा कुर्यात् दम्पत्योश्च सुपुत्रयोः
aṣṭottaraśataṃ vāpi aṣṭaviṃśatireva vā |
abhiṣekaṃ tathā kuryāt dampatyośca suputrayoḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्ट-उत्तर-शतं = शत (100) + अष्ट-उत्तर (आठ अधिक) = १०८; वा अपि = अथवा; अष्ट-विंशतिः = अष्ट (8) + विंशति (20) = २८; एव वा = अथवा ही; अभिषेकं = अभिषेक (जल-सिञ्चन-संस्कार); तथा = वैसे ही; कुर्यात् = करे; दम्पत्योः = दम्पति (पति-पत्नी) का; सुपुत्रयोः = शुभ-सन्तान की कामना वाले।

हिन्दी भावार्थ एक सौ आठ (108), अथवा अट्ठाईस (28) आहुतियाँ/जप करके, वैसे ही सुसन्तान-अभिलाषी दम्पति का अभिषेक करे। संख्या यहाँ आहुति/जप की मात्रा का विकल्प देती है — पूर्ण अनुष्ठान 108, संक्षिप्त 28।

English rendering With one hundred and eight, or else twenty-eight (oblations), one should likewise perform the consecration of the couple who desire good progeny.

गणित / तकनीक: आहुति/जप-संख्या n ∈ {108, 28}, शब्द-संख्या से पठित:
अष्टोत्तरशत = 100 + 8 = 108; अष्टविंशति = 20 + 8 = 28।
दोनों नक्षत्र-चक्र से जुड़ी पारम्परिक संख्याएँ हैं: 108 = 27 नक्षत्र × 4 पाद; 28 = 27 नक्षत्र + अभिजित्।

उदाहरण (worked example) पूर्ण-विकल्प के लिए
108 = 27 × 4 (प्रत्येक नक्षत्र के 4 पाद, कुल पाद-संख्या),
अथवा 108 = 12 राशि × 9 (नवांश) — दोनों विभाजन 108 पर संगत;
संक्षिप्त-विकल्प के लिए 28 = 27 + 1 (मुख्य 27 नक्षत्र + अभिजित्)। शब्द-संख्या को अंक-निष्ठ रूप में (≈ नहीं, ठीक 108 व 28) पढ़ा गया।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही 27-नक्षत्र आधार हमारे विंशोत्तरी दशा-यन्त्र की धुरी है — 120-वर्ष चक्र चन्द्र के नक्षत्र से कीलित (Ketu 7…Mercury 17, Σ=120)। शब्द-संख्या का हमारा अनुशासन "अष्टोत्तरशत" को सन्निकट "लगभग सौ" नहीं, अपितु सटीक 108 (= 27×4) पढ़ता है — वही exact-`==` दृष्टि जो ± सहन-पट्टी को दोष-छिपाऊ मानती है।

86.9
हिरण्यं रजतं चैव कृष्णधेनुश्च दक्षिणा ।
ब्राह्मणान् भोजयेत् शक्त्या ततः क्षेममवाप्नुयात्
hiraṇyaṃ rajataṃ caiva kṛṣṇadhenuśca dakṣiṇā |
brāhmaṇān bhojayet śaktyā tataḥ kṣemamavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हिरण्यं = स्वर्ण; रजतं = रजत (चाँदी); च एव = और भी; कृष्ण-धेनुः = काली गाय; दक्षिणा = दक्षिणा (यज्ञ-शुल्क); ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; भोजयेत् = भोजन कराए; शक्त्या = सामर्थ्य के अनुसार; ततः = तत्पश्चात्; क्षेमम् = क्षेम (कल्याण, सुख-शान्ति); अवाप्नुयात् = प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ स्वर्ण, रजत और एक कृष्ण-धेनु — यह दक्षिणा दे; यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराए; तत्पश्चात् शास्त्र कहता है कि (कर्ता) क्षेम को प्राप्त करता है। यह अध्याय का फल-वचन एवं दान-विधान है।

English rendering Gold, silver, and a black cow as the sacrificial fee, and feeding brāhmaṇas according to one's means — thereafter, the text states, one attains well-being.

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (क्षेम-प्राप्ति) एवं दान-विधान। "क्षेम की प्राप्ति" शास्त्र का कथित फल है, न कि गणनीय राशि।

हमारा डिकोड (Our Decode) फल-वचनों में हमारा अनुशासन स्पष्ट है — "क्षेममवाप्नुयात्" को हम "शास्त्र कहता है" रूप में देते हैं, न कि निश्चित परिणाम या दबाव-रूप उपाय के रूप में। दान-अनुष्ठान शास्त्र का प्रस्ताव है; गणित और व्याख्या को हम पृथक् ही रखते हैं।

अध्यायः 87

कृष्णचतुर्दशीजन्म शान्त्यध्यायः

13 श्लोक
87.1
कृष्णपक्षचतुर्दश्याः षड्भागेषु फलं क्रमात् ।
जन्म चेत् प्रथमे भागे तदा ज्ञेयं शुभं द्विज
kṛṣṇapakṣacaturdaśyāḥ ṣaḍbhāgeṣu phalaṃ kramāt |
janma cet prathame bhāge tadā jñeyaṃ śubhaṃ dvija

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृष्णपक्ष-चतुर्दशी = कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि; षड्भागेषु = छह समान भागों में; फलं क्रमात् = भाग-क्रम से फल; जन्म चेत् = यदि जन्म हो; प्रथमे भागे = प्रथम षड्भाग में; शुभं ज्ञेयम् = शुभ जानना; द्विज = हे द्विज (संबोधन)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को छह बराबर भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का फल क्रम से बताता है। यदि जन्म उस तिथि के प्रथम भाग में हो, तो उसे शुभ जानना चाहिए। शेष पाँच भागों का विवरण आगे के श्लोकों में आता है। यह विधान तिथि-काल के सूक्ष्म विभाजन पर टिका है, न कि सामान्य “चतुर्दशी जन्म” के एकमुश्त निर्णय पर।

English rendering The text divides the fourteenth lunar day of the dark fortnight into six equal segments and assigns results in sequence. Birth in the first segment is to be regarded as auspicious.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) चतुर्दशी-अवधि \(T\) (सूर्य–चन्द्र 12° सापेक्ष-वृद्धि का काल; व्यावहारिक रूप में पूर्व-तिथि-समाप्ति से चतुर्दशी-समाप्ति तक) को छह समान खंडों में बाँटा जाता है:

\[
\Delta t = T ÷ 6
\]

\[
\begin{align*}
\text{भाग 1} &= [t_0,\; t_0 + \Delta t) \\
\text{भाग 2} &= [t_0 + \Delta t,\; t_0 + 2\Delta t) \\
&\vdots \\
\text{भाग 6} &= [t_0 + 5\Delta t,\; t_0 + T]
\end{align*}
\]

जहाँ \(t_0\) = चतुर्दशी-आरम्भ। जन्म-क्षण \(t_j\) किस अंतराल में पड़ता है, वही “भाग-संख्या” है। परंपरा: स्थानीय सूर्योदय-आधारित तिथि-सीमा या निरंतर चन्द्र–सूर्य-अंतर-आधारित सीमा — दोनों संभव; संख्या \(\Delta t\) चुनी हुई \(T\)-परिभाषा पर निर्भर करती है।

उदाहरण (worked example) मान लें कृष्ण-चतुर्दशी \(T = 24^{\mathrm{h}}\,00^{\mathrm{m}}\) (सुविधा-उदाहरण; वास्तविक \(T\) नक्षत्र-गति से भिन्न हो सकता है), आरम्भ \(t_0 = 06{:}00\) स्थानीय। तब \(\Delta t = 4^{\mathrm{h}}\)। जन्म \(t_j = 08{:}30\) ⇒ भाग 1 \([06{:}00,\,10{:}00)\) में ⇒ शास्त्र के अनुसार प्रथम-भाग-फल (शुभ)। जन्म \(14{:}15\) ⇒ भाग 3 \([14{:}00,\,18{:}00)\)।

87.2
द्वितीये पितरं हन्ति मातरं च तृतीयके ।
चतुर्थे मातुलं चैव पञ्चमे वंशनाशनम्
dvitīye pitaraṃ hanti mātaraṃ ca tṛtīyake |
caturthe mātulaṃ caiva pañcame vaṃśanāśanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये = दूसरे भाग में; पितरं हन्ति = पिता के लिए अरिष्ट (शास्त्र-कथित दोष); तृतीयके मातरम् = तीसरे में माता के लिए; चतुर्थे मातुलम् = चौथे में मामा (मातृ-भ्राता) के लिए; पञ्चमे वंशनाशनम् = पाँचवें में वंश (कुल) के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — दूसरे भाग में जन्म हो तो पिता के लिए, तीसरे में माता के लिए, चौथे में मामा के लिए, और पाँचवें भाग में समस्त वंश के लिए अरिष्ट-दोष बताया गया है। ये तिथि-भागवार दोष-कथन हैं, कोई नियति-घोषणा नहीं; इनकी शान्ति अगले श्लोकों में आती है।

English rendering The text states that a birth in the second part is inauspicious for the father, in the third for the mother, in the fourth for the maternal uncle, and in the fifth for the lineage.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — भागवार फल-कथन (v.1 के षड्भाग की क्रम-सूची)। तकनीकी रूप से केवल इतना कि प्रत्येक "भाग" वही 2°-elongation / T·(तिथि)÷6 का खंड है; फल स्वयं अगणितीय है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह स्थान है जहाँ हमारा अनुशासन निर्णायक है — पिता/माता-नाश जैसे भय-फल शास्त्र के अपने कथन हैं, हमारी भविष्यवाणी नहीं। हम गणित (भाग-सीमा) को फल (दोष-कथन) से अलग रखते हैं और फल को केवल "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत करते हैं — भय, नियति या दबाव-रूप उपाय नहीं।

87.3
षष्ठे तु धननाशः स्यादात्मनो नाश एव वा ।
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिं कुर्याद् प्रयत्नतः
ṣaṣṭhe tu dhananāśaḥ syādātmano nāśa eva vā |
taddoṣaparihārārthaṃ śāntiṃ kuryād prayatnataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ठे = षष्ठ षड्भाग में; धननाशः = धन-नाश; आत्मनो नाशः = आत्म-नाश (अथवा “वा” से विकल्प); तद्दोष-परिहारार्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; कुर्यात् प्रयत्नतः = यत्नपूर्वक करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि षष्ठ भाग में धन-नाश, अथवा आत्म-नाश — ऐसा विकल्प-युक्त फल वर्णित है। उसी दोष के परिहार के लिए शास्त्र शान्ति करने का निर्देश देता है, और “प्रयत्नतः” कहकर सावधानी का स्वर जोड़ता है। यह फल-कथन + अनुष्ठान-निर्देश है; पाठक पर दबाव या “अवश्यंभावी विपत्ति” का दावा नहीं बनाया जाना चाहिए। आगे के श्लोक उसी शान्ति-विधि का विस्तार करते हैं।

English rendering In the sixth segment the text states loss of wealth or even ruin of the self, and for the removal of that stated fault it enjoins a carefully performed pacification rite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन + शान्ति-निर्देश। षष्ठ भाग = \([t_0 + 5\Delta t,\; t_0 + T]\); फल-वाक्य शास्त्र की अपनी भाषा में रिपोर्ट करें, भविष्य-निश्चितता के रूप में नहीं।

87.4
शिवस्य प्रतिमां कुर्यात् सौवर्णीं कर्षसम्मिताम् ।
तदर्धार्धमितां वाऽपि यथावित्तं मनोहराम्
śivasya pratimāṃ kuryāt sauvarṇīṃ karṣasammitām |
tadardhārdhamitāṃ vā'pi yathāvittaṃ manoharām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिवस्य प्रतिमाम् = शिव की प्रतिमा; कुर्यात् = बनाए; सौवर्णीम् = स्वर्णमयी; कर्ष-सम्मिताम् = एक कर्ष-भार-तुल्य; तद्-अर्ध-अर्ध-मिताम् = उसका आधा-का-आधा (अर्थात् चतुर्थांश) भार; वाऽपि = अथवा; यथावित्तम् = यथा-सामर्थ्य; मनोहराम् = मनोरम।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र शान्ति के अंग के रूप में स्वर्ण की शिव-प्रतिमा बनाने का विधान देता है। मानक भार एक कर्ष कहा गया है; विकल्प में उसके आधे का आधा — अर्थात् मूल कर्ष का चौथाई — भी अनुमत है, अथवा यथावित्त सुंदर प्रतिमा। यह मापन-निर्देश है: भार की ऊपरी सीमा या न्यूनतम “कर्ष” परंपरा, और सामर्थ्य के अनुसार लघुतर विकल्प।

English rendering The text prescribes a golden image of Śiva, ideally weighing one karṣa, or else a quarter of that, or a pleasing image according to one’s means.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) भार-मापदंड (शास्त्र-कथित):

\[
\begin{align*}
m_{\text{मानक}} &= 1\,\text{कर्ष} \\
m_{\text{लघु विकल्प}} &= \tfrac12 × \tfrac12 × 1\,\text{कर्ष} = \tfrac14\,\text{कर्ष} \\
m_{\text{यथावित्त}} &\le m_{\text{सामर्थ्य}}\quad\text{(गुण-रूप “मनोहरा”)}
\end{align*}
\]

“कर्ष” पारंपरिक भार-इकाई है; आधुनिक ग्राम-रूपांतरण संस्करण/क्षेत्र-परंपरा से भिन्न हो सकता है — पाठ-भेद/मापदंड-भेद संभव; शास्त्र यहाँ संख्यात्मक रूप में “एक / चतुर्थांश” अनुपात देता है, न कि SI-रूपांतर।

उदाहरण (worked example) यदि किसी परंपरा में 1 कर्ष ≈ 11.34 g माना जाए (केवल अनुवाद-सुविधा; स्थानीय परिभाषा घोषित करें), तो \(m_{\text{मानक}} \approx 11.34\,\mathrm{g}\), \(m_{\text{लघु}} = 11.34/4 \approx 2.84\,\mathrm{g}\)। “यथावित्त” विकल्प अनुपात-बंधन से मुक्त रहता है।

87.5
बालचन्द्रकिरीटाञ्च श्वेतमाल्याम्बरान्विताम् ।
त्रिनेत्रां च वृषासीनां वराभयकरामथ
bālacandrakirīṭāñca śvetamālyāmbarānvitām |
trinetrāṃ ca vṛṣāsīnāṃ varābhayakarāmatha

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बालचन्द्र-किरीटाम् = बाल-चन्द्र (द्वितीया-चन्द्र) का मुकुट धारण किए; श्वेत-माल्य-अम्बर-अन्विताम् = श्वेत माला व श्वेत वस्त्र सहित; त्रिनेत्राम् = त्रिनेत्र; वृष-आसीनाम् = वृषभ (नन्दी) पर आसीन; वर-अभय-कराम् = वर-मुद्रा व अभय-मुद्रा वाले हाथों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ वह शिव-प्रतिमा बाल-चन्द्र के मुकुट से युक्त, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किए, त्रिनेत्र, वृषभ पर विराजमान, तथा एक हाथ में वर और दूसरे में अभय-मुद्रा लिए हुए बनाई जाए। यह प्रतिमा-लक्षण (ध्यान-स्वरूप) है।

English rendering The image should bear a crescent-moon diadem, white garlands and garments, three eyes, be seated upon the bull, and show the boon-granting and fear-dispelling gestures.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रतिमा-लक्षण/ध्यान-वर्णन। इन पाँच शिल्प-चिह्नों (बालचन्द्र, श्वेत, त्रिनेत्र, वृषवाहन, वर-अभय) से इष्ट-देव का स्वरूप निर्धारित होता है — शान्ति-प्रतिमा की सुनिश्चित पहचान।

87.6
त्रयम्बकं चेति मन्त्रेण पूजां कुर्यादतन्द्रितः ।
आवाह्य वारुणैर्मन्त्रैराचार्यो मन्त्रतत्त्ववित्
trayambakaṃ ceti mantreṇa pūjāṃ kuryādatandritaḥ |
āvāhya vāruṇairmantrairācāryo mantratattvavit

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्र्यम्बकं इति मन्त्रेण = "त्र्यम्बकं यजामहे…" (त्र्यम्बक/महामृत्युंजय मन्त्र, ऋग्वेद 7.59.12) से; पूजां कुर्यात् अतन्द्रितः = आलस्य-रहित होकर पूजा करे; आवाह्य = आवाहन कर; वारुणैः मन्त्रैः = वरुण-सम्बन्धी मन्त्रों से; आचार्यः मन्त्र-तत्त्व-वित् = मन्त्र-तत्त्व का ज्ञाता आचार्य।

हिन्दी भावार्थ मन्त्र-तत्त्व का ज्ञाता आचार्य "त्र्यम्बक" मन्त्र से अनालस्य होकर पूजा करे, और वरुण-सम्बन्धी मन्त्रों से देव का आवाहन करे। कर्ता आचार्य का मन्त्रज्ञ होना यहाँ अनिवार्य कहा गया है।

English rendering Untiring, with the "Tryambakam" mantra the officiant should perform the worship; and the ācārya, versed in the essence of mantras, should invoke the deity with the Vāruṇa mantras.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मन्त्र-विनियोग (procedure)। "त्र्यम्बक" मन्त्र (ऋग्वेद 7.59.12) की पहचान महत्त्वपूर्ण है; यही मन्त्र होम (v.11–12) में भी विनियुक्त होगा — पूजा और होम में एक-सूत्रता।

87.7
इमं मे वरुणे त्येवं तत्त्वा यामी त्यृचा पुनः ।
त्त्वन्न अग्ने इत्यनया सत्वं नो इत्यृचापि च
imaṃ me varuṇe tyevaṃ tattvā yāmī tyṛcā punaḥ |
ttvanna agne ityanayā satvaṃ no ityṛcāpi ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इमं मे वरुण = ऋग्वैदिक ṛcā “इमं मे वरुण…” (आवाहन/प्रार्थना); तत्त्वा यामी = “तत् त्वा यामि…” ṛcā; त्यृचा = उस ऋचा से; पुनः = फिर; त्वन्न अग्ने = “त्वं नो अग्ने…” (पाठ-रूप; पाठ-भेद संभव); इत्यनया = इस ऋचा से; सत्वं नो = “सत्यं नः…” (पाठ-रूप; पाठ-भेद संभव); इत्यृचा अपि च = और उस ऋचा से भी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र वारुण-पक्ष के आवाहन के लिए विशिष्ट वैदिक ऋचाओं का क्रम देता है: “इमं मे वरुण…”, फिर “तत् त्वा यामि…”, फिर अग्नि-संबंधी “त्वं नो अग्ने…” प्रकार की ऋचा, तथा “सत्यं नः…” प्रकार की ऋचा। ये संकेत-पद हैं; पूर्ण मन्त्र-पाठ श्रौत/स्मार्त संहिता-परंपरा से जुड़ा होता है, और विकिस्रोत-पाठ में संक्षेप/पाठ-भेद संभव है। यह श्लोक गणना नहीं, मन्त्र-सूची है।

English rendering The rite further employs the ṛcās beginning “imaṃ me varuṇa…,” then “tat tvā yāmi…,” then the Agni-verse of the “tvaṃ no agne…” type, and also the “satyaṃ naḥ…” type verse — exact full wording may vary by recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वैदिक ऋचा-निर्देश / संवाद-अनुष्ठान-सूची। पाठ-भेद संभव; पूर्ण पद पाठ्-संहिता से सत्यापित करें।

87.8
आग्नेयं कुम्भमारभ्य पूजयेद् भक्तितः क्रमात् ।
आ नोभद्रेति सूक्तं च भद्रा अग्नेश्च सूक्तकम्
āgneyaṃ kumbhamārabhya pūjayed bhaktitaḥ kramāt |
ā nobhadreti sūktaṃ ca bhadrā agneśca sūktakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आग्नेयम् = अग्नि-सम्बद्ध / आग्नेय-दिशा-क्रम; कुम्भम्-आरभ्य = कुम्भ (मकर-के-बाद की राशि) से आरम्भ करके; पूजयेत् = पूजन करे; भक्तितः = भक्ति-पूर्वक; क्रमात् = क्रम से; आ नो भद्रा इति सूक्तम् = «आ नो भद्राः» (ऋग्वेद) सूक्त; भद्रा अग्नेः सूक्तकम् = «भद्रा अग्ने» आदि अग्नि-सूक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रह-शान्ति / पूजा-विधि का क्रम बताता है — आग्नेय-पूजन कुम्भ राशि से आरम्भ कर, भक्ति के साथ क्रमिक रूप से किया जाए। साथ ही «आ नो भद्राः» सूक्त तथा अग्नि-सम्बन्धी «भद्रा अग्ने» सूक्त का पाठ विहित है। यह फल-गणना का सूत्र नहीं, विधान का निर्देश है। पाठ में सूक्त-नाम संक्षेप में हैं — विस्तृत पदपाठ पर पाठ-भेद संभव।

English rendering The text directs sequential, devout worship of the Āgneya order beginning from Kumbha, together with recitation of the Ā no bhadrāḥ sūkta and the Agni sūkta associated with bhadrā / fire. It is a ritual prescription, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-विधान / सूक्त-निर्देश। राशि-क्रम (कुम्भ से आरम्भ) यहाँ पूजा-क्रम का चिह्न है, न कि वर्ग-भाग या अष्टकवर्ग-बिन्दु का सूत्र।

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87.9
जप्त्वा पुरुषसूक्तं च कन्द्रुद्रेति तथा जपेत् ।
शङ्करस्याऽभिषेकं च ग्रहपूजां च कारयेत्
japtvā puruṣasūktaṃ ca kandrudreti tathā japet |
śaṅkarasyā'bhiṣekaṃ ca grahapūjāṃ ca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जप्त्वा = जप करके; पुरुषसूक्तम् = पुरुष-सूक्त; कन्द्रुद्रेति = «कन् द्रुद्रे» / रुद्र-सम्बद्ध जप-निर्देश (पाठ-भेद संभव); तथा जपेत् = उसी प्रकार जपे; शङ्करस्य अभिषेकम् = शिव-अभिषेक; ग्रहपूजाम् = नवग्रह-पूजा; कारयेत् = करवाए / करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि पुरुषसूक्त का जप करने के पश्चात् रुद्र-सम्बद्ध मन्त्र-जप भी किया जाए। तदनन्तर शङ्कर का अभिषेक तथा ग्रह-पूजा करनी चाहिए। पूरा श्लोक शान्ति-उपचार की क्रमिक साधना बताता है — जप → अभिषेक → ग्रहपूजा। «कन्द्रुद्रेति» पद की शुद्ध पाठावली पर संस्करण-भेद संभव।

English rendering After reciting the Puruṣa-sūkta, one should likewise recite the Rudra-related formula indicated in the text; then perform Śaṅkara’s abhiṣeka and graha-pūjā. The verse orders a ritual sequence, not a chart calculation.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — जप-अभिषेक-ग्रहपूजा का विधि-क्रम। फल या बलांक यहाँ निर्दिष्ट नहीं।

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87.10
समिदाज्यचरूंश्चैव तिलमाषांश्च सर्पपान् ।
अश्वस्थल्पक्षपालासखादिराः समिधः शुभाः
samidājyacarūṃścaiva tilamāṣāṃśca sarpapān |
aśvasthalpakṣapālāsakhādirāḥ samidhaḥ śubhāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समित्-आज्य-चरून् = समिधा (होम-काष्ठ), आज्य (घृत), चरु (पका अन्न-हवि); तिल-माषान् च = तिल और उड़द (माष); सर्षपान् = सरसों; अश्वत्थ-…-पलाश-खादिराः समिधः शुभाः = अश्वत्थ, पलाश, खदिर आदि की समिधाएँ शुभ (पाठ-भेद संभव: "अश्वस्थल्पक्षपालास" सन्धि-ग्रस्त)।

हिन्दी भावार्थ होम-द्रव्य में समिधा, घृत, चरु, तिल, उड़द और सरसों लिए जाएँ; तथा अश्वत्थ, पलाश, खदिर आदि वृक्षों की समिधाएँ शुभ मानी गई हैं। यह हवन-सामग्री की सूची है; "अश्वस्थल्पक्षपालास" पद सन्धि-ग्रस्त है, अतः पाठ-भेद संभव।

English rendering The oblation materials are fuel-sticks, ghee and caru, sesame, black gram and mustard; and the fuel-woods of aśvattha, palāśa, khadira and the like are held auspicious (variant reading possible in the elided compound).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — हवि-द्रव्य व समिध-सूची। द्रव्य-चयन (तिल/माष/सर्षप + विशिष्ट काष्ठ) कर्म-विशेष का नियत अंग है; यहाँ संख्या नहीं, वस्तु-विधान।

87.11
अष्टोत्तरशतं वह्नौ जुहुयाद् विधिपूर्वकम् ।
अष्टविंशतिसंख्या वा होमं कुर्यात् पृथक् पृथक्
aṣṭottaraśataṃ vahnau juhuyād vidhipūrvakam |
aṣṭaviṃśatisaṃkhyā vā homaṃ kuryāt pṛthak pṛthak

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टोत्तर-शतम् = एक सौ आठ (100 + 8 = 108); वह्नौ जुहुयात् विधिपूर्वकम् = अग्नि में विधिपूर्वक आहुति दे; अष्टविंशति-संख्या वा = अथवा अट्ठाईस (28) की संख्या; होमं कुर्यात् पृथक् पृथक् = पृथक्-पृथक् (प्रत्येक हेतु अलग) होम करे।

हिन्दी भावार्थ अग्नि में विधिपूर्वक एक सौ आठ आहुतियाँ दे, अथवा अट्ठाईस की संख्या से पृथक्-पृथक् होम करे। संख्या-विधान स्पष्ट है — 108 (पूर्ण), या 28 (प्रत्येक अंग हेतु अलग)।

English rendering One should offer one hundred and eight oblations in the fire according to rule, or perform the homa with the number twenty-eight, separately for each.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टोत्तरशत = 100 + 8 = 108 (सीधी संख्या-उक्ति, bhūtasaṃkhyā नहीं); अष्टाविंशति = 28। ये पूर्ण-पूर्णांक आहुति-गणनाएँ हैं (कोई भिन्न/रौंडिंग नहीं)। "पृथक् पृथक्" = प्रत्येक इकाई (ग्रह/मन्त्र) हेतु अलग गणना।

उदाहरण (worked example) यदि "पृथक् पृथक्" ग्रहवार लें और नवग्रह (9) मानें → 9 × 28 = 252 आहुति कुल; अथवा एकल पूर्ण-होम = 108 आहुति (त्र्यम्बक-मन्त्र से, v.12)। 28 की सम्भावित प्रासंगिकता: 27 नक्षत्र + अभिजित् = 28 (व्याख्या/विनियोग-सापेक्ष; पाठ-भेद संभव)।

हमारा डिकोड (Our Decode) आहुति-संख्या पूर्णांक-सत्य है — 108 का अर्थ ठीक 108, 28 का ठीक 28, बीच में कोई सहन-सीमा (tolerance) नहीं। यही exact-गणना का अनुशासन हम अष्टकवर्ग-ऑरैकल में `==` से लगाते हैं (सूर्य 48, चन्द्र 49 … SAV 337; एक ±band वहाँ वास्तविक −1 छिपा चुका था)। कर्म-संख्या भी वैसी ही अखंडित पूर्णांक-इकाई है।

87.12
मन्त्रेण त्र्यम्बकेनाथ तिलान् व्याहृतिभिस्तथा ।
ग्रहहोमं च विधिवत् कुर्याद् क्षेमं ततो भवेत्
mantreṇa tryambakenātha tilān vyāhṛtibhistathā |
grahahomaṃ ca vidhivat kuryād kṣemaṃ tato bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्त्रेण त्र्यम्बकेन = त्र्यम्बक-मन्त्र से; अथ = फिर; तिलान् = तिल (आहुति); व्याहृतिभिः = व्याहृतियों (भूर् भुवः स्वः आदि) के साथ; तथा = उसी प्रकार; ग्रहहोमम् = ग्रह-होम; विधिवत् = विधि से; कुर्यात् = करे; क्षेमम् = कल्याण / कुशल; ततः भवेत् = तब होता है — शास्त्र का फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र निर्देश देता है कि त्र्यम्बक-मन्त्र से तथा व्याहृतियों के साथ तिल-आहुति देकर विधिवत् ग्रहहोम किया जाए। पाठ कहता है — तदनन्तर क्षेम होता है। यह शान्ति-अनुष्ठान का फल-वाक्य है; इसे नियति या भय के रूप में नहीं पढ़ना। मन्त्र-पाठ की पूर्ण आवृत्ति इस श्लोक में नहीं गिनी गई।

English rendering With the Tryambaka mantra and with the vyāhṛtis one should offer sesame and duly perform graha-homa; the text then states that welfare (kṣema) follows. Report the result as the śāstra’s claim, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मन्त्र-सहित ग्रहहोम का विधि-फल कथन। पूर्व श्लोक (१०८ / २८) की संख्याएँ यहाँ दोहराई नहीं गईं; फल «क्षेमं ततो भवेत्» शास्त्र-वाच्य है।

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87.13
अभिषेकं च जातस्य तत्पित्रोश्चापि मन्त्रवित् ।
कुर्यात् ततो यथाशक्ति ब्राह्मणान् भोजयेत् सुधीः
abhiṣekaṃ ca jātasya tatpitroścāpi mantravit |
kuryāt tato yathāśakti brāhmaṇān bhojayet sudhīḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभिषेकम् = अभिषेक; जातस्य = जातक का; तत्-पित्रोः च अपि = उसके माता-पिता का भी; मन्त्रवित् = मन्त्र-ज्ञाता; कुर्यात् = करे; ततः = उसके बाद; यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; ब्राह्मणान् भोजयेत् = ब्राह्मणों को भोजन कराए; सुधीः = बुद्धिमान / विवेकी कर्ता।

हिन्दी भावार्थ मन्त्रवेत्ता जातक का तथा उसके माता-पिता का भी अभिषेक करे — ऐसा शास्त्र कहता है। तदनन्तर सुधी व्यक्ति यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन का आयोजन करे। यह अनुष्ठान का सामाजिक-धार्मिक समापन-क्रम है; कोई आयुर्दाय, दशा-वर्ष या बल-रूप यहाँ नहीं दिया गया।

English rendering The mantra-knower should perform abhiṣeka for the native and for the parents as well; thereafter the wise person should feed brāhmaṇas according to means. A closing ritual duty, not a computational verse.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अभिषेक + यथाशक्ति ब्राह्मण-भोज का विधि-समापन। «यथाशक्ति» मात्रा को व्यक्तिगत क्षमता पर छोड़ता है; कोई नियत संख्या नहीं।

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अध्यायः 88

भर्दावमदुर्योगशान्त्यध्यायः

5 श्लोक
88.1
अथाऽहं संप्रवक्ष्यामि भद्रायामवमे तथा ।
व्यातूपातादिदुर्योगे यमघण्टादिके च यत्
athā'haṃ saṃpravakṣyāmi bhadrāyāmavame tathā |
vyātūpātādiduryoge yamaghaṇṭādike ca yat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (प्रस्ताव-आरम्भ); अहम् = मैं (पराशर); संप्रवक्ष्यामि = भली-भाँति कहूँगा; भद्रायाम् = भद्रा (= विष्टि करण) में; अवमे = अवम (= क्षय-तिथि) में; व्यातूपात-आदि = व्यतीपात आदि (नित्य-योगों में १७वाँ); दुर्योगे = अशुभ योग में; यमघण्ट-आदिके = यमघण्ट आदि (अशुभ योग) में; यत् = जो (फल)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, अब मैं यह बताऊँगा कि भद्रा (विष्टि करण), अवम (क्षय-तिथि), व्यतीपात-आदि दुर्योग तथा यमघण्ट आदि में जन्म होने पर जो फल कहा जाता है, वह क्या है। यह अध्याय इन पञ्चाङ्ग-जनित दुर्योगों तथा उनकी शान्ति का उपोद्घात है। ("व्यातूपात" = व्यतीपात — पाठ-भेद संभव।)

English rendering "Now I shall fully expound what is declared for a birth in Bhadrā, in avama (the diminished tithi), in the ill-yogas beginning with Vyatīpāta, and in Yamaghaṇṭa and the rest."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-प्रस्तावना (उपोद्घात)। यहाँ नामित हर दुर्योग वस्तुतः पञ्चाङ्ग-अंकगणित से नियत होता है — भद्रा = विष्टि करण (तिथि का अर्धांश), अवम = क्षय-तिथि (जिसमें एक तिथि लोप हो जाती है), व्यतीपात = सूर्य-चन्द्र देशान्तर से बना १७वाँ नित्य-योग, यमघण्ट = विशिष्ट वार-नक्षत्र संयोग — यद्यपि यह श्लोक केवल उनके नाम गिनाता है, सूत्र नहीं देता।

88.2
जन्माशुभफलं प्रोक्तं तस्य शान्तिविधिं द्विज ।
प्राप्ते प्रसूतिदुर्योगे शान्तिं कुर्याद् विचक्षणः
janmāśubhaphalaṃ proktaṃ tasya śāntividhiṃ dvija |
prāpte prasūtiduryoge śāntiṃ kuryād vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्म-अशुभ-फलम् = जन्म-काल का अशुभ फल; प्रोक्तम् = (पूर्व में) कहा गया; तस्य शान्ति-विधिम् = उसकी शान्ति की विधि; द्विज = हे द्विज; प्राप्ते प्रसूति-दुर्योगे = जब प्रसूति/जन्म का दुर्योग प्राप्त हो; शान्तिं कुर्यात् = शान्ति करे; विचक्षणः = विवेकी/कुशल व्यक्ति

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जन्म के अशुभ फल पहले बताए जा चुके हैं; अब उनकी शान्ति-विधि कही जा रही है। जब प्रसूति-काल में दुर्योग उपस्थित हो, तो विचक्षण व्यक्ति शान्ति-कर्म करे — यही इस श्लोक का स्पष्ट आदेश है। यह फल-कथन को विधि-कथन से जोड़ता है, न कि कोई संख्यात्मक गणना।

English rendering “The inauspicious results of birth have already been stated; O twice-born, (hear) the procedure for their pacification. When an adverse birth-yoga is present, the discerning one should perform śānti.” The text frames ritual pacification as the chapter’s practical response to previously named prasūti-duryogas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन से शान्ति-विधि की ओर संक्रमण। यहाँ «दुर्योग» पूर्वोक्त अशुभ योगों का संकेत है; कोई अंश, वर्ष या बल-मात्रा नहीं दी गई।

88.3
दैवज्ञैर्दर्शिते वाऽपि सुलग्ने सुदिने गृही ।
पूजनं देवतानां च ग्रहाणां यजनं तथा
daivajñairdarśite vā'pi sulagne sudine gṛhī |
pūjanaṃ devatānāṃ ca grahāṇāṃ yajanaṃ tathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दैवज्ञैः दर्शिते = ज्योतिषियों द्वारा निर्दिष्ट (काल/लग्न) में; वा अपि = अथवा; सुलग्ने = शुभ लग्न में; सुदिने = शुभ दिन में; गृही = गृहस्थ; पूजनं देवतानाम् = देवताओं का पूजन; च = और; ग्रहाणां यजनम् = ग्रहों का यजन/पूजन; तथा = तथा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि गृहस्थ शुभ लग्न और शुभ दिन पर — अथवा दैवज्ञों द्वारा बताए गए समय पर — देव-पूजन तथा ग्रह-यजन करे। यहाँ «सुलग्न» और «सुदिन» काल-चयन के सामान्य निर्देश हैं; विशेष योग-नाम इस श्लोक में नहीं हैं। विधि का आरम्भ शुभ मुहूर्त से जोड़ा गया है।

English rendering “On a favourable lagna and a favourable day—or at a time indicated by the daivajñas—the householder should perform worship of the deities and also the propitiation (yajana) of the grahas.” The verse states the ritual setting before listing specific acts.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मुहूर्त-निर्देश / विधि-आरम्भ। «सुलग्न–सुदिन» का निर्धारण पारंपरिक मुहूर्त-नियमों पर निर्भर है; इस श्लोक में कोई अंश-सूत्र या दशा-वर्ष नहीं है।

