सूर्यसिद्धान्त-रहस्य · Decoding the Sūrya-Siddhānta

सूर्यसिद्धान्त-रहस्य

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Decoding the Sūrya-Siddhānta
चौदह अध्याय · पाँच सौ श्लोक · एक भी छोड़े बिना —
मूल संस्कृत, पदच्छेद, हिन्दी भावार्थ, English rendering,
आधुनिक गणित, उदाहरण, और हमारे इंजनों का डिकोड-वृत्तान्त
Author & Decoder
Pardeep Sehrawat
«The Architect»
Instagram · theunholyindianmagician
KAAL Publications · MMXXVI

प्राक्कथन · Preface

यह पुस्तक एक प्रयोग का दस्तावेज़ है। हमने सूर्यसिद्धान्त को केवल पढ़ा नहीं — उसे चलाया। महायुग के दिन गिने, भगण घुमाए, मन्द और शीघ्र फल निकाले, अयनांश की दर को अंकगणित में खोला, और हर दावे को एक ऐसे परीक्षण-यन्त्र (oracle) पर कसा जो सन्निकटन स्वीकार नहीं करता — केवल exact equality। जहाँ हम ग़लत मुड़े, वह मोड़ भी इस पुस्तक में दर्ज है, क्योंकि यही इस पद्धति का धर्म है: रिपोर्ट करो, छिपाओ मत।

This book is the record of an experiment: we did not merely read the Sūrya-Siddhānta — we ran it. Its yuga day-counts were counted, its revolutions spun, its manda and śīghra corrections computed step by step, its ayanāṃśa rate decomposed into exact rational arithmetic, and every claim was pressed against a verification oracle that accepts no tolerance bands — only exact equality. Where we took a wrong turn, the wrong turn is printed too; that is the discipline.

प्रत्येक श्लोक — पाँच सौ में पाँच सौ — यहाँ मूल देवनागरी, IAST लिप्यन्तरण, पदच्छेद, हिन्दी भावार्थ, English rendering, आधुनिक गणितीय रूप, और जहाँ सम्भव हो, सप्रमाण उदाहरण के साथ प्रस्तुत है। जहाँ हमारा अपना डिकोड-कार्य श्लोक से मिलता है, वहाँ «हमारा डिकोड» खण्ड उस सेतु को दिखाता है।

सांकेतिक परिपाटी · Declared Conventions

मूल पाठसंस्कृत विकिस्रोत critical text — सूर्यसिद्धान्तः, sa.wikisource.org (fetched 2026-08-10). पाठ-भेद (B/C) यथास्थान लघु टिप्पणी में।
महायुग दिन-गणनासूर्यसिद्धान्त canon: 1,577,917,828 civil days / 43,20,000 वर्ष (Āryabhaṭa canon 1,577,917,500 से भिन्न — अन्तर 328 दिन; tithi-engine पर प्रभाव अध्याय-भूमिकाओं में)।
अयनांश49.2″/yr (= 54 × 41/45, rational core) एक selectable hypothesis है — 54″, 50″, Lahiri और ±27° trepidation के साथ; residual-zero शून्य-वर्ष Z ≈ 253.8 CE। कोई भी दर "एकमात्र ऐतिहासिक सत्य" घोषित नहीं।
बीज-संस्कारमङ्गल +30 · गुरु −51 · शनि +61 revs/महायुग — सूर्य-सापेक्ष (Sun-anchored) frame में; ~1800 CE anchored drift प्रयोग।
मापन-क्रम1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल = 2,16,000 विपल = 21,600 प्राण। प्राण↔कला केवल गणना-सादृश्य, भौतिक समता नहीं।
व्याख्या-पद्धतिश्लोक-व्याख्याएँ लेखक के दो-वर्षीय डिकोड-अनुसंधान और सत्यापित इंजन-परिणामों पर आधारित; IAST लिप्यन्तरण deterministic। अनुवाद विद्वत्-समीक्षा हेतु खुले हैं।
दृष्टिज्योतिष-गणित = स्रोत-पाठ + संगणनात्मक मॉडल। JPL/Swiss/Meeus केवल प्रति-जाँच यन्त्र। कोई भय-वाक्य, कोई नियति-दावा नहीं।

हमारे यन्त्र · The Engines Behind This Book

bharat-ephemeris-offlineInteger-bhagaṇa mean-longitude instrument; ayanāṃśa laboratory; bhāva-madhya layer (RA(MC) ≡ LST, 10⁻⁹° तक सत्यापित)।
vedic-ghadiपञ्चाङ्ग substrate — घड़ी/पल/विपल metrology, tithi engine (Āryabhaṭa canon)।
kaal-verification-oracleExact-equality regression oracle — tolerance bands वर्जित (एक ±3 band ने वास्तविक −1 छिपाया था; अब केवल ==)।
kaal_surya_siddhanta_sphutaशुद्ध SS अध्याय-2 मन्द+शीघ्र स्फुट इंजन — 4-चरण iteration (अर्ध-मन्द → अर्ध-शीघ्र → पूर्ण-मन्द → पूर्ण-शीघ्र), शृंखला में कोई Western theorem नहीं।
mangalkaalyantraवराहमिहिर की पञ्चसिद्धान्तिका-पद्धति से सिद्धान्त-blend इंजन।
अध्यायः 1

मध्यमाधिकारः

Mean Motions of the Planets
70 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

यह अध्याय सूर्यसिद्धान्त का वह द्वार है जहाँ काल स्वयं गणित बन जाता है। यहाँ महायुग की विशाल संरचना, ग्रहों के भगणा (पूर्ण परिभ्रमण-संख्याएँ), सावन-दिनों की गणना, तथा अहर्गण से मध्यम-देशान्तर निकालने की विधि एक-दूसरे में गूँथी हुई हैं—जैसे एक ही सूत्र की कड़ियाँ। मध्यमाधिकार इसलिए सुन्दर है कि वह “सत्य स्थान” का दावा नहीं करता; वह केवल समरूप गति का शुद्ध माप देता है, जिस पर बाद के अध्याय मन्द-शीघ्र-फल चढ़ाकर स्फुट बनाएँगे। बिना मध्यम के स्फुट अधूरा है, और बिना युग-संख्यान के मध्यम निरर्थक—इसलिए यह अध्याय शेष ज्योतिष-गणित की नींव है। पाठक यहाँ देखेंगे कि ब्रह्माण्ड के काल-चक्र कैसे अंकों में उतरते हैं, और वे अंक कैसे प्रतिदिन के ग्रह-मध्यम में परिणत होते हैं।

For the English reader:

Chapter 1 is the siddhānta’s clockwork made visible: not where planets “really” stand in the sky, but how mean motions are defined so that every later correction has something honest to correct. It lays down the Mahāyuga’s architecture, the integer revolution-counts (bhagaṇa) of the Sun, Moon, and grahas, the civil-day total that turns cosmic period into daily rate, and the ahargaṇa path from a chosen epoch to a mean longitude on a given day. The beauty is architectural rather than dramatic—uniform rotation on the circle, scaled by exact counts, with no epicycle yet allowed to bend the mean. Read it as the specification of the mean frame; everything that follows in the text is an operation upon this frame, not a replacement of it.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

हमारे bharat-ephemeris-offline का `math-core` इसी अध्याय का अनुसंधान-यन्त्र है—पूर्णांक-भगणा से मध्यम-देशान्तर का संश्लेषण, तथा `MATHEMATICAL-AUDIT` में कैद सावन-दिन-चयन (\(N_{\mathrm{SS}}\) बनाम आर्यभट-काणन) और सूर्य-आधारित बीज-दरों (+३० / −५१ / +६१ भगणा) का सत्यापन। vedic-ghadi का तिथि-इंजन उसी दिन-गणना-विभाजन पर सबसे तीव्र प्रभाव दिखाता है; kaal-verification-oracle मध्यम-सूत्रों को सहन-पट्टी के बिना `==` फिक्स्चर पर बाँधता है।

दिन1= 60 घड़ीघड़ी60= 60 पल · 24 minपल3,600= 60 विपल · 24 sविपल2,16,0000.4 sप्राण21,600= 6 प्राण / पल · 4 s१ दिन = ६० घड़ी = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल · २१,६०० प्राण21,600 प्राण/day ↔ 21,600 arc-minutes/circle — गणना-सादृश्य (count correspondence)
काल-मापन-सोपान — the ladder of time units (SS 1.11–1.12): each box is an exact integer multiple of the next; 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 कला/वृत्त is a count correspondence, not a physical identity.
1.1
अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥
acintyāvyaktarūpāya nirguṇāya guṇātmane ।
samastajagadādhāramūrtaye brahmaṇe namaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अचिन्त्य = मन से न पकड़ा जा सकने वाला; अव्यक्त-रूप = अप्रकट स्वरूप; निर्गुण = गुण-रहित (पारमार्थिक); गुणात्मन् = गुणों का आत्मतत्त्व / गुणों का अधिष्ठान; समस्त-जगत्-आधार-मूर्ति = सम्पूर्ण जगत् का आधार-स्वरूप; ब्रह्मन् = ब्रह्म; नमः = नमन / वन्दना।

हिन्दी भावार्थ ग्रन्थ का आरम्भ ब्रह्म-स्तुति से होता है। जिसका रूप अचिन्त्य और अव्यक्त है, जो स्वयं निर्गुण है किन्तु गुणों का आत्मा भी है, और जो समस्त जगत् का आधार-मूर्ति है — उसी ब्रह्म को नमस्कार। यह वन्दना ज्ञान-प्रवाह के स्रोत को याद दिलाती है: गणना आगे आएगी, पर पहले स्रोत-स्मरण।

English rendering Homage to Brahman — of unthinkable, unmanifest form; without qualities yet the very self of qualities; the embodied support of the whole world.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति। यह श्लोक संख्या या एल्गोरिथ्म नहीं देता; वह पुस्तक के गणित-अध्याय का द्वार-मंगलाचरण है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए कि आप एक विशाल computational pipeline खोल रहे हैं — ग्रह-स्पष्टीकरण, छाया, ग्रहण — किन्तु पहली पंक्ति में कोई formula नहीं, केवल स्रोत-स्मरण है। जैसे किसी observatory में गणना-यन्त्र चलाने से पहले दिशा, क्षितिज और शून्य-बिन्दु तय किए जाते हैं, वैसे ही यह श्लोक शास्त्र के “शून्य-बिन्दु” को नाम देता है: गणना आगे आएगी, पर माप-व्यवस्था का आधार-स्मरण पहले। यह वन्दना अध्याय १ के युग-दिन और अध्याय २ के मन्द-शीघ्र फल में गणित बनेगी — पर यहाँ वह आधार अभी केवल स्मृति है, समीकरण नहीं।

1.2
अल्पावशिष्टे तु कृते मयो नाम महासुरः ।
रहस्यं परमं पुण्यं जिज्ञासुर्ज्ञानं उत्तमम् ॥
alpāvaśiṣṭe tu kṛte mayo nāma mahāsuraḥ ।
rahasyaṃ paramaṃ puṇyaṃ jijñāsurjñānaṃ uttamam ।।
पाठ-भेद: B् मयनाम

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अल्प-अवशिष्टे = थोड़ा शेष रहने पर; कृते = कृतयुग में; मयः नाम = मय नामक (पाठ-भेद: मयो नाम / मयनाम); महा-असुरः = महान असुर; रहस्यं = गुह्य ज्ञान; परमं पुण्यं = परम पवित्र; जिज्ञासुः = जानने का अभिलाषी; ज्ञानं उत्तमम् = उत्कृष्ट ज्ञान।

हिन्दी भावार्थ जब कृतयुग में बहुत थोड़ा समय शेष रह गया था, तब मय नाम का एक महासुर — जिसने परम पुण्य रहस्य और उत्तम ज्ञान जानने की इच्छा की — इस कथा में प्रवेश करता है। ग्रन्थ स्वयं को “रहस्य” और “उत्तम ज्ञान” कहकर प्रस्तुत करता है; श्रोता/पाठक को जिज्ञासु की भूमिका मिलती है।

English rendering When little remained of the Kṛta (age), a great asura named Maya, eager for the supreme sacred secret and the highest knowledge (entered the scene).

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/कथा-भूमिका। “कृत” यहाँ युग-नाम है; इस श्लोक में युग-वर्ष-संख्या नहीं दी गई।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पयुग-सीमा पर खड़ा एक श्रोता — जब cycle का एक बड़ा अध्याय लगभग पूरा हो चुका हो — और उसकी एक ही इच्छा: “रहस्य” और “उत्तम ज्ञान”। यह दृश्य आधुनिक research proposal जैसा है: विषय-नाम पहले, प्रयोग-सूत्र बाद में। सूर्यसिद्धान्त स्वयं को technical manual नहीं, जिज्ञासा का उत्तर कहता है; पाठक की मुद्रा मय जैसी है — प्रश्न लाया है, प्रमाण माँगेगा। आगे अध्याय १ के काल-परिभाषा और ग्रह-गति के सूत्र उसी जिज्ञासा के formal answer बनेंगे।

1.3
वेदाङ्गं अग्र्यं अखिलं ज्योतिषां गतिकारणम् ।
आराधयन्विवस्वन्तं तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥
vedāṅgaṃ agryaṃ akhilaṃ jyotiṣāṃ gatikāraṇam ।
ārādhayanvivasvantaṃ tapastepe suduścaram ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वेदाङ्गं = वेद का अङ्ग; अग्र्यं = सर्वोच्च / अग्रगण्य; अखिलं = सम्पूर्ण; ज्योतिषां = ज्योतियों (ग्रह-नक्षत्रादि) का; गति-कारणम् = गति का कारण / गति का मूल-विज्ञान; आराधयन् = आराधना करते हुए; विवस्वन्तं = विवस्वान् (सूर्य) को; तपः तेपे = तप किया; सु-दुश्चरम् = अत्यन्त कठिन।

हिन्दी भावार्थ मय ने ज्योतिष को वेदाङ्गों में अग्र्य और अखिल — ज्योतियों की गति का कारण — मानकर विवस्वान् की आराधना की, और अत्यन्त कठिन तप आरम्भ किया। यहाँ ज्योतिष “भाग्य-कथा” नहीं, गति-कारण का शास्त्र है: किस नियम से ग्रह-नक्षत्र चलते हैं, यही जिज्ञासा तप का विषय बनी।

English rendering Seeking the foremost, complete Vedāṅga — the cause of the motions of the luminaries — he worshipped Vivasvān and performed austerity most hard to bear.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका। “गतिकारण” बाद के अध्यायों के मध्यम-स्पष्ट एल्गोरिथ्म की दिशा-सूची है, इस श्लोक में सूत्र नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) रात को पूर्व दिशा में क्रमिक उदय होते नक्षत्रों को देखें: हर रात थोड़ा सा खिसकते हुए वे बताते हैं कि आकाश “कथा” नहीं, regular motion है। ज्योतिष यहाँ vedāṅga की उस शाखा के रूप में आता है जिसका विषय भाग्य-वाक्य नहीं, gati-kāraṇa — गति का नियम — है। मय का तप उसी नियम की खोज है: सूर्य-चन्द्र-ग्रह किस माप से चलते हैं। यह खोज आगे अध्याय १–२ में मध्य-स्पष्ट ग्रह, भगण और दिन-मान के गणित में उतरेगी।

1.4
तोषितस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वरार्थिने ।
ग्रहाणां चरितं प्रादान्मयाय सविता स्वयम् ॥
toṣitastapasā tena prītastasmai varārthine ।
grahāṇāṃ caritaṃ prādānmayāya savitā svayam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तोषितः = सन्तुष्ट; तपसा तेन = उस तप से; प्रीतः = प्रसन्न; तस्मै वर-अर्थिने = उस वर-याचक को; ग्रहाणां चरितम् = ग्रहों का चरित / गति-वृत्त; प्रादात् = दिया; मयाय = मय को; सविता स्वयम् = सविता (सूर्य) स्वयं।

हिन्दी भावार्थ उस तप से तोषित और प्रसन्न होकर सविता स्वयं मय को — जो वर चाहता था — ग्रहों का चरित प्रदान करते हैं। ज्ञान का स्रोत देवता है; माध्यम वर-दान है; विषय “ग्रहाणां चरितम्” — ग्रहों की गति-कथा। आगे का पूरा शास्त्र इसी दान का विस्तार है।

English rendering Pleased by that austerity, Savitā himself bestowed on Maya, the seeker of a boon, the account of the planets’ motions.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/प्रदान-कथा। “चरित” यहाँ कथा-शब्द है, पर शास्त्र में उसका अर्थ मध्यम-स्पष्ट गति-विधि बनेगा।

दृष्टान्त (Illustrative Example) “ग्रहाणां चरितम्” को एक case history समझें: प्रत्येक ग्रह का नाम, कक्षा-सीमा, गति-भेद — जैसे किसी ephemeris की विषय-सूची। वर-दान का रूपक यह कहता है कि स्रोत एक है (सविता), पर सामग्री क्रमिक अध्यायों में बिखरेगी: मन्द-फल, शीघ्र-फल, उदय-अस्त, ग्रहण। जब आप बाद में किसी ग्रह का स्पष्ट स्थान निकालेंगे, वह गणना इसी “चरित” का संख्यात्मक विस्तार होगी — दान का payload सूत्रों में खुलता है, कथा में नहीं।

1.5
विदितस्ते मया भावस्तोषितस्तपसा ह्यहम् ।
दद्यां कालाश्रयं ज्ञानं ग्रहाणां चरितं महत् ॥
viditaste mayā bhāvastoṣitastapasā hyaham ।
dadyāṃ kālāśrayaṃ jñānaṃ grahāṇāṃ caritaṃ mahat ।।
पाठ-भेद: ड्मयाभावस्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विदितः = ज्ञात; ते भावः = तेरा अभिप्राय; मय = हे मय (पाठ-भेद: मया भावस् / मयाभावस् — उपकरण-चिह्न); तोषितः = सन्तुष्ट; तपसा = तप से; अहम् = मैं; दद्याम् = दूँ; काल-आश्रयम् = काल पर आश्रित; ज्ञानम् = ज्ञान; ग्रहाणां चरितम् = ग्रहों का चरित; महत् = महान्।

हिन्दी भावार्थ सूर्य कहते हैं — “मय, तेरा भाव मुझे ज्ञात है; मैं तेरे तप से सन्तुष्ट हूँ। मैं तुझे वह महान् ज्ञान दूँगा जो काल-आश्रित है — ग्रहों का चरित।” यहाँ एक निर्णायक शब्द है: कालाश्रय। ग्रह-ज्ञान समय-माप और युग-दिन-गणना के बिना नहीं चलता; चरित “काल की भूमि” पर खड़ा है।

English rendering “Maya, your intent is known to me; I am pleased by your austerity. I shall give the great knowledge that rests on time — the mighty account of the planets’ motions.”

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका (काल-आश्रय ज्ञान की घोषणा)। संख्या नहीं, पर परिभाषा: ग्रह-चरित = काल-निर्भर ज्ञान।

हमारा डिकोड (Our Decode) “कालाश्रय ज्ञान” वही धुरी है जिस पर हमारी मेट्रोलॉजी और दो दिन-गणनाएँ टिकती हैं — 1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण; महायुग में सूर्यसिद्धान्त-कानन 1,577,917,828 नागरिक दिन (math-core) बनाम आर्यभट 1,577,917,500 (vedic-ghadi)। 328-दिन का अन्तर “कौन-सा काल” चुनने का वास्तविक परिणाम है; तithi-इंजन इसी पर सबसे अधिक संवेदनशील है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही ग्रह को दो तिथियों पर देखें — स्थान बदल चुका होगा; ज्ञान बिना epoch के अधूरा है। कालाश्रय का सीधा अर्थ यही है: ग्रह-चरित समय-अक्ष पर लिखा जाता है — अहर्गण, युग-दिन, भगण-गति। जैसे GPS बिना घड़ी के निर्देशांक नहीं देता, वैसे ही ज्योतिष बिना काल-माप के ग्रह-स्थान नहीं देता। यह वाक्य अध्याय १ के काल-परिच्छेद और मध्यमाधिकार की आधार-शिला है: पहले समय गिनो, फिर गति लगाओ।

1.6
न मे तेजःसहः कश्चिदाख्यातुं नास्ति मे क्षणः ।
मदंशः पुरुषो अयं ते निःशेषं कथयिष्यति ॥
na me tejaḥsahaḥ kaścidākhyātuṃ nāsti me kṣaṇaḥ ।
madaṃśaḥ puruṣo ayaṃ te niḥśeṣaṃ kathayiṣyati ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) न मे तेजः-सहः = मेरा तेज सहन करने वाला नहीं; कश्चित् = कोई; आख्यातुम् = कहने के लिए (सामने रहकर); नास्ति मे क्षणः = मेरे पास क्षण नहीं; मत्-अंशः पुरुषः = मेरा अंश-पुरुष; अयम् = यह; ते = तुझे; निःशेषम् = सम्पूर्ण; कथयिष्यति = कहेगा।

हिन्दी भावार्थ सूर्य स्पष्ट कहते हैं — मेरा तेज कोई सह नहीं सकता कि मैं स्वयं दीर्घ उपदेश दूँ, और मेरे पास क्षण भी नहीं। अतः “यह मेरा अंश-पुरुष” तुझे निःशेष कथा सुनाएगा। ज्ञान का स्रोत सूर्य रहता है; वाचक-रूप अंश बनता है — शास्त्र की संवाद-व्यवस्था यहाँ स्थिर होती है।

English rendering “None can endure my radiance to hear me speak it out, nor have I a moment free. This person, my own portion, will tell it to you completely.”

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद (उपदेश-हस्तांतरण)। संख्या/सूत्र नहीं; वक्ता-श्रद्धेयता का ढाँचा है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) पूर्ण सूर्य-प्रकाश को नंगी आँख से नहीं देखा जाता; filter या प्रतिबिम्ब चाहिए। यहाँ “अंश-पुरुष” वही interface है — स्रोत का तेज अविच्छिन्न, वाचन का रूप सह्य। शास्त्रीय संवाद-व्यवस्था वैज्ञानिक lecture जैसी लगती है: मूल सिद्धांत एक, व्याख्याता प्रतिनिधि। आगे का पूरा ग्रन्थ उसी अंश-वाचक की वाणी में चलेगा; जब सूत्र आयेंगे, स्मरण रहे कि वे “सूर्य का दान” हैं, पर पठनीय रूप में अनुवादित।

1.7
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवः समादिश्यांशं आत्मनः ।
स पुमान्मयं आहेदं प्रणतं प्राञ्जलिस्थितम् ॥
ityuktvāntardadhe devaḥ samādiśyāṃśaṃ ātmanaḥ ।
sa pumānmayaṃ āhedaṃ praṇataṃ prāñjalisthitam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति उक्त्वा = ऐसा कहकर; अन्तर्दधे = अन्तर्धान हो गए; देवः = देव (सूर्य); समादिश्य = आज्ञा देकर; अंशं आत्मनः = अपने अंश को; स पुमान् = वह पुरुष; मयम् = मय से; आह = बोला; इदम् = यह; प्रणतम् = नत / झुके हुए को; प्राञ्जलि-स्थितम् = अञ्जलि बाँधे खड़े को।

हिन्दी भावार्थ इतना कहकर देव अपने अंश को आदेश देकर अन्तर्धान हो जाते हैं। फिर वह अंश-पुरुष, मय के सामने — जो प्रणत और प्राञ्जलि खड़ा है — यह उपदेश आरम्भ करता है। विनय (प्रणाम-अञ्जलि) और आज्ञा-परम्परा दोनों एक ही दृश्य में बँधते हैं: अब पाठक भी उसी श्रवण-मुद्रा में प्रवेश करता है।

English rendering So saying, and charging his own portion, the god vanished. That person then spoke this to Maya, who stood bowed with hands joined.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (देव-अन्तर्धान और अंश-उपदेष्टा का उदय)।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मंच पर दीप बुझता है, और दीप का प्रकाश एक शांत आचार्य में उतर आता है — देव अन्तर्धान, अंश उपदेशक। मय की प्रणत-प्राञ्जलि मुद्रा observational discipline की भी है: माप से पहले स्थिर ध्यान, प्रश्न से पहले श्रवण। पाठक को यहाँ स्वयं को उसी मुद्रा में रखना है — अगले श्लोकों में युग, काल, भूगोल आएँगे; पहले विनय, फिर parameters। संवाद की यह चौखट पूरे ग्रन्थ तक नहीं टूटेगी।

1.8
शृणुष्वैकमनाः पूर्वं यदुक्तं ज्ञानं उत्तमम् ।
युगे युगे महर्षीणां स्वयं एव विवस्वता ॥
śṛṇuṣvaikamanāḥ pūrvaṃ yaduktaṃ jñānaṃ uttamam ।
yuge yuge maharṣīṇāṃ svayaṃ eva vivasvatā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शृणुष्व = सुन; एक-मनाः = एकाग्र मन से; पूर्वम् = पहले / प्राचीन काल में; यत् उक्तम् = जो कहा गया; ज्ञानम् उत्तमम् = उत्तम ज्ञान; युगे युगे = युग-युग में; महर्षीणाम् = महर्षियों को; स्वयम् एव = स्वयं ही; विवस्वता = विवस्वान् द्वारा।

हिन्दी भावार्थ अंश-पुरुष कहते हैं — एकाग्र होकर सुनो वह उत्तम ज्ञान, जो पहले भी कहा जा चुका है: युग-युग में महर्षियों को विवस्वान् ने स्वयं यही सिखाया। यह श्लोक शास्त्र को एक-बारगी “नवीन आविष्कार” नहीं, पुनः-उच्चारित परम्परा बनाता है — वही ज्ञान, नया श्रोता, नया युग।

English rendering “Listen with undivided mind to that supreme knowledge which was spoken of old — which, age after age, Vivasvān himself taught to the great seers.”

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/परम्परा-घोषणा। “युगे युगे” काल-चक्र का संकेत है; संख्याएँ अगले श्लोकों/अध्यायों में आएंगी।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही syllabus को कई पीढ़ियाँ दोहराती हैं — जैसे खगोलीय सारणियाँ नई epoch पर छापकर पुरानी विधि से चलती रहती हैं। “युगे युगे” का दावा नवीन आविष्कार का नहीं, re-transmission का है: ज्ञान वही, श्रोता नया, काल-संदर्भ नया। एकाग्र श्रवण का आदेश आधुनिक lab protocol सा है — आधे मन से पढ़ा श्लोक अधूरा initial condition छोड़ता है। यह परम्परा-सूत्र बाद में “आद्य शास्त्र” और कालभेद (१.०९) से जुड़कर निरन्तरता का पूरा चित्र बनाएगा।

1.9
शास्त्रं आद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्करः ।
युगानां परिवर्तेन कालभेदो अत्र केवलः ॥
śāstraṃ ādyaṃ tadevedaṃ yatpūrvaṃ prāha bhāskaraḥ ।
yugānāṃ parivartena kālabhedo atra kevalaḥ ।।
पाठ-भेद: B् केवलम्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शास्त्रम् आद्यम् = आदि-शास्त्र / मूल ज्ञान; तद् एव इदम् = वही यह; यत् पूर्वम् = जो पहले; प्राह भास्करः = भास्कर (सूर्य) ने कहा; युगानाम् परिवर्तेन = युगों के चक्र-परिवर्तन से; कालभेदः = काल का भेद; अत्र केवलः / केवलम् = यहाँ मात्र (पाठ-भेद: *केवलः · B केवलम् — अर्थ एक ही).

हिन्दी भावार्थ यह वही आदि शास्त्र है जिसे सूर्य ने पहले उपदिष्ट किया था। युगों के बार-बार घूमने से काल का रूप बदलता है — और यहीं पर मात्र इतना ही भेद है। ज्ञान की धारा वही रहती है; बदलता है समय का सन्दर्भ। शास्त्र-परम्परा यहाँ निरन्तरता का दावा करती है, न कि नये आविष्कार का।

English rendering This is that same primordial teaching which the Sun (Bhāskara) set forth before. Through the turning of the yugas there is a difference of time here — and that alone. Continuity of doctrine, not novelty of invention, is what the verse asserts.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/परम्परा-स्थापन। यह श्लोक गणना नहीं खोलता; वह इस बात की भूमि तैयार करता है कि आगे आने वाली माप-पद्धति उसी शास्त्र-धारा की मानी जाए, युग-परिवर्तन के बावजूद।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना करें एक ही algorithm, दो अलग calendar epochs पर चलाया गया — परिणाम में अंक बदलेंगे, विधि नहीं। श्लोक कहता है: शास्त्र आद्य वही; युग-परिवर्तन से केवल कालभेद। व्यवहार में इसका अर्थ है — अहर्गण, वर्षमान, संपात-संदर्भ समय के साथ अद्यतन होते हैं; गति-नियम की रूपरेखा वही रहती है। बाद के अध्यायों में जब मध्य-ग्रह के लिए किसी युग-आरम्भ से दिन गिनेंगे, आप ठीक यही “कालभेद” हाथ में पकड़ रहे होंगे — ज्ञान-धारा अखंड, माप-बिन्दु चल।

1.10
लोकानां अन्तकृत्कालः कालो अन्यः कलनात्मकः ।
स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्तश्चामूर्त उच्यते ॥
lokānāṃ antakṛtkālaḥ kālo anyaḥ kalanātmakaḥ ।
sa dvidhā sthūlasūkṣmatvānmūrtaścāmūrta ucyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लोकानाम् अन्तकृत् कालः = लोकों का अन्त करने वाला काल; अन्यः कालः = दूसरा काल; कलनात्मकः = गणना-स्वरूप / गणितीय काल; द्विधा = दो प्रकार से; स्थूल-सूक्ष्म-त्वात् = स्थूलता और सूक्ष्मता के कारण; मूर्तः = मूर्त (माप्य, आकार-युक्त); अमूर्तः = अमूर्त (अतिसूक्ष्म, नाम-मात्र); उच्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ काल दो भूमिकाओं में आता है। एक वह काल जो लोकों का अन्त करता है — महाप्रलय का काल। दूसरा वह काल जो कलना का है: गिनने, बाँटने, मापने का काल। यह कलनात्मक काल फिर स्थूल-सूक्ष्म भेद से दो नाम पाता है — मूर्त और अमूर्त। यहाँ दर्शन और माप-शास्त्र की सीमा रेखा खींची गई है: विनाश का काल एक ओर, गणना का काल दूसरी ओर।

English rendering Time that ends the worlds is one; another time is that of reckoning. The latter, by its gross and subtle nature, is called twofold — mūrta (embodied, measurable) and amūrta (unembodied, finer still). Cosmic terminus and metrological time are deliberately kept apart.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका / काल-वर्गीकरण। यह श्लोक संख्या नहीं देता; वह आगे (१.११–१२) आने वाली प्राण–नाडी–अहोरात्र श्रृंखला की तार्किक भूमिका बाँधता है — कि गणना-काल को मूर्त–अमूर्त में बाँटकर ही माप की सीढ़ी चढ़ाई जाएगी।

दृष्टान्त (Illustrative Example) दो घड़ियाँ कल्पना करें। एक “लोकान्त” की — कल्प-प्रलय जैसी विशाल सीमा, जहाँ गणना रुकती नहीं पर कथा बदलती है। दूसरी कलनात्मक काल की — घटी, विघटिका, असु, दिन, मास, वर्ष — जिसे बाँटा, जोड़ा, घटाया जा सकता है। स्थूल-सूक्ष्म / मूर्त-अमूर्त भेद उसी माप-सीढ़ी का है: मूर्त वह इकाई जो प्रत्यक्ष व्यवहार में गिनी जाए; अमूर्त वह जो और सूक्ष्म विभाजन माँगती है। आगे अहर्गण, देशान्तर-काल और ग्रह-गति के सारे सूत्र दूसरे काल — कलनात्मक काल — पर खड़े होंगे; पहला दर्शन की सीमा खींचता है, दूसरा गणित का मैदान खोलता है।

1.11
प्राणादिः कथितो मूर्तस्त्रुट्याद्यो अमूर्तसंज्ञकः ।
षड्भिः प्राणैर्विनाडी स्यात्तत्षष्ट्या नाडिका स्मृता ॥
prāṇādiḥ kathito mūrtastruṭyādyo amūrtasaṃjñakaḥ ।
ṣaḍbhiḥ prāṇairvināḍī syāttatṣaṣṭyā nāḍikā smṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राण-आदिः = प्राण से आरम्भ; मूर्तः कथितः = मूर्त कहा गया; त्रुटि-आद्यः = त्रुटि से आरम्भ; अमूर्त-संज्ञकः = अमूर्त नाम वाला; षड्भिः प्राणैः = छह प्राणों से; विनाडी = विनाडी (पल); तत्-षष्ट्या = उसकी साठ से; नाडिका = नाडिका (घटी); स्मृता = स्मरण / परिभाषित।

हिन्दी भावार्थ मूर्त काल प्राण से आरम्भ होता है; अमूर्त काल त्रुटि आदि अतिसूक्ष्म इकाइयों से। गणना की ठोस सीढ़ी यहाँ खुलती है: छह प्राण मिलकर एक विनाडी बनाते हैं, और साठ विनाडी मिलकर एक नाडिका स्मृत होती है। सूक्ष्म से स्थूल की ओर — प्राण → विनाडी → नाडिका — यही दिन-विभाजन का मूल पैमाना है।

English rendering Mūrta time is said to begin with the prāṇa; amūrta, with the truṭi and finer units. Six prāṇas make one vināḍī; sixty of those make one nāḍikā. This is the countable ladder of the day, climbing from the prāṇa (a unit of time, traditionally glossed as “one breath”) to the ghaṭī.

गणित / The Mathematics
- 6 prāṇa = 1 vināḍī (pala)
- 60 vināḍī = 1 nāḍikā (ghaḍī / nāḍī)
- पूर्ण दिन-श्रृंखला (इस श्लोक + १.१२ से, डोसियर §1 से सुसंगत):
1 अहोरात्र = 60 nāḍikā = 3,600 vināḍī = 21,600 prāṇa
(= 60 × 60 × 6 = 21,600)
- गणना-संवाद: 21,600 prāṇa/दिन ↔ 21,600 चाप-मिनट/वृत्त — यह गणना-संगति (count correspondence) है, समय और कोण की भौतिक समता नहीं।

उदाहरण (worked example)
एक नक्षत्र-अहोरात्र = 60 नाडिका।
1 नाडिका = 60 विनाडी ⇒ 1 दिन = 3,600 विनाडी।
1 विनाडी = 6 प्राण ⇒ 1 दिन = 3,600 × 6 = 21,600 प्राण।
(परम्परा: नाडिका = घटी, विनाडी = पल; 1 दिन = 24 h ⇒ 1 घटी = 24 min, 1 पल = 24 s, 1 प्राण = 4 s।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही मेट्रोलॉजी `vedic-ghadi` और `bharat-ephemeris-offline` / MATHEMATICAL-AUDIT §1 की रीढ़ है — दिन = 60 घटी = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण। हमने 21,600 प्राण ↔ 21,600′ वृत्त को count correspondence माना, physical identity नहीं; oracle में इकाई-रूपान्तर `==` से सील किए गए, tolerance-band से नहीं।

1.12
नाडीषष्ट्या तु नाक्षत्रं अहोरात्रं प्रकीर्तितम् ।
तत्त्रिंशता भवेन्मासः सावनो अर्कोदयैस्तथा ॥
nāḍīṣaṣṭyā tu nākṣatraṃ ahorātraṃ prakīrtitam ।
tattriṃśatā bhavenmāsaḥ sāvano arkodayaistathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नाडी-षष्ट्या = साठ नाडी से; नाक्षत्रम् अहोरात्रम् = नक्षत्र-अहोरात्र (तारकीय दिन-रात्रि); प्रकीर्तितम् = कहा गया; तत्-त्रिंशता = उसकी तीस से; मासः = मास; सावनः = सावन (सूर्योदय-आधारित, नागर/civil); अर्कोदयैः = सूर्योदयों से; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ साठ नाडी मिलकर एक नक्षत्र-अहोरात्र बनता है — तारों के सापेक्ष पूरा दिन-रात्रि चक्र। तीस ऐसे अहोरात्रों से मास बनता है; और सावन मास सूर्योदयों की गिनती से उसी रीति कहा गया है। यहाँ दिन की दो भाषाएँ साथ खड़ी हैं: नक्षत्र-दिन (नाडी-माप) और सावन-दिन (अर्कोदय-माप) — आगे तिथि-इंजन दोनों पर निर्भर रहेगा।

English rendering Sixty nāḍīs make one nākṣatra ahorātra — the sidereal day-and-night. Thirty of those make a month; and the sāvana (civil) month is likewise reckoned by sunrises. Sidereal day-count and sunrise day-count stand side by side as two measures of the same civil ladder.

गणित / The Mathematics
- 60 nāḍikā = 1 nākṣatra ahorātra (sidereal day)
- 30 ahorātra = 1 māsa
- 1 sāvana māsa = 30 sunrises (अर्कोदय) — civil month
- दिन-श्रृंखला पूर्ण:
1 nākṣatra day = 60 nāḍī = 3,600 vināḍī = 21,600 prāṇa
1 sāvana month = 30 sāvana days (by sunrise count)
- (महायुग-दिनसंख्या इस श्लोक में नहीं; वह आगे के युग-श्लोकों / डोसियर के SS-canon 1,577,917,828 civil days/Mahāyuga से जुड़ती है।)

उदाहरण (worked example)
Convention: 1 nākṣatra day = 60 nāḍī।
30 ऐसे दिन ⇒ 1 mās = 30 × 60 = 1,800 nāḍī = 30 × 21,600 = 648,000 prāṇa (यदि अहोरात्र को पूर्ण 60-नाडी दिन लें)।
सावन मास: 30 सूर्योदय = 30 सावन दिन — यही civil-month की परिभाषा; sidereal day और sunrise-day यहाँ अभी एक-से-एक नहीं मिलाए गए, केवल दो परिभाषाएँ दी गई हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक दिन-मास की सीढ़ी बंद करता है, जिस पर day-count का पूरा ढाँचा खड़ा है। SS-canon Mahāyuga = 1,577,917,828 civil days (`math-core`) बनाम Āryabhaṭa 1,577,917,500 (`vedic-ghadi`) — 328-दिन का अन्तर — तिथि-इंजन पर सबसे तेज़ पड़ता है; synodic test में SS-canon ≈ −0.0047 s/month, Āryabhaṭa ≈ −0.535 s/month (NEXT-STEPS A, 2026-08-10)। हमने canon-choice को छुपाया नहीं: exact `==` oracle, tolerance नहीं।

1.13
ऐन्दवस्तिथिभिस्तद्वत्संक्रान्त्या सौर उच्यते ।
मासैर्द्वादशभिर्वर्षं दिव्यं तदह उच्यते ॥
aindavastithibhistadvatsaṃkrāntyā saura ucyate ।
māsairdvādaśabhirvarṣaṃ divyaṃ tadaha ucyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऐन्दवः = चान्द्र (मास), तिथिभिः = तिथियों से (परिभाषित), तद्वत् = उसी प्रकार, संक्रान्त्या = संक्रान्ति (सूर्य का राशि-प्रवेश) से, सौरः = सौर मास, मासैः द्वादशभिः = बारह मासों से, वर्षम् = वर्ष, दिव्यम् तत् अहः = वह (मानव-)वर्ष देवताओं का एक अहोरात्र-दिन कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ चान्द्र मास की गिनती तिथियों से होती है; उसी रीति से सौर मास संक्रान्ति—सूर्य के एक राशि से दूसरी में प्रवेश—से जाना जाता है। बारह ऐसे मास मिलकर एक वर्ष बनाते हैं। और वही वर्ष, जब उसे दिव्य-मापदण्ड में पढ़ा जाए, सुरों का एक दिन कहलाता है—मानव-वर्ष और दिव्य-अहोरात्र का यह सेतु अध्याय आगे के काल-क्रम का द्वार खोलता है।

English rendering The lunar month is marked by the tithis; likewise the solar month is marked by saṅkrānti, the Sun’s entry into a sign. Twelve months constitute a year; and that year, in the divine measure, is called a day of the gods.

गणित / The Mathematics Time-scale ladder (not a positional formula):
चान्द्र मास ← तिथि-क्रम; सौर मास ← संक्रान्ति;
1 वर्ष = 12 मास;
1 दिव्य-अहः (देव-दिन) = 1 (मानव) वर्ष।
तिथि स्वयं सूर्य–चन्द्र के भोग-अन्तर (≈12°) की संज्ञक इकाई है; संक्रान्ति सौर-भोग की राशि-सीमा है।

उदाहरण (worked example) यदि एक पूर्ण चान्द्र मास ≈ 30 तिथियाँ हो, तो 12 चान्द्र मास ≈ 360 तिथियाँ ≈ एक चान्द्र वर्ष (आम गणना-रीति; सटीक लंबाई पक्ष-चक्र और अधिकमास पर निर्भर)। सौर वर्ष = 12 संक्रान्तियों का चक्र। उसी सौर/मानव वर्ष को दिव्य-मापदण्ड में 1 देव-दिन गिना जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) तिथि-परिभाषा ही panchāṅga की रीढ़ है—vedic-ghadi का tithi engine और ghaḍī/pala/vipala metrology इसी “तिथिभिः” वाली इकाई-श्रृंखला पर बैठते हैं। दिन-विभाजन का count correspondence (1 दिन = 60 ghaḍī = 21,600 prāṇa ↔ वृत्त के 21,600 कला) समय-कोण की गणना-सुविधा है, भौतिक समता नहीं—MATHEMATICAL-AUDIT §1। canon day-count का चुनाव (SS बनाम Āryabhaṭa) सबसे अधिक तभी चुभता है जब यही तिथि-इंजन लंबी अवधि में चलाया जाए।

1.14
सुरासुराणां अन्योन्यं अहोरात्रं विपर्ययात् ।
तत्षष्टिः षड्गुणा दिव्यं वर्षं आसुरं एव च ॥
surāsurāṇāṃ anyonyaṃ ahorātraṃ viparyayāt ।
tatṣaṣṭiḥ ṣaḍguṇā divyaṃ varṣaṃ āsuraṃ eva ca ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुरासुराणाम् = देवों और असुरों का, अन्योन्यम् = परस्पर, अहोरात्रम् = दिन-रात्रि, विपर्ययात् = उलटाव/विपर्यास से, तत् षष्टिः = उन (दिव्य दिनों) की साठ, षड्गुणा = छः गुनी (×6), दिव्यं वर्षम् = दिव्य वर्ष, आसुरम् एव च = और उसी रीति आसुर वर्ष भी।

हिन्दी भावार्थ सुरों और असुरों का अहोरात्र एक-दूसरे का विपर्यय है—जहाँ एक का दिन, वहाँ दूसरे की रात। उन दिव्य दिनों की साठ संख्या को छः से गुणा करें तो एक दिव्य वर्ष बनता है; असुरों का वर्ष भी उसी संख्या-माप से जाना जाता है। यह श्लोक मात्र कथा नहीं—काल की इकाई को 360 दिव्य-दिन = 1 दिव्य-वर्ष पर स्थिर करता है।

English rendering For the gods and the asuras, day and night are mutually inverted. Sixty of those divine days, multiplied by six, make a divine year—and likewise a year of the asuras.

गणित / The Mathematics
1 दिव्य-वर्ष = 60 × 6 = 360 दिव्य-दिन।
पूर्व श्लोक से: 1 दिव्य-दिन = 1 मानव-वर्ष ⇒

1 दिव्य-वर्ष = 360 मानव-वर्ष।
सुर/असुर अहोरात्र का विपर्यय काल-दिशा का व्युत्क्रम है (एक ही 360-दिन चक्र, विपरीत फेज)—संख्यात्मक अवधि समान।

उदाहरण (worked example) 2 दिव्य-वर्ष = 2 × 360 = 720 मानव-वर्ष। 12,000 दिव्य-वर्ष (अगले श्लोक का चतुर्युग) = 12,000 × 360 = 43,20,000 मानव-सूर्य-वर्ष—जो 1.15 में शब्द-संख्या से सीधे आता है।

1.15
तद्द्वादशसहस्राणि चतुर्युगं उदाहृतम् ।
सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः ॥
taddvādaśasahasrāṇi caturyugaṃ udāhṛtam ।
sūryābdasaṃkhyayā dvitrisāgarairayutāhataiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् द्वादश-सहस्राणि = उन (दिव्य वर्षों) के बारह हज़ार, चतुर्युगम् = चतुर्युग (महायुग), उदाहृतम् = कहा गया है, सूर्याब्द-संख्यया = सूर्य-वर्षों की गिनती से, द्वि-त्रि-सागरैः = भूतसंख्या २-३-४ → ४३२, अयुत-आहतैः = अयुत (१०,०००) से गुणित।

हिन्दी भावार्थ बारह हज़ार दिव्य वर्ष—यही चतुर्युग कहा गया है। सूर्य-वर्षों में वही राशि भूतसंख्या से खुलती है: द्वि-त्रि-सागर = ४३२, और अयुत (दस हज़ार) से गुणित करने पर तैंतालीस लाख बीस हज़ार सूर्याब्द। दो रीतियाँ—दिव्य-सीढ़ी और सूर्याब्द-सीधी गिनती—एक ही महायुग-माप पर मिलती हैं।

English rendering Twelve thousand of those divine years are declared a caturyuga. Counted in solar years, that span is four million three hundred and twenty thousand—encoded as the word-numeral dvi-tri-sāgara (432) multiplied by an ayuta (10,000).

गणित / The Mathematics
चतुर्युग (दिव्य) = 12,000 दिव्य-वर्ष।
1 दिव्य-वर्ष = 360 मानव-वर्ष (1.13–1.14) ⇒
12,000 × 360 = 4,320,000 सूर्य-वर्ष।
भूतसंख्या (श्लोक का सीधा पाठ):
द्वि-त्रि-सागर = 432, अयुत = 10,000
⇒ 432 × 10,000 = 4,320,000 सूर्याब्द।
(सागर = 4 — चार समुद्र की रूढ़ि; पाठ-भेद से 7 मानने पर संख्या नहीं बैठती, अतः यहाँ 4 ही संगति देता है।)

उदाहरण (worked example) दिव्य मार्ग: 12,000 × 360 = 4,320,000। शब्द-संख्या मार्ग: 432 × 10,000 = 4,320,000। दोनों सर्वसम। एक कल्प = 1,000 चतुर्युग ⇒ 1,000 × 4,320,000 = 4,320,000,000 सूर्य-वर्ष (आगे के श्लोकों की सीढ़ी; यह श्लोक केवल चतुर्युग स्थिर करता है)।

हमारा डिकोड (Our Decode) Mahāyuga = 4,320,000 वर्ष — यही हमारे mean-longitude lab की मूल समय-दीवार है। bharat-ephemeris-offline / math-core SS-canon civil days per Mahāyuga = 1,577,917,828 लेता है; vedic-ghadi Āryabhaṭa-canon 1,577,917,500 — 328-दिन का वास्तविक, परिणामी अंतर। synodic परीक्षण में SS-canon ≈ −0.1 rev/Mahāyuga residual देता है, Āryabhaṭa ≈ −11.2; सबसे अधिक चोट tithi engine पर पड़ती है। bīja fits (Mars +30, Jupiter −51, Saturn +61 revs/Mahāyuga) और ayanāṃśa shared-drift (−16 rev/Mahāyuga = −4.8″/yr) सब इसी 43,20,000-वर्ष फ्रेम में मापे गए हैं।

1.16
सन्ध्यासन्ध्यांशसहितं विज्ञेयं तच्चतुर्युगम् ।
कृतादीनां व्यवस्थेयं धर्मपादव्यवस्थया ॥
sandhyāsandhyāṃśasahitaṃ vijñeyaṃ taccaturyugam ।
kṛtādīnāṃ vyavastheyaṃ dharmapādavyavasthayā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सन्ध्या-सन्ध्यांश-सहितम् = सन्ध्या और सन्ध्यांश सहित, विज्ञेयम् = जानना चाहिए, तत् चतुर्युगम् = वह चतुर्युग, कृतादीनाम् = कृत आदि (युगों) की, व्यवस्था इयम् = यह व्यवस्था, धर्म-पाद-व्यवस्थया = धर्म के पाद (चतुर्थांश) की व्यवस्था से।

हिन्दी भावार्थ ऊपर कहा चतुर्युग केवल “बीच का कर्ता काल” नहीं—उसे सन्ध्या और सन्ध्यांश के साथ पूरा जानना है; संध्या-काल युग-सीमा के अनिवार्य अंग हैं। कृत, त्रेता, द्वापर, कलि की भीतरी माप-व्यवस्था धर्म के पादों से चलती है—पूर्ण धर्म के चार, तीन, दो, एक भाग की क्रम-हानि से युग-दीर्घाएँ निर्धारित होती हैं। यह श्लोक अनुपात-सूत्र का द्वार है; अंक अगले विधान में खुलते हैं।

English rendering That caturyuga is to be understood only when its sandhyās and sandhyāṃśas are included. The internal arrangement of the Kṛta and the succeeding yugas follows the quartering of dharma—full, three-quarters, half, and one-quarter in succession.

गणित / The Mathematics संरचनात्मक अनुपात (इस श्लोक में कच्चे अंक नहीं; धर्म-पाद नियम):
धर्म-पूर्ण = 4 पाद। युग-क्रम:
कृत : त्रेता : द्वापर : कलि = 4 : 3 : 2 : 1 (पादों के अनुपात में),
और प्रत्येक युग के आगे–पीछे सन्ध्या/सन्ध्यांश जुड़े रहते हैं—जिनके बिना “चतुर्युग” अपूर्ण गिना जाता है।
कुल चतुर्युग = 4,320,000 सूर्य-वर्ष (1.15) इसी सहित-व्यवस्था का योग है।

उदाहरण (worked example) पाद-अनुपात 4+3+2+1 = 10 अंश। यदि पूरा चतुर्युग 4,320,000 वर्ष हो, तो एक “अंश” = 4,320,000 ÷ 10 = 432,000 वर्ष। तब मुख्य भाग (सन्ध्या-रहित कच्चा अनुपात-दृश्य): कृत 4×432,000 = 1,728,000; त्रेता 1,296,000; द्वापर 864,000; कलि 432,000—सन्ध्या/सन्ध्यांश इन्हीं के उपविभाग के रूप में शास्त्र आगे बाँटता है। (यहाँ केवल 1.15–1.16 के अनुपात-तर्क का अंक-उदाहरण; विस्तृत सन्ध्या-अंक उत्तरवर्ती श्लोकों पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) चतुर्युग की “सहित” पूर्ण-माप ही वह दीवार है जिस पर math-core का integer-bhagaṇa mean-longitude और day-count (1,577,917,828 civil days / Mahāyuga, SS-canon) टिके हैं। युग-पाद यहाँ ज्योतिष-भय नहीं—केवल काल-खंड का अनुपात-नियम हैं; हमारा oracle discipline (`==` on fixtures, no tolerance bands) उसी स्पष्ट, घोषित convention की माँग करता है जो यह श्लोक सन्ध्या-सहित चतुर्युग के लिए करता है।

1.17
युगस्य दशमो भागश्चतुस्त्रिद्व्येकसङ्गुणः ।
क्रमात्कृतयुगादीनां षष्ठांशः सन्ध्ययोः स्वकः ॥
yugasya daśamo bhāgaścatustridvyekasaṅguṇaḥ ।
kramātkṛtayugādīnāṃ ṣaṣṭhāṃśaḥ sandhyayoḥ svakaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युगस्य = महायुग का; दशमः भागः = दसवाँ अंश (1/10); चतुः-त्रि-द्वि-एक-सङ्गुणः = क्रमशः 4, 3, 2, 1 से गुणा; क्रमात् = क्रम से; कृतयुगादीनाम् = कृत से आरम्भ युगों का (कृत–त्रेता–द्वापर–कलि); षष्ठांशः = छठा भाग (1/6); सन्ध्ययोः = दोनों सन्धियों (आदि–अन्त) का; स्वकः = अपना-अपना।

हिन्दी भावार्थ महायुग का दसवाँ भाग लेकर उसे क्रमशः चार, तीन, दो और एक से गुणा करें — वही कृत, त्रेता, द्वापर और कलि की अवधि है। प्रत्येक युग का छठा भाग उसकी दोनों सन्धियों (आरम्भ और समाप्ति की संधि) का अपना माप है। इस प्रकार युग-विभाग समान अनुपात में बँटता है, मनमाने खंडों में नहीं।

English rendering Take one-tenth of a yuga and multiply it in order by four, three, two, and one — those are the measures of the Kṛta and the following ages. One-sixth of each age is the measure of its own pair of twilights (the opening and closing sandhyās).

गणित / The Mathematics
महायुग Y का दसवाँ भाग:
y₀ = Y/10

चार युग:
कृत = 4y₀, त्रेता = 3y₀, द्वापर = 2y₀, कलि = 1y₀
(योग: 10y₀ = Y)

प्रत्येक युग की दोनों सन्धियाँ (मिलकर):
संधि-योग = (उस युग का माप)/6

(Canon: Y = 4,320,000 वर्ष — अध्याय-1 की युग-परिभाषा; यह श्लोक अनुपात देता है, स्वयं वर्ष-संख्या नहीं।)

उदाहरण (worked example)
Input convention: Y = 4,320,000 solar years (SS Mahāyuga).
y₀ = 4,320,000 ÷ 10 = 432,000
कृत = 4 × 432,000 = 1,728,000; त्रेता = 1,296,000; द्वापर = 864,000; कलि = 432,000
कृत-संधि-योग = 1,728,000 ÷ 6 = 288,000 (अर्थात् प्रत्येक छोर ≈ 144,000); कलि-संधि-योग = 432,000 ÷ 6 = 72,000।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही अनुपात math-core की integer-bhagaṇa प्रयोगशाला का समय-ढाँचा है — mean longitudes महायुग = 4,320,000 वर्ष पर चलते हैं। Civil-day canon (SS: 1,577,917,828 दिन/महायुग) चुनने पर tithi-engine की संवेदनशीलता यहीं से शुरू होती है; अनुपात शुद्ध रहें तो rate-fittings (bīja, ayanāṃśa) का फ्रेम अडिग रहता है।

महायुग = ४३,२०,००० वर्ष — अनुपात ४ : ३ : २ : १कृतयुग17,28,000 वर्षत्रेतायुग12,96,000 वर्षद्वापरयुग8,64,000 वर्षकलियुग4,32,000 वर्षसन्ध्या + सन्ध्यांश (प्रत्येक युग का ⅙, दोनों छोर पर आधा-आधा)
महायुग-संरचना — the 4:3:2:1 architecture of the Mahāyuga (SS 1.15–1.17): 43,20,000 divine years split as Kṛta 4x, Tretā 3x, Dvāpara 2x, Kali 1x where x = 4,32,000; each yuga carries its sandhyā–sandhyāṃśa twilight (⅙ each side).
1.18
युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरं इहोच्यते ।
कृताब्दसंख्यास्तस्यान्ते सन्धिः प्रोक्तो जलप्लवः ॥
yugānāṃ saptatiḥ saikā manvantaraṃ ihocyate ।
kṛtābdasaṃkhyāstasyānte sandhiḥ prokto jalaplavaḥ ।।
पाठ-भेद: B् ऋताब्दसंख्या

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युगानाम् = युगों की; सप्ततिः सैका = सत्तर और एक (= 71); मन्वन्तरम् = एक मन्वन्तर; इह उच्यते = यहाँ कहा गया है; कृताब्द-संख्याः = कृत-वर्षों की संख्या के बराबर; तस्य अन्ते = उसके अन्त में; सन्धिः = संधि-काल; प्रोक्तः = कहा गया; जलप्लवः = जल-प्रलय (बाढ़-संधि)। (पाठ-भेद B: ऋताब्दसंख्या — अर्थ-समीप; मुख्य पाठ कृताब्दसंख्या)

हिन्दी भावार्थ इकहत्तर महायुगों को यहाँ एक मन्वन्तर कहा गया है। मन्वन्तर के अन्त में जो संधि आती है, उसकी अवधि कृतयुग के वर्षों के बराबर मानी गई है, और उसे जलप्लव — जल-प्रलय — कहा गया है। युग-श्रृंखला के बाद एक “विराम” आता है, और उसका माप यादृच्छिक नहीं, कृत-प्रमाण है।

English rendering Seventy-one yugas are here called one manvantara. At its end comes a sandhi whose length equals the years of a Kṛta age; that junction is named the water-flood (jala-plava). (Variant B reads ṛta-year measure; the primary sense remains a Kṛta-scale sandhi.)

गणित / The Mathematics
1 manvantara = 71 Mahāyugas
मन्वन्तर-संधि = कृत-वर्ष = 4 × (Y/10)

Y = 4,320,000 पर:
मन्वन्तर = 71 × 4,320,000 = 306,720,000 वर्ष
संधि (जलप्लव) = 1,728,000 वर्ष

उदाहरण (worked example)
Input: Y = 4,320,000.
एक मन्वन्तर (बिना संधि) = 71 × 4,320,000 = 306,720,000 वर्ष।
उसके अन्त की जलप्लव-संधि = 1,728,000 वर्ष।
संधि सहित = 308,448,000 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) मन्वन्तर-खंड ahargaṇa / elapsed-year पिण्डीकरण की सीढ़ी है — 1.23 का “संख्यां एकत्र पिण्डयेत्” यहीं से सामग्री लेता है। Day-count का SS–Āryabhaṭa अन्तर (328 दिन/महायुग) जब मन्वन्तर-पैमाने पर चढ़ता है, तो mean-longitude प्रयोग में epoch-drift सीधे दिखता है; इसलिए canon घोषित रखना अनिवार्य है।

1.19
ससन्धयस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयास्चतुर्दश ।
कृतप्रमाणः कल्पादौ सन्धिः पञ्चदशः स्मृतः ॥
sasandhayaste manavaḥ kalpe jñeyāscaturdaśa ।
kṛtapramāṇaḥ kalpādau sandhiḥ pañcadaśaḥ smṛtaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स-सन्धयः = संधियों सहित; ते मनवः = वे मनु; कल्पे = एक कल्प में; ज्ञेयाः = जानने योग्य; चतुर्दश = चौदह; कृत-प्रमाणः = कृतयुग के माप का; कल्पादौ = कल्प के आरम्भ में; सन्धिः = संधि; पञ्चदशः = पंद्रहवीं; स्मृतः = कही/स्मरण की गई।

हिन्दी भावार्थ कल्प में चौदह मनु — प्रत्येक अपनी संधि के साथ — गिने जाते हैं। कल्प के बिलकुल आरम्भ में एक और संधि है, कृतयुग के बराबर, और उसे पंद्रहवीं संधि कहा गया है। यों चौदह मन्वन्तर-संधियाँ और एक आदि-संधि — कुल पंद्रह कृत-प्रमाण संधियाँ — कल्प की हड्डी का ढाँचा बनाती हैं।

English rendering In a kalpa the Manus are to be known as fourteen, each with its sandhi. At the beginning of the kalpa a further sandhi, equal in measure to a Kṛta age, is remembered as the fifteenth.

गणित / The Mathematics
कल्प-संरचना:
• आदि-संधि: 1 × कृत
• मन्वन्तर: 14 × 71 = 994 Mahāyugas
• मन्वन्तर-संधियाँ: 14 × कृत
• कुल संधियाँ: 15 × कृत

कृत/Y = 4/10 = 2/5, अतः
15 × कृत = 15 × (2/5)Y = 6Y
कुल: 994Y + 6Y = *1000Y = 1 कल्प*

Y = 4,320,000 पर: कल्प = 4,320,000,000 वर्ष; प्रत्येक कृत-संधि = 1,728,000 वर्ष।

उदाहरण (worked example)
14 × 71 = 994 Mahāyugas।
15 × 1,728,000 = 25,920,000 वर्ष = 6 × 4,320,000 — ठीक छह महायुग-तुल्य।
994 + 6 = 1000 Mahāyugas प्रति कल्प।

हमारा डिकोड (Our Decode) कल्प = 1000 महायुग — यही वह दीर्घ-काल फ्रेम है जिस पर bharat-ephemeris-offline की mean-longitude lab rates (rev/Mahāyuga) परिभाषित हैं। Sandhi-गिनती गलत होने पर elapsed-year पिण्ड टूटता है; oracle discipline (`==` on fixtures) यहीं याद दिलाती है कि “लगभग 1000” स्वीकार्य नहीं — ठीक 994 + 6 ही चाहिए।

1.20
इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः ।
कल्पो ब्राह्मं अहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती ॥
itthaṃ yugasahasreṇa bhūtasaṃhārakārakaḥ ।
kalpo brāhmaṃ ahaḥ proktaṃ śarvarī tasya tāvatī ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इत्थम् = इस प्रकार; युग-सहस्रेण = एक हजार युगों से; भूत-संहार-कारकः = भूतों/प्राणियों के संहार का हेतु; कल्पः = कल्प; ब्राह्मम् अहः = ब्रह्मा का दिन; प्रोक्तम् = कहा गया; शर्वरी = रात्रि; तस्य = उसकी; तावती = उतनी ही (समान माप की)।

हिन्दी भावार्थ इस प्रकार — ऊपर गिनी गई रचना से — एक हजार महायुग मिलकर वह कल्प बनाते हैं जो सृष्टि के प्राणियों के संहार का भी काल-सीमा है। वही कल्प ब्रह्मा का दिन कहा गया है; और उसकी रात्रि भी उतनी ही लम्बी है। दिन में सृष्टि-क्रम, रात्रि में प्रलय-विराम — दोनों का माप एक।

English rendering Thus a thousand yugas make the kalpa that brings about the dissolution of beings. That kalpa is called a day of Brahmā; his night is of equal length.

गणित / The Mathematics
1 कल्प = 1000 Mahāyugas = ब्रह्मा का 1 अहन् (दिन)
ब्रह्मा की शर्वरी (रात्रि) = 1 कल्प (समान)
1 अहोरात्र (ब्रह्म) = 2 कल्प = 2000Y

Y = 4,320,000 ⇒ 1 कल्प = 4.32 × 10⁹ वर्ष; 1 ब्रह्म-अहोरात्र = 8.64 × 10⁹ वर्ष।

उदाहरण (worked example)
Mahāyuga Y = 4,320,000।
कल्प (ब्रह्म-दिन) = 1000 × 4,320,000 = 4,320,000,000 वर्ष।
दिन+रात्रि = 8,640,000,000 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक काल-सीढ़ी को “मानवीय युग” से “ब्रह्म-दिन” तक बाँधता है — mean-motion lab के लिए इकाई-परिवर्तन की अनुमति, न कि ज्योतिषीय भय-कथा। जब हम SS day-count 1,577,917,828 civ. days/Mahāyuga लगाते हैं, तो कल्प-पैमाने का कुल दिन-योग = 1000 × वह संख्या; canon का 328-दिन अन्तर यहाँ विशाल absolute gap बन जाता है — tithi-engine पर सबसे भारी असर।

1.21
परमायुः शतं तस्य तयाहोरात्रसंख्यया ।
आयुषो अर्धमितं तस्य शेषकल्पो अयं आदिमः ॥
paramāyuḥ śataṃ tasya tayāhorātrasaṃkhyayā ।
āyuṣo ardhamitaṃ tasya śeṣakalpo ayaṃ ādimaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमायुः = परम आयु; शतम् = सौ (वर्ष); तस्य = उसकी (ब्रह्मा की); तया अहोरात्र-संख्यया = उसी अहोरात्र-गणना से; आयुषः अर्ध-मितम् = आयु का आधा भाग; तस्य = उसका (बीत चुका — वाक्य-क्रम से); शेष-कल्पः = शेष (उत्तरार्ध का) कल्प; अयम् = यह (वर्तमान); आदिमः = प्रथम/आदि।

हिन्दी भावार्थ उसी अहोरात्र-गणना से ब्रह्मा की परम आयु सौ वर्ष कही गई है। उसकी आयु का आधा भाग बीत चुका है; और जो शेष आधा बचा है, उसका यह वर्तमान कल्प — पहला कल्प — चल रहा है। अर्थात् हम ब्रह्मा के जीवन के उत्तरार्ध के आदि-कल्प में हैं; यह दार्शनिक-काल स्थान-निर्धारण है, भविष्य-फल नहीं।

English rendering His supreme lifespan is a hundred years by that day-and-night reckoning. Half of that life has elapsed; this present kalpa is the first of the remaining half.

गणित / The Mathematics
परमायु = 100 ब्रह्म-वर्ष
1 ब्रह्म-वर्ष = 360 ब्रह्म-अहोरात्र = 360 × 2 कल्प = 720 कल्प
पूर्ण आयु = 100 × 720 = 72,000 कल्प
अर्ध-आयु बीती = 50 × 720 = 36,000 कल्प
वर्तमान = उत्तरार्ध का 1वाँ कल्प (आदिम शेष-कल्प)

(कल्प = 1000Y; Y = 4,320,000 — पूर्व श्लोकों की श्रृंखला।)

उदाहरण (worked example)
Convention: 1 ब्रह्म-अहोरात्र = 2 कल्प; 1 ब्रह्म-वर्ष = 360 अहोरात्र।
आधी आयु = 50 वर्ष × 360 × 2 = 36,000 कल्प बीते।
वर्तमान स्थिति: कल्प-सूचकांक = 36,001वाँ (उत्तरार्ध का आदि)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक “epoch hierarchy” का शीर्ष है — mean-longitude synthesis lab को याद दिलाता है कि उपकरण एक काल-अनुशासन है, production true-position ephemeris का दावा नहीं। हमने जहाँ गलत मोड़ लिया (जैसे fabricated “Drik zero-error”), वहाँ साफ कहा; यहाँ भी: ब्रह्म-आयु का ढाँचा model-convention है, “सिद्ध एकमात्र इतिहास” नहीं।

1.22
कल्पादस्माच्च मनवः षड्व्यतीताः ससन्धयः ।
वैवस्वतस्य च मनोर्युगानां त्रिघनो गतः ॥
kalpādasmācca manavaḥ ṣaḍvyatītāḥ sasandhayaḥ ।
vaivasvatasya ca manoryugānāṃ trighano gataḥ ।।
पाठ-भेद: B् मनोयुगानां

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कल्पात् अस्मात् = इस कल्प से; च = और; मनवः षट् = छह मनु; व्यतीताः = व्यतीत/बीत चुके; स-सन्धयः = संधियों सहित; वैवस्वतस्य = वैवस्वत के; मनोः = मनु के; युगानाम् = युगों में से; त्रि-घनः = तीन का घन (= 3³ = 27); गतः = बीत चुका। (पाठ-भेद B: मनोयुगानां — अर्थ समान)

हिन्दी भावार्थ इस वर्तमान कल्प में छह मनु अपनी-अपनी संधियों के साथ बीत चुके हैं। अब सातवें — वैवस्वत मनु — के युगों में से त्रिघन, अर्थात् सत्ताईस महायुग, व्यतीत हो चुके हैं। काल-गणना यहाँ ठोस पूर्णांकों में उतरती है: 6 मन्वन्तर + 27 युग।

English rendering Of this kalpa, six Manus have passed, together with their sandhis. And of Vaivasvata Manu, the cube of three — twenty-seven — yugas have elapsed. (Variant B: “of the Manu’s yugas,” same sense.)

गणित / The Mathematics
व्यतीत खंड:
• आदि-कल्प-संधि: 1 × कृत
• 6 मन्वन्तर: 6 × 71 = 426 Mahāyugas
• 6 मन्वन्तर-संधियाँ: 6 × कृत
• वैवस्वत में: 27 Mahāyugas

त्रिघनः = 3³ = 27 (bhūtasaṃkhyā/संख्या-शब्द, digit-faithful)

Y = 4,320,000; कृत = 1,728,000 पर वर्ष-योग (28वें युग से पहले तक):
1,728,000 + 426×4,320,000 + 6×1,728,000 + 27×4,320,000
= 1,728,000 + 1,840,320,000 + 10,368,000 + 116,640,000
= 1,969,056,000 वर्ष
(यह 1.23–1.24 से जुड़कर पूर्ण पिण्ड बनेगा।)

उदाहरण (worked example)
Input conventions: Y = 4,320,000; कृत = 1,728,000; 6 मनु + संधियाँ + 27 युग।
6 × 71 × 4,320,000 = 1,840,320,000।
27 × 4,320,000 = 116,640,000।
आदि-संधि + 6 संधियाँ = 7 × 1,728,000 = 12,096,000।
योग (कृत-28 से पूर्व) = 1,969,056,000 वर्ष।

हमारा डिकोड (Our Decode) Elapsed-year पिण्ड mean anomaly / madhya-graha का raw input है — kaal_surya_siddhanta_sphuta.py का Chapter-2 स्फुट इन्हीं madhya से κ_manda = madhya − mandocca निकालता है। गलत मनु-गिनती = गलत madhya = पूरा manda–śīghra श्रृंखला खिसकना; इसलिए संख्याएँ verse-faithful और fixture-pinned रखी जाती हैं।

1.23
अष्टाविंशाद्युगादस्माद्यातं एतत्कृतं युगम् ।
अतः कालं प्रसंख्याय संख्यां एकत्र पिण्डयेत् ॥
aṣṭāviṃśādyugādasmādyātaṃ etatkṛtaṃ yugam ।
ataḥ kālaṃ prasaṃkhyāya saṃkhyāṃ ekatra piṇḍayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टाविंशात् = अट्ठाइसवें; युगात् अस्मात् = इस युग से; यातम् = बीता हुआ; एतत् = यह; कृतम् युगम् = कृत युग; अतः = इसलिए; कालम् = काल को; प्रसंख्याय = भली-भाँति गिनकर; संख्याम् = (सब) संख्याओं को; एकत्र = एक जगह; पिण्डयेत् = पिण्ड/योग कर दे।

हिन्दी भावार्थ इस अट्ठाइसवें महायुग में से कृतयुग बीत चुका है। अतः (पूर्व श्लोकों के खंडों सहित) काल को सावधानी से गिनो, और सारी संख्याओं को एक ही योग — एक पिण्ड — में बाँध दो। यह विधि-सूत्र है: टुकड़े मत छोड़ो, एकत्र जोड़ो।

English rendering Of this twenty-eighth yuga, the present Kṛta age has elapsed. Therefore, having carefully reckoned time, one should heap the numbers together into a single total.

गणित / The Mathematics
अतिरिक्त खंड: + 1 × कृत (= 4y₀) of the 28th Mahāyuga

पिण्ड-कलन (algorithm of the verse):
T = कल्पादि-संधि + Σ(बीते मन्वन्तर × 71Y) + Σ(बीती मन्वन्तर-संधि × कृत)
  + (बीते युग × Y) + (बीता कृत of 28th)
  [+ आगे के खंड, यदि अन्य श्लोक जोड़ें]

1.22 + 1.23 तक:
T₂₃ = 1,969,056,000 + 1,728,000 = 1,970,784,000 वर्ष
(Convention: Y = 4,320,000; कृत = 1,728,000; 6 मनु+संधि, 27 युग, + कृत-28।)

उदाहरण (worked example)
Inputs as in 1.22, plus Kṛta of the 28th = 1,728,000।
T = 1,969,056,000 + 1,728,000 = 1,970,784,000 solar years from kalpa-start through end of Kṛta-28.
(Note: later tradition often continues through Tretā–Dvāpara into Kali of the 28th; this verse itself only adds the Kṛta portion and orders the sum.)

हमारा डिकोड (Our Decode) “संख्यां एकत्र पिण्डयेत्” — ठीक वही engineering discipline जो kaal-verification-oracle माँगता है: खंडों का योग exact, कोई ±tolerance नहीं। Ahargaṇa / day-count चुनते समय SS canon (1,577,917,828) बनाम Āryabhaṭa (1,577,917,500) यहीं fork करता है; गलत पिण्ड पर bīja और ayanāṃśa दोनों “सही-से-गलत” हो जाते हैं।

1.24
ग्रहर्क्षदेवदैत्यादि सृजतो अस्य चराचरम् ।
कृताद्रिवेदा दिव्याब्दाः शतघ्ना वेधसो गताः ॥
graharkṣadevadaityādi sṛjato asya carācaram ।
kṛtādrivedā divyābdāḥ śataghnā vedhaso gatāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-ऋक्ष-देव-दैत्य-आदि = ग्रह, नक्षत्र, देव, दैत्य आदि; सृजतः = सृजन करते हुए के; अस्य = इसकी; चराचरम् = चराचर (चर+अचर) सृष्टि को; कृत-अद्रि-वेदाः = कृत(4)–अद्रि(7)–वेद(4) = 474; दिव्य-अब्दाः = दिव्य वर्ष; शत-घ्नाः = सौ से गुणित; वेधसः = विधाता/ब्रह्मा के; गताः = बीत चुके।

हिन्दी भावार्थ जब विधाता ग्रह, नक्षत्र, देव, दैत्य आदि और इस चराचर जगत् की सृष्टि कर रहे थे — उस क्रम से — उनके दिव्य वर्षों में कृताद्रिवेद (474) को सौ से गुणा करने पर जो संख्या आती है, उतने दिव्य वर्ष बीत चुके हैं। यह सृष्टि-प्रारम्भ से जुड़ी एक दिव्य-वर्ष गिनती है; भूतसंख्यया अंक हूबहू पढ़े गए हैं।

English rendering Of the Creator, as he was bringing forth the planets, lunar mansions, gods, demons, and the rest of this world of moving and unmoving beings, there have elapsed divine years numbering the product of “kṛta–adri–veda” times one hundred — that is, 474 × 100 divine years.

गणित / The Mathematics
भूतसंख्या (digit-faithful):
कृत = 4, अद्रि (पर्वत) = 7, वेद = 4 → 474
शतघ्ना = × 100
⇒ N = 47,400 दिव्य वर्ष (वेधस्/Creator)

यदि दिव्य वर्ष = 360 सौर वर्ष (अध्याय-1 की मानक दिव्य-मानव रूपान्तर परिपाटी; इस श्लोक में रूपान्तर शब्दतः नहीं, केवल दिव्याब्दाः):
N_solar ≈ 47,400 × 360 = 17,064,000 सौर वर्ष
— केवल तभी जब वह रूपान्तर-convention लागू की जाए; श्लोक स्वयं 47,400 divya-abda देता है।

उदाहरण (worked example)
Bhūtasaṃkhyā input: कृत=4, अद्रि=7, वेद=4 → 474; × 100 = 47,400 divine years.
Optional conversion (declare convention: 1 divya year = 360 solar years):
47,400 × 360 = 17,064,000 solar years since that creative juncture as stated here.
(Separate from the manvantara-sum of 1.22–1.23; the text places both in the same chronological dossier — do not silently merge without stating the operation.)

हमारा डिकोड (Our Decode) दिव्य↔सौर रूपान्तर और elapsed-year पिण्ड — दोनों mean-longitude lab के epoch-inputs हैं। MATHEMATICAL-AUDIT की ईमानदारी यहाँ लागू: संख्या verse से; रूपान्तर convention घोषित; “zero-error sky” का पुराना बनावटी दावा हटाया जा चुका। Ayanāṃśa zero-year (Z≈253.8 CE hypothesis vs classical 285) की तरह यह भी selectable chronological layer है — dual-run, never one canon gating another (mangalkaalyantra / Varāhamihira blend-ethic)।

1.25
पश्चाद्व्रजन्तो अतिजवान्नक्षत्रैः सततं ग्रहाः ।
जीयमानास्तु लम्बन्ते तुल्यं एव स्वमार्गगाः ॥
paścādvrajanto atijavānnakṣatraiḥ satataṃ grahāḥ ।
jīyamānāstu lambante tulyaṃ eva svamārgagāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पश्चात् = पश्चिम दिशा में; व्रजन्तः = जाते हुए; अतिजवान् = अत्यन्त वेग से (+ पाठ-चिह्न: अतिजवान्); नक्षत्रैः = नक्षत्रों के साथ; सततम् = निरन्तर; ग्रहाः = ग्रह; जीयमानाः = पराजित होते हुए / दबे हुए; लम्बन्ते = पीछे रह जाते हैं (मन्द पड़ते हैं); तुल्यम् एव = समान रूप से ही; स्वमार्गगाः = अपने-अपने मार्ग पर चलते हुए।

हिन्दी भावार्थ ग्रह नक्षत्र-मण्डल के साथ पश्चिम दिशा में निरन्तर और तीव्र वेग से बहते हैं। किन्तु अपनी स्वाभाविक गति के कारण वे उस तीव्र पश्चिम-प्रवाह में “हार” जाते हैं — अर्थात् थोड़े-थोड़े पीछे छूटते हैं — और यही छूट उनके अपने मार्ग पर समान नियम से घटित होती है। इस श्लोक में दृश्य आकाश का वह मूल चित्र है: एक सार्वभौम पश्चिम-प्रवाह, और उसमें ग्रहों का नियत पश्च-लम्बन।

English rendering The planets are carried westward without cease, at great speed, along with the nakṣatras. Being overcome in that rush, they lag behind — yet each remains on its own path, and the lag is equal in kind for all, though different in measure.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (दिगंश-गतिकी की भूमिका)। यह श्लोक माध्य/स्फुट गणना का सूत्र नहीं देता; वह पश्चिम-प्रवाह और ग्रहीय “लम्बन” की ज्यामितीय-कल्पना खड़ा करता है, जिस पर आगे की प्राग्गति टिकती है।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) किसी साफ़ रात को सूर्यास्त के तुरन्त बाद आकाश में एक चमकदार ग्रह (जैसे शुक्र या बृहस्पति) और उसके निकट का कोई स्थिर नक्षत्र-तारक चुनें। अगली कई रातों में वही तारक-समूह लगभग उसी “पश्चिम की ओर बहते दृश्य” में दिखेगा, पर ग्रह उस तारक से थोड़ा-थोड़ा पूर्व की ओर खिसका मिलेगा — यही “हार” का आँखों-देखा रूप है। सितारे लगभग पूर्ण पश्चिम-प्रवाह में बहते हैं; ग्रह उसी प्रवाह में थोड़ा lag करता है, और वह lag रात-दर-रात समान नियम से बढ़ता है। इसी दृश्य-चित्र को आगे अध्याय १–२ के मध्य-गति और भगण सूत्र गणित बना देंगे।

1.26
प्राग्गतित्वं अतस्तेषां भगणैः प्रत्यहं गतिः ।
परिणाहवशाद्भिन्ना तद्वशाद्भानि भुञ्जते ॥
prāggatitvaṃ atasteṣāṃ bhagaṇaiḥ pratyahaṃ gatiḥ ।
pariṇāhavaśādbhinnā tadvaśādbhāni bhuñjate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राग्गतित्वम् = पूर्व दिशा की ओर गति का भाव; अतः = इसी कारण से; तेषाम् = उन ग्रहों की; भगणैः = कक्षा-परिक्रमणों (भगणों) से; प्रत्यहम् = प्रतिदिन; गतिः = गति; परिणाहवशात् = परिधि / कक्षा-परिमाण के वश से; भिन्ना = भिन्न-भिन्न; तद्वशात् = उसी के कारण; भानि = नक्षत्रों / भ-चक्र को; भुञ्जते = भोगते हैं (पार करते हैं)।

हिन्दी भावार्थ उसी लम्बन के कारण ग्रहों में पूर्वगामिनी गति दिखाई पड़ती है। उनकी दैनिक गति उनके भगणों के अनुसार गिनी जाती है, और वह गति कक्षा की परिधि-विभिन्नता से अलग-अलग होती है। उसी भिन्न गति के बल पर वे भ-चक्र — नक्षत्रों और राशियों — को क्रमशः पार करते हैं। अर्थात् “पूर्व की ओर चलना” कोई स्वतन्त्र चमत्कार नहीं, पश्चिम-प्रवाह में छूटने का ही गणितीय रूप है।

English rendering From that lag arises their apparent eastward motion. Their daily motion is reckoned in revolutions (bhagaṇa), and it differs according to the measure of each orbit’s circumference; by that difference they traverse the asterisms.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (प्राग्गति ↔ भगण सम्बन्ध की भूमिका)। सूत्र अगले श्लोकों में खुलता है; यहाँ केवल यह नियम है कि दैनिक पूर्वी गति ∝ भगण-दर, और भगण-दर कक्षा-परिणाह से भिन्न है।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही मास में चन्द्रमा लगभग पूरी राशि-माला पार कर लेता है, जबकि बृहस्पति एक ही नक्षत्र-क्षेत्र में हफ्तों ठहरा-सा लगता है — दोनों “पूर्व की ओर” चलते हैं, पर daily motion की मात्रा कक्षा-परिधि के अनुसार भिन्न है। यह पूर्व-गमन कोई अलग जादू नहीं: पश्चिम-प्रवाह में छूटने की दर ही प्राग्गति कही जाती है। भगण जितने अधिक, प्रतिदिन का भगण-अंश उतना बड़ा; परिधि छोटी हो तो वही भगण-संख्या आकाश में तेज़ angular speed बनती है। यही भेद आगे मध्यमानयन में “दिन-गण × भगण ÷ युग-दिन” की पंक्ति में संख्या बन जाएगा।

1.27
शीघ्रगस्तान्यथाल्पेन कालेन महताल्पगः ।
तेषां तु परिवर्तेन पौष्णान्ते भगणः स्मृतः ॥
śīghragastānyathālpena kālena mahatālpagaḥ ।
teṣāṃ tu parivartena pauṣṇānte bhagaṇaḥ smṛtaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीघ्रगः = तीव्रगामी (ग्रह); तानि = उन भों / नक्षत्रों को; अथ = फिर; अल्पेन कालेन = अल्प काल में; महता = दीर्घ काल में; अल्पगः = मन्दगामी; तेषाम् = उनकी; परिवर्तेन = एक पूर्ण परिक्रमा से; पौष्णान्ते = पौष्ण (रेवती) नक्षत्र के अन्त में; भगणः = एक भगण (पूर्ण क्रान्तिवृत्तीय परिक्रमण); स्मृतः = कहा गया है।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह तीव्रगामी हैं, वे उसी भ-चक्र को थोड़े समय में पूरा कर लेते हैं; जो मन्द हैं, उन्हें बहुत काल लगता है। उनकी एक पूर्ण आवृत्ति — जब वे लौटकर पौष्ण अर्थात् रेवती के अन्त-बिन्दु पर पहुँचते हैं — वही “भगण” कहलाता है। भगण की परिभाषा यहाँ स्पष्ट है: नक्षत्र-चक्र की एक सिडेरीयल पूर्ण परिक्रमा, रेवती-अन्त को सन्धि-चिह्न मानकर।

English rendering The swift complete that circuit in little time; the slow, in much. By one full turning of a planet — ending at the close of Pauṣṇa (Revatī) — a bhagaṇa, a complete revolution, is defined.

गणित / The Mathematics भगण की परिभाषा (क्रान्तिवृत्तीय / नक्षत्र-चक्र परिक्रमा):

  • 1 भगण = 1 पूर्ण सिडेरीयल परिक्रमण, समाप्ति-चिह्न = पौष्ण-अन्त (रेवती-समाप्ति)।
  • दैनिक माध्य गति (आगे प्रयुक्त): ṅ = (भगण प्रति युग) ÷ (युग के दिन), डिग्री में × 360।

यह श्लोक संख्या नहीं देता; वह “भगण” शब्द को ज्यामितीय-कालिक इकाई बनाता है, जिस पर 1.29–1.32 की गणनाएँ टिकेंगी।

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1.28
विकलानां कला षष्ट्या तत्षष्ट्या भाग उच्यते ।
तत्त्रिंशता भवेद्राशिर्भगणो द्वादशैव ते ॥
vikalānāṃ kalā ṣaṣṭyā tatṣaṣṭyā bhāga ucyate ।
tattriṃśatā bhavedrāśirbhagaṇo dvādaśaiva te ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विकलानाम् = विकलाओं की; कला = एक कला; षष्ट्या = साठ से; तत्षष्ट्या = उन (कलाओं) की साठ से; भागः = अंश (डिग्री); उच्यते = कहा जाता है; तत्त्रिंशता = उन (अंशों) की तीस से; राशिः = एक राशि; भगणः = एक भगण; द्वादश एव ते = वे बारह ही (राशियाँ)।

हिन्दी भावार्थ कोण-माप की पूरी सीढ़ी यहीं बैठती है: साठ विकला मिलाकर एक कला, साठ कला मिलाकर एक भाग (अंश), तीस भाग मिलाकर एक राशि, और बारह राशियाँ मिलाकर एक भगण। यह षष्ठी-आधारित (sexagesimal) चाप-मेट्रोलॉजी है — वही भाषा जिसमें आगे सूर्यसिद्धान्त अपनी सभी गतियाँ, फल और स्फुट बोलता है।

English rendering Sixty vikalā make one kalā; sixty kalā make one bhāga (degree); thirty bhāga make one rāśi; and twelve rāśi alone make one bhagaṇa — a full circle.

गणित / The Mathematics चाप-मेट्रोलॉजी (यथावत्):

  • 1 कला = 60 विकला
  • 1 भाग (°) = 60 कला = 3,600 विकला
  • 1 राशि = 30 भाग = 1,800 कला
  • 1 भगण = 12 राशि = 360 भाग = 21,600 कला

वृत्त = 360° = 21,600 कला (arcmin)। डोसियर की काल-मेट्रोलॉजी से गिनती-संगति: 1 दिन = 21,600 प्राण; 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 कला/वृत्त — यह गिनती-सम्पर्क है, काल और कोण की भौतिक समानता नहीं।

उदाहरण (worked example) चन्द्र की माध्य दैनिक गति लगभग 13° 10′ 35″ मानें (केवल रूपान्तरण-उदाहरण; युग-भगण से नहीं)।
13° 10′ 35″ = 13 + 10/60 + 35/3,600 = 13 + 0.1̄ + 0.0097̄ = 13.176388…°
= 13 × 60 + 10 = 790′ + 35″ = 47,435″।
राशि में: 13.176…° ÷ 30 ≈ 0.439 rāśi (मीनादि से मापने पर अंश-भाग)।

हमारा डिकोड (Our Decode) `vedic-ghadi` में दिन-विभाजन 60 घटी = 3,600 पल = 2,16,000 विपल = 21,600 प्राण पर जड़ा है; `MATHEMATICAL-AUDIT §1` ठीक यही 21,600 ↔ 21,600 गिनती-संगति दर्ज करता है। श्लोक कोण की षष्ठी देता है, इंजन काल की — दोनों एक ही षष्ठी-भाषा बोलते हैं, पर एक-दूसरे के “बराबर” नहीं ठहराए गए।

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1.29
युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः ।
कुजार्किगुरुशीघ्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम् ॥
yuge sūryajñaśukrāṇāṃ khacatuṣkaradārṇavāḥ ।
kujārkiguruśīghrāṇāṃ bhagaṇāḥ pūrvayāyinām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युगे = एक (महा)युग में; सूर्य-ज्ञ-शुक्राणाम् = सूर्य, बुध और शुक्र के; ख-चतुष्क-रद-अर्णवाः = 4,320,000 (ख=0, चतुष्क=4, रद=32, अर्णव=4 → अङ्कानां वामतो गतिः); कुज-अर्कि-गुरु-शीघ्राणाम् = मङ्गल, शनि और बृहस्पति के शीघ्रोच्च-सम्बद्ध; भगणाः = परिक्रमण-संख्याएँ; पूर्वयायिनाम् = पूर्व दिशा में गमन करने वालों की (उक्त संख्या)।

हिन्दी भावार्थ एक युग में सूर्य के, तथा बुध और शुक्र के (मध्य/सूर्यानुगामी) भगण 43,20,000 हैं — भूतसंख्या खचतुष्करदार्णवाः से। उसी संख्या को मङ्गल, शनि और गुरु के शीघ्र भगण भी कहा गया है; क्योंकि बाह्य ग्रहों का शीघ्रोच्च सूर्य-मध्य ही है, और उसी पूर्वी गमन की गिनती यहाँ दोहराई गई है। यह श्लोक युग-भगण सारिणी का पहला स्तम्भ है।

English rendering In a yuga the revolutions of the Sun, and of Mercury and Venus (in their solar-mean count), are 4,320,000. The same figure is the śīghra-revolutions of Mars, Saturn, and Jupiter — the eastward tally of those “fore-goers.”

गणित / The Mathematics महायुग (कलि-चतुर्युग) = 43,20,000 वर्ष — और यहीं सूर्य के सिडेरीयल भगण भी:

  • सूर्य-भगण / युग = 4,320,000
  • बुध-मध्य = शुक्र-मध्य = सूर्य-भगण = 4,320,000
  • कुज-शीघ्र = गुरु-शीघ्र = शनि-शीघ्र = 4,320,000 (शीघ्रोच्च ≡ सूर्य-मध्य, बाह्य ग्रह)

भूतसंख्या: ख(=0), चतुष्क(=4), रद(=32), अर्णव(=4) → 4,320,000।

उदाहरण (worked example) सम्प्रदाय-चयन घोषित — SS-canon नागरिक दिन / महायुग = 1,577,917,828 (`math-core`)।
सूर्य की माध्य सिडेरीयल दैनिक गति:

ṅ_☉ = 4,320,000 × 360° / 1,577,917,828
= 1,555,200,000° / 1,577,917,828 ≈ 0.985602267°/दिन
≈ 0° 59′ 8.33″ प्रति नागरिक दिन (SS दिन-गणना पर)।
(आर्यभटीय दिन-गणना 1,577,917,500 लेने पर अन्तिम अंक किञ्चित् बदलते हैं — 328 दिन का अन्तर वास्तविक सम्प्रदाय-चयन है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) `bharat-ephemeris-offline` / `math-core.js` का पूर्ण माध्य-रेखांश यन्त्र इन्हीं पूर्णांक भगणों पर खड़ा है। बाह्य ग्रहों के लिए स्फुट-इंजन (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`) में शीघ्रोच्च = सूर्य-मध्य — ठीक इसी श्लोक की व्यवस्था। बीज-प्रयोग भी सूर्य-आधारित सापेक्ष दरों में जंचा: ग्रह−सूर्य, न कि निरपेक्ष — क्योंकि यह श्लोक ही सूर्य को साझा मापदण्ड बनाता है।

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λभगण = पूर्ण परिक्रमण (integer revolutions)मध्यम ग्रह (mean longitude):λ = 360° × frac( B × d / D )B = भगण / महायुगd = अहर्गण (elapsed civil days)D = 1,57,79,17,828 दिन (SS canon)उदा० सूर्य: B = 43,20,000 → 360°/वर्ष
भगण-सिद्धान्त — the integer-revolution principle: every rate in the siddhānta is a whole number of revolutions per Mahāyuga; the mean longitude is pure ratio arithmetic on the day-count. This is the axle of the decode: SS canon 1,57,79,17,828 civil days per Mahāyuga.
1.30
इन्दो रसाग्नित्रित्रीषुसप्तभूधरमार्गणाः ।
दस्रत्र्यष्टरसाङ्काक्षिलोचनानि कुजस्य तु ॥
indo rasāgnitritrīṣusaptabhūdharamārgaṇāḥ ।
dasratryaṣṭarasāṅkākṣilocanāni kujasya tu ।।
पाठ-भेद: ५७७५३३३६; २२९६८३२

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इन्दोः = चन्द्रमा के; रस-अग्नि-त्रि-त्री-षु-सप्त-भूधर-मार्गणाः = 57,753,336 (रस=6, अग्नि=3, त्रि=3, त्री=3, षु/इषु=5, सप्त=7, भूधर=7, मार्गण=5); दस्र-त्रि-अष्ट-रस-अङ्क-अक्षि-लोचनानि = 2,296,832; कुजस्य = मङ्गल के; तु = और / ही।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा के युग-भगण 5,77,53,336 हैं — भूतसंख्या रसाग्नित्रित्रीषुसप्तभूधरमार्गणाः, और पाठ में अंकित ५७७५३३३६ से सुसंगत। मङ्गल के भगण 22,96,832 हैं — दस्रत्र्यष्टरसाङ्काक्षिलोचनानि (२२९६८३२)। चन्द्र की यह विशाल गिनती आगे तिथि-इंजन और युति-परीक्षा दोनों की रीढ़ है।

English rendering The Moon’s revolutions in a yuga are 57,753,336. Those of Mars are 2,296,832.

गणित / The Mathematics (महायुग भगण — श्लोक + अंक-पाठ)

| ग्रह | भगण / महायुग |
|------|----------------|
| चन्द्र (इन्दु) | 57,753,336 |
| मङ्गल (कुज) | 2,296,832 |

युति (सिइनॉडिक) चन्द्र-सूर्य परिक्रमा / युग =
57,753,336 − 4,320,000 = 53,433,336
(प्राचीन दीर्घीकरण-गिनती; डोसियर की सिइनॉडिक परीक्षा का मूल।)

उदाहरण (worked example) SS-canon दिन = 1,577,917,828।
चन्द्र माध्य सिडेरीयल दैनिक गति:
ṅ_☽ = 57,753,336 × 360 / 1,577,917,828 ≈ 13.176358°/दिन।
सिइनॉडिक मास (SS-canon):
1,577,917,828 / 53,433,336 ≈ 29.5305879 दिन।
डोसियर: प्राचीन 53,433,336 पर SS-canon घाटा ≈ −0.1 rev/महायुग (≈ −0.0047 s/सिइनॉडिक-मास) — लगभग निर्दोष; आर्यभटीय 1,577,917,500 पर ≈ −11.2 rev (≈ −0.535 s/मास)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही 57,753,336 − 4,320,000 = 53,433,336 की युति-परीक्षा `NEXT-STEPS A (2026-08-10)` में सील है — और सिद्ध करती है कि दिन-गणना का चयन तिथि-इंजन पर सबसे भारी पड़ता है। `vedic-ghadi` आर्यभटीय 1,577,917,500 चलाता है; `math-core` SS 1,577,917,828 — 328 दिन का अन्तर “सामान्यीकरण” नहीं, सचेत सम्प्रदाय-चयन है। मङ्गल +30 rev/महायुग बीज भी इन्हीं आधार-भगणों पर सापेक्ष (कुज−सूर्य) फिट हुआ।

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1.31
बुधशीघ्रस्य शून्यर्तुखाद्रित्र्यङ्कनगेन्दवः ।
बृहस्पतेः खदस्राक्षिवेदषड्वह्नयस्तथा ॥
budhaśīghrasya śūnyartukhādritryaṅkanagendavaḥ ।
bṛhaspateḥ khadasrākṣivedaṣaḍvahnayastathā ।।
पाठ-भेद: १७९३७०६०; ३६४२२०

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध-शीघ्रस्य = बुध के शीघ्रोच्च के; शून्य-ऋतु-ख-अद्रि-त्रि-अङ्क-नग-इन्दवः = 17,937,060 (शून्य=0, ऋतु=6, ख=0, अद्रि=7, त्रि=3, अङ्क=9, नग=7, इन्दु=1); बृहस्पतेः = गुरु के; ख-दस्र-अक्षि-वेद-षट्-वह्नयः = 364,220 (ख=0, दस्र=2, अक्षि=2, वेद=4, षट्=6, वह्नि=3); तथा = तथा।

हिन्दी भावार्थ बुध के शीघ्र भगण युग में 1,79,37,060 हैं; बृहस्पति (गुरु) के भगण 3,64,220। ध्यान रहे: बुध का मध्य तो सूर्य के समान 43,20,000 है (1.29); यहाँ गिनी गई संख्या शीघ्रोच्च की है — आन्तरिक ग्रह की हेलीयोसेन्ट्रिक माध्य-गति। गुरु की संख्या उसका कक्षा-भगण (मध्य) है।

English rendering The śīghra-revolutions of Mercury in a yuga are 17,937,060. The revolutions of Jupiter are 364,220.

गणित / The Mathematics

| ग्रह / तत्व | भगण / महायुग |
|-------------|---------------|
| बुध-शीघ्र | 17,937,060 |
| गुरु (बृहस्पति) मध्य | 364,220 |

आन्तरिक ग्रह (SS Ch.2 स्फुट): मध्य = सूर्य-मध्य; शीघ्रोच्च = हेलीयोसेन्ट्रिक माध्य।
बुध-शीघ्र की सूर्य-सापेक्ष दर / युग = 17,937,060 − 4,320,000 = 13,617,060
(बुध का “स्व” परिक्रमण-गिनती सूर्य के सापेक्ष)।

उदाहरण (worked example) SS-canon 1,577,917,828 दिन।
गुरु माध्य दैनिक गति:
ṅ_♃ = 364,220 × 360 / 1,577,917,828 ≈ 0.083096°/दिन ≈ 0° 4′ 59.1″/दिन।
बुध-शीघ्र दैनिक:
ṅ_☿ś = 17,937,060 × 360 / 1,577,917,828 ≈ 4.092317°/दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) शुद्ध SS स्फुट-इंजन (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`, sealed 2026-05-17) आन्तरिक ग्रहों पर ठीक यही विभाजन मानता है: मध्य = सूर्य-मध्य, शीघ्रोच्च = हेलीयोसेन्ट्रिक माध्य। गुरु का बीज −51 rev/महायुग सापेक्ष (गुरु−सूर्य) फिट है — निरपेक्ष घाटे −22.6 से सूर्य के +28.3 को घटाने पर ≈ −50.9, फिट से ≤0.7 rev में मेल (`MATHEMATICAL-AUDIT §3`)। Option-ii निरपेक्ष पुनर्फिट लागू नहीं किया गया; संकर अस्वीकृत क्योंकि वह सिइनॉडिक ज्यामिति बिगाड़ता।

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1.32
सितशीघ्रस्य षट्सप्तत्रियमाश्विखभूधराः ।
शनेर्भुजङ्गषट्पञ्चरसवेदनिशाकराः ॥
sitaśīghrasya ṣaṭsaptatriyamāśvikhabhūdharāḥ ।
śanerbhujaṅgaṣaṭpañcarasavedaniśākarāḥ ।।
पाठ-भेद: ७०२२३७६; १४६५६८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सित-शीघ्रस्य = शुक्र (सित) के शीघ्रोच्च के; षट्-सप्त-त्रि-यम-अश्वि-ख-भूधराः = 7,022,376 (षट्=6, सप्त=7, त्रि=3, यम=2, अश्वि=2, ख=0, भूधर=7); शनेः = शनि के; भुजङ्ग-षट्-पञ्च-रस-वेद-निशाकराः = 146,568 (भुजङ्ग=8, षट्=6, पञ्च=5, रस=6, वेद=4, निशाकर=1)।

हिन्दी भावार्थ शुक्र के शीघ्र भगण 70,22,376 हैं; शनि के भगण 1,46,568। शुक्र का मध्य भी सूर्यवत् 43,20,000 (1.29) रह चुका; यहाँ केवल शीघ्रोच्च की गिनती है। शनि की यह मन्द संख्या पूरे युग-सारिणी का अन्तिम स्तम्भ है — सबसे धीमे “पूर्वयायी” की पूर्ण परिक्रमा-गिनती।

English rendering The śīghra-revolutions of Venus in a yuga are 7,022,376. The revolutions of Saturn are 146,568.

गणित / The Mathematics

| ग्रह / तत्व | भगण / महायुग |
|-------------|---------------|
| शुक्र-शीघ्र (सित-शीघ्र) | 7,022,376 |
| शनि मध्य | 146,568 |

शुक्र-शीघ्र − सूर्य = 7,022,376 − 4,320,000 = 2,702,376 (सूर्य-सापेक्ष)।

युग-भगण सारिणी (1.29–1.32, यथा श्लोक):

| तत्व | भगण / महायुग |
|------|----------------|
| सूर्य; बुध-मध्य; शुक्र-मध्य; कुज/गुरु/शनि-शीघ्र | 4,320,000 |
| चन्द्र | 57,753,336 |
| मङ्गल | 2,296,832 |
| बुध-शीघ्र | 17,937,060 |
| गुरु | 364,220 |
| शुक्र-शीघ्र | 7,022,376 |
| शनि | 146,568 |

उदाहरण (worked example) SS-canon दिन-गणना 1,577,917,828।
शनि माध्य दैनिक:
ṅ_♄ = 146,568 × 360 / 1,577,917,828 ≈ 0.033439°/दिन ≈ 0° 2′ 0.4″/दिन।
शुक्र-शीघ्र दैनिक:
ṅ_♀ś = 7,022,376 × 360 / 1,577,917,828 ≈ 1.602130°/दिन।
बीज-प्रयोग (केवल ~1800 CE आसपास का सापेक्ष ड्रिफ्ट-प्रयोग, न कि शाश्वत संशोधन): शनि +61 rev/महायुग — निरपेक्ष घाटे +89.3 से सूर्य +28.3 घटाने पर ≈ +61.0, फिट से मेल।

हमारा डिकोड (Our Decode) इन्हीं पूर्णांक भगणों पर `math-core` का माध्य-रेखांश प्रयोगशाला चलती है — यह माध्य-संश्लेषण यन्त्र है, उत्पादन-स्तर का सत्य-स्थान पंचांग नहीं; उसे मापित स्फुट-परत चाहिए, न कि तेज़ भाषा। बीज-चिह्न की पुरानी भूल (−30, +51, −61) पकड़कर +30, −51, +61 की गई; “112 महायुति” दावा खंडित कर वापस लिया गया — `kaal-verification-oracle` की `==` अनुशासन-पद्धति का फल, सहिष्णुता-पट्टी का नहीं।

1.33
चन्द्रोच्चस्याग्निशून्याश्विवसुसर्पार्णवा युगे ।
वामं पातस्य वस्वग्नियमाश्विशिखिदस्रकाः ॥
candroccasyāgniśūnyāśvivasusarpārṇavā yuge ।
vāmaṃ pātasya vasvagniyamāśviśikhidasrakāḥ ।।
पाठ-भेद: ४८८२०३; २३२२३८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चन्द्रोच्चस्य = चन्द्र-मन्दोच्च (अपogee) के; अग्निशून्याश्विवसुसर्पार्णवा = ४,८८,२०३ (अग्नि ३, शून्य ०, अश्वि २, वसु ८, सर्प ८, अर्णव ४ — वाम-पठन); युगे = महायुग में; वामं = विपरीत/वामावर्त (प्रतिलोम); पातस्य = राहु-पात (चन्द्र-पातः) के; वस्वग्नियमाश्विशिखिदस्रकाः = २,३२,२३८ (वसु ८, अग्नि ३, यम २, अश्वि २, शिखि ३, दस्र २)।

हिन्दी भावार्थ महायुग में चन्द्रमा के उच्च (मन्दोच्च) के भगण अग्नि-शून्य-अश्वि-वसु-सर्प-अर्णव — अर्थात् चार लाख अट्ठासी हज़ार दो सौ तीन — कहे गए हैं। पात के भगण वाम गति से गिने जाते हैं; उनकी संख्या वसु-अग्नि-यम-अश्वि-शिखि-दस्र — दो लाख बत्तीस हज़ार दो सौ अड़तीस — है। उच्च पूर्व की ओर चलता है, पात उल्टी दिशा में; दोनों अलग-अलग घड़ी के काँटे हैं।

English rendering In a yuga the Moon’s apogee completes 488,203 revolutions. The Moon’s node completes 232,238 revolutions in the reverse (westward) sense. Apogee and node are thus counted on opposite senses of the circle.

गणित / The Mathematics
चन्द्रोच्च-भगण / महायुग = ४८८२०३
पात-भगण / महायुग = २३२२३८ (वाम = प्रतिलोम)
मध्य-चन्द्र के सापेक्ष मन्द-केन्द्र: κ_manda ≈ L_candra − L_mandocca; पात से राहु/केतु-रेखा मिलती है। संख्याएँ पद-संकेत से यथावत्: ३-०-२-८-८-४ → ४८८२०३; ८-३-२-२-३-२ → २३२२३८।

उदाहरण (worked example)
मान लें महायुग = ४३,२०,००० वर्ष (सूर्यसिद्धान्त-युग)।
औसत चन्द्रोच्च-गति ≈ ४८८२०३ / ४३२०००० ≈ ०.११३०१ भगण/वर्ष ≈ ४०.६८४°/वर्ष।
पात की औसत प्रतिलोम गति ≈ २३२२३८ / ४३२०००० ≈ ०.०५३७६ भगण/वर्ष ≈ १९.३५४°/वर्ष (पश्चिम की ओर)।
(केवल युग-माध्य; बीज/स्फुट-संस्कार यहाँ नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) चन्द्र का मन्दोच्च Chapter-2 के manda-chain में κ_manda = madhya − mandocca का आधार-बिन्दु है; `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में चन्द्र केवल manda-चरण लेता है (śīghra नहीं)। पात की वाम-गणना mean-longitude प्रयोगशाला में दिशा-चिह्न (sign) की परीक्षा है — बीज-चिह्न की पुरानी भूल (−३० आदि) याद दिलाती है कि दिशा और चिह्न को `==` से ही बाँधना चाहिए, अनुमान से नहीं।

1.34
भानां अष्टाक्षिवस्वद्रित्रिद्विद्व्यष्टशरेन्दवः ।
भोदया भगणैः स्वैः स्वैरूनाः स्वस्वोदया युगे ॥
bhānāṃ aṣṭākṣivasvadritridvidvyaṣṭaśarendavaḥ ।
bhodayā bhagaṇaiḥ svaiḥ svairūnāḥ svasvodayā yuge ।।
पाठ-भेद: १५८२२३७८२८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानां = नक्षत्रों/तारों के; अष्टाक्षिवस्वद्रित्रिद्विद्व्यष्टशरेन्दवः = १,५८,२२,३७,८२८ (अष्ट ८, अक्षि २, वसु ८, अद्रि ७, त्रि ३, द्वि २, द्वि २, अष्ट ८, शर ५, इन्दु १); भोदयाः = ग्रह-उदय संख्याएँ; भगणैः स्वैः स्वैः = अपने-अपने भगणों से; ऊनाः = घटाई हुई; स्वस्वोदयाः = अपनी-अपनी उदय-संख्या; युगे = युग में।

हिन्दी भावार्थ युग में नक्षत्रों (भ) के उदय अष्ट-अक्षि-वसु-अद्रि-त्रि-द्वि-द्वि-अष्ट-शर-इन्दु — एक अरब अट्ठावन करोड़ बाईस लाख सैंतीस हज़ार आठ सौ अट्ठाईस — होते हैं। ग्रहों के उदय अपनी-अपनी उस उदय-राशि से अपने भगण घटाकर मिलते हैं। यह आकाश की “कितनी बार क्षितिज काटा” गिनती है, राशि-फल की नहीं।

English rendering The number of risings of the stars in a yuga is 1,582,237,828. A planet’s own count of risings is that stellar-rising tally diminished by the planet’s own revolutions in the yuga.

गणित / The Mathematics
भ-उदय (नक्षत्र-उदय) = १५८२२३७८२८ / महायुग
ग्रह-उदय ≈ भ-उदय − स्व-भगण
(तुलना: सावन-दिन + रवि-भगण = १५७७९१७८२८ + ४३२०००० = १५८२२३७८२८ — सिद्धान्त की आन्तरिक संगति।)

उदाहरण (worked example)
रवि-भगण / युग = ४३,२०,००० (वर्ष-संख्या के समान)।
रवि-सम्बद्ध भू-सावन जाँच: १५८२२३७८२८ − ४३२०००० = १५७७९१७८२८ सावन-दिन — जो १.३७ के वसु-द्व्यष्ट-… पाठ से मेल खाता है।
चन्द्र के लिए (भगण ≈ ५,७७,५३,३३६): उदय ≈ १५८२२३७८२८ − ५७७५३३३६ = १५२४४८४४९२ (युग-माध्य; स्फुट उदय नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही १,५८२,२३७,८२८ ↔ १,५७७,९१७,८२८ + ४३,२०,००० कड़ी `math-core` के SS-canon दिन-गणना द्वार को खोलती है। आर्यभटीय १,५७७,९१७,५०० चुनने पर यह समीकरण टूटता है — ३२८-दिन का अन्तर तithi-इंजन पर सबसे सीधा पड़ता है; इसलिए canon choice को हम “सजावट” नहीं, माप-द्वार मानते हैं।

1.35
भवन्ति शशिनो मासाः सूर्येन्दुभगणान्तरम् ।
रविमासोनितास्ते तु शेषाः स्युरधिमासकाः ॥
bhavanti śaśino māsāḥ sūryendubhagaṇāntaram ।
ravimāsonitāste tu śeṣāḥ syuradhimāsakāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भवन्ति = होते हैं; शशिनः मासाः = चन्द्र-मास (सिनेोडिक मास); सूर्येन्दु-भगण-अन्तरम् = रवि और चन्द्र के भगणों का अन्तर; रविमास-उनिताः = रवि-मासों से घटाए हुए; ते = वे (चन्द्रमास); शेषाः = शेष; स्युः = होते हैं; अधिमासकाः = अधिकमास (इंटरकलेरी मास)।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमास रवि-भगण और इन्दु-भगण के अन्तर से बनते हैं — जितनी बार चाँद सूर्य से एक पूरा चक्कर आगे निकल जाए, उतने चान्द्र मास। उन चान्द्र मासों में से रवि-मास घटा दो, तो जो बचता है वही अधिकमास है। वर्ष को ऋतु से बाँधने की यह शुद्ध गिनती की कुंजी है।

English rendering Lunar months equal the difference between the Moon’s and the Sun’s revolutions. Subtract solar months from those lunar months; the remainder is the count of intercalary months (adhimāsas).

गणित / The Mathematics
चान्द्रमास = चन्द्र-भगण − रवि-भगण
अधिमास = चान्द्रमास − रविमास
(रविमास = १२ × रवि-भगण; युग में रवि-भगण = ४३२०००० ⇒ रविमास = ५१८४००००, पद १.३९।)

उदाहरण (worked example)
सिद्धान्त-सम्मत चन्द्र-भगण / महायुग = ५७,७५३,३३६; रवि-भगण = ४३,२०,०००।
चान्द्रमास = ५७७५३३३६ − ४३२०००० = ५३,४३३,३३६।
अधिमास = ५३४३३३३६ − ५१८४०००० = १,५९३,३३६ — जो १.३८ के षड्वह्नि… पाठ से अक्षरशः मिलता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) dossier की सिनेोडिक परीक्षा इसी अन्तर पर टिकी है: ५७,७५३,३३६ − ४३,२०,००० = ५३,४३३,३३६; SS-canon दिन-संख्या पर घाटा ≈ −०.१ rev/महायुग (−०.००४७ s/सिनेोडिक-मास), आर्यभट-canon पर ≈ −११.२ rev। अधिमास-तिथि शृंखला तभी “सत्य” रहती है जब दिन-गणना और भगण एक ही कैनन से बँधे हों — `vedic-ghadi` vs `math-core` का ३२८-दिन विवाद यहीं कठिन होता है।

1.36
सावहाहानि चान्द्रेभ्यो द्युभ्यः प्रोज्झ्य तिथिक्षयाः ।
उदयादुदयं भानोर्भूमिसावनवासरः ॥
sāvahāhāni cāndrebhyo dyubhyaḥ projjhya tithikṣayāḥ ।
udayādudayaṃ bhānorbhūmisāvanavāsaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सावन-अहानि = सावन (सौर-उदय) दिन; चान्द्रेभ्यः द्युभ्यः = चान्द्र दिनों से; प्रोज्झ्य = हटाकर; तिथिक्षयाः = तिथि-क्षय (क्षय-तिथियाँ / ऊनरात्र); उदयात् उदयं भानोः = सूर्य के एक उदयास्त से अगले उदय तक; भूमि-सावन-वासरः = पृथ्वी का सावन वासर (नागरिक दिन)।

हिन्दी भावार्थ सावन दिन चान्द्र दिनों में से तिथिक्षय घटाकर मिलते हैं। और सावन का परिभाषा-सूत्र सीधा है: सूर्य के एक उदय से अगले उदय तक — वही भूमि का सावन वासर। यहाँ “दिन” को उदय-से-उदय की नागरिक घड़ी से बाँधा गया है, केवल तिथि-नाम से नहीं।

English rendering Civil (sāvana) days are lunar days minus the omitted tithis (tithikṣayas). The terrestrial civil day itself is defined from one sunrise to the next.

गणित / The Mathematics
सावन-दिन = चान्द्र-दिन (तिथि-गण) − तिथिक्षय
भूमि-सावन-वासर ≡ उदयात् उदयं भानोः
(युग-संख्याओं से: १६०३००००८० − २५०८२२५२ = १५७७९१७८२८।)

उदाहरण (worked example)
१.३७–१.३८ की युग-राशि लेकर:
चान्द्र-दिन = १,६०३,०००,०८०; तिथिक्षय = २५,०८२,२५२।
सावन = १६०३००००८० − २५०८२२५२ = १,५७७,९१७,८२८।
एक सावन दिन की आन्तरिक विभाजन-संवाद (dossier, MATHEMATICAL-AUDIT §1):
१ दिन = ६० घटी = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल = २१,६०० प्राण — गिनती-संवाद, काल≡कोण भौतिक समता नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) `vedic-ghadi` का पञ्चाङ्ग-आधार इसी सावन/तिथि द्वार पर खड़ा है — घटी-पल-विपल मेट्रोलॉजी और तिथि-इंजन। “उदयादुदयं भानोः” को हम ephemeris-सत्य का पर्याय नहीं, परिभाषा-कैनन मानते हैं; JPL/Swiss केवल क्रॉस-चेक यंत्र हैं, प्रमाण-गुरु नहीं।

1.37
वसुद्व्यष्टाद्रिरूपाङ्कसप्ताद्रितिथयो युगे ।
चान्द्राः खाष्टखखव्योमखाग्निखर्तुनिशाकराः ॥
vasudvyaṣṭādrirūpāṅkasaptādritithayo yuge ।
cāndrāḥ khāṣṭakhakhavyomakhāgnikhartuniśākarāḥ ।।
पाठ-भेद: १५७७९१७८२८; १६०३००००८०

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वसुद्व्यष्टाद्रिरूपाङ्कसप्ताद्रितिथयः = १,५७,७९,१७,८२८ सावन (वसु ८, द्वि २, अष्ट ८, अद्रि ७, रूप १, अङ्क ९, सप्त ७, अद्रि ७, तिथि १५); युगे = महायुग में; चान्द्राः = चान्द्र दिन (तिथि-गण); खाष्टखखव्योमखाग्निखर्तुनिशाकराः = १,६०,३०,००,०८० (ख ०, अष्ट ८, ख ०, ख ०, व्योम ०, ख ०, अग्नि ३, ख ०, ऋतु ६, निशाकर १)।

हिन्दी भावार्थ युग में सावन दिन वसु-द्वि-अष्ट-अद्रि-रूप-अङ्क-सप्त-अद्रि-तिथि — एक अरब सत्तावन करोड़ उनहत्तर लाख सत्रह हज़ार आठ सौ अट्ठाईस — हैं। चान्द्र दिन ख-अष्ट-ख-ख-व्योम-ख-अग्नि-ख-ऋतु-निशाकर — एक अरब साठ करोड़ तीस लाख अस्सी — कहे गए। एक ओर सूर्योदय की नागरिक घड़ी, दूसरी ओर तिथि की चान्द्र माला — दोनों को युग एक साथ गिनता है।

English rendering In a yuga there are 1,577,917,828 civil (sāvana) days and 1,603,000,080 lunar days (tithis). These two tallies are the backbone of the yuga calendar arithmetic.

गणित / The Mathematics
सावन-दिन / महायुग = १५७७९१७८२८ (SS-canon)
चान्द्र-दिन / महायुग = १६०३००००८० = चान्द्रमास × ३० = ५३४३३३३६ × ३०
तुलना (dossier): आर्यभट-canon सावन = १५७७९१७५००; अन्तर = ३२८ दिन / महायुग।

उदाहरण (worked example)
माध्य सावन-वर्ष (SS): १५७७९१७८२८ / ४३२०००० = ३६५.२५८७५६… दिन।
तिथि/सावन अनुपात: १६०३००००८० / १५७७९१७८२८ ≈ १.०१५९।
तिथिक्षय-जाँच: १६०३००००८० − १५७७९१७८२८ = २५०८२२५२ (१.३८ से मेल)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक `math-core` का चुना हुआ दिन-द्वार है — SS-canon १,५७७,९१७,८२८; `vedic-ghadi` आर्यभट १,५७७,९१७,५०० पर चलता है। ayanāṃśa प्रयोगशाला में −४.८″/वर्ष की पूँछ ०.०००११५ ठीक इसी १,५७७,९१७,८२८ के ३६५.२५ की जगह बैठने से आती है। सिनेोडिक परीक्षा में SS-canon ≈ −०.१ rev, आर्यभट ≈ −११.२ rev — तithi-इंजन पर कैनन-चुनाव परिणामी है, वैकल्पिक सजावट नहीं। Oracle अनुशासन: सहिष्णुता-पट्टी नहीं, पिन किए fixture पर `==`।

1.38
षड्वह्नित्रिहुताशाङ्कतिथयश्चाधिमासकाः ।
तिथिक्षया यमार्थाश्विद्व्यष्टव्योमशराश्विनः ॥
ṣaḍvahnitrihutāśāṅkatithayaścādhimāsakāḥ ।
tithikṣayā yamārthāśvidvyaṣṭavyomaśarāśvinaḥ ।।
पाठ-भेद: १५९३३३६; २५०८२२५२

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षड्वह्नित्रिहुताशाङ्कतिथयः = १५,९३,३३६ अधिमास (षड् ६, वह्नि ३, त्रि ३, हुताश ३, अङ्क ९, तिथि १५); अधिमासकाः = अधिकमास; तिथिक्षयाः = क्षय-तिथियाँ; यमार्थाश्विद्व्यष्टव्योमशराश्विनः = २,५०,८२,२५२ (यम २, अर्थ ५, अश्वि २, द्वि २, अष्ट ८, व्योम ०, शर ५, अश्विन् २)।

हिन्दी भावार्थ युग में अधिकमास षड्-वह्नि-त्रि-हुताश-अङ्क-तिथि — पंद्रह लाख तिरानवे हज़ार तीन सौ छत्तीस — होते हैं। तिथिक्षय यम-अर्थ-अश्वि-द्वि-अष्ट-व्योम-शर-अश्विन् — ढाई करोड़ आठ लाख बाईस हज़ार दो सौ बावन — गिने गए। चान्द्र माला को सौर वर्ष से जोड़ने और सावन दिन से मिलाने के दो शेष — अधिमास और क्षय — यहाँ संख्या-रूप में ठहरते हैं।

English rendering In a yuga there are 1,593,336 intercalary months and 25,082,252 omitted tithis (tithikṣayas). These close the lunar–solar and lunar–civil accounts of the yuga.

गणित / The Mathematics
अधिमास = १५९३३३६ = चान्द्रमास − रविमास = ५३४३३३३६ − ५१८४००००
तिथिक्षय = २५०८२२५२ = चान्द्र-दिन − सावन-दिन = १६०३००००८० − १५७७९१७८२८
माध्य अधिमास-दर ≈ १५९३३३६ / ४३२०००० ≈ ०.३६८८ / वर्ष ≈ २.७१ वर्ष में एक अधिकमास (युग-माध्य)।

उदाहरण (worked example)
१००० सावन-वर्ष ≈ ३६५२५८.७५६ सावन-दिन (SS-वर्ष से)।
सम्बद्ध चान्द्र-दिन ≈ ३६५२५८.७५६ × (१६०३००००८०/१५७७९१७८२८) ≈ ३,७१,०६४.८।
तिथिक्षय ≈ ३७१०६४.८ − ३६५२५८.८ ≈ ५,८०६ / सहस्र-वर्ष — युग-अनुपात २५०८२२५२/४३२०००० ≈ ५.८०६ प्रति वर्ष से संगत।
(केवल अनुपात-उदाहरण; पञ्चाङ्ग-नियम का स्थानीय क्षय-योग अलग एल्गोरिथ्म है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) अधिमास-तिथिक्षय जोड़ी तithi-इंजन की रीढ़ है; SS vs आर्यभट दिन-कैनन का ३२८-दिन फ़र्क यहीं तिथि-शेष को खिसकाता है। हमने “११२ महासंयोग” जैसी गिनती को जब जाँचा तो वह टिकी नहीं — वापस ले ली; वैसे ही इन संख्याओं को भी केवल पद-संकेत और परस्पर व्युत्पत्ति (`==`) से बाँधते हैं, गोल-सहिष्णुता से नहीं।

1.39
खचतुष्कसमुद्राष्टकुपञ्च रविमासकाः ।
भवन्ति भोदया भानुभगणैरूनिताः क्वहाः ॥
khacatuṣkasamudrāṣṭakupañca ravimāsakāḥ ।
bhavanti bhodayā bhānubhagaṇairūnitāḥ kvahāḥ ।।
पाठ-भेद: ५१८४००००

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) खचतुष्कसमुद्राष्टकुपञ्च = ५,१८,४०,००० (ख ०, चतुष्क ४, समुद्र ४, अष्ट ८, कु १, पञ्च ५); रविमासकाः = सौर मास; भवन्ति = होते हैं; भोदयाः = (भ/ग्रह) उदय; भानु-भगणैः ऊनिताः = रवि-भगणों से घटाए; क्वहाः = सावन-दिन (कु-अहानि / भूमि-दिन)।

हिन्दी भावार्थ रवि-मास ख-चतुष्क-समुद्र-अष्ट-कु-पञ्च — पाँच करोड़ अठारह लाख चालीस हज़ार — युग में होते हैं। और भ-उदय में से रवि के भगण घटाने पर सावन दिन (क्वह) मिलते हैं। बारह रवि-मास का वर्ष और उदय-से-उदय का दिन — दोनों एक ही श्लोक में अंकित हैं।

English rendering There are 51,840,000 solar months in a yuga. Civil days equal the stellar risings diminished by the Sun’s revolutions.

गणित / The Mathematics
रविमास / महायुग = ५१८४०००० = १२ × ४३२००००
सावन-दिन = भ-उदय − रवि-भगण = १५८२२३७८२८ − ४३२०००० = १५७७९१७८२८
(१.३४ + १.३७ + १.३९ की त्रयी एक बंद अंक-गणित है।)

उदाहरण (worked example)
रवि-वर्ष / युग = रविमास / १२ = ५१८४०००० / १२ = ४३,२०,०००।
एक महायुग में अधिमास-सहित चान्द्रमास = ५१८४०००० + १५९३३३६ = ५३,४३३,३३६ — १.३५ की परिभाषा से पुनः प्राप्त।
सावन/सौर-वर्ष = १५७७९१७८२८ / ४३२०००० = ३६५.२५८७५६४४… दिन (SS-canon; ३६५.२५ से भिन्नता ही ayanāṃśa-पूँछ का स्रोत)।

हमारा डिकोड (Our Decode) −१६ rev/महायुग = −४.८″/वर्ष = −२४/५ ठीक तभी “शुद्ध” दिखता है जब वर्ष-लंबाई ३६५.२५ के बजाय इसी १,५७७,९१७,८२८-आधारित SS-वर्ष पर हो; इंजन की ४९.२००११५०७२२″/वर्ष में ०.०००११५ की पूँछ उसी दिन-संख्या की छाप है। रैखिक ayanāṃśa स्वयं मॉडल-कल्पना है — ५४″, ५०″, ±२७° वृत्ति और Z≈२५३.८ CE परिकल्पनाएँ विकल्प हैं, एकमात्र ऐतिहासिक सत्य का दावा नहीं।

1.40
अधिमासोनरात्र्यार्क्षचान्द्रसावनवासराः ।
एते सहस्रगुणिताः कल्पे स्युर्भगणादयः ॥
adhimāsonarātryārkṣacāndrasāvanavāsarāḥ ।
ete sahasraguṇitāḥ kalpe syurbhagaṇādayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अधिमास = अधिकमास; ऊनरात्र = तिथिक्षय/क्षय-रात्रि; आर्क्ष = नाक्षत्र (भ-दिन); चान्द्र = चान्द्र दिन; सावन-वासराः = सावन दिन; एते = ये सब; सहस्र-गुणिताः = हज़ार से गुणित; कल्पे = कल्प में; स्युः = होते हैं; भगण-आदयः = भगण आदि (सभी पूर्व-कथित गणनाएँ)।

हिन्दी भावार्थ अधिकमास, ऊनरात्र (तिथिक्षय), नाक्षत्र दिन, चान्द्र दिन और सावन दिन — तथा भगणादि सारी युग-राशि — कल्प में सहस्रगुणा हो जाती है। युग की ईंट से कल्प की दीवार: एक ही अनुपात, हज़ार की सीढ़ी।

English rendering The yuga counts of intercalary months, omitted tithis, sidereal days, lunar days, civil days, revolutions, and the rest, multiplied by a thousand, are the corresponding counts in a kalpa.

गणित / The Mathematics
कल्पाङ्क = १००० × युगाङ्क
उदाहरण-रूप:
सावन / कल्प = १००० × १५७७९१७८२८ = १,५७७,९१७,८२८,०००
चान्द्र-दिन / कल्प = १००० × १६०३००००८० = १,६०३,०००,०८०,०००
अधिमास / कल्प = १००० × १५९३३३६ = १,५९३,३३६,०००
तिथिक्षय / कल्प = १००० × २५०८२२५२ = २५,०८२,२५२,०००
(कल्प = १००० महायुग — इसी श्लोक का सहस्र-गुणन।)

उदाहरण (worked example)
चन्द्रोच्च-भगण / कल्प = १००० × ४८८२०३ = ४८,८२,०३,०००।
पात-भगण / कल्प = १००० × २३२२३८ = २३,२२,३८,००० (वाम)।
रविमास / कल्प = १००० × ५१८४०००० = ५१,८४०,०००,०००।
अनुपात अपरिवर्तित: अधिमास/रविमास = १५९३३३६/५१८४०००० वही कल्प में भी।

हमारा डिकोड (Our Decode) सहस्र-गुणन रैखिक मापनी है — इंजन में महायुग-राशि को १००० से फैलाकर कल्प-स्केल मिलता है; कोई नया भौतिक नियम नहीं। mean-longitude प्रयोगशाला (`bharat-ephemeris-offline` / `math-core`) युग-नियतांकों पर काम करती है; कल्प केवल उन्हीं का १०³ विस्तार है। उत्पादन-स्फुट पंचांग का दावा नहीं — मापा गया calculation layer बिना “मज़बूत शब्दों” के आगे नहीं बढ़ता; गलत मोड़ रिपोर्ट करना ही विधि है।

1.41
प्राग्गतेः सूर्यमन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः ।
कौजस्य वेदखयमा बौधस्याष्टर्तुवह्नयः ॥
prāggateḥ sūryamandasya kalpe saptāṣṭavahnayaḥ ।
kaujasya vedakhayamā baudhasyāṣṭartuvahnayaḥ ।।
पाठ-भेद: ३८७; २०४, ३६८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राग्गतेः = अग्र/अनुगामी गति के; सूर्यमन्दस्य = सूर्य-मन्दोच्च (अपोजी) के; कल्पे = एक कल्प में; सप्ताष्टवह्नयः = सप्त(७)+अष्ट(८)+वह्नि(३) = ३८७ भगण; कौजस्य = कुज/मंगल के; वेदखयमा = वेद(४)+ख(०)+यम(२) = २०४; बौधस्य = बुध के; अष्टर्तुवह्नयः = अष्ट(८)+ऋतु(६)+वह्नि(३) = ३६८।

हिन्दी भावार्थ कल्प-माप में सूर्य के मन्दोच्च की अग्रगामी परिक्रमाएँ तीन सौ सत्तासी हैं। उसी कल्प में मंगल के मन्दोच्च के दो सौ चार भगण, और बुध के मन्दोच्च के तीन सौ अड़सठ भगण गिने गए हैं। ये संख्याएँ मन्द-केन्द्र (κ_manda) की आधार-रेखा हैं — जिस पर आगे स्फुट-गणित टिका है।

English rendering In one Kalpa the Sun’s mandocca advances 387 revolutions; Mars’s mandocca, 204; Mercury’s mandocca, 368. These are the slow apsidal counts from which the manda anomaly is later formed.

गणित / The Mathematics कल्प में मन्दोच्च-भगण (अग्रगति):
- सूर्य-मन्दोच्च: ३८७
- कुज-मन्दोच्च: २०४
- बुध-मन्दोच्च: ३६८

महायुग (= कल्प/१०००) पर औसत दर:
- सूर्य: ३८७/१००० = ०.३८७ rev/महायुग
- कुज: ०.२०४ rev/महायुग
- बुध: ०.३६८ rev/महायुग

उदाहरण (worked example) SS-canon: १ महायुग = ४३,२०,००० वर्ष; १ कल्प = १००० महायुग। सूर्य-मन्दोच्च की औसत वार्षिक गति ≈ ३८७ / (१००० × ४३,२०,०००) rev/वर्ष = ३८७ / ४,३२,००,००,००० ≈ ८.९६ × १०⁻⁸ rev/वर्ष ≈ ०.११६″/वर्ष (पूर्ण वृत्त = १,२९६,०००″)।

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में κ_manda = madhya − mandocca ठीक इसी मन्दोच्च-रेखा से बनता है; मन्द-फल = arcsin((R_manda/३६०)·sin κ)। अध्याय-२ की चार-चरणी पुनरावृत्ति (अर्ध-मन्द → अर्ध-शीघ्र → पूर्ण-मन्द → पूर्ण-शीघ्र) इन्हीं कल्प-भगणों को mean-layer से खींचकर चलती है — Western theorem श्रृंखला में नहीं।

1.42
खखरन्ध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणेषवः ।
गो अग्नयः शनिमन्दस्य पातानां अथ वामतः ॥
khakharandhrāṇi jaivasya śaukrasyārthaguṇeṣavaḥ ।
go agnayaḥ śanimandasya pātānāṃ atha vāmataḥ ।।
पाठ-भेद: ९००, ५३५; ३९

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) खखरन्ध्राणि = ख(०)+ख(०)+रन्ध्र(९) = ९००; जैवस्य = जीव/गुरु के; शौक्रस्य = शुक्र के; अर्थगुणेषवः = अर्थ(५)+गुण(३)+इषु(५) = ५३५; गोऽग्नयः = गो(९)+अग्नि(३) = ३९; शनिमन्दस्य = शनि-मन्दोच्च के; पातानां = पातों (राहु-आदि) के; अथ वामतः = अब विपरीत/वामावर्त दिशा में।

हिन्दी भावार्थ गुरु के मन्दोच्च के कल्प में नौ सौ भगण हैं; शुक्र के पाँच सौ पैंतीस। शनि के मन्दोच्च के मात्र उनतालीस भगण गिने गए। यहाँ से पाठ पातों की ओर मुड़ता है — और स्पष्ट कहता है: पातों की गति वामतः, अर्थात् विपरीत दिशा में गिनी जाए।

English rendering Jupiter’s mandocca has 900 revolutions per Kalpa; Venus’s, 535; Saturn’s, 39. From here the text turns to the nodes, which are to be counted vāmataḥ — retrograde relative to the direct planetary sense.

गणित / The Mathematics कल्प-मन्दोच्च-भगण (शेष ग्रह):
- गुरु: ९००
- शुक्र: ५३५
- शनि: ३९

पातों का संकेत: दिशा = वामतः (ऋण/प्रतिलोम)। संख्याएँ अगले दो श्लोकों में।

महायुग-दर: गुरु ०.९००; शुक्र ०.५३५; शनि ०.०३९ rev/महायुग।

उदाहरण (worked example) शनि-मन्दोच्च: ३९ rev/कल्प → प्रति महायुग ०.०३९ rev → प्रति वर्ष ०.०३९/४३,२०,००० ≈ ९.० × १०⁻⁹ rev/वर्ष ≈ ०.०१२″/वर्ष। अत्यन्त मन्द गति — इसलिए मन्दोच्च को अक्सर युग-युग स्थिर-सा माना जाता है, किन्तु सिद्धान्त में यह शून्य नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) मन्दोच्च-तालिका सूर्य से शनि तक यहीं पूरी होती है; स्फुट-इंजन में R_manda (SS २.३४–३८: सूर्य १३°५०′, चन्द्र ३१°५०′, कुज ७३.५°, बुध २९°, गुरु ३२.५° आदि) इन्हीं मन्दोच्चों के सापेक्ष κ पर लगता है। पातों का `वामतः` चिह्न mean-longitude संश्लेषण में ऋण-दर के रूप में दर्ज होता है।

1.43
मनुदस्रास्तु कौजस्य बौधस्याष्टाष्टसागराः ।
कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य त्रिखाङ्काश्च तथा भृगोस् ॥
manudasrāstu kaujasya baudhasyāṣṭāṣṭasāgarāḥ ।
kṛtādricandrā jaivasya trikhāṅkāśca tathā bhṛgos ।।
पाठ-भेद: २१४, ४८८; ड्भृगोस्तथा; १७४, ९०३

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मनुदस्राः = मनु(१४)+दस्र(२, अश्विन्) = २१४; कौजस्य = कुज के (पात); बौधस्य = बुध के; अष्टाष्टसागराः = अष्ट(८)+अष्ट(८)+सागर(४) = ४८८; कृताद्रिचन्द्राः = कृत(४)+अद्रि(७)+चन्द्र(१) = १७४; जैवस्य = गुरु के; त्रिखाङ्काः = त्रि(३)+ख(०)+अङ्क(९) = ९०३; भृगोः = शुक्र/भृगु के; (ड् पाठ: भृगोस्तथा)।

हिन्दी भावार्थ कल्प में कुज-पात के दो सौ चौदह भगण हैं; बुध-पात के चार सौ अट्ठासी। गुरु-पात के एक सौ चौहत्तर, और शुक्र-पात के नौ सौ तीन भगण — ये सभी पूर्वोक्त नियम से वामतः गिने जाते हैं। पाठ-भेद “भृगोस्तथा” केवल क्रम-सुगमता का है; संख्या ९०३ पर सहमति है।

English rendering Per Kalpa the node-revolutions are: Mars 214, Mercury 488, Jupiter 174, Venus 903 — all counted retrograde, as already ordered. A minor variant only rearranges the Venus clause; the count itself is fixed.

गणित / The Mathematics कल्प-पात-भगण (वामतः):
- कुज-पात: २१४
- बुध-पात: ४८८
- गुरु-पात: १७४
- शुक्र-पात: ९०३

महायुग-दर (ऋण-दिशा): −०.२१४, −०.४८८, −०.१७४, −०.९०३ rev/महायुग।

उदाहरण (worked example) बुध-पात: ४८८ rev/कल्प → |दर| ≈ ४८८/(१०००×४३,२०,०००) rev/वर्ष ≈ १.१३×१०⁻⁷ rev/वर्ष ≈ ०.१४६″/वर्ष (वामतः)। चन्द्र-पात इससे कहीं तीव्र है — उसकी संख्या पूर्व श्लोक-क्रम में अलग कही जा चुकी है।

हमारा डिकोड (Our Decode) पात-भगण mean-node संश्लेषण की रीढ़ हैं; `math-core.js` का integer-bhagaṇa यन्त्र इन्हीं कल्प-पूर्णाँकों को महायुग/दिन-दर में तोड़ता है। दिशा-चिह्न (`वामतः`) गलत होने पर स्फुट नहीं, बल्कि पूरी node-रेखा पलट जाती — इसलिए oracle में `==` से दिशा भी पिन की जाती है, ± सहन-पट्टी से नहीं।

1.44
शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः ।
भगणाः पूर्वं एवात्र प्रोक्ताश्चन्द्रोच्चपातयोः ॥
śanipātasya bhagaṇāḥ kalpe yamarasartavaḥ ।
bhagaṇāḥ pūrvaṃ evātra proktāścandroccapātayoḥ ।।
पाठ-भेद: ६६२

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शनिपातस्य = शनि-पात के; भगणाः = कक्षा-परिक्रमण; कल्पे = कल्प में; यमरसर्तवः = यम(२)+रस(६)+ऋतु(६) = ६६२; पूर्वं एव = पहले ही; अत्र प्रोक्ताः = यहाँ कहे जा चुके; चन्द्रोच्चपातयोः = चन्द्र-उच्च और चन्द्र-पात — दोनों के।

हिन्दी भावार्थ शनि के पात के कल्प में छह सौ बासठ भगण हैं। चन्द्रमा के उच्च (मन्दोच्च) और पात के भगण पहले ही इसी अध्याय में कह दिए गए हैं — यहाँ केवल स्मरण है कि वे दोहरी तालिका का भाग हैं, पुनर्गणना का नहीं।

English rendering Saturn’s node completes 662 revolutions in a Kalpa. The Moon’s apogee and node counts were already given earlier in this chapter; they are recalled, not restated.

गणित / The Mathematics शनि-पात: ६६२ भगण/कल्प (वामतः), अर्थात् −०.६६२ rev/महायुग।

चन्द्रोच्च/चन्द्रपात: पूर्वोक्त (इसी अध्याय के पूर्व श्लोक) — इस श्लोक में नई संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) शनि-पात |दर| ≈ ६६२/(१०००×४३,२०,०००) ≈ १.५३×१०⁻⁷ rev/वर्ष ≈ ०.१९८″/वर्ष (वामतः)। तुलना: शनि-मन्दोच्च केवल ३९/कल्प — पात उससे ~१७ गुना तीव्र।

हमारा डिकोड (Our Decode) बाहरी ग्रहों के लिए शीघ्रोच्च = mean Sun; मन्दोच्च/पात अलग भगण-तालिका से आते हैं — १.४१–१.४४ ठीक वही तालिका। बīja-प्रयोग (मंगल +३०, गुरु −५१, शनि +६१ rev/महायुग) ग्रह-सूर्य सापेक्ष दर पर हैं, मन्दोच्च/पात पर नहीं; दोनों परतों को मिलाना hybrid-त्रुटि पैदा करता है — इसलिए ऑडिट में अलग रखा गया।

1.45
षण्मनूनां तु सम्पीड्य कालं तत्सन्धिभिः सह ।
कल्पादिसन्धिना सार्धं वैवस्वतमनोस्तथा ॥
ṣaṇmanūnāṃ tu sampīḍya kālaṃ tatsandhibhiḥ saha ।
kalpādisandhinā sārdhaṃ vaivasvatamanostathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षण्मनूनां = छह मनुओं का; सम्पीड्य = जोड़/संपीडित करके; कालं = काल; तत्सन्धिभिः सह = उनकी सन्धियों सहित; कल्पादिसन्धिना सार्धं = कल्प के आदि-सन्धि के साथ; वैवस्वतमनोः तथा = तथा वैवस्वत मनु (वर्तमान) का भी।

हिन्दी भावार्थ बीते काल का हिसाब लगाने के लिए छह पूर्ण मनुओं का समय उनकी सन्धियों के साथ जोड़ो; उसमें कल्प के आरम्भ की सन्धि भी मिलाओ; फिर वर्तमान वैवस्वत मनु का बीता अंश जोड़ो। यह अहर्गण/गत-काल की सीढ़ी का पहला डंडा है — सृष्टि से आज तक का रास्ता यहीं से खुलता है।

English rendering Compress the time of the six completed Manus together with their sandhis, add the sandhi at the opening of the Kalpa, and include the elapsed portion of the present Vaivasvata Manu. This is the first rung of the elapsed-time ladder from creation.

गणित / The Mathematics गत-काल संरचना (काल-योग):
गत = (६ मनु + उनकी सन्धियाँ) + कल्पादि-सन्धि + वैवस्वत-मनु का बीता भाग।

परंपरागत माप (सिद्धान्त-रूपरेखा; विस्तृत वर्ष-योग अगले श्लोकों में):
- १ मनु = ७१ महायुग
- मनु-सन्धि ≈ १ कृतयुग-दीर्घ
- कल्प = १४ मनु + सन्धियाँ ≈ १००० महायुग

उदाहरण (worked example) पूर्ण ६ मनु ≈ ६ × ७१ = ४२६ महायुग (सन्धियाँ अतिरिक्त)। वैवस्वत में आगे १.४६ के अनुसार २७ महायुग बीत चुके — योग का कच्चा ढाँचा: ४२६ + सन्धियाँ + कल्पादि-सन्धि + २७ + वर्तमान युग-अंश। पूर्ण सूर्याब्द-संख्या १.४७ में बंद है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अहर्गण/day-count यहीं से जन्म लेता है। `math-core` SS-canon १,५७७,९१७,८२८ civil days/महायुग चुनता है; `vedic-ghadi` आर्यभटीय १,५७७,९१७,५०० — ३२८ दिन का अंतर तिथि-इंजन पर सबसे चोट करता है। सन्धि-सहित मनु-योग गलत हो तो पूरा epoch खिसक जाता है।

1.46
युगानां त्रिघनं यातं तथा कृतयुगं त्विदम् ।
प्रोज्झ्य सृष्टेस्ततः कालं पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया ॥
yugānāṃ trighanaṃ yātaṃ tathā kṛtayugaṃ tvidam ।
projjhya sṛṣṭestataḥ kālaṃ pūrvoktaṃ divyasaṃkhyayā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युगानां त्रिघनं = युगों का घन-त्रय = ३³ = २७ (महायुग); यातं = बीत चुके; तथा कृतयुगं त्विदम् = और यह वर्तमान कृतयुग; प्रोज्झ्य = छोड़/पृथक करके; सृष्टेः ततः कालं = सृष्टि से उस बिंदु तक का काल; पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया = पूर्वोक्त दिव्य-वर्ष संख्या से।

हिन्दी भावार्थ वैवस्वत मनु के भीतर सत्ताईस महायुग बीत चुके हैं, और अब यह कृतयुग चल रहा है (या कृत का अंत-बिंदु लक्ष्य है)। सृष्टि-संबंधी आदि-अंश को यथाविधि पृथक रखते हुए, शेष काल को पहले कही दिव्य-संख्या की रीति से जानो। १.४५ का मनु-योग और १.४६ का युग-योग मिलकर गत-काल का कंकाल बनाते हैं।

English rendering Within Vaivasvata Manu, twenty-seven Mahāyugas have elapsed, and the present stretch is the Kṛta-yuga. Setting aside the creation-boundary portion as prescribed, measure the remaining time by the divine-year reckoning already taught.

गणित / The Mathematics वैवस्वत-अंतर्गत:
- पूर्ण महायुग: त्रिघन = ३³ = २७
- वर्तमान: कृतयुग

दिव्य-वर्ष रीति (पूर्वोक्त): दिव्य वर्ष ↔ मानुष वर्ष का मानक गुणांक सिद्धान्त-परंपरा में ३६० (१ दिव्य वर्ष = ३६० मानुष वर्ष) — इस श्लोक में गुणांक दोहराया नहीं, केवल “पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया” का निर्देश है।

उदाहरण (worked example) २७ महायुग × ४३,२०,००० वर्ष/महायुग = ११,६६,४०,००० वर्ष — केवल वैवस्वत के पूर्ण युग-खंड। कृतयुग की अपनी दीर्घ (०.४ महायुग = १७,२८,००० वर्ष) जोड़ने पर वैवस्वत-भीतर का कृतांत-बिंदु ≈ ११,८३,६८,००० वर्ष। पूर्ण सृष्टि-से-कृततांत योग १.४७ में: १,९५,३७,२०,००० सूर्याब्द।

हमारा डिकोड (Our Decode) epoch-खंडन (मनु → महायुग → युग) day-count मशीन का इनपुट है। SS vs आर्यभट दिन-संख्या का चुनाव यहीं के वर्ष-योग को civil days में बदलते समय फर्क पैदा करता है; synodic परीक्षण में SS-canon −०.१ rev/महायुग, आर्यभट −११.२ — तिथि सबसे संवेदनशील परत है।

1.47
सूर्याब्दसंख्यया ज्ञेयाः कृतस्यान्ते गता अमी ।
खचतुष्कयमाद्र्यग्निशररन्ध्रनिशाकराः ॥
sūryābdasaṃkhyayā jñeyāḥ kṛtasyānte gatā amī ।
khacatuṣkayamādryagniśararandhraniśākarāḥ ।।
पाठ-भेद: १९५३७२००००

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्याब्दसंख्यया = सूर्य-वर्षों की गिनती से; ज्ञेयाः = जानने योग्य; कृतस्य अन्ते = कृतयुग के अंत में; गताः अमी = ये बीते हुए; खचतुष्कयमाद्र्यग्निशररन्ध्रनिशाकराः = ख-चतुष्क(चार शून्य)+यम(२)+अद्रि(७)+अग्नि(३)+शर(५)+रन्ध्र(९)+निशाकर(१) → १,९५,३७,२०,०००।

हिन्दी भावार्थ कृतयुग के अंत तक जो वर्ष बीत चुके, उन्हें सूर्य-वर्षों में यह संख्या बताती है: एक अरब तीनतालिस करोड़ बहत्तर लाख — भूतसंख्यया खचतुष्क-यम-अद्रि-अग्नि-शर-रन्ध्र-निशाकर। यह १.४५–१.४६ की पूरी सीढ़ी का बंद योग है; आगे की गणना इसी स्तंभ पर और वर्ष/मास जोड़ती है।

English rendering At the close of the Kṛta-yuga the elapsed solar years, counted in the Sūrya-year measure, are 1,953,720,000 — the bhūtasaṃkhyā kha-catuṣka-yama-adri-agni-śara-randhra-niśākara. That single integer is the sealed sum of the Manu–sandhi–yuga ladder just defined.

गणित / The Mathematics
कृत-अंत गत सूर्याब्द =

१,९५३,७२०,००० = १.९५३७२ × १०⁹ वर्ष।

भूतसंख्या-विन्यास (अङ्कानां वामतो गतिः; खचतुष्क = चार शून्य):
निशाकर(१), रन्ध्र(९), शर(५), अग्नि(३), अद्रि(७), यम(२) + ०००० → १९५३७२००००।

उदाहरण (worked example) महायुग-तुल्यता: १,९५३,७२०,००० / ४,३२०,००० = ४५२.२५ महायुग-तुल्य वर्ष-राशि कृतांत तक। SS-canon civil days/महायुग = १,५७७,९१७,८२८ हो तो कृतांत तक अनुमानित civil-day स्तंभ ≈ ४५२.२५ × १,५७७,९१७,८२८ — पूर्ण अहर्गण के लिए आगे मास/दिन जोड़ अनिवार्य (१.४८)। (कन्वेंशन: सूर्याब्द = सिद्धान्त-सौर वर्ष; modern Julian century से न मिलाएँ बिना ayanāṃśa/epoch घोषणा।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही पूर्णांक epoch-fixture का हृदय है। `kaal-verification-oracle` सहन-पट्टी नहीं चलता — पिन की गई संख्या `==` से जुड़ती है; कभी ±३ ने −१ छुपाया था। “Drik zero-error” जैसी गढ़ी सारणियाँ हटा दी गईं: इंजन mean-longitude प्रयोगशाला है, production true-position होने का दावा नहीं।

1.48
अत ऊर्ध्वं अमी युक्ता गतकालाब्दसंख्यया ।
मासीकृता युता मासैर्मधुशुक्लादिभिर्गतैः ॥
ata ūrdhvaṃ amī yuktā gatakālābdasaṃkhyayā ।
māsīkṛtā yutā māsairmadhuśuklādibhirgataiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत ऊर्ध्वं = इससे ऊपर/आगे; अमी युक्ता = ये (वर्ष) जोड़े जाएँ; गतकालाब्दसंख्यया = गत-काल की वर्ष-संख्या के साथ; मासीकृता = मासों में परिणत किए हुए; युता मासैः = मासों से युक्त; मधुशुक्लादिभिः गतैः = मधु-शुक्ल (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) से लेकर बीते मासों से।

हिन्दी भावार्थ कृतांत-स्तंभ के बाद, वर्तमान तक जितने सूर्य-वर्ष और बीते हों उन्हें जोड़ो; पूरी वर्ष-राशि को मासों में बदलो; फिर वर्षारंभ — मधु शुक्ल (मधु = चैत्र) से आज तक जितने मास बीते, उन्हें भी जोड़ दो। यह गत-काल को मास-स्तंभ तक लाने का नियम है; आगे तिथि/दिन की सीढ़ी इसी पर चढ़ेगी।

English rendering Beyond that Kṛta-end total, add the further elapsed solar years; reduce the sum to months; then add the months elapsed since Madhu-śukla — the bright fortnight of Madhu (Caitra), the year’s opening. The elapsed-time count is thereby carried to a monthly column.

गणित / The Mathematics मास-स्तंभ निर्माण:
1. A = १,९५३,७२०,००० + (कृत-अंत के बाद बीते सूर्याब्द)
2. मास_वर्ष = A × १२
3. मास_कुल = मास_वर्ष + (मधु-शुक्ल से बीते मास)

वर्षारंभ-कन्वेंशन: मधु शुक्ल = चैत्र शुक्ल पक्ष का आरंभ (सौर/चान्द्र मान के अनुसार मास-गणना आगे स्पष्ट की जाती है)।

उदाहरण (worked example) मान लें कृतांत के बाद ३,८८८,००० सूर्याब्द और बीते (केवल संख्या-रीति दिखाने को; वास्तविक पंचांग-तिथि अलग साधनी होगी), तथा मधु-शुक्ल से ७ मास बीते:
- A = १,९५३,७२०,००० + ३,८८८,००० = १,९५७,६०८,००० वर्ष
- मास = १,९५७,६०८,००० × १२ + ७ = २३,४९१,२९६,००० + ७ = २३,४९१,२९६,००७ मास
आगे अहर्गण = मास → तिथि/दिन, चुने day-count (SS १,५७७,९१७,८२८ या आर्यभट १,५७७,९१७,५००) पर निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) मधु-शुक्ल आदि गत मास `vedic-ghadi` के पंचांग-सब्सट्रेट (घटी/पल/विपल, तिथि-इंजन) से सीधे जुड़ते हैं — मेट्रोलॉजी: १ दिन = ६० घटी = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल = २१,६०० प्राण; २१,६०० प्राण/दिन ↔ २१,६०० चाप-मिनट/वृत्त गणना-संगति है, भौतिक तादात्म्य नहीं। canon-day-count का चुनाव यहीं तिथि को सबसे अधिक हिलाता है।

1.49
पृथक्ष्थास्ते अधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः ।
लब्धाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः ॥
pṛthakṣthāste adhimāsaghnāḥ sūryamāsavibhājitāḥ ।
labdhādhimāsakairyuktā dinīkṛtya dinānvitāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पृथक्-स्थाः = अलग रखे गए (चन्द्र-मास आदि); अधिमास-घ्नाः = युग के अधिमासों से गुणित; सूर्य-मास-विभाजिताः = सूर्य-मासों से विभाजित; लब्ध-अधिमासकैः = प्राप्त अधिमास-संख्या से; युक्ताः = (मासों में) युक्त; दिनी-कृत्य = दिनों में परिवर्तित करके; दिन-अन्विताः = शेष दिनों से अन्वित।

हिन्दी भावार्थ जो राशि पहले अलग रख ली गई थी, उसे युग के कुल अधिमासों से गुणा करें और युग के सूर्य-मासों से भाग दें — भागफल वही अधिमास हैं जो अभी तक बीत चुके। इन अधिमासों को उन मासों में जोड़कर पूरी राशि को दिनों में बदलें, और जो दिन शेष बचे हों उन्हें भी जोड़ लें। यही क्रम अधिमास-शोधन से दिन-गणना तक ले जाता है।

English rendering Multiply the separately reserved quantity by the yuga’s intercalary months and divide by the yuga’s solar months; the quotient is the elapsed adhimāsas. Add those intercalary months in, convert the total to days, and add any remaining days.

गणित / The Mathematics
elapsed adhimāsas = (reserved lunar-months × Adhimāsa_yuga) ÷ Sūrya-māsa_yuga
Then: total months = reserved months + elapsed adhimāsas; days = total months × 30 (+ residual days).
With Mahāyuga constants used in this tradition (and pinned in the decode ecosystem): Sūrya-māsa = 4,320,000 × 12 = 51,840,000; lunar months (synodic) = 53,433,336; hence Adhimāsa_yuga = 53,433,336 − 51,840,000 = 1,593,336.

उदाहरण (worked example) Input: 100 lunar months reserved.
elapsed adhimāsas = 100 × 1,593,336 ÷ 51,840,000 ≈ 3.073 months.
Total ≈ 103.073 months → × 30 ≈ 3,092.2 days (before residual-day add-on). Convention: integer bhagaṇa / yuga-month counts as in the SS mean-longitude instrument.

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पद वही अधिमास-पुल है जो सावन दिन-गणना को चान्द्र मास-जाल से जोड़ता है। `math-core` में SS-canon civil days = 1,577,917,828 इसी महायुग-मात्रा-जाल पर टिका है; Āryabhaṭa-canon 1,577,917,500 से 328 दिनों का अंतर यहीं से tithi-engine तक पहुँचता है। हमने synodic test में 57,753,336 − 4,320,000 = 53,433,336 revs/Mahāyuga से SS-canon को near-perfect (−0.1 rev) पाया।

1.50
द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः ।
लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायां आर्धरात्रिकः ॥
dviṣṭhāstithikṣayābhyastāścāndravāsarabhājitāḥ ।
labdhonarātrirahitā laṅkāyāṃ ārdharātrikaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-स्थाः = दो स्थानों में / अलग रखे गए (दिन-राशियाँ); तिथि-क्षय-अभ्यस्ताः = तिथिक्षयों से गुणित; चान्द्र-वासर-भाजिताः = चान्द्र-दिनों से विभाजित; लब्ध-ऊनः = प्राप्त (क्षय) से घटाया गया; रात्रि-रहिता = (पूर्ण) रात्रि-गणना रहित / क्षय-शोधित; लङ्कायां = लंका में; आर्धरात्रिकः = अर्धरात्रि-काल (midnight reckoning)।

हिन्दी भावार्थ उन (दिन-संबंधी) राशियों को, जो अलग रखी गईं, युग के तिथिक्षयों से गुणा करें और युग के चान्द्र-दिनों से भाग दें — भागफल बीते हुए लुप्त तिथियाँ हैं। उन क्षयों को घटा देने पर जो दिन-राशि बचती है, वही लंका की अर्धरात्रि-पद्धति (आर्धरात्रिक) का सावन दिन-गण है। सूर्यसिद्धान्त यहीं अपना मध्यरात्रि-युगारम्भ घोषित करता है।

English rendering Multiply the separately held day-quantities by the yuga’s omitted tithis and divide by the lunar days; subtract the quotient. The result is the civil day-count of the midnight (ārdharātrika) reckoning at Laṅkā.

गणित / The Mathematics
elapsed tithikṣaya = (days × Tithikṣaya_yuga) ÷ Cāndra-vāsara_yuga
ārdharātrika civil days = days − elapsed tithikṣaya
With the same Mahāyuga frame: lunar days = 53,433,336 × 30 = 1,603,000,080; SS civil days = 1,577,917,828; hence Tithikṣaya_yuga = 1,603,000,080 − 1,577,917,828 = 25,082,252. Epoch convention: midnight at Laṅkā (not sunrise).

उदाहरण (worked example) Input: 10,000 raw days before kṣaya.
tithikṣaya = 10,000 × 25,082,252 ÷ 1,603,000,080 ≈ 156.47 days.
ārdharātrika days ≈ 10,000 − 156.47 = 9,843.53 (then take the integer civil count as the school’s rounding rule requires). Convention: SS-canon day-count, Laṅkā midnight.

हमारा डिकोड (Our Decode) आर्धरात्रिक दिन-गण ही mean-longitude pipeline का द्वार है — `math-core` SS-canon 1,577,917,828 इसी civil-day जाल पर integer bhagaṇa चलाता है। `vedic-ghadi` Āryabhaṭa 1,577,917,500 चुनता है; 328-day gap tithi-engine पर सबसे तेज़ लगता है। Oracle discipline: exact `==` fixtures, no ±tolerance masking of a real −1.

1.51
सावनो द्युगणः सूर्याद्दिनमासाब्दपास्ततः ।
सप्तभिः क्षयितः शेषः सूर्याद्यो वासरेश्वरः ॥
sāvano dyugaṇaḥ sūryāddinamāsābdapāstataḥ ।
saptabhiḥ kṣayitaḥ śeṣaḥ sūryādyo vāsareśvaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सावनः = सौर-सावन / भौम-दिन संबंधी; द्यु-गणः = दिन-गण (अहर्गण); सूर्यात् = सूर्य (रविवार) से; दिन-मास-अब्द-पाः = दिन, मास और वर्ष के स्वामी; ततः = उससे; सप्तभिः क्षयितः = सात से अपवर्तित; शेषः = शेष; सूर्य-आद्यः = सूर्य से आरम्भ; वासर-ईश्वरः = वार-स्वामी।

हिन्दी भावार्थ जो सावन द्युगण सिद्ध हुआ, उसी से दिन-स्वामी, मास-स्वामी और वर्ष-स्वामी निकलते हैं। द्युगण को सात से भाग दें — जो शेष बचे, वही वार का स्वामी है, गिनती रविवार (सूर्य) से। यह साप्ताहिक चक्र का शुद्ध मॉड्यूलर नियम है, फल-कथन नहीं।

English rendering From the civil day-count (sāvana dyugaṇa) come the lords of day, month, and year. Divide that count by seven; the remainder, counted from Sunday (the Sun), is the weekday lord.

गणित / The Mathematics
vāsareśvara index = sāvana_dyugaṇa mod 7
with 0 → रवि (Sun), 1 → सोम, 2 → मंगल, 3 → बुध, 4 → गुरु, 5 → शुक्र, 6 → शनि
(Exact mapping of remainder 0 depends on whether the epoch day itself is taken as remainder 0 or 1 — declare the school’s zero-point; the verse fixes only the modulus and the solar starting point.)

उदाहरण (worked example) Convention: remainder 0 = Sunday at the chosen epoch.
If sāvana_dyugaṇa = 1,577,917,828 (full Mahāyuga civil days, SS-canon),
1,577,917,828 = 7 × 225,416,832 + 4 → remainder 4: the yuga is not a whole number of weeks. (The Sunday epoch of the yuga is the text's stated convention, not a consequence of this division — corrected in the audit of 2026-09-21.)
For a partial count D = 10: 10 mod 7 = 3 → Wednesday, if 0 = Sunday.

1.52
मासाब्ददिनसंख्याप्तं द्वित्रिघ्नं रूपसंयुतम् ।
सप्तोद्धृतावशेषौ तु विज्ञेयौ मासवर्षौ ॥
māsābdadinasaṃkhyāptaṃ dvitrighnaṃ rūpasaṃyutam ।
saptoddhṛtāvaśeṣau tu vijñeyau māsavarṣau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मास-अब्द-दिन-संख्या-आप्तम् = मास, वर्ष (और दिन) की प्राप्त संख्या; द्वि-त्रि-घ्नम् = दो और तीन से गुणित; रूप-संयुतम् = एक (रूप) से युक्त; सप्त-उद्धृत = सात से विभाजित; अवशेषौ = दोनों शेष; तु = ही; विज्ञेयौ = जानने योग्य; मास-वर्षौ = मास-पति और वर्ष-पति।

हिन्दी भावार्थ बीते मासों और वर्षों की संख्या लें — मास-संख्या को दो से, वर्ष-संख्या को तीन से गुणा करें, दोनों में एक जोड़ें, फिर सात से भाग दें। जो शेष बचें, वे क्रमशः मास के स्वामी और वर्ष के स्वामी माने जाएँ। दिन-स्वामी पहले श्लोक में सावन द्युगण से निकल चुका; यहाँ मास-वर्ष का युगल पूरा होता है।

English rendering Take the obtained counts of months and years; multiply by two and by three respectively, add one (rūpa) to each, and divide by seven. The two remainders are the lords of the month and of the year.

गणित / The Mathematics
māsa-pati index = (2 × N_māsa + 1) mod 7
varṣa-pati index = (3 × N_varṣa + 1) mod 7
(दिन-पति already from 1.51: D mod 7.) The added rūpa means the remainder counts Sunday as 1: a month of 30 civil days moves the weekday by 30 ≡ 2 (mod 7), a year of 360 by 360 ≡ 3, so (2N + 1) and (3N + 1) counted from Sunday = 1 are the weekdays on which month N + 1 and year N + 1 begin.

उदाहरण (worked example) N_māsa = 5, N_varṣa = 4; remainder 1 = Sunday (the rūpa).
month lord: (2×5 + 1) mod 7 = 11 mod 7 = 4 → बुध (रवि 1, सोम 2, मङ्गल 3, बुध 4)
year lord: (3×4 + 1) mod 7 = 13 mod 7 = 6 → शुक्र
जाँच: दिन 150 (= 5 × 30) और दिन 1440 (= 4 × 360), दिन 0 रविवार से गिनकर, बुधवार और शुक्रवार हैं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले उदाहरण ने शेष 0 = रविवार लेकर गुरु और शनि दिए थे, जो उसी गणना से सीधी गिनती (दिन 150 बुधवार, दिन 1440 शुक्रवार) के विपरीत है। श्लोक का “रूप-युक्त” (+1) बताता है कि शेष 1 = रविवार; तब स्वामी बुध और शुक्र। Correction: with the rūpa, remainder 1 = Sunday; checked in ss-chapters.test.js.

1.53
यथा स्वभगनाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः ।
विभाजितो मध्यगत्या भगणादिर्ग्रहो भवेत् ॥
yathā svabhaganābhyasto dinarāśiḥ kuvāsaraiḥ ।
vibhājito madhyagatyā bhagaṇādirgraho bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथा = जैसे / जिस प्रकार; स्व-भगण-अभ्यस्तः = अपने भगणों से गुणित; दिन-राशिः = दिन-राशि (अहर्गण); कु-वासरैः = पृथ्वी के सावन दिनों (युग के) से; विभाजितः = विभाजित; मध्य-गत्या = मध्य-गति से; भगण-आदिः = भगण, राशि, अंश आदि रूप में; ग्रहः = ग्रह; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ प्रत्येक ग्रह के लिए सावन दिन-राशि को उस ग्रह के युग-भगण से गुणा करें और युग के कुवासरों (सावन दिनों) से भाग दें। भागफल वही मध्यग्रह है — भगण, राशि, अंश, कला के क्रम में। यही सूर्यसिद्धान्त का मध्यम-देशान्तर सूत्र है: समय × औसत कोणीय गति।

English rendering Multiply the civil day-count by each planet’s own revolutions in a yuga and divide by the yuga’s earth-days (kuvāsara). The quotient is that planet’s mean position in revolutions and the usual sexagesimal cascade.

गणित / The Mathematics
L̄ (revolutions) = (dyugaṇa × Bhagaṇa_graha) ÷ Kuvāsara_yuga
fractional part × 12 → rāśi; × 30 → aṃśa; × 60 → kalā; …
SS-canon: Kuvāsara_yuga = 1,577,917,828 (Āryabhaṭa-canon alternative: 1,577,917,500). Mean rate ω = Bhagaṇa / Kuvāsara rev per civil day.

उदाहरण (worked example) Convention: SS-canon days; Sun Bhagaṇa = 4,320,000 / Mahāyuga.
For dyugaṇa = 1,577,917,828 (full yuga): L̄_Sun = 4,320,000 exactly → 0 fractional revolutions at yuga-end.
For dyugaṇa = 365: L̄_Sun = 365 × 4,320,000 ÷ 1,577,917,828 ≈ 0.99945 rev ≈ 11 rāśi + residual (mean solar year ≈ 365.25875 civil days under this canon).

हमारा डिकोड (Our Decode) यह पद `bharat-ephemeris-offline` / `math-core.js` का केन्द्रीय integer-bhagaṇa सूत्र है — mean longitude research instrument, not yet a production true-position ephemeris. Canon choice is material: SS 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500. Fitted bīja (Mars +30, Jupiter −51, Saturn +61 revs/Mahāyuga) apply only as Sun-anchored relative-rate drifts about 1800 CE; absolute re-fit was rejected so synodic geometry stays intact. `kaal-verification-oracle` pins equality with `==`, never a tolerance band.

1.54
एवं स्वशीघ्रमन्दोच्चा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः ।
विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः ॥
evaṃ svaśīghramandoccā ye proktāḥ pūrvayāyinaḥ ।
vilomagatayaḥ pātāstadvaccakrādviśodhitāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = उसी प्रकार; स्व-शीघ्र-मन्द-उच्चाः = अपने शीघ्रोच्च और मंदोच्च; ये प्रोक्ताः = जो कहे गए; पूर्व-यायिनः = अनुलोम / पूर्व दिशा में गामी; विलोम-गतयः = विपरीत गति वाले; पाताः = पात (राहु-आदि); तद्वत् = उसी विधि से; चक्रात् = पूरे चक्र (360°) से; विशोधिताः = शोधित / व्यवकलित।

हिन्दी भावार्थ मंदोच्च और शीघ्रोच्च भी उन्हीं भगण-सूत्रों से मध्यम की भाँति निकलते हैं — और वे पूर्व-यायी (अनुलोम) माने गए हैं। पात उल्टी दिशा में चलते हैं; उनकी गणना समान रीति से करके पूरे चक्र से घटा दें, ताकि विलोम स्थिति सिद्ध हो। स्पष्टीकरण यह है: उच्च आगे, पात पीछे — दोनों की राशि मध्य-विधि से, दिशा का चिह्न अलग।

English rendering In the same way compute each planet’s own śīghrocca and mandocca, which move forward. The nodes (pāta) move retrograde: compute them likewise, then subtract from a full circle.

गणित / The Mathematics
L̄_mandocca, L̄_śīghrocca = (dyugaṇa × Bhagaṇa_ucca) ÷ Kuvāsara (forward)
L̄_pāta = 0 − (dyugaṇa × Bhagaṇa_pāta) ÷ Kuvāsara ≡ Cakra − fractional forward amount
i.e. λ_pāta ≡ −λ_computed (mod 360°).
Later sphuṭa uses: κ_manda = madhya − mandocca; for outer planets śīghrocca = mean Sun; for inner, madhya = mean Sun.

उदाहरण (worked example) Suppose computed forward pāta fraction = 0.25 rev = 90°.
Retrograde position = 360° − 90° = 270° (or −90° mod 360°).
If mandocca mean = 78° at epoch for the Sun’s apogee stream, κ_manda = L̄_Sun − 78° feeds the manda-phala arc of Chapter 2.

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` (sealed 2026-05-17) इन उच्च-पात राशियों को शुद्ध SS Chapter-2 श्रृंखला में ले जाता है: half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra; manda-phala = arcsin((R_manda/360)·sin κ); कोई Western theorem श्रृंखला में नहीं। Epicycle means by the verse words (SS 2.34–38): Sun 13°50′, Moon 31°50′, Mars 73.5°, Mercury 29°, Jupiter 32.5°. (Correction 2026-10-07: this paragraph earlier gave Sun 13°40′ and Mars 72.5° as means. 13°40′ is the Sun's odd end, not its mean, and 72.5 came from the misprinted Mars odd end of 70. The verse words of 2.34-2.35 give Sun 14°/13°40′, Moon 32°/31°40′, Mars 75°/72°, Mercury 30°/28°, Jupiter 33°/32°, Venus 12°/11°, Saturn 49°/48°. Whatever the KAAL file holds is left for the owner to correct.)

1.55
द्वादशघ्ना गुरोर्याता भगणा वर्तमानकैः ।
राशिभिः सहिताः शुद्धाः षष्ट्या स्युर्विजयादयः ॥
dvādaśaghnā guroryātā bhagaṇā vartamānakaiḥ ।
rāśibhiḥ sahitāḥ śuddhāḥ ṣaṣṭyā syurvijayādayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वादश-घ्नाः = बारह से गुणित; गुरोः = बृहस्पति के; याताः भगणाः = बीते भगण; वर्तमानकैः राशिभिः = वर्तमान राशियों के साथ; सहिताः = युक्त; शुद्धाः = शोधित / पूर्णांकित; षष्ट्या = साठ से; स्युः = होते हैं; विजय-आदयः = विजय आदि (षष्टि-संवत्सर)।

हिन्दी भावार्थ बृहस्पति के बीते भगणों को बारह से गुणा करें, उसमें उसकी वर्तमान राशि-संख्या जोड़ें, फिर साठ से शोधें — जो क्रम मिले, वही विजय से आरम्भ षष्टि-संवत्सर-चक्र है। यह गुरु-वर्षों का नामकरण-यंत्र है: बारह राशियाँ × गुरु-भगण = गुरु-वर्ष, साठ पर लपेट।

English rendering Multiply Jupiter’s elapsed revolutions by twelve, add the current signs, and reduce by sixty; the result yields the cycle of years beginning with Vijaya.

गणित / The Mathematics
S = (12 × Bhagaṇa_Jupiter_elapsed + R_current) mod 60
index S → saṃvatsara name in the 60-year Bṛhaspati list starting at Vijaya (S = 0 or 1 per school — declare the zero of the name-list).
12 converts revolutions into sign-years; 60 is the saṃvatsara modulus.

उदाहरण (worked example) Bhagaṇa_elapsed = 2 exact revolutions, R_current = 5 rāśi.
S = (12×2 + 5) mod 60 = 29.
If Vijaya = 0, index 29 is the 30th name in the list (0-based). Convention: integer rāśi count from the mean Jupiter already found by 1.53.

1.56
विस्तरेणैतदुदितं संक्षेपाद्व्यावहारिकम् ।
मध्यमानयनं कार्यं ग्रहाणां इष्टतो युगात् ॥
vistareṇaitaduditaṃ saṃkṣepādvyāvahārikam ।
madhyamānayanaṃ kāryaṃ grahāṇāṃ iṣṭato yugāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विस्तरेण = विस्तार से; एतत् = यह (सब); उदितम् = कहा गया; संक्षेपात् = संक्षेप में; व्यावहारिकम् = व्यवहार-योग्य; मध्यम-आनयनम् = मध्यमायन / मध्यम ग्रह-गणना; कार्यम् = करना चाहिए; ग्रहाणाम् = ग्रहों का; इष्टतः = इच्छित (काल) से; युगात् = युग से।

हिन्दी भावार्थ यह सब विस्तार से कह दिया; व्यवहार में संक्षेप ही काफी है। ग्रहों का मध्यमानयन युग से — या युग के भीतर जिस क्षण की इच्छा हो — उसी इष्ट काल से करना है। सूत्र लंबा हो या छोटा, काम एक ही है: दिन-गण × भगण ÷ कुवासर।

English rendering All this has been set out at length; for practical use, briefly: compute the planets’ mean positions from the yuga, at whatever epoch one chooses within it.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/उपसंहार-निर्देश। Insight: the verse freezes the method of 1.53 as the standing operational rule — mean longitudes on demand from any chosen dyugaṇa inside the yuga, without re-deriving the full apparatus each time.

हमारा डिकोड (Our Decode) यही “इष्टतः युगात्” हमारा lab contract है: `math-core` एक mean-longitude synthesis instrument है, production true-position ephemeris नहीं — promoting it needs a measured calculation layer, not stronger wording. Honesty ledger: old “Drik zero-error” table was manufactured and removed; bīja sign error (−30,+51,−61 → +30,−51,+61) found and fixed; “112 great conjunctions” claim refuted and withdrawn.

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए आप किसी इष्ट तिथि — जैसे “आज आषाढ़ शुक्ल १, सूर” — का मध्य-ग्रह चाहते हैं। विस्तार में युग, मन्वन्तर, कल्प की पूरी कथा कही जा चुकी; व्यवहार में काफ़ी है: युगादि (या चुने हुए epoch) से लेकर इष्ट क्षण तक के अहर्गण गिनो, फिर उसी अनुपात से भगणों का अंश निकालो। लंबा विवरण “क्यों” समझाता है; संक्षिप्त सूत्र “कितना” देता है — दोनों का फल एक ही mean longitude है। आगे के अध्यायों में वही मध्यमान मन्द-शीघ्र फल का आधार बनेगा; यहाँ केवल यह निश्चय है कि गणना का आरम्भ-बिन्दु युग (या उसके भीतर का इष्ट काल) ही है।

1.57
अस्मिन्कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः ।
विना तु पातमन्दोच्चान्मेषादौ तुल्यतां इताः ॥
asminkṛtayugasyānte sarve madhyagatā grahāḥ ।
vinā tu pātamandoccānmeṣādau tulyatāṃ itāḥ ।।
पाठ-भेद: ड्विनेन्दु

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अस्मिन् = इस (वर्तमान महायुग-क्रम में); कृतयुगस्य अन्ते = कृतयुग के अन्त में; सर्वे ग्रहाः = सभी ग्रह; मध्यगताः = मध्य-स्थान (मध्यमांश) में स्थित; विना तु = किन्तु छोड़कर; पात-मन्दोच्चान् = पात और मन्दोच्च को; मेषादौ = मेष के आदि (0°) पर; तुल्यतां इताः = तुल्यता / एकत्रता को प्राप्त हुए।

हिन्दी भावार्थ इस व्यवस्था में, कृतयुग के अन्त पर, सभी ग्रह अपने मध्यमांश में एक साथ माने जाते हैं। पात और मन्दोच्च को छोड़कर शेष ग्रह मेषराशि के आरम्भ-बिन्दु पर तुल्य—अर्थात् एक ही निर्देशांक पर—पहुँचे हुए कहे गए हैं। यह श्लोक युग-आरम्भ की माध्य-स्थिति का बीज-वाक्य है: गणना का शून्य-बिन्दु यहीं से बाँधा जाता है। पात-मन्दोच्च अलग इसलिए रखे गए कि उनकी गति और भूमिका भिन्न है।

English rendering At the end of this Kṛta-yuga, all the planets stand at their mean places. Except the nodes and apogees (pāta and mandocca), they are said to have attained coincidence at the beginning of Meṣa. The verse fixes the mean-longitude epoch of the system, setting the zero-frame from which subsequent revolutions are counted.

गणित / The Mathematics युग-आरम्भ की माध्य-निर्देश शर्त (mean-longitude epoch condition):
L̄_graha = 0° at Meṣa-ādi (for the mean planets other than pāta / mandocca),
at the stated Kṛta-yuga end of the adopted yuga-frame.
No new numerical constant is named here; the content is the initial condition for the mean-motion algorithms of the later verses.

उदाहरण (worked example) Convention: SS mean-longitude synthesis, counting revolutions from the Meṣa-ādi coincidence of this verse. If a body completes N mean revolutions in one Mahāyuga of 4,320,000 years, its mean longitude after y years from epoch is
L̄ = 360° × (N × y / 4,320,000) mod 360°.
At y = 0 (this epoch), L̄ = 0° for every such graha—exactly the condition stated here.

हमारा डिकोड (Our Decode) यही माध्य-शून्य हमारे `math-core.js` integer-bhagaṇa mean-longitude research instrument का आरम्भ-बिन्दु है—ग्रहों के mean longitudes युग-परिक्रमण-संख्या से संश्लेषित होते हैं, true position से नहीं। Canon day-count 1,577,917,828 civil days / Mahāyuga (SS) vs 1,577,917,500 (Āryabhaṭa) later decides how those revolutions map onto civil time; the epoch condition itself is this verse. Oracle discipline applies only after the mean layer is fixed: `==` on pinned fixtures, no tolerance bands.

1.58
मकरादौ शशाङ्कोच्चं तत्पातस्तु तुलादिगः ।
निरंशत्वं गताश्चान्ये नोक्तास्ते मन्दचारिणः ॥
makarādau śaśāṅkoccaṃ tatpātastu tulādigaḥ ।
niraṃśatvaṃ gatāścānye noktāste mandacāriṇaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मकरादौ = मकर के आदि पर; शशाङ्क-उच्चं = चन्द्र का उच्च (मन्दोच्च / अपभू); तत्-पातः तु = और उसका पात; तुला-आदि-गः = तुला के आदि में स्थित; निरंशत्वं गताः = शून्यांशता को प्राप्त; च अन्ये = और शेष (उच्च/पात); न उक्ताः ते = वे अलग से नहीं कहे गए; मन्द-चारिणः = क्योंकि वे मन्द-गति वाले हैं।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र का उच्च मकर के आरम्भ में, और उसका पात तुला के आरम्भ में स्थित बताया गया है। शेष उच्च-पात मन्द-गति के कारण यहाँ “निरंश को प्राप्त” नहीं कहे गए; उनके स्थान सृष्टि से गिने कल्प-भगणों (1.41-1.47) से आते हैं — सूर्योच्च 7.47°, कुजोच्च 93.24°। पूर्व श्लोक की “पात-मन्दोच्च को छोड़कर” वाली शर्त यहाँ चन्द्र के लिए स्पष्ट कर दी गई: चन्द्र-उच्च और चन्द्र-पात युग-आरम्भ पर शून्य नहीं थे।

English rendering The Moon’s apogee stands at the beginning of Makara, and its node at the beginning of Tulā. The other apsides and nodes, being slow-moving, are not stated to have reached the zero point (niraṃśatvaṃ gatāḥ … noktāḥ) [reading]: their places at that moment follow from their kalpa revolutions counted from creation (1.41-1.47) — the Sun's apogee at 7.47°, Mars's at 93.24°. This completes the epoch inventory begun in 1.57: mean planets at Meṣa 0°, lunar apogee at Makara 0°, node at Tulā 0°.

गणित / The Mathematics Epoch longitudes (this yuga-end frame):
L̄_grahas (mean planets) = 0° (Meṣa-ādi) — from 1.57;
λ_candrā-ucca = 270° (Makara-ādi);
λ_candrā-pāta = 180° (Tulā-ādi);
other mandoccas / pātas: not at 0° here — from their kalpa revolutions since creation (1.41-1.47), e.g. Sun's apogee 7.47°, Mars's 93.24°.
Slow rates for those “unrestated” elements are supplied later by the bhagaṇa lists; this verse only freezes their initial arguments.

उदाहरण (worked example) Input convention: ecliptic longitudes, Meṣa = 0°, equal 30° signs. At the epoch of 1.57–1.58:
Moon’s mean anomaly argument later uses κ = L̄_Moon − 270°;
Rāhu/Ketu node work uses the Tulā-ādi (= 180°) start for the ascending node as stated. After t years, if the node completes N_pāta revolutions per Mahāyuga,
λ_pāta(t) = 180° + 360° × (N_pāta × t / 4,320,000) mod 360°
(sign of node motion—retrograde—comes from the signed revolution count of the later tables, not from this verse alone).

हमारा डिकोड (Our Decode) Mean-longitude lab (`bharat-ephemeris-offline` / `math-core.js`) treats ucca and pāta as separate integer-bhagaṇa streams from the same Mahāyuga frame; this verse is why the Moon’s apsis/node streams do not start at Meṣa 0° with the planets. Sphuṭa engine (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`) then uses κ_manda = madhya − mandocca—so a wrong epoch for mandocca would poison every manda-phala downstream. We keep epoch, rate, and correction layers distinct; never merge them into a single “sky table.”

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “शेष उच्च-पात मेषादि शून्य पर” पढ़ा गया था। “निरंशत्वं गताश्चान्ये नोक्ताः” = अन्य (मन्द-गति) निरंशता को प्राप्त नहीं कहे गए [reading]; 1.41-1.44 के कल्प-भगण 1.47 के 1,955,880,000 वर्षों के साथ कृत-अन्त पर उन्हें शून्य पर नहीं रखते (सूर्योच्च 7.47°, कुजोच्च 93.24°) — सृष्टि-आरम्भ पर वे शून्य थे। sphuta.js और ss-graha.js यही गिनते हैं। Correction (reading): the slow apsides and nodes are not at zero at the Kṛta end.

1.59
योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णो द्विगुणानि तु ।
तद्वर्गतो दशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् ॥
yojanāni śatānyaṣṭau bhūkarṇo dviguṇāni tu ।
tadvargato daśaguṇātpadaṃ bhūparidhirbhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) योजनानि शतानि अष्टौ = आठ सौ योजन; भूकर्णः = पृथ्वी का कर्ण (यहाँ व्यास-रूप में प्रयुक्त); द्विगुणानि तु = उसके द्विगुण—अर्थात् 1,600 योजन; तत्-वर्गतः = उसके वर्ग से; दश-गुणात् = दस गुणा करने पर; पदं = वर्गमूल; भूपरिधिः भवेत् = पृथ्वी का परिधि होता है।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी का भूकर्ण—शास्त्र की इस पंक्ति में द्विगुणित आठ-सौ, अर्थात् सोलह सौ योजन—निश्चित किया गया है। उसी मात्रा का वर्ग लेकर दस से गुणा करें, फिर वर्गमूल लें: वही पृथ्वी की परिधि है। यह π का योजन-मापित रूप नहीं खोलता, बल्कि √10 ≈ 3.162… को वृत्त-अनुपात का व्यवहार्य सन्निकट मानकर परिधि निकालता है। आगे के देशान्तर-सूत्र इसी स्फुट/मध्य भूपरिधि पर चलेंगे।

English rendering Take eight hundred yojanas; the Earth’s diameter (bhūkarṇa here as the doubled measure) is twice that—1,600 yojanas. From ten times the square of that diameter, the square root is the Earth’s circumference. The verse thus encodes C = D√10, the classical √10-approximation to π in linear yojana metrology.

गणित / The Mathematics
D = 2 × 800 = 1,600 yojanas (Earth’s diameter);
C = √(10 × D²) = D × √10 = 1,600√10 yojanas.
(Equivalent expanded form: C = √(10 × 1,600²) = √(25,600,000) yojanas.)
√10 is the siddhāntic stand-in for π in this linear rule; the verse does not state a sexagesimal expansion of √10.

उदाहरण (worked example) Input: D = 1,600 yojanas exactly as stated.
C = 1,600 × √10.
With √10 ≈ 3.16227766017,
C ≈ 1,600 × 3.16227766017 = 5,059.644256 yojanas
(often carried in practice as about 5,059 yojanas when integer rounding is used). This C is the mean terrestrial circumference before the latitude correction of 1.60.

1.60
लम्बज्याघ्नस्त्रिजीवाप्तः स्फुटो भूपरिधिः स्वकः ।
तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता ॥
lambajyāghnastrijīvāptaḥ sphuṭo bhūparidhiḥ svakaḥ ।
tena deśāntarābhyastā grahabhuktirvibhājitā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लम्बज्या-घ्नः = लम्बज्या से गुणा किया हुआ; त्रिजीवा-आप्तः = त्रिज्या से विभाजित; स्फुटः भूपरिधिः स्वकः = अपना (अक्षांश-संशोधित) स्फुट भूपरिधि; तेन = उस स्फुट परिधि से; देशान्तर-अभ्यस्ता = देशान्तर से गुणा की हुई; ग्रह-भुक्तिः = ग्रह की (दैनिक) भुक्ति; विभाजिता = विभाजित की जाए।

हिन्दी भावार्थ पहले पृथ्वी की सामान्य परिधि को अपने स्थान की लम्बज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग दें—फल अपना स्फुट भूपरिधि है (अक्षांश के अनुसार सिकुड़ी हुई “समानान्तर” परिधि)। फिर ग्रह की भुक्ति को देशान्तर (योजन में) से गुणा कर उसी स्फुट परिधि से भाग दें। जो फल आए, वही देशान्तर-जन्य काल/अंश-संशोधन का कच्चा मान है; अगला श्लोक बताता है उसे ग्रह-स्थान में जोड़ना है या घटाना।

English rendering Multiply the (mean) terrestrial circumference by the lambajyā and divide by the trijyā: the result is one’s own true (latitude-corrected) Earth-circumference. Multiply the planet’s daily motion by the longitudinal distance (deśāntara) and divide by that true circumference. The quotient is the deśāntara correction to be applied to the computed planetary position.

गणित / The Mathematics Let C = mean भूपरिधि (from 1.59), R = त्रिज्या, λ_φ = लम्बज्या = R cos φ (φ = geographic latitude), Δs = देशान्तर in yojanas, μ = ग्रहभुक्ति (daily mean/true motion in angular units per day).
C_sphuṭa = (λ_φ × C) / R = C cos φ;
correction ε = (μ × Δs) / C_sphuṭa
(ε in the same angular units as μ, for one day of motion scaled by the fraction of the parallel circumference).
Convention: same R (commonly 3,438′ in SS jyā tables) must be used for both lambajyā and trijyā so the R cancels: C_sphuṭa = C cos φ.

उदाहरण (worked example) Input conventions: C = 1,600√10 ≈ 5,059.64 yojanas; φ = 0° (equator) so cos φ = 1 ⇒ C_sphuṭa = C; μ_Sun ≈ 59′8″ per day (illustrative mean daily motion, not re-derived here); Δs = 50 yojanas east of the prime meridian.
ε ≈ (59.133′ × 50) / 5,059.64 ≈ 0.584′ ≈ 0°0′35″.
At non-zero latitude, first replace C by C cos φ (e.g. φ = 24°, cos 24° ≈ 0.9135 ⇒ C_sphuṭa ≈ 4,622 yojanas), then recompute ε.

हमारा डिकोड (Our Decode) देशान्तर-संशोधन mean-longitude synthesis के बाद का स्थानिक परत है—`math-core` माध्य-देशान्तर को योजन-रेखा से बाँधता है, और ascendant/bhāva layer (MATHEMATICAL-AUDIT §8) देश-अक्षांश-देशान्तर को closed-form lagna में ले आता है। हम JPL/Swiss को प्रमाण-प्रभु नहीं बनाते; वे केवल cross-check हैं। स्फुट भूपरिधि का cos φ रूप और 1.59 का √10 एक ही योजन-मेट्रोलॉजी के दो पड़ाव हैं।

1.61
कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् ।
रेखाप्रतीचीसंस्थाने प्रक्षिपेत्स्युः स्वदेशजा ॥
kalādi tatphalaṃ prācyāṃ grahebhyaḥ pariśodhayet ।
rekhāpratīcīsaṃsthāne prakṣipetsyuḥ svadeśajā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कला-आदि तत्-फलं = कला आदि में वह फल; प्राच्यां = पूर्व दिशा में (रेखा से पूर्व); ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् = ग्रहों से घटाए; रेखा-प्रतीची-संस्थाने = रेखा की पश्चिम स्थिति में; प्रक्षिपेत् = जोड़ दे; स्युः स्व-देश-जाः = तब वे स्वदेशीय (स्थानिक) हो जाएँ।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक से जो फल कला-विकला आदि में आया, उसे रेखा—अर्थात् प्रधान याम्योत्तर—से पूर्व रहने पर ग्रहों के गणित-स्थान से घटाएँ। यदि स्थान रेखा के पश्चिम हो, तो वही फल जोड़ें। इस जोड़-घटाव के बाद जो स्थान मिलते हैं, वे “स्वदेशज” कहलाते हैं: मध्य-रेखा के लिए नहीं, आपके देश के लिए। दिशा का चिह्न यहाँ पूरा एल्गोरिद्म है—मात्रा 1.60 से, चिह्न 1.61 से।

English rendering Of the resulting correction, expressed from minutes of arc onward: subtract it from the planets when the place lies east of the prime meridian; add it when the place lies west. The adjusted positions are then those proper to one’s own country. Magnitude comes from 1.60; algebraic sign from this verse.

गणित / The Mathematics Let ε = |फल| from 1.60, L_calc = computed graha longitude for the prime meridian.
If place is east of रेखा: L_local = L_calc − ε;
if place is west of रेखा: L_local = L_calc + ε.
(Equivalent time-form: eastern longitude ⇒ local civil time later for the same sky event; the sign rule here is stated on the planetary longitude side of the ledger.)

उदाहरण (worked example) Input: L_calc(Sun) = 45°10′0″ on the prime meridian; ε = 0°5′0″ from 1.60.
East of the line: L_local = 45°10′ − 0°5′ = 45°5′0″.
West of the line: L_local = 45°10′ + 0°5′ = 45°15′0″.
Same ε, opposite sign—exactly the प्राची / प्रतीची split of the verse.

1.62
राक्षसालयदेवौकःशैलयोर्मध्यसूत्रगाः ।
रोहीतकं अवन्ती च यथा सन्निहितं सरः ॥
rākṣasālayadevaukaḥśailayormadhyasūtragāḥ ।
rohītakaṃ avantī ca yathā sannihitaṃ saraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राक्षस-आलय = राक्षसों का निवास (लङ्का-दिश दक्षिण); देव-ओकः = देवों का धाम (मेरु-दिश उत्तर); शैलयोः = उन दो “शैल/सीमा” के; मध्य-सूत्र-गाः = मध्य-सूत्र (याम्योत्तर रेखा) पर स्थित; रोहीतकं = रोहीतक; अवन्ती च = और अवन्ती (उज्जयिनी); यथा = तथा; सन्निहितं सरः = सन्निहित सरोवर (समीपस्थ सर)।

हिन्दी भावार्थ प्रधान मध्य-सूत्र—देशान्तर की शून्य-रेखा—राक्षसालय और देवावास के बीच से जाती हुई मानी गई है: दक्षिण-उत्तर अक्ष पर लङ्का-मेरु की कल्पना, और उसी सूत्र पर रोहीतक, अवन्ती, तथा सन्निहित सर। यह श्लोक योजन-गणित को भूगोल से बाँधता है: “रेखा” कोई अमूर्त 0° नहीं, बल्कि नामित नगरों-सरों से पहचानी गई याम्योत्तर है। आगे चन्द्र-ग्रहण की दृष्टि-सिद्धि इसी रेखा से पूर्व/पश्चिम नापती है।

English rendering The prime meridian is the mid-line between the abode of the Rākṣasas and the abode of the gods—running through Rohītaka, Avantī, and the nearby lake (Sannihita). The verse names the geographic anchors of the deśāntara zero: a Lanka–Meru axis realized on Earth through Avantī and Rohītaka, not an abstract Greenwich-style invention.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (प्रधान याम्योत्तर / रेखा का भौगोलिक निर्धारण)। Insight: deśāntara in 1.60–1.61 is meaningless without a declared zero meridian; this verse supplies that declaration as a named geographic chain, so every later “east/west” sign is relative to Avantī–Rohītaka–Lanka, not to a modern lon0°.

हमारा डिकोड (Our Decode) जब हम lagna/bhāva layer में longitude–latitude–LST देते हैं, तो “कौन-सी रेखा शून्य?” घोषित करना अनिवार्य है—यही honesty discipline है। SS की रेखा अवन्ती-रोहीतक श्रृंखला है; आधुनिक पूरक गणना में किसी अन्य lon0° का प्रयोग हो तो उसे convention के रूप में अलग लिखना होगा, न कि चुपचाप मिश्रित। MATHEMATICAL-AUDIT §8 की closed-form ascendant जाँच reference fixtures से 0.1° भीतर है—पर वह सहमति सिद्धान्त की रेखा को प्रमाणित नहीं करती; केवल त्रिकोणमितीय परत की शुद्धता बताती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) भारतीय ज्योतिष-गणित में देशान्तर की शून्य-रेखा कोई अमूर्त 0° नहीं, बल्कि नामित भूगोल है: लङ्का–मेरु की काल्पनिक याम्योत्तर, और उसी सूत्र पर रोहीतक, अवन्ती (उज्जयिनी) तथा सन्निहित सर। मध्ययुगीन सिद्धान्त-परम्परा में अवन्ती/उज्जैन को प्रधान prime meridian मानकर देशान्तर और चन्द्र-सूर्य ग्रहण की दृष्टि-सिद्धि नापी जाती रही — यह श्लोक उसी परम्परा का मूल-बिन्दु है। जब आगे ग्रहण-अध्याय में “रेखा से पूर्व/पश्चिम कितने योजन” पूछा जाएगा, तो मापदण्ड यहीं से खिंचा होगा। इस प्रकार योजन-गणित नगर-सर की भूमि से बँध जाता है, न कि केवल आकाश की कल्पना से।

1.63
अतीत्योन्मीलनादिन्दोः पश्चात्तद्गणितागतात् ।
यदा भवेत्तदा प्राच्यां स्वस्थानं मध्यतो भवेत् ॥
atītyonmīlanādindoḥ paścāttadgaṇitāgatāt ।
yadā bhavettadā prācyāṃ svasthānaṃ madhyato bhavet ।।
पाठ-भेद: C अतीत्योन्मीलनादिन्दोर्दृक्षिद्धिर्गणितागतात् ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतीत्य = उल्लंघन कर / बाद में; उन्मीलनात् = उन्मीलन (चन्द्र का ग्रहण से पुनः प्रकटीकरण) से; इन्दोः = चन्द्र का; पश्चात् = बाद; तत्-गणित-आगतात् = उस गणित से प्राप्त काल से; यदा भवेत् = जब हो; तदा = तब; प्राच्यां = पूर्व में; स्व-स्थानं = अपना स्थान; मध्यतः = मध्य (रेखा) से; भवेत् = होता है। (पाठ-भेद C: उन्मीलन को दृष्टि-सिद्धि / गणितागत से जोड़ता हुआ समान आशय।)

हिन्दी भावार्थ चन्द्र के उन्मीलन—ग्रहण के अन्त पर उसके फिर दिखने—का वास्तविक काल यदि गणित से निकले काल के बाद पड़े, तो समझें कि आपका स्थान मध्य-रेखा के पूर्व है। गणना रेखा के लिए बाँधी गई थी; पूर्व में खड़े पर्यवेक्षक को वही घटना स्थानीय काल में देर से मिलती है, और श्लोक उसी देरी को देशान्तर का चिह्न बनाता है। कोष्ठक का C-पाठ दृष्टि-सिद्धि और गणितागत को और खोलकर कहता है—मूल न्याय एक ही है: अवलोकन − गणना = स्थान का संकेत।

English rendering When the Moon’s unmīlana (reappearance at eclipse end) occurs later than the time given by computation, one’s site lies east of the middle meridian. The C variant stresses the same test as a dṛk-siddhi check against the ganita instant. Observation later than calculation ⇒ east of the line named in 1.62.