88.4
शङ्करस्याऽभिषेकं च घृतदीपं शिवालये ।
आयुर्वृद्धिकरं कुर्यादश्वत्थस्य प्रदक्षिणम्
śaṅkarasyā'bhiṣekaṃ ca ghṛtadīpaṃ śivālaye |
āyurvṛddhikaraṃ kuryādaśvatthasya pradakṣiṇam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शङ्करस्य अभिषेकम् = शङ्कर का अभिषेक; च = और; घृत-दीपम् = घृत का दीप; शिवालये = शिव-मन्दिर में; आयुः-वृद्धि-करम् = आयु-वृद्धि करने वाला (कर्म); कुर्यात् = करे; अश्वत्थस्य प्रदक्षिणम् = अश्वत्थ (पीपल) की प्रदक्षिणा

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शिवालय में शङ्कर का अभिषेक तथा घृत-दीप किया जाए, और अश्वत्थ की प्रदक्षिणा की जाए — जिसे पाठ आयु-वृद्धिकर बताता है। ये कर्म जन्म-दुर्योग की शान्ति-परम्परा के अंतर्गत गिनाए गए हैं। फल-शब्द «आयुर्वृद्धिकरम्» शास्त्र का अपना कथन है, न कि चिकित्सकीय दावा।

English rendering “One should perform the abhiṣeka of Śaṅkara and (offer) a ghee-lamp in a Śiva temple, and should do circumambulation of the aśvattha tree, which the text states as conducive to increase of life-span.” The verse lists concrete ritual acts within the chapter’s śānti sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-कर्मों की सूची / फल-कथन। प्रदक्षिणा-संख्या या अभिषेक-मात्रा यहाँ निर्दिष्ट नहीं; केवल कर्म-नाम और शास्त्रोक्त फल-शब्द दिए हैं।

88.5
हवनं विष्णुमन्त्रेण स/तमष्टोत्तरं सुधीः ।
ब्राह्मणान् भोजयेत् शक्त्या ततः कल्याणमाप्नुयात्
havanaṃ viṣṇumantreṇa sa/tamaṣṭottaraṃ sudhīḥ |
brāhmaṇān bhojayet śaktyā tataḥ kalyāṇamāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हवनम् = हवन; विष्णु-मन्त्रेण = विष्णु-मन्त्र से; शतम्/सहस्रम् अष्टोत्तरम् = अष्टोत्तर-शत (१०८) अथवा अष्टोत्तर-सहस्र (१००८) — पाठ-भेद संभव; सुधीः = बुद्धिमान; ब्राह्मणान् भोजयेत् = ब्राह्मणों को भोजन कराए; शक्त्या = शक्ति/सामर्थ्य के अनुसार; ततः = तदनन्तर; कल्याणम् आप्नुयात् = कल्याण प्राप्त करे

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सुधी व्यक्ति विष्णु-मन्त्र से हवन करे — संख्या «अष्टोत्तर» से जुड़ी है; संस्करण में शत/सहस्र का पाठ-भेद संभव, अत: १०८ अथवा १००८, दोनों पाठ-परम्परा में देखे जा सकते हैं। फिर सामर्थ्यानुसार ब्राह्मण-भोजन कराए; तदनन्तर शास्त्र कल्याण-प्राप्ति का फल कहता है। दबाव या अनिवार्यता का स्वर नहीं — «शक्त्या» सामर्थ्य की सीमा स्पष्ट रखता है।

English rendering “The wise one should perform homa with a Viṣṇu-mantra a hundred-and-eight times—or, on the alternate reading, a thousand-and-eight (पाठ-भेद संभव)—feed brāhmaṇas according to one’s means, and thereafter, the text states, one attains well-being (kalyāṇa).” The verse closes the ritual sequence with mantra-homa, dāna-through-feeding, and the śāstra’s own phala-phrase.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — हवन-संख्या का शाब्दिक निर्देश (अष्टोत्तर-शत/सहस्र)। अष्टोत्तर = ८ + १; अष्टोत्तरशत = १०८, अष्टोत्तरसहस्र = १००८। उपलब्ध पाठ «स/तमष्टोत्तरं» दोनों पठनों की संभावना छोड़ता है — कोई भी संख्या यहाँ दशा-वर्ष या बल-रूपा नहीं है।

अध्यायः 89

अथैक नक्षत्र जातशान्त्यध्यायः

7 श्लोक
89.1
अथ यद्येकनक्षत्रे भ्रात्रोर्वा पितृपुत्रयोः ।
प्रसूतिश्च तयोर्मृतुरथैवकस्य निश्चयः
atha yadyekanakṣatre bhrātrorvā pitṛputrayoḥ |
prasūtiśca tayormṛturathaivakasya niścayaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (अध्याय-आरम्भ); यदि = यदि; एक-नक्षत्रे = एक ही (समान) नक्षत्र में; भ्रात्रोः = दो भाइयों का; वा = अथवा; पितृ-पुत्रयोः = पिता और पुत्र का; प्रसूतिः = जन्म; तयोः = उन दोनों का; मृतुः (=मृत्युः, पाठ-भेद संभव) = मृत्यु/अरिष्ट; एकस्य निश्चयः = (उनमें से) एक की (मृत्यु का) निश्चय/आशंका।

हिन्दी भावार्थ अब यह प्रकरण आरम्भ होता है — यदि दो सगे भाइयों का, अथवा पिता और पुत्र का जन्म एक ही नक्षत्र में हो जाए, तो उन दोनों में से किसी एक के लिए मृत्यु-अरिष्ट का योग शास्त्र में कहा गया है। यही इस अध्याय की समस्या है, जिसके निवारण हेतु आगे शान्ति-विधि बतायी जाएगी।

English rendering Now, if two brothers, or a father and son, are born under one and the same nakṣatra, the text states that death-ariṣṭa is portended for one of the two — the problem this chapter addresses.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रसंग-प्रस्तावना (समस्या-कथन)। यहाँ "जन्म-नक्षत्र" चन्द्र की स्थित राशि-अंश से निर्धारित 27 नक्षत्रों में से एक है; अरिष्ट का यह कथन एक फल-कथन है, कोई परिकलित मात्रा नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस अध्याय का धुरी-तत्त्व जन्म-नक्षत्र (चन्द्र का नक्षत्र) है — वही राशि-चक्रीय मात्रा जो हमारे विमशोत्तरी-इंजन में 120-वर्षीय महादशा-चक्र का आधार बनती है (दोसियर §3)। यहाँ "एक का निश्चय" (मृत्यु-अरिष्ट) शुद्ध फल-कथन है; हमारी पद्धति उसे "शास्त्र कहता है" के रूप में प्रस्तुत करती है, नियति-घोषणा के रूप में नहीं — गणित और व्याख्या को पृथक् रखने का वही अनुशासन (दोसियर §5)।

89.2
तत्र शान्तिं प्रवक्ष्यामि गर्गादिमुनिभाषितम् ।
सुदिने शुभनक्षत्रे चन्द्रताराबलान्विते
tatra śāntiṃ pravakṣyāmi gargādimunibhāṣitam |
sudine śubhanakṣatre candratārābalānvite

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उस (अरिष्ट) के लिए; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; गर्ग-आदि-मुनि-भाषितम् = गर्ग आदि मुनियों द्वारा कथित; सुदिने = शुभ दिन में; शुभ-नक्षत्रे = शुभ नक्षत्र में; चन्द्र-तारा-बल-अन्विते = चन्द्रबल एवं ताराबल से युक्त (काल में)।

हिन्दी भावार्थ उस अरिष्ट के निवारण के लिए अब मैं वह शान्ति कहता हूँ जो गर्ग आदि मुनियों ने कही है। यह कर्म शुभ दिन, शुभ नक्षत्र तथा चन्द्रबल और ताराबल से युक्त समय में करना चाहिए।

English rendering For that danger I shall now declare the śānti as taught by Garga and the other sages — to be performed on an auspicious day, under a benefic nakṣatra, at a time endowed with candra-bala and tārā-bala.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (मुहूर्त-चयन)। ताराबल जन्म-नक्षत्र से गिनकर 27 नक्षत्रों को 9-9 के त्रि-आवर्त (जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र, अति-मित्र) में बाँटने की गणना-विधि है; यहाँ श्लोक केवल उसका पालन कहता है, सूत्र नहीं देता।

89.3
रिक्तावविष्टिविवर्ज्ये च समय शान्तिमाचरेत् ।
शनेरीशानदिग्भागे नक्षत्रप्रतिमां शुभाम्
riktāvaviṣṭivivarjye ca samaya śāntimācaret |
śanerīśānadigbhāge nakṣatrapratimāṃ śubhām

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रिक्ता = रिक्ता तिथियाँ (४, ९, १४ — परंपरागत त्रय); अविष्टि / विष्टि = विष्टि-करण (पाठ-भेद संभव: रिक्ता-विष्टि); विवर्ज्ये = त्याज्य; समये = उचित समय में; शान्तिम् आचरेत् = शान्ति करे; शनेः = शनि (दिवस/दिशा-संबंध; पाठानुसार); ईशान-दिग्-भागे = ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा-भाग में; नक्षत्र-प्रतिमाम् = उस नक्षत्र की प्रतिमा; शुभाम् = शुभ/सुंदर

हिन्दी भावार्थ रिक्ता तिथियों और विष्टि (अथवा “अविष्टि”) को छोड़कर, उचित समय पर शान्ति का आचरण कहा गया है—पाठ-भेद संभव। ईशान दिशा के भाग में (शनि-संबंधित उल्लेख के साथ) उस नक्षत्र की शुभ प्रतिमा स्थापित/रखी जाए, जिस नक्षत्र का प्रसंग है। यह कर्म-स्थान और प्रतिमा-नियम का श्लोक है।

English rendering Avoiding riktā tithis and viṣṭi (reading may vary: aviṣṭi), one should perform the śānti at a fit time. In the north-eastern (īśāna) quarter—with the text’s mention of Saturn (Śani)—a fair image of the nakṣatra is to be set.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — तिथि/करण-वर्जन + दिशा-प्रतिमा-विधि। रिक्ता = चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी (तिथि-त्रय); विष्टि = करण-वर्ग का एक सदस्य—यहाँ केवल त्याज्य-काल की सूची, कोई अंश-सूत्र नहीं।

89.4
तन्नक्षत्रोक्तमन्त्रेण पूजयेत् कलशोपरि ।
रक्तवस्त्रेण संछाद्य वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत्
tannakṣatroktamantreṇa pūjayet kalaśopari |
raktavastreṇa saṃchādya vastrayugmena veṣṭayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-नक्षत्र-उक्त-मन्त्रेण = उस नक्षत्र के लिए कथित मंत्र से; पूजयेत् = पूजा करे; कलश-उपरि = कलश के ऊपर; रक्त-वस्त्रेण = लाल वस्त्र से; संछाद्य = ढककर; वस्त्र-युग्मेन = वस्त्र-युगल से; वेष्टयेत् = लपेटे / आवृत करे

हिन्दी भावार्थ उस नक्षत्र के लिए शास्त्र/परंपरा में उक्त मंत्र से कलश के ऊपर प्रतिमा की पूजा कही गई है। उसे रक्त-वस्त्र से आच्छादित कर, दो वस्त्रों (वस्त्र-युग्म) से वेष्टित करने का निर्देश है। यह पूजा-उपकरण और आच्छादन का नियम है।

English rendering One should worship with the mantra prescribed for that nakṣatra, upon a kalaśa; covering (the image) with a red cloth and wrapping it with a pair of garments.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पूजा-विधि / वस्त्र-कलश-विधान। “वस्त्रयुग्म” = दो वस्त्र; कोई संख्यात्मक ज्योतिष-सूत्र नहीं।

89.5
स्वस्वशाखोक्तमार्गेण कुर्यादग्निमुखं तथा ।
पुनस्तेनैव मन्त्रेण हुनदष्टोत्तरं शतम्
svasvaśākhoktamārgeṇa kuryādagnimukhaṃ tathā |
punastenaiva mantreṇa hunadaṣṭottaraṃ śatam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-स्व-शाखा-उक्त-मार्गेण = अपनी-अपनी वेद-शाखा में कथित मार्ग से; कुर्यात् = करे; अग्नि-मुखम् = अग्निमुख (हवन-आरंभ-विधि); तथा = तथा; पुनः = फिर; तेन एव मन्त्रेण = उसी मंत्र से; हुनेत् = होम करे; अष्टोत्तरं शतम् = एक सौ आठ (१०० + ८)

हिन्दी भावार्थ अपनी-अपनी शाखा के उक्त मार्ग से अग्निमुख कर्म करना कहा गया है। फिर उसी नक्षत्र-मंत्र से अष्टोत्तरशत—अर्थात् एक सौ आठ—आहुतियाँ होम करने का निर्देश है। संख्या यहाँ कर्म-मात्रा है, दशा-वर्ष या वर्ग-भाग नहीं।

English rendering According to the method stated in one’s own Vedic śākhā, the agni-mukha rite is to be performed; then, with that same mantra, one should offer one hundred and eight (aṣṭottara-śata) oblations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अष्टोत्तरशत = १०० + ८ = १०८ आहुति (होम-संख्या)। यह कर्म-गिनती है—न वाग-विभाजन, न अष्टकवर्ग-बिंदु, न विंशोत्तरी-वर्ष। सूत्र रूप में: आहुति-संख्या = १०८ (अष्ट + उत्तर-शत)।

उदाहरण (worked example) यदि होम “प्रत्येक समिध/अन्न/आज्य” की तीन धाराओं में बाँटा जाए (अगला श्लोक), तो धारा-मात्रा अलग-अलग कही जा सकती है; इस श्लोक की स्थिर संख्या केवल १०८ है—जैसे एक मंत्र-धारा में १०८ घृत-आहुति। कोई अयनांश/भाव-पद्धति यहाँ लागू नहीं।

89.6
प्रत्येकं समिदन्नाज्यैः प्रायश्चित्तान्तमेव हि ।
अभिषेकं ततः कुर्यादाचार्यश्च द्वयोरपि
pratyekaṃ samidannājyaiḥ prāyaścittāntameva hi |
abhiṣekaṃ tataḥ kuryādācāryaśca dvayorapi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रत्येकम् = प्रत्येक (आहुति/मन्त्र के साथ); समिद्-अन्न-आज्यैः = समिधा, अन्न और घृत (आज्य) से; प्रायश्चित्त-अन्तम् = प्रायश्चित्त (समापन-होम) पर्यन्त; एव हि = ही; अभिषेकम् = अभिषेक (जल-सिंचन-संस्कार); ततः = तदनन्तर; कुर्यात् = करे; आचार्यः = आचार्य; द्वयोः अपि = दोनों (व्यक्तियों) का।

हिन्दी भावार्थ प्रत्येक आहुति के साथ समिधा, अन्न और घृत से हवन करे, यह क्रम प्रायश्चित्त-होम तक चले। तदनन्तर आचार्य उन दोनों व्यक्तियों का अभिषेक करे।

English rendering With samidh, anna and ājya for each oblation, up to the concluding prāyaścitta homa; thereafter the ācārya should perform the abhiṣeka of both persons.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-निर्देश (हवन-द्रव्य एवं अभिषेक-क्रम)। संख्या "द्वयोः" = 2, अर्थात् वही दो व्यक्ति (भ्राता-युगल या पिता-पुत्र) जिनकी रक्षा हेतु यह शान्ति है; गणना द्रव्य/पात्र-निर्देश की है, राशि-गणित की नहीं।

89.7
ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यादाचार्याय विशेषतः ।
ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः
ṛtvigbhyo dakṣiṇāṃ dadyādācāryāya viśeṣataḥ |
brāhmaṇān bhojayed bhaktyā vittaśāṭhyavivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऋत्विग्भ्यः = ऋत्विजों को; दक्षिणाम् = दक्षिणा; दद्यात् = दे; आचार्याय = आचार्य को; विशेषतः = विशेष रूप से; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; भोजयेत् = भोजन कराए; भक्त्या = भक्ति से; वित्त-शाठ्य-विवर्जितः = धन के प्रति कंजूसी/शाठ्य से रहित

हिन्दी भावार्थ ऋत्विजों को दक्षिणा दे—आचार्य को विशेषतः। भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-भोजन कराना कहा गया है, और वित्त-शाठ्य (धन में छल/कृपणता) से दूर रहने का निर्देश। अध्याय की यह शान्ति-विधि दक्षिणा और सत्कार पर समाप्त होती है; कोई फल-भविष्य या बाध्य-उपचार का दबाव-पाठ यहाँ नहीं पढ़ना चाहिए—केवल शास्त्र-कथित कर्म-समाप्ति।

English rendering One should give dakṣiṇā to the ṛtviks, and especially to the ācārya; feed brāhmaṇas with devotion, free from stinginess or meanness with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दक्षिणा/भोजन-विधान (कर्म-समाप्ति)। कोई संख्या, वर्ष, या बल-इकाई इस श्लोक में नहीं है।

अध्यायः 90

संक्रान्तिजन्मशान्त्यध्यायः

18 श्लोक
90.1
घोराध्वांक्षीमहोदर्यो मन्दा मन्दाकिनी तथा ।
मिश्रा च राक्षसी सूर्यसंक्रान्तिः सूर्यवासरात्
ghorādhvāṃkṣīmahodaryo mandā mandākinī tathā |
miśrā ca rākṣasī sūryasaṃkrāntiḥ sūryavāsarāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) घोरा = रवि-दिन की संक्रान्ति-नाम; अध्वांक्षी = सोम-दिन की संक्रान्ति; महोदरी = मङ्गल-दिन की; मन्दा = बुध-दिन की; मन्दाकिनी = गुरु-दिन की; मिश्रा = शुक्र-दिन की; राक्षसी = शनि-दिन की; सूर्यसंक्रान्तिः = सूर्य का राशि-परिवर्तन-क्षण; सूर्यवासरात् = रविवार से आरम्भ कर (सप्ताह-क्रम)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सूर्य-संक्रान्ति को उस वार के अनुसार नाम देता है जिस दिन संक्रान्ति पड़ती है। रविवार से क्रमशः घोरा, अध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा और राक्षसी — ये सात नाम सात वासरों से जुड़े हैं। यह वर्गीकरण फल-अध्याय का आधार-सूची है, न कि स्वतन्त्र गणना-सूत्र।

English rendering From Sunday onward, the Sun’s ingress (saṅkrānti) is named Ghorā, Adhvāṅkṣī, Mahodarī, Mandā, Mandākinī, Miśrā, and Rākṣasī — one name for each weekday on which the transit falls.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) साप्ताहिक मानचित्र (वार-क्रम, रवि = 1):
संक्रान्ति-नाम = {1: घोरा, 2: अध्वांक्षी, 3: महोदरी, 4: मन्दा, 5: मन्दाकिनी, 6: मिश्रा, 7: राक्षसी}
जहाँ वार-सूचकांक = ((JD_weekday − रवि_सूचकांक) mod 7) + 1।
कोई अंश/धनु-सूत्र नहीं — केवल सात-पद नाम-तालिका; पाठ-भेद संभव for exact spellings of अध्वांक्षी etc. across recensions.

उदाहरण (worked example) Convention: civil weekday of the saṅkrānti instant in the chosen timezone (e.g. Asia/Kolkata). If Sūrya enters a new rāśi on Thursday → वार-सूचकांक = 5 → नाम = मन्दाकिनी. The longitude rule itself is ordinary saṅkrānti (λ_☉ crosses n×30°); only the name is weekday-keyed.

90.2
संक्रान्तौ च नरो जातो भवेद् दारिद्र्य दुःखभाक् ।
शान्त्या सुखमवाप्नोति ततः शान्तिविधि ब्रुवे
saṃkrāntau ca naro jāto bhaved dāridrya duḥkhabhāk |
śāntyā sukhamavāpnoti tataḥ śāntividhi bruve

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) संक्रान्तौ = संक्रान्ति-क्षण पर; नरः जातः = जो मनुष्य उत्पन्न हुआ; दारिद्र्य-दुःखभाक् = दरिद्रता और दुःख का भागी (शास्त्रोक्त फल); शान्त्या = शान्ति-कर्म से; सुखम् अवाप्नोति = सुख प्राप्त करता है; ततः = इसलिए; शान्ति-विधिम् ब्रुवे = शान्ति की विधि कहता हूँ (मैं पराशर)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जो जातक ठीक संक्रान्ति-क्षण पर जन्म लेता है, उसके विषय में यह ग्रन्थ दारिद्र्य और दुःख का फल-कथन करता है, और यही ग्रन्थ इसका उपचार भी अपनी ही वाणी में देता है — शान्ति-कर्म से वह सुख पा लेता है। इसी कारण, हे शिष्य, अब पराशर स्वयं शान्ति की विधि कहते हैं। ध्यान रहे — यह ग्रन्थ का कथन है, कोई अटल भविष्य या भय का विषय नहीं।

English rendering The text states that one born at the exact moment of saṃkrānti is said to bear poverty and sorrow, and that by the pacification rite he attains ease; therefore, says Parāśara, I now declare the procedure of śānti.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन एवं विधि-प्रस्तावना। यहाँ ध्यातव्य यह है कि "संक्रान्ति-क्षण पर जन्म" एक कालगणितीय शर्त है (सूर्य का राशि-सन्धि-बिन्दु = 0° पर लग्न-काल से जन्म-काल का सन्निपात), जबकि "दारिद्र्य-दुःख" पूर्णतः फल-वचन है — दोनों को कभी मिलाना नहीं चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही श्लोक हमारी मूल अनुशासन-रेखा का जीवंत उदाहरण है: गणित को व्याख्या से अलग रखना। संक्रान्ति-क्षण (काल-सन्धि) एक नाप-योग्य खगोलीय घटना है; "दारिद्र्य-दुःख" शास्त्र का फल-वचन है, अटल नियति नहीं। जैसे हमारे काल-सत्यापन-ओरैकल में अष्टकवर्ग के अंक `==` से जाँचे जाते हैं पर फल-कथन केवल "शास्त्र कहता है" रूप में प्रस्तुत होता है, वैसे ही यहाँ हम शान्ति-विधि को ग्रन्थ का प्रस्ताव मानकर बिना भय, बिना दबाव के रखते हैं।

90.3
नवग्रहमखं कुर्यात् तस्य दोषोपशान्तये ।
गृहस्य पूर्वदिग्भागे गोमयेनोपलिप्य च
navagrahamakhaṃ kuryāt tasya doṣopaśāntaye |
gṛhasya pūrvadigbhāge gomayenopalipya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नवग्रह-मखम् = नवग्रह-यज्ञ/मख (नौ ग्रहों का हवन); कुर्यात् = करे; तस्य दोष-उपशान्तये = उस (संक्रान्ति-जन्म) दोष की उपशान्ति के लिए; गृहस्य पूर्व-दिग्-भागे = घर के पूर्व-दिशा-भाग में; गोमयेन = गोबर से; उपलिप्य = लीपकर (शुद्ध करके)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उस संक्रान्ति-जन्म-दोष की उपशान्ति के लिए नवग्रह-मख (नौ ग्रहों का यज्ञ) करना चाहिए। इसके लिए घर के पूर्व-दिशा वाले भाग को पहले गोबर से लीपकर शुद्ध किया जाए — यही कर्म-भूमि की तैयारी है।

English rendering For the appeasement of that fault one should perform the nine-planet sacrifice; in the eastern quarter of the house, first purifying the ground by smearing it with cow-dung.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (कर्म-भूमि-संस्कार)। ध्यातव्य: "नवग्रह" संख्या नौ (7 ग्रह + राहु-केतु) को इंगित करता है — यही मख की देवता-संख्या का आधार बनेगी।

90.4
स्वलंकृतप्रदेशे तु ब्रीहिराशिं प्रकल्पयेत् ।
पञ्चद्रोणमितं धान्यैस्तदर्धं तण्डुलैस्तथा
svalaṃkṛtapradeśe tu brīhirāśiṃ prakalpayet |
pañcadroṇamitaṃ dhānyaistadardhaṃ taṇḍulaistathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वलंकृतप्रदेशे = सुसज्जित स्थान में; ब्रीहिराशिं = धान्य/जौ-धान का ढेर; प्रकल्पयेत् = स्थापित करे; पञ्चद्रोणमितं = पाँच द्रोण माप का; धान्यैः = अन्न से; तदर्धं = उसका आधा; तण्डुलैः = चावल से।

हिन्दी भावार्थ सुसज्जित प्रदेश में ब्रीहि (धान्य) का राशि बनाएँ। शास्त्र माप देता है — धान्य पञ्च-द्रोण; उसी का आधा तण्डुल (चावल) का। यह मात्रा-क्रम अगले श्लोक में तिल तक चलता है।

English rendering In a well-adorned place prepare a heap of grain measuring five droṇas; half that quantity again in rice (taṇḍula).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) मात्रा-श्रृंखला (द्रोण इकाइयों में):
धान्य = 5 द्रोण
तण्डुल = तदर्धं = 5 ÷ 2 = 5/2 = 2.5 द्रोण
(अगले श्लोक में तिल = तण्डुल ÷ 2।)
“पञ्च” = 5 (plain numeral, not bhūtasaṃkhyā). Droṇa is the classical volume unit stated by the text; modern litre conversion is outside this verse and recension-dependent — do not invent a fixed SI map.

उदाहरण (worked example) If one droṇa of grain is taken as the working unit U, then: grain heap = 5U, rice heap = 2.5U. Relative ratio grain : rice = 2 : 1. Absolute modern volume needs a declared droṇa-standard (tradition varies); the śāstra’s ratio alone is exact.

90.5
तदर्धं च तिलैः कुर्याद्राशिं च द्विजसत्तम ।
पृथक् त्रितयराशौ तु लिखेदष्टदलं बुधैः
tadardhaṃ ca tilaiḥ kuryādrāśiṃ ca dvijasattama |
pṛthak tritayarāśau tu likhedaṣṭadalaṃ budhaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदर्धम् = उसका (ढाई द्रोण का) आधा; तिलैः = तिल से; राशिम् कुर्यात् = ढेर बनाए; द्विज-सत्तम = हे श्रेष्ठ द्विज (मैत्रेय-सम्बोधन); पृथक् त्रितय-राशौ = अलग-अलग तीनों ढेरों पर; लिखेत् = अंकित करे; अष्ट-दलम् = आठ पंखुड़ी वाला (कमल); बुधैः = विद्वानों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ हे श्रेष्ठ द्विज, उसका भी आधा — अर्थात् सवा द्रोण — तिल से तीसरा ढेर बनाए। इस प्रकार तीन ढेर तैयार होते हैं, और विद्वान् प्रत्येक ढेर पर पृथक्-पृथक् अष्टदल (आठ पंखुड़ी वाला) कमल अंकित करें। यह कमल-रचना कलश-स्थापन की पीठिका है।

English rendering Half of that again — in sesame — make the third heap, O best of the twice-born; upon each of the three heaps let the wise inscribe an eight-petalled lotus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) माप एवं संख्या:
तिल = 2½ ÷ 2 = 1¼ द्रोण।
तीनों ढेरों का अनुपात — धान्य : तण्डुल : तिल = 5 : 2½ : 1¼ = 4 : 2 : 1 (ज्यामितीय श्रेणी, सामान्य-अनुपात ½)।
संख्याएँ: ढेर = 3; प्रत्येक पर दल = 8 (अष्टदल कमल)।

उदाहरण (worked example) तण्डुल 2.5 द्रोण ⇒ तिल = 2.5 × ½ = 1.25 द्रोण। तीन ढेरों को न्यूनतम पूर्णांक में लिखें तो 4 : 2 : 1 — अर्थात् यदि तिल के लिए 1 इकाई लें, तो तण्डुल 2 और धान्य 4 इकाई।

90.6
पुण्याहं वाचयित्वा तु आचार्यं वृणुयात् पुरा ।
धर्मज्ञं मन्त्रतत्त्वज्ञं शान्तिकर्मणि कोविदम्
puṇyāhaṃ vācayitvā tu ācāryaṃ vṛṇuyāt purā |
dharmajñaṃ mantratattvajñaṃ śāntikarmaṇi kovidam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुण्याहम् वाचयित्वा = "पुण्याहवाचन" (मंगल-दिन की उद्घोषणा) करवाकर; आचार्यम् वृणुयात् पुरा = पहले आचार्य (ऋत्विक्) का वरण करे; धर्मज्ञम् = धर्म का ज्ञाता; मन्त्र-तत्त्वज्ञम् = मन्त्रों के तत्त्व का ज्ञाता; शान्ति-कर्मणि कोविदम् = शान्ति-कर्म में निपुण।

हिन्दी भावार्थ पहले पुण्याहवाचन करवाकर एक योग्य आचार्य का वरण करना चाहिए। शास्त्र आचार्य के तीन लक्षण बताता है — वह धर्मज्ञ हो, मन्त्रों के तत्त्व को जानता हो, और शान्ति-कर्म में कुशल हो। पात्र आचार्य के बिना कर्म पूर्ण नहीं माना जाता।

English rendering Having had the auspicious-day proclamation recited, one should first choose an officiant — knower of dharma, versed in the essence of the mantras, and skilled in the rites of pacification.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (ऋत्विक्-वरण एवं पात्रता)। ध्यातव्य: आचार्य की तीन अर्हताएँ — धर्मज्ञता, मन्त्र-तत्त्व-ज्ञान, शान्ति-कौशल — एक गुणात्मक चयन-मानदण्ड हैं, संख्यात्मक गणना नहीं।

90.7
राशिषु स्थापयेत् कुम्भानव्रणान् सुमनोहरान् ।
तीर्थोदकेन सम्पूर्य समृदौषधपल्लवम्
rāśiṣu sthāpayet kumbhānavraṇān sumanoharān |
tīrthodakena sampūrya samṛdauṣadhapallavam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशिषु = (तीनों) राशियों पर; कुम्भान् = कलश; अव्रणान् = बिना दरार/निर्दोष; सुमनोहरान् = मनोरम; स्थापयेत् = रखे; तीर्थोदकेन सम्पूर्य = तीर्थ-जल से भरकर; समृदौषधपल्लवम् = उत्तम औषधि और पल्लव सहित।

हिन्दी भावार्थ राशियों पर निर्दोष, सुन्दर कुम्भ स्थापित करें। उन्हें तीर्थोदक से भरें और समृद्ध औषधि-पल्लव जोड़ें। यह कलश-स्थापन शान्ति-मण्डल का अगला भौतिक चरण है।

English rendering Upon the heaps place flawless, pleasing pots, filled with sacred water and furnished with excellent herbs and leafy shoots.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — द्रव्य-निर्देश (कुम्भ × राशि-त्रय; जल = तीर्थोदक; सह-सामग्री = औषधि + पल्लव)। Insight: “अव्रण” is a quality filter (no cracked vessel), not a numeric measure; count of pots is implied one set per rāśi-heap (3), unless a fuller vidhi elsewhere expands it — पाठ-भेद/विस्तार संभव in other chapters or recensions.

90.8
पंचगव्यं क्षिपेत्तत्र वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत् ।
कुम्भोपरि न्यसेत् पात्रं सूक्ष्मवस्त्रेण वेष्टितम्
paṃcagavyaṃ kṣipettatra vastrayugmena veṣṭayet |
kumbhopari nyaset pātraṃ sūkṣmavastreṇa veṣṭitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पंचगव्यम् = गाय के पाँच द्रव्य (दूध, दही, घृत, गोमूत्र, गोमय); क्षिपेत् = वहाँ डाले/स्थापित करे; वस्त्रयुग्मेन = दो वस्त्रों से; वेष्टयेत् = लपेटे; कुम्भोपरि = कलश के ऊपर; न्यसेत् = रखे; पात्रम् = पात्र/बर्तन; सूक्ष्मवस्त्रेण = महीन वस्त्र से; वेष्टितम् = आवृत/लपेटा हुआ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र इस चरण में कलश-विधान का अगला क्रम बताता है। उस स्थान पर पंचगव्य डाले और उसे वस्त्र-युगल से वेष्टित करे। तत्पश्चात् कुम्भ के ऊपर वह पात्र रखे जो सूक्ष्म वस्त्र से लपेटा गया हो। यह स्थापना-क्रम पूजा-सामग्री को शुद्ध और व्यवस्थित रखने का विधि-निर्देश है।

English rendering The text directs that pañcagavya be placed there and wrapped with a pair of cloths; then the vessel, itself wrapped in fine cloth, is to be set upon the kumbha.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-विधान / कर्मकाण्ड-वर्णन। यहाँ संख्यात्मक गणना नहीं; “पंच” गव्य-द्रव्यों का पारंपरिक पञ्चक-निर्देश है, और “युग्म” दो वस्त्रों का युगल-मात्र है।

90.9
प्रतिमां स्थापयेत् तत्र साधिप्रत्यधिदैवताम् ।
अधिदैवं भवेत् सूर्यश्चन्द्रः प्रत्यधिदैवतम्
pratimāṃ sthāpayet tatra sādhipratyadhidaivatām |
adhidaivaṃ bhavet sūryaścandraḥ pratyadhidaivatam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रतिमाम् स्थापयेत् तत्र = वहाँ प्रतिमा स्थापित करे; स-अधि-प्रत्यधि-दैवताम् = अधिदेवता और प्रत्यधिदेवता सहित; अधिदैवम् भवेत् सूर्यः = अधिदेवता सूर्य हो; चन्द्रः प्रत्यधि-दैवतम् = चन्द्र प्रत्यधिदेवता हो।

हिन्दी भावार्थ उस पीठ पर संक्रान्ति की प्रतिमा स्थापित करे, और उसके साथ उसके अधिदेवता तथा प्रत्यधिदेवता को भी। शास्त्र निर्दिष्ट करता है — इस कर्म में अधिदेवता सूर्य हैं और प्रत्यधिदेवता चन्द्र। सूर्य-चन्द्र का यह देव-द्वय संक्रान्ति-देवता को घेरता है।

English rendering There one installs the image together with its presiding and co-presiding deities; the presiding deity is the Sun, and the Moon the co-presiding one.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (देवता-न्यास)। ध्यातव्य: संक्रान्ति स्वयं सूर्य की गति की घटना है, इसीलिए सूर्य अधिदेव और चन्द्र प्रत्यधिदेव — देवता-निर्धारण घटना के खगोलीय स्वरूप से संगत है, फिर भी यह उपासना-न्यास है, गणना नहीं।

90.10
चन्द्रादित्याकृती पार्श्वे मध्ये संक्रान्तिमर्चयेत् ।
प्रतिमां पूजने पूर्वं वस्त्रयुग्मं निवेदयेत्
candrādityākṛtī pārśve madhye saṃkrāntimarcayet |
pratimāṃ pūjane pūrvaṃ vastrayugmaṃ nivedayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र-आदित्य-आकृती = चन्द्र और सूर्य की दो आकृतियाँ (मूर्तियाँ); पार्श्वे = दोनों पार्श्व (बगल) में; मध्ये संक्रान्तिम् अर्चयेत् = मध्य में संक्रान्ति-देवता का पूजन करे; प्रतिमाम् पूजने पूर्वम् = प्रतिमा-पूजन के आरम्भ में; वस्त्र-युग्मम् निवेदयेत् = वस्त्र-युग्म अर्पित करे।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र और सूर्य की आकृतियाँ दोनों पार्श्वों में स्थापित करे और मध्य में संक्रान्ति-देवता का अर्चन करे। प्रतिमा के पूजन के प्रारम्भ में सबसे पहले वस्त्र-युग्म (दो वस्त्र) निवेदित करे। यह पूजा-क्रम का प्रथम उपचार है।

English rendering With the forms of Moon and Sun set on either side, in the centre one worships the Saṃkrānti; and at the outset of worshipping the image, one first offers a pair of cloths.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (मूर्ति-विन्यास एवं पूजा-क्रम)। ध्यातव्य: विन्यास त्रि-केन्द्रीय है — पार्श्व में चन्द्र-सूर्य, मध्य में संक्रान्ति — जो पिछली ऋचा के अधि/प्रत्यधि-देव-न्यास को स्थानिक रूप में दोहराता है।

90.11
ततो व्याहृतिपूर्र्वेण तत्तन्मन्त्रेण पूजयेत् ।
त्रैयम्बकेण मन्त्रेण प्रधानप्रतिभां पूजयेत्
tato vyāhṛtipūrrveṇa tattanmantreṇa pūjayet |
traiyambakeṇa mantreṇa pradhānapratibhāṃ pūjayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = उसके बाद; व्याहृतिपूर्वेण = व्याहृतियों (भूर् भुवः स्वः आदि) से पूर्वक; तत्तन्मन्त्रेण = अपने-अपने (उस-उस) मन्त्र से; पूजयेत् = पूजन करे; त्रैयम्बकेण मन्त्रेण = त्र्यम्बक-मन्त्र से; प्रधानप्रतिभाम् = प्रधान प्रतिमा (पाठ: प्रतिभाम् — पाठ-भेद संभव, अनेक संस्करणों में प्रतिमाम्); पूजयेत् = पूजे।

हिन्दी भावार्थ तदनन्तर प्रत्येक देवता/रूप का पूजन व्याहृति-पूर्वक, उसके नियत मन्त्र से करना चाहिए। प्रधान प्रतिमा की पूजा त्रैयम्बक-मन्त्र से कही गई है। “तत्तन्मन्त्र” का नियम यह है कि पार्श्व-देवताओं और मुख्य रूप — प्रत्येक का अपना मन्त्र-क्रम अलग-अलग रहे।

English rendering Then one is to worship each with its proper mantra preceded by the vyāhṛtis; the principal image is to be worshipped with the Tryambaka mantra (reading pratibhām/pratimām may vary — पाठ-भेद संभव).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मन्त्र-विधि / पूजा-क्रम। यहाँ “पूर्वेण” केवल क्रम (व्याहृति → मन्त्र) बताता है; कोई काल-खंड, अंश या जप-संख्या इस श्लोक में नहीं दी गई।

90.12
उत्सूर्य इति मन्त्रेण सूर्यपूजां समाचरेत् ।
आप्यायस्वेति मन्त्रेण चन्द्रपूजां समाचरेत्
utsūrya iti mantreṇa sūryapūjāṃ samācaret |
āpyāyasveti mantreṇa candrapūjāṃ samācaret

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) "उत्सूर्य" इति मन्त्रेण = "उत् सूर्यः..." प्रतीक वाले सूर्य-मन्त्र से; सूर्य-पूजाम् समाचरेत् = सूर्य की पूजा करे; "आप्यायस्व" इति मन्त्रेण = "आप्यायस्व समेतु ते..." प्रतीक वाले मन्त्र से; चन्द्र-पूजाम् समाचरेत् = चन्द्र की पूजा करे।

हिन्दी भावार्थ पार्श्व-देवताओं के लिए भी शास्त्र मन्त्र निर्दिष्ट करता है — "उत्सूर्य" से आरम्भ होने वाले मन्त्र से सूर्य का पूजन करे, और "आप्यायस्व" से आरम्भ होने वाले (सोम/चन्द्र-सम्बन्धी) मन्त्र से चन्द्र का पूजन करे। मन्त्र अपने प्रतीक-पद से पहचाने गए हैं।

English rendering With the mantra beginning "ut sūrya…" one performs the worship of the Sun, and with the mantra beginning "āpyāyasva…" the worship of the Moon.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (मन्त्र-निर्देश प्रतीक-पद द्वारा)। ध्यातव्य: मन्त्र अपने आरम्भिक पद (प्रतीक) से निर्दिष्ट हैं — यह वैदिक विनियोग की मानक शैली है; "आप्यायस्व" ऋग्वेदीय सोम-सूक्त का प्रतीक है, जिसे चन्द्र-पूजन में प्रयुक्त किया जाता है — पाठ-भेद संभव।

90.13
उपचारैः षोडशभिर्यद्वा पञ्चोपचारकैः ।
मृत्युंजयन मन्त्रेण प्रधानप्रतिमां स्पृशन्
upacāraiḥ ṣoḍaśabhiryadvā pañcopacārakaiḥ |
mṛtyuṃjayana mantreṇa pradhānapratimāṃ spṛśan

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपचारैः षोडशभिः = सोलह उपचारों से; यद्वा = अथवा; पञ्चोपचारकैः = पाँच उपचारों से; मृत्युंजयन मन्त्रेण = मृत्युंजय-मन्त्र से (पाठ-रूप: मृत्युंजयन — पाठ-भेद संभव); प्रधानप्रतिमाम् = प्रधान प्रतिमा को; स्पृशन् = स्पर्श करते हुए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र पूजा के दो स्तर बताता है — षोडशोपचार अथवा, सामर्थ्य/परंपरा के अनुसार, पञ्चोपचार। प्रधान प्रतिमा को स्पर्श करते हुए मृत्युंजय-मन्त्र का प्रयोग निर्देशित है। उपचार-संख्या विकल्प है; स्पर्श-सहित मन्त्र-प्रयोग प्रधान-रूप के लिए विशेष रूप से कहा गया है।

English rendering Worship may be done with the sixteen upacāras or, alternatively, with the five; while touching the principal image, one employs the Mṛtyuñjaya mantra (as the text states).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपचार-संख्या / विधि-विकल्प; किन्तु संख्याएँ श्लोक-निहित हैं:
उपचार-विकल्प = १६ (षोडश) अथवा ५ (पञ्च)।
यह पूजा-अंगों की गणना है, न कि वर्ग-विभाजन या बल-सूत्र; “षोडश” यहाँ षोडश-वर्ग (D-चार्ट) से भिन्न कर्मकाण्डीय षोडशोपचार है।

उदाहरण (worked example)
यदि षोडशोपचार अपनाया जाए — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, प्रदक्षिणा/नमस्कार — क्रम से १६ अंग।
यदि पञ्चोपचार — प्रायः गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य — ५ अंग।
मृत्युंजय-मन्त्र से प्रधान-प्रतिमा-स्पर्श दोनों विकल्पों के साथ जोड़ा जा सकता है; जप-संख्या अगले श्लोक में स्वतन्त्र रूप से दी गई है।

90.14
अष्टोत्तरसहस्रं चाऽप्यष्टोत्तरशतं जपेत् ।
अथाऽष्टाविंशतिं वापि जपेन्मन्त्रं स्वशक्तितः
aṣṭottarasahasraṃ cā'pyaṣṭottaraśataṃ japet |
athā'ṣṭāviṃśatiṃ vāpi japenmantraṃ svaśaktitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टोत्तरसहस्रम् = १००० + ८ = १००८; चापि = और/अथवा; अष्टोत्तरशतम् = १०० + ८ = १०८; जपेत् = जप करे; अथवा = या फिर; अष्टाविंशतिम् = २८; वापि = अथवा; जपेत् = जपे; मन्त्रम् = (उक्त) मन्त्र को; स्वशक्तितः = अपनी शक्ति/सामर्थ्य के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ मन्त्र-जप की तीन वैकल्पिक संख्याएँ शास्त्र स्वयं देता है — अष्टोत्तर-सहस्र (१००८), अष्टोत्तर-शत (१०८), अथवा अष्टाविंशति (२८)। चयन “स्वशक्तितः” — साधक की सामर्थ्य — पर छोड़ा गया है। यह फल-दबाव या अनिवार्यता नहीं, अपितु जप-मात्रा का क्रमिक विकल्प-क्रम है।

English rendering One may recite the mantra 1008 times, or 108 times, or even 28 times — according to one’s capacity (svaśakti), as the text allows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) जप-संख्या (word-numeral → digit), शुद्ध गणना:
- अष्टोत्तरसहस्र = सहस्र (१०००) + अष्ट (८) = १००८
- अष्टोत्तरशत = शत (१००) + अष्ट (८) = १०८
- अष्टाविंशति = २८
विकल्प-समुच्चय: जप-संख्या ∈ {१००८, १०८, २८}, चयन-नियम = स्वशक्ति। कोई दशा-वर्ष, वर्ग-भाग या अष्टकवर्ग-बिन्दु यहाँ नहीं गूँथा गया।

उदाहरण (worked example)
मान लें मृत्युंजय-मन्त्र का जप (पूर्व श्लोक से जुड़ा प्रधान-प्रतिमा-स्पर्श-क्रम)।
- पूर्ण-विकल्प: १००८ आवृत्तियाँ
- मध्यम: १०८ आवृत्तियाँ (= १००८ ÷ १०.०… नहीं — शास्त्र अनुपात नहीं देता; ये स्वतन्त्र विकल्प हैं)
- लघु: २८ आवृत्तियाँ
नियम: तीनों में से एक, स्वशक्तितः; श्लोक कोई अनिवार्य “फल = जप × स्थिरांक” सूत्र नहीं देता — केवल जप-मात्रा का विकल्प।

90.15
कुम्भेभ्यः पश्चिमे देशे स्थण्डिलेऽग्निं प्रकल्पयेत् ।
स्वगृह्योक्तविधानेन कारयेत् संस्कृतानलम्
kumbhebhyaḥ paścime deśe sthaṇḍile'gniṃ prakalpayet |
svagṛhyoktavidhānena kārayet saṃskṛtānalam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुम्भेभ्यः = (पूर्वस्थापित) कलशों से; पश्चिमे देशे = पश्चिम दिशा-भाग में; स्थण्डिले = वेदी/समतल संस्कारित भूमि पर; अग्निम् प्रकल्पयेत् = अग्नि की स्थापना करे; स्व-गृह्य-उक्त-विधानेन = अपने गृह्यसूत्र (शाखा-विहित गृह-कर्म-पद्धति) में कहे विधान से; कारयेत् = कराए/सिद्ध करे; संस्कृत-अनलम् = संस्कारयुक्त (सम्यक् स्थापित) अग्नि को।

हिन्दी भावार्थ जिन कलशों को पहले पूर्व-दिशा में स्थापित किया गया था, उनसे पश्चिम की ओर वेदी बनाकर वहाँ अग्नि की स्थापना करे। अग्नि-स्थापन मनमाना नहीं — साधक अपनी ही शाखा के गृह्यसूत्र-विहित प्रक्रिया से अग्नि का संस्कार करे, तभी वह "संस्कृत अनल" होकर होम-योग्य बनती है।

English rendering To the west of the pots, upon a prepared altar, one should establish the fire, consecrating it by the procedure laid down in one's own Gṛhya-sūtra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कर्मकाण्ड-विधि (अग्नि-स्थापन एवं दिक्-नियोजन)। एकमात्र संरचनात्मक निर्देश दिक् का है: कलश पूर्व में (श्लोक 3 के "पूर्वदिग्भागे" के अनुरूप), अग्नि उनसे पश्चिम में — अर्थात् उपासक पूर्वमुख होकर पूजा-वेदी और होम-अग्नि को एक पूर्व-पश्चिम अक्ष पर रखता है।

90.16
त्रयम्बकेन मन्त्रेण समिदाज्यचरून् हुनेत् ।
अष्टोत्तरसहस्रं वा अष्टोत्तरशतं यथा
trayambakena mantreṇa samidājyacarūn hunet |
aṣṭottarasahasraṃ vā aṣṭottaraśataṃ yathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रयम्बकेन मन्त्रेण = त्र्यम्बक-मन्त्र से; समिद् = समिधा (हवन-काष्ठ); आज्य = घृत; चरून् = चरु (हविष्यान्न); हुनेत् = होम करे; अष्टोत्तरसहस्रम् = १००० + ८ = १००८; अष्टोत्तरशतम् = १०० + ८ = १०८; वा … यथा = अथवा यथा-योग्य/यथा-शक्ति।

हिन्दी भावार्थ त्र्यम्बक मन्त्र से समिधा, आज्य और चरु का होम करना चाहिए। शास्त्र दो स्पष्ट संख्या-विकल्प देता है — अष्टोत्तर-सहस्र (१००८) अथवा अष्टोत्तर-शत (१०८), “यथा” अर्थात् परिस्थिति व सामर्थ्य के अनुरूप। यह गणना ज्योतिषीय वर्ग-सूत्र नहीं, आहुति-संख्या का शास्त्रोक्त पैमाना है।

English rendering With the Tryambaka mantra one is to offer fuel-sticks (samidh), ghee (ājya), and caru. The text states the count as either one thousand and eight (1008) or one hundred and eight (108), as appropriate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आहुति-संख्या (शाब्दिक संख्या-वाचन, digit-faithful):
- अष्टोत्तरसहस्र = 1000 + 8 = 1008
- अष्टोत्तरशत = 100 + 8 = 108
क्रम: 1008 (पूर्णतर) → 108 (लघुतर), “यथा” = क्षमता/उपयुक्तता से चयन। कोई राशि-अंश या वर्गाधार नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें साधक पूर्ण आहुति-क्रम चुनता है: N = 1008 (त्र्यम्बक से समिद्-आज्य-चरु)। सामर्थ्य-सीमित क्रम: N = 108। दोनों संख्याएँ पद में ही निहित हैं; बाहरी “शुभ-अशुभ” गुणन नहीं जोड़ा जाता — केवल शास्त्र का यथा-विकल्प।

90.17
अष्टविंशतिमेवापि कुर्याद् होमं स्वशक्तितः ।
मृत्युंजयेन मन्त्रेण तिलहोमश्च कारयेत्
aṣṭaviṃśatimevāpi kuryād homaṃ svaśaktitaḥ |
mṛtyuṃjayena mantreṇa tilahomaśca kārayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टविंशतिम् = अष्ट + विंशति = २८; एव अपि = ही / यहाँ तक भी; कुर्यात् होमम् = होम करे; स्वशक्तितः = अपनी शक्ति/सामर्थ्य के अनुसार; मृत्युंजयेन मन्त्रेण = मृत्युंजय मन्त्र से; तिलहोमः = तिल-होम; कारयेत् = कराए।

हिन्दी भावार्थ जो और भी अल्प सामर्थ्य में हों, उनके लिए शास्त्र तीसरा स्पष्ट स्तर देता है — अष्टाविंशति (२८) आहुतियों का होम, “स्वशक्तितः”। इसके साथ मृत्युंजय मन्त्र से तिल-होम भी करवाने को कहा गया है। यहाँ भी फल-गिनती ज्योतिष-यन्त्र की नहीं, कर्म-संख्या और मन्त्र-भेद की है।

English rendering The text further allows the homa to be performed even twenty-eight times, according to one’s capacity (svaśaktitaḥ). It also states that a sesame homa is to be done with the Mṛtyuñjaya mantra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आहुति-संख्या का तीसरा स्तर:
- अष्टविंशति = 28
पिछले पद से पूर्ण श्रेणी (पाठानुसार): 1008 → 108 → 28, चयन-नियम = स्वशक्ति। मृत्युंजय-तिलहोम: मन्त्र-भेद + द्रव्य-भेद (तिल); कोई दशा-वर्ष या षड्बल-रूप नहीं।

उदाहरण (worked example) सामर्थ्य-सीमा पर Nₕₒₘₐ = 28 (त्र्यम्बक-क्रम से समिद्-आज्य-चरु, पूर्व-पद के द्रव्य)। अतिरिक्त: मृत्युंजय मन्त्र से तिल-होम — संख्या इस पद में तिल-होम के लिए अलग अंक नहीं दी; केवल 28 होम + तिलहोम का निर्देश। (यदि किसी संस्करण में तिल-आहुति की अलग संख्या हो — पाठ-भेद संभव।)

90.18
ततः स्विष्टकृतं हुत्वाअभिषेकं च कारयेत् ।
ब्रह्मणान् भोजयेत् पश्चादेवं शान्तिमवाप्नुयात्
tataḥ sviṣṭakṛtaṃ hutvāabhiṣekaṃ ca kārayet |
brahmaṇān bhojayet paścādevaṃ śāntimavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तदनन्तर; स्विष्टकृतम् हुत्वा = अग्नि-स्विष्टकृत् की समापन-आहुति देकर; अभिषेकम् च कारयेत् = और (जातक का) अभिषेक कराए; ब्राह्मणान् भोजयेत् = ब्राह्मणों को भोजन कराए (पाठ "ब्रह्मणान्" → ब्राह्मणान्; पाठ-भेद संभव); पश्चात् = इसके पश्चात्; एवम् = इस प्रकार; शान्तिम् अवाप्नुयात् = शान्ति (दोष-उपशम) प्राप्त करता है।

हिन्दी भावार्थ होम के अन्त में स्विष्टकृत्-आहुति देकर उस जातक का अभिषेक (शान्ति-जल से अभिषिञ्चन) कराए, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराए। शास्त्र कहता है कि इस समग्र विधि के सम्पन्न होने से संक्रान्ति-जन्म-दोष की शान्ति प्राप्त होती है — यह विधि का समापन-अंग और उसका उपसंहार-फल है।

English rendering Then, having offered the Sviṣṭakṛt oblation, one should perform the consecratory sprinkling and afterwards feed the brāhmaṇas; thus, the text says, one attains the pacification.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — समापन-विधि + फल-कथन (शान्ति-प्राप्ति)। "शान्तिम् अवाप्नुयात्" शास्त्र का अपना कथन है, न कि कोई नियति या निश्चित भविष्य-वचन — इसे "शास्त्र कहता है" रूप में ही ग्रहण करें; अभिषेक व ब्राह्मण-भोजन विधि के क्रिया-अंग हैं, कोई परिकलन नहीं।

अध्यायः 91

ग्रहणजातशान्त्यध्यायः

14 श्लोक
91.1
सूर्येन्दुग्रहणे काले येषां जन्म भवेद् द्विज ।
व्याधिः कष्टं च दारिद्र्यं तेषां मृत्युभयं भवेत्
sūryendugrahaṇe kāle yeṣāṃ janma bhaved dvija |
vyādhiḥ kaṣṭaṃ ca dāridryaṃ teṣāṃ mṛtyubhayaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्येन्दु-ग्रहणे = सूर्य- अथवा चन्द्र-ग्रहण के काल में; जन्म = जन्म; द्विज = हे द्विज (शिष्य-संबोधन); व्याधिः = रोग/पीड़ा; कष्टं = कष्ट; दारिद्र्यं = दरिद्रता; मृत्यु-भयं = मृत्यु का भय (शास्त्र-कथन, न कि नियति-घोषणा)।

हिन्दी भावार्थ हे द्विज, शास्त्र कहता है कि जिनका जन्म सूर्य- अथवा चन्द्र-ग्रहण के काल में होता है, उनके लिए व्याधि, कष्ट और दारिद्र्य का संकेत दिया गया है, तथा मृत्यु-भय की भी संभावना कही गई है। यह फल-कथन है—ज्योतिषीय संकेत का वर्णन—न कि निश्चित भाग्य। आगे के श्लोक इसी संकेत के संदर्भ में शान्ति-विधि का उपक्रम खोलते हैं।

English rendering The text states that those born at the time of a solar or lunar eclipse are indicated as subject to disease, hardship, and poverty, and to fear of death. This is a phala-statement of the śāstra, not a deterministic decree; the following verses introduce a pacification (śānti) procedure on that basis.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (ग्रहण-काल-जन्म का शास्त्रोक्त संकेत)। यहाँ कोई अंश-विभाजन, बल-इकाई या दशा-अनुपात नहीं; केवल काल-विशेष (ग्रहण) और जन्म का गुणात्मक फल-वर्णन है।

91.2
अतः शान्तिं प्रवक्ष्यामि जनानां हितकाङ्क्षया ।
सूर्यस्येन्दोश्च ग्रहेणं यस्मिनृक्षे प्रजायते
ataḥ śāntiṃ pravakṣyāmi janānāṃ hitakāṅkṣayā |
sūryasyendośca graheṇaṃ yasminṛkṣe prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इसलिए; शान्तिं = शान्ति-विधि / प्रशमन; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; जनानां हित-काङ्क्षया = जन-हित की कामना से; सूर्यस्य इन्दोः च = सूर्य और चन्द्र का; ग्रहणं = ग्रहण; यस्मिन् ऋक्षे = जिस नक्षत्र में; प्रजायते = घटित होता है।

हिन्दी भावार्थ अतः आचार्य कहते हैं कि जन-हित की इच्छा से अब शान्ति-विधि का कथन करेंगे। मूल बिन्दु यह है कि सूर्य अथवा चन्द्र का ग्रहण जिस नक्षत्र (ऋक्ष) में होता है, उसी नक्षत्र-सम्बन्ध को आगे की क्रिया का आधार माना गया है। यह श्लोक फल से विधि की ओर संक्रमण है—गणना नहीं, प्रक्रिया का द्वार।

English rendering Therefore, for the welfare of people, the teacher undertakes to set forth a śānti (pacification) procedure. The key datum is the nakṣatra (ṛkṣa) in which the solar or lunar eclipse occurs; that star-field becomes the reference for what follows.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-उपक्रम / संवाद-प्रवेश। ग्रहण-नक्षत्र का निर्धारण ज्योतिष-गणना से आता है (चन्द्र-देशांतर → नक्षत्र-खण्ड), किन्तु यह श्लोक स्वयं कोई सूत्र नहीं देता—केवल “जिस ऋक्ष में ग्रहण हो” का निर्देश।

91.3
तन्नक्षत्रपते रूपं सुवर्णेन प्रकल्पयेत् ।
सूर्यग्रहे सूर्यरूपं सुवर्णेन स्वशक्तितः
tannakṣatrapate rūpaṃ suvarṇena prakalpayet |
sūryagrahe sūryarūpaṃ suvarṇena svaśaktitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-नक्षत्र-पतेः = उस (ग्रहण-स्थित) नक्षत्र के स्वामी का; रूपं = प्रतिमा / आकृति; सुवर्णेन = स्वर्ण से; प्रकल्पयेत् = बनावे; सूर्य-ग्रहे = सूर्य-ग्रहण में; सूर्य-रूपं = सूर्य की आकृति; सुवर्णेन = स्वर्ण से; स्व-शक्तितः = अपनी सामर्थ्य के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस नक्षत्र में ग्रहण हुआ हो, उस नक्षत्र-स्वामी का रूप स्वर्ण से कल्पित किया जाए। विशेषतः सूर्य-ग्रहण में सूर्य का रूप स्वर्ण से, अपनी शक्ति/सामर्थ्य के अनुसार, बनाया जाए। यहाँ धातु और देवता-रूप का मेल विधि का भाग है—नक्षत्र-स्वामी की पहचान पारंपरिक नक्षत्र-अधिपति-क्रम पर निर्भर करती है (पाठ-भेद/परंपरा-भेद संभव)।

English rendering The text directs that an image of the lord of the eclipse-nakṣatra be fashioned in gold. In a solar eclipse specifically, a solar form is to be made in gold, according to one’s means (sva-śakti). Identification of the nakṣatra-lord follows the traditional rulership scheme; recensional nuance is possible.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-विधान (धातु-प्रतिमा)। अंतर्निहित केवल पहचान-चरण है: ग्रहण-कालीन चन्द्र/सूर्य-देशांतर से नक्षत्र-खण्ड (27-fold; each 13°20′) → नक्षत्र-स्वामी → स्वर्ण-रूप; श्लोक स्वयं अंश-सूत्र नहीं लिखता।

91.4
चन्द्रग्रहे चन्द्ररूपं रजतेन तथैव च ।
राहुरूपं प्रकुर्वीत सीसकेन विचक्षणः
candragrahe candrarūpaṃ rajatena tathaiva ca |
rāhurūpaṃ prakurvīta sīsakena vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्र-ग्रहे = चन्द्र-ग्रहण में; चन्द्र-रूपं = चन्द्र की आकृति; रजतेन = रजत (चाँदी) से; तथा एव च = उसी प्रकार; राहु-रूपं = राहु की आकृति; प्रकुर्वीत = बनाए; सीसकेन = सीसा (lead) से; विचक्षणः = कुशल/विवेकी।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र-ग्रहण में चन्द्र का रूप चाँदी से बनाया जाए—सूर्य-ग्रहण के स्वर्ण-रूप के समानांतर। विचक्षण व्यक्ति राहु का रूप सीसे से बनाए। यहाँ तीन रूपों की धातु-व्यवस्था स्पष्ट होती है: सूर्य—सुवर्ण, चन्द्र—रजत, राहु—सीसक। यह फल नहीं, सामग्री-निर्देश है।

English rendering In a lunar eclipse, a lunar form is to be made in silver, likewise. The skilled practitioner should fashion a Rāhu form in lead (sīsaka). The metal triad is thus fixed: Sun—gold, Moon—silver, Rāhu—lead.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सामग्री (धातु-निर्देश)। सूर्य/चन्द्र/राहु रूपों की त्रयी अगले श्लोकों में स्थापना का विषय बनेगी; यहाँ केवल धातु-चयन का नियम है।

91.5
शुचौ देशे समं स्थानं गोमयेन प्रलेपयेत् ।
तत्र च स्थापयेद् वस्त्रं नूतनं सुमनोहरम्
śucau deśe samaṃ sthānaṃ gomayena pralepayet |
tatra ca sthāpayed vastraṃ nūtanaṃ sumanoharam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुचौ देशे = शुद्ध/पवित्र स्थान में; समं स्थानं = समतल भूमि; गोमयेन = गोबर से; प्रलेपयेत् = लेप करे; तत्र = वहाँ; स्थापयेत् = रखे; वस्त्रं = वस्त्र; नूतनं = नया; सुमनोहरम् = सुंदर/मनोहर।

हिन्दी भावार्थ विधि के लिए शुद्ध देश में भूमि को समतल करके गोमय से लेप करने का निर्देश है। उस लेपित स्थान पर नया, सुंदर वस्त्र बिछाया/स्थापित किया जाए। यह स्थान-शुद्धि और आसन-तैयारी का चरण है—प्रतिमा-स्थापना से पहले का आधार।

English rendering In a pure place, level the ground and smear it with cow-dung. There, set out a new and pleasing cloth. This is the preparatory purification of the site before the images are installed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-स्थान-वर्णन (शुद्धि-आसन)। कोई अंश, बल या दशा-संख्या नहीं; केवल कर्म-भूमि की तैयारी।

91.6
त्रयाणामेव रूपाणां स्थापनं तत्र कारयेत् ।
सूर्यग्रहे प्रदातव्यं सूर्यप्रीतिकरं च यत्
trayāṇāmeva rūpāṇāṃ sthāpanaṃ tatra kārayet |
sūryagrahe pradātavyaṃ sūryaprītikaraṃ ca yat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रयाणाम् एव रूपाणां = उन्हीं तीन रूपों का; स्थापनं = स्थापना; तत्र = वहाँ (लेपित-वस्त्र-युक्त स्थान पर); कारयेत् = करवाए; सूर्य-ग्रहे = सूर्य-ग्रहण में; प्रदातव्यं = अर्पण करने योग्य; सूर्य-प्रीति-करं = सूर्य को प्रिय/प्रसन्न करने वाला; यत् = जो कुछ।

हिन्दी भावार्थ उन तीन रूपों (सूर्य/नक्षत्र-स्वामी, चन्द्र, राहु—संदर्भानुसार) की स्थापना उसी तैयार स्थान पर की जाए। सूर्य-ग्रहण में सूर्य-प्रीतिकर वस्तुएँ अर्पण की जाएँ—अगला श्लोक रक्त-वर्ण की सामग्री विशेषतः गिनाएगा। यह श्लोक स्थापना + सूर्य-ग्रहण-उपचार का द्वार खोलता है।

English rendering Install those three forms there. In a solar eclipse, offer whatever is said to please the Sun; the next verse specifies red offerings. The present line states the rule of installation and the solar-eclipse branch of the gift.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-स्थापना + सूर्य-शाखा। “त्रयाणां रूपाणां” = पूर्वोक्त तीन प्रतिमाएँ; गणना नहीं, कर्म-क्रम।

91.7
रक्ताक्षतं रक्तगन्धं रक्तमाल्याम्बरादिकम् ।
चन्द्रग्रहे प्रदातव्यं चन्द्रप्रीतिकरं च यत्
raktākṣataṃ raktagandhaṃ raktamālyāmbarādikam |
candragrahe pradātavyaṃ candraprītikaraṃ ca yat

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रक्त-अक्षतं = लाल अक्षत (चावल आदि); रक्त-गन्धं = लाल गंध/चंदन आदि; रक्त-माल्य-अम्बर-आदिकम् = लाल माला, वस्त्र आदि; चन्द्र-ग्रहे = चन्द्र-ग्रहण में; प्रदातव्यं = अर्पण करने योग्य; चन्द्र-प्रीति-करं = चन्द्र को प्रिय करने वाला; यत् = जो कुछ।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-प्रीतिकर पक्ष में शास्त्र रक्त-अक्षत, रक्त-गंध, रक्त-माला-वस्त्र आदि का निर्देश देता है। चन्द्र-ग्रहण में चन्द्र-प्रीतिकर वस्तुएँ अर्पण की जाएँ—यह श्लोक चन्द्र-शाखा का द्वार खोलता है (आगे के श्लोकों में विस्तार अपेक्षित; इस बैच में यहीं तक)। पुनः यह विधि-सामग्री है, फल-भविष्यवाणी नहीं; शास्त्र कहता है—अर्पण का वर्ण-क्रम रक्त (सूर्य) तथा चन्द्र-प्रिय (चन्द्र)।

English rendering For the solar side, red unbroken grains (akṣata), red fragrance, and red garlands, cloth, and the like are to be offered. In a lunar eclipse, offer what pleases the Moon. The verse is a materials-list for the two eclipse branches, not a predictive formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सामग्री / वर्ण-निर्देश (रक्त ↔ सूर्य; चन्द्र-प्रीतिकर ↔ चन्द्र)। कोई अंश-संख्या या बल-इकाई नहीं; केवल उपचार-वर्ण की शास्त्रोक्त सूची।

91.8
श्वेतगन्धं श्वेतपुष्पं श्वेतमाल्याम्बरादिकम् ।
राहवे च प्रदातव्यं कृष्णपुष्पाम्बरादिकम्
śvetagandhaṃ śvetapuṣpaṃ śvetamālyāmbarādikam |
rāhave ca pradātavyaṃ kṛṣṇapuṣpāmbarādikam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्वेतगन्धम् = श्वेत सुगन्ध/चन्दनादि; श्वेतपुष्पम् = श्वेत पुष्प; श्वेतमाल्याम्बरादिकम् = श्वेत माला, वस्त्र आदि; राहवे = राहु के लिए; प्रदातव्यम् = देना चाहिए; कृष्णपुष्पाम्बरादिकम् = कृष्ण/श्याम पुष्प, वस्त्र आदि।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रहण-जात शान्ति की सामग्री-व्यवस्था बताता है। श्वेत गन्ध, श्वेत पुष्प तथा श्वेत माला-वस्त्रादि का उल्लेख पहले किया गया है; और राहु के लिए कृष्ण पुष्प, वस्त्र आदि अर्पित करने को कहा गया है। रंग और द्रव्य का यह भेद ग्रह-विशेष की प्रीति-विधि का अंग है, न कि सामान्य घरेलू नियम। पाठ में जो श्वेत-सामग्री पूर्व-क्रम से जुड़ी हो, उसे उसी विधि-श्रृंखला में समझना चाहिए।

English rendering The text prescribes white fragrance, white flowers, and white garlands, garments, and the like (in the ritual sequence), and states that for Rāhu black flowers, clothes, and similar offerings are to be given. Colour and material are specified as part of the grahaṇa-śānti procedure.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-सामग्री / अर्पण-विधान। यह श्लोक गणना नहीं सिखाता; राहु-संबंधी कृष्ण-द्रव्य और श्वेत-सामग्री का शास्त्रीय अर्पण-नियम बताता है।

91.9
दद्यान्नक्षत्रनाथाय श्वेतगन्धादिकं तथा ।
सूर्यं सम्पूजयेद्धीमानाकृष्णेति च मन्त्रतः
dadyānnakṣatranāthāya śvetagandhādikaṃ tathā |
sūryaṃ sampūjayeddhīmānākṛṣṇeti ca mantrataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दद्यात् = दे; नक्षत्रनाथाय = नक्षत्र-स्वामी (जन्म-नक्षत्र के अधिपति) को; श्वेतगन्धादिकम् = श्वेत गन्ध आदि; तथा = उसी प्रकार; सूर्यम् = सूर्य को; सम्पूजयेत् = सम्यक् पूजे; धीमान् = बुद्धिमान् (कर्ता); आकृष्णेति = “आ कृष्णेन…” इत्यादि मन्त्र से; मन्त्रतः = मन्त्रपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नक्षत्र-नाथ को भी श्वेत गन्ध आदि अर्पित किए जाएँ। फिर धीमान् साधक सूर्य की पूजा “आ कृष्णेन रजसा…” (ऋग्वेद-संबंधित सूर्य-मन्त्र; पाठ-भेद/पूर्ण-पद पाठ-परंपरा में भिन्न हो सकता है) मन्त्र से करे। यहाँ नक्षत्र-स्वामी और सूर्य — दोनों को विधि के अलग-अलग चरणों में स्मरण किया गया है। पूजा मन्त्र-सहित और शास्त्रोक्त क्रम से कही गई है।

English rendering One should give white fragrance and the like to the lord of the (birth) nakṣatra, and the wise person should worship the Sun with the mantra beginning “Ā kṛṣṇena…” (as the tradition names it). The verse thus links nakṣatra-lord offering and Sūrya-pūjā in the same ritual line.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पूजा-विधि / मन्त्र-निर्देश। “नक्षत्रनाथ” यहाँ जन्म-नक्षत्र के अधिपति का विधिक संकेत है; कोई अंश-विभाजन या दशा-अनुपात नहीं दिया गया।

91.10
अथा चन्द्रं इमे देवा इति मन्त्रेण भक्तितः ।
दूर्वाभि पूजयेद्राहुं कया न इति मन्त्रतः
athā candraṃ ime devā iti mantreṇa bhaktitaḥ |
dūrvābhi pūjayedrāhuṃ kayā na iti mantrataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब/तदनंतर; चन्द्रम् = चन्द्रमा को; इमे देवा इति = “इमे देवा…” मन्त्र से; भक्तितः = भक्तिपूर्वक; दूर्वाभिः = दूर्वा (दूब) से; पूजयेत् = पूजे; राहुम् = राहु को; कया न इति = “कया न…” मन्त्र से; मन्त्रतः = मन्त्रपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ तदुपरांत चन्द्रमा की पूजा “इमे देवा असपत्ना…” (पाठ-भेद संभव; पूर्ण मन्त्र-श्रुति परंपरा-निर्भर) मन्त्र से भक्तिपूर्वक करनी चाहिए। राहु की पूजा दूर्वा से “कया नश्चित्र आ भुवत्…” (पाठ-भेद संभव) मन्त्र से कही गई है। शास्त्र सूर्य-चन्द्र-राहु — ग्रहण-त्रयी — को अलग-अलग मन्त्र और द्रव्य से संबोधित करता है। दूर्वा यहाँ राहु-पूजा का निर्दिष्ट वनस्पति-द्रव्य है।

English rendering Next, the Moon is to be worshipped devotedly with the mantra “Ime devā…”, and Rāhu with dūrvā grass using the mantra “Kayā na…”. The text thus assigns distinct mantras and offerings to Candra and Rāhu in the grahaṇa-śānti sequence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मन्त्र-पूजा / द्रव्य-विधान। ग्रहण-संबंधी सूर्य-चन्द्र-राहु त्रय की पूजा-रेखा का भाग; कोई बलांक या वर्ग-सूत्र नहीं।

91.11
सूर्येन्द्वोरर्कपालाशमिद्भिर्जुहुयात् क्रमात् ।
तथा च राहोः प्रीत्यर्थं दूर्वाभिर्द्विजसत्तम
sūryendvorarkapālāśamidbhirjuhuyāt kramāt |
tathā ca rāhoḥ prītyarthaṃ dūrvābhirdvijasattama

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्येन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र के लिए; अर्क = मदार/आक (Calotropis); पालाश = पलाश (Butea); इद्भिः/समिद्भिः = समिधाओं से; जुहुयात् = होम करे; क्रमात् = क्रमशः; राहोः प्रीत्यर्थम् = राहु की प्रीति के लिए; दूर्वाभिः = दूर्वा से; द्विजसत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सूर्य और चन्द्र के लिए क्रमशः अर्क और पलाश की समिधाओं से होम किया जाए। राहु की प्रीति के लिए दूर्वा से होम/अर्पण का निर्देश द्विजसत्तम को संबोधित करके दिया गया है। पूजा के बाद हवन-क्रम — सूर्य → चन्द्र → राहु — स्पष्ट है। प्रत्येक ग्रह के लिए वनस्पति-समिधा अलग निर्दिष्ट है।

English rendering For the Sun and the Moon one should offer homa in order with arka and palāśa kindling respectively; and for Rāhu’s propitiation, with dūrvā, O best of the twice-born. The verse maps each of the three grahaṇa-linked bodies to a specific sacrificial fuel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — होम-द्रव्य / क्रमिक विधान। “क्रमात्” केवल अनुक्रम बताता है (अर्क → पलाश → दूर्वा), कोई संख्यात्मक गुणांक नहीं।