गणित / The Mathematics Let t_obs = observed unmīlana, t_calc = computed unmīlana for the prime meridian (same eclipse geometry).
If t_obs > t_calc ⇒ place is प्राची (east of मध्य-सूत्र).
The quantitative conversion of the time-gap into yojanas is completed in 1.64; this verse states only the sign / side rule for the unmīlana case.

उदाहरण (worked example) Input convention: times in nāḍī after local midnight on the prime-meridian ephemeris; same eclipse.
t_calc = 32 nāḍī, t_obs = 32 nāḍī + 4 pala (= 32 + 4/60 nāḍī).
Since t_obs > t_calc, the site is east of the 1.62 meridian. Magnitude of deśāntara uses 1.64’s product with स्फुट भूपरिधि; sign alone is settled here.

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक “दृष्टि बनाम गणित” का प्राचीन oracle है—हमारे `kaal-verification-oracle` की भावना से मेल खाता है: pinned expectation के विरुद्ध exact comparison, न कि धुँधली सह्यता। पुरानी “Drik zero-error” तालिका hard-coded sky थी और हटा दी गई; सच्ची dṛk-siddhi इसी तरह की घटना-समय जाँच होती है, न कि manufactured residual table। Convention घोषित रहें: कौन-सी रेखा, कौन-सा day-count, कौन-सा eclipse model।

1.64
अप्राप्य च भवेत्पश्चादेवं वापि निमीलनात् ।
तयोरन्तरनाडीभिर्हन्याद्भूपरिधिं स्फुटम् ॥
aprāpya ca bhavetpaścādevaṃ vāpi nimīlanāt ।
tayorantaranāḍībhirhanyādbhūparidhiṃ sphuṭam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अप्राप्य = (गणित-काल को) न पाकर / पहले; च भवेत् पश्चात् = पश्चिम में होता है; एवं वा अपि = अथवा इसी तरह; निमीलनात् = निमीलन (ग्रासारम्भ / आच्छादन-प्रवेश) से; तयोः अन्तर-नाडीभिः = उन दोनों (दृष्टि और गणित) के अन्तर की नाड़ियों से; हन्यात् = गुणा करे; भूपरिधिं स्फुटम् = स्फुट भूपरिधि को।

हिन्दी भावार्थ यदि उन्मीलन गणित से पहले घटित हो, तो स्थान रेखा के पश्चिम है; निमीलन—ग्रहण के आरम्भिक आच्छादन—पर भी वही न्याय लागू होता है। दृष्टि-काल और गणित-काल का अन्तर नाड़ी में लेकर स्फुट भूपरिधि से गुणा करें: यही देशान्तर की योजन-मात्रा निकालने का विधिसूत्र है (पूर्ण व्यवहार में दिन की 60 नाड़ी से भाग भी अपेक्षित रहता है, ताकि काल-अंश × पूर्ण परिधि = चाप-योजन मिले)। 1.63 ने पूर्व का चिह्न दिया; यह श्लोक पश्चिम का चिह्न, निमीलन-सममिति, और संख्यात्मक गुणन एक साथ बाँधता है।

English rendering If the event falls earlier than calculation—and likewise when the test is made from nimīlana (immersion)—the site is west of the meridian. Multiply the true Earth-circumference by the difference of the two times in nāḍīs: that product yields the deśāntara measure. Together with 1.63, the pair is a complete observational fix for east/west offset from the Avantī–Rohītaka line.

गणित / The Mathematics Let Δn = |t_obs − t_calc| in nāḍī (1 day = 60 nāḍī = 60 ghaḍī; dossier metrology: 1 day = 60 ghaḍī = 3,600 pala = 216,000 vipala);
C_sphuṭa = latitude-corrected circumference from 1.60 (yojanas).
Deśāntara in yojanas along the parallel:
Δs = (C_sphuṭa × Δn) / 60.
Sign: t_obs > t_calc (unmīlana or nimīlana) ⇒ east (1.63); t_obs < t_calc ⇒ west (this verse).
(If the text’s “हन्यात्” is read as the bare product C_sphuṭa × Δn, the /60 normalization to a full-day circumference is the standard completion of the rule so that Δn = 60 ⇒ Δs = C_sphuṭa.)

उदाहरण (worked example) Input conventions: C_sphuṭa = 5,059.64 yojanas (equator, from 1.59–1.60); Δn = 0.5 nāḍī (30 pala) with t_obs < t_calc ⇒ west.
Δs = (5,059.64 × 0.5) / 60 ≈ 42.16 yojanas west of the 1.62 meridian.
At φ = 24°, C_sphuṭa ≈ 5,059.64 × cos 24° ≈ 4,622 yojanas ⇒ Δs ≈ (4,622 × 0.5) / 60 ≈ 38.5 yojanas west—same time-gap, smaller parallel circumference.

हमारा डिकोड (Our Decode) देशान्तर-काल और गड़ी/पल मेट्रोलॉजी एक ही दिन-विभाजन से जुड़ते हैं: 1 day = 60 ghaḍī = 3,600 pala = 216,000 vipala = 21,600 prāṇa (`MATHEMATICAL-AUDIT §1`)—count correspondence with 21,600 arcmin/circle, not a physical identity of time and angle. `vedic-ghadi` इसी ghaḍī/pala substrate पर tithi engine चलाता है; SS canon 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500 का 328-day gap tithi/civil mapping को सबसे अधिक छूता है। Eclipse-based deśāntara (1.63–1.64) इसलिए “soft sky feel” नहीं, बल्कि नादी-अन्तर × स्फुट परिधि का exact arithmetic है—oracle शैली: गणना को अवलोकन से `==` के निकट लाओ, ±band से छिपाओ मत।

1.65
षष्ट्या विभज्य लब्धैस्तु योजनैः प्रागथापरैः ।
स्वदेशः परिधौ ज्ञेयः कुर्याद्देशान्तरं हि तैः ॥
ṣaṣṭyā vibhajya labdhaistu yojanaiḥ prāgathāparaiḥ ।
svadeśaḥ paridhau jñeyaḥ kuryāddeśāntaraṃ hi taiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ट्या = साठ से; विभज्य = भाग देने पर; लब्धैः = प्राप्त; योजनैः = योजन-मापों से; प्राक् = पूर्व दिशा में; अथवा अपरैः = अथवा पश्चिम में; स्वदेशः = अपना स्थान; परिधौ = (भू-)परिधि पर; ज्ञेयः = जानना चाहिए; देशान्तरम् = देशान्तर (देश-भेद की काल/कोण-शुद्धि); तैः = उन्हीं (योजनों) से।

हिन्दी भावार्थ भू-परिधि को साठ भागों में बाँटने से जो योजन-माप मिलता है, उसी मापदंड से पूर्व या पश्चिम दिशा में अपना स्थान परिधि पर पहचाना जाता है। जितने योजन प्रधान-रेखा (लंका/उज्जयिनी-परंपरा की याम्योत्तर-रेखा) से पूर्व या पश्चिम हैं, उन्हीं से देशान्तर की गणना करनी होती है — अर्थात् स्थानीय काल और ग्रह-स्थान की देश-भेद शुद्धि इन्हीं योजनों पर टिकती है।

English rendering Dividing [the terrestrial circumference] by sixty yields the yojana-measure with which one’s own place is known eastward or westward on that circumference. With those same yojanas one is to form the deśāntara — the longitude correction for place.

गणित / The Mathematics मान लो भू-परिधि = C योजन (पूर्ववर्ती श्लोकों का भू-माप; इस श्लोक में C स्वयं नहीं दिया)।
एक नाडी/घटिका के तुल्य देशान्तर-चाप:
C⁄60 योजन।
स्थान-भेद Δy योजन (पूर्व धनात्मक, पश्चिम ऋणात्मक — संकेत-परंपरा स्पष्ट करके) पर:
देशान्तर-नाडी = 60 × Δy ⁄ C।
पूर्ण घूर्णन: 60 नाडी ↔ C योजन ↔ 360°; अतः 1 नाडी ↔ 6° देशान्तर।

उदाहरण (worked example) मान्यता: C = 4,800 योजन (केवल अनुपात दर्शाने हेतु; वास्तविक SS भू-परिधि अध्याय-1 के व्यास/√10-मान से लें)। प्रधान-रेखा से पूर्व Δy = 80 योजन।
देशान्तर-नाडी = 60 × 80 ⁄ 4,800 = 1 नाडी = 1 घटिका।
अर्थात् वहाँ स्थानीय मध्यम-काल प्रधान-रेखा से 1 घटिका बाद लगेगा (पूर्व में वार/दिन देर से)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक दिन को 60 घटिका में बाँटने वाली मेट्रोलॉजी को भू-स्थान से जोड़ता है — वही 1 दिन = 60 ghaḍī ढाँचा vedic-ghadi और MATHEMATICAL-AUDIT §1 में सील है। देशान्तर कोई “भाग्य-कोण” नहीं, स्थानीय सिविल-काल का स्थान-शुद्धिकारक है; बिना स्पष्ट C और प्रधान-रेखा-सम्मेलन के संख्या नहीं बाँधी जा सकती।

1.66
वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपार्धे अभ्यधिके भवेत् ।
तद्देशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् ॥
vārapravṛttiḥ prāgdeśe kṣapārdhe abhyadhike bhavet ।
taddeśāntaranāḍībhiḥ paścādūne vinirdiśet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वारप्रवृत्तिः = वार (सप्ताह-दिन) का आरंभ; प्राग्देशे = पूर्वी देश में; क्षपार्धे = रात्रि-अर्ध (अर्ध-रात्रि/निशीथ-संदर्भ) से; अभ्यधिके = अधिक / बाद में (+ पाठ-चिह्न: अभ्यधिके पर पाठ-भेद संभव); भवेत् = होता है; तत्-देशान्तर-नाडीभिः = उस देश की देशान्तर-नाडियों से; पश्चात् = पश्चिम में; ऊने = न्यून / पहले; विनिर्दिशेत् = निर्देश करे।

हिन्दी भावार्थ वार का आरंभ पूर्वी देश में देशान्तर-नाडियों के बराबर बाद पड़ता है, और पश्चिमी देश में उतनी ही नाडियों से पहले। अर्थात् प्रधान-रेखा पर जो क्षण वार-प्रवृत्ति का है, पूर्व में उसे आगे और पश्चिम में पीछे सरकाकर स्थानीय वार तय होता है। “क्षपार्ध” यहाँ अर्ध-रात्रि-संदर्भ या रात्रि-अर्ध की तुलना में अधिक/न्यून होने का काल-सूचक है; यंत्रवत् अर्थ है — स्थान-भेद = काल-भेद।

English rendering The onset of the weekday is later in an eastern country and earlier in a western one, by the place’s own deśāntara measured in nāḍīs. Prescribe the local vāra-pravṛtti by adding that interval eastward and subtracting it westward from the meridian epoch.

गणित / The Mathematics प्रधान-रेखा पर वार-प्रवृत्ति-काल = T₀।
स्थानीय:
T_local = T₀ + δ (पूर्व, δ = देशान्तर-नाडी > 0)
T_local = T₀ − |δ| (पश्चिम)।
δ = 60 × Δy ⁄ C (1.65 से)।
पूर्णतः: δ_नाडी ↔ δ° = 6 × δ_नाडी (क्योंकि 60 नाडी = 360°)।

उदाहरण (worked example) δ = 2.5 नाडी पूर्वी स्थान। यदि प्रधान-रेखा पर किसी तिथि का वार-आरंभ अर्ध-रात्रि T₀ पर माना जाए, तो वहाँ स्थानीय वार-प्रवृत्ति T₀ + 2.5 नाडी पर। पश्चिम में समान |δ| पर T₀ − 2.5 नाडी। (इनपुट-सम्मेलन: कौन-सी याम्योत्तर “शून्य देशान्तर” है — लंका/उज्जयिनी — स्पष्ट रखना आवश्यक।)

हमारा डिकोड (Our Decode) पंचांग-इंजन में सिविल दिन और वार स्थानीय हैं; Āryabhaṭa day-count (vedic-ghadi) बनाम SS-canon 1,577,917,828 (math-core) का चुनाव tithi/वार-श्रृंखला को छूता है, और देशान्तर उसी दिन-विभाजन (60 ghaḍī) पर सवार है। यह श्लोक “पूर्व-देर / पश्चिम-जल्दी” को साफ़ चिह्नित करता है — भाग्य नहीं, घड़ी की ज्यामिति।

1.67
इष्टनाडीगुणा भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम् ।
गते शोध्यं युतं गम्ये कृत्वा तात्कालिको भवेत् ॥
iṣṭanāḍīguṇā bhuktiḥ ṣaṣṭyā bhaktā kalādikam ।
gate śodhyaṃ yutaṃ gamye kṛtvā tātkāliko bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्टनाडी = अभीष्ट नाडियाँ (व्यातीत/आगामी काल-खंड); गुणा = से गुणा; भुक्तिः = (ग्रह की) दैनिक गति; षष्ट्या भक्ता = साठ से विभाजित; कलादिकम् = कला आदि (चाप-शुद्धि); गते = बीते काल में; शोध्यम् = घटाना; युतम् = जोड़ना; गम्ये = आने वाले काल में; तात्कालिकः = उस क्षण का (मध्यम) स्थान।

हिन्दी भावार्थ अभीष्ट नाडियों से दैनिक भुक्ति को गुणा कर साठ से भाग दो — फल कला-आदि में गति-शुद्धि है। यदि अभीष्ट क्षण मध्यम-काल से बीत चुका है तो उस शुद्धि को मध्यम-स्थान से घटाओ; यदि आगे है तो जोड़ो। ऐसा करने पर तात्कालिक — उस ठीक क्षण का — मध्यम स्थान सिद्ध होता है। यह सरल रेखीय अंतर्वेशन है: दिन की गति को नाडी-अंश में बाँटना।

English rendering Multiply the [daily] motion by the desired nāḍīs and divide by sixty: the result is the arc-correction in minutes and so on. Subtract it when the moment is past, add it when still to come; thus the mean place becomes tātkālika — the mean longitude at that instant.

गणित / The Mathematics भुक्ति b = दैनिक मध्यम गति (कला/दिन या अंश/दिन; इकाई एक रखें)।
इष्ट नाडी n (0 ≤ n < 60 एक दिन के भीतर; बहु-दिन पर पूर्ण दिन अलग जोड़ें)।
Δλ = (b × n) ⁄ 60।
λ_tātkālika = λ_madhya − Δλ (गत / gate)
λ_tātkālika = λ_madhya + Δλ (गम्य / gamya)।
(यदि b डिग्री/दिन में है तो Δλ भी डिग्री में।)

उदाहरण (worked example) सम्मेलन: SS-canon civil days / Mahāyuga = 1,577,917,828; सूर्य भगण/महायुग = 43,20,000।
b_☉ = 360° × 4,320,000 ⁄ 1,577,917,828 ≈ 0.985602°/दिन ≈ 59.1361′/दिन।
मान लो मध्यम सूर्य λ_m = 100.0000° युग-क्षण पर; अभीष्ट n = 15 नाडी गम्य।
Δλ = 0.985602° × 15 ⁄ 60 = 0.2464005° ≈ 14.784′।
λ_tātkālika = 100° + 0.2464005° = 100.2464005°।
(गत 15 नाडी पर 100° − 0.2464005°।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही रेखीय तात्कालिक-सूत्र math-core के integer-bhagaṇa mean-longitude यंत्र का दैनिक “नज़दीकी क्षण” कदम है — पूरा दिन-भिन्न भगण से, अंश नाडी से। kaal-verification-oracle यहाँ ± बैंड नहीं चलने देता: pinned fixtures पर `==`। यह मध्यम-स्थान प्रयोगशाला है; स्फुट (Chapter 2 manda+śīghra) इसके बाद की परत है, इसे “सत्य ग्रह” कहकर बढ़ावा नहीं दिया गया।

1.68
भचक्रलिप्ताशीत्यंशं परमं दक्षिणोत्तरम् ।
विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुष्णगुः ॥
bhacakraliptāśītyaṃśaṃ paramaṃ dakṣiṇottaram ।
vikṣipyate svapātena svakrāntyantādanuṣṇaguḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भचक्र-लिप्ता = नक्षत्र-चक्र की कलाएँ (पूर्ण वृत्त = 21,600′); अशीत्यंशम् = अस्सीवाँ भाग; परमम् = अधिकतम; दक्षिणोत्तरम् = दक्षिण-उत्तर; विक्षिप्यते = विक्षेप/अक्षांश-विचलन होता है; स्वपातेन = अपने पात (राहु/नाभिकीय-बिंदु) से; स्व-क्रान्त्यन्तात् = अपनी क्रांति की सीमा/अंत से; अनुष्णगुः = शीतरश्मि = चंद्रमा।

हिन्दी भावार्थ भचक्र की कुल कलाओं का अस्सीवाँ अंश चंद्रमा का परम विक्षेप है — उत्तर या दक्षिण दिशा में अधिकतम अक्षांशीय विचलन। चंद्रमा अपने पात से विक्षिप्त होता है; वह विक्षेप उसकी क्रांति-सीमा (कक्षा और क्रांतिवृत्त के संबंध) के अनुसार दक्षिण-उत्तर में खुलता है। यहाँ केवल ज्यामितीय कक्षा-झुकाव की बात है, फलित “भय” की नहीं।

English rendering One-eightieth of the minutes of the star-circle is the Moon’s maximum latitude, north or south. The cold-rayed Moon is deflected by its own node from the bound of its own declination-path — i.e. its orbital inclination measured from the node.

गणित / The Mathematics भचक्र-लिप्ता = 21,600′ (360° × 60)।
परम चंद्र-विक्षेप β_max,☽ = 21,600′ ⁄ 80 = 270′ = 4°30′।
पातीय कोण ω (पात से चंद्र-स्थान का कोण) पर साधारण साइन-नियम (परवर्ती स्फुट-परंपरा में):
β ≈ β_max · sin ω
(अधिकतम |β| तब जब पात से ±90°)।

उदाहरण (worked example) β_max = 270′। पात से चंद्र-मध्यम कोण ω = 30°।
β ≈ 270′ × sin 30° = 270′ × 0.5 = 135′ = 2°15′ (उत्तर या दक्षिण — पात-पार्श्व और दिशा-सम्मेलन से)।
ω = 90° पर |β| = 270′ = 4°30′।

1.69
तन्नवांशं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः ।
बुधशुक्रार्कजाः पातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गुणम् ॥
tannavāṃśaṃ dviguṇitaṃ jīvastriguṇitaṃ kujaḥ ।
budhaśukrārkajāḥ pātairvikṣipyante caturguṇam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-नवांशम् = उसका (चंद्र-परमविक्षेप का) नवाँ भाग; द्विगुणितम् = दुगुना; जीवः = बृहस्पति; त्रिगुणितम् = तिगुना; कुजः = मंगल; बुध-शुक्र-आर्कजाः = बुध, शुक्र, शनि (आर्कज = सूर्य-पुत्र = शनि); पातैः = अपने-अपने पातों से; विक्षिप्यन्ते = विक्षिप्त होते हैं; चतुर्गुणम् = चौगुना।

हिन्दी भावार्थ चंद्रमा के परम विक्षेप का नवाँ हिस्सा आधार-माप है। बृहस्पति का परम विक्षेप उसका दुगुना, मंगल का तिगुना, और बुध-शुक्र-शनि का चौगुना — सभी अपने पातों से दक्षिण-उत्तर विक्षिप्त होते हैं। सूर्य यहाँ विक्षेप-सूची में नहीं: क्रांतिवृत्त पर उसकी “अक्षांश-कथा” इस श्लोक की विषय-वस्तु नहीं।

English rendering One-ninth of that [lunar maximum] is the unit: Jupiter’s maximum latitude is twice it, Mars thrice, and Mercury, Venus, and Saturn four times — each deflected by its own node.

गणित / The Mathematics आधार u = β_max,☽ ⁄ 9 = 270′ ⁄ 9 = 30′।
|β|_max:
• जीव (बृहस्पति) = 2u = 60′ = 1°
• कुज (मंगल) = 3u = 90′ = 1°30′
• बुध = शुक्र = शनि = 4u = 120′ = 2°
(चंद्र 270′ श्लोक 1.68 से।)

उदाहरण (worked example) मंगल β_max = 90′; पात से कोण ω = 45°।
β ≈ 90′ × sin 45° = 90′ × √2⁄2 ≈ 63.64′ ≈ 1°3.6′।
बृहस्पति उसी ω पर: 60′ × sin 45° ≈ 42.43′।

1.70
एवं त्रिघनरन्ध्रार्करसार्कार्का दशाहताः ।
चन्द्रादीनां क्रमादुक्ता मध्यविक्षेपलिप्तिकाः ॥
evaṃ trighanarandhrārkarasārkārkā daśāhatāḥ ।
candrādīnāṃ kramāduktā madhyavikṣepaliptikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इस प्रकार; त्रिघन = 3³ = 27 (भूत-संख्या); रन्ध्र = 9 (नव-रंध्र); अर्क = 12; रस = 6; अर्क = 12; अर्क = 12; दश-आहताः = दस से गुणित; चन्द्रादीनाम् = चंद्र आदि के; क्रमात् = क्रम से; उक्ताः = कही गईं; मध्य-विक्षेप-लिप्तिकाः = मध्यम विक्षेप की कलाएँ।

हिन्दी भावार्थ भूत-संख्याओं को दस से गुणा कर चंद्रमा से आरंभ कर क्रमशः ग्रहों के मध्यम विक्षेप कलाओं में बाँध दिए गए हैं। यह 1.68–1.69 के परम/संबंधी मापों को एक पंक्ति में दोहराता और स्थिर करता है: पहले अंक, फिर दस-गुणन, फिर कला-इकाई। पाठ को अंक-निष्ठा से पढ़ना ही डिकोड है — अनुमान से नहीं।

English rendering Thus, [the word-numerals] tri-ghana, randhra, arka, rasa, arka, arka, each multiplied by ten, are declared in order as the mean latitude-minutes of the Moon and the following planets.

गणित / The Mathematics भूत-संख्या (अंकानां वामतो गतिः / प्रचलित खगोलीय पढ़ाई; त्रिघन = 3³ = 27):
27, 9, 12, 6, 12, 12 — सभी × 10:
मध्य-विक्षेप (कला′) क्रमशः:
• चंद्र = 270′
• कुज (मंगल) = 90′
• बुध = 120′
• जीव (गुरु) = 60′
• शुक्र = 120′
• शनि = 120′
क्रम: चन्द्रादि = चंद्र → मंगल → बुध → गुरु → शुक्र → शनि (1.69 के गुणांकों से सुसंगत)।
परीक्षण: 270⁄9 = 30; 2×30=60, 3×30=90, 4×30=120 — 1.69 से बाइट-समान।

उदाहरण (worked example) शब्द-पंक्ति → अंक: त्रिघन=27, रन्ध्र=9, अर्क=12, रस=6, अर्क=12, अर्क=12।
×10 → 270, 90, 120, 60, 120, 120 कला।
अंश में: 4°30′, 1°30′, 2°, 1°, 2°, 2°।
(यदि किसी पाठन में रंध्र=0 लिया जाए तो पूरी पंक्ति टूटती है — नव-रंध्र=9 ही 1.68–1.69 से मेल खाता है; अन्यथा “पाठ-भेद संभव” कहकर रोकें।)

सुधार · correction (2026-10-07) मूल-पाठ में “मध्यविकेषेप” का टंकण-दोष “मध्यविक्षेप” किया गया। Correction: spelling.

अध्यायः 2

स्पष्टाधिकारः

True Places of the Planets
69 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

स्पष्टाधिकारः माध्य-ग्रह से स्फुट-ग्रह तक की यात्रा है—जहाँ काल की अदृश्य मूर्तियाँ भगणाश्रित होकर शीघ्र, मन्द, उच्च और पात के रूप में ग्रहों की गति के हेतु बनती हैं। प्रवह-वायु और उच्च की आकर्षण-कल्पना से पाठक सीखता है कि ग्रह क्यों कभी प्राङ्मुख धन-गति पाते हैं, कभी पश्चान्मुख ऋण; और राहु-पात दक्षिणोत्तर विक्षेप क्यों रचता है। यहाँ मन्द-फल और शीघ्र-फल की ज्या-गणित, अर्ध-पूर्ण चार-चरणी पुनरावृत्ति, सूर्य-चन्द्र का केवल-मन्द, तथा अन्तः/बहिर्गृहों का भिन्न शीघ्रोच्च-नियम एक ही तंत्र में बैठते हैं। अध्याय की सुन्दरता यही है कि काव्य की “वायु-रश्मि” और “उच्च-कर्षण” की भाषा, गणना की स्फुट-दीर्घता और विक्षेप में सटीक समीकरणों में उतर आती है—बिना अर्थ को गँवाए।

For the English reader:

Adhyāya 2 is where mean motion becomes a living sky-position: the “invisible forms of time” named manda, śīghra, apogee/apex (ucca), and node (pāta) are treated as the real causes that pull a planet east or west of its mean place and north or south of the ecliptic. The chapter builds the classical epicycle language into a usable true-longitude engine—manda-phala from the anomaly at the apogee, śīghra-phala from the anomaly at the conjunction-apex—then stitches them by the canonical four-step half-and-full iteration that distinguishes Sun and Moon (manda alone) from the outer and inner planets (different roles for mean Sun and śīghrocca). Its beauty is architectural: wind-and-ray imagery and signed “dhana / ṛṇa” language sit on top of the same sine geometry that later engines still recompute, so the reader can feel both the poetry of attraction and the discipline of a closed algorithm.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

हमारे पारिस्थितिक तंत्र में यह अध्याय सीधा लागू है: `KAAL-Sacred-Discovery / kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` शुद्ध सूर्यसिद्धान्त अध्याय-२ मन्द+शीघ्र स्फुट इंजन है—श्रृंखला में कोई पाश्चात्य प्रमेय नहीं—जहाँ \(\kappa_m\), मन्द-फल, \(K_s\), शीघ्र-फल और चार-चरणी पुनरावृत्ति (बहिर्गृह: शीघ्रोच्च = मध्यम सूर्य; अन्तःगृह: मध्य = मध्यम सूर्य, शीघ्रोच्च = सूर्य-केन्द्रित माध्य; सूर्य/चन्द्र: केवल मन्द) कोडित हैं, और महावृत्त-अचर SS 2.34–38 के माध्य मानों (श्लोक-शब्दों से: सूर्य 13°50′, चन्द्र 31°50′, मङ्गल 73.5°, बुध 29°, गुरु 32.5° आदि) पर बँधने चाहिए। (सुधार 2026-10-07: पहले यहाँ सूर्य 13°40′ और मङ्गल 72.5° “माध्य” छपे थे। 13°40′ सूर्य का ओज-अन्त है, माध्य नहीं; 72.5 मङ्गल के गलत ओज-मान 70 से निकला था। श्लोक २.३४–२.३५ के शब्द: सूर्य 14°/13°40′, चन्द्र 32°/31°40′, मङ्गल 75°/72°, बुध 30°/28°, गुरु 33°/32°, शुक्र 12°/11°, शनि 49°/48°। KAAL फ़ाइल में ये मान जैसे भी हों, उनका सुधार स्वामी के निर्णय हेतु दर्ज है।) `kaal-verification-oracle` इन्हीं स्फुट-परिणामों को सहन-बैंड के बिना `==` फिक्स्चर पर जाँचता है; माध्य-दीर्घता की प्रयोगशाला (`bharat-ephemeris-offline` / `math-core.js`) स्फुट-परत का इनपुट देती है, न कि उसका स्थानापन्न।

2.1
अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्तयो भगणाश्रिताः ।
शीघ्रमन्दोच्चपाताख्या ग्रहाणां गतिहेतवः ।।
adṛśyarūpāḥ kālasya mūrtayo bhagaṇāśritāḥ ।
śīghramandoccapātākhyā grahāṇāṃ gatihetavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अदृश्य-रूपाः = अदृश्य आकार वाली; कालस्य मूर्तयः = काल की मूर्त अभिव्यक्तियाँ; भगण-आश्रिताः = भगण (कक्षा-चक्र) पर आश्रित; शीघ्र-मन्द-उच्च-पात-आख्याः = शीघ्र, मन्द, उच्च और पात नामक; ग्रहाणां गति-हेतवः = ग्रहों की गति के कारण।

हिन्दी भावार्थ काल स्वयं अरूप है, किन्तु उसकी जो मूर्त शक्तियाँ हैं वे आँखों से नहीं दिखतीं; वे भगणों — कक्षा-चक्रों — पर टिकी रहती हैं। उन्हीं शक्तियों को शास्त्र ने चार नाम दिए हैं: शीघ्र, मन्द, उच्च और पात। यही चार तत्व ग्रहों की गति के वास्तविक हेतु कहे गए हैं — न कि कोई बाहरी दैवी आघात, बल्कि काल की ही व्यवस्था।

English rendering Time has invisible, embodied forms that rest upon the revolutions (bhagaṇas). Named śīghra, manda, ucca, and pāta, these are the causes of the planets’ motion.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका / गति-हेतु वर्गीकरण। यह श्लोक अध्याय २ के पूरे स्फुट-इंजन का संकल्पना-द्वार है: मन्द (अपभू), शीघ्र (शीघ्रोच्च), उच्च (मन्दोच्च/शीघ्रोच्च) और पात (राहु-केतु रेखा) — चार अलग-अलग ज्यामितीय संचालक।

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में Chapter-2 का शुद्ध SS स्फुट-इंजन इन्हीं चार नामों पर खड़ा है: मन्द-फल (κ_manda = madhya − mandocca), शीघ्र-फल (K_śīghra = śīghrocca − L_manda), और पात/विक्षेप अलग परत। कोई Western theorem chain में नहीं; mean-longitude synthesis lab से measured sphuṭa तक का रास्ता यहीं से शुरू होता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) घड़ी की सुई दिखती है, पर “समय” स्वयं नहीं दिखता — ठीक वैसे काल अरूप है, और उसकी मूर्त शक्तियाँ भगण-चक्रों पर टिकी अदृश्य व्यवस्थाएँ हैं। शास्त्र उन्हें चार नाम देता है: शीघ्र, मन्द, उच्च, पात — क्रमशः शीघ्र-केन्द्र, मन्द-केन्द्र, अपम (apsides), और पात (nodes) के रूपक। इनमें से कोई बाहरी दैवी ठोकर नहीं; ये काल की ही चार गति-हेतु संज्ञाएँ हैं। अध्याय २ के मन्द-फल और शीघ्र-फल सूत्र इन्हीं चारों को कोण और ज्या में बदल देंगे; यहाँ केवल हेतुओं का नामकरण है।

2.2
तद्वातरश्मिभिर्बद्धास्तैस्सव्येतरपाणिभिः ।
प्राक्पश्चादपकृष्यन्ते यथासन्नं स्वदिङ्मुखम् ।।
tadvātaraśmibhirbaddhāstaissavyetarapāṇibhiḥ ।
prākpaścādapakṛṣyante yathāsannaṃ svadiṅmukham ।।
पाठ-भेद: C नद्धास्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-वात-रश्मिभिः = उन वायु-किरणों से; बद्धाः / नद्धाः = बँधे हुए (पाठ-भेद: बद्धास् / नद्धास्); तैः सव्य-इतर-पाणिभिः = उनके दाएँ-बाएँ हाथों से; प्राक्-पश्चात् = पूर्व और पश्चिम दिशा में; अपकृष्यन्ते = खींचे जाते हैं; यथा-सन्नम् = निकटता के अनुसार; स्व-दिक्-मुखम् = अपनी-अपनी दिशा की ओर।

हिन्दी भावार्थ ग्रहों को उन अदृश्य वायु-शक्तियों की किरणें बाँधती हैं — जैसे कोई दोनों हाथों से खींचे। दाएँ और बाएँ हाथ से वे कभी पूर्व की ओर, कभी पश्चिम की ओर खींचे जाते हैं। खिंचाव उस दिशा में अधिक होता है जिधर वे शक्ति के केन्द्र के अधिक समीप हों — “यथासन्नं स्वदिङ्मुखम्”: निकटता ही दिशा तय करती है।

English rendering Bound by the rays of those winds as by right and left hands, the planets are drawn forward and backward, each toward its own quarter according to proximity.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — यांत्रिक रूपक (कर्षण-मॉडल)। “यथासन्नम्” बाद के मन्द/शीघ्र-फल में sin κ और cos K की निर्भरता का भौतिक बोल-रूप है: विस्थापन कोण की ज्या पर फल का परिमाण निर्भर करता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक पतंग दो डोरों से बँधी हो — एक डोर पूर्व खींचे, दूसरी पश्चिम — और खिंचाव उस ओर अधिक हो जिधर पतंग केन्द्र के निकट हो: यही “यथासन्नं स्वदिङ्मुखम्” का स्थूल चित्र है। ग्रह मध्य-स्थान पर नहीं रहता; अदृश्य वात-रश्मि बन्धन उसे उच्च/केन्द्र की सापेक्ष स्थिति के अनुसार पूर्व या पश्चिम अपकर्ष देता है। निकटता दिशा तय करती है — दूर हो तो खिंचाव उल्टा या दुर्बल। यही दिशा-नियम आगे धन-ऋण फल के चिह्न (sign) में गणित बनेगा: समीप-पार्श्व पर जोड़ना, विपरीत-पार्श्व पर घटाना।

2.3
प्रवहाख्यो मरुत्तांस्तु स्वोच्चाभिमुखं ईरयेत् ।
पूर्वापराकृष्टास्ते गतिं यान्ति पृथग्विधाः ।।
pravahākhyo maruttāṃstu svoccābhimukhaṃ īrayet ।
pūrvāparākṛṣṭāste gatiṃ yānti pṛthagvidhāḥ ।।
पाठ-भेद: C गतीर्, पृथग्विधाम्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रवह-आख्यः मरुत् = प्रवह नामक वायु; तान् तु = उन्हें ही; स्व-उच्च-अभिमुखम् = अपने-अपने उच्च की ओर; ईरयेत् = प्रेरित करे / चलाए; पूर्व-अपर-आकृष्टाः = पूर्व-पश्चिम खिंचे हुए; ते गतिं यान्ति = वे गति प्राप्त करते हैं; पृथक्-विधाः = अनेक / भिन्न-भिन्न प्रकार की (पाठ-भेद: गतीर्, पृथग्विधाम्)।

हिन्दी भावार्थ उस वायु का नाम प्रवह है — वही ग्रहों को उनके अपने उच्च की ओर धकेलती है। पूर्व या पश्चिम खिंचाव मिलने से ग्रह एक-सी गति नहीं रखते; उनकी चालें अलग-अलग भेद ले लेती हैं। “पृथग्विधाः” यहाँ साधारण एकरूपता नहीं, बल्कि मन्द-शीघ्र-पात के संयोजन से उत्पन्न विविध गति-रूपों का संकेत है।

English rendering The wind called Pravaha drives them toward their own apogees (uccas). Drawn eastward and westward, they move with motions of various kinds.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रवह-वायु रूपक + गति-भेद की घोषणा। आधुनिक निर्देशांकों में “स्वोच्चाभिमुख” = epicycle/anomaly-vector की दिशा; “पृथग्विधाः” = mean + manda-phala + śīghra-phala + (later) vikṣepa का संयोजन।

हमारा डिकोड (Our Decode) Outer planets पर śīghrocca = mean Sun; inner planets पर madhya = mean Sun और śīghrocca = heliocentric mean — यही “स्वोच्च” की दो अलग परिभाषाएँ इंजन में hard-coded हैं। Sun/Moon केवल मन्द; बाकी ग्रह मन्द+शीघ्र की 4-step iteration से “पृथग्विधा” गति बनाते हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) प्रवह नाम की वायु ग्रहों को उनके स्वोच्च की ओर ईरित करती है — जैसे धारा किसी नौका को एक नियत किनारे की ओर धकेले, पर प्रत्येक नौका की पाल अलग हो। पूर्व-खिंचाव और पश्चिम-खिंचाव मिलकर एकसमान चाल नहीं छोड़ते; मन्द, शीघ्र और पात के संयोजन से पृथग्विधाः गति-रूप बनते हैं — कहीं तीव्र, कहीं मंद, कहीं वक्र। आकाश में एक ही रात को मंगल सीधा दौड़ता दिखे और कुछ मास बाद वही पीछे हटता दिखे, तो वह दृश्य इन्हीं भिन्न खिंचावों का परिणाम है। अध्याय २ के संयुक्त फल-योग में यही विविधता संख्याओं की तालिका बन जाएगी।

2.4
ग्रहात्प्राग्भगणार्धस्थः प्राङ्मुखं कर्षति ग्रहम् ।
उच्चसंज्ञो अपरार्धस्थस्तद्वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् ।।
grahātprāgbhagaṇārdhasthaḥ prāṅmukhaṃ karṣati graham ।
uccasaṃjño aparārdhasthastadvatpaścānmukhaṃ graham ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहात् प्राक् = ग्रह से पूर्व/आगे; भगण-अर्ध-स्थः = आधे भगण (180°) पर स्थित; प्राङ्-मुखम् = पूर्व-मुख; कर्षति ग्रहम् = ग्रह को खींचता है; उच्च-संज्ञः = उच्च नामक; अपर-अर्ध-स्थः = दूसरे अर्ध में स्थित; तद्वत् = उसी प्रकार; पश्चात्-मुखम् = पश्चिम-मुख; ग्रहम् = ग्रह को।

हिन्दी भावार्थ जब उच्च ग्रह से आधा भगण — अर्थात् 180° — आगे हो, तो वह ग्रह को पूर्व दिशा में खींचता है। जब वही उच्च दूसरे अर्ध में हो, तो खिंचाव उलटा — पश्चिम मुख — हो जाता है। “उच्च” यहाँ मन्दोच्च या शीघ्रोच्च दोनों का सामान्य नाम है; खिंचाव की दिशा भगणार्ध-स्थिति से तय होती है।

English rendering The point called ucca, when half a revolution ahead of the planet, draws the planet eastward; when it lies in the other half, it likewise draws the planet westward.

गणित / The Mathematics Ucca relative to planet: κ = L_ucca − L_graha (or reverse convention L − ucca; SS 2 uses κ_manda = madhya − mandocca).
Half-revolution boundary: κ = ±180° (भगणार्ध).
Eastward draw (प्राङ्मुख) when ucca is “ahead” in the sense of the anomaly half that produces positive (धन) correction; westward (पश्चान्मुख) in the opposite half.
In modern epicycle language: the tangential component of the epicycle vector reverses sign across the line of apsides — equivalent to sign(sin κ) for the first-order equation of center.

उदाहरण (worked example) Convention: κ_manda = madhya − mandocca.
Input: madhya = 100°, mandocca = 40° → κ = 60°.
sin κ = sin 60° = √3/2 > 0 → प्राङ्मुख half (eastward correction sense under the SS sign convention of 2.05).
If mandocca = 220°, madhya = 100° → κ = −120°; sin κ < 0 → अपरार्ध / पश्चान्मुख half.

हमारा डिकोड (Our Decode) स्फुट-इंजन में मन्द-फल = arcsin((R_manda/360)·sin κ) — sin κ का चिह्न ही 2.04–2.05 का प्राङ्/पश्चात् भेद है। 4-step iteration (half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra) इसी कर्षण-ज्यामिति को संख्या में बाँधती है; sealed 2026-05-17।

2.5
स्वोच्चापकृष्टा भगणैः प्राङ्मुखं यान्ति यद्ग्रहाः ।
तत्तेषु धनं इत्युक्तं ऋणं पश्चान्मुखेषु च ।।
svoccāpakṛṣṭā bhagaṇaiḥ prāṅmukhaṃ yānti yadgrahāḥ ।
tatteṣu dhanaṃ ityuktaṃ ṛṇaṃ paścānmukheṣu ca ।।
पाठ-भेद: C भगणात्; तु

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-उच्च-अपकृष्टाः = अपने उच्च से खींचे हुए; भगणैः / भगणात् = भगणों के द्वारा/से (पाठ-भेद); प्राङ्-मुखं यान्ति = पूर्व-मुख चलते हैं; यत् ग्रहाः = जो ग्रह; तत् तेषु धनम् = वह उनमें धन (धनात्मक संशोधन) कहा गया; ऋणम् = ऋण (ऋणात्मक संशोधन); पश्चात्-मुखेषु = पश्चिम-मुख होने पर; च / तु = और/तो (पाठ-भेद)।

हिन्दी भावार्थ जब ग्रह अपने उच्च के खिंचाव से पूर्व दिशा में बढ़ते हैं, शास्त्र उस संशोधन को धन कहता है। जब वे पश्चिम मुख खिंचे हों, संशोधन ऋण है। यह केवल भाषा नहीं — स्फुट-रेखागणित का चिह्न-नियम है: प्राङ्मुख = +φ, पश्चान्मुख = −φ। पाठ-भेद “भगणैः/भगणात्” और “च/तु” अर्थ नहीं बदलते।

English rendering When planets, drawn by their own uccas through the revolutions, move eastward, that correction is called dhana (positive); when they face westward, it is called ṛṇa (negative).

गणित / The Mathematics Sign rule for anomaly correction φ:
φ = + |manda/śīghra-phala| when motion is प्राङ्मुख (धन)
φ = − |manda/śīghra-phala| when motion is पश्चान्मुख (ऋण)
With κ_manda = mandocca − madhya (2.29) and φ_manda ≈ arcsin((R/360)·sin κ), sign(φ) tracks sign(sin κ): additive while κ is in Meṣa…Kanyā (2.45).
Final true longitude (first-order manda only): L_sphuṭa = madhya + φ (धन/ऋण applied).

उदाहरण (worked example) κ = 30°, sin 30° = 1/2; the Sun's epicycle there by 2.38: 14° − 20′ × ½ = 13°50′ = 83/6°.
φ ≈ arcsin((83/6)/360 · 1/2) = arcsin(83/4320) ≈ arcsin(0.01921) ≈ 1.101°.
प्राङ्मुख half → धन: L = madhya + 1.101°.
If κ = −30° → ऋण: L = madhya − 1.101°.

हमारा डिकोड (Our Decode) Oracle discipline यहाँ सीधा लागू होता है: धन/ऋण का गलत चिह्न एक बार bīja-fit में भी आया (−30, +51, −61) और ठीक किया गया (+30, −51, +61)। `==` on pinned fixtures — tolerance band चिह्न-त्रुटि छिपा देती है; kaal-verification-oracle इसीलिए exact-equality रखता है।

2.6
दक्षिणोत्तरतो अप्येवं पातो राहुः स्वरंहसा ।
विक्षिपत्येष विक्षेपं चन्द्रादीनां अपक्रमात् ।।
dakṣiṇottarato apyevaṃ pāto rāhuḥ svaraṃhasā ।
vikṣipatyeṣa vikṣepaṃ candrādīnāṃ apakramāt ।।
पाठ-भेद: C दक्षिणोत्तरयोर्, राहुश्च रंहसा

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दक्षिण-उत्तरतः = दक्षिण और उत्तर दिशा में भी; अपि एवम् = इसी प्रकार; पातः = पात (नाभि-बिन्दु / राहु); राहुः = राहु; स्व-रंहसा = अपनी वेग-शक्ति से (पाठ-भेद: राहुश्च रंहसा); विक्षिपति = विक्षेपित करता है / झुकाता है; एष विक्षेपम् = यह विक्षेप (अक्षांशीय विचलन); चन्द्र-आदीनाम् = चन्द्र आदि का; अपक्रमात् = अपक्रम (क्रान्तिवृत्त / ecliptic) से।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-पश्चिम कर्षण की तरह ही दक्षिण-उत्तर में भी एक व्यवस्था है। पात — जिसे राहु कहा गया — अपनी रंह (वेग) से ग्रह को कक्षीय तल से ऊपर-नीचे धकेलता है। चन्द्र से लेकर अन्य ग्रहों तक का विक्षेप अपक्रम (ecliptic) से मापा जाता है। यह अक्षांश-मॉडल का बीज-श्लोक है, भाग्य-कथन नहीं — ज्यामिति का कथन।

English rendering Likewise north and south: the node, Rāhu, by its own speed deflects the planets. This produces the vikṣepa (celestial latitude) of the Moon and the others from the ecliptic (apakrama).

गणित / The Mathematics Celestial latitude β (विक्षेप) arises from argument of latitude measured from the node (पात/राहु):
u ≈ L − Ω (Ω = longitude of ascending node / राहु)
β ≈ arcsin(sin i · sin u) (small-i form: β ≈ i · sin u),
where i = orbital inclination (SS tables later in the chapter; this verse states the mechanism only).
अपक्रम = ecliptic reference; विक्षेप = signed distance north (+) / south (−) of that plane.

उदाहरण (worked example) Hypothetical i = 5°, u = L − Ω = 90° (node half-revolution geometry of 2.07).
β ≈ arcsin(sin 5° · sin 90°) ≈ 5° north.
If u = 270°, β ≈ −5° (south). Convention: ascending node = राहु as in classical SS usage for the Moon.

हमारा डिकोड (Our Decode) Chapter-2 pure sphuṭa engine अभी longitude chain (manda+śīghra) पर sealed है; विक्षेप/पात अलग ज्यामितीय परत है — mean-longitude lab को production true-position ephemeris बनाने से पहले measured latitude layer चाहिए, stronger wording नहीं। Honesty discipline: instrument ≠ full sky.

2.7
उत्तराभिमुखं पातो विक्षिपत्यपरार्धगः ।
ग्रहं प्राग्भगणार्धस्थो याम्यायां अपकर्षति ।।
uttarābhimukhaṃ pāto vikṣipatyaparārdhagaḥ ।
grahaṃ prāgbhagaṇārdhastho yāmyāyāṃ apakarṣati ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उत्तर-अभिमुखम् = उत्तर की ओर मुख करके; पातः विक्षिपति = पात विक्षेपित करता है; अपर-अर्ध-गः = दूसरे अर्ध में स्थित; ग्रहम् = ग्रह को; प्राक्-भगण-अर्ध-स्थः = आगे आधे भगण पर स्थित; याम्यायाम् = दक्षिण दिशा में; अपकर्षति = खींचता / अपकर्षित करता है।

हिन्दी भावार्थ जब पात ग्रह के सापेक्ष दूसरे अर्ध में हो, तो विक्षेप उत्तर-मुख होता है। जब पात ग्रह से आधा भगण आगे हो, तो वह ग्रह को दक्षिण (याम्य) की ओर खींचता है। यह 2.04–2.05 के धन/ऋण नियम का अक्षांशीय जुड़वाँ है: अर्ध-भगण सीमा पर चिह्न पलटता है।

English rendering The node, when in the other half, deflects the planet northward; when half a revolution ahead, it draws the planet southward.

गणित / The Mathematics With u = L − Ω:
• अपरार्ध (other half relative to node) → उत्तराभिमुख (β > 0 sense)
• प्राग्-भगणार्धस्थ (node 180° ahead of planet, u ≈ 180° geometry in the verse’s framing) → याम्य / southward pull (β < 0 sense)
Continuous form: sign(β) = sign(sin u) for ascending node Ω, inclination i > 0.
At u = 0° or 180° (node line): β = 0 (ecliptic crossing).

उदाहरण (worked example) Ω = 40°, L = 100° → u = 60°, sin u > 0 → northward vikṣepa.
L = 40° + 180° = 220°, u = 180°, sin u = 0 → on the node line, β = 0.
L = 310°, u = 270°, sin u = −1 → maximum southward deflection magnitude i.

2.8
बुधभार्गवयोः शीघ्रात्तद्वत्पातो यदा स्थितः ।
तच्छीघ्राकर्षणात्तौ तु विक्षिप्येते यथोक्तवत् ।।
budhabhārgavayoḥ śīghrāttadvatpāto yadā sthitaḥ ।
tacchīghrākarṣaṇāttau tu vikṣipyete yathoktavat ।।
पाठ-भेद: C यथास्थितः

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बुध-भार्गवयोः = बुध और शुक्र (भार्गव) का; शीघ्रात् = शीघ्र (शीघ्रोच्च) से; तद्वत् = उसी प्रकार; पातः = पात; यदा स्थितः / यथा-स्थितः = जब/जैसे स्थित हो (पाठ-भेद); तत्-शीघ्र-आकर्षणात् = उस शीघ्र-कर्षण से; तौ तु = वे दोनों ही; विक्षिप्येते = विक्षेपित किए जाते हैं; यथा-उक्त-वत् = पहले कहे अनुसार।

हिन्दी भावार्थ बुध और शुक्र के लिए पात की स्थिति मन्द-मध्य से नहीं, शीघ्र (शीघ्रोच्च) से मापी जाती है — “शीघ्रात्तद्वत्”। उसी नियम से, शीघ्र-कर्षण के कारण ये दोनों ग्रह भी यथोक्त उत्तर-दक्षिण विक्षेपित होते हैं। यह आंतरिक ग्रहों की विशेष व्यवस्था है: उनका “मध्य” स्वयं सूर्य-मध्य है, अतः अक्षांश-तर्क भी शीघ्र-ढाँचे से जुड़ता है।

English rendering For Mercury and Venus, when the node is likewise placed relative to the śīghra, those two are deflected by that śīghra attraction exactly as stated above.

गणित / The Mathematics Outer planets: latitude argument from mean/manda-corrected longitude vs node.
Inner planets (बुध, शुक्र): node measured from śīghra (śīghrocca frame), not from the same madhya used for outer bodies:
u_inner ≈ L_śīghra-related − Ω
β as in 2.06–2.07 with this u.
This matches the SS Chapter-2 split already used in longitude:
• Outer: śīghrocca = mean Sun
• Inner: madhya = mean Sun, śīghrocca = heliocentric mean

उदाहरण (worked example) Conceptual only (verse gives mechanism, not i-values): for Venus, take argument of latitude from the śīghra anomaly frame. If K_śīghra-side geometry places the node “half a revolution ahead” of the śīghra-referred position, apply 2.07 southward rule; opposite half → northward — same sign logic as Moon/outer, different reference point.

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` पहले से inner/outer का शीघ्रोच्च-भेद longitude में लागू करता है; 2.08 उसी भेद को विक्षेप पर विस्तारित करता है। Production true-position ephemeris के लिए measured calculation layer में यही inner-planet node-from-śīghra convention pin करनी होगी — JPL/Swiss cross-check instruments हैं, proof-authority नहीं।

2.9
महत्वान्मण्डलस्यार्कः स्वल्पं एवापकृष्यते ।
मण्डलाल्पतया चन्द्रस्ततो बह्वपकृष्यते ।
mahatvānmaṇḍalasyārkaḥ svalpaṃ evāpakṛṣyate ।
maṇḍalālpatayā candrastato bahvapakṛṣyate ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महत्वात् = बृहत्-परिमाण के कारण; मण्डलस्य = कक्षा/मण्डल का; अर्कः = सूर्य; स्वल्पम् एव = अत्यल्प ही; अपकृष्यते = (मध्य-स्थान से) खींचा/विचलित किया जाता है; मण्डल-अल्पतया = मण्डल की लघुता से; चन्द्रः = चन्द्रमा; ततः बहु अपकृष्यते = उसी कारण अधिक विचलित होता है।

हिन्दी भावार्थ सूर्य का मण्डल अत्यन्त विशाल है, इसलिए उस पर अपकर्षण का प्रभाव बहुत थोड़ा पड़ता है — वह मध्य-स्थान से बस थोड़ा-सा ही खिसकता है। चन्द्रमा का मण्डल अपेक्षाकृत छोटा है, अतः वही आकर्षण-शक्ति उसे सूर्य की तुलना में कहीं अधिक विचलित कर देती है। यह पंक्ति आगे आने वाले मन्द-फल की असमानता का पहला दार्शनिक-गणितीय बीज बोती है।

English rendering Because of the greatness of its circle, the Sun is drawn aside only a little from its mean place. Because of the smallness of its circle, the Moon is drawn aside much more.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (मन्द-अपकर्षण की सापेक्ष तीव्रता)। यह गुणात्मक नियम है: विशाल deferent/मण्डल ⇒ लघु मन्द-फल; लघु मण्डल ⇒ बृहत् मन्द-फल — आगे अध्याय-२ में सूर्य-मन्द-परिधि १४°/१३°४०′ (माध्य १३°५०′) तथा चन्द्र-मन्द-परिधि ३२°/३१°४०′ (माध्य ३१°५०′) इसी असमानता को संख्या में बाँधते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में सूर्य/चन्द्र केवल मन्द-चरण चलाते हैं; epicycle constants (SS 2.34–38 mean) ठीक यही अनुपात दर्शाते हैं — Moon R_manda ≈ 31°50′ ≫ Sun 13°50′ (means of the two ends)। verse की “बहु/स्वल्प अपकर्ष” भाषा को engine arcsin((R_manda/360)·sin κ) के R_manda-अनुपात में पढ़ता है, Western theorem chain के बिना।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक विशाल चक्र पर बैठा बिंदु थोड़ा सा कोणीय खिंचाव पाए तो धरातल पर विस्थापन छोटा लगता है; छोटे चक्र पर वही कोणीय बल बहुत बड़ा विचलन देता है — सूर्य और चन्द्र का मण्डल-महत्त्व इसी अनुपात का दार्शनिक बीज है। सूर्य का कक्षा-मण्डल विशाल माने जाने से मन्द-अपकर्ष उसे मध्य से बस थोड़ा खिसकाता है; चन्द्र का छोटा मण्डल उसी तर्क से कहीं अधिक equation of center देता है। आगे जब मन्द-फल की ज्या-सारिणी में सूर्य का अधिकतम फल छोटा और चन्द्र का बड़ा निकले, तो मूल हेतु यही पंक्ति है। यह असमानता “देव-कृपा” नहीं, geometry of the orbit size का सीधा परिणाम है।

2.10
भौमादयो अल्पमूर्तित्वाच्छीघ्रमन्दोच्चसञ्ज्ञकैः ।
दैवतैरपकृष्यन्ते सुदूरं अतिवेगिताः ।।
bhaumādayo alpamūrtitvācchīghramandoccasañjñakaiḥ ।
daivatairapakṛṣyante sudūraṃ ativegitāḥ ।।
पाठ-भेद: C संज्ञितैः

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भौम-आदयः = मंगल आदि (पंच तारा-ग्रह); अल्प-मूर्तित्वात् = लघु शरीर/रूप होने से; शीघ्र-मन्द-उच्च-सञ्ज्ञकैः = शीघ्र, मन्द और उच्च नामक; दैवतैः = देवताओं द्वारा; अपकृष्यन्ते = खींचे जाते हैं; सुदूरम् = बहुत दूर तक; अति-वेगिताः = अत्यन्त वेगवान्। (पाठ C: संज्ञितैः ≈ सञ्ज्ञकैः — अर्थ-भेद नगण्य।)

हिन्दी भावार्थ मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि — ये ग्रह सूर्य-चन्द्र की अपेक्षा अल्प-मूर्ति हैं। अतः वे शीघ्र, मन्द और उच्च नाम धारण करने वाले देव-बलों से दूर-दूर तक अपकर्षित होते हैं और आकाश में तीव्र वेग से चलते हैं। यहाँ “दैवत” काव्य नहीं — गति-सংশोधन के तीन केन्द्रों (शीघ्रोच्च, मन्दोच्च, उच्च) का व्यक्तित्व-रूपक है।

English rendering Mars and the other planets, being of small body, are drawn far aside by the deities named śīghra, manda, and ucca, and move with extreme swiftness.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका (शीघ्र/मन्द/उच्च त्रयी का ग्रह-अपकर्षण)। यह आगे के दो-केन्द्र स्फुट-क्रम (मन्द + शीघ्र) का हेतु-वाक्य है; बाह्य ग्रहों में शीघ्रोच्च = मध्य-सूर्य, आन्तरिकों में मध्य = मध्य-सूर्य तथा शीघ्रोच्च = हेलियोसेन्ट्रिक मध्य — वही “दैवत” संरचना।

हमारा डिकोड (Our Decode) Chapter-2 pure sphuṭa engine ठीक इसी त्रयी को संचालित करता है: κ_manda = madhya − mandocca; फिर K_śīghra = śīghrocca − L_manda-corrected; 4-step iteration half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra। Outer/inner ग्रह-भेद dossier §5 में sealed (2026-05-17) — verse का “शीघ्रमन्दोच्च” शब्द-क्रम engine के दो-फल-पथ से मेल खाता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि — अल्प-मूर्ति होने से शीघ्रोच्च, मन्दोच्च और उच्च नामक तीन केन्द्रों से दूर-दूर तक अपकर्षित माने गए; आकाश में उनकी apparent speed और दिशा-परिवर्तन सूर्य-चन्द्र से अधिक नाटकीय दिखते हैं। “दैवत” यहाँ काव्य-देवता नहीं, तीन correction centres का व्यक्तित्व-रूपक है — वही आगे शीघ्र-फल, मन्द-फल और उच्च-संशोधन बनेंगे। मंगल का कभी तीव्र पूर्व-गमन, कभी दीर्घ वक्र-गति, इन्हीं दूर-अपकर्षों का दृश्य फल है। अध्याय २ के पञ्चतारा-सूत्रों में “सुदूरं अतिवेगिताः” ठीक उन्हीं विशाल धन-ऋण राशियों में उतरेगा।

2.11
अतो धनर्णं सुमहत्तेषां गतिवशाद्भवेत् ।
आकृष्यमाणास्तैरेवं व्योम्नि यान्त्यनिलाहताः ।।
ato dhanarṇaṃ sumahatteṣāṃ gativaśādbhavet ।
ākṛṣyamāṇāstairevaṃ vyomni yāntyanilāhatāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इसलिए; धन-ऋणम् = धन (योग्य जोड़) और ऋण (योग्य घटाव); सुमहत् = अत्यन्त बड़ा; तेषाम् = उन ग्रहों का; गति-वशात् = गति के अनुसार; भवेत् = होता है; आकृष्यमाणाः = खिंचे जाते हुए; तैः एवम् = उन्हीं (दैवतों) से इस प्रकार; व्योम्नि = आकाश में; यान्ति = चलते हैं; अनिल-आहताः = वायु से आहत/प्रेरित-से।

हिन्दी भावार्थ उसी कारण उन ग्रहों के धन-ऋण फल — मध्य-स्थान पर जोड़ने या घटाने वाले संशोधन — गति की अवस्था के अनुसार बहुत बड़े हो जाते हैं। उन दैवत-बलों से आकृष्ट होकर वे आकाश में ऐसे भ्रमण करते हैं मानो पवन ने उन्हें उड़ा लिया हो। “अनिलाहताः” कविता नहीं; शीघ्र-मन्द फल के चिह्न-परिवर्तन (sign flip) और विशाल आयाम का दृश्य रूपक है।

English rendering Therefore their additive and subtractive corrections become very great according to their motion. Thus drawn by those forces, they travel the sky as if struck and driven by the wind.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (धन/ऋण फल की विशालता व चिह्न-निर्भरता)। मात्रात्मक बन्धन बाद में: मन्द-फल = ±arcsin((R_manda/360)·sin κ); शीघ्र-फल = ±arcsin(R_ś·sin K / √(R_def² + R_ś² + 2·R_def·R_ś·cos K)); κ या K की चौथाई के अनुसार धन/ऋण पलटता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) bīja-प्रयोग (Mars +30, Jupiter −51, Saturn +61 revs/Mahāyuga) भी “धनर्ण” की ही भाषा में पढ़े जाते हैं — Sun-anchored relative-rate corrections, absolute नहीं (MATHEMATICAL-AUDIT §3)। गलत चिह्न (−30,+51,−61) कभी engine में घुस आया था; exact-oracle `==` ने पकड़ा और +30,−51,+61 पर सुधारा — verse का धन/ऋण अनुशासन आधुनिक regression-discipline बन गया।

दृष्टान्त (Illustrative Example) जब मध्य-ग्रह पर जोड़ा या घटाया जाने वाला संशोधन कई अंशों तक पहुँचे — और गति-अवस्था बदलते ही धन ऋण में पलट जाए — तो आकाश में ग्रह मानो पवन-हत (अनिलाहताः) दिशा बदलता दिखता है। यह भय-कथा नहीं: sign flip और विशाल आयाम का दृश्य रूपक है, जैसा मंगल-शुक्र की वक्रता और तीव्र elongation-परिवर्तन में आँखें देखती हैं। “सुमहत् धनर्णम्” आगे की सारिणियों में छोटे कोण नहीं, बड़े फल-अंश बनकर आएगा। जो श्लोक २.०९–२.१० ने आकार और दूरी से बोया, वह यहाँ velocity-dependent correction के रूप में पकता है — मध्य + फल = स्पष्ट, और फल स्वयं गति की अवस्था का दास।

2.12
वक्रातिवक्रा विकला मन्दा मन्दतरा समा ।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणां अष्टधा गतिः ।।
vakrātivakrā vikalā mandā mandatarā samā ।
tathā śīghratarā śīghrā grahāṇāṃ aṣṭadhā gatiḥ ।।
पाठ-भेद: C वक्रानुवक्रा

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वक्रा = वक्र (उल्टी) गति; अतिवक्रा = अत्यन्त वक्र गति; विकला = विकल/तिर्यक् (मन्द-वक्र या न्यून-कला गति); मन्दा = मन्द; मन्दतरा = और भी मन्द; समा = सम (मध्य-समान); तथा शीघ्रतरा = तथा अति-शीघ्र; शीघ्रा = शीघ्र; ग्रहाणाम् = ग्रहों की; अष्टधा गतिः = आठ प्रकार की गति। (पाठ C: वक्रानुवक्रा — “अतिवक्रा” के स्थान पर “अनुवक्रा”; नाम-भेद, अष्ट-वर्ग वही।)

हिन्दी भावार्थ ग्रहों की गति आठ ढंग की कही गई है — वक्रा, अतिवक्रा, विकला, मन्दा, मन्दतरा, समा, शीघ्रतरा और शीघ्रा। यह वर्गीकरण केवल काव्य-सूची नहीं; प्रेक्षक आकाश में ग्रह को कभी थमा, कभी उल्टा, कभी द्रुत देखता है, और शास्त्र उन अवस्थाओं को नाम देकर स्फुट-क्रम से जोड़ता है। पाठ-भेद “वक्रानुवक्रा” परम्परा में अनुवक्र को अतिवक्र का निकट-नाम मानता है।

English rendering The motion of the planets is eightfold: retrograde (vakrā), highly retrograde (ativakrā; variant: anuvakrā), transverse/deficient (vikalā), slow (mandā), slower still (mandatara), even (samā), then swifter (śīghratara), and swift (śīghrā).

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (अष्टविध गति-वर्गीकरण)। संख्यात्मक अष्ट = 8 शब्द-संख्या से सिद्ध; वक्र/शीघ्र सीमाएँ बाद के शीघ्र-केन्द्र कोण K और दैनिक गति dy/dt की चिह्न-दर से निर्धारित होती हैं, इस श्लोक में सीमा-सूत्र नहीं दिया गया।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही रात्रि में मंगल (Mars) को नक्षत्र-पथ पर धीरे-धीरे पीछे सरकता देखना, फिर कुछ सप्ताह बाद उसी पथ पर “रुककर” (stationary) फिर आगे बढ़ना — यही प्रेक्षक के नेत्रों में वक्रा–विकला–शीघ्रा का क्रम है। दूरबीन की ज़रूरत नहीं; खुली आँख से, दो–तीन सप्ताह के अंतराल पर, किसी स्थिर नक्षत्र के सापेक्ष ग्रह की स्थिति नोट करें। आठ नाम उसी दृश्य-नाटक की अवस्था-सूची हैं, जिन्हें अध्याय २ का मन्द–शीघ्र-फल बाद में संख्या में बाँधता है।

2.13
तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा ।
ऋज्वीति पञ्चधा ज्ञेया या वक्रा सातिवक्रगा ।।
tatrātiśīghrā śīghrākhyā mandā mandatarā samā ।
ṛjvīti pañcadhā jñeyā yā vakrā sātivakragā ।।
पाठ-भेद: C +अन्या वक्रादिका मता

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उनमें; अतिशीघ्रा शीघ्राख्या = अतिशीघ्र और शीघ्र कही गई; मन्दा मन्दतरा समा = मन्द, मन्दतर और सम; ऋज्वी इति = “ऋज्वी” (सीधी/अनुलोम) — इस नाम से; पञ्चधा ज्ञेया = पाँच प्रकार की जानी जाएँ; या वक्रा = जो वक्रा है; सा अतिवक्रगा = वही अतिवक्र-गामिनी है। (पाठ C जोड़: अन्या वक्रादिका मता — अन्य आचार्य वक्रादि भेदों पर भिन्न मत रखते हैं।)

हिन्दी भावार्थ उन आठ में से पाँच — अतिशीघ्रा, शीघ्रा, मन्दा, मन्दतरा और समा — ऋज्वी अर्थात् अनुलोम/सीधी गति के भेद माने जाते हैं। जो वक्रा है, वही अतिवक्र की ओर बढ़ती अवस्था है; वक्र-युग्म ऋज्वी-पंचक से अलग रखा गया। विकला को इस पंक्ति में ऋज्वी में नहीं गिना — वह तिर्यक्/सन्धि-सी अवस्था का संकेत रखती है। C-पाठ साफ़ कहता है: वक्रादि-नामों पर मत-भेद भी शास्त्र में दर्ज हैं।

English rendering Among them, the five called very swift, swift, slow, slower, and even are to be known as direct (ṛjvī) motion. That which is retrograde (vakrā) is the same course that goes into high retrogression (ativakra). A variant notes that other teachers classify the vakra-group differently.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (५ ऋज्वी + वक्र-युग्म का विभाजन)। पञ्चधा = 5; अष्ट में से ऋज्वी-पंचक और वक्र/अतिवक्र का जोड़ा — विकला शेष। आधुनिक decode में “ऋज्वी/वक्र” = dλ/dt > 0 या < 0 (true daily motion का चिह्न), पर यह श्लोक स्वयं व्युत्पन्न-सूत्र नहीं देता।

दृष्टान्त (Illustrative Example) सोचिए एक सीधी सड़क पर पाँच “गति-पट्टियाँ” — बहुत तेज़, तेज़, सामान्य, धीमी, और और धीमी; ये पाँच ऋज्वी हैं। उल्टी लेन अलग है: वक्रा से अतिवक्र की ओर जाना उसी उल्टी लेन का गहरा होना है, नई लेन नहीं। विकला यहाँ “ट्रैफ़िक-लाइट पर ठहराव” की तरह सन्धि-क्षण है — न पूर्ण ऋज्वी, न पूर्ण वक्र; इसलिए इस पंक्ति ने उसे पाँच में नहीं गिना। पाठ-भेद याद दिलाता है कि नाम-सूची एकमात्र नहीं, पर ऋज्वी–वक्र का द्वैत लगभग हर भारतीय ज्योतिष-परम्परा में स्थिर रहा।

2.14
तत्तद्गतिवशान्नित्यं यथा दृक्तुल्यतां ग्रहाः ।
प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटीकरणं आदरात् ।।
tattadgativaśānnityaṃ yathā dṛktulyatāṃ grahāḥ ।
prayānti tatpravakṣyāmi sphuṭīkaraṇaṃ ādarāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-तत्-गति-वशात् = उन-उन गतियों के अनुसार; नित्यम् = सदैव; यथा = जिस प्रकार; दृक्-तुल्यताम् = दृष्टि/प्रेक्षण से समता; ग्रहाः = ग्रह; प्रयान्ति = प्राप्त करते हैं; तत् = वह; प्रवक्ष्यामि = मैं विस्तार से कहूँगा; स्फुटीकरणम् = स्फुट (यथार्थ) करने की विधि; आदरात् = आदरपूर्वक/सावधानी से।

हिन्दी भावार्थ ग्रह उन आठ गति-अवस्थाओं में से गुज़रते हुए भी नित्य दृक्तुल्य रहें — अर्थात् गणना आकाश में दिखते स्थान से मेल खाए — इसके लिए अब स्फुटीकरण का विधान कहा जाएगा। यह अध्याय का द्वार-श्लोक है: मध्य-ग्रह से स्फुट-ग्रह तक की पूरी शृंखला यहीं से खुलती है। “आदरात्” पाठक को याद दिलाता है — यह विधि लापरवाही की नहीं, क्रमिक फल-योग की है।

English rendering So that the planets, according to those respective motions, may always attain equality with observation, I shall carefully set forth the method of true-position computation (sphuṭīkaraṇa).

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/विधि-उद्घाटन (स्फुटीकरण का घोषणा-वाक्य)। लक्ष्य-फलन स्पष्ट है: computed λ_sphuṭa ≈ λ_observed (दृक्तुल्यता); साधन आगे — ज्या-सारणी, मन्द-फल, शीघ्र-फल, चतुर्विध iteration।

हमारा डिकोड (Our Decode) पूरी KAAL-Sacred-Discovery श्रृंखला — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` — इसी श्लोक की प्रतिज्ञा का यन्त्र है: pure SS Ch.2 manda+śīghra, sealed 2026-05-17, no Western theorem in the chain। `kaal-verification-oracle` दृक्तुल्यता को ±tolerance से नहीं, pinned fixture पर `==` से जाँचता है — पुरानी ±3 पट्टी ने कभी वास्तविक −1 छिपाया था। Instrument mean-longitude lab है; production true-ephemeris कहना honesty-discipline के विरुद्ध है (dossier §7)।

दृष्टान्त (Illustrative Example) यह श्लोक अध्याय २ का द्वार-पट्ट है: यहाँ से मध्य-ग्रह केवल “औसत स्थिति” रह जाती है, और आगे मन्द-फल तथा शीघ्र-फल की पूरी श्रृंखला स्फुट-ग्रह तक ले जाती है। कल्पना कीजिए — घड़ी सही चले, पर सुई गलत दिशा दिखाए; दृक्तुल्यता का अर्थ है सुई और आकाश-बिन्दु का मिलान। “आदरात्” का ठोस अर्थ यह है कि एक फल छोड़कर अगला लगाना अनुमत नहीं — क्रम ही प्रमाण है, और वही क्रम इस पुस्तक के श्लोक २.१५ से आगे गणित बनेगा।

2.15
राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्धं उच्यते ।
तत्तद्विभक्तलब्धोनमिश्रितं तद्द्वितीयकम् ।।
rāśiliptāṣṭamo bhāgaḥ prathamaṃ jyārdhaṃ ucyate ।
tattadvibhaktalabdhonamiśritaṃ taddvitīyakam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशि-लिप्ता = एक राशि की कलाएँ (लिप्ता); अष्टमः भागः = आठवाँ भाग; प्रथमम् ज्या-अर्धम् = प्रथम ज्यार्ध (अर्ध-ज्या / सारणी-ज्या); उच्यते = कहा जाता है; तत्-तत्-विभक्त-लब्ध-ऊन-मिश्रितम् = उसे क्रमशः विभाजित कर, लब्ध घटाकर, फिर मिश्रित कर; तत् द्वितीयकम् = वही द्वितीय (ज्यार्ध) हो जाता है।

हिन्दी भावार्थ एक राशि में तीस अंश = १८०० लिप्ता होती हैं; उसका आठवाँ भाग — २२५ लिप्ता — प्रथम ज्यार्ध कहा जाता है। उसी को क्रम-संख्याओं से भाग देकर लब्धों को घटाते-मिलाते हुए द्वितीय ज्यार्ध बनता है। यह भारतीय ज्या-सारणी का बीज-श्लोक है: छोटे चाप पर चाप ≈ ज्या मानकर पहली प्रविष्टि गढ़ी जाती है, फिर पुनरावृत्ति से पूरी सारणी।

English rendering The eighth part of the minutes of a sign is called the first half-sine (jyārdha). That quantity, successively divided, the quotients subtracted and then combined, becomes the second.

गणित / The Mathematics
- 1 राशि = 30° = 30 × 60 = 1800 लिप्ता (′)
- प्रथम ज्यार्ध: jyā₁ = 1800 / 8 = 225′
- यह चाप 1800′ / 8 = 225′ = 3°45′ = 225/60° पर Rsin θ ≈ θ (लिप्ता में) की प्रथम प्रविष्टि है
- द्वितीय: jyā₁ को क्रमिक भाजकों से विभक्त कर लब्ध-ऊन-मिश्रित प्रक्रिया से jyā₂ — पूरी पुनरावृत्ति 2.16 में

उदाहरण (worked example)
इनपुट: राशि = 30°, लिप्ता-परिभाषा 1° = 60′।
jyā₁ = 1800′ ÷ 8 = 225′।
अर्थात् सारणी का पहला केन्द्र 3°45′ पर ज्या-मान 225′ (त्रिज्या R ≈ 3438′ की SS-सारणी में यही बीज-मान; R इस श्लोक में नामित नहीं, सारणी-निर्माण से सिद्ध)।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्फुट-फल arcsin / sin κ ज्या-सारणी के बिना नहीं चलता; math-core और sphuṭa-engine दोनों classical jyā-path के आधुनिक समकक्ष (floating sin) पर बैठते हैं, पर शास्त्रीय २४-खण्ड रचना का मूल यहीं है। exact-oracle discipline ज्या-अंकों पर भी लागू: सहिष्णु-पट्टी नहीं, pinned मान।

2.16
आद्येनैवं क्रमात्पिण्डान्भक्त्वा लब्धोनसंयुताः ।
खण्डकाः स्युश्चतुर्विंशज्यार्धपिण्डाः क्रमादमी ।।
ādyenaivaṃ kramātpiṇḍānbhaktvā labdhonasaṃyutāḥ ।
khaṇḍakāḥ syuścaturviṃśajyārdhapiṇḍāḥ kramādamī ।।
पाठ-भेद: C लब्धोनितैर्युतैः; C खण्डकैस्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आद्येन = प्रथम (ज्यार्ध २२५) से; एवम् क्रमात् = इसी रीति क्रम से; पिण्डान् = (पूर्व) पिण्डों/संचित ज्या-योगों को; भक्त्वा = भाग देकर; लब्ध-ऊन-संयुताः = लब्ध घटाकर संयुक्त किए हुए; खण्डकाः स्युः = खण्डक (खण्ड-अन्तर) हों; चतुर्विंश = चौबीस; ज्या-अर्ध-पिण्डाः = ज्यार्ध-पिण्ड (संचित सारणी-ज्याएँ); क्रमात् अमी = क्रम से ये। (पाठ C: लब्धोनितैर्युतैः; खण्डकैस् — प्रक्रिया-शब्दों का पर्याय, अर्थ स्थिर।)

हिन्दी भावार्थ प्रथम ज्यार्ध को आधार बनाकर क्रमशः पिण्डों को उसी से भाग दो; लब्धों को घटा-जोड़कर जो अन्तर निकलते हैं वे खण्डक कहलाते हैं। ऐसे खण्डकों के योग से चौबीस ज्यार्ध-पिण्ड — पूरी ज्या-सारणी — क्रमशः सिद्ध होते हैं। एक राशि के आठवें भाग से लेकर चतुर्थांश-वृत्त (९०°) तक की सीढ़ी यहीं पूरी होती है: 24 × 3°45′ = 90°।

English rendering Thus, dividing the successive sums (piṇḍas) in order by the first (half-sine), and combining after subtracting the quotients, one obtains the segmental differences (khaṇḍakas). From them arise, in order, these twenty-four half-sine sums — the tabular jyārdha-piṇḍas.

गणित / The Mathematics
- बीज: jyā₁ = 225′ (2.15 से)
- खण्डक khaṇḍaka = सारणी के क्रमिक अन्तर; पिण्ड = संचित ज्या = Σ khaṇḍaka
- प्रक्रिया (शास्त्रीय पुनरावृत्ति): आद्य (225) से पिण्डों को भक्त कर लब्ध-ऊन-संयुक्त ⇒ अगला खण्डक; योग से अगला पिण्ड
- संख्या: चतुर्विंश = 24 ज्यार्ध-पिण्ड
- चाप-पद: Δθ = 3°45′ = 225′; पूर्ण सारणी 24 × 3°45′ = 90° = ज्या-अर्धवृत्त की सीमा
- (SS-परम्परा में सिद्ध त्रिज्या R = 3438′ — इस युग्म 2.15–16 की सारणी से; श्लोक स्वयं R नहीं गाता)

उदाहरण (worked example)
इनपुट-संकेत: jyā₁ = 225′; लक्ष्य N = 24 प्रविष्टियाँ, पद 3°45′।
पहला पिण्ड P₁ = 225′।
अगले खण्डक/पिण्ड 2.15–16 की लब्ध-ऊन-संयुक्त रीति से क्रमशः बनते हैं जब तक P₂₄ = R (परम्परा-सिद्ध 3438′) — 90° पर jyā = त्रिज्या।
जाँच: 24 × 3°45′ = 90° ठीक बैठता है; यह कोण-जाल की पूर्णता है, न कि आधुनिक sin-कैलकुलेटर का प्रमाण।

हमारा डिकोड (Our Decode) 24-jyārdha संरचना SS स्फुट की गणना-भाषा है; engine आज `sin`/`arcsin` से समकक्ष फल देता है, पर अध्याय-२ की ज्या-सीढ़ी का शास्त्रीय अनुशासन यहीं से बँधता है। dossier की honesty-line लागू: instrument को “Drik zero-error” कहकर hardcode नहीं किया जाता — पुरानी बनावटी सारणी हटाई जा चुकी; ज्या/स्फुट दोनों pinned fixtures पर `==` से जीते हैं, tolerance-पट्टी से नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) जाँच (प्रमेय): श्लोक के शब्दशः नियम (हर नया खण्डक = पिछला खण्डक − पिछली ज्या ÷ 225) से, बिना पूर्णांकन, 8वीं ज्या 1717 आती है (सारणी 1719) और 24वीं 3375 (सारणी 3438, 63′ कम)। अतः 2.17–2.22 की सारणी इस नियम का शब्दशः फल नहीं; ऊपर का “इनसे ये चौबीस पिण्ड बनते हैं” नियम का कथन है, सारणी की व्युत्पत्ति नहीं। Check: the literal rule does not reproduce the table (ss-chapters.test.js).

θज्या = R·sin θकोटिज्या = R·cos θउत्क्रमER = 3438′ (त्रिज्या in arc-minutes)प्रथम ज्या = 225′ (3°45′ का चाप)24 चरण × 3°45′ = 90°उत्क्रमज्या = R − R·cos θ(versine — छाया-गणित में प्रयुक्त)
ज्या-कोटिज्या-उत्क्रमज्या — the Indian half-chord construction (SS 2.15–2.27) that the world now calls the sine: for arc θ on radius R = 3438′, jyā = R·sin θ (vertical half-chord), koṭijyā = R·cos θ, utkramajyā = R − R·cos θ (versine). First jyā = 225′; the table climbs in 24 steps of 3°45′.
2.17
तत्त्वाश्विनो अङ्काब्धिकृता रूपभूमिधरर्तवः ।
खाङ्काष्टौ पञ्चशून्येशा बाणरूपगुणेन्दवः ।।
tattvāśvino aṅkābdhikṛtā rūpabhūmidharartavaḥ ।
khāṅkāṣṭau pañcaśūnyeśā bāṇarūpaguṇendavaḥ ।।
पाठ-भेद: शब्दों से कोई अंक-भेद नहीं निकलता — २२५, ४४९, ६७१; ८९०, ११०५, १३१५

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्त्व-अश्विनः = २५-२ → २२५ (तत्त्व = २५, अश्विन् = २; इकाई पहले); अङ्क-अब्धि-कृता = ९-४-४ → ४४९; रूप-भूमिधर-ऋतवः = १-७-६ → ६७१; ख-अङ्क-अष्टौ = ०-९-८ → ८९०; पञ्च-शून्य-ईशाः = ५-०-११ → ११०५; बाण-रूप-गुण-इन्दवः = ५-१-३-१ → १३१५; ज्यार्ध-पिण्डिका = त्रिज्या-गुणित अर्धज्या (R·sin θ) की सारणी-प्रविष्टि।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक सूर्यसिद्धान्त की प्रसिद्ध ज्या-सारणी के आरम्भिक छह मान देता है। प्रत्येक मान व्यासार्ध (त्रिज्या) R = ३४३८′ पर, ३°४५′ (एक राशि का अष्टमांश) के क्रमिक चापों पर अर्धज्या (आधुनिक R·sin) है। पहले पाद में तीन पिण्ड — २२५, ४४९, ६७१ — और दूसरे में ८९०, ११०५, १३१५ गिनाए गए हैं। ये पूर्णांक “पिण्ड” ही प्राचीन गणना के यन्त्र हैं, और ग्रन्थ स्वयं इन्हें प्रमाणित करता है: २.२३–२.२७ की प्रत्येक उत्क्रमज्या इन्हीं को उलटे क्रम से ३४३८ में से घटाकर बनती है।

English rendering This verse opens the Sūrya-Siddhānta Rsin table: six successive half-chord values at 3°45′ steps on radius R = 3438′. The verse words give 225, 449, 671, 890, 1105, 1315. The text proves them itself: the versed sines of 2.23–2.27 are 3438 minus these sines read backwards (3213 = 3438 − 225, 2767 = 3438 − 671).

गणित / The Mathematics Interval Δθ = 3°45′ = 225′; radius (vysāsārdha) R = 3438′ (stated fully at 2.22). Table entries J₁…J₆ (arcminutes of Rsin):
J₁ = 225, J₂ = 449, J₃ = 671, J₄ = 890, J₅ = 1105, J₆ = 1315.
Modern sense: Jₖ ≈ R × sin(k · 3°45′), rounded to integer arcminutes. Circle = 21,600′; R is an independent computational constant, not a physical rod.

उदाहरण (worked example) Convention: R = 3438′, θ = 7°30′ = 2 × 3°45′ → table J₂.
R × sin(7.5°) ≈ 3438 × 0.130526 ≈ 448.7 → rounds to 449, matching the verse.
For θ = 3°45′: 3438 × sin(3.75°) ≈ 224.86 → 225, which is what tattva-aśvin says.

हमारा डिकोड (Our Decode) Chapter-2 sphuṭa in `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` is the pure manda+śīghra chain; historically those phala steps rest on exactly this integer jyā infrastructure with R = 3438′. The sovereign engine (sphuta.js) uses this very table with the interpolation of 2.31–2.32; the audit keeps mean-longitude and sphuṭa layers separate, and exact `==` fixtures rather than tolerance bands — the same integer-faith spirit as these piṇḍas.

सुधार · correction (2026-10-07) पूर्व संस्करण में यहाँ २२४ और ६९१ छपे थे और उन्हें पाठ-भेद कहा गया था। श्लोक के शब्दों में ये संख्याएँ नहीं हैं (तत्त्व-अश्विन् = २२५, रूप-भूमिधर-ऋतु = ६७१), और ग्रन्थ की अपनी उत्क्रमज्या-सारणी (३२१३, २७६७) उन्हें अस्वीकार करती है। The earlier edition printed 224 and 691 and called them variants; the words and the versed-sine table rule them out. Check: ss-numbers.test.js.

2.18
शून्यलोचनपञ्चैकाश्छिद्ररूपमुनीन्दवः ।
वियच्चन्द्रातिधृतयो गुणरन्ध्राम्बराश्विनः ।।
śūnyalocanapañcaikāśchidrarūpamunīndavaḥ ।
viyaccandrātidhṛtayo guṇarandhrāmbarāśvinaḥ ।।
पाठ-भेद: १५२०, १७१९; १९१०, २०९३

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शून्य-लोचन-पञ्च-एकाः = ०-२-५-१ → १५२०; छिद्र-रूप-मुनि-इन्दवः = ९-१-७-१ → १७१९; वियत्-चन्द्र-…धृतयः = १९१०; गुण-रन्ध्र-अम्बर-अश्विनः = ३-९-०-२ → २०९३; ज्यार्ध-पिण्ड = क्रमिक R·sin मान।

हिन्दी भावार्थ ज्या-सारणी आगे बढ़ती है — सातवें से दसवें पिण्ड तक। शून्य-लोचन-पञ्च-एक से १५२०, छिद्र-रूप-मुनि-इन्दु से १७१९, फिर १९१० और गुण-रन्ध्र-अम्बर-अश्विन् से २०९३। प्रत्येक अगला मान पूर्व की अपेक्षा थोड़ा कम “वृद्धि” दिखाता है: ज्या वक्र धीरे-धीरे झुक रहा है। यही पूर्णांक श्रृंखला ग्रह-मन्द/शीघ्र फल की प्राचीन सारणी-गणित की रीढ़ है।

English rendering Four further Rsin piṇḍas at the next 3°45′ steps: 1520, 1719, 1910, and 2093 (arcminutes on R = 3438′). The successive increments steadily shrink, as expected from the sine curve past the first quadrant-eighths.

गणित / The Mathematics J₇ = 1520, J₈ = 1719, J₉ = 1910, J₁₀ = 2093.
First differences (khaṇḍa, for sense):
1520−1315 = 205; 1719−1520 = 199; 1910−1719 = 191; 2093−1910 = 183.
Angles: 26°15′, 30°, 33°45′, 37°30′ respectively (from 0° at the table’s origin).

उदाहरण (worked example) θ = 30° = 8 × 3°45′ → J₈.
R × sin(30°) = 3438 × 0.5 = 1719 exactly — the verse’s १७१९ is not an approximation here but an exact hit of the chosen R.

हमारा डिकोड (Our Decode) Exact hits like R/2 = 1719 at 30° are why the SS radius 3438 is “sealed” in our notes: the table is a fixed computational convention, not a floating modern sin re-fit. Cross-checks against Swiss/JPL never overwrite these śāstra constants; they only audit the synthesis lab.

2.19
मुनिषड्यमनेत्राणि चन्द्राग्निकृतदस्रकाः ।
पञ्चाष्टविषयाक्षीणि कुञ्जराश्विनगाश्विनः ।।
muniṣaḍyamanetrāṇi candrāgnikṛtadasrakāḥ ।
pañcāṣṭaviṣayākṣīṇi kuñjarāśvinagāśvinaḥ ।।
पाठ-भेद: २२६७, २४३१; २५८५, २७२८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुनि-षट्-यम-नेत्राणि = ७-६-२-२ → २२६७; चन्द्र-अग्नि-कृत-दस्रकाः = १-३-४-२ → २४३१; पञ्च-अष्ट-विषय-अक्षीणि = ५-८-५-२ → २५८५; कुञ्जर-अश्विन्-नग-अश्विनः = ८-२-७-२ → २७२८।

हिन्दी भावार्थ ग्यारहवें से चौदहवें ज्या-पिण्ड: २२६७, २४३१, २५८५, २७२८। चाप अब ४१°१५′ से ५२°३०′ के क्षेत्र में है; वृद्धि और भी धीमी पड़ रही है। भूतसंख्यक पद — मुनि, अग्नि, कुञ्जर, अश्विन् — अंकों को स्मृति-योग्य बनाते हैं, ताकि गणक सारणी को हृदयस्थ रख सके।

English rendering The next four half-chords: 2267, 2431, 2585, 2728. These cover steps 11–14 of the 24-entry quadrant table (angles 41°15′ through 52°30′).

गणित / The Mathematics J₁₁ = 2267, J₁₂ = 2431, J₁₃ = 2585, J₁₄ = 2728.
Δ: 174, 164, 154, 143 (continuing the smooth decline of successive differences).
Identity check near mid-quadrant: at 45° one expects R/√2 ≈ 3438 × 0.707107 ≈ 2431.0 — and J₁₂ = 2431 sits at 45° exactly (12 × 3°45′).

उदाहरण (worked example) θ = 45° → J₁₂.
3438 / √2 ≈ 2431.02 → integer 2431, matching चन्द्राग्निकृतदस्रकाः. Input convention: pure geometric sin, R fixed at 3438′, no ayanāṃśa (table is orbital-argument trig, not star longitudes).

2.20
रन्ध्रपञ्चाष्टकयमा वस्वद्र्यङ्कयमास्तथा ।
कृताष्टशून्यज्वलना नगाद्रिशशिवह्नयः ।।
randhrapañcāṣṭakayamā vasvadryaṅkayamāstathā ।
kṛtāṣṭaśūnyajvalanā nagādriśaśivahnayaḥ ।।
पाठ-भेद: शब्दों से कोई अंक-भेद नहीं — २८५९, २९७८; ३०८४, ३१७७

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्र-पञ्च-अष्टक-यमाः = ९-५-८-२ → २८५९; वसु-अद्रि-अङ्क-यमाः = ८-७-९-२ → २९७८; कृत-अष्ट-शून्य-ज्वलनाः = ४-८-०-३ → ३०८४; नग-अद्रि-शशि-वह्नयः = ७-७-१-३ → ३१७७ (इकाई पहले: ७, ७, १, ३)।

हिन्दी भावार्थ पंद्रहवें से अठारहवें पिण्ड — २८५९, २९७८, ३०८४, ३१७७ — ज्या को ५६°१५′ से ६७°३०′ तक ले जाते हैं। अब प्रत्येक कदम पर वृद्धि लगभग ११९, १०६, ९३ जैसी रह गई है; वक्र शिखर (९०°) की ओर मुड़ रहा है। ये ही वे संख्याएँ हैं जिनसे मन्दोच्च-केन्द्र और शीघ्रोच्च-केन्द्र के ज्या-फल निकाले जाते थे।

English rendering Steps 15–18 of the Rsin table: 2859, 2978, 3084, 3177. The first differences continue to fall as the argument climbs through the upper second half of the quadrant’s first 90°.

गणित / The Mathematics J₁₅ = 2859, J₁₆ = 2978, J₁₇ = 3084, J₁₈ = 3177.
Δ: 131, 119, 106, 93. The text checks it: the versed sine 261 of 2.23 is 3438 − 3177.
Angles: 56°15′, 60°, 63°45′, 67°30′.
At 60°: R × sin(60°) = 3438 × √3/2 ≈ 3438 × 0.866025 ≈ 2977.4 → 2978 (verse).

उदाहरण (worked example) θ = 60° = 16 × 3°45′.
3438 × (√3/2) ≈ 2977.4, rounded to 2978 = वस्वद्र्यङ्कयमाः. Rounding convention of the śāstra: nearest integer arcminute of Rsin.

हमारा डिकोड (Our Decode) In the sealed sphuṭa engine, manda-phala = arcsin((R_manda/360)·sin κ) and the śīghra denominator √(R_def² + R_ś² + 2·R_def·R_ś·cos K) are the continuous form of what these tables discretised. We do not re-fit 3438 to modern R; we keep SS constants and report residual against sky instruments honestly.

सुधार · correction (2026-10-07) पूर्व संस्करण में ३१७९ छपा था, जबकि उसी पंक्ति का अपना पद-विभाग ७-७-१-३ पढ़ता है, जो इकाई-पहले ३१७७ है। उत्क्रमज्या २६१ = ३४३८ − ३१७७ इसे पुष्ट करती है। The earlier edition decoded 7-7-1-3 and printed 3179; units-first it is 3177, confirmed by the versed sine 261.

2.21
षट्पञ्चलोचनगुणाश्चन्द्रनेत्राग्निवह्नयः ।
यमाद्रिवह्निज्वलना रन्ध्रशून्यार्नवाग्नयः ।।
ṣaṭpañcalocanaguṇāścandranetrāgnivahnayaḥ ।
yamādrivahnijvalanā randhraśūnyārnavāgnayaḥ ।।
पाठ-भेद: शब्दों से कोई अंक-भेद नहीं — ३२५६, ३३२१; ३३७२, ३४०९

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षट्-पञ्च-लोचन-गुणाः = ६-५-२-३ → ३२५६; चन्द्र-नेत्र-अग्नि-वह्नयः = १-२-३-३ → ३३२१; यम-अद्रि-वह्नि-ज्वलनाः = २-७-३-३ → ३३७२; रन्ध्र-शून्य-अर्णव-अग्नयः = ९-०-४-३ → ३४०९।

हिन्दी भावार्थ उन्नीसवें से बाईसवें पिण्ड: ३२५६, ३३२१, ३३७२, और रन्ध्र-शून्य-अर्णव-अग्नि से शब्दशः ३४०९। चाप ७१°१५′ से ८२°३०′ तक है; ज्या अब त्रिज्या के अत्यन्त निकट पहुँच चुकी है। अन्तिम दो कदमों की वृद्धि बहुत छोटी रह जाती है।

English rendering Table steps 19–22: 3256, 3321, 3372, and 3409, each read from its own words. Arguments: 71°15′, 75°, 78°45′, 82°30′.

गणित / The Mathematics J₁₉ = 3256, J₂₀ = 3321, J₂₁ = 3372, J₂₂ = 3409.
Δ: 79, 65, 51, 37 (from J₁₈ = 3177). The versed sine 29 of 2.23 is 3438 − 3409.
At 75°: 3438 × sin(75°) = 3438 × (√6+√2)/4 ≈ 3438 × 0.965926 ≈ 3320.8 → 3321.

उदाहरण (worked example) θ = 75° = 20 × 3°45′.
sin(75°) = (√6+√2)/4 ≈ 0.965925826.
3438 × 0.965925826 ≈ 3320.85 → 3321 = चन्द्रनेत्राग्निवह्नयः.

सुधार · correction (2026-10-07) पूर्व संस्करण में श्लोक के अन्त में एक भटका अंक-अंश (३४०१) छपा था और उसे पाठ-भेद माना गया था; वह श्लोक का भाग नहीं है। अन्तर ७७ भी पुराने ३१७९ से निकला था; सही ७९ है। A stray fragment was printed after the verse and treated as a variant; it is not part of the verse.

2.22
रूपाग्निसागरगुणा वस्वग्निकृतवह्नयः ।
प्रोज्झ्योत्क्रमेण व्यासार्धादुत्क्रमज्यार्धपिण्डिकाः ।।
rūpāgnisāgaraguṇā vasvagnikṛtavahnayaḥ ।
projjhyotkrameṇa vyāsārdhādutkramajyārdhapiṇḍikāḥ ।।
पाठ-भेद: ३४३१, ३४३८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रूप-अग्नि-सागर-गुणाः = १-३-४-३ → ३४३१; वसु-अग्नि-कृत-वह्नयः = ८-३-४-३ → ३४३८; प्रोज्झ्य = त्याग कर / घटा कर; उत्क्रमेण = उलटी दिशा (अन्तिम पिण्ड से आरम्भ) में; व्यासार्धात् = त्रिज्या R से; उत्क्रम-ज्या-अर्ध-पिण्डिकाः = उत्क्रमज्या (versine-प्रकार) की अर्धज्या-सारणी।

हिन्दी भावार्थ सारणी के अन्तिम दो ज्या-पिण्ड: ३४३१ (८६°१५′) और ३४३८ (९०°)। ३४३८ ही व्यासार्ध — पूरी त्रिज्या — है; ९०° पर jyā = R। फिर विधि-सूत्र: व्यासार्ध से उत्क्रम क्रम में (अन्तिम ज्या-खण्डों को उलटा घटाते हुए) उत्क्रमज्या-पिण्डिकाएँ बनती हैं। अर्थात् कोज्या-सारणी को सीधा न लिखकर, दी गई ज्या-सारणी के पूरक से उत्क्रमज्या निकालने का नियम।

English rendering Final two Rsines: 3431 and 3438. The last is the radius itself (sin 90° = 1 ⇒ jyā = R). Then the algorithm: by successive reverse subtraction from that semi-diameter one constructs the utkrama-jyā (versed-sine) half-chord table.

गणित / The Mathematics J₂₃ = 3431, J₂₄ = R = 3438.
Utkrama construction (from this verse’s rule, completed in 2.23–24):
Uₖ = R − J₂₄₋ₖ for k = 1, 2, … (with J₀ = 0),
i.e. U₁ = 3438 − 3431 = 7, U₂ = 3438 − 3409 = 29, …
Modern identity: utkrama-jyā(θ) = R − R·cos θ = R(1 − cos θ) = 2 R sin²(θ/2) (versine × R).
No LaTeX: U(θ) = R − R × cos θ = 2 × R × sin²(θ/2).

उदाहरण (worked example) θ = 3°45′.
U₁ = R − J₂₃ = 3438 − 3431 = 7.
Check: 2 × 3438 × sin²(1.875°) ≈ 6876 × (0.032719)² ≈ 6876 × 0.0010705 ≈ 7.36 → nearest integer 7.
θ = 90°: U₂₄ = R − 0 = 3438.

हमारा डिकोड (Our Decode) R = 3438 is the single scale that ties jyā, utkrama-jyā, and the epicycle R_manda / R_śīghra ratios in Chapter 2. Our pure-SS sphuṭa file implements the geometric phala with that spirit (mean epicycle constants from the words of SS 2.34–38: Sun 13°50′, Moon 31°50′, Mars 73.5°). (Correction 2026-10-07: this paragraph earlier gave Sun 13°40′ and Mars 72.5° as means. 13°40′ is the Sun's odd end, not its mean, and 72.5 came from the misprinted Mars odd end of 70. The verse words of 2.34-2.35 give Sun 14°/13°40′, Moon 32°/31°40′, Mars 75°/72°, Mercury 30°/28°, Jupiter 33°/32°, Venus 12°/11°, Saturn 49°/48°. Whatever the KAAL file holds is left for the owner to correct.) Floating cos/sin replace the piṇḍa look-up; the model chain stays śāstra-side, not Swiss-gated.

2.23
मुनयो रन्ध्रयमला रसषट्का मुनीश्वराः ।
द्व्यष्टैका रूपषड्दस्राः सागरार्थहुताशनाः ।
munayo randhrayamalā rasaṣaṭkā munīśvarāḥ ।
dvyaṣṭaikā rūpaṣaḍdasrāḥ sāgarārthahutāśanāḥ ।
पाठ-भेद: ७, २९, ६६, ११७; १८२, २६१, ३५४

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मुनयः = ७; रन्ध्र-यमलाः = ९-२ → २९; रस-षट्काः = ६-६ → ६६; मुनि-ईश्वराः = ७-११ → ११७; द्वि-अष्ट-एकाः = २-८-१ → १८२; रूप-षट्-दस्राः = १-६-२ → २६१; सागर-अर्थ-हुताशनाः = ४-५-३ → ३५४; उत्क्रमज्या-पिण्ड = R(1−cos) प्रकार की सारणी।

हिन्दी भावार्थ अब उत्क्रमज्या की सात आरम्भिक पिण्डिकाएँ: ७, २९, ६६, ११७, १८२, २६१, ३५४। ये ठीक उसी व्यासार्ध ३४३८ से, ज्या-सारणी को उलटा घटाकर (२.२२) प्राप्त होती हैं। जहाँ साधारण ज्या चाप के साथ तेज़ी से बढ़ती है, उत्क्रमज्या शून्य से धीरे उठती है — कोज्या की कमी का लेखा।

English rendering The first seven utkrama-jyā values: 7, 29, 66, 117, 182, 261, 354. They are the reverse-complement construction of the Rsin table against R = 3438′, not an independent observation set.

गणित / The Mathematics U₁…U₇ = 7, 29, 66, 117, 182, 261, 354.
Verification from J-table:
U₁ = 3438 − 3431 = 7
U₂ = 3438 − 3409 = 29
U₃ = 3438 − 3372 = 66
U₄ = 3438 − 3321 = 117
U₅ = 3438 − 3256 = 182
U₆ = 3438 − 3179 = 259 ≈ 261 (integer table rounding; verse 261)
U₇ = 3438 − 3084 = 354.
U(θ) = R − R cos θ; successive ΔU grow where successive ΔJ shrink.

उदाहरण (worked example) θ = 15° = 4 × 3°45′ → U₄ = 117.
R(1 − cos 15°) = 3438 × (1 − 0.9659258) ≈ 3438 × 0.034074 ≈ 117.15 → 117.
Convention: same R = 3438′, angles from the jyā grid, integer arcminutes.

हमारा डिकोड (Our Decode) Exact reverse-sum identities (Uₖ + J₂₄₋ₖ = R) are the kind of invariant our oracle discipline loves: `==` on the pin, no ± band. A ±3 band once hid a real −1 elsewhere in the stack; these tables train the same habit — one unit off is a real discrepancy, not noise.

2.24
खर्तुवेदा नवाद्र्यर्था दिङ्नागास्त्र्यर्थकुञ्जराः ।
नगाम्बरवियच्चन्द्रा रूपभूधरशङ्कराः ।।
khartuvedā navādryarthā diṅnāgāstryarthakuñjarāḥ ।
nagāmbaraviyaccandrā rūpabhūdharaśaṅkarāḥ ।।
पाठ-भेद: ४६०, ७१०, ८५३; १००७, ११७१

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ख-ऋतु-वेदाः = ०-६-४ → ४६०; नव-अद्रि-अर्थाः = ९-७-५ → ५७९; दिङ्-नागाः = दिशा(१०)-नाग(८) — सारणी-मान ७१० (शब्द से ८१० भी पढ़ा जा सकता है; पाठ/सन्धि-भेद संभव); त्रि-अर्थ-कुञ्जराः = ३-५-८ → ८५३; नग-अम्बर-वियत्-चन्द्राः = ७-०-०-१ → १००७; रूप-भूधर-शङ्कराः = १-७-११ → ११७१।

हिन्दी भावार्थ उत्क्रमज्या आगे: ४६०, ५७९, ७१०, ८५३, १००७, ११७१ — आठवें से तेरहवें पिण्ड तक (३०° से ४८°४५′ के उत्क्रम-चाप)। कोष्ठक-सूची में ५७९ कभी छूट जाता है, पर शब्द नव-अद्रि-अर्थ और R − J पूरक दोनों ५७९ देते हैं। शङ्कर (११) और भूधर (७) जैसे पद स्मृति को बाँधते हैं; संख्या स्वयं ज्या-सारणी की छाया है।

English rendering Six further versed-sine piṇḍas: 460, 579, 710, 853, 1007, 1171. They continue the reverse-complement of the Rsin table through the middle of the quadrant and must sum with the complementary jyā to R = 3438′.

गणित / The Mathematics U₈…U₁₃ = 460, 579, 710, 853, 1007, 1171.
Complement checks:
U₈ + J₁₆ = 460 + 2978 = 3438
U₉ + J₁₅ = 579 + 2859 = 3438
U₁₀ + J₁₄ = 710 + 2728 = 3438
U₁₁ + J₁₃ = 853 + 2585 = 3438
U₁₂ + J₁₂ = 1007 + 2431 = 3438
U₁₃ + J₁₁ = 1171 + 2267 = 3438.
Closed form: Uₖ + J₂₄₋ₖ = R (exact integer identity of the paired tables).

उदाहरण (worked example) θ = 30° → U₈.
R(1 − cos 30°) = 3438 × (1 − √3/2) ≈ 3438 × 0.1339746 ≈ 460.6 → 460 = खर्तुवेदाः.
Cross-check: J at 60° was 2978; 3438 − 2978 = 460. Same number, two paths.

हमारा डिकोड (Our Decode) These paired identities (jyā + utkrama-jyā of complements = R) are the śāstra’s own “oracle”: two constructions, one constant. Our stack separates source table, computational model, and sky cross-check the same way — bharat-ephemeris-offline as mean-longitude lab, sphuṭa sealed pure, Swiss only as fixture reference, never as proof-authority over the Siddhānta chain.

2.25
शरार्णवहुताशैका भुजङ्गाक्षिशरेन्दवः ।
नवरूपमहीध्रैका गजैकाङ्कनिशाकराः ।।
śarārṇavahutāśaikā bhujaṅgākṣiśarendavaḥ ।
navarūpamahīdhraikā gajaikāṅkaniśākarāḥ ।।
पाठ-भेद: १३४५, १५२८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शर = ५ (बाण), अर्णव = ४ (समुद्र), हुताश = ३ (अग्नि), एक = १ → १३४५; भुजङ्ग = ८ (सर्प), अक्षि = २ (नेत्र), शर = ५, इन्दु = १ → १५२८; नव = ९, रूप = १, महीध्र = ७ (पर्वत), एक = १ → १७१९; गज = ८ (हाथी), एक = १, अङ्क = ९, निशाकर = १ (चन्द्र) → १९१८; उत्क्रमज्या-अर्धपिण्ड = वर्सड्-साइन की अर्ध-तालिका के पिण्ड।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक उत्क्रमज्या (versed sine) की अर्ध-पिण्ड तालिका के चार क्रमिक मान भूतसंख्या में बाँधकर देता है। अंकों को इकाई से बाईं ओर पढ़ें — जैसा प्राचीन रीति है — तो क्रमशः १३४५, १५२८, १७१९ और १९१८ प्राप्त होते हैं। ये मान त्रिज्या-प्रणाली की उसी सारणी की कड़ियाँ हैं जो आगे के श्लोकों में ३४३८ तक पहुँचती है। तालिका गणना का कच्चा माल है, न कि दार्शनिक कथन।

English rendering Four successive half-table entries of the utkrama-jyā (versed sine) are encoded in word-numerals: 1345, 1528, 1719 and 1918. Read digit-wise from the units place leftward, in the classical bhūtasaṃkhyā order.

गणित / The Mathematics उत्क्रमज्या-अर्धपिण्ड (R = 3438 माप-प्रणाली में):
- j_u = 1345, 1528, 1719, 1918
भूतसंख्या-रूपान्तरण (इकाई → बाएँ): शर-अर्णव-हुताश-एक = ५-४-३-१ → १३४५; भुजङ्ग-अक्षि-शर-इन्दु = ८-२-५-१ → १५२८; नव-रूप-महीध्र-एक = ९-१-७-१ → १७१९; गज-एक-अङ्क-निशाकर = ८-१-९-१ → १९१८।

उदाहरण (worked example) मान लें तालिका-क्रम में कोई चरण-कोण θ के लिए उत्क्रमज्या = 1528 (R = 3438)। तब versed sine अंश में: versin θ = 1528/3438 ≈ 0.4444; समतुल्य cos θ = 1 − versin θ ≈ 0.5556 (त्रिज्या-एकक में)। यह केवल सारणी-मान का आधुनिक अनुवाद है — युग/अयनांश यहाँ लागू नहीं।

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सुधार · correction (2026-10-07) श्लोक-पाठ के अन्त में भटका अंक-अंश हटाया गया; मान पद-विभाग में ही हैं। A stray fragment after the verse line was removed.

2.26
गुणाश्विरूपनेत्राणि पावकाग्निगुणाश्विनः ।
वस्वर्णवार्थयमलास्तुरङ्गर्तुनगाश्विनः ।।
guṇāśvirūpanetrāṇi pāvakāgniguṇāśvinaḥ ।
vasvarṇavārthayamalāsturaṅgartunagāśvinaḥ ।।
पाठ-भेद: २१२३, २३३३; २५४८, २७६७

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुण = ३, अश्वि = २, रूप = १, नेत्र = २ → २१२३; पावक = ३, अग्नि = ३, गुण = ३, अश्वि = २ → २३३३; वसु = ८, अर्णव = ४, अर्थ = ५, यमल = २ → २५४८; तुरङ्ग = ७ (अश्व), ऋतु = ६, नग = ७ (पर्वत), अश्वि = २ → २७६७।

हिन्दी भावार्थ उत्क्रमज्या-तालिका आगे बढ़ती है — चार और पिण्ड: २१२३, २३३३, २५४८, २७६७। शब्द-अंक वही प्राचीन कूट हैं; अर्थ पाँच (पञ्च अर्थ/विषय) के रूप में, यमल युग्म-दो के रूप में पढ़े जाते हैं। सारणी का यह मध्य-भाग कोण बढ़ने पर versed sine के तीव्र उत्थान को दर्शाता है।

English rendering The next four utkrama-jyā half-table values are 2123, 2333, 2548 and 2767, again in bhūtasaṃkhyā. The digit order is units-first, classical.

गणित / The Mathematics उत्क्रमज्या-अर्धपिण्ड (क्रमशः):
- 2123 = गुण-अश्वि-रूप-नेत्र (३-२-१-२, इकाई से)
- 2333 = पावक-अग्नि-गुण-अश्वि (३-३-३-२)
- 2548 = वसु-अर्णव-अर्थ-यमल (८-४-५-२)
- 2767 = तुरङ्ग-ऋतु-नग-अश्वि (७-६-७-२)

उदाहरण (worked example) मान 2548 पर, R = 3438: versin = 2548/3438 ≈ 0.7411; cos ≈ 0.2589। सारणी-अन्तर 2333 → 2548 = 215; 2548 → 2767 = 219 — लगभग समान चरण, जैसा ३°४५′ की नियमित जाल में अपेक्षित।

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2.27
नवाष्टनवनेत्राणि पावकैकयमाग्नयः ।
गजाग्निसागरगुणा उत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ।।
navāṣṭanavanetrāṇi pāvakaikayamāgnayaḥ ।
gajāgnisāgaraguṇā utkramajyārdhapiṇḍakāḥ ।।
पाठ-भेद: शब्दों से कोई अंक-भेद नहीं — २९८९, ३२१३; ३४३८

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नव = ९, अष्ट = ८, नव = ९, नेत्र = २ → २९८९; पावक = ३, एक = १, यम = २, अग्नि = ३ → ३२१३ (इकाई पहले); गज = ८, अग्नि = ३, सागर = ४, गुण = ३ → ३४३८; उत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः = उत्क्रमज्या की अर्ध-तालिका के (अन्तिम) पिण्ड।

हिन्दी भावार्थ तालिका के अन्तिम तीन मान: २९८९, ३२१३ और ३४३८। अन्तिम संख्या — गजाग्निसागरगुणा — स्वयं त्रिज्या (R) है: पूर्ण वृत्त की ज्या-प्रणाली की इकाई-त्रिज्या ३४३८ कला-इकाइयों में। श्लोक स्पष्ट कहता है — ये उत्क्रमज्या के अर्धपिण्ड हैं; क्रमज्या-तालिका से यह स्तम्भ अलग है, यद्यपि माप-एक ही R साझा करते हैं।

English rendering The closing utkrama-jyā entries are 2989, 3213 and 3438. The last is the trigonometric radius R itself; the verse names the whole set utkrama-jyārdha-piṇḍaka — half-table versed-sine quantities.

गणित / The Mathematics
- j_u ∈ {2989, 3213, 3438}
- त्रिज्या R = 3438 (गजाग्निसागरगुणा: ८-३-४-३ → ३४३८)
- पूर्ण उत्क्रम पर j_u(90°) = R; अर्थात् versin 90° = 1 जब एकक-त्रिज्या में लें।
- पावकैकयमाग्नयः = ३-१-२-३ → ३२१३; प्रमाण: ३२१३ = ३४३८ − २२५ (२.१७ का पहला ज्या-पिण्ड), २९८९ = ३४३८ − ४४९।

उदाहरण (worked example) R = 3438 पर अन्तिम मान: versin 90° = 3438/3438 = 1। तुरंत पहले 3213: versin 86°15′ = 3213/3438 ≈ 0.9346, अर्थात् R·cos 86°15′ = 3438 − 3213 = 225 — ठीक २.१७ का पहला ज्या-पिण्ड। इनपुट-परम्परा: SS अर्ध-ज्या तालिका, २४ चरण × २२५′ = ९०°।

हमारा डिकोड (Our Decode) R = 3438 वही त्रिज्या है जो स्फुट-इंजन की manda/śīghra चाप-ज्या श्रृंखला में माप-एकक बनती है — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` arcsin((R_manda/360)·sin κ) तथा शीघ्र-फल के हर मूल में यही इकाई निहित रहती है। तालिका स्वयं ephemeris नहीं; वह शुद्ध त्रिकोणमिति का कच्चा माल है जिसे अध्याय-२ का स्फुट-क्रम बाद में खाता है।

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सुधार · correction (2026-10-07) पूर्व संस्करण ने स्वयं लिखा था कि शब्द ३-१-२-३ → ३२१३ देते हैं, फिर भी ३२९३ छापा। विधि (उत्क्रमज्या = त्रिज्या − उलटी ज्या) ३२१३ ही देती है। The earlier edition noted that the words give 3213 and printed 3293 anyway; the construction gives 3213.

2.28
परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्दवः ।
तद्गुणा ज्या त्रिजीवाप्ता तच्चापं क्रान्तिरुच्यते ।।
paramāpakramajyā tu saptarandhraguṇendavaḥ ।
tadguṇā jyā trijīvāptā taccāpaṃ krāntirucyate ।।
पाठ-भेद: १३९७; C इष्यते

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परमापक्रमज्या = अधिकतम क्रान्ति (ε) की ज्या; सप्त = ७, रन्ध्र = ९, गुण = ३, इन्दु = १ → १३९७; तद्गुणा ज्या = उस (परमापक्रमज्या) से गुणित अभीष्ट ज्या; त्रिजीवा = R (त्रिज्या); आप्त = विभाजित फल; तच्चापं = उस फल का चाप; क्रान्ति = declination; उच्यते / C इष्यते = कही जाती है / वांछित है।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अधिकतम अपक्रम-ज्या १३९७ है — अर्थात् R·sin ε = १३९७। किसी अभीष्ट राशि-कोण की ज्या को इससे गुणा कर त्रिज्या से भाग दें; जो फल आए, उसका चाप ही क्रान्ति कहलाता है। यह विषुव-वृत्तीय कोण से क्रान्ति निकालने का सीधा ज्या-अनुपात है। पाठ C में “इष्यते” — अभीष्ट क्रान्ति — मात्र शैली-भेद है, सूत्र नहीं बदलता।

English rendering The sine of maximum declination is 1397 (in the R = 3438 system). Multiply that constant by the desired sine, divide by the trigonometric radius; the arc of the quotient is the declination (krānti).

गणित / The Mathematics
- परमापक्रमज्या = R sin ε = 1397
- R = 3438 (पूर्व श्लोक से)
- sin ε = 1397/3438 ≈ 0.40634 ⇒ ε ≈ 23.975° ≈ 24° (शास्त्रीय पूर्णांक)
- क्रान्ति-ज्या: sin δ = (1397 × jyā(λ)) / 3438
जहाँ jyā(λ) = R sin λ, λ = अभीष्ट भू-केन्द्रीय/क्रान्तिवृत्तिय कोण (परम्परा-निर्भर)
- δ = चाप(sin δ) = krānti

उदाहरण (worked example) λ = 90° पर jyā = R = 3438:
sin δ = (1397 × 3438) / 3438 = 1397/3438 ⇒ δ = ε ≈ 23.975° — ठीक अधिकतम क्रान्ति।
λ = 0° पर jyā = 0 ⇒ δ = 0° (विषुव)।
परम्परा: R = 3438 कला-इकाई; अयनांश यहाँ अप्रासंगिक (यह कोणीय ज्या-अनुपात है)।

हमारा डिकोड (Our Decode) closed-form लग्न-सूत्र में obliquity ε एक घोषित इनपुट है (MATHEMATICAL-AUDIT §8: longitude, latitude, obliquity, sidereal time)। हम ε को “आधुनिक सत्य” से नहीं थोपते — SS का 1397/3438 स्वयं एक selectable convention है, ठीक जैसे अयनांश ५४″ / ४९.२″ / ±२७° trepidation कतार में रखे जाते हैं।

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2.29
ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात्तथा शीघ्राद्विशोध्य च ।
शेषं केन्द्रपदं तस्माद्भुजज्या कोटिरेव च ।।
grahaṃ saṃśodhya mandoccāttathā śīghrādviśodhya ca ।
śeṣaṃ kendrapadaṃ tasmādbhujajyā koṭireva ca ।।
पाठ-भेद: C केन्द्रं पदं

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह = मध्यम/स्फुट-पूर्व ग्रह-स्थान; संशोध्य = घटाकर; मन्दोच्चात् = मन्दोच्च से; तथा = और; शीघ्रात् = शीघ्रोच्च से; विशोध्य = घटाकर; शेषं = शेष; केन्द्रपदं = केन्द्र (anomaly) और उसका पद (quadrant); तस्मात् = उससे; भुजज्या = भुज की ज्या (sine of bhuja); कोटि = कोटि-ज्या (cosine); C केन्द्रं पदं = केन्द्र और पद पृथक् पढ़ने का पाठ।

हिन्दी भावार्थ ग्रह को मन्दोच्च से शुद्ध करें — शेष मन्द-केन्द्र है; शीघ्रोच्च से घटाने (या शीघ्र-क्रम में उचित व्यवकलन) पर शीघ्र-केन्द्र मिलता है। केन्द्र का पद (कौन-सा चतुर्थांश) तय करता है कि भुज और कोटि कैसे लें; फिर भुजज्या और कोटिज्या निकालें। यही अध्याय-२ के स्फुट-क्रम का द्वार है — फल आगे की ज्या-तालिका और चाप-सूत्रों से बँधते हैं।

English rendering Subtract the planet from its manda-apex (grahaṃ saṃśodhya mandoccāt), and likewise subtract it from the śīghra-apex; the remainder is the kendra with its quadrant. From that kendra take the base-sine (bhujajyā) and the perpendicular (koṭi).

गणित / The Mathematics
- मन्द-केन्द्र: κ_m = मन्दोच्च − ग्रह (mod 360°) [“ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात्”: मन्दोच्च से ग्रह घटाओ]
- शीघ्र-केन्द्र: κ_ś = शीघ्रोच्च − (मन्द-शोधित ग्रह) [बाह्य/आन्तर क्रम शास्त्रानुसार]
- पद p = ⌊κ / 90°⌋ ∈ {0,1,2,3}; भुज = पद-के भीतर की चाप; कोटि = 90° − भुज (पद-नियम २.३० से)
- भुजज्या = jyā(भुज); कोटिज्या = jyā(कोटि)

उदाहरण (worked example) मान लें मध्यम ग्रह = 100°, मन्दोच्च = 130° ⇒ κ_m = 130° − 100° = 30°। पद = 0 (प्रथम, विषम); भुज = 30°, कोटि = 60°। R = 3438 पर: भुजज्या = 3438 × sin 30° = 1719; कोटिज्या = 3438 × sin 60° ≈ 2977। (आधुनिक sin केवल जाँच; इंजन तालिका+अन्तर्वेशन २.३१–३२ से भी चल सकता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही परिभाषा `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` की नींव है: κ_manda = madhya − mandocca; फिर manda-phala = arcsin((R_manda/360)·sin κ); शीघ्र पक्ष में K_śīghra = śīghrocca − L_manda-corrected। चार-चरण SS iteration (half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra) बिना किसी पाश्चात्य प्रमेय के — sealed 2026-05-17। बाहरी ग्रह: śīghrocca = mean Sun; आन्तरिक: madhya = mean Sun।

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सुधार · correction (2026-10-07) पहले केन्द्र “ग्रह − मन्दोच्च” लिखा था। “ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात्” = मन्दोच्च में से ग्रह घटाकर; अतः κ = मन्दोच्च − ग्रह, और 2.45 का चिह्न-नियम (मेष-कन्या में धन) इसी केन्द्र पर बैठता है। sphuta.js और spanda-ganita.js यही लेते हैं। 2.5 का सूत्र भी इसी अनुसार सुधारा गया। Correction: kendra = apex − planet, as the verse says.

2.30
गताद्भुजज्या विषमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् ।
युग्मे तु गम्याद्बाहुज्या कोटिज्या तु गताद्भवेत् ।।
gatādbhujajyā viṣame gamyātkoṭiḥ pade bhavet ।
yugme tu gamyādbāhujyā koṭijyā tu gatādbhavet ।।
पाठ-भेद: C समे

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गतात् = गत चाप से (पद में तय की हुई दूरी); भुजज्या = भुज की ज्या; विषमे = विषम पद में (१, ३); गम्यात् = गम्य (शेष) चाप से; कोटिः = कोटि-ज्या; पदे = पद में; युग्मे / * / C समे = सम पद में (२, ४); गम्याद्बाहुज्या = गम्य से भुज-ज्या; कोटिज्या तु गतात् = कोटि गत से।

हिन्दी भावार्थ विषम चतुर्थांश में भुजज्या गत-चाप से लें, कोटि गम्य-चाप से। सम चतुर्थांश में उल्टा — भुज गम्य से, कोटि गत से। यह केवल ज्या/कोज्या के चिह्न और पूरक-कोण का पद-नियम है; केन्द्र स्वयं ०°–३६०° पर घूमता है, और प्रत्येक ९०° पर “भुज” की परिभाषा पलटती है। तारांकित “युग्मे” और पाठ C “समे” अर्थतः एक ही वर्ग — सम पद।

English rendering In an odd quadrant, take the base-sine from the arc already traversed and the perpendicular from the arc still to go; in an even quadrant, reverse the assignment. The starred yugme and the C-reading same are the even-quadrant rule under two names.

गणित / The Mathematics κ ∈ [0°, 360°); r = κ mod 90°; gata = r; gamya = 90° − r।
- विषम पद (p = 0, 2 अर्थात् I, III): भुजज्या = jyā(gata); कोटिज्या = jyā(gamya)
- सम/युग्म पद (p = 1, 3 अर्थात् II, IV): भुजज्या = jyā(gamya); कोटिज्या = jyā(gata)
आधुनिक तुल्य: sin/cos के quadrant signs को SS भुज-कोटि भाषा में बाँधना।

उदाहरण (worked example) κ = 120° ⇒ p = 1 (सम), r = 30°, gata = 30°, gamya = 60°। सम-नियम: भुजज्या = jyā(60°), कोटिज्या = jyā(30°) — जो cos/sin 120° के निरपेक्ष मान से मेल खाता है (|sin 120°| = sin 60°, |cos 120°| = sin 30°)। R = 3438: भुजज्या ≈ 2977, कोटिज्या = 1719।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्फुट-इंजन में sin κ और √(…) वाले शीघ्र-सूत्र आधुनिक पुस्तकालय-sin से चल सकते हैं, पर शास्त्र का मूल मार्ग यही पद→भुज/कोटि→ज्यापिण्ड है। oracle-अनुशासन (`==` on fixtures) ज्या-मार्ग या book-sin — दोनों में — सहिष्णुता-पट्टी से नहीं, पिन किए मान से जाँचता है; ±पट्टी कभी −1 छिपा चुकी है।

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2.31
लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धं ज्यापिण्डिकं गताम् ।
गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्त्वलोचनैः ।।
liptāstattvayamairbhaktā labdhaṃ jyāpiṇḍikaṃ gatām ।
gatagamyāntarābhyastaṃ vibhajettattvalocanaiḥ ।।
पाठ-भेद: C लब्धा ज्यापिण्डिका गताः; २२५

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लिप्ताः = कलाएँ (arcminutes); तत्त्वयमैः = २५×? / तालिका-ह्रास २२५ के सन्दर्भ में; भक्ता = विभाजित; लब्धं ज्यापिण्डिकं गताम् = प्राप्त गत ज्या-पिण्ड (पूर्ण सारणी-सूचकांक); गतगम्यान्तराभ्यस्तं = गत-गम्य ज्या-अन्तर से गुणित; विभजेत् = भाग दें; तत्त्वलोचनैः = तत्त्व(२५)+लोचन(२) → २२५; C लब्धा ज्यापिण्डिका गताः = गत ज्यापिण्डिकाएँ (बहुवचन पाठ)।

हिन्दी भावार्थ अभीष्ट चाप की कलाओं को २२५ से भाग दें — भागफल गत ज्या-पिण्ड का क्रमांक है (प्रत्येक पिण्ड ३°४५′ = २२५′ पर)। शेष कलाओं को गत और गम्य पिण्डों के अन्तर से गुणा कर पुनः २२५ से भाग दें — यह रैखिक अन्तर्वेशन का फल है। तत्त्वलोचनैः की भूतसंख्या स्पष्ट २२५ देती है; पहले चरण का “तत्त्वयम” उसी २२५-जाल की ओर संकेत करता है।

English rendering Divide the arc in minutes by 225 to obtain the completed tabular sine-index; multiply the remainder by the difference of consecutive table entries and divide again by 225. The word-numeral tattva-locana encodes 225′ — the table step of 3°45′.

गणित / The Mathematics
- तालिका-चरण: Δ = 225′ = 3°45′; २४ पिण्ड × २२५′ = ५४००′ = ९०°
- n = ⌊L / 225⌋ (गत ज्यापिण्ड सूचकांक), s = L mod 225 (शेष कला)
- अन्तर्वेशन: phala = (j[n+1] − j[n]) × s / 225
- जहाँ j[·] क्रमज्या या उत्क्रमज्या सारणी (२.३२ दोनों पर लागू)
- तत्त्वलोचन = २५-२ → २२५ (इकाई से)

उदाहरण (worked example) L = 500′ (= 8°20′)। n = ⌊500/225⌋ = 2; s = 500 − 450 = 50′।
मान लें क्रमज्या-तालिका में j₂ = 890, j₃ = 1315 (उदाहरण-मान; वास्तविक SS पिण्ड श्लोक २.१५–२४ से लें)।
phala = (1315 − 890) × 50 / 225 = 425 × 50 / 225 = 21250/225 ≈ 94.44।
गत+फल ≈ 890 + 94 = 984 ≈ jyā(8°20′) [R = 3438 प्रणाली में जाँच योग्य]।

हमारा डिकोड (Our Decode) manda-phala और śīghra-phala दोनों को sin/arcsin चाहिए; शास्त्रीय पथ ज्यापिण्ड+२२५′-अन्तर्वेशन है, आधुनिक पथ book-sin — परिणाम को kaal-verification-oracle पिन-fixtures पर `==` से बाँधता है। mean-longitude प्रयोगशाला (math-core) और स्फुट-इंजन अलग परतें हैं; ज्या-तालिका स्फुट-परत का ईंधन है, “Drik zero-error” जैसी गढ़ी मेज़ नहीं।

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2.32
तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञके ।
स्यात्क्रमज्याविधिरयं उत्क्रमज्यास्वपि स्मृतः ।।
tadavāptaphalaṃ yojyaṃ jyāpiṇḍe gatasaṃjñake ।
syātkramajyāvidhirayaṃ utkramajyāsvapi smṛtaḥ ।।
पाठ-भेद: C गतसंज्ञिते

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदवाप्तफलं = (२.३१ से) प्राप्त अन्तर्वेशन-फल; योज्यं = जोड़ने योग्य; ज्यापिण्डे गतसंज्ञके / C गतसंज्ञिते = गत-नाम वाले ज्या-पिण्ड में; क्रमज्याविधिः = साधारण ज्या (sine) की विधि; अयं = यह; उत्क्रमज्यास्वपि = उत्क्रमज्याओं में भी; स्मृतः = स्मरण/विधान किया गया।

हिन्दी भावार्थ अन्तर्वेशन का फल गत ज्या-पिण्ड में जोड़ दें — यही अभीष्ट क्रमज्या है। और यही विधि उत्क्रमज्या के लिए भी कही गई है: गत उत्क्रम-पिण्ड + वही रैखिक फल। इस प्रकार २.२५–२.२७ की उत्क्रम-तालिका और क्रमज्या-तालिका एक ही अन्तर्वेशन-इंजन साझा करती हैं; केवल पिण्ड-स्तम्भ बदलता है।

English rendering Add the interpolation result to the completed (“gata”) tabular entry — that is the desired krama-jyā. The same procedure is prescribed for the utkrama-jyā table as well.

गणित / The Mathematics
- क्रमज्या: jyā(L) = j_krama[n] + (j_krama[n+1] − j_krama[n]) × s / 225
- उत्क्रमज्या: utkrama(L) = j_ut[n] + (j_ut[n+1] − j_ut[n]) × s / 225
- संबंध (एकक-त्रिज्या में): utkrama(θ) = R − jyā(90° − θ) = R (1 − cos θ) जब jyā(θ) = R sin θ
- R = 3438; Δ = 225′; n, s = २.३१ के अनुसार

उदाहरण (worked example) उत्क्रम तालिका से (२.२५): मान लें n ऐसे कि j_ut[n] = 1528, j_ut[n+1] = 1719, s = 75′।
utkrama = 1528 + (1719 − 1528) × 75 / 225 = 1528 + 191 × 1/3 = 1528 + 63.667 ≈ 1592।
यही “गतसंज्ञक पिण्ड + फल”।

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय-२ का स्फुट-श्रृंखला — half/full manda व śīghra — हर चरण पर jyā और चाप (arcsin रूप) माँगती है; २.३१–३२ वह विधि है जिससे सारणी से स्फुट तक की श्रृंखला शुद्ध SS रहती है। हमारा sealed sphuṭa इंजन इसी तर्क-मार्ग का आधुनिक क्रियान्वयन है; Swiss/JPL केवल क्रॉस-चेक हैं, प्रमाण-अधिकार नहीं।

2.33
ज्यां प्रोज्झ्य शेषं तत्त्वाश्विहतं तद्विवरोद्धृतम् ।
संख्यातत्त्वाश्विसंवर्गे संयोज्य धनुरुच्यते ।।
jyāṃ projjhya śeṣaṃ tattvāśvihataṃ tadvivaroddhṛtam ।
saṃkhyātattvāśvisaṃvarge saṃyojya dhanurucyate ।।
पाठ-भेद: C प्रोज्झ्यान्यत्तत्त्वयमैर्हत्वा; २२५; C संयोज्यं; २२५

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्या = सारणी-ज्या (sine-chord); प्रोज्झ्य = घटाकर/निकालकर; शेष = अवशिष्ट; तत्त्वाश्वि = २२५ (तत्त्व २५ + अश्विन् २, अङ्कानां वामतो गतिः); हतम् = गुणित; विवर = क्रमागत ज्या-अन्तर; उद्धृतम् = भाग; संख्या = सारणी-पद-संख्या; संयोज्य = जोड़कर; धनुः = चाप (arc)।

हिन्दी भावार्थ जब किसी दी हुई ज्या से चाप निकालना हो, तो उस ज्या से ठीक नीचे वाली सारणी-ज्या घटा दो। जो शेष बचे, उसे दो सौ पच्चीस से गुणा करो और उसी स्थान की दो क्रमागत सारणी-ज्याओं के अन्तर से भाग दो। फिर जितने सारणी-पद पूरे हुए हों, उन पर भी दो सौ पच्चीस का गुणनफल जोड़ दो — यही धनुः (चाप) कहा जाता है। यह व्युत्क्रम-ज्या की प्रक्षेप-विधि है: सारणी के बीच का सूक्ष्म भाग समानुपात से निकाला जाता है।

English rendering To recover an arc from a given tabular sine, subtract the next lower table-entry; multiply the remainder by 225 and divide by the difference of the two consecutive table sines; then add that quotient to the product of the completed table-step count and 225. The sum is the arc (dhanus).

गणित / The Mathematics Inverse-sine (jīvā → dhanus) by linear interpolation on the 24-jyā table. Step-arc constant: 225′ (= 3°45′ = 90°/24).
dhanus = n × 225′ + (śeṣa × 225′) / Δj
where n = index of the last table-jyā not exceeding the given jyā, śeṣa = given jyā − jyāₙ, Δj = jyāₙ₊₁ − jyāₙ (same units as the table, typically minutes of chord).
Variant (C): slightly different wording of the same multiply-by-225 / divide-by-difference rule — sense unchanged.

उदाहरण (worked example) Convention: table in the usual SS jyā units; suppose the given jyā lies between jyā₇ and jyā₈ with n = 7, śeṣa = 40, Δj = 100.
dhanus = 7 × 225 + (40 × 225) / 100 = 1575 + 90 = 1665′ = 27°45′.

हमारा डिकोड (Our Decode) यह व्युत्क्रम-ज्या चरण उसी jyā-कर्म की रीढ़ है जिस पर Chapter-2 का manda/śīghra फल चाप में बदलता है। `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में phala → dhanus रूपान्तरण इसी वर्ग की सारणी-तर्क पर टिका है; oracle-अनुशासन `==` fixtures पर exact arc जाँच रखता है, ±band नहीं।

2.34
रवेर्मन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगो रदाः ।
ravermandaparidhyaṃśā manavaḥ śītago radāḥ ।
पाठ-भेद: १४, ३२

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवेः = सूर्य का; मन्द-परिधि-अंशाः = मन्द-उपवृत्त की परिधि (अंशों में); मनवः = १४ (मनु); शीतगोः = चन्द्र का; रदाः = ३२ (दाँत)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की मन्द-परिधि चौदह अंश कही गई है, और चन्द्रमा की बत्तीस अंश। ये युग्म-अन्त (सम पादों) के आधार-मान हैं; अगले श्लोक में विषम-अन्त पर इनसे सूक्ष्म कटौती बताई जाएगी। मन्द-परिधि ही आगे मन्द-फल का पैमाना बनेगी।

English rendering The Sun’s manda-epicycle circumference is 14°, the Moon’s 32°. These are the base (even-end) values; the next verse reduces them at the odd ends.

गणित / The Mathematics Manda-paridhi (circumference of the anomaly epicycle), in degrees:
R_manda(Sun) = 14° (= manavaḥ)
R_manda(Moon) = 32° (= radāḥ)
(Mean values used later in the sphuṭa chain average even/odd ends — see 2.35.)

उदाहरण (worked example) Input: Sun, even-end convention.
manda-phala scale factor r/R ≡ paridhi/360 = 14/360 = 7/180 ≈ 0.038889
(so at κ = 90°, raw jyā-phala ≈ 14° of the sine table before arcsin).

हमारा डिकोड (Our Decode) Dossier की sealed sphuṭa-engine (SS 2.34–38 mean epicycles) सूर्य के लिए 13°50′ और चन्द्र के लिए 31°50′ mean manda — 14°/13°40′ और 32°/31°40′ के दोनों अन्तों का औसत (13°40′ और 31°40′ स्वयं ओज-अन्त हैं)। `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में Sun/Moon केवल manda-path चलाते हैं; śīghra नहीं।

2.35
युग्मान्ते विषमान्ते तु नखलिप्तोनितास्तयोः ।
युग्मान्ते अर्थाद्रयः खाग्निसुराः सूर्या नवार्णवाः ।
ओजे द्व्यगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्दयः ।।
yugmānte viṣamānte tu nakhaliptonitāstayoḥ ।
yugmānte arthādrayaḥ khāgnisurāḥ sūryā navārṇavāḥ ।
oje dvyagā vasuyamā radā rudrā gajābdayaḥ ।।
पाठ-भेद: C खाग्निः सुरास्; ७५, ३०, ३३, १२, ४९

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युग्मान्ते = सम पाद-अन्तों पर; विषमान्ते = विषम पाद-अन्तों पर; नख-लिप्ता = २० कला (नख = २०); ऊनिताः = घटाए हुए; तयोः = उन दोनों (सूर्य-चन्द्र) के; अर्थाद्रयः = ७५ (अर्थ→५, अद्रि→७); ख-अग्नि = ०-३ → ३० (बुध); सुराः = ३३ (गुरु); सूर्याः = १२; नवार्णवाः = ४९; ओजे = विषम-अन्त पर; द्वि-अग = २-७ → ७२ (मङ्गल, इकाई पहले); वसुयमाः = २८; रदाः = ३२; रुद्राः = ११; गजाब्दयः = ४८ (गज ८ + अब्धि ४)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्र की मन्द-परिधियाँ युग्म-अन्त पर पूरे १४° और ३२° रहती हैं; विषम-अन्त पर दोनों से बीस कला घटाई जाती हैं — अर्थात् सूर्य १३°४०′, चन्द्र ३१°४०′। कुज से शनि तक की मन्द-परिधियाँ युग्म-अन्त पर क्रमशः ७५°, ३०°, ३३°, १२°, ४९° हैं; ओज-अन्त पर ७२°, २८°, ३२°, ११°, ४८°। इस तरह परिधि केन्द्रांश के पाद के साथ हल्की-सी “साँस” लेती है — स्थिर नहीं, दो सिरों के बीच।

English rendering At even ends the Sun’s and Moon’s manda circumferences stay 14° and 32°; at odd ends each is reduced by 20′ (→ 13°40′ and 31°40′). For Mars through Saturn the even-end manda values are 75°, 30°, 33°, 12°, 49°; the odd-end values are 72°, 28°, 32°, 11°, 48°.

गणित / The Mathematics
Sun: yugma 14°; oja 14° − 20′ = 13°40′ → mean (14 + 13⅔)/2 = 13°50′ (engine mean often cited 13°40′ as the working odd-end / table mean — convention must be declared).
Moon: yugma 32°; oja 31°40′.
Mars…Saturn manda (yugma / oja):
75°/72°, 30°/28°, 33°/32°, 12°/11°, 49°/48°.
Means: Mars 73.5°, Mercury 29°, Jupiter 32.5°, Venus 11.5°, Saturn 48.5°.
(द्व्यगाः = द्वि २ + अग ७, इकाई पहले → ७२; यही math-core.js का SS.mandaParidhi.mangal = [75, 72] है।)

उदाहरण (worked example) Convention: linear in bhuja between ends; Mars at bhuja = 45° (midway in a quadrant sense for simple half-mix).
R_manda ≈ (75 + 72)/2 = 73.5° if a single constant is taken; the text itself varies it with the bhuja (2.38).

हमारा डिकोड (Our Decode) शास्त्र-विधि (2.38) में परिधि bhuja के साथ दोनों सिरों के बीच बदलती है; sphuta.js और math-core.js यही करते हैं।

सुधार · correction (2026-10-07) पूर्व संस्करण में मङ्गल का ओज-मान ७० छपा था (द्व्यगा = २-७ इकाई-पहले ७२ है), और उससे औसत ७२.५ निकाला गया था। वही ७२.५ KAAL के kaal_surya_siddhanta_sphuta.py:58 में "mean of 70° and 75°" के रूप में गया है — उस फ़ाइल का सुधार स्वामी के निर्णय हेतु दर्ज है। The earlier edition printed 70 for Mars’s odd end; the words give 72. Its 72.5° mean reached KAAL’s kaal_surya_siddhanta_sphuta.py:58.

सुधार · correction (2026-10-07) इस खण्ड के श्लोक-पाठ में भटका “।। ३.३४ ।।” हटाया गया (पिछले श्लोक का अंत यहाँ आ गया था)। Correction: stray verse marker removed.

2.36
कुजादीनां अतः शीघ्रा युग्मान्ते अर्थाग्निदस्रकाः ।
गुणाग्निचन्द्राः खनगा द्विरसाक्षीणि गोअग्नयः ।।
kujādīnāṃ ataḥ śīghrā yugmānte arthāgnidasrakāḥ ।
guṇāgnicandrāḥ khanagā dvirasākṣīṇi goagnayaḥ ।।
पाठ-भेद: C ततश्शैघ्र्या; २३५; C खागाश्च; १३३, ७०, २६२, ३९

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजादीनाम् = मङ्गल से आरम्भ ग्रहों के; शीघ्राः = शीघ्र-परिधियाँ; युग्मान्ते = सम-अन्त पर; अर्थाग्निदस्रकाः = २३५ (अर्थ/अर्ध-पंक्ति + अग्नि ३ + दस्र २); गुणाग्निचन्द्राः = १३३; खनगाः = ७०; द्विरसाक्षीणि = २६२; गोऽग्नयः = ३९।

हिन्दी भावार्थ अब मन्द के बाद शीघ्र-उपवृत्त। मङ्गल आदि की शीघ्र-परिधियाँ युग्म-अन्त पर क्रमशः दो सौ पैंतीस, एक सौ तैंतीस, सत्तर, दो सौ बासठ और उनतालीस अंश कही गई हैं। ये बाह्य/आन्तरिक ग्रहों के शीघ्र-केन्द्र के लिए वह त्रिज्या-पैमाना हैं जिससे शीघ्र-फल निकलेगा।

English rendering The even-end śīghra-epicycle circumferences of Mars through Saturn are 235°, 133°, 70°, 262° and 39° respectively.

गणित / The Mathematics Śīghra-paridhi at yugmānta (°):
Mars 235, Mercury 133, Jupiter 70, Venus 262, Saturn 39
(Word-numerals: अर्थाग्निदस्रकाः → 235; गुणाग्निचन्द्राः → 133; खनगाः → 70; द्विरसाक्षीणि → 262; गोऽग्नयः → 39 — apparatus २३५, १३३, ७०, २६२, ३९ confirms.)

उदाहरण (worked example) Input: Mars, even-end only.
r_ś / 360 = 235/360 ≈ 0.65278
(used as R_ś in the śīghra-phala formula of 2.39–2.40 / Ch.2 iteration).

हमारा डिकोड (Our Decode) Outer planets पर śīghrocca = mean Sun; inner पर madhya = mean Sun — dossier §5। यही 235° आदि R_ś मान `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` की शीघ्र-शाखा में epicycle constants की यथार्थ जड़ हैं।

2.37
ओजान्ते द्वित्रियमला द्विविश्वे यमपर्वताः ।
खर्तुदस्रा वियद्वेदाः शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः ।।
ojānte dvitriyamalā dviviśve yamaparvatāḥ ।
khartudasrā viyadvedāḥ śīghrakarmaṇi kīrtitāḥ ।।
पाठ-भेद: C द्वित्रिकयमाः; १३२, ७२; २६०,४०

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ओजान्ते = विषम-अन्त पर; द्वित्रियमलाः = २३२ (द्वि-त्रि-यमल); द्विविश्वे = १३२ (द्वि + विश्वेदेव १३); यमपर्वताः = ७२; खर्तुदस्राः = २६०; वियद्वेदाः = ४०; शीघ्रकर्मणि = शीघ्र-संस्कार में; कीर्तिताः = कथित।

हिन्दी भावार्थ विषम-अन्त पर वे ही शीघ्र-परिधियाँ क्रमशः दो सौ बत्तीस, एक सौ बत्तीस, बहत्तर, दो सौ साठ और चालीस अंश हो जाती हैं। युग्म और ओज — दो सिरे — शीघ्रकर्म में इसीलिए गिनाए गए हैं कि आगे का श्लोक उनके अन्तर से स्फुट परिधि बनाए।

English rendering At the odd ends the śīghra circumferences become 232°, 132°, 72°, 260° and 40° (Mars through Saturn). These, with the even-end set, are the values prescribed for the śīghra operation.

गणित / The Mathematics Śīghra-paridhi at ojānta (°):
Mars 232, Mercury 132, Jupiter 72, Venus 260, Saturn 40
Means (yugma+oja)/2: Mars 233.5°, Mercury 132.5°, Jupiter 71°, Venus 261°, Saturn 39.5°.
(Variant C द्वित्रिकयमाः — same 232-class reading family; apparatus fragments १३२, ७२, २६०, ४० match the oja set.)

उदाहरण (worked example) Venus, simple mean constant:
R_ś ≈ (262 + 260)/2 = 261°.
At śīghra-kendra K = 90°, the raw sine-arm scale is 261/360 = 0.725 before the karṇa normalisation of 2.40.

हमारा डिकोड (Our Decode) Manda और śīghra दोनों की even/odd जोड़ी 4-step SS iteration (half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra) का संख्यात्मक कच्चा माल है। Engine इन्हें mean constants के रूप में pin कर pure SS chain चलाता है — JPL/Swiss केवल cross-check, proof-authority नहीं।

2.38
ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता ।
युग्मे वृत्ते धनर्णं स्यादोजादूनाधिके स्फुटम् ।।
ojayugmāntaraguṇā bhujajyā trijyayoddhṛtā ।
yugme vṛtte dhanarṇaṃ syādojādūnādhike sphuṭam ।।
पाठ-भेद: C युग्मवृत्ते

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ओज-युग्म-अन्तर = विषम–सम परिधि-भेद; गुणा = (भुजज्या से) गुणित; भुजज्या = केन्द्र की भुज-ज्या; त्रिज्या = radius of base circle (प्रायः ३४३८′); उद्धृता = विभाजित; युग्मे वृत्ते = सम-परिधि पक्ष में; धनर्णम् = धन या ऋण; ओजात् ऊनाधिके = ओज से न्यून/अधिक होने पर; स्फुटम् = स्फुट (corrected) परिधि।

हिन्दी भावार्थ ओज और युग्म परिधियों का अन्तर लो, उसे भुजज्या से गुणा करो, त्रिज्या से भाग दो — यही संस्कार-खण्ड है। युग्म-वृत्त को आधार मानकर, यदि वास्तविक (स्फुट) परिधि ओज से छोटी या बड़ी हो, तो उस खण्ड को धन या ऋण रूप में जोड़कर स्फुट परिधि सिद्ध करो। सीधी भाषा में: दो सिरों के बीच ज्या-समानुपात से परिधि “जीवित” की जाती है।

English rendering Multiply the odd–even epicycle difference by the bhuja-jyā and divide by the trijyā; applied with the proper sign to the even-circle base (according as the true circle is less or greater than the odd-end value), this yields the sphuṭa (corrected) epicycle.

गणित / The Mathematics
Δ = R_oja − R_yugma
δR = (Δ × jyā_bhuja) / trijyā
R_sphuṭa = R_yugma ± δR
(sign rule: on the yugma-vṛtta base, dhana/ṛṇa as the verse states when comparing with the oja value — “ऊनाधिके स्फुटम्”).
trijyā convention in classical SS tables: 3438′ (must be declared if a modern R = 1 sine is substituted).

उदाहरण (worked example) Mars manda: R_yugma = 75°, R_oja = 72°, Δ = −3°.
Convention: trijyā = 3438′, jyā_bhuja = 1719′ (≈ sin 30° × 3438).
δR = (−3 × 1719) / 3438 = −1.5°.
R_sphuṭa ≈ 75 − 1.5 = 73.5° (mid-bhuja recovers the mean).
(सुधार 2026-10-07: पहले ओज-मान 70° लिया गया था; २.३५ का “द्व्यगा” 72 देता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) जब engine mean epicycle constants (मङ्गल 73.5°, बुध 29°, … — २.३५ के शब्दों से) चुनता है, वह इसी ओज–युग्म प्रक्षेप का औसत-सीमा रूप है। (सुधार 2026-10-07: पहले यहाँ मङ्गल 72.5° छपा था।) Full variable-paridhi path भी SS-शुद्ध है; sealed sphuṭa ने mean values चुने ताकि regression fixtures `==` पर स्थिर रहें।

2.39
तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते ।
तद्भुजज्याफलधनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम् ।।
tadguṇe bhujakoṭijye bhagaṇāṃśavibhājite ।
tadbhujajyāphaladhanurmāndaṃ liptādikaṃ phalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्गुणे = उस (मन्द-परिधि) से गुणित; भुज-कोटि-ज्ये = भुजज्या और कोटिज्या; भगणांश = ३६०; विभाजिते = विभाजित; भुजज्या-फल = भुज की फल-ज्या; धनुः = उसका चाप; मान्दम् = मन्द-फल; लिप्तादिकम् = कला आदि में।

हिन्दी भावार्थ स्फुट मन्द-परिधि से भुजज्या और कोटिज्या दोनों को गुणा करो, फिर तीन सौ साठ अंशों से भाग दो। भुजज्या से जो फल-ज्या मिले, उसका धनुः ही मन्द-फल है — कला-विकला में। कोटि-फल आगे के शीघ्र-कर्म या कर्ण-संस्कार में काम आता है; मन्द का मुख्य दृश्य फल भुज-पथ से आता है।

English rendering Multiply the bhuja-jyā and koṭi-jyā by the (sphuṭa) manda circumference and divide each by 360°. The arc of the resulting bhuja-phala is the manda-phala, expressed from minutes of arc upward.

गणित / The Mathematics With κ = madhya − mandocca (manda-kendra), and R_m = manda-paridhi in degrees:
jyā_phala = (R_m / 360) × jyā(κ)
koṭi_phala = (R_m / 360) × koṭi(κ)
manda-phala = dhanus(jyā_phala)
In unit-circle form (dossier §5):
manda-phala = arcsin((R_manda / 360) · sin κ)
(Sun/Moon: manda only; outer/inner grahas continue into śīghra.)

उदाहरण (worked example) Convention: Sun, R_m = 14°, κ = 90°, modern sin for illustration.
(R_m/360)·sin 90° = 14/360 ≈ 0.038889 → manda-phala ≈ arcsin(0.038889) ≈ 2.228° ≈ 2°13.7′
(Table-jyā + dhanus of 2.33 would replace arcsin in a pure SS path.)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही सूत्र sealed engine की पहली धुरी है: κ_manda = madhya − mandocca; manda-phala = arcsin((R_manda/360)·sin κ)। 4-step iteration में half-manda → full-manda यहीं से बँधे हैं; kaal-verification-oracle exact `==` fixtures पर इसी फल को pin करता है — tolerance band नहीं, क्योंकि ±3 ने कभी −1 छुपाया था।

Eमन्दोच्च UP₀ (मध्यम)P (स्फुट)κκ = मध्यम − मन्दोच्चमन्दफल =arcsin( (R_m/360) · sin κ )R_m: रवि 13°50′ · चन्द्र 31°50′कुज 73.5° · गुरु 32.5° (मध्य-मान)स्फुट दिशा सदा उच्च की ओर
मन्द-संस्कार की ज्यामिति — the manda epicycle (SS 2.34–2.39): the mean planet P₀ rides the deferent around E; the epicycle of circumference R_m (degrees of the 360° deferent) pulls it toward the apsis (मन्दोच्च U). The correction angle is manda-phala = arcsin((R_m/360)·sin κ), κ = madhya − mandocca.
2.40
शैघ्र्यं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम् ।
संशोध्यं तु त्रिजीवायां कर्क्यादौ कोटिजं फलम् ।।
śaighryaṃ koṭiphalaṃ kendre makarādau dhanaṃ smṛtam ।
saṃśodhyaṃ tu trijīvāyāṃ karkyādau koṭijaṃ phalam ।।
पाठ-भेद: C शैघ्रे; C त्रिजीवातः

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शैघ्र्यम् = शीघ्र-कर्म संबंधी; कोटिफलम् = कोटि-ज्या का फल; केन्द्रे = शीघ्र-केन्द्र में; मकरादौ = मकर से (धनु-मकर-कुम्भ-मीन पक्ष); धनम् = त्रिज्या पर योग्य; संशोध्यम् = घटाने योग्य; त्रिजीवायाम् = त्रिज्या में; कर्क्यादौ = कर्क से (मिथुन-कर्क-सिंह-कन्या पक्ष); कोटिजं फलम् = कोटि से उत्पन्न फल।

हिन्दी भावार्थ शीघ्र-कर्म में कोटि-फल का व्यवहार केन्द्र के राशि-पक्ष पर निर्भर है। जब केन्द्र मकरादि में हो, कोटि-फल को त्रिज्या में धन करो; जब कर्क्यादि में हो, त्रिज्या से उसे घटाओ। यही संस्कृत त्रिज्या आगे कर्ण (hypoteneuse) का आधार बनती है, जिससे शीघ्र-भुज-फल का धनुः — शीघ्र-फल — निश्चय होता है।

English rendering In the śīghra operation the koṭi-phala is added to the trijyā when the kendra is in the Capricorn half (Makarādi), and subtracted from the trijyā when it is in the Cancer half (Karkyādi). That adjusted base is the standing radius for the śīghra hypotenuse.

गणित / The Mathematics Let K = śīghra-kendra, R_ś = śīghra-paridhi (°), trijyā = R (e.g. 3438′ or 1 in unit form).
koṭi_phala = (R_ś / 360) × koṭi(K)
Adjusted upright:
R′ = R + koṭi_phala when K ∈ Makarādi (roughly cos K ≥ 0 in the SS quadrant rule)
R′ = R − koṭi_phala when K ∈ Karkyādi
Then karṇa = √(R′² + bhuja_phala²) with bhuja_phala = (R_ś/360)×jyā(K),
and śīghra-phala = dhanus( (R · bhuja_phala) / karṇa ).
Unit form (dossier §5):
śīghra-phala = arcsin( R_ś·sin K / √(R_def² + R_ś² + 2·R_def·R_ś·cos K) )
(with R_def the deferent radius ≡ trijyā; sign of cos term encodes the ± koṭi rule).
Outer planets: śīghrocca = mean Sun; inner: madhya = mean Sun, śīghrocca = heliocentric mean.

उदाहरण (worked example) Convention: unit trijyā R = 1, Mars R_ś = 235°, K = 60° (Karkyādi → subtract).
bhuja_phala = (235/360)·sin 60° ≈ 0.5657
koṭi_phala = (235/360)·cos 60° ≈ 0.3264
R′ = 1 − 0.3264 = 0.6736
karṇa = √(0.6736² + 0.5657²) ≈ 0.8796
śīghra sine-arm = 1 × 0.5657 / 0.8796 ≈ 0.6431 → phala ≈ arcsin(0.6431) ≈ 40.0°.

हमारा डिकोड (Our Decode) Dossier का śīghra-phala सूत्र — arcsin(R_ś sin K / √(R_def² + R_ś² + 2 R_def R_ś cos K)) — इसी कोटि±त्रिज्या / कर्ण पथ का आधुनिक बन्द रूप है। `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` half-śīghra → full-śīghra चरणों में इसे शुद्ध SS iteration से चलाता है; mean-longitude lab को true-position ephemeris कहने से इंकार — measured calculation layer के बिना wording नहीं चढ़ाई जाती।

2.41
तद्बाहुफलवर्गैक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः ।
त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम् ।।
tadbāhuphalavargaikyānmūlaṃ karṇaścalābhidhaḥ ।
trijyābhyastaṃ bhujaphalaṃ calakarṇavibhājitam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-बाहु-फल = उस (शीघ्र) बाहु-फल; वर्ग-ऐक्यात् = वर्गों के योग से; मूलम् = वर्गमूल; कर्णः चलाभिधः = कर्ण, जिसका नाम ‘चल’ है; त्रिज्या-अभ्यस्तम् = त्रिज्या से गुणित; भुज-फलम् = भुज-फल (ज्या-फल); चल-कर्ण-विभाजितम् = चल-कर्ण से विभाजित।

हिन्दी भावार्थ जिस बाहु-फल की गणना हो चुकी है, उसके वर्ग को (त्रिज्या ± कोटि-फल के वर्ग के साथ) जोड़कर वर्गमूल लो — वही कर्ण है, और शास्त्र उसे चल-कर्ण कहता है। फिर भुज-फल को त्रिज्या से गुणा करो और इस चल-कर्ण से भाग दो। जो राशि मिले, वही आगे चाप-फल निकालने का आधार बनेगी। यह शीघ्र-कर्म की ज्यामितीय रीढ़ है: त्रिभुज के कर्ण पर भुज को प्रक्षिप्त करना।

English rendering From the sum of the squares of that bāhu-phala (with the complementary base, trijyā ± koṭi-phala), take the square root — that hypotenuse is called the chala-karṇa. Multiply the bhuja-phala by the radius (trijyā) and divide by this chala-karṇa; the quotient is the sine-argument of the śīghra equation.

गणित / The Mathematics
Let R = trijyā (tabular radius), B = bāhu-phala, Kₜ = koṭi-phala (signed with quadrant).
Base: D = R ± Kₜ

chala-karṇa H = √(D² + B²)

śīghra sine-argument s = (bhuja-phala × R) / H
Equivalently (modern epicycle form, dossier §5):
śīghra-phala = arcsin( R_ś · sin κ / √(R_def² + R_ś² + 2 · R_def · R_ś · cos κ) )
where κ = śīghra-kendra, R_ś = śīghra epicycle radius, R_def = deferent radius (often = R).

उदाहरण (worked example) Convention: R = 3438′ (classical trijyā). Suppose bāhu-phala B = 400′, koṭi-phala Kₜ = +200′ (first-quadrant style), so D = 3438 + 200 = 3638′.
H = √(3638² + 400²) = √(13,235,044 + 160,000) = √13,395,044 ≈ 3660′.
If bhuja-phala = 400′, then s = (400 × 3438) / 3660 ≈ 375.7′ — the sine-entry whose arc is the śīghra-phala.

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में यही चल-कर्ण / शीघ्र-फल ज्यामिति शुद्ध सूर्यसिद्धान्त श्रृंखला में बैठी है — arcsin(R_ś sin K / √(R_def² + R_ś² + 2 R_def R_ś cos K)), बिना पश्चिमी प्रमेय के। Oracle `==` fixtures पर ही जाँचता है; tolerance-band यहाँ bug-hider माना गया।

2.42
लब्धस्य चापं लिप्तादिफलं शैघ्र्यं इदं स्मृतम् ।
एतदाद्ये कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि ।।
labdhasya cāpaṃ liptādiphalaṃ śaighryaṃ idaṃ smṛtam ।
etadādye kujādīnāṃ caturthe caiva karmaṇi ।।
पाठ-भेद: C शैघ्रम्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लब्धस्य = प्राप्त राशि का; चापम् = चाप (आर्क्साइन); लिप्ता-आदि-फलम् = कला आदि में फल; शैघ्र्यम् = शीघ्र-फल (पाठ-भेद: C शैघ्रम्); इदं स्मृतम् = इसे कहा गया; एतत् = यह; आद्ये = प्रथम कर्म में; कुज-आदीनाम् = मंगल आदि का; चतुर्थे च एव कर्मणि = और चौथे कर्म में भी।

हिन्दी भावार्थ ऊपर जो भाग-फल (ज्या-रूप) मिला, उसका चाप निकालो — कला-विकला में वही शैघ्र्य फल है। मंगल से आरम्भ कर बाहरी-भीतरी ग्रहों के चार-चरणीय स्फुट-कर्म में यह फल प्रथम और चतुर्थ चरण पर लगता है। सूर्य-चन्द्र पर यह धारा लागू नहीं; उनकी अलग एक-कर्म व्यवस्था अगले श्लोक में है।

English rendering The arc of the quantity just obtained — expressed in minutes and so on — is the śaighrya (śīghra) equation. For Mars and the other planets this equation is applied in the first and the fourth of the four operations.

गणित / The Mathematics
śīghra-phala φ_ś = arcsin(s) (or tabular चाप of the sine-argument from 2.41), in ′.
Application mask for Kuja-ādi: φ_ś used at step 1 and step 4 of the four-fold karma (detail in 2.43–2.44).
Variant: C reads शैघ्रम् for शैघ्र्यम् — same technical sense.

उदाहरण (worked example) If s / R = sin-argument corresponding to 2°30′ on the sine table, then φ_ś = 2°30′ = 150′. That 150′ is the śaighrya-phala applied (in half or full measure per step) at the first and fourth operations.

हमारा डिकोड (Our Decode) Decode dossier §5 — outer planets: śīghrocca = mean Sun; inner: madhya = mean Sun, śīghrocca = heliocentric mean. Epicycle mean constants by the verse words (SS 2.34–38): Mars 73.5°, Mercury 29°, Jupiter 32.5°, Venus 11.5°, Saturn 48.5°. (Correction 2026-10-07: this paragraph earlier gave Sun 13°40′ and Mars 72.5° as means. 13°40′ is the Sun's odd end, not its mean, and 72.5 came from the misprinted Mars odd end of 70. The verse words of 2.34-2.35 give Sun 14°/13°40′, Moon 32°/31°40′, Mars 75°/72°, Mercury 30°/28°, Jupiter 33°/32°, Venus 12°/11°, Saturn 49°/48°. Whatever the KAAL file holds is left for the owner to correct.) Engine sealed 2026-05-17 as pure Chapter-2 manda+śīghra chain.

2.43
मान्दं कर्मैकं अर्केन्दोर्भौमादीनां अथोच्यते ।
शैघ्र्यं मान्दं पुनर्मान्दं शैघ्र्यं चत्वार्यनुक्रमात् ।।
māndaṃ karmaikaṃ arkendorbhaumādīnāṃ athocyate ।
śaighryaṃ māndaṃ punarmāndaṃ śaighryaṃ catvāryanukramāt ।।
पाठ-भेद: C शैघ्रं

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मान्दम् कर्म = मन्द-कर्म; एकम् = केवल एक; अर्क-इन्दोः = सूर्य और चन्द्र का; भौम-आदीनाम् = मंगल आदि का; अथ उच्यते = अब कहा जाता है; शैघ्र्यम् · मान्दम् · पुनर्-मान्दम् · शैघ्र्यम् = शीघ्र, मन्द, पुनः मन्द, शीघ्र; चत्वारि = चार; अनुक्रमात् = क्रम से (पाठ-भेद: C शैघ्रं)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्रमा के लिए स्फुट-साधन में केवल एक मन्द-कर्म पर्याप्त है — कोई शीघ्र-चक्र नहीं। मंगल आदि ग्रहों के लिए अब चार कर्मों का क्रम बताया जाता है: शैघ्र्य → मान्द → पुनर्मान्द → शैघ्र्य। आधा-पूरा का नाप अगले श्लोक में खुलेगा; यहाँ केवल चार-पद की माला बाँधी गई है।

English rendering For the Sun and the Moon there is a single manda operation. For Mars and the others the sequence is now stated: śīghra, manda, again manda, śīghra — four operations in that order.

गणित / The Mathematics
Sun / Moon: L_sphuṭa = L_madhya + manda-phala(κ_m), κ_m = madhya − mandocca.
Kuja-ādi four-step skeleton (text order):
(1) śaighrya → (2) manda → (3) manda again → (4) śaighrya
Half vs full amplitudes: verse 2.44.
Dossier implementation note (selectable convention of first two half-steps): sealed engine records half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra; both are four-step SS families — declare which chain you pin when comparing fixtures.

उदाहरण (worked example) Moon at madhya 100°, mandocca 80° → κ_m = 20°. With R_manda/360 scaling and arcsin as in §5, one manda-phala only is added — no śīghra loop. For Mars, four successive corrections are applied to the running longitude before the final sphuṭa is accepted.

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` precisely this split: Sun/Moon = manda only; remaining grahas = four-step manda+śīghra iteration. Instrument remains a mean-longitude synthesis lab until a measured true-position layer is promoted — wording must not outrun the seal.

2.44
मध्ये शीघ्रफलस्यार्धं मान्दं अर्धफलं तथा ।
मध्यग्रहे मन्दफलं सकलं शैघ्र्यं एव च ।।
madhye śīghraphalasyārdhaṃ māndaṃ ardhaphalaṃ tathā ।
madhyagrahe mandaphalaṃ sakalaṃ śaighryaṃ eva ca ।।
पाठ-भेद: C पुनर्मान्दं

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये = मध्य (मध्यग्रह) पर; शीघ्र-फलस्य अर्धम् = शीघ्र-फल का आधा; मान्दम् अर्ध-फलम् तथा = तथा मन्द का आधा फल; मध्य-ग्रहे = (संशोधित) मध्यग्रह पर; मन्द-फलम् सकलं = पूरा मन्द-फल; शैघ्र्यम् एव च = और पूरा शैघ्र्य भी (पाठ-भेद: C पुनर्मान्दं — क्रम-सूचक)।

हिन्दी भावार्थ चार कर्मों का नाप यह है — मध्य-देश में पहले आधा शीघ्र-फल, और उसी रीति से आधा मन्द-फल; फिर मध्यग्रह पर पूरा मन्द-फल, और अन्त में पूरा शैघ्र्य-फल। आधा-आधा से कक्षा को धीरे झुकाया जाता है, पूरे फल से अन्तिम स्फुट स्थिर होता है। पाठ-भेद (C पुनर्मान्दं) तीसरे पद को फिर मन्द कहकर उसी चार-माला को दोहराता है।

English rendering Upon the mean planet apply half the śīghra equation and likewise half the manda equation; then upon the (updated) mean apply the full manda equation and the full śīghra equation as well.

गणित / The Mathematics Textual half/full schedule (with 2.42–2.43):
1. L₁ = L₀ + ½ φ_ś(L₀)
2. L₂ = L₁ + ½ φ_m(L₁)
3. L₃ = L₂ + 1 · φ_m(L₂)
4. L₄ = L₃ + 1 · φ_ś(L₃) → sphuṭa
where φ_m = manda-phala, φ_ś = śīghra-phala, each recomputed from the current anomaly at that step.
(Some modern ports swap the two half-steps; pin the order before `==` oracle work.)

उदाहरण (worked example) Toy numbers (not a full epicycle run): L₀ = 120°, φ_ś₀ = +2.0°, φ_m at successive stations ≈ +1.2°, +1.1°, and final φ_ś ≈ +1.8°.
L₁ = 120 + 1.0 = 121°; L₂ = 121 + 0.6 = 121.6°; L₃ = 121.6 + 1.1 = 122.7°; L₄ = 122.7 + 1.8 = 124.5° (illustrative only — real φ must be recomputed from κ and K at each station).

हमारा डिकोड (Our Decode) यही चार-चरण SS iteration dossier §5 का हृदय है। Outer: śīghrocca = mean Sun; inner: madhya = mean Sun. Sealed pure chain — promoting it to production true ephemeris needs a measured calculation layer, not louder prose.

2.45
अजादिकेन्द्रे सर्वेषां शैघ्र्ये मान्दे च कर्मणि ।
धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणं एव च ।।
ajādikendre sarveṣāṃ śaighrye mānde ca karmaṇi ।
dhanaṃ grahāṇāṃ liptādi tulādāvṛṇaṃ eva ca ।।
पाठ-भेद: C मान्दे शैघ्रे

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अज-आदि-केन्द्रे = मेष आदि केन्द्र में; सर्वेषाम् = सभी ग्रहों का; शैघ्र्ये मान्दे च कर्मणि = शीघ्र और मन्द दोनों कर्मों में (पाठ-भेद: C मान्दे शैघ्रे — क्रम उलटा, अर्थ समान); धनम् = धन (जोड़); ग्रहाणाम् लिप्ता-आदि = ग्रहों की कला आदि; तुला-आदौ = तुला आदि में; ऋणम् एव च = ऋण (घटाव) ही।

हिन्दी भावार्थ केन्द्र जब मेष से कन्या तक (केन्द्र-चाप का पूर्वार्ध) हो, तो मन्द और शीघ्र दोनों फलों को ग्रह पर धन — जोड़ — रूप में लगाओ। जब केन्द्र तुला से मीना तक हो, तो वही फल ऋण — घटाव — है। चिह्न फल की दिशा है, उसकी मात्रा नहीं; मात्रा ज्या-चाप से आती है, चिह्न राशि-द्वय के आधे चक्र से।

English rendering When the anomaly (kendra) lies in Aries and the following signs, the equation — in both the śīghra and the manda operations — is additive for all planets, in minutes and so on; from Libra onward it is subtractive.

गणित / The Mathematics
Let κ be the kendra in [0°, 360).
Sign rule (text):
κ ∈ [0°, 180) (Meṣa → Kanyā) → φ applied as + (dhana)
κ ∈ [180°, 360) (Tulā → Mīna) → φ applied as − (ṛṇa)
Equivalent modern: φ = ±arcsin(…), with the geometric sine already carrying sign if a full-circle sine is used; the śāstra states the quadrant rule explicitly in rāśi language.
Applies to both manda and śīghra phala.

उदाहरण (worked example) Manda-kendra κ_m = 40° (Meṣa-side), |φ_m| = 1°20′ → apply +1°20′.
If κ_m = 200° (Tulā-side), same magnitude → apply −1°20′.
Śīghra-kendra follows the identical dhana/ṛṇa gate.

सुधार · correction (2026-10-07) “तुलादाव्र्णं” का टंकण-दोष “तुलादावृणं” (तुलादौ + ऋणं) किया गया। Correction: spelling.

Eशीघ्रोच्च SL (मन्द-शुद्ध)P (दृश्य)कर्णKK = शीघ्रोच्च − Lकर्ण = √(R_d² + R_ś² + 2·R_d·R_ś·cos K)शीघ्रफल = arcsin( R_ś·sin K ∕ कर्ण )बाहरी ग्रह: S = मध्यम रविभीतरी ग्रह: madhya = मध्यम रविवक्री (retrograde) यहीं जन्म लेती है
शीघ्र-संस्कार का त्रिभुज — the śīghra triangle (SS 2.40–2.45): from Earth E the manda-corrected planet L sits on the deferent; the śīghra epicycle of radius R_ś points toward the śīghrocca S (for outer planets, the mean Sun). The visible correction is śīghra-phala = arcsin( R_ś·sin K ⁄ √(R_d² + R_ś² + 2·R_d·R_ś·cos K) ) — the law of the hypotenuse (karṇa). This is where retrograde motion is born.
2.46
अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता ।
भचक्रकलिकाभिस्तु लिप्ताः कार्या ग्रहे अर्कवत् ।।
arkabāhuphalābhyastā grahabhuktirvibhājitā ।
bhacakrakalikābhistu liptāḥ kāryā grahe arkavat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्क-बाहु-फल-अभ्यस्ता = सूर्य के बाहु-फल से गुणित; ग्रह-भुक्तिः = ग्रह की (मध्य) दैनिक गति; विभाजिता भ-चक्र-कलिकाभिः = भचक्र की कलाओं से विभाजित; लिप्ताः = कलाएँ; कार्या ग्रहे = ग्रह पर लगानी हों; अर्क-वत् = सूर्य की भाँति; +अर्कवत् = सन्धि/पाठ-चिह्न।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की भुक्ति को सूर्य के बाहु-फल से गुणा करो, और भचक्र-कलिका — पूरे वृत्त की 21,600 कला — से भाग दो। जो कलाएँ निकलें, उन्हें ग्रह की गति/स्थिति-संस्कार में सूर्य-वत् लगाओ। यह सूर्य-समीकरण की छाया ग्रह-भुक्ति पर उतारने का सूत्र है; कोण की 21,600 कला और दिन की 21,600 प्राण-गिनती गिनती-समानता है, भौतिक एकत्व नहीं।

English rendering Multiply the planet’s daily motion by the Sun’s bāhu-phala and divide by the minutes of the star-circle; the resulting minutes are to be applied to the planet in the same manner as for the Sun.

गणित / The Mathematics
Bhacakra-kalikā = 21,600′ (= 360 × 60).
Δ′ = (graha-bhukti × arka-bāhu-phala) / 21,600
Unit: both bhukti and bāhu-phala in ′ (or consistent sexagesimal); result in ′ of correction.
Metrology note (dossier §1): 21,600 prāṇa/day ↔ 21,600′/circle is a count correspondence, not a physical identity of time and angle.

उदाहरण (worked example) Suppose graha-bhukti = 60′/day, arka-bāhu-phala = 360′.
Δ = (60 × 360) / 21,600 = 21,600 / 21,600 = 1′.
One minute of arc is the correction term to carry to the planet “like the Sun.”

हमारा डिकोड (Our Decode) MATHEMATICAL-AUDIT §1 — 1 day = 60 ghaḍī = 3,600 pala = 216,000 vipala = 21,600 prāṇa; the same 21,600 as circle-minutes is the metrological rhyme this verse leans on. Day-count canon (SS 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500) hits mean rates first; this verse is the local phala-on-bhukti gear, not the Mahāyuga total.

सुधार · correction (2026-10-07) “कर्या” → “कार्या”। Correction: spelling.

मध्यम ग्रह → → → स्फुट ग्रह१अर्ध-मन्द½ manda-phala२अर्ध-शीघ्र½ śīghra-phala३पूर्ण-मन्दfull manda४पूर्ण-शीघ्रfull śīghra → स्फुटप्रत्येक चरण पिछले परिणाम पर — successive refinement (SS 2.43–2.46)
चतुश्चरण-स्फुटीकरण — the four-step iteration the text prescribes for the star-planets: half-manda, then half-śīghra on that, then full manda, then full śīghra — successive approximation, sealed exactly this way in the sphuṭa engine.
2.47
स्वमन्दभुक्तिसंशुद्धा मध्यभुक्तिर्निशापतेः ।
दोर्ज्यान्तरादिकं कृत्वा भुक्तावृणधनं भवेत् ।।
svamandabhuktisaṃśuddhā madhyabhuktirniśāpateḥ ।
dorjyāntarādikaṃ kṛtvā bhuktāvṛṇadhanaṃ bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-मन्द-भुक्ति-संशुद्धा = अपनी मन्द-भुक्ति से संशोधित; मध्य-भुक्तिः = मध्य गति; निशा-पतेः = चन्द्र (निशापति) की; दोः-ज्या-अन्तर-आदिकम् = भुज-ज्या के अन्तर आदि को; कृत्वा = करके; भुक्तौ = गति में; ऋण-धनम् भवेत् = ऋण या धन हो।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा की मध्य-भुक्ति को उसकी स्व-मन्द-भुक्ति से शुद्ध करो — मन्द-कर्म गति-स्तर पर। फिर दोर्ज्या (भुज की ज्या) के अन्तर आदि से जो संस्कार बने, वह भुक्ति में कभी ऋण, कभी धन होता है। स्फुट-देश जहाँ मन्द-फल से झुकता है, वहीं दैनिक गति भी उसी चक्र की ज्या-ढाल से तेज-मंद होती है।

English rendering The Moon’s mean daily motion is to be corrected by its own manda-bhukti. After forming the difference of the sines of the arm and the related terms, the motion becomes subtractive or additive accordingly.

गणित / The Mathematics
Moon only (niśāpati):
bhukti_madhya_corrected = bhukti_madhya ± manda-bhukti(κ_m)
Manda-bhukti from tabular/sine-difference slope of the manda equation (detail completed in 2.48): proportional to Δ(doh-jyā) along the anomaly.
Sign: ṛṇa or dhana per the same kendra logic as 2.45 and the sense of the jyā-difference.

उदाहरण (worked example) Classical mean lunar motion ~790′/day order. If manda-bhukti term evaluates to +12′ at the current κ_m (dhana side), corrected bhukti ≈ 790 + 12 = 802′/day for that station (illustrative magnitudes; pin your bhagaṇa-derived mean before oracle use).

हमारा डिकोड (Our Decode) Tithi engine feels mean lunar rate first — and dossier §2: SS canon days/Mahāyuga 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500 is a 328-day gap that hits the tithi path hardest. Synodic check (57,753,336 − 4,320,000 = 53,433,336) favours SS-canon residual ≈ −0.1 rev/Mahāyuga. vedic-ghadi uses Āryabhaṭa day-count; math-core uses SS — declare the canon before comparing Moon bhukti.

2.48
ग्रहभुक्तेः फलं कार्यं ग्रहवन्मन्दकर्मणि ।
दोर्ज्यान्तरगुणा भुक्तिस्तत्त्वनेत्रोद्धृता पुनः ।।
grahabhukteḥ phalaṃ kāryaṃ grahavanmandakarmaṇi ।
dorjyāntaraguṇā bhuktistattvanetroddhṛtā punaḥ ।।
पाठ-भेद: २२५

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-भुक्तेः फलम् = ग्रह-गति का फल; कार्यम् ग्रह-वत् = ग्रह की भाँति करना; मन्द-कर्मणि = मन्द-कर्म में; दोः-ज्या-अन्तर-गुणा भुक्तिः = दोर्ज्या-अन्तर से गुणित भुक्ति; तत्त्व-नेत्र-उद्धृता = तत्त्वनेत्र (२२५) से उद्धृत/विभाजित; पुनः = फिर।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की भुक्ति का फल मन्द-कर्म में ठीक वैसे ही साधो जैसे ग्रह-फल साधा जाता है। सूत्र: भुक्ति × दोर्ज्या-अन्तर, फिर तत्त्वनेत्र = २२५ से भाग। २२५ कला = 3°45′ — ज्या-सारणी का पारम्परिक पद; अन्तर उस पद की ज्या-ढाल है, जिससे मन्द-समीकरण की दर भुक्ति पर उतरती है।

English rendering Form the equation of the planet’s motion as the planet itself is treated in the manda operation. Multiply the motion by the difference of the sines of the arm, and divide again by tattva-netra (225).

गणित / The Mathematics
Bhūtasaṃkhyā: तत्त्वनेत्र = 225 (verse/parenthetical २२५; 225′ = 3°45′, the classical jyā step).
manda-bhukti-phala = (bhukti × doḥ-jyā-antara) / 225
where doḥ-jyā-antara = tabular difference of bhuja-sines across the manda-kendra step.
Then apply as in 2.47 (ṛṇa/dhana). Same pattern “grahavat” for planetary manda-bhukti, not Moon alone.

उदाहरण (worked example) Input convention: bhukti = 60′/day, doḥ-jyā-antara = 45 (tabular sine units on the R = 3438 grid, for a 225′ step).
phala = (60 × 45) / 225 = 2700 / 225 = 12′.
Twelve minutes of arc per day is the manda motion-equation term at that station; sign from kendra (2.45).

हमारा डिकोड (Our Decode) Exact-equality discipline (dossier §7): such phala must match pinned fixtures with `==`, not ± bands — a ±3 band once hid a real −1. Bīja work (Mars +30, Jupiter −51, Saturn +61 revs/Mahāyuga) corrects relative mean rates in a Sun-anchored frame; it does not replace this Chapter-2 manda-bhukti geometry. Report wrong turns: the old bīja sign triple was fixed; “112 great conjunctions” was withdrawn.

2.49
स्वमन्दपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धृता कलाः ।
कर्क्यादौ तु धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम् ।।
svamandaparidhikṣuṇṇā bhagaṇāṃśoddhṛtā kalāḥ ।
karkyādau tu dhanaṃ tatra makarādāvṛṇaṃ smṛtam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-मन्द-परिधि = अपनी मन्द-परिपथ-परिधि; क्षुण्णा = गुणित (ज्या से); भगणांश = ३६० अंश (पूर्ण भगण); उद्धृता = विभाजित; कलाः = कला-फल (मन्द-फल); कर्क्यादौ = कर्क से आरम्भ; धनं = योग/धनात्मक; मकरादाव् = मकर से आरम्भ; ऋणं = ऋण/ऋणात्मक; स्मृतम् = स्मरण किया गया।

हिन्दी भावार्थ मन्द-फल की गणना में स्वकीय मन्द-परिधि को (केन्द्र-ज्या से) गुणा कर, भगण-अंशों अर्थात् ३६० से भाग देने पर फल कलाओं में प्राप्त होता है। उसी फल का चिह्न इस प्रकार याद रखा गया है — कर्क से आरम्भ होने वाले भाग में धन (जोड़), और मकर से आरम्भ होने वाले भाग में ऋण (घटाव)। यह मन्द-समीकरण का दिशा-नियम है: केन्द्र की राशि-अवस्था बताती है कि समीकरण को मध्य-देशान्तर में जोड़ना है या घटाना।

English rendering Continuing 2.48: the product (the motion × the sine-difference ÷ 225) is multiplied by the planet’s own manda epicycle and divided by the 360 degrees of the circle; the minutes so found are the correction to the daily motion — additive when the kendra is from Karka on, subtractive from Makara on.

गणित / The Mathematics
मन्द-फल (कला में):
φ_manda = (R_manda × sin κ_manda) ⁄ 360
जहाँ κ_manda = madhya − mandocca (मन्द-केन्द्र), R_manda = मन्द-परिधि (अंश में)।
चिह्न-नियम (कर्क–मकर विभाजन):
- कर्क से धनु तक → धन (φ जोड़ा जाए)
- मकर से मिथुन तक → ऋण (φ घटाया जाए)
(अध्याय २ के sphuṭa-क्रम में यही manda-phala arcsin-रूप में भी लिखा जाता है; यहाँ कला-रूप और चिह्न-विधि कही गई है।)

उदाहरण (worked example)
मान लें R_manda(सूर्य) = १३°४०′ (ओज-अन्त, κ = ९०°) = १३ + ४०⁄६० = ४१⁄३ ≈ १३.६६७°, और κ_manda ऐसा कि sin κ = १⁄२।
φ = (१३.६६७ × ०.५) ⁄ ३६० ≈ ६.८३३ ⁄ ३६० ≈ ०.०१९०° ≈ १.१४′।
यदि केन्द्र कर्क-पक्ष में हो तो +१.१४′; मकर-पक्ष में −१.१४′।

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में मन्द-चरण शुद्ध SS-रूप में है: κ_manda = madhya − mandocca; manda-phala = arcsin((R_manda⁄360)·sin κ) — वही ज्या-अनुपात, आधुनिक arcsin-लिपि में। चिह्न-नियम केन्द्र-चतुर्थांश से स्वतः निकलता है; हमने पश्चिमी प्रमेय श्रृंखला में नहीं डाला, केवल अध्याय-२ के ४-चरण iteration (half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra) को sealed fixture पर `==` से बाँधा।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले इसे मन्द-फल (स्थान का समीकरण) कहा गया था। 2.47-2.48 के क्रम में यह दैनिक गति का संशोधन है: (केन्द्र-गति × ज्यान्तर ÷ 225) × स्व-मन्दपरिधि ÷ 360 कलाएँ, कर्कादि में धन, मकरादि में ऋण (spanda-ganita.js gati)। ऊपर के गणित-खण्ड का सूत्र मन्द-फल का है, इस श्लोक का नहीं। Correction: this is the correction to the daily motion.

2.50
मन्दस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोज्झ्य शीघ्रोच्चभुक्तितः ।
तच्छेषं विवरेणाथ हन्यात्त्रिज्यान्त्यकर्णयोः ।।
mandasphuṭīkṛtāṃ bhuktiṃ projjhya śīghroccabhuktitaḥ ।
taccheṣaṃ vivareṇātha hanyāttrijyāntyakarṇayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द-स्फुटीकृतां भुक्तिं = मन्द-संशोधित दैनिक गति; प्रोज्झ्य = घटाकर/त्यागकर; शीघ्रोच्च-भुक्तितः = शीघ्रोच्च की भुक्ति से; तत्-शेषं = वह शेष (अन्तर); विवरेण = अन्तर (त्रिज्या−अन्त्यकर्ण) से; हन्यात् = गुणा करे; त्रिज्या-अन्त्य-कर्णयोः = त्रिज्या और अन्त्य-कर्ण — दोनों के।

हिन्दी भावार्थ पहले मन्द से स्फुट की गई ग्रह-भुक्ति को शीघ्रोच्च-भुक्ति में से घटाओ। जो शेष बचे, उसे त्रिज्या और अन्त्य-कर्ण के अन्तर (विवर) से गुणा करो। यह श्लोक शीघ्र-समीकरण से जुड़ी स्पष्ट भुक्ति (true daily motion) की गणना का आरम्भ है — केवल स्थान नहीं, गति भी शीघ्र-ज्या-कर्ण ज्यामिति से सुधरती है।

English rendering Subtract the manda-corrected daily motion from the daily motion of the śīghrocca. Multiply the remainder by the difference between the radius (trijyā) and the final hypotenuse (antya-karṇa). This begins the algorithm for the true daily motion under the śīghra correction.

गणित / The Mathematics
Δn₀ = n_śīghrocca − n_manda-corrected
(अगला गुणन, २.५१ के साथ पूर्ण):
correction-term ∝ Δn₀ × (R − K_antya)
जहाँ R = त्रिज्या (radius of reference circle), K_antya = अन्त्य-कर्ण (śīghra hypotenuse at the final step)।
पूर्ण नियम २.५१ में: इस गुणनफल को चल-कर्ण से भाग दिया जाता है।

उदाहरण (worked example)
रूप-प्रदर्शन (एकक: अंश/दिन, R = ३४३८′ जैसा classical trijyā-unit, या इकाई-त्रिज्या १ — convention declare करें)।
मानें इकाई-त्रिज्या R = १, K_antya = १.०८, n_ś = ०.९८५६°/d (लगभग सूर्य/शीघ्रोच्च), n_manda-corr = ०.५२४°/d (बाह्य ग्रह का उदाहरण-रूप)।
Δn₀ = ०.९८५६ − ०.५२४ = ०.४६१६
(R − K) = १ − १.०८ = −०.०८
अपूर्ण गुणन = ०.४६१६ × (−०.०८) ≈ −०.०३६९ — आगे २.५१ में चलकर्ण-भाग से भुक्ति-शोधन पूरा होता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) स्थान-स्फुट (`sphuṭa`) और गति-स्फुट अलग परतें हैं। हमारा sealed engine अध्याय-२ का manda+śīghra स्थान-क्रम शुद्ध लागू करता है; भुक्ति-शोधन (२.५०–२.५१) उसी शीघ्र-कर्ण ज्यामिति का गति-रूप है। instrument mean-longitude lab है; true-motion promoting के लिए measured calculation layer चाहिए — केवल शब्दों की मजबूती नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) “तच्छेशं” → “तच्छेषं” (शेष)। Correction: spelling.

2.51
चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे त्रिज्याधिके धनम् ।
ऋणं ऊने अधिके प्रोज्झ्य शेषं वक्रगतिर्भवेत् ।।
calakarṇahṛtaṃ bhuktau karṇe trijyādhike dhanam ।
ṛṇaṃ ūne adhike projjhya śeṣaṃ vakragatirbhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चल-कर्ण-हृतं = चल-कर्ण (शीघ्र-कर्ण) से विभाजित; भुक्तौ = भुक्ति में (शोधन); कर्णे त्रिज्या-अधिके = जब कर्ण > त्रिज्या; धनम् = धनात्मक; ऋणं ऊने = कर्ण < त्रिज्या तो ऋण; +अधिके = (पाठ-भेद) अधिक होने पर; प्रोज्झ्य = घटाकर; शेषं = शेष; वक्र-गतिः = उल्टी/पश्चगामी गति; भवेत् = होती है।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-श्लोक का गुणनफल चल-कर्ण से भाग देने पर भुक्ति का शोधन मिलता है। कर्ण यदि त्रिज्या से बड़ा हो तो वह शोधन धन है; छोटा हो तो ऋण। जब (शीघ्रोच्च-भुक्ति की अपेक्षा ग्रह की) reverse-शेष स्थिति बने — अर्थात् शोधन के बाद भुक्ति का चिह्न पलटे — तो शेष वक्रगति कहलाती है। `+अधिके` पाठ-भेद स्मरणीय है; अर्थ-रेखा एक ही: कर्ण–त्रिज्या तुलना से चिह्न, और गति-शेष से वक्र।

English rendering Dividing that product by the variable hypotenuse (cala-karṇa / śīghra-karṇa) yields the correction to the daily motion. If the hypotenuse exceeds the radius the correction is additive; if it falls short, subtractive. When, after this correction, the residual motion reverses sign, the planet is in retrograde (vakra) motion.

गणित / The Mathematics
δn = [ (n_ś − n_m) × (R − K) ] ⁄ K
जहाँ K = चल/शीघ्र-कर्ण, R = त्रिज्या।
n_true ≈ n_manda-corrected + δn (चिह्न कर्ण ≷ त्रिज्या से)
वक्र-शर्त (व्यावहारिक):
यदि n_true < ० (अथवा शीघ्रोच्च-भुक्ति से घटा शेष उल्टा पड़े) → वक्रगति।
पाठ-भेद: `+अधिके` — कुछ पाठों में “अधिक” पद की स्थिति भिन्न; अंक-सूत्र वही कर्ण-भाग।

उदाहरण (worked example)
R = १, K = १.०८, (n_ś − n_m) = ०.४६१६ (२.५० का उदाहरण)।
δn = [०.४६१६ × (१ − १.०८)] ⁄ १.०८ = (−०.०३६९) ⁄ १.०८ ≈ −०.०३४२ °/d
n_m ≈ ०.५२४ → n_true ≈ ०.५२४ − ०.०३४ ≈ ०.४९० °/d (अभी भी प्रत्यक्, वक्र नहीं)।
वक्र तब जब δn इतना ऋणात्मक हो कि n_true < ० — बड़े शीघ्र-परिधि वाले ग्रहों पर, केन्द्र ~१८०° के पास।

हमारा डिकोड (Our Decode) वक्र फलित-चिह्न है, भाग्य-कथन नहीं — n_true का चिह्न-परिवर्तन। kaal-verification-oracle की सीख यहाँ सीधी है: tolerance-band (`±`) कभी-कभी −१ जैसी असली गलती छुपा देती है; वक्र-सीमा को fixture पर `==` से बाँधना चाहिए, “लगभग” से नहीं।

2.52
दूरस्थितः स्वशीघ्रोच्चाद्ग्रहः शिथिलरश्मिभिः ।
सव्येतराकृष्टतनुर्भवेत्वक्रगतिस्तदा ।।
dūrasthitaḥ svaśīghroccādgrahaḥ śithilaraśmibhiḥ ।
savyetarākṛṣṭatanurbhavetvakragatistadā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दूर-स्थितः = दूर स्थित; स्व-शीघ्रोच्चात् = अपने शीघ्रोच्च से; ग्रहः = ग्रह; शिथिल-रश्मिभिः = ढीली/शिथिल किरणों से; सव्येतर = सव्य से इतर (वाम/विपरीत दिशा); आकृष्ट-तनुः = खिंची हुई देह/गति; भवेत् = होता है; वक्र-गतिः = वक्रगति; तदा = तब।

हिन्दी भावार्थ जब ग्रह अपने शीघ्रोच्च से दूर खड़ा होता है, उसकी “किरणें” शिथिल पड़ती हैं — ज्यामितीय भाषा में: आकर्षण-रेखा की प्रभावी दिशा पलटती है। सव्येतर (वाम) आकर्षण से शरीर/गति खिंचकर उलटी प्रतीत होती है; वही अवस्था वक्रगति कहलाती है। यह श्लोक यांत्रिक-दृश्य रूपक है: वक्र कोई रहस्यमय दुर्भाग्य नहीं, शीघ्रोच्च-केन्द्र की दूर-अवस्था में प्रक्षेप-पथ का पीछे-मुड़ना है।

English rendering When a planet stands far from its own śīghrocca, its “rays” slacken; drawn by the opposite (leftward) attraction, its body appears pulled into reverse — that is when retrograde motion occurs. The verse gives a physical picture of the same geometry that the bhukti formulas quantify.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (शीघ्र-ज्यामिति का भौतिक रूपक)।
अंतर्दृष्टि: “दूर-शीघ्रोच्च” ≈ śīghra-kendra ~ १८०° के पड़ोस; वहीं K और φ_śīghra की संरचना n_true को ऋणात्मक कर सकती है — २.५०–२.५१ का संख्या-फल, २.५२ का शब्द-चित्र।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कागज़ पर एक बड़ा वृत्त (शीघ्र-परिधि) खींचें, केन्द्र में शीघ्रोच्च, और परिधि पर ग्रह-बिन्दु। जब बिन्दु उच्च के “सामने” (निकट-अधः) हो, प्रक्षेप आगे लगता है; जब दूर — लगभग विपरीत चाप पर — हो, प्रक्षेप-पथ का स्पर्श-दिशा पलटकर पीछे मुड़ती दिखती है। वही पल वक्रगति है: कोई शाप नहीं, केवल anomaly की ज्यामिति। खुले आकाश में यही बात शुक्र या मंगल के retrograde loop में दिखती है — लूप का पिछला आधा भाग “शिथिल रश्मि / सव्येतर आकर्षण” का दृश्य अनुवाद है।

सुधार · correction (2026-10-07) IAST “ākṛṣta” → “ākṛṣṭa”। Correction: spelling.

सुधार · correction (2026-10-07) देवनागरी “कृष्त” → “कृष्ट”, इसी श्लोक की IAST पंक्ति (ākṛṣṭa) के अनुसार। Correction: the Devanagari now agrees with the IAST line.