91.12
ब्रह्मवृक्षसमिद्भिश्च भेशाय जुहुयात् पुनः ।
अभिषेकं ततः कुर्यात् जातस्य कलहोदकैः
brahmavṛkṣasamidbhiśca bheśāya juhuyāt punaḥ |
abhiṣekaṃ tataḥ kuryāt jātasya kalahodakaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्मवृक्षसमिद्भिः = ब्रह्मवृक्ष (प्रायः पलाश) की समिधाओं से; भेशाय = भेश के लिए (पाठ-भेद/अर्थ-संदेह संभव — औषध/शान्ति-संदर्भ); जुहुयात् पुनः = फिर होम करे; अभिषेकम् = अभिषेक; ततः = उसके बाद; कुर्यात् = करे; जातस्य = (ग्रहण में) जात का; कलहोदकैः = कलहोदक जलों से (पाठ-भेद संभव: कलश-उदक आदि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र आगे कहता है कि ब्रह्मवृक्ष की समिधाओं से “भेश” के लिए पुनः होम किया जाए; “भेशाय” का सटीक अधिष्ठान/पाठ अन्य संहिताओं में भिन्न हो सकता है — पाठ-भेद संभव। तदनंतर जात (ग्रहण-काल में जन्मे) का अभिषेक कलहोदक से करने को कहा गया है। होम के बाद अभिषेक — यह शान्ति-क्रम का स्नान/सिंचन चरण है। द्रव्य-नाम और पाठ जहाँ अस्थिर हों, वहाँ संहिता-भेद को खुला रखना चाहिए।

English rendering Again one should offer homa with fuel from the brahma-tree (commonly palāśa) for “bheṣa” (reading/sense uncertain — pāṭha-bheda possible), and then perform the abhiṣeka of the one born (in eclipse) with the waters named kalahodaka (other recensions may differ). Homa is followed by ritual aspersion in the stated order.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — होम-उत्तर अभिषेक-विधान। कोई अंश, वर्ष, या बिन्दु-गणना नहीं; केवल कर्मकाण्डीय क्रम और द्रव्य-नाम।

91.13
आचार्यं पूजयेद्भक्त्या सुशान्तो विजितेन्द्रियः ।
ब्राह्मणान् भोजयेत्वा तु यथाशक्ति विसर्जयेत्
ācāryaṃ pūjayedbhaktyā suśānto vijitendriyaḥ |
brāhmaṇān bhojayetvā tu yathāśakti visarjayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आचार्यम् = आचार्य/पुरोहित को; पूजयेत् = पूजे; भक्त्या = भक्ति से; सुशान्तः = अत्यंत शान्त; विजितेन्द्रियः = इन्द्रिय-विजयी; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; भोजयेत् = भोजन कराए; तु = और; यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; विसर्जयेत् = विदा/विसर्जन करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कर्ता स्वयं सुशान्त और जितेन्द्रिय रहकर आचार्य की भक्तिपूर्वक पूजा करे। फिर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर विधिवत् विसर्जन करे। यहाँ फल की घोषणा नहीं, आचरण और दक्षिणा/सत्कार का क्रम है। शान्ति-कर्म का समापन आचार्य-पूजन और ब्राह्मण-तर्पण/भोजन से जोड़ा गया है।

English rendering With a calm mind and conquered senses, one should worship the ācārya with devotion, feed brāhmaṇas according to one’s means, and then formally dismiss them. The verse closes the ritual with teacher-honour and charitable feeding, not with a numerical rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आचार्य-पूजा / ब्राह्मण-भोजन-विसर्जन। “यथाशक्ति” क्षमता-सापेक्ष नैतिक मापदंड है, कोई निश्चित इकाई या राशि नहीं।

91.14
एवं ग्रहणजातस्य शान्तिं कृत्वा विधानतः ।
सर्वविघ्नं विनिर्जित्वा सौभाग्यं लभते नरः
evaṃ grahaṇajātasya śāntiṃ kṛtvā vidhānataḥ |
sarvavighnaṃ vinirjitvā saubhāgyaṃ labhate naraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; ग्रहणजातस्य = ग्रहण में जन्मे का; शान्तिम् = शान्ति-कर्म; कृत्वा = करके; विधानतः = विधि के अनुसार; सर्वविघ्नम् = सब विघ्नों को; विनिर्जित्वा = जीतकर; सौभाग्यम् = सौभाग्य; लभते = प्राप्त करता है; नरः = मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र का फल-कथन है: ग्रहण-जात की शान्ति विधानपूर्वक करने पर, सब विघ्नों को पार करके नर सौभाग्य प्राप्त करता है — यह ग्रंथ का अपना कथन है, न कि निश्चित भाग्य-घोषणा। पूरा अध्याय-क्रम (सामग्री, मन्त्र, होम, अभिषेक, आचार्य-पूजा) इसी “एवं…विधानतः” में समाहित है। पाठ फल को कर्म-निष्पत्ति से जोड़ता है; भय या दबाव का भाषा-प्रयोग यहाँ अपना नहीं करना चाहिए।

English rendering The text states that one who has thus duly performed the pacification for a person born during an eclipse, having overcome all obstacles, obtains good fortune. This is the śāstra’s own phala-claim for the completed vidhi, not a deterministic forecast endorsed outside the text.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / विधि-समापन। “ग्रहणजात” काल-संकेत मात्र है; यहाँ कोई दशा-वर्ष, वर्ग-भाग, या अष्टकवर्ग-बिन्दु नहीं गिना गया — केवल शास्त्रोक्त शान्ति का वर्णित परिणाम।

अध्यायः 92

गण्डान्तजातशान्त्यध्यायः

11 श्लोक
92.1
तिथिनक्षत्रलग्नानां गण्डान्तं त्रिविधं स्मृतम् ।
जन्मयात्राविवाहादौ भवेत्तन्निधनप्रदम्
tithinakṣatralagnānāṃ gaṇḍāntaṃ trividhaṃ smṛtam |
janmayātrāvivāhādau bhavettannidhanapradam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिथि = चान्द्र तिथि (१–३०); नक्षत्र = २७ नक्षत्र-खण्ड; लग्न = उदित राशि/लग्न-बिन्दु; गण्डान्त = संधि-सीमा-क्षेत्र (दो खण्डों का सन्धि-काल); त्रिविध = तीन प्रकार; जन्म-यात्रा-विवाह-आदि = जन्म, यात्रा, विवाह आदि मुहूर्त; निधनप्रदम् = शास्त्रोक्त “निधन”/विघ्न-फल-संकेत।

हिन्दी भावार्थ मैत्रेय को संबोधित परंपरा में शास्त्र कहता है कि गण्डान्त तीन प्रकार का स्मृत है—तिथि-गण्डान्त, नक्षत्र-गण्डान्त और लग्न-गण्डान्त। जन्म, यात्रा, विवाह आदि कार्यों के सन्दर्भ में यह संधि-काल शास्त्र के अनुसार निधन/विघ्न-प्रद कहा गया है। यहाँ “निधन” का अर्थ गणना-क्षेत्र के फल-कथन के रूप में समझना चाहिए, न कि किसी निश्चित भविष्यवाणी के रूप में। आगे के श्लोक इन्हीं तीन संधियों की नाड़ी/घटी-सीमाएँ खोलते हैं।

English rendering The text states that gaṇḍānta is threefold—of tithi, of nakṣatra, and of lagna. In contexts such as birth, travel, and marriage, it is classically said to be nidhana-prada (death/end-indicating in the śāstra’s own phala-voice). The following verses fix the temporal bounds of each type.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण-फल-कथन। यह श्लोक केवल त्रिविध गण्डान्त का नाम-विभाग देता है; नाड़ी/घटी की संख्याएँ ९२.२–९२.५ में आती हैं। गणना-मॉडल: किसी घटना-क्षण को तीन अक्षों (तिथि-संधि, नक्षत्र-संधि, लग्न-संधि) पर “गण्डान्त-क्षेत्र में / बाहर” जाँचना।

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92.2
पूर्णानन्दाख्ययोस्तिथ्योः सन्धौ नाडीचतुष्टयम् ।
अध ऊर्ध्वं च मैत्रेय तिथिगण्डान्तमुच्यते
pūrṇānandākhyayostithyoḥ sandhau nāḍīcatuṣṭayam |
adha ūrdhvaṃ ca maitreya tithigaṇḍāntamucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्णा = पूर्णिमा (१५वीं तिथि; पाठ-भेद/परंपरा में “पूर्णा” नाम); आनन्दा = अमावस्या-संधि-पक्ष की संबद्ध तिथि-नाम (पाठ-भेद संभव; प्रचलित अर्थ: अमावस्या-संधि); सन्धि = दो तिथियों का संयोग-क्षण; नाडी-चतुष्टयम् = चार नाड़ी (= चार घटी); अधः-ऊर्ध्वम् = नीचे और ऊपर (संधि से पूर्व और पश्चात्); तिथिगण्डान्त = तिथि-संधि का गण्डान्त।

हिन्दी भावार्थ हे मैत्रेय, शास्त्र कहता है कि पूर्णा और आनन्दा नामक तिथियों की संधि पर—अर्थात् संधि-क्षण से अधः और ऊर्ध्व चार-चार नाड़ी—तिथि-गण्डान्त कहा जाता है। यह काल-खण्ड तिथि-परिवर्तन की संधि के दोनों ओर सममित रूप से मापा जाता है। फल-कथन आगे के प्रसंगों में; यहाँ मूल नियम काल-माप का है।

English rendering At the junction of the tithis named Pūrṇā and Ānandā, Maitreya, four nāḍīs below and four above constitute tithi-gaṇḍānta. (Reading of the pair-names may vary by recension—पाठ-भेद संभव; the arithmetic bound is four nāḍīs on each side of the sandhi.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१ नाड़ी (यहाँ काल-माप) = १ घटी = २४ मिनट।
तिथि-गण्डान्त-अर्ध-विस्तार = ४ नाड़ी = ४ × २४ = ९६ मिनट = १ʰ ३६ᵐ।
यदि तिथि-संधि-क्षण = Tₛ (स्थानीय मध्यमा/स्पष्ट तिथि-संधि, जिस एफ़ेमेरिस से स्पष्ट तिथि ली जाए), तो
गण्डान्त-अन्तराल = [Tₛ − ९६ᵐ , Tₛ + ९६ᵐ ]।
कुल चौड़ाई = ८ नाड़ी = १९२ मिनट = ३ʰ १२ᵐ।
(पूर्णा–आनन्दा-युग्म की शाब्दिक पहचान में पाठ-भेद संभव; संख्या ४×२ अपरिवर्तित रहती है।)

उदाहरण (worked example) मान लें स्पष्ट पूर्णिमा-समाप्ति (तिथि-संधि) स्थानीय समय १४:२० है। तब तिथि-गण्डान्त = १२:४४ से १५:५६ तक (दोनों ओर १ʰ ३६ᵐ)। कोई जन्म-क्षण १५:४० इस अन्तराल में पड़ता है → “तिथि-गण्डान्त में” (केवल काल-वर्गीकरण; फल = शास्त्र का कथन, न कि नियति)।

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92.3
रेवतीदास्रयोः साप्रमघयोः शाक्रमूलयोः ।
सन्धौ नक्षत्रगण्डान्तमेवं नाडीचतुष्टयम्
revatīdāsrayoḥ sāpramaghayoḥ śākramūlayoḥ |
sandhau nakṣatragaṇḍāntamevaṃ nāḍīcatuṣṭayam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेवती = २७वाँ नक्षत्र; दास्र = अश्विनी (अश्विनी-देवता “दास्र”); साप्र = आश्लेषा (सarp-संबंधि नाम; आश्लेषा); मघा = मघा; शाक्र = ज्येष्ठा (इन्द्र/शक्र-देवता); मूल = मूल; सन्धि = दो नक्षत्रों का योग-बिन्दु; नक्षत्रगण्डान्त = नक्षत्र-संधि-गण्डान्त; नाडीचतुष्टयम् = चार नाड़ी दोनों ओर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र तीन नक्षत्र-संधियों को नक्षत्र-गण्डान्त कहता है—रेवती–अश्विनी, आश्लेषा–मघा, और ज्येष्ठा–मूल। इन संधियों पर भी तिथि-गण्डान्त के समान चार नाड़ी अधः और ऊर्ध्व गण्डान्त-काल है। ये तीन संधियाँ जल-राशि/अग्नि-राशि की सीमाओं से भी जुड़ती हैं (मीन–मेष, कर्क–सिंह, वृश्चिक–धनु की नक्षत्र-सीमाएँ)।

English rendering Nakṣatra-gaṇḍānta falls at the junctions of Revatī–Aśvinī (Dāsra), Āśleṣā–Maghā, and Jyeṣṭhā–Mūla (Śākra–Mūla), again measured as four nāḍīs on either side of each sandhi.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
नक्षत्र-खण्ड (समान-भाग मॉडल, २७ × १३°२०′ = ३६०°):
• रेवती-अन्त / अश्विनी-आरम्भ = ०° मेष (सिद्धान्तिक ०° sidereal; अयनांश-निर्भर)।
• आश्लेषा-अन्त / मघा-आरम्भ = ०° सिंह = १२०° sidereal।
• ज्येष्ठा-अन्त / मूल-आरम्भ = ०° धनु = २४०° sidereal।
४ नाड़ी = ९६ मिनट काल-माप (चन्द्र की गति से चाप में बदलने पर):
यदि चन्द्र की स्पष्ट गति ≈ १३°२०′/दिन ≈ ०°३३′.३/घंटा, तो ९६ᵐ ≈ ०°५३′.३ चाप (लगभग; सटीक चाप = ω_☽ × Δt, जहाँ ω_☽ घटना-दिन की स्पष्ट चान्द्र गति)।
काल-अन्तराल: [Tₙ − ९६ᵐ , Tₙ + ९६ᵐ ], Tₙ = नक्षत्र-संधि-क्षण।

उदाहरण (worked example) अयनांश: लाहिरी (उदाहरण-मात्र)। ज्येष्ठा–मूल संधि = चन्द्र २४०° sidereal पर। मान लें वह क्षण ०६:०० IST। नक्षत्र-गण्डान्त ≈ ०४:२४–०७:३६ IST। चन्द्र ०६:५० पर २४०°+अल्प → अन्तराल में → “नक्षत्र-गण्डान्त” (वर्गीकरण मात्र)।

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92.4
मीनाजयोः कर्किहर्योर्लग्नयोरलिचापयोः ।
सन्धौ च लग्नगण्डान्तमधऊर्ध्व घटीमितम्
mīnājayoḥ karkiharyorlagnayoralicāpayoḥ |
sandhau ca lagnagaṇḍāntamadhaūrdhva ghaṭīmitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मीन = 12वीं राशि (जल); अज = मेष ("अज" = मेढ़ा, अग्नि); कर्कि = कर्क (जल); हरि = सिंह ("हरि" = सिंह, अग्नि); अलि = वृश्चिक ("अलि" = बिच्छू, जल); चाप = धनु ("चाप" = धनुष, अग्नि); लग्नयोः सन्धौ = लग्न-युग्मों की सन्धि पर; अधः-ऊर्ध्वं घटीमितम् = नीचे-ऊपर एक-एक घटी परिमित।

हिन्दी भावार्थ मीन–मेष, कर्क–सिंह, और वृश्चिक–धनु — इन लग्न-सन्धियों पर, नीचे और ऊपर एक-एक घटी का जो काल है, वह लग्न-गण्डान्त कहलाता है। ये वही तीन जल→अग्नि राशि-संधियाँ हैं जिन पर नक्षत्र-गण्डान्त भी पड़ता है।

English rendering At the ascendant-junctions Pisces–Aries, Cancer–Leo and Scorpio–Sagittarius, the span of one ghaṭī below and above is called lagna-gaṇḍānta.

गणित / तकनीक: राशि = 30° खण्ड; लग्न-गण्डान्त-सन्धियाँ = {0° (मीन→मेष), 120° (कर्क→सिंह), 240° (वृश्चिक→धनु)} — नक्षत्र-गण्डान्त के समान तीन बिन्दु, क्योंकि रेवती/आश्लेषा/ज्येष्ठा के अन्त ठीक इन राशि-कूस्पों पर हैं। काल-मात्रा यहाँ घटी में: 1 घटी अधः + 1 घटी ऊर्ध्व; 1 घटी = 24 min ⇒ खिड़की ≈ 48 min (लग्नोदय-काल आधारित — तिथि/नक्षत्र से भिन्न इकाई)।

उदाहरण (worked example) यदि किसी क्षण उदित-लग्न 29°40′ मीन है (सन्धि 30° = 0° मेष के निकट), तो उस उदय-क्षण के 1 घटी (24 min) पूर्व से 1 घटी पश्चात् तक लग्न-गण्डान्त है — इस खिड़की में जन्मे शिशु के लिए श्लोक 8 स्वर्ण-दान कहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्न/राशि-कूस्प {0°, 120°, 240°} ठीक वहाँ हैं जहाँ D1 राशि-सूचकांक (⌊देशान्तर ÷ 30°⌋) एक अंक बढ़ता है। हमारा षोडश-वर्ग इंजन (BPHS अ.6, D1 … D60) हर कुण्डली को देशान्तर पर विशुद्ध मॉड्युलर-अंकगणित की भाँति विभाजित करता है; गण्डान्त उसी विभाजन की सीमा-रेखा है, जहाँ सूक्ष्म देशान्तर-त्रुटि राशि ही बदल देती है।

92.5
एषु चाभुक्तमूलाख्यं महाविघ्नपदं स्मृतम् ।
इन्द्रराक्षसयोः सन्धौ पञ्चाष्टघटिकाः क्रमात्
eṣu cābhuktamūlākhyaṃ mahāvighnapadaṃ smṛtam |
indrarākṣasayoḥ sandhau pañcāṣṭaghaṭikāḥ kramāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एषु = इन (गण्डान्तों) में; अभुक्तमूल = “अभुक्त मूल” (मूल का आरम्भिक/अभुक्त खण्ड); महाविघ्नपद = शास्त्रोक्त महा-विघ्न-स्थान; इन्द्र = ज्येष्ठा (इन्द्र-देवता); राक्षस = मूल (राक्षस/निऋति-वर्ग); सन्धि = ज्येष्ठा–मूल संधि; पञ्च-अष्ट-घटिकाः = पाँच और आठ घटिका; क्रमात् = क्रमशः (पूर्व-पश्चात्)।

हिन्दी भावार्थ इन गण्डान्त-भेदों में शास्त्र “अभुक्त-मूल” को महाविघ्नपद कहता है। इन्द्र (ज्येष्ठा) और राक्षस (मूल) की संधि पर क्रमशः पाँच और आठ घटिकाएँ—अर्थात् ज्येष्ठा के अन्त की ५ घटी तथा मूल के आदि की ८ घटी—यह विशेष खण्ड है। यह सामान्य नक्षत्र-गण्डान्त (±४ नाड़ी) से भिन्न, संधि-विशेष का विस्तृत काल-मान है। फल-शब्द “महाविघ्न” शास्त्र का अपना कथन है; गणना केवल काल-सीमा की है।

English rendering Among these, the text names abhukta-mūla a mahā-vighna-pada. At the Indra–Rākṣasa (Jyeṣṭhā–Mūla) junction the spans are, in order, five and eight ghaṭikās—five at the end of Jyeṣṭhā and eight at the start of Mūla.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique)
१ घटी = २४ मिनट।
ज्येष्ठा-अन्त भाग = ५ घटी = ५ × २४ = १२० मिनट = २ʰ।
मूल-आदि भाग = ८ घटी = ८ × २४ = १९२ मिनट = ३ʰ १२ᵐ।
यदि Tⱼₘ = ज्येष्ठा–मूल संधि-क्षण (चन्द्र २४०° sidereal), तो
अभुक्त-मूल/इन्द्र-राक्षस-विशेषान्तराल = [Tⱼₘ − २ʰ , Tⱼₘ + ३ʰ १२ᵐ ]।
कुल = १३ घटी = ५ʰ १२ᵐ।
सामान्य नक्षत्र-गण्डान्त (९२.३) = ±४ नाड़ी = ±९६ᵐ; यह श्लोक उसी संधि पर असममित ५+८ घटी देता है—दो परतें: संकीर्ण (±४ नाड़ी) और विस्तृत अभुक्त-मूल (५|८)।
चाप (लगभग, ω_☽ ≈ १३°.३/दिन): ५ घटी ≈ २°४६′; ८ घटी ≈ ४°२६′ चान्द्र-चाप (स्पष्ट गति से पुनःगणना आवश्यक)।

उदाहरण (worked example) Tⱼₘ = २१:०० IST। अभुक्त-मूल-अन्तराल = १९:०० से ००:१२(+१) IST। जन्म २२:३० → मूल के आदि ८ घटी में → शास्त्र की शब्दावली में अभुक्त-मूल-खण्ड (वर्गीकरण; फल = “शास्त्र कहता है महाविघ्नपद”, न कि नियत विपत्ति)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यहाँ कोई अष्टकवर्ग/वर्ग/दशा-इंजन का सीधा पिन नहीं है; फिर भी वही अनुशासन लागू होता है जो Ch.66 अष्टकवर्ग में अपनाया गया—सीमाएँ exact नाड़ी/घटी संख्याओं से बाँधो, ±tolerance से नहीं। गण्डान्त “हाँ/नहीं” = संधि-क्षण ± श्लोक-स्थिर मिनट; अयनांश और स्पष्ट चन्द्र/लग्न-गति घोषित किए बिना चाप-तुलना न करें।

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92.6
अथ गण्डान्तजातस्य शिशोः शान्तिविधिं ब्रुवे ।
गण्डान्तकालजातस्य सूतकान्त्यदिने पिता
atha gaṇḍāntajātasya śiśoḥ śāntividhiṃ bruve |
gaṇḍāntakālajātasya sūtakāntyadine pitā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; गण्डान्त-जातस्य = गण्डान्त में जन्मे; शिशोः = शिशु का; शान्ति-विधिम् = शान्ति-अनुष्ठान-विधि; ब्रुवे = (मैं) कहता हूँ; गण्डान्त-काल-जातस्य = गण्डान्त-काल-जात का; सूतक-अन्ति-दिने = सूतक की समाप्ति के दिन; पिता = पिता।

हिन्दी भावार्थ अब शास्त्र गण्डान्त-काल में जन्मे शिशु की शान्ति-विधि कहने लगता है। गण्डान्त-समय जात के लिए सूतक की समाप्ति वाले दिन पिता (विधि का कर्ता) आगे कहा गया क्रम आरम्भ करता है। यह विधि-वर्णन है, चिकित्सा या अनिवार्यता का दावा नहीं—पाठ परंपरागत शान्ति-कल्प का निर्देश देता है।

English rendering The text now turns to the śānti procedure for a child born in gaṇḍānta: on the day the sūtaka ends, the father (is to undertake what the next verse continues).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/संस्कार-वर्णन। पूर्वश्लोकों से केवल इतना जुड़ता है कि “गण्डान्त-जात” का निर्णय ९२.२–९२.५ की काल-सीमाओं से पहले निश्चित हो; शान्ति-दिन = सूतक-अन्त-दिवस (पारंपरिक प्रसूति-सूतक गणना से, जो इस श्लोक में संख्याबद्ध नहीं)।

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92.7
शान्तिंशुभेऽह्नि वा कुर्यात् पश्येत् तावन्न तं शिशुम् ।
वृषभं तिथिगण्डान्ते नक्षत्रे धनुमेव च
śāntiṃśubhe'hni vā kuryāt paśyet tāvanna taṃ śiśum |
vṛṣabhaṃ tithigaṇḍānte nakṣatre dhanumeva ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शान्तिम् = शान्ति-कर्म; शुभे अह्नि = शुभ दिन में; वा = अथवा; कुर्यात् = करे; पश्येत् तावत् न = तब तक न देखे; तं शिशुम् = उस शिशु को; वृषभम् = बैल (दान/उपचार-द्रव्य); तिथि-गण्डान्ते = तिथि-गण्डान्त में; नक्षत्रे = नक्षत्र-गण्डान्त में; धनुम् एव च = धनुष ही (तथा)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शान्ति शुभ दिन में भी की जा सकती है; और तब तक पिता उस शिशु को न देखे (यह पाठ का विधि-नियम है)। तिथि-गण्डान्त में वृषभ (बैल) और नक्षत्र-गण्डान्त में धनु—ये द्रव्य/उपचार आगे की पंक्तियों में पूर्ण होते हैं; इस श्लोक-खंड में यही संकेत सुरक्षित है। पाठ-भेद/अध्याय-शेष संभव; यहाँ दिए गए पदों से आगे नहीं बढ़ाया गया।

English rendering He should perform the śānti on an auspicious day, or until then not look upon that child. For tithi-gaṇḍānta a bull (vṛṣabha), and for nakṣatra-gaṇḍānta a bow (dhanus), are indicated—this half of the prescription as the verse states; fuller ritual detail may continue beyond this line in the recension.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधि/दान-द्रव्य-कथन। गणना केवल पूर्व-निर्णय से जुड़ती है: यदि घटना तिथि-गण्डान्त (±४ नाड़ी, ९२.२) में है तो शास्त्र वृषभ-संकेत देता है; यदि नक्षत्र-गण्डान्त (९२.३) में है तो धनु-संकेत। लग्न-गण्डान्त (९२.४) और अभुक्त-मूल (९२.५) का द्रव्य इस श्लोक-खंड में नहीं आता—अध्याय-शेष/पाठ-भेद संभव।

92.8
काञ्चनं लग्नगण्डान्ते दद्यात्तद्दोषप्रशान्तये ।
आद्यभागे प्रजातस्य पितुश्चाप्यभिषेचनम्
kāñcanaṃ lagnagaṇḍānte dadyāttaddoṣapraśāntaye |
ādyabhāge prajātasya pituścāpyabhiṣecanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) काञ्चनम् = स्वर्ण; लग्नगण्डान्ते = लग्न-गण्डान्त में; दद्यात् = दे; तद्दोषप्रशान्तये = उस दोष की शान्ति हेतु; आद्यभागे प्रजातस्य = (गण्डान्त के) प्रथम भाग में जन्मे के लिए; पितुः च अपि अभिषेचनम् = पिता का भी अभिषेक।

हिन्दी भावार्थ लग्न-गण्डान्त में उस दोष की शान्ति के लिए स्वर्ण का दान करे। और यदि शिशु गण्डान्त के प्रथम भाग (आद्य-भाग) में जन्मा हो, तो पिता का भी अभिषेक (शुद्धि-स्नान/जल-सेचन) कराया जाए।

English rendering For lagna-gaṇḍānta let him give gold to quiet that flaw; and if the child was born in the first portion of the gaṇḍānta, the father too is to receive the aspersion (abhiṣeka).

गणित / तकनीक: गणितीय सूत्र नहीं — दान/विधि-कथन, किन्तु एक विभाजन निहित है: गण्डान्त-खिड़की को दो भागों में बाँटा गया है — आद्य (प्रथम) व द्वितीय (श्लोक 9)। प्रथम भाग → पिता का अभिषेक; द्वितीय → माता का। अर्थात् सन्धि-पूर्व (अधः) बनाम सन्धि-पश्चात् (ऊर्ध्व) का द्विदल विभाजन।

92.9
द्वितीये तु शिशोर्मातुरभिषेकं च कारयेत् ।
सुवर्णेन तदर्धेण यथावित्तं द्विजोत्तम ।
तिथिभेषादिरूपं च कृत्वा वस्त्रसमन्वितम्
dvitīye tu śiśormāturabhiṣekaṃ ca kārayet |
suvarṇena tadardheṇa yathāvittaṃ dvijottama |
tithibheṣādirūpaṃ ca kṛtvā vastrasamanvitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वितीये तु = किन्तु द्वितीय भाग में (जन्म पर); शिशोः मातुः = शिशु की माता का; अभिषेकम् कारयेत् = अभिषेक कराए; सुवर्णेन तदर्धेन = स्वर्ण से, उसका आधा (½); यथावित्तम् = सामर्थ्यानुसार; द्विजोत्तम = हे द्विजश्रेष्ठ; तिथिभेष-आदि-रूपम् = तिथि, भ (=नक्षत्र) आदि की प्रतिमा; कृत्वा वस्त्रसमन्वितम् = वस्त्र-सहित बनाकर।

हिन्दी भावार्थ किन्तु द्वितीय भाग में जन्म हो तो शिशु की माता का अभिषेक कराए, और स्वर्ण से — उससे आधा (½) परिमाण में, सामर्थ्यानुसार। हे द्विजश्रेष्ठ! तिथि-नक्षत्र आदि के देवता की प्रतिमा वस्त्र-सहित बनाकर (आगे श्लोक 10 में पूजा)।

English rendering But if born in the second portion, let the child's mother be given the aspersion, with gold of half that measure, according to means, O best of the twice-born; and having made an image of the tithi, nakṣatra and the rest, clothed with cloth …

गणित / तकनीक: संख्यात्मक अंश — तदर्धेन = ½। द्वितीय-भाग-जन्म पर माता का अभिषेक तथा स्वर्ण-मात्रा = (लग्न-गण्डान्त/आद्य-भाग की स्वर्ण-मात्रा) × ½, यथावित्त-सापेक्ष। "भेष/भ" = नक्षत्र — अर्थात् तिथि व नक्षत्र के अधिष्ठातृ-देवता की सवस्त्र प्रतिमा। (द्विदल विभाजन: आद्य→पिता, द्वितीय→माता; दान ½।)

92.10
उपचारैर्यथाशक्ति कलहोपरि पूजयेत् ।
पूजान्ते समिदन्नज्यैर्होम। कुर्याद्यथाविधि
upacārairyathāśakti kalahopari pūjayet |
pūjānte samidannajyairhoma| kuryādyathāvidhi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपचारैः = उपचारों से (पूजा के अंग); यथा-शक्ति = शक्ति के अनुसार; कलह-उपरि = कलह पर / कलह-संबंधी (पाठ-भेद संभव); पूजयेत् = पूजे; पूजा-अन्ते = पूजा के अन्त में; समिद्-अन्न-आज्यैः = समिधा, अन्न और आज्य (घृत) से; होमम् = होम; कुर्यात् = करे; यथा-विधि = विधि के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ यथाशक्ति उपचारों से पूजा करने को कहा गया है; “कलहोपरि” का पाठ सन्दर्भ में दोष/कलह-संबंधी पूजा-स्थान या क्रम सूचित करता है—पाठ-भेद संभव। पूजा के पश्चात् समिधा, अन्न और आज्य से विधिवत् होम करना विहित है। यह शान्ति-अनुष्ठान का यज्ञ-भाग है।

English rendering Worship is to be offered with the upacāras as one’s capacity allows, in the context indicated by “kalahopari” (reading may vary). At the close of the pūjā, homa is performed with fuel-sticks, food-grain, and ghee, according to rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-विधान (उपचार-पूजा + होम-द्रव्य)। समिद्-अन्न-आज्य होम की सामग्री-सूची है, संख्या-सूत्र नहीं।

92.11
ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चादेवं दोषात्प्रमुच्यते ।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं सम्प्राप्नोति दिने दिने
brāhmaṇān bhojayet paścādevaṃ doṣātpramucyate |
āyurārogyamaiśvaryaṃ samprāpnoti dine dine

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; भोजयेत् = भोजन कराए; पश्चात् = तदनन्तर; एवम् = इस प्रकार; दोषात् = दोष से; प्रमुच्यते = मुक्त होता है (शास्त्र-कथन); आयुः = आयु; आरोग्यम् = आरोग्य; ऐश्वर्यम् = ऐश्वर्य; सम्प्राप्नोति = प्राप्त करता है (शास्त्र-कथन); दिने दिने = दिन-प्रतिदिन।

हिन्दी भावार्थ होम आदि के बाद ब्राह्मण-भोजन कराने का क्रम है। शास्त्र कहता है कि इस प्रकार करने से दोष से मुक्ति मिलती है, और आयु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य दिन-प्रतिदिन प्राप्त होते हैं। यह फल-कथन शास्त्र का अपना दावा है—हम इसे नियति या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं कहते।

English rendering Afterwards brāhmaṇas are to be fed. The text states that thus one is released from the doṣa and day by day obtains longevity, health, and prosperity—reported as the śāstra’s claim, not as endorsed fate.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (दोष-मुक्ति + आयु-आरोग्य-ऐश्वर्य)। यह अनुष्ठान-समाप्ति का फल-वाक्य है; कोई गणना-सूत्र नहीं।

अध्यायः 93

अभुक्तमूलशान्त्यध्यायः

20 श्लोक

सूचना · Note. यह अध्याय एक ऐतिहासिक ग्रन्थ का पाठ है। इसमें (93.2) शिशु के त्याग या पिता द्वारा उसका मुख न देखने की बात आती है — उसका पालन न करें: शिशु का त्याग या उससे दूरी शिशु के लिए हानिकारक है; शिशु के स्वास्थ्य की कोई चिन्ता हो तो बाल-चिकित्सक से मिलें। · This chapter is the text of a historical treatise. Its verse 93.2 speaks of giving up a child or of the father not seeing the child's face; this must not be followed — abandoning or avoiding an infant harms the child. For any concern about a baby's health, see a paediatrician.

93.1
ज्येष्ठामूलमयोर्यस्मादधिपाविन्द्रराक्षसौ ।
महावैरात् तयोः सन्धिर्महादोषप्रदः स्मृतः
jyeṣṭhāmūlamayoryasmādadhipāvindrarākṣasau |
mahāvairāt tayoḥ sandhirmahādoṣapradaḥ smṛtaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्येष्ठा-मूलम् = 18वाँ (ज्येष्ठा) व 19वाँ (मूल) नक्षत्र; अधिपौ = दोनों के अधिष्ठातृ-देव; इन्द्र-राक्षसौ = इन्द्र (ज्येष्ठा का देवता) तथा राक्षस/निरृति (मूल का देवता); यस्मात् = जिस कारण; महावैरात् = महान् (देव-दानव) वैर के कारण; तयोः सन्धिः = उन दोनों का सन्धि-काल (नक्षत्र-गण्डान्त); महादोषप्रदः = महादोष देने वाला; स्मृतः = परम्परा में माना गया है।

हिन्दी भावार्थ ज्येष्ठा और मूल — इन दो नक्षत्रों के स्वामी क्रमशः इन्द्र और राक्षस (निरृति) हैं। इन दोनों में स्वाभाविक महावैर है, इसीलिए जहाँ ज्येष्ठा समाप्त होकर मूल आरम्भ होता है, वह सन्धि-बिन्दु शास्त्र में महादोषप्रद (अभुक्त-मूल/गण्डान्त) कहा गया है। यही इस अध्याय की शान्ति का विषय है।

English rendering The lords of Jyeṣṭhā and Mūla are Indra and the Rākṣasa (Nirṛti); because of the great enmity between them, the junction of these two asterisms is traditionally held to be a giver of grave affliction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) नक्षत्र-चाप = 360° ÷ 27 = 13°20′ = 800′. ज्येष्ठा (क्रम 18) का विस्तार 226°40′–240°00′; मूल (क्रम 19) का 240°00′–253°20′। सन्धि-बिन्दु = 18 × 13°20′ = 240°00′ = 8 × 30°, अर्थात् यही धनु राशि (9वीं) का आरम्भ भी है — इस कारण यह एक साथ नक्षत्र-सन्धि और राशि-सन्धि, अर्थात् द्वि-गण्डान्त है। "अधिप" यहाँ नक्षत्र-देवता है (इन्द्र/निरृति), विंशोत्तरी दशा-स्वामी नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि चन्द्र-स्पष्ट = 239°55′, तो वह 240°00′ से 5′ पूर्व = ज्येष्ठा के अन्तिम पाद में; यदि 240°05′, तो मूल के प्रथम पाद में। दोनों ओर सीमा-रेखा 240°00′ पर ही सन्धि-दोष की परिभाषा केन्द्रित है (नक्षत्र-पाद = 3°20′ = 200′)।

हमारा डिकोड (Our Decode) गण्डान्त शुद्ध मापांक-अंकगणित है — देशान्तर-रेखा पर 240°00′ की ठीक सीमा — वही सतत देशान्तर-क्षेत्र जिसे हमारे वर्ग-इंजन (D1…D60) समान चापों में विभाजित करते हैं। यहाँ सावधानी: इस श्लोक का "अधिपति" देवता (निरृति) है, जबकि विंशोत्तरी 120-वर्ष चक्र मूल को केतु से आरम्भ करता है — देवता-कीलन और दशा-कीलन दो भिन्न प्रणालियाँ हैं, इन्हें मिलाना नहीं।

93.2
अभुक्तमूलजं पुत्रं पुत्रीं वाऽपि परित्यजेत् ।
अथवाऽब्दाष्टकं तातस्तन्मुखं न विलोकयेत्
abhuktamūlajaṃ putraṃ putrīṃ vā'pi parityajet |
athavā'bdāṣṭakaṃ tātastanmukhaṃ na vilokayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभुक्त-मूल-जम् = अभुक्त-मूल में जन्मा; पुत्रम् = पुत्र; पुत्रीम् वा अपि = अथवा पुत्री भी; परित्यजेत् = त्याग करे (शास्त्र-कथन); अथवा = या फिर; अब्द-अष्टकम् = आठ वर्ष तक; तातः = पिता; तत्-मुखम् = उसके मुख को; न विलोकयेत् = न देखे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि अभुक्त-मूल में जन्मे पुत्र अथवा पुत्री का परित्याग करना चाहिए; अथवा पिता आठ वर्ष तक उसके मुख का दर्शन न करे। यह दो विकल्पों वाला शास्त्रीय दोष-परिहार-कथन है — “अभुक्त-मूल” यहाँ मूल-नक्षत्र के उस भाग/अवस्था-सन्दर्भ को इंगित करता है जिसकी व्याख्या परम्परा-विशेष में भिन्न हो सकती है (पाठ-भेद/परम्परा-भेद संभव)। भय या दबाव के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए; यह पाठ का अपना विधान-वाक्य है। यह ऐतिहासिक ग्रन्थ-वचन है, आचरण-निर्देश नहीं। किसी शिशु का त्याग या उससे दूरी शिशु के लिए हानिकारक है; शिशु के स्वास्थ्य की कोई चिन्ता हो तो बाल-चिकित्सक से मिलें। इसे पालन न करें।

English rendering The text states that a son or daughter born in abhukta-mūla should be given up; or else the father should not look upon that child’s face for a period of eight years. The statement presents an either–or traditional prescription, not a mathematical rule. This is a historical statement of the text, not an instruction, and it must not be followed: abandoning or avoiding an infant harms the child. For any concern about a baby's health, see a paediatrician.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल/आचार-कथन। एकमात्र स्पष्ट काल-मात्रा: अब्दाष्टकम् = 8 वर्ष (अब्द = वर्ष; अष्टक = आठ का समूह)। “अभुक्त-मूल” का सटीक चाप-परिभाषा इस श्लोक में नहीं दी गई।

93.3
तद्दोषपरिहारार्थमथ शान्तिविधिं ब्रुवे ।
तत्राऽदौ दोषबहुल्यान् मूलशान्तिर्निगद्यते
taddoṣaparihārārthamatha śāntividhiṃ bruve |
tatrā'dau doṣabahulyān mūlaśāntirnigadyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-दोष-परिहार-अर्थम् = उस दोष के निवारण हेतु; अथ = अब; शान्ति-विधिम् = शान्ति की विधि को; ब्रुवे = कहता हूँ; तत्र आदौ = वहाँ सर्वप्रथम; दोष-बहुल्यात् = दोष की अधिकता के कारण; मूल-शान्तिः = मूल-नक्षत्र की शान्ति; निगद्यते = कही जाती है।

हिन्दी भावार्थ उस दोष को दूर करने के लिए अब मैं (पराशर) शान्ति-विधि कहता हूँ; और चूँकि मूल में दोष की प्रबलता सर्वाधिक है, इसलिए सबसे पहले मूल-शान्ति का वर्णन किया जाता है। यह श्लोक कठोर विधान से करुण उपचार की ओर संक्रमण है।

English rendering To remove that affliction I now declare the rite of pacification; and since the fault is greatest there, the Mūla-śānti is set forth first.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संक्रमण/प्रतिज्ञा-वचन। यहाँ ग्रन्थकार का सम्पादकीय क्रम-निर्णय स्वयं दिखता है: दोष की मात्रा के अनुपात में उपचार का क्रम तय होता है — अधिकतम दोष = प्रथम शान्ति।

93.4
जन्मतो द्वादशाहे वा तदृक्षे वा शुभे दिने ।
जातस्य वाऽष्टमे वर्षे शान्तिं कुर्याद् विधानतः
janmato dvādaśāhe vā tadṛkṣe vā śubhe dine |
jātasya vā'ṣṭame varṣe śāntiṃ kuryād vidhānataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जन्मतः = जन्म से; द्वादश-अहे = बारहवें दिन में / बारह दिनों में; वा = अथवा; तत्-ऋक्षे = उसी नक्षत्र में; वा शुभे दिने = अथवा शुभ दिन में; जातस्य = जन्मे हुए के; वा अष्टमे वर्षे = अथवा आठवें वर्ष में; शान्तिम् = शान्ति; कुर्यात् = करे; विधानतः = विधि के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि शान्ति जन्म से बारह दिन के भीतर, अथवा उसी नक्षत्र-दिन पर, अथवा किसी शुभ दिन में, अथवा जातक के आठवें वर्ष में — विधिपूर्वक — की जाए। चार काल-विकल्प दिए गए हैं; चयन का विस्तृत निर्णायक-सूत्र यहाँ नहीं है, केवल सम्भव काल-बिन्दु गिनाए गए हैं।

English rendering The text states that the śānti should be performed according to rule either within twelve days from birth, or on the day of that same nakṣatra, or on an auspicious day, or in the eighth year of the child.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) काल-मात्राएँ ही अंक हैं — गणना-सूत्र नहीं:
- द्वादशाह = जन्म से 12 दिन (जन्म-दिन + 11, या “12 दिनों के भीतर” — पारम्परिक गणना में दिन-गणना की शुरुआत पर पाठ-भेद संभव)
- अष्टमे वर्षे = 8वाँ वर्ष (वर्ष-पूर्णता की परिभाषा: जन्मदिन-आधारित या वर्ष-समाप्ति — यहाँ अस्पष्ट)
- तदृक्षे = जन्म-नक्षत्र का पुनरागमन-दिन (चन्द्र-नक्षत्र-चक्र ≈ 27 नक्षत्र; यहाँ केवल “उसी ऋक्ष” कहा गया)
- शुभे दिने = शुभ-दिन (गुण-निर्धारण इस श्लोक में नहीं)

उदाहरण (worked example) मान लीजिए जन्म: 2020-03-15। तो द्वादशाह-विकल्प ≈ 2020-03-15 से 2020-03-26 तक का विधान-काल (दिन-गणना की परम्परा घोषित करके)। अष्टमे वर्षे ≈ 2027–2028 का आठवाँ वर्ष-खण्ड (जन्मदिन-आधारित: 2027-03-15 के आस-पास)। “तदृक्षे” के लिए उसी चन्द्र-नक्षत्र वाले दिन चुनना होगा — नक्षत्र-गणना के लिए अयनांश/एफेमेरिस घोषित करना आवश्यक; यह श्लोक स्वयं वह नहीं देता।

93.5
सुसमे च शुभे स्थाने गोमयेनोपलेपिते ।
मण्डपं स्वगृहात् प्राच्यामुदीच्यां वा प्रकल्पयेत्
susame ca śubhe sthāne gomayenopalepite |
maṇḍapaṃ svagṛhāt prācyāmudīcyāṃ vā prakalpayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुसमे = समतल/सम; च शुभे स्थाने = और शुभ स्थान में; गोमयेन = गोबर से; उपलेपिते = लीपे हुए; मण्डपम् = मण्डप; स्व-गृहात् = अपने घर से; प्राच्याम् = पूर्व दिशा में; उदीच्याम् वा = अथवा उत्तर दिशा में; प्रकल्पयेत् = तैयार करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सम और शुभ स्थान पर, गोमय से उपलेपित भूमि पर, अपने गृह से पूर्व अथवा उत्तर दिशा में मण्डप का निर्माण/कल्पना की जाए। यह शान्ति-अनुष्ठान की स्थल-व्यवस्था का निर्देश है — दिशा-विकल्प दो: प्राची या उदीची।

English rendering The text states that one should arrange a maṇḍapa on even and auspicious ground plastered with cow-dung, to the east or to the north of one’s own house.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्थल-विधि / दिशा-निर्देश। दिशाएँ: प्राची (पूर्व) या उदीची (उत्तर) — गृह-संदर्भ में सापेक्ष; कोई डिग्री-माप नहीं।

93.6
चतुर्द्वारसमायुक्तं तोरणाद्यैरलङ्कृतम् ।
कुण्डं ग्रहादियज्ञार्थं तद्बहिश्च प्रकल्पयेत्
caturdvārasamāyuktaṃ toraṇādyairalaṅkṛtam |
kuṇḍaṃ grahādiyajñārthaṃ tadbahiśca prakalpayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुः-द्वार-समायुक्तम् = चार द्वारों से युक्त; तोरण-आद्यैः = तोरण आदि से; अलङ्कृतम् = अलंकृत; कुण्डम् = यज्ञ-कुण्ड; ग्रह-आदि-यज्ञ-अर्थम् = ग्रह आदि यज्ञ के लिए; तत्-बहिः च = और उसके बाहर भी; प्रकल्पयेत् = कल्पना/निर्माण करे।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मण्डप चार द्वारों से युक्त हो और तोरण आदि से अलंकृत हो; तथा ग्रह-आदि यज्ञ के लिए कुण्ड भी उसी मण्डप के बाहर कल्पित/निर्मित किया जाए। यह स्थापत्य-अनुष्ठान-विन्यास है — चतुर्द्वार = चार प्रवेश।

English rendering The text states that the pavilion should be furnished with four doors and adorned with archways and the like; and outside it one should also arrange a fire-pit (kuṇḍa) for the sacrifice to the planets and so on.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रचना-निर्देश। एकमात्र स्पष्ट संख्या: चतुर्द्वार = 4 द्वार। कुण्ड की माप/आकार इस श्लोक में नहीं दी गई।

93.7
सुवर्णेन तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः ।
नक्षत्रदेवतारूपं कुर्याद् वित्तानुसारतः
suvarṇena tadardhena tadardhārdhena vā punaḥ |
nakṣatradevatārūpaṃ kuryād vittānusārataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुवर्णेन = स्वर्ण से; तत्-अर्धेन = उसके आधे से; तत्-अर्ध-अर्धेन वा = अथवा उसके आधे के आधे (चतुर्थांश) से; पुनः = फिर/भी; नक्षत्र-देवता-रूपम् = नक्षत्र-देवता की मूर्ति/रूप; कुर्यात् = बनाए; वित्त-अनुसारतः = धन/सामर्थ्य के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि नक्षत्र-देवता का रूप स्वर्ण से बनाया जाए; अथवा उसके आधे मूल्य/परिमाण से; अथवा आधे के आधे से — वित्त के अनुसार। तीन स्तर दिए गए हैं: पूर्ण, अर्ध, पाद (¼)। यह क्षमता-अनुपाती सामग्री-निर्देश है, अनिवार्य भार-सूत्र नहीं।

English rendering The text states that one should fashion the image of the nakṣatra-deity in gold, or with half of that, or again with half of that half, according to one’s means.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) अनुपात-श्रृंखला (भार/मूल्य — इकाई श्लोक में अकथित):
- पूर्ण: S (सुवर्ण)
- अर्ध: S/2
- अर्धार्ध: (S/2)/2 = S/4
अर्थात् विकल्प-समुच्चय: {S, S/2, S/4}, चयन वित्तानुसारतः। आधार-इकाई (कर्ष, माष, तोला, मुद्रा-मूल्य) इस श्लोक में नहीं; “सुवर्ण” धातु-पद है, निश्चित ग्राम-भार नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि परिवार “पूर्ण” स्तर को 4 इकाई स्वर्ण मानता है, तो विकल्प: 4, 2, 1 इकाई। यदि “पूर्ण” = 1 तोला, तो 1 तोला / ½ तोला / ¼ तोला। इकाई पारम्परिक माप-प्रणाली पर निर्भर; श्लोक केवल अनुपात देता है।

93.8
श्यामवर्णं महोग्रं च द्विशिरस्कं वृकाननम् ।
खड्गचर्मधरं तद्वद् ध्येयं कुणपवाहनम्
śyāmavarṇaṃ mahograṃ ca dviśiraskaṃ vṛkānanam |
khaḍgacarmadharaṃ tadvad dhyeyaṃ kuṇapavāhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्यामवर्ण = श्याम/काला वर्ण; महोग्र = अत्यन्त उग्र/भीषण; द्विशिरस्क = दो सिर वाला; वृकानन = वृक-मुख (भेड़िए-सा मुख); खड्गचर्मधर = खड्ग और चर्म (ढाल/कवच) धारण करने वाला; तद्वद् ध्येय = उसी रूप में ध्येय; कुणपवाहन = कुणप (शव) वाहन वाला।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र उस देवता (पूर्व-संदर्भ में निरृति-रूप) का ध्यान-स्वरूप बताता है — श्यामवर्ण, महोग्र, दो सिर वाला, वृक-मुख, खड्ग और चर्म धारण किये हुए, और कुणप को वाहन बनाये हुए। उपासक को उसी रूप का ध्यान करना कहा गया है। यह रूप-वर्णन है, न कि ग्रह-गणित का सूत्र।

English rendering The text states the form for meditation: dark-complexioned, intensely fierce, two-headed, wolf-faced, bearing sword and hide/shield, and having a corpse as vehicle — to be contemplated in that very aspect.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ध्यान-स्वरूप / रूप-वर्णन। “द्वि-” यहाँ शाब्दिक “दो” है; कोई वर्ग-भाग, बिन्दु-तालिका या दशा-वर्ष नहीं निकलता।

93.9
सुवर्णस्य च मूल्यं वा स्थापयित्वा प्रपूजयेत् ।
सुवर्णं सर्वदैवत्यं यतः शास्त्रेषु निश्चितम्
suvarṇasya ca mūlyaṃ vā sthāpayitvā prapūjayet |
suvarṇaṃ sarvadaivatyaṃ yataḥ śāstreṣu niścitam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुवर्णस्य मूल्यं वा = स्वर्ण का मूल्य अथवा (स्वर्ण); स्थापयित्वा = स्थापित कर; प्रपूजयेत् = पूजा करे; सुवर्णं = स्वर्ण; सर्वदैवत्यं = सब देवताओं का दैवत्य/देव-तत्त्व; यतः = क्योंकि; शास्त्रेषु निश्चितम् = शास्त्रों में निश्चित।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — स्वर्ण अथवा उसके मूल्य को स्थापित कर पूजन करना चाहिए। कारण भी दिया है: स्वर्ण को शास्त्रों में सर्व-दैवत्य माना गया है। यह पूजा-विधि का निर्देश है; फल को अनिवार्यता या भय के रूप में नहीं पढ़ना।

English rendering The text states that one should install and worship gold, or its value, since gold is affirmed in the śāstras as the deity-substance of all divinities.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पूजा-विधि / द्रव्य-स्थापन। “मूल्य” यहाँ आर्थिक विनिमय-मात्रा का ज्योतिष-सूत्र नहीं; शास्त्रीय पूजा-सामग्री का विकल्प है।

93.10
आचार्यं वरयेत् पश्चात् स्वस्तिवाचनुपूर्वकम् ।
कलशस्थापनं कुर्यात् स्वगृह्योक्तविधानतः
ācāryaṃ varayet paścāt svastivācanupūrvakam |
kalaśasthāpanaṃ kuryāt svagṛhyoktavidhānataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आचार्यं वरयेत् = आचार्य का वरण करे; पश्चात् = तत्पश्चात्; स्वस्ति-वाचन-पूर्वकम् = स्वस्ति-वाचन पूर्वक; कलश-स्थापनम् = कलश की स्थापना; कुर्यात् = करे; स्व-गृह्य-उक्त-विधानतः = अपने गृह्य-सूत्र में कहे विधान के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ इसके पश्चात् स्वस्ति-वाचन के साथ आचार्य का वरण करे, और अपने (शाखा-सम्मत) गृह्य-सूत्र में कही विधि के अनुसार कलश-स्थापना करे। विधि यहाँ यजमान की अपनी वैदिक शाखा पर निर्भर है।

English rendering Thereafter, preceded by the svasti-vācana, one should engage the ācārya and perform the installation of the kalaśa according to the rule stated in one's own Gṛhya-sūtra.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कर्मकाण्ड-क्रम। तकनीकी बिन्दु: "स्व-गृह्य-उक्त" — विधि शाखा-सापेक्ष है, अर्थात् एकल सार्वभौम पाठ नहीं, बल्कि यजमान की परम्परा के अनुसार परिवर्ती (पाठ-भेद स्वीकृत)।

93.11
पञ्चगव्यादिकं क्षेप्यं कलशे तीर्थवारि च ।
शतौषध्यादिकं तत्र शतच्छिद्रघटे क्षिपेत्
pañcagavyādikaṃ kṣepyaṃ kalaśe tīrthavāri ca |
śatauṣadhyādikaṃ tatra śatacchidraghaṭe kṣipet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्चगव्यादिकं = पञ्चगव्य आदि; क्षेप्यं = डालने योग्य / डाला जाए; कलशे = कलश में; तीर्थवारि = तीर्थ-जल; शतौषध्यादिकं = सौ औषधियाँ आदि; तत्र = वहाँ; शतच्छिद्रघटे = सौ छिद्र वाले घट में; क्षिपेत् = डाले।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — कलश में पञ्चगव्य आदि तथा तीर्थ-जल डाले। फिर शत-औषधि आदि सामग्री को शत-च्छिद्र घट में क्षेपण करे। “शत” यहाँ शाब्दिक सौ की संख्या है — औषधि-समूह और छिद्र-संख्या के रूप में।

English rendering The text states that pañcagavya and the like, together with sacred water, are to be put into the kalaśa; and that a hundred herbs and such materials are to be placed into a pot of a hundred perforations.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — द्रव्य-क्षेपण / पात्र-विधान। स्थिरांक (पाठ से): शत = 100 (औषधि-समूह; छिद्र-संख्या)। कोई देशांतर-विभाजन या दशा-अनुपात नहीं।

उदाहरण (worked example) यदि “शतच्छिद्रघट” को शाब्दिक 100 छिद्र वाला पात्र माना जाए, तो छिद्र-संख्या N = 100; “शतौषधि” का गणना-पक्ष भी N_auṣadhi = 100 का समूह-निर्देश है — ज्योतिष-वर्ग-मापांक नहीं, कर्मकाण्ड-संख्या।

93.12
वंशपात्रं च संस्थाप्य तत्र वै पश्चिमामुखम् ।
अर्चेयेन्निरृतिं देवं शुक्लवस्त्राक्षतादिभिः
vaṃśapātraṃ ca saṃsthāpya tatra vai paścimāmukham |
arceyennirṛtiṃ devaṃ śuklavastrākṣatādibhiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वंशपात्रं = बाँस का पात्र; संस्थाप्य = स्थापित कर; तत्र वै = वहीं; पश्चिमामुखम् = पश्चिम-मुखी; अर्चेयेत् = अर्चना करे; निरृतिं देवं = निरृति देव को; शुक्लवस्त्र = श्वेत वस्त्र; अक्षतादिभिः = अक्षत आदि से।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — वंश-पात्र स्थापित कर उसे पश्चिम-मुख रखे, और निरृति-देव की अर्चना शुक्ल वस्त्र, अक्षत आदि से करे। दिशा यहाँ पश्चिम (निरृति-दिशा/दक्षिण-पश्चिम से संबद्ध कर्म-परंपरा) है; यह दिक्-निर्देश है, ग्रह-दृष्टि-कोण का गणित नहीं।

English rendering The text states that a bamboo vessel is to be set there facing west, and that the deity Nirṛti is to be worshipped with white cloth, unbroken rice-grains (akṣata), and the like.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दिशा-मुख / देव-अर्चना। पश्चिम = 270° (राशि-चक्र के 0° मेष-आरंभ वाले स्थूल दिक्-मॉडल में, यदि दिशा को ज्योतिष-कोण से जोड़ें) — किन्तु श्लोक स्वयं कोण नहीं देता; केवल “पश्चिमामुख” का विधि-निर्देश है।

93.13
इन्द्रं तदधिदेवं च जलं प्रत्यधिदैवतम् ।
स्वस्वशाखोक्तमन्त्रेण प्रधानादीन्प्रपूजयेत्
indraṃ tadadhidevaṃ ca jalaṃ pratyadhidaivatam |
svasvaśākhoktamantreṇa pradhānādīnprapūjayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इन्द्रम् = इन्द्र को; तत्-अधिदेवम् = उसका अधिदेवता; जलम् = जल (आप्/वरुण-तत्त्व); प्रति-अधि-दैवतम् = प्रत्यधिदेवता; स्व-स्व-शाखा-उक्त-मन्त्रेण = अपनी-अपनी वैदिक शाखा में कहे मन्त्र से; प्रधान-आदीन् = प्रधान (निरृति) आदि देवों को; प्रपूजयेत् = भली प्रकार पूजे।

हिन्दी भावार्थ इन्द्र को उसका अधिदेवता और जल को प्रत्यधिदेवता (मानकर), अपनी-अपनी शाखा में कहे मन्त्र से प्रधान (निरृति) आदि देवों की पूजा करे। यहाँ मूल की देवता-त्रयी स्पष्ट होती है — प्रधान: निरृति, अधिदेव: इन्द्र, प्रत्यधिदेव: जल।

English rendering With Indra as its over-deity and Water as its counter-deity, one should worship the principal deity and the rest with the mantra prescribed in one's own Vedic branch.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — देवता-योजना एवं मन्त्र-विधि। तकनीकी ढाँचा: प्रत्येक नक्षत्र-पूजा की त्रि-स्तरीय संरचना — देवता (प्रधान) → अधिदेवता → प्रत्यधिदेवता; मूल हेतु यहाँ श्लोक से ही निरृति → इन्द्र → जल। मन्त्र शाखा-सापेक्ष (पाठ-भेद स्वीकृत), अतः एकल सार्वभौम पाठ नहीं।

93.14
देवाधिदेवप्रीत्यर्थं होमं कुर्याद्यथाविधि ।
अष्टोत्तरं सहस्रं वा शतं वा नियतेन्द्रियः
devādhidevaprītyarthaṃ homaṃ kuryādyathāvidhi |
aṣṭottaraṃ sahasraṃ vā śataṃ vā niyatendriyaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवाधिदेव = देवों के भी अधिदेव (मृत्युञ्जय-रूप परमेश्वर); प्रीत्यर्थम् = प्रसन्नता/प्रीति हेतु; होमम् = अग्नि में आहुति (हवन); यथाविधि = शास्त्रोक्त क्रम से; अष्टोत्तरं सहस्रम् = एक हज़ार आठ (1008); शतम् = (अष्टोत्तर-) शत = 108; नियतेन्द्रियः = संयमित इन्द्रियों वाला साधक।

हिन्दी भावार्थ देवाधिदेव की प्रीति के लिए यथाविधि होम करे — सामर्थ्य के अनुसार एक हज़ार आठ (1008) अथवा एक सौ आठ (108) आहुतियाँ अर्पित करे, इन्द्रियों को संयमित रखते हुए।

English rendering For the propitiation of the Lord of gods one should perform the fire-oblation according to rule — one thousand-and-eight, or a hundred-and-eight offerings — with the senses held in restraint.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) आहुति-संख्या का शब्द-संख्या विच्छेद — अष्टोत्तर = अष्ट (8) + उत्तर (अधिक)। अतः अष्टोत्तरं शतम् = 100 + 8 = 108; अष्टोत्तरं सहस्रम् = 1000 + 8 = 1008. विकल्प: 1008 (पूर्ण) ÷ या 108 (लघु), सामर्थ्यानुसार। (पारम्परिक संगति: 108 = 27 नक्षत्र × 4 पाद — यह इस श्लोक का कथन नहीं, केवल परिचित गणना।)

उदाहरण (worked example) सामर्थ्य अधिक हो → 1008 आहुति; सीमित हो → 108. दोनों में "अष्टोत्तर" (+8) अपरिवर्तित रहता है; केवल आधार 1000 अथवा 100 बदलता है — 1000 + 8 बनाम 100 + 8।

93.15
मृत्युप्रशमनार्थं च मन्त्रं त्रयम्बकं जपेत् ।
प्रार्थयेच्च ततो देवमभिषेकार्थमादरात्
mṛtyupraśamanārthaṃ ca mantraṃ trayambakaṃ japet |
prārthayecca tato devamabhiṣekārthamādarāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मृत्यु-प्रशमन-अर्थम् = मृत्यु-दोष के शमन हेतु; मन्त्रम् = मन्त्र; त्रयम्बकम् = त्र्यम्बक (मृत्युञ्जय/त्र्यम्बक-मन्त्र); जपेत् = जप करे; प्रार्थयेत् = प्रार्थना करे; ततः = उसके पश्चात्; देवम् = देवता को; अभिषेक-अर्थम् = अभिषेक के लिए; आदरात् = आदरपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि मृत्यु-प्रशमन के प्रयोजन से त्र्यम्बक-मन्त्र का जप करना चाहिए। जप के अनन्तर आदर सहित देवता से अभिषेक की प्रार्थना की जाए। यह क्रम जप और अभिषेक-निवेदन को एक साथ बाँधता है।

English rendering The text states that for the pacification of death one should recite the Tryambaka mantra, and thereafter respectfully petition the deity for the abhiṣeka.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (जप + अभिषेक-प्रार्थना)। यह श्लोक गणना नहीं देता; यह मन्त्र-जप और देव-प्रार्थना का क्रम निर्दिष्ट करता है।

93.16
भद्रासनोपविष्टस्य सस्त्रीपुत्रस्य मन्त्रवित् ।
आचार्यो यजमानस्य कुर्यात् प्रीत्याभिषेचनम्
bhadrāsanopaviṣṭasya sastrīputrasya mantravit |
ācāryo yajamānasya kuryāt prītyābhiṣecanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भद्र-आसन = शुभ/भद्र आसन; उपविष्टस्य = बैठे हुए का; स-स्त्री-पुत्रस्य = पत्नी और पुत्र सहित; मन्त्र-वित् = मन्त्र-ज्ञाता; आचार्यः = आचार्य; यजमानस्य = यजमान का; कुर्यात् = करे; प्रीत्या = प्रीति/स्नेह से; अभिषेचनम् = अभिषेक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यजमान भद्रासन पर पत्नी और पुत्र सहित बैठे हो। मन्त्र-ज्ञाता आचार्य प्रीतिपूर्वक उस यजमान का अभिषेचन करे। यहाँ कर्ता आचार्य है और विधि का भाव स्नेह-युक्त अनुष्ठान है।

English rendering The text states that the mantra-knowing ācārya should, with goodwill, perform the abhiṣecana of the yajamāna who is seated on a bhadrāsana together with wife and son.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (आचार्य द्वारा अभिषेक)। यह श्लोक आसन, सहभागिता और कर्ता-पद निर्दिष्ट करता है; कोई अंश/राशि-सूत्र नहीं है।

93.17
वस्त्रान्तरितकुम्भाभ्यां स्नापयेत्तदनन्तरम् ।
शुक्लाम्बरधरस्तद्वत् श्वेतगन्धानुलेपनः
vastrāntaritakumbhābhyāṃ snāpayettadanantaram |
śuklāmbaradharastadvat śvetagandhānulepanaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्र-अन्तरित = वस्त्र से आवृत/ढके; कुम्भाभ्याम् = दो कुम्भों से; स्नापयेत् = स्नान कराए; तद्-अनन्तरम् = उसके पश्चात्; शुक्ल-अम्बर-धरः = श्वेत वस्त्र धारण किए; तद्वत् = उसी प्रकार; श्वेत-गन्ध-अनुलेपनः = श्वेत गन्ध से अनुलिप्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उसके बाद वस्त्र से आवृत दो कुम्भों से स्नान कराना चाहिए। अभिषेक/स्नान के क्रम में यजमान (अथवा विधि-पात्र) श्वेत वस्त्र धारण करे और श्वेत गन्ध से अनुलिप्त रहे। यह श्लोक द्रव्य-रूप (दो कुम्भ) और वेष-गन्ध की शुक्लता पर बल देता है।

English rendering The text states that one should next bathe him with two pots screened by cloth; likewise he is to wear white garments and be anointed with white fragrance.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (द्वि-कुम्भ स्नान + शुक्ल वेष)। “कुम्भाभ्याम्” द्विवचन से दो पात्र सूचित होते हैं; अंश-विभाजन या बलांक नहीं दिए गए।

93.18
धेनुं पयस्विनीं दद्यादाचार्याय च शक्तितः ।
ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्याद् ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत्
dhenuṃ payasvinīṃ dadyādācāryāya ca śaktitaḥ |
ṛtvigbhyo dakṣiṇāṃ dadyād brāhmaṇāṃścāpi bhojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धेनुम् = गाय; पयस्विनीम् = दूध देने वाली; दद्यात् = दे; आचार्याय = आचार्य को; शक्ति-तः = सामर्थ्य के अनुसार; ऋत्विग्भ्यः = ऋत्विजों को; दक्षिणां = दक्षिणा; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; अपि = भी; भोजयेत् = भोजन कराए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आचार्य को शक्ति के अनुसार दूध देने वाली गाय दान करनी चाहिए। ऋत्विजों को दक्षिणा देनी चाहिए और ब्राह्मणों को भी भोजन कराना चाहिए। यह श्लोक दक्षिणा-दान और भोज को अनुष्ठान के पूर्ण भाग के रूप में रखता है।

English rendering The text states that one should give a milch cow to the ācārya according to one’s means, present dakṣiṇā to the ṛtviks, and also feed the brāhmaṇas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-कथन (दान-दक्षिणा-भोजन)। “शक्तितः” सामर्थ्य-अनुपात सूचित करता है, कोई निश्चित संख्या या सूत्र नहीं।

93.19
यत्पापं यच्च मे दौःस्थ्यं सर्वगात्रेष्ववस्थितम् ।
तत्सर्वं भक्षयाज्य त्वं लक्ष्मीं पुष्टिं च वर्धय
yatpāpaṃ yacca me dauḥsthyaṃ sarvagātreṣvavasthitam |
tatsarvaṃ bhakṣayājya tvaṃ lakṣmīṃ puṣṭiṃ ca vardhaya

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत् पापम् = जो भी पाप; यत् मे दौःस्थ्यम् = जो मेरी दुर्दशा/दुःस्थ भाव; सर्वगात्रेषु अवस्थितम् = समस्त अंगों में स्थित; तत् सर्वम् = वह सब; भक्षय = भक्षण कर ले (आज्य को सम्बोधन); आज्य = हे घृत; त्वम् = तू; लक्ष्मीं पुष्टिं वर्धय = लक्ष्मी और पुष्टि बढ़ा। (पाठ-भेद: "भक्षयाज्य त्वं" = भक्षय + आज्य + त्वम् — सन्धि-विच्छेद पर पाठ-भेद संभव।)

हिन्दी भावार्थ (यह घृत/आज्य को सम्बोधित प्रार्थना-मन्त्र है —) "मेरे समस्त अंगों में स्थित जो पाप और दुर्दशा है, हे आज्य! तू उस सबका भक्षण कर ले, और मेरी लक्ष्मी तथा पुष्टि को बढ़ा।"

English rendering (A prayer addressed to the ghee): "Whatever sin and misfortune abides in all my limbs — O ghee, devour it entirely, and increase my prosperity and vigour."

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — प्रार्थना/मन्त्र। शास्त्र इसे संकल्प-वचन के रूप में रखता है — "पाठ का कथन" है, नियति की घोषणा नहीं; अभिषेक-आज्य को शोधक-प्रतीक मानकर उससे संबोधन किया गया।

93.20
अनेनैव तु मन्त्रेण सम्यगाज्यं विलोकयेत् ।
मूलगण्डोद्भवस्तैवं सर्पपापं प्रणश्यति
anenaiva tu mantreṇa samyagājyaṃ vilokayet |
mūlagaṇḍodbhavastaivaṃ sarpapāpaṃ praṇaśyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेन एव = इसी से; मन्त्रेण = मन्त्र से; सम्यक् = सम्यक/ठीक रीति से; आज्यम् = घृत; विलोकयेत् = देखे/निरीक्षण करे; मूल-गण्ड-उद्भवम् = मूल-गण्ड से उत्पन्न; तैवम् (तथैव/तैवं — पाठ-भेद संभव) = उसी प्रकार/उससे; सर्प-पापम् = सर्प-संबंधी/सर्पवत् पाप; प्रणश्यति = नष्ट होता है — शास्त्र-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इसी मन्त्र से आज्य का सम्यक विलोकन करना चाहिए। पाठ का फल-कथन है कि मूल-गण्ड से उत्पन्न सर्प-पाप इस प्रकार नष्ट होता है। “तैवं” पाठ में पाठ-भेद संभव; भाव विधि-संपन्न आज्य-दर्शन से दोष-शमन का शास्त्र-वाक्य है, न कि नियति की घोषणा।

English rendering The text states that with this very mantra one should properly regard the ājya; thus, it says, the serpentine pāpa arising from mūla-gaṇḍa is destroyed. (Reading “tаївam/tathaiva” may vary — पाठ-भेद संभव.)