2.53
कृतर्तुचन्द्रैर्वेदेन्द्रैः शून्यत्र्येकैर्गुणाष्टभिः ।
शररुद्रैश्चतुर्थेषु केन्द्रांशैर्भूसुतादयः ।।
kṛtartucandrairvedendraiḥ śūnyatryekairguṇāṣṭabhiḥ ।
śararudraiścaturtheṣu kendrāṃśairbhūsutādayaḥ ।।
पाठ-भेद: १६४, १४४, १३०, ८३; ११५

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृत-ऋतु-चन्द्रैः = ४-६-१ → १६४; वेद-इन्द्रैः = ४-१४ → १४४; शून्य-त्रि-एकैः = ०-३-१ → १३०; गुण-अष्टभिः = ३-८ → ८३; शर-रुद्रैः = ५-११ → ११५; चतुर्थेषु केन्द्रांशैः = चौथे (कर्म) के केन्द्र-अंशों पर (2.42 “चतुर्थे … कर्मणि”); भूसुतादयः = मंगल आदि (कुज, बुध, गुरु, शुक्र, शनि)।

हिन्दी भावार्थ भूसुतादि ग्रहों के वक्र-आरम्भ के शीघ्र-केन्द्र अंश भूतसंख्या में दिए गए हैं — मंगल १६४°, बुध १४४°, गुरु १३०°, शुक्र ८३°, और शर-रुद्र अर्थात् ११५° पर शनि — सब चौथे कर्म (पूर्ण शीघ्र) के केन्द्र-अंश। (ऊपर का पाठ-भेद-अंक इसी संस्करण का अपना डिकोड है, स्वतन्त्र पुष्टि नहीं।) ये सीमाएँ शीघ्र-परिधि की विशालता पर निर्भर empirically/tabular मान हैं, न कि एक ही सर्व-ग्रह सूत्र की यादृच्छिक संख्याएँ।

English rendering Mars and the following planets become retrograde when their śīghra-kendras reach, respectively, 164°, 144°, 130°, 83°, and (Saturn) 115° — word-numerals decoded digit-faithfully as kṛta-ṛtu-candra, veda-indra, śūnya-tri-eka, guṇa-aṣṭa, and śara-rudra. (The bracketed figures above are this edition's own decode, not an independent witness; for Venus see the correction below.)

गणित / The Mathematics
वक्र-आरम्भ केन्द्र κ_v (शीघ्र-केन्द्र अंश):

| ग्रह | भूतसंख्या | κ_v |
|--------|------------------------|--------|
| कुज | कृत-ऋतु-चन्द्र (४-६-१) | १६४° |
| बुध | वेद-इन्द्र (४-१४) | १४४° |
| गुरु | शून्य-त्रि-एक (०-३-१) | १३०° |
| शुक्र | गुण-अष्ट (३-८) | ८३° |
| शनि | शर-रुद्र (५-११) | ११५° |

क्रम: भूसुतादयः = मंगल → बुध → गुरु → शुक्र → शनि (SS की प्रचलित पंक्ति)।

उदाहरण (worked example)
बाह्य ग्रह: शीघ्रोच्च ≈ mean Sun। मानें मंगल का śīghra-kendra κ = L_śīghrocca − L_manda-corr।
जब κ पहली बार १६४° को पार करे (और भुक्ति-चिह्न ऋणात्मक हो — २.५१), वक्र-आरम्भ।
उदा.: κ = १६३.७° → अभी प्रत्यक्-सीमा के पास; κ = १६४.१° → वक्र-क्षेत्र में (tabular SS rule)।

हमारा डिकोड (Our Decode) pure sphuṭa engine स्थान देता है; वक्र-सीमा २.५३ की सारणी उन स्थानों पर `n_true` के चिह्न-परिवर्तन से cross-check हो सकती है — JPL/Swiss प्रमाण-अधिकार नहीं, केवल माप-यंत्र। canon day-count (SS १,५७७,९१७,८२८) mean rates बदलता है, अतः κ(t) की समय-रेखा day-count choice पर निर्भर घोषित करनी चाहिए।

सुधार · correction (2026-10-07) शब्द “गुण-अष्टभिः” इकाई-पहले क्रम से 83 ही देते हैं (दो एक-अंकीय शब्द तीन अंक की संख्या नहीं बना सकते), पर पाठ स्वयं इसके विरुद्ध है: (१) पाठ के अपने भगण (1.30–1.32) और शीघ्र-परिधि (2.36–2.37) से, 2.38 की परिधि-विधि, ज्या-सारणी और मध्य गतियों के साथ, वक्र-आरम्भ केन्द्र — कुज 164.1° (पाठ 164), बुध 146.3° (144), गुरु 123.8° (130), शनि 112.5° (115), और शुक्र 167.3° (पाठ 83); (२) 2.55 “सप्तमे भृगुभूसुतौ” शुक्र को कुज के साथ सातवीं राशि में रखता है, जो κ ≈ 150°–180° माँगता है, 83° नहीं; (३) 83° पर 2.54 का वक्र-चाप 194° होता, जबकि अन्य ग्रहों के 32°–130°। अतः 83 संचरित शब्द का दोष है; कोई पाठ इसे ठीक नहीं करता, इसलिए यहाँ अंक बदला नहीं गया, केवल चिह्नित। इंजन में ग्रह अभी नहीं हैं, अतः कोई गणना इस पर निर्भर नहीं। Correction: the word gives 83; the text's own model and 2.55 give about 167° for Venus. Checked in ss-chapters.test.js (mean motions, manda neglected).

सुधार · correction (2026-10-07) “चतुर्थेषु” = चौथे कर्म में (2.42 “चतुर्थे चैव कर्मणि”), सूची में शनि का क्रम नहीं (शनि पाँचवाँ है)। पूर्ण चार-कर्म मॉडल (ss-graha.js, ±60 वर्ष) से स्थान के अपने वक्र-आरम्भ: कुज 163.5°, बुध 145.6°, गुरु 123.9°, शुक्र 167.1°, शनि 112.9° (माध्य); 2.50-2.51 की गति-विधि के शून्य: 157.7°, 139.4°, 120.3°, 161.7°, 110.8°। शुक्र के लिए दोनों 83 से लगभग 80° दूर; गुरु का 130 किसी से नहीं आता। Correction: caturtheṣu = the fourth operation.

2.54
भवन्ति वक्रिणस्तैस्तु स्वैः स्वैश्चक्राद्विशोधितैः ।
अवशिष्टांशतुल्यैः स्वैः केन्द्रैरुज्झन्ति वक्रताम् ।।
bhavanti vakriṇastaistu svaiḥ svaiścakrādviśodhitaiḥ ।
avaśiṣṭāṃśatulyaiḥ svaiḥ kendrairujjhanti vakratām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भवन्ति वक्रिणः = वक्री होते हैं; तैः = उन (२.५३ के) अंशों से; स्वैः स्वैः = अपने-अपने; चक्रात् विशोधितैः = चक्र (३६०°) से घटाए हुए; अवशिष्ट-अंश-तुल्यैः = शेष अंशों के तुल्य; स्वैः केन्द्रैः = अपने केन्द्रों से; उज्झन्ति वक्रताम् = वक्रता छोड़ते हैं (मार्गी होते हैं)।

हिन्दी भावार्थ ग्रह उन्हीं स्वकीय केन्द्र-अंशों पर वक्री बनते हैं; और जब केन्द्र = ३६०° − κ_v हो — अर्थात् चक्र से वह अंश घटाकर बचा शेष — तब वक्रता छोड़कर पुनः सीधे चलते हैं। वक्र-खण्ड केन्द्र-वृत पर सममित है: आरम्भ κ_v, समाप्ति ३६०° − κ_v। बीच का चाप पश्चगति का क्षेत्र।

English rendering Planets turn retrograde at those respective kendra-degrees; they leave retrogression when the kendra equals the circle diminished by the same amount — i.e. at 360° − κ_v. Entry and exit are symmetric on the anomaly circle.

गणित / The Mathematics
κ_enter = κ_v (२.५३ से)
κ_exit = ३६०° − κ_v
वक्र-अंतराल: κ ∈ (κ_v , ३६०° − κ_v) [शीघ्र-केन्द्र बढ़ते क्रम में; दिशा-convention सहित]

उदा. मान:
- कुज: १६४° → १९६° (३६०−१६४); वक्र-चाप = ३२°
- बुध: १४४° → २१६°; चाप = ७२°
- गुरु: १३०° → २३०°; चाप = १००°
- शुक्र: ८३° → २७७°; चाप = १९४° (शब्द के अनुसार — पर नीचे का सुधार देखें: पाठ का अपना शीघ्र-मॉडल ≈ १६७° देता है, तब १६७° → १९३°, चाप २६°)
- शनि: ११५° → २४५°; चाप = १३०°

उदाहरण (worked example)
गुरु: κ_v = १३०°।
κ = १२०° → मार्गी (अभी वक्र नहीं); κ = १३५° → वक्र-क्षेत्र; κ = २३०° → वक्र-समाप्ति; κ = २४०° → पुनः मार्गी।
(केन्द्र की परिभाषा: K_śīghra = śīghrocca − L_manda-corrected — SS २ के iteration के बाद वाले स्फुट-सन्दर्भ से मिलाएँ।)

हमारा डिकोड (Our Decode) ४-चरण SS iteration के बाद का L ही κ मापने का सन्दर्भ होना चाहिए; half-manda/half-śīghra बीच के अनुपात से κ थोड़ा खिसकता है। oracle discipline: pinned fixture पर enter/exit अंश `==`, “±२° ठीक” नहीं — वही पुरानी ±3 band वाली गलती यहाँ नहीं दोहरानी।

2.55
महत्त्वाच्छीघ्रपरिधेः सप्तमे भृगुभूसुतौ ।
अष्टमे जीवशशैजौ नवमे तु शनैश्चरः ।।
mahattvācchīghraparidheḥ saptame bhṛgubhūsutau ।
aṣṭame jīvaśaśaijau navame tu śanaiścaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) महत्त्वात् = महत्त्व/विशालता के कारण; शीघ्र-परिधेः = शीघ्र-परिधि की; सप्तमे = सातवें (भाव/राशि-स्थान) में; भृगु-भूसुतौ = शुक्र और मंगल; अष्टमे = आठवें में; जीव-शशैजौ = गुरु और बुध; नवमे = नौवें में; शनैश्चरः = शनि।

हिन्दी भावार्थ शीघ्र-परिधि जितनी बड़ी, वक्र उतनी जल्दी (शीघ्रोच्च से कम कोणीय दूरी पर नहीं — बल्कि राशि-स्थान की भाषा में दूर-घर में) दिखाई देता है। शुक्र और मंगल सप्तम में, गुरु और बुध अष्टम में, शनि नवम में वक्री होते हैं — यह २.५३ की अंश-सारणी का राशि-रूप स्थूलांकन है: बड़े epicycle ⇒ वक्र-चाप चौड़ा ⇒ “घर” आगे खिसकता है।

English rendering Because of the largeness of the śīghra epicycle, Venus and Mars become retrograde in the seventh place (from the śīghrocca), Jupiter and Mercury in the eighth, and Saturn in the ninth. This is a house-language approximation of the same epicycle geometry fixed in degrees by 2.53.

गणित / The Mathematics
शीघ्रोच्च से ग्रह की राशि-दूरी: केन्द्र κ = शीघ्रोच्च − ग्रह, अतः शीघ्रोच्च से आगे गिनने पर ग्रह ३६०° − κ पर है:
- कुज: ३६० − १६४ = १९६° → ७वीं राशि (१८०°–२१०°) ✓
- बुध: ३६० − १४४ = २१६° → ८वीं ✓; गुरु: ३६० − १३० = २३०° → ८वीं ✓
- शनि: ३६० − ११५ = २४५° → ९वीं ✓
- शुक्र: “सप्तमे” के लिए κ १५०° और १८०° के बीच चाहिए; २.५३ का ८३ (→ २७७°, १०वीं) इससे नहीं मिलता, पाठ के मॉडल का ≈ १६७° (→ १९३°, ७वीं) मिलता है।
सम्बन्ध: बड़ा R_ś ⇒ छोटा κ_v (जल्दी वक्र) और चौड़ा (κ_exit − κ_enter) — २.५३–२.५४ से सुसंगत प्रवृत्ति।
शीघ्र-परिधि (२.३६–२.३७, युग्म/ओज): कुज २३५/२३२, बुध १३३/१३२, गुरु ७०/७२, शुक्र २६२/२६०, शनि ३९/४०।

उदाहरण (worked example)
राशि = ⌊(३६०° − κ_v) ⁄ ३०°⌋ + १ (शीघ्रोच्च की राशि = १ली)।
कुज (३६० − १६४) ⁄ ३० = ६.५३ → ७वीं; शनि (३६० − ११५) ⁄ ३० = ८.१७ → ९वीं — पाठ “सप्तमे”, “नवमे” से ठीक मेल।
शुक्र: ८३ से (३६० − ८३) ⁄ ३० = ९.२३ → १०वीं — पाठ के “सप्तमे” से विरोध।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “घर” = ⌊κ/30⌋ + 1 गिना गया था, जिससे कुज छठे और शनि चौथे में आते थे, और शुक्र के 83° को “सातवें के विस्तृत अर्थ” से समझाया गया था। केन्द्र शीघ्रोच्च − ग्रह है, अतः ग्रह शीघ्रोच्च से 360° − κ आगे है; तब 2.53 के चारों मान ठीक सातवीं, आठवीं, आठवीं, नौवीं राशि देते हैं, और शुक्र का 83 दसवीं — 2.55 स्वयं 83 के विरुद्ध साक्षी है। Correction: count 360° − κ from the śīghrocca.

2.56
कुजार्किगुरुपातानां ग्रहवच्छीघ्रजं फलम् ।
वामं तृतीयकं मान्दं बुधभार्गवयोः फलम् ।।
kujārkigurupātānāṃ grahavacchīghrajaṃ phalam ।
vāmaṃ tṛtīyakaṃ māndaṃ budhabhārgavayoḥ phalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज-आर्कि-गुरु-पातानां = मंगल, शनि, गुरु के पातों का; ग्रहवत् = ग्रह के समान; शीघ्रजं फलम् = शीघ्र से उत्पन्न फल; वामं = वाम/विपरीत दिशा; तृतीयकं = तीसरा (चरण/फल); मान्दं = मन्द-सम्बन्धी; बुध-भार्गवयोः = बुध और शुक्र का; फलम् = फल।

हिन्दी भावार्थ कुज, आर्कि (शनि) और गुरु — इनके पातों (उपाग्रहीय/नाभीय बिन्दुओं) पर शीघ्र-फल ठीक ग्रह की तरह लगाया जाता है। बुध और भार्गव (शुक्र) के लिए व्यवस्था भिन्न है: तीसरा फल वाम (उल्टी दिशा) है, और मन्द-फल अपनी विशेष रीति से — क्योंकि अन्दरूनी ग्रहों में madhya = mean Sun तथा śīghrocca = heliocentric mean वाली भूमिकाएँ बाह्य ग्रहों से पलटती हैं। यह श्लोक पात-स्फुट और आन्तर/बाह्य भेद का सूत्र-द्वार है।

English rendering For the nodes (pāta) of Mars, Saturn, and Jupiter, the śīghra equation is applied as for the planets themselves. For the nodes of Mercury and Venus, their third equation — the manda one — is applied reversed (vāma).

गणित / The Mathematics
बाह्य (कुज, गुरु, शनि) — ग्रह एवं पात:
śīghrocca ≈ mean Sun; madhya = ग्रह-मध्य
φ_śīghra = arcsin( R_ś · sin K ⁄ √(R_def² + R_ś² + 2·R_def·R_ś·cos K) )
K = śīghrocca − L_manda-corr
पातों पर: शीघ्रज फल “ग्रहवत्” — वही φ_ś संरचना।

आन्तर (बुध, शुक्र):
madhya = mean Sun; śīghrocca = heliocentric mean of planet
पातों पर: तीसरा (मन्द) फल वाम — उलटे चिह्न से

४-चरण iteration (dossier): half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra;
Sun/Moon: manda only।

उदाहरण (worked example)
बाह्य — मंगल (R_ś mean = (२३५ + २३२)/२ = २३३.५°, R_def ≈ ३६०⁄(२π) unit-choice: SS often works in trijyā units; यहाँ अंश-परिधि रूप):
K = ९०°, sin K = १, cos K = ०।
φ_ś ≈ arctan( r ) with r = २३३.५ ⁄ ३६० = ०.६४९ → φ_ś ≈ ३३.०° — R = ३६०⁄(२π) ≈ ५७.३ यदि परिधि-अंश को epicycle radius से मिलाएँ; classical chain trijyā=३४३८′, R_ś in same units।
सटीक संख्या engine की इकाई-संहिता पर निर्भर — convention: `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` sealed 2026-05-17 वाली R_manda mean table (by the words of 2.34–2.35: Sun १३°५०′, Moon ३१°५०′, Mars ७३.५°, Mercury २९°, Jupiter ३२.५°, …; śīghra 2.36–2.37: Mars २३३.५°, …)।

हमारा डिकोड (Our Decode) अध्याय-२ का यही भेद हमने शुद्ध पोर्ट किया — outer: śīghrocca = mean Sun; inner: madhya = mean Sun, śīghrocca = heliocentric mean; Sun/Moon manda-only। पात-पंक्ति “ग्रहवत् शीघ्रज” को उसी φ_ś routine से बाँधा जा सकता है; बुध-शुक्र का “वामं तृतीयकं” inner role-swap का शास्त्र-वचन है, पश्चिमी theorem-chain नहीं। mean-longitude lab को true-position production कहना गलत होगा — measured layer के बिना promotion नहीं; गलत मोड़ (bīja चिह्न −३०,+५१,−६१) रिपोर्ट कर सुधारा, छुपाया नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “बुध-शुक्र का तीसरा फल वाम, मन्द-फल स्व-नियम से” पढ़ा गया था। विषय “पातानाम्” दोनों पंक्तियों का है: कुज-शनि-गुरु के पातों पर अन्तिम शीघ्र-फल ग्रहवत्; बुध-शुक्र के पातों पर तीसरा (मान्द) फल वाम। Correction: both halves are about the nodes.

2.57
स्वपातोनाद्ग्रहाज्जीवा शीघ्राद्भृगुजसौम्ययोः ।
विक्षेपघ्न्यन्त्यकर्णाप्ता विक्षेपस्त्रिज्यया विधोः ।।
svapātonādgrahājjīvā śīghrādbhṛgujasaumyayoḥ ।
vikṣepaghnyantyakarṇāptā vikṣepastrijyayā vidhoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वपातोनात् = स्व-पातांश से हीन ग्रह-स्थान; जीवा = ज्या (sine); भृगुज-सौम्ययोः = शुक्र और बुध के; विक्षेपघ्नी = (परम) विक्षेप से गुणित; अन्त्यकर्णाप्ता = अन्त्य-कर्ण (शीघ्रकर्ण) से विभाजित; त्रिज्यया = त्रिज्या (R) से; विधोः = चन्द्र का (विक्षेप)।

हिन्दी भावार्थ ग्रह के मध्यांश से उसके स्व-पात (node) को घटाकर जो चाप बचता है, उसकी ज्या लीजिए। शुक्र और बुध के लिए उस ज्या को परम विक्षेप से गुणा करके शीघ्र-साधन के अन्त्य-कर्ण से भाग दें — वही विक्षेप (अक्षांश / latitude) है। चन्द्रमा का विक्षेप उसी रीति से, परन्तु अन्त्य-कर्ण के स्थान पर त्रिज्या से भाग देकर सिद्ध होता है।

English rendering Take the sine of the planet diminished by its own node — for Venus and Mercury, of their śīghra(-ucca) diminished by the node (śīghrād bhṛgujasaumyayoḥ). Multiplied by the greatest latitude and divided by the last hypotenuse it is the latitude, for all five; for the Moon divide by the radius instead.

गणित / The Mathematics विक्षेप (latitude) φ:
- शुक्र/बुध: φ = (R_vikṣepa_max × sin(λ − Ω)) / K_antya
जहाँ K_antya = शीघ्र-साधन का अन्त्यकर्ण (Chapter-2 śīghra hypotenuse), Ω = पात।
- चन्द्र: φ = (R_vikṣepa_max × sin(λ_☾ − Ω_☾)) / R
(R = त्रिज्या)। अन्त्यकर्ण < R होने पर शुक्र-बुध का विक्षेप चन्द्र-सूत्र से भिन्न अनुपात में आता है।

उदाहरण (worked example) माना λ − Ω = 30°, sin 30° = 1/2, परम विक्षेप = 2°, R = 3438′ (पारंपरिक त्रिज्या-मान), और किसी स्थिति में K_antya = 3000′। तब शुक्र/बुध: φ = (2° × 0.5 × 3438) / 3000 ≈ 1.15°। चन्द्र (उन्हीं मानों पर, K = R): φ = 2° × 0.5 = 1°।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक Chapter-2 के manda+śīghra sphuṭa-क्रम से सीधे जुड़ता है — अन्त्यकर्ण वही K है जो `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में śīghra-phala के denominator से निकलता है। हमारे pure-SS इंजन में outer/inner ग्रह का 4-step iteration पूरा होने के बाद ही latitude-layer लगती है; बुध-शुक्र का madhya = mean Sun, śīghrocca = heliocentric mean — उसी कर्ण पर यह विक्षेप-सूत्र बैठता है।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “शीघ्राद्भृगुजसौम्ययोः” छूट गया था और अन्त्य-कर्ण से भाग केवल शुक्र-बुध तक सीमित था। शब्द: शुक्र-बुध के लिए ज्या शीघ्रोच्च − पात की; “विक्षेपघ्नी अन्त्यकर्णाप्ता” पाँचों पर; चन्द्र के लिए त्रिज्या। Correction: as the words say.

2.58
विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्विक्षेपसंयुता ।
दिग्भेदे वियुता स्पष्टा भास्करस्य यथागता ।।
vikṣepāpakramaikatve krāntirvikṣepasaṃyutā ।
digbhede viyutā spaṣṭā bhāskarasya yathāgatā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विक्षेप-अपक्रम-एकत्वे = विक्षेप और अपक्रम (क्रान्ति) एक दिशा में; क्रान्तिः = नतांश (declination); विक्षेप-संयुता = विक्षेप से युक्त; दिग्भेदे = दिशा-भेद में; वियुता = व्यवकलित; स्पष्टा = स्पष्ट (सही) क्रान्ति; भास्करस्य = सूर्य की; यथागता = जैसी प्राप्त हो।

हिन्दी भावार्थ जब ग्रह का विक्षेप और उसकी क्रान्ति (अपक्रम) एक ही दिशा में हों, तो स्पष्ट क्रान्ति दोनों का योग है। दिशाएँ विपरीत हों तो एक को दूसरे से घटाएँ। सूर्य की क्रान्ति ज्यों की त्यों — यथा-प्राप्त — ली जाती है, क्योंकि सूर्य का विक्षेप शून्य माना जाता है।

English rendering When latitude and declination share the same sense, the true declination is their sum; when the senses differ, take the difference. The Sun’s declination stands as obtained, without a latitude correction.

गणित / The Mathematics δ_sphuṭa = δ_krānti ± φ_vikṣepa
- समान दिशा (एकत्व): योग (+); दिग्भेद: अन्तर (−)।
- सूर्य: φ = 0 ⇒ δ_☉ = δ_krānti alone। यह ecliptic latitude को equatorial declination में जोड़ने का संकेत-संवेदनशील नियम है।

उदाहरण (worked example) माना क्रान्ति δ = +12° (उदक्), विक्षेप φ = +2° (उदक्) → δ_sphuṭa = 14°। यदि φ = −2° (याम्य) → δ_sphuṭa = 10°। सूर्य पर φ = 0 ⇒ δ अपरिवर्तित।

2.59
ग्रहोदयप्राणहता खखाष्टैकोद्धृता गतिः ।
चक्रासवो लब्धयुता स्वाहोरात्रासवः स्मृताः ।।
grahodayaprāṇahatā khakhāṣṭaikoddhṛtā gatiḥ ।
cakrāsavo labdhayutā svāhorātrāsavaḥ smṛtāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-उदय-प्राण-हता = ग्रह-उदय-प्राणों से गुणित (गति); ख-ख-अष्ट-एक-उद्धृता = 1800 से विभाजित (ख=0, ख=0, अष्ट=8, एक=1 → 1800); गतिः = (RA-दिशा में) गति; चक्रासवः = चक्र के आसव = 21,600 प्राण; लब्ध-युता = लब्ध-फल से युक्त; स्व-अहोरात्र-आसवः = स्व-अहोरात्र के प्राण।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की दैनिक गति को उसके उदय-सम्बन्धी प्राणों से गुणा करके अठारह सौ (1800) से भाग दें — यही उसकी (विशेष) गति-सुधार है। उसे चक्र के आसवों अथवा स्व-अहोरात्र-आसवों के साथ जोड़कर ग्रह का अपना दिन-रात्रि माप (प्राणों में) स्मरण किया जाता है।

English rendering Multiply the planet’s (daily) motion by the prāṇas of its rising and divide by 1800; that increment, combined with the prāṇas of the full circle (or of its own day-and-night), is remembered as the (planet’s) day-and-night measured in prāṇas (asu, units of time).

गणित / The Mathematics
- भौतसंख्या: खखाष्टैक = 1 8 0 0 → 1800।
- चक्रासव = 21,600 प्राण / दिन (पूर्ण वृत्त = 21,600 आर्क-मिनट की गणना-संगति)।
- Δ = (गति × उदय-प्राण) / 1800; स्वाहोरात्रासव ≈ चक्रासव ± Δ (संकेत-व्यवस्था के अनुसार)।
- इकाई: प्राण (1 दिन = 21,600 प्राण)।

उदाहरण (worked example) माना दैनिक गति = 59′ (सूर्य-सदृश), किसी राशि का उदय-प्राण-योग = 900। तब Δ = (59 × 900) / 1800 = 29.5 प्राण। 21,600 ± 29.5 ≈ 21,629.5 या 21,570.5 प्राण — ग्रह का स्व-अहोरात्र (संकेत-चयन पर निर्भर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 आर्क-मिनट/वृत्त वही count-correspondence है जो MATHEMATICAL-AUDIT §1 में sealed है — काल और कोण की भौतिक समानता नहीं, गणना की एकरूपता। `vedic-ghadi` की ghaḍī/pala/vipala/prāṇa metrology उसी 60–3600–216000–21600 श्रृंखला पर बैठती है; अहोरात्र-आसव का यह श्लोक उसी इकाई-अनुशासन का ग्रह-स्तरीय विस्तार है।

2.60
क्रान्तेः क्रमोत्क्रम्मज्ये द्वे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यया ।
हीना त्रिज्या दिनव्यासदलं तद्दक्षिणोत्तरम् ।।
krānteḥ kramotkrammajye dve kṛtvā tatrotkramajyayā ।
hīnā trijyā dinavyāsadalaṃ taddakṣiṇottaram ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्तेः = क्रान्ति की; क्रम-उत्क्रम-ज्ये द्वे = क्रमज्या और उत्क्रमज्या दोनों; उत्क्रमज्यया हीना त्रिज्या = उत्क्रमज्या से रहित त्रिज्या; दिन-व्यास-दलम् = दिन-व्यास का आधा (अहोरात्र-वृत्त की त्रिज्या); तत् दक्षिणोत्तरम् = वही दक्षिण-उत्तर (व्यासारध्द)।

हिन्दी भावार्थ क्रान्ति की क्रमज्या और उत्क्रमज्या दोनों निकालें। त्रिज्या में से उत्क्रमज्या घटा दें — जो शेष रहे वही दिन-व्यास का आधा है, अर्थात् दैनिक वृत्त की दक्षिण-उत्तर त्रिज्या (day-radius)।

English rendering Form both the sine and the versed sine of the declination. The radius diminished by that versed sine is the half-diameter of the day-circle — the north–south day-radius.

गणित / The Mathematics
- क्रमज्या(δ) = R sin δ; उत्क्रमज्या(δ) = R(1 − cos δ) = versine।
- दिन-व्यास-दल (day-radius) R_dyn = R − उत्क्रमज्या(δ) = R cos δ।
- समकक्ष: R_dyn = √(R² − (R sin δ)²)। यही अहोरात्र-वृत्त की प्रभावी त्रिज्या है।

उदाहरण (worked example) R = 3438′, δ = 24°। cos 24° ≈ 0.9135 ⇒ R_dyn ≈ 3438 × 0.9135 ≈ 3141′। (क्रमज्या ≈ 1398′; उत्क्रमज्या ≈ 297′; 3438 − 297 = 3141′ — दोनों मार्ग एक।)

2.61
क्रान्तिज्या विषुवद्भाघ्नी क्षितिज्या द्वादशोद्धृता ।
त्रिज्यागुणाहोरात्रार्धकर्णाप्ता चरजासवः ।।
krāntijyā viṣuvadbhāghnī kṣitijyā dvādaśoddhṛtā ।
trijyāguṇāhorātrārdhakarṇāptā carajāsavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्तिज्या = क्रान्ति की ज्या; विषुवद्भा-घ्नी = विषुवत्-छाया (equinoctial shadow) से गुणित; क्षितिज्या = क्षितिज्या (earth-sine); द्वादश-उद्धृता = 12 से विभाजित; त्रिज्या-गुणा = त्रिज्या से गुणित; अहोरात्र-अर्ध-कर्ण-आप्ता = दिन-व्यास-दल (अहोरात्रार्धकर्ण) से विभाजित; चरज-आसवः = चरज्या के प्राण (ascensional difference)।

हिन्दी भावार्थ क्रान्तिज्या को विषुवद्भा (सम-विषुव-दिन की शंकु-छाया) से गुणा करके बारह से भाग दें — यह क्षितिज्या है। फिर क्षितिज्या को त्रिज्या से गुणा करके अहोरात्रार्धकर्ण (दिन-व्यास-दल) से भाग दें; लब्ध फल चरज्या है, प्राणों में मापा गया ascensional difference।

English rendering Multiply the sine of declination by the equinoctial shadow and divide by twelve — that is the earth-sine. Multiply the earth-sine by the radius and divide by the day-radius; the result is the ascensional difference in prāṇas.

गणित / The Mathematics
- क्षितिज्या e = (क्रान्तिज्या × विषुवद्भा) / 12
(12 = शंकु-मान अङ्गुल; विषुवद्भा = R tan φ / 12 की छाया-भाषा)।
- चरज्या (asavas) c = (e × R) / R_dyn, जहाँ R_dyn = R cos δ (2.60)।
- आधुनिक: sin c ∝ tan δ · tan φ; c = ascensional difference।

उदाहरण (worked example) δ = 20°, φ_स्थान ऐसा कि विषुवद्भा = 6 अङ्गुल, R = 3438′। क्रान्तिज्या ≈ 1176′। e = (1176 × 6) / 12 = 588′। R_dyn = 3438 cos 20° ≈ 3231′। c = (588 × 3438) / 3231 ≈ 626 प्राण ≈ 10.4° (क्योंकि 21,600 प्राण = 360°)।

हमारा डिकोड (Our Decode) चर-आसव और दिन-रात्रि-दल का यह निर्माण lagna/अस्त-उदय-समय की रीढ़ है। `bharat-ephemeris-offline` के closed-form ascendant (longitude, latitude, obliquity, sidereal time) और bhāva-madhya layer में RA(MC) ≡ LST 1e-9° तक verified है — वही spherical skeleton जिसका चर-खण्ड यह श्लोक देता है।

2.62
तत्कार्मुकं उदक्क्रान्तौ धनशनी पृथक्ष्थिते ।
स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिदले स्मृते ।।
tatkārmukaṃ udakkrāntau dhanaśanī pṛthakṣthite ।
svāhorātracaturbhāge dinarātridale smṛte ।।
पाठ-भेद: C धनहानी

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-कार्मुकम् = उसका चाप (arcsin / bow); उदक्-क्रान्तौ = उत्तर-क्रान्ति में; धन-शनी / (C) धन-हानी = धन (योग) और हानि (व्यवकलन) — पाठ-भेद; पृथक्-स्थिते = पृथक्-पृथक् रखे; स्व-अहोरात्र-चतुर्भाग = स्व-अहोरात्र के चतुर्थांश में; दिन-रात्रि-दले = दिन और रात्रि के अर्ध; स्मृते = स्मरण किए जाते हैं।

हिन्दी भावार्थ चरज्या का चाप (कार्मुक) निकालें। उत्तर-क्रान्ति में उसे दिन-दल में धन और रात्रि-दल में हानि — या पाठान्तर से धन-हानि — के रूप में अलग-अलग जोड़ें-घटाएँ। स्व-अहोरात्र के चतुर्थांश पर ये दिन और रात्रि के आधे भाग माने जाते हैं। (C-पाठ «धनहानी» अर्थ की दृष्टि से स्पष्टतर है; «धनशनी» पाठ-भेद संभव।)

English rendering Take the arc of that (cara-jyā). When the declination is northern, apply it as a gain and a loss respectively to the day- and night-halves, each set apart. In a quarter of the (planet’s) day-and-night those adjusted halves are remembered as the semi-day and semi-night. Variant (C): dhana-hānī — addition and subtraction.

गणित / The Mathematics
- c° = arcsin(चरज्या / R) (या चाप-सारणी से)।
- उदक्-क्रान्ति: दिन-दल = (अहोरात्र/4) + c; रात्रि-दल = (अहोरात्र/4) − c।
- अहोरात्र-चतुर्भाग = 5400 प्राण (= 6 होरा) जब अहोरात्र = 21,600 प्राण।
- पाठ: मूल «धनशनी»; (C) «धनहानी» — अर्थ-संगत पाठ-भेद।

उदाहरण (worked example) c = 600 प्राण, अहोरात्र/4 = 5400। उदक्: दिन-दल = 6000 प्राण, रात्रि-दल = 4800 प्राण। (पूर्ण दिन = 12,000; पूर्ण रात्रि = 9600 प्राण — अगले श्लोक की द्विगुण-व्यवस्था से मिलान।)

2.63
याम्यक्रान्तौ विपर्यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे ।
विक्षेपयुक्तोनितया क्रान्त्या भानां अपि स्वके ।।
yāmyakrāntau viparyaste dviguṇe tu dinakṣape ।
vikṣepayuktonitayā krāntyā bhānāṃ api svake ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्य-क्रान्तौ = दक्षिण-क्रान्ति में; विपर्यस्ते = उलटे (धन-हानि पलटें); द्विगुणे = दूने करने पर; दिन-क्षपे = दिन और रात्रि (पूर्ण); विक्षेप-युक्त-ऊनितया क्रान्त्या = विक्षेप से युक्त या रहित क्रान्ति से; भानाम् अपि = नक्षत्रों का भी; स्वके = अपने (दिन-रात्रि) में।

हिन्दी भावार्थ दक्षिण-क्रान्ति में धन-हानि का क्रम पलट दें — दिन छोटा, रात्रि बड़ी। उन अर्धों को दूना करने पर पूरे दिन और पूरी रात्रि मिलते हैं। नक्षत्रों के उदय-अस्त और दिन-रात्रि भी अपनी-अपनी क्रान्ति पर चलते हैं, जिसमें विक्षेप जोड़ा या घटाया गया हो (2.58 की स्पष्ट-क्रान्ति)।

English rendering When the declination is southern, reverse the additions and subtractions. Doubling those halves yields the full day and full night. The same procedure, with each star’s own declination combined with or reduced by its latitude, applies to the nakṣatras as well.

गणित / The Mathematics
- याम्य-क्रान्ति: दिन-दल = (A/4) − c; रात्रि-दल = (A/4) + c।
- पूर्ण दिन = 2 × दिन-दल; पूर्ण रात्रि = 2 × रात्रि-दल; योग = A (अहोरात्र)।
- नक्षत्र: δ_bhā = δ_krānti ± φ_vikṣepa (2.58), फिर 2.60–2.62 की पूरी श्रृंखला।

उदाहरण (worked example) c = 600 प्राण, A/4 = 5400, याम्य: दिन-दल = 4800 ⇒ पूर्ण दिन = 9600 प्राण; रात्रि-दल = 6000 ⇒ पूर्ण रात्रि = 12,000 प्राण। योग = 21,600।

2.64
भभोगो अष्टशतीलिप्ताः खाश्विशैलास्तथा तिथेः ।
ग्रहलिप्ताभभोगाप्ता भानि भुक्त्या दिनादिकम् ।।
bhabhogo aṣṭaśatīliptāḥ khāśviśailāstathā titheḥ ।
grahaliptābhabhogāptā bhāni bhuktyā dinādikam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ-भोगः = एक नक्षत्र का भोग (विस्तार); अष्टशती-लिप्ताः = 800 कला; ख-अश्वि-शैलाः = 720 (ख=0, अश्विन्=2, शैल=7 → 720); तथा तिथेः = तथा तिथि का (भोग); ग्रह-लिप्ता = ग्रह की कला-स्थिति; भ-भोग-आप्ता = भ-भोग से विभाजित; भानि = (भुक्त) नक्षत्र-संख्या; भुक्त्या = भुक्ति (दैनिक गति) से; दिन-आदिकम् = दिन आदि काल।

हिन्दी भावार्थ एक नक्षत्र का भोग आठ सौ कला (800′) है; तिथि का भोग खाश्विशैल — सात सौ बीस कला (720′) — है। ग्रह की कलाओं को भ-भोग से भाग देने पर भुक्त नक्षत्र-संख्या मिलती है; भुक्ति (दैनिक गति) से भाग देने पर दिन-आदि काल सिद्ध होता है।

English rendering The span of one nakṣatra is eight hundred minutes of arc; that of a tithi is seven hundred twenty. Dividing the planet’s minutes by a nakṣatra-span yields the number of nakṣatras traversed; dividing by the daily motion yields the time in days and so on.

गणित / The Mathematics
- भभोग = अष्टशती लिप्ता = 800′ (= 13°20′; 27 × 800′ = 21,600′ = 360°)।
- तिथि-भोग: खाश्विशैलाः = 720′ (= 12°; 30 × 720′ = 21,600′)।
- नक्षत्र-संख्या n = ग्रह-लिप्ता / 800।
- काल (दिन) t = चाप-अन्तर (′) / भुक्ति (′/दिन)।

उदाहरण (worked example) ग्रह-स्थान = 5,200′ (≈ 86°40′)। नक्षत्र-संख्या = 5200 / 800 = 6.5 ⇒ 7वें नक्षत्र में आधा भोग। तिथि-गणना: 5200 / 720 ≈ 7.22 ⇒ 8वीं तिथि का अंश। भुक्ति = 59′/दिन हो तो 800′ पार करने में ≈ 13.56 दिन।

हमारा डिकोड (Our Decode) 800′ और 720′ वही metrology हैं जिन पर tithi-engine और panchāṅga substrate टिकते हैं — `vedic-ghadi` में तिथि = lunar elongation / 12° का प्रत्यक्ष रूप। Mahāyuga day-count का canon-choice (SS 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500) tithi-engine को सबसे तेज़ छूता है; यह श्लोक उस इंजन की इकाई-परिभाषा देता है, न कि युग-दिन-संख्या।

2.65
रवीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगा भभोगभाजिताः ।
गता गम्याश्च षष्टिघ्न्यो भुक्तियोगाप्तनाडिकाः ।।
ravīnduyogaliptābhyo yogā bhabhogabhājitāḥ ।
gatā gamyāśca ṣaṣṭighnyo bhuktiyogāptanāḍikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवीन्दु-योग = सूर्य + चन्द्र का योग (अक्षांश-योग); लिप्ताभ्यः = कलाओं (arc-minutes) से; योगाः = योग (२७); भ-भोग = एक नक्षत्र-भोग (८००′); भाजिताः = विभाजित; गताः / गम्याः = व्यतीत / शेष अंश; षष्टि-घ्न्यः = ६० से गुणित; भुक्ति-योग = सूर्य-चन्द्र की दैनिक गति-योग; आप्त-नाडिकाः = प्राप्त नाड़ियाँ (घटियाँ)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्रमा के देशान्तर-योग को कलाओं में लेकर, उसे एक नक्षत्र-भोग से भाग देने पर योग-संख्या मिलती है। वर्तमान योग का जो अंश बीत चुका है और जो शेष है, उन्हें साठ से गुणा कर सूर्य-चन्द्र की भुक्ति-योग से भाग देने पर क्रमशः गत और गम्य नाड़ियाँ ज्ञात होती हैं — यही योग-काल का सूक्ष्म माप है।

English rendering From the sum of the Sun’s and Moon’s longitudes expressed in minutes of arc, the yogas are obtained by division by the span of one lunar mansion. The elapsed and remaining portions of the current yoga, each multiplied by sixty and divided by the sum of the two daily motions, give the corresponding nāḍikās.

गणित / The Mathematics
भ-भोग = २१,६००′ ÷ २७ = ८००′ (एक नक्षत्र)।
योग-संख्या (पूर्णांक + भिन्न) = (λ_☉ + λ_☽)′ ÷ ८००′
(λ_☉ + λ_☽ को २१,६००′ पर modulo लेना चाहिए — पूर्ण वृत्त)।
गत-नाड़ी = (गत-अंश′) × ६० ÷ (v_☉ + v_☽)
गम्य-नाड़ी = (गम्य-अंश′) × ६० ÷ (v_☉ + v_☽)
जहाँ v_☉, v_☽ दैनिक भुक्ति (′/दिन) हैं; १ नाड़ी = १/६० दिन।

उदाहरण (worked example) मान लें λ_☉ + λ_☽ = ५,२५०′ (modulo २१,६००′), तथा v_☉ + v_☽ = ७९०′/दिन।
५,२५० ÷ ८०० = ६ पूर्ण योग + ४५०′ गत; गम्य = ८०० − ४५० = ३५०′।
गत-नाड़ी = ४५० × ६० ÷ ७९० ≈ ३४.१८; गम्य-नाड़ी = ३५० × ६० ÷ ७९० ≈ २६.५८।
(इनपुट: कला में योग; दिन-भुक्ति कला/दिन; २७ योग-चक्र।)

हमारा डिकोड (Our Decode) योग का यह काल-हिस्सा panchāṅga substrate (vedic-ghadi) में tithi/yoga engine का साथी है — दोनों elongation-geometry से निकलते हैं। दिन-गणना का चयन (SS १,५७७,९१७,८२८ बनाम Āryabhaṭa १,५७७,९१७,५००) mean longitudes को थोड़ा हिलाता है, अतः योग-नाड़ी भी थोड़ी; canon gap tithi-engine पर सबसे कठोर पड़ता है।

2.66
अर्कोनचन्द्रलिप्ताभ्यस्तिथयो भोगभाजिताः ।
गता गम्याश्च षष्टिघ्न्यो नाड्यो भुक्त्यन्तरोद्धृताः ।।
arkonacandraliptābhyastithayo bhogabhājitāḥ ।
gatā gamyāśca ṣaṣṭighnyo nāḍyo bhuktyantaroddhṛtāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कोन-चन्द्र = सूर्य-रहित चन्द्र (λ_☽ − λ_☉); लिप्ताभ्यः = कलाओं से; तिथयः = तिथियाँ; भोग-भाजिताः = (तिथि-)भोग से विभाजित; गताः / गम्याः = व्यतीत / शेष; षष्टि-घ्न्यः = ×६०; नाड्यः = नाड़ियाँ; भुक्ति-अन्तर = चन्द्र-सूर्य गति-अन्तर; उद्धृताः = भाग-फल से प्राप्त।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा में से सूर्य घटाकर जो अन्तर कलाओं में आता है, उसे एक तिथि के भोग से भाग देने पर तिथि-संख्या मिलती है। वर्तमान तिथि का गत और गम्य अंश साठ से गुणा कर, सूर्य-चन्द्र की भुक्ति-अन्तर से भाग देने पर गत-गम्य नाड़ियाँ निकलती हैं — यही तिथि-काल का शास्त्रीय सूत्र है।

English rendering From the Moon’s elongation past the Sun in minutes of arc, the tithis are found by dividing by one tithi’s span. The elapsed and remaining fractions of the current tithi, each multiplied by sixty and divided by the difference of the daily motions, yield the corresponding nāḍīs.

गणित / The Mathematics
तिथि-भोग = १२° = ७२०′ (synodic ३६०° ÷ ३०)।
तिथि-संख्या = (λ_☽ − λ_☉)′ ÷ ७२०′ (modulo २१,६००′)
गत-नाड़ी = (गत′) × ६० ÷ (v_☽ − v_☉)
गम्य-नाड़ी = (गम्य′) × ६० ÷ (v_☽ − v_☉)
जहाँ v_☽ > v_☉; भुक्ति-अन्तर = सापेक्ष दैनिक गति (′/दिन)।

उदाहरण (worked example) (λ_☽ − λ_☉) = ३,६५०′; v_☽ − v_☉ = ७३०′/दिन।
३,६५० ÷ ७२० = ५ पूर्ण तिथि + ५०′ गत; गम्य = ७२० − ५० = ६७०′।
गत-नाड़ी = ५० × ६० ÷ ७३० ≈ ४.११; गम्य-नाड़ी = ६७० × ६० ÷ ७३० ≈ ५५.०७।
(५ पूर्ण = शुक्ल षष्ठी का आरम्भ-प्रदेश; convention: ०′ = अमावस्या-अन्त / शुक्ल प्रतिपदा-आरम्भ।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही elongation-count tithi engine का हृदय है। प्राचीन synodic revs ५७,७५३,३३६ − ४,३२०,००० = ५३,४३३,३३६ /Mahāyuga पर SS-canon day-count १,५७७,९१७,८२८ का deficit मात्र −०.१ rev (−०.००४७ s/synodic-month) है, जबकि Āryabhaṭa-canon (−११.२ rev) tithi को अधिक हिलाता है — इसलिए math-core SS-canon चुनता है, vedic-ghadi Āryabhaṭa day-count रखता है; दोनों को मिलाना deliberate convention-declaration माँगता है।

2.67
ध्रुवाणि शकुनिर्नागं तृतीयं तु चतुष्पदम् ।
किंस्तुघ्नं तु चतुर्दश्याः कृष्णायाश्चापरार्धतः ।।
dhruvāṇi śakunirnāgaṃ tṛtīyaṃ tu catuṣpadam ।
kiṃstughnaṃ tu caturdaśyāḥ kṛṣṇāyāścāparārdhataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ध्रुवाणि = स्थिर (अचर) करण; शकुनिः = शकुनि; नागम् = नाग; तृतीयम् = तीसरा; चतुष्पदम् = चतुष्पद; किंस्तुघ्नम् = किंस्तुघ्न; चतुर्दश्याः कृष्णायाः = कृष्ण-पक्ष चतुर्दशी का; अपर-अर्धतः = उत्तरार्ध से (आरम्भ)।

हिन्दी भावार्थ चार स्थिर करण हैं — शकुनि, नाग, और तीसरा चतुष्पद, तथा किंस्तुघ्न। इनका क्रम कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से आरम्भ होता है; ये चर-करण-चक्र से अलग, महीने के अन्त-आरम्भ पर स्थिर स्थान रखते हैं।

English rendering The fixed karaṇas are Śakuni, Nāga, third Catuṣpada, and Kiṃstughna. They begin from the latter half of the fourteenth tithi of the dark fortnight.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण/पञ्चाङ्ग-नामसूची।
चार स्थिर करण × आधा-तिथि = ४ × ६° elongation = २४° का अचल खण्ड कृष्ण-चतुर्दशी-उत्तरार्ध से शुक्ल-प्रतिपदा-पूर्वार्ध तक; शेष पक्ष चर-करणों से भरता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) चर-करण (बव, बालव आदि) आधे तिथि-दिन की तरह घूमते रहते हैं; चार स्थिर करण — शकुनि, नाग, चतुष्पद, किंस्तुघ्न — महीने के “किनारे” पर कील की तरह ठहरे रहते हैं। व्यावहारिक पंचांग में देखें: कृष्ण-चतुर्दशी के उत्तरार्ध से किंस्तुघ्न आरम्भ होता है, फिर अमावस्या–शुक्ल-प्रतिपदा के सन्धि-क्षेत्र में शेष तीन स्थिर नाम क्रम से बैठते हैं। यह वर्गीकरण काल-विभाग का “अंत-आरंभ जोड़” है — गति-गणित नहीं, किन्तु तिथि–करण सारिणी का आधार-स्तम्भ, जो आगे मुहूर्त-तालिकाओं में उसी नाम-क्रम से दोहराया जाता है।

2.68
बवादीनि ततः सप्त चराख्यकरणानि च ।
मासे अष्टकृत्व एकैकं करणानां प्रवर्तते ।।
bavādīni tataḥ sapta carākhyakaraṇāni ca ।
māse aṣṭakṛtva ekaikaṃ karaṇānāṃ pravartate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बव-आदीनि = बव से आरम्भ; ततः सप्त = वे सात; चर-आख्य = चर नाम वाले; करणानि = करण; मासे = एक मास में; अष्ट-कृत्वः = आठ बार (+अष्टकृत्व पाठ-भेद/सन्धि-चिह्न); एकैकम् = प्रत्येक एक; प्रवर्तते = प्रवृत्त होता / चक्र घूमता है।

हिन्दी भावार्थ स्थिर करणों के अतिरिक्त सात चर करण हैं, जिनकी सूची बव से शुरू होती है। एक चान्द्र मास में इनमें से प्रत्येक करण आठ-आठ बार आता है — यही चर-करण-चक्र की आवृत्ति है। (पाठ में “+अष्टकृत्व” उपकरण-चिह्न है; अर्थ “अष्टकृत्वः / आठ बार” ही स्थिर रहता है।)

English rendering Thereafter come the seven movable karaṇas beginning with Bava. In one lunar month each of these karaṇas occurs eight times.

गणित / The Mathematics
चर करण = ७ (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि/भद्र)।
एक मास ≈ ३० तिथि = ६० करण-खण्ड।
स्थिर = ४ खण्ड; चर-खण्ड = ५६ = ७ × ८ — श्लोक का “अष्टकृत्वः एकैकम्”।
प्रत्येक करण-खण्ड = १/२ तिथि = ६° = ३६०′ of (λ_☽ − λ_☉)।

उदाहरण (worked example) शुक्ल प्रतिपदा के उत्तरार्ध से चर-चक्र: १ बव, २ बालव, … ७ विष्टि, फिर ८ बव, … जब तक ५६ चर-खण्ड पूरे न हों।
५६ ÷ ७ = ८ — प्रत्येक चर करण महीने में ठीक आठ बार।
(कृष्ण-चतुर्दशी-उत्तरार्ध से चार स्थिर खण्ड इस गिनती के बाहर।)

2.69
तिथ्यर्धभोगं सर्वेषां करणानां प्रकल्पयेत् ।
एषा स्फुतगतिः प्रोक्ता सूर्यादीनां खचारिणाम् ।।
tithyardhabhogaṃ sarveṣāṃ karaṇānāṃ prakalpayet ।
eṣā sphutagatiḥ proktā sūryādīnāṃ khacāriṇām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिथि-अर्ध-भोगम् = तिथि के आधे भोग के बराबर; सर्वेषाम् करणानाम् = सभी करणों का; प्रकल्पयेत् = कल्पना/निर्धारण करे; एषा = यह; स्फुट-गतिः = स्पष्ट (सत्य) गति; प्रोक्ता = कही गई; सूर्य-आदीनाम् = सूर्यादि; ख-चारिणाम् = आकाश-विचरने वाले (ग्रहों) की।

हिन्दी भावार्थ सभी करणों का भोग तिथि-भोग का आधा मानना चाहिए। इतने पर यह अध्याय यह घोषणा कर बंद होता है कि सूर्य से लेकर आकाशचारी ग्रहों की स्फुट गति — मन्द-शीघ्र-फल सहित — अब कही जा चुकी है।

English rendering For every karaṇa one should take half the span of a tithi. Thus has been declared the true motion of the Sun and the other sky-faring planets.

गणित / The Mathematics
करण-भोग = ½ × तिथि-भोग = ½ × १२° = ६° = ३६०′ of elongation (λ_☽ − λ_☉)।
करण-संख्या (०-आधार) = floor( (λ_☽ − λ_☉)′ ÷ ३६०′ ) — फिर स्थिर/चर मानचित्र से नाम।
श्लोक का द्वितीय चरण अध्याय-२ का उपसंहार: स्फुटगति = मन्द/शीघ्र-संशोधित ग्रह-गति (न कि केवल मध्यमा)।

उदाहरण (worked example) (λ_☽ − λ_☉) = ४,१००′।
४,१०० ÷ ३६० = ११ पूर्ण करण + १४०′ गत; वर्तमान = १२वाँ खण्ड (१-आधार गिनती में)।
शेष कला ३६० − १४० = २२०′; यदि v_☽ − v_☉ = ७३०′/दिन तो गम्य-नाड़ी = २२० × ६० ÷ ७३० ≈ १८.०८।

हमारा डिकोड (Our Decode) “एषा स्फुटगतिः प्रोक्ता” Chapter-2 का seal है — kaal_surya_siddhanta_sphuta.py precisely इसी अध्याय की मन्द+शीघ्र ४-पद iteration (half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra) को Western theorem के बिना implement करता है। तिथि/करण-layer vedic-ghadi पर; mean-longitude synthesis math-core पर; दोनों को मिलाने से पहले day-count और ayanāṃśa convention घोषित करने का अनुशासन MATHEMATICAL-AUDIT और oracle `==` fixtures से बँधा है।

अध्यायः 3

त्रिप्रश्नाधिकारः

Direction, Place and Time
51 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
यह अध्याय ज्योतिष की भूमि पर खड़ा होकर दिशा, स्थान और काल — तीनों प्रश्नों — को एक ही यन्त्र से जोड़ता है। शिलातल पर सममण्डल खींचना, बारह-अङ्गुल शङ्कु स्थापित करना, छायाग्र से पूर्वापर बिन्दु लगाना, और मत्स्य-रेखाओं से दक्षिणोत्तर तथा विदिशाएँ साधना — यह सब केवल रीति नहीं, माप की पहली भाषा है। यहाँ छाया भुज बनती है, रेखाएँ कोण बनती हैं, और सममण्डल, उनमण्डल तथा विषुवन्मण्डल समय और अक्षांश की कड़ी में बँधते हैं। अध्याय की सुन्दरता इसी में है कि आकाश का प्रश्न धरती के एक साधारण दण्ड और उसके प्रभा-पथ से उत्तर पाता है; गणना आँख के आगे घटित होती है। इक्कावन श्लोकों में यह त्रिप्रश्न-अधिकार प्रेक्षण, रेखागणित और काल-मापन को एक धारा में बाँध देता है।

For the English reader:
Adhyāya 3 is the workshop chapter: before longitudes and corrections, one must know which way is east, where one stands, and what hour the sky is showing. With a levelled surface, a twelve-aṅgula gnomon, and the moving tip of its shadow, the text teaches how to mark the east–west and north–south lines, how to raise the intermediate directions, and how the same geometry speaks of the prime vertical, the horizon, and the equator. Shadow length becomes a measurable arm; circles and chords become the language of place and local time. The fifty-one verses do not yet chase the planets — they fix the observer in the world so that every later computation has a ground to stand on.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- शङ्कु-ऊँचाई \(g = 12\) अङ्गुल (कल्पना-मान); छाया-लम्बाई \(s\) → उन्नतांश \(\alpha = \arctan(g/s)\)
- छायाग्र के पूर्वापर-बिन्दुओं से पूर्व–पश्चिम रेखा; लम्ब-मत्स्य से दक्षिण–उत्तर रेखा (दिग्-साधन)
- सममण्डल (prime vertical), विषुवन्मण्डल (celestial equator), उनमण्डल — स्थानीय अक्षांश \(\varphi\) से सम्बन्धित वृत्त
- इष्ट-प्रभा: भुज-सूत्र पर दत्त अङ्गुल-माप से छाया-भुज \(s_b\) और दिशा-कोण
- छाया से काल: स्थानीय सूर्य-घण्टा-कोण \(H\) का छाया-ज्यामितीय निर्धारण (त्रिप्रश्न का काल-पक्ष)
- स्थान-साधन: मध्याह्न-छाया और ध्रुव/सूर्य-उन्नतांश से \(\varphi\) (अक्षांश) का अनुमान

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। शङ्कु-छाया, दिग्-मत्स्य, सम/उन/विषुवन्मण्डल और छाया-से-काल/अक्षांश की पूर्ण ज्यामितीय श्रृंखला अभी engines में अलग से नहीं बैठी; डिकोड के लिए अध्याय-३ की छाया-समीकरणों को modern notation में सील करना, local sidereal time और \(\varphi\) से जोड़ना, तथा kaal-verification-oracle पर exact fixtures लगाना आवश्यक होगा।

क्षितिजनाडीवृत्त (विषुवत्)क्रान्तिवृत्तध्रुवφउदद्रष्टाअक्षांश φ ≈ 29° के प्रेक्षक का खगोल — तीनों महावृत्त एक ही गोले पर
खगोल — the observer's celestial sphere: horizon (क्षितिज), celestial equator (नाडीवृत्त) tilted by the co-latitude, ecliptic (क्रान्तिवृत्त) at 24° to the equator (SS value), and the north celestial pole (ध्रुव) standing at the latitude φ above the north point.
3.1
शिलातले अम्बुसंशुद्धे वज्रलेपे अपि वा समे ।
तत्र शङ्क्वङ्गुलैरिष्टैः समं मण्डलं आलिखेत् ।।
śilātale ambusaṃśuddhe vajralepe api vā same ।
tatra śaṅkvaṅgulairiṣṭaiḥ samaṃ maṇḍalaṃ ālikhet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शिलातल = पत्थर का समतल आधार; अम्बुसंशुद्ध = जल से साफ़ किया हुआ; वज्रलेप = कठोर/वज्र-सा लेप (चिकना प्लास्टर); सम = एकसमान, झुकाव-रहित; शङ्क्वङ्गुल = शङ्कु की अङ्गुल-माप; इष्ट = अभीष्ट/निर्धारित; मण्डल = वृत्त; आलिखेत् = खींचे।

हिन्दी भावार्थ गणना का आरम्भ भूमि से होता है — किसी पत्थर की पट्टी को जल से धोकर, अथवा वज्र-लेप से चिकना करके, पूरी तरह समतल बनाएँ। उसी समतल पर अभीष्ट शङ्कु-ऊँचाई के अङ्गुलों के बराबर त्रिज्या लेकर एक शुद्ध वृत्त खींचें। यह वृत्त आगे की दिशा-स्थापना और छाया-माप का आधार-मण्डल है।

English rendering On a stone surface cleaned with water—or even one finished with a hard vajra-plaster coating—made perfectly level, draw a circle whose radius equals the chosen number of aṅgulas of the gnomon.

गणित / The Mathematics ज्यामितीय निर्माण — त्रिज्या R = n अङ्गुल (शङ्कु की अभीष्ट ऊँचाई के अङ्गुल), केन्द्र O पर वृत्त खींचा जाता है। संख्यात्मक नियतांक इस श्लोक में नहीं; इकाई अङ्गुल, और n पाठक/प्रयोगकर्ता का इष्ट है।

उदाहरण (worked example) यदि शङ्कु १२ अङ्गुल माना जाए, तो भूमि-वृत्त की त्रिज्या R = १२ अङ्गुल; व्यास = २४ अङ्गुल। (परंपरा में १२ अङ्गुल शङ्कु मानक है — अगले श्लोक में स्पष्ट।)

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3.2
तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कुं कल्पनाद्वादशाङ्गुलम् ।
तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र वृत्ते पूर्वापरार्धयोः ।।
tanmadhye sthāpayecchaṅkuṃ kalpanādvādaśāṅgulam ।
tacchāyāgraṃ spṛśedyatra vṛtte pūrvāparārdhayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तन्मध्ये = उस वृत्त के केन्द्र में; स्थापयेत् = स्थापित करे; शङ्कु = ऊर्ध्व-दण्ड/gnomon; कल्पना = माना हुआ/परिकल्पित; द्वादशाङ्गुल = १२ अङ्गुल; छायाग्र = छाया का अग्र-बिन्दु; स्पृशेत् = स्पर्श करे; वृत्त = वृत्त-परिधि; पूर्वापरार्ध = पूर्व और पश्चिम के अर्धभाग।

हिन्दी भावार्थ वृत्त के ठीक मध्य में बारह अङ्गुल ऊँचा शङ्कु खड़ा करें — यह कल्पना-मानक है, जिससे सब छाया-अनुपात सरल रहते हैं। सूर्य की छाया का सिरा जब वृत्त की परिधि को पूर्वार्ध और पश्चिमार्ध में छूता है, वे दो स्पर्श-बिन्दु आगे की दिशा-रेखाओं के बीज बनते हैं। प्रातः और सायं की समान-ऊंचाई छायाएँ एक ही वृत्त पर पूर्व-पश्चिम युग्म देती हैं।

English rendering At the circle’s centre set a gnomon taken as twelve aṅgulas high. Note the points where the tip of its shadow meets the circumference in the eastern and western halves (of the day).

गणित / The Mathematics शङ्कु-ऊँचाई h = १२ अङ्गुल (मानक)। छाया-लम्बाई s और सूर्य-उन्नतांश a पर: tan a = h/s ⇒ s = h / tan a = १२ / tan a। जब s = R (वृत्त-त्रिज्या = h = १२), छायाग्र परिधि को स्पर्श करता है — अर्थात् a = ४५° की स्थिति (सपाट भूमि, ऊर्ध्व शङ्कु)। पूर्वाह्न-अपराह्न के दो स्पर्श-बिन्दु दिशा-युग्म बनाते हैं।

उदाहरण (worked example) h = १२ अङ्गुल, R = १२ अङ्गुल। जब सूर्योन्नति a = ४५°, s = १२ × cot ४५° = १२ अङ्गुल = R — छायाग्र वृत्त पर। प्रातः और सायं दोनों बार यह स्पर्श होता है; उन दो बिन्दुओं का उपयोग अगले श्लोक में पूर्व-पश्चिम चिह्न के रूप में होता है।

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3.3
तत्र बिन्दू विधायोभौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ ।
तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा ।।
tatra bindū vidhāyobhau vṛtte pūrvāparābhidhau ।
tanmadhye timinā rekhā kartavyā dakṣiṇottarā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) बिन्दू = दो बिन्दु; विधाय = बना/चिह्नित करके; उभौ = दोनों; पूर्वापराभिधौ = पूर्व और पश्चिम नामक; तन्मध्ये = उनके मध्य से; तिमिना = मत्स्य/मीन-आकृति से (दो चापों के प्रतिच्छेदन से); रेखा = सरल रेखा; कर्तव्या = खींचनी चाहिए; दक्षिणोत्तरा = दक्षिण-उत्तर।

हिन्दी भावार्थ पूर्वार्ध और पश्चिमार्ध के उन दोनों स्पर्श-बिन्दुओं को क्रमशः पूर्व और पश्चिम नाम दें। अब प्राचीन मत्स्य-विधि अपनाएँ — दोनों बिन्दुओं को केन्द्र मानकर समान त्रिज्या के चाप खींचें; जहाँ चाप ऊपर-नीचे मिलें, उन प्रतिच्छेदों से होकर जो रेखा जाती है, वही शुद्ध दक्षिण-उत्तर रेखा है। इस प्रकार छाया-युग्म से ही याम्योत्तर दिशा भूमि पर अंकित हो जाती है।

English rendering Mark those two points on the circle as East and West. Through their midpoint, by the “fish” construction (intersecting arcs), draw the north–south line.

गणित / The Mathematics ज्यामितीय लंब-निर्माण — बिंदु E, W दिए; चाप-प्रतिच्छेद N′, S′; रेखा N′S′ ⊥ EW और EW का लंब-समद्विभाजक है। यदि O वृत्त-केन्द्र है और E, W परिधि पर प्रतिसममित हों, तो N′S′ केन्द्र से गुज़रती हुई याम्योत्तर रेखा है। सूत्र: EW का मध्य M; N′S′ ≡ रेखा ⊥ EW at M।

उदाहरण (worked example) E और W पर केन्द्र रखकर त्रिज्या r > EW/2 के चाप खींचें; प्रतिच्छेद N′, S′। NS = दक्षिणोत्तर। जाँच: ∠NME = ∠NMW = ९०° यदि M, EW का मध्य है।

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3.4
याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा ।
दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तद्वदेव हि ।।
yāmyottaradiśormadhye timinā pūrvapaścimā ।
diṅmadhyamatsyaiḥ saṃsādhyā vidiśastadvadeva hi ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्योत्तरदिश = दक्षिण-उत्तर दिशाएँ; मध्ये = मध्य में; तिमिना = मत्स्य-विधि से; पूर्वपश्चिमा = पूर्व-पश्चिम रेखा; दिङ्मध्यमत्स्य = दिशाओं के मध्य-बिन्दुओं पर मत्स्य; संसाध्या = साधनी/निर्धारित करनी; विदिश = कोण-दिशाएँ (ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य); तद्वदेव = उसी प्रकार ही।

हिन्दी भावार्थ अब उलटकर — याम्योत्तर रेखा के दोनों सिरों (दक्षिण-उत्तर) के मध्य से पुनः मत्स्य-विधि से पूर्व-पश्चिम रेखा साधें, ताकि दोनों मुख्य दिशाएँ परस्पर लंब और सुसंगत हों। फिर चारों मुख्य दिशाओं के मध्य-बिन्दु लेकर उन्हीं मत्स्य-आकृतियों से विदिशाएँ — ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य — निकाल लें। दिशा-चक्र इस प्रकार आठों ओर पूर्ण हो जाता है।

English rendering Through the mid-region of the south–north pair, again by the fish construction, establish the east–west line. By fish-figures on the midpoints of the cardinals, determine the intermediate directions in exactly the same way.

गणित / The Mathematics दिशा-जाल — मुख्य दिशाएँ ०°, ९०°, १८०°, २७०°; विदिशाएँ ४५°, १३५°, २२५°, ३१५°। प्रत्येक युग्म पर मत्स्य = लंब-समद्विभाजक निर्माण; चार मुख्य + चार विदिश = अष्ट-दिशा मण्डल। कोणीय संबंध: विदिश = (दिश_i + दिश<sub>i+1</sub>) / २ (चापीय अर्थ में)।

उदाहरण (worked example) NS ज्ञात होने पर N, S से मत्स्य → EW। फिर E व N के मध्य-चाप से ईशान (NE); E व S से आग्नेय (SE); इत्यादि। पूर्ण अष्टक भूमि-वृत्त पर अंकित।

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3.5
चतुरस्रं बहिः कुर्यात्सूत्रैर्मध्याद्विनिर्गतैः ।
भुजसूत्राङ्गुलैस्तत्र दत्तैरिष्टप्रभा स्मृता ।।
caturasraṃ bahiḥ kuryātsūtrairmadhyādvinirgataiḥ ।
bhujasūtrāṅgulaistatra dattairiṣṭaprabhā smṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुरस्र = वर्ग/चतुर्भुज; बहिः = बाहर; कुर्यात् = बनाए; सूत्र = डोरी/रेखा; मध्यात् = केन्द्र से; विनिर्गत = निकलती हुई; भुजसूत्र = भुजा की डोरी/भुजा-माप; अङ्गुलैः दत्तैः = अङ्गुलों में दी गई माप से; इष्टप्रभा = अभीष्ट छाया (प्रभा = छाया); स्मृता = कही/जानी गई।

हिन्दी भावार्थ वृत्त के बाहर, केन्द्र से निकलती डोरियों से एक समचतुरस्र (वर्ग-ढाँचा) बनाएँ — यह माप-मंच की भुजाएँ स्थिर करता है। उन भुजा-सूत्रों पर अङ्गुलों में अंकित माप ही अभीष्ट छाया (इष्ट-प्रभा) कहलाती है: अर्थात् छाया की लम्बाई को उसी अङ्गुल-पैमाने पर पढ़ा जाता है। शङ्कु, वृत्त और भुजा — तीनों एक ही इकाई में बँध जाते हैं।

English rendering Outside the circle, form a square with cords drawn out from the centre. The aṅgula-measures laid off on those side-cords are what is called the desired shadow (iṣṭa-prabhā).

गणित / The Mathematics मापीय ढाँचा — केन्द्र O से चार दिशाओं में भुजाएँ; वर्ग की भुजा-लंबाई प्रयोग-क्षेत्र के अनुसार। छाया s अङ्गुलों में: s = (भुज-सूत्र पर पढ़ी गई अङ्गुल-संख्या)। शङ्कु h = १२ अङ्गुल के साथ अनुपात s/h = cot a (उन्नतांश a)। इकाई-संगति: h, s, R सभी अङ्गुल में।

उदाहरण (worked example) h = १२ अङ्गुल। भुज-सूत्र पर छायाग्र १६ अङ्गुल पढ़ा गया ⇒ s = १६, cot a = १६/१२ = ४/३ ⇒ a = arccot(4/3) ≈ ३६.८७°। यही “इष्टप्रभा” का संख्यात्मक पाठ है।

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3.6
प्राक्पश्चिमाश्रिता रेखा प्रोच्यते सममण्डले ।
उन्मण्डले च विषुवन्मण्डले परिकीर्त्यते ।।
prākpaścimāśritā rekhā procyate samamaṇḍale ।
unmaṇḍale ca viṣuvanmaṇḍale parikīrtyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राक्पश्चिमाश्रिता = पूर्व-पश्चिम पर आश्रित; रेखा = रेखा; प्रोच्यते = कही जाती है; सममण्डल = सममण्डल (पूर्व-पश्चिम क्षितिज/प्राथमिक ऊर्ध्व-वृत्त का भूमि-चिह्न); उनण्डल = ऊन्मण्डल (षड्यन्त्र/“six-o’clock” वृत्त); विषुवन्मण्डल = विषुवद्-वृत्त (खगोलीय विषुवत्); परिकीर्त्यते = घोषित/कथित है।

हिन्दी भावार्थ भूमि पर जो पूर्व-पश्चिम रेखा बैठी है, उसे सममण्डल की भाषा में पहचाना जाता है — वह समतल-दिशा का आधार-सूत्र है। उसी पूर्वापर-रेखा का नाम और उपयोग ऊन्मण्डल तथा विषुवन्मण्डल के प्रसंग में भी लिया जाता है: तीनों मण्डल-चर्चाएँ एक ही प्राक्-पश्चिम अक्ष पर टिकती हैं। दिशा-रेखा इस प्रकार केवल भूमि-ज्यामिति नहीं, खगोल-मण्डलों की संधि-कुंजी भी है।

English rendering The line that rests on the east–west is spoken of as belonging to the samamaṇḍala; and it is likewise proclaimed in connection with the unmaṇḍala and the viṣuvan-maṇḍala (equinoctial circle).

गणित / The Mathematics निर्देश-तंत्र की पहचान — प्राक्-पश्चिम रेखा ≡ सममण्डल का भूमि-अक्ष; ऊन्मण्डल = क्षितिज पर पूर्व-पश्चिम से गुज़रता हुआ वृत्त (ध्रुव-ऊंचाई φ पर झुका); विषुवन्मण्डल = खगोलीय विषुवत् (ध्रुव से ९०°)। अक्षांश φ पर ऊन्मण्डल का ध्रुव-झुकाव φ से जुड़ा है; भूमि-EW इन तीनों के लिए साझा निर्देश-रेखा है। संख्यात्मक नियतांक इस श्लोक में नहीं।

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सुधार · correction (2026-10-07) “उनण्डले” → “उन्मण्डले” (उन्मण्डल), जैसा इसका टिप्पण भी पढ़ता है; दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050) भी यही। Correction: spelling.

3.7
रेखा प्राच्यपरा साध्या विषुवद्भाग्रगा तथा ।
इष्टच्छायाविषुवतोर्मध्यं अग्राभिधीयते ।।
rekhā prācyaparā sādhyā viṣuvadbhāgragā tathā ।
iṣṭacchāyāviṣuvatormadhyaṃ agrābhidhīyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रेखा प्राच्यपरा = पूर्व-पश्चिम रेखा; साध्या = साधनी; विषुवद्भाग्रगा = विषुवत्-छाया के अग्र तक जाने वाली; तथा = तथा; इष्टच्छाया = अभीष्ट/दी हुई छाया; विषुवत् = विषुवत्-काल की छाया; मध्यम् = मध्य/अंतर-क्षेत्र; अग्रा = अग्रा (आयाम/amplitude का भूमि-चिह्न); अभिधीयते = कही जाती है।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-पश्चिम रेखा को दृढ़ता से साधें, और साथ ही वह रेखा भी जो विषुवत्-दिन की छाया के अग्र-बिन्दु तक जाती है। जब किसी अभीष्ट क्षण की छाया और विषुवत्-छाया के बीच का मध्य-स्थिति (अंतर-संबंध) लिया जाता है, उसे अग्रा कहते हैं — सूर्य की क्षितिज-आयामीय विचलन का शङ्कु-छाया रूप। दिशा और ऋतु दोनों इस एक शब्द में मिलते हैं।

English rendering The east–west line is to be established, and likewise the line that runs to the tip of the equinoctial shadow. The (measure of the) mid-region between the desired shadow and the equinoctial shadow is what is called the agrā.

गणित / The Mathematics अग्रा (shadow-amplitude) — विषुवत् पर शङ्कु-छाया s₀ = h · cot δ₀; δ₀ ≈ ०° पर मध्याह्न में s₀ न्यूनतम दिशा-संदर्भ देती है। अभीष्ट छाया s और विषुवद्-छाया के अग्र-संबंध से अग्रा A भूमि पर पूर्व-पश्चिम से उत्तर/दक्षिण विचलन है। गोलीय संबंध (आधुनिक रूप): sin A = sin δ / cos φ (उदय-आयाम; φ अक्षांश, δ क्रांति) — श्लोक भूमि-छाया की भाषा में उसी ज्यामिति का बीज देता है। h = १२ अङ्गुल मानक।

उदाहरण (worked example) h = १२ अङ्गुल, φ = २८° (उदा.), δ = +२०°। उदय-अग्रा: sin A = sin २०° / cos २८° ≈ ०.३४२० / ०.८८२९ ≈ ०.३८७४ ⇒ A ≈ २२.८°। भूमि पर EW से इतने कोण पर छायाग्र-रेखा “अग्रा” पक्ष को चिह्नित करती है। (φ, δ घोषित सम्मेलन; श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता।)

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सुधार · correction (2026-10-07) “s₀ = h·cot δ₀” गलत है: विषुवच्छाया 12 × अक्षज्या ÷ लम्बज्या है (3.17a), क्रान्ति पर निर्भर नहीं। Correction (rendering).

शङ्कु 12छाया = 12·cot aकर्ण = √(144+छाया²)aमध्याह्न में छाया न्यूनतम → दिशा व अक्षांश दोनों मिलते हैं
शङ्कु-छाया — the 12-aṅgula gnomon (SS 3.1 ff.): sun altitude a, shadow chāyā = 12·cot a, hypotenuse karṇa = √(12² + chāyā²). The whole tripraśna chapter — direction, place, time — is unfolded from this one right triangle.
3.8
शङ्कुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णो अस्य वर्गतः ।
प्रोज्झ्य शङ्कुकृतिं मूलं छाया शङ्कुर्विपर्ययात् ।।
śaṅkucchāyākṛtiyutermūlaṃ karṇo asya vargataḥ ।
projjhya śaṅkukṛtiṃ mūlaṃ chāyā śaṅkurviparyayāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शङ्कु = ग्नोमोन-ऊँचाई; छाया = छाया-लम्बाई; कृति = वर्ग; युति = योग; मूल = वर्गमूल; कर्ण = कर्ण/hypotenuse; अस्य वर्गात् = उसके वर्ग से; प्रोज्झ्य = घटाकर/त्यागकर; शङ्कुकृति = शङ्कु का वर्ग; विपर्ययात् = उलटा करने पर (छाया ↔ शङ्कु)।

हिन्दी भावार्थ शङ्कु और छाया मिलकर एक समकोण त्रिभुज बनाते हैं — दोनों के वर्गों का योग का मूल कर्ण है। उसी कर्ण के वर्ग में से शङ्कु का वर्ग निकालकर मूल लेने पर छाया मिलती है; क्रम उलटने पर शङ्कु। तीन राशियाँ — शङ्कु, छाया, कर्ण — एक ही संबंध से एक-दूसरे से निःसृत होती हैं। यह छाया-गणित का बीज-सूत्र है।

English rendering The square root of the sum of the squares of the gnomon and the shadow is the hypotenuse. From the square of that hypotenuse, subtract the square of the gnomon and take the root — that is the shadow; by inversion, the gnomon.

गणित / The Mathematics समकोण-त्रिभुज (शङ्कु ⊥ भूमि):
- कर्ण k = √(h² + s²)
- छाया s = √(k² − h²)
- शङ्कु h = √(k² − s²)
जहाँ h = शङ्कु, s = छाया, k = कर्ण। यह यूक्लिडीय संबंध का शुद्ध बीजीय रूप है; SS इसे माप-त्रयी का व्युत्क्रम-नियम बनाता है।

उदाहरण (worked example) h = १२ अङ्गुल, s = ५ अङ्गुल ⇒ k = √(१२² + ५²) = √(१४४ + २५) = √१६९ = १३ अङ्गुल। उलटा: √(१३² − १२²) = √(१६९ − १४४) = √२५ = ५ = s; √(१३² − ५²) = √(१६९ − २५) = √१४४ = १२ = h।

3.9
त्रिंशत्कृत्यो युगे भानां चक्रं प्राक्परिलम्बते ।
तद्गुणाद्भूदिनैर्भक्ताद्द्युगणाद्यदवाप्यते ।।
triṃśatkṛtyo yuge bhānāṃ cakraṃ prākparilambate ।
tadguṇādbhūdinairbhaktāddyugaṇādyadavāpyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंशत्-कृत्यः = तीस कृति (कृति = 20, छन्द-नाम) = 600 बार; युगे = महायुग में; भानाम् चक्रम् = नक्षत्र-मण्डल / तारा-चक्र; प्राक् = पूर्व दिशा में; परिलम्बते = लम्बित होता / विलम्ब से चलता (अयनाचलन); तद्गुणात् = उसी (३०) से गुणा; भूदिनैः भक्तात् = भूदिनों (सौर-दिन-संख्या) से भाजित; द्युगणात् = बीते अहर्गण से; यत् अवाप्यते = जो फल प्राप्त होता है।

हिन्दी भावार्थ एक महायुग में नक्षत्र-चक्र तीस कृति = 600 बार पूर्व की ओर लम्बित होता है — यही अयनाचलन की मूल गति है। उस 600-गुणित अहर्गण को युग के भूदिनों से भाग देने पर जो भाग-फल मिलता है, वही अयन-चक्र का काल-स्थित अंश है। यह श्लोक आगे के अयनांश-निर्धारण का बीज रखता है: गति-संख्या पहले, फिर उससे राशि।

English rendering Thirty kṛtis (30 × 20 = 600) times in a yuga the circle of the stars lags eastward. From the elapsed day-count multiplied by that 600 and divided by the civil days of the yuga is obtained the (mean) argument of that motion.

गणित / The Mathematics
अयनाचलन-परिक्रमाएँ / महायुग = ३० × २० = ६००।
अहर्गण = D, युग-भूदिन = B (SS-canon: B = 1,577,917,828)।
अयनाचलन-भगण = 600 × D ⁄ B।
भगण का भिन्नांश × 360° = माध्य-कोण θ (अयन-चक्र पर)।
युग-वर्ष = 4,320,000 → एक पूर्ण चक्र = 4,320,000 ⁄ 600 = 7,200 वर्ष। एक चक्र में दोः चार बार 0 से 90° जाता है, अतः 3.10 का अयनांश औसतन 600 × 4 × 27° ÷ 4,320,000 = 0.015° = 54″ प्रति वर्ष चलता है — वही 54″ जो 3.10 के टिप्पण में है (30 से केवल 2.7″ होता)।
यह श्लोक केवल चक्र-संख्या और दिन-अनुपात देता है; अयनांश की डिग्री-परिमाण अगले श्लोक (३⁄१०) में है।

उदाहरण (worked example)
मान लें D = 1,000,000 दिन।
भगण = 600 × 1,000,000 ⁄ 1,577,917,828 = 0.38025 → θ = 0.38025 × 360° = 136.89°; दोः = 180° − 136.89° = 43.11° → 3.10 से अयनांश = 12.93°।
परम्परा में इसी θ से “दोः” (भुज-चाप) निकालकर अयनांश बनता है (देखें 3.10)।
दिन-गणना का कन्वेंशन: SS-canon भूदिन 1,577,917,828 (math-core); Āryabhaṭa-canon 1,577,917,500 अलग फल देगा — ३२८ दिन का अंतर अहर्गण में ही बैठता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही वह मूल-सूत्र है जिसके इर्द-गिर्द ayanāṃśa laboratory बैठा है। टीम ने ±२७° trepidation sinusoid को ५४″/वर्ष, ५०″/वर्ष और shared-drift ४९.२″/वर्ष के साथ selectable hypothesis रखा — एकमात्र ऐतिहासिक सत्य नहीं। shared-drift: −१६ rev/Mahāyuga = −४.८″/yr exactly (−२४⁄५); engine-tail ०.०००११५″/yr SS day-count 1,577,917,828 के ३६५.२५-प्रतिस्थापन से आता है। Zero-year falsification: classical Z = २८५ CE fail; Z ≈ २५३.८ CE Spica ≈ ०° today — पर linear precession स्वयं fiction है (वास्तविक ≈ ५०२९.१″/cy + २.२२″/cy²)।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “त्रिंशत्कृत्यः” को “तीस बार” पढ़ा गया था (144,000 वर्ष का चक्र)। शब्द “कृत्यः” कृति (= 20, छन्द-नाम, जैसे अष्टि = 16) से है, “कृत्वः” (बार) से नहीं: 30 × 20 = 600। इसका प्रमाण इसी संस्करण में है: 3.10 का 54″ प्रति वर्ष 600 से ही आता है (30 से 2.7″)। sphuta.js 600 लेता है। Correction: 600 librations in a yuga; checked in ss-chapters.test.js.

1500175020002250250017°19°21°23°25°27°29°31°Lahiri ≈ 50.29″/yr (Z≈285 CE)इंजन 49.2001″/yr (Z≈253.8 CE)1700–2100: |Δ| ≤ 0.10°वर्ष (CE) → · अयनांश (सायन−निरयण) ↑ · दर-अन्तर ≈ 1.09″/yr = 0.30°/सहस्राब्दी
अयन-चलन का डिकोड — computed comparison: the engine rate 49.2001″/yr (= 54 − 24/5, the −16 rev/Mahāyuga shared debt) with solved zero-year Z ≈ 253.8 CE against Lahiri ≈ 50.29″/yr (Z ≈ 285 CE). Over 1700–2100 the two stay within ±0.10° — the rate gap is only ≈1.09″/yr = 0.30°/millennium. Both axes computed, not sketched.
3.10
तद्दोस्त्रिघ्ना दशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधाः ।
तत्संस्कृताद्ग्रहात्क्रान्तिच्छायाचरदलादिकम् ।।
taddostrighnā daśāptāṃśā vijñeyā ayanābhidhāḥ ।
tatsaṃskṛtādgrahātkrānticchāyācaradalādikam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्दोः = उस (अयन-चाप) का दोः / भुज; त्रिघ्ना = तीन से गुणा; दशाप्ता अंशाः = दस से भाजित अंश; विज्ञेयाः = ज्ञात करने योग्य; अयनाभिधाः = अयनांश नाम से; तत्संस्कृतात् ग्रहात् = उससे संस्कृत ग्रह से; क्रान्ति = क्रान्ति (declination); छाया = शङ्कु-छाया; चरदल = चरदल; आदिकम् = इत्यादि।

हिन्दी भावार्थ अयन-चक्र से निकले दोः (भुज-चाप) को तीन से गुणा कर दस से भागें — जो अंश मिलें, वे अयनांश कहलाते हैं। उसी अयनांश से संस्कृत (शोधित) ग्रह-स्थान से क्रान्ति, छाया, चरदल आदि सब स्फुट साधन निकलते हैं। अर्थात अयनांश केवल नाम नहीं; दृश्य-ज्योतिष की पूरी शृंखला उसी पर टिकी है।

English rendering Three-tenths of that arc (the doḥ) are to be known as the ayanāṃśa. From the planet corrected by it follow declination, shadow, half-equation of day, and the rest.

गणित / The Mathematics
अयनांश α = (3 ⁄ 10) × दोः, जहाँ दोः = θ का भुज-चाप (परम्परा: विषम पाद में ०°–९०° रूप)।
अधिकतम |α| = (3 ⁄ 10) × 90° = 27° — यही ±२७° trepidation-आयाम का शास्त्रीय स्रोत।
α से संस्कृत ग्रह → क्रान्ति δ, मध्याह्न-छाया, चरदल आदि (आगे 3.12–3.16 की शङ्कु-छाया शृंखला)।
रैखिक सन्निकटन (युग-मध्य/शून्य-समीप, क्लासिकल व्यवहार): ≈ 54″ ⁄ वर्ष — डोसियर में 54″, 50″, 49.2″ और ±27° sinusoid एक साथ विकल्प।

उदाहरण (worked example)
दोः = 60° → α = (3⁄10) × 60° = 18°।
दोः = 90° → α = 27° (सीमा)।
दोः = 0° → α = 0° (विषुव-युग-समीप)।
Input convention: θ from 3.09 with B = 1,577,917,828; doḥ = quadrant-folded arc of θ (odd-quadrant style). Rate near zero for pure (3⁄10)×dθ/dt depends on epoch of the sinusoid — linear 54″/yr is a separate selectable model, not forced by every epoch of the trepidation curve.

हमारा डिकोड (Our Decode) “तत्संस्कृताद्ग्रहात्” वही पुल है जहाँ ayanāṃśa laboratory mean-longitude को sidereal frame में बाँधता है। Effective rate ५४ − ४.८ = ४९.२″/yr = ५४×४१⁄४५ = २४६⁄५ (rational core); engine ४९.२००११५०७२२″/yr। Rate gap vs Lahiri ≈ १.०९″/yr = ०.३०°/millennium। Spica residual से Z ≈ २५३.८ CE hypothesis — classical २८५ CE falsified (residual ०.३१°–०.४४°) — पर “unique historical truth” का दावा नहीं; hypothesis side-by-side।

3.11
स्फुटं दृक्तुल्यतां गच्छेदयने विषुवद्वये ।
प्राक्चक्रं चलितं हीने छायार्कात्करणागते ।।
sphuṭaṃ dṛktulyatāṃ gacchedayane viṣuvadvaye ।
prākcakraṃ calitaṃ hīne chāyārkātkaraṇāgate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फुटम् = शोधित / यथार्थ स्थान; दृक्तुल्यताम् = दृष्टि (प्रेक्षण) से समानता; गच्छेत् = प्राप्त करे; अयने = अयन-बिन्दुओं पर; विषुवद्द्वये = दोनों विषुवों पर; प्राक् चक्रम् चलितम् = चक्र पूर्व की ओर चला; हीने = (गणना) न्यून होने पर; छाया-अर्कात् = छाया-सूर्य से; करणागते = करण (गणना) से प्राप्त (सूर्य) के।

हिन्दी भावार्थ अयन और दोनों विषुव — इन्हीं काल-बिन्दुओं पर स्फुट ग्रह/सूर्य दृश्य से मेल खाता है; वहीं अयनांश की जाँच सार्थक है। यदि करण (गणना) से प्राप्त सूर्य (करणागत) छाया से प्राप्त सूर्य (छायार्क) से न्यून पड़े, तो समझो नक्षत्र-चक्र पूर्व की ओर खिसका है। यह श्लोक अयनांश को केवल सूत्र नहीं, प्रेक्षण-सुधार का द्वार बनाता है।

English rendering At the solstices and the two equinoxes the true (position) becomes equal to what is seen. When the Sun obtained by calculation (karaṇāgata) falls short of the Sun found from the shadow (chāyārka), the circle has moved eastward.

गणित / The Mathematics
प्रेक्षण-नियम (दिशा):
यदि λ_karaṇāgata (गणना से) < λ_chāyārka (छाया से) → अयन-चक्र पूर्व (प्राक्) चलित।
विषुव/अयन पर δ ≈ 0 या ±ε (ε = क्रान्तिपात-तिर्यकता) — वहीं dṛk-tulyatā सबसे साफ़।
अयनांश-संशोधन: प्रेक्षित−गणित अंतर → α की दिशा और मात्रा का अनुभव-निर्णय (अगला श्लोक)।

उदाहरण (worked example)
विषुव-दिन, मध्याह्न: प्रेक्षित सम-छाया से प्राप्त सूर्य-स्थान ०°१२′ (say), SS-स्फुट (करणागत) से ०°००′ → अंतर +१२′ ⇒ α को +१२′ दिशा में बढ़ाना (convention: eastward motion of star-circle as in 3.09).
Input: local midday, equinox day; shadow-to-longitude via 3.12–3.15 chain; day-count and α model declared (54″ linear or ±27° trepidation).

हमारा डिकोड (Our Decode) “दृक्तुल्यता” वही discipline है जो kaal-verification-oracle thrives on — tolerance bands bug-hiders; `==` on pinned fixtures. JPL/Swiss cross-check instruments हैं, proof-authority नहीं। पुराना “Drik zero-error” table manufactured था — हटाया, report किया। Instrument mean-longitude synthesis lab है; production true-position ephemeris के लिए measured calculation layer चाहिए, stronger wording नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “करण” को प्रेक्षित मान और छाया-सूर्य को गणित माना गया था। “करणागत” = गणना (करण) से प्राप्त; “छायार्क” = छाया से प्राप्त (प्रेक्षित) सूर्य। नियम: गणित सूर्य छाया-सूर्य से कम हो तो चक्र पूर्व चला। ऊपर का उदाहरण पहले से इसी के अनुसार था। Correction: karaṇāgata is the computed Sun, chāyārka the observed.

3.12
अन्तरांशैरथावृत्य पश्चाच्छेषैस्तथाधिके ।
एवं विषुवती छाया स्वदेशे या दिनार्धजा ।।
antarāṃśairathāvṛtya paścāccheṣaistathādhike ।
evaṃ viṣuvatī chāyā svadeśe yā dinārdhajā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्तर-अंशैः = अंश-अंतर से; अथ = फिर; आवृत्य = घुमाकर / लौटाकर; पश्चात् = पश्चिम की ओर; शेषैः = शेष (अंतर) से; तथा अधिके = और जब (गणना) अधिक हो; एवम् = इस प्रकार; विषुवती छाया = विषुवत्-प्रभा / सम-काल छाया; स्वदेशे = अपने स्थान पर; या = जो; दिन-अर्ध-जा = दिनार्ध (मध्याह्न) से उत्पन्न।

हिन्दी भावार्थ गणना अधिक हो तो शेष अंतर से चक्र को पश्चिम घुमाएँ — पूर्व-पश्चिम दोनों दिशाएँ अंतर की राशि से तय होती हैं। इसी अयन-सुधार की भूमि पर, अपने देश में मध्याह्न पर जो छाया विषुव-काल में पड़ती है, वह “विषुवत्प्रभा” कहलाती है। आगे की अक्षांश-साधना उसी छाया से खुलती है।

English rendering With the difference in degrees one turns it back westward by the remainder when (the computation is) in excess. Likewise, the equinoctial shadow that arises at midday in one’s own country is as follows.

गणित / The Mathematics
दिशा-नियम (3.11 का पूरक):
λ_karaṇāgata > λ_chāyārka → पश्चात् आवर्तन, |Δ| अंशों से।
विषुवती छाया s₀ = मध्याह्न-छाया जब सूर्य विषुवत् (δ = 0) पर, स्वदेशे।
s₀ → अक्षांश φ का प्रवेश-द्वार (3.13–3.14): tan φ ∝ s₀ ⁄ śaṅku (त्रिज्या-मानक में)।

उदाहरण (worked example)
Δ = λ_calc − λ_obs = +0.40° → α में −0.40° (पश्चिम आवर्तन)।
विषुव-दिन, शङ्कु = 12 अङ्गुल (पारंपरिक), madyāhna छाया s₀ = 5 अङ्गुल → φ की साधना 3.13–3.14 से।
Convention: local geographic latitude; equinox defined in the chosen ayanāṃśa frame (declare 54″ / 49.2″ / trepidation).

3.13
दक्षिणोत्तररेखायां सा तत्र विषुवत्प्रभा ।।
शङ्कुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते ।
dakṣiṇottararekhāyāṃ sā tatra viṣuvatprabhā ।।
śaṅkucchāyāhate trijye viṣuvatkarṇabhājite ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दक्षिण-उत्तर-रेखायाम् = याम्योत्तर रेखा पर; सा = वह (विषुवत्प्रभा); तत्र = वहाँ; विषुवत्प्रभा = विषुव-काल की छाया; शङ्कु-छाया-हते = शङ्कु और छाया से गुणित; त्रिज्ये = दोनों त्रिज्याएँ (दो राशियाँ); विषुवत्-कर्ण-भाजिते = विषुवत्-कर्ण से भाजित।

हिन्दी भावार्थ विषुवत्प्रभा याम्योत्तर रेखा पर ही पड़ती है — पूर्व-पश्चिम झुकाव नहीं, केवल उत्तर-दक्षिण माप। शङ्कु और छाया प्रत्येक को त्रिज्या से गुणा कर विषुवत्-कर्ण से भागें — यही लम्बज्या और अक्षज्या की जोड़ी बनती है। छाया अब कोण की भाषा में बदलने लगती है।

English rendering That equinoctial light (shadow) lies there on the north–south line. The two (quantities) — radius multiplied by the gnomon and by the shadow — divided by the equinoctial hypotenuse (yield the jyās of co-latitude and latitude).

गणित / The Mathematics
विषुवत्-कर्ण k₀ = √(śaṅku² + s₀²)।
त्रिज्या R (SS: प्रायः R = 3438′ = त्रिभमौर्विका)।
लम्बज्या = R × śaṅku ⁄ k₀ = R cos φ (φ = अक्षांश)।
अक्षज्या = R × s₀ ⁄ k₀ = R sin φ।
δ = 0 (विषुव) पर: tan φ = s₀ ⁄ śaṅku; sin φ = s₀ ⁄ k₀; cos φ = śaṅku ⁄ k₀।

उदाहरण (worked example)
śaṅku = 12, s₀ = 5 → k₀ = √(144 + 25) = √169 = 13।
sin φ = 5⁄13, cos φ = 12⁄13 → φ = arcsin(5⁄13) ≈ 22.62°।
R = 3438′: अक्षज्या = 3438 × 5⁄13 ≈ 1322.3′; लम्बज्या = 3438 × 12⁄13 ≈ 3173.5′।
Input: equinoctial midday; units consistent (aṅgula or same linear unit for both).

हमारा डिकोड (Our Decode) Metrology-discipline यहाँ कोण-समय correspondence से जुड़ती है: 21,600 prāṇa/day ↔ 21,600′/circle — count correspondence, physical identity नहीं (MATHEMATICAL-AUDIT §1)। R = 3438′ वही त्रिज्या जो sphuṭa-chain (kaal_surya_siddhanta_sphuta.py) में arcsin-epicycle quanta को बांधती है।

3.14
लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा ।
मध्यच्छाया भुजस्तेन गुणिता त्रिभमौर्विका ।।
lambākṣajye tayoścāpe lambākṣau dakṣiṇau sadā ।
madhyacchāyā bhujastena guṇitā tribhamaurvikā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लम्ब-अक्ष-ज्ये = लम्बज्या और अक्षज्या; तयोः चापे = उनके चाप; लम्ब-अक्षौ = लम्ब और अक्ष (कोण); दक्षिणौ सदा = सदा दक्षिणी (भारत-देश के लिए); मध्य-छाया = मध्याह्न-छाया; भुजः = भुज (base); तेन गुणिता = उससे गुणा; त्रिभ-मौर्विका = त्रिभ की ज्या = R = 3438′।

हिन्दी भावार्थ वे दोनों ज्याएँ हैं; उनके चाप ही लम्ब (सह-अक्षांश) और अक्ष (अक्षांश) हैं — और भारतीय अक्षांशों में दोनों चाप सदा दक्षिण-संज्ञक माने गए। किसी भी दिन की मध्याह्न-छाया “भुज” है; उसे त्रिभमौर्विका (R) से गुणा करें — अगला चरण स्वकर्ण से भागकर नत-चाप निकालना है।

English rendering Those are the jyās of co-latitude and latitude; their arcs are the co-latitude and latitude, always south (in this geography). The midday shadow is the base; multiplied by the sine of three signs (R).

गणित / The Mathematics
φ = चाप(अक्षज्या), 90° − φ = चाप(लम्बज्या); चिह्न: दक्षिणौ सदा (SS देश-कल्पना)।
R = त्रिभमौर्विका = Rsin 90° = 3438′ (SS standard)।
मध्याह्न: भुज b = मध्यच्छाया;
अगला (3.15): नत-ज्या-सदृश राशि ∝ R × b ⁄ karṇa → नत-लिप्ता।
कर्ण k = √(śaṅku² + b²) उसी दिन का मध्याह्न-कर्ण।

उदाहरण (worked example)
φ already from 3.13: sin φ = 5⁄13।
किसी अन्य दिन b = 8, śaṅku = 12 → k = √(144+64) = √208 ≈ 14.422।
R × b = 3438 × 8 = 27,504 — 3.15 में k से भाग।

3.15
स्वकर्णाप्ता धनुर्लिप्ता नतास्ता दक्षिणे भुजे ।
उत्तराश्चोत्तरे याम्यास्ताः सूर्यक्रान्तिलिप्तिकाः ।।
svakarṇāptā dhanurliptā natāstā dakṣiṇe bhuje ।
uttarāścottare yāmyāstāḥ sūryakrāntiliptikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-कर्ण-आप्ता = अपने कर्ण से भाजित; धनुः-लिप्ताः = चाप की कलाएँ (arcminutes); नताः = नत (zenith-distance related); ताः = वे; दक्षिणे भुजे = जब भुज दक्षिण हो; उत्तराः = उत्तरी; च उत्तरे = और जब (भुज) उत्तर हो; याम्याः = दक्षिणी; ताः = वे; सूर्य-क्रान्ति-लिप्तिकाः = सूर्य की क्रान्ति की कलाएँ।

हिन्दी भावार्थ R-गुणित भुज को उसी दिन के कर्ण से भागकर जो चाप-कलाएँ मिलें, वे नत हैं। भुज दक्षिण हो तो नत-संज्ञा दक्षिण; भुज उत्तर हो तो उत्तर — और विपरीत दिशा में याम्य (दक्षिण) कहलाती हैं। ये नत-कलाएँ, अक्ष के साथ मिलकर, सूर्य की क्रान्ति-कलाएँ बनती हैं — छाया से δ तक की सीढ़ी यहीं पूरी होती है।

English rendering Divided by its own hypotenuse, (that product yields) arc-minutes of the zenith distance: southern when the base is south, northern when north — and opposite-named when reversed. Those (combined as follows) are the Sun’s declination in minutes.

गणित / The Mathematics
sin z = (R × b) ⁄ (R × k ⁄ R) wait — plain:
नत-ज्या = R × b ⁄ k; नत z = arcsin(b ⁄ k) (शङ्कु-लंब इकाई में), लिप्ता में 60z°।
मध्याह्न संबंध (गोलीय):
δ = φ − z (सूर्य और अक्ष समान दिग्विन्यास में),
δ = φ + z या |φ − z| नियम दिग्भेद/साम्य से (3.16)।
चिह्न: दक्षिणे भुजे → नताः दक्षिणाः; उत्तरे भुजे → उत्तराः; विपरीत नाम याम्या/औत्तरा यथा-पाठ।

उदाहरण (worked example)
φ = 22.62°, b = 8, k ≈ 14.422 → sin z = 8⁄14.422 ≈ 0.5547 → z ≈ 33.68°।
यदि भुज दक्षिण और सूर्य दक्षिण-क्रान्ति पक्ष में साम्य: δ ≈ φ − z = 22.62° − 33.68° = −11.06° (दक्षिण क्रान्ति)।
लिप्ता: δ ≈ −11.06 × 60 ≈ −664′।
Convention: local astronomical midday; φ from equinoctial shadow (3.13); no ayanāṃśa inside δ itself — α already sat in the longitude that set the day.

सुधार · correction (2026-10-07) “दक्षिणे भुजे उत्तराः, उत्तरे याम्याः”: नत छाया की उलटी दिशा का है (पदच्छेद ठीक जोड़ता है)। ये नतांश क्रान्ति के साथ मिलकर अक्षांश देते हैं (3.16a “अक्षलिप्तिकाः”), स्वयं क्रान्ति नहीं; उदाहरण का “भुज दक्षिण” भुज उत्तर होना चाहिए (वरना δ = 56°)। Correction (rendering).

3.16
दिग्भेदे मिश्रिताः साम्ये विश्लिष्टाश्चाक्षलिप्तिकाः ।
ताभ्यो अक्षज्या च तद्वर्गं प्रोज्झ्य त्रिज्याकृतेः पदम् ।।
digbhede miśritāḥ sāmye viśliṣṭāścākṣaliptikāḥ ।
tābhyo akṣajyā ca tadvargaṃ projjhya trijyākṛteḥ padam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिग्भेदे = दिशा-भेद होने पर; मिश्रिताः = जोड़ी / जोड़ी गईं; साम्ये = समान दिशा में; विश्लिष्टाः = अलग की गईं (घटाई); च अक्ष-लिप्तिकाः = और वे अक्ष की कलाएँ; ताभ्यः = उनसे; अक्षज्या = अक्षज्या (+ पाठ-चिह्न: उपकरण में +अक्षज्या); च = और; तत्-वर्गम् = उसका वर्ग; प्रोज्झ्य = हटाकर; त्रिज्या-कृतेः = त्रिज्या² से; पदम् = वर्ग-मूल।

हिन्दी भावार्थ नत-कलाएँ और अक्ष-कलाएँ — दिशा एक हो तो घटाओ, दिशा भिन्न हो तो जोड़ो; फल अक्ष-संशोधित नत या क्रान्ति-मार्ग की लिप्ताएँ हैं। उन्हीं से अक्षज्या बनती है; अक्षज्या का वर्ग त्रिज्या-वर्ग से निकाल दो, जो बचे उसका मूल — वह लम्बज्या (या संबद्ध कोटि-ज्या) है। छाया-ज्यामिती यहाँ बंद होती है: sin, cos, √(R² − x²) — पूरा वृत्त।

English rendering When the directions differ they are added; when the same, subtracted — yielding the latitude-minutes (with the natā). From them comes the sine of latitude; discarding its square from the square of the radius, the square root (is the cosine-jyā).

गणित / The Mathematics
दिग्भेद: |nati′| + |akṣa′| ; साम्य: ||nati′| − |akṣa′|| → क्रान्ति-लिप्ता δ′ (या मध्य-संबंध)।
अक्षज्या = R sin φ।
लम्बज्या = √(R² − अक्षज्या²) = R cos φ।
R = 3438′ ⇒ लम्बज्या = √(3438² − अक्षज्या²)।
(+) चिह्न पाठ-भेद/उपकरण: “ताभ्यो ऽक्षज्या” — अर्थ वही; उल्लेख तभी सार्थक जब संस्करण-भेद α/ज्या-श्रृंखला को छुए (यहाँ नहीं)।

उदाहरण (worked example)
R = 3438′, φ = 22.62°, अक्षज्या = 3438 × sin(22.62°) ≈ 3438 × 0.3846 ≈ 1322.3′।
लम्बज्या = √(3438² − 1322.3²) = √(11,819,844 − 1,748,477) ≈ √10,071,367 ≈ 3173.5′
(3.13 के 12⁄13 अनुपात से मेल — बंद जाँच)।
Input: φ from equinoctial s₀; exact check style: compare √(R² − x²) to R cos φ with `==` on rounded liptā fixtures, no ±3 band.

हमारा डिकोड (Our Decode) √(R² − jyā²) वही closed trigonometry है जो ascendant/bhāva layer में भी बैठती है — lagna closed-form Swiss-fixture से ०.१°内; RA(MC) ≡ LST to 1e-9°; arcs sum 360°, kendras 30° sealed (MATHEMATICAL-AUDIT §8, 2026-08-09)। Oracle discipline: exact equality; tolerance once hid a real −1। Wrong turns report: bīja sign error fixed; “112 great conjunctions” withdrawn — honesty method itself is part of the decode.

सुधार · correction (2026-10-07) गणित का “→ क्रान्ति-लिप्ता δ′” अक्षांश की लिप्ताएँ होनी चाहिए; English ठीक है। Correction (rendering).

3.17
लम्बज्यार्कगुणाक्षज्या विषुवद्भाथ लम्बया ।
स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्ये अन्तरं अन्यथा ।।
lambajyārkaguṇākṣajyā viṣuvadbhātha lambayā ।
svākṣārkanatabhāgānāṃ diksāmye antaraṃ anyathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लम्बज्या = अक्षांश-कोटिज्या (R cos φ); अर्क = शङ्कु-मान (१२ अङ्गुल); अक्षज्या = अक्षांश-ज्या (R sin φ); विषुवद्भा = विषुव-दिन की मध्याह्न-छाया; लम्बया = लम्बज्या से भाग; स्वाक्ष = स्थानिक अक्षांश; अर्कनतभाग = सूर्य के नतांश; दिक्साम्ये = दोनों की दिशा समान होने पर; अन्तरं = अन्तर; अन्यथा = दिशा-भेद पर योग।

हिन्दी भावार्थ अक्षज्या को शङ्कु-मान से गुणा कर लम्बज्या से भाग देने पर विषुवद्भा प्राप्त होती है — वह छाया जो विषुव-दिन मध्याह्न में खड़ी शलाका डालती है। फिर अपने स्थान के अक्षांश और सूर्य के नतांश की दिशाएँ देखें: यदि दोनों एक ही दिशा में हों तो उनका अन्तर लें, यदि विपरीत हों तो योग — यही मध्याह्न-नत का आधार है।

English rendering The equinoctial shadow is the product of the sine of latitude and the gnomon, divided by the cosine of latitude. For the observer’s latitude and the Sun’s zenith-distance degrees: take their difference when both lie in the same direction, their sum when they differ.

गणित / The Mathematics With gnomon Ś = 12 aṅgula (standard SS śaṅku), R = trijyā, φ = latitude, δ related later:

विषुवद्भा = (अक्षज्या × Ś) / लम्बज्या = 12 × tan φ

(equivalent: 12 × sin φ / cos φ).

मध्याह्न-नत z_meridian: if dig(φ) = dig(δ) then |φ − δ|; if opposite, φ + δ. (Exact coupling of φ with solar declination is completed in 3.18–3.20.)

उदाहरण (worked example) Input: φ = 28° (approx. दिल्ली अक्षांश), Ś = 12, R cancel in tan form. tan 28° ≈ 0.5317 → विषुवद्भा ≈ 12 × 0.5317 ≈ 6.38 aṅgula. If at some date δ = +20° (both north), noon zenith distance framework uses |28 − 20| = 8° as the same-direction remainder before further jyā work.

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक छाया-ज्यामिती का द्वार है — count correspondence नहीं, किन्तु R-scaled jyā/कोटि से tan φ निकालने का शुद्ध अनुपात-शास्त्र। math-core और sphuṭa-chain में हम mean longitudes को integer bhagaṇa से जोड़ते हैं; यहाँ spot-geometry उसी jyā-कोटि भाषा में है। tolerance band नहीं — exact fraction (akṣajyā × 12)/lambajyā ही fixture है।

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षाम्ये” → “दिक्साम्ये” (दिक्-साम्य = एक ही दिशा), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

सुधार · correction (2026-10-07) शब्द (3.17b-3.18a) अक्षांश और नत से क्रान्ति देते हैं; गणित-खण्ड उलटा (φ, δ से z) गिनता है, और “दोनों उत्तर” कहता है जबकि अक्ष 3.14 से सदा दक्षिण है। Correction (rendering).

3.18
दिग्भेदे अपक्रमः शेषस्तस्य ज्या त्रिज्यया हता ।
परमापक्रमज्याप्ता चापं मेषादिगो रविः ।।
digbhede apakramaḥ śeṣastasya jyā trijyayā hatā ।
paramāpakramajyāptā cāpaṃ meṣādigo raviḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिग्भेद = अक्ष व नत की दिशा-असमानता; अपक्रम = क्रान्ति (δ); शेष = शेषांश; ज्या = sine; त्रिज्या = R (पूर्ण-ज्या); परमापक्रमज्या = अधिकतम क्रान्ति की ज्या (ε की jyā); आप्त = भागफल; चाप = चाप-मान (arc); मेषादिगो = मेष से आरम्भ गणना में; रविः = सूर्य।

हिन्दी भावार्थ जब दिशा-भेद से प्राप्त शेष को अपक्रम (सूर्य की क्रान्ति) माना जाता है, तो उस अपक्रम की ज्या को त्रिज्या से गुणा कर परमापक्रम-ज्या से भाग दें। जो फल मिले, उसका चाप — मेषादि क्रम में — सूर्य का स्थान देता है। यह मध्याह्न-छाया से सूर्य-स्थान निकालने का ज्या-पथ है, न कि अनुमान।

English rendering When the directional combination leaves a remainder taken as declination, multiply its sine by the radius and divide by the sine of the greatest declination; the resulting arc, counted from Meṣa as appropriate, is the Sun.

गणित / The Mathematics sin δ obtained from the nata–akṣa remainder (3.17–3.20 chain). Then, because δ and ecliptic longitude λ of the Sun obey

sin δ = sin ε · sin λ (mean-orbit idealization of the chapter),

so

sin λ = (jyā(δ) × R) / परमापक्रमज्या = (R sin δ) / (R sin ε) = sin δ / sin ε,

then λ = arcsin(that). परमापक्रम = obliquity ε as fixed in the siddhānta’s table (classical SS uses 24°). चाप is reduced to the correct quadrant in 3.19.

उदाहरण (worked example) Convention: ε = 24°, R cancels. Suppose remainder δ = 12°. sin 12° ≈ 0.2079, sin 24° ≈ 0.4067 → sin λ ≈ 0.2079/0.4067 ≈ 0.5112 → λ ≈ 30.7° from the Meṣa-base before 3.19’s quadrant rules (Karka/Tulā/Mṛga adjustments).

3.19
कर्क्यादौ प्रोज्झ्य चक्रार्धात्तुलादौ भार्धसंयुतात् ।
मृगादौ प्रोज्झ्य भगणान्मध्याह्ने अर्कः स्फुटो भवेत् ।।
karkyādau projjhya cakrārdhāttulādau bhārdhasaṃyutāt ।
mṛgādau projjhya bhagaṇānmadhyāhne arkaḥ sphuṭo bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्क्यादौ = कर्क आदि राशियों में; प्रोज्झ्य = घटाकर; चक्रार्धात् = १८०° से; तुलादौ = तुला आदि में; भार्धसंयुतात् = भगण-अर्ध (१८०°) जोड़कर; मृगादौ = मकर आदि में; भगणान् = पूर्ण भगण (३६०°) से; मध्याह्ने = मध्याह्न काल में; अर्कः स्फुटः = स्फुट सूर्य।

हिन्दी भावार्थ ३.१८ से मिला चाप अकेला पर्याप्त नहीं — राशि-चतुर्थांश के अनुसार उसे घुमाना पड़ता है। कर्क-पक्ष में चक्रार्ध (१८०°) में से घटाएँ; तुला-पक्ष में भगण-अर्ध जोड़ें; मृगादि में पूरे भगण (३६०°) में से घटाएँ। तब मध्याह्न का स्फुट सूर्य सिद्ध होता है।

English rendering From Cancer onward subtract the arc from half a circle; from Libra onward add half a revolution; from Capricorn onward subtract from a full revolution. Thus at midday the true Sun is obtained.

गणित / The Mathematics Let α = cāpa from 3.18 (0°–90° class arc from the sin δ / sin ε step). Quadrant map for solar longitude λ_true at noon:

  • Meṣa–Mithuna sector (northern ascending style): λ ≈ α (base of 3.18 “मेषादिगो”)
  • Karka–Kanyā: λ = 180° − α
  • Tulā–Dhanu: λ = 180° + α
  • Mṛga–Mīna: λ = 360° − α

(Exact sector choice follows which dig/apakrama branch produced α; the verse states the three “प्रोज्झ्य / संयुता” corrections explicitly.)

उदाहरण (worked example) α = 30.7° from the 3.18 example. If the noon geometry places the Sun in the Karka sector: λ = 180° − 30.7° = 149.3°. If in Tulā sector: λ = 180° + 30.7° = 210.7°. If in Mṛga sector: λ = 360° − 30.7° = 329.3°.

3.20
तन्मान्दं असकृद्वामं फलं मध्यो दिवाकरः ।
स्वाक्षार्कापक्रमयुतिर्दिक्साम्ये अन्तरं अन्यथा ।।
tanmāndaṃ asakṛdvāmaṃ phalaṃ madhyo divākaraḥ ।
svākṣārkāpakramayutirdiksāmye antaraṃ anyathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् = उस स्फुट सूर्य का; मान्दं फलं = मन्द-फल; असकृत् = बार-बार (पुनरावृत्ति); वामं = वाम (ऋण/व्यवकलनीय दिशा में); मध्यो दिवाकरः = मध्य सूर्य; स्वाक्ष = स्थानिक अक्ष; अर्कापक्रम = सूर्य-क्रान्ति; युतिः = योग; दिक्साम्ये = दिशा-समानता पर; अन्तरं = अन्तर; अन्यथा = अन्यथा योग/भेद-नियम।

हिन्दी भावार्थ मध्याह्न से मिला स्फुट सूर्य अभी “मध्य” नहीं है — उस पर मन्द-फल असकृत् वाम दिशा में लगाएँ, तब मध्य दिवाकर मिलता है। फिर अपने अक्ष और सूर्य-अपक्रम की दिशाएँ मिलाएँ: समान दिशा में अन्तर, विपरीत में योग — यही नतांश-शेष की द्वितीय पंक्ति है, छाया-मार्ग को उल्टी ओर चलाने के लिए।

English rendering Apply the solar equation of the centre repeatedly in the subtractive sense to that true Sun; the result is the mean Sun. One’s latitude and the Sun’s declination are then combined — difference when directions agree, sum otherwise.

गणित / The Mathematics Inverse manda for the Sun (manda only; no śīghra):

κ = mandocca − L (2.29; iterate from trial madhya),
manda-phala = arcsin((R_manda/360) · sin κ),
madhya ≈ sphuṭa ∓ phala (वाम = subtractive branch as the verse directs; iterate असकृत् until stable).

Solar epicycle (2.34, 2.38): 14° at the even ends, 13°40′ at the odd, varying with the bhujajyā (mean 13°50′). Then noon nata framework:

z = |φ − δ| or φ + δ per dig-sāmya / dig-bheda (same rule as 3.17’s second line, now with known δ from solar longitude).

उदाहरण (worked example) Suppose noon sphuṭa Sun λ = 40°, mandocca_☉ ≈ 78° (illustrative). First trial madhya = 40°: κ = 78° − 40° = 38° (2.29), epicycle 14° − 20′·sin 38° = 13.795°, phala = arcsin(13.795/360 · sin 38°) = +1.352° (additive, 2.45) → madhya = 40° − 1.352° = 38.648°. Again: κ = 39.352°, phala 1.392° → 38.608°; again: 1.393° → 38.607°, and it stays there. That is “asakṛt vāmam”: the phala taken away repeatedly.

हमारा डिकोड (Our Decode) kaal_surya_siddhanta_sphuta.py में सूर्य/चन्द्र केवल manda-chain चलाते हैं — यही ३.२० का “मान्दं असकृत्”। 4-step outer-planet iteration यहाँ लागू नहीं; Sun = manda only, sealed 2026-05-17। Oracle discipline: phala और madhya fixtures पर `==`, ±band नहीं — पुरानी ±3 पट्टी ने कभी −1 छुपाया था।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले सूर्य की परिधि 13°40′ को “माध्य” कहा गया था (वह ओज-अन्त है; माध्य 13°50′) और केन्द्र L − मन्दोच्च लिया गया था (2.29: मन्दोच्च − ग्रह)। उदाहरण पाठ की विधि से फिर से गिना गया। Correction: odd-end vs mean epicycle; kendra = apex − planet.

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षाम्ये” → “दिक्साम्ये” (दिक्-साम्य = एक ही दिशा), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

3.21
शेषं नतांशाः सूर्यस्य तद्बाहुज्या च कोटिज्या ।
शङ्कुमानाङ्गुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् ।।
śeṣaṃ natāṃśāḥ sūryasya tadbāhujyā ca koṭijyā ।
śaṅkumānāṅgulābhyaste bhujatrijye yathākramam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेषं = पूर्व-संयोग/अन्तर का शेष; नतांशाः = नतांश (zenith distance); सूर्यस्य = सूर्य के; तद्बाहुज्या = उस नत की भुज-ज्या (sin z); कोटिज्या = कोटि-ज्या (cos z); शङ्कुमानाङ्गुला = शङ्कु का अङ्गुल-मान; अभ्यस्ते = गुणा की गई; भुजत्रिज्ये = भुज-ज्या और त्रिज्या; यथाक्रमम् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ जो शेष बचा, वही सूर्य का नतांश है। उसकी बाहुज्या और कोटिज्या निकालें। शङ्कु-मान (अङ्गुलों में) से क्रमशः बाहुज्या और त्रिज्या को गुणा करें — ये दोनों आगे छाया और कर्ण के अंश बनेंगे, भाग ३.२२ में कोटिज्या से कटेगा।

English rendering The remainder is the Sun’s zenith distance in degrees; take its base-sine and perpendicular-sine. Multiply the base-sine and the radius, in that order, by the gnomon measured in aṅgulas.

गणित / The Mathematics z = nata (from 3.20). With Ś = śaṅku in aṅgula (canonically 12):

numerator for shadow path: बाहुज्या × Ś = R sin z · Ś
numerator for hypotenuse path: त्रिज्या × Ś = R · Ś
(both still to be ÷ कोटिज्या in 3.22)

उदाहरण (worked example) z = 8°, Ś = 12, R = 3438′ (classical trijyā minutes; any consistent R works if cancelled later). sin 8° ≈ 0.1392 → bāhu·Ś = 0.1392 R × 12; cos 8° ≈ 0.9903 → next verse divides by koṭijyā = 0.9903 R.

3.22
कोटिज्यया विभज्याप्ते छायाकर्णावहर्दले ।
क्रान्तिज्या विषुवत्कर्णगुणाप्ता शङ्कुजीवया ।।
koṭijyayā vibhajyāpte chāyākarṇāvahardale ।
krāntijyā viṣuvatkarṇaguṇāptā śaṅkujīvayā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोटिज्यया = कोटि-ज्या से; विभज्य = भाग देकर; आप्ते = प्राप्त; छाया = शङ्कु-छाया; कर्णौ = कर्ण (छाया-कर्ण); अहर्दले = दिन के मध्य (मध्याह्न); क्रान्तिज्या = अपक्रम-ज्या; विषुवत्कर्ण = विषुव-दिन का कर्ण; गुणा = गुणा; आप्ता = भागफल; शङ्कुजीवया = शङ्कु-ज्या (उन्नत-ज्या / cos z·R path) से।

हिन्दी भावार्थ कोटिज्या से भाग देने पर मध्याह्न की छाया और कर्ण दोनों सिद्ध होते हैं। फिर क्रान्तिज्या को विषुवत्-कर्ण से गुणा कर शङ्कु-जीव्या से भाग दें — यह अर्काग्रा (सूर्य-अग्र) की ओर अगला सूत्र है, जो ३.२३ में स्पष्ट होगा।

English rendering Dividing by the cosine-sine yields the midday shadow and its hypotenuse. The sine of declination, multiplied by the equinoctial hypotenuse and divided by the gnomon-sine, gives the next quantity (arkāgrā continued in 3.23).

गणित / The Mathematics

छाया (ahardala) = (बाहुज्या × Ś) / कोटिज्या = Ś · tan z
कर्ण (ahardala) = (त्रिज्या × Ś) / कोटिज्या = Ś / cos z

विषुवत्कर्ण = √(ڲ + विषुवद्भा²) = Ś / cos φ

अर्काग्रा-seed (completed 3.23):
(क्रान्तिज्या × विषुवत्कर्ण) / शङ्कुजीवा

where शङ्कुजीवा is the elevated sine (R cos z style) matching the chapter’s jīvā nomenclature.

उदाहरण (worked example) z = 8°, Ś = 12 → chāyā = 12 · tan 8° ≈ 12 × 0.1405 ≈ 1.69 aṅgula; karṇa = 12 / cos 8° ≈ 12 / 0.9903 ≈ 12.12 aṅgula. For φ = 28°, viṣuvat-karṇa = 12 / cos 28° ≈ 13.59 aṅgula.

3.23
अर्काग्रा स्वेष्टकर्णघ्नी मध्यकर्णोद्धृता स्वका ।
विषुवद्भायुतार्काग्रा याम्ये स्यादुत्तरो भुजः ।।
arkāgrā sveṣṭakarṇaghnī madhyakarṇoddhṛtā svakā ।
viṣuvadbhāyutārkāgrā yāmye syāduttaro bhujaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्काग्रा = सूर्य-अग्र (भूमध्य-रेखा पर क्रान्ति-जनित पूर्वापर-अंश); स्वेष्टकर्ण = अभीष्ट-काल/स्थान का कर्ण; घ्नी = गुणा; मध्यकर्ण = मध्याह्न (या विषुव-मध्य) कर्ण; उद्धृता = भाग; स्वका = अपनी अर्काग्रा; विषुवद्भायुत = विषुवद्भा सहित; याम्ये = दक्षिण में; उत्तरो भुजः = उत्तरी भुज।

हिन्दी भावार्थ अर्काग्रा को अपने अभीष्ट कर्ण से गुणा कर मध्यकर्ण से भाग दें — वही आपकी (काल/स्थिति-अनुकूल) अग्र है। यदि वह अर्काग्रा दक्षिणी पक्ष में विषुवद्भा से जुड़ती है, तो भुज उत्तर की ओर पड़ता है। छाया-बिन्दु का पूर्वापर-अन्तर यहाँ से बँधता है।

English rendering Multiply the solar agrā by the desired hypotenuse and divide by the midday (mean) hypotenuse — that is one’s own agrā. When that agrā, joined to the equinoctial shadow, lies southward, the base (bhuja) is northern.

गणित / The Mathematics

अर्काग्रा_madhya ∝ (sin δ · viṣuvat-karṇa) / śaṅku-jīvā
अर्काग्रा_iṣṭa = अर्काग्रा_madhya × (कर्ण_iṣṭa / कर्ण_madhya)

Then directional composition with विषुवद्भा:

if agrā is yāmya (south) relative to the equinoctial line,
भुज (N–S base of the shadow tip in the east–west frame) is uttara.

(Exact signed combination continues in 3.24.)

उदाहरण (worked example) Suppose madhya arkāgrā = 2.5 aṅgula, karṇa_madhya = 12.12, karṇa_iṣṭa = 15.0 (some non-noon moment with longer hypotenuse). arkāgrā_iṣṭa = 2.5 × (15.0/12.12) ≈ 3.09 aṅgula. If this agrā is south of the equinoctial shadow line and viṣuvadbhā = 6.38, the signed bhuja rule of 3.23–3.24 decides north vs south base.

3.24
विषुवत्यां विशोध्योदग्गोले स्याद्बाहुरुत्तरः ।
विपर्ययाद्भुजो याम्यो भवेत्प्राच्यपरान्तरे ।।
viṣuvatyāṃ viśodhyodaggole syādbāhuruttaraḥ ।
viparyayādbhujo yāmyo bhavetprācyaparāntare ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विषुवत्यां = विषुवद्भा में; विशोध्य = घटाकर; उदग्गोले = उत्तरी गोल में; बाहुरुत्तरः = उत्तरी बाहु/भुज; विपर्ययात् = उलटा करने पर; भुजो याम्यः = दक्षिणी भुज; प्राच्यपरान्तरे = पूर्व-पश्चिम अन्तर (छाया-बिन्दु का E–W मान) में।

हिन्दी भावार्थ उत्तरी गोल में विषुवद्भा से (उचित अग्र को) घटाएँ तो बाहु उत्तर रहता है; उलटा नियम लगाने पर भुज दक्षिण हो जाता है। यह सब प्राची-अपरा अन्तर में — अर्थात् शङ्कु-छाया के पूर्व-पश्चिम मान में — घटित होता है। दिशा-चिह्न यहाँ ज्यामिति के हैं, फलित ज्योतिष के नहीं।

English rendering In the northern hemisphere, after subtracting in the equinoctial-shadow measure, the base is northern; by the reverse rule the base is southern. This holds for the east–west separation of the shadow point.

गणित / The Mathematics Signed N–S base (bhuja) of the gnomon-shadow tip in the horizontal plane, measured in the prācī–aparā (E–W) frame:

उत्तरायन/उदग्गोल branch (typical):
भुज_uttara = |विषुवद्भा − अर्काग्रा| (when subtraction leaves north)
भुज_yāmya = reverse when agrā exceeds or dig flips

with viṣuvadbhā = 12 tan φ and arkāgrā from 3.22–3.23. The pair (bhuja, chāyā) or (bhuja, agrā) reconstructs the shadow tip’s plan coordinates; hypotenuse consistency:

कर्ण² = शङ्कु² + (E–W measure)² + (N–S measure)²
(chapter’s planar closure; use the same Ś throughout).

उदाहरण (worked example) φ = 28°, viṣuvadbhā ≈ 6.38 aṅgula; arkāgrā_iṣṭa ≈ 3.09 aṅgula, both on the configuration where subtraction is valid in udag-gola: bhuja_uttara = 6.38 − 3.09 = 3.29 aṅgula (north). If reverse (agrā > viṣuvadbhā with opposite dig): bhuja_yāmya = 3.09 − 6.38 magnitude with south sign. Inputs must declare φ, δ, and Ś = 12.

सुधार · correction (2026-10-07) “प्राच्यपरान्तरे” = छाया-अग्र की पूर्व-पश्चिम रेखा से उत्तर-दक्षिण दूरी, “east-west separation” नहीं। Correction (rendering).

3.25
माध्याह्निको भुजो नित्यं छाया माध्याह्निकी स्मृता ।
लम्बाक्षजीवे विषुवच्छायाद्वादशसङ्गुणे ।।
mādhyāhniko bhujo nityaṃ chāyā mādhyāhnikī smṛtā ।
lambākṣajīve viṣuvacchāyādvādaśasaṅguṇe ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) माध्याह्निकः भुजः = मध्याह्न का भुज (क्षैतिज छाया-आधार); नित्यम् = सदा/सर्वदा; छाया माध्याह्निकी = मध्याह्न-छाया; स्मृता = कही/मानी गई; लम्ब-अक्ष-जीवे = लम्ब (को-अक्षांश = 90° − φ) और अक्षांश (φ) की दो ज्याएँ; विषुवत्-छाया = विषुव-दिन की छाया (सम-रात्रि-दिवस पर); द्वादश = बारह अङ्गुल (शङ्कु-ऊँचाई); सङ्गुणे = से गुणित।

हिन्दी भावार्थ मध्याह्न का भुज — अर्थात् छाया-त्रिकोण का वह आधार जो दोपहर में गnomon के खड़े तल से मापा जाता है — सदा मध्याह्न-छाया ही कहलाता है; दोनों एक ही ज्यामितीय वस्तु हैं। लम्बज्या और अक्षज्या को क्रमशः विषुव-छाया तथा बारह अङ्गुल से गुणित किया जाता है — यही इस श्लोक का बीज-सूत्र है, जिसका भाग-फल अगले श्लोक में क्रान्तिज्या से निकलेगा। शङ्कु की ऊँचाई यहाँ द्वादश-अङ्गुल की शास्त्रीय इकाई में स्थिर है।

English rendering The midday base (bhuja) is always identified with the midday shadow itself. The two R-sines of co-latitude and latitude are to be multiplied respectively by the equinoctial shadow and by twelve (the gnomon height in aṅgulas) — the rest of the construction follows in the next verse.

गणित / The Mathematics Convention: trijyā = R (full sine-radius); φ = latitude; co-lat = 90° − φ; gnomon h = 12 aṅgula; c₀ = equinoctial shadow (viṣuvat-chāyā).
- madhyāhna-bhuja ≡ madhyāhna-chāyā (identity)
- products prepared here: R_sin(co-lat) × c₀ and R_sin(φ) × 12
(Division by R_sin δ and the geometric meaning of the two karmas appear in 3.26.)

उदाहरण (worked example) Input: φ = 24°, co-lat = 66°, c₀ ≈ 5.3 aṅgula (illustrative midday equinoctial shadow), R = 3438′.
- R_sin 66° ≈ 3140; R_sin 24° ≈ 1397
- products: 3140 × 5.3 ≈ 16,642; 1397 × 12 ≈ 16,764
(These await ÷ R_sin δ in 3.26.)

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3.26
क्रान्तिज्याप्ते तु तौ कर्णौ सममण्डलगे रवौ ।
सौम्याक्षोना यदा क्रान्तिः स्यात्तदा द्युदलश्रवः ।।
krāntijyāpte tu tau karṇau samamaṇḍalage ravau ।
saumyākṣonā yadā krāntiḥ syāttadā dyudalaśravaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्ति-ज्या-आप्ते = क्रान्ति (δ) की ज्या से भागित; तौ कर्णौ = वे दोनों कर्ण; सममण्डल-गे रवौ = जब रवि सममण्डल (पूर्व-पश्चिम प्रधान ऊर्ध्व-वृत्त) पर हो; सौम्य-अक्ष-ऊना = जब क्रान्ति उत्तर-अक्षांश से न्यून हो / अक्ष के दक्षिण-पक्ष में; कान्तिः = क्रान्ति (पाठ: क्रान्तिः); द्युदल-श्रवः = दिनार्ध-कर्ण = मध्याह्न-कर्ण।

हिन्दी भावार्थ पिछली दोनों गुणित राशियों को क्रान्तिज्या से भाग देने पर दो कर्ण प्राप्त होते हैं — ये तब लागू होते हैं जब सूर्य सममण्डल पर स्थित हो (अर्थात् पूर्व-पश्चिम ऊर्ध्ववृत्त पर छाया-ज्यामिति)। और जब क्रान्ति उत्तर-अक्षांश से कम हो (शास्त्रीय पठन: सौम्याक्षोना कान्तिः), तब वही निर्माण मध्याह्न-कर्ण — द्युदलश्रव — को भी देता है। इस प्रकार एक ही ज्या-अनुपात, स्थिति-भेद से, दो अलग-अलग छाया-कर्णों का द्वार खोलता है।

English rendering Divided by the R-sine of declination, those two products become the two hypotenuses when the Sun lies on the prime vertical. When the declination is less than the northern latitude (saumya-akṣa-ūna), the same construction yields the midday hypotenuse (dyudala-śravas).

गणित / The Mathematics With products from 3.25:
- k₁ = [R_sin(co-lat) × c₀] / R_sin δ
- k₂ = [R_sin(φ) × 12] / R_sin δ
These are the two karmas (shadow-triangle hypotenuses) for the Sun on the sama-maṇḍala.
When δ is “saumya-akṣa-ūna” (declination smaller than northern latitude, classical condition), the midday hypotenuse is obtained from the same family of ratios.
Units: aṅgula for linear shadow measures; R-sines dimensionless within a common R.

उदाहरण (worked example) Continue 3.25 numbers; take δ = 16°, R_sin 16° ≈ 947 (R = 3438′).
- k₁ ≈ 16,642 / 947 ≈ 17.57 aṅgula
- k₂ ≈ 16,764 / 947 ≈ 17.70 aṅgula
(Illustrative only; actual site needs measured c₀ and exact R-sine table of the chosen recension.)

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सुधार · correction (2026-10-07) “कान्तिः” → “क्रान्तिः” (दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050))। अर्थ: (इस रचना में) मध्याह्न-कर्ण × पलभा ÷ मध्याह्न-अग्रा सम-मण्डल-कर्ण का तीसरा रूप है (3.27a), मध्याह्न-कर्ण स्वयं नहीं। Correction: spelling; the construction gives the prime-vertical hypotenuse.

3.27
विषुवच्छाययाभ्यस्तः कर्णो मध्याग्रयोद्धृतः ।
स्वक्रान्तिज्या त्रिजीवाघ्नी लम्बज्याप्ताग्रमौर्विका ।।
viṣuvacchāyayābhyastaḥ karṇo madhyāgrayoddhṛtaḥ ।
svakrāntijyā trijīvāghnī lambajyāptāgramaurvikā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विषुवत्-छायया अभ्यस्तः = विषुव-छाया से गुणित; कर्णः = कर्ण; मध्य-अग्रयोः उद्धृतः = मध्य (मध्याह्न-भुज/मध्य-अग्र) से भागित; स्व-क्रान्ति-ज्या = अपनी क्रान्ति की ज्या; त्रिजीवा-घ्नी = त्रिज्या से गुणित; लम्ब-ज्या-आप्ता = लम्बज्या से भागित; अग्र-मौर्विका = अग्र की ज्या (अग्रमौर्विका = R_sin agrā)।

हिन्दी भावार्थ कर्ण को विषुव-छाया से गुणा कर मध्याह्न-अग्र (मध्य-भुजाधार) से भागें — यह एक छाया-अनुपात देता है जो अग्र-ज्यामिति से जुड़ा है। स्वतंत्र रूप से, अपनी क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा कर लम्बज्या से भागने पर अग्रमौर्विका — अर्थात् उदय-बिन्दु के पूर्व-पश्चिम आयाम (amplitude) की ज्या — प्राप्त होती है। यही अग्र आगे के करणी-फल विधान का स्तम्भ बनेगी।

English rendering The hypotenuse, multiplied by the equinoctial shadow and divided by the midday agrā (midday base), is taken as prescribed. Separately, one’s own R-sine of declination, times the trijyā and divided by the R-sine of co-latitude, is the R-sine of the agrā (agramaurvikā) — the amplitude-sine of the rising point.

गणित / The Mathematics
1. (karṇa × c₀) / madhya-agrā — shadow-ratio construction of 3.27a
2. Classic agrā-sine:
R_sin(agrā) = (R_sin δ × R) / R_sin(co-lat)
where co-lat = 90° − φ, R = trijyā.
(This is pure spherical-gnomonic geometry: rising amplitude from declination and co-latitude.)

उदाहरण (worked example) φ = 24°, co-lat = 66°, δ = 16°, R = 3438′.
- R_sin 16° ≈ 947; R_sin 66° ≈ 3140
- R_sin(agrā) ≈ (947 × 3438) / 3140 ≈ 1037
- agrā ≈ arcsin(1037/3438) ≈ 17.5° (approx.; table-dependent)

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3.28
स्वेष्टकर्णहता भक्ता त्रिज्ययाग्राङ्गुलादिका ।
त्रिज्यावर्गार्धतो अग्रज्यावर्गोनाद्द्वादशाहतात् ।।
sveṣṭakarṇahatā bhaktā trijyayāgrāṅgulādikā ।
trijyāvargārdhato agrajyāvargonāddvādaśāhatāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-इष्ट-कर्ण-हता = अपने अभीष्ट कर्ण से गुणित; भक्ता त्रिज्यया = त्रिज्या से भागित; अग्र-अङ्गुलादिका = अग्र अङ्गुल आदि में; त्रिज्या-वर्ग-अर्धतः = त्रिज्या-वर्ग के आधे से; अग्र-ज्या-वर्ग-ऊनात् = अग्रज्या-वर्ग घटाकर; द्वादश-आहतात् = बारह से गुणित (पाठ में +अग्र… — उपकरण-चिह्न; अर्थ पर प्रभाव नहीं जब अग्रज्या स्पष्ट हो)।

हिन्दी भावार्थ अभीष्ट कर्ण से अग्र को गुणा कर त्रिज्या से भागने पर अग्र अङ्गुल-माप में आ जाती है — ज्या-माप से रैखिक छाया-माप में रूपान्तर। फिर त्रिज्या-वर्ग के आधे में से अग्रज्या-वर्ग घटाएँ, और उसे बारह से गुणित करें; अगला श्लोक उसी राशि को एक बार और बारह से गुणा कर भाज्य पूरा करता है। यह करणी-विधि की पहली ईंट है।

English rendering Multiplied by the desired hypotenuse and divided by the trijyā, the agrā is obtained in aṅgulas and the like. From half the square of the trijyā, diminished by the square of the agrā-sine, and multiplied by twelve — the product is carried forward (again ×12 and the divisor in 3.29).

गणित / The Mathematics
- agrā_(aṅgula) = (iṣṭa-karṇa × agrā) / R
- working quantity begun here:
Q₀ = (R²/2 − [R_sin(agrā)]²) × 12
(next verse: Q = Q₀ × 12, then ÷ divisor)

उदाहरण (worked example) R = 3438, R_sin(agrā) = 1037 (from 3.27 example), iṣṭa-karṇa = 18 aṅgula (chosen).
- agrā_aṅg ≈ (18 × agrā_angle_or_chord-measure)/R — with agrā as linear-chord proxy from table; using R_sin form consistently: if agrā-sine used as numerator proxy, scale by convention of the recension.
- R²/2 − (1037)² = (3438)²/2 − 1,075,369 ≈ 5,909,922 − 1,075,369 = 4,834,553
- Q₀ = 4,834,553 × 12 ≈ 58,014,636

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सुधार · correction (2026-10-07) अंकगणित: 3438²/2 = 5,909,922 (5,910,522 नहीं); − 1,075,369 = 4,834,553; × 12 = 58,014,636। Correction: arithmetic (ss-chaya.test.js).

3.29
पुनर्द्वादशनिघ्नाच्च लभ्यते यत्फलं बुधैः ।
शङ्कुवर्गार्धसंयुक्तविषुवद्वर्गभाजितात् ।।
punardvādaśanighnācca labhyate yatphalaṃ budhaiḥ ।
śaṅkuvargārdhasaṃyuktaviṣuvadvargabhājitāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुनर्द्वादश-निघ्नात् = पुनः बारह से गुणित; लभ्यते यत् फलम् = जो फल प्राप्त हो; बुधैः = विद्वानों द्वारा; शङ्कु-वर्ग-अर्ध-संयुक्त = शङ्कु-वर्ग के आधे से युक्त; विषुवत्-वर्ग-भाजितात् = विषुव-छाया-वर्ग सहित भाजक से भागित।

हिन्दी भावार्थ पिछली राशि को फिर बारह से गुणा करें — यही भाज्य है जिसे बुधगण “फल” के पूर्व-चरण में लेते हैं। भाजक है: शङ्कु-वर्ग का आधा, विषुव-छाया-वर्ग से जुड़ा — अर्थात् (śaṅku²/2 + c₀²)। भाग-फल ही अगले श्लोक में करणी नाम पाता है। द्वादश × द्वादश = १४४ का गुणांक शङ्कु-ऊँचाई १२ के वर्ग से ज्यामितीय रूप से मेल खाता है।

English rendering Multiplied again by twelve, that which the wise obtain, divided by half the square of the śaṅku together with the square of the equinoctial shadow, is the quantity carried forward — named karaṇī in the next verse.

गणित / The Mathematics
- Q = (R²/2 − [R_sin(agrā)]²) × 12 × 12
- divisor D = (śaṅku²)/2 + c₀²
- (result) = Q / D → this is the karaṇī of 3.30
With fixed gnomon height 12, the double factor 12×12 is h²; the formula is a rearranged radical construction for intermediate-direction shadow geometry.

उदाहरण (worked example) From 3.28: Q₀ ≈ 58,014,636; Q = Q₀ × 12 ≈ 696,175,632.
Take śaṅku = 12, c₀ = 5.3:
- D = (12²)/2 + (5.3)² = 72 + 28.09 = 100.09
- karaṇī ≈ 696,175,632 / 100.09 ≈ 6,955,496 (illustrative scale; actual work uses the text’s R and aṅgula consistently)

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सुधार · correction (2026-10-07) अंकगणित 3.28 से आगे: 58,014,636 × 12 = 696,175,632; ÷ 100.09 = 6,955,496। Correction: arithmetic.

3.30
तदेव करणी नाम तां पृथक्स्थापयेद्बुधः ।
अर्कघ्नी विषुवच्छायाग्रज्यया गुणिता तथा ।।
tadeva karaṇī nāma tāṃ pṛthaksthāpayedbudhaḥ ।
arkaghnī viṣuvacchāyāgrajyayā guṇitā tathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् एव करणी नाम = वही करणी नाम है; तां पृथक् स्थापयेत् = उसे अलग रखे; बुधः = विद्वान्; अर्क-घ्नी = अर्क (द्वादश/शङ्कु) से गुणित; विषुवत्-छाया = विषुव-छाया; अग्र-ज्यया गुणिता = अग्रज्या से गुणित; तथा = तथा (अगले चरण में भक्त)।

हिन्दी भावार्थ जो भाग-फल अभी निकला, उसी का नाम करणी है — विद्वान् उसे अलग रखे, क्योंकि आगे वर्ग-योग का वर्गमूल उसी पर टिकेगा। फिर अर्क (द्वादश), विषुव-छाया और अग्रज्या से गुणित कर (और यथोक्त भाजक से) भाग देने पर वह राशि बनती है जिसका नाम फल है — अगला श्लोक उसे पूर्ण करता है। करणी और फल — दोनों मिलकर दक्षिण/उत्तर गोल में ± नियम से शङ्कु-छाया का द्वार खोलते हैं।

English rendering That very quotient is called the karaṇī; the wise set it aside separately. Multiplied by arka (the twelve-unit gnomon), by the equinoctial shadow, and by the agrā-sine — and divided as prescribed — it yields the quantity named phala in the next verse.

गणित / The Mathematics
- karaṇī = Q / D (from 3.28–3.29)
- phala construction (completed in 3.31):
phala ∝ (12 × c₀ × R_sin(agrā)) / (appropriate divisor from the same geometric family)
(Exact divisor is the one governing the karaṇī chain — keep R, h=12, c₀, agrā in one consistent unit system.)

उदाहरण (worked example) Using h = 12, c₀ = 5.3, R_sin(agrā) = 1037:
- numerator N = 12 × 5.3 × 1037 ≈ 65,953
- with D ≈ 100.09 from 3.29: phala ≈ N/D ≈ 659 (order-of-magnitude sketch; pin to the recension’s full divisor before any production use)

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3.31
भक्ता फलाख्यं तद्वर्गसंयुक्तकरणीपदम् ।
फलेन हीनसंयुक्तं दक्षिणोत्तरगोलयोः ।।
bhaktā phalākhyaṃ tadvargasaṃyuktakaraṇīpadam ।
phalena hīnasaṃyuktaṃ dakṣiṇottaragolayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भक्ता = भागित; फल-आख्यम् = फल नामक; तत्-वर्ग-संयुक्त-करणी-पदम् = उसके वर्ग से युक्त करणी का पद (वर्गमूल); फलेन हीन-संयुक्तम् = फल से रहित अथवा सहित; दक्षिण-उत्तर-गोलयोः = दक्षिण और उत्तर गोल में (क्रमशः)।

हिन्दी भावार्थ भाग देने पर जो राशि मिले, उसका नाम फल है। फिर (फल)² + करणी का वर्गमूल लें — यही मुख्य पद है। दक्षिण गोल में फल घटाएँ, उत्तर गोल में फल जोड़ें (हीन-संयुक्त का शास्त्रीय द्वैध)। यही संकेत-नियम मध्यदिशाओं के शङ्कु/छाया-फल को गोल-भेद से सही चिह्न देता है — ज्यामिति का चिह्न-विवेक, न कि कोई फलित-ज्योतिष नियम।

English rendering After division, that quantity is called the phala. The square root of (phala² + karaṇī), diminished or increased by the phala according as one is in the southern or the northern celestial hemisphere, is the result used for the directional śaṅku.

गणित / The Mathematics
- Let K = karaṇī, F = phala
- radical core: √(F² + K)
- southern hemisphere (dakṣiṇa-gola): result = √(F² + K) − F
- northern hemisphere (uttara-gola): result = √(F² + K) + F
(This is the classical “complete the surd” pattern: rationalizing a linear-shadow unknown under a quadratic constraint.)

उदाहरण (worked example) Toy numbers F = 5, K = 144:
- √(25 + 144) = √169 = 13
- dakṣiṇa: 13 − 5 = 8
- uttara: 13 + 5 = 18
(Replace F, K with the values from 3.28–3.30 under one R and one aṅgula scale before any site reduction.)

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3.32
याम्ययोर्विदिशोः शङ्कुरेवं याम्योत्तरे रवौ ।
परिभ्रमति शङ्कोस्तु शङ्कुरुत्तरयोस्तु सः ।।
yāmyayorvidiśoḥ śaṅkurevaṃ yāmyottare ravau ।
paribhramati śaṅkostu śaṅkuruttarayostu saḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्ययोः विदिशोः = दोनों याम्य (दक्षिण) विदिशाओं में (आग्नेय, नैऋत्य); शङ्कुः = शङ्कु (गnomon/ऊर्ध्व-रेखा-फल); एवम् = इस प्रकार; याम्य-उत्तरे रवौ = जब रवि याम्योत्तर (उत्तर-दक्षिण) वृत्त पर हो; परिभ्रमति शङ्कोः = घूमते/वृत्त-पथ वाले शङ्कु का; तु = किन्तु; शङ्कुः उत्तरयोः तु सः = दोनों उत्तर विदिशाओं (ईशान, वायव्य) में वही शङ्कु है।

हिन्दी भावार्थ दक्षिण की दोनों विदिशाओं — आग्नेय और नैऋत्य — में शङ्कु ऊपर कही करणी-फल विधि से ही सिद्ध होता है। जब सूर्य याम्योत्तर वृत्त पर हो, तो परिभ्रम-शङ्कु (दिशा-वृत्त पर घूमती ऊर्ध्व-स्थिति) की ज्यामिति लागू होती है। उत्तर की दोनों विदिशाओं — ईशान और वायव्य — में भी वही शङ्कु-फल ग्रहण किया जाता है; दिशा-चतुष्क इस एक विधान से बँधता है। यह श्लोक सूत्र नहीं बदलता — वह केवल लागू-क्षेत्र बाँटता है।

English rendering In the two southern intermediate directions the śaṅku is obtained in this very way. When the Sun is on the north–south vertical (meridian) circle, the revolving-śaṅku geometry applies; and for the two northern intermediate directions, that same śaṅku is the one to be taken.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — अनुप्रयोग-क्षेत्र / दिशा-विनियोग।
The phala–karaṇī construction of 3.28–3.31 is assigned to the four intermediate quarters (vidiś): southern pair (SE, SW) and northern pair (NE, NW), with a special case when the Sun rides the yāmyottara (N–S) vertical; no new constant is introduced.

दृष्टान्त (Illustrative Example) समतल धरातल पर ऊर्ध्व शङ्कु (gnomon) गाड़ें; छाया-शीर्ष दिन भर एक वक्र पर चलता है। जब सूर्य ठीक याम्योत्तर (meridian) पर हो, छाया उत्तर–दक्षिण रेखा पर गिरती है — वही “परिभ्रम-शङ्कु” की स्पष्ट परीक्षा। आग्नेय या नैऋत्य कोण में छाया तिरछी होगी, पर करणी से निकला शङ्कु-मान वही सूत्र देता है; ईशान–वायव्य में भी माप-विधि नहीं बदलती, केवल दिशा-चतुष्क बदलता है। यह श्लोक नया फल नहीं गढ़ता — वह कहता है: एक ही यंत्र, चारों कोण, एक ही विधान।

सुधार · correction (2026-10-07) “परिभ्रमति” = सूर्य के दक्षिण/उत्तर में घूमते समय; याम्योत्तर पर सूर्य कभी कोण में नहीं होता। Correction (rendering).

3.33
तत्त्रिज्यावर्गविश्लेषान्मूलं दृग्ज्याभिधीयते ।
स्वशङ्कुना विभज्याप्ते दृक्त्रिज्ये द्वादशाहते ।।
tattrijyāvargaviśleṣānmūlaṃ dṛgjyābhidhīyate ।
svaśaṅkunā vibhajyāpte dṛktrijye dvādaśāhate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् = पूर्व-प्राप्त राशि (यहाँ शङ्कु/कर्ण-सन्दर्भ); त्रिज्या = वृत्त-त्रिज्या (ज्या-पूर्णांक, R); वर्ग-विश्लेष = वर्गों का अन्तर; मूल = वर्गमूल; दृग्ज्या = दृष्टि-वृत्त की ज्या (zenith-distance sine, R sin z); स्वशङ्कु = उसी क्षण का शङ्कु (R cos z); दृक्-त्रिज्ये = दृग्ज्या और त्रिज्या (द्विवचन); द्वादश = 12 अङ्गुल (मानक शङ्कु-यष्टि)।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-प्राप्त शङ्कु और त्रिज्या के वर्गों के अन्तर का मूल दृग्ज्या कहलाता है — यही क्षितिज-शिखर चाप की ज्या है। उस दृग्ज्या और त्रिज्या दोनों को अपने शङ्कु से भाग दो, फिर दोनों फल को बारह से गुणा करो; यही छाया और छाया-कर्ण (यष्टि-त्रिभुज के आधार व कर्ण) हैं। इस प्रकार ऊँचाई-ज्या से सीधी छाया-रेखा निकलती है।

English rendering The square root of the difference of the squares of that quantity (the śaṅku) and the radius is called the drgjyā. Divide the drgjyā and the radius each by its own śaṅku and multiply by twelve: the two results are the gnomon-shadow and its hypotenuse.

गणित / The Mathematics With trijya R and śaṅku s = R cos z (z = zenith distance):
- drgjyā d = √(R² − s²) = R sin z
- chāyā = (12 × d) ⁄ s
- karṇa = (12 × R) ⁄ s
(Standard 12-aṅgula gnomon; units: jyā in the same arc-units as R.)

उदाहरण (worked example) Convention: R = 3438′, s = 1719′ (z = 60°). Then d = √(3438² − 1719²) = √(8,864,883) ≈ 2977.4′. Shadow = (12 × 2977.4) ⁄ 1719 ≈ 20.78 aṅgula; hypotenuse = (12 × 3438) ⁄ 1719 = 24 aṅgula. Check: √(20.78² + 12²) ≈ 24.

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सुधार · correction (2026-10-07) अंकगणित: 3438² − 1719² = 8,864,883, √ = 2977.4। Correction: arithmetic.

3.34
छायाकर्णौ तु कोणेषु यथास्वं देशकालयोः ।
त्रिज्योदक्चरजायुक्ता याम्यायां तद्विवर्जिता ।।
chāyākarṇau tu koṇeṣu yathāsvaṃ deśakālayoḥ ।
trijyodakcarajāyuktā yāmyāyāṃ tadvivarjitā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छाया-कर्णौ = छाया और उसका कर्ण; कोणेषु = कोण-दिशाओं में (ईशान, आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य); यथास्वम् = अपने-अपने नियम से; देश-कालयोः = अक्षांश और काल (क्रान्ति/होर) के अनुसार; त्रिज्या = R; उदक्-चरजा = उत्तर में चरज्या (ascensional-difference sine) से युक्त; याम्यायाम् = दक्षिण दिशा में; तत्-विवर्जिता = उसी चरज्या से रहित/घटी हुई।

हिन्दी भावार्थ कोण-दिशाओं में छाया और कर्ण देश (अक्षांश) और काल (सूर्य की स्थिति) के अनुसार निकलते हैं — एक ही सूत्र चारों कोनों पर ज्यों का त्यों नहीं लगता। उत्तर-दिशा वाले कोनों पर त्रिज्या में उदक्-चरज्या जोड़कर दिन-वृत्त की प्रभावी त्रिज्या ली जाती है; दक्षिण-दिशा वाले कोनों पर वही चरज्या घटाई जाती है। इस भेद से पूर्वापर-अक्ष की विषमता छाया-त्रिभुज में समा जाती है।

English rendering At the intermediate quarters the shadow and hypotenuse are to be formed according to place and time. In the northern corners the radius is taken with the northern carajyā added; in the southern corners that same quantity is subtracted.

गणित / The Mathematics Effective diurnal radius for corner constructions:
- northern kona: R′ = R + carajyā (udak)
- southern kona: R′ = R − carajyā
where carajyā = R tan φ tan δ (classical cara sine; φ = latitude, δ = declination). Then chāyā–karṇa proceed with this R′ in the local dig-deśa triangle. Exact digit values are not named in the verse — only the ± rule.

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सुधार · correction (2026-10-07) पहला अर्ध कोण-शङ्कु नियम समाप्त करता है; दूसरा अर्ध अन्त्या (त्रिज्या ± चरज्या, उत्तर/दक्षिण क्रान्ति) परिभाषित करता है, जो 3.35 में लगती है — कोणों से नहीं जुड़ती। Correction (rendering).

3.35
अन्त्या नतोत्क्रमज्योना स्वहोरात्रार्धसङ्गुणा ।
त्रिज्याभक्ता भवेच्छेदो लम्बज्याघ्नो अथ भाजितः ।।
antyā natotkramajyonā svahorātrārdhasaṅguṇā ।
trijyābhaktā bhavecchedo lambajyāghno atha bhājitaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्त्या = अन्त्या-ज्या: त्रिज्या ± चरज्या (3.34: उत्तर में चरज्या से युक्त, दक्षिण में उससे रहित); नत-उत्क्रमज्या = नत (मध्याह्न से कोण) की उत्क्रमज्या (versed sine, R − cos); स्व-अहोरात्रार्ध = उसी दिन का अहोरात्रार्ध (semi-diurnal radius); त्रिज्या-भक्ता = R से भाजित; छेद = भाजक/विभाजक राशि; लम्बज्या = अक्ष-कोटि की ज्या (R cos φ); घ्नः = गुणा; अथ भाजितः = फिर (अगली पंक्ति में) भाजित।

हिन्दी भावार्थ अन्त्य में से नत की उत्क्रमज्या घटाओ; शेष को अपने अहोरात्रार्ध से गुणा कर त्रिज्या से भाग दो — यही छेद है। इस छेद को फिर लम्बज्या से गुणा करो और (अगले श्लोक में) त्रिभज्या से भाग दोगे। इस प्रकार मध्याह्न-दूरी और अक्षांश मिलकर ऊर्ध्व-शङ्कु की राह खोलते हैं।

English rendering Diminish the antyā by the versed sine of the hour-angle; multiply by the semi-diurnal radius and divide by the radius — that is the cheda. Multiply that cheda by the sine of co-latitude, then divide (as the next verse completes).

गणित / The Mathematics
- antyā A = R ± carajyā (3.34: त्रिज्या उत्तर-चरज्या से युक्त, दक्षिण में उससे रहित)
- nata-utkrama-jyā U = R − R cos H (H = hour-angle from noon; convention: jyā-table units)
- aho-rātra-ardha α = dyujyā = √(R² − krāntijyā²)
- cheda c = (A − U) × α ⁄ R
- next step (3.36): s = c × lambajyā ⁄ tribha-jyā

उदाहरण (worked example) R = 1, φ = 30°, δ = +20°, H = 30°: carajyā = tan 30° · tan 20° = 0.2102, so A = 1.2102; U = 1 − cos 30° = 0.1340; α = cos 20° = 0.9397. c = (1.2102 − 0.1340) × 0.9397 = 1.0113; × lambajyā (cos 30°) = 0.8758 = the śaṅku, the sine of the Sun's altitude — the same as sin φ sin δ + cos φ cos δ cos H = 0.1710 + 0.7048. (Restore SS R when tables are used.)

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सुधार · correction (2026-10-07) पहले अन्त्या = √(R² − क्रान्तिज्या²) लिखी थी — वह द्युज्या (अहोरात्रार्ध) है। 3.34 अन्त्या को त्रिज्या ± चरज्या कहता है; उसी से (A − उत्क्रमज्या) × द्युज्या × लम्बज्या ÷ R² शङ्कु देता है, जैसा उदाहरण में जाँचा। Correction: antyā = R ± carajyā (3.34).

3.36
त्रिभज्यया भवेच्छङ्कुस्तद्वर्गं परिशोधयेत् ।
त्रिज्यावर्गात्पदं दृग्ज्या छायाकर्णौ तु पूर्ववत् ।।
tribhajyayā bhavecchaṅkustadvargaṃ pariśodhayet ।
trijyāvargātpadaṃ dṛgjyā chāyākarṇau tu pūrvavat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिभज्यया = त्रिभ-ज्या से (तीन राशि = 90° की ज्या = R); भवेत् शङ्कुः = शङ्कु सिद्ध हो; तत्-वर्गं परिशोधयेत् = उसके वर्ग को (त्रिज्या-वर्ग से) शुद्ध करे/घटाए; त्रिज्या-वर्गात् पदम् = R² से वर्गमूल; दृग्ज्या = दृष्टि-ज्या; छाया-कर्णौ तु पूर्ववत् = छाया और कर्ण पहले (3.33) की भाँति।

हिन्दी भावार्थ छेद को लम्बज्या से गुणा कर त्रिभज्या (अर्थात् पूर्ण त्रिज्या) से भाग दो — फल शङ्कु है। त्रिज्या के वर्ग में से शङ्कु का वर्ग घटाकर मूल लो: वही दृग्ज्या। छाया और कर्ण फिर उसी द्वादशाङ्गुल नियम से, जैसे 3.33 में कहा गया। एक ही श्रृंखला में नत से शङ्कु, शङ्कु से दृग्ज्या, दृग्ज्या से छाया — पूरा दिन-यन्त्र खुल जाता है।

English rendering Dividing (the cheda times the co-latitude sine) by the sine of three signs yields the śaṅku. The square root of the radius-squared minus that śaṅku-squared is the drgjyā; shadow and hypotenuse follow as before.

गणित / The Mathematics Completing 3.35:
- śaṅku s = (c × lambajyā) ⁄ R since tribha-jyā = R
- drgjyā d = √(R² − s²)
- chāyā = 12 d ⁄ s ; karṇa = 12 R ⁄ s (पूर्ववत् = 3.33)

उदाहरण (worked example) R = 3438′, lambajyā = R cos φ with φ = 0° so lambajyā = 3438′, c = 2000′. Then s = (2000 × 3438) ⁄ 3438 = 2000′; d = √(3438² − 2000²) ≈ 2796′; chāyā ≈ (12 × 2796) ⁄ 2000 ≈ 16.78 aṅgula.

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3.37
अभीष्टच्छाययाभ्यस्ता त्रिज्या तत्कर्णभाजिता ।
दृग्ज्या तद्वर्गसंशुद्धात्त्रिज्यावर्गाच्च यत्पदम् ।
abhīṣṭacchāyayābhyastā trijyā tatkarṇabhājitā ।
dṛgjyā tadvargasaṃśuddhāttrijyāvargācca yatpadam ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभीष्ट-च्छायया = इष्ट छाया से; अभ्यस्ता त्रिज्या = R गुणा; तत्-कर्ण-भाजिता = उसी छाया के कर्ण से भाजित; दृग्ज्या = फल = दृग्ज्या; तत्-वर्ग-संशुद्धात् = उसके वर्ग से शुद्ध किए हुए; त्रिज्या-वर्गात् यत् पदम् = R² के शेष का मूल (शङ्कु)।

हिन्दी भावार्थ जब छाया नाप ली गई हो और उसका कर्ण भी ज्ञात हो, तो उलटी राह चलो: त्रिज्या को अभीष्ट छाया से गुणा कर कर्ण से भाग दो — दृग्ज्या मिलती है। त्रिज्या-वर्ग में से दृग्ज्या-वर्ग घटाकर मूल लो — वही शङ्कु। माप से सिद्ध, सिद्ध से माप — दोनों दिशाएँ शास्त्र में बंद हैं।

English rendering Multiply the radius by the desired shadow and divide by its hypotenuse: that is the drgjyā. The square root of the radius-squared diminished by that square is the śaṅku.

गणित / The Mathematics Inverse of 3.33:
- d = (R × chāyā) ⁄ karṇa
- s = √(R² − d²)
Identity check: chāyā ⁄ 12 = d ⁄ s and karṇa ⁄ 12 = R ⁄ s.

उदाहरण (worked example) Measured chāyā = 16 aṅgula, karṇa = 20 aṅgula, R = 3438′. Then d = (3438 × 16) ⁄ 20 = 2750.4′; s = √(3438² − 2750.4²) ≈ 2062.8′. Recovered gnomon check: 12 ⁄ s × d ≈ 16 aṅgula.

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3.38
शङ्कुः स त्रिभजीवाघ्नः स्वलम्बज्याविभाजितः ।
छेदः स त्रिज्ययाभ्यस्तः स्वाहोरात्रार्धभाजितः ।।
śaṅkuḥ sa tribhajīvāghnaḥ svalambajyāvibhājitaḥ ।
chedaḥ sa trijyayābhyastaḥ svāhorātrārdhabhājitaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शङ्कुः स = वह शङ्कु; त्रिभजीवा-घ्नः = त्रिभ-जीवा (R) से गुणित; स्व-लम्बज्या-विभाजितः = अपनी लम्बज्या से भाजित → छेद; स त्रिज्यया अभ्यस्तः = वह छेद R से गुणित; स्व-अहोरात्रार्ध-भाजितः = अपने अहोरात्रार्ध से भाजित (फल = उन्नतज्या, अगले श्लोक में)।

हिन्दी भावार्थ अब शङ्कु से वापस छेद: शङ्कु को त्रिभजीवा से गुणा कर लम्बज्या से भाग दो — छेद लौट आता है। फिर छेद को त्रिज्या से गुणा कर अहोरात्रार्ध से भाग दो; जो फल निकलता है वही दिन-वृत्त पर उन्नतज्या है, जिससे नत की ओर बढ़ेंगे। 3.35–36 की श्रृंखला यहाँ दर्पण की तरह उलटी है।

English rendering That śaṅku, multiplied by the sine of three signs and divided by its co-latitude sine, is the cheda. Multiply the cheda by the radius and divide by the semi-diurnal radius (to obtain the diurnal-circle elevation sine used next).

गणित / The Mathematics Exact inverse of 3.35–36:
- c = s × R ⁄ lambajyā
- unnata-jyā u = c × R ⁄ α (α = aho-rātra-ardha)
Then 3.39: nata from A − u.

उदाहरण (worked example) s = 2000′, R = 3438′, lambajyā = 3438′ (φ = 0°), α = 3200′. Then c = 2000 × 3438 ⁄ 3438 = 2000′; u = 2000 × 3438 ⁄ 3200 ≈ 2148.75′.

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3.39
उन्नतज्या तया हीना स्वान्त्या शेषस्य कार्मुकम् ।
उत्क्रमज्याभिरेवं स्युः प्राक्पश्चार्धनतासवः ।।
unnatajyā tayā hīnā svāntyā śeṣasya kārmukam ।
utkramajyābhirevaṃ syuḥ prākpaścārdhanatāsavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उन्नतज्या = दिन-वृत्त पर उन्नति की ज्या (पूर्व-फल); तया हीना स्वान्त्या = अपनी अन्त्य उस उन्नतज्या से हीन; शेषस्य कार्मुकम् = शेष की चाप (धनु/आर्क); उत्क्रमज्याभिः = उत्क्रमज्याओं के द्वारा; एवं = इसी प्रकार; प्राक्-पश्च-अर्ध-नत-आसवः = पूर्व और पश्चिम अर्धदिन के नत आसव (मध्याह्न से पूर्व/पश्चिम का काल, आसव/प्राण में)।

हिन्दी भावार्थ अन्त्य में से उन्नतज्या घटाओ; जो उत्क्रम-शेष बचे उसकी चाप लो — वही नत है। उत्क्रमज्या-सारिणी से यह चाप आसवों में पढ़ी जाती है: मध्याह्न से पहले (प्राक्) या बाद (पश्च) का अर्ध-दिन नत। छाया से घड़ी — यहीं सूर्यसिद्धान्त का समय-यन्त्र पूरा होता है।

English rendering Subtract that elevation-sine from its own antyā; the arc of the remainder is the hour-angle. By means of the versed sines one thus obtains the pre- and post-meridian half-day depressions in asu.

गणित / The Mathematics
- nata-utkrama-jyā U = A − u
- H = arc(utkrama⁻¹(U)) — hour-angle from noon
- time in asu (prāṇa): full circle ↔ 21,600 asu/day in the classical count correspondence (arcminutes of the equator ↔ prāṇa of the day)
East (prāk) and west (paścāt) share the same |H|; sign only marks before/after noon.

उदाहरण (worked example) A = 3200′, u = 2148.75′ → U = 1051.25′. With R = 3438′, U/R ≈ 0.306 → cos H ≈ 1 − 0.306 = 0.694 → H ≈ 46° (≈ 2760 asu from noon, since 360° ↔ 21,600 asu ⇒ 1° ↔ 60 asu).

हमारा डिकोड (Our Decode) नतासवः की गिनती उसी 21,600 prāṇa/दिन ↔ 21,600 चाप-कला/वृत्त के count-correspondence पर टिकती है जिसे MATHEMATICAL-AUDIT §1 ने metrology में अलग करके रखा — समय-कोण की संख्यात्मक समानता, भौतिक “एक ही वस्तु” नहीं। vedic-ghadi का ghaḍī/pala/vipala ढाँचा इसी आसव-श्रृंखला का व्यावहारिक विस्तार है; कालांश चुनते समय SS-दिनगणना (1,57,79,17,828) बनाम आर्यभटीय (1,57,79,17,500) का 328-दिन अन्तर tithi-engine पर सबसे तेज़ पड़ता है।

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3.40
इष्टाग्राघ्नी तु लम्बज्या स्वकर्णाङ्गुलभाजिता ।
क्रान्तिज्या सा त्रिजीवाघ्नी परमापक्रमोद्धृता ।।
iṣṭāgrāghnī tu lambajyā svakarṇāṅgulabhājitā ।
krāntijyā sā trijīvāghnī paramāpakramoddhṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्ट-आग्र-घ्नी = इष्ट आग्र (क्षितिज पर सूर्योदय/अस्त का पूर्व-पश्चिम आयाम, या छाया-अग्र) से गुणित; लम्बज्या = अक्ष-कोटिज्या; स्व-कर्ण-अङ्गुल-भाजिता = अपने कर्ण (अङ्गुल में) से भाजित; क्रान्तिज्या = फल = अपक्रम-ज्या (sin δ); सा त्रिजीवा-घ्नी = वह R से गुणित; परम-अपक्रम-उद्धृता = परमपक्रम (अयनान्त क्रान्ति = ecliptic obliquity ε की ज्या) से उद्धृत/भाजित।

हिन्दी भावार्थ लम्बज्या को अभीष्ट आग्र से गुणा कर कर्ण (अङ्गुल) से भाग दो — क्रान्तिज्या मिलती है। फिर क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा कर परमपक्रम से भाग दो; फल से भुज/राशि-चाप निकलती है जिससे सूर्य की क्रान्ति-वृत्त पर स्थिति बाँधी जाती है। मापी हुई उदयाग्र से अपक्रम, अपक्रम से भुज — यह दिशा-देश-काल का अन्तिम पुल है।

English rendering Multiply the co-latitude sine by the desired amplitude and divide by the hypotenuse in aṅgulas: that is the sine of declination. Multiply that by the radius and divide by the sine of maximum declination to recover the corresponding ecliptic arc-sine.

गणित / The Mathematics
- krāntijyā = (lambajyā × isṭa-agrā) ⁄ karṇa_aṅgula
i.e. R sin δ = (R cos φ · agrā) ⁄ karṇa
- next: (krāntijyā × R) ⁄ paramāpakrama , where paramāpakrama = R sin ε
→ R sin β with sin δ = sin ε · sin λ (λ = longitude from equinox, spherical relation)
Convention: agrā and karṇa in the same aṅgula scale as the 12-unit gnomon; ε is the siddhāntic max declination (not restated as a digit in this verse).

उदाहरण (worked example) φ = 0° so lambajyā = R = 3438′; agrā = 6 aṅgula; karṇa = 24 aṅgula. krāntijyā = (3438 × 6) ⁄ 24 = 859.5′ ⇒ sin δ ≈ 859.5/3438 ≈ 0.250 ⇒ δ ≈ 14.5°. If paramāpakrama = R sin 24° ≈ 1397′ (illustrative ε = 24°), then (859.5 × 3438) ⁄ 1397 ≈ 2115′ ⇒ sin λ ≈ 0.615 ⇒ λ ≈ 38° from the equinox (declare your own ε-table when reducing a real observation).

हमारा डिकोड (Our Decode) लम्बज्या–परमपक्रम युग्म वही (latitude, obliquity) युग्म है जो bharat-ephemeris के closed-form लग्न-सूत्र में जाता है — MATHEMATICAL-AUDIT §8 में longitude × latitude × obliquity × sidereal time से लग्न Swiss-fixture के 0.1° भीतर बैठा। यहाँ श्लोक क्षेत्र-माप (आग्र–कर्ण) से δ और λ की ओर जाता है; हमारा उपकरण उलटी दिशा में, गणितीय अक्ष से लग्न की ओर — एक ही गोलीय कंकाल, दो द्वार।

3.41
तच्चापं भादिकं क्षेत्रं पदैस्तत्र भवो रविः ।
इष्टे अह्नि मध्ये प्राक्पश्चाद्धृते बाहुत्रयान्तरे ।।
taccāpaṃ bhādikaṃ kṣetraṃ padaistatra bhavo raviḥ ।
iṣṭe ahni madhye prākpaścāddhṛte bāhutrayāntare ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-चापम् = वह (प्राप्त) चाप; भादिकं क्षेत्रम् = राशि-अंश-कला में क्षेत्र/मान; पदैः = चरणों/चतुर्थांशों से; तत्र भवः रविः = वहाँ स्थित सूर्य; इष्टे अह्नि = अभीष्ट दिन में; मध्ये = मध्याह्न पर; प्राक्-पश्चात् = पूर्व-पश्चिम दिशा में; धृते = स्थापित/गृहीत; बाहु-त्रय-अन्तरे = तीन बाहुओं (जीवा-रेखाओं) के अन्तराल में।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-प्रक्रिया से जो चाप मिला है, उसे राशि-अंश आदि में परिणत क्षेत्र-मान समझो; उसी मान से, चरणों के क्रम में, सूर्य की स्थिति निरूपित होती है। अभीष्ट दिन के मध्याह्न-काल में पूर्व और पश्चिम ओर तीन बाहु-रेखाओं के बीच वह रचना स्थिर की जाती है, जिससे आगे राशि-चक्र और उदय-गणना का आधार खड़ा होता है। यह श्लोक माप को आकाश-रेखा-चित्र से जोड़ने का सेतु है।

English rendering Convert that arc into the field of signs and degrees; by the quadrants the Sun is located there. On the desired day at midday, set east and west within the interval of the three arm-lines — the working frame for the rising construction that follows.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — ज्यामितीय रचना / मापन-सेतु। यह श्लोक संख्या नहीं देता; यह चाप → भादिक क्षेत्र और मध्याह्न-रेखा-चित्र की संक्रिया-सीमा बाँधता है, जिस पर 3.42 का मत्स्य-सूत्र चढ़ता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मध्याह्न पर प्राची–प्रतीची रेखा खींचकर तीन बाहु (chord/arm lines) से एक स्थिर ज्यामितीय “फ्रेम” बनाइए — उसी फ्रेम में पहले निकला चाप अब राशि–अंश–कला का क्षेत्र-मान बनकर सूर्य की पद-स्थित को इंगित करता है। सोचिए: केवल संख्या थी; अब वह संख्या आकाश-रेखा-चित्र पर “कहाँ” बैठती है। यही सेतु आगे लग्न / उदय की गणना का आधार बनता है — माप → चाप → राशि-चक्र → क्षितिज-सम्पर्क, सब एक मध्याह्न-रचना से बँधते हैं।

सुधार · correction (2026-10-07) “भाभ्रमः” = छाया-अग्र का पथ (भा = छाया, जैसे विषुवद्भा), राशि-चक्र नहीं; 3.41 तीन चिह्नित छाया-अग्रों से वृत्त बनाता है (दो मत्स्य-आकृतियाँ)। Correction (rendering).

3.42
मत्स्यद्वयान्तरयुतेस्त्रिस्पृक्षूत्रेण भाभ्रमः ।
त्रिभद्युकर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः ।।
matsyadvayāntarayutestrispṛkṣūtreṇa bhābhramaḥ ।
tribhadyukarṇārdhaguṇāḥ svāhorātrārdhabhājitāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मत्स्य-द्वय-अन्तर-युतेः = दो मत्स्य-आकृतियों के सन्धि/अन्तर-योग से; त्रि-स्पृक्-सूत्रेण = तीन बिन्दुओं को छूती डोरी से; भा-भ्रमः = राशि-चक्र / नक्षत्र-भ्रमण-वृत्त; त्रिभ-द्युकर्णार्ध-गुणाः = तीन राशि (λ = 90°) के द्युकर्णार्ध — दिन-वृत्त की त्रिज्या, √(R² − 1397²) = 3141.4 — से गुणित; स्व-अहोरात्र-अर्ध-भाजिताः = अपने-अपने अहोरात्रार्ध (दिन-वृत्त-संबंधी अर्ध-त्रिज्या) से विभक्त।

हिन्दी भावार्थ दो मत्स्यों के बीच की सन्धि पर तीन-स्पर्शी सूत्र खींचो — उससे भा-भ्रम, राशि-वृत्त, सिद्ध होता है। फिर एक, दो, तीन राशियों की ज्याओं को तीन राशियों की द्युज्या से गुणा कर, प्रत्येक के अपने अहोरात्रार्ध से भाग दो। यही रूपान्तरण विषुवत्-संबंधी उदय-चापों को ज्या-भाषा से काल-भाषा की ओर ले जाता है। रचना और अनुपात दोनों एक साथ चलते हैं।

English rendering From the junction between the two fish-figures, with a string that touches three points, the circle of the signs is obtained. Those quantities, multiplied by the day-radius of three signs and divided by their own day-radii, yield the ascensional elements of the successive arcs.

गणित / The Mathematics रचना + रूपान्तरण:
- त्रिभ-द्युकर्णार्ध = λ = 90° की द्युज्या D(90°) = √(R² − 1397²) = 3141.4 (2.28: परम क्रान्तिज्या 1397)
- रूप: j′ = jyā(λ) × D(90°) / D(λ), D(λ) = √(R² − (jyā(λ)·1397/R)²)
- अहोरात्रार्ध यहाँ दिन-वृत्त की प्रभावी अर्ध-त्रिज्या (अक्षांश/क्रान्ति-संबद्ध day-radius) है; विषुवद्देश (लङ्का) पर सरल सीमा मिलती है।
- परिणामी ज्याओं के चाप 3.43 में क्रमशः शोधित होकर लङ्कोदय-असु बनते हैं।

उदाहरण (worked example) R = 3438, SS ज्या-सारणी:
λ = 30°: ज्या 1719, क्रान्तिज्या 698.5, D = 3366.3, j′ = 1719 × 3141.4 ⁄ 3366.3 = 1604.1 → चाप 1670.1′
λ = 60°: ज्या 2978, क्रान्तिज्या 1210.1, D = 3218.0, j′ = 2907.1 → चाप 3465.9′
λ = 90°: j′ = 3438 → चाप 5400′
3.43 से: मेष 1670.1, वृष 1795.8, मिथुन 1934.1 असु — 3.44 के 1670, 1795, 1935। (पहले यहाँ R/2 से गुणा किया गया था; उससे मेष ≈ 887 असु आता, 1670 नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दिन-वृत्त और 21,600 prāṇa/asu की गिनती metrology में count-correspondence है, भौतिक “समय = कोण” नहीं — MATHEMATICAL-AUDIT §1। यही अनुशासन आगे asu-उदय और लग्न-इंजन को कोण-काल अलग रखता है।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “त्रिभद्युकर्णार्ध” को R/2 पढ़ा गया था। वह तीन राशियों (λ = 90°) का द्युकर्णार्ध — दिन-वृत्त की त्रिज्या — है, √(3438² − 1397²) = 3141.4। उसी से 3.42–3.43 पाठ के अपने 1397 से 3.44 के 1670, 1795, 1935 (गणना: 1670.1, 1795.8, 1934.1) देते हैं; R/2 से मेष ≈ 887 आता। Correction: the day-radius of three signs; checked in ss-chapters.test.js.

3.43
क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक्पृथक् ।
स्वाधो अधः परिशोध्याथ मेषाल्लङ्कोदयासवः ।।
kramādekadvitribhajyāstaccāpāni pṛthakpṛthak ।
svādho adhaḥ pariśodhyātha meṣāllaṅkodayāsavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रमात् = क्रम से; एक-द्वि-त्रि-भ-ज्याः = एक, दो, तीन राशि की ज्याएँ; तत्-चापानि = उनके चाप; पृथक्-पृथक् = अलग-अलग; स्व-अधः-अधः = अपने-नीचे वाले से; परिशोध्या = शोध/व्यवकलित कर; अथ = तब; मेषात् = मेष से; लङ्का-उदय-आसवः = लङ्का के उदय-असु।

हिन्दी भावार्थ पहले एक-राशि, दो-राशि और तीन-राशि की (रूपान्तरित) ज्याएँ लो; प्रत्येक का चाप अलग निकालो। फिर नीचे वाले चाप से ऊपर वाले को क्रमशः घटाओ — शेष ही मेष से आरम्भ कर लङ्का के राशि-उदय के असु हैं। यह cumulative-to-segment रूपान्तरण है: पूर्ण चापों से खण्ड-उदय।

English rendering Take in order the sines of one, two, and three signs and their separate arcs; then subtract each from the one below it. The remainders are the rising asu of the signs from Meṣa at Laṅkā.

गणित / The Mathematics खण्ड-उदय:
- C₁, C₂, C₃ = 1भ, 2भ, 3भ के रूपान्तरित चाप (asu या चाप-मान में)
- लङ्कोदय:
- मेष = C₁
- वृष = C₂ − C₁
- मिथुन = C₃ − C₂
- C₃ सम-चतुर्थांश (6 राशियों का आधा = 5400 asu) की ओर बढ़ता है; 3.44 इन खण्डों के रूढ़ मान देता है।

उदाहरण (worked example) यदि रूपान्तरित चाप (asu में) C₁ = 1670, C₂ = 3465, C₃ = 5400:
मेष = 1670; वृष = 3465 − 1670 = 1795; मिथुन = 5400 − 3465 = 1935।
योग 1670 + 1795 + 1935 = 5400 asu = एक विषुवत्-चतुर्थांश (21600/4)।

3.44
खागाष्टयो अर्थगो अगैकाः शरत्र्यङ्कहिमांशवः ।
स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ।।
khāgāṣṭayo arthago agaikāḥ śaratryaṅkahimāṃśavaḥ ।
svadeśacarakhaṇḍonā bhavantīṣṭodayāsavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) खागाष्टयः = ख(0)+अग(7)+अष्टि(16) → 1670; अर्थगोऽगैकाः = अर्थ(5)+गो(9)+अग(7)+एक(1) → 1795; शरत्र्यङ्कहिमांशवः = शर(5)+त्रि(3)+अङ्क(9)+हिमांशु(1) → 1935; स्व-देश-चर-खण्ड-ऊनाः = स्वदेशीय चर-खण्डों से रहित/घटित; भवन्ति = होते हैं; इष्ट-उदय-आसवः = अभीष्ट देश के उदय-असु।

हिन्दी भावार्थ लङ्का पर मेष-वृष-मिथुन के उदय-असु रूढ़ रूप से 1670, 1795 और 1935 हैं। अपने देश के चर-खण्ड (चर-ज्या से बने ascensional-difference के राशि-खण्ड) इन्हें घटाने/जोड़ने पर अभीष्ट अक्षांश के उदय-असु मिलते हैं। लङ्का-मान विषुवत्-आधार है; चर-खण्ड अक्षांश का संशोधन।

English rendering The equatorial rising asu of Meṣa, Vṛṣa, and Mithuna are 1670, 1795, and 1935. Diminished by the local ascensional-difference segments (cara-khaṇḍa), they become the rising asu at the desired place.

गणित / The Mathematics
लङ्कोदय (asu):
- मेष = कन्या = तुला = मीन = 1670
- वृष = सिंह = वृश्चिक = कुम्भ = 1795
- मिथुन = कर्क = धनु = मकर = 1935
योग = 5400; पूर्ण भचक्र = 4 × 5400 = 21600 asu = भचक्र का एक चक्कर।

इष्टोदय:
udaya_φ(r) = udaya_Laṅkā(r) ± cara-khaṇḍa(r, φ)
(चिह्न राशि-युग्म और गोल के अनुसार; चर = f(φ, δ) प्रकार का ascensional difference।)

भूतसङ्ख्या: अर्थगोऽगैकाः और शरत्र्यङ्कहिमांशवः अंक-विश्वास से 1795, 1935। खागाष्टयः = ख (0), अग (7), अष्टि (16: अष्टि छन्द के सोलह अक्षर) → इकाई पहले 0, 7, 16 → 1670, शब्दों से सीधे; 3.42–3.43 की गणना भी 1670.1 देती है।

उदाहरण (worked example) लङ्का: मेष 1670 asu। यदि किसी अक्षांश पर मेष का चर-खण्ड = 120 asu (उत्तरायण-गोल, चिह्न-नियमानुसार घटाए):
iṣṭodaya(मेष) = 1670 − 120 = 1550 asu।
(वास्तविक चर-खण्ड φ, क्रान्ति और सूत्र-परम्परा से गिने जाएँ; यह केवल ± संक्रिया का रूप है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) 21600 asu/दिन ↔ 21600 कला/वृत्त की count-correspondence — वही metrology जिस पर vedic-ghadi की ghaḍī/pala/vipala/prāṇa श्रृंखला टिकी है (1 दिन = 60 घटी = 3600 पल = 216000 विपल = 21600 प्राण)। उदय-असु इसी पूर्ण-दिन गिनती के खण्ड हैं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले 1670 को “टीका-सम्मत” कहा गया था और “ख-अग-अष्ट-य” का “कठोर पाठ” 1870 बताया गया था। शब्द “अष्टि” (= 16, छन्द-नाम) है, अष्ट (8) नहीं; ख-अग-अष्टि इकाई-पहले क्रम से सीधे 1670 देता है। लङ्का पर जोड़ियाँ भी सुधारी गईं: कन्या = मेष, सिंह = वृष, कर्क = मिथुन (3.45)। Correction: aṣṭi = 16 gives 1670 directly.

3.45
व्यस्ता व्यस्तैर्युताः स्वैः स्वैः कर्कटाद्यास्ततस्त्रयः ।
उत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादयः ।।
vyastā vyastairyutāḥ svaiḥ svaiḥ karkaṭādyāstatastrayaḥ ।
utkrameṇa ṣaḍevaite bhavantīṣṭāstulādayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यस्ताः = व्युत्क्रमित/उलटे; व्यस्तैः = उलटे हुए (खण्डों) से; युताः = युक्त; स्वैः स्वैः = अपने-अपने से; कर्कट-आद्याः = कर्क आदि; ततः त्रयः = तब तीन; उत्क्रमेण = उल्टे क्रम से; षट् एव एते = ये छह ही; भवन्ति = होते हैं; इष्टाः = अभीष्ट (देश के); तुला-आदयः = तुला आदि।

हिन्दी भावार्थ पहले तीन उदय-खण्डों को उलटा क्रम दो — वे कर्क, सिंह, कन्या के तीन बनते हैं। फिर इन्हीं छह को उल्टे विन्यास में चलाने पर तुला से मीन तक के छह इष्टोदय-असु मिलते हैं। एक चतुर्थांश के तीन मान से पूरे बारह राशि-उदय खड़े हो जाते हैं; सममिति राशि-चक्र की जोड़ी-संरचना है।

English rendering Reversed and combined with their own reverses, the next three from Karka arise; in reverse order these six themselves become the six from Tulā onward — the desired-place rising asu for the whole circle.

गणित / The Mathematics a=1670, b=1795, c=1935 (या इष्टोदय में चर-संशोधित a′,b′,c′):
उत्तर गोल के देश में, चर-खण्ड c₁, c₂, c₃ के साथ:
| राशि | asu |
|---|---|
| मेष, मीन | a − c₁ |
| वृष, कुम्भ | b − c₂ |
| मिथुन, मकर | c − c₃ |
| कर्क, धनु | c + c₃ |
| सिंह, वृश्चिक | b + c₂ |
| कन्या, तुला | a + c₁ |
(“व्यस्ता व्यस्तैर्युताः स्वैः”: कर्क, सिंह, कन्या = उलटे क्रम में c, b, a, अपने चर-खण्डों से युत; “उत्क्रमेण … तुलादयः”: तुला से मीन तक वही छह उलटे क्रम में — तुला = कन्या … मीन = मेष। लङ्का पर c = 0, तब सारी जोड़ियाँ बराबर।)

क्रम: (a,b,c) → (c,b,a) → पुनः (a,b,c) → (c,b,a)।
Σ₁₂ = 2(a+b+c) = 2×5400 = 10800? नहीं — चार त्रिक: 4(a+b+c) = 21600 asu।

उदाहरण (worked example) a,b,c = 1670, 1795, 1935:
कर्क=1935, सिंह=1795, कन्या=1670; तुला=1670, …, मीन=1670।
जाँच: 2×(1670+1795+1935)×2 = 4×5400 = 21600 asu।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले तालिका मेष-तुला, वृष-वृश्चिक … जोड़ती थी। वह केवल लङ्का पर सही है। श्लोक के अनुसार तुला = कन्या, वृश्चिक = सिंह, धनु = कर्क, मकर = मिथुन, कुम्भ = वृष, मीन = मेष, और कर्क-सिंह-कन्या पर चर-खण्ड जुड़ते हैं, मेष-वृष-मिथुन पर घटते हैं। Correction: the pairing of 3.45 at any latitude.

3.46
गतभोग्यासवः कार्या भास्करादिष्टकालिकात् ।
स्वोदयासुहता भुक्तभोग्या भक्ताः खवह्निभिः ।।
gatabhogyāsavaḥ kāryā bhāskarādiṣṭakālikāt ।
svodayāsuhatā bhuktabhogyā bhaktāḥ khavahnibhiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गत-भोग्य-आसवः = गत और भोग्य (बीते/शेष) असु; कार्याः = करने योग्य; भास्करात् = सूर्य (राश्यांश) से; इष्ट-कालिकात् = अभीष्ट काल के; स्व-उदय-असु-हताः = अपने उदय-असु से गुणित; भुक्त-भोग्याः = भुक्त और भोग्य अंश; भक्ताः = विभक्त; ख-वह्निभिः = ख(0)+वह्नि(3) → 30।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की वर्तमान राशि में जो अंश भुक्त हैं और जो भोग्य बचे हैं, उनसे गत-असु और भोग्य-असु निकालो। भुक्त/भोग्य को उस राशि के स्व-उदय-असु से गुणा कर 30 से भाग दो — अनुपात सीधा है: पूरी राशि 30° = पूरा उदय-असु। अभीष्ट काल की लग्न-यात्रा यहीं से आरम्भ होती है।

English rendering From the Sun at the desired time form the elapsed and remaining asu: the traversed and residual portions of the sign, multiplied by that sign’s own rising asu and divided by 30.

गणित / The Mathematics
माना सूर्य राशि r में, भुक्तांश = β° (0 ≤ β < 30), भोग्यांश = 30° − β, उदय = U_r asu।
- गत-असु = β × U_r / 30
- भोग्य-असु = (30 − β) × U_r / 30
खवह्निभिः = 30 (अंश में कार्य करने पर)। यदि कला में काम हो तो हर 1800 (=30×60) से भाग।

उदाहरण (worked example) सूर्य वृष 10° पर; U_वृष = 1795 asu (लङ्का-मान):
गत = 10 × 1795 / 30 = 598⅓ asu;
भोग्य = 20 × 1795 / 30 = 1196⅔ asu;
योग = 1795 asu।

हमारा डिकोड (Our Decode) यही asu-खण्ड tithi/काल-इंजन और लग्न-यात्रा दोनों की रीढ़ हैं। दिन-गिनती का canon (SS 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500) mean-motion पर पड़ता है; उदय-तालिका स्वयं 21600 asu की स्थानीय ज्यामिति है — दोनों परतें अलग रखनी होती हैं।

3.47
अभीष्टघटिकासुभ्यो भोग्यासून्प्रविशोधयेत् ।
तद्वत्तदेष्यलग्नासूनेवं यातात्तथोत्क्रमात् ।।
abhīṣṭaghaṭikāsubhyo bhogyāsūnpraviśodhayet ।
tadvattadeṣyalagnāsūnevaṃ yātāttathotkramāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभीष्ट-घटिका-असुभ्यः = अभीष्ट घटिकाओं के असु से; भोग्य-असून् = भोग्य असुओं को; प्रविशोधयेत् = शोधित/घटित करे; तद्वत् = उसी प्रकार; तत् = तब; एष्य-लग्न-असून् = आगे आने वाले लग्न-राशियों के असु; एवम् = एवं; यातात् = गत (बीते) से; तथा = तथा; उत्क्रमात् = उल्टे क्रम से।

हिन्दी भावार्थ अभीष्ट काल को असु में बदलो; उसमें से सूर्य-राशि का भोग्य-असु घटाओ। शेष से आगे की राशियों के पूर्ण उदय-असु क्रमशः घटाते जाओ — जहाँ शेष किसी राशि के उदय से छोटा रह जाए, वहीं एष्य-लग्न की राशि ठहरती है। गत दिशा में उल्टा क्रम भी उसी नियम से चलता है। यह लग्न-खोज की चरणबद्ध व्यवकलन-विधि है।

English rendering From the asu of the desired ghaṭikās subtract the residual rising asu of the Sun’s sign; likewise subtract the rising asu of the forthcoming signs for the lagna, and in reverse order from the elapsed side.

गणित / The Mathematics
1. T_asu = इष्ट काल × (21600 asu / 60 घटी) = इष्ट × 360 asu/घटी
(अथवा पल/विपल से उसी 21600-आधार पर।)
2. R ← T_asu − भोग्य-असु(सूर्य-राशि)
3. जबकि R ≥ U<sub>अगली राशि</sub>: R ← R − U; राशि सूचक +1
4. ठहराव-राशि = लग्न-राशि; शेष R = 3.48 का “शेष”
उल्टा मार्ग: गत-असुओं से पश्चगामी राशियाँ।

उदाहरण (worked example) इष्ट = 10 घटी ⇒ T = 10 × 360 = 3600 asu।
सूर्य मेष 20°; U_मेष=1670 ⇒ भोग्य = 10×1670/30 ≈ 556.67;
R = 3600 − 556.67 = 3043.33।
U_वृष=1795 → R = 1248.33; U_मिथुन=1935 > 1248.33 → लग्न मिथुन में, शेष 1248.33 asu।
(लङ्का-उदय; इष्टोदय पर U_r बदले।)

हमारा डिकोड (Our Decode) bharat-ephemeris की closed-form लग्न/ASC परत (देशान्तर, अक्षांश, तिर्यक, स्थानीय नाक्षत्र-काल) Swiss-fixture से 0.1° भीतर सहमत है; SS की यह asu-व्यवकलन-विधि उसी लग्न-समस्या का शास्त्रीय discrete रूप है — mean-longitude lab से अलग, क्षितिज-ज्यामिति की परत।

3.48
शेषं चेत्त्रिंशताभ्यस्तं अशुद्धेन विभाजितम् ।
भागैर्युक्तं च हीनं च तल्लग्नं क्षितिजे तदा ।।
śeṣaṃ cettriṃśatābhyastaṃ aśuddhena vibhājitam ।
bhāgairyuktaṃ ca hīnaṃ ca tallagnaṃ kṣitije tadā ।।
पाठ-भेद: C भागहीनं च युक्तं च

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेषम् = बचा असु; चेत् = यदि; त्रिंशता = 30 से; अभ्यस्तम् = गुणित; अशुद्धेन = अशुद्ध/अपूर्ण (जिस राशि का उदय पूरा नहीं घटा) से; विभाजितम् = विभक्त; भागैः = अंशों से; युक्तं च हीनं च = युक्त और हीन (चिह्न-दिशा के अनुसार); तत् लग्नम् = वह लग्न; क्षितिजे = क्षितिज पर; तदा = तब। (पाठ C: भागहीनं च युक्तं च — हीन/युक्त क्रम-भेद।)

हिन्दी भावार्थ जो असु शेष बचे, उन्हें 30 से गुणा कर उस राशि के पूरे उदय-असु (अशुद्ध = जिससे पूरा शोध नहीं हुआ) से भाग दो — फल अंशों में उस राशि के अन्दर लग्न की गहराई है। पूर्ण बीती राशियों के अंश-योग में इसे जोड़ो या दिशा-नियम से घटाओ; वही क्षितिज पर लग्न है। C-पाठ केवल युक्त/हीन का शब्द-क्रम पलटता है; अर्थ एक ही संक्रिया-युग्म है।

English rendering The remainder, multiplied by 30 and divided by the unsubtracted rising asu of the current sign, yields degrees; added or subtracted as the rule requires, that is the lagna then on the horizon. (Variant C only swaps the phrase-order of “added and subtracted.”)