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि + फल-कथन (आज्य-विलोकन; मूलगण्ड-दोष-शमन का शास्त्र-वाक्य)। कोई अंश, बिन्दु-तालिका या दशा-वर्ष यहाँ कूटित नहीं।

अध्यायः 94

ज्येष्ठादि गण्डशान्त्यध्यायः

13 श्लोक
94.1
ज्येष्ठागण्डान्तजातस्तु पितुः स्वस्य च नाशकः ।
तस्य शान्तिविधिं वक्ष्ये सर्वविघ्नोपशान्तये
jyeṣṭhāgaṇḍāntajātastu pituḥ svasya ca nāśakaḥ |
tasya śāntividhiṃ vakṣye sarvavighnopaśāntaye

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्येष्ठा-गण्डान्त-जातः = ज्येष्ठा नक्षत्र के गण्डान्त (जल-अग्नि राशि की सन्धि) में उत्पन्न; तु = किन्तु/तो; पितुः = पिता का; स्वस्य च = और स्वयं का; नाशकः = नाश करने वाला (अरिष्ट-सूचक); शान्ति-विधिम् = शान्ति-कर्म की विधि; वक्ष्ये = मैं (पराशर) कहूँगा; सर्व-विघ्न-उपशान्तये = समस्त विघ्नों की उपशान्ति के लिए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो ज्येष्ठा-गण्डान्त में जन्म लेता है, वह (परम्परा की भाषा में) पिता और स्वयं के लिए अरिष्ट का कारक माना गया है। पराशर आगे कहते हैं कि अब मैं उसी के लिए वह शान्ति-विधि कहूँगा जिससे सभी विघ्नों की उपशान्ति हो। यह अध्याय एक अरिष्ट-कथन नहीं, अपितु उसका परिहार (उपाय) प्रस्तुत करने की प्रतिज्ञा है।

English rendering One born at the Jyeṣṭhā-gaṇḍānta is said by the text to be inauspicious for father and self; I shall now declare the rite of pacification for that person, for the quelling of every obstacle.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अरिष्ट-फल-कथन + शान्ति-प्रतिज्ञा। तकनीकी रूप से "गण्डान्त" एक निश्चित राशि-चक्र-बिन्दु है: ज्येष्ठा का अन्त = वृश्चिक (जल) 30° = निरयन देशान्तर 240°00′ = धनु (अग्नि) 0° = मूल का आरम्भ — अर्थात् जल-राशि और अग्नि-राशि की सन्धि ही गण्डान्त कहलाती है; फल शास्त्र का कथन है, नियति-घोषणा नहीं।

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94.2
मूलशान्तिसमं सर्वमात्रापि मण्डपादिकम् ।
इन्द्रोऽत्र देवता तद्वदधिदेवोऽनलस्तथा
mūlaśāntisamaṃ sarvamātrāpi maṇḍapādikam |
indro'tra devatā tadvadadhidevo'nalastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मूल-शान्ति-समम् = (नक्षत्र) मूल की शान्ति के समान; सर्वम् = सब कुछ; मात्रा अपि = परिमाण/प्रमाण भी; मण्डप-आदिकम् = मण्डप आदि (वेदी-रचना); इन्द्रः अत्र देवता = यहाँ मुख्य देवता इन्द्र; तद्वत् = उसी प्रकार; अधिदेवः अनलः = अधिदेवता अनल (अग्नि); तथा = भी।

हिन्दी भावार्थ इस शान्ति में मण्डप-रचना आदि सब कुछ, उनका परिमाण तक, मूल-शान्ति के समान ही करना चाहिए। यहाँ आराध्य मुख्य देवता इन्द्र हैं और अधिदेवता अग्नि (अनल) हैं। अर्थात् ज्येष्ठा (जिसका नक्षत्र-देवता स्वयं इन्द्र है) की शान्ति में देव-विन्यास ज्येष्ठा के स्वामी-देव के अनुरूप है।

English rendering Everything — pavilion and the rest, even its measure — is to be done as in the Mūla-śānti; here the presiding deity is Indra, and likewise the adhidevatā is Agni (Anala).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (देव-विन्यास)। तकनीकी बिन्दु: ज्येष्ठा का नक्षत्र-देवता इन्द्र है, अतः शान्ति का मुख्य देव भी इन्द्र — नक्षत्र → अधिष्ठातृ-देव का यह मानचित्रण ही आगे श्लोक 8 में नक्षत्र-नामों को देव-नामों से "एन्कोड" करने का आधार बनता है।

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94.3
विज्ञेयं च तथा विप्र रक्षः प्रत्यधिदैवतम् ।
यथाशक्ति सुवर्णेन कुर्यादिन्द्रस्वरूपकम्
vijñeyaṃ ca tathā vipra rakṣaḥ pratyadhidaivatam |
yathāśakti suvarṇena kuryādindrasvarūpakam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विज्ञेयम् = जानना चाहिए; तथा = और; विप्र = हे ब्राह्मण (मैत्रेय); रक्षः = रक्ष (राक्षस); प्रत्यधि-दैवतम् = प्रत्यधिदेवता; यथाशक्ति = सामर्थ्य के अनुसार; सुवर्णेन = सोने से; कुर्यात् = बनावे; इन्द्र-स्वरूपकम् = इन्द्र की प्रतिमा/स्वरूप।

हिन्दी भावार्थ हे विप्र, इस शान्ति में प्रत्यधिदेवता रक्ष (राक्षस) जानना चाहिए। साधक अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने से इन्द्र की प्रतिमा बनवाए। इस प्रकार देवता–अधिदेवता–प्रत्यधिदेवता का त्रिक इन्द्र–अग्नि–रक्ष के रूप में पूर्ण होता है।

English rendering And, O Brahmin, the pratyadhidevatā here is to be known as Rakṣas; according to one's means, one should fashion an image of Indra's form in gold.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि-वर्णन (प्रतिमा-निर्माण एवं देव-त्रिक)। अन्तर्दृष्टि: नक्षत्र-शान्ति का शास्त्रीय ढाँचा सदा त्रिस्तरीय देव-विन्यास (देवता → अधिदेवता → प्रत्यधिदेवता) रखता है; यहाँ वह इन्द्र → अग्नि → रक्ष है।

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94.4
वज्राङ्कुशधरं दिव्यं गजराजोपरिस्थितम् ।
शालितण्डुलसंयुक्तकुम्भस्योपरि पूजयेत्
vajrāṅkuśadharaṃ divyaṃ gajarājoparisthitam |
śālitaṇḍulasaṃyuktakumbhasyopari pūjayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वज्र-अङ्कुश-धरम् = वज्र और अङ्कुश धारण किए हुए; दिव्यम् = दिव्य; गज-राज-उपरि-स्थितम् = गजराज (ऐरावत) पर आरूढ़; शालि-तण्डुल-संयुक्त = शालि चावल से भरे; कुम्भस्य उपरि = कलश के ऊपर; पूजयेत् = पूजा करे।

हिन्दी भावार्थ उस इन्द्र-प्रतिमा को वज्र और अङ्कुश धारण किए हुए, दिव्य, तथा गजराज (ऐरावत) पर आरूढ़ रूप में बनावे। फिर शालि-चावल से भरे कलश के ऊपर स्थापित कर उसकी पूजा करे। यह इन्द्र का शास्त्रोक्त आयुध-वाहन सहित पूर्ण मूर्ति-विधान है।

English rendering Divine, bearing the thunderbolt and the goad, seated upon the king of elephants — this image one should worship, set upon a pot filled with śāli rice-grains.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — मूर्ति-ध्यान एवं पूजा-वर्णन। अन्तर्दृष्टि: वज्र, अङ्कुश और ऐरावत — इन्द्र के तीन शास्त्रसिद्ध चिह्न — प्रतिमा को शब्दार्थ से ही अभिज्ञेय (identifiable) बनाते हैं, ताकि किसी संशय के बिना सही देव की स्थापना हो।

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94.5
स्वस्वगृह्योक्तमन्त्रेण गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ।
अभिषेकं च होमं च कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम्
svasvagṛhyoktamantreṇa gandhapuṣpākṣatādibhiḥ |
abhiṣekaṃ ca homaṃ ca kuryād brāhmaṇabhojanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-स्व-गृह्य-उक्त-मन्त्रेण = अपने-अपने गृह्यसूत्र में कहे मन्त्र से; गन्ध-पुष्प-अक्षत-आदिभिः = चन्दन, पुष्प, अक्षत आदि से; अभिषेकम् = अभिषेक; च होमम् = और होम; कुर्यात् = करे; ब्राह्मण-भोजनम् = ब्राह्मण-भोजन।

हिन्दी भावार्थ साधक अपनी-अपनी शाखा के गृह्यसूत्र में विहित मन्त्र से, गन्ध-पुष्प-अक्षत आदि उपचारों सहित अभिषेक और होम करे, तथा ब्राह्मण-भोजन कराए। शास्त्र यहाँ मन्त्र-चयन को साधक की अपनी शाखा-परम्परा पर छोड़ता है — कोई एकल थोपा हुआ मन्त्र नहीं।

English rendering With the mantra prescribed in one's own gṛhya-sūtra, and with sandal, flowers, unbroken rice and the rest, one should perform the consecration and the fire-oblation, and the feeding of Brahmins.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कर्म-विधि (अभिषेक–होम–भोजन)। अन्तर्दृष्टि: "स्व-स्व-गृह्योक्त-मन्त्र" यह दर्शाता है कि विधि शाखा-सापेक्ष है — मन्त्र का चयन साधक की परम्परा पर निर्भर घोषित convention है, न कि एक निश्चित पाठ।

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94.6
इन्द्रसूक्तं जपेद् भक्त्या मन्त्रं मृत्युञ्जयं तथा ।
प्रार्थयेदिन्द्रदेवं च ततः शान्तिमवाप्नुयात्
indrasūktaṃ japed bhaktyā mantraṃ mṛtyuñjayaṃ tathā |
prārthayedindradevaṃ ca tataḥ śāntimavāpnuyāt

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इन्द्र-सूक्तम् = इन्द्र-सूक्त (ऋग्वेदीय इन्द्र-स्तुति); जपेत् = जपे; भक्त्या = भक्तिपूर्वक; मन्त्रम् मृत्युञ्जयम् = मृत्युञ्जय मन्त्र; तथा = भी; प्रार्थयेत् = प्रार्थना करे; इन्द्र-देवम् = इन्द्रदेव की; ततः = तत्पश्चात्; शान्तिम् अवाप्नुयात् = शान्ति को प्राप्त करे।

हिन्दी भावार्थ साधक भक्तिपूर्वक इन्द्र-सूक्त का जप करे और साथ ही मृत्युञ्जय मन्त्र का भी। फिर इन्द्रदेव से प्रार्थना करे; ऐसा करने पर शास्त्र कहता है कि वह शान्ति को प्राप्त करता है। यहाँ फल "शान्ति-प्राप्ति" शास्त्र का कथन है।

English rendering One should recite the Indra-sūkta with devotion, and the Mṛtyuñjaya mantra as well, and pray to the deity Indra; thereupon, the text says, one attains peace.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — जप-प्रार्थना-विधि एवं फल-कथन। अनुशासन-टिप्पणी: "ततः शान्तिमवाप्नुयात्" को शास्त्र-का-कथन ("the text states") रूप में रखा जाता है, किसी निश्चित परिणाम की गारंटी या भय-प्रेरक दबाव के रूप में नहीं।

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94.7
अथ वा शक्त्यभावे तु कुर्याद् गोदानमेव हि ।
यतः समस्तभूदानाद् गोदानमतिरिच्यते
atha vā śaktyabhāve tu kuryād godānameva hi |
yataḥ samastabhūdānād godānamatiricyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथवा = अथवा; शक्ति-अभावे = सामर्थ्य न होने पर; तु = तो; कुर्यात् = करे; गोदानम् एव हि = गोदान ही; यतः = क्योंकि; समस्त-भू-दानात् = समस्त भूमि-दान से; गोदानम् = गो का दान; अतिरिच्यते = अधिक / श्रेष्ठ कहा गया

हिन्दी भावार्थ यदि पूर्ण स्वर्ण-प्रतिमा आदि की शक्ति न हो, तो शास्त्र विकल्प देता है — गोदान ही कर ले। कारण-वाक्य में कहा गया है कि समस्त भूमि-दान से भी गोदान अधिक माना गया है। यह सामर्थ्य-हीनता में सरलीकृत विकल्प है, दबाव या अनिवार्य “उपाय-बेचने” का रूप नहीं।

English rendering Or, when capacity is lacking, one should simply perform the gift of a cow; for — the text states — the gift of a cow surpasses all gifts of land.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विकल्प-विधि (शक्त्यभाव → गोदान) + तुलनात्मक दान-मूल्य का शास्त्र-कथन। कोई अंश, वर्ष, बिन्दु या बल-इकाई यहाँ नहीं; “अतिरिच्यते” गुणात्मक श्रेष्ठता-वाक्य है, संख्या-अनुपात नहीं।

94.8
मूलेन्द्राहिमघागण्डजाते दद्याद् गवां त्रयम् ।
गोयुग्मं पौष्णदास्रोत्थे गण्डान्ते च द्विजन्मने
mūlendrāhimaghāgaṇḍajāte dadyād gavāṃ trayam |
goyugmaṃ pauṣṇadāsrotthe gaṇḍānte ca dvijanmane

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मूल-इन्द्र-अहि-मघा-गण्ड-जाते = मूल, इन्द्र (= ज्येष्ठा, देवता इन्द्र), अहि (= आश्लेषा, देवता सर्प/अहि) और मघा के गण्ड में उत्पन्न के लिए; दद्यात् गवां त्रयम् = तीन गाएँ दे; गो-युग्मम् = गायों का जोड़ा (दो); पौष्ण-दास्र-उत्थे = पौष्ण (= रेवती, देवता पूषन्) तथा दस्र (= अश्विनी, देवता अश्विनौ/दस्रौ) के गण्डान्त में उत्पन्न के लिए; गण्डान्ते च द्विजन्मने = और गण्डान्त में जन्मे द्विज के लिए।

हिन्दी भावार्थ मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा के गण्ड में जन्मे व्यक्ति के लिए तीन गाएँ दान करे; तथा रेवती एवं अश्विनी के गण्डान्त में जन्मे द्विज के लिए दो गायों का जोड़ा दे। यहाँ नक्षत्रों को उनके अधिष्ठातृ-देवताओं के नाम से संकेतित किया गया है — यही श्लोक का "कूट" (code) है।

English rendering For one born in the gaṇḍa of Mūla, Jyeṣṭhā, Āśleṣā and Maghā, let three cows be given; a pair of cows for the twice-born born at the gaṇḍānta arising from Revatī and Aśvinī.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) दो परतें हैं — (क) देव-कूट-विगलन (deity-encoding decode): इन्द्र → ज्येष्ठा, अहि → आश्लेषा, पौष्ण → रेवती, दस्र → अश्विनी (नक्षत्र-देवता ↔ नक्षत्र प्रतिस्थापन)। (ख) गो-गणना: त्रयम् = 3, युग्मम् = 2 (शब्द-संख्या अंक-वत डिकोडेड)। तीनों गण्डान्त-सन्धियाँ = जल→अग्नि राशि-योग, निरयन देशान्तर पर 120° के अन्तराल से: रेवती-अन्त/अश्विनी-आदि = 360°↔0°; आश्लेषा-अन्त/मघा-आदि = 120°; ज्येष्ठा-अन्त/मूल-आदि = 240°।

उदाहरण (worked example) नक्षत्र-चौड़ाई = 360° ÷ 27 = 13°20′ = 800′ (निरयन/सायन-भेद अयनांश पर निर्भर; यहाँ नक्षत्र-सीमाएँ निरयन)। ज्येष्ठा = #18 → आरम्भ 17 × 13°20′ = 226°40′, अन्त 18 × 13°20′ = 240°00′; मूल = #19 → 240°00′ से 253°20′। अतः ज्येष्ठा–मूल गण्डान्त-बिन्दु ठीक 240°00′ (वृश्चिक 30° = धनु 0°) पर पड़ता है — जिसके निकट जन्म पर श्लोक 8 तीन गायों का दान निर्दिष्ट करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक जिस 27-नक्षत्र विभाजन (प्रत्येक 13°20′) पर टिका है, वही विभाजन हमारे दशा-इंजन में विंशोत्तरी के 120-वर्ष चक्र की कुंजी है — जन्म-चन्द्र के नक्षत्र-अंश से महादशा-क्रम निकलता है (डोज़ियर मद 3)। यहाँ हमने केवल सीमाएँ (गण्डान्त = 0°/120°/240°) परखीं; गण्ड-दोष का फल शास्त्र का कथन है, गणना नहीं — मानचित्रण (देव↔नक्षत्र) और सीमा-अंकगणित ही सत्यापन-योग्य भाग है।

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94.9
अन्यगण्डे च दुर्योगे गामेकां हि प्रदापयेत् ।
गोरभावे च विप्राय दद्यात् तन्मूल्यमेव हि
anyagaṇḍe ca duryoge gāmekāṃ hi pradāpayet |
gorabhāve ca viprāya dadyāt tanmūlyameva hi

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्य-गण्डे = अन्य (शेष) गण्ड में; च दुर्योगे = तथा दुर्योग (अशुभ योग) में; गाम् एकाम् = एक गाय; हि प्रदापयेत् = अवश्य दिलवावे; गोः अभावे = गाय के अभाव में; च विप्राय = और ब्राह्मण को; दद्यात् = दे; तत्-मूल्यम् एव हि = उसका (गाय का) मूल्य ही।

हिन्दी भावार्थ अन्य नक्षत्रों के गण्ड में तथा किसी अशुभ योग में जन्म होने पर एक गाय दिलवा देनी चाहिए। और यदि गाय उपलब्ध न हो, तो उसके स्थान पर उसका मूल्य ही ब्राह्मण को दे देना चाहिए। इस प्रकार विधि द्रव्य-सामर्थ्य के अनुसार पूर्णतः लचीली है।

English rendering At any other gaṇḍa, and in an inauspicious conjunction, let a single cow be given; and in the absence of a cow, let one give to a Brahmin its equivalent value.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गो-गणना का न्यूनतम पद: एकाम् = 1 गाय (शब्द-संख्या अंक-वत)। इस प्रकार श्लोक 8–9 एक अवरोही मात्रा-सारणी बनाते हैं: तीव्रतम गण्ड (मूल/ज्येष्ठा/आश्लेषा/मघा) → 3 गाय; रेवती/अश्विनी गण्डान्त → 2 गाय; अन्य गण्ड/दुर्योग → 1 गाय; गाय-अभाव → तुल्य मूल्य (द्रव्यान्तर)। यह विशुद्ध गणना नहीं, अपितु सामर्थ्य-अनुरूप दान-मात्रा का विधान है।

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94.10
ज्येष्ठनक्षत्रजा कन्या विनिहन्ति धवाग्रजम् ।
विशाखान्त्यपदोत्पन्ना कन्या देवरघातिनी
jyeṣṭhanakṣatrajā kanyā vinihanti dhavāgrajam |
viśākhāntyapadotpannā kanyā devaraghātinī

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्येष्ठा-नक्षत्र-जा कन्या = ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मी कन्या; विनिहन्ति = नाश करती है (शास्त्र-कथन); धव-अग्रजम् = पति के अग्रज (जेठ) का; विशाखा-अन्त्य-पद-उत्पन्ना = विशाखा के अन्तिम पाद (चतुर्थ चरण) में उत्पन्न; कन्या = कन्या; देवर-घातिनी = देवर (पति के छोटे भाई) की घातिनी।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मी कन्या (परम्परा की भाषा में) पति के जेठ के लिए अरिष्ट-कारक मानी गई है, और विशाखा के अन्तिम पाद में जन्मी कन्या देवर के लिए। ये नक्षत्र-पाद-आधारित दोष-कथन हैं, जिनका परिहार आगे शान्ति द्वारा बताया गया है — न कि नियति की घोषणा।

English rendering A girl born in Jyeṣṭhā, the text says, is inauspicious for the husband's elder brother; a girl born in the last quarter of Viśākhā is held to be harmful to the husband's younger brother.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पाद (चरण) = नक्षत्र ÷ 4 = 13°20′ ÷ 4 = 3°20′ = 200′। विशाखा = नक्षत्र #16 → आरम्भ 15 × 13°20′ = 200°00′, अन्त 213°20′; अतः "अन्त्य-पद" (चौथा चरण) = 210°00′ से 213°20′ (निरयन)। ज्येष्ठा = #18 → 226°40′–240°00′ (सम्पूर्ण नक्षत्र)। ध्यातव्य: विशाखा जल-अग्नि सन्धि पर नहीं है — यह गण्डान्त से भिन्न, स्वतन्त्र नक्षत्र-पाद-दोष है।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी कन्या का जन्म-चन्द्र निरयन 211°30′ पर है (लहिरी अयनांश-सापेक्ष)। 211°30′ ∈ [210°00′, 213°20′] ⇒ विशाखा का अन्त्य-पद ⇒ श्लोक के अनुसार "देवर-दोष" कोटि; अतः श्लोक 11 विवाह-काल में गोदान-सहित शान्ति निर्दिष्ट करता है। (सीमाएँ नक्षत्र-आरम्भ 0° मेष = निरयन पर आधारित; अयनांश घोषित करना अनिवार्य।)

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94.11
तस्याः प्रदानकालेऽतो गोदानमपि कारयेत् ।
आश्लेषान्त्यत्रिपादोत्थौ मूलाद्यत्रिपदोद्भवौ
tasyāḥ pradānakāle'to godānamapi kārayet |
āśleṣāntyatripādotthau mūlādyatripadodbhavau

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्याः = उस (कन्या) के; प्रदान-काले = कन्यादान (विवाह) के समय; अतः = इसलिए; गो-दानम् अपि = गोदान भी; कारयेत् = करवावे; आश्लेषा-अन्त्य-त्रि-पाद-उत्थौ = आश्लेषा के अन्तिम तीन पादों में उत्पन्न (द्वि.); मूल-आद्य-त्रि-पद-उद्भवौ = मूल के आरम्भिक तीन पादों में जन्मे (द्वि.)।

हिन्दी भावार्थ इसलिए ऐसी कन्या के विवाह के समय गोदान भी करवाना चाहिए। तदुपरान्त वह उन दो का वर्णन आरम्भ करते हैं — जो आश्लेषा के अन्तिम तीन पादों में तथा मूल के आरम्भिक तीन पादों में उत्पन्न हुए हैं (इनका फल अगले श्लोक 12 में पूरा होता है)।

English rendering Therefore, at the time of her giving in marriage, let a gift of a cow also be made. (Now those) born in the last three quarters of Āśleṣā, and born in the first three quarters of Mūla —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) पाद = 3°20′ = 200′ (नक्षत्र/4)। आश्लेषा = #9 → 106°40′–120°00′; "अन्त्य-त्रिपाद" (पाद 2–3–4) = 110°00′–120°00′ (चौड़ाई 3 × 3°20′ = 10°00′)। मूल = #19 → 240°00′–253°20′; "आद्य-त्रिपाद" (पाद 1–2–3) = 240°00′–250°00′ (चौड़ाई 10°00′)। दोनों खण्ड ठीक आश्लेषा-अन्त/मूल-आदि की जल-अग्नि सन्धि (120° तथा 240°) पर संलग्न हैं — अर्थात् ये गण्ड-सन्ध्यंश हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) "पाद" यहाँ नक्षत्र का चतुर्थांश (13°20′ ÷ 4 = 3°20′) है — वही न्यूनतम इकाई जिससे हमारे विंशोत्तरी दशा-इंजन में जन्म-नक्षत्र का व्यतीत-अंश (elapsed nakṣatra-fraction) मापा जाता है, जिससे महादशा का प्रारम्भिक शेष निकलता है (डोज़ियर मद 3)। यहाँ हमने केवल पाद-सीमाओं (110°–120°, 240°–250°) का अंकगणित परखा; गण्ड-दोष का फल शास्त्र का कथन है।

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94.12
कन्यासुतौ हतः श्वश्रूं श्वशुरञ्च यथाक्रमम् ।
तयोर्विवाहकालेऽतः शान्तिं कुर्याद् विचक्षणः
kanyāsutau hataḥ śvaśrūṃ śvaśurañca yathākramam |
tayorvivāhakāle'taḥ śāntiṃ kuryād vicakṣaṇaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कन्या-सुतौ = कन्या और पुत्र (द्वि.); हतः = मारते/नाश करते हैं (शास्त्र-कथन, द्वि. वर्तमान); श्वश्रूम् = सास को; श्वशुरम् च = और ससुर को; यथाक्रमम् = क्रमशः; तयोः = उन दोनों के; विवाह-काले = विवाह के समय; अतः = इसलिए; शान्तिम् कुर्यात् विचक्षणः = विचक्षण (बुद्धिमान) शान्ति करे।

हिन्दी भावार्थ (श्लोक 11 से जुड़कर) — आश्लेषा के अन्तिम तीन पादों में जन्मी कन्या और मूल के आरम्भिक तीन पादों में जन्मा पुत्र, शास्त्र-कथनानुसार, क्रमशः सास और ससुर के लिए अरिष्ट-कारक माने गए हैं। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति उन दोनों के विवाह-काल में शान्ति-कर्म कराए।

English rendering — the daughter and the son, respectively, are said to be harmful to the mother-in-law and the father-in-law; therefore at the time of their marriage the discerning one should perform the pacificatory rite.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पाद-आधारित दोष-कथन (श्लोक 11 के अंकगणित का फल-पक्ष)। अनुशासन-टिप्पणी: "हतः श्वश्रूं श्वशुरं च" जैसे तीव्र कथन शास्त्र के दोष-वर्गीकरण हैं और परिहार (शान्ति) के साथ बँधे हैं; इन्हें नियति, निश्चयात्मक भविष्यवाणी या भय-दबाव के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता — यही "गणित बनाम व्याख्या" का पृथक्करण है।

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94.13
तत्तदोषविनाशाय यथावित्तानुसारतः ।
धवाग्रजद्यभावे तु न दोषाय प्रजायते
tattadoṣavināśāya yathāvittānusārataḥ |
dhavāgrajadyabhāve tu na doṣāya prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत्-दोष-विनाशाय = उन-उन (पूर्वोक्त) दोषों के विनाश के लिए; यथा-वित्त-अनुसारतः = अपने धन (सामर्थ्य) के अनुसार; धव-अग्रज-आदि-अभावे = पति के अग्रज (जेठ) आदि के अभाव में; तु = किन्तु; न दोषाय प्रजायते = दोष उत्पन्न नहीं होता।

हिन्दी भावार्थ उन-उन दोषों के निवारण हेतु व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार शान्ति करे। किन्तु शास्त्र यह भी स्पष्ट करता है कि जिस सम्बन्धी (जेठ, देवर, सास, ससुर आदि) के लिए दोष कहा गया है, यदि वह सम्बन्धी ही न हो, तो उसके लिए कोई दोष नहीं लगता। यह विधान को सापेक्ष एवं संतुलित रखता है — दोष तभी, जब उसका पात्र विद्यमान हो।

English rendering For the removal of these several blemishes let one act according to one's wealth; but where the husband's elder brother and the like do not exist, no blemish arises at all.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-उपसंहार + दोष का सापेक्ष निषेध। अन्तर्दृष्टि: "धवाग्रजाद्यभावे न दोषाय प्रजायते" एक सशर्त-निषेध (conditional nullification) है — दोष तभी सक्रिय है जब उसका निर्दिष्ट पात्र (जेठ/देवर/सास/ससुर) उपस्थित हो; पात्र-अभाव में शान्ति की आवश्यकता ही नहीं — विधि की आन्तरिक तर्क-संगति यहाँ स्वयं शास्त्र घोषित करता है।

अध्यायः 95

त्रीतरजन्मशान्त्यध्यायः

9 श्लोक
95.1
अथाऽन्यत् संप्रवक्ष्यामि जन्मदोषप्रदं द्विज ।
सुतत्र्ये सुताजन्म तत्त्रये सुतजन्म चेत्
athā'nyat saṃpravakṣyāmi janmadoṣapradaṃ dvija |
sutatrye sutājanma tattraye sutajanma cet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; अन्यत् = एक और (विषय); संप्रवक्ष्यामि = भलीभाँति कहूँगा; जन्मदोषप्रदम् = जन्म के समय दोष/अरिष्ट उत्पन्न करनेवाला; द्विज = हे द्विज (मैत्रेय); सुत = पुत्र, सुता = पुत्री, त्रय = तीन का समूह; सुतत्र्ये सुताजन्म = तीन पुत्रों के क्रम में पुत्री का जन्म; तत्त्रये सुतजन्म चेत् = (अथवा) उस त्रय में — तीन पुत्रियों के क्रम में — यदि पुत्र का जन्म हो।

हिन्दी भावार्थ अब, हे द्विज, मैं एक और प्रसंग कहता हूँ जो जन्म-काल में दोष देनेवाला माना गया है। यदि लगातार तीन पुत्रों के पश्चात् पुत्री का जन्म हो, अथवा तीन पुत्रियों के पश्चात् पुत्र का जन्म हो — शास्त्र इस विषम त्रिक-क्रम को विशेष दोष का लक्षण कहता है।

English rendering Now, O twice-born, I shall expound another matter held to bring affliction at birth: when, after three sons in succession a daughter is born, or after three daughters a son is born.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दोष-लक्षण (जन्म-क्रम का परिभाषा-कथन)। यहाँ एकमात्र संख्या 'त्रय = 3' है, और दोष का ढाँचा विशुद्ध क्रमबद्ध है: एक ही लिंग की तीन (3) संतति के पश्चात् विपरीत-लिंग की एक (1) संतति — अर्थात् 3+1 का क्रम-प्रतिरूप, न कि कोई ग्रह-गणना।

95.2
तदाऽरिष्टभयं ज्ञेयं पितृमातृकुलद्वये ।
तत्र शान्तिविधिं कुर्याद् वित्तशाठ्यविवर्जितः
tadā'riṣṭabhayaṃ jñeyaṃ pitṛmātṛkuladvaye |
tatra śāntividhiṃ kuryād vittaśāṭhyavivarjitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदा = तब; अरिष्टभयम् = अरिष्ट (अनिष्ट/मृत्यु-तुल्य संकट) का भय; ज्ञेयम् = जानना चाहिए; पितृ-मातृ-कुल-द्वये = पिता और माता — दोनों कुलों में; तत्र = उस स्थिति में; शान्तिविधिम् = शान्ति-कर्म की विधि; कुर्यात् = करे; वित्त-शाठ्य-विवर्जितः = धन में कृपणता/कंजूसी से रहित होकर।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि ऐसे जन्म-क्रम में पितृ-कुल और मातृ-कुल — दोनों पक्षों पर अरिष्ट का भय समझना चाहिए। इस स्थिति में मनुष्य को चाहिए कि धन के प्रति कृपणता त्यागकर, श्रद्धापूर्वक शान्ति-विधान सम्पन्न करे।

English rendering The text states that in such a case a fear of misfortune is to be recognized for both the paternal and maternal lines; there one should perform the pacifying rite, free of any miserliness with wealth.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आरिष्ट-कथन एवं विधि-निर्देश। 'द्वय = 2' दो कुलों की गणना मात्र सूचक है; शेष वाक्य फल-कथन तथा कर्तव्य-निर्देश है, कोई परिमेय गणना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस श्लोक का 'अरिष्ट-भय' शास्त्र का कथन है — हमारी ओर से कोई भविष्यवाणी या भय-प्रदर्शन नहीं। हमारी डिकोड-अनुशासना (CLAUDE.md + oracle, दोषियर §5) गणना को व्याख्या से पृथक रखती है: वर्ग/अष्टकवर्ग/दशा/बल = परिमेय गणना; जबकि अरिष्ट एवं शान्ति = शास्त्र का फल-वचन, जिसे हम 'शास्त्र कहता है' रूप में प्रस्तुत करते हैं — नियति या दबाव-रूप उपचार के रूप में नहीं।

95.3
सूतकान्तेऽथ वा शुद्धे समये च शुभे दिने ।
आचार्यमृत्विजो वृत्वा ग्रहयज्ञपुरस्सरम्
sūtakānte'tha vā śuddhe samaye ca śubhe dine |
ācāryamṛtvijo vṛtvā grahayajñapurassaram

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूतक-अन्ते = सूतक (जन्म-जनित अशौच) की समाप्ति पर; अथ वा शुद्धे = अथवा शुद्ध हो जाने पर; समये शुभे दिने च = शुभ मुहूर्त और शुभ दिन में; आचार्यम् ऋत्विजः वृत्वा = आचार्य (प्रधान) तथा ऋत्विजों (याज्ञिक पुरोहितों) का वरण करके; ग्रहयज्ञ-पुरस्सरम् = ग्रह-यज्ञ (नवग्रह-हवन) को अग्रगण्य रखते हुए।

हिन्दी भावार्थ सूतक की समाप्ति पर अथवा कुल के शुद्ध हो जाने पर, किसी शुभ दिन और शुभ मुहूर्त में, आचार्य एवं ऋत्विजों का वरण करके, ग्रह-यज्ञ को प्रमुख रखकर शान्ति-कर्म का आरम्भ करे।

English rendering At the close of the birth-impurity period, or once purity is restored, on an auspicious day and hour, having engaged the ācārya and the officiating priests, with the planetary sacrifice placed foremost —

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अनुष्ठान-काल एवं वरण-विधि। श्लोक केवल शुभ दिन/मुहूर्त की ओर संकेत करता है — जो पंचांग-गणना का विषय है — परन्तु स्वयं कोई संख्या या सूत्र नहीं देता।

95.4
ब्रह्मविष्णु महेशेन्द्रप्रतिमाः स्वर्णजाः शुभाः ।
पूजयेद् धान्यराशिस्थकलशोपरि भक्तितः
brahmaviṣṇu maheśendrapratimāḥ svarṇajāḥ śubhāḥ |
pūjayed dhānyarāśisthakalaśopari bhaktitaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्मविष्णुमहेशेन्द्रप्रतिमाः = ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र की प्रतिमाएँ; स्वर्णजाः = स्वर्ण-निर्मित; शुभाः = शुभ/मंगल; पूजयेत् = पूजे; धान्यराशिस्थ = धान्य-राशि पर स्थित; कलशोपरि = कलश के ऊपर; भक्तितः = भक्तिपूर्वक

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र की स्वर्ण-प्रतिमाएँ शुभ मानी गई हैं। उन्हें धान्य-राशि पर रखे कलश के ऊपर भक्ति से पूजे। यह प्रतिमा-पूजा का उपकरण-विधान है: धातु (स्वर्ण), देव-चतुष्क, और धान्य-कलश-आसन का क्रम स्पष्ट है।

English rendering Auspicious gold images of Brahmā, Viṣṇu, Maheśa, and Indra are to be worshipped with devotion, set upon a kalasha placed on a heap of grain.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपकरण/पूजा-विधान। देव-संख्या = 4 (ब्रह्मा–विष्णु–महेश–इन्द्र); कोई कोण, वर्ग-अंश या बिन्दु-सारणी नहीं।

95.5
चत्वारि रुद्रसूक्तानि शान्तिसूक्तानि सर्वशः ।
विप्र एको जपेद् होमकाले च सुचिसंयतः
catvāri rudrasūktāni śāntisūktāni sarvaśaḥ |
vipra eko japed homakāle ca sucisaṃyataḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चत्वारि = चार; रुद्रसूक्तानि = रुद्र-सूक्त; शान्तिसूक्तानि = शान्ति-सूक्त; सर्वशः = सभी / समग्रतः; विप्र एकः = एक ब्राह्मण; जपेत् = जप करे; होमकाले = होम-काल में; सुचिसंयतः = शुद्ध और संयत

हिन्दी भावार्थ होम-काल में शास्त्र निर्देश देता है — चार रुद्र-सूक्त तथा शान्ति-सूक्त समग्र रूप से जपे जाएँ। एक ही विप्र, शुद्ध और संयत रहकर, यह जप करे। “चत्वारि” यहाँ स्पष्ट संख्या है; शान्ति-सूक्तों का “सर्वशः” समग्रता-सूचक है, न कि कोई अंश-गणना।

English rendering At the time of the homa, one pure and self-restrained brāhmaṇa is to recite the four Rudra-sūktas and the śānti-sūktas in full.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — जप-संख्या/पाठ-निर्देश। रुद्र-सूक्त-गणना = 4; अन्य कोई रेखांकित स्थिरांक नहीं।

उदाहरण (worked example) होम-काल में एक जपकर्ता: रुद्र-सूक्त × 4 + शान्ति-सूक्त (सर्व) — यह पाठ-क्रम है, न कि ज्योतिष-वर्ग का मॉड्यूलर विभाजन।

95.6
आचार्यो जुहुयात्तत्र समिदाज्यतिलांश्चरुम् ।
अष्टोत्तरं सहस्रं वा शतं वाऽष्टौ च विंशतिम्
ācāryo juhuyāttatra samidājyatilāṃścarum |
aṣṭottaraṃ sahasraṃ vā śataṃ vā'ṣṭau ca viṃśatim

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आचार्यः जुहुयात् तत्र = आचार्य वहाँ आहुति दे; समिध्-आज्य-तिलान् चरुम् = समिधा, आज्य (घृत), तिल और चरु (पक्व हविष्य); अष्टोत्तरम् = आठ अधिक (अष्ट + उत्तर); सहस्रम् = 1000; शतम् = 100; अष्टौ च विंशतिम् = आठ और बीस।

हिन्दी भावार्थ आचार्य वहाँ समिधा, घृत, तिल और चरु से आहुति दे — एक हजार आठ (1008), अथवा एक सौ (आठ) [108/100], अथवा अट्ठाईस (28) आहुतियाँ — यजमान के सामर्थ्य अनुसार संख्या नियत करे।

English rendering There the ācārya should offer oblations of fuel-sticks, ghee, sesame and cooked caru — one thousand and eight, or a hundred (and eight), or twenty-eight.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) यह श्लोक सामासिक शब्द-संख्याओं में आहुति-गणना देता है:
- अष्टोत्तरं सहस्रम् = 1000 + 8 = 1008
- (अष्टोत्तरं) शतम् = 100 + 8 = 108 — अथवा केवल शतम् = 100 (पाठ-भेद संभव: 'अष्टोत्तर' का अन्वय 'शत' के साथ हो तो 108, स्वतन्त्र हो तो 100)
- अष्टौ च विंशतिम् = 8 + 20 = 28

आहुति-संख्या ∈ {1008, 108 (वा 100), 28} — तीन वैकल्पिक स्तर।

उदाहरण (worked example) सामासिक अंक का विच्छेद अंक-सत्य रूप में — 'अष्टौ च विंशतिम्' → 8 + 20 = 28; 'अष्टोत्तरं सहस्रम्' → अष्ट(8) + उत्तर(अधिक) + सहस्र(1000) = 1008; 'अष्टोत्तरं शतम्' → 8 + 100 = 108। मध्य-पद में 'अष्टोत्तर' के अन्वय पर 100 भी संभव (पाठ-भेद संभव)।

95.7
ब्रह्मादिसर्वदेवेभ्यः स्वस्वगृह्योक्तमन्त्रतः ।
ततः स्विष्टकृतं हुत्वा बलिं पूर्णाहुतिं पुनः
brahmādisarvadevebhyaḥ svasvagṛhyoktamantrataḥ |
tataḥ sviṣṭakṛtaṃ hutvā baliṃ pūrṇāhutiṃ punaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्मादिसर्वदेवेभ्यः = ब्रह्मा आदि सभी देवों के लिए; स्वस्वगृह्योक्तमन्त्रतः = अपने-अपने गृह्य-सूत्रोक्त मन्त्र से; ततः = तदनन्तर; स्विष्टकृतम् = स्विष्टकृत्-होम; हुत्वा = हवन कर; बलिम् = बलि; पूर्णाहुतिम् = पूर्णाहुति; पुनः = फिर/अन्त में

हिन्दी भावार्थ ब्रह्मा से लेकर समस्त देवों को अपने-अपने गृह्य-परम्परा में निर्दिष्ट मन्त्रों से आहुति दी जाए। तदनन्तर स्विष्टकृत् हवन कर, बलि और पूर्णाहुति पुनः सम्पन्न करे। यह यज्ञ-समापन का क्रम है — मन्त्र-स्रोत “स्व-गृह्योक्त” है, अतः गृह्य-पाठ-भेद संभव; ज्योतिष-वर्ग या दशा-गणित यहाँ नहीं जुड़ता।

English rendering Offerings are made to Brahmā and all the deities with the mantras prescribed in each one’s own gṛhya tradition; then, having offered the sviṣṭakṛt, one performs the bali and the pūrṇāhuti again.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — यज्ञ-समापन-क्रम (स्विष्टकृत् → बलि → पूर्णाहुति)। संख्यात्मक स्थिरांक नहीं; “स्वस्वगृह्योक्त” से मन्त्र-स्रोत गृह्य-परम्परा पर निर्भर — पाठ-भेद संभव।

95.8
अभिषेकं च जातस्य सकुटुम्बस्य कारयेत् ।
ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्याद् ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत्
abhiṣekaṃ ca jātasya sakuṭumbasya kārayet |
ṛtvigbhyo dakṣiṇāṃ dadyād brāhmaṇāṃścāpi bhojayet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभिषेकम् = स्नान/अभिषेक-कर्म; जातस्य = जातक (नवजात) का; सकुटुम्बस्य = परिवार-सहित; कारयेत् = करवाए; ऋत्विग्भ्यः = यज्ञ-ऋत्विजों को; दक्षिणाम् = दक्षिणा/दक्षिणा-दान; दद्यात् = दे; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; भोजयेत् = भोजन करवाए।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जातक का, परिवार-सहित, अभिषेक-कर्म करवाया जाए। फिर ऋत्विजों को दक्षिणा दी जाए और ब्राह्मणों को भी भोजन कराया जाए। यह क्रम शान्ति-विधि के अनुष्ठान-पक्ष को बताता है—गणित नहीं, कर्म-विधान।

English rendering The text states that the native’s abhiṣeka should be performed together with the family; dakṣiṇā should then be given to the officiating priests, and brāhmaṇas should also be fed.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — कर्म-विधान / शान्ति-अनुष्ठान-फल-कथन। यह श्लोक अभिषेक, दक्षिणा और ब्राह्मण-भोजन की क्रमबद्ध विधि का निर्देश है; कोई वर्ग-विभाजन, बल-इकाई या दशा-वर्ष यहाँ नहीं आता।

95.9
कांस्याज्यवीक्षणं कृत्वा दीनानाथांश्च तर्पयेत् ।
एवं शान्त्या च मैत्रेय सर्वारिष्टं विलीयते
kāṃsyājyavīkṣaṇaṃ kṛtvā dīnānāthāṃśca tarpayet |
evaṃ śāntyā ca maitreya sarvāriṣṭaṃ vilīyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कांस्य-आज्य-वीक्षणम् = कांस्य-पात्र में (रखे) घृत में (मुख/प्रतिबिम्ब का) दर्शन; कृत्वा = करके; दीन-अनाथान् च तर्पयेत् = दीनों और अनाथों को (दान/अन्न से) तृप्त करे; एवं शान्त्या च = इस प्रकार शान्ति-कर्म से; मैत्रेय = हे मैत्रेय; सर्व-अरिष्टं विलीयते = समस्त अरिष्ट विलीन हो जाता है।

हिन्दी भावार्थ कांस्य-पात्र में रखे घृत में (शिशु/पिता का) दर्शन कराकर दीन-अनाथों को तृप्त करे। शास्त्र कहता है — हे मैत्रेय, इस प्रकार शान्ति-विधान से समस्त अरिष्ट विलीन हो जाता है।

English rendering Having performed the gazing into ghee held in a bronze vessel, one should gratify the poor and the destitute. Thus, O Maitreya — the text states — by this pacification all affliction is dissolved.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (शान्ति का समापन-फल)। 'सर्वारिष्टं विलीयते' सम्पूर्ण विधान का फल-वचन है — शास्त्र का कथन, कोई परिमेय राशि नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) 'सर्वारिष्टं विलीयते' शास्त्र का समापन-फल-वचन है — हमारा समर्थित पूर्वानुमान नहीं। हमारी अनुशासन-नीति (दोषियर §5 एवं framing-rules) फल-वचन को पाठ की अपनी आवाज़ में रखती है और उपचार को भय या दबाव के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। जहाँ अंक आते हैं — जैसे v.6 की 1008/108/28 आहुतियाँ — वहीं तक हमारा exact-अंक-सत्य विच्छेद सीमित रहता है; फल-दावे पर नहीं।

अध्यायः 96

प्रसवविकारशान्त्यध्यायः

10 श्लोक
96.1
अथाऽहं सम्प्रवक्ष्यामि विकारं प्रसवोद्भवम् ।
येनाऽरिष्टं समस्तस्य ग्रामस्य च कुलस्य च
athā'haṃ sampravakṣyāmi vikāraṃ prasavodbhavam |
yenā'riṣṭaṃ samastasya grāmasya ca kulasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (अध्याय-प्रारम्भ); अहं सम्प्रवक्ष्यामि = मैं भली-भाँति कहूँगा; विकारम् = विकृति / असामान्य रूप; प्रसवोद्भवम् = प्रसव से उत्पन्न; येन = जिससे; अरिष्टम् = अशुभ / विपत्ति-संकेत; समस्तस्य ग्रामस्य = सम्पूर्ण ग्राम का; कुलस्य च = और कुल/वंश का।

हिन्दी भावार्थ आचार्य अब प्रसव से उत्पन्न विकारों का पूर्ण वर्णन आरम्भ करते हैं। शास्त्र कहता है कि ऐसे विकार केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते; उनसे पूरे ग्राम और कुल में अरिष्ट का संकेत माना गया है। यह अध्याय विकृत प्रसव को सामुदायिक और पारिवारिक अशुभ-चिह्न के रूप में प्रस्तुत करता है।

English rendering “I shall now fully expound the anomalies that arise at birth, by which affliction is said to befall the whole village and the family.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-उद्घाटन / विषय-निर्देश। यह श्लोक गणना नहीं सिखाता; यह प्रसव-विकार अध्याय की सीमा और उसके फल-क्षेत्र (ग्राम-कुल) को घोषित करता है।

96.2
अत्यल्पे वाऽधिके काले प्रसवो यदि जायते ।
हीनाङ्गोवाऽधिकाङ्गो वा विशिरा द्विशिरास्तथा
atyalpe vā'dhike kāle prasavo yadi jāyate |
hīnāṅgovā'dhikāṅgo vā viśirā dviśirāstathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत्यल्पे काले = अति अल्प काल में (असमय/अत्यल्प अवधि); वा अधिके काले = अथवा अधिक काल में; प्रसवो यदि जायते = यदि प्रसव हो; हीनाङ्गः = अंग-हीन; वा अधिकाङ्गः = अथवा अधिक अंग वाला; विशिराः = सिर-रहित; द्विशिराः = दो सिर वाला; तथा = तथा इसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जब प्रसव अत्यल्प या अत्यधिक काल में होता है, अथवा जब जात अंगहीन, अधिकांग, शिरहीन या द्विशिरस् हो — ये सब प्रसव-विकार की श्रेणी में गिने जाते हैं। यहाँ “काल” जन्म-समय की असामान्यता को भी छूता है और अंग-रूप की विकृति को भी। पाठ-भेद संभव: “अत्यल्पे/अधिके काले” को गर्भ-अवधि या प्रसव-क्रिया की अवधि दोनों रीतियों से पढ़ा गया है।

English rendering “If birth occurs in too short or too long a time, or if the offspring is limb-deficient or over-limbed, headless or two-headed — such forms belong to the class of birth-anomalies.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विकार-सूची / लक्षण-वर्णन। कोई वर्ग, दशा या बल-माप नहीं; केवल अशुभ-प्रसव के रूप-लक्षणों की गिनती है।

96.3
नार्या पश्वाकृतिर्वापि पशुष्वपि नराकृतिः ।
प्रसवस्य विकारोऽयं विनाशायोपजायते
nāryā paśvākṛtirvāpi paśuṣvapi narākṛtiḥ |
prasavasya vikāro'yaṃ vināśāyopajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नार्याः = नारी से (मनुष्य-प्रसव में); पश्वाकृतिः = पशु-आकृति; वा अपि = अथवा भी; पशुषु अपि = पशुओं में भी; नराकृतिः = मनुष्य-आकृति; प्रसवस्य विकारः अयम् = यह प्रसव का विकार; विनाशाय = विनाश के लिए; उपजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यदि मनुष्य-स्त्री से पशु-रूप का प्रसव हो, अथवा पशुओं में मनुष्य-रूप का जन्म दिखे — यह प्रसव-विकार विनाश का संकेत माना गया है। यह श्लोक रूप-विपर्यय (species-inversion) को केन्द्रीय विकार बताता है। फल-कथन शास्त्र का अपना दावा है; इसे निश्चित भविष्य या भय-वाक्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

English rendering “When a woman bears a creature of animal form, or when among animals a human form appears — the text states that this birth-anomaly arises toward destruction.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / विकार-परिभाषा। “विनाशाय” शास्त्रीय फल-शब्द है, न कि कोई संख्यात्मक सूत्र।

96.4
यस्य स्त्रियाः पशुनां वा विकाराः प्रसवोद्भवः ।
अनिष्टं भवने तस्य कुलेऽपि च महद् भवेत्
yasya striyāḥ paśunāṃ vā vikārāḥ prasavodbhavaḥ |
aniṣṭaṃ bhavane tasya kule'pi ca mahad bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यस्य = जिसके; स्त्रियाः = स्त्री के; पशुनां वा = अथवा पशुओं के; विकाराः प्रसवोद्भवः = प्रसव से उत्पन्न विकार; अनिष्टम् = अशुभ; भवने तस्य = उसके भवन/घर में; कुले अपि च = और कुल में भी; महत् भवेत् = महान (अनिष्ट) होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि जिस गृहस्थ की स्त्री या पशुओं में प्रसव-विकार उत्पन्न हो, उसके भवन और कुल में महान् अनिष्ट का संकेत माना गया है। यहाँ फल व्यक्तिगत से पारिवारिक-कुलिक स्तर तक फैलाया गया है। यह भय-व्यापार नहीं, शास्त्र की पारंपरिक अरिष्ट-भाषा का वक्तव्य है।

English rendering “For him whose wife or whose cattle show such birth-anomalies, the text states that great inauspiciousness arises in the house and in the lineage.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (गृह-कुल अनिष्ट)। कोई माप, अंश या बलांक नहीं।

96.5
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिः कार्या प्रयत्नतः ।
स्त्री वा गौवंडवा वापि परित्याज्या हितार्थिना
taddoṣaparihārārthaṃ śāntiḥ kāryā prayatnataḥ |
strī vā gauvaṃḍavā vāpi parityājyā hitārthinā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोषपरिहारार्थम् = उस दोष के परिहार हेतु; शान्तिः कार्या = शान्ति (अनुष्ठान) करनी चाहिए; प्रयत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; स्त्री वा = स्त्री अथवा; गौः = गौ; वडवा वा अपि = अथवा वडवा (घोड़ी/मादी अश्व); परित्याज्या = त्याज्य; हितार्थिना = हित चाहने वाले के द्वारा। पाठ-भेद संभव: “गौवंडवा” = गौ + वडवा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि उक्त दोष के निवारण के लिए शान्ति प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए; और हित चाहने वाले को संबंधित स्त्री, गौ या वडवा का परित्याग भी बताया गया है। यह पारंपरिक दोष-परिहार की भाषा है — दबाव-उपाय या अनिवार्य “इलाज” के रूप में नहीं पढ़ना। आधुनिक पाठक इसे ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विधि-निर्देश मानकर देखे, न कि आदेशात्मक भविष्य-चिकित्सा।

English rendering “For removing that fault, the text prescribes that a propitiatory rite (śānti) be carefully performed; and that one seeking welfare may renounce the woman, cow, or mare concerned.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विधि/परिहार-निर्देश (शान्ति + परित्याग)। कोई अंकगणितीय नियम नहीं; केवल शास्त्रीय उपचार-क्रम का कथन।

96.6
नार्याः पञ्चदशे वर्षे जन्मतः षोडशोऽपि वा ।
गर्भो वा प्रसवो वाऽपि न शुभाय प्रजायते
nāryāḥ pañcadaśe varṣe janmataḥ ṣoḍaśo'pi vā |
garbho vā prasavo vā'pi na śubhāya prajāyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नार्याः = नारी का; पञ्चदशे वर्षे = पंद्रहवें वर्ष में; जन्मतः = जन्म से गिनकर; षोडशः अपि वा = अथवा सोलहवाँ भी; गर्भः वा = गर्भ अथवा; प्रसवः वा अपि = अथवा प्रसव भी; न शुभाय = शुभ के लिए नहीं; प्रजायते = होता है।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि स्त्री के जन्म से पंद्रहवें अथवा सोलहवें वर्ष में गर्भ या प्रसव शुभफल के लिए नहीं माना गया। यहाँ स्पष्ट संख्याएँ हैं: १५ और १६ वर्ष — जन्मतिथि से पूर्ण वर्ष-गिनती का पारंपरिक संकेत। यह आयु-सीमा का फल-कथन है, चिकित्सकीय नियम या निश्चित हानि का प्रमाण नहीं।

English rendering “Pregnancy or childbirth in a woman’s fifteenth or sixteenth year from birth, the text states, does not arise for auspicious result.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणना-सूत्र नहीं, किन्तु शास्त्र-स्थिर आयु-सीमाएँ: जन्म से वर्ष = १५ अथवा १६।
समीकरण (केवल गिनती): आयु_वर्ष = पूर्ण_वर्ष (जन्म-तिथि से)। यदि आयु_वर्ष ∈ {१५, १६} तो शास्त्र गर्भ/प्रसव को “न शुभाय” कहता है। अयनांश/भाव-पद्धति यहाँ लागू नहीं।

उदाहरण (worked example) जन्मतिथि २०१०-०३-०१। तिथि २०२५-०६-०१ पर पूर्ण आयु = १५ वर्ष (पंद्रहवाँ वर्ष चल रहा/पूर्ण — गिनती-रीति घोषित करनी चाहिए: “पूर्ण हुए वर्ष” बनाम “चालू वर्ष”)। शास्त्र कहता है इस आयु-पट्टी में गर्भ/प्रसव शुभ के लिए नहीं। (केवल पाठ-अनुवाद; कोई चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं।)

96.7
सिंहराशिस्थितेऽर्क गौनक्रस्थे महिषी तथा ।
प्रसूता स्वामिनं हन्ति स्वयं चापि विनश्यति
siṃharāśisthite'rka gaunakrasthe mahiṣī tathā |
prasūtā svāminaṃ hanti svayaṃ cāpi vinaśyati

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सिंह-राशि-स्थिते अर्के = सूर्य के सिंह राशि में स्थित होने पर; गौः = गाय; नक्रस्थे = नक्र (= मकर) में स्थित होने पर; महिषी तथा = तथा महिषी (भैंस); प्रसूता = प्रसूत हुई; स्वामिनम् हन्ति = स्वामी को मारती है (शास्त्र-कथन); स्वयं च अपि विनश्यति = और स्वयं भी नष्ट होती है। पाठ-भेद संभव: “गौनक्रस्थे” को “गौ + नक्रस्थे” पढ़ा गया; नक्र = मकर का पर्याय।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि सिंह राशि में सूर्य स्थित हो तब गाय का प्रसव, और मकर (नक्र) में सूर्य हो तब महिषी का प्रसव — ऐसे प्रसूत पशु स्वामी का नाश करते और स्वयं भी विनष्ट होते माने गए हैं। यह राशि-काल से बँधा पशु-प्रसव फल है। फल-शब्द “हन्ति / विनश्यति” शास्त्र की अरिष्ट-भाषा हैं; इन्हें निश्चित घटना या भय-भविष्य के रूप में नहीं लेना।

English rendering “When the Sun is in Leo, a cow that calves, and when the Sun is in Makara (nakra), a she-buffalo that calves — the text states that such a birth kills the owner and the animal itself perishes.”

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) कोई वर्ग-सूत्र नहीं; केवल सूर्य की राशि-स्थिति की शर्त।
शर्त (सौर राशि, सायन/निरायन घोषित करें):
- गौ-प्रसव: λ☉ ∈ सिंह [१२०°, १५०°) — निरायन अयनांश के साथ, यदि भारतीय पंचांग-रीति अपनाई जाए।
- महिषी-प्रसव: λ☉ ∈ मकर [२७०°, ३००°)।
अयनांश (Lahiri/अन्य) बदलने से तिथि-सीमाएँ खिसकती हैं — संख्या राशि-सीमा पर निर्भर है, न कि फल पर।

उदाहरण (worked example) निरायन (लाहिरी) मानकर: सूर्य १३५° (सिंह १५°) पर कोई गौ प्रसूत — शास्त्र ९६.७ के अनुसार इस प्रसव को स्वामी-अनिष्ट और स्वयं-विनाश का संकेत कहता है। सूर्य २८५° (मकर १५°) पर महिषी-प्रसव — वही फल-श्रेणी। (केवल शास्त्र-शर्त का अनुवाद; कोई भविष्यवाणी नहीं।)

96.8
ब्राह्मणाय प्रदद्यात् तां शान्तिं वापि समाचरेत् ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां ग्रहाणां चैव पूजनम्
brāhmaṇāya pradadyāt tāṃ śāntiṃ vāpi samācaret |
brahmaviṣṇumaheśānāṃ grahāṇāṃ caiva pūjanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्राह्मणाय = ब्राह्मण के लिए/को; प्रदद्यात् = अर्पित करे, दे दे; तां = उस (पूर्वोक्त शान्ति-विधि/सामग्री) को; शान्तिं = उपद्रव-शमन का अनुष्ठान; वा अपि = अथवा; समाचरेत् = स्वयं विधिवत् करे; ब्रह्म-विष्णु-महेशानाम् = ब्रह्मा, विष्णु और महेश की; ग्रहाणाम् = ग्रहों की; च एव = तथा ही; पूजनम् = पूजा-अर्चना।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ शान्ति-कर्म के दो सरल मार्ग बताता है — या तो वह शान्ति ब्राह्मण को अर्पित कर दी जाए, अथवा स्वयं विधिपूर्वक उसका आचरण किया जाए। उसी क्रम में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पूजन, तथा ग्रहों का पूजन भी विहित कहा गया है। यह फल-कथन नहीं, अनुष्ठान-निर्देश का स्वर है: त्रिदेव-पूजा और ग्रह-पूजा को शान्ति-क्रम का अभिन्न अंग माना गया है।

English rendering The text directs that the said pacification be given over to a brāhmaṇa, or else performed oneself in due form; and likewise the worship of Brahmā, Viṣṇu, and Maheśa, as also of the grahas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अनुष्ठान-निर्देश / शान्ति-विधि। यहाँ कोई भार्ग, अंश, वर्ग-विभाग या बल-माप नहीं; केवल कर्म-क्रम का शास्त्रीय कथन है — ब्राह्मण-अर्पण अथवा स्व-समाचरण, साथ में त्रिदेव- और ग्रह-पूजन।

96.9
सर्वं होमादिकं कर्म कुर्यात् त्रितरशान्तिवत् ।
ततो गृहो सुखी भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते
sarvaṃ homādikaṃ karma kuryāt tritaraśāntivat |
tato gṛho sukhī bhūtvā sarvapāpaiḥ pramucyate

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वम् = समस्त; होम-आदिकम् = होम आदि; कर्म = अनुष्ठान-कार्य; कुर्यात् = करे; त्रितर-शान्ति-वत् = त्रितर-शान्ति की भाँति (त्रिदेव/त्रिविध शान्ति-क्रम; पाठ-भेद संभव); ततः = उसके पश्चात्; गृही/गृहो = गृहस्थ (पाठ-भेद संभव — गृहो/गृही); सुखी भूत्वा = सुख-युक्त होकर; सर्व-पापैः = समस्त पापों से; प्रमुच्यते = मुक्त हो जाता है — ऐसा शास्त्र का फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि होम आदि समस्त कर्म त्रितर-शान्ति की रीति से संपन्न किए जाएँ। “त्रितरशान्तिवत्” का पाठ कुछ संस्करणों में भिन्न हो सकता है; प्रसंगतः पूर्व श्लोक के ब्रह्मा-विष्णु-महेश क्रम से जोड़कर त्रिविध/त्रिदेव-शान्ति की भाँति समझना सहज है। इसके अनन्तर, शास्त्र का अपना फल-कथन है कि गृहस्थ सुखी होकर सर्व-पापों से मुक्त होता है — यह शास्त्र का दावा है, न कि हमारे द्वारा दी गई निश्चितता।

English rendering The text states that all rites beginning with homa should be done in the manner of the trita(ra)-śānti (reading may vary); thereafter, it claims, the householder becomes happy and is released from all demerit.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन सह अनुष्ठान-निर्देश। कोई संख्या, दशा-वर्ष, बिन्दु-गणना या वर्ग-नियम नहीं; “त्रितरशान्तिवत्” कर्म-मानक का संकेत है, और “सर्वपापैः प्रमुच्यते” शास्त्र का अपना फल-वाक्य है — इसे भाग्य-निर्णय या भय-कथन के रूप में नहीं पढ़ना।

96.10
एवं त्वरिष्टे सम्प्राप्ते नरः शान्तिं करोति यः ।
सर्वान् कामानवाप्नोति चिरजीवी सुखी च सः
evaṃ tvariṣṭe samprāpte naraḥ śāntiṃ karoti yaḥ |
sarvān kāmānavāpnoti cirajīvī sukhī ca saḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; तु = ही/परन्तु; अरिष्टे सम्प्राप्ते = अरिष्ट के उपस्थित होने पर; नरः = मनुष्य; शान्तिं करोति यः = जो शान्ति करता है; सर्वान् कामान् = समस्त कामनाओं को; अवाप्नोति = प्राप्त करता है — शास्त्र का कथन; चिर-जीवी = दीर्घायु; सुखी च = और सुखी; सः = वह।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र सार रूप में कहता है — जब अरिष्ट की स्थिति आ जाए, तब जो नर शान्ति-अनुष्ठान करता है, वह समस्त कामनाएँ पाता है, चिरजीवी और सुखी होता है। यह अरिष्ट-शान्ति-अध्याय का फल-निष्कर्ष है: शान्ति को यहाँ उपाय-क्रम के रूप में रखा गया है, न कि भय बढ़ाने वाले निर्णय के रूप में। ध्यान रहे — यह शास्त्र का अपना वाक्य है; हम इसे भाग्य की गारंटी, चिकित्सा-आश्वासन, या दबावपूर्ण “उपाय” के रूप में नहीं दुहराते।

English rendering Thus, the text states, when an ariṣṭa has set in, the person who performs śānti attains all desired ends, lives long, and is happy — reported as the śāstra’s claim, not as fate we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन / अरिष्ट-शान्ति का निगमन। कोई दशा-अनुपात, बल-रूप, या वर्ग-विभाजन नहीं; केवल शास्त्रीय फल-सूक्ति — “शान्ति करने वाला कामना-प्राप्ति, चिरजीवन और सुख पाता है” — जिसे गणना से सिद्ध नहीं किया जाता, केवल पाठ-वचन के रूप में रखा जाता है।

अध्यायः 97

अथोपसंहाराध्यायः

25 श्लोक
97.1
यच्छास्त्रं ब्रह्मणा प्रोक्तं नारदाय महात्मने ।
तदेव शौनकादिभ्यो नारदः प्राह सादरम्
yacchāstraṃ brahmaṇā proktaṃ nāradāya mahātmane |
tadeva śaunakādibhyo nāradaḥ prāha sādaram

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यत् शास्त्रम् = जो शास्त्र; ब्रह्मणा प्रोक्तम् = ब्रह्मा द्वारा कहा गया; नारदाय महात्मने = महात्मा नारद के लिए; तदेव = वही (अपरिवर्तित); शौनकादिभ्यः = शौनक आदि (ऋषियों) को; नारदः प्राह = नारद ने कहा; सादरम् = आदरपूर्वक / श्रद्धा से।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक शास्त्र की परंपरा-श्रृंखला बताता है। जो होरा-शास्त्र ब्रह्मा ने महात्मा नारद को कहा, उसी को नारद ने आदर सहित शौनक आदि ऋषियों तक पहुँचाया। ग्रन्थ यहाँ स्वयं को ब्रह्मा → नारद → शौनकादि की श्रुति-परंपरा में रखता है — ज्ञान का स्रोत और क्रम स्पष्ट किया गया है।

English rendering That very śāstra which Brahmā spoke to the great-souled Nārada, Nārada in turn taught with reverence to Śaunaka and the others. The verse frames the text as a transmitted tradition, not a solitary invention.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — परंपरा-वर्णन / संवाद-श्रृंखला। यह अध्याय के आरंभ में ज्ञान की वंशावली (paramparā) स्थापित करता है; गणना-नियम यहाँ नहीं आते।

97.2
ततो मया यथा ज्ञातं तुभ्यमुक्तं तथा द्विज ।
नासूयकाय दातव्यं परनिन्दारताय वा
tato mayā yathā jñātaṃ tubhyamuktaṃ tathā dvija |
nāsūyakāya dātavyaṃ paranindāratāya vā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तब / उसके बाद; मया यथा ज्ञातम् = जैसा मैंने जाना; तुभ्यम् उक्तम् तथा = वैसा ही तुम्हें कहा; द्विज = हे द्विज (ब्राह्मण / दीक्षित); न असूयकाय = ईर्ष्यालु / दोष-दृष्टि वाले को नहीं; दातव्यम् = देना चाहिए; पर-निन्दा-रताय वा = अथवा पर-निन्दा में रत को (भी नहीं)।

हिन्दी भावार्थ आचार्य कहते हैं — जैसा यह शास्त्र मुझे ज्ञात हुआ, वैसा ही मैंने आपको कहा। किन्तु यह ज्ञान असूया करने वाले को नहीं देना; न ही पर-निन्दा में लगे हुए को। श्लोक शिष्य-पात्रता की पहली सीमा खींचता है: ज्ञान-दान का अधिकार केवल योग्य श्रोता के लिए।

English rendering “As I came to know it, so have I told it to you, O twice-born. It must not be given to the envious, nor to one devoted to censuring others.” The verse sets a first rule of transmission: withhold the teaching from malice and fault-finding.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुरु-शिष्य-नियम / पात्रता-कथन। यह फल-गणना नहीं, अपितु शास्त्र-प्रदान की नीति है।

97.3
जडाय दुर्विनीताय नाज्ञाताय कदाचन ।
देयमेतत्सुरिलाय भक्ताय सत्यवादिने
jaḍāya durvinītāya nājñātāya kadācana |
deyametatsurilāya bhaktāya satyavādine

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जडाय = जड़ / मन्द-बुद्धि को; दुर्विनीताय = अविनीत / दुराचारी को; न अज्ञाताय = अज्ञात (अयोग्य / अपरिचित) को नहीं; कदाचन = कभी भी; देयम् एतत् = यह (शास्त्र) देना चाहिए; सुरिलाय = सुशील / शुद्ध-स्वभाव वाले को (पाठ-भेद संभव: सुशीलाय आदि); भक्ताय = भक्त / श्रद्धालु को; सत्यवादिने = सत्यवादी को।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जड़, दुर्विनीत, अथवा अज्ञात-अयोग्य व्यक्ति को यह कभी न दिया जाए। देय है सुशील (सुरिल) स्वभाव वाले को, भक्त को, और सत्य बोलने वाले को। निषेध और विधि दोनों एक ही श्लोक में बँधे हैं: पात्रता चरित्र और सत्यनिष्ठा से मापी जाती है।

English rendering Never give this to the dull, the ill-mannered, or the unknown/unworthy. It is to be given to the pure-natured (text: surila; पाथ-भेद संभव), the devoted, and the truth-speaker. Transmission is conditioned on character, not curiosity alone.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — पात्रता-विधि / निषेध-कथन। यह hoरा-नियम नहीं, शिक्षा-नीति का श्लोक है।

97.4
मेधाविने विनीताय सम्यग् ज्ञातकुलाय च ।
पुण्यदं ज्यौतिषं शास्त्रमग्र्यं वेदाङ्गमुत्तमम्
medhāvine vinītāya samyag jñātakulāya ca |
puṇyadaṃ jyautiṣaṃ śāstramagryaṃ vedāṅgamuttamam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेधाविने = मेधावी / बुद्धिमान को; विनीताय = विनम्र को; सम्यक् ज्ञात-कुलाय च = और सम्यक् ज्ञात कुल वाले को; पुण्यदम् = पुण्य देने वाला; ज्यौतिषं शास्त्रम् = ज्योतिष शास्त्र; अग्र्यम् = श्रेष्ठ / अग्रगण्य; वेदाङ्गम् उत्तमम् = उत्तम वेदाङ्ग।

हिन्दी भावार्थ योग्य पात्र आगे भी गिनाए गए: मेधावी, विनीत, और जिसका कुल सम्यक् रूप से ज्ञात हो। शास्त्र स्वयं को “पुण्यद” कहता है — पुण्य देने वाला — तथा ज्योतिष को अग्र्य वेदाङ्ग, उत्तम वेदाङ्ग घोषित करता है। यह स्तुति-वाक्य है; गणना-सूत्र नहीं।

English rendering Give it also to the intelligent, the humble, and one of well-known lineage. The text calls Jyotiṣa a merit-bestowing śāstra — the foremost and supreme among the Vedāṅgas. Praise of rank, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति / पात्रता-विस्तार। “वेदाङ्ग” यहाँ शास्त्रीय पद है; अंश-विभाजन या दशा-वर्ष नहीं।

97.5
जानाति कालमानं यो ग्रहर्क्षाणां च संस्थितिम् ।
होराशास्त्रमिदं सम्यक् स विजानाति नाऽपरः
jānāti kālamānaṃ yo graharkṣāṇāṃ ca saṃsthitim |
horāśāstramidaṃ samyak sa vijānāti nā'paraḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) जानाति = जानता है; काल-मानम् = काल का मान / समय-माप; यः = जो; ग्रह-ऋक्षाणाम् = ग्रहों और नक्षत्रों की; च संस्थितिम् = और स्थिति / स्थिति-क्रम; होरा-शास्त्रम् इदम् = इस होरा-शास्त्र को; सम्यक् = सम्यक् रूप से; सः विजानाति = वही जानता है; न अपरः = अन्य नहीं।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो काल का मान जानता है और ग्रहों तथा ऋक्षों (नक्षत्रों) की संस्थिति जानता है, वही इस होरा-शास्त्र को सम्यक् जानता है; अन्य नहीं। ज्ञान की कुंजी यहाँ “समय-माप + ग्रह-नक्षत्र-स्थिति” है — होरा का द्वार गणना-योग्य आकाश-ज्ञान से खुलता है।

English rendering He who knows the measure of time and the placement of the grahas and the ṛkṣas (nakṣatras) — he alone truly understands this Horā-śāstra; no other. Competence is defined as mastery of time-reckoning and celestial configuration.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — योग्यता-कथन (कालमान + ग्रह-ऋक्ष संस्थिति)। श्लोक स्वयं अंश-सूत्र नहीं देता; किन्तु होरा को “समय-माप और स्थिति-ज्ञान” पर टिकाता है — वही क्षेत्र जहाँ देशान्तर, लग्न, नक्षत्र-अंश आदि आधुनिक संकेतन में तय होते हैं (अयनांश, गृह-पद्धति घोषित करके)।

हमारा डिकोड (Our Decode) इसी श्लोक की दिशा में हमारा ढाँचा है: ज्योतिष = स्रोत-पाठ + गणना-मॉडल। कालांश, ग्रह-देशान्तर, नक्षत्र-स्थिति — ये ephemeris / panchang / daśā इंजनों में निश्चित नियमों से निकलते हैं; फल-भाषा अलग रखी जाती है। “सम्यक् जानाति” का अनुशासन हमारे पास exact-`==` जाँच है — सहन-पट्टी नहीं, पिन किए गए स्थिरांक।

97.6
होराशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सत्यवाग् विजितेन्द्रियः ।
शुभाऽशुभं फलं वक्ति सत्यं तद्वचनं भवेत्
horāśāstrārthatattvajñaḥ satyavāg vijitendriyaḥ |
śubhā'śubhaṃ phalaṃ vakti satyaṃ tadvacanaṃ bhavet

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) होरा-शास्त्र-अर्थ-तत्त्वज्ञः = होरा-शास्त्र के अर्थ-तत्त्व का ज्ञाता; सत्य-वाक् = सत्यवादी; विजित-इन्द्रियः = जितेन्द्रिय; शुभ-अशुभम् फलम् = शुभ-अशुभ फल; वक्ति = कहता है; सत्यम् = सत्य; तत् वचनम् भवेत् = वह वचन (सत्य) होता है — शास्त्र का कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो होरा-शास्त्र के अर्थ-तत्त्व को जानता है, सत्य बोलता है, और इन्द्रियों पर विजय रखता है, जब वह शुभ-अशुभ फल कहता है, तो उसका वचन सत्य होता है। यह फल-कथन की नैतिक शर्त है, न कि स्वतःसिद्ध नियति। पाठ पात्रता (ज्ञान + सत्य + संयम) को फल-वाणी की प्रामाणिकता से जोड़ता है।

English rendering The text states: one who knows the essential meaning of the Horā-śāstra, speaks truthfully, and has mastered the senses — when such a person utters śubha and aśubha phala, that speech becomes true. Authority is tied to knowledge, veracity, and self-restraint; the verse does not license casual prediction.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-वाणी की पात्रता / शास्त्रीय दावा। शुभ-अशुभ फल यहाँ “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें; गणना (वर्ग, अष्टकवर्ग, दशा, बल) अलग परत है, फल-भाषा अलग।

हमारा डिकोड (Our Decode) इसी भेद पर हमारा अनुशासन टिका है — गणित और व्याख्या अलग। वर्ग-विभाजन, अष्टकवर्ग बिन्दु, विंशोत्तरी १२० वर्ष, षड्बल — ये exact computation; फल-वाक्य “शास्त्र कहता है” के रूप में रिपोर्ट, नियति या भय के रूप में नहीं। च.६६ के ४८/४९/…/३३७ जैसे स्थिरांक `==` पर पिन हैं; फल-भाषा को उन स्थिरांकों के साथ मिलाकर “निश्चय” नहीं बनाया जाता।

97.7
ये सुशास्त्रं पठन्तीदं ये वा शृण्वन्ति भक्तितः ।
तेषांमायुर्बलं वित्तं वृद्धिमेति यशः सदा
ye suśāstraṃ paṭhantīdaṃ ye vā śṛṇvanti bhaktitaḥ |
teṣāṃmāyurbalaṃ vittaṃ vṛddhimeti yaśaḥ sadā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ये = जो; सुशास्त्रम् = इस उत्तम शास्त्र को; पठन्ति इदम् = पढ़ते हैं; ये वा = अथवा जो; शृण्वन्ति भक्तितः = भक्ति से सुनते हैं; तेषाम् = उनका; आयुः = आयु; बलम् = बल; वित्तम् = धन; वृद्धिम् एति = वृद्धि को प्राप्त होता है; यशः = यश; सदा = सदा — शास्त्र का फल-कथन।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है — जो इस सुशास्त्र को पढ़ते हैं, अथवा भक्तिपूर्वक सुनते हैं, उनका आयु, बल, वित्त और यश सदा वृद्धि को प्राप्त होता है। यह अध्ययन-श्रवण का पारंपरिक फल-वचन है; संख्यात्मक आयुर्दाय-सूत्र यहाँ नहीं। पाठ-भेद संभव जहाँ “तेषांमायुर्…” सन्धि-लेखन में भिन्न मुद्रण हों।

English rendering The text states: those who study this excellent śāstra, or who listen to it with devotion — their life-span, strength, wealth, and fame continually increase. A closing phala for study and hearing, not a computational longevity formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — फल-कथन (अध्ययन-श्रवण का शास्त्रोक्त फल)। आयुर्दाय के संख्या-नियम अन्य अध्यायों (आयुर्दाय प्रकरण) में हैं; यहाँ केवल अध्ययन का आशीर्वाद-सा फल-वाक्य है — “शास्त्र कहता है”, नियति-घोषणा नहीं।

97.8
इत्थं पराशरेणोक्तं होराशास्त्रं चमत्कृतम् ।
नवं नवजनप्रीत्यै विविधाध्यायसंयुतम्
itthaṃ parāśareṇoktaṃ horāśāstraṃ camatkṛtam |
navaṃ navajanaprītyai vividhādhyāyasaṃyutam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इत्थम् = इस प्रकार / यथापूर्व; पराशरेण = पराशर मुनि द्वारा; उक्तम् = कथित / उपदिष्ट; होराशास्त्रम् = होरा-विद्या का शास्त्र (जातक-ज्योतिष); चमत्कृतम् = अद्भुत / विस्मयकारी; नवम् = नूतन / नवीन; नवजनप्रीत्यै = नव-जन (नई पीढ़ी) की प्रसन्नता हेतु; विविधाध्यायसंयुतम् = अनेक अध्यायों से युक्त।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इसी रीति से पराशर ने यह अद्भुत होराशास्त्र कहा है। यह नूतन है और नई पीढ़ी की प्रीति के लिए अनेक प्रकार के अध्यायों से संबद्ध है। यह श्लोक ग्रन्थ-समाप्ति की दिशा में ग्रन्थ-गुण-कथन का स्वर रखता है—शास्त्र अपने को पराशर-वाणी और अध्याय-विन्यास दोनों से जोड़ता है।

English rendering Thus, the text states, Parāśara has set forth this wondrous Horā-śāstra—fresh, composed for the delight of a new generation, and furnished with manifold chapters.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रन्थ-गुण-कथन / उपसंहार-वर्णन। यह श्लोक गणना-नियम नहीं देता; यह ग्रन्थ की उत्पत्ति (पराशर-उक्ति) और उसकी अध्याय-संपन्नता का स्मरण मात्र है।

97.9
श्रेष्ठं जगद्धितायेदं मैत्रेयाय द्विजन्मने ।
ततः प्रचरितं पृथ्व्यामादृतं सादरं जनैः
śreṣṭhaṃ jagaddhitāyedaṃ maitreyāya dvijanmane |
tataḥ pracaritaṃ pṛthvyāmādṛtaṃ sādaraṃ janaiḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) श्रेष्ठम् = उत्कृष्ट; जगद्धिताय = जगत्-हित के लिए; इदम् = यह (होराशास्त्र); मैत्रेयाय = मैत्रेय को; द्विजन्मने = द्विज / ब्राह्मण शिष्य को; ततः = तत्पश्चात्; प्रचरितम् = प्रचलित / फैला; पृथ्व्याम् = पृथ्वी पर; आदृतम् = सम्मानित; सादरम् = आदरपूर्वक; जनैः = लोगों द्वारा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि यह श्रेष्ठ ग्रन्थ जगत् के हित के लिए मैत्रेय द्विज को दिया गया। तदनन्तर यह पृथ्वी पर प्रचलित हुआ और जन-समुदाय ने इसे सादर ग्रहण किया। यह श्लोक गुरु-शिष्य-संवाद की परंपरा और ग्रन्थ-प्रचार दोनों को एक ही वाक्य में बाँधता है—पहले मैत्रेय को, फिर लोक को।

English rendering The text states that this excellent work, meant for the world’s welfare, was given to the twice-born Maitreya; thereafter it spread upon the earth and was received by people with reverence.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / प्रचार-वर्णन। कोई अंश, वर्ष, बल-इकाई या वर्ग-नियम यहाँ कूटित नहीं; यह आख्यानिक उपसंहार है।

97.10
ग्रन्थेऽस्मिन् पृथगध्यायैर्विषया विनिवेशिताः ।
सृष्टिक्रमोऽवताराश्च गुणाः खेटस्य भस्य च
granthe'smin pṛthagadhyāyairviṣayā viniveśitāḥ |
sṛṣṭikramo'vatārāśca guṇāḥ kheṭasya bhasya ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रन्थेऽस्मिन् = इस ग्रन्थ में; पृथक्-अध्यायैः = अलग-अलग अध्यायों द्वारा; विषयाः = विषय; विनिवेशिताः = स्थापित / क्रमबद्ध; सृष्टिक्रमः = सृष्टि-क्रम; अवताराः = अवतार; च = और; गुणाः = गुण / स्वभाव; खेटस्य = ग्रह के; भस्य = राशि (भ) के; च = तथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इस ग्रन्थ में विषय पृथक्-पृथक् अध्यायों में विनिवेशित हैं। सबसे पहले सृष्टि-क्रम और अवतार, फिर खेट (ग्रह) तथा भ (राशि) के गुण—यह सूची ग्रन्थ-संरचना का आरम्भिक मानचित्र है। पाठक को स्मरण रहता है कि होरा-शास्त्र मात्र फल-कथन नहीं, सृष्टि-सिद्धांत से ग्रह-राशि-स्वरूप तक का क्रमबद्ध विन्यास है।

English rendering In this treatise, the text states, the topics are set out in separate chapters: the order of creation and the avatāras, and the qualities of the planets (kheṭa) and of the signs (bha).