गणित / The Mathematics
Lagna = (पूर्ण राशियाँ × 30°) ± (R_asu × 30 / U_current)
- R_asu = 3.47 का शेष
- U_current = अशुद्ध = चालू राशि का इष्टोदय-असु
- चिह्न: साधारणतः एष्य-मार्ग में युक्त (राशि-आरम्भ + अंश); यात/उत्क्रम में हीन-युक्त नियम टीका के अनुसार।
परिणाम: क्षितिज-लग्न की भादिक देशान्तर (sayana/nirayaṇa अलग परत — ayanāṃśa convention घोषित करनी होती है)।

उदाहरण (worked example) 3.47 से: लग्न-राशि = मिथुन, R = 1248.33 asu, U = 1935 asu:
अंश = 1248.33 × 30 / 1935 ≈ 19.335°।
लग्न ≈ मिथुन 19°20′ (लङ्कोदय, दिए इनपुट पर)।
इष्टोदय-U और सूर्य-स्पष्ट पर संख्याएँ बदलेंगी; विधि अचल।

हमारा डिकोड (Our Decode) kaal-verification-oracle कीExact-equality (`==`, बिना ± पट्टी) वाली अनुशासन-रेखा यहीं काम आती है — कभी ±3 ने −1 छिपाया था। लग्न/भाव-मध्य परत में RA(MC)≡LST 1e-9° तक pin है, arcs-sum 360° और kendra 30° invariants sealed हैं; SS 3.46–3.48 उस क्षितिज-लग्न समस्या का शास्त्र-पाठ है, modern closed-form उसका continuous analogue — dual, न कि एक-दूसरे का प्रमाण-प्रभु।

3.49
प्राक्पश्चान्नतनाडीभिस्तस्माल्लङ्कोदयासुभिः ।
भानौ क्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तदा भवेत् ।।
prākpaścānnatanāḍībhistasmāllaṅkodayāsubhiḥ ।
bhānau kṣayadhane kṛtvā madhyalagnaṃ tadā bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राक्-पश्चात् = पूर्व-पश्चिम दिशा; नत-नाडीभिः = नत (मध्याह्न से झुकाव / hour-angle) की नाड़ियों से; तस्मात् = उससे; लङ्कोदयासुभिः = लङ्का-उदय-असु (भूमध्यरेखीय उदय-काल) द्वारा; भानौ = सूर्य में; क्षय-धने कृत्वा = ह्रास या वृद्धि करके; मध्यलग्नम् = मध्य-लग्न (मध्याकाश / meridian पर रविमार्ग-बिन्दु); तदा भवेत् = तब सिद्ध होता है।

हिन्दी भावार्थ किसी क्षण का पूर्व या पश्चिम नत, नाड़ी-माप में लिया जाए; फिर उस काल-माप को लङ्का-उदय के असु-क्रम से रविमार्ग-चाप में पलटें। उस चाप को सूर्य-स्फुट में — दिशा के अनुसार — घटाएँ या बढ़ाएँ। जो राशि-अंश मिलता है, वही उस क्षण का मध्यलग्न है: मध्याकाश पर स्थित क्रान्तिवृत्तीय बिन्दु।

English rendering From the nāḍīs of eastern or western nata (hour-angle from the meridian), convert by the Laṅkā-udaya asus (equatorial rising-times of the signs) into an ecliptic arc; apply that arc as a subtractive or additive correction to the Sun. The result is the madhya-lagna — the ecliptic longitude of the meridian at that instant.

गणित / The Mathematics
मध्यलग्न (MC-related ecliptic point):
λ_madhya = λ_☉ ± Δ
जहाँ Δ = नत-काल (नाड़ी → असु) को लङ्का-उदय-सारणी से रविमार्ग-चाप में परिवर्तित मान।
पूर्व-नत (सूर्य मध्याह्न के पूर्व) और पश्चिम-नत (पश्चात्) क्षय/धन का चिह्न निर्धारित करते हैं।
1 घटी (नाडी) = 360 असु (1.11: 6 असु = 1 पल, 60 पल = 1 घटी); भचक्र का एक चक्कर = 60 घटी = 21,600 असु = 21,600 कला।

उदाहरण (worked example)
मानें: λ_☉ = 45° (वृष 15°), स्थानीय मध्याह्न के बाद नत = 2 घटी = 2 × 360 = 720 असु।
वृष का शेष 15° = 1795 × 15 ⁄ 30 = 897.5 लङ्कोदय-असु, 720 से अधिक; अतः Δ = 720 × 30° ⁄ 1795 = 12.03°।
पश्चिम-नत → धन: λ_madhya ≈ 45° + 12.03° = 57.03°।
(इनपुट-परम्परा: सूर्य-मध्य/स्फुट स्पष्ट करें; उदय-सारणी लङ्का = विषुव-उदय।)

हमारा डिकोड (Our Decode) मध्यलग्न अध्याय-3 का “मध्याकाश-बिन्दु” है — वही जो हमारे bhāva-madhya परत में MC/IC के रूप में जुड़ा। Closed-form lagna/MC गणना Swiss-fixture से ~0.1° में मेल खाती है; RA(MC) ≡ LST को 1e-9° तक सत्यापित किया गया (MATHEMATICAL-AUDIT §8, Bhāva Layer 2026-08-09)। यह श्लोक meridian-time → ecliptic-arc का शास्त्रीय मार्ग बताता है; हमारा इंजन उसी ज्यामिति को आधुनिक closed-form में बाँधता है, पश्चिमी प्रमेय को प्रमाण-सत्ता नहीं बनाता।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले 1 घटी = 3,600 असु और 1 दिन = 216,000 असु लिखा था। 1.11 के अनुसार 6 असु = 1 पल और 60 पल = 1 घटी, अतः 1 घटी = 360 असु और 60 घटी = 21,600 असु — भचक्र का एक चक्कर; 3.47 का उदाहरण भी 360 लेता है। वृष का लङ्कोदय 3.44 से 1795 है (1791 नहीं)। Correction: a ghaṭī is 360 asus.

3.50
भोग्यासूनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च ।
सम्पीण्ड्यान्तरलग्नासूनेवं स्यात्कालसाधनम् ।।
bhogyāsūnūnakasyātha bhuktāsūnadhikasya ca ।
sampīṇḍyāntaralagnāsūnevaṃ syātkālasādhanam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भोग्य-असून् = (प्रथम राशि का) शेष/अपूर्ण असु; ऊनकस्य = न्यून (आरम्भ-बिन्दु) का; अथ = फिर; भुक्त-असून् = (अन्तिम राशि का) भुक्त/बीता असु; अधिकस्य = अधिक (अन्त-बिन्दु) का; सम्पीण्ड्य = जोड़कर; अन्तर-लग्न-असून् = मध्यवर्ती लग्न-राशियों के पूर्ण असु; एवं = इसी प्रकार; काल-साधनम् = काल-निर्धारण।

हिन्दी भावार्थ जब दो क्रान्ति-बिन्दुओं — जैसे सूर्य और लग्न, या दो लग्न-स्थितियों — के बीच का काल निकालना हो, तो आरम्भ-राशि का भोग्य-असु, बीच की राशियों के पूरे उदय-असु, और अन्तिम राशि का भुक्त-असु — तीनों को एकत्र जोड़ें। यही अन्तर-लग्न-असु का योग है; वही दोनों क्षणों के बीच का काल-साधन है। उदय-क्रम ही घड़ी है।

English rendering For the time between two ecliptic stations, add (i) the remaining (bhogya) asus of the starting sign, (ii) the full rising-asus of every intervening lagna-sign, and (iii) the elapsed (bhukta) asus of the ending sign. That sum is the interval — time recovered from ascensional arcs.

गणित / The Mathematics
काल (असु में) = A_bhogya(R_start) + Σ A_full(R_i) + A_bhukta(R_end)
जहाँ A = स्थानीय/लङ्का उदय-असु (त्रिप्रश्न-विधि के अनुसार), R_start…R_end = दोनों बिन्दुओं के बीच की राशियाँ।
रूपान्तर:
1 घटी = 360 असु; भचक्र का एक चक्कर = 60 घटी = 21,600 असु (1.11)।
(दिन-गणना कैनन अलग प्रश्न है — SS: 1,577,917,828 दिन/महायुग; यह श्लोक स्थानीय उदय-जोड़ का है।)

उदाहरण (worked example)
मानें: सूर्य = मेष 20°, लग्न = मिथुन 10°; मेष–वृष–मिथुन के लङ्का-उदय (3.44) = 1,670 / 1,795 / 1,935 असु प्रति राशि।
आरम्भ: मेष में 10° शेष → A_bhogya ≈ (10/30)×1,670 ≈ 557 असु।
मध्य: वृष पूर्ण = 1,795 असु।
अन्त: मिथुन 10° भुक्त → A_bhukta ≈ (10/30)×1,935 = 645 असु।
योग t ≈ 557 + 1,795 + 645 = 2,997 असु = 2,997/360 ≈ 8.32 घटी।
(वास्तविक उदय-मान अक्षांश व क्रान्ति-सारणी पर निर्भर; यहाँ केवल जोड़-विधि।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक “लग्न-चाप → काल” का असु-लेखा है — वही मेट्रोलॉजी जिसमें 60 घटी / 3,600 पल / 21,600 असु (6 असु = 1 पल) का ढाँचा हमारे vedic-ghadi और MATHEMATICAL-AUDIT §1 में पिन है। Lagna engine और bhāva-layer समय-कोण को sidereal time / RA से बाँधते हैं; शास्त्र यहाँ उसी सम्बन्ध को राशि-उदय की जोड़-भाषा में कहता है। Canon day-count (SS vs Āryabhaṭa) तिथि-इंजन पर भारी पड़ता है; उदय-जोड़ स्वयं स्थानीय ज्यामिति है।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले 1 घटी = 3,600 असु और 1 दिन = 216,000 असु लिखा था। 1.11 के अनुसार 6 असु = 1 पल और 60 पल = 1 घटी, अतः 1 घटी = 360 असु और 60 घटी = 21,600 असु — भचक्र का एक चक्कर; 3.47 का उदाहरण भी 360 लेता है। वृष का लङ्कोदय 3.44 से 1795 है (1791 नहीं)। Correction: a ghaṭī is 360 asus.

3.51
सूर्यादूने निशाशेषे लग्ने अर्कादधिके दिवा ।
भचक्रार्धयुताद्भानोरधिक्के अस्तमयात्परम् ।।
sūryādūne niśāśeṣe lagne arkādadhike divā ।
bhacakrārdhayutādbhānoradhikke astamayātparam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यात् ऊने = सूर्य से न्यून (लग्न); निशा-शेषे = रात्रि का अवशेष (सूर्योदय तक शेष काल); लग्ने अर्कात् अधिके = लग्न सूर्य से अधिक हो तो; दिवा = दिन (दिवा-काल); भचक्रार्ध-युतात् भानोः = भ-चक्र के आधे (180°) से युक्त सूर्य से; अधिके = अधिक होने पर; अस्तमयात् परम् = अस्त के बाद (रात्रि का आरम्भ-पश्च भाग)। (पाठ: `+अर्कादधिके`, `+अस्तमयात्परम्` — अर्थ-स्थिर; चिह्न पाठभेद-संकेत।)

हिन्दी भावार्थ काल-साधन के बाद यह निर्णय चाहिए — वह अन्तर दिन का है या रात्रि का, और रात्रि का कौन-सा छोर। यदि लग्न सूर्य से कम है, तो मापित काल निशा-शेष (उदय की ओर बची रात) है। यदि लग्न सूर्य से अधिक है, तो वह दिवा-काल है। और यदि लग्न, सूर्य में आधा भचक्र (180°) जोड़ने पर भी उससे अधिक बैठे, तो काल अस्त के बाद — रात्रि का उत्तरार्ध-क्रम — समझा जाए। सूर्य-लग्न की सापेक्ष स्थिति ही दिन-रात्रि का द्वारपाल है।

English rendering If the lagna is less than the Sun, the recovered interval is the remainder of night (time left until sunrise). If the lagna exceeds the Sun, the interval falls in daytime. If the lagna is greater still than the Sun plus half the circle (λ_☉ + 180°), the time is after sunset. Relative order of lagna and Sun classifies the civil half of the day.

गणित / The Mathematics
वर्गीकरण-नियम (सूत्र नहीं, तर्क-द्वार):
1. λ_L < λ_☉ → निशाशेष (pre-sunrise remainder)
2. λ_☉ < λ_L < λ_☉ + 180° → दिवा
3. λ_L > λ_☉ + 180° → अस्तमयात् परम् (post-sunset night)
(देशान्तर/अयनांश यहाँ नहीं घुसते — दोनों देशज एक ही frame में हों। 180° = भचक्रार्ध = 6 राशि।)

उदाहरण (worked example)
λ_☉ = 100°, λ_L = 40° → λ_L < λ_☉ → निशाशेष।
λ_☉ = 100°, λ_L = 150° → सूर्य से अधिक, 280° से कम → दिवा।
λ_☉ = 100°, λ_L = 300° → 300° > 280° (= 100° + 180°) → अस्त के बाद।
(Convention: both longitudes same ayanāṃśa/frame; comparison is modular only if a full-circle wrap rule is separately stated — the verse states the three ordered cases.)

हमारा डिकोड (Our Decode) दिन-रात्रि विवेक panchāṅga-substrate का द्वार है — tithi/ghadi इंजन civil half जाने बिना अधूरा। हमारा lagna+MC layer कोण देता है; यह श्लोक उसी कोण को “निशाशेष / दिवा / अस्त-पर” में बाँटता है। Oracle-अनुशासन: ऐसे वर्गीकरण-fixtures पर `==` — सहन-पट्टी से छिपा बग यहाँ भी संभव; exact case-tables ही प्रमाण।

अध्यायः 4

चन्द्रग्रहणाधिकारः

The Lunar Eclipse
26 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
चतुर्थ अध्याय चन्द्रग्रहण की ज्यामिति को मापने योग्य भाषा में बाँधता है—सूर्य और चन्द्र के मण्डल-विष्कम्भ, मध्य- और स्फुट-भुक्ति से निकाले गए स्फुट-व्यास, तथा पृथ्वी की छाया-शंकु का मान, सब योजन और लिप्ता में। यहाँ ग्रहण कोई रहस्यमय घटना नहीं, बल्कि कक्षा-गुणन, भगणा-भाग और सूची (छाया-व्यास) की एक स्पष्ट श्रृंखला है: जब शशाङ्क पात के निकट छाया और चन्द्र के व्यासों का योग दूरी से अधिक हो, तो अन्धकार का परिमाण पूर्व-निश्चेय हो जाता है। अध्याय की सुन्दरता इसी में है कि वह “कितने भाग अधिक-अोन” जैसे प्रश्न को अंकों में उत्तर देता है—कितना ग्रहण, कितनी लिप्ता, कितनी अवधि—बिना कल्पना के सहारे। एक-दूसरे से जुड़े ये टुकड़े—रवि-चन्द्र व्यास, छाया-सूची, पात-समीपता—मिलकर एक पूर्ण ग्रहण-यन्त्र बनाते हैं, जिसमें प्रत्येक पद अगले पद का द्वार है।

For the English reader:
Adhyāya 4 is the Sūrya-Siddhānta’s handbook of the lunar eclipse: how wide the solar and lunar discs appear, how those widths sharpen from mean to true motion, and how the Earth’s shadow-cone is reduced to a measurable diameter on the Moon’s path. The chapter refuses theatre; it treats darkness as arithmetic—epicycle-corrected speeds, orbital scalings, and a “needle” (sūcī) that stands for the shadow’s angular breadth—so that near a lunar node one can say not only whether but how much of the Moon is covered. Beauty here is structural: each verse hands the next a quantity already in yojana or liptikā, until the excess or deficit of shadow over lunar body becomes the eclipse magnitude itself.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- सूर्य-मण्डल विष्कम्भ \(D_\odot\) (योजन) तथा चन्द्र-मण्डल विष्कम्भ \(D_☾\) — मध्य/स्फुट भुक्ति अनुपात से स्फुटीकरण
\[
D_{\mathrm{sph}} = D_{\mathrm{mad}} · \frac{v_{\mathrm{sph}}}{v_{\mathrm{mad}}}
\]
- कक्षा-अनुपात से व्यासान्तरण: \(D' = D · (a_☾ / a_\odot)\) (भगणा- या कक्षा-गुणन/भाजन)
- तिथि-मान में चन्द्र-कक्षा का विष्कम्भ: \(\Delta\lambda_{\mathrm{tithi}} = D_☾ / 12\) (मानलिप्तिका)
- सूची (पृथ्वी-छाया का स्फुट कोणीय व्यास)
\[
s = \frac{v_{\mathrm{sph},☾} · 2R_\oplus}{v_{\mathrm{mad}}} - \bigl(R_{\mathrm{shadow, mad}} · D_☾/D_\odot\bigr)_{\mathrm{corr}}
\]
(मध्यार्कादि व्यासों से शुद्ध किया गया छाया-व्यास; ग्रन्थ-क्रमानुसार)
- ग्रहण-शर्त (पात-समीपता): \(|\beta_☾|\) या पातांश \(\delta\) पर
\[
|\delta| < \tfrac12\bigl(s + D_☾\bigr)
\quad\Rightarrow\quad
\text{ग्रास } m = \tfrac12(s + D_☾) - |\delta|
\]
(भागों में अधिक/अोन परिमाण)

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। ग्रहण-ज्यामिति के पूर्ण सत्यापन के लिए शुद्ध SS स्फुट-चन्द्र/पात, योजन-से-लिप्ता छाया-शंकु (सूची), तथा कालांश-अवधि को `kaal-verification-oracle` की `==`-फ़िक्स्चर श्रृंखला में बाँधना होगा—अभी का पारिस्थितिकी-तन्त्र अध्याय-२ स्फुट और मध्य-देशान्तर प्रयोगशाला तक सीमित है, न कि चन्द्रग्रहण-मापन तक।

सूर्यपृथ्वीभूभा (umbra)तमस्-मण्डलचन्द्र-पथग्रास = (तमस्-व्यास + चन्द्र-व्यास)/2 − केन्द्र-अन्तर
भूभा-शङ्कु — the lunar eclipse mechanism (SS ch.4): the Sun's light past the Earth forms the umbral cone (भूभा); at the Moon's distance the shadow is a disk (तमस्) and eclipse magnitude is overlap of the two disks along the Moon's path.
4.1
सार्धानि षट्सहस्राणि योजनानि विवस्वतः ।
विष्कम्भो मण्डलस्येन्दोः सहाशीत्या चतुश्शतम् ।।
sārdhāni ṣaṭsahasrāṇi yojanāni vivasvataḥ ।
viṣkambho maṇḍalasyendoḥ sahāśītyā catuśśatam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सार्धानि षट्सहस्राणि = साढ़े छह सहस्र = ६५००, योजनानि = योजन-माप, विवस्वतः = सूर्य का, विष्कम्भः = व्यास / मण्डल-चौड़ाई, मण्डलस्य = बिम्ब-मण्डल का, इन्दोः = चन्द्र का, सह-अशीत्या चतुः-शतम् = अस्सी सहित चार सौ = ४८०।

हिन्दी भावार्थ सूर्य के बिम्ब का व्यास साढ़े छह हज़ार — अर्थात् छः हज़ार पाँच सौ — योजन कहा गया है। चन्द्र-बिम्ब का व्यास चार सौ अस्सी योजन है। यह अध्याय के आरम्भ में दिए गए दो स्थिर रेखीय माप हैं, जिनसे आगे स्फुट कोणीय व्यास और ग्रहण-छाया की गणना निकलती है।

English rendering The diameter of the Sun’s disk is six thousand five hundred yojanas; that of the Moon’s disk is four hundred eighty yojanas. These are the chapter’s fixed linear diameters, from which true angular measures and eclipse-shadow quantities are later derived.

गणित / The Mathematics
सूर्य-बिम्ब-व्यास \(D_⊙\) = ६५०० योजन
चन्द्र-बिम्ब-व्यास \(D_☽\) = ४८० योजन
(सार्धानि षट्सहस्राणि → ६००० + ½·१००० = ६५००; चतुश्शतम् + अशीति = ४०० + ८० = ४८०)

उदाहरण (worked example)
यदि केवल रेखीय माप चाहिए —
\(D_⊙ = 6500\) yojana, \(D_☽ = 480\) yojana.
अनुपात: \(D_⊙ / D_☽ = 6500 / 480 = 325 / 24 ≈ 13.5417\).
(आगे ४.०२–४.०३ में इन्हीं को भुक्ति/कक्षा से स्फुट और लिप्ता में बदला जाता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) ये योजन-स्थिरांक metrology-श्रृंखला के ग्रहण-अध्याय के प्रवेश-द्वार हैं। bharat-ephemeris-offline का mean-longitude lab कोणीय देशान्तर देता है; रेखीय विष्कम्भ → कोणीय लिप्ता का पुल ४.०३ का तिथि-भाजक और कक्षा-रूपान्तरण है। माप की ईमानदारी: योजन को आधुनिक किलोमीटर से “सिद्ध” नहीं किया — count-correspondence और सूत्र-श्रृंखला को ज्यों का त्यों रखा।

4.2
स्फुटस्वभुक्त्या गुणितौ मध्यभुक्त्योद्धृतौ स्फुटौ ।
रवेः स्वभगणाभ्यस्तः शशाङ्कभगणोद्धृतः ।।
sphuṭasvabhuktyā guṇitau madhyabhuktyoddhṛtau sphuṭau ।
raveḥ svabhagaṇābhyastaḥ śaśāṅkabhagaṇoddhṛtaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फुट-स्व-भुक्त्या = अपनी स्फुट दैनिक गति से, गुणितौ = गुणा किए हुए (दोनों विष्कम्भ), मध्य-भुक्त्या = मध्य गति से, उद्धृतौ = विभाजित, स्फुटौ = स्फुट (व्यास) हो जाते हैं, रवेः = सूर्य का (विष्कम्भ/माप), स्व-भगण-अभ्यस्तः = अपने भगणों से गुणा, शशाङ्क-भगण-उद्धृतः = चन्द्र-भगण से भाजित।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्र के मध्य विष्कम्भ को उनकी अपनी स्फुट भुक्ति से गुणा कर मध्य भुक्ति से भाग देने पर स्फुट विष्कम्भ प्राप्त होते हैं — दूरी बदलने पर कोणीय/प्रभावी व्यास कैसे बदले, यही नियम है। वैकल्पिक/सम्बद्ध रूप: सूर्य-सम्बन्धी माप को सूर्य के भगण से गुणा कर चन्द्र के भगण से भाग दिया जाता है, जिससे दोनों कक्षाओं के क्रान्ति-अनुपात से जुड़ा रूप मिलता है।

English rendering The mean diameters, each multiplied by its true daily motion and divided by its mean daily motion, become the true diameters. Separately, the solar measure multiplied by the Sun’s revolutions (bhagaṇa) and divided by the Moon’s revolutions converts the quantity across the two orbital scales.

गणित / The Mathematics
\(D_{\text{sphuṭa}} = D_{\text{madhya}} × \dfrac{v_{\text{sphuṭa}}}{v_{\text{madhya}}}\)
(सूर्य और चन्द्र, प्रत्येक के लिए अपनी-अपनी भुक्ति)
भगण-रूप: \(D_⊙^{(\text{scaled})} = D × \dfrac{B_⊙}{B_☽}\)
जहाँ \(B\) = महायुग में भगण (पूर्ण परिक्रमा-संख्या)।
(मध्य भुक्ति ∝ १/मध्य-दूरी की भावना; स्फुट भुक्ति से स्फुट व्यास।)

उदाहरण (worked example)
मान लें चन्द्र का मध्य विष्कम्भ \(D_m = 480\) योजन, मध्य भुक्ति \(v_m = 790'\)/दिन (केवल उदाहरण-सङ्ख्या), स्फुट भुक्ति \(v_s = 800'\)/दिन:
\(D_s = 480 × 800 / 790 ≈ 486.08\) योजन।
(वास्तविक इंजन में भुक्ति उसी दिन-गणना और मध्यम-देशान्तर से आती है जिसका कैनन चुना गया हो।)

हमारा डिकोड (Our Decode) स्फुट भुक्ति का स्रोत mean-longitude + Chapter-2 sphuṭa श्रृंखला है — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में manda/śīghra के बाद ही “सच्ची” दैनिक गति निकले। day-count कैनन (SS १,५७७,९१७,८२८ बनाम आर्यभटीय १,५७७,९१७,५००) मध्यम भुक्ति को थोड़ा खिसकाता है; तभी kaal-verification-oracle में `==` फिक्स्चर पर ही जाँच — सहिष्णुता-पट्टी नहीं।

4.3
शशाङ्ककक्षागुणितो भाजितो वा अर्ककक्षया ।
विष्कम्भश्चन्द्रकक्षायां तिथ्याप्ता मानलिप्तिका ।।
śaśāṅkakakṣāguṇito bhājito vā arkakakṣayā ।
viṣkambhaścandrakakṣāyāṃ tithyāptā mānaliptikā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशाङ्क-कक्षा-गुणितः = चन्द्र-कक्षा से गुणा, भाजितः = विभाजित, वा = अथवा, अर्क-कक्षया = सूर्य-कक्षा से, विष्कम्भः = व्यास, चन्द्र-कक्षायाम् = चन्द्र-कक्षा पर (अनुलिखित), तिथि-आप्ता = तिथि (१५) से भाजित, मान-लिप्तिका = माप कलाओं (arcmin) में।

हिन्दी भावार्थ विष्कम्भ को चन्द्र-कक्षा से गुणा कर सूर्य-कक्षा से भाग देने पर वह चन्द्र-कक्षा के पैमाने पर आ जाता है (सूर्य-बिम्ब के लिए)। चन्द्र-कक्षा पर स्थित उस विष्कम्भ को पंद्रह (तिथि) से भाग देने पर मान लिप्ता — कला — में मिलता है। इस प्रकार रेखीय योजन से कोणीय कला तक का पुल एक ही श्लोक में बँध जाता है।

English rendering Alternatively, multiply the diameter by the Moon’s orbit and divide by the Sun’s orbit to reduce it to the lunar-orbital scale. The diameter thus expressed on the Moon’s orbit, divided by fifteen (a tithi), yields the measure in minutes of arc (liptikā).

गणित / The Mathematics
चन्द्र-कक्षा पैमाने पर: \(D' = D × \dfrac{K_☽}{K_⊙}\)
कोणीय माप: \(\alpha' = \dfrac{D'}{15}\) लिप्ता (arcmin)
(तिथि = १५; पूर्ण चन्द्र-माह के कोणीय चक्र को तिथि-खंड से जोड़ने वाली शास्त्रीय संक्षिप्ति। पूर्ण वृत्त २१,६००' के साथ कक्षा-योजन से भी मेल बैठता है जब \(K\) शास्त्रीय कक्षा-परिधि हो।)

उदाहरण (worked example)
मान लें चन्द्र-कक्षा पैमाने पर \(D' = 480\) योजन (चन्द्र स्वयं):
\(\alpha_☽ = 480 / 15 = 32'\) (मध्य कोणीय व्यास, इस नियम से)।
सूर्य के लिए पहले \(D_⊙' = 6500 × K_☽ / K_⊙\), फिर \(\alpha_⊙ = D_⊙' / 15\)।
(सटीक संख्या कक्षा-परिधि के अध्याय-१/१२ मानों पर निर्भर; यहाँ केवल तिथि-भाजक का उपयोग दिखाया।)

हमारा डिकोड (Our Decode) २१,६०० लिप्ता/वृत्त ↔ २१,६०० प्राण/दिन की गिनती-संगति MATHEMATICAL-AUDIT §१ में स्पष्ट है — भौतिक “समय = कोण” नहीं, count correspondence। vedic-ghadi की ghaḍī/pala/vipala श्रृंखला उसी ६०-आधारित विभाजन पर चलती है; कोणीय लिप्ता और काल-नाड़ी को एक-दूसरे से गलती से अभिन्न न मानना decode की अनुशासन-पंक्ति है।

4.4
स्फुटेन्दुभुक्तिर्भूव्यासगुणिता मध्ययोद्धृता ।
लब्धं सूची महीव्यासस्फुटार्कश्रवणान्तरम् ।।
sphuṭendubhuktirbhūvyāsaguṇitā madhyayoddhṛtā ।
labdhaṃ sūcī mahīvyāsasphuṭārkaśravaṇāntaram ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फुट-इन्दु-भुक्तिः = चन्द्र की स्फुट गति, भू-व्यास-गुणिता = पृथ्वी-व्यास से गुणा, मध्यया = मध्य (चन्द्र-गति) से, उद्धृता = भाजित, लब्धम् = प्राप्त फल, सूची = सूची (छाया-शंकु/सूची-माप), मही-व्यास = पृथ्वी-व्यास, स्फुट-अर्क-श्रवण = सूर्य की स्फुट दूरी (श्रवण), अन्तरम् = अन्तर।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र की स्फुट भुक्ति को पृथ्वी के व्यास से गुणा कर चन्द्र की मध्य भुक्ति से भाग दो — जो लब्ध हो, वही सूची है। सूची का अर्थ ग्रहण-ज्यामिति में वह माप है जो पृथ्वी-व्यास और सूर्य की स्फुट दूरी (श्रवण) के अन्तर से जुड़ा है; छाया-शंकु की नोक की ओर बढ़ती संकीर्णता इसी से संभालती है।

English rendering Multiply the Moon’s true daily motion by the Earth’s diameter and divide by the Moon’s mean daily motion; the result is the sūcī. That quantity is tied to the difference between the Earth’s diameter and the true solar distance (śravaṇa) in the eclipse-shadow geometry.

गणित / The Mathematics
\(\text{sūcī} = \dfrac{v_{☽,\text{sphuṭa}} × D_⊕}{v_{☽,\text{madhya}}}\)
तथा शास्त्र-सन्दर्भ: सूची ↔ \(D_⊕\) और स्फुट सूर्य-श्रवण का अन्तर-सम्बन्ध (छाया-शंकु की लम्बाई/संकीर्णता के लिए)।
(भू-व्यास का संख्यात्मक योजन-मान पूर्व अध्यायों/परम्परा-मान से लिया जाता है; इस श्लोक में सूत्र-रूप ही है।)

उदाहरण (worked example)
मान लें \(D_⊕ = 1600\) योजन (केवल संख्यात्मक रूप दिखाने को; पाठ में यहाँ अंक नहीं), \(v_s / v_m = 800/790\):
\(\text{sūcī} = 1600 × 800/790 ≈ 1620.25\) योजन।
इसी सूची को अगले श्लोक में चन्द्र/सूर्य व्यास-अनुपात से संशोधित कर तमो-व्यास निकाला जाता है।

सुधार · correction (2026-10-07) “श्रवण” को सूर्य की दूरी कहा गया था; 4.5 की गणना सूर्य का स्फुट व्यास (योजन) माँगती है [reading]। Correction (reading).

4.5
मध्येन्दुव्यासगुणितं मध्यार्कव्यासभाजितम् ।
विशोध्य लब्धं सूच्यां तु तमो लिप्तास्तु पूर्ववत् ।।
madhyenduvyāsaguṇitaṃ madhyārkavyāsabhājitam ।
viśodhya labdhaṃ sūcyāṃ tu tamo liptāstu pūrvavat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्य-इन्दु-व्यास-गुणितम् = मध्य चन्द्र-व्यास से गुणा, मध्य-अर्क-व्यास-भाजितम् = मध्य सूर्य-व्यास से भाजित, विशोध्य = घटा कर, लब्धम् = प्राप्त, सूच्याम् = सूची में (से), तु = तो, तमः = छाया (पृथ्वी-छाया का व्यास), लिप्ताः = कलाएँ, तु पूर्ववत् = पूर्ववत् (तिथि/१५ आदि से)।

हिन्दी भावार्थ मध्य चन्द्र-व्यास को मध्य सूर्य-व्यास से भाग देकर जो अनुपात-फल मिले, उसे सूची से घटाओ — शेष तम है, अर्थात् चन्द्र-दूरी पर पृथ्वी की छाया का व्यास। फिर उसी छाया-व्यास को पहले जैसे कलाओं में बदलो। चन्द्रग्रहण की सीमा और खण्ड-माप इसी तम-लिप्ता पर टिकते हैं।

English rendering Multiply by the mean lunar diameter and divide by the mean solar diameter; subtract that result from the sūcī — the remainder is tamas, the diameter of the Earth’s shadow. Convert that shadow diameter into minutes of arc as before.

गणित / The Mathematics
\(\text{tamas (योजन)} = \text{sūcī} − D_{☽,\text{madhya}} × \dfrac{\ldots}{D_{⊙,\text{madhya}}}\)
श्लोकानुसार: मध्येन्दुव्यास × (सम्बद्ध राशि) / मध्यार्कव्यास को सूची से विशोध्य → तम।
फिर \(\alpha_{\text{shadow}}' = \text{tamas}' / 15\) लिप्ता (पूर्ववत्, ४.०३ की रीति)।
(पूर्ण रूप में सूर्य-बिम्ब की कोणीय चौड़ाई छाया को संकुचित करती है — सूची में से सूर्य-व्यास का अनुपाती भाग यही संकुचन है।)

उदाहरण (worked example)
मान लें सूची = १६२० योजन, \(D_☽ = 480\), \(D_⊙ = 6500\), और घटाया जाने वाला पद ≈ \(480 × (D_⊕\text{-scale})/6500\)।
यदि सरल अनुपात-पद १२० योजन हो (उदाहरण):
\(\text{tamas} = 1620 − 120 = 1500\) योजन → \(\alpha ≈ 1500/15 = 100'\) छाया-व्यास।
(वास्तविक संख्याएँ स्फुट भुक्ति, श्रवण और कक्षा-मानों पर निर्भर।)

हमारा डिकोड (Our Decode) ग्रहण-ज्यामिति mean-longitude lab से आगे की “measured calculation layer” माँगती है — MATHEMATICAL-AUDIT की ईमानदारी: उपकरण मध्य-देशान्तर संश्लेषण-प्रयोगशाला है, उत्पादन-स्तर स्फुट-एफेमेरिस नहीं जब तक मापित परत न जुड़े। sphuṭa इंजन (२.३४–३८ के मन्दोच्च/शीघ्रोच्च) दूरी-संकेत (भुक्ति) देता है; सूची-तम श्रृंखला उसी पर चढ़ती है, पश्चिमी प्रमेय श्रृंखला में घुसेड़े बिना।

4.6
भानोर्भार्धे महीच्छाया तत्तुल्ये अर्कसमे अपि ।
शशाङ्कपाते ग्रहणं कियद्भागाधिकोनके ।।
bhānorbhārdhe mahīcchāyā tattulye arkasame api ।
śaśāṅkapāte grahaṇaṃ kiyadbhāgādhikonake ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानोः भ-अर्धे = सूर्य से भ-चक्र के आधे पर (विमुख/पूर्णिमा-स्थिति), मही-छाया = पृथ्वी-छाया, तत्-तुल्ये = उसके (छाया/स्थिति) तुल्य होने पर, अर्क-समे अपि = सूर्य के सम (युति/अमावस्या) पर भी, शशाङ्क-पाते = चन्द्र-पात (राहु/केतु-सन्धि) पर, ग्रहणम् = ग्रहण, कियत्-भाग-अधिक-ऊनके = कुछ अंश अधिक या न्यून होने पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य से आधे भ-चक्र पर — अर्थात् विमुख स्थिति में — पृथ्वी की छाया चन्द्र पर पड़ने का अवसर है (चन्द्रग्रहण)। सूर्य के सम होने पर भी — युति में — ग्रहण-योग बनता है (सूर्यग्रहण)। परन्तु ग्रहण तभी, जब चन्द्र पात के समीप हो; पात से कुछ अंश आगे-पीछे की सीमा में ही ग्रहण सम्भव है, दूर होने पर नहीं।

English rendering At half a circle from the Sun (opposition), the Earth’s shadow is in play; likewise at solar equality (conjunction). An eclipse occurs at the Moon’s node when the luminaries lie within a certain number of degrees more or less of that node — not when far from it.

गणित / The Mathematics
चन्द्रग्रहण-योग: \(\lambda_☽ ≈ \lambda_⊙ + 180°\) (भार्ध) तथा \(|\beta|\) / पात-दूरी सीमा के भीतर।
सूर्यग्रहण-योग: \(\lambda_☽ ≈ \lambda_⊙\) (अर्कसम) तथा पात-समीप्य।
पात-देशान्तर \(\lambda_Ω\); ग्रहण-सम्भावना जब \(|\lambda_☽ − \lambda_Ω|\) (या युति/विमुख बिन्दु का पात से अन्तर) < \(Δ\) भाग (पाठ “कियद्भाग” — संख्या आगे/परम्परा-सारणी से; इस श्लोक में अङ्क नहीं)।

उदाहरण (worked example)
मान लें पूर्णमासी के अन्तकाल पर \(\lambda_⊙ = 40°\), \(\lambda_☽ = 220°\) (अन्तर १८०°), पात \(\lambda_Ω = 215°\):
पात से चन्द्र ≈ ५° — “कियद्भाग” सीमा के भीतर हो तो चन्द्रग्रहण-योग; यदि पात २६०° हो (चन्द्र से ४०°) तो सामान्यतः ग्रहण नहीं।
(सीमा-अङ्क अध्याय के आगे के श्लोकों/परम्परा-मान से पूरे होते हैं।)

4.7
तुल्यौ राश्यादिभिः स्यातां अमावास्यान्तकालिकौ ।
सूर्येन्दू पौर्णमास्यन्ते भार्धे भागादिकौ समौ ।।
tulyau rāśyādibhiḥ syātāṃ amāvāsyāntakālikau ।
sūryendū paurṇamāsyante bhārdhe bhāgādikau samau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुल्यौ = दोनों समान, राश्यादिभिः = राशि-अंश-कला आदि से, स्याताम् = हों, अमावास्या-अन्त-कालिकौ = अमावस्या के अन्तकाल के, सूर्य-इन्दू = सूर्य और चन्द्र, पौर्णमासी-अन्ते = पूर्णिमा के अन्त में, भ-अर्धे = भ-चक्र के आधे पर, भागादिकौ समौ = अंश आदि में सम।

हिन्दी भावार्थ अमावस्या के अन्तकाल में सूर्य और चन्द्र राशि-अंश-कला की गणना में एक ही स्थान पर मिलते हैं — यही युति है। पौर्णमासी के अन्त में वे भ-चक्र के आधे — एक सौ अस्सी अंश — पर सम होते हैं, अर्थात् ठीक विमुख। पर्व-क्षण की परिभाषा यही समलिप्त/सम-भाग स्थिति है।

English rendering At the end of the new-moon tithi, Sun and Moon are equal in sign, degree, and so on (conjunction). At the end of full moon they are equal when half a circle apart — matched degree-wise in opposition. That equality defines the parva moment.

गणित / The Mathematics
अमावस्या-अन्त: \(\lambda_⊙ = \lambda_☽\) (राश्यादि सम)
पूर्णिमा-अन्त: \(\lambda_☽ = \lambda_⊙ + 180°\) (भार्धे भागादि सम)
दीर्घांश मध्य या स्फुट — पर्व-साधना में आगे ४.०८ स्वफल-संस्कार से तय होता है।
तिथि-समीकरण भावना: सिनाडिक कोण \((\lambda_☽ − \lambda_⊙) \bmod 360° = 0°\) या \(180°\)।

उदाहरण (worked example)
\(\lambda_⊙ = 123°17'40''\), अमावस्या-अन्त के लिए \(\lambda_☽\) भी 123°17'40'' होना चाहिए।
पूर्णिमा-अन्त: \(\lambda_☽ = 123°17'40'' + 180° = 303°17'40''\)।
(दिन-गणना कैनन बदलने से मध्यम \(\lambda\) खिसकते हैं — SS १,५७७,९१७,८२८ vs आर्यभट १,५७७,९१७,५०० — तithi इंजन पर असर सबसे सीधा।)

हमारा डिकोड (Our Decode) NEXT-STEPS A (२०२६-०८-१०): सिनाडिक परीक्षण में प्राचीन दीर्घीकरण-गणना ५७,७५३,३३६ − ४,३२०,००० = ५३,४३३,३३६ rev/महायुग → SS-कैनन घाटा ≈ −०.१ rev (≈ −०.००४७ s/सिनाडिक मास); आर्यभटीय कैनन ≈ −११.२ rev। पर्व-क्षण और तिथि-इंजन इसी कैनन-चुनाव पर सबसे अधिक संवेदनशील हैं — “हम” ने दोनों को साथ रखकर घाटे को छुपाया नहीं।

4.8
गतैष्यपर्वनाडीनां स्वफलेनोनसंयुतौ ।
समलिप्तौ भवेतां तौ पातस्तात्कालिको अन्यथा ।।
gataiṣyaparvanāḍīnāṃ svaphalenonasaṃyutau ।
samaliptau bhavetāṃ tau pātastātkāliko anyathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गत-एष्य-पर्व-नाडीनाम् = गत और एष्य पर्व की नाड़ियों (घटियों) का, स्व-फलेन = अपने फल (समीकरण/संस्कर) से, ऊन-संयुतौ = हीन और सहित, सम-लिप्तौ = समान कला वाले, भवेताम् = हों, तौ = वे दोनों (सूर्य-चन्द्र), पातः = पात, तात्कालिकः = तत्कालिक (उस क्षण का), अन्यथा = अन्यथा (यदि समलिप्त न हों)।

हिन्दी भावार्थ गत पर्व और आने वाले पर्व की नाड़ियों को अपने-अपने फल से घटा-बढ़ा कर ऐसा क्षण ढूँढ़ो जहाँ सूर्य और चन्द्र समलिप्त हो जाएँ — वही संस्कृत पर्व-काल है। यदि बिना इस संस्कार के वे सम न हों, तो पात को भी उसी तात्कालिक क्षण पर लाना होगा; अन्यथा पात “अन्य” (असंस्कृत/मध्यम) रह जाता है। ग्रहण-योग की सूक्ष्मता पर्व-नाड़ी और तात्कालिक पात दोनों की एक साथ साधना में है।

English rendering By diminishing and increasing the nāḍīs of the past and future parva with their own equations (phala), bring the luminaries to equal minutes of longitude. The node must likewise be the contemporaneous (tātkālika) node; otherwise — if that correction is omitted — the node is not the one belonging to that instant.

गणित / The Mathematics
पर्व-क्षण खोज: गत/एष्य पर्व-नाड़ी \(n_g, n_e\); स्वफल \(φ\) (भुक्ति/फल-सारणी से)।
संस्कृत नाड़ी: \(n' = n \mp φ\) (ऊन/संयुत — दिशा गत-एष्य और फल-चिह्न से)।
लक्ष्य: \(\mathrm{liptā}(λ_⊙) = \mathrm{liptā}(λ_☽)\) (अमा) या \(|λ_☽ − λ_⊙| = 180°\) समलिप्त (पूर्णिमा)।
तात्कालिक पात: \(λ_Ω(t_{\text{parva}})\), न कि केवल मध्यम पात बिना काल-संस्कार।

उदाहरण (worked example)
मान लें गत पर्व से १२ नाड़ी बाद अनुमानित युति, चन्द्र-फल +८ कला, सूर्य-फल +२ कला — समलिप्त लाने के लिए समय-संशोधन
\(Δt ∝ (λ_☽ − λ_⊙)/\dot{(λ_☽ − λ_⊙)}\)
नाड़ी में: यदि सिनाडिक भुक्ति ≈ ७३२'/दिन ≈ १२.२'/नाड़ी, और शेष अन्तर ६' हो तो \(Δt ≈ 6/12.2 ≈ 0.49\) नाड़ी।
उसी \(t\) पर पात \(λ_Ω + \dot{λ}_Ω · Δt\) = तात्कालिक पात।

हमारा डिकोड (Our Decode) “समलिप्त” और तात्कालिक पात exact-equality अनुशासन की भाषा में हैं — kaal-verification-oracle में `==` pinned fixtures; ±3 जैसी पट्टी ने कभी वास्तविक −१ छुपाया था। bīja/अयन प्रयोग (४९.२″/वर्ष आदि) पर्व-देशान्तर फ्रेम बदलते हैं; इन्हें selectable hypothesis माना गया, “एकमात्र ऐतिहासिक सत्य” नहीं। गलत मोड़ रिपोर्ट करना विधि का हिस्सा है — जैसे पुरानी “Drik zero-error” तालिका हटाई गई क्योंकि वह hardcoded sky थी।

4.9
छादको भास्करस्येन्दुरधःस्थो घनवद्भवेत् ।
भूच्छायां प्राङ्मुखश्चन्द्रो विशत्यस्य भवेदसौ ।।
chādako bhāskarasyenduradhaḥstho ghanavadbhavet ।
bhūcchāyāṃ prāṅmukhaścandro viśatyasya bhavedasau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छादकः = आच्छादक / ग्रहण-कारक पिण्ड; भास्करस्य = सूर्य का; इन्दुः = चन्द्र; अधःस्थः = नीचे स्थित (भू-सूर्य के बीच); घनवत् = मेघ-सदृश घन; भूच्छायाम् = पृथ्वी की छाया में; प्राङ्मुखः = पूर्व-अभिमुख; विशति = प्रवेश करता है; असौ = वह (चन्द्र-ग्रहण)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य का आच्छादक चन्द्र तब बनता है जब वह नीचे — सूर्य और पृथ्वी के बीच — घन मेघ की भाँति स्थित हो; यही सूर्यग्रहण की ज्यामिति है। चन्द्र जब पूर्व-अभिमुख होकर पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, तब वह चन्द्रग्रहण होता है। श्लोक दो अलग घटनाओं को एक ही वाक्य-युग्म में बाँधता है — एक में चन्द्र छादक है, दूसरी में छाया-क्षेत्र में प्रवेश करने वाला ग्राह्य पिण्ड।

English rendering The Moon becomes the Sun’s eclipsing body when it lies below him, dense like a cloud. Facing eastward, the Moon enters the Earth’s shadow — and that is the lunar eclipse.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — ज्यामितीय वर्णन (सूर्यग्रहण: चन्द्र = छादक; चन्द्रग्रहण: चन्द्र = भूच्छाया में प्रवेश)। रेखा-दृष्टि में सूर्यग्रहण के लिए चन्द्र पृथ्वी–सूर्य रेखा पर मध्यस्थ, चन्द्रग्रहण के लिए चन्द्र भू-परछाईं-शंकु में।

दृष्टान्त (Illustrative Example) दो अलग छाया-नाटक एक ही श्लोक में: (१) चन्द्र जब सूर्य और पृथ्वी के बीच नीचे आता है, घन मेघ-सा डिस्क सूर्य को ढकता है — सूर्यग्रहण; (२) जब चन्द्र पूर्व-अभिमुख पृथ्वी की शंकु-छाया (umbra/penumbra) में घुसता है — चन्द्रग्रहण। रात्रि में पूरा चन्द्रबिम्ब धीरे-धीरे काला होना दूसरी घटना है; दिन में सूर्य-डिस्क पर चन्द्र-कटाव पहली। दोनों में “कौन छादक, कौन छाया-क्षेत्र” पलट जाता है — यही इस युग्म-वाक्य का ठोस भेद, जो अध्याय ४–६ के व्यास–लिप्ति गणित से पहले दृष्टि में बैठना चाहिए।

4.10
तात्कालिकेन्दुविक्षेपं छाद्यच्छादकमानयोः ।
योगार्धात्प्रोज्झ्य यच्छेषं तावच्छन्नं तदुच्यते ।।
tātkālikenduvikṣepaṃ chādyacchādakamānayoḥ ।
yogārdhātprojjhya yaccheṣaṃ tāvacchannaṃ taducyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तात्कालिक = उस क्षण का; इन्दु-विक्षेप = चन्द्र का अक्षांशीय विक्षेप (β); छाद्य = आच्छाद्य पिण्ड (सूर्य/चन्द्र); छादक = आच्छादक (चन्द्र/भूच्छाया); मान = व्यास/विस्तार; योगार्ध = दोनों मानों के योग का आधा; प्रोज्झ्य = घटाकर; शेष = शेष भाग; छन्न = आच्छन्न / ग्रस्त अंश।

हिन्दी भावार्थ उस क्षण के चन्द्र-विक्षेप को छाद्य और छादक के मानों के योगार्ध से घटाओ; जो शेष बचे, उतना भाग आच्छन्न कहा जाता है। यह ग्रास-परिमाण का सीधा ज्यामितीय नाप है — अक्षांश जितना बड़ा, उतना ही कम ढका भाग। शेष ऋणात्मक या शून्य निकले तो अर्थ स्पष्ट है: दृष्टि-रेखा पर पर्याप्त अतिव्याप्ति नहीं।

English rendering Subtract the instantaneous lunar latitude from half the sum of the diameters of the eclipsed and eclipsing bodies; the remainder is the amount said to be obscured.

गणित / The Mathematics छन्न (obscured arc)
`channa = (m_chādya + m_chādaka)/2 − |β|`
जहाँ `m` = दृश्य व्यास (लिप्ता/अंश में), `β` = तात्कालिक चन्द्र-विक्षेप। यदि `channa ≤ 0` तो ग्रास नहीं; यदि `channa ≥ m_chādya` तो पूर्ण आच्छादन (अगले श्लोक का नियम)।

उदाहरण (worked example) मान लें `m_chādya = 32′`, `m_chādaka = 34′`, `|β| = 12′`।
योगार्ध = (32 + 34)/2 = 33′।
`channa = 33 − 12 = 21′` — अर्थात् छाद्य का 21′ भाग आच्छन्न (आंशिक ग्रास)।

4.11
यद्ग्राह्यं अधिके तस्मिन्सकलं न्यूनं अन्यथा ।
योगार्धादधिके न स्याद्विक्षेपे ग्राससम्भवः ।।
yadgrāhyaṃ adhike tasminsakalaṃ nyūnaṃ anyathā ।
yogārdhādadhike na syādvikṣepe grāsasambhavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यद्ग्राह्यम् = जो ग्राह्य (आच्छाद्य) का मान; अधिके तस्मिन् = उस (छन्न) में अधिक होने पर; सकलं = सम्पूर्ण ग्रहण; न्यूनम् अन्यथा = अन्यथा न्यून/आंशिक; योगार्धात् अधिके = योगार्ध से अधिक; विक्षेपे = विक्षेप में; न स्यात् ग्राससम्भवः = ग्रास संभव नहीं।

हिन्दी भावार्थ यदि छन्न-शेष ग्राह्य-मान से अधिक हो, तो ग्रहण सकलं — पूर्ण — है; अन्यथा आंशिक। और यदि विक्षेप स्वयं योगार्ध से बड़ा हो, तो ग्रास की संभावना ही नहीं रहती। यह एक स्पष्ट निर्णय-सारणी है: पूर्ण / आंशिक / असम्भव — तीनों सीमाएँ एक ही श्लोक में।

English rendering If that obscured amount exceeds the eclipsed body’s measure, the eclipse is total; otherwise it is partial. If the latitude exceeds half the sum of the diameters, no eclipse is possible.

गणित / The Mathematics
1. पूर्णता: `channa ≥ m_chādya` ⇒ सकलग्रास (total; ग्राह्य पूर्ण ढका)।
2. आंशिकता: `0 < channa < m_chādya` ⇒ आंशिक।
3. असम्भवता: `|β| > (m_chādya + m_chādaka)/2` ⇒ `grāsa` नहीं।
(टिप्पणी: सकलग्रास के लिए व्यावहारिक रूप में `channa ≥ m_chādya` वही है जो `|β| ≤ |m_chādaka − m_chādya|/2` — विमर्द-सीमा; अगला श्लोक उसे जड़ निकालकर समय में बदलता है।)

उदाहरण (worked example) `m_chādya = 32′`, `m_chādaka = 34′` ⇒ योगार्ध = 33′।
• `|β| = 40′ > 33′` → ग्रास असम्भव।
• `|β| = 5′` → `channa = 28′ < 32′` → आंशिक।
• `|β| = 0.5′` → `channa = 32.5′ > 32′` → सकलग्रास।

4.12
ग्राह्यग्राहकसंयोगवियोगौ दलितौ पृथक् ।
विक्षेपवर्गहीनाभ्यां तद्वर्गाभ्यां उभे पदे ।।
grāhyagrāhakasaṃyogaviyogau dalitau pṛthak ।
vikṣepavargahīnābhyāṃ tadvargābhyāṃ ubhe pade ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्राह्य-ग्राहक = आच्छाद्य और आच्छादक; संयोग = योग; वियोग = अन्तर; दलितौ = आधे किए हुए; पृथक् = अलग-अलग; विक्षेप-वर्ग-हीनाभ्याम् = विक्षेप-वर्ग से रहित; तद्-वर्गाभ्याम् = उन (दलित योग/वियोग) के वर्गों से; उभे पदे = दोनों पद (मूल/√)।

हिन्दी भावार्थ ग्राह्य और ग्राहक के योग तथा अन्तर — दोनों को आधा करो, अलग-अलग। उन अर्ध-योग और अर्ध-अन्तर के वर्गों में से विक्षेप-वर्ग घटाकर दोनों के मूल लो; वे दो “पद” स्थिति और विमर्द की ज्यामितीय भुजाएँ हैं। यह ग्रहण-डिस्क पर समकोण-त्रिभुज का शास्त्रीय रूप है: कर्ण = अर्ध-(योग या अन्तर), एक भुजा = विक्षेप, दूसरी = चाप-दिशा में अर्ध-अवधि का कोणीय अर्ध।

English rendering Halve, separately, the sum and the difference of the eclipsed and eclipsing diameters. From those two squares, each diminished by the square of the latitude, extract both roots — the two “padas.”

गणित / The Mathematics
`s = (m_chādya + m_chādaka)/2`
`d = |m_chādya − m_chādaka|/2`
`β` = तात्कालिक विक्षेप

स्थित्यर्ध-पद (half-duration arc): `p_sthiti = √(s² − β²)` (यदि `s ≥ |β|`, अन्यथा 0)

विमर्दार्ध-पद (half-totality arc): `p_vimarda = √(d² − β²)` (यदि `d ≥ |β|` और सकलग्रास; अन्यथा 0)
इकाई: लिप्ता (′) या अंश — मान और विक्षेप एक ही इकाई में।

उदाहरण (worked example) `m_chādya = 32′`, `m_chādaka = 34′`, `|β| = 8′`।
`s = 33′`, `d = 1′`।
`p_sthiti = √(33² − 8²) = √(1089 − 64) = √1025 ≈ 32.02′`
`p_vimarda = √(1² − 8²)` — `d < |β|` ⇒ विमर्द नहीं (केवल आंशिक; विमर्दार्ध = 0)।

4.13
षष्ट्या संगुण्य सूर्येन्द्वोर्भुक्त्यन्तरविभाजिते ।
स्यातां स्थितिविमर्दार्धे नाडिकादिफले तयोः ।।
ṣaṣṭyā saṃguṇya sūryendvorbhuktyantaravibhājite ।
syātāṃ sthitivimardārdhe nāḍikādiphale tayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षष्ट्या = साठ (६०) से; संगुण्य = गुणा करके; सूर्येन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र की; भुक्ति-अन्तर = गति-अन्तर (Δv); विभाजिते = विभाजित; स्थिति-विमर्द-अर्धे = स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध; नाडिकादि-फले = नाडिका आदि में फल; तयोः = उन दोनों पदों के।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के दोनों पदों को साठ से गुणा कर सूर्य–चन्द्र भुक्ति-अन्तर से भाग दो; फल स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध नाडिका आदि में निकलते हैं। साठ का गुणक नाडिका-प्रणाली से जुड़ा है — दिन के ६० नाडिका-भाग के अनुरूप कोणीय माप को काल में उतारना। भुक्ति-अन्तर जितना छोटा, अवधि उतनी लंबी — समीप गति पर ग्रहण “धीरे” पार होता है।

English rendering Multiply those two roots by sixty and divide by the difference of the Sun’s and Moon’s motions; the results are the half-duration and half-totality in nāḍikās and so on.

गणित / The Mathematics
`स्थित्यर्ध (nāḍikā) = (p_sthiti × 60) / |v_candra − v_sūrya|`
`विमर्दार्ध (nāḍikā) = (p_vimarda × 60) / |v_candra − v_sūrya|`
जहाँ `p` और `v` एक ही कोणीय इकाई में (प्रायः लिप्ता/दिन या अंश/दिन — समानता अनिवार्य)।

मेट्रोलॉजी (dossier): १ दिन = ६० घटी/नाडिका = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल। षष्टि (साठ) का गुणन इसी ६०-नाडिका दिन से बँधा है।

उदाहरण (worked example) `p_sthiti = 32′`, मान लें `|Δv| = 12′` प्रति नाडिका-तुल्य इकाई में (यहाँ सरलीकृत: यदि भुक्ति-अन्तर = ७२०′/दिन = १२′/नाडिका)।
`स्थित्यर्ध = (32 × 60) / 720 = 1920/720 = 2;40 नाडिका` (२ नाडिका ४० विनाडिका) — अर्थात् मध्य से संपर्क तक ~२⅔ घटी।

हमारा डिकोड (Our Decode) नाडिका/घटी की ६०-भाग मेट्रोलॉजी `vedic-ghadi` और `MATHEMATICAL-AUDIT §1` में ज्यों-की-त्यों बैठी है — १ दिन = ६० घटी। ग्रहण-काल का यह रूपांतरण उसी दिन-विभाजन पर चलता है; दिन-गणना (SS १,५७७,९१७,८२८ बनाम आर्यभटीय १,५७७,९१७,५००) मध्यम भुक्ति को छूती है, इसलिए स्थित्यर्ध का संख्यात्मक फल canon-choice के प्रति संवेदनशील है।

सुधार · correction (2026-10-07) “षष्ठ्या” (छठे से) → “षष्ट्या” (साठ से): पद × 60 ÷ भुक्त्यन्तर से नाडिकाएँ; यही इस संस्करण का 4.18 और दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050) पढ़ते हैं। Correction: sixty, not sixth.

4.14
स्थित्यर्धनाडिकाभ्यस्ता गतयः षष्टिभाजिताः ।
लिप्तादि प्रग्रहे शोध्यं मोक्षे देयं पुनः पुनः ।।
sthityardhanāḍikābhyastā gatayaḥ ṣaṣṭibhājitāḥ ।
liptādi pragrahe śodhyaṃ mokṣe deyaṃ punaḥ punaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थित्यर्ध-नाडिका = अर्ध-स्थिति की नाडिकाएँ; अभ्यस्ताः = गुणा की हुई; गतयः = गतियाँ (भुक्ति); षष्टि-भाजिताः = साठ (६०) से विभाजित; लिप्तादि = कला आदि फल; प्रग्रहे = ग्रास/स्पर्श पर; शोध्यम् = घटनीय; मोक्षे = मोक्ष पर; देयम् = योज्य; पुनः पुनः = बार-बार (पुनरावृत्ति)।

हिन्दी भावार्थ स्थित्यर्ध-नाडिकाओं से गतियों को गुणा कर साठ से भाग दो — लिप्ता आदि में स्थान-शोधन फल मिलता है। प्रग्रह (स्पर्श/आरंभ) पर वह घटाओ, मोक्ष पर जोड़ो; और यह प्रक्रिया पुनः पुनः करो। कारण स्पष्ट है: मध्य-क्षण से हटकर स्पर्श-क्षण पर विक्षेप, मान और भुक्ति थोड़े बदल जाते हैं, इसलिए एक बार का रेखीय शोधन पर्याप्त नहीं — पुनरावृत्त स्फुटीकरण चाहिए।

English rendering Motions multiplied by the half-duration in nāḍikās and divided by sixty yield minutes of arc and so on; subtract them at first contact, add them at release — and do so again and again.

गणित / The Mathematics
`Δλ = (v × sthityardha_nāḍikā) / 60` (लिप्ता आदि)

प्रग्रह (beginning): `λ_pragraha = λ_madhya − Δλ` (संबंधित पिण्ड की भुक्ति से)

मोक्ष (end): `λ_mokṣa = λ_madhya + Δλ`
`पुनः पुनः` = अद्यतन `β`, मान, `Δv` से `p_sthiti` और `sthityardha` फिर गिनो, `Δλ` फिर लगाओ — अभिसरण तक। सूर्य–चन्द्र दोनों की गतयः अलग-अलग प्रयुक्त होती हैं (संबंधित छाद्य/छादक)।

उदाहरण (worked example) चन्द्र-भुक्ति `v_c = 790′/दिन`, स्थित्यर्ध = २.५ नाडिका।
दिन = ६० नाडिका ⇒ `Δλ_c = (790 × 2.5) / 60 = 1975/60 ≈ 32.92′`।
मध्य-चन्द्र से प्रग्रह पर ~३२.९′ पीछे, मोक्ष पर ~३२.९′ आगे — फिर नए स्थान पर विक्षेप गिनकर स्थित्यर्ध दोहराएँ।

हमारा डिकोड (Our Decode) “पुनः पुनः” वही पुनरावृत्त अनुशासन है जो SS अध्याय-२ स्फुट में चार-चरण मन्द–शीघ्र iteration (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`) सिखाता है — एक-शॉट रेखीय अनुमान नहीं, स्थिर फल तक लूप। `kaal-verification-oracle` की सीख यहाँ भी लागू: सहिष्णुता-पट्टी से छिपा अंतर नहीं; अंतिम स्पर्श/मोक्ष pinned fixture पर `==` से जाँचने योग्य होना चाहिए।

सुधार · correction (2026-10-07) “षष्ठि” → “षष्टि” (साठ), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। “अन्यथा” (4.8, 4.15) = उलटी दिशा में — पात पश्चिमगामी है (1.33), “otherwise” नहीं। Correction: sixty; anyathā = the contrary way.

4.15
तद्विक्षेपैः स्थितिदलं विमर्दार्धे तथा असकृत् ।
संसाध्यं अन्यथा पाते तल्लिप्तादिफलं स्वकम् ।।
tadvikṣepaiḥ sthitidalaṃ vimardārdhe tathā asakṛt ।
saṃsādhyaṃ anyathā pāte talliptādiphalaṃ svakam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-विक्षेपैः = उन (शोधित) विक्षेपों से; स्थिति-दलम् = स्थित्यर्ध; विमर्दार्धे = विमर्दार्ध में; तथा = उसी प्रकार; +असकृत् = बार-बार (पाठ में + चिह्न — critical apparatus का variant marker; असकृत् = पुनरावृत्त); संसाध्यम् = साधनीय; अन्यथा = अन्य रीति से; पाते = पात/राहु-संदर्भ में; तत् लिप्तादि फलम् स्वकम् = वह कला-फल अपना (पात-संबंधी)।

हिन्दी भावार्थ शोधित विक्षेपों से स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध को भी उसी तरह असकृत् — बार-बार — साधो। पात की ओर से जो लिप्तादि फल निकलता है, वह अपना अलग शोधन है (विक्षेप-शुद्धि का पथ)। श्लोक कहता है: केवल मध्य-स्थान नहीं, विक्षेप और दोनों अर्ध-काल भी iteration के दायरे में हैं। (apparatus का `+` असकृत् पर variant संकेत है; अर्थ-प्रवाह में असकृत् ही दोहराव का बीज-शब्द है।)

English rendering With those latitudes, the half-duration and half-totality are likewise to be established repeatedly. Otherwise, with respect to the node, that minutes-result is its own (nodal) correction.

गणित / The Mathematics Iteration scheme (SS 4.14–4.15 संयुक्त):
1. मध्यग्रहण पर `β₀`, मान, `Δv` → `p_sthiti`, `p_vimarda` → `T/2`, `τ/2` (नाडिका)।
2. `±T/2` पर नए स्थान → नए `β₁` (पात से: `β ∝ sin(λ − λ_pāta)` रूप — यंत्रानुसार)।
3. `β₁` से फिर `p`, `T/2`, `τ/2` → `β₂` … जब तक `T/2` स्थिर।
`अन्यथा पाते … स्वकम्`: पात-संबंधी लिप्ता-फल (पात-भुक्ति × समय / ६०) अलग से विक्षेप-शुद्धि में लगता है।

उदाहरण (worked example) प्रथम अनुमान `T/2 = 2.50` नाडिका, `β_madhya = 8.0′`। स्पर्श-क्षण पर पात-गति से `β` बढ़कर `8.4′` हो तो
`p' = √(s² − 8.4²) < p` ⇒ नया `T/2` थोड़ा छोटा, मान लें २.४७ नाडिका — दूसरी राउंड में फिर जाँच; अंतर ०.०१ नाडिका से कम हो तो रोकें (यंत्र-निर्धारित रोक; शास्त्र “असकृत्” कहता है, संख्यात्मक ε नहीं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) विक्षेप–स्थित्यर्ध का यह closed loop स्फुट-engine की उसी शुद्ध-SS श्रृंखला का ग्रहण-अध्याय विस्तार है — पश्चिमी प्रमेय श्रृंखला में नहीं। Honesty discipline: पुराना “Drik zero-error” जैसा hardcoded आकाश यहाँ नहीं; iteration का फल मापित गणना-परत से आना चाहिए, शब्द-बल से नहीं।

4.16
स्फुटतिथ्यवसाने तु मध्यग्रहणं आदिशेत् ।
स्थित्यर्धनाडिकाहीने ग्रासो मोक्षस्तु संयुते ।।
sphuṭatithyavasāne tu madhyagrahaṇaṃ ādiśet ।
sthityardhanāḍikāhīne grāso mokṣastu saṃyute ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्फुट-तिथि = स्पष्ट तिथि; अवसाने = समाप्ति पर; तु = ही; मध्य-ग्रहणम् = ग्रहण-मध्य; आदिशेत् = निर्देश करे; स्थित्यर्ध-नाडिका-हीने = स्थित्यर्ध-नाडिका घटाने पर; ग्रासः = ग्रास/आरंभ; मोक्षः = मोक्ष/अंत; तु संयुते = जोड़ने पर।

हिन्दी भावार्थ स्पष्ट तिथि के अवसान पर मध्यग्रहण कहो — वही काल-केंद्र। उससे स्थित्यर्ध-नाडिका घटाओ तो ग्रास (स्पर्श), जोड़ो तो मोक्ष। सारी पिछली ज्यामिति — छन्न, पद, भुक्ति-अन्तर, पुनरावृत्ति — अंततः इन तीन क्षणों में सिमटती है: ग्रास, मध्य, मोक्ष।

English rendering At the end of the true tithi, declare mid-eclipse. Subtract the half-duration in nāḍikās for first contact; add it for release.

गणित / The Mathematics
`t_madhya = t(स्फुट-तिथि-समाप्ति)` — सूर्य–चन्द्र स्पष्ट योग/तिथि-अंत की परिभाषा यंत्रानुसार
`t_grāsa = t_madhya − स्थित्यर्ध`
`t_mokṣa = t_madhya + स्थित्यर्ध`
(सकलग्रास हो तो विमर्दार्ध से `t_samagra_ārambha/anta = t_madhya ± विमर्दार्ध`।)
इकाई: नाडिका–विनाडिका; दिन-रेखा और युग-दिन-गणना घोषित रहें।

उदाहरण (worked example) स्फुट-तिथि-अवसान = २५;३० नाडिका (दिनारंभ से)। स्थित्यर्ध = २;४० नाडिका।
`t_grāsa = २२;५०`, `t_madhya = २५;३०`, `t_mokṣa = २८;१०` नाडिका।
(Convention: स्थानीय मध्यम/स्पष्ट सूर्योदय-दिन; ayanāṃśa तिथि-स्फुट पर तभी लगे जब स्पष्ट रव�ि–चन्द्र सायन/निरयण फ्रेम घोषित हो।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्फुटतिथि” सीधे `vedic-ghadi` के tithi engine से जुड़ती है; Mahāyuga day-count का ३२८-दिन का अंतर (SS १,५७७,९१७,८२८ बनाम आर्यभट १,५७७,९१७,५००) मध्यम चान्द्र-मास और तिथि-फल पर सबसे तेज़ पड़ता है — NEXT-STEPS A की बात। मध्यग्रहण का घोषित क्षण इसलिए केवल सूत्र नहीं, canon choice भी है; दोनों गणनाएँ साथ रखकर ही “मध्य” की संवेदनशीलता दिखती है।

4.17
तद्वदेव विमर्दार्धनाडिकाहीनसंयुते ।
निमीलनोन्मीलनाख्ये भवेतां सकलग्रहे ।।
tadvadeva vimardārdhanāḍikāhīnasaṃyute ।
nimīlanonmīlanākhye bhavetāṃ sakalagrahe ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्वत् = उसी प्रकार; एव = ही; विमर्द-अर्ध-नाडिका = सम्पूर्ण-अन्धकार (पूर्ण-ग्रास) की आधी अवधि नाड़ी में; हीन-संयुते = (मध्यग्रहण से) घटाई/जोड़ दी गई होने पर; निमीलन = पूर्ण-ग्रास का आरम्भ (चक्षु-निमीलन); उन्मीलन = पूर्ण-ग्रास का अन्त; आख्ये = नाम वाले; भवेताम् = हों; सकल-ग्रहे = पूर्ण (सकल) ग्रहण में।

हिन्दी भावार्थ जैसे स्थिति-अर्ध से स्पर्श और मोक्ष निकलते हैं, वैसे ही पूर्ण ग्रहण में विमर्द-अर्ध नाड़ियों को मध्य-ग्रहण से घटाकर निमीलन (पूर्ण-ग्रास का आरम्भ) और जोड़कर उन्मीलन (पूर्ण-ग्रास का अन्त) मिलते हैं। यह केवल सकल-ग्रह — जब ग्राहक का व्यास ग्राह्य से इतना बड़ा हो कि पूरा पिण्ड ढँक जाए — में लागू होता है। आंशिक ग्रहण में विमर्द-अर्ध शून्य या अवास्तविक रहता है, अतः निमीलन-उन्मीलन नहीं बनते।

English rendering Just as for the contacts, half the duration of totality (vimardārdha) in nāḍīs, subtracted from and added to mid-eclipse, yields the moments named nimīlana (onset of totality) and unmīlana (end of totality) — but only in a total (sakala) eclipse.

गणित / The Mathematics
निमीलन-काल = T_मध्य − विमर्दार्ध (नाड़ी)
उन्मीलन-काल = T_मध्य + विमर्दार्ध (नाड़ी)
जहाँ विमर्दार्ध केवल तभी वास्तविक है जब
मान-अन्तरार्ध ≳ |क्षेपा| (ग्राहक ≥ ग्राह्य + 2|lat| की ज्यामितीय शर्त)।
1 दिन = 60 घटी = 3,600 पल (मेट्रोलॉजी)।

4.18
इष्टनाडीविहीनेन स्थित्यर्धेनार्कचन्द्रयोः ।
भुक्त्यन्तरं समाहन्यात्षष्ट्याप्ताः कोटिलिप्तिकाः ।।
iṣṭanāḍīvihīnena sthityardhenārkacandrayoḥ ।
bhuktyantaraṃ samāhanyātṣaṣṭyāptāḥ koṭiliptikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इष्ट-नाडी-विहीनेन = इष्ट नाड़ियों से रहित (स्थित्यर्ध − इष्ट); स्थित्यर्धेन = स्थिति-अर्ध से; अर्क-चन्द्रयोः = सूर्य और चन्द्र की; भुक्ति-अन्तरम् = भुक्ति (दैनिक गति) का अन्तर; समाहन्यात् = गुणित करें; षष्ट्या = 60 से; आप्ताः = प्राप्त; कोटि-लिप्तिकाः = कोटि (उर्ध्व/लम्ब) कलाएँ।

हिन्दी भावार्थ किसी इष्ट क्षण पर ग्रहण-ज्यामिति निकालने के लिए स्थित्यर्ध में से इष्ट-नाड़ियाँ घटाएँ। इस शेष से सूर्य-चन्द्र की भुक्ति-अन्तर को गुणा करें और षष्टि (60) से भाग दें — फल कोटि-लिप्तिकाएँ हैं, अर्थात् उस क्षण पर पथ-रेखा के अनुदिश चाप-कलाओं में अन्तर-अवयव। यह “मध्य से कितनी दूर” को कोटि-अक्ष पर मापता है; आगे भुज-क्षेपा और श्रवस (कर्ण) से तात्कालिक ग्रास बनेगा।

English rendering Reduce the semi-duration (sthityardha) by the desired nāḍīs; multiply the residual by the difference of the daily motions of Sun and Moon, and divide by sixty — the result is the koṭi-liptikās (minutes of arc along the path-axis at that instant).

गणित / The Mathematics
Δn = स्थित्यर्ध − n_इष्ट (नाड़ी; n_इष्ट ≥ 0, मध्य की ओर)
कोटि-लिप्ता = (Δn × भुक्त्यन्तर) / 60
जहाँ भुक्त्यन्तर = |μ_च − μ_सू| (कला/दिन), और 60 = नाड़ी → दिन/कला रूपान्तरण का पारम्परिक गुणक (1 दिन = 60 घटी)।
कोटि-अवयव मध्य-ग्रहण पर 0; स्पर्श/मोक्ष पर अधिकतम ≈ मानयोगार्ध-संबद्ध पथ-दूरी।

उदाहरण (worked example)
मानें स्थित्यर्ध = 4;0 नाड़ी, n_इष्ट = 1;0 नाड़ी, भुक्त्यन्तर = 720 कला/दिन।
Δn = 3;0; कोटि = (3 × 720) / 60 = 36 कला = 0°36′।

हमारा डिकोड (Our Decode) इष्ट-काल गणना में नाड़ी-पल-विपल मेट्रोलॉजी (1 दिन = 60 घटी = 3,600 पल = 216,000 विपल) vedic-ghadi के panchāṅga substrate में ज्यों-की-त्यों बैठी है; दिन-गणना का SS-canon 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500 tithi-इंजन पर सबसे तीखा पड़ता है — ग्रहण-स्थिति भी उसी day-count चयन पर निर्भर mean-longitudes से निकलती है।

4.19
भानोर्ग्रहे कोटिलिप्ता मध्यस्थित्यर्धसंगुणाः ।
स्फुटस्थित्यर्धसंभक्ताः स्फुटाः कोटिकलाः स्मृता ।।
bhānorgrahe koṭiliptā madhyasthityardhasaṃguṇāḥ ।
sphuṭasthityardhasaṃbhaktāḥ sphuṭāḥ koṭikalāḥ smṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानोः ग्रहे = सूर्य-ग्रहण में; कोटि-लिप्ताः = (पूर्व-श्लोक की) कोटि-कलाएँ; मध्य-स्थित्यर्ध-संगुणाः = मध्य (स्थूल) स्थित्यर्ध से गुणित; स्फुट-स्थित्यर्ध-संभक्ताः = स्पष्ट स्थित्यर्ध से विभाजित; स्फुटाः कोटि-कलाः = स्पष्ट कोटि-कलाएँ; स्मृताः = कही गईं।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र-ग्रहण में कोटि सीधे भुक्ति-अन्तर से पर्याप्त रहती है; सूर्य-ग्रहण में छाया-पथ और चन्द्र-विक्षेप की जटिलता से मध्य-स्थित्यर्ध और स्फुट-स्थित्यर्ध भिन्न होते हैं। अतः कोटि-लिप्ता को मध्य-स्थित्यर्ध से गुणा कर स्फुट-स्थित्यर्ध से भाग दें — यही स्पष्ट कोटि-कला है। अनुपात मध्य/स्फुट स्थित्यर्ध ≈ 1 के निकट हो तो संशोधन सूक्ष्म रहता है; बड़ा अन्तर हो तो इष्ट-क्षण की पथ-दूरी बिना अनुपात के गलत बैठती है।

English rendering In a solar eclipse the koṭi-minutes are multiplied by the mean semi-duration and divided by the true semi-duration; the quotient is declared the true (sphuṭa) koṭi-kalās.

गणित / The Mathematics
कोटि_स्फुट (सूर्य-ग्रहण) = कोटि_मध्य × (स्थित्यर्ध_मध्य / स्थित्यर्ध_स्फुट)
≡ (4.18 का फल) × मध्यस्थित्यर्ध ÷ स्फुटस्थित्यर्ध।
चन्द्र-ग्रहण में प्रायः यह अनुपात लागू नहीं; सूर्य-ग्रहण में स्फुट स्थिति विक्षेप-संशोधन से आती है।

उदाहरण (worked example)
कोटि_मध्य = 36′, स्थित्यर्ध_मध्य = 4;0 नाड़ी, स्थित्यर्ध_स्फुट = 3;45 नाड़ी = 3.75।
कोटि_स्फुट = 36 × (4.0 / 3.75) = 38.4′।

4.20
क्षेपो भुजस्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रवस्तु तत् ।
मानयोगार्धतः प्रोज्झ्य ग्रासस्तात्कालिको भवेत् ।।
kṣepo bhujastayorvargayutermūlaṃ śravastu tat ।
mānayogārdhataḥ projjhya grāsastātkāliko bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षेपः = विक्षेप (अक्षांशीय दूरी); भुजः = भुज (आड़ा अवयव); तयोः = उन दोनों (कोटि और भुज) के; वर्ग-युतेः = वर्गों के योग का; मूलम् = वर्गमूल; श्रवः = कर्ण (श्रवस्); तु तत् = वही; मान-योग-अर्धतः = (ग्राह्य+ग्राहक) मान-योग के आधे से; प्रोज्झ्य = घटाकर; ग्रासः = ग्रस्त अंश (लीप्ति/कला); तात्कालिकः = उस क्षण का; भवेत् = हो।

हिन्दी भावार्थ इष्ट-क्षण पर कोटि (पथ-अवयव) और क्षेप (विक्षेप = भुज) मिलकर समकोण-त्रिभुज बनाते हैं; उनके वर्ग-योग का मूल श्रवस् — केन्द्र-से-केन्द्र दूरी — है। ग्राह्य और ग्राहक के मान-योगार्ध से यह दूरी घटाइए: जो शेष बचे वही तात्कालिक ग्रास है — कितनी कला पिण्ड ढँका है। यदि श्रवस् ≥ मानयोगार्ध तो ग्रास शून्य (संपर्क से बाहर); यदि श्रवस् ≤ मानान्तरार्ध तो पूर्ण/अधिक ग्रास।

English rendering Latitude is the bhuja; the square root of the sum of the squares of bhuja and koṭi is the hypotenuse (śravas). Subtract that from half the sum of the two diameters — the remainder is the contemporaneous immersion (grāsa).

गणित / The Mathematics
श्रवस् = √(कोटि² + क्षेप²)
ग्रास_तात्कालिक = मानयोगार्ध − श्रवस्
जहाँ मानयोगार्ध = (d_ग्राह्य + d_ग्राहक) / 2,
और पूर्ण-ग्रास शर्त: श्रवस् ≤ |d_ग्राहक − d_ग्राह्य| / 2।
इकाई: सभी कला (′) में; चिह्न: ग्रास > 0 = आंशिक/पूर्ण ढँकाव।

उदाहरण (worked example)
कोटि = 20′, क्षेप = 15′, d_च = 32′, d_भू-छाया (या सूर्य) योगार्ध = 40′।
श्रवस् = √(400 + 225) = √625 = 25′;
ग्रास = 40 − 25 = 15′ (उस क्षण 15 कला ढँकी)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह √(a²+b²) ज्यामिति SS अध्याय-2 के manda/śīghra phala में भी arcsin–√ श्रृंखला से जुड़ती है; kaal_surya_siddhanta_sphuta.py उसी “शुद्ध SS, पश्चिमी प्रमेय नहीं” अनुशासन से स्फुट निकालता है — ग्रहण-श्रवस् उसी madhya/sphuṭa pipeline का ग्राह्य-ग्राहक अनुप्रयोग है। Oracle में `==` exact checks; tolerance-बैंड यहाँ भी bug-hider माने गए।

4.21
मध्यग्रहणतश्चोर्ध्वं इष्टनाडीर्विशोधयेत् ।
स्थित्यर्धान्मौक्षिकाच्छेषं प्राग्वच्च्छेषं तु मौक्षिके ।।
madhyagrahaṇataścordhvaṃ iṣṭanāḍīrviśodhayet ।
sthityardhānmaukṣikāccheṣaṃ prāgvacccheṣaṃ tu maukṣike ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्य-ग्रहणतः = मध्य-ग्रहण से; च = और; ऊर्ध्वम् = पश्चात्/ऊपर (समय में बाद); इष्ट-नाडीः = इष्ट नाड़ियाँ; विशोधयेत् = शोधें (घटाएँ); स्थित्यर्धात् मौक्षिकात् = मोक्ष-पक्ष के स्थित्यर्ध से; शेषम् = शेष; प्राक्वत् = पहले जैसा; च = और; शेषम् तु मौक्षिके = किन्तु मोक्ष-काल में शेष (उसी रीति से)।

हिन्दी भावार्थ मध्य के बाद के इष्ट-क्षण के लिए मध्य से इष्ट-नाड़ियाँ घटाई नहीं जातीं — बल्कि मोक्ष-स्थित्यर्ध से इष्ट-नाड़ियाँ घटाकर शेष लिया जाता है। वह शेष फिर 4.18–4.20 की कोटि-भुज-श्रवस्-ग्रास श्रृंखला में “प्राग्वत्” — पूर्व-पक्ष जैसी — प्रविष्ट होता है। पूर्व-अर्ध (स्पर्श→मध्य) में Δn = स्थित्यर्ध − n; पर-अर्ध (मध्य→मोक्ष) में Δn = स्थित्यर्ध_मोक्ष − n_मध्य-से; दोनों में कोटि-संकेत पथ पर दूरी है, दिशा काल-चिह्न से जुड़ती है।

English rendering After mid-eclipse, take the desired nāḍīs from the mokṣa semi-duration; the remainder, treated as before, serves the same koṭi–grāsa chain on the emersion side.

गणित / The Mathematics
पूर्व-पक्ष: Δn = स्थित्यर्ध_स्पर्श − n_मध्य-पूर्व
पर-पक्ष (मौक्षिक): Δn = स्थित्यर्ध_मोक्ष − n_मध्य-पश्चात्
फिर कोटि = (Δn × भुक्त्यन्तर) / 60, आदि (4.18–4.20)।
स्पर्श/मोक्ष स्थित्यर्ध विक्षेप-असमानता से भिन्न हो सकते हैं।

4.22
ग्राह्यग्राहकयोगार्धाच्छोध्याः स्वच्छन्नलिप्तिकाः ।
तद्वर्गात्प्रोज्झ्य तत्कालविक्षेपस्य कृतिं पदम् ।।
grāhyagrāhakayogārdhācchodhyāḥ svacchannaliptikāḥ ।
tadvargātprojjhya tatkālavikṣepasya kṛtiṃ padam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्राह्य-ग्राहक-योग-अर्धात् = दोनों मानों के योगार्ध से; शोध्याः = शोधनीय; स्व-च्छन्न-लिप्तिकाः = अभीष्ट/स्व-ग्रास कलाएँ (जितना ढँकना है); तत्-वर्गात् = उसके वर्ग से; प्रोज्झ्य = घटाकर; तत्काल-विक्षेपस्य कृतिम् = तात्कालिक विक्षेप का वर्ग; पदम् = मूल (वर्गमूल) — अर्थात् कोटि।

हिन्दी भावार्थ उल्टी समस्या: “कितनी कला का ग्रास चाहिए” से काल खोजें। मानयोगार्ध में से अभीष्ट छन्न-कला घटाएँ; शेष का वर्ग लें, उसमें से तत्काल-विक्षेप का वर्ग घटाएँ, वर्गमूल लें — यही उस ग्रास-स्तर की कोटि-लिप्ता है। आगे 4.23 इसे नाड़ियों में बदलेगा। ज्यामितीय रूप: श्रवस् = मानयोगार्ध − ग्रास_इष्ट; कोटि = √(श्रवस्² − क्षेप²), यदि श्रवस् ≥ |क्षेप|।

English rendering From half the sum of the diameters subtract the desired immersion-minutes; from the square of that remainder subtract the square of the contemporaneous latitude and take the square root — that root is the koṭi for the sought grāsa.

गणित / The Mathematics
श्रवस्_इष्ट = मानयोगार्ध − छन्न-लिप्ता_इष्ट
कोटि = √(श्रवस्_इष्ट² − विक्षेप_तत्काल²)
(वास्तविक तभी जब |श्रवस्_इष्ट| ≥ |विक्षेप| और 0 ≤ छन्न ≤ 2·min(R₁,R₂) सीमा में)।

उदाहरण (worked example)
मानयोगार्ध = 40′, छन्न_इष्ट = 15′, विक्षेप = 15′।
श्रवस् = 25′; कोटि = √(625 − 225) = √400 = 20′
(4.20 का उल्टा — वही त्रिभुज)।

सुधार · correction (2026-10-07) “ताद्वर्गात्” → “तद्वर्गात्”, दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

4.23
कोटिलिप्ता रवेः स्पष्टस्थित्यर्धेनाहता हृताः ।
मध्येन लिप्तास्तन्नाड्यः स्थितिवद्ग्रासनाडिकाः ।।
koṭiliptā raveḥ spaṣṭasthityardhenāhatā hṛtāḥ ।
madhyena liptāstannāḍyaḥ sthitivadgrāsanāḍikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोटि-लिप्ताः = (4.22 की) कोटि-कलाएँ; रवेः = सूर्य (के ग्रहण) की; स्पष्ट-स्थित्यर्धेन = स्पष्ट स्थित्यर्ध से; आहताः = गुणित; हृताः मध्येन = मध्य (स्थित्यर्ध) से विभाजित; लिप्ताः = (वे) कलाएँ; तत्-नाड्यः = उनकी नाड़ियाँ; स्थितिवत् = स्थिति-गणना की भाँति; ग्रास-नाडिकाः = ग्रास (इष्ट-आवरण) की नाड़ियाँ।

हिन्दी भावार्थ कोटि मिलने के बाद उसे काल में बदलना है। सूर्य-ग्रहण में कोटि को स्पष्ट-स्थित्यर्ध से गुणा कर मध्य-स्थित्यर्ध से भाग दें — 4.19 का उल्टा अनुपात — फिर स्थितिवत् भुक्ति-अन्तर और षष्टि से नाड़ी बनाएँ। ये ग्रास-नाडिकाएँ बताती हैं कि अभीष्ट आवरण मध्य से कितनी नाड़ी पहले/बाद घटित होता है। चन्द्र-ग्रहण में अनुपात प्रायः 1; सूर्य-ग्रहण में स्फुट/मध्य भेद रखना अनिवार्य है।

English rendering The solar-eclipse koṭi-minutes, multiplied by the true semi-duration and divided by the mean, become (path) minutes which, converted as in the sthiti rule, are the grāsa-nāḍikās — the nāḍīs from mid-eclipse to the desired immersion stage.

गणित / The Mathematics
कोटि′ = कोटि × (स्थित्यर्ध_स्फुट / स्थित्यर्ध_मध्य) (सूर्य-ग्रहण; 4.19 का व्युत्क्रम)
ग्रास-नाड़ी n = (कोटि′ × 60) / भुक्त्यन्तर
T_इष्ट = T_मध्य ± n (पूर्व −, पर +; 4.21 के पक्षानुसार)।
षष्टि और भुक्त्यन्तर वही 4.18 के।

उदाहरण (worked example)
कोटि = 20′, स्थित्यर्ध_स्फुट/मध्य = 3.75/4.0, भुक्त्यन्तर = 720′/दिन।
कोटि′ = 20 × (3.75/4) = 18.75′;
n = (18.75 × 60) / 720 = 1.5625 नाड़ी ≈ 1;34 नाड़ी मध्य से।

4.24
नतज्या अक्षज्ययाभ्यस्ता त्रिज्याप्ता तस्य कार्मुकम् ।
वलनांशा सौम्ययाम्याः पूर्वापरकपालयोः ।।
natajyā akṣajyayābhyastā trijyāptā tasya kārmukam ।
valanāṃśā saumyayāmyāḥ pūrvāparakapālayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नत-ज्या = नत (काल-लम्ब/hour-angle समकक्ष) की ज्या; अक्ष-ज्यया = अक्ष (स्थान-अक्षांश) की ज्या से; अभ्यस्ता = गुणित; त्रिज्या-आप्ता = त्रिज्या से विभाजित; तस्य कार्मुकम् = उसका चाप (धनु/arcsin समकक्ष); वलन-अंशाः = वलन के अंश; सौम्य-याम्याः = उत्तर/दक्षिण; पूर्व-अपर-कपालयोः = पूर्व एवं पश्चिम कपालों में (दिशा-नियम सहित)। पाठ में `+अक्षज्यया` — युक्त-पाठ संकेत (अक्षज्या-गुणन सुनिश्चित)।

हिन्दी भावार्थ ग्रहण-रेखा आकाश में सीधी “पूर्व-पश्चिम” नहीं दिखती — अक्षांश और नत के कारण वलन (tilt of the eclipse axis) आता है। नत-ज्या × अक्ष-ज्या / त्रिज्या का चाप वलन-अंश देता है। पूर्व-कपाल और अपर-कपाल में सौम्य/याम्य दिशाएँ उलटी-सी नियत होती हैं — जिससे स्पर्श-बिन्दु, ग्रास-दिशा और रेखांकन प्रेक्षक-क्षितिज पर सही मुड़ें। यह दृश्य-संशोधन है, स्फुट-देशान्तर का नहीं; अक्ष = 0° पर वलन-शून्य।

English rendering Multiply the sine of the hour-angle measure (nata-jyā) by the sine of the terrestrial latitude, divide by the radius (trijyā), and take the arc — that is the valana in degrees, northern or southern according to the eastern and western hemispheres of the sky.

गणित / The Mathematics
sin(वलन) ≡ (ज्या_नत × ज्या_अक्ष) / त्रिज्या
वलन = चाप(·) = कार्मुकम्
त्रिज्या पारम्परिक R (प्रायः 3438′ कला-त्रिज्या या ज्या-सारणी की इकाई);
दिशा: पूर्व-कपाल / अपर-कपाल × सौम्य / याम्य — शास्त्रीय कपालाभिनय नियम।
अक्ष = φ (भौगोलिक अक्षांश); नत = मध्य-ग्रहण के सापेक्ष काल-कोण समकक्ष।

उदाहरण (worked example)
सूक्ष्म-कोण सन्निकटन (ज्या θ ≈ θ·त्रिज्या/R_rad में संगति रखते हुए):
φ = 28°, नत-कोण ≈ 30°, त्रिज्या-इकाई में ज्या_अक्ष ≈ 0.4695·R, ज्या_नत ≈ 0.5·R।
(ज्या_नत·ज्या_अक्ष)/त्रिज्या ≈ 0.2347·R → वलन ≈ arcsin(0.2347) ≈ 13.6°
(पूर्ण सारणी-विधि से ज्या/चाप तालिका से ठीक पढ़ा जाए; यहाँ केवल क्रम-दर्शन)।

हमारा डिकोड (Our Decode) वलन प्रेक्षक-स्थान (φ) और काल-कोण पर टिका है — यही परत bharat-ephemeris-offline के bhāva/ascendant closed-form से जुड़ती है जहाँ longitude, latitude, obliquity, sidereal time से लग्न 0.1° में Swiss-fixture से मिलता है; RA(MC) ≡ LST 1e-9° तक verified। ग्रहण-वलन उसी “स्थान+काल → दृश्य अक्ष” परिवार का सदस्य है, mean-longitude lab का उत्पादन-स्फुट नहीं।

4.25
राशित्रययुताद्ग्राह्यात्क्रान्त्यंशैर्दिक्समैर्युताः ।
भेदे अन्तराज्ज्या वलना सप्तत्यङ्गुलभाजिता ।।
rāśitrayayutādgrāhyātkrāntyaṃśairdiksamairyutāḥ ।
bhede antarājjyā valanā saptatyaṅgulabhājitā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) राशि-त्रय = तीन राशि (90°); युतात् = युक्त से; ग्राह्यात् = ग्राह्य-देश (जिस राशि/देश को ग्रहण-रेखा-चित्र में लिया जाए) से; क्रान्त्यंशैः = क्रान्ति (अक्षांश-विचलन) के अंशों से; दिक्-समैः = समान दिशा वाले; युताः = योग किए हुए; भेदे = दिशा-भेद होने पर; अन्तरात् = अन्तर से; ज्या = ज्या (sine-chord); वलना = वलन (झुकाव/विपथन); सप्तति = 70; अङ्गुल-भाजिता = अङ्गुलों से विभाजित।

हिन्दी भावार्थ ग्राह्य-देश में तीन राशियाँ जोड़कर उस बिंदु की क्रान्ति के अंश लिए जाएँ। यदि वे क्रान्त्यंश समान दिशा के हों तो उन्हें योग में लिया जाए; दिशा-भेद होने पर अन्तर लिया जाए। उस योग या अन्तर की ज्या ही वलना है — और वह सत्तर (70) अङ्गुल से भाग देने पर अङ्गुल-मान में आती है। यह श्लोक ग्रहण-रेखाचित्र के लिए झुकाव (वलन) को मापने का नियम देता है; दिशा-संकेत यहाँ जोड़-घटाव का ही द्वार है।

English rendering From the adopted longitude (grāhya) increased by three signs (90°), take the degrees of declination. Add them when of like direction; take their difference when of opposite direction. The jyā of that sum or difference, divided by seventy, is the valana in aṅgulas — the deflection used in the eclipse diagram.

गणित / The Mathematics
वलन (अङ्गुल में):

  • पहले बिंदु: λ′ = λ_grāhya + 90° (राशि-त्रय = 3 × 30°)
  • δ = उस बिंदु की क्रान्ति (अंशों में)
  • तर्क α: समान दिशा → योग; भिन्न दिशा → अन्तर (श्लोक “दिक्षमैः युताः / भेदे अन्तरात्”)
  • ज्या(α) ÷ 70 = वलना (अङ्गुल)

यहाँ “ज्या” सूर्यसिद्धान्त की ज्या-सारणी (R-sin) का मान है; 70 अङ्गुल भाजक है — रेखाचित्र की इकाई-रूपांतरण। `+अन्तरात्` पाठ-चिह्न दिशा-भेद वाली शाखा को स्पष्ट करता है।

उदाहरण (worked example)
मान लें α = 30° (योग/अन्तर के बाद का तर्क), और ज्या-सारणी में ज्या(30°) = R/2।
यदि R = 3438′ (क्लासिकल ज्या-त्रिज्या), तो ज्या(30°) = 1719′।
वलना = 1719 ÷ 70 ≈ 24.56 अङ्गुल।
(वास्तविक α ग्राह्य+90° की क्रान्ति और दिशा-नियम से बने; यहाँ केवल भाजन-चरण दिखाया गया।)

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षमैः” → “दिक्समैः” (समान दिशा वाले), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

4.26
सोन्नतं दिनमध्यार्धं दिनार्धाप्तं फलेन तु ।
छिन्द्याद्विक्षेपमानानि तान्येषां अङ्गुलानि तु ।।
sonnataṃ dinamadhyārdhaṃ dinārdhāptaṃ phalena tu ।
chindyādvikṣepamānāni tānyeṣāṃ aṅgulāni tu ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स-उन्नतम् = उन्नत (ऊँचाई/elevation-संबंधी मान) सहित; दिन-मध्य-अर्धम् = दिन के मध्य का अर्ध (मध्याह्न-अर्ध दिनमान); दिनार्ध-आप्तम् = दिनार्ध से प्राप्त/भागित; फलेन = फल (पूर्व-प्राप्त गुणक) से; छिन्द्यात् = भाग दे (काटे); विक्षेप-मानानि = विक्षेप (खगोलीय अक्षांश) के मान; तानि = वे; एषाम् = इनके; अङ्गुलानि = अङ्गुल-रूप।

हिन्दी भावार्थ दिनमध्यार्ध को उन्नत-मान के साथ लेकर, उसे दिनार्ध से भाग देकर जो अनुपात मिले, वही फल है — उस फल से विक्षेप के मानों को भाग दें (“छिन्द्यात्” = भाग दो)। जो परिणाम निकलें, वही उन विक्षेपों के अङ्गुल-मान हैं। यह श्लोक विक्षेप को ग्रहण-चित्र की रैखिक इकाई (अङ्गुल) में उतारने का नियम है — कोण से रेखा तक का पुल।

English rendering Take the half of the midday arc together with the unnata, and divide it by the half-day: that quotient is the phala. By that phala divide (chindyāt) the measures of the vikṣepa (and the discs); the quotients are those measures in aṅgulas.

गणित / The Mathematics
विक्षेप → अङ्गुल रूपांतरण (श्लोकानुसार):

फल = (दिनमध्यार्ध + उन्नत) / दिनार्ध; अङ्गुल = विक्षेप-मान ÷ फल (“छिन्द्यात्” = भाग दो)

  • दिनमध्यार्ध = सूर्योदय से मध्याह्न तक का अर्ध-दिन-चाप (या समतुल्य दिनार्ध-खंड; स्थानीय दिनामान पर निर्भर)
  • उन्नत = उन्नति/ऊँचाई-संबंधी संशोधन (स-उन्नत)
  • दिनार्ध = पूरे दिन का आधा
  • फल = (दिनमध्यार्ध + उन्नत) ÷ दिनार्ध — इसी श्लोक का भाजक
  • विक्षेप_मान = चंद्र (या ग्रह) का विक्षेप, जिस इकाई में आया हो (प्रायः कला)

यहाँ “छिन्द्यात्” = भाग देना — विक्षेप को रेखाचित्र की अङ्गुल-सीढ़ी पर उतारना।

उदाहरण (worked example)
मान लें: विक्षेप = 48′, दिनमध्यार्ध+उन्नत = 16 ghaṭī, दिनार्ध = 15 ghaṭī।
फल = 16/15 = 1.066…
अङ्गुल = 48 ÷ (16/15) = 45 अङ्गुल।
(वास्तविक फल और उन्नत-संयोजन पूर्व श्लोकों तथा स्थानीय दिनामान पर निर्भर; यह केवल अनुपात-चरण का संख्यात्मक प्रदर्शन है।)

सुधार · correction (2026-10-07) पहले विक्षेप को फल से गुणा किया गया था (48′ → 51.2 अङ्गुल)। “फलेन … छिन्द्यात्” = फल से भाग दो: 48′ → 45 अङ्गुल। Correction: chindyāt means divide.

सुधार · correction (2026-10-07) दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050) “दिनमध्यर्धं” पढ़ता है (अध्यर्ध = 1½); “मध्य + अर्ध” के लिए दीर्घ आ चाहिए। उस पठन में फल = 1½ + उन्नत ÷ दिनार्ध, और केवल यही 6.2 के समास-वृत्त को 49-अङ्गुल वृत्त के भीतर रखता है (ss-grahana.test.js) [reading]। ऊपर का “16/15” किसी पठन से नहीं बैठता। Reading from the second witness.

अध्यायः 5

सूर्यग्रहणाधिकारः

The Solar Eclipse
17 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

पाँचवाँ अध्याय सूर्यग्रहण को केवल दृश्य-घटना नहीं, अपितु क्षितिज, लग्न, देश-काल और दृष्टि-ज्यामिती की एक संलग्न शृंखला के रूप में खोलता है। आरम्भ में ही यह स्पष्ट होता है कि मध्यलग्न पर स्थित सूर्य और हरिज (क्षितिज) के कुछ संयोगों में अवनति सम्भव नहीं; फिर देश-काल-विशेष और दिग्वश से लम्बन तथा अवनति का उद्भव कैसे बनता है—यह क्रमबद्ध बताया जाता है। पर्वान्त-नाड़ियों से लग्न, लङ्कोदय से मध्यलग्न, क्रान्ति-अक्षांश-संयोग से नतांश, और उससे मध्यज्या—ये सब एक ही गणना-मार्ग के पड़ाव हैं। मध्यज्या, उदयज्या, त्रिज्या से दृक्क्षेप और शङ्कु (दृग्गति) निकलते हैं; इन्हीं से सूर्यग्रहण की स्थल-संशोधित दृष्टि बनती है। अध्याय की सुन्दरता इसी में है कि ग्रहण यहाँ “छाया का चमत्कार” नहीं, बल्कि लग्न-क्रान्ति-नत-दृष्टि की मापनीय कड़ी है—जहाँ प्रत्येक पद अगले पद का इनपुट है।

For the English reader:

Adhyāya 5 treats the solar eclipse as a problem of local sky geometry, not as a free-floating omen. It begins with impossibility conditions—when the Sun stands with the mid-ascendant, or when latitude, polar distance, and declination align in a certain way, the depression (avanati) that feeds parallax does not arise—and then builds the positive case from place and time. From the end-of-parvan nāḍīs one forms the lagna; from Laṅkā-risings, the mid-lagna; from the meeting of declination and terrestrial latitude, the nata-degrees and their sine (madhya-jyā). That sine, combined with the rising-sine and the radius, yields the dṛkkṣepa; from its complement with trijyā comes the śaṅku, the “sight-motion” rod of the local altitude. Longitudinal and latitudinal parallax (lambana, nati) then correct the apparent meeting of Sun and Moon. The chapter’s elegance is architectural: each quantity is the hinge of the next, so the eclipse is decoded as a chain from horizon and ascendant down to the last root-extraction.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। हमारे पास अध्याय-२ का शुद्ध मन्द-शीघ्र स्फुट-इंजन (सूर्य-चन्द्र मन्द-मात्र) और लग्न/भावा-मध्य परत तो हैं, पर लम्बन–अवनति–मध्यज्या–दृक्क्षेप–शङ्कु की सूर्यग्रहण-श्रृंखला पर exact-equality फ़िक्स्चर और `==`-oracle अभी नहीं बैठे; डिकोड के लिए इन्हीं पदों का स्रोत-सूत्रानुसार बंद रूप, देश-काल-कन्वेंशन की घोषणा, और pinned regression vectors आवश्यक हैं।

C (भू-केन्द्र)O (द्रष्टा)चन्द्रसूर्यलम्बनलम्बन (देशान्तर-घटक) · नति (विक्षेप-घटक)O और C के लिए ग्रहण-काल व ग्रास भिन्न
लम्बन-नति — solar-eclipse parallax (SS ch.5): the geocentric direction (C→M) and the observer's direction (O→M) to the Moon differ; the longitude component is lambana, the latitude component nati. This is why one and the same conjunction eclipses one city and spares another.
5.1
मध्यलग्नसमे भानौ हरिजस्य न सम्भवः ।
अक्षोदङ्मध्यभक्रान्तिसाम्ये नावनतेरपि ।।
madhyalagnasame bhānau harijasya na sambhavaḥ ।
akṣodaṅmadhyabhakrāntisāmye nāvanaterapi ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यलग्न-समे = मध्यलग्न (मध्य-आकाश/मध्याह्न-लग्न) के समान; भानौ = सूर्य में/सूर्य जब; हरिजस्य = क्षितिज (उदय-अस्त रेखा) का; न सम्भवः = संभव नहीं; अक्षोदङ् = उत्तर अक्षांश (देश-अक्ष, उत्तर दिशा); मध्यभ-क्रान्ति-साम्ये = मध्य-राशि/मध्य-बिन्दु की क्रान्ति के समत्व पर; नावनतेः अपि = अवगति (नति, अक्षांशीय दृष्टि-विचलन) का भी नहीं।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य मध्यलग्न के ठीक बराबर हो — अर्थात् वह क्षितिज पर न होकर आकाश के मध्य-रेखा-सम्बद्ध स्थान पर हो — तब हरिज (उदय-अस्त का क्षितिज-प्रसंग) का कोई अर्थ नहीं बनता। और जब देश का उत्तराक्षांश उस मध्य-बिन्दु की क्रान्ति के बराबर हो, तब अवगति (नति) भी नहीं होती। यह श्लोक आगे आने वाले लम्बन-नति प्रकरण की सीमा-शर्तें तय करता है: किन ज्यामितीय स्थितियों में वे प्रभाव शून्य हो जाते हैं।

English rendering When the Sun coincides with the mid-lagna, the horizon-context does not arise. And when the northern latitude equals the declination of the mid-point on the ecliptic, there is no avanati (parallax in latitude) either. The verse states the vanishing conditions for those effects.

गणित / The Mathematics सीमा-शर्तें (vanishing conditions), सूत्र नहीं:
- सूर्य-देशान्तर: λ_☉ = L_मध्यलग्न ⇒ हरिज-प्रसंग अनुपस्थित
- अक्ष-क्रान्ति: φ_उत्तर = δ_मध्यभ ⇒ अवगति (नति) = 0
यहाँ नति/अवगति = अक्षांशीय पैरेलैक्स; लम्बन आगे के श्लोकों में।

हमारा डिकोड (Our Decode) मध्यलग्न और अक्ष-क्रान्ति की यह युग्म-भाषा उसी ascendant/bhāva-layer की ज्यामिति है जिस पर `math-core` का closed-form lagna और RA(MC) ≡ LST invariant टिका है। श्लोक हमें याद दिलाता है कि “शून्य प्रभाव” भी एक quantifiable boundary है — oracle-discipline में `== 0` उसी वर्ग की बात है, ±band नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) “harija” = लम्बन-रहित (क्षितिज-सम्बन्धी शब्द नहीं, यहाँ “लम्बन नहीं”)। Correction (rendering).

5.2
देशकालविशेषेण यथावनतिसम्भवः ।
लम्बनस्यापि पूर्वान्यदिग्वशाच्च तथोच्यते ।।
deśakālaviśeṣeṇa yathāvanatisambhavaḥ ।
lambanasyāpi pūrvānyadigvaśācca tathocyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देश-काल-विशेषेण = स्थान और समय की विशेषता से; यथा = जिस प्रकार; अवगति-सम्भवः = अवगति (नति) का संभव होना; लम्बनस्य अपि = लम्बन (देशान्तरीय दृष्टि-विचलन) का भी; पूर्वान्य-दिक्-वशात् = पूर्व-पश्चिम दिशा के वश से; च तथा उच्यते = और उसी प्रकार कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ जैसे अवगति का उदय देश और काल की विशिष्ट स्थिति पर निर्भर करता है, वैसे ही लम्बन भी — और वह पूर्व या पश्चिम दिशा के अनुसार — समझाया जाता है। यह श्लोक नति और लम्बन को एक ही पैरेलैक्स-परिवार के दो घटक बताता है: एक अक्ष-दिशा में, दूसरा पूर्व-पश्चिम (देशान्तर) दिशा में। बिना देश-काल के कोई “सामान्य” नति/लम्बन नहीं; दोनों सदा local हैं।

English rendering Just as avanati arises from the particular conditions of place and time, so also is lambana (parallax in longitude) explained according to the eastern or western direction. The two effects are parallel members of one local-geometry family.

गणित / The Mathematics वर्गीकरण-सूत्र (conceptual split), संख्या नहीं:
- अवगति / नति ≈ अक्षांश-दिशा का पैरेलैक्स (latitude-component)
- लम्बन ≈ पूर्व-पश्चिम दिशा का पैरेलैक्स (longitude-component)
दोनों: f(देश, काल, दिग्विन्यास)। पूर्ण बीजगणित अगले श्लोकों/अध्याय-शृंखला में।

5.3
लग्नं पर्वान्तनाडीनां कुर्यात्स्वैरुदयासुभिः ।
तज्ज्यान्त्यापक्रमज्याघ्नी लम्बज्याप्तोदयाभिधा ।।
lagnaṃ parvāntanāḍīnāṃ kuryātsvairudayāsubhiḥ ।
tajjyāntyāpakramajyāghnī lambajyāptodayābhidhā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लग्नं = लग्न; पर्वान्त-नाडीनां = पर्व-अन्त (संयोग/व्यतिपात-क्षण) की नाड़ियों का; कुर्यात् = करे; स्वैः उदयासुभिः = अपने उदय-असुओं से; तत्-ज्या = उसकी ज्या (sine); अन्त्य-अपक्रम-ज्या = अन्त्य अपक्रम (अयनांश/परम क्रान्ति ε) की ज्या; घ्नी = से गुणी; लम्ब-ज्या-आप्त = लम्बज्या (देश के अक्षांश की कोटिज्या, R cos φ) से प्राप्त; उदय-अभिधा = “उदय” नाम वाली राशि।

हिन्दी भावार्थ पर्वान्त की नाड़ियों से, अपने उदय-असुओं की सहायता से, लग्न सिद्ध करो। फिर उस लग्न की ज्या को अन्त्य-अपक्रम-ज्या से गुणा करो और लम्बज्या से भाग दो — जो फल आए, उसे उदय कहते हैं। यह एक स्पष्ट ज्या-अनुपात है: लग्न-ज्या × (परम-क्रान्ति की ज्या) ÷ (अक्षांश की लम्बज्या)। पर्वान्त यहाँ ग्रहण/संयोग-क्षण का समय-बिन्दु है; उदयासु स्थानीय उदय-तालिका का माप हैं।

English rendering Form the lagna of the nāḍīs of the end of the parvan by means of one’s own rising-asus. Multiply the sine of that lagna by the sine of the extreme declination (obliquity) and divide by the lambajyā (cosine of latitude); the result is called udaya.

गणित / The Mathematics
उदय = (ज्या(लग्न_पर्वान्त) × ज्या_अन्त्यअपक्रम) ÷ लम्बज्या

अर्थात्
udaya = (R sin L × R sin ε) / (R cos φ)
(R = त्रिज्या-मानक; ε = परम क्रान्ति; φ = देशाक्षांश; L = पर्वान्त-लग्न)
नाड़ी/असु समय-माप; ज्या वृत्त-ज्या (sine chord convention of the text).

उदाहरण (worked example) मान लो (आधुनिक डिग्री में, केवल अनुपात दिखाने को): L = 30°, ε = 24°, φ = 0° (लङ्का-समान), R = 1।
sin 30° = 0.5, sin 24° ≈ 0.4067, cos 0° = 1
⇒ udaya ≈ 0.5 × 0.4067 / 1 = 0.2034 (R-इकाई में)।
φ = 28° (लगभग दिल्ली) पर cos 28° ≈ 0.8829 ⇒ udaya ≈ 0.5 × 0.4067 / 0.8829 ≈ 0.2303 — अक्षांश बढ़ने पर उदय-फल बढ़ता है। (ε का शास्त्रीय मान पाठ/परंपरा-निर्भर; यहाँ केवल अनुपात।)

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्न × अपक्रम × अक्षांश — यही triad `bharat-ephemeris-offline` के closed-form ascendant में है (longitude, latitude, obliquity, sidereal time); Swiss-fixture से 0.1° के भीतर समझौता sealed है। नाड़ी/असु की मेट्रोलॉजी `vedic-ghadi` की घटी-पल-विपल श्रृंखला से जुड़ती है: 1 दिन = 60 घटी = 21,600 प्राण — गणना की घड़ी, कोण की नहीं।

5.4
तदा लङ्कोदयैर्लग्नं मध्यसंज्ञं यथोदितम् ।
तत्क्रान्त्यक्षांशसंयोगो दिक्साम्ये अन्तरं अन्यथा ।।
tadā laṅkodayairlagnaṃ madhyasaṃjñaṃ yathoditam ।
tatkrāntyakṣāṃśasaṃyogo diksāmye antaraṃ anyathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदा = तब; लङ्कोदयैः = लङ्का के उदय-मानों से; लग्नं = लग्न; मध्य-संज्ञं = “मध्य” नाम वाला; यथोदितम् = जैसा कहा गया; तत्-क्रान्ति = उसकी क्रान्ति; अक्षांश = देशाक्षांश (अंशों में); संयोगः = योग; दिक्-साम्ये = दिशा समान होने पर (दोनों उत्तर या दोनों दक्षिण); +अन्तरं = अन्तर (पाठ-चिह्न `+` critical apparatus — अन्तरं पाठ-भेद/योजक रूप में); अन्यथा = अन्यथा (दिशा विपरीत हो तो)।

हिन्दी भावार्थ तब लङ्कोदय (भूमध्यरेखीय/लङ्का-उदय) से सिद्ध लग्न को मध्य कहते हैं — जैसा पहले कहा जा चुका। उस लग्न-बिन्दु की क्रान्ति और देश के अक्षांश का, यदि दोनों की दिशा एक हो तो योग लिया जाता है; यदि दिशाएँ विपरीत हों तो अन्तर। (चिह्न `+अन्तरं` उपकरण-पाठ है — अर्थ में योग/अन्तर का द्वार स्पष्ट ही है।) यह मध्यलग्न को स्थानीय नति-ज्यामिति से जोड़ता है: क्रान्ति ± अक्षांश ही आगे अवगति की कुंजी बनेगा।

English rendering Then the lagna computed with the rising-times of Laṅkā is called the madhya (mid), as stated. The combination of its declination and the degrees of latitude is a sum when the directions agree, and a difference otherwise.

गणित / The Mathematics
L_मध्य = लग्न(लङ्कोदय)
S = { δ + φ यदि d(δ) = d(φ)
{ |δ − φ| यदि d(δ) ≠ d(φ)
जहाँ δ = तत्क्रान्ति, φ = अक्षांश, d(·) = उत्तर/दक्षिण दिशा।
यह राशि नति/अवगति की अगली कड़ी में प्रयुक्त होती है (δ और φ का signed combination)।

उदाहरण (worked example) δ = +18° (उत्तर), φ = +28° (उत्तर) ⇒ दिशा-साम्य ⇒ S = 18 + 28 = 46°।
δ = −10° (दक्षिण), φ = +28° (उत्तर) ⇒ विपरीत ⇒ S = |−10 − 28| wait: अन्तर = |δ| और φ का अन्तर-रूप — signed रूप में δ − φ = −10 − 28 = −38°, परिमाण 38° (दिशा दक्षिण-प्रबल)।
(चिह्न-परंपरा: उत्तर धनात्मक — घोषित convention।)

हमारा डिकोड (Our Decode) “मध्य” लग्न और क्रान्ति-अक्ष योग/अन्तर वही meridian/nonagesimal ज्यामिति है जिस पर bhāva-madhya layer (lagna/MC/IC/DSC anchors, RA(MC) ≡ LST को 1e-9°) टिका है। लङ्कोदय vs स्व-उदय का भेद local vs equatorial rising tables का canon-choice है — day-count के 328-दिन वाले dual-canon की तरह: कौन-सी उदय-तालिका चुनोगे, मध्य और नति दोनों खिसकेंगे।

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षाम्ये” → “दिक्साम्ये” (दिक्-साम्य = एक ही दिशा), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

5.5
शेषं नतांशास्तन्मौर्वी मध्यज्या साभिधीयते ।
मध्योदयज्ययाभ्यस्ता त्रिज्याप्ता वर्गितं फलम् ।।
śeṣaṃ natāṃśāstanmaurvī madhyajyā sābhidhīyate ।
madhyodayajyayābhyastā trijyāptā vargitaṃ phalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेषं = (पूर्व-गणना से) अवशिष्ट; नतांशाः = नतांश (अवनति/शीर्षबिन्दु-दूरी के अंश); तन्मौर्वी = उनकी जीवा/ज्या; मध्यज्या = मध्य-ज्या (नाम); सा अभिधीयते = कही जाती है; मध्योदयज्यया अभ्यस्ता = मध्योदय-ज्या से गुणित; त्रिज्याप्ता = त्रिज्या से भाजित; वर्गितं फलम् = (उस) फल का वर्ग।

हिन्दी भावार्थ जो राशि शेष बची, वही नतांश है; उसकी ज्या को मध्यज्या कहते हैं। उस मध्यज्या को मध्योदय-ज्या से गुणा करें, त्रिज्या से भाग दें — और जो फल मिले, उसे वर्गित कर रख लें। यह वर्गित-फल आगे दृक्क्षेप की रचना का आधार बनेगा: पहले मध्यज्या, फिर इस मध्य-गुणन का वर्ग, फिर उनका वियोग।

English rendering The remainder is the natāṃśa; its sine is called the madhyajyā. Multiply that madhyajyā by the madhyodaya-jyā, divide by the trijyā, and square the quotient — that squared result is the phala carried into the next step.

गणित / The Mathematics Let n = natāṃśa, R = trijyā, M = madhyodaya-jyā.
madhyajyā = jyā(n) = R · sin(n) (in the jyā-convention of the text)
phala = ( madhyajyā × M ⁄ R )²
The verse encodes only this product-and-square; it does not yet name dṛkkṣepa or śaṅku.

उदाहरण (worked example) Convention: angles in degrees; jyā(x) = R · sin(x) with R left symbolic (trijyā of the instrument). Suppose natāṃśa n = 30°, so madhyajyā = R · sin 30° = R/2; and madhyodaya-jyā M = R · sin 20° ≈ 0.3420 R. Then
(madhyajyā × M ⁄ R) = (R/2) × 0.3420 = 0.1710 R,
phala = (0.1710 R)² = 0.02924 R².
(This phala is the term subtracted from madhyajyā² in 5.06.)

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5.6
मध्यज्यावर्गविश्लिष्टं दृक्क्षेपः शेषतः पदम् ।
तत्त्रिज्यावर्गविश्लेषान्मूलं शङ्कुः स दृग्गतिः ।।
madhyajyāvargaviśliṣṭaṃ dṛkkṣepaḥ śeṣataḥ padam ।
tattrijyāvargaviśleṣānmūlaṃ śaṅkuḥ sa dṛggatiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यज्या-वर्ग-विश्लिष्टं = मध्यज्या के वर्ग से वियोजित (फल); दृक्क्षेपः = दृक्क्षेप; शेषतः पदम् = शेष का वर्गमूल; तत् = वह (दृक्क्षेप); त्रिज्या-वर्ग-विश्लेषात् मूलं = त्रिज्या-वर्ग से उसके वर्ग के वियोग का मूल; शङ्कुः = शङ्कु; स दृग्गतिः = वही दृग्गति है।

हिन्दी भावार्थ मध्यज्या के वर्ग में से पूर्व-श्लोक का वर्गित-फल घटाओ; जो बचे, उसका वर्गमूल दृक्क्षेप है। फिर त्रिज्या के वर्ग में से दृक्क्षेप का वर्ग घटाओ — उस शेष का वर्गमूल शङ्कु है, और उसी को दृग्गति कहते हैं। इस प्रकार आकाश-वृत्त की दो लम्ब-दिशाएँ — क्षेप और गति — शुद्ध ज्या-वर्ग-योग से खड़ी हो जाती हैं।

English rendering Subtract the previous phala from the square of the madhyajyā; the square root of the remainder is the dṛkkṣepa. Subtract the square of that dṛkkṣepa from the square of the trijyā; the square root is the śaṅku, which is also called the dṛggati.

गणित / The Mathematics With madhyajyā and phala from 5.05, and R = trijyā:
dṛkkṣepa = √( madhyajyā² − phala )
śaṅku = dṛggati = √( R² − dṛkkṣepa² )
Identity check: dṛkkṣepa² + dṛggati² = R² — the two are complementary jyā-quantities on the circle of radius R.

उदाहरण (worked example) Continue 5.05’s numbers: madhyajyā = R/2, phala = 0.02924 R².
dṛkkṣepa = √( (R/2)² − 0.02924 R² ) = √(0.25000 − 0.02924) R = √0.22076 R ≈ 0.4699 R
dṛggati = √( R² − (0.4699 R)² ) = √(1 − 0.2208) R ≈ √0.7792 R ≈ 0.8827 R
Check: 0.4699² + 0.8827² ≈ 0.2208 + 0.7792 = 1.0000.

हमारा डिकोड (Our Decode) ये दृक्क्षेप–दृग्गति युग्म शुद्ध वृत्त-सम्मिता हैं — `√(a²−b²)` की वही अनुशासन-रेखा जो हमारे kaal-verification-oracle में `==` fixtures से बँधी है: सहिष्णुता-पट्टी यहाँ भी bug-hider ही होती। गणित को “लगभग” नहीं, पद-मूल की यथातथ्य समानता से बाँधना — अध्याय-५ की इस कड़ी का आधुनिक अनुवाद वही exact-equality अनुशासन है।

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5.7
नतांशबाहुकोटिज्ये अस्फुटे दृक्क्षेपदृग्गती ।
एकज्यावर्गतश्छेदो लब्धं दृग्गतिजीवया ।।
natāṃśabāhukoṭijye asphuṭe dṛkkṣepadṛggatī ।
ekajyāvargataśchedo labdhaṃ dṛggatijīvayā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नतांश-बाहु-कोटि-ज्ये = नतांश की बाहु-ज्या और कोटि-ज्या; अस्फुटे = अपरिष्कृत/स्थूल; दृक्क्षेप-दृग्गती = (क्रमशः) दृक्क्षेप और दृग्गति; एकज्या-वर्गतः = एकज्या (एक राशि अर्थात् ३०° की ज्या, १७१९) के वर्ग से; छेदः = छेद (भाजक); लब्धं दृग्गति-जीवया = दृग्गति-जीवा से भाग देकर जो लब्ध हो।

हिन्दी भावार्थ नतांश की बाहु-ज्या और कोटि-ज्या को ही स्थूल (अस्फुट) दृक्क्षेप और दृग्गति मान लिया जाता है — पहले की सूक्ष्म रचना का सरलीकृत पर्याय। एकज्या के वर्ग को दृग्गति-जीवा से भाग देने पर जो लब्ध मिले, वही छेद है। अस्फुट से छेद-लब्ध तक का यह पग लम्बन-सूत्र के भाजक को तैयार करता है।

English rendering The sine and cosine of the natāṃśa are the approximate (asphuṭa) dṛkkṣepa and dṛggati. The divisor (cheda) is the quotient (labdha) of the square of the ekajyā (the sine of one sign) divided by the dṛggati-jīvā.

गणित / The Mathematics Let n = natāṃśa, R = ekajyā = trijyā.
asphuṭa dṛkkṣepa = bāhu-jyā(n) = R · sin(n)
asphuṭa dṛggati = koṭi-jyā(n) = R · cos(n)
ekajyā = jyā 30° = R ⁄ 2 (1719 on R = 3438)
cheda = labdha = ekajyā² ⁄ dṛggati-jīvā = 1719² ⁄ dṛggati
(When the refined dṛggati of 5.06 is used, this labdha feeds the lambana step; the asphuṭa pair is the quick substitute named in the first pāda.)

उदाहरण (worked example) Take n = 30°, R symbolic.
asphuṭa dṛkkṣepa = R · sin 30° = R/2
asphuṭa dṛggati = R · cos 30° = R · √3⁄2 ≈ 0.8660 R
cheda = (R/2)² ⁄ (0.8660 R) ≈ 0.2887 R (on R = 3438: 1719² ⁄ 2977.4 ≈ 992.5)
(With the refined dṛggati ≈ 0.8827 R from 5.06: cheda ≈ 0.2832 R. The largest lambana, jyā = R over the smallest cheda (R/2)² ⁄ R = R/4, is 4 ghaṭikās [theorem].)

हमारा डिकोड (Our Decode) “अस्फुट → स्फुट” की यह भाषा अध्याय-२ के मन्द–शीघ्र चार-पद अनुक्रम से ध्वनि-साम्य रखती है: पहले स्थूल कोण, फिर परिष्कृत फल। हमारे `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra वही अनुशासन है — यहाँ दृक्क्षेप/दृग्गति के अस्फुट–स्फुट युग्म पर। पश्चिमी प्रमेय श्रृंखला में नहीं; पाठ की ही पुनरावृत्ति-विधि में।

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सुधार · correction (2026-10-07) “एकज्यार्धगतः” → “एकज्यावर्गतः” (दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050))। छेद = (एक राशि की ज्या)² ÷ दृग्गति = 1719² ÷ दृग्गति; तभी लम्बन घटिकाओं में आता है और उसका अधिकतम R² ÷ 1719² = ठीक 4 घटिका होता है (ss-grahana.test.js)। ऊपर का “cheda = R/2” इससे भिन्न है। Correction: the square of the sine of one sign.

5.8
मध्यलग्नार्कविश्लेषज्या छेदेन विभाजिता ।
रवीन्द्वोर्लम्बनं ज्ञेयं प्राक्पश्चाद्घटिकादिकम् ।।
madhyalagnārkaviśleṣajyā chedena vibhājitā ।
ravīndvorlambanaṃ jñeyaṃ prākpaścādghaṭikādikam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यलग्न-अर्क-विश्लेष-ज्या = मध्यलग्न और सूर्य के अन्तर की ज्या; छेदेन विभाजिता = छेद से भाजित; रवि-इन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र का; लम्बनं = लम्बन (देशान्तरीय/दृष्टि-लंब-सा दृष्टिदोष); ज्ञेयं = जानना चाहिए; प्राक्-पश्चात् = पूर्व या पश्चिम; घटिका-आदिकम् = घटी आदि (काल-माप) में।

हिन्दी भावार्थ मध्यलग्न और सूर्य के अन्तर की ज्या को (पूर्व-निर्धारित) छेद से भाग दो — वही सूर्य और चन्द्र का लम्बन है। यह लम्बन पूर्वाभिमुख या पश्चिमाभिमुख होता है, और इसे घटी-पलादि काल-माप में व्यक्त करना है। ग्रहण-रेखा पर चन्द्र-सूर्य की दृश्य स्थिति इसी लम्बन-संशोधन से सँवरती है।

English rendering The sine of the difference between the madhyalagna (meridian ecliptic point) and the Sun, divided by the cheda, is the lambana of the Sun and the Moon. Take it as eastward or westward, and express it in ghaṭikā and the finer time units.

गणित / The Mathematics With cheda from 5.07 (cheda = ekajyā² ⁄ dṛggati = 1719² ⁄ dṛggati):
lambana = jyā( madhyalagna − arka ) ⁄ cheda
Direction: prāk (east) or paścāt (west) according to the sign of (madhyalagna − arka).
Unit: ghaṭikā (&c.) — the result is a time-parallax measure on the day-circle, not an arc left unconverted.
(The verse itself does not state a separate numerical parallax-constant; the cheda carries the scale.)

उदाहरण (worked example) Convention: jyā(x) = R · sin(x), R = 3438; cheda from 5.07. Let madhyalagna − arka = 12° and take dṛggati = R (the case of no dṛkkṣepa):
jyā(12°) = 3438 · sin 12° ≈ 714.8
cheda = 1719² ⁄ 3438 = 859.5
lambana = 714.8 ⁄ 859.5 ≈ 0.8316 ghaṭikā ≈ 0 ghaṭikā 49.9 pala — east or west as the sign of the difference dictates. The largest possible value, jyā = R with dṛggati = R, is 3438 ⁄ 859.5 = 4 ghaṭikās [theorem].

हमारा डिकोड (Our Decode) लम्बन को “घटिकादिकम्” में मापना सीधे हमारी मेट्रोलॉजी से जुड़ता है — 1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण (`MATHEMATICAL-AUDIT` §1)। 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 कला/वृत्त गणना-संगति है, काल और कोण की भौतिक एकता नहीं। vedic-ghadi का tithi–ghaḍī इंजन इसी दिन-विभाजन पर खड़ा है; ग्रहण-लम्बन जब घटी में लिखा जाता है, तो वही सब्सट्रेट बोलता है।

सुधार · correction (2026-10-07) गणित और उदाहरण अब 5.7 के सुधरे पाठ (छेद = एकज्या² ÷ दृग्गति) पर हैं; पहले यहाँ भी पुराना “cheda = R/2” था। Correction: the working follows the corrected 5.7.

5.9
मध्यलग्नाधिके भानौ तिथ्यन्तात्प्रविशोधयेत् ।
धनं ऊने असकृत्कर्म यावत्सर्वं स्थिरीभवेत् ।।
madhyalagnādhike bhānau tithyantātpraviśodhayet ।
dhanaṃ ūne asakṛtkarma yāvatsarvaṃ sthirībhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यलग्नाधिके = मध्य-लग्न से अधिक होने पर; भानौ = सूर्य में; तिथ्यन्तात् = तिथ्यन्त (अमा/पूर्णिमा-समाप्ति काल) से; प्रविशोधयेत् = शुद्धतः घटावे; धनं = जोड़; ऊने = (सूर्य) कम होने पर; असकृत्कर्म = बार-बार कर्म (पुनरावृत्ति); यावत् = जब तक; सर्वं स्थिरीभवेत् = सब स्थिर हो जाए।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य का स्थान मध्य-लग्न से अधिक हो, तो तिथ्यन्त-काल से (लम्बन-फल) घटाया जाए; जब सूर्य मध्य-लग्न से कम हो, तो वही फल जोड़ा जाए। यह कर्म एक बार नहीं, बार-बार करना है — जब तक गणना का पूरा परिणाम स्थिर न हो जाए, अर्थात् पुनरावृत्ति से लम्बन और तिथ्यन्त में और अन्तर न रहे। यही चन्द्र-सूर्य योग-काल का शुद्ध, स्थिर काल है जिस पर ग्रहण की आगे की रचना टिकी है।

English rendering If the Sun exceeds the mid-ascendant (madhya-lagna), subtract (the parallax correction) from the tithi-end; if it falls short, add. Repeat the operation until the whole result stabilizes — the fixed conjunction-time that later eclipse steps require.

गणित / The Mathematics Iterative fixed-point for eclipse conjunction-time under lambana (lunar parallax in longitude):
- Let t₀ = tiṭhyanta (mean/true conjunction epoch from tithi).
- At each step compute lambana λ(t) from Sun vs madhya-lagna at t.
- Update: if Sūrya > madhya-lagna → t ← t − λ; if Sūrya < madhya-lagna → t ← t + λ.
- Stop when successive t no longer changes (स्थिरीभवेत्) — exact stability, not a tolerance band.
The “+” on असकृत् marks apparatus attention on the repeated-work reading; the sense of iteration is the verse’s own.

उदाहरण (worked example) Convention: times in ghaḍī from local mean noon; input t₀ = 15.00 ghaḍī (tiṭhyanta). First lambana λ₁ = +0.42 ghaḍī with Sūrya < madhya-lagna → t₁ = 15.00 + 0.42 = 15.42. Recompute λ₂ = +0.08 → t₂ = 15.50. Next λ₃ ≈ 0 → t₃ = 15.50 ghaḍī accepted as स्थिरीभूत tiṭhyanta. (Numbers illustrative of the loop; true λ from the chapter’s lambana tables/formulas at the station.)

हमारा डिकोड (Our Decode) “यावत् सर्वं स्थिरीभवेत्” is the text’s own stop-rule for an iterative engine — not a rhetorical flourish. Our oracle discipline matches it in spirit: pin the fixed point with `==` on successive values, never a ± band that once hid a real −1. The instrument remains a mean-longitude / sphuṭa lab; promoting full eclipse-time production still needs a measured lambana layer on top of that chain.

5.10
दृक्क्षेपः शीततिग्मांश्वोर्मध्यभुक्त्यन्तराहतः ।
तिथिघ्नत्रिज्यया भक्तो लब्धं सावनतिर्भवेत् ।।
dṛkkṣepaḥ śītatigmāṃśvormadhyabhuktyantarāhataḥ ।
tithighnatrijyayā bhakto labdhaṃ sāvanatirbhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृक्क्षेपः = दृक्क्षेप (दृष्टि-क्षेप, नति-सम्बन्धी कोण); शीततिग्मांश्वोः = चन्द्र और सूर्य के; मध्यभुक्त्यन्तर = मध्य-भुक्ति (दैनिक मध्य-गति) का अन्तर; आहतः = गुणा हुआ; तिथिघ्नत्रिज्यया = तिथि × त्रिज्या से; भक्तः = विभाजित; लब्धं = प्राप्त फल; सावनतिः = साव-नति (सावन-सम्बन्धी नति)।

हिन्दी भावार्थ दृक्क्षेप को चन्द्र और सूर्य की मध्य-भुक्तियों के अन्तर से गुणा करें, फिर तिथि और त्रिज्या के गुणनफल से भाग दें — जो लब्धि आए, वही साव-नति है। यह सूत्र दृक्क्षेप (आकाश-स्थान से जुड़ी ऊर्ध्वाधर-सदृश राशि) को काल-माप की नति में बदलता है, ताकि ग्रहण-पथ की उत्तर-दक्षिण विचलन-रचना आगे बढ़ सके।

English rendering Multiply the dṛkkṣepa by the difference of the mean daily motions of the Moon and the Sun; divide by the product of the tithi and the trijyā. The quotient is the sāva-nati — the time-related vertical parallax component.

गणित / The Mathematics
sāva-nati = (dṛkkṣepa × |bhukti_Candra − bhukti_Sūrya|) ÷ (tithi × trijyā)
- trijyā (SS radius) conventionally 3438′ (arcminutes as sine-radius units).
- “तिथि” here is the tithi-measure in the eclipse-context proportional scale used with that product (same chapter’s lambana/nati metrology), not an extra free constant from outside the text.
- bhukti-antara is the mean daily motion difference (Moon − Sun), the synodic driver of tithi change.

उदाहरण (worked example) Input convention: trijyā = 3438; dṛkkṣepa = 120 (same units); bhukti-antara = 12°10′ ≈ 730′ per day; take tithi-factor = 1 in the verse’s product-slot for a unit demonstration. Then sāva-nati = (120 × 730) / (1 × 3438) ≈ 25.48 (in the nati units consistent with those inputs). Re-scale with the chapter’s actual tithi-factor when building a full eclipse run.

सुधार · correction (2026-10-07) “sāva-nati” = “सा अवनतिः” (वह अवनति)। Correction (rendering).

5.11
दृक्क्षेपात्सप्ततिहृताद्भवेद्वावनतिः फलम् ।
अथवा त्रिज्यया भक्तात्सप्तसप्तकसङ्गुणात् ।।
dṛkkṣepātsaptatihṛtādbhavedvāvanatiḥ phalam ।
athavā trijyayā bhaktātsaptasaptakasaṅguṇāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दृक्क्षेपात् = दृक्क्षेप से; सप्ततिहृतात् = सत्तर (70) से विभाजित; भवेत् = हो; वा = अथवा; अवनतिः फलम् = अवनति-फल (नति-फल); अथवा = या फिर; त्रिज्यया भक्तात् = त्रिज्या से विभाजित; सप्तसप्तकसङ्गुणात् = सात×सात (= 49) से गुणित (दृक्क्षेप) से।

हिन्दी भावार्थ दृक्क्षेप को सत्तर से भाग देने पर अवनति-फल मिलता है। वैकल्पिक रूप — दृक्क्षेप को उनचास (सप्त-सप्तक) से गुणा कर त्रिज्या से भाग दें; दोनों मार्ग एक ही नति-फल की ओर ले जाते हैं। पाठ दो समतुल्य अनुपात देता है, ताकि ज्या-सारणी वाले और सीधे भाग वाले, दोनों पद्धतियाँ काम कर सकें।

English rendering Nati-phala equals dṛkkṣepa divided by seventy; or, equivalently, dṛkkṣepa times forty-nine divided by the trijyā. Two proportional forms of one correction.

गणित / The Mathematics
avanati (nati-phala) = dṛkkṣepa / 70
alternatively:
avanati = (dṛkkṣepa × 49) / trijyā
with सप्तसप्तक = 7 × 7 = 49, सप्तति = 70.
Consistency check with SS trijyā ≈ 3438: 3438 / 70 ≈ 49.11 ≈ 49 — the two forms are the same rational approximation, not two different physics.

उदाहरण (worked example) dṛkkṣepa = 140, trijyā = 3438.
Form A: 140 / 70 = 2.
Form B: (140 × 49) / 3438 = 6860 / 3438 ≈ 1.995 ≈ 2.
Difference is the 49-vs-49.11 rounding baked into the word-numeral pair — report both when auditing.

5.12
मध्यज्यादिग्वशात्सा च विज्ञेया दक्षिणोत्तरा ।
सेन्दुविक्षेपदिक्साम्ये युक्ता विश्लेषितान्यथा ।।
madhyajyādigvaśātsā ca vijñeyā dakṣiṇottarā ।
senduvikṣepadiksāmye yuktā viśleṣitānyathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्यज्या = मध्य-ज्या; दिग्वशात् = दिशा के वश से; सा = वह (नति); विज्ञेया = जानी जाए; दक्षिणोत्तरा = दक्षिणी या उत्तरी; सेन्दुविक्षेप = चन्द्र-विक्षेप के साथ; दिक्साम्ये = समान दिशा में; युक्ता = जोड़ी जाए; विश्लेषिता = घटाई जाए; अन्यथा = विपरीत दिशा में।

हिन्दी भावार्थ वह नति मध्य-ज्या की दिशा के अनुसार दक्षिणी या उत्तरी कही जाती है। यदि नति की दिशा चन्द्र-विक्षेप (चन्द्र का क्रान्तिवृत्त से उत्तर/दक्षिण पलायन) की दिशा से मेल खाए, तो दोनों जोड़ें; दिशाएँ उलटी हों तो घटाएँ। यही शुद्ध अक्षांश-सदृश राशि — ग्रहण-पथ पर चन्द्र का प्रभावी विक्षेप — स्थिति, विमर्द और ग्रास की नींव बनती है।

English rendering Assign the nati north or south by the direction of the madhya-jyā. Add it to the Moon’s latitude when the directions agree; subtract when they oppose. The signed sum is the latitude used in the eclipse contacts.

गणित / The Mathematics
Let β = candravikṣepa (signed lunar latitude), ν = nati (signed from madhya-jyā direction).
β′ = β + ν if sign(β) = sign(ν) (दिक्षाम्य)
β′ = β − ν if signs oppose (अन्यथा)
(Equivalently β′ = β + ν with ν already signed in the madhya-jyā frame.) No new constant — pure signed composition for later sthiti / vimarda / grāsa.

उदाहरण (worked example) β = +32′ (north), ν = +8′ (north, same dig) → β′ = 40′. If ν = −8′ (south) → β′ = 32 − 8 = 24′ (or 32 + (−8)). Use β′ in the contact formulas of the preceding eclipse verses.

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षाम्ये” → “दिक्साम्ये” (दिक्-साम्य = एक ही दिशा), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

5.13
तया स्थितिविमर्दार्धग्रासाद्यं तु यथोदितम् ।
प्रमाणं वलनाभीष्टग्रासादि हिमरश्मिवत् ।।
tayā sthitivimardārdhagrāsādyaṃ tu yathoditam ।
pramāṇaṃ valanābhīṣṭagrāsādi himaraśmivat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तया = उस (शुद्ध नति/विक्षेप) से; स्थिति = स्थिति (ग्रहण की स्थिति-अवधि); विमर्दार्ध = विमर्दार्ध (खग्रास/पूर्णता-अर्ध); ग्रासाद्यं = ग्रास आदि; यथोदितम् = यथा पूर्वोक्त; प्रमाणं = मान; वलन = वलन (अक्ष-वलन/दिशा-कोण); अभीष्टग्रास = अभीष्ट ग्रास; आदि = इत्यादि; हिमरश्मिवत् = चन्द्र (हिम-रश्मि) के समान।

हिन्दी भावार्थ उसी शुद्ध राशि से स्थिति, विमर्दार्ध, ग्रास आदि — सब कुछ पहले कहे नियम से साधें। वलन, अभीष्ट-ग्रास और शेष प्रमाण चन्द्र-ग्रहण की ही रीति पर चलते हैं; सूर्य-ग्रहण में चन्द्र-डिस्क की जगह सूर्य-डिस्क की ज्यामिति आती है, पर वलन-ग्रास की संरचना “हिमरश्मिवत्” — चन्द्र-विधि की छाया — है।

English rendering From that (corrected latitude), compute half-duration, half of totality, obscuration, and the rest exactly as already stated. Valana, desired grāsa, and kindred measures follow the lunar method — “as for the cool-rayed one.”

गणित / The Mathematics Procedural pointer, not a new constant. With R_m, R_s (semi-diameters), π-combination, and β′ from 5.12:
- grāsa measures and sthityardha / vimardārdha use the same contact geometry already given for the Moon (Ch. 4–5 prior rules), swapping the appropriate disk radii for a solar eclipse.
- valana and abhīṣṭa-grāsa likewise inherit the hima-raśmi (lunar) algorithmic shape.

5.14
स्थित्यर्धोनाधिकात्प्राग्वत्तिथ्यन्ताल्लम्बनं पुनः ।
ग्रासमोक्षोद्भवं साध्यं तन्मध्यहरिजान्तरम् ।।
sthityardhonādhikātprāgvattithyantāllambanaṃ punaḥ ।
grāsamokṣodbhavaṃ sādhyaṃ tanmadhyaharijāntaram ।।
पाठ-भेद: ?

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थित्यर्ध = स्थित्यर्ध (स्थिति का आधा); ऊनाधिकात् = घटाकर/बढ़ाकर; प्राग्वत् = पहले की भाँति; तिथ्यन्तात् = तिथ्यन्त से (पाठ में तिथ्या(?)न्त — पाठ-भेद/अस्पष्टता संभव); लम्बनं = लम्बन; पुनः = फिर; ग्रासमोक्षोद्भवं = ग्रास और मोक्ष से उत्पन्न; साध्यं = साधनीय; तत् = वह; मध्यहरिजान्तरम् = मध्य और हरिज (क्षितिज-सम्बन्ध) का अन्तर।

हिन्दी भावार्थ तिथ्यन्त को स्थित्यर्ध से घटाकर (ग्रास-काल) और बढ़ाकर (मोक्ष-काल) — पूर्व-विधि से — उन दोनों क्षणों पर लम्बन फिर साधें। ग्रास और मोक्ष से जो लम्बन उपजता है, उसी से मध्य-हरिज-अन्तर सिद्ध होता है: मध्य-ग्रहण और क्षितिज-सन्दर्भ के बीच का काल-अन्तर, जो आगे प्राक्/पश्च कपाल की व्यवस्था में काम आएगा। कोष्ठक वाला “तिथ्या(?)न्त” पाठ-भेद/अनिश्चित पठन की ओर संकेत है; अर्थ-सूत्र तिथ्यन्त पर ही टिका रहता है।

English rendering From the tithi-end diminished and increased by half the duration, recompute lambana as before for immersion and release. That yields the mid-to-horizon interval (madhya-harija-antara) at grāsa and at mokṣa. The parenthetical tiṭhyā(?)nta flags a possible apparatus uncertainty; the operational epoch remains tiṭhyanta.

गणित / The Mathematics
t_grāsa = t_madhya − sthityardha
t_mokṣa = t_madhya + sthityardha
λ_g = lambana(t_grāsa), λ_m = lambana(t_mokṣa) [same algorithm as 5.09’s family]
madhya-harija-antara from those λ values vs mid-eclipse lambana — the chapter’s contact-time shift between mid-eclipse and the horizon-referenced contacts.
No new numerical constant in the verse itself.

उदाहरण (worked example) t_madhya = 15.50 ghaḍī, sthityardha = 1.20 ghaḍī → t_grāsa = 14.30, t_mokṣa = 16.70. Suppose λ at those times are 0.35 and 0.28 ghaḍī (sign per east/west capola rules of 5.15–16). The madhya–harija intervals are the signed differences of those lambanas from the mid-eclipse lambana, then applied to the contact half-durations in the next two verses.

सुधार · correction (2026-10-07) “तिथ्यान्तलाल्” क्षत e-text है; दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050): “तिथ्यन्तात्” — तिथि-अन्त से (स्थित्यर्ध घटाकर/जोड़कर) फिर लम्बन। “हरिज” यहाँ लम्बन है (5.1, 5.16); अन्तर मध्य-लम्बन से लिया जाता है। Correction: from the witness.

5.15
प्राक्कपाले अधिकं मध्याद्भवेत्प्राग्रहणं यदि ।
मौक्षिकं लम्बनं हीनं पश्चार्धे तु विपर्ययः ।।
prākkapāle adhikaṃ madhyādbhavetprāgrahaṇaṃ yadi ।
maukṣikaṃ lambanaṃ hīnaṃ paścārdhe tu viparyayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राक्कपाले = पूर्व-कपाल (पूर्वार्ध आकाश) में; अधिकं = अधिक; मध्यात् = मध्य (मध्य-ग्रहण के लम्बन) से; भवेत् = हो; प्राग्रहणं = प्रग्रहण (ग्रास/आरम्भ); यदि = यदि; मौक्षिकं लम्बनं = मोक्ष-सम्बन्धी लम्बन; हीनं = कम; पश्चार्धे = पश्चिमार्ध में; तु = तो; विपर्ययः = उलटा नियम।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-कपाल में, यदि प्रग्रहण (आरम्भ) का लम्बन मध्य-ग्रहण के लम्बन से अधिक हो, तो मोक्ष-काल का लम्बन उससे कम होता है। पश्चिमार्ध में यही सम्बन्ध उलट जाता है — जहाँ आरम्भ कम था, मोक्ष अधिक, और उलटा। कपाल (पूर्व/पश्चिम गोलार्ध) लम्बन की चिह्न-व्यवस्था का द्वार है; बिना कपाल-ज्ञान के ग्रास-मोक्ष काल अशुद्ध रहेंगे।

English rendering In the eastern hemisphere, if the immersion lambana exceeds the mid-eclipse lambana, the release lambana is the smaller; in the western half the relation reverses.

गणित / The Mathematics Sign/order rule on lambana at three epochs (no new magnitude formula):
- प्राक्कपाल (east): if λ_pragrahaṇa > λ_madhya → λ_mokṣa < λ_madhya (and the inequality pattern stated).
- पश्चार्ध (west): विपर्यय — reverse the greater/lesser assignment.
Used with 5.16 to decide whether madhya-harija-antara is added to or subtracted from each sthiti-dala.

5.16
तदा मोक्षस्थितिदले देयं प्रग्रहणे तथा ।
हरिजान्तरकं शोध्यं यत्रैतत्स्याद्विपर्ययः ।।
tadā mokṣasthitidale deyaṃ pragrahaṇe tathā ।
harijāntarakaṃ śodhyaṃ yatraitatsyādviparyayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदा = तब; मोक्षस्थितिदले = मोक्ष की स्थिति-दल (मोक्षार्ध/मोक्ष-स्थित्यर्ध) में; देयं = देना (जोड़ना) चाहिए; प्रग्रहणे तथा = प्रग्रहण में भी वैसे ही; हरिजान्तरकं = हरिज-अन्तर (मध्य-हरिज-अन्तर); शोध्यं = शोधनीय (घटाने योग्य); यत्र = जहाँ; एतत् = यह; स्यात् = हो; विपर्ययः = विपरीत स्थिति।

हिन्दी भावार्थ जब 5.15 की “अधिक/हीन” व्यवस्था लागू हो, तो हरिज-अन्तर को मोक्ष-स्थिति-दल में जोड़ा जाए, और प्रग्रहण-पक्ष में भी वही नियम। जहाँ कपाल या लम्बन-क्रम उलटा हो (विपर्यय), वहाँ वही हरिज-अन्तर घटाया जाए। इस जोड़-घटाव से ग्रास और मोक्ष के शुद्ध काल मिलते हैं — मध्य-ग्रहण ± स्थित्यर्ध के ऊपर लम्बन-कपाल का अन्तिम संस्कार।

English rendering Then apply the horizon-interval: add it to the release half-duration, and likewise at immersion; where the reverse case holds, subtract it. That finishes the contact times under lambana.

गणित / The Mathematics
Let Δh = madhya-harija-antara (from 5.14), S_g = pragrahaṇa-sthiti-dala, S_m = mokṣa-sthiti-dala.
- Default (5.15 non-viparyaya branch): S_g′ = S_g + Δh, S_m′ = S_m + Δh (as the verse’s देयं assigns).
- Viparyaya branch: S_g′ = S_g − Δh, S_m′ = S_m − Δh (शोध्या).
Contact times: t_grāsa = t_madhya − S_g′, t_mokṣa = t_madhya + S_m′ (with signs already absorbed in the east/west rule). Exact arithmetic on the chosen day-count and station; no outside constant.

उदाहरण (worked example) t_madhya = 15.50 ghaḍī, raw sthityardha = 1.20, Δh = 0.15 ghaḍī, प्राक्कपाल non-viparyaya. Then S′ = 1.20 + 0.15 = 1.35 → t_grāsa = 15.50 − 1.35 = 14.15, t_mokṣa = 15.50 + 1.35 = 16.85 ghaḍī. If viparyaya: S′ = 1.05 → contacts at 14.45 and 16.55. Convention: local civil ghaḍī from the same noon/epoch used in the lambana loop of 5.09.

5.17
एतदुक्तं कपालैक्ये तद्भेदे लम्बनैकता ।
स्वे स्वे स्थितिदले योज्या विमर्दार्धे अपि चोक्तवत् ।।
etaduktaṃ kapālaikye tadbhede lambanaikatā ।
sve sve sthitidale yojyā vimardārdhe api coktavat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एतत्-उक्तम् = यह (पूर्वोक्त नियम) कहा गया है; कपाल-ऐक्ये = दोनों कपालों (अर्ध-बिम्बों / अर्ध-व्यास-सम्बन्धी पक्षों) की एकता में; तत्-भेदे = उनके भेद होने पर; लम्बन-एकता = लम्बन की एकता (एकरूपता); स्वे स्वे स्थिति-दले = अपने-अपने स्थिति-दल (ग्रहण-काल-अर्ध) में; योज्या = जोड़नी चाहिए; विमर्द-अर्धे = विमर्द (पूर्ण-आच्छादन-काल) के अर्ध में; अपि च उक्तवत् = और भी पूर्व-कथित रीति से (+अपि = पाठ-भेद-चिह्न; अर्थ में अपि-स्वीकार सामान्य)।

हिन्दी भावार्थ जो कुछ पहले कहा गया, वह कपालों की एकता—अर्थात् दोनों पक्षों के समरूप होने—पर लागू होता है। जब कपाल भिन्न हों, तो लम्बन की गणना में एकता का नियम अपनाया जाता है: विभेद को एक-रूप लम्बन-विधान में समेटकर चलाया जाता है। ये जोड़ (लम्बन-संशोधन) प्रत्येक पक्ष के अपने-अपने स्थिति-दल में करने हैं, और विमर्द के अर्ध में भी उसी पूर्व-निर्दिष्ट रीति से। यह पद ग्रहण-काल के दो प्रमुख अर्ध-माप—स्थिति-दल और विमर्दार्ध—पर संशोधन-स्थान निश्चित करता है।

English rendering What has been stated holds when the two kapālas — the eastern and western halves of the sky, divided by the meridian — are the same; when they differ, the two lambanas are combined (lambana-ekatā). That correction is to be applied in each respective half of the sthiti (eclipse half-duration), and likewise in half of the vimarda (totality half-duration), exactly as previously set out.

गणित / The Mathematics Algorithmic placement rule (no new constants in this śloka). Let
S = स्थिति (full eclipse duration from first to last contact),
V = विमर्द (duration of total immersion, if any),
λ = लम्बन (longitudinal parallax correction at the relevant phase).
Then
स्थिति-दल: S⁄2 ; विमर्दार्ध: V⁄2.
Application (as the verse directs):
(S⁄2)_corrected ← (S⁄2) ± λ (in each respective half, स्वे स्वे),
(V⁄2)_corrected ← (V⁄2) ± λ (also, उक्तवत्).
Branch: if कपाल-ऐक्य (both instants in the same half of the sky, east or west of the meridian) → use the already-stated rule set; if कपाल-भेद → impose लम्बन-एकता (single unified lambana treatment) before those additions. Units are the siddhānta time-scales already in force for grahaṇa (ghaḍī / pala chain); this verse does not redefine them.

उदाहरण (worked example) Input convention: times already reduced to ghaḍī; sign of λ by the chapter’s earlier lambana direction (east/west of meridian). Suppose S = 4.0 ghaḍī, V = 1.2 ghaḍī, and at mid-eclipse the applicable λ = 0.05 ghaḍī. Then S⁄2 = 2.0, V⁄2 = 0.6. Under कपाल-भेद with unified lambana: each half-duration is adjusted as 2.0 ± 0.05 and 0.6 ± 0.05 (sign per earlier rule), giving corrected half-sthiti 1.95 or 2.05 ghaḍī and half-vimarda 0.55 or 0.65 ghaḍī. The verse only places where λ enters; the numerical λ itself comes from the preceding lambana algorithm, not from 5.17.

सुधार · correction (2026-10-07) पहले कपाल को “अर्ध-बिम्ब” पढ़ा गया था। कपाल = याम्योत्तर से बँटे आकाश का पूर्व या पश्चिम आधा, जैसा इसी संस्करण के 5.15 में; “तद्भेदे लम्बनैकता” = आधे भिन्न हों तो दोनों लम्बनों को मिलाना। Correction (reading): kapāla is the half of the sky, as in 5.15.

अध्यायः 6

छेद्यकाधिकारः

Projection of Eclipses
24 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
छेद्यकाधिकार वह अध्याय है जहाँ ग्रहण केवल संख्या नहीं रह जाता—वह रेखा, वृत्त और दिशा बन जाता है। बिना छेद्यक के ग्रहण के भेद—स्पर्श, मध्य, मोक्ष; चन्द्र-ग्रहण और सूर्य-ग्रहण—स्फुट नहीं जान पड़ते; अतः यहाँ उत्तम छेद्यक-ज्ञान का क्रम खुलता है। सुसाधित अवनि पर बिन्दु रखकर पहले वलन-आश्रित मण्डल, फिर ग्राह्य-ग्राहक योगार्ध से समास-मण्डल, फिर ग्राह्यार्ध से तृतीय मण्डल खींचा जाता है; याम्योत्तर-प्राच्यापर दिशाएँ पूर्ववत् स्थिर की जाती हैं। इन्दु का ग्रहण पूर्व में आरम्भ और पश्चिम में मोक्ष, सूर्य का ठीक विपर्यय—और वलन भी उसी धुरी पर विपरीत—यह ज्यामितीय नियम यहाँ सूत्रबद्ध है। वलनाग्र से मध्य-सूत्र लाकर जहाँ वह समास-वृत्त को छूए, वहीं ग्रास-मौक्षिक विक्षेप दिए जाते हैं। अध्याय की सुंदरता यही है: ग्रहण का आकाश-घटना एक कागज़ के छेद्यक में उतर आता है, और गणना दृष्टि बन जाती है।

For the English reader:
Adhyāya 6 turns eclipse arithmetic into a drawable instrument—the chedyaka, a ruled projection by which the differences between contacts, mid-eclipse and release, and between lunar and solar geometry, become clear rather than merely listed. On a well-prepared ground one fixes a centre and draws, in order: a first circle scaled to the deflection (valana), a second whose radius is half the sum of the diameters of the eclipsed and eclipsing bodies (the samāsa circle), and a third equal to half the eclipsed body; the cardinal axes are laid as before. For the Moon the first contact lies east and release west; for the Sun the order is reversed, and the sense of valana reverses with it. From the tip of the deflection one draws the mid-line; where it meets the samāsa circle, the latitudes (or offsets) for beginning and end of obscuration are read off. The chapter’s beauty is architectural: the same quantities that live in verses become compass strokes, so that an eclipse is not only computed but seen.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- प्रथम मण्डल: R_1 = 7 वर्गाङ्गुल (वलन-आश्रित माप-वृत्त)
- समास-मण्डल: R_2 = \tfrac{1}{2}(d_{\text{ग्राह्य}} + d_{\text{ग्राहक}})
- तृतीय मण्डल: R_3 = \tfrac{1}{2}\,d_{\text{ग्राह्य}}
- दिशा-नियम: चन्द्र—स्पर्श पूर्व, मोक्ष पश्चिम; सूर्य—विपर्यय; वलन भी उसी विपर्यय-धर्मी
- वलनाग्र \to मध्य-सूत्र \cap समास-वृत्त \Rightarrow विक्षेप_{\text{ग्रास}}, विक्षेप_{\text{मोक्ष}}

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। छेद्यक के तीनों मण्डलों, वलन-दिशा-नियम और ग्रास-मौक्षिक विक्षेप-पाठ को शुद्ध सूर्यसिद्धान्त-श्रृंखला में ज्यामितीय इंजन के रूप में बाँधना, और काला-ओरेकल पर स्पर्श/मध्य/मोक्ष के पिन किए गए फिक्स्चर से `==` सत्यापन—यही अगला डिकोड-पद होगा।

स्पर्शमध्य-ग्रासमोक्षग्रास-वलयअंगुल-मान से बिम्ब खींचो; वलन से पथ झुकाओ; स्पर्श-मोक्ष पढ़ लो
छेद्यक — the projection diagram (SS ch.6): the eclipsed disk is drawn to scale, the path of the eclipsing body crosses it, and the contact points — sparśa (first contact), madhya (mid), mokṣa (release) — with the valana deflection are read off geometrically. The siddhānta's own graphics engine.
6.1
न छेद्यकं ऋते यस्माद्भेदा ग्रहणयोः स्फुटाः ।
ज्ञायन्ते तत्प्रवक्ष्यामि छेद्यकज्ञानं उत्तमम् ।।
na chedyakaṃ ṛte yasmādbhedā grahaṇayoḥ sphuṭāḥ ।
jñāyante tatpravakṣyāmi chedyakajñānaṃ uttamam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छेद्यकम् = प्रक्षेप-रेखाचित्र / ग्रहण-परिलेख; ऋते = बिना; भेदाः = भेद / चरण-विशेष (स्पर्श, मध्य, मोक्ष आदि); ग्रहणयोः = चन्द्र- व सूर्य-ग्रहणों के; स्फुटाः = स्पष्ट / यथार्थ; ज्ञायन्ते = जाने जाते हैं; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; उत्तमम् = श्रेष्ठ / पूर्ण।

हिन्दी भावार्थ जब तक छेद्यक—अर्थात् ग्रहण का ज्यामितीय परिलेख—न बनाया जाए, ग्रहणों के चरण और दिशा-भेद स्पष्ट नहीं समझे जाते। इसलिए यह अध्याय उसी उत्तम छेद्यक-ज्ञान का उपदेश देता है, जिससे स्पर्श, मध्य और मोक्ष को रेखा-चित्र पर देखा जा सके। यह गणना के साथ-साथ दृष्टि-प्रमाण का द्वार खोलता है।

English rendering Without the chedyaka—the projection diagram of an eclipse—the clear distinctions of the eclipses cannot be known. Therefore the text now sets forth that excellent science of the diagram.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/अध्याय-भूमिका। छेद्यक को स्फुट-भेद का आवश्यक दृश्य-उपकरण घोषित करता है; संख्या या सूत्र यहाँ नहीं हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) केवल संख्याओं से “स्पर्श–मध्य–मोक्ष” के क्षण मिल सकते हैं, पर दिशा और चरण-आकृति बिना छेद्यक (eclipse diagram) के अधूरी रहती हैं। कागज़ पर याम्योत्तर–प्राची अक्ष खींचकर चन्द्र/सूर्य और छाया-वृत्तों का प्रतिच्छेद बनाइए — वही रेखा-चित्र बताता है कि स्पर्श उत्तर-पूर्व था या दक्षिण-पश्चिम। यह अध्याय गणना को दृष्टि-प्रमाण से जोड़ने का शिल्प-द्वार है; आगे के श्लोक उसी परिलेख पर कोण और चाप चढ़ाते हैं, इसलिए “उत्तम ज्ञान” यहाँ चित्र-साक्षरता भी है, केवल फल-सारिणी नहीं।

6.2
सुसाधितायां अवनौ बिन्दुं कृत्वा ततो लिखेत् ।
सप्तवर्गाङ्गुलेनादौ मण्डलं वलनाश्रितम् ।।
susādhitāyāṃ avanau binduṃ kṛtvā tato likhet ।
saptavargāṅgulenādau maṇḍalaṃ valanāśritam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुसाधितायाम् अवनौ = अच्छी तरह समतल की गई भूमि पर; बिन्दुम् = केन्द्र-बिन्दु; कृत्वा = बनाकर; लिखेत् = खींचे; सप्तवर्ग-अङ्गुलेन = सात के वर्ग अङ्गुल से (७² = ४९ अङ्गुल); आदौ = पहले; मण्डलम् = वृत्त; वलनाश्रितम् = वलन (दिशा-झुकाव) पर आश्रित / वलन-कार्य के लिए।

हिन्दी भावार्थ समतल भूमि पर एक केन्द्र-बिन्दु स्थिर करके पहले एक वृत्त खींचा जाता है, जिसकी त्रिज्या सात-वर्ग अङ्गुल—अर्थात् उनचास अङ्गुल—हो। यही प्रथम मण्डल वलन के आश्रय से आगे की रचना का आधार बनता है। माप की इकाई अङ्गुल है; चित्र का पैमाना इसी वृत्त से बँधता है।

English rendering On carefully prepared level ground one marks a centre and first draws a circle of radius seven-squared aṅgulas—that is, forty-nine aṅgulas—the circle that will carry the valana construction.

गणित / The Mathematics प्रथम वृत्त की त्रिज्या
R₁ = सप्तवर्ग अङ्गुल = 7² = 49 अङ्गुल।
यह माप-वृत्त है; वलन (ecliptic deflection in the diagram) इसी परिधि/त्रिज्या-आधार पर रखा जाता है। अङ्गुल यहाँ रेखा-चित्र की स्व-निर्मित इकाई है, न कि आधुनिक SI सेतु।

उदाहरण (worked example) मान लें 1 अङ्गुल = 1 इकाई। तब R₁ = 49 इकाई। यदि चित्र को कागज़ पर 1 इकाई = 2 mm रखा जाए, तो प्रथम वृत्त की त्रिज्या = 98 mm; व्यास = 196 mm। वलन-चाप या वलन-रेखा इसी 49-अङ्गुल पैमाने पर पढ़ी जाती है।

6.3
ग्राह्यग्राहकयोगार्धसम्मितेन द्वितीयकम् ।
मण्डलं तत्समासाख्यं ग्राह्यार्धेन तृतीयकम् ।।
grāhyagrāhakayogārdhasammitena dvitīyakam ।
maṇḍalaṃ tatsamāsākhyaṃ grāhyārdhena tṛtīyakam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्राह्य = ग्रसित पिण्ड (चन्द्र/सूर्य, जिसे ढका जा रहा है); ग्राहक = ग्रासक (छाया/चन्द्र); योगार्ध = दोनों के मानों के योग का आधा; सम्मितेन = बराबर; द्वितीयकम् मण्डलम् = दूसरा वृत्त; तत्समासाख्यम् = उसे “समास” कहते हैं; ग्राह्यार्धेन = ग्राह्य के आधे से; तृतीयकम् = तीसरा वृत्त।

हिन्दी भावार्थ दूसरा वृत्त ऐसी त्रिज्या से खींचा जाता है जो ग्राह्य और ग्राहक के मानों के योगार्ध के बराबर हो—अर्थात् दोनों अर्ध-व्यासों का योग। यही “समास-मण्डल” कहलाता है; स्पर्श और मोक्ष इसी पर बैठते हैं। तीसरा वृत्त केवल ग्राह्य के आधे—अर्थात् ग्राह्य-अर्धव्यास—के बराबर त्रिज्या वाला होता है। तीनों वृत्त एक ही केन्द्र-व्यवस्था में छेद्यक का कंकाल बनाते हैं।

English rendering Draw a second circle whose radius equals half the sum of the measures of the eclipsed and eclipsing bodies—this is named the samāsa (sum) circle. A third circle has radius equal to half the eclipsed body alone.

गणित / The Mathematics मान लें d_g = ग्राह्य-व्यास, d_k = ग्राहक-व्यास; अथवा r_g, r_k उनके अर्धव्यास।
R₂ (समास) = (d_g + d_k)/2 = r_g + r_k
R₃ (ग्राह्य) = d_g/2 = r_g
(पाठ “योगार्ध” और “ग्राह्यार्ध” को अर्धव्यास-योग व अर्धव्यास के रूप में पढ़ना साधारण सिद्धान्त-परंपरा है; माप उसी इकाई में हो जो 6.02 के अङ्गुल-पैमाने से सुसंगत हो।)

उदाहरण (worked example) मान लें चन्द्र-ग्रहण में चन्द्र (ग्राह्य) का अर्धव्यास r_g = 16′, भू-छाया (ग्राहक) r_k = 40′ (उदाहरण-मान, अङ्गुल-रूपांतरण अलग)।
R₂ = 16 + 40 = 56′
R₃ = 16′
यदि 1′ = 1 अङ्गुल चुना जाए, तो समास-त्रिज्या 56 अङ्गुल, ग्राह्य-त्रिज्या 16 अङ्गुल; प्रथम वलन-वृत्त 49 अङ्गुल से इनकी तुलना पैमाने पर की जाती है।

6.4
याम्योत्तराप्राच्यपरासाधनं पूर्ववद्दिशाम् ।
प्रागिन्दोर्ग्रहणं पश्चान्मोक्षो अर्कस्य विपर्ययात् ।।
yāmyottarāprācyaparāsādhanaṃ pūrvavaddiśām ।
prāgindorgrahaṇaṃ paścānmokṣo arkasya viparyayāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्य-उत्तर = दक्षिण-उत्तर; प्राची-अपरा = पूर्व-पश्चिम; साधनम् = निर्धारण; पूर्ववत् = जैसे पहले कहा; दिशाम् = दिशाओं का; प्राक् = पूर्व में; इन्दोः = चन्द्र का; ग्रहणम् = ग्रहणारंभ / स्पर्श; पश्चात् = पश्चिम में; मोक्षः = छुटकारा / अंत; अर्कस्य = सूर्य का; विपर्ययात् = उलटा होने से।

हिन्दी भावार्थ दक्षिण-उत्तर और पूर्व-पश्चिम का स्थापन पूर्व-वर्णित विधि से ही किया जाए। चन्द्र-ग्रहण में प्रथम स्पर्श पूर्व दिशा की ओर और मोक्ष पश्चिम की ओर दिखता है। सूर्य-ग्रहण में दिशाएँ उलटी हो जाती हैं—स्पर्श पश्चिम-पक्ष, मोक्ष पूर्व-पक्ष—क्योंकि दिन के आकाश में सूर्य-चक्र की दृष्टि-व्यवस्था चन्द्र-रात्रि से भिन्न है।

English rendering Fix south–north and east–west as before. For the Moon the eclipse begins in the east and ends in the west; for the Sun the order is reversed.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दिशा-नियम / परिलेख-संकेत।
चन्द्र: स्पर्श → पूर्व, मोक्ष → पश्चिम।
सूर्य: स्पर्श → पश्चिम, मोक्ष → पूर्व (विपर्यय)।
यह प्रेक्षण-ज्यामिति का चिह्न-नियम है, न कि कोण-सूत्र।

दृष्टान्त (Illustrative Example) पूर्ण चन्द्रग्रहण की रात्रि देखें: छाया का पहला स्पर्श प्रायः चन्द्र-बिम्ब के पूर्व किनारे पर लगता है, और मोक्ष पश्चिम किनारे पर खुलता है — क्योंकि चन्द्र अपनी पूर्वाभिमुख कक्षा-गति से छाया-शंकु में पूर्व से घुसता है। सूर्यग्रहण में दिन-आकाश की दृष्टि उलटी पड़ती है: चन्द्र सूर्य-डिस्क पर पश्चिम-पक्ष से “काटता” हुआ दिखता है और मोक्ष पूर्व-पक्ष की ओर पूरा होता है। दिशा-स्थापन पूर्ववत् वही शङ्कु–वृत्त विधि; बदला केवल ग्रहण-प्रकार का orientation — यही विपर्यय प्रेक्षक को भ्रम से बचाता है जब वे दोनों घटनाओं को एक ही “पूर्व=स्पर्श” नियम से नापने लगें।

6.5
यथादिशं प्राग्रहणं वलनं हिमदीधितेः ।
मौक्षिकं तु विपर्यस्तं विपरीतं इदं रवेः ।।
yathādiśaṃ prāgrahaṇaṃ valanaṃ himadīdhiteḥ ।
maukṣikaṃ tu viparyastaṃ viparītaṃ idaṃ raveḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) यथादिशम् = दिशा के अनुसार; प्राग्रहणम् = प्रथम स्पर्श का; वलनम् = वलन (दिशा-झुकाव); हिमदीधितेः = चन्द्र का (शीत-किरण); मौक्षिकम् = मोक्ष-संबंधी; विपर्यस्तम् = उलटा; विपरीतम् = विरुद्ध; इदम् = यह (नियम); रवेः = सूर्य का।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र के लिए प्रथम-स्पर्श का वलन उसी दिशा में लगाया जाता है जिस दिशा का निर्देश है; मोक्ष का वलन उससे उलटा होता है। सूर्य के लिए पूरा यह क्रम फिर उलटा हो जाता है—स्पर्श-वलन और मोक्ष-वलन दोनों चन्द्र-नियम के विपर्यय में। इस प्रकार वलन दिशा-संकेत को स्पर्श/मोक्ष और सूर्य/चन्द्र दोनों अक्षों पर व्यवस्थित करता है।

English rendering For the Moon, the valana of first contact is taken in the stated direction; that of release is reversed. For the Sun the whole scheme is opposite again.

गणित / The Mathematics संकेत-नियम (चिह्न-तालिका), सूत्र नहीं:
चन्द्र: valana_स्पर्श = +दिशा; valana_मोक्ष = −valana_स्पर्श (विपर्यस्त)।
सूर्य: दोनों चिह्न चन्द्र के विपरीत।
वलन-मान स्वयं अन्य श्लोकों/अध्यायों से आता है; यहाँ केवल आरोपण की दिशा तय होती है।

6.6
वलनाग्रान्नयेन्मध्यं सूत्रं यद्यत्र संस्पृशेत् ।
तत्समासे ततो देयौ विक्षेपौ ग्रासमौक्षिकौ ।।
valanāgrānnayenmadhyaṃ sūtraṃ yadyatra saṃspṛśet ।
tatsamāse tato deyau vikṣepau grāsamaukṣikau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वलनाग्रात् = वलन के अग्र-बिन्दु से; नयेत् = ले जाए / खींचे; मध्यम् = केन्द्र की ओर; सूत्रम् = डोरी / सरल रेखा; यद्यत्र संस्पृशेत् = जहाँ जहाँ छुए; तत्समासे = उस समास-वृत्त पर; ततः = वहाँ से; देयौ = लगाने योग्य; विक्षेपौ = दो विक्षेप (अक्षांशीय विस्थापन); ग्रास-मौक्षिकौ = ग्रास (स्पर्श) और मोक्ष के।

हिन्दी भावार्थ वलन के अग्र से केन्द्र की ओर एक सूत्र-रेखा खींचें। जहाँ यह रेखा समास-मण्डल को छूती है, वहीं ग्रास और मोक्ष के दो विक्षेप रखे जाते हैं। वलन दिशा देता है; समास-वृत्त स्पर्श-दूरी बाँधता है; विक्षेप उस बिंदु से उत्तर-दक्षिण विस्थापन खोलता है। तीनों मिलकर स्पर्श/मोक्ष के स्थान को चित्र पर बैठते हैं।

English rendering From the tip of the valana draw a cord toward the centre. Where it meets the samāsa circle, lay off there the two vikṣepas belonging to immersion and release.

गणित / The Mathematics ज्यामितीय रचना-चरण:
1) बिंदु V = वलनाग्र; C = केन्द्र।
2) रेखा VC (या V से C की ओर किरण) खींचें।
3) समास-वृत्त (त्रिज्या R₂ = r_g + r_k) से प्रतिच्छेदन-बिंदु P_s, P_m (ग्रास/मोक्ष पक्ष)।
4) P पर विक्षेप δ_grāsa, δ_mokṣa लगाएँ (माप व दिशा अगले श्लोक/परंपरा से)।
यह रूलर-कम्पास प्रक्रिया है; बीजगणितीय हल वैकल्पिक आधुनिक रूपांतर है, मूल पाठ रेखा-विधि है।

उदाहरण (worked example) C पर R₂ = 56 इकाई का समास-वृत्त; वलनाग्र V, मान लें CV की दिशा पूर्व से 12° उत्तर (उदाहरण)। रेखा CV वृत्त को दो बिंदुओं पर काटती है; ग्रास-पक्ष के बिंदु पर δ = +12′ (उत्तर) और मोक्ष-पक्ष पर δ = −8′ (दक्षिण) जैसे मान (यदि पूर्व-गणना से आए हों) अङ्कित किए जाते हैं। वास्तविक δ वलन से नहीं—विक्षेप-गणना से—आते हैं; यहाँ केवल उनका स्थान तय होता है।

6.7
विक्षेपाग्रात्पुनः सूत्रं मध्यबिन्दुं प्रवेशयेत् ।
तद्ग्राह्यबिन्दुसंस्पर्शाद्ग्रासमोक्षौ विनिर्दिशेत् ।।
vikṣepāgrātpunaḥ sūtraṃ madhyabinduṃ praveśayet ।
tadgrāhyabindusaṃsparśādgrāsamokṣau vinirdiśet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विक्षेपाग्रात् = विक्षेप के अग्र से; पुनः = फिर; सूत्रम् = रेखा; मध्यबिन्दुम् = केन्द्र-बिन्दु; प्रवेशयेत् = प्रवेश कराए / से गुजारे; तत् = उस; ग्राह्यबिन्दु-संस्पर्शात् = ग्राह्य-वृत्त/बिन्दु के स्पर्श से; ग्रास-मोक्षौ = स्पर्श और मोक्ष; विनिर्दिशेत् = निर्देशित करे / निश्चित करे।

हिन्दी भावार्थ विक्षेप के अग्र से फिर एक सूत्र केन्द्र-बिन्दु की ओर ले जाया जाता है। जहाँ यह रेखा ग्राह्य-मण्डल (तृतीय वृत्त) को छूती है, वहीं ग्रास और मोक्ष के बिंदु निर्दिष्ट होते हैं। इस प्रकार वलन → समास → विक्षेप → ग्राह्य—चार चरणों में छेद्यक स्पर्श-मोक्ष की स्थिति को रेखा से “बोल” देता है।

English rendering Again, from the tip of the vikṣepa, pass a cord through the centre. From its contact with the circle (or point) of the eclipsed body, mark immersion and release.

गणित / The Mathematics रचना-चरण (6.06 के बाद):
1) विक्षेपाग्र W से रेखा W–C।
2) ग्राह्य-वृत्त (R₃ = r_g) से प्रतिच्छेदन → बिंदु G_grāsa, G_mokṣa।
3) ये बिंदु ही परिलेख पर ग्रास और मोक्ष हैं।
मध्य-ग्रहण तब निकट आता है जब विक्षेप न्यूनतम और ग्राह्य-ग्राहक ज्यामिति मध्य-रेखा पर हो; यह श्लोक स्पर्श/मोक्ष-निर्धारण तक सीमित है।

उदाहरण (worked example) R₃ = 16 इकाई; W, समास पर रखे विक्षेप का अग्र। रेखा WC ग्राह्य-वृत्त को काटती है—मान लें प्रतिच्छेदन C से 16 इकाई पर चाप-स्थिति ≈ 18° पूर्वोत्तर (उदाहरण)। वही बिंदु ग्रास-चिह्न; विपरीत पक्ष का प्रतिच्छेदन मोक्ष-चिह्न। माप-पैमाना 6.02–6.03 से अटल रहता है।

6.8
नित्यशो अर्कस्य विक्षेपाः परिलेखे यथादिशम् ।
विपरीताः शशाङ्कस्य तद्वशादथ मध्यमम् ।।
nityaśo arkasya vikṣepāḥ parilekhe yathādiśam ।
viparītāḥ śaśāṅkasya tadvaśādatha madhyamam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नित्यशः = सदैव; अर्कस्य = सूर्य के; विक्षेपाः = विक्षेप; परिलेखे = परिलेख/छेद्यक में; यथादिशम् = दिशा के अनुसार (सीधे); विपरीताः = उलटे; शशाङ्कस्य = चन्द्र के; तद्वशात् = उसी के वश से; अथ = फिर; मध्यमम् = मध्य (मध्य-ग्रहण / मध्य-बिंदु व्यवस्था)।

हिन्दी भावार्थ परिलेख में सूर्य के विक्षेप सदैव कथित दिशा में ही लगाए जाते हैं; चन्द्र के विक्षेप उनसे विपरीत दिशा में। उसी नियम के अधीन फिर मध्य की स्थिति—मध्य-ग्रहण का स्थान—निश्चित होती है। दिशा-चिह्न सूर्य और चन्द्र के लिए अदला-बदली का स्थायी अनुशासन है, जिससे चित्र आकाश-दृष्टि से न उलझे।

English rendering In the diagram the Sun’s vikṣepas are always laid in the stated direction; those of the Moon are reversed. Under that rule the middle (of the eclipse) is then fixed.

गणित / The Mathematics चिह्न-नियम:
सूर्य: δ_diagram = +δ_computed (यथादिशम्)।
चन्द्र: δ_diagram = −δ_computed (विपरीत)।
मध्य (madhyama) उसी चिह्न-व्यवस्था और पूर्व-वृत्त-रचना के अधीन निर्धारित होता है। कोई नया संख्या-स्थिरांक नहीं; 6.04–6.05 के वलन-विपर्यय के समानांतर विक्षेप-विपर्यय।

6.9
वलनं प्राङ्मुखं देयं तद्विक्षेपैकता यदि ।
भेदे पश्चान्मुखं देयं इन्दोर्भानोर्विपर्ययात् ।।
valanaṃ prāṅmukhaṃ deyaṃ tadvikṣepaikatā yadi ।
bhede paścānmukhaṃ deyaṃ indorbhānorviparyayāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वलनं = अयन/विक्षेप-दिशा का झुकाव-कोण (deflection); प्राङ्मुखं = पूर्व-मुखी (पूर्व की ओर); देयं = लगाना/देना चाहिए; तद्-विक्षेप-ऐकता = वलन और विक्षेप की एक ही दिशा; भेदे = दिशा-भेद में; पश्चान्मुखं = पश्चिम-मुखी; इन्दोः = चन्द्र के लिए (ऊपर का नियम); भानोः विपर्ययात् = सूर्य के लिए उलटा।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र के लिए: यदि वलन और विक्षेप एक ओर हों तो मध्य का वलन पूर्व-मुखी दें; यदि उनकी दिशाएँ भिन्न हों तो पश्चिम-मुखी। सूर्य के लिए यह नियम उलटा है (विपर्ययात्)। यह छेद्यक-रेखा-चित्र में अक्ष-झुकाव की शुद्ध दिशा-निर्धारण की कुंजी है।

English rendering For the Moon (indoḥ), lay the middle’s valana eastward when it and the vikṣepa agree in direction, westward when they differ; for the Sun (bhānoḥ) the reverse (viparyayāt).

गणित / The Mathematics Direction rule for combining valana (axis deflection) with vikṣepa (latitude) in the eclipse diagram:

  • if sign(valana) = sign(vikṣepa) → valana drawn east (prāṅmukha)
  • if signs differ → valana drawn west (paścānmukha)
  • these two cases are the Moon’s (indoḥ); for the Sun (bhānoḥ) both are reversed (viparyayāt)

No numerical constant; pure orientation algorithm for the chedyaka.

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सुधार · correction (2026-10-07) अन्वय: “इन्दोः” नियम के साथ, “भानोः विपर्ययात्” = सूर्य के लिए उलटा — चन्द्र: वलन-विक्षेप एक दिशा में तो पूर्वमुख, भिन्न तो पश्चिममुख; सूर्य: विपरीत। पहले का अनुवाद “चन्द्र और सूर्य दोनों के लिए उलटा” पढ़ता था, जो किसी नियम को उलटता नहीं (इस अध्याय में और कोई ग्रह नहीं)। प्रमाण [theorem]: केवल यही अन्वय 6.4, 6.5, 6.8 और 6.9 को एक ही घुमाव (वलन जितना) बनाता है; दूसरा अन्वय नहीं। ss-parilekha.js `middleTip`; check: ss-parilekha.test.js. Correction: construal.

6.10
वलनाग्रात्पुनः सूत्रं मध्यबिन्दुं प्रवेशयेत् ।
मध्यसूत्रेण विक्षेपं वलनाभिमुखं नयेत् ।।
valanāgrātpunaḥ sūtraṃ madhyabinduṃ praveśayet ।
madhyasūtreṇa vikṣepaṃ valanābhimukhaṃ nayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वलन-अग्रात् = वलन-रेखा के सिरे से; पुनः सूत्रं = फिर से सूत्र/डोरी; मध्य-बिन्दुं = मध्य-बिन्दु में; प्रवेशयेत् = प्रवेश कराए; मध्य-सूत्रेण = मध्य-रेखा द्वारा; विक्षेपं = अक्षांशीय विक्षेप; वलन-अभिमुखं = वलन की ओर मुख करके; नयेत् = ले जाए।

हिन्दी भावार्थ वलन की अग्र-बिन्दु से एक सूत्र मध्य-बिन्दु तक खींचिए — यही मध्य-सूत्र बनता है। उसी मध्य-सूत्र पर विक्षेप को वलन की दिशा की ओर ले जाइए, अर्थात् विक्षेप को वलन-अभिमुख खिसकाकर नयी स्थिति अंकित कीजिए। इस दो-चरणीय खिंचाव से विक्षेप और वलन एक ही ज्यामितीय फ्रेम में जुड़ते हैं, ताकि आगे का ग्राहक-वृत्त सही स्थान पर बैठे।

English rendering From the tip of the valana draw a line again into the midpoint. Along that mid-line carry the vikṣepa toward the valana’s sense. The latitude offset is thus transferred onto the deflected axis before the next construction step.

गणित / The Mathematics Geometric transfer on the chedyaka plane:

1. Line from valana-tip → centre (mid-point)
2. On that mid-line, displace the vikṣepa magnitude in the valana-facing direction

If v = valana length, β = vikṣepa length (same linear scale as the diagram’s aṅgula unit), the effective offset vector is the composition of the valana segment and the β-segment along the mid-line — not an algebraic product, but a ruler-and-string composition.

उदाहरण (worked example) Convention: diagram radius scale 1 aṅgula = 1′ of arc on the chosen grāhya circle. Suppose valana = 12′, vikṣepa = 8′, same sense (east by 6.09). Draw 12 units east from centre to valana-tip; from that tip pull a string through the centre; then from the centre mark 8 units along the mid-line toward the valana side. The vikṣepa-tip so obtained is the pivot for the next verse’s circle.

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6.11
विक्षेपाग्राल्लिखेद्वृत्तं ग्राहकार्धेन तेन यत् ।
ग्राह्यवृत्तं समाक्रान्तं तद्ग्रस्तं तमसा भवेत् ।।
vikṣepāgrāllikhedvṛttaṃ grāhakārdhena tena yat ।
grāhyavṛttaṃ samākrāntaṃ tadgrastaṃ tamasā bhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विक्षेप-अग्रात् = विक्षेप के अग्र-बिन्दु से; लिखेत् वृत्तं = वृत्त लिखे; ग्राहक-अर्धेन = ग्राहक (ग्रहण-कर्ता) के अर्ध-व्यास से; तेन यत् = उससे जो; ग्राह्य-वृत्तं = ग्राह्य (ग्रहण-पात्र) का वृत्त; समाक्रान्तं = आक्रान्त/ढका हुआ; तत् ग्रस्तं = वही ग्रस्त; तमसा = तम/अन्धकार से; भवेत् = होता है।

हिन्दी भावार्थ विक्षेप के अग्र से ग्राहक के आधे व्यास (अर्धव्यास) को त्रिज्या मानकर वृत्त खींचिए। उस वृत्त से ग्राह्य-वृत्त का जो भाग ढक जाता है, वही भाग तम से ग्रस्त — अर्थात् ग्रहण में अदृश्य या छाया-ढका — माना जाता है। यह छेद्यक की केन्द्रीय परिभाषा है: ग्रस्त-क्षेत्र = ग्राहक-वृत्त ∩ ग्राह्य-वृत्त, विक्षेप-अग्र को केन्द्र मानकर।

English rendering From the tip of the vikṣepa draw a circle with radius equal to half the eclipsing body’s diameter. Whatever of the eclipsed body’s circle that circle covers is what is seized by darkness — the geometric definition of the eclipsed portion on the board.

गणित / The Mathematics Let
- R_grāhya = semi-diameter of the eclipsed body (Moon or Sun on the diagram)
- R_grāhaka = semi-diameter of the eclipsing body (Earth’s shadow or Moon)
- O′ = vikṣepa-tip (centre of the grāhaka circle after 6.09–6.10)
- O = centre of the grāhya circle

Grasta arc/area = intersection of circle(O, R_grāhya) with circle(O′, R_grāhaka).
Magnitude of obscuration (linear, for chord methods later in the adhyāya) scales with the distance d = |O O′| and the two radii — the classic eclipse-condition d < R_grāhya + R_grāhaka for contact, and partial depth R_grāhya + R_grāhaka − d.

उदाहरण (worked example) Input (diagram units = arcminutes): R_Moon = 16′, R_shadow = 40′, d = |O O′| = 30′ after valana+vikṣepa transfer.
Contact test: 16 + 40 = 56 > 30 → partial eclipse.
Linear depth of obscuration: 16 + 40 − 30 = 26′.
The grasta portion is the cap of the Moon-circle cut by the shadow-circle of radius 40′ centred at the vikṣepa-tip.

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6.12
छेद्यकं लिखता भूमौ फलके वा विपश्चिता ।
विपर्ययो दिशां कार्यः पूर्वापरकपालयोः ।।
chedyakaṃ likhatā bhūmau phalake vā vipaścitā ।
viparyayo diśāṃ kāryaḥ pūrvāparakapālayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छेद्यकं = ग्रहण-रेखाचित्र (construction diagram); लिखता = लिखते समय; भूमौ = भूमि पर; फलके वा = अथवा फलके/पट्टे पर; विपश्चिता = विद्वान् द्वारा; विपर्ययः दिशां = दिशाओं का उलटाव; कार्यः = करना चाहिए; पूर्व-अपर-कपालयोः = पूर्व और पश्चिम गोलार्धों/अर्ध-भागों का।

हिन्दी भावार्थ जब विद्वान् भूमि पर या फलके पर छेद्यक अंकित करता है, पूर्व-पश्चिम कपोलों की दिशाएँ उलटी रखनी चाहिए। अर्थात् आकाश में जो पूर्व है, चित्र के बोर्ड पर उसे पश्चिम-स्थान पर, और जो पश्चिम है उसे पूर्व-स्थान पर लगाइए। यह दृष्टि-संबंधी निर्देश है — ऊपर देखते हुए आकाश-दिशा और नीचे लिखते हुए बोर्ड-दिशा का स्वाभाविक विपर्यय — ताकि खींचा पथ आकाश-गति से मेल खाए।

English rendering When the skilled hand draws the chedyaka on the ground or on a board, reverse the east–west hemispheres. The diagram is a mirror of the sky’s lateral sense so that the constructed track matches what the observer sees looking up.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — रचना-निर्देश (orientation convention)।
Board-map: East_sky ↔ West_board, West_sky ↔ East_board; north–south ordinarily kept. Without this flip, the grāhaka-path of 6.16 would run opposite the true sky motion.

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दृष्टान्त (Illustrative Example) दक्षिण की ओर मुँह करके आकाश देखें — तो पूर्व बाईं ओर, पश्चिम दाईं ओर रहता है। पर वही पथ जब आप भूमि पर बैठकर फलक पर खींचते हैं, दृष्टि नीचे की ओर पलट जाती है: बायाँ–दायाँ अब उलटा बैठता है। इसलिए सूर्यसिद्धान्त यहाँ निर्देश देता है कि पूर्वापर-कपोलों का विपर्यय जान-बूझकर रखें, ताकि खींचा छेद्यक-पथ आकाश की वास्तविक गति से मेल खाए — ठीक जैसे मानचित्र पर “उत्तर ऊपर” का नियम काग़ज़ की दिशा तय करता है, आकाश-बोर्ड पर यह नियम दिशाएँ उलटी करके पथ को सही रखता है। यह विचार आगे अध्याय ६ के प्रक्षेप-रेखाण और छेद्यक-निर्माण में रेखा-गणित बनता है।

सुधार · correction (2026-10-07) दृष्टान्त: “उत्तर की ओर मुँह करके … पूर्व बाईं ओर” → “दक्षिण की ओर मुँह करके”: उत्तर की ओर मुँह हो तो पूर्व दाईं ओर होता है। श्लोक का अर्थ स्वयं एक पाठ-निर्णय है [reading]: यह संस्करण इसे फलक पर पूर्व-पश्चिम का दर्पण पढ़ता है; दूसरा अर्थ — पूर्व और पश्चिम कपाल में दिशाएँ उलटी, जैसा 4.24 का अक्ष-वलन (पूर्व कपाल में उत्तर, पश्चिम में दक्षिण) पहले से करता है। ss-parilekha.js `svg` में दोनों: view “sky” (पूर्व बाईं ओर, उत्तर ऊपर) और “board”. Correction: worked example.

6.13
स्वच्छत्वाद्द्वादशांशो अपि ग्रस्तश्चन्द्रस्य दृश्यते ।
लिप्तात्रयं अपि ग्रस्तं तीक्ष्णत्वान्न विवस्वतः ।।
svacchatvāddvādaśāṃśo api grastaścandrasya dṛśyate ।
liptātrayaṃ api grastaṃ tīkṣṇatvānna vivasvataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वच्छत्वात् = स्वच्छता/उज्ज्वलता के कारण; द्वादश-अंशः = बारहवाँ भाग (1/12); अपि = भी; ग्रस्तः = ग्रस्त; चन्द्रस्य = चन्द्र का; दृश्यते = दिखाई देता है; लिप्ता-त्रयं = तीन लिप्ता (3′ चाप-मिनट); अपि ग्रस्तं = भी ग्रस्त; तीक्ष्णत्वात् = तीक्ष्णता/प्रखर ज्योति के कारण; न = नहीं; विवस्वतः = सूर्य का।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र इतना स्वच्छ-प्रकाशमय है कि उसका बारहवाँ भाग भी यदि ग्रस्त हो तो वह ग्रहण-चिह्न आँख को दिख जाता है। सूर्य इतना तीक्ष्ण-प्रखर है कि तीन लिप्ता मात्र का ग्रस्त अंश भी दृष्टि से ओझल रहता है — इतना छोटा छाया-दाग उसकी ज्योति में डूब जाता है। यह दो दृश्यता-सीमाएँ हैं: चन्द्र-ग्रहण की सूक्ष्म संसूचन-सीमा ≈ 1/12 व्यास, सूर्य-ग्रहण की ≈ 3′ — दोनों प्रेक्षण-अनुभव से बँधी संख्याएँ, न कि कक्षा-सूत्र।

English rendering Because of the Moon’s clarity, even a twelfth part of her disk when eclipsed is seen. Because of the Sun’s piercing brilliance, even three arcminutes of his disk when eclipsed is not seen. Two empirical visibility thresholds, not orbital constants.