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-सूची / अनुक्रमणिका-वर्णन। यह अध्याय-क्रम का कथन है; यहाँ कोई संख्यात्मक सूत्र नहीं, किन्तु “खेटस्य भस्य च गुणाः” बाद के ग्रह-राशि-स्वभाव अध्यायों की ओर संकेत करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक उसी संरचना का आरम्भ-बिंदु है जिस पर यह संस्करण टिका है—सृष्टि/अवतार (अ. 1–2) से ग्रह-राशि स्वरूप (अ. 3–5)। Wikisource-पाठ पर यह संस्करण 97 अध्याय / 3,943 श्लोक में पिन किया गया है; पाठ-भेद अन्य संस्करणों में संभव।

97.11
विशेषलग्नं वर्गाश्च तद्विवेकश्च राशिदृक् ।
अरिष्टं तद्विभङ्गश्च विवेको भावजस्तथा
viśeṣalagnaṃ vargāśca tadvivekaśca rāśidṛk |
ariṣṭaṃ tadvibhaṅgaśca viveko bhāvajastathā

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विशेषलग्नम् = विशेष लग्न (सूर्योदयादि से भिन्न लग्न-भेद); वर्गाः = वर्ग / विभागीय कुण्डलियाँ; तद्विवेकः = उनका विवेक / निर्णय-विधि; राशिदृक् = राशि-दृष्टि; अरिष्टम् = अरिष्ट (बालादि-पीड़ा-योग); तद्विभङ्गः = उसका विभंग / भंग; विवेकः भावजः = भाव-जन्य विवेक; तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि आगे के अध्यायों में विशेष लग्न, वर्ग और उनका विवेक, तथा राशि-दृष्टि स्थापित हैं। फिर अरिष्ट और उसका विभंग, तथा भाव से उत्पन्न विवेक—यह क्रम वर्ग-गणित से दृष्टि और अरिष्ट-विचार तक का पुल बनाता है। “वर्गाः” शब्द षोडश-वर्ग-शृंखला का द्वार है; “राशिदृक्” दृष्टि-नियमों का।

English rendering The text states that special lagnas, the vargas and their discrimination, and sign-aspect (rāśi-dṛk) are treated; likewise ariṣṭa, its cancellation (vibhaṅga), and house-based discrimination.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-सूची (वर्ग / दृष्टि / अरिष्ट)। स्वयं श्लोक कोई अंश-सूत्र नहीं देता; किन्तु “वर्गाः” D1…D60-प्रकार की समान-चाप विभाजन-योजना की ओर संकेत करता है, जिसकी विस्तृत नियम अगले अध्यायों में हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “वर्गाः / तद्विवेकः” सीधे षोडश-वर्ग (अ. 6–7) से जुड़ता है—D1, D2(होरा), D3, D4, D7, D9(नवांश), D10…D60—प्रत्येक 30° राशि का नियत-चाप मॉड्यूलर विभाजन। दृष्टि-अध्याय (अ. 8) और अरिष्ट (अ. 9–10) इसी सूची के अगले पद हैं; गणना को फल-वाक्य से अलग रखने का अनुशासन यहीं से लागू रहता है।

97.12
भावानां च फलाध्यायो भावेशोत्थफलं तथा ।
अप्रकाशफलं स्पष्टखेटदृष्टिप्रसाधनम्
bhāvānāṃ ca phalādhyāyo bhāveśotthaphalaṃ tathā |
aprakāśaphalaṃ spaṣṭakheṭadṛṣṭiprasādhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भावानाम् = भावों का; फल-अध्यायः = फल-अध्याय; भावेश-उत्थ-फलम् = भाव-ईश से उत्पन्न फल; तथा = तथा; अप्रकाश-फलम् = अप्रकाश (राहु-केतु आदि / अप्रकाशित) का फल; स्पष्ट-खेट = स्पष्ट (गणित-शुद्ध) ग्रह; दृष्टि-प्रसाधनम् = दृष्टि का साधन / निर्धारण।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि भावों का फलाध्याय और भावेश से उत्पन्न फल—दोनों यहाँ विषय हैं। साथ ही अप्रकाश-फल तथा स्पष्ट खेटों की दृष्टि का प्रसाधन (निर्धारण-विधि) भी गिनाया गया है। यह श्लोक भाव-फल-श्रृंखला को “स्पष्ट” गणित (देशान्तर-शुद्ध ग्रह-स्थान) से जोड़ता है: पहले स्थान-शुद्धि, फिर दृष्टि, फिर फल-कथन।

English rendering The text states that there is a chapter on house-results and on results arising from the lords of the houses; also the results of the non-luminous (aprakāśa), and the determination of the aspects of the computed (spaṣṭa) planets.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-सूची (भाव-फल / दृष्टि-प्रसाधन)। “स्पष्टखेट” का संकेत यह है कि दृष्टि-निर्णय से पहले ग्रह-स्थान गणितीय रूप से स्पष्ट होना चाहिए; स्वयं यहाँ कोई °/′ सूत्र नहीं दिया गया।

97.13
ततः स्पष्टबलाध्यायः इष्टकष्टप्रसाधनम् ।
पदं चोपपदं तद्वदर्गला त्वथ कारकाः
tataḥ spaṣṭabalādhyāyaḥ iṣṭakaṣṭaprasādhanam |
padaṃ copapadaṃ tadvadargalā tvatha kārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तत्पश्चात्; स्पष्टबल-अध्यायः = स्पष्ट बल का अध्याय; इष्ट-कष्ट-प्रसाधनम् = इष्ट-कष्ट (शुभ-अशुभ-बल) का निर्धारण; पदम् = आरोढ / पद (भावाधारित पद); उपपदम् = उपपद; तद्वत् = उसी प्रकार; अर्गला = अर्गला (प्रतिबंध-योग); अथ = फिर; कारकाः = कारक (आत्मकारकादि)।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि इसके बाद स्पष्ट-बल का अध्याय आता है, तथा इष्ट-कष्ट का प्रसाधन। पद और उपपद, उसी क्रम में अर्गला, और फिर कारक—यह सूची बल-गणित से पद-अर्गला-कारक तक की तकनीकी कड़ी है। “स्पष्टबलाध्यायः” षड्बल-प्रकार की संख्यात्मक बल-गणना की ओर इंगित करता है; फल यहाँ नहीं, साधन है।

English rendering Next, the text states, comes the chapter on computed strength (spaṣṭa-bala) and the determination of iṣṭa and kaṣṭa; likewise pada and upapada, argalā, and then the kārakas.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-सूची (बल / पद / अर्गला / कारक)। विस्तृत नियम अन्य अध्यायों में हैं; षड्बल-परंपरा में बल रूप/विरूप में जोड़ा जाता है (1 रूप = 60 विरूप)—यह इस श्लोक का विस्तार-संदर्भ है, स्वयं यहाँ स्थिरांक नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्पष्टबलाध्यायः” BPHS अ. 27 की षड्बल-शृंखला (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक, दृग्) से जुड़ता है—प्रत्येक घटक नियत संख्या-नियम, योग रूप/विरूप में। पद-अर्गला-कारक (अ. 25–34-क्षेत्र) बल के बाद की तकनीकी परत हैं; गणना `==` अनुशासन से, फल “शास्त्र कहता है” के रूप में—भय या निश्चित भाग्य के रूप में नहीं।

97.14
कारकांशफलं योगकारकाध्याय एव च ।
नाभसा विविधा योगाश्चन्द्रयोगोऽर्कयोगकः
kārakāṃśaphalaṃ yogakārakādhyāya eva ca |
nābhasā vividhā yogāścandrayogo'rkayogakaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कारकांश-फलम् = कारकांश (D9 पर कारक-राशि) का फल; योगकारक-अध्यायः = योगकारक-अध्याय; एव च = तथा; नाभसाः = नाभस (आकाश/आकृति) योग; विविधाः = अनेक प्रकार के; योगाः = योग; चन्द्र-योगः = चन्द्र-योग; अर्क-योगकः = सूर्य (अर्क) संबंधित योग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र कहता है कि कारकांश-फल और योगकारक-अध्याय भी विषय हैं। फिर विविध नाभस योग, चन्द्र-योग और अर्क-योग—यह योग-खण्ड की सूची है। कारकांश नवांश-स्तर पर कारक-संयोग का फल-क्षेत्र है; नाभस योग ग्रह-संख्‍या/आकृति-आधारित संरचना हैं—दोनों को शास्त्र अलग-अलग अध्यायों में रखता है।

English rendering The text states that there is also the fruit of the kārakāṃśa and a chapter on yoga-kārakas; and various Nābhasa yogas, as well as Candra-yoga and Arka-yoga.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-सूची (कारकांश / योग)। कारकांश-निर्णय में D9 (नवांश = 30° ÷ 9 = 3°20′ प्रति अंश) पर कारक-ग्रह की राशि देखी जाती है—यह अगले अध्यायों का गणित है; यहाँ केवल नाम-सूची है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “कारकांश” षोडश-वर्ग के D9-नियम से बँधा है—नवांश = 3°20′ चाप; योग-अध्याय (अ. 35–42-क्षेत्र) फल-कथन हैं, गणना नहीं। जहाँ योग-परिभाषा में ग्रह-संख्या या भाव-स्थान मापनीय हैं, वहाँ `==` जाँच लागू; जहाँ केवल फल-वाक्य हैं, वहाँ “शास्त्र कहता है”—न भाग्य-निर्णय, न भय-वाणी।

97.15
राजयोगस्ततः प्रोक्तो राजसम्बन्धयोगकः ।
विशेषधनयोगाश्च योगा दारिद्र्यकारकाः
rājayogastataḥ prokto rājasambandhayogakaḥ |
viśeṣadhanayogāśca yogā dāridryakārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राजयोग = राज-सदृश सामर्थ्य/स्थिति के योग; ततः = उससे (पूर्वोक्त योग-वर्ग से) आगे; प्रोक्तः = कहा गया; राजसम्बन्धयोगकः = राज-सम्बन्ध का योग; विशेषधनयोगाः = विशेष धन-योग; दारिद्र्यकारकाः = दारिद्र्य-कारक योग; योगाः = (ये) योग-वर्ग।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ ग्रन्थ-क्रम का स्मरण कराता है — राजयोग, फिर राज-सम्बन्ध योग, फिर विशेष धन-योग, और उन योगों का उल्लेख जो दारिद्र्य के कारक कहे गए हैं। यह फल-विधान नहीं, अध्याय-सूची का पद है: पाठक को याद दिलाया जाता है कि होरा-शास्त्र में योगों का यह पूर्ण वर्ग कहा गया है। भाषा सूची-धर्मी है — “कहा गया है” की सूची, न कि किसी एक जन्म-फल का निर्णय।

English rendering The text then enumerates the chapters on royal yogas, yogas of royal connection, special wealth-yogas, and the yogas stated as poverty-producing. It is a table-of-contents line, not a predictive rule for any chart.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — ग्रन्थ-सूची / योग-अध्याय-क्रम का वर्णन। यहाँ कोई वर्ग-विभाजन, बिन्दु-गणना या दशा-वर्ष नहीं; केवल यह कि शास्त्र में योग-फलों का यह वर्ग कहा गया है — फल-कथन को “शास्त्र कहता है” के रूप में ही पढ़ें, नियति या निश्चित भविष्य के रूप में नहीं।

97.16
आयुर्मारकभेदाश्च ग्रहावस्थाः फलान्विताः ।
नानाविधदशाध्यायास्तत्फलाध्यायः संयुताः
āyurmārakabhedāśca grahāvasthāḥ phalānvitāḥ |
nānāvidhadaśādhyāyāstatphalādhyāyaḥ saṃyutāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आयुर्मारकभेदाः = आयु और मारक के भेद; ग्रहावस्थाः = ग्रह-अवस्थाएँ; फलान्विताः = फल-युक्त; नानाविधदशाध्यायाः = अनेक प्रकार की दशा-अध्याय; तत्फलाध्यायः = उनके फल के अध्याय; संयुताः = जुड़े हुए / सहित।

हिन्दी भावार्थ क्रम आगे बढ़ता है — आयु-मारक भेद, फल-सहित ग्रह-अवस्थाएँ, फिर नानाविध दशा-अध्याय और उनसे जुड़े फल-अध्याय। यह भी अनुक्रमणिका-वाक्य है: आयुर्दाय, अवस्था और दशा-प्रकरण ग्रन्थ में कहा गया — यह पद स्वयं आयु या दशा की गणना नहीं सिखाता। पाठक को स्मरण रहता है कि होरा में काल-विभाग और अवस्था-फल दोनों वर्ग हैं।

English rendering Next are listed the distinctions of longevity and death-inflicting factors, the planetary states with their results, the many daśā chapters, and the chapters on their results. Again a catalogue of topics, not a computational formula.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — आयुर्दाय/अवस्था/दशा-अध्याय-सूची। आयु, मारक, अवस्था और दशा के नियम स्वयं अपने अध्यायों में संख्यात्मक हैं; यह श्लोक केवल क्रम बताता है। दशा-फल को शास्त्र-कथन के रूप में रखें — “शास्त्र कहता है”, न कि निश्चित काल-निर्णय के रूप में।

हमारा डिकोड (Our Decode) इस ग्रन्थ-क्रम में दशा-प्रकरण (अध्याय ४६–६५) उस स्थान पर बैठता है जहाँ विंशोत्तरी १२०-वर्ष चक्र संख्यात्मक है: केतु ७, शुक्र २०, सूर ६, चन्द्र १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७ (Σ = १२०), और अन्तर्दशा = (महादशा-वर्ष × अन्तर्ग्रह-वर्ष)/१२०। सूची-श्लोक गणना नहीं देता; गणना नक्षत्र-अंश पर शुद्ध अनुपात-अंकगणित है — फल-व्याख्या से अलग।

97.17
अन्तःप्रत्यन्तरप्राणसूक्ष्मसंज्ञाश्च तद्भिदाः ।
सूर्याद्यष्टकवर्गश्च त्रिकोणपरिशोधनम्
antaḥpratyantaraprāṇasūkṣmasaṃjñāśca tadbhidāḥ |
sūryādyaṣṭakavargaśca trikoṇapariśodhanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्तः = अन्तर्दशा; प्रत्यन्तर = प्रत्यन्तर्दशा; प्राण = प्राण-दशा; सूक्ष्म = सूक्ष्म-दशा; संज्ञाः = नाम/संज्ञाएँ; तद्भिदाः = उनके भेद; सूर्याद्यष्टकवर्गः = सूर्य आदि का अष्टकवर्ग; त्रिकोणपरिशोधनम् = त्रिकोण-शुद्धि / त्रिकोण-परिशोधन।

हिन्दी भावार्थ दशाओं के भीतर की परतें गिनाई जाती हैं — अन्तर्, प्रत्यन्तर्, प्राण, सूक्ष्म — और उनके भेद। तदुपरान्त सूर्यादि अष्टकवर्ग और त्रिकोण-परिशोधन का उल्लेख है। अध्याय-सूची यहाँ दशा-सूक्ष्मता से अष्टकवर्ग-शुद्धि की ओर मुड़ती है। श्लोक स्वयं बिन्दु या शुद्धि का सूत्र नहीं लिखता; वह बताता है कि शास्त्र में ये प्रकरण कहाँ जुड़े हैं।

English rendering Listed are the designations and distinctions of antar, pratyantar, prāṇa, and sūkṣma (sub-periods), then the aṣṭakavarga of the Sun and the other planets, and triangular purification (trikoṇa-śodhana). Catalogue of topics leading into the aṣṭakavarga block.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — दशा-परत + अष्टकवर्ग/त्रिकोण-शुद्धि की अध्याय-सूची। अष्टकवर्ग और त्रिकोण-शुद्धि की संख्याएँ अपने अध्यायों (६६–६७) में हैं; यहाँ केवल नामोल्लेख है। फल को शास्त्र-कथन मानें, न कि “निश्चित परिणाम”।

हमारा डिकोड (Our Decode) सूर्यादि अष्टकवर्ग BPHS अध्याय ६६ के कैननिकल योग से जुड़ा है — सूर्य ४८, चन्द्र ४९, मंगल ३९, बुध ५४, गुरु ५६, शुक्र ५२, शनि ३९ → सर्वाष्टकवर्ग (SAV) = ३३७; oracle इन पर `==` फिक्स्चर लगाता है (सहिष्णुता-बैंड नहीं)। त्रिकोण-परिशोधन अध्याय ६७ का कदम है जो फल से पहले SAV घटाता है। चन्द्र-तालिका में “९” चन्द्र-से-चन्द्र पर है (BPHS); फलादीपिका/मेहता ९ को स्थानान्तरित करते हैं — योग ४९ एक, प्रति-राशि भिन्न; घोषित `[HUMAN]` कन्वेंशन, मौन चयन नहीं।

97.18
एकाधिपत्यसंशुद्धिस्ततः पिण्डप्रसाधनम् ।
ततश्चाऽष्टकवर्गाणां प्रस्फुटानि फलानि च
ekādhipatyasaṃśuddhistataḥ piṇḍaprasādhanam |
tataścā'ṣṭakavargāṇāṃ prasphuṭāni phalāni ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकाधिपत्यसंशुद्धिः = एकाधिपत्य-शुद्धि; ततः = उसके बाद; पिण्डप्रसाधनम् = पिण्ड-साधन / पिण्ड-प्रसाधन; ततः = फिर; अष्टकवर्गाणाम् = अष्टकवर्गों के; प्रस्फुटानि = स्पष्ट / सुस्पष्ट; फलानि = फल; च = और।

हिन्दी भावार्थ अष्टकवर्ग-क्रम आगे चलता है — एकाधिपत्य-संशुद्धि, फिर पिण्ड-प्रसाधन, फिर अष्टकवर्गों के स्पष्ट फल। शुद्धि के दो चरण (त्रिकोण के बाद एकाधिपत्य) और पिण्ड-साधन के बाद फल-अध्याय — यही सूची है। श्लोक शुद्धि-सूत्र नहीं देता; वह प्रकरण-क्रम बताता है कि फल “प्रस्फुट” कहे जाने से पहले शुद्धि और पिण्ड आते हैं।

English rendering Next: purification by single-lordship (ekādhipatya-śuddhi), then the fixing of the piṇḍa, and then the clear results of the aṣṭakavargas. Order of the aṣṭakavarga refinement block, not the algorithms themselves.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — एकाधिपत्य-शुद्धि / पिण्ड / अष्टकवर्ग-फल की सूची। एकाधिपत्य-शुद्धि अध्याय ६८ में SAV को फल से पहले घटाती है; पिण्ड-साधन और फल अपने प्रकरणों में संख्यात्मक हैं। यहाँ केवल क्रम है — फल-कथन को “शास्त्र कहता है” रखें।

हमारा डिकोड (Our Decode) एकाधिपत्य-संशुद्धि (Ch.68) त्रिकोण-शुद्धि (Ch.67) के साथ SAV को फल से पहले घटाती है — कैननिकल ग्रह-योग ४८/४९/३९/५४/५६/५२/३९ → ३३७ उसी चेन का आरम्भ-बिन्दु है। डिकोड में शुद्धि से पहले कच्ची तालिका `==` से पिन है; ±बैंड ने कभी वास्तविक −१ छिपाया था, इसलिए सहिष्णुता नहीं।

97.19
ततोऽप्यष्टकवर्गायुःसाधनं च ततः परम् ।
समुदायाष्टवर्गोत्थफलाध्यायः परिस्फुटः
tato'pyaṣṭakavargāyuḥsādhanaṃ ca tataḥ param |
samudāyāṣṭavargotthaphalādhyāyaḥ parisphuṭaḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततोऽपि = उसके बाद भी / फिर; अष्टकवर्गायुःसाधनम् = अष्टकवर्ग से आयु-साधन; ततः परम् = उसके पश्चात्; समुदायाष्टवर्गोत्थ = समुदाय (सर्व) अष्टकवर्ग से उत्पन्न; फलाध्यायः = फल-अध्याय; परिस्फुटः = पूर्णतः स्पष्ट।

हिन्दी भावार्थ क्रम कहता है — अष्टकवर्ग-आयु का साधन, और तदनन्तर समुदायाष्टकवर्ग (सर्वाष्टकवर्ग) से उत्पन्न फल-अध्याय, जो “परिस्फुट” कहा गया। आयु-साधन और सर्व-अष्टकवर्ग-फल अलग प्रकरण हैं; यह पद दोनों का स्थान सूची में बताता है। गणना-सूत्र यहाँ नहीं; केवल यह कि शास्त्र में आयु और समुदाय-फल अष्टकवर्ग-शृंखला के बाद आते हैं।

English rendering Thereafter the determination of longevity from aṣṭakavarga, and after that the fully clear chapter of results arising from the collective (samudāya) aṣṭakavarga. Topic order within the aṣṭakavarga corpus.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — अष्टकवर्ग-आयु और समुदाय-अष्टकवर्ग-फल की अध्याय-सूची। आयु-साधन और SAV-फल अपने अध्यायों में नियमों से चलते हैं; यह श्लोक केवल “ततः / ततः परम्” का क्रम देता है। आयु-फल को शास्त्र-कथन मानें — निश्चित आयु-भविष्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “समुदायाष्टवर्ग” सर्वाष्टकवर्ग (SAV) की ओर इशारा करता है — सात ग्रहों के कैननिकल योग का योग ३३७ (४८+४९+३९+५४+५६+५२+३९)। फल-अध्याय से पहले त्रिकोण- और एकाधिपत्य-शुद्धि उसी ३३७-आधार को घटाती हैं; आयु-साधन अलग प्रकरण है। डिकोड गणित को फल से अलग रखता है: बिन्दु-योग `==` से, फल “शास्त्र कहता है” से।

97.20
ग्रहरश्मिफलाध्यायः सुदर्शनफलं तथा ।
महापुरुषचिह्नानि महाभूतफलानि च
graharaśmiphalādhyāyaḥ sudarśanaphalaṃ tathā |
mahāpuruṣacihnāni mahābhūtaphalāni ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहरश्मिफलाध्यायः = ग्रह-रश्मि फल-अध्याय; सुदर्शनफलम् = सुदर्शन-फल; तथा = तथा; महापुरुषचिह्नानि = महापुरुष-चिह्न; महाभूतफलानि = महाभूत-फल; च = और।

हिन्दी भावार्थ सूची आगे बढ़ती है — ग्रह-रश्मि फल-अध्याय, सुदर्शन-फल, महापुरुष-चिह्न, और महाभूत-फल। विविध फल-प्रकरण एक पंक्ति में बँधे हैं। यह वर्णनात्मक अनुक्रमणिका है; रश्मि, सुदर्शन, चिह्न या भूत का कोई माप-सूत्र यहाँ नहीं। शास्त्र कहता है कि ये प्रकरण ग्रन्थ में हैं — स्वयं फल-निर्णय नहीं।

English rendering Then the chapter on planetary-ray results, the Sudarśana results, the marks of the great person (mahāpuruṣa), and the results of the great elements (mahābhūta). Further catalogue of miscellaneous phala topics.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — रश्मि/सुदर्शन/महापुरुष/महाभूत फल-अध्यायों की सूची। जहाँ रश्मि या सुदर्शन के अपने अध्याय संख्या या चक्र देते हों, वे वहीं देखें; इस पद में कोई अचर या सूत्र नहीं। फल-कथन को “शास्त्र कहता है” के रूप में पढ़ें, भय या निश्चित भाग्य के रूप में नहीं।

97.21
गुणत्रयफलाध्यायस्ततोऽप्यज्ञातजन्मनाम् ।
जन्मलग्नादिविज्ञानं प्रव्रज्यालक्षणानि च
guṇatrayaphalādhyāyastato'pyajñātajanmanām |
janmalagnādivijñānaṃ pravrajyālakṣaṇāni ca

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुणत्रयफलाध्यायः = त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम) फल-अध्याय; ततोऽपि = उसके बाद भी; अज्ञातजन्मनाम् = अज्ञात-जन्म वालों के (विषय में); जन्मलग्नादिविज्ञानम् = जन्म-लग्न आदि का ज्ञान; प्रव्रज्यालक्षणानि = प्रव्रज्या (संन्यास/वैराग्य) के लक्षण; च = और।

हिन्दी भावार्थ क्रम में गुणत्रय-फल-अध्याय आता है, फिर अज्ञात-जन्म वालों के लिए जन्म-लग्न आदि का विज्ञान, और प्रव्रज्या-लक्षण। अज्ञात-जन्म प्रकरण लग्न-निर्धारण की विधियों की ओर संकेत करता है; प्रव्रज्या-लक्षण योग/चिह्न-वर्ग का नाम है। श्लोक विधियाँ नहीं लिखता — केवल यह कि शास्त्र में ये अध्याय जुड़े हैं। सूची का स्वर शान्त और सूची-धर्मी है, भविष्य-वाणी का नहीं।

English rendering Next the chapter on the results of the three guṇas; then, for those of unknown birth, the knowledge of birth-lagna and related factors; and the marks of renunciation (pravrajyā). Closing lines of this stretch of the chapter-index.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — गुणत्रय-फल / अज्ञात-जन्म / प्रव्रज्या-लक्षण की अध्याय-सूची। अज्ञात-जन्म में लग्न-साधन जहाँ संख्यात्मक हो, वह अपने प्रकरण का नियम है; यहाँ केवल नाम और क्रम है। फल और लक्षण को शास्त्र-कथन के रूप में रखें — चिकित्सा, कानूनी या निश्चित भाग्य-कथन नहीं।

97.22
स्त्रीणां च फलवैष्ट्यमङ्गलक्ष्मफलानि च ।
पूर्वपापोत्थशापोत्थयोगा वैपुत्र्यकारकाः
strīṇāṃ ca phalavaiṣṭyamaṅgalakṣmaphalāni ca |
pūrvapāpotthaśāpotthayogā vaiputryakārakāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्त्रीणां = नारी-जातक के विषय में; फल-वैष्ट्यम् = फल-वैशिष्ट्य/फल-वैविध्य (पाठ-भेद संभव: वैष्ट्य ~ वैशिष्ट्य); अङ्ग-लक्ष्म-फलानि = अंग-चिह्न (लक्ष्म) सम्बन्धी फल; पूर्व-पाप-उत्थ = पूर्व-पाप से उत्पन्न; शाप-उत्थ = शाप से उत्पन्न; योगाः = योग-संयोग; वैपुत्र्य-कारकाः = अपुत्रता/पुत्र-अभाव के कारक।

हिन्दी भावार्थ शास्त्र यहाँ संक्षेप में याद दिलाता है कि स्त्रियों के फल का वैशिष्ट्य तथा अंग-चिह्नों से जुड़े फल भी प्रतिपादित हुए हैं। साथ ही पूर्व-पाप से और शाप से उत्पन्न योगों का उल्लेख है। उन योगों को पाठ वैपुत्र्य (पुत्र-अभाव) के कारक कहता है — यह शास्त्र का अपना कथन-क्रम है, न कि कोई नियति-घोषणा।

English rendering The text also records the distinctive results concerning women and the results of bodily marks. Yogas arising from past pāpa and from curses are stated as factors of childlessness (vaiputrya) — as the śāstra’s own catalogue, not as fate we assert.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार-सूची / फल-विषय-सूची। यह श्लोक गणना नहीं खोलता; अध्याय के अंत में जिन विषयों का उल्लेख किया गया है, उनकी सूची-पंक्ति है।

97.23
सत्पुत्रप्राप्त्युपायाश्च सहैव प्रतिपादिताः ।
जन्मन्यनिष्टलग्नर्क्षतिथ्यादिप्रतिपादनम्
satputraprāptyupāyāśca sahaiva pratipāditāḥ |
janmanyaniṣṭalagnarkṣatithyādipratipādanam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्-पुत्र-प्राप्ति = शुभ/सत्पुत्र की प्राप्ति; उपायाः = उपाय-विधि; सह एव = उसी क्रम में साथ; प्रतिपादिताः = प्रतिपादित किए गए; जन्मनि = जन्म-काल में; अनिष्ट = अशुभ/अनिष्ट; लग्न = उदित राशि (लग्न); ऋक्ष = नक्षत्र; तिथि = चान्द्र तिथि; आदि = इत्यादि; प्रतिपादनम् = कथन/स्थापना।

हिन्दी भावार्थ सत्पुत्र-प्राप्ति के उपाय भी, शास्त्र कहता है, उन्हीं प्रसंगों के साथ प्रतिपादित किए गए हैं। जन्म में अनिष्ट लग्न, नक्षत्र, तिथि आदि का कथन भी इसी श्रृंखला में आता है। यहाँ ‘उपाय’ पाठ का अपना विषय-नाम है; इसे दबाव-उपचार या भय-व्यापार नहीं बनाना।

English rendering Means for obtaining worthy offspring are said to have been set forth together with the same topics. Exposition of inauspicious lagna, nakṣatra, tithi and the like at birth is likewise included in this recension’s closing list.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — विषय-सूची / उपाय-फल-कथन। लग्न-ऋक्ष-तिथि यहाँ संख्या-सूत्र नहीं देते; वे केवल अनिष्ट-सूचक प्रसंगों के नाम हैं जिन्हें अन्य अध्यायों में विस्तार मिलता है।

97.24
तत्तच्छान्तिविधिश्चैव संक्षेपेण प्रदर्शितः ।
प्रसवस्य विकाराश्च कथिताः शान्तिसंयुताः
tattacchāntividhiścaiva saṃkṣepeṇa pradarśitaḥ |
prasavasya vikārāśca kathitāḥ śāntisaṃyutāḥ

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत् = उन-उन प्रसंगों की; शान्ति-विधिः = शान्ति/प्रशमन की विधि; च एव = और भी; संक्षेपेण = संक्षेप में; प्रदर्शितः = दिखाया/प्रदर्शित; प्रसवस्य = प्रसव (जन्म) का; विकाराः = विकार/असामान्यताएँ; कथिताः = कही गईं; शान्ति-संयुताः = शान्ति-विधि सहित।

हिन्दी भावार्थ उन-उन अनिष्ट-प्रसंगों की शान्ति-विधि भी, पाठ कहता है, संक्षेप में प्रदर्शित की गई है। प्रसव-सम्बन्धी विकार भी शान्ति के साथ कथित हैं। यह शास्त्र की अपनी शान्ति-भाषा है — गणना नहीं, और न ही चिकित्सा/कानूनी/वित्तीय निर्देश; केवल स्रोत-पाठ का संक्षिप्त अनुस्मरण।

English rendering The respective śānti procedures are said to have been shown in brief. Disorders of childbirth are likewise stated together with their pacification rites — as the text’s own register, not as clinical or coercive counsel.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — शान्ति-विधि / प्रसव-विकार-वर्णन की उपसंहार-पंक्ति। कोई अंश, बला-इकाई या वर्ग-सूत्र यहाँ नहीं बँधता; विषय-सूची का समापन-वाक्य है।

97.25
एवं जातकवर्येऽत्र निविष्टा विषयाः शतम् ।
विज्ञाय विबुधास्त्वेतान् प्राप्नुवन्तु यशः श्रियम्
evaṃ jātakavarye'tra niviṣṭā viṣayāḥ śatam |
vijñāya vibudhāstvetān prāpnuvantu yaśaḥ śriyam

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; जातक-वर्ये = इस श्रेष्ठ जातक-ग्रन्थ में; अत्र = यहाँ; निविष्टाः = निविष्ट/समाविष्ट; विषयाः = विषय; शतम् = सौ (१००); विज्ञाय = जानकर/समझकर; विबुधाः = विद्वान्/बुद्धिमान्; तु = ही/तो; एतान् = इन (विषयों) को; प्राप्नुवन्तु = प्राप्त करें; यशः = यश; श्रियम् = श्री/समृद्धि।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार इस जातक-वर्य में, शास्त्र कहता है, सौ विषय निविष्ट हैं। विद्वान् इन्हें जानकर यश और श्री प्राप्त करें — यह मंगलात्मक आशीर्-वाक्य है, गणना नहीं। ‘शतम्’ यहाँ विषय-संख्या का पाठ-कथन है (इस विकिस्रोत-पाठ के उपसंहार में); अध्याय-संख्या/श्लोक-संख्या का गणित नहीं।

English rendering Thus, in this excellent Jātaka treatise, a hundred topics are said to have been set down. May the wise, knowing them, obtain renown and prosperity — a benedictory close, not a computational rule.

गणित / तकनीक (The Mathematics / Technique) गणितीय सूत्र नहीं — उपसंहार-स्तुति / विषय-संख्या-कथन। शतम् = १०० विषय (पाठ का अपना गणना-बोध); यह वर्ग, दशा, अष्टकवर्ग या षड्बल का सूत्र नहीं है — केवल ग्रन्थ-समाप्ति का आशीर्-वाक्य।