गणित / The Mathematics Visibility floors stated by the verse:

- Moon: eclipsed fraction f ≥ 1/12 of the lunar disk is visible as eclipse
(linear: if lunar diameter ≈ 2 R_☾, then grasta chord/depth ≳ R_☾/6 on the diameter scale; fraction of area is not given — the text says aṃśa of the body, conventionally the diameter-share)
- Sun: eclipsed arc ≤ 3 liptā = 3′ is not visible

So:
- lunar threshold: grasta ≥ (1/12) × (full Moon measure)
- solar threshold: grasta < 3′ → invisible; detection only when grasta > 3′

उदाहरण (worked example) Convention: Moon’s apparent diameter 32′ → 1/12 ≈ 2.67′ of diameter. A partial lunar eclipse with linear grasta depth 4′ (> 2.67′) is counted dṛśya; one of 2′ is below the svacchatva floor of this verse. For the Sun, grasta = 2.5′ → na dṛśyate; grasta = 5′ → past the 3′ tīkṣṇatva floor and potentially visible (weather and glare aside — the text gives only the angular cut).

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6.14
स्वसंज्ञितास्त्रयः कार्या विक्षेपाग्रेषु बिन्दवः ।
तत्र प्राङ्मध्ययोर्मध्ये तथा मौक्षिकमध्ययोः ।।
svasaṃjñitāstrayaḥ kāryā vikṣepāgreṣu bindavaḥ ।
tatra prāṅmadhyayormadhye tathā maukṣikamadhyayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्व-संज्ञिताः = अपने-अपने नाम से चिह्नित; त्रयः = तीन; कार्याः = करने चाहिए; विक्षेप-अगेषु = विक्षेपों के अग्रों पर; बिन्दवः = बिन्दु; तत्र = वहाँ; प्राक्-मध्ययोः मध्ये = पूर्व और मध्य के बीच; तथा = तथा; मौक्षिक-मध्ययोः = मोक्ष (ग्रहण-अन्त) और मध्य के बीच।

हिन्दी भावार्थ विक्षेप के अग्र-बिन्दुओं पर तीन स्व-नाम-युक्त बिन्दु अंकित कीजिए — स्पर्श, मध्य (अधिकतम ग्रास), और मोक्ष। फिर पूर्व (स्पर्श/आदि) और मध्य के बीच, तथा मोक्ष और मध्य के बीच, अगली रचना के लिए स्थान तैयार कीजिए। ये तीन बिन्दु ग्राहक के पथ को बाँधते हैं: जहाँ से छाया लगती है, जहाँ ग्रास चरम है, जहाँ मुक्त होती है।

English rendering Mark three self-named points at the vikṣepa tips — the contacts that bound the eclipse. Between the eastern (ingress) and the middle, and between the middle and the mokṣa (egress), the next construction will sit. The triple of points is the skeleton of the eclipsing body’s track.

गणित / The Mathematics Three labelled points on the vikṣepa-line family:

1. Prāk / sparśa — first contact (ingress)
2. Madhya — mid-eclipse (greatest obscuration)
3. Mokṣa — last contact (egress)

Intervals for the following matsya-construction: segment (prāk, madhya) and segment (madhya, mokṣa). No new numerical constant; discrete sample of the grāhaka path at three epochs already computed from longitudes and vikṣepa.

उदाहरण (worked example) Suppose after true-position and valana work one has diagram offsets: sparśa at (−18′, +6′), madhya at (0′, +8′), mokṣa at (+17′, +5′) in (along-track, vikṣepa) board units. Plot the three named points; the mid-segments between 1–2 and 2–3 are where 6.15 draws the twin fish figures.

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6.15
लिखेन्मत्स्यौ तयोर्मध्यान्मुखपुच्छविनिःसृतम् ।
प्रसार्य सूत्रद्वितयं तयोर्यत्र युतिर्भवेत् ।।
likhenmatsyau tayormadhyānmukhapucchaviniḥsṛtam ।
prasārya sūtradvitayaṃ tayoryatra yutirbhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लिखेत् मत्स्यौ = दो मत्स्य (मछली-आकृतियाँ) लिखे; तयोः मध्यात् = उनके मध्य से; मुख-पुच्छ-विनिःसृतम् = मुख और पुच्छ निकलते हुए; प्रसार्य = फैलाकर; सूत्र-द्वितयं = दो सूत्र; तयोः = उनका; यत्र युतिः भवेत् = जहाँ संयोग/मिलन हो।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-मध्य और मोक्ष-मध्य के जोड़ों पर दो मत्स्य लिखिए — प्रत्येक मत्स्य के मुख और पुच्छ मध्य से बाहर निकलते हों (क्लासिकल चाप-द्वय से बना ‘मछली’ चिह्न, केन्द्र-खोज का पारंपरिक यंत्र)। दोनों मत्स्यों से दो सूत्र फैलाइए; जहाँ वे दोनों सूत्र मिलें, वही अभीष्ट बिन्दु है — पथ-निर्धारण का संधि-स्थान। यह ज्यामितीय प्रतिच्छेदन है, बीजगणितीय सूत्र नहीं।

English rendering Draw two fish-figures between those mid-pairs, mouth and tail issuing from the middle of each. Stretch a pair of strings from them; where the two strings meet is the junction used next. The matsya is the classical Indian compass construction for finding a point equidistant from a segment’s ends — here harnessed to the eclipse path.

गणित / The Mathematics Classical matsya (vesica-style) construction on each segment:

  • On segment AB (e.g. sparśa–madhya): two arcs of equal radius > ½|AB| from A and from B; their intersections are the “mouth” and “tail” of the matsya.
  • The line through those two intersections is the perpendicular bisector of AB.
  • Repeat on madhya–mokṣa → second bisector.
  • Yuti = intersection of the two bisectors (or of the two stretched sūtra along those axes).

That yuti is the centre used to swing the path-arc of 6.16.

उदाहरण (worked example) Points A = sparśa, B = madhya, C = mokṣa as in 6.14’s example. Matsya on AB yields perpendicular bisector ℓ₁; matsya on BC yields ℓ₂. Their intersection P = yuti. P is the centre of the circular arc that will pass near A, B, C as the grāhaka path — exact through three non-collinear points when the arc of 6.16 is drawn with a string from P.

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दृष्टान्त (Illustrative Example) दो वृत्त-चापों को परस्पर काटने पर जो “मछली”-आकृति बनती है — मुख और पुच्छ मध्य से बाहर निकले — वही शास्त्रीय मत्स्य है; शिल्प-सूत्र और ज्योतिष दोनों में केन्द्र-खोज का यह हाथ-का यंत्र रहा है। पूर्व-मध्य और मोक्ष-मध्य पर दो ऐसे मत्स्य खींचकर उनके मुख–पुच्छ से सूत्र फैलाएँ: जहाँ दोनों रेखाएँ मिलें, वही अभीष्ट बिन्दु — पथ का संधि-स्थान — निकलता है। कोई समीकरण हल नहीं; केवल चाप, तार और प्रतिच्छेदन। यही ज्यामितीय संधि बाद में अध्याय ६–७ के दृक्-पथ और ग्रह-युति की रेखा-साधना में अङ्कित बिन्दु बन जाती है।

6.16
तत्र सूत्रेण विलिखेच्चापं बिन्दुत्रयस्पृशा ।
स पन्था ग्राहकस्योक्ता येनासौ सम्प्रयास्यति ।।
tatra sūtreṇa vilikheccāpaṃ bindutrayaspṛśā ।
sa panthā grāhakasyoktā yenāsau samprayāsyati ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्र = उस (युति) स्थान पर; सूत्रेण = सूत्र से; विलिखेत् = लिखे; चापं = चाप; बिन्दु-त्रय-स्पृशा = तीन बिन्दुओं को स्पर्श करते हुए; सः पन्था = वही पथ; ग्राहकस्य = ग्राहक का; उक्ता = कहा गया; येन = जिससे; असौ = वह (ग्राहक); सम्प्रयास्यति = आगे बढ़ेगा/यात्रा करेगा।

हिन्दी भावार्थ उस युति-बिन्दु से सूत्र बाँधकर ऐसा चाप खींचिए जो तीनों बिन्दुओं — स्पर्श, मध्य, मोक्ष — को छुए। वही चाप ग्राहक का पन्था (पथ) कहलाता है; उसी मार्ग से छाया या चन्द्र आगे बढ़ता हुआ ग्रहण पूरा करता है। तीन-बिन्दु-स्पर्शी वृत्त-चाप आकाश में ग्राहक की सापेक्ष गति का छेद्यक-प्रतिकृति है।

English rendering From that junction, with a string, draw the arc that touches the three points. That arc is declared the path of the eclipsing body — the track along which it will travel through the eclipse. Three-point circular fit is the chedyaka model of the grāhaka’s motion on the board.

गणित / The Mathematics Unique circle through three non-collinear points A (sparśa), B (madhya), C (mokṣa):

  • centre P = intersection of perpendicular bisectors of AB and BC (the yuti of 6.15)
  • radius R_path = |P A| (= |P B| = |P C| if construction is exact)
  • grāhaka path = arc ABC on circle(P, R_path)

Parametric sense of travel: sparśa → madhya → mokṣa along the arc, with board east–west already reversed per 6.12 so that the drawn sense matches the sky.

उदाहरण (worked example) With A, B, C as above and P from the twin matsya, measure R_path = |P A|. Draw arc A→B→C. Mid-eclipse is where the path is nearest the grāhya centre in the vikṣepa sense; first/last contacts are A and C. If A, B, C are nearly collinear (very small vikṣepa change), R_path becomes large — the path approaches a straight line, which is the correct limiting geometry for a nearly central, short-chord eclipse on the diagram.

6.17
ग्राह्यग्राहकयोगार्धात्प्रोज्झ्येष्टग्रासं आगतम् ।
अवशिष्टाङ्गुलसमां शलाकां मध्यबिन्दुतः ।।
grāhyagrāhakayogārdhātprojjhyeṣṭagrāsaṃ āgatam ।
avaśiṣṭāṅgulasamāṃ śalākāṃ madhyabindutaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्राह्य = ग्रसित होने वाला पिण्ड (चन्द्र/सूर्य) का मान; ग्राहक = ग्रास करने वाला (भू-छाया/चन्द्र) का मान; योगार्धात् = दोनों मानों के योग के आधे से; प्रोज्झ्य = घटाकर; इष्टग्रासम् आगतम् = अभी तक आया हुआ अभीष्ट/वर्तमान ग्रास-परिमाण; अवशिष्ट = शेष; अङ्गुलसमाम् = अङ्गुल-मात्रा के बराबर; शलाकाम् = मापक-दण्ड/रेखा-खण्ड; मध्यबिन्दुतः = मध्य-बिन्दु से।

हिन्दी भावार्थ ग्रहण-रेखाचित्र में पहले ग्राह्य और ग्राहक — दोनों के मान (व्यास-परिमाण) जोड़कर आधा लीजिए। उस योगार्ध से उस क्षण का इष्ट ग्रास, जो आ चुका है, घटा दीजिए। जो शेष बचे, उतने अङ्गुल की एक शलाका मध्यबिन्दु से मापकर रखी जाए। यह शलाका आगे के चरणों में मार्ग-दिशा और स्पर्श-बिन्दु निकालने का ज्यामितीय मापदण्ड बनती है।

English rendering From half the sum of the measures (diameters) of the eclipsed and eclipsing bodies, subtract the desired amount of obscuration that has already set in. From the mid-point, set out a measuring rod equal, in aṅgulas, to that remainder.

गणित / The Mathematics
शलाका-लम्बाई (मध्यबिन्दु से):
L = (m_grāhya + m_grāhaka) ⁄ 2 − g_iṣṭa
जहाँ m = व्यास-मान (अङ्गुल में, उसी माप-क्रम में जिस पर चित्र खींचा गया), g_iṣṭa = उस क्षण का इष्ट/आया हुआ ग्रास (अङ्गुल)।
योगार्ध ही वह दूरी है जिस पर दोनों परिधियाँ ठीक स्पर्श करती हैं (स्पर्श/मोक्ष की सीमा); ग्रास घटाने पर शेष, मध्य से उस स्थिति तक का केन्द्र-अन्तर का ज्यामितीय प्रतिबिम्ब है।

उदाहरण (worked example)
मान लें m_grāhya = 32 अङ्गुल, m_grāhaka = 80 अङ्गुल, और अभी g_iṣṭa = 20 अङ्गुल आया है (आंशिक ग्रास)।
योगार्ध = (32 + 80) ⁄ 2 = 56 अङ्गुल।
L = 56 − 20 = 36 अङ्गुल।
मध्यबिन्दु से 36 अङ्गुल की शलाका — यही अगले श्लोक में मार्ग-दिशा में बिछाई जाएगी। (माप-क्रम: वही अङ्गुल-मान जिसमें मण्डल खींचे गए हों।)

6.18
तयोर्मार्गोन्मुखीं दद्याद्ग्रासतः प्राग्ग्रहाश्रिताम् ।
विमुञ्चतो मोक्षदिशि ग्राहकाध्वानं एव सा ।।
tayormārgonmukhīṃ dadyādgrāsataḥ prāggrahāśritām ।
vimuñcato mokṣadiśi grāhakādhvānaṃ eva sā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तयोः = उन दोनों (ग्राह्य-ग्राहक) के; मार्ग-उन्मुखीम् = (सापेक्ष) पथ की ओर मुख किए; दद्यात् = रखे/बिछाए; ग्रासतः = ग्रास-बिन्दु/स्पर्श-प्रारम्भ से; प्राक् = पहले; ग्रह-आश्रिताम् = ग्रह (ग्राह्य) की ओर आश्रित; विमुञ्चतः = छोड़ते समय (मोक्ष-काल में); मोक्ष-दिशि = मोक्ष की दिशा में; ग्राहक-अध्वानम् एव = वही ग्राहक-पथ/मार्ग; सा = वह (शलाका)।

हिन्दी भावार्थ पिछली शलाका को दोनों पिण्डों के सापेक्ष मार्ग की दिशा में इस प्रकार बिछाएँ कि ग्रास-पक्ष में वह स्पर्श-स्थान से ग्राह्य की ओर झुकी रहे। जब पिण्ड छोड़ने — मोक्ष — की बात हो, तो वही शलाका मोक्ष-दिशा में, ग्राहक के ही मार्ग-अध्वान पर रखी जाए। एक ही मापदण्ड, दो दिशाएँ: प्रवेश (ग्रास) और निर्गमन (मोक्ष)।

English rendering Lay that rod along the mutual path of the two bodies, directed from the point of contact toward the eclipsed body at the onset of obscuration. At release, place the same rod along the eclipsing body’s path in the direction of mokṣa.

गणित / The Mathematics
सदिश-नियमन (रेखाचित्र पर):
- ग्रास-पक्ष: शलाका \(\vec{L}\) मार्ग-रेखा पर, स्पर्श/ग्रास-बिन्दु से ग्राह्य-मध्य की ओर।
- मोक्ष-पक्ष: वही L, मार्ग पर, मोक्ष-दिशा में (ग्राहक-अध्वान)।
यह कोणीय स्थिति का नहीं, पथ-रेखा पर केन्द्र-अन्तर का स्थान-निर्धारण है — SS की ग्रहण-ज्यामिति का दिशा-नियम।

6.19
स्पृशेद्यत्र ततो वृत्तं ग्राहकार्धेन संलिखेत् ।
तेन ग्राह्यं यदाक्रान्तं तत्तमोग्रस्तं आदिशेत् ।।
spṛśedyatra tato vṛttaṃ grāhakārdhena saṃlikhet ।
tena grāhyaṃ yadākrāntaṃ tattamograstaṃ ādiśet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्पृशेत् यत्र = जहाँ (शलाका) स्पर्श करे; ततः = वहाँ से; वृत्तम् = वृत्त; ग्राहक-अर्धेन = ग्राहक के अर्ध-मान (त्रिज्या) से; संलिखेत् = पूर्णतः लिखे/खींचे; तेन = उस (वृत्त) से; ग्राह्यम् = ग्रसित पिण्ड; यत् आक्रान्तम् = जो अंश आक्रान्त/ढका हो; तत् = वही; तमोग्रस्तम् = तमस् से ग्रस्त; आदिशेत् = घोषित करे।

हिन्दी भावार्थ जहाँ शलाका का सिरा मार्ग पर स्पर्श-स्थान को छूता है, वहीं से ग्राहक के अर्ध-मान — उसकी त्रिज्या — लेकर एक वृत्त खींचें। जो भाग इस वृत्त से ग्राह्य-मण्डल पर आक्रान्त दिखे, उसी को तमोग्रस्त — छाया/अन्धकार से ग्रसा हुआ — कहा जाए। यह श्लोक ग्रहण-रेखाचित्र को “दृश्य ग्रास” में बदल देता है: माप से आकृति, आकृति से घोषणा।

English rendering Where the rod meets (the path), from that point draw a circle with the half-measure (radius) of the eclipsing body. Whatever part of the eclipsed disc is overlaid by that circle is to be declared swallowed by darkness (tamas).

गणित / The Mathematics
स्पर्श-बिन्दु P पर:
वृत्त C_grāhaka: केन्द्र P′ (शलाका-निर्धारित स्थिति), त्रिज्या r_k = m_grāhaka ⁄ 2।
ग्रास-क्षेत्र = C_grāhaka ∩ चक्र_ग्राह्य
(ज्यामितीय प्रतिच्छेदी क्षेत्र; कोणीय/चाप-माप पाठ में अङ्गुल-वृत्त से पढ़ा जाता है, न कि पश्चिमी प्रक्षेप से)।

उदाहरण (worked example)
m_grāhaka = 80 अङ्गुल ⇒ r_k = 40 अङ्गुल; m_grāhya = 32 अङ्गुल ⇒ r_y = 16 अङ्गुल।
यदि शलाका L = 36 अङ्गुल मध्य से मार्ग पर रखी और P पर स्पर्श मिले, तो P से 40 अङ्गुल की त्रिज्या वाला वृत्त खींचें — ग्राह्य-वृत्त (r = 16) का जो भाग उसके भीतर पड़े, वही तमोग्रस्त अंश। (केवल रेखाचित्र-माप; कोई काल-रूपान्तर यहाँ नहीं।)

6.20
मानान्तरार्धेन मितां शलाकां ग्रासदिङ्मुखीम् ।
निमीलनाख्यां दद्यात्सा तन्मार्गे यत्र संस्पृशेत् ।।
mānāntarārdhena mitāṃ śalākāṃ grāsadiṅmukhīm ।
nimīlanākhyāṃ dadyātsā tanmārge yatra saṃspṛśet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मान-अन्तर-अर्धेन = दोनों मानों के अन्तर के आधे से; मिताम् = मापी हुई; शलाकाम् = दण्ड; ग्रास-दिक्-मुखीम् = ग्रास-दिशा की ओर मुख किए; निमीलन-आख्याम् = “निमीलन” नाम की; दद्यात् = रखे; सा = वह; तत्-मार्गे = उसी मार्ग पर; यत्र संस्पृशेत् = जहाँ स्पर्श करे।

हिन्दी भावार्थ अब पूर्ण-ग्रास की दहलीज़ — निमीलन — के लिए अलग शलाका चाहिए। ग्राह्य और ग्राहक के मानों का अन्तर लेकर आधा करें; उतनी माप की शलाका ग्रास-दिशा की ओर बिछाएँ। उसे निमीलन कहा गया है। जहाँ यह शलाका मार्ग पर स्पर्श करती है, वहीं से अगला वृत्त-लेखन शुरू होगा। आंशिक ग्रास की शलाका योगार्ध-घटाव थी; निमीलन की शलाका मानान्तरार्ध है — जब छाया-वृत्ते ग्राह्य को पूरी तरह घेरने लगे।

English rendering Set out a rod measured by half the difference of the two diameters, pointed in the direction of contact; call it nimīlana. Note where, along that path, it meets (the circle of contact).

गणित / The Mathematics
निमीलन-शलाका:
L_nim = |m_grāhaka − m_grāhya| ⁄ 2
(पूर्ण ग्रास तभी संभव जब m_grāhaka > m_grāhya; अन्यथा निमीलन-उन्मीलन नहीं — केवल आंशिक ग्रास।)
यह केन्द्र-दूरी है जिस पर ग्राहक-वृत्त ग्राह्य-वृत्त को भीतर से स्पर्श करता है (आंतरिक स्पर्श) — पूर्ण अन्धकार का आरम्भ।

उदाहरण (worked example)
m_grāhaka = 80, m_grāhya = 32 अङ्गुल।
L_nim = (80 − 32) ⁄ 2 = 24 अङ्गुल।
ग्रास-दिशा में मध्य से 24 अङ्गुल की शलाका = निमीलन-स्थिति का मापदण्ड।

6.21
ततो ग्राहकखण्डेन प्राग्वन्मण्डलं आलिखेत् ।
तद्ग्राह्यमण्डलयुतिर्यत्र तत्र निमीलनम् ।।
tato grāhakakhaṇḍena prāgvanmaṇḍalaṃ ālikhet ।
tadgrāhyamaṇḍalayutiryatra tatra nimīlanam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = वहाँ से; ग्राहक-खण्डेन = ग्राहक के (अर्ध/त्रिज्या-)खण्ड से; प्राग्वत् = पहले की भाँति; मण्डलम् = वृत्त; आलिखेत् = लिखे; तत् = वह (वृत्त); ग्राह्य-मण्डल-युतिः = ग्राह्य-वृत्त से संयोग; यत्र = जहाँ; तत्र = वहाँ; निमीलनम् = पूर्ण-ग्रास का आरम्भ (आँख-बंद होने-सा)।

हिन्दी भावार्थ निमीलन-शलाका जहाँ स्पर्श करती है, वहाँ से पहले की तरह ग्राहक-खण्ड (उसकी त्रिज्या) लेकर मण्डल खींचें। जिस बिन्दु/स्थान पर यह मण्डल ग्राह्य-मण्डल से युति करता है — वहीं निमीलन है: वह क्षण जब पिण्ड पूर्णतः छाया में डूबने लगता है, “आँखें बंद” हो जाती हैं। श्लोक नाम और ज्यामिति को एक ही रेखा पर बाँधता है।

English rendering From that point draw a circle with the eclipsing body’s (radius) segment, as before. Where that circle joins the disc of the eclipsed body — there is nimīlana, the onset of total immersion.

गणित / The Mathematics
केन्द्र-दूरी δ_nim = |m_grāhaka − m_grāhya| ⁄ 2 = r_k − r_y (जब r_k > r_y)।
आंतरिक स्पर्श: δ + r_y = r_k ⇒ पूर्ण आवरण का आरम्भ।
निमीलन = वह ज्यामितीय अवस्था; काल-रूपान्तर (कब घटे) अध्याय के गति/स्थिति-सूत्रों से अलग चरण में जोड़ा जाता है।

6.22
एवं उन्मीलने मोक्षदिङ्मुखीं सम्प्रसारयेत् ।
विलिखेन्मण्डलं प्राग्वदुन्मीलनं अथोक्तवत् ।।
evaṃ unmīlane mokṣadiṅmukhīṃ samprasārayet ।
vilikhenmaṇḍalaṃ prāgvadunmīlanaṃ athoktavat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; उन्मीलने = उन्मीलन (पूर्ण-ग्रास से बाहर निकलने) में; मोक्ष-दिक्-मुखीम् = मोक्ष-दिशा की ओर मुख किए; सम्प्रसारयेत् = फैलाए/बिछाए; विलिखेत् मण्डलम् = मण्डल लिखे; प्राग्वत् = पहलेवत्; उन्मीलनम् = पूर्ण-ग्रास का अन्त; अथ = और; उक्तवत् = जैसा कहा गया।

हिन्दी भावार्थ उन्मीलन — जब पूर्ण तमस् टूटकर पिण्ड फिर दिखने लगे — के लिए वही विधि उल्टी दिशा में चलाएँ। शलाका अब मोक्ष-दिशा की ओर प्रसारित की जाए; मण्डल पहले जैसा खींचा जाए। जहाँ युति बने, वही उन्मीलन — “आँखें खुलना”। निमीलन प्रवेश है, उन्मीलन निर्गमन; सममिति मार्ग की दो छोरों पर।

English rendering Likewise for unmīlana, stretch the rod toward the direction of release and draw the circle as before; unmīlana is then obtained in the manner already stated.

गणित / The Mathematics
उन्मीलन: वही L_unm = |m_grāhaka − m_grāhya| ⁄ 2, पर दिशा = मोक्ष-दिशा (ग्रास के विपरीत मार्ग-अध्वान)।
ज्यामितीय प्रतिबन्ध निमीलन के समरूप (आंतरिक स्पर्श); कालक्रम में निमीलन → मध्य-पूर्ण → उन्मीलन → मोक्ष।
पूर्ण-ग्रास-अवधि का रेखाचित्रीय आधार: दोनों सिरों पर समान मानान्तरार्ध-दूरी।

6.23
अर्धादूने सधूम्रं स्यात्कृष्णं अर्धाधिकं भवेत् ।
विमुञ्चतः कृष्णताम्रं कपिलं सकलग्रहे ।।
ardhādūne sadhūmraṃ syātkṛṣṇaṃ ardhādhikaṃ bhavet ।
vimuñcataḥ kṛṣṇatāmraṃ kapilaṃ sakalagrahe ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्धात् ऊने = (ग्रास) आधे से कम होने पर; सधूम्रम् = धुएँ-जैसा/धूमिल-रक्त; स्यात् = हो; कृष्णम् = काला; अर्धाधिकम् = आधे से अधिक; भवेत् = हो; विमुञ्चतः = छोड़ते समय (मोक्ष के समीप); कृष्ण-ताम्रम् = काला-ताँबई (कालिमा लिये ताम्र-वर्ण); कपिलम् = कपिल/पिंगल-वर्ण; सकल-ग्रहे = पूर्ण ग्रहण में।

हिन्दी भावार्थ ग्रस्त पिण्ड का रंग ग्रास की गहराई से बँधा है। जब छाया आधे से कम हो, आभा सधूम्र — धुएँ-सी, मद्धिम लाल-धूसर — रहती है; आधे से अधिक ग्रास पर वह कृष्ण हो जाती है। छूटते समय (विमुञ्चतः) वर्ण कृष्ण-ताम्र — काला-ताँबई — होता है; और सकल-ग्रह — पूर्ण आवरण — में कपिल। यह वर्ण-नियम प्रेक्षण-संकेत है, फलित-भय नहीं: कितना ढका, कैसा दिखे।

English rendering When less than half is obscured, the appearance is smoky-reddish (sadhūmra); when more than half, it becomes black. While it is being released (vimuñcataḥ) it is dark copper-red (kṛṣṇatāmra); when wholly eclipsed (sakalagrahe) it is tawny (kapila).

गणित / The Mathematics
वर्ण-सीमाएँ ग्रास-अनुपात g ⁄ m_grāhya से:
- g < m_grāhya ⁄ 2 → सधूम्र
- g > m_grāhya ⁄ 2 → कृष्ण
- विमोचन के समय (विमुञ्चतः) → कृष्ण-ताम्र
- g ≥ m_grāhya (सकल-ग्रह) → कपिल
यह श्रेणी-नियम है, न कि स्पेक्ट्रमी सूत्र; संख्यात्मक रंग-मापक पाठ में नहीं दिया।

उदाहरण (worked example)
m_grāhya = 32 अङ्गुल।
g = 12 (< 16) → सधूम्र; g = 20 (> 16) → कृष्ण; g = 32 (पूर्ण) → कपिल; मोक्ष के समय → कृष्ण-ताम्र। (केवल वर्गीकरण; प्रकाश-भौतिकी का दावा नहीं।)

सुधार · correction (2026-10-07) पहले सकल-ग्रहण को काला और मोक्ष को कपिल बताया था। “विमुञ्चतः कृष्णताम्रं, कपिलं सकलग्रहे” = छूटते समय काला-ताँबई, सम्पूर्ण ग्रहण में कपिल। Correction: as the words say.

सुधार · correction (2026-10-07) “सधूंरं” → “सधूम्रं”, “कृष्णतांरं” → “कृष्णताम्रं” (धूम्र, ताम्र: म्र, अनुस्वार नहीं), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। ss-parilekha.js `varna`; check: ss-parilekha.test.js. Correction: spelling.

6.24
रहस्यं एतद्देवानां न देयं यस्य कस्यचित् ।
सुपरीक्षितशिष्याय देयं वत्सरवासिने ।।
rahasyaṃ etaddevānāṃ na deyaṃ yasya kasyacit ।
suparīkṣitaśiṣyāya deyaṃ vatsaravāsine ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रहस्यम् = गूढ़ विद्या; एतत् = यह (पूर्वोक्त ग्रहण-ज्ञान/विधि); देवानाम् = देवताओं का; न देयम् = नहीं देना चाहिए; यस्य कस्यचित् = जिस-किसी को; सु-परीक्षित-शिष्याय = अच्छी तरह परखे हुए शिष्य को; देयम् = देना उचित; वत्सर-वासिने = वर्ष भर (गुरु-समीप) निवास करने वाले को।

हिन्दी भावार्थ ग्रन्थ यहाँ विधि से हटकर गुरु-शिष्य की अनुशासन-पंक्ति खींचता है। यह रहस्य देवताओं का कहा गया — यानी सहज बाँटने योग्य लौकिक खेल नहीं। जिस-किसी को नहीं; केवल उस शिष्य को दिया जाए जो सुपरीक्षित हो और गुरु के पास पूरे वर्ष रहा हो। ज्ञान की रक्षा यहाँ संकुचन नहीं, परिपक्वता की शर्त है: रेखा, माप और काल तभी सौंपे जाएँ जब धारण की पात्रता सिद्ध हो।

English rendering This is a secret of the gods; it is not to be given to just anyone. It may be imparted only to a thoroughly tested pupil who has lived (with the teacher) for a year.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/गुरु-शिष्य अनुशासन (विद्या-संप्रेषण की पात्रता)। एक वाक्य: गणना की शुद्धता जितनी कठिन है, उतनी ही कठिन पाठ की परंपरा में पात्र-चयन की शर्त — दोनों में “जल्दबाज़ी” अस्वीकृत।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक वर्ष गुरु-गृह में रहना मात्र “समय काटने” का नियम नहीं — रेखा, गोल, छाया और काल की त्रुटियाँ तभी पकड़ में आती हैं जब शिष्य एक पूर्ण ऋतु-चक्र देख चुका हो: ग्रीष्म की लम्बी छाया, वर्षा की धुँधली क्षितिज-रेखा, हेमन्त की तीक्ष्ण नक्षत्र-रात्रि। “सुपरीक्षित” का अर्थ परीक्षा-पत्र नहीं, बल्कि यह कि उसने माप में ग़लती भी की हो और सुधार भी सीखा हो। रहस्य यहाँ छिपाने का हथियार नहीं; अपरिपक्व हाथ में अधूरी विधि देने से पथ-रेखाएँ ही बिगड़ जातीं — इसलिए पाठ केवल उस शिष्य को सौंपा जाता था जो धारण और पुनरावृत्ति दोनों में सिद्ध हो।

अध्यायः 7

ग्रहयुत्यधिकारः

Planetary Conjunctions
24 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
यह अध्याय उन क्षणों का गणित खोलता है जब दो ग्रह आकाश-वृत्त पर एक ही रेखा-कला में मिलते हैं — यति, युद्ध और सूर्य-चन्द्र के साथ समागम। यहाँ केवल “कौन-कहाँ है” नहीं पूछा जाता; पूछा जाता है — संयोग बीत चुका है या आने वाला है, और कितनी कला-भुक्ति के बाद वह क्षण आयेगा। शीघ्र-मन्द, प्राग्यायि-वक्र, अनुलोम-विलोम — इन्हीं सापेक्ष गतियों से भूतकाल और भविष्य का निर्णय बनता है; ग्रहान्तर को भुक्त्यन्तर (या वक्र-युगल में भुक्ति-योग) से भाग देने पर दिन-लिप्ता फल निकलता है। सौंदर्य इसी में है कि युद्ध और समागम को अलग-अलग काव्य नहीं, एक ही अनुपात-शास्त्र के दो फल मान लिया गया है — जब दोनों समालिप्त हों, वृत्त पर वे एक स्थान पर हैं, और विवर से ही दिनादि फल इष्ट होता है।

For the English reader:
Adhyāya 7 turns true longitudes into meetings: the mutual yuddha and samāgama of the star-planets, conjunction with the Moon, and the solar setting that swallows a body in the Sun’s glare. The text does not stop at “they share a degree”; it decides whether the contact is already past or still ahead from the relative order of the swifter and slower motions, and from whether each body is direct or retrograde. Arc-separation in minutes is then divided by the difference of daily motions when both go the same way, or by their sum when one is reversed — a clean first-order intercept that yields the time-offset in liptā and days. Beauty here is operational, not ornamental: the same arithmetic that stages a planetary war also times an ordinary conjunction, and equality of longitudes on the bhagaṇa is the geometric fixed point from which the calendar residual is read.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- संयोग-काल (समान दिशा): \( t = \dfrac{|\lambda_2 - \lambda_1|}{|\dot\lambda_2 - \dot\lambda_1|} \) — ग्रहान्तरकला ÷ भुक्त्यन्तर
- संयोग-काल (एक वक्र / विलोम): \( t = \dfrac{|\lambda_2 - \lambda_1|}{\dot\lambda_1 + \dot\lambda_2} \) — ग्रहान्तर ÷ भुक्तियोग
- भूत/भविष्य नियम: शीघ्रे मन्दाधिके → अतीत; अन्यथा भविष्य (वक्र-युगल पर विपर्यय; प्राग्यायि-अधिके वक्रिण्येष्यः)
- चिह्न-नियोजन: लब्ध लिप्ता — गते शोध्यं, भविष्ये देयं; वक्र-गति-युगल में धन-व्यय विपर्ययात्
- समालिप्ति-शर्त: \( \lambda_1 \equiv \lambda_2 \pmod{360^\circ} \) → समागम; विवर से दिनादि फल
- प्रकार-विभाजन: ताराग्रह-युद्ध/समागम; शशाङ्क-समागम; सूर्येणास्त (heliacal extinction geometry)

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। अध्याय-२ का शुद्ध मन्द-शीघ्र स्फुट और math-core की मध्यम-भुक्ति परत यति के लिए आवश्यक \(\lambda,\dot\lambda\) तो दे सकती हैं, पर ग्रहान्तर–भुक्त्यन्तर से दिनादि फल, वक्र-विपर्यय नियम, और युद्ध/अस्त-वर्गीकरण का pinned exact-equality oracle अभी सील नहीं हुआ — उसी श्रृंखला को काला-सत्यापन-ढाँचे में बाँधना इस अध्याय का डिकोड होगा।

काल (दिन) →भोगांश ↑शीघ्रगामीमन्दगामीयुतियुति-काल = शेषान्तर ÷ गति-अन्तर
ग्रह-युति — planetary conjunction (SS ch.7): two planets share a longitude; whether it is a mere yuti (meeting) or a yuddha (occultation-battle) depends on their latitude gap at that instant. The time of meeting comes from relative daily motion — a pursuit problem.
7.1
ताराग्रहाणां अन्योन्यं स्यातां युद्धसमागमौ ।
समागमः शशाङ्केन सूर्येणास्तमनं सह ।।
tārāgrahāṇāṃ anyonyaṃ syātāṃ yuddhasamāgamau ।
samāgamaḥ śaśāṅkena sūryeṇāstamanaṃ saha ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ताराग्रह = सूर्य-चन्द्र को छोड़कर पाँच तारामय ग्रह, अन्योन्यं = परस्पर, युद्ध = युति-विशेष (संघर्ष/युद्ध-संज्ञा), समागम = युति/संयोग, शशाङ्क = चन्द्र, सूर्येण = सूर्य के साथ, अस्तमन = अस्त (दहन/सूर्य-संयोग)।

हिन्दी भावार्थ ताराग्रहों के बीच परस्पर दो प्रकार की निकटता होती है—युद्ध और समागम। चन्द्रमा के साथ होने वाली युति को समागम कहते हैं; सूर्य के साथ होने वाली युति को अस्तमन (अस्त) कहते हैं। इस प्रकार अध्याय की शब्दावली स्वयं तय कर देती है कि कौन-सी युति किस नाम से जानी जाएगी।

English rendering Among the star-planets, mutual yuddha and samāgama may occur. Conjunction with the Moon is called samāgama; conjunction with the Sun is astamana (setting/combustion).

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — परिभाषा/वर्गीकरण। यह श्लोक युति-प्रकरण की नामावली बाँधता है: ग्रह–ग्रह (युद्ध/समागम), ग्रह–चन्द्र (समागम), ग्रह–सूर्य (अस्त)।

हमारा डिकोड (Our Decode) समागम/युद्ध का कोई भी संख्यात्मक निर्णय पहले sphuṭa देशान्तर माँगता है। `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` (अध्याय 2 की मन्द+शीघ्र श्रृंखला) वही शुद्ध SS-स्फुट देता है जिस पर बाद के दिन–अन्तर के सूत्र चलते हैं—पश्चिमी प्रमेय श्रृंखला में नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) आकाश में दो “निकटताएँ” दिख सकती हैं, पर नाम अलग हैं क्योंकि साथी अलग हैं। मङ्गल और बृहस्पति जब एक ही नक्षत्र-पट्टी में पास आएँ — वह युद्ध या समागम की भाषा में ताराग्रह-युति है; चन्द्रमा के साथ वही निकटता समागम कहलाती है; सूर्य के साथ मिलकर ग्रह दृष्टि से ओझल हो तो वह अस्तमन। एक ही ज्यामितीय घटना — कोणीय निकटता — तीन नाम इसलिए पाती है कि प्रेक्षण का प्रश्न बदल जाता है: क्या दो ग्रह एक-दूसरे से टकराते-से दिखे, क्या चन्द्र के पास जगमगाए, या क्या सूर्य-प्रकाश में लुप्त हुए। यह शब्दावली आगे अध्याय ७ के युति–युद्ध-साधन में परिभाषा-सूत्र बनती है।

7.2
शीघ्रे मन्दाधिके अतीतः संयोगो भवितान्यथा ।
द्वयोः प्राग्यायिनोरेवं वक्रिणोस्तु विपर्ययात् ।।
śīghre mandādhike atītaḥ saṃyogo bhavitānyathā ।
dvayoḥ prāgyāyinorevaṃ vakriṇostu viparyayāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शीघ्र = अधिक भुक्ति वाला (द्रुत), मन्द = कम भुक्ति वाला (मन्द), अधिके = देशान्तर में आगे, अतीतः = बीता हुआ संयोग, संयोग = युति, भविष्यति अन्यथा = अन्यथा भावी, प्राग्यायिन् = पूर्व/अनुलोम गामी (वक्र नहीं), वक्रिणोः = दोनों वक्र हों तो, विपर्ययात् = उलटा नियम।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों ग्रह अनुलोम (पूर्वाभिमुख) चल रहे हों, तो यदि द्रुत ग्रह मन्द ग्रह से देशान्तर में आगे हो, तो संयोग बीत चुका है; अन्यथा संयोग आने वाला है। दोनों वक्र हों तो यही परीक्षा उलटी हो जाती है—क्योंकि वक्र में “आगे–पीछे” का सापेक्ष अर्थ पलट जाता है। दिशा एक हो, तभी “अतीत/भावी” का यह सरल चिह्न लागू होता है।

English rendering When both planets are direct, if the swifter stands at greater longitude than the slower, the conjunction is past; otherwise it is still to come. If both are retrograde, reverse the test.

गणित / The Mathematics चिह्न-परीक्षा (संयोग-काल की दिशा):
- दोनों अनुलोम: यदि λ_शीघ्र > λ_मन्द ⇒ संयोग अतीत; अन्यथा भावी।
- दोनों वक्र: नियम विपर्यय (λ_शीघ्र > λ_मन्द ⇒ भावी, इत्यादि)।
यहाँ “शीघ्र/मन्द” का अर्थ दैनिक भुक्ति |μ| से है, न कि मन्द-परिधि से।

उदाहरण (worked example) मान लें मंगल λ = 120°20′, बुध λ = 118°10′, दोनों अनुलोम; |μ_बुध| > |μ_मंगल| ⇒ बुध द्रुत। λ_द्रुत < λ_मन्द ⇒ संयोग अभी भावी (7.02 का “अन्यथा”)।

7.3
प्राग्यायिन्यधिके अतीतो वक्रिण्येष्यः समागमः ।
ग्रहान्तरकलाः स्वस्वभुक्तिलिप्ताः समाहताः ।।
prāgyāyinyadhike atīto vakriṇyeṣyaḥ samāgamaḥ ।
grahāntarakalāḥ svasvabhuktiliptāḥ samāhatāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राग्यायिनि अधिके = अनुलोम वाले का देशान्तर अधिक हो, अतीतः = बीता, वक्रिणि एष्यः = वक्र वाले का अधिक हो तो भावी समागम, ग्रहान्तरकलाः = दोनों के देशान्तर का अन्तर कलाओं में, स्वस्वभुक्तिलिप्ताः = अपनी-अपनी दैनिक भुक्ति लिप्ता में, समाहताः = (अगले श्लोक की भाजक-विधि से) संयुक्त/प्रयुक्त।

हिन्दी भावार्थ जब एक अनुलोम और एक वक्र हो, तो यदि अनुलोम ग्रह देशान्तर में आगे हो तो समागम बीत चुका; यदि वक्र आगे हो तो समागम अभी आना है। काल-साधना के लिए दोनों ग्रहों का देशान्तरांतर कलाओं में लें और उसे आगे बताई गई भुक्ति-विधि से जोड़ें—यही अगले दो श्लोकों का द्वार है।

English rendering If one planet is direct and the other retrograde: when the direct one has the greater longitude, conjunction is past; when the retrograde one has it, conjunction is future. Take the difference of their longitudes in minutes of arc, to be used with their daily motions as the next verses prescribe.

गणित / The Mathematics मिश्र-गति चिह्न:
- μ₁ > 0 (अनुलोम), μ₂ < 0 (वक्र): λ_अनुलोम > λ_वक्र ⇒ अतीत; λ_वक्र > λ_अनुलोम ⇒ एष्य।
Δλ (कला) = |λ₁ − λ₂| × 60 (यदि λ अंश में)।
अगला चरण: Δt = Δλ ÷ (भुक्त्यन्तर या भुक्तियोग) — 7.04।

उदाहरण (worked example) शनि λ = 45°.0 अनुलोम, मंगल λ = 46°.5 वक्र ⇒ λ_वक्र अधिक ⇒ समागम एष्य (7.03ab)। Δλ = 1°.5 = 90 कला।

7.4
भुक्त्यन्तरेण विभजेदनुलोमविलोमयोः ।
द्वयोर्वक्रिण्यथैकस्मिन्भुक्तियोगेन भाजयेत् ।।
bhuktyantareṇa vibhajedanulomavilomayoḥ ।
dvayorvakriṇyathaikasminbhuktiyogena bhājayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्त्यन्तरेण = दैनिक भुक्तियों के अन्तर से, विभजेत् = भाग दे, अनुलोमविलोमयोः = दोनों एक दिशा में (अनुलोम-अनुलोम या वक्र-वक्र — “समान-दिशा”) चलने पर, द्वयोः वक्रिणि = दोनों वक्र—पाठानुसार समान-दिशा पक्ष में ही, अथवा एकस्मिन् = एक वक्र एक अनुलोम, भुक्तियोगेन = भुक्तियों के योग से, भाजयेत् = भाग दे।

हिन्दी भावार्थ दोनों ग्रह एक ही दिशा में चल रहे हों (दोनों अनुलोम अथवा दोनों वक्र), तो देशान्तरांतर को उनकी दैनिक भुक्तियों के अन्तर से भाग दें। एक अनुलोम और एक वक्र हो—अर्थात् विपरीत दिशा—तो अन्तर को भुक्तियों के योग से भाग दें। भागफल ही वह काल-मान है जो युति तक या युति से बीता हुआ बताया जाएगा।

English rendering Divide the longitude-difference by the difference of the two daily motions when both move in the same sense (both direct or both retrograde). When one is direct and one retrograde, divide by the sum of the daily motions.

गणित / The Mathematics संयोग तक/से काल (दिन में):
- समान दिशा: Δt = Δλ_कला ÷ |μ₁ − μ₂|_कला/दिन
- विपरीत दिशा: Δt = Δλ_कला ÷ (|μ₁| + |μ₂|)_कला/दिन
जहाँ μ दैनिक भुक्ति (स्फुट या मध्य—परम्परा में प्रसंगानुसार), Δλ = |λ₁ − λ₂| कलाओं में। परिणाम लिप्तादि काल में आता है (7.05)।

उदाहरण (worked example) Δλ = 90 कला; μ₁ = 48′/दिन, μ₂ = 14′/दिन, दोनों अनुलोम।
Δt = 90 ÷ |48 − 14| = 90 ÷ 34 ≈ 2.647 दिन ≈ 2 दिन 38;49 घटी (1 दिन = 60 घटी)।

हमारा डिकोड (Our Decode) μ स्वयं दिन-गणना पर निर्भर है। SS-canon 1,577,917,828 नागरिक दिन/महायुग (`math-core`) और आर्यभट 1,577,917,500 (`vedic-ghadi`)—328 दिन का अन्तर—भुक्ति की दर को हल्के से हिलाता है; तithi-engine पर यह अन्तर सबसे तीखा पड़ता है, युति-Δt पर भी वही धारा बहती है।

7.5
लब्धं लिप्तादिकं शोध्यं गते देयं भविष्यति ।
विपर्ययाद्वक्रगत्योरेकस्मिंस्तु धनव्ययौ ।।
labdhaṃ liptādikaṃ śodhyaṃ gate deyaṃ bhaviṣyati ।
viparyayādvakragatyorekasmiṃstu dhanavyayau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लब्धं = भागफल, लिप्तादिकं = कला आदि काल-मान, शोध्यं गते = अतीत संयोग में घटनीय, देयं भविष्यति = भावी में योज्य, विपर्ययात् = उलटा, वक्रगत्योः = दोनों वक्र गति में, एकस्मिन् = केवल एक वक्र हो, धनव्ययौ = धन/ऋण (जोड़/घटाव) का विपर्यय।

हिन्दी भावार्थ ऊपर मिला लिप्तादि फल यदि संयोग बीत चुका हो तो वर्तमान देशान्तर से घटाएँ; यदि संयोग आने वाला हो तो जोड़ें—यही अतीत/भावी का साधारण नियम है। दोनों ग्रह वक्र हों तो धन–ऋण पलट जाते हैं। केवल एक वक्र हो तो भी जोड़–घटाव का पक्ष विपर्यय से साधना होता है, ताकि प्राप्त क्षण पर दोनों देशान्तर बराबर बैठें।

English rendering The quotient, in minutes and so on, is subtracted when conjunction is past and added when it is future. Reverse the add/subtract rule when both are retrograde; when only one is retrograde, invert the credit and debit accordingly.

गणित / The Mathematics काल-संशोधन:
- अनुलोम-युग्म, अतीत: t_now − Δt; भावी: t_now + Δt।
- दोनों वक्र: चिह्न विपर्यय।
- एक वक्र: धन/व्यय का पक्ष 7.03 की अतीत–एष्य परीक्षा से बाँधकर उलटा लागू।
लक्ष्य: λ₁(t★) = λ₂(t★) (भगण-वृत्त पर समान देशान्तर)।

उदाहरण (worked example) t₀ पर Δt = 2.647 दिन, परीक्षा = भावी, दोनों अनुलोम ⇒ t★ = t₀ + 2.647 दिन। यदि वही युग्म दोनों वक्र और परीक्षा “भावी” लगे, तो 7.05 के विपर्यय से घटाव पक्ष चुनें।

7.6
समालिप्तौ भवेतां तौ ग्रहौ भगणसंस्थितौ ।
विवरं तद्वदुद्धृत्य दिनादिफलं इष्यते ।।
samāliptau bhavetāṃ tau grahau bhagaṇasaṃsthitau ।
vivaraṃ tadvaduddhṛtya dinādiphalaṃ iṣyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समालिप्तौ = समान लिप्ता/समान देशान्तर, भवेतां तौ ग्रहौ = वे दोनों ग्रह, भगणसंस्थितौ = एक ही भगण-स्थिति में, विवरं = अन्तर (पूर्व-साधित कालान्तर), तद्वत् उद्धृत्य = उसी रीति से निकालकर, दिनादिफलं = दिन आदि में फल, इष्यते = अभीष्ट है।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों ग्रह भगण-वृत्त पर समान कला-देशान्तर पर स्थित हों, तभी वास्तविक समागम-क्षण है। पहले जो विवर (देशान्तरांतर) लिया गया, उसी को भुक्ति-विधि से दिनादि फल में बदलकर अभीष्ट काल कहा जाता है—अर्थात् 7.03–7.05 की पूरी श्रृंखला यहीं फलित होती है।

English rendering The two planets are in true conjunction when they stand at equal longitude on the circle of revolutions. Extracting the interval in the manner above yields the desired result in days and so on.

गणित / The Mathematics परिभाषा: समागम ⇔ λ₁ ≡ λ₂ (mod 360°), लिप्ता-समानता तक।
काल: t★ = t₀ ± Δt, जहाँ Δt = Δλ / |μ₁ ∓ μ₂| (7.04 का अन्तर/योग)।
दिनादि = पूर्ण दिन + घटी + पल… (1 दिन = 60 घटी = 3,600 पल)।

उदाहरण (worked example) t₀ = दिन 0; Δλ = 90′, |μ₁ − μ₂| = 34′/दिन, भावी ⇒ t★ = dig 2 + (0.647 × 60) घटी ≈ दिन 2, घटी 38;49। उस क्षण जाँच: λ₁(t★) − λ₂(t★) ≈ 0।

हमारा डिकोड (Our Decode) दिनादि को घटी/पल में खोलना हमारी मेट्रोलॉजी से सीधा जुड़ता है: 1 दिन = 60 घटी = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण (`MATHEMATICAL-AUDIT` §1)। प्राण↔चाप-मिनट की 21,600-गिनती गणना-संगति है, समय और कोण की भौतिक एकता नहीं।

7.7
कृत्वा दिनक्षपामानं तथा विक्षेपलिप्तिकाः ।
नतोन्नतं साधयित्वा स्वकाल्लग्नवशात्तयोः ।।
kṛtvā dinakṣapāmānaṃ tathā vikṣepaliptikāḥ ।
natonnataṃ sādhayitvā svakāllagnavaśāttayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृत्वा = करके, दिनक्षपामानं = दिन और रात्रि का मान, विक्षेपलिप्तिकाः = विक्षेप (क्रान्तिवृत्त से अक्षांश) की कलाएँ, नतोन्नतं = नत और उन्नत (क्षितिज-सम्बन्धी अवनमन/उन्नयन), साधयित्वा = साधकर, स्वकाल्लग्नवशात् = अपने-अपने काल के लग्न के वश से, तयोः = उन दोनों का।

हिन्दी भावार्थ केवल समान देशान्तर पर्याप्त नहीं—दृश्य युद्ध/समागम के लिए दिन–रात्रि मान, दोनों के विक्षेप (कलाओं में), और नत–उन्नत भी साधने पड़ते हैं। ये सब प्रत्येक ग्रह के अपने काल-लग्न के अनुसार निकलते हैं, ताकि क्षितिज और याम्योत्तर के सापेक्ष उनकी स्थिति तुलनीय हो। यह श्लोक दृश्य-ज्यामिति की ओर मुड़ता है।

English rendering Compute the lengths of day and night, the celestial latitudes in minutes, and the depression and elevation of each, determined from the ascendant proper to each planet’s own time.

गणित / The Mathematics सहायक राशियाँ (युद्ध/दृश्य-युति के लिए):
- दिनमान / रात्रिमान (स्थान, क्रान्ति, अक्षांश पर निर्भर)
- β₁, β₂ = विक्षेप कलाओं में
- नत/उन्नत: लग्न L(t) और ग्रह की स्वकाल-स्थिति से
लग्न-स्तरीय ज्यामिति आगे 7.08 में छाया-सूत्र से जुड़ती है।

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्न और भाव-मध्य परत `bharat-ephemeris-offline` में बंद-रूप में बँधी है—देशान्तर, अक्षांश, तिर्यकता, स्थानीय तारकीय समय से लग्न; Swiss-fixture से ≤ 0.1° सहमति; RA(MC) ≡ LST 1e-9° तक (`MATHEMATICAL-AUDIT` §8)। युद्ध-प्रकरण का “स्वकाल्लग्न” उसी यंत्र पर बैठता है।

7.8
विषुवच्छाययाम्यस्तद्विक्षेपाद्द्वादशोद्धृतात् ।
फलं स्वनतनाडीघ्नं स्वदिनार्धविभाजितम् ।।
viṣuvacchāyayāmyastadvikṣepāddvādaśoddhṛtāt ।
phalaṃ svanatanāḍīghnaṃ svadinārdhavibhājitam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विषुवच्छायया = विषुवद्-दिन की मध्यछाया से, आम्यात् = दक्षिणायन/याम्य पक्ष से (पाठ: याम्य), तद्विक्षेपात् = उस विक्षेप से, द्वादश उद्धृतात् = बारह से भाग देकर, फलं = लब्धि, स्वनतनाडीघ्नं = अपनी नत-नाड़ी से गुणा, स्वदिनार्धविभाजितम् = अपने दिनार्ध से भागित।

हिन्दी भावार्थ विषुवद्-छाया (याम्य) और विक्षेप को लेकर बारह से भाग देने पर एक फल मिलता है। उस फल को ग्रह की अपनी नत-नाड़ियों से गुणा कर, उसके अपने दिनार्ध से भाग दें—यही नत/उन्नत या दृश्य-अवनमन की साधना का अंश है, जिससे दो ग्रहों की युति केवल देशान्तर-समानता नहीं, दृष्टि-पथ पर कितनी “ऊँची–नीची” बैठती है, यह तौलने योग्य होती है।

English rendering From the equinoctial shadow (southward) and from the latitude, divided by twelve, take the result; multiply by the planet’s own hour-angle in nāḍīs and divide by its own half-day — yielding the required depression/elevation component.

गणित / The Mathematics (श्लोकानुसार सोपान, यूनिट: नाड़ी = घटी)
1. विषुवच्छाय (याम्य) और विक्षेप β से:
R = (संबंधित छाया/विक्षेप-राशि) ÷ 12
(पाठ “तद्विक्षेपाद् द्वादशोद्धृतात्” — विक्षेप को 12 से भाग; छाया-पद विषुवत्-याम्य निर्देश देता है।)
2. नतोन्नत-फल ≈ (R × nata_nāḍī) ÷ (दिनार्ध_nāḍī)
जहाँ दिनार्ध = दिनमान/2 (नाड़ियों में); नत-नाड़ी = मध्याह्न से काल-कोण घटी में।
पूर्ण युद्ध-परीक्षा में यह फल दोनों ग्रहों पर अलग-अलग साधकर विक्षेप-अन्तर से मिलाया जाता है (आगामी श्लोक-श्रृंखला में)।

उदाहरण (worked example) मान लें β-संबंधी द्वादश-लब्धि R = 0.4 (आयाम-रहित अनुपात), नत = 8 नाड़ी, दिनार्ध = 15 नाड़ी।
फल = (0.4 × 8) ÷ 15 = 3.2 ÷ 15 ≈ 0.213 (वही इकाई-क्रम जिसमें R लिया गया—दृश्य अवनमन-घटक)।
कन्वेंशन: स्थानीय अक्षांश, दिनमान, और स्फुट β स्पष्ट घोषित होने पर ही संख्या अन्तिम कही जाए।

सुधार · correction (2026-10-07) पाठ क्षत है: “विषुवच्छाययाम्यस्तद्” में “याम्य” (दक्षिण) क्षति का अंश है; पठन “विषुवच्छाययाभ्यस्ताद् विक्षेपाद् द्वादशोद्धृतात्” = विक्षेप को पलभा से गुणा कर 12 से भाग [reading] — जो ss-udaya.js और ss-graha.js का आक्ष-दृक्कर्म है। Reading of damaged e-text.

7.9
लब्धं प्राच्यां ऋणं सौम्याद्विक्षेपात्पश्चिमे धनम् ।
दक्षिणे प्राक्कपाले स्वं पश्चिमे तु तथा क्षमः ।।
labdhaṃ prācyāṃ ṛṇaṃ saumyādvikṣepātpaścime dhanam ।
dakṣiṇe prākkapāle svaṃ paścime tu tathā kṣamaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लब्धं = पूर्व-सूत्र से प्राप्त फल; प्राच्यां = पूर्व दिशा में; ऋणं = घटाव; सौम्यात् विक्षेपात् = उत्तर अक्षांश से; पश्चिमे = पश्चिम में; धनम् = योग; दक्षिणे = दक्षिण अक्षांश में; प्राक्कपाले = पूर्व-गोले/पूर्वार्ध में; स्वं = स्वभावानुसार उल्टा/विपरीत चिह्न; पश्चिमे तथा क्षमः = पश्चिम में भी वही नियम यथायोग्य लागू।

हिन्दी भावार्थ विक्षेप से निकला हुआ लब्ध-फल दिशा और अक्षांश-चिह्न पर निर्भर करता है। जब ग्रह का विक्षेप उत्तर (सौम्य) हो, तो पूर्व में वह फल ऋण माना जाता है और पश्चिम में धन। दक्षिण विक्षेप होने पर चिह्न उल्टे हो जाते हैं — पूर्व-कपाल में “स्व” अर्थात् उत्तर-नियम का प्रतिलोम, और पश्चिम में भी वही प्रतिलोम यथायोग्य चलता है। यह दिशा-नियंत्रित चिह्न-व्यवस्था दृक्कर्म/योग-साधना में अक्षांश-शुद्धि का द्वार है।

English rendering The correction obtained from latitude is subtractive in the east and additive in the west when the latitude is northern; when the latitude is southern the signs reverse in the eastern hemisphere, and the same reversed rule applies in the west.

गणित / The Mathematics चिह्न-नियम (विक्षेप × दिशा):
- विक्षेप उत्तर: पूर्व → − (ऋण), पश्चिम → + (धन)
- विक्षेप दक्षिण: पूर्व-कपाल → चिह्न उल्टा, पश्चिम → उसी प्रतिलोम से
यहाँ संख्यात्मक गुणांक नहीं — केवल ऋण/धन-नियमन। “लब्ध” पूर्व-श्लोक की प्रक्रिया से आता है; यह श्लोक उसका दिशात्मक अनुप्रयोग बताता है।

सुधार · correction (2026-10-07) पाठ “क्षमः” क्षत है; पठन “क्षयः” (ऋण) [reading]। “स्वं” = धन (जोड़), उलटा नहीं: उत्तर विक्षेप पूर्व में ऋण, पश्चिम में धन; दक्षिण विक्षेप पूर्व-कपाल में धन, पश्चिम में ऋण। Reading of damaged e-text; svaṃ = additive.

7.10
सत्रिभग्रहजक्रान्तिभागघ्नाः क्षेपलिप्तिकाः ।
विकलाः स्वं ऋणं क्रान्तिक्षेपयोर्भिन्नतुल्ययोः ।।
satribhagrahajakrāntibhāgaghnāḥ kṣepaliptikāḥ ।
vikalāḥ svaṃ ṛṇaṃ krāntikṣepayorbhinnatulyayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सत्रिभ = + ३ राशि (९०°) सहित; ग्रहज-क्रान्ति-भाग = ग्रह-स्थित से उत्पन्न क्रान्ति के अंश; घ्नाः = गुणित; क्षेप-लिप्तिकाः = विक्षेप की कलाएँ; विकलाः = परिणाम विकला (अर्कसेकण्ड); स्वं ऋणं = धन/ऋण यथायोग्य; क्रान्ति-क्षेपयोः भिन्न-तुल्ययोः = क्रान्ति और विक्षेप समान-दिशा या विपरीत-दिशा होने पर।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की स्थिति में तीन राशि जोड़कर जो क्रान्ति-अंश बनते हैं, उन्हीं से विक्षेप की कलाओं को गुणा करें — फल विकला में आता है। क्रान्ति और विक्षेप यदि भिन्न दिशा के हों तो एक चिह्न, यदि तुल्य दिशा के हों तो दूसरा — “स्वं ऋणं” उसी भेद-तुल्य नियम से तय होता है। यह अक्षांश-क्रान्ति का सूक्ष्म संयुक्त संशोधन है, स्थूल विक्षेप के ऊपर की परत।

English rendering Multiply the minutes of latitude by the degrees of declination formed from the planet’s place advanced by three signs; the product is in arc-seconds, applied as additive or subtractive according as declination and latitude are of unlike or like direction.

गणित / The Mathematics
δ_corr (″) = kṣepa_liptikāḥ × krānti_bhāgāḥ(λ + 3 rāśi)
= kṣepa′ × δ°(λ + 90°)
चिह्न: क्रान्ति व विक्षेप भिन्न दिशा → एक पक्ष (स्वं); तुल्य दिशा → ऋण/विपरीत पक्ष (पाठ-परंपरा अनुसार चिह्न-युग्म बाँधें)। इकाई: लिप्ता × भाग = विकला।

उदाहरण (worked example) मान लें विक्षेप = २४′, और (λ + ९०°) पर क्रान्ति = १०° (उत्तरा)।
δ_corr = २४ × १० = २४०″ = ४′।
यदि क्रान्ति व विक्षेप तुल्य-दिशा हों तो यह फल ऋण पक्ष में लगाया जाता है; भिन्न-दिशा पर धन (श्लोक के भिन्न/तुल्य नियम के अनुसार)।

7.11
नक्षत्रग्रहयोगेषु ग्रहास्तोदयसाधने ।
शृङ्गोन्नतौ तु चन्द्रस्य दृक्कर्मादाविदं स्मृतम् ।।
nakṣatragrahayogeṣu grahāstodayasādhane ।
śṛṅgonnatau tu candrasya dṛkkarmādāvidaṃ smṛtam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नक्षत्र-ग्रह-योगेषु = नक्षत्र-ग्रह संयोगों में; ग्रहास्तोदय-साधने = ग्रहों के उदयास्त-निर्धारण में; शृङ्गोन्नतौ = चन्द्र-शृंगों की उन्नति (शीर्ष-उभार) में; तु चन्द्रस्य = विशेषतः चन्द्र का; दृक्कर्मादौ = दृक्कर्म आदि प्रक्रियाओं में; इदं स्मृतम् = यही (पूर्वोक्त संशोधन) स्मरण/शास्त्र-सिद्ध है।

हिन्दी भावार्थ ऊपर बताई गई दृक्कर्म-विक्षेप शुद्धि केवल एक जगह काम नहीं आती। नक्षत्रों के साथ ग्रहों के योग में, ग्रहों के उदय-अस्त साधने में, और चन्द्रमा की शृंगोन्नति — चन्द्र-कलाओं के उभार — में भी यही क्रम लागू माना गया है। श्लोक उपयोग-क्षेत्र खोलता है: एक ही दृक्-संशोधन-श्रृंखला तीनों प्रसंगों की नींव है।

English rendering This same procedure, beginning with the dṛk-karma corrections, is prescribed for planet–nakṣatra conjunctions, for determining the rising and setting of the planets, and for the elevation of the Moon’s cusps.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — अनुप्रयोग-सूची / विधि-क्षेत्र-निर्देश।
एक वाक्य: दृक्कर्म-श्रृंखला को योग, उदयास्त और शृंगोन्नति — तीनों में समान रूप से “स्मृत” ठहराकर अध्याय की एकता बाँधता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) दृक्कर्म और विक्षेप-शुद्धि केवल एक तालिका का अलंकार नहीं। ग्रह जब किसी नक्षत्र से योग साधे, या क्षितिज पर उदय–अस्त की घड़ी निकाले, या चन्द्रमा की दोनों शृंग (कला-कोनों) की ऊँचाई शृङ्गोन्नति में तौले — तीनों जगह आँख और गणना के बीच वही अक्षांश–अयन–विक्षेप संशोधन-श्रृंखला काम करती है। सोचिए: एक ही ग्रह की “सच्ची” स्थिति तीन प्रश्नों का उत्तर देती है — किस तारे के पास है, कब क्षितिज छूता है, चन्द्र-कला कितनी तिरछी उठती है — और आधार एक ही दृक्-क्रम है। यह उपयोग-क्षेत्र अध्याय ७ तथा चन्द्र-शृंग के खण्डों में बार-बार गणित बनकर लौटता है।

7.12
तात्कालिकौ पुनः कार्यौ विक्षेपौ च तयोस्ततः ।
दिक्तुल्ये त्वन्तरं भेदे योगः शिष्टं ग्रहान्तरम् ।।
tātkālikau punaḥ kāryau vikṣepau ca tayostataḥ ।
diktulye tvantaraṃ bhede yogaḥ śiṣṭaṃ grahāntaram ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तात्कालिकौ = उस क्षण के; पुनः कार्यौ = फिर से साधने योग्य; विक्षेपौ = दोनों (ग्रहों) के अक्षांश; तयोः ततः = फिर उन दोनों से; दिक्तुल्ये = दिशा समान हो तो; अन्तरं = अन्तर; भेदे = दिशा भिन्न हो तो; योगः = योग; शिष्टं = शेष; ग्रहान्तरम् = ग्रहों का (सच्चा) अन्तराल।

हिन्दी भावार्थ योग-साधना में केवल मध्य/स्फुट देशान्तर काफी नहीं — दोनों ग्रहों के तात्कालिक विक्षेप अलग से निकालने पड़ते हैं। यदि दोनों विक्षेप एक ही दिशा के हों तो उनका अन्तर लो; विपरीत दिशा के हों तो योग करो। वही शेष, देशान्तर के साथ मिलकर, सच्चा ग्रहान्तर बनता है। दिशा-भेद यहाँ जोड़-घटाव का द्वारपाल है।

English rendering Compute again the two instantaneous latitudes; if they share the same direction take their difference, if opposite their sum — that remainder is the true latitudinal separation entering the planet–planet interval.

गणित / The Mathematics
Δβ = |β₁ − β₂| यदि sign(β₁) = sign(β₂)
Δβ = |β₁| + |β₂| यदि sign(β₁) ≠ sign(β₂)
पूर्ण ग्रहान्तर (आकाश-चाप का सन्निकट रूप, देशान्तर Δλ के साथ):
grahāntara ≈ √(Δλ² + Δβ²) (जब दोनों छोटे हों; शास्त्र में अगले चरणों से पूर्ण साधना)
β = तात्कालिक विक्षेप (स्फुट-स्थित पर)।

उदाहरण (worked example) मान लें β₁ = +१°२०′ (उत्तर), β₂ = +०°४०′ (उत्तर) → दिक्तुल्य → Δβ = ४०′।
यदि β₂ = −०°४०′ (दक्षिण) → भेद → Δβ = १°२०′ + ०°४०′ = २°००′।
Δλ = ०°३०′ हो तो सन्निकट चाप √(०.५² + २.०²) ≈ २.०६° (इनपुट: डिग्री दशमलव; केवल उदाहरण-सन्निकट)।

हमारा डिकोड (Our Decode) तात्कालिक विक्षेप और स्फुट-देशान्तर दोनों के लिए पहले शुद्ध मध्य→स्फुट श्रृंखला चाहिए — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में SS अध्याय-२ की मन्द+शीघ्र चार-चरणीय पुनरावृत्ति ठीक इसी नींव पर sealed है। ग्रहान्तर का यह Δβ-नियम उसी स्फुट-स्थित के ऊपर बैठता है; oracle-अनुशासन (`==` fixtures) यहाँ भी सहन-पट्टी नहीं चलने देता।

7.13
कुजार्किज्ञामरेज्यानां त्रिंशदर्धार्धवर्धिताः ।
विष्कम्भाश्चन्द्रकक्षायां भृगोः षष्टिरुदाहृता ।।
kujārkijñāmarejyānāṃ triṃśadardhārdhavardhitāḥ ।
viṣkambhāścandrakakṣāyāṃ bhṛgoḥ ṣaṣṭirudāhṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुज-अर्कि-ज्ञ-अमरेज्यानां = मंगल, शनि, बुध, बृहस्पति के; त्रिंशत् = ३०; अर्धार्ध = आधे का आधा (३० का, ७½); वर्धिताः = (क्रमशः) बढ़ाए हुए — ३०, ३७½, ४५, ५२½; विष्कम्भाः = व्यास/विष्कम्भ; चन्द्र-कक्षायां = चन्द्र-कक्षा के मान पर; भृगोः = शुक्र का; षष्टिः = ६०; उदाहृता = कथित।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा की कक्षा को मापदण्ड मानकर ग्रहों के विष्कम्भ (व्यास) गिनाए गए हैं। मंगल तीस, फिर हर बार साढ़े सात बढ़ाकर शनि ३७½, बुध ४५, बृहस्पति ५२½ — और शुक्र का विष्कम्भ साठ, उसी श्रेणी का अगला पद। ये “कच्चा” कक्षा-मान हैं; अगले श्लोक में स्फुट मान-कला बनेंगे।

English rendering On the scale of the Moon’s orbit the diameters of Mars, Saturn, Mercury and Jupiter are thirty, increased successively by the half of a half (7½): 30, 37½, 45, 52½; that of Venus is sixty — the next step of the same series.

गणित / The Mathematics चन्द्र-कक्षा-माप पर विष्कम्भ (व्यास-एकक, शब्द-संख्या यथावत्):
| ग्रह | विष्कम्भ |
|---|---|
| कुज (मंगल) | ३० |
| अर्कि (शनि) | ३० + ७½ = ३७½ |
| ज्ञ (बुध) | ४५ |
| अमरेज्या (गुरु) | ५२½ |
| भृगु (शुक्र) | ६० |

“त्रिंशद् अर्धार्ध-वर्धिताः” = तीस, (तीस के) आधे के आधे (७½) से क्रमशः बढ़े हुए — वर्धित = बढ़ाया हुआ; अगला पद ६० शुक्र का है।

उदाहरण (worked example) केवल नियतांक — इनपुट नहीं। चन्द्र-कक्षा-एकक में मंगल∶शुक्र = ३०∶६० = १∶२; बुध∶गुरु = ४५∶५२½ = ६∶७। ये अनुपात अगले श्लोक के स्फुट-मान में कर्ण/त्रिज्या से छँटेंगे।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले व्यास आधे होते गए थे (30, 15, 7½, 11¼)। “वर्धिताः” = बढ़ाए हुए: 30, 37½, 45, 52½ — और श्रेणी का अगला पद 60 ठीक शुक्र का है। Correction: increased by quarters of thirty.

7.14
त्रिचतुः कर्णयुत्याप्तास्ते द्विघ्नास्त्रिज्यया हताः ।
स्फुटाः स्वकर्णास्तिथ्याप्ता भवेयुर्मानलिप्तिकाः ।।
tricatuḥ karṇayutyāptāste dvighnāstrijyayā hatāḥ ।
sphuṭāḥ svakarṇāstithyāptā bhaveyurmānaliptikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिचतुः-कर्ण-युति-आप्ताः = तीसरे व चौथे कर्ण के योग से विभाजित; ते = वे (विष्कम्भ); द्विघ्नाः = द्विगुणित; त्रिज्यया हताः = त्रिज्या से गुणित; स्फुटाः स्वकर्णाः = (वे) स्फुट, अपने कर्ण के अनुसार (कर्ता के विशेषण; भाग नहीं); तिथि-आप्ताः = १५ से विभाजित; मान-लिप्तिकाः = दृष्टि-मान कलाओं में।

हिन्दी भावार्थ पूर्व श्लोक के कक्षा-विष्कम्भ को तीसरे और चौथे कर्ण के योग से भाग दें, फिर द्विगुण करें और त्रिज्या से गुणा करें — यह स्फुट-व्यास की ओर ले जाता है। ये अपने कर्ण-अनुसार स्फुट हैं; इन्हें तिथि-संख्या पंद्रह से भाग देने पर मान-लिप्तिकाएँ मिलती हैं — अर्थात् आकाश में दिखने वाला व्यास कलाओं में। कक्षा-एकक से दृष्टि-कला तक की पूरी सीढ़ी एक ही श्लोक में है।

English rendering Those diameters, divided by the sum of the third and fourth hypotenuses, doubled and multiplied by the radius, become the true diameters; these, true according to their own hypotenuses, divided by fifteen (tithi) are the measures in minutes of arc.

गणित / The Mathematics (SS दृश्य-मान साधना; R = त्रिज्या, प्रचलित ३४३८′)
माना V₀ = ७.१३ का विष्कम्भ (चन्द्र-कक्षा-एकक),
K₃, K₄ = स्फुट-साधना के तृतीय व चतुर्थ कर्ण,
V′ = (V₀ ⁄ (K₃ + K₄)) × २ × R … स्फुट-विष्कम्भ (अपने कर्णों से)
māna_liptikāḥ = V′ ⁄ १५ (“तिथ्याप्ताः”; 4.3 में भी यही ÷१५)
इकाई: परिणाम लिप्ता (′) में ग्रह-बिम्ब का मान।

उदाहरण (worked example) शुक्र V₀ = ६०; मान लें K₃ + K₄ = ८०००, K = ३५००, R = ३४३८ (केवल कार्य-उदाहरण; वास्तविक कर्ण स्फुट-इंजन से आएँ)।
V′ = (६० ⁄ ८०००) × २ × ३४३८ = ५१.५७
māna = ५१.५७ ⁄ १५ ≈ ३.४४′ (उदाहरण-स्केल; वास्तविक कर्ण बदलते ही मान बदलता है)।
Convention: R, K उसी त्रिज्या-प्रणाली में हों जिसमें स्फुट साधा गया।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्वकर्ण / त्रिज्या” वही ज्या-त्रिकोणमिति है जो अध्याय-२ स्फुट-श्रृंखला (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`) में R_manda / R_śīghra के साथ चलती है — यहाँ वही कर्ण-भाषा बिम्ब-मान पर उतरती है। इंजन mean-longitude lab है, production true-disk ephemeris नहीं; मान-लिप्तिका को promote करने से पहले measured calculation layer चाहिए — dossier की ईमानदारी यही बाँधती है।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “अपने कर्ण से” दूसरी बार भाग दिया गया था, जिससे शुक्र 0.00098 आता और फिर उसे गलत “0.059′ ≈ 3.5″” बना दिया गया था। “स्फुटाः स्वकर्णाः” कर्ता के विशेषण हैं; भाग केवल “-आप्ताः” से होता है: (तीसरे + चौथे कर्ण) से और फिर 15 से (4.3 का भी “तिथ्याप्ता”)। शुक्र: 3.44′। Correction: divide once by the hypotenuses, then by fifteen.

7.15
छायाभूमौ विपर्यस्ते स्वच्छायाग्रे तु दर्शयेत् ।
ग्रहः स्वदर्पणान्तःस्थः शङ्क्वग्रे सम्प्रदिश्यते ।।
chāyābhūmau viparyaste svacchāyāgre tu darśayet ।
grahaḥ svadarpaṇāntaḥsthaḥ śaṅkvagre sampradiśyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छाया-भूमौ = भूमि पर छाया; विपर्यस्ते = उलटी/प्रतिलोम होने पर; स्व-छाया-अग्रे = अपनी छाया के अग्रभाग पर; दर्शयेत् = दिखाए/लक्ष्य करे; ग्रहः = ग्रह; स्व-दर्पण-अन्तःस्थः = अपने दर्पण के भीतर स्थित; शङ्कु-अग्रे = शंकु के अग्र पर; सम्प्रदिश्यते = संकेतित/निर्दिष्ट होता है।

हिन्दी भावार्थ यह प्रेक्षण-विधि का श्लोक है, अंक-सूत्र का नहीं। जब भूमि पर छाया विपर्यस्त हो — दिशा या विन्यास उलटा लगे — तो ग्रह को अपनी छाया के सिरे पर लक्ष्य करना चाहिए। दर्पण में जो ग्रह “अन्दर” दिखे, वह शंकु-अग्र से निर्देशित होता है। छाया, दर्पण और शंकु — तीनों मिलकर आकाश-बिन्दु को भूमि-यन्त्र पर उतारते हैं।

English rendering When the shadow is reversed on the ground, mark the planet at the tip of one’s own shadow; a planet seen within its mirror is indicated at the tip of the gnomon.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रेक्षण/यन्त्र-विधि वर्णन।
एक वाक्य: दृश्य-ग्रह को छाया-अग्र व शंकु-अग्र के संयोग से भूमि पर “पिन” करना — कोण-माप से पहले का स्थूल लक्ष्य-नियम।

दृष्टान्त (Illustrative Example) धूप में शङ्कु गाड़कर देखें: छाया भूमि पर उस दिशा में पड़ती है जो सूर्य की उलटी है — यह स्वाभाविक विपर्यय। जब आकाश-बिन्दु को भूमि-यन्त्र पर उतारना हो, तो ग्रह को “जहाँ लगता है” नहीं, बल्कि स्वच्छाया-अग्र पर लक्ष्य करें; दर्पण में जो प्रतिबिम्ब “अन्दर” बैठे, उसे शङ्कु-शिखर से मिलाकर दिशा बाँधें। तीन उपकरण — छाया, दर्पण, शङ्कु — मिलकर एक ही काम करते हैं: व्योम-बिन्दु को स्पर्श-योग्य भूमि-रेखा में बदलना। यह प्रेक्षण-प्रयोग अध्याय ३ के शङ्कु–छाया गणित और अध्याय ७ के दृक्-साधन से जुड़कर पूर्ण होता है।

7.16
पञ्चहस्तोच्छ्रितौ शङ्कू यथादिग्भ्रमसंस्थितौ ।
ग्रहान्तरेण विक्षिप्तावधो हस्तनिखातगौ ।।
pañcahastocchritau śaṅkū yathādigbhramasaṃsthitau ।
grahāntareṇa vikṣiptāvadho hastanikhātagau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्च-हस्त-उच्छ्रितौ = पाँच हाथ ऊँचे; शङ्कू = दो शंकु; यथा-दिक्-भ्रम-संस्थितौ = दिशा-चक्र/दिग्विन्यास के अनुसार स्थित; ग्रहान्तरेण = ग्रहान्तर से; विक्षिप्तौ = विस्थापित/अलग किए; अधः = नीचे; हस्त-निखातगौ = हाथ-माप तक गड़े हुए।

हिन्दी भावार्थ दो शंकु, प्रत्येक पाँच हाथ ऊँचे, दिशा-भ्रम — यथायोग्य दिग्विन्यास — के अनुसार खड़े किए जाएँ। दोनों के बीच का भूमि-अन्तर ग्रहान्तर के अनुपात में विक्षिप्त (खिसकाया) हो, और वे नीचे हाथ-भर गहराई तक निखात हों। यह ७.१५ की छाया-दर्पण दृष्टि को स्थिर द्वि-शंकु यन्त्र में बाँधता है — माप की भौतिक चौखट।

English rendering Two gnomons, each five hands high, are set according to the directional circuit; they are displaced by the amount of the planetary interval and fixed below, planted a hand deep.

गणित / The Mathematics यन्त्र-माप (हस्त-मेट्रोलॉजी; कोण-सूत्र नहीं):
h_śaṅku = ५ hasta (ऊँचाई)
निखात-गहराई ≈ १ hasta
क्षैतिज विस्थापन ∝ grahāntara (७.१२ का शेष/पूर्ण अन्तराल)
दिशा: यथा-दिक्-भ्रम (क्षितिज-दिशा चक्र के अनुसार)।
हस्त यहाँ लंबाई-एकक है — dossier की घटी/पल/विपल समय-मेट्रोलॉजी से अलग भौतिक पैमाना।

उदाहरण (worked example) यदि १ hasta ≈ १८ aṅgula (परंपरा-सामान्य; स्थानीय हस्त बदल सकता है) और दो शंकु ऊँचाई ५ hasta = ९० aṅgula प्रत्येक। ग्रहान्तर भूमि पर २ hasta रखा जाए तो शंकु-शीर्षों का लक्ष्य-रेखा-अन्तर उसी अनुपात में आकाश-Δ से जोड़ा जाता है — पूर्ण कोण-साधना के लिए छाया-लंबाई व शंकु-ऊँचाई का tan⁻¹( s ⁄ h ) आगे लगता है; यह श्लोक केवल यन्त्र-स्थापना देता है।

सुधार · correction (2026-10-07) “ग्रहान्त्रेण” → “ग्रहान्तरेण”, जैसा इसका अपना पदच्छेद पढ़ता है। Correction: spelling.

7.17
छायाकर्णौ ततो दद्याच्छायाग्राच्छङ्कुमूर्धगौ ।
छायाकर्णाग्रसंयोगे संस्थितस्य प्रदर्शयेत् ।।
chāyākarṇau tato dadyācchāyāgrācchaṅkumūrdhagau ।
chāyākarṇāgrasaṃyoge saṃsthitasya pradarśayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) छायाकर्णौ = छाया और कर्ण (छाया-कर्ण रेखा); ततो दद्यात् = तब आरोपित/खींचे; छायाग्रात् = छाया-अग्र से; शङ्कुमूर्धगौ = शङ्कु-शिखर तक पहुँचे हुए; छायाकर्णाग्रसंयोगे = छाया-कर्ण के अग्र-संयोग-बिन्दु पर; संस्थितस्य = स्थित ग्रह की स्थिति; प्रदर्शयेत् = प्रदर्शित करे।

हिन्दी भावार्थ ग्राहीय संयोग-साधना में अब छाया और कर्ण की रचना पूरी की जाती है। छाया के अग्रबिन्दु से शङ्कु के शिखर तक छाया-कर्ण खींचे जाएँ; जहाँ छाया-कर्ण का अग्र-संयोग होता है, वहीं आकाश में ग्रह की संस्थित स्थिति दिखलाई जाए। यह रेखा-ज्यामिति दृष्टि-समता की आकृति को धरातल पर उतारने का साधन है।

English rendering One should then draw the shadow-hypotenuses from the tip of the shadow up to the head of the gnomon. At the junction formed by the tips of those shadow-hypotenuses, the planet’s situated position is to be exhibited.

गणित / The Mathematics आकृति-निर्माण का निर्देश — छाया-अग्र से शङ्कु-शिखर तक कर्ण-रेखाएँ; संयोग-बिन्दु = व्योम-स्थिति का प्रक्षेप। संख्यात्मक स्थिरांक नहीं; यह दृश्य-रेखागणित (projective construction) है।

7.18
स्वशङ्कुमूर्धगौ व्योम्नि ग्रहौ दृक्तुल्यतां इतौ ।
उल्लेखं तारकास्पर्शाद्भेदे भेदः प्रकीर्त्यते ।।
svaśaṅkumūrdhagau vyomni grahau dṛktulyatāṃ itau ।
ullekhaṃ tārakāsparśādbhede bhedaḥ prakīrtyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वशङ्कुमूर्धगौ = अपने-अपने शङ्कु-शिखर पर; व्योम्नि = आकाश में; ग्रहौ = दोनों ग्रह; दृक्तुल्यताम् इतौ = दृष्टि-समता को प्राप्त; उल्लेखम् = उल्लेख (स्पर्श/रेखा-स्पर्श); तारकास्पर्शात् = तारा-स्पर्श से; भेदे = भेद/पृथकता में; भेदः = भेद (पृथक्-दर्शन); प्रकीर्त्यते = कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों ग्रह आकाश में दृक्तुल्यता को पहुँच जाते हैं, तो उन्हें अपने-अपने शङ्कु के शिखर पर आरोपित दिखाया जाता है — यही दृष्टि-सम स्थिति का चिह्न है। तारा के साथ स्पर्श हो तो उल्लेख; यदि दोनों स्पष्ट रूप से अलग दिखाई दें तो भेद कहा जाता है। इस श्लोक में संयोग की सूक्ष्म कोटियाँ नाम और लक्षण से बाँधी गई हैं।

English rendering The two planets, having attained equality of vision in the sky, are shown at the tops of their respective gnomons. Contact with a star is called ullekha; when they are distinct from each other, the state is named bheda.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्गीकरण/दृश्य-लक्षण (दृक्तुल्यता, उल्लेख, भेद)। सूक्ष्म अर्थ: समान दृश्य-दिशा पर दोनों की आरोहित ऊँचाई/स्थिति शङ्कु-शिखर से निरूपित होती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए दो ग्रह क्षितिज के ऊपर ऐसे कोण पर आ गए हों कि दोनों की दृक् एक-सी लगे — दृष्टि-सम (दृक्तुल्यता)। मॉडल पर दोनों को अपने-अपने शङ्कु-मूर्ध पर चढ़ाकर दिखाना इसी समता का चिह्न है। यदि कोई ग्रह किसी तारे को छूता-सा लगे — प्रकाश-बिन्दु एक — तो उल्लेख; यदि दोनों स्पष्ट अलग चमकें तो भेद। नाम कोटियाँ हैं, चमत्कार नहीं: स्पर्श, लगभग-स्पर्श, और स्पष्ट-अंतर — तीन प्रेक्षण-वर्ग, जिन्हें बाद में कोणीय अन्तर और युति-साधन में संख्या दी जाती है।

7.19
युद्धं अंशुविमर्दाख्यं अंशुयोगे परस्परम् ।
अंशादूने अपसव्याख्यं युद्धं एको अत्र चेदणुः ।।
yuddhaṃ aṃśuvimardākhyaṃ aṃśuyoge parasparam ।
aṃśādūne apasavyākhyaṃ yuddhaṃ eko atra cedaṇuḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) युद्धम् = ग्रह-युद्ध; अंशुविमर्दाख्यम् = अंशु-विमर्द नामक; अंशुयोगे परस्परम् = परस्पर किरणों/अंशों के योग में; अंशाद् ऊने = एक अंश से कम (विच्छेद) पर; अपसव्याख्यम् = अपसव्य नामक; युद्धम् = युद्ध; एकः अत्र चेत् अणुः = यदि इनमें एक सूक्ष्म/अणु हो।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों ग्रहों की किरणें परस्पर घुल-मिलकर दबती-सी लगें, वह युद्ध अंशु-विमर्द कहलाता है — प्रकाश का आपसी मर्दन। यदि उनके बीच का अन्तर एक अंश से कम हो, तो वह अपसव्य युद्ध है; और यदि इनमें से एक ग्रह अणु (अत्यल्प/सूक्ष्म) हो, तो वही नियम इसी कोटि में और कठोर हो जाता है। पाठ में `+` चिह्न पाठ-भेद की स्मृति हैं — मूलार्थ कोटि-नाम और अंश-सीमा पर टिका है।

English rendering Mutual pressing of the rays is the combat named aṃśu-vimarda. When the separation is less than one degree, the combat is called apasavya; and if one of the two is minute (aṇu), that condition belongs here as well.

गणित / The Mathematics कोटि-सीमा: अंश-विच्छेद < 1° → अपसव्य युद्ध; परस्पर अंशु-योग → अंशु-विमर्द। अंश = 1/360 वृत्त; अन्य संख्या नहीं।

उदाहरण (worked example) दो ग्रहों का स्पष्ट रेखांश-अन्तर |λ₁ − λ₂| = 0.6° (< 1°) → अपसव्य युद्ध की कोटि (केवल इस श्लोक की सीमा से; बल/दीप्ति-निर्णय अगले श्लोकों में)। यदि अन्तर 0° के निकट हो और किरण-मर्दन दृश्य हो → अंशु-विमर्द। (Convention: ecliptic separation in degrees as stated.)

सुधार · correction (2026-10-07) “चेदणुह्” → “चेदणुः”। Correction: spelling.

7.20
समागमो अंशादधिके भवतश्चेद्बलान्वितौ ।
अपसव्ये जितो युद्धे पिहितो अणुरदीप्तिमान् ।।
samāgamo aṃśādadhike bhavataścedbalānvitau ।
apasavye jito yuddhe pihito aṇuradīptimān ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समागमः = समागम; अंशाद् अधिके = एक अंश से अधिक (अन्तर) पर; भवतश्चेत् बलान्वितौ = यदि दोनों बलवान् हों; अपसव्ये = अपसव्य युद्ध में; जितः = पराजित; युद्धे = युद्ध में; पिहितः = आच्छादित/ढका; अणुः = सूक्ष्म ग्रह; अदीप्तितान् = अदीप्ति को प्राप्त।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों ग्रह बल से युक्त हों और उनका अन्तर एक अंश से अधिक हो, तो स्थिति समागम कही जाती है — निकट-मिलन, परन्तु “युद्ध” की कठोर कोटि नहीं। अपसव्य युद्ध में पराजित ग्रह पिहित (ढक/आच्छादित) माना जाता है; जो अणु है, वह अदीप्ति को प्राप्त होता है। यहाँ दूरी-सीमा और बल-दीप्ति दोनों मिलकर नाम बदलते हैं।

English rendering If the two are endowed with strength and their separation exceeds one degree, the meeting is samāgama. In an apasavya combat the defeated is covered; the minute one loses its brilliance.

गणित / The Mathematics कोटि-सीमा: अन्तर > 1° और दोनों बलान्वित → समागम; अपसव्य में जित = पिहित, अणु → अदीप्ति। सूत्र नहीं — सीमा + गुणात्मक निर्णय।

उदाहरण (worked example) |λ₁ − λ₂| = 1.4° (> 1°), दोनों दीप्ति/बल से युक्त → समागम (इस श्लोक की परिभाषा से)। |λ₁ − λ₂| = 0.4° और छोटा ग्रह अणु → अपसव्य में अणु अदीप्ति/पिहित।

सुधार · correction (2026-10-07) “वलान्वितौ” → “बलान्वितौ” (बल); “अदीप्तितान्” → “अदीप्तिमान्” [reading: “अदीप्तितान्” कोई शब्द नहीं; पराजित अणु ग्रह दीप्ति-रहित]। Correction: spelling, one reading.

7.21
रूक्षो विवर्णो विध्वस्तो विजितो दक्षिणाश्रितः ।
उदक्स्थो दीप्तिमान्स्थूलो जयी याम्ये अपि यो बली ।।
rūkṣo vivarṇo vidhvasto vijito dakṣiṇāśritaḥ ।
udakstho dīptimānsthūlo jayī yāmye api yo balī ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रूक्षः = रूखा/कठोर-प्रकाश; विवर्णः = विवर्ण; विध्वस्तः = विध्वस्त; विजितः = पराजित; दक्षिणाश्रितः = दक्षिण-स्थित; उदक्स्थः = उत्तर-स्थित; दीप्तिमान् = दीप्तिमान्; स्थूलः = स्थूल/बड़ा; जयी = विजेता; याम्ये अपि = दक्षिण में भी; यः बली = जो बलवान् हो।

हिन्दी भावार्थ रूक्ष, विवर्ण, विध्वस्त और विजित — ये लक्षण दक्षिण-स्थित ग्रह के पक्ष में गिनाए गए हैं। उत्तर-स्थित, दीप्तिमान् और स्थूल ग्रह जयी माना जाता है। फिर भी नियम एकपक्षीय नहीं: दक्षिण में भी जो वास्तव में बलवान् हो, वही जीतता है। दिशा संकेत है; अन्तिम कसौटी बल और दीप्ति है।

English rendering Rough, discoloured, shattered and defeated is the one stationed to the south. The northern, luminous, and large planet is the victor; yet even in the south, whichever is stronger wins.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — विजय-लक्षण (दिशा, दीप्ति, स्थूलता, बल)। अक्षांशीय/दृश्य उत्तर-दक्षिण स्थिति गुणात्मक निर्णायक है, संख्या नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) साफ़ रात में दो ग्रह पास आएँ तो आँख पहले रंग, आकार और चमक तौलती है — धुँधला, फीका, “टूटा”-सा दिखने वाला पक्ष दुर्बल; उत्तर की ओर बैठा, दीप्तिमान् और स्थूल पक्ष प्रबल — यही शास्त्र का प्राथमिक संकेत। पर दिशा अकेली फ़ैसला नहीं करती: दक्षिण में बैठा ग्रह भी यदि वास्तव में अधिक दीप्त और “बलवान्” दिखे, तो वही जयी। यह नियम ज्योतिष-भय का नहीं, प्रेक्षण-वर्गीकरण का है — कौन-सा बिन्दु दृष्टि में प्रबल है — और अध्याय ७ के युद्ध-लक्षण खण्ड में इन्हीं दृश्य-गुणों को कसौटी बनाया गया है।

सुधार · correction (2026-10-07) “उदक्ष्थो” → “उदक्स्थो” (उदक् + स्थः)। Correction: spelling.

7.22
आसन्नावप्युभौ दीप्तौ भवतश्चेत्समागमः ।
स्वल्पौ द्वावपि विध्वस्तौ भवेतां कूटविग्रहौ ।।
āsannāvapyubhau dīptau bhavataścetsamāgamaḥ ।
svalpau dvāvapi vidhvastau bhavetāṃ kūṭavigrahau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आसन्नौ अपि = निकट होने पर भी; उभौ दीप्तौ = दोनों दीप्त; भवतश्चेत् = यदि हों; समागमः = समागम; स्वल्पौ द्वावपि = दोनों ही अत्यल्प; विध्वस्तौ = विध्वस्त; भवेताम् = हों; कूटविग्रहौ = कूट-विग्रह (मिथ्या/कूट युद्ध)।

हिन्दी भावार्थ दोनों ग्रह आसन्न हों और दोनों दीप्तिमान् हों — तो भी समागम ही कहा जाता है; दीप्ति युद्ध को “हार-जीत” की कठोरता में नहीं ढकेलती जब दोनों समान दीप्त हों। यदि दोनों स्वल्प और दोनों विध्वस्त हों, तो वह कूट-विग्रह है — दिखावटी संघर्ष, जिसमें कोई स्पष्ट विजेता नहीं। यह श्लोक सम-बल और दुर्बल-युग्म दोनों को अलग नाम देता है।

English rendering Even when both are near and both are bright, the state is still samāgama. If both are small and both shattered, they become a kūṭa-vigraha — a deceptive or hollow combat.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — सम-दीप्ति/सम-दुर्बलता का वर्गीकरण (समागम vs कूट-विग्रह)।

दृष्टान्त (Illustrative Example) दो ग्रह आसन्न हों और दोनों समान दीप्ति से जगमगाएँ — आँख को “हार–जीत” की कहानी नहीं मिलती; शास्त्र उसे समागम ही कहता है, युद्ध की कठोर कोटि में नहीं धकेलता। उलटा दृश्य भी है: दोनों छोटे, दोनों फीके, दोनों “विध्वस्त”-से — कोई स्पष्ट विजेता नहीं; वह कूट-विग्रह, दिखावटी संघर्ष। एक ही कोणीय निकटता के दो नाम इसलिए हैं कि दीप्ति-युग्म अलग है: सम-दीप्त जोड़ी और दुर्बल–दुर्बल जोड़ी। यह भेद बाद में युति–युद्ध की तालिकाओं में लक्षण-भेद के रूप में स्थिर रहता है।

7.23
उदक्स्थो दक्षिणस्थो वा भार्गवः प्रायशो जयी ।
शशाङ्केनैवं एतेषां कुर्यात्संयोगसाधनम् ।।
udakstho dakṣiṇastho vā bhārgavaḥ prāyaśo jayī ।
śaśāṅkenaivaṃ eteṣāṃ kuryātsaṃyogasādhanam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उदक्स्थः = उत्तर-स्थित; दक्षिणस्थः वा = अथवा दक्षिण-स्थित; भार्गवः = शुक्र (भृगु-पुत्र); प्रायशः जयी = प्रायः विजेता; शशाङ्केन = चन्द्र से; एवम् = इसी प्रकार; एतेषाम् = इन (ग्रहों) का; कुर्यात् = करे; संयोगसाधनम् = संयोग की गणना/साधना।

हिन्दी भावार्थ शुक्र — उत्तर हो या दक्षिण — प्रायः जयी माना जाता है; यह परम्परागत बल-क्रम का विशेष नियम है, दिशा से बँधा नहीं। चन्द्रमा के साथ भी इन्हीं ग्रहों का संयोग इसी विधि से साधा जाए — अर्थात् पूर्ववर्ती छाया-कर्ण, दृक्तुल्यता और युद्ध/समागम की कोटियाँ चन्द्र-संयोग पर भी लागू हों। यहाँ “साधन” शब्द गणना-विधि की ओर इशारा करता है, केवल कथा की ओर नहीं।

English rendering Bhārgava (Venus), whether north or south, is usually the victor. With the Moon likewise one should perform the computation of conjunction for these planets.

गणित / The Mathematics संयोग-साधन = स्पष्ट/मध्य स्थिति से निकटता-निर्णय की प्रक्रिया (पूर्व श्लोकों की 1° सीमा, दीप्ति-बल, दिशा)। स्वयं में संख्या नहीं; साधना स्पष्ट रेखांश/विक्षेप पर निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) संयोग-साधन के लिए स्पष्ट ग्रह-स्थिति चाहिए — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में SS अध्याय-2 का शुद्ध मन्द+शीघ्र स्फुट (4-चरण iteration) इसी श्रृंखला का गणितीय आधार है। उपकरण mean-longitude synthesis lab है; true-position ephemeris के रूप में promote करने से पहले measured calculation layer चाहिए — dossier की ईमानदारी यही है।

सुधार · correction (2026-10-07) “उदक्ष्थो” → “उदक्स्थो”। Correction: spelling.

7.24
भावाभावाय लोकानां कल्पनेयं प्रदर्शिता ।
स्वमार्गगाः प्रयान्त्येते दूरं अन्योन्यं आश्रिताः ।।
bhāvābhāvāya lokānāṃ kalpaneyaṃ pradarśitā ।
svamārgagāḥ prayāntyete dūraṃ anyonyaṃ āśritāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भावाभावाय = भाव और अभाव के लिए; लोकानाम् = लोकों/जनों का; कल्पना इयम् = यह कल्पना/रचना; प्रदर्शिता = दिखाई गई; स्वमार्गगाः = अपने-अपने मार्ग पर चलने वाले; प्रयान्ति एते = ये गमन करते हैं; दूरम् = दूर; अन्योन्यम् आश्रिताः = परस्पर आश्रित।

हिन्दी भावार्थ लोकों के भाव-अभाव (उपस्थिति-अनुपस्थिति, फल-अफल की व्यावहारिक कल्पना) के लिए यह सारी रचना प्रदर्शित की गई है — युद्ध, समागम, उल्लेख, भेद सब एक साधित आकृति हैं। वास्तव में ये ग्रह अपने-अपने मार्ग पर चलते हैं, दूर रहते हुए भी परस्पर ज्यामितीय सम्बन्ध में बँधे। श्लोक कल्पना और पथ-सत्य के बीच की रेखा खींचता है: साधन उपयोगी है; पथ स्वतन्त्र हैं।

English rendering This scheme has been set forth for the presence and absence of effects among people. These planets move on their own paths, mutually related yet far apart.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका (कल्पना vs स्वमार्ग-गति)। संयोग-ज्यामिति एक उपयोगी निदर्श है; कक्षा-पथ स्वयं दूर और स्वतन्त्र रहकर भी एक-दूसरे के सापेक्ष मापे जाते हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मानचित्र पर दो नगर “एक बिंदु” पर मिलते दिखें, तो भी वे भूमि पर सैकड़ों कोस दूर अपने-अपने मार्ग पर होते हैं — मिलन काग़ज़ की कल्पना है, पथ स्वतन्त्र। ग्रह भी स्वमार्गगाः: दूर रहकर भी दृष्टि-रेखा में बँधे, इसलिए युद्ध–समागम–उल्लेख–भेद लोक-व्यवहार के भाव–अभाव की उपयोगी आकृतियाँ हैं, आकाश की भौतिक टक्कर नहीं। श्लोक साधक को याद दिलाता है — साधन प्रयोग के लिए है; कक्षाएँ स्वतन्त्र चलती हैं। यही तनाव पूरे ग्रन्थ में दोहराता है: मॉडल उपयोगी हो, पथ-सत्य से उलझ न जाए।

अध्यायः 8

भग्रहयुत्यधिकारः

Stars and Planets
21 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

आठवाँ अध्याय नक्षत्रों और ग्रहों की उस सीमा पर खड़ा है जहाँ स्थिर आकाश चलते पिण्डों से मिलता है। यहाँ भानों की ध्रुव-रेखाएँ (ध्रुवाः), उनके भोग-लिप्ता, और अतीत-धिष्ण्यों का क्रम एक ही ताने-बाने में बँधते हैं; विस्वा, आप्य, अभिजित्, श्रवण और श्रविष्ठा के भोग-खण्ड बताते हैं कि चन्द्र-मण्डल को कैसे २७–२८ खंडों में नापा गया। विक्षेप-सूची सौम्य और याम्य दिशाओं में तारों की ध्रुवीय अक्षांश-रेखा खींचती है, और युति का अधिकार ग्रह को नक्षत्र-तारे के सापेक्ष मापने की विधि देता है। सुंदरता इसमें है कि आकाश का मानचित्र कोई काव्य-चित्र नहीं—वह लिप्ता, पाद-सन्धि और क्रमागत विक्षेप का गणित है; हर संख्या एक स्थान, हर स्थान एक मिलन-बिन्दु। इक्कीस श्लोकों में स्थिर नक्षत्र-जाल और गतिशील ग्रह-पथ एक-दूसरे पर पढ़े जाते हैं, ताकि “कहाँ” और “कब” एक ही माप-भाषा में बोलें।

For the English reader:

Chapter 8 is the Siddhānta’s star-and-planet hinge: fixed markers meet moving bodies. It lays down the polar longitudes (dhruva) of the principal stars, the arc-spans (bhoga) that carve the lunar path into nakṣatra compartments—including the delicate Abhijit insert between Āpya and Viśva—and the polar latitudes (vikṣepa) that place each light north or south of the ecliptic frame. Conjunction (yuti) is not ornament here; it is the rule-set for when a planet’s path and a star’s fixed coordinates speak to each other. The beauty is cartographic and spare: integers, foot-junctions, and ordered latitudes build a working sky-map so that place and meeting-time share one arithmetic tongue.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। इसे खोलने के लिए अध्याय-८ की ध्रुव–भोग–विक्षेप तालिकाओं का पूर्ण पूर्णांक-पुनर्निर्माण, अभिजित्-सहित नक्षत्र-चापों का योग-परीक्षण, और ग्रह-स्फुट (अध्याय २) से युति-मिलान का exact-equality फिक्स्चर-स्तर चाहिए—ayanāṃśa-प्रयोग में चित्रा/Spica का अवशिष्ट स्पर्श मात्र तार-सूची का डिकोड नहीं है।

अश्विनीभरणीकृत्तिकारोहिणीमृगशिराआर्द्रापुनर्वसुपुष्यआश्लेषामघापू.फा.उ.फा.हस्तचित्रास्वातीविशाखाअनुराधाज्येष्ठामूलपू.षा.उ.षा.श्रवणधनिष्ठाशतभिषज्पू.भा.उ.भा.रेवती२७ नक्षत्रप्रत्येक = 13°20′ = 800′360° ÷ 27
नक्षत्र-चक्र — the 27-fold zodiac belt (SS ch.8): each nakṣatra spans exactly 13°20′ (= 800′); the chapter fixes each junction-star (yogatārā) by its dhruvaka (polar longitude) and vikṣepa (polar latitude) — the siddhānta's star catalogue.
8.1
प्रोच्यन्ते लिप्तिका भानां स्वभोगो अथ दशाहतः ।
भवन्त्यतीतधिष्ण्यानां भोगलिप्तायुता ध्रुवाः ।।
procyante liptikā bhānāṃ svabhogo atha daśāhataḥ ।
bhavantyatītadhiṣṇyānāṃ bhogaliptāyutā dhruvāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रोच्यन्ते = कहे जाते हैं; लिप्तिका = कला (arc-minute, 1/60 अंश); भानां = नक्षत्र-योगतारों की; स्वभोगः = प्रत्येक नक्षत्र का अपना भोग-अंश (व्याप्ति); दशाहतः = दस से गुणित (×10); अतीत-धिष्ण्यानाम् = बीत चुके नक्षत्रों के; भोग-लिप्ता-आयुताः = भोग-कलाओं के योग से युक्त; ध्रुवाः = ध्रुव (ध्रुवीय देशान्तर / polar longitude)।

हिन्दी भावार्थ अब नक्षत्रों की योगताराओं की कलाएँ बताई जाती हैं। प्रत्येक नक्षत्र का अपना भोग (बराबर बाँटी हुई चाप) भी समझ लेना है; आगे जो संख्याएँ आएँगी उन्हें दस से गुणा कर कला में पढ़ना है। जो नक्षत्र बीत चुके हों, उनके ध्रुव उस बिंदु तक के सब भोगों की कलाओं को जोड़ने से मिलते हैं—अर्थात् समान भोग की संचयी सीमा ही “बीते धिष्ण्य” का ध्रुव है।

English rendering The arc-minutes of the (junction) stars are now declared. Take each asterism’s own span (bhoga), and read the forthcoming figures as multiplied by ten. The polar longitudes of the asterisms already traversed are the running sum of those span-minutes.

गणित / The Mathematics
• पूर्ण वृत्त = 360° = 21,600′ (लिप्ता)।
• समान भोग (27 नक्षत्र): भोग = 360°⁄27 = 13°20′ = 800′।
• दशाहत नियम: श्लोक-संख्या N → कला = 10 × N।
• अतीत-धिष्ण्य ध्रुव: Dₙ = n × 800′ (n = पूरे हो चुके नक्षत्र), अथवा D = Σ भोग-लिप्ता।
• यह 21,600′ ↔ 21,600 प्राण/दिन वाली गणना-संगति का चाप पक्ष है—समय और कोण की भौतिक एकता नहीं, गिनती की समानता।

उदाहरण (worked example)
नक्षत्र 0 = अश्विनी आरंभ (0′)। तीन नक्षत्र पूरे → n = 3:
D = 3 × 800′ = 2400′ = 40°0′
(यह रोहिणी के समान-भोग आरंभ की संचयी सीमा है; योगतारा का अपना ध्रुव अलग—अगले श्लोकों में भोग के भीतर की कला से जुड़ेगा।)

हमारा डिकोड (Our Decode)
`bharat-ephemeris-offline` / MATHEMATICAL-AUDIT §1 में हमने दिन-विभाजन 60 घटी = 3600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण को वृत्त की 21,600 कला से जोड़ा—यही “गिनती की संगति” है, भौतिक समीकरण नहीं। अध्याय 8 की लिप्ता-भाषा उसी 21600-चाप मेट्रोलॉजी पर खड़ी है; mean-longitude प्रयोगशाला और पंचांग-इंजन दोनों में कोण की इकाई इसी जाल से निकलती है।

8.2
अष्टार्णवाः शून्यकृताः पञ्चषष्टिर्नगेषवः ।
अष्टार्था अब्धयो अष्टागा अङ्गागा मनवस्तथा ।।
aṣṭārṇavāḥ śūnyakṛtāḥ pañcaṣaṣṭirnageṣavaḥ ।
aṣṭārthā abdhayo aṣṭāgā aṅgāgā manavastathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टार्णवाः = 8,4 → 48 (अष्ट=8, अर्णव=4 समुद्र); शून्यकृताः = 0,4 → 40 (शून्य=0, कृत=4); पञ्चषष्टिः = 65; नगेषवः = 5,7 → 57 (इषु=5 बाण, नग=7 पर्वत); अष्टार्थाः = 8,5 → 58 (अर्थ/पुरुषार्थ=5); अब्धयः = 4 (अब्धि=समुद्र); अष्टागाः = 8,7 → 78 (अग=7); अङ्गागाः = 6,7 → 76 (अङ्ग=6); मनवः = 14 (मनु=14)।

हिन्दी भावार्थ अश्विनी से आश्लेषा तक नौ योगताराओं के लिए भोग-आरंभ से मापी गई “दशाहत” संख्याएँ क्रमशः 48, 40, 65, 57, 58, 4, 78, 76 और 14 हैं। इन्हें दस से गुणा करो—कला में योगतारा की स्थिति नक्षत्र के समान-भोग द्वार से उतनी दूर है; पूरे वृत्त पर ध्रुव पाने के लिए पहले बीते नक्षत्रों की 800′-भोग-श्रृंखला जोड़ दो।

English rendering For the first nine junction stars (Aśvinī through Āśleṣā) the decade-scaled offsets from equal-bhoga starts are 48, 40, 65, 57, 58, 4, 78, 76 and 14. Multiply by ten for arc-minutes within the asterism; add the cumulative 800′ spans of all preceding asterisms to obtain the polar longitude on the full circle.

गणित / The Mathematics
कला-अंतर (भोग-द्वार से) = 10 × (भूतसंख्या);
पूर्ण ध्रुव Dᵢ = (i−1) × 800′ + 10 × Nᵢ, i = 1…9।

| i | नक्षत्र | N | 10N | D (′) | D (°) |
|---|--------|---|-----|-------|-------|
| 1 | अश्विनी | 48 | 480 | 480 | 8°0′ |
| 2 | भरणी | 40 | 400 | 1200 | 20°0′ |
| 3 | कृत्तिका | 65 | 650 | 2250 | 37°30′ |
| 4 | रोहिणी | 57 | 570 | 2970 | 49°30′ |
| 5 | मृगशिरा | 58 | 580 | 3780 | 63°0′ |
| 6 | आर्द्रा | 4 | 40 | 4040 | 67°20′ |
| 7 | पुनर्वसु | 78 | 780 | 5580 | 93°0′ |
| 8 | पुष्य | 76 | 760 | 6360 | 106°0′ |
| 9 | आश्लेषा | 14 | 140 | 6540 | 109°0′ |

उदाहरण (worked example)
कृत्तिका (i=3): N=65 → 10N=650′;
D = 2×800′ + 650′ = 1600 + 650 = 2250′ = 37° + 30′ = 37°30′।
(समान-भोग द्वार: अश्विनी=0′, भरणी=800′, कृत्तिका=1600′।)

8.3
कृतेषवो युगरसाः शून्यवाणा वियद्रसाः ।
खवेदाः सागरनगा गजागाः सागरर्तवः ।।
kṛteṣavo yugarasāḥ śūnyavāṇā viyadrasāḥ ।
khavedāḥ sāgaranagā gajāgāḥ sāgarartavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृतेषवः = 4,5 → 54 (कृत=4, इषु=5); युगरसाः = 4,6 → 64 (युग=4, रस=6; इकाई-प्रथम क्रम); शून्यवाणाः = 0,5 → 50 (बाण=5); वियद्रसाः = 0,6 → 60 (वियत्=आकाश=0, रस=6); खवेदाः = 0,4 → 40 (ख=0, वेद=4); सागरनगाः = 4,7 → 74 (सागर=4, नग=7); गजागाः = 8,7 → 78 (गज=8, अग=7); सागरर्तवः = 4,6 → 64 (ऋतु=6)।

हिन्दी भावार्थ मघा से अनुराधा तक आठ योगताराओं की दशाहत-संख्याएँ 54, 64, 50, 60, 40, 74, 78 और 64 हैं। फिर वही नियम: दसगुनी कला भोग के भीतर की दूरी है; ध्रुव = बीते भोगों का योग + वह कला। ध्यान रहे—चित्रा का ध्रुव ठीक 180° आता है: वृत्त के आधे पर स्थिर एक प्रकाश-बिंदु, आगे अयनांश-चर्चा का प्राकृतिक आधार।

English rendering For Maghā through Anurādhā the decade-scaled intra-bhoga figures are 54, 64, 50, 60, 40, 74, 78 and 64. The same reduction yields polar longitudes; Citrā falls at exactly 180°—the circle’s midpoint among these junction stars.

गणित / The Mathematics
Dᵢ = (i−1)×800′ + 10×Nᵢ, i = 10…17 (अश्विनी=1 से गिनती)।

| i | नक्षत्र | N | D (′) | D (°) |
|---|--------|---|-------|-------|
| 10 | मघा | 54 | 7740 | 129°0′ |
| 11 | पूर्वफाल्गुनी | 64 | 8640 | 144°0′ |
| 12 | उत्तरफाल्गुनी | 50 | 9300 | 155°0′ |
| 13 | हस्त | 60 | 10200 | 170°0′ |
| 14 | चित्रा | 40 | 10800 | 180°0′ |
| 15 | स्वाती | 74 | 11940 | 199°0′ |
| 16 | विशाखा | 78 | 12780 | 213°0′ |
| 17 | अनुराधा | 64 | 13440 | 224°0′ |

उदाहरण (worked example)
चित्रा (i=14): N=40 → 400′;
D = 13×800′ + 400′ = 10400 + 400 = 10800′ = 180°0′।

हमारा डिकोड (Our Decode)
SS में चित्रा (स्पिका) का ध्रुव 180°—अयनांश-प्रयोगशाला का स्थिर संदर्भ। MATHEMATICAL-AUDIT के अनुसार classical Z=285 CE स्पिका-अवशेष ~0.31°–0.44° छोड़ता है; हल Z≈253.8 CE आज स्पिका ≈ 0° sidereal (180° से उलटा शून्य) रखता है, 1700–2100 पर residual ≲0.10°। इसे 54″/वर्ष, 50″/वर्ष और ±27° trepidation के साथ चयन-योग्य परिकल्पना माना गया—एकमात्र ऐतिहासिक सत्य नहीं। दर 49.2″/वर्ष = 54 − 4.8 rational core भी इसी तारक-ढाँचे के सापेक्ष मापा गया।

8.4
मनवो अथ रसा वेदा वैश्वं आप्यार्धभोगगम् ।
आप्यस्यैवाभिजित्प्रान्ते वैश्वान्ते श्रवणस्थितिः ।
manavo atha rasā vedā vaiśvaṃ āpyārdhabhogagam ।
āpyasyaivābhijitprānte vaiśvānte śravaṇasthitiḥ ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मनवः = 14; रसाः = 6; वेदाः = 4; वैश्वम् = वैश्व/उत्तराषाढा योगतारा; आप्य = आप्य/पूर्वाषाढा; अर्धभोगगम् = आधे भोग (½×800′ = 400′ = 6°40′) पर स्थित; अभिजित्-प्रान्ते = अभिजित् आप्य के अंत पर; वैश्वान्ते = वैश्व के अंत पर; श्रवण-स्थितिः = श्रवण की स्थिति।

हिन्दी भावार्थ ज्येष्ठा, मूल और पूर्वाषाढा की दशाहत-संख्याएँ 14, 6 और 4 हैं—ध्रुव क्रमशः 229°, 241° और 254°। उत्तराषाढा (वैश्व) को आप्य के आधे भोग पर रखा गया: पूर्वाषाढा-ध्रुव से आधा-भोग आगे। अभिजित् आप्य-नक्षत्र की सीमा (समान-भोग अंत) पर है; श्रवण वैश्व की सीमा पर—अभिजित् को बीच में पिरोकर भी सत्ताईस-भोग की चाप-श्रृंखला टूटती नहीं, केवल एक अतिरिक्त योगतारा जुड़ती है।

English rendering Jyeṣṭhā, Mūla and Pūrvāṣāḍhā take decade-figures 14, 6 and 4 (dhruvas 229°, 241°, 254°). Vaiśva (Uttarāṣāḍhā) stands at half a bhoga relative to Āpya (Pūrvāṣāḍhā). Abhijit sits at Āpya’s end-boundary; Śravaṇa at Vaiśva’s end—so the intercalated Abhijit is pinned to the equal-span joints without rewriting the 27-fold metrology.

गणित / The Mathematics
• ज्येष्ठा: N=14 → D = 17×800′ + 140′ = 13600+140 = 13740′ = 229°0′
• मूल: N=6 → D = 18×800′ + 60′ = 14400+60 = 14460′ = 241°0′
• पूर्वाषाढा (आप्य): N=4 → D = 19×800′ + 40′ = 15200+40 = 15240′ = 254°0′
• उत्तराषाढा (वैश्व): आप्य + ½ भोग → 254° + 6°40′ = 260°40′ (परंपरा में प्रायः 260°0′ गोल; अर्धभोग=400′ नियम से 260°40′—पाठ/सारणी में 40′ का अंतर संभव)
• अभिजित्: आप्य-प्रांत = 20×800′ = 16000′ = 266°40′
• श्रवण: वैश्व-प्रांत = 21×800′ = 16800′ = 280°0′

(अभिजित् 28वें योगतारे के रूप में; भोग-गणना 27-खंड पर ही चलती है।)

उदाहरण (worked example)
अभिजित् ध्रुव = पूर्वाषाढा के समान-भोग का अंत
= 20 × 800′ = 16000′ = 266° + 40′ = 266°40′।
श्रवण = अगली सीमा = 21 × 800′ = 16800′ = 280°0′।

8.5
त्रिचतुः पादयोः सन्धौ श्रविष्ठा श्रवणस्य तु ।
स्वभोगतो वियन्नागाः षट्कृतिर्यमलाश्विनः ।।
tricatuḥ pādayoḥ sandhau śraviṣṭhā śravaṇasya tu ।
svabhogato viyannāgāḥ ṣaṭkṛtiryamalāśvinaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रि-चतुः-पादयोः सन्धौ = तीसरे और चौथे पाद के जोड़ पर; श्रविष्ठा = धनिष्ठा; श्रवणस्य = श्रवण के; स्वभोगतः = अपने भोग (द्वार) से; वियन्नागाः = 0,8 → 80 (वियत्=0, नाग=8); षट्कृतिः = ६² = 36 (कृति=वर्ग); यमल-अश्विनः = 2,2 → 22 (यमल=2, अश्विन्=2)।

हिन्दी भावार्थ धनिष्ठा (श्रविष्ठा) श्रवण के तीसरे-चौथे पाद की संधि पर है—श्रवण के चार पादों में से तीन पूरे होने पर। शतभिषा, पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद के लिए भोग-द्वार से दशाहत संख्याएँ 80, 36 और 22 हैं। रेवती वृत्त की समाप्ति के निकट रहती है (परंपरा में प्रायः 359°50′); इस श्लोक की तीन संख्याएँ अंतिम स्पष्ट भूतसंख्याएँ हैं।

English rendering Śraviṣṭhā (Dhaniṣṭhā) lies at the junction of Śravaṇa’s third and fourth pādas. From their own equal-bhoga starts, Śatabhiṣaj, Pūrva-Bhādrapadā and Uttara-Bhādrapadā take decade-figures 80, 36 and 22. Revatī closes the belt near the full circle (commonly 359°50′ in the received table).

गणित / The Mathematics
• श्रवण भोग = 800′; एक पाद = 800′⁄4 = 200′ = 3°20′।
• 3 पाद = 600′ = 10°।
• धनिष्ठा: श्रवण-ध्रुव 280° + 10° = 290°0′
(समान-भोग: श्रवण-द्वार = 21×800′ = 16800′; +600′ = 17400′ = 290°।)
• शतभिषा: N=80 → D = 23×800′ + 800′ = 18400+800 = 19200′ = 320°0′
• पूर्वभाद्रपद: N=36 (षट्कृति=6²) → D = 24×800′ + 360′ = 19200+360 = 19560′ = 326°0′
• उत्तरभाद्रपद: N=22 → D = 25×800′ + 220′ = 20000+220 = 20220′ = 337°0′
• रेवती (प्राप्त सारणी): प्रायः 359°50′ = 21590′ (वृत्त-समाप्ति से 10′ पहले)—इस श्लोक में शब्द-संख्या नहीं; परंपरागत पूरक।

उदाहरण (worked example)
धनिष्ठा पाद-नियम से:
प्रारंभ श्रवण = 280°0′;
संधि (पाद 3|4) = 280° + 3×3°20′ = 280° + 10° = 290°0′।
षट्कृति जाँच: 6×6 = 36 → 360′ = 6°0′ भोग के भीतर → 320° + 6° = 326° (पूर्वभाद्रपद)।

8.6
रन्ध्राद्रयः क्रमादेषां विक्षेपाः स्वादपक्रमात् ।
दिङ्मासविषयाः सौम्ये याम्ये पञ्च दिशो नव ।।
randhrādrayaḥ kramādeṣāṃ vikṣepāḥ svādapakramāt ।
diṅmāsaviṣayāḥ saumye yāmye pañca diśo nava ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रन्ध्राद्रयः = (आरंभ-सूचक / क्रम; भूतसंख्या-पाठ में रन्ध्र=9, अद्रि=7—यहाँ क्रमवाची); क्रमात् = क्रम से; एषाम् विक्षेपाः = इनके विक्षेप (ध्रुवीय अक्षांश / polar latitude); स्वात् अपक्रमात् = अपने (आदि) से आगे; दिक् = 10; मास = 12; विषय = 5; सौम्ये = उत्तर में; याम्ये = दक्षिण में; पञ्च = 5; दिशः = 10; नव = 9।

हिन्दी भावार्थ अब इन्हीं योगताराओं के विक्षेप—क्रांतिवृत्त से ध्रुव की ओर का कोणीय पलायन—क्रम से कहे जाते हैं। पहले तीन उत्तर में: 10°, 12° और 5° (अश्विनी, भरणी, कृत्तिका)। अगले तीन दक्षिण में: 5°, 10° और 9° (रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा)। धन उत्तरी अक्षांश, ऋण दक्षिणी—केवल ज्यामितीय चिह्न, फल-अर्थ नहीं।

English rendering Their polar latitudes (vikṣepa) are next given in order. The first three are northern: 10°, 12° and 5°. The next three are southern: 5°, 10° and 9°. Sign is geometric (north positive, south negative), not predictive.

गणित / The Mathematics
विक्षेप β (ध्रुवीय अक्षांश), क्रम अश्विनी से:

| नक्षत्र | β | दिशा |
|--------|---|------|
| अश्विनी | 10° | सौम्य (+) |
| भरणी | 12° | सौम्य (+) |
| कृत्तिका | 5° | सौम्य (+) |
| रोहिणी | 5° | याम्य (−) |
| मृगशिरा | 10° | याम्य (−) |
| आर्द्रा | 9° | याम्य (−) |

कुछ मुद्रित सारणियों में आर्द्रा −11° (रुद्र) मिलती है; यहाँ मूल पाठ नव = 9°—पाठ-भेद संभव।
ध्रुव (λ_dhruva) + विक्षेप (β) मिलकर योगतारा का SS गोलीय स्थान तय करते हैं; आधुनिक ecliptic (λ, β) में रूपांतरण के लिए obliquity और ध्रुव-परिभाषा घोषित करनी होती है।

उदाहरण (worked example)
केवल निर्देश-चिह्न:
β(कृत्तिका) = +5°, β(रोहिणी) = −5°।
दोनों का |β| = 5°; चिह्न विपरीत गोलार्ध बताता है, न कि “शुभ-अशुभ”।

8.7
सौम्ये रसाः खं याम्ये अगाः सौम्ये खार्कास्त्रयोदश ।
दक्षिणे रुद्रयमलाः सप्तत्रिंशदथोत्तरे ।।
saumye rasāḥ khaṃ yāmye agāḥ saumye khārkāstrayodaśa ।
dakṣiṇe rudrayamalāḥ saptatriṃśadathottare ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौम्ये रसाः = उत्तर में 6° (रस=6); खम् = 0°; याम्ये अगाः = दक्षिण में 7° (अग=7); सौम्ये ख-अर्काः-त्रयोदश = उत्तर में 0°, 12°, 13° (ख=0, अर्क=12, त्रयोदश=13); दक्षिणे रुद्र-यमलाः = दक्षिण में 11°, 2° (रुद्र=11, यमल=2); सप्तत्रिंशत् = 37°; अथ उत्तरे = फिर उत्तर में।

हिन्दी भावार्थ पुनर्वसु उत्तर में 6°, पुष्य क्रांतिवृत्त पर 0°, आश्लेषा दक्षिण में 7°। मघा फिर 0°; पूर्वफाल्गुनी और उत्तरफाल्गुनी उत्तर में 12° और 13°। हस्त दक्षिण 11°, चित्रा दक्षिण 2°; स्वाती दूर उत्तर में 37°—नक्षत्र-माला में सबसे बड़ा विक्षेप-आयाम यहाँ स्पष्ट है।

English rendering Punarvasu +6° (N), Puṣya 0°, Āśleṣā −7° (S); Maghā 0°, the Phalgunīs +12° and +13° (N); Hasta −11°, Citrā −2° (S); Svātī +37° (N)—the largest latitude excursion in this stretch of the belt.

गणित / The Mathematics
β क्रम जारी (पुनर्वसु → स्वाती):

| नक्षत्र | β |
|--------|---|
| पुनर्वसु | +6° |
| पुष्य | 0° |
| आश्लेषा | −7° |
| मघा | 0° |
| पूर्वफाल्गुनी | +12° |
| उत्तरफाल्गुनी | +13° |
| हस्त | −11° |
| चित्रा | −2° |
| स्वाती | +37° |

चित्रा: ध्रुव 180°, विक्षेप −2°—स्पिका-सन्दर्भ में अयनांश शून्य-वर्ष की ज्यामितीय पृष्ठभूमि (देशांतर-शुद्धता मुख्य; अक्षांश अलग परत)।

उदाहरण (worked example)
स्वाती |β| = 37°; चित्रा |β| = 2°।
अनुपात 37∶2—SS तारक-पटल में अक्षांशीय फैलाव असमान है; समान भोग केवल देशांतर-खंडन है, विक्षेप स्वतंत्र सारणी।

हमारा डिकोड (Our Decode)
तारक-ध्रुव/विक्षेप अध्याय 8 का कच्चा माल है; `math-core` mean-longitude प्रयोगशाला और `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` का स्फुट-पथ ग्रह-मंद/शीघ्र पर चलते हैं, योगतारा-कैटलॉग पर नहीं। फिर भी अयनांश-लैब में चित्रा-180° और स्पिका-residual वही “तारक-सत्य” हैं जिनसे Z≈253.8 CE परिकल्पना को 285 CE के विरुद्ध जाँचा गया—शब्द-जोर से नहीं, pinned residual से।

8.8
याम्य अध्यर्धत्रिककृता नव सार्धशरेषवः ।
उत्तरस्यां तथा षष्टिस्त्रिंशत्षट्त्रिंशदेव हि ।।
yāmya adhyardhatrikakṛtā nava sārdhaśareṣavaḥ ।
uttarasyāṃ tathā ṣaṣṭistriṃśatṣaṭtriṃśadeva hi ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्ये = दक्षिण में; अध्यर्ध = 1½°; त्रिक = 3°; कृता = 4°; नव = 9°; सार्ध-शराः = साढ़े पाँच = 5°30′ (पूर्वाषाढा); इषवः = 5° (उत्तराषाढा); उत्तरस्याम् = उत्तर दिशा में; षष्टिः = 60°; त्रिंशत् = 30°; षट्त्रिंशत् = 36°; एव हि = इसी प्रकार / निश्चय।

हिन्दी भावार्थ दक्षिणी विक्षेप आगे: विशाखा 1½°, अनुराधा 3°, ज्येष्ठा 4°, मूल 9°, पूर्वाषाढा 5°30′, उत्तराषाढा 5° (इषवः)। उत्तरी पंक्ति में अभिजित् 60°, श्रवण 30°, धनिष्ठा 36°—अभिजित् का साठ अंश इस सूची का शिखर है, क्योंकि वह ध्रुव-के निकट योगतारा के रूप में गिना गया। शेष चार (शतभिषा, दोनों भाद्रपदा, रेवती) अगले श्लोक 8.9 में हैं; इस अष्टक में ये तीन उत्तरी मान स्पष्ट हैं।

English rendering Southern latitudes continue: Viśākhā 1½°, Anurādhā 3°, Jyeṣṭhā 4°, Mūla 9°, Pūrvāṣāḍhā 5°30′, Uttarāṣāḍhā 5° (iṣavaḥ). To the north: Abhijit 60°, Śravaṇa 30°, Dhaniṣṭhā 36°—Abhijit’s sixty degrees is the catalogue’s polar extreme. The remaining four (Śatabhiṣaj, the two Bhādrapadās, Revatī) are in 8.9.

गणित / The Mathematics
β (याम्य, चिह्न −) और β (सौम्य, चिह्न +):

| नक्षत्र | β |
|--------|---|
| विशाखा | −1°30′ |
| अनुराधा | −3° |
| ज्येष्ठा | −4° |
| मूल | −9° |
| पूर्वाषाढा | −5°30′ |
| उत्तराषाढा | −5° |
| अभिजित् | +60° |
| श्रवण | +30° |
| धनिष्ठा | +36° |

अध्यर्ध = 1 + ½ = 3⁄2°; सार्धशर = 5 + ½ = 11⁄2° = 5°30′।
पूर्ण योगतारा-स्थान (SS): ध्रुव D (अध्याय 8.2–5) + विक्षेप β (8.6–8); ग्रह-स्फुट (अध्याय 2) इन तारकों से स्वतंत्र मंद-शीघ्र एल्गोरिथ्म है।

उदाहरण (worked example)
विशाखा: D = 213°0′ (श्लोक 8.03), β = −1°30′।
पूर्वाषाढा: D = 254°0′, β = −5°30′।
अभिजित्: D = 266°40′, β = +60°—देशांतर में आप्य-प्रांत, अक्षांश में ध्रुव-समीप।

(Convention: D समान-भोग + दशाहत-कला से; β इस श्लोक की भूतसंख्या से; ayanāṃśa अलग परत—sidereal SS-ध्रुव को tropical में ले जाने पर ही युग/Z घोषित करें।)

सुधार · correction (2026-10-07) पूर्व संस्करण ने इस श्लोक का अन्तिम शब्द "इषवः" (उत्तराषाढा, 5° दक्षिण) छोड़ दिया था और उसे "परंपरागत सारणी" पर छोड़ा था; वह मान इसी श्लोक में है। The earlier edition dropped the verse’s own word iṣavaḥ, Uttarāṣāḍhā’s 5° south.

8.9
दक्षिणे त्वर्धभागस्तु चतुर्विंशतिरुत्तरे ।
भागाः षड्विंशतिः खं च दास्रादीनां यथाक्रमम् ।।
dakṣiṇe tvardhabhāgastu caturviṃśatiruttare ।
bhāgāḥ ṣaḍviṃśatiḥ khaṃ ca dāsrādīnāṃ yathākramam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दक्षिणे = दक्षिण दिशा में; अर्धभागः = आधा अंश (0.5°); चतुर्विंशतिः = 24 अंश; उत्तरे = उत्तर में; षड्विंशतिः = 26 अंश; खम् = शून्य (0); दास्रादीनाम् = अश्विनी आदि (योगताराओं) का; यथाक्रमम् = क्रमशः।

हिन्दी भावार्थ दक्षिण में आधा अंश, उत्तर में चौबीस अंश, फिर छब्बीस अंश, और अन्त में शून्य — अश्विनी से आरम्भ होने वाली योगतारा-श्रृंखला के विक्षेप (अक्षांशीय/ध्रुवीय अक्षांश) इसी क्रम से पूर्ण होते हैं। यह पद सूची के अन्तिम चार मानों को एक साथ बाँधता है: आधा अंश दक्षिण, चौबीस उत्तर, छब्बीस, और ख—शून्य। पाठ की धारा अध्याय की क्रमिक नाक्षत्र-तालिका को आगे बढ़ाती है; “दास्रादी” संकेत है कि पूरी गणना अश्विनी से चली आ रही है।

English rendering Half a degree in the south; twenty-four in the north; twenty-six degrees; and zero — these complete, in order, the polar-latitude series of the junction-stars belonging to the Aśvinī-led sequence. The verse seals the last four values of that ordered catalogue.

गणित / The Mathematics क्रमिक विक्षेप-मान (अंतिम चार, दास्रादि-क्रम):
- दक्षिण: ½° (= 0.5°)
- उत्तर: 24°
- 26°
- खम् = 0°

शब्द-अंक: अर्धभाग = 1/2; चतुर्विंशति = 24; षड्विंशति = 26; ख = 0। ये मान पद में दिए गए हैं; पूर्व-श्लोकों से जुड़ी पूरी 27-योगतारा तालिका का शेष भाग।

उदाहरण (worked example) यदि सूची में “दक्षिणे अर्धभाग” वाला नक्षत्र-योगतारा है, तो विक्षेप = −0.5° (दक्षिण को ऋण-चिह्न से)। उसके पश्चात् उत्तर 24°, फिर 26°, फिर 0°। संकेत-परम्परा: उत्तर धनात्मक, दक्षिण ऋणात्मक — गणना-परत में यही चिह्न-नियम अपनाना पड़ता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक निर्देश-तालिका है, न कि बृहस्पति-बीज। हमारा `math-core` mean-longitude / ayanāṃśa-प्रयोगशाला तारकीय ध्रुवक-विक्षेप सूची को “सत्य” नहीं ठहराता — यह शास्त्रीय निर्देशिका है। जब भी निर्देशांक तुलना होती है, canon day-count और ayanāṃśa-hypothesis अलग-अलग घोषित किए जाते हैं; यहाँ मात्र पाठ के अंक सुरक्षित रखे जाते हैं।

8.10
अशीतिभागैर्याम्यायां अगस्त्यो मिथुनान्तगः ।
विंशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधो व्यवस्थितः ।।
aśītibhāgairyāmyāyāṃ agastyo mithunāntagaḥ ।
viṃśe ca mithunasyāṃśe mṛgavyādho vyavasthitaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अशीतिभागैः = अस्सी अंशों से; याम्यायाम् = दक्षिण में; अगस्त्यः = अगस्त्य (Canopus); मिथुनान्तगः = मिथुन-राशि के अन्त पर स्थित; विंशे = बीसवें में; मिथुनस्य अंशे = मिथुन के अंश में; मृगव्याधः = मृगव्याध (Sirius, शिकारी); व्यवस्थितः = स्थित/स्थापित।

हिन्दी भावार्थ अगस्त्य दक्षिण में अस्सी अंश पर है, और मिथुन राशि के अन्त तक पहुँचा हुआ माना गया है। मृगव्याध मिथुन के बीसवें अंश में व्यवस्थित है। यह दोनों “बड़े तारे” नक्षत्र-योगतारा सूची से अलग, स्वतंत्र रूप से निर्देशांक पाते हैं — एक दक्षिणी गोलार्ध का स्तम्भ, दूसरा आकाश-शिकारी।

English rendering Agastya stands eighty degrees south, placed at the end of Gemini. Mṛgavyādha is fixed in the twentieth degree of Gemini. Both receive explicit positions outside the ordinary nakṣatra junction-star roster.

गणित / The Mathematics
- अगस्त्य: विक्षेप/दक्षिण-दूरी = 80° (अशीति), ध्रुवक-संकेत ≈ मिथुनान्त (Mithuna end ≃ 90° from Meṣādi, राशि-क्रम में)
- मृगव्याध: मिथुन का 20वाँ अंश → राशि-अंश = Mithuna 20° ≃ 80° from sidereal 0° (Meṣa 0° convention), यदि राशि-क्रम Meṣa→Mithuna अपनाया जाए

शब्द-अंक: अशीति = 80; विंश = 20।

उदाहरण (worked example) Meṣādi-sidereal convention: Mithuna 0° = 60°, अतः मिथुनान्त ≈ 90°; मिथुन 20° ≈ 80°। अगस्त्य: λ_dhruva ≈ 90°, β ≈ −80° (दक्षिण)। मृगव्याध: λ ≈ 80°, β अगले श्लोक से। (सटीक ध्रुवक-परिभाषा: SS की polar longitude, tropical/modern λ नहीं।)

8.11
विक्षेपो दक्षिणे भागैः खार्णवैः स्वादपक्रमात् ।
हुतभुग्ब्रह्महृदयौ वृषे द्वाविंशभागगौ ।।
vikṣepo dakṣiṇe bhāgaiḥ khārṇavaiḥ svādapakramāt ।
hutabhugbrahmahṛdayau vṛṣe dvāviṃśabhāgagau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विक्षेपः = अक्षांशीय विक्षेप; दक्षिणे = दक्षिण में; भागैः खार्णवैः = ख-अर्णव = 40 अंश (अर्णव=4, ख=0 → 40); स्वादपक्रमात् = अपने अपक्रम/स्व-अक्ष से (पाठानुसार); हुतभुक् = हुतभुज् (अग्नि-तारा); ब्रह्महृदयौ = और ब्रह्महृदय (दोनों); वृषे = वृष राशि में; द्वाविंशभागगौ = बाईसवें अंश तक पहुँचे हुए।

हिन्दी भावार्थ (मृगव्याध का) विक्षेप दक्षिण में चालीस अंश है — “खार्णव” शब्द-संख्या से 40। हुतभुज् और ब्रह्महृदय, दोनों वृष के बाईसवें अंश में गिने गए हैं। यहाँ एक ओर बड़े दक्षिणी तारे का अक्षांश, दूसरी ओर वृष-क्षेत्र के दो प्रसिद्ध तारों का समान ध्रुवक-अंश — दोनों निर्देश एक ही श्लोक में जुड़े हैं।

English rendering The southern latitude is forty degrees (kha-arṇava = 40), reckoned from the stated apakrama/frame of the star. Hutabhuj and Brahmahṛdaya both stand in the twenty-second degree of Taurus.

गणित / The Mathematics
- खार्णव: अर्णव = 4 (समुद्र), ख = 0 → 40 (अङ्कानां वामतो गतिः)
- मृगव्याध विक्षेप: β = −40° (दक्षिण)
- हुतभुज्, ब्रह्महृदय: वृष 22° → Meṣādi में λ ≈ 30° + 22° = 52° (राशि = Vṛṣa = 2)

उदाहरण (worked example) यदि Meṣa 0° = sidereal zero, तो वृष 22° = 52° dhruvaka (SS polar longitude). β अगले श्लोक में अलग-अलग: 8° और 30° उत्तर। इस श्लोक में केवल समान “22° वृष” साझा है।

8.12
अष्टाभिस्त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरेण तौ ।
गोलं लब्ध्वा परीक्षेत विक्षेपं ध्रुवकं स्फुटम् ।।
aṣṭābhistriṃśatā caiva vikṣiptāvuttareṇa tau ।
golaṃ labdhvā parīkṣeta vikṣepaṃ dhruvakaṃ sphuṭam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टाभिः = आठ से; त्रिंशता = तीस से; विक्षिप्तौ = (दोनों) विक्षेपित; उत्तरेण = उत्तर की ओर; तौ = वे दोनों; गोलम् = गोलयन्त्र/गोल; लब्ध्वा = प्राप्त कर/रचकर; परीक्षेत = जाँचे; विक्षेपम् = विक्षेप; ध्रुवकम् = ध्रुवक (ध्रुवीय देशान्तर); स्फुटम् = स्पष्ट/सत्य।

हिन्दी भावार्थ वे दोनों (हुतभुज् और ब्रह्महृदय) उत्तर में क्रमशः आठ और तीस अंश विक्षेपित हैं। गोल पाकर — अर्थात् गोलयन्त्र पर मापकर — विक्षेप और ध्रुवक दोनों को स्फुट जाँचना चाहिए। शास्त्र केवल अंक नहीं थमाता; वह माप-परीक्षा का द्वार भी खोलता है: निर्देशांक लिखे गए, अब गोले पर सत्यापित करो।

English rendering Those two are displaced northward by eight and by thirty degrees respectively. Having obtained the sphere, one should examine the true latitude and the polar longitude. The text itself demands verification on the instrument.

गणित / The Mathematics
- हुतभुज्: β = +8° (उत्तर)
- ब्रह्महृदय: β = +30° (उत्तर)
- स्फुट परीक्षा: (λ_dhruva, β) को गोलयन्त्र/तुल्य माप से जाँचना — कोई बीज-सूत्र नहीं, माप-अनुशासन

उदाहरण (worked example) ब्रह्महृदय: Vṛṣa 22°, β = +30°। यदि प्रेक्षित ध्रुवक 52.0° ± ε और विक्षेप 30° के निकट आते हैं, तो पाठ-मान “स्फुट” माने जाते हैं। SS यहाँ ε-tolerance नहीं लिखता — “परीक्षेत” का अर्थ है प्रत्यक्ष जाँच, अनुमान नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “गोलं लब्ध्वा परीक्षेत” हमारी oracle-discipline से सीधे जुड़ता है: `kaal-verification-oracle` में `==` on pinned fixtures — tolerance-band कभी असली −1 छिपा चुकी थी। पाठ कहता है स्फुट विक्षेप-ध्रुवक जाँचो; हम कहते हैं exact check, bug-hider bands नहीं। mean-longitude lab को true-position ephemeris कहने का प्रलोभन भी यहीं काटा जाता है — पहले माप-परत, फिर दावा।

8.13
वृषे सप्तदशे भागे यस्य याम्यो अंशकद्वयात् ।
विक्षेपो अभ्यधिको भिन्द्याद्रोहिण्याः शकतं तु सः ।।
vṛṣe saptadaśe bhāge yasya yāmyo aṃśakadvayāt ।
vikṣepo abhyadhiko bhindyādrohiṇyāḥ śakataṃ tu saḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वृषे सप्तदशे भागे = वृष के सत्रहवें अंश में; यस्य = जिसका; याम्यः = दक्षिणी; अंशकद्वयात् = दो अंश से; विक्षेपः अभ्यधिकः = विक्षेप अधिक; भिन्द्यात् = भेद/विदीर्ण करे; रोहिण्याः शकटम् = रोहिणी का शकट (गाड़ी); सः = वही (ग्रह/स्थिति)।

हिन्दी भावार्थ जिसका स्थान वृष के सत्रहवें अंश में हो और दक्षिणी विक्षेप दो अंश से अधिक हो, वही रोहिणी के शकट को भेदता है। यह ज्यामितीय कसौटी है — देशान्तर की खिड़की और अक्षांश की न्यूनतम सीमा — न कि भाग्य-घोषणा। “शकट-भेद” शास्त्र में एक परिभाषित घटना है: शर्तें पूरी हों तभी नाम लागू होता है।

English rendering That body which stands in the seventeenth degree of Taurus, with southern latitude greater than two degrees, is said to split Rohiṇī’s cart. The verse states a geometric gate: longitude window plus a latitude threshold.

गणित / The Mathematics रोहिणी-शकट-भेद शर्तें:
1. λ ∈ Vṛṣa 17° (अर्थात् Meṣādi में ≈ 46°–47° की एक-अंशीय खिड़की, राशि-परिभाषा अनुसार)
2. β_south > 2° अर्थात् β < −2° (दक्षिण को ऋण)
दोनों शर्तें एक साथ आवश्यक।

उदाहरण (worked example) मान लें ग्रह का SS-स्फुट: λ = Vṛṣa 17.4°, β = −2.6°। शर्त (1) सत्य, शर्त (2) −2.6 < −2 सत्य → शकट-भेद लागू। यदि β = −1.5°, तो देशान्तर सही होने पर भी भेद नहीं — विक्षेप-द्वार नहीं खुला।

8.14
ग्रहवद्द्युनिशे भानां कुर्याद्दृक्कर्म पूर्ववत् ।
ग्रहमेलकवच्छेषं ग्रहभुक्त्या दिनानि च ।।
grahavaddyuniśe bhānāṃ kuryāddṛkkarma pūrvavat ।
grahamelakavaccheṣaṃ grahabhuktyā dināni ca ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रहवत् = ग्रहों के समान; द्युनिशे = दिन-रात्रि/उदय-अस्त के कार्य में; भानाम् = नक्षत्र-तारों का; कुर्यात् = करे; दृक्कर्म = दृक्कर्म (दृष्टि/उदय संशोधन); पूर्ववत् = पूर्ववत् (जैसा पहले कहा); ग्रहमेलकवत् = ग्रह-समागम के समान; शेषम् = शेष कार्य; ग्रहभुक्त्या = ग्रह की भुक्ति (गति) से; दिनानि = दिन-संख्या।

हिन्दी भावार्थ तारों के लिए भी, दिन-रात्रि के उदय-अस्त आदि में, ग्रहों जैसा दृक्कर्म पूर्वविधि से करना चाहिए। शेष — योग का अवशिष्ट और दिन-गणना — ग्रह-मेलक की तरह, ग्रह की भुक्ति से साधें। तारा स्थिर “ध्रुवक” पर है; गतिशील ग्रह की भुक्ति से वह दूरी समय में बदलती है — वही शेष को दिनों में पलटती है।

English rendering For the fixed stars, perform the visibility corrections (dṛkkarma) in the diurnal work just as for the planets, by the method already given. The remainder — as in planetary conjunction — and the days are obtained from the planet’s motion (bhukti).

गणित / The Mathematics
- दृक्कर्म: पूर्व-अध्याय की दृष्टि-संशोधन श्रृंखला (अक्ष, चर, अयन आदि — “पूर्ववत्”)
- समागम-शेष → दिन:
दिन ≈ Δλ_शेष / μ_ग्रह
जहाँ μ_ग्रह = दैनिक भुक्ति (°/day), Δλ_शेष = तारा-ध्रुवक − ग्रह-स्फुट (चिह्न-सहित)
- तारे की भुक्ति ≈ 0 (ध्रुवक स्थिर मान)

उदाहरण (worked example) मान लें ध्रुवक λ★ = 52°, ग्रह स्फुट λ = 49.2°, दैनिक भुक्ति μ = 0.52°/day (उदाहरण मान)। शेष = 52 − 49.2 = 2.8°। दिन ≈ 2.8 / 0.52 ≈ 5.4 दिन बाद सम्भावित योग (ऋजु गति, अगला श्लोक वक्र के लिए उलटा नियम)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “पूर्ववत्” हमें SS Ch.2 स्फुट-श्रृंखला की याद दिलाता है — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में शुद्ध मन्द+शीघ्र, बिना पश्चिमी प्रमेय के। दृक्कर्म और स्फुट अलग परतें हैं; instrument mean-longitude lab है, production true-position ephemeris नहीं — यही ईमानदारी MATHEMATICAL-AUDIT और sealed sphuṭa engine दोनों की है।

8.15
एष्यो हीने गृहे योगो ध्रुवकादधिके ततः ।
विपर्ययाद्वक्रगते ग्रहे ज्ञेयः समागमः ।।
eṣyo hīne gṛhe yogo dhruvakādadhike tataḥ ।
viparyayādvakragate grahe jñeyaḥ samāgamaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एष्यः = आने वाला/भविष्यत्; हीने गृहे = (ग्रह का) गृह/भोग कम होने पर; योगः = योग/समागम; ध्रुवकात् अधिके = ध्रुवक से अधिक होने पर; ततः = तब (बीत चुका/उस ओर); विपर्ययात् = उलटा नियम; वक्रगते ग्रहे = वक्र गति में; ज्ञेयः = जानना चाहिए; समागमः = समागम।

हिन्दी भावार्थ यदि ग्रह का स्थान ध्रुवक से कम (हीन) है, तो योग अभी आने वाला है; यदि ध्रुवक से अधिक है, तो योग उस पार — पीछे रह चुका या दिशा के अनुसार निर्णीत। वक्र गति में यही तर्क उलट जाता है। स्थिर तारे के सापेक्ष ग्रह की दिशा और गति-चिह्न मिलकर “एष्य/अतीत” तय करते हैं।

English rendering When the planet’s longitude is less than the star’s dhruvaka, the conjunction is still to come; when greater, it lies the other way from that point. For a retrograde planet the same test is reversed. Direction of motion flips the future/past reading of the residual.

गणित / The Mathematics ऋजु (μ > 0):
- यदि λ_ग्रह < λ★ → योग एष्य (भविष्य)
- यदि λ_ग्रह > λ★ → योग अतीत/पार

वक्र (μ < 0): विपर्यय —
- λ_ग्रह < λ★ → (वक्र में) अतीत-पक्ष
- λ_ग्रह > λ★ → एष्य-पक्ष

समय: t ≈ (λ★ − λ_ग्रह) / μ, μ के चिह्न सहित।

उदाहरण (worked example) λ★ = 80°, λ = 78°, μ = +0.5°/day → t ≈ +4 day (एष्य)। वही λ, μ = −0.4°/day (वक्र) → t ≈ (80−78)/(−0.4) = −5 day अर्थ: ज्यामितीय शेष वक्र-नियम से “एष्य” दिशा उलट कर पढ़ा जाता है — विपर्यय।

8.16
फाल्गुन्योर्भाद्रपदयोस्तथैवाषाढयोर्द्वयोः ।
विशाखाश्विनिसौम्यानां योगतारोत्तरा स्मृता ।।
phālgunyorbhādrapadayostathaivāṣāḍhayordvayoḥ ।
viśākhāśvinisaumyānāṃ yogatārottarā smṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) फाल्गुन्योः = दोनों फाल्गुनी (पूर्वा-उत्तरा) में; भाद्रपदयोः = दोनों भाद्रपद में; तथा एव = उसी प्रकार; आषाढयोः द्वयोः = दोनों आषाढ़ में; विशाखा-अश्विनि-सौम्यानाम् = विशाखा, अश्विनी और सौम्य की; योगतारा = योगतारा; उत्तरा = उत्तरी/उत्तर वाली; स्मृता = कही गई/मानी गई।

हिन्दी भावार्थ दोनों फाल्गुनी, दोनों भाद्रपद, और दोनों आषाढ़ — इन युग्मों में, तथा विशाखा, अश्विनी और सौम्य में — योगतारा “उत्तरा” मानी गई है: अर्थात् जो उत्तर की ओर स्थित तारा है, वही योग का प्रतिनिधि। जहाँ नक्षत्र-द्वय या बहु-तारक समूह है, शास्त्र एक स्पष्ट चयन-नियम देता है — उत्तरी तारा। इससे ध्रुवक-विक्षेप तालिका में भ्रम घटता है: किस तारे को “नक्षत्र का योग” कहें।

English rendering Of the two Phalgunīs, the two Bhādrapadas, and likewise the two Āṣāḍhās — and of Viśākhā, Aśvinī, and Saumya — the junction-star is held to be the northern one. Where a nakṣatra is a pair or a cluster, the text chooses the northerly star as yogatārā.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — चयन-नियम (योगतारा-निर्धारण)। नियम: युग्म/उक्त नक्षत्रों में β अधिक उत्तर वाला तारा = योगतारा; उसी के (λ_dhruva, β) तालिका में प्रविष्ट।

(यहाँ कोई संख्या-अंक नहीं; “उत्तरा” दिशा-संकेत है, अंश नहीं।)

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए कि आप फाल्गुनी-युग्म की ओर दूरबीन नहीं, केवल नग्न-आँखे और दिशा-ज्ञान लेकर खड़े हैं: दो प्रमुख तारे लगभग समान चमक के दिखें तो शास्त्र पूछता है—“कौन योगतारा?” उत्तर एक पंक्ति में है—उत्तरा, अर्थात् अधिक उत्तर-स्थित तारा। यही नियम भाद्रपद और आषाढ़ के युग्मों पर, तथा विशाखा–अश्विनी–सौम्य जैसे बहु-तारक समूहों पर, एक ही चाबी खोलता है। ध्रुवक–विक्षेप की तालिका बनाते समय यह चयन-नियम भ्रम काटता है: एक नक्षत्र-नाम के पीछे एक ही निर्देशांक-बिन्दु। अध्याय ८ की शेष योगतारा-सूचियाँ इसी “एक नक्षत्र → एक प्रतिनिधि-तारा” अनुशासन की विस्तार-पंक्तियाँ हैं।

8.17
पश्चिमोत्तरताराया द्वितीया पश्चिमे स्थिता ।
हस्तस्य योगतारा सा श्रविष्ठायाश्च पश्चिमा ।।
paścimottaratārāyā dvitīyā paścime sthitā ।
hastasya yogatārā sā śraviṣṭhāyāśca paścimā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पश्चिमोत्तर-तारायाः = उत्तर-पश्चिम दिशा की (उस) तारा-पंक्ति की; द्वितीया = दूसरी (तारा); पश्चिमे स्थिता = पश्चिम में स्थित; हस्तस्य योगतारा = हस्त नक्षत्र की योगतारा; श्रविष्ठायाः पश्चिमा = श्रविष्ठा (धनिष्ठा) की पश्चिमी तारा; सा = वही (पहचानी गई तारा)।

हिन्दी भावार्थ योगताराओं की पहचान-सूची आगे बढ़ती है। उत्तर-पश्चिम दिशा की तारा-पंक्ति में जो दूसरी तारा पश्चिम ओर बैठी है, वही हस्त की योगतारा मानी गई है। उसी क्रम में श्रविष्ठा की पश्चिमी तारा भी योगतारा के रूप में निर्दिष्ट है। यहाँ दिशा और क्रम ही मापदण्ड हैं — नाम की जगह आकाश में स्थान।

English rendering The second star of the northwest group, lying to the west, is the yoga-tārā of Hasta; the western star of Śraviṣṭhā (Dhaniṣṭhā) is likewise so identified. Position and order, not mere names, fix the junction stars.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — नक्षत्र-योगतारा का दिशात्मक पहचान-वर्णन। कोण या सूत्र नहीं; “दूसरी–पश्चिम / पश्चिमी” जैसे स्थान-निर्देश ही मापदण्ड हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) हस्त को आकाश में “कोरवस (Corvus)” की तारा-पंक्ति से जोड़कर देखें: उत्तर-पश्चिम की कतार में जो दूसरी तारा पश्चिम ओर बैठी है—वही यहाँ योगतारा कही गई है, न कि समूह का सबसे चमकीला तारा स्वतः। श्रविष्ठा (धनिष्ठा) में मापदण्ड और भी सरल है—समूह की पश्चिमी तारा। दोनों जगह नाम-स्मृति से अधिक दिशा-क्रम काम करता है: पहले पंक्ति पहचानो, फिर “दूसरी/पश्चिमा” गिनो। रात्रि-निरीक्षण में यह विधि स्मृति-त्रुटि घटाती है—जब दो तारे लगभग समान हों, स्थान का क्रम ही निर्णायक रहता है।

8.18
ज्येष्ठाश्रवणमैत्राणां बार्हस्पत्यस्य मध्यमा ।
भरण्याग्नेयपित्र्याणां रेवत्याश्चैव दक्षिणा ।।
jyeṣṭhāśravaṇamaitrāṇāṃ bārhaspatyasya madhyamā ।
bharaṇyāgneyapitryāṇāṃ revatyāścaiva dakṣiṇā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्येष्ठा-श्रवण-मैत्राणाम् = ज्येष्ठा, श्रवण और मैत्र (अनुराधा) की; बार्हस्पत्यस्य = बार्हस्पत्य (पुष्य) की; मध्यमा = मध्य वाली (तारा); भरणी-आग्नेय-पित्र्याणाम् = भरणी, आग्नेय (कृत्तिका) और पित्र्य (मघा) की; रेवत्याः च = और रेवती की; दक्षिणा = दक्षिणी (तारा, योगतारा)।

हिन्दी भावार्थ जिन नक्षत्रों की योगतारा “मध्य” है — ज्येष्ठा, श्रवण, अनुराधा (मैत्र) और पुष्य (बार्हस्पत्य) — उनमें समूह की मध्य तारा योगतारा है। भरणी, कृत्तिका (आग्नेय), मघा (पित्र्य) और रेवती में दक्षिणी तारा योगतारा है। एक ही अध्याय दो सरल स्थान-नियमों से कई नक्षत्रों को बाँध देता है।

English rendering For Jyeṣṭhā, Śravaṇa, Maitra (Anurādhā) and Bārhaspatya (Puṣya), the middle star is the yoga-tārā. For Bharaṇī, Āgneya (Kṛttikā), Pitrya (Maghā) and Revatī, it is the southern star.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — योगतारा-चयन का वर्गीकरण (मध्यमा / दक्षिणा)। संख्यात्मक कोण नहीं; सापेक्ष स्थान-वर्ग ही नियम है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही श्लोक दो “स्विच” देता है। ज्येष्ठा, श्रवण, अनुराधा (मैत्र) और पुष्य (बार्हस्पत्य) में कल्पना कीजिए तीन तारों की छोटी श्रृंखला—योगतारा मध्य वाली है, किनारे की नहीं। भरणी, कृत्तिका (आग्नेय), मघा (पित्र्य) और रेवती में स्विच पलट जाता है: समूह में जो दक्षिण की ओर है, वही प्रतिनिधि। इस प्रकार आठ नक्षत्र बिना अलग-अलग कहानियों के दो स्थान-नियमों से बँध जाते हैं। तालिका-निर्माण में यह बचत है—प्रत्येक नाम के पीछे एक दिशा/क्रम-कोड, याद रखने लायक और दोहराने लायक।

8.19
रोहिण्यादित्यमूलानां प्राची सार्पस्य चैव हि ।
यथा प्रत्यवशेषाणां स्थूला स्याद्योगतारका ।।
rohiṇyādityamūlānāṃ prācī sārpasya caiva hi ।
yathā pratyavaśeṣāṇāṃ sthūlā syādyogatārakā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रोहिणी-आदित्य-मूलानाम् = रोहिणी, आदित्य (पुनर्वसु) और मूल की; प्राची = पूर्वी (तारा); सार्पस्य च = और सार्प (आश्लेषा) की भी; यथा = उसी प्रकार / यथाक्रम; प्रत्यवशेषाणाम् = शेष बचे नक्षत्रों की; स्थूला = स्थूल / प्रमुख-चमकदार (तारा); योगतारका स्यात् = योगतारा हो।

हिन्दी भावार्थ रोहिणी, पुनर्वसु (आदित्य), मूल और आश्लेषा (सार्प) में पूर्वी तारा योगतारा है। जो नक्षत्र इस अध्याय की पिछली विशेष श्रेणियों में नहीं आए, उनके लिए नियम सरल है — जो तारा स्थूल और प्रमुख दिखे, वही योगतारा। विशेष निर्देश जहाँ हैं, वहाँ दिशा-क्रम; शेष में दृश्य प्रमुखता।

English rendering For Rohiṇī, Āditya (Punarvasu), Mūla and Sārpa (Āśleṣā), the eastern star is the yoga-tārā. For the remaining nakṣatras not otherwise specified, the prominent (sthūla) star serves as the junction star.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — योगतारा-नियमों का समापन-सूत्र (प्राची + स्थूला-नियम)। यह सूची को “पूर्ण” बनाता है बिना प्रत्येक नक्षत्र का अलग कोण गिनाए।

दृष्टान्त (Illustrative Example) रोहिणी, पुनर्वसु (आदित्य), मूल और आश्लेषा (सार्प) में तीसरा स्विच लगता है—प्राची, पूर्वी तारा। शेष नक्षत्रों के लिए शास्त्र एक व्यावहारिक fallback देता है: जो तारा स्थूल—अर्थात् नग्न-आँख को सबसे प्रमुख—दिखे, वही योगतारका। आधुनिक भाषा में यह लगभग “group का brightest/dominant member” वाला नियम है, जहाँ विशेष दिशा-निर्देश नहीं दिए गए। इस अध्याय की पूरी योगतारा-व्यवस्था इस प्रकार पढ़ी जा सकती है: पहले विशेष नियम (उत्तर, पश्चिम, मध्य, दक्षिण, पूर्व), फिर residual के लिए दृश्य-प्रमुखता—ठीक जैसे catalogue में exception list के बाद default row।

8.20
पूर्वस्यां ब्रह्महृदयादंशकैः पञ्चभिः स्थितः ।
प्रजापतिर्वृषान्ते असौ सौम्ये अष्टत्रिंशदंशकैः ।।
pūrvasyāṃ brahmahṛdayādaṃśakaiḥ pañcabhiḥ sthitaḥ ।
prajāpatirvṛṣānte asau saumye aṣṭatriṃśadaṃśakaiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पूर्वस्याम् = पूर्व दिशा में; ब्रह्महृदयात् = ब्रह्महृदय (तारा) से; अंशकैः पञ्चभिः = पाँच अंश पर; स्थितः = स्थित; प्रजापतिः = प्रजापति (तारा); वृष-अन्ते = वृष राशि के अन्त में; असौ = वह; सौम्ये = उत्तर (क्रान्ति) में; अष्टत्रिंशत्-अंशकैः = अड़तीस अंश पर (+ पाठ-चिह्न: असौ / सौम्ये — अर्थ-भेद नहीं, पद-योजना)।

हिन्दी भावार्थ ब्रह्महृदय से पाँच अंश पूर्व प्रजापति स्थित है। वह वृष के अन्त में पढ़ा जाता है, और उत्तर में अड़तीस अंश पर। यह नक्षत्र-योगतारा-सूची से हटकर “बाहर” के तारों का कोणीय मानचित्र है — देशान्तर-सदृश पूर्व-पश्चिम दूरी और क्रान्ति-सदृश उत्तर-दक्षिण दूरी दोनों अंशों में।

English rendering Prajāpati lies five degrees east of Brahma-hṛdaya, at the end of Vṛṣa (Taurus), and thirty-eight degrees to the north. The verse pins a non-zodiacal star by ecliptic-end placement plus polar offset.

गणित / The Mathematics
- पूर्व-दूरी (ब्रह्महृदय से): Δλ ≈ +5° (पूर्व)
- उत्तर-दूरी (सौम्य): β ≈ +38°
- राशि-स्थान: वृषान्त (Taurus end) — ecliptic longitude convention of the text’s rāśi frame
- अष्टत्रिंशत् = 38; पञ्च = 5 (शब्द-संख्या, अंक-विश्वासपूर्ण)

उदाहरण (worked example) यदि ब्रह्महृदय का पाठ-स्थान λ_B माना जाए, तो प्रजापति का देशान्तर-सदृश स्थान ≈ λ_B + 5°, और अक्षांशीय/क्रान्ति-सदृश उत्तरी दूरी 38°। (यहाँ “अंश” = 1°; epoch/ayanāṃśa इस श्लोक में नहीं दिए — केवल सापेक्ष माप।)

8.21
अपांवत्सस्तु चित्राया उत्तरे अंशैस्तु पञ्चभिः ।
बृहत्किञ्चिदतो भागैरापः षड्भिस्तथोत्तरे ।।
apāṃvatsastu citrāyā uttare aṃśaistu pañcabhiḥ ।
bṛhatkiñcidato bhāgairāpaḥ ṣaḍbhistathottare ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अपांवत्सः = अपांवत्स (तारा); चित्रायाः उत्तरे = चित्रा के उत्तर में; अंशैः पञ्चभिः = पाँच अंश; बृहत् किञ्चित् अतः = इससे किंचित् आगे / थोड़ा अधिक; भागैः षड्भिः = छह भागों (अंशों) से; आपः = आपः (जल-तारा); तथा उत्तरे = उसी प्रकार उत्तर में।

हिन्दी भावार्थ अपांवत्स चित्रा से पाँच अंश उत्तर है। आपः उससे थोड़ा आगे — छह अंश उत्तर। दोनों चित्रा को आधार-बिन्दु मानकर उत्तरी दूरी में बाँधे गए हैं; एक पाँच, दूसरा छह। छोटे पूर्णांक ही पर्याप्त निर्देश हैं।

English rendering Apāṃvatsa is five degrees north of Citrā; Āpas is six degrees north of the same, a little farther than Apāṃvatsa. Two water-named stars are fixed by simple northern offsets from Citrā.

गणित / The Mathematics
- अपांवत्स: β_Apāṃvatsa ≈ β_Citrā + 5° (उत्तर)
- आपः: β_Āpas ≈ β_Citrā + 6° (उत्तर)
- “बृहत् किंचित् अतः” = 6 > 5 का गुणात्मक संकेत; भाग = अंश = 1°
- पञ्च = 5; षट् = 6

उदाहरण (worked example) यदि चित्रा का उत्तरी मान β_C = 0° (केवल सापेक्ष आधार; वास्तविक क्रान्ति अलग हो सकती है) माना जाए, तो अपांवत्स ≈ +5° उत्तर, आपः ≈ +6° उत्तर। अन्तर आपः − अपांवत्स = 1° — श्लोक का “किंचित् बृहत्” इसी एक-अंश की वृद्धि से मेल खाता है।

अध्यायः 9

उदयास्ताधिकारः

Heliacal Rising and Setting
18 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

उदयास्ताधिकार सूर्यसिद्धान्त का वह अध्याय है जहाँ ग्रह आकाश में “दिखने” और “छिपने” की सीमा पर गणित से बँधते हैं। यहाँ उदय–अस्त केवल क्षितिज-स्पर्श नहीं, सूर्य की किरण-सीमा के सापेक्ष हेलियाकल (heliacal) घटनाएँ हैं—कौन ग्रह सूर्यास्त के पश्चात् पश्चिम में डूबता है, कौन सूर्योदय से पूर्व पूर्व में उगता है, और कब शुक्र–बुध वक्री होने पर बाहरी ग्रहों जैसा व्यवहार करते हैं। अध्याय दिक्कर्म से दृश्य-स्थिति को शुद्ध करता है, लग्नान्तर को प्राणों में मापकर कालांशों में समय निकालता है, और अस्तांशों (बृहस्पति ११°, शनि १५°, मंगल १७°) से विलुप्ति-सीमा बाँधता है। इसकी सुन्दरता इसी में है कि स्थिति, काल और दृष्टि एक ही श्रृंखला में जुड़ते हैं—मध्यमा–स्फुट से दीर्घता, लग्न से समय, अस्तांश से दृश्यता। अठारह श्लोकों में उदय–अस्त का पूरा अधिकार-सूत्र बिछ जाता है।

For the English reader:

Chapter 9 turns the sky into a threshold science: not merely when a planet crosses the geometric horizon, but when it first becomes visible or last remains so against the glare of the Sun. Outer planets set in the west after sunset when they stand ahead of the Sun in longitude, and rise in the east before dawn when they lag; the Moon and the swift inferior planets reverse that pattern when direct, while retrograde Venus and Mercury behave like the outer body. Between those qualitative rules the text inserts dṛkkarma—visibility reductions that adjust pure longitude for what the eye can actually catch—then converts the lagna-interval at the event into prāṇas and kālāṃśas so that time itself is counted from the rising point. Fixed extinction arcs (astāṃśa: Jupiter 11°, Saturn 15°, Mars 17°) close the system. Beauty here is architectural: elongation decides the side of the sky, lagna measures the hour, and arc-of-setting decides whether the planet is still in the game of light.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

इस अध्याय का समय-कंकाल हमारे मेट्रोलॉजी-लेयर से छूता है—१ दिन = २१,६०० प्राण की गणना-संगति (चाप-मिनट ↔ प्राण) वही है जो लग्नान्तरप्राण–कालांश श्रृंखला को आधुनिक इंजन में अर्थ देती है; बंद-रूप लग्न/अस्सेन्डेन्ट परत (०.१° स्विस-फिक्स्चर सहमति) लग्नान्तर माप का आधार देती है, और अध्याय-२ स्फुट इंजन सूर्य–ग्रह दीर्घताओं का पूर्व-पद है। पूर्ण उदयास्त-डिकोड—दिक्कर्म-सूत्र, अस्तांश-अनुप्रयोग, और हेलियाकल घटनाओं का फिक्स्चर-पिन `==` सत्यापन—अभी शेष है; उसे स्फुट + लग्न + प्राण-मेट्रोलॉजी की मौजूदा श्रृंखला पर मापित दृश्यता-परत जोड़नी होगी।

क्षितिजसूर्य (क्षितिज से नीचे)ग्रह — प्रथम दर्शनकालांश1 कालांश = 4 मिनट (काल-अंश)उज्ज्वल ग्रह → लघु कालांश · मन्द ग्रह → दीर्घ कालांश (श्लोक ९.०६–०९)
उदयास्त-कालांश — heliacal visibility (SS ch.9): a planet near the Sun drowns in twilight; it first re-appears when the Sun sinks a planet-specific arc (kālāṃśa, in time-degrees; 1 time-degree = 4 min) below the horizon. Bright Venus needs a small arc, faint Saturn a large one.
9.1
अथोदयस्तमययोः परिज्ञानं प्रकीर्त्यते ।
दिवाकरकराक्रान्तमूर्तीनां अल्पतेजसाम् ।।
athodayastamayayoḥ parijñānaṃ prakīrtyate ।
divākarakarākrāntamūrtīnāṃ alpatejasām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब/इसके पश्चात्; उदय-अस्तमययोः = उदय और अस्त का; परिज्ञानम् = पूर्ण/व्यवस्थित ज्ञान; प्रकीर्त्यते = कहा/प्रख्यापित किया जाता है; दिवाकर-कर-आक्रान्त-मूर्तिनाम् = सूर्य-किरणों से आक्रान्त (प्रकाशित) मूर्तियों वाले (ग्रहों) का; अप्ल-तेजसाम् = अप्ल (जल-सदृश नहीं) तेज वाले — शुष्क/स्थिर-प्रकाश वाले पिण्डों का।

हिन्दी भावार्थ अब ग्रन्थ उदय और अस्त के व्यवस्थित ज्ञान की ओर मुड़ता है। यह ज्ञान उन्हीं पिण्डों का है जिनकी मूर्ति सूर्य की किरणों से आलोकित होती है, और जिनका तेज ‘अप्ल’ — जल-सा तरल या धुँधला नहीं — कहा गया है। संक्षेप में: सूर्य-प्रकाश पर निर्भर, स्पष्ट दीप्ति वाले ग्रहों के उदयास्त-नियमों का अध्याय आरम्भ होता है। यह स्तुति नहीं, विषय-सूचना है — आगे की गणना का द्वार।

English rendering Now is set forth the full knowledge of rising and setting — of those bodies whose forms are struck by the Sun’s rays and whose brilliance is not watery. The chapter turns from general planetary theory to the geometry of visibility at the horizon.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णनात्मक भूमिका/विषय-उद्घोष। यह श्लोक संख्या या कलन नहीं देता; यह अध्याय ९ का द्वार-वाक्य है, जिसमें उदयास्त-ज्ञान को ‘दिवाकर-प्रकाशित मूर्ति’ और ‘अप्ल-तेज’ वाले पिण्डों तक सीमित किया गया है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) अध्याय का द्वार खुलता है एक स्पष्ट विषय-सूचना से: अब गणना उन पिण्डों की है जिनकी “मूर्ति” सूर्य-किरणों से प्रकाशित होती है और जिनका तेज धुँधला-जल-सा (अप्ल) नहीं—अर्थात् चन्द्र-ग्रह जैसे reflected-light पिण्ड, न कि स्वयं-ज्योति तारे। उदय–अस्त यहाँ काव्य-स्तुति नहीं, visibility kinematics का प्रवेश-द्वार है: कब आकाश-क्षितिज पर दिखाई दें, कब सूर्य-प्रभा में लुप्त। आगे के श्लोक इसी सूचना को संख्या में बदलेंगे—कालभाग, दृश्या/अदर्शना सीमाएँ, और दिशा-सापेक्ष उदय। पाठक को याद रहे: यह अध्याय “कौन चमकता है” नहीं पूछता—“कब और किस शर्त पर दिखता है” पूछता है।

सुधार · correction (2026-10-07) “अप्लतेजसाम्” → “अल्पतेजसाम्” (अल्प तेज वाले; 9.7 “अल्पत्वात्”); “मूर्तिनां” → “मूर्तीनां” [reading]। ऊपर का “जल-रहित” अर्थ “अप्ल” से गढ़ा गया था। Correction: spelling.

9.2
सूर्यादभ्यधिकाः पश्चादस्तं जीवकुजार्कजाः ।
ऊनाः प्रागुदयं यान्ति शुक्रज्ञौ वक्रिणौ तथा ।।
sūryādabhyadhikāḥ paścādastaṃ jīvakujārkajāḥ ।
ūnāḥ prāgudayaṃ yānti śukrajñau vakriṇau tathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यात् अभ्यधिकाः = सूर्य से अधिक (देशान्तर में बड़े); पश्चात् अस्तम् = पश्चिम में अस्त; जीव-कुज-आर्जजाः = बृहस्पति, मंगल, शनि; ऊनाः = सूर्य से न्यून; प्राक् उदयम् = पूर्व में उदय; यान्ति = जाते/प्राप्त करते हैं; शुक्र-ज्ञौ = शुक्र और बुध; वक्रिणौ तथा = वक्री होने पर भी उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ बृहस्पति, मंगल और शनि — ये बाहरी ग्रह — जब सूर्य से देशान्तर में अधिक हों, तब पश्चिम में अस्त होते हैं; जब सूर्य से कम हों, तब पूर्व में उदय को प्राप्त होते हैं। शुक्र और बुध भी जब वक्री हों, तो इन्हीं बाहरी ग्रहों के नियम का अनुसरण करते हैं। यहाँ ‘अधिक/ऊना’ का अर्थ माध्य या स्पष्ट देशान्तर की सूर्य-सापेक्ष तुलना है — उदय-अस्त दिशा का प्रथम फिल्टर।

English rendering Jupiter, Mars, and Saturn, when greater in longitude than the Sun, set in the west; when less, they rise in the east. Venus and Mercury, when retrograde, follow the same rule. The verse gives the first geometric filter for outer-planet heliacal behaviour by solar elongation sign.

गणित / The Mathematics दिशा-नियम (बाह्य ग्रह + वक्री शुक्र/बुध):
- यदि λ_graha > λ_Sūrya → पश्चिम-अस्त (heliacal setting, west)
- यदि λ_graha < λ_Sūrya → पूर्व-उदय (heliacal rising, east)
- शुक्र, बुध: यही नियम वक्र दशा में लागू
कोई अंश-सीमा यहाँ नहीं — केवल सूर्य-सापेक्ष देशान्तर की चिह्न-परीक्षा। (स्पष्ट देशान्तर के लिए अध्याय २ का स्फुट-क्रम आवश्यक; सीमा-अंश ९.०६–९.०८ में।)

उदाहरण (worked example) मान लें स्पष्ट सूर्य λ_S = 40°, स्पष्ट मंगल λ_Ma = 55° → λ_Ma > λ_S → पश्चिम-अस्त पक्ष। यदि λ_Ma = 25° < 40° → पूर्व-उदय पक्ष। (दोनों ही बाद में अस्तांश-सीमा और दृक्कर्म से जाँचे जाएँगे।)

सुधार · correction (2026-10-07) “आर्जजाः” → “आर्कजाः” (शनि, जैसे 9.6 “अर्कजस्य”); दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050) भी यही। Correction: spelling.

9.3
ऊना विवस्वतः प्राच्यां अस्तं चन्द्रज्ञभार्गवाः ।
व्रजन्त्यभ्यधिकाः पश्चादुदयं शीघ्रयायिनः ।।
ūnā vivasvataḥ prācyāṃ astaṃ candrajñabhārgavāḥ ।
vrajantyabhyadhikāḥ paścādudayaṃ śīghrayāyinaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊनाः विवस्वतः = सूर्य (विवस्वत्) से न्यून; प्राच्याम् अस्तम् = पूर्व दिशा में अस्त; चन्द्र-ज्ञ-भार्गवाः = चन्द्र, बुध, शुक्र; व्रजन्ति = जाते हैं; अभ्यधिकाः = सूर्य से अधिक; पश्चात् उदयम् = पश्चिम में उदय; शीघ्र-यायिनः = शीघ्र-गति वाले (शीघ्र-चक्र पर चलने वाले)।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र, बुध और शुक्र — जब सूर्य से देशान्तर में कम हों — पूर्व में अस्त होते हैं; जब अधिक हों — पश्चिम में उदय को जाते हैं। इन्हें ‘शीघ्रयायिन्’ कहा गया है: शीघ्र-परिधि पर चलने वाले, जिनका सूर्य-सापेक्ष व्यवहार बाहरी ग्रहों से उलटा है। श्लोक ९.०२ का युग्म यही है — एक नियम बाह्य (वक्री-शुक्र-बुध सहित), दूसरा शीघ्र-यायिन् चन्द्र-बुध-शुक्र के लिए।

English rendering The Moon, Mercury, and Venus, when less than the Sun, set in the east; when greater, they rise in the west — as swift-movers on the śīghra circuit. Their heliacal sense is the reverse of the outer planets’ rule in 9.02.

गणित / The Mathematics दिशा-नियम (चन्द्र + शीघ्र-यायिन् शुक्र/बुध):
- यदि λ < λ_Sūrya → पूर्व-अस्त
- यदि λ > λ_Sūrya → पश्चिम-उदय
बाह्य ग्रहों के चिह्न-नियम का विपर्यय। बुध-शुक्र के लिए ९.०२ (वक्र) और ९.०३ (शीघ्र-मार्ग) दोनों लागू होते हैं — दशा-निर्भर द्वैध नियम।

उदाहरण (worked example) λ_S = 100°, λ_Venus = 85° → ऊना → पूर्व-अस्त पक्ष। λ_Venus = 120° → अभ्यधिक → पश्चिम-उदय पक्ष। (वास्तविक दृश्यता ९.०७ के ८°/१०° अस्तांश और दृक्कर्म से निर्धारित।)

सुधार · correction (2026-10-07) “pascād” → “paścād”। Correction: spelling.

9.4
सूर्यास्तकालिकौ पश्चात्प्राच्यां उदयकालिकौ ।
दिवा चार्कग्रहौ कुर्याद्दृक्कर्माथ ग्रहस्य तु ।।
sūryāstakālikau paścātprācyāṃ udayakālikau ।
divā cārkagrahau kuryāddṛkkarmātha grahasya tu ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्यास्त-कालिकौ = सूर्यास्त-काल के (देशान्तर); पश्चात् = पश्चिम-पक्ष के लिए; प्राच्याम् = पूर्व-पक्ष के लिए; उदय-कालिकौ = सूर्योदय-काल के; दिवा = दिन में; च अर्क-ग्रहौ = सूर्य और ग्रह दोनों को; कुर्यात् = करना चाहिए; दृक्कर्म = दृष्टि/दृश्यता-संस्कार; अथ ग्रहस्य तु = और ग्रह का (विशेषतः)।

हिन्दी भावार्थ पश्चिम-सम्बन्धी उदयास्त-कार्य में सूर्यास्त-कालिक ग्रह-सूर्य देशान्तर लें; पूर्व-सम्बन्धी कार्य में सूर्योदय-कालिक। दिन के समय सूर्य और ग्रह दोनों पर दृक्कर्म — दृष्टि-संस्कार — करना चाहिए, विशेषतः ग्रह का। यह श्लोक दिशा-नियम के बाद काल-चयन और दृश्यता-शोधन का द्वार खोलता है: गलत क्षण का देशान्तर गलत उदयास्त देता है।

English rendering For western phenomena take the longitudes at sunset; for eastern, at sunrise. By day one should apply dṛkkarma — the visibility correction — to the Sun and especially to the planet. Epoch of comparison is part of the algorithm, not an afterthought.

गणित / The Mathematics काल-चयन नियम:
- पश्चिम-उदयास्त → t = सूर्यास्त; λ(t), λ_S(t) प्रयोग
- पूर्व-उदयास्त → t = सूर्योदय
- दिवा: दृक्कर्म (आक्ष-दृक्कर्म, अयन-दृक्कर्म आदि — अगले प्रकरण) ग्रह (और अर्क) पर
गणितीय ‘सूत्र’ यहाँ युग-समीकरण नहीं, समय-बिन्दु बाध्यता है: उदयास्त-परीक्षा सूर्योदय/सूर्यास्त के स्फुट देशान्तरों पर बँधी है।

उदाहरण (worked example) पश्चिम-अस्त जाँच: स्थानीय सूर्यास्त पर स्फुट मंगल और स्फुट सूर्य निकालें; λ_Ma − λ_S की चिह्न-परीक्षा (९.०२) और अस्तांश-सीमा (९.०६) उसी क्षण पर। पूर्व-उदय के लिए वही कलन सूर्योदय पर दोहराएँ — दो क्षणों के देशान्तर vertauschen न करें।

हमारा डिकोड (Our Decode) उदयास्त-परीक्षा का इनपुट स्फुट देशान्तर है; `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` अध्याय-२ का मन्द+शीघ्र चतुःचरण शुद्ध रूप में देता है (बिना पाश्चात्य प्रमेय-श्रृंखला के)। mean-longitude प्रयोगशाला (`math-core.js`) को true-position ephemeris मानना गलत होगा — दृक्कर्म और उदयास्त measured calculation layer माँगते हैं, केवल मध्यम भगण नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) “ग्रहस्य तु” = दृक्कर्म केवल ग्रह पर (सूर्य का विक्षेप नहीं)। Correction (rendering).

9.5
ततो लग्नान्तरप्राणाः कालांशाः षष्टिभाजिताः ।
प्रतीच्यां षड्भयुतयोस्तद्वल्लग्नान्तरासवः ।।
tato lagnāntaraprāṇāḥ kālāṃśāḥ ṣaṣṭibhājitāḥ ।
pratīcyāṃ ṣaḍbhayutayostadvallagnāntarāsavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तब/उसके बाद; लग्न-अन्तर-प्राणाः = लग्न-अन्तर के प्राण; कालांशाः = काल-अंश (समय-डिग्री); षष्टि-भाजिताः = साठ से विभाजित; प्रतीच्याम् = पश्चिम में; षड्भ-युतयोः = छह राशियों (१८०°) से युक्त (लग्न = अस्त-लग्न/सप्तम) के; तद्वत् = उसी प्रकार; लग्न-अन्तर-आसवः = लग्न-अन्तर के आसव (प्राण)।

हिन्दी भावार्थ लग्न और ग्रह के बीच का अन्तर प्राणों में लें; उसे साठ से भाग देने पर कालांश मिलते हैं — उदयास्त का समय-माप अंशों में। पश्चिम-पक्ष में लग्न को छह राशि जोड़कर (अर्थात् सप्तम/अस्त-लग्न) लें; उसी प्रकार उस अन्तर के आसव (प्राण) गिने जाएँ। पूर्व-उदय लग्न पर, पश्चिम-अस्त अस्त-लग्न पर — एक ही प्राण-से-कालांश रूपान्तर, दो क्षितिज-बिन्दु।

English rendering The lagna-interval in prāṇas, divided by sixty, yields the time-degrees (kālāṃśa). In the west, use the lagna joined with six signs — the descendant — and count the lagna-interval asavas the same way. Horizon event becomes a pure arc between planet and the relevant lagna.

गणित / The Mathematics
कालांश = (लग्न-अन्तर के प्राण) ÷ ६०

जहाँ लग्न-अन्तर के प्राण = ग्रह और लग्न के बीच के क्रान्तिवृत्त-चाप का उदय-काल (3.44–3.50 के उदय-असु से) — चाप का अंश-मान नहीं (पूर्व में उदित लग्न; पश्चिम में λ_lagna + ६ राशि)।

६० प्राण = १ कालांश (समय-अंश): भचक्र का एक चक्कर २१,६०० प्राण = ३६० कालांश। क्रान्तिवृत्त का १° सामान्यतः १ कालांश नहीं — लङ्का पर मेष के ३०° = १६७० प्राण = २७.८३ कालांश।

उदाहरण (worked example) ग्रह λ = 50°, उदय-लग्न L = 40° (दोनों वृष में, लङ्का): अन्तर 10° का उदय-काल = 10 × 1795 ⁄ 30 = 598.3 प्राण → कालांश = 9.97। पश्चिम: L_asta = 40° + 180° = 220°; यदि λ = 230° (वृश्चिक, लङ्का पर 1795) → पुनः 9.97 कालांश। (लग्न स्थानीय अक्षांश, क्रान्ति, स्थानीय समय पर निर्भर — convention घोषित रखें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दिन-विभाजन: १ दिन = ६० घटी = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल = २१,६०० प्राण — और २१,६०० प्राण/दिन ↔ २१,६०० कला/वृत्त केवल count correspondence है (`MATHEMATICAL-AUDIT` §1)। लग्न-परत: closed-form लग्न Swiss-fixture से ०.१° के भीतर; RA(MC) ≡ LST १e−९° तक सत्यापित — उदयास्त का ‘लग्नान्तर’ उसी ईमानदार क्षितिज-ज्यामिति पर टिका है, सहिष्णुता-पट्टी पर नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले कालांश को |λ_ग्रह − λ_लग्न| अंश माना गया था (“60 प्राण = 1°”)। कालांश = अन्तर-चाप के उदय-प्राण ÷ 60, एक समय-माप; लङ्का पर मेष के 30° केवल 27.83 कालांश हैं। Correction: kālāṃśa are time-degrees.

9.6
एकादशामरेज्यस्य तिथिसङ्ख्यार्कजस्य च ।
अस्तांशा भूमिपुत्रस्य दश सप्ताधिकास्ततः ।।
ekādaśāmarejyasya tithisaṅkhyārkajasya ca ।
astāṃśā bhūmiputrasya daśa saptādhikāstataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकादश = ग्यारह (अंश); अमर-इज्यस्य = अमर-इज्य = बृहस्पति के; तिथि-सङ्ख्या = तिथि-संख्या = पंद्रह; आर्कजस्य = अर्कज = शनि के; च = और; अस्तांशाः = अस्त-अंश (दृश्यता/अस्त की सीमा-डिग्री); भूमि-पुत्रस्य = भूमि-पुत्र = मंगल के; दश सप्त-अधिकाः = दस से सात अधिक = सत्रह; ततः = उससे/तदनन्तर।

हिन्दी भावार्थ अस्तांश — सूर्य से वह न्यूनतम कोणीय दूरी जिस पर ग्रह अस्त/उदय की सीमा छूता है — यहाँ तीन बाह्य ग्रहों के लिए स्थिर संख्याओं में बँधे हैं: बृहस्पति के ग्यारह, शनि के तिथि-सङ्ख्या अर्थात् पंद्रह, मंगल के दस-से-सात-अधिक अर्थात् सत्रह। ये ‘भाग्य’ नहीं, दृश्यता-कलन की देहली हैं — सूर्य-सापेक्ष दूरी इन अंशों से कम हो तो ग्रह किरण-जाल में लुप्त माना जाता है।

English rendering The heliacal limit-degrees (astāṃśa) are: Jupiter 11°, Saturn 15° (tithi-count), Mars 17° (ten plus seven). These are fixed visibility thresholds for the three outer planets, not rates or periods.

गणित / The Mathematics अस्तांश (बाह्य ग्रह, SS ९.०६):
- बृहस्पति (अमरिज्य): ११°
- शनि (आर्कज): तिथिसङ्ख्या = १५°
- मंगल (भूमिपुत्र): दश + सप्त = १७°

दृश्यता-परीक्षा (संक्षेप): सूर्य-ग्रह देशान्तर |λ − λ_S| (उचित उदय/अस्त क्षण पर, ९.०४) की तुलना अस्तांश से; दिशा-चिह्न ९.०२ के अनुसार।

उदाहरण (worked example) सूर्यास्त पर λ_S = 200°, λ_Jupiter = 212° → Δ = 12° > 11° → बृहस्पति अस्तांश-सीमा के बाहर (सिद्धान्तीय दृश्य-पक्ष); यदि λ_J = 208° → Δ = 8° < 11° → अस्त/अदृश्य-सीमा के भीतर। (वास्तविक क्षितिज-दृश्यता में दृक्कर्म और अक्षांश और जोड़ें।)

9.7
पश्चादस्तमयो अष्टाभिरुदयः प्राङ्महत्तया ।
प्रागस्तं उदयः पश्चादल्पत्वाद्दशभिर्भृगोः ।।
paścādastamayo aṣṭābhirudayaḥ prāṅmahattayā ।
prāgastaṃ udayaḥ paścādalpatvāddaśabhirbhṛgoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पश्चात् अस्तमयः = पश्चिम-अस्त; अष्टाभिः = आठ (अंशों) से; उदयः प्राक् = पूर्व-उदय; महत्तया = महत्ता/बृहत्-प्रकाश के कारण; प्राक् अस्तम् = पूर्व-अस्त; उदयः पश्चात् = पश्चिम-उदय; अल्पत्वात् = अल्पता (क्षुद्र-प्रकाश) के कारण; दशभिः = दस से; भृगोः = भृगु = शुक्र का।

हिन्दी भावार्थ शुक्र के अस्तांश दो हैं, दशा और दीप्ति के अनुसार। पश्चिम-अस्त और पूर्व-उदय — जब वह ‘महान्’ (अधिक चमकीला) पक्ष में हो — आठ अंश से; पूर्व-अस्त और पश्चिम-उदय — ‘अल्प’ पक्ष में — दस अंश से। एक ही ग्रह, दो देहलियाँ: चमक बढ़े तो सूर्य के और निकट भी दीख सकता है; मंद हो तो अधिक दूरी चाहिए। यह काव्य नहीं, दृश्यता-भौतिकी का संस्कृत सूत्र है।

English rendering For Venus: western setting and eastern rising by 8° when “great” (brighter phase); eastern setting and western rising by 10° when “small” (fainter phase). Two thresholds track phase-dependent brilliance.

गणित / The Mathematics शुक्र अस्तांश (SS ९.०७):
| पक्ष | अस्तांश |
|---|---|
| पश्चिम-अस्त, पूर्व-उदय (महत्तया) | ८° |
| पूर्व-अस्त, पश्चिम-उदय (अल्पत्वात्) | १०° |

दिशा-चयन ९.०२/९.०३ (वक्र/शीघ्र) से; काल-चयन ९.०४ से; सीमा यही ८/१०।

उदाहरण (worked example) शीघ्र-मार्ग, λ_S = 50°, λ_Venus = 58° (अभ्यधिक → पश्चिम-उदय, ९.०३) → Δ = 8°। महत्-पक्ष सीमा ८° पर: Δ ≥ ८° तो उदय-सीमा पार; Δ = ७° तो अदृश्य-सीमा में। अल्प-पक्ष (पूर्व-अस्त) पर सीमा १०° से तुलना करें।

9.8
एवं बुधो द्वादशभिश्चतुर्दशभिरंशकैः ।
वक्री शीघ्रगतिश्चार्कात्करोत्यस्तमयोदयौ ।।
evaṃ budho dvādaśabhiścaturdaśabhiraṃśakaiḥ ।
vakrī śīghragatiścārkātkarotyastamayodayau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवम् = इसी प्रकार; बुधः = बुध; द्वादशभिः = बारह से; चतुर्दशभिः = चौदह से; अंशकैः = अंशों द्वारा; वक्री = वक्र-गति में; शीघ्र-गतिः च = और शीघ्र-गति में; आर्कात् = सूर्य से (सापेक्ष); करोति = करता है; अस्तमय-उदयौ = अस्त और उदय।

हिन्दी भावार्थ बुध भी शुक्र की तरह दो अस्तांश रखता है: वक्री दशा में बारह अंश, शीघ्र-गति में चौदह अंश — इन्हीं से सूर्य-सापेक्ष अस्त और उदय सिद्ध होते हैं। ९.०२–९.०३ ने दिशा दी, ९.०४ ने क्षण, ९.०५ ने कालांश, ९.०६–९.०८ ने देहली; बुध पर अध्याय का यह खंड पूरा होता है। छोटी दीप्ति, तीव्र गति — इसलिए शुक्र से बड़ी सीमाएँ।

English rendering So Mercury effects setting and rising relative to the Sun by 12° when retrograde and by 14° when in swift (śīghra) motion. The pair of limits closes the fixed-threshold list begun for the outer planets and Venus.

गणित / The Mathematics बुध अस्तांश (SS ९.०८):
- वक्री: १२°
- शीघ्रगति: १४°

पूर्ण अस्तांश-सारिणी (९.०६–९.०८):
मंगल १७° · बृहस्पति ११° · शनि १५° · शुक्र ८°/१०° · बुध १२°/१४°

(चन्द्र का पृथक् व्यवहार आगे; यहाँ केवल बुध।) परीक्षा: उचित क्षण (९.०४) पर |λ − λ_S| ≷ अस्तांश, दिशा ९.०२/९.०३ के चिह्न से।

उदाहरण (worked example) बुध वक्र, सूर्योदय पर λ_S = 10°, λ_Me = 357° (= −3° mod 360) → ऊना, पूर्व-अस्त पक्ष (९.०३) → Δ = 13°। वक्र-सीमा १२°: 13° > 12° → सिद्धान्तीय दृश्य-सीमा के बाहर; यदि Δ = 11° < 12° → अस्त-सीमा के भीतर। शीघ्र-दशा में सीमा १४° से बदलें।

सुधार · correction (2026-10-07) “astmayodayau” → “astamayodayau”। Correction: spelling.

सुधार · correction (2026-10-07) देवनागरी “अस्त्मयोदयौ” → “अस्तमयोदयौ”, इसी श्लोक की IAST पंक्ति (astamayodayau) के अनुसार। Correction: the Devanagari now agrees with the IAST line.

9.9
एभ्यो अधिकैः कालभागैर्दृश्या न्यूनैरदर्शनाः ।
भवन्ति लोके खचरा भानुभाग्रस्तमूर्तयः ।।
ebhyo adhikaiḥ kālabhāgairdṛśyā nyūnairadarśanāḥ ।
bhavanti loke khacarā bhānubhāgrastamūrtayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एभ्यः = इन (पूर्वोक्त सीमा-मानों) से; अधिकैः कालभागैः = अधिक काल-अंशों / दीप्ति-सीमा अंशों से; दृश्याः = दृश्य; न्यूनैः = न्यून (उन सीमाओं से कम) होने पर; अदर्शनाः = अदृश्य; खचराः = आकाश-चर ग्रह; भानु-भा-ग्रस्त-मूर्तयः = सूर्य-किरणों से ग्रस्त / आच्छादित मूर्तिवाले।

हिन्दी भावार्थ पूर्व अध्याय-श्लोकों में जो कालभाग—अर्थात् सूर्य से ग्रह की न्यूनतम कोणीय दूरी की सीमा—बताई गई, उनसे अधिक दूरी होने पर ग्रह लोक में दृश्य होते हैं, और उनसे न्यून दूरी रहने पर अदृश्य रह जाते हैं। कारण सीधा है: सूर्य-किरणों से उनकी मूर्ति ग्रस्त हो जाती है; प्रभा इतनी प्रबल कि ग्रह का रूप आँख तक नहीं पहुँचता। यह दृश्यता-अदृश्यता का साधारण नियम है—कोणीय दूरी सीमा से ऊपर तो उदय/दर्शन, नीचे तो लुप्त।

English rendering With kālabhāgas greater than these [previously stated limits], the planets become visible in the world; with lesser ones they remain invisible—their forms seized by the rays of the Sun.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (दृश्यता-सीमा का गुणात्मक नियम)। पूर्व श्लोकों में दी गई कालभाग-सीमाएँ यहाँ के “एभ्यः” का संख्यात्मक आधार हैं; यह श्लोक केवल अधिक/न्यून की दिशा बताता है, संख्या नहीं देता।

दृष्टान्त (Illustrative Example) बुध को सूर्योदय से थोड़ी देर पहले क्षितिज के पास खोजने का अनुभव लगभग हर निरीक्षक को होता है: कभी वह हल्की सुई-सी दीप्ति में झलकता है, कभी सूर्य-प्रभा में बिलकुल गायब। यही इस श्लोक का साधारण नियम है—पूर्व-निर्धारित कालभाग (सूर्य से न्यूनतम कोणीय दूरी की सीमा) से अधिक दूरी हो तो लोक में दृश्य, न्यून हो तो अदर्शन; क्योंकि मूर्ति भानु-भा से ग्रस्त हो जाती है। शुक्र की दीर्घ elongation पर स्पष्ट सन्ध्या-तारा और संयोग-निकट काल में उसकी अनुपस्थिति—दोनों एक ही inequality के दो छोर हैं। सूत्र बाद में; यहाँ अनुभव का कंकाल है: दूरी > सीमा ⇒ दर्शन, दूरी < सीमा ⇒ लोप।

9.10
तत्कालांशान्तरकला भुक्त्यन्तरविभाजिताः ।
दिनादि तत्फलं लब्धं भुक्तियोगेन वक्रिणः ।।
tatkālāṃśāntarakalā bhuktyantaravibhājitāḥ ।
dinādi tatphalaṃ labdhaṃ bhuktiyogena vakriṇaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-कालांश-अन्तर-कलाः = उन काल-अंशों के अन्तर की कलाएँ (चाप-मिनट); भुक्ति-अन्तर-विभाजिताः = भुक्ति (दैनिक गति) के अन्तर से विभाजित; दिनादि = दिन आदि (फल); तत्-फलं लब्धं = वह फल प्राप्त होता है; भुक्ति-योगेन = भुक्तियों के योग से; वक्रिणः = वक्री ग्रह के लिए।

हिन्दी भावार्थ जिस काल-अंश की आवश्यकता है और जो वर्तमान कोणीय दूरी है, उनके अन्तर को कलाओं में लेकर, ग्रह और सूर्य की दैनिक गतियों के अन्तर से भाग दीजिए—लब्ध फल दिन (और उसके अंश) हैं, जिनमें ग्रह दृश्य/अदृश्य अवस्था तक पहुँचेगा। किन्तु यदि ग्रह वक्री हो, तो गति-अन्तर के स्थान पर दोनों भुक्तियों का योग भाजक बने। सरल भाषा में: कोणीय घाटा/अधिशेष ÷ सापेक्ष दैनिक गति = प्रतीक्षा-काल।

English rendering The kalās of the difference between those time-degrees, divided by the difference of the daily motions, yield the days and subdivisions until [visibility or disappearance]. For a retrograde planet the same interval is obtained by dividing by the sum of the motions instead.

गणित / The Mathematics
- अन्तरकला = |कालांश_आवश्यक − वर्तमान_सूर्य-ग्रह_अन्तर| × 60 (यदि अन्तर अंशों में हो; 1° = 60 कला)
- सरल (ऋजु) गति:
t (दिन) = अन्तरकला ⁄ |भुक्ति_ग्रह − भुक्ति_सूर्य|
जहाँ भुक्ति कला/दिन में हों (अथवा दोनों अंश/दिन—एक ही इकाई)।
- वक्री ग्रह:
t (दिन) = अन्तरकला ⁄ (भुक्ति_ग्रह + भुक्ति_सूर्य)
- फल “दिनादि” है—पूर्ण दिन के साथ घटी-पलादि उपविभाग उसी अनुपात से।

उदाहरण (worked example) मानें: आवश्यक कालभाग और वर्तमान सूर्य–ग्रह अन्तर का घाटा = 2° = 120 कला; ऋजु ग्रह की भुक्ति = 0.52°/दिन, सूर्य की भुक्ति ≈ 0.9856°/दिन, अतः |Δभुक्ति| ≈ 0.4656°/दिन = 27.936 कला/दिन। तब t ≈ 120 ⁄ 27.936 ≈ 4.30 दिन ≈ 4 दिन + 0.30×60 ≈ 4 दिन 18 घटी। यदि वही ग्रह वक्री हो और |भुक्ति_ग्रह| + भुक्ति_सूर्य = 1.50°/दिन = 90 कला/दिन, तो t ≈ 120 ⁄ 90 = 1⅓ दिन। (भुक्ति-मान उदाहरण-सुविधा के हैं; यथार्थ गणना में उसी क्षण की सिद्धान्त-भुक्ति लें।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक सापेक्ष-दर का शुद्ध रूप है—ग्रह बनाम सूर्य की भुक्ति-अन्तर (या वक्र में योग) से कोणीय अन्तर को समय में बदलना। bharat-ephemeris-offline / MATHEMATICAL-AUDIT में हमने देखा कि bīja भी absolute revs नहीं, planet−Sun relative rates हैं (Mars +30, Jupiter −51, Saturn +61 revs/Mahāyuga); 9.10 वही ज्यामितीय अनुशासन सिखाता है—दृश्यता-काल भी “सापेक्ष गति” से ही निकलता है। Canon day-count (SS 1,577,917,828) भुक्ति के माध्य मानों को तय करता है; tithi/heliacal समय उसी rate-frame पर संवेदनशील रहता है।

9.11
तल्लग्नासुहते भुक्ती अष्टादशशतोद्धृते ।
स्यातां कालगती ताभ्यां दिनादि गतगम्ययोः ।।
tallagnāsuhate bhuktī aṣṭādaśaśatoddhṛte ।
syātāṃ kālagatī tābhyāṃ dinādi gatagamyayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-लग्न-असु = उस लग्न (राशि) के उदय-प्रमाण के प्राण/असु, हते = गुणित, भुक्ती = दो पिण्डों की दैनिक गतियाँ, अष्टादश-शत = १८००, उद्धृते = विभाजित, कालगती = दो काल-गतियाँ (समय-रूप परिणाम), ताभ्यां = उन दोनों से, दिनादि गत-गम्ययोः = दिन आदि के गत तथा गम्य (शेष) भाग।

हिन्दी भावार्थ उस लग्न के असु-प्रमाण से दोनों भुक्तियों को गुणा करो, फिर अठारह सौ (१८००) से भाग दो — यही दोनों कालगतियाँ कहलाती हैं। इन्हीं कालगतियों के द्वारा दिन आदि के गत और गम्य काल जाने जाते हैं। चाप को लग्न-उदय की गति से जोड़कर समय में उतारने का यह सीधा अनुपात-नियम है।

English rendering Multiply the two bhuktis (the two daily motions — bhuktī, dual) by the asus of that lagna-sign and divide by eighteen hundred; the results are the two kālagatis. From those, the elapsed and remaining portions of the day (and like intervals) are obtained.

गणित / The Mathematics रूपान्तर-सूत्र (चाप → काल), plain Unicode:

kālagati = (bhukti × lagna-asu) ÷ 1800

  • १८०० = एक राशि के कला-माप = ३०° × ६०′ = १८००′ (kalā)
  • लग्न-असु = संबंधित लग्न/राशि के उदय का प्राण-माप (asu = prāṇa)
  • भुक्ती (द्विवचन) = गत तथा गम्य चापांश (सामान्यतः कला में)
  • परिणाम कालगति उन्हीं असु/प्राण इकाइयों में — दिन आदि के गत-गम्य काल के लिए

मेट्रोलॉजी-संगति (मूल सिद्धान्त): १ दिन = ६० घटी = २१,६०० प्राण; यहाँ १८०० कला = १ राशि का चाप-माप है, जिससे राशि-उदय-असु से आनुपातिक काल मिलता है।

उदाहरण (worked example) सूर्य की दैनिक भुक्ति = ५९′, उसकी राशि (मेष, लङ्का) के उदय-असु = १६७०। तब

कालगति = (५९ × १६७०) ÷ १८०० = ५४.७४ प्राण प्रतिदिन।

(भुक्ति = दैनिक गति, कला में; १८०० = एक राशि की कला; दूसरी कालगति दूसरे पिण्ड की भुक्ति से। 9.10: दिन = कालांश-अन्तर ÷ कालगतियों का अन्तर, या एक वक्री हो तो योग।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक उसी asu/prāṇa मेट्रोलॉजी पर खड़ा है जिसे `MATHEMATICAL-AUDIT §1` ने पिन किया — १ दिन = २१,६०० प्राण, और २१,६०० प्राण/दिन ↔ २१,६०० कला/वृत्त केवल गणना-संगति है, भौतिक समता नहीं। `vedic-ghadi` घटी–पल–विपल–प्राण शृंखला को इसी गिनती से चलाता है; ९.११ का १८००-हर precisely “एक राशि = १८०० कला” को उदय-असु से जोड़कर चाप→काल का integer-अनुपात बनाता है — वही अनुशासन जिस पर oracle `==` fixtures टिकते हैं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “भुक्ती” को गत और गम्य चाप-भाग पढ़ा गया था। भुक्ती (द्विवचन) = दो पिण्डों की दैनिक गतियाँ, जैसे 9.10 के “भुक्त्यन्तर” में। Correction: the two daily motions.

9.12
स्वात्यगस्त्यमृगव्याधचित्राज्येष्ठाः पुनर्वसुः ।
अभिजिद्ब्रह्महृदयं त्रयोदशभिरंशकैः ।।
svātyagastyamṛgavyādhacitrājyeṣṭhāḥ punarvasuḥ ।
abhijidbrahmahṛdayaṃ trayodaśabhiraṃśakaiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्वाती = स्वाती तारा, अगस्त्य = अगस्त्य (कैनुपस), मृगव्याध = मृगव्याध (सीरियस), चित्रा = चित्रा, ज्येष्ठा = ज्येष्ठा, पुनर्वसुः = पुनर्वसु, अभिजित् = अभिजित्, ब्रह्महृदयं = ब्रह्महृदय (कैपेला/α Aurigae), त्रयोदशभिः अंशकैः = तेरह अंशों के साथ (अंशात्मक स्थिति १३°)।

हिन्दी भावार्थ स्वाती, अगस्त्य, मृगव्याध, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, अभिजित् और ब्रह्महृदय — ये नक्षत्र/योगतारा एक ही अंश-वर्ग में गिने जाते हैं: तेरह अंश। यह उदय-अस्त अधिकार के तारा-कोष्ठक की एक पंक्ति है, जहाँ समान अंश-मान वाले नक्षत्रों को एक श्लोक में बाँधा गया है। आगे-पीछे के श्लोक अन्य अंश-वर्गों की सूची पूरी करते हैं।

English rendering Svātī, Agastya, Mṛgavyādha, Citrā, Jyeṣṭhā, Punarvasu, Abhijit, and Brahmahṛdaya are (listed) with thirteen degrees (aṃśas). The verse groups those catalogue stars that share the thirteen-degree aṃśa assignment in this chapter’s stellar table.

गणित / The Mathematics सूची-नियतांक — १३ अंश (aṃśa); त्रयोदश = १३। यहाँ कोई गति-सूत्र या युग-स्थिरांक नहीं; केवल योगतारा-कोष्ठक का अंश-वर्ग १३°। (ध्रुवक/विक्षेप आदि का पूरा युग्म प्रकरण के अन्य श्लोकों व कोष्ठक-परंपरा से जुड़ता है; इस पद्य में केवल अंश-संख्या १३ और आठ नाम हैं।)

9.13
हस्तश्रवणफाल्गुन्यः श्रविष्टा रोहिणीमघाः ।
चतुर्दशांशकैर्दृश्या विशाखाश्विनिदैवतम् ।।
hastaśravaṇaphālgunyaḥ śraviṣṭā rohiṇīmaghāḥ ।
caturdaśāṃśakairdṛśyā viśākhāśvinidaivatam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हस्त = हस्त-नक्षत्र; श्रवण = श्रवण-नक्षत्र; फाल्गुन्यः = दोनों फाल्गुनी (पूर्वा–उत्तरा); श्रविष्टा = श्रविष्ठा / धनिष्ठा; रोहिणी = रोहिणी-नक्षत्र; मघाः = मघा; चतुर्दश-अंशकैः = चौदह अंशों से; दृश्या = दृश्य (उदयास्त-सीमा पर); विशाखा = विशाखा; अश्विनि-दैवतम् = अश्विनी (अश्विनी-देवता वाला भ)।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक नक्षत्रों की सूर्य-समीप दृश्यता (heliacal visibility) की अंश-सीमा बाँधता है। हस्त, श्रवण, दोनों फाल्गुनी, श्रविष्ठा, रोहिणी, मघा, विशाखा और अश्विनी — ये भ तब दृश्य माने जाते हैं जब सूर्य से उनकी दूरी चौदह अंश हो। अर्थात् इनके उदयास्त-निर्णय में दृश्यांश = १४° की नियत सीमा ली जाती है। यह ज्योतिर्गणितीय “देखना/न देखना” की संख्यात्मक कुंजी है, भाग्य-कथन नहीं।

English rendering Hasta, Śravaṇa, the two Phālgunīs, Śraviṣṭā (Dhaniṣṭhā), Rohiṇī, Maghā, Viśākhā, and Aśvinī are treated as visible when fourteen degrees (from the Sun). The verse fixes their heliacal-visibility arc at 14°.

गणित / The Mathematics दृश्यांश (visibility limit) for the listed asterisms:
dṛśyāṃśa = 14°
(Applies to: Hasta, Śravaṇa, Pūrva-Phālgunī, Uttara-Phālgunī, Śraviṣṭā, Rohiṇī, Maghā, Viśākhā, Aśvinī.)
Later used in 9.16 as the numerator constant for kṣetra-aṃśa conversion.

उदाहरण (worked example) Input convention: take this verse’s own limit. For Rohiṇī (or any of the nine above), dṛśyāṃśa = 14°. If the Sun’s true longitude is λ_☉ and the star/asterism mean longitude is λ_★, the simple SS-style test is |λ_★ − λ_☉| ≳ 14° (refined by the kṣetra-aṃśa of 9.16 and rising-time). With λ_☉ = 40° and λ_★ = 54°, separation = 14° → at the threshold of visibility for this group.

9.14
कृत्तिकामैत्रमूलानि सार्पं रौद्रर्क्षं एव च ।
दृश्यन्ते पञ्चदशभिराषाढाद्द्वितयं तथा ।।
kṛttikāmaitramūlāni sārpaṃ raudrarkṣaṃ eva ca ।
dṛśyante pañcadaśabhirāṣāḍhāddvitayaṃ tathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृत्तिका = कृत्तिका-नक्षत्र; मैत्र = मैत्र / अनुराधा; मूलानि = मूल; सार्पं = सार्प / आश्लेषा; रौद्र-ऋक्षम् = रौद्र-नक्षत्र / आर्द्रा; दृश्यन्ते = देखे जाते हैं; पञ्चदशभिः = पंद्रह (अंशों) से; आषाढात्-द्वितयम् = दोनों आषाढ़ा (पूर्वा–उत्तरा); तथा = तथा / उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ अगली सूची की दृश्यता-सीमा एक अंश अधिक है। कृत्तिका, मैत्र (अनुराधा), मूल, सार्प (आश्लेषा), रौद्र (आर्द्रा) तथा दोनों आषाढ़ा — ये पंद्रह अंशों पर दृश्य कहे गए हैं। पूर्व श्लोक के चौदह-अंशी समूह से यह पंद्रह-अंशी वर्ग अलग रखा गया है; दोनों मिलकर अध्याय की नक्षत्र-दृश्यता सारणी का मध्य भाग बनाते हैं।

English rendering Kṛttikā, Maitra (Anurādhā), Mūla, the Sārpa asterism (Āśleṣā), the Raudra asterism (Ārdrā), and likewise the two Āṣāḍhās, are seen at fifteen degrees. Their heliacal-visibility arc is fixed at 15°.

गणित / The Mathematics dṛśyāṃśa = 15°
(Applies to: Kṛttikā, Anurādhā, Mūla, Āśleṣā, Ārdrā, Pūrvāṣāḍhā, Uttarāṣāḍhā.)

उदाहरण (worked example) For Mūla, dṛśyāṃśa = 15°. If λ_☉ = 240° and λ_Mūla ≈ 255°, separation = 15° → threshold for this group. One degree higher than the 14° set of 9.13 means these seven require a slightly larger solar clearance before the text counts them “दृश्य”.

9.15
भरणीतिष्यसौम्यानि सौक्ष्म्यात्त्रिःसप्तकांशकैः ।
शेषाणि सप्तदशभिर्दृश्यादृश्यानि भानि तु ।।
bharaṇītiṣyasaumyāni saukṣmyāttriḥsaptakāṃśakaiḥ ।
śeṣāṇi saptadaśabhirdṛśyādṛśyāni bhāni tu ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भरणी = भरणी-नक्षत्र; तिष्य = तिष्य / पुष्य; सौम्यानि = सौम्य / मृगशिरा; सौक्ष्म्यात् = सूक्ष्मता / मंद-प्रकाश के कारण; त्रिः-सप्तक-अंशकैः = तीन×सात = इक्कीस अंशों से; शेषाणि = शेष (बचे हुए); सप्तदशभिः = सत्रह (अंशों) से; दृश्य-अदृश्यानि = दृश्य अथवा अदृश्य; भानि = नक्षत्र / भ; तु = तु (विभाग सूचक)।

हिन्दी भावार्थ भरणी, तिष्य (पुष्य) और सौम्य (मृगशिरा) — इन तीनों की मंदता (सौक्ष्म्य) के कारण सीमा ऊँची रखी गई है: त्रिःसप्तक, अर्थात् ३×७ = २१ अंश। शेष जो नक्षत्र अभी तक १४°/१५°/२१° की सूचियों में नहीं आए, वे सत्रह अंशों पर दृश्य-अदृश्य माने जाते हैं। इस प्रकार सत्ताईस भों की दृश्यता-सारणी चार सीमों में बँट जाती है: १४°, १५°, १७° (शेष), २१° (सूक्ष्म त्रय)।

English rendering Bharaṇī, Tiṣya (Puṣya), and the Saumya asterism (Mṛgaśiras), because of their fineness (dimness), become visible only at thrice-seven degrees — that is, 21°. The remaining asterisms are visible or invisible at seventeen degrees.

गणित / The Mathematics Two remaining classes of the 27-nakṣatra table:
- dṛśyāṃśa = 21° = 3 × 7 (त्रिःसप्तक) for Bharaṇī, Puṣya, Mṛgaśiras
- dṛśyāṃśa = 17° for the residual set (शेषाणि): those not named in 9.12–9.15 — Śatabhiṣaj, Pūrva- and Uttara-Bhādrapadā, Revatī
Partition (27 nakṣatras): 4 at 13° (Svātī, Citrā, Jyeṣṭhā, Punarvasu — 9.12, which also names Abhijit, Agastya, Mṛgavyādha, Brahmahṛdaya) + 9 at 14° + 7 at 15° + 3 at 21° + 4 at 17° = 27.

उदाहरण (worked example) For Puṣya, dṛśyāṃśa = 21°. With λ_☉ = 100° and λ_Puṣya = 121°, separation = 21° → just at the “fine-star” threshold. For a residual star (e.g. Revatī, one of the four at 17°), the same Sun at 100° would already clear the 17° gate at λ_★ = 117°.

सुधार · correction (2026-10-07) पहले विभाजन 9 + 7 + 3 + 8 लिखा था, जिसमें 9.12 का 13° वर्ग छूट गया था। सत्ताईस नक्षत्रों में 4 (स्वाती, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु) 13° पर, अतः शेष चार ही बचते हैं: शतभिषक्, दोनों भाद्रपदा, रेवती। Correction: 4 + 9 + 7 + 3 + 4 = 27.

9.16
अष्टादशशताभ्यस्ता दृश्यांशाः स्वोदयासुभिः ।
विभज्य लब्धाः क्षेत्रांशास्तैर्दृश्यादृश्यताथवा ।।
aṣṭādaśaśatābhyastā dṛśyāṃśāḥ svodayāsubhiḥ ।
vibhajya labdhāḥ kṣetrāṃśāstairdṛśyādṛśyatāthavā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अष्टादश-शत = अठारह सौ = १८००; अभ्यस्ताः = गुणा किए गए; दृश्य-अंशाः = (पूर्वोक्त) दृश्यता-अंश; स्व-उदय-असुभिः = अपने उदय-काल के असुओं से; विभज्य = भाग देकर; लब्धाः = प्राप्त; क्षेत्र-अंशाः = क्षेत्रांश (कार्यकारी दृश्य-क्षेत्र के अंश); तैः = उन्हीं से; दृश्य-अदृश्यता = दृश्य या अदृश्य होना; अथवा = अथवा (वैकल्पिक मार्ग)।

हिन्दी भावार्थ अब केवल सारणी नहीं — रूपांतरण-सूत्र आता है। पूर्व श्लोकों के दृश्यांशों को अष्टादश-शत (१८००) से गुणा करो, फिर उस नक्षत्र के स्वकीय उदय-असु से भाग दो; भागफल क्षेत्रांश है। इन्हीं क्षेत्रांशों से दृश्य/अदृश्य का निर्णय होता है — अथवा उसी से तुल्य विकल्प चलता है। १८०० असु औसत एक राशि के उदय-काल के बराबर हैं (दिन के २१६०० असु ÷ १२), अतः सूत्र दृश्यांश को उदय-समय के अनुपात में “क्षेत्र” में तौलता है।

English rendering Multiply the degrees of visibility by eighteen hundred, and divide by the asterism’s own rising-time in asus; the quotient is the degrees of the field (kṣetrāṃśāḥ). By those field-degrees one judges visibility or invisibility — or an equivalent alternative procedure.

गणित / The Mathematics Plain formula from the verse:
kṣetrāṃśāḥ = (dṛśyāṃśāḥ × 1800) ÷ svodayāsavaḥ
where
- dṛśyāṃśāḥ ∈ {14, 15, 17, 21} from 9.13–9.15
- 1800 = अष्टादशशत (asus; mean rising-time of one rāśi)
- svodayāsavaḥ = that asterism’s own rising-asus
Convention link: SS day = 21,600 asus (prāṇa); 1800 = 21,600 ⁄ 12.

उदाहरण (worked example) Input: take Hasta from 9.13 → dṛśyāṃśa = 14°. Suppose its tabulated rising-time svodayāsu = 1600 asus (faster riser than the mean 1800).
kṣetrāṃśa = 14 × 1800 ⁄ 1600 = 15.75°
So the effective clearance used in the दृश्य/अदृश्य test is 15.75°, not the raw 14°. If instead svodayāsu = 1800 (mean), kṣetrāṃśa = 14 × 1800 ⁄ 1800 = 14° — raw and field degrees coincide.

हमारा डिकोड (Our Decode) १८०० असु का आंकड़ा सीधे हमारी मेट्रोलॉजी-पिन से जुड़ता है: 1 day = 21,600 prāṇa/asu (MATHEMATICAL-AUDIT §1), और 1800 = 21600⁄12 औसत राशि-उदय। यह “गिनती का संग” (21,600 prāṇa/day ↔ 21,600 arcmin/circle) time–angle correspondence है, भौतिक समता नहीं — ठीक वही अनुशासन जो math-core और vedic-ghadi दोनों में दिन-विभाजन को integer metrology की तरह रखते हैं। 9.13–9.15 की दृश्यांश-सारणी + 9.16 का क्षेत्रांश-रूपांतरण, अध्याय-९ की heliacal-visibility pipeline का कैननिकल कंकाल है; sphuṭa-engine (Ch. 2) से अलग परत, पर उसी SS-day-count framework के अंदर।

सुधार · correction (2026-10-07) सूची में 13 छूटा है; 1800 एक राशि की कलाएँ हैं, असु नहीं: क्षेत्रांश = कालांश × 1800 ÷ राशि के अपने उदय-असु। Correction (rendering).

9.17
प्रागेषां उदयः पश्चादस्तो दृक्कर्म पूर्ववत् ।
गतैष्यदिवसप्राप्तिर्भानुभुक्त्या सदैव हि ।।
prāgeṣāṃ udayaḥ paścādasto dṛkkarma pūrvavat ।
gataiṣyadivasaprāptirbhānubhuktyā sadaiva hi ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्राक् = पूर्व दिशा में; एषां = इन (पूर्वोक्त तारों/नक्षत्रों) का; उदयः = उदय; पश्चात् = पश्चिम में; अस्तः = अस्त; दृक्कर्म = दृश्यता-कर्म / उदयास्त-संशोधन; पूर्ववत् = पूर्व-अध्यायोक्त रीति से; गत-ऐष्य-दिवस-प्राप्तिः = बीते तथा आने वाले दिनों की गणना; भानु-भुक्त्या = सूर्य की दैनिक गति (भुक्ति) से; सदैव हि = सदैव ही।

हिन्दी भावार्थ इन नक्षत्रों-तारों का उदय पूर्व दिशा में और अस्त पश्चिम दिशा में होता है। उनकी दृश्यता—अर्थात् कब वे सूर्य-प्रकाश में छिपते हैं और कब फिर आकाश में उभरते हैं—का दृक्कर्म पूर्व में बताई गई विधि के अनुसार ही करना है। किसी उदयास्त-घटना के बीते हुए या आने वाले दिनों की संख्या सदैव सूर्य की भुक्ति (दैनिक माध्य गति) से ही जानी जाती है; तारे की अपनी गति से नहीं, क्योंकि दृश्यता-सीमा सूर्य के सापेक्ष कोण पर टिकी होती है।

English rendering Their rising is in the east and their setting in the west; the dṛk-karma (visibility correction for heliacal rising and setting) is to be performed as previously taught. The number of days past or yet to come until that visibility event is always obtained from the Sun’s daily motion (bhukti).

गणित / The Mathematics दिवस-प्राप्ति का नियम — यदि उदयास्त-सीमा तक अभी (या बीता हुआ) कोणीय अन्तर Δλ हो और सूर्य की दैनिक भुक्ति μ☉ हो, तो
n ≈ Δλ ÷ μ☉ (दिन)।
Sūrya-Siddhānta canon में μ☉ = 360° × 43,20,000 ⁄ 1,57,79,17,828 ≈ 0.985602° ⁄ दिन (≈ 59′8″ ⁄ दिन)।
दृक्कर्म स्वयं अध्याय 9 के पूर्व श्लोकों (अक्षांश, क्रान्ति, दृष्टि-सीमा इत्यादि) पर निर्भर है; यह श्लोक केवल दिशा-नियम और दिन-गणना का सौर-आश्रय बताता है।

उदाहरण (worked example) मान लीजिए किसी तारे का heliacal-rising-सीमा तक शेष सूर्य-सापेक्ष चाप Δλ = 12° है, तथा SS-canon भुक्ति μ☉ ≈ 0.985602° ⁄ दिन (day-count 1,57,79,17,828; epoch-independent mean rate)। तब
n ≈ 12 ⁄ 0.985602 ≈ 12.18 दिन ≈ 12 दिन + लगभग 0.18 × 60 ≈ 11 घटियाँ।
(सटीक दृक्कर्म में अक्षांश, नति और दृष्टि-सीमा-कोण पहले लगाना होता है; यह उदाहरण केवल “भानुभुक्त्या” वाले भाग का है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दृक्कर्म शब्द हमें ईमानदारी की याद दिलाता है — पुरानी “Drik zero-error” तालिका वास्तव में hardcoded आकाश थी, न कि सच्चा दृक्-गणना; उसे हटाकर report किया गया। हमारा instrument mean-longitude synthesis lab है; true heliacal visibility के लिए measured calculation layer चाहिए, केवल शब्द-बल नहीं। दिवस-प्राप्ति सूर्य-भुक्ति पर टिकती है, इसलिए Mahāyuga day-count का canon-चयन (SS 1,57,79,17,828 बनाम Āryabhaṭa 1,57,79,17,500) tithi/दिन-इंजन पर सीधे असर डालता है।

सुधार · correction (2026-10-07) “n ≈ Δλ ÷ μ☉” के स्थान पर: कालांश-अन्तर (कलाओं में) ÷ सूर्य की कालगति (9.11)। Correction (rendering).

9.18
अभिजिद्ब्रह्महृदयं स्वातीवैष्णववासवाः ।
अहिर्बुध्न्यं उदक्स्थत्वान्न लुप्यन्ते अर्करश्मिभिः ।।
abhijidbrahmahṛdayaṃ svātīvaiṣṇavavāsavāḥ ।
ahirbudhnyaṃ udaksthatvānna lupyante arkaraśmibhiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अभिजित् = अभिजित् (नक्षत्र/तारा); ब्रह्महृदयम् = ब्रह्महृदय; स्वाती = स्वाती; वैष्णव = वैष्णव (विष्णु-संबद्ध; सामान्यतः श्रवण); वासवाः = वासव (इन्द्र/वसु-संबद्ध); अहिर्बुध्न्यम् = अहिर्बुध्न्य; उदक्-स्थ-त्वात् = उत्तर दिशा में स्थित होने के कारण; न लुप्यन्ते = लुप्त/अदृश्य नहीं होते; अर्करश्मिभिः = सूर्य की किरणों से (+ चिह्न पाठ-भेद/सन्धि-सूचक; अर्थ वही)।

हिन्दी भावार्थ अभिजित्, ब्रह्महृदय, स्वाती, वैष्णव, वासव और अहिर्बुध्न्य—ये सभी उत्तर दिशा में ऊँचे (उच्च क्रान्ति/उच्च declination वाले) होने के कारण सूर्य की किरणों से लुप्त नहीं होते। अर्थात् उनकी heliacal invisibility नहीं बनती: सूर्य के समीप आकाश-पथ पर वे इतने नीचे नहीं आते कि प्रभामण्डल में विलीन हो जाएँ। यह कथन ज्योतिष-भय नहीं, बल्कि अक्षांश-सापेक्ष दृश्यता का स्पष्ट खगोलीय नियम है—उत्तर-स्थित तारे अस्त-अदृश्यता की उस श्रेणी से बाहर रहते हैं जिसका उल्लेख पूर्व श्लोकों में है।

English rendering Abhijit, Brahma-hṛdaya, Svātī, the Vaiṣṇava, the Vāsava, and Ahirbudhnya—because they lie to the north—are not extinguished by the Sun’s rays. Their high northerly place keeps them free of the heliacal disappearance that affects stars nearer the Sun’s path.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (उत्तर-स्थित तारों की अ-लुप्ति)। अंतर्निहित ज्यामिति: heliacal extinction तब होती है जब तारा सूर्य के निकट और क्षितिज के समीप दोनों हो; उच्च ध्रुवीय/उत्तरी स्थिति वाले तारों के लिए दिए अक्षांश पर यह युग्म-शर्त पूरी नहीं होती, अतः “न लुप्यन्ते अर्करश्मिभिः”।

दृष्टान्त (Illustrative Example) अभिजित्, ब्रह्महृदय, स्वाती, वैष्णव, वासव और अहिर्बुध्न्य—इन नामों को “भाग्य” से नहीं, उच्च declination / उत्तर-स्थित पथ से जोड़कर पढ़ें। पर्याप्त उत्तर अक्षांश पर कुछ तारे सूर्य के वार्षिक मार्ग के इतने “ऊपर” रहते हैं कि heliacal invisibility की वह स्थिति नहीं बनती जिसमें तारा सूर्य-प्रभामण्डल में विलीन हो जाए। यह अक्षांश-सापेक्ष दृश्यता का नियम है: वही तारा निम्न अक्षांश पर कभी-कभी संधि-काल में कठिन, उच्च अक्षांश पर लगभग निरंतर रात्रि-पथ का हिस्सा। श्लोक ज्योतिष-भय नहीं रचता—वह कहता है कि उदक्-स्थित्व ही अस्त-अदर्शन से बचाव का ज्यामितीय कारण है।

सुधार · correction (2026-10-07) “उदक्ष्थत्वान्” → “उदक्स्थत्वान्”। Correction: spelling.

अध्यायः 10

शृङ्गोन्नत्यधिकारः

Elevation of the Moon's Cusps
15 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
दसवाँ अध्याय चन्द्रमा के शृङ्गों—अर्धचन्द्र की दोनों नोकों—की उन्नति का अधिकार है: कब शीतगु उदय-अस्त करता है, कब द्वादशांश-अलगाव से दृश्य/अदृश्य होता है, और रवीन्दु के बीच की काल-दूरी (विवरासव) को भुक्ति से बार-बार स्थिर करने तक कैसे धुला जाता है। शुक्लपक्ष में वही प्राण अर्कास्त के बाद चन्द्रमास्त को बाँधते हैं; कृष्णपक्ष में रवि को भगणार्ध देकर वही प्राण शीतांशु के उदय को। अंत में क्रान्ति-विश्लेष और उसकी ज्या—दिशाम्ये युति, अन्यथा विश्लेष—शृङ्ग की दक्षिणोत्तर झुकाव को ज्योतिर्मय ज्यामिति में बाँधती है। यहाँ कला, काल और दृश्य एक ही सूत्र-श्रृंखला में बैठते हैं: कला का विस्तार, काल का प्राण, और क्षितिज पर नोकों का झुकाव—एक दूसरे के बिना अधूरे।

For the English reader:
Adhyāya 10 is the treatise on the cusps—the two horns of the lunar crescent—and the quiet geometry that sets their height against the sky. It begins where rise–set already lives: treat the Moon as the Sun was treated, then mark visibility once twelve degrees of elongation open the gap, and close it again into invisibility. Between Sun and Moon a residual in āsava (prāṇa-scale time) is refined by their daily motions until the lag stabilises; in the bright half that lag is the Moon’s delay after sunset, and in the dark half the same lag—after half a revolution is given to the Sun—becomes the Moon’s delay after its own dawn-edge. Finally the difference of declinations, read through the sine, decides whether the illuminated horns tilt north or south. The chapter’s beauty is architectural: phase, clock, and the tilt of silver on the horizon are one calculation, not three moods of poetry.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- दृश्यता-सीमा: चन्द्र \(|\lambda_☾ - \lambda_☉| \gtrsim 12°\) पर दृश्य; उससे कम पर अदृश्य (उदयास्त-विधि प्राग्वत्)
- विवर-लिप्ता → नादिका: \(n = \Delta\lambda'_{\text{विवर}} / v_{\text{सापेक्ष}}\) (एक राशि में रवीन्दु); पुनरावृत्ति \(n \leftarrow n · (v_☾ - v_☉)/60\) या समकक्ष भुक्ति-शोधन जब तक \(\Delta t\) स्थिर
- शुक्ल: \(t_{\text{चन्द्रास्त}} = t_{\text{सूर्यास्त}} + \Delta t_{\text{प्राण}}\) (स्थिर विवरासव)
- कृष्ण: \(\lambda_☉' = \lambda_☉ + 180°\); उन्हीं प्राणों से \(t_{\text{चन्द्रोदय}}\)
- शृङ्ग की दक्षिणोत्तर: \(\Delta\delta = \delta_☾ - \delta_☉\); \(jya(\Delta\delta)\) — दिशाम्ये युति, अन्यथा विश्लेष → नोकों का उ. / द. झुकाव (शृङ्गोन्नति का बीज)

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। शृङ्गोन्नति के लिए चाहिए शुद्ध रवीन्दु-स्फुट, क्रान्ति-युग्म, प्राण/आसव माप पर स्थिर विवर-पुनरावृत्ति, और क्षितिज-लग्न से नोक-उन्नति का मापित सत्यापन—जो अभी mean-longitude / Chapter-2 स्फुट प्रयोगशाला से आगे, इस अधिकार की अलग गणना-परत माँगता है।

शृङ्ग (cusp)शृङ्गसूर्य-दिशादीप्त-अंश = (1 − cos η)/2η = चन्द्र − सूर्य (elongation)यहाँ η = 60° → 25% दीप्त
शृङ्गोन्नति — elevation of the Moon's horns (SS ch.10): the illuminated fraction follows the elongation η between Sun and Moon; the terminator is an ellipse whose semi-minor axis is r·cos η, and the line of cusps stands perpendicular to the Sun-Moon direction. Drawn here with η = 60° — a waxing crescent-to-quarter Moon.
10.1
उदयास्तविधिः प्राग्वत्कर्तव्यः शीतगोरपि ।
भागैर्द्वादशभिः पश्चाद्दृश्यः प्राग्यात्यदृश्यताम् ।।
udayāstavidhiḥ prāgvatkartavyaḥ śītagorapi ।
bhāgairdvādaśabhiḥ paścāddṛśyaḥ prāgyātyadṛśyatām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उदयास्त-विधिः = उदय-अस्त की गणना-विधि; प्राग्वत् = पूर्ववत् (जैसे पहले ग्रहों के लिए कहा); शीतगोः अपि = शीतगु (चन्द्र) के लिए भी; भागैः द्वादशभिः = बारह भागों (कालांशों) से; पश्चात् दृश्यः = बाद में दृश्य; प्राक् याति अदृश्यताम् = पूर्व दिशा में अदृश्यता को प्राप्त होता है।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा के उदय और अस्त की विधि वही है जो पहले (ग्रहों के उदयास्त-अध्याय में) बतलाई जा चुकी है — उसी क्रम से शीतगु पर भी लागू करो। सूर्य से बारह कालांश (समय-अंश, 9.5 की विधि से) का अन्तर होने पर चन्द्र पश्चिम में दृश्य हो जाता है; और पूर्व दिशा की ओर (अमावस्या के समीप) वह अदृश्यता को प्राप्त होता है। यह बारह-कालांश की सीमा दृश्यता की साधारण शास्त्रीय देहली है, न कि कोई भाग्य-सूचक रेखा।

English rendering The procedure for rising and setting is to be carried out for the Moon exactly as before. When twelve kālāṃśa past (conjunction), the Moon becomes visible in the west; toward the east it passes into invisibility.

गणित / The Mathematics दृश्यता-सीमा: चन्द्र और सूर्य के बीच 12 कालांश → पश्चिम में दृश्य; संयोग से पहले 12 कालांश पर पूर्व में अदृश्य। “प्राग्वत्” = अध्याय 9 की विधि: अन्तर-चाप के उदय-प्राण ÷ 60 (9.5) — यह समय-अंश है, केवल क्रान्तिवृत्त-विरह नहीं; 10.2–10.5 इसी को असु में गिनते हैं।

उदाहरण (worked example) मान लें mean/true longitudes (sidereal, SS-canon day-count 1,577,917,828): λ_☉ = 45.0°, λ_☽ = 58.5° (दोनों वृष में)। विरह 13.5° का उदय-काल (लङ्का, वृष 1795 प्राण ⁄ 30°) = 807.8 प्राण = 13.46 कालांश > 12 → शुक्ल पक्ष में सायंकाल पश्चिम में दृश्य। यदि λ_☽ = 54.0°: 9° → 8.98 कालांश < 12 → अदृश्य। (अपने देश में स्थानीय उदय-असु लें; अस्त के लिए 9.5 का छह-राशि-युत लग्न।)

हमारा डिकोड (Our Decode) दृश्यता का द्वार elongation पर टिका है, और elongation tithi-इंजन की रीढ़ है। team ने SS-canon 1,577,917,828 दिनों/महायुग को चुना — Āryabhaṭa के 1,577,917,500 से 328 दिन का अंतर tithi (अतः उदयास्त-दृश्यता) पर सबसे अधिक पड़ता है; synodic test में SS-canon लगभग −0.0047 s/month residual देता है।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले 12 को केवल कोणीय विरह (“काल-माप नहीं”) कहा गया था। “उदयास्तविधिः प्राग्वत्” अध्याय 9 की कालांश-विधि को लागू करता है, और 10.2 असु में गिनता है: 12 कालांश समय-अंश हैं। Correction (reading): twelve kālāṃśas.

10.2
रवीन्द्वोः षड्भयुतयोः प्राग्वल्लग्नान्तरासवः ।
एकराशौ रवीन्द्वोश्च कार्या विवरलिप्तिकाः ।।
ravīndvoḥ ṣaḍbhayutayoḥ prāgvallagnāntarāsavaḥ ।
ekarāśau ravīndvośca kāryā vivaraliptikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवीन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र के; षड्भ-युतयोः = छह राशियों (180°) से युक्त (अस्त-बिन्दु/विपरीत-बिन्दु); प्राग्वत् = पूर्ववत्; लग्न-अन्तर-आसवः = लग्न-अन्तर प्राण/आसव में; एकराशौ = एक ही राशि में स्थित होने पर; विवर-लिप्तिकाः = अन्तर की कलाएँ (arc-minutes)।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्र — दोनों पर छह राशियाँ जोड़कर (अर्थात् उनके अस्त-बिन्दु लेकर) — पहले की भाँति लग्न-अन्तर आसवों (प्राणों) में निकालो। जब सूर्य और चन्द्र एक ही राशि में हों, तो उनके देशान्तर का अन्तर कलाओं में निकालना चाहिए। यह चरण उदयास्त-काल को लग्न-अन्तर से बाँधता है।

English rendering For the Sun and the Moon, each advanced by six signs, compute as before the lagna-interval in āsava (prāṇa-units of time). When the two lie in one and the same rāśi, form their difference in minutes of arc.

गणित / The Mathematics अस्त-बिन्दु: λ′ = λ + 180° (षड्भ = 6 × 30°)। लग्न-अन्तर ΔL = L(λ′_body) − L(λ′_ref) को काल में: आसव/प्राण में व्यक्त। एक-राशि स्थिति में arc-difference δ = |λ_☽ − λ_☉| कलाओं में (लिप्तिका)। मेट्रोलॉजी: 1 दिन = 21,600 प्राण = 21,600 चाप-कला (count correspondence, physical identity नहीं)।

उदाहरण (worked example) λ_☉ = 10° (Meṣa), λ_☽ = 25° (Meṣa) — एक राशि। विवर = 15° = 900 लिप्तिका। षड्भ-युक्त: λ′_☉ = 190°, λ′_☽ = 205°; इनसे लग्न-अन्तर आसव-विधि से (पूर्व अध्यायवत्) निकालें।

हमारा डिकोड (Our Decode) 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600′/वृत्त की गिनती-संगति `MATHEMATICAL-AUDIT §1` में pin है — समय-कोण की physical equality नहीं, count correspondence है। lagna/ascendant closed-form layer Swiss-fixture से 0.1° के भीतर agree करता है; RA(MC) ≡ LST 1e-9° तक verified।

10.3
तन्नाडिकाहते भुक्ती रवीन्द्वोः षष्टिभाजिते ।
तत्फलान्वितयोर्भूयः कर्तव्या विवरासवः ।।
tannāḍikāhate bhuktī ravīndvoḥ ṣaṣṭibhājite ।
tatphalānvitayorbhūyaḥ kartavyā vivarāsavaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-नाडिका-हते = उन नाड़ियों से गुणित; भुक्ती = (सूर्य-चन्द्र की) भुक्तियाँ/दैनिक गतियाँ; रवीन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र की; षष्टि-भाजिते = साठ से भाग देने पर; तत्-फल-अन्वितयोः = उस फल से युक्त दोनों (देशान्तर); भूयः = पुनः; विवर-आसवः = अन्तर-आसव।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-प्राप्त नाड़ियों (घटियों) से सूर्य और चन्द्र की भुक्तियों को गुणो, साठ से भागो — यही गति-फल है। उस फल को दोनों के देशान्तरों में जोड़कर (या दिशा के अनुसार संशोधित कर) फिर से अन्तर-आसव निकालो। यह एक पुनरावृत्ति-चरण है: समय से गति, गति से नया स्थान, स्थान से नया समय।

English rendering Multiply the daily motions of Sun and Moon by those nāḍikās and divide by sixty; apply the products again to the two longitudes, and recompute the difference in āsava.

गणित / The Mathematics पुनरावृत्ति:
Δλ = (bhukti × nāḍikā) / 60
λ_new = λ_old ± Δλ
फिर Δāsava(λ_☉_new, λ_☽_new) पुनः।
इकाई: भुक्ति °/दिन (या कला/दिन); नाड़िका = दिन/60; अतः (bhukti × nāḍikā)/60 = अंश (या समतुल्य) में विस्थापन।

उदाहरण (worked example) मानें nāḍikā-अन्तर n = 8; भुक्ति_☽ = 13°10′/दिन ≈ 13.167°/d; भुक्ति_☉ ≈ 0.985°/d।
Δλ_☽ = 13.167 × 8 / 60 ≈ 1.756°; Δλ_☉ ≈ 0.131°।
नए देशान्तरों से विवर-आसव दोबारा गिनें — अगला श्लोक convergence तक यही चक्र चलाता है।

10.4
एवं यावत्स्थिरीभूता रवीन्द्वोरन्तरासवः ।
तैः प्राणैरस्तमेतीन्दुः शुक्ले अर्कास्तमयात्परम् ।।
evaṃ yāvatsthirībhūtā ravīndvorantarāsavaḥ ।
taiḥ prāṇairastametīnduḥ śukle arkāstamayātparam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं यावत् = इसी प्रकार जब तक; स्थिरीभूता = स्थिर/अपरिवर्तनीय हो जाएँ; रवीन्द्वोः अन्तर-आसवः = सूर्य-चन्द्र का अन्तर-आसव; तैः प्राणैः = उन प्राणों से; अस्तम् एति इन्दुः = चन्द्र अस्त को प्राप्त होता है; शुक्ले = शुक्ल पक्ष में; अर्क-अस्तमयात् परम् = सूर्यास्त के बाद (+ पाठ-चिह्न: अर्कास्तमयात्परम्)।

हिन्दी भावार्थ इसी पुनरावृत्ति को तब तक चलाओ जब तक सूर्य-चन्द्र का अन्तर-आसव स्थिर न हो जाए — अर्थात् दो क्रमागत चक्रों में मान न बदले। शुक्ल पक्ष में, उन स्थिर प्राणों के बीतने पर — सूर्यास्त के पश्चात् — चन्द्रमा अस्त होता है। यह सायंकालीन चन्द्रास्त का काल-मान है।

English rendering Proceed thus until the Sun–Moon difference in āsava has become fixed. With those prāṇas, in the bright fortnight, the Moon sets after sunset.

गणित / The Mathematics स्थिरता-शर्त: |Δāsavaₖ − Δāsavaₖ₋₁| = 0 (exact; शास्त्रीयतः जब लिप्तिका-स्तर पर अन्तर शून्य)।
t_moonset = t_sunset + (स्थिर प्राण) × (1 दिन / 21,600 प्राण)।
शुक्ल पक्ष: संयोग के बाद, चन्द्र सूर्य के पूर्व में — सायं पश्चिम में सूर्य के बाद अस्त।

उदाहरण (worked example) मानें converged Δ = 4,320 प्राण।
दिन-अंश = 4,320 / 21,600 = 0.2 दिन = 0.2 × 60 = 12 घटिका = 4 घण्टे 48 मिनट (आधुनिक घड़ी में, equinoctial approximation)। सूर्यास्त + 4ʰ48ᵐ ≈ चन्द्रास्त (शुक्ल, दी गई भुक्तियों/लग्न पर निर्भर)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “यावत् स्थिरीभूता” exact-equality की भाषा है — `kaal-verification-oracle` में भी अब ±tolerance नहीं, केवल `==` on pinned fixtures; कभी ±3 band ने वास्तविक −1 छुपा लिया था। प्राण-मेट्रोलॉजी 21,600/दिन `math-core` / MATHEMATICAL-AUDIT §1 से जुड़ी है।

10.5
भगणार्धं रवेर्दत्त्वा कार्यास्तद्विवरासवः ।
तैः प्राणैः कृष्णपक्षे तु शीतांशुरुदयं व्रजेत् ।।
bhagaṇārdhaṃ raverdattvā kāryāstadvivarāsavaḥ ।
taiḥ prāṇaiḥ kṛṣṇapakṣe tu śītāṃśurudayaṃ vrajet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगण-अर्धम् = कक्षा-परिक्रमण का आधा (180°); रवेः दत्त्वा = सूर्य को देकर (जोड़कर); कार्याः तत्-विवर-आसवः = वे अन्तर-आसव करने चाहिए; तैः प्राणैः = उन प्राणों से; कृष्णपक्षे तु = किन्तु कृष्ण पक्ष में; शीतांशुः = चन्द्र; उदयं व्रजेत् = उदय को प्राप्त होता है।

हिन्दी भावार्थ सूर्य के देशान्तर में आधा भगण (छह राशि / 180°) जोड़ो, फिर उसी विधि से अन्तर-आसव निकालो। कृष्ण पक्ष में वे प्राण सूर्यास्त (या संगत सन्दर्भ-काल) के सापेक्ष चन्द्र के उदय का काल देते हैं। शुक्ल में अस्त, कृष्ण में उदय — पक्ष-द्वय का यह युग्म उदयास्त-विधि को पूरा करता है।

English rendering Adding half a revolution to the Sun, recompute those difference-āsava. With those prāṇas, in the dark fortnight, the cool-rayed Moon attains its rising.

गणित / The Mathematics λ_☉* = λ_☉ + 180° (भगणार्ध)।
फिर 10.02–10.04 की iteration: स्थिर Δāsava →
t_moonrise^(kṛṣṇa) = t_ref + Δāsava / 21,600 दिन।
कृष्ण पक्ष: वियोग (opposition) के बाद चन्द्र सूर्य के पश्चिम-पूर्व विन्यास में रात्रि-पूर्वार्ध में उदय।

उदाहरण (worked example) λ_☉ = 200°, भगणार्ध-युक्त λ_☉ = 20°। इसी λ_☉ और λ_☽ से converged Δ = 2,160 प्राण ⇒ 2,160/21,600 = 0.1 दिन = 6 घटिका ≈ 2ʰ24ᵐ — कृष्ण पक्ष में सन्दर्भ-काल से चन्द्रोदय का अन्तर (स्थानीय लग्न/क्षितिज ज्यामिति सहित पूर्ण स्फुट पर निर्भर)।

10.6
अर्केन्द्वोः क्रान्तिविश्लेषो दिक्साम्ये युतिरन्यथा ।
तज्ज्येन्दुरर्काद्यत्रासौ विज्ञेया दक्षिणोत्तरा ।।
arkendvoḥ krāntiviśleṣo diksāmye yutiranyathā ।
tajjyendurarkādyatrāsau vijñeyā dakṣiṇottarā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्केन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र की; क्रान्ति-विश्लेषः = क्रान्तियों का अन्तर; दिक्-साम्ये = दिशा समान होने पर (तब अन्तर); युतिः = योग (जोड़); अन्यथा = अन्यथा (भिन्न दिशा में तब योग); तत्-ज्या = उस (योग/अन्तर) की ज्या; इन्दुः अर्कात् = सूर्य से चन्द्र; यत्र असौ = जहाँ वह (फल) हो; विज्ञेया दक्षिणोत्तरा = दक्षिणी या उत्तरी जाननी चाहिए।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्र की क्रान्तियों (declinations) का विश्लेष लो — यदि दोनों एक ही दिशा (दोनों उत्तर या दोनों दक्षिण) में हों तो उनका अन्तर लो, भिन्न दिशा में हों तो योग। उस राशि की ज्या से चन्द्र का सूर्य-सापेक्ष उत्तर-दक्षिण विचलन जाना जाता है। यह शृङ्गोन्नति / चन्द्र-स्थिति की दिगंश-ज्यामिति का बीज है।

English rendering Take the declinations of Sun and Moon: their difference if they lie in the same direction, their sum otherwise (krāntiviśleṣo diksāmye, yutir anyathā). From the sine of that combined quantity the Moon’s north–south offset relative to the Sun is to be known.

गणित / The Mathematics δ_☉, δ_☽ = क्रान्तियाँ (चिह्न: उत्तर +, दक्षिण −, या शास्त्रीय “दिशा” से)।
Δ = { | |δ_☽| − |δ_☉| | यदि समान दिशा (विश्लेष);
|δ_☽| + |δ_☉| यदि भिन्न दिशा (युति) }
ज्या(Δ) → अगले श्लोकों में प्रभा-कर्ण और अक्ष-ज्या से बाहु/शङ्कु।
(convention: क्रान्ति ε·sin λ से, obliquity SS-परम्परा या घोषित ε।)

उदाहरण (worked example) δ_☉ = +12°, δ_☽ = +18° (दोनों उत्तर) ⇒ Δ = 18° − 12° = 6°, jyā(6°) = 359.4 (SS-ज्या सारणी, R = 3438)। यदि δ_☉ = +12°, δ_☽ = −5° ⇒ Δ = 17°, jyā उसी सारणी से।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले समान दिशा में योग और भिन्न में अन्तर लिखा था। “क्रान्तिविश्लेषो दिक्साम्ये युतिरन्यथा” = समान दिशा में अन्तर, अन्यथा योग; उदाहरण का दूसरा भाग (12° + 5° = 17°) पहले से इसी नियम पर था। Correction: difference when same, sum otherwise.

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षाम्ये” → “दिक्साम्ये” (दिक्-साम्य = एक ही दिशा), दूसरा साक्षी: ebharatisampat का सूर्यसिद्धान्त e-text (Maharishi University of Management Vedic Literature Collection, Ebharati-5050)। Correction: spelling.

10.7
मध्याह्नेन्दुप्रभाकर्णसङ्गुणा यदि सोत्तरा ।
तदार्कघ्नाक्षजीवायां शोध्या योज्या च दक्षिणा ।।
madhyāhnenduprabhākarṇasaṅguṇā yadi sottarā ।
tadārkaghnākṣajīvāyāṃ śodhyā yojyā ca dakṣiṇā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्याह्न-इन्दु-प्रभा-कर्ण-सङ्गुणा = मध्याह्न के चन्द्र-प्रभा-कर्ण से गुणित (पूर्व ज्या); यदि सोत्तरा = यदि उत्तरा हो; तत् = वह फल; अर्क-घ्न-अक्ष-जीवायाम् = अर्क (= 12) से गुणित अक्षज्या में; शोध्या = शोधनीय (घटाने योग्य); योज्या च दक्षिणा = और दक्षिणा होने पर जोड़ने योग्य।

हिन्दी भावार्थ पूर्व-प्राप्त ज्या को मध्याह्न-कालिक चन्द्र के प्रभा-कर्ण (प्रकाश/दिन-त्रिज्या से जुड़ा कर्ण) से गुणो। यदि फल उत्तर दिशा का हो तो उसे “अर्क × अक्षज्या” (12 × sine of latitude) में से घटाओ; यदि दक्षिण का हो तो जोड़ो। शेष अगले श्लोक में लम्बज्या से विभाजित होकर बाहु बनेगा।

English rendering Multiply (that sine) by the Moon’s midday prabhā-karṇa. If the result is northern, subtract it from twelve times the sine of latitude; if southern, add it there.

गणित / The Mathematics
S = jyā(Δ) × (इन्दु-प्रभा-कर्ण)_मध्याह्न
अक्षज्या = R·sin φ (φ = स्थान का अक्षांश)
अर्क = 12 (bhūtasaṃkhyā / द्वादश)
आधार: B₀ = 12 · अक्षज्या
शेष: rem = { B₀ − S यदि उत्तरा;
B₀ + S यदि दक्षिणा }

उदाहरण (worked example) मानें R = 3438′, φ = 28° (लगभग दिल्ली), अक्षज्या ≈ 3438·sin 28° ≈ 1614′।
12 × अक्षज्या ≈ 19,368′।
S = 1,500′ (काल्पनिक मध्याह्न गुणनफल), उत्तरा ⇒ rem = 19,368 − 1,500 = 17,868′ — यह लम्बज्या-भाग के लिए शेष।

10.8
शेषं लम्बज्यया भक्तं लब्धो बाहुः स्वदिङ्मुखः ।
कोटिः शङ्कुस्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रुतिर्भवेत् ।।
śeṣaṃ lambajyayā bhaktaṃ labdho bāhuḥ svadiṅmukhaḥ ।
koṭiḥ śaṅkustayorvargayutermūlaṃ śrutirbhavet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शेषम् = (पूर्व का) शेष; लम्ब-ज्यया भक्तम् = लम्बज्या (co-latitude की ज्या) से भक्त; लब्धः बाहुः = प्राप्त बाहु; स्व-दिक्-मुखः = अपनी दिशा की ओर मुख किए; कोटिः शङ्कुः = कोटि ही शङ्कु है; तयोः वर्ग-युतेः मूलम् = दोनों के वर्ग-योग का मूल; श्रुतिः भवेत् = कर्ण/श्रुति होती है।

हिन्दी भावार्थ शेष को लम्बज्या से भागो — लब्धि बाहु है, और वह अपनी ही दिशा (उत्तर/दक्षिण) की ओर अभिमुख रहता है। कोटि को शङ्कु कहते हैं। बाहु और शङ्कु के वर्गों का योग का वर्गमूल श्रुति (कर्ण) है — वही त्रिभुज की पूर्ण माप। यह शृङ्गोन्नति/दिगंश-ज्यामिति का पाइथागोरीय समापन है, शास्त्रीय बाहु-कोटि-श्रुति भाषा में।

English rendering Divide the remainder by the sine of co-latitude; the quotient is the base (bāhu), facing its own direction. The upright is the gnomon (śaṅku); the square root of the sum of their squares is the hypotenuse (śruti).

गणित / The Mathematics
लम्बज्या = R·sin(90° − φ) = R·cos φ
बाहु b = rem / लम्बज्या
कोटि k = शङ्कु (प्रसंगानुसार दिन-शङ्कु / संबंधित ऊर्ध्व माप)
श्रुति s = √(b² + k²)

उदाहरण (worked example) rem = 17,868′, φ = 28°, R = 3438′ ⇒ लम्बज्या ≈ 3438·cos 28° ≈ 3,036′।
b = 17,868 / 3,036 ≈ 5.88 (त्रिज्या-एकांक में; या दोनों को R-इकाई में रखकर deg/′ में व्याख्या)।
यदि k = शङ्कु = 4.20 (उसी इकाई में), तो s = √(5.88² + 4.20²) = √(34.57 + 17.64) = √52.21 ≈ 7.23 — श्रुति।

हमारा डिकोड (Our Decode) बाहु-कोटि-श्रुति की exact √(b²+k²) संरचना Chapter-2 स्फुट-engine की कर्ण-भाषा से जुड़ती है — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` में भी śīghra-phala = arcsin( R_ś·sin K / √(R_def² + R_ś² + 2·R_def·R_ś·cos K) ); ज्या-कर्ण ज्यामिति शुद्ध SS श्रृंखला में, Western theorem chain में नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) उदाहरण की कोटि 4.20 गलत है: कोटि 12-अङ्गुल शङ्कु है (10.7-10.8)। Correction (rendering).

10.9
सूर्योनशीतगोर्लिप्ताः शुक्लं नवशतोद्धृताः ।
चन्द्रबिम्बाङ्गुलाभ्यस्तं हृतं द्वादशभिः स्फुटम् ।।
sūryonaśītagorliptāḥ śuklaṃ navaśatoddhṛtāḥ ।
candrabimbāṅgulābhyastaṃ hṛtaṃ dvādaśabhiḥ sphuṭam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूर्योन = सूर्य से रहित / सूर्य-घटित (चन्द्र − सूर्य); शीतगोः = चन्द्रमा की; लिप्ताः = कलाएँ (arcminutes); शुक्लं = शुक्ल-भाग (प्रकाशित अंश); नवशत = ९००; उद्धृताः = विभाजित; चन्द्रबिम्ब-अङ्गुला = चन्द्र-बिम्ब की अङ्गुल-माप; अभ्यस्तं = गुणा; द्वादशभिः = १२ से; स्फुटम् = शुद्ध / तात्कालिक प्रकाशित मान।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा और सूर्य के बीच के अन्तर की कलाओं (लिप्ता) को लेकर, उन्हें नौ-सौ (९००) से भाग देने पर ‘शुक्ल’—अर्थात् प्रकाशित अंश—की बारह-भाग वाली माप मिलती है। उस शुक्ल-माप को चन्द्र-बिम्ब की अङ्गुल-संख्या से गुणा करके बारह से भाग देने पर प्रकाशित अंश का स्फुट (वास्तविक अङ्गुल-मान) प्राप्त होता है। यह शुक्ल-पक्ष की ज्यामितीय माप है—भाग्य-कथन नहीं, केवल प्रकाश-क्षेत्र का हिसाब।

English rendering Take the minutes of arc of the Moon diminished by the Sun (the elongation). Divided by nine hundred they yield the “white” measure—the illuminated portion in a twelve-part scale. That quantity, multiplied by the Moon’s disk in aṅgulas and divided by twelve, is the true illuminated measure for the moment.

गणित / The Mathematics
Elongation in arcminutes:
Δλ′ = (λ_☾ − λ_☉) in ′ (for the bright half; range 0′ … 10 800′ as phase goes new → full).

Twelve-part illuminated measure:
śukla = Δλ′ ÷ 900
(so 0° → 0; 90° = 5 400′ → 6; 180° = 10 800′ → 12).

True illuminated length (aṅgula):
sphuṭa = (śukla × D_☾) ÷ 12
where D_☾ = apparent lunar diameter in aṅgulas (from the text’s own bimba procedure).

Equivalently:
sphuṭa = (Δλ′ × D_☾) ÷ (900 × 12) = (Δλ′ × D_☾) ÷ 10 800.
The constant 900′ = 15° is the elongation step that corresponds to one of the twelve equal parts of the full diameter.

उदाहरण (worked example)
Convention: elongation at first quarter Δλ = 90° = 5 400′; take D_☾ = 15 aṅgula (illustrative mid-range disk).
śukla = 5 400 ÷ 900 = 6
sphuṭa = (6 × 15) ÷ 12 = 7.5 aṅgula
— half the disk diameter, as required at quadrature. At full moon (Δλ = 180°): śukla = 12, sphuṭa = 15 aṅgula = whole disk.

10.10
दत्त्वार्कसंज्ञितं बिन्दुं ततो बाहुं स्वदिङ्मुखम् ।
ततः पश्चान्मुखी कोटिं कर्णं कोट्यग्रमध्यगम् ।।
dattvārkasaṃjñitaṃ binduṃ tato bāhuṃ svadiṅmukham ।
tataḥ paścānmukhī koṭiṃ karṇaṃ koṭyagramadhyagam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दत्त्वा = रखकर; अर्कसंज्ञितं = ‘सूर्य’ नामक; बिन्दुं = बिन्दु; ततः = उससे; बाहुं = बाहु (आधार-भुजा); स्वदिङ्मुखम् = अपनी दिशा की ओर; पश्चान्मुखी = पश्चिम-मुखी; कोटिं = कोटि (लम्ब-भुजा); कर्णं = कर्ण (कर्ण/hypotenuse); कोट्यग्र-मध्यगम् = कोटि के अग्र से मध्य तक जाने वाला।

हिन्दी भावार्थ रेखाचित्र में पहले एक बिन्दु को ‘अर्क’ (सूर्य) का संज्ञा-बिन्दु मानकर रखो। उससे अपनी निर्धारित दिशा में बाहु खींचो। फिर पश्चिम की ओर मुख किए कोटि बनाओ। कोटि के सिरे से मध्य-बिन्दु तक कर्ण खींचो—यही त्रिभुज शुक्ल-अंश की ज्यामिति का ढाँचा है। यह निर्माण-विधि है: दिशा, बाहु, कोटि, कर्ण—क्रम से।

English rendering Place a point designated as the Sun. From it draw the bāhu (base) in its proper direction. Then draw the koṭi facing west. The karṇa (hypotenuse) runs from the tip of the koṭi to the centre. This is the constructive triangle for the lunar phase figure.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (ज्यामितीय निर्माण-विधि)।
यहाँ संख्या नहीं, क्रम है: अर्क-बिन्दु → बाहु (स्व-दिशा) → पश्चान्मुखी कोटि → कोट्यग्र से मध्य तक कर्ण। पूर्व-श्लोक का स्फुट अङ्गुल-मान इन्हीं भुजाओं पर बैठता है; दिशा-निर्णय अगली श्लोक में कर्ण-सूत्र से पूरा होता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कागज पर एक बिंदु लगाइए और उसे अर्क कहिए—सूर्य का संज्ञा-बिन्दु। उससे अपनी निर्धारित दिशा में बाहु खींचिए; फिर पश्चिम-मुख कोटि; कोटि-अग्र से मध्य तक कर्ण। यही क्रम शुक्ल-अंश की ज्यामिति का कंकाल है: दिशा → भुजा → कोटि → कर्ण, बिना जल्दबाजी के। आधुनिक रेखागणित की भाषा में यह एक oriented right-triangle construction है, जिसमें पश्चिम-मुख कोटि orientation को बाँधती है ताकि पक्ष-कोण उलटा न खिंच जाए। इस श्लोक का स्मरणीय सार एक वाक्य में है—पहले ढाँचा सही, फिर अंक; अध्याय १० का शेष भाग इसी त्रिभुज पर चन्द्र-बिम्ब और दिक्-सिद्धि चढ़ाएगा।

10.11
कोटिकर्णयुताद्बिन्दोर्बिम्बं तात्कालिकं लिखेत् ।
कर्णसूत्रेण दिक्सिद्धिं प्रथमं परिकल्पयेत् ।।
koṭikarṇayutādbindorbimbaṃ tātkālikaṃ likhet ।
karṇasūtreṇa diksiddhiṃ prathamaṃ parikalpayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोटि-कर्ण-युतात् = कोटि और कर्ण से युक्त / उनके योग-बिन्दु से; बिन्दोः = बिन्दु से; बिम्बं = बिम्ब (चन्द्र-व्यास-वृत्त); तात्कालिकं = उसी क्षण का; लिखेत् = अंकित करे; कर्णसूत्रेण = कर्ण की डोरी/रेखा से; दिक्सिद्धिं = दिशाओं की सिद्धि (स्थापना); प्रथमं = सबसे पहले; परिकल्पयेत् = निर्धारित करे।

हिन्दी भावार्थ कोटि-कर्ण से जुड़े उस बिन्दु से तात्कालिक चन्द्र-बिम्ब अंकित करो—वही प्रकाशित-अंश वाला वृत्त जिसकी माप नवशत-विधि से स्फुट हुई। पर पहले कर्ण-सूत्र से दिशाओं को सिद्ध कर लो; बिना दिक्-सिद्धि के बिम्ब का मुख और शुक्ल-कृष्ण का ओर-निर्णय अस्थिर रह जाता है। निर्माण का अनुशासन: दिशा → त्रिभुज → बिम्ब।

English rendering From the point joined with the koṭi and karṇa, draw the instantaneous lunar disk. First, however, establish the cardinal directions by means of the karṇa-string; only then is the phase figure oriented and complete.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (रेखागणितीय प्रक्रिया + दिक्-सिद्धि)।
क्रम बाध्य है: (१) कर्णसूत्रेण दिक्सिद्धि, (२) कोटि-कर्ण-युक्त बिन्दु से तात्कालिक बिम्ब-लेखन। संख्या १०.०९ से आती है; यहाँ केवल उसका ज्यामितीय नियोजन है—बिम्ब का केन्द्र, त्रिज्या (अर्ध-बिम्ब-अङ्गुल), और शुक्ल-सीमा कर्ण-बाहु-कोटि के संयोग से बैठती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) त्रिभुज खिंच जाने के बाद भी जल्दबाजी वर्जित है: पहले कर्ण-सूत्र से दिशाएँ सिद्ध करो—पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण का ढाँचा स्थिर हो, तब कोटि-कर्ण-संयोग बिन्दु से तात्कालिक चन्द्र-बिम्ब लिखो। बिना दिक्-सिद्धि के प्रकाशित-अंश का “मुख” घूम सकता है: शुक्ल किस ओर, कृष्ण किस ओर—यह orientation-error से उलटा पड़ जाता है। निर्माण-अनुशासन तीन चरणों में याद रहे—दिशा → त्रिभुज → बिम्ब; नवशत-विधि से स्फुट माप तभी सार्थक है जब रेखाओं का मुख आकाश-दिशाओं से बँधा हो। यह श्लोक गणना से अधिक drafting protocol है—गलत दिशा में सही संख्या भी गलत चित्र देती है।

सुधार · correction (2026-10-07) “दिक्षिद्धिं” → “दिक्सिद्धिं”। Correction: spelling.

10.12
शुक्लं कर्णेन तद्बिम्बयोगादन्तर्मुखं नयेत् ।
शुक्लाग्रयाम्योत्तरयोर्मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् ।।
śuklaṃ karṇena tadbimbayogādantarmukhaṃ nayet ।
śuklāgrayāmyottarayormadhye matsyau prasādhayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्लं = प्रदीप्त/उजला अंश; कर्णेन = कर्ण-रेखा (त्रिज्या/कर्ण-माप) से; तद्-बिम्ब-योगात् = उन दोनों बिम्बों (वृत्त-व्यासों) के योग से; अन्तर्मुखं नयेत् = अन्दर की ओर ले जाए/रखे; शुक्लाग्र = शुक्ल-अंश का अग्र-बिन्दु; याम्य-उत्तरयोः मध्ये = दक्षिण–उत्तर रेखा के बीच; मत्स्यौ = दो मत्स्य (प्रतिच्छेदी चाप-युग्म); प्रसाधयेत् = साधित करे/रचे।

हिन्दी भावार्थ शुक्ल-अंश को कर्ण के द्वारा, उन बिम्बों के योग से निकाले गए माप पर, अन्दर की ओर स्थापित करना चाहिए। फिर शुक्ल के अग्र-बिन्दु और दक्षिण–उत्तर रेखा के बीच दो मत्स्य रचें — अर्थात् दो प्रतिच्छेदी चापों का वह ज्यामितीय युग्म जिससे अभीष्ट बिन्दु या लम्ब-दिशा शुद्ध निकलती है। यह पद चन्द्र-कला-आकृति के रेखा-विधान का मध्य-चरण है: माप रखकर मत्स्य से सन्धि-बिन्दु तैयार करना।

English rendering Lay the bright (illuminated) portion inward by means of the hypotenuse (karṇa), taking it from the sum of those disks. Between the tip of the bright portion and the south–north line, construct the two matsya — the pair of intersecting arcs used to fix the required point of the figure.

गणित / The Mathematics रचना-विधि (ज्यामितीय):
1. शुक्ल-माप को कर्ण-रेखा पर अन्तर्मुख रखें; आधार-माप बिम्ब-योग (दोनों बिम्ब/वृत्त-सम्बन्धी योग) से आता है।
2. शुक्लाग्र और याम्य–उत्तर रेखा के बीच दो मत्स्य साधें: प्रत्येक मत्स्य = दो चापों का प्रतिच्छेद-युग्म (शास्त्रीय भारतीय रेखागणित), जिससे मध्य-सूत्र/सन्धि-बिन्दु मिलता है।
मात्राएँ इसी अध्याय के पूर्व पदों से आई हुई शुक्ल-राशि और बिम्ब-माप पर निर्भर हैं; इस श्लोक में नया संख्या-स्थिरांक नहीं दिया गया।

उदाहरण (worked example) मान लें पूर्व-साधित शुक्ल-माप = 12 अङ्गुल, दोनों बिम्बों का योग-सन्दर्भ कर्ण पर चिह्नित है, और याम्य–उत्तर व्यास पहले खींचा जा चुका है। कर्ण पर केन्द्र से अन्तर्मुख 12 अङ्गुल पर शुक्लाग्र P अंकित करें। P और याम्य–उत्तर रेखा के उपयुक्त बिन्दुओं से समान त्रिज्या के दो–दो चाप काटकर दो मत्स्य बनाएँ; उनके प्रतिच्छेद मध्य-सूत्र के लिए आधार-बिन्दु देते हैं (अगला पद उसी सन्धि पर धनुः खींचता है)। इकाइयाँ रचना-पटल की अङ्गुल-परम्परा में; खगोलीय डिग्री में बदलना अलग रूपान्तर है।

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10.13
तन्मध्यसूत्रसंयोगाद्बिन्दुत्रिस्पृग्लिखेद्धनुः ।
प्राग्बिम्बं यादृगेव स्यात्तादृक्तत्र दिने शशी ।।
tanmadhyasūtrasaṃyogādbindutrispṛglikheddhanuḥ ।
prāgbimbaṃ yādṛgeva syāttādṛktatra dine śaśī ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-मध्य-सूत्र-संयोगात् = उन (मत्स्यों) के मध्य-सूत्र के संयोग से; बिन्दु = सन्धि/चिह्न-बिन्दु; त्रिस्पृक् = तीन बिन्दुओं को स्पर्श करने वाला (वृत्त/चाप); लिखेत् = खींचे; धनुः = धनुषाकार चाप; प्राग्-बिम्बम् = पूर्व-रचित/पूर्व-दिशा का बिम्ब; यादृक् एव स्यात् = जैसा ही हो; तादृक् = वैसा ही; तत्र दिने = उस दिन; शशी = चन्द्रमा।

हिन्दी भावार्थ मत्स्य-रचना से मिले मध्य-सूत्र के संयोग-बिन्दु पर, तीन बिन्दुओं को छूते हुए चाप — त्रिस्पृक् धनुः — खींचना चाहिए। जितनी आकृति उस (पूर्व) बिम्ब की बनती है, उसी रूप का चन्द्र उस दिन दृष्टिगोचर होता है। यहाँ शास्त्र रेखा को आकाश-दर्शन से जोड़ता है: पटल पर साधित चाप ही उस तिथि की चन्द्र-कला का प्रतिरूप है।

English rendering From the junction of the mid-line obtained through that construction, mark the point and draw the thrice-touching bow-arc (the arc of a circle determined by three points). Whatever form that disk takes, such is the Moon on that day.

गणित / The Mathematics चाप-निर्धारण:
- तीन ज्ञात बिन्दुओं (मत्स्य/मध्य-सूत्र से प्राप्त सन्धि + पूर्व-स्थापित परिधि-बिन्दु) से एकमात्र वृत्त निर्धारित होता है; उसका अभीष्ट चाप = धनुः।
- दृश्य नियम (शास्त्र-कथन):
आकृति(शशी; दिन d) ≅ आकृति(प्राग्-बिम्ब)
अर्थात् उस दिन की कला-आकृति = रचना से प्राप्त बिम्ब-रूप। संख्यात्मक स्थिरांक नहीं; ज्यामिति + दर्शन-समन्वय।

उदाहरण (worked example) मान लें तीन बिन्दु A (शुक्लाग्र-सन्धि), B व C (बिम्ब-परिधि पर मत्स्य-मध्य-सूत्र से प्राप्त) पटल पर अंकित हैं। A, B, C से गुजरने वाले वृत्त की त्रिज्या R और केन्द्र O प्रतिच्छेद-लम्बों से मिलते हैं; चाप BAC ही धनुः है। यदि शुक्ल लगभग अर्ध-कला हो तो धनुः लगभग अर्धवृत्त-सदृश दीर्घ चाप होगा; यदि शुक्ल क्षीण हो तो चाप पतला/तीक्ष्ण शृङ्ग की ओर झुकेगा — यही “यादृक्… तादृक्… शशी” का रेखा-अर्थ है।

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सुधार · correction (2026-10-07) “तन्मद्ख्य” → “तन्मध्य” (टिप्पण भी तत्-मध्य पढ़ता है); पहले अर्ध के बाद का “।।” → “।”। Correction: spelling, punctuation.

10.14
कोट्या दिक्साधनात्तिर्यक्सूत्रान्ते शृङ्गं उन्नतम् ।
दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य साकृतिः ।।
koṭyā diksādhanāttiryaksūtrānte śṛṅgaṃ unnatam ।
darśayedunnatāṃ koṭiṃ kṛtvā candrasya sākṛtiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कोट्या = कोटि (लम्ब-अंश/उन्नतांश-सम्बन्धी भुजा) से; दिक्-साधनात् = दिशा-साधन के पश्चात्; तिर्यक्-सूत्र-अन्ते = तिर्यक/आड़ा सूत्र के अन्त पर; शृङ्गम् = चन्द्र-शृङ्ग (कला का नोक); उन्नतम् = ऊँचा/उन्नत; दर्शयेत् = दिखाए; उन्नतां कोटिं कृत्वा = उन्नत कोटि बनाकर; चन्द्रस्य = चन्द्र की; स-आकृतिः = वह आकृति/रूप।

हिन्दी भावार्थ दिशा-साधन से प्राप्त कोटि के द्वारा, तिर्यक सूत्र के अन्त में उन्नत शृङ्ग स्थापित करना चाहिए। उन्नत कोटि रचकर जो रूप बनता है, वही चन्द्र की आकृति कही गई है। यह पद केवल समतल चाप नहीं छोड़ता — शृङ्ग की ऊँचाई (उन्नति) को कोटि से जोड़कर कला को त्री-आयामी दृष्टि के निकट लाता है: नोक कहाँ उठती है, यह कोटि-तिर्यक सन्धि बताती है।

English rendering After the direction has been fixed by means of the koti (the perpendicular component), place the elevated horn at the end of the transverse line. Having constructed that elevated koti, one exhibits the form of the Moon.

गणित / The Mathematics शृङ्ग-उन्नति रचना:
- दिक् पहले साधित; उसके साथ कोटि (लम्ब-घटक) से उन्नति।
- तिर्यक्-सूत्र के अन्त-बिन्दु पर शृङ्ग उन्नतम् अंकित।
- प्रतीकात्मक सम्बन्ध (रचना-भाषा में):
शृङ्ग-स्थान = अन्तः (तिर्यक्-सूत्र; कोटि_उन्नत, दिक्)
आकृति(चन्द्र) = आकृति(उन्नत-कोटि + पूर्व धनुः/बिम्ब)
श्लोक स्वयं कोटि का संख्या-मान नहीं देता; मान पूर्व-साधित कोटि-फल से आता है।

उदाहरण (worked example) मान लें दिशा-साधन के बाद कोटि = 5 अङ्गुल (उन्नत), तिर्यक्-सूत्र क्षैतिज आधार पर 8 अङ्गुल खींचा गया। सूत्र के बाह्य सिरे से लम्बवत 5 अङ्गुल ऊपर शृङ्ग-बिन्दु S अंकित करें; S को पूर्व-रचित धनुः से मिलाकर कला का नोक-रूप बनता है। यदि कोटि ≈ 0, शृङ्ग आधार-रेखा के निकट (न्यून उन्नति); कोटि बढ़े तो नोक ऊपर उठती हुई दिखे — यही “उन्नतां कोटिं कृत्वा… साकृतिः” है। अङ्गुल-पटल की इकाई; खगोलीय कोण में रूपान्तर अलग चरण।

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सुधार · correction (2026-10-07) “तिर्यक्षूत्रान्ते” → “तिर्यक्सूत्रान्ते”। Correction: spelling.

10.15
कृष्णे षड्भयुतं सूर्यं विशोध्येन्दोस्तथासितम् ।
दद्याद्वामं भुजं तत्र पश्चिमं मण्डलं विधोः ।।
kṛṣṇe ṣaḍbhayutaṃ sūryaṃ viśodhyendostathāsitam ।
dadyādvāmaṃ bhujaṃ tatra paścimaṃ maṇḍalaṃ vidhoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृष्णे = कृष्ण-पक्ष में; षड्भ-युतम् = छह भाव (६ राशि = १८०°) से युत; सूर्यम् = सूर्य; विशोध्य = घटाकर; इन्दोः = चन्द्र से; तथा = उसी प्रकार; असितम् = कृष्ण/अन्धकार-अंश; दद्यात् = दे/स्थापित करे; वामं भुजम् = वाम (बायाँ) भुज; तत्र = वहाँ; पश्चिमं मण्डलम् = पश्चिम वृत्त/बिम्ब; विधोः = चन्द्र का।

हिन्दी भावार्थ कृष्ण-पक्ष में सूर्य में छह राशि जोड़कर उस योग को चन्द्र से घटाने पर असित (अन्धकार-अंश) उसी विधि से मिलता है जैसे शुक्ल-पक्ष में शुक्ल मिलता था। वहाँ वाम भुज देना चाहिए — और वही चन्द्र का पश्चिम मण्डल है। शुक्ल में पूर्व-बिम्ब की बात थी; कृष्ण में पश्चिम मण्डल और वाम भुज से अन्धकार-कला की रचना पूरी होती है। षड्भ यहाँ दिशा-पलट का स्पष्ट गणित है: आधा वृत्त जोड़कर पक्ष-परिवर्तन।

English rendering In the dark fortnight, add six signs to the Sun and subtract that from the Moon — thus the dark portion (asita) is obtained in the same manner. Apply the left (vāma) bhuja there; that is the western disk of the Moon.

गणित / The Mathematics पक्ष-भेद से असित-माप (राशि-गणित):
- षड्भ = ६ राशि = 180°
- कृष्ण-पक्ष:
असित = λ_चन्द्र − (λ_सूर्य + 180°)
(मानों को वृत्त पर समान रूप से समायोजित करें: परिणाम को 0°–360° में लाना शास्त्र-परम्परा के भुज/कोटि-नियम से।)
- शुक्ल-पक्ष का युग्म-सम्बन्ध (सन्दर्भ): शुक्ल ∝ λ_चन्द्र − λ_सूर्य (पूर्व पदों की परम्परा); कृष्ण में +६ राशि से असित उसी ढाँचे में आता है।
- रचना: वाम भुज लगाएँ → पश्चिम मण्डल (विधु) — शुक्ल-पक्ष के प्राग्-बिम्ब का पक्ष-विपरीत।

उदाहरण (worked example) मान लें किसी क्षण (मध्यम/स्फुट दीर्घांश, घोषित संधि पर) λ_सूर्य = 40°, λ_चन्द्र = 250°।
λ_सूर्य + 180° = 220°।
असित-सन्दर्भ = 250° − 220° = 30°।
रचना-पटल पर इस 30° (या उससे व्युत्पन्न अङ्गुल-माप) को वाम भुज की ओर पश्चिम मण्डल में अन्तर्मुख रखें — कृष्ण-कला का अन्धकार-अंश। यदि λ_चन्द्र − (λ_सूर्य+180°) ऋणात्मक आए तो 360° जोड़कर धनात्मक भुज लें। दीर्घांश-स्रोत: सिद्धान्त-मध्यम या स्फुट; आयनांश/युग-दिन-गणना अलग संधि हैं और इस श्लोक के असित-सूत्र में अन्दर नहीं घुसतीं।

अध्यायः 11

पाताधिकारः

The Pātas of Sun and Moon
23 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

पाताधिकार ग्यारहवें अध्याय का वह द्वार है जहाँ सूर्य और चन्द्र की क्रान्ति (declination) बराबर हो जाने की दो गम्भीर स्थितियाँ — व्यतीपात और वैधृत — परिभाषित होती हैं। जब दोनों एक ही अयन में हों, उनके मण्डल-योग पर क्रान्तियाँ तुल्य हों, तो वैधृत; जब विपरीत अयनों में हों, क्रान्ति-लिप्ताएँ समान हों और दोनों का योग भगणार्ध (१८०°) हो, तो व्यतीपात — नाम अलग, गणितीय सार एक: दृक्-तुल्य क्रान्ति। शास्त्र इन पातों को प्रवह-वायु से प्रेरित “दृक्क्रोध-वह्नि” और लोक-क्षय की भाषा में भी बाँधता है; इस पुस्तक में हम उस भाषिक आवेश को व्याख्या-स्तर पर रखेंगे और गणना-स्तर पर केवल कोण, अयन-चिह्न और क्रान्ति-समानता का शुद्ध ज्यामितीय ढाँचा खोलेंगे। तेईस श्लोकों में परिभाषा, पहचान, दृक्-साधित अंश, और पात की पुनरावृत्ति का क्रम एक ही सूत्र-शृंखला में जुड़ता है — आकाशीय सममिति का वह क्षण जब दो पिण्डों की छाया-रेखाएँ एक नियम से मिलती हैं।

For the English reader:

Chapter 11 of the Sūrya-Siddhānta is the short, sharp treatise on the pātas: the two named configurations—Vyatīpāta and Vaidhṛta—in which the Sun and Moon share equal declinations under opposite or same solstitial half-years, and under complementary or full-circle sums of longitude. The verses open with geometry (ayana, krānti, half-circle sum) and then shift into a fierce personification of the pāta as a dark, red-eyed destroyer—language this edition treats as interpretive tradition, not as a second mathematical theorem. What the chapter actually hands the computer is a clean predicate: when are the two luminaries “sight-equal” in latitude from the equator, and how is that equality timed from their true longitudes and the obliquity of the ecliptic. Twenty-three verses braid definition, recognition criteria, and the dṛk-based auxiliary arcs into one compact module—celestial coincidence stated first as measure, then as mythic name.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। डिकोड के लिए शुद्ध SS-स्फुट (अध्याय २) से सूर्य-चन्द्र के सत्य देशान्तर, निश्चित अयनांश/तिर्यक् (ε), अयन-चिह्न, और δ☉−δ☽ = 0 तथा λ-योग की शर्तों पर exact-equality (`==`) वाले फिक्स्चर-परीक्षण चाहिए — न कि सहिष्णुता-पट्टी।

क्रान्तिवृत्तचन्द्र-पथ (विक्षेप 4°30′)राहु ☊केतु ☋पात-गति: −2,32,238 भगण/महायुग (वक्री) — nodes regress ≈ 18.6-वर्ष चक्रव्यतीपात/वैधृति: क्रान्ति-साम्य के क्षण (|δ☉| = |δ☾|, विपरीत/समान अयन)
पात — the dread-points chapter (SS ch.11): the Moon's path is inclined 4°30′ (SS value) to the ecliptic, crossing it at the nodes Rāhu (☊, ascending) and Ketu (☋, descending). When Sun and Moon sit symmetric about a solstitial axis with equal-and-opposite declinations, the text names the moments vyatīpāta and vaidhṛta.
11.1
एकायनगतौ स्यातां सूर्यचन्द्रमसौ यदा ।
तद्युतौ मण्डले क्रान्त्योस्तुल्यत्वे वैधृताभिधः ।।
ekāyanagatau syātāṃ sūryacandramasau yadā ।
tadyutau maṇḍale krāntyostulyatve vaidhṛtābhidhaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकायन-गतौ = एक ही अयन में स्थित; सूर्य-चन्द्रमसौ = सूर्य और चन्द्रमा; तद्-युतौ = उनकी युति/संयोग-अवस्था में; मण्डले = राशि-मण्डल (भचक्र) में; क्रान्त्योः तुल्यत्वे = दोनों की क्रान्तियों (विषुवत्-अयन-झुकाव) के समान होने पर; वैधृत-अभिधः = वैधृत नामक योग कहलाता है।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य और चन्द्रमा एक ही अयन में गतिशील हों, और राशि-मण्डल में उनकी ऐसी युति हो कि दोनों की क्रान्ति समान हो जाए, तब उस अवस्था को वैधृत कहा जाता है। यह केवल साधारण युति नहीं — अयन की समता और क्रान्ति की तुल्यता दोनों शर्तें साथ जुड़नी चाहिए। अध्याय आगे इसी योग-युगल (वैधृत–व्यतीपात) की परिभाषा और गणना खोलता है।

English rendering When the Sun and Moon lie in the same ayan, and in the circle their conjunction is such that their declinations become equal, that condition is named Vaidhṛta. The verse fixes two co-requisites: shared ayan and equal krānti.

गणित / The Mathematics Equality condition (definitional): δ☉ = δ☽, with both luminaries in the same ayan (both northward or both southward of the equator in the solstitial sense of ayan-gati). The “yuti in the maṇḍala” for Vaidhṛta is the full-circle meeting — conventionally λ☉ + λ☽ = 360° (0°) — paired with that equal-declination constraint. Exact longitude sum is sharpened in the next verse for the sister yoga; here the book names the equal-krānti, same-ayan case.

उदाहरण (worked example) Convention: tropical-style declination from true longitude and obliquity ε (SS uses its own ε from the obliquity chapter; for a worked check one may take ε ≈ 24° as the classical mean if the local edition so tables). Suppose true λ☉ = 10°, λ☽ = 350° so λ☉ + λ☽ = 360°, both in the same ayan-half, and computed δ☉ ≈ δ☽ ≈ +4°. Then the Vaidhṛta name of 11.01 applies. If the declinations differ by even a few liptā, the yoga is not sealed by this verse’s equality test.

हमारा डिकोड (Our Decode) वैधृत–व्यतीपात both need sphuṭa longitudes first — mean positions are not enough for real krānti. `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` (Chapter-2 manda chain for Sun/Moon) is the pure SS front-end before any δ comparison; the instrument stays a synthesis lab until measured true-position layers are sealed by the oracle’s `==` fixtures.

11.2
विपरीतायनगतौ चन्द्रार्कौ क्रान्तिलिप्तिका ।
समास्तदा व्यतीपातो भगणार्धे तयोर्युतौ ।।
viparītāyanagatau candrārkau krāntiliptikā ।
samāstadā vyatīpāto bhagaṇārdhe tayoryutau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विपरीत-अयन-गतौ = विपरीत अयनों में स्थित; चन्द्र-अर्कौ = चन्द्रमा और सूर्य; क्रान्ति-लिप्तिकाः समाः = क्रान्ति की कलाएँ समान; तदा = तब; व्यतीपातः = व्यतीपात; भगण-अर्धे = भगण के आधे पर (180°); तयोः युतौ = दोनों की युति/योग-अवस्था में।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य और चन्द्रमा विपरीत अयनों में हों और उनकी क्रान्ति-कलाएँ बराबर हों, तथा दोनों की युति भगणार्ध — अर्थात् अर्ध-चक्र, 180° — पर बैठे, तब वह योग व्यतीपात कहलाता है। वैधृत जहाँ एकायन और पूर्ण-मण्डल युति की ओर झुकता है, व्यतीपात विपरीत अयन और अर्ध-भगण की शर्त पर खड़ा है। दोनों में क्रान्ति-साम्य मूल परीक्षा है।

English rendering When Moon and Sun are in opposite ayans, their declination-minutes are equal, and their conjunction (sum-yuti) stands at half a revolution, that is Vyatīpāta. The half-bhagaṇa fixes the 180° sum against Vaidhṛta’s full-circle meeting.

गणित / The Mathematics Vyatīpāta conditions: (1) opposite ayan-gati of Sun and Moon; (2) |δ☉| and |δ☽| equal in liptā (arcminutes of declination); (3) yuti at bhagaṇārdha ⇒ λ☉ + λ☽ = 180° (half of 360°). Together with 11.01: Vaidhṛta ↔ same ayan + equal δ + (full-circle sum); Vyatīpāta ↔ opposite ayan + equal δ + (half-circle sum).

उदाहरण (worked example) Let true λ☉ = 40°, λ☽ = 140° ⇒ sum = 180°. If they lie in opposite ayans and both have δ = +8° 12′ (same absolute declination in the verse’s “समाः लिप्तिका” sense as tabulated), the configuration is Vyatīpāta by 11.02. A 5′ residual between the two declinations fails the equality test even if the longitude sum is exact.

हमारा डिकोड (Our Decode) Longitude sums and δ-equality are only as good as the sphuṭa and day-count underneath. SS-canon civil days 1,577,917,828 (math-core) vs Āryabhaṭa 1,577,917,500 (vedic-ghadi) shift mean rates; the 328-day gap hits synodic geometry and thus any yoga timed from true longitudes. We treat the canon choice as declared convention, never as invisible default.

11.3
तुल्यांशुजालसम्पर्कात्तयोस्तु प्रवहाहतः ।
तद्दृक्क्रोधभवो वह्निर्लोकाभावाय जायते ।।
tulyāṃśujālasamparkāttayostu pravahāhataḥ ।
taddṛkkrodhabhavo vahnirlokābhāvāya jāyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुल्य-अंशु-जाल-सम्पर्कात् = समान अंशों के जाल (किरण/संपर्क) से; तयोः = उन दोनों का; तु = ही; प्रवह-आहतः = प्रवह वायु से आहत; तत्-दृक्-क्रोध-भवः = उस दृष्टि-क्रोध से उत्पन्न; वह्निः = अग्नि; लोक-अभावाय = लोकों के अभाव/नाश के लिए; जायते = उत्पन्न होती है।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों की समान-अंश स्थिति का संपर्क बनता है, प्रवह-वायु से आहत होकर वह संपर्क एक प्रकार के “दृष्टि-क्रोध” से अग्नि-सा फल उत्पन्न करता है — शास्त्र इसे लोकों के अभाव की ओर संकेत मानता है। यह पद खगोलीय शर्त को काव्यात्मक-दार्शनिक भाषा में बाँधता है: समान क्रान्ति/अंश का मिलन केवल ज्यामितीय घटना नहीं, ग्रन्थ की दृष्टि में तीव्र पात-योग है। गणित आगे; यहाँ प्रभाव का रूपक है।

English rendering From the contact of their equal-degree “net,” struck by the pravaha wind, a fire born of that visual wrath arises toward the undoing of the worlds. The verse frames the equal-position pāta as cosmically fierce, not as a gentle coincidence.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक/फल-वर्णन। The operational equalities remain those of 11.01–11.02 (equal δ, ayan relation, 180°/360° sums); this verse does not add a new constant or algorithm.

दृष्टान्त (Illustrative Example) समान-अंश संपर्क को यहाँ केवल निर्देशांक-मिलन न समझें; ग्रन्थ उसे प्रवह से आहत एक तीव्र योग के रूप में बाँधता है—दृष्टि-क्रोध से जन्मा वह्नि-रूप रूपक, लोक-अभाव की काव्यात्मक भाषा में। गणित की दृष्टि से यह pahāta / तीव्र पात-योग की दहलीज है: समान क्रान्ति-अंश का मिलन ज्यामितीय शर्त, और “वह्नि” प्रभाव का रूपक—न कि भय-कथन। आगे के अध्याय-सूत्र इसी संपर्क को मापने-योग्य शर्तों में खोलेंगे; यहाँ याद रखने लायक बात एक है—समानता साधारण संयोग नहीं, ग्रन्थ की शब्दावली में उग्र-योग का संकेत। पाठक रूपक को रूपक रखे और संख्या को आगे के गणित-स्थलों पर खोले।

11.4
विनाशयति पातो अस्मिन्लोकानां असकृद्यतः ।
व्यतीपातः प्रसिद्धो अयं सञ्ज्ञाभेदेन वैधृतः ।।
vināśayati pāto asminlokānāṃ asakṛdyataḥ ।
vyatīpātaḥ prasiddho ayaṃ sañjñābhedena vaidhṛtaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) विनाशयति = नष्ट करता है; पातः = यह पात (पात-योग); अस्मिन् = इसमें/इस अवस्था में; लोकानाम् = लोकों का; असकृत् = बार-बार; यतः = क्योंकि; व्यतीपातः = व्यतीपात; प्रसिद्धः = प्रसिद्ध; अयम् = यह; सञ्ज्ञा-भेदेन = नाम-भेद से; वैधृतः = वैधृत (भी कहा जाता है)।

हिन्दी भावार्थ क्योंकि यह पात लोकों का बार-बार विनाश करता है, इसलिए यह व्यतीपात नाम से प्रसिद्ध है; और सञ्ज्ञा-भेद से वही वैधृत भी कहलाता है। पद दोनों नामों को एक ही “पात” परिवार में बाँधता है — शर्तों का अन्तर 11.01–11.02 में है, प्रभाव-गम्भीरता यहाँ एक स्वर में कही गई है। पाठ में “पातो ऽस्मिन्” / “प्रसिद्धो ऽयम्” जैसे सन्धि-बिन्दु critical apparatus के सामान्य रूप हैं।

English rendering Because this pāta repeatedly destroys the worlds, it is famous as Vyatīpāta; by a difference of name it is also Vaidhṛta. The two labels share one destructive pāta-class; their geometric split was already given above.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — नामकरण/फल-संवाद। Computationally one still branches on same vs opposite ayan and on 360° vs 180° longitude sum; this verse only unifies the nomenclature under “pāta.”

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए कि आकाश में एक ही “सन्धि-बिन्दु” — राहु-केतु की रेखा पर सूर्य-चन्द्र का विशेष मिलान — दो नामों से बुलाया जा रहा हो, जैसे एक ही नदी घाट “पूर्वी घाट” और “उत्तरी घाट” दोनों कहलाती है क्योंकि किनारे अलग-अलग दिखते हैं। इसी तरह व्यतीपात और वैधृत एक ही पात-परिवार के दो सञ्ज्ञा-द्वार हैं; शर्तें अध्याय के आरम्भिक सूत्रों (11.01–11.02) में अलग-अलग बाँधी गई हैं, किन्तु यहाँ शास्त्र उन्हें एक प्रभाव-स्वर में जोड़ देता है। बाद के मुहूर्त-ग्रन्थों में भी ये दोनों योग “पात-योग” की सूची में साथ-साथ चलते हैं — नाम बदला, ज्यामितीय मूल नहीं। पाठक यहाँ याद रखे: सञ्ज्ञा-भेद गणना का शत्रु नहीं, द्वार-पट्टिका है।

11.5
स कृष्णो दारुणवपुर्लोहिताक्षो महोदरः ।
सर्वानिष्टकरो रौद्रो भूयो भूयः प्रजायते ।।
sa kṛṣṇo dāruṇavapurlohitākṣo mahodaraḥ ।
sarvāniṣṭakaro raudro bhūyo bhūyaḥ prajāyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सः = वह (पात); कृष्णः = काला/अन्धकारमय; दारुण-वपुः = भयंकर शरीर वाला; लोहित-अक्षः = रक्त-नेत्र; महोदरः = विशाल उदर वाला; सर्व-अनिष्ट-करः = सब अनिष्ट करने वाला; रौद्रः = रौद्र/उग्र; भूयः भूयः = बार-बार; प्रजायते = उत्पन्न होता है।

हिन्दी भावार्थ उस पात का मानवीकरण — कृष्ण, दारुण शरीर, लाल नेत्र, महोदर — सर्वानिष्टकारी और रौद्र कहा गया है, और वह बार-बार जन्म लेता है। यह ज्योतिषीय-पुराणिक चित्रण है: योग की पुनरावृत्ति को “भूयो भूयः प्रजायते” से बाँधा गया। गणना की कुंजी यहाँ नहीं; आकृति और प्रभाव का वर्णन है।

English rendering That pāta is dark, of terrible body, red-eyed and great-bellied — all-harming, fierce — and it arises again and again. A personified image of a recurring celestial condition, not a new equation.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति/रूपक-वर्णन। Insight: “arises again and again” matches the periodic return of equal-δ configurations as the luminaries’ true longitudes sweep the circle — the myth restates periodicity without giving the period.

दृष्टान्त (Illustrative Example) यह श्लोक संख्या नहीं गिनता — वह योग की पुनरावृत्ति को एक “आकृति” में बाँधता है, जैसे मानचित्र पर उसी चौराहे को बार-बार लाल रंग से घेरा जाए। जब सूर्य, चन्द्र और पात की रेखाएँ फिर से वही ज्यामितीय दशा लेती हैं, शास्त्र कहता है कि वही “रौद्र” रूप भूयो भूयः प्रकट होता है — कोई नया ग्रह नहीं, वही कोण-सन्धि फिर से सक्रिय। पाठक इसे राक्षस-कथा की तरह न पढ़े, बल्कि आवर्ती खगोलीय विन्यास का काव्य-चित्र समझे: गणना अध्याय के अन्य श्लोकों में है; यहाँ स्मृति के लिए चेहरा बनाया गया है। “महोदर” और “लोहिताक्ष” जैसे शब्द प्रभाव की गम्भीरता के संकेत हैं, न कि कोई अलग खगोलीय पिण्ड।

11.6
भास्करेन्द्वोर्भचक्रान्तश्चक्रार्धावधिसंस्थयोः ।
दृक्तुल्यसाधितांशादियुक्तयोः स्वावपक्रमौ ।।
bhāskarendvorbhacakrāntaścakrārdhāvadhisaṃsthayoḥ ।
dṛktulyasādhitāṃśādiyuktayoḥ svāvapakramau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भास्कर-इन्द्वोः = सूर्य और चन्द्रमा के; भ-चक्र-अन्तः = भचक्र के अन्त तक; चक्र-अर्ध-अवधि-संस्थयोः = चक्रार्ध की सीमा तक स्थित दोनों के; दृक्-तुल्य-साधित-अंश-आदि-युक्तयोः = दृष्टि-तुल्य साधित अंश आदि से युक्त; स्वौ अपक्रमौ = उनके अपने-अपने अपक्रम (क्रान्ति)।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य और चन्द्रमा भचक्र के अन्त (पूर्ण चक्र, 360°) अथवा चक्रार्ध (180°) की सीमाओं पर स्थित हों — अर्थात् वैधृत/व्यतीपात की योग-रेखाओं पर — तब उनके दृष्टि-तुल्य (स्पष्ट/साधित) अंश आदि से उनके अपने अपक्रम (क्रान्ति) निकालने चाहिए। पद गणना का द्वार खोलता है: पहले स्पष्ट स्थिति, फिर अपक्रम; केवल मध्यमांश से पात नहीं जाँचा जाता।

English rendering For the Sun and Moon standing at the circle’s end or at the half-circle limit, obtain each luminary’s own declination (apakrama) from the degrees and so on secured by equal, sight-true computation. True positions feed the δ test.

गणित / The Mathematics Positions under test: λ☉ + λ☽ = 360° (bhacakrānta / full) or 180° (cakrārdha). Then compute each apakrama (declination) from true (dṛk-tulya sādhita) longitude, classically
δ = arcsin( sin ε · sin λ′ )
with λ′ the relevant true ecliptic longitude and ε the siddhāntic obliquity — or the SS tabular equivalent of that sine relation. “अंशादि” points to the full sexagesimal stack (aṃśa, kalā, …) used in the krānti tables, not mean longitude alone.

उदाहरण (worked example) Input convention: true λ☉ = 70°, true λ☽ = 110°, sum = 180° (Vyatīpāta line). With ε = 24°,
sin δ☉ = sin 24° · sin 70° ≈ 0.4067 × 0.9397 ≈ 0.382 → δ☉ ≈ 22.4°,
sin δ☽ = sin 24° · sin 110° = sin 24° · sin 70° → δ☽ ≈ 22.4° same absolute magnitude. Equality of apakrama holds; ayan-opposition still required by 11.02 before naming the yoga.

हमारा डिकोड (Our Decode) “दृक्तुल्यसाधित” is exactly why the sealed Chapter-2 sphuṭa chain exists: half-manda → full-manda for Sun/Moon (manda only). We do not smuggle Western true-anomaly theorems into that path; cross-checks against Swiss/JPL remain instruments, never the proof-authority. Oracle discipline: pin δ or yoga flags with exact fixtures, not ± bands that once hid a real −1 error.

11.7
अथौजपदगस्येन्दोः क्रान्तिर्विक्षेपसंस्कृता ।
यदि स्यादधिका भानोः क्रान्तेः पातो गतस्तदा ।।
athaujapadagasyendoḥ krāntirvikṣepasaṃskṛtā ।
yadi syādadhikā bhānoḥ krānteḥ pāto gatastadā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब; ओज-पद-गस्य = विषम पद में गए हुए; इन्दोः = चन्द्रमा की; क्रान्तिः = क्रान्ति; विक्षेप-संस्कृता = विक्षेप (चन्द्र-अक्षांश/अक्षविचलन) से संस्कृत; यदि स्यात् अधिका = यदि अधिक हो; भानोः क्रान्तेः = सूर्य की क्रान्ति से; पातः गतः = पात बीत चुका; तदा = तब।

हिन्दी भावार्थ अब विधि: विषम पद (1, 3, …) में स्थित चन्द्रमा की क्रान्ति को विक्षेप से संस्कारित करो। यदि वह संस्कृत क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो, तो पात गत — बीत चुका — मानना चाहिए। यह “बीता या आने वाला” का निर्णय-सूत्र है; केवल योग-रेखा की उपस्थिति नहीं, काल-दिशा भी शास्त्र यहाँ बाँधता है।

English rendering Next: for the Moon in an odd pada, take the declination corrected by her latitude (vikṣepa). If that exceeds the Sun’s declination, the pāta is past. Odd-pada branch of the past/future test.

गणित / The Mathematics Let δ☽_corr = krānti of Moon refined by vikṣepa (lunar latitude β; sense: effective declination of the Moon’s true body, not the ecliptic point alone). Let δ☉ = Sun’s declination.
For Moon in odd pada (ojapada):
if δ☽_corr > δ☉ ⇒ pāta = gata (past);
(the complementary case continues in 11.08).
Pada here is the quarter-context of the Moon’s position on the relevant arc used by the pāta algorithm (standard SS usage in this chapter), not a civil time unit.

उदाहरण (worked example) Convention: Moon in pada 1 (odd); δ☉ = +10° 0′; Moon’s ecliptic krānti +9° 20′ with vikṣepa-correction raising the effective value to δ☽_corr = +10° 40′. Since 10° 40′ > 10° 0′, by 11.07 the pāta is gata. If the correction had left 9° 40′, the next verse’s “future” branch would apply.

हमारा डिकोड (Our Decode) Past/future of a yoga is a pure inequality on computed angles — ideal for kaal-verification-oracle style exact checks. We pin the comparison operands (which δ, which correction) in fixtures; tolerance theater is forbidden. Sphuṭa + latitude layer must be declared before the inequality is trusted.

11.8
ऊना चेत्स्यात्तदा भावी वामं युग्मपदस्य च ।
पदान्यत्वं विधोः क्रान्तिविक्षेपाच्चेद्विशुध्यति ।।
ūnā cetsyāttadā bhāvī vāmaṃ yugmapadasya ca ।
padānyatvaṃ vidhoḥ krāntivikṣepāccedviśudhyati ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊना चेत् स्यात् = यदि न्यून हो; तदा भावी = तब (पात) भावी/आने वाला; वामम् = उलटा/विपरीत नियम; युग्म-पदस्य च = और युग्म (सम) पद का; पद-अन्यत्वम् = पद का अन्यत्व/भिन्नता; विधोः = चन्द्रमा का; क्रान्ति-विक्षेपात् = क्रान्ति और विक्षेप से; चेत् विशुध्यति = यदि शुद्ध हो जाए।

हिन्दी भावार्थ यदि (विषम पद में) चन्द्र की विक्षेप-संस्कृत क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से कम हो, तो पात भावी है। सम पद (युग्मपद) में नियम उलटा — वाम — लागू होता है। और जब पद-भेद के साथ क्रान्ति-विक्षेप से चन्द्र-सम्बन्धी राशि शुद्ध/निर्णीत हो जाती है, तब दिशा-निर्णय स्पष्ट माना जाता है। तीन पदों का जोड़: विषम–अधिक = गत; विषम–ऊन = भावी; सम = विपरीत; शुद्ध संस्कार = निर्णायक स्पष्टता।

English rendering If (in the odd-pada case) the Moon’s latitude-corrected declination is less than the Sun’s, the pāta is future. For even pada the rule is reversed. When, through pada-difference and the krānti–vikṣepa refinement, the Moon’s side becomes clear (viśuddha), the past/future call is settled.

गणित / The Mathematics Completing 11.07–11.08 as one decision table:
• Odd pada: δ☽_corr > δ☉ → gata; δ☽_corr < δ☉ → bhāvī.
• Even (yugma) pada: reverse the two inequalities (vāmam).
• Equality δ☽_corr = δ☉ is the on-yoga instant (the pāta “now”); the verse’s ऊना/अधिका language brackets that knife-edge.
“पदान्यत्वं … विशुध्यति” marks that switching the pada class (and applying vikṣepa to krānti) is what purifies the criterion — i.e., do not mix odd-rule with even position.

उदाहरण (worked example) Moon in pada 2 (even); δ☉ = +12° 0′; δ☽_corr = +12° 30′. Odd-rule would say “gata” (greater), but even-pada reverses ⇒ bhāvī. Same numbers in pada 3 (odd) would read gata. Input convention: both declinations from the same true-position and ε convention as in 11.06–11.07; never mix SS sphuṭa λ with a foreign δ table without declaring the hybrid.

हमारा डिकोड (Our Decode) This is pure algorithm hygiene — branch on pada parity, compare two angles, no fate claim. It matches our honesty discipline: name the convention (which sphuṭa, which ε, SS day-count if means feed the true layer), then exact-compare. The engines decode the procedure; they do not promote a mean-longitude lab into a production true-sky oracle without a measured calculation layer sealed on pinned fixtures.

11.9
क्रान्त्योर्ज्ये त्रिज्ययाभ्यस्ते परक्रान्तिज्ययोद्धृते ।
तच्चापान्तरं अर्धं वा योज्यं भाविनि शीतगौ ।।
krāntyorjye trijyayābhyaste parakrāntijyayoddhṛte ।
taccāpāntaraṃ ardhaṃ vā yojyaṃ bhāvini śītagau ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्त्योः = सूर्य-चन्द्र की दोनों क्रान्तियाँ; ज्ये = ज्याएँ (Rsine); त्रिज्या = त्रिज्या-मान (R); अभ्यस्ते = गुणित; परक्रान्तिज्ययोः = परस्पर/दूसरी क्रान्ति-ज्या से; उद्धृते = भागित; तत्-चापान्तरम् = उन चापों का अन्तर; अर्धम् = आधा; योज्यम् = जोड़ने योग्य; भाविनि = आगामी/अभी न आने पर; शीतगौ = चन्द्रमा पर।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्र की दोनों क्रान्तियों की ज्याएँ लो; प्रत्येक को त्रिज्या से गुणा कर, परस्पर क्रान्ति-ज्या से भाग दो। जो चाप (चाप = arcsin फल) निकलें, उनके अन्तर का आधा भाग — यदि चन्द्र अभी आने वाला (भावी) है — चन्द्र-स्थान पर जोड़ दो। यह एक ही चरण नहीं, समान-क्रान्ति की ओर ले जाने वाला सुधार है: दोनों की क्रान्ति-रेखाओं को एक स्तर पर लाने के लिए चन्द्र-देशान्तर में छोटा-सा घुमाव।

English rendering Take the Rsines of the Sun’s and Moon’s declinations; multiply each by the Radius (trijyā) and divide by the Rsines of the mutual (other) declinations. Half the difference of the resulting arcs is to be applied — added — to the Moon when she is still “to come” (bhāvinī).

गणित / The Mathematics Equal-declination correction step (iterative longitude nudge of the Moon):

  • j₁ = jyā(δ_S), j₂ = jyā(δ_M) (δ = krānti, declination)
  • R = trijyā (SS convention: R = 3438′)
  • u₁ = arcsin( (R · j₁) / jyā(δ_para₁) ), u₂ = arcsin( (R · j₂) / jyā(δ_para₂) )
  • Δλ_M = ½ · (u₁ − u₂) (sign: add when Moon is bhāvinī, per this verse)

Units: arc-minutes (liptā) in the classical table-chain; modern form keeps degrees or radians consistently inside arcsin.

उदाहरण (worked example) Convention: R = 3438′; work in degrees for the inverse. Suppose after first reduction one obtains effective arcs u₁ = 2.40°, u₂ = 1.10° with Moon still “future.” Then

Δλ_M = ½ × (2.40° − 1.10°) = 0.65°

Add 0.65° to the Moon’s longitude and recompute both krāntis (next verses close the loop).

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11.10
शोध्यं चन्द्राद्गते पाते तत्सूर्यगतिताडितम् ।
चन्द्रभुक्त्या हृतं भानौ लिप्तादि शशिवत्फलम् ।।
śodhyaṃ candrādgate pāte tatsūryagatitāḍitam ।
candrabhuktyā hṛtaṃ bhānau liptādi śaśivatphalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शोध्यम् = घटाने योग्य; चन्द्रात् = चन्द्र से; गते पाते = पात बीत जाने पर; तत् = वह (चन्द्र-फल); सूर्यगति = सूर्य की भुक्ति/दैनिक गति; ताडितम् = गुणित; चन्द्रभुक्त्या = चन्द्र-भुक्ति से; हृतम् = भागित; भानौ = सूर्य पर; लिप्तादि = कला आदि में; शशिवत् = चन्द्र के समान; फलम् = फल/सुधार।

हिन्दी भावार्थ यदि पात पहले ही निकल चुका है, तो वही सुधार चन्द्र से घटाओ — जोड़ नहीं। जो चन्द्र-फल मिला, उसे सूर्य-गति से गुणा कर चन्द्र-भुक्ति से भाग दो; जो लिप्ता (कला) आदि निकलें, वे सूर्य पर उसी रीति से लगाओ जैसे चन्द्र पर लगाए थे। गति-अनुपात से सूर्य को चन्द्र के साथ “साथ-साथ” खिसकाया जाता है, ताकि दोनों की क्रान्ति-तुलना एक ही समय-बिन्दु पर बनी रहे।

English rendering When the node-moment is past, subtract that correction from the Moon. Multiply the Moon’s correction by the Sun’s motion and divide by the Moon’s motion; apply the resulting minutes, etc., to the Sun in the same manner as to the Moon.

गणित / The Mathematics Sign rule + coupled solar correction:

  • If pāta is gata (past): λ_M ← λ_M − Δ (Δ from 11.09)
  • If pāta is bhāvin (future): λ_M ← λ_M + Δ (from 11.09)
  • Solar companion: Δ_S = Δ_M × (v_S / v_M)

where v_S = sūrya-gati (mean or true daily motion as used in the local procedure), v_M = candra-bhukti. Result in liptā (′) etc.

उदाहरण (worked example) Inputs (illustrative daily motions, SS-style order of magnitude): v_S = 59′/day, v_M = 790′/day; Δ_M = +39′ (Moon still future → add). Then

Δ_S = 39′ × (59 / 790) ≈ 2.91′

Apply +39′ to the Moon and +2.91′ to the Sun, then recompute declinations.

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11.11
तद्वच्छशाङ्कपातस्य फलं देयं विपर्ययात् ।
कर्मैतदसकृत्तावद्यावद्क्रान्ती समे तयोः ।।
tadvacchaśāṅkapātasya phalaṃ deyaṃ viparyayāt ।
karmaitadasakṛttāvadyāvadkrāntī same tayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्वत् = उसी प्रकार; शशाङ्कपातस्य = चन्द्र-पात (राहु/केतु-सम्बद्ध) का; फलम् = सुधार; देयम् = देना चाहिए; विपर्ययात् = उलटी रीति से (चिह्न/दिशा उलटी); कर्म = यह प्रक्रिया; एतत् = यह; असकृत् = बार-बार; तावत् = तब तक; यावत् = जब तक; क्रान्ती = दोनों क्रान्तियाँ; समे = समान; तयोः = उन दोनों की।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र-पात का फल भी उसी श्रृंखला में दो, पर विपर्यय से — दिशा/चिह्न उलटा रखकर। पूरी कर्म-श्रृंखला एक बार नहीं चलती: असकृत — बार-बार — जब तक सूर्य और चन्द्र की क्रान्तियाँ सम न हो जाएँ। समान-क्रान्ति ही इस अध्याय का लक्ष्य-बिन्दु है; वहीं “पात” की काल-स्थिति पकड़ में आती है।

English rendering Likewise apply the Moon-node’s correction, but in the reverse sense. Repeat the whole operation again and again until the two declinations become equal.

गणित / The Mathematics Iteration to equal krānti:

1. Compute δ_S, δ_M from current λ_S, λ_M (and obliquity/node as needed).
2. Apply 11.09–11.10 corrections (and this verse’s reverse-signed pāta-phala).
3. Recompute; stop when δ_S = δ_M (classical table-equality; modern: exact match within the chosen arc-second unit).

No closed single-step formula — fixed-point iteration on longitude.

उदाहरण (worked example) Suppose after pass 1: δ_S = +12.40°, δ_M = +11.85°. After applying Δ_M, Δ_S and reverse pāta-phala, pass 2 yields δ_S = +12.10°, δ_M = +12.05°; pass 3: both +12.07°. Stop when equal; that simultaneous state defines the pāta condition of 11.12.

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11.12
क्रान्त्योः समत्वे पातो अथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ ।
हीने अर्धरात्रिकाद्यातो भावी तात्कालिके अधिके ।।
krāntyoḥ samatve pāto atha prakṣiptāṃśonite vidhau ।
hīne ardharātrikādyāto bhāvī tātkālike adhike ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्त्योः समत्वे = दोनों क्रान्तियों की समानता पर; पातः = (वह) पात-काल; अथ = तब; प्रक्षिप्तांश-ऊनिते = डाले/जोड़े गए अंश घटाकर; विधौ = चन्द्र में; हीने = कम होने पर; अर्धरात्रिकाद्यातः = अर्धरात्रि-चन्द्र से; भावी = अभी आने वाला; तात्कालिके = तत्कालिक/वर्तमान मान में; अधिके = अधिक होने पर (बीता हुआ)।

हिन्दी भावार्थ जब दोनों क्रान्तियाँ सम हो जाएँ — तभी पात सिद्ध होता है। प्रक्षिप्त अंश (वे सुधार जो चन्द्र पर लगाए गए) घटाकर देखो: यदि वह चन्द्र अर्धरात्रि-चन्द्र से छोटा है, तो पात अभी भावी है; यदि तत्कालिक मान से बड़ा है, तो पात पहले निकल चुका। समान-क्रान्ति से “कब” का निर्णय, और अर्धरात्रि-तुलना से “आगे/पीछे” का निर्णय — दोनों अलग-अलग परतें हैं।

English rendering When the two declinations are equal, the pāta is established. With the projected (applied) degrees removed from the Moon: if she is then less than the midnight Moon, the pāta is still to come; if greater than the contemporaneous value, it is past.

गणित / The Mathematics Decision rules after δ_S = δ_M:

  • Equality condition: δ_S(λ_S, λ_) = δ_M(λ_M*, …) ⇒ pāta-state fixed
  • Let λ_M° = λ_M* − Σ(prakṣiptāṃśa) (undo applied longitude nudges)
  • If λ_M° < λ_M(midnight) ⇒ pāta is bhāvī (future)
  • If λ_M° > λ_M(tātkālika) ⇒ pāta is gata (past)

Convention: “ardharātrika” = positions computed for local midnight of the civil day under use; “tātkālika” = the working contemporaneous longitudes of the iteration.

उदाहरण (worked example) Midnight Moon λ_M(0ʰ) = 142.00°; after iteration λ_M* = 142.55° with total prakṣipta = +0.40° ⇒ λ_M° = 142.15°. Since 142.15° > 142.00°, pāta is past relative to midnight; time offset is then read by 11.13.

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11.13
स्थिरीकृतार्धरात्रेन्द्वोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः ।
षष्टिघ्न्यश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ।।
sthirīkṛtārdharātrendvordvayorvivaraliptikāḥ ।
ṣaṣṭighnyaścandrabhuktyāptāḥ pātakālasya nāḍikāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्थिरीकृत = स्थिर/सिद्ध किए हुए; अर्धरात्र-इन्द्वोः = दोनों अर्धरात्रि-चन्द्रों के; द्वयोः = दोनों के; विवर-लिप्तिकाः = अन्तर की कलाएँ; षष्टि-घ्न्यः = साठ से गुणित; चन्द्रभुक्त्या = चन्द्र-भुक्ति से; आप्ताः = प्राप्त; पातकालस्य = पात-काल की; नाडिकाः = नाड़ियाँ (घटियाँ)।

हिन्दी भावार्थ दोनों स्थिरीकृत अर्धरात्रि-चन्द्र-स्थानों का अन्तर कलाओं में लो; उसे साठ से गुणा कर चन्द्र-भुक्ति से भाग दो — फल पात-काल की नाड़ियाँ हैं। देशान्तर-अन्तर को गति से समय में बदलने का सीधा अनुपात: कोण ÷ (कोण/दिन) = दिन-अंश, और षष्टि-गुणन उसे नाड़ी-माप में लाता है।

English rendering Take the difference, in minutes of arc, of the two fixed midnight Moons; multiply by sixty and divide by the Moon’s motion — the quotient is the nāḍikās of the pāta-time.

गणित / The Mathematics

Δt (nāḍikā) = 60 × |λ_M⁽¹⁾ − λ_M⁽²⁾|_liptā ⁄ v_M

where v_M = candra-bhukti in liptā per day (or consistent ′/day), and the two longitudes are the stabilised midnight pair around the pāta. Sign of (λ* − λ_midnight) places the event after or before midnight.

Metrology link: 1 civil day = 60 nāḍikā (ghaḍī) = 3,600 pala = 216,000 vipala (dossier metrology).

उदाहरण (worked example) Convention: v_M = 790′/day; |Δλ| = 12.0′ between the two fixed midnight Moons.

Δt = 60 × 12.0 / 790 ≈ 0.911 nāḍikā ≈ 0.911 ghaḍī
(≈ 0.911 × 24 min ≈ 21.9 ordinary minutes after/before midnight, per the sign rule of 11.12).

हमारा डिकोड (Our Decode) नाड़ी/घटी वही मेट्रोलॉजी है जिसे vedic-ghadi और MATHEMATICAL-AUDIT §1 में पिन किया गया: 1 दिन = 60 ghaḍī। यहाँ पात-काल को अर्धरात्रि से नाड़ियों में पढ़ना उसी षष्टि-माप का व्यावहारिक उपयोग है — कोण-अन्तर × 60 ÷ भुक्ति। day-count (SS 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500) चुनने से मध्य-देशान्तर थोड़ा खिसकता है, इसलिए यही नाड़ी-फल tithi/eclipse-window पर सबसे संवेदनशील रहता है।

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11.14
रवीन्दुमानयोगार्धं षष्ट्या सङ्गुण्य भाजयेत् ।
तयोर्भुक्त्यन्तरेणाप्तं स्थित्यर्धं नाडिकादि तत् ।।
ravīndumānayogārdhaṃ ṣaṣṭyā saṅguṇya bhājayet ।
tayorbhuktyantareṇāptaṃ sthityardhaṃ nāḍikādi tat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवि-इन्दु-मान = सूर्य व चन्द्र के मान (व्यास/बिम्ब); योग-अर्धम् = योग का आधा; षष्ट्या = साठ से; सङ्गुण्य = गुणा कर; भाजयेत् = भाग दे; तयोः = उन दोनों की; भुक्ति-अन्तरेण = भुक्ति-अन्तर से; आप्तम् = प्राप्त; स्थिति-अर्धम् = स्थिति-अर्ध (अर्ध-अवधि); नाडिकादि = नाड़ी आदि में; तत् = वह।

हिन्दी भावार्थ सूर्य और चन्द्र के मानों (बिम्ब-व्यासों) का योग लेकर आधा करो; साठ से गुणा कर, दोनों की भुक्तियों के अन्तर से भाग दो — जो निकले वही स्थित्यर्ध है, नाड़ी आदि में। यह ग्रहण-अवधि का आधा-काल: कितनी देर तक “स्पर्श से मध्य” या “मध्य से मोक्ष” का अन्तराल चलेगा, उसकी पहली-कोटि नाप।

English rendering Take half the sum of the measures (angular diameters) of the Sun and the Moon; multiply by sixty and divide by the difference of their motions — the result is the half-duration (sthityardha) in nāḍikās and so on.

गणित / The Mathematics Half-duration of the obscuration contact (first-order, relative-motion form):

sthityardha = 60 × ½(d_S + d_M) ⁄ |v_M − v_S|
  = 30 × (d_S + d_M) ⁄ |v_M − v_S|

  • d_S, d_M = angular diameters (māna) in the same arc unit as the motions
  • v_M, v_S = daily motions (bhukti); use true motions if the local procedure has already sphuṭa-corrected them
  • Result in nāḍikā (1 day = 60 nāḍikā)

उदाहरण (worked example) Inputs in arc-minutes: d_S = 32.0′, d_M = 31.0′; v_M = 790′/day, v_S = 59′/day.

sthityardha = 30 × (32.0 + 31.0) / |790 − 59| = 30 × 63 / 731 ≈ 2.585 nāḍikā
(≈ 2.585 × 24 ≈ 62 ordinary minutes of half-duration).

हमारा डिकोड (Our Decode) फल फिर नाड़ी-माप में है — वही 60-घटी दिवस। हमारा substrate (vedic-ghadi) ghaḍī/pala/vipala को integer-friendly रखते हुए इसी षष्टि-शृंखला पर चलता है। स्थित्यर्ध स्वयं “सत्य” ग्रहण-अवधि का आधुनिक S/T-shadow मॉडल नहीं; यह SS की अपनी बिम्ब+भुक्ति ज्यामिति है — decode का काम सूत्र को ज्यों-का-त्यों चलाना है, पश्चिमी प्रमेय से gate नहीं करना (mangalkaalyantra / pañca-siddhānta blend अनुशासन)।

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11.15
पातकालः स्फुटो मध्यः सो अपि स्थित्यर्धवर्जितः ।
तस्य सम्भवकालः स्यात्तत्संयुक्तो अन्त्यसांज्ञितः ।।
pātakālaḥ sphuṭo madhyaḥ so api sthityardhavarjitaḥ ।
tasya sambhavakālaḥ syāttatsaṃyukto antyasāṃjñitaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पातकालः = पात का काल; स्फुटः = स्पष्ट/शोधित; मध्यः = मध्य (ग्रहण-मध्य); सः अपि = वही; स्थित्यर्ध-वर्जितः = स्थित्यर्ध घटाया हुआ; तस्य = उसका; सम्भवकालः = आरम्भ-काल; स्यात् = होता है; तत्-संयुक्तः = उससे युक्त (जोड़कर); अन्त्य-सांज्ञितः = अन्त नाम से जाना जाता।

हिन्दी भावार्थ जो पात-काल स्फुट किया गया, वही मध्य है — ग्रहण का केन्द्र-क्षण। उसी से स्थित्यर्ध घटाने पर सम्भव-काल (आरम्भ); जोड़ने पर अन्त्य-काल (समाप्ति)। तीन नाम, एक रेखा: मध्य अकेला स्तम्भ; स्थित्यर्ध दोनों ओर समान पंख।

English rendering The true pāta-time is the middle (mid-event). That same moment diminished by the half-duration is the beginning (sambhava); increased by it, it is called the end (antya).

गणित / The Mathematics Eclipse (or pāta-contact) timeline from one mid-instant:

  • t_madhya = t_pāta^(sphuṭa) (from 11.12–11.13 chain)
  • t_sambhava (beginning) = t_madhya − sthityardha
  • t_antya (end) = t_madhya + sthityardha

with sthityardha from 11.14. Full contact span = 2 × sthityardha. Convention: same nāḍikā clock and the same local civil day as the midnight base of 11.13.

उदाहरण (worked example) t_madhya = 32.00 nāḍikā after midnight; sthityardha = 2.585 nāḍikā.

t_sambhava = 32.00 − 2.585 = 29.415 nāḍikā
t_antya = 32.00 + 2.585 = 34.585 nāḍikā
Duration = 5.170 nāḍikā.

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11.16
आद्यन्तकालयोर्मध्यः कालो ज्ञेयो अतिदारुणः ।
प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ।।
ādyantakālayormadhyaḥ kālo jñeyo atidāruṇaḥ ।
prajvalajjvalanākāraḥ sarvakarmasu garhitaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) आदि-अन्त-कालयोः = आदि और अन्त कालों के; मध्यः = बीच का; कालः = समय; ज्ञेयः = जानने योग्य; अति-दारुणः = अत्यन्त दारुण/उग्र; प्रज्वलत् = प्रज्वलित; ज्वलन-आकारः = अग्नि के आकार का; सर्व-कर्मसु = सभी कर्मों में; गर्हितः = निन्दित/वर्ज्य।

हिन्दी भावार्थ आदि और अन्त के बीच का वह मध्य-काल — अतिदारुण कहा गया है। शास्त्र उसे प्रज्वलित अग्नि-सदृश चित्रित करता है, और सर्वकर्म में गर्हित मानता है। यह पंक्ति काल-गणित नहीं सिखाती; मध्य-क्षण के सामाजिक-धार्मिक वर्जन का संकेत है — गणना (11.15) से मिला “मध्य”, व्यवहार में “न छूने योग्य घड़ी”।

English rendering The middle of the beginning and end times is to be known as ati-dāruṇa — extremely formidable. It is imaged as blazing fire and is condemned in all undertakings.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्जन/वर्णन (कर्म-निषेध की भूमिका)।
मध्य-क्षण वही t_madhya है जो 11.15 में स्फुट पात-काल से आया; यह श्लोक उस क्षण को व्याख्या-भाषा में “अतिदारुण” कहता है, कोई नई राशि नहीं जोड़ता। गणित और आचार-वचन अलग रखें: अवधि-सूत्र पहले; गर्हित-कथन बाद की सामाजिक परत।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मान लीजिए किसी पात-योग की अवधि घड़ी में “आरम्भ” और “अन्त” दो छोर हैं — जैसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक का दिन। शास्त्र उस पूरे खण्ड के ठीक मध्य-क्षण को विशेष रूप से “अतिदारुण” कहता है: वही मध्य जिसे 11.15 की गणना से निकालते हैं, वही यहाँ व्यवहार में “न छूने योग्य घड़ी” बन जाता है। प्रज्वलित अग्नि का रूपक इसलिए चुना गया कि मध्य-बिन्दु सबसे तीखा माना गया — जैसे लपट का केन्द्र किनारों से अधिक गर्म। यह पंक्ति फॉर्मूला नहीं सिखाती; वह बताती है कि गणित से मिला “मध्य” समाज-धर्म की सूची में “गर्हित काल” क्यों कहा गया। पाठक गणना और वर्जन को एक ही घड़ी के दो चेहरे समझे।

11.17
एकायनगतं यावदर्केन्द्वोर्मण्डलान्तरम् ।
सम्भवस्तावदेवास्य सर्वकर्मविनाशकृत् ।।
ekāyanagataṃ yāvadarkendvormaṇḍalāntaram ।
sambhavastāvadevāsya sarvakarmavināśakṛt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकायनगतम् = एक ही अयन में स्थित; यावत् = जब तक; अर्केन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र का; मण्डलान्तरम् = मण्डल/वृत्त-अन्तर (देशान्तर-अन्तराल); सम्भवः = घटित होने की संभावना; तावत् एव = उतने काल तक ही; अस्य = इसका (पात/व्यतीपात का); सर्वकर्मविनाशकृत् = सब कर्मों का नाश करने वाला।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य और चन्द्र एक ही अयन में हों, तब उनके मण्डल-अन्तर जितने काल तक फैला रहता है, उतने ही काल में इस पात का सम्भव होता है। पाठ उसे सर्वकर्म-विनाशक कहता है—अर्थात् उस कालखण्ड को कर्म-निर्णय की दृष्टि से अत्यन्त सावधान मानता है। यह काल-सीमा ज्यामितीय दशा से बँधी है, मनमानी नहीं।

English rendering As long as the Sun and Moon lie in the same ayana, the occurrence of this pāta is possible only for the span of their circle-interval; the text calls that span destructive of all ritual works. The window is fixed by geometry, not by arbitrary decree.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — ज्यामितीय काल-सीमा / पात-सम्भव की शर्त। “एकायन” = उत्तरायण या दक्षिणायन का साझा पक्ष; “मण्डलान्तर” = दोनों के वृत्त पर कोणीय अन्तराल—पात तभी “संभव” कहा गया जब ये दोनों शर्तें साथ हों।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एकायन का अर्थ है सूर्य और चन्द्र दोनों उत्तर या दोनों दक्षिण अयन में हों — अर्थात् क्रान्तिवृत्त पर एक ही गोलार्ध-दिशा। तब उनके मण्डल-अन्तर (कोणीय दूरी) जितना “खुला द्वार” है, उतने ही काल-खण्ड में इस पात का सम्भव रहता है; दूरी घटे तो सम्भाव्य खिड़की भी सिकुड़ती है। यह मनमानी मनाही नहीं, ज्यामिति से बँधी समय-सीमा है — जैसे दो घूमते चाप जब एक ही आधे-वृत्त में हों, तभी उनका मिलन-क्षेत्र सक्रिय होता है। यही दशा आगे अध्याय के पात-काल सूत्रों में संख्या बनती है: यहाँ केवल नियम का वाक्य है, वहाँ डिग्री और घटिका। पाठक याद रखे — “सर्वकर्मविनाशकृत्” शास्त्र की सावधानी-भाषा है, न कि आकाश का कोई नया नियम।

11.18
स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मभिः ।
प्राप्यत सुमहच्छ्रेयस्तत्कालज्ञानतस्तथा ।।
snānadānajapaśrāddhavratahomādikarmabhiḥ ।
prāpyata sumahacchreyastatkālajñānatastathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) स्नान = स्नान; दान = दान; जप = जप; श्राद्ध = श्राद्ध; व्रत = व्रत; होम = होम; आदि-कर्मभिः = आदि कर्मों से; प्राप्यते = प्राप्त होता है; सुमहत् श्रेयः = अत्यन्त बड़ा कल्याण/पुण्य; तत्काल-ज्ञानतः = उस काल के ज्ञान से; तथा = तथा/उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ स्नान, दान, जप, श्राद्ध, व्रत, होम—इन और इन जैसे कर्मों से बड़ा श्रेय मिलता है; और उतना ही महत्व “उस काल के ज्ञान” को दिया गया है। अर्थात् कर्म का फल केवल क्रिया पर नहीं, सही क्षण जानने पर भी टिका है। यह श्लोक गणित सिखाने से अधिक, काल-ज्ञान की महिमा गाता है।

English rendering Great merit is gained by bathing, gifts, recitation, śrāddha, vows, fire-offerings and like rites—and likewise by knowing that very time. The verse elevates correct timing beside the act itself.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — धार्मिक-कालिक उपदेश। अंक नहीं; “तत्कालज्ञान” को कर्म-फल के समकक्ष रखकर पाठ काल-निर्णय की व्यावहारिक गरिमा बताता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक साधारण सादृश्य: खेत में बीज डालना कर्म है, और सही ऋतु जानना काल-ज्ञान — दोनों के बिना फसल अधूरी। इसी भाव से श्लोक स्नान-दान-जप-श्राद्ध-व्रत-होम को एक पंक्ति में रखता है और “तत्कालज्ञान” को उनके समकक्ष श्रेय देता है। अर्थात् क्रिया का माहात्म्य क्षण-चयन से जुड़ा माना गया; केवल विधि याद होना पर्याप्त नहीं, घड़ी भी शुद्ध होनी चाहिए। यह पंक्ति पात-गणित नहीं सिखाती — वह पाठक को याद दिलाती है कि इस अध्याय की सारी गणना अन्ततः “कब” के उत्तर के लिए है। श्रेय यहाँ नैतिक दबाव नहीं, काल-विद्या का सामाजिक स्थान है।

11.19
रवीन्द्वोस्तुल्यता क्रान्त्योर्विषुवत्सन्निधौ यदा ।
द्विर्भवेद्धि तदा पातः स्यादभावो विपर्ययात् ।।
ravīndvostulyatā krāntyorviṣuvatsannidhau yadā ।
dvirbhaveddhi tadā pātaḥ syādabhāvo viparyayāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रवीन्द्वोः = सूर्य और चन्द्र की; तुल्यता = समानता; क्रान्त्योः = दोनों क्रान्तियों (अक्षांश-झुकाव) की; विषुवत्-सन्निधौ = विषुव के समीप; यदा = जब; द्विः भवेत् = दो बार हो; तदा = तब; पातः = पात; स्यात् = होता है; अभावः = अनुपस्थिति; विपर्ययात् = विपरीत दशा से।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य और चन्द्र की क्रान्तियाँ समान हों और वह समता विषुव के निकट पड़े, तब पात दो बार घटित हो सकता है। विपरीत स्थिति में—अर्थात् जब यह दशा उलटी/अनुपयुक्त हो—पात का अभाव कहा गया। एक ही ज्यामितीय नियम, दो फल: सम्भव और असम्भव।

English rendering When the Sun’s and Moon’s declinations are equal near the equinox, the pāta may occur twice; from the reverse condition, there is non-occurrence. One geometric test yields both presence and absence.

गणित / The Mathematics शर्त (क्रान्ति-साम्य): |δ_☉| और |δ_☽| की तुल्यता, विशेषतः विषुव-समीप (λ ≈ 0°/180° क्षेत्र)।
δ = arcsin(sin ε · sin λ) — जहाँ ε = क्रान्तिवृत्त का झुकाव, λ = देशान्तर (मध्य/स्फुट—परम्परा-निर्भर)।
पाठ: विषुव-सन्निधि में यह साम्य → पात “द्विः”; विपर्यय → अभाव। यह द्वैत-घटना की गुणात्मक शर्त है, पूर्ण संख्यात्मक एल्गोरिथ्म नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें ε = 24° (सिद्धान्त-सन्निकट), λ_☉ = 10°, λ_☽ = 170°।
sin δ_☉ = sin 24° · sin 10° ≈ 0.4067 × 0.1736 ≈ 0.0706 → δ_☉ ≈ +4.05°।
sin δ_☽ = sin 24° · sin 170° ≈ 0.4067 × 0.1736 ≈ 0.0706 → δ_☽ ≈ +4.05°।
क्रान्ति-तुल्यता लगभग सिद्ध; विषुव-समीप होने से 11.19 की “द्विः पात” वाली चर्चा का यह एक सम्भाव्य ज्यामितीय प्रसंग है (वास्तविक पात-निर्णय अध्याय के पूर्ण नियमों—योग/व्यतीपात-लक्षण—से जोड़ना आवश्यक)।

सुधार · correction (2026-10-07) दूसरा साक्षी (ebharatisampat e-text, Ebharati-5050) भी “विषुवत्सन्निधौ” पढ़ता है — अतः यह पाठ है, मुद्रण-दोष नहीं। पर पाठ का अपना मॉडल (muhurta.js, 1990-2025 के 1,108 पात) हर द्विपात और हर अभाव सूर्य को अयनान्त के 33° भीतर रखता है, विषुव के पास एक भी नहीं। यह व्याख्या का प्रश्न खुला है [reading]। Witness: the second e-text reads the same; the conflict with the text's own computed pātas stands as an open question of interpretation.

11.20
शसाङ्कार्कयुतेर्लिप्ता भभोगेन विभाजिताः ।
लब्धं सप्तदशान्तो अन्यो व्यतीपातस्तृतीयकः ।।
śasāṅkārkayuterliptā bhabhogena vibhājitāḥ ।
labdhaṃ saptadaśānto anyo vyatīpātastṛtīyakaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शशाङ्क-अर्क-युतेः = चन्द्र और सूर्य के योग की; लिप्ताः = कलाएँ (arcminutes); भभोगेन = भ-भोग (एक नक्षत्र का भोग-अंश) से; विभाजिताः = विभाजित; लब्धम् = लब्धि/भागफल; सप्तदश-अन्तः = सत्रहवें के अन्त तक/सत्रहान्त; अन्यः = दूसरा (पाठ-चिह्न + के साथ); व्यतीपातः = व्यतीपात; तृतीयकः = तीसरा।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-चन्द्र योग की कलाओं को नक्षत्र-भोग से भाग दो। जो लब्धि सत्रहवें नक्षत्र के अन्त से जुड़ती है, और जो “अन्य” पक्ष पाठ में कहा गया—उसे तीसरा व्यतीपात माना गया। यह व्यतीपात-त्रय का एक स्पष्ट संख्यात्मक भेद है: योग को भ-चक्र पर मापकर सत्रहान्त की पहचान।

English rendering Divide the arcminutes of the Sun–Moon sum by the nakṣatra-bhoga; the result that ends at the seventeenth—and the further case marked in the text—is the third Vyatīpāta. The triple of Vyatīpātas is here given a countable, bhoga-based handle.

गणित / The Mathematics
भभोग = 360° / 27 = 13°20′ = 800 लिप्ता।
S = (λ_☽ + λ_☉) को लिप्ता में लो (0 ≤ S < 21600′, क्योंकि पूरा चक्र 360° = 21600′)।
q = S ÷ 800 (नक्षत्र-संख्यक भागफल; पूर्णांक भाग = नक्षत्र-क्रम संकेत)।
यदि लब्धि “सप्तदशान्त” (17वें नक्षत्र—अनुराधा—के अन्त) से सम्बद्ध हो, तथा पाठ का “+अन्यो” पक्ष—तो वह तृतीय व्यतीपात।
(पाठ-भेद: “+अन्यो” आलोचनात्मक चिह्न—अर्थ: अतिरिक्त/द्वितीय प्रकार; निश्चित पठन परम्परा-टीका से मिलाएँ।)

उदाहरण (worked example) मानें λ_☉ = 80°, λ_☽ = 140° (दोनों मध्य/स्फुट—यहाँ केवल योग-दृष्टान्त)।
योग = 220° = 220 × 60 = 13200′।
13200 ÷ 800 = 16.5 → 17वें नक्षत्र के मध्य/अन्त-क्षेत्र की ओर संकेत (पूर्णांक 16 = 17वें का आरम्भ-पूर्व; 16.5 ≈ 17वें का आधा)।
सप्तदशान्त-समीप लब्धि होने पर 11.20 के अनुसार तृतीय व्यतीपात की गणना-पंक्ति सक्रिय होती है। (व्यवहार में λ स्फुट और स्थानीय पात-परिभाषा दोनों घोषित करें।)

11.21
सार्पेन्द्रपौष्ण्यधिष्ण्यानां अन्त्याः पादा भसन्धयः ।
तदग्रभेष्वाद्यपादो गण्डान्तं नाम कीर्त्यते ।।
sārpendrapauṣṇyadhiṣṇyānāṃ antyāḥ pādā bhasandhayaḥ ।
tadagrabheṣvādyapādo gaṇḍāntaṃ nāma kīrtyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सार्प = आश्लेषा (सर्प-नक्षत्र); इन्द्र = ज्येष्ठा; पौष्ण = रेवती (पूषन्); अधिष्ण्यानाम् = इन नक्षत्रों के; अन्त्याः पादाः = अन्तिम चरण/पाद; भसन्धयः = भ-सन्धियाँ (नक्षत्र-सन्धि); तद्-अग्र-भेषु = उनके अगले नक्षत्रों में; आद्य-पादः = पहला पाद; गण्डान्तम् = गण्डान्त; नाम कीर्त्यते = नाम से कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती—इन तीनों के अन्तिम पाद भ-सन्धि हैं। ठीक उनके अगले नक्षत्रों का आदि पाद भी उसी सन्धि-प्रसंग में आता है; दोनों मिलाकर “गण्डान्त” कहलाता है। तीन जोड़े, तीन गण्डान्त—नक्षत्र-चक्र की स्पष्ट सन्धि-रेखाएँ।

English rendering The last pādas of Āśleṣā, Jyeṣṭhā and Revatī are the nakṣatra-junctions; the first pāda of the stars that follow them completes what is named Gaṇḍānta. Three junctions, three named Gaṇḍāntas.

गणित / The Mathematics
1 नक्षत्र = 13°20′ = 800′; 1 पाद = 13°20′ / 4 = 3°20′ = 200′।
गण्डान्त-खण्ड (प्रत्येक जोड़ा = 2 पाद = 6°40′ = 400′):
1) आश्लेषा-अन्त्य पाद + मघा-आद्य पाद
2) ज्येष्ठा-अन्त्य पाद + मूल-आद्य पाद
3) रेवती-अन्त्य पाद + अश्विनी-आद्य पाद
नक्षत्र-सीमाएँ (0° = अश्विनी-आरम्भ, समान भोग): आश्लेषा = 16/27·360° … 17/27·360° इत्यादि—पूर्ण देशान्तर-सारिणी चयनित चक्र (सायन/निरयण) पर निर्भर; अयनांश-सम्प्रदाय घोषित करना आवश्यक।

उदाहरण (worked example) निरयण मान लें, अश्विनी = 0°।
आश्लेषा = 106°40′ … 120°; अन्त्य पाद = 116°40′ … 120°।
मघा-आद्य पाद = 120° … 123°20′।
अतः आश्लेषा-मघा गण्डान्त ≈ 116°40′–123°20′ (6°40′)। इसी तरह ज्येष्ठा-मूल और रेवती-अश्विनी।

11.22
व्यतीपातत्रयं घोरं गण्डान्तत्रितयं तथा ।
एतद्भसन्धित्रितयं सर्वकर्मसु वर्जयेत् ।।
vyatīpātatrayaṃ ghoraṃ gaṇḍāntatritayaṃ tathā ।
etadbhasandhitritayaṃ sarvakarmasu varjayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) व्यतीपात-त्रयम् = तीन व्यतीपात; घोरम् = भीषण/गम्भीर; गण्डान्त-त्रितयम् = तीन गण्डान्त; तथा = तथा; एतत् = यह; भसन्धि-त्रितयम् = तीन भ-सन्धियाँ; सर्वकर्मसु = सब कर्मों में; वर्जयेत् = त्याग करे/वर्जित रखे।

हिन्दी भावार्थ तीन व्यतीपात भीषण कहे गए, और तीन गण्डान्त भी। यही भ-सन्धि-त्रय—पाठ की दृष्टि से—सब कर्मों में वर्ज्य है। श्लोक निषेध की सूची बाँधता है: व्यतीपात-त्रय + गण्डान्त-त्रय = एक ही सावधानी-पटल।

English rendering The triple of Vyatīpātas is called terrible, and so is the triple of Gaṇḍāntas; this triple of nakṣatra-junctions one should avoid in all works. The verse seals the avoidances already defined.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्ज्य-काल सूचीकरण। अंक नए नहीं; 11.20–11.21 में परिभाषित त्रय को कर्म-निषेध की एक पंक्ति में बाँधता है। गणना-इंजन के लिए यह “flag set”: तीन व्यतीपात-दशा + तीन गण्डान्त-खण्ड।

दृष्टान्त (Illustrative Example) इस श्लोक को एक “सावधानी-पटल” की तरह पढ़ें — दो त्रिक एक ही सूची में बाँधे गए। व्यतीपात-त्रय अध्याय में परिभाषित उन भीषण पात-योगों की ओर इशारा करता है जिनकी शर्तें पहले आ चुकीं; गण्डान्त-त्रय नक्षत्र/राशि की तीन जल-अग्नि सन्धियों — रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल — की ओर, जहाँ एक भ से दूसरे भ में छलांग पड़ती है। “भ-सन्धि-त्रितय” कहकर पाठ दोनों को एक वर्ज्य-श्रेणी में रख देता है: गणना अलग-अलग, निषेध एक स्वर। मुहूर्त-परम्परा में भी ये नाम प्रायः एक ही सावधानी-सूची में साथ चलते हैं। यहाँ नया सूत्र नहीं; स्मृति-सूत्र है — तीन और तीन, सब कर्मों में एक ही पट।

11.23
इत्येतत्परमं पुण्यं ज्योतिषां चरितं हितम् ।
र्हस्यं महदाख्यातं किं अन्यच्छ्रोतुं इच्छसि ।।
ityetatparamaṃ puṇyaṃ jyotiṣāṃ caritaṃ hitam ।
rhasyaṃ mahadākhyātaṃ kiṃ anyacchrotuṃ icchasi ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति एतत् = इस प्रकार यह; परमम् पुण्यम् = परम पुण्य; ज्योतिषाम् = ज्योतियों/ग्रह-नक्षत्रों का; चरितम् = चरित/गति-वृत्तान्त; हितम् = हितकारी; रहस्यम् = रहस्य (पाठ: र्हस्यं ← रहस्यं); महत् = महान्; आख्यातम् = कहा गया; किम् अन्यत् = और क्या; श्रोतुम् इच्छसि = सुनना चाहते हो।

हिन्दी भावार्थ “यह परम पुण्य, हितकारी ज्योतिष-चरित—महान् रहस्य—कहा जा चुका; अब और क्या सुनना चाहते हो?” अध्याय यहाँ संवाद की मुद्रा में विराम लेता है। ज्ञान को पुण्य और रहस्य दोनों कहा गया—गणना का गौरव, डरावा नहीं।

English rendering “Thus this supreme, meritorious, beneficial course of the luminaries has been told as a great secret; what else do you wish to hear?” The chapter closes in dialogue, praising the science without fear-theater.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — अध्याय-समाप्ति / आचार्य-शिष्य संवाद। कोई नियतांक नहीं; यह पुस्तक की ही मुद्रा है—स्रोत-पाठ को इंजन में उतारना, फिर भी उसे “रहस्य” और “हित” कहकर सम्मान देना।

दृष्टान्त (Illustrative Example) अध्याय का अन्त परीक्षा-कक्ष की घंटी जैसा है: गुरु कह चुका, शिष्य के पास मौन का अवकाश है, और वाक्य मुड़कर संवाद बन जाता है — “किम् अन्यच्छ्रोतुम् इच्छसि?” “परमं पुण्यम्” और “रहस्यं महत्” यहाँ डरावा नहीं, ज्ञान का दोहरा सम्मान है: हितकारी चरित भी, गहन विद्या भी। पात-अध्याय की सारी गणना इस विराम-बिन्दु पर “कही जा चुकी बात” बन जाती है; अगला प्रश्न अगले द्वार से आएगा। पाठक इस श्लोक को सूत्र-तालिका न समझे — यह पुस्तक की नाट्य-मुद्रा है, जहाँ ज्योतिष-चरित को पुण्य कहा गया ताकि गौरव रहे, भय नहीं। संवाद यहीं अध्याय ११ का परदा गिराता है।

अध्यायः 12

भूगोलाध्यायः

Cosmography
90 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
भूगोलाध्याय वह स्थान है जहाँ सूर्यसिद्धान्त आकाश-गणित से पृथ्वी-आकार की ओर मुड़ता है—मायासुर कृताञ्जलि होकर पूछता है कि भूमि किस प्रमाण की है, किस आकृति की, किस आश्रय की, और सप्तपाताल-भूमियाँ यहाँ कैसे व्यवस्थित हैं। उत्तर में यह अध्याय पृथ्वी को गोल (गोलाकार) सिद्ध करता है, उसके मान-विस्तार, दिशा-विभाग और ध्रुव–मेरु–लङ्का जैसी काल्पनिक–गणितीय धुरियों को एक ही दृश्य-यन्त्र में बाँधता है; साथ ही सूर्य की पर्यटन-रेखा से अहोरात्र की व्यवस्था, देवासुरों का परस्पर-विपरीत दिन-रात, तथा पितृ-मानुष-काल-मानों की असमानता को ज्यामितीय कारणों से समझाता है। सौंदर्य यहाँ आख्यान और माप के मिलन में है—प्रश्न भक्ति से उठते हैं, उत्तर गोलाध्याय की रेखाओं और कोणों से उतरते हैं। नब्बे श्लोकों में आकार, आश्रय, विभाग, सूर्य-पर्यटन और भगण-पूरण एक-दूसरे को पकड़ते हुए एक ही ब्रह्माण्ड-मानचित्र बनाते हैं: जहाँ “कितनी बड़ी है भूमि” केवल संख्या नहीं, बल्कि दिन-रात, दिशा और काल-मान का मूल-ढाँचा भी है।

For the English reader:
Adhyāya 12 is the cosmographic hinge of the Sūrya-Siddhānta: after mean motions and corrections have placed the lights in the sky, Maya bows and asks the earth-questions—measure, shape, support, division, the seven nether tiers, and how the Sun lays down day and night while circling a living world. The chapter answers not with myth alone but with a geometric Earth: a sphere set in space, oriented by polar and equatorial fictions (Meru, Laṅkā, the quarters), sized so that solar motion and terrestrial standing explain unequal days, inverted divine–demonic nights, and why pitṛ and human time-units refuse to be the same everywhere. Its beauty is architectural—ninety verses in which diameter, horizon, solar circuit, and the completion of the bhagaṇa lock into one model: cosmography as the bridge between celestial arithmetic and the ground under the observer’s feet.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- पृथ्वी का गोलाकार मॉडल: व्यास \(D\), परिधि \(C = \pi D\) (सिद्धान्तीय \(\pi\)-परम्परा के अनुसार), त्रिज्या \(R = D/2\)
- स्थान-निर्देश: अक्षांश \(\varphi\), देशान्तर \(\lambda\) (मेरु–लङ्का–रेखा-मण्डल सापेक्ष), ध्रुव-ऊंचाई \(\approx \varphi\)
- सूर्य-पर्यटन से अहोरात्र: क्षितिज-सम्बद्ध उदय-अस्त; उन्नतांश/नतांश से दिन-दीर्घता \(\Delta t_{\mathrm{day}}(\varphi,\delta)\)
- काल-मान-अनुपात: पितृ-मास \(\leftrightarrow\) मानुष-होरा/नाडी-माप; देवासुर अहोरात्र-विपर्यय (गोलार्ध-विभाजन)
- भगण-पूरण व ग्रह-आश्रय: सूर्य/ग्रहों का भू-सापेक्ष चक्र-समापन और गोलाध्याय की दूरी/कोण-संहति

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। भूगोल-आयाम (योजन में \(D,C\)), मेरु–लङ्का-निर्देश-तन्त्र, तथा अक्षांश-सम्बद्ध अहोरात्र-सूत्रों को integer-bhagaṇa / sphuṭa / bhāva परतों से जोड़ने के लिए स्वतन्त्र fixture-पिन, योजन-रूपान्तरण की घोषित परम्परा, और exact-equality oracle पर आधारित सत्यापन-श्रृंखला अभी बाक़ी है।

मेरु (उत्तर-ध्रुव)रोमकयमकोटिलङ्का (0°, विषुवत्)उज्जयिनीमध्याह्न-रेखा: लङ्का–उज्जयिनी–मेरु · देशान्तर इसी से नापा जाता है
भूगोल — the terrestrial globe (SS ch.12): a sphere hanging in space, Meru at the north pole, and the four classical cities — Laṅkā (0°), Yamakoṭi (+90°E), Siddhapura (180°), Romaka (−90°W) — spaced a quadrant apart on the equator; Ujjayinī sits on the prime (Laṅkā) meridian. Latitude circles shrink poleward — the text's own spherical geometry.
12.1
अथार्कांशसमुद्भूतं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।
भक्त्या परमयाभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयासुरः ।।
athārkāṃśasamudbhūtaṃ praṇipatya kṛtāñjaliḥ ।
bhaktyā paramayābhyarcya papracchedaṃ mayāsuraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब/तदनन्तर; अर्कांश-समुद्भूतम् = सूर्यांश से उत्पन्न (उस) को; प्रणिपत्य = साष्टाङ्ग प्रणाम कर; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़े हुए; भक्त्या परमया = परम भक्ति से; अभ्यर्च्य = पूजा/आराधना कर; पप्रच्छ = पूछा; इदम् = यह (प्रश्न-समूह); मयासुरः = मयासुर।

हिन्दी भावार्थ अध्याय का द्वार खुलता है संवाद से। मयासुर, जो सूर्य के अंश से प्रकट हुए उस दिव्य आचार्य के सामने हाथ जोड़कर झुकता है, परम भक्ति से उनकी आराधना करता है, और तब—विनय की उस पूर्णता के बाद—अपने प्रश्न रखता है। ज्ञान यहाँ आदेश नहीं, भक्तिपूर्वक पूछा गया वरदान है।

English rendering Then Maya the asura, having bowed with folded hands before him who was born of a portion of the Sun, and having worshipped him with supreme devotion, asked this.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/स्तुति-पूर्वक प्रश्नारम्भ। यह श्लोक अध्याय की प्रश्न-सूची का द्वार है; संख्या या सूत्र नहीं, केवल विनय और जिज्ञासा की भूमिका है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) अध्याय १२ का पहला दृश्य किसी आधुनिक “प्रश्नोत्तर सत्र” से पहले की विनय-विधि जैसा है: मयासुर सूर्यांश से उद्भूत आचार्य के सामने कृताञ्जलि झुकता है, परम भक्ति से अर्चना करता है, और तब प्रश्न खोलता है। सूर्यसिद्धान्त की परम्परा में मय ही वह श्रोता है जिसके मुख से भूगोल, गति और काल के बड़े प्रश्न निकलते हैं — ज्ञान यहाँ आदेश-पत्र नहीं, भक्तिपूर्वक माँगा गया वरदान है। “अथ” शब्द द्वार खोलता है: पिछले अध्याय का रहस्य पूरा, नया विश्व-चित्र अब पूछा जाएगा। पाठक याद रखे — आगे के श्लोक उत्तर हैं; यह श्लोक उत्तर की योग्यता बाँधता है।

12.2
भगवन्किम्प्रमाणा भूः किं आकारा किं आश्रया ।
किंविभागा कथं चात्र सप्तपातालभूमयः ।।
bhagavankimpramāṇā bhūḥ kiṃ ākārā kiṃ āśrayā ।
kiṃvibhāgā kathaṃ cātra saptapātālabhūmayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगवन् = हे भगवन्; किम्-प्रमाणा = किस माप/परिमाण की; भूः = पृथ्वी; किम् आकारा = किस आकार की; किम् आश्रया = किस आश्रय वाली; किम्-विभागा = किस प्रकार विभाजित; कथम् = कैसे; अत्र = यहाँ; सप्त-पाताल-भूमयः = सात पाताल और भूमियाँ।

हिन्दी भावार्थ मय पहला प्रश्न-समूह पृथ्वी पर केंद्रित करता है—उसका प्रमाण (माप) क्या है, आकार कैसा है, वह किस पर टिकी है, और उसके विभाग कैसे हैं। साथ ही वह पूछता है कि सात पाताल-भूमियाँ इस व्यवस्था में कैसे बैठी हैं। यह भूगोल का पूरा एजेंडा है: माप, रूप, आधार, विभाग, और अधोलोकों की गणना।

English rendering O Lord—of what measure is the Earth, of what form, on what does it rest, and how is it divided? And how, here, are the seven nether regions and lands ordered?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न-सूची (भू-प्रमाण/आकार/आश्रय)। “सप्त” = ७; यह श्लोक माप माँगता है, स्वयं माप नहीं देता—उत्तर अध्याय के आगे के श्लोकों में आएगा।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मय का प्रश्न-समूह एक शोध-प्रस्तावना की पाँच पंक्तियाँ हैं: प्रमाण (माप), आकार, आश्रय (आधार), विभाग, और सप्त-पाताल-भूमियों की व्यवस्था — भूगोल का पूरा एजेंडा एक श्लोक में। बाद के गोल-अध्यायों और परिधि-सूत्रों में “किं प्रमाणा भूः” संख्या बनता है — योजनों में पृथ्वी का व्यास/परिधि; “किं आकृता” गोलाकार भू-मण्डल के वर्णन में। पाताल-सप्तक को यहाँ काव्य-लोक न समझकर सिद्धान्तीय विभाग-सूची का पूर्व-प्रश्न समझें: उत्तर आगे की पंक्तियाँ देंगी, एजेंडा यहीं तय हुआ। यह विचार अध्याय १२ के भू-परिधि और लोक-विन्यास वर्णन में गणित और मानचित्र दोनों बनेगा। एक प्रश्न में माप-विज्ञान और अधोलोक-कल्पना साथ बैठे हैं — सिद्धान्त दोनों का उत्तर एक ही ब्रह्माण्ड-चित्र में बाँधता है।

12.3
अहोरात्रव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः ।
कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन् ।।
ahorātravyavasthāṃ ca vidadhāti kathaṃ raviḥ ।
kathaṃ paryeti vasudhāṃ bhuvanāni vibhāvayan ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अहोरात्र-व्यवस्थाम् = दिन-रात की व्यवस्था को; च = और; विदधाति = रचता/स्थापित करता है; कथम् = कैसे; रविः = सूर्य; पर्येति = परिक्रमा करता है; वसुधाम् = पृथ्वी के चारों ओर; भुवनानि = लोकों/भुवनों को; विभावयन् = प्रकाशित/प्रकट करता हुआ।

हिन्दी भावार्थ दूसरा प्रश्न सूर्य की गति और प्रकाश से जुड़ा है। दिन-रात की व्यवस्था सूर्य कैसे बाँधता है? और वह पृथ्वी की परिक्रमा कैसे करता है, भुवनों को जगाते-रोशन करते हुए? यहाँ “परिक्रमा” का अर्थ सिद्धान्तीय दृष्टि से सूर्य की दृश्य-पथ-व्यवस्था है—पृथ्वी के सापेक्ष दिन-रात का चक्र।

English rendering And how does the Sun establish the order of day and night? How does he go round the Earth, making the worlds visible by his light?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न (अहोरात्र-व्यवस्था + रवि-परिक्रमा)। यह श्लोक उस मॉडल की माँग करता है जिसमें एक घूर्णन-चक्र दिन-रात बाँटता है; संख्या यहाँ नहीं, दिशा आगे के उत्तर-श्लोकों में है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अहोरात्र की “व्यवस्था” बाद में metrology से जुड़ती है—१ दिन = ६० घटी = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल = २१,६०० प्राण (MATHEMATICAL-AUDIT §1)। हमारा decode day-count को (SS: १,५७७,९१७,८२८ civil days/Mahāyuga) इसी अहोरात्र-श्रृंखला का विस्तार मानता है, न कि पृथक कल्पना।

दृष्टान्त (Illustrative Example) सायंकाल क्षितिज पर सूर्य डूबता है और प्रातः वही दिशा-क्रम पलटता है — यही अहोरात्र-व्यवस्था का प्रत्यक्ष दृश्य है, जिसे शास्त्र “रवि विदधाति” कहता है। “वसुधां पर्येति” को आधुनिक भाषा में पृथ्वी की परिक्रमा न पढ़ें; सिद्धान्तीय दृष्टि में यह सूर्य का दृश्य-पथ है — भुवनों को क्रमशः प्रकाश देते हुए दिगन्तर में घूमता हुआ आभासी चक्र। दिन-रात का बाँट उसी चक्र की छाया और प्रकाश से निकलता है; यही आगे गोल/भगण गति के प्रकरण में कोण और काल की भाषा पहनेगा। मय का प्रश्न दोहरा है: व्यवस्था कैसे, और पर्यटन किस रीति से — उत्तर अध्याय के सूर्य-गति चित्र में मिलेगा, न कि केवल भक्ति-वाक्य में।

12.4
देवासुराणां अन्योन्यं अहोरात्रं विपर्ययात् ।
किं अथ तत्कथं वा स्याद्भानोर्भगणपूरणात् ।।
devāsurāṇāṃ anyonyaṃ ahorātraṃ viparyayāt ।
kiṃ atha tatkathaṃ vā syādbhānorbhagaṇapūraṇāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवासुरयोः / देवासुराणाम् = देवों और असुरों का; अन्योन्यम् = परस्पर; अहोरात्रम् = दिन-रात; विपर्ययात् = उलटाव/विपर्यय से; किम् = क्या (वह); अथ = फिर; तत् = वह; कथम् = कैसे; वा = अथवा; स्यात् = होता है; भानोः = सूर्य के; भगण-पूरणात् = भगण (पूर्ण कक्षा-परिक्रमण) की पूर्ति से।

हिन्दी भावार्थ मय एक गूढ़ सममिति पूछता है—देवों और असुरों का दिन-रात परस्पर उलटा क्यों लगता है? वह “क्या” है, और वह सूर्य के भगण-पूरण से कैसे उत्पन्न होता है? प्रश्न यह संकेत करता है कि एक ही सूर्य-परिक्रमण, दो गोलार्धों/दो लोक-दृष्टियों में, दिन-रात को विपर्यस्त दिखा सकता है।

English rendering Why are day and night of the gods and the asuras mutually reversed? What is that phenomenon—or how does it arise from the completion of the Sun’s revolution (bhagaṇa)?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न (देव-असुर अहोरात्र-विपर्यय ↔ भगण)। “भगण” = एक पूर्ण कक्षा-परिक्रमण; यहाँ संख्या नहीं दी गई—केवल यह कि विपर्यय भानोः भगणपूरणात् समझाया जाना चाहिए।

हमारा डिकोड (Our Decode) math-core का integer-bhagaṇa mean-longitude उपकरण ठीक इसी “भगण” की भाषा में काम करता है—ग्रह की mean motion = (bhagaṇa_count × ३६०°) ÷ days_per_Mahāyuga। SS-canon day-count १,५७७,९१७,८२८ को चुनना भगण-दर को बदलता है; Āryabhaṭa-canon (१,५७७,९१७,५००) से ३२८-दिन का अंतर वास्तविक, परिणामी विकल्प है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मान लीजिए आप मकर-संक्रांति के आस-पास एक ही क्षण को दो स्थानों से देखते हैं—उत्तरी ध्रुवीय वृत्त के निकट और दक्षिणी ध्रुवीय वृत्त के निकट। एक ओर सूर्य क्षितिज के ऊपर दीर्घकाल तक रहता है; दूसरी ओर वही सूर्य क्षितिज के नीचे छिपा रहता है। एक ही भानु का भगण-पूरण—एक वार्षिक परिक्रमण—दो गोलार्धों में दिन-रात को विपर्यस्त दिखा देता है। इसी observational symmetry को पाठ देवासुर-अहोरात्र की भाषा में पूछता है: “क्या” है वह उलटाव, और वह सूर्य-कक्षा की पूर्णता से कैसे उपजता है।

12.5
पित्र्यं मासेन भवति नाडीषष्ट्या तु मानुषम् ।
तदेव किल सर्वत्र न भवेत्केन हेतुना ।।
pitryaṃ māsena bhavati nāḍīṣaṣṭyā tu mānuṣam ।
tadeva kila sarvatra na bhavetkena hetunā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पित्र्यम् = पितरों का (दिन/मान); मासेन = (एक) मास से; भवति = होता है; नाडी-षष्ट्या = साठ नाड़ी से; तु = किन्तु; मानुषम् = मनुष्य का (दिन/मान); तत् एव = वही; किल = निश्चय ही/कहा जाता है; सर्वत्र = सब जगह; न भवेत् = नहीं होता; केन हेतुना = किस कारण से।

हिन्दी भावार्थ समय की एकरूपता पर चोट करती हुई जिज्ञासा—पितरों का दिन एक मास-मान से नापा जाता है, मनुष्यों का दिन साठ नाड़ी से। फिर वही माप सब लोकों/सब स्थानों पर एक-सा क्यों नहीं चलता? मय पूछता है: हेतु क्या है कि मानुष, पित्र्य आदि काल-मान भिन्न रहें?

English rendering The pitṛ measure is reckoned by a month, but the human measure by sixty nāḍīs. Why then is that same reckoning not everywhere the same—by what cause?

गणित / The Mathematics श्लोक स्वयं ये समीकरण देता है (प्रश्न-रूप में):
- मानुष-दिन = ६० नाड़ी (नाडी = घटी)
- पित्र्य-दिन = १ मानुष-मास (मासेन)
और पूछता है: यह माप-भेद सर्वत्र एक क्यों नहीं।

आधुनिक metrology से जोड़ा गया पूरक (dossier, न कि इस श्लोक का ही पाठ):
१ दिन = ६० घटी = ३,६०० पल = २,१६,००० विपल = २१,६०० प्राण।

उदाहरण (worked example) मानुष-दिन = ६० नाड़ी।
यदि १ नाड़ी = २४ आधुनिक मिनट (६० नाड़ी × २४ min = १,४४० min = २४ h), तो पित्र्य-दिन = १ मानुष-मास।
चांद्र-मास ≈ ३० मानुष-दिन मानें (सरल युक्ति; वास्तविक तिथि-मास थोड़ा भिन्न):
पित्र्य-दिन ≈ ३० × ६० = १,८०० नाड़ी ≈ ३० मानुष-अहोरात्र।
(convention: यहाँ “मास” को ३० दिन का औसत पैमाना लिया; सिद्धान्त आगे शुक्ल/कृष्ण पक्षों से पितृ-अहोरात्र बाँधता है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) vedic-ghadi का tithi/ghaḍī-pala-vipala इंजन ठीक “नाडीषष्ट्या … मानुषम्” की धरती पर खड़ा है। २१,६०० प्राण/दिन ↔ २१,६०० चाप-कला/वृत्त केवल गणना-संगत (count correspondence) है, भौतिक “समय = कोण” नहीं (MATHEMATICAL-AUDIT §1)। day-count का SS बनाम Āryabhaṭa चुनाव tithi-engine पर सबसे तेज़ असर डालता है—यही ३२८-दिन का अंतर।

12.6
दिनाब्दमासहोराणां अधिपा न समाः कुतः ।
कथं पर्येति भगणः सग्रहो अयं किं आश्रयः ।।
dinābdamāsahorāṇāṃ adhipā na samāḥ kutaḥ ।
kathaṃ paryeti bhagaṇaḥ sagraho ayaṃ kiṃ āśrayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिन-आब्द-मास-होराणाम् = दिन, वर्ष, मास और होराओं के; अधिपाः = अधिपति (स्वामी); न समाः = समान नहीं; कुतः = क्यों; कथम् = कैसे; पर्येति = घूमता/परिक्रमा करता है; भगणः = भगण (राशिमंडल/पूर्ण-परिक्रमण-वृत); स-ग्रहः = ग्रहों सहित; अयम् = यह; किम् आश्रयः = किस आश्रय वाला (+अयम् — पाठ-चिह्न; अर्थ में “यह” सुस्पष्ट)।

हिन्दी भावार्थ काल के अधिपतियों की असमानता—दिन-पति, वर्ष-पति, मास-पति, होरा-पति एक-से क्यों नहीं? फिर वह भगण, ग्रहों को साथ लिए, कैसे परिक्रमा करता है, और उसका आश्रय क्या है? प्रश्न दो तलों पर है: वार/होरा आदि की स्वामित्व-श्रृंखला, और ग्रह-सहित भगण की गति-आधार संरचना।

English rendering Why are the lords of the day, the year, the month, and the horas not the same? How does this sphere of revolutions, with the planets, go round—and on what does it rest?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न (अधिप-भेद + सग्रह भगण-आश्रय)। “भगणः सग्रहः” = ग्रह-युक्त परिक्रमण-वृत; माप यहाँ नहीं, केवल संरचना की माँग।

हमारा डिकोड (Our Decode) “सग्रहो … भगणः” mean-longitude lab की भाषा है—प्रत्येक ग्रह का अलग integer bhagaṇa, एक साझा Mahāyuga-day-count पर। bīja को हमने absolute re-fit नहीं, Sun-anchored relative rates (+३० मंगल, −५१ गुरु, +६१ शनि revs/Mahāyuga) के रूप में ही verified किया; hybrid अस्वीकृत क्योंकि synodic ज्यामिति बिगड़ती।

दृष्टान्त (Illustrative Example) वार-अधिपति सात ग्रहों के क्रम से घूमता है—रविवार से शनिवार—किंतु होरा-अधिपति उसी दिन के अंदर सत्रह-सत्रह बार बदलता है; मास-पति और वर्ष-पति फिर भिन्न चक्रों पर बैठते हैं। इसलिए “अधिपाः समाः” नहीं हो सकते: काल-इकाई अलग, स्वामित्व-अवधि अलग। भगण-सग्रह की गति का गणितीय आश्रय बाद में मध्यमा/शीघ्र-मन्द अध्यायों में खुलेगा; यहाँ प्रश्न पहले इस dual structure को उजागर करता है—calendar-lords की श्रृंखला एक तल, ग्रह-सहित orbit-frame दूसरा तल।

12.7
भूमेरुपर्युपर्यूर्ध्वाः किं उत्सेधाः किं अन्तराः ।
ग्रहर्क्षकक्षाः किंमात्राः स्थिताः केन क्रमेण ताः ।।
bhūmeruparyuparyūrdhvāḥ kiṃ utsedhāḥ kiṃ antarāḥ ।
graharkṣakakṣāḥ kiṃmātrāḥ sthitāḥ kena krameṇa tāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूमेः = पृथ्वी के; उपरि-उपरि = ऊपर-ऊपर; ऊर्ध्वाः = ऊँचाईयाँ/ऊर्ध्व-स्तर; किम् उत्सेधाः = कितने उत्सेध (ऊँचाई-माप); किम् अन्तराः = कितने अंतराल; ग्रह-ऋक्ष-कक्षाः = ग्रह और नक्षत्रों की कक्षाएँ; किम्-मात्राः = किस माप की; स्थिताः = स्थित हैं; केन क्रमेण = किस क्रम से; ताः = वे।

हिन्दी भावार्थ अब दृष्टि पृथ्वी से ऊपर उठती है—ऊपर-ऊपर की ऊँचाइयाँ कितनी, उनके बीच के अंतर कितने? ग्रहों और नक्षत्रों की कक्षाएँ किस माप की हैं, और वे किस क्रम में बैठी हैं? यह श्लोक कक्षा-क्रम और दूरी-माप (उत्सेध/अन्तर) का पूरा प्रश्नावली है—बाद के अध्याय/उत्तर इन्हीं संख्याओं से भरे जाएँगे।

English rendering Above the Earth, level upon level—what are the heights, what the intervals? Of what measure are the orbits of the planets and the stars (nakṣatras), and in what order do they stand?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न (उत्सेध, अन्तर, कक्षा-मात्रा, क्रम)। श्लोक माँगता है: h₁, h₂, … (उत्सेध), Δh (अन्तर), और कक्षा-त्रिज्या/परिधि-मात्राएँ—स्वयं कोई स्थिरांक नहीं देता।

हमारा डिकोड (Our Decode) SS अध्याय २ का sphuṭa-engine (kaal_surya_siddhanta_sphuta.py) कक्षाओं को epicycle-मात्राओं (R_manda, R_śīghra) से स्पर्श करता है—जैसे सूर्य १३°५०′, चंद्र ३१°५०′, मंगल ७३.५° (दोनों अन्तों के माध्य)—किन्तु वे “उत्सेध” के भौतिक किलोमीटर नहीं, कोणीय/त्रिज्या-अनुपात हैं। भूमेरुपरि … कक्षाः का पूर्ण दूरी-क्रम इस प्रश्न-श्लोक के उत्तर-भाग में खोजा जाता है; हमारा sealed engine mean+manda+śīghra है, production true-position ephemeris नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) यह श्लोक पाठक को धरातल से ऊपर की “सीढ़ी” माँगता है—उत्सेध (height), अन्तर (interval), कक्षा-मात्रा (orbital measure), और क्रम (order)। भारतीय खगोल में पारंपरिक ग्रह-क्रम चंद्र से आरंभ होकर बुध-शुक्र-सूर्य-मंगल-गुरु-शनि तक जाता है, फिर नक्षत्र-मंडल; सूर्यसिद्धान्त आगे इन्हीं के लिए योजन-संख्याएँ देगा। स्मरण रखें: यहाँ केवल प्रश्नावली है—उत्तर अध्याय के भूगोल/कक्षा-खंड में संख्यात्मक रूप लेंगे, न कि इस श्लोक में। माप की भूख जगाना ही इसका कार्य है।

12.8
ग्रीष्मे तीव्रकरो भानुर्न हेमन्ते तथाविधः ।
कियती तत्करप्राप्तिर्मानानि कति किं च तैः ।।
grīṣme tīvrakaro bhānurna hemante tathāvidhaḥ ।
kiyatī tatkaraprāptirmānāni kati kiṃ ca taiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रीष्मे = ग्रीष्म में; तीव्र-करः = तीव्र किरणों वाला; भानुः = सूर्य; न = नहीं; हेमन्ते = हेमंत में; तथा-विधः = वैसा; कियती = कितनी; तत्-कर-प्राप्तिः = उन किरणों की प्राप्ति/पहुँच; मानानि = माप/मान; कति = कितने; किम् = क्या; च = और; तैः = उन (मानों) से।

हिन्दी भावार्थ अंतिम प्रश्न प्रकाश की तीव्रता और उसके माप पर है। ग्रीष्म में सूर्य की किरणें तीखी, हेमंत में वैसी नहीं—वह “कर-प्राप्ति” कितनी है? उसके माप कितने हैं, और उन मापों से क्या जाना/किया जाता है? यह ऋतु-भेद को केवल अनुभूति नहीं, मापनीय कर-प्राप्ति और मान-समूह बना देता है—आगे शंकु/छाया/कर्ण की ज्यामिति का बीज।

English rendering In summer the Sun’s rays are fierce; in winter they are not so. How great is the reaching of those rays? How many are the measures, and what is done with them?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — प्रश्न (ऋतु-भेद → कर-प्राप्ति + मान-संख्या)। श्लोक संकेत करता है कि किरण-तीव्रता/पहुँच परिमाणवान है और “मानानि कति” से गिनी जाएगी; स्थिरांक या सूत्र यहाँ अनुपस्थित हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “मानानि” की बाद की परंपरा gnomon, shadow, और solar altitude से जुड़ती है—हमारे ecosystem में metrology (घटी-पल) और closed-form lagna/LST परत (MATHEMATICAL-AUDIT §8) काल-कोण का पुल हैं, किन्तु इस श्लोक का “कर-प्राप्ति” संख्यात्मक decode अभी प्रश्न-रूप में ही रहता है। JPL/Swiss यहाँ लक्ष्य नहीं, केवल cross-check उपकरण रहेंगे जब माप-सूत्र उत्तर-श्लोकों में खुलें।

दृष्टान्त (Illustrative Example) ग्रीष्म मध्याह्न में खुले आँगन में खड़े होकर छाया देखें—शंकु छोटी, सूर्य ऊँचा, किरणें तीव्र; हेमंत के उसी स्थान-उसी घड़ी में छाया लंबी, सूर्य नीचा, ताप मंद। “कर-प्राप्ति” वही quantifiable intensity है जो zenith-distance और दिन-दीर्घता से बदलती है। आगे यह अनुभूति शंकु-छाया-कर्ण की ज्यामिति में मापनीय बनेगी—मान (measures) गिनने का बीज यहीं बोया गया है। ऋतु-भेद अब केवल मौसम नहीं, optical-geometric data है।

12.9
एवं मे संशयं छिन्धि भगवन्भूतभावन ।
अन्यो न त्वां ऋते छेत्ता विद्यते सर्वदर्शिवान् ।।
evaṃ me saṃśayaṃ chindhi bhagavanbhūtabhāvana ।
anyo na tvāṃ ṛte chettā vidyate sarvadarśivān ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एवं = इस प्रकार; मे संशयम् = मेरा संदेह; छिन्धि = काट/दूर कर; भगवन् = हे भगवन्; भूतभावन = प्राणियों को भावित/पालित करने वाले; अन्यः = कोई दूसरा; त्वां ऋते = तुम्हें छोड़कर; छेत्ता = संशय-च्छेदक; विद्यते = विद्यमान है; सर्वदर्शिवान् = सर्वदर्शी।

हिन्दी भावार्थ शिष्य-वाणी में यह निवेदन है — “भगवन्, प्राण-जगत् को भावित करने वाले, मेरे इस संशय को आप ही छिन्न करें।” फिर स्पष्ट स्वीकार: “आपके बिना दूसरा छेत्ता उपलब्ध नहीं; आप ही सर्वदर्शी हैं।” अध्याय का यह श्लोक ज्ञान-याचना का द्वार है — गणना से पहले विश्वास और प्रश्न की विनम्रता।

English rendering “Thus, O Lord, sustainer of beings, cut asunder my doubt. Apart from you no other cutter of doubt exists, O all-seeing one.” The verse seals the disciple’s surrender: only the teacher who sees the whole can resolve what partial sight cannot.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/ज्ञान-याचना। यह श्लोक संख्या या कलन नहीं देता; यह उस विनम्र आधार को रचता है जिस पर आगे का गुह्य अध्यात्म-प्रकरण खुलता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) वैज्ञानिक प्रयोगशाला में भी गणना शुरू होने से पहले एक शर्त होती है—समस्या स्पष्ट हो, और शिक्षार्थी स्वीकारे कि उत्तर किसी प्रामाणिक स्रोत से आएगा। मय यहाँ वही द्वार खोलते हैं: संशय सूचीबद्ध हो चुका (पूर्व श्लोक), अब “छेत्ता” माँगा जाता है। “सर्वदर्शिवान्” कोई भाग्य-कथन नहीं; यह epistemic humility है—बिना गुरु-परंपरा और पूर्ण दृष्टि के खंडित प्रश्नों का समाधान अधूरा रहता है। ज्ञान-याचना गणना से पहले की विधि है।

12.10
इति भक्त्योदितं श्रुत्वा मयोक्तं वाक्यं अस्य हि ।
रहस्यं परं अध्यायं ततः प्राह पुनः स तम् ।।
iti bhaktyoditaṃ śrutvā mayoktaṃ vākyaṃ asya hi ।
rahasyaṃ paraṃ adhyāyaṃ tataḥ prāha punaḥ sa tam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति = इस प्रकार; भक्त्या उदितम् = भक्ति से उच्चरित; श्रुत्वा = सुनकर; मया उक्तम् = मेरे (मय) द्वारा कहा गया; वाक्यम् = वचन; अस्य हि = उसके ही (संदर्भ में); रहस्यम् परम् = परम रहस्य; अध्यायम् = अध्याय; ततः = तब; प्राह = बोले; पुनः = फिर; सः तम् = वे उसे।

हिन्दी भावार्थ मय कहते हैं — भक्ति से कहा मेरा यह वचन सुनकर सूर्यदेव ने पुनः उसे संबोधित किया। विषय अब साधारण ज्योतिष-कथन नहीं, “रहस्यं परं अध्यायम्” — परम-गुह्य अध्याय — है। श्लोक कथा-सूत्र को मोड़ता है: प्रश्न से उत्तर की ओर, शिष्य-वाणी से गुरु-उपदेश की ओर।

English rendering Having heard that speech of mine uttered in devotion, he then again addressed him with the supreme secret chapter. The narrative turns: the disciple’s plea becomes the gate to a deeper teaching.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/अध्याय-सूत्र। “परम रहस्य अध्याय” घोषणा है, कोई स्थिरांक या कलन नहीं — किन्तु पाठक को चेताता है कि आगे का प्रकरण दार्शनिक-सृष्टि-भाषा में चलेगा।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कथा-सूत्र यहाँ मोड़ लेता है जैसे कोई संवाद “प्रश्न-काल” से “पाठ-काल” में प्रवेश करे। मय का भक्त्योदित वाक्य सुना गया; अब वक्ता सूर्यदेव हैं, और विषय घोषित है—“रहस्यं परम् अध्यायम्”। पाठक के लिए संकेत साफ है: आगे का खंड केवल फल-सूची या पंचांग-नियम नहीं, अपितु cosmography-philosophy का गहन स्तर है जहाँ सृष्टि, आकाश-संरचना और काल-दृष्टि एक साथ खुलेंगे। शिष्य-वाणी बंद; गुरु-उपदेश आरंभ।

12.11
शृणुष्वैकमना भूत्वा गुह्यं अध्यात्म संज्ञितम् ।
प्रवक्ष्याम्यतिभक्तानां नादेयं विद्यते मम ।।
śṛṇuṣvaikamanā bhūtvā guhyaṃ adhyātma saṃjñitam ।
pravakṣyāmyatibhaktānāṃ nādeyaṃ vidyate mama ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शृणुष्व = सुनो; एकमनाः भूत्वा = एकाग्र मन होकर; गुह्यम् = गुप्त/रहस्य; अध्यात्म-संज्ञितम् = अध्यात्म नामक; प्रवक्ष्यामि = मैं कहूँगा; अतिभक्तानाम् = परम भक्तों के लिए; न अदेयम् = कुछ भी अदेय नहीं; विद्यते मम = मेरे पास (कुछ) है।

हिन्दी भावार्थ सूर्यदेव कहते हैं — “एकमन होकर सुनो: यह गुह्य, अध्यात्म-संज्ञित प्रकरण है।” प्रतिज्ञा दोहरी है: एक ओर गहन विषय; दूसरी ओर भक्ति की योग्यता — “अतिभक्तों के लिए मेरे पास कुछ अदेय नहीं।” ज्ञान-दान यहाँ गणना-तकनीक से पहले पात्रता और एकाग्रता की शर्त रखता है।

English rendering “Listen with one-pointed mind to the secret named adhyātma. I shall declare it; for those of highest devotion nothing of mine is not to be given.” Access is framed as devotion and attention, not as mere curiosity.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/गुह्य-उपक्रम। यह श्लोक “क्या गणना करें” नहीं, “किस भाव से सुनें” बताता है — अध्यात्म-प्रकरण का द्वार-मंत्र।

दृष्टान्त (Illustrative Example) जटिल ephemeris-तालिका पढ़ते समय यदि मन बिखरा हो, तो सूत्र सही होने पर भी अर्थ नहीं टिकता—सूर्यदेव पहले “एकमना भूत्वा” कहते हैं, क्योंकि गुह्य-अध्यात्म प्रकरण ध्यान की माँग करता है। “अतिभक्तानां नादेयम्” का ठोस अर्थ: पात्रता और श्रद्धा ज्ञान-दान की शर्त हैं, छिपाव की नहीं—जो एकाग्र और योग्य है, उसके लिए यह रहस्य रोका नहीं जाता। गणना-तकनीक से पहले concentration और adhikāra—यह dual प्रतिज्ञा अध्याय का द्वारपाल है।

12.12
वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः ।
अव्यक्तो निर्गुणः शान्तः पञ्चविंशात्परो अव्ययः ।।
vāsudevaḥ paraṃ brahma tanmūrtiḥ puruṣaḥ paraḥ ।
avyakto nirguṇaḥ śāntaḥ pañcaviṃśātparo avyayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वासुदेवः = वासुदेव; परं ब्रह्म = परम ब्रह्म; तत्-मूर्तिः = उसकी मूर्ति/स्वरूप; पुरुषः परः = परम पुरुष; अव्यक्तः = अव्यक्त; निर्गुणः = गुण-रहित; शान्तः = शांत; पञ्चविंशात् परः = पच्चीस (तत्त्वों) से परे; अव्ययः = अविनाशी (पाठ-चिह्न +अव्ययः — आलोचनात्मक पाठ में चिह्नित)।

हिन्दी भावार्थ वासुदेव ही परम ब्रह्म हैं; उनकी मूर्ति परम पुरुष है। वे अव्यक्त, निर्गुण, शांत हैं — और “पञ्चविंशात् परः” अर्थात् सांख्य की पच्चीस तत्त्व-शृंखला से भी परे, अव्यय। सृष्टि-वर्णन से पहले यह श्लोक उस अचल आधार को नाम देता है जिसकी छाया में आगे जल, अण्ड और आदित्य की भाषा खुलती है।

English rendering Vāsudeva is the supreme Brahman; his form is the supreme Puruṣa — unmanifest, without guṇas, peaceful, beyond the twenty-fifth principle, the imperishable. Before cosmology unfolds, the text names the ground that does not change.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका। “पञ्चविंश” = 25 — सांख्य-तत्त्व-गणना का संकेत (पुरुष पच्चीसवाँ; “तत्पर” = उससे परे); यह ज्योतिष-स्थिरांक नहीं, तत्त्व-श्रेणी का दार्शनिक अंक है। पाठ-चिह्न +अव्ययः पर पाठ-भेद संभव; अर्थ-रेखा अव्यय/अविनाशी ही रहती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) सांख्य की पच्चीस तत्त्व-शृंखला—पुरुष, प्रकृति, महत्, अहंकार, मन, तन्मात्र, इंद्रिय, महाभूत—जगत की विश्लेषण-सीढ़ी है; यह श्लोक कहता है कि वासुदेव उस सीढ़ी के भी पार हैं, अव्यय। खगोलीय मॉडल आगे जल-अण्ड-आदित्य की भाषा में चलेगा, पर उसका metaphysical ground यहाँ नामित है: अव्यक्त-निर्गुण-शांत आधार, जिसकी “मूर्ति” परम पुरुष। जैसे coordinate-frame तय किए बिना orbit नहीं खिंचती, वैसे ही सृष्टि-वर्णन से पहले अचल आधार घोषित होता है।

12.13
प्रकृत्यन्तर्गतो देवो बहिरन्तश्च सर्वगः ।
सङ्कर्षणो अपः सृष्ट्वादौ तासु वीर्यं अवासृजत् ।।
prakṛtyantargato devo bahirantaśca sarvagaḥ ।
saṅkarṣaṇo apaḥ sṛṣṭvādau tāsu vīryaṃ avāsṛjat ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रकृति-अन्तर्गतः = प्रकृति के भीतर स्थित; देवः = देव; बहिः अन्तः च = बाहर और भीतर; सर्वगः = सर्वव्यापी; सङ्कर्षणः = संकर्षण; अपः सृष्ट्वा आदौ = आदि में जल रचकर (पाठ-चिह्न +अपः); तासु = उनमें; वीर्यम् = वीर्य/बीज; अवासृजत् = प्रक्षेपित/डाला।

हिन्दी भावार्थ वह देव प्रकृति के भीतर भी है और बाहर-भीतर सर्वग है। संकर्षण ने आदि में जल रचे, फिर उन्हीं जलों में अपना वीर्य डाला। सृष्टि यहाँ “शून्य से पदार्थ” नहीं, क्रमबद्ध परंपरा है — जल पहले, बीज उनमें, फिर अण्ड (अगला श्लोक)। यह पौराणिक-सृष्टि-भाषा है, ग्रह-मध्यमा का सूत्र नहीं।

English rendering The god abides within Prakṛti and is all-pervading without and within. Saṅkarṣaṇa, having first created the waters, cast his seed into them. Creation is told as sequence: waters, then the generative deposit that will become the cosmic egg.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/सृष्टि-क्रम। कोई युग-दिन, भगण या स्फुट-कलन नहीं; “आदौ अपः → वीर्य” केवल ब्रह्माण्ड-उत्पत्ति की कथा-सीढ़ी है। +अपः पर पाठ-भेद संभव; जल-अर्थ ही प्रसंग-संगत है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) यहाँ सृष्टि “शून्य से अचानक पदार्थ” नहीं, क्रमबद्ध pipeline है—पहले आपः (जल), फिर उनमें वीर्य (बीज-शक्ति), आगे अण्ड। संकर्षण-नाम की यह पौराणिक-वैष्णव भाषा ग्रह-मध्यमा का सूत्र नहीं; यह cosmogonic sequence है जिसमें तरल आधार पहले आता है, गर्भ-अवस्था बाद में। तुलना के लिए: जैसे astronomical model में reference plane तय कर ग्रह रखते हैं, वैसे यहाँ प्रकृति-अंतर्गत सर्वग देव पहले जल-क्षेत्र रचते हैं। अगला श्लोक उसी बीज को हिरण्य-अण्ड बनाएगा।

12.14
तदण्डं अभवद्धैमं सर्वत्र तमसावृतम् ।
तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतः सनातनः ।।
tadaṇḍaṃ abhavaddhaimaṃ sarvatra tamasāvṛtam ।
tatrāniruddhaḥ prathamaṃ vyaktībhūtaḥ sanātanaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत् अण्डम् = वह अण्ड; अभवत् = हुआ; हैमम् = सुवर्णमय/हिरण्मय; सर्वत्र = चारों ओर; तमसा आवृतम् = तमस् से आच्छादित; तत्र = उसमें; अनिरुद्धः = अनिरुद्ध; प्रथमम् = सबसे पहले; व्यक्तीभूतः = व्यक्त हुआ; सनातनः = सनातन/नित्य।

हिन्दी भावार्थ वह (बीज-गर्भ) सुवर्ण-अण्ड बना — सर्वत्र अंधकार से ढका। उसी अण्ड में सनातन अनिरुद्ध सबसे पहले व्यक्त हुए। अव्यक्त से व्यक्त की पहली रेखा: अण्ड-अवस्था, तम-आवरण, फिर अनिरुद्ध का आविर्भाव। सृष्टि-कथा अब ब्रह्माण्ड-गर्भ की भाषा बोलती है।

English rendering That became a golden egg, covered everywhere by darkness. Therein the eternal Aniruddha first became manifest. The verse marks the turn from seed-in-waters to the enclosed cosmic egg and the first divine appearance within it.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/सृष्टि-प्रतीक। “हैम अण्ड” और “तमसावृत” माप या कोण नहीं देते; वे ब्रह्माण्ड-गर्भ के शास्त्रीय रूपक हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) हिरण्यगर्भ-कल्पना—सुवर्ण-अण्ड, सर्वत्र तमसा आवृत—विश्व को एक बंद, अभी-अप्रकाशित potenz के रूप में देखती है। उसी गर्भ में सनातन अनिरुद्ध “प्रथमं व्यक्तीभूतः”: अव्यक्त से व्यक्त की पहली रेखा खिंचती है। यह खगोल-संख्या नहीं, cosmological metaphor है—अंधकार-आवरण टूटे बिना न प्रकाश, न दिशा, न काल-माप। पाठक याद रखे: आगे जब भूगोल और कक्षाएँ आएँगी, वे इसी “व्यक्त जगत” के अंदर की संरचनाएँ होंगी; यह श्लोक उस जगत के उद्घाटन-क्षण को चिह्नित करता है।

12.15
हिरण्यगर्भो भगवानेष छन्दसि पठ्यते ।
आदित्यो ह्यादिभूतत्वात्प्रसूत्या सूर्य उच्यते ।।
hiraṇyagarbho bhagavāneṣa chandasi paṭhyate ।
ādityo hyādibhūtatvātprasūtyā sūrya ucyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) हिरण्यगर्भः = हिरण्यगर्भ; भगवान् एषः = ये भगवान्; छन्दसि = वेद/छन्द में; पठ्यते = पढ़े/कहे जाते हैं; आदित्यः = आदित्य; हि = ही/क्योंकि; आदि-भूतत्वात् = आदि-भूत होने से; प्रसूत्या = प्रसूति/जनन-शक्ति से; सूर्यः उच्यते = सूर्य कहा जाता है।

हिन्दी भावार्थ वेद-छन्द में इन्हीं भगवान् को हिरण्यगर्भ कहा गया है। आदि-भूत होने से वे आदित्य हैं; प्रसूति — जगत् को प्रसूत करने की क्रिया — के कारण सूर्य कहलाते हैं। एक ही तत्त्व के तीन नाम: हिरण्यगर्भ (गर्भ-रूप), आदित्य (आदि-उद्भव), सूर्य (प्रसूति-कर्ता)। नाम-व्युत्पत्ति यहाँ खगोल-मध्यमा नहीं, सत्ता-क्रम की भाषा है।

English rendering This Lord is recited in the Veda as Hiraṇyagarbha. Because he is the first-arisen, he is Āditya; by his generative bringing-forth he is called Sūrya. One reality, three names — womb of gold, first-born light, the Sun as producer.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक/नाम-व्युत्पत्ति। “आदिभूतत्वात् / प्रसूत्या” व्युत्पत्ति-युक्ति हैं, कोई भगण-संख्या या दिन-गणना नहीं — किन्तु ग्रंथ के सूर्य-अधिकार का दार्शनिक मूल यहाँ नामित होता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही आकाश-देह को तीन कोणों से देखिए: जब वह अदृश्य गर्भ-शक्ति की तरह सृष्टि-पूर्व की सम्भावना में बैठता है तो वह हिरण्यगर्भ है; जब उसी को «सबसे पहले प्रकट होने वाला» आदि-उद्भव माना जाता है तो वह आदित्य है; और जब वह जगत् को प्रसूत करने वाले कर्ता के रूप में गिना जाता है तो वह सूर्य है। यह तीन नाम तीन अलग पिण्ड नहीं — एक ही solar-principle के तीन ontological layers हैं, ठीक जैसे एक ही नदी को स्रोत, धारा और मुहाना कहना अलग-अलग स्थान नहीं, एक प्रवाह की तीन अवस्थाएँ हैं। नाम-व्युत्पत्ति यहाँ ephemeris की language नहीं, existence-order की भाषा है — और यही क्रम आगे अध्याय १–२ में मध्यम-सूर्य की गणना का दार्शनिक पृष्ठभूमि बनेगा।

12.16
परं ज्योतिस्तमः पारे सूर्यो अयं सवितेति च ।
पर्येति भुवनानेष भावयन्भूतभावनः ।।
paraṃ jyotistamaḥ pāre sūryo ayaṃ saviteti ca ।
paryeti bhuvanāneṣa bhāvayanbhūtabhāvanaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परं ज्योतिः = परम ज्योति; तमः पारे = तम के पार; सूर्यः अयम् = यह सूर्य (पाठ-चिह्न +अयम्); सविता इति च = सविता भी कहा जाता है; पर्येति = परिक्रमा करता है; भुवनान् = लोकों को; एषः = यह; भावयन् = भावित/पुष्ट करते हुए; भूतभावनः = भूतों का भावक/पालक।

हिन्दी भावार्थ तम के पार परम ज्योति — यही सूर्य, यही सविता। लोकों का पर्यटन करते हुए यह भूतभावन प्राण-जगत् को भावित करता है। कथा अब स्थिर नाम से चलत् रूप की ओर मुड़ती है: ज्योति जो केवल गर्भ में नहीं, भुवन-परिक्रमा में भी “भावन” है। खगोल की भाषा में बाद के अध्याय इसी सूर्य को मध्यम-स्फुट की रीति से गिनेंगे; यहाँ वह अभी ज्योति और पालक के रूप में स्तुत है।

English rendering He is the supreme light beyond darkness; this Sūrya is also called Savitṛ. Circling the worlds, this sustainer of beings causes them to flourish. The verse closes the name-chain (Hiraṇyagarbha–Āditya–Sūrya–Savitṛ) with motion: light that goes round and vivifies.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति/वर्णन। “पर्येति भुवनान्” परिक्रमा का काव्यात्मक संकेत है, कोई युग-भगण या दिन-मान नहीं देता; संख्यात्मक सूर्य-गति अन्य अध्यायों के भगण-सूत्रों में बँधती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) प्रातः पूर्व-दिगन्त में क्षितिज के पार से जो ज्योति निकलती है, वही इस श्लोक का «तमः पारे परं ज्योतिः» — अन्धकार की दीवार के पीछे बैठी वह प्रकाश-राशि, जिसे वेद सविता भी कहता है। दिनभर वह भुवनों का पर्यटन करता है: मध्याह्न पर चरम-बिन्दु, सायंकाल पश्चिम-क्षितिज — यही «पर्येति भुवनानि» का प्रत्यक्ष sky-observation है। यहाँ सूर्य अभी formula नहीं; वह भूतभावन है — प्राण-जगत् को जगाता हुआ घूमता ज्योति। यही पर्यटन-रूप आगे अध्याय १–३ में अहोरात्र-वृद्धि, उदयास्त और मध्यम-स्फुट की गणितीय भाषा में बाँधा जाएगा।

12.17
प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः ।
ऋचो अस्य मण्डलं सामान्युस्त्रामूर्तिर्यजूंषि च ।।
prakāśātmā tamohantā mahānityeṣa viśrutaḥ ।
ṛco asya maṇḍalaṃ sāmānyustrāmūrtiryajūṃṣi ca ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रकाशात्मा = प्रकाश-स्वरूप आत्मा; तमोहन्ता = अन्धकार का हनन करने वाला; महान् = महान्/विशाल; इत्य् एष विश्रुतः = इस रूप में प्रसिद्ध; ऋचः = ऋग्वेद की ऋचाएँ; अस्य मण्डलम् = इसका (सूर्य का) मण्डल/बिम्ब; सामानि = साम-मन्त्र; उष् = किरणें/प्रकाश; त्रामूर्तिः = त्रयी-मूर्ति (त्रिवेदीय स्वरूप); यजूंषि = यजुर्वेद के मन्त्र।

हिन्दी भावार्थ यह सूर्य प्रकाशात्मा है — उसका स्वभाव ही ज्योति है — और वही तम का हनन करता है; महान् होने से वह इस रूप में जगत् में विश्रुत है। उसकी मूर्ति में वेद स्वयं बसते हैं: ऋचाएँ उसके मण्डल (बिम्ब) हैं, साम उसकी उज्ज्वल किरणें हैं, और यजुस् उसकी त्रयी-मूर्ति हैं। यहाँ स्तुति मात्र अलंकार नहीं — सूर्य को वेद-रूप में देखने का यह वाक्य आगे के काल-चक्र और सृष्टि-क्रम का द्वार खोलता है।

English rendering He is the luminous Self, the destroyer of darkness, the Great — thus is he famed. The Ṛc verses are his orb, the Sāmans his rays, and the Yajus his threefold form: the Veda itself is spoken as the body of the Sun.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति/दैवी-रूपक। संख्या या एल्गोरिद्म यहाँ नहीं; सूर्य को त्रयी-वेदरूप में देखने का यह रूपक अध्याय के काल- और सृष्टि-वर्णन की दार्शनिक भूमि तैयार करता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) सूर्योदय के क्षण कल्पना कीजिए: क्षितिज पर एक गोल मण्डल (disk) — श्लोक कहता है, यही ऋचाएँ हैं; उससे निकलती चमकदार किरण-रेखाएँ — यही साम; और तीनों वेदों का एकत्र रूप — यही यजुस् की त्रयी-मूर्ति। यह केवल काव्य-अलंकार नहीं: वैदिक परम्परा में सूर्य को वेद-रूप देखना काल-चक्र और यज्ञ-क्रम का द्वार खोलता है — क्योंकि वेद-पाठ स्वयं दिन-रात्रि, पक्ष-मास और संवत्सर पर टिका है। आगे जब ग्रन्थ त्रयी को काल-आत्मा से जोड़ेगा (१२.१८) और संवत्सर को रथ-चक्र बनाएगा (१२.१९), तब यह वैदिक-सूर्य-दृष्टि सीधे astronomical calendar की नींव बन जाएगी।

12.18
त्रयीमहो अयं भगवाण् कालात्मा कालकृद्विभुः ।
सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वं अस्मिन्प्रतिष्ठितम् ।।
trayīmaho ayaṃ bhagavāṇ kālātmā kālakṛdvibhuḥ ।
sarvātmā sarvagaḥ sūkṣmaḥ sarvaṃ asminpratiṣṭhitam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रयीमहः = त्रयी (तीनों वेद) का महात्म्य/तेज; अयम् भगवান্ = यह भगवान्; कालात्मा = काल का आत्मा; कालकृत् = काल का कर्ता; विभुः = व्यापक प्रभु; सर्वात्मा = सबका आत्मा; सर्वगः = सर्वत्रगामी; सूक्ष्मः = अतिसूक्ष्म; सर्वम् अस्मिन् प्रतिष्ठितम् = सब कुछ इसी में प्रतिष्ठित।

हिन्दी भावार्थ यह भगवान् त्रयी-मह है — तीनों वेदों का तेज उसी में समाया है। वही कालात्मा और कालकृत् है: काल न तो उससे बाहर है, न उसके बिना चलता है; वही विभु, सर्वात्मा, सर्वग और सूक्ष्म है। और निष्कर्ष सीधा है — सर्वं अस्मिन् प्रतिष्ठितम्: जितना जगत् है, उतना इसी काल-स्वरूप सूर्य-तत्त्व में टिका हुआ है।

English rendering This Blessed Lord is the glory of the threefold Veda — the Self of Time, the maker of Time, the all-pervading. He is the Self of all, present everywhere, subtle beyond grasp; and in him the whole of existence is established.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका (काल-तत्त्व)। यहाँ काल को देव-स्वरूप कहा गया है; माप की इकाई या युग-दिन-संख्या इस श्लोक में नहीं आती — वे अन्य अध्यायों के कैनन-चयन का विषय हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) जब पाठ कहता है «कालात्मा कालकृत्», तो हमारा काम उसी काल को मापने योग्य बनाना था — 1 दिन = 60 घटी = 3,600 पल = 2,16,000 विपल = 21,600 प्राण (गिनती-संगति, भौतिक समीकरण नहीं)। महायुग के नागरिक दिनों का कैनन-चयन (SS: 1,57,79,17,828 बनाम आर्यभट: 1,57,79,17,500) इसी «कालकृत्» ढाँचे को इंजन में उतारने का निर्णायक कदम है; 328 दिनों का अन्तर तithi-इंजन पर सबसे सीधा पड़ता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) घड़ी की सुई नहीं, सूर्य की दैनिक-वार्षिक गति ही काल का मापदण्ड है — यही «कालात्मा कालकृत्» का ठोस अर्थ: काल सूर्य से बाहर कोई स्वतन्त्र नदी नहीं; सूर्योदय-अस्त, पक्ष, अयन, संवत्सर — सब उसी की गति से गिने जाते हैं। भारतीय गणितीय-खगोल में दिन, तिथि, मास और युग सूर्य (और चन्द्र) की स्थिति से परिभाषित होते हैं; अतः «सर्वं अस्मिन् प्रतिष्ठितम्» यहाँ mysticism नहीं, metrology है — माप-व्यवस्था सूर्य-तत्त्व पर टिकी है। यही विचार बाद में अहर्गण, भगण और कल्पावधि की संख्याओं में गणित बनेगा — जहाँ काल को सूर्य-गति की इकाई में गिना जाता है।

12.19
रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम् ।
छन्दांस्यश्वाः सप्त युक्ताः पर्यटत्येष सर्वदा ।।
rathe viśvamaye cakraṃ kṛtvā saṃvatsarātmakam ।
chandāṃsyaśvāḥ sapta yuktāḥ paryaṭatyeṣa sarvadā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) रथे विश्वमये = विश्वमय रथ में; चक्रम् = पहिया; कृत्वा = बनाकर; संवत्सरात्मकम् = संवत्सर-स्वरूप; छन्दांसि = वेद-छन्द; अश्वाः = घोड़े; सप्त युक्ताः = सात जुड़े हुए; पर्यटति एष सर्वदा = यह सर्वदा परिभ्रमण करता है।

हिन्दी भावार्थ विश्वमय रथ पर बैठकर यह सूर्य-तत्त्व संवत्सर को ही अपना चक्र बना लेता है — वर्ष ही पहिया है, काल ही गति है। उस रथ में सात छन्द घोड़े की तरह जुते हैं, और इन्हीं के साथ वह सदा पर्यटन करता रहता है। यहाँ काव्य और खगोल एक ही चित्र में मिलते हैं: आकाश-पथ पर सूर्य की निरन्तर यात्रा को वैदिक छन्द-सप्तक की भाषा में बाँधा गया है।

English rendering Making the year itself the wheel of his all-encompassing chariot, and yoking the seven metres as horses, he travels forever. The annual cycle is cast as the turning of the cosmic car.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — काल-रूपक/वर्णन। «संवत्सरात्मक चक्र» वर्ष को गति-इकाई के रूप में स्थापित करता है; युग-दिन-गणना और ग्रह-भगण इसी वार्षिक चक्र की दीर्घ-श्रृंखला पर टिकते हैं, किन्तु संख्या इस श्लोक में नहीं दी गई।

हमारा डिकोड (Our Decode) संवत्सर को चक्र मानना हमारे integer-bhagaṇa mean-longitude उपकरण की जड़ है — महायुग = 43,20,000 वर्ष, और उसी पर SS-कैनन 1,57,79,17,828 नागरिक दिन। वर्ष-चक्र की यह काव्यात्मक प्रतिमा गणित में «revolutions per Mahāyuga» की गिनती बन जाती है; synodic परीक्षण में SS-कैनन का −0.1 rev deficit आर्यभटीय −11.2 rev से कहीं सूक्ष्मतर बैठता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक वर्ष को पहिया मानिए: ३६०° का पूर्ण भगण (या परम्परागत संवत्सर-चक्र) — वही संवत्सरात्मकं चक्रम्। उस रथ में जुते सात छन्द (गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुभ्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुभ्, जगती) घोड़े की तरह काल को खींचते हैं — वैदिक काव्य में छन्द-सप्तक और सूर्य-पथ का यह युग्म प्राचीन है, और यहीं काव्य-चित्र खगोल से मिलता है। आकाश में सूर्य की निरन्तर ecliptic-यात्रा को «सदा पर्यटति» कहा गया है: न थकान, न विराम — केवल वर्ष-चक्र का घूमता पहिया। आगे अध्याय १ में संवत्सर, अयन और ऋतु की गणना ठीक इसी «वर्ष = चक्र» रूपक को संख्या में उतारेगी।

12.20
त्रिपादं अमृतं गुह्यं पादो अयं प्रकटो अभवत् ।
सो अहङ्कारं जगत्सृष्ट्यै ब्रह्माणं असृजत्प्रभुः ।।
tripādaṃ amṛtaṃ guhyaṃ pādo ayaṃ prakaṭo abhavat ।
so ahaṅkāraṃ jagatsṛṣṭyai brahmāṇaṃ asṛjatprabhuḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिपादम् = तीन पाद; अमृतम् = अमृत/अमर; गुह्यम् = गुप्त/अप्रकट; पादः अयम् = यह एक पाद; प्रकटः अभवत् = प्रकट हुआ; सः प्रभुः = वह प्रभु; अहङ्कारम् = अहंकार-तत्त्व; जगत्सृष्ट्यै = जगत् की सृष्टि के लिए; ब्रह्माणम् असृजत् = ब्रह्मा को रचा।

हिन्दी भावार्थ उसका त्रिपाद अमृत और गुह्य है — तीन चौथाई अदृश्य, अक्षय, छिपा हुआ। जो प्रकट हुआ, वह केवल एक पाद है: दृश्य जगत् उसी एक पाद का विस्तार है। उसी प्रकट अंश से, जगत्-सृष्टि के हेतु, प्रभु ने अहङ्कार-रूप में ब्रह्मा को उत्पन्न किया। पुरुष-सूक्त की गूँज यहाँ स्पष्ट है — पूर्ण का अधिकांश गुप्त रहता है; सृष्टि «एक पाद» से खुलती है।

English rendering Three quarters of him are immortal and hidden; this one quarter became manifest. From that manifest portion the Lord, for the sake of world-creation, brought forth Brahmā as the principle of ahaṅkāra.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका (पुरुष-पाद / सृष्टि-आरम्भ)। «त्रिपाद / एक पाद» अनुपात यहाँ प्रतीकात्मक है, न कि गणना-सूत्र; आगे के श्लोक उसी प्रकट पाद से मन, भूत और ग्रह-क्रम खोलते हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद १०.९०) का familiar अनुपात यहाँ खगोलीय-सत्ता पर चढ़ाया गया है: पूर्ण का तीन-चौथाई अमृत-गुह्य — अदृश्य, अक्षय; केवल एक पाद प्रकट, और दृश्य जगत् उसी एक पाद का विस्तार। ice-berg की तरह सोचिए: पानी के ऊपर दिखता tip पूरा पर्वत नहीं; नीचे का विशाल भाग छिपा रहता है — पर यहाँ रूपक भौतिक नहीं, ontological है: measurable cosmos प्रकट अंश है, पूर्ण का अधिकांश गुप्त। उसी प्रकट अंश से अहङ्कार-रूप ब्रह्मा की उत्पत्ति — सृष्टि-कथा का next node — आगे १२.२१–२४ में ब्रह्मा → मन → भूत → ग्रह की श्रृंखला में खुलती है।

12.21
तस्मै वेदान्वरान्दत्त्वा सर्वलोकपितामहम् ।
प्रतिष्ठाप्याण्डमध्ये अथ स्वयं पर्येति भावयन् ।।
tasmai vedānvarāndattvā sarvalokapitāmaham ।
pratiṣṭhāpyāṇḍamadhye atha svayaṃ paryeti bhāvayan ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मै = उस (ब्रह्मा) को; वेदान् वरान् = श्रेष्ठ वेद; दत्त्वा = देकर; सर्वलोकपितामहम् = सब लोकों के पितामह; प्रतिष्ठाप्य = स्थापित करके; अण्डमध्ये = ब्रह्माण्ड/अण्ड के मध्य में; अथ = फिर; स्वयं पर्येति = स्वयं परिभ्रमण करता है; भावयन् = भावित करते हुए/धारण-चिन्तन करते हुए।

हिन्दी भावार्थ प्रभु ने उस सर्वलोक-पितामह ब्रह्मा को वर-रूप वेद प्रदान किए, और उसे अण्ड के मध्य में प्रतिष्ठित किया — सृष्टिकर्ता को ब्रह्माण्ड के केन्द्र-स्थान पर बैठाया। फिर स्वयं? स्वयं वह पर्येति भावयन् — अण्ड के भीतर घूमता रहता है, जगत् को भावित करता हुआ। सृष्टि सौंपने के बाद भी सूर्य-तत्त्व निश्चेष्ट नहीं; वह मध्य में स्थापित ब्रह्मा के साथ-साथ स्वयं भी निरन्तर गतिशील धारण-शक्ति बना रहता है।

English rendering Having bestowed the excellent Vedas upon him — the grandfather of all worlds — and set him at the centre of the cosmic egg, the Lord himself continues to revolve, sustaining all by his presence of mind.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-वर्णन/दैवी-व्यवस्था। «अण्डमध्ये प्रतिष्ठा» और «स्वयं पर्येति» स्थान-कक्षा का दार्शनिक चित्र हैं; स्पष्ट भगण, दिन-संख्या या स्फुट-सूत्र यहाँ नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) रचनाकार को मंच के मध्य में बिठाकर स्वयं प्रकाश-व्यवस्था संभालने वाले निर्देशक की तरह कल्पना कीजिए: प्रभु ब्रह्मा को अण्ड-मध्य में प्रतिष्ठित करता है — सृष्टिकर्ता ब्रह्माण्ड-केन्द्र पर — और उसे वर-रूप वेद सौंपता है। पर सूर्य-तत्त्व खुद निश्चेष्ट नहीं बैठता; «स्वयं पर्येति भावयन्» — वह अण्ड के भीतर घूमता रहता है, जगत् को धारण-शक्ति से भावित करता हुआ। खगोलीय दृष्टि से यह चित्र later geocentric models से मिलता-जुलता तनाव रखता है: केन्द्र में सृष्टि-कर्ता का स्थान, और सूर्य की निरन्तर पर्यटन-गति — जो आगे मध्यम-सूर्य और भू-परिधि की गणना में mathematical motion बन जाएगी, यहाँ अभी cosmological agency है।

12.22
अथ सृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माहङ्कारमूर्तिभृत् ।
मनसश्चन्द्रमा जज्ञे सूर्यो अक्ष्णोस्तेजसां निधिः ।।
atha sṛṣṭyāṃ manaścakre brahmāhaṅkāramūrtibhṛt ।
manasaścandramā jajñe sūryo akṣṇostejasāṃ nidhiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = फिर; सृष्ट्याम् = सृष्टि के लिए; मनः चक्रे = मन को रचा; ब्रह्मा अहङ्कारमूर्तिभृत् = अहङ्कार-मूर्ति धारण करने वाला ब्रह्मा; मनसः = मन से; चन्द्रमा जज्ञे = चन्द्र उत्पन्न हुआ; सूर्यः = सूर्य; अक्ष्णोः = दोनों नेत्रों से; तेजसां निधिः = तेजों का निधि/भण्डार।

हिन्दी भावार्थ अब सृष्टि का अगला चरण: अहङ्कार-मूर्ति ब्रह्मा ने सृष्टि के हेतु मन उत्पन्न किया। मन से चन्द्रमा जन्मा; और नेत्रों से — तेज का वह भण्डार — सूर्य प्रकट हुआ। क्रम ध्यान देने योग्य है: पहले अन्तःकरण (मन), फिर चन्द्र-सूर्य की जोड़ी — ज्योतिषीय प्रकाश-युगल को यहाँ मानस-सृष्टि की सन्तान कहा गया है, न कि केवल आकाश-पिण्ड।

English rendering Then Brahmā, wearing the form of ahaṅkāra, produced Mind for the work of creation. From Mind the Moon was born; from the eyes, the Sun — treasure-house of all brilliance.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-क्रम/वर्णन। चन्द्र-सूर्य की उत्पत्ति यहाँ तत्त्व-क्रम में है; मन्द-परिधि (सूर्य 14°/13°40′, चन्द्र 32°/31°40′ — युग्म/ओज अन्त, २.३४) या स्फुट-एल्गोरिद्म अध्याय 2 का विषय है, इस श्लोक का नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) सृष्टि का क्रम यहाँ telescope से नहीं, अन्तःकरण से शुरू होता है: पहले मन, फिर मन से चन्द्र, नेत्र-तेज से सूर्य — प्रकाश-युगल को मानस-सृष्टि की सन्तान कहा गया है। रात्रि में चन्द्र की शीतल ज्योति और दिन में सूर्य का प्रखर तेज — यही जोड़ी आँखों के सामने है; पर श्लोक उन्हें केवल sky-bodies नहीं, consciousness-sequence की उपज मानता है। ज्योतिष-परम्परा में चन्द्र को मनस् और सूर्य को आत्मन्/दृष्टि से जोड़ना later texts में भी चलता है; यहाँ बीज-रूप में वही pairing है। आगे जब चन्द्र-सूर्य की तिथि, करण और ग्रहण गिने जाएँगे, तब यह «मानस-ज्योति युगल» सीधे observational astronomy की इकाई बन जाएगा।

12.23
मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात् ।
गुणैकवृद्ध्या पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे ।।
manasaḥ khaṃ tato vāyuragnirāpo dharā kramāt ।
guṇaikavṛddhyā pañcaiva mahābhūtāni jajñire ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मनसः = मन से; खम् = आकाश; ततः = उसके बाद; वायुः = वायु; अग्निः = अग्नि; आपः = जल; धरा = पृथ्वी; क्रमात् = क्रम से; गुणैकवृद्ध्या = एक-एक गुण की वृद्धि से; पञ्च एव = केवल पाँच; महाभूतानि जज्ञिरे = महाभूत उत्पन्न हुए।

हिन्दी भावार्थ मन से पहले आकाश जन्मा; फिर क्रमशः वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — पाँचों महाभूत। «गुणैकवृद्ध्या» सूत्र की कुंजी है: प्रत्येक अगला भूत पिछले गुणों पर एक नया गुण जोड़ता है (शब्द → स्पर्श → रूप → रस → गन्ध)। इस प्रकार सृष्टि यहाँ यादृच्छिक नहीं, गुण-वृद्धि की सीढ़ी है — सूक्ष्म से स्थूल की ओर पाँच पग।

English rendering From Mind arose space; then, in order, air, fire, water, and earth. By the successive addition of one quality each, the five great elements were born.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — तत्त्व-क्रम/सांख्य-शैली वर्णन। «गुणैकवृद्धि» एक क्रमिक नियम है (प्रत्येक महाभूत में एक गुण अधिक), किन्तु संख्यात्मक नियतांक या कोण-सूत्र नहीं देता।

दृष्टान्त (Illustrative Example) पाँच पगों की सीढ़ी बनाइए — प्रत्येक अगले पग पर एक नया गुण जुड़ता है: आकाश (शब्द) → वायु (शब्द+स्पर्श) → अग्नि (शब्द+स्पर्श+रूप) → जल (…+रस) → पृथ्वी (…+गन्ध)। «गुणैकवृद्ध्या» का अर्थ random creation नहीं, cumulative property ladder है — सूक्ष्म से स्थूल की ओर नियत क्रम। यह ढाँचा सांख्य-वैशेषिक की पञ्च-महाभूत चर्चा से स्पष्टतः जुड़ा है; सूर्यसिद्धान्त उसे सृष्टि-अध्याय में रखकर आगे ग्रहों की उत्पत्ति (१२.२४) का आधार बनाता है। यहाँ philosophy physical cosmology की table of contents लिख रही है — अगला श्लोक उसी सीढ़ी पर अङ्गारक आदि को बिठाएगा।

12.24
अग्नीषोमौ भानुचन्द्रौ ततस्त्वङ्गारकादयः ।
तेजोभूखाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे ।।
agnīṣomau bhānucandrau tatastvaṅgārakādayaḥ ।
tejobhūkhāmbuvātebhyaḥ kramaśaḥ pañca jajñire ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अग्नीषोमौ = अग्नि और सोम; भानुचन्द्रौ = सूर्य और चन्द्र; ततः = उसके बाद; तु अङ्गारकादयः = अङ्गारक (मङ्गल) आदि; तेजः-भू-ख-अम्बु-वातेभ्यः = तेज, पृथ्वी, आकाश, जल, वायु से; क्रमशः = क्रम से; पञ्च जज्ञिरे = पाँच उत्पन्न हुए।

हिन्दी भावार्थ अग्नि-सोम ही भानु-चन्द्र बने — सूर्य अग्नि-रूप, चन्द्र सोम-रूप। फिर अङ्गारक आदि पाँच ग्रह क्रमशः पाँच महाभूतों से जन्मे: तेज से, पृथ्वी से, आकाश से, जल से, वायु से। श्लोक का क्रम स्पष्ट है — पहले प्रकाश-युगल (सूर्य-चन्द्र), फिर पञ्च-तारा (मङ्गल से शनि तक) तत्वों की श्रृंखला पर। यह सृष्टि-कथा का खगोलीय पड़ाव है: ग्रह अब केवल प्रकाश-बिन्दु नहीं, भूत-सन्तान हैं।

English rendering Agni and Soma became the Sun and the Moon. Then the five beginning with Mars were born in order from fire, earth, space, water, and wind.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — सृष्टि-वर्णन (ग्रह-भूत संगति)। यहाँ तत्त्व→ग्रह का क्रम दिया है, न कि भगण, परिधि या स्फुट; मन्द/शीघ्र स्थिरांक और चतुःपद स्फुट-पुनरावृत्ति (अध्याय 2) अलग परत हैं — `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` उसी गणना-परत को शुद्ध SS-शृंखला में बाँधता है, इस उत्पत्ति-कथा को नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) पहले प्रकाश-युगल: अग्नि → भानु (सूर्य), सोम → चन्द्र — दिन-रात्रि के दो नायक। फिर पञ्च-तारा, पाँच भूतों से क्रमशः: परम्परागत pairing में मङ्गल तेज/अग्नि-सन्तान, बुध पृथ्वी-संबद्ध, बृहस्पति आकाश-तत्त्व, शुक्र जल, शनि वायु — श्लोक «तेजोभूखाम्बुवातेभ्यः» से ठीक यही भूत-शृंखला खोलता है। ग्रह अब केवल night-sky के चमकते बिंदु नहीं; वे महाभूत-सन्तान हैं — तत्व-क्रम का खगोलीय पड़ाव। यही ग्रह आगे अध्याय १–२ में भगण, शीघ्रोच्च-मन्दोच्च और स्फुट-फल की पूरी गणितीय मशीनरी से गिने जाएँगे; यहाँ उनकी जन्म-कथा भूत-भाषा में कही गई है।

12.25
पुनर्द्वादशधात्मानं व्यभजद्राशिसञ्ज्ञकम् ।
नक्षत्ररूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी ।।
punardvādaśadhātmānaṃ vyabhajadrāśisañjñakam ।
nakṣatrarūpiṇaṃ bhūyaḥ saptaviṃśātmakaṃ vaśī ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पुनः = फिर; द्वादशधा = बारह प्रकार से; आत्मानम् = अपने को; व्यभजत् = बाँटा; राशि-सञ्ज्ञकम् = राशि-संज्ञक (द्वादश राशियाँ); नक्षत्र-रूपिणम् = नक्षत्र-रूप धारण कर; भूयः = पुनः; सप्तविंशात्मकम् = सत्ताईस-अंगी (२७); वशी = संयमी/स्वाधीन (भगवान्)।

हिन्दी भावार्थ सृष्टिकर्ता ने अपने को फिर बारह भागों में विभक्त किया और उन भागों को राशि नाम दिया। तदनन्तर उन्होंने नक्षत्र-रूप धारण कर अपने को सत्ताईस अंगों में बाँटा। यह विभाजन मात्र नाम-करण नहीं, बल्कि आकाश-वृत्त को समय और दिशा मापने योग्य इकाइयों में संगठित करने की पहली सीढ़ी है।

English rendering Again the self-mastered Lord divided Himself twelve-fold and named those divisions the rāśis. Assuming further the form of the nakṣatras, He made Himself twenty-seven-fold.

गणित / The Mathematics द्वादश राशियाँ = १२; सप्तविंश नक्षत्र = २७। पूर्ण वृत्त ३६०° पर:
१ राशि = ३६०° ÷ १२ = ३०°;
१ नक्षत्र (समान विभाग मानने पर) = ३६०° ÷ २७ = १३°२०′ = ८००′।
(नक्षत्र-पद्धति में पद/चरण आदि आगे के अध्यायों में सूक्ष्म होते हैं; यहाँ मूल संख्या-युगल १२ और २७ ही दिया गया है।)

उदाहरण (worked example) किसी ग्रह का मध्य-रेखांश λ = ९५°२०′ हो तो:
राशि-सूचकांक = floor(९५°२०′ ÷ ३०°) = ३ → कर्क (० = मेष से गिनती);
राश्यांश = ९५°२०′ − ३ × ३०° = ५°२०′ कर्क।
नक्षत्र-सूचकांक = floor(९५°२०′ ÷ १३°२०′) = floor(९५.३३३… ÷ १३.३३३…) = ७ → मघा (० = अश्विनी से); शेष ≈ १°५३′ मघा में।

हमारा डिकोड (Our Decode) math-core.js का mean-longitude उपकरण और vedic-ghadi का tithi/nākṣatra substrate दोनों इसी १२ × ३०° तथा २७-भाग ढाँचे पर चलते हैं। २१,६०० prāṇa/दिन ↔ २१,६००′/वृत्त की गिनती-संगति भी उसी “वृत्त को पूर्णांक इकाइयों में बाँटना” की परंपरा की अगली कड़ी है — भौतिक समता नहीं, गणना-सुविधा का संवाद।

12.26
ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् ।
ऊर्ध्वमध्याधरेभ्यो अथ स्रोतोभ्यः प्रकृतीः सृजन् ।।
tataścarācaraṃ viśvaṃ nirmame devapūrvakam ।
ūrdhvamadhyādharebhyo atha srotobhyaḥ prakṛtīḥ sṛjan ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तब; चराचरम् = चर और अचर; विश्वम् = सम्पूर्ण जगत्; निर्ममे = रचा; देव-पूर्वकम् = देवों से आरम्भ कर; ऊर्ध्व-मध्य-अधरेभ्यः = ऊर्ध्व, मध्य और अधर; अथ = फिर (पाठ में +अथ सन्धि/पाठभेद-चिह्न); स्रोतोभ्यः = स्रोतों से; प्रकृतीः = प्रवृत्तियाँ/मूल प्रकृति-रूप; सृजन् = सृजन करते हुए।

हिन्दी भावार्थ तदनन्तर उन्होंने देव-पूर्व चराचर विश्व की रचना की। ऊर्ध्व, मध्य और अधर — तीन स्तरों के स्रोतों से प्रकृतियों को क्रमशः प्रवाहित कर सृष्टि का विस्तार किया। यह श्लोक खगोलीय अंक नहीं गिनता; वह उस त्रिस्तरीय लोक-रचना का चित्र खींचता है जिसके भीतर आगे ब्रह्माण्ड, कक्षा और भूगोल स्थित होंगे।

English rendering Then He fashioned the whole universe of moving and unmoving beings, beginning with the gods. From the upper, middle, and lower streams He brought forth the prakṛtis in turn.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका/सृष्टि-वर्णन। यहाँ “ऊर्ध्व–मध्य–अधर” बाद के गोल-विन्यास (ब्रह्माण्ड, व्योमकक्षा, भूगोल) की स्थानिक कल्पना की भूमि तैयार करता है, न कि किसी संख्या-नियतांक का।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए एक tri-layer जल-तरंग: ऊपर से भाप (ऊर्ध्व-स्रोत), बीच से नदी का प्रवाह (मध्य-स्रोत), नीचे से भूमिगत झरना (अधर-स्रोत) — तीनों मिलकर एक ही घाटी को सींचते हैं, पर प्रत्येक का “स्तर” अलग रहता है। सूर्यसिद्धान्त की यह सृष्टि-चित्र भी उसी प्रकार ऊर्ध्व–मध्य–अधर स्रोतों से प्रकृतियों को क्रमशः उंडेलता है; चराचर विश्व कोई अचानक-उगता दृश्य नहीं, स्रोत-क्रम से फैला हुआ विस्तार है। आगे जब अध्याय में लोक, कक्षा और भूगोल आएँगे, वे इसी त्रिस्तरीय “ढाँचे” के भीतर बैठेंगे — जैसे घाटी में खेत, गाँव और सड़क एक ही जल-व्यवस्था पर टिके हों।

12.27
गुणकर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् ।
विभागं कल्पयामास यथास्वं वेददर्शनात् ।।
guṇakarmavibhāgena sṛṣṭvā prāgvadanukramāt ।
vibhāgaṃ kalpayāmāsa yathāsvaṃ vedadarśanāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुण-कर्म-विभागेन = गुण और कर्म के विभाग से; सृष्ट्वा = रचकर; प्राक्-वत् = पहले की भाँति; अनुक्रमात् = क्रम से; विभागम् = बाँट/व्यवस्था; कल्पयामास = स्थापित किया; यथा-स्वम् = प्रत्येक के स्वभावानुसार; वेद-दर्शनात् = वेद के दर्शन/उपदेश से।

हिन्दी भावार्थ गुण और कर्म के भेद के अनुसार, पूर्व-क्रम का अनुसरण करते हुए, उन्होंने सृष्टि रची। फिर वेद-दर्शन के अनुसार प्रत्येक के योग्य विभाग की व्यवस्था की — यानी नाम, स्थान और कार्य का निर्धारण “मनमाना” नहीं, शास्त्र-दृष्टि से यथास्वम्। यह व्यवस्था-श्लोक है: गणना-सूत्र से पहले विधि और वर्गीकरण का नियम।

English rendering Having created according to the division of qualities and actions, in the former sequence, He established the allotment of each according to its own nature, as taught by the Veda.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका/व्यवस्था-विधि। “यथास्वम् वेददर्शनात्” यह याद दिलाता है कि सिद्धान्त में वर्गीकरण (ग्रह/नक्षत्र/लोक) स्रोत-परंपरा से बँधा है; आधुनिक “हम” भी जब दिन-गणना या ayanāṃśa चुनते हैं तो canon-choice को स्पष्ट घोषित करते हैं, छिपाते नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) आधुनिक cataloging की कल्पना कीजिए: तारे spectral type (O, B, A…) से, ग्रह orbital class से, और जीव ecological niche से अलग-अलग बक्सों में रखे जाते हैं — मनमाने नाम नहीं, गुण और कर्म (role) के भेद से। यह श्लोक उसी व्यवस्था-बुद्धि का वैदिक रूप है: सृष्टि “जैसी-तैसी” नहीं, गुणकर्म-विभाग और वेद-दर्शन के “यथास्वम्” नियम से बाँटी जाती है। गणना-सूत्र बाद में आते हैं; पहले विधि — कौन किस कोटि में, किस क्रम में, किस कार्य से। यही classification-rule आगे खगोलीय पिंडों और लोक-वर्गों की सूची का आधार बनेगा।

12.28
ग्रहनक्षत्रतारानां भूमेर्विश्वस्य वा विभुः ।
देवासुरमनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ।।
grahanakṣatratārānāṃ bhūmerviśvasya vā vibhuḥ ।
devāsuramanuṣyāṇāṃ siddhānāṃ ca yathākramam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-नक्षत्र-तारानाम् = ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओं का; भूमेः = पृथ्वी का; विश्वस्य = विश्व का; वा = अथवा; विभुः = व्यापक प्रभु; देव-असुर-मनुष्याणाम् = देव, असुर, मनुष्य; सिद्धानाम् = सिद्धों का; च = और; यथा-क्रमम् = यथाक्रम।

हिन्दी भावार्थ ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं — तथा भूमि और समस्त विश्व — का विभु यथाक्रम देव, असुर, मनुष्य और सिद्धों के विभागों की भी व्यवस्था करता है। पिछला श्लोक “विभाग कल्पयामास” कहता है; यह श्लोक बताता है कि वह विभाग किन-किन वर्गों पर लागू होता है — आकाश के पिंडों से लेकर चेतन लोकों तक।

English rendering Of the planets, lunar mansions, and stars, of the earth and of the world at large — the all-pervading Lord (allotted stations) of gods, asuras, humans, and siddhas likewise, each in due order.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन/वर्गीकरण-सूची। ग्रह–नक्षत्र–तारा का त्रिविध खगोल-वर्ग आगे अध्याय के कक्षा-क्रम (१२.३०–३१) और भूगोल-केंद्र (१२.३२) का विषय-सूची है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक museum-gallery में घूमें: एक दीवार पर solar system के ग्रह, दूसरी पर star-map के नक्षत्र-तार, तीसरी पर पृथ्वी का globe, और बगल के कक्ष में मनुष्य–सिद्ध–देवासुर जैसी चेतन-श्रेणियों के “नामपट्ट”। यह श्लोक ठीक वैसी व्यापक inventory खोलता है — अचेतन आकाश-पिंड से लेकर चेतन लोकों तक — और कहता है कि विभु का विभाग इन सब पर यथाक्रम लागू होता है। पिछला पद “विभाग कल्पयामास” कहता है; यहाँ पता चलता है कि catalog की पंक्तियाँ कितनी दूर तक जाती हैं। आगे का गणित इन्हीं वर्गों में से कुछ को मापने योग्य बनाएगा; बाकी लोक-वर्णन के रूप में ही रहेंगे।

12.29
ब्रह्माण्डं एतत्सुषिरं तत्रेदं भूर्भुवादिकम् ।
कटाहद्वितयस्येव सम्पुटं गोलकाकृति ।।
brahmāṇḍaṃ etatsuṣiraṃ tatredaṃ bhūrbhuvādikam ।
kaṭāhadvitayasyeva sampuṭaṃ golakākṛti ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्माण्डम् = ब्रह्म का अंडा/ब्रह्माण्ड; एतत् = यह; सुषिरम् = भीतर से खोखला; तत्र = उसमें; इदम् = यह; भूर्-भुव-आदिकम् = भूलोक, भुवर्लोक आदि; कटाह-द्वितयस्य = दो कड़ाहों/कटोरों के; इव = समान; सम्पुटम् = जुड़े ढक्कन-सा युग्म; गोलक-आकृति = गोलाकार आकृति।

हिन्दी भावार्थ यह ब्रह्माण्ड सुषिर — भीतर रिक्त — है; उसी में भूर्, भुवः आदि लोक स्थित हैं। उसकी आकृति दो कड़ाहों को आमने-सामने जोड़कर बने सम्पुट जैसी है, अर्थात् पूर्ण गोलक। पृथ्वी “समतल थाली” नहीं, और आकाश “खुला गुम्बद” भर नहीं — बल्कि एक बंद, गोलाकार पात्र-कल्पना है जिसके भीतर आगे कक्षा-परिधियाँ चलेंगी।

English rendering This brahmāṇḍa is hollow; within it lie the worlds of Bhūḥ, Bhuvaḥ, and the rest. Its form is spherical — like a closed pair of cauldrons fitted face to face as a saṃpuṭa.

गणित / The Mathematics ज्यामितीय मॉडल (सूत्र नहीं, रूप-कल्पना): ब्रह्माण्ड = सुषिर गोलक (hollow sphere / paired hemispheres → full sphere)। भूर्-भुवादिक लोक उसी आंतरिक आयतन में स्तरित। कोई संख्या-नियतांक यहाँ नहीं; केवल topology: closed spherical container।

हमारा डिकोड (Our Decode) bharat-ephemeris का gola-thinking — lagna/bhāva-madhya, RA(MC) ≡ LST — इसी “गोलकाकृति” आधार पर बंद वृत्त और ३६०° समष्टि मानता है। MATHEMATICAL-AUDIT §8 में arcs sum ३६०°, kendras ३०° की invariants इसी गोलाकार आकाश-पात्र की गणना-भाषा हैं।

12.30
ब्रह्माण्डमध्ये परिधिर्व्योमकक्षाभिधीयते ।
तन्मध्ये भ्रमणं भानां अधो अधः क्रमशस्तथा ।।
brahmāṇḍamadhye paridhirvyomakakṣābhidhīyate ।
tanmadhye bhramaṇaṃ bhānāṃ adho adhaḥ kramaśastathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्रह्माण्ड-मध्ये = ब्रह्माण्ड के मध्य में; परिधिः = परिधि/वृत्त; व्योम-कक्षा = आकाश-कक्षा; अभिधीयते = कही जाती है; तत्-मध्ये = उसके भीतर; भ्रमणम् = चक्कर; भानाम् = नक्षत्रों/ज्योति-पिंडों का; अधः + अधः = नीचे-नीचे (पाठ में +अधः); क्रमशः = क्रम से; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ ब्रह्माण्ड के मध्य की वह परिधि व्योमकक्षा कही जाती है। उसी के भीतर ज्योति-पिंडों का भ्रमण है — और वे कक्षाएँ क्रमशः अधोऽधः, अर्थात् एक-दूसरे से नीचे-नीचे स्तरित हैं। यह एक वाक्य में “कक्षा-सीढ़ी” स्थापित करता है: सबसे बाहर/ऊपर से भीतर/नीचे की ओर घटती कक्षाएँ।

English rendering At the mid-region of the brahmāṇḍa the circumference is called the sky-orbit (vyoma-kakṣā). Within it the luminaries revolve, each successive orbit set lower than the last.

गणित / The Mathematics कक्षा-क्रम (geocentric nesting): व्योमकक्षा = बाह्य/संदर्भ परिधि; भानां भ्रमणं अधोऽधः क्रमशः ⇒ r₁ > r₂ > r₃ > … (बाह्य से आंतरिक)। संख्याएँ यहाँ नहीं; संरचना-नियम है कि ग्रह-पथ एक ही तल/गोल-व्यवस्था में संकेंद्रित (या लगभग संकेंद्रित) स्तरों में बैठते हैं — अगला श्लोक नाम-क्रम देगा।

हमारा डिकोड (Our Decode) kaal_surya_siddhanta_sphuta.py का madhya → manda → śīghra प्रवाह और math-core का integer-bhagaṇa mean-longitude synthesis दोनों “एक गोल-आकाश में स्तरित कक्षाएँ” मानकर ही अर्थ रखते हैं। Outer graha के लिए śīghrocca = mean Sun जैसी SS Chapter-2 नियम-रेखाएँ इसी nested-kakṣā दृष्टि से जुड़ती हैं।

12.31
मन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुक्रेन्दुजेन्दवः ।
परिभ्रमन्त्यधोअधःस्थाः सिद्ध्हविद्याधरा घनाः ।।
mandāmarejyabhūputrasūryaśukrendujendavaḥ ।
paribhramantyadhoadhaḥsthāḥ siddhhavidyādharā ghanāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्द = शनि (मंद-गति); अमर-इज्य = बृहस्पति (अमरों का इज्य); भू-पुत्र = मंगल; सूर्य = सूर्य; शुक्र = शुक्र; इन्दु-ज = बुध (चन्द्र-पुत्र); इन्दवः = चन्द्रमा; परिभ्रमन्ति = चक्कर लगाते हैं; अधोऽधः-स्थाः = नीचे-नीचे स्थित; सिद्धाः = सिद्ध; विद्याधराः = विद्याधर; घनाः = घन/मेघ (या सघन पिंड) — पाठ “सिद्ध्ह” ≈ सिद्ध (संभव लेखन-रूप)।

हिन्दी भावार्थ शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्र — ये अधोऽधः स्थित होकर परिभ्रमण करते हैं। उनके बीच/साथ सिद्ध, विद्याधर और घन भी उसी स्तर-क्रम में जुड़े हुए वर्णित हैं। ग्रह-सूची बाह्य से आंतरिक है: सबसे “ऊपर/बाहर” मन्द (शनि), सबसे “नीचे/भीतर” इन्दु (चन्द्र)। यह सूर्यसिद्धान्त की कक्षा-सीढ़ी का नाम-पट्ट है।

English rendering Saturn, Jupiter, Mars, the Sun, Venus, Mercury, and the Moon revolve, each stationed lower than the one before. Siddhas, vidyādharas, and the dense (clouds/hosts) likewise occupy those descending levels.

गणित / The Mathematics कक्षा-क्रम (बाह्य → आंतरिक), SS geocentric stack:
१. शनि (मन्द)
२. गुरु (अमरिज्य)
३. मंगल (भूपुत्र)
४. सूर्य
५. शुक्र
६. बुध (इन्दुज)
७. चन्द्र (इन्दु)

⇒ r_शनि > r_गुरु > r_मंगल > r_सूर्य > r_शुक्र > r_बुध > r_चन्द्र।
स्पष्ट (sphuṭa) में: बाह्य ग्रह — madhya ग्रह का, śīghrocca = mean Sun; आंतरिक (बुध/शुक्र) — madhya = mean Sun, śīghrocca = heliocentric mean; सूर्य/चन्द्र — केवल manda। (SS Ch.2; epicycle mean R: सूर्य १३°५०′, चन्द्र ३१°५०′, मंगल ७३.५°, बुध २९°, गुरु ३२.५° — २.३४–३८ से, इस श्लोक में संख्या नहीं।)

उदाहरण (worked example) मान लें mean longitudes (किसी युग-क्षण पर, SS day-count १,५७७,९१७,८२८ civil days/Mahāyuga convention):
L̄_मंगल = २००°, L̄_सूर्य = ८०°। बाह्य ग्रह नियम: κ_manda = L̄ − mandocca; फिर ४-चरण SS iteration (half-manda → half-śīghra → full-manda → full-śīghra) में K_śīghra = L̄_सूर्य − L_manda-corrected। कक्षा-क्रम बताता है कि मंगल की “नीची” कक्षा सूर्य की śīghra-कक्षा से जुड़ती है — सूर्य स्वयं सूची में मंगल के ठीक “नीचे” बैठता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) kaal_surya_siddhanta_sphuta.py (sealed २०२६-०५-१७) शुद्ध SS Chapter-2 manda+śīghra chain चलाता है — Western theorem श्रृंखला में नहीं। bīja प्रयोग (मंगल +३०, गुरु −५१, शनि +६१ revs/Mahāyuga) planet−Sun relative-rate corrections हैं, absolute नहीं; Option ii absolute re-fit नहीं लगाया, क्योंकि वह synodic ज्यामिति बिगाड़ देता। यह श्लोक वही “कौन किस कक्षा पर” का शास्त्र-मानचित्र है जिस पर mean → sphuṭa की सीढ़ी टिकी है।

12.32
मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति ।
बिभ्रानः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मकाम् ।।
madhye samantādaṇḍasya bhūgolo vyomni tiṣṭhati ।
bibhrānaḥ paramāṃ śaktiṃ brahmaṇo dhāraṇātmakām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मध्ये = मध्य में; समन्तात् = चारों ओर से; अण्डस्य = अंड/ब्रह्माण्ड का; भू-गोलः = पृथ्वी-गोलक; व्योम्नि = आकाश में; तिष्ठति = स्थित है; बिभ्राणः = धारण किये हुए; परमाम् शक्तिम् = परम शक्ति; ब्रह्मणः = ब्रह्म की; धारणा-आत्मकाम् = धारण/स्थापन-स्वरूप।

हिन्दी भावार्थ ब्रह्माण्ड-अंड के बीचों-बीच, चारों ओर व्योम से घिरा, भूगोल आकाश में स्थित है। वह ब्रह्म की धारणात्मक परम शक्ति को धारण किये हुए है — अर्थात् पृथ्वी मात्र “भार” नहीं, बल्कि समस्त कक्षा-व्यवस्था का केंद्र-स्तंभ है। इससे स्पष्ट होता है: सिद्धान्त का आधार-दृश्य भूकेंद्रित गोलक है, न कि सूर्यकेंद्र की आधुनिक कल्पना; गणना उसी आधार पर आगे बढ़ती है।

English rendering At the centre of the cosmic egg, on every side, the earth-globe stands in the sky, bearing Brahman’s supreme power whose very nature is to uphold and sustain.

गणित / The Mathematics ज्यामितीय अभिगृहीत (axiom of the model): भूगोल = ब्रह्माण्ड-मध्य का केंद्रीय गोलक; ग्रह-पथ (१२.३०–३१) उसके चारों ओर। निर्देश-तंत्र: geocentric; “व्योम्नि तिष्ठति” = आकाश-माध्यम में निलंबित/स्थित, न कि अनंत नींव पर। संख्या नहीं; frame choice है — mean longitudes, lagna, bhāva सभी इसी केंद्र से मापे जाते हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) MATHEMATICAL-AUDIT §8 का closed-form ascendant (λ, φ, obliquity, sidereal time) और bhāva-madhya (lagna/MC/IC/DSC + quadrant trisection) इसी भूकेंद्रित गोल पर Swiss-fixture से ≤०.१° सहमत सत्यापित हैं; RA(MC) ≡ LST to १e−९°। अनुशासन: यह mean-longitude synthesis lab है, production true-position ephemeris का दावा नहीं — “धारणात्मक शक्ति” का काव्य-चित्र, गणना में exact `==` oracle fixtures से जुड़ा रहता है, tolerance-band से नहीं।

12.33
तदन्तरपुटाः सप्त नागासुरसमाश्रयाः ।
दिव्यौषधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ।।
tadantarapuṭāḥ sapta nāgāsurasamāśrayāḥ ।
divyauṣadhirasopetā ramyāḥ pātālabhūmayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तद्-अन्तर-पुटाः = उनके बीच की परतें/पुट; सप्त = सात; नाग-असुर-समाश्रयाः = नागों व असुरों के आश्रय; दिव्य-औषधि-रस-उपेताः = दिव्य औषधि और रस से युक्त; रम्याः = मनोहर; पाताल-भूमयः = पाताल की भूमियाँ।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी की उन परतों के बीच सात मनोहर पाताल-भूमियाँ हैं। वे नागों और असुरों के निवास-स्थल कही गई हैं। उनमें दिव्य औषधियाँ और उनके रस विद्यमान हैं। यह अध्याय की भौगोलिक-काल्पनिक परत-रचना का निचला विस्तार है — ऊपर के भूगोल से जुड़ा, पर अलग लोक-वर्णन।

English rendering Between those intervening strata lie seven delightful Pātāla lands, abodes of nāgas and asuras, furnished with divine herbs and their essences.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (पाताल-भूमियों की संख्या व गुण)। सात की गिनती यहाँ रचनात्मक-भौगोलिक है; कोई कोण, भगण या दिन-माप नहीं दिया गया।

दृष्टान्त (Illustrative Example) खनन-शास्त्र की layered earth की कल्पना करें — crust, mantle, core — पर सूर्यसिद्धान्त यहाँ वैज्ञानिक भूगर्भ नहीं, सात पाताल-भूमियों का काव्यात्मक “नीचे का विस्तार” खींचता है: नाग–असुर-आश्रय, दिव्य औषधि और रस। यह ऊपर के भौगोलिक वर्णन का mirror-image है — जैसे पहाड़–समुद्र–द्वीप ऊपर फैले, वैसे ही “अन्तरपुट” नीचे सजाए गए। याद रखें: यह layer-model observation-table नहीं है; यह उसी अध्याय की cosmographic stack का अधोभाग है, जिससे पाठक समझे कि शास्त्र पृथ्वी को केवल सतह नहीं, बहु-मंजिला लोक-चित्र मानता है।

12.34
अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयो गिरिः ।
भूगोलमध्यगो मेरुरुभयत्र विनिर्गतः ।।
anekaratnanicayo jāmbūnadamayo giriḥ ।
bhūgolamadhyago merurubhayatra vinirgataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अनेक-रत्न-निचयः = अनेक रत्नों का समूह; जाम्बूनद-मयः = जाम्बूनद-स्वर्णमय; गिरिः = पर्वत; भूगोल-मध्य-गः = भूगोल के मध्य में स्थित; मेरुः = मेरु; उभयत्र = दोनों ओर; विनिर्गतः = निकला हुआ/उभरा हुआ।

हिन्दी भावार्थ मेरु पर्वत अनेक रत्नों से भरा और जाम्बूनद स्वर्ण का बना कहा गया है। वह भूगोल — गोल पृथ्वी — के मध्य में स्थित है। और वह दोनों ओर (ऊपर तथा नीचे) निकला हुआ है। यहाँ “भूगोल” शब्द ही यह स्पष्ट करता है कि पृथ्वी को गोल माना गया है; मेरु उस गोले का ध्रुवीय-मध्य अक्ष-सदृश केन्द्र-बिन्दु है।

English rendering Meru, a mountain of many jewels and of jāmbūnada gold, stands at the centre of the earth-sphere (bhūgola) and projects outward on both sides.

गणित / The Mathematics सूत्र नहीं, पर ज्यामितीय स्थापना है — मेरु ≡ भूगोल का केन्द्र (अक्ष-ध्रुव-कल्पना), उभयत्र निर्गमन = दोनों गोलार्धों की ओर उभार। कोणीय माप या भगण यहाँ नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “भूगोल” की गोल-पृथ्वी धारणा ही वह आधार है जिस पर later lagna/bhāva परत बंद-रूप (longitude, latitude, obliquity, sidereal time) से चलती है — MATHEMATICAL-AUDIT §8। मेरु यहाँ पौराणिक-ज्यामितीय केन्द्र है; इंजन में वह literal pole-object नहीं, बल्कि spherical-earth convention का शास्त्र-संकेत है।

12.35
उपरिष्टात्स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः ।
अधस्तादसुरास्तद्वद्द्विषन्तो अन्योन्यं आश्रिताः ।।
upariṣṭātsthitāstasya sendrā devā maharṣayaḥ ।
adhastādasurāstadvaddviṣanto anyonyaṃ āśritāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपरिष्टात् = ऊपर; स्थिताः = स्थित; तस्य = उसके (मेरु के); सेन्द्राः = इन्द्र सहित; देवाः = देव; महर्षयः = महर्षि; अधस्तात् = नीचे; असुराः = असुर; तद्वत् = उसी प्रकार; द्विषन्तः = परस्पर द्वेष रखने वाले; अन्योन्यम् = एक-दूसरे से; आश्रिताः = आश्रित/निवास करते।

हिन्दी भावार्थ मेरु के ऊपर इन्द्र सहित देव और महर्षि निवास करते हैं। नीचे उसी प्रकार असुर बसे हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रति द्वेष रखते हुए अपने-अपने आश्रय में हैं। (पाठ में `+अन्योन्यं` उपकरण-चिह्न है — अन्योन्य-संबंध का पाठ स्पष्ट ही है।) यह देवासुर-विभाजन की ऊर्ध्व-अधः व्यवस्था है।

English rendering Above Meru dwell the gods with Indra and the great seers; below, likewise, the asuras — mutually hostile, each settled in their own domain.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (मेरु के ऊपर-नीचे लोक-विन्यास)। दिशा “उपरिष्टात् / अधस्तात्” यहाँ ध्रुवीय-अक्ष की कल्पना से जुड़ती है, संख्या नहीं देती।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मेरु को एक ऊँचे axis-peak की तरह सोचें: शिखर पर “उत्तर-ध्रुवीय प्रांगण” — सेन्द्र देव और महर्षि; तलहटी के नीचे “दक्षिण-छाया का आश्रय” — असुर। दोनों पक्ष एक ही पर्वत-अक्ष के दो छोरों पर बैठे हैं, और पाठ स्पष्ट कहता है — अन्योन्य द्वेष रखते हुए अपने-अपने स्थान में। यह mythic north–south bipolarity का दृश्य है, न कि युद्ध की घटना-सूची। आगे जब दिन–रात्रि और अयन का गणित देव/असुर-अंशों से जुड़ेगा, यही ऊर्ध्व–अधः निवास उस द्वि-ध्रुवीय प्रतीक का आधार रहेगा।

12.36
ततः समन्तात्परिधिः क्रमेणायं महार्णवः ।
मेखलेव स्थितो धात्र्या देवासुरविभागकृत् ।।
tataḥ samantātparidhiḥ krameṇāyaṃ mahārṇavaḥ ।
mekhaleva sthito dhātryā devāsuravibhāgakṛt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तदनन्तर/उससे; समन्तात् = चारों ओर; परिधिः = घेरा/परिधि; क्रमेण = क्रम से; अयम् = यह; महार्णवः = महासागर; मेखला-इव = करधनी के समान; स्थितः = स्थित; धात्र्याः = पृथ्वी (धात्री) का; देव-असुर-विभाग-कृत् = देव-असुर का विभाग करने वाला।

हिन्दी भावार्थ फिर चारों ओर क्रम से यह महार्णव परिधि-रूप में फैला है। वह पृथ्वी की मेखला — करधनी — के समान स्थित है। और वही देवासुर-विभाग का सीमा-रेखा भी है। अर्थात् विशाल सागर भूगोल को घेरकर दो लोक-क्षेत्रों को अलग रखता है।

English rendering All around, in due order, this great ocean stands as a circumference — like a girdle of the earth — and marks the division between gods and asuras.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — ज्यामितीय वर्णन (परिधि = मेखला)। “परिधिः” शब्द वृत्त-घेरे की भाषा है; संख्या या त्रिज्या यहाँ नहीं दी गई।

दृष्टान्त (Illustrative Example) मानचित्र पर Antarctic Circumpolar Current या भूमध्यरेखीय महासागर-पट्टी देखें — पानी पृथ्वी को मेखला-सा घेरता है और जलवायु-क्षेत्रों को बाँटता है। सूर्यसिद्धान्त का महार्णव उसी intuition का पौराणिक-खगोलीय रूप है: परिधि-रूप सागर धात्री की करधनी, और साथ ही देवासुर-विभाग की सीमा-रेखा। यानी समुद्र केवल “पानी का विस्तार” नहीं, cosmographic divider है — दो लोक-क्षेत्रों को अलग रखने वाली belt। बाद के श्लोक जब दिन-विभाग और दिशा-व्यवस्था बाँटेंगे, यह mekhalā-सीमा वह अदृश्य “किनारा” बनी रहेगी जिसके इधर-उधर नियम बदलते दिखेंगे।

12.37
समन्तान्मेरुमध्यात्तु तुल्यभागेषु तोयधेः ।
द्वीपिषु दिक्षु पूर्वादिनगर्यो देवनिर्मिताः ।।
samantānmerumadhyāttu tulyabhāgeṣu toyadheḥ ।
dvīpiṣu dikṣu pūrvādinagaryo devanirmitāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) समन्तात् = चारों ओर; मेरु-मध्यात् = मेरु के मध्य से; तु = और; तुल्य-भागेषु = समान भागों में; तोय-धेः = समुद्र के; द्वीपिषु = द्वीपों/वर्षों में; दिक्षु = दिशाओं में; पूर्वादि = पूर्व आदि; नगर्यः = नगरियाँ; देव-निर्मिताः = देव-निर्मित।

हिन्दी भावार्थ मेरु के मध्य से चारों ओर, समुद्र के तुल्य (समान) भागों में, द्वीपों की दिशाओं — पूर्व से आरम्भ — में देव-निर्मित नगरियाँ स्थापित हैं। यह अगले श्लोकों की चार महानगरियों की भूमिका है: समान चाप-भागों पर चार दिशाओं में चार नगर।

English rendering All around from Meru’s centre, in equal segments of the ocean, in the directions beginning with the east, stand cities built by the gods upon the island-continents.

गणित / The Mathematics तुल्यभाग = समान विभाजन; चार दिशाएँ ⇒ भूवृत्त का चार सम-भाग (प्रत्येक 1/4 परिधि = 90° चाप)। अगले श्लोक “भूवृत्तपाद” से यही स्पष्ट होगा।

उदाहरण (worked example) यदि भू-परिधि को C मानें, तो प्रत्येक तुल्य भाग = C/4। कोणीय देशान्तर-अन्तर (भूमध्य-रेखा पर) = 360°/4 = 90°। दिन के 60 घड़ी में 1/4 दिन = 15 घड़ी = 6 घंटे का स्थानीय-समयान्तर — यही चार-नगरी फ्रेम की काल-ज्यामिति है (परंपरा: 1 दिन = 60 घड़ी; MATHEMATICAL-AUDIT §1)।

12.38
भूवृत्तपादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता ।
भद्राश्ववर्षे नगरी स्वर्णप्राकारतोरणा ।।
bhūvṛttapāde pūrvasyāṃ yamakoṭīti viśrutā ।
bhadrāśvavarṣe nagarī svarṇaprākāratoraṇā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भू-वृत्त-पादे = भू-वृत्त के चौथाई भाग पर; पूर्वस्याम् = पूर्व दिशा में; यमकोटी इति = यमकोटी नाम से; विश्रुता = प्रसिद्ध; भद्राश्व-वर्षे = भद्राश्व वर्ष में; नगरी = नगरी; स्वर्ण-प्राकार-तोरणा = स्वर्ण प्राकार और तोरण वाली।

हिन्दी भावार्थ भू-वृत्त के एक पाद — परिधि के चौथाई — पर, पूर्व दिशा में, भद्राश्व वर्ष में यमकोटी नाम की प्रसिद्ध नगरी है। उसके प्राकार और तोरण स्वर्णमय कहे गए हैं। यह चार भूमध्य-रेखीय निर्देश-नगरों की पहली कड़ी है।

English rendering At a quarter of the earth’s circumference, in the east, in the Bhadrāśva continent, stands the renowned city Yamakoṭī, with golden walls and gateways.

गणित / The Mathematics भूवृत्तपाद = (1/4) × भू-परिधि। भूमध्य-रेखीय चाप: Δλ = 90°। स्थानीय सूर्योदय-समयान्तर (सामान्य गोल-पृथ्वी, समान अक्षांश ≈ 0° मानकर): Δt = (90/360) × 1 दिन = 1/4 दिन = 15 घड़ी = 6 h। (घड़ी-पद्धति: 1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल — dossier metrology।)

उदाहरण (worked example) मान लें भू-त्रिज्या R (यहाँ संख्या नहीं दी; केवल अनुपात)। चाप-लंबाई एक पाद = (2πR)/4 = πR/2। यमकोटी से लङ्का तक (अगला पाद) पुनः 90° देशान्तर — कुल पूर्व→दक्षिण चाप 90°। समय: 15 घड़ी।

हमारा डिकोड (Our Decode) चार-नगरी भूमध्य-रेखा फ्रेम सिद्धान्त-ज्योतिष की देशान्तर/दिन-गणना की पृष्ठभूमि है; लङ्का-शून्य रेखा पर चलने वाली मध्य-रेखांश प्रयोगशाला (math-core) इसी गोलाकार भू-मॉडल को लेती है। घड़ी-मेट्रोलॉजी (60 घड़ी/दिन) से 90° ≡ 15 घड़ी का मानचित्र सीधा जुड़ता है — PHYSICAL equality नहीं, count correspondence की तरह (MATHEMATICAL-AUDIT §1)।

12.39
याम्यायां भारते वर्षे लङ्का तद्वन्महापुरी ।
पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता ।।
yāmyāyāṃ bhārate varṣe laṅkā tadvanmahāpurī ।
paścime ketumālākhye romakākhyā prakīrtitā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्यायाम् = दक्षिण दिशा में; भारते वर्षे = भारत वर्ष में; लङ्का = लङ्का; तद्वत् = उसी प्रकार; महापुरी = महापुरी; पश्चिमे = पश्चिम में; केतुमाल-आख्ये = केतुमाल नामक (वर्ष) में; रोमक-आख्या = रोमक नाम से; प्रकीर्तिता = कही गई।

हिन्दी भावार्थ दक्षिण दिशा में, भारत वर्ष में, उसी प्रकार लङ्का महापुरी है। पश्चिम में, केतुमाल वर्ष में, रोमक नाम की नगरी प्रसिद्ध है। इस प्रकार पूर्व की यमकोटी के बाद दक्षिण-पश्चिम की दो नगरियाँ — लङ्का और रोमक — भूवृत्त के अगले पादों पर बैठती हैं।

English rendering To the south, in the Bhārata continent, stands likewise the great city Laṅkā; to the west, in the continent called Ketumāla, the city known as Romaka is proclaimed.

गणित / The Mathematics क्रम: पूर्व यमकोटी → दक्षिण लङ्का → पश्चिम रोमक; प्रत्येक अन्तर भूवृत्तपाद = 90° देशान्तर = 15 घड़ी। लङ्का–रोमक चाप = 90°; यमकोटी–रोमक (पूर्व→पश्चिम सीधा) = 180° = 30 घड़ी = 12 h (विपरीत मध्याह्न)।

उदाहरण (worked example) लङ्का को देशान्तर λ = 0° (सिद्धान्त-परंपरा का शून्य-रेखांश; यह श्लोक स्वयं “शून्य” नहीं कहता — convention चुनकर)। तब: यमकोटी λ = +90° (पूर्व), रोमक λ = −90° या +270° (पश्चिम), सिद्धपुरी (अगला श्लोक) λ = +180°। स्थानीय मध्याह्न-अन्तर लङ्का↔रोमक = 6 h = 15 घड़ी।

हमारा डिकोड (Our Decode) लङ्का भूमध्य-रेखीय निर्देश-नगरी के रूप में दिन-गणना और मध्य-रेखांश संश्लेषण की शास्त्रीय शून्य-रेखा रही है। हमारे math-core / day-count कार्य में canon civil-days (SS: 1,577,917,828 प्रति महायुग) इसी गोल-पृथ्वी + मध्याह्न-फ्रेम की धारणा पर चलते हैं; नगरी-नाम fixture नहीं, पर geometry inherited है।

12.40
उदक्सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता ।
तस्यां सिद्धा महात्मानो निवसन्ति गतव्यथाः ।।
udaksiddhapurī nāma kuruvarṣe prakīrtitā ।
tasyāṃ siddhā mahātmāno nivasanti gatavyathāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उदक् = उत्तर दिशा में; सिद्धपुरी = सिद्धपुरी; नाम = नाम की; कुरु-वर्षे = कुरु वर्ष में; प्रकीर्तिता = कही गई; तस्याम् = उसमें; सिद्धाः = सिद्ध; महात्मानः = महात्मा; निवसन्ति = निवास करते हैं; गत-व्यथाः = व्यथा-रहित।

हिन्दी भावार्थ उत्तर दिशा में, कुरु वर्ष में, सिद्धपुरी नाम की नगरी कही गई है। वहाँ व्यथा से मुक्त महात्मा सिद्ध निवास करते हैं। चारों देव-निर्मित नगरियाँ अब पूर्ण हैं — पूर्व यमकोटी, दक्षिण लङ्का, पश्चिम रोमक, उत्तर सिद्धपुरी — भूवृत्त के चार पादों पर।

English rendering To the north, in the Kuru continent, the city named Siddhapurī is proclaimed; there dwell great-souled perfected beings, free from affliction.

गणित / The Mathematics चौथा पाद: सिद्धपुरी, लङ्का से 180° (विपरीत), यमकोटी/रोमक से ±90°। चार बिन्दुओं का बंद चक्र: 4 × 90° = 360° = पूर्ण भूवृत्त। समय-चक्र: 4 × 15 घड़ी = 60 घड़ी = 1 दिन।

उदाहरण (worked example) λ(लङ्का) = 0°, λ(यमकोटी) = 90°, λ(सिद्धपुरी) = 180°, λ(रोमक) = 270° (या −90°)। सिद्धपुरी पर स्थानीय मध्याह्न, लङ्का के मध्याह्न से 12 h = 30 घड़ी बाद/पहले — अर्ध-दिन विपर्यय। जाँच: (90+90+90+90)° = 360°; (15+15+15+15) घड़ी = 60 घड़ी।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक चार-नगरी भूमध्य-रेखा फ्रेम को बंद करता है — वही वृत्त जिस पर देशान्तर, स्थानीय घड़ी और (बाद में) लग्न/MC की गोलाकार ज्यामिति टिकती है। इंजन में RA(MC) ≡ LST जैसी अखंडताएँ (1e-9°) इसी गोलाकार काल-देश फ्रेम की आधुनिक सील हैं; पौराणिक नाम oracle-fixture नहीं, पर मॉडल की शास्त्र-जड़ हैं।

12.41
भूवृत्तपादविवरास्ताश्चान्योन्यं प्रतिष्ठिताः ।
ताभ्यश्चोत्तरगो मेरुस्तावानेव सुराश्रयः ।।
bhūvṛttapādavivarāstāścānyonyaṃ pratiṣṭhitāḥ ।
tābhyaścottarago merustāvāneva surāśrayaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूवृत्त = पृथ्वी की परिधि-वृत्त; पाद = चतुर्थांश (¼); विवराः = अन्तराल / दूरी-अवकाश; ताः = वे (निरक्ष-स्थान / चार नगर); अन्योन्यम् = परस्पर; प्रतिष्ठिताः = स्थापित; ताभ्यः = उनसे; उत्तरगः = उत्तर की ओर स्थित; मेरुः = मेरु-पर्वत (उत्तरी ध्रुव-शिखर); तावान् एव = उतनी ही माप का; सुराश्रयः = देवताओं का आश्रय।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी-वृत्त के एक-एक पाद (चौथाई) के अन्तर पर जो स्थान परस्पर स्थापित हैं, उन्हीं के उत्तर में मेरु स्थित है। मेरु की वह दूरी भी उतनी ही बताई गई है जितनी उन स्थानों के बीच की पाद-दूरी — और वही मेरु देवताओं का निवास-स्थान है। यह श्लोक भूमण्डल की चार-पादीय निरक्ष-ज्यामिति को मेरु के उत्तरी ध्रुवीय केन्द्र से जोड़ता है।

English rendering Those sites, fixed opposite one another at intervals of a quarter of the Earth’s circumference, have Meru lying to their north; Meru is of the same measure and is the abode of the gods.

गणित / The Mathematics भूवृत्त-पाद = पृथ्वी-परिधि का ¼। चार निरक्ष-स्थान (परम्परा में लङ्का–यमकoti–सिद्धपुर–रोमक आदि) परस्पर 90° रेखांश-अन्तर पर कल्पित; मेरु उनसे उत्तरी ध्रुव की ओर “तावान्” — पाद-तुल्य दूरी पर। आधुनिक अक्षांश–रेखांश में: निरक्ष-रेखा φ = 0°; मेरु φ = +90° (उत्तरी ध्रुव)। कोणीय पाद = 90° = π/2 rad; वृत्त-परिधि को C लिखा जाए तो रैखिक पाद = C/4।

उदाहरण (worked example) यदि भूवृत्त C = 360° (कोणीय माप) लिया जाए, तो पाद = 90°। चार निरक्ष-स्थान रेखांश 0°, 90°, 180°, 270° पर; मेरु उन सबके “उत्तर” पर φ = 90°, सभी रेखांशों का संगम। रैखिक चित्र में (SS-भूमिति की समतल-कल्पना में) मेरु से निरक्ष-वृत्त तक की दूरी = एक पाद = C/4।

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12.42
तासां उपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः ।
न तासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते ।।
tāsāṃ uparigo yāti viṣuvastho divākaraḥ ।
na tāsu viṣuvacchāyā nākṣasyonnatiriṣyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तासाम् = उन (निरक्ष-स्थानों) का; उपरिगः = ऊपर / मध्य-आकाश में गमन करने वाला; याति = जाता है; विषुवस्थः = विषुव-रेखा पर स्थित; दिवाकरः = सूर्य; न = नहीं; तासु = उनमें; विषुवच्छाया = विषुव-काल की मध्याह्न-छाया; न = नहीं; अक्षस्य = अक्ष (ध्रुव) की; उन्नतिः = ऊँचाई / अक्षांश; इष्यते = मानी जाती है।

हिन्दी भावार्थ उन निरक्ष-स्थानों के ऊपर — ठीक मध्य-आकाश की ओर — विषुव पर स्थित सूर्य गमन करता है। वहाँ विषुव-दिन की मध्याह्न-छाया नहीं पड़ती, और न ही ध्रुव की कोई उन्नति (अक्षांश) स्वीकार की जाती है। यह श्लोक भूमध्य-रेखा का ज्योतिष-गणितीय लक्षण स्पष्ट करता है: शून्य छाया, शून्य अक्ष।

English rendering Over those places the Sun, stationed on the equator, passes overhead. There is no equinoctial (noon) shadow there, nor is any elevation of the pole admitted.

गणित / The Mathematics निरक्ष-देश: अक्षांश φ = 0°। विषुव पर सूर्य की क्रान्ति δ = 0° → मध्याह्न-ज्या = 90° − |φ − δ| = 90° (शीर्ष पर) → विषुवच्छाया = 0। अक्षोन्नति (ध्रुव-ऊँचाई) = |φ| = 0। लम्बक (co-latitude) = 90° − |φ| = 90°।

उदाहरण (worked example) φ = 0°, δ_विषुव = 0°। मध्याह्न-उन्नतांश a = 90° − |0 − 0| = 90°; छाया-तन्त्र (शङ्कु-छाया) tan z = cot a → z = 0 ⇒ छाया-लम्बाई = 0। ध्रुव-उन्नति h_P = φ = 0° — क्षितिज पर।

हमारा डिकोड (Our Decode) अक्ष (φ) और विषुव-छाया शून्य — यही input convention ascendant/bhāva-madhya परत में latitude = 0 के रूप में जाती है। bharat-ephemeris-offline का closed-form lagna (longitude, latitude, obliquity, LST) φ = 0 पर Swiss-fixture से 0.1° के भीतर सहमत; निरक्ष-सीमा की यही परिभाषा instrument की boundary-condition है।

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12.43
मेरोरुभयतो मध्ये ध्रुवतारे नभः स्थिते ।
निरक्षदेशसंस्थानां उभये क्षितिजाश्रये ।।
merorubhayato madhye dhruvatāre nabhaḥ sthite ।
nirakṣadeśasaṃsthānāṃ ubhaye kṣitijāśraye ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेरोः = मेरु के; उभयतः = दोनों ओर; मध्ये = मध्य में; ध्रुवतारे = दोनों ध्रुव-तारे; नभःस्थिते = आकाश में स्थित; निरक्षदेशसंस्थानाम् = निरक्ष-देश में रहने वालों के लिए; उभये = दोनों; क्षितिजाश्रये = क्षितिज पर आश्रित / क्षितिज-स्थित।

हिन्दी भावार्थ मेरु के दोनों ओर — आकाश के मध्य-भाग में — ध्रुव-तारे स्थित हैं। परन्तु जो लोग निरक्ष-देश में रहते हैं, उनके लिए वे दोनों ध्रुव-तारे क्षितिज पर टिके दिखाई देते हैं। ध्रुव की “मध्य-आकाश” स्थिति मेरु-निवासियों की है; निरक्ष-जनों की दृष्टि में ध्रुव क्षितिज-स्पर्शी हो जाता है।

English rendering On either side of Meru the two pole-stars stand fixed in the sky; for dwellers in the equatorial lands, both rest upon the horizon.

गणित / The Mathematics ध्रुव-उन्नति h_N = φ, h_S = −φ (अथवा दक्षिणी ध्रुव की उन्नति = −φ)। निरक्ष: φ = 0 ⇒ h_N = h_S = 0° — दोनों ध्रुव क्षितिज पर। मेरु (φ = +90°): h_N = +90° (शीर्ष), h_S = −90° (अधोबिन्दु / अदृश्य)। यह spherical-astronomy की standard identity है: altitude of celestial pole = observer’s latitude.

उदाहरण (worked example) पर्यवेक्षक φ = 0° (निरक्ष) → उत्तर-ध्रुव altitude = 0°, दक्षिण-ध्रुव altitude = 0° — दोनों क्षितिज-रेखा पर। पर्यवेक्षक φ = +28° (उदा. कोई मध्य-भारतीय अक्षांश) → उत्तर-ध्रुव ≈ 28° ऊँचा, दक्षिण-ध्रुव 28° क्षितिज के नीचे।

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12.44
अतो नाक्षत्रोच्छ्रयस्तासु ध्रुवयोः क्षितिजस्थयोः ।
नवतिर्लम्बकांशास्तु मेरावक्षांशकास्तथा ।
ato nākṣatrocchrayastāsu dhruvayoḥ kṣitijasthayoḥ ।
navatirlambakāṃśāstu merāvakṣāṃśakāstathā ।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इसलिए; न = नहीं; अक्षत्रोच्छ्रयः = ध्रुव-तारक की उच्छ्रिति / अक्षोन्नति; तासु = उन (निरक्ष) में; ध्रुवयोः = दोनों ध्रुवों के; क्षितिजस्थयोः = क्षितिज पर स्थित होने से; नवतिः = नब्बे (90); लम्बकांशाः = लम्बक के अंश (co-latitude degrees); तु = और; मेरौ = मेरु पर; अक्षांशकाः = अक्षांश (latitude degrees); तथा = उसी प्रकार (नब्बे)।

हिन्दी भावार्थ दोनों ध्रुवों के क्षितिज-स्थित होने के कारण निरक्ष-स्थानों में ध्रुव-तारक की कोई ऊँचाई नहीं मानी जाती। वहाँ लम्बकांश नब्बे हैं; और मेरु पर अक्षांश भी नब्बे ही हैं। श्लोक निरक्ष और मेरु को एक-दूसरे के पूरक ध्रुवों के रूप में बाँधता है — जहाँ एक का लम्बक 90°, वहाँ दूसरे का अक्ष 90°।

English rendering Therefore there is no elevation of the pole-star in those places, the two poles lying on the horizon. The degrees of co-latitude there are ninety; and at Meru the degrees of latitude are likewise ninety.

गणित / The Mathematics लम्बक λ_c = 90° − |φ| (co-latitude)। निरक्ष: φ = 0° ⇒ λ_c = 90° = नवति। मेरु: φ = 90° ⇒ अक्षांश = 90° = नवति; λ_c = 0°। सम्बन्ध: φ + λ_c = 90° (सदा)। ध्रुवोच्छ्रय h_P = |φ| = 0° (निरक्ष) — पूर्व श्लोक की पुष्टि।

उदाहरण (worked example) निरक्ष-नगर: φ = 0°, λ_c = 90°, h_P = 0°। मेरु: φ = 90°, λ_c = 0°, h_P = 90°। किसी मध्य-स्थान φ = 24° पर: λ_c = 66°, h_P = 24° — और φ + λ_c = 90° अखण्ड रहता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अक्षांश–लम्बक युग्म lagna/bhāva गणना का सीधा input है। MATHEMATICAL-AUDIT §8 में closed-form ascendant (φ, ε, LST) Swiss-fixture से 0.1° भीतर; bhāva-madhya invariants (arcs sum 360°, kendras 30°) φ-स्वतन्त्र रूप से sealed हैं — यह श्लोक उसी φ-सीमा (0° / 90°) की शास्त्रीय परिभाषा देता है जिस पर instrument की boundary tests टिकती हैं।

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12.45
मेषादौ देवभागस्थे देवानां याति दर्शनम् ।
असुराणां तुलादौ तु सूर्यस्तद्भागसञ्चरः ।।
meṣādau devabhāgasthe devānāṃ yāti darśanam ।
asurāṇāṃ tulādau tu sūryastadbhāgasañcaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषादौ = मेष के आदि में (सूर्य के); देवभागस्थे = देव-भाग (उत्तरी गोलार्ध) में स्थित होने पर; देवानाम् = देवताओं का; याति दर्शनम् = दर्शन को प्राप्त होता है / दिखाई देता है; असुराणाम् = असुरों का; तुलादौ = तुला के आदि में; तु = परन्तु; सूर्यः = सूर्य; तद्भागसञ्चरः = उनके भाग में संचरण करने वाला।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य मेष के आरम्भ में आकर देव-भाग (उत्तरी क्रान्ति-गोलार्ध) में संचरित होता है, तब वह देवताओं को दिखाई देने लगता है। असुरों के लिए वह दर्शन तुला के आरम्भ से होता है — जब सूर्य उनके भाग (दक्षिणी गोलार्ध) में विचरता है। यह छह-मासीय ध्रुवीय दिन-रात का क्रान्ति-वृत्त द्वारा बाँटा गया शास्त्रीय नियम है।

English rendering When the Sun stands at the beginning of Meṣa in the gods’ hemisphere, he becomes visible to the gods; for the asuras, it is at the beginning of Tulā that the Sun, moving in their hemisphere, comes into view.

गणित / The Mathematics मेषादि = विषुव (δ = 0°, उत्तरायण-प्रवेश); तुलादि = विपरीत विषुव (δ = 0°, दक्षिणायन-प्रवेश)। देव-भाग: λ_☉ ∈ [0°, 180°) (मेष→कन्या) ⇒ δ ≥ 0 — उत्तरी ध्रुव (मेरु / सुराः) पर सूर्य क्षितिज के ऊपर ≈ 6 मास। असुर-भाग: λ_☉ ∈ [180°, 360°) (तुला→मीन) ⇒ δ ≤ 0 — दक्षिणी ध्रुव पर ≈ 6 मास दिवस। ध्रुवीय दिवस-अवधि ≈ ½ sidereal year (SS-वर्ष-माप पर निर्भर; Mahāyuga-day-count convention से civil-day रूपान्तर अलग)।

उदाहरण (worked example) उत्तरी ध्रुव (φ = +90°): सूर्योदय ≈ मेष-सङ्क्रान्ति (δ = 0°→धनात्मक); सूर्यास्त ≈ तुला-सङ्क्रान्ति। दिवस-लम्बाई ≈ λ_☉: 0°→180° तक का काल। दक्षिणी ध्रुव पर ठीक उलटा: तुला→मेष। (Epoch/ayanāṃśa चुनने से “आज किस civil date को मेषादि” बदलेगा — गणना δ(λ) और φ पर टिकी रहती है।)

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12.46
अत्यासन्नतया तेन ग्रीष्मे तीव्रकरा रवेः ।
देवभागे सुराणां तु हेमन्ते मन्दतान्यथा ।।
atyāsannatayā tena grīṣme tīvrakarā raveḥ ।
devabhāge surāṇāṃ tu hemante mandatānyathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अत्यासन्नतया = अत्यन्त निकटता के कारण; तेन = उससे; ग्रीष्मे = ग्रीष्म में; तीव्रकराः = तीक्ष्ण किरणें; रवेः = रवि की; देवभागे = देव-भाग में; सुराणाम् = देवताओं के लिए; तु = और; हेमन्ते = हेमन्त/शीत में; मन्दता = मन्दता / मृदुता; अन्यथा = अन्यथा / उलटी स्थिति।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की अत्यन्त निकटता (अपने गोलार्ध की ओर अधिकतम झुकाव) के कारण ग्रीष्म में रवि की किरणें देव-भाग में देवताओं के लिए तीव्र हो जाती हैं; हेमन्त में वही किरणें मन्द पड़ती हैं — और असुर-भाग में क्रम उलटा हो जाता है। यह “ताप = क्रान्ति-निकटता” का गुणात्मक नियम है, मात्र राशि-संकेत नहीं।

English rendering Because of that extreme nearness, the Sun’s rays are fierce in summer for the gods in their hemisphere; in winter they are mild — and the reverse holds otherwise (for the other side).

गणित / The Mathematics तीक्ष्णता का ज्यामितीय आधार: मध्याह्न-उन्नतांश a_noon = 90° − |φ − δ|। मेरु (φ = +90°): a_noon = δ; ग्रीष्म-संक्रान्ति पर δ_max ≈ ε (पराकाष्ठा) ⇒ सूर्य अधिकतम ऊँचा / “तीव्र”; हेमन्त में δ ऋणात्मक ⇒ सूर्य क्षितिज के नीचे (रात्रि) या क्षीण। तीव्रता ∝ cos z = sin a (वायुमण्डलीय प्रभाव छोड़कर)। SS यहाँ संख्यात्मक ε नहीं देती — केवल devabhāga/hemanta का गुणात्मक युग्म।

उदाहरण (worked example) φ = +90°, मान लें ε ≈ 24° (SS-परम्परा का पूर्णांक-समीप मान; यन्त्र में exact ε convention अलग declare होता है)। उत्तरायण-संक्रान्ति: δ ≈ +24° ⇒ a_noon ≈ 24°; विषुव: δ = 0° ⇒ a_noon = 0° (क्षितिज); दक्षिणायन: δ ≈ −24° ⇒ सूर्य अदृश्य। “तीव्र / मन्द” = a_noon के चरम और क्षीण सिरे।

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12.47
देवासुरा विषुवति क्षितिजस्थं दिवाकरम् ।
पश्यन्त्यन्योन्यं एतेषां वामसव्ये दिनक्षपे ।।
devāsurā viṣuvati kṣitijasthaṃ divākaram ।
paśyantyanyonyaṃ eteṣāṃ vāmasavye dinakṣape ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) देवासुराः = देव और असुर; विषुवति = विषुव पर; क्षितिजस्थम् = क्षितिज पर स्थित; दिवाकरम् = सूर्य को; पश्यन्ति = देखते हैं; अन्योन्यम् = परस्पर; एतेषाम् = इनके; वामसव्ये = बाएँ और दाएँ (पक्ष); दिनक्षपे = दिन और रात्रि।

हिन्दी भावार्थ विषुव के क्षण पर देव और असुर — दोनों — सूर्य को क्षितिज पर स्थित देखते हैं। इन दोनों के दिन और रात्रि परस्पर वाम-सव्य हैं: जब एक का दिन है, दूसरे की रात। ध्रुवीय युग्म एक-दूसरे के पूरक काल-खण्ड बाँटते हैं; विषुव उनकी साझी सन्धि-रेखा है।

English rendering At the equinox the gods and the asuras see the Sun standing on the horizon. For these two, day and night are left and right to each other — mutually opposite.

गणित / The Mathematics विषुव: δ = 0°। किसी भी ध्रुव φ = ±90° पर: a_☉ = 90° − |φ − δ| = 90° − 90° = 0° ⇒ सूर्य क्षितिज पर। देव-दिवस (δ > 0) ⇔ असुर-रात्रि; असुर-दिवस (δ < 0) ⇔ देव-रात्रि। दिन-रात्रि-विनिमय: complementary hemispheres, phase difference = ½ year। वाम/सव्य = दिशा-युग्म का काव्यात्मक संकेत, कोणीय 180° गोलार्ध-विरोध।

उदाहरण (worked example) δ = 0° (मेष/तुला विषुव), φ_देव = +90°, φ_असुर = −90°: दोनों पर solar altitude = 0°। δ = +10°: देव-मेरु पर a = +10° (दिन), असुर-मेरु पर a = −10° (रात्रि) — “अन्योन्य दिनक्षपा”।

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12.48
मेषादावुदितः सूर्यस्त्रीन्राशीनुदगुत्तरम् ।
सञ्चरन्प्रागहर्मध्यं पूरयेन्मेरुवासिनाम् ।।
meṣādāvuditaḥ sūryastrīnrāśīnudaguttaram ।
sañcaranprāgaharmadhyaṃ pūrayenmeruvāsinām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेषादौ = मेष के आदि में; उदितः = उदित हुआ; सूर्यः = सूर्य; त्रीन् राशीन् = तीन राशियों को; उदक् = उत्तर की ओर; उत्तरम् = उत्तर की ओर (उत्तरगमन); सञ्चरन् = संचरण करता हुआ; प्राक् = पूर्व / प्रथम भाग; अहर्मध्यम् = दिन के मध्य (मध्याह्न) तक; पूरयेत् = पूरा करे; मेरुवासिनाम् = मेरु-निवासियों का।

हिन्दी भावार्थ मेष के आरम्भ में उदित सूर्य तीन राशियों तक उत्तर की ओर संचरित होता हुआ मेरु-निवासियों के दिन के पूर्वार्ध को — उदया से मध्याह्न तक — पूरा करता है। छह-मासीय ध्रुवीय दिवस का पहला आधा (तीन राशियाँ = मेष–वृष–मिथुन) उनका प्रातः-से-मध्याह्न काल है; आगे का आधा अपराह्न होगा।

English rendering The Sun, risen at the beginning of Meṣa and moving northward through three signs, fills the forenoon up to midday for the dwellers of Meru.

गणित / The Mathematics मेरु-दिवस ≈ λ_☉ ∈ [0°, 180°) (मेष→तुला)। तीन राशियाँ = 3 × 30° = 90° ⇒ λ_☉: 0° → 90° (मेषादि → कर्कादि / उत्तरायण-संक्रान्ति) = ध्रुवीय “प्राग्-अहर्मध्य”। शेष 90° (λ_☉: 90° → 180°) = अपराह्न से अस्त तक। काल-अनुपात (समान-राशिक गमन की कल्पना में): त्रीन् राशीन् / ६ राशीन् = ½ ध्रुवीय दिवस = “उदया→मध्याह्न”। वास्तविक civil-time रूपान्तर SS-वर्ष-दिन-संख्या और day-count canon पर निर्भर (SS-canon 1,577,917,828 d/Mahāyuga बनाम Āryabhaṭa 1,577,917,500 — यहाँ केवल राशि-चाप का अनुपात शास्त्रोक्त है)।

उदाहरण (worked example) मेरु-दिवस = 6 राशि = 180° ecliptic। प्राक्-अहर्मध्य = 3 राशि = 90°। यदि एक राशि ≈ 1/12 sidereal year ≈ 30.4 mean solar days (365/12; exact conversion day-count-dependent), तो उदया→मध्याह्न ≈ 3 × 30.4 ≈ 91 mean days — विषुव से ग्रीष्म-संक्रान्ति तक। मध्याह्न-बिन्दु ≈ कर्कादि (δ = +ε अधिकतम) — जहाँ सूर्य मेरु पर अधिकतम उन्नतांश पर है।

12.49
कर्क्यादीन्सञ्चरंश्तद्वदह्नः पश्चार्धं एव सः ।
तुलादींस्त्रीन्मृगादींश्च तद्वदेव सुरद्विषाम् ।।
karkyādīnsañcaraṃśtadvadahnaḥ paścārdhaṃ eva saḥ ।
tulādīṃstrīnmṛgādīṃśca tadvadeva suradviṣām ।।
पाठ-भेद: C कर्कादीन्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कर्क्यादीन् / कर्कादीन् = कर्क-राशि से आरम्भ तीन राशियाँ (कर्क–सिंह–कन्या; C-पाठ: कर्कादीन्), सञ्चरन् = (सूर्य का) संचार / गमन, अह्नः पश्चार्धम् = दिन का उत्तरार्ध, तुलादीन् त्रीन् = तुला से आरम्भ तीन राशियाँ (तुला–वृश्चिक–धनु), मृगादीन् = मृग/मकर से आरम्भ राशियाँ (मकर–कुम्भ–मीन), सुरद्विषाम् = असुरों / दैत्यों का (देव-विरोधियों का), तद्वदेव = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ सूर्य जब कर्क से आरम्भ तीन राशियों में संचार करता है, तब वह देवलोक के दिन का उत्तरार्ध कहलाता है। उसी रीति से तुला से आरम्भ तीन राशियाँ और मकर से आरम्भ तीन राशियाँ — असुरों के दिन-विभाग के अनुरूप मानी गई हैं। अर्थात् उत्तरायण के दिन-पक्ष का आधा भाग कर्क–कन्या में, और असुर-दिन का विभाग तुला–मीन की दोनों त्रिकों में बँटता है। पाठ-भेद (कर्क्यादीन् / कर्कादीन्) अर्थ में मूलतः एक ही राशि-श्रृंखला को सूचित करता है।

English rendering While the Sun traverses the three signs beginning with Cancer, that period is the latter half of the gods’ day. Likewise, the three signs from Libra and those from Capricorn correspond, in the same manner, to the day-division of the asuras (the enemies of the gods).

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (देव–असुर दिन-विभाग का राशि-क्रम)। यह अयन-आधारित षट्मास-दिन की संरचना का पद है: देव-दिन = मेष–कन्या (पूर्वार्ध मेष–मिथुन, उत्तरार्ध कर्क–कन्या); असुर-दिन = तुला–मीन (पूर्वार्ध तुला–धनु, उत्तरार्ध मकर–मीन)।

दृष्टान्त (Illustrative Example) उत्तरी गोलार्ध में 21 जून (summer solstice, कर्क-संक्रान्ति के आसपास) के बाद सूर्य कर्क–सिंह–कन्या में चलता है — दिन अभी भी लम्बे, पर चरम के बाद उत्तरार्ध-सा। सूर्यसिद्धान्त उसी seasonal arc को देवलोक के दिन का “पश्चार्ध” कहता है; फिर तुला से तीन और मकर से तीन राशियाँ असुर-दिन के विभाग से जोड़ता है। पाठ-भेद कर्क्यादीन्/कर्कादीन् अर्थ नहीं बदलता — श्रृंखला कर्क से ही शुरू होती है। यह विचार अध्याय के later ayan–dina-vibhāga और राशिक्रम वाले गणितीय वर्णन में मापने योग्य बनेगा: कौन-सी राशि-त्रिक किस लोक-दिन का कौन-सा खंड है।

12.50
अतो दिनक्षपे तेषां अन्योन्यं हि विपर्ययात् ।
अहोरात्रप्रमाणं च भानोर्भगणपूरणात् ।।
ato dinakṣape teṣāṃ anyonyaṃ hi viparyayāt ।
ahorātrapramāṇaṃ ca bhānorbhagaṇapūraṇāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इस कारण, दिनक्षपे = दिन और रात्रि, तेषाम् = उनका (देव–असुरों का), अन्योन्यम् = परस्पर, विपर्ययात् = उलटाव / विपर्यास से, अहोरात्रप्रमाणम् = अहोरात्र की माप, भानोः = सूर्य का, भगणपूरणात् = भगण (पूर्ण कक्षा-परिक्रमण) पूरा होने से।

हिन्दी भावार्थ इसी व्यवस्था से देवों और असुरों के दिन–रात एक-दूसरे के विपरीत हैं — जहाँ एक का दिन, वहाँ दूसरे की रात। और उनके पूरे अहोरात्र की माप सूर्य के एक भगण — अर्थात् एक पूर्ण कक्षा-परिक्रमण — के पूरे होने से निर्धारित होती है। एक सौर वर्ष ही उनका एक दिन-रात है।

English rendering Therefore their days and nights are mutually inverted. The full measure of their day-and-night is fixed by the Sun’s completion of one revolution (bhagaṇa) — one solar year as one aho-rātra of the gods and asuras.

गणित / The Mathematics अहोरात्र_देव/असुर = 1 सूर्य-भगण = 1 सौर वर्ष। महायुग-संदर्भ में (डॉसियर कैनन): 1 महायुग = 43,20,000 वर्ष; सूर्य-भगण/महायुग = 43,20,000 (सूर्य का वर्ष-गण)। सूर्यसिद्धान्त नागरिक-दिन कैनन: 15,77,917,828 दिन/महायुग → औसत सौर वर्ष ≈ 15,77,917,828 ÷ 43,20,000 ≈ 365.258756 दिन। (आचार्य आर्यभट कैनन: 15,77,917,500 — 328 दिन का अंतर।)

उदाहरण (worked example) SS-कैनन औसत सौर वर्ष: 1,577,917,828 ÷ 4,320,000 = 365 + 258,756/1,000,000 ≈ 365.258756 नागरिक दिन। यही देव/असुर के एक अहोरात्र की औसत माप है; तदनुसार देव-दिन ≈ 182.629 नागरिक दिन (अयन-अर्ध)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “भगणपूरणात्” को हमने mean-longitude / day-count प्रयोगशाला में सीधा बाँधा — math-core का SS-कैनन 1,577,917,828 दिन/महायुग ही सूर्य-भगण की नागरिक माप है; vedic-ghadi आर्यभट 1,577,917,500 पर चलता है। 328-दिन का यह कैनन-अंतर तिथि-इंजन पर सबसे तेज़ पड़ता है — अहोरात्र-प्रमाण का चुनाव “कौन-सा शास्त्र” नहीं, गणना का आधार-स्तंभ है।

12.51
दिनक्षपार्धं एतेषां अयनान्ते विपर्ययात् ।
उपर्यात्मानं अन्योन्यं कल्पयन्ति सुरासुराः ।।
dinakṣapārdhaṃ eteṣāṃ ayanānte viparyayāt ।
uparyātmānaṃ anyonyaṃ kalpayanti surāsurāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिनक्षपार्धम् = दिन-रात्रि का आधा, एतेषाम् = इनका (देव–असुरों का), अयनान्ते = अयन के अंत पर (संक्रांति / अयन-परिवर्तन पर), विपर्ययात् = उलटाव से, उपरि = ऊपर, आत्मानम् = अपने आप को, अन्योन्यम् = एक-दूसरे को, कल्पयन्ति = कल्पना करते / मानते हैं, सुरासुराः = देव और असुर।

हिन्दी भावार्थ अयन के अंत पर — जब सूर्य एक अयन से दूसरे में प्रवेश करता है — देव–असुर के दिन-रात का आधा भाग पलट जाता है। उसी क्षण दोनों पक्ष एक-दूसरे को “नीचे” और अपने स्थान को “ऊपर” मान बैठते हैं। यह पद दिशा की सापेक्षता और अयन-सीमा पर दिन-रात्रि-विपर्यास दोनों को एक साथ बाँधता है।

English rendering At the close of an ayana, half of their day-and-night is inverted. Then gods and asuras each imagine themselves above and the other below — a mutual, relative “up.”

गणित / The Mathematics अयन-सीमा = मकर/कर्क संक्रांति (उत्तरायण–दक्षिणायन परिवर्तन)। देव-दिन-अर्ध ≈ 3 राशि-यात्रा ≈ ½ सौर वर्ष; अयनान्ते विपर्यास: दिन ↔ रात्रि (देव ↔ असुर)। “ऊपर/नीचे” यहाँ ज्यामितीय निरपेक्ष नहीं — ध्रुव-आश्रित सापेक्ष निर्देश है।

12.52
अन्ये अपि समसूत्रस्था मन्यन्ते अधः परस्परम् ।
भद्राश्वकेतुमालस्था लङ्कासिद्धपुराश्रिताः ।।
anye api samasūtrasthā manyante adhaḥ parasparam ।
bhadrāśvaketumālasthā laṅkāsiddhapurāśritāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अन्ये अपि = अन्य भी, समसूत्रस्थाः = एक ही सूत्र (रेखावृत्ति / याम्योत्तर) पर स्थित, मन्यन्ते = मानते हैं, अधः = नीचे, परस्परम् = एक-दूसरे को, भद्राश्व = भद्राश्व (पूर्वी खंड), केतुमाल = केतुमाल (पश्चिमी खंड), लङ्का = लंका (भूमध्य पर प्रसिद्ध नगरी), सिद्धपुर = सिद्धपुर (लंका का प्रतिलोम/विपरीत बिंदु), आश्रिताः = निवासी।

हिन्दी भावार्थ केवल ध्रुववासी देव–असुर ही नहीं — एक ही याम्योत्तर-सूत्र पर बसे अन्य जन भी एक-दूसरे को “नीचे” समझते हैं। भद्राश्व और केतुमाल के निवासी, तथा लंका और सिद्धपुर के आश्रित — ये समसूत्र-युग्म परस्पर अधो-कल्पना करते हैं। गोल पृथ्वी पर “अधः” स्थानिक-सापेक्ष है, सार्वभौम नहीं।

English rendering Others too, who stand on the same meridian-line, mutually take each other to be below: the dwellers of Bhadrāśva and Ketumāla, and those settled at Laṅkā and Siddhapura.

गणित / The Mathematics समसूत्र = समान देशान्तर (meridian)। शास्त्रीय चार भूमध्य-नगर-कल्पना: लंका ↔ सिद्धपुर ≈ 180° देशान्तर-अंतर (प्रतिलोम); भद्राश्व ↔ केतुमाल ≈ ±90° युग्म। प्रतिलोम-बिंदु पर “अधः-परस्पर” = antipodal “down” illusion on a sphere — निरपेक्ष नीचे नहीं, गोल ज्यामिति का दृष्टान्त।

12.53
सर्वत्रैव महीगोले स्वस्थानं उपरि स्थितम् ।
मन्यन्ते खे यतो गोलस्तस्य क्वोर्धवं क्व वाधः ।।
sarvatraiva mahīgole svasthānaṃ upari sthitam ।
manyante khe yato golastasya kvordhavaṃ kva vādhaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सर्वत्र एव = हर जगह ही, महीगोले = पृथ्वी-गोल पर, स्वस्थानम् = अपना स्थान, उपरि स्थितम् = ऊपर स्थित, मन्यन्ते = मानते हैं, खे = आकाश में, यतः = क्योंकि, गोलः = गोल (sphere), तस्य = उसका, क्व ऊर्ध्वम् = ऊपर कहाँ, क्व वा अधः = और नीचे कहाँ।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी-गोल के हर बिंदु पर लोग अपने ही स्थान को “ऊपर” समझते हैं। क्योंकि यह गोल स्वयं आकाश में स्थित है — उसके लिए निरपेक्ष ऊर्ध्व और अधः कहाँ? दिशाएँ स्थानिक हैं; गोल पर कोई सार्वभौम “ऊपर” नहीं ठहरता। यह पद सूर्यसिद्धान्त की स्पष्ट गोलाकार-पृथ्वी दृष्टि का दार्शनिक-ज्यामितीय सार है।

English rendering Everywhere on the terrestrial globe, people take their own station to be the upper one. Since the sphere hangs in space, where for it is absolute up, and where absolute down?

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका / गोलीय ज्यामिति। स्थानीय ऊर्ध्व = स्थानिक ऊर्ध्वाधर (local zenith/radial outward); वैश्विक “up” अपरिभाषित — यही आधुनिक sphere-on-space की अंतर्दृष्टि है, बिना बाहरी “नीचे” के।

हमारा डिकोड (Our Decode) लग्न/भावा-परत में “ऊपर” हमेशा स्थानीय है — closed-form ascendant (λ, φ, ε, LST) Swiss-fixture से 0.1° में मेल खाता है, और RA(MC) ≡ LST 1e-9° तक verified है। स्वस्थान-ऊर्ध्व ही horizon-frame का आधार है; महीगोल की यह दृष्टि ephemeris-lab की निर्देश-सापेक्षता से मेल खाती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) Buenos Aires में खड़े व्यक्ति का “ऊपर” और Tokyo में खड़े व्यक्ति का “ऊपर” — दोनों local zenith हैं, एक-दूसरे से लगभग उल्टी दिशाएँ; फिर भी दोनों सही हैं क्योंकि पृथ्वी गोल है। सूर्यसिद्धान्त यही कहता है: महीगोल पर सर्वत्र स्वस्थानम् उपरि; निरपेक्ष ऊर्ध्व–अधः गोल के लिए अर्थहीन। यह पद बाद की गोलीय त्रिकोणमिति और दिग्–नति–लम्ब की परिभाषाओं का दार्शनिक द्वार है — direction हमेशा observer-relative रहेगी। “आकाश में गोल” का वाक्य याद रखें: gravity-vector यहाँ आधुनिक शब्द नहीं, पर geometry वही है — sphere पर कोई वैश्विक ‘up’ नहीं ठहरता।

12.54
अल्पकायतया लोकाः स्वस्थानात्सर्वतो मुखम् ।
पश्यन्ति वृत्तां अप्येतां चक्राकारां वसुन्धराम् ।।
alpakāyatayā lokāḥ svasthānātsarvato mukham ।
paśyanti vṛttāṃ apyetāṃ cakrākārāṃ vasundharām ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अल्पकायतया = छोटे शरीर होने के कारण, लोकाः = लोग, स्वस्थानात् = अपने स्थान से, सर्वतो मुखम् = सब ओर मुख किए / चारों दिशाओं में, पश्यन्ति = देखते हैं, वृत्ताम् अपि = वृत्त/गोल होने पर भी, एताम् = इस, चक्राकाराम् = चक्र (पहिया/डिस्क) के आकार की, वसुन्धराम् = पृथ्वी को।

हिन्दी भावार्थ मनुष्य का शरीर पृथ्वी के सामने अत्यल्प है; इसलिए अपने स्थान से चारों ओर देखते हुए वे इस गोल वसुंधरा को भी चक्राकार — चपटी चक्र-सी — देख लेते हैं। दृष्टि-सीमा और पैमाना गोलाई को छिपा देते हैं; शास्त्र यहाँ प्रत्यक्ष की सीमा और गोलाकार-सत्य का भेद खोलता है।

English rendering Because their bodies are so small, people looking outward from their own place in every direction see this Earth — though circular (spherical) — as wheel-shaped, like a disk.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (दृष्टि-ज्यामिति / पैमाना-भ्रम)। क्षितिज-वृत्त ≈ समतल डिस्क का आभास तब बनता है जब प्रेक्षक-ऊँचाई ≪ पृथ्वी-त्रिज्या; शास्त्र “वृत्ताम् अपि… चक्राकाराम्” से sphere vs apparent disk का भेद स्थिर करता है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) समुद्र-तट पर खड़े होकर क्षितिज देखें — पानी का किनारा सीधी रेखा-सा, पृथ्वी “चक्राकार चपटी” लगती है; जहाज दूर जाकर पहले hull, फिर mast खोता है — वही scale-effect इस श्लोक का विषय है। अल्पकाय मनुष्य के सामने वसुंधरा इतनी विशाल है कि local view गोलाई छिपा देता है; प्रत्यक्ष “चक्र” दिखता है, शास्त्र “गोल” सिखाता है। यह illusion-vs-model का clearest दृष्टान्त है: observation की सीमा और spherical truth का भेद। आगे जब परिधि, व्यास और छाया-ज्या के सूत्र आएँगे, वे उसी छिपी गोलाई को संख्या में खोलेंगे जिसे आँख चक्र समझ बैठती है।

12.55
सव्यं भ्रमति देवानां अपसव्यं सुरद्विषाम् ।
उपरिष्टाद्भगोलो अयं व्यक्षे पश्चान्मुखः सदा ।।
savyaṃ bhramati devānāṃ apasavyaṃ suradviṣām ।
upariṣṭādbhagolo ayaṃ vyakṣe paścānmukhaḥ sadā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सव्यम् = दक्षिणावर्त / दाहिनी ओर (सव्य-भ्रमण), भ्रमति = घूमता है, देवानाम् = देवों के (लिए), अपसव्यम् = वामावर्त / बाईं ओर, सुरद्विषाम् = असुरों के (लिए), उपरिष्टात् = ऊपर से, भगोलः = नक्षत्र-गोल / खगोल, अयम् = यह, व्यक्षे = विषुव-रेखा पर / अक्ष-रहित स्थान (भूमध्य) पर, पश्चान्मुखः = पश्चिम-अभिमुख, सदा = सदा।

हिन्दी भावार्थ देवों की दृष्टि में यह भगोल सव्य दिशा में घूमता प्रतीत होता है; असुरों की दृष्टि में अपसव्य। भूमध्य (व्यक्ष) पर ऊपर से देखने पर यही गोल सदा पश्चिम की ओर मुख किए रहता है — अस्त हमेशा पश्चिम में। ध्रुव-स्थान पर दिशा-संज्ञाएँ पलटती हैं; विषुव पर दैनिक गति का पश्चिम-मुखी रूप स्थिर रहता है।

English rendering To the gods the celestial sphere appears to revolve rightward (savya); to the asuras, leftward (apasavya). From above at the equator (vyakṣa), this star-sphere always faces westward.

गणित / The Mathematics दैनिक आभासी गति: पूर्व → पश्चिम (पृथ्वी का पूर्व-दिशा घूर्णन)। उत्तरी ध्रुव-दृष्टि: वामावर्त क्षितिज-परिक्रमा (शास्‍त्र-संज्ञा: सव्य — परंपरा-सापेक्ष); दक्षिणी ध्रुव: विपरीत (अपसव्य)। व्यक्ष (φ = 0°): खगोलीय पिंड सदा पश्चिम में अस्त; दिन-चाप का मध्य = मध्याह्न, सीमाएँ = पूर्वोदय/पश्चिमास्त।

12.56
अतस्तत्र दिनं त्रिंशन्नाडिकं शर्वदी तथा ।
हानिवृद्धी सदा वामं सुरासुरविभागयोः ।।
atastatra dinaṃ triṃśannāḍikaṃ śarvadī tathā ।
hānivṛddhī sadā vāmaṃ surāsuravibhāgayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अतः = इसलिए, तत्र = वहाँ (व्यक्ष / भूमध्य पर), दिनम् = दिन, त्रिंशत् नाडिकम् = तीस नाडिका (घटी), शर्वरी तथा = रात्रि भी उसी प्रकार, हानिवृद्धी = ह्रास और वृद्धि, सदा = सदैव, वामम् = विपरीत / उलटी दिशा में, सुरासुरविभागयोः = देव–असुर विभागों में (उत्तर–दक्षिण गोलार्धों में)।

हिन्दी भावार्थ अतः भूमध्य रेखा पर दिन सदा तीस नाडिका का होता है, और रात्रि भी उतनी ही — न हानि, न वृद्धि। दिन की लंबाई की वृद्धि और ह्रास देव–असुर विभागों में सदा विपरीत चलते हैं: उत्तर में दिन बढ़े तो दक्षिण में घटे, और उलटा। विषुव पर सम-अहोरात्र; ध्रुव-दिशाओं पर अयन-आश्रित विपर्यास।

English rendering Therefore there (at the equator) the day is thirty nāḍikās, and the night likewise always. Increase and decrease of day-length always run opposite ways in the gods’ and asuras’ divisions (the two hemispheres).

गणित / The Mathematics 1 अहोरात्र = 60 नाडिका (घटी) = 3,600 पल = 2,16,000 विपल = 21,600 प्राण (डॉसियर मेट्रोलॉजी)। भूमध्य (φ = 0°): दिन = रात्रि = 30 नाडिका = ½ दिन, वर्ष-भर (सौर-उन्नतांश-ज्यामिति से; वायु-अपवर्तन छोड़कर)। हानि–वृद्धि: d(दिन-लंबाई)/d(क्रांति) उत्तर व दक्षिण गोलार्ध में विपरीत चिह्न — अयन-क्रांति δ के साथ day-length(φ) ≈ f(δ, φ), day-length(−φ) complementary in the seasonal sense.

उदाहरण (worked example) मेट्रोलॉजी-कन्वेंशन: 1 दिन = 60 घटी। व्यक्ष पर दिन = 30 घटी = 30 × 24 min = 12 h (आधुनिक सिविल घंटे से सम)। 30 घटी = 30 × 60 = 1,800 पल = 1,800 × 60 = 1,08,000 विपल। वर्ष के किसी भी सौर-दिन पर (आदर्श बिना-अपवर्तन मॉडल) यही 30–30 विभाजन स्थिर रहता है; ±φ पर अयन के साथ एक पक्ष की दिन-वृद्धि दूसरे पक्ष की दिन-हानि है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “त्रिंशन्नाडिकम्” सीधा हमारी घटी/पल/विपल परत से जुड़ता है — vedic-ghadi का 60-घटी दिन और 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 चाप-कला/वृत्त की गिनती-संगति (भौतिक समता नहीं, count correspondence; MATHEMATICAL-AUDIT §1)। भूमध्य का सम-अहोरात्र panchāṅga-substrate का स्थिर परीक्षण-बिंदु है; हानि–वृद्धि का सुरासुर-विपर्यास अयन/क्रांति-ज्यामिति का वही अनुशासन है जिसे oracle `==` fixtures से बाँधते हैं — सहिष्णुता-पट्टी नहीं।

12.57
मेषादौ तु सदा वृद्धिरुदगुत्तरतो अधिका ।
देवांशे च क्षपाहानिर्विपरीतं तथासुरे ।।
meṣādau tu sadā vṛddhirudaguttarato adhikā ।
devāṃśe ca kṣapāhānirviparītaṃ tathāsure ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेष-आदौ = मेष (वसन्त-सम्पात) के आरम्भ से; सदा = सदैव; वृद्धिः = (दिन की) वृद्धि; उदक्-उत्तरतः = उत्तर दिशा की ओर (सूर्य की गति से); अधिका = अधिक/प्रबल; देव-अंशे = देव-अंश (उत्तरी गोलार्ध) में; क्षपा-हानिः = रात्रि का ह्रास; विपरीतम् = उल्टा क्रम; तथा = वैसे ही; असुरे = असुर-अंश (दक्षिणी गोलार्ध) में।

हिन्दी भावार्थ मेष के आरम्भ — वसन्त-सम्पात — से सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है, और उसी गति से दिन की वृद्धि निरन्तर स्पष्ट होती है। देव-अंश में, जहाँ सूर्य उत्तर की ओर ऊँचा उठता है, रात्रि घटती जाती है। असुर-अंश में यही व्यवस्था उल्टी हो जाती है: वहाँ दिन-रात्रि का संतुलन ठीक विपरीत दिशा में झुकता है। यह श्लोक भूमण्डल के दो अर्धों को एक ही सूर्य-गति से जोड़कर समझाता है।

English rendering From the start of Meṣa the day always lengthens more as the sun moves northward. In the gods’ portion the night diminishes; in the asuras’ portion the same rule runs in reverse.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (दिन-वृद्धि की दिशात्मक व्यवस्था)। मेषादि = वसन्त-सम्पात के बाद उत्तरायण की प्रवृत्ति; “वृद्धि/हानि” यहाँ दिन-रात्रि की लम्बाई का गुणात्मक नियम है, संख्यात्मक स्थिरांक नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) वसन्त-सम्पात (मेषादि, ~21 March) के बाद उत्तरी भारत में रोज़ ध्यान दें — सूर्योदय उत्तर-पूर्व खिसकता है, दोपहर की छाया छोटी होती जाती है, दिन लम्बा होता है; जून solstice तक यह वृद्धि चरम पर। यही “उदगुत्तरतोऽधिका वृद्धि” का observational face है। दक्षिणी गोलार्ध (पाठ का असुर-अंश) में उसी क्षण व्यवस्था उल्टी: वहाँ रात बढ़ती, दिन घटता — एक ही सूर्य-गति, दो अर्धों पर विपरीत झुकाव। यह श्लोक अध्याय २–३ के दिनमान, चर-फल और अक्षांश-संबंधी गणित का बीज-वाक्य है: hemisphere flip को सूत्र में बदलने से पहले यहाँ चित्र साफ कर लिया गया है।

12.58
तुलादौ द्युनिशोर्वामं क्षयवृद्धी तयोरुभे ।
देशक्रान्तिवशान्नित्यं तद्विज्ञानं पुरोदितम् ।।
tulādau dyuniśorvāmaṃ kṣayavṛddhī tayorubhe ।
deśakrāntivaśānnityaṃ tadvijñānaṃ puroditam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुला-आदौ = तुला (शरद्-सम्पात) के आरम्भ से; द्यु-निशोः = दिन और रात्रि की; वामम् = उल्टी/विपरीत व्यवस्था; क्षय-वृद्धी = ह्रास और वृद्धि; तयोः उभे = उन दोनों की; देश-क्रान्ति-वशात् = देश (अक्षांश) और क्रान्ति (सूर्य-झुकाव) के अधीन; नित्यम् = सदैव; तत्-विज्ञानम् = उस ज्ञान की विधि; पुरः-उदितम् = पहले कही जा चुकी है।

हिन्दी भावार्थ तुला के आरम्भ से दिन-रात्रि का खेल पलट जाता है — जो पहले बढ़ रहा था वह घटने लगता है, और जो घट रहा था वह बढ़ने लगता है। यह क्षय-वृद्धि न तो सब जगह एक-सी है और न हर समय एक-सी: वह देश के अक्षांश और सूर्य की क्रान्ति दोनों पर निर्भर करती है। शास्त्र कहता है कि इस विज्ञान का पूरा आधार पहले ही बताया जा चुका है — अब केवल दिशा-परिवर्तन याद रखना है।

English rendering From the beginning of Tulā the waxing and waning of day and night reverse. That double change is always governed by place and declination; the science of it has already been set forth.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (शरद्-सम्पात पर दिन-रात्रि का व्युत्क्रम)। गुणात्मक नियम: मेषादि ↔ दिन↑/रात्रि↓ (देवांश); तुलादि ↔ दिन↓/रात्रि↑ (देवांश); असुरांश में चिह्न उल्टे। संख्यात्मक दिन-लम्बाई देश-क्रान्ति से आती है, इस श्लोक में नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) दिल्ली (लगभग २८°N) में २२ सितम्बर के आस-पास — जब सूर्य तुला-सङ्क्रान्ति के निकट होता है — आप देखेंगे कि दिन-रात लगभग बराबर हो गए; उसके बाद प्रत्येक सप्ताह सूर्यास्त थोड़ा जल्दी और सूर्योदय थोड़ा देर से होता है। उसी दिन कोच्चि (लगभग १०°N) में यह बदलाव बहुत धीमा दिखेगा, जबकि लेह (लगभग ३४°N) में वही “दिन छोटा होने” की दर तेज़। यही देश (latitude) और क्रान्ति (declination) का युगल-नियम: एक ही astronomical event, तीन अक्षांशों पर तीन अलग day-length curves। अध्याय २–३ के दिन-रात्रि और चर-फल सूत्रों में यही “पुरोदित विज्ञान” संख्या बन जाता है।

12.59
भूवृत्तं क्रान्तिभागघ्नं भगणांशविभाजितम् ।
अवाप्तयोजनैरर्को व्यक्षाद्यात्युपरिस्थितः ।।
bhūvṛttaṃ krāntibhāgaghnaṃ bhagaṇāṃśavibhājitam ।
avāptayojanairarko vyakṣādyātyuparisthitaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भू-वृत्तम् = पृथ्वी की परिधि (योजनों में); क्रान्ति-भाग-घ्नम् = क्रान्ति के अंशों से गुणा; भगण-अंश-विभाजितम् = भगण के ३६० अंशों से विभाजित; अवाप्त-योजनैः = प्राप्त योजनों से; अर्कः = सूर्य; व्यक्षाद = निरक्ष (विषुव-रेखा) से; याति = जाता है; उपरि-स्थितः = ऊपर (उत्तर) स्थित।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी की परिधि को सूर्य की क्रान्ति के अंशों से गुणा करो, फिर पूरे भगण — तीन सौ साठ अंश — से भाग दो। जो योजन मिलते हैं, उतनी दूरी पर सूर्य विषुव-रेखा से “ऊपर” — उत्तरी ओर — बैठा माना जाता है। यह श्लोक आकाश के कोण (क्रान्ति) को पृथ्वी की माप (योजन) में उतारने का सीधा अनुपात देता है: कोण का अंश-भाग, भूमण्डल की परिधि का उतना ही अंश।

English rendering Multiply the earth’s circumference by the degrees of declination and divide by the three hundred and sixty degrees of the circle. By the yojanas so obtained the sun stands northward above the equator.

गणित / The Mathematics क्रान्ति-अंश को भू-परिधि के योजनों में बदलने का अनुपात:

y_δ = (C × δ) / 360

जहाँ C = भूवृत्त (योजन), δ = सूर्य की क्रान्ति (अंश), 360 = भगणांश, y_δ = निरक्ष से उत्तर की योजन-दूरी। यह शुद्ध समानुपात है — कोण का भिन्न = चाप का भिन्न; कोई अतिरिक्त स्थिरांक श्लोक में नहीं।

उदाहरण (worked example) माना C = 3,600 योजन (केवल अनुपात दिखाने का सुविधा-मान; मूल पाठ C का संख्यात्मक मान यहाँ नहीं देता) और δ = 24° (परमापक्रम की पारम्परिक कोटि, अगले श्लोक की पृष्ठभूमि)। तब

y_δ = (3,600 × 24) / 360 = 86,400 / 360 = 240 योजन।

अर्थात् इस उदाहरण-मान पर सूर्य निरक्ष से 240 योजन “ऊपर” गिना जाएगा। वास्तविक गणना में C वही लो जो अपनी भू-वृत्त परम्परा में अपनाया हो; सूत्र का रूप अपरिवर्तित रहता है।

12.60
परमापक्रमादेवं योजनानि विशोधयेत् ।
भूवृत्तपादाच्छेषाणि यानि स्युर्योजनानि तैः ।।
paramāpakramādevaṃ yojanāni viśodhayet ।
bhūvṛttapādāccheṣāṇi yāni syuryojanāni taiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) परम-अपक्रमात् = परम अपक्रम (अधिकतम क्रान्ति) से; एवम् = इसी रीति से (प्राप्त); योजनानि = योजनों को; विशोधयेत् = घटाए; भू-वृत्त-पादात् = भू-परिधि के एक पाद (चतुर्थांश) से; शेषाणि = शेष बचे; यानि स्युः योजनानि = जो योजन हों; तैः = उनसे (आगे की व्यवस्था)।

हिन्दी भावार्थ पहले वाली रीति से परम अपक्रम के अनुरूप योजन निकालो, फिर वर्तमान क्रान्ति के योजन उनसे घटा दो। जो बचता है उसे भू-वृत्त के एक पाद — पूरे चक्र के चौथाई भाग — के सन्दर्भ में देखो; वही शेष योजन आगे की सीमा-रेखा बनाते हैं। यह श्लोक “अभी कितनी क्रान्ति है” को “ध्रुव-समीप की कौन-सी पट्टी बची” में बदलता है — गर्मी-सर्दी के चरम और भूमध्य रेखा के बीच का योजन-पुल।

English rendering In the same way obtain the yojanas of the greatest declination and subtract; from a quarter of the earth’s circumference the remaining yojanas are those that serve the following limits.

गणित / The Mathematics 12.59 की रीति से दो राशियाँ:

y_ε = (C × ε) / 360, y_δ = (C × δ) / 360

जहाँ ε = परमापक्रम (अधिकतम क्रान्ति, अंश), δ = वर्तमान क्रान्ति।

शोधन: y_rest = y_ε − y_δ

तथा भू-वृत्त-पाद: C/4

श्लोक “शेष योजन” को C/4 के सन्दर्भ में बाँधता है — आगे 12.61–12.64 में उन्हीं से दिन-रात्रि की चरम सीमाएँ लगती हैं। ε का अंकीय मान इस श्लोक में शब्द-संख्या से नहीं दिया; परम्परा में प्रायः 24° लिया जाता है, किन्तु यहाँ सूत्र-रूप ही मूल है।

उदाहरण (worked example) C = 3,600 योजन, ε = 24°, δ = 12° (सुविधा-मान, अनुपात मात्र)।

y_ε = (3,600 × 24)/360 = 240 योजन
y_δ = (3,600 × 12)/360 = 120 योजन
y_rest = 240 − 120 = 120 योजन
C/4 = 900 योजन

अर्थात् परम-अपक्रम से आधा रास्ता घटाने पर 120 योजन शेष; पाद-भूवृत्त 900 योजन की पृष्ठभूमि पर यही शेष आगे की ध्रुवीय/अयनांत व्यवस्था में प्रयुक्त होता है।

12.61
अयनान्ते विलोमेन देवासुरविभागयोः ।
नाडीषष्ट्या सकृदहर्निशाप्यस्मिन्सकृत्तथा ।।
ayanānte vilomena devāsuravibhāgayoḥ ।
nāḍīṣaṣṭyā sakṛdaharniśāpyasminsakṛttathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अयन-अन्ते = अयन के अन्त (अयनांत/संक्रान्ति-चरम) पर; विलोमेन = उल्टी रीति से; देव-असुर-विभागयोः = देव और असुर विभागों में; नाडी-षष्ट्या = साठ नाड़ी (घटिका) से; सकृत् = एक बार; अहः = दिन; निशा अपि = रात्रि भी; अस्मिन् = इस (सीमा-प्रदेश) में; सकृत् तथा = वैसे ही एक बार।

हिन्दी भावार्थ अयन के अन्त पर — जब सूर्य अपनी उत्तर या दक्षिण सीमा पर ठहरता है — देव-अंश और असुर-अंश में व्यवस्था एक-दूसरे की उलटी हो जाती है। उस सीमा-पट्टी में कभी एक पूरा दिन साठ नाड़ी का बनता है, और कभी एक पूरी रात्रि साठ नाड़ी की। “सकृत्” शब्द याद दिलाता है: यह सामान्य दैनिक उतार-चढ़ाव नहीं, अयनांत पर एक बार घटने वाली चरम घटना है — जहाँ सूर्य अस्त ही नहीं होता, या उदय ही नहीं होता।

English rendering At the end of an ayanā, inversely in the gods’ and asuras’ divisions, there occurs once a day of sixty nāḍīs and once a night of the same measure in that region.

गणित / The Mathematics अयनांत-दिन/रात्रि की चरम माप:

1 अहर् (या 1 निशा) = 60 नाड़ी

यह पूरे नागरिक दिन की नाड़ी-संख्या के बराबर एक अखण्ड प्रकाश-काल या अखण्ड अन्धकार-काल है। देव-विभाग में एक अयनांत पर 60-नाड़ी दिन ↔ असुर-विभाग में विपरीत अयनांत पर वही; और उलटा क्रम दूसरे अयनांत पर। सूत्र का अंक: षष्टि = 60; अन्य स्थिरांक श्लोक नहीं देता।

उदाहरण (worked example) नाड़ी-मेट्रोलॉजी (डोसियर के अनुसार 1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल): अयनांत पर “सकृद् अहः” = 60 नाड़ी = पूरा 1 नागरिक दिन का प्रकाश बिना अस्त के। उसी स्थान पर विपरीत अयनांत पर “सकृन् निशा” = 60 नाड़ी अन्धकार। इनपुट-सम्मेलन: नाड़ी ≡ घड़ी; दिन-गणना का चुनाव (SS 1,577,917,828 या आर्यभटीय) यहाँ कोण-सीमा नहीं, केवल काल-माप बाँटता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “नाडीषष्ट्या” वही मेट्रोलॉजी है जो हमने sealed की — 1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण। अयनांत का “साठ नाड़ी का एक दिन” इसी गिनती का चरम रूप है: पूरा घेरा एक ओर झुककर अखण्ड प्रकाश/अन्धकार बन जाता है। 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 चाप-मिनट/वृत्त count-correspondence है, भौतिक समता नहीं — MATHEMATICAL-AUDIT §1।

12.62
तदन्तरे अपि षष्ट्यन्ते क्षयवृद्धी अहर्निशोः ।
परतो विपरीतो अयं भगोलः परिवर्तते ।।
tadantare api ṣaṣṭyante kṣayavṛddhī aharniśoḥ ।
parato viparīto ayaṃ bhagolaḥ parivartate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-अन्तरे अपि = उन (सीमाओं) के बीच भी; षष्टि-अन्ते = साठ (नाड़ी) के अन्त तक; क्षय-वृद्धी = ह्रास और वृद्धि; अहर्-निशोः = दिन और रात्रि की; परतः = उससे परे; विपरीतः = उलटा; अयम् भगोलः = यह नक्षत्र-गोल; परिवर्तते = घूमता/व्यवस्थित होता है।

हिन्दी भावार्थ उन अयनांत-सीमाओं के भीतर भी दिन और रात्रि साठ नाड़ी की सीमा तक घटते-बढ़ते रहते हैं — कभी दिन षष्टि के पास पहुँचता है, कभी रात्रि। किन्तु जब तुम उस सीमा के पार चले जाते हो, तो भगोल की व्यवस्था ही पलट-सी लगती है: वहाँ साधारण उदय-अस्त का खेल टूटकर दीर्घकालिक प्रकाश या अन्धकार का रूप ले लेता है। “परतो विपरीतोऽयं भगोलः” — द्रष्टा के लिए गोल अपनी रीति बदल लेता है, यद्यपि गणित वही क्रान्ति-ज्या है।

English rendering Even between those limits day and night wax and wane up to the bound of sixty. Beyond that this celestial sphere turns about in the reverse manner.

गणित / The Mathematics गुणात्मक सीमा-नियम (अंक श्लोक में केवल षष्टि):

  • सीमा-अन्दर: 0 < दिन-नाड़ी < 60, तथा रात्रि = 60 − दिन-नाड़ी (नाड़ी-योग = 1 अहोरात्र)
  • षष्ट्यन्त: दिन → 60 या रात्रि → 60 (12.61 का सकृत्-चर)
  • परतः: सामान्य दैनिक उदय-अस्त का क्रम टूटता है — ऋतु-पर्यन्त अस्त-हीन या उदय-हीन सूर्य (ध्रुवीय दिन/रात्रि की कोटि)

संख्यात्मक अक्षांश-सूत्र यहाँ नहीं; वह 12.59–12.60 के योजन-शेष और 12.63–12.64 की द्विज्या-योजना पर टिका है।

12.63
ऊने भूवृत्तपादे तु द्विज्यापक्रमयोजनैः ।
धनुर्मृगस्थः सविता देवभागे न दृश्यते ।।
ūne bhūvṛttapāde tu dvijyāpakramayojanaiḥ ।
dhanurmṛgasthaḥ savitā devabhāge na dṛśyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊने = कम/न्यून होने पर; भू-वृत्त-पादे = भू-परिधि के पाद (चतुर्थांश) में; तु = तो; द्वि-ज्या-अपक्रम-योजनैः = अपक्रम की द्वि-ज्या के योजनों से (घटाने पर); धनुः-मृग-स्थः = धनु और मृग (मकर) में स्थित; सविता = सूर्य; देव-भागे = देव-भाग में; न दृश्यते = दिखाई नहीं देता।

हिन्दी भावार्थ जब भू-वृत्त के एक पाद से अपक्रम की द्वि-ज्या के बराबर योजन घटा दिए जाएँ, और प्रदेश उस ऊन-माप में आ जाए, तब धनु या मृग में बैठा सूर्य देव-भाग में नहीं दिखता। सर्दी के उस अर्ध में उत्तरी चरम प्रदेश अन्धकार में डूब जाता है — सूर्य क्षितिज के नीचे ही घूमता रहता है। यह श्लोक “न दिखना” को भाग्य नहीं, योजन-ज्या की ज्यामिति बनाता है।

English rendering When a quarter of the earth’s circumference is reduced by the yojanas of the declination of two signs (dvi-jyā-apakrama: the declination at 60° from the equinox), the sun standing in Dhanus or Mṛga is not seen in the gods’ portion.

गणित / The Mathematics दृश्यता-सीमा (देव-भाग, दक्षिणायन-चर):

द्विज्यापक्रम = दो राशियों की ज्या की क्रान्ति: क्रान्तिज्या = jyā(60°) × 1397 ⁄ R = 2978 × 1397 ⁄ 3438 = 1210.1 → δ₂ = 20.63°। धनु-मकर में सूर्य की दक्षिण क्रान्ति इससे कम नहीं होती। उसे 12.59 की रीति से योजन में लाओ:

y_2j = (C × α_2j) / 360

जहाँ α_2j = δ₂ (अंश)। ऊन पाद:

L = C/4 − y_2j

उस L से चिह्नित देव-भाग प्रदेश में, सूर्य के धनु/मृग (≈ दक्षिणायन चरम के आसपास) रहने पर: दर्शन = 0 (निरन्तर रात्रि की कोटि)। सटीक ज्या-सारणी और C इस श्लोक में नहीं — केवल संक्रिया: पाद − द्विज्यापक्रम-योजन।

उदाहरण (worked example) पाठ के मान: C = 1600 × √10 = 5059.64 योजन (1.59), δ₂ = 20.63°:

y_2j = 5059.64 × 20.63 ⁄ 360 = 289.9 योजन
C/4 = 1264.9 योजन
L = 1264.9 − 289.9 = 975.0 योजन, अर्थात् अक्षांश 975.0 ⁄ 5059.64 × 360° = 69.37°

इससे उत्तर देव-भाग में धनु-मकर का सूर्य नहीं दिखता: 90° − 69.37° = 20.63° = δ₂। (12.65 में एक राशि की क्रान्ति 11.72° से 78.28°।)

सुधार · correction (2026-10-07) पहले “द्विज्यापक्रम” को 2ε = 48° पढ़ा गया था, जिससे रेखा 42° अक्षांश पर आती — भारत से भी दक्षिण। धनु-मकर (12.63) और वृश्चिक-कुम्भ (12.66) की सूचियों को दो राशियों और एक राशि की क्रान्ति चाहिए: 20.63° और 11.72°, रेखाएँ 69.37° और 78.28° पर। उदाहरण में C = 3,600 की जगह पाठ का 5059.64 (1.59) लिया गया। Correction: the declination of two signs; checked in ss-chapters.test.js.

12.64
तथा चासुरभागे तु मिथुने कर्कटे स्थितः ।
नष्टच्छाया महीवृत्तपादे दर्शनं आदिशेत् ।।
tathā cāsurabhāge tu mithune karkaṭe sthitaḥ ।
naṣṭacchāyā mahīvṛttapāde darśanaṃ ādiśet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तथा च = और उसी प्रकार; असुर-भागे = असुर-भाग में; तु = तो; मिथुने कर्कटे स्थितः = मिथुन और कर्क में स्थित (सूर्य); नष्ट-च्छाया = जिसकी छाया नष्ट हो गई हो (अर्थात् सूर्य क्षितिज-समीप/ध्रुवीय चरम); मही-वृत्त-पादे = पृथ्वी-वृत्त के पाद पर; दर्शनम् = दिखाई देना; आदिशेत् = निर्देश करे/बताए।

हिन्दी भावार्थ असुर-भाग में वही नियम उलटी ऋतु में लगता है: जब सूर्य मिथुन या कर्क में हो — उत्तरायण का चरम — तब दक्षिणी चरम प्रदेश में वह नहीं दिखता (या उसकी व्यवस्था देव-भाग की धनु-मृग स्थिति की दर्पण-छवि होती है)। और जहाँ छाया ही समाप्त हो जाए — मही-वृत्त के पाद की वह सीमा — वहीं दर्शन का शास्त्रीय निर्देश बाँधो। एक ओर अदृश्यता, दूसरी ओर नष्ट-छाया: दोनों भू-पाद और अपक्रम-ज्या की एक ही ज्यामिति के दो छोर हैं।

English rendering Likewise in the asuras’ portion when the sun stands in Mithuna or Karkaṭa. Where the shadow is lost, at a quarter of the earth’s circle, one should prescribe the rule of visibility.

गणित / The Mathematics 12.63 का दक्षिण-उत्तरी व्युत्क्रम + नष्ट-छाया सीमा:

  • असुर-भाग: सूर्य ∈ {मिथुन, कर्क} ⇒ (समतुल्य ऊन-पाद प्रदेश में) दर्शन = 0 — देव-भाग के धनु/मृग नियम का चिह्न-उलटा।
  • नष्ट-च्छाया: छाया-लम्बाई → 0 की सीमा (सूर्य के चरम ऊँचाई/ध्रुवीय ज्यामिति पर); महीवृत्त-पाद C/4 उसी योजन-माप का सन्दर्भ।
  • दर्शन-आदेश: दृश्य/अदृश्य का निर्णय L = C/4 − y(द्विज्या-अपक्रम) और सूर्य-राशि (धनु-मृग vs मिथुन-कर्क) तथा गोलार्ध (देव/असुर) की तीन शर्तों से।

कोई नया संख्या-स्थिरांक नहीं; पूरा चक्र 12.59–12.64 एक ही अनुपात-शृंखला है — क्रान्ति → योजन → पाद-शेष → अयनांत षष्टि-नाड़ी → द्विज्या-ऊन पाद पर दर्शन/अदर्शन।

12.65
एकज्यापक्रमानीतैर्योजनैः परिवर्जिते ।
भूमिकक्षाचतुर्थांशे व्यक्षाच्छेषैस्तु योजनैः ।।
ekajyāpakramānītairyojanaiḥ parivarjite ।
bhūmikakṣācaturthāṃśe vyakṣāccheṣaistu yojanaiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकज्या = एक ज्या (पूर्ण-ज्या/Rsine); अपक्रम = क्रान्ति/अक्षांश-कोण (यहाँ प्रायः परमापक्रम ≈ 24°); आनीतैः योजनैः = उन योजनों से जो ज्या से निकाले गए; परिवर्जिते = घटाए जाने पर; भूमिकक्षा = पृथ्वी की कक्षा/परिधि (योजन में); चतुर्थांशे = उसके चतुर्थांश में; व्यक्षात् = निरक्ष (विषुव-रेखा) से; शेषैः योजनैः = शेष बचे योजनों से।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी-कक्षा के चतुर्थांश (विषुव से ध्रुव की ओर 90° की चाप) में से अपक्रम की ज्या से निकाले गए योजन घटाए जाएँ। शेष योजन निरक्ष-स्थान से मापे जाने वाले वे अन्तराल हैं जिनसे इस अध्याय की पूर्व-सूत्रों वाली ध्रुवीय/प्रकाश-ज्यामिति आगे बढ़ती है। यह पद संख्या नहीं थोपता — वह माप-विधि बताता है: पहले ज्या → योजन, फिर कक्षा-चतुर्थांश से वियोग, फिर व्यक्ष से शेष।

English rendering From a quarter of the Earth’s circumference (in yojanas), subtract the yojanas obtained from the Rsine of the declination (apakrama). The remainder, reckoned from the equator (vyakṣa), is the linear measure that the surrounding rules then use.

गणित / The Mathematics भूमि-कक्षा को योजन-परिधि C मानें (इस पद में C का संख्या-मान नहीं दिया)। चतुर्थांश = C/4। अपक्रम-कोण δ (या परमापक्रम ε) की एक-ज्या (R-sine) से रैखिक योजन:
y_δ = (C / (2π)) × (jya(δ) / R)
— जहाँ jya SS-परम्परा की ज्या है और R त्रिज्या-नियतांक (शास्त्रीय रूप में 3438′ इत्यादि; यहाँ R का वचन पद में नहीं)। तब:
शेष = C/4 − y_δ
यह शेष व्यक्ष से मापा जाता है। (C, δ, R का सटीक पाठ-युग्म पूर्व-श्लोकों/परम्परा से बाँधना होगा — इस पद में केवल संक्रिया-क्रम निश्चित है।)

उदाहरण (worked example) केवल संक्रिया-दृष्टांत (C का मान पद में नहीं): एक राशि की क्रान्ति (एकज्यापक्रम): jyā(30°) × 1397 ⁄ 3438 = 698.5 → δ₁ = 11.72°; C = 5059.64 (1.59): y = 5059.64 × 11.72 ⁄ 360 = 164.7 योजन; शेष = 1264.9 − 164.7 = 1100.2 योजन व्यक्ष से = अक्षांश 78.28°, जहाँ वृश्चिक-कुम्भ का सूर्य नहीं दिखता। वास्तविक पुस्तक-गणना में C और jya-सारणी का शास्त्र-पाठ बाँधें।

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12.66
धनुर्मृगालिकुम्भेषु संस्थितो अर्को न दृश्यते ।
देवभागे असुराणां तु वृषाद्ये भचतुष्टये ।।
dhanurmṛgālikumbheṣu saṃsthito arko na dṛśyate ।
devabhāge asurāṇāṃ tu vṛṣādye bhacatuṣṭaye ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) धनुः = धनु-राशि; मृग = मकर; अलि = वृश्चिक; कुम्भ = कुम्भ; संस्थितः अर्कः = स्थित सूर्य; न दृश्यते = दिखाई नहीं देता; देवभागे = देव-भाग (उत्तर/मेरु-पक्ष); असुराणाम् = असुर-भाग में; तु = किन्तु; वृष-आद्ये = वृष से आरम्भ; भ-चतुष्टये = चार राशियों में।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य धनु, मकर, वृश्चिक और कुम्भ में स्थित हो, तब देव-भाग में वह दृष्टिगोचर नहीं होता — अर्थात उत्तर-ध्रुवीय “देव” क्षेत्र में वह दीर्घ-रात्रि का काल है। असुर-भाग में ठीक उलटा: वृष से आरम्भ चार राशियों (वृष, मिथुन, कर्क, सिंह) में सूर्य नहीं दिखता। यह भाग-द्वय की अर्ध-वर्षी अदृश्यता का राशि-रूप है, न कि व्यक्तिगत “भाग्य” का वचन।

English rendering When the Sun stands in Scorpio, Sagittarius, Capricorn and Aquarius, it is not seen in the Deva half; for the Asura half, the same non-visibility falls in the four signs beginning with Taurus.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — ध्रुवीय दृश्यता/अदृश्यता का राशि-वर्णन। अंतर्निहित ज्यामिति: सूर्य की क्रान्ति δ < 0 (दक्षिण) के गहरे भाग में उत्तर-ध्रुव पर सूर्य क्षितिज के नीचे; δ > 0 के गहरे भाग में दक्षिण-ध्रुव पर अदृश्य — चार-चार राशियों का यह समूह उसी अर्ध-वर्षी चक्र को नाम देता है।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए ७०°N पर एक प्रेक्षक — नवंबर–जनवरी में जब सूर्य धनु–मकर–कुम्भ की ओर होता है, तो कई सप्ताह तक सूर्य क्षितिज के ऊपर नहीं आता; यही “देव-भाग” की दीर्घ-रात्रि का राशि-रूप। दक्षिणी गोलार्ध के सममित अक्षांश (जैसे ७०°S) पर उलटा दृश्य: मई–जुलाई में सूर्य क्षितिज के नीचे रह जाता है — “असुर-भाग” का वही चार-राशि अदृश्यता-काल। यह भाग्य-कथन नहीं, polar night का राशि-निर्देशिका है: ecliptic longitude को local horizon visibility से जोड़ने की पुरानी सूची।

12.67
मेरौ मेषादिचक्रार्धे देवाः पश्यन्ति भास्करम् ।
सकृदेवोदितं तद्वदसुराश्च तुलादिगम् ।।
merau meṣādicakrārdhe devāḥ paśyanti bhāskaram ।
sakṛdevoditaṃ tadvadasurāśca tulādigam ।।
पाठ-भेद: ड्चकार्धे

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मेरौ = मेरु (उत्तर-ध्रुवीय शिखर) पर; मेष-आदि = मेष से आरम्भ; चक्रार्धे = चक्र के आधे भाग में (पाठ-भेद: ड्चकार्धे — सम्भवतः “चक्रार्धे” ही का रूप); देवाः = देव; पश्यन्ति भास्करम् = सूर्य को देखते हैं; सकृत्-एव-उदितम् = एक बार ही उदित (फिर अस्त बिना निरन्तर); तद्वत् = उसी प्रकार; असुराः च = और असुर; तुला-आदिगम् = तुला से आरम्भ वाले (अर्ध-चक्र) को।

हिन्दी भावार्थ मेरु पर देवगण मेष से आरम्भ अर्ध-चक्र भर सूर्य को एक ही उदय में निरन्तर देखते हैं — आधा वर्ष का ध्रुवीय दिन। उसी नियम से असुर-भाग तुला से आरम्भ अर्ध-चक्र में सूर्य को एक-उदय-निरन्तर देखता है। उदय-अस्त की दैनिक लय यहाँ टूटकर एक दीर्घ दिन/दीर्घ रात्रि बन जाती है।

English rendering At Meru the gods see the Sun once risen throughout the half-circle that begins with Aries; likewise the asuras see him continuously through the half that begins with Libra.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — ध्रुवीय दिन/रात्रि का संवाद-वर्णन। मॉडल: |φ| = 90° पर, जब δ और φ समान चिह्न के हों और |δ| पर्याप्त, सूर्य क्षितिज-ऊपर अर्ध-वर्ष रहता है; मेष→कन्या ≈ उत्तर-क्रान्ति पक्ष, तुला→मीन ≈ दक्षिण-क्रान्ति पक्ष।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) उत्तरी ध्रुव (लगभग ९०°N) पर २१ मार्च के आस-पास सूर्य एक बार “उदय” लेता है और लगभग २१ सितम्बर तक अस्त नहीं होता — छह महीने का एक ही दिन; यही मेरु पर “मेषादि चक्रार्ध” का observational core। दक्षिणी ध्रुव पर वही घटना तुला से मीन तक पलट जाती है। आधुनिक Arctic/Antarctic stations (जैसे Ny-Ålesund या Amundsen–Scott) इसी half-year daylight को calendar पर लिखते हैं; सूर्यसिद्धान्त उसे राशि-अर्धचक्र की भाषा में बाँधता है।

12.68
भूमण्डलात्पञ्चदशे भागे देवे अथ वासुरे ।
उपरिष्टाद्व्रजत्यर्कः सौम्ययाम्यायनान्तगः ।।
bhūmaṇḍalātpañcadaśe bhāge deve atha vāsure ।
upariṣṭādvrajatyarkaḥ saumyayāmyāyanāntagaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भूमण्डलात् = पृथ्वी-मण्डल (360°-वृत्त) से; पञ्चदशे भागे = पन्द्रहवें भाग में (360°/15 = 24°); देवे अथवा आसुरे = देव या असुर क्षेत्र में; उपरिष्ठात् व्रजति अर्कः = सूर्य ऊपर से गुजरता है (शिरोबिन्दु/लगभग zenith); सौम्य-याम्य-अयन-अन्तगः = उत्तर व दक्षिण अयन के अन्त तक पहुँचा हुआ (अयनांत = संक्रान्ति-सीमा)।

हिन्दी भावार्थ पृथ्वी-वृत्त के पन्द्रहवें भाग — अर्थात 24° की चाप — वाले क्षेत्र में, देव और असुर दोनों पक्षों में, सूर्य अयनों के अन्त पर सिर के ऊपर भ्रमण करता है। 24° यहाँ परमापक्रम के समकक्ष कोणीय माप है: ध्रुव से 24° नीचे (या विषुव से 66°) वह पट्टी जहाँ संक्रान्ति-सूर्य लगभग ऊर्ध्व होता है — शास्त्र का “ध्रुव-वृत्त/अयन-सीमा” संकेत।

English rendering In the fifteenth part of the terrestrial circle — that is, the 24° zone — in both the Deva and Asura regions, the Sun passes overhead when it has reached the ends of the northern and southern ayanas.

गणित / The Mathematics
1 भाग = 360° / 15 = 24°।
ध्रुव से 24° = अक्षांश |φ| = 90° − 24° = 66° (लगभग SS-ध्रुववृत्त, जहाँ ε ≈ 24°)।
अयनांत पर δ = ±ε ≈ ±24°; तब zenith-दूरी z ≈ |φ − δ|; φ = ±66° और δ = ±24° (समान गोलार्ध) पर z ≈ 42° नहीं — zenith-passage के लिए φ = δ, अर्थात उष्णकटिबन्ध |φ| = ε ≈ 24°।
पाठ की दो पठनीय ज्यामितियाँ: (क) 24° = ε की कोणीय इकाई के रूप में “पञ्चदश भाग”; (ख) देव/असुर-ध्रुवीय पट्टी में अयन-सूर्य का “उपरि” गमन — वर्णनात्मक। संख्या 24° पद से निश्चित (360/15); ε से तादात्म्य शास्त्र-परम्परा पर निर्भर, इस पद में ε शब्द नहीं।

उदाहरण (worked example) वृत्त = 360°। पञ्चदश भाग = 24°। यदि परमापक्रम ε = 24° लिया जाए (SS-सन्दर्भ में प्रचलित पूर्णांक), तो ध्रुववृत्त φ = 90° − 24° = 66°। विषुव से उष्णकटिबन्ध φ = ±24° — वही 24° इकाई। (आधुनिक ε ≈ 23.44°; तुलना के लिए, प्रमाण नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) मेट्रोलॉजी-लेयर में कोण ↔ गिनती का अनुशासन (MATHEMATICAL-AUDIT §1) इसी “भाग = वृत्त/पूर्णसंख्या” सोच से मेल खाता है: 360° को 15 से बाँटना = 24° की स्वच्छ इकाई। हमने ephemeris में ε/ayanāṃśa को selectable hypothesis रखा है, किसी एक “सत्य 24°” को इतिहास-निर्णय नहीं ठहराया।

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12.69
तदन्तरालयोश्च्छाया याम्योदक्सम्भवत्यपि ।
मेरोरभिमुखं याति परतः स्वविभागयोः ।।
tadantarālayoścchāyā yāmyodaksambhavatyapi ।
merorabhimukhaṃ yāti parataḥ svavibhāgayoḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-अन्तरालयोः = उन (सीमाओं) के बीच के अन्तराल में; छाया = शंकु/वस्तु की छाया; याम्य-उदक् = दक्षिण व उत्तर; सम्भवति अपि = भी उत्पन्न होती है; मेरोः अभिमुखम् = मेरु की ओर मुख किए; याति = जाती है; परतः = उसके पार/आगे; स्व-विभागयोः = अपने-अपने (देव/असुर) भागों में।

हिन्दी भावार्थ उन सीमा-पट्टियों के बीच के क्षेत्रों में छाया कभी दक्षिण को, कभी उत्तर को पड़ती है — ऋतु और सूर्य-क्रान्ति के अनुसार। उन सीमाओं के पार, अपने-अपने भाग में, छाया सदैव मेरुभिमुख चलती है। यह शंकु-छाया से गोलार्ध और “उष्ण/शीत” पट्टियों का सरल प्रेक्षण-नियम है।

English rendering In the intermediate belts the shadow falls both south and north; beyond those limits, in each division, it always moves facing Meru.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — छाया-दिशा का वर्णन। आधुनिक समान: उष्णकटिबन्धों (|φ| < ε) के भीतर मध्याह्न-छाया ऋतु से उत्तर↔दक्षिण पलटती है; |φ| > ε पर एक गोलार्ध में मध्याह्न-छाया सदैव ध्रुवाभिमुख (उत्तर में उत्तर की ओर, आदि)। SS “मेरुभिमुख” उसी को नाम देता है।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) एक सीधा shañku (gnomon) mid-day पर रखिए। दिल्ली में ग्रीष्म-सङ्क्रान्ति के निकट छाया उत्तर की ओर छोटी पड़ती है; शीत-सङ्क्रान्ति के निकट वही छाया दक्षिण की ओर लंबी हो जाती है — “कभी याम्य, कभी उदक्”। Tropic of Cancer (लगभग २३.५°N) के उत्तर में छाया कभी मध्याह्न पर दक्षिण नहीं जाती; tropic के दक्षिण–equator के बीच की पट्टी में ऋतु-अनुसार दिशा पलटती है। अध्याय के shañku-छाया गणित में यही सीमा-नियम latitude belts का प्रेक्षण-चिह्न बनता है।

12.70
भद्राश्वोपरिगः कुर्याद्भारते तूदयं रविः ।
रात्र्यर्धं केतुमाले तु कुरावस्तमयं तदा ।।
bhadrāśvoparigaḥ kuryādbhārate tūdayaṃ raviḥ ।
rātryardhaṃ ketumāle tu kurāvastamayaṃ tadā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भद्राश्व-उपरिगः = भद्राश्व (पूर्वी वर्ष) के ऊपर स्थित; कुर्यात् = करे; भारते = भारत-वर्ष में; तु उदयम् = तो उदय; रविः = सूर्य; रात्र्यर्धम् = अर्ध-रात्रि; केतुमाले = केतुमाल (पश्चिमी वर्ष) में; तु = और; कुरौ = कुरु (उत्तर-कुरु) में; अस्तमयम् = अस्त; तदा = तब।

हिन्दी भावार्थ जब सूर्य भद्राश्व के ऊपर हो, तब भारत में उसका उदय होता है, केतुमाल में अर्ध-रात्रि, और उसी क्षण कुरु में अस्त। चार वर्ष — भारत (दक्षिण), भद्राश्व (पूर्व), केतुमाल (पश्चिम), उत्तर-कुरु (उत्तर) — मेरु के चारों ओर एक ही सूर्य-स्थिति को चार “स्थानीय काल” में बाँटते हैं: उदय, मध्याह्न, अस्त, अर्ध-रात्रि का चक्र।

English rendering When the Sun is over Bhadrāśva it makes sunrise in Bhārata, midnight in Ketumāla, and sunset then in Kuru.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — चार-वर्ष स्थानीय-काल का वर्णन। ज्यामितीय सार: एक ही सूर्य-देशान्तर (या “उपरित” वर्ष) पर ≈ 90° देशान्तर-अन्तर वाले क्षेत्रों में काल-कला = 6 घंटे का व्यवस्थित फेज-शिफ्ट (उदय → मध्याह्न → अस्त → अर्धरात्रि) — अगला श्लोक इसे प्रदक्षिण क्रम में सामान्य करता है।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही instant — मान लीजिए Greenwich ६:०० UT — को चार दिशाओं में बाँटिए: भारत (लगभग ७५°E) में सूर्योदय-सदृश प्रातः, “पूर्वी” वर्ष में मध्याह्न-सदृश, “पश्चिमी” वर्ष में अर्ध-रात्रि, और “उत्तरी” वर्ष में अस्त-सदृश। यह ठीक वैसा ही है जैसे आज हम time zones से local solar time पढ़ते हैं: एक sun-position, चार longitudes पर चार clock-phases। सूर्यसिद्धान्त के चार वर्ष — भारत, भद्राश्व, केतुमाल, उत्तर-कुरु — उसी ९०°–९०° स्थानिक-काल चक्र को पौराणिक भूगोल की चौखट में रखते हैं।

12.71
भारतादिषु वर्षेषु तद्वदेव परिभ्रमन् ।
मध्योदयार्धरात्र्यस्तकालान्कुर्यात्प्रदक्षिणम् ।।
bhāratādiṣu varṣeṣu tadvadeva paribhraman ।
madhyodayārdharātryastakālānkuryātpradakṣiṇam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भारत-आदिषु वर्षेषु = भारत आदि वर्षों में; तद्वत् एव = ठीक उसी प्रकार; परिभ्रमन् = घूमता हुआ; मध्य = मध्याह्न; उदय = सूर्योदय; अर्धरात्रि = अर्ध-रात्रि; अस्त = अस्त; कालान् = कालों को; कुर्यात् = करे; प्रदक्षिणम् = प्रदक्षिण (दक्षिणावर्त) क्रम में।

हिन्दी भावार्थ भारत आदि सभी वर्षों में सूर्य उसी रीति से परिक्रमा करता हुआ मध्याह्न, उदय, अर्ध-रात्रि और अस्त के कालों को प्रदक्षिण क्रम से रचता है। एक ही घूर्णन — चार दिशाओं में चार “घड़ी-घाट”; दिशा बदलो, घड़ी का चरण 90° सरक जाता है।

English rendering Revolving in just the same way over the varṣas that begin with Bhārata, the Sun produces the successive times of midday, sunrise, midnight and sunset in clockwise (pradakṣiṇa) order.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्थानीय-काल का प्रदक्षिण-क्रम वर्णन। मॉडल (आधुनिक संकेत): स्थानीय सूर्य-काल ≈ LST/hour-angle ज्यामिति; 90° देशान्तर ≈ 6h = 15 योजन-कला नहीं, बल्कि 360°/24h = 15°/h। चार वर्ष ≈ चार 90° चतुर्थांश → चार प्रावस्थाएँ: noon, rise, midnight, set — क्रम दिशा-निर्भर।

हमारा डिकोड (Our Decode) lagna/MC परत में RA(MC) ≡ LST की 1e-9° जाँच (MATHEMATICAL-AUDIT §8) ठीक इसी “स्थानीय मध्य-आकाश ↔ काल” सम्बन्ध की आधुनिक मुहर है। हम ephemeris को mean-longitude प्रयोगशाला मानते हैं; true local-time/ascendant परत अलग sealed invariants पर टिकी है — इस श्लोक का “चार काल प्रदक्षिण” उसी intuition का पौराणिक मानचित्र है, न कि उत्पादन-ephemeris का दावा।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) एक घड़ी की सुई कल्पना कीजिए जो मेरु के चारों ओर प्रदक्षिण घूमती है: “भारत” पर मध्याह्न का अंक, ९०° पूर्व सरकते ही “उदय”, फिर “अर्ध-रात्रि”, फिर “अस्त”। दिशा बदलो — phase ६ घंटे सरक जाता है; सूर्य नहीं बदलता, केवल observer की meridian। आधुनिक भाषा में यही Earth rotation के कारण local hour angle का ३६०° चक्र है — चार वर्ष चार fixed longitudes, एक ही परिभ्रमण चार local times रचता है।

12.72
ध्रुवोन्नतिर्भचक्रस्य नतिर्मेरुं प्रयास्यतः ।
निरक्षाभिमुखं यातुर्विपरीते नतोन्नते ।।
dhruvonnatirbhacakrasya natirmeruṃ prayāsyataḥ ।
nirakṣābhimukhaṃ yāturviparīte natonnate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ध्रुव-उन्नतिः = ध्रुव की ऊँचाई (क्षितिज से); भचक्रस्य नतिः = नक्षत्र-चक्र (ख-मण्डल/विषुव-वृत्त पक्ष) की नति/दबाव; मेरुं प्रयास्यतः = मेरु की ओर जाते हुए; निरक्ष-अभिमुखम् = निरक्ष (विषुव) की ओर मुख किए; यातुः = जाते हुए का; विपरीते = उलटी; नत-उन्नते = नति और उन्नति।

हिन्दी भावार्थ मेरु की ओर बढ़ते हुए ध्रुव की उन्नति बढ़ती है और भचक्र की नति उसी माप में होती है — अक्षांश = ध्रुवोन्नति का शास्त्र-वाक्य। निरक्ष की ओर चलने वाले के लिए नति-उन्नति पलट जाती हैं: ध्रुव नीचे, भचक्र ऊपर। यात्रा की दिशा ही उन्नति/नति का चिह्न बदल देती है।

English rendering For one going toward Meru, the elevation of the pole is the depression of the star-circle; for one facing the equator, elevation and depression reverse.

गणित / The Mathematics
φ = अक्षांश = ध्रुवोन्नति h_p
h_p = φ (उत्तर-ध्रुव के लिए; दक्षिण में चिह्न उलटा)
भचक्र (खगोलीय विषुव/नक्षत्र-वृत्त) की नति = φ
मेरु-दिशा (+φ): h_p ↑, भचक्र-नति ↑
निरक्ष-दिशा (φ → 0): h_p ↓, नति-उन्नति विपर्यस्त
(Convention: क्षितिज से ध्रुव का taila-altitude; SS-पाठ “उन्नति/नति” युग्म।)

उदाहरण (worked example) भारत-सदृश φ = 28° पर ध्रुवोन्नति h_p = 28°; भचक्र-नति = 28°। निरक्ष (φ = 0°) पर h_p = 0° — ध्रुव क्षितिज पर। मेरु (φ = 90°) पर h_p = 90° — ध्रुव शिरोबिन्दु; भचक्र क्षितिज-वृत्त। (क्षितिज-ज्यामिति; ayanāṃśa यहाँ अनुपस्थित — यह शुद्ध अक्षांश-सम्बन्ध है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) ascendant की closed-form (longitude, latitude φ, obliquity, sidereal time) और bhāva-madhya invariants (MATHEMATICAL-AUDIT §8) इसी φ = polar altitude नींव पर खड़े हैं — Swiss-fixture से 0.1° भीतर सहमति, RA(MC) ≡ LST को 1e-9° तक। हमने “ध्रुवोन्नति = अक्षांश” को interpretation नहीं, geometry seal माना; oracle discipline: `==` on fixtures, no tolerance that hides a −1.

12.73
भचक्रं ध्रुवयोर्बद्धं आक्षिप्तं प्रवहानिलैः ।
पर्येत्यजस्रं तन्नद्धा ग्रहकक्षा यथाक्रमम् ।।
bhacakraṃ dhruvayorbaddhaṃ ākṣiptaṃ pravahānilaiḥ ।
paryetyajasraṃ tannaddhā grahakakṣā yathākramam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भचक्रम् = नक्षत्र-मण्डल / तारों का चक्र; ध्रुवयोः = दोनों ध्रुवों पर; बद्धम् = बँधा हुआ; आक्षिप्तम् = प्रेरित / वेग से घुमाया गया; प्रवह-अनिलैः = प्रवह नामक वायुओं से; पर्येति = चक्कर लगाता है; अजस्रम् = निरन्तर; तत्-नद्धा = उससे बँधी हुई; ग्रह-कक्षाः = ग्रहों की कक्षाएँ; यथा-क्रमम् = क्रम के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक आकाश की यांत्रिकी का एक स्पष्ट चित्र खींचता है। नक्षत्रों का चक्र दोनों ध्रुवों पर बँधा है और प्रवह-वायुओं के वेग से निरन्तर घूमता रहता है। उसी चक्र से ग्रहों की कक्षाएँ भी बँधी हैं, इसलिए वे भी उसी क्रम में अपनी-अपनी गति से परिक्रमा करती हैं। यहाँ “प्रवह” कोई कल्पना-मात्र नहीं, बल्कि उस काल की भाषा में घूर्णन-प्रेरक का नाम है।

English rendering The stellar sphere is bound to the two poles and driven by the pravaha winds; it revolves without pause. Bound to that same sphere, the planetary orbits move in their proper order.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — वर्णन (कोशिक/यांत्रिक भूगोल)। श्लोक कक्षा-त्रिज्या या अवधि नहीं देता; वह केवल यह स्थापित करता है कि भचक्र और ग्रह-कक्षाएँ एक ही घूर्णन-व्यवस्था में जुड़े हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) रात को ध्रुव-तारे के आस-पास circumpolar तारे देखिए — वे एक अक्ष पर बँधे चक्र की तरह घूमते दिखते हैं; यही “भचक्रं ध्रुवयोर्बद्धम्” का आँखों-देखा रूप। ग्रहों की “कक्षाएँ” उसी घूमते frame से जुड़ी हैं, इसलिए वे नक्षत्र-पृष्ठभूमि पर अपनी-अपनी slow proper motion से खिसकती हैं, जबकि पूरा आकाश nightly east-to-west घूमता रहता है। “प्रवहानिल” यहाँ mechanical driver का नाम है — बाद के गोल-ग्रन्थ (जैसे भास्कर द्वितीय के सिद्धान्तशिरोमणि में गोलाध्याय) इसी diurnal rotation चित्र को यन्त्र और उपपत्ति से और सख्त बनाते हैं।

12.74
सकृदुद्गतं अब्दार्धं पश्यन्त्यर्कं सुरासुराः ।
पितरः शशिगाः पक्षं स्वदिनं च नरा भुवि ।।
sakṛdudgataṃ abdārdhaṃ paśyantyarkaṃ surāsurāḥ ।
pitaraḥ śaśigāḥ pakṣaṃ svadinaṃ ca narā bhuvi ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सकृत्-उद्गतम् = एक बार उदित; अब्द-अर्धम् = वर्ष का आधा; पश्यन्ति = देखते हैं; अर्कम् = सूर्य को; सुर-असुराः = देव और असुर; पितरः = पितृगण; शशि-गाः = चन्द्रमा पर / चन्द्र-मार्ग में स्थित; पक्षम् = एक पक्ष (15 तिथियाँ); स्व-दिनम् = अपना दिन; नराः = मनुष्य; भुवि = पृथ्वी पर।

हिन्दी भावार्थ दिन की परिभाषा यहाँ स्थान और दृष्टि से बदलती है। देव और असुर सूर्य को आधा वर्ष तक निरन्तर उदित देखते हैं — वही उनका एक दिन है। पितृगण, जो चन्द्र-मण्डल से जुड़े कहे गए हैं, एक पक्ष को अपना दिन मानते हैं। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य का दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक का अपना साधारण दिन है। एक ही सूर्य — तीन अलग-अलग “दिन” की माप।

English rendering Gods and asuras see the risen Sun for half a year as their day. The pitṛs, associated with the Moon, take a fortnight as theirs. Humans on Earth keep their own solar day.

गणित / The Mathematics दिन-दीर्घता की तुलनात्मक परिभाषा (संख्याएँ श्लोक से):
- सुर/असुर-दिन = ½ वर्ष (अब्दार्ध)
- पितृ-दिन = 1 पक्ष
- मनुष्य-दिन = 1 स्व-दिन (साधारण सौर दिन)
यदि 1 वर्ष ≈ 360 सावन दिन की सुविधा-मान्यता लें (केवल अनुपात-दृष्टि), तो सुर-दिन ≈ 180 मनुष्य-दिन; पितृ-दिन ≈ 15 मनुष्य-दिन। सटीक रूपान्तरण युग-दिन-गणना (Sūrya-Siddhānta: 1,577,917,828 दिन / 4,320,000 वर्ष) पर निर्भर करता है।

उदाहरण (worked example) SS-canon दिन-गणना पर औसत वर्ष-लंबाई = 1,577,917,828 ÷ 4,320,000 ≈ 365.258756 दिन। तब सुर/असुर-दिन ≈ 365.258756 ÷ 2 ≈ 182.629 दिन (मनुष्य-सौर-दिनों में)। पितृ-दिन = 1 पक्ष ≈ आधा सिनोडिक मास; पूर्ण रूप से तिथि-इंजन की परिभाषा पर टिकता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “दिन” की इकाई-परिभाषा बदलते ही सारी पञ्चाङ्ग-श्रृंखला हिल जाती है। हमारे पारिस्थितिकी-तंत्र में civil-day की दो canon-मान्यताएँ साफ हैं — SS: 1,577,917,828 दिन/महायुग (math-core) और Āryabhaṭa: 1,577,917,500 (vedic-ghadi); अन्तर 328 दिन। तिथि-इंजन पर यही चुनाव सबसे तेज़ चोट करता है — श्लोक का “स्वदिनं च नरा भुवि” उसी civil-day आधार की याद दिलाता है जिस पर हमने oracle-fixtures को `==` से बाँधा है।

12.75
उपरिष्टस्य महती कक्षाल्पाधःस्थितस्य च ।
महत्या कक्षया भागा महान्तो अल्पास्तथाल्पया ।।
upariṣṭasya mahatī kakṣālpādhaḥsthitasya ca ।
mahatyā kakṣayā bhāgā mahānto alpāstathālpayā ।।
पाठ-भेद: C उपरिष्ठस्य

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उपरि-स्थस्य = ऊपर स्थित का (पाठ-भेद: C उपरिष्ठस्य); महती कक्षा = बड़ी कक्षा; अल्पा = छोटी; अधः-स्थितस्य = नीचे स्थित का; महत्या कक्षया = बड़ी कक्षा से; भागाः = अंश / चाप-भाग; महान्तः = बड़े (रैखिक रूप से); अल्पाः = छोटे; तथा = उसी प्रकार; अल्पया = छोटी कक्षा से।

हिन्दी भावार्थ जो ग्रह ऊपर है उसकी कक्षा बड़ी है, जो नीचे है उसकी कक्षा छोटी। समान कोणीय अंश भी बड़ी कक्षा पर लम्बा रैखिक चाप बनाते हैं और छोटी कक्षा पर छोटा। अर्थात् “भाग” यहाँ केवल कोण नहीं — कक्षा-त्रिज्या के साथ जुड़ी दूरी भी है। ऊपर-नीचे का क्रम और कक्षा-आकार एक ही ज्यामितीय सत्य के दो मुख हैं।

English rendering The upper body has a large orbit; the lower, a small one. On a large orbit the linear extent of a degree is great; on a small orbit it is small.

गणित / The Mathematics कोणीय अंश θ का चाप-लंबाई s = r × θ (θ रेडियन में), अथवा s ∝ r जब θ समान हो। श्लोक कहता है: बाह्य कक्षा (r बड़ा) ⇒ समान भaga/अंश का रैखिक मान बड़ा; अन्तः कक्षा (r छोटा) ⇒ छोटा। कोई संख्यात्मक स्थिरांक यहाँ नहीं — केवल r–s अनुपात का सिद्धांत।

उदाहरण (worked example) मान लें दो कक्षाएँ r₁ = 2 r₂ और एक ही कोण 1° = π/180 rad। तब चाप s₁ / s₂ = r₁ / r₂ = 2 — ऊपरी कक्षा पर वही “एक भाग” दोगुना लम्बा। यह केवल ज्यामितीय अनुपात है; yojana-माप श्लोक में नहीं दी गई।

12.76
कालेनाल्पेन भगणं भुङ्क्ते अल्पभ्रमणाश्रितः ।
ग्रहः कालेन महता मण्डले महति भ्रमन् ।।
kālenālpena bhagaṇaṃ bhuṅkte alpabhramaṇāśritaḥ ।
grahaḥ kālena mahatā maṇḍale mahati bhraman ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कालेन अल्पेन = थोड़े काल में; भगणम् = एक पूर्ण कक्षा-परिक्रमण; भुङ्क्ते = पूरा करता है; अल्प-भ्रमण-आश्रितः = छोटी परिक्रमा / छोटी कक्षा पर स्थित; ग्रहः = ग्रह; कालेन महता = बड़े काल में; मण्डले महति = बड़े मण्डल में; भ्रमन् = घूमता हुआ।

हिन्दी भावार्थ छोटी कक्षा वाला ग्रह थोड़े समय में एक पूरा भगण पूरा कर लेता है। बड़े मण्डल में घूमने वाला ग्रह उसी एक भगण के लिए बहुत काल लेता है। कक्षा छोटी — गति (कोणीय, औसत रूप में) तेज़; कक्षा बड़ी — गति धीमी। यह अवधि और कक्षा-आकार का सीधा सम्बन्ध है, न कि किसी फलित-कथन का।

English rendering A planet on a small orbit completes a revolution in little time. One that wanders on a great circle needs a long time for the same full turn.

गणित / The Mathematics औसत कोणीय गति ω = 2π / T, जहाँ T = सिडेरियल अवधि। छोटी कक्षा ⇒ छोटा T ⇒ बड़ा ω; बड़ी कक्षा ⇒ बड़ा T ⇒ छोटा ω। युग-भाषा में: भगण-संख्या N (प्रति महायुग) ∝ 1/T। महायुग = 4,320,000 वर्ष पर mean motion μ = N × 360° / (दिन-संख्या)।

उदाहरण (worked example) SS-canon दिन-संख्या D = 1,577,917,828 दिन/महायुग। यदि किसी ग्रह के भगण N हों, तो औसत दैनिक गति = (N × 360°) / D। उदाहरण: N बड़ा (चन्द्र) ⇒ μ बड़ा; N छोटा (शनि) ⇒ μ छोटा — ठीक अगले श्लोक की दिशा।

हमारा डिकोड (Our Decode) math-core.js का integer-bhagaṇa mean-longitude यंत्र ठीक इसी सिद्धांत पर खड़ा है — युग में भगण-पूर्णांक तय करो, दिन-canon चुनो, mean longitude निकालो। bīja-संशोधन भी हमने absolute नहीं, planet−Sun relative-rate के रूप में जाँचे (मङ्गल +30, गुरु −51, शनि +61 rev/महायुग) — क्योंकि “कक्षा-आकार ↔ अवधि” का ढाँचा सूर्य-आधारित सिडेरियल फ्रेम में ही स्थिर बैठता है।

12.77
स्वल्पयातो बहून्भुङ्क्ते भगणान्शीतदीधितिः ।
महत्या कक्षया गच्छन्ततः स्वल्पं शनैश्चरः ।।
svalpayāto bahūnbhuṅkte bhagaṇānśītadīdhitiḥ ।
mahatyā kakṣayā gacchantataḥ svalpaṃ śanaiścaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सु-अल्पया = बहुत छोटी (कक्षा) से; अतः = इसलिए; बहून् भगणान् = अनेक परिक्रमण; भुङ्क्ते = पूरा करता है; शीत-दीधितिः = चन्द्रमा (शीतल-किरण वाला); महत्या कक्षया = बड़ी कक्षा से; गच्छन् = चलता हुआ; ततः = उससे / इसलिए; स्वल्पम् = बहुत कम (भगण); शनैः-चरः = शनि (धीरे चलने वाला)।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा छोटी कक्षा पर चलता है, इसलिए युग भर में अनगिनत भगण पूरे कर लेता है। शनि बड़ी कक्षा पर धीरे चलता है, इसलिए उतने ही काल में उसके भगण बहुत कम होते हैं। “शीतदीधिति” और “शनैश्चर” — नामों में ही गति का संकेत है। यह श्लोक 12.76 के नियम का दो ध्रुवों पर जीवन्त उदाहरण है।

English rendering The cool-rayed Moon, moving on a small orbit, completes many revolutions. Saturn, travelling on a great orbit, completes few.

गणित / The Mathematics गुणात्मक नियम: N_चन्द्र ≫ N_शनि (प्रति महायुग भगण)। अवधि-अनुपात T_शनि / T_चन्द्र ≈ N_चन्द्र / N_शनि। श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता; वह केवल चरम-युग्म (अल्पतम कक्षा ↔ अधिकतम भगण; महत्तम कक्षा ↔ न्यूनतम भगण) स्थापित करता है।

उदाहरण (worked example) केवल दिशा दिखाने को (श्लोक से संख्या नहीं): यदि काल्पनिक रूप से N_Moon / N_Saturn ≈ 300 हो, तो औसत सिडेरियल अवधि-अनुपात T_Sat / T_Moon ≈ 300 — चन्द्र “बहून् भगणान्”, शनि “स्वल्पम्”। वास्तविक SS भगण-तालिका अध्याय-1/2 की सूची से ली जाती है; यहाँ केवल अनुपात-तर्क है।

हमारा डिकोड (Our Decode) mean-longitude प्रयोगशाला में चन्द्र और शनि ठीक इन दोनों सिरों पर बैठते हैं — तीव्र μ और मन्द μ। शनि का fitted relative bīja +61 rev/महायुग (Sun-anchored; MATHEMATICAL-AUDIT §3) इसी धीमे बाहरी ग्रह की दर-संवेदनशीलता को छूता है; absolute re-fit जान-बूझकर नहीं लगाया गया, ताकि सिनोडिक ज्यामिति न बिगड़े।

12.78
मन्दादधः क्रमेण स्युश्चतुर्था दिवसाधिपाः ।
वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः ।।
mandādadhaḥ krameṇa syuścaturthā divasādhipāḥ ।
varṣādhipatayastadvattṛtīyāśca prakīrtitāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्दात् = शनि से (मन्द = सबसे धीमा); अधः = नीचे की ओर; क्रमेण = क्रम से; स्युः = होते हैं; चतुर्थाः = चौथे-चौथे; दिवस-अधिपाः = दिन के स्वामी (वारेश); वर्ष-अधिपतयः = वर्ष के स्वामी; तद्वत् = उसी प्रकार; तृतीयाः = तीसरे-तीसरे; च = और; प्रकीर्तिताः = कहे गए हैं।

हिन्दी भावार्थ ग्रहों को कक्षा-क्रम में शनि से नीचे गिनो — शनि, गुरु, मङ्गल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र। इस पंक्ति में प्रत्येक चौथा ग्रह दिवस का स्वामी होता है। उसी पंक्ति में प्रत्येक तीसरा वर्ष का स्वामी कहा गया है। यह वार-क्रम और वर्षेश-क्रम की रचना-विधि है — फलित-भविष्य नहीं, गिनती का नियम।

English rendering Counting downward from the slowest (Saturn) in orbital order, every fourth planet is a day-lord. In the same way, every third is declared a year-lord.

गणित / The Mathematics कक्षा-क्रम (बाह्य → अन्तः):
P = [शनि, गुरु, मङ्गल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र] (सूचकांक 0…6)
वारेश-अनुक्रम: a<sub>k+1</sub> = a_k + 3 (mod 7) — अर्थात् “चतुर्थ” गिनती (वर्तमान सहित चार)।
शनि से: शनि → सूर्य → चन्द्र → मङ्गल → बुध → गुरु → शुक्र → (फिर शनि)।
वर्षेश: b<sub>k+1</sub> = b_k + 2 (mod 7) — “तृतीय” गिनती।
यह 24 होराओं वाली प्राचीन व्युत्पत्ति से भी मेल खाता है: एक दिन की 24 होराएँ P-क्रम में घूमती हैं; अगले दिन की पहली होरा = +24 ≡ +3 (mod 7) स्थान आगे।

उदाहरण (worked example) शनिवार का प्रथम होरेश = शनि। P पर +3: गुरु(1), मङ्गल(2), सूर्य(3) ⇒ रविवार का वारेश = सूर्य। फिर +3 ⇒ चन्द्र (सोम), +3 ⇒ मङ्गल (मङ्गल), +3 ⇒ बुध (बुध), +3 ⇒ गुरु (गुरु), +3 ⇒ शुक्र (शुक्र), +3 ⇒ शनि (शनि)। सात वार पूरे।

12.79
ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानां अधिपाः स्मृताः ।
होरेशाः सूर्यतनयादधोअधः क्रमशस्तथा ।।
ūrdhvakrameṇa śaśino māsānāṃ adhipāḥ smṛtāḥ ।
horeśāḥ sūryatanayādadhoadhaḥ kramaśastathā ।।
पाठ-भेद: ड्मसानाम्

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ऊर्ध्व-क्रमेण = ऊपर की ओर क्रम से; शशिनः = चन्द्रमा से; मासानाम् अधिपाः = महीनों के स्वामी (पाठ-भेद: ड्मसानाम् — अर्थ मासानाम् की ओर ही; पाठ-भेद संभव); स्मृताः = स्मरण किए / कहे गए; होरेशाः = होरा (होरा = ½ राशि ≈ 1 घंटा के निकट व्यवहार) के स्वामी; सूर्य-तनयात् = सूर्य-पुत्र शनि से; अधः-अधः = नीचे-नीचे; क्रमशः = क्रमशः; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ मास के स्वामी चन्द्रमा से ऊपर की ओर गिने जाते हैं — कक्षा-क्रम को उल्टा चढ़ते हुए। होरा के स्वामी सूर्य-पुत्र शनि से नीचे-नीचे क्रमशः चलते हैं। एक दिशा मासेश की, दूसरी होरेश की; दोनों एक ही सात-ग्रह माला पर विपरीत या भिन्न आरम्भ-बिन्दु से। (हस्तलेख में “ड्मसानाम्” जैसा पाठ-भेद मिलता है; प्रचलित अर्थ मासानाम् ही रखता है।)

English rendering Lords of the months are counted upward from the Moon. Lords of the horas run downward, step by step, from the Sun’s son (Saturn).

गणित / The Mathematics होरेश-क्रम = P अधोमुखी चक्र (शनि से):
शनि → गुरु → मङ्गल → सूर्य → शुक्र → बुध → चन्द्र → शनि …
मासेश-क्रम = शशि से ऊर्ध्व:
चन्द्र → बुध → शुक्र → सूर्य → मङ्गल → गुरु → शनि → चन्द्र …
(अर्थात् P का उल्टा क्रम, आरम्भ चन्द्र से।)
1 दिन = 24 होरा; प्रत्येक होरा का स्वामी क्रम में एक entri आगे। वारेश = उस दिन की पहली होरा का स्वामी — 12.78 से जुड़ा परिणाम।

उदाहरण (worked example) रविवार, सूर्योदय = होरा 1, होरेश = सूर्य। होरा 2 = शुक्र, 3 = बुध, 4 = चन्द्र, 5 = शनि, … चक्र P पर अधोमुखी। 24 होराओं बाद अगला वारेश = चन्द्र (सोमवार) — +3 mod 7 नियम की पुष्टि।

12.80
भवेद्भकक्षा तीक्ष्णांशोर्भ्रमणं षष्टिताडितम् ।
सर्वोपरिष्टाद्भ्रमति योजनैस्तैर्भमण्डलम् ।।
bhavedbhakakṣā tīkṣṇāṃśorbhramaṇaṃ ṣaṣṭitāḍitam ।
sarvopariṣṭādbhramati yojanaistairbhamaṇḍalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भवेत् = होता है; भ-कक्षा = नक्षत्र/तारा-कक्षा (भचक्र की परिधि); तीक्ष्ण-अंशोः = सूर्य की (तीक्ष्ण-किरण वाले की); भ्रमणम् = कक्षा-परिक्रमा / कक्षा-परिधि; षष्टि-ताडितम् = साठ से गुणित; सर्व-उपरि-स्तात् = सबसे ऊपर; भ्रमति = घूमता है; योजनैः तैः = उन्हीं योजनों में; भ-मण्डलम् = भचक्र / नक्षत्र-मण्डल।

हिन्दी भावार्थ सूर्य की कक्षा-परिधि को साठ से गुणा करो — वही भकक्षा की माप है। सबसे ऊपर, उन्हीं योजनों में नापा गया भमण्डल घूमता है। यह श्लोक आकाश की सबसे बाहरी परिधि को सूर्य-कक्षा की षष्टि-गुणित प्रतिबिम्ब बनाता है — एक स्वच्छ पैमाना-सूत्र, काव्य नहीं।

English rendering The stellar orbit equals the Sun’s orbital circuit multiplied by sixty. Above all else the star-sphere turns, measured in those same yojanas.

गणित / The Mathematics
C_bha = 60 × C_sūrya
जहाँ C = कक्षा-परिधि (योजन में); षष्टि = 60।
यदि सूर्य-कक्षा की त्रिज्या r_s (योजन) हो, तो C_s = 2π r_s (आधुनिक वृत्त-सूत्र; सिद्धान्त स्वयं प्रायः दी गई परिधि से काम करता है), और
C_bha = 60 × C_s ⇒ r_bha = 60 × r_s
अर्थात् भचक्र सूर्य-कक्षा से त्रिज्या में भी षष्टि-गुणित। संख्या 60 श्लोक से digit-faithful है।

उदाहरण (worked example) यदि किसी पाठ/सारणी में सूर्य-कक्षा परिधि C_s = Y योजन दी हो, तो भकक्षा = 60Y योजन। अनुपात स्थिर है: C_bha / C_s = 60, चाहे Y का निरपेक्ष मान किसी भी अध्याय-तालिका से आए। (यहाँ Y श्लोक में नहीं है — केवल गुणक 60 है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) षष्टि-आधारित पैमाना पूरे सिद्धान्त की मेट्रोलॉजी-संस्कृति से मेल खाता है — 1 दिन = 60 घटी = 3,600 पल = 216,000 विपल (MATHEMATICAL-AUDIT §1)। समय की षष्टि-विभाजन और यहाँ कक्षा-परिधि का ×60 एक ही sexagesimal ढाँचे के दो चेहरे हैं; 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 चाप-मिनट/वृत्त केवल गणना-संगति है, भौतिक समता नहीं। हमारा यंत्र mean-longitude संश्लेषण-प्रयोगशाला है, production true-position ephemeris नहीं — इस श्लोक का योजन-पैमाना उसी ईमानदारी से “माडल की इकाई” रहता है, आकाश का अंतिम प्रमाण नहीं।

12.81
कल्पोक्तचन्द्रभगणा गुणिताः शशिकक्षया ।
आकाशकक्षा सा ज्ञेया करव्याप्तिस्तथा रवेः ।।
kalpoktacandrabhagaṇā guṇitāḥ śaśikakṣayā ।
ākāśakakṣā sā jñeyā karavyāptistathā raveḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कल्पोक्त = कल्प में कहे गए; चन्द्रभगणाः = चन्द्रमा के कक्षा-परिक्रमण-संख्या; गुणिताः = गुणा किए हुए; शशिकक्षया = चन्द्र-कक्षा (योजन-परिधि) से; आकाशकक्षा = आकाश-कक्षा / व्योम-परिधि; सा ज्ञेया = वही जानी जाए; करव्याप्तिः = कर-व्याप्ति (सूर्य-सम्बद्ध आकाश-माप); तथा रवेः = उसी प्रकार सूर्य की भी।

हिन्दी भावार्थ कल्प में निर्दिष्ट चन्द्र-भगणों को चन्द्रमा की कक्षा (योजनों में परिधि) से गुणा करो — वह गुणनफल ही आकाश-कक्षा है, अर्थात् व्योम की वह बृहत् परिधि जिससे सारी ग्रह-कक्षाएँ अनुपात में निकलती हैं। वही माप सूर्य की कर-व्याप्ति के रूप में भी जानी जाती है: एक ही आकाश-परिधि, दो नामों से — चन्द्र-आधारित रचना और सूर्य-सम्बद्ध व्याप्ति।

English rendering Multiply the Moon’s kalpa-stated revolutions by the Moon’s orbital circumference; the product is the orbit of the sky (ākāśa-kakṣā). That same measure is likewise known as the Sun’s kara-vyāpti — one celestial circumference, named from both lunar construction and solar extent.

गणित / The Mathematics
आकाशकक्षा = (कल्पोक्त चन्द्र-भगण) × (शशि-कक्षा)
यही राशि रवि की कर-व्याप्ति भी है। संख्याएँ इस श्लोक में नहीं दीं; कक्षा-योजन आगे 12.85 आदि में आते हैं। इकाई: योजन (रैखिक परिधि)।

उदाहरण (worked example)
शशि-कक्षा = 324,000 योजन (12.85)। कल्प (1000 युग) में चन्द्र-भगण = 57,753,336 × 1000 = 57,753,336,000 (1.30), तो
आकाशकक्षा = 57,753,336,000 × 324,000 = 18,712,080,864,000,000 योजन — ठीक वही संख्या जो 12.90 के शब्द देते हैं।
(The sky-orbit = the Moon's kalpa revolutions × its orbit = the number of 12.90, exactly.)

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक रैखिक कक्षा-परत की “एक आकाश-परिधि” वाली आधार-रचना है — सभी ग्रह-कक्षाएँ उसी आकाशकक्षा से भाग द्वारा निकलती हैं। हमारी metrology-पढ़त (MATHEMATICAL-AUDIT §1) समय-वृत्त (21,600 प्राण/दिन) और कोण-वृत्त (21,600 कला/वृत्त) को गिनती-संगत मानती है, भौतिक समता नहीं; 12.81 उसी “एक वृत्त से अनुपात” की भावना को रैखिक योजन-जगत में खोलता है।

12.82
सैव यत्कल्पभगणैर्भक्ता तद्भ्रमणं भवेत् ।
कुवासरैर्विभज्याह्नः सर्वेषां प्राग्गतिः स्मृता ।।
saiva yatkalpabhagaṇairbhaktā tadbhramaṇaṃ bhavet ।
kuvāsarairvibhajyāhnaḥ sarveṣāṃ prāggatiḥ smṛtā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सैव = वही (आकाशकक्षा); यत् = जो; कल्पभगणैः = कल्प-भगणों से; भक्ता = विभाजित; तत् भ्रमणं = वही उस (ग्रह) का भ्रमण / कक्षा-परिधि; भवेत् = हो; कुवासरैः = भू-दिनों (सावन दिवसों) से; विभज्य = भाग देकर; आह्नः = दैनिक; सर्वेषां = सबकी; प्राग्गतिः = पूर्वगामिनी (पूर्वाभिमुख) गति; स्मृता = कही गई है।

हिन्दी भावार्थ वही आकाशकक्षा जब किसी पिण्ड के कल्प-भगणों से भाजित हो, तो फल उसकी अपनी कक्षा-परिधि (भ्रमण) बनता है। फिर आकाशकक्षा (अथवा तुल्य रचना) को कल्प के कुवासरों — सावन दिनों — से भाग दो: जो दैनिक रैखिक गति निकलती है, वही सब ग्रहों की प्राग्गति, पूर्व दिशा की दैनिक चाल, कही गई है। कक्षा भगणों से; दिन-गति कुवासरों से — दो भाग, एक आकाश-सूत्र।

English rendering That same sky-orbit, divided by a body’s kalpa-revolutions, becomes that body’s own orbital circumference. Divided by the civil days of the kalpa, it yields the daily eastward linear motion of all — the prāggati remembered for every graha.

गणित / The Mathematics
स्व-कक्षा (भ्रमण) = आकाशकक्षा ÷ (उसके कल्प-भगण)
आह्न-प्राग्गति (योजन/दिन) = आकाशकक्षा ÷ (कल्प के कुवासर)
तुल्य रूप: आह्न-गति = (स्व-कक्षा × कल्प-भगण) ÷ कुवासर।
कुवासर = सावन (civil) दिन — सिद्धान्त की दिन-गिनती का वरण यहाँ निर्णायक है।

उदाहरण (worked example)
संकेतात्मक: आकाशकक्षा = A योजन, कल्प-भगण = B, कुवासर = D।
स्व-कक्षा = A/B; दैनिक योजन-गति = A/D।
महायुग-पैमाने पर Sūrya-Siddhānta-canon: D/महायुग = 1,577,917,828 सावन दिन (math-core); Āryabhaṭa-canon: 1,577,917,500 — 328 दिन का अन्तर तभी से दैनिक गति में पैठता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) “कुवासरैर्विभज्य” बिल्कुल वही जगह है जहाँ day-count का वरण इंजन को छूता है। bharat-ephemeris-offline / math-core SS-canon 1,577,917,828 पर चलता है; vedic-ghadi Āryabhaṭa 1,577,917,500 पर — 328-दिन की दरार वास्तविक है, और synodic/tithi परत पर सबसे तेज़ लगती है। प्राग्गति का भाजक “कौन-से civil days” हैं, यह श्लोक उसी प्रश्न को शास्त्र-वाक्य बना देता है।

12.83
भुक्तियोजनजा सङ्ख्या सेन्दोर्भ्रमणसङ्गुणा ।
स्वकक्षाप्ता तु सा तस्य तिथ्याप्ता गतिलिप्तिका ।।
bhuktiyojanajā saṅkhyā sendorbhramaṇasaṅguṇā ।
svakakṣāptā tu sā tasya tithyāptā gatiliptikā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भुक्तियोजनजा सङ्ख्या = दैनिक गति से उत्पन्न योजन-संख्या; सेन्दोः = चन्द्र सहित / चन्द्र की; भ्रमणसङ्गुणा = भ्रमण (कक्षा) से गुणा; स्वकक्षाप्ता = अपनी कक्षा से भाजित; सा = वह राशि; तस्य = उसकी; तिथ्याप्ता = तिथि से भाजित; गतिलिप्तिका = गति कलाओं (लिप्ता) में।

हिन्दी भावार्थ ग्रह की दैनिक चाल पहले योजनों में ली जाए; उस योजन-भुक्ति को चन्द्र-भ्रमण से गुणा करो, फिर अपनी कक्षा से भाग दो। जो फल आए, उसे तिथि-माप से और भाजित करो — परिणाम उस ग्रह की गति लिप्तिकाओं में, अर्थात् कोणीय कलाओं में। रैखिक योजन-संसार से कोणीय कला-संसार तक का पुल: चन्द्र-कक्षा सन्दर्भ, स्व-कक्षा भाजक, तिथि अन्तिम मापदण्ड।

English rendering Take the daily motion as a count of yojanas; multiply by the Moon’s orbit and divide by the planet’s own orbit; divide that result by the tithi-measure — you obtain the motion in liptikās (minutes of arc). Linear speed becomes angular speed through the lunar orbit as bridge.

गणित / The Mathematics
मध्यावस्था: S = (भुक्ति_योजन × चन्द्र-भ्रमण) ÷ स्व-कक्षा
गति_लिप्तिका = S ÷ (तिथि-माप)
(पाठ “तिथ्याप्ता” को भाजक-चरण मानता है; पूर्ण संख्यात्मक तिथि-गुणक इस श्लोक में नहीं खुला।)
तुल्य आधुनिक भावना (वृत्त = 21,600′): गति′ ≈ (भुक्ति_योजन × 21,600) ÷ कक्षा — जब कोण-वृत्त और कक्षा-परिधि एक ही अनुपात-भाषा बोलें।

उदाहरण (worked example)
संकेत-उदाहरण (रूप-मात्र; तिथि-भाजक को 1 मानकर मध्य पद):
चन्द्र-कक्षा = 324,000 योजन (12.85), स्व-कक्षा = 324,000 (चन्द्र स्वयं), भुक्ति = u योजन/दिन।
S = (u × 324,000) / 324,000 = u।
संख्या से: 12.82 की दैनिक योजन-गति = 18,712,080,864,000,000 ÷ 1,577,917,828,000 (कल्प के भूदिन) = 11,858.75 योजन; ÷ 15 (तिथि) = 790.58′ = चन्द्र की मध्य दैनिक गति (57,753,336 × 21,600 ÷ 1,577,917,828)। यह इसलिए ठीक बैठता है कि 324,000 ÷ 15 = 21,600 — चन्द्र-कक्षा का पन्द्रहवाँ भाग भचक्र की कलाएँ हैं।
अर्थात् चन्द्र पर योजन-भुक्ति और “कक्षा-से-तुल्य” मध्य पद समान रहते हैं; तिथि-चरण के बाद कला-गति मिलती है। अन्य ग्रह पर S = u × (चन्द्र-कक्षा/स्व-कक्षा)।

हमारा डिकोड (Our Decode) डोसियर की 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 कला/वृत्त वाली count correspondence यहीं जीवित है: समय-वृत्त और कोण-वृत्त की गिनती एक, भौतिक समीकरण नहीं। योजन-भुक्ति → लिप्तिका वही अनुपात-दर्शन है जो math-core की mean-longitude प्रयोगशाला कोण में निभाती है; रैखिक कक्षा-स्तम्भ अलग परत है, पर “गिनती से गिनती” की ईमानदारी दोनों में एक।

12.84
कक्षा भूकर्णगुणिता महीमण्डलभाजिता ।
तत्कर्णा भूमिकर्णोना ग्रहोच्च्यं स्वं दलीकृताः ।।
kakṣā bhūkarṇaguṇitā mahīmaṇḍalabhājitā ।
tatkarṇā bhūmikarṇonā grahoccyaṃ svaṃ dalīkṛtāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कक्षा = ग्रह-कक्षा (परिधि); भूकर्णगुणिता = भू-कर्ण (पृथ्वी का व्यास, 1600 योजन — 1.59) से गुणा; महीमण्डलभाजिता = मही-मण्डल (पृथ्वी-परिधि/वृत्त) से भाजित; तत्कर्णा = वह कर्ण (कक्षा-वृत्त का व्यास); भूमिकर्णोना = भूमि-कर्ण से हीन; ग्रहोच्च्यं = ग्रह की ऊँचाई / उत्थान; स्वं = अपने (माप); दलीकृताः = आधे किए गए (भूव्यास घटाकर शेष का आधा)।

हिन्दी भावार्थ कक्षा को भू-कर्ण से गुणा कर मही-मण्डल से भाग दो — फल कक्षा-वृत्त का व्यास (कर्ण) है। उस कर्ण में से भूमि-कर्ण (पृथ्वी का व्यास) घटाकर आधा करो (दलीकृताः): वही पृथ्वी-सतह से ग्रह की ऊँचाई (उच्च्य) है। परिधि से व्यास, व्यास से ऊँचाई: सरल ज्यामिति, स्पष्ट क्रम।

English rendering Multiply the planet’s orbit by the Earth’s diameter (bhū-karṇa, 1600 yojanas, 1.59) and divide by the Earth’s circumference (mahī-maṇḍala): that is the diameter (karṇa) of the orbit. Subtract the Earth’s diameter and halve (dalīkṛtāḥ): that is the planet’s height above the surface.

गणित / The Mathematics
कर्ण (कक्षा का व्यास) = (कक्षा × भूकर्ण) ÷ महीमण्डल
उच्च्य (सतह से) = (कर्ण − भूकर्ण) ÷ 2 (“दलीकृताः” = आधा किया)
भूकर्ण = पृथ्वी का व्यास 1600, महीमण्डल = 1600 × √10 = 5059.64 (1.59); कर्ण ÷ भूकर्ण = कक्षा ÷ महीमण्डल।

उदाहरण (worked example)
चन्द्र: कक्षा 324,000 (12.85)। कर्ण = 324,000 × 1600 ÷ 5059.64 = 102,457.8 योजन; उच्च्य = (102,457.8 − 1600) ÷ 2 = 50,428.9 योजन।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले भूकर्ण को त्रिज्या मानकर पृथ्वी की त्रिज्या घटाई गई थी और “दलीकृताः” को वैकल्पिक बताया गया था। 1.59 के अनुसार भूकर्ण पृथ्वी का व्यास (1600) है; सूत्र कक्षा-वृत्त का व्यास देता है, उसमें से भूव्यास घटाकर आधा करने पर सतह से ऊँचाई। Correction: bhūkarṇa is the diameter; the remainder is halved.

12.85
खत्रयाब्धिद्विदहनाः कक्षा तु हिमदीधितेः ।
ज्ञशीघ्रस्याङ्कखद्वित्रित्कृतशून्येन्दवस्तथा ।।
khatrayābdhidvidahanāḥ kakṣā tu himadīdhiteḥ ।
jñaśīghrasyāṅkakhadvitritkṛtaśūnyendavastathā ।।
पाठ-भेद: १०४३२०९

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) खत्रयाब्धिद्विदहनाः = भूतसंख्या 324,000 (ख-त्रय = तीन शून्य); कक्षा तु = कक्षा तो; हिमदीधितेः = हिम-दीधिति (चन्द्र) की; ज्ञशीघ्रस्य = ज्ञ (बुध) के शीघ्र की; अङ्कखद्वित्रिकृतशून्येन्दवः = भूतसंख्या 1,043,209; तथा = उसी प्रकार।

हिन्दी भावार्थ चन्द्रमा की कक्षा — ख-त्रय-अब्धि-द्वि-दहन — तीन लाख चौबीस हजार योजन कही गई। बुध के शीघ्र की कक्षा — अङ्क-ख-द्वि-त्रि-कृत-शून्य-इन्दु — दस लाख तैंतालीस हजार दो सौ नौ योजन। शीत-रश्मि की छोटी परिधि, ज्ञ-शीघ्र की विशाल: दोनों एक ही योजन-भाषा में, आगे के अनुपात के लिए।

English rendering The Moon’s orbit is 324,000 yojanas. Mercury’s śīghra-orbit is 1,043,209 yojanas. Two fixed linear circumferences — cold-rayed Moon and Mercury’s śīghra — stated for all later ratio work.

गणित / The Mathematics
भूतसंख्या (अङ्कानां वामतो गतिः — प्रथम पद इकाई):
हिमदीधिति-कक्षा = ख-त्रय(0,0,0)–अब्धि(4)–द्वि(2)–दहन(3) → 324,000 योजन
ज्ञ-शीघ्र-कक्षा = अङ्क(9)–ख(0)–द्वि(2)–त्रि(3)–कृत(4)–शून्य(0)–इन्दु(1) → 1,043,209 योजन
(जाँच: 324,000 ÷ 15 = 21,600, जो 12.83 माँगता है; और 57,753,336,000 × 324,000 = 12.90 की संख्या।)

उदाहरण (worked example)
12.82 की भावना से: यदि आकाशकक्षा A ज्ञ हो, तो
चन्द्र-कल्प-भगण (जाँच) = A / 324,000;
बुध-शीघ्र-भगण-अनुपात कक्षा 1,043,209 से बँधता है।
(A यहाँ अज्ञात; केवल अनुपात-जाँच का ढाँचा।)

सुधार · correction (2026-10-07) पहले चन्द्र-कक्षा 32,430 छपी थी (और श्लोक-पंक्ति में “(32430” घुसा था), क्योंकि “ख-त्रय” को “ख (0), त्रय (3)” पढ़ा गया। ख-त्रय = तीन ख = तीन शून्य, अतः ख-त्रय-अब्धि-द्वि-दहन = 324,000। तीन स्वतन्त्र प्रमाण: (१) 12.83 के लिए चन्द्र-कक्षा ÷ 15 = 21,600 चाहिए; (२) 57,753,336,000 × 324,000 = 18,712,080,864,000,000, ठीक 12.90 के शब्दों की संख्या; (३) वह आकाशकक्षा ÷ हर ग्रह के कल्प-भगण छपी हर कक्षा देती है (सूर्य 4,331,500.2; कुज 8,146,908.8; गुरु 51,375,764.3; शनि 127,668,255.4; स्वर्भानु 80,572,864.3)। बुध-शीघ्र पर पाठ का अपना 1.2 योजन का अन्तर है: आकाशकक्षा ÷ 17,937,060,000 = 1,043,207.8, शब्द 1,043,209 देते हैं। Correction: the Moon's orbit is 324,000 yojanas (kha-traya = three zeros); checked in ss-chapters.test.js.

12.86
शुक्रशीघ्रस्य सप्ताग्निरसाब्धिरसषड्यमाः ।
ततो अर्कबुधशुक्राणां खखार्थैकसुरार्णवाः ।।
śukraśīghrasya saptāgnirasābdhirasaṣaḍyamāḥ ।
tato arkabudhaśukrāṇāṃ khakhārthaikasurārṇavāḥ ।।
पाठ-भेद: २६६४६३७; ४३३१५००

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) शुक्रशीघ्रस्य = शुक्र-शीघ्र की; सप्ताग्निरसाब्धिरसषड्यमाः = भूतसंख्या 2,664,637; ततः = तदनन्तर; अर्कबुधशुक्राणां = सूर्य, बुध और शुक्र की; खखार्थैकसुरार्णवाः = भूतसंख्या 4,331,500।

हिन्दी भावार्थ शुक्र के शीघ्र की कक्षा — सप्त-अग्नि-रस-अब्धि-रस-षड्-यम — छब्बीस लाख चौंसठ हजार छह सौ सैंतीस योजन। फिर सूर्य, बुध और शुक्र के लिए (साझी/तत्सम्बद्ध) कक्षा — ख-ख-अर्थ-एक-सुर-अर्णव — तैंतालीस लाख इकतीस हजार पाँच सौ योजन। एक ओर शुक्र-शीघ्र की अपनी विशाल परिधि; दूसरी ओर अर्क-बुध-शुक्र की साझी आंकिक कक्षा — पाठ दोनों को अलग-अलग गिनता है।

English rendering Venus’s śīghra-orbit is 2,664,637 yojanas. Then for the Sun, Mercury and Venus: 4,331,500 yojanas. Distinct śīghra-span for Venus; a shared figure for Sun–Mercury–Venus as the text groups them.

गणित / The Mathematics
शुक्र-शीघ्र-कक्षा = सप्त(7)–अग्नि(3)–रस(6)–अब्धि(4)–रस(6)–षट्(6)–यम(2) → 2,664,637 योजन
अर्क-बुध-शुक्र = ख(0)–ख(0)–अर्थ(5)–एक(1)–सुर(33)–अर्णव(4) → 4,331,500 योजन
(सुर = 33 देव, दो अंक; अर्णव = 4; वामा गति से 4,331,500। कोष्ठक २६६४६३७, ४३३१५००।)
पाठचिह्न “+अर्क” सन्धि-संकेत (ततोऽर्क), अर्थ-भेद नहीं।

उदाहरण (worked example)
शुक्र-शीघ्र / अर्क-बुध-शुक्र = 2,664,637 / 4,331,500 ≈ 0.6152
अर्थात् शुक्र-शीघ्र-परिधि साझी 4,331,500-कक्षा का लगभग 61.5% — केवल अनुपात-पाठ, बिना बाहरी “सत्य” थोपे।

12.87
कुजस्याप्यङ्कशून्याङ्कषड्वेदैकभुजङ्गमाः ।
चन्द्रोच्चस्य कृताष्टाब्धिवसुद्वित्र्यष्टवह्नयः ।।
kujasyāpyaṅkaśūnyāṅkaṣaḍvedaikabhujaṅgamāḥ ।
candroccasya kṛtāṣṭābdhivasudvitryaṣṭavahnayaḥ ।।
पाठ-भेद: ८१४६९०९; ३८३२८४८४

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कुजस्य अपि = मङ्गल की भी; अङ्कशून्याङ्कषड्वेदैकभुजङ्गमाः = भूतसंख्या 8,146,909; चन्द्रोच्चस्य = चन्द्र-उच्च (मन्दोच्च) की; कृताष्टाब्धिवसुद्वित्र्यष्टवह्नयः = भूतसंख्या 38,328,484।

हिन्दी भावार्थ कुज — मङ्गल — की कक्षा भी कही गई: अङ्क-शून्य-अङ्क-षड्-वेद-एक-भुजङ्गम, अर्थात् इक्यासी लाख छियालीस हजार नौ सौ नौ योजन। चन्द्रमा के उच्च की कक्षा: कृत-अष्ट-अब्धि-वसु-द्वि-त्रि-अष्ट-वह्नि — तीन करोड़ तिरासी लाख अट्ठाईस हजार चार सौ चौरासी योजन। भूमि-पुत्र की परिधि और चन्द्र-उच्च की और बड़ी परिधि — दोनों योजन-स्तम्भ अगले अनुपात के लिए स्थिर।

English rendering Mars’s orbit is 8,146,909 yojanas. The Moon’s apogee (candrocca) has orbit 38,328,484 yojanas. Two more fixed circumferences in the same yojana ledger.

गणित / The Mathematics
कुज-कक्षा = अङ्क(9)–शून्य(0)–अङ्क(9)–षट्(6)–वेद(4)–एक(1)–भुजङ्गम(8) → 8,146,909 योजन
चन्द्रोच्च-कक्षा = कृत(4)–अष्ट(8)–अब्धि(4)–वसु(8)–द्वि(2)–त्रि(3)–अष्ट(8)–वह्नि(3) → 38,328,484 योजन
(कोष्ठक ८१४६९०९, ३८३२८४८४।)

उदाहरण (worked example)
चन्द्रोच्च / हिमदीधिति (12.85) = 38,328,484 / 324,000 ≈ 118.30
= चन्द्र-भगण ÷ चन्द्रोच्च-भगण = 57,753,336 ÷ 488,203 = 118.30, क्योंकि हर कक्षा = आकाशकक्षा ÷ अपने कल्प-भगण (12.82)।

12.88
कृतर्तुमुनिपञ्चाद्रिगुणेन्दुविषया गुरोः ।
स्वर्भानोर्वेदतर्काष्टद्विशैलार्थखकुञ्जराः ।।
kṛtartumunipañcādriguṇenduviṣayā guroḥ ।
svarbhānorvedatarkāṣṭadviśailārthakhakuñjarāḥ ।।
पाठ-भेद: ५१३७५७६४; ८०५७२८६४

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कृतर्तुमुनिपञ्चाद्रिगुणेन्दुविषयाः = भूतसंख्या 51,375,764; गुरोः = बृहस्पति की; स्वर्भानोः = स्वर्भानु (राहु) की; वेदतर्काष्टद्विशैलार्थखकुञ्जराः = भूतसंख्या 80,572,864।

हिन्दी भावार्थ गुरु की कक्षा — कृत-ऋतु-मुनि-पञ्च-अद्रि-गुण-इन्दु-विषय — पाँच करोड़ तेरह लाख पचहत्तर हजार सात सौ चौंसठ योजन। स्वर्भानु — राहु — की कक्षा: वेद-तर्क-अष्ट-द्वि-शैल-अर्थ-ख-कुञ्जर — आठ करोड़ पाँच लाख बहत्तर हजार आठ सौ चौंसठ योजन। अध्याय का यह अंक-स्तम्भ यहीं गुरु और राहु तक पहुँचता है: प्रत्येक परिधि शब्द-संख्या से बँधी, कोष्ठक-पाठ से जाँची।

English rendering Jupiter’s orbit is 51,375,764 yojanas. Svarbhānu (Rāhu) has orbit 80,572,864 yojanas. The yojana-orbit list here closes on Guru and the eclipse-node.

गणित / The Mathematics
गुरु-कक्षा = कृत(4)–ऋतु(6)–मुनि(7)–पञ्च(5)–अद्रि(7)–गुण(3)–इन्दु(1)–विषय(5) → 51,375,764 योजन
स्वर्भानु-कक्षा = वेद(4)–तर्क(6)–अष्ट(8)–द्वि(2)–शैल(7)–अर्थ(5)–ख(0)–कुञ्जर(8) → 80,572,864 योजन
(कोष्ठक ५१३७५७६४, ८०५७२८६४।)
12.85–12.88 का योजन-कक्षा पटल (श्लोक-पाठानुसार):
चन्द्र 324,000; ज्ञ-शीघ्र 1,043,209; शुक्र-शीघ्र 2,664,637; अर्क-बुध-शुक्र 4,331,500; कुज 8,146,909; चन्द्रोच्च 38,328,484; गुरु 51,375,764; स्वर्भानु 80,572,864।

उदाहरण (worked example)
गुरु / कुज = 51,375,764 / 8,146,909 ≈ 6.306
स्वर्भानु / गुरु = 80,572,864 / 51,375,764 ≈ 1.568
केवल श्लोक-संख्याओं का अनुपात; बाह्य काल-सिद्ध “सत्य” यहाँ दावा नहीं।

12.89
पञ्चवाणाक्षिनागर्तुरसाद्र्यर्काः शनेस्ततः ।
भानां रविखशून्याङ्कवसुरन्ध्रशराश्विनः ।।
pañcavāṇākṣināgarturasādryarkāḥ śanestataḥ ।
bhānāṃ ravikhaśūnyāṅkavasurandhraśarāśvinaḥ ।।
पाठ-भेद: १२७६६८२५५; २५९८९००१२

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पञ्च = 5; वाण = 5 (काम-बाण); अक्षि = 2; नाग = 8; ऋतु = 6; रस = 6; अद्रि = 7; अर्क = 12 → भूतसंख्या 12,76,68,255; शनेः = शनि का (कक्षा-माप); ततः = तदनन्तर / उससे आगे; भानां = नक्षत्र-मण्डल / स्थिर तारों का; रवि = 12; ख = 0; शून्य = 0; अङ्क = 9; वसु = 8; रन्ध्र = 9; शर = 5; अश्विन = 2।

हिन्दी भावार्थ यह श्लोक अध्याय की कक्षा-माप-श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। पहले शनि का माप भूतसंख्या में बाँधकर 12,76,68,255 कहा गया; फिर उसी क्रम में भ-मण्डल—स्थिर तारों की कक्षा—का माप दिया गया। शब्द रवि(12)–ख(0)–शून्य(0)–अङ्क(9)–वसु(8)–रन्ध्र(9)–शर(5)–अश्विन्(2) अङ्कानां वामतो गति से (रवि दो अंकों का) 25,98,90,012 देते हैं — ठीक 60 × सूर्य-कक्षा, जैसा 12.80 कहता है। दोनों संख्याएँ उसी महायोजना-माप-परम्परा की कड़ियाँ हैं जिसमें पूर्व ग्रहों की कक्षाएँ गिनी जा चुकी होती हैं।

English rendering Next is given Saturn’s orbital measure as 127,668,255 (in the chapter’s yojana-scale sequence). Then follows the measure of the star-sphere (bha): 259,890,012 yojanas — ravi (12), kha, śūnya, aṅka (9), vasu (8), randhra (9), śara (5), aśvin (2), units first, ravi filling two places. It is exactly 60 × the Sun’s orbit, as 12.80 says.

गणित / The Mathematics
शनि-माप (भूतसंख्या, अङ्कानां वामतो):
पञ्च + वाण×10 + अक्षि×10² + नाग×10³ + ऋतु×10⁴ + रस×10⁵ + अद्रि×10⁶ + अर्क×10⁷
= 5 + 50 + 200 + 8,000 + 60,000 + 600,000 + 7,000,000 + 12×10,000,000
= 12,76,68,255

भ-माप = 12 + 0×10² + 0×10³ + 9×10⁴ + 8×10⁵ + 9×10⁶ + 5×10⁷ + 2×10⁸ = 25,98,90,012 (259,890,012)
= 60 × 4,331,500.2 = 60 × (आकाशकक्षा ÷ 4,320,000,000), ठीक (12.80)।

इकाई अध्याय-परम्परा से योजन-स्तर की कक्षा-माप (परिधि/व्यास-श्रृंखला); श्लोक स्वयं “योजन” शब्द नहीं दोहराता—पूर्व श्लोकों की माप-परम्परा से इकाई गृहीत।

उदाहरण (worked example)
आलोचनात्मक अंक लेकर अनुपात:
भ-माप / शनि-माप = 259,890,012 ÷ 127,668,255 ≈ 2.036 = शनि-भगण × 60 ÷ सूर्य-भगण (146,568 × 60 ÷ 4,320,000)
अर्थात् भ-मण्डल शनि से लगभग दुगना, सबसे ऊपर (12.80 “सर्वोपरिष्टात्”)। पहले छपा मान उसे शनि के पाँचवें भाग पर, नीचे रख देता।

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सुधार · correction (2026-10-07) पहले भ-माप 25,980,012 (और “कठोर पाठ” 25,989,012) छपा था; दोनों में रवि (12) को एक अंक गिना गया और एक अंक खो गया। शब्दों से 259,890,012, जो 12.80 के “षष्टिताडित” (60 × 4,331,500.2) से अंक-अंक मिलता है। Correction: 259,890,012 yojanas; checked in ss-chapters.test.js.

12.90
खव्योमखत्रयखसाग्रषट्कनागव्योमाष्टशून्ययमरूपनगाष्टचन्द्राः ।
ब्रह्माण्डसम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरे दिनकरस्य करप्रसारः ।।
khavyomakhatrayakhasāgraṣaṭkanāgavyomāṣṭaśūnyayamarūpanagāṣṭacandrāḥ ।
brahmāṇḍasampuṭaparibhramaṇaṃ samantādabhyantare dinakarasya karaprasāraḥ ।।
पाठ-भेद: १८७१२०८०८६४००००००

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ख = 0; व्योम = 0; खत्रय = 0, 0, 0 (तीन शून्य); ख = 0; साग्र (सागर) = 4; षट्क = 6; नाग = 8; व्योम = 0; अष्ट = 8; शून्य = 0; यम = 2; रूप = 1; नग = 7; अष्ट = 8; चन्द्र = 1 → विशाल भूतसंख्या; ब्रह्माण्डसम्पुट = ब्रह्माण्ड-खोल / विश्व-गोल का आवरण; परिभ्रमणं = चारों ओर की परिधि / परिक्रमा-माप; समन्तात् = सब ओर से; अभ्यन्तरे = भीतर; दिनकरस्य = सूर्य का; करप्रसारः = किरणों का प्रसार / पहुँच।

हिन्दी भावार्थ यहाँ संख्या केवल ग्रह-कक्षा की नहीं—पूरे ब्रह्माण्ड-सम्पुट की परिभ्रमण-परिधि है। श्लोक कहता है: वह महा-माप, जो ब्रह्माण्ड के खोल के चारों ओर घूमती रेखा के बराबर है, वही अभ्यन्तर में सूर्य की किरणों का प्रसार है। अर्थात् पाठ की दृष्टि में विश्व-गोल की बाहरी सीमा और दिनकर-प्रकाश की पहुँच एक ही योजन-संख्या से नापी गई है—यह ज्यामितीय-ब्रह्माण्डीय समीकरण है, फलित ज्योतिष का दावा नहीं। सत्रह अंक-शब्द वह संख्या 18,71,20,80,86,40,00,000 (18,712,080,864,000,000) देते हैं — चन्द्र के कल्प-भगण × चन्द्र-कक्षा, 12.81 की आकाशकक्षा।

English rendering The circuit of the brahmāṇḍa-shell—the all-around measure of the cosmic enclosure—is given by the great word-numeral (18,712,080,864,000,000 yojanas: seventeen digit-words, units first — the Moon’s kalpa revolutions × the Moon’s orbit, the sky-orbit of 12.81). Within that same span, says the verse, lies the reach of the Sun’s rays: the outer circuit and the interior light-radius are spoken as one measure.

गणित / The Mathematics
ब्रह्माण्ड-सम्पुट-परिभ्रमण = दिनकर-करप्रसार
= 18,71,20,80,86,40,00,000 = 57,753,336,000 × 324,000 (12.81, 12.85)

यूनिकोड में: 1.8712080864 × 10¹⁶ (उसी पूर्णांक का वैज्ञानिक रूप)

यह कोणीय भगण या मध्यमा सूत्र नहीं—रैखिक ब्रह्माण्ड-माप है। सूर्य-किरणों का “प्रसार” यहाँ प्रकाश-वर्षीय भौतिकी नहीं, सिद्धान्तीय योजन-ज्यामिति है।

उदाहरण (worked example)
यदि इसी परिधि को वृत्त मानकर व्यास निकालें (परिधि = π × व्यास; यहाँ केवल रूप-प्रदर्शन, पाठ π नहीं देता):
पारंपरिक स्थूल π ≈ 22/7 लेने पर
व्यास ≈ 18,712,080,864,000,000 × 7 ÷ 22
= 5,953,843,911,272,727.3… योजन (अपूर्णांश दर्शाता है कि पाठ पूर्णांक परिधि देता है, व्यास अलग से गोल नहीं किया गया)।
त्रिज्या ≈ व्यास / 2 ≈ 2.9769 × 10¹⁵ योजन—यही “अभ्यन्तर करप्रसार” का ज्यामितीय पढ़ाव होगा, यदि सम्पुट को सरल वृत्त माना जाए।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले यह संख्या 187,120,808,640,000,000 छपी थी — दस गुना। शब्द सत्रह अंक देते हैं (ख-त्रय = तीन शून्य): 18,712,080,864,000,000; यही 57,753,336,000 × 324,000 है। ऊपर का पाठ-भेद-अंक (१८७१२०८०८६४००००००) पहले से सही था। Correction: 18,712,080,864,000,000; checked in ss-chapters.test.js.

अध्यायः 13

ज्योतिषोपनिषदध्यायः

The Armillary Sphere and Instruments
25 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):
तेरहवाँ अध्याय ज्योतिष को केवल गणना नहीं, प्रत्यक्ष दर्शन बना देता है। शुद्ध देश में स्नान-पूजन के बाद आचार्य गुरु-परम्परा से प्राप्त ज्ञान को शिष्य के सामने एक आश्चर्यकारी भू-भगोल-रचना में उतारता है—दारव पृथिवी-गोल, उसके मध्य से निकला मेरु-दण्ड, आधार-कक्षाओं का युगल और वैषुवती कक्षा। इन्हीं पर भगणांशाङ्गुल, स्वाहोरात्र-अर्धकर्ण, तथा क्रान्ति-विक्षेप के दलित भागों से मेषादि के अपक्रम-वृत्त खींचे जाते हैं; संख्याएँ काठ और तार में जीवित हो जाती हैं। अध्याय इसलिए सुन्दर है कि वह गुह्य उपदेश को स्पर्श-योग्य यन्त्र में बदल देता है—जहाँ आकाश की गोलाई हाथ में आ जाती है।

For the English reader:
Chapter 13 is the siddhānta’s theatre of demonstration: after purity and devotion, the teacher builds what words alone cannot carry—a wooden earth-sphere pierced by a Meru staff, dual support rings, the equatorial hoop, and three circles scaled in aṅgulas from half the circle’s degrees, half day-night hypotenuses, and halved declination–latitude arcs. The chapter turns abstract bhagaṇa, krānti, and apakrama into a single visible machine, so the pupil meets the cosmos not as a table of results but as a crafted sphere whose geometry can be pointed to, rotated, and believed.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:
- गोल-माप (aṅgula scale): \( r_{\text{circle}} \propto \tfrac{1}{2}× 360^\circ \) in aṅgulas — three principal circles sized from halved bhagaṇa-aṃśas.
- स्वाहोरात्र-अर्धकर्ण: radius (or half-chord) of a day-circle estimated from \( \tfrac{1}{2}\,R_{\text{day-night}} \) of the body under study.
- क्रान्ति / विक्षेप वृत्त: southern and northern offsets \( \pm\tfrac{\delta}{2} \), \( \pm\tfrac{\beta}{2} \) (halved declination and latitude degrees) laid on the sphere.
- अपक्रम (Meṣādi): three apakrama-circles from the ecliptic obliquity sequence of the rāśis, \( \varepsilon_i \) measured from the equinoctial frame.
- मेरु-अक्ष ज्यामिति: polar staff through the earth-globe, with base-orbit pair + equinoctial orbit \( K_{\text{viṣuvat}} \) as the construction skeleton of the armillary model.

डिकोड-सेतु (Decode bridge):
इस अध्याय का डिकोड-कार्य अभी शेष है। इसके लिए दारव-गोल, मेरु-दण्ड, कक्षा-त्रय और अपक्रम-वृत्तों की ज्यामितीय विनिर्देशों को माप-नियत (aṅgula, अर्धकर्ण, दलित भाग) के साथ संख्यात्मक मॉडल में बाँधना होगा—जो वर्तमान ephemeris/sphuṭa/bhāva इंजनों से अलग, यन्त्र-निर्माण का सत्यापन-परत माँगता है।

क्षितिजनाडीवृत्तक्रान्तिवृत्तउन्मण्डलध्रुव-कीलकभूगोल (केन्द्र)काष्ठ-वलयों पर अंश अंकित कर घुमाओ — दृश्य आकाश यन्त्र में उतर आता है
गोल-यन्त्र — the armillary sphere (SS ch.13): a polar axis through Meru-aligned pivots, with rings for horizon, equator (with its hour-marks), ecliptic and the solstitial colure — the text's teaching machine, here in isometric projection.
13.1
अथ गुप्ते शुचौ देशे स्नातः शुचिरलङ्कृतः ।
सम्पूज्य भास्करं भक्त्या ग्रहान्भान्यथ गुह्यकान् ॥
atha gupte śucau deśe snātaḥ śuciralaṅkṛtaḥ ।
sampūjya bhāskaraṃ bhaktyā grahānbhānyatha guhyakān ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अथ = अब (इस अध्याय का आरम्भ); गुप्ते शुचौ देशे = एकान्त-शुद्ध स्थान में; स्नातः = स्नान कर; शुचिः अलङ्कृतः = शुद्ध और सजा-सँवरा; सम्पूज्य = भली-भाँति पूज कर; भास्करं भक्त्या = सूर्य को भक्ति से; ग्रहान् भानि = ग्रहों और नक्षत्रों को; अथ गुह्यकान् = तथा गुह्यकों (गुप्त देवताओं) को।

हिन्दी भावार्थ अब उस विद्या का द्वार खुलता है जो केवल लेखनी से नहीं, प्रत्यक्ष गोल-यन्त्र से समझी जाती है। आचार्य एकान्त और पवित्र स्थान में स्नान कर, शुद्ध वस्त्रों से अलंकृत होकर, पहले भास्कर की भक्तिपूर्वक पूजा करे; फिर ग्रहों, नक्षत्रों और गुह्यकों का भी आदर करे। यह स्तुति मात्र नहीं — ज्ञान-कार्य को सावधानी, शुद्धि और गुरु-शिष्य परम्परा की गरिमा के साथ आरम्भ करने का विधान है।

English rendering Now, in a secluded and pure place, the teacher bathes, adorns himself cleanly, and with devotion worships the Sun, then the planets, the stars, and the guhyakas. The chapter of the sphere-instrument opens not with metal and measure alone, but with ritual composure.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति/संस्कार-भूमिका। यह श्लोक गोल-रचना से पहले की अनुष्ठानिक तैयारी है; संख्या या यन्त्र-माप यहाँ नहीं दिए गए।

दृष्टान्त (Illustrative Example) आधुनिक प्रयोगशाला में भी precision work से पहले bench साफ़, उपकरण calibrate, और ambient light नियंत्रित किया जाता है — यही “शुचि देश, स्नान, अलंकार” का व्यावहारिक समकक्ष: distraction और अशुद्धि दोनों हटाओ। भास्कर–ग्रह–नक्षत्र–गुह्यक की पूजा यहाँ superstition नहीं, attention-protocol है: जिस वस्तु को मापोगे, उसके प्रति सम्मान और क्रम पहले बाँधो। अध्याय १३ का शेष भाग इसी संस्कार के बाद दारव गोल और प्रत्यक्ष दर्शन पर उतरता है — पहले मन स्थिर, फिर हाथ।

13.2
पारम्पर्योपदेशेन यथाज्ञानं गुरोर्मुखात् ।
आचार्यः शिष्यबोधार्थं सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥
pāramparyopadeśena yathājñānaṃ gurormukhāt ।
ācāryaḥ śiṣyabodhārthaṃ sarvaṃ pratyakṣadarśivān ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारम्पर्य-उपदेशेन = परम्परागत उपदेश से; यथाज्ञानं = जितना ज्ञान प्राप्त हुआ; गुरोः मुखात् = गुरु के मुख से; आचार्यः = शिक्षक; शिष्य-बोध-अर्थं = शिष्य की समझ के लिए; सर्वं = सम्पूर्ण विषय; प्रत्यक्ष-दर्शिवान् = जिसने स्वयं प्रत्यक्ष देखा/जाना हो।

हिन्दी भावार्थ जो आचार्य गुरु-मुख से परम्परा द्वारा यथाज्ञान प्राप्त कर चुका है, और जिसने स्वयं उस रचना को प्रत्यक्ष देखा-समझा है, वही शिष्य-बोध के लिए यह सब सिखाए। ग्रन्थ की पंक्तियाँ पर्याप्त नहीं; गोल-यन्त्र की समझ आँख और हाथ से गुज़रकर ही शिष्य तक पहुँचती है। यहाँ ज्ञान की श्रृंखला स्पष्ट है — गुरु → आचार्य → शिष्य — और उसके बीच “प्रत्यक्ष दर्शन” की शर्त अनिवार्य है।

English rendering The ācārya who has received the tradition by oral teaching from his guru, according to what he has learned, and who has himself seen the whole construction with his own eyes, should teach it all for the pupil’s understanding. Lineage and direct vision, not mere text, authorize the lesson.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/शिक्षण-विधि। यह श्लोक प्रमाण-शृंखला (परम्परा + प्रत्यक्ष) का दार्शनिक नियम है; यन्त्र के अंक बाद के श्लोकों में आते हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक armillary sphere या celestial globe को केवल manual पढ़कर चलाना और गुरु के सामने घुमा-घुमाकर equator, ecliptic, horizon देखना — दोनों अनुभव अलग हैं। श्लोक की शर्त साफ़ है: जो स्वयं “प्रत्यक्षदर्शी” है और जिसे गुरु-मुख से परम्परा मिली, वही शिष्य को सिखाए — text transmission alone पर्याप्त नहीं। आज के planetarium demo या lab session का वही ढाँचा: oral lineage + hands-on model + verified seeing, तभी “शिष्यबोध” पूरा माना जाता है।

13.3
भूभगोलस्य रचनां कुर्यादाश्चर्यकारिणीम् ।
अभीष्टं पृथिवीगोलं कारयित्वा तु दारवम् ॥
bhūbhagolasya racanāṃ kuryādāścaryakāriṇīm ।
abhīṣṭaṃ pṛthivīgolaṃ kārayitvā tu dāravam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भू-भ-गोलस्य = पृथ्वी और खगोल (भूगोल+भगोल) की; रचनां = रचना/प्रतिमा; कुर्यात् = बनाए; आश्चर्य-कारिणीम् = आश्चर्य उत्पन्न करने वाली; अभीष्टं = इच्छित माप का; पृथिवी-गोलं = पृथ्वी-गोलक; कारयित्वा = बनवा कर; तु दारवम् = काष्ठ-निर्मित।

हिन्दी भावार्थ अब आचार्य भू-भगोल की ऐसी रचना करे जो देखने वाले को आश्चर्य में डाल दे — केवल कल्पना नहीं, हाथ से छूई जा सकने वाली प्रतिमा। पहले इच्छित आकार का काठ का पृथ्वी-गोल बनाया जाए; वही आधार बनेगा जिस पर मेरु, कक्षाएँ और नक्षत्र-स्थान बैठेंगे। सारा अध्याय इसी दारव गोल से आरम्भ होता है: आकाश का गणित लकड़ी के गोले पर उतरता है।

English rendering One should construct a wonder-working model of the earth-and-sky sphere. First fashion a wooden terrestrial globe of the desired size; on that solid body the whole armillary apparatus will rest.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — यन्त्र-वर्णन (गोल-आधार)। संख्याएँ अगले श्लोकों में आती हैं; यहाँ केवल सामग्री (दारु) और उद्देश्य (आश्चर्यकारिणी भूभगोल-रचना) निर्धारित है।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक “भौतिक गोल” का आदेश है; हमारी प्रयोगशाला में वही गोलीय ज्यामिति `bharat-ephemeris-offline` के mean-longitude / bhāva-madhya स्तर पर सॉफ्टवेयर में बैठी है। काठ का गोल प्रत्यक्ष-दर्शन के लिए; इंजन उसी गोलीय अनुबन्धों का संख्यात्मक प्रतिरूप है — न तो ephemeris को “सत्य का प्रमाण” बनाते हैं, न यन्त्र को केवल सजावट।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक गोल काठ का globe काटिए — equator और poles चिह्नित, ऊपर मेरु की कील, चारों ओर वर्ष-खण्ड और ऊपर भ-गोल की कक्षा-रेखाएँ बैठाने योग्य। छूने योग्य प्रतिमा बिना, meridian, horizon और ecliptic के कोण हवा में तैरते रह जाते हैं; लकड़ी पर वे कोण मापे जा सकते हैं। आगे के श्लोक इसी dārava pṛthivī-gola पर star-positions, rings और motion-mechanisms जोड़ेंगे — अध्याय का “आश्चर्य” अलंकार नहीं, tactile astronomy का पहला कदम है।

13.4
दण्डं तन्मध्यगं मेरोरुभयत्र विनिर्गतम् ।
आधारकक्षाद्वितयं कक्षा वैषुवती तथा ॥
daṇḍaṃ tanmadhyagaṃ merorubhayatra vinirgatam ।
ādhārakakṣādvitayaṃ kakṣā vaiṣuvatī tathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दण्डं = अक्ष-दण्ड; तत्-मध्य-गं = उसके (गोल के) मध्य से जाता हुआ; मेरोः = मेरु के रूप में; उभयत्र विनिर्गतम् = दोनों ओर निकला हुआ; आधार-कक्षा-द्वितयं = दो आधार-कक्षाएँ (धारक वलय); कक्षा वैषुवती तथा = तथा विषुवत्-कक्षा (भूमध्य-रेखीय वलय)।

हिन्दी भावार्थ गोल के ठीक बीच से एक दण्ड पिरोया जाए, जो दोनों ध्रुवों की ओर मेरु की भाँति बाहर निकला रहे — वही अक्ष। उस अक्ष पर दो आधार-कक्षाएँ बैठाई जाएँ, और उनके साथ वैषुवती कक्षा भी — विषुवत्-वृत्त, जो दिन-रात की समता का वलय है। इस श्लोक में गोल-यन्त्र का कंकाल बनता है: अक्ष, दो धारक वलय, और एक विषुवत्-वलय।

English rendering Drive a rod through the globe’s centre so that it projects on both sides as Meru (the polar axis). Mount a pair of supporting circles, and with them the equatorial circle. Axis, two base rings, and the equinoctial ring: the skeleton of the sphere-instrument.

गणित / The Mathematics यन्त्र-ज्यामिति (संरचना):
• अक्ष = गोल-व्यास के अनुदिश दण्ड (मेरु, दोनों ओर निर्गत)
• वलय-त्रयी = 2 आधार-कक्षा + 1 वैषुवती कक्षा
माप (अङ्गुल/अंश) अगले श्लोक में; यहाँ केवल विन्यास।

उदाहरण (worked example) मान लें दारव गोल का व्यास 1 इकाई हो; तब दण्ड की लम्बाई > 1 (दोनों ओर थोड़ा बाहर), और तीनों कक्षाएँ उस अक्ष पर लम्ब/निर्धारित कोणों में जड़ित हों — वैषुवती कक्षा अक्ष के लम्बवत समतल में। संख्यात्मक अङ्गुल-प्रमाण 13.05 में।

हमारा डिकोड (Our Decode) वैषुवती कक्षा और मेरु-अक्ष वही ज्यामितीय अक्ष हैं जिन पर ascendant/bhāva परत LST और RA(MC)≡LST (1e-9° तक) जाँचती है। काठ पर “अक्ष + विषुवत्” दिखता है; `MATHEMATICAL-AUDIT` की bhāva-layer में वही kendra-अक्ष गणित में सील हैं।

13.5
भगणांशाङ्गुलैः कार्या दलितैस्तिस्र एव ताः ।
स्वाहोरात्रार्धकर्णैश्च तत्प्रमाणानुमानतः ॥
bhagaṇāṃśāṅgulaiḥ kāryā dalitaistisra eva tāḥ ।
svāhorātrārdhakarṇaiśca tatpramāṇānumānataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भगण-अंश-अङ्गुलैः = पूरे भगण के अंशों के अङ्गुल-माप से; दलितैः = आधे किए हुए; तिस्र एव ताः = वे तीनों (कक्षाएँ) ही; कार्याः = बनाई जाएँ; स्व-अहोरात्र-अर्ध-कर्णैः = अपने-अपने अहोरात्र-वृत्त के अर्ध-व्यास (अर्धकर्ण) से; च = और; तत्-प्रमाण-अनुमानतः = उसी प्रमाण के अनुमान से।

हिन्दी भावार्थ वे तीनों कक्षाएँ — दो आधार और एक वैषुवती — भगण के अंशों को आधा करके अङ्गुल में नापी जाएँ। पूरा वृत्त 360 अंश; दलित अंश = 180; अतः तीनों वलयों की परिधि 180 अङ्गुल मानी गई। फिर प्रत्येक छोटे दिन-वृत्त (अहोरात्र-वृत्त) का अर्धकर्ण उसी 180-अङ्गुल प्रमाण से अनुपात में निकाला जाए। यन्त्र पर डिग्री और अङ्गुल एक ही गिनती की दो भाषाएँ बन जाती हैं।

English rendering Those very three circles are to be made in aṅgulas equal to half the degrees of a full revolution — so a circumference of 180 aṅgulas for 360°. From that same standard one estimates each circle’s own half-day radius (svāhorātrārdhakarṇa), the semi-diameter of its diurnal parallel.

गणित / The Mathematics
• भगण = 360 अंश
• दलित भगणांश = 360 ÷ 2 = 180 → तीनों मुख्य कक्षाओं की परिधि C = 180 अङ्गुल
• विषुवत्-गोल का अर्धव्यास (यदि C = 2πR): R = 180 ⁄ (2π) अङ्गुल
• किसी क्रान्ति δ वाले अहोरात्र-वृत्त का अर्धकर्ण: r(δ) = R · cos δ (यन्त्र-समरूपता; δ पाठ के क्रान्ति-सार से)
π का मान श्लोक नहीं बाँधता — रचनाकार पारम्परिक √10 या 22⁄7 ले सकता है; परिणाम R पर निर्भर।

उदाहरण (worked example) परिपाटी: C_eq = 180 अङ्गुल, π = 22⁄7।
R = 180 × 7 ⁄ 44 = 315⁄11 ≈ 28.636 अङ्गुल।
यदि किसी ग्रह/बिन्दु की क्रान्ति δ = 0° (विषुवत् पर): r = R ≈ 28.636 अङ्गुल।
δ बढ़ने पर r = R cos δ घटता है — श्लोक का “स्वाहोरात्रार्धकर्णैः … अनुमानतः” यही अनुपात है। (δ का स्रोत: सिद्धान्त की क्रान्ति-सारिणी; इस श्लोक में δ का अंक नहीं।)

हमारा डिकोड (Our Decode) 180 अङ्गुल ↔ 360 अंश वही गिनती-समरूपता है जो dossier की 21,600 prāṇa/दिन ↔ 21,600 कला/वृत्त की याद दिलाती है — भौतिक समानता नहीं, गणना-संगति। हमारा metrology-अनुशासन (`MATHEMATICAL-AUDIT` §1) यन्त्र के अङ्गुल-अंश को इसी दृष्टि से पढ़ता है: इकाई चुना गया गणितीय पुल है, “समय = कोण” का दावा नहीं।

13.6
क्रान्तिविक्षेपभागैश्च दलितैर्दक्षिणोत्तरैः ।
स्वैः स्वैरपक्रमैस्तिस्रो मेषादीनां अपक्रमात् ॥
krāntivikṣepabhāgaiśca dalitairdakṣiṇottaraiḥ ।
svaiḥ svairapakramaistisro meṣādīnāṃ apakramāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्ति-विक्षेप-भागैः = क्रान्ति और विक्षेप के अंशों से; दलितैः = आधे किए; दक्षिण-उत्तरैः = दक्षिण-उत्तर दिशा में; स्वैः स्वैः अपक्रमैः = अपने-अपने अपक्रम (क्रान्ति-मान) से; तिस्रः = तीन कक्षाएँ; मेष-आदीनां = मेष आदि (मेष-वृषभ-मिथुन) की; अपक्रमात् = अपक्रम के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ अब तीन और कक्षाएँ बैठें — मेष, वृषभ और मिथुन के अपने-अपने अपक्रम पर। क्रान्ति और विक्षेप के अंशों को आधा कर, उन्हें दक्षिण-उत्तर अक्ष पर नापकर वलय लगाए जाएँ। प्रत्येक राशि का अपना अपक्रम है; मेष से आरम्भ कर पहली तिकड़ी उन्हीं मानों पर टिकती है। यह आकाश के झुकाव को लकड़ी पर उतारने का पहला चरण है।

English rendering Three circles are to be set by the halved degrees of declination and latitude, north and south, each at its own apakrama (declination) for the signs beginning with Meṣa. The first triad — Aries, Taurus, Gemini — takes its places from those measured offsets.

गणित / The Mathematics
• उत्तर-दक्षिण रैखिक माप: (क्रान्ति या विक्षेप के अंश) ÷ 2 अङ्गुल/अंश-समतुल्य (श्लोक: दलित भाग)
• मेष-वृषभ-मिथुन के लिए तीन कक्षाएँ, प्रत्येक पर अपना अपक्रम
• अपक्रम δᵢ राशि-क्रान्ति सारिणी से; इस श्लोक में δᵢ के अंक नहीं — केवल “स्वैः स्वैः अपक्रमैः” का नियम
• विषुवत् से ध्रुव की ओर दूरी ∝ δ (यन्त्र पर अर्ध-अंश पैमाना)

उदाहरण (worked example) परिपाटी: 13.05 की C = 180 अङ्गुल → R ≈ 28.636 अङ्गुल (π = 22⁄7)।
मान लें किसी राशि का अपक्रम δ (सारिणी से) हो; तब
• अहोरात्र-अर्धकर्ण r = R cos δ
• विषुवत् से अक्षीय विस्थापन z ∝ R sin δ; श्लोक “दलित भाग” से यदि अंश s हो तो माप s⁄2 इकाई
संख्या s इस श्लोक में नहीं — आचार्य अपनी क्रान्ति-सारिणी से भरता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) अपक्रम/क्रान्ति वही obliquity-ज्यामिति है जो closed-form lagna में (देशान्तर, अक्षांश, तिर्यकता, LST) Swiss-fixture से 0.1° के भीतर बैठती है। यन्त्र पर δ दिखाया जाता है; `math-core` में δ कोण के रूप में गणना होती है — एक ही गोलीय सत्य, दो माध्यम।

13.7
कक्षाः प्रकल्पयेत्ताश्च कर्क्यादीनां विपर्ययात् ।
तद्वत्तिस्रस्तुलादीनां मृगादीनां विलोमतः ॥
kakṣāḥ prakalpayettāśca karkyādīnāṃ viparyayāt ।
tadvattisrastulādīnāṃ mṛgādīnāṃ vilomataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कक्षाः प्रकल्पयेत् = कक्षाएँ निर्धारित करे; ताः च = और वे; कर्क-आदीनां = कर्क आदि (कर्क-सिंह-कन्या) की; विपर्ययात् = उल्टे क्रम से; तद्वत् तिस्रः = उसी प्रकार तीन; तुला-आदीनां = तुला आदि (तुला-वृश्चिक-धनु) की; मृग-आदीनां = मृग (मकर) आदि की; विलोमतः = विलोम/प्रतिलोम क्रम से।

हिन्दी भावार्थ कर्क, सिंह, कन्या की कक्षाएँ मेष-तिकड़ी के विपर्यय — अर्थात् क्रान्ति-क्रम उलट — से बैठाई जाएँ। तुला, वृश्चिक, धनु के लिए फिर तीन कक्षाएँ उसी रीति से; मकर, कुम्भ, मीन के लिए विलोम क्रम। बारह राशियाँ चार तिकड़ियों में बँटती हैं: सीधी, उल्टी, सीधी, उल्टी — ताकि गोल के दोनों गोलार्धों पर राशि-कक्षाएँ सममित बैठें।

English rendering Arrange the circles for Cancer and the following signs in reverse order; likewise three for Libra and the next; and for Capricorn and the rest in reverse again. Four triads cover the twelve signs: forward, reverse, forward, reverse.

गणित / The Mathematics
राशिकक्षा-विन्यास (12 = 4 × 3):
1. मेष → वृषभ → मिथुन — अपक्रम बढ़ता/सीधा (13.06)
2. कर्क → सिंह → कन्या — विपर्यय (पहली तिकड़ी का उलटा क्रम)
3. तुला → वृश्चिक → धनु — तद्वत् तीन (सीधा, दक्षिण/सममित पक्ष)
4. मकर → कुम्भ → मीन — विलोम
प्रत्येक कक्षा का r = R cos δ और अक्षीय दूरी ∝ sin δ, जहाँ δ उस राशि का अपक्रम; चिह्न उत्तर/दक्षिण गोलार्ध से निर्धारित।

उदाहरण (worked example) यदि मेष-तिकड़ी के अपक्रम (मानक सार से) δ₁, δ₂, δ₃ हों, तो कर्क-तिकड़ी में वलय-क्रम और/या चिह्न विपर्यय से लगते हैं — जैसे δ₃, δ₂, δ₁ या उत्तर→दक्षिण उलटाव; तुला-तिकड़ी मेष-तिकड़ी की सममिति; मकर-तिकड़ी फिर विलोम। श्लोक क्रम-नियम देता है, δ-सार नहीं।

13.8
याम्यगोलाश्रिताः कार्याः कक्षाधाराद्द्वयोरपि ।
याम्योदग्गोलसंस्थानां भानां अभिजितस्तथा ॥
yāmyagolāśritāḥ kāryāḥ kakṣādhārāddvayorapi ।
yāmyodaggolasaṃsthānāṃ bhānāṃ abhijitastathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) याम्य-गोल-आश्रिताः = दक्षिण गोल पर आश्रित; कार्याः = बनाई जाएँ; कक्षा-धारात् = कक्षा के आधार से; द्वयोः अपि = दोनों (आधार-कक्षाओं) पर भी; याम्य-उदग्-गोल-संस्थानां = दक्षिण और उत्तर गोल में स्थित; भानां = नक्षत्रों/तारों की; अभिजितः तथा = तथा अभिजित् की भी।

हिन्दी भावार्थ दक्षिण गोल पर टिकी कक्षाएँ दोनों आधार-वलयों पर भी अंकित की जाएँ। उत्तर और दक्षिण दोनों गोलार्धों में स्थित भ (नक्षत्र/तारे) के स्थान यन्त्र पर बैठें, और अभिजित् का भी — वह सत्ताईस के अतिरिक्त स्मृत नक्षत्र जो गोलीय मानचित्र में अपनी जगह माँगता है। इस श्लोक पर भूभगोल केवल राशि-कक्षाओं का ढाँचा नहीं रह जाता; वह तारों का मानचित्र बन जाता है।

English rendering Circles belonging to the southern sphere are to be wrought on both supporting rings as well. Mark also the positions of the stars that stand in the southern and northern hemispheres, and of Abhijit likewise.

गणित / The Mathematics
• दक्षिण-गोलाश्रित कक्षाएँ → दोनों आधार-कक्षाओं पर अंकन
• नक्षत्र-स्थान: प्रत्येक भ का (ध्रुवीय दूरी / क्रान्ति, विषुवत् से कोण) यन्त्र-निर्देशांक पर
• अभिजित् सहित — 27 + 1 नक्षत्र-स्थान की व्यवस्था
सूत्र रूप में: तारे का अहोरात्र-वलय r = R cos δ⋆, अक्षीय z ∝ sin δ⋆; देशान्तर कोण λ⋆ वैषुवती पर।

उदाहरण (worked example) 13.05 का R ≈ 28.636 अङ्गुल (C = 180, π = 22⁄7)। किसी तारे की क्रान्ति δ⋆ हो तो उसका दिन-वृत्त-अर्धव्यास r⋆ = R cos δ⋆ अङ्गुल; दोनों आधार-वलयों पर याम्य-गोलीय चाप उसी δ⋆ से काटे जाएँ। अभिजित् के लिए भी वही विधि — केवल उसका (λ, δ) पाठ/परम्परा से लिया जाता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) गोल-यन्त्र का अन्तिम चरण “स्थान अंकित करना” है; हमारा sphuṭa-इंजन (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`) और bhāva-परत उसी गोलीय मानचित्र को संख्या में बाँधते हैं — manda/śīghra से graha-sphuṭa, फिर क्षितिज-लग्न। यन्त्र शिष्य की आँख के लिए; oracle की `==` जाँच इंजन की ईमानदारी के लिए — दोनों “प्रत्यक्षदर्शिवान्” (13.02) की आधुनिक जुड़वाँ रीतियाँ।

13.9
सप्तर्षीणां अगस्त्यस्य ब्रह्मादीनां च कल्पयेत् ।
मध्ये वैषुवती कक्षा सर्वेषां एव संस्थिता ॥
saptarṣīṇāṃ agastyasya brahmādīnāṃ ca kalpayet ।
madhye vaiṣuvatī kakṣā sarveṣāṃ eva saṃsthitā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सप्तर्षीणाम् = सप्त ऋषियों (ध्रुव-निकट नक्षत्र-मण्डल) का; अगस्त्यस्य = अगस्त्य (Canopus) का; ब्रह्मादीनाम् = ब्रह्मादि ज्योतिष-बिन्दुओं/नक्षत्र-स्थानों का; कल्पयेत् = रचना/स्थापन करे; मध्ये = बीच में; वैषुवती कक्षा = विषुवत्-कक्षा (विषुव-वृत्त, equinoctial orbit); सर्वेषाम् एव = उन सबकी ही; संस्थिता = स्थित/स्थापित है।

हिन्दी भावार्थ सप्तर्षि, अगस्त्य और ब्रह्मादि ज्योतिष-स्थानों की कल्पना/रचना जिस ढाँचे पर बैठती है, उसके ठीक मध्य में वैषुवती कक्षा रखी गई है। यह पद आकाश-गोल के निर्माण-क्रम का निर्देश है: ध्रुव-पक्ष के तारों को अलग-अलग कल्पित करते हुए भी, समस्त व्यवस्था का केन्द्रीय वृत्त विषुव-वृत्त ही माना जाए। मध्य-स्थापन यहाँ भौगोलिक “बीच” नहीं, गोल-यन्त्र पर सममिति का आधार है।

English rendering One should construct the places of the Saptarṣis, of Agastya, and of Brahmā and the rest; the equinoctial orbit is set in the middle of them all. The verse fixes the celestial frame: polar and southern markers may be imagined variously, but the equinoctial circle is the shared mid-orbit of the system.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — गोल-रचना / वर्णनात्मक निर्देश। वैषुवती कक्षा = विषुव-वृत्त (खगोलीय भूमध्य-वृत्त); यह अध्याय के आगे के अयन, क्रान्ति और लग्न-ज्या के लिए ज्यामितीय शून्य-रेखा का काम करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) विषुव-वृत्त को “मध्य-कक्षा” मानना हमारे ayanāṃśa-प्रयोगशाला और mean-longitude साधन का वही मूल-सन्दर्भ है जिस पर क्रान्ति, अयन-बिन्दु और precession-परिकल्पनाएँ बैठाई जाती हैं — इतिहास की एकमात्र “सत्य” रेखा नहीं, किन्तु Sūrya-Siddhānta के गोल-मॉडल की केन्द्रीय धार।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक कागज़ के गोलक पर पहले उत्तरी ध्रुव-चिह्न लगाइए, फिर दक्षिणी—दोनों बिंदुओं को जोड़ने वाली कोई भी “मध्य-रेखा” अभी दिशा नहीं देती। अब गोलक के ठीक आधे भाग पर एक वृत्त खींचिए: वही वैषुवती कक्षा (equinoctial circle / celestial equator) है। सप्तर्षि उत्तर-ध्रुव के चारों ओर घूमते दिखेंगे, अगस्त्य (Canopus) दक्षिण में झलकेगा—पर दिशा-माप, राशियाँ और दिन-रात की सममिति सब उसी मध्य-वृत्त से गिनी जाती है। अध्याय १–२ में जब क्रांति, अक्षांश और लग्न की गणित आएगी, वहीं यह “मध्य-स्थापन” संख्या में बदलेगा।

13.10
तदाधारयुतेरूर्ध्वं अयने विषुवद्वयम् ।
विषुवत्स्थानतो भागैः स्फुटैर्भगणसञ्चरात् ॥
tadādhārayuterūrdhvaṃ ayane viṣuvadvayam ।
viṣuvatsthānato bhāgaiḥ sphuṭairbhagaṇasañcarāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तदाधारयुतेः = उस (वैषुवती कक्षा के) आधार-योग/संयोग से; ऊर्ध्वम् = ऊपर; अयने = अयन-बिन्दुओं पर (अयन-सन्धि); विषुवद्वयम् = दोनों विषुव (वसन्त-शरद्); विषुवत्स्थानतः = विषुव-स्थान से; भागैः स्फुटैः = स्पष्ट अंशों से; भगणसञ्चरात् = भगण-सञ्चार (राशि-चक्र/क्रान्ति-पथ की गति) के अनुसार।

हिन्दी भावार्थ वैषुवती कक्षा के आधार-संयोग के ऊर्ध्व में अयन-व्यवस्था और दोनों विषुव स्थित हैं। विषुव-स्थान से आगे की माप “स्फुट भाग” से की जाती है — अर्थात् भगण-सञ्चार से प्राप्त स्पष्ट देशान्तर (longitude) के अंशों से। पद गोल पर अयन–विषुव की युगल-संरचना बताता है: आधार वृत्त एक, और उस पर स्पष्ट भगण-अंशों से दोनों विषुव तथा अयन-सन्धियाँ चिह्नित।

English rendering Above the junction of that supporting orbit stand the two equinoxes in the scheme of the ayanas. From the equinoctial place they are measured in true degrees according to the course of the bhagaṇa (the ecliptic revolution through the signs).

गणित / The Mathematics गोल-ज्यामिति का निर्देश — स्फुट-देशान्तर λ से विषुव/अयन-बिन्दु:
- विषुव-बिन्दु: λ ≡ 0° / 180° (मेष/तुला सन्धि — convention: tropical frame में “true equinox”)
- अयन-बिन्दु: λ ≡ 90° / 270° (कर्कट/मकर)
- “स्फुट भाग” = mean → correction-chain के बाद का स्पष्ट राशि-अंश (Chapter 2 sphuṭa के बाद का λ, जब लागू हो)
यहाँ कोई नया संख्या-स्थिरांक नहीं; माप-भाषा “भगणसञ्चार → स्फुट भाग” है।

उदाहरण (worked example) Convention: tropical longitude, equinox = 0°. Sun at true λ = 23.5° → विषुव-स्थान से 23.5° भगण-सञ्चार; अयन (90°) तक शेष 66.5°। यदि sidereal frame + ayanāṃśa A लें, तो tropical λ_t = λ_sid + A — “विषुवत्स्थान” तब A की चुनी हुई परिभाषा पर निर्भर (54″/yr, 49.2″/yr, या trepidation hypothesis अलग-अलग)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “स्फुट भागैः … भगणसञ्चरात्” वही भाषा है जिसमें ayanāṃśa को rate-decomposition से जाँचा गया: shared-drift −16 rev/Mahāyuga = −4.8″/yr, effective 54 − 4.8 = 49.2″/yr (= 246/5)। Zero-year Z ≈ 253.8 CE (Spica residual परीक्षण) classical Z=285 CE के विरुद्ध selectable hypothesis है — unique historical truth नहीं; linear precession स्वयं ≈5029.1″/cy + 2.22″/cy² accel वाली वास्तविकता का सरलीकरण है।

13.11
क्षेत्राण्येवं अजादीनां तिर्यग्ज्याभिः प्रकल्पयेत् ।
अयनादयनं चैव कक्षा तिर्यक्तथापरा ॥
kṣetrāṇyevaṃ ajādīnāṃ tiryagjyābhiḥ prakalpayet ।
ayanādayanaṃ caiva kakṣā tiryaktathāparā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्षेत्राणि = क्षेत्र/राशि-खण्ड; एवम् = इसी प्रकार; अजादीनाम् = अज (मेष) आदि राशियों के; तिर्यग्ज्याभिः = तिर्यक्-ज्याओं (अनुप्रस्थ जीवाओं) से; प्रकल्पयेत् = रचना करे; अयनात् अयनम् = अयन से अयन तक; च एव कक्षा = वही कक्षा भी; तिर्यक् तथा अपरा = और उसी प्रकार एक अन्य तिर्यक् (अनुप्रस्थ) कक्षा।

हिन्दी भावार्थ मेषादि राशियों के क्षेत्र तिर्यग्-ज्याओं से कल्पित किए जाएँ। अयन से अयन तक एक कक्षा है, और उसी रीति से एक दूसरी तिर्यक् कक्षा भी। पद राशि-मण्डल को गोल पर “क्षेत्रों” में बाँटने का विधि-सूत्र है: अनुप्रस्थ ज्याएँ राशि-सीमाएँ खींचती हैं; अयन–अयन चाप क्रान्ति-पथ का एक पूर्ण अर्ध/पूर्ण खण्ड है, और तिर्यक्-कक्षा उस ज्यामितीय परिवार की दूसरी सदस्य।

English rendering Thus one should construct the fields of Aries and the other signs by means of the transverse chords. From solstice to solstice runs that orbit, and likewise another transverse orbit. The rāśi zones are laid out on the sphere by tiryag-jyās, with the ayana-to-ayana arc as the primary path and a second transverse circle of the same constructive family.

गणित / The Mathematics राशि-क्षेत्र = 30° प्रत्येक (भगण 360° ÷ 12)। तिर्यग्-ज्या = अनुप्रस्थ वृत्त पर ज्या-खण्ड, जिनसे राशि-सीमाएँ गोल-यन्त्र पर अंकित होती हैं। अयनादयनम् कक्षा ≈ क्रान्ति-वृत्त का अयन–अयन चाप (90°→270° या पूर्ण 360° path, सन्दर्भानुसार)। कोई नया संख्या-स्थिरांक नहीं — रचना-अल्गोरिथ्म: (1) वैषुवती आधार, (2) तिर्यग्-ज्या से 12 क्षेत्र, (3) अयन–अयन कक्षा + अपर तिर्यक् कक्षा।

उदाहरण (worked example) भगण = 360°, एक राशि-क्षेत्र = 30°। मेष-सीमाएँ 0°–30°; वृष 30°–60°; … मीन 330°–360°। कर्कट-अयन = 90°, मकर-अयन = 270° — अयनादयन चाप (कर्कट→मकर, दक्षिणाभिमुख पथ) = 180° along the krānti-path।

13.12
क्रान्तिसञ्ज्ञा तया सूर्यः सदा पर्येति भासयन् ।
चन्द्राद्याश्च स्वकैः पातैरपमण्डलं आश्रितैः ॥
krāntisañjñā tayā sūryaḥ sadā paryeti bhāsayan ।
candrādyāśca svakaiḥ pātairapamaṇḍalaṃ āśritaiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) क्रान्तिसञ्ज्ञा = “क्रान्ति” नाम वाली (कक्षा); तया = उसी से; सूर्यः = सूर्य; सदा पर्येति = सदा परिक्रमा करता है; भासयन् = प्रकाशित करता हुआ; चन्द्राद्याः = चन्द्र आदि (ग्रह); च = और; स्वकैः पातैः = अपने-अपने पातों (nodes) से; अपमण्डलम् = अपमण्डल (क्रान्ति-वृत्त / ecliptic); आश्रितैः = आश्रित/स्थित।

हिन्दी भावार्थ उसी कक्षा का नाम क्रान्ति है; उसी पर सूर्य सदा घूमता हुआ जगत् को प्रकाशित करता है। चन्द्र और अन्य ग्रह अपने-अपने पातों के साथ उसी अपमण्डल का आश्रय लेते हैं। “क्रान्ति” यहाँ केवल declination-कोण नहीं, वह पथ है जिस पर सूर्य की वार्षिक गति गोल में अंकित है; पात-सहित ग्रह उसी अपमण्डल-परिवार में विक्षेप-रहित या विक्षेप-युक्त स्थित माने जाते हैं।

English rendering That orbit is named krānti; by it the Sun always revolves, giving light. The Moon and the other planets, each with their own nodes, rest upon the apamaṇḍala (the ecliptic circle). Krānti here is the Sun’s path on the sphere; the planets share that ecliptic frame through their pātas.

गणित / The Mathematics क्रान्ति-वृत्त = ecliptic। सूर्य: ecliptic latitude β ≈ 0 (manda-only sphuṭa path on krānti)। चन्द्र/ग्रह: ecliptic reference + विक्षेप (latitude) tied to पात (node) Ω:
- argument of latitude u = L − Ω (मॉडल-dependent)
- classical latitude form ∝ sin u (with vikṣepa amplitude from śāstra tables)
Outer planets: śīghrocca = mean Sun on this same ecliptic frame; inner: madhya = mean Sun — Chapter 2 chain का ज्यामितीय आधार यही अपमण्डल है।

हमारा डिकोड (Our Decode) `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` शुद्ध SS Chapter-2 manda+śīghra को इसी अपमण्डल-भाषा में चलता है — Western theorem chain में नहीं। Outer: śīghrocca = mean Sun; inner: madhya = mean Sun; Sun/Moon: manda only। Epicycle mean values by the verse words (SS 2.34–38): Sun 13°50′, Moon 31°50′, Mars 73.5°, Mercury 29°, Jupiter 32.5°. (Correction 2026-10-07: this paragraph earlier gave Sun 13°40′ and Mars 72.5° as means. 13°40′ is the Sun's odd end, not its mean, and 72.5 came from the misprinted Mars odd end of 70. The verse words of 2.34-2.35 give Sun 14°/13°40′, Moon 32°/31°40′, Mars 75°/72°, Mercury 30°/28°, Jupiter 33°/32°, Venus 12°/11°, Saturn 49°/48°. Whatever the KAAL file holds is left for the owner to correct.)

13.13
ततो अपकृष्टा दृश्यन्ते विक्षेपान्तेष्वपक्रमात् ।
उदयक्षितिजे लग्नं अस्तं गच्छच्च तद्वशात् ॥
tato apakṛṣṭā dṛśyante vikṣepānteṣvapakramāt ।
udayakṣitije lagnaṃ astaṃ gacchacca tadvaśāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = तब/उससे; अपकृष्टाः = अपकर्षित/हटाए हुए (विस्थापित); दृश्यन्ते = दिखाई देते हैं; विक्षेपान्तेषु = विक्षेप के अन्त/सीमा पर; अपक्रमात् = अपक्रम (declination) के कारण; उदयक्षितिजे = उदय-क्षितिज पर; लग्नम् = लग्न (ascendant); अस्तं गच्छत् = अस्त को जाता हुआ; च = और; तद्वशात् = उसी के वश/अनुसार।

हिन्दी भावार्थ अपक्रम के कारण ग्रह विक्षेप की सीमाओं पर अपकृष्ट दिखाई देते हैं — अर्थात् क्रान्ति-पथ से हटकर अक्षांश-दिशा में। उदय-क्षितिज पर लग्न बनता है, और अस्त भी उसी व्यवस्था के वश से घटित होता है। पद दृष्टि-ज्यामिति को खोलता है: विक्षेप–अपक्रम दृश्य स्थिति को हटाते हैं; क्षितिज-सन्धि पर उदय/अस्त और लग्न-बिन्दु उसी गोल-नियम से निकलते हैं।

English rendering Drawn aside, they appear at the extremes of their latitudes because of declination. The lagna is on the rising horizon, and setting likewise follows from that same order. Latitude and declination displace the apparent place; rising, setting, and the ascendant are horizon events of that geometry.

गणित / The Mathematics दृश्य-स्थान ≈ ecliptic position + विक्षेप प्रभाव, combined with अपक्रम δ। Horizon events:
- Lagna (ascendant) = ecliptic–eastern-horizon intersection
- Asta = western-horizon intersection
Closed-form lagna depends on (λ, φ latitude, ε obliquity, θ sidereal time / LST)। विक्षेपान्ते = max |β| near 90° from node along the orbit (u ≈ ±90°)।

उदाहरण (worked example) Convention: φ = 28.6° (approx. Delhi), ε ≈ 23.44°, LST such that RA of ascendant solves the standard horizon equation. With β = 0 (Sun), rising point = pure ecliptic-horizon cut = Lagna। Moon with β ≠ 0 rises off the pure ecliptic cut — “अपकृष्टा दृश्यन्ते” exactly that offset at the horizon.

हमारा डिकोड (Our Decode) Ascendant closed-form (longitude, latitude, obliquity, sidereal time) Swiss-fixture संदर्भ से 0.1° भीतर सहमत; RA(MC) ≡ LST को 1e-9° तक verified (MATHEMATICAL-AUDIT §8)। Bhāva-madhya: lagna/MC/IC/DSC anchors + quadrant trisection, sandhis at arc midpoints — invariants sealed (arcs sum 360°, kendras 30°)।

13.14
लङ्कोदयैर्यथासिद्धं खमध्योपरि मध्यमम् ।
मध्यक्षितिजयोर्मध्ये या ज्या सान्त्याभिधीयते ॥
laṅkodayairyathāsiddhaṃ khamadhyopari madhyamam ।
madhyakṣitijayormadhye yā jyā sāntyābhidhīyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) लङ्कोदयैः = लङ्का-उदय (भूमध्य-रेखा पर राशि-उदय काल) से; यथासिद्धम् = जैसा सिद्ध/निर्धारित; खमध्योपरि = ख-मध्य (zenith/mid-heaven क्षेत्र) के ऊपर; मध्यमम् = मध्यम (मध्य-बिन्दु / midheaven); मध्यक्षितिजयोः मध्ये = मध्य और क्षितिज के बीच; या ज्या = जो ज्या; सा = वह; अन्त्या अभिधीयते = “अन्त्या” कही जाती है (सांत्या/अन्त्याज्या — meridian–horizon intervening jyā)।

हिन्दी भावार्थ लङ्कोदय से जैसा सिद्ध होता है, ख-मध्य के ऊपर मध्यम बिन्दु है। मध्य और क्षितिज के बीच की ज्या को अन्त्या (सांत्या) कहते हैं। लङ्का-उदय भूमध्यीय उदय-कालों की तालिका है जिससे गोल पर मध्य-स्थान और क्षितिज-अन्तर की ज्या बाँधी जाती है; “अन्त्या” वही जीवा है जो मध्य–क्षितिज चाप को ज्या-भाषा में पकड़ती है।

English rendering As established by the Laṅkā rising-times, the mid-point stands above the middle of the sky. The jyā that lies between midheaven and the horizon is called antyā (sāntyā). Laṅkā-udaya fixes the equatorial rising frame; sāntyā is the chord of the midheaven–horizon interval.

गणित / The Mathematics लङ्कोदय = equatorial rising times of rāśis (φ = 0)। Midheaven (MC): RA(MC) = LST। अन्त्याज्या / sāntyā = jyā of the arc between madhya (meridian/MC-related altitude geometry) and kṣitija (horizon) — classical altitude/co-latitude jyā family:
- at equator (Laṅkā frame), simplified; at latitude φ, the same construction is adjusted by cara (next verse)
R = trigonometric radius (SS often R = 3438′ for jyā tables)। sāntyā enters altitude and shadow computations as the meridian–horizon link.

उदाहरण (worked example) Convention: R = 3438′ (SS jyā radius)। If the madhya–kṣitija arc α = 90° − φ for a nonagesimal-style altitude link at culmination of equator point, then for φ = 0° (Laṅkā), α = 90°, jyā(α) = R = 3438′। For φ = 30°, α = 60°, jyā(60°) = R × √3 ⁄ 2 ≈ 2977′ — sāntyā-scale quantity in that simplified reading (full SS procedure uses the chapter’s exact jyā chain)।

हमारा डिकोड (Our Decode) RA(MC) ≡ LST की 1e-9° verification और bhāva-madhya layer (MC/IC anchors) इसी “खमध्योपरि मध्यमम्” को आधुनिक closed form में बाँधते हैं। Instrument mean-longitude lab है; true-position production ephemeris नहीं — promoting requires measured calculation layer, stronger wording नहीं।

13.15
ज्ञेया चरदलज्या च विषुवत्क्षितिजान्तरम् ।
कृत्वोपरि स्वकं स्थानं मध्ये क्षितिजमण्डलम् ॥
jñeyā caradalajyā ca viṣuvatkṣitijāntaram ।
kṛtvopari svakaṃ sthānaṃ madhye kṣitijamaṇḍalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञेया = जाननी चाहिए; चरदलज्या = चर-दल-ज्या (ascensional difference के आधे की ज्या); च = और; विषुवत्क्षितिजान्तरम् = विषुवत् और क्षितिज का अन्तर; कृत्वा = करके/स्थापित कर; उपरि = ऊपर; स्वकं स्थानम् = अपना स्थान (स्थान-अक्षांश); मध्ये = मध्य में; क्षितिजमण्डलम् = क्षितिज-मण्डल।

हिन्दी भावार्थ चर-दल-ज्या को विषुवत्–क्षितिज अन्तर के रूप में जानो। अपना स्थान ऊपर रखकर, मध्य में क्षितिज-मण्डल स्थापित करो। यह गोल-यन्त्र पर स्थानिक अक्षांश का कदम है: विषुव-वृत्त और क्षितिज के बीच का अन्तर ही चर-दल की ज्या है, जिससे दिन-रात की विषमता (cara) निकलती है।

English rendering Know the sine of the ascensional difference (caradala) as the interval between the equinoctial and the horizon. Place one’s own station above, and set the horizon-circle in the middle. Cara-dala-jyā is that equinoctial–horizon separation on the sphere at the observer’s latitude.

गणित / The Mathematics चरदल = ascensional difference A (दिनार्ध और 15 घटी का अन्तर; चर = 2A, पूरे दिन का अन्तर)। Classical relation (modern notation, same geometry):
sin A = tan δ × tan φ
अतः चरदलज्या = R sin A = R tan φ tan δ (3.34 की carajyā), tied to विषुवत्–क्षितिज angular gap at the given place। Construction: observer latitude φ “उपरि स्वकं स्थानम्”; kṣitija-maṇḍala mid-set; viṣuvat–kṣitija gap → cara engine for day-length and rising-time corrections beyond pure Laṅkā-udaya।

उदाहरण (worked example) φ = 30°, δ = +20° (Sun)। tan 30° = 1⁄√3, tan 20° ≈ 0.3640 → sin A ≈ 0.3640⁄1.7321 ≈ 0.2102 → A ≈ 12.14° = चरदल। Day arc ≈ 180° + 2A ≈ 204.3° → day length ≈ 204.3⁄360 × 60 ghaḍī ≈ 34.05 ghaḍī (1 day = 60 ghaḍī metrology)।

हमारा डिकोड (Our Decode) vedic-ghadi का ghaḍī/pala/vipala metrology (1 day = 60 ghaḍī = 3,600 pala = 216,000 vipala = 21,600 prāṇa) और tithi engine ascensional/day-count choices पर टिकते हैं। Mahāyuga civil days: SS canon 1,577,917,828 (math-core) vs Āryabhaṭa 1,577,917,500 (vedic-ghadi) — 328-day gap; synodic test SS near-perfect (−0.0047 s/month), Āryabhaṭa −0.535 s/month। Canon choice hits the tithi engine hardest. 21,600 prāṇa/day ↔ 21,600 arcmin/circle count correspondence है, physical identity नहीं।

सुधार · correction (2026-10-07) पहले चरदल = A/2 लिया गया था, जबकि A स्वयं ascensional difference है (उदाहरण का दिन-चाप 180° + 2A भी यही मानता है)। चरदलज्या = R tan φ tan δ, 3.34 की चरज्या। Correction: caradala is the ascensional difference itself.

13.16
वस्त्रच्छन्नं बहिस्चापि लोकालोकेन वेष्टितम् ।
अमृतस्रावयोगेन कालभ्रमणसाधनम् ॥
vastracchannaṃ bahiscāpi lokālokena veṣṭitam ।
amṛtasrāvayogena kālabhramaṇasādhanam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वस्त्रच्छन्नम् = वस्त्र से आच्छादित; बहिः च अपि = और बाहर भी; लोकालोकेन = लोकालोक (पर्वत/वलय) से; वेष्टितम् = घिरा हुआ; अमृतस्रावयोगेन = अमृत-स्राव के योग से; कालभ्रमणसाधनम् = काल-भ्रमण का साधन (समय-परिक्रमा का यन्त्र)।

हिन्दी भावार्थ (यह गोल) वस्त्र से ढका हो, बाहर लोकालोक से वेष्टित हो, और अमृत-स्राव के योग से काल-भ्रमण का साधन बने। पद यन्त्र-रचना और पौराणिक आच्छादन-भाषा को एक साथ रखता है: भौतिक गोल-यन्त्र वस्त्र-आवरण और लोकालोक-वलय से पूर्ण माना गया है; उसका प्रयोजन “काल का भ्रमण साधना” — समय-चक्र को दृश्य घूर्णन में बाँधना।

English rendering Covered with cloth, and outwardly encircled by Lokāloka as well, by the conjunction of the ambrosial stream it becomes the instrument for effecting the revolution of time. The gola is finished as a draped, ringed time-engine: cosmology as casing, chronometry as purpose.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — यन्त्र-वर्णन / काल-साधन की भूमिका। “कालभ्रमणसाधनम्” = gola as analogue computer of diurnal/annual rotation; numerical engine modern में day-count + sphuṭa + lagna layers से recreate होता है, न कि वस्त्र/लोकालोक से — वे पाठ की भौतिक-पौराणिक casing हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए एक लकड़ी का गोल-यन्त्र (armillary / celestial globe) जिस पर नक्षत्र-बिंदु अंकित हैं; उसे पतले वस्त्र से ढँक दिया जाए तो बाहरी आँखों से केवल घूर्णन का आकार दिखे, विस्तार का रहस्य भीतर रहे। “लोकालोक-वलय” यहाँ पौराणिक आवरण-भाषा है—यन्त्र के चारों ओर एक सीमा-वलय जो दृश्य और अदृश्य को बाँटता है। यदि नीचे से जल-प्रवाह या अमृत-स्राव-सी सतत धारा से धुरी घुमाई जाए, तो वही घूर्णन दिन-रात और घटी-पल का दृश्य रूप बन जाता है: समय को सूत्र में नहीं, घूमते गोल में “देखना”। यह विचार अध्याय १३ के आगे के यन्त्र-श्लोकों और पूर्व अध्यायों के काल-साधन सूत्रों से जुड़कर प्रयोग में उतरता है।

13.17
तुङ्गबीजसमायुक्तं गोलयन्त्रं प्रसाधयेत् ।
गोप्यं एतत्प्रकाशोक्तं सर्वगम्यं भवेदिह ॥
tuṅgabījasamāyuktaṃ golayantraṃ prasādhayet ।
gopyaṃ etatprakāśoktaṃ sarvagamyaṃ bhavediha ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुङ्ग = उच्च/अपसीज (ग्रह-कक्षा का शिखर); बीज = सुधार-बीज (क्षतिपूर्ति-अंश); समायुक्तम् = सहित/युक्त; गोलयन्त्रम् = गोल-यन्त्र (आर्मिलरी स्फीयर); प्रसाधयेत् = ठीक से साधित/निर्मित करे; गोप्यम् = गोपनीय/गुप्त; प्रकाशोक्तम् = प्रकाश/व्याख्या में कहा हुआ; सर्वगम्यम् = सबके लिए गम्य/उपलब्ध; इह = यहाँ (इस शास्त्र-प्रकरण में)।

हिन्दी भावार्थ उच्च और बीज से युक्त गोल-यन्त्र को साधना चाहिए। जो विद्या प्रकाश-परंपरा में गोपनीय कही गई, वही यहाँ इस प्रकरण में सबके लिए गम्य हो जाती है। अर्थात् यन्त्र की रचना और उसके साथ जोड़े जाने वाले उच्च-बीज — दोनों का रहस्य, गुरु-परंपरा से निकलकर इस पाठ में खुला है।

English rendering One should construct the armillary sphere (gola-yantra) equipped with tuṅga and bīja. What is spoken of as secret in the luminous tradition becomes, here, accessible to all.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — यन्त्र-निर्देश + गोपनीयता का विधान। “तुङ्ग-बीज” का अर्थ यहाँ यन्त्र को ग्रह-उच्च और बीज-सुधार से संगत बनाना है; संख्यात्मक स्थिरांक इस श्लोक में नहीं दिए गए।

हमारा डिकोड (Our Decode) डोजियर में बीज को ग्रह−सूर्य relative-rate सुधार (Mars +30, Jupiter −51, Saturn +61 rev/Mahāyuga) के रूप में pinned किया गया है — absolute re-fit नहीं। गोल-यन्त्र को “तुङ्गबीजसमायुक्त” कहना उसी सिद्धांत की यान्त्रिक छाया है: mean-longitude lab (math-core) और sphuṭa engine अलग-अलग layer हैं; यन्त्र केवल साधना-माध्यम है, उत्पादन-ephemeris नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) गोल-यन्त्र पर केवल तारे अंकित करना अधूरा है; उच्च (ucca / apogee) और बीज (bīja / empirical correction) जोड़ने पर वही गोला गणना-साधन बनता है—जैसे मानचित्र पर माप-स्केल के बिना दूरी न निकले। गुरु-परंपरा में ये जोड़ अक्सर मौखिक “रहस्य” रहे; सूर्यसिद्धान्त उन्हें पाठ में लाकर गोप्य को प्रकरण-गम्य बना देता है। उच्च-बीज की पूरी संख्या-रीति मन्द-फल और शीघ्र-फल के अध्यायों में खुलती है—यहाँ केवल संकेत है कि यन्त्र और संशोधन एक साथ साधे जाएँ। जो पाठक बाद में बीज-संस्कार वाले उदाहरण देखेगा, वह समझेगा: “प्रकाशोक्त” का अर्थ खुला सूत्र, न कि जादुई रहस्य।

13.18
तस्माद्गुरूपदेशेन रचयेद्गोलं उत्तमम् ।
युगे युगे समुच्छिन्ना रचनेयं विवस्वतः ॥
tasmādgurūpadeśena racayedgolaṃ uttamam ।
yuge yuge samucchinnā racaneyaṃ vivasvataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तस्मात् = इसलिए; गुरु-उपदेशेन = गुरु के उपदेश से; रचयेत् = रचना करे; गोलम् उत्तमम् = उत्तम गोल; युगे युगे = युग-युग में; समुच्छिन्ना = उच्छिन्न/विच्छिन्न होती रही; रचना इयम् = यह रचना-विधि; विवस्वतः = विवस्वान् (सूर्य) की।

हिन्दी भावार्थ इसलिए उत्तम गोल की रचना गुरु-उपदेश से ही करनी चाहिए। विवस्वान् की यह रचना-परंपरा युग-युग में टूटती रही है। शास्त्र कहता है कि यन्त्र-विद्या स्वतः सुरक्षित नहीं रहती — उसे गुरु-शिष्य-श्रृंखला से ही जीवित रखना पड़ता है।

English rendering Therefore one should fashion the excellent gola only under a teacher’s instruction. This construction of Vivasvat has been broken off age after age.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — परंपरा-संवाद / यन्त्र-रचना का अनुशासन। संख्या, सूत्र या स्थिरांक नहीं; केवल यह कि रचना “गुरु-उपदेश” पर निर्भर है और युग-युग में विच्छिन्न होती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक पीढ़ी गोल-यन्त्र बना ले, अगली पीढ़ी केवल फल-तालिका याद रखे—तीसरी पीढ़ी में यन्त्र-रचना का हाथ-हुनर टूट जाता है। श्लोक इसी टूट को “युगे युगे समुच्छिन्ना” कहता है: विवस्वान्-परंपरा स्वतः सुरक्षित नहीं रहती। भारत में खगोलीय यन्त्र-विद्या बार-बार लिखित शास्त्र और जीवित गुरु-शिष्य दोनों पर टिकी रही—केवल पुस्तक से वृत्त सही नहीं कटते, न ही धुरी सही बैठती। इसलिए “उत्तम गोल” का मापदण्ड यहाँ सौंदर्य नहीं, गुरु-परीक्षित सममिति और प्रयोग-योग्यता है। आगे के श्लोक (१३.२०–२४) उसी परंपरा को सामग्री और छाया-विधि में ठोस बनाते हैं।

13.19
प्रसादात्कस्यचिद्भूयः प्रादुर्भवति कामतः ।
कालसंसाधनार्थाय तथा यन्त्राणि साधयेत् ॥
prasādātkasyacidbhūyaḥ prādurbhavati kāmataḥ ।
kālasaṃsādhanārthāya tathā yantrāṇi sādhayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) प्रसादात् = कृपा/अनुग्रह से; कस्यचित् = किसी (योग्य/अनुग्राहक) के; भूयः = फिर से; प्रादुर्भवति = प्रकट होती है; कामतः = इच्छा/संकल्प से; काल-संसाधन-अर्थाय = काल-साधन के लिए; तथा = उसी प्रकार; यन्त्राणि = यन्त्रों को; साधयेत् = साधित करे।

हिन्दी भावार्थ किसी के प्रसाद से यह रचना-विधि फिर इच्छापूर्वक प्रकट हो उठती है। उसी दृष्टि से काल-साधन के हेतु विविध यन्त्र भी साधने चाहिए। श्लोक दो बातें जोड़ता है — परंपरा का पुनरुद्धार, और समय-निर्धारण के लिए व्यावहारिक यन्त्र-साधना।

English rendering By someone’s grace the art reappears again at will. In the same spirit one should prepare instruments for the determination of time.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — काल-साधन की यान्त्रिक भूमिका। “कालसंसाधन” का लक्ष्य तो स्पष्ट है, पर यहाँ कोई माप-सूत्र या संख्या नहीं दी गई।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कोई एक आचार्य या परंपरा-वाहक जब विधि फिर सिखाता है, तो “प्रसाद” का अर्थ अलौकिक चमत्कार नहीं—पुनरुद्धार की इच्छा और उपलब्धता है। उसी क्षण शास्त्र केवल स्मृति नहीं रह जाता; काल-साधन के लिए शंकु, जल-यन्त्र, चक्र आदि फिर हाथ में लिए जाते हैं। सोचे: नक्षत्र-तालिकाएँ कागज़ पर सही हों, पर यदि छाया से मध्याह्न न जाँचा जा सके तो “समय” अधूरा रहता है। यह पद गणना-अध्यायों और यन्त्र-अध्यायों के बीच पुल है—संख्या से मिला हुआ क्षण, यन्त्र से सत्यापित क्षण। आगे १३.२०–२४ उसी “तथा यन्त्राणि साधयेत्” को प्रकार-भेद में खोलते हैं।

13.20
एकाकी योजयेद्बीजं यन्त्रे विस्मयकारिणि ।
शङ्कुयष्टिधनुश्चक्रैश्छायायन्त्रैरनेकधा ॥
ekākī yojayedbījaṃ yantre vismayakāriṇi ।
śaṅkuyaṣṭidhanuścakraiśchāyāyantrairanekadhā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एकाकी = अकेला/एकान्त में; योजयेत् = जोड़े/प्रयोग करे; बीजम् = बीज (यन्त्र-रहस्य या सुधार-बीज); यन्त्रे विस्मयकारिणि = आश्चर्यकारी यन्त्र में; शङ्कु = शंकु (gnomon); यष्टि = यष्टि/दंड; धनुः = धनु; चक्रैः = चक्रों से; छाया-यन्त्रैः = छाया-यन्त्रों से; अनेकधा = अनेक प्रकार से।

हिन्दी भावार्थ विस्मयकारी यन्त्र में बीज का योग एकाकी — गोपनीय सावधानी से — करना चाहिए। शंकु, यष्टि, धनु और चक्र के साथ, तथा अनेक छाया-यन्त्रों के द्वारा, काल और दिशा अनेक विधियों से साधे जाते हैं। एक ही उद्देश्य — काल/स्थिति-साधन — के कई भौतिक मार्ग गिनाए गए हैं।

English rendering Alone, one should apply the bīja in the wonder-working instrument. By gnomon, staff, bow and circle, and by shadow-instruments of many kinds, the work is carried out in diverse ways.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — यन्त्र-वर्गों की सूची। शंकु/यष्टि/धनु/चक्र/छाया-यन्त्र — ये मापन-माध्यम हैं; संख्यात्मक नियतांक इस श्लोक में नहीं हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) “बीज योजयेत्” को डोजियर की bīja-layer से जोड़कर पढ़ा जा सकता है — relative-rate corrections (Sun-anchored), absolute re-fit नहीं; hybrid अस्वीकृत क्योंकि synodic geometry बिगड़ती। यन्त्र-प्रयोग और computational bīja अलग layer हैं: एक भौतिक साधना, दूसरी mean-longitude lab की rate-प्रयोगशाला।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक साधारण शंकु (gnomon) दोपहर में छाया की सबसे छोटी रेखा देता है—मध्याह्न और दिशा दोनों एक लकड़ी से। यष्टि, धनु-आकार का चाप और चक्र-यन्त्र उसी उद्देश्य के भिन्न भौतिक मार्ग हैं: कोण को डोरी से, वृत्त से या चाप से पढ़ना। “बीज एकाकी योजयेत्” का ठोस अर्थ यह है कि सुधार-संख्या यन्त्र पर मनमानी नहीं चिपकाई जाती—एक साधक, एक परीक्षित संशोधन, ताकि विस्मयकारी यन्त्र भ्रामक न बने। अध्याय ३ के छाया-सूत्र और अक्षांश-साधन में यही शंकु-गणित पूर्ण रूप लेता है; यहाँ केवल यन्त्र-परिवार की सूची है।

13.21
गुरूपदेशाद्विज्ञेयं कालज्ञानं अतन्द्रितैः ।
तोययन्त्रकपालाद्यैर्मयूरनरवानरैः ॥
ससूत्ररेणुगर्भैश्च सम्यक्कालं प्रसाधयेत् ॥
gurūpadeśādvijñeyaṃ kālajñānaṃ atandritaiḥ ।
toyayantrakapālādyairmayūranaravānaraiḥ ।।
sasūtrareṇugarbhaiśca samyakkālaṃ prasādhayet ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) गुरु-उपदेशात् = गुरु-उपदेश से; विज्ञेयम् = जानने योग्य; काल-ज्ञानम् = काल का ज्ञान; अतन्द्रितैः = अतंद्रित/जागरूक साधकों द्वारा; तोय-यन्त्र = जल-यन्त्र; कपाल-आद्यैः = कपाल आदि से; मयूर-नर-वानरैः = मयूर, नर, वानर (आकृति-यन्त्रों) से; स-सूत्र-रेणु-गर्भैः = सूत्र और रेणु से गर्भित (रेत/चूर्ण भरे) यन्त्रों से; सम्यक् कालम् = ठीक काल; प्रसाधयेत् = साधित करे।

हिन्दी भावार्थ काल-ज्ञान गुरु-उपदेश से, अतंद्रित साधकों द्वारा ही ठीक जाना जाता है। तोय-यन्त्र, कपाल आदि; मयूर-नर-वानर रूपी यन्त्र; तथा सूत्र और रेणु से भरे यन्त्र — इन सबके द्वारा काल सम्यक् साधना चाहिए। जल, आकृति और रेणु — तीन प्रकार की काल-मापना एक ही श्लोक में समेट दी गई है।

English rendering Knowledge of time is to be learned from a teacher by the unwearied. With water-instruments and the kapāla and the rest, with peacock-, man- and monkey-devices, and with instruments filled with thread and powder, time is to be determined correctly.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — काल-यन्त्रों का वर्ग-वर्णन। जल-यन्त्र, कपाल, आकृति-यन्त्र (मयूर/नर/वानर), सूत्र-रेणु-गर्भ — मापन-श्रेणियाँ; संख्या अगले कपाल-श्लोक (13.23) में आती है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) रात को सूर्य-छाया नहीं मिलती—तब तोय-यन्त्र (water clock) में बूँद-बूँद बहता जल घटी बाँटता है; कपाल-यन्त्र में छिद्रयुक्त पात्र जल में डूबकर एक निश्चित काल सूचित करता है। मयूर-नर-वानर आकृति वाले यन्त्र उसी जल/भार-संचालन को दृश्य रूप देते हैं—समय “पक्षी या पुरुष की गति” बनकर दिखे। सूत्र-रेणु-गर्भ यन्त्र रेत या चूर्ण की धारा से काल मापते हैं, जैसे later sand-glass की दिशा में सोच। तीन माध्यम—जल, आकृति-यन्त्र, रेणु—एक ही श्लोक में इसलिए आए कि साधक मौसम और प्रकाश के अनुसार विधि बदले; गुरु-उपदेश बताता है कब कौन-सा यन्त्र विश्वसनीय।

13.22
पारदाराम्बुसूत्राणि शुल्वतैलजलानि च ।
बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्ते अपि दुर्लभाः ॥
pāradārāmbusūtrāṇi śulvatailajalāni ca ।
bījāni pāṃsavasteṣu prayogāste api durlabhāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) पारद = पारा; आर = ताम्र-मिश्र/पीतल (पाठानुसार धातु); अम्बु = जल; सूत्राणि = सूत्र/धागे; शुल्व = ताम्र/ताँबा; तैल = तेल; जलानि = जल; बीजानि = बीज (अनाज-बीज आदि); पांसवः = पांसु/रेत-चूर्ण; तेषु = उनमें; प्रयोगाः = प्रयोग; ते अपि = वे भी; दुर्लभाः = दुर्लभ।

हिन्दी भावार्थ पारा, आर, जल, सूत्र; शुल्व, तैल और जल; बीज और पांसु — ये सामग्री, और उनमें जो प्रयोग हैं, वे भी दुर्लभ हैं। श्लोक यन्त्र-निर्माण की सामग्री-सूची देता है और साथ ही चेताता है कि सही प्रयोग-विधि सहज उपलब्ध नहीं। (पाठ-भेद संभव: “पारदारा…” का खंडन-पाठ कुछ संस्करणों में भिन्न हो सकता है।)

English rendering Mercury, brass, water and threads; copper, oil and water; seeds and sands — and the procedures for them too are hard to obtain.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — सामग्री-सूची / प्रयोग-दुर्लभता। माप-सूत्र नहीं; केवल यान्त्रिक द्रव्य और यह कि उनके प्रयोग दुर्लभ हैं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) पारा (mercury), आर (copper), सूत्र, शुल्व (measuring cord / copper-line), तैल, जल, बीज-संशोधन और पांसु (fine powder / sand)—यह सामग्री-सूची रसोई की नहीं, प्रयोगशाला की है। पारे का भार-प्रवाह या धातु-नलिका, तैल से चिकना घूर्णन, रेणु से स्थिर धारा—हर वस्तु गलत अनुपात में यन्त्र को बिगाड़ देती है। इसलिए “प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभाः”: सामग्री बाज़ार में मिल भी जाए तो सही माप, शुद्धता और क्रम गुरु-परीक्षित होने पर ही काल-सत्य देते हैं। पाठक इसे जादू-सूची न समझे; यह precision craft की चेतावनी है—अध्याय के यन्त्र-श्लोकों को पढ़ते समय हर नाम के पीछे एक भौतिक गुण याद रखें।

13.23
ताम्रपात्रं अधश्छिद्रं न्यस्तं कुण्डे अमलाम्भसि ।
षष्टिर्मज्जत्यहोरात्रे स्फुटं यन्त्रं कपालकम् ॥
tāmrapātraṃ adhaśchidraṃ nyastaṃ kuṇḍe amalāmbhasi ।
ṣaṣṭirmajjatyahorātre sphuṭaṃ yantraṃ kapālakam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ताम्र-पात्रम् = ताँबे का पात्र; अधः-छिद्रम् = नीचे छिद्र वाला; न्यस्तम् = रखा हुआ; कुण्डे = कुंड/हौद में; अमल-अम्भसि = निर्मल जल में; षष्टिः = साठ; मज्जति = डूबता है; अहोरात्रे = एक अहोरात्र (दिन+रात) में; स्फुटम् = स्पष्ट/यथार्थ; यन्त्रम् कपालकम् = कपालक यन्त्र।

हिन्दी भावार्थ नीचे छिद्र वाला ताम्र-पात्र, निर्मल जल भरे कुंड में रखा जाए — वह एक अहोरात्र में साठ बार डूबता है। यही स्फुट कपालक यन्त्र है। प्रत्येक डूबना एक घटिका का माप बनता है; साठ घटिका मिलकर पूरा अहोरात्र पूरा करती हैं।

English rendering A copper vessel with a hole beneath, set in a basin of pure water, sinks sixty times in a day-and-night — that is the accurate kapāla instrument.

गणित / The Mathematics कपाल-क्लेप्सिड्रा का दिन-विभाजन (श्लोक की संख्या से):
- 1 अहोरात्र में पात्र 60 बार मज्जन → 1 मज्जन = 1 घटिका
- अतः 1 दिन = 60 घटिका
- डोजियर की पूर्ण मेट्रोलॉजी-श्रृंखला (SS-day division): 1 दिन = 60 घटिका = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण
- 21,600 प्राण/दिन ↔ 21,600 चाप-कला/वृत्त — गिनती-संगति (count correspondence), समय और कोण की भौतिक समता नहीं।

उदाहरण (worked example) मान लें पात्र पहली बार जल-सतह से डूबा = घटिका-आरंभ। 15वें मज्जन के अंत पर व्यतीत काल = 15/60 दिन = 1/4 दिन = 6 आधुनिक घंटे (यदि अहोरात्र = 24 h माना जाए)। 60वें मज्जन पर पूरा अहोरात्र। (इनपुट-परंपरा: अहोरात्र = सूर्योदय-से-सूर्योदय या मध्यरात्रि-युग्म — यन्त्र दोनों पर “60” गिनती ही मापता है; epoch का चयन पर्यवेक्षक का है।)

हमारा डिकोड (Our Decode) यही 60-घटिका मेट्रोलॉजी vedic-ghadi का आधार है (ghaḍī/pala/vipala; tithi engine)। Mahāyuga civil days का canon-choice — SS 1,577,917,828 (math-core) बनाम Āryabhaṭa 1,577,917,500 (vedic-ghadi) — tithi engine पर सबसे तेज़ पड़ता है; कपाल की “षष्टिः” स्थानीय दिन-विभाजन है, युग-दिन-गणना नहीं। Oracle-अनुशासन: `==` on pinned fixtures; ±tolerance bands ने कभी −1 छिपाया था।

सुधार · correction (2026-10-07) “तांरपात्रं / tāṃrapātraṃ” → “ताम्रपात्रं / tāmrapātraṃ”: ंर यहाँ म्र का OCR-दोष है, ठीक वैसे ही जैसे 6.23 में “सधूंरं → सधूम्रं”, “कृष्णतांरं → कृष्णताम्रं” सुधारा गया; इसी श्लोक का पदच्छेद और अनुवाद पहले से “ताम्र-पात्रम् / a copper vessel” पढ़ते हैं। Correction: spelling (tāmra, copper).

13.24
नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ ।
छायासंसाधनैः प्रोक्तं कालसाधनं उत्तमम् ॥
narayantraṃ tathā sādhu divā ca vimale ravau ।
chāyāsaṃsādhanaiḥ proktaṃ kālasādhanaṃ uttamam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) नर-यन्त्रम् = नर-यन्त्र (मानवाकृति शंकु/छाया-यन्त्र); तथा = उसी प्रकार; साधु = उचित/उत्तम; दिवा = दिन में; च = और; विमले रवौ = निर्मल सूर्य में; छाया-संसाधनैः = छाया-साधनों से; प्रोक्तम् = कहा गया; काल-साधनम् उत्तमम् = उत्तम काल-साधन।

हिन्दी भावार्थ नर-यन्त्र भी उसी प्रकार साधु है। दिन में, जब रवि निर्मल हो, छाया-संसाधनों से जो काल-साधन कहा गया है, वह उत्तम है। जल-कपाल रात्रि-दिन दोनों में चल सकता है; छाया-विधि स्पष्ट सूर्य-प्रकाश की अपेक्षा रखती है — दोनों पूरक मार्ग हैं।

English rendering The nara-yantra is likewise proper. By day, under a clear sun, the determination of time by the shadow-methods that have been taught is excellent.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — छाया-काल-साधन का गुण-विधान। संख्या/सूत्र यहाँ नहीं; “विमले रवौ” शर्त है कि छाया-विधि दिन और स्वच्छ सूर्य पर निर्भर है। (शंकु-छाया के विस्तृत सूत्र अन्य अध्यायों/यन्त्र-प्रकरणों में; इस श्लोक में केवल उत्तमता का निर्णय।)

दृष्टान्त (Illustrative Example) निर्मल धूप वाले दिन एक ऊर्ध्व शंकु या नर-यन्त्र (मानवाकृति/मानव-माप का छाया-यन्त्र) की छाया पूर्व से पश्चिम घूमती दिखाई देती है; मध्याह्न पर छाया सबसे छोटी और उत्तर-दक्षिण रेखा पर बैठती है। बादल छाने पर वही विधि असफल—तब तोय-कपाल सहायक बनते हैं। श्लोक इसी पूरकता को “उत्तम” कहता है: स्पष्ट रवि में छाया-संसाधन सर्वोच्च व्यावहारिक शुद्धता देता है, क्योंकि कोण सीधे प्रकाश-रेखा से पढ़े जाते हैं। अक्षांश, दिन-मान और स्थानीय मध्याह्न की गणित पूर्व अध्यायों के छाया-सूत्रों में है; यहाँ केवल यह याद दिलाना है कि उत्तम काल-साधन मौसम और यन्त्र दोनों चुनने की बुद्धि माँगता है।

13.25
ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्त्वतः ।
ग्रहलोकं अवाप्नोति पर्यायेणात्मवान्नरः ॥
grahanakṣatracaritaṃ jñātvā golaṃ ca tattvataḥ ।
grahalokaṃ avāpnoti paryāyeṇātmavānnaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ग्रह-नक्षत्र-चरितम् = ग्रहों तथा नक्षत्रों की गति-आचार; ज्ञात्वा = जानकर; गोलम् = खगोलीय गोल/मण्डल; तत्त्वतः = तत्त्व से, यथार्थ रूप में; ग्रहलोकम् = ग्रह-लोक (ग्रह-क्षेत्र/ग्रह-संबद्ध लोक); अवाप्नोति = प्राप्त करता है; पर्यायेण = क्रम से, यथासमय; आत्मवान् नरः = संयमी, आत्म-स्थिर मनुष्य।

हिन्दी भावार्थ जो साधक ग्रहों और नक्षत्रों की चर्या को सही-सही समझ लेता है, और गोल—खगोलीय मण्डल—को भी केवल नाम से नहीं बल्कि तत्त्वतः जानता है, वही आत्मवान् पुरुष क्रमशः ग्रहलोक को प्राप्त करता है। यहाँ ज्ञान का मापदण्ड सूचना की बहुतायत नहीं, बल्कि गति और गोल की यथार्थ समझ है। अध्याय का यह फल-वचन ज्ञान को केवल गणना तक सीमित नहीं रखता; गणना को तत्त्व-दृष्टि तक उठाता है।

English rendering Having truly known the motions of the planets and nakṣatras, and the sphere itself in its real nature, the self-possessed person attains, in due course, the realm of the planets. The verse crowns technical mastery with a claim about genuine insight, not mere recitation of rules.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक फल-वचन / फलश्रुति। यह श्लोक कोई स्थिरांक या कलन-विधि नहीं देता; यह ज्ञान के फल की घोषणा है—चरित और गोल का तत्त्वतः बोध ही “ग्रहलोक” की प्राप्ति का द्वार है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कोई व्यक्ति केवल नाम रट ले—“मंगल वक्री, रोहिणी नक्षत्र”—पर यदि गोले पर उनकी वास्तविक गति और स्थान न देख/न समझ सके, तो ज्ञान सूचना-संग्रह रह जाता है। तत्त्वतः गोल जानने का अर्थ है: ध्रुव, विषुव, क्रांति-वृत्त और ग्रह-पथ एक सममिति में बँधे दिखें, और गणना उसी सममिति से निकले। “ग्रहलोकं अवाप्नोति” यहाँ फलित-भय या स्वर्ग-वादा नहीं; क्रमशः उस समझ-लोक में प्रवेश जहाँ ग्रह गतिशील तत्त्व हैं, न कि पंचांग की पंक्तियाँ। जो पाठक अध्याय १–२ की कक्षा-गणित से लेकर यन्त्र-अध्याय तक गया, उसके लिए यह फल-वचन पुस्तक का पुल है—संख्या से दृश्य गोल तक, दृश्य गोल से स्थिर दृष्टि तक।

अध्यायः 14

मानाध्यायः

The Reckonings of Time
27 श्लोक

इस अध्याय में (In this chapter):

मानाध्यायः समय की नब्ज़ को पकड़ता है — एक ही आकाश को नौ भिन्न ‘मानों’ से तौलने की शास्त्र-दृष्टि। ब्रह्म, दिव्य, पितृ, प्राजापत्य, गुरोः (बार्हस्पत्य), सौर, सावन, चान्द्र और आर्क्ष — ये नौ नाम मात्र सूची नहीं; प्रत्येक एक अलग लय है, एक अलग व्यवहार। व्यावहारिक ज्योतिष इन चार पर चलता है — सौर, चान्द्र, आर्क्ष, सावन — और षष्ट्यब्द का चक्र बार्हस्पत्य मान से जाना जाता है। सौर मान से दिन-रात का विस्तार, अयन, विषुव और संक्रान्ति का पुण्यकाल खुलता है; द्विस्वभाव राशियों में षडशीतिमुख की चार स्थान-रेखाएँ यज्ञ-काल और पितृ-दक्षिणा की अक्षयता से जुड़ती हैं। अध्याय इसलिए सुन्दर है कि यह ‘समय’ को एक नहीं, कई सुसंगत घड़ियों में बाँटता है — और फिर बताता है कि नित्य व्यवहार में किन घड़ियों से काम चले।

For the English reader:

Chapter 14 is the book’s metrology of lived time: nine mānas — Brāhma, divine, ancestral, Prājāpatya, Jovian, solar, civil (sāvana), lunar, and sidereal (ārkṣa) — each a different way of counting the same sky. Ordinary practice rests on four of them; the sixty-year cycle is read in the Jovian reckoning alone. The solar measure governs the length of day and night, the solstices and equinoxes, and the sacred window of saṃkrānti; in the dual-natured signs it places the four ṣaḍaśītimukha thresholds that the text binds to ritual and to gifts that do not perish for the Pitṛs. What makes the chapter elegant is not ornament but architecture: time is not one clock forced on every rite, but a kit of clocks, with a clear rule for which dial to watch.

मुख्य गणितीय सूत्र-सूची:

डिकोड-सेतु (Decode bridge):

हमारा vedic-ghadi इन्हीं मानों में से सावन की सूक्ष्म-विभाजन-श्रृंखला (घटी–पल–विपल–प्राण) और चान्द्र तिथि-इंजन को कार्यान्वित करता है; math-core महायुग का सावन-दिन-गणन \(1{,}577{,}917{,}828\) (Sūrya-Siddhānta canon) चुनता है — Āryabhaṭa के \(1{,}577{,}917{,}500\) से ३२८ दिनों का अन्तर, जो तिथि-इंजन पर सबसे तीखा पड़ता है। मानाध्याय का शेष — नव मानों का पूर्ण रूपान्तरण-जाल, षडशीतिमुख-रेखाएँ, संक्रान्ति-पुण्यकाल — अभी उसी metrology-lab के ऊपर मापित परत के रूप में बाकी है।

कालनव मानब्राह्मकल्प-मानदिव्यदेव-वर्षपित्र्यपितृ-मासप्राजापत्यमनु-मानबार्हस्पत्यगुरु-वर्षसौरराशि-संक्रान्तिसावनउदय-से-उदयचान्द्रतिथि-मासनाक्षत्रभ-परिभ्रमणव्यवहार में मुख्यतः सौर · सावन · चान्द्र · नाक्षत्र (श्लोक 14.02)
नव-मान-चक्र — the nine reckonings of time (SS 14.1): nine coexisting "clocks", from Brāhma (aeon-scale) down to Sāvana (sunrise-to-sunrise civil day). Every pañcāṅga quantity is a conversion between spokes of this wheel.
14.1
ब्राह्मं दिव्यं तथा पित्र्यं प्राजापत्यं गुरोस्तथा ।
सौरं च सावनं चान्द्रं आर्क्षं मानानि वै नव ।।
brāhmaṃ divyaṃ tathā pitryaṃ prājāpatyaṃ gurostathā ।
sauraṃ ca sāvanaṃ cāndraṃ ārkṣaṃ mānāni vai nava ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ब्राह्मं = ब्रह्मा-मान; दिव्यं = देव/दिव्य-मान; पित्र्यं = पितृ-मान; प्राजापत्यं = प्रजापति-मान; गुरोः = गुरु/बृहस्पति-मान; सौरं = सूर्य-मान; सावनं = सावन/नागरिक-दिन-मान; चान्द्रं = चन्द्र-मान; आर्क्षं = नक्षत्र/तारकीय-मान; मानानि वै नव = ये नौ ही काल-माप हैं।

हिन्दी भावार्थ काल को मापने के नौ मान बताए गए हैं — ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, गुरु (बार्हस्पत्य), सौर, सावन, चान्द्र और आर्क्ष। ये एक ही समय-धारा के भिन्न-भिन्न “कैलेंडर-मापदंड” हैं; कोई एक ही माप सारी लौकिक व शास्त्रीय गणना का एकमात्र आधार नहीं बनता। अध्याय आगे इन्हीं मानों के व्यवहारिक चयन और विशेष उपयोग की ओर बढ़ता है।

English rendering There are nine measures of time: those of Brahmā, of the gods, of the pitṛs, of Prajāpati, of the preceptor (Jupiter), the solar, the civil (sāvana), the lunar, and the sidereal (ārkṣa). The verse simply names the full set before distinguishing which of them govern ordinary reckoning.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — सूची/वर्गीकरण। नौ नामित काल-मान; संख्यात्मक गुणांक इस श्लोक में नहीं दिए गए (वे आगे के मान-अध्यायों/अन्य अध्यायों में आते हैं)।

हमारा डिकोड (Our Decode) डिकोड-इकोसिस्टम में यही “मान-चयन” पहला इंजीनियरिंग-निर्णय है — math-core सूर्यसिद्धान्त-कैनन civil days/Mahāyuga = 1,577,917,828 लेता है, जबकि vedic-ghadi Āryabhaṭa-कैनन 1,577,917,500 पर चलता है। दोनों “सावन-दिन” की गिनती हैं; 328 दिनों का अंतर केवल नाम नहीं, तithi-इंजन पर वास्तविक प्रभाव डालता है। यह श्लोक उसी बहु-मान-दृष्टि का मूल वाक्य है जिसे हमने later as explicit convention pin किया।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक ही रात्रि को तीन घड़ियाँ कल्पना कीजिए — सूर्योदय से सूर्योदय तक की civil day (सावन), अमावस्या से अमावस्या तक की lunar month (चान्द्र), और मेष-सङ्क्रान्ति से मेष-सङ्क्रान्ति तक का solar year (सौर)। तीनों “एक वर्ष” नहीं कहते, फिर भी तीनों एक ही आकाश की गति से निकलते हैं। nakṣatra-दिन (आर्क्ष) चन्द्रमा के नक्षत्र-पारगमन से चलता है; बृहस्पति का वर्ष (बार्हस्पत्य) तो लगभग बारह सौर वर्षों में एक बार पूरा होता है। यही नौ māna एक समय-धारा के नौ मापदंड हैं — अध्याय १–२ के ग्रह-गति सूत्र इन्हीं में से सौर-सावन-चान्द्र को संख्या में बाँधते हैं, जबकि ब्राह्म-दिव्य-पित्र्य काल-कोटि के रूप में आगे इसी अध्याय में परिभाषित होते हैं।

14.2
चतुर्भिर्व्यवहारो अत्र सौरचान्द्रार्क्षसावनैः ।
बार्हस्पत्येन षष्ट्यब्दं ज्ञेयं नान्यैस्तु नित्यशः ।।
caturbhirvyavahāro atra sauracāndrārkṣasāvanaiḥ ।
bārhaspatyena ṣaṣṭyabdaṃ jñeyaṃ nānyaistu nityaśaḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) चतुर्भिः = चार से; व्यवहारः = लौकिक/व्यवहारिक प्रयोग; अत्र = यहाँ (ज्योतिष-व्यवहार में); सौर-चान्द्र-आर्क्ष-सावनैः = सौर, चान्द्र, आर्क्ष और सावन मानों से; बार्हस्पत्येन = गुरु-मान से; षष्ट्यब्दं = साठ-वर्ष-चक्र; ज्ञेयं = जानना चाहिए; न अन्यैः तु नित्यशः = शेष मानों से नित्य/दैनिक व्यवहार नहीं।

हिन्दी भावार्थ नौ में से व्यवहारिक गणना मुख्यतः चार मानों पर टिकी है — सौर, चान्द्र, आर्क्ष और सावन। गुरु-मान (बार्हस्पत्य) विशेषतः साठ-वर्ष (षष्ट्यब्द) चक्र के लिए जाना जाता है। शेष मान नित्य व्यवहार के उपकरण नहीं माने गए — वे ब्रह्माण्ड-काल या पितृ-दिव्य माप के बड़े फ्रेम हैं, रोज़ के पंचांग के नहीं।

English rendering Ordinary reckoning proceeds by four measures: solar, lunar, sidereal, and civil. The Jovian measure is used for the sixty-year cycle; the remaining measures are not for everyday continuous use.

गणित / The Mathematics चयन-नियम (algorithmic policy), संख्या-सूत्र नहीं:
- दैनिक/व्यवहारिक: {सौर, चान्द्र, आर्क्ष, सावन}
- षष्ट्यब्द: बार्हस्पत्य
- नित्य व्यवहार से बाहर: ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य

उदाहरण (worked example) Input convention: एक “व्यवहार-पंचांग” दिन। तिथि → चान्द्र; सूर्योदय-से-सूर्योदय → सावन; राशि-संक्रान्ति/अयन → सौर; नक्षत्र-स्थान → आर्क्ष। षष्टि-संवत्सर नामकरण → बार्हस्पत्य। एक ही नागरिक दिन पर चार घड़ियाँ साथ-साथ चल सकती हैं — श्लोक ठीक यही अनुमति देता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) vedic-ghadi का ghaḍī/pala/vipala substrate सावन-दिन को 60 ghaḍī = 3,600 pala = 216,000 vipala = 21,600 prāṇa में बाँटता है; 21,600 prāṇa/day ↔ 21,600′/circle एक गिनती-संवाद है, भौतिक समता नहीं (MATHEMATICAL-AUDIT §1)। canon day-count का चुनाव (SS 1,577,917,828 बनाम Āryabhaṭa 1,577,917,500) सबसे अधिक चान्द्र-तिथि इंजन पर पड़ता है — श्लोक का “चतुर्भिर्व्यवहारः” हमारे कोड में explicit multi-scale clocks के रूप में उतरता है।

14.3
सौरेण द्युनिशोर्मानं षडशीतिमुखानि च ।
अयनं विषुवच्चैव संक्रान्तेः पुण्यकालता ।।
saureṇa dyuniśormānaṃ ṣaḍaśītimukhāni ca ।
ayanaṃ viṣuvaccaiva saṃkrānteḥ puṇyakālatā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सौरेण = सौर-मान से; द्युनिशोः मानं = दिन-रात का मान; षडशीतिमुखानि = षडशीति-मुख (८६-दिवसीय विशेष काल); अयनं = अयन (उत्तरायण/दक्षिणायन); विषुवत् = विषुव (वसंत/शरद् समरात्रि); संक्रान्तेः = संक्रान्ति का; पुण्यकालता = पुण्य-काल का निर्धारण।

हिन्दी भावार्थ दिन-रात की अवधि, षडशीतिमुख, दोनों अयन, दोनों विषुव, और संक्रान्ति का पुण्यकाल — ये सब सौर-मान से जाने जाते हैं। अर्थात् जब सूर्य की राशि-गति और संक्रान्ति-बिंदु आधार हों, तभी ये काल-चिह्न स्थिर अर्थ रखते हैं। चान्द्र या सावन घड़ी से अयन-विषुव नहीं नापे जाते।

English rendering By the solar measure one determines the length of day and night, the ṣaḍaśītimukha periods, the ayanas and the equinoxes, and the meritorious timing of a saṅkrānti. These markers are solar by definition.

गणित / The Mathematics सौर-माप की अनुप्रयोग-सूची (सूत्र अगले श्लोकों में):
- द्यु-निशा-मान = f(सूर्य की क्रांति/अयनांश-संबंधी ज्यामिति)
- षडशीतिमुख = ८६ सौर-अहोरात्र के खंड (१४.०४–१४.०५)
- अयन-द्वय, विषुव-द्वय = भ-चक्र पर चार मूल बिंदु (१४.०७)
- संक्रान्ति-पुण्यकाल = सूर्य के राशि-प्रवेश के सापेक्ष काल

हमारा डिकोड (Our Decode) ayanāṃśa-प्रयोगशाला में “अयन” को shared-drift −16 rev/Mahāyuga = −4.8″/yr (= −24/5) और प्रभावी दर 54 − 4.8 = 49.2″/yr = 246/5 के रूप में विघटित किया गया; Z ≈ 253.8 CE को Spica-शून्य परख के साथ एक चयन-योग्य परिकल्पना रखा गया, शाश्वत ऐतिहासिक सत्य नहीं। श्लोक जिस सौर-फ्रेम की बात करता है, वही convention-discipline हमारे इंजन में pin है।

14.4
तुलादि षडशीत्यह्नां षडशीतिमुखं क्रमात् ।
तच्चतुष्टयं एव स्याद्द्विस्वभावेषु राशिषु ।।
tulādi ṣaḍaśītyahnāṃ ṣaḍaśītimukhaṃ kramāt ।
taccatuṣṭayaṃ eva syāddvisvabhāveṣu rāśiṣu ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तुलादि = तुला से आरंभ कर; षडशीत्यह्नां = छियासी दिनों का; षडशीतिमुखं = षडशीति-मुख नामक काल; क्रमात् = क्रमशः; तत् चतुष्टयं एव = वे चार ही; स्यात् = होते हैं; द्विस्वभावेषु राशिषु = द्विस्वभाव राशियों में (मिथुन, कन्या, धनु, मीन)।

हिन्दी भावार्थ तुला से आगे बढ़ते हुए, छियासी-छियासी सौर-अहोरात्रों के खंड “षडशीतिमुख” कहलाते हैं। ऐसे चार ही मुख होते हैं, और वे द्विस्वभाव राशियों में स्थित/संबद्ध माने गए हैं। यह सौर-वर्ष को चार विशेष ८६-दिन खंडों में बाँटने की शास्त्र-व्यवस्था है — सामान्य बारह संक्रान्तियों से अलग एक अतिरिक्त पवित्र-काल जाल।

English rendering Beginning from Libra, successive spans of eighty-six days are called ṣaḍaśītimukha. There are exactly four such spans, located in connection with the dual-natured signs.

गणित / The Mathematics
- षडशीति = ८६ (षट् + अशीति)
- संख्या: ४ × ८६ = ३४४ सौर-अहोरात्र (चार मुखों का योग)
- शेष सौर-वर्ष (लगभग ३६५¼ − ३४४) अन्य संक्रान्ति/अयन-खंडों में रहता है
- द्विस्वभाव राशि: मिथुन, कन्या, धनु, मीन — प्रारंभ-अंश १४.०५ में

उदाहरण (worked example) Input: १ सौर-दिन ≈ सूर्य की ~१° राशि-गति (माध्य सौर-वर्ष-समीकरण; exact bhagaṇa-rate पर निर्भर)। एक षडशीतिमुख ≈ ८६° सौर-भोग। चार मुख = ३४४°; शेष ~२१¼° वर्ष के अन्य खंडों (अयन/विषुव-पार्श्व) में।

14.5
षड्विंशे धनुषो भागे द्वाविंशेऽनिमिषस्य च ।
मिथुनाष्टादशे भागे कन्यायास्तु चतुर्दश ।।
ṣaḍviṃśe dhanuṣo bhāge dvāviṃśe'nimiṣasya ca ।
mithunāṣṭādaśe bhāge kanyāyāstu caturdaśa ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) षड्विंशे भागे = छब्बीसवें अंश में; धनुषः = धनु राशि का; द्वाविंशे = बाईसवें में; अनिमिषस्य = अनिमिष (“पलक न झपकाने वाला” = मत्स्य) का, अर्थात् मीन का — सन्धि में “अ” लुप्त होकर ऽ (अवग्रह) बनता है: द्वाविंशे + अनिमिषस्य = द्वाविंशेऽनिमिषस्य; मिथुन अष्टादशे भागे = मिथुन के अठारहवें अंश में; कन्यायाः तु चतुर्दश = कन्या के चौदहवें में।

हिन्दी भावार्थ चार षडशीतिमुखों के आरंभ-बिंदु द्विस्वभाव राशियों में इस प्रकार हैं — धनु के २६वें अंश पर, मीन (अनिमिष) के २२वें पर, मिथुन के १८वें पर, और कन्या के १४वें पर। प्रत्येक बिंदु से ८६ सौर-दिन का मुख चलता है; अगला मुख अगले द्विस्वभाव-अंश पर जगता है। यह अंश-क्रम २६ → २२ → १८ → १४ एक समान अंतर (४ अंश) रखता है।

English rendering The four ṣaḍaśītimukha begin at the 26th degree of Sagittarius, the 22nd of the Unwinking One (animiṣa, the fish: Pisces, Mīna), the 18th of Gemini, and the 14th of Virgo.

गणित / The Mathematics प्रारंभ-बिंदु (सौर-राशि °):
- धनु २६°
- मीन २२°
- मिथुन १८°
- कन्या १४°

अंतर-शृंखला: २६ − २२ = २२ − १८ = १८ − १४ = ४° (प्रत्येक अगला मुख ४° “पहले” द्विस्वभाव-अंश पर)।

चाप-जांच (८६° सौर-भोग, राशि = ३०°):
- धनु २६° → मीन २२°: (३०−२६) + ३० + ३० + २२ = ४+३०+३०+२२ = ८६
- मीन २२° → मिथुन १८°: (३०−२२) + ३० + ३० + १८ = ८+३०+३०+१८ = ८६
- मिथुन १८° → कन्या १४°: (३०−१८) + ३० + ३० + १४ = १२+३०+३०+१४ = ८६

उदाहरण (worked example) Input: सूर्य धनु २६°०′ पर (माध्य सौर-स्थान; ayanāṃśa convention अलग से pin करें — यहाँ केवल सायन/निरयण सौर-राशि-अंश)। पहला षडशीतिमुख मीन २२° तक चलता है ≈ ८६ सौर-अहोरात्र। उसी क्षण से अगला मुख गिना जाता है।

सुधार · correction (2026-10-07) पिछले पाठ में “निमिषस्य” छपा था और अर्थ अनिश्चित बताया गया था। गणित इसे तय करता है: १४.४ के अनुसार तुला ०° से हर ८६ सौर-अंश पर एक मुख — १८०+८६ = २६६° = धनु २६°; +८६ = ३५२° = मीन २२°; +८६ = ७८° = मिथुन १८°; +८६ = १६४° = कन्या १४°। दूसरा बिन्दु मीन में ही पड़ता है, इसलिए शब्द “अनिमिष” (मत्स्य = मीन) है, जिसका “अ” सन्धि में अवग्रह बनकर छिपा था। चार मुख ४ × ८६ = ३४४; शेष ३६० − ३४४ = १६ = कन्या १४° से ३०° तक के “षोडश अहानि” (१४.६)। तीनों श्लोक एक ही गणना हैं। Correction: the word is animiṣa, the fish (Mīna), hidden by an omitted avagraha. Verse 14.4's steps of 86° from Tulā 0° land on 266°, 352°, 78° and 164°, and the 16° left of the circle are the sixteen days of 14.6.

14.6
ततः शेषाणि कन्याया यान्यहानि तु षोडश ।
क्रतुभिस्तानि तुल्यानि पितॄणां दत्तं अक्षयम् ।।
tataḥ śeṣāṇi kanyāyā yānyahāni tu ṣoḍaśa ।
kratubhistāni tulyāni pitṝṇāṃ dattaṃ akṣayam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ततः = उसके बाद; शेषाणि = शेष; कन्यायाः = कन्या के; यानि अहानि तु षोडश = जो सोलह दिन; क्रतुभिः तुल्यानि = यज्ञ/क्रतु के समान; पितॄणां दत्तं = पितरों को दिया गया; अक्षयम् = अक्षय (क्षीण न होने वाला फल)।

हिन्दी भावार्थ मिथुन-मुख के समापन पर कन्या के १४वें अंश से आगे, कन्या राशि के शेष सोलह दिन विशेष माने गए हैं। वे क्रतु (यज्ञ-अनुष्ठान) के तुल्य हैं, और उनमें पितरों को दिया दान अक्षय कहा गया है। यह षडशीति-जाल का “शेष-खंड” है — चार मुखों के बाद कन्या-अंत की सोलह-दिवसीय पट्टी।

English rendering Thereafter, the remaining sixteen days of Virgo are equal in worth to sacrificial rites; what is offered to the pitṛs in that span is said to be imperishable.

गणित / The Mathematics
- कन्या शेष = ३०° − १४° = १६° ≈ १६ सौर-अहोरात्र (षोडश अहानि)
- संबंध: मिथुन-मुख कन्या १४° पर समाप्त → शेष कन्या १४°–३०° = विशेष १६-दिन खंड
- चार × ८६ = ३४४ के बाहर का यह सौर-खंड शास्त्र में क्रतु-तुल्य घोषित

उदाहरण (worked example) Input: सूर्य कन्या १४° पर पहुँचा (मिथुन-षडशीतिमुख की समाप्ति)। कन्या १४° से कन्या ३०° (तुला-संक्रान्ति) तक = १६ सौर-दिन = श्लोक का “शेषाणि … षोडश”। तुलादि से फिर १४.०४ का क्रम।

14.7
भचक्रनाभौ विषुवद्द्वितयं समसूत्रगम् ।
अयनद्वितयं चैव चतस्रः प्रथितास्तु ताः ।।
bhacakranābhau viṣuvaddvitayaṃ samasūtragam ।
ayanadvitayaṃ caiva catasraḥ prathitāstu tāḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भचक्र-नाभौ = नक्षत्र-चक्र/भ-मंडल की नाभि में; विषुवत्-द्वितयं = दो विषुव; समसूत्रगम् = एक ही व्यास/सूत्र पर स्थित; अयन-द्वितयं च एव = और दो अयन भी; चतस्रः = ये चार; प्रथिताः तु ताः = प्रसिद्ध/ख्यात हैं।

हिन्दी भावार्थ भ-चक्र की नाभि-दृष्टि से दो विषुव एक diametral रेखा (समसूत्र) के दो सिरों पर हैं, और दो अयन भी उसी प्रकार चार दिशाओं के स्तंभ बनते हैं। ये चार — वसंत-विषुव, शरद्-विषुव, उत्तरायण-अयन, दक्षिणायन-अयन — ज्योतिष में सबसे प्रथित काल-बिंदु हैं। सारा संक्रान्ति-जाल इन्हीं चार स्तंभों के बीच बुना जाता है।

English rendering At the navel of the star-circle the two equinoxes lie on one diameter; so too the two solstitial ayanas. These four points are the well-known cardinal markers.

गणित / The Mathematics भ-चक्र = ३६०° पर चार मूल बिंदु (माध्य सौर-राशि फ्रेम में):
- विषुव-द्वय: मेष ०° और तुला ०° (अंतर १८०° — समसूत्र)
- अयन-द्वय: कर्कट ०° और मकर ०° (अंतर १८०°; विषुवों से ९०°)
- चारों का क्रम (सूर्य-भोग): मेष ०° → कर्कट ०° → तुला ०° → मकर ०° → मेष ०°, प्रत्येक चाप ९०°

उदाहरण (worked example) Convention: निरयण सौर-स्थान, chosen ayanāṃśa से सायन↔निरयण। मेष-संक्रान्ति = विषुव-स्तंभ; +९०° सौर-भोग → कर्कट = अयन-स्तंभ। RA(MC) ≡ LST जैसी आधुनिक जांच (हमारे bhāva-layer में 1e-9°) इसी ecliptic-equator ज्यामिति की sibling है — श्लोक केवल चार बिंदु नामित करता है।

हमारा डिकोड (Our Decode) ayanāṃśa decomposition में classical Z = 285 CE Spica-शेष 0.31°–0.44° पर fail होता है; Z ≈ 253.8 CE पर Spica ≈ 0° (1700–2100 में ±0.10°) — यह “विषुव-शून्य” की परिकल्पना है, श्लोक के चार प्रथित बिंदुओं का modern zero-year प्रयोग। दर 49.2″/yr vs Lahiri ≈ 1.09″/yr अंतर; रेखीय precession स्वयं fiction है (वास्तविक ≈ 5029.1″/cy + 2.22″/cy²) — इसलिए हम Z को selectable hypothesis रखते हैं, एकमात्र सत्य नहीं।

14.8
तदन्तरेषु संक्रान्तिद्वितयं द्वितयं पुनः ।
नैरन्तर्यात्तु संक्रान्तेर्ज्ञेयं विष्णुपदीद्वयम् ।।
tadantareṣu saṃkrāntidvitayaṃ dvitayaṃ punaḥ ।
nairantaryāttu saṃkrānterjñeyaṃ viṣṇupadīdvayam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तत्-अन्तरेषु = उनके (चार बिंदुओं के) अंतरालों में; संक्रान्ति-द्वितयं द्वितयं पुनः = बार-बार दो-दो संक्रान्तियाँ; नैरन्तर्यात् तु संक्रान्तेः = संक्रान्तियों की निरंतर परंपरा से; ज्ञेयं = जानना चाहिए; विष्णुपदी-द्वयम् = दो विष्णुपदी (काल/संक्रान्ति-वर्ग)।

हिन्दी भावार्थ विषुव-अयन के चार स्तंभों के बीच-बीच में संक्रान्तियाँ युग्म-युग्म होकर आती हैं। उसी संक्रान्ति-परंपरा की निरंतरता से दो “विष्णुपदी” पहचानी जाती हैं — अर्थात् चार मूल बिंदुओं के अतिरिक्त जो युग्मित संक्रान्ति-मार्ग विष्णुपदी नाम से जाने जाते हैं। श्लोक संक्रान्ति-वर्गीकरण का सूत्र देता है: स्तंभ (विषुव/अयन) और उनके अंतराल के युग्म (विष्णुपदी)।

English rendering In the intervals between those four points, saṅkrāntis occur again in successive pairs. From that continuous sequence of saṅkrāntis the two Viṣṇupadī are to be known.

गणित / The Mathematics
- ४ स्तंभ: मेष ०°, कर्कट ०°, तुला ०°, मकर ०°
- प्रत्येक ९०° चाप में बीच की संक्रान्तियाँ: स्थिर/द्विस्वभाव युग्म
- मेष→कर्कट: वृष, मिथुन
- कर्कट→तुला: सिंह, कन्या
- तुला→मकर: वृश्चिक, धनु
- मकर→मेष: कुंभ, मीन
- “द्वितयं द्वितयं” = प्रत्येक अंतराल में संक्रान्ति-युग्म
- विष्णुपदी-द्वय: शास्त्र में सामान्यतः उन्हीं अंतराल-संक्रान्तियों (विशेषतः स्थिर-राशि प्रवेश: वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ — दो अयनार्ध-मार्गों में बाँटकर “द्वय”) से जुड़ा वर्ग; इस श्लोक में केवल पहचान-नियम, अंश-सूची नहीं

उदाहरण (worked example) Input: सूर्य तुला ०° (शरद्-विषुव स्तंभ) पार कर वृश्चिक-संक्रान्ति → धनु-संक्रान्ति की ओर। यह तुला–मकर अंतराल का संक्रान्ति-द्वय है; सममित रूप से मकर–मेष में कुंभ–मीन युग्म। चार अंतराल × २ संक्रान्ति = ८ मध्य-संक्रान्तियाँ + ४ स्तंभ = १२ राशि-संक्रान्ति — पूर्ण सौर-चक्र।

14.9
भानोर्मकरसङ्क्रान्तेः षण्मासा उत्तरायणम् ।
कर्क्यादेस्तु तथैव स्यात्षण्मासा दक्षिणायनम् ।।
bhānormakarasaṅkrānteḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam ।
karkyādestu tathaiva syātṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भानोः = सूर्य की; मकर-सङ्क्रान्तेः = मकर-राशि-प्रवेश से; षट्-मासाः = छह मास; उत्तरायणम् = उत्तरायण; कर्क्यादेः = कर्क-राशि के आरम्भ से; तु तथैव = उसी प्रकार; दक्षिणायनम् = दक्षिणायन।

हिन्दी भावार्थ सूर्य जब मकर में प्रवेश करता है, उसी क्षण से गिनकर छह मास उत्तरायण कहलाते हैं — दिन धीरे-धीरे लम्बे होने का आधा वर्ष। कर्क के आरम्भ से ठीक उसी रीति से छह मास दक्षिणायन हैं। यह खगोलीय विभाजन है: सूर्य का क्रान्तिवृत्त पर उत्तरी और दक्षिणी पथ, कोई भाग्य-कथन नहीं। अयन-युग्म मिलकर एक पूर्ण सौर वर्ष का चक्र पूरा करता है।

English rendering From the Sun’s entry into Makara, six months constitute uttarāyaṇa; from the start of Karka, likewise six months are dakṣiṇāyana. The verse fixes the two solstitial halves of the solar year by saṅkrānti, not by civil calendar dates.

गणित / The Mathematics उत्तरायण = मकर-सङ्क्रान्ति → … → (6 rāśi) → कर्क-सङ्क्रान्ति से ठीक पहले तक; दक्षिणायन = कर्क-सङ्क्रान्ति → … → (6 rāśi) → मकर-सङ्क्रान्ति से ठीक पहले तक। प्रत्येक अयन = 6 × 30° = 180° सूर्य-मध्यमांश; दोनों मिलकर 360° = 1 सौर वर्ष (सौर मान)।

उदाहरण (worked example) यदि मकर-सङ्क्रान्ति किसी वर्ष 14 जनवरी (लगभग) मानी जाए, तो उत्तरायण ≈ मकर–मिथुन (6 राशि); कर्क-सङ्क्रान्ति ≈ 16 जून के आस-पास से दक्षिणायन ≈ कर्क–धनु। सटीक घड़ी saṅkrānti-काल और सूर्य की दैनिक भुक्ति पर निर्भर करती है (अगला श्लोक 14.11)।

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14.10
द्विराशिनाथ ऋतवस्ततो अपि शिशिरादयः ।
मेषादयो द्वादशैते मासास्तैरेव वत्सरः ।।
dvirāśinātha ṛtavastato api śiśirādayaḥ ।
meṣādayo dvādaśaite māsāstaireva vatsaraḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) द्वि-राशि-नाथः = दो-दो राशियों के स्वामी; ऋतवः = छह ऋतुएँ; ततः अपि = उसी क्रम से; शिशिर-आदयः = शिशिर से आरम्भ; मेष-आदयः = मेष से शुरू; द्वादश एते मासाः = ये बारह मास; तैः एव वत्सरः = उन्हीं से वर्ष बनता है।

हिन्दी भावार्थ ऋतुएँ दो-दो राशियों की स्वामिनी हैं — शिशिर से लेकर क्रम चलता है। मेष से आरम्भ कर बारह सौर मास गिने जाते हैं, और उन्हीं बारह मासों से वत्सर पूरा होता है। यहाँ अयन (14.09) के बाद सूक्ष्मतर काल-खण्ड दिए गए हैं: राशि → ऋतु (द्विराशि) → मास → वर्ष। यह सौर मान का ऋतु-मास ढाँचा है।

English rendering The seasons each govern two rāśis, beginning with śiśira; the twelve solar months, starting from Meṣa, compose the year. Thus the solar year is stratified as rāśi → ṛtu (pair of rāśis) → māsa → vatsara.

गणित / The Mathematics 1 ऋतु = 2 राशि = 60° सूर्य-पथ; 6 ऋतु = 360°। 1 सौर मास = 1 राशि = 30°; 12 सौर मास = 1 वत्सर। क्रम (पारम्परिक): शिशिर → वसन्त → ग्रीष्म → वर्षा → शरद् → हेमन्त; मास: मेष, वृष, …, मीन।

उदाहरण (worked example) मेष+वृष = वसन्त (60°); कर्क+सिंह = ग्रीष्म; मकर+कुम्भ = शिशिर — प्रत्येक जोड़ी सूर्य के 60° माध्य-पथ के बराबर। बारह मास × 30° = 360° = एक पूर्ण सौर वर्ष।

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14.11
अर्कमानकलाः षष्ट्या गुणिता भुक्तिभाजिताः ।
तदर्धनाड्यः सङ्क्रान्तेरर्वाक्पुण्यं तथा परे ।।
arkamānakalāḥ ṣaṣṭyā guṇitā bhuktibhājitāḥ ।
tadardhanāḍyaḥ saṅkrānterarvākpuṇyaṃ tathā pare ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्क-मान-कलाः = सूर्य-बिम्ब के मान (व्यास) की कलाएँ — “मान” वही जो ४.१–४.३ और ११.१४ (रवीन्दुमान) में बिम्ब का माप है; षष्ट्या गुणिताः = साठ से गुणित; भुक्ति-भाजिताः = (सूर्य की) दैनिक भुक्ति से विभाजित; तत्-अर्ध-नाड्यः = उसका आधा नाड़ी में; सङ्क्रान्तेः अर्वाक् = सङ्क्रान्ति से पहले; पुण्यम् = पुण्य-काल; तथा परे = और उतना ही बाद में।

हिन्दी भावार्थ सूर्य-बिम्ब के व्यास की कलाओं को साठ से गुणा कर सूर्य की दैनिक भुक्ति से भाग दो — परिणाम नाड़ियों में वह काल है जिसमें पूरा बिम्ब राशि-सीमा को पार करता है। उसका आधा भाग सङ्क्रान्ति से पहले पुण्य-काल माना जाता है, और उतना ही आधा बाद में। श्लोक सङ्क्रान्ति के दोनों ओर सममित काल-खिड़की देता है; गणना सूर्य की चाल (भुक्ति) पर टिकी है।

English rendering Take the minutes of the Sun's disc (its māna, as in 4.1–4.3 and 11.14), multiply by sixty, divide by the Sun’s daily motion: half the resulting nāḍīs before the saṅkrānti, and half after, are the puṇya interval. It is the time the whole disc takes to cross the sign's boundary.

गणित / The Mathematics
R (नाड़ी) = (अर्कमानकला × 60) ÷ भुक्ति
पुण्य-काल प्रत्येक ओर = R ⁄ 2 नाड़ी
जहाँ अर्कमानकला = सूर्य-बिम्ब का कोणीय व्यास (४.१–४.३): 6500 योजन × (स्फुट ÷ मध्य भुक्ति) × 4320000 ÷ 57753336 ÷ 15 = 32′ 24.8″ (मध्य); भुक्ति = सूर्य की दैनिक गति (′/दिन), मध्य 21600 × 4320000 ÷ 1577917828 = 59′ 8.2″; नाड़ी = उसी दिन का साठवाँ भाग जिसकी भुक्ति ली गई।
सङ्क्रान्ति तक शेष चाप δ′ हो तो शेष काल = (δ′ × 60) ⁄ भुक्ति नाड़ी — वही रूप, δ′ के साथ।

उदाहरण (worked example) मध्य मान: अर्कमान = 32.414′, भुक्ति = 59.136′/दिन।
R = (32.414 × 60) ⁄ 59.136 ≈ 32.89 नाड़ी।
पुण्य = R⁄2 ≈ 16.44 नाड़ी (16 नाड़ी 27 विनाड़ी) सङ्क्रान्ति से पहले, और उतना ही बाद में।
यदि सङ्क्रान्ति से 5′ पहले का क्षण चाहिए: t = (5 × 60) ⁄ 59.14 ≈ 5.07 नाड़ी ≈ 2 घड़ी 2.1 पल (1 नाड़ी = 1 घड़ी)।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक कला → नाड़ी रूपान्तरण सिखाता है — वही मेट्रोलॉजी जिस पर vedic-ghadi का घड़ी/पल/विपल ढाँचा खड़ा है: 1 दिन = 60 घड़ी = 3,600 पल = 216,000 विपल। सङ्क्रान्ति-काल “सटीक घड़ी” की माँग करता है; day-count (SS 1,577,917,828 vs Āryabhaṭa 1,577,917,500) चुनते ही माध्य सूर्य-गति और saṅkrānti-क्षण थोड़े खिसकते हैं — इसलिए canon घोषित रखना अनिवार्य है।

सुधार · correction (2026-10-07) पिछले पाठ ने “अर्कमान” को एक राशि (30°) माना था, जिससे पुण्य-काल सङ्क्रान्ति के दोनों ओर लगभग पन्द्रह-पन्द्रह दिन बनता — एक क्षण के “अर्वाक्” और “परे” के लिए असम्भव। “मान” इस ग्रन्थ में बिम्ब का माप है (४.१–४.३; ११.१४ रवीन्दुमानयोगार्ध)। बिम्ब से पुण्य-काल 16.44 नाड़ी प्रत्येक ओर, और यह हर सङ्क्रान्ति पर एक-सा है: ४.२ में बिम्ब स्फुट भुक्ति के अनुपात में बढ़ता है और यहाँ उसी भुक्ति से भाग होता है, इसलिए भुक्ति कट जाती है — अर्ध पुण्य = 6500 × 1577917828 ÷ (57753336 × 10800) = (65/108) × चन्द्र का नाक्षत्र मास (27.3217 दिन) = 16.444 नाड़ी। Correction: arkamāna is the Sun's disc, not a sign. The puṇya time is 16 nāḍī 27 vināḍī on each side of every saṅkrānti, the time the disc takes to cross the boundary; the true motion cancels between 4.2 and 14.11.

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14.12
अर्काद्विनिःसृतः प्राचीं यद्यात्यहरहः शशी ।
तच्चान्द्रमानं अंशैस्तु ज्ञेया द्वादशभिस्तिथिः ।।
arkādviniḥsṛtaḥ prācīṃ yadyātyaharahaḥ śaśī ।
taccāndramānaṃ aṃśaistu jñeyā dvādaśabhistithiḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) अर्कात् विनिःसृतः = सूर्य से निकलकर; प्राचीम् = पूर्व दिशा में; यदि आति = जो जाता है; अहर्-अहः = प्रतिदिन; शशी = चन्द्र; तत् चान्द्र-मानम् = वही चान्द्र मान; अंशैः तु द्वादशभिः = बारह अंशों से; तिथिः ज्ञेया = तिथि जानी जाती है।

हिन्दी भावार्थ चन्द्र प्रतिदिन सूर्य से निकलकर पूर्व की ओर बढ़ता है — सूर्य-चन्द्र का यही बढ़ता अन्तर चान्द्र मान है। बारह अंश के उस अन्तर से एक तिथि गिनी जाती है। स्पष्ट परिभाषा: तिथि = चापात्मक elongation ⁄ 12°, न कि मात्र “चन्द्रमा दिखना”।

English rendering Day by day the Moon, leaving the Sun, advances eastward; that elongation is the lunar measure. A tithi is known by twelve degrees of it. The lunar day is thus an angular, not a civil, unit.

गणित / The Mathematics
elongation λ = L_Moon − L_Sun (माध्यम या स्पष्ट, यथा-प्रयोग)
तिथि-सूचकांक = λ ⁄ 12°
1 तिथि = 12°; 30 तिथि = 360° = 1 चान्द्र मास (सि्नोडिक)।
तिथि की दैनिक वृद्धि ≈ (भुक्ति_चन्द्र − भुक्ति_सूर्य) ⁄ 12 (तिथि/दिन)।

उदाहरण (worked example) यदि λ = 0° → अमावस्या का आरम्भ; λ = 12° → 1 तिथि पूर्ण; λ = 180° → पूर्णिमा (15 तिथि); λ = 348° → कृष्ण 29 तिथि। मान लें λ = 47.5° तो तिथि-संख्या = 47.5 ⁄ 12 = 3.958 → शुक्ल चतुर्थी चल रही है (0.958 भाग शेष)।

हमारा डिकोड (Our Decode) तिथि-इंजन का मूल यही 12° नियम है। Mahāyuga में सि्नोडिक गणना (प्राचीन elongation-गणना 57,753,336 − 4,320,000 = 53,433,336 rev) पर SS-canon day-count 1,577,917,828 लगभग −0.1 rev residual देता है, जबकि Āryabhaṭa 1,577,917,500 पर −11.2 rev — canon choice तिथि-इंजन को सबसे अधिक छूती है (NEXT-STEPS A)। हमने दोनों दिन-गणनाएँ अलग रखीं; “मिश्र” से सि्नोडिक ज्यामिति बिगड़ती है।

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14.13
तिथिः करणं उद्वाहः क्षौरं सर्वक्रियास्तथा ।
व्रतोपवासयात्राणां क्रिया चान्द्रेण गृह्यते ।।
tithiḥ karaṇaṃ udvāhaḥ kṣauraṃ sarvakriyāstathā ।
vratopavāsayātrāṇāṃ kriyā cāndreṇa gṛhyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) तिथिः = तिथि; करणम् = करण; उद्वाहः = विवाह; क्षौरम् = मुण्डन/क्षौर; सर्व-क्रियाः = सब क्रियाएँ; तथा = और; व्रत-उपवास-यात्राणाम् क्रिया = व्रत, उपवास, यात्रा की क्रिया; चान्द्रेण गृह्यते = चान्द्र मान से ली जाती है।

हिन्दी भावार्थ तिथि, करण, विवाह, क्षौर और अन्य सब क्रियाएँ — तथा व्रत, उपवास और यात्रा — चान्द्र मान से गृहीत होती हैं। श्लोक काल-मान का व्यावहारिक क्षेत्र बाँटता है: जो कर्म तिथि-करण से बँधे हैं, वे चान्द्र घड़ी पर चलते हैं, न कि केवल सौर सङ्क्रान्ति पर। यह विधान का संकेत है, फलित भय नहीं।

English rendering Tithi, karaṇa, marriage, tonsure, and rites in general — also vows, fasts, and journeys — are taken by the lunar measure. The verse assigns a class of observances to the cāndra clock defined in 14.12.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — विधान/काल-मान-विन्यास। करण = आधी तिथि = 6° elongation; क्रिया-चयन चान्द्र इकाइयों (तिथि–करण) पर आधारित है, जबकि सौर सङ्क्रान्ति/अयन अलग धारा (14.09–14.11) रखते हैं।

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दृष्टान्त (Illustrative Example) किसी अक्टूबर की संध्या को सूर्य अभी “शुक्ल पक्ष” की गणना में है, पर चन्द्रमा का कोणीय अंतर tithi बदल चुका होता है — karana भी उसी क्षण पलट जाता है। विवाह-पत्रिका या व्रत-सूची में तारीख नहीं, तिथि लिखी जाती है, क्योंकि कर्म-काल चन्द्र-सूर्य के elongation से बँधा है, केवल solar longitude से नहीं। क्षौर, उपवास, यात्रा — सब उसी lunar clock पर टिकते हैं; सौर सङ्क्रान्ति पर्व-सीमा बाँधती है, पर इन क्रियाओं की घड़ी चान्द्र है। यह विभाजन अध्याय २ के तिथि-करण गणित में संख्या बनकर लौटता है, जहाँ चन्द्र-सूर्य अंतर को ३० तिथियों में बाँटा जाता है।

14.14
त्रिंशता तिथिभिर्मासश्चान्द्रः पित्र्यं अहः स्मृतम् ।
निशा च मासपक्षान्तौ तयोर्मध्ये विभागतः ।।
triṃśatā tithibhirmāsaścāndraḥ pitryaṃ ahaḥ smṛtam ।
niśā ca māsapakṣāntau tayormadhye vibhāgataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) त्रिंशता तिथिभिः = तीस तिथियों से; मासः चान्द्रः = चान्द्र मास; पित्र्यम् अहः स्मृतम् = पितरों का दिन कहा गया; निशा च = और रात्रि; मास-पक्ष-अन्तौ = मास के दोनों पक्षों के अन्त पर; तयोः मध्ये विभागतः = उनके मध्य में विभाजन से (दिन)।

हिन्दी भावार्थ तीस तिथियों का समूह एक चान्द्र मास है — वही पितरों का एक दिन माना गया है। पक्षों के अन्त (मास-पक्षान्त) पर निशा कही गई, और दोनों के मध्य का भाग विभाजन से दिन। चान्द्र मास को पितृ-दिनरात्रि से जोड़कर श्लोक सि्नोडिक मास की पूर्णता (30 तिथि) को लौकिक-पारलौकिक मानचित्र पर रखता है।

English rendering Thirty tithis make a lunar month, remembered as a day of the Pitṛs; night is at the ends of the month’s fortnights, and day is the middle portion by that division. The complete synodic month is thus one pitṛ-ahorātra in this scheme.

गणित / The Mathematics
1 चान्द्र मास = 30 तिथि = 360° elongation
1 पितृ-अहोरात्र = 1 चान्द्र मास
पक्ष = 15 तिथि = 180°; पक्षान्त = अमावस्या/पूर्णिमा के सन्धि-बिन्दु।
(माध्य सि्नोडिक मास ≈ 29.53 सौर दिन; तिथि-मास = 30 तिथि-इकाई, सौर-दिनों से भिन्न।)

उदाहरण (worked example) अमावस्या (λ = 0°) से अगली अमावस्या (λ = 360°) = 30 तिथि = 1 चान्द्र मास = 1 पितृ-दिन। शुक्ल 1 → पूर्णिमा = 15 तिथि (एक पक्ष); कृष्ण 1 → अमावस्या = दूसरा पक्ष। पक्षान्त-सन्धियाँ = निशा-स्थान (श्लोकोक्त विभाजन)।

हमारा डिकोड (Our Decode) “30 तिथि = चान्द्र मास” तिथि-इंजन की समापन-शर्त है। SS vs Āryabhaṭa day-count का 328-दिन का अन्तर सि्नोडिक residual में सीधे दिखता है; इसलिए panchāṅga substrate (vedic-ghadi) में day-count चुनना “छोटा विकल्प” नहीं — पूरा तिथि-मास ढाँचा उसी से बँधता है।

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14.15
भचक्रभ्रमणं नित्यम् नाक्षत्रं दिनं उच्यते ।
नक्षत्रनाम्ना मासास्तु ज्ञेयाः पर्वान्तयोगतः ।।
bhacakrabhramaṇaṃ nityam nākṣatraṃ dinaṃ ucyate ।
nakṣatranāmnā māsāstu jñeyāḥ parvāntayogataḥ ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) भ-चक्र-भ्रमणम् = नक्षत्र-चक्र का भ्रमण; नित्यम् = निरन्तर/प्रतिदिन; नाक्षत्रं दिनम् = नाक्षत्र दिन; उच्यते = कहा जाता है; नक्षत्र-नाम्ना मासाः = नक्षत्र-नाम वाले मास; पर्व-अन्त-योगतः = पर्वान्त (पक्षान्त) के योग से; ज्ञेयाः = जाने जाएँ।

हिन्दी भावार्थ नक्षत्र-चक्र का निरन्तर एक पूरा भ्रमण नाक्षत्र दिन कहलाता है — तारों के सापेक्ष एक पूर्ण आवर्तन। चान्द्र मासों के नाम नक्षत्रों पर रखे जाते हैं, और वे पर्वान्त (पक्ष की समाप्ति) पर चन्द्र के योग से जाने जाते हैं। एक ओर sidereal day की परिभाषा; दूसरी ओर मास-नामकरण की योग-विधि — अगला श्लोक उसे खोलता है।

English rendering The continuous revolution of the star-wheel is called the sidereal (nākṣatra) day. Months named after nakṣatras are known from the yoga at the end of the parvan. Sidereal time-of-day and lunar month-names share the same stellar reference, used differently.

गणित / The Mathematics
1 नाक्षत्र दिन = 1 पूर्ण भचक्र = 360° = 21,600′ (तारामण्डल के सापेक्ष)
नाक्षत्र दिन ≠ सौर दिन (सौर दिन = सूर्योदय से सूर्योदय; नाक्षत्र ≈ 1 sidereal rotation)।
मास-नाम: पर्वान्त (विशेषतः पूर्णिमा-योग) पर चन्द्र जिस नक्षत्र-युग्म में हो → मास का नाम (विस्तार 14.16)।

उदाहरण (worked example) भचक्र = 27 नक्षत्र × (360°⁄27) = 27 × 13°20′ = 360°। एक नाक्षत्र दिन में तारे एक बार पूर्व–पश्चिम पूरा चक्र करते दिखते हैं। मास-नाम उदाहरण: पूर्णिमा पर चन्द्र कृत्तिका-योग में → कार्तिक (अगला श्लोक)।

हमारा डिकोड (Our Decode) 21,600′/वृत्त ↔ 21,600 प्राण/दिन का गिनती-संगत (count correspondence) है, भौतिक समता नहीं — MATHEMATICAL-AUDIT §1। lagna/bhāva परत में RA(MC) ≡ LST की 1e-9° जाँच उसी sidereal घड़ी पर टिकी है; “नक्षत्र-दिन” यहाँ पंचांग-नाम और तारकीय समय दोनों का साझा आधार है।

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14.16
कार्तिक्यादिषु संयोगे कृत्तिकादि द्वयं द्वयम् ।
अन्त्योपान्त्यौ पञ्चमश्च त्रिधा मासत्रयं स्मृतम् ।।
kārtikyādiṣu saṃyoge kṛttikādi dvayaṃ dvayam ।
antyopāntyau pañcamaśca tridhā māsatrayaṃ smṛtam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) कार्तिक्यादिषु संयोगे = कार्तिकी आदि (पूर्णिमा) संयोगों में; कृत्तिका-आदि द्वयम् द्वयम् = कृत्तिका से दो-दो नक्षत्र; अन्त्य-उपान्त्यौ = अन्तिम और उपान्तिम; पञ्चमः च = और पाँचवाँ; त्रिधा = तीन प्रकार से; मास-त्रयम् स्मृतम् = तीन मास याद किए गए।

हिन्दी भावार्थ कार्तिकी से आरम्भ कर पूर्णिमा-संयोगों में नक्षत्र कृत्तिका से जोड़े-जोड़े लिए जाते हैं — उसी से मास का नाम। अन्त (रेवती), उपान्त (उत्तरभाद्रपदा) और पाँचवें का विशेष त्रिविध विधान तीन मासों के लिए स्मृत है। यह पर्वान्त-योग (14.15) का नामकरण-सारणी है: अधिकांश मास द्वन्द्व-नक्षत्र से, तीन मास त्रिविध नियम से।

English rendering At the conjunctions beginning with Kārttikī, take the nakṣatras in pairs starting from Kṛttikā. The last, the penultimate, and the fifth are remembered threefold for three months. Month-names follow the full-moon (parvan) yoga, with a special triple rule for three of the twelve.

गणित / The Mathematics
मास-नाम ← पूर्णिमा (या उक्त पर्व) पर चन्द्र का नक्षत्र-योग।
सामान्य नियम: नक्षत्र युग्म (द्वयं द्वयम्) कृत्तिका से —
कृत्तिका–रोहिणी → कार्तिक; मृगशिरा–आर्द्रा → मार्गशीर्ष; … क्रमशः।
विशेष: अन्त्य (रेवती), उपान्त्य (उ.भाद्रपदा), पञ्चम — त्रिधा → तीन मासों का स्मृत विधान (पाठ/टीका-परम्परा में युग्म-सूची के अपवाद)।
12 चान्द्र मास-नाम ↔ 27 नक्षत्रों का आवर्ती मानचित्र; योग = चन्द्र-स्थान ∩ नक्षत्र-सीमा।

उदाहरण (worked example) पूर्णिमा पर चन्द्र कृत्तिका में → मास = कार्तिक; मृगशिरा में → मार्गशीर्ष; पुष्य में → पौष। यदि योग रेवती/उ.भाद्र/निर्दिष्ट पञ्चम पर पड़े तो श्लोक का त्रिधा नियम उन तीन मासों पर लागू (पारम्परिक नाम-सारणी के अनुसार) — द्वन्द्व-सूची का अपवाद, मनमाना नहीं।

हमारा डिकोड (Our Decode) नामकरण-योग तिथि/पर्वान्त-इंजन की आउटपुट परत है: पहले 12° तिथि और 30-तिथि मास (14.12–14.14), फिर पर्वान्त पर नक्षत्र-योग → मास-नाम। day-count या bīja से मास-नाम नहीं बदलता; बदलता है पर्वान्त का क्षण — और वही panchāṅga substrate में “कौन-सा कार्तिक” तय करता है। Oracle-अनुशासन: नाम तभी सही जब elongation और नक्षत्र-सीमा दोनों pinned fixtures पर `==` हों, ± बैंड से नहीं।

14.17
वैशाखादिषु कृष्णे च योगः पञ्चदशे तिथौ ।
कार्त्तिकादीनि वर्षाणि गुरोरस्तोदयात्तथा ।।
vaiśākhādiṣu kṛṣṇe ca yogaḥ pañcadaśe tithau ।
kārttikādīni varṣāṇi gurorastodayāttathā ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) वैशाखादिषु = वैशाख आदि मासों में; कृष्णे = कृष्ण-पक्ष में; योगः = संयोग / योग-विचार; पञ्चदशे तिथौ = पन्द्रहवीं तिथि (अमावास्या) पर; कार्त्तिकादीनि वर्षाणि = कार्त्तिक से आरम्भ होने वाले वर्ष; गुरोः = बृहस्पति के; अस्तोदयात् = अस्त और उदय से; तथा = उसी प्रकार / तदनुसार।

हिन्दी भावार्थ वैशाख आदि मासों के कृष्ण-पक्ष में, विशेषतः पञ्चदशी (अमावास्या) पर, योग का निश्चय किया जाता है। वर्ष-नामों की शृंखला कार्त्तिक से आरम्भ होती है, और उनका निर्धारण बृहस्पति के अस्त तथा उदय से होता है। यह पंक्ति ज्योतिष-काल-विभाग में बृहस्पति-वर्ष (गुरु-वर्ष) और अमावास्या-योग की परम्परा को एक सूत्र में बाँधती है।

English rendering In the dark fortnights of the months beginning with Vaiśākha, the yoga is taken on the fifteenth tithi; and years beginning with Kārttika are reckoned from the setting and rising of Jupiter.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — काल-निर्धारण / गुरु-वर्ष-नामकरण। अस्त–उदय यहाँ हेलियाकल (सूर्योन्मुख) अदृश्यता और पुनः दृष्टि का व्यावहारिक संकेत है; संख्यात्मक भगण या दिवस-गणना इस श्लोक में नहीं दी गई।

दृष्टान्त (Illustrative Example) वैशाख की अमावस्या की रात — आकाश में चन्द्र अदृश्य, सूर्य से लगभग एक दिशा में — उसी क्षण yoga का निश्चय पारंपरिक पंचांग-विधि में होता है; यह केवल “नाम” नहीं, पक्ष-अंत का अवलोकनीय मोड़ है। वर्ष-नामों की शृंखला कार्त्तिक से खुलती है, और उनका निर्धारण बृहस्पति के heliacal rising/setting (अस्त-उदय) से जुड़ा है — वही Bārhaspatya saṃvatsara जो बाद की ज्योतिष-परंपरा में साठ-वर्ष चक्र के रूप में प्रचलित रहा। आकाश में बृहस्पति लगभग हर ३९९ दिनों में सूर्य से फिर “नया” दिखाई देता है; वही लौकिक संकेत गुरु-वर्ष की घड़ी को सौर-वर्ष से अलग रखता है। यह पंक्ति अध्याय १ की बृहस्पति-मध्यमा गति को “वर्ष-नाम” की सामाजिक-कालिक भाषा में जोड़ती है।

14.18
उदयादुदयं भानोः सावनं तत्प्रकीर्तितम् ।
सावनानि स्युर्एतेन यज्ञकालविधिस्तु तैः ।।
udayādudayaṃ bhānoḥ sāvanaṃ tatprakīrtitam ।
sāvanāni syuretena yajñakālavidhistu taiḥ ।।
पाठ-भेद: डेतन

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) उदयादुदयम् = (एक) उदय से (अगले) उदय तक; भानोः = सूर्य का; सावनम् = सावन-दिन (नागरिक/सौर-उदय दिन); तत् = वही; प्रकीर्तितम् = कहा गया; सावनानि = सावन-माप की इकाइयाँ; स्युः = होती हैं; एतेन = इसी से (*पाठ-भेद: एतेन / डेतन — अर्थ-प्रवाह “इस मापदंड से” ही रहता है); यज्ञकालविधिः = यज्ञ-काल की व्यवस्था; तैः = उन्हीं (सावन इकाइयों) से।

हिन्दी भावार्थ सूर्य के एक उदय से अगले उदय तक का अन्तराल सावन-दिन कहलाता है। उसी मापदंड से सावन-संज्ञक काल-इकाइयाँ बनती हैं, और यज्ञादि कर्मों का काल-विधान भी उन्हीं से निर्धारित होता है। यह श्लोक नागरिक दिन को खगोलीय माप से जोड़कर कर्मकांड और खगोल दोनों की घड़ी एक कर देता है।

English rendering From one sunrise of the Sun to the next is declared the sāvana (civil) day. By that standard the sāvana measures are formed, and the timing of sacrificial rites is fixed by them.

गणित / The Mathematics सावन-दिन की परिभाषा:
1 sāvana-dina = Udaya(Sūrya)<sub>n+1</sub> − Udaya(Sūrya)ₙ
(सूर्योदय से सूर्योदय)। महायुग (4,320,000 वर्ष) में सावन-दिनों की दो प्रमुख परम्पराएँ:
- सूर्यसिद्धान्त-canon: 1,577,917,828 दिन
- आर्यभट-canon: 1,577,917,500 दिन
अन्तर = 328 दिन — वास्तविक, परिणामकारी canon-विकल्प।

उदाहरण (worked example) convention: Sūrya-Siddhānta civil-day count। 1 वर्ष (मध्यमान) ≈ 1,577,917,828 ÷ 4,320,000 ≈ 365.25875648 sāvana-दिन। एक सावन-दिन = 60 घटी = 3,600 पल = 216,000 विपल = 21,600 प्राण (मेट्रोलॉजी-पिन)।

हमारा डिकोड (Our Decode) math-core.js सावन-दिन गणना में SS-canon 1,577,917,828 का उपयोग करता है; vedic-ghadi Āryabhaṭa 1,577,917,500। synodic-test में प्राचीन दीर्घता-गणना 57,753,336 − 4,320,000 = 53,433,336 revs/Mahāyuga से SS-canon का घाटा केवल ≈ −0.1 rev (−0.0047 s/synodic-month) है, जबकि Āryabhaṭa ≈ −11.2 rev — canon-विकल्प तिथि-इंजन को सबसे अधिक छूता है।

14.19
सूतकादिपरिच्छेदो दिनमासाब्दपास्तथा ।
मध्यमा ग्रहभुक्तिस्तु सावनेनैव गृह्यते ।।
sūtakādiparicchedo dinamāsābdapāstathā ।
madhyamā grahabhuktistu sāvanenaiva gṛhyate ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सूतकादिपरिच्छेदः = सूतक आदि (अशौच) की अवधि-सीमा; दिनमासाब्दपाः = दिन-स्वामी, मास-स्वामी, वर्ष-स्वामी; तथा = तथा; मध्यमा = मध्यम (औसत); ग्रहभुक्तिः = ग्रह की (मध्य) भुक्ति / दैनिक गति; तु = ही / तो; सावनेन = सावन (दिन) से; एव = ही; गृह्यते = ली जाती है।

हिन्दी भावार्थ सूतक आदि परिच्छेद, तथा दिन–मास–वर्ष के अधिपति — ये सब सावन-माप पर टिके हैं। ग्रहों की मध्यमा भुक्ति भी सावन-दिन से ही ली जाती है। अर्थात् मध्यम-देशान्तर का इंजन “सौर-उदय दिन” की घड़ी पर चलता है, न कि केवल नक्षत्र-दिन पर।

English rendering The delimitation of impurity periods (sūtaka and the like), and the lords of day, month, and year, are likewise so fixed. The mean daily motion of the planets is taken by the sāvana day alone.

गणित / The Mathematics मध्यम भुक्ति (mean daily motion):
n̄ = (bhagaṇa × 360°) / N_sāvana
जहाँ N_sāvana = महायुग के सावन-दिन (SS: 1,577,917,828)। mean longitude at day D (from epoch):
L̄ = L₀ + n̄ × D (mod 360°)

उदाहरण (worked example) convention: SS-canon N = 1,577,917,828; सूर्य-भगण/महायुग = 4,320,000। सूर्य की मध्यम दैनिक गति n̄_☉ = (4,320,000 × 360°) / 1,577,917,828 ≈ 0.985602268°/दिन ≈ 59′8.33″/दिन। 100 सावन-दिनों में मध्यम सूर्य ≈ 98.5602268°।

हमारा डिकोड (Our Decode) bharat-ephemeris-offline / math-core.js precisely इसी सावन-आधारित integer-bhagaṇa mean-longitude उपकरण पर टिका है। kaal-verification-oracle मध्यम राशियों को tolerance-band के बिना `==` fixtures पर pin करता है — क्योंकि ±बैंड कभी वास्तविक −1 त्रुटि छिपा चुका है।

14.20
सुरासुराणां अन्योन्यं अहोरात्रं विपर्ययात् ।
यत्प्रोक्तं तद्भवेद्दिव्यं भानोर्भगणपूरणात् ।।
surāsurāṇāṃ anyonyaṃ ahorātraṃ viparyayāt ।
yatproktaṃ tadbhaveddivyaṃ bhānorbhagaṇapūraṇāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सुरासुराणाम् = देवों और असुरों का; अन्योन्यम् = परस्पर; अहोरात्रम् = अहोरात्र (दिन-रात); विपर्ययात् = उलटा होने से; यत् प्रोक्तम् = जो कहा गया; तत् = वही; भवेत् = होता है; दिव्यम् = दिव्य (दिव्य-दिन / दिव्य-वर्ष का आधार); भानोः = सूर्य का; भगणपूरणात् = (एक) भगण पूर्ण होने से।

हिन्दी भावार्थ देवों और असुरों का अहोरात्र परस्पर विपर्यस्त कहा गया है — वही, सूर्य के एक भगण (कक्षा-परिक्रमण) की पूर्ति से, दिव्य काल-माप बन जाता है। सरल भाषा में: एक सौर-वर्ष = एक दिव्य-दिन। यह श्लोक मानवीय वर्ष को दिव्य काल-सीढ़ी की पहली सीढ़ी बनाता है।

English rendering What was said of the day and night of the gods and asuras being mutually reversed becomes the divine measure through the completion of one revolution of the Sun.

गणित / The Mathematics 1 divya-dina (दिव्य-दिन) = 1 solar year = 1 bhagaṇa of the Sun。
1 divya-varṣa = 360 divya-dina = 360 solar years।
Mahāyuga = 4,320,000 human years = 12,000 divya years (classical stacking: 360 × 12,000 = 4,320,000)।

उदाहरण (worked example) 1 दिव्य-वर्ष = 360 × (SS mean solar year) ≈ 360 × 365.25875648 ≈ 131,493.15 सावन-दिन। 12,000 दिव्य-वर्ष = 4,320,000 मानव-वर्ष = 1,577,917,828 सावन-दिन (SS-canon)।

हमारा डिकोड (Our Decode) दिव्य-दिन की यह परिभाषा महायुग-दिन-गणना की जड़ है जिस पर math-core का mean-longitude lab और bīja-rate प्रयोग (revs/Mahāyuga) खड़े हैं — सभी “प्रति महायुग भगण” इकाई इसी सौर-भगण-सीढ़ी पर मापे जाते हैं।

14.21
मन्वन्तरव्यवस्था च प्राजापत्यं उदाहृतम् ।
न तत्र द्युनिशोर्भेदो ब्राह्मं कल्पः प्रकीर्तितम् ।।
manvantaravyavasthā ca prājāpatyaṃ udāhṛtam ।
na tatra dyuniśorbhedo brāhmaṃ kalpaḥ prakīrtitam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मन्वन्तरव्यवस्था = मन्वन्तर की व्यवस्था; च = और; प्राजापत्यम् = प्राजापत्य (प्रजापति-सम्बन्धी काल); उदाहृतम् = कहा / उदाहरणित; न तत्र = वहाँ नहीं; द्युनिशोः = दिन और रात्रि का; भेदः = भेद; ब्राह्मम् = ब्रह्मा का; कल्पः = कल्प; प्रकीर्तितम् = कहा गया।

हिन्दी भावार्थ मन्वन्तरों की व्यवस्था प्राजापत्य काल के रूप में कही गई है। उस स्तर पर दिन–रात का भेद नहीं रहता; वही ब्राह्म-कल्प के रूप में प्रख्यात है। यहाँ काल-सीढ़ी मानवीय/दिव्य अहोरात्र से ऊपर उठकर उस क्षितिज पर पहुँचती है जहाँ “द्यु” और “निशा” का द्वैत लागू नहीं होता।

English rendering The arrangement of manvantaras is set forth as the prājāpatya measure. There is no distinction of day and night at that level; the Brāhma kalpa is so proclaimed.

गणित / The Mathematics शास्त्रीय सोपान (पूर्व-अध्यायों से जुड़े मानक SS-अनुपात; इस श्लोक में संख्याएँ नहीं दीं):
1 manvantara = 71 mahāyuga (+ sandhi layers in full reckoning);
1 kalpa (Brāhma-day) = 14 manvantara + sandhis = 1,000 mahāyuga = 4,320,000,000 human years।
यहाँ सूत्र-संख्या श्लोक में नहीं — केवल “द्यु-निशा-अभेद” का स्तर-निर्देश।

14.22
एतत्ते परमाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम् ।
ब्रह्मैतत्परमं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।।
etatte paramākhyātaṃ rahasyaṃ paramādbhutam ।
brahmaitatparamaṃ puṇyaṃ sarvapāpapraṇāśanam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) एतत् = यह; ते = तुम्हें (मय को); परम = परम / पूर्ण रूप से; आख्यातम् = कहा गया; रहस्यम् = रहस्य; परमाद्भुतम् = परम अद्भुत; ब्रह्म = ब्रह्म; एतत् = यही; परमं पुण्यम् = परम पुण्य; सर्वपापप्रणाशनम् = सब पापों का नाश करने वाला।

हिन्दी भावार्थ हे मय! यह परम अद्भुत रहस्य तुम्हें पूर्ण रूप से कह दिया गया। यही परम ब्रह्म है, परम पुण्य है, और सब पापों का नाशक है। अध्याय-समाप्ति के पूर्व यह फल-श्रुति ज्ञान को केवल गणना नहीं, साधना-पथ भी घोषित करती है।

English rendering This supreme, most wonderful secret has been fully told to you. It is the highest Brahman, the supreme merit, the destroyer of all sins.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — स्तुति / फल-श्रुति। ज्ञान को “रहस्य” और “पुण्य” कहना पाठ की समापन-भाषा है; कोई स्थिरांक या एल्गोरिद्म यहाँ कूटबद्ध नहीं।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कल्पना कीजिए कि गणना-पट्टी पर ग्रह-स्थान निकल आए, पर मन में अभी भी “आकाश अज्ञात” का अंधेरा हो — फल-श्रुति उसी अंतर को पाटती है: विद्या केवल ephemeris नहीं, दृष्टि का परिवर्तन भी है। “पाप-प्रणाशन” यहाँ नैतिक भय नहीं; वह अज्ञान-कलंक का रूपक है जिसे सटीक काल-ज्ञान धोता है — जैसे अशुद्ध घड़ी ठीक होते ही सारा दिन-क्रम सही पड़ जाता है। अध्याय के अंत में यह वाक्य पाठक को याद दिलाता है कि पूर्व के मन्द-शीघ्र सूत्र (अध्याय २) और मान-परिभाषाएँ (यही अध्याय १४) एक ही साधना-शरीर के अंग हैं। रहस्य “अद्भुत” इसलिए है कि वह आकाश को मापने योग्य बनाता है, रहस्यमय नहीं छोड़ता।

14.23
दिव्यं चार्क्षं ग्रहाणां च दर्शितं ज्ञानं उत्तमम् ।
विज्ञायार्कादिलोकेषु स्थानं प्राप्नोति शास्वतम् ।।
divyaṃ cārkṣaṃ grahāṇāṃ ca darśitaṃ jñānaṃ uttamam ।
vijñāyārkādilokeṣu sthānaṃ prāpnoti śāsvatam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) दिव्यम् = दिव्य (काल/ज्ञान); च = और; आर्क्षम् = आर्क्ष / नक्षत्र-सम्बन्धी; ग्रहाणाम् = ग्रहों का; च = और; दर्शितम् = दिखाया गया; ज्ञानम् उत्तमम् = उत्तम ज्ञान; विज्ञाय = जानकर; अर्कादिलोकेषु = सूर्य आदि लोकों में; स्थानम् = स्थान; प्राप्नोति = प्राप्त करता है; शाश्वतम् = शाश्वत।

हिन्दी भावार्थ दिव्य काल, नक्षत्र-ज्ञान और ग्रह-ज्ञान — यह उत्तम विद्या प्रदर्शित की गई। इसे जानकर साधक सूर्य आदि लोकों में शाश्वत स्थान पाता है। तीनों परतें — दिव्य, आर्क्ष, ग्रहीय — एक ही शास्त्र-शरीर के अंग हैं।

English rendering The divine, the stellar, and the planetary — this highest knowledge has been shown. Knowing it, one attains an everlasting place in the worlds of the Sun and the rest.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक भूमिका / ज्ञान-फल। “दिव्य–आर्क्ष–ग्रह” त्रयी ठीक वही स्तरीकरण है जिस पर सावन/दिव्य दिन, नक्षत्र-भोग और ग्रह-मध्यम/स्फुट अलग-अलग मॉड्यूल बनते हैं — किन्तु यह श्लोक स्वयं संख्या नहीं देता।

दृष्टान्त (Illustrative Example) तीन परतों को एक रात में जोड़कर देखिए: divya — युग-कल्प की दीर्घ घड़ी; ārkṣa — अश्विनी से रेवती तक चन्द्र का नक्षत्र-पथ; graha — बुध से शनि तक की दृश्य गति। कोई एक परत पूरी विद्या नहीं बनती — जैसे नक्शा बिना पैमाने, पैमाना बिना दिशा, दिशा बिना गंतव्य अधूरा। जो इन्हें एक साथ जानता है, शास्त्र “सूर्य आदि लोकों में स्थान” कहता है — प्रतीक यह कि साधक की समझ सौर-मण्डल की संरचना से मेल खाती है, कल्पना से नहीं। यही त्रयी अध्याय १ (मध्यमा), अध्याय २ (स्फुटा), और अध्याय ८ (नक्षत्र-चक्र) में क्रमशः गणित बनकर फैलती है।

14.24
इत्युक्त्वा मयं आमन्त्र्य सम्यक्तेनाभिपूजितः ।
दिवं आचक्रमे अर्कांशः प्रविवेश स्वमण्डलम् ।।
ityuktvā mayaṃ āmantrya samyaktenābhipūjitaḥ ।
divaṃ ācakrame arkāṃśaḥ praviveśa svamaṇḍalam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) इति उक्त्वा = ऐसा कहकर; मयम् = मय को; आमन्त्र्य = विदा लेकर / सम्बोधित कर; सम्यक् = सम्यक् रूप से; तेन = उसके (मय) द्वारा; अभिपूजितः = पूजित; दिवम् = स्वर्ग / द्युलोक को; आचक्रमे = चढ़ा / प्रस्थित हुआ; अर्कांशः = अर्कांश (सूर्य का अंश / सौर-दूत) (+पाठ-चिह्न उपकरण-पाठ); प्रविवेश = प्रवेश किया; स्वमण्डलम् = अपने मण्डल में।

हिन्दी भावार्थ इतना कहकर, मय से विदा लेकर, और मय द्वारा सम्यक् पूजित होकर, अर्कांश द्युलोक की ओर बढ़ा और अपने मण्डल में प्रवेश कर गया। कथा-वृत्त यहीं बन्द होता है — उपदेशक आकाश-मण्डल में लौटता है, शिष्य पृथ्वी पर शास्त्र लेकर रहता है।

English rendering Having spoken thus, taken leave of Maya, and been duly worshipped by him, the solar emissary (arkāṃśa) ascended to heaven and entered his own orb.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद / कथा-समापन। ग्रन्थ का नाटकीय अवतरण (मय ← अर्कांश) यहाँ पूर्ण होता है; गणना-इंजन पाठ में पीछे छूट चुके हैं, यह श्लोक केवल प्रस्थान का दृश्य है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) कथा-दृश्य स्पष्ट है — उपदेश पूरा, पूजा हुई, Arkāṃśa (सूर्यांश) अपने maṇḍala की ओर लौटता है; मय पृथ्वी पर शास्त्र लेकर ठहरता है। यह केवल अंत-वाक्य नहीं: ज्ञान का स्रोत आकाश-मण्डल में “रहता” है, पर पाठ पृथ्वी पर रुकता है — जैसे प्रकाश सूर्य से आता है, छाया धरती पर मापी जाती है। पाठक के लिए संकेत यह है कि आगे का पूरा Sūrya-Siddhānta उस संवाद का लिखित अवशेष है, न कि कोई नई कथा। कथा-वृत्त यहीं बंद; गणना-वृत्त अध्याय १ से फिर खुलता है, जहाँ वही सूर्य अब केवल पात्र नहीं, ephemeris का केंद्र है।

14.25
मयो अथ दिव्यं तज्ञानं ज्ञात्वा साक्षाद्विवस्वतः ।
कृतकृत्यं इवात्मानं मेने निर्धूतकल्मषम् ।।
mayo atha divyaṃ tajñānaṃ jñātvā sākṣādvivasvataḥ ।
kṛtakṛtyaṃ ivātmānaṃ mene nirdhūtakalmaṣam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) मयः = मय (सूर्य से ज्ञान पाने वाला); अथ = तब; दिव्यम् = अलौकिक/दैवी; तत्-ज्ञानम् = वही ज्ञान; ज्ञात्वा = जानकर/प्राप्त कर; साक्षात् = प्रत्यक्ष रूप से; विवस्वतः = विवस्वान् (सूर्य) से; कृतकृत्यम् = कृतार्थ, जिसने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया; आत्मानम् = अपने को; मेने = समझा; निर्धूत-कल्मषम् = जिसके सब कल्मष धुल गए हों।

हिन्दी भावार्थ तब मय ने वह दिव्य ज्ञान साक्षात् सूर्य (विवस्वान्) से प्राप्त किया। ज्ञान मिलते ही वह स्वयं को कृतकृत्य अनुभव करने लगा — जैसे जीवन का परम कार्य पूरा हो गया हो। उसके भीतर का कल्मष धुल चुका था; जानने वाले का मन अब निर्मल था। यह केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि साक्षात्कार और शुद्धता का एक साथ घटित होना है।

English rendering Then Maya, having received that divine knowledge directly from Vivasvat (the Sun), regarded himself as one who had fulfilled his purpose — purified of impurity. The verse closes the reception of the teaching as both illumination and inner cleansing.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/स्तुति-पूर्ण ज्ञान-प्राप्ति का वर्णन। यह अध्याय का आख्यानिक मोड़ है: ग्रंथ का विज्ञान अब “सुनने” से “प्राप्त करने” में बदल चुका है; संख्याएँ पीछे, पात्रता और प्रत्यक्षता आगे आती हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) यह श्लोक उस क्षण को चिह्नित करता है जब शास्त्र “पाठ” से “प्राप्त ज्ञान” बनता है — ठीक वैसी ही भूमिका हमारे decode ecosystem की है: `kaal_surya_siddhanta_sphuta.py` और `math-core.js` सूर्यसिद्धान्त को केवल उद्धृत नहीं करते, बल्कि Chapter-2 sphuṭa व mean-longitude नियमों को runnable engines में उतारते हैं। साक्षात् विवस्वतः का आधुनिक प्रतिरूप verification है — oracle-fixture पर `==`, न कि विश्वास पर निर्भरता।

दृष्टान्त (Illustrative Example) किसी कठिन समस्या का हल अचानक हाथ लगने पर मन “हो गया” कहता है — मय का kṛtakṛtya भाव उसी अनुभव का शास्त्रीय रूप है, पर विषय व्यक्तिगत सफलता नहीं, दिव्य काल-ज्ञान है। “कल्मष धुलना” यहाँ नैतिक नाटक नहीं; वह भ्रम का हट जाना है — जैसे गलत epoch सुधारते ही सारी ग्रह-तालिकाएँ एक साथ सीधी हो जाएँ। साक्षात् Vivasvān से प्राप्त ज्ञान सूचना-सूची नहीं, दृष्टि-शुद्धि है: जानने वाला और जाना हुआ एक क्षण में मेल खाते हैं। इसी शुद्धता से अगला श्लोक संभव होता है — ज्ञान अब बाँटने योग्य हो चुका है, केवल अपने पास रखने योग्य नहीं।

14.26
ज्ञात्वा तं ऋषयश्चाथ सूर्यलब्धवरं मयम् ।
परिबब्रुरुपेत्याथो ज्ञानं पप्रच्छुरादरात् ।।
jñātvā taṃ ṛṣayaścātha sūryalabdhavaraṃ mayam ।
paribabrurupetyātho jñānaṃ papracchurādarāt ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) ज्ञात्वा = जानकर; तम् = उसे (मय को); ऋषयः = ऋषिगण; अथ = तब; सूर्य-लब्ध-वरम् = सूर्य से वर/ज्ञान प्राप्त; मयम् = मय; परिबब्रुः = चारों ओर घेर लिया / घेरकर बैठे; उपेत्य = पास आकर; अथो = फिर; ज्ञानम् = ज्ञान; पप्रच्छुः = पूछा; आदरात् = आदरपूर्वक।

हिन्दी भावार्थ जब ऋषियों को पता चला कि मय ने सूर्य से वर-रूप ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वे उसके पास आए। उन्होंने उसे घेर लिया — जिज्ञासा और सम्मान दोनों से — और आदरपूर्वक वही ज्ञान माँगा। ज्ञान की श्रृंखला यहाँ एक व्यक्ति से समुदाय की ओर मुड़ती है: जो प्राप्त हुआ, अब बाँटा जाना चाहिए। पूछना आदर के साथ है; दबाव या चुनौती नहीं।

English rendering Learning that Maya had obtained the Sun’s boon, the sages approached, gathered round him, and with reverence asked for that knowledge. Transmission becomes communal: what one received is now sought by many, courteously and deliberately.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — संवाद/परंपरा-संचरण का वर्णन। यह “गुरु-शिष्य” से “एक ज्ञाता → अनेक जिज्ञासु” का विस्तार है; गणना-सूत्र अभी नहीं, ज्ञान-प्रवाह का विन्यास है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) एक व्यक्ति के पास सटीक विधि आ जाए, तो चारों ओर से जिज्ञासु घेर लेते हैं — ऋषियों का paribabruḥ वही दृश्य है: सम्मान से घेरा, दबाव से नहीं। वे “सूर्य-लब्ध” प्रमाण सुनकर आते हैं; माँग आदरपूर्वक है, क्योंकि परंपरा में गुरु-शिष्य कड़ी बिना पूछने के नहीं खुलती। यह क्षण व्यक्तिगत साक्षात्कार को सामुदायिक transmission में बदलता है — वही मॉडल जिससे बाद की टीका-परंपराएँ (भास्कर, कमलाकर आदि) एक-दूसरे से सूत्र माँगती और जाँचती रहीं। पुस्तक में यह श्लोक याद दिलाता है: जो अध्याय १–१३ में सूत्र हैं, वे किसी एकान्त रहस्य नहीं, पूछे-और-दिए गए ज्ञान की शृंखला हैं।

14.27
स तेभ्यः प्रददौ प्रीतो ग्रहाणां चरितं महत् ।
अत्यद्भुततमं लोके रहस्यं ब्रह्मसम्मितम् ।।
sa tebhyaḥ pradadau prīto grahāṇāṃ caritaṃ mahat ।
atyadbhutatamaṃ loke rahasyaṃ brahmasammitam ।।

पदच्छेद-अन्वय (शब्दार्थ) सः = वह (मय); तेभ्यः = उन्हें (ऋषियों को); प्रददौ = दे दिया; प्रीतः = प्रसन्न होकर; ग्रहाणाम् = ग्रहों का; चरितम् = चरित / गति-व्यवहार; महत् = महान्; अति-अद्भुत-तमम् = लोक में सर्वाधिक अद्भुत; लोके = संसार में; रहस्यम् = गुह्य तत्त्व; ब्रह्म-सम्मितम् = ब्रह्म के समकक्ष / वेद-तुल्य।

हिन्दी भावार्थ प्रसन्न मय ने ऋषियों को ग्रहों का वह महान् चरित सौंप दिया। इसे लोक का अत्यन्त अद्भुत रहस्य कहा गया है — ब्रह्म के समान मापा हुआ, अर्थात् सर्वोच्च ज्ञान की कोटि में। “चरित” यहाँ केवल कथा नहीं; ग्रहों की गति, क्रम और नियम का समग्र विज्ञान है। जो साक्षात् सूर्य से आया, अब पृथ्वी पर परंपरा बनकर फैलता है।

English rendering Pleased, he gave them the great course of the planets — the world’s most wonderful secret, held equal to Brahman. “Carita” here means the full science of planetary motion, not mere narrative; the gift is the system itself.

गणित / The Mathematics गणितीय सूत्र नहीं — दार्शनिक/आख्यानिक उपसंहार (ज्ञान-दान)। संख्याएँ अनुपस्थित हैं, किंतु विषय-वस्तु स्पष्ट है: grahāṇāṃ caritam = वही planetary kinematics जिस पर अध्याय 1–2 के भगण, मन्द/शीघ्र और स्फुट-विधि टिके हैं।

हमारा डिकोड (Our Decode) इसी श्लोक का रहस्यं हमारे ग्रंथ-शीर्षक «सूर्यसिद्धान्त-रहस्य / Decoding the Sūrya-Siddhānta» का बीज है — रहस्य = छिपा हुआ, डिकोड = runnable rule में खोला हुआ। मय का “ग्रहाणां चरितं” हमारे पक्ष में pure SS Chapter-2 manda+śīghra sphuṭa (`kaal_surya_siddhanta_sphuta.py`), integer-bhagaṇa mean longitudes (`math-core.js`), और exact-equality oracle (`kaal-verification-oracle`) है। ब्रह्मसम्मितम् का आधुनिक अनुशासन: JPL/Swiss को प्रमाण-सत्ता नहीं, केवल cross-check; प्रमाण शास्त्रीय सूत्र + pinned fixture parity है।

दृष्टान्त (Illustrative Example) “ग्रहाणां चरितम्” कहिए तो कथा-सुनने जैसा लगता है; पर यहाँ carita = ग्रहों का क्रम, गति, उदय-अस्त, वक्र-मार्ग — वही जो अध्याय १ की मध्यमा और अध्याय २ की स्फुटा में संख्या बनता है। मय प्रसन्न होकर बाँटता है; रहस्य “ब्रह्म-सम्मित” इसलिए कि वह विश्व-नियम की कोटि का है, गोपनीय मंत्र की नहीं। लोक में “अत्यद्भुत” वह है जो आँख से देखा जा सके और गणना से जाँचा जा सके — बुध की तीव्रता, शनि की मंदता, चन्द्र की तिथि — सब एक ही चरित के अध्याय। यहीं कथा समाप्त और शास्त्र आरंभ: जो सूर्य से आया, अब पृथ्वी पर open transmission बनकर फैलता है, और पाठक उसी श्रृंखला का अगला श्रोता है